आत्म विश्वास ही ईश्वर है।

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पुलस की सशस्त्र गारद साथ रहने पर सुरक्षा की निश्चिन्तता हो जाती है और निर्भय रहा जा सकता है। जिसे ईश्वर पर उसकी सर्व शक्ति सत्ता पर विश्वास है उसे किसी से भी डरना नहीं पड़ेगा। जिसे ईश्वर पर भरोसा है और जो उसे अपने भीतर हर घड़ी विद्यमान अनुभव करता है उसे आत्म-विश्वास की कमी क्यों रहेंगी? ईश्वर-विश्वास और आत्म-विश्वास एक ही आस्था के दो पहलू मात्र है। जो अपने ऊपर से-अपनी महानता और सम्भावना से आस्था से खो बैठा उसे नास्तिक के अतिरिक्त और क्या कहा जायेगा?

जो अपने ऊपर भरोसा करता है उसी पर दूसरे भी भरोसा करते हैं। जो अपने सहायता आप करता है, उसी की सहायता ईश्वर करता है। हो सकता है कि कोई निष्ठावान असफल भी रहा हो, पर जितने भी सफलता सम्पन्न हुए है उनमें से प्रत्येक आत्म-विश्वासी रहा है। सम्भव है किसी कुशल किसान की फसल मारी जाये पर जिनने भी कृषि में कमाई की है उनमें से प्रत्येक को जो जोतने और बोने का श्रम करना पड़ा है। आत्म-विश्वास ही शक्ति का स्त्रोत है। प्रगति के किसी भी क्षेत्र में आगे बढ़ सकना उसी के सहारे सम्भव हो सकता है। जो ईश्वर भाग्य का निर्माण करता है उसका दूसरा नाम आत्म-विश्वास है। वस्तुतः ईश्वर का एकमात्र दिव्य उपहार जो मनुष्य को मिलता है वह आत्म-विश्वास ही है।

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चित्तशुद्धि योगाभ्यास का प्रथम आधार

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चित्त में अनेकानेक प्रकार की वृत्तियों - संस्कारों की तरंगें समुद्री लहरों की तरह हिलोरें मारती और उसे चंचल बनाये रखती है। योग का प्रमुख कार्य चित्त की उन तमाम वृत्तियों को रोकना और उसे उसके वास्तविक स्वरूप में लाना है। चित्त का वास्तविक स्वरूप सर्वव्यापक, असीमित एवं विभु है। कार्य चित्त भिन्न-भिन्न जीवों में भिन्न-भिन्न प्रकार का होता है। यही जीवों के दुख-सुख का मूल कारण है।मनुष्य शरीर का चित्त मृत्योपरान्त यदि निम्न योनी वाले पशु शरीर में प्रवेश करता है, तब शास्त्रों के अनुसार वह सिमट कर अपेक्षाकृत छोटे रूप में हो जाता है। सिकुड़ने-फैलने वाला चित्त ही कार्य चित्त कहलाता है। कारण चित्त पुरुष जीव से संबंधित होता है तथा भले-बुरे कर्मों के अनुसार अभिव्यक्त होता है।

प्रार्थना, दान, सेवा, त्याग, बलिदान से चित्त की सीमा बढ़ती है और पाप, अनुदारता से सीमा बढ़ती है। मन की एकाग्रता, आस्था-विश्वास से भी चित्त चेतना का विस्तार होता है। योगाभ्यास से सीमा विस्तरण के साथ ही शक्तियों, दिव्य क्षमताओं का जागरण एवं अभिवर्धन होता है।

चित्त की प्रमुखता को अध्यात्मवादी और भौतिक मनोविज्ञानी समान रूप से स्वीकार करते है। अध्यात्मवादी चित्त को आदतों का-संस्कार का भांडागार मानते है। उसी में वैसा कर गुजरने की प्रेरणाएं उठती रहती है जैसी की चित्त की लालसाएं उभरती है। आदतें इतनी प्रबल होती है कि वे समूचे व्यक्तित्व पर छाई रहती है। और नशेबाजी की तरह छुड़ाये नहीं छूटती। इसीलिए साधना विज्ञान ने हट पूर्वक चित्त का परिशोधन करने के लिए कहा गया है। अनेक प्रकार के साधनात्मक प्रयोग इसी निमित्त किये जाते हैं। तपश्चर्या की आग चित्त परिमार्जित करने के लिए ही प्रज्वलित करनी पड़ती है।

मनोविज्ञानियों की मान्यताएं भी प्रत्यक्षतया भिन्न होते हुए भी वस्तुतः कुछ मिलती जुलती है। उनके अनुसार शरीर की स्वचालित क्रियाएं अचेतन चित्त के आधार पर ही चलती है। चित्त का चेतन भाग कल्पना और बुद्धि, अचेतन भाग्य-आदतें और शरीर की स्वसंचालित क्रियाएं तथा सुपर चेतन-भावनाएं एवं सूझबूझ का केंद्र-अपने-अपने काम करते रहते हे। इन्हें ही संभालने, सुधारने और प्रशिक्षित करने की आवश्यकता पड़ती है, तब ही मनुष्य की समग्र प्रगति सम्भव हो पाती है।

अचेतन चित्त की पूर्ण जानकारी भारतीय योग दार्शनिकों को आरम्भ से ही थी। फ्रायड, जुँग प्रभृति मनोवैज्ञानिकों ने बाद में उसके आधे अधूरे भाग का ही पता लगाया है। तत्ववेत्ताओं के अनुसार अचेतन मन में पूर्व जन्म के ज्ञान, भावनाएं, वासनाएं, क्रियाएं तथा उनके अंतर्गत संवेदना, प्रत्यक्षीकरण, अनुमान, शब्द, स्मृति, भ्रम, अनुभूति, विकल्प, तर्क, उद्वेग और संकल्प आदि आते है। दोषों से मुक्त चित्त में ये समस्त क्रियाएं समाप्त हो जाती है।

कठोपनिषद् अ॰ 2/3/15) के अनुसार चित्त में अनेकानेक भाव ग्रन्थियाँ अज्ञानवश उत्पन्न होती हैं, और स्थायित्व प्राप्त कर लेती है जिससे साँसारिक सुख-दुःख के चक्र का अनुभव होता रहता है। किन्तु ज्ञान से यह चक्र समाप्त हो जाता है। तब जीव को भवबन्धनों से छुटकारा मिलता है। चित्त में अनेकों जन्मों के अनुभव और संस्कार विद्यमान रहते है। मृत्योपरान्त चित्त इन्हें लेकर नवीन शरीर में चला जाता है। जिस योनि में जीव उत्पन्न होता है उसी में उपयुक्त पूर्व जन्मों के संस्कार तथा प्रवृत्तियाँ इस योनि में भी उदय हो जाती है। यदि मनुष्य अवांछनीय प्रवृत्तियों को उदय न होने देना चाहे तो उसके लिए उसकी संस्कार रूपी जड़ पर प्रहार कर उसे नष्ट करना होगा।

इस दिशा में सफलता प्राप्त करने का एक ही उपाय है-योगाभ्यास। शास्त्रों में इसका बहुत बड़ा महत्व बताया गया है। इसका कारण उसे प्रक्रिया के साथ जुड़ी हुई चित्त शुद्धि की अनिवार्य प्रक्रिया ही है।

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परमसत्ता का स्वरूप एवं अनुभूति!

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वैदिक ऋषि परमसत्ता का स्वरूप सच्चिदानन्द बताते है। यही नहीं “सर्व खल्विदं ब्रह्म” का प्रतिपादन करते हुए समूची सृष्टि को भी उसी से ओत-प्रोत हुई मानते है। फिर जीव सत्ता तो उसका अपना विशिष्ट अंश ही है। यही कारण है कि इस परम्परा के भारतीय सन्तों ने इसे “चेतन अमल सहज सुखरासी” बताया है। इस तरह का कथन ऋषियों की वाणी का सरलीकरण ही हैं, सत् चित् आनन्द से ही मिलर समूचा ढाँचा बना है। सत् अर्थात् शाश्वत अमर और अविनाशी स्वरूप। चित् अर्थात् भाव संवेदनाओं, सरसता, मृदुलता से सिक्त अन्तः करण। आशा-उत्साह, सन्तोष के पारस्परिक समन्वय पर आधारित जीवन क्रम। आत्मा का सहज स्वभाव है उत्कृर्षी स्वयं को अपने विराट् स्वरूप की प्रतिमूर्ति बनाने के लिए इन्हीं गुणों से अपने को समृद्ध करना तथा समस्त आवरणों को हटाते हुए अपने चरम लक्ष्य को प्राप्त करना। ऐसे ही परिष्कार के लिए जीव सत्ता आध्यात्मिक पुरुषार्थ करती है एवं अपने अंशी परमात्मा से मिलन कर सत् चित् आनन्द के स्वरूप को प्राप्त करती है।

सत् चित् आनन्द का पहला चरण सत् जीव सत्ता के शाश्वत व अविनाशी होने का बोध कराता है। मरणधर्मा पंचतत्वों से बनी यह काया है न कि हम स्वयं। इस काया के सभी अवयवों के बिखर जाने पर भी हमारी निज की सत्ता बनी रहती है। इस तथ्य का बोध होने से अनेकानेक भटकाव स्वयमेव नष्ट हो जाते है।

सत् की अनुभूति से यह स्पष्ट हो जाता है कि शरीर-आत्मा की विकास यात्रा हेतु वाहन मात्र है। यह वाहन दुर्बल भी हो सकता है और नष्ट भी। पर इससे यात्री पर कोई प्रभाव नहीं पड़ने वाला है। शाश्वत तो विकास पथ का यात्री आत्मा है। इसकी सबलता-बलिष्ठता ही मानव की समस्त सफलताओं का प्राण है। यह तभी सम्भव है, जब मानव अपने वर्तमान जीवन को श्रेष्ठ, उदार व उदात्त भावनाओं से युक्त करने का प्रयास करें। सत् परायण व्यक्ति आशावादी होता है। उसका जीवन क्षुद्रता के लिए न होकर महानता के लिए होता है।

जिस व्यक्ति की आस्था सत् में है, उसका विश्वास सृष्टि का संचालन करने वाली विवेक युक्त व उद्देश्य पूर्ण व्यवस्था में होता है। वह जानता है कि सृष्टि की इस व्यवस्था में किस भी तरह की अनुशासनहीनता, अनियंत्रण अदूरदर्शिता की गुँजाइश नहीं है। उसे पूर्ण रूपेण इस तथ्य का बोध रहता है कि विकास पथ की यात्रा हेतु शरीर वाहन के सदृश है। किसी न किसी स्थान पर इसे बदलना ही होगा। फिर व्यर्थ के मोह से क्या लाभ? समूची सृष्टि के मुकुटमणि होने का गौरव पाने वाले मानव के लिए अनावश्यक संग्रह व नाना प्रकार के भोगों में लीन होना शोभनीय भी नहीं है। चिन्तन की यह प्रखरता स्वयं को उत्कर्ष के सोपानों पर अग्रसर करती जाती है। इस तरह आत्मिक प्रगति के विविध सोपानों को पार करता हुआ वह अपने लक्ष्य की ओर बढ़ता जाता है।

परम् सत्ता के प्रतिरूप आत्मा की दूसरी विशेषता है चित्। उच्चस्तरीय मान्यताओं व आदर्शों से युक्त व्यक्ति ‘चित्त’ परायण कहलाता है। चित् अर्थात् स्वयं के विषय में उत्कृष्ट मान्यता अपने लक्ष्य के प्रति सजगता, चेतनता। इनको मनुष्य के विकास पथ का मानचित्र कहा जा सकता है। अन्तः करण के दिव्यत्व में आस्था, आदर्शवादी उत्कृष्टता में अटूट विश्वास, परम् सत्ता ़़़ प्राप्त करने का भाव चित् के परिष्कृत स्वरूप है।

ऐसे व्यक्ति आदर्शों की बलिवेदी पर अपने समस्त स्वार्थों का हवन कर देते है। जीवन यज्ञ की पूर्णाहुति के लिए यदि स्वयं को भी आहुति होना पड़े तो भी उन्हें तनिक भी हिचकिचाहट नहीं होती। उनकी सारी मान्यताएं चिन्तन का खाका, व्यक्तित्व का ढाँचा, इस तरह विनिर्मित होता है कि संपर्क में आया व्यक्ति भी उच्चस्तरीय जीवन की ओर उन्मुख हो जाता है। ये स्थूल रूप से भले ही अल्प समय तक रहे पर इनके क्रिया-कलाप-युग-युगान्तर तक प्रकाश संकेतक के सदृश भावी पीढ़ी को विकास का पथ दर्शाते रहते है। आध्यात्म उनके रोम-रोम से प्रस्फुटित होता रहता है। क्रियाओं में विचारणा में, प्रतिभासित होते रहते है। निःसन्देह ‘चित’ ऐसा दिव्य गुण है जो परिष्कृत स्वरूप में सामान्य व्यक्ति को महामानव बना देता है।

सच्चिदानन्द का तृतीय व अन्तिम चरण है “आनन्द”। इसके बिना परमसत्ता व जीवसत्ता की सर्वांगीण व्याख्या सम्भव नहीं। जीवात्मा का लक्ष्य ही आनन्द है। स्वयं भी यह आनन्द स्वरूप है। इसी कारण ऋषियों ने ‘रसौ वै सः’ का सूत्र प्रतिपादित किया है। इस रस को प्राप्त करने के लिए विभिन्न साधन पथों से साधक का पुरुषार्थ होता है एवं सन्तोष का आनन्द लेता है। इस रस का अन्तरंग पक्ष है-भाव संवेदनाओं से परिपूर्ण अन्तःकरण। करुणा, दया, सेवा भावना इसी रस से निःसृत होते है। जब इनका विकास सहज ढंग से होता है, तो ये व्यक्ति को भावनात्मक दृष्टि से ऊंचा उठाते हैं। ऐसे महामानव व्यष्टि के लिए नहीं समष्टि के लिए जीते हैं। जड़ पदार्थों से प्राप्त होने वाले ऐन्द्रिक सुखों की क्षणिकता का बोध होने के कारण वे शाश्वत व चैतन्य आनन्द के लिए अपनी क्षमताओं का परिपूर्ण उपयोग करते हैं। परस्पर सौहार्द्र की वृद्धि कर “आत्मवत् सर्व भूतेषु” के भाव की अनुभूति करना उनका लक्ष्य होता है।

चेतना पर मल, विक्षेप आवरण की जो विविध परतें चढ़ी है, इसी के कारण जीव-आनन्द के इस अजस्र उद्गम स्त्रोत तक नहीं पहुँच पाता। तृषा की तृप्ति नहीं हो पाती। कस्तूरी की ढूंढ़-खोज में जिस तरह हिरन अरण्य में चतुर्दिक् भटकता रहता है पर परिणाम में अरण्य रोदन के अतिरिक्त और कुछ भी हाथ नहीं लगता हैं उसी तरह मानव भी आनन्द की प्राप्ति हेतु नाना प्रकार की योजनाएं गढ़ता और परेशान होता है किन्तु उसे भटकने के सिवा कुछ हाथ नहीं लगता।

आनन्द की मिठास तो परिष्कृत चिन्तन व साधनात्मक पुरुषार्थ से पा सकना ही सम्भव है। चिन्तन में विकृति होने पर इसकी विकृति भी वासना-तृष्णा के रूप में परिलक्षित होती है। आनन्द की प्रतिच्छाया होने के कारण वासनाएं भी आकर्षक लगती हैं।

प्रतिच्छाया का आकर्षक-वास्तविक सत्ता के कारण है। छाया का भला क्या अस्तित्व? परमसत्ता चिदानन्द से परिपूर्ण है, जीव सत्ता के लिए गीताकार ने “ममैवा शो जीवरुपःजीवभूतः “सनातनः” कहा है यह भी उसी दिव्य आनन्द से लबालब है। परमसत्ता द्वारा प्रदत्त आनन्द की धरोहर भौतिक न होकर आत्मिक है, जड़ न होकर चेतन हैं। इसे शाँति-सन्तोष जैसी दिव्य संवेदनाओं के रूप में अनुभव किया जा सकता है। साधनात्मक अनुशासन के परिपालन से इनकी बाह्माभिव्यक्ति उसी तरह होती है- जैसी श्री रामकृष्ण, अरविन्द आदि के जीवन में हुई। परम् चेतना से ऐक्य की स्थिति ऐसी ही जागृति पर आती है। जीव-सत्ता भी उसी की तरह सत्-चित् आनन्दमय हो जाती है।

सत् चित् आनन्द का यह स्वरूप मात्र ऋषियों की मानसिक संकल्पना का विचारणा नहीं है। यह उनकी वह दिव्यानुभूति है जो उन्होंने अपने चिन्तन चरित्र व्यवहार को तदनुरूप बनाकर समाधि की स्थिति में प्राप्त की। इसी ऐक्य को प्राप्त कर वे सच्चिदानंदोऽहम्, का उद्घोष कर सकें। परम् सत्ता का यह स्वरूप बोध तथा इसको एकाकार होने का पथ-प्रशस्तीकरण भारतीय चिन्तन की अपनी विशेषता है, जिसको आधार बनाकर कोई भी विकास के चरमोत्कर्ष पर सहज व सुगम ढंग से पहुँचे सकता है।


विवेक और समर्पण

बुद्धिमान वह है जिसे अपने दूरवर्ती स्वार्थ का ज्ञान है और बीज बोकर फसल उगाने जैसी नीति अपनाता है। अदूरदर्शी लाभ देखते हैं। उसी को प्रधानता देते हैं और अपनी गतिविधियों के लिए उत्साह प्रदर्शित करने एवं प्रयास करने में इसी आधार पर कदम बढ़ाते है। अन्यान्य जीव जन्तुओं में इतनी ही कमी होती है, क्योंकि प्रत्यक्ष की परिधि इतनी ही छोटी है। वे लोभ को ही प्रधानता देते हैं। कुछ छोड़ने पड़े तो उसका एक ही कारण होता है-भय। जिन्हें बलिष्ठता की दृष्टि में दुर्बल पाया जाये उसी पर आक्रमण कर दौड़ना ही उनका व्यवसाय होता है। बलिष्ठों से जूझने में पराक्रम तो है। अहंकार की पूर्ति भी होती है। पर इसे वे इसलिए छोड़ देते हैं कि जोखिम उठाना स्वीकार नहीं होता। युद्ध में परास्त होने वाला या अपनी हार भाँपने वाला पशु किसी प्रकार का जान बचाने के लिए भागने का प्रयत्न करता है।

किन्तु मानवी विशेषता इससे कहीं अधिक बढ़ी-चढ़ी होती है। उसे अपने गौरव का भान होता है। इसलिए सरलतापूर्वक उठाये जाने वाले लाभ की भी अनीति की आत्म-प्रताड़ना सहने के लिए तैयार नहीं होगा। अनेकों समर्थों ने हाथ आये लाभदायक अवसरों का इसलिए परित्याग कर दिया कि उनकी मौलिक विशेषता-न्यायशीलता ने ऐसा करने से रोका, फलतः हानि सहकर भी नीति की रक्षा की।

बुद्धि से एक सीढ़ी ऊंची मनः स्थिति को विवेक कहते है। बुद्धि की सीमा इतनी ही है कि लाभ भी कमालें और दुष्परिणाम भी न भुगतें। उसकी मर्यादा इतनी ही है कि निन्दा और प्रताड़ना सामने लाने वाले स्वयं की अतिशयता तक कदम न बढ़ाये। लाभ उठाता रहे और अनीति से बचता हें। ऐसे लोगों को क्रिया-कुशल या चतुर कहते है। ऐसे लोग सम्पन्नता और सफलता तो अर्जित करते हैं, पर उसकी कीमत इस सीमा तक नहीं चुकाते कि अप्रामाणिक ठहराये जावें अपयश के भागी बनें।

विवेक सबसे ऊंची स्थिति है। उसमें व्यक्तित्व को भौतिक वातावरण से, चिन्तन क्षेत्र की बुद्धिमत्ता से ऊंचा उठाकर वहाँ ले जाता है जहाँ समूह मन का आधिपत्य है। जिस प्रकार ब्रह्मांड के अनेक घटक होने पर भी एक ब्रह्माण्डीय व्यवस्था और चेतना काम करती है, उसी प्रकार प्राणि मन से ऊंचा उठकर उसका एक सामूहिक स्वरूप भी है, जिसे परब्रह्म या परमात्मा कहते है। जिस प्रकार पृथ्वी ब्रह्माण्ड का एक छोटा घटक है उसी प्रकार व्यक्ति का ब्रह्मचेतना का एक अंग या अंश है। शासन में जिस प्रकार समस्त प्रजा जनों के स्वार्थों का समावेश होता है, उसी प्रकार ब्रह्माण्डव्यापी मनस् का लघु अंश व्यक्ति का विवेकशीलता मन भी है, जो अपनी निज की सीमा में सीमित न रहकर इस समस्त विश्व के स्वार्थ और हित का समन्वय सोचता है। जिसकी दृष्टि इस केन्द्र पर केन्द्रीभूत होती है कि प्राणी छोटी परिधि से बाहर निकल कर विराट् की सुव्यवस्था में अपना योगदान दे।

इस स्तर की चेतना में पहुँचा हुआ ‘अहम्’ ‘मैं’ न रहकर ‘हम’ हो जाता है। यह ‘हम’ इतना बड़ा होता है जिसमें चेतन ही नहीं समग्र जड़ भी समा सके। तब स्वार्थ की परिभाषा परमार्थ हो जाती है। चिन्तन समष्टिगत हो जाता है और हित साधना की परिधि में सब कुछ समा जाता है।

सबके हित में अपना हित मानने वाला वहीं सोचता ओर करता है, जिसमें समग्र स्वार्थ साधन बन पड़ता हो ऐसी स्थिति विश्वहित या विश्व सेवा ही हो सकती है।

स्वार्थ साधन में किसी का अहित भी हो सकता है। पशु जब चरते हैं तो घास को कुतरते हैं और उसकी ऊंचाई घट जाती है। परमार्थ में विश्व हित की योजना बनाने वाला भी यह सोचता है कि जिस प्रकार खेत की सिंचाई में कुछ पानी भी खर्च होता है उस प्रकार विश्व को फला-फूला बनाने के लिए ‘स्व’ का स्थूल अंश शेष रह गया है से भी खपा दिया जाये।

ताओ धर्म में विकसित व्यक्ति की उपमा फूल से दी गई है। अन्य धर्मों में भी धर्म प्रतिष्ठा के लिए विभिन्न फूलों की चर्चा है। ईसाई धर्म में गुलाब और भारतीय धर्म में कमल को अर्चना का माध्यम बताया गया है। व्यवहार में प्रेम का प्रतीक भी वही है। प्रणय-सूत्र में बंधने की स्वीकृति फूलों के आदान-प्रदान से आरम्भ होती है। परब्रह्म की पूजा में मनुष्य को फूल अपनी पंखुड़ियों को बखेर देता है। विवेकवान व्यक्ति अपना अपनों का नहीं रहता वरन् पंखुड़ियों के रूप में एक से अनेक हो जाता है। सृष्टि के आरम्भ में भी मूल सत्ता ने अपने को एक से अनेक बनाया था। असंख्यों का-सभी का-स्वार्थ जिसमें सम्मिलित है वह परमार्थ ही परब्रह्म की सर्वतोमुखी उपासना है।

विवेक वह मनःस्थिति है जिसमें न्याय औचित्य युक्त उदारता ही शेष रह जाती है। यही वह कसौटी रहती है जिसके ऊपर कसकर जीवन को खरा-खोटा उत्कृष्ट-निकृष्ट ठहराया जाता है।

श्रेष्ठता के समुच्चय का नाम है-परमात्मा। आत्मा को परमात्मा की प्राप्ति करने के लिए उसकी मनुहार नहीं करनी पड़ती वरन् अपने को तद्रूप बनाना पड़ता है। द्वैत को अद्वैत में विकसित करना पड़ता है। यह समर्पण है। इसी को तंत्र में आत्म बलि कहा गया है। ‘स्व’ मनुष्य को सबसे अधिक प्रिय होता है जब स्व और पर मिलकर एक हो जाते हैं तो आग और ईंधन जैसी स्थिति बन जाती है। पत्नी पति के लिए समर्पित होती है और पति को प्रियतमा, प्राण बल्लभ कहता है। प्राणों से भी अधिक प्रिय बनने की स्थिति पत्नी की उसी दशा में आती है जब वह द्विधा को मिटाकर एकाकार हो जाती है। भगवान के साथ भी भक्त को अपना परिवर्तन इसी रूप में करना पड़ता है। वह माँगता नहीं सिर्फ देता है।

परमात्मा के प्रति अपने को समर्पित करना किसी व्यक्ति विशेष के साथ मैत्री या घनिष्टता उत्पन्न करना नहीं वरन् यह है कि संसार में जो कुछ श्रेष्ठतम है उसके प्रति अपने को सौंप देना या उसे आत्मभूत बना लेना। जब हम विश्व व्यवस्था, विश्व चेतना की बता सोचते हैं तो सज्जनता के अतिरिक्त और कुछ रहता नहीं, प्रकाश तो शाश्वत है। उसका जहाँ जितना अभाव है वहाँ उतना ही अंधकार है।

परमात्मा सत्ता की अस्वीकृति ही पाप है। अधर्म का स्वतंत्र कोई अस्तित्व नहीं वह अनास्था का ही दूसरा नाम है। जब हम प्रकाश का वरण करते हैं, तो श्रेष्ठता के अतिरिक्त और कुछ नहीं बचता। समर्पण के उपरान्त न स्व रहता न स्वार्थ। परब्रह्म परमार्थ के रूप में ही हमारे कण कण में समा जाता है और हम वैसे ही बन जाते हैं जैसा हमारा आराध्य है।


छाया को पकड़ने दौड़ा (Kahani)

एक आदमी छाया को पकड़ने दौड़ा जा रहा है। सूरज पीछे होने के कारण छाया भी पकड़ने वाले के आगे ही आती जा रही थी।

एक बुद्धिमान ने उससे ठहरने को कहा और समझाया प्रकाश की दिशा में मुँह करके चलो। छाया तुम्हारे पीछे-पीछे चलने लगेगी। ऐसा ही हुआ भी।

हम माया के पीछे दौड़ते है। भगवान की ओर पीठ कर लेते है तो सफलता दूर भागती जाती है पर जब हम अपना रवैया बदल लेते है। भगवान की ओर मुँह करके चलते हैं तो आदर्शवादी के पीछे-पीछे सफलता भागती चली आती है।


सर्वांगीण विकास का साधन व्यावहारिक वेदान्त

भारतीय दर्शनों में वेदान्त का अपना विशिष्ट स्थान है। प्रायः सभी तत्व वेत्ताओं ने चिन्तन के क्षेत्र में इसे शीर्ष स्थानीय माना है। विचारकों की यह मान्यता अकारण हो, ऐसा नहीं हैं। सहस्राब्दियों पूर्व ऋषि कहे जाने वाले विचारकों ने विचारों के विशाल क्षीर सागर का मन्थन करके जो नवनीत निस्सृत किया वही वेदांत का रूप संकलित है। इन मनीषियों द्वारा प्रतिपादित सूत्र सिद्धान्त काल की दृष्टि से भले ही चिर-पुरातन हो गए हैं, पर उपादेयता की दृष्टि से सर्वथा नवीन है। जीवन के विकास हेतु आरोहण का पथ आज भी उसी तरह प्रशस्त करते है, जैसा पूर्व में किया था।

इन विचारों ने पूर्व व पश्चिम के अनेकानेक विचारकों-मनीषियों-दार्शनिकों-सन्तों को समान रूप से प्रभावित किया है। यह प्रभाव मात्र विचारणा के स्तर पर रहा हो, ऐसा नहीं है। जीवन की दिशा, कार्यपद्धति सहित आमूल-चूल परिवर्तन अभिनव रूप से उनका जीवन गठित हो सका। पूर्वी विचारकों में बोधायन, उपवर्ष, गुहदेव, कपर्दी, भारुचि, भर्तृमित्र, टंक, ब्रह्मदत्त, सुन्दर पाण्ड्य, गौडपाद आदि आचार्य शंकर के पूर्ववर्ती चिन्तकों से लेकर सुरश्वराचार्या पद्यपादाचार्य, वाचस्पति मिश्र, सर्वज्ञात्म मुनि, अद्वैतानन्द, बोधेन्द्र, विद्यारण्य, धर्मराजाध्वरीन्द्र, आदि पश्चाद्वर्ती आचार्यों तक सभी ने अपने-अपने ग्रंथों में इसके स्वरूप में महत्व को स्वीकारा तथा मानव व मानवता का पथ-प्रशस्त करने हेतु इसकी उपयोगिता-आवश्यकता पर बल दिया है।

वेदान्तरूपी सूर्य की किरणों से मात्र पूर्वी जगत आलोकित हुआ हो, ऐसा नहीं। इसकी प्रखरता व आलोक से पश्चिमी विचारकों के मन-मानस आलोकित हुए, और उनने दिशा ग्रहण की। प्रख्यात विचारक टाँमलिन ने अपने ग्रन्थ “द ग्रेट फिलासफर्स” के पृष्ठ 217 पर वेदान्त के पश्चिम जगत पर प्रभाव का उल्लेख करते हुए बताया है कि शाँकर दर्शन की दिशा लगभग वहीं थी जिसको उत्तरकाल में जाकर जर्मन दार्शनिक काण्ट ने अपनाया।

उपर्युक्त कथन के आधार पर यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि पाश्चात्य आलोचक विद्वान इसके प्रभाव को सहर्ष स्वीकारते है। वैसे तो अनेकों विचारक इसके ऋणी है। फिर भी देकार्त, स्पिनोजा, लाइब्निज, बर्कल, काण्ट फिक्ते, शेलिंग, हेगल व शोपेनहार के दार्शनिक सिद्धान्तों में वेदान्त के स्वर की गूँज स्पष्ट सुनाई देती है।

फ्राँसीसी दार्शनिक व गणितज्ञ रेनेदेकार्त ने भारतीय चिन्तन के अनुरूप ही ईश्वर को सृष्टि का नियामक उद्भवकर्ता समष्टि में उसकी उपस्थिति को स्वीकार किया है। श्री बलदेव उपाध्याय ने अपने ग्रन्थ “भारतीय दर्शन” में इसकी तुलना वाचस्पति मिश्र से की है। हालैण्ड के समृद्ध परिवार में जन्मे वारुच दे स्पिनोजा ने वेदान्त के ब्रह्म को सबर्स्टेशिया के रूप में स्वीकारा है। अन्तर मात्र शब्दों का है न कि भावों का। वेदान्त की ही तरह इसने भी इस सत्ता को प्द म मेज दक चमत म ब्वदबपचपजनत अर्थात् “स्वतंत्र तथा स्वतः सिद्ध माना है। शंकर वेदान्त के सदृश उक्त तत्व असीम, अविभाज्य, अद्वैत, स्वतंत्र तथा आनन्द रूप है। इसी कारण मैक्समूलर ने “थ्री लेर्क्चस इन वेदान्त फिलासॉफी” के पृष्ठ 123 पर दोनों के तुलनात्मक अध्ययन तथा गहन चिन्तन के उपरान्त घोषित किया कि उपनिषदों और शंकराचार्य ने जिस ब्रह्म का प्रतिपादन किया है, वह स्पष्ट रूप से वैसा ही है, जैसा की स्पिनोजा का सबर्स्टेशिया।

गोट फ्रीड, विल्हेम लाइब्निज के प्रधान दार्शनिक सिद्धान्त मोनेडिज्म पर भी वेदान्तिक द्वैतवाद का प्रभाव है। उसके ग्रन्थ “दमोनेडालाजी” तथा प्रिन्सीपल ऑफ नेचर एण्ड ग्रेस का अध्ययन करने पर इसकी स्पष्टता और भी अधिक हो जाती है।

वेदान्तिक प्रतिपादन “माया” की मान्यता को इसने भी “मैटेरिया प्राइभा” के रूप में स्वीकारा है। उसने अनुसार यह मैटेरिया प्राइभा ही है जो आत्म कणों का ऐक्य ईश्वर से नहीं होने देती। लाइब्निज की ही तरह आयरलैण्ड के प्रख्यात दार्शनिक जार्ज वर्कल के अध्यात्मवादी सिद्धान्त पर वेदान्त का प्रभाव स्पष्ट गोचर होता है। उनके अनुसार विज्ञान के अतिरिक्त जगत में बाह्य वस्तुओं की सत्ता नहीं है। इसका यह कथन प्रश्नोपनिषद् का भाष्य करते आचार्य शंकर के उस के कथन की प्रतिध्वनि ही है, जिसमें उन्होंने कहा है “जैसा-जैसा जो पदार्थ जाना जाता है वैसा-वैसा ही जाना हुआ होने के कारण उस पदार्थ का स्वरूप होता है।” इस प्रकार दोनों ही ज्ञान की सत्यता पर बल देते है। बर्कल का उक्त मत वेदान्त के दृष्टि सृष्टिवाद से भी मिलता-जुलता है। इस सिद्धान्त का समर्थन वेदान्त सिद्धान्त मुक्तावलीकार प्रकाशानन्द ने भी किया है। जिस में उन्होंने स्पष्ट किया है कि सकल जगत की सत्ता आत्मा में ही है।

सुविख्यात जर्मन दार्शनिक काण्ट के प्रतिपादनों में भी वेदान्तिक सिद्धान्तों की स्वर लहरियां गुंजायमान होती हैं। उनने परम सत्ता को “दिंगएनसिश” के रूप में माना है। जिसकी व्याख्या उनके तीन प्रधान ग्रन्थों-क्रिटीक ऑफ प्योर रीजन, क्रिटीक ऑफ पे्रक्टिकल रीजन एवं क्रिटीक ऑफ जजमेण्ट में है। काण्ट शंकर मत की तरह ईश्वर को जगत का आधार मानते ळें आत्मका के शुद्ध-आत्म स्वरूप ज्ञान की स्थिति के बारे में भी इनका मत शंकर के समान ही है। ई॰ केथर्ड ने “द फिलासफी आफ काण्ट” में स्पष्ट किया है कि काण्ट ने दो प्रकार की सत्ताएं मानी हैं। एक व्यावहारिक, सत्ता और दूसरी वस्तु सारात्मक सत्ता। यह दो प्रकार की सत्ताएं मानने में भी आचार्य शंकर के स्वर की गूँज सुनाई देती है। प्रो॰ रानाडे ने विशद अध्ययन के उपरान्त अपने विश्व प्रसिद्ध अद्वितीय ग्रन्थ “क्रन्सक्ट्रक्टिव सर्वे आफ उपनिषदिकफिलासफी” में स्पष्ट किया है कि काण्ट द्वारा स्वीकृत उक्त दोनों सत्ताएं भी विचार की दृष्टि से आचार्य शंकर द्वारा उपदिष्ट व्यावहारिक एवं परमार्थिक सत्ताएं है।

वेदान्तिक चिन्तन का प्रभाव मात्र विचारणा के स्तर पर ही हो, ऐसा नहीं है। इसकी शोभा ग्रंथालयों, मनीषियों के तर्क-वितर्क वाद-विवाद तक ही सीमित न होकर जन सामान्य तक है। इसकी सुरभि सर्वत्र समान रूप से फैली हुई है। यह व्यक्ति, जाति, देश, धर्म, सम्प्रदाय आदि किसी भी तरह की अर्गलाओं, श्रृंखलाओं से आबद्ध नहीं है। इसमें प्रतिपादित तत्व सर्वथा सार्वभौम व सर्वग्राही है। स्वामी रामतीर्थ के अनुसार “ वेदान्त के तथ्यों को ग्रहण कर आत्मसात् कर लो, इन्हें स्वरूप में ढाल लों, फिर तुम कोई भी हो, किसी धर्म के हो, विकास के उत्कर्ष की ओर बढ़ते जाओगे “। वेदान्त व्यक्ति केन्द्रित नहीं अपितु व्यक्ति और समाज दोनों की ही उन्नति का साधन है। यही नहीं महात्मा गाँधी ने इसके साधन पक्ष के तत्व सत्य-अहिंसा का आश्रम लेकर देश को दासता से मुक्ति दिलाई।

विश्व के प्रमुख विचारकों के अनुसार मानव समाज की विविध समस्याओं का समाधान चाहें वे आर्थिक हों या रंगभेद की अथवा साम्प्रदायिक कट्टरता की, वेदान्त के व्यावहारिक प्रयोग द्वारा ही सम्भव है। वेदान्त के व्यावहारिक प्रयोग द्वारा ही सम्भव है। वेदान्त काल और देश की सीमाओं को तोड़कर मानव मात्र ही नहीं प्राणि मात्र में समत्व और एकत्व की बुद्धि जागृत करता है। इस दृष्टि से वेदान्त जीवित और व्यावहारिक है। मानव और मानवता के शाश्वत कल्याण का यही सुगम व सरल राजमार्ग हैं, जिस पर चल पड़ने के लिए ऋषियों की गुरु गंभीर वाणी “उतिष्ठजागृत” का संदेश सुनाकर चल पड़ने को प्रेरित कर रहीं है। इस पथ पर आरुढ होकर स्वयं का सर्वांगीण विकास करने के साथ मानव जाति के समक्ष एक ऐसे प्रकाश संकेतक-मार्ग दर्शक के रूप में प्रतिष्ठित हुआ जा सकता है।, जैसे कि स्वामी विवेकानन्द, रामतीर्थ हुए थे। बिना एक पल की देर लगाए- इस ओर बढ़ चलने का उत्साह सभी को जागृत करना चाहिए।


नजरें जो बदली, तो नजारे बदल गये

कौन व्यक्ति सुखी है? कौन दुःखी? इसका अनुमान उसकी परिस्थितियों को देखकर लगाना गलत है। आमतौर से हमारे पास जिन वस्तुओं का अभाव है, उन्हें दूसरों के पास देख कर हम यह मान बैठते हैं कि यह सुखी है। इसी प्रकार अपने जैसे अभावग्रस्तों को देख कर यह सोचा जाता है कि यह दुःखी होगा। किन्तु यह मापदण्ड सही नहीं है। हर व्यक्ति अपने-अपने ढंग से सोचता है। किस वस्तु का अभाव कितना खलता है और किस वस्तु के होने से कौन व्यक्ति कितना सुखी है, इसका अनुमान लगाना एक जैसा नहीं हो सकता। परिस्थितियों के संबंध में भी यही बात है। किन परिस्थितियों में कौन कितना सुखी या कितना दुःखी होगा, इसका मापदण्ड भी एक जैसा नहीं हो सकता।

हम अपने विचारों से यह सोचते हैं कि जिनके पास पैसा हैं, रूप हैं, उच्च पद हैं, संतान हैं, वह सुखी होना चाहिए। किन्तु जिनके पास वे वस्तुएं हैं, उनकी मनःस्थिति देखकर कई बार अपनी कल्पना से विपरीत निष्कर्ष भी निकलते देख गया है। जिन वस्तुओं का हमें अभाव है, उनकी बहुलता जिनके पास दीखती है, उन्हें सुखी मानते है। यह हमारी अपनी मान्यता है। कई बार इससे ठीक विपरीत भी होता हैं। जिनके पास पैसा है, वे संतान के अभाव में अपने को दुःख मानते हैं और धन का होना उनकी दृष्टि में कुछ नहीं मान्य रखता। जो वस्तु जिसके पास है, उसे वह सामान्य मानता हैं उसका होना कुछ मानी नहीं रखता। बात अभाव की सदा सामने रहती है।

जिनकी अनेक संतानें हैं, उन्हें धन की अपेक्षा है। भले ही बच्चे कम होते, पर धन तो होता, जिनसे उनका भली प्रकार लालन-पालन हो पाता। तीसरा व्यक्ति वह है, जिनके पास धन-संतान दोनों हैं, किन्तु पद में आगे बढ़ गया। इसलिए वह शत्रुवत् प्रतीत होता हैं। ईर्ष्या रहती है कि मेरा अधिकार छीनकर वह आगे बढ़ गया। इसने अनीति का आश्रय लिया है। यदि वह आड ने आता, तो आज अपना दर्जा ऊंचा होता। जिसे स्वयं रूप प्राप्त है, उसकी पत्नी कुरूप है। हर किसी को कोई-न-कोई कुरूपता हैं, कुछ-न-कुछ प्रतिकूलता है। सदा वह अभाव ही ध्यान में रहता है। भाग्य को दोष देने के लिए कुछ-न-कुछ प्रतिकूलता सामने रहती है। थोड़े से नम्बर कम आने के कारण फेल हो जाने के कारण कई विद्यार्थी इतने दुःखी होते हैं कि रेल की पटरी के आगे बैठ कर प्राण खो बैठते हैं। सास-बहु में कहना-सुनना हो जाने पर कई बहुएं आत्मघात कर लेती हैं। दहेज कम आने का प्रसंग बन जाता है, पकड़–धकड़ होती है, मुकदमा चलता है, जेल होती है और अच्छा खासा घर बरबाद हो जाता है। वस्तुतः प्रसंग वैसा था नहीं। काम-काज इस या उस तरह करने की बात पर मात्र कड़वे वचन मुँह से निकल गये थे। यदि थोड़ी-सी सहनशीलता होती तो इतनी बड़ी दुर्घटना सहज ही टल सकती थी। किन्तु दूसरी ओर यह भी सच हो सकता है कि सास अपने कड़वे वचन व व्यवहार में बर्बरता को सामान्य क्रम मानकर चलती है, जिससे भावनात्मक दबाव बहू पर अत्यधिक हो जाये।

प्रसन्नता कितनी, किसमें है, यह कल्पना भर का विषय है। जिसके पास लाख रुपये की पूँजी है, उसे उतने से संतोष नहीं, पड़ोसी की तरह अपने पास भी दस लाख की पूँजी होती। तब काम चलता। जबकि दूसरे पड़ोसी को दस हजार से ही संतोष है और भगवान को धन्यवाद देता है कि चैन की रोटी मिल जाती है, किसी से उधार नहीं लेना पड़ता, किसी का कर्जा देना नहीं है। एक को खुशियाँ मनाते इसलिए देखा जाता है कि उससे उस विरोध की भैंस मर गई, जिसने उस पर मुकदमा चलाया था। ईर्ष्यालु व्यक्ति के लिए खुशी मनाने के लिए इतना ही बहुत है कि उसके प्रतिद्वन्द्वी को कोई हानि पहुँच गई। एक की खुशी के लिए पोता जन्मे का समाचार ही बहुत बड़ी बात है। भले ही बड़ा होने पर वह कुपात्र निकले और दुर्व्यसनों से संचित सम्पदा बरबाद कर दे।

जो वस्तु जिसे प्राप्त है उसकी दृष्टि में उसका महत्व चला जाता है। सोचता है इससे अधिक मूल्य की संपदा उसे प्राप्त हुई होती, तो अच्छा होता। जो उपलब्ध है वह कम मालूम पड़ता है। जबकि अनेकों व्यक्ति उसकी स्थिति के लिए भी तरसते है। अभाव की पूर्ति के लिए जो ललक उठती है, उसकी बेचैनी ही एक प्रकार से सुख की परिभाषा हैं जैसे ही उसकी पूर्ति हुई कि उससे बड़ी वस्तु पाने की बेचैनी उत्पन्न हो जाती है। जो हस्तगत हुआ था, वह स्वल्प प्रतीत होने लगता है। यह मनोवैज्ञानिक गोरखधंधा ऐसा है जो हर व्यक्ति को अभावग्रस्त बनाये रखता है। यदि इस मानसिक कुचक्र से छूटा जा सके और इस प्रकार सोचा जा सके कि हमें जो प्राप्त है, उसके लिए भी हजारों-लाखों तरसते हैं, तो स्वल्प साधन वाले को भी संतोष की साँस लेने का अवसर मिल सकता है। संतोष ही सुख है। अपनी अपेक्षा गई-गुजरी स्थिति वालों पर दृष्टि डाल कर यह सोचा जा सके की भगवान ने हमें हजारों-लाखों से अच्छा बनाया हैं, तो फिर कोई भी अपने को दरिद्र अनुभव न करेगा।

गीता ने कर्मयोग की शिक्षा दी है और दुःख का केन्द्र वस्तुओं से हटा कर अपने पुरुषार्थ पर केन्द्रित किया है। किस निमित्त हमने कितना पुरुषार्थ किया? वह सामर्थ्य भर था कि नहीं- इस पर अपनी प्रसन्नता केन्द्रित करने पर हर व्यक्ति अपने को सुखी अनुभव कर सकता है। कर्म अपने हाथ में है। कितनी कुशलता-कितनी तत्परता प्रसन्नतापूर्वक काम किया गया। इस बात पर अपनी खुशी को केन्द्रित किया गया, इस प्रश्न को अपने से पूछते रहने पर काम अधिक होता है, अच्छा होता है और उसका स्तर भी ऊंचा रहता है। यह कर्म-कौशल ही प्रधानता का केन्द्र होना चाहिए।

वस्तुओं की मात्रा बढ़ाना अपने हाथ में नहीं। अनेक परिस्थितियाँ ऐसी है जो सफलता की मात्रा में सहायक और बाधक होती है। जो हमने चाहा है, वह उतना ही, या वैसा ही मिल जाय, यह आवश्यक नहीं। हाँ, इतना संभव है कि जो उपलब्ध हुआ है, उसका स्तर ऊंचा बनावे। कुरूप धर्मपत्नी को सुन्दर नहीं बनाया जा सकता किन्तु प्रयत्न करके उसे सुयोग्य, सुशिक्षित एवं सुलक्षणी बनाया जा सकता है यह अपने कर्म कौशल पर निर्भर है। यदि वह किया गया हो, तो सुन्दर पत्नी प्राप्त करने की अपेक्षा वह अधिक आनन्ददायक हो सकती है।

अपने से अधिक सुविधा सम्पन्नों के साथ अपने तुलना करने पर सदा अभाव ही अनुभव होगा, पर यदि कम सुविधा वालों के साथ अपनी स्थिति की तुलना की जाय तो प्रतीत होगा कि भगवान ने बड़ी कृपा की है और सम्पन्नता का एक बड़ा भाग प्रदान किया है। सुखी और दुःखी होना एक मानसिक जाल-जंजाल है, जिसे हम स्वयं बुनते है। सोचने का तरीका सही करने भर की देर है किस हर व्यक्ति कम वस्तुएं रहते हुए भी अपने आप को प्रसन्नता भरी परिस्थितियों में अनुभव कर सकता है।


तप को समाप्त कर दिया (Kahani)

एक तपस्वी की उग्र तपस्या चल रही थी। इन्द्र को भय हुआ कि कही उसका इंद्रासन न हिल जाये। तप भंग करने के लिए उसने डरावने दैत्य और लुभाने वाली अप्सराएं भेजीं। पर तपस्वी अपने मार्ग से डिगा नहीं।

एक स्वर्ग प्रहरी ने कहा मैं उसकी तपस्या डिगा सकता हूँ। उसे प्रोत्साहन मिला। प्रहरी ने स्वाद रूप धरा और इन्द्रियों के मुख पर जा बैठा। सभी इन्द्रियाँ उत्तेजित होने लगीं, उसे स्वाद का चस्का लगा। जीभ तरह-तरह के व्यंजनों के लिए ललचाने लगी तो उसका साथ दूसरी इंद्रियां भी देने लगी। तपस्वी चटोरा बन गया। स्वाद ने उसके संचित तप को समाप्त कर दिया। इन्द्र की इच्छा पूरी हो गई।


धर्म परायण को क्रोधोन्माद से बचना चाहिए!

धर्म धारणा का अंतिम और दसवां लक्षण है- अक्रोध। अक्रोध अर्थात् क्रोध न करना। आवेश में न आना। अपना मानसिक संतुलन हर स्थिति में हर कीमत पर बनाये रहना।

नौवाँ लक्षण सत्य हैं सत्य के बाद सामान्यतया अहिंसा को स्मरण किया जाता है। पर शब्द इतना जंजाल भरा और उलझा हुआ है कि उसकी व्याख्या सकना सचमुच बड़ी टेड़ी खीर है। यों जैन और बौद्ध सम्प्रदाय अहिंसावादी। रामानन्द, कृष्ण भक्त वैष्णव भी इसे वैसी ही मान्यता देते है। इतने पर भी माँसाहारी वर्ग को छोड़ देने का शाकाहारियों के लिए भी काफी कठिन पड़ता है। जुएं, खटमल, ईंधन के जलने और पैरों तले कुचलने वाले, पशुओं के शरीर में चिपके रहने वाले कीड़े, मक्खी, मच्छर बर्र, बिच्छू, सर्प आदि अनेकों कृमि कीटक ऐसे हैं जिनकी जान बूझकर न सही अनजाने या उपेक्षा बरतने के कारण मृत्यु होती रहती है। पानी और हवा के साथ शरीर में पहुँचने वाले कृमि भी मरते ही है। बीमार पड़ने पर रोग कीटाणुओं को मारने वाली दवाओं का प्रयोग कैसे छोड़ा जाये? अनाज को धूप में सुखाने और पीसने से भी छोटी बड़ी हिंसा होती है। कृषि की सिंचाई में चींटी दीमकों के बिलों में पानी भरता है और उनकी मृत्यु का कारण वह कृषि बनती है जो अपना जीवनाधार है। अब तो पौधों में भी जीवन माना जाने लगा है ऐसी दशा में शाकाहारी तक में जीव हिंसा की जा सकती है। फिनायल, डी.डी.टी., कुओं में डालने की दवा जैसे सामान्य प्रचलनों को रोक सकना बहुत ही कठिन है। माँसाहार रुक सके और पशु पक्षियों जैसे बड़े आकार के जीवधारियों के प्राण बच सकें तो भी आधी लड़ाई जीत ली गई समझी जा सकती है। शत्रु के देश पर हमला करने पर आत्म रक्षा के लिए प्रतिरोध करना ही पड़ेगा और उस कार्य में हिंसा होगी ही।

सर्वथा अहिंसक बनकर रहना किन्हीं योगी तपस्वियों के लिए अपवाद रूप में ही संभव हो सकता है। सामान्यजनों के लिए तो इतनी अहिंसा बन पड़ती है कि क्रूरता की सीमा तक न पहुँचें। माँसाहार न करें। सभी में स्नेह सद्भाव रखें और अनीतिपूर्वक शोषण करने से बचें। सेना और पुलिस द्वारा दुष्टों से निपटने के लिए जो हिंसा गोली चलाई जाती है। यह सब कैसे बंद हो? इन सब बातों को ध्यान में रखते हुए भगवान मनु ने सत्य के साथ अहिंसा का नहीं वरन् अक्रोध का युग्म बनाया और उससे भी अहिंसा के तत्व ज्ञान की आँशिक पूर्ति होती देखी है।

प्रतिपक्षी, विरोधी, आक्रामक, चोरी हानि पहुँचाने वालों के कारण जो आक्रोश उत्पन्न होता है उसे मर्यादा में रखने की प्रक्रिया शास्त्रकारों ने “मन्यु” बताई है और भगवान से ऋचाकारों ने प्रार्थना की है कि-हे भगवान! आप मन्यु हैं। हम भी मन्यु दीजिए। पंचवटी क्षेत्र में जब असुरों द्वारा नष्ट किये हुए लोगों की अस्थि समूह देखे तो राम ने भुजा उठाकर प्रण किया कि इस पृथ्वी को निशाचर विहीन किया जायगा और सचमुच उन्होंने वैसा किया भी। सीता अपहरण के प्रत्युत्तर में ही जिन हनुमान ने पर्वत उठाया और समुद्र लाँघा था वे सीताजी को भी पीठ पर बाँध कर वापस ला सकते थे पर वास्तविकता दूसरी ही थी। असुरों का विनाश ही किसी बहाने करना था ताकि अत्याचारों की श्रृंखला को विराम दिया जा सकें।

इस समूचे संयोजन में राम ने समुचित योजनाएं बनाई और रणनीति अपनाई किन्तु किसी अवसर पर अपना संतुलन न खोया, आवेशग्रस्त न हुए। कारण कि जिस पर क्रोध किया जाता है उसे बदला लेने के निमित्त हानि पहुँचाने की तुलना में अपना ही अहित हो जाते है। आधे घंटे के क्रोध में उतना खून सूख जाता है जितना कि चौबीस घंटे के तेज बुखार में।

मशीनें चलाने वाली मोटर जब गरम हो जाती है तो ये काम करना बंद कर देती है या अपनी वायरिंग जला देती है। तेजाब जहाँ भी फैलता है वहाँ वस्तुएं ही नहीं जमीन तक जला देता है। माचिस औरों को जलाने से पूर्व अपने आपको समाप्त कर लेती है। क्रोध भी इसी स्तर की आग है जो जिसके विरुद्ध भड़की है उसे हानि पहुँचाने से पूर्व अपने आप को जला लेती है। उत्तेजित मस्तक स्थिति पागलों जैसी हो जाती है। सूझ नहीं पड़ता कि क्या करना चाहिए, क्या नहीं? नशे की उत्तेजना में आदमी कुछ भी कर सकता है। कोई काम बिगड़ सकता है। किसी के प्रति भी असभ्य और अनुचित व्यवहार कर सकता है। यहाँ तक कि दूसरों का सिर फोड़ सकता है या अपनी आत्महत्या कर सकता है। ऐसी विक्षिप्त स्थिति में बिगड़े काम को बनाना और उलझन को सुलझाना तो नितान्त कठिन हैं शराबी के लड़खड़ाते हुए-डगमगाते हुए-कदम उठते हैं, उसी प्रकार आवेशग्रस्त व्यक्ति जो सोचता है जो करता है वह तीन चौथाई गलत होता है। जिसके कारण आवेश आया था उस स्थिति को सुधारना या व्यक्ति को बदलना तो दूर अपने आप को ही विभिन्न स्थिति में डाल लेने वाला व्यक्ति उस बचकानेपन के कारण संपर्क क्षेत्र में अपनी इज्जत बुरी तरह गिरा लेता है। फलतः जो उसके समर्थक एवं सहयोगी थे वे भी विरोधी बन जाते है।

बड़ी-बड़ी पेचीदा और उलझी हुई गुत्थियों को जो सुलझा सकें हैं, वे शान्त चित्त और हँसते मुस्कराते रहे है। अनुपयुक्त परिस्थिति के हल करने का सहज तरीका यह है- उस घटना को महत्व दिया जाये और शान्त चित्त धैर्य पूर्वक उपाय सोच कर और उपयुक्त कदम उठाया जायं। विरोधी से गुत्थम–गुत्था करने की अपेक्षा गलतफहमी निकालने और समाधान का मार्ग खोजने में काम बन सकता है।

विग्रह के कारण जो नुकसान हुआ था उसे दूना चौगुना कर लेने का यही तरीका है कि क्रोध में भरकर अपनी शान्ति और निद्रा गंवा दी जाये। इसकी अपेक्षा उस पहली हानि को सह कर संतोष कर लिया गया होता तो अधिक उत्तम होता।

डॉक्टर रोगी का ऑपरेशन करता है तो चाकू चलाने के पीछे उसकी कोई दुर्भावना नहीं होती। इसी प्रकार किसी उद्दंड को रास्ते पर लाना है तो उसे नीचा दिखाने की अपेक्षा यही उत्तम है कि समझाने का रास्ता खोजा जाये। वह न निकलता हो दण्ड नीति का आश्रय लेना हो तो भी कम से कम उस हानि से अपने आप को बचा लेना चाहिए जो आवेशग्रस्त होने पर सामने वाले का नहीं उलट कर अपना अहित अधिक मात्रा में करती।

उपाय करना, रास्ता खोजना एक बात है और लड़−झगड़ कर बात का बतंगड़ बना लेना दूसरी। शत्रु से भी हंसते हुए बोला जा सकता है और अपनी सज्जनता को सुरक्षित रखा जा सकता है। ताली दोनों हाथों से बजती है, अकेला एक हाथ थपथपाने की कोशिश करता रहे तो भी ताली बजने जैसा माहौल नहीं बनता। ईंधन अकेला न मिलने पर आग स्वयं ही बुझ जाती है। मौन धारण कर लिया जाये तो कटुवचन कहने वाला भी थम कर चुप हो जाता है।

अनावश्यक नहीं कि हर कोई आपकी बात माने ही। स्वभाव भिन्न-भिन्न है और सोचने के तरीके भी अलग-अलग। ऐसी दशा में जिसे जिस हद तक अनुकूल बनाया जा सके उतने में ही संतोष करना चाहिए। उपेक्षा भी तीखा हथियार है। जो टेढ़ा चलता है, समझ की बात नहीं मानता उसके प्रति उपेक्षा की नीति अपनाना और एक प्रकार से असहयोग जैसा रुख बना लेना। उसकी अपेक्षा अधिक बुद्धिमत्ता पूर्ण यह है, जिसमें अपना दिमाग गरम करके दूसरों की दृष्टि में अपने को भी असज्जन सिद्ध न किया जाये।


सब से बड़ा आश्चर्य (Kahani)

युधिष्ठिर ने महर्षि व्यास से पूछा-संसार में सबसे बड़ा आश्चर्य क्या हैं?

उन्होंने उत्तर दिया-मनुष्य दूसरों को आये दिन मरता देखता है और अपने बारे में अजर अमर होने जैसी दीर्घकालिक योजना बनाता रहता है यही सब से बड़ा आश्चर्य है।


सुषुम्नैव परंध्यानं सुषुम्नैव परागतिः!

कुण्डलिनी साधना के प्रसंग में सुषुम्ना का अत्यन्त महत्वपूर्ण स्थान आता है। योगशास्त्रों में इसकी महिमा और शक्ति का विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है। साथ ही इड़ा और पिंगला के साथ इसके समन्वय की भी सुविस्तृत चर्चा की गई है। कुण्डलिनी शक्ति के जागरण में इन तीनों के स्वरूप एवं उपयोग को समझ लेना आवश्यक है।

मेरुदण्ड-स्पाइनल कालम को प्राण प्रवाह का राजमार्ग-महामार्ग माना गया है। धरती से स्वर्ग तक पहुँचने का देवयान मार्ग-सुषुम्ना अपनी सहयोगी नाड़ियों इड़ा-पिंगला के साथ इसी में अवस्थित होती है। दर्शनोपनिषद् में इसकी स्थिति का वर्णन करते हुए कहा गया है कि-

पृष्ठम ध्यस्थिते नाम्ना वीणादण्डेन सुव्रत। सहमस्तकपर्यन्तं सुषुम्ना सुप्रतिष्ठिता॥

अर्थात् पीठ के पीछे भाग में वीणा दंड में मस्तक पर्यन्त सुषुम्ना का विस्तार है।

देहस्योपाधि रुपा सा सुषुम्ना मध्यरुपिणी। दिव्यमार्गमिदं प्रोक्तममृतानंद कारकम्॥

-श्ि संहिता संहिता अर्थात् श्रीर के मध्य में सुषुम्ना अवस्थित है। यही देवमार्ग है। इसी के मध्य में अमृत आनन्द की प्राप्ति होती है।

सुषुम्ना साधन का महात्म्य बताते हुए तंत्रसार में कहा गया है :-

सुषुम्नैव परं तीर्थम् सुषुम्नैव परोजपः। सुषुम्नैव परं ध्यानं सुषुम्नैव परा गतिः॥

अर्थात् सुषुम्ना साधना से बड़ा तीर्थ, जप, ध्यान आदि और कुछ नहीं है। सुषुम्ना ही परमगति है।

दर्शनोपनिषद् में आगे कहा गया है :-

‘अश्वमेध सहस्त्राणि वाजपेय शतानि च।’

अर्थात् सुषुम्ना साधना का फल अश्वमेधों, वाजपेय यज्ञों से अधिक है।

इस तरह सुषुम्ना के महत्व का वर्णन अनेक ग्रन्थों में किया गया है। उनमें उसके क्षमता एवं गरिमा का आभास मिलता है। शांडिल्योपनिषद् में उसे ‘विश्वधारिणी’ कहा गया है। योगशिखोपनिषद् में उसे ‘समस्त दूषणों से रहित ब्रह्मरूप’ बताया गया है। अद्वैतोपनिषद् में उसे ‘प्राणियों की अन्तरात्मा’ कहा है। दर्शनोपनिषद्, षट्चक्र निरूपण आदि में सुषुम्ना के स्वरूप और कार्य का विस्तृत वर्णन है। षट्चक्रों की उसी के अंतर्गत मानी गई है। शिव संहिता के अनुसार सुषुम्ना के ऊर्ध्व शीर्ष पर सहस्रार चक्र है और अधोभाग में मूलाधार चक्र। मूलाधार में ब्रह्मयोनि है जहाँ काम बीज का स्थान है। यहाँ एक ज्योति जलती है जिसे ज्वलन्त रखने के लिए सहस्रार में अमृत स्नेह टपकता है।

दर्शनोपनिषद् एवं अन्य उपनिषदों के वर्णन से सिद्ध होता है कि मेरुदण्ड रज्जु स्पाइनल कार्ड ही सुषुम्ना है। दर्शनोपनिषद् 4/5-10 में सुषुम्ना को ही ब्रह्मनाड़ी कहा गया है और उसे रीढ़ की हड्डियों के छिद्र में स्थित बताया गया है। यही मूलाधार से सहस्रार तक फैली हुई है। जहाँ उसका अन्त होता है वह मस्तिष्क का चौथा खोखला भाग - फोर्थ वेन्ट्रिकल ही ब्रह्मरंध्र है सुषुम्ना के खोखले भाग में ही प्रमुख नाड़ियों की सत्ता है। यो उस क्षेत्र में प्रत्यक्ष आँखों से तथा सूक्ष्म दर्शी यंत्रों की सहायता से देखी जा सकने वाली प्रत्यक्ष नलिकाओं एवं तंतुओं की संख्या भी कम नहीं है। ‘संगीत रत्नाकर’ और ‘सहानुभूतिक’ मेरुतंत्र’ ग्रंथों में सुषुम्ना को 900 महत्वपूर्ण नाड़ियों से घिरा हुआ बताया गया है। वे दासियाँ और सुषुम्ना रानी है।

यही सही है कि जिस प्रकार मस्तिष्क के केन्द्र नीचे केन्द्रों को प्रेरणा-एक्साइटेशन भेजते हैं, उसी प्रकार निचले केन्द्र भी मस्तिष्क को न केवल जानकारियाँ भेजते हैं, वरन् उत्तेजनाएं एवं प्रेरणाएं भी भेजते हैं, मस्तिष्क को नाड़ी मण्डल द्वारा भेजे जाने वाले उत्तेजनात्मक संकेत-प्रवाहों को-फीडबैक एक्साइटेशन कहते हैं।

मस्तिष्क बहुसमर्थ तो है पर सर्वसमर्थ नहीं से भी आवश्यक उत्तेजना एवं प्रेरणा चाहिए। यह जाग्रत कुँडलिनी संस्थान से भेजे जा सकते है। जिस प्रकार जनरेटर के चुम्बकीय क्षेत्र को एक्साइटिंग करन्ट द्वारा सशक्त बनाने से उच्च विभवयुक्त हाईपोटैन्शियल विद्युत पैदा होने लगती है। उसी प्रकार मूलाधार क्षेत्र से ऊपर भेजे जाने वाले उत्तेजक प्रवाह मस्तिष्क में अति संवेदनशीलता-सुपर सैन्सेशन पैदा करने में समर्थ होते है।

मस्तिष्क को विद्युतीय संचार व्यवस्था ही सक्रिय बनाती हैं। इस प्रणाली को ‘रैटीक्युलर एक्टिवेटिंगसिस्टम’ कहते है। यह विद्युत धाराएं ही मस्तिष्क के विभिन्न केन्द्रों को सजग एवं सक्रिय बनाये रखती है। वैज्ञानिकों का मत है कि मस्तिष्क के गहन अन्तराल में-सेन्ट्रनाकिफैलिक सिस्टम में यह विद्युत धाराएं प्रसुप्त अवस्था में रहती है। उनका बहुत थोड़ा अंश ही काम में आ पाता हैं यदि इस प्रसुप्त प्रणाली को जाग्रत किया जा सके तो अपना यही मस्तिष्क सक्रियता, क्षमता एवं स्तर की दृष्टि से आश्चर्यजनक साधना इन प्रयोजनों की पूर्ति में अत्यधिक सहायक सिद्ध हो सकती है।

सुषुम्ना-ब्रह्मनाड़ी के संबंध में योगियों और शरीर शास्त्रियों की अलग-अलग व्याख्याएं रही हैं। साधना विज्ञान के प्राचीन ग्रंथों में समूचे मेरुदण्ड को ही सुषुम्ना कहा गया है। उसके पोले भाग में विशेष क्षमताएं रहने के संबंध में तो जानकारी थी पर वह समूचा संस्थान अति संवेदनशीलता है और भीतरी तथा बाहरी परतों में अन्योन्याश्रय संबंध है। इसलिए पृथक् वर्गीकरण करने की आवश्यकता नहीं समझी गई है। पूर मेरुदण्ड को ही सुषुम्ना संस्थान माना गया। विद्युत या प्राण संचार का प्रवाह खोल भी उस भीतरी भाग में ही चलता है पर बाहरी खोल भी उस संदर्भ में कम संवेदनशील, कम सहायक या कम प्रभावित नहीं है।

आधुनिक शरीरशास्त्र - एनाटामी क मत से मेरुदण्ड के भीतर एक सूक्ष्म नली का अस्तित्व है लिसे ‘केनालिससेन्ट्रेलिस’ कहते हैं। यह मेरुदण्डीय और मस्तिष्कीय तत्वों से मिलकर बनी है। यह मेरुदण्डीय और मस्तिष्कीय तत्वों से मिलकर बनी है। सुषुम्ना यही है। इस क्षेत्र में अनेकों संचार प्रणालियाँ काम करती है। जिनमें से एक ‘केनेलिससेंटे्रस’ भी है। इसे ही योगशास्त्र की दृष्टि से ब्रह्मनाड़ी कहा जा सकता है।

मेरुदण्ड की संचार प्रक्रिया का संवाहक क्षेत्र ‘पैरासिम्पैथेटिक’ और ‘सिम्पैथेटिक’ के नाम से जाना जाता है। यह मेरुदण्ड के भीतरी भाग में स्थित होता है। इसे ‘गैंग्लिया’ कहते हैं। इसे नाड़ी कोशिकाओं का केन्द्रिय गुच्छक भी कह सकते हैं। इस क्षेत्र में प्राण संचार गुच्छक भी कह सकते है। इस क्षेत्र प्राण संचार प्रणाली को अपना काम करने के लिए आवश्यक साधन प्राप्त होते है।

मस्तिष्क से गुदा-उपस्थ भाग तक के क्षेत्र में फैले हुए अनेक महत्वपूर्ण संस्थानों का योग ग्रंथों में उल्लेख हुआ है। यों वे सभी सूक्ष्म शरीर से संबंधित हैं तो भी उनकी स्थूल शरीर के कुछ संस्थानों के साथ सीधी संगति दीखती और स्पष्ट संबंध दिखाई पड़ता है। थियोसोफी की मान्यताओं के अनुसार सुषुम्ना को वज्रा-बाह्य आवरण एवं माध्यमिक आवरण है। इसे ‘ड्यूरामैटर’ एवं ‘पा मैटर’ कह सकते हैं। चित्रा-मस्तिष्कीय धूसर पदार्थ- ‘ग्रे मैटर’ है। ब्रह्मरंध्र केन्द्रिय छिद्र-सेन्ट्रल कैनाल। अमृत-प्रमस्तिष्कीय द्रव-सेरिब्रो-स्पाइनल फलूइड। इड़ा-बाई सहानुभूतिक रज्जु-राइट सिम्पैथिक टं्रक्स। त्रिवेणी-सुषुम्ना शीर्ष-मेडुला ओंब्लागेटा। शंकु शिखर-सुमेरु-पान्स को कह सकते हैं।

योग विद्या विशारदों का कहना है कि मेरुदण्ड सुषुम्ना के आखिर में ‘कोनस मेडुलरिस’ नाम एक स्थान है जहाँ प्राण ऊर्जा का विशाल भण्डार छिपा है। जीवन शक्ति अथवा चुम्बकीय विद्युत का विपुल भण्डार यही है। इसे खोजने और सक्रिय बनाने के वैज्ञानिकों प्रयास भी किये जा रहे है। शरीर शास्त्रियों के अनुसार जिस प्रकार वैज्ञानिक जानकारी, प्रयोग विधि और यंत्र व्यवस्था के आधार पर विद्युत, ईथर आदि शक्तियों से प्रत्यक्ष लाभ उठाया जाता है, ठीक उसी प्रकार स्पाइनल कालम स्थित प्राण ऊर्जा का उन्नयन करके शरीर की अपरा प्रकृति की प्रचण्ड शक्तियों से लाभान्वित हुआ जा सकता है।

थियोसोफिकल सोसायटी की जन्मदात्री मैडम ब्लैवेटस्की के अनुसार स्पाइनल एक्सिस-सुषुम्ना और कुँडलिनी का उन्होंने अन्योन्याश्रित संबंध है। कुण्डलिनी को उन्होंने विश्वव्यापी विद्युत शक्तिकास्मि कइलैक्ट्रिसिटी नाम दिया है उसकी विवेचना विश्व विद्युत के समतुल्य चेतनात्मक प्रचण्ड प्रवाह के रूप में किया है। सरपेंट फायर, द वायस ऑफ साइलैंस, फायरी पावर तथा वर्ल्ड मदर भी इसी के नाम है। सुप्त सर्पिणी की तरह यह मेरुदण्ड के निचले सिरे के मूलाधार केन्द्र में सोई पड़ी है। स्पाइनल कार्ड या स्पाइनल एक्सिस मेरुदण्ड का ही नाम है जिसमें एक प्रकार का विद्युत द्रव पदार्थ भरा है। मूलाधार चक्र से मेरुदण्ड मार्ग में जो शक्ति प्रवाह चलता है वह पेंच की चूड़ी की तरह कुण्डलाकार होता है। इसलिए इसे कुण्डलिनी के नाम से जाना जाता है। प्रसुप्त स्थिति में पड़ी-पड़ी यह विष उगलती रहती है। वासना की अग्नि को शाँत नहीं होने देती। ऐसी स्थिति में वह शरीर और मन की दिव्य सम्पदाओं का विनाश ही करती है। जाग्रत होकर सहस्रार तक पहुँचने और सोम संपर्क में आने पर ही समाधान होता है।

र्स्टनवर्ग स्थिति ‘रिसर्च फाउन्डेशन फॉर ईर्स्टन विजडम एण्ड वैर्स्टन साइंस’ में मानवी काया की प्रसुप्त क्षमताओं को उभारने के प्रयोग परीक्षण चल रहें है। इस संस्था में अनुसंधानरत मूर्धन्य वैज्ञानिकों के अनुसार कुण्डलिनी साधना में बिजली की दो धाराएं काम करती है। दोनों के मिलने पर ही शक्ति प्रवाह बहता है। इन दोनों को सही दिशा देने एवं बाहर भटक कर उत्पात मचाने से रोकने का काम स्पाइनल कालम की पोली रज्जु ही करती है। यही वह राजमार्ग है जिसके अंदर स्नायु तंतु केन्द्रीभूत होकर चक्रों के रूप में दृष्टिगोचर होते है। कुण्डलिनी जागरण में इन चक्रों की विद्युत शक्ति और स्नायु प्रवाह को प्रभावित एवं सक्रिय किया जाता है।

शरीर शास्त्र के अंतर्गत मेरुदण्ड संचार संस्थान का थोड़ा सा परिचय ऊपर की पंक्तियों में इसलिए दिया गया है ताकि स्थूल शरीर की संरचना से मिलते जुलते सूक्ष्म शरीर की उपयुक्त कल्पना कर सकना साधना मार्ग के पथिकों के लिए सरल हो सके। सुषुम्ना तथा दूसरी अन्याय नाड़ियों का अस्तित्व प्रत्यक्ष शरीर में भी है और उससे इस काय कलेवर के महत्वपूर्ण चेतनात्मक प्रयोजन सिद्ध होते है। ठीक इसी प्रकार सूक्ष्म शरीर के मेरुदण्ड क्षेत्र में ऐसी दिव्य विद्युत धाराएं प्रवाहित होती है। जो चेतना के उच्च स्तरों को प्रभावित करती और बल देती है। साधना-ध्यान चेतना द्वारा संग्रहित प्राण विद्युत के माध्यम से की जाती है। यही वह और औजार है जो सूक्ष्म शरीर के विभिन्न अवयवों में हलचल और उलट-फेर प्रस्तुत करता है। ध्यान-धारण, संकल्प शक्ति, एकाग्रता, प्राण-प्रवाह, भाव संवेदना, प्रगाढ़-निष्ठा जैसी अध्यात्म प्रयोजनों की पूर्ति में सुषुम्ना साधना का असाधारण योगदान रहता है।

ध्यान-धारण में मेरुदण्ड सीधा करके बैठने का विधान है। प्राणायाम में इड़ा-पिंगला के माध्यम से प्राणवायु को ग्रहण करने और छोड़ने का उपक्रम चलता है और कुँभक द्वारा सुषुम्ना में उस दिव्य ऊर्जा को धारण किया जाता है। कुण्डलिनीयोग में मूलाधार और सहस्रार के मध्यवर्ती आदान-प्रदान का पथ प्रशस्त करने में सुषुम्ना मार्ग को ही प्रधान भूमिका रहती है। इसलिए उसे देवयान मार्ग भी कहा जाता है। सुषुम्ना साधना अपने आप में एक योग साधना है। उसे कर पाते हैं, भौतिक सिद्धियों एवं आत्मिक ऋद्धियों का लाभ उठाते है।


जीवन सम्पदा की उपेक्षा न करें!

एक सेठ बड़ा चतुर था और बुद्धिमान भी। उसने अपनी चतुरता के बल पर बहुत सम्पत्ति कमाई। व्यापार चला और बहुत मुनाफा हुआ। घर धन धान्य से भर गया। स्वर्ण मुद्राओं की कमी न थी। उनसे तिजोरियाँ भरी थी।

घर में तीन व्यक्ति थे। पति-पत्नि और एक छोटा बच्चा। तीनों सुखपूर्वक रहते और प्रसन्नता पूर्वक दिन गुजारते।

दुर्दैव से एक दिन घर में अचानक आग लग गई। पता चला जब लपटेँ चारों और फूटने लगीं। घटना अकस्मात घटी। पहले से वैसा होने की आशंका न थी, ताकि बुझाने का कुछ प्रबंध करके रखा जाता। जब यह दुर्घटना घटी थी तब आधीरात बीत चली थी। पड़ोस के सब लोग भी गहरी नींद सोये हुए थे। किसी को आग की लपटें दिखी भी नहीं।

आग जब पलंग के निकट आ गई तब सेठ सेठानी जगे। भयंकर दृश्य चारों ओर देखा तो हड़बड़ा कर बैठें। जल्दी बुझने की सूरत नहीं थी। चिल्लाये पुकारे पर आवाज पड़ोस तक में नहीं पहुँची सो दोनों मिलकर ही बहुमूल्य वस्तुएं बचाने और उन्हें बाहर निकालने में जुट गये। साथ ही पड़ोसियों को भी सहायता के लिल आवाज देते रहें।

सामान निकालने का क्रम जारी रहा। पड़ोसी भी कुहराम सुनकर जग गये और आग बुझाने में सहायता करने के लिए दौड़े। वे आग भी बुझाते रहे और समान निकालने में भी सहायता करते रहे। बहुतों के बहुत प्रयास से आग काबू में आ गई। सामान भी अधिकाँश बाहर निकाल दिया गया।

सेठ सेठानी ने बचे हुए सामान पर दृष्टि डाली तो संतोष की साँस ली। देखा तो प्रतीत हुआ कि बहुमूल्य सामान प्रायः सभी अग्नि की चपेट से बचा लिया गया था। जो जला था वह कम मूल्य का था। बचे धन के सहारे व्यापार चलता रह सकता था। सोचा फिर कुछ दिन के प्रयत्न से उतना ही कमा लेंगे जितना जल गया था।

जब सब कुछ शान्त हो गया तो सूझा कि अपना प्राण प्यारा बच्चा तो है ही नहीं, सोचा भीड़ के साथ कहीं चला गया हों। पड़ोसियों के घरों में खोज बीन की गई पर वह वहाँ कहीं न था। जले हुए घर में प्रवेश करके देखा गया तो प्रतीत हुआ कि सोने वाले कमरे में ही पलंग पर पड़ा रहा और जलकर समाप्त हो गया।

हा-हा कार मच गया। सेठ-सेठानी दहाड़ मार कर रोने लग गये। विवाह के बहुत दिन बाद यह बच्चा हुआ था। बड़ा सुन्दर भी था, हंसमुख भी। सभी आँख का तारा बन गया था, माता-पिता तो उस पर प्राण देते थे। पर अब क्या हो सकता है। जल हुई लाश के रूप में बच्चा आँखों के सामने पड़ा था। मृत शरीर को भी वे आँख से ओझल नहीं करना चाहते थे छाती से लगाये बैठे थे। विलाप का अन्त होते न देखकर संबंधी, कुटुम्बियों ने उसकी अन्त्येष्टि की। माता-पिता विक्षिप्त बने किंकर्तव्य विमूढ बने बैठे थे।

सहानुभूति प्रकट करने आने वालों में से एक ने कहा-अग्नि काण्ड देखकर आप लोग सम्पत्ति बचाने तो दौड़े पर बच्चे का ध्यान क्यों नहीं दिया? उसे प्रथम खोजने और बचाने की याद क्यों नहीं रही?

दुर्घटना की चर्चा जहाँ तहाँ बहुत दिनों तक होती रहीं। एक विचार गोष्ठी में उसी घटना का उदाहरण देते हुए एक ज्ञानी कह रहे थे-मनुष्य जीवन रूप बालक को उपेक्षा में पड़ा और दुर्घटना का शिकार होने देता है। धन-दौलत को ही सब कुछ समझता है और उसी को बढ़ाने-बचाने के लिए हाथ-पैर पीटता रहता है। अन्त में इतना घाटा है जिसकी क्षतिपूर्ति नहीं हो सकती। उस सेठ की तरह हम सब भी तो जीवन सम्पदा की ऐसी ही उपेक्षा करते है।


चिन्तन उभय पक्षीय हो

पक्षी दा पंखों के सहारे उड़ता है। गाड़ी का गतिचक्र तब बनता है जब दोनों पहिए समान रूप से काम करते हों विचारों के संबंध में भी यही बात है उन्हें व्यावहारिक एवं उपयोगी बनाने के लिए प्रतिपादन और संदेह के उभय-पक्षीय झूले पर झुलना पड़ता है। सोने को कसौटी पर कसना और आग में तपाना पड़ता है। इसके बिना हर पीली धातु को सोना बताने का दावा कर सकती है।

भावुकता विचारों का एक-पक्षीय उभार है। जिसमें अपनी इच्छा अथवा मान्यता ही प्रधान रहती है। एक दिशा में सभी उड़ाने उड़ते रहने से वही बात सत्य एवं लाभदायक प्रतीत भी होती है। साथ ही यदि का समर्थन प्रतिपादन भी उस निमित्त निकल जाये तब तो बात और भी सुदृढ़ बन जाती है। और उसे करने के लिए ऐसी आतुरता उभरती है कि फिर वह रोके नहीं रुकती। ऐसी मनोदशा में प्रायः आतुरता भरें कदम उठने लगते है। कठिनाई कोई दीखती नहीं अवरोध को हटाना भी उस माहौल में नहीं बन पड़ता। निर्धारण की व्यावहारिकता इसी हद तक है, इस पर सोचने का तो अवसर ही नहीं मिलता। पुनर्विचार का तो प्रश्न ही नहीं उठता।

अपनी कल्पना के अनुरूप ही परिस्थितियाँ बनती चली जायें। सफलता मिलती रहे यह आवश्यक नहीं। साथी सहयोगियों का अपना-अपना स्वभाव एवं व्यक्तित्व है। वे हमारी इच्छानुरूप ही सिद्ध हो यह आवश्यक नहीं उनकी वफादारी-सदा यथावत् बनी रहेगी इसकी कोई गारन्टी नहीं। अत्युत्साह में उठे कदम तब प्रतिकूलताओं से टकराते है। सपने जब सपने सिद्ध होते हैं तब आँखें खुलती है। सरता से न निपटें पाने वाली कठिनाई जब सामने आती है तब पता चलता है कि इस संदर्भ में तो कुछ सोचा ही नहीं गया था। एकपक्षीय चिन्तन की अनुपयुक्तता तब समझ में आती है, जब समय निकल गया होता है।

बुद्धिमत्ता इसमें से कोई दिशा पकड़ने से पूर्व जहाँ उसके लाभदायक पक्ष पर विचार किया जाये वहाँ उसकी अड़चनों पर भी विचार कर लिया जाये। इसी को दूसरों के साथ विचारने पर विचार विनिमय कहते हैं और अपने आप ही तर्क वितर्क कर लेने का चिन्तन मनन। हथियारों को तेज करने के लिए उन्हें उल्टी और सीधी ओर से पत्थर पर घिसा जाता है अपने विचारों, योजनाओं और क्रियाकलापों को आरम्भ करने से पूर्व उसे दोनों पहलुओं पर विचार कर लेना चाहिए, तथा ऐसा मार्ग मिलता रहे जिसे व्यवहार एवं सफलता के निकट तक पहुँचा सकने वाला कहा जायें।

अतिवाद एक पक्षीय होता है। उसका आवेश चढ़ जाने पर मनुष्य की प्रथम कल्पना ही रंगीली पोशाक पहन कर सामने आती और मनमोहक लगती है। उसके दोष तो तब मालूम पड़ते हैं जब आवरण उघाड़ कर यथार्थता देखने, समझने का अवसर आता है।

अत्युत्साही जल्दी-जल्दी काम कर लेते हैं। जब तक एक पूरा नहीं हो पाता तब तक दूसरे की परिकल्पना आरम्भ कर देते हैं। किसी प्रयोजन को पूरा करने के लिए उसमें कितनी बुद्धिमत्ता, लगन मेहनत, धैर्य और साधनों की आवश्यकता पड़ती है इसे भुला दिया जाता है। फलतः वही दुर्गति होती है जो शेखचिल्ली की हुई थी। शेखचिल्ली की योजना गलत नहीं थी। मजूरी के पैसा से मुर्गी, मुर्गी से बकरी, बकरी से गाय, गाय से सम्पन्नता, सम्पन्नता से विवाह, विवाह होने पर बच्चे होना असम्भव नहीं है। पर योजना को कार्यान्वित करने में समय, श्रम साधन भी तो चाहिए। शेखचिल्ली से यही भूल हो गई। वह बीच के ताने-बाने को बुनने की तैयारी में जुटने की अपेक्षा एक ही छलाँग में बेड़ा पार करने के लिए आतुर हो उठा। फलतः मध्यवर्ती मंजिल को समझने और पार करने के लिए किस प्रकार क्या करना पड़ेगा, यह ध्यान नहीं न रहा। पैर में ठोकर लगने और सिर पर रखा घड़ा फूट जाने से वह रंगीली योजना भी चकनाचूर हो गई।एक बार असफलता मिलने पर दूसरी बार नये सिरे से काम करने का उत्साह ही समाप्त हो गया। दिवास्वप्न इस प्रकार टूटने और उसकी मरम्मत करने तक का साहस न बन पड़ा। उतावली सर्वत्र ऐसा ही उपहासास्पद परिणाम उत्पन्न करती है। प्रकृति के लोग एक काम और वे संकल्प शक्ति के अभाव में सभी अधूरे रहते और बीच में ही छूटते रहते है।

काम का आरम्भ योजना बनने के साथ शुरू होता है। क्रिया का जामा पहनना इसके बाद ही बनता है। विचार उठने के साथ ही उसे समग्र नहीं मान लेना चाहिए। उसकी विरोधी सम्भावनाओं पर भी विचार करना चाहिए। इसमें अति बरतने की आवश्यकता नहीं। अन्धा समर्थन बुरा है किन्तु किसी बात के नकारात्मक पहलू के साथ जकड़ कर भयभीत हो जाये और उसे असमर्थ मान बैठना और भी अधिक बुरा है। अत्युत्साही कल्पना के घोड़े पर कुछ दूर तक सवारी कर लेता है, पर जिनकी प्रवृत्ति नकारात्मक-कठिनाई वाले पख से होकर देखने की है उनसे सकारात्मक सम्भावनाओं की उपस्थिति को देख पाना भी नहीं बन पड़ता।

व्यक्तिगत मैत्री या शत्रुता के संबंध बनाने में भी प्रायः अतिवाद भी प्रधान पहलू देखा गया है। गुणवाला पक्ष देखने लगा जाये तो कोई व्यक्ति देवता जैसा सर्वगुण सम्पन्न मालूम पड़ता है और उसका चरम सीमा तक विश्वास करने लग जाता है। इस स्थिति का परिणाम यह होता है कि उस भावुकता को ताड़ने पर चतुर लोग उसका अनुचित लाभ उठाते है। मित्र बनकर ठगने वालों की संख्या ही प्रायः अधिक होती है। सहज विश्वास बरतने वाला प्रायः धूर्तों द्वारा पग-पग पर शोषित किया जाता रहता हैं उसकी शिकायत लोगों से तो होती है, पर यह भुला दिया जाता हे कि अति मात्रा में विश्वास कर बैठे और कहीं छिद्र भी होने की सम्भावना को भुला भी ऐसा ही है जिसके रहते भविष्य में भी ऐसी जोखिम उठाते रहने के अवसर आते रह सकते है।

न्यायाधीश, दोनों पक्षों के प्रतिपादनों को पूर्वक सुनता है। इसके बाद अपनी स्वतंत्र बुद्धि से यह निर्णय करता है कि किस पक्ष के कथन किस सीमा तक सच्चाई का अंश होना सम्भव हैं यदि इसके विपरीत कोई न्यायाधीश एक पक्षीय बात सुनकर उतने भर से अत्यधिक प्रभावित होता और समर्थन में फैसलाकर बैठे तो उसकी भाव से न्याय का आधार ही टूट जायेगा। यही बत उठने वाली कल्पनाओं, उमंगों, उत्साहों के संबंध में भी है। वे यदि एकाकी एकपक्षीय रही तो उनमें प्रतिफल उल्टा भी विनिर्मित होगा।

तर्कों का आधार इसीलिए लिया जाता है, उनके अनुसार अनुकूल और प्रतिकूल पक्षों स्वरूप, आधार, क्रियान्वयन आदि को विचारपूर्वक समझने का अवसर प्राप्त कर लिया जाये उससे जीवन की रणनीति बनाना, किसी योजना कार्यान्वित करना सरल पड़ता है।

अतिवाद सर्वत्र बुरा है। बहुत खाना बिल्कुल खाना दोनों ही स्थितियाँ बुरी है। भावुकता यदि उत्साह भरी हो, एकपक्षीय हो तो उससे वास्तविकता का समझना और तदनुरूप सम सम्भावना का अनुमान लगाना सरल पड़ता हैं तथ्य, प्रमाण, उदाहरण इस संदर्भ में बहुत काम जाते है। जो कुछ भी सोचना करना हो उसके दोनों पंखों पर समान रूप से समान गंभीरता से विचार करना चाहिए तभी उस निष्कर्ष पर पहुँचा जा सकता है जो सफलता और प्रसन्नता को उपलब्ध कराता है।


क्या सचमुच ईश्वर पक्षपात करता है?

ईश्वर समद्रष्टा है, वह कल्याणकारी, न्यायकारी व दयालु है। कुछ लोग ऐसा नहीं मानते और कहते हैं कि यदि उसमें समत्व का भाव रहा होता, तो यह संसार दुःखों का पिटारा न होता। तब हम किसी को मौज-मस्ती करते और किसी को दुःखों का पहाड़ उठाते नहीं देखते। सर्वत्र समता दृष्टिगोचर होती। वे तर्क प्रस्तुत करते हुए कहते हैं कि यदि वह दयालु होता तो इस सृष्टि के प्राणियों को रोग-शोक और प्रकृति-प्रकोप की मार नहीं झेलनी पड़ती।

प्रथम दृष्टि में अनीश्वरवादियों के यह कथन सत्य जान पड़ते हैं, पर तनिक सूक्ष्म बुद्धि का प्रयोग करने से कथन की निरर्थकता और आधार हीनता स्पष्ट झलकने लगती है। दुःख दर्द सर्वदा दाता की क्रूरता के परिचायक नहीं होते। इसके पीछे कल्याणकारी भावना भी छिपी रह सकती है। पिता जब पुत्र को बुरे कार्य करते, कुमार्गगामी बनते देखता है, तो वह उसे दण्ड देता हैं, ताकि वह ऐसा करना छोड़ दें, अपना सुधार करें और उन्नति-प्रगति के लिए उत्तम मार्ग चुने। इसकी प्रतिक्रिया भी अनुकूल होती है और इस नियंत्रण से बालक सुधरता दिखाई पड़ता हैं कारण न जानने वालों को इसमें पिता की गलती और नृशंसता दिखाई पड़ सकती है, पर जो कारण जानते हैं, जिन्हें बालक की उच्छृंखलता का पता है, वह पिता को कदापि दोष न देंगे।अतः किसी मनुष्य को दुःख भोगते देख कर यह कहना कि ईश्वर पक्षपाती है, उचित न होगा, क्योंकि हमारे ये स्थूल नेत्र मनुष्य की सम्पूर्ण विकास यात्रा को कहाँ देख समझ पाते हैं पिछले जन्म में उसने कैसे कर्म किए?इसे जानने की सामर्थ्य इन चर्म चक्षुओं में कहाँ है? अस्तु कारण को समझे बिना ईश्वर पर दोषारोपण करना किसी भी प्रकार समीचीन न होगा। मानवी दुःखों पर यदि गहराईपूर्वक विचार किया जाये, तो उस से हमें दो बातें मालूम होंगी- प्रथम यह कि वह व्यक्ति को विकास के लिए उद्यत करता है और दूसरे पाप से रोकता है। पहले प्रकार के दुःख में व्यक्ति को अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु प्रयास और परिश्रम करना पड़ता है। यदि व्यक्ति गरीब है, तो उसे इनका उपार्जन करना पड़ता है, तभी वह अपनी दुरवस्था से उबर पाता है, पर मनुष्य अपनी विपन्नता को, अभाव की स्थिति व उपार्जन के परिश्रम को दुःख मान बैठता हैं यदि वह किसी प्रकार की क्रिया न कर, काम से जी चुराए और निष्क्रिय बना बैठा रहें, तो उसकी शारीरिक मानसिक क्षमताओं का विकास कैसे होगा? विकास के लिए आवश्यक है कि उन क्षमताओं का उपयोग हो और उपयोग तभी संभव है, जब वैसी परिस्थिति हो, जिसमें उनका उपयोग बन पड़ें। अभावग्रस्तता-विपन्नता ऐसी ही परिस्थितियाँ हैं, जिनमें मानवी क्षमताओं को विकसित होने का भरपूर अवसर मिलता है और इन्हें सुविकसित कर व्यक्ति अन्ततः अपनी अभावग्रस्तता से मुक्ति पाता है। अतः इस दुरवस्था को दुःख समझ लेना एक प्रकार की भूल है। ऐसा मान लेने से तो व्यक्ति प्रयत्न-पुरुषार्थ त्याग कर अकर्मण्य बन बैठेगा। ज्ञातव्य है-कोई व्यक्ति इस दुनिया में धन-दौलत लेकर नहीं आता। वह सदा खाली हाथ आता है। सम्पत्ति तो उसे प्रयास और परिश्रम पूर्वक कमानी पड़ती है, क्योंकि इस जीवन-संकट को गतिवान रखने के लिए हर व्यक्ति की यह प्रथम आवश्यकता है, जिसे सबों को पूरी करनी पड़ती है। जिसके दौरान क्षमताओं का निश्चय ही विकास होता है। देखा जाता है कि कोई जीविकोपार्जन के लिए शिल्पकला अपना लेता है, तो कोई साहित्य सृजन। कोई चित्रकारी करके अपना पेट भरता है, तो कोई कृषि कार्य करता है। यदि किसी ऐसे व्यक्ति से कोई मूर्ति गढ़ने, निबंध लिखने, चित्र बनाने या कृषि संबंधी कार्य करने के लिए कहा जाय, जिस के यह व्यवसाय नहीं हैं, तो वह इन कार्यों में वह निपुणता प्रदर्शित नहीं कर सकेगा, जो इनके पेशेवर व्यवसायी कर सकते हैं, क्योंकि उन्होंने लगातार अपने-अपने क्षेत्र में अपनी-अपनी क्षमताओं को उन्नत बनाया है।

इसके विपरीत जिन्हें विरासत में सम्पत्ति मिली हुई है, और जिसे प्राप्त करने के लिए उन्हें तनिक भी हाथ-पैर चलाने की आवश्यकता नहीं पड़ती, वे व्यसनों में पड़ कर धीरे-धीरे अपनी शक्तियों गंवाने लगते है। संसार में ऐसी अनेक जातियाँ, राजा और व्यक्ति हुए हैं, जिनने ऐश्वर्य के मद में आकर अपना सर्वनाश कर डाला। ऐसे भी उदाहरणार्थ की कमी नहीं, जिसमें व्यक्ति माली स्थिति में सर्व सम्पन्नता की स्थिति में जा पहुँचे हों। आराम तलब आराम फरमाने के कारण कुछ करने योग्य भी नहीं रहते।

धनियों का इतिहास देखने से ज्ञात होगा कि उनके बाप-दादों ने कंगाली की स्थिति में घोर परिश्रम द्वारा धन इकठ्ठा किया था, जिसे अब वे मौज-मस्ती में उड़ा रहें है। क्या उनमें अपने पूर्वजों जैसे प्रबल पुरुषार्थ और जीवट जैसे गुणों शेष रह जाते है? यदि नहीं तो क्या यह अवगति नहीं हुई? व्यक्ति को यदि हर प्रकार के सुख अनायास ही मिल जाये, तो फिर उसकी उन्नति की प्रवृत्ति ही समाप्त हो जाएगी। विजय हमेशा युद्ध लड़ने वालों को ही मिलती है, और कष्ट सहने वाले ही सदा यश के भागी बनते है। लड़ाई लड़ना और कष्ट-कठिनाई उठाना दुःख कहना, निश्चय ही एक भारी भूल है।

दूसरे प्रकार की व्यथा हमें पाप से बचाती हैं। व्यक्ति जब अनाचार-अत्याचार पर उतारू होता है तो भगवान की ओर से उसे उसका अन्यान्य प्रकार से दण्ड भी मिलता है। जब किये की सजा पाता है तो व्यक्ति फिर वैसे पाप-कर्म करने का साहस नहीं कर पाता और इस प्रकार कुकर्मों से बचा रहता है इस तरह एक प्रकार की अवस्था मनुष्यों के लिए प्रेरित करके उन्नति का कारण बनती है, दूसरे प्रकार की अनेकानेक अवस्थाएं उन्हें दण्ड मिली होती है। दण्ड को दुःख कैसे माना जाये ऐसा मान भी लिया जाये,त्र तो इसका जिम्मेदार स्वयं होता है। यह स्थिति उसकी खुद की होती है। कोई व्यक्ति अपराध की सजा पाकर जाता है और इसे वह अपना दुःख मान लेता है उसकी नासमझी ही होगी। यह तो उसके बुरे कर्म परिणाम है। अधिकारीगण हर किसी को जो कहाँ बन्द कर देते हैं जो अपराध वृत्ति अपना जेल भी उन्हें ही भुगतनी पड़ती है। ईश्वर के पापकर्म के लिए सजा और पुण्य के लिए पारितों का प्रावधान है। पर ईश्वरीय न्याय व्यवस्था दुष्कर्म की सजा के लिए प्रतिकार का भाव नहीं है न ही उसमें क्रूरता-कठोरता की निशानी होती है दण्ड सदा सुधार भावना से दिया जाता है, और उसी स्तर का होता है, जिस स्तर का अपराध प्रकार देखा जाये तो इसमें भी उसकी दयालुता पुट मिलती है। कोई कोमल-हृदय माता भी प्रिय पुत्र को ऐसी दयालुता से दण्ड नहीं दे पाती ईश्वर नियम-भंग करने वालों को देता हैं इतना ही अन्तर है कि व्यामोह बन्धन में जकड़ी अपनी सन्तान को कुमार्गगामी बनने का साहस बैठती है, किन्तु ईश्वरीय सत्ता ऐसा नहीं करती। प्रकार यह कहना कि इस संसार में दुःख-ही-दुःख भरा पड़ा है, अथवा भगवत् सत्ता न्याय का कल्याणकारी नहीं है, अनुचित होगा।

सच तो यह है कि जितना हम दुःखों पर ध्यान हैं, उतना ईश्वर प्रदत्त सुखों पर विचार करते ही यदि ऐसा होता, तो परमसत्ता को कोसने की बजाये हम सदा उसके आभारी बने रहते। शायद हमने कभी सोचा ही नहीं कि विभिन्न प्रकार की इन्द्रियों माध्यम से जो हमें आनन्दानुभूति प्राप्त होती है, वह ईश्वर की महती कृपा नहीं है? इन आँखों से हम कि सुन्दर-सुन्दर दृश्य निहारते हैं, स्रष्टा की अनुपरमरच देख कर हमें कितना सुख मिलता है, इसे तो कि अंधे से पूछकर ही जाना जा सकता है। यदि स्वाद लिए जीभ न मिली होती, तो हम जायकेदार व्यंजनों का रसास्वादन नहीं कर पाते। फिर गुड और गोबर हमें एक जैसे प्रतीत होते। कान के अभाव में हम संगीत और शब्दों का आनन्द-लाभ कैसे ले पाते? नाक नहीं होती तो विभिन्न प्रकार की वस्तुओं और फूलों की खुशबू बेकार साबित होती। तब खुशबू और बदबू में भेद प्रकट नहीं हो पाता और एक के प्रति सुख व आकर्षण एवं दूसरे के प्रति घृणा की अभिव्यक्ति नहीं हो पाती।

इतना ही नहीं, सर्वेश्वर ने हर जीव की सुरक्षा का प्रबन्ध भी किया है। समर्थ और शक्तिशाली प्राणियों को शत्रु से अपनी रक्षा के लिए उपयुक्त अंग-अवयव प्रदान किये हैं, जबकि वैसे प्राणी जो निर्बल और कमजोर हैं, उनकी शरीर की बनावट और रूप-रंग ही ऐसे मिले हैं जिससे वे शत्रुओं की नजरों से बचे रह सकें। कितने ही प्रकार के कृमि-कीटकों और पक्षियों के रंग ठीक वैसे ही होते हैं, जिस वातावरण अथवा पेड़-पौधों, वृक्ष-वनस्पतियों में वे निवास करते हैं फूलों पर बैठी रहने वाली तितलियों को कभी-कभी उनसे पृथक् पहचानना कठिन हो जाता हैं। झाड़ियों में रहने वाले खरगोशों और तोतों का रंग अपने-अपने आवास के अनुरूप होता है। इसके अतिरिक्त वह अपनी स्वाभाविक अवस्था में दुर्घटनाओं के शिकार भी कम ही होते है। बंदर, चिंपेंजी व लंगूर के ऊंचे-ऊंचे पेड़ों से नीचे कूद पड़ने पर भी चोट नहीं लगती। उनके वृक्षीय आवास के हिसाब से उनमें यह क्षमता होनी आवश्यक थी, जिसका समावेश किया गया। गिद्ध सदा ऊंचे आकाश में मंडराता रहता है। यदि उसे तीक्ष्ण दृष्टि न मिली होती, तो वह अपने भोजन की व्यवस्था न कर पाता और संभव अपना अस्तित्व ही गंवा बैठता, पर ऐसा नहीं देखा जाता है। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि परमेश्वर ने बड़ी ही विवेक और न्यायशीलता का परिचय देते हुए प्रत्येक जीव में उसकी आवश्यकता के अनुरूप योग्यता, क्षमता और सामर्थ्य का समावेश किया जाता है। फिर ईश्वर कठोर और अन्यायी कैसे है?

यदि परमसत्ता सचमुच ही कठोर और अन्यायी होती, तो संकट की घड़ी में उसके प्रति श्रद्धा न उपजती। प्रायः देखा जाता है कि जब कोई भारी विपत्ति हमारे सामने प्रस्तुत होती है और उस से उबरने का कोई मार्ग सूझ नहीं पड़ता, हाथ-पैर फूलने लगते हैं, तो घोर निराशा की स्थिति में आशा की किरण एक ही ओर से आती दिखाई पड़ती है वह है ईश्वरीय सत्ता। मरीज की स्थिति जब गंभीर हो जाती है एवं उसके स्वस्थ होने के सभी उपाय-उपचार विफल होने लगते हैं, तो डाक्टर भी दवा के बदले दुआ की सलाह देता है और उस महान सत्ता के जिम्मे सब कुछ छोड़ देता है। इस प्रकार की आशा-अपेक्षा किसी नेक से ही की जा सकती है। और ऐसी ही सत्ता के प्रति प्रेम भी प्रदर्शित किया जाता है। चोर, डाकू, अपराधी के प्रति कोई प्रेम-श्रद्धा कहाँ दिखा पाता है? प्यार-प्रेम तो दूर, उनके नाम लेने में भी लोग भय का अनुभव करते हैं। यदि ईश्वर में ऐसी ही बदी होती तो उनके प्रति लोग ऐसे भाव प्रदर्शित नहीं करते।

संभव है अनीश्वरवादियों ने उस महत् सत्ता के प्रति ऐसे आरोप इसलिए लगाये हों, क्योंकि उनने मनुष्य और संसार के सिर्फ एक पक्ष को देखा हो। यदि कोई रात की कालिमा को देख कर दुनिया को अन्धकारमय बताये, तो उसे उसका अपूर्ण ज्ञान ही कहा जायेगा। वस्तुतः राज दिन की तरह दुःख-सुख मनुष्य की नियति हैं। कोई व्यक्ति न तो सदा-सर्वदा दुःखी ही बना रहता है, न सुख में ही डूबा रहता है। दोनों स्थितियाँ आती-जाती है। भगवान की ओर से यदि किसी को प्रताड़ना मिलती है, तो वह दंडस्वरूप होती है न तो वह इतनी अधिक होती है कि व्यक्ति उसके बोझ से ही दब जाये, न इतना कम कि उसका उस पर कोई प्रभाव ही न पड़ें। वास्तव में वह संतुलित होती हैं, जिसमें उसकी एक आँख प्यार की दूसरी सुधार की वाली नीति ही प्रमुख होती है। अतः संसार को दुःखमय बताना और ईश्वर को पक्षपाती कहना सर्वथा भूल है।


॥ पानीयं प्राणिनाँ प्राणाः॥

जल को अमृत कहा गया है। जीवन रक्षक तत्वों में वायु के बाद जल के बाद सर्वाधिक महत्वपूर्ण तत्व है। भोजन के बिना मनुष्य कई दिनों तक जीवित रह सकता है परन्तु इस जीवन दाता के अभाव में 60 से 70 वह घण्टे के मध्य में ही दम तोड़ने लग जाता है। इसीलिए जल के संबंध में शास्त्रकार ने कहा है- “पानीयं प्राणिनाँ प्राणाः विश्वमेव च तन्मयम्। न हि तोयाद्विना वृत्तिः, स्वस्थस्य व्याधितस्य का।” अर्थात् जल जीव-सृष्टि का प्राण है। विश्व ही जलमय है। क्या स्वस्थ, क्या रोगी किसी का भी जीवन जल के बिना संभव नहीं है।

जीवित रहने और कोशिकाओं की वृद्धि के लिए शारीरिक संरचना में जल से अधिक महत्वपूर्ण कोई यौगिक नहीं है। शारीरिक वजन का लगभग तीन-चौथाई भाग पानी होता है जो कोशिकाओं के अन्दर रहता है। मनुष्य शरीर के रक्त में 90 प्रतिशत जल की मात्रा होती है। मस्तिष्क में जल की उपस्थिति 74 प्रतिशत कार्टिलेज में 69 प्रतिशत हड्डी में 40 प्रतिशत और वसा में 15 प्रतिशत जल होता हैं इसके अतिरिक्त लार ग्रन्थियों से स्रवित रस में 99.6 प्रतिशत पानी होता है। पाचन संस्थान के पाचक अम्ल रस में 99.5 प्रतिशत मूल में 99.3 प्रतिशत पित्त में 77 प्रतिशत और पसीने में 46.7 प्रतिशत जल होता है।

शरीर का प्रत्येक क्षुद्रतम कोश पानी से सदैव तर रहता है और पानी से धुलते रहने के कारण ही शरीर को स्वस्थ रखता है। शारीरिक द्रव में से कुछ की संरचना में स्थायित्व होता है, जैसे रक्तप्लाज्मा, लिम्फ सेरिब्रोस्पाइनल फलूड। परन्तु स्वेद, लार पाचक रस और मूत्र जैसी द्रवीय यौगिकों की संरचना बदलती रहती है। इस परिवर्तन में जल की कमी का प्रमुख योगदान होता है। हमारे शरीर का जलीय अंश मल-मूत्र पसीना और निःश्वास वायु साथ बाहर निकलता रहता हैं पसीना के रूप में रोम कूपों के माध्यम से 500 सी.सी, मूत्राशय 2500 सी.सी, और निःश्वास मार्ग से 350 सी.सी पानी प्रतिदिन शरीर से बाहर निकलता है। परिश्रम करने वालों के शरीर में 10 पाइंट तक पानी पसीने के रूप में निकल जाता है। इस प्रकार शरीर संचित विजातीय तत्व जल के साथ बाहर निकल जाते हैं। हर समय शरीर में अनेकों कोशिकाएं होती रहती हैं जो रक्त के धकेल दी जाती है, जहाँ उन्हें शरीर से बाहर निकाल दिया जाता है। पेशाब चार प्रतिशत यूरिया और यूरिक एसिड होते हैं। यदि यूरेनिया नाम बीमारी हो जाती है। पर्याप्त मात्रा में पानी पीने से ही विषाक्त द्रव शरीर से बाहर निकल पाता हैं अन्यथा शारीरिक क्षमता घटने लगती है अंत अनेक बीमारियों धर दबोचती हैं पानी पीने से स्रावी ग्रंथियों का स्राव भी पर्याप्त मात्रा में होता रहता है, जो शरीर को स्वस्थ बनाये रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। पानी की कमी से शरीर में अम्ल और क्षार का अनुपात गड़बड़ा जाता है। जली माध्यम होने के कारण शरीर के अंदर अंतः वातावरण की समरूपता स्थिर रह पाती है। शरीर का होमियोस्टैसिस-तापमान, नमकसान्द्रण्य भोज्य पदार्थों और ऑक्सीजन का स्थायित्व आदि जलीय अंश की उपस्थिति में ही स्थिर रह सकता है।

आयुर्वेद में जल को एक विश्वसनीय औषधि कहा गया है। जल रोग नाशक हैं, विश्व भैषज है और जल जीवन को बनाये रखने के लिए आवश्यक तत्व है। इसकी महत्ता को समझा जाना।


ध्यान द्वारा आधि व्याधियों का समग्र उपचार

सूर्य किरणें बिखरी रहती हैं तो उनसे गर्मी और रोशनी भर प्राप्त होती है किन्तु एक छोटे आतिशी शीशे द्वारा 2 इंच घेरे की किरणें एकत्र कर ली जाये तो उतने भर से अग्नि प्रकट हो जाती है और यदि उसका विस्तार किया जाये तो वह चिनगारी भयंकर दावानल के रूप में विस्तृत की जा सकती है।यही बात मानवी मन के संबंध में भी लागू होती है। जो सतत् निरर्थक घुड़दौड़ लगाता रहता है। इसने न केवल मनुष्य बाह्य जीवन की समस्याओं में उलझा रहता है वरन् अपनी असीम शक्तियों सम्पद का भी अपव्यय करता रहता है। किन्तु जब मन की भगदड़ को किसी विषय पर केन्द्रित कर लिया जाता है तो उसकी बेधक शक्ति अत्यधिक हो जाती है। उसे जिस भी काम में नियोजित किया जाये उसे अधिक सशक्तता और विशेषता के साथ करती है। ध्यान द्वारा मन के बिखराव को रोका जा सकता हैं ओर इस निग्रह से जो शक्ति एकत्रित होती है उसे अभीष्ट प्रयोजन में लगाकर असाधारण प्रतिफल प्राप्त किया जा सकता है।

ध्यान किसी भौतिक प्रयोजन में भी लगाया जा सकता है और अध्यात्म उद्देश्य के लिए भी। वैज्ञानिक, कलाकार, शिल्पी, साहित्यकार अपना ध्यान इन कार्यों में संलग्न करके तद्विषयक सफलताएं पाते हैं और जिन्हें अन्तर्मुखी होकर आत्मशोधन करना है वे उस दिशा में प्रगति करते है। प्रयोजन विशेष के अनुसार ध्यान को वैसा मोड़ दिया जा सकता है। इस प्रक्रिया की वैज्ञानिक पृष्ठभूमि पर भी अब विशद् अनुसंधान किया जा चुका है।

ध्यान साधना से शरीर-क्रिया-विज्ञान पर पड़ने वाले संभावित प्रभावों की खोज का कार्य विभिन्न देशों क मूर्धन्य वैज्ञानिकों ने किया है। भारत संहिता अमेरिका, इंग्लैण्ड, पश्चिम जर्मनी के विभिन्न संस्थानों में इस प्रकार के अनुसंधान कार्य चल रहे है। तंत्रिका विशेषज्ञों का कहना है कि मननशील एकाग्र ध्यानस्थ मस्तिष्क में अनेकों विशेषताएं विकसित हो जाती है। फलतः मनुष्य का संबंध सृजनात्मक बौद्धिकता से जुड़ता और उसी परिणति को प्राप्त होने लगता है।

पाया गया है कि ध्यान की दशा में व्यक्ति के मस्तिष्क और शरीर में कई तरह की जैव रासायनिक प्रक्रियाएं सक्रिय हो जाती है। कई अवाँछनीय क्रियाएं उसी समय निष्क्रिय उसी समय निष्क्रिय हो जाती है। मिनिसोटा के सुप्रसिद्ध चिकित्सक डाँ. डैविड डब्ल्यू. “ओर्मे जान्स ने आटोनामिक स्टैबिलिटी एण्ड मेडीटेशन” नामक अपने अनुसंधान-निष्कर्ष में बताया है कि ध्यान के द्वारा के तंत्रिका तंत्र के क्रिया-कलापों में एक नई चेतना आ जाती है और उनके सभी कार्य नियमित एवं स्थायी रूप में होने लगते है। शरीर की त्वचा बाह्य वातावरण के प्रति प्रतिरोधी क्षमता धारण कर लेती है। और उस पर आये दिन पड़ने वाले वातावरण के तनाव, साइकोसोमैटिक बीमारियाँ, व्यावहारिक अस्थायित्व एवं तंत्रिका तंत्र की विभिन्न कमजोरियाँ आदि दूर हो जाती है।शरीर के अन्दर शक्ति का संरक्षण और भण्डारण होने लगता है। और यह अतिरिक्त ऊर्जा शरीर और मन के विभिन्न कार्यों व्यवहारों को अच्छे ढंग से सम्पादित करने के कार्य में प्रयुक्त होने लगती है। चिकित्सक जान्सन के कथनानुसार ध्यान का नियमित अभ्यास से जल्दी ही छुटकारा पा लेते है। हाइपों कोन्ड्रियाँ, सीजोफे्रनिया, टायलरमेनीफेस्ट एंक्जाइटी जैसी बीमारियों को ध्यान द्वारा नियंत्रित करने में उन्हें असाधारण सफलता मिली है। कुछ महीनों तक ध्यान का अभ्यास कराने पर उन्हें लोगों के व्यक्तित्व में आशाजनक सत्परिणाम देखने को मिले। अधिक दिनों तक ध्यान के नियमित अभ्यास का क्रम बनाये रखने से शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य में असाधारण रूप में वृद्धि होती है।

अमेरिका के दो मूर्धन्य वैज्ञानिकों-राबर्ट शा और डेविड कोल्ब ने ध्यान के अभ्यासियों पर किये गये अपने प्रयोगों में पाया है कि उन लोगों के शरीर और मस्तिष्क के बीच अच्छा समन्वय, सतर्कता में वृद्धि, मतिमन्दता में कमी और प्रत्यक्ष ज्ञान, निष्पादन-क्षमता एवं रिएक्शन टाइम में वृद्धि असामान्य रूप से होती है। मिरट टे्रसिंग टेस्ट में ऐसे व्यक्ति अग्रणी निकले है। उनके शारीरिक न्यूरोमस्कुलर समाकलन की दक्षता बहुत चढ़ी-बढ़ी हुई पाई गई।

आन्द्रे एस. जोआ ने हालैण्ड में हाई स्कूल के छात्रों को एक वर्ष तक ध्यान का अभ्यास कराया। नियमित ध्यान करने वाले छात्रों की सामान्य पाई गई। कठिन प्रश्नों के उत्तर देने व हल करने में ध्यान करने वाले छात्र अग्रणी रहें। उनकी स्मृति क्षमता में भी वृद्धि हुई। शैक्षणिक प्रदर्शन में ये छात्र सर्वश्रेष्ठ रहें।

वैज्ञानिक विलियम सीमैन ने बताया है कि प्रथम दो महीने तक ध्यान करने वाले व्यक्तियों के व्यक्तित्व में विकास होते देखा गया है। ध्यान का अभ्यास नियमित क्रम से करते रहने पर अन्तःवृत्तियों अन्तःशक्तियों पर नियंत्रण पाया जा सकता है। और चिन्ता मुक्त हुआ जा सकता है।

डा. थियोफोर नामक वैज्ञानिक ने अपने अनुसंधान निष्कर्ष में बताया है कि ध्यान करने वाले व्यक्तियों की साइकोलॉजी में असाधारण रूप से परिवर्तन होता है। ऐसे व्यक्तियों में घबराहट, उत्तेजना, मानसिक तनाव, मनोकायिक बीमारियाँ स्वार्थपरता आदि विकारों में कमी पाई गई है। तथा आत्म-विश्वास और सन्तोष में वृद्धि, सहनशक्ति, स्थिरता, कार्यदक्षता, विनोद प्रियता, एकाग्रता जैसे सद्गुणों की वृद्धि ध्यान के प्रत्यक्ष लाभ मिलते है।

वैज्ञानिकों का मत है कि ध्यान का प्रयोग उच्च रक्तचाप को कम करता है। डा. रावर्ट कीथ वैलेस और हर्बट वेन्सन ने उच्च रक्तचाप युक्त व्यक्तियों का ध्यान के पूर्व और ध्यान के बाद एक सजा अधिक बार उनका सिस्टोलिक और आटीरि ब्लड प्रेशर-रिकार्ड किया। ध्यान करने के पश्चात् उक्त रोगियों के रक्तचाप में महत्वपूर्ण कमी आंकड़े डा. रावर्ट कीथ वैलेस ने अपनी पुस्तक में लिखा है। कि ध्यान के आक्सीजन की खपत तथा हृदय की गति कम जाती है। इसके परिणाम स्वरूप रक्त में विद्युत अम्ल रूपी विष लैक्टेट काफी मात्रा में कम हो जाते है फलतः साधक को हल्की योग निद्रा आने है शरीर की प्रतिरोधक क्षमता में अभिवृद्धि से मनोबल बढ़ाने तथा अभीष्ट प्रयोजन को भली प्रकार पूरा कर सकने में ध्यान अपनी महत्वपूर्ण भूमि सम्पादित करता है।

मूर्धन्य मनोवैज्ञानिक द्वय फिलिप फर्गुसन और जान सी गोवान का निष्कर्ष है कि दिनों तक ध्यान करते रहने का व्यक्ति अपने वास्तविक स्वरूप को जान लेता है। ध्यान लगाया गया समय चक्रवृद्धि ब्याज सत्परिणाम देता है।

ध्यानयोग अब चिकित्सा विज्ञान में एक विधा रूप में प्रतिष्ठा पा चुका है। और भविष्य में इस माध्यम से असाध्य रोगों के उपचार और सम्पत्ति रोगों की रोकथाम की संभावना भी बनी है। कि ध्यान साधना का यह भौतिक पक्ष है। इससे न केवल जीवन शक्ति के अभिवर्धन तथा एकाग्रताजन्य संतुलित मनःस्थिति का लाभ मिलता है। विश्वव्यापी दिव्य सत्ता के साथ घनिष्ठता बना लेते और उसके साथ संपर्क साथ सकने वाले आत्मिक चुम्बकत्व का भी विकास होता है। ध्यान में यदि इस मार्ग पर चलते-चलते मनोनिग्रह लेकर मनोलय तक की स्थिति प्राप्त हो सकती है तथा समाधि का, आत्म-साक्षात्कार एवं ईश्वर दर्शन व लाभ मिल सकता है। ध्यानयोग का यही वास्तविक लक्ष्य है।


सृष्टि का नियन्ता व अधिपति कौन?

अनीश्वरवाद एवं शून्यवाद जिस जड़वादी मान्यता पर आधारित है, वह यही प्रतिपादित करती है कि इस दृश्यमान जगत् की संरचना में पदार्थ की ही प्रमुख भूमिका है। उन्हीं के परस्पर मिलन संयोग से यह सृष्टि बनी। किसी अभौतिक चेतन सत्ता का इस सृजन में कोई योगदान नहीं है। चार्वाक ने प्रत्यक्ष कर्त्ता के अभाव में अनुमाण प्रमाण को अमान्य ठहराया, वहीं नीत्से-ने नोसोल-नोगाँर्ड का उद्घोष कर ईश्वर के मर जाने का नारा बुलन्द किया। शून्यवादियों ने जागतिक घटनाओं को माया कहकर छुट्टी पा ली। कुछ सीमा तक साम्यवाद एवं विज्ञान के प्रत्यक्ष वाद ने भी इन प्रतिपादनों का समर्थन किया।

किन्तु यदि तनिक सूक्ष्म व्यापार पर दृष्टिपात करने पर इसमें हमें कुछ निश्चित विधि व्यवस्थाएं दिखाई पड़ेगी, जो मानने के लिए बाध्य करती हैं कि इसे बनाने व नियंत्रित करने वाली कोई नियामक सत्ता अवश्य है। क्रमबद्धता के नियम की ही तरह जीव-जन्तु, वृक्ष-वनस्पति अपने में एक विशिष्ट स्तर का ज्ञान संजोये होते हैं, कि फलने-फूलने का समय आ गया और उन्हें अब ऐसा करना चाहिए। ऐसा भी नहीं हैं कि संसार के सारे वृक्ष एक ही समय में फलोत्पादन करते हों। प्रत्येक वनस्पति का अपना एक निर्धारित समय होता है, उसी नियम समय में वह फूलती-फलती देखी जाती है। उन्हें इसका पता कैसे चलता है कि इसके लिए अनुकूल वक्त आ गया। प्राणियों में ईल मछली प्रायः जुलाई-अगस्त के महीनों में अंडे देती है। इसके लिए उसे लम्बी यात्रा तय कर नदी में आना पड़ता है। इसी प्रकार अन्य जीव जन्तु भी प्रजनन अपने निश्चित समय पर ही करते है। इन जन्तुओं को समय की सूचना कौन देता है। पृथ्वी अपनी कक्षा में अंश से झुकाव के बिना पृथ्वी में जीवन संभव न हो सकेगा, परिस्थितियाँ अनुकूल न बन सकेंगी। सूर्य जलता हुआ अग्नि पिण्ड है। जिसकी सतह का तापक्रम डिग्री सेंटीग्रेट है। पृथ्वी की दूरी सूर्य से इतनी ही निर्धारित है कि इसके अभीष्ट परिमाण की गर्मी और प्रकाश से वहाँ जीवन-व्यापार चलता रहता है। दूरी तनिक कम होती, तो पृथ्वी जल कर राख हो जाती और तनिक अधिक होने से हर वक्त बर्फ जमी रहती। इतना हीं नहीं, लगातार, बरसने वाली ब्रह्मांडीय किरणों से रक्षा के लिए सुरक्षा-कवचों की भी व्यवस्था है और दिन-रात व मौसम-परिवर्तन के लिए कक्षा एवं धुरी में उपयुक्त गतियों की भी। यह सब तंत्र सही-सही कैसे संचालित-नियंत्रित होते रहते है।, विज्ञान के पास इसका कोई उत्तर नहीं है।

इसी प्रकार जीव जगत और वनस्पति की एक अन्य विशेषता आकार संबंधी है। प्रत्येक वनस्पति और जन्तु का निर्धारण आकार प्रकार होता है यूक्लिप्टस और ताड के पेड़ सदा पतले-लंबे होते हैं उनमें शाखा-प्रशाखाएं कम होती है। संभव है इनसे यदि उनका भार बढ़ता तो वे अपना अस्तित्व न बचा पाते, आँधी-तूफान में गिर पड़ते। संसार का सबसे ऊंचा वृक्ष पैसिकोइया है, जो अमेरिका में पाया जाता है। इनमें भी शाखाएं कम होती है। जबकि मध्यम आकार के वृक्षों में प्रायः अधिक डालियाँ पायी जाती है। जन्तुओं में भी निवास और वातावरण के हिसाब से आकार की उपयुक्तता देखी जा सकती है। जीव विज्ञानियों के अनुसार जलचर और नभचरों की शरीर-आकृति यदि स्ट्रीम लाइण्ड नहीं होती तो शायद ही वे उस वातावरण में रह पाते और जल व वायु जैसे प्रतिरोधों की चीर कर आगे बढ़ने में सक्षम होते। इन्हीं को देखते हुए वायुयानों को वह शक्ल प्रदान की गई ताकि वायु का न्यूनतम अवरोध उस पर आरोपित हों। इसके अतिरिक्त एक अन्य महत्वपूर्ण बात जीव विज्ञानी बतानी है वह यह कि भ्रूणावस्था में कई सप्ताह तक सभी जन्तुओं की आकृति एक सी होती है, चाहे वह मानवी भ्रूण हो या घोड़े, कुत्ते, गाय अथवा बिल्ली के। अनेक सप्ताह बाद ही उनमें भिन्नता दृष्टिगोचर होनी आरम्भ होती है। इस संदर्भ में कभी ऐसा देखा-सुना नहीं गया कि मनुष्य के खरगोश पैदा हुआ हो अथवा गाय ने बिल्ली जनी हों। कुछ सप्ताहों की समानता के बाद भिन्नता प्रकट करने वाली यह कौन-सी प्रणाली हैं। जो रक्त पिण्ड से आरम्भ होकर त्वचा, अस्थि जैसे नितान्त भिन्न अवयव पैदा करता देती है। वैज्ञानिक इस संबंध में मौन है।

नियमितता भी सृष्टि का एक निश्चित नियम है। सूर्य-चन्द्र अन्यान्य ग्रह-नक्षत्र सभी समय के पाबन्द है। सूर्य निर्धारित समय पर उदित और अस्त होता रहता है। इसी प्रकार चन्द्र कलाओं का घटना-बढ़ना भी सदा निर्धारित क्रम से होता है। ग्रह-नक्षत्रों की गतियाँ भी नियत हैं। खगोलीय गणनाएं इनकी इसी नियमितता पर आधारित है। जिस दिन ये प्रमाद बरतने लगें सारा ज्योतिर्विज्ञान ही झूठा हो जाये।

इस प्रकार देखा जाये तो ज्ञात होगा कि पूरा विश्व-ब्रह्मांड एक निश्चित नियम-व्यवस्था में आबद्ध है। किसी अव्यवस्था है ही नहीं। जब व्यवस्था है, तो इसका कोई व्यवस्थापक भी होना चाहिए, क्योंकि इतनी बुद्धिमान गतिविधियाँ सम्पन्न हो भी गई-ऐसा मान भी लिया जाये, तो इनके नियन्त्रण के लिए कोई-न-कोई नियन्ता होना ही चाहिए, क्योंकि स्वचालित यंत्र−उपकरण भी बिना संचालक के

सही-सही काम नहीं कर पाते। आदि से लेकर अब तक के सृष्टि-नियम में किसी प्रकार का कोई व्यतिरेक न आना इसी का प्रमाण-परिचय प्रस्तुत करता है।

कार्य-कारण सिद्धान्त के अनुसार कोई भी कार्य बिना कारण के हो ही नहीं सकता। कणाद मुनि ने भी इसका समर्थन करते हुए कहा है कि “कारणाभवात् कार्य्याभावः” अर्थात् कारण के अभाव में कार्य संभव ही नहीं है। मनीषियों ने निमित्त कारण अथवा कर्त्ता के तीन लक्षण बताये है।-1-उत्पादन कारण का उत्तम ज्ञान, 2-इच्छाशक्ति एवं, 3-प्रयास।

इन तीनों के संयोग से ही कोई क्रिया सम्पन्न हो सकती है। कोई इंजीनियर भवन बनाना चाहता है, तो इसके लिए आवश्यक है कि उसे ईंट-गारे जैसी निर्माण सामग्री का भी ज्ञान भी हो, तभी उसमें भवन की इच्छा द्वारा भवन बन कर तैयार हो जाता है। इसे देखने वाला कोई यह नहीं कह सकता कि इमारत स्वभाव अथवा प्रकृति द्वारा अकस्मात् बन गई। भले ही उसने निर्माता को न देखा हो, पर इस संबंध में उसका निश्चित मत होता है कि इसके पीछे किसी-न-किसी कर्ता का हाथ है, किसी-न-किसी की इच्छा शक्ति जुड़ी है, जिसने इस संरचना के रूप में उसकी अभिव्यक्ति की है।

इस प्रकार यह प्रमाणित हो जाता है कि यह विश्व ब्रह्माण्ड भी ईश्वरीय सत्ता रचित है, क्योंकि जब एक छोटी इमारत निर्माता की इच्छा के बिना नहीं बन सकती तो यह कैसे माना जा सकता है, कि इतनी विशाल, सुन्दर, सुव्यवस्थित और सुसम्बद्ध रचना कर्त्ता व उसकी इच्छा के बिना बन गई। निश्चय ही इसके पीछे उसकी एक से अनेक बनने की आकाँक्षा रही होगी और उसी के फलस्वरूप यह सृष्टि बन पड़ी। अतः अनीश्वरवादियों का यह कथन कि इस सृष्टि का कोई स्रष्टा अथवा नियन्ता है ही नहीं निताँत भ्रमपूर्ण है। यह भला भाँति समझा लिया जाना चाहिए।


प्राणायाम एवं सोऽहम् साधना के फलितार्थ

अंग-अवयवों से समुचित काम लिया जाये, तो उनकी क्रियाशीलता बनी रहती है। यदि उन्हें निरर्थक पड़ा रहने दिया जाये अथवा क्षमता से काम लिया जाये, तो उनका स्वाभाविक शक्ति घटने लगती है। इसका परिणाम पीछे अहितकर होता चला जाता है।

हाथ-पैर से काम न लिया जाये, तो वे अपनी क्षमता गंवा बैठते है और जरा से कामों के लिए नौकर का सहारा लेना पड़ता है। पैरों से काम कम लिये जाये, तो वे जकड़ जाते हैं और सवारी की जरूरत पड़ती है। दूर तक पैदल चलना पड़े, तो दर्द होने लगता हैं और ऐंठन मचती रहती है, किन्तु यदि अभ्यास बनाये रहा जायें, तो अस्सी वर्ष से अधिक उम्र हो जाने पर भी बुढ़िया चक्की चलाती, सूत कातती रहती है। जिन अवयवों का अभ्यास बना रहता है, वे अपनी शक्ति गंवाते नहीं,, वरन् गतिचक्र चलते रहने से उसे बढ़ाते रहते हैं। विनोबा अस्सी के करीब हो गये, तो भी उनकी क्रिया शक्ति बनी हुई थी और दस मील नित्य पैदल चल लेते थे।

जो बात हाथ-पैर के संबंध में है, वही फेफड़ों के संबंध में लागू रहती है। नियम यह कि छाती को सीधी तनी रखा जाये और साँस ली जाये। छाती सीधी रखने से सीने के सभी भागों में पूरी हवा का आवागमन होता रहता है। किन्तु यदि झुककर बैठा रहा जाये, तो सिकुड़ने वाले हिस्से में पूरी हवा नहीं पहुँच पाती। छाती सिकुड़ने लगती है और आधे तिहाई हिस्से को निकम्मा पड़ा रहना पड़ता है। इसका फल यह होता है, कि जो हिस्सा खाली रहता है, उसमें दमा, क्षय, खासा आदि के कीटाणु जमा होने लगते है। अपने लिए गड्ढा बना लेते हैं और उनमें छिपे बैठे रहते हैं बीमारी का क्षेत्र बढ़ाते रहते हैं। झुक कर बैठने की आदत से कमर झुकने लगती है। कभी कमर के ऊपर का हिस्सा झुकने लगता हैं, कभी नीचे का। इस प्रकार चलने में आदमी कुरूप लगता है। पीछे लाठी का सहारा लेकर चलने की आदत बन पड़ती है। उसके बिना काम नहीं चलता। कम आयु में इस प्रकार कमर झुकने वाले लोगों में से अधिकाँश वे होते हैं, जिन्हें झुककर चलने या बैठने की आदत पड़ जाती है।

मिलिट्री में सामान्यतया चलना सिखाने में भी दोनों हाथ हिलाते हुए सीना तना हुआ लेकर चलना सिखाया जाता है। इससे फेफड़े मजबूत होते हैं और अधिक प्राणवायु मिलने पर चेहरे पर लालिमा बनी रहती है। दौड़ने का अवसर आने पर वे लम्बी दूरी तक उछलते चले जाते है। यदि यह आदत न रहें, तो उनका शरीर जल्दी थकेगा और दम फूलने लगेगा। ऐसे लोग सदा दौड़ की प्रतियोगिता में फिसड्डी रह जाते है।

साँस का एक काम और भी है कि जीव कोशिकाएं टूटती रहती हैं उनका मलवा साँस के द्वारा बाहर निकाल दिया जाता है। जब फेफड़े से शरीर को रक्त जाता है, तब वह शुद्ध और लाल होता है, किन्तु जब वापस लौटता है, तो उसके साथ गन्दगी भरी रहती है। साँस उस सारी गंदगी को निकाल कर बाहर कर देती है। रक्त में संचित हुई गंदगी ली गई साँस के साथ बाहर निकल जाती है। और फिर रक्त शुद्ध होकर लाल रंग में परिणत होता हुआ वापस लौटता है।

लम्बी गहरी साँस लेने के कितने ही लाभ है-रक्त शुद्धि, फेफड़े का सही संचालन,सीने का चौड़ा रहना, भीतर गन्दगी न जमने पाना आदि। गहरी साँस लेने पर यह विकृतियाँ सहज ही दूर हो जाती है। का आत्मा को आमंत्रित किया और बालक जी उठा। देवर्षि नारद ने कहा-लो राजन् तुम्हारा पुत्र जी उठा।

अपने पुत्र को जीवित देख कर राजा चित्रकेतु तथा महारानी कृतद्युति ‘हा पुत्र’ कह कर उसे अपनी छाती से लगाने दौड़े।

‘कौन पुत्र? -उस बालक ने कहा- देवर्षि ये लोग कौन हैं?’ बालक ने नारद से कहा।

“यह तुम्हारे ने कहा- “नहीं मैं जीवात्मा हूँ। शरीर ही पुत्र हो सकता है। सारे सम्बन्ध शरीर के ही है जहाँ शरीर से सम्बन्ध छूटा वहीं सब सम्बन्ध छूट जाते हैं। यह कर कर शरीर फिर निष्प्राण हो गया। चित्रकेतु का जैसा सारा मोहावरण नष्ट हो गया। वे पुत्र के शव का अन्तिम संस्कार संपन्न करके लौटे तो देवर्षि नारद ने कहा- अनात्म वस्तु में सम्बन्ध करना ही शोक का कारण है अतः किसी के लिये आसक्ति न करते हुए अपने कर्त्तव्य कर्मों को भली−भांति पूरा करते चलना ही संसार में सुखी रहने का सर्वोत्तम साधन है।


साधना से सिद्धि का मर्म

आध्यात्मिक साधनाएं व्यक्ति को पूर्णता ओर ले जाने के निमित्त की जाती है। इन साधनाओं का मूलभूत आधार है-आत्म समीक्षा। बिना इसके हवाई किले की तरह कोई भी साधना टिन नहीं सकती। अपने आपकी समीक्षा करना व्यक्तित्व के वर्तमान स्वरूप को समझना आध्यात्मिकता की दृष्टि से आवश्यक ही नहीं अनिवार्य भी है। क्योंकि इसी आधार पर त्रुटियों का संशोधन तथा न्यूनता की पूर्ति करना सम्भव है। इस आत्म-निरीक्षण का एक और भी पहलू है कि जो विशिष्टताएं-आत्मिक प्रगति के लिए आवश्यक है, उनका यदि विकास नहीं हुआ है तो उसकी आवश्यकता अनुभव करते हुए आत्मोत्कर्ष का प्रयास सम्भव हो सकेगा।

वस्तुतः मनुष्य के पास ऐसा बहुत कुछ है जो सदा अप्रकट और अविकसित ही बना रहता है। मस्तिष्कीय क्षेत्र की अनूठी क्षमताएं और अन्तः करण की विविध विशिष्टताएं ऐसी हैं जो हर किसी के पास न्यूनाधिकता में पाई जाती है। यदि आत्म-निरीक्षण की कला हस्तगत हो सके तो मनुष्य इन दिव्य केंद्रों का स्थान एवं स्वरूप समझ सकता है और उन्हें विकसित करने के लिए सब कर सकता है जो सुदृढ़ संकल्प शक्ति के सहारे निश्चित रूप से हो सकता है।

यदि लक्ष्य और आदर्श ईश्वर प्राप्ति जैसा उच्च हो तो इसकी प्राप्ति कर्मकाण्डों के बलबूते सम्भव नहीं। इसके लिए आन्तरिक परिष्कार और उत्कृष्ट चिन्तन-चरित्र अपनाने की आवश्यकता है। तद् विषयक जो कुछ परिवर्तन या विकास करना है, उसका स्वरूप सामने आने की बात तभी बनती है जब आत्म निरीक्षण का सिलसिला परिपूर्ण उत्साह के साथ चलाया जायें।

यह भ्रम जितनी जल्दी दूर किया जा सके उतना ही अच्छा है कि ईश्वर प्राप्ति के लिए अमुक कर्मकाण्ड ही सब कुछ है। अधिकाँश लोग इसी भ्रम में ग्रसित रहकर अपनी-अपनी मान्यताओं के अनुरूप पूजा-विधानों में संलग्न रहते और सोचते हैं कि ईश्वर के भी मनुष्य की भाँति चर्म चक्षु ही हैं। वह मात्र क्रिया-कृत्यों को ही देख पाता है। किसी का अंतरंग देखने या परखने की उसमें क्षमता नहीं है या है तो इसे महत्व नहीं देता और हेय व्यक्तियों को भी उनके कर्मकांडों जैसे बाह्य दिखावे से प्रभावित होकर अपने सिंहासन पर बैठा लेता है।

पापों के क्षमा होने या उल्टे-सीधे नाम रटने से सभी दुष्कृत्यों को अनदेखे करने जैसी बातें गल्प ही है। तीर्थाटन अरइि कृत्यों में भी यदि कोई चाहे तो दिशा-निर्देशन प्राप्त कर सकता है। पर पापों के नष्ट होने या कर्मफल के उलट जाने की बात सोचना प्रकारान्तर से ईश्वर की बड़ी व्यवस्था उलट जाने की दुराशा रखना है। परम सत्ता के दरबार में पुजारियों के साथ पक्षपात होने तथा बिना पुजारियों को दूध में से मक्खी की तरह निकाल फेंकने की उपेक्षा जैसा कोई विधान नहीं है। इस तथ्य को समझते ही तुरन्त यह समस्या आगे आती है। इस तथ्य को समझते ही तुरन्त यह अभ्यास करना चाहिए ताकि आत्म निरीक्षण के साथ आत्म सुधार का प्रयास भी चल पड़ें। इसकी अनिवार्य आवश्यकता है। इस क्षेत्र में कोई सस्ते उपचार-आत्म प्रवंचना के अतिरिक्त और किसी उद्देश्य की पूर्ति नहीं करते।

आत्म-निरीक्षण में सर्वप्रथम शरीर और आत्मा की भिन्नता अनुभव करने का प्रसंग आता है। इसके बिना वह भ्रान्ति बनी रहती है जिसे अध्यात्मक की भाषा में माया कहा गया है। माया का सार-संक्षेप इतना ही है कि चेतना अपने आप को मात्र शरीर मानती रहती है और उसके निर्वाह तक सीमित न रहकर उसे सजाने, मोटा करने, टप दिखाने में लगी रहती है। वासनाओं एवं अहंकार की पूर्ति को ही सफलता एवं प्रसन्नता का केन्द्र बिन्दु मान लिया है इतना ही नहीं शरीर के साथ संपर्क साधने वाले कुटुम्बी संबंधी मित्र परिचित ही इस शरीराभ्यास के क्षेत्र में घुस पड़ते है। इन्हीं सबको वैभववान बनाने के लिए इच्छाओं और चेष्टाओं का केंद्रीकरण हो जाता है। जीवन की अवधि और शारीरिक मानसिक शक्ति का आना इसी क्षेत्र में होता रहता है। कूप मण्डूक जैसी-गूलर के फल के भीतर रहने वाले भुनगों की तरह मनुष्य की स्थिति हो जाती है और आत्मा-परमात्मा के संबंध में कुछ गंभीर विचार तक नहीं कर पाता। फिर सुधार विकास की प्रक्रिया चले भी तो कैसे?

आत्मिक प्रगति का प्रथम चरण-आत्म-निरीक्षण जितना गंभीर और प्रखर होता है। उसी अनुपात से शरीर और आत्मा की भिन्नता का वास्तविक आभास होती है अन्यथा तोतारटन्त की तरह आत्मा-परमात्मा की चर्चा का बाल विनोद-चलता रहता है।

माया के बंधन शिथिल होने या कटने का एक मात्र उपाय है कि अपनी सत्ता की स्थिति को समझा जाये। यह अनुभूति विकसित हो सके तो ही आत्मा का महत्व एवं हित सूझ पड़ता है और शरीर के पक्ष में झुकी हुई सारी प्रकृति को सन्तुलित करने का मन होता है। शरीर संसार में अनुरक्त रहता है। और शरीर के पक्ष में झुकी हुई सारी प्रकृति को सन्तुलित करने का मन होता है। शरीर संसार में अनुरक्त रहता है और आत्मा की प्रायः उपेक्षा करता है। यह सोच तक नहीं पाता और उसकी भी कुछ माँग, पुकार, सुखा एवं आवश्यकताएं भी है। इस प्रकार की अनुभूति तभी न्यौछावर किए रहने के ढर्रे में परिवर्तन किया जाये। आत्मा को परमात्मा का सन्देश सुनने और आह्वान को अंगीकार करने की बात अन्तरंग की गहराई तक प्रवेश कर जाती है-तभी यह सूझ पड़ता है कि शरीर की तरह के निमित्त भी कुछ किया जाना चाहिए।

क्या किया जाना चाहिए? इसके उत्तर में दो तथ्य उभर कर सामने आते है। यह एक कि आत्मा गौरव के अनुरूप, व्यक्तित्व के ढलने में जो त्रुटियां चल रही है उनका कठोरतापूर्वक नियमन किया जाये। इसी को तप कहते है। इस संदर्भ में कठोरता बरतनी होती है अन्यथा अभ्यस्त दुष्प्रवृत्तियाँ सहज पीछा नहीं छोड़ती। तपश्चर्या का अभिप्राय शरीर को कष्ट देना नहीं है। इसका वास्तविक अर्थ है ऐसा मनोबल विकसित करना जो दुष्प्रवृत्तियों से मल्लयुद्ध करके उन्हें परास्त कर सके। इसी के संशोधन पक्ष कहते है।

इसके अतिरिक्त दूसरा पक्ष श्रेष्ठता के अभिवर्धन का है। यह आत्म-विश्वास एवं आत्म-बल के आधार उपर्युक्त क्रम बना लेने से भी सम्भव हो सकता है।

इसके लिए सत्प्रवृत्तियों के समन्वय द्वारा ईश्वर की उपासना सहायक होती है। इसे ही योग कहते है। विराट् ब्रह्म से अपने आप को जोड़ने ही योग है। क्षुद्र स्वार्थपरता के-संकीर्ण बन्धनों को शिथिल करने का अभ्यास करना ही योग है। ऐसे साधक का दृष्टिकोण समता और क्रिया कल्याण सर्वजनीन ति साधन का होता है इसके लिए कर्म-ज्ञान-भक्ति किसी भी मार्ग अथवा इनके समन्वय का अभ्यास प्रारम्भ किया जा सकता है। यही है यथार्थवादी आत्मिक प्रगति का राजमार्ग जिसे अपनाकर कोई भी साधक पूर्णता के लक्ष्य की ओर बढ़ सकता है। यही साधना से सिद्धि का मर्म है। इस प्रक्रिया में किसी भी प्रकार के शार्टकटों की कोई गुँजाइश न अब है, न कभी रहेगी। जो भी व्यक्ति महापुरुषों-सिद्धपुरुषों- महात्माओं की ढूंढ़ खोज मात्र सिद्धि प्राप्ति हेतु करते हैं, उनके सही मार्गदर्शन यही है कि वे सर्व प्रथम इस प्रक्रिया का ककहरा पढें आत्म-शोधन की प्रक्रिया समझें, उसे अपनायें। इतना बन पड़ने पर ही आध्यात्मिक प्रगति की वह कुँजी हाथ लग सकती है जो व्यक्ति को पूर्ण पुरुष बनाती है।


Quotation

इच्छाओं को त्यागने का अर्थ यह नहीं है कि महानता के लक्ष्य तक पहुँचने की उमंगों को भी गंवा बैठा जाये।


शरीर तथा मन चुस्त एवं तनाव रहित रहें!

योग एक ऊंची आध्यात्मिक प्रक्रिया का नाम है जिसमें आत्मसत्ता को परमात्मा सत्ता के साथ जुड़ने का स्वयं को महत् चेतना में विसर्जित कर तद्रूप बनने का प्रयास किया जाता है। इस शब्द का पिछले दिनों इस सीमा तक दुरुपयोग हुआ है कि यह योग से बदल कर योगा हो गया एवं पश्चिम जगत में एक फैशन के रूप में प्रचलित हुआ। देव संस्कृति के महत्वपूर्ण प्रतिपादनों को विश्वभर में व्यापक कर जन-जन तक पहुँचाना एक पुण्य है किंतु जब यही विकृति रूप में पहुँचे पढ़े लिखे समझकर व्यक्ति भी जब मात्र नेति धौति, वस्ति, बंध, मुद्राओं को समग्र योग का पर्याय मानने लगें तो ऐसे समूह के दिमाग की सफाई की आवश्यकता है।

गत दो दशकों में बायोफिडबैक प्रक्रिया के अनुसंधान ने एक महत्वपूर्ण आयाम योग चिकित्सा में जोड़ा है कि मन को साधना व अपनी गतिविधियों को नियंत्रित कर पाना संभव है। इस पर जो अविश्वास करते थे, उनके लिए बायोफीडबैक यंत्र विविध रूपों सामने आ गए जिसे अब भली प्रकार दर्शाया जा सकता है कि शरीर क्रियाओं में परिवर्तन क्यों व कैसे लाया जाता है?

शरीर शास्त्रियों को जब क्रियायोग की यह विशेषता ज्ञात हुई, तो उनने इनका परीक्षण रोगियों पर आरंभ किया। किरोव स्टेट यूनिवर्सिटी, अलमाअता (यू.एस.एस.आर) के चिकित्सा शास्त्रियों ने इसके लिए कुछ उच्च रक्तचाप के मरीजों को चुना और बायोफीड बैक यंत्रों के माध्यम से आत्म नियंत्रण द्वारा अपने रक्तचाप को नियंत्रित करने का उन्हें प्रशिक्षण दिया। कुछ दिनों के प्रशिक्षण के उपरान्त वे इसे भली-भाँति सीख गये और अपनी इच्छानुसार इसे नियंत्रित करने में निष्णात हो भी गये, किन्तु प्रशिक्षकों ने देखा की इस ऐच्छिक नियंत्रण से उन्हें क्षणिक लाभ पहुँचाया था। नियंत्रण हटते ही स्थिति पुनः पूर्ववत् हो जाती। अस्तु उनने इसके साथ ध्यान परक योग क्रियाओं को भी सम्मिलित कर दिया, तो पाया कि हाइपर टेंशन के रोगी कम से कम एक वर्ष के लिए अपनी तकलीफ से मुक्ति पा लेते है। इस संदर्भ में “योगाएण्ड बायोफीडबैक इन दि मैनेजमेंट ऑफ हाइपरटेंशन” नाम शीर्षक से “दि लैन्सेटनामक” पत्रिका में अभी कुछ दिनों पूर्व एक लेख छपा था जिसमें योगाभ्यास के विभिन्न शरीर-क्रियाओं व प्लाज्मा कार्टीसाल जैसे रक्त स्रावों पर प्रभावों की चर्चा की गई थी, कि आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के साथ यदि इस प्राचीन स्वास्थ्य संवर्धन पद्धति को भी जोड़ा ज सकें, तो इसकी लाभकारी परिणति और भी अनेक गुनी बढ़ी जायेंगी।

अब तो इससे संबंधित बायो एनर्जेटिक्स नामक एक स्वतंत्र उपचार पद्धति का विकास हो गया है। इसके अतिरिक्त जर्मनी के डा. इड़ा राल्फा ने भी एक नई चिकित्सा प्रणाली आरम्भ की है, जो राल्फिंग पद्धति कहलाती है। उपचार विज्ञान की इन दोनों विधाओं में मूल रूप से अष्टाँग योग के आसनों पर ध्यान केन्द्रित कर रुग्णों को आरोग्य-लाभ देने की एक अन्य शाखा में मनः कायिक रोगियों को आटोजैनिक ट्रेनिंग द्वारा रिलेक्सेशन (शिथिलीकरण) का अभ्यास कराया जाता है। इससे भी मूल भूमि का यौगिक क्रियाओं की ही होती है।

स्वास्थ्य-संरक्षण की इस विधा को देश विदेश के अनेक चिकित्सकों-विद्वानों ने स्वयं पर भी आजमाया और उसे लाभों को अनुभव किया है। इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइन्सेज, बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी के डायरेक्टर एवं “ए मेनुअल ऑफ साइंस एण्ड फिलासॉफी ऑफ योगा” के मूर्धन्य लेखक के0 एन॰ उडुपा अनेक प्रकार की मनोकायिक बीमारियों के शिकार थे। टै्रक्वलाइजर्स का सेवन करते रहे पर शिवाय सुस्ती के इससे और कोई लाभ नहीं मिला। किसी योग विशेषज्ञ की सलाह से उनने योगासनों का अभ्यास आरम्भ किया। उनके आश्चर्य की सीमा न रहीं जो फायदा महीनों के औषधि सेवन से नहीं रहीं। जो फायदा महीनों के औषधि सेवन से नहीं हुआ वह एक सप्ताह के यौगिक अभ्यास में ही अनुभव होने लगा। अभ्यास जारी रखा। शिकायतें धीरे-धीरे कम होती गयी और समाप्त हो गयी। इसके अतिरिक्त उन्हें जो अन्य लाभ प्राप्त हुए, वह थे- कार्यक्षमता में बढ़ोत्तरी तथा बुढ़ापे के लक्षणों यथा बालों का झड़ना-उनका श्वेत होना, त्वचा पर झुर्रियाँ पड़ना आदि में घटोत्तरी। इन उपलब्धियों से उनके शोध क्षेत्र में परिवर्तन आगया वे अब वनौषधियों व ध्यानयोग के शरीर विज्ञान पर संभावित प्रभावों का अध्ययन करने लगें। उनका कहना है कि उन्हें जो सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि योगाभ्यास से प्राप्त हुई, वह थी मन-मस्तिष्क की ताजगी।

इस विषय के निष्णातों का कथन है कि व्यायाम और योगाभ्यास में एक मूलभूत अन्तर है कि व्यायाम स्थूलतापरम होता है, जबकि योगासन सूक्ष्म क्रियापरक। इस अन्तर के कारण ही दोनों से मिलने वाले लाभों में व्यतिरेक दिखाई पड़ता है व्यायाम में एक ही क्रिया की आवृत्ति बारंबार होती है, तथा यह अधिक थकाने वाला होता है, तथा यह उपभोग भी अधिक होता है। इससे बाह्य शरीर संगठन सुन्दर क्रिया और अंतःस्रावी ग्रन्थियों को प्रभावित करने का प्रश्न आता है, वहाँ यह अक्षम साबित होता है, जबकि दूसरी ओर योगाभ्यासों से स्थूलता तो नहीं बढ़ती किन्तु अंतःस्रावी ग्रन्थियों को नियंत्रित कर यह शरीर-फिजियोलॉजी को सुव्यवस्थित बनाये रहता है, किन्तु अंतःस्रावी ग्रन्थियों को नियंत्रित कर यह शरीर-फिजियोलॉजी को सुव्यवस्थित बनाये रहता है, फलतः व्यक्ति हर वक्त स्फूर्ति का एहसास करता है। इसमें ऊर्जा उपभोग भी न्यूनतम होता है, क्योंकि योगासनों में एक ही क्रिया की पुनरावृत्ति के स्थान पर शरीर को एक निश्चित अवधि तक अवस्था विशेष में रखा जाता है, जिससे शारीरिक-मानसिक शक्ति का संरक्षण होता है। सामान्य कसरत से ऐच्छिक माँस-पेशियां में रक्त प्रवाह बढ़ता है, जबकि यौगिक क्रियाएं उन समस्त अंग-अवयवों को प्रभावित, उत्तेजित करती हैं, जो प्राणदायी हैं। रक्त प्रवाह भी उनमें बढ़ाती है। इस प्रकार प्राणायाम से यदि फेफड़ों में रक्त-संचार बढ़ता है, तो सर्वांगासन से अंतःस्रावी ग्रन्थियों का रक्त-प्रवाह तेज होता है। इस तरह हम देखते हैं कि साधारण योग-क्रियाओं द्वारा अंतरंगों को सीधे प्रभावित कर उनकी सक्रियता को आसानी से बढ़ाया जा सकता है। फिर भी इन सभी को उचित मार्गदर्शन में किया जाना चाहिए।

ज्ञातव्य है कि शरीर-क्रिया का आयु से गहरा संबंध है। यदि आन्तरिक अवयव ठीक रहें, वे सुव्यवस्थित ढंग से काम करते रहें, तो स्वास्थ्य उत्तम बना रहता है, जिसका सीधा प्रभाव आयुष्य पर पड़ता है। इसके नियमित अभ्यास से अनेकों ने आयु बढ़ायी है। इन्हीं में से एक इंग्लैण्ड के प्रख्यात पत्रकार चार्ल्स हेनरी अर्नाल्ड। सन् 1996 में 110 में वर्ष की आयु पूर्ण कर जीवेम् शरदः शतम् के श्रुतिवचन को सार्थक करते हुए उन्होंने महाप्रयाण किया। इस आयु में भी उनका स्वास्थ्य, याददाश्त, आँखों की रोशनी सामान्य व्यक्ति से अच्छे थे। बिना किसी व्याधि के कष्ट के वे चिरनिद्रा में सो गए।

इन दिनों तनावजन्य व्याधियों का बाहुल्य है। चिकित्सा वैज्ञानिकों का मत कि ये प्रायः से 40 से 50 वर्ष की आयु में होती देखी जाती है। इस अवधि में रक्तचाप,रक्तावरोध, मधुमेह, मोटापा, पेप्टिक अल्सर, पित्ताशय व गुर्दे की पथरी का शिकार हो कष्ट पाता व मृत्यु को प्राप्त होता है। यदि इस स्थिति के आने के पूर्व ही योग विज्ञान के प्रचलित अनुशासनों का अवलम्बन लिया जा सके तो स्वास्थ्य को अक्षुण्ण बनाये रखना संभव है। योग उपचार के रूप में एक वैकल्पिक चिकित्सा पद्धति को अपनाया जा सके तो लम्बे समय तक निरोग रह जीने का आनन्द लिया जा सकता है।


दैवी अनुकम्पा कैसे व किन्हें मिलती है?

दैवी अनुग्रह किन्हें प्राप्त होता है।? सूक्ष्म सत्ताएं किन पर अनुकम्पा बरसाती है। यह जानने से पूर्व यह तथ्य भली भाँति समझ लेना चाहिए कि पुरुष महामानव मात्र उत्कृष्ट चरित्रवान, संयमी, तपस्वी संतोषी ओर परमार्थ परायण के साथ ही संबंध जोड़ते है। अपनी अति महत्वपूर्ण तप-सम्पदा क एक भाग देकर अनुग्रहीत को इस योग्य बनाते हैं कि वह निजी सामर्थ्य कम पड़ने पर भी उस अनुदान के सहारे पुण्य परमार्थ के निमित्त कोई बड़े कदम उठा सकें। बढ़-चढ़ कर काम कर सकें। प्रतिकूलताओं के बीच रहकर भी यशस्वी हो सके॥ बड़े त्याग बलिदान करके असंख्यों के लिए मार्गदर्शन बन सकें। जहाँ ऐसा कुछ घटित होता दिखे तो समझना चाहिए कि किसी तपस्वी सिद्धपुरुष की अनुकंपा उन्हें उपलब्ध हुई है। व्यक्तिगत भौतिक सफलताएं पितर आत्माओं के अनुग्रह से प्राप्त हुई समझी जा सकती है। दृश्य रूप में सामान्य व्यक्तियों को न सिद्ध पुरुष, न पितर दिखाई देते है। न ही अपने अस्तित्व का वे कभी परिचय देते है।

सिद्धपुरुषों को सूक्ष्म शरीरधारी ऋषि कहना चाहिए। योगी तपस्वी जब तक स्थूल शरीर धारण किये रहते है। तब तक उन्हें ऋषि कहते है। जब वे स्थूल शरीर की अपेक्षा सूक्ष्म शरीर में रहने लगते हैं तब वे दिव्य पुरुष बन जाते है। इन्हीं को सिद्ध पुरुष भी कहते है। इन्हें देव ओर मनुष्य की मध्यवर्ती स्थिति में रहने वाला समझा जाता है। साधारणतया वे अदृश्य ही रहते है। पर आवश्यकता पड़ने पर स्थूल काय कलेवर भी वे धारण कर लेते है। जिस शरीर से तप किया और सिद्ध पाई है, वह उन्हें प्रिय भी लगता है और उसे प्रकट करना भी सरल पड़ता है। इसलिए जब कभी किन्हीं को उनका दर्शन होता है तो वही काया सामने आती है। उतनी ही वय दृष्टिगोचर होती है जितनी में कि उन ने स्थूल शरीर का सूक्ष्मीकरण किया था। इस परिवर्तन के दोनों ही स्वरूप हो सकते हैं, एक यह कि अवधारित शरीर को उसी प्रकार अलग कर दिया जायें, जिस प्रकार सर्प केंचुली छोड़कर नई त्वचा वाली स्फूर्तिवान काया का उपयोग करता है। छोड़ा हुआ शरीर नष्ट भी किया जा सकता है। ओर ऐसा भी हो सकता है कि स्थूल का धीरे धीरे परित्याग करते करते स्थिति मात्र उतनी ही रहने दी जाये जिसमें कि सूक्ष्म ही शेष रहें। तत्वतः सिद्ध पुरुष सूक्ष्म शरीर धारी ही होते हैं आवश्यकतानुसार कभी कभी वे स्थूल शरीर से भी प्रकट होते है। ऐसा विशेषतया तब होता है जब उन्हें किसी या किन्हीं शरीर धारियों के साथ संपर्क बनाने वार्तालाप करने की आवश्यकता होती है।

प्रकट होना या न होना यह पूर्णतया उनकी अपनी इच्छा पर निर्भर है। किसी के आग्रह अनुरोध का उन पत्र कोई दबाव नहीं पड़ता। कारण कि सिद्ध पुरुष मात्र कुछ उच्च उद्देश्यों की पूर्ति को ही ध्यान में रखते हैं जब कि सामान्यजन कौतुक कौतूहल देखने या चमत्कारों का रस लेने, मनोकामना पूरी कराने के फेर में हरते है। इस स्तर की निकृष्ट मनोभूमि के दर्शन अभिलाषा में भी घोर स्वार्थ ही भरा होता है। उसे वे कुचक्र भर समझते हैं और अपने को उस जाल में फंसने से स्पष्ट इन्कार कर देते हैं। उन्हें मात्र उन्हीं के सम्मुख प्रकट होने के उपयोगिता प्रतीत होती है, जिन्हें महत्वपूर्ण परामर्श देने पर उसकी पूर्ति हो सकने की पात्रता परिलक्षित होती है। कोई अपने बेटी को कुपात्र वर के हाथों जान बूझ कर नहीं सौंपता।

फिर दिव्य दर्शी आत्माएं अपने अत्यन्त कष्ट पूर्वक कमाया हुआ तप किसी की चाहना भर से प्रभावित होकर देने के लिए क्योंकर सहमत हो सकती है।

यों सिद्ध पुरुषों का शरीर सूक्ष्म होने के कारण उन्हें आकाश गमन की सिद्धि होती है। वे इच्छानुसार चाहे जिस क्षेत्र या स्थान में तत्काल जा पहुँच सकते है। फिर भी वे पतंग की तरह नहीं उड़ते फिरते। किसी एक या किन्हीं स्थानों को अपने लिए नियत करते है। जहाँ शक्ति संचय के लिए वे तप करते रहते हैं, जो स्थूल शरीर धारियों के विधि विधानों से सर्वथा भिन्न होता है।

सूक्ष्म शरीर तन्मात्राएं जुड़ी होती है। शब्द, रूप, रस, गंध स्पर्श में सूक्ष्म शरीर को भी आसक्ति हो सकती है। यह कामनाएं प्रकारान्तर से बन्धन में बाँधती और विशालता को संकुचित करती है। इसलिए उन्हें भी उसी प्रकार काटना पड़ता हैं जैसे कि स्थूल से वासना, तृष्णा के लोभ मोह के बंधन बंधते हैं ओर समुन्नत स्तर तक व्यक्तित्व को नहीं पहुंचने देते। उसी प्रकार सूक्ष्म शरीर धारियों के लिए पंच तन्मात्राओं के बंधन जकड़ते तो हैं और अधिक ऊंची आत्मिक स्थिति पर अग्रगामी नहीं बनने देते। एकाग्रता को चंचलता में बदलती है। ऐसी स्थिति में वे देवात्मा बनने की स्थिति में नहीं पहुँच पाते। इसलिए तप का आश्रय उन्हें भी लेना पड़ता है अपूर्णताओं को पूर्णता में विकसित करने के लिए। इसलिए उन्हें भी अपने लिए साधना हेतु उपयुक्त स्थान चुनना पड़ता है।

स्थान चयन में उन्हें दो तथ्यों को ध्यान में रखना पड़ता है। एक यह कि वह कोलाहल रहित हों। प्रकृति की स्वाभाविक निस्तब्धता में किसी कारण विक्षेप न पड़ता हों। दूसरे यह कि जब भी सूक्ष्म शरीर को स्थूल आकार में बदलना पड़े तब उसके लिए आवश्यक ताप और आहार उपलब्ध हों सके। इसके लिए गुफाएं उपयोगी पड़ती है। वे पर्वतों के फैलने सिकुड़ने में बन जाती हैं उनमें से कितनी ही ऐसी भी होती है। जिनमें सूक्ष्म शरीर धारी ही स्थूल शरीर वाले प्राणी भी शीतकाल तन्द्रित स्थिति में रहकर गुजार सकें।

कुछ दशकों पूर्व देवात्मा हिमालय के यातायात वाले स्थानों के समीप की गुफाओं में ऐसी आत्माएं करती थीं तब यात्रियों की धूम-धाम नहीं थीं। मार्ग कच्चे ओर आगम्य थे। इसलिए दुस्साहसी आत्मवान ही उस क्षेत्र की यात्रा पर सिर पर कफर बाँधकर चलने जैसी मनोभूमि बनाकर निकलते थे। पर अब वैसा बिल्कुल भी नहीं हैं वाहन दुर्गम-मार्गों पर चलने लगे है। यात्रियों की संख्या हर वर्ष कई गुनी हो जाती है। इन सब के कारण वातावरण में कोलाहल बढ़ता ही है। साधारण स्तर के व्यक्तित्वों का चिन्तन चरित्र भी उस क्षेत्र को प्रभावित करता है। साधनारत सिद्ध पुरुषों को उसमें घुटन अनुभव होती हैं फलतः वे उन स्थानों को छोड़कर सघन वनों में ऊंचे पर्वतों में इसलिए चले जाते हैं कि उन्हें मानव संकुल से उत्पन्न असुविधा का सामना न करना पड़ें अब यदि उनकी उपस्थिति का पता चल सकें तो खोजी को ऐसे क्षेत्रों में पहुँचना पड़ेगा जो सर्व सुलभ नहीं है। इस कारण अब वह दूरी बहुत बढ़ गई है। जिसको कभी सरलतापूर्वक पार किया जा सकता था ओर सिद्ध पुरुषों से संपर्क साधा जा सकता था। खोजी वर्ग के लोग भी अपनी जीवट और तितीक्षा की दृष्टि से बहुत दुर्बल रहने लगे है। भौतिक लाभ के लिए सिद्ध पुरुषों का संपर्क कुछ विशेष लाभदायक नहीं होता। आत्मिक प्रगति की अभिलाषा अब किन्हीं बिरलों में ही देखी जाती है। ऐसी दशा में उन्हें आपस में मिलाने वाले आधार ही एक दूसरे से प्रायः विपरीत स्तर के हो जाने पर दोनों ओर से ऐसे प्रयत्न नहीं होते कि सामान्य साधकों ओर सिद्धपुरुषों संभव हों। सिद्धपुरुष परमार्थ प्रयोजनों के लिए उपयुक्त उच्चस्तरीय आत्माओं को तलाशते है। जबकि कौतूहल देखने की मनोभूमि वालों को मुफ्त के ऐसे वरदान अनुदान चाहिए जो उन्हें सम्पन्न, समृद्ध युवक, यशस्वी अधिकारी, विजयी जैसी लौकिक सफलताएं मात्र दर्शन नमन के बदले दे या दिला सकें। अन्तर बहुत बड़ा हो गया हैं यही कारण हैं कि पुरातन काल में साधकों और सिद्धों के जो संयोग बनते थे वे अब असम्भव स्तर के बन गये है।


चेतना का सर्वोच्च आयाम एवं उसकी प्राप्ति

मानव जीवन को स्रष्टा का सर्वोत्तम उपहार कहा गया है। इस निमार्ण में परमात्मा ने अपना सारा कला-कौशल संजो दिया है। प्राणियों में इसके समकक्ष और कोई नहीं है। उसे विशिष्ट काया, मन, बुद्धि, प्रतिभा, सुविधा सभी कुछ उपलब्ध है। विकास क्रम में भी वह समस्त जीवधारियों से आगे है। इतना सब कुछ होने पर भी अभी मनुष्य का विकास अधूरा रह गया है। उसके पास बुद्धि उच्चतम स्थिति तक पहुँचाने के लिए पर्याप्त नहीं है। सामान्य बुद्धि के रहते वह सृष्टि के मुकुटमणि के शीर्षस्थ पद से सम्मानित नहीं हो सकता। मन के जिस धरातल पर वह आज खड़ा है। उससे भी अधिक उच्चस्तरीय चेतना की परतें उसके अन्तराल में विद्यमान हैं जिन्हें अब तक कुरेदा नहीं गया है। पूर्णता की प्राप्ति के लिए उसे मन के उच्चतर धरातल अतिमानसिक चेतना की ओर छलाँग लगाना होगा जिस पर पहुँच कर मनुष्य सर्वज्ञ बन जाता है। मानव से अतिमानव, महामानव, पुरुष से पुरुषोत्तम बनना, यही उसके विकास की अगली मंजिल है।

परमेश्वर के दस या चौबीस अवतारों की मान्यता में मत्स्य, कच्छप, वाराह, नृसिंह, वामन से लेकर क्रमशः कलाओं का बढ़ते जाना और मर्यादा पुरुषोत्तम राम को बारह कलाओं वाला, पूर्ण पुरुष कृष्ण को सोलह कलाओं वाला माना जाना यही बताता है। कि अवतारों में भी विकास क्रम के अनुरूप स्तर बढ़ता चला आया है। बुद्ध को बीस कलाओं का तथा उनके उत्तरार्द्ध निष्कलंक, प्रज्ञावतार को चौबीस कलाओं वाला निरूपित किया गया है। समस्त कलाएं चौंसठ मानी गई हैं। उनमें से अवतारों का विकास अभी आँशिक रूप में ही हुआ है। जो होना शेष है उसमें अभी यह प्रगतिशीलता का क्रम चलता ही रहेगा।

मनुष्य के बारे में भी यही बात है। आदिम काल में उसकी काया भले ही अधिक परिपुष्ट रही हो पर वह चेतना की दृष्टि से निश्चय ही पिछड़ा हुआ रहा होगा। अब उसकी समझदारी, साधना सम्पन्नता और कला के रूप में प्रकट होने वाली भाव-सम्वेदना पहले की अपेक्षा कहीं अधिक है। यह प्रगति क्रम भविष्य में भी तब तक चलता रहेगा जब तक कि पूर्णता के लक्ष्य तक पहुँचने की बात बन न जायें।

मानव की सर्वतोमुखी प्रगति का कल्पना चित्र जो आप्त पुरुषों ने खींचा है। उसे एक शब्द में देवता कहा गया है। यही उसकी विकसित अवस्था है। वैदिक ऋषि का उद्घोष है- कृधि यमा देववन्तम्। अर्थात् विकास में हमें दिव्यता उपलब्ध करनी हैं, देवता बनना है। दिव्यता का मूर्धन्य स्वरूप देवताओं में मिलता है। कहते हैं कि देवता स्वर्ग में रहते हैं। वे श्वेत वर्ण होते है। तथा अजर अर्थात् जरा रहित प्रौढ़ परिपक्व रहते हैं। वे अमृत पीते और अमर रहते हैं। काया से प्रौढ़, सुन्दर, युवा, स्वस्थ, परिपुष्ट एवं सौंदर्य सज्जित होता है। उनका व्यक्तित्व धवल, प्रखर एवं परिपक्व होता है। वे समूचे अन्तरिक्ष में उड़ते और कहीं भी जा पहुंचने की क्षमता रखते हैं। श्रेष्ठता का समर्थन सहयोग करना उनका रुचिकर विषय और स्वभाव होता है।

मनुष्यों में जिनकी भावनाएं सदा दूसरों को समुन्नत सुसंस्कृत देखने को उमंगती रहें, जिनकी गतिविधियाँ सत्प्रवृत्तियों के सम्वर्धन में निरत रहें उन्हें दवे स्वभाव का अधिष्ठाता कहा जा सकता है। सद्भाव, सम्पन्न, उदार, सेवाभावी, परमार्थ परायण व्यक्ति इसी वर्ग में गिने जा सकते है। जिनकी आत्मिक विभूतियाँ, भौतिक सम्पत्तियाँ उत्कृष्टता की समर्थक आदर्शवादिता में सहयोगरत हों, उन्हें देव-प्रकृति का कहा जा सकता है। दैवी ज्योति से सम्पन्न ऋतम्भरा प्रज्ञा की प्रभा से देदीप्यमान आत्माओं की संज्ञा ही देव है। दिव्यता की इसी कोटि में पहुँचने पर आत्म मानवी उत्कर्ष की चरम सीमा पर पहुँची मानी जा सकती है। जबकि भौतिक विकासवादियों की मान्यता है कि वर्तमान मनुष्य विकास की चरम अवस्था है। उनकी भौतिकवादी बुद्धिमत्ता यह स्वीकार करने की स्थिति में नहीं हैं कि इसके आगे भी मानवी विकास और परिष्कार की संभावनाएं विद्यमान है और वह अपनी वर्तमान प्रवृत्तियों पर विजय प्राप्त करके महामानव बन सकता है। डार्विन की विकासवादी मान्यता ही उनके गले उतरती है। जिनने अपनी पुस्तक “द ओरिजन ऑफ स्पेशीज” में कहा है कि मनुष्य बन्दर की औलाद हैं देवताओं की संतान न होकर पशुयोनि से विकसित हुआ है। अतः पाशविकता उसके भीतर जन्मजात रूप से विद्यमान है। इसके साथ ही उनने “सरवाइवल ऑफ दी फिटेस्ट” में यह भी कहा है कि अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए प्राणियों के मध्य संघर्ष छिड़ा हुआ है और इस संघर्ष में वही जीवित बचेगा जो शक्तिशाली होगा। मनोविज्ञान फ्रायड ने भी मनुष्य को मूल प्रवृत्तियों का गुलाम बताकर प्रकारान्तर से डार्विन की उक्त मान्यता का ही समर्थन किया था। इन मान्यताओं ने न केवल मनुष्य से उसका देवत्व छीन लिया वरन् उसे नर-पशु भी बना दिया।

उपरोक्त मान्यताओं का खण्डन करते हुए प्रख्यात मनीषी डिजराइली ने अपनी कृति “आदमी बन्दर है या देवता के पक्ष में अधिक निकट है। मेरा स्वयं का निर्णय देवता के पक्ष में है न कि डार्विन के पशु-मानव के पक्ष में। महर्षि अरविंद ने भी उक्त मान्यताओं को निराधार बताया है। उनका कहना है कि स्रष्टा के निर्माणों में मनुष्य ही सबसे श्रेष्ठ प्राणी है। ईश्वर का अंशधर बीज रूप में सन्निहित है। यद्यपि न उसका सबसे बड़ा यंत्र है किन्तु इससे भी सूक्ष्मतर एवं सूक्ष्मतम शक्तिशाली यंत्रों की संभावनाएं उसके भीतर विद्यमान हैं। उन शक्तियों को जाग्रत और विकसित करके वह देवता भी बन सकता है और स्वाधीन भी हो सकता है। चेतना के आकाश में ऊपर उठकर वह विकास-क्रम में अति मानस सुप्रामेण्टल अवस्था को प्राप्त करके अतिमानव बन सकता है। इतना ही नहीं वह स्वयं पूर्णता को प्राप्त कर सम्पूर्ण मानव जाति का आध्यात्मीकरण कर सकने में भी समर्थ हो सकता है।

श्री अरविन्द ने विकासवाद का समाधान वेदान्त के आधार पर प्रस्तुत करते हुए कहा है कि मनुष्य ही वह चिंतनशील प्रयोगशाला है जिसमें से प्रकृति अतिमानव अथवा देवता उत्पन्न करने में लगी है। किन्तु मनुष्य स्वयं सोचने, विचारने ओर निर्णय करने की क्षमता वाला प्राणी है। उसे विवेक करने की क्षमता वाला प्राणी है। उसे विवेक बुद्धि का अनुपम उपहार जो मिला है, अतः उसका उपयोग करते हुए उसे अगले विकास की प्रक्रिया के साथ सहयोग करना पड़ेगा। पंचभौतिक तत्वों से जीवन, जीवन से मन उत्पन्न हो चुके है। अब मन के भीतर से अतिमन-सुपरमाइन्ड प्रकट होने वाला है। उसके विकास का यही अगला सोपान है। प्रकृति उसे इसी सोपान पर ले जाने के लिए प्रयास कर रही है। ईश्वरीय करुणा का भी यहीं संकेत है। अपने सावित्री महाकाव्य में उन्होंने कहा है कि मनुष्य के भीतर विश्वभर की संभावनाएं उसी प्रकार प्रतीक्षा में हैं, जैसे बीज में छिपा हुआ वृक्ष अपने विकास की प्रतीक्षा करता है। अतिमानव चेतना मनुष्य के अन्तराल में छिपी हुई है। और वह अब प्रकट होने के समीप हैं मनुष्य यदि सावधानी-पूर्वक उसे चेतना को ग्रहण करने का प्रयास करें तो सुपर-चेतना अवश्य अवतीर्ण होगी और मानव अपनी समस्त समस्याओं का समाधान अपने आप पा लेगा।

श्री अरविन्द का विकासवादी सिद्धान्त विज्ञान पर नहीं, अध्यात्म पर आधारित हैं चेतना के उच्चस्तरीय सोपानों को उन्होंने चार भागों में विभक्त किया है। वे हैं-क्रमशः उच्चतर मन, प्रकाशित मन, संबुद्ध मन और ओवरमाइण्ड। सुपरमाइंड का स्तर ओवरमाइंड से ऊपर है। ये चेतना के ऐसे आयाम हैं जिन्हें अब तक विरले लोग ही कुरेद सके हैं और उनमें छिपी शक्तियों का लाभ उठा सके है। इन्हें प्राप्त करने के लिए आवश्यक है कि मनुष्य अपने गुण, कर्म, स्वभाव को निर्मल बनाये, परिष्कृत करें। विचारणा, भावना, संवेदना में उत्कृष्टता का समावेश करके ही महानता का वरण किया जा सकता है। अरविन्द के अनुसार अतिमानसी धरातल की ओर बढ़ने की पहली शर्त यह है कि मन को शान्ति किया जाये और साथ ही सर्वतोभावेन ईश्वर के प्रति समर्पित हो जाया जायें। इसी को उन्होंने इवोल्यूशन और इवोल्यूशन की प्रक्रिया के नाम से संबोधित किया है। इवोल्यूशन अर्थात् आरोह में मनुष्य अपनी चेतना को परिष्कृत करके प्रयत्नपूर्वक ऊपर को उठाता है। आत्म-विकास की साधना, उपासना के विविध विधि उपचारों का सृजन इसीलिए हुआ है। दूसरी प्रक्रिया इवोल्यूशन-अवरोह में अतिमानव विकास के लिए योग मार्ग का आश्रय लेकर भागवत् करुणा का आह्वान करना पड़ता है। सच्चे अर्थों में अध्यात्म जीवी-नास्टिक बीइंग होने का यही राजमार्ग हैं इस अध्यात्म जीविता को प्राप्त करना ही व्यक्तित्व की पूर्णता है, वही उसका पूर्ण विकास भी है। यही मनुष्य में देवत्व की कल्पना है।

सुपरमैन अर्थात् उत्कृष्ट मानव की कल्पना अरविन्द से पूर्व विभिन्न पाश्चात्य दार्शनिकों शोपनहावर का यदि वह जीनियस प्रतिभा सम्पन्न पुरुष था तो कार्लाइल का “वीरपुरुष” हीरो तथा दार्शनिक वेगनर का ‘शीजफ्रेड’ एवं शिलर का कार्लमूर था दार्शनिक गेटे ने पूर्ण पुरुष का वर्णन देवता तुल्य शाँती

वाले गोज के रूप में किया है जिसने अपने समस्त अव्यवस्थित मनोभावों, मनोविकारों, मनोवेगों, दुष्प्रवृत्तियों को नियंत्रित एवं परिष्कृत कर लिया है। अपने चरित्र को विशिष्ट बना लिया और सर्जनात्मक हो गया है। ऐसा महामानव जीवन को बिना किसी अमर्ष-रोष के स्वीकार करता है।

‘सुपरमैन वस्तुतः जर्मन शब्द अबरमेन्श्च का रूपांतरण है जिसका शाब्दिक अर्थ हैं ‘ओवरमैन’ अतिमानव। इसको सर्वप्रथम विवादास्पद जर्मन दार्शनिक विचारधारा में प्रयुक्त किया था इस परिकल्पना को उसने गेटे की रचनाओं से ग्रहण किया था। परन्तु चूँकि उस डार्विन के विकासवाद के ‘सरवाइवल ऑफ दी फिटेस्ट का भूत सवार था, अतः उसने इसे एक अलग ही विशिष्ट श्रेणी प्रदान की। एक को शासक एवं अन्यान्यों को शासित बताया। इसका बृहत् वर्णन ओर्टेगा वाइ गैसेट ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “द रिवोल्ट आफ दी मासेज” में किया है।

नीत्शे ने अपनी पुस्तक “दस स्पेक जर थु्रस्त्र” में कहा हैं कि मनुष्य के अन्दर अतिमानव का अस्तित्व विद्यमान है और वह सूर्य की भाँति काले बादलों को चीर कर बाहर आने की प्रतीक्षा में है। जरथुस्त्र के माध्यम से उसने कहा है कि सुपरमैन क्या है? यह मैं बताता हुँ। मनुष्य जो कुछ है उस पर विजय पाना ही अतिमानव बनना है। क्या तुम ने यह क्षमता है कि नैतिक, अनैतिक, सदाचार, दुराचार का सम्मिश्रण एवं क्रूरता की प्रतिमूर्ति था जो सभी को मारपीट और दबा कर रखना तथा उन पर शक्तिपूर्वक आधिपत्य करना चाहता था। इसके इस दर्शन ने ही नाजी तानाशाह हिटलर को जन्म दिया ओर समूचे जर्मनी को ऐसे आवेश में भर दिया कि वे लोग अपने समुदाय को अति श्रेष्ठ मानने और समस्त विश्व पर शासन स्थापित करने की तैयारी करने लगे थे।

सत्रहवीं शताब्दी के प्रख्यात रहस्यवेत्ता जे0जी0 गिचेल ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “थियोसोफिया पैक्टिका” में उत्कृष्ट मानव का चित्र खींचा है। उनने उसे पूर्ण पुरुष (परफैक्ट मैन) कहा है। उनके अनुसार मनुष्य अपनी अन्तरात्मा के जितने नजदीक पहुँचता जाता हैं, ओर उसमें गहराई तक प्रवेश करता जाता है, उसी अनुपात से वह दिव्यता की ओर अग्रसर होता जाता है। आत्मा की अनन्त गहराइयों में पहुंचने पर ही ईश्वर के दर्शन होते है। और तभी मनुष्य पूर्णता को प्राप्त करता है। उन्होंने मानवी कार्यों में पाँच ऐसे केन्द्रों का वर्णन किया जिनमें देवता, अवतारों,ईश्वर और आत्मा का निवास माना गया है। इनमें से किसी एक अथवा सभी केन्द्रों को जाग्रत करके तदनुरूप मानव से महामानव बना जा सकता है। उनकी यह मान्यता प्रकारान्तर से तैत्तरीय उपनिषद् की उस आख्यायिक से मिलती है जिसमें पंचकोश अनावरण का उपदेश किया गया है।

ख्याति प्राप्त ब्रिटिश लेखक जार्जबर्नाडशा ने अपनी पुस्तक “मैन एण्ड सुपरमैन” में मानवी विकास के दर्शन का प्रतिपादन यिका है जो उसे दिव्यता की ओर ले जाता है। अरविंद के समकालीन दार्शनिक मार्टिन हेडेगर ने भी मनुष्य में देवत्व की कल्पना की है। अरविन्द जिसे नास्टिक बीइंग-अध्यात्म जीवी कहते है। हेडेगर ने उसे आथेन्टिक बीइंग अर्थात् प्रामाणिक जीव कहा है। उनके अनुसार पृथ्वी का रूपांतरण ही मनुष्य के सामने एकमात्र उपाय है। उर्दू के प्रसिद्धे शायद मुहम्मद इकबाल ने अपनी रचना “असरारेखुदी” और “बाले जिबरील” में अतिमानवकी कल्पना की है। उन्होंने इसके माध्यम से मनुष्य को आध्यात्मिक विकास की ओर बढ़ने को अभिप्रेरित किया हैं मनुष्य की पूर्ण विकसित अवस्था को उन्होंने ‘नायबे इलाही’ की संज्ञा दी है।

सुप्रसिद्ध दार्शनिक गुजजिएफ की गणना सिद्ध एवं संत पुरुषों में की जाती है। उनने भी अध्यात्मक जीवी के रूप में दिव्य-मानव का वर्णन किया है। उनका कहना है कि मनुष्य को चाहिए कि सबसे पहले वह अपने आपको पहचाने और अपना आध्यात्मिक विकास करके पूर्णता प्राप्त करें।उन्हीं के शिष्य पी0डी0 औस्पेंकी ने इसी संभावना को अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “ए न्यू माडेल ऑफ दी यूनिवर्स” में विशद रूप में गूढतकाँ के माध्यम से सिद्ध किया है।

वस्तुतः मनुष्य की चेतन क्षमता असामान्य एवं अनन्त हैं वह जैसा सोचता ओर करता है वैसा ही बन जाता है। उसकी विचारणा और कार्य करने की क्रिया पद्धति ने उसे इस वैज्ञानिक युग तक पहुँचाया है। अपनी अपूर्णता को पूर्ण करने के सभी साधन स्रष्टा ने उसे बीज रूप में सौंपे है। देव-मानव बनना ही उसका लक्ष्य है। इस लक्ष्य को प्राप्त करने वाले अध्यात्म जीवित अति-मानव के लक्षण क्या होंगे? इस संदर्भ विभिन्न मनीषियों के अपने-अपने अनुमान अलग-अलग हैं। किसी का कहना है कि वह दानवी शक्ति सम्पन्न दीर्घ जीवन जीने वाला होगा तो किसी का मानना है कि वह अमर हो जायेगा। अन्यों की धारणा है कि वह स्वेच्छा मृत्यु का वरण करेगा। इस बारे में श्री अरविन्द की अपनी पृथक धारणा थी कि वह अमरता के लोक से आकर पृथ्वी पर स्वर्ग बसाने वाला अमरता का साकार रूप होगा। अपने प्रत्येक कार्य के पीछे वह प्रेरणाप्रद पर चिह्न छोड़ जायेगा जो भविष्य में आने वाली पीढ़ी के लिए मार्गदर्शक आधार स्तम्भ सिद्ध होंगे। ऐसे व्यक्ति की व्यष्टिगत चेतना समष्टिगत चेतना से एकाकार हो जायेगी और वह अपने में सब को तथा सब में अपने को देखने वाला तथा समस्त प्राणियों का हित साधना करने बन जायेगा। तब उसके भीतर न ईर्ष्या होगी न द्वेष, न कीर्ति की कामना ओर नहीं प्रभुत्व जमान-शासनं करने का लोभ होगा। वह स्वयं तो मुक्त होगा ही, अपनी नाव पर बिठाकर अन्य असंख्यों को भी भवसागर में पार लगायेगा, पूर्णता तक पहुँचायेगा।

मानवी विशेषता में उसके अतिचेतन स्तर सुप्रामेण्टल को ही दैवी विभूति माना गया है। वह उसे प्रचुर परिमाण में उपलब्ध भी है, पर कषाय कल्मषों से आच्छादित होने के कारण प्रसुप्त स्थिति में पड़ी है। अन्तःचेतना की इस उत्कृष्टता को ऋषियों महामानवों सिद्धपुरुषों में से प्रत्येक को किसी न किसी प्रकार अर्जित करना ही पड़ेगा।

बलिष्ठता के लिए व्यायाम, विद्वता के लिए अध्ययन, उपार्जन के लिए पराक्रम की जिस प्रकार आवश्यकता है, उसी प्रकार नर से नारायण, मानव से अतिमानव-देवमानव बनने के लिए उच्चस्तरीय योग साधना का स्वरूप समझने तथा उनका सही रूप में प्रयोग करने की दिशा में कदम बढ़ाना अनिवार्य है।


सहैव मृत्युर्व्रजति सह मृत्युर्निषीदति

मरने के पश्चात् मनुष्य का क्या होता है? इस संबंध में प्रख्यात मस्तिष्क विज्ञानी डा. एक्लीस कहते हैं कि भौतिक पदार्थों से बने शरीर का अवसान तो देखा-सुना जाता है, पर सूक्ष्म शक्ति के रूप में क्रियारत उसकी अपदार्थ सत्ता के नाश की बात किसी प्रकार समझ में नहीं आती। भौतिक विज्ञान भी इसका समर्थन करते हुए कहता है कि ऊर्जा का न तो नाश होता है, न निर्माण ही। एक रूप में दूसरे में उसका रूपांतरण अवश्य होता है, पर किसी न किसी रूप में उसका अस्तित्व जरूर बना रहता हैं इस आधार पर मस्तिष्क विज्ञानियों की पदार्थवादी प्रस्तावना का वे जोरदार शब्दों में खण्डन करते हुए कहते है। कि विज्ञानियों की यह मान्यता है कि चेतना मस्तिष्क में हो रही विभिन्न प्रकार की भौतिक-रासायनिक क्रियाओं का सहउत्पाद (बाई प्रोडक्ट) है, अस्तु मस्तिष्क की मृत्यु के साथ ही चेतना का भी अस्तित्व समाप्त हो जाता है, यह किसी प्रकार गले नहीं उतरता।

विचारणीय प्रश्न तो यह है कि कोई अपदार्थ सत्ता किसी भौतिक प्रक्रिया का गौणफल कैसे हो सकती है? यदि ऐसी बात होती, तो इन क्रियाओं में व्यतिक्रम (रोग आदि की स्थिति में) आने पर चेतना प्रभावित होनी चाहिए, पर व्यावहारिक जीवन में चेतना क्षेत्र में कोई ऐसी कठिनाई आती नहीं दिखाई पड़ती। इससे यह कहा जा सकता है कि उनकी मान्यताओं में सत्य का रंच मात्र भी नहीं है। “ड्यूएलिस्ट इण्टरएक्शनिज्म” नामक अपने प्रसिद्ध सिद्धान्त में उपरोक्त मत को अमान्य करते हुए श्री एक्लीस कहते हैं कि चेतना का अपना स्वतंत्र अस्तित्व हैं यह किसी शरीर-क्रिया का परिणाम नहीं, वरन् शरीर की चेतना की परिणति कहा जा सकता है। अतः शरीर जब मरता है, तब भी इसका अस्तित्व शेष रहना चाहिए। अपने इस सिद्धान्त में उन्होंने मस्तिष्क को प्रभावित करने वाली अभौतिक सत्ता के रूप में चेतना का उल्लेख किया है। इस प्रकार इसके द्वारा प्रकारान्तर से उन्होंने मरणोत्तर जीवन का ही समर्थन किया है।

श्री एक्लीस की इस परिकल्पना के आधार पर मृत्यु के बाद के जीवन के स्वरूप की व्याख्या विवेचना तो नहीं की जा सकती, पर आये दिन घटने वाली तत्संबंधी घटनाओं और मृत्यु के मुँह से वापस लौट लोगों के कथनों का निष्कर्ष उपस्थिति डाक्टरों ने इस प्रकार निकाला है-

मृत्यु के बाद मृतक स्वयं को अपने भौतिक शरीर से पृथक् हवा में उठा हुआ पाता है ओर अपने सगे-संबंधियों को इसका शोक मनाते, रोते कलपते स्पष्ट देखता हैं इतना ही नहीं, वह उनकी आवाजें भी सुनता है उन्हें मनाने, चुप करने की कोशिश करता है, पर यह देखकर निराश हो जाता है कि उसकी एक स्वतंत्र सत्ता का आभास होता है एवं अपने पार्थिव शरीर की अन्त्येष्टि होते हुए देखता है। अन्ततः एक अन्धेरी सुरंग में होकर जाते हुए की अनुभूति होती है। फिर स्वयं को एक प्रकाश लोक में आत्माएं उससे मिलती और उसकी सहायता करती है। इस दिव्य लोक में उसे असीम आनन्द, प्रेम व सुख की प्राप्ति होती है, जिससे इस सुखमय संसार से वह पुनः पृथ्वी लोक और भौतिक शरीर में जाना नहीं चाहता, परन्तु किसी अज्ञात प्रेरणा के कारण उसे फिर आना पड़ता है।

ऑस्ट्रेलिया के मनोवैज्ञानिक डा. स्कून मेकर भी वर्ष के श्रमसाध्य शोध-सर्वेक्षण के उपरान्त लगभग इसी स्तर के निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि मृत्यु के समय शाँति व आनन्द का अनुभव होता है, आरम्भ में गहन अन्धकार के लम्बे रास्ते को पार करने के उपरान्त मृतात्मा दिव्य प्रकाश लोक में पहुँचती है।

इन निष्कर्षों पर पहुँचने के पूर्व डा. मेकर ने शताधिक ऐसे लोगों से साक्षात्कार किया, जिनके बारे में कहा जाता था कि मरण के पश्चात् उनकी चेतना वापस लौट आयी। ऐसी अनेकानेक घटनाओं का संकलन उनने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “दि अदर साइड ऑफ दि लाइफ” में किया है। एक घटना अमेरिका की है। अप्रैल को प्रातः न्यूजर्सी की कुमारी मार्था ईंगन को दिल का दौरा पड़ा और उसकी मृत्यु हो गई। उसने अपने को शरीर से बाहर पाया और देखा की डाक्टरों का एक दल उसके हृदय को पुनः सक्रिय करने में संलग्न है। यह देख कर मार्था के मन में विचार आया कि जब मरना ही है, तो क्यों न इसकी खबर अपनी माँ को स्वयं दे दूँ। यह स्फुरणा आते ही वह बारमोट सिटी अपनी माँ के पास अविलम्ब पहुँच गई। उसकी माँ उस वक्त उपन्यास पढ़ने में तल्लीन थी। निकट जाकर उसने कहा माँ दिल का दौर पड़ने के कारण मेरी मृत्यु हो गई है। देखो अब मैं तुम्हारे पास हूँ। पर माँ ने जैसे उसकी बातें सुनी न हों। उसने बार-बार अपनी बात दोहरायी मगर वह अप्रभावित रही। माँ को अपनी ओर कैसे आकृष्ट करूं- अभी वह इस बारे में सोच ही रही थी की मार्था का ऐसा आभास हुआ, जैसे वह अपने स्थूल शरीर में वापस लौट आयी हो। इसके उपरान्त ही उसे ज्ञात हो सका कि जिस समय वह माँ से अपनी बात कर रही थीं, उस वक्त उसकी माँ के मन में बार-बार उसके बारे में विचार आ रहे थे

इस प्रकार अब यह निर्विवाद रूप में सत्य सिद्ध हो चुका है कि मृत्युपरांत भी हमारा सूक्ष्म सत्ता अक्षुण्ण बनी रहती है। आये दिन घटने वाली पुनर्जन्म की घटनाओं से भी इसकी सत्यता प्रमाणित हो जाती है जिसमें बालम अपने पूर्व जन्म के माँ बाप भाई बहन सगे संबंधी सभी को पहचान कर लोगों को आश्चर्य में डाल देता है। यदि वस्तुतः आत्मा और चेतना की मृत्यु होती, तो फिर उसके जन्मने का प्रश्न ही नहीं उठता और पुनर्जन्म की घटनाएं ही नहीं घटती। मृत्यु दरअसल शरीर की होती है। उसके जरा-जीर्ण पड़ जाने के कारण ही चेतना को बार बार कलेवर परिवर्तित करना पड़ता है। सम्मोहन विद्या के विशेषज्ञों ने भी इसका समर्थन किया है। उनने अगणित लोगों को सम्मोहन के माध्यम से पूर्व जन्म की स्थिति में भेज कर उस जन्म से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारियां हस्तगत करने में सफलता पायी है।

डा. कू्रकल अपनी प्रख्यात पुस्तक सुप्रीम एडवेंचर में लिखते हैं कि प्रत्येक प्राणी का एक सूक्ष्म शरीर होता हैं मरण के उपरान्त वह इस शरीर से सूक्ष्म लोकों में गमन करता है। वहाँ कुछ समय बिताने के बाद कालान्तर में वह पुनः शरीर धारण करता है। रूस के परामनोविज्ञानी डा. विलियोन ने इसके अनेक चित्र भी लिए है। भारतीय गुह्य विद्या विशारदों ने तेजोवलय व व्यक्तित्व के अध्ययन के आधार पर सूक्ष्म शरीर के रंगों का निर्धारण किया है। उनके अनुसार कपटी लोगों के सूक्ष्म शरीर का रंग काला, स्वार्थी लोगों का भूरा चमकीला क्रोधी का लाल धोखेबाजों का हरा मृदुभाषियों का गुलाबी बुद्धिमान का पीला और महापुरुषों का श्वेत होता है। इन निर्धारणों के माध्यम से प्रकारान्तर से उनने चेतना की अविनाशिता की ही पुष्टि की है। गीताकार ने तो “नैन छिंदन्ति शस्त्राणी नैनं दहति पावक” कहकर आत्मा की अमरता का स्पष्ट उद्घोष किया है।

कुछ भी हो अब चेतना-आत्मा के मात्र अदृश्य होने के आधार पर उसकी अनश्वरता को नहीं झुठलाया जा सकता है। हमारे इर्द-गिर्द असंख्यों सूक्ष्म जीवधारी मंडराते रहते हैं, पर उन्हें भी हम कहाँ देख पाते है। इतने पर भी उनके अस्तित्व से इन्कार नहीं किया जा सकता है। यही बात चेतना के साथ भी है। जीवित अवस्था में यह अपनी हलचलें शरीर के विभिन्न अंग-अवयवों के माध्यम से प्रकट करती रहती है, किन्तु देह के मर जाने पर माध्यम के अभाव में वह ऐसा नहीं कर पाती ओर सूक्ष्म स्थिति में चली जाती है। यही वह अवस्था है, जब भले-बुरे कर्मों के आधार पर जीवात्मा की सद्गति अथवा दुर्गति होती है। भारतीय दर्शन में इसे ही स्वर्ग, मुक्ति, नरक की संज्ञा दी गयी है।


क्या मनुष्य क्रमशः घटता ही चला जायगा

देखा जाता है कि जानवरों की नस्लें जैसे भी हैं, खुराक या सुविधा के कारण मोटे तो हो जाते हैं, पर ऐसा कदाचित् ही किसी जीवधारी में होता है कि अपनी नस्ल की दृष्टि गिर रहा हो।

यह आश्चर्य मनुष्यों में ही देखने को मिलता है कि उनकी नस्ल क्रमशः छोटी होती जा रही है। कद वजन की दृष्टि से वह निरन्तर घटता जा रहा है, फलतः उसकी प्रतिभा और क्षमता भी न्यून होती जा रही है। कुछ शताब्दी पूर्व के लोगों पर दृष्टिपात करें, ज्ञात होगा कि कद, ऊंचाई, वजन, क्षमता, परा और पुरुषार्थ की दृष्टि से वे अब के लोगों की कहीं अधिक समर्थ और बलिष्ठ होते थे, पर स्थिति विपरीत नजर आ रही है, क्रम उल्टा हो चला है। लोग हर दृष्टि से कमजोर होते जा रहे है। शारीरिक बल तो गंवाया ही अपनी स्वाभाविक लम्बाई भी खोते चले जा रहें है। यदि यह क्रम विराम चलने लगा तो इसे चिन्ता की बात समझनी चाहिए।

ऐसे अपवादों में कुछ समय पहले लाख के पीछे के बौना दृष्टिगोचर होता था। अब वह संख्या बढ़ी है। अब दस हजार के पीछे एक बौना होने लगा है।

बौनों में आमतौर से तीन फुट के बोने पहले देखने आते थे, पर अब कुछ उदाहरण ऐसे भी सामने आये है। जिसमें वे दो फुट से भी कम रह गये है। अनुमान लगाया जा सकता हैं कि उनका पराक्रम कितना कम रह जायेगा और उनका जीवनकाल भी कितना स्वल्प होगा। विश्व में ऐसी घटनाएं अब बढ़ती जा रहीं है।

मवूत्ती (अफ्रीकी) आदिम जाति के लोग मान्य ऊंचाई से अब काफी कम के रह गये है।

अफ्रीका का काँगो प्रदेश तो पूर्ण रूप से बौनों का हो चला है। वहाँ अब तीन फुट से अधिक कोई बिरला ही दीखता हैं अब से सौ वर्ष पूर्व वे तीर-कमान के सहारे शिकार मार लेते थे। बि वे गुलेल के सहारे पक्षियों पर निर्भर रह गये हैं। लक्षणों को देखने से संभावना और भी अधिक घटने की है।

इसके अतिरिक्त जहाँ तहाँ जो बौने पाये जाते हैं, उनका कद ओर भी घटा हुआ है। ऐसे लोगों को लोग मनुष्य में न मानकर खिलौना समझते है ओर उन्हें उसी दृष्टि से पालते है। संसार के कुछ प्रसिद्ध बौनों ने तो घटते-घटते अपनी स्थिति आश्चर्यजनक स्तर तक पहुंचा दी है।

रियलिंग ब्रदर्स के सकर्स में काम करने वाली एक बौनी का कद मात्र 21 इंच था। नाम था लिया ग्राफ। इसकी सर्वत्र बड़ी धूम थी। हिटलर ने उसे जासूसी के अपराध में गिरफ्तार कर लिया था। किंतु मृत्युदण्ड से वह बच गयी।

कोनी आइलैण्ड में लिलीपुट के नाम की कई बस्ती भी ऐसी ही बनी थीं। जो पीछे आग में जलकर नष्ट हो गई। संभवतः गुलीवर की कहानी की कल्पना का आधार लेखक ने इसे ही बनाया हो। रूस के बादशाह जार ने एक बौने जोड़े की शादी में खुद बहुत दिलचस्पी ली। राजकुमारी की एक बौनी सेविका के लिए उसने खुद वैसा वर ढूंढ़ा ओर शादी सजधज के साथ की। उनकी औसत ऊंचाई दो फुट तीन इंच थी।

अमरीकी फिल्मी कम्पनियों में काम करने वाले हेरी, टिनी, ग्रेस और डेजी नामक बौने बहुत ख्याति अर्जित कर चुके है। साढ़े बत्तीस इंच के मंचू ने भी सर्कस के नाम कमाया था दो फूट एक इंच के थम्ब और टाम अमेरिका भर का मनोरंजन करते रहे। टामथम्ब का बाद में वैसी ही लड़कियों से विवाह भी हो गया था।

हालैण्ड की पार्लिन नामक लड़की जब जन्मी तब बीस से0मी0 थी। सोलह वर्ष की होकर मरी तब तक उसकी लम्बाई तीस से0मी0 हो पायी थी तथा वजन डेढ़ कि0ग्रा0 था। “लाइफ” पत्रिका के अनुसार स्पेन के एक बौने की लम्बाई चालीस से0मी0 थी तथा वजन दो कि0ग्रा0। फ्राँस की एक सर्कस कम्पनी ‘लि फोक्स’ के सभी कलाकार बोने थे। कम्पनी ने बड़े प्रयत्न पूर्वक करीब-करीब समान ऊंचाई चौंतीस बोने इकट्ठे किये थे। वे अपने आश्चर्यजनक करतबों से दर्शकों का मन मोह लेते थे। वे अपने आश्चर्यजनक करतबों से दर्शकों का मन मोह लेते थे। एकबार यह प्रदर्शन फ्राँस के तत्कालीन शासक लुई चौदहवें के समक्ष किया गया। राजा उनके कारनामों से बड़े प्रसन्न हुए। उन्होंने बौनों को भरपूर उपहार दिया।

इसी प्रकार रूस की एक सर्कस कम्पनी “कास्त्रोव” में एक ढाई फुट का बौना था। वह तरह तरह से लोगों का मनोरंजन करता था। कम्पनी वालों ने उसकी शादी एक बौनी लड़की से यह सोचकर कर दी इसके जो बच्चे होंगे उससे कम्पनी में बौनों की संख्या बढ़ेगी, जिससे करतबों का देखने के लिए लोगों आकर्षण भी बढ़ेगा, फलतः कम्पनी की आय बढ़ेगी। दुर्भाग्यवश उनके दो बच्चे हुए भी, पर कोई भी लम्बे समय तक ठहर न सके। वे एक-एक दि नहीं जी सके।

पहले के योरोपीय राजाओं को भी बौने पालने का शौक था। वे दूर-दूर से उन्हें एकत्रित कर अपने राजदरबार में रखते थे। रोम सम्राट आगस्टस का एक योद्धा मात्र दो फुट ऊंचा था। सम्राट डोमेसियन को भी यह शौक जीवन भर लगा ही रहा। वह उनसे मनोरंजन का काम लेते थे। लीबिया के बादशाह में भी यह प्रवृत्ति थी। सोलहवीं और सत्रहवीं सदी में बौने संग्रह करने का शौक बहुत बढ़ गया था और वे ऊंची कीमत पर बिकने भी लगे थे।

यह सब आंकड़े निश्चय ही चिन्ताजनक हैं यदि यही हाल रहा तो वह दिन दूर नहीं जब आदमी खरगोशों की समता करने लगेगा और प्रकृति का एक खिलौना मात्र रह जायेगा। आदमी घटेगा-गिरेगा तो आखिर उस का यही हश्र होना है। पौराणिक मिथक बताते है। कि द्वापर व त्रेता युग में मनुष्यों की अच्छी खासी ऊंचाई होती थीं। किन्तु अब बौनों की बढ़ती संख्या संरचना व क्षमता की दृष्टि से अब से छोटा ही होता जाएगा। अक्ल की दृष्टि से भले ही उसने प्रगति करली हो, कम्प्यूटर, माइक्रोचिप्स व सुपरकण्डर्क्टस की शोधों द्वारा न्यूनतम आकार में बड़े बड़े यंत्रों की कार्य पद्धति को समाहित कर दिया हो, एक भय मन में उठता है कि कहीं वही “माइक्रो” वाला छूत का रोग मनुष्य को तो नहीं लग गया जिस कारण वह छोटा और छोटा होता चला जा रहा है।


अचेतन का अनावरण सम्मोहन द्वारा सम्भव

पूर्वार्त्त मानसशास्त्र में सम्मोहन का वर्णन सारणी, वशीकरण, आकर्षण आदि छः प्रमुख अंगों के साथ मोहन के रूप में प्रमुखता से किया गया है। यही वह सम्मोहन विद्या है जिस ग्रीक भाषा में हिप्नोज और अंग्रेजी में हिप्नोटिज्म के नाम से जाना जाता हैं पिछले दिनों इसका प्रमुख उद्देश्य निद्राकर्षण करने के पश्चात् कौतुम कौतूहल दिखाने भर का रहा है। प्रयोक्ता इसका दुरुपयोग भी करते रहे है। उन्नीसवीं सदी के अंत तक लोग इसे काला जादू कबाला आदि कह कर पुकारते और कपोल कल्पनाओं की विडम्बना भर समझकर संदेहास्पद दृष्टि से देखते रहे, किन्तु अब इसे चिकित्सा उपचार से संबंध करके वैज्ञानिकों ने चिकित्सा क्षेत्र में एक नये अध्याय की शुरुआत की है। इण्टरनेशनल कांग्रेस ऑफ हिप्नोटिज्म के वैज्ञानिकों ने इस विद्या की चिकित्सा संबंधी उपयोगिता पर प्रकाश डाला और उसके सत्परिणामों में समूची मानव जाति को अवगत कराया है।

प्रख्यात चिकित्सा शास्त्री डा. विलियम ब्राउन के अनुसार साइको-पैथोलाजिकल डिसआर्डर्स जैसे मनोविकारों के उपचार में सम्मोहन विद्या अपनी अहम् भूमिका निभा सकती है। उन्होंने इसका प्रयोग करके हजारों सैनिकों एवं अन्यान्य लोगों को स्वस्थ किया ओर उन्हें आनंदमय जीवन जीने के लिए प्रेरित किया। प्रथम विश्व युद्ध के समय सैनिकों में पनपी मनोविकृति और स्नायु रोगों को दूर करने के लिए उन्हें हिप्नोसिस का ही आश्रय लेना पड़ा था। उस समय न्यूरोसिस का एक मा.त्र उपचार ही था हिप्नोसिस। तब से इसका प्रयोग रोगोपचार में तीव्रता के साथ चल पड़ा।

सम्मोहन चिकित्सा विज्ञान के अंतर्गत व्यक्ति के शरीर को स्पर्श किये बिना ही उसे कृत्रिम निद्रा का आभास कराया जाता है। मनुष्य को मोह निद्रा में निमब्न करने का यह एक श्रेष्ठ तरीका चिकित्सा विज्ञानियों ने खोज निकाला है। सम्मोहन कर्त्ता रोगी की मनः स्थिति को निरख–परख कर ही अपनी इच्छा शक्ति के माध्यम से संकेत सूचनाओं की संप्रेषण प्रक्रिया को पूरा करते हैं। पाश्चात्य देशों के चिकित्सा क्षेत्र में अब इसका प्रयोग द्रुतगति के साथ बढ़ता जा रहा है। अमेरिका के एडगर केसी के बारे में यही कहा जाता है। अमेरिका के एडगर केसी के बारे में यही कहा जाता है। कि इक्कीस वर्ष की आयु तक वह लैरिजाइटिस नामक बीमारी के कारण कुछ भी बोलने में असमर्थ था।किन्तु सम्मोहन चिकित्सा से वह न केवल पूर्णतः स्वस्थ बना, वरन् अपनी अतीन्द्रिय क्षमताओं को भी इतना विकसित कर दिखाया कि लोग उसे आज भी स्लीपिंग डाक्टर के प्रख्यात नाम से अपनी स्मृतियों में बिठाये हुए है। सम्मोहन के द्वारा उसने अपने जीवनकाल में तीस हजार से अधिक रोगियों को जीवन प्रदान किया हैं फ्राँस के सुप्रसिद्ध मनोविज्ञानी एवं तंत्रिका विशेषज्ञ रिचेट को सम्मोहन विद्या का निष्णात तथा मूर्धन्य चिकित्सक समझा जाता है। पेरिस में उनने एक चिकित्सालय बनाया हैं जिसमें रोगियों का उपचार सम्मोहन प्रक्रिया को उनने साइकिक एक्सकर्सन नाम दिया है।

वाशिंगटन के वाल्टरी रीड आर्मी मेडिकल सेन्टर चिकित्सक डा. हेरॉल्ड वेन के अनुसार सम्मोहन विधि का रोगियों पर सफलतापूर्वक उपयोग किया जा सकता है। इससे रोगी पर किसी प्रकार का कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता। लाल एंजिल्स स्थिति कैलीफोर्निया विश्वविद्यालय के मूर्धन्य चिकित्सा विशेषज्ञ जोजेफ बारबर का कहना है कि यह प्रक्रिया दर्द नियंत्रण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। विशेषकर जले हुए व्यक्तियों एवं फैन्टम लिम्ब पेन से ग्रस्त व्यक्तियों को इस विधि द्वारा प्रभावित करके पीड़ा को कम किया जा सकता हैं सम्मोहित अवस्था में कष्टों का भान नहीं रहता। फैन्टम लिम्ब पेन में इतनी असह्य पीड़ा होती है जिससे छुटकारा पाने के लिए कई बार लोग आत्म-हत्या तक कर बैठते हैं सम्मोहन प्रक्रिया इनके लिए बहुत ही लाभकारी सिद्ध हुई है। दंत चिकित्सकों ने भी जबड़ों के दर्द निवारण में इस विधि द्वारा सफलता पाई है। वेस्ट वर्जीनिया यूनिवर्सिटी के प्रसिद्ध चिकित्सक के0 थाम्पसन ने इस विधि द्वारा सामूहिक रूप से दन्त रोगियों पर प्रयोग किया और आशातीत सफलता पाई है। मूर्धन्य चिकित्सा शास्त्री हेनरी बेनैटी भी रक्ताल्पता वाले रोगियों को सम्मोहन प्रक्रिया द्वारा स्वास्थ्य प्रदान करने में सफल हुए है। खिलाड़ियों की एकाग्रता में इस विधि से अभिवृद्धि होती देखी गई है।

बाल रोग विशेषज्ञ डा. जोस्फीन तथा सैमुअल लावेरन ने कैंसर ग्रस्त बालकों की पीड़ा निवारण के लिए सम्मोहन चिकित्सा को अति महत्वपूर्ण बताया है। इससे न केवल उनकी श्वसन प्रक्रिया सामान्य हो जाती है, वरन् वे दर्द में आश्चर्यजनक कमी का भी अनुभव करते है। कैंसर का उपचार तो नहीं किंतु उसके लक्षणों में कमी इससे आ जाती है। वमन और मितली में इसका दीर्घकालिक उपयोग रोग को निर्मूल कर देता है। अस्थमा, ब्रौंकाइटिस, एलर्जी, चर्मरोग आदि में भी इसके अच्छे प्रभाव देखे गये है। मानसिक तनाव दूर करने एवं उच्च रक्तचाप के नियंत्रण में सम्मोहन प्रक्रिया बहुत लाभकारी सिद्ध हुई है।

सम्मोहन विद्या को चिकित्सा क्षेत्र में उपयोगी बनाने का श्रेय एफ0ए॰ मेस्मर को दिया जाता है। आस्ट्रिया के वियना शहर में निवास करने वाला यह व्यक्ति अपने समय का प्रख्यात चिकित्सा शास्त्री था। उसने मनुष्य की विलक्षण मानसिक क्षमता को विरलित द्रव-रेअरीफाइड फलूड अर्थात् चुम्बकीय तरल पदार्थ का स्वरूप प्रदान किया तथा अपने प्रतिपादन में कहा कि इस अलौकिक द्रव को सम्मोहन शक्ति से उत्पन्न करके रोगोपचार का उपक्रम बिठाया जा सकता है। इस तरह के उनने कई प्रयोग भी किए और सफल रहें। मेस्मर के अनुसार मानवी काया में एक प्रकार का विद्युत चुम्बकीय प्रवाह सतत् प्रवाहित होता रहता है जिसकी मात्रा अंगुलियों के अग्रभाग में ज्यादा होती रहता है। इससे रोगों को दूर करने में सहायता मिलती है। इस शक्ति प्रवाह को उन्होंने जैव-चुम्बक या चुम्बकीय तरल नाम दिया। कालान्तर में उपरोक्त सिद्धान्त को प्रतिपादन कर्त्ता के नाम पर मेस्मेरिज्म भी कहा जाने लगा। सम्मोहन वस्तुतः मानवी जैव चुम्बक की आकर्षण शक्ति का परिणाम है जो प्रभावित व्यक्ति के दिल दिमाग पर हावी हो जाती है। और उसे प्रयोक्ता सूचना निर्देशों का पालन-अनुसरण करने के लिए बाध्य करती है।

प्रख्यात मनोविज्ञानी अलेक्जेन्डर राल्फ ने अपनी कृति द पावर ऑफ माइण्ड में लिखा है कि मानव मन सम्मोहन प्रक्रिया द्वारा सजीव एवं निर्जीव दोनों पर अपने इच्छानुकूल प्रभाव डाल सकता है। इस शक्ति का उपयोग रोगोपचार में सरलता से किया जा सकता है। किसी समय यूनान में इस विद्या का बहुत प्रचलन था। वहाँ के विख्यात चिकित्सा विज्ञानी पेपिरस ने रोगों की उपचार प्रक्रिया में चिकित्सा द्वारा मरीज के सिर पर हाथ फिराकर अच्छा करने की विद्या को शास्त्रीय रूप दिया था। सम्राट पाइरस और वैसेपसीयन को ऐसे ही उपचार प्रक्रिया से कष्ट साध्य रोगों से मुक्ति मिली थी। फ्राँस के शासक फ्राँसिस प्रथम से लेकर चार्ल्स दशम तक की चिकित्सा में जैव चुम्बक का प्रयोग प्रतिभाशाली व्यक्तियों द्वारा होता रहा है। हाथ का स्पर्श और विशिष्ट दृष्टिपात इस प्रक्रिया में विशेष रूप से प्रयुक्त हुआ है। संभव संत महात्मा इसी प्रक्रिया द्वारा पीड़ितों की पीड़ा हरते रहे है। मार्किस डी0 पुसेगर ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक मैग्नेटाइज्ड एनीमल में विभिन्न प्रमाण प्रस्तुत करते हुए लिखा है कि ऐसे कई व्यक्ति हुए हैं, जिन्होंने अपनी अतीन्द्रिय दृष्टि के बल पर लोगों को सम्मोहित करके उन्हें स्वास्थ्य प्रदान करने में सफलता पाई। इस विधा में चिकित्सक एक्सटरनलाइजेशन ऑफ सेंसीबिलिटी के सिद्धान्त को अपनाते हैं मन में घुसे दुरावों ओर दुराग्रहों को निकाल बाहर फेंकते ओर उसमें नवीन विवेक संगत विचारणाएं भरते है।

मानवी मस्तिष्क की संरचना इतनी जटिल और विलक्षण है कि उसे कोई सूक्ष्मदर्शी ही समझ सकता है मानस शास्त्र के विशेषज्ञों का कथन है कि मनः संस्थान की गतिविधियों के संचालन में जाग्रति, स्मृति और धृति तीन प्रकार की अवस्थाएं दृष्टिगोचर होती है। जाग्रत अवस्था में मन ज्ञानेंद्रियां की अनुभूतियां उपलब्ध करता हैं जन्मों जन्मान्तरों के चिर संचित ज्ञान सम्पदा के भण्डार का बोध स्मृति के माध्यम से होता है। धृति मन की सूक्ष्मतर अवस्था है जिसमें विचार संप्रेषण की क्षमता होती है। उसका प्रयोग करके दूसरे व्यक्ति की मनः स्थितियों और परिस्थितियों से अवगत हुआ जा सकता है। सम्मोहन चिकित्सा में मनुष्य की विद्युतीय प्रतिरोधक क्षमता ( जी.एस.आर) पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ता। सोते समय यह दस गुणी अधिक बढ़ जाती है, चिकित्सा विशेषज्ञों ने मस्तिष्कीय तरंगों को ई0ई0जी0 मशीनों पर रिकार्ड करके इस तरह के प्रमाण प्रस्तुत किये है। चिकित्सक इच्छा शक्ति में अभिवृद्धि करके सहानुभूतिपूर्ण भावनात्मक मुद्रा से अपने में इस चुम्बकीय द्रव को उत्पन्न करता है। रोगी की दृष्टि एक प्रकाश बिन्दु पर केन्द्रित करके घड़ी के पेंडुलम की तरह उसे लयबद्ध ओर ध्वनियां सुनाई जाती है। मैट्रोनोम-तालमापी उपकरण के द्वारा ध्वनि और प्रकाश का समन्वयात्मक स्वरूप रोगी के सम्मुख प्रस्तुत किया जाता है। दन्त चिकित्सा में तो सम्मोहन को अप्रत्याशित सफलता मिल चूंकि है। एनेस्थेसिया की बेहोश करने वाली दवाओं की खोज से पूर्व प्रायः सम्मोहन का ही आश्रम लिया जाता था।

मनःचिकित्सकों के अनुसार समस्त आधि−व्याधियों का एक मात्र कारण मानसिक विकृतियों को ही समझा जा सकता हैं सम्मोहन चिकित्सा में सर्वप्रथम रोगी को कृत्रिम ढंग से निद्रा का आभास कराया जाता है। तदुपरान्त उसके अंतर्मन में संकेत सूचनाएं पहुंचाई जाती है। निद्रावस्था में शरीर प्रायः निष्क्रिय पड़ जाता है। पर मनः संस्थान सक्रिय रहता है। मन को अन्यान्य साँसारिक विषयों से हटाकर विचार शून्य बनाया जाता है तब कहीं जाकर मस्तिष्क में सत्प्रवृत्तियों को समाविष्ट होने का सुअवसर मिलता है। रोगी में आत्म विश्वास जगाकर उसकी मानसिक दुर्बलताओं को हटाने मिटाने की यह सर्वोत्तम चिकित्सा समझी गई है। लेनिनग्राड यूनीवर्सिटी के मूर्धन्य शरीर विज्ञानी डा. लियोवि वैसिलेव ने अपने अनुसंधान निष्कर्ष में कहा है कि सम्मोहन कर्त्ता अपने मानसिक रेडियो तरंगों को रोगी के मन मस्तिष्क में संप्रेषित करके उसमें छिपी विकृतियों को ढूंढ़ निकालने एवं उन्हें उखाड़ फेंकने में सफल हो सकता है एक स्थान पर बैठकर भी किसी दूरवर्ती रोगी की इस विधि से चिकित्सा की जा सकती है।

मानसिक ग्रन्थियों का निराकरण मनोविश्लेषण द्वारा ही संभव है। कुछ ग्रंथियां इतनी जटिल ओर कठिन होती है। कि रोगी उन्हें जाग्रत अवस्था में नहीं बता सकता क्योंकि उसका चेतन मन इस प्रकार के अप्रिय प्रसंगों को स्मृति पटल में प्रवेश नहीं पाने देता है ऐसी स्थिति में सम्मोहन विधा ही उपयुक्त सिद्ध होती है। पुनर्जन्म के प्रसंगों को भी रोगी के सम्मुख प्रस्तुत करके रोगोपचार के सत्परिणाम सामने आये है।

सम्मोहन प्रक्रिया मात्र कौतुक वर्धक नहीं अपितु एक विज्ञान सम्मत चिकित्सा प्रणाली के रूप में पिछले दिनों उभर का आई है। आज मनोशारीरिक व्याधियाँ परिमाण में बढ़ती जा रहीं है। इनका निदान व उपचार अचेतन के अनावरण के बिना असंभव है। मनोग्रंथियां तनाव अनिद्रा असाध्य साइकिएट्रिक व्याधियां इस उपचार के द्वारा पूर्णरूपेण ठीक की जा सकती है। प्रायश्चित उपचार में भी इस विधा का एक सुपात्र अध्यात्मक प्रधान चिन्तन वाले चिकित्सक द्वारा प्रयोग सफलता पूर्वक हो सकता है। पूर्वार्त्त मनोविज्ञानी की इस चिर पुरातन विधा के पुनर्जीवन की अनिवार्यता अनुभव की जानी चाहिए एवं इस दिशा में निरन्तर शोध चलनी चाहिए।

रूस के प्रख्यात इतिहासवेत्ता वेसली रेडलोव ने उन्नीसवीं शताब्दी में दक्षिण साइबेरिया के अल्टाई पर्वतों पर विभिन्न प्रकार के छोटे बड़े टीलों को खोज निकला था। ये दो हजार वर्ष से भी अधिक पुराने है। कहा जाता है। कि पश्चिम योरोप से आये स्काइथियन्स योद्धाओं की ये कब्रें हैं, जिनमें उनके शव दफन है।

रूस के दक्षिण भाग में एक विशाल भू क्षेत्र पर खुदाई करने पर बहुत ही प्राचीन इमारतों के खण्डहर मिले है। बर्फ की चट्टानों से ढके अन्धकार युक्त कमरों में मृतकों के शरीर, स्वर्ण आभूषण, पोशाकें एवं सुन्दर फर्नीचर पाये गये है। मध्य रूस के सोलोखा नामक स्थान से खुदाई के समय एक स्वर्णनिर्मित कंघा प्राप्त हुआ है, जिस पर स्काइथियन्स योद्धाओं के चित्र बने हुए थे इसी तरह कटंडा के निकट पेजीयर्क घाटी की कई पहाड़ियों में विभिन्न तरह के मुलायम चमड़े एवं काष्ठों निर्मित वस्तुएं, कपड़े, आभूषण आदि प्राप्त हुए है। सुन्दर कसीदाकारी की हुई दरिया शाल आदि उपलब्ध हुए है। इन पहाड़ियों पर उत्खनन के समय दीवालों पर पशु-पक्षियों, बैल-गांधियों राक्षसों आदि के चित्राँकन की उत्कृष्ट शैली भी देखने को मिली है। चिकित्सा उपचार एवं बेहोश करने में प्रयुक्त होने वाली जड़ी बूटियाँ व उन्हें पीसने एवं गरम करने के यंत्र उपकरण भी प्राप्त हुए है। कम्बल और बर्फ में लपेटकर रखे गये सुरक्षित शव इस बात को प्रमाणित करते हैं कि उस समय के लोगों का ज्ञान वर्तमान वैज्ञानिकों युग के लोगों से कम नहीं था। भवन निर्माण की कला में वे दक्ष थे। वन्य प्रदेश में ऊंचाई पर निर्मित गुम्बज वाले महलों के ध्वंसावशेष अभी जहाँ तहाँ बिखरे दिखाई देते है। इनकी संरचना रेफ्रिजरेटर जैसी है। यहाँ की इमारतों और गूढ़ाक्षरों से बने कलेंडरों की तुलना मध्य अमेरिका के मय सभ्यता से की जा सकती है।

मूर्धन्य वैज्ञानिक एलवर्टो रूप ने में एक अति प्राचीन धर्म स्थल को ढूंढ़ निकाला है जिसे प्लेंक्यू मंदिर के नाम से जाना जाता था। सारा मंदिर कलात्मक पत्थरों से बना हुआ है। इसमें मनुष्य के त्याग बलिदार को प्रदर्शित करने वाले सुन्दर दृश्य चित्राँकित किये गये है।

प्राचीन विकसित सभ्यता के अनेक अलौकिक दृश्य आस्ट्रेलिया के रेगिस्तान में सुप्रसिद्ध खान विशेषज्ञ माइकेल टेरी ने खोज निकाले है। इनमें मानव सिर में सींग तथा मुकुट जिसकी पुष्टि आस्ट्रेलियन इन्स्टीट्यूट ऑफ एवोरिजिनल्स्टडीज ने भी की है। इसका अध्ययन साउथ आस्ट्रेलियन म्यूजियम के सुप्रसिद्ध शरीर विज्ञानी रावर्ट एडवर्ड ने किया और उन से संबंधित अनेक तथ्यों को प्रकाशित किया है। उन्होंने उस समय की अनेकानेक कलाकृतियों का भी अध्ययन किया है। उनका कहना है कि ये कलाकार वस्तुतः ऑस्ट्रेलिया के बाहर से आये थे।

दक्षिण अमेरिका के पहाड़ों पर यक्सुना से कोवा तक से फीट चौड़ी एवं मील लम्बी पक्की सड़क बनी हुई है। जिसकी ऊपरी सतह सीमेन्ट की है। संभवतः यह मय सभ्यता काल की बनी हुई है। पूर्वजों की प्रखर बुद्धि एवं कुशल इंजीनियर होने का यह प्रत्यक्ष प्रमाण है। इसके अतिरिक्त पूर्व पाषाण एवं उत्तर पाषाण काल के कुछ अवशेषों पर विभिन्न प्रकार की रचनाएं रेखाँकन आदि पाये गये है। जो तत्कालीन सभ्यता के बौद्धिक विकास की ओर इंगित करते है। इस तरह के अवशेष योरोप के अधिकाँश भागों में पाये गये हैं जिन पर पेड़ पौधे सर्प एवं अन्यान्य सुन्दर आकृतियां अंकित की है। निसर्ग में फैले जहाँ-तहाँ मानवीय कृत्यों को देखते हुए नृतत्ववेत्ता भी अब यह मानने लगे हैं कि पूर्वकालिक लोग हमसे कहीं अधिक सक्षम एवं सभ्य थे।

उपरोक्त पुरातन प्रमुखों के रहते अब यह कहना अनुपयुक्त ही होगा कि बंदर ही विकसित होकर मनुष्य बना है। सच तो यह है। कि हम पूर्वजों की तुलना में हर क्षेत्र में नीचे गिरते आयें है।


इनसे सीखिये सहयोग सहकार!

सहयोग और संगठन को मानवी प्रगति का मूलाधार है माना गया है। बुद्धिमता की जिस विकसित ऊंचाई तक मानव आज पहुंचा है, वह उसे सहकारिता के आधार पर ही उपलब्ध हुई है। ज्ञान विज्ञान की अगणित उपलब्धियों साधन सम्पन्नता का सारा वैभव चमत्कार इसी सत्प्रवृत्ति की देन एक आदमी दूसरे के साथ सघन आत्मीयता स्थापित न करता-दूसरों के सुख-दुख में भागीदारी करने में उत्साह न दिखाता तो सहयोग की इच्छा ही न उठती और आदान-प्रदान का सिलसिला न चलता। इस स्थिति से उस प्रगति की कल्पना भी नहीं की जा सकती है जिनके कारण मनुष्य जीवन को सुरदुर्लभ अनुभूतियों से भरा-पूरा माना जाता है। यथार्थता यह है कि सहयोग और उत्कर्ष एक दूसरे पर पूरी तरह निर्भर है। एक के बिना दूसरे की न आशा की जा सकती है और न संभावना ही बनती है। मिल-जुलकर रहने और मिल–बांटकर खाने की सुखद अनुभूतियों को जो जानते हैं, वे न केवल संकीर्णता की विलगावजन्य दुःखद परिस्थितियों से बचे रहते हैं वरन् प्रगतिशीलता का सत्परिणाम भी हाथों-हाथ प्राप्त करते है।

न केवल मानव-जाति में वरन् प्रकृति के हर क्षेत्र में प्रत्येक घटक में यह संगठन और सहयोग की प्रक्रिया चल रही है। जड़-चेतन जगत इसी आधार पर सुसंबद्ध है और अपने क्रम से आगे चल रहा है। यदि इस विधि व्यवस्था में अन्तर पड़ जाये तो समझना चाहिए की अगले क्षण घोर अव्यवस्था की अन्धकारपूर्ण स्थिति सामने आकर खड़ी होने वाली है।

सहयोग-सहकार की शक्ति सर्व-विदित है। अस तथ्य को सभी जानते हैं कि ईंटों के मिलने से गगन चुम्बी भवन विनिर्मित होते है। तिनके मिलकर रस्सा बनाते हैं जिनसे पानी खींचने से लेकर नावों के लंगर तक बाँधे जा सकते है। सींकें सिमट कर समर्थ बुहारी बनती है। नन्हीं बूंदें मिलकर सरिता के रूप में बहती है जिनकी प्रचंड धारा मजबूत पुलों और बड़े बड़े बाँधों को बहा ले जाती है। बिखरे मनके मिलकर सुन्दर माला या मनमोहक हार का रूप धारण करते ओर प्रशंसा के पात्र बनते है। व्यक्तियों का समुच्चय परिवार कहलाता है। और उनसे समाज बनता है। सहकारिता के आधार पर ही उसके सभी समर्थ-असमर्थ घटक मिल-जुलकर शांतिपूर्वक सुरक्षित रहते ओर समुन्नत बनने के लिए अग्रसर होते है। बिखरे जाने पर इनमें से किसी का भी कोई महत्व नहीं रहता।सहयोग के आधार पर सैन्यदल बनते ओर शत्रु से लोहा लेते, विजयी बनते है। काल कारखानों भी इसी आधार पर चलते हैं और विशालकाय निर्माण पूरे होते हैं। धर्मतंत्र लेकर राजतंत्र की प्रगति में यह बल पर प्रजातंत्रीय शासनों में परिवर्तन होते देर नहीं लगती। इस प्रकार सहकारिता को इस युग की उच्चस्तरीय उपलब्धि माना गया हैं जहाँ इस विद्या को अपनाया नहीं जाता संकीर्ण स्वार्थपरता से प्रेरित होकर विग्रह और विलगाव पर उतारू रहा जाता है वहाँ समझना चाहिए कि देर सबेर में सर्वनाश ही होकर रहेगा।

प्रख्यात लेखक प्रिंस क्रोपाटकिन ने अपना सारा जीवन-प्रकृति के अध्ययन में लगाया। उन्होंने जीवन-जन्तुओं के व्यवहार-अध्ययन से जो निष्कर्ष निकाले उन्हें अपनी प्रसिद्ध पुस्तक संघर्ष नहीं सहयोग में संकलित किया है। उनके अनुसार मानव जाति की सुख-समुन्नति स्पर्धा एवं बिखराव में नहीं, वरन् सहयोग की भावनाओं के विकास में सन्निहित है। इसका प्रत्यक्ष स्वरूप ओर उसके सत्परिणाम को बुद्धिहीन समझे जाने वाले क्षुद्र जीवों में भी स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। वह मिल-जुलकर काम करते और एक जुट रहते है। अपनी इसी संगठित शक्ति के कारण दीमकों, टिड्डियों ओर चिड़ियों को विशालकाय क्षेत्रों को वीरान करते देखा गया है। जिस ओर भी वे दल-बल के साथ चल पड़ती हैं उसी ओर सफाया कर देती है। दुश्मन भी उनका कुछ नहीं बिगाड़ पाते।

जीव विज्ञानियों का कहना है कि मधुमक्खियों में सहकारिता की प्रवृत्ति कूट-कूट भर होती उसके सभी सदस्य मिलकर छत्ता बनाते और शहद विनिर्मित करने जैसा कौशल विकसित करते हुए यशस्वी बनते है। सुप्रसिद्ध प्राणिशास्त्री फ्रिश के शिष्य डा. लिण्डावर ने मधुमक्खियों की विभिन्न जातियों का वर्षों तक गहन अध्ययन किया और अपनी पुस्तक कम्युनिकेशन अंगस्ट सोशलबीज में बताया है कि उनकी सहकार प्रवृत्तियाँ मनुष्य को भी पीछे छोड़ देती है। उनके अनुसार इन मक्खियों में अपने-अपने विभाग बंट होते है। इनमें से कुछ मजदूर होती हैं, जिनका काम छत्ते को बनाना टूट फूट को जोड़ना छत्ते में कोई मर जाय तो उसे वहाँ से ले जाकर श्मशान तक पहुँचाना यह सब काम मजदूर करते है। कुछ सैनिक मक्खियाँ होती हैं जिनका कार्य रानी की बाहरी आक्रमणकारियों से सुरक्षा करना होता मनुष्यों की फौज में कुछ सिपाही कायर ओर डरपोक भी हो सकते हैं किन्तु मधुमक्खियाँ दुश्मन के संघर्ष में अपने प्राणों की भी परवाह नहीं करती ये उनमें मृत्यु पर्यन्त लड़ती है। कुछ मक्खियों का काम फूलों से पराग लाना और उससे शहद बनाना होता है। इस तरह जिनको जो काम मिला होता है, वह वही काम दत्त-चित्त होकर करती रहती है।

इसी प्रकार प्रकार मूर्धन्य वैज्ञानिक सी0आर॰ रिबैन्ड्स ने अपने पुस्तक बिहैवियर एण्ड सोशल लाइफ ऑफ हनी बीज में मधुमक्खियों से पाये जाने वाले परस्पर सहयोग-सहकार का विस्तृत वर्णन किया है उनका कहना है कि इन छोटी मक्खियों से मनुष्य बहुत कुछ सीख सकता है। श्रमरत रहते हुए भी वह अपने जीवन को हल्का फुल्का एवं प्रसन्न बनाये रखती है। उनका प्रत्येक कार्य मनोरंजन से भरा पूरा होता है। जर्मनी के वरिष्ठ जीव विज्ञानी कार्लवान फ्रिश के अनुसार मधुमक्खियों नृत्य करती है। जहाँ कही सुन्दर फल-फूलों युक्त बगीचे दिख जाते है। वहीं वे चक्राकार या गोलाकार पथ में चक्कर लगाती हुई नाचने लगती हैं जिससे उनके दूसरे साथी-सहयोगी यह जान जाते हैं कि खाद्य पदार्थ का स्त्रोत दूर अथवा पास ही कहीं है।

सहयोग और संगठन के आधार पर सृष्टि के छोटे से छोटे प्राणी भी बड़े से बड़े शक्तिशाली जीवों को ध्वस्त करने में समर्थ होते है। कहते हैं कि चींटियां मिलकर हाथी की सूँड में घुस पड़ें तो उसे मार सकती है। प्राणिशास्त्रियों ने अफ्रीका के जंगलों में इसी तरह की चींटियों की एक विशिष्ट प्रजाति को खोज निकाला है जो लाखों-करोड़ों की संख्या में एक साथ रहती है। और मिल-जुलकर अपने कामों को निपटाती है। वैज्ञानिकों ने इन्हें सैनिक चींटियों के नाम से संबंधित किया है यह सभी नेत्र विहीन होती है। किन्तु शिर पर लगे एन्टीनानुमा दो संवेदी अंगों की सहायता से अपने आस-पास की जानकारी प्राप्त कर लेती है।

यह अंधी चींटियां सदैव समूहों में ही चलती हैं इनका कोई स्थायी घर नहीं होता। खानाबदोशों की तरह यह प्रतिदिन सुबह से शाम तक भोजन की तलाश में घूमती रहती है। ओर जहाँ भी रात्रि हो जाती है वही अपना अस्थायी निवास बना लेती है। इनके भयं से जंगल के हिंस्र पशु भी भयभीत रहते है। कारण कि ये उन पर एक साथ टूट पड़ती है। और देखते ही देखते ही उनको चट कर जाती है। शेर, भालू, घोड़े, बैल, भैंसे बड़े जानवरों को यह चींटी दल एक घण्टे के अंदर ही उदरस्थ कर जाती है। मनुष्य को खाने में इन्हें आधे घण्टे से भी कम समय लगता है। इनकी पकड़ में जो भी प्राणी आ जाता है उसका मात्र अस्थि पिंजर ही शेष मिलता है।

अपने यात्रा के समय सामने आये संकटों, विपन्न, परिस्थितियों का सामना मिल-जुलकर एक साथ यह किसी सुनियोजित ओर संगठित ढंग से करती है, उसे देखकर मूर्धन्य वैज्ञानिक इंजीनियर भी आश्चर्यचकित रह जाते है। रास्ते में जब कभी नहीं, नाले आदि कोई जल स्रोत पड़ जाते हैं तो इनका इंजीनियर दल सक्रिय हो जाता है। ओर पैर से पैर मिलाकर हजारों चींटियां तुरन्त पुल बना देती हैं जिस पर से इनका शेष दल पार हो जाता है। अन्त में पुल बनी चींटियां तुरन्त पुज बना देती हैं जिस पर से इनका शेष दल पार हो जाता है अन्त में पुल बनी चींटियां एक दूसरे से लिपटे हुए गेंद के आकार में गोल हो जाती है। और बहते बहते दूसरे तट तक पहुंच जाती है। इसी प्रकार शिविर निर्माण में भी यह एक दूसरे का सहयोग करती हुईं सुन्दर कोठरियों का निर्माण करती है।

मनुष्य की बुद्धिमत्ता शारीरिक चेष्टा और प्रयत्न परायणता के मूल में जो अत्यन्त प्रेरक दिव्य प्रवृत्ति झाँकती है। उसे सहकारिता कह सकते है। वस्तुतः यही मानव प्राणी की सबसे बड़ी विशेषता है। परस्पर सहयोग की इस महत्ता को समझने वाले लोग देश ओर जातियां ही अपराजेय होती है। वे कही भी चली जायें वहीं अपना प्रभाव स्थापित कर लेती है। प्राणियों में सहयोग की प्रवृत्ति की महत्ता को प्रतिपादित करने वाले प्रख्यात प्राणि विशेषज्ञ फोरल ने एक बार एक विचित्र प्रयोग किया। उन्होंने एक स्थान की चींटियों के झुण्ड को एक थैले में भरा और उसे एक ऐसे स्थान पर लाकर छोड़ दिया जहाँ बहुत से चींटी भक्षी-टिड्डे पतिंगे रहते थे बर्र मकड़ियां ओर गुबरैलों की जहां जमाते लगी थी।

इनमें से एक भी जीव ऐसा नहीं था जो चींटियों के वहाँ पहुँचते ही बर्रो ने युद्ध ठान दिया पर संगठित चींटियां घबराई नहीं उनमें से कितनी ही शहीद हो गई पर उनके संगठित हमले के आगे बर्रे ठहर न सकीं। गुबरीले उन्हें देख कर बिना प्रतिरोध वहाँ से खिसक गये पतिंगों और टिड्डों ने अपने बने बनाये किले चींटियों के लिए खाली कर दिये निर्वासित चींटियों ने संगठित शक्ति के बल पर वहाँ भी पहले जैसा ही साम्राज्य स्थापित कर लिया।

यह उदाहरण मनुष्य जाति के देश ओर समाज की सुख समुन्नति के आधार है। सहयोग के बल पर जब क्षुद्र समझे जाने वाले जीवधारी अपना जीवन यापन शानदार ढंग से कर लेते है। बड़ी बड़ी बाधाओं से निपट लेते है। विशालकाय शरीर वालों के छक्के छुड़ा देते है। फिर कोई कारण नहीं कि मनुष्य यदि स्नेह ओर सहयोगपूर्वक रहें। सहकारिता का आश्रय ले तो अपनी सामयिक तथा भावी कठिनाइयों का सामना न कर सकें। विलगाव की दुःखद हानियों और मिलजुलकर रहने की सुखद संभावनाओं को हम जितनी जल्दी समझ सकें, उतना ही अच्छा है।


हर वर्ष अपना विवाहोत्सव (Kahani)

वे दोनों हर वर्ष अपना विवाहोत्सव मनाया करते थे। यथाशक्ति एक दूसरे को इस उपलक्ष में उपहार भी दिया करते थे।

उस वर्ष पैसे की तंगी थी फिर भी एक दूसरे को कुछ बढ़िया और कारगर उपहार देना चाहते थे। अभाव के बीच भी उनने रास्ता खोज निकाला।

वधू अपने पति के लिए घड़ी की चेन देना चाहती थी। उसने अपने सुनहरी बाल किसी सज्जा संस्थान को बेच दिये ओर उसके बदले में घड़ी की सुन्दर चेन खरीद ली।

उधर पति भी कुछ ताना-बाना बुन रहा था। उसने अपने घड़ी बेच दी ओर बदलें में बालों में लगाने के लिए एक सुनहरी क्लिप खरीद ली। दोनों अपने-अपने निर्णय को छिपाये रहें।

विवाह दिन आया तो पत्नी ने पति की कलाई में घड़ी बाँधनी चाही पर देखा कि घड़ी तो पहले ही बिक चूंकि थी।

पति ने पत्नि के बालों में क्लिप लगाने चाही पर बाल तो पहले ही किसी सज्जा संस्थान में बिक चुके थे।

दोनों प्रत्यक्षतः निराश रहें। पर दोनों को परस्पर प्रेम की गहराई की उस क्रियाकलाप ने उजागर कर दिया।


अनीति त्रास ही त्रास देती है।

धन-सम्पदा का अपना महत्व है। हर व्यक्ति जीवन में सुख-समृद्धि-वैभव देखना चाहता है, किन्तु जब यह लालसा अति की सीमा को पार कर जाती है। तो येन-केन-प्रकारेण उसे पूरा करने का प्रयास किया जाता है। पुरातत्व विज्ञान एवं नृतत्व विज्ञान की शोधों में ऐसे कई घटनाक्रम प्रकाश में आये है। जिनसे पता चलता है कि अगणित व्यक्तियों ने सम्पदा जुटाने हेतु किस प्रकार प्रयास किए एवं कैसे उनसे जुड़े अभिशापों से उन्हें दण्डित भी होना पड़ा। प्रकृति की यह व्यवस्था स्वयं में अद्भुत है कि आतंक व अनीति की कीमत पर प्राप्त की गई वस्तु जिस किसी के पास जाती है, उसे सुख नहीं कष्ट-ही-कष्ट देती है। होप डायमण्ड पर यह तथ्य अक्षरशः लागू होता है।

नीली प्रकाश किरणों वाला यह हीरा देखने में जितना आकर्षक व सुन्दर है, वह उतना ही खतरनाक भी है। अब तक यह जिस-जिस के पास गया, उसे चैन से नहीं रहने दिया। कइयों ने इसे पाकर आत्महत्या कर लीं, कई पागल हो गये, काल के गाल में समा गये। जबकि कुछ के घरों में ऐसी तबाही मचायी कि उन्हें राजा से रंक की स्थिति में ही लाकर छोड़ा। तात्पर्य यह कि हर किसी को जिसने इसका स्वामित्व प्राप्त किया, किसी-न-किसी प्रकार भी हानि अवश्य उठानी पड़ी। ढूंढ़ने से ऐसा एक भी प्रसंग में नहीं आया, जिसमें व्यक्ति इसके अभिशाप से बिल्कुल अछूता रह सका हों। आखिर यह अभिशाप से बिल्कुल अछूता रह सका हो। आखिर यह अभिशाप इसके साथ जुड़ा कैसे? इसे जानने के लिए इसके पिछले इतिहास का अवलोकन करना पड़ेगा।

आज से करीब साढ़े सौ वर्ष पूर्व इस हीरे को दक्षिण भारत में कृष्णा नदी के तटवर्ती क्षेत्र से निकाला गया था। इसके बाद इस भगवान वैंकटेश्वर की प्रतिमा में जड़ दिया गया। मंदिर के पुजारी ने जब इस मनमोहक हीरे को देखा, तो अपना लोभ संवरण नहीं कर सका, और दिन-रात इसे प्राप्त करने के ताने-बाने बुनता रहा एवं एक दिन इसे मुकुट से निकाल ही लिया तथा चोरी छिपे बेच कर रातों रात लाखों की सम्पत्ति का मािलक बन बैठा। जब इस चोरी की जानकारी भक्तजनों को हुई, तो पुजारी की धूर्त्तता उनसे छिपी न रही ओर एक विशाल भीड़ ने उस पर आक्रमण कर उसकी हत्या कर डाली। यह हीरा एक ऐसे जौहरी के हाथ लगा जिसने उसे तत्काल एक फ्राँसीसी तस्कर जीन वापतीसे के हाथों बेच दिया। यही से हीरे के प्रतिकार कहानी शुरू होती है। जिस जौहरी ने उसे फ्राँसीसी तस्कर को बेचा था, उसे अपनी जान एक सड़क दुर्घटना में गंवानी पड़ी।

वापतीसे ने हीरे को फ्राँस के राजा लुई चतुर्दश को बेचकर अच्छी खासी धनराशि अर्जित कर ली। लेकिन दूसरी बार जब वह दूसरी बार भारत आया तो कालीकट के निकट जंगल में शिकार खेलते समय जंगली कुत्तों का आहार बन गया।

लुई चौदहवें के एक दरबारी निकोलस ने हीरे अपने शान-शौकत का प्रतीक समझा और किसी राजकीय भोज में उसे राजा से माँगकर सम्मिलित हुआ। कुछ समय पश्चात् निकोलस को हिसाब में गड़बड़ी के आरोप में बन्दी बनाया गया ओर वहीं कारावास में उसने दम तोड़ दिया। लोगों का कहना है लुई की मृत्यु एक कुत्ते के समान हुयी। साथ ही उसके राज घराने के तीन सदस्यों को भी असामयिक रूप से काल का ग्रास बनना पड़ा। हीरे को गले में पहनने वाली राजकुमारी डी0 लैम्वाले की हत्या भी किन्हीं अज्ञात लोगों द्वारा कर दी गयी।

अब बारी आती है फ्राँस के राजा लुई सोलहवें की। हीरे को विरासत में प्राप्त करते ही गृह युद्ध की स्थिति उसके शासन काल में पैदा हो गयी। हत्यारों ने राजा ओर रानी दोनों को ही गिलोटीन से काटकर निर्मम हत्या कर दी।

अभिशप्त हीरा में फ्राँस के जैकस कैलोट जौहरी के पास आया। जौहरी हीरे की सुन्दरता को देखते-देखते पागलों जैसा हो गया और अन्ततोगत्वा आत्महत्या कर बैठा। इस को अब पेरिस में बसे एक रूसी राजकुमार इवान ने खरीद लिया और अपनी प्रेयसी को उपहार स्वरूप भेंट किया। न जाने क्यों इवान को अपनी प्रेयसी के चरित्र पर आशंका हुई ओर उस बेचारी की हत्या करवा दी। तदुपरान्त स्वयं इवान भी दरबारियों के चंगुल में फंस कर मारा गया।

रूस की महारानी कैथरीन ने जब यह अभिशप्त “हापडायमण्ड” गले में पहना, तो कुछ ही दिनों में दमे रोग की शिकार बन कर अपनी जीवन लीला पूरी कर गयी। सन् में जब वही हीरा एक अन्य जौहरी के यहाँ पहुँचा तो जौहरी का सौतेला लड़का उस हीरे को तिजोरी से निकाल कर चलता बना। जौहरी इस आघात को सहन न कर सका। अन्ततः उसने दम तोड़ दिया। उसका लड़का भी एक नदी में डूबा पाया गया।

सन् में आयरलैण्ड के एक सुप्रसिद्ध बैंक मालिक हैनरी थामस होप के हाथों यह हीरा नियति के विधानानुसार हजार पौण्ड में क्रय किया गया। हेनरी ने हीरा का नाम “होपडायमण्ड” रखा। दो साल पूरे हुए भी न थे कि बैंक दिवालिया घोषित हो गयी और हेनरी की तीन पीढ़ियों ने गरीबी से संत्रस्त होकर अपनी जीवन लीला समाप्त कर दी।

वर्ष में हीरे को हजार पौण्ड में क्रय करने वाले तुर्की सुल्तान हमीद थे। भाग्य की विडम्बना ही कहनी चाहिए कि लिया तो बेगम को उपहार स्वरूप भेंट करने हेतु पर आपस में तालमेल न बैठ पाने के कारण सुल्तान ने बेगम की गोली मार कर हत्या कर दी। सन् में विरोधी सेनाओं ने सुल्तान को भी गोलियों से भून डाला।

सन् में इस अभागे हीरे को अमेरिका के नेंड में मेकलीन ने लाख हजार में लिया। कुछ दिनों में उसका जवान बेटा विनसेंट कार में कुचल कर मृत्यु को प्राप्त हुआ। इधर पुत्र वियोग का दुःख, दूसरी तरफ व्यापार में घाटा होने से मैकलीन विष पान करके आत्म-हत्या कर बैठा। उसकी पत्नी भी थोड़े ही दिनों में चल बसी।

इस प्रकार इसके रक्तरंजित इतिहास को देखते हुए अन्ततः इसे वाशिंगटन के स्निथ सोनियन संग्रहालय को दान स्वरूप भेंट कर दिया गया, जो आज भी वहाँ सुरक्षित पड़ा है, जिसे देखने के लिए अब भी लोग दूर-दूर से आते है।

कोहिनूर हीरे का इतिहास भी इसी प्रकार का बताया जाता हैं वह जहाँ भी गया, जहाँ भी रहा, अपने साथ विपत्ति ही लेकर आया ओर उसे रखने वाले के लिए सदा प्राणघात की व्यथा संजोये रहा। इतना सब होते हुए भी सम्पत्ति बटोरने वालों को यह नहीं सूझ पड़ता कि यह अन्याय की कमाई है इससे बचा जाना चाहिए पर दुर्बुद्धि के आगे उनका विवेक मारा जाता है। वे आनन-फानन में जैसे भी बन पड़ता है लूट खसोट कर धन कुबेर बनने की अभिलाषा पूरी करने की कोशिश करते हैं, मगर जब उनकी महत्वाकाँक्षा पूरी नहीं होती ओर लाभ के स्थान पर उल्टे नुकसान होता है, तो उनकी समझ में आता है कि शेखचिल्लियों का-सा सपना पालना कितना खतरनाक है, किन्तु तक काफी देर हो चूंकि होती है। वे भंवर में इस बुरी तरह फंस चुके होते है कि उस से आसानी से उबर पाना उनके लिए संभव नहीं होता ओर प्राण तक गंवाने की स्थिति बन पड़ती है।

वस्तुतः इस प्रकार के कारण यही सिद्ध करते हैं कि अनीति-अत्याचार की कमाई कभी फलती नहीं वह व्यक्ति को हर प्रकार से हैरान-परेशान ही करती है। यदि इसे दुष्कर्मों का प्रत्यक्ष फल माना जाये ओर भगवान की विधि-व्यवस्था की संज्ञा दी जायें, तो कोई अत्युक्ति नहीं होगी।


Quotation

तुम जैसे भी हो वैसे तुम्हें आ मिलेंगे या ढूंढ़ लेंगे।


अगले दिनों रंगों से दूर होंगे रोग।

सविता देवता की आराधना का विधान आप्त वचनों में आता हैं वस्तुतः वे प्रकाश व ताप देने वाले वृक्ष वनस्पतियों में जीवन संचार करने वाले प्राणि जगत में स्फूर्ति भर देने वाले भर नहीं हैं, उनकी सप्त किरणों में व्यक्ति को निरोग करने की अभूतपूर्व सामर्थ्य छिपी पड़ी हैं हम सही मात्रा में सही वर्ण का प्रयोग कर न केवल रोगों से बचे रह सकते हैं, अपितु बलिष्ठता भी अर्जित कर सकते है।

वर्ण चिकित्सा प्रणाली (क्रोमोपैथी) को प्रकृति का एक रहस्यमय विज्ञानी डा. ऐडगर मेसी प्रायः यही कहा करते थे कि चिकित्सा का भविष्य प्रकाश स्पेक्ट्रम और ध्वनि तरंगों के ऊपर ही निर्भर करता है। रंग और ध्वनि चिकित्सा में ब्रह्माण्डीय अदृश्य तरंगों को प्रयोग रोगी पर किया जाता है शरीर के क्षतिग्रस्त अवयवों में रंग भरी किरणें पहुँचाई जाती हैं इन्हें लैम्प के माध्यम से उत्पन्न किया जाता है। और कभी कभी विशेष प्रकार से बने रेडियोनिक्स बाक्सों का भी इस्तेमाल होता हैं।

मनुष्य सहित समस्त जीवधारियों वृक्ष वनस्पतियों को सूर्य की शक्ति की हर क्षण जरूरत पड़ती हैं प्रकाश किरणों के माध्यम से यह आवश्यकता निरन्तर पूरी भी होती रहती है। शुभ्र उज्ज्वल दिखने वाली ये किरणें वस्तुतः कई भागों में विभक्त होती है। लाल नारंगी पीला हरा नीला जम्बुकी नीला(इन्डिगो) तथा बैंगनी नामक सात रंगों को हम त्रिपार्श्व नामक शीशे से अलग अलग करके देख सकते है इन्द्र धनुष में भी ये सातों रंग अलग अलग घेरे में दिखाई देते है। इन रंगों का मानवी काया से गहरा संबंध है। इनसे यदि किसी एक रंग की अभावग्रस्तता शरीर को महसूस होने लगे तो स्वास्थ्य के असंतुलित होने में जरा सी भी देर नहीं लगती। यही कारण है कि विभिन्न रोगों में खुले बदन सूर्य के मध्यम प्रकाश में विशेषकर प्रातः कालीन अरुणोदय के समय धूप सेवन को बहुत महत्वपूर्ण कृत्रिम रूप से भी लैम्प द्वारा उत्सर्जित प्रकाश से भी शरीर की रंग अभावग्रस्तता को दूर किया ओर रोगी को स्वस्थ रखा जा सकता है।

प्रख्यात चिकित्सक श्रीमती ऐलिस हौबार्ड को होमियोपैथी, रेडियोनिक्स तथा कलर थेरेपी का विशेषज्ञ माना जाता हैं उनका कहना है कि रोगोपचार में विभिन्न रंग महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं लाल रंग की मुख्य विशेषता यह होती है कि वह स्नायु ओर रक्त की क्रियाशीलता को बढ़ाता है। एड्रीनल ग्रन्थि एवं संवेदी तंत्रिकाओं को उत्तेजित करने का काम तो लाल रंग का होता ही है। शरीर में प्राण-शक्ति की भरपूर मात्रा बनाये रखने की जिम्मेदारी भी उस की है। चिकित्सा में इस रंग का उपयोग बहुत ही सावधानीपूर्वक करना चाहिए। अत्यधिक उत्तेजक होने के कारण यह भावनात्मक व्यतिरेक भी उत्पन्न होने के कारण यह भावनात्मक व्यतिरेक भी उत्पन्न कर सकता हैं अतः इसे पृथक् रूप से प्रयुक्त न करके हमेशा हरे ओर नीले रंग के साथ संयुक्त रूप से प्रयोग करने को अधिक लाभप्रद समझा गया है।

नारंगी रंग लाल और पीले का सम्मिश्रण है। लाल की तुलना में इसका प्रभाव अधिक लम्बे समय तक रहता है। यह रोगाणु प्रतिरोध क्षमता को बढ़ाने वाला माना गया है। इसकी अधिकतर उपयोगिता ऐंठन और जकड़न के उपचार में समझी गयी है। कैल्शियम चयापचय-मेटाबालिज्म में अभिवृद्धि तथा फेफड़े, पैन्क्रियाज एवं स्प्लीन-प्लीहा को सशक्त बनाने में नारंगी रंग महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह रंग नाड़ी की गति को तो बढ़ाता है पर रक्तचाप को सामान्य बनाये रखता है। यह एक सर्व विदित तथ्य है कि इस रंग के प्रभाव से भावनाएं अनुप्राणित होती है।

चिकित्सा शास्त्रियों ने अपने अनुसंधान निष्कर्ष में बताया है कि मोटर तंत्रिकाओं की क्रियाशीलता बढ़ाने में पीले रंग की प्रकाश किरणों का बहुत अधिक महत्व होता है। माँसपेशियों को मजबूत बनाये रखने एवं पाचन संस्थान को ठीक रखने एवं पाचन संस्थान को ठीक रखने के लिए प्रायः इसका प्रयोग किया जाता है। अधिक समय तक पीले रंग की रश्मियोँ का प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए अन्यथा पित्त दोष उत्पन्न होने के अवसर बढ़ जाते है। इस रंग के अधिक प्रयोग से सन्निपात ओर हृदय की धड़कने बढ़ने लगती है। वस्तुतः पीला रंग बुद्धिवर्धक माना गया है।

हरे रंग की रश्मियों को चयापचय को बढ़ाने वाला माना जाता है। मस्तिष्क की उच्चतम स्थिति अर्थात् अन्तः प्रज्ञा को जगाने की क्षमता इस रंग में विद्यमान रहती है। त्वचा के जलने पर प्रायः इसी रंग द्वारा उपचार व्यवस्था बिठाई जाती हैं जबकि जम्बू की नीला प्रकाश मोटर तंत्रिकाओं लिम्फैटिक तथा हृदय तंत्र को हतोत्साहित करता है। अधिकतर इसका प्रयोग रक्त कणिकाओं के परिशोधन में किया जाता है। बैंगनी रंग शरीर में पोटेशियम का संतुलन बनाये रखने की क्षमता रखता है। इसके प्रभाव से ट्यूमर का विकास रुक जाता है। अति तीव्र भूख लगने को भी बैंगनी रंग रोकता है।

वैज्ञानिकों ने विभिन्न रंगों के सम्मिश्रण से बने कुछ ऐसे रंग खोज निकाले हैं जो रोगोपचार में अपनी सक्रिय भूमिका निभाते हैं। लेमन हल्के पीले ओर हरे रंग का सम्मिश्रण है जिसमें रेचक का गुण विद्यमान है। मस्तिष्क के सेरिब्रल भाग को अनुप्राणित करने में सक्रिय भूमिका रहती है। इसमें मिला पीला रंग एण्टेसिड (अम्लपित्तनाशक) होता है दर्दनाशक के रूप में बैंगनी की रश्मियाँ प्रयुक्त होती हैं यह रंग लाल और नीले रंग की अधिक मात्रा को मिलाने से बनता है जिसकी मलेरिया उन्मूलन में विशेष उपयोगिता बताई गयी है। सिंदूरी रंग की उत्पत्ति लाल रंग की अधिकता तथा नीले रंग की न्यूनतम मात्रा के सम्मिश्रण से होती हैं यह गुर्दे ओर कामेंद्रियां को उत्तेजित करता है। लाल और बैंगनी रंग मिलकर मैजेन्टा कलर तैयार करते हैं जिसे हृदय और एड्रीनल ग्लैण्ड को सक्रिय बनाने में उपयोगी पाया गया है। फिरोजी कलर को नीले और हरे रंग का मिश्रण कहा जाता हैं चर्म रोग अथवा त्वचा में होने वाली किसी भी प्रकार की गड़बड़ी को यह रंग रोकता है। साइनुसाइटिस के उपचार में प्रायः इसका प्रयोग होता है। लाल और सफेद रंग मिलाकर गुलाबी रंग तैयार होता है। भावनात्मक विकास में इसका बहुत अधिक महत्व समझा जाता है।

स्वास्थ्य को अक्षुण्ण बनाये रखने के लिए शरीर में प्रकाश ओर रंगों का संतुलन नितान्त आवश्यक है जिससे शरीर को विभिन्न कार्यों के संचालन के लिए भरपूर मात्रा में शक्ति मिलती रहें। खगोल विज्ञानियों को चाहिए कि वे मनुष्य की आकृति और प्रकृति देखकर यह निर्णय करें कि कितनी मात्रा में शरीर को प्रकाश ओर रंगों की आवश्यकता है इसे समझना भी उन्हीं की सूक्ष्म बुद्धि द्वारा संभव है। वस्तुतः वर्ण चिकित्सा का काम ज्योतिष विज्ञान की सहायता से और सुगम हो जाता है।

वर्ण चिकित्सा यदि विज्ञान सम्मत ढंग से उपयुक्त व्यक्तियों में प्रयोग संभव हो सके तो वैकल्पिक चिकित्सा के क्षेत्र में एक नया विस्तृत आयाम जन्म ले सकता है।

आज मानव जाति को ऐसे ही हानि रहित सुगम उपाय उपचारों की आवश्यकता है।अनुसंधान इस क्षेत्र में किया जाना चाहिए।


प्रशंसा की सृजनात्मक शक्ति

गहन अन्तस्तल में एक चेतन चिनगारी ऐसी है जो अपना सम्मान चाहती है गौरवास्पद बनाने के लिए आकृत व्याकुल रहती है। इस तड़पन की तृप्ति जहाँ से होती है वह उसे प्रिय लगने लगती है। प्रशंसा एक प्रकार का प्रोत्साहन है, एक संदेश है जो प्राणी को साफ-साफ बता देता है। कि उसे किस रूप में पसंद किया जाता है। खिलाड़ियों को सिखाते समय जब शिक्षक समय जब शिक्षक हाँ या शाबाश कहता है तो वह उन्हें प्रोत्साहित करके उनके अंग चालन प्रक्रिया पर अपनी स्वीकृति वाली मुहर लगा देता है। उसका अधिकाधिक उपयोग करके खिलाड़ी दक्ष बनता है।

प्रशंसा करने का प्रोत्साहित करने का अवसर जब भी मिले उसे व्यक्त करने से न चूका जाये इससे प्रशंसक की भी प्रतिष्ठा बढ़ती है। इसके अतिरिक्त इसी के बल पर अग्रिम मार्गदर्शन एवं दोष निवारण भी बन पड़ता है। प्रोत्साहन प्रशंसा शिक्षण प्रक्रिया का एक अति आवश्यक ओर व्यावहारिक अंग ठहराता है। चित्रकला का एक अध्यापक कक्षा में गृहकार्य कर लिया था उनकी परिणाम यह हुआ कि न केवल होम वर्क करने वालों की संख्या द्विगुणित हो उठी अपितु अध्यापक भी विद्यार्थियों में और प्रिय होने लगा।

संसार में सर्वथा गुण विहीन व्यक्ति कोई नहीं। तलाश करने पर बुरा लगने वाले व्यक्ति में भी कुछ न कुछ गुण मिल सकते है। बिना झूँठ बोले भी व्यक्ति में जो प्रत्यक्ष या परोक्ष गुण दीख पड़े उसकी चर्चा कर देना अपनी सद्भावना का प्रकटीकरण है जिससे व्यक्ति अनुकूल भी बनता है। नरम पड़ने पर अपनी ओर झुकने पर परामर्शों को भी दिया गया और स्वीकारा कराया जा सकता हैं जो उसके लिए उपयोगी और आवश्यकता हैं साथ ही जिन्हें चरितार्थ होने पर अपना आदर्शवादी दृष्टिकोण भी पूरा होता है। इसी संबंध में एक ऐसी नवविवाहित का दृष्टान्त रीडर्स डाइजेस्ट पत्रिका में छपा है जिसके पति एवं श्वसुर दोनों ही अफसरी मिजाज वाले थे जो प्रायः हुक्म चलाते रहते थे। भोली भाली बेचारी पत्नी उस पर कभी भी अपनी खीझ भरी प्रतिक्रिया व्यक्त न करती किन्तु जब कभी उसके पति अथवा श्वसुर घर के छोटे-मोटे कामों को पूरा करके उसका भार बटाने जैसा कोई नेक काम करते तो पत्नी अपनी प्रसन्नता व्यक्त किए बिना ओर उन्हें सम्मान दिये बिना न रहती। इस तरह से उसने उन दोनों को अपने आदर्शों के अनुरूप मोड़ने में सफलता पाई।

प्रशंसा प्रोत्साहन के माध्यम से आगे बढ़ाना ऊंचे उछालना जितना सरल है उतना और किसी प्रकार नहीं। प्रशंसा के उपरान्त यह परामर्श भी दिया जा सकता है कि गेहूँ में घुन की भाँति कुछ घिनौनी आदतों को वह किस प्रकार त्यागकर अधिक प्रतिभा सम्पन्न सज्जन देवतुल्य बन सकता हैं यदि इन्हीं दुर्गुणों के प्रति आँगुल्यानिर्देश छिद्रान्वेषी ढंग से पेश किया जाता तो उससे चिढ़कर व्यक्ति में दुर्भावनायें ओर गहरे जड़ें जमा पाने का अवसर पा जाती है।

सकारात्मक प्रोत्साहन द्वारा व्यक्ति के वाँछित आचरण में सुधार तभी आता हैं जब वह कार्यावधि में ही दी जायें। उदाहरणार्थ बच्चा जब साइकिल सीख रहा है तब भी यदि उसे शाबाश ठीक कहा जाये तो वह पागलपन सरीखा सिद्ध होगा। सीखी गई बात को बरकरार बनाये रखने के लिए यदाकदा प्रोत्साहन दिया जा सकता है।

प्रशंसा प्रोत्साहन एक ऐसा सुधारात्मक आयुध है जिसकी वजह से मनुष्य ही नहीं पशु-पक्षी जैसे स्वच्छन्द प्राणियों को भी सुदृढ़ बनाकर उनमें काम लिया जा सकता है। न्यूयार्क शहर के वौन्क्सा चिड़ियाघर में वार्षिक स्वच्छता अभियान के अंतर्गत एक गोरिल्ले को पिंजड़े से बाहर निकालने की कोशिशें इसलिए चल रही थी ताकि पिंजड़ा भीतर से भली भाँति साफ किया जा सके किन्तु ऐसा लग रहा था कि गोरिल्ले में बाहर न निकलने की ठान ली थी। केले दिए जाने पर वह खाकर तुरन्त भीतर घुस जाता। विवश होकर मुख्य प्रशिक्षक को बुलाया गया। उन्होंने समाधान यह सुझाया कि जब गोरिल्ला दरवाजे में बैठा उसकी उपेक्षा की जाये पर ज बवह स्वयं बाहर आए तो उसे भोजन देकर प्रोत्साहित किया जाये। प्रोत्साहन तो तभी दिया जाना चाहिए जब वाँछनीय कार्य हो रहा हैं ऐसा ही किया गया व वाँछनीय कार्य हो रहा हैं ऐसा ही किया गया व वाँछित प्रयोजन पूरा हुआ। वस्तुतः अभीष्ट कार्य की संभावना में पहले से प्रोत्साहन देना प्रकारान्तर से घूँस देने के समान है। गोरिल्ले के इस दृष्टान्त में उसे केले दिखाना उस आचरण का प्रोत्साहन नहीं है जो अभी शुरू ही नहीं हुआ।

समय से पूर्व दिया गया प्रोत्साहन कारगर नहीं होता। इसमें कभी कभार आगे असफल होने वाले कार्यों को भी हम प्रोत्साहित करने की भूल अनजाने में कर जाते है। प्रोत्साहन कोई भी चाहे वह सकारात्मक प्रशंसा वाला हो या निराशात्मक पिटाई नाराजगी वाला हो समय से दिया जाये। कार्यावधि में या कार्य समाप्त होते प्रोत्साहन निष्प्रभाव ही देना चाहिए।बाद का दिया गया प्रोत्साहन निष्प्रभाव ही नहीं समस्यात्मक बन जाता हैं उदाहरणार्थ यदि किसी कलाकार से कहा कि कलवाला तो आपका अभिनय बड़ा ही बेजोड़ था। इस प्रोत्साहन का उल्टा अर्थ वह यह भी मान सकता है कि कल वाला उत्तम था और आज का निकृष्ट जबकि कहने वाले का यही अभिप्राय नहीं था। वाँछित परिणाम आते ही तुरंत की हल्की डाट फटकार बच्चों पर अंकुश का काम करती है। बाद में डाँटते रहना निष्प्रभावी होकर मात्र शोर शराबा ही उनकी निगाहों में रह जाता है।

प्रोत्साहन परिवर्तनशीलता व सृजनात्मक होने चाहिए। एक सरीखे प्रोत्साहन अपना महत्व गंवा बैठते हैं इसकी परख कारेन प्रायर ने डाल्फिनों पर की है। उनका कथन है कि यदि डाल्फिन की हर उछाल की हर उछाल पर उसे मछली खिलाना बन्द तो कुदान भी ठप्प। इसकी जगह प्रोत्साहन में भी परिवर्तनशील कार्यक्रम अपनाए जाने पर डाल्फिन वाँछित आचरण करेंगी।

अन्तरात्मा अपनी गरिमा भूलती नहीं। वह येन-केन प्रकारेण स्नेह सम्मान पाने के लिए हाथ पाँव पीटती रहती है। व्यक्ति में सौंदर्य सज्जा से लेकर डाट-बाट रोपने और सस्ते प्रदर्शनों से या उपहार देकर लोगों को इसके लिए उफसाती रहती है। यह ललक लिप्सा मानवेत्तर प्राणियों में भी पाई जाती है। बी0एफ॰ स्किनर मनोविद ठहरे। उन्होंने देखा कि एक लड़की चाहती थी कि उसका कुत्ता साथ साथ घूमें। पर वह दूर भाग जाता और बुलाने पर भी न आता। स्किनर ने कुत्ते की तारीफ वाली योजना बताई। जब भी कुत्ता बिना बुलाए उसके पास आ जाता वह उसकी तारीफों का पुल बाँध देती। उसे खिलाती, दुलारती तथा बच्चों सरीखी बातें करती। अब वही कुत्ता एक आवाज पर आने लगा।

कारेन फ्रायर ने जब यह देखा कि घर में बच्चों पर चीखना चिल्लाना बेअसर हो रहा था, उन्होंने सकारात्मक प्रोत्साहन अपनाना आरम्भ कर दिया। भोजन कर लेने के बाद ज्योंही बच्चे बरतन माँजने हाथ बाँटने आगे बढ़ते तो उनकी माँ उन्हें गले लगाकर प्रशंसा के दो चार शब्द कहकर प्रोत्साहित करने लगी। जब उनके अच्छे काम प्रशंसित होने लगे तो उनकी पुनरावृत्ति होते रहने से घर का वातावरण शनैः-शनैः सुख शान्तिमय होने लगा। निःसन्देह प्रशंसा वह सीढ़ी है जिसकी सहारे ऊपर उठना आगे बढ़ाना सरल होता हैं प्रशंसा चाहे दूसरा करें या स्वयं कर लिया जाये हर दशा में उत्साहवर्धक सिद्ध हो सकती।

जीवन में हम अपने आप से बड़ी आशायें रक्खे रहते हैं जब वे पूरी होने को हों तब हम उन पर अपने को प्रोत्साहित न करें ऐसे अवसर प्रायः कम ही आया करते हैं अस्तु हम अपने को प्रोत्साहित करना भूल जाते हैं कारने प्रायर के शब्दों में मैं समझती हूँ की हमारी चिन्ता और उदासी की एक वजह प्रोत्साहन से वंचित रहना भी है। उनकी राय में व्यक्ति एक घण्टे काम काज बन्द कर के दोस्तों के साथ गप्प लगाकर आत्मानुमोदन से अपने आप को बड़े अच्छे ढंग से प्रोत्साहन दे सकता है। इस संदर्भ में अभिनेत्री रुथ गोर्डेन के सुझाव है कलाकारी प्रशंसा होनी ही चाहिए अगर काफी दिनों तक मेरी प्रशंसा न हो तो मैं स्वयं अपने को बधाई देती हूँ। अपनी तारीफ आप करना दूसरों के मुँह तारीफ सुनने जैसा ही होता है। कम से कम इतना तो जानती ही हूँ कि यह तारीफ एक दम सही है।

अपने आप को जानने की अपने बारे में सोचने समझने की उपेक्षा लोग बाग किया करते है। व्यक्ति कितना ही व्यस्त क्यों न रहे उसे इस निमित्त समय निकालना ही पड़ेगा निद्रा में निमग्न होने के पहले अपने दिन भर के कार्यों का लेख जोखा उसे लेना चाहिए। जो भी स्तुत्य कृत्य वचन या व्यवहार नेकी के जान पड़ें उस हेतु उसे अपनी प्रशंसा प्रोत्साहन स्वयं ही कर देनी चाहिए। दुर्व्यवहार पर स्वयं को लानत दिया जाये और उससे बचे रहने का परामर्श भी दिया जाता रहें।


भावावेश अपरिपक्वता का चिह्न

उत्साह के अतिरेक में भावावेश की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। ऐसा सफलता मिलने प्रसन्न होने तथा असाधारण लाभ मिलने की स्थिति में तो होता ही है किसी प्रियजन के मिलने या उसकी पूर्ति निकट भविष्य में होती देख कर भी यही स्थिति बन जाती है। नशे जैसी उन्माद की स्थिति में होता है और चित्र-विचित्र चेष्टाएं करता है।

भावावेश का एक दूसरा पक्ष भी है बिछोह, घाटा, भूल पाप आदि ऐसी स्थिति में भी भावावेश आता हैं नींद उड़ जाती है आँखों से आँसू बहने लगते है। रोमाँच हो आते है। उदासी एवं पश्चात्ताप में मन रुदन करता है।

भक्तियोग में भावावेश को प्रगति का चिह्न माना गया है। भगवान मिलने वाले हैं, निकट हैं, उन पर अपना प्रेम प्रकट हो रहा है। अनुग्रह बरसने ही वाला है। उनकी समीपता में स्वर्ग मुक्ति जैसे आनन्दों की अनुभूति सदा होती रहेंगी। भव-बंधन कट जायेंगे। स्वतंत्र स्वच्छन्द रहने ओर रंगीले सपनों की उड़ानें उड़ते रहते का अवसर पंख न होने पर भी मिलता रहेगा ऐसी कल्पनाएं अन्तर में उत्साह उत्पन्न करती हैं और भावावेश की स्थिति ला देती है। भले ही कल्पनाएं स्व-रचित रंगीली रात जैसी ही आकर्षक क्यों न हों? कल्पना यदि गहरी हो ओर उसमें संदेह का व्यवधान न पड़े तो वह भी एक प्रकार की सच्चाई ही बन जाती है। उसमें अनुभूतियाँ आभासित होती है। भक्तजनों को कई बार ऐसे ही उत्साह वर्धक आवेश आने लगते हैं वे नाचते-कूदते, थिरकते, हंसते, मुस्कराते और चित्र-विचित्र क्रियाएं करते है। मीरा की भक्ति भावना प्रसिद्ध है। चैतन्य महाप्रभु भी इसी प्रकार भाव विभोर हो जाते थे। अब भी भक्ति मण्डली में विशेषतया कीर्तन के अवसर पर वैसी ही गति विधियाँ दीख पड़ती है। एक की देखा देखी दूसरा भी मस्ती में झूमने लगता है।

भक्ति का आवेश वाला दूसरा पक्ष है विछोह। भगवान रूठ गये है मिल नहीं रहे है। हमारी पुकार पर ध्यान नहीं दे रहे है। व्यथा को समझ नहीं रहें है। आदि की भावनाएं वियोगजन्य पीड़ा पैदा करती है।

जन्म व्यर्थ चला गया। भव बंधन कटे नहीं। भजन पूरा हुआ नहीं राह भूल गया समर्पण बन नहीं पड़ा लोभ मोह में फंसकर रह गये पापों की गठरी सिर पर बाँध ली। धर्मराज के दरबार में जवाब देना पड़ेगा। नरक की यंत्रणाएं सहनी पड़ेगी चौरासी लाख योनियों में घूमना पड़ेगा। जीवन का लाभ घाटे में बदल गया। आदि कल्पनाएं जब उठती है तब भी भावावेश आता है पर वह व्यथित स्तर का होता हैं। उसमें आंखें भर आती है। कंठ रुंध जाता है पश्चात्ताप और पीड़ा जैसी वेदना होती है। ऐसी ही इस करुण पक्ष की भक्ति भावना में भी होती है।

यह दोनों ही स्थितियां आवेशमयी है असंतुलित है इससे शक्तियों का अनावश्यक क्षरण होता है। काल्पनिक स्वभाव बन जाने की सम्भावना बढ़ती है। ओर सामान्य घटनाओं या कल्पनाओं में भी असामान्य स्थिति हो जाती है। दूसरों को अजीब लगता है। वस्तुस्थिति के समझने वाले इसे सनम स्तर पर ले जाते है। और मानसिक विकृति का अनुमान लगाते है। ओर मानसिक विकृति का अनुमान लगाते है। यह दयनीय स्थिति है। इससे मूल्य ओर महत्व घटता है। बचकानेपन का आभास मिलता है। वे ही बार बार रूठते मटकते हंसते कुदकते है। बड़ी आयु वाले तरुण परिपक्वों से ऐसी चेष्टाएं अपनाने की आशा नहीं की जाती। विवेकवान हर भली, बुरी स्थिति के स्वरूप कारण निवारण ओर समाधान को समझने का प्रयत्न करते है। तदनुसार ही रीति-नीति अपनाते है। मनोदशा की यत्किंचित झलक ही चेहरे पर आने देते है। कपड़े उतार कर हर किसी के सामने नंगे नहीं होते भावावेश तत्वतः भावुकता है। जिसमें आत्म निर्धारण ओर आत्म विश्वास की कमी रहती है। कल्पनाएं या घटनाएं सिर पर इस तरह सवार हो जाती हैं कि उसमें आत्म-निष्ठा तेज हवा में उड़ते फिरने वाले पत्ते की तरह डगमगा जाती है।

समझदारी यह है कि उत्साह या अवसाद की कल्पनाओं की यथार्थता का पर्यवेक्षण किया जाये। वस्तुतः ऐसा कोई आधार हो उसका सामना करने के लिए योजनाबद्ध रूप से कमर कसी जायें। रणनीति बनाई जाये ओर निपटने की तैयारी के साथ कदम बढ़ाया जाये। भावुकता बच्चे का गुण है। कई बार प्रणय या वात्सल्य के प्रसंगों में स्त्रियाँ भी भावुक हो जाती है। अपमान होने या अनाश्रित रह जाने की मान्यता भी भावुक कर देती है। बूढ़े भी जराजीर्ण होने पर विवशता के आँसू बहाने लगते है। भूत-कालीन स्मृतियाँ उन्हें हैरान करती है। पर प्रौढ़ परिपक्व मनुष्यों को इन स्थितियों में होकर नहीं गुजरना पड़ता। वे उन्मादियों की तरह अकारण भावावेश बखेरते नहीं फिरते।

तीर्थ यात्रा कर आने पर धर्म का सन्तोष होता है या गृहस्थ रहने पर भव बंधनों का असन्तोष कई बार विरक्ति निराशा उदासीनता उत्पन्न करता है। यह भी काल्पनिक अस्त व्यस्तताएं है। पर्यटन अच्छी बात हैं देव दर्शन से अच्छा लगता है। दान पुण्य से कर्तव्यपालन बन पड़ता हैं भजन, समय का सदुपयोग ओर स्वाध्याय विचारों का परिमार्जन है इन्हें करते समय या बाद में किलो जीतने जैसा कोई कारण नहीं। जिसके आधार पर स्वर्ग मुक्ति आदी की ठेकेदारी का दावा किया जा सके ओर फूलकर कुप्पा हुआ जाये। कर्तव्यपालन माने जा सकते है। पर उनके कारण गर्वान्वित होने का कोई कारण नहीं।

गृहस्थ होना भव बंधन नहीं है और न मोह का बंधन हंसती हंसाती जिन्दगी जीना हिल मिल कर रहना और मिल बाँट कर खाना यही हलकी फुलकी जिन्दगी जीने का चिह्न है। इस स्थिति में प्रसन्नता भरी मुसकान से मुसकराते रहा जा सकता है। अनुकूलताओं प्रतिकूलताओं के उतार चढ़ाव ज्वार भाटे की तरह आते जाते रहते है। इनमें स्थिति के अनुरूप अपने धैर्य साहस और पुरुषार्थ का परिचय देना चाहिए। सन्तुलन हर हालत में बनाये रहना चाहिए। असन्तुलित होने पर न तो उपलब्धियों का सदुपयोग बन पड़ता है और न प्रतिकूलताओं से निपटने का बार बार मार्ग मिलता हैं मनुष्य की बहादुरी ओर समझदारी इसमें हैं कि वह बनाए रहे। उदासी व्यक्ति की दीनता और हीनता का चिह्न हैं। उन्माद आवेश की तरह वह भी अवाँछनीय और अनगढ़पन का चिह्न है।

जीवन का खेल है जिसे खिलाड़ी की तरह खेला जाना चाहिए। जीवन एक परीक्षण है जिसकी हर कसौटी पर चढ़ने और उत्तीर्ण होने के लिए हमें हर कसौटी पर चढ़ने और उत्तीर्ण होने के लिए हमें हर घड़ी कटिबद्ध एवं तत्पर रहना चाहिए। भावावेश का शानदार जीवन में कोई स्थान नहीं है।


पितरों का श्राद्ध (Kahani)

सन्त एकनाथ ने एक दिन अपने पितरों का श्राद्ध किया। पडोस के निर्धन बालक उन मिष्ठानों की गन्ध पाकर ललचाई दृष्टि से उस घर के आसपास चक्कर लगाने लगे।

सन्त ने उनकी भावना समझी ओर सब को बिठाकर भर पेट भोजन करा दिया। यह समाचार जब ब्राह्मणों को मिला जो कि उनने बना हुआ खाने से इन्कार कर दिया।

सन्त एकनाथ ने बिना जाति पाँति का भेद किये नगर के सभी बालकों को बुला कर भोजन करा दिया। सन्त को अनुभूति हुई जैसे उनके पितर ही आकर बालकों के रूप में भोजन कर रहे हैं।


समयदान की श्रद्धांजलि से नूतन अलख जगाई!

दीपयज्ञ, प्रज्ञा विद्यालय, स्लाइड प्रोजेक्टर, नारी जागरण आदि की धूममचाई

बसंत पर्व और शिवरात्रि पर्व पर सृजन शिल्पियों से समयदान के संकल्प कराये गये उससे नव जागरण की एक नई लहर पैदा हुई है। दीप-यज्ञ और उनके द्वारा दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन तथा सत्प्रवृत्ति संवर्धन स्लाइड प्रोजेक्टर, ज्ञान रथ, घर-घर आलोक वितरण-नारी जागरण के लिए शाखाओं की स्थापना ओर प्रौढ़ शिक्षा प्रज्ञा विद्यालयों कार्यक्रमों के विस्तार से युग निर्माण अभियान तेजी से आगे बढ़ा है। प्रस्तुत है उसके भाव-भीने वृतान्त :-

नरदेही (राज0) श्रीमती कमल पाण्डेय ने मिनी बसन्त पर्व सम्मेलन से वापस जाते ही महिला जागरण शाखा की स्थापना की। नित्य 4 घण्टे का समय वे जन संपर्क में लगाती हैं अभी तक 67 महिला सदस्य बनाकर सभी को रचनात्मक कार्यक्रमों को पूरा करने में लगाया है। विभिन्न टोलियों में चार स्थान पर प्रौढ़ पाठशालायें दोपहर दो से चार की अवधि में नित्य चल रहीं है। सुश्री मनोरमा पाण्डेय, सुषमा चौधरी, मीना चौधरी उमा माहेश्वरी तथा कमला सिंह का सराहनीय योगदान मिल रहा है। गायत्री जयन्ती एक सौ सात महिला सदस्य बनाने सौ सात अखण्ड-ज्योति तथा चौबीस युग निर्माण योजना के सदस्य बनाने का सामूहिक संकल्प लिया गया है।

पनगाँव (म0प्र0) बसन्त पर्वोत्सव हर्षोल्लास के साथ सम्पन्न हुआ। अवसर पर रचनात्मक कार्य क्रमों को पूरा करने के लिए कार्यकर्ताओं द्वारा साहसिक संकल्प लिए गये। समूचे क्षेत्र में दीप यज्ञ कार्यक्रम के माध्यम से पूज्य गुरुदेव का संदेश पहुँचाने के लिए सर्व श्री जवाहर लाल सोनी बुद्धेश्वर प्रसाद मूलचन्द बदी प्रसाद पराग पटेल नरेश पटेल, तीरथराम, अमर सिंह श्रीमती मीराबाई, कमला इंदू, कुशलीबाई एवं साधना द्वारा टोलीबद्ध रूप में काम करने का संकल्प लिया।

श्रंगपुर स्थानीय कार्यकर्ताओं के अथक सहयोग से समूचे क्षेत्र में दीप-यज्ञ कार्यक्रम चलाने की व्यापक व्यवस्था बनाई गई है। इन दीप यज्ञ आयोजनों के माध्यम से पत्रिकाओं के अधिकाधिक सदस्य बनाने का प्रयास कार्य कर्त्ताओं द्वारा किया जा रहा है।

अलीराजपुरा बसन्तोत्सव के अवसर पर शतवेदीय दीपयज्ञ कार्यक्रम प्रेरणादायी वातावरण में सम्पन्न हुआ। इस अवसर पर विशिष्ट व्यक्तियों का नागरिक अभिनन्दन भी गायत्री परिवार शाखा द्वारा किया गया। इस अवसर पर पाँच हजार से भी अधिक का जन समुदाय परम पूज्य गुरुदेव का संदेश सुनने के लिए एकत्र हुआ। नशा निवारण, दहेज उन्मूलन के लिए लगभग पाँच सौ प्रतिज्ञा पत्र भराये गये। आयोजन से नगर में धार्मिक प्रवृत्तियों के प्रति अपार उत्साह उमड़ा। इसे स्थायी बनाने व दिशा देने के लिए कार्यकर्ताओं ने नियमित जन संपर्क की व्यापक व्यवस्था बनाई है।

असरोडा बसन्त पर्व के सम्मेलन में श्रीमती करुणा भ्राडे ने दस स्थानों पर महिला प्रौढ़ पाठशाला, एक सौ सात स्थानों पर धर्म घटों की स्थापना एक सौ सात सद्वाक्य लिखाने तथा चौबीस अखण्ड-ज्योति के सदस्य बनाने का संकल्प लिया था। उन्हें प्रसन्नता तब हुई जब यह कार्य डेढ़ माह की स्वल्पावधि में ही पूरा हो गया। इसके पीछे परम पूज्य गुरुदेव की अदृश्य शक्ति को ही उनने सक्रिय देखा। अब उनने अपना संकल्प दुगुना कर दिया है।

द्योतकपुर श्रीमती देवरानी सिंह के अथक प्रयासों से समीपवर्ती गाँवों में दस महिला जागरण शाखाओं की स्थापना हो चूंकि है। अब तक दो माह की अवधि में लगभग पाँच हजार रुपये का साहित्य श्रीमती अनुपम सिंह तथा श्रीमती सुधा सिंह के सहयोग से विक्रय किया गया।

बस्ती शाखा के कर्मठ कार्यकर्त्ताओं की टोली द्वारा इस वर्ष व्यापक स्तर पर जन संपर्क कार्य क्रम चलाया जा रहा है। जिले की हर पंचायत तक परम पूज्य गुरुदेव का संदेश पहुँचाने के लिए दीप यज्ञ कार्यक्रमों की व्यवस्थित श्रृंखला स्थानीय स्तर पर चल रही है जून तक लगभग पाँच सौ भावनाशील परिजनों को शान्तिकुँज प्रशिक्षण में भेजने का विशेष प्रयास इन्हीं दिनों किया जा रहा है। देव दक्षिणा स्वरूप प्रतिज्ञापत्र हजारों की संख्या में भराये जा चुके है। नशा निवारण दहेज उन्मूलन प्रौढ़ शिक्षा विस्तार तथा हरीतिमा संवर्धन जैसे रचनात्मक कार्यक्रमों के प्रति आम जनता का अपार उत्साह है।

रींवा 11-12 जून की अवधि में पाँच हजार वेदीय दीप-यज्ञ कार्यक्रम का संकल्प विन्ध्य क्षेत्र की समस्त शाखाओं की ओर से डा. रतन सवसेना, श्री बसन्त कुमार पाण्डेय तथा श्री प्रमोद सिंह जी द्वारा लिया गया। कार्यक्रम को ऐतिहासिक बनाने की दृष्टि से संकल्प के साथ ही जिला स्तरीय गोष्ठियां आरंभ हो गई है। संभागीय कार्यक्रम होने के कारण सभी में अपार उत्साह है। इस बीच पूरे क्षेत्र में शत वेदीय तथा सहस्र वेदीय कार्यक्रमों की व्यापक श्रृंखला चलाई जा रहीं है। सभी की पूर्णाहुति स्वरूप वृहद आयोजन संभाग में आयोजित किया गया है।

गाडा श्री कमलेश्वरी प्र0 सिंह श्री राम बिलास सिंह तथा श्री राजेन्द्र सिंह के अथक प्रयासों से प्रज्ञा पुस्तकालय, बाल संस्कार पाठशाला युग साहित्य प्रचार केन्द्र तथा प्रौढ़ पाठशाला द्वारा समूचे क्षेत्र में महाप्रज्ञा के आलोक विस्तार में आशातीत सफलता मिल रही है।

सहसनगर की महिमा राम सिंह व अनिल श्रीवास्तव के प्रयासों से प्रज्ञा विद्यालय का शुभारम्भ समारोहपूर्वक किया गया। विद्यालय का उद्घाटन पी0डब्लू0 डी0 इंजीनियर श्री शिव प्रकाश रस्तोगी द्वारा किया गया। इस अवसर पर श्री रस्तोगी ने समूचे क्षेत्र में प्रज्ञा आलोक के विस्तार के लिये इसे अभूतपूर्व कदम बतलाया। नगर के प्रतिष्ठित व्यक्तियों द्वारा पाँच हजार रुपया तत्काल साहित्य के लिए दिया गया।

सुखरामपुर प्रज्ञा विद्यालय के माध्यम से समूचे क्षेत्र में हर शिक्षित तक सत्साहित्य पहुँचाने का अभूतपूर्व कदम उठाया गया है। विद्यालयों के नियमित छात्रों द्वारा प्रतिपादन दो व्यक्तियों से संपर्क कर उन्हें सत्साहित्य पढ़ने के लिये प्रेरित किया जाता है। इस प्रकार प्रतिदिन संपर्क होता है। अभी तक सात हजार का साहित्य मंगाया जा चुका है।

समसपुर परवन्ता प्रखण्ड कार्यालय के सामने सहस्र वेदीय दीप-यज्ञ कार्यक्रम उत्साह, उमंग एवं उल्लासपूर्ण वातावरण में सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम में क्षेत्र के प्रतिष्ठित राजनैतिक तथा धार्मिक नेता सम्मिलित हुए। आयोजन में सम्मिलित प्रायः पाँच हजार के जन समूह में से अधिकाँश ने नशा निवारण की तथा दहेज उन्मूलन के संकल्प पत्र भरें। कार्यकर्ताओं की सक्रियता के परिणाम स्वरूप दो सौ पचास नये अखण्ड ज्योति के सदस्य कार्यक्रम के अवसर पर ही बनाये गये। इतने ही सदस्य और भी बनाने का संकल्प कार्य कर्त्ताओं ने मिल-जुल कर लिया।

बिलखेडी यहाँ सम्पन्न दीप यज्ञ कार्यक्रम आशातीत सफलताओं के साथ सम्पन्न हुआ। मुख्य अतिथि के रूप में क्षेत्र के सासंदश्री दिलीप सिंह झरिया ने जनसमूह को संबोधित करते हुए समाज में व्याप्त अंधविश्वास रूढ़ियों तथा कुप्रथाओं को दूर करने के लिए युग निर्माण योजना द्वारा चलाये जा रहे रचनात्मक कार्यक्रमों की सराहना की व सभी को इसमें पूरा-पूरा सहयोग देने का आह्वान किया। कार्यक्रम की सफलताओं में डा. मोहन लाल पाटीदार ठा0 विक्रम सिंह हरिभाई गौराना सर्व श्री जगन्नाथ सोनी पर्वत सिंह सुरेन्द्र सोनी राजेन्द्र सोनी तथा शिवनारायण पुरोहित का सराहनीय योगदान रहा।

वर्धसराया श्री शिव कुमार मिश्र की अटूट निष्ठा ने समूचे क्षेत्र में जाग्रति की एक नई लहर पैदा कर दी है। श्री मिश्र पिछले दिनों शान्ति कुँज सत्र में गये थे वहाँ में स्लाइड प्रोजेक्टर लाये। प्रारम्भ में जहाँ भी यह कार्यक्रम रखा जाता श्री मिश्र को उपहास ही मिलता। किन्तु वे निराश नहीं हुए। भले ही दस व्यक्तियों की उपस्थिति क्यों न रही हो? उन्हें पूरे मनोयोग के साथ स्लाइडों की व्याख्या कर बतलाते। मुहल्ले-मुहल्ले यह कार्यक्रम चलता रहा। धीरे-धीरे उपस्थिति इतनी बढ़ कि उन्हें माइक की व्यवस्था करनी पड़ी ओर अब तो इसके लिए उन्हें विधिवत् आमंत्रित किया जाता है। महीन-महीने भर के उनके कार्यक्रम निर्धारित, रहते है। इस कर्मठता ने उन्हें अपार लोक सम्मान दिया है।

ढ्योकी एक मासीय युग शिल्पी सत्र में ज्ञानरथ चलाने का संकल्प श्री मनोहर प्रताप सिंह ने लिया था। ज्ञान रथ शाँति कुँज से ही साथ ले गये थे। प्रारम्भ में गली मुहल्लों में न रथ लेकर निकलने में एक ऑफिसर होने के नाते झिझक लगती रही लेकिन इस ज्ञानरथ के बहाने जब नगरवासियों द्वारा अपार सम्मान दिया जाने लगा तो गहरा आत्म सन्तोष हुआ। अब वे नित्य छः से सात दो घण्ट ज्ञान रथ लेकर निकलते हैं लगभग दो सौ रुपये तक का प्रतिदिन साहित्य भी बिकता है साथ ही पत्रिकायें एवं साहित्य के आदान-प्रदान का भी क्रम चलता है।

गाडरवारा बसन्त पर्व के अवसर पर शतवेदीय कार्यक्रम आशातीत सफलता के साथ सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम की सफलता में महिलाओं का सराहनीय योगदान रहा जिसका नेतृत्व श्रीमती चन्द्रा महाजन ने किया। कार्यक्रम के अवसर पर रचनात्मक कार्यक्रम चलाकर परमपूज्य गुरुदेव के जन्म दिन की सच्ची श्रद्धांजलि समर्पित करने का आह्वान किया गया जिसे कार्यकर्ताओं ने श्रद्धावनत होकर स्वीकार किया।

दमोह एक हजार आठ वेदीय दीपयज्ञ कार्यक्रम का शुभारम्भ प्रदेश काँग्रेसाध्क्ष एवं साँसद श्री दिग्विजय सिंह जी द्वारा हर्षोल्लास के साथ किया गया।

घुरामऊ श्री कमलाकर पाण्डेय के प्रयास से यहाँ प्रौढ़ पाठशाला की स्थापना की गई है। इसमें लगभग तीस महिला-पुरुष नित्य दो बजे से चार बजे तक पढ़ने आते हैं अध्यापन का उत्तरदायित्व महिलाओं में श्रीमती फूलमती मिश्रा व श्रीमती रमा देवी तथा पुरुषों में श्री वीरेन्द्र सिंह के जगदीश नारायण जी द्वारा हर विद्यालयों में सद्वाक्य लेखन का संकल्प लिया है।

इन्दौर तिलक नगर प्राँगण में आयोजित सहस्रवेदीय दीप-यज्ञ कार्यक्रम में सैकड़ों लोगों ने नशेबाजी दहेज प्रथा शादियों में अनावश्यक धूमधाम रूढ़िवादिता जैसे कलंक को उखाड़ फेंकने ओर समाज के नव निर्माण में योगदान देने का संकल्प लिया है। कार्यक्रम की सफलताओं में नगर कार्यवाहक श्री भवानी कश्यप श्री समर बहादुर कौशिक श्री व्यंकट लाल गुप्ता श्री वी0के0शर्मा एस0के0 श्रीवास्तव जी0डी सोनी तथा श्री सत्यनारायण गुप्ता का सराहनीय योगदान रहा।

केविडिया कालौनी एक हजार आठ वेदीय दीप यज्ञ कार्यक्रम हर्षोल्लास के साथ सम्पन्न हुआ। नगर का प्राय पाँच हजार का जनसमुदाय इस कार्यक्रम से लाभान्वित हुआ देश को वर्तमान विभीषिकाओं से उबारने के लिए मिशन द्वारा चलाये जा रहे रचनात्मक कार्यक्रमों की पूर्ति में पूरा पूरा सहयोग करने का आश्वासन प्रबुद्ध वर्ग ने दिया समीपवर्ती शाखाओं के आयोजन की सफलता में सराहनीय योगदान रहा। इस कार्यक्रम में सर्व श्री बनवारी लाल भाई लाल भाई राम सहाय शास्त्री अरविन्द भाई के0 शर्मा बी0के0 पेन्टर, जयंतीभाई आर॰ देवाई, आर0सी0 राज, उमंगलाल वी0 दवे, गोपाल भाई, एवं परेश भाई एम॰ शाह का विशेष सहयोग रहा।

कटरा लगभग दस हजार जन समुदाय के मध्य दीप-यज्ञ कार्यक्रम क्षेत्र में ऐतिहासिक छाप छोड़ता हुआ सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम स्थल पर मानो मेला जैसा लगा हो। इसे स्थानीय कार्यकर्ताओं ने परमपूज्य गुरुदेव की अदृश्य शक्ति का चमत्कार माना। उपस्थिति जन समुदाय में से अधिकाँश ने नशा निवारण, दहेज उन्मूलन तथा वृक्षारोपण के लिए संकल्प पत्र भरें।


अपनों से अपनी बात - महिलाएं पाँच, पाँच से पच्चीस की मंडलियां बनाये!

यह युग संधि की बेला है। इन्हीं दिनों विनाश या विकास में से एक का चयन होना है। इन्हीं दिनों महान प्रयोजन के लिए प्राणवानों को ही आगे आना है। उन्हें ही पतन को रोकने और अभ्युदय को गतिशील बनाने के लिए महती भूमिका सम्पादित करने के लिए अग्रिम मोर्चे पर खड़ा होना अपने निर्वाह परिवार तक ही सीमित न रह कर नव सृजन के लिए भी भाव-भरा योगदान प्रस्तुत करना है।

अखण्ड ज्योति परिवार को चाहिए की अपने भावनात्मक वैचारिक बौद्धिक चारित्रिक व्यावहारिक स्तर में शालीनता का अधिकाधिक समावेश करें। दूरदर्शी विवेकशीलता अपनायें और व्यक्तित्व को प्रामाणिक प्रखर प्रतिभावना और पुरुषार्थ पराक्रम से परिपूर्ण बनाने का प्रयत्न करें चन्दन जब महकता है दो निकटवर्ती झाड़ भी महकने लगते हैं। उद्यान में खिले हुए पुष्प सारे वातावरण को सुगंधित ओर सारे क्षेत्र को सुगन्धित कर देते है। उच्चकोटि के व्यक्ति स्वयं पार होते और कुशल माँझी की तरह अनेकों को अपनी नाव पर बिठा कर पार करते है। अपना निर्माण संसार की सबसे बड़ी सेवा है। इस उक्ति में गहरी यथार्थता है।

इस तथ्य को मान्यता और क्रिया में गहराई तक उतारने के साथ परिजनों को दूसरों का संगठन का शक्ति का संचय करके वातावरण के परिवर्तन का कार्य हाथ में लेन पड़ता हैं अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ता है डेढ़ चावल की खिचड़ी नहीं पकती ढाई ईंट की मस्जिद नहीं बनती एकाकी व्यक्ति कितना ही सुयोग्य और समर्थ क्यों न हो वह युग परिवर्तन जैसे महान प्रयोजन में कोई कहने लायक भूमिका नहीं निभा सकता। इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए इन सत्यों को स्वीकार करते हुए हममें से हर किसी को आत्मा परिष्कार के साथ व लोकमंगल के निमित्त भाव भरे कदम उठाने चाहिए इस शाश्वत सत्य को पूरी तरह अंगीकार करना चाहिए कि हम बदलेंगे युग बदलेगा। हम सुधरेंगे युग सुधरेगा। इन दोनों ही प्रयोजनों के लिए हम में से प्रत्येक प्राण पण से प्रयत्न करना चाहिए। साथ ही यह समझ लेना चाहिए कि मन स्थिति ही परिमार्जन की जन्मदात्री है उसी के कारण समस्याएं सुलझती ओर उलझती है। हमें यदि अपना और दूसरों का सुस्थिर एवं दूरगामी कल्याण करना हो तो विचार क्रान्ति अभियान की अनिवार्य आवश्यकता अनुभव करनी चाहिए। उसकी पूर्ति के लिए अपने समय श्रम और मनोयोग को पूरी तरह नियोजित करना चाहिए। इस निमित्त जिन साधनों की आवश्यकता पड़ेगी भी उसकी पूर्ति के लिए अपना उदाहरण प्रस्तुत करते हुए अन्यान्यों को सहज सहयोगी बनाना चाहिए। सादा जीवन उच्च विचार की नीति अपनाते ही यह प्रयोजन उत्साहवर्धक मात्रा में सहज ही पूरा होने लगता है।

प्रश्न कुछ व्यक्तियों ओर कुछ परिवारों को नहीं है जो कुछेक व्यक्तियों की भागदौड़ में काबू में आ जायें। उसके लिए बड़े समुदाय के संगठित प्रयत्न ही कारगर हो सकते हैं समुद्र सेतु बंधने गोवर्धन उठने स्वतंत्रता जीतने जैसे अनेकों पौराणिक और ऐतिहासिक संस्मरण देख सूने और समझे जा सकते है। निकटवर्ती क्षेत्र में भी ऐसे उदाहरणार्थ की कमी नहीं रहती। बूँद मिल जुलकर घनघोर घटाटोप की रूप में बरसती है। ईंट के सहयोग से भव्य भवन बनते है। तिनके से रस्सा बटा जाता है।

प्रस्तुत प्रसंग इस वर्ष के नये संकल्प के साथ उठें नारी जागरण रूपी आँदोलन के संदर्भ में प्रतिपादित किया जा रहा है। बिना संघबद्ध हुए यह भागीरथी कार्य पूरा कर पाना असंभव नहीं तो कठिन अवश्य है आधी जनसंख्या को जाग्रत, संगठित, शिक्षित, स्वावलम्बी एवं विचारशील बनाने का कार्य छोटा नहीं है। उसे भी प्रा परिकर के समतुल्य ही भारी भरकम और दूरगामी परिणाम उत्पन्न करने वाला माना जा सकता है। इसकी आवश्यकता तो सर्वत्र समझी जाती है। पर किसी से कोई ठोस कदम उठाने बन नहीं पड़ता बात लेखन भाषण छुट पुट समायोजन लैटर पैड साइनबोर्ड तक सीमाबद्ध होकर रह जाती है कारण स्पष्ट है कि घरों की चहार-दीवार में कैद रहने वाली अशिक्षित नारी तक पहुँच सकना ओर उनके साथ संबंध मिलाकर प्रगति प्रयोजनों को कार्यान्वित कर सकना किसी के लिए भी सम्भव नहीं हो सकता है। यह कार्य अखण्ड ज्योति के परिजन ही थोड़े प्रयत्न से सहज रूप से सम्पन्न कर सकते है।

अपने अपने घरों में एक प्रतिभाशाली महिला को नारी जागरण अभियान में काम करने के लिए थोड़ा अवकाश और प्रोत्साहन दिया जा सके तो उसका परिणाम यह हो सकता है कि इन दिनों पाँच लाख परिवारों में जाने वाली मिशन की पत्रिकाओं से पाँच लाख परिवार ऐसे हो सकते है। जिनकी महिलाएं इस पुण्य प्रयोजन का थोड़ा उत्तरदायित्व अपने कंधों पर उठाये और अपने संपर्क क्षेत्र में से पाँच नई समझदार महिलाएं समेट कर उन्हें अपने सहयोगिनी बनायें इतने भर से एक नारी जागरण मण्डली पाँच का महिला मण्डल बना पायेंगी। और न्यूनतम पच्चीस को अपने प्रभाव में ले लेगी इस प्रकार उन पाँच को भी पच्चीस तक जा पहुँचने का अवसर मिल जायेगा।

इतना संगठित परिकल यदि महिला जागरण के क्षेत्र में कार्य करने में जुट जाये तो उसके चमत्कारी परिणाम सामने आ सकते है। इस आन्दोलन की प्रथम आवश्यकता यह है कि घर घर जाकर हम नारी और हर नर को नारी की अवगति से होने वाली हानियों से अवगत कराया जाये ओर बताया जाये कि वे यदि किसी प्रकार सुविकसित समुन्नत हो सके तो परिपूर्ण मनुष्य जैसी भूमिका निभाने में पूरी तरह समर्थ हो सकती है। अपना अपने परिवार ओर समाज का इतना बड़ा हित साधन कर सकती है। जिसका प्रभाव परिणाम समूचे देश में विश्व में एक कल्याणकारी प्रगति का शुभारम्भ कर सकें।

21 वीं सदी नारी प्रधान होगी। उसमें उसकी उत्कृष्टता का समुचित योगदान होगा। इस निमित्त यह नितान्त आवश्यक है कि नारी जागरण का आन्दोलन स्वतंत्रता संग्राम जैसे युद्ध स्तर पर आरम्भ किया जाये।

थ्मशन कि कितनी ही समर्थ महिलाएं है वे बल बूते एक मण्डल गठित कर सकती है। और अपना कार्यक्षेत्र बढ़ा कर न्यूनतम पच्चीस तो कर सकती है।

इसके अतिरिक्त प्रत्येक पुरुष परिजन को कहा गया है कि वे अपने परिवार एवं संपर्क क्षेत्र में से पाँच प्रतिभावान महिलाओं की मण्डली गठित करें। उन्हें प्रोत्साहन और मार्गदर्शन प्रदान करें। सुविधा साधन जुटायें आवश्यक वातावरण बनायें किन्तु अग्रिम पंक्ति पर नारी को ही खड़ा होने दे स्वयं चलें तो अपनी पत्नी माता बहन या पुत्री को साथ लेकर चलें अकेला पुरुष नारी वर्ग में प्रवेश करें तो उससे अनुपयुक्त वातावरण बनता है।

सूत्र संचालक की उत्कट इच्छा महाकाल की महती प्रेरणा एवं युगधर्म की पुकार है कि अखण्ड ज्योति परिकल की नारी सदस्याएं इन दिनों पाँच पाँच की मण्डली में गठित हों प्रगतिशील नारियों का ऐसा परिकल खड़ा करें जो उल्टी परिस्थितियों को उलट कर सीधा करने में समर्थ एवं सफल हो सकें। इस कार्य के लिए प्रशिक्षण हेतु त्रैमासिक प्रशिक्षण सत्रों में अग्रदूत कार्यकर्ता महिलाओं को शाँतिकुँज भेजें। जिनके पास समय कम हो वे एक माह के लिए आ सकती है। इस अवधि में उन्हें नवसृजन संबंधी संगठनपरक क्रिया -कलापों का शिक्षण करने का प्रयास किया जायेगा। आने से पूर्व केन्द्र से अनुमति ले लेनी चाहिए। एक दिवसीय साधना-सत्र यथावत् चलते ही रहेंगे।

*समाप्त*