दुर्भाग्य कभी आपके पीछे हाथ धोकर पड़ जाये, ऐसा लगने लगे कि कोई भी उपाय प्रगति पथ पर स्थिर रखने में समर्थ नहीं हैं। चारों और असफलता ही असफलता, अंधकार ही अंधकार प्रतीत हो रहा हैं तब आप महापुरुषों के ग्रंथ पढ़ें। उनके विचारों का नवनीत आपके जीवन में फिर से प्रकाश लायेगा, दुर्भाग्य को सौभाग्य में बदलेगा, प्रगति पथ पर यात्रा को सरल बनाएगा। कभी भी ऐसा अवसर आए तो ज्ञान देवता की ही शरण लें।
समस्त शक्तियां साथ छोड़ दे, मित्र, पड़ोसी, कुटुम्बी भी स्वार्थवश विरुद्ध हो जाए, जीवनपथ पर चलने के लिए आपको असहाय एकाकी छोड़ दें, तब उत्तम पुस्तकों को मित्र बनाकर आगे बढ़ें। एकाकी और असहायपन के बीच भी आपको मौन मैत्री व प्रकाश की वह किरण मिल जाएगी जो हाथ पकड़कर मार्ग दर्शन करती हुई निर्दिष्ट लक्ष्य तक पहुंचा देगी।
देवालय टूटकर खण्डहर बन सकते हैं, गिरकर समय के साथ नष्ट हो सकते हैं, लेकिन उत्तम ज्ञान और सद्विचार कभी भी नहीं नष्ट नहीं होते। ज्ञान देवता का वरदान पाकर मानव निहाल हो जाता हैं। वह मानव से देवमानव बन जाता हैं। ज्ञान वह सीपी हैं जिसमें प्रवेश की मानव-जीवन मोती बन जाता हैं। इसीलिए मनीषी कहते हैं कि सद्ज्ञान की शरण लें।
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उपासना के अनेकानेक अभ्यास हैं। अनेकों योग सिद्धांत हैं। उनका निर्माण साधकों के निजी अनुभव अभ्यास के आधार पर बना हैं। उनके पीछे शास्त्रकारों की दूरदर्शी वेधक दृष्टि भी हैं। योगों की संख्या 74 बताई गई हैं। जिनमें राजयोग, हठयोग, मंत्रयोग, प्राणयोग, लययोग, स्वरयोग, नादयोग आदि प्रमुख हैं। मात्र शरीर से किये जाने वाले आसन बन्ध मुद्रा आदि की संख्या भी सुविकसित हैं। इन सभी का एक व्यक्ति द्वारा किया, अपनाया जाना असंभव हैं। हर किसी को अपनी स्थिति के अनुसार विस्तृत साधन विधियों में से कुछ का चयन करना पड़ता हैं। खाद्य पदार्थों की संख्या सैकड़ों हजारों में हैं पर अपनी थाली में रुचिकर और सुन्दर ही वस्तुएं संजोई जाती हैं। कपड़े अनेक फैशन के संसार भर में सिये जाते हैं। पर अपनी पसंदगी और सुविधा के कुछेक ही होते हैं। इसी प्रकार निर्धारित साधनाओं में से सभी-हर किसी के लिए नहीं हैं उसे अपनी अंतरंग और बहिरंग परिस्थितियों के साथ तालमेल बिठा सकने वाले ही चुनने पड़ते हैं।
नदियां अनेक हैं पर उनमें से गंगा, यमुना, सरस्वती का संगम ही तीर्थराज प्रयाग बनता हैं। इसी प्रकार साधना में तीन को ही प्रमुखता दी गई है। उन्हें ही सर्वसाधारण के लिए सुगम साथ ही थोड़े प्रयास में अधिक फल देने वाला माना गया हैं। इनमें छोटी मोटी भूल रहने पर भी किसी अनिष्ट की आशंका नहीं हैं। अनेकानेक साधनाओं का आविर्भाव इन्हीं की शाखा प्रशाखाओं के रूप में हुआ भी हैं।
ऐसी प्रमुख साधना धाराओं में तीन को वरिष्ठता दी गई हैं। एक जय, दूसरा प्राणायाम, तीसरा ध्यान। इनकी श्रेष्ठता भी क्रमशः एक के बाद एक की हैं। जप सामान्य हैं। माला पर
गिनती रहने और निर्धारित शब्दों की बार-बार पुनरावृत्ति करते रहने से, वातावरण को स्वच्छ
समाधान कारक बनाये रहने से जप की प्रक्रिया सही रूप में चल पड़ती हैं। शब्द गु¡थन मंत्र की विशेष शक्ति हैं। उसके अक्षरों का कुछ अर्थ भी होता हैं। पर वह अर्थ ऐसा नहीं हैं जो इससे पूर्व जाना ना गया हो या उस जानकारी मात्र से कुछ अधिक हित साधन होने वाला हैं। शिक्षा प्राप्त करना ही उद्देश्य हो तो स्वाध्याय सत्संग के आधार पर पूरा किया जा सकता हैं। मंत्रों से उनका अक्षर गु¡थन ही रहस्यमय हैं यदि उन्हें प्रयोग करते समय समुचित श्रद्धा विश्वास का पुट लगाये रहा जाय तो उसका समुचित प्रतिफल मिलकर ही रहता हैं।
एक शिष्य ने अपने क्षेत्र में घोषणा की, वह हर रोग का निवारण करने वाली एक दवा प्राप्त कर चुका हैं। हजारों आने लगे, शिष्य उनको जल से भरी कटोरी में अपनी शीशी से निकाल कर एक बूंद डाल देते। पीने वाले प्रायः सभी अच्छे होने लगते।
एक बार उसके गुरु को भयंकर बीमारी हुई। उनने शिष्य की चमत्कारी चिकित्सा विधि के संबंध में सुना। वे उसके पास पहुँचे। शिष्य ने उन्हें भी जल भरी कटोरी में एक बूंद दवा डालकर पिला दी। वे देखते-देखते अच्छे हो गये। बड़े चमत्कृत हुए और यह इच्छा करने लगे कि किसी प्रकार इस दवा का भेद उन्हें भी विदित हो जाये तो उनकी भी प्रतिष्ठा को सम्पदा बढ़ सकती हैं। उनने शिष्य को औषधि का नुस्खा पूछने का साहस कर ही डाला। उसने नम्रता पूर्वक बता दिया कि हर गुरुपूर्णिमा को आपके दर्शन करने जाता हूँ तभी आपके पैर धोकर एक बोतल भर लाता हूँ। एक-एक बूँद उसमें से देते रहकर साल भर में हजारों रोगियों का भला कर देता हूँ। आप इस कथन को अन्यथा न समझे मैंने वास्तविकता में ज्यों की त्यों आपके सामने प्रकट कर दी हैं।
गुरु बड़े उत्साह में थे। उनने भी अपने क्षेत्र में वैसे ही ढिंढोरा पिटवा दिया लोग आये गुरुजी ने अपने दोनों
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एक मूर्तिकार था। वह मिट्टी की सुन्दर मूर्तियां बनाया करता था। हस्तकौशल की प्रवीणता के कारण वे औरों की अपेक्षा सुन्दर भी होती थी। अच्छे दाम में बिक जाती और मूर्तिकार का निर्वाह भी ठीक प्रकार चल जाता था।
मूर्तिकार का एक ही लड़का था। वह उसे भी उसी कला में प्रवीण बनाना चाहता था। सो स्वतः उसका शिक्षण शुरू कर दिया। बालक ने भी मूर्त प्रत्यक्षीकरण की इस विद्या में रुचि दिखाई और वह इस कला की बारीकियों को समझने तथा उत्साहपूर्वक उस अभ्यास में निरत रहने लगा।
लड़का बड़ा हुआ तो उसे अपने कार्य में अच्छी सफलता मिलने लगी। इस सीमा तक की उसकी मूर्तियां पिता की तुलना में अधिक दाम में बिकने लगी। स्वाभाविक भी था। एक तो सीखने की उत्कंठा, दूसरे बच्चे की जन्मजात प्रतिभा। क्रमशः निखार आता गया एवं ख्याति बढ़ने लगी।
लड़का रोज अपनी कृतियों को पिता को दिखाता और उसके गुण-दोष पूछता। उनकी विक्रय राशि दिखाता व पिता से प्रशंसा की अपेक्षा करता। पिता उसकी लगन की प्रशंसा तो करता पर साथ ही उनमें जो-जो कमी रह गई होती, उन्हें भी बताता।
नित्य अपनी कमियाँ सुनने पर लड़के को बुरा लगने लगा। उसने एक दिन झुँझलाकर पिता से कह दिया-”इतना प्रयत्न करता हूँ, तो भी आप कुछ न कुछ कमी बता ही देते हैं।आप की तुलना में तो मेरी मूर्तियाँ अभी भी अधिक दाम में बिकती हैं। फिर दोष क्यों ढूंढ़े जाते हैं? मुझे कारण समझ में नहीं आ रहा कि आपको दोष व कमियाँ ही दिखाई देती हैं, अच्छाई नहीं।”
पिता चुप हो गया। पर उसके मन में दुख बहुत हुआ। लड़के के बाजार चले जाने पर वह दुखी मन से लेटा रहा। उस दिन उसके गले भोजन भी न उतरा।
लड़का जब बाजार से लौटा तो उसे पिता के दुखी होने की जानकारी मिली। अपने क्यों किया? वह पिता के समक्ष गलती की माफी मांगने व भोजन का अनुरोध करने पहुंचा।
पिता ने रुद्ध कण्ठ से कहा -”प्रश्न यह नहीं है कि तुमने क्या कहा और मुझे कैसा लगा? असल बात यह है कि यदि तुम समीक्षा का बुरा मानोगे तो कृतियों में जो सुधार की थोड़ी बहुत गुंजाइश है, तुम्हारी और अधिक ख्याति होने और अधिक कीमत मिलने की जो संभावना हैं, वह समाप्त हो जाएगी। समीक्षा ही सुधार का द्वार खोलती हैं, वह यदि बन्द हो गया तो प्रगति का पथ भी अवरुद्ध हो जाता हैं।
पिता की बात सही थी। अहंकार आने पर, सर्वांगपूर्णता की अनुभूति होने पर मनुष्य अपने दोष ढूंढ़ना तो दूर, उन्हें बताने पर उलटा क्रुद्ध हो जाता हैं। फलतः उसकी प्रगति भी वही रुक जाती हैं।
लड़के ने वस्तुस्थिति को समझा और नित्य अपनी कृतियों के संबंध में पिता से ही नहीं, खरीददारों तथा परिचितों से भी विनम्र पूछताछ करने लगा। गलती पूछने तथा सुधारने के क्रम ने उसे अपने क्षेत्र का सर्वोत्तम मूर्तिकार बना दिया।
प्रगति जिस भी क्षेत्र में, जिसे भी अभीष्ट हो, यही एक मात्र राजमार्ग हैं। चाहे आत्म समीक्षा की जाय अथवा दूसरों से मार्गदर्शन माँगा जाय, हर दृष्टि से यह रीति-नीति दूरदर्शितापूर्ण सिद्ध होती हैं। अपनी उपलब्धि पर व्यक्ति जिस दिन पूर्णतः संतुष्ट होने लगता हैं, अहंकार का आवरण भी साथ-साथ चढ़ने लगता हैं, तथा प्रगति के मार्ग में अवरोध आ जाते हैं। अच्छे-अच्छे व्यक्ति जो प्रतिभावान थे, इसी तरह असफल होते रहे हैं। दूसरों द्वारा समीक्षा की चर्चा “निंदक नियरे राखिये” प्रसंग में भी की गई हैं। समीक्षा के लिए सतत् उद्यत रह सुधार परिष्कार जो करता रहता हैं, वह निश्चित ही सफलता हस्तगत करता हैं।
स्रष्टा ने मानवी काया में बीज रूप में वे सभी तत्व पदार्थ, वैभव, पराक्रम एवं क्षमताएँ भर दी हैं जो विश्व ब्रह्माण्ड के जड़ पदार्थों तथा चेतन प्राणियों में कही भी देखे, पाये जा सकते हैं। वह स्वयं में एक चलता फिरता चुम्बक हैं। उसकी विलक्षण काय संरचना को एक अच्छा खासा बिजली धर कह सकते हैं। जिससे उसकी अपनी मशीन चलती और जिन्दगी गुजर बसर होती हैं। इसके अतिरिक्त वह दूसरों को प्रकाशित करने से लेकर भले-बुरे अनुदान दे सकने में भी भली प्रकार सफल होता रहता हैं। चुम्बक होने के नाते वह जहाँ प्रभावित करता हैं। वहाँ स्वयं भी अन्यान्यों से आकर्षित किया और दबाया-घसीटा जाता रहता हैं।
मानवी चुम्बकत्व का स्त्रोत ढूंढ़ने वालों ने अभी इतना ही जाना हैं कि वह पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति से यह अनुदान उसी प्रकार प्राप्त करता हैं जैसे कि धरती सूर्य से ब्रह्मांडव्यापी चुम्बकत्व से भी उसका आदान-प्रदान चलता रहता हैं। इस ऊर्जा की मात्रा में न्यूनाधिकता होने तथा सदुपयोग दुरुपयोग करने से वह आये दिन लाभ-हानि उठाता रहता हैं। अच्छा हो इस संबंध में अधिक जाना जाए और सफलतापूर्वक हानि से बचने तथा लाभ उठाने में तत्पर रहा जाए।
मनुष्य का मैगनेट घटता बढ़ता रहता हैं। इसकी अल्पता से आ¡खो का विशेष आकर्षण समाप्त हो जाता हैं। शरीर रूखा, नीरस, कुरूप, निस्तेज, शिथिल सा दिखाई पड़ने लगता हैं साथ ही मनुष्य को विस्मृति, भ्रान्ति, थकान जैसी अनुभूति होती हैं। जबकि चुम्बकत्व के आधिक्य से वह आकर्षक, मोहक एवं सुन्दर लगने लगता हैं। उसकी प्रतिभा, स्मृति, स्फूर्ति जैसी विशेषताएं¡ उभरी हुई प्रतीत होती हैं। सत्संग और कुसंग के परिणाम भी व्यक्ति की निजी प्राण ऊर्जा की न्यूनाधिकता के सहारे ही संभव होते हैं। बढ़े हुए चुम्बकत्व वाला अपने से हल्के वालों को प्रभावित करने में सफल रहता हैं। साथ ही यह बात भी है कि उससे बड़े स्तर की प्रतिभा उसे अपनी पक डमें कस लेती हैं। इतने पर भी कुछ मनस्वी ऐसे होते हैं जो आत्मबल पर दृढ़ रहते हैं। आदान-प्रदान तो करते हैं, किन्तु अनिवार्य रूप से किसी से भी प्रभावित नहीं होते।
अंतरिक्ष में संव्याप्त भले-बुरे अनुदानों को मनुष्य अपने चुम्बकत्व द्वारा ही स्वीकार-अस्वीकार करता हैं। इस शक्ति का ऊर्ध्वगामी प्रवाह मस्तिष्क में केन्द्रित हैं। मस्तिष्क को मानवी चुम्बक का उत्तरी ध्रुव कहा जाता हैं। उस मर्मस्थल के प्रभाव से व्यक्तित्व निखरता और प्रतिभाशाली बनता है। चेहरे के इर्द−गिर्द छाये ओजस “तेजोवलय” को इस ऊर्ध्वगामी विद्युत का ही प्रतीक मानना चाहिए। जननेंद्रिय मूल में काया का दक्षिणी ध्रुव स्थित हैं। ऊर्जा का अधोगामी प्रवाह यहीं केन्द्रित होता हैं। यौनाकर्षण के पीछे यही प्रवाह काम करता हैं। भिन्न प्रकृति के होते हुए भी दोनों प्रवाहों में परस्पर संबंध हैं। कामातिरेक और कामविकार पर अंकुश की प्रक्रिया को क्रमशः अधोगामी और ऊर्ध्वगामी प्रवाह की परिपूर्ति ही मानना चाहिए। प्राण ऊर्जा का ऊर्ध्वगमन ही प्रखरता का द्योतक हैं।
सेन फ्राँसिस्को के प्रसिद्ध चिकित्साशास्त्री डॉ. अलबर्ट अब्राहम के अनुसार मानवी काया को चुम्बकीय ऊर्जा तरंगों का भँवर कहा जाना चाहिए। उसमें भी पृथ्वी की भाँति उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव होते हैं। जो विद्युत एवं चुम्बकत्व के नियमों के अनुसार काम करते है। शरीर द्वारा ऊर्जा तरंगों के निष्कासन में उन्होंने बताया हैं कि मनुष्य के शरीर से 90 अरब साइकल्स प्रति सेकेंड की दर से विद्युत चुम्बकीय ऊर्जा का विकिरण होता रहता हैं। जबकि आकर्षण क्षमता इस से कई गुना अधिक हैं। मस्तिष्क, हाथ पैर की अंगुलियाँ, नेत्र, जननेन्द्रिय आदि से इस ऊर्जा तरंगों का सबसे अधिक निष्कासन होता हैं। डॉ. अब्राहम ने शरीर के विभिन्न अंगों से निकलने वाले इस ऊर्जा प्रवाह को मापने की एक विधि का विकास किया। जिसे चिकित्सा विज्ञान में “रेडिस्थेसिया” के नाम से जाना जाता है।
आधुनिक बायोमेडिकल सांइंस की मान्यता के अनुसार मनुष्य का स्वास्थ्य शारीरिक कोशिकाओं के विभिन्न समूहों के मध्य चुम्बकीय क्षेत्र के सामंजस्य-संतुलन पर निर्भर करता है। शारीरिक संरचना में भाग लेने वाले विभिन्न तत्वों के अतिसूक्ष्म परमाणविक कण-इलेक्ट्रान, प्रोटान, न्यूट्रान आदि विद्युत चुम्बकीय ऊर्जा से परिपूर्ण होते हैं। लाल रक्त कणों में भी लोहे की प्रचुर मात्रा होती हैं। सारे शरीर में रक्त के निरन्तर प्रवाहित होते रहने से एक निश्चित विद्युत प्रवाह बनता है। इस प्रवाह चुम्बकीय क्षेत्र उत्पन्न होता है। यही लौह तत्व विश्वव्यापी ऊर्जा का अवशोषण करके कोशिकाओं को विभिन्न कार्यों के सम्पादन के लिए ऊर्जा की पूर्ति करता है। स्वस्थ कोशिकाओं की शक्ति भण्डारण क्षमता अधिक होती है।इसमें कमी होने पर शरीर रोगग्रस्त होने लगता हैं। जीवनी शक्ति क्षीण हो जाती हैं। इस प्रकार शरीर में निर्धारित परिणाम में चुम्बकीय क्षमता का होना पूर्णतः विज्ञान सम्मत हैं।
लेनिन ग्राड यूनिवर्सिटी, रूस के अनुसंधानकर्ता मूर्धन्य वैज्ञानिकों ने डिटेक्टर के माध्यम से मनुष्य शरीर में स्थित जैव चुम्बकीय क्षेत्रों का पता लगाया है। उनका कहना हैं कि किन्हीं-किन्हीं व्यक्तियों में ये क्षेत्र विशेष रूप से सक्रिय हो उठते हैं जिससे उनके लिए कभी-कभी अनेकों मुश्किलें पैदा हो जाती हैं। जोनी माइकेल एवं राबर्ट जे0 एम. रिचर्ड ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “मीस्टिरियसफिनानिना” में इस तरह की अनेक घटनाओं का वर्णन किया हैं, जिनमें विभिन्न व्यक्तियों को चुम्बकत्व की बहुलता के कारण विचित्रताओं का शिकार होना पड़ा।
कनाडा में कैरोलिना लेयर नामक एक ऐसी महिला थी जिसमें शरीर चुम्बकत्व की अधिकता थी। ओण्टोरियो मेडिकल एसोसियेशन के जांचकर्ता वैज्ञानिकों ने परखने पर पाया था कि जब वह आवेशित अवस्था में होती तो उसके शरीर से छुरी, कांटे, कीलें जैसी लौह धातुएं चिपक जाती। इसी तरह अमेरिका के मेरीलैण्ड की एक छात्रा लुई हैबर्गर की अंगुलियों के अग्रभाग में चुम्बकीय गुण था। आधी इंच मोटी, एक फट लम्बी लोहे की छड़ वह अंगुलियों के पोरों से छूकर अधर में उठा लेती थी। धातुओं से विनिर्मित वस्तुएं उसके हाथ से चिपक कर रह जाती हैं। समीप आने वाले लोग उसमें एक विचित्र सा आकर्षण महसूस करते थे। मेरीलैण्ड कालेज ऑफ फार्मेसी के अनुसंधानकर्ताओं ने उसकी इस क्षमता को जांचा परखा और हर तरह से सत्य पाया था। कम्पास निउल उसके समीप रखने पर रुक जाती थी।
जोपलिन, मिसौरी के फ्रेंक मैक किन्स्ट्री नामक व्यक्ति के बारे में कहा जाता हैं कि जब वह चुम्बकीय ऊर्जा से आवेशित होता तो चलते वक्त उसके पैर धरती से चिपक जाते। वह एक कदम भी आगे बढ़ने में असमर्थ हो जाता। ऐसी आकस्मिक स्थिति में राहगीर ही उसकी मदद करते, उसके पैरों को छुड़ाते तभी वह फिर से आगे बढ़ जाता।
मनुष्य में अपना चुम्बकत्व तो है ही पर उसे न्यूनाधिक करने में उसके अपने प्रयत्न ही चमत्कार दिखाते हैं। सुप्रसिद्ध मनःशास्त्री विक्टर ई॰ क्रोमर का कथन है कि मनःशक्ति को केन्द्रीभूत करके यदि इस शक्ति को किसी दिशा विशेष में प्रयुक्त किया जा सके तो बहिरंग में सम्मोहन प्रक्रिया द्वारा दूसरों को तथा अंतरंग में स्वयं की सूक्ष्म शक्तियों को प्रभावित करने-जगाने में सफलता मिल सकती हैं।
आस्ट्रिया के वियेना शहर में निवास करने वाले डॉ. फ्राँसिस्कम् एण्टोनियर्स मेस्मर को सम्मोहन विद्या का जनक माना जाता हैं। अपने समय के वे प्रख्यात चिकित्साशास्त्री थे। एक बार चिकित्सा करते समय रोगी के शरीर से अत्यधिक रक्त बहने लगा। मेस्मर के पास उस रक्त प्रवाह को बंद करने की कोई औषधि नहीं थी। इस पर उनने उक्त स्थान पर अपना हाथ फिराना आरंभ किया। कुछ ही क्षणों में चमत्कारिक ढँग से रक्त का रिसना बंद हो गया। इससे प्रभावित होकर उन्होंने कई अन्य प्रयोग-परीक्षण किये और सफल रहने पर यह सिद्धांत प्रतिपादित किया कि - मनुष्य के शरीर में एक प्रकार की बायोइलेक्ट्रोमैग्नेटिक विद्युत धारा सतत् प्रवाहित होती रहती हैं। यह प्रवाह अंगुलियों के अग्रभाग से अधिक होता है जो स्ग्ण स्थान पर हाथ फिराने से रोगी के शरीर में प्रवेश कर जाता हैं और रोग को दूर करने में सहायक सिद्ध होता हैं।मेस्मर ने इस शक्ति प्रवाह को “जैव चुम्बक” नाम दिया। वान हैल्माण्ट ने इसी ऊर्जा शक्ति का शारीरिक एवं मानसिक रोगियों पर सफल प्रयोग करने में अच्छी ख्याति प्राप्त की थी। लोग उन्हें चमत्कारी सिद्ध पुरुष कहने लगे थे।
वस्तुतः मैस्मेरिज्म के प्रयोगों में प्रयोक्ता द्वारा अपने चुम्बकीय विद्युत के सहारे दूसरों को सम्मोहित करने की प्रक्रिया सम्पादित होती हैं। इसी माध्यम से एक व्यक्ति का प्राण दूसरे में प्रवाहित होने लगता हैं तथा शारीरिक रुग्णता एवं मानसिक अक्षमता को दूर करने में सहायक होता हैं। ऐसे अनेकों उदाहरण विद्यमान हैं जिसमें प्रयोक्ताओं ने अपनी प्राण शक्ति से दूसरों को स्वास्थ्य लाभ प्रदान किया।
जर्मनी के तानाशाह हिटलर का उसकी रुग्णावस्था में उपचार इस्टोनिया निवासी “क्रिस्टन” नामक एक चिकित्सक करता था। उसकी अंगुलियों में दर्द दूर करने की चमत्कारिक क्षमता थी जिनके स्पर्श से वह रोगियों को चंगाकर देता था। अभ्यास के द्वारा ही उसने ऐसी जादुई क्षमता प्राप्त की थी। हिटलर के अंतरंग मित्र हिटलर तक ने उससे कई बार अपनी चिकित्सा करवाई और रुग्णता के पंजे से मुक्ति पाई थी। क्रिस्टन ने अपनी क्षमता का हिटलर पर सदुपयोग करके उसके माध्यम से हिटलर के मृत्युपाश में जकड़े हुए लगभग एक लाख व्यक्तियों को छुटकारा दिलाया था।
महामनीषी हिपोक्रेटस को प्राणतत्व के प्रति असाधारण श्रद्धा थी। वे लिखते थे कि - “शरीर आत्मा की शक्ति से संचालित एवं नियंत्रित होता हैं तो उसकी प्रचण्ड प्राण-शक्ति से रोगों का निवारण भी संभव हैं”। स्काटलैंड के मैक्सवेल नामक विद्वान का भी विश्वव्यापी प्राणतत्व में अटूट विश्वास था। प्राण चिकित्सा प्रशिक्षण के लिए उन्होंने एक केन्द्र तक खोल रखा था।
इस्कुलेपियस नामक एक योरोपीय व्यक्ति अस्वस्थ व्यक्तियों के रुग्ण अवयवों पर सांस छोड़कर और हाथों से थपथपाकर चिकित्सा करने में पारंगत था। इंग्लैण्ड के पादरी ठइड को इस क्षेत्र में असाधारण ख्याति मिली थी। अनेक विद्वानों ने अपने साहित्य में उनकी इस विलक्षण क्षमता का वर्णन किया हैं। लन्दन का लेर्न्हट नामक माली अंगुलियों से छूकर रोगमुक्त करने के लिए प्रसिद्ध था।
प्रख्यात परामनोविज्ञानी डॉ. थेल्मामाँस एवं उनके सहयोगियों ने ऐसे कई व्यक्तियों को जांचा परखा हैं जो सम्मोहन द्वारा प्राण चिकित्सा करते हैं। उनमें से एक हैं- किडनी स्पेशलिस्ट डॉ. मार्शल वार्शेय, जिन्हें पाश्चात्य जगत में आध्यात्मिक चिकित्सक के रूप में प्रसिद्धि मिली हुई हैं। अंगुलियों तथा हाथ के स्पर्श से वे अब तक सैकड़ों रोगियों को नवजीवन प्रदान कर चुके हैं। सिरदर्द जैसी सामान्य बीमारियां¡ उनके स्पर्श मात्र से दूर होती देखी गई हैं। डॉ. थेल्मामाँस ने परीक्षण करने पर पाया कि इस तरह उपचार करते समय मार्शल की अंगुलियों से प्राण ऊर्जा प्रकाशपुँज के रूप में निकलकर मरीज के शरीर में प्रविष्ट हो जाती हैं। जिससे उसकी अंगुलियों का परिमंडल भी प्रदीप्त हो उठता हैं। रोगी को हीलर के हाथ से अपने शरीर में गर्मी प्रवेश करती हुई झुनझुनाहट सी महसूस होती हैं, साथ ही एक शक्तिधारा के अपने शरीर में प्रवेश होने की सुखद अनुभूति होती हैं। यह अनुभूति काफी समय तक बनी रहती हैं।
काया में सन्निहित प्राण चुम्बकत्व की खोज विभिन्न वैज्ञानिकों ने अपने-अपने ढँग से की हैं और उसे बायोमैग्नेटिज्म, बायोप्लाज्म, एक्टोप्लाज्म, बायोफ्लक्स आदि भिन्न-भिन्न नामों से सम्बोधित किया हैं। मनुष्य में इसका विशेष बाहुल्य होता हैं। जबकि वनस्पतियों एवं अन्य जीवधारियों में यह साधारण रूप से विद्यमान होता हैं। डॉ. किर्लियन, एवं डॉ. थेल्मामाँस जैसे वैज्ञानिकों ने किर्लियन तथा आर्गान फज्ञेटोग्राफी द्वारा इसके रंगीन चित्र भी खींचे हैं। थियोसोफिस्ट इसे “ईथरिक डबल” कहते हैं, जो शरीर के चारों और आवरण के समान विद्यमान हैं। अतीन्द्रिय क्षमता वाली विशेषताएँ इसी चुम्बकत्व पर निर्भर बताई गयी हैं।
प्राण चुम्बकत्व को विकसित एवं परिष्कृत करने के ध्यान-धारणा तथा प्राणायाम कितने ही प्रयोग अपनी स्थिति एवं आवश्यकता के अनुरूप अपनाये जा सकते हैं। किन्तु उससे भी अधिक अनिवार्य यह है कि इन्द्रिय निग्रह, मनोनिग्रह की नीति-निष्ठा, जीवनचर्या अपना कर ईश्वर प्रदत्त प्राण विद्युत के अपव्यय से बचे रहने की सतर्कता बरती जाय।
यूनान देश में सबसे प्रख्यात दार्शनिक सोलन था। उसके निर्णय को सर्वत्र मान्यता मिलती थी। एक दिन यूनान के बादशाह ने सोलन को राजमहल देखने के लिए आदरपूर्वक सम्मानित किया। वह उसके मुंह से प्रसन्नता के शब्द सुनना चाहता था।
सेलन को राजमहल का कोना-कोना दिखाया गया। देखते समय वे मौन रहे और न कोई भाव व्यक्त किया।
देख चुकने के बाद राजा ने उनसे अभिमत व्यक्त करने की प्रार्थना की।
सोलन ने इतना हर कहा- यहाँ प्रशंसा के योग्य कुछ है ही नहीं और निन्दा करूं तो आपको सहन न होगी। इसलिए मौन रहना ही बेहतर लगता हैं।
कौशल नरेश राज्य के समस्त पाँच सौ कर्मचारियों की पत्नियों के लिए वस्त्र दान किया करते थे। यह नियम उन्होंने राजमाता की आज्ञानुसार बनाया था।
एक बार शीत ऋतु का आगमन होने को था। कौशल नरेश वस्त्र बाँट चुके थे, तभी बौद्ध भिक्षु आनन्द ने कौशल में प्रवेश किया। उस दिन राजधानी में ही उनका प्रवचन रखा गया। दान के महत्व पर बोलते हुए भिक्षु ने कहा-”अपनी आवश्यकता से अधिक द्रव्य या वस्तुयें लोकहित में दान करते रहना चाहिये, इससे समाज में विषमता पैदा नहीं होती।”
राज कर्मचारियों को लगा जैसे राज्य से प्राप्त होने वाले वस्त्र में उनकी लोभ और परिग्रह की वृति भी जुड़ी हुई हैं। वे सब धर्मनिष्ठ, देश-भक्त और सामाजिक मर्यादाओं का पालन करने वाले थे, सो सबने अपने-अपने वस्त्र लाकर आनन्द को दान कर दिये।
अगले दिन यह चर्चा महाराज के कानों पर पड़ी। भगवान बुद्ध के उपदेशों का उन्होंने अच्छी तरह स्वाध्याय किया था। भिक्षुओं के लिये निर्धारित आचार-संहिता- शास्ता के भी वे अच्छे ज्ञाता थे। उन्हें मालूम था कि भिक्षु को अपने पास तीन चीवर से अधिक रखने का अधिकार नहीं हैं। उन्हें ऐसा लगा कि अपरिग्रह का उपदेश करने वाले आनन्द ने स्वयं ही शास्ता-मर्यादा तोड़ दी हैं, सो उनकी नाराजी और भी बढ़ गई। अगले दिन वे स्वयं ही बौद्ध स्थविर आ उपस्थित हुए।
आनन्द अभी संध्योपासना से निवृत्त होकर बैठे ही थे। कि उन्हें महाराज के आगमन की सूचना दी गई। आनन्द द्वार तक स्वयं आये और महाराज को सादर परामर्श कक्ष तक ले आये। महाराज उद्विग्न थे, सो जाते ही पूछ लिया-भंते! आप भिक्षु हैं शास्ता के अनुसार आप अधिक से अधिक तीन चीवर ही ग्रहण करने के अधिकारी हैं, फिर आपने पांच सौ वस्त्र कैसे ग्रहण कर लिये?
आनन्द उठे और संध विश्रामागार की और प्रस्थान करते हुये बोले-महाराज! आपका कथन सत्य हैं। वह समस्त चीवर यहाँ के अन्य भिक्षुओं को बाँट दिये गये हैं, अपने लिये तो एक ही चीवर-पर्याप्त था सो लिया भी एक ही हैं। भिक्षुओं के चीवर फट चुके थे, सो उनके लिये ही यह वस्त्र स्वीकार करने पड़े। अनावश्यक कुछ नहीं लिया।
महाराज ने पूछा-पर इस तरह इन भिक्षुओं के पास अब तक जा चीवर थे, क्या उनका अपव्यय नहीं हुआ, क्या आपके पूर्ण उपभोग की बात यहाँ असत्य न हो गई? आनन्द ने कहा- नहीं महाराज! हम शास्त की मर्यादा का कभी भी उल्लंघन नहीं करेंगे। भिक्षुओं के पुराने चीवर उत्तरीय वस्त्र, उत्तरीय वस्त्र अन्तर वासक और अन्तर वासक बिछौने के काम में उपयोग कर लिये गये हैं, महाराज इन सबके बिछावन फट चुके थे। आपका संदेह और भी शेष रह गया हो तो उसके निवारण हेतु निवेदन कर दूं कि फटे बिछावन के चीथड़ों से दीपकों की बायाँ बनाली गयी हैं। वे प्रकाश देती है व सतत् संदेश देती हैं कि हर वस्तु का नष्ट न होने तक प्रयोग किया जा सकता हैं। हमने अपरिग्रह व्रत का पूर्ण परिपालन किया हैं महाराज।
महाराज को अपने अविश्वास पर बड़ी आत्म-ग्लानि हुई। क्षमा माँगते हुए उन्होंने कहा-”भंते! आनी भूल के लिए हार्दिक पश्चाताप हैं।” इस पर आनन्द ने की नहीं महाराज/ ऐसा न कहें। दान पाने वाले को ही नहीं, देने वाले को भी संतुष्ट होना चाहिये कि उसका सही उपयोग हो रहा हैं, इसके लिये यदि दान दाता निरीक्षण करना चाहता है तो वह भी पुण्य ही हैं। महाराज सन्तुष्ट होकर लौट आये।
प्रजा का विश्वास और प्रेम अर्जित करने के लिए प्राचीन काल के राजा बादशाह अपनी मेहनत की कमाई पर गुजारा करते थे। राज्य कोष से पैसा नहीं लेते थे।
राजा जनक कृषि करते थे। हल जोतते थे। उसी अवसर पर उन्हें सीता मिली थी। नसरुद्दीन बादशाह टोपियाँ सीकर अपना पेट पालता था।
यह मान्यता सही नहीं हैं कि स्वर्ग कोई लोक विशेष हैं। वहाँ देवता रहते है और समस्त सुख-सुविधाओं के भण्डार भरे रहते है। इसी प्रकार यह प्रतिपादन भी सही नहीं हैं कि मृत्यु के बाद भगवान के समीप जा पहुंचता हैं और उनके जैसी सुविधाओं के बीच रहने लगता हैं। वैसे ही अधिकार प्राप्त कर लेता हैं, उसी प्रकार का स्वरूप बन जाता है। उन्हीं के साथ अविच्छिन्न बन जाता हैं। यह कल्पना उस प्रतिपादन से चली हैं, जिसमें ब्रह्मलोक को पृथ्वी जैसा कोई क्षेत्र विशेष माना गया है। भगवान को मनुष्य जैसी स्थिति में रहता हुआ कल्पित किया गया अनुमान लगाया गया हैं कि मोक्ष प्राप्त व्यक्ति उसी ब्रह्मलोक में निवास करने लगते हैं, जन्म-मरण के बंधन से छूट जाते हैं। उसी आनन्द लोक में मौज मजा करते रहते हैं।
वस्तुतः परब्रह्म निराकार है वह सर्वव्यापी हैं। सत्प्रवृत्तियों के समुच्चय, नियामक सूत्र संचालक, कर्मफल के न्यायाधीश जैसी स्थिति में उसकी कल्पना की जा सकती है। वह नियम रूप हैं। व्यवस्था का निर्धारणकर्ता और उसको सुसंचालित रखने वाला व्यवस्थापक। आकार वाले देहधारी भगवान की कल्पना तो ध्यान धारणा एवं पूजा उपासना के माध्यम से भक्ति भावना को अंकुरित एवं परिपक्व करने के लिये की गई है। वस्तुतः स्रष्टा शरीरधारी नहीं हो सकता। यदि वह एक जगह रहने लगे तो अन्यत्र उसकी उपस्थिति कैसे बन पड़ेगी? यही बात उसकी प्रसन्नता अप्रसन्नता के संबंध में हैं। यदि पूजा प्रार्थना वालों से यह प्रसन्न होता है तो नास्तिक समुदाय के लोगों के साथ उसका द्वेष भी होना चाहिये। द्वेष से तात्पर्य भक्तजनों को उपलब्ध होने वाली सुविधाओं से वंचित करना। जो प्रशंसा अभ्यर्थना से प्रसन्न होता होगा वह निन्दा, उपेक्षा को सहन नहीं करेगा और बदले की भावना से प्रेरित होकर उनका अहित अनिष्ट करेगा। किन्तु देखा जाता है कि इस संसार में ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो नास्तिक स्तर के तार्किक हैं। उसका अस्तित्व ही स्वीकार नहीं करते। कहते है कि प्रकृति की स्वयंभू व्यवस्था ऐसी है जो सृष्टि क्रम को अपने ढंग से स्वसंचालित रखे रहती हैं। यदि ईश्वर ने
संसार बनाया तो फिर ईश्वर को बनाने वाला भी कोई होना चाहिए यदि ईश्वर स्वयंभू हो सकता है तो प्रकृति को भी वैसा ही मानने में क्या हर्ज है?
जब ईश्वर का शरीर होना और उसका किसी लोक या क्षेत्र विशेष में निवास करना संदिग्ध है तो फिर मरने के उपरान्त उसे आसपास प्राणियों का जमघट कैसे लगता होगा और वे मोक्ष के अधिकारी बनकर वहाँ निरर्थक रहते हुए अपना समय कैसे गुजारते होगे? सालोक्य, सामीप्य, सारूप्य स्थिति में पहुँच कर अपनी सत्ता बनाये रहते हैं या उसी में धुल कर समाप्त कर देते हैं। यदि समाप्त हो जाते है तो उसे अपने अस्तित्व का विसर्जन कहना चाहिए। इस स्थिति के लिए न कोई सहमत हो सकता है। और न वैसी कल्पना ही कर सकने में मनः चेतना को सहमत कर सकता है।
यही बात देवलोक के संबंध में भी हैं। यदि शारीरिक सुख सुविधाओं के बाहुल्य वाले स्थान को स्वर्ग कहा जाय तो ऐसा लाभ तो धनिक वर्ग के लिए पैसे के बल पर कभी भी कही भी प्राप्त किया जा सकता है। उसके लिए स्वर्ग लोक तक की लम्बी यात्रा करने की क्या आवश्यकता हैं। फिर प्रत्येक जीवधारी को कुछ काम करने की व्यवस्था होनी चाहिए। निष्क्रिय आलसी पड़े रहने पर तो चेतना तक दुर्बल और समाप्त हो जाती है। एक रस स्थिति में रहते हुए जीवधारी उबने लगता है। स्वर्ग में यदि मात्र सुविधाओं का भोगना ही एक मात्र लाभ है तो उसका लाभ शरीर उठा सकता है। इन्द्रियों रहित सूक्ष्म शरीर ही यदि स्वर्ग जाता हैं तो सुविधा साधनों का लाभ उठाना अशरीरी सूक्ष्म शरीरधारी स्वर्गस्थ व्यक्ति को किस प्रकार मिलता होगा। इस प्रकार स्वर्ग लोक की कल्पना असंगत बैठती हैं। नरक लोक के बारे में भी सही बात हैं। प्राणान्त के उपरान्त जब शरीर की अन्त्येष्टि इसी लोक में हो जाती हैं। फिर सूक्ष्म शरीर की अन्त्येष्टि इसी लोक में हो जाती है। फिर सूक्ष्म शरीर वाली आत्मा को किस प्रकार यमदूत वैसी प्रताड़ना देते होंगे जैसी कि शरीर धारियों को ही दी जा सकती हैं। नरक लोक के बारे में भी कुछ पता नहीं चला कि वह ब्रह्मांड के गृहलोकों में कहीं है या नहीं?
फिर मरणोत्तर जीवन के संबंध में अनेक मत सम्प्रदायों की अलग-अलग प्रकार की मान्यताएं है। किसी का किसी के साथ मेल नहीं खाता। वैज्ञानिक शोधें भी किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँचती। ऐसी दशा में स्वर्ग, नरक, मोक्ष, आदि पारलौकिक परिस्थितियों के संबंध में किस आधार पर किसी सुनिश्चित निष्कर्ष पर पहुंचा जाय।
अच्छा यही है कि प्रत्यक्ष जीवन में ही व्यावहारिक मनोविज्ञान के धरातल पर इन सभी मान्यताओं का समावेश कर लिया जाये। स्वर्ग को परिष्कृत दृष्टिकोण मानना ठीक होगा। संयमी सदाचारी जीवन जहाँ भी दृष्टिपात करता हैं, वहाँ विद्यमान सद्गुणों सत्प्रवृत्तियों को गंभीरतापूर्वक देखता हैं। आय व्यय का संतुलन बिठाकर संतोषपूर्वक जीता हैं। संयमशीलता अपना कर शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को अक्षुण्ण रखे रहता हैं। अपनी विनम्रता, मधुरता, सदाशयता की प्रतिक्रिया भी सम्मान और सहयोग के रूप में उपलब्ध होती हैं। इन परिस्थितियों को उत्पन्न उपलब्ध कर लेना अपने लिए स्वर्ग का सृजन करना हैं। इसके विपरित दुर्गुणों, दुर्व्यसनों, दुराचरणों, में फस कर उनकी दुखद प्रतिक्रिया को सहन करते रहना नरक हैं। इसे भी अपने दूषित दृष्टिकोण और अगणित अनाचार अपनाकर मनुष्य स्वयं ही अपने लिए विनिर्मित करता हैं। इसी संसार में कितने ही व्यक्ति भावना क्षेत्र में देवोपम जीवन जीते हैं और स्वर्गीय सुख शान्ति का अनुभव करते हैं। साथ ही ऐसे लोगों की भी कमी नहीं जो शारीरिक मानसिक एवं सामाजिक क्षेत्रों में विविध विधि दुरूह दुख सहन करते रहते है। निन्दित तिरस्कृत एवं भर्त्सना प्रताड़ना के भाजन बनते हैं। प्रतिरोध और पश्चाताप उन्हें आये दिन जलाते रहते हैं। इस स्थिति में पड़े हुए लोगों को नरक भोगने वाले कहा जा सकता हैं।
भवबंधनों से छुटकारा प्राप्त करके मोक्ष का आनन्द लेना भी इसी जन्म में पूर्णतया संभव हैं। मनोविकार ही भवबंधन हैं। गीताकार के अनुसार यह म नहीं बंधन और मुक्ति का निमित्त कारण हैं मनुष्य आप ही अपना शत्रु और मित्र हैं। अपना व्यक्तित्व और कर्तृत्व ही फलित होकर अमृत या विष का रूप धारण करता है। यदि वह गर्हित स्तर का है तो समझना चाहिए कि उसकी प्रतिक्रिया नरक या भवबंधन के रूप में त्रास देगी। परिस्थितियों में संकटों का समावेश होता जायेगा। अपनी पिछड़ी, अनगढ़ एवं अविवेक पूर्ण मनःस्थिति ही ऐसी परिस्थितियों का सृजन करती हैं, जिसमें शोक, संताप सब और से उमड़ते−घुमड़ते चले आते हैं।
अपने असंयम, असंतोष, अनाचरण से यदि छुटकारा प्राप्त कर लिया जाय तो समझना चाहिए कि अवाँछनीयता से छुटकारा मिल गया। देवत्व की उत्कृष्ट आदर्शवादिता व्यक्तित्व में समाविष्ट हो गई। इसी को स्वर्ग या मुक्ति समझा जा सकता है। इनकी प्राप्ति पूर्णतया अपने बस की बात हैं।
एक राजा जंगल में वन-विहार के लिए गया। राजा भूलकर बीहड़ों में भटक गया। संध्या हो गई। उसे वनवासियों की झोंपड़ी में आश्रम लेना पड़ा। उन लोगों के एक अपरिचित व्यक्ति पर भी सहज आत्मीयता दिखाई और भाव भरा सत्कार किया।
प्रातः चलते समय राजा ने अपना परिचय दिया और उन लोगों के आतिथ्य के बदले उस क्षेत्र में एक साधन सम्पन्न अस्पताल बनवा देने की घोषणा की ताकि वहाँ के निवासियों को बीमारियों से कष्ट न उठाना पड़े। अस्पताल खुल गया। उसमें बहुमूल्य औषधियाँ और उपकरण की सभी सुविधाएँ जुटाई गई। किन्तु मुद्दतें हो गई। कोई मरीज इलाज कराने नहीं आया। चिकित्सक बैठे-बैठे दिन काटते।
राजा ने अस्पताल की प्रगति देखने के लिए वहाँ का दौरा किया। पूछने पर मालूम हुआ कि कोई इलाज कराने आता ही नहीं।
समीपवर्ती गाँव के प्रमुख व्यक्ति बुलाये गये। राजा ने पूछा आप लोग अस्पताल से लाभ लेने क्यों नहीं आते?
वनवासियों ने नम्रतापूर्वक कहा-हम लोग भूख से कम खाते हैं और दिन भर कड़ा परिश्रम करते हैं फिर बीमार क्यों पड़ेंगे?
राजा का स्वस्थ जीवन का रहस्य विदित हो गया। वहाँ के अस्पताल का किसी शहर में स्थानान्तरण करा दिया।
ब्रह्म कलेवर की भिन्नता के कारण सर्व सामान्य की समझ यही है कि विज्ञान और अध्यात्म के आधारभूत सिद्धांतों में मौलिक अन्तर हैं। इस कारण उनका समन्वय कदाचित सम्भव न हो सकेगा। सामान्यजन ही नहीं मनीषीगण भी स्वीकारने लगे है कि विज्ञान दुराग्रही नहीं हैं। वह लगातार के प्रयोग-परीक्षण के बाद ही कसी तथ्य को स्वीकारता और उसे प्रामाणिक ठहराता है। इसी ठोस आधार पर सिद्धांत विनिर्मित होते है। इसके विपरित मान्यता यह है कि अध्यात्म श्रद्धा विश्वास के नाम पर तरह-तरह की धारणाएँ गढ़ता और उन्हें स्वीकारने-अपनाने की जोर जबरदस्ती करता है। तर्क-प्रमाण की इसमें कोई गुंजाइश नहीं। प्रयोग-परीक्षण जैसी बात को इस क्षेत्र से पूर्ण रूपेण बहिष्कृत कर दिया गया हैं। पीढ़ी दर पीढ़ी पूर्व बनाई गई लोक मान्यताएं ही सब कुछ हैं। प्रचलनों के इसी गोल दायरे में कोल्हू के बैल की तरह आंखें बन्द किए लगातार घूमते रहने में ही धर्म भावना की यथार्थता समझी जाती हैं। ऐसी दशा में समन्वय का स्थापन कैसे हो? या तो विज्ञान अपने तथ्यों की प्रमाणिकता देने वाली प्रवृत्ति छोड़े अथवा धर्म को परम्परागत आग्रह अपनाए रहने से विरत किया जाय। तभी वह स्थिति बन सकेगी जिसके आधार पर दोनों साथ चलने अथवा सहयोगी बनने जैसी भूमिका निभा सकेंगे।
जन सामान्य का यह दृष्टिकोण धर्म और विज्ञान के तत्वदर्शन को न समझने के कारण ही हैं। दोनों की ही मूल प्रकृति को न समझने के कारण जिन अड़चनों की कल्पना की गई हैं, उसे उथले चिन्तन का ही परिणाम कहा जा सकता हैं। गहराई में उतरने पर धर्म और विज्ञान दोनों ही ऐसे तथ्यों पर आधारित दीखते हैं। जिन पर अविश्वास करने या मिल जुलकर साथ-साथ न चल सकने की आशंका करने का कोई कारण नहीं हैं।
विज्ञान और अध्यात्म का कार्य क्षेत्र अवश्य भिन्न हैं। पर कार्य पद्धति तथा उद्देश्य दोनों में साम्य हैं। दोनों ही सत्यान्वेषण की प्रक्रिया में अलग-अलग मार्गों से प्रगतिशील हैं। विज्ञान वेत्ता भी इस तथ्य को स्वीकारने लगे हैं। वस्तुतः विज्ञान आध्यात्म के तत्वदर्शन को नकारता
नहीं हैं, न ही आध्यात्म के मूलभूत सिद्धांत विज्ञान के विरोधी हैं। पर इस प्रकार की सामंजस्य प्रक्रिया वेदान्त दर्शन में ही दिखाई पड़ती हैं। बाकी जगह धर्म के नाम पर अपनी विलासिता की सामग्री जुटाने वाले ठेकेदार तो विज्ञान को पानी-पी-पी की गालियाँ देने में ही अपनी शान समझते हैं।
वेदान्त दर्शन के सुप्रसिद्ध व्याख्याता स्वामी विवेकानन्द ने 1973 में हुई शिकागो की धर्म महासभा में दिए गए व्याख्यान में कहा था। “रचना नहीं अभिव्यक्ति” वैज्ञानिकों की इस मान्यता को उपनिषदों के सूत्रकार पूर्व काल से ही बताते आ रहे हैं। सम्पूर्ण जगत चिदाकाश से अभिव्यक्त हुआ है।” फ्रेड हाँयल की यह बात प्रकारान्तर से ऋषि वाणी का ही प्रतिपादन हैं।
वेदान्त की वैज्ञानिकता को टेलीहार्ड दे चार्डिन, ज्लियन हक्सले तथा थाँमस हक्सले भी अपनी कृतियों में स्वीकारते हैं। इन विज्ञान विदों का मानना है कि अध्यात्म अपने स्वस्थ रूप तो तभी उभर कर आएगा, जब उसमें घुस आई विकृतियों मूढ मान्यताओं, लोक-प्रचलनों के प्रति हठवादिता पूर्ण दृष्टिकोण से छुटकारा पाया जाय।
स्वामी विवेकानन्द ने इसी को स्पष्ट करते हुए कहा था कि - धर्म के उन ठेकेदारों को विज्ञान की प्रगति से ईर्ष्या होना स्वाभाविक है जो ईश्वर को सातवें आसमान में शाही ठाठ से बैठे हुक्म चलाते सामन्तवादी के रूप में बताते हैं। यही नहीं ये तथाकथित ईश्वर के एजेन्ट मरने के बाद स्वर्ग में फ्लैट की सुविधा, रूप लावण्यमयी परियाँ सुस्वादु भोजन तथा उत्तम कोटि की मदिरा दिलवाने के नाम पर भोले भाले धर्म भीरुओं से सैकड़ों-हजारों रुपये ठग लेते हैं।
स्वामी जी ने विदेशों में व्याप्त-धर्म के इस विकृत रूप को देखकर कहा था, जो धर्म वैज्ञानिकता से घबराता है, तर्क तथ्य-प्रमाणों का नाम सुनकर जिसकी नानी मरती है, उसका नष्ट हो जाना ही उचित हैं। उन्होंने आगे स्पष्ट करते हुए कहा था कि वेदान्त के चिन्तकों को विज्ञान का स्वागत करने के लिए तैयार रहना चाहिए। उनके लिए ऋषियों ने अभय का सूत्र दे रखा हैं। वेदान्त का ब्रह्म किसी ऑफिस में बैठकर आदेश नहीं चलाता। जिसकी कुर्सी उलटने की सम्भावना बन पड़े। वह तो सर्व व्याप्त हैं। प्रकृति के कण-कण में साथ ही आस्तिकों, नास्तिकों, वैज्ञानिकों, सभी के हृदय में समान रूप से उसकी उपस्थिति है।
आज से लगभग 100 वर्ष पूर्व अपने वक्तव्य में स्वामी जी ने स्पष्ट किया था- कि विज्ञान कुछ नहीं अपितु एकता ढूंढ़ रहा हैं। जैसे ही एकता की उपलब्धि हुई। विज्ञान अध्यात्म में मिल जायेगा। क्योंकि यही इसका ध्येय हैं। रसायन विज्ञान की चरम प्रणति मूलतत्व की खोज में हैं। इस मूलतत्व से ही सारे तत्व अभिव्यक्त हुए हैं। यही इसका चरतादर्श होगा। ठीक इसी तरह से भौतिक शास्त्र की पूर्णता-पदार्थ नहीं सर्व व्याप्त ऊर्जा की खोज में होगी। विज्ञान की सरित इस प्रकार अपने बहाव की परिसमाप्ति पर अध्यात्म के सागर में लीन हो जायेगी।
विज्ञान-अध्यात्म के समन्वय के मंत्र द्रष्टा एक ऋषि का भविष्य कथन उनके दिये गए वक्तव्य के ठीक चालीस वर्ष बाद तब पूरा हो गया, जब क्वाँटम फिजिक्स के जन्मदाता मैक्स प्लैंक उन्हीं के कथन को दोहराने लगे। इस सुप्रसिद्ध भौतिक शास्त्री ने बताया कि विज्ञान लगातार बिना रुके प्रगति करता चला जा रहा हैं। इसका उद्देश्य एकतत्व मूलतत्व की प्राप्ति हैं। इस लक्ष्य की प्राप्ति अन्त प्रज्ञा से ही होगी बौद्धिक विवेचना से नहीं। क्वाँटम थ्योरी के प्रवेश के बाद अब एकतत्व का मार्ग प्रशस्त हो गया हैं। जिसे “ग्राण्ड सूनिफिकेशन ऑफ फोर्सेस” कहा जाता हैं।
प्रख्यात विज्ञान वेत्ता ग्रे जुकाव ने अपने ग्रन्थ दि वु लाई मार्स्टस में “ विज्ञान का अन्त” शीर्षक में बताया हैं, विज्ञानवेत्ताओं की जननी पश्चिमी सभ्यता विज्ञान की संकीर्ण परिधि लांघ कर मानवीय अनुभूतियों के उन आयामों में प्रवेश कर रही हैं।
वेदान्त के उत्कृष्ट चिन्तन से प्रभावित प्रो. विलियम जेम्स ने कहा था-वैज्ञानिकों को वेदान्त के चिन्तन से दिशा मिल सकती हैं। उनने बताया कि विज्ञान का लक्ष्य वेदान्त में ही हैं भौतिकी विद् वारनर हाइजेन वर्ग ने अपने ग्रन्थ “दि पार्ट एण्ड होल” में इस कथन को महत्वपूर्ण बताते हुए कहा है कि वैज्ञानिक जगत में इसकी महती आवश्यकता हैं।
वारनर हाईजेन वर्ग का कथन मात्र वाग्विलास हो, ऐसा नहीं हैं। उनने अपने एक संस्मरण में लिखा है कि इंग्लैण्ड में मेरी मुलाकात श्री रवीन्द्र नाथ टैगोर से हुई। उनसे हुई वेदान्तिक चर्चा ने ही शोध कार्य में मेरा मार्ग प्रशस्त किया।
उनने आगे बताया है कि “क्वाँटम फिजिक्स में कार्य प्रारम्भ करने के बाद-लेक्चर टूर के लिए भारत आने पर मैं उनका अतिथि हुआ-तथा उस समय उनसे हुई विशद् वेदान्तिक विवेचना ने रहे सहे सन्देह दूर कर दिए और मैं विज्ञान जगत को एक नई शोध देने में समर्थ हुआ।”
वेदान्त की वैज्ञानिकता से मात्र हाइजेनवर्ग ही नहीं स्क्रीडिंगर, नील्स बोर, जेरमी, ब्रेन स्टेन आदि बहुत अधिक प्रभावित हुए। स्क्रोडिंगर ने वेदान्त औंर क्वाँटम फिजिक्स के अन्तर सम्बन्धों के वैज्ञानिक आध्यात्म वाद पर डपदक दक उंजजमत (मन व पदार्थ) तथा डल अपमू विजीम वतसक (संसार के प्रति मेरा दृष्टिकोण) जैसे उत्कृष्ट ग्रंथ भी लिखे हैं।
इन वैज्ञानिकों द्वारा प्रस्तुत की गई विवेचनाओं का अध्ययन करने पर स्पष्ट होता है कि विज्ञानवेत्ता बुद्धिवाद तथा जड़वाद की संकीर्ण सीमाओं को तोड़ने के लिये प्रयत्नशील हैं। अध्यात्मवेत्ताओं का कर्तव्य हैं कि वे भी लोक मान्यताओं, चित्र-विचित्र प्रचलनों की विडम्बनाओं में मुक्त हों, तभी इसमें सही ढंग से निखार आ सकेगा। इस कार्य को यदि वेदान्तिक चिन्तन को आदर्श मान कर कार्यान्वित किया जाय तो उचित दिशा−दर्शन के साथ समुचित सफलता मिल सकेगी।
विज्ञान आध्यात्म का यह समन्वय सहयोग समूची मानव जाति को भौतिक समृद्धि तथा आत्मिक प्रगति प्रदान करने वाला सिद्ध हो सकेगा। यह एक प्रकार का ऐसा समुद्र मंथन होगा जिसकी उपलब्धियाँ मानव जाति को गौरवान्वित करेंगी, ऐसे अजस्र अनुदान भी प्रदान करेंगी जिससे मानव कृतकृत्य हो सके।
अति निकट और अति दूर की उपेक्षा करना मानव का सहज स्वभाव है। यह उक्ति जीवन सम्पदा के हर क्षेत्र में लागू होती हैं। जीवन हम घड़ी जीते हैं, पर न तो उसकी गरिमा समझते और न सोच पाते हैं कि इसके सदुपयोग से क्या-क्या सिद्धियां उपलब्ध हो सकती है। प्राणी जन्म लेता और पेट प्रजनन की, प्राकृतिक उत्तेजनाओं से विक्षुब्ध होकर, निर्वाह की जरूरतें पूरी करते हुए दम तोड़ देता हैं। ऐसे क्षण कदाचित ही कभी आते हैं, जब यह सोच हो कि स्रष्टा की तिजोरी का सर्वोपरि उपहार मनुष्य जीवन हैं। जिसे अनुग्रह पूर्वक यह जीवन दिया गया हैं। उससे यह आशा की गई हैं कि वह उसका श्रेष्ठतम सदुपयोग करेगा। अपनी अपूर्णता पूरी करके तुच्छ से महान बनेगा, साथ ही विश्व उद्यान को कुशल माली की तरह सीँचते-संजोते, यह सिद्ध करेगा कि उसे स्वार्थ और परमार्थ के सही रूप का ज्ञान हैं। स्वार्थ इसमें हैं कि पशु प्रवृत्तियों की कुसंस्कारिता से पीछा छुड़ाएं और सत्प्रवृत्तियों की आवश्यक मात्रा में अवधारणा करते हुए उस परीक्षा में उत्तीर्ण हों, जो धरोहर का सदुपयोग कर सकने के रूप में सामने प्रस्तुत हुई हैं। जो उसमें उत्तीर्ण होता है। वह देव मानव की कक्षा में प्रवेश करता हैं। अपना ही भला नहीं करता, असंख्यों को अपनी नाव में बिठाकर पार करता हैं। ऐसों को ही अनिन्दनीय, अनुकरणीय महामानव कहा जाता है। तृप्ति, तुष्टि-शान्ति के त्रिविध आनन्द ऐसों को ही मिलते हैं।
मनुष्य जीवन दिव्य सत्ता की एक बहुमूल्य धरोहर हैं, जिसे सौंपते समय उसकी सत्पात्रता पर विश्वास किया जाता हैं। मनुष्य के साथ यह पक्षपात नहीं है वरन् ऊंचे अनुदान देने के लिये यह प्रयोग परीक्षण है। अन्य जीवधारी शरीर भर की बात सोचते और क्रिया करते हैं, किन्तु मनुष्य को स्रष्टा का उत्तराधिकारी युवराज होने के नाते अनेकानेक कर्तव्य और उत्तरदायित्व निबाहने पड़ते हैं। उसी में उसकी गरिमा और सार्थकता हैं। यदि पेट प्रजनन तक, लोभ मोह तक उसकी गतिविधियाँ सीमित रहें तो उसे नर पशु के अतिरिक्त और क्या कहा जायेगा? लोभ-मोह के साथ अहंकार और जुड़ जाने पर तो बात और भी अधिक बिगड़ती हैं। महत्वकांक्षाओं की पूर्ति के लिये उभरी अहमन्यता अनेकों प्रकार के कुचक्र रचती और पतन पराभव के गर्त में गिरती हैं। अहंता से प्रेरित व्यक्ति अनाचारी बनता हैं और आक्रामक भी। ऐसी दशा में उसका स्वरूप और भी भयंकर हो जाता हैं। दुष्ट दुरात्मा एवं नर पिशाच स्तर की आसुरी गतिविधियाँ अपनाता हैं। इस प्रकार मनुष्य जीवन जहाँ श्रेष्ठ-सौभाग्य का प्रतीक था, वहाँ वह दुर्भाग्य और दुर्गति का कारण ही बनता हैं। इसी को कहते है वरदान को अभिशाप बना लेना। दोनों ही दिशाएं हर किसी के लिए खुली हैं। जो इनमें जिसे चाहता हैं। उसे चुन लेता हैं। मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप जो हैं।
साधकों में भिन्नता देखी जाती हैं। उनके भिन्न-भिन्न इष्ट देव उपास्य होते हैं। उनसे अनुग्रह अनुकंपा की आशा की जाती है और विभिन्न मनोकामनाएं पूर्ण करने की अपेक्षा रखी जाती हैं। इनमें से कितने सफल होते हैं। इस सम्बन्ध में कुछ नहीं कहा जा सकता हैं, क्योंकि पराधीनता की स्थिति में स्वामी की इच्छा पर सब कुछ निर्भर रहता है। सेवक तो अनुनय विनय ही करता रह सकता हैं। किन्तु जीवन देवता के संबंध में यह बात नहीं है। उसकी अभ्यर्थना सही रूप में बन पड़ने पर, वह सब कुछ इसी कल्प वृक्ष के नीचे प्राप्त किया जा सकता है, जिसकी कहीं अन्य से पाने की आशा लगाई जाती है।
ब्रह्मांड का छोटा सा रूप पिण्ड परमाणु हैं। जो ब्रह्मांड में हैं वह सब कुछ पदार्थ के सबसे छोटे घटक परमाणु में भी विद्यमान हैं और सौर मंडल की समस्त क्रिया-प्रक्रिया अपने में धारण किये हुए हैं। इसे विज्ञानवेत्ता ने एक स्वर से स्वीकार किया हैं। इसी प्रतिपादन का दूसरा पक्ष यह है कि परम सत्ता ब्रह्मांडीय चेतना का छोटा किन्तु समग्र प्रतीक जीव हैं। वेदान्त दर्शन के अनुसार आत्मा ही परमात्मा हैं। तत्व दर्शन के अनुसार इसी काय कलेवर में समस्त देवताओं का निवास हैं। परब्रह्म की दिव्य क्षमताओं का समस्त वैभव जीवब्रह्म के प्रसुप्त संस्थानों में समग्र रूप से विद्यमान हैं। यदि उन्हें जगाया जा सके तो विज्ञात अतीन्द्रिय क्षमतायें और अविज्ञात दिव्य विभूतियाँ जाग्रत, संयम एवं क्रियाशील हो सकती हैं। तपस्वी योगी, ऋषि, मनीषी, महामानव सिद्ध पुरुष ऐसी ही विभूतियों से सम्पन्न देखे गये हैं। तथ्य शाश्वत और सनातन हैं। जो कभी हो चुका हैं। वह अभी भी हो सकता हैं। जीवन देवता की साधना से ही महान सिद्धियां प्राप्त होती हैं। कस्तूरी के हिरण जैसी बात है। बाहर खोजने में थकान और खीझ ही हाथ लगती हैं। शान्ति तब मिलती हैं जब जब उस सुगंध का केन्द्र अपनी ही नाभि में होने का पता चलता हैं। परमात्मा के साथ संपर्क स्थापित करने के लिए अन्यत्र खोजबीन करने की योजना व्यर्थ हैं। वह एक देश काल तक सीमित नहीं है, कलेवरधारी भी नहीं। उसे अति निकटवर्ती क्षेत्र में देखना हो तो वह अपना अन्तः करण ही हो सकता हैं। समग्र जीवन इसी की प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति हैं।
गीताकार ने उस परब्रह्म को श्रद्धा में ही समाहित बताया हैं और कहा हैं कि जिसकी जैसी श्रद्धा हो वह वैसा ही हैं, जो अपने को जैसा मानता हैं वह वैसा ही बन जाता हैं। यदि अपने को तुच्छ और हेय समझा जाता रहा जायेगा तो व्यक्तित्व उसी ढांचे में ढल जायेगा।जिसने अपने अन्दर महानता आरोपित की है। उसे अपना व्यक्तित्व गरिमा से ओत-प्रोत दिखाई पड़ेगा।
परमात्मा सब कुछ करने में समर्थ हैं। उसमें समस्त विभूतियाँ विद्यमान हैं। इसी शास्त्र वचन को यों भी कहा जा सकता है कि उसका प्रतीक प्रतिनिधि-उत्तराधिकारी युवराज भी, अपने सृजेता की विशेषताओं से सम्पन्न हैं। कठिनाई तब पड़ती है। जब आत्म-विस्मृति का अज्ञानान्धकार अपनी सघनता से वस्तु स्थिति को आच्छादित कर लेता हैं। अंधेरे में झाड़ी को भूत और रस्सी को साँप के रूप में देखा जाता हैं। जिधर भी कदम बढ़ाया जाये उधर ही ठोकरें लगती हैं, किन्तु यदि प्रकाश की व्यवस्था बन जाये तो सब कुछ यथावत दिखाई पड़ेगा। आत्मबोध को उस प्रकाश का उदय माना जाता है, जिसमें अपने सही स्वरूप का आभास भी मिलता है और मार्ग ढूंढ़ने में भी विलम्ब नहीं लगता।
भेड़ों के झुण्ड में पले सिंह शावक की कथा सर्वविदित हैं। अपने इर्द-गिर्द का वातावरण और प्रचलन मनुष्य को अपने ही समूह में घसीट ले जाता हैं। पर जब आत्मबोध होता हैं तब पता चलता हैं कि आत्म सत्ता “शुद्धोडसि-बुद्धाकडसि-निरजंनोडसि” के सिद्धांत को अक्षरशः चरितार्थ करती हैं। “मनुष्य भटका हुआ देवता हैं” इस कथन में उसका सही विश्लेषण देखा जा सकता हैं। यदि भटकाव दूर हो जाये तो समझाना चाहिए कि समस्त समस्याओं का हल निकल आया, समस्त भवबंधनों से छुटकारा मिल गया। मोक्ष और कुछ नहीं अपने संबंध में जो अचिन्त्य-चिन्तनवश भूल हो गई हैं, उससे त्राण पा लेन का परम पुरुषार्थ है। मकड़ी अपने लिए जाला अपने भीतर का द्रव निकाल कर स्वयं ही बुनती हैं, स्वयं ही उसमें उलझती और छटपटाती हैं, किन्तु देखा गया हैं कि जब उसमें उमंग उठती है तो उस जाले को समेट बटोर कर स्वयं ही निगल भी जाती हैं। हेय जीवन स्वकृत हैं। जैसा सोचा गया, चाहा गया, माना गया, वैसी ही परिस्थितियाँ बन गई। अब उस बदलने का मन हो तो मान्यताओं आकांक्षाओं और गतिविधियों को उलटने की देर है। निकृष्ट को उत्कृष्ट बनाया जा सकता हैं। क्षुद्र से महान बना जा सकता हैं।
“साधना से सिद्धि” का सिद्धांत सर्वमान्य हैं। देखना इतना भर है कि साधना किसकी की जाय। अन्यान्य इष्ट देवों के बारे में कहा नहीं जा सकता कि उनका निर्धारित स्वरूप और स्वभाव वैसा है या नहीं, जैसा कि सोचा जाना गया हैं। इसमें संदेह होने का कारण भी स्पष्ट हैं। समूची विश्व व्यवस्था एक है। सूर्य, चन्द्र, पवन आदि सार्वभौम हैं। ईश्वर भी सर्वजनीन है, सर्वव्यापी भी। फिर उसके अनेक रूप कैसे बने? अनेक आकार-प्रकार और गुण स्वभाव का उसे कैसे देखा गया? मान्यता यदि यथार्थ हैं तो उसका स्वरूप सार्वभौम होना चाहिए। यदि वह मतमतान्तरों के कारण अनेक प्रकार का होता है, तो समझना चाहिए की यह मान्यताओं की ही चित्र-विचित्र अभिव्यक्तियाँ हैं। ऐसी दशा में सत्य तक कैसे पहुँचा जाये? प्रश्न का सही उत्तर यह है कि जीवन को ही जीवित जाग्रत देवता माना जाये। उसके ऊपर चढ़े कषाय-कल्मषों का परिमार्जन करने का प्रयत्न किया जाय। अंगार पर राख की परत जम जान पर वह काला कलूटा दिख पड़ता हैं, पर जब वह परत हटा दी जाती है तो भीतर छिपी अग्नि स्पष्ट दिखने लगती है। साधना का उद्देश्य इन आवरण आच्छादनों को हटा देना भर है। इसे प्रसुप्ति को जागरण में बदल देना ही कहा जा सकता हैं।
आध्यात्म विज्ञान तत्ववेत्ताओं ने अनेक प्रकार के साधना उपचार बताए हैं। यदि गंभीरतापूर्वक उनका विश्लेषण विवेचन किया जाये तो प्रतीत होगा कि यह प्रतीक पूजा और कुछ नहीं मात्र आत्म परिष्कार का ही बाल बोध स्तर का प्रतिपादन हैं। पात्रता और प्रखरता का अभिवर्धन ही योग और तप का लक्ष्य हैं। पात्रता एक चुम्बक है जो अपने उपयोग की वस्तु-शक्तियों को अपनी और सहज ही आकर्षित करती रहती है। मनुष्य में विकसित हुए देवत्व का चुम्बक संसार में संव्याप्त शक्तियों और परिस्थितियों को अपनी और आकर्षित करता रहता हैं। जलाशय गहरे होते हैं। सब और से पानी सिमटकर इकट्ठा होने के लिए उनमें जा पहुँचता हैं। समुद्र में सभी नदियाँ जा मिलती हैं। यह उसकी गहराई का ही प्रतिफल है। पर्वत की चोटियों पर यदि शीत की अधिकता से बर्फ जम जाये तो गर्मी पड़ते ही पिघल जाता है और नदियों से होकर समुद्र में पहुँच कर रुकता हैं। इसी को कहते हैं “पात्रता”। पात्रता का अभिवर्धन ही साधना का मूलभूत उद्देश्य हैं। ईश्वर को न किसी की मनुहार चाहिए और न उपहार। वह छोटी मोटी पेट पूजाओं से या स्तवन गुणगान से प्रसन्न नहीं होता। ऐसी प्रकृति तो क्षुद्र लोगों की होती है। भगवान का ऐसा मानस नहीं। वह न्यायनिष्ठ और विवेकवान हैं। व्यक्तित्व में उत्कृष्ट आदर्शवादिता का समावेश होने पर जो गरिमा उभरती है। उसी के आधार पर वह प्रसन्न होता और अनुग्रह बरसाता हैं। उसे फुसलाने बरगलाने का प्रयास करने वालों की बाल क्रीडा निराशा ही प्रदान करती है।
ऋषि ने पूछा- “कस्मै देवाय हविषा विधेम” अर्थात् “हम किस देवता के लिए यजन करें” उसका सुनिश्चित उत्तर है, आत्म देव के लिए। अपने आप को चिन्तन, चरित्र और व्यवहार की कसौटियों पर खरा सिद्ध होना ही वह स्थिति है, जिसे सौ टंच सोना कहते है। पेड़ पर फल-फूल ऊपर से टपक कर नहीं लदते, वरन् जड़ें जमीन से जो रस खींचती हैं उसी से वृक्ष बढ़ता है और फलता-फूलता है। जड़े अपने अन्दर हैं, जो समूचे व्यक्तित्व को प्रभावित करती हैं। इसी प्रखरता के आधार पर वे सिद्धियां-विभूतियाँ प्राप्त होती हैं। जिनके आधार पर अध्यात्मिक महानता और भौतिक प्रगतिशीलता के उभय पक्षीय लाभ मिलते है। यही उपासना, साधना और आराधना का समन्वित स्वरूप है। यही वह साधना है जिसके आधार पर सिद्धियां और सफलताएं सुनिश्चित बनती हैं। दूसरे के सामने हाथ पसारने गिड़गिड़ाने भर से पात्रता के अभाव में कुछ प्राप्त नहीं होता। भले कही वह दानी परमेश्वर ही क्यों न हों। कहा गया हैं कि ईश्वर केवल उनकी सहायता करते हैं, जो अपनी सहायता करने को तत्पर है। आत्मपरिष्कार, आत्मशोधन, यही जीवन साधना है। इसी को परम पुरुषार्थ कहा गया है। जिनने इस लक्ष्य को समझा, जानना चाहिए कि उनने अध्यात्म तत्व ज्ञान का रहस्य और मार्ग हस्तगत कर लिया, चरम लक्ष्य तक पहुंचने का राजमार्ग पा लिया।
रावण असाधारण मायावी था। उसे रूप बदल लेने जैसी कितनी ही कलाएं आती थी।
सीता हरण के बाद उन्हें उसने अशोक वाटिका में रखा। उन्हें पत्नी बनाने के लिए फुसलाने के अनेक प्रयत्न करता रहा पर उसकी सभी चालें निष्फल हुई।
एक दूसरे मायावी “कालनेमि” ने उस सलाह दी कि तुम राम रूप ही क्यों नहीं बना लेते? सीता पहचान न सकेगी और आसानी से तुम्हारे साथ रहने लगेगी।
रावण ने कहा- यह प्रयोग करके भी मैं देख चुका हूं। जब राम के रूप में अपने को सज्जित करता हूं तो बुद्धि भी वैसी ही बन जाती है। तब सीता माता के समान दीख पड़ती है और उससे कुछ अधोगामी चर्चा करने के लिए मन तक नहीं करता।
सैन्य अनुशासन की इसलिए प्रतिष्ठा की जाती है कि उस समुदाय में सभी को एकता, समस्वरता, सहकारिता जैसी सत्प्रवृत्तियों का पल-पल परिचय देना पड़ता है। सभी की वर्दी एक जैसी होती है। सभी को भोजन साथ-साथ करना पड़ता है।सभी कदम से कदम मिलाकर चलने के आदि होते है। किसी को व्यक्तिगत आपाधापी करने की छूट नहीं होती। नियम अनुबंधों का पूरी तरह परिपालन करने के लिए सभी को प्रशिक्षित एवं अभ्यस्त किया जाता है। मनमर्जी चलाने की अनुबंधों को तोड़ने की, निर्धारित कर्तव्यों के परिपालन में आना कानी करने के लिए किसी को भी स्वच्छन्दता प्राप्त नहीं होती। प्रकारान्तर से यही समाजवाद की आरम्भिक शिक्षा हैं।
इस अनुशासन में स्वच्छता, सुव्यवस्था बरतने के लिए हर सदस्य को आदत डालनी और सतर्कता बरतनी पड़ती है। कोई भी मैला कुचैला नहीं रह सकता। कसी के भी कपड़ों में सिलवट, सिकुड़न नहीं होती, दाग-धब्बे वाले पोशाक कोई नहीं पहन सकता। चलने में पंक्तिबद्ध चलने का क्रम अपनाना पड़ता हैं। सीना तानकर चलना पड़ता है। बुड्ढों की तरह कमर झुकाकर चलते हुए उनमें से किसी को भी नहीं देखा जाता। यह सतर्क अनुशासन और जागरुक व्यक्तित्व के लक्षण है। जिन्हें सामान्य नागरिकों को भी अपने व्यक्तिगत जीवन में अनुकरणीय आदर्श मानकर अपनाना चाहिए। इस संगठन में किसी को भी स्वेच्छाचार बरतने का मन भर साहस नहीं होता। उच्छृंखलता का आभास मिलते ही बड़े साहब के आगे पेशी होती हैं और भविष्य में वैसा न करने की कड़ी चेतावनी के साथ आवश्यक प्रताड़ना भी मिलती है।
सभ्य नागरिकों में से प्रत्येक को अपना व्यवहार इसी प्रकार से स्वेच्छापूर्वक रखना चाहिए। यह नागरिक कर्तव्यों का अनुशासन है जो सच्चे अर्थों में मनुष्य कहलाने वाले प्रत्येक व्यक्ति को अपनी गतिविधियों में समाविष्ट करना ही चाहिए। प्रयत्न यही होना चाहिए कि परिधान आच्छादन निर्वाह सजधज के सभी एक जैसे रहें ऐसी मन मर्जी न बरतें, जिसमें स्वेच्छाचार अपनाने का लाँछन लगे।
दुर्गुणों में सर्वप्रथम हैं संकीर्ण स्वार्थपरता की कीचड़ से सना हुआ “व्यक्तिवाद” इसी से प्रेरित होकर लोग अपने आप को सार्वजनिक स्तर में संतुष्ट न रख कर अपने लिए विशेष सुविधाएं चाहते है। बड़प्पन व प्यार में शेखी जताने, विशिष्ट सिद्ध करने के लिए चित्र-विचित्र पाखंड रचते हैं। कीमती पोशाकें पहनते है। श्रृंगार से सजाते है। ठाठ-बाठ रोपते हैं। फिजूल खर्ची में धन जुटा कर अपनी अमीरी का ढिंढोरा पीटते है। औसत निर्वाह में संतुष्ट न रहकर किसी भी प्रकार अपनी सम्पन्नता विशेषता जताने के लिए महंगे आडम्बर अपनाते है। इस उद्धतपन के लिए आकुल व्याकुल रहने वाले महत्वाकांक्षी अपनी हविस पूरी करने के लिए अनाचार अपनाते आक्रामक बनते है। और अपराध स्तर की गतिविधियाँ बिना हिचक अपनाते है। अवाँछनीयताएं तो पहले ही आरम्भ होती है।अनौचित्य भले पाप पुण्यों का सिलसिला यही से चलता है। पतन और कुछ नहीं बढ़े चढ़े व्यक्तिवाद का ही सामान्य प्रतिफल है।इस उन्माद से पीड़ित व्यक्ति जो कुछ बुरे से बुरा कर गुजरे वही कम हैं।
होना यही चाहिए कि व्यक्ति अपने आप को समाज के एक अविच्छिन्न और सामान्य घटक मात्र समझे। सब की उन्नति में अपनी उन्नति समझे। महत्वाकांक्षाओं की साधारण साधना के साथ न जोड़े और यह आकाँक्षा संजोये रखे कि आदर्शों के परिपालन में अपने को हर किसी से आगे रखना है। सामूहिक उन्नति को ही अपनी उन्नति मानना हैं। यही मनोवृत्ति और रीति नीति अपनाना सच्चे अर्थों में धार्मिकता या आध्यात्मिकता हैं। लोक व्यवहार की भाषा में इसी को समतावाद, समाजवाद,
आदि नामों से पुकारा और सराहा जाता हैं। इस नैतिक अनुशासन में बंधने पर हर किसी को समाजनिष्ठ बनना पड़ता हैं। सार्वजनिक हित को सर्वोपरि मानना पड़ता है। भले ही इसमें अपने को सामान्य बनकर रहना पड़ता हो। चतुर कहे जाने वाले स्वार्थियों की तुलना में घाटा स्वीकार करना पड़ता है। पाप छोड़ने और पुण्य परमार्थ अपनाने की बात इसी प्रकार बन पड़ती हैं कि व्यक्तिवाद पर और अधिकाधिक कड़ा अंकुश लगाया जाये, और लोकहित के लिए सत्प्रवृत्ति संवर्धन के लिए जितना अधिक उदार साहस अपनाया जा सके, उतना अपनाकर दिखाया जाये। मर्यादाओं और वर्जनाओं की उपेक्षा करने, मनमौजी उद्दंडता अपनाकर असामाजिकता पर उतारू होना, यही पाप की एकमात्र परिभाषा हैं। इसी को अन्याय कहते हैं। जो उसे अपनाते हैं उसे मानवी गरिमा से रहित या पतित कहा जाना चाहिए। उसकी भर्त्सना ही की जानी चाहिए भले ही उसने कितनी ही बड़ी सफलता पाई या कितनी ही अधिक सम्पदा एकत्रित क्यों न की हो। व्यक्तिगत जीवन में, समाज परिकर में अनेक प्रकार के विग्रह संकट और अनाचार खड़े करने का अपराधी व्यक्तिवाद को ही माना जाना चाहिए।
जो जितना अधिक खुदगर्ज हैं। समझना चाहिए कि वह सभ्य समाज का सदस्य कहलाने से उतना ही दूर हैं। मनुष्य सामाजिक प्राणी हैं, उसकी समस्त सुविधाएं, विशेषताएं, उपलब्धियाँ सार्वजनिक सहयोग से ही उपलब्ध हुई हैं। इतने पर भी लोकहित की उपेक्षा करने वाले को कृतघ्न ही कहा जायेगा। स्वार्थपरता की सघनता ही मनुष्य को निष्ठुर, कृपण, अनाचारी बनाती हैं। ऐसों को नर पशु से अधिक कुछ नहीं माना जा सकता भले ही वह बड़प्पन के कितने ही बड़े सरंजाम क्यों न जुटा चुका हो। समता, समस्वरता, शालीनता, सज्जनता इसी में है कि व्यक्ति समाजनिष्ठ होकर जिये। अपनी विभूतियों का लोक हित में उत्सर्ग करें। व्यक्तिवाद के विष वृक्ष से अनेकों शाखा प्रशाखाएँ फूटती और दृष्प्रवृत्तियों की अगणित पत्तियाँ निकलती है। अहंकार, अनाचार, अपव्यय, लालच, संग्रह आत्म विज्ञापन, आलस्य, प्रमाद, विलास आदि की उत्पत्ति कर उद्गम आदर्शों की अवमानना ही हैं। इसी कारण व्यक्ति निष्ठुर बनता हैं। कृतघ्नता अपनाता हैं। उदार व्यवहार, सहयोग, सहकार के अवसर आने पर बगलें झांकता हैं। ऐसी दशा में चिन्तन, चरित्र, और व्यवहार में शालीनता जुड़ ही नहीं पाती। दुर्भाग्य से हमारे दर्शन और इतिहास में भी वैज्ञानिक सुख सुविधा, स्वार्थ मुक्ति, सिद्धि, दैव अनुकम्पा आदि की ही विशेष रूप से चर्चा है। सामाजिकता की उपेक्षा जब से की जाने लगी तभी से विगठन अनेक रूपों में प्रकट होते गये। आर्थिक आधार को लेकर अनेकों संगठन बनते हैं। अनाचारी षड़यंत्रों का गिरोह बंदी के आधार पर व्यवसाय चलता हैं। पर उदारचेता सज्जन इसके लिए कोई सुदृढ़ संगठन नहीं बना पाते कि सत्प्रवृत्तियों का सम्वर्धन और दुष्प्रवृत्तियों का उन्मूलन व्यापक रूप से संभव हो सके। इसी कमी के कारण देवता असुरों से हारते हैं। आज भी अनाचारी जीत बोलते और सदाचारी हाथ मलते, पराभव पाते दीख पड़ते हैं।
व्यक्ति की सत्ता और महत्ता यदि सद्भावना और न्याय व्यवस्था की पक्षधर रही होती तो अतीत का सतयुग अभी भी बना होता। धरती पर स्वर्ग का वातावरण होता और जन-जन को ऐसा देव जीवन जीते देखा जाता जो स्वयं सुख शान्ति से उल्लासित रहता और दूसरों को ऊंचा उठाने आगे बढ़ाने के लिए ऐसा कुछ करता रहता जिससे यह स्नेह सौजन्य सहयोग के आन्तरिक वैभव और अभ्युदय की भी कमी न रहती। यह आस्था संकट ही हैं जिसके कारण समूह का अंग बन कर रहना और सार्वजनिक प्रगति की व्यवस्था बन पड़ने में पग-पग पर व्यवधान मजबूरी वश देखना पड़ता है। इस संकट से निपटने के लिये हमें लोक मानस का बहिष्कार करने के लिये नये सिरे से नये-नये प्रयत्न करने की आवश्यकता पड़ेगी। प्रचलित चिन्तन को असाधारण मोड़ देना पड़ेगा।
आस्था क्षेत्र का दूसरा संकट हैं- अनौचित्य को सहन करते और अपनाते रहना। प्रचलित मान्यताओं, प्रथा, परम्पराओं में से अधिकाँश ऐसी है जो न्यायानुमोदित नहीं हैं। उनके पीछे तर्क, तथ्य, प्रमाण के ऐसे आधार नहीं हैं जिनके सहारे उन्हें अनुचित ठहराया जा सके। फिर भी अभ्यास में आने के कारण न केवल उन्हें सहन किया जाता रहता हैं वरन् उचित जैसी लगने के कारण आग्रह पूर्वक समर्थन भी किया जाता रहता हैं। कितनी ही मूढ़ मान्यताएं ऐसी ही हैं। अन्य विश्वासों की कोई गणना नहीं। कुरीतियों की हानियां सुनते समझते रहने पर भी लोग उनके साथ बुरी तरह लिपटे रहते हैं। तर्क, तथ्य प्रमाण, उदाहरण उनका समर्थन नहीं करते फिर भी परम्परा इसी को अपनाये रहने की आदत आवश्यक परिवर्तन को भी अंगीकार करने के लिए सहमत नहीं होती।
उदाहरण के लिए जाति-पाँति के आधार पर चलने वाली ऊंच-नीच मान्यताएं का न तो तर्कों के आधार पर समर्थन हो सकता हैं और न न्याय की कसौटी पर वह प्रथा सही सिद्ध हो सकती हैं। फिर भी जाति उपजातियों के आधार पर चलने वाली ऊंच-नीच की मान्यता उन लोगों के भीतर भी किसी कदर जमी होती हैं। जो प्रत्यक्षतः उसे अमान्य ठहराने के लिए बड़ी-बड़ी बातें कहते रहते हैं। जातिवाद ने राजनीति से लेकर अर्थनीति तक में अपनी जड़े जमा ली हैं। सामाजिक बुराई तो वह है ही उसे विघटन का एक बड़ा कारण माना जा सकता है। और प्रगति पथ पर अड़ा हुआ एक भारी चट्टान जैसा अवरोध।
नर वशिष्ठ और नारी कनिष्ठ मानने की मान्यता भी ऐसी ही हैं। जिसका कोई औचित्य नहीं। आधी जनसंख्या को इसी आधार पर शोषित और गुलाम बनकर रहना पड़ता हैं। आधी जनसंख्या अपने को उनका अधिपति मानती और मनमाने दुर्व्यवहार करते रहने को अपना अधिकार जताती है। मनुष्य जाति के दोनों पक्ष अविच्छिन्न रूप से एकता और समता की धुरी से जुड़कर गाड़ी के दो पहियों की तरह सच्चे अर्थों में प्रगति पथ पर अग्रसर होते हैं पर देखने में कुछ और भी आता हैं। उनके बीच अघोषित शोषक और शोषित का स्वरूप ही प्रथा प्रचलन में सम्मिलित हैं।
मुहूर्तवाद, भाग्यवाद, ज्योतिष, फलादेश, जादूटोना, देवदर्शन, चित्र-विचित्र, कर्मकांडों का कोई तथ्यपूर्ण आधार नहीं बन पड़ता फिर भी अधिकाँश लोग उसको अपनाकर ही चलते देखे जाते हैं। आहार-विहार के क्षेत्र में हमारी अधिकांश आदतें ऐसी हैं जिन्हें स्वास्थ्य संतुलन और अर्थ व्यवस्था की दृष्टि से हानिकारक ही माना जाएगा। नशेबाजी, माँसाहार, कपड़ों से लदे रहने, सौंदर्य प्रसाधनों पर समय और धन खर्चने जैसी बातों को यदि उपयोगिता की कसौटी पर कसा जाय तो व सर्वत्र निरर्थक ही सिद्ध होती हैं। फिर भी आदत से मजबूर होकर किसी न किसी प्रकार उन्हें अपनाते रहते हैं। सम्प्रदायवाद, क्षेत्रवाद, जातिवाद आदि के नाम पर चलने वाले विभेदों, विग्रहों के पीछे भी कोई तथ्य पूर्ण आधार का कारण नहीं खोजा जा सकता।
इन दिनों मानव जीवन बुरी तरह अवाँछनीयता और कृत्रिमताओं से जकड़ा हुआ हैं। उनमें न्याय नीति के प्रति भी अवमानना और उपेक्षा का भाव देखा जाता है। शिष्टाचार छोड़ा और स्वेच्छाचार अपनाया जा रहा हैं। दूसरों के साथ व्यवहार करते समय यह भुला दिया जाता है कि अपने को यदि दूसरे की स्थिति में रहना और वह सब सहन करना पड़ता तो कैसा लगता? अधिकाँश अनाचार इसीलिए पनपते हैं कि लोग अपने लिए मनमर्जी बरतने की छूट चाहते है और दूसरों के अधिकारों के हनन की जरा भी परवाह नहीं करते। पशु पक्षियों के साथ हमारा व्यवहार प्रायः ऐसे ही अनाचार पर अवलम्बित होता हैं। माँसाहार के अपनाने के लिए असाधारण स्तर की निष्ठुरता भी अपनानी पड़ती हैं। कोई यह नहीं सोचता कि वध किये जाने वाले प्राणी के स्थान पर यदि हम रहे होते तो कैसा लगता। चोरी, ठगी, प्रपंच, अन्याय, शोषण पर आधारित अनेकानेक अपराधों के पीछे अनौचित्य को सहन समर्थन करने अपनाने का भव ही काम करता रहा है। इस कारण सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक क्षेत्र में अनेकानेक दुष्प्रवृत्तियां उपजी और आँधी तूफान की तरह बढ़ी हैं।
युग विभीषिकाएं एकता और समता पर आधारित सद्भावनाओं का परित्याग करने से ही उत्पन्न हुई है। इसी प्रकार “व्यक्तिवाद” और “अनौचित्य” को प्रश्रय देने में दुष्प्रवृत्तियों का विस्तार हुआ हैं। जो हर किसी के लिये हर प्रकार दुष्परिणाम ही प्रस्तुत करता हैं। इन्हीं के कारण वायुमंडल और वातावरण विषाक्त हुआ हैं। प्रकृति को कुपित होकर सर्वनाशी संकट उत्पन्न करने के लिए बाधित किया हैं। मानवी चिंतन साँसारिक व्यवस्था को ही नहीं प्रकृति संतुलन को भी बिगाड़ती हैं। इस समय के प्रस्तुत घटाटोप से बचना हो तो उनके मूल कारण मानव चिन्तन और व्यवहार में क्रान्तिकारी परिवर्तन करने के अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं।
आज से कई शताब्दियों पूर्व के सतयुग का वर्णन हम पुराण - कथा गाथाओं में सुनते आए हैं। आज जो परिस्थितियाँ हैं, उन्हें दृष्टिगत रख सतयुग की वापसी कैसे होगी, यह महत्वपूर्ण प्रश्न सामने आता हैं। विगत सतयुग के आरंभ में प्रत्येक वरिष्ठजन की महत्वाकांक्षा एक ही होती थी कि वह उत्कृष्ट आदर्शवादिता की कसौटी पर खरा उतरे। श्रेष्ठता को अपनाए और इस स्तर तक परिपक्व करें कि उसकी गरिमा हर किसी को प्रभावित करे और अनुकरण की ऐसी परम्परा चल पड़े जो समूचे वातावरण को नन्दनवन की तरह सुगंधित-सुसंस्कृत बना दे। यह कैसे संभव हो सकेगा, यही सबसे ऊहापोह मन के सामने हैं।
प्रागैतिहासिक काल की श्रुति और स्मृतियों के आधार पर प्रमाणित सतयुग ऋषि परम्परा के कारण बीज रूप में अंकुरित और वट वृक्ष की तरह फला-फूला था।उसकी छत्रछाया में प्रायः समूची मानव जाति ने आश्रय प्राप्त किया था। बीज के लिए यह आवश्यक नहीं कि वह जिस वृक्ष पर परिपक्व हुआ हैं, वह अपने भावी निवास की बात सोचे, वहीं जमकर रह जाय। उसे अन्यत्र चले जाने का उत्साह भी होता है और नियति प्रवाह भी।
उस काल के ऋषियों ने संकीर्णता से मुक्त हो विस्तार की बात सोची। विश्वभर में जहाँ भी पिछड़ापन देखा, वहीं उससे निपटने के लिए दौड़ते चले गए। अकाल, बाढ़, बीमारी, दुर्घटना, विपत्ति, अग्निकाण्ड, भूकम्प, आदि कारणों से जहाँ विपत्ति उभरती हैं, वहीं उनसे निपटने के लिए उदारचेता बिना किसी आमंत्रण की प्रतीक्षा किये स्वयं ही अनायास पहुँचते हैं। विश्व वसुधा को ऋषियों ने अपना कार्यक्षेत्र बनाया था। यों वे उपजे भारत की देव भूमि में ही थे। मानसरोवर में जन्मने वाले हंस सुन्दर आकाश में उड़ते और समूचे संसार की शोभा बढ़ाते हैं।
ऋषि परम्परा दो भागों में विभाजित होती हैं। एक पुरोहित दूसरे परिव्राजक। पुरोहित वे जो एक स्थान पर रह कर आश्रम परिपाटी चलायें। निकटवर्ती क्षेत्रों में जन जागृति का धर्म धारणा का उत्तरदायित्व संभाले। छात्रों का प्रशिक्षण गुरुकुल पद्धति से चलाये। साहित्य सृजें। चिकित्सालय क्रम चलायें। आध्यात्म क्षेत्रों की शोधों की प्रयोगशाला हेतु तत्पर रहें। पुरोहितों का विवाहित रहना आवश्यक समझा गया था। ताकि अर्धांगिनी की सहायता से आश्रम की भोजन आदि की क्रम व्यवस्था चलती रहे। परिव्राजक वे जो सदा भ्रमण करते रहें। जन संपर्क साधें। प्रतिभाओं को उभारें उन्हें बादलों की तरह बरसना पड़ता था। जब कि ब्राह्मण स्थान विशेष पर रह कर सरोवर की तरह क्षेत्रीय अभ्युदय का सूत्र संचालन करते थे। दोनों के कार्यक्रमों में थोड़ा अन्तर दिखाई पड़ता हैं पर लक्ष्य सर्वथा एक था, उन्हें एक दूसरे का पूरक समझा जाना चाहिए।
सतयुग में सम्पूर्ण धरातल पर मनुष्यों का निर्वाध आवागमन था। छोटे छोटे गणतंत्र शासन तो थे उनकी सीमाएं भी थी पर ऐसा कुछ न था जिससे आवागमन में बाधा पड़े अथवा वस्तुओं को कहीं से कही लाने ले जाने पर प्रतिबंध हो। नागरिकता ऐसी प्रतिबंधित न थी कि एक देश का व्यक्ति अपनी रुचि या सुविधा के अन्य किसी देश में क्षेत्र में निर्वाध रूप से बस न सके। आवागमन करता न रह सके। इसी मानव जीवन की सार्वभौम स्वतंत्रता ने यह अवसर प्रदान किया कि वीरान बसते और सरसब्ज होते चले गये।
आरंभिक मानवी उद्भव तथा विकास गंगा यमुना के दोआब में हुआ। इसी को आर्यावर्त ब्रह्मवर्त आदि नामों से पुकारा जाता था। जिसे प्रकार मध्य कालीन सामंतों को अपने राज्य बढ़ाने की महत्वाकांक्षा रहती थी। उसी प्रकार आरंभिक दिनों में कहीं मनुष्य समुदाय का एक अच्छा झुण्ड बना वहीं यह अभिलाषा उठी कि कहीं अन्यत्र चलकर वहाँ के वीरान स्थिति को सुविकसित बनाया जाय। उसमें बसने वाले वन्य मानवों को सभ्य बनाकर उत्पादन बढ़ाकर अभावग्रस्तता के संकट से उबारा जाय। इन्हें शिक्षित, सुसंस्कृत बनाया जाये। कृषि, उद्योग, व्यवसाय, पशुपालन आदि के अतिरिक्त नीतिमत्ता एवं समाज संरचना की व्यवस्था बनाकर उसे परम्परा के रूप में प्रचलित किया जाये। यही वह काम था जिसके लिए विकसित समूहों के लोग घर परिवार छोड़ कर बाहर निकल पड़ते थे और चुने हुए क्षेत्र को पूर्ण विकसित करने तक वहीं डटे रहते थे। पूर्ववर्ती स्वजन संबंधी भी उनका हाथ बंटाने के लिए जब वह पहुँचते रहते थे। सामयिक सहयोग करते अथवा वही जाकर बस जाते थे। इस प्रकार वहाँ फिर एक विकसित समुदाय बस जाता था। उसी में पशु पलते थे। खनिज खोदे जाते और उसके प्रयोग में आने वाले उपकरण बनते थे। इस प्रकार बिखरे हुए वनवासी एक केन्द्र पर केन्द्रित हो जाते थे और अपनी आयु तथा कार्य शैली का निश्चित विभाजन कर लेते थे। अपनी नियत जिम्मेदारी को पूरा करने के लिए इतनी प्रवीणता प्राप्त करते थे कि अपनी सीमा में प्रवीण पारंगत समझे जाने लगे। वर्णाश्रम धर्म इसी का नाम था। इसे विभाजन नहीं अपने स्तर का कौशल कहना चाहिए। इससे पारस्परिक व्यवहार में कोई अन्तर नहीं पड़ता था। मनुष्य की एक ही जाति है। फिर जाति पाँति क्या? व्यावसायिक भिन्नता एवं क्रिया कौशल की प्रवीणता विकसित करने की दृष्टि सुवर्ण बन सकते हैं। पर ऐसे वर्ण नहीं बन सकते जिनके कारण पारस्परिक रोटी बेटी जैसे व्यवहारों में कोई अन्तर पड़े। उप दिनों क्रिया कलापों के आधार पर अनायास ही बन जाने वाले वर्ग वर्णों के नाम से पुकारे जाते थे। उन दिनों तक जन्म जाति के आधार पर इन दिनों दीख पड़ने वाली जाति बिरादरियों की किसी ने कल्पना तक नहीं की थी। जल वायु की भिन्नता में विभिन्न क्षेत्रों के लोगों में आकृति प्रकृति का थोड़ा अन्तर अवश्य आता था। पर किसी कारण लोग विलगाव की बात नहीं सोचते। गर्म देशों की त्वचा काली और ठंडे क्षेत्रों के निवासी गोरे होने चाहिए। यह प्रकृतिगत अन्तर है। ऐसे भेद उपभेद तो पशु-पक्षियों तक में पाये जाते हैं। देश विशेष के कारण वहाँ रहने वाले प्राणियों में रंग रूप की भिन्नता आ जाती हैं। फूलों के स्वरूप और फूलों के स्वाद में भी इस आधार पर हुआ अन्तर देखा जा सकता है। पर यह मात्र प्रकृति संरचना का कौतूहल भर हैं। इससे जाति विभाजन नहीं होता। ऐसे में ऊंच–नीच के व्यवहार की तो कल्पना भी नहीं की जा सकती।
इन दिनों प्रत्येक समर्थ और सुसंस्कृत व्यक्ति की महत्वाकांक्षा एक ही रहती थी कि वह वीरान क्षेत्रों को उर्वर कैसे बनाये? बिखरे हुओं को समेट कर एकता के समस्वरता के सूत्र में कैसे बाँधे? इसके लिये आवश्यक था कि पुराने जमे हुए निवास को बिना किसी प्रकार की क्षति पहुँचाये, कर्मठों को अन्यत्र चले जाने की, नये प्रदेशों को सुविकसित कर दिखाने की चुनौती को किस प्रकार योजनाबद्ध रूप से पूरा कर दिखाया जाये।
उन दिनों जीवन के प्रत्येक पक्ष की सुव्यवस्था धर्म के नाम से जानी जाती थी। इसी एक विद्या के अंतर्गत उपार्जन, निर्माण, उपभोग, