अन्तर्ज्योति को प्रदीप्त रखें!

रात्रि में ‘टार्च’ का प्रकाश जितने क्षेत्र पर पड़ता है, उतना ही वह प्रकाशित हो उठता है। जहाँ वह रोशनी नहीं पड़ती, वह प्रकाश क्षेत्र के अति समीप होते हुए भी अंधकारमय बना रहता है। अंधेरे में भी अनेक वस्तुएं रखी होती है, पर प्रकाश क्षेत्र की तरह दृष्टिगोचर नहीं होतीं। प्रकाश क्षेत्र की वस्तुओं का उपयोग कर सकना, वहाँ के खतरों से बच सकना संभव होता है, जबकि अंधेरे में रखी वस्तुओं के बारे में सब कुछ अविज्ञात एवं रहस्यमय ही बना रहता है। रात्रि के अंधेरे में अपरिचित क्षेत्र डरावने लगते हैं, जबकि प्रकाश क्षेत्र में निर्भयता और निश्चिन्तता पूर्वक कहीं भी विचरण किया जा सकता है। प्रकाश के कारण दिन में सभी प्रकार के कार्य होते रहते हैं, पर रात के अंधेरे में सोते रहने या निरर्थक बैठे रहने की ही बात बनती है। तेज रोशनी में कुछ करना तो एक अपवाद है। उसमें भी श्रेय तो प्रकाश का ही माना जायेगा।

तत्वज्ञान की दृष्टि से प्रकाश का अर्थ है-प्रखर आत्म-चेतना। उसका ‘प्रकाश पुँज’ जहाँ भी पड़ता है, वही सुन्दर और प्रिय लगने लगता है। क्या सुन्दर और क्या कुरूप है? इसका निर्धारण नहीं हो सकता। अपनी दृष्टि और पसन्दगी के आधार पर ही सुन्दरता-असुन्दरता का निर्णय होता है। कौन प्रिय, कौन अप्रिय है? यह भी अपनी ही मान्यता पर निर्भर है आज जो प्रिय है, वह कल अप्रिय लगने लग सकता है। मात्र व्यवहार की प्रतिक्रिया ही मित्रता को उपेक्षा या शत्रुता में बदल देती है। इस परिवर्तन के मूल में सामने वाले का व्यक्तित्व नहीं अपनी मान्यताओं की हेरा-फेरी ही प्रमुख है। भले ही वह किसी भी कारण उत्पन्न हुई हों।

लोक व्यवहार में साँसारिक परिस्थितियों में जो खिन्नता एवं प्रसन्नता उभरती है उसमें जड़-पदार्थों की उतनी भूमिका नहीं जितनी आत्म-चेतना से उत्पन्न होते रहने वाले प्रकाश की है। वह पाषाण पर जा जमे तो उसमें से भगवान प्रकट हो सकते है। सामान्य परिस्थितियों में ही स्वर्गोपम अनुभूतियाँ हो सकती है। वस्तुतः आत्म-प्रकाश की गरिमा ज्योतिर्मय सूर्य से किसी भी प्रकार कम नहीं है।


आत्मज्ञान से देवत्व की प्राप्ति

सृष्टि संरचना का कार्य पूर्ण हो गया। प्रजापति ने अपनी संतानों की ओर देखा तो उनकी प्रसन्नता का ठिकाना नहीं रहा। सर्वांग सुन्दर और सर्वोपयोगी शरीर जैसा मनुष्य के पल्ले पड़ा वैसा किसी जीवधारी को भी अब तक उपलब्ध न हो पाया था, जैसी बौद्धिक क्षमतायें मनुष्य में थीं किसी अन्य प्राणी में नहीं, प्रजापति ने सन्तोष की साँस ली और आत्म जनों को विदाई दी।

“मनुष्य को चाहिए कि क्रोध को प्रेम से, बुराई को भलाई से, लोभ को उदारता से और मिथ्या को सत्य से जीते।”

फिर न जाने क्या सोचकर पितामह ने प्रजाजन को रुक जाने को कहा--परिजन, उनकी ओर उन्मुख हुए। प्रजापति ने कहना प्रारम्भ किया--तात! तुम्हें सर्वांगपूर्ण शरीर दिया गया है। तुम शरीर नहीं हों, तुम्हें बुद्धि नहीं हों, तुम जो हो--उस आत्म तत्व के ज्ञान के बिना तुम सुखी नहीं रह सकोगे। अतएव विपुल साधनों के स्वामी होकर भी आत्म-विमुख नहीं होना, क्योंकि समस्त समस्याओं का एक मात्र हल यह आत्म-ज्ञान ही है।

प्रजाजन के दो वर्ग थे एक सुर दूसरे असुर। यों भी कहा जा सकता है। दो विभिन्न क्षेत्रों में विभक्त दो दलों का यह नामकरण मात्र था। दोनों ने निश्चय किया कि प्रजापति जिनने हमें जन्म दिया, हमारे कल्याण के सभी साधन संग्रहित किये इनकी उक्ति मिथ्या नहीं होनी चाहिए, अतएव दोनों वर्गों से प्रतिनिधि स्वरूप दो व्यक्ति नियत किये गये, जो प्रजापति से आत्म का ज्ञान प्राप्त करें और अपने-अपने वर्ग को उसका प्रशिक्षण करें। देव वर्ग ने इन्द्र को ओर असुरों ने विरोचन को अपना प्रतिनिधि बनाकर भेजा।

प्रजापति ने अन्तर्मुखी दृष्टि के विकास के लिये इन शिष्यों को दर्पण साधना बताई उन्हें कहा--दर्पण में अपनी छवि देखना। छवि देखने वाले दृगों की देखना, दृगों की पुतलियों के भीतर प्रविष्ट होकर यह पहचान करना कि यह भीतर कौन देखता है? कैसे देखता है?

दोनों शिष्य अपनी साधना करने लगें। विरोचन ने तरह तरह से दर्पण देखा, वेश-भूषा बदलकर केश विन्यास में परिवर्तन कर सौंदर्य प्रसाधनों में कई बार अन्तर कर उसने जितनी बार दर्पण में देखा उसको अपनी सुडौल देह व्यष्टि सुन्दर मुखमण्डल ही स्मरण में आया तो उसने यही माना कि यह शरीर ही आत्मा है उसे ही तरह तरह से सजाने से उसी की तृप्ति में लगे रहना ही सुख का साधन है, विरोचन को ओर अधिक रुकने में उकताहट हुई सो उसने अपनी इसी मान्यता को पूर्ण मान लिया और घर लौट आया।

इन्द्र ने बहुत देरी दृष्टि जमाई पर नेत्रों की पुतलियों से उन्हें कुछ नहीं दीखा। उन्होंने प्रजापति से आगे की कक्षा का पाठ पढ़ाने की याचना की। प्रजापति ने उन्हें और अधिक समय तप करने का आदेश दिया।

प्रजापति ने कहा अब तुम यह ज्ञात करो कि स्वप्नावस्था में यह जो तुम्हारी तरह क्रियायें करता है वह कौन है? इन्द्र ने तुलनात्मक अध्ययन के बाद पाया कि चेतन और स्वप्न दोनों का ही कर्ता एक है पर कई बार प्रगाढ़ निद्रा में स्वप्न का चेतन अबोध हो जाता है तब फिर उसे आत्मा कैसे माना जाये?

प्रजापति ने उन्हें फिर तप करने की आज्ञा दी। इस बार इन्द्र को बोध हुआ। दर्पण के आगे से मुँह फेर लेने से शीशा रहने पर भी जिस तरह प्रतिबिम्ब नहीं रहता उसी तरह मृत्यु के बाद शरीर रहने पर भी आत्मा आकाशभूत हो जाती है। शरीर तो उस आत्मा की अभिव्यक्ति का दर्पण मात्र है। आत्मा उसका चेतन भाग हैं सो इन्द्र उस चेतना के विकास में ही लग गये और देवताओं को उसी का उपदेश दिया जिससे देवगण अमर, पवित्र, पूज्य और उच्च पदस्थ हुए जबकि शरीर को ही आत्मा मानकर उसी को सजाने संवारने में इन्द्रिय सुखों की लिप्सा में पड़े असुरगण सर्वत्र विग्रह उत्पन्न करते और निकृष्ट जीवन जीते हुए प्रजापति की कृति को कलंकित करते रहते है।


अपरिमित सामर्थ्य का स्वामी है मनुष्य

साधनों और परिस्थितियों का अपना मूल्य महत्व तो है। उनकी न्यूनाधिकता से होने वाली सुविधा असुविधाओं को भी नकारा नहीं जा सकता। इतने पर भी यह मानकर चलना होगा कि जो कुछ उपलब्ध है, उसका सदुपयोग कर पाना इतना बड़ा कौशल है, उसका सदुपयोग कर पाना इतना बड़ा कौशल है कि उतने से भी आवश्यकताओं को पूरा करना और प्रगति पथ पर आगे बढ़ चलना संभव हो सकता है। स्रष्टा ने किसी में भी इतनी कम क्षमता नहीं रहने दी है कि उसे निर्वाह साधनों में एवं प्रगति पथ पर बढ़ चलने में गतिरोध जैसा दृष्टिगोचर हों।

अभावग्रस्त और कष्ट साध्य परिस्थितियों में भी लोगों को जीवन साधन ढूंढ़ निकालने में समर्थ पाया गया हैं उतरी ध्रुव की परिस्थितियाँ अत्यन्त विकट है। शून्य तापमान से कम वाली कड़ाके की सर्दी वनस्पतियों का अभाव किन्हीं साधनों का दृष्टिगोचर न होना चुम्बकीय तूफान भूगर्भीय हलचलों जैसी विकट परिस्थितियों में भी वहाँ के निवासी एस्किमो कहलाने वाले मनुष्यों ने आवश्यक निर्वाह आहार जल प्रकाश आवागमन एवं पारस्परिक सुविधाओं से मिलने वाली सुविधाओं का तारतम्य बिठा लिया है। सघन वनों में वनमानुषों की तरह रहने वाले विभिन्न क्षेत्रों के आदिवासी भी सभ्यताजन्य सुविधाओं से वंचित रहते हुए भी वही आसपास उपलब्ध हो सकने वाले साधनों के आधार पर सहस्रों वर्षों से काम चलाते आ रहे हैं। और अपना अस्तित्व बनाये हुए है। समुद्रों के बीच पाये जाने वाले छोटे-छोटे टापुओं पर भी मनुष्य रहते और फलते-फूलते देखे गये हैं जब कि उन्हें उस क्षेत्र में आदिम कालीन न्यूनतम सुविधायें उपलब्ध है। कही कही तो ऋतु विपर्यय भी कम हैरान करने वाला नहीं होता। फिर उन क्षेत्रों के मनुष्य एवं प्राणी अपनी सुरक्षा रख सकने और वश वृद्धि करते रहने में समर्थ पाये गये है। इससे प्रतीत होता है कि प्राणी समुदाय सहित मनुष्यों में वह जन्मजात क्षमता विद्यमान हैं जिसके सहारे उसे प्रतिकूलताओं पर विजय करने का श्रेय मिलता रहा है।

मिट्टी और पानी में घुले रहने वाले सूक्ष्मजीवी अपने निर्वाह हेतु सुख साधना अपने लिए उन्हीं अति कठिन दीखने वाली परिस्थितियों में ढूंढ़ निकालना है। इस सफलता का श्रेय उस अदृश्य क्षमता को जाता है जो अपनी परिस्थितियों को अनुकूल बनाने हेतु स्रष्टा ने हर किसी को प्रदान की है। मनुष्य अपने दृष्टिकोण से उन सामान्य प्राणियों की क्षमताओं को सामान्य समझ कर हेय मान सकता है पर यदि किसी को उन्हीं की परिस्थितियों में रहने का अवसर मिले तो अनुभव करेगा कि मानव को अपनी परिस्थितियों से निपटने के लिए जो विशेषताएं मिली हुई हैं, उनकी तुलना में इन प्राणियों को मिला अनुदान किसी भी प्रकार कम नहीं है।

हवा में तैरते फिरने वाले बैक्टीरिया एवं वायरस स्तर के जीवों का भी अपना एक संघ है। वे प्राणियों के कलेवर आँतरिक अंग अवयवों में चाहे जहाँ पहुँच जाते है। अपने लिए अनुकूल परिस्थितियां हर जगह प्राप्त कर लेते है। परिवर्तन की नियति स्वरूप तो उनकी भी बदलती रहती है पर अस्तित्व को चुनौती देने वाला कभी कोई संकट उनके आड़े नहीं आया। अनादिकाल से उनकी प्रजातियां विद्यमान है और अनन्तकाल तक यथावत बनी भी रहेंगी।

शरीर के जीवकोषों सूक्ष्मतम घटकों की भी अपनी सत्ता है वे जल्दी जल्दी जन्मते मरते तो रहते हैं, पर उनका व्यवस्था क्रम ऐसा सुनियोजित है जिसकी तुलना में चलते फिरते दृश्यमान प्राणियों में से किसी के भी क्रिया–कलापों को उतना सुव्यवस्थित एवं अनुशासित होने का श्रेय नहीं मिल सकता। यह धरती के प्राणियों में से कुछ की बात हुई।

अन्तरिक्ष में विद्यमान ग्रह उपग्रहों-निहारिकाओं का अपना एक अनोखा संसार विद्यमान है, जिससे महाछिद्रों गह्वरों महामेघों और महान ऊर्जास्रोतों का अपना अनोखा संसार विद्यमान है। मनुष्यों की तरह वार्तालाप आदि में भले ही वे समर्थ न हों पर उनके बीच विद्यमान अनुशासन और तारतम्य ऐसा है, जिसे देखते हुए कहा जा सकता है कि एक विराट ब्रह्म के अविच्छिन्न घटकों की तरह परस्पर मिलजुल कर रहे है। एक दूसरों के बीच आदान-प्रदान का सुनियोजित क्रम चला रहे है। इसी अनुबंध के परिपालन के आधार पर उनकी सत्ता और गतिविधियों की सुनियोजित श्रृंखला अनादिकाल से चलती आ रही है और चलती रहेगी। पदार्थ जगत के प्रत्येक अणु-परमाणु में वह व्यवस्था तंत्र अपने-अपने ढंग से काम करता पाया जा सकता है। आणविक संरचनाएं उनकी मध्यवर्ती नाभिकीय ऊर्जा तथा परिभ्रमण की गति कक्षा का निर्धारण भी ऐसा है जिसे देखते हुए सौरमण्डल से लेकर विश्व ब्रह्माण्ड की संरचना तक में काम करने वाले व्यवस्था क्रम को सर्वत्र एक रस विद्यमान समझा जा सकता है। यहां सब कुछ सुव्यवस्थित एवं सुनियंत्रित है। अणोरणीयान् एवं महतोमहीयान् वाले प्रकृति विस्तार के प्रत्येक घटक में इसी आधार पर समस्वरता विद्यमान है।

सृष्टिक्रम के पीछे विद्यमान इस सुनियोजन को यदि समझा जा सके तो सहज ही जाना जा सकेगा कि मनुष्य की मौलिक सत्ता कितनी प्रबल और प्रखर होनी चाहिए। कारण कि उसे दुहरा अतिरिक्त अनुदान उपलब्ध है। उसकी शारीरिक संरचना अन्य प्राणियों की तुलना में अनेक गुणी विशिष्ट है। इतने सुनियोजित हाथ किसी भी प्राणी को मिले हुए नहीं है। यदि संरचना में कमी रही होती तो उसे कला-कौशलों में से एक को भी प्रदर्शित कर सकना संभव न रहा होता, न वह लेखक हो सकता था, न संगीत वादक न मूर्तिकार न चित्रकार न वैज्ञानिक न विशेषज्ञ। यह सुविधाएं उसके हाथों ने ही जुटाई हैं जिनने अनेकों यंत्र-उपकरणों का आविष्कार किया और उनके कुशल संचालन में प्रवीणता प्राप्त कि खड़े होकर चलने वाली रीढ़ की हड्डी और लम्बी ऊंची नीची यात्राएं कर सकने में समर्थ पैर भी किसे मिले हैं? अन्य ज्ञानेन्द्रियों और कर्मेन्द्रियों के संबंध में भी यही बात है। उनकी अपनी विलक्षण और अतिरिक्त क्षमता है। मानवी उपलब्धियों और सफलताओं में से प्रायः सभी इसी कारण बन पड़ी कि उसे अनुपम स्तर की शरीर संरचना मिली हुई है।

मन मस्तिष्क की क्षमता तो और भी अधिक विलक्षण है। उसमें सोचने की अनुकरण करने की स्मृतियां धारण किये रहने की अनुभवों की संस्कारों की एक से एक बढ़कर विशेषताएं उपलब्ध है। कल्पना शक्ति बौद्धिक प्रखरता एवं निष्कर्ष निर्धारण को इस स्तर का पाया जाता है। जिसकी उपमा अन्यत्र कहीं भी नहीं मिलती। यदि मानसिक विलक्षणताओं से वह सम्पन्न न रहा होता तो एक से एक विशेषताओं से भरे पूरे प्राणी जगत में उसकी गणना मुकुटमणि स्तर पर न हुई होती। गज प्राह, सिंह जैसे जीव ही उसे पछाड़ देने के लिए पर्याप्त थे। वह पक्षियों की तरह उड़ने जलचरों की तरह तैरने में भी कहाँ समर्थ है। घोड़े और चीत जैसी दौड़ने की क्षमता भी उसमें कहाँ है? पौधों के भीतर घुसकर अपनी दुनिया बसाते और चलाते रहने वाले कृमि कीटकों जितनी क्षमता उसमें कहाँ है? इतना सब होने पर भी वह जिस कारण सृष्टि का मुकुटमणि कहला सका, वह उसकी मानसिक विलक्षणता ही है। उसी ने इस शोभा सज्जा से खचित बनाकर रख दिया है।

स्रष्टा ने यों किसी को भी असमर्थ नहीं छोड़ा है। क्या जड़ पदार्थ और क्या वनस्पति या प्राणि जगत् सभी को अपनी-अपनी आवश्यकता के अनुरूप प्रचुर मात्रा में क्षमता एवं दक्षता प्रदान की है। फिर स्रष्टा का युवराज कुमार ज्येष्ठ पुत्र होने के नाते उसके कंधों पर तो यह दायित्व भी लदा है। कि संबद्ध पदार्थों को सुनियोजित और प्राणियों को समुन्नतता बनाने के लिए भी वह सब करें जो स्रष्टा ने अपना कार्यभार हल्का करने के लिए मानव को सहयोगी के रूप में रचकर योजनाबद्ध रूप से निरूपित किया है। इन परिस्थितियों में उसे अधिक भारी दायित्वों का निर्वाह कर सकने वाला सिद्ध होकर अपनी वरिष्ठता की सार्थकता सिद्ध करनी चाहिए। उसका चिन्तन कौशल और क्रिया−कलाप ऐसा होना चाहिए जो उस सुव्यवस्था को अधिक सक्षम रख सके, जिसे नियति ने कण कण में समाविष्ट कर दिया है।

मनुष्य साधारण प्राणियों के बीच रहते हुए उन्हीं जैसा व्यवहार न अपना ले इसलिए तत्वदर्शियों ने उसके लिए अतिरिक्त प्रकाश प्रेरणा का निर्धारण किया हैं उसी के निमित्त तत्वज्ञान आत्मबोध दिशा निर्धारण एवं कर्तव्यपालन की दिशाधारा अपनाने वाली उत्कृष्टता बनाये रहने वाले प्रकाश प्रवाह का आविर्भाव किया है। इसी को अध्यात्म कहते है। धर्म धारणा भी यही है। कला के पीछे भी यही मर्म सन्निहित है कि उसकी भाव संवेदनाओं में अधिक सहृदयता और शालीनता का समावेश बना रहे।

छोटे बच्चे अक्सर गड़बड़ाते और लड़खड़ाते रहते है। उनकी चेष्टाएं अटपटी होती है। जो बोलते है वह भी अस्पष्ट असंबद्ध होता है। आवश्यकता की पूर्ति तो दूर वे उसकी अभिव्यक्ति भी दूसरों पर प्रकट कर सकने में समर्थ नहीं होते सर्दी गर्मी से बच सकने की विद्या तक उन्हें नहीं आती। मल-मूत्र तक को यथा स्थान त्यागने एवं उस गंदगी को दूर हटाने की प्रक्रिया तक उनसे नहीं बन पड़ती। ऐसी दशा में मनुष्यजन्म वरण कर लेने पर भी वह बचपन में भी स्थिति ऐसी ही बनी रहती है जिसे अपंगों एवं अनगढ़ों के स्तर की कहा जा सके। यह स्थिति कई वर्षों तक बनी रहती है और अभिभावकों के निखार सहयोग से धीरे धीरे सुधार परिष्कार की दिशा में चल पाती है। प्रौढ़ता तो किशोरावस्था को पार कर लेने के उपरान्त ही दृष्टिगोचर होती है। तभी वह इस योग्य बन पाता है कि अपनी क्षमता और जिम्मेदारी को ठीक तरह सकने तथा उसका निर्वाह भली प्रकार कर सकने में समर्थ सिद्ध हो सके। यह प्रत्यक्ष कलेवर का प्रगति क्रम हुआ।

अपनी चेतना क्षेत्र के पिछड़ेपन को सुसंस्कृति बनाने का प्रश्न सामने आता है जिसे सम्पन्न कर सकने में वह तत्वदर्शन ही समर्थ है जिसे शालीनता का पक्षधर अनुशासन कहा जाता है। सिविक सेन्स नीतिशास्त्र समाज शास्त्र मनोविज्ञान सभी मिलकर इसी की पूर्ति करते है। अध्यात्म और धर्म के विशालकाय ढाँचे को खड़ा करने वाले भी इसी लक्ष्य की पूर्ति के लिए आवश्यकता ताना बाना बुनते रहे है। आस्तिकता आध्यात्मिकता धार्मिकता के नाम पर भी चेतना को इसी प्रयोजन की पूर्ति के लिए प्रशिक्षित किया जाता है। कि मनुष्य अनुशासन में स्वेच्छापूर्वक बंधा रहे जैसे कि पदार्थजगत और प्राणिजगत प्रकृति प्रेरणा के अनुबंधों में बाधित रूप से जकड़ा हुआ है।

मनुष्य को स्वतंत्र चिन्तन और स्वतंत्र रूप से क्रिया निर्धारण की छूट है। यह सुविधा और किसी घटक को नहीं मिली। ऐसी दशा में उसकी यह निजी जिम्मेदारी बनती है कि अपने को स्वयमेव नियति की अनुशासन व्यवस्था में बाँधे रहे। संयम इसी का नाम है। मानवी मर्यादाओं और वर्जनाओं के विशेष निर्देशों के अंतर्गत उसे यह प्रशिक्षण भी दिया गया है। कि अन्तः प्रकाश के आधार पर राजमार्ग को अपनाये रहे। भटकने ने पायें। पगडंडी ढूंढ़ने की आतुरता में कहीं कंटीले झाड़ झंखाड़ों में न जा फंसे। धर्मधारणाओं के आधार पर मनुष्य को अपने चिन्तन चरित्र और व्यवहार को शालीनता के अनुबंधों में बंधे रहने के लिए कहा गया है।

इसके बाद तत्व ज्ञान का उत्तरार्ध आरंभ होता है जिसे सेवा साधना के नाम से जाना जाता है। इसका विस्तार तो बहुत लम्बा है पर संक्षेप में इसे इस प्रकार कहा जा सकता है चिन्तन का उन्नयन और साधना का सुनियोजन यदि इस दिशा में सही निर्धारण के साथ चल सकना संभव हो सके तो मानना चाहिए कि पुण्य परमार्थ का सेवा साधना का वह प्रकाश पा लिया गया जो जीवन लक्ष्य की पूर्ति में पूर्णतया समर्थ है।


सतयुगी गरिमा को प्रतिभाएं जीवन्त करेंगी!

प्रस्तुत समय जिससे हम गुजर रहे है। संधि काल है। यह युग संधि का समय न चूकने जैसा है। आपत्तिकाल में लोग निजी व्यवसाय छोड़कर दुर्घटना से निपटने के लिए दौड़ पड़ते है। अग्निकाण्ड भूकम्प दुर्भिक्ष महामारी दुर्घटना जैसे अवसरों पर उदार सेवा भावना की परीक्षा होती है। भावनाशील इस अवसर पर चूकते नहीं। उपेक्षा करने वाले तिरष्कृत जैसे होते और सेवा साधना में जुट पड़ने वाले सदा सर्वदा के लिए लोगों के मन पर अपनी प्रामाणिक महानता की गहरी छाप छोड़ती है। जो कालान्तर में उन्हें अनेक माध्यमों से महत्वपूर्ण वरिष्ठता प्रदान कराती है।

इतिहास साक्षी है कि आपत्ति काल में राजपूत घरानों से एक एक सदस्य सेना में भर्ती होता था। सिख धर्म जिन दिनों चला था तब भी उस विपन्न वेला में उस प्रभाव क्षेत्र में आए हर परिवार ने अपने परिवार में से एक को सिख सेना का सदस्य बनने के लिए प्रोत्साहित किया था। आज की वेला तब की अपेक्षा कम विपन्न नहीं है। नव सृजन में संलग्न होने के लिए हर घर से एक प्रतिभा को आगे आना चाहिए और भारत भूमि की सतयुगी गरिमा को जीवन्त रखने का श्रेय लेना चाहिए। इक्कीसवीं सदी में सतयुग की वापसी वाली संभावनाएं सुस्पष्ट हैं कुछेक चिह्न पहले से ही निर्वाह में कटौती करके अपनी भाव संवेदनाएं आकांक्षाएं एवं गतिविधियों को सृजन प्रयोजनों में समर्पित कर सकें जिससे उनका समर्पण अन्धकार में जुलते मशाल की भूमिका निभाते हुए सबकी आँखों में चमक पैदा कर सकें।

स्वर्ग मुक्ति दिव्य दर्शन आदि के लिए प्रतीक्षा करनी पड़ सकती है और निराशा भी रहना पड़ सकता है। पर सत्य प्रयोजनों के लिए प्रस्तुत किया गया आदर्श साहस व्यक्तित्व को ऐसा प्रामाणिक प्रखर एवं प्रतिभावान बनाता है जिसके उपार्जन को दैवी सम्पदा के रूप में आँका जा सके जिस पर आज की भौतिक सम्पदाओं सुविधाओं को निछावर किया जा सके धनाढ्य और विद्वान कुछ लोगों पर ही अपनी धाक जमा पाते है। पर महामानव स्तर की प्रतिभाएं इतिहास को समस्त मानव जाति को कृतकृत्य करती है।

प्रतिभाओं का प्रयोग जहाँ कहीं भी जब कभी भी औचित्य की दिशा में हुआ है वहाँ उन्हें हर प्रकार से सम्मानित पुरस्कृत जीतते और छात्र वृत्ति के अधिकारी बनते है। सैनिकों में विशिष्टता प्रदर्शिता करने वाले वीरता पदक पाते ही अधिकारियों की पदोन्नति होती है। लोकनायकों के अभिनंदनों किए जाते है। संसार उन्हें महामानव का सम्मान देता है। तथा भगवान उन्हें हनुमान अर्जुन जैसा अपना सघन आत्मीय वरण करते है।

युग सृजन बड़ा काम है। उसका संबंध किसी व्यक्ति क्षेत्र देश से नहीं वरन् विश्व व्यापी समस्त मानव जाति के चिन्तन चरित्र और व्यवहार में आमूल-चूल परिवर्तन करने से है। पतनोन्मुख प्रवृत्तियां तो आँधी तूफान की तरह गति पकड़ लेती है पर उन्हें रोकना और तदुपरान्त उत्कृष्टता की दिशा में उछाल देना असाधारण दुस्साहस भरा प्रयत्न है। कैंसर के मरीज को रोग मुक्त करना और नीरोग होने पर उसे पहलवान स्तर का समर्थ बनाना एक प्रकार से चमत्कारी काया कल्प है। ऐसे उदाहरण सम्राट अशोक स्तर के अपवाद स्वरूप ही दीख पड़ते है। पर जब यही प्रक्रिया सार्वभौम बनानी हो तो कितनी दुरूह होगी इसका अनुमान वे ही लगा सकते हैं जिन्हें असंभव को संभव कर दिखाने का प्रण पूरा करना हो। जिन्हें करना कुछ न हो उनकी समीक्षा तो बाल विनोद ही हो सकती है।

दुस्साहस पर प्रतिभाएं उतरती है। विशेषतया जब वे सृजनात्मक हों कटे हुए अंगों के घाव भरना उनमें दूसरे प्रत्यारोपण जोड़ कर पूर्व स्थिति में लाना मुश्किल सर्जरी का ही काम है। युग की समस्याओं को सुलझाने के लिए अनौचित्य को निरस्त करने और सृजन का अभिनव उद्यान खड़ा करने के लिए ऐसे व्यक्तित्व चाहिए जो परावलम्बन की हीनता से स्वार्थ परता की संकीर्णता से ऊंचे उठकर अपने को परिष्कृत करने के साथ साथ वातावरण को समुन्नत बना सकने की उत्कंठा से अन्त करण को भाव संवेदनाओं से ओत−प्रोत कर सकें।

आत्मबल बढ़ाने के लिए उपासना को सब कुछ माना जाता है और उसी के सहारे मनोकामनाओं की पूर्ति से लेकर स्वर्ग मुक्ति तक देवताओं और भगवानों से अपनी मान्यताओं के अनुरूप छवि बनाकर दर्शन देने की अपेक्षा की जाती है। ऋद्धि सिद्धियों की आशा की कितने ही लोग लगाए रहते है। और सफलता की कसौटी यह मानते है कि उन्हें चित्र विचित्र कौतुक कौतूहल दृष्टिगोचर होते है। चमत्कार देखने और चमत्कार दिखाने तक ही उनकी सफलता सीमित रहती है। पर बात वस्तुतः ऐसी है नहीं। यदि आत्म शक्ति जागी तो उसका दर्शन आदर्शवादी प्रतिभा में ही अनुभव होगा। उसी में ध्वंस से निपटने और सृजन को चरितार्थ कर दिखाने की सामर्थ्य होती है। यही दैवी वरदान है इसी को सिद्ध पुरुषों का अनुदान भी कह सकते है। यथार्थ खोजों अन्वेषणों में भी यही उभर कर आते है।

भगवान शंकर ने परशुराम को कालकुठार थमाया था कि पृथ्वी को इक्कीस बार अनाचारियों से मुक्त कराए सहस्रबाहु की अदम्य समझी जाने वाली शक्ति का दमन उसी के द्वारा संभव हुआ था। प्रजापति ने दधीचि की अस्थियाँ मान कर इन्द्र को वज्रोपम प्रतिभा प्रदान की थी जिससे वृत्रासुर जैसे अपराजेय दानव से निपटा जा सका। अर्जुन को गाण्डीव देवताओं से मिला था छत्रपति शिवाजी की भवानी तलवार देवी द्वारा प्रदान की गई बताई जाती है। वस्तुतः यह किन्हीं अस्त्र शस्त्रों का उल्लेख नहीं है वरन् उस समर्थता का उल्लेख है जो लाठियों या ढेलों से भी अनीति को परास्त कर सकती है। गाँधी के सत्याग्रह में उसी स्तर के अनुयायियों की आवश्यकता पड़ी थी।

ऋद्धियों सिद्धियों द्वारा किसी को न तो बाजीगर बनाया जाता है। और न कौतुक दिखाकर मनोरंजन किया जाता है। विश्वामित्र राम लक्ष्मण को यज्ञ के बहाने अपने आश्रम में ले गए थे। वहाँ उन्हें बला अतिबला विद्या प्रदान की थी। उनके सहारे वे शिव-धनुष तोड़ने सीता स्वयंवर जीतने लंका की असुरता मिटाने और रामराज्य के रूप में सतयुग की वापसी सम्भव कर दिखाने में समर्थ हुए थे। विश्वामित्र ने ही अपने एक दूसरे शिष्य हरिश्चंद्र को ऐसा कीर्तिमान स्थापित करने का साहस प्रदान किया था, जिसके आधार पर वे तत्कालीन युग सृजन योजना को सफल बनाने में समर्थ हुए थे। साथ ही साथ हरिश्चन्द्र के यश को भी उस स्तर तक पहुँचा सके थे जिसकी सुगंध पर मोहित होकर देवता भी आरती उतारने धरती आए।

चाणक्य ने चन्द्रगुप्त को कोई गड़ा खजाना खोद कर नहीं थमाया था वरन् ऐसा संकल्प बल उपलब्ध कराया था जिसके सहारे आक्रमणकारियों का मुँह तोड़कर चक्रवर्ती के हौसले इतने बुलन्द किए थे कि अजेय समझे जाने वाले शासन को नाकों चने चबाते रहे। छत्रसाल ने सिद्ध पुरुष प्राणनाथ से ही वह छत्रसाल ने सिद्ध पुरुष प्राणनाथ से ही वह प्राणदीक्षा प्राप्त की थी जिसके सहारे वे हर दृष्टि से राजर्षि कहला सके।

देवताओं ने सिद्धार्थ को राजकुमार न रहकर धर्मचक्र प्रवर्तन में संलग्न होने का परामर्श दिया था। सिद्ध पुरुष माने जाने वाले गोरखनाथ, मत्स्येन्द्र नाथ के तप वैभव के अधिकारी बने थे। रामानन्द ने कबीर को स्वर्ण खान कही नहीं सौंपी थी। वरन् वह प्रतिभा प्रदान की थीं जिसके कारण कुलीनता और विद्वत्ता के अभाव में भी अपने समय के प्रचण्ड प्रवर्तक के रूप में प्रख्यात हुए। भगवान के भक्तों में सर्वोपयोगी नारद माने जाते है। उन्हें वह ललक मिली थी कि जन जन में भाव संवेदना का बीजारोपण करते हुए अनवरत रूप से संलग्न रह सकें। पवन ने अपने पुत्र हनुमान को वह वर्चस प्रदान किया था कि रामचरित्र में मेरुदण्ड जैसी भूमिका का निर्वाह कर सके।

गाँधी ने अपने प्रिय पात्र विनोबा को महान प्रयोजनों के लिए मर मिटने की भावसंवेदना प्रदान की थी उनके संपर्क में आने वाली अन्य लोगों ने भी जुझारू प्रतिभा पाई और अपने चरित्र तथा कर्त्तव्य से जनमानस पर गहरी छाप छोड़ने में सफलता पायी थी।

सन्त माधवेन्द्र पुरी ने अपने शिष्य चैतन्य को जनजागरण के कर्मक्षेत्र में उतारा था। विरजानन्द ने दयानन्द को ऐसा ही पुरुषार्थ प्रकट करने के लिए उद्यत किया था। रामकृष्ण परमहंस द्वारा विवेकानन्द को जिस मार्ग पर चलाया गया वह लोकमंगल के लिए समर्पित होकर स्वयं संकल्पवान नर रत्न की तरह चमकने और मूर्छित संस्कृति में प्राण चेतना फूँकने वाला राजमार्ग ही था।

महर्षि अगस्त्य ने भगीरथ को राजपाट छोड़कर गंगावतरण के महाप्रयास में संलग्न होने के लिए नियोजित किया था। लक्ष्य इतना उच्चस्तरीय था कि उनकी सफलता में योगदान देने के लिए स्वयं शंकरजी को कैलाश छोड़कर आना पड़ा था। योगी भर्तृहरि ने अपने भाई विक्रमादित्य को आदर्श शासक और भाँजे गोपीचन्द को तत्वदर्शन के अवगाहन में संलग्न किया था। इससे अधिक और कुछ कोई अपने स्वजन संबंधियों को दे ही क्या सकता है?

सम्राट अशोक ने जो प्रेरणा पाई थी उसी को अपनाने के लिए अपने पुत्र महेन्द्र और पुत्री संघमित्रा को परिव्राजक के रूप में धर्म प्रचार के लिए समर्पित कर दिया था। स्वयं बुद्ध भी तो अपने पुत्र राहुल को इसी स्तर की दीक्षा दे चुके थे बुद्ध परम्परा में आम्रपाली से लेकर कुमार जीव तक ऐसे अनेकों प्रतिभाशाली हुए जो भौतिक सुख भोगों से कोसों दूर रहकर धर्म प्रयोजनों में ही लगे रहते थे। मध्यपूर्व को भारतीय संस्कृति की छत्र छाया में लाने का श्रेय महाभाग कौडिन्य को जाता है। जिनने उच्च लक्ष्य की प्राप्ति के लिए जीवन भर प्रयास जारी रखा।

उन पुराण पंथियों की गली कूचों में भरमार है जिनने वैभव बढ़ाने सुविधा भोगने दर्प दिखाने और औलाद के लिए भरे खजाने छोड़ कर मरने जैसी सफलताएं अर्जित की श्रम संभवत उन्हें भी महापुरुषों से कम न करना पड़ना होगा। पर संकीर्ण स्वार्थपरता की परिधि से ऊंचे न उठने के कारण सुरदुर्लभ जीवन सम्पदा के व्यर्थ नियोजन पर पश्चात्ताप करते ही मरे होंगे। इसके विपरीत महर्षि कर्वे, हीरालाल शास्त्री, बाबासाहब आमटे, महामना मालवीयजी, भामाशाह, स्वामी श्रद्धानन्द, अहिल्या बाई, सुभाषचन्द्र बोस जैसी विभूतियों को प्रात स्मरणीय समझा जाता है। जिनने स्वयं तो रोटी कपड़े पर निर्वाह किया पर अपने समूचे वर्चस को परमार्थ प्रयोजनों के लिए निचोड़ दिया।

विदेशी प्रतिभाओं में जापान के गाँधी कागावा स्काउट आन्दोलन के जन्मदाता वेडेन पावेल रूस के लेनिन मार्क्स आदि संसार के इतिहास में जगमगाते हीरकों की तरह आँके जा सकते है। जहाँ सच्चरित्रता और सेवा भावना भगवत् कृपा प्रत्यक्ष होकर बरस पड़ी ऐसे लोग यशस्वी तेजस्वी ओजस्वी और मनस्वी कहलाते है। उनकी उदार चेतना और मनस्वी कहलाते है। उनकी उदार चेतना और युगसृजन जैसी सेवा साधना बन पड़ना परिवर्तन का प्रत्यक्ष प्रमाण हैं वास्तविक भगवत् कृपा इसी प्रकटीकरण में देखी जा सकती है। इसे ऐसी सिद्धि कह सकते हैं जिसके ऊपर अंधविश्वास एवं भ्रम जंजाल होने जैसा कोई लाँछन लगता ही नहीं।


योगत्रयी का मर्म एवं विधि व्यवस्था

यह विश्व प्रत्यक्ष भी है और परोक्ष भी। इसका कुछ अंश दृश्यमान है कुछ अदृश्य पेड़ पौधे जीव जन्तु पदार्थ हमें प्रत्यक्ष दीखते या माध्यमों की सहायता से अनुभव में आते है। पर कुछ ऐसे है। जिन्हें देखा नहीं जा सकता उनके प्रभाव को देखकर ही मूल सत्ता का अनुमान लगाया जाता है। परमाणु के सूक्ष्म घटक रेडियो कंपन प्रत्यक्ष अनुभव नहीं होते उनकी हलचलों प्रतिक्रियाओं को देखते हुए वस्तुस्थिति का अनुमान लगाया जा सकता है। आत्म और परमात्मा तक का स्वरूप वैज्ञानिक प्रत्यक्षवाद की कसौटी पर वास्तविक सिद्ध नहीं हो सका है। फिर भी प्रायः सभी बुद्धि जीवी यह विश्वास करते हैं कि बिना किसी बनाने वाले के इतना बड़ा और सुनियोजित ब्रह्माण्ड नहीं बन सकता है उसकी गतिविधियां ऐसा क्रमबद्ध तारतम्य नहीं रह सकता जब घर के थोड़े से बर्तन हमेशा आपस में टकराते और आवाज करते रहते हैं तो इतने ग्रह नक्षत्र अपनी धुरी और कक्षाओं में नियमित गति और रीति में किस प्रकार चलते घूमते रह सकते है। अनुमान तर्क तथ्य और प्रमाण के आधार पर भी विश्वास तक पहुँचा जा सकता है। वह प्रत्यक्ष की भूमिका निभा सकता है।

ज्ञानयोग का तात्पर्य अनेक जानकारियों का संग्रह करके विद्वता या बुद्धि बढ़ा लेना नहीं वरन् यह है कि स्व के स्वरूप उद्देश्य एवं दायित्व की अनुभूति अन्तरंग को होने लगे मनुष्य शरीर नहीं अविनाशी आत्मा है शरीर तो उसका आवरण आच्छादन है जबकि भ्रमवश अपने आपको काया ही समझा जाता है। और उसी की इच्छाएं पूरी करने के लिए वासना तृष्णा और अहंता में निरत रहा जाता हैं लोभ मोह और अहंकार के निमित्त चिन्तन और कर्म में निरत रहा जाता है होना यह चाहिए कि आत्मबोध आत्म निरीक्षण आत्म सुधार आत्म निर्माण और आत्म विकास की योजनाएं बने आत्म उत्कर्ष को आत्म परिष्कार को आत्म कल्याण को शरीरगत लिप्सा लालसा की तुलना में अधिक महत्व दिया जाये। चिन्तन चरित्र और व्यवहार में अन्तर्मुखी होकर जिया जाये।

कर्म-योग का अर्थ है मानवी गरिमा के अनुरूप ही कर्तव्य को समझा जाये ओर मर्यादाओं का अनुशासन पाला जाये। वर्जनाओं का उल्लंघन तो नहीं हो रहा इसका ध्यान रखा जाये अन्य प्राणी नीति नियमों में बंधे हुए नहीं है। वे किसी का भी खेत चर सकते हैं किसी भी मादा से पत्नीवत यौनाचार कर सकते हैं भले ही वह माता भगिनी या पुत्री ही क्यों न हो उन्हें उचित अनुचित का ज्ञान भी नहीं होता न जिम्मेदारी की अनुभूति। इन्द्रिय प्रेरणा ही उनका मार्ग दर्शन करती है। भय के अतिरिक्त वे स्वेच्छा पूर्वक किसी प्रकार का ऐसा अनुशासन नहीं बरतते जो मनुष्यता की परिधि में प्रवेश करते ही अनिवार्य रूप में आवश्यक हो जाता है।

मनुष्य यों स्वतंत्र है। उसे न तो रस्सों में बाँधा जाता है और न लगाम नकेल अंकुश आदि बंधनों से जकड़ा जाता है फिर भी वह वैयक्तिक गरिमा परिवारगत सहकार समाज के अनुबंधों में जकड़ा हुआ है देश धर्म समाज और संस्कृति के प्रति अति प्रभावी और नीति सदाचार के प्रति वफादार रहना पड़ता है। अनुबंधों को स्वेच्छा पूर्वक स्वीकार करना पड़ता हैं यही कर्मयोग है। जिम्मेदारियों को कड़ाई से प्रतिपालन करते हुए संतुष्ट और प्रसन्न रहा जाता है। भले ही प्रयत्नों का इच्छित परिणाम उपलब्ध हो या न हों।

भक्तियोग में स्वभाव स्नेह सद्भाव से सना हुआ रखना पड़ता है। भक्ति ईश्वर की या देवता की करते लोग देखे जाते हैं पर यह नहीं समझ पाते कि ईश्वर या देवता की भक्ति का वास्तविक स्वरूप क्या है? प्रत्यक्ष ब्रह्म यह विराट विश्व ही है उसी की सेवा साधना से भक्ति चरितार्थ हो सकती है। देवता प्रतिमा को नहीं देवत्व को कहते है। प्रतिमा तो उसका प्रतीक चिह्न मात्र है। उसे धूप दीप नैवेद्य अक्षत पुष्प चढ़ा देने भर से देवत्व का परिपोषण अभिवर्धन में ही बन पड़ता है।

भक्ति का अर्थ है सेवा भजन भज धातु से बनता है उसका अर्थ पुण्य परमार्थ ही हो सकता है। इस निमित्त मन को ढालने के लिए जप कीर्तन सहायक हो सकते है। किन्तु इतने भर से ही देवता की अनुकम्पा नहीं मिल सकती और न अन्त करण में आनन्द उल्लास का उद्भव हो सकता है। भक्ति की नवधा क्रिया पद्धति में प्रतिमा का पूजा अर्चा के लिए मनुहार उपहार भर पर्याप्त नहीं देवत्व आत्मा है और देव प्रतिमा उसका प्रतीक चिह्न प्रतीक बालबोध के निमित्त विनिर्मित किये जाते है उन्हें देखकर मूल तत्व का स्मरण उसी प्रकार किया जाता है जैसे कि चित्र को देखकर किसी हितैषी संबंधी का स्मरण हो आता है। चित्र देख कर उल्लसित होने में मूल व्यक्ति के प्रति अपनी स्मृतियों में समाविष्ट सद्भावना को सजीव करना हैं देवता कोई व्यक्ति नहीं हैं आदर्शों को ही देव कहते है जो उत्कृष्ट आदर्शवादिता का परिपालन करता है वही देव उपासक है। जिसके मन में यह भ्रम समाया हुआ है।

भक्ति का सीधा अर्थ है स्नेह सद्भाव वह सर्वप्रथम अपने कर्तव्यों और दायित्वों में किया जाता है। इसके अतिरिक्त लोकमंगल और सत्प्रवृत्ति संवर्धन को ध्यान में रखा जाता है। इन प्रसंगों में किया गया पुण्य परमार्थ ही वास्तविक भक्ति हैं इन प्रयोजनों के लिए शौर्य पराक्रम साहस का भी प्रदर्शन करना पड़ता है। और आवश्यकता पड़ने पर अनीतियों कुरीतियों से संघर्ष भी करना पड़ सकता है। भक्ति का दायर चापलूसी अपनाने से उसकी पूर्ति नहीं हो सकती छुटपुट आत्म परिष्कार और लोक मंगल के लिए उदारता और सेवा साधना करने के लिए आवश्यकता पड़ती है।


मनुष्य शरीर में ही देवोपम उपलब्धियाँ (Kahani)

भारद्वाज ने चलने से इंकार कर दिया और मुझे मनुष्यों के बीच ही जीने मरने दे ताकि सत्य सत्य तक पहुँचाने वाला ज्ञान निरन्तर अर्जित कर सकूँ। संयम साध सकूँ और सेवा साधना का संतोष प्राप्त करता रहूं।

देवदूतों का आग्रह अस्वीकार कर दिया गया और महर्षि ने जन्म मरण का सिलसिला जारी रखा। मनुष्य शरीर में ही वे देवोपम उपलब्धियाँ प्राप्त करते हैं।


परोक्ष जगत के अस्तित्व को स्वीकारना ही पड़ेगा!

बुद्धिवाद कहता है कि जो दृश्यमान नहीं है, काल्पनिक है परम्परावादी मान्यताओं पर आधारित है उस पर विश्वास नहीं किया जाना चाहिए। प्रत्यक्षवाद हर उस धारण को तर्क तथ्य प्रमाणों की कसौटी पर कसना चाहता है जो किसी समुदाय में फैली या प्रचलन में मान्यता प्राप्त कर चुकी है। यह सब सही होने पर भी परोक्ष जगत का एक क्षेत्र ऐसा है जिसके प्रत्यक्ष प्रमाण न मिलने पर भी विज्ञान जगत को दबी जबान से यह मानने पर पर विवश होना पड़ा है कि मरणोत्तर जीवन एक अकाट्य सत्य है। परामनोविज्ञानी रहस्यवादी या एक ही शब्द में आँक्ल्टिस्ट्स की यही मान्यता है कि मृत्यु ही जीवन का अंतिम पड़ाव नहीं है। वरन् इसके बाद भी जीवन अनन्तता सतत् चलायमान यात्रा आरंभ रहती है। मरण तो इस प्रत्यक्ष नजर आने वाली काया का होता है जीवात्मा का नहीं चेतना अमर अमर है। गीताकार नैनंछिन्दन्ति शस्त्राणि के प्रतिपादन का सत्यापन करते हुए वे वैज्ञानिकों को बताते हैं कि इस जगत से परे एक अदृश्य परोक्ष जगत का भी अस्तित्व है। इसी जगत में ऐसे सूक्ष्म जीवी विचरण करते रहते हैं जिनका यदाकदा प्रकट होते अथवा जिनके द्वारा सम्पन्न क्रिया कलापों को देखा गया है। जिनने उन्हें प्रत्यक्ष देखा है संपर्क साधा है उन्होंने दिवास्वप्न नहीं देखा अपितु एक सच्चाई का सत्यापन किया है।

गुह्यविज्ञानी कहते हैं कि प्रत्यक्ष दिखाई न देने पर भी ऐसी सूक्ष्म आत्माओं के अस्तित्व को नकारा नहीं जा सकता। कई आत्माएं स्वतः ही बिना किसी प्रयास के अनिपेक्षित तरीके से लोगों दिखाई देने लगती है। उच्च श्रेणी की सदाशयी पितर आत्माएं तो संस्कारवान शरीरधारियों से संपर्क स्थापित कर उनकी सहायता उनका मार्ग दर्शन करती पायी गयी हैं। ये घटनाक्रम जिनके साथ भी घट है उन व्यक्ति की प्रामाणिकता पर संदेह नहीं व्यक्त किया जा सकता।

बहुधा ऐसी चर्चा करने वालों अथवा इनका प्रतिपादन करने वालों पर रूढ़िवादी होने का आरोप लगाया जाता रहा है। पर अब जब विज्ञान की साक्षियाँ भी समानान्तर परोक्ष जगत के अस्तित्व के पक्ष में प्रस्तुत होने लगी हैं, आरोपों का सिलसिला टूट-सा गया है।

इंग्लैण्ड के प्रख्यात परामनोविज्ञानी एण्ड्रयूगीन के अनुसार समय-समय पर ऐसी अनेक प्रामाणिक घटनाएं सामने आती रहती है जिनसे प्रेतात्माओं के अस्तित्व की पुष्टि होती है। उनका कहना है कि उद्विग्न अशांत आतुर विक्षुब्ध क्रुद्ध कामनाग्रस्त अतृप्त लोगों को ही प्रायः प्रेत बनना पड़ता है। शाँत चित्त सौम्य एवं सज्जन प्रकृति के लोग सीधी सादी जन्म मरण की प्रक्रिया पूरी करते व मुक्ति से पूर्व पितर बनकर सहायता करते रहते है।

विश्व के मूर्धन्य परामनोविज्ञानियों द्वारा किये गये प्रयोग परीक्षणों से अब यह सिद्ध हो गया है कि ऐसी आत्माओं का अस्तित्व प्रेत योनि में काफी लम्बे समय तक बना रहता है जिन्हें बरबस प्रतिबंधित कर के बहुत दिनों तक बंदी बना कर रखा और प्रताड़ित किया गया हो। ऐथेन्स की एक ऐसी ही प्रख्यात घटना है जो मरणोत्तर जीवन की सच्चाई को प्रकट करती है। ईसा से एक शताब्दी पूर्व की बात है कि इसी नगर के महल में एक वृद्ध पुरुष को देखा जाता था जिसके दोनों हाथ और पैर लोहे की जंजीरों से जकड़े रहते थे। समय समय पर उस जंजीर के खड़खड़ाहट की ध्वनि भी आसपास के वातावरण में प्रतिध्वनित होती रहती थी। उपलब्ध प्रमाणों के अनुसार उस व्यक्ति को उक्त भवन में कैद करके रखा गया था तथा भयाक्रान्त स्थिति में ही उसकी वहाँ हत्या कर दी गई थी। तब से उसने उस महल को अपना निवास स्थान बना लिया। बिना किराये के भी तब से उसमें कोई भी रहना पसंद नहीं करता था।

प्रसिद्ध दार्शनिक ऐथनोडोरस ने उक्त घटना के रहस्य को समझने के लिए शोधकार्य आरम्भ किया। जैसे ही उनने उस भवन में प्रवेश किया तो उस प्रेतात्मा का उन्हें भी सामना करना पड़ा एक बार तो वे बुरी तरह भयभीत भी हो गये पर धैर्य नहीं खोया आखिर में भूत ने महल के आँगन में गड्ढा खोदा और उसी में विलुप्त हो गया। जब इस घटना की जानकारी जिलाधिकारी को दी गई तो उन्होंने उस स्थान की खुदाई के आदेश दिये। खोदने पर उस स्थान से जंजीर के जीवाश्म निकले जिन्हें समीपवर्ती संग्रहालय में सुरक्षित रख उस विक्षुब्ध आत्मा का धर्माचार्यों द्वारा यथाविधि अंतिम संस्कार कर दिया गया। तब से वह भवन रहने योग्य हो गया अब पर्यटक वहाँ यह देखने जाते हैं कि कैसे कोई स्थान भवन किसी विक्षुब्ध आत्मा के रहने से अभिशप्त हो जाता? हमारे देश की बात छोड़ दें इंग्लैंड व अमेरिका में ही ऐसे कितने भवन हैं जिन्हें अभिशप्त अभी भी माना जाता है जिनमें प्रेतात्माओं का निवास है यह वहीं समीप रहने वाले शपथ पूर्वक कहते हैं तथा जहाँ रहस्यवादियों ने भी जाँच पड़ताल कर यही निष्कर्ष निकाला है। यूरोप में सामंतों व राजाओं के ऐसे अनेकों किले निर्जन पड़े हुए हैं जिनमें कभी क्रूर शासक निवास किया करते थे, इतिहास जिनका साक्षी है। यह उन देशों का प्रसंग है जिन्हें विकसित प्रगतिशील कहा जाता है तथा जो विज्ञान व साधनों की दृष्टि से भी प्रगति के चरम शिखर पर है। फिर वे कैसे गुह्य विद्या को अप्रामाणिक ठहराते है। वस्तुतः वे चेतना के अस्तित्व को उसकी जानबूझकर स्वीकार नहीं करना चाहते क्योंकि इससे उनकी भोगवादी जीवन पद्धति पर चार्वाकवादी दर्शन शैली पर सीधा प्रहार पहुंचता है।

पर आँखें बन्द कर लेने से यह तो प्रमाणित नहीं होना हो जाता कि सूर्य का अस्तित्व ही नहीं है।

ऐरिक मैपल भूत-प्रेत विद्या का विशेषज्ञ समझा जाता है। अपनी इन विशेषताओं के कारण उन्होंने इंग्लैण्ड में विशेष ख्याति अर्जित की है। ऐसैक्स के समीपवर्ती रैकयुल्वर गाँव में घटी एक घटना के संबंध में जब उन्होंने वहां की जनता से पूछताछ की तो लोगों ने बताया है कि एक पेड़ के नीचे कुछ नवजात शिशुओं के रोने की आवाज सुनाई देती है। उनकी करुण चिल्लाहट ऐसी होती है कि गाँव वालों को रात्रि के समय ठीक तरह से सोने नहीं देती। मैपल ने इस दुखद संवेदना भरी ध्वनि को कई बार सुना तो सन् 1960 में भू गर्भ विज्ञानियों की सहायता से उस स्थान की खुदाई करवायी। खुदाई में अनेक मासूमों बच्चों की खोपड़ियां तथा शरीर के अन्य अंगों के अस्थि पंजर भी पाये गये। वैज्ञानिकों ने परीक्षण करने पर पाया है कि बच्चों के ये अस्थि पंजर कम से कम 1500 वर्ष पुराने है। एक बच्चे का कंकाल तो बिना किसी क्षति के भी उपलब्ध हुआ है। विशेषज्ञों का कहना है कि इन बच्चों की हत्या तत्कालीन सैनिकों द्वारा धार्मिक प्रयोजनों की पूर्ति के लिए की गयी थी। देवताओं की प्रसन्नता हेतु नरबलि की घिनौनी परम्परा का प्रचलन यूरोप में ईसा से पूर्व बहुत अधिक था।

इसी तरह इंग्लैण्ड के नौरफाक नगर की एक आश्चर्यजनक घटना लोगों के कौतूहल का विषय बनी हुई है। प्रतिवर्ष 31 मई को अर्धरात्रि के समय रथ सवार एक व्यक्ति की छाया बैस्टविक गाँव से गुजरती है। उसमें प्रज्वलित अग्नि वहाँ के दर्शकों को स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। लोगों का कहना है कि सन् 1741 में सर गाँडफ्रे हैजलिट नामक व्यक्ति का विवाह बैस्टविक में ही बड़ी धूमधाम से संपन्न होने जा रहा था कि विद्वेषियों ने उन्हें रास्ते में ही रथ समेत जला डाला। बाद उन्हें बैस्टविक हाल में दफना दिया गया। तभी से उनकी मृतात्मा प्रतिवर्ष रात्रि में उसी निश्चित समय पर उस रास्ते पर इस तरह दिखाई देती है।

परामनोविज्ञानी एण्ड्रयूवन ने भूत-प्रेतों के 97 किस्मों को वैज्ञानिक विश्लेषण किया है उनका कहना है कि दो प्रतिशत भूत−प्रेत ऐसे हैं जिनकी अद्भुत अलौकिकता का रहस्य अभी तक नहीं समझा जा सकता है। दी रोमियो एरर नामक प्रसिद्ध पुस्तक में लायल वाट्सन द्वारा वर्णित न्यूयार्क की एक घटना ऐसी ही है जिसे सबसे अधिक प्रामाणिक एवं अद्भुत समझा जाता है सन् 1764 में न्यूयार्क के एक अस्पताल में चिकित्सक ने एक ऐसे व्यक्ति का शव-परीक्षण किया, जिसकी असामयिक मृत्यु हो गयी थी। विच्छेदन के समय कई चिकित्सकों द्वारा मृत्यु हुई प्रमाणित उस शव ने उछलना-फुदकना आरम्भ कर दिया और सहयोगियों के देखते देखते सर्जन का गला घोंट डाला। सर्जन की मृत्यु में देर नहीं लगी विक्षुब्ध मनः स्थिति की मृतात्मा द्वारा अपने स्थूल शरीर के माध्यम से किया यह कृत्य बड़ा ही आश्चर्यजनक उदाहरण है। बाद में पाया गया कि सर्जन की मृत्यु बाद शब भी ठण्डा हो गया दोनों का अंतिम संस्कार साथ साथ किया गया।

अकाल मृत्यु के सिद्धान्तों का व्यावहारिक प्रयोग परीक्षण करने वालों एडगर एलनपों का नाम सब से अग्रणी है उन्होंने ऐसी अनेकों घटनाओं का वर्णन किया है जिनसे मरणोत्तर जीवन एवं भूत-प्रेतों के अस्तित्व की सच्चाई प्रकट होती है दी फाल ऑफ हाउस ऑफ यूश रनाम पुस्तक में उन्होंने लिखा है कि गृह स्वामी रौड्रिक यूशर को अपनी मृत बहन लेडी मैडेलीन की छाया बहुत ही डरावने आकार में दिखाई देती थी जिसके वस्त्रों पर रक्त के धब्बे थे। उसकी मृत्यु अपहरण के बाद बड़े ही नृशंस तरीके से किसी गुम्बज में दम घोंट कर की गई थी। इस दृश्य को उपस्थित जन समुदाय ने भी नजदीक से देखा था।

एडगर एलन के अनुसार सामान्यता जो महिला अथवा पुरुष हत्या या आत्महत्या का शिकार बनते हैं अथवा प्रतिशोध की भावना से कुँठित होकर शरीर त्याग कर बैठते हैं, वे ही विचित्र तरह की स्थिति में अपना स्वरूप प्रकट करते है।

पश्चिम जर्मनी में गुप्तचर विभाग के भूतपूर्व संचालक फ्रेडरिक हर्जेनरिथ ने प्रेतात्माओं की स्मृतियां को 1930 के अपने प्रकाशन में सचित्र वर्णन किया है। उनका कहना है कि कुछ मृतात्माएं व्यक्ति के मार्गदर्शन में पूरी तरह सहायक होती हैं तो कुछ स्थूल सहायताएं भी पहुँचाती है।

घटना लगभग 70 वर्ष पुरानी है। राजस्थान के मेवाड़ कस्बे में मंडेरा गाँव के दर्जी परिवार के एक महिला की मृत्यु प्रसव के तुरन्त बाद हो गई थी। पर अतृप्त अभिलाषाओं के कारण उसकी मृतात्मा रात्रि के समय अपने नवजात शिशु के पास आती और उसकी देखभाल करती। प्रातःकाल होते उसे स्नानादि कराकर वापस अदृश्य हो जाती। इसी अवधि में वह सास ससुर की एवं अपने पति की भी सेवा सुश्रूषा करती रहीं।

पिछले दिनों राजस्थान के ही चित्तौड़ जिले के अकोला गाँव में इसी तरह की एक घटना प्रकाश में आई है। एक जमींदार की पत्नी की प्रेतात्मा अपने बच्चे की परवरिश पूर्व की ही भाँति करती रहीं लोगों द्वारा जब उसे भागने को विवश किया गया तो अदृश्य होने से पूर्व उसने अपने पति को एक गुप्त खजाने का रहस्य बताया और साथ ही यह भी कहा की इसका सदुपयोग मात्र बच्चे के विकास में ही करें अन्यथा वे अपने स्वयं के धन से भी हाथ धो बैठेंगे।

ह्यूमन पर्सनालिटी एण्ड इट्स सरवाइवल ऑफ बाडिली डेथ नामक प्रसिद्ध पुस्तक के के मूर्धन्य लेख एफ॰ डब्ल्यू0 एच॰ मायर्स का अभिमत है कि मृतात्माएं मनुष्य की उस शक्ति की परछाई है जिनका सतत्-प्रवाह मरणोपरांत भी बना रहता है। इनसे संपर्क स्थापित करके मनुष्य लाभान्वित भी हो सकता है। प्रेतात्माओं की मुक्ति हेतु श्राद्धतर्पण का विधान इसी कारण भारतीय संस्कृति का एक महत्वपूर्ण अंग रहा है।

परोक्ष जगत का अस्तित्व मानने का सबसे बड़ा लाभ यह है कि व्यक्ति की उत्कृष्ट उदात्त जीवन जीने के प्रति आस्थाएं मजबूत होती है वह आस्तिक बनता है ईश्वर के प्रति विश्वास दृढ़ होते चलने से सहज ही आचरण भी आदर्श बन पड़ता है। गुह्य विज्ञान डराता नहीं एक अविज्ञात किंतु यथार्थ लोक की यात्रा कराता है एवं व्यक्ति को श्रेष्ठ जीवन जीने की प्रेरणा देता है।


विचित्र विलक्षण यह सृष्टि

मायापति भगवान की यह सृष्टि सचमुच बड़ी विचित्र है। ऐसी विराट सुनियोजित सुन्दरतम कृति कोई बुद्धिमत्तापूर्ण सत्ता ही रच सकती है यही बार बार कहने को मन करता है इतनी विशाल यह सृष्टि है कि एक एक घटक पर विचार करें तो लगता है कि उसने अपने घटक पर विचार करें तो लगता है कि उसने अपने विनिर्मित हर कृति पर पूरा ध्यान नहीं नहीं दिया है सुव्यवस्था को भी दृष्टि में रखा है।

खगोल शास्त्रियों का ऐसा मत है कि अनगिनत सौर मण्डल हमारी सृष्टि में है जिनमें एक हमारा भी है इतने विराट ब्रह्मांड की तुलना में वह इतना छोटा है कि रीडर्स डायजेस्ट ग्रेट एटलस का चित्रकार अपने विशाल नक्शे में मात्र यही लिख पाया कि हमारा सौर मण्डल कहाँ कही है कहाँ है यह भी सुनिश्चित नहीं यही कहीं है यह उसे विवश होकर लिखना पड़ा इतना नगण्य-सा होने पर भी हम जानते हैं कि वह कितना विराट हमारी दृष्टि में है। सूर्य की पृथ्वी से दूरी लगभग पंद्रह करोड़ किलोमीटर है एवं वहाँ से चले प्रकाश को हम तक पहुँचने में ही काफी समय लग जाता है। अकेले हमारे सूर्य के चारों ओर दस करोड़ धूमकेतु चक्कर लगाते हैं ऐसा एक धूमकेतु हमारी पृथ्वी के समीप भी आ जाता है तो हम घबरा जाते हैं व उससे संभावित प्रभावों का विश्लेषण करने लगते है।

सूर्य की सतह पर पड़ने वाले धब्बों या सौर कलंकों पर बड़ा विशद अध्ययन होता रहा है क्योंकि वे सीधे पृथ्वी पर जीवधारियों पर वातावरण पर प्रभाव डालते हैं। सूर्य के अन्दर का तापमान तो कल्पनातीत है फिर भी वैज्ञानिक इसे नापने में सफल हुई है। यह लगभग एक करोड़ चौवन लाख य़ ईकाई के लगभग होता है। सतह पर तापमान 5525 डिग्री सेण्टीग्रेट मापा गया है। सौर धब्बों का आकार यदि उन्हें पृथ्वी से देखा जाना है तो लगभग 1300 मिलियन वर्ग किलोमीटर का घेरा उनका होना चाहिए। ये प्रति 11 वर्ष पर उभरते व घटते रहते है। 8 अप्रैल 1947 का सबसे बड़ा सौर धब्बा देखा गया जो कि अठारह हजार मिलियन वर्ग किलोमीटर परिधि का था। इन्हें धब्बा या कलंक संभवत इसलिए कहा जाता है। कि इनका तापमान सविता देवता के स्वयं के तापमान से पंद्रह सौ डिग्री सेंटीग्रेट कम होता है, दूसरे ये सूर्य के प्रकाश के अनुकूल प्रभाव के विपरीत हमारे पर्यावरण में व्यापक उथल-पुथल पैदा कर देते हैं। इनका उभरना ही अनिष्ट का प्रतीक माना जाता है। एक ऐसा ही बड़े आकार का सौर कलंक इन दिनों सूर्य की सतह पर उभरा है जिसकी चरमावस्था दिसम्बर 1989 में होगी व क्रमशः 1995 तक अपना प्रभाव बनाये रख सन् 2000 में अपना प्रभाव सामर्थ्य कुछ कम करेगा। अभी तो इन कलंकों के बारे में बहुत कुछ जानना शेष है परन्तु इतनी दूरी पर होते हुए भी वे कैसे मानवी मस्तिष्क के न्यूरान्स से लेकर वृक्षों के तनों में बनने वाले वर्तुलों तथा भू-चुम्बकीय धारा को प्रभावित कर देते है। यह अभी तक जाना नहीं जा सका। हो सकता है अगले दिनों हम इस क्षेत्र में अपनी जानकारी बढ़ा सकेंगे।

हमारी अपनी पृथ्वी जो इस सौर मण्डल का एक घटक है कम विचित्र नहीं है सभी जानते है। कि यह पूर्णतः गोल नहीं है अपने दोनों ध्रुवों पर चपटी है ध्रुव से ध्रुव तक का व्यास पूर्वी व पश्चिम छोर को जोड़ने वाले इक्वेटोरियल व्यास से बयालीस हजार सात सौ सत्तर किलोमीटर कम है इसी कारण यह नाशपाती के आकार की दृष्टिगोचर होती है। इसका क्षेत्रफल ही उन्नीस करोड़ सत्तर लाख वर्ग मील है। डॉ. नेबिल मस्केलिन ने 1780 ्नष्ठ में सबसे पहले पृथ्वी का भार जानने का प्रयास किया था। किन्तु अब आधुनिक उपकरणों में से जो जानकारी मिली है वह बताती है कि यह 5967 ग 10 टन है एवं आकाश से गिरी धूल उल्काखण्डों जले ईंधन के अवशेषों तथा समुद्र से सतत् होती बौछार से बने बने नमक के कारण प्रतिवर्ष और स्थूल हो जाती है। हर वर्ष बढ़ने वाला यह भार लगभग एक लाख पौण्ड है क्रमशः पृथ्वी भारी होती ही चली जा रही है। अंतिम नियति क्या होगी अभी हमें कुछ जानकारी इसकी नहीं है।

पृथ्वी की कुल सत्तर का 70.12 प्रतिशत भाग समुद्री जल से घिरा हुआ है। एक गणना के अनुसार सभी समुद्र मिलकर छत्तीस करोड़ सत्रह लाख चालीस हजार वर्ग किमी. क्षेत्रफल धरती का घेरे पड़े है। प्रशान्त महासागर सबसे बड़ा है पूरे समुद्री क्षेत्र का यह पैंतालीस प्रतिशत है एवं सबसे गहरा भी है। मल्टीबीम सोनर्स की मदद से छत्ती हजार फीट गहराई सर्वाधिक इसी में है। यह इतनी है कि पृथ्वी का सबसे ऊंचा पर्वत हिमालय जिसका शिखर माउण्ट एवरेस्ट है, इसमें समा सकता है। यदि सतह से एक पौण्ड भारी लोहे का गोला इसमें डाला जाये तो समुद्री तक पहुँचने में इसे लगभग 64 मिनट लगेंगे।

एक विलक्षण तथ्य वैज्ञानिकों और निकला है। कि अगर ऐसा पाइप बनाया जाये जिसका व्यास लगभग 121 किमी हो तथा पृथ्वी से सत्तर हजार मील ऊंचाई तक फैलाया जाये तो उसमें विश्व के सभी सागरों को जल समा सकता है। भगवान करे ऐसा न हो पर कभी सारी दुनिया के समुद्र सूख भी जाये तो जो नमक बचेगा उससे विषुवत् रेखा के चारों ओर एक मील मोटी तथा 180 मील ऊंची दीवार बनायी जा सकती है। इससे अंदाज लगाया जा सकता है समुद्र में कितना खारापन है।

यदाकदा कहीं बिजली गिरती है तड़ित विद्युत का पृथ्वी पर संघात होता है तो हम चौंक जाते हैं। पर एक तथ्य जानने पर प्रतीत होगा कि यह तो कुछ भी नहीं है। पृथ्वी पर प्रतिक्षण अठारह सौ जगहों पर बिजली और आँधी के साथ पानी बरसता ही रहता है। प्रति सेकेंड कही न कही पूरी पृथ्वी पर सौ बार बिजली कड़क कर गिरती ही रहती है। यह क्रम कभी भी बन्द नहीं होता।

बिहार व नेपाल को अपनी विभीषिका से दहला देने वाला एक भूकम्प पिछले दिनों आया किन्तु पाठकों का यह जानकर आश्चर्य होगा कि पृथ्वी का भूगर्भीय केन्द्र कभी भी शान्त नहीं बैठता। प्रतिवर्ष 5,00,000 ऐसे छोटे बड़े भूकम्प पूरे विश्व में आते रहते हैं जिनमें भूगर्भ की हलचल को सीस्मोग्राफ पर रिकार्ड किया जा सकें। इनसे 1,00,000 ऐसे हैं जिनकी अनुभूति होती है एवं 1,000 ऐसे होते है। जो हानि पहुँचा सकते है। सबसे गहरा केन्द्र जिस भूकम्प का रिकार्ड किया गया वह 447 मील गहरा था व 1933, 1934, 1943 में तीन बार इंडोनेशिया में आया। चिली में 22 मई 1960 को जो भूकम्प आया वह अब तक का सबसे भयावह व सामर्थ्यवान माना जाता है। इसकी शक्ति 10 घात 26 अग्स मापी गई है। जहाँ तक जन धन की हानि का प्रश्न है सबसे भीषण त्रासदी पहुँचाने वाला भूकम्प भूमध्य सागरीय क्षेत्र में पूर्वी भाग में जुलाई 1201 में आया था उस समय के लोगों ने जो अब तक के प्रमाण मिले हैं इतिहास में लिखा है कि इसमें 11 लाख आदमी मारें गए। पूर्वी चीन के ताँगाशान में प्रातः में 27 जुलाई 1976 को आए भूकम्प में साढ़े सात लाख व्यक्ति अकाल मृत्यु के शिकार हुए। यह आंकड़ा प्रामाणिक माना जाता रहा है। जहाँ तक धन व सम्पदा की क्षति का प्रश्न है सर्वाधिक भूकंप क्वाण्टों जापान में एक सितम्बर 1923 को आया था, जिससे एक पूरा द्वीप समुद्र में समा गया एक लाख बयालीस हजार व्यक्ति समुद्र के गर्म में विलुप्त हो गए एवं दस अरब पौण्ड से भी अधिक की सम्पत्ति की क्षति हुईं।

प्रकृति के चित्र विचित्र घटनाक्रमों में भूकम्प इत्यादि की ही तरह ज्वालामुखी भी आते है। कुछ सक्रिय ज्वालामुखी पूरी धरती पर 950 हैं, इनमें से कई जल सतह के नीचे है। इन सबका न जाने क्यों अत्यधिक स्नेह इंडोनेशिया से ही है जहाँ ज्ञात इतिहास में अब तक 167 विद्यमान ज्वालामुखी में से 77 आग उगल चुके है। अंग्रेजी नाम वाँल्केनो भी वल्केनो द्वीप से पड़ा है। जो भूमध्य सागर में विस्फोट के बाद विलुप्त हो गया। वल्केनस को ग्रीक मायथाँलाजी में अग्नि का देवता माना गया है। संभवतः इसी पर आधारित हो। सबसे विराट् परिमाण वाला ज्वालामुखी विस्फोट 27 अगस्त 1883 के दिन क्राकाटोआ द्वीप में हुआ जो इंडोनेशिया में जावा व समात्रा के बीच स्थित है। इससे निकले लावा से 163 गाँव राख हो गए, 36,000 व्यक्ति मृत्यु की गोद में पहुँचे गए एवं आसमान में 55 किमी की ऊंचाई तक चट्टानों एवं पत्थरों को लावा की राख को इसने राख 10 दिन बाद तक 5330 किमी दूर तक पायी गयी। पूरे विश्व के 1/13 भाग में इसके गर्जन की आवाज सुनाई दी। इस विस्फोटों की क्षमता हाइड्रोजन बम की सामर्थ्य से 26 गुणा अधिक थी।

सबसे बड़ा सक्रिय वर्तमान ज्वालामुखी हवाई द्वीप में है। इसका नाम है माँनालोआ इसका गुम्बद 75 मील लम्बा, 64 मील चौड़ा है। तथा लावा का प्रवाह पूरे द्वीप के 2000 वर्ग मील को घेरे हुए है। इस के क्रेटर की गहराई 180 मीटर मापी गई है। जब भी इसमें विस्फोट होता है, लावा की ज्वालाएं 4168 मीटर ऊपर जाती है। इसकी एक विचित्र विशेषता यह है कि प्रति साढ़े तीन वर्ष में एक बार यह अवश्य फूट पड़ता है। एवं यह क्रम सन् 1832 से बराबर चला आ रहा है। पिछला विस्फोट अप्रैल 1985 में हुआ था।

पृथ्वी अपने गर्भ से लावा ही नहीं निकालती मात्र कम्पन पैदाकर अव्यवस्था ही नहीं फैलाती हमारे हित के लिए गरम पानी के कुण्ड भी अपने अंदर समाये हुए है। तथा फव्वारे भी स्थान स्थान से छोड़ती है, जिन्हें गीजर्स कहते है। सबसे ऊंचा फव्वारा न्यूजीलैण्ड के वायमाँगू क्षेत्र का है जिसे ब्लैक वाटर गीजर कहते हैं। सन् 1904 में यह 1500 फीट ऊंचाई तक भूगर्भ से छूटता रहा किन्तु एक अप्रैल 1917 के बाद से अब तक शाँति हैं, जब इसके अकस्मात फूट पड़ने से 4 व्यक्ति तुरन्त मर गए। वर्तमान में सबसे ऊंचा सक्रिय गीजर अमेरिका के येलोस्टीन नेशनल पार्क म वायमिंग में है। जहाँ 1962 से 1969 तक 5 दिन से 10 माह के अंतर पर यह सतत् 250 से 360 फीट की ऊंचाई तक पहुँचता रहा। इसी पार्क में एक जायण्ट गीजर है जिससे 8,25,000 गैलन पानी फव्वारे द्वारा भूगर्भ से बाहर आया, जो अब तक की सर्वाधिक मात्रा है। सन् 1955 से यह निष्क्रिय है।

यह पृथ्वी यह ब्रह्माण्ड सृष्टि का हर घटक वैभिन्नय एवं विचित्रता लिये हुए है। मनुष्य यदि शोध करना चाहे तो अनन्त विस्तृत क्षेत्र उसे ज्ञानार्जन के लिए खुला पड़ा है। यह मानवी जिज्ञासा ही तो है जो व्यक्ति को सतत् अन्वेषण हेतु प्रेरित करती रहती है। इसी से निकल कर आते हैं

ऐसे विचित्र, विलक्षण निष्कर्ष जो प्रमाणित करते हैं कि यहाँ जो कुछ भी है, अद्भुत है अनुपम है साथ ही इतना विराट् भी कि अचिन्त्य व अगम्य है। जितना कुछ जाना जा सकता है। उसे से भी कई गुणा वह है जो नहीं जाना जा सका ज्ञान की उस परिसीमा को मनुष्य पार कर सकेगा या नहीं, किन्तु ज्ञानार्जन की शोध-अनुसंधान की यह यात्रा सतत् चलती रहेगी, कभी बन्द नहीं होगी। जितने नये आयाम खुलते जायेंगे उतनी ही नयी अविज्ञात विलक्षणताएं और उभर कर आयेंगी। परन्तु मानवी जिज्ञासा कभी विराम नहीं लेगी। यह विश्वास विज्ञानविदों को तो है ही, सृजेता को भी है। तभी तो वह तरह-तरह की लीलाएं रचना, उठापटक मचाता रहता है। एवं मानवी बुद्धि को अविज्ञात की गहराई तक जाने की चुनौती देता रहता है। विचित्र विलक्षण के इस क्रम में कुछ और घटनाक्रमों का विवरण अगले अंक में पढ़ें। (क्रमशः)


Quotation

सुनो सब की पर साथ ही यह परखो की उसमें समझने लायक कितना सार है। करो अपने मन की उस मन की, जिसे भले बुरे की पहचान है।


त्रिविध भव बंधन एवं उनसे मुक्ति

साधना से तात्पर्य है साध लेना सधा लेना। पशु प्रशिक्षक यही करते रहते है। अनगढ़ एवं उच्छृंखल पशुओं को वे एक रीति-नीति सिखाते हैं, उनको अभ्यस्त बनाते और उस स्थिति तक पहुँचाते है जिसमें उस असंस्कृति प्राणी को उपयोगी समझा जा सके। पालने वाला अपने को लाभान्वित हुआ देख सके। सिखाने वाला भी अपने प्रयास की सार्थकता देखते हुए प्रसन्न हो सके।

देखा यह जाता है कि भक्त भगवान को साधता है। उसको मूर्ख समझते हुए उसकी गलतियां निकालता रहता है। तरह तरह के उलाहने देता है। साथ ही गिड़गिड़ाकर नाम रगड़कर खींसे निपोरकर अपना अपना अनुचित उल्लू सीधा करने के लिए जाल जंजाल बुनता है। प्रशंसा के पुल बाँधता हैं छुटपुट भेंट चढ़ाकर उसे फुसलाने का प्रयत्न करता है। समझा जाता है कि सामान्य लोगों से व्यावहारिक जगत में आदान-प्रदान के आधार पर ही लेन-देन चलता है, पर ईश्वर या देवता ऐसे हैं जिन्हें वाणी की वाचालता तथा शारीरिक मानसिक उचक मचक करने भर से वशवर्ती किया जा सकता है। यह दार्शनिक भूल मनुष्य को एक प्रकार से छिपा हुआ नास्तिक बना देती हैं प्रकट नास्तिक वे हैं जो प्रत्यक्षवाद के आधार पर ईश्वर की सत्ता स्पष्ट दृष्टिगोचर न होने पर उसकी मान्यता से इन्कार कर देते है। दूसरे छिपे नास्तिक वे हैं जो उस से पक्षपात की मुफ्त में लम्बी चौड़ी मनोकामनाओं की पूर्ति चाहते रहते है। मनुष्य विधि व्यवस्था को तोड़ता छोड़ता रहता हैं, पर ईश्वर के लिए यह संभव नहीं कि अपनी बनाई कर्मफल व्यवस्था का उल्लंघन करे या दूसरों को ऐसा करने के लिए उत्साहित करें, तथा कथित भक्त लोग ऐसी ही आशाएं किया करते है। अन्ततः उन्हें निराश ही होना पड़ता है। इस निराशा की खीज और थकान से वे या तो साधना-विधान को मिथ्या बताते है या ईश्वर के निष्ठुर होने की मान्यता बनाते हैं कई पाखण्डी कुछ भी हस्तगत न होने पर भी प्रवंचना रचते हैं और नकटा सम्प्रदाय की तरह अपनी सिद्धि सफलता का बखान करते है। आज का आस्तिकवाद इसी विडम्बना में फंसा हुआ है और वह लगभग नास्तिकवाद के स्तर पर जा पहुँचा है।

आवश्यकता है भ्रान्तियों से निकलने और यथार्थता को अपनाने की। इस दिशा में मान्यताओं को अग्रगामी बनाते हुए हमें सोचना होगा कि जीवन साधना ही आध्यात्मिक स्वस्थता ओर बलिष्ठता है। इसी के बदले प्रत्यक्ष जीवन में मरण की प्रतीक्षा किये बिना स्वर्ग मुक्ति और सिद्धि का रसास्वादन करते रहा जा सकता हैं उन लाभों को हस्तगत किया जा सकता है। जिनका उल्लेख विद्या की महत्ता बताते हुए शास्त्रकारों ने विस्तार पूर्वक किया है। सच्चे सन्तों भक्तों का इतिहास भी विद्यमान है। खोजने पर प्रतीत होता हैं कि पूजा पाठ भले ही उनका न्यूनाधिक रहा हैं, पर उनने जीवन साधना के क्षेत्र में परिपूर्ण जागरुकता बरती। इसमें व्यतिक्रम नहीं आने दिया। न आदर्श की अवज्ञा की और न उपेक्षा बरती। भाव संवेदनाओं में श्रद्धा विचार बुद्धि में प्रज्ञा और लोक-व्यवहार में शालीन सद्भावना की निष्ठा अपनाकर कोई भी सच्चे अर्थों में जीवन देवता का सच्चा साधक बन सकता उसका उपहार वरदान भी उसे हाथों हाथ मिलता चला जाता है।

ऋषियों मनीषियों सन्त सुधारकों और वातावरण में ऊर्जा उभार देने वाले महामानवों की अनेकानेक साक्षियां विश्व इतिहास में भरी पड़ी है। इनमें से प्रत्येक को हर कसौटी पर जाँच परख कर देखा जा सकता है कि उनमें से हर एक को अपना व्यक्तित्व उत्कृष्टता की कसौटी पर खरा सिद्ध करना पड़ा हैं इससे कम में किसी को भी न आत्मा की प्राप्ति हो सकी न परमात्मा की न ऐसों को लोक बना न परलोक पूजा को श्रृंगार माना जाता है। स्वास्थ्य वास्तविक सुन्दरता है। ऊपर से स्वस्थ व्यक्ति को वस्त्राभूषणों से प्रसाधन सामग्री से सजाया भी जा सकता है। इसे सोने में सुगन्ध का संयोग बन पड़ा माना जा सकता है जीवन साधना समग्र स्वास्थ्य बनाने जैसी विद्या है। उसके ऊपर पूजा-पाठ का श्रृंगार सजाया जाये तो शोभा और भी अधिक बढ़ेगी इसमें सुरुचि तो है किन्तु यह नहीं माना जाना चाहिए कि मात्र श्रृंगार साधनों के सहारे किसी जीर्ण-जर्जर रुग्ण या मृत शरीर को सुन्दर बना दिया जाये तो प्रयोजन सध सकता है। इससे तो उल्टा उपहास ही बढ़ता है। इसके विपरीत यदि कोई हृष्ट-पुष्ट पहलवान मात्र लंगोट पहन कर अखाड़े में उतरता है तो भी उसकी शोभा बढ़ जाती है ठीक इसी प्रकार जीवन को सुसंस्कृत बना लेने वाले यदि पूजा अर्चा के लिए कम समय निकाल पाते हैं तो भी काम चल जाता है।

अध्यात्म विज्ञान के साधकों को अपने दृष्टिकोण में मौलिक परिवर्तन करना पड़ता है उन्हें सोचना होता है कि मानव जीवन की बहुमूल्य धरोहर का इस प्रकार उपभोग करना है जिससे शरीर निर्वाह लोक व्यवहार भी चलता रहे पर साथ ही आत्मिक अपूर्णता को पूरा करने का चरम लक्ष्य भी प्राप्त हो सके। ईश्वर के दरबार में पहुँचकर सीना तानकर यह कहा जा सके कि जो अमानत जिस प्रयोजन के लिए सौंपी गई थी, उसे उसी हेतु सही रूप में प्रयुक्त किया गया।

इस मार्ग में सबसे बड़ी रुकावटें तीन है। इन्हीं को रावण कुम्भकरण मेघनाद कहा गया है।यही दैवी भागवत के महिषासुर मधुकैटभ रक्तबीज है। यह प्रायः साथ लगे रहते है और पीछा नहीं छोड़ते इन्हीं के कारण मनुष्य पतन ओर पराभव के गर्त में गिरता है। पशु प्रेत और नर-पामर के रूप में इन्हीं के चंगुल में फंसे हुए लोगों को देखा जाता है। ये तीन हैं-लोभ, मोह एवं अहंकार। वासना, तृष्णा और कुत्सा इन्हीं के कारण उत्पन्न होती है।

लोक विजय के लिए सादा जीवन-उच्च विचार का सिद्धान्त अपनाना पड़ता है औसत नागरिक स्तर के निर्वाह में संतोष करना पड़ता है। ईमानदारी ओर परिश्रम की कमाई पर निर्भर रहना पड़ता है। लालची के लिए अनीति अपनाये बिना तृष्णा की पूर्ति कर सकना किसी भी प्रकार संभव नहीं होता जो व्यक्ति विलास में अधिक खर्च करता है, वह प्रकारान्तर से दूसरों को उतना ही अभावग्रस्त रहने के लिए मजबूर करता है।

मोह वस्तुओं से भी होता है और व्यक्तियों से भी। छोटे दायरे में आत्मीयता सीमाबद्ध करना ही मोह है। उसके रहते हृदय की विशालता चरितार्थ ही नहीं होती। अपना शरीर और परिवार ही सब कुछ दिखाई पड़ता है। अपना शरीर और परिवार ही सब कुछ दिखाई पड़ता है। उन्हीं के लिए मरने खपने के कुचक्र में फंसे रहना पड़ता है। आत्मवत् सर्व भूतेषु और वसुधैव कुटुम्बकम के दो आत्मवादी सिद्धान्त है। इनसे एक को भी मोह ग्रस्त कार्यान्वित नहीं कर सकता है इसलिए अपने में सब को और सब में अपने को देखने की दृष्टि विकसित करना जीवन साधना के लिए आवश्यक माना गया है।

परिवार छोटे से छोटा रखा जायें। पूर्ववर्ती अभिभावकों बड़ों और आश्रितों के ऋणों को चुकाने की ही व्यवस्था नहीं बन पाती तो नये अतिथियों का क्यों न्यौत बुलाया जाये? विषमता को देखते हुए अनावश्यक बच्चे उत्पन्न कर परिवार का भार बढ़ाना परले सिरे की भूल है। समान विचारों का साथी सहयोगी मिले तो विवाह करने में हर्ज नहीं पर वह एक दूसरे के सहायता सेवा करते हुए प्रगति पथ पर अग्रसर होने के लिए ही किया जाना चाहिए। जिन्हें संतान की बहुत ललक हो वे निर्धनों के बच्चे पालने के लिए ले सकते है। परिवार को स्वावलम्बी और सुसंस्कारी बनाना पर्याप्त है। औलाद के लिए विपुल सम्पदा उत्तराधिकार में छोड़ मरने की भूत किसी को नहीं करनी चाहिए। मुफ्त का माल किसी को भी हजम नहीं होता। वह दुर्बुद्धि और दुर्गुण ही उत्पन्न करता है। सन्तान पर यह भार लदेगा तो उसका अपकार ही होगा।

पारिवारिक उत्तरदायित्वों को निबाहा जाना चाहिए पर उस कीचड़ में इतनी गहराई तक नहीं फंसना चाहिए कि उबर सकना संभव न हो सके। मोह को भव बंधनों में से प्रमुख माना गया है। उसी संकीर्ण दायरे में जकड़े हुए लोग लोक मंगल का कर्त्तव्य पालन कर ही नहीं पाते। जिन्हें सभी के प्रति पारिवारिकता का भाव अपनाने का अवसर मिलता है उनके लिए हर किस का आत्मीय मानने का सभी की सेवा सहायता करने का आनन्द मिलता है।

अहंकार मोटे अर्थों में घमण्ड समझा जाता हैं अकड़ना उद्धत-अशिष्ट व्यवहार करना क्रोध ग्रस्त रहना अहंकार की निशानी है। पर वस्तुतः वह और भी अधिक सूक्ष्म और व्यापक है। फैशन सजधज श्रृंगार ठाट-बाट अपव्यय सस्ता बड़प्पन आदि अहंकार परिवार के ही सदस्य है। लोग शेखी खोरी के लिए ढेरों समय श्रम और पैसा खर्च करते देखे जाते है। यह भी एक प्रकार का नशा हैं जिसमें अपने को भले ही मजा आता हो पर हर विचारशील को इसमें क्षुद्रता की बचकानेपन की ही गंध आती है। इस विडम्बना के लिए चित्र विचित्र प्रवंचनायें रखनी पड़ती है। ईर्ष्या, द्वेष उत्पन्न करने में भी अहंता की ही प्रमुख भूमिका रहती है। कलह और विग्रह प्रायः उसी कारण उत्पन्न होते हैं। आदमी की विशिष्टता अपनी विनयशीलता दूसरों के सम्मान में निहित है उसी कसौटी पर किसी की सज्जनता परखी जाती है। अहंकारी से उन सद्गुणों में से एक भी नहीं निभा पाता। अहंभाव को आत्मघाती शत्रु माना गया है। ऐसे लोगों से आत्म साधना तो बन ही नहीं पाती। उन पर तो उद्दण्डता व दूसरों को नीचा दिखाने का भूत सदैव चढ़ा रहता है। और दूसरों को गिराने और नीचा दिखाने की ही ललक उठती रहती है। ऐसे लोग अपने प्रशंसा और दूसरों की निंदा करने में ही रहते है। इन परिस्थितियों में आत्मोत्कर्ष और आत्म परिष्कार कैसे बन पड़े?

लोभ, मोह और अहंकार के तीन भार पत्थर जिनने सिर पर लाद रखें है। उनके लिए जीवन साधना की लम्बी और ऊंची मंजिल पर चल सकना चल पड़ना असंभव हो जाता है। भले ही कोई कितना ही पूजा पाठ क्यों न करता हरें जिन्हें तथ्यान्वेषी बनना है उन्हें इन तीन शत्रुओं से अपना पीछा छुड़ाना ही चाहिए।

हल्की वस्तुयें पानी पर तैरती है। किन्तु भारी होने पर वे डूब जाती है। जो लोभ मोह और अहंकार रूपी पत्थर अपनी पीठ पर लादे हुए है उन्हें भवसागर में डूबना ही पड़ेगा जिन्हें तैरना है उन्हें इन तीनों भारों को उतारने का प्रयत्न करना चाहिए।

अनेकानेक दोष-दुर्गुणों कषाय कल्मषों का वर्गीकरण विभाजन करने पर उनकी संख्या हजारों हो सकती है। पर उनके मूल उद्गम यही लोभ मोह और अहंकार है। इन्हीं भवबंधनों से मनुष्य के स्थूल सूक्ष्म और कारण शरीर जकड़े पड़े है। इनका उन्मूलन किए बिना आत्मा को उस स्वतंत्रता का लाभ नहीं मिल सकता जिसे मोक्ष कहते है। इन तीनों पर कड़ी नजर रखी जाये। इन्हें अपना संयुक्त शत्रु माना जाये। इनसे पीछा छुड़ाने के लिए हर दिन नियमित रूप से प्रयास जारी रखा जाये। एकदम तो सब कुछ सही हो जाना कठिन है पर सुधार क्रम में सफलता मिलती ही चलती है और एक दिन ऐसा भी आता है जब इनसे पूरी तरह छुटकारा पाकर बंधन मुक्त हुआ जा सके।


सहिष्णुता से हृदय जीता!

घटना अरब देश के एक सुसम्पन्न परिवार की है। उन दिनों अरब में हजरत मूसा का मूसाई मत बड़े जोरों पर अपना प्रभाव जमाये बैठा था। उन दिनों इस धर्म में अन्ध-विश्वास रूढ़िवादिता और कट्टरता प्रधान रूप से विद्यमान थे।

इस धर्म से पूर्ण प्रभावित और आबद्ध अजमत नाम की एक महिला थी। इनके पति अमीर वास्तव में अमीर थे। खुदा ने उन्हें सब कुछ दे रखा था। किसी भी वस्तु की कमी न थी। अजमत को इस बात का भी बहुत बड़ा घमण्ड था और वह पास-पड़ौस तथा मोहल्ले की स्त्रियों में अपने को नवाबजादी बताया करती थीं। जब भी वह कहीं जाती दूसरी स्त्रियों को उपेक्षा भरी नजरों से देखती और बात-चीत तथा व्यवहार में भी अभिमान एवं अहंकार टपका करता था।

अजमत के घर के बगल से जो रास्ता जाता था उसी से इस्लाम धर्म के प्रवर्तक मोहम्मद साहब नित्य ही प्रातः साँय वायु सेवन के लिये निकला करते थे। अपने मत को वह सही मानती थी और इस्लाम की निन्दा किया करती थी। मोहम्मद साहब से भी इसे चिढ़ थी। अजमत को ऐसी शरारत सूझी कि वह अपने घर का कूड़ा-कचरा एक टोकरी में इकट्ठा कर लेती और उनकी प्रतीक्षा में बैठी रहती थी। ज्योंही वे उस मार्ग से निकलते त्योंही उनके ऊपर निःसंकोच भाव से फेंक देती। ऐसा लगता था मानों वह उन्हें कूड़ा-करकट का घेरा समझती हो।

यही नित्य का क्रम चल पड़ा था देखने वाले राहगीर और आस पड़ौस के लोग भी हैरत करते थे। सहिष्णुता और दुष्टता दोनों में जोरों की होड़ लगी हुई थी देखें कौन बाजी मार ले जाता है? अन्त में अजमत को हार माननी पड़ी। आत्म-ग्लानि से उसका पराजित दिल बेतरह घायल हो गया और अपने कुकृत्यों पर स्वयं पश्चाताप करने लगी। इसी अफसोस में वह बीमार पड़ गई और चारपाई पकड़ ली।

डस दिन मोहम्मद साहब शान्त भाव से आगे निकल गये और कूड़ा कचरा उन पर न पड़ा इसी तरह दूसरा तीसरा और चौथा दिन भी व्यतीत हो गया जब अजमत बिलकुल ही दिखाई न दी अन्त में मोहम्मद साहब ने पास के एक पड़ौस से पूछा भाई! कई दिनों से बहन अजमत दिखाई नहीं दे रही है पड़ौस मुस्कराते हुए बोला कूड़े-कचरे का मोह सिर बरसते हुए अधिक आनन्द आता है क्या? हंसते हुए मोहम्मद साहब ने कहा हाँ भाई! बहन की इन सेवाओं को भी मुझे स्वीकार ही करना पड़ता है। इसलिये तो मुझे इतनी बेचैनी है। आगे पड़ौसी के द्वारा मालूम हुआ की वह कई दिनों से बीमार है।

अजमत की बीमारी का समाचार सुनते ही हजरत साहब का चेहरा उदास हो गया मानो उनका कोई परम स्नेही संबंधी बीमार पड़ गया हो तुरन्त ही वे परिचारिका से आज्ञा लेकर वहाँ पहुँचे जहाँ अजमत बिस्तर पर लेटी पड़ी हुई थी। उसे इस अवस्था में देखते ही हजरत का हृदय करुणा से भर आया और बोले बहन अजमत तुम्हारी यह क्या दशा हो गई? तबियत कैसी है? उन्हें देखते ही अजमत की आंखें शर्म से नीचे गड़ गई। अन्तःकरण अपने कुकृत्यों पर पश्चाताप करके नीचे दबा जा रहा था। आखिर वह बोली क्या? उसके आँखों के सामने तो वे सब दृश्य नाच रहे थे, जो उनके साथ व्यवहृत किये थे। हजरत उसकी कठिनाइयों और उलझनों को समझ रहे थे।

उन्होंने अधिक वार्तालाप की आवश्यकता न समझी और तुरन्त चिकित्सा व्यवस्था में लग गये। अच्छे चिकित्सक को दिखाकर लाना दवादारु तथा परिचर्या की व्यवस्था करना मोहम्मद साहब का दैनिक कार्य बन गया और वह तब तक चलता रहा जब तक कि अजमत पूर्ण स्वस्थ न हो गई।


मानवी गरिमा से जुड़ी सभ्यता-सुसंस्कारिता

सृष्टा ने प्राणि में मनुष्य को अनेक विशेषताओं से युक्त बनाया है। उसका शरीर और मस्तिष्क विचित्र है। खड़े होकर चलना, वाणी की अभिव्यक्ति, संगीत से लेकर वैज्ञानिक अनुसंधानों और भावनात्मक सम्बन्धों तक अनेक विशेषताएँ एवं विभूतियाँ उसके साथ जुड़ी हुई है। परन्तु विभूतियाँ रहती है प्रसुप्त स्थिति में। उन्हें प्रयत्न पूर्वक जाग्रत करना और अभ्यास-स्वभाव में शामिल करना पड़ता है, अन्यथा वे कोयले की खदान में दबे हुए हीरे की तरह अनजान ही पड़ी रहती है।

मनुष्य का सबसे बड़ा सौभाग्य और कौशल यही है कि मानवी गरिमा के साथ जुड़ी हुई विशिष्टताओं को समझे अपनाये और उनके आधार पर समर्थ, समृद्ध और सुसंस्कारी बनने को श्रेय प्राप्त करे। ऐसे ढेरों उदाहरण मिल जाते हैं जहाँ परिस्थितियों का रोना रोते हुए प्रगति से वंचित रहा गया। इसके विपरीत ऐसों के भी असंख्य उदाहरण मिल जाते है, जिन्होंने परिस्थितियों की घोर प्रतिकूलता के रहते अपने सद्गुणों के आधार पर आगे बढ़ने, ऊँचे उठने के कीर्तिमान स्थापित किए।

प्रगति की आकाँक्षा सभी को है। सफलताएँ हर कोई चाहता है। महत्वाकाँक्षाएँ सभी के मनों में उठती हैं, परन्तु उनकी आँशिक पूर्ति ही अधिकाँश में हो पाती है। तमाम लोगों तो उससे वंचित ही रह जाते है। यों इस सम्बन्ध में साधनों के अभाव, सहयोग न जुट पाना, परिस्थितियों का प्रतिकूल रहना ही प्रधान कारण बतलाए जाते है। परन्तु वस्तु स्थिति ऐसी नहीं है। यदि ऐसा रहा होता तो साधन सम्पन्न लोग ही सराहनीय सफलताएँ पाया करते, निर्धनों में से किसी को भी महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ नहीं मिलती है। परन्तु देखा कुछ और ही गया है। संपन्नता और सुविधा वाले दुर्व्यसनों में फँसते, आलस्य प्रमाद का परिचय देते और कुसंगों-दुर्गुणों में ग्रस्त होते देखे जाते हैं। फलस्वरूप वे संचित को गँवा देते हैं, और अप्रत्याशित कठिनाइयों में फँसकर दुर्गति के शिकार होते है।

साधनों और परिस्थितियों की प्रत्यक्ष उपयोगिता तो किसी सीमा तक है भी, परन्तु गहरी दृष्टि डालने पर वस्तुस्थिति दूसरी ही दिखती है। मनुष्य के अपने गुण-कर्म-स्वभाव की श्रेष्ठता और निकृष्टता से ही प्रगति अवगति के आधार पर बनते हैं। वही अनुकूलता को अपव्यय के आधार पर दुर्गति का निमित्त कारण बना देते हैं और वही प्रतिकूलता को अनुकूलता में बदल देते है। इसलिए विचारशील सदा इसी बात पर जोर देते रहते हैं कि मनुष्य का व्यक्तित्व प्रामाणिक, प्रखर और प्रतिभावान बनाने के लिए, एड़ी चोटी का जोर लगाया जाय। यह सब बन पड़ने पर व्यक्ति ऐसा जीवन चुम्बक बन जाता है जो प्रगतिशील के तत्वों को खींचकर घसीटकर उसे प्रचुर मात्रा में अपने भण्डार में भर सके।

दार्शनिकों, धर्म धुरंधरों ने सद्गुणों की गणना अपने-अपने ढंग से की है और उनके प्रतिफल भी अपने-अपने ढंग से समझाये हैं। व्रत, अनुष्ठान, दान, तप, भक्ति, ध्यान जप आदि के महत्व की बढ़ी चढ़ी चर्चायें होती है। उनके प्रतिफल स्वर्ग मुक्ति स्तर के बताये जाते है। ईश्वर दर्शन, ब्रह्म निर्वाण ऋद्धि सिद्धियों के आकर्षण के पीछे यही उद्देश्य रहता है, किन्तु मनुष्य इन्हें ध्यान में रखते हुए सद्गुणी बने। सभी तत्वदर्शियों ने सद्गुणों की सम्पदा संचित करके ही आत्मिक प्रगति का शुभारंभ करने के लिए कहा है। योगाभ्यास में यम नियमों को प्राथमिकता दी गई है। वे और कुछ नहीं, शारीरिक एवं मानसिक, सदाशयता के प्रकार है। धर्म के दस लक्षण ‘मनु’ द्वारा प्रतिपादित किए गए है। इन सभी में सद्गुणों पर ही जोर दिया गया है।

इतना सब होते हुए भी एक प्रश्न बना ही रहता है कि उनका प्रारम्भ किस क्रम से किस प्रकार किया जाय? इसके बिना बात बनती नहीं, क्रम बद्धता का तारतम्य बैठता नहीं। शिक्षा के सर्वांगीण स्वरूप के अंतर्गत शिक्षार्थी को उच्च कक्षाओं में साहित्य, इतिहास, भूगोल, विज्ञान आदि अनेक विषय पढ़ने पड़ते है; किन्तु इन सबसे पहले वर्णमाला का, अक्षरों, मात्राओं का, गिनती पहाड़ों का ज्ञान तो चाहिए ही। ऐसा कोई “शार्टकट” नहीं है जिसके आधार पर इस प्राथमिक शिक्षा की उपेक्षा करके सीधे हाईस्कूल, कालेज आदि में दाखिला लिया जा सके। ऐसा प्रयास कोई अति उत्साही कर रहा हो तो समझ लेना चाहिए कि उसका समय परिश्रम और उत्साह सभी व्यर्थ जाने वाले है।

विकास क्रमशः ही संभव है। बीज अंकुर बनाता है। पौधे पेड़ बनता है और फल फूलों से लद जाता है। यह सब परिणति बीज बोने की ही है। आध्यात्मिक और भौतिक उभयपक्षीय प्रगतियों की बीज तत्व है-सभ्यता। यह बहिरंग है। समयानुसार जब यह अंतरंग क्षेत्र में प्रवेश करती है तो ‘सुसंस्कारिता कहलाती है। सिद्धान्त रूप से तो यह भी कहा जाता है कि संस्कारिता को हृदयंगम करने के उपरान्त सभ्यता की रीति-नीति भी व्यवहार में मिलने लगती है। परन्तु प्रत्यक्ष अनुभव यह बतलाया है कि जन सामान्य में, संस्कारिता के प्रति उमंग पैदा करने के लिए सभ्यता के बहिरंग सूत्रों को ही माध्यम बनाना पड़ता है। अध्यात्म का एक मात्र उद्देश्य, चेतना को उत्कृष्टता अपनाने के लिए प्रशिक्षित करना है।

अन्तरंग जीवन में दूरदर्शी विवेकशीलता उचित-अनुचित का निर्धारण आदर्शों की पक्षधर भाव संवेदनाएँ जाग्रत करती पड़ती है। देवत्व इन्हीं के सहारे उभरता है। दिव्य अनुदान के बरसने का सुयोग इसी आधार पर हस्तगत होता है। इसे सुसंस्कारिता या मानवी संस्कृति कहते है। मनुष्य में पाया जाने वाला देवत्व इस पृष्ठभूमि पर उगता और विकसित होता है। चेतनात्मक विकास परिकर का मूल्यांकन इन्हीं मानवों से आँका-नापा जाता है।

दूसरा पक्ष है सभ्यता। यह प्रत्यक्ष एवं दृश्यमान है। शारीरिक गतिविधियाँ एवं पारस्परिक व्यवहार के आधार पर इसकी जानकारी मिलती है। यह आरम्भिक हैं। क्रिया से चेतना विकसित होती है। इसी से संयम जैसे अध्यात्म निर्धारण में व्रत-उपवास जैसे क्रिया कलापों को अभ्यास में उतारा जाता है। सभ्यता का अनुसरण करते-करते संस्कृति के भावनात्मक उच्च स्तर तक पहुँचा जाता है।

चिन्तन और चरित्र अन्तःकरण की सुसंस्कारिता के आधार पर विकसित होता है। नीति-धर्म, पुण्य परमार्थ उसी गहन अन्तराल पर निर्भर है। किन्तु तीसरी धारा व्यवहार है। उसे संपर्क में रहने वालों से शिक्षण अनुकरण द्वारा सीखा जाता है। उसमें आदर्शों का गहन पुट तो रहता है, परन्तु सीखते समय अल्प विकसित लोग अथवा बालक उसे तत्व ज्ञान को उतनी अच्छी तरह से समझ नहीं पाते। केवल अनुकरण अभ्यास से ही उसे सीखते रहते है। सोने उठने, खाने पीने आदि का अभ्यास भी इसी प्रकार होता है। साँचे में खिलौने ढलते है और वातावरण के प्रभाव से उस क्षेत्र में रहने वाले अपना स्वभाव उस तरह का बना लेते है। यह धीरे-धीरे विकसित होता चलता है। यह अभ्यास क्रम, मानवी गरिमा के अनुरूप होने पर शिष्टाचार और प्रतिकूल अनगढ़ होने पर अनाचार कहा जाता है।

शिष्टाचार से कुछ ऊँची स्थिति है सदाचार। उसमें नीति मर्यादा एवं मानवी गरिमा के अनुरूप चिन्तन चरित्र और व्यवहार का ऐसा पुट रहता है जिसके लिए बार-बार सीखने समझने और सुधारने की आवश्यकता नहीं पड़ती। वह स्वभाव का अंग बन जाता है और क्रिया कलापों में अनायास ही सम्मिलित रहता है। शालीनता इसी को कहा जाता है। सज्जनता यही है। व्यक्ति इसी आधार पर भीतर से सन्तुष्ट प्रफुल्लता रहता है और बाहर से उसे श्रेय, सम्मान, सहयोग मिलते रहने का उपक्रम सहज ही बनता रहता है।

मनुष्य के साथ जुड़ी विशिष्टता परक रीति नीति शिष्टाचार है। इसे अन्य प्राणी नहीं जानते, परन्तु मनुष्य को इस आरंभिक में ही सीख लेना पड़ता है। जब तक शिशु शारीरिक दृष्टि से अविकसित विवश है, तभी तक उसे छुट रहती है कि मल मूत्र का विसर्जन चाहे जहाँ करे। जैसे ही उन्हें थोड़ा-थोड़ा बोध होता है, शरीर सक्षम होता है, वैसे ही वे यथासम्भव शिष्टाचार अपनाने लगते है। पहले बड़े लोग उन्हें सिखाते समझाते हैं, फिर उसे अनुशासन का पालन वे स्वेच्छा पूर्वक करने लगते है। भूल होने पर जो नाराजगी सहनी पड़ती है। उसके कारण भूलों का सुधार होता रहता है। छोटों के साथ, बड़ों के साथ, अपनों और परायों के साथ उन्हें कैसा व्यवहार करना चाहिए, यह अपने अनुभव, अपनी सूझ-बूझ से भी सीखना पड़ता है, और अभिभावक भी सिखाते रहते है।

यह शिक्षण यदि उपयुक्त स्तर का हुआ तो बालक में सभ्यता के लक्षण उभरते हैं और श्रेय सम्मान, स्नेह सहयोग दिलाकर उत्साहित करते रहते हैं। यह प्रयास यदि सही दिशा में चलता रहे तो वयस्क होने पर वह सज्जनों की पंक्ति में गिना जाने लगता है। उसे समुचित आदर मिलने लगता है और उसकी सामर्थ्य के अनुरूप उत्तरादयित्व बेहिचक सौंपे जाते है। स्वयं को भी यह आत्मविश्वास होने लगता है। उत्साह और साहस इसी आधार पर परिपक्व होते है। व्यक्ति अपनी गरिमा का प्रामाणिक परिचय देते हुए मूर्धन्य स्तर का पहुँचने योग्य बन जाता है। यदि इस प्रक्रिया में गड़बड़ी हुई तो व्यक्ति ढीठ, उद्दण्ड, कटुभाषी, अशिष्ट स्तर का परिचय देने लगता है। अवाँछनीय, प्रमाद और असभ्यों जैसे हेय आदतों का पिटारा बन उसे साथियों की उपेक्षा और भर्त्सना ही नहीं, प्रताड़ना भी सहनी पड़ती है। अपना अनाचार उलटकर अपने ही ऊपर आक्रमण करता है और उस दुर्गति से अपना मन खिन्न और उद्विग्न रहने लगता है। मन को बहलाने के लिए इस विसंगति का दोषारोपण दूसरों पर करने का .... किया जाता है। यह अनगढ़ स्थिति ऐसी है। जो किसी को भी गहरा सम्मान, सहयोग और विश्वास प्राप्त नहीं करने देती।

व्यवहार को देखकर किसी के चरित्र का अनुमान लगाया जाता है। चरित्र का पर्यवेक्षण करने पर उसी आस्थाओं, विचारणाओं, भावनाओं और आकाँक्षाओं का परिचय मिलता है। यों उच्चस्तरीय विश्लेषण में चिन्तन को प्रधान, चरित्रों का उसका परिपाक और व्यवहार को उसकी अभिव्यक्ति माना जाता है। यह अपने ढंग का विश्लेषण है। परन्तु यह निश्चित है कि व्यवहार ही किसी की आरंभिक पहचान कराता है। चरित्र और चिन्तन की जानकारी प्राप्त करने में तो बहुत देर लगती है और गहरी खोज बीन की आवश्यकता पड़ती है। व्यवहार पहली दृष्टि में ही सामने आ जाता है। दुकान में क्या समान रखा है, इसकी जाँच पड़ताल समय साध्य है। परन्तु साइनबोर्ड देखकर रास्ता चलता व्यक्ति भी समझ जाता है कि यहाँ क्या रखा और बेचा जाता है? जिसके पास संपर्क साधने का पर्याप्त समय नहीं है, ऐसे अधिकाँश लोग किसी व्यक्ति के बारे में लगे हुए अनुमान, उसके व्यवहार की थोड़ी भी गतिविधियों को देखकर लगाते है। इस प्रथम मूल्यांकन के आधार पर अगले मूल्यांकन होते है। सम्मान तिरस्कार, विश्वास अविश्वास का मन इसी आधार पर बनता है।

कहना न होगा स्वाभाविक, सामान्य अभ्यास में शामिल व्यवहार किसी को बहुत त्रुटिपूर्ण नहीं लगते। अभ्यास में आ जाने के बाद उनकी समीक्षा करने की जरूरत भी समझ में नहीं आती। ऐसे में सुधार तो बन ही कैसे पड़े? इसी कमजोरी के कारण अधिकाँश मनुष्य शिष्टाचार के अनभ्यस्त, अनगढ़ गये गुजारे और असभ्य स्तर के बने रहते हैं। उसमें किसी को तात्कालिक लाभ भले ही दिखे पर यह निश्चित है कि अशिष्ट व्यक्ति दूसरों की उपेक्षा अपना अहित स्वयं ही अधिक कर लेता है। इसी कारण शिष्टाचार की महत्ता सर्वाधिक बतायी गयी है एवं कहा गया है कि ‘मानव की अनगढ़ता के मिटने एवं सुगढ़ता के विकसित होने दिशा में यह पहला एवं महत्वपूर्ण कदम है।


मिथ्या प्रदर्शन-संकट को आमंत्रण

राजहंस कपिष्ठल, इन्दुजात, श्वेतपुच्छ उद्रक और विनता पाँचों ने मन्त्रणा की ओर फिर निकल पड़ प्रवास पर। सुदूर देशों का प्रवास राजहंस प्रति वर्ष किया करते और कठोर शीत के चतुर्मास समाप्त होते ही मानसरोवर आ जाते। इस प्रवास में जहाँ देश-दुनिया के रंग-बिरंगे दृश्य दीखते वहाँ संसार के विभिन्न लोगों से भेंट और उनकी परिस्थितियों के अध्ययन द्वारा एक विवेकपूर्ण दृष्टिकोण अपनाने भी उन्हें मदद मिलती।

अनेक देश और भूखण्ड पार करते हुये राजहंसों की टोली समुद्र तट पर रुकी। कोर्णक राजवंश के प्रसिद्ध उद्यान यही पर थे वहाँ का माली इन राजहंसों का प्रति वर्ष आतिथ्य करता। राजहंस प्रत्युपकार वश माली को प्रति वर्ष एक उपदेश दिया करते। इस बार भी माली ने अध्यागातों को सुन्दर मीठे फलों से ब्रह्मभोज कराया। टोली नायक कपिष्ठल ने मानी को उपदेश दिया और कहा-तात! जो व्यक्ति अपनी शक्ति और साधनों की मर्यादा में रहता है वह स्वल्प साधनों में भी अपनी जीवन हँसी-खुशी में बिता लेता है किन्तु अपनी शक्ति से अधिक का मिथ्या प्रदर्शन करते वाले न केवल संकट में पड़ते है अपितु उपहास और निन्दा के पात्र भी बनते हैं।

माली राजहंस की विद्रूपता से बहुत प्रभावित हुआ। मार्ग के लिये भी कुछ देने लगा तो राजहंसों ने मना किया कहा-तात! संचय पाप है यह खाद्य तुम ले जाओ दुनिया में और बहुत से लोग अभाव ग्रस्त है उन्हें दे दो। सामर्थ्यवान लोग अपनी आवश्यकतायें आप पूरी कर लेते हैं, कुछ भी मिले, कहीं से भी मिलें उदरस्थ कर लेने की काकवृत्ति घटिया लोगों का काम है।”

कपिष्ट के यह शब्द वटवृक्ष पर बैठे कौवे “उपद्रवी” ने सुन लिये। पंख फुलाता हुआ “उपद्रवी” सुन लिये। पंख फुलाता हुआ उपद्रवी राजहंसों की टोली के पास जाकर भला बुरा कहने लगा और बोला-राजहंसों! तुम लोग यदि श्रेष्ठता का अभियान करते हो तो चलो न हमारी तुम्हारी प्रतिद्वन्द्विता हो जाये। यह देखो विशाल समुद्र दूर तक फैला है चलो न देख ले किसके पास शक्ति है इसे पार करने की। अभी पता चल जायेगा कि तुम लोग समर्थ हो अथवा मैं।

राजहंस हंसे और बोल-तात! हम लोग किसी से प्रतिद्वन्द्विता नहीं करते, आप भी न किया करें, परमात्मा ने एक से एक बढ़कर क्षमतावान् प्राणी रचे हैं फिर काई अपनी शक्ति का गर्व क्यों करें। यह कहकर राजहंसों की टोली ने उछाल भरी और फिर अपनी यात्रा पर चल पड़े। किन्तु उपद्रवी कौवा उन्हें यों छोड़ने वाला नहीं था-अहंकार की सहजात है “अशाँति” सो कौवा कैसे शान्त हो जाता वह भी राजहंसों की बलत में उड़ चला और थोड़ा तेजी दिखाकर आगे हो गया। आगे-आगे काक पीछे अपनी सज स्वाभाविक गति में हंस कौवा बीच-बीच में कोई न कोई व्यंग मारता जाता ओर कहता-”थक जाओ तो बता देना-हम तो केवल तुम्हें अपनी शक्ति दिखाना चाहते हैं, मारना नहीं चाहते।” राजहंस बिना कोई उत्तर दिये समुद्र के ऊपर धीर-गंभीर उड़ते चले जा रहे थे।

अभी कुछ ही देर उड़े हुये हुई थी कि बकवादी कौवे का शरीर थक गया, पंख ढीले पड़ गये यों लगा कि अब गिरा तब गिरा, किन्तु हेकड़ी उसकी अभी तक भी जाती न थी। कौवा अब एक क्षण में समुद्र में गिरने ही वाला था। अपने ही कृत्य पर उसकी आँखें डबडबा आई। यह देख राजहंसों को दया आ गई उन्होंने कौवे को अपनी पीठ पर बिठाया, फिर पीछे लौटे और कौवे को वहाँ पर पहुँचा दिया जहाँ वह रहता था। अभी तक उसका दम फूल रहा था कपिष्ठल बोले-”तात! आगे कभी अपनी शक्ति से बढ़कर प्रदर्शन मत करना अन्यथा मारे जाओगे”-यह कहकर टोली फिर अपने प्रवास चल पड़ी।


भाव संवेदनाओं की गंगोत्री सूखने न पाए

मनुष्य का सम्पूर्ण जीवन भावनाओं संवेदनाओं से संचालित होता है। दुख और आनन्द घृणा और प्रेम, क्रोध और सहिष्णुता, कृपणता और उदारता सन्देह और विश्वास आदि भावनायें अन्तःकरण से उपजती है तथा मन मस्तिष्क को प्रभावित कर मनुष्य की विभिन्न गतिविधियों को संचालित प्रेरित करती है। भावनाओं के क्रीड़ा केन्द्र को ही अन्तःकरण कहा जाता है। इन भावनाओं का मानव जीवन पर उसके शारीरिक स्वास्थ्य एवं मानसिक स्थिति पर क्या प्रभाव पड़ता है मनोविज्ञानियों एवं मनःचिकित्सकों ने इस पर गहन अनुसंधान किया है और पाया है कि विचारणा एवं भावना क्षेत्र की विकृतियाँ अनेकानेक बीमारियों का जन्म देती है, मनोविज्ञान की भाषा में जिन्हें “साइकोसोमेटिक” या “साइकोजैनिक” व्याधियाँ कहा जाता है। भावनाओं का विवेकयुक्त सुनियोजन ही शारीरिक मानसिक स्वास्थ्य एवं आत्मिक प्रगति का मूलाधार है।

मानव मन किसी न किसी कल्पना की उधेड़बुन में सतत् लगा रहता है। विचारों की भावनाओं की असंख्यों तरंगों जीवन में ज्वार भाटे की तरह उठती दबती रहती है और शरीर तथा मन स्थिति को प्रभावित करती है। इनके प्रभाव को मुख्य रूप से दो भागों में समझा जा सकता है। पहले प्रकार की भावनायें वे है जिनके कारण शरीर के विभिन्न अतिरिक्त रूप से उत्तेजित हो उठते हैं तथा दुख, संक्षोभ से लेकर तनाव, उद्वेग जैसे विकार उत्पन्न होने लगते हैं। इस श्रेणी की भावनाओं को क्रोध, चिन्ता, भय, शोक, ईर्ष्या, द्वेष आदि को रखा जा सकता है। दूसरी श्रेणी में उन भावनाओं को रखा जा सकता है जिनका प्रभाव मनःसंस्थान पर अच्छा व अनुकूल पड़ता है। इसमें आशा, उत्साह, विश्वास, प्रेम, साहस, प्रफुल्लता आदि भावनाओं को रखा जा सकता है।

पहले प्रकार की भावनायें शरीर में रोग और मन में तनाव अथवा अवसाद के लक्षण पैदा कर देती है। जबकि वास्तव में शरीर में रोग का कोई कारण नहीं होता। लम्बे समय तक अध्ययन, परीक्षण करने के पश्चात मनःशास्त्री एवं जीव विज्ञानी इस निष्कर्ष पर पहुँचें है कि वे स्नायु तथा नलिया विहीन ग्रंथियों द्वारा शरीर को प्रभावित करती है। हमारे शरीर में ऐच्छिक तथा अनैच्छिक दो तरह के स्नायु मंडल तंत्रिका तंत्र होते है जिनके द्वारा समस्त शारीरिक क्रिया कलापों का संचालन होता है। ऐच्छिक स्नायु तंत्र (तंत्रिका तंत्र) से हम अपनी इच्छानुसार काम लेते है जैसे उठना-बैठना, चलना-फिरना, किसी चीज को पकड़ना आदि। अनैच्छिक स्नायु तंत्र पर हमारा कोई नियंत्रण नहीं होता। हृदय की धड़कन, फेफड़ों द्वारा श्वसन, पाचन, संवेदन, गुर्दे की क्रिया आदि कार्य अनैच्छिक स्नायुओं द्वारा ही सम्पादित होते है। भावनाओं का प्रभाव इन्हीं स्नायुओं पर होता है। भाव चिन्तन में विकृत आने पर आटोनामिक तंत्रिका-तंत्र की क्रिया प्रणाली गड़बड़ा जाती है और तनाव, उद्वेग, बेचैनी, सिर दर्द जैसी कितनी ही बीमारियाँ मनुष्य को धर दबोचती है। अनेकों बीमारियों का उदय भावनात्मक असंतुलन के कारण ही होता है। इन्हीं की ऋषि चरक ने प्रज्ञापराध की श्रेणी में माना है।

प्रख्यात मनःचिकित्सक डब्ल्यू.बी. कैनन ने अपनी कृति “बाडिली चेन्जेज इन पेन हंगर, फियर एण्ड रेज” में कहा है कि असंतुलित भावनायें अव्यवस्थित कल्पनायें कायिक प्रणाली पर घातक प्रभाव डालती है। विचारणा एवं भावना का उत्कृष्ट-निकृष्ट जैसा भी स्तर होगा स्वास्थ्य भी तदनुरूप ही होगा। उनका कहना है कि उत्तम भावनाओं रोग निवारण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। भावनात्मक उतार-चढ़ाव की स्थिति में व्यक्ति के स्नायु मण्डल-तंत्रिकातंत्र की विद्युतीय सक्रियता में भारी परिवर्तन होता है जिसे ई.ई.जी. जैसे यंत्रों के माध्यम से भी आँशिक रूप से देखा जा सकता है। मूलतः इसका प्रभाव अंतःस्रावी ग्रंथियों, एन्जाइम, उत्पादक घटकों एवं सूक्ष्म जीवाणुओं के क्रिया-कलापों पर पड़ता है।

इस संदर्भ में सुप्रसिद्ध मनःचिकित्सक एच.एफत्र डनबार ने गहन अनुसंधान किया है। उन्होंने अपनी पुस्तक “इमोशन्स एण्ड बाडिली चेन्जेज” में बताया है कि जिनके अन्तःकरण में सदैव सद्भावनायें ही हिलोरें मारती रहती है तथा मन-मस्तिष्क से सद्विचारणायें ही फूलती रहती है, जिनका मन सदैव प्रसन्नता-प्रफुल्लता से भरा रहता है, उनका शरीर स्वस्थ रहता है, चेहरे पर दीप्ति छाई रहती है। ऐसे व्यक्तियों की आँखों की चमक एवं चेहरे की प्रदीप्ति-आभा उनकी प्रचण्ड जीवनी शक्ति का प्रमाण स्वयं उपस्थित कर देती है। इसके विपरीत क्रोधोन्माद, आवेश आदि मनोविकार शरीर को विषैले रासायनिक पदार्थों से भर देते है जिससे कोशिकाएँ एवं ऊतक समूह सूखने लगते हैं और त्वचा का रंग बदल जाता है। वह शुष्क पड़ जाती है। विकृत भावनाओं से हृदय स्पन्दन की गति तीव्र हो जाती है, ऊर्जा का अनावश्यक क्षरण आरंभ हो जाता है जिससे इच्छाशक्ति बुझ जाती है और मनोबल को लकवा मार जाता है। इस तरह की भावनाएँ शरीर पर भले-बुरे दोनों तरक के असर डालती हैं। महान दार्शनिक अरस्तू ने कहा भी है-”भावनाओं का काया पर उसी प्रकार आधिपत्य रहता है जिस तरह स्वामी का गुलाम पर, मालिक का नौकर पर।”

मूर्धन्य मनःशास्त्री एवं लेखक बेंजामिन वाकर ने अपनी पुस्तक “एनसाइक्लोपिडिरु ऑफ एसोटेरिक मैन” में कहा है कि मानवी काया की व्याख्या मात्र उसके भौतिक रासायनिक विश्लेषण या फिजियोलॉजी के आधार पर नहीं की जा सकती। वस्तुतः उसमें सन्निहित विचारणा भावना, आस्था ही वह मूलभूत तत्व है जो समस्त शारीरिक क्रिया कलापोँ उससे क्रिया-व्यवहारों को दिशा देते, प्रेरित उत्तेजित करते रहते है। मन में उठी तीव्र भावना शरीर के स्नायु एवं हार्मोन प्रणाली को प्रभावित करती है। ब्रिटिश मनोचिकित्सा विज्ञानी ए.ओ. लुडविग के अनुसार मन में उठने वाली विभिन्न भावतरंगें शारीरिक प्रक्रिया के प्रभावित करती है। उनका कहना है कि भावनाओं की शरीर पर क्या प्रतिक्रिया होती है? इन तथ्यों पर ध्यान देने से यह सहज ही समझा जा सकता है कि क्रोध के कारण व्यक्ति तनावग्रस्त हो जाता है, रक्तचाप बढ़ जाता है। शरीर से पसीना निकलने लगता है और वह पीला पड़ जाता है। इसी तरह कभी-कभी भय के कारण पेशाब छुट जाना, हृदय गति बढ़ जाना, चेहरे का पीला पड़ना, घबराहट से पसीना छूटना, चिन्ता के कारण भूख न लगना, गुस्से में नींद न आना और लज्जा के मारे लाल हो जाना, चेहरा झुका लेना आदि स्थितियाँ दर्शाती हैं कि भावनाओं का प्रभाव मनुष्य शरीर के रक्त-प्रवाह और अंदरूनी हलचलों पर अनिवार्य रूप से पड़ता है। इसकी पुष्टि प्रसिद्ध मनोविज्ञानवेत्ता ए.सिमन ने भी की हैं अपनी पुस्तक “द फिजियोलॉजी ऑफ इमोशन्स” में उन्होंने कहा है कि साधारण-सा भावात्मक उतार चढ़ाव भी शरीर की फिजियोलॉजी का परिवर्तित कर देता है। वैज्ञानिक अनुसंधानों से भी इसकी पुष्टि हो गई है।

मनोकायिक चिकित्सा साइकोसोमेटिक मेडिसिन के जन्मदाता प्रख्यात मनोविज्ञानी जार्ज ग्रोडेक गहन अध्ययन के पश्चात् इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि शारीरिक रोगों की जड़े मन में होती हैं। उनका कथन है कि चिंतन एवं भावना क्षेत्र की विकृति ही रोगों का प्रमुख कारण है। तनाव, उन्माद जैसे मनोविकार एवं उच्च रक्तचाप, इरीटेबल, बाँवेल, कोलाइटिस, त्वचारोग, दमा, यहाँ तक कि कैंसर भी विकृत भावनाओं की ही देन है। सिर दर्द, आधा शीशी का रोग भावनात्मक उत्पादन माने गये हैं। मूर्धन्य चिकित्साविज्ञानी वोल्फ हैराल्ड ने अपनी कृति “स्टे्रट एण्ड डिसीज, में इसका प्रमुख कारण कामुकता, विद्वेष, अप्रसन्नता, कुढ़न आदि की हीन भावनाओं को बताया है। उनके अनुसार हृदय की बीमारियों, उच्च रक्तचाप आदि अनेकों कारण है, पर इस कोमल एवं संवेदनशील अंग पर सबसे अधिक गहरा प्रभाव भावनाओं का पड़ता है। क्रोध, तनाव, चिन्ता आदि के भाव यदि लम्बे समय तक मस्तिष्क पर छाये रहे तो इससे हृदय को भारी क्षति झेलनी पड़ती है। श्वसन तंत्र एवं पाचन तंत्र की अनेक बीमारियों के पीछे भाव-विकृतियाँ ही काम करती हैं।

प्रसिद्ध मन-चिकित्सक डेनियल हैक टूके ने अपनी पुस्तक “एन्फ्लुएन्स ऑफ दी मान्इड अपाँन दी बाडी” के दूसरे खण्ड में कहा है कि विकृत भाव चिंतन के कारण व्यक्ति अनैतिक आचरण अपनाता और पाप कर्म करता है। परिणाम स्वरूप अनेकानेक मनोकायिक बीमारियाँ उसे धर दबोचती है। पाप कर्मों को छिपाने से एक्जिमा, दमा, माइग्रेन, जैसे रोग फूट कर व्यक्ति की मनोदशा का परिचय स्वयमेव दे देते हैं। सोरियेसि रोग भी इसी की देन है। “साइको सोमैटिक मेडिसिन” नामक अपनी कृति में मनोचिकित्सक द्वय ई.वीस एवं ओ.एस इंग्लिस ने भी कहा है कि मानसिक एवं भावनात्मक विकृतियों का दबाव किसी भी रोग के रूप में फूट सकता है। वैज्ञानिक भी अब मानने लगे हैं कि कैन्सर एवं क्षय जैसी घातक बीमारियों का कारण मानसिक भावनात्मक अस्त-व्यस्तता है। जर्मन मनःचिकित्सकों ने इस संदर्भ में गहन अनुसंधान किया है।

“साइकोसोमेटिक डिस आर्डर” नामक अपनी कृति में प्रख्यात मनःचिकित्सा विशेषज्ञ शेल्ड जे. लेकमने ने बताया है कि भावनात्मक उतार-चढ़ाव शारीरिक क्रिया कलापों को निश्चित रूप से प्रभावित करते है और इनका असर देर तक बना रहता है। यह परिवर्तन रचनात्मक भी हो सकता है और विध्वंसक भी, जो भावनाओं की उत्कृष्टता-निकृष्टता पर निर्भर करते हैं। काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या, द्वेष की दूषित भावनाएँ अपने लिए एवं अन्यों के लिए हानि ही हानि प्रस्तुत करती है जबकि सद्भावनाओं से लबालब भरा हृदय और मस्तिष्क स्वयं के लिए तथा साथी सहयोगियों, सभी के लिए सुखदायी परिस्थितियों विनिर्मित करता है। शेल्डन ने अपनी उक्त पुस्तक में विचारणाओं भावनाओं में होने वाली परिवर्तनों एवं उनके दूषण से होने वाले विभिन्न रोगों का विस्तृत विवरण किया है। उनके अनुसार दुश्चिंतन एवं विकृत भावनायें ही विभिन्न रोगों की उत्पत्ति के मूल कारण है। सर्व प्रथम इसी क्षेत्र का परिष्कार सुधार किये जाने की आवश्यकता है। बाह्य औषधियाँ कुछ तात्कालिक लाभ पहुँचा सकती हैं, रोग को दबा सकती हैं परन्तु वह स्थायी समाधान प्रस्तुत नहीं कर सकतीं। मनोकायिक रोगों से छुटकारा पाने एवं भावना क्षेत्र को परिष्कृत करने के लिए उनने योगाभ्यास की ध्यान धारणा प्रक्रिया का महत्वपूर्ण बताया है।

यह बात निश्चित रूप से मानी जानी चाहिए कि मानवी जीवनचर्या भावनाओं की धुरी पर ही घूमती है। शरीर हमारे अन्तःकरण की बहिरंग में अभिव्यक्ति का एक माध्यम मात्र है। काय तंत्र में जो अव्यवस्थाएँ समय-समय पर उत्पन्न होतीं, रोगों के रूप में परिलक्षित होती हैं, वे अपने आप पर संतुलन स्थापित करने की चेतावनी मात्र हैं, रोग नहीं। चेतावनी पर ध्यान देकर रोगों को अप्राकृतिक रूप से दबाने का प्रयास और जटिलताओं को जन्म देता एवं अनेकानेक व्याधियों के रूप में सामने आता है। भावना तंत्र का श्रद्धा-समर्पण द्वारा अभिसिंचन करते रहने से जड़े कभी सूखने नहीं पाती। भावनाओं की उत्कृष्टता हर दृष्टि से जीवन में जरूरी है। सतत् आत्मावलोकन मनुष्य को अपना मूल्यांकन करने में मदद करती है व यही निष्कर्ष उसे समझाता है कि बिना सरस भावसंवेदनाओं के न व्यक्ति का स्वस्थ, जीवनी शक्ति मनोबल सम्पन्न रह पाना संभव है, न ही उसके जीवन की इसमें सार्थकता है। आवश्यकता है कि अन्तःकरण का उपचार किये जाने की महत्ता प्रतिपादित कर जनमानस को समझा जाय कि सरस उदात्त भावनाओं की गंगोत्री कभी सूखने न पाए।


आत्म विश्वास की महती शक्ति सामर्थ्य

मन से हारा व्यक्ति आमतौर से हारता है पर जिसे अपनी जीत पर पूरा विश्वास है वह देखता है कि अपने में इतनी क्षमता का भण्डार भरा पड़ा था जिसे कभी जाना पहचाना नहीं गया और वैसा सोचने का भी अवसर नहीं आया। वस्तुतः मनुष्य का मनोबल ही उच्च स्तरीय वैभव है। उसी के सहारे लोग साधारण से असाधारण बनते हैं और कम योग्यता होते हुए भी कथित समर्थ कहे जाने वालों के कान काटते हैं। आत्म विश्वासी कछुआ अस्थिर मन वाले खरगोश से बाजी मार ले गया था यह सर्वविदित है।

अपने आपको दीन-हीन कमजोर मानने वालों का अनायास ही मनोबल गिरा रहता है। वह आज की अपेक्षा कल को अधिक अच्छा बनाने की बात सोच तक नहीं पाता। कहते है कि जो अपनी सहायता आप नहीं करता उसकी सहायता करने के लिए ईश्वर भी आगे नहीं आता है। भ्रूण जब आवश्यक शक्ति अर्जित कर लेता है तो बाहर निकलने का प्रयत्न करता है। कठिनाइयों से जूझने का नाम ही “प्रसव पीड़ा” है। इसके बाद ही कभी बालक का जन्म संभव होता है। यदि वह अत्याधिक दुर्बल हो और बाहर आने का पुरुषार्थ न अपनाए तो कदाचित उसे सही स्थिति में जन्म लेने का अवसर ही न मिले। अण्डा जब खोखले के भीतर पकता है और बाहर निकलने की आवश्यकता अनुभव करता है तो छिलके को तोड़ने की भीतर से ही शक्ति निकालता है। अण्डे में दरार पड़ती, हलचल होती और चूजा बाहर निकल आता है। आत्मविश्वास और पराक्रम की यह शिक्षा जन्म से पहले ही मिल चुकी होती है। ताकि उसे जीवन भर भुलाया न जाय और कठिनाई से निबटने तथा प्रगति पथ पर अग्रसर होने के लिए हर पल ध्यान में रखा जा सके। ऐसी ही मनःस्थिति में स्वतंत्र निर्णय बन पड़ते है। अपनी स्थिति के अनुरूप अभिष्ट प्रयोजन के लिए साहस भरे कदम उठाते बन पड़ते है जिनमें हर मौलिक क्षमता का अभाव है वे दूसरों का मुँह ताकते रहते है। अवसर आकर उन्हें स्वयं गोदी में उठाएँ, सफलता छप्पर फाड़कर आँगन में आ टपके, इसी का इन्तजार करते रहते है। ऐसी हतप्रभ मनोभूमि वाले या तो निराश होकर भाग्यवादी बन जाते हैं या फिर शेखचिल्ली जैसे इस प्रकार के सपने देखते रहते हैं, जिनका वास्तविकता के रूप में विकसित होने का कभी अवसर आता ही नहीं। तार में बिजली होने पर बल्ब जलते और पंखे घूमते है। पर यदि बिजली गुल हो जाय तो न पंखे चलते हैं और न बल्ब जलते है। आत्म विश्वास एक प्रकार की बिजली है, जो मनुष्यों की अनेक विशेषताओं को उभारता और प्रस्तुत क्षमताओं को जगाकर इस योग्यता बनाता है कि व्यक्ति कुछ महत्वपूर्ण कार्य कर से और अपने क्रिया-कलापों से अनेकों को प्रभावित करके उन्हें प्रतिभावान बनाने में समर्थ हो सके। समझना चाहिए कि मनुष्य में आधी क्षमता शरीर और कौशल के साथ जुड़ी होती है और शेष आधी आत्मा विश्वास पर अवलम्बित रहती है।

आत्म विश्वास आत्म गौरव को विकसित करता है और अपने अनुरूप मनःस्थिति एवं परिस्थिति बनाकर रहता है। भूमि की उर्वरता और बीज की सशक्तता मिलकर जिस अंकुर को उगाते हैं उसमें अपनी निज की सशक्तता भरी रहती है और उसके सहारे पौधा, झाड़ तथा वृक्ष बनने में बहुत दिन लगते है। एक दिन का अंकुर विकास क्रम पर ठीक प्रकार चलते हुए फूलों, फलों से लदा सघन छाया और विशाल कलेवर वाला वृक्ष बन जाता है। विकास का यही क्रम उन पर भी लागू होता है जो आत्म विश्वास के धनी होते हैं। वे न तो देय परिस्थितियों में पड़े रह सकते है और न सामान्य जनों जैसे निर्वाह उपार्जन तक सीमित जीवन जी पाते हैं। यही है आत्म विश्वास का चमत्कार एवं उसी महती सामर्थ्य।


लय व तालबद्ध है-मानव का जीवनक्रम

जन्म से लेकर मरण तक मानव के शारीरिक, मानसिक एवं भावनात्मक स्थिति में अनेकों परिवर्तन होते रहते है। इच्छा-आकाँक्षाओं विचारणाओं-भावनाओं के अनुरूप जीवन व्यवहार में उतार-चढ़ाव ज्वार-भाटे की तरह सतत् चलते रहते है। एक ही व्यक्ति दिन भर में कई प्रकार के व्यक्तित्वों की झलकी दिखाता है। कभी प्रसन्न रहता है तो कभी उदास, दुःखी एवं तनावग्रस्त। कभी भावनाओं के प्रबल प्रवाह में डूबता-उतारता दीखता है तो कभी बौद्धिकता बढ़ी-चढ़ी दिखाई देती है। वैज्ञानिकों जीवन में आने वाली इन उतार-चढ़ाव का कारण “बायोरिद्” को माना है और कहा है कि यह चक्रीय जैविक परिवर्तन है जो आँतरिक एवं बाह्य दोनों कारकों से प्रभावित होता है। उनके अनुसार यह परिवर्तन एक निश्चित चक्र के अंतर्गत चलते रहते है, जिनका मानव जन्म से गहरा सम्बन्ध होता है।

प्रायः मनुष्य शरीर की सामान्य गतिविधियाँ लयात्मक एवं चक्रीय लक्षणों वाली होती हैं और एक निश्चित अन्तराल के बाद पुनः प्रकट होती रहती है। प्रसिद्ध वैज्ञानिक एफ.ए. ब्राउन ने अपनी पुस्तक द बायोलॉजिकल क्लाक में कहा है कि शरीर की समस्त आकुंचन-प्रकुँचन क्रियाएँ तथा भूख, प्यास, निद्रा आदि लयात्मक होती है। विभिन्न वैज्ञानिक अनुसंधानों के आधार पर भी अब यह सिद्ध हो चुका है कि कोशिका विभाजन की दर, मेटाबालिज्म, एनर्जी लेवल, ब्लट सेल काउन्ट, ब्लड शुगर लेवल, होमोग्लोबिन का स्तर, पाचन अंगों तथा गुर्दां का कार्य, मस्तिष्कीय क्रिया-कलापों जैसे विभिन्न फिजियोलॉजिकल प्रक्रियाएँ एक लयबद्ध तरीके से चलती है। इसका अधिक स्पष्ट व्याख्या करते हुए “रिदमिक एक्टीविटी इन एनीमल फिजियोलॉजी एण्ड बिहेवियर” नामक अपनी कृति में मूर्धन्य चिकित्सा विज्ञानी डॉ. क्लाउडस्ली थाम्पसन ने भी कहा है कि शरीर की यह एक सार्वभौमिक स्तर पर होने वाली प्रक्रिया है। उनके अनुसार मस्तिष्कीय कोशिकाओं की ध्रुवता का सेकेंड के कुछ ही हिस्से में परिवर्तित होना, स्वस्थ हृदय का 60 से 70 बार प्रति मिनट की दर से धड़कना, एवं 15 से 20 बार प्रतिमिनट के हिसाब से श्वास-प्रश्वास, आकुँचन-प्रकुँचन आदि लयबद्ध रूप से चलते है। शरीर के प्रत्येक क्रिया कलाप में नियमितता एवं समयबद्धता का समावेश है।

बायोरिदम मानव जीवन को कई तरह से प्रभावित करती है। “ह्यूमन सरकैडियन रिदम” नामक अपनी प्रसिद्ध कृति में वैज्ञानिक लेखक द्वय-आर. कोनराय एवं मिल्स ने बताया है कि दिन और रात्रि के साथ इसकी महत्वपूर्ण कड़ियाँ अन्तर्गुम्फित होती हैं इस तरह के रिदम को इन्होंने ‘करकैडियन नाम से सम्बोधित किया है जो सामान्यतः 24 घण्टे के अन्तराल से प्रकट होती है। इसके अनुसार काया में चुम्बकीय परिवर्तन का एक चक्र 24 घण्टे में बदल जाता है। सर्वविदित जैविक चक्रों में से निद्रा एवं जागरण का चक्र है जिनका अनुपात प्रायः 16 घण्टे जागने एवं 7 घण्टे निद्रा का होता है। नींद भी चार छः अवस्थाओं में पूरी होती है। इसी मध्य प्रत्येक 90 मिनट के अन्तराल से मनुष्य स्वप्नावस्था में चला जाता है। मूर्धन्य वैज्ञानिक बनार्ड गिटेल्सन ने- ‘‘बायोरिदम” नामक पुस्तक में बताया है कि मानव शरीर का तापमान प्रायः 37 डिग्री सेन्टीग्रेट 18 डिग्री फैरन ही होता है किन्तु इसमें भी सरकैडियन परिवर्तन आता रहता है। सुबह बॉडी टेम्परेचर सबसे कम होता है एवं सूर्योदय तक क्रमशः बढ़ता जाता है और रात्रि में सबसे अधिक हो जाता है। इसी के साथ हृदय की गति में भी परिवर्तन मापा गया है यह धड़कन तीन बजे सायं तक अपनी चरम सीमा पर पहुँच जाती है। उस वक्त चयापचय की दर क्रमशः कमजोर पड़ती जाती है।

श्री आर. कोनराय एवं मिल्स नामक उक्त दोनों वैज्ञानिक ने विभिन्न अनुसंधानों के आधार पर निष्कर्ष निकाला है कि जन्म और मृत्यु का भी बायोरिदम से घनिष्ठ सम्बन्ध है। उनके अनुसार दिन या रात्रि के समय विशेष में ही यह घड़ियाँ आती है। मानव शिशुओं का जन्म प्रायः मध्य रात्रि से 3 बजे के मध्य होता है। सुप्रसिद्ध चिकित्सा विज्ञानी हेलवर्ग एफ ने अपनी कृति-”द ट्वेन्टी फोर आवर स्केलःए टाइम डायमेन्सन ऑफ एडाप्टिव फन्क्शनल आर्गेनाइजेशन” में कहा है कि बच्चे प्रायः 4 बजे सुबह ही जन्मते हैं। उस समय जन्मदात्री का मेटाबाँलिक चक्र सबसे कम होता है और वह सुस्त रहती है। उसके अनुसार जन्म की तरह मृत्यु का समय भी निर्धारित रहता है। अधिकाँश लोगों की मृत्यु ऊषाकाल या गोधूलि वेला के धुंधल के प्रकाश में अर्थात् साँध्य वेला में होती हैं इन अवसरों पर जीवन शक्ति सबसे अधिक कमजोर होती है।

वैज्ञानिकों का कहना है कि ग्रह-नक्षत्रों के वार्षिक चक्र से प्रभावित होने की मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है। कुछ व्यक्तियों के शारीरिक वजन पर सरकैनुअल रिदम का प्रभाव देखा गया है जिसमें वजन की कमी एवं मानसिक दबाव की अधिकता पाई गई है। इस संदर्भ में अमेरिका वैज्ञानिका ई.टीत्र पे-जेली एवं एस.जे. अमुण्डसेन ने महत्वपूर्ण खोजें की है। इन्होंने “एन्युअल बायोलॉजिकल क्लाक” नामक एक अनुसंधानपूर्ण लेख प्रसिद्ध पत्रिका “साइंटिफिक अमेरिकन” में प्रकाशित किया है। उसके अनुसार उत्तरी गोलार्द्ध में मई एवं जून में सबसे अधिक बच्चे पैदा होते है। मई में जन्में शिशुओं का वजन अन्य महीनों में पैदा होने वाली अपेक्षा औसतन 200 ग्राम अधिक होता है। यह परिवर्तन हारमोन वृद्धि के कारण एन्युअल रिदम के द्वारा छोड़े गये प्रभाव का माना गया है। उक्त वैज्ञानिकों का कहना है कि दक्षिणी गोलार्द्ध में स्थिति ठीक इसके विपरीत होती है। न्यूजीलैण्ड की सेना में भर्ती हुए 21 हजार सैनिकों का अध्ययन करने के पश्चात उन्होंने पाया कि उनमें अधिकतर लम्बे व्यक्ति दिसम्बर और फरवरी के मध्य में पैदा हुए थे। यह वहाँ के लिए मध्य ग्रीष्म का समय होता है।

मूर्धन्य वैज्ञानिक अमुण्ड सेन के अनुसार पृथ्वी के दोनों गोलार्द्धों में उपरोक्त महीनों में जन्मे बच्चे दीर्घायु एवं बुद्धिमान पाये गये है। उत्तम स्वास्थ्य के लिए संतुलित आहार, विहार, व्यायाम, चिकित्सा आदि आवश्यक माने जाते हैं, किन्तु वातावरण एवं जैविक चक्र भी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है।

किसी व्यक्ति विशेष के बुद्धि परीक्षण द्वारा क्षेत्र विशेष के सभी लोगों की बुद्धिलब्धता आई.क्य. का पता लगाना कठिन एवं सन्देह भरा होता हैं किन्तु जब उस क्षेत्र के हजारों लोगों का इस प्रकार परीक्षण किया जाय तो प्राप्त निष्कर्ष में संदेह की कोई गुंजाइश नहीं रह जाती है। अमेरिका के विख्यात मनोविज्ञानी ई.हटिंगटन ने एक ऐसा ही परीक्षण न्यूयार्क के 17 हजार छात्रों का आई.क्यू अन्यान्य माहों में जन्में छात्रों की उपेक्षा सबसे अधिक था। परीक्षण में उन्होंने अधिक अंक प्राप्त किए। इसका विस्तृत विवरण अपनी कृति “सीजन ऑफ बर्थ” इट्स रिलेश्ज्ञन टू ह्यूमन एविलीटिज” में किया है।

इसी तरह का दूसरा परीक्षण एच. नोवलाच तथा बी पासामैनिक नामक दो मूर्धन्य चिकित्सावैज्ञानिकों ने ओहियो में मानसिक रूप से अविकसित बच्चे किया है। उससे जो तथ्य उभरकर सामने आये हैं, उनके अनुसार उनमें से अधिकाँश मानसिक रूप से अविकसित बच्चे का जन्म जनवरी और फरवरी जैसे सर्दी के महीनों में हुआ था। इसका विस्तृत विवरण “अमेरिकन जनरल ऑफ पब्लिक हैल्थ” के सन् 1958 के अंक में “सीजनल वैरिएशन इन दी बर्थ ऑफ दी मेन्टली डिफीसियन्ट” नामक शीर्षक से प्रकाशित हुआ था।

“द रिदम ऑफ लाइफ’8 नाम पुस्तक में प्रसिद्ध शरीरशास्त्री एक सोफी ने लिखा है कि 21 दिप अथवा 25 दिन के एक क्रक में मनुष्य शरीर में एक पूर्ण परिवर्तन होता रहता है जिसमें जीवनी शक्ति का नवीनीकरण होता और नयी चेतना, नयी स्फूर्ति का उदय होता है। इसे अधिक स्पष्ट करते हुए ब्रिटिश वैज्ञानिक गेगिर ल्यूस ने अपनी पुस्तक “बॉडी टाइम” में बताया है कि वस्तुतः यह हारमोन परिवर्तन के कारण होता है जिसका परिवर्तन चक्र लयबद्ध तरीके से चलता रहता है। 32 दिन बाद इस क्रम की पुनरावृत्ति होती रहती है। हारमोन रक्त प्रवाह में मिलकर अंतःस्रावी ग्रन्थियों के रसायन तंत्र को प्रभावित करते हैं, जिनसे स्रवित तत्व शारीरिक क्रिया–कलापों को परिवर्तित नियंत्रित करते हैं। ल्यूस के अनुसार साइक्लो थायमिक रिदम के कारण 35 दिन के अन्तराल से मनुष्य के भावावेग में परिवर्तन आ जाता है और प्रति 5 सप्ताह में एक बार चरम स्थिति में पहुँच जाता है। परिणाम स्वरूप उदासी और प्रफुल्लता का क्रम बारी-बारी से आता रहता है। प्रत्येक 40 दिन बाद इन्टेलेक्चुअल रिदम प्रकट होता है जो सम्बन्धित व्यक्ति की सतर्कता, मनोयोग, स्मृति एवं व्यावहारिकता को प्रभावित करती है। इस तरह के अनेकों लयात्मक चक्रों का वर्णन वेंजामिन वाकरकृत “एसोटेरिक मैन,” में किया गया है।

अमेरिका के प्रख्यात मनोवैज्ञानिक ई॰एल॰ स्मिथ ने “टाइम्स इन द अफेयर्स ऑफ मेन” में बताया है कि प्रत्येक 36 महीने पश्चात् मनुष्य में एक “सद् विवेक लय”-”कन्साइन्स रिदम” का उदय होता है जिसमें सदाचरण के प्रति सजगता बढ़ी-चढ़ी होती है। उस समय व्यक्ति का रुझान आध्यात्मिक कार्योंक एवं नैतिकता की ओर विशेष रूप से होता है। स्मिथ का कहना है कि यही वह समय है जिसका चाहे तो व्यक्ति पूर्ण सदुपयोग कर अपने जीवन को समुन्नत और सुखी बना सकता है। अभ्यास द्वारा इसे लगातार जीवनपर्यंत बनाये रखा जा सकता है। उनके अनुसार 42 महीने चक्र वाली एक आडम्बर प्रवृत्ति-स्प्लर्ज अर्ज भी एकान्तर क्रम से मानव जीवन में प्रकट होती, जिसमें मनुष्य फिजूलखर्ची अपनाता और ठाट-बाट का प्रदर्शन करता है। सद्विवेक लय की लयबद्धता को नियमित बनाये रखकर इस पर नियंत्रण साधा जा सकता है।

बायोरिदम के कारण मानव स्वभाव में भी तर-चढ़ाव देखा जाता है। कभी उसमें पुरुषोचित कठोरता का भाव उदय होता है तो कभी नारी सुलभ कोमलता-अतिसंवेदनशीलता आदि के दर्शन होते हैं। मनोविज्ञानी सिगमंड फ्रायड के सहयोगी जर्मन के सुप्रसिद्ध चिकित्साशास्त्री विल्हेल्म फ्लीस ने बायोरिदम पर गहन अनुसंधान किया था और पाया था कि प्रत्येक मनुष्य में नर और नारी दोनों के गुण विद्यमान होते हैं। प्रत्येक व्यक्ति में नर तत्व का एक 23 दिवसीय चक्र कार्य करता जिसमें शक्ति, ऊर्जा, उत्साह, जीवटता आदि की प्रधानता प्रमुख रूप से परिलक्षित होती है। इसके बाद नारी तत्व प्रधान चक्र की बारी आती है। इसकी अवधि 28 दिन की होती है। इसमें मनुष्य की क्रियाशीलता, सृजनात्मकता, स्नेह, वात्सल्यता, भावुकता, अतिसंवेदनशीलता, जैसे नारी सुलभ गुणों की बहुलता देखी गयी है।

विशेषज्ञों का कहना है कि जीवन की परिभाषा ताल एवं लयों से नियंत्रित समय के रूप में की जा सकती है। अगणित लयों में से अधिकाँश को जाना समझा जा सकता है और शरीर के छोटे-छोटे क्रिया–कलापों में सक्रिय देखा जा सकता है। समय-बद्धता उनकी प्रमुख विशेषता है। बायोरिदम में भी समय प्रमुख कारक की भूमिका निभाता है। मनुष्य है जो अपने जीवन के कितने ही महत्वपूर्ण लयों को योंही व्यर्थ नष्ट होने देता है और उनकी उपयोगिता यथार्थता को नहीं समझता। जबकि इन लयों से शरीर, मन और भावनाओं का गहरा संबंध होता है। यदि उन्हें समझा जा सके, उनका विश्लेषण कर उपयोगी लयों को संजोया, सुनियोजित किया जा सके, तो जीवन को पूर्णता तक पहुँचाने में इससे काफी सहायता मिल सकती है।


Quotation

हम झंझट में तब पड़ते हैं जब आत्म संतोष की बात छोड़कर, दूसरों को प्रसन्न करने के फेर में पड़ते हैं।


सुपात्र कौन?

“इसमें मन्त्रणा की क्या आवश्यकता महाराज! महामन्त्री बोधायन ने काँची नरेश देवमित्र से नीति स्पष्ट की-राज-परम्परा के अनुसार ज्येष्ठ राजकुमार को ही आपके बाद राजगद्दी का उत्तराधिकारी होना चाहिये।”

“सो तो ठीक है महामन्त्री किंतु हर परम्परा विवेक की कसौटी पर खरी सिद्ध हो यह आवश्यक नहीं। शास्त्र यह भी तो कहता है कि देशकाल और परिस्थितियों के अनुसार परम्पराओं को बदलते और उन्हें बुद्धि संगत स्वरूप देते रहना चाहिये, सत्ता हर किसी को नहीं सौंपी जा सकती।”

तत्पश्चात् सम्राट देवमित्र और महामन्त्री बोधायन मन्त्रणा करने लगे। देर तक विचार-विमर्श हुआ। दूसरे दिन प्रातःकाल होने के साथ ही ज्येष्ठ राजकुमार सुरेश को बिना राज्याभिषेक के ही राजगद्दी सौंप दी गई। प्रजा चकित थी न कोई उत्सव न अभिशेष यह कैसा राज्याभिषेक? किन्तु महाराज के निर्णय को कौन टाल सकता था? अभी राजगद्दी धारण किये हुए कुल पाँच घण्टे ही हुये थे कि एक ग्रामीण ने आकर दुहाई दी--”महाराज न्याय कीजिये, आज स्वयं राजमाता ने हम गरीबों के झोंपड़े जलवा दिये। पहले ही दिन यह अन्याय। महाराज न्याय कीजिये।”

सुरेश ने पूरी बात सुनी तो, किन्तु उन्होंने वृद्ध ग्रामीण को न्याय देने की अपेक्षा डाँट लगाई और कहा-”दुष्ट! राजमाता के खिलाफ फिर कुछ कहा तो तेरी खाल उधेड़ दी जायेगी।” ग्रामीण सहम गया और चुपचाप घर वापस लौट आया। यह समाचार राज्य में फैला हो या नहीं पर दूसरे दिन ही यह खबर फैली कि नीति निर्मात्री परिषद् ने राजकुमार सुरेश को गद्दी से उतार दिया है और उनके स्थान पर मझले राजकुमार विरथ को राज्यासीन किया गया है। लोग इन आकस्मिक परिवर्तनों पर आश्चर्य चकित थे कुछ समझ नहीं पा रहे थे बात क्या है?

दूसरे ही दिन फिर वही स्थिति! कि “महामन्त्री ने और मेरी समस्त कलाकृतियाँ पानी में यह कह कर फिंकवा दी--कि इसमें केवल सम्राट की मूर्तियाँ लग सकती हैं, देवी-देवताओं की नहीं। यह अन्याय है कला का अपमान है राजकुमार! न्याय कीजिये।”

राजकुमार विरथ को महामन्त्री के विरुद्ध अभियोग चलाने का साहस नहीं हुआ पर उन्होंने मूर्तिकार को मूर्तियों का मूल्य चुका दिया और खबर कहीं भी न फैलाने का आदेश देकर वहाँ से भगा दिया।

तीसरे दिन विरथ भी गद्दी से उतार दिये गये। और तीसरे राजकुमार प्रताप गद्दी पर बैठाये गये। उसी दिन एक और पीड़ित ने पुकार लगाई-”महाराज! यह क्या अन्धेर है। जब हमने एक बार राज्य कर अदा कर दिया तो महाराज जो अब राजगद्दी पर भी नहीं है-देवमित्र! डसने हमसे कर क्यों माँगा? न देने पर इन्होंने हमें कोड़ों से क्यों पिटवाया?”

राजकुमार प्रताप तड़प उठे-- “मेरी प्रजा के साथ अन्याय! कोई भी क्यों न हो वह मेरे दण्ड से बच नहीं सकता। सैनिकों जाओ और अपराधी देवमित्र को पकड़ कर कैद में डाल दो। कल सुनवाई होगी!” महामन्त्री बोधायन टोका-- “राजकुमार आप अपने पिता के लिये ऐसा कहते हैं।” प्रताप ने उत्तर दिया-- “शासनाध्यक्ष के समक्ष प्रजा का न्याय बड़ा है पिता नहीं।”

प्रातःकाल सम्राट देवमित्र दरबार में उपस्थित किये गये-- बन्दी की वेशभूषा में-- सारा अभियोग सुनने के बाद प्रताप ने कहा-- “जितने कोड़े इस निर्धन किसान की पीठ पर लगाये गये हैं उतने कोड़े देवमित्र को लगाये जायें।” सैनिकों ने कोड़े बरसाये और राजकुमार देखते रहे। सजा समाप्त होने के साथ ही राजकुमार प्रताप गद्दी से उतर आये और महामंत्री से बोले- “महामन्त्री मुझे अपने ही पिता को दंड देना पड़ा, ऐसा सिंहासन मुझे नहीं चाहिये।”

किन्तु तभी महाराज देवमित्र हँसते हुए आगे आये और बोले “बेटा यह तो उत्तराधिकारी की परीक्षा थी। राज्य के सच्चे अधिकारी तुम्हीं हो।”


सदैव जागरुक रहें!

नींद में मनुष्य सोया रहता है तो उसे न अपने शरीर की खबर रहती है न निकटवर्ती घटनाक्रम की। मन भी छुट्टल रहता है उस पर किसी मर्यादा या दिशाधारा का अंकुश नहीं रहता। सपने देखता है तो भी वे बिना सिर पैर के होते हैं। शरीर पर ढके कपड़े भी अस्त-व्यस्त हो जाते हैं। यहाँ तक कि लज्जा ढकने के कपड़े भी कभी-कभी वदन पर से हट जाते हैं जिसे देखकर देखने वालों को शर्म आती है पर सोया हुआ व्यक्ति इस सब से बेखबर ही रहता है। गहरी नींद होने पर गले से खर्राटों की आवाज भी निकलने लगती है। जिससे समीप सोये हुओं की नींद तक में बाधा पड़ती है। पर उस सोये हुए व्यक्ति को यह भी विदित नहीं रहता कि शिष्टाचार का किस कदर उल्लंघन हो रहा है। घर में चोरी होती रहे कोई अनर्थ होता रहे दुर्घटना घटित होती रहे तो भी उससे सोया व्यक्ति अनजान ही रहता है। उसकी रोकथाम का उपाय तक तो सूझता हीं फिर जिस विडम्बना के कुचक्र में पैर फँसता जाता है उसे निकालने वाले का तो प्रश्न ही नहीं उठता। निद्राग्रस्त से कुछ कमाना बन पड़े यह भी संभव नहीं। वह तो बिगाड़ को समझने तक में समर्थ नहीं होता फिर रोके कैसे? सोना थकान को भले ही मिटाता हो पर उस अवधि में मूर्च्छित मृतक जैसी परिस्थिति ही छाई रहती हैं। मनुष्य आधी जिन्दगी प्रायः इसी स्थिति में गुजार देता है।

जिन्हें महत्वपूर्ण उत्तरदायित्व निभाने हैं वे जागरण का दूसरा प्रबन्ध करते हैं। स्वयं सोते हैं तो अपने स्थान पर किसी दूसरे को नियुक्त कर देते हैं। बिजलीघर, पुलिस, रेल जैसे अनेकों कार्य ऐसे हैं जिनका निरन्तर चलते रहना आवश्यक है। उनके कार्यकर्ता पारी-पारी से सोते हैं। जागरुक व्यक्ति हर घड़ी कार्यरत रहे ऐसा प्रबन्ध किया जाता है। जेलखाने, खजाने आदि की चौकीदारी निरन्तर चलती है। गली मुहल्लों में प्रहरी नियुक्त रहते हैं ताकि घरों के लोग सोए रहने पर भी चोरों को सेंध लगाने चोरी करने का अवसर न मिले सेन सीमाओं की सुरक्षा पर निरन्तर चौकस करते जाने की व्यवस्था करती है। जागरुकता को हर घड़ी तत्पर रखे जाने पर ही महत्वपूर्ण कार्य चलते हैं। व्यक्तियों को बीच-बीच में विश्राम की छूट मिल सकती है पर सुरक्षा और सुव्यवस्था का तंत्र अहर्निशि कार्यरत रहता है। जिनके कंधों पर उन्हें चलाने की जिम्मेदारी है वे उसके लिए दूरदर्शिता भरी व्यवस्था बनाते हैं। ताकि जागरुकता का तंत्र टूटने न पाए। इसमें असावधानी या उपेक्षा की कोई गुँजाइश नहीं है। क्योंकि असावधानी को अव्यवस्था ही नहीं, विपत्ति या दुर्गति का निमित्त कारण भी माना जाता है। जो इस महत्व को नहीं स्वीकारते वे अपना काम आप बिगाड़ने अपने पैरों आप कुल्हाड़ी मारने का खतरा उठाते हैं।

अपराधों में कुछ ऐसे होते हैं जिनमें दूसरों को हानि होती है पर अपने को लाभ मिल जाता है भले ही वह तात्कालिक ही क्यों न हो और बाद में उसका वैसा ही दुष्परिणाम क्यों न भुगतना पड़ता हो। चोर, उचक्के, जेबकट, उठाईगीरे अपनी धूर्तता के जाल में कितनों को ही फँसा लेते हैं दूसरों सहज विश्वास का, असावधान रहने का अवसर पाकर अपना उल्लू सीधा करते हैं। इसमें हानि उन्हीं की होती है जो फँसते हैं। फँसाने वाला कम से कम आरंभ में तो लाभ उठा ही लेता है। इसलिए ऐसे अपराधी को परघाती कहा जाता है। पर उनमें से कुछ ऐसे भी हैं जो दूसरों की हानि कालान्तर में करते हैं पर अपनी हानि आरंभ से ही हो जाती है। इन्हें वज्रमूर्ख कहा जाता है।

आलस्य और प्रमाद ऐसे ही कृत्य हैं जो अपराधों की प्रचलित श्रेणी में तो नहीं आते हैं। उनके लिए आक्रमण, अपहरण जैसी दण्ड व्यवस्था तो नहीं है। पर इन दुर्गुणों को अपनाने वाला पुरुषार्थ हीन होकर उस कमाई से वंचित रहता चला जाता है जो सक्रिय रहने पर सहज ही हस्तगत होती रह सकती थी। वह लाभदायक अवसरों को, सौभाग्य सुयोगों को चूकता गँवाता चला जाता है। फलतः दरिद्रता, असफलता और पिछड़ेपन की स्थिति ही उसके हाथ लगती है। क्षमताएँ क्रमशः कुण्ठित होती जाती हैं। सम्मान घटता जाता है फलतः जिनसे सहज सहयोग मिल सकता था और प्रगति की सम्भावनाओं में सहायक हो सकता था उससे भी वंचित रहना पड़ता है। यह आत्मघाती अपराध है। कुपथ्य खाकर, नशे पीकर, विष निगल कर भी आत्म हत्या की जा सकती है। यह भी अपराध है। भले ही उसकी भाँति अपना जीवन गँवाने तक ही सीमित क्यों न हो। भले ही उससे दूसरों को बाद में ही किसी समस्या का सामना करना पड़ता हो।

व्यक्ति के लिए जिन आवश्यक गुणों को बिना चूक किए अपनाने का निर्धारण किया गया है उनमें जागरुकता का प्रथम स्थान है। उससे आधार पर ही शरीर को, चमड़े को, घर को, उपकरणों को, स्वच्छ रखा जा सकता है। इस दिशा में आँखें खुली रखने पर ही गंदगी को देखने, घृणा करने, हटाने और उठाने के उपाय सूझते हैं और उसके लिए कदम उठाते हैं। यदि जागरुकता न हो तो समीपवर्ती गंदगी भी सूझ नहीं पड़ती और वह यथास्थान पड़ती सड़ती रहती है। यह सड़न कभी भयंकर बीमारियों का रूप भी धारण कर सकती है।

जीवन सम्पदा ऐसे कलेवर में रखी हुई है जिसमें अनेकों छिद्र हैं। उनमें हर एक इतना चौड़ा है यदि उसे रिसने दिया जाय तो जो कुछ भी महत्वपूर्ण भरा हुआ है वह धीरे-धीरे फैलता बिखरता चला जायगा और अन्ततः फूटा और खाली घड़ा हाथ रहने पर ऐसा पश्चाताप करना पड़ेगा जिसका न कोई उपचार है और न कहीं अन्त।

समय सबसे मूल्यवान दौलत है, इसी ईश्वर प्रदत्त अनुकम्पा का सदुपयोग जो कर सके, उनने इसके बदले बहुमूल्य मणि मुक्तक खरीदे। सफलताओं के अनेकानेक श्रेय प्राप्त किए। संसार में जितने भी प्रगतिशील, समुन्नत, प्रख्यात, क्रिया कुशल विद्या और वैभव के धीन व्यक्ति हुए हैं उनमें से प्रत्येक ने यह व्यवस्था अपनाई है कि एक भी क्षण बेकार न जाने पाए। एक भी निरर्थक काम अपनी गतिविधियों में सम्मिलित न होने पाए। एक भी आवश्यक छूटने पाए। समय ही किसी के पास चौबीस घण्टे का ही है। पर यह अपने हाथ की बात है कि उसे इस क्रम में किन प्रयोजनों में प्रयुक्त किया जाय। यह कार्य समग्र जागरुकता रखते हुए ही हो सकता है। शतरंज की चाल चलने वाले सभी गोटी की सम्भावित चाल का ध्यान रखते हैं। सेनापतियों को भी मात्र एक ही दिशा तक सीमित नहीं रहना पड़ता, वरन् वे शत्रु की सम्भावित रणनीति का समय रहते कल्पना करते हैं और किसी भी दिशा में ऐसी गुँजाइश नहीं छोड़ते जिसमें होकर शत्रु को प्रवेश करने का अवसर मिले और वह अपनी एवं पक्षीय चिन्तन की कमजोरी का लाभ उठाए।

चिन्तन की अस्त-व्यस्तता भी ऐसी ही भूल है, जिसे प्रगति क्रम की सबसे बड़ी बाधा माना जा सकता है। जिन दिशाओं को अपनाना है, जिन मार्गों पर चलना है, जिन योग्यताओं का सम्पादन करना है। चिन्तन की यदि अपनी निर्धारित कार्य पद्धति ही सीमित रहे। उन्हीं प्रयोजनों का ताना-बाना बुने, सम्भावित कठिनाइयों से निबटने और आवश्यकताओं की पूर्ति करने की बात पर ही यदि विचारणा को सीमा बद्ध रखा जाय तो अनेकों प्रसंग ऐसे उभर आते हैं जिनकी उपेक्षा करने पर सारी योजना ही असफल हो जाती है। एकाग्रता इसी का नाम है कि सामने प्रस्तुत योजना के ही हर पक्ष को गम्भीरता से विचारा जाय। अप्रासंगिक प्रसंगों पर मन को न दौड़ते देने की संकल्प शक्ति को भी जागरुकता कहते हैं।

वातावरण का मनुष्य पर असाधारण रूप से प्रभाव पड़ता है। जिस प्रकार शीत प्रधान और उष्णकटिबन्ध के, तराई के क्षेत्रों की जलवायु वहाँ के निवासियों के स्वास्थ्य को प्रभावित करती है उसी प्रकार जिस प्रकृति, स्वभाव एवं गतिविधियों का जहाँ माहौल होता है वहाँ बसने वाले उस क्षेत्रवासियों के प्रभाव से प्रभावित हुए बिना नहीं रहते। भले-बुरे लोगों का बाहुल्य अपनी विशेषताओं से भरा पूरा एक शक्तिशाली वातावरण बना लेते हैं। उसके संपर्क में अपने वालों पर वैसी छाप पड़ती है। मद्यपों, जुआरियों, ठग, पाखण्डियों, व्यभिचारियों के बीच बसना मनुष्य की चेतना उन्हीं प्रयोजनों के लिए सहमत होने, ललचाने लगती है। यही बात अच्छे माहौल के संबंध में भी है। जहाँ सत्संग, सेवा, साधना, स्वाध्याय आदि सत्प्रवृत्तियाँ चलती रहती हैं वहाँ अपने ठाँव बना लेने वाले भी उसी ढाँचे में ढलने लगते हैं। ऐसे बिरले ही होते हैं जो समुद्र के बीच भी टापू की तरह उभरे रहते हैं और अपने स्वतंत्र व्यक्तित्व को अक्षुण्ण बनाए रहते हैं। अन्यथा खारी झील में पड़ने के उपरान्त मोटी लकड़ी तक नमक बन जाती है। इस तथ्य को ध्यान में रखा जाय। अपना स्थान बदलकर, अनुपयुक्तता से हटकर उपयुक्तता के समीप निवास बदला जा सके तो सर्वोत्तम। अन्यथा इतना तो करना ही चाहिए कि आत्मरक्षा के लिए कवच धारण करने जैसा उपाय बरता जाय। सेनापति को जब स्वयं निर्णायक युद्ध में उतरना पड़ता है तो वह लोहे के बने जिरह बख्तर धारण कर लेते हैं, ताकि शत्रु का शस्त्र प्रहार कारगर न हो सके। संकल्प शक्ति और व्रतशीलता के आधार पर अनुपयुक्त प्रभाव को निरस्त भी किया जा सकता है और अभाव की स्थिति में भी अपने मनोबल द्वारा अभिष्ट अनुकूलता उत्पन्न की जा सकती है। तपस्वी सुनसान वनों में हिंस्र पशुओं से घिरे होने पर भी अपनी साधना कुटी बनाकर उस नीरस वातावरण में उत्कृष्टता भर देते हैं। चन्दन वृक्ष अपने समीपवर्ती उगे झाड़-झंखाड़ों को भी सुगंधित कर लेता है। मनस्वी लोग ऐसा ही व्यक्तित्व विकसित करते हैं, जिससे टकराकर अवाँछनीयता वापस लौट चले और उत्कृष्टता अदृश्य वातावरण में से खिंचती चली आवे।

एक प्रकृति के अनेक लोगों का जमघट उनकी विचारणा एवं गतिविधि के अनुरूप वातावरण बनाता है। पर साथ ही होता यह भी है कि एक दो प्रतिभावान् व्यक्ति यदि साथ में रहे और अपना मन उनके प्रभाव से प्रभावित होने लगे तो वैसा प्रभाव भी पड़ने लगे। ऐसे सज्जनों के सत्प्रभाव की अपेक्षा दुर्जनों का कुप्रभाव अधिक क्षमता सम्पन्न होता है। पानी नीचे की ओर आसानी से ढुलने लगता है जब कि उसे ऊँचा उठाने के लिए शक्ति लगानी पड़ती है और उपकरण जुटाने पड़ते हैं। उत्कृष्ट आदर्शवादिता जिनके स्वभाव में सम्मिलित हो ऐसे लोग कम ही देखे जाते हैं पर जिन्हें उनकी तलाश हो वे निकट नहीं तो दूर उन्हें उपलब्ध कर लेते हैं। प्रत्यक्ष मिलन न बन पड़े तो उच्चस्तरीय जीवन विज्ञान सिखाने वाले सद्ग्रन्थों से भी यह प्रयोजन बहुत हद तक पूरा हो सकता है। वातावरण और संपर्क के संबंध में भी हमें सदा जागरुकता की आवश्यकता है ताकि अवगुणों से बचना और शुभ का अधिग्रहण करना सम्भव हो सके।


पितृ-पक्ष में ब्राह्मण भोजन (Kahani)

एक वेश्या ने सुन रखा था कि पितृ-पक्ष में ब्राह्मण भोजन कराने के से पितर प्रसन्न होते हैं और कराने वाले को बहुत-सा उपहार वरदान देते हैं।

वेश्या इतना खर्च करने को तैयार हो गई और किसी ब्राह्मण को निमंत्रण स्वीकार करने पर तैयार करने के लिए निकल पड़ी। बहुतों के पास गई पर वेश्या के यहाँ भोजन करने जाने के लिए कोई तैयार न हुआ। वह निराश होकर बैठ गई और भाग्य को कोसने लगी।

एक भाँड़ को यह समाचार मिला उसके मुँह में पानी भर आया। पंडित का वेश बनाकर वेश्या के घर पर जा पहुँचा और बोला तुम्हारी धर्म भावना को सार्थक बनाने के लिए मैं स्वयं ही दौड़ा आया। तुम चाही तो पितृ-पक्ष के पन्द्रह दिन मुझे भोजन कराती रह सकती हो। वेश्या रजामंद हो गई ब्राह्मण बनकर भाँड़ नित्य आता और इच्छा भोजन करके तृप्त हो जाता।

पितृ-पक्ष पूरा हो जाने पर वेश्या ने कहा जिस प्रकार दूसरे पंडित मंत्र पढ़कर आशीर्वाद देते है। उस प्रकार आप भी तो दीजिए।

भाँड़ को संस्कृत आती न थी उसने चतुरता से तुरंत एक दोहा गढ़ा और सुनाया-

पन्द्रह दिन पूरन भये, खाय खीर और खाँड। जैसा धन तैसे गया, तुम वेश्या हम भाँड।

असलियत का पता चलने पर वेश्या ने समझा कि मूर्खों को धूर्त इसी प्रकार ठगते रहते हैं।


मनुष्य पर्यावरण से जुड़े तो व्यक्तित्व का बिखराव रुके!

मानव जीवन की प्रगति यात्रा का अवलोकन करें तो हम पाते हैं कि यह त्रिविध आधारों पर अवलम्बित है-भौतिक, जैविक, मानसिक भौतिक एवं जैविक पक्षों पर बहुत कुछ लिखा जा चुका है। मानव के यह दोनों ही पक्ष विलक्षण-शरीर शास्त्रियों के लिए शोध का विषय बने हुए हैं। किंतु मनीषियों-दार्शनिकों ने मानवीय श्रेष्ठता, उसके व्यक्तित्व की सबलता का एक मात्र आधार मानसिक माना है व कहा है कि इसी धुरी के चारों ओर वैयक्तिक व सामाजिक जीवन गतिशील होता है। इसी को केन्द्र मानकर हमारे पारस्परिक संबंध मधुर तथा गतिशील होते हैं।

जो विशिष्टता इस केन्द्र को सर्वाधिक आकर्षित करती है-वह हमारा अपना परिवेश-पर्यावरण है। इस परिवेश में नदी, निर्झर, उपवन, वृक्ष-वनस्पतियाँ, पशु-पक्षी, विराट् ब्रह्माण्ड सभी आ जाते हैं। मनोवैज्ञानिकों ने मन तथा परिवेश के पारस्परिक भावनाशील संबंधों को अपनी भाषा में “साइकिक रिलेशन्स बिट मैन एण्ड द एनवायरमेण्ट” कह कर निरूपित किया है।

इसी मानसिक स्तर में चेतना के ऊपरी धरातल पर आरोहण और विकास की असीम सम्भावनाएँ समायी हुई हैं। इसकी परिपक्वता और दृढ़ता तथा ऊर्ध्वमुखी प्रवृत्ति सिद्ध होने पर ही इन सम्भावनाओं का मूर्त होना बन पड़ता है। इसी प्रक्रिया में बिखराव आने पर, मणि माला के सूत्र टूट जाने पर उर्ध्व गम न की संभावनाएँ समाप्त हो जाती हैं।

आज मनुष्य ऐसी ही बिखराव की स्थिति में जी रहा है। कुछ अपने व्यक्तित्व की मणियों को बिखेर चुके हैं, कुछ बिखेर रहे हैं और कुछ बिखेरने वाले हैं। इस बिखराव को मनःचिकित्साविदों ने “मनो-व्यथा” का नाम दिया है। विकास तथा वैज्ञानिकता की प्रगति की प्रक्रिया के साथ ही मानव अपनी इस अमूल्य मणियों को खोकर मनी शारीरिक रोगों, मनोविकारों से ग्रसित होता जा रहा है।

मानसिक स्तर पर बढ़ता बिखराव मनःचिकित्सकों ही नहीं, विश्व मनीषा के लिए चिन्ता का विषय है। इटली में ट्रिस्टे के “ओस्पेडेले साइकियाट्रिफो” में कार्यरत मनोअध्येता-फ्राँको बासज्लिया तथा गौस्ताद साइकियाट्रिक हास्पिटल ओस्लो के मनोचिकित्सक स्वेन हौग्सर्ग्जड ने अपनी विस्तृत अध्ययन तथा विभिन्न भू भागो के मनोरोगियों के सर्वेक्षण के आधार पर स्पष्ट किया है “इस तरह रोगियों की बढ़ती जा रही दर का कारण परिवेश में, पर्यावरण में उत्पन्न की गयी विकृतियाँ हैं। परिवेश की इस परिधि में समाज एवं वातावरण दोनों ही समाहित हैं।”

मनोविद् डोरोथी हाँफमैन “बर्ल्ड हेल्थ आर्गनाइजेशन” की पत्रिका “बर्ल्ड हेलथ” के अप्रैल 1988 में प्रकाशित अपने निबन्ध “हेल्दी माइण्ड-हेल्दी बाडी” में स्पष्ट करती है कि मानसिक स्तर का स्वस्थ व सुगठित रहना इस बात पर निर्भर है कि पर्यावरण के साथ इसका-समन्वयात्मक सामंजस्य रहे। वे करती हैं-कि “मानसिक गड़बड़ियाँ इसी कारण बढ़ रही हैं कि हम अपने आपसी रिश्ते-तोड़ते जा रहे हैं।” येले विश्वविद्यालय अमेरिका के प्रोफेसर डॉ. बेरनी सेशेल ने भी उपरोक्त मत का समर्थन करते हुए कहा है कि”पनप रही संकीर्णता के कारण भावनात्मक सम्बन्धों का टूटना ही आज की समस्याओं का एकमात्र कारण है।”

मानसिक स्तर में बिखराव के प्रमुख कारक ये घटक कौन से हैं? इस समस्या का समाधान प्रस्तुत करते हुए रशियन चिन्तक एण्टोली गोरेलोव व अलेक्जेन्डर शातालोप अपने विचारपूर्ण लेख “मैन एण्ड इन्वायरनमेण्ट मेथाँडोलाँजिकल आस्पेक्टस ऑफ प्राँब्लम” में स्पष्ट करते हैं कि “मनुष्य के जैविक आयाम, सामाजिक आयाम के साथ ही एक और इकॉलाजिकल आयाम” भी है। इन तीनों के साथ उसका एक-सा भावनात्मक सम्बन्ध है। इनमें से किसी के भी टूटने से गड़बड़ी का होना स्वाभाविक ही बन पड़ता है। इन त्रिविध आयामों के सम्बन्धों का तात्पर्य है-”जिस तरह मनुष्य अपने शरीर के साथ जुड़ा हुआ है, उसी तरह अन्य दोनों के साथ भी। शरीर की तरह अन्य दो के प्रति भी उसके उतने ही दायित्व हैं।”

इन चिन्तकों का उपरोक्त कथन कुछ अस्वाभाविक-सा प्रतीत होने पर भी पूर्णतया यथार्थ है। अभी तक प्रायः रिश्ते नाते की बात मानवी प्रगति तक समझकर ही सन्तोष कर लिया जाता रहा है। इन्हीं के साथ भाव पूर्ण सम्बन्ध स्थापित करने की बात भी सोची गई है। किन्तु गम्भीर स्तर पर विचार करने पर पर्यावरण के साथ भी उतने ही भावनात्मक स्तर की बात समझ में आने लगती है।

4त्रन74ो तो मैक्स प्लाँक श्रोडिंजर, हेनरी स्टैप के द्वारा की गई परमाणु जगत की खोजों तथा आइन्स्टीन के सापेक्षिकता के सिद्धान्त ने सम्पूर्ण विश्व के साथ एकता का वैज्ञानिक व प्रायोगिक प्रतिपादन सुस्पष्ट रूप से किया है। किन्तु पर्यावरण के साथ भावनात्मक सम्बन्धों की बात अब मनोवैज्ञानिक सुस्पष्ट रूप से स्वीकारने लगे हैं। यह सम्बन्ध एक तरफा नहीं है। पर्यावरण के विविध घटक मानव समाज से उससे भी कहीं अधिक लगाव रखते हैं।

मनीषीगण कहते हैं कि मानव समाज जिस तरह अपने दैनन्दिन जीवन में पारस्परिक व्यवहार में सामाजिक नीति नियमों का पालन करता है, उसी तरह पर्यावरण नीति का भी पालन किया जाना चाहिए। इन अध्येताओं ने स्पष्ट किया है कि पर्यावरण नीति को विस्मृत करने के कारण उत्पन्न विकृत मानसिकता ने सामाजिक नीति को भी विस्मृत करना प्रारम्भ ही नहीं, अपनाना शुरू कर दिया है।

नीति को विस्मरणीय मान बैठने का परिणाम येले विश्वविद्यालय, अमेरिका के प्राध्यापक ख्याति प्राप्त मनोविद् ‘एरिक फ्राम’ अपनी कृति “मैन ऑन हिम सेल्फ-एन इन्क्वारी इन टू द साइकोलॉजी ऑफ इथिक्स” में बताते हैं कि आज के मनोरोग इसी मान्यता की उपलब्धि हैं। उन्होंने पुस्तक की भूमिका में ही स्पष्ट किया है कि मनोव्यथा इस बात का लक्षण है कि कहीं नैतिक मूल्यों को अस्वीकारा गया है। आज के परिप्रेक्ष्य में सबसे बड़ा अस्वीकरण है-पर्यावरण नीति का उच्छृंखलतापूर्वक उल्लंघन।

कैम्ब्रीज विश्वविद्यालय के प्राध्यापक डॉ. लेबी उपरोक्त तथ्यों को स्वीकार करते हुए “अण्डर स्टैण्डिंग मेण्टल इलनेस” में कहते हैं कि “मनोव्याधि एक रहस्य है जिसका उद्घाटन और निवारण तभी सम्भव है जबकि मानव और पर्यावरण के मध्य के मानसिक संबंध उद्घाटित और स्थापित हों।”

इसके बिना मनोरोगों की बाढ़ का रुकना पूर्णतया असम्भव बताते हुए ब्रिटिश रायल कालेज ऑफ साइकिएट्री के संस्थापक अध्यक्ष प्रो.सर मार्टिन रुथ साइकियाट्री एण्ड इट्सक्रिटिक्स में कहते हैं-”प्रचलित मनोचिकित्सा के विरोध में एक आन्दोलन चलाने की आवश्यकता है क्योंकि यह उद्देश्यविहीन और अवैज्ञानिक है।

डॉ. डेविड लेवी यह भी स्पष्ट करते हैं कि-”पर्यावरण के घटकों के साथ भावनात्मक सम्बन्धों की बात कहने भर से काम न चलेगा। इसके लिए एक ऐसी बिहेवियर थेरेपी स्पष्टतया समझानी होगी, जिसके द्वारा मानव स्वयं अपनी प्रजाति तथा पर्यावरण के साथ बिगड़े संबंधों को मधुर बना सके।”

मानसिक बिखराव के इस बढ़ते स्तर तथा प्रचलित चिकित्सा उपायों की असफलता के आँकलन से मानवीय कृति की विकृति प्रमाणित हो जाती है। स्वस्थ, समुन्नत और सुदृढ़ जीवन का सहज अर्थ है- इसके सभी आयाम सुगठित हों। शारीरिक विकृति जहाँ मानव विशेष के अस्तित्व को विनष्ट करती है वही सामाजिक विकृति पूरे समाज को नष्ट कर देती है। पर्यावरण की विकृति का क्षेत्र तो और भी अधिक विस्तृत है।

पर्यावरण के साथ मानवीय भावनात्मकता भी अधिक है। हारवर्ड विश्वविद्यालय के डॉ. वेनरिस “टु वार्ड ए सोशियोबायोलाजिक थ्योरी ऑफ द इमोशन्स” में करते हैं-पर्यावरणीय अनुकूलता या प्रतिकूलता हमारी भावनाओं में अनुकूल या प्रतिकूल परिवर्तन लाने वाली होती हैं। उदाहरणार्थ-किसी सूखे पीड़ित क्षेत्र में जहाँ का इकोसिस्टम ध्वस्त हो चुका है जाने पर मन सहज ही क्षुब्ध हो जाएगा। किन्तु किसी सुरम्य घाटी में जिसका इकोसिस्टम समृद्ध है, में जान पर क्षुब्ध मन भी सहज प्रसन्न हो जाएगा। इसी मनोवैज्ञानिक घनिष्ठता के कारण ही हिमालय को, उत्तराखण्ड को धरती के स्वर्ग के नाम से जाना जाता रहा है। डॉ. वैनरिच के अनुसार सूखेवन-जल विहीन जगह पर जाने पर जो अवसाद होता है, वह लगभग किसी मित्र की मृत्यु जैसा ही है।

यदि यह घनिष्ठता इतनी अधिक है तो सम्बन्धों की मधुरता कैसे नष्ट हुई? इस विचारणीय प्रश्न का हल पोस्ट ग्रेजुएट सेण्टर फॉर मेण्टल हेल्थ-न्यूयार्क के सह निदेशक हेनरी केलरमैन “इमोशन्स एण्ड परसनाल्टी स्ट्रक्चर” में प्रस्तुत करते हुए कहते हैं कि बौद्धीकरण ही वह विष है जिससे भावनाओं में जहर-घुला और मधुरता विषाक्त हुई।”

यह हलाहल कैसे मिटे, कैसी दुर्गति को उलटकर सही मार्ग पर आया जाय, इसके लिए पश्चिमी मनीषी मनोविज्ञान के इस क्षेत्र में भी चिन्तन का आधार भारतीय वाङ्मय में पाने का प्रयत्न कर रहे हैं। मिल-हिस्ट्री ऑफ इण्डिया के खण्ड 2 के पृष्ठ 47 में एच॰ डब्लू विल्सन के अध्ययन को उन्हीं के शब्दों में कहते हैं “कि भारतीय ऋषि गहन चिन्तक थे, उन्हें पादपों व अन्य परिस्थिति की घटकों तथा स्वयं के बीच मानसिक सम्बन्धों का परिपूर्ण ज्ञान था।” इसकी साक्षी स्वरूप वैदिक ऋषि श्वेताश्वेतर (3.3) तथा मुण्डक उपनिषद् (2.13), प्रश्नोपनिषद् (6.9) छान्दोग्य (8.24) में आकाश को जीवन रक्षक बताते हुए उसे मन की उन्नति का कारण।

इसी तरह ऋग्वेद का ऋषि प्रथम मण्डल के 23 वे सूक्त के 20 वें मंत्र में जल को तृषा की तृप्ति के साथ मानसिक सुख एवं शाँति का प्रदाता भी बताता है। यही नहीं इसी के 6 वें मण्डल 50 वें सूक्त के 7 वें मंत्र में स्पष्ट करता है कि “हे जल! तुम मनुष्यों के घनिष्ठ मित्र हो, उन्हें जीवन रक्षा के साथ मानसिक शान्ति भी प्रदान करते हो।”

जल के साथ मानसिक शान्ति की अभिन्नता बताते हुए अथर्ववेद का ऋषि 19 वें मण्डल के दूसरे सूक्त के प्रथम व द्वितीय मंत्र में कहता है-” हे मनुष्य। सुन्दर पहाड़ों से निकलता जल तुझे शान्ति प्रदाता सिद्ध हो, झरने तुझे मनःशान्ति की गहराई में ले जाएँ, बरसात में बरसता पानी तेरे लिए मन के सारे उद्वेगों को शाँत करने वाला हो।”

जल की तरह वायु के बारे में भी ऋषि कहता है-”हे वायु! तुम अपने प्रवाह के साथ स्वास्थ्य देने तथा मनःसन्ताप हरने वाले हो।”

वैदिक वाङ्मय में पर्यावरण के प्रति ऐसे ही उदात्त भाव स्थान-स्थान पर बिखरे हैं। इन्हीं भावों को वर्तमान की सर्वाधिक अनिवार्यता बताते हुए डॉ. राबर्ट डिश “द इकोलाजिक कानसिएन्स वैल्यू फॉर सरवाइवल” में कहा है-”मानसिक स्तर के विकास तथा सारी व्यथाओं से मुक्त होने के लिए इन्हीं भावों से युक्त “इकॉलाजिकल साइंस” जिसे व्यवहार विज्ञान की भाषा में “डेप्थ इकाँलाँजी” कहा जा सकता है-विकसित करने की भारी आवश्यकता है।”

निस्सन्देह पर्यावरण के प्रति जागरुकता बढ़ रही है एवं उसके आध्यात्मिक पक्ष को समझते हुए व्यक्ति ने यह अनुभव किया है कि आज युग में शाँति लानी है, भावी महाविनाश को रोकना है, उन्मादग्रस्त मनःस्थिति की विडम्बना से मुक्ति पानी है तो उन मधुर संबंधों को पुनः स्थापित करना होगा जो मानवी अंतःकरण मानव शरीर को उसके चहुँ ओर के पर्यावरण से जोड़ते हैं। इन सूत्रों के जुड़े जाने से व्यक्तित्व का बिखराव रुकेगा तथा एक तनावरहित, प्रगतिशील मानवजाति विकसित होगी जिसका लक्ष्य होगा-”वसुधैव कुटुम्बकम्।”


एकान्त सेवन की तपश्चर्या

दैनन्दिन जीवन की घटनाओं, सामाजिक परिवेश की कलह से उत्पन्न उद्वेगों के कारण जीवनी शक्ति बर्बाद होती है। इस बर्बादी को रोकने के लिए सत्पुरुषों ने प्रकृतितः शान्त वातावरण में निवास करने की सलाह दी है। इस बचत को उपयोगी प्रयोजनों में नियोजित कर प्रगति का पथ प्रशस्त किया जा सकता है।

व्यक्तित्व विकास की साधना में रत साधक अपने अन्तराल की प्रसुप्त शक्तियों के जागरण हेतु प्रयोग-प्रयास करते रहते हैं। उन्हें अपने इस प्रयोजन के लिए ऐसे स्थान का चुनाव करना पड़ता है जो मनः क्षेत्र में तनाव व उद्वेग उत्पन्न करने वाला न हो।

स्तब्धता व नीरवता यद्यपि विनोद मनोरंजन में बाधक बनती और ऊब उत्पन्न करती है-जिससे हर कोई बचना चाहता है। किन्तु वैज्ञानिक दृष्टि से भी इसकी उपयोगिता दिन पर दिन अधिक साबित होती जा रही है। ध्वनि प्रदूषण, तनाव भरे वातावरण में निवास करने की शारीरिक और मानसिक हानियों को शरीर शास्त्री और मनोचिकित्सा विद् अनुभव करने लगे हैं। शान्त, एकान्त स्थान प्रत्येक दृष्टि से लाभदायक है।

निस्तब्धता एक बात है, अंधकार दूसरी। दोनों के सम्मिश्रण से तीसरी स्थिति बनती है। जो सदुपयोग और दुरुपयोग दोनों ही दृष्टि से अपने अद्भुत परिणाम प्रस्तुत करती है। आयुर्वेद शास्त्र में कायाकल्प चिकित्सा का विधान है। उसमें शरीर के पुनर्गठन की नवीनीकरण की विद्या सम्पन्न की जाती है। इस विधान में भी लम्बे समय तक एकान्त और अंधेरे में रहना पड़ता है। औषधि उपचार के अतिरिक्त इस विशेष स्थिति का जो प्रभाव शरीर पर पड़ता है उसका महत्व अधिक माना गया है।

वैज्ञानिक, साहित्यकार, शोधकर्ता योगाभ्यासी प्रायः वैसी ही स्थिति तलाश करते हैं। भीड़-भाड़ के बीच उनका काम ठीक तरह हो ही नहीं पता। चिन्तन और मनन के लिए तो विशेष रूप से एकान्त की ही आवश्यकता पड़ती है। आत्मानुसंधान में निरत योगाभ्यासी प्रायः एकान्त स्थान में रहकर अपने प्रयोग सफलता पूर्वक सम्पन्न करते थे। अभी भी वैज्ञानिक अन्वेषणों के लिए प्रयोगशालाएँ ऐसे ही स्थान और वातावरण में बनी होती हैं, जहाँ बाह्य विक्षेपों का प्रभाव कम से कम पहुँचे।

निस्तब्धता की क्षमता दोनों ही प्रकार की है। शोर से अभ्यस्त लोगों के लिए वह बहुत ही कष्ट कर होती है, किन्तु जिनके अभ्यास में आ जाती है-सहन होने एवं रुचिकर लगने लगती है। उनके लिए एक वरदान का काम करती है। रात्रि के सुनसान अन्धेरे में हवा के पत्ते खड़कने, पक्षियों के बोलने के स्वर प्रारम्भिक स्थिति में डर उत्पन्न कर सकते हैं। किन्तु उत्पन्न हुआ डर अपने आप से आता है। जब तक व्यक्ति भीड़ में खोया रहता है- तब तक स्वयं को सुरक्षित मानता है किन्तु एकान्त में जब उसे अपना दुर्बल स्वरूप देखने का अवसर मिलता है तो झाड़ी में भूत दिखाई देने लगता है, वह डर जाता है। इस स्थिति से पीछा छुड़ाने के लिए फिर भीड़ में घुसने की कल्पना या चेष्टा करता है।

साधना में एकाकीपन रहता है। अन्तर्मुखी होने की चेष्टा चलती है। पर यह चेष्टा सामान्य मनुष्यों के लिए कष्ट कर प्रतीत होती है। वे दुनिया की बहुत बातें सोच सकते हैं और साँसारिक समस्याओं पर काफी ऊहापोह कर सकते हैं किन्तु आत्मनिरीक्षण और आन्तरिक समाधान की बात सोचना और उस दिशा में कुछ आगे तक बढ़ सकना उनके लिए सम्भव ही नहीं हो पाता। इसी प्रकार वे भीड़ के साथ रहने और गपबाजी करने में घन्टों गुजार सकते हैं, पर अकेले थोड़ी देर भी बैठे नहीं रह सकते। आत्म संपर्क उनसे सधता ही नहीं। इसका विश्लेषण करते हुए मनोविज्ञानी इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं, कि ऐसे व्यक्ति वे होते हैं जिनका मत अपने व्यक्तित्व के सम्बन्ध में अच्छा नहीं होता। वे उसे बुरा, पिछड़ा और घिनौना समझते हैं फलतः अपने साथ बैठने में उन्हें घृणा उपजती और नाराज होते हैं। जिस तरह गन्दे और अविश्वासी लोगों के पास बैठने को जी नहीं करता। आत्म चिन्तन से ऐसे ही लोगों का जी उचटता है और एकान्त में उन्हें ही डर लगता है।

इसके विपरीत यह देखा गया है कि एकान्त की स्थिति में कई व्यक्ति आत्म चिन्तन में तन्मय रहने लगे और अपनी आन्तरिक दुर्बलताओं को हटाने तथा विशेषताओं को बढ़ाने के लिए सुनिश्चित मार्ग ढूँढ़ निकालने में भी सफल हो गए। इस प्रकार यह स्तब्धता जहाँ अनभ्यस्त होने के कारण प्रारम्भ में तो अखरी, किन्तु थोड़े ही समय में वह न केवल सहन ही हो गई वरन् उपयोगी तथा रुचिकर भी लगने लगी।

साधनात्मक प्रक्रियाओं, उपासनात्मक प्रविधियों की असफलता का एकमात्र यही कारण है कि उनमें मात्र कर्मकाण्ड तक सीमित कर दिया है। इस तरह उनका प्रभाव कान, आँख, मस्तिष्क तक ही पहुँच पाता है। इन यन्त्रों की बनावट ही कुछ ऐसी है कि किसी प्रभाव से देर तक प्रभावित नहीं रहते। इसलिए इनकी असफलता का रोना-रोना व्यर्थ है। अन्तः परिष्कार के लिए आवश्यक है कि अन्तःचेतना की गहरी परतों का स्पर्श और परिवर्तन कर सकने योग्य उपाय ढूँढ़ा जाय। इसके लिए एकान्त सेवन का बहुत महत्व है।

पश्चिमी देशों में “ब्रेन वाशिंग” नामक पद्धति का उपयोग किया जाता रहा है। इसका तात्पर्य है-मस्तिष्क की धुलाई-अर्थात् पूर्व मान्यताओं का बदलाव। इसमें एकान्त अंधेरी कोठरी में रखना उत्तम सिद्ध हुआ है। यद्यपि ब्रेनवाशिंग की प्रक्रिया महत्वपूर्ण नहीं है क्योंकि दूसरे के विचार किसी के ऊपर लादे जाते हैं। किन्तु इसका उपयोग अपने पूर्व संचित कुसंस्कारों को धोने तथा आत्म के दिव्यत्व से आलोकित होने के लिए किया जाय तो इसे औचित्यपूर्ण कहा जाएगा। योगियों का गुफा गमन ऐसा ही है। अरुणाचलम् के रमण और पाँडिचेरी के अरविन्द की साधनाओं को पूर्व काल का आधुनिकीकरण कहा जा सकता है। इस तरह की साधना गाजीपुर के फलाहारी बाबा, वाराणसी के तेलंग स्वामी, योगी गम्भीरनाथ, महाप्रभु जगत्- बन्धु ने भी सम्पन्न की है।

कनाडा के मनोवैज्ञानिकों ने इस अन्ध निस्तब्धता के समय कैसा अनुभव होता है, इसके परीक्षण किए हैं। इसके लिए ठीक ब्रेन वाशिंग में काम आने वाले जैसे कक्ष बनाए गए। उसमें बन्द किए जाने वाले लोगों ने बताया कि वहाँ भी उन्हें जोर-जोर की आवाजें सुनाई दी। सीटी, सरसराहट जैसे शब्द उनके कानों में आते रहे। बाद में अन्वेषण करने पर ज्ञात हुआ कि शरीर में होने वाला रक्त संचार, श्वास प्रश्वास जैसी हलचलों की ही प्रतिक्रिया थी। यही ध्वनि तरंगें उस कमरे में प्रतिध्वनित होती हैं। बन्दी उन्हें कहीं बाहर से आने वाली आवाजें समझता है।

इन कमरों में पहुँचने वालों ने अपने अनुभव में कहा कि पहले वह गहरी नींद में सो गए लगभग चालीस घण्टे सो लेने के बाद उनकी आँख खुली। जगने पर पूर्व की तुलना में अधिक चेतना और ताजगी का अनुभव हुआ। कइयों ने नशेबाजी जैसी आदतों को अपनी अन्तःप्रेरणा से त्याग दिया। कई अपने प्रिय विषयों पर मनन चिन्तन कर महत्वपूर्ण नतीजे पर पहुँचने में सफल हो गए।

एकान्त सहन का प्राथमिक अभ्यास कठिन अवश्य है किन्तु साधनात्मक प्रयोजनों के लिए इसकी अनिवार्य आवश्यकता है। गीतकार ने अठारहवें अध्याय में “विविक्तसेवीलघ्वाशी- यत्वाक्कायमानस” के सूच में एकान्त सेवन को प्रथम स्थान प्रदान किया है। इसके अभ्यास से मनोबल बढ़ता है साथ ही व्यक्ति अन्तराल की गहराइयों में उतरने योग्य हो जाता है।

पूर्ण एकान्त का लाभ अधिक समय तक न मिले तो यथा सम्भव यह प्रयत्न करना चाहिए कि इसका अधिक से अधिक लाभ उठाया जाय। इस तरह मान को भीड़-भाड़ के विचारों से हटाकर आध्यात्मिक भाव पर नियोजित करने की ध्यान-धारणा को किसी न किसी रूप में क्रियान्वित करते रहना चाहिए।


आत्मिकी का प्रवेशद्वार ध्यानयज्ञ

अग्निहोत्र प्रक्रिया का उच्चस्तरीय रूप यज्ञ है, जिसे आध्यात्मिक उत्कर्ष के मान्य उपाय के रूप में स्वीकारा गया है। अन्तःकरण से लेकर अन्तरात्मा तक के गुह्य परिष्कारों में यज्ञ की अपनी उपयोगिता और महत्ता है, पर वह भावना प्रधान, चरित्र प्रधान और साधना प्रधान होने से अधिक सूक्ष्म है। इतना सूक्ष्म कि उसे पदार्थ विज्ञान की वर्तमान पकड़ से ऊपर ही समझा जा सकता है। प्रयोगशालाओं के यंत्र उपकरण और वैज्ञानिकों की प्रत्यक्षवादी समझ उसका विवेचन-विश्लेषण आदि करने में समर्थ नहीं हो सकती।

ध्यानयोग को भौतिकी की कसौटी पर भी कसा जा सकता है। ध्यान की भौतिक-स्थूल परिणतियाँ भी होती हैं। समाधि में निःचेष्ट हो जाना, अंग का रक्त संचार बन्द कर देना, माँसपेशियों को अतिशय कड़ा कर देना जैसे कौतुक ध्यानयोग के अभ्यासी प्रायः दिखाते रहते हैं। सरकस के पात्रों का कौतूहल प्रदर्शन उनकी एकाग्रता पर अवलम्बित है। वैज्ञानिक, साहित्यकार, कलाकार अपनी विशेषतायें ध्यान को केन्द्रीभूत करके ही प्रदर्शित कर पाते हैं। परीक्षाओं, प्रतियोगिताओं में सफल हो पाना प्रायः इसी कौशल पर निर्भर रहता है। निशाना सही लगा सकने की विशेषता इसी अभ्यास पर निर्भर है। टिड्डे बरसात में हरे रंग के होते हैं और वे ही गर्मियों में पीले पड़ जाते हैं। इसका एक ही कारण है कि हरियाली उनके ध्यान काया को हरा बनाये रहती है। पर जब गर्मी आती है और घास सूखकर पीली पड़ जाती है, तब उस पर रहने वाले टिड्डे चारों ओर पीला रंग देखते और ठीक वैसा ही बन जाते हैं। मस्तिष्क पर छाये रहने वाले आयामों की प्रतिक्रिया है। वही सर्वत्र दीख पड़ता है। आँखों पर चश्मा जिस रंग का पहन जाता है, उसी रंग में रंगा हुआ सारा संसार प्रतीत होता है। जब बदलकर अन्य रंग वाला चश्मा पहन लिया जाता है, तो क्षण भर में सारा दृश्यजगत अपना रंग बदल लेता है। यह भीतर से उत्पन्न हुई मान्यता की दृश्यमान प्रतिक्रिया है। रस्सी का सांप और झाड़ी का भूत इसी प्रकार बनता है। यह भ्रान्तियाँ कई बार इतनी समर्थ और प्रबल होती हैं कि सशक्त शत्रु की तरह प्राण घातक भी बन जाती हैं। स्व संकेतों के आधार पर व्यक्तित्व किस कदर उभरते और गिरते है, इसके असंख्य प्रमाण उदाहरण हमें अपने इर्द-गिर्द के वातावरण में ही बड़ी संख्या में विद्यमान दिखते हैं।

ध्यान योग इन दिनों एक मान्य प्रयोग बन गया है। चिंतन में परिवर्तन लाने पर मनुष्य जीवन की दिशा धारा बदल जाती है। आरोग्य की उपलब्धि, मनोबल की प्रखरता एवं भविष्य निर्माण से जुड़ने वाली महती भूमिका में सघन विचार धारा का असाधारण योगदान होता है। महत्वपूर्ण रचनात्मक कार्यों की रूपरेखा निर्धारित करती है। इस संदर्भ में हुए निश्चय के उपरान्त योजना कार्यरूप में परिणत होती है, साधन जुटते हैं और सफलता के आधार खड़े होते हैं। दैनिक घटनाओं का सुनियोजन बन पड़ना और अस्त-व्यस्तता की चट्टान से टकराकर छितरा जाना और कुछ नहीं, केवल तत्परता और तन्मयता के समन्वय की कमीवेशी रहने की ही परिणति हैं।

इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए “ध्यान” को महती सामर्थ्य सम्पदा के रूप में समझा जा सकता है। उसका प्रभाव जिस काय-कलेवर पर, मनःसंस्थान पर, प्रगति और समृद्धि पर दिखाई देता है, उसे सफलताओं की आधारशिला कहा जा सकता है। हर व्यक्ति की अपनी दुनिया होती है। पहले वह बीज के रूप में मनःक्षेत्र की कल्पना बनकर आती है। इसके बाद मनःस्थिति और परिस्थिति का उपयुक्त खाद पानी लगने पर वह सुनिश्चित यथार्थता एवं संभावना के रूप में सामने आ खड़ी होती है। प्रकारान्तर से जीवन की प्रखरता और ध्यान धारणा को एक ही रूप में देखा जा सकता है।

अन्तःकरण की विशिष्टता और आत्मा की उत्कृष्टता की साधना हेतु जिन छोटे बड़े योगाभ्यासों का प्रयोग विभिन्न वर्गों के लोग विभिन्न प्रकार से करते रहते हैं, उनमें अन्य क्रिया कृत्यों का समावेश तो रह सकता है, पर ध्यान को नहीं छोड़ा जा सकता। यह ध्यान परब्रह्म का, प्रकार ज्योति का, आत्मिक प्रकाश पुँज का षट्चक्रों का पंचकोशों का, त्रिविध कलेवरों से सम्बन्धित तीन ग्रंथियों का हो सकता है। इष्टदेवों के रूप में अवतारों, देवत्वों, महामानवों अथवा दिव्य शक्तियों को माध्यम बनाया जा सकता है। इन्द्रिय तन्मात्राओं को विकसित करने के लिए शब्द रूप, रस, गंध स्पर्श के कुछ भाव चित्र गढ़े जा सकते हैं। सोऽहम् प्रस्फुटीकरण, कुण्डलिनी जागरण आदि की दिव्य साधनाएँ इसी प्रयोजन के साथ जुड़ती हैं।

इन सभी प्रयोगों के अन्तिम परिणामों को देखकर साधना से सिद्धि के सिद्धान्त को कसौटी पर कसा जा सकता है। पर इस बीच का मध्यान्तर भी इस बात का प्रमाण देता रहता है कि क्रिया की प्रतिक्रिया किस रूप में सही पड़ रही है। इस आधार पर प्रगति का, अवगति का, स्थिरता का मूल्याँकन किया जा सकता है। यदि गलती हो रही हो तो उसे सुधार जा सकता है। अवगति को रोका जा सकता है। परिणति यदि सफलता की दिशा में चल पड़ी तो उसे और भी अधिक तीव्र किया जा सकता है। इस प्रकार आत्मिक प्रगति की दिशा में सही रीति-नीति अपनाते हुए सही दिशा में चला और सही लक्ष्य तक पहुँच जा सकता है। वैज्ञानिक प्रयोगशालाएँ उस संदर्भ में महत्वपूर्ण योगदान दे सकती है। उस आधार पर निकले हुए निष्कर्ष जीवनोत्कर्ष में असाधारण रूप से सहयोगी बन सकते हैं। अभिष्ट सफलता को लक्ष्य तक पहुँचाने में उनका असाधारण योगदान हो सकता है।

शान्तिकुँज की ब्रह्मवर्चस् प्रयोगशाला में इस संदर्भ में आवश्यक शोध प्रबंध के लिए सभी उपयोगी एवं आवश्यक उपकरण जुटाये गये हैं, जिनसे मस्तिष्क में चल रहीं हलचलों का स्वरूप, संदर्भ एवं गतिक्रम का परिचय प्राप्त किया जा सकता है। स्नायु संस्थान की गतिविधियों एवं उनका माँसपेशियों तथा शरीर के अंग अवयवों पर संभावित प्रभाव की जानकारी प्राप्त की जा सकती है। प्रयोगशाला के इन निष्कर्षों के आधार पर आगे बढ़ चलने के लिए उपयुक्त मार्गदर्शन मिलता है और भूल होने की आशंका का निराकरण होता रहता है।

ब्रह्मवर्चस् की प्रयोगशाला में एक चार चैनेल का पाँलीग्राफ, एक दो चैनेल का पाँलीग्राफ, एक इलेक्ट्रोएनसेफेलोग्राफी संयंत्र तथा तीन चैनल वाला एक बायोफीडबैक यंत्र प्रयोग में लाये जाते हैं। पाँलीग्राफ द्वारा रक्त का दबाव, नाड़ी की गति, श्वास गति, त्वचा का तापमान, इलेक्ट्रोमायोग्राफ तथा इलेक्ट्रोएनसेफेलोग्राफ का एक साथ मापन कर ध्यान की अवधि में शरीर में संव्याप्त विद्यतीय क्षेत्र में परिवर्तन की अति सूक्ष्म स्थिति तक मापा जा सकता है। ई.ई.जी, उपकरण मस्तिष्क की जाग्रत, प्रसुप्त तथा गहरे ध्यान की स्थिति में, तरंगों का अंकन कर बताता है कि बहिरंग से मोड़कर व्यक्ति स्वयं को कितना अंतर्मुखी बना सका। बायोफीडबैक यंत्र में त्वचा का विद्युतीय प्रतिरोध (जी.एस.आर) माँसपेशियों की विद्युत (ई.एम.जी.) तथा मस्तिष्क की अल्फा तरंगें (अल्फा ई.ई.जी.) इन तीनों को दृश्य एवं ध्वनि के माध्यम से साधक को दिखाया व ध्यान प्रक्रिया द्वारा तीनों में परिवर्तन लाने हेतु उसे प्रशिक्षित किया जाता है। अपनी मनःशक्ति के माध्यम से साधक तनाव शैथिल्य द्वारा त्वचा का प्रतिरोध कम करता तथा ध्यान की स्थिति में ही दृश्यमान अल्फा तरंगें उत्पन्न करता है। इससे उसका मनोबल भी बढ़ता है एवं क्रमशः ध्यान की गहराई में जाने का प्रशिक्षण भी मिलता है। इन प्रयोगों के अलावा रिएक्शनटाइम, एप्टीट्यूड, इल्युजन, मेमोरी, सेल्फ कन्सेप्ट संबंधी लगभग 12 परीक्षण और कराये जाते हैं तो साइकोमेट्री की परिधि में आते हैं। ये भी यान प्रक्रिया की गहराई में जाने की परिणति के परिचायक हैं। स्थूल मापदण्ड ही सही, पर इनकी महत्ता अपने स्थान पर है।

इन प्रयोगों का आरम्भ “रंग ध्यान” से किया जाता है। यह अधिक प्रत्यक्ष, अधिक सरल और अधिक स्पष्ट है। रंग विज्ञान के ज्ञाता जानते हैं कि सूर्य किरणों में सात रंग होते हैं। उनमें से जो पदार्थ जिस रंग किरण को, जिस अनुपात में ग्रहण करता है, वह उसी रंग का दिखने लगता है। रंग स्वाभाविक हों या कृत्रिम, सभी इसी आधार पर विनिर्मित होते और परिणाम उत्पन्न करते हैं। कमरों में जिस रंग को पोता जाता है, खिड़कियों में जिस रंग के पर्दे रहते हैं, उसी रंग की किरणों का प्रवाह छनकर उस परिधि में अपना प्रभाव प्रस्तुत करता रहता है। रंगीन काँचों या काँच पर लगे रंगीन जिलेटिन कागजों से भी यही उद्देश्य पूरा होता है।

ध्यान धारणा के रंग संबंधी प्रयोगों में साधक को आँखें बंद करके अमुक रंग के ध्यान का निर्देश दिया जाता है।सुविधा के लिए उसी रंग के चश्मे पहना देते है, अथवा उस कक्ष में वैसे पर्दे लटका कर कृत्रिम प्रकाश उत्पन्न कर रंगों का ध्यान करने को कहा जाता है। इलेक्ट्रॉनिक स्ट्रोबोस्कोप की मदद से सात विभिन्न रंगों के बल्बों से आँखों पर फ्लैशेज डाले जाते हैं। रंगों का मन मस्तिष्क पर प्रभाव सर्वविदित है एवं जाँचा परखा जा चुका है। लाल रंग स्नायु संस्थान एवं रक्त की क्रियाशीलता को बढ़ाता है। प्राणशक्ति इससे बढ़ती है। नारंगी रंग साधक की जीवाणु प्रतिरोधी सामर्थ्य को बढ़ाता है तथा सभी अंगों के चयापचय प्रक्रिया को संतुलित करता है। पीला रंग पाचन संस्थान तथा स्वैच्छिक स्नायु संस्थान को संतुलित रखता है। यह बुद्धिवर्धक भी है। हरा रंग मानसिक तनाव से मुक्ति दिलाता व हारमोन ग्रंथियों का स्राव बढ़ाता है। नीला रंग रक्त परिशोधन एवं मानसिक अवसाद के हेतु प्रयुक्त होता है। बैंगनी रंग हृदय की गति को स्थिर तथा श्वसन प्रक्रिया को संतुलित करता हैं यह दर्दनाशक भी है। सभी रंग विभिन्न सम्मिश्रण में भाव संस्थान को प्रभावित उत्तेजित करते हैं। इन सम्मिश्रणों के प्रभाव को देखा जा रहा है।

देखा गया है कि सही निदान के बाद निर्धारित रंग का ध्यान करने पर अभिष्ट प्रभाव उपयुक्त मात्रा में मिलना आरम्भ हो जाता है। सूर्य किरण चिकित्सा एक विशेष कक्ष में बिठाकर अथवा रंगीन बोतलों का पानी पिलाकर लम्बे समय से की जाती रही है। पर “रंगध्यान” का नया निर्धारण नये अनुसंधान के आधार पर ही बन पड़ा है। इस ध्यान प्रक्रिया की अवधि में क्या परिवर्तन रक्त के रासायनिक घटकों तथा शरीर की इलेक्ट्रोफिजीयोलॉजी पर हो रहा है, इसे विभिन्न यंत्रों की मदद से मापा ज सकता है। इस उपचार की प्रतिक्रिया शारीरिक रोगों के निवारण की अपेक्षा मानसिक अस्त-व्यस्तता को दूर करने, तनाव मिटाने तथा मनःसंतुलन बिठाने में अधिक प्रभावोत्पादक होते देखी गयी है।

रंगों के ध्यान के आधार पर यह समझना अधिक सरल और संभव हो जाता है कि उच्चस्तरीय ध्यान धारणा की, त्राटक के विभिन्न रूपों की परिणति कितनी गहराई तक प्रवेश करके अन्तराल को प्रभावित कर सकती है। ध्यान-धारणा सभी अध्यात्म उपचारों का मेरुदण्ड है। उसी के समन्वय से हर योगाभ्यासी प्राणवान बनता एवं अभिष्ट परिणाम प्रस्तुत करता है। शाँतिकुँज के ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान ने अध्यात्म विद्या के परिणामों को खोजते हुए ध्यान विद्या के सम्बन्ध में अतिमहत्वपूर्ण प्रसंगों की जानकारी प्राप्त की है। अगले दिनों उसके और भी व्यापक परिणाम सामने आकर रहेंगे। इन्हें समय-समय पर पत्रिका में अथवा बुलेटिन के रूप में प्रकाशित किये जाने की सुनियोजित व्यवस्था की जा रही है। जिन साधकों के अपने प्रयोग भी इस दिशा में चले हों वे भी पत्र व्यवहार कर जानकारी के आदान-प्रदान का लाभ उठा सकते हैं।


नवयुग की संभावनाएं-लेखमाला-1 - भ्रान्तियों के घटाटोप में रह रहे हम सब!

कसाई के खूँटे से बंधा हुआ बकरा जब तक घास खाता और मस्ती करता रहता है जब तक उसकी गरदन कड़क्के में फँस नहीं दी जाती। पिंजड़े में घुसते समय तक चूहे भी यह कहाँ सोच पाते हैं कि अगले ही क्षण उन पर क्या बीतने वाली है। अदूरदर्शिता को एक अभिशाप ही कहना चाहिए जो तात्कालिक लाभ को ही सब कुछ मानती है और यह सोच नहीं पाती कि जो किया जा रहा है, उसका कुछ अनिष्टकर परिणाम तो नहीं होने जा रहा है। पिछली कुछ शताब्दियों से एक पर नहीं, समुदाय के विशिष्ट माने जाने वाले वर्ग पर ऐसा उन्माद चढ़ा है, जिसमें एक सोने का अण्डा राज देने वाली मुर्गी का पेट चीर कर एक ही दिन में सो अण्डे निकाल लेने और देखते-देखते धन कुबेर बन जाने की ललक ही चरितार्थ होती देखी जा सकती है।

इसी शताब्दी में दो बड़े विश्व युद्ध हुए हैं और सैकड़ों स्थानीय क्षेत्रीय। इनके कारण बताने में बहाने जो भी बनाये जाते रहे हों, पर मूल कारण आर्थिक साम्राज्य स्थापित करने की प्रतिद्वन्द्विता ही रही है। इस युद्धों में जन-धन का कितना विनाश हुआ, उसका विवरण पढ़ने से लगता है कि वह इतना असाधारण था कि यदि उसे रोका जा सका होता और बर्बाद हुई शक्तियों को सर्वतोमुखी अभ्युदय में लगाता जा सका होता तो वह स्थिति बन पड़ी होती, जिस स्वर्गोपम कहा जाता और अपनी धरती को ही ब्रह्माण्ड का एकमात्र सुसम्पन्न ग्रह कहा जाता है। कटु अनुभवों के बाद भी समझदारी वापस कहाँ लौट रही है? मिल जुलकर रहने और मिल बाँट कर खाने के लिए समर्थता कहाँ सहमत हो रही है? उसने आक्रमण की नीति अभी भी छोड़ी नहीं है। एक से एक भयंकर प्रलयंकर अस्त्र धड़ाधड़ बनते चले जा रहे हैं। वे इतने अधिक जमा हो गये हैं कि कोई पगला इस बारूद में एक चिनगारी फेंक दे तो इस धरातल का सारा वैभव आतिशबाजी की तरह जल कर भस्म हो सकता है। तैयारियों में अभी भी कमी नहीं है। सुलह-सफाई की वास्तविक इच्छा अभी भी जगी नहीं है। मात्र कूटनीतिक दांव−पेंच ही चल रहे हैं और शतरंज के खेल में सामने वाले को मात देने भर की नीति सोची-अपनायी जा रही है। इन दिनों जिनका धन युद्धोन्माद की बलिवेदी पर स्वाहा हो रहा है, यदि उसे बचाया जा सकता है तो सैन्य प्रयोजनों में लगी, हुई जनशक्ति, धनशक्ति, विज्ञान और कौशल अपनी दिशा बदलते ही उन कार्यों में जुट सकते हैं जिनके कारण संसार के अधिकाँश लोगों को अभावग्रस्त एवं पिछड़ेपन की स्थिति में रहना पड़ रहा है, पर यह सब बन कैसे पड़े? समझदारी तो वापस लौटने का नाम ही नहीं लेती। शक्ति और दुर्बुद्धि एक दूसरे के साथ इस बुरी तरह गुँथ गई हैं कि पूछने का नाम तक नहीं लेती। तीसरा युद्ध हुआ तो उसके बाद जो कुछ बच रहेगा, उसे श्मशान से कम वीभत्स न देखा जा सकेगा। छिटपुट आक्रमण भी कहाँ कुछ कम भयंकर है? इससे भी तनाव और विद्वेष की विषाक्तता दिनों दिन बढ़ रही है।

अणु शक्ति का नया उद्भव अगले दिनों क्या कुछ करने जा रहा है, इसका अनुमान लगाने से ही दिल दहलने लगता है। जापान पर गिरे दो छोटे बमों का दृश्य ऐसा है जिसे मनुष्य कभी भुला न सकेगा। अब उसी शक्ति के निर्माण से जो विकिरण वातावरण में फैल रहा है, उसका अनुमान समय-समय पर होते रहने वाले “चैर्नोबिल काण्ड” जैसे लीकेजों से लगाया जा सकता है। वैज्ञानिक कहते हैं अब तक जितना रेडियो धर्मी विकिरण फैल चुका है और जितना खतरनाक कचरा जमा हो चुका है, उससे भुगतान भी टेढ़ी खीर है। फिर आगे इस उपक्रम के चलते आगे क्या कुछ होकर रहेगा, इसकी तो कल्पना भी दहला देती है।

विज्ञान का अर्थ क्षेत्र में हुआ तो उसने औद्योगीकरण के सब्ज बाग दिखाये। विशालकाय कल कारखाने लगे। सुविधा की दृष्टि से उनके लिए बड़े शहर चुने गए। कच्चे माल व उत्पादन के पहाड़ जमा होते चले गए। इनमें कुछ व्यक्तियों को नया काम तो अवश्य मिला पर प्रतिद्वन्द्विता में कुटीर उद्योग न ठहर सके और बेकारी-गरीबी का व्यापक माहौल बन गया। कुछ लोग समृद्ध जरूर हुए पर उन्हें खारे जल से भरे समुद्र में जहाँ तहाँ उभरे हुए टापू ही कह सकते हैं। अमीरों को अधिक अमीर और गरीबों को और अधिक गरीब बनाने का सारा श्रेय प्रस्तुत वैज्ञानिक औद्योगीकरण को ही जाता है। दुष्परिणामों को देखते हुए भी उन्हें छोड़ने या बदलने की कहीं कोई योजना नहीं बन पा रही है। विशालकाय कल कारखाने घट नहीं बढ़ रही रहे हैं। इनके कारण शहरों की आबादी घिचपिच होती चली जा रही है और गाँवों से प्रतिभा पलायन बुरी तरह जारी है। इसके दुहरे संकट खड़े हो रहे हैं। एक ओर शहर गाँव से उमड़ते जन प्रवाह का बोझ सहन नहीं कर पा रहे। उनकी स्वास्थ्य, सफाई, आवास समस्या बुरी तरह चरमरा रही है। बीमारियों से लेकर अपराधी प्रवृत्ति को पनपने की छूट मिल रही है। उनसे निबटना कैसे संभव हो? बाढ़ का उफान रेत की पोटली डालने से किस प्रकार रुक सके? दूसरी ओर गाँव हैं-जिनकी प्रतिभाएँ शहरों में जा बसने से छूँछ बनकर रह गयी हैं। इच्छा होते हुए भी विकास की दिशा में वे उतना कुछ नहीं कर पार रहे जितना कि सुयोग्य प्रतिभाओं द्वारा वहाँ बसे रहने पर हो सकता था। प्रगति की आकाँक्षा कितनी ही बढ़ी चढ़ी क्यों न हो, पर अवगति से तो पहले पल्ला छूटे?

प्रदूषण अपने समय की ऐसी समस्या है, जिसे औद्योगीकरण की, अतिशय सुविधा पाने की अदम्य लालसा का प्रतिफल ही कहा जा सकता है। पर्यावरण का प्रदूषण से भरते जाना एक ऐसा संकट है जिसे अनदेखा करना वैसा ही है, जैसा शिकारी को पीछे आते देखकर शुतुरमुर्ग का बालू में मुँह छिपा लेना। चूँकि यह समूची विडम्बनाएँ हर मनुष्य के सामने प्रत्यक्ष खड़ी नहीं होती इसलिए उनका महत्व नहीं समझा जाता और ध्यान भी नहीं दिया जाता। फिर भी अन्यत्र घटित होने वाले प्रभावों से एक जगह बैठा रहने वाला सुरक्षित भी कहाँ रह पाता है? सर्दी, गर्मी, वर्षा के कारण जो भी हों, उनका मूल सिलसिला जहाँ से भी चलता हो, पर उसका प्रभाव तो हर किसी पर पड़ता है। वातावरण के साथ छेड़खानी का परिणाम वैसा ही हो सकता है जैसा कि बर्रों के छत्ते में हाथ डालने का।

ऊर्जा का अतिशय उपयोग और बढ़ते प्रदूषण के दबाव से अंतरिक्षीय तापमान बढ़ रहा है। उसने ध्रुवों के पिघल जाने और समुद्र में भयंकर बाढ़ आने से जलप्रलय की चेतावनी समय से पहले ही भेज दी है। उसका दूसरा पक्ष हिम प्रलय भी है। पृथ्वी का रक्षा कवच जिसे “ओजोन” नाम से जाना जाता है ताप के दबाव से फटता, उखड़ता जा रहा है। इन छिद्रों से होकर ब्रह्माण्डीय किरणें घर-घर बरस सकती हैं और यहाँ जो कुछ भी सजीव, सरस व सुन्दर है, उसे देखते-देखते विस्मार कर सकती हैं। यह सब प्रकृति के साथ अनावश्यक छेड़खानी करने की प्रतिक्रिया भर है।

कोढ़ में खाज की तरह बढ़ती आबादी की अपनी अलग समस्या है, जिस अकेली को ही प्रकृति रूपी शेरनी की पूँछ मरोड़ने से कम भयंकर नहीं समझा जा सकता। कोई समय था, जब बड़ी आयु में विवाह होते थे। आयु का उत्तरार्ध वानप्रस्थ में बिताते थे। कामुकता को अश्लील और हेय समझा जाता था। फलतः संतानें भी सीमित होती थीं और जनसंख्या बढ़ने का संकट खड़ा नहीं होने पाता था। लाखों करोड़ों वर्षों से यह संख्या संतुलन अपनी सीमा में बना हुआ था पर अब तो कामुकता भड़काने में साहित्य, सिनेमा, चित्र, प्रचलन, कला, संगीत सभी कुछ तो मदद देकर स्वच्छन्द विलासिता को प्रोत्साहन दे रहे हैं। ऐसी दशा में बहुप्रजनन का बाँध टूटे तो आश्चर्य ही क्या? इन दिनों जनसंख्या की अभिवृद्धि वैसा ही संकट बनकर सामने आई है. आश्वासन देने वाली ऊषा अपने समय पर उदित होती रही है एवं परिवर्तन लाती रही है।

रात्रि के उपरान्त प्रभात आता है, अवाँछनीयताओं का साम्राज्य देर तक टिकना नहीं। समय चक्र ऐसी परिस्थितियाँ भी लाता है जिसमें विपन्नताओं से उबर सकना संभव हो सके। इक्कीसवीं सदी ऐसा ही संदेश लेकर आ रही है। उसे सर्वतोमुखी अभ्युदय का समय भी कह सकते है, “सतयुग” भी। इक्कीसवीं सदी इसी की प्रतीक बन कर आ रही है।

युग संधि को द्वंद्व और संघर्ष की अवधि कह सकते है। अब से लेकर बीसवीं सदी के अन्त तक ऐसी ही द्विधा छाई रहेगी। रात्रि के अन्तिम प्रहर में तमिस्रा अत्यधिक सघन हो जाती है। दीपक जब बुझता है तो ऊँची लौ दिखाता है। चींटी मरने को होती है, तब पंख उगाती है। मरते समय गहरी सांसें चलते लगती है। यही सब देखकर यह उक्ति बनी है कि “मरता क्या न करता।” आत्मरक्षा के लिए कौन हाथ पैर नहीं पीटता? यदि अनौचित्य की प्रस्तुत परम्परा भी ऐसा ही कुछ करे तो क्या आश्चर्य?

सड़े फोड़े का गहरा मवाद यदि एक साथ ही निकलेगा तो अधिक घिनौने दृश्य उपस्थित करेगा। इस संभावता को देखते हुए अदृश्य द्रष्टाओं ने रोमाँचकारी भविष्यवाणियाँ की है जो प्रायः इस युग संधि पर लागू होती है। ईसाई धर्म में सेविन टाइम्स एवं एण्टीक्राइस्ट इस्लाम धर्म में चौदहवीं सदी में कयामत तथा भविष्य पुराण में खण्ड प्रलय की चर्चा है। अन्य पूर्वार्त्त और पाश्चात्य दिव्य दर्शियों ने भी इसी स्तर की भविष्यवाणियां की है जिनसे प्रतीत होता है कि कुसमय का अन्त होते-होते कहर बरसेगा। किन्तु इसके बाद ऐसा समय आयेगा जिसमें पिछले समस्त घाटे की पूर्ति हो जायगी ताकि गहरी खाई पाटकर समतल ही नहीं वरन् पुष्पोद्यान के रूप में भी छटा दिखाने लगे।

एक ही समय में दो काम हो सकते है। खेत की जुताई से खुदाई होती है किन्तु साथ ही बुवाई का क्रम भी चलता है और देखते-देखते खेत पर हरियाली लहलहाने लगती है। इस भारी परिवर्तन में एक सप्ताह से भी कम समय लगता है। प्रसव वेदना में जहाँ प्रसूता को कष्ट सहना पड़ता है वहाँ शिशु जन्म की खुशियाँ मनाने के सरंजाम भी साथ ही जुट जाते है। जरा जीर्ण काया इधर मृत्यु का वरण करती है, उधर दूसरे जन्म का नया सुयोग भी बन जाता है। जुआरियों में से एक हार पर उदास होता है तो दूसरा जीत पर मुसकाता है। खिलाड़ी और व्यापारी भी आपस में हारने जीतने के परस्पर विरोधी अनुभव करते है। युग संधि में देवासुर संग्राम मचे-विनाश और विकास का मल्लयुद्ध ठने तो उसे नियति की विचित्रता ही करना चाहिए। संध्या काल में दिन और रात्रि दोनों का समन्वय देखा जा सकता है। प्रायश्चित करते समय जहाँ कठिनाई का सामना करना पड़ता है वहाँ भार उतर जाने और उज्ज्वल भविष्य की संभावना बनने की प्रसन्नता भी होती है। युग संधि के इन बारह वर्षों को ऐसे ही खट्टे मीठे स्वाद का सम्मिश्रण समझा जा सकता है। अशुभ की विदाई और शुभ की अगवानी का मिश्रित माहौल इन दिनों देखने को मिलेगा। एक ओर आपरेशन की छुरी-कैंची संभाली जायगी तो दूसरी ओर घाव सीने और मरहम पट्टी के सरंजाम भी इकट्ठे होंगे। वधू को विदा करते समय जहाँ एक घर में आँसू टपकते है। वहीं दूसरे घर में गृह लक्ष्मी के आगमन पर सभी के चेहरे खिलते है। ऐसी ही द्विधा लेकर आ रही है युग संधि की बेला। इन बारह वर्षों में ऐसे ही ज्वार भाटे रहेंगे।

भ्रष्ट चिन्तन और दुष्ट आचरण के कारण जो अनर्थ उपजे है उन्हें कोई दावानल भस्मसात् करके रख दे, यह संभव है। ऐसा समय असाधारण रूप से कष्ट कारक भी हो सकता है। विपत्तियाँ और बढ़ सकती है। संकट और भी अधिक गहरा सकते है, किन्तु साथ ही यह भी निश्चित है कि उज्ज्वल भविष्य का सृजन भी इन्हीं दिनों होगा। प्रतिभाएँ इन्हीं दिनों उभरेगी और उनके द्वारा बहुमुखी सृजन की ऐसी योजनाएँ भी बनेगी जो चरितार्थ होने पर ऐसा बासंती वातावरण बना दें जिसकी इक्कीसवीं सदी के रूप में आशा, उपेक्षा चिरकाल से की जाती रही है।


नवयुग की संभावनाएं-लेखमाला-4 - आ रहा है एकता और समता का नवयुग

ऋतु प्रभाव को-प्रजनन को ध्यान में रखते हुए पक्षी नया घोंसला बनाने में जुट जाते है। वर्षा से कुछ समय पूर्व ही चींटियां अपने बिलों की सुरक्षा तथा आहार की दृष्टि से निश्चित हो जाती है। बसंत के आते ही मधु मक्खियों की सक्रियता अत्यधिक बढ़ जाती है, जिससे ग्रीष्म के सूखे माहौल में उन्हें शहद की दृष्टि से अभाव का अनुभव न होने लगे। गर्भिणी महिलाएँ प्रसूति काल में बच्चों के लिए कपड़े पूर्व से ही जमा कर लेती है। बच्चा उत्पन्न होने के उपरान्त अभिभावक उसे लालन-पालने से लेकर शिक्षा, विवाह, व्यवसाय आदि के लिए साधन जुटाना शुरू कर देते है। बीमारियों के फैलने का माहौल बनने पर लोग सुरक्षा के टीके पहले ही लगवा लेते है। यह सहज स्वाभाविक दूरदर्शिता का परिणाम है जिससे संभावनाओं को बदलने का काम, पत्थर से सिर टकराने की बात छोड़ कर सभी अपनी सुरक्षा और सुविधा की बात सोचने लगते हैं समझदारी भी इसी में है।

अगली शताब्दी की संभावनाएँ अद्भुत, अनुपम और अभूतपूर्व है। वैज्ञानिक, बौद्धिक और औद्योगिक प्रगति के साथ-साथ ही उदार चेतना का उन्मूलन भी इन्हीं दिनों हुआ है। जिसके कारण प्रगति के नाम पर जो कुछ हस्तगत हुआ है, उसका दुरुपयोग होने पर परिणाम उलटे रूप में ही सामने आये है। सुविधा साधन अवश्य बढ़े है, पर उलझे मानस ने न केवल व्यक्तित्व का स्तर गिराया है, वरन् साधनों को इस बुरी तरह प्रयुक्त किया है कि पिछले पूर्वजों की सामान्य स्थिति की तुलना में हम कहीं अधिक समस्याओं में उलझे और विपत्तियों के घटाटोप में घिर गये है। दलदल में फँस जाने जैसी स्थिति अवश्य है, पर ऐसा नहीं हो सकता कि देवत्व से एक सीढ़ी नीचे ही समझा जाने वाला मनुष्य असह्य बन कर अपना सर्वनाश ही देखता रहे, समय रहते न चेते।

मानस बदलने से प्रचलन गड़बड़ाते है और व्यवस्था अस्त व्यस्त हो जाती है। बिखराव और वैषम्य दो बड़े संकट है, जो असंख्यों प्रकार के संकटों को जन्म देते है। इन्हें निरस्त करने के लिए एकता और समता की सर्वतोमुखी प्रतिष्ठा करनी पड़ती है। इतना बन पड़ने पर वे सभी अवरोध अनायास ही समाप्त हो जाते है जो तिल से ताड़ बन कर, राई का पर्वत बन कर महाविनाश को चुनौती देते हुए गर्जन तर्जन कर रहे थे। नवयुग में एकता और समता के दानों सिद्धान्त हर व्यक्ति को इच्छा या अनिच्छा से अंगीकार करने पड़ेंगे, ऐसा मनीषियों, भविष्य द्रष्टाओं का अभिमत है। शासन और समाज को भी अपनी मान्यताएँ व्यवस्थाएँ इसी प्रकार की बनानी पड़ेगी। प्रवाह और प्रचलन के अनुरूप अपने प्रवाह में आवश्यक परिवर्तन करने होंगे। अड़ंगेबाजी तो हर भली बुरी व्यवस्था में अपनी उद्दण्डता का परिचय देने के लिए कही न कही से आ टपकती है। जलते दीपक की लौ बुझाने के लिए पतंगों के दल उस पर टूट पड़ने से बाज नहीं आते, भले ही इस दुरभिसंधि में उन्हें अपने पंख जलाने और प्राण गंवाने पड़े। तूफान का मार्ग रोकने वाले वृक्षों को उखड़ते और झोंपड़ों को आसमान में उड़ते हुए आये दिन देखा जाता है। महाकाल के निर्धारण एवं अनुशासन के सामने कोई उद्दण्डता अवरोध बन कर अड़ंगा और व्यवधान बन कर कारगर रोकथाम करेगी, इसकी आशंका न की जाय तो ही ठीक है।

अगले नवयुग की-इक्कीसवीं सदी की सम्पूर्ण व्यवस्था एकता और समता के सिद्धान्तों पर निर्धारित होगी। हर क्षेत्र में, हर प्रसंग में, उन्हीं का बोलबाला दृष्टिगोचर होगा। इस भवितव्यता के अनुरूप हम अभी से धीमी-धीमी तैयारियाँ शुरू कर दे तो यह अपने हित में होगा। ब्रह्म मुहूर्त में जाग कर नित्य कर्म से निबट लेने वाले व्यक्ति सूर्योदय होते ही अपने क्रिया-कलापों में जुट जाते है जबकि दिन चढ़े तक सोते रहने वाले कितने ही कामों में पिछड़ जाते है।

मूर्धन्य मनीषियों का कहना है कि अगले दिनों एकता, एक मान्य व्यवस्था होगी। सभी लोग मिलजुल कर रहने के लिए विवश होंगे। डेढ़ चावल की खिचड़ी पकाने, ढाई ईंट की मस्जिद खड़ी करने का कोई उपहासास्पद खिलवाड़ नहीं करेगा। सभ्यता के बढ़ते चरणों में एकता ही सबकी आराध्य होगी। विलगाव का प्रदर्शन करने वाली बाल-खिलवाड़ देर तक अपनी अलग पहचान बनाये न रह सकेगी। बिखराव सहन न होगा। विलगाव को कही से भी समर्थन नहीं मिलेगा। संकीर्ण स्वार्थपरता और अपने मतलब से मतलब रखने वाली क्षुद्रता किसी भी क्षेत्र में व्यावहारिक न होगी। मिलजुलकर रहने पर ही शाँति, सुविधा और सुरक्षा, प्रगति की दिशा में बढ़ा जा सकेगा। वसुधैव कुटुम्बकम् का आदर्श अब समाजवाद, समूहवाद-संगठन-एकीकरण का विधान बन कर समय के अनुरूप कार्यान्वित होगा। उसे सभी विज्ञजनों का समान समर्थन भी मिलेगा।

अगली दुनिया एकता का लक्ष्य स्वीकारने के लिए निश्चय कर चुकी है। अड़ंगेबाजी से निबटना ही शेष है। वे प्रवाह में बहने वाले पत्तों की तरह लहरों पर उछलते कूदते कही से कही जा पहुंचेंगे। चक्रवात से टकराने की मूर्खता करने वाले तिनकों के अस्तित्व उस वायु भ्रमर में फँस कर अपना अस्तित्व तक गवाँ बैठते है। एकता अब अपरिहार्य होकर रहेगी। जाति-पाँति के नाम पर रंग, वर्ण और लिंग के आधार पर अलग-अलग कबीले बसा कर रहना आदिम काल में ही संभव था। अब के औचित्य को समर्थन देने वाले युग में नहीं।

संसार भर में एक ही जाति का अस्तित्व रहेगा। सुसंस्कृत-सभ्य मनुष्य जाति का। काले, पीले, सफेद, गेहुँआ आदि रंगों की चमड़ी होने से किसी को भी अपनी अलग बिरादरी बनायें रह सकना अब संभव न होगा। विवेक काम देगा तो संघर्ष होगा पर समझदारी के माहौल में मात्र न्याय ही जीवित रहेगा और औचित्य ही सराहा अपनाया जाएगा। तूती उसी को बोलेगी।

धर्म सम्प्रदायों के नाम पर, भाषा, जाति, प्रथा, क्षेत्र आदि के नाम पर जो कृत्रिम विभेद दीवारें बन गई है वे लहरों की तरह अपना-अपना अलग प्रदर्शन भले ही करती रहे, पर वे सभी एक ही जलाशय की सामयिक हलचल कर मानी जायेगी। पानी में उठने वाले बबूले थोड़ी देर उछलने-मचलने का कौतूहल दिखाते है। इसके बाद त्वरित ही उनका अथाह जल राशि में विलय-समापन हो जाता है। मनुष्य को अलगाव और बिखराव में बाँधने वाले प्रचलन इन दिनों कितने ही पुरातन, शास्त्र-सम्मत अथवा संकीर्णता पर आधारित होने के कारण कितने ही प्रबल प्रतीत क्यों न होते हो, पर अगले तूफान में इन बालुई घर घरौंदों में से एक का भी पता न चलेगा। मनुष्य जाति अभी एक इन दिनों भले ही न हो, पर अगले ही दिनों तो वह सुनिश्चित रूप से एक बन कर रहेगी।

धरातल एक देश बन कर रहेगा। देशों की कृत्रिम दीवारें खींचकर उसके टुकड़े बने रहना न तो व्यावहारिक रहेगा, न सुविधाजनक। इनके रहते शोषण, आक्रामकता, आपाधापी का माहौल बना ही रहेगा। देश भक्ति के नाम पर युद्ध छिड़ते रहेंगे और समर्थ दुर्बलों को पीसते रहेंगे। “जंगल का कानून-मत्स्य न्याय” इस अप्राकृतिक विभाजन की व्यवस्था ने ही उत्पन्न किया है। हर क्षेत्र का नागरिक अपनी ही छोटी कोठरियों, में रहने के लिए बाधित है। वहाँ यह सुविधा नहीं कि अपनी अनुकूलता वाले किसी भी क्षेत्र में बस सके। कुछ देशों के पास अपार भूमि है कुछ को बेतुकी घिचपिच में रहना पड़ता है। कुछ देशों ने अपने क्षेत्र की खनिज एवं प्राकृतिक सम्पदाओं पर अधिकार घोषित करके धन कुबेर जैसी स्थित प्राप्त कर ली है और कुछ को असीम श्रम करने पर भी प्राकृतिक सम्पदा का लाभ न मिलने पर असहायों की तरह तरसते रहना पड़ता है। भगवान ने धरती को अपने सभी पुत्रों के लिए समान सुविधा देने के लिए सृजा है। प्राकृतिक सम्पदा पर सभी का समान हक है। फिर कुछ देश अनुचित अधिकार को अपनी पिटारी में बंद कर, शेष को दाने-दाने के लिए तरसायें, यह विभाजन अन्यायपूर्ण होने के कारण देर तक टिकेगा नहीं। आज की दादागीरी आगे भी इसी प्रकार अपनी लाठी बजाती रहेगी यह हो नहीं सकेगा। विश्व एक देश होगा और उस पर रहने वाले सभी मनुष्य ईश्वर प्रदत्त सभी साधनों का उपयोग एक पिता की संतान होने के नाते कर सकेंगे। परिश्रम और कौशल के आधार पर किसी को कुछ अधिक मिले वह दूसरी बात है। पर पैतृक सम्पदा पर तो सभी संतानों का समान अधिकार होना ही चाहिए। औचित्य होना चाहिए, ऐसा मनीषा ने घोषित किया है। न्याय युग में उसे “हो रहा है’ या “हो गया” कहा जाएगा।

संसार की एक भाषा होनी चाहिए। ताकि कहीं के निवासी अन्यत्र कहीं भी रहने वालों के साथ पड़ोसी की तरह बिना किसी कठिनाई के वार्तालाप कर सकें। आज तो समीपवर्ती क्षेत्रों के लोग भाषाई कठिनाई के कारण गूंगे−बहरों की तरह आपस में इशारे से बात करते है। कोई किसी से अपने मन की बात कह सकने में असमर्थ है। पुस्तकों में छिपा अगाध ज्ञान इसी भाषाई क्षेत्र में कैद होकर रह जाता है। अनुवाद और प्रकाशन की व्यवस्था अत्यंत महंगी और अतीव कष्ट साध्य है। उसका लाभ सभी देश, भाषा के लाग समान रूप से नहीं उठा सकते। इस कारण किसी क्षेत्र में उभरा विश्व भर को प्रभावित करने वाला विचार भी उसी छोटी सीमा में आबद्ध होकर रह जाता है। अन्यत्र के लोग कदाचित ही कभी उसकी झलक झाँकी प्राप्त कर सकें इन समस्त बाधाओं से निबटने के लिए हमें अपनी भाषा का व्यामोह छोड़ना होगा और हृदय की विशालता के साथ एक घटक के रूप में जुड़ जाने के लिए मानस और साहस जुटाना पड़ेगा।

बूंदें अलग-अलग रह कर अपनी श्री गरिमा का परिचय नहीं दे सकती। उन्हें हवा का एक झोंका भर सुखा देने में समर्थ होता है। पर जब वे मिलकर एक विशाल जलाशय का रूप धारण करती है, तो फिर उनकी समर्थता और व्यापकता देखते ही बनती है। इस तथ्य को हमें समूची मानव जाति को एकता के केन्द्र पर केन्द्रित करने के लिए साहसिक तत्परता अपनाते हुए संभव कर दिखाना होगा।

धर्म सम्प्रदाओं की विभाजन रेखा भी ऐसी है जो अपनी मान्यताओं को सच और दूसरों के प्रतिपादनों को झूठा सिद्ध करने में अपने बुद्धि वैभव से शास्त्रार्थों, टकरावों के आ पड़ने पर उतरती रही है। अस्त्र शस्त्रों वाले युद्धों ने कितना विनाश किया है, उसका प्रत्यक्ष होने के नाते लेखा जोखा लिया जा सकता है। पर अपनी धर्म मान्यता दूसरों पर थोपने के लिए कितना दबाव और कितना प्रलोभन, कितना पक्षपात और कितना अन्याय कामों में लगाया गया है, इसकी परोक्ष विवेचना किया जाना संभव हो तो प्रतीत होगा कि इस क्षेत्र के आक्रमण भी कम दुखदायी नहीं रहे है। आगे भी उसका इसी प्रकार परिपोषण और प्रचलन होता रहा तो विवाद, विनाश और विषाद घटेंगे नहीं बढ़ते ही रहेंगे। अनेकता में एकता खोज निकालने वाली दूरदर्शिता को सम्प्रदायवाद के क्षेत्र में भी प्रवेश करना चाहिए।

आरंभिक दिनों में सर्व-धर्म-समभाव, सहिष्णुता, बिना टकराये अपनी-अपनी मर्जी पर चलने की स्वतंत्रता अपनाए रहना ठीक है काम चलाऊ नीति है। अन्ततः विश्व मानव का एक ही मानव-धर्म होगा। उसके सिद्धान्त चिन्तन, चरित्र और व्यवहार के साथ जुड़ने वाली आदर्शवादिता पर अवलम्बित होंगे। मान्यताओं और परम्पराओं में से प्रत्येक को तर्क, तथ्य, प्रमाण, परीक्षण एवं अनुभव की कसौटियों पर करने के उपरान्त ही विश्व धर्म की मान्यता मिलेगी। संक्षेप में उसे आदर्शवादी व्यक्तित्व और न्यायोचित निष्ठा पर अवलम्बित माना जाएगा। विश्व धर्म की बात आज भले ही सघन तमिस्रा में कठिन मालूम पड़ती हो पर वह समय दूर नहीं, जब एकता का सूर्य उगेगा और इस समय जो अदृश्य है, असंभव प्रतीत होता है, वह उस बेला में प्रत्यक्ष एवं प्रकाशवान होकर रहेगा। यहीं है आने वाली सतयुगी समाज व्यवस्था की कुछ झलकियाँ जो हर आस्तिक को भविष्य के प्रति आशावान् बनाती है।


नवयुग की संभावनाएं- लेखमाला-5 - भव्य भवन का छोटा मॉडल!

भौतिक प्रगति के लिए तीन उपाय अपेक्षित होते है (1) अभावों को पूरा करना, (2) भावी प्रगति का सरंजाम जुटाना, (3) अनाचार व्यवधानों से निबटना। लक्ष्य बेध के लिए धनुष बाण और सही निशाना लगाने के लिए क्षमता अपेक्षित होती है। युग की महती आवश्यकता के लिए मनीषा को तीन प्रयास अनिवार्य रूप से करने होंगे (1) युग चेतना को जन मानस के अन्तराल तक पहुँचाने वाली महाप्रज्ञा की पक्षधर लेखनी (2) जन मानस को झकझोरने और उलटे को सीधा कर सकने में समर्थ परिमार्जित वाणी, (3) अपनी प्रतिभा, प्रखरता और प्रामाणिकता को पग-पग पर खरा सिद्ध करते रहने में समर्थ पुरोधाओं का परिकर। युग क्रांतियों में सदा यह तीनों तथ्य अपनी समर्थ भूमिका निभाते रहे है। अनाचार को आदर्शवादी प्रवाह में परिवर्तित कर सकने वाले महान कायाकल्प इन्हीं तीन अमोघ शक्तियों द्वारा सम्पन्न होते रहे है।

युगसन्धि में अशुभ का समापन और शुभ का आगमन नियोजित किया जाने वाला है। इसमें अवाँछनीयताओं से जूझने और औचित्य को लोक मान्यता में सिंहासनारूढ़ होने की क्रिया प्रक्रिया चलेगी। इसके लिए ऐसी प्रतिभाओं को खोजना-निखारना और कार्य क्षेत्र में उतारना होगा जो प्रचारात्मक, रचनात्मक और सुधारात्मक, तीनों ही क्षेत्र में अपने-अपने स्तर की मोर्चे बन्दी कर सकें। लक्ष्य की ओर सनसनाती हुई बढ़ सकें।

क्या ऐसा सम्भव है? इस पर सहज विश्वास नहीं होता। कारण कि इन दिनों आदर्शवादिता मात्र कहने सुनने की चीज बनकर रह गई है। वह व्यावहारिक जीवन में उतर सकती है इस पर भरोसा नहीं किया जाता, क्योंकि उत्कृष्टता के प्रवर्तक निजी जीवन में-”कथनी और करनी” की एकता सिद्ध नहीं कर पाते। इससे लगता है कि वे स्वयं उस पर विश्वास नहीं करते जिसकी कि दूसरों से आशा करते है जो स्वयं सफल रहा है उसे देखकर कौन यह विश्वास करेगा कि उच्च सिद्धान्तों की बात बताने और उनको चरितार्थ करने की सम्भावना को साकार करना जैसा इस आधार पर बन भी पड़ता है या नहीं?

फिर किया क्या जाय? इसे लिए एक ही उपाय सोचा गया कि इतने विशाल आयोजन के लिए एक विश्वस्त परिचय देने वाला मॉडल खड़ा किया जाय। ताजमहल जैसी बड़ी इमारतें बनती है, तो उनके लिए आर्चीटेक्ट, इंजीनियर मात्र नक्शा खींचकर निश्चिन्त नहीं हो जाते वरन् उसी आकार-प्रकार का एक साइज के अनुरूप मॉडल खड़ा करते है। उसे देखने पर हर किसी का दिमाग साफ होता है और समझ में आता है कि किस स्तर पर क्या तैयारियाँ करनी होगी। इस आधार पर प्रज्ञा अभियान की रूपरेखा किस प्रकार कार्यान्वित की जा सकती है, इसका एक छोटा किन्तु आनुपातिक मॉडल बनाकर खड़ा किया है। कृषि फार्मों में यही होता रहता है और जो सफलताएँ मिलती है उन्हें सर्वसाधारण को दिखाकर यह हृदयंगम कराते है कि इस प्रकार यह करने से इतनी उपलब्धि हस्तगत हो सकती है। विभिन्न प्रयोगशालाएँ भी यही करती रहती है। पायलट प्रोजेक्ट्स में यही होता है।

शांतिकुंज की विचार क्रान्ति योजना के तीन तथ्य अपने-अपने ढंग से प्रयोग परीक्षण के क्षेत्र में उतारे गए है और उसे निकट से गंभीरता से देखने के लिए हर किसी को अवसर दिया गया है। कारण कि कई बार बढ़-चढ़ कर दावे किए जाते और विज्ञापन छपाये जाते हैं। अब जाँच परख पर ही निर्भर है कि किसी बड़ी योजना के सम्बन्ध में उसकी सम्भावनाओं का निश्चय करने के लिए आवश्यक विश्वास पैदा किया जा सके।

विचार क्रान्ति के अंतर्गत सर्व साधारण को यह बताया जाना है कि मनुष्य की भावी गतिविधियों का स्वरूप क्या होगा? अभिष्ट बदलाव के लिए किए निर्धारणों को लोक व्यवहार में सम्मिलित करना पड़ेगा? इस सम्बन्ध में कुछ निर्धारण इस प्रकार है।

“समझदारी, ईमानदारी, जिम्मेदारी, बहादुरी, दयानतदारी को स्वभाव का अंग बनाना होगा। वह अपनाना होगा जो हम दूसरों से अपने लिए अपेक्षा करते है। “सादा जीवन उच्च विचार” का सिद्धान्त सर्वग्राही बनाना होगा। संयमशील बन अनुशासन में रहा जायगा। एकता और समता के सार्वभौम सिद्धान्तों के आधार पर समाज की अभिनव संरचना की जाएगी। सत्प्रवृत्तियों को बढ़ाया और कुप्रचलनों को हटाया जाएगा। औसत नागरिक स्तर का निर्वाह स्वीकार होगा। नीति का उपार्जन ही स्वीकार होगा। समय, श्रम, साधन, कौशल आदि का जितना अंश बन सकेगा, पिछड़ों को उठाने और उठो को उभारने में लगाया जायगा। शालीनता को संगठित किया जायगा और उसे सामुदायिक उत्कर्षों के लिए पूरी तरह नियोजित किया जायेगा।”

दृष्टि दौड़ाने पर इन दिनों मानवी गरिमा के अनुरूप आचरणों में भारी व्यतिरेक दिखाई पड़ती है। अवांछनीयता अपनाने वालों को अपनी भूल का अहसास कराना होगा और जिनके विश्वास आदर्शवादिता के सम्बन्ध में असमंजस ग्रस्त हैं, उन्हें तर्कों, तथ्यों, प्रमाणों, उदाहरणों के आधार पर यह स्वीकारने के लिए बाधित किया जायगा कि श्रेय का वरण करने में ही अपना और सब का कल्याण है। विचार क्रान्ति के अंतर्गत ऐसा ही प्रबल प्रयास करना होगा जिससे विश्वव्यापी लोक मानस को भटकाव से विरत करना और सन्मार्ग पर चला करना सम्भव हो सके।

थोड़ा हेर-फेर करना होता तो यह छुटपुट स्थानीय प्रयत्नों से भी सम्भव हो सकता था पर जब 500 करोड़ से भी अधिक मनुष्यों की भौतिक गतिविधियों एवं आन्तरिक चिन्तन चेतना को बदलना है तो उसे सम्पन्न करने की योजना भी असाधारण स्तर की और उपयुक्त माध्यमों और साधनों से सम्पन्न करनी होगी। वही किया भी जा रहा है।

इस संदर्भ में प्राथमिकता युग साहित्य के सृजन को देनी होगी। प्रजातंत्र, साम्यवाद जैसी युग चेतनाएँ उन प्रतिपादनों के पक्षधर साहित्य से ही उद्भूत हुई है। सामाजिक कुरीतियों और अन्य प्रतिगामिताओँ के निराकरण में भी इसी माध्यम ने आश्चर्यजनक परिवर्तन कर दिखाये है। युग साहित्य की व्यवस्था भी अभिष्ट परिवर्तन के लिए करनी ही होगी। यह कैसे किया जाय, इसका एक छोटा प्रयास “युग निर्माण योजना” के अंतर्गत हुआ है। उसने बहुत कुछ सृजा छापा और करोड़ों तक अपने प्रतिपादनों को पहुँचाया है। यह आगे बढ़कर बनायी गई एक पगडंडी है, जिसे समर्थ मनीषा अपने अनुरूप बड़ा बनाकर राजमार्ग के रूप में विकसित कर सकती है।

हुआ यह कि एक सामान्य व्यक्ति ने युग चिन्तन में निमग्न निरत रहना अपना लक्ष्य बनाया। जो सूझा, उस पर अनेकों बार विचार किया और फिर प्रकाशन की दिशा में कदम बढ़ाया। साधनों के अभाव में हर प्रकाशन को 500 की संख्या में छपाते रहने का निश्चय करके रुका हुआ कदम आगे बढ़ाया गया। प्रतिपादन इतने सारगर्भित थे कि समर्थकों और विरोधियों ने समान रूप से उन्हें पढ़ना, समझना और अपने जैसे अन्य विचारशीलों को पढ़ने के लिए आग्रह पूर्वक सहमत करना आरंभ किया। क्रमशः माँग बढ़ती गई और लेखक का उत्साह ही नहीं कार्यान्वयन का प्रयास भी बढ़ता गया। पचास वर्ष के इस प्रयास की उपलब्धि देखकर लोगों को इस बात का आश्चर्य करना पड़ता है कि एक नितान्त सामान्य स्थिति में युग साहित्य का इतना सृजन और उसका असाधारण विस्तार कैसे संभव हो सका? इसका एक ही उत्तर में समाधान बन पड़ता है कि दैवी चेतन सत्ता ने अन्तराल के प्रवाह को उच्च उद्देश्यों की ओर कदम बढ़ाते हुए देखा, प्रेरणा दी एवं ये प्रयास आँधी के साथ उड़ने वाले तिनके तथा पत्तों की तरह कहीं से कहीं पहुँचते चले गये।

अखण्ड-ज्योति पत्रिका में विज्ञापनों की कोई आमदनी नहीं है। सहायता के लिए भी याचना नहीं की जाती। बिना लाभ और बिना नुकसान के निर्माण नीति का अवलम्बन लिया गया है। इसी का परिणाम है कि विगत पचास वर्षा में पत्रिका की सदस्य संख्या 500 गुनी हो गई। अगला निश्चय है कि कुछ ही दिनों में एक हजार .... होने का कीर्तिमान संस्थापक के जीवित रहते बनकर रहेगा। एक हिन्दी मासिक से सत्प्रवृत्ति संवर्धन का काम नहीं चला तो विषयों के विभाजन को ध्यान में रखते हुए दूसरी पत्रिका “युग निर्माण योजना” निकाली गयी। इसके गुजराती, मराठी, उड़ीसा, तमिल, तेलगू संस्करण छपने लगे। इन सबकी ग्राहक संख्या प्रायः पाँच लाख और पाठक संख्या पच्चीस लाख है। एक प्रति को न्यूनतम पाँच व्यक्ति पढ़ते है। बिना पढ़े इन प्रतिपादनों को चाव पूर्वक सुनते है। इस प्रकार एक से अनेक होने की श्रुति चरितार्थ हुई।

पत्रिकाएँ सामयिक महत्व की होती है महीना बीतते ही वे पुरानी पड़ जाती है और उपेक्षित बनती है। इसलिए पुस्तकाकार साहित्य का सृजन भी साथ-साथ आरंभ हुआ। अब तक 500 से भी अधिक अनेकानेक विषयों पर प्रेरणाप्रद पुस्तकें छप चुकी है। उनके कितने ही संस्करण बिक चुके है। अन्य भारतीय भाषाओं में और अंग्रेजी में उनके अनुवाद धड़ल्ले से छपते चले जाते है।

विकट प्रश्न है विक्रय का। पुस्तक विक्रेता को, सरकारी पुस्तकालयों को बड़ी एवं आकर्षक कलेवर की पुस्तकें चाहिए, जिनका मूल्य भी अधिक हो और बेचने वालों को इस महंगाई में उपयुक्त कमीशन का लाभ भी मिले। इस कथन का औचित्य हो सकता है कि गरीब देश का गरीब पाठक ऐसे रूखे समझे जाने वाले साहित्य को महंगे मोल में किस प्रकार खरीदे? और जन-जन तक पहुँचाने का उद्देश्य कैसे पूरा हो? इस असमंजस का हल पाठकों ने अपने बलबूते निकाला। जिसे उनने उपयुक्त पाया उसे दूसरों तक पहुँचाने का प्रयत्न स्वयं आगे बढ़ कर किया। बिना मूल्य घर-घर जाकर पढ़ाने और वापस लेने की योजना बहु सफल एवं लोकप्रिय बनी। साथ ही अधिक पसंद करने वाले उनमें से कुछ खरीदने भी लगे। धकेल गाड़ियों के रूप में “ज्ञान रथ” गली-गली इसी प्रयोजन के लिए नियमित रूप से घूमने लगे और वह प्रचार प्रसार बन पड़ा? जिसकी अब तक कल्पना भी नहीं की जा सकी है। ऐसा कुछ ईसाई मिशनों और साम्यवादी क्षेत्रों में ही होता रहा है। उसी प्रकार का यह भी एक अपने ढंग का अनोखा प्रयोग है।

उच्च स्तरीय लेखक जुटाना भी कम कठिन नहीं, जो ऐसे जटिल विषयों पर लेखनी उठा सकें उनकी संख्या गिनी चुनी है। वे व्यस्त भी पाये जाते है और लेखन, शुल्क, कापी राइट आदि की भी उचित अपेक्षा रखते है। पर उस भार के बढ़ने पर तो साहित्य का मूल्य बढ़ता है जबकि आवश्यकता इस बात की है कि युगक्रांति सम्पन्न करने के लिए सस्ते से सस्ता सत्साहित्य पाठकों के हाथ तक पहुँचें यही झंझट व्यवसायी प्रकाशकों के साथ में भी है। उनका लाभाँश सस्ता साहित्य उपलब्ध कराने में अड़चन उत्पन्न करता है। इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए लेखन, प्रकाशन, प्रचार, विक्रय आदि के बहुमुखी प्रयासों को एके ही तंत्र के अंतर्गत केन्द्रित करना पड़ा।

युग साहित्य का लेखक इस संस्था का संस्थापक, निजी सम्पत्ति का बहुत पहले विसर्जन कर चुका है। रोटी, कपड़ा और मकान की शरीर यात्रा पर उसे पूरा संतोष रहा है। चार घंटा नियमित और एकाग्र रूप से प्रस्तुत ज्ञान यज्ञ में उसका शरीर और मस्तिष्क समर्पित भाव से निरत रहा है। फलतः उसका यह व्रत निभ गया कि कलम की कमाई किये बिना ही काम चलाया जाय। अन्य संस्थानों के लिए कभी लिखा है तो लिखाई का एक पैसा भी स्वीकार नहीं किया। कापी राइट नाम से कोई चीज सोची ही नहीं गई। जब लाभाँश ही नहीं तो कापी राइट किस बात का। यह कारण है कि मिशन के लेखन-प्रकाशन को कोई भी छाप लेता है। लेखों को अनेक पत्रिकाएँ छापती है, पर उन्हें उद्धरण का हवाला देने की आवश्यकता नहीं पड़ती।

यह उदाहरण इसलिए प्रस्तुत करना पड़ा कि अगले दिनों लोकमानस को ब्रेन वाशिंग की प्रक्रिया से होकर गुजरना है तो उसके लिए उपयुक्त साहित्य सृजन प्रकाशन विक्रय का क्या प्रबंध करने की आवश्यकता पड़ेगी? जो हुआ है, हो रहा है, उसका प्रकाश कुछ लाखों की परिधि में ही अपना प्रकाश फैला सका है। जबकि संसार की प्रमुख चौबीस भाषाओं में 600 करोड़ मनुष्यों को बेतरह झकझोरने और शीर्षासन तक के लिए तैयार करने, हर स्थिति में कमर कसने हेतु प्रस्तुत प्रयास की तुलना में हजारों लाखों गुनी योजनाएँ बनानी पड़ेगी। जो लोग समझते है कि यह नीरस विषय है, जन सहयोग न मिलेगा, साधनों के अभाव में इतना बड़ा तंत्र कैसे खड़ा हो सकेगा, उन्हें जानना चाहिए कि उच्च स्तरीय साधना में असाधारण बल होता है और यदि वह प्रचंड हो सके तो सहयोग, समर्थन लेने का सुधारने तक का सारा सरंजाम जुट सकता है। शर्त एक ही है कि निर्धारण और क्रियान्वयन पूरी ईमानदारी से और समर्पित भाव से किया गया हो। लेखनी का यह चमत्कार अगले दिनों विश्व चिन्तन एवं प्रवाह को मोड़ने में किस प्रकार सफल हो सकता है, इसका बड़ी योजनाएँ बनाने वाले यदि सूत्र संकेत भर प्राप्त कर सकें, तो अच्छा ही होगा। विश्वास किया जाना चाहिए कि युग चेतना अपनी आवश्यकता किसी अदृश्य प्रेरणा के आधार पर पूरा करेगी और सफलता के चरण लक्ष्य तक जा पहुँचेगी।

विचार परिवर्तन का दूसरा माध्यम है वाणी। प्रवचन, समारोह, आयोजन, गोष्ठियां, विचार विनिमय आदि इसी प्रयोजन के निमित्त होते है। इनमें प्रवक्ता क्या प्रतिपादन करें, इसके लिए उन्हें अलग से कुछ सीखना समझना नहीं है। कोई पाठ्यक्रम पूरा करना नहीं है। युग साहित्य के अंतर्गत वह सब कुछ मिल जायगा तो विभिन्न परिस्थितियों में विभिन्न प्रयोजनों के लिए विभिन्न शैलियों में कहा जाता है। मात्र बात भाषण कला की रह जाती है। वह अन्य कलाओं की तरह कुछ दिन के अभ्यास से सीखी जा सकती है। जितना साइकिल चलाना सरल है, उतना ही वाणी को मुखर करना, जीभ चलाना भी सुगम और मनोरंजक है, उसे सीखा जा सकता है। शान्ति कुंज में इसी कौशल को सिखाने का, एक-एक महीने वाले सत्रों में अभिष्ट अभ्यास करने का अवसर निरन्तर मिलता रहता है।

आदर्शवादिता के क्षेत्र में प्रवेश करने के लिए भाव संवेदनाओं की शुष्कता को सरसता में बदलना आवश्यक है। यह कार्य भाषणों की अपेक्षा संगीत माध्यमों से अधिक अच्छी तरह हो सकता है। भाषण ज्ञानयोग का समर्थ है और संगी भक्ति भावना का पक्षधर। वाणी विनियोग में युग चेतना ने भाषण और संगीत दोनों का समन्वय किया है। यहाँ संगीत का तात्पर्य लोक गायन, सुगम संगीत से समझा जाना चाहिए जिसमें वाद्य यंत्र भी कम मूल्य के प्रयुक्त होते है और वे कम समय में अधिक आसानी से अभ्यास में उतर जाते है।

एक महीने वाले शान्ति कुंज सत्रों में वाणी शक्ति को भाषण और संगीत माध्यम से काम चलाऊ सफलता मिलती रहती है। अभी इस स्तर के पाँच सौ शिक्षार्थी हर महीने प्रशिक्षण प्राप्त करते रहते है। उनके निवास, भोजन, प्रशिक्षण प्राप्त करते रहते है। उनके निवास, भोजन, प्रशिक्षण उपकरण आदि की भी तो आवश्यकता पड़ती है। इस वर्ग में याँत्रिक प्रचार उपकरणों का प्रयोजन भी सम्मिलित है। स्लाइड प्रोजेक्टर, टेप-रिकार्डर, लाउडस्पीकर आदि यंत्र भी ऐसे है जो प्रचार कार्यों में आये दिन काम आते है। एक महीने की कक्षाओं में इन सबका अभ्यास हो जाता है। इसके साथ-साथ ये सभी वातावरण के सूक्ष्म परिशोधन की महापुरश्चरण साधना के भागीदार भी बनते है एवं अपने यहाँ जाकर प्रज्ञामण्डल बनाकर साप्ताहिक सत्संग-स्वाध्याय-उपासना का क्रम चलाते है।

पाँच सौ हर मास के शिविरों से एक साल में छः हजार हो जाते है। युग संधि के आगामी बारह वर्षों में युग प्रवक्ताओं की संख्या एक लाख तक पहुँचनी है। इसलिए स्थान की, निःशुल्क भोजन की कुछ ही समय में व्यवस्था बन जायेगी तो युग प्रवक्ताओं के निर्माण की जो गति आज है, वह अगले दिनों न रहेगी। ईसाई मिशनों के पास संसार भर में प्रायः एक लाख प्रशिक्षित पादरी है। साम्यवाद जैसे प्रचंड आन्दोलन को सिर पर उठाये फिरने वाले लोक सेवी कार्यकर्ताओं की संख्या भी प्रायः इतनी ही होगी। भारतीय संस्कृति से उद्भूत आध्यात्मिक ऊर्जा को विश्व के कोने-कोने तक पहुँचाने के लिए भी इससे कम व्यक्ति नहीं लगेंगे।

अनुमान लगाया जाना चाहिए कि शान्तिकुंज जैसा स्वल्प सामर्थ्य संपन्न तंत्र जो कर सकता है, उसी काम को यदि समर्थ प्रतिभाएँ और मनीषीगण मिलकर अपने कंधों पर उठाएँ तो उसकी कितनी बड़ी परिणति हो सकती है। इसका सहज अनुमान लगाया जा सकता है।

निजी निर्माण कितने कठिन पड़ते है, इसे सभी जानते है। निजी समस्याओं का समाधान कितना उलझन भरा होता है, इससे कौन परिचित नहीं? फिर शताब्दियों से संग्रही विकृतियों से व्यापक स्तर पर निबटना कितना कठिन हो सकता है, इसकी गंभीरता पर दो मत नहीं हो सकते। इतने पर भी प्रस्तुत मॉडल को देखकर यह अनुमान लगाया जा सकता है कि मानवी प्रतिभा और प्रयत्नशीलता नगण्य नहीं है। वह जब कुछ करने पर उतारू होती है तो समुद्र लाँघने और गोवर्धन उठाने जैसे बड़े काम सम्पन्न करती है। इस चर्चा में एक चरण और जोड़ा जा सकता है कि विचार क्रान्ति की दिशा में एक छोटे “एकलव्य” ने लेखनी और वाणी के जो धनुष बाण उठाये, वे अपने अब तक की सफलता और भावी संभावना का संकेत देते हुए निराशा के माहौल में भी आशा की उमंगे उत्पन्न कर सकते है। (क्रमशः)


युग संधि-महापुरश्चरण प्रयोजन और प्रयास

पिछली दो शताब्दियों से विज्ञान के उदय अभिवर्धन और चमत्कार प्रस्तुत करने का अवसर कहा जाता है। प्रत्यक्षवाद द्वारा तत्वदर्शन को पीछे धकेले जाने का अवसर भी यही रहा। पचाने की क्षमता से अधिक साधन प्राप्त होने पर उत्पन्न उन्माद ऐसा ही कुछ करा डालता है, जो विवेकशीलता की दृष्टि से नहीं किया जाना चाहिए। इधर प्रकृति के दरबार में किसी के साथ लिहाज नहीं, करनी का फल भुगतान एक अनिवार्यता है, जो रहता होकर ही है। यही क्रम भी चल रहा है।

विज्ञान ने औद्योगिक की दिशा में कदम बढ़ाया। विशालकाय काल कारखाने लगे। उत्पादन की मात्रा इतनी बढ़ी कि उसे खपाने के लिए मंडियों की आवश्यकता पड़ी। इसका एक प्रभाव यह हुआ कि अविकसित देशों पर आधिपत्य जमाकर, उन्हें कच्चा माल देने और बना माल खरीदने के लिए विवश किया गया। भारत पर अंग्रेजी शासन का यही प्रधान कारण था। औद्योगिक से सम्पन्न अन्य देशों ने जहाँ बस चला वहाँ पंजे गड़ाये। दूसरे समर्थ राष्ट्रों से यह आशातीत लाभ देखा न गया और वे आपस में लड़ पड़े। इन दो सौ वर्षों में छुटपुट युद्ध तो हजारों हुए, पर दो विश्व युद्ध ऐसे हुए, जिन्हें अभूतपूर्व कहा जा सकता है। इनमें जन-धन की अपार क्षति हुई।

पिछले छोटे बड़े युद्धों के परिणाम देखकर भी तीसरे विश्व युद्ध की हविश शान्त नहीं हुई है। युद्धोन्माद अणु आयुधों के अम्बार लगाने पर उतारू है। यदि यह युद्ध हुआ तो धरती तल पर शायद एक भी जीवधारी न बचेगा। यदि वह न हुआ तो भी आणविक कचरे और विकिरण से ही जन समाज के अर्द्ध मृतक बनने जैसी स्थिति पैदा हो रही है। दृष्टि पसार कर देखने से लगता है कि यह कथित प्रगति वर्तमान समुदाय और भावी पीढ़ी के लिए ऐसे संकट खड़े कर रही है, जिससे निबटना अभी भी कठिन है, अगले दिनों तो पूरी तरह गतिरोध हो जायेगा।

प्रत्यक्षवाद ने तत्वदर्शन को झुठलाने में बड़ी हद तक सफलता पायी है। फलतः अनाचार, अपराध इस तेजी से बढ़े हैं कि जन साधारण अपने आपको असुरक्षित, आशंकित, आंतकित अनुभव करता है। शोषण और छल की तेजी से बढ़ती हुई प्रवृत्ति कहीं एक दूसरे को चीर कर खा जाने की स्थिति तक न पहुँचा दे? स्नेह, सौजन्य, सहकार घटने तथा लिप्सा-लालसाओं के अनियंत्रित होने पर इसके अतिरिक्त और हो ही क्या सकता है कि दैत्यों-दानवों का युग लौट आये?

समय गया, कामुकता को छुट मिली तो बहु प्रजनन स्वाभाविक है - चक्रवृद्धि क्रम से बढ़ रही जनसंख्या की आवश्यकताएँ पूरी करने के लिए साधन उस गति से बढ़ नहीं सकते। न तो पृथ्वी को रबड़ की तरह खींच कर बढ़ाया जा सकता हैं। न उत्पादन दिन दूना रात चौगुना हो सकता है। औद्योगीकरण के बढ़ते प्रदूषण से हरीतिमा पर और भी गहरी चोट की है। हरीतिमा घटने से भूमि क्षरण, रेगिस्तानों के विस्तार जैसी समस्याएँ विकराल हो रही है। पर्यावरण का असंतुलन ऋतु चक्र को ही अस्त−व्यस्त किए दे रहा है। जन संख्या की बाढ़ न रुकने से विकास के लिए किए गये प्रयास विफल होते जा रहे है। इन सब का परिणाम क्या होगा? इसका अनुमान लगाते ही हर विचारशील का मन घबराने लगता है।

किसी भी शक्ति अथवा साधन का दुरुपयोग बुरा होता है। मर्यादाएँ टूटी और वर्जनाओं का उल्लंघन द्रुतगति से हुआ तो उसके परिणाम भयावह ही हो सकते हैं। यही हो भी रहा है। समस्याओं विभीषिकाओं विपत्तियों के घटाटोप बढ़ा रहें हैं। पतन और पराभव का क्रम जिस तेजी से गति पकड़ रहा हैं, उसे देखते हुए अगले दिनों की भयंकरता में कोई संदेह नहीं रह जाता हैं।

प्रत्यक्ष ही नहीं, परोक्ष भी प्रदूषित

मनुष्य का चिन्तन, चरित्र और व्यवहार व्यक्ति और समाज को तो प्रभावित करता ही है, सूक्ष्म जगत भी उससे अछूता नहीं रह पाता है। विकृत चिन्तन और भ्रष्टचरित्र, सूक्ष्म जगत के अदृश्य वातावरण को प्रदूषण से भर देते हैं। प्रकृति की सरल स्वाभाविकता बदल जाती है और वह रुष्ट होकर दैवी आपत्तियाँ बरसाने लगती है। इन दिनों अतिवृष्टि, अनावृष्टि, बाढ़ दुष्काल, भूकम्प जैसी विपत्तियां बढ़े क्षेत्रों को प्रभावित कर रही है। शारीरिक ही नहीं, मानसिक रोगों में भी भारी बढ़ोतरी हो रही है। मानवी सद्भावना में, व्यक्तित्व के स्तरों में बुरी तरह गिरावट आ रही है। इन सब के कारण वर्तमान जटिल और भविष्य धूमिल बनता जा रहा है। अनेक विसंगतियाँ जड़ें जमा रही है। जो लोग इन परिस्थितियों में सुधार करने की स्थिति में हैं, उनमें भी इन कर्त्तव्यों के प्रति आवश्यक उत्साह नहीं हैं। सदुपयोग से वही शक्तियाँ सुख सुविधा सम्पन्न स्वर्गीय वातावरण बना सकती हैं। दुरुपयोग तो नरक के अलावा और कुछ बना ही नहीं सकता।

प्रवाह यदि उल्टा न गया तो स्थिति ऐसी भी आ सकती है जिसे प्रलय कि समतुल्य कहा जा सकता है। अंतरिक्ष का बढ़ता हुआ तापमान ध्रुव प्रदेशों की बर्फ गलाकर जल प्रलय जैसी स्थिति बना सकता है। असंतुलन के दूसरे पक्ष के कारण हिम प्रलय की संभावनाएँ विज्ञजनों द्वारा व्यक्त की जा रही है। धरती कि अंतरिक्ष कवच -ओजोन की पर्त क्षीण होकर फट गयी तो ब्रह्मांडीय किरणें धरती के जीवन को भूतकाल का विषय बना सकती है। यह सब और कुछ नहीं, मनुष्य की उन करतूतों की प्रक्रिया है, जो पिछली दो शताब्दियों में उन्मादी उपक्रम अपनाकर महाविनाश को आमन्त्रण दे रही है।

परन्तु सृष्टा ऐसा होने नहीं देगा। उसने इस बरती को, उसकी प्रकृति सम्पदा को, मानवी सत्ता को अलग मनोयोग पूर्वक सँजोया है। सृष्टि के आदि से लेकर अब तक अनेक बार, अनेकों की विकट परिस्थितियाँ आयी है। उन्हें टालने वाले ने समय रहते टाला है और उलटी दिशा में बहते प्रवाह को उलट कर सीधा किया है। “यदा यदा हि धर्मस्य” वाला वचन समय समय पर पूरा होता रहा है। अब भी वह पूरा होकर रहेगा। वही होने की आवश्यकता में सन्देह नहीं, पर बरतते हुए भी निराश होने कर आवश्यकता नहीं है। विनाश की विभीषिकाओं में सन्देह नहीं है वर यह भी निश्चित है कि समय चक्र पूर्व स्थिति की ओर घूम गया है। पुरातन सतयुगी वातावरण का पुनर्निर्माण होकर रहेगा। इसके लिए उपयुक्त समय यही है।

रात्रि जब समाप्त है, तो एक बार सघन अंधियारा छाता हैं। बुझते दीपक की लौ तेज हो जाती है। संव्याप्त असुरता भी यदि अपने विनाश की वेला आश्चर्य नहीं। प्राचीन काल में असुरों को जब अपनी दुष्टता का समापन होता दिखा तो उन्होंने देवत्व पर सारी शक्ति झोंक कर आक्रमण किया। हारा जुआरी एक बार साहस बटोर कर सब कुछ दाँव पर लगा देता है। भले ही उसे वह सब गँवाना पड़ें। युगसंधि में ऐसा ही हो तो आश्चर्य।

परिवर्तन की वेला युगसंधि

युगसंधि प्रसव पीड़ा जैसा समय हैं। शिशु जन्म के समय जननी पर क्या बीतती है, इसे सभी जानते हैं, पर पुत्र रतन को पाकर उसकी खुशी का ठिकाना भी नहीं दिनों रहता। फसल जिन हिदउनो दिनों पकने को होती है। उन्हीं दिनों खेतों पर पक्षियों के झुंड टूटते हैं। युगसंधि की इस वेला में जहाँ पके फोड़े को फूटने और दुर्गंधभरा मवाद निकलने की संभावना है, वहाँ यह भी निश्चित है कि आपरेशन के बाद दर्द घटेगा, घाव भरेगा और संचित विकारों से छुटकारा मिलेगा।

देवताओं की संयुक्त शक्ति से असुर निकन्दिनी दुर्गा का आवरण हुआ था। उन्हें संघ शक्ति भी कहा जाता है। ऋषियों का रक्त संचय करके घड़ा भरा गया, उससे सीता उत्पन्न हुई जिनने लंका की असुरता को नष्ट करने में महत्वपूर्ण भूमिका निबाही, समुद्र सेतु बनना दुर्दान्त दानवों को निरस्त करना, राम राज्य का सतयुगी माहौल बनाना, रीछ वानरों की सेना द्वारा ही समय हुआ। उस पुण्य प्रयोजन में गीध गिलहरी तक ने योगदान दिया। बुद्ध के धर्म चक्र प्रवर्तकों ने संसार को हिलाया यह पुरुषार्थ भिक्षु और भिक्षुओं के समुदाय का ही था। गाँधी के सत्याग्रही ही खोयी हुई। आजादी वापस लाने में समर्थ हुए। तिनके मिलकर रस्सी और धागों के मिलने से कपड़ा बनने की बात सभी को विदित है। युगसंधि के दुहरे मोर्चे पर लड़ना वरिष्ठ प्राणवानों के लिए ही संभव होगा। अनिष्टों को निरस्त करना उज्ज्वल भविष्य को धरती पर स्वर्ग उतारने जैसा उदाहरण प्रस्तुत करना देव मानवों की संयुक्त शक्ति से ही संभव है। इसी उमंग का उमगाना अदृश्य भगवान का साकार रूप में अवतरण कहा जा सकता है।

युगसंधि बारह वर्ष है। अब से लेकर सन् 2000 तक इक्कीसवीं सदी से नवयुग-सतयुग आरम्भ होगे की भविष्यवाणी अनेक आध्यात्मवादी एवं परिस्थितियों का आंकलन करने वाले विद्वानों ने एक स्वर में भविष्यवक्ताओं और ज्योतिर्विदों का भी प्रतिपादन सम्मिलित हैं इक्कीसवीं सदी निश्चय ही उज्ज्वल भविष्य का संदेश लेकर आ रही है। पर उससे पूर्व कठिन अग्नि परीक्षा में भी सब को गुजरना पड़ेगा। इस बारह वर्ष की अवधि में जहाँ तक सृजन का शिलान्यास होगा वहाँ संचित अवांछनीयताओं के दुष्परिणामों से भी निबटना होगा। इसलिए इस अवधि को दुहरे वरिष्ठ जनों को सहभागी बना कर हनुमान और अर्जुन जैसी भूमिका निभानी होगी। परोक्ष प्रक्रिया भगवान की होगी, पर उसका श्रेय तो इस संदर्भ में प्रबल पुरुषार्थ करने वालों को ही मिलेगा।

परिजनों की भूमिका

प्रयासों की तीन दिशाधाराएँ है। (1) लोक मंगल के लिए जो प्रत्यक्ष उपाय अपनाए जा रहे है उनसे सहयोग करना। (2) विचार क्रान्ति को व्यापक बनाने की विशिष्ट भूमिका सम्पन्न करना। (3) सामूहिक आध्यात्म साधना से सूक्ष्म वातावरण में संव्याप्त प्रतिकूलता को अनुकूलता में बदलना। प्रथम सोपान को राजतंत्र अर्थतंत्र एवं स्वयं सेवी संस्थान पूरा कर रहे है। तो भी उसमें यथा शक्ति सहयोग प्रज्ञा परिजनों को भी देना चाहिए।

शेष दो उपेक्षित कार्य ऐसे है, जो युग शिल्पियों को विशेष रूप से अपने कंधे पर उठाना हैं जन मानस का परिष्कार सत्प्रवृत्ति संवर्धन एक ऐसा लोहा लाया जाना है, जिसके सहारे उस दुर्बुद्धि से लोहा लिया जाना है जो क्षमताओं का दुरुपयोग करने नारकीय परिस्थितियां उत्पन्न करने के लिए प्रधान रूप से उत्तरदायी है। इनके लिए लेखनी वाणी और सद्भाव संपन्नों के संगठनों को सक्रिय किया जा रहा है। अब उसमें और भी अधिक गति देने की आवश्यकता पड़ेगी। शांतिकुंज में युग सृजेता को एक बहुत कड़ी संख्या इन्हीं प्रयोजनों की पूर्ति के लिए संगठित की जा रही है। एक-एक महीने के और नौ-नौ दिन के प्रशिक्षण सत्र इसी प्रयोजन की पूर्ति के लिए किए जा रहे हैं। युग साहित्य का सृजन और युग चेतना का आलोक वितरण करने वाले सत्संग आयोजनों का उद्देश्य यही है। दीप यज्ञों की श्रृंखला इसलिये व्यापक बनाई जा रही है। कि युग चेतना से लोक मानस को आन्दोलित किया जा सके और जिनकी प्रधान चेतना जीवन्त है, उन्हें इस विषम वेला में कुछ पुरुषार्थ करने के लिए कटिबद्ध किया जा सकें।

महापुरश्चरण

इसके अतिरिक्त तीसरा पक्ष है सूक्ष्म जगत के परिशोधन एवं भविष्य को उज्ज्वल बनाने हेतु दिव्य उपासना। मनुष्य में देवत्व का उदय और धरती पर स्वर्ग का आवरण संभव बनाने के लिए सामूहिक महासाधना का नियोजन। यह दिव्य पुरश्चरण सन्निकट की आश्विन नवरात्रि से शांतिकुंज हरिद्वार में यह पुण्य आयोजन सन् 1000 तक चलता रहेगा। इक्कीसवीं सदी के आरंभ के साथ ही इसकी पूर्णाहुति होगी। जिसे साधना के अनुरूप ही इतना बड़ा कहा जा सकेगा। जिसकी तुलना अब तक के किसी विशालतम समापन से भी न की जा सके। इस संकल्प के अंतर्गत आयोजन केन्द्र में नाघ् विसीय गायत्री अनुष्ठानों की श्रृंखला अन्त तक अनवरत रूप से जारी रहेगी। यह अपने समय का एक सबसे विराट् अनुष्ठान होगा।

पाण्डव वनवास में बारह वर्ष साधनारत रहे। राम ने चौदह वर्षों में से बारह वर्ष तप प्रयोजन में और दो वर्ष असुर संहार में लगाएं। पार्वती का भागीरथ का दधिचि का च्यवन का तप भी बारह वर्ष का रहा। बुद्ध अपने में देवी शक्ति का अवतरण करने हेतु बारह वर्ष तक तप में रहे। शंकराचार्य और चाणक्य भी प्रायः इतने ही दिन साधनारत रहे। विश्वामित्र, वशिष्ठ, अत्रि अगस्त, नारद आदि ऋषियों के प्रचण्ड तप की अवधि भी प्रायः इतनी ही रही। युगसंधि के उभयपक्षीय प्रयोजन भी बारह वर्ष की नर देवों की इतनी लम्बी साधना से ही पूर्ण होंगे।

प्रस्तुत साधना का केन्द्र शान्तिकुँज बन रहा है। यहाँ बारह वर्ष तक नौ दिवसीय गायत्री अनुष्ठानों की श्रृंखला चलती रहेगी। जिनको उपासना की गरिमा पर विश्वास है उन सभी का आह्वान किया गया है कि इस अवधि में एक अनुष्ठान यहाँ सम्पन्न करें और विराट् सामूहिक जप यज्ञ के भागीदार बनने का श्रेय प्राप्त करें। आशा की जाती है कि निर्धारित अवधि में लाखों व्यक्ति इसके सहगामी बन सकेंगे। उद्देश्य तो युग परिवर्तन के दोनों पक्षों को सम्पन्न कर सकने वाला दिव्य वातावरण बनाना है। पर साथ ही यह बात दिव्य वातावरण बनाना है। पर साथ ही यह बात भी है कि दूसरों के लिए मेंहदी पीसने वाले के अपने लिए सुरक्षा कवच प्राप्त करने में प्रतीत परिष्कार से लाभान्वित होने में सफल हो सकते है। यदि उनकी निष्ठा बीच में ही न डगमगा गई तो लक्ष्य तक पहुँचने के लिए अनवरत प्रयत्न करने वालों को सेनापतियों जैसा श्रेय मिलेगा।

सूर्य की ध्यान धारण

प्रस्तुत युग साधना में अन्य क्रिया-कलाप तो साधारण अनुष्ठानों की भाँति ही रहेंगे। पर एक बात विशिष्ट रहेगी “सूर्योपस्थान” भगवान सूर्य की निकटता। उन्हें ही इस महान प्रक्रिया का अधिष्ठाता वरण किया गया है। इसलिए जप गायत्री का पूजन गायत्री का करते हुए भी प्रातः काल उदय होते हुए स्वर्णिम आभा वाले सविता देव का ध्यान करते रहना होगा। ध्यान ही नहीं प्राण प्रत्यावर्तन का भाव समर्पण भी। साधक का प्राण सविता में प्रवेश करे वैसा ही लाल हो जाता है जैसा भट्टी में कुछ समय पड़ा रहने के उपरान्त सोना लाल हो जाता हैं ईंधन को आग डालने पर भी यही होता है। यह समर्पण हुआ। दूसरा भाग है सविता का साधक की सत्ता में अवतरण। जिस प्रकार किरणें धरती पर उतरती है ओर प्रभव क्षेत्र को ऊर्जा एवं आभा से भर देती है। उसी प्रकार साधक भी अनुभव करेगा। कि सविता का ओजस तेजस वर्चस बरसता है और उपासनारत को अपने दिव्य अनुग्रह से ओत-प्रोत कर देता है।

गहरी साँस लेते हुए सूर्य के अवतरण की ओर धीरे धीरे साँस छोड़ते हुए सूर्यार्घ्य दान की तरह सविता को आत्म समर्पण करने की भावना करते रहना चाहिए।

इक्कीसवीं सदी में सूर्य तेजस में भी अनुकूल परिवर्तन होगा और उसका प्रभाव समस्त वातावरण पर पड़ेगा। प्राणियों में भी क्षमताओं और चेतना विकसित होंगी ईंधन का, विद्युत का रोग नियंत्रण का, समुद्र से पानी लाकर मेघ बरसने वायु संशोधन का काम तो सूर्य अभी भी करता है। सड़ी हुई दुर्गंध को मिटाने और विषाणुओं का हनन करने में उसके चमत्कार निरंतर देखे जाते है। शरीरों में विटामिन “डी” का उत्पादन स्त्रोत वही है। अगले दिनों उसकी प्रखरता चेतना क्षेत्र को भी अपने प्रभाव में लेगी। गिरों को उठाने और उठों को उछालने में जहाँ मानवी प्रयत्न काम करेंगे वहाँ उसे सफल संभव बनाने में सविता की अदृश्य भूमिका भी काम करेगी। आद्यशक्ति गायत्री का अधिष्ठाता भी तो सविता ही है। उसी के प्रतीक रूप में दीपक ज्योति को, अगरबत्ती के रूप में प्रतिष्ठित किया जाता है।

सूर्य योग के सम्बन्ध में सूर्य पुराण, सूर्य उपनिषद् चाक्षुष्योपनिषद् आदि में बहुत कुछ कहा गया है। सावित्री और सविता का युग्म अपने समय की आवश्यकता भली प्रकार पूरी कर सकेगा, ऐसा विश्वास किया जाता है। निराकरण, उन्नयन के लिए जो भौतिक प्रयत्न चल रहे है उनमें से इस दिव्य साधना का समावेश हो जाने से लक्ष्य की पूर्ति में असाधारण योगदान मिलने की आशा है। इसीलिए पुरश्चरण में गायत्री मंत्र और सूर्योपासना का महत्व दिया गया है। दैनिक साधना की पूर्णाहुति महातेज की अभ्यर्थना होगी, ऐसी जिसे अभूतपूर्व कहा जा सके।

शांतिकुंज का केन्द्र यहाँ की परम्परागत विशेषताओं को ध्यान में रखते हुए बनाया गया है। गंगा की गोद, हिमालय की छाया, सप्त ऋषियों का तपस्थान, जैसी पुरातन और नित्य गायत्री जप यज्ञ व गुरुकुल, आरण्यक जैसी विशेषताओं के कारण वह एक प्रकार से असाधारण विशेषताओं से सम्पन्न हो चला है। घर गृहस्थी के वातावरण की अपेक्षा ऐसे दिव्य केन्द्र में रह कर साधना करने में कितनी अधिक विशेषता हो सकती है उसका अनुमान कोई भी लगा सकता है। सभी इच्छुकों को अवसर मिल सके इस दृष्टि से नौ दिवसीय साधना सत्र बारह वर्ष तक चलते रहने का संकल्प प्रकट किया गया है। अन्तरिक्ष का विभाजन बारह राशियों में हुआ है। पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करते हुए ठीक अपनी उसी स्थिति में बारह वर्ष में आती है। इस तथ्य को देखते हुए प्रस्तुत पुरश्चरण की अवधि बारह वर्ष रखी गयी है।

विस्तार विश्वव्यापी होगा

युगसंधि पुरश्चरण शांतिकुंज में उद्भूत अवश्य हुआ है, पर उसका विस्तार उद्गत तक ही सीमित न रहकर विश्वव्यापी बनेगा। कम से कम प्रज्ञा परिवार के तो सभी लोग उसमें भाग लेंगे ही। जो घर से बाहर नहीं जा सकते, अत्यधिक व्यस्त या प्रतिबंधित है वे अवकाश के किसी भी समय कम से कम दस मिनट मानसिक रूप से गायत्री का जप और ध्यान कर सकते है। मन में ही सूर्यार्घ्य देने की भावना की जा सकती है और शांतिकुंज पहुँचकर मन ही मन उस उद्गम की परिक्रमा लगाने की भी।

जहाँ प्रज्ञा पीठें बनी है जहां प्रज्ञा मण्डल या महिला मण्डल बने हो, गायत्री परिवार जीवन्त है, वहाँ भी महापुरश्चरण की एक इकाई अपने यहाँ प्रतिष्ठित करनी चाहिए। हर रोज बन पड़ना कठिन रहे तो सप्ताह में एक दिन इसके लिए निश्चित किया जा सकता है, रविवार-यह सूर्य का दिन भी है। उस दिन किसी स्थित स्थान में अथवा बारी-बारी आमंत्रित करने वाले सदस्यों के घरों में ये आयोजन रखा जा सकता है। समय प्रातःकाल का रखना ही ठीक पड़ता है।

सामूहिक गायत्री पाठ। दीप यज्ञ का प्रज्ज्वलन। पाँच दीपक एक माचिस, अगरबत्ती दो थालियों में सूर्य के रूप में स्थापन। आधा घण्टा मानसिक जप ध्यान, युग संगीत का सहगान कीर्तन, यन्मण्डलम् स्तोत्रों से सविता का स्तवन। इसके बाद झोला पुस्तकालय उपक्रम में सभी उपस्थित जनों को भागीदार बनाना। जिनके जितनों जितनों से सम्बन्ध हो वे उतनी पुस्तकें पढ़ाने के लिए मण्डल से ले जायें और अगले सप्ताह जब आयें तो अधिकाधिक शिक्षितों को पढ़ाने और अशिक्षितों को सुनाने के उपरान्त वापस कर दें। यही है साप्ताहिक साधना का वह उपक्रम, जिसमें दिव्य अवतरण तो प्रधान है ही, पर साथ में जन मानस को परिष्कृत करने वाले ज्ञान यज्ञ का भी समावेश है। युग संगीत और युग साहित्य द्वारा आलोक वितरण यह दोनों कार्य इसी स्तर के है। जिनके माध्यम से विचार क्रान्ति अभियान का भी विस्तार होता है।

“पाँच से पच्चीस” बनने का प्रेरणा मंत्र किसी को भी भूलना नहीं चाहिए। इसी आधार पर तो अपना सीमित परिवार विश्वव्यापी बनेगा। साप्ताहिक आयोजनों में सम्मिलित होने वाले इस प्रयत्न से रहे कि अगले सप्ताह अपने प्रभाव क्षेत्र से अधिक लोगों को लेकर चलें। उनकी निष्ठा बढ़े तो वे भी पाँच नये खोज निकाले और आयोजन के साथ जोड़े। इसी प्रयास के अंतर्गत प्रज्ञा मण्डलों और महिला मण्डलों का गठन एवं विस्तार होता चलेगा। संघ शक्ति बन कर अगले दिनों कंधे पर आने वाले उत्तरदायित्वों का वहन कर सकेंगे। जो जीवन एवं समाज के हर क्षेत्र को असाधारण रूप से प्रभावित करेंगे।

जहाँ भी युग पुरश्चरण की उपरोक्त सामूहिक साधना का उपक्रम चले वहाँ से नए सम्मिलित होने वाले श्रद्धालुओं को एक बार एक अनुष्ठान शांतिकुंज में जाकर पूरा करने के लिए कहा जाय। लौटने पर वे पूरा उत्साह लेकर लौटेंगे और बारह वर्ष तक सम्मिलित होते रहने के व्रत का निर्वाह करेंगे।

आयोजनों का खर्च चलाने के लिए सम्मिलित होने वाले साधकों के यहाँ बीस पैसे नित्य जमा करने के लिए ज्ञानघट स्थापित किए जायें। उसी संग्रहित राशि से साप्ताहिक आयोजन का खर्च चलता रहेगा। इस आपूर्ति की जिम्मेदारी साधकों को ही मिल जुलकर उठानी चाहिए। बड़े खर्च वाली आवश्यकताओं के लिए ही बाहर के लोगों के अनुदान स्वीकार किये जायें।

प्रचार उपकरणों के लिए लाउडस्पीकर, टेपरिकार्डर, स्लाइड प्रोजेक्टर आदि की आवश्यकता पड़ती है। इसमें लगभग दो हजार खर्च होते है। दीप-यज्ञायोजनों एवं ज्ञान रथ की स्थापना के लिए भी कुछ अतिरिक्त धन की आवश्यकता पड़ती है। इन सबके लिए जन सहयोग लिया जा सकता है। जो एकत्र हो और किस प्रकार खर्च किया गया, उसका विवरण दान देने वालों को देते रहने से किसी को उँगली उठाने का अवसर नहीं मिलता।

युग संधि पुरश्चरण के आरम्भिक वर्ष में युग चेतना का उदय दृष्टिगोचर कराने वाले आदर्श वाक्यों के स्टीकर घर-घर चिपकाने का आन्दोलन पूरे उत्साह के साथ चलाया जाना चाहिए। कोई दुकान, कोई घर, कोई दफ्तर-कारखाना, कोई वाहन ऐसा न बचे जहाँ आदर्श वाक्यों का अंकन दृष्टिगोचर न हो। देखने वालों को लगता है कि घर-घर में स्थान-स्थान पर युग चेतना की छवि उभरने लगी है। नव युग की चेतना उभरने का परिचय स्टीकरों के माध्यम से मिले तो जन-जन को लगे कि आदर्शवादिता जड़ जमाने लगी। पतन या उत्थान के लिए प्रेरणाएँ ऐसे ही दृश्य वातावरण से बनती है।

गायत्री परिवार में जिनकी भी श्रद्धा है, वे उपरोक्त क्रिया-कलाप को दिव्य साधना का प्रारम्भिक चरण मानें और उसे भावना-पूर्वक अपनाये। इतना कर लेने वाले उस अग्रगामी भूमिका को निभा सकेंगे जिसके आधार पर महाविनाश को रोकना और महाविकास के सतयुगी वातावरण का नवनिर्माण संभव हो सकें। बड़े कार्यों को बड़ी शक्तियाँ सम्पन्न करती है। उच्च स्तरीय बड़प्पन का सम्पादन करने के लिए राजमार्ग बनाना ही प्रस्तुत युग संधि महापुरश्चरण का प्रमुख उद्देश्य है। इसमें सच्चे स्वार्थ और सच्चे परमार्थ का समन्वय है।


VigyapanSuchana

विचार परिष्कार की दिशा में एक व्यापक कदम!

बारह वर्ष तक चलने वाला युग संधि महापुरश्चरण आश्विन नवरात्रि से आरंभ हो गया है। सन् 2000 तक वह नियमित रूप से चलता रहेगा।

इसमें सभी साधक सहभागी बनें। नित्य न बन पड़े तो साप्ताहिक रूप से इस सामूहिक साधना को चलायें। इससे मण्डलों की स्थापना क्रियाशील रहेगी और साप्ताहिक सत्संग निष्ठापूर्वक चलते रहेंगे।

युग संधि के प्रथम वर्ष की अभ्यर्थना आदर्श वाक्यों का अधिकाधिक विस्तार करके की जाय। दीवारों पर प्रेरणाप्रद वाक्य लिखे, स्टीकर्स चिपकायें, सिनेमाओं में स्लाइडें दिखाने का प्रबन्ध करे, सड़कों के सहारे बोर्ड खड़े करे, बाजारों में कपड़ों के बैनर लटकाये। जैसा भी जहाँ बन पड़े, मिशन की विचारधारा को व्यापक बनाने का प्रयत्न करें।


दीप चाहिए ऐसे

दीप चाहिए ऐसे, जो मावस को करदें पूनम। दीप चाहिए ऐसे, जिनकी बाती सदा रहे नम॥

जितनी हो सामर्थ्य, बहायें हम प्रकाश की धारा। तम हरने में लग जाये, जीवन सम्पूर्ण हमारा॥

खिले, उषा बन, अंधकार के घर मनवा दें मातम। दीप चाहिए ऐसे, जो मावस को करदे पूनम॥

हो प्रकाश ऐसा जो अन्दर भी उज्ज्वलता भर दे। बचे न तमस् किसी कोने में, अन्तर भासित करदे॥

दीप चाहिए ऐसे, कि बने सूरज का परचम। दीप चाहिए ऐसे, जो मावस को करदें पूनम॥

इन दीपों का स्नेह सूत्र हो शाश्वत और अनश्वर। बुझे न ज्योति कभी, चाहे आये तूफान भयंकर॥

हर घर-हर आँगन हर देहरी, हो प्रकाश का आलम। दीप चाहिए ऐसे, जो मावस को करदें पूनम॥

कुछ मनुष्य भी जलें दीप की भाँति-ज्ञान फैलाएँ इस प्रकाश से लोग, अंधेरा अज्ञान का मिटाएँ॥

तो इस जग का हाहाकार स्वतः हो जाएगा कम। दीप चाहिए ऐसे, जो मावस को करदें पूनम॥

*समाप्त*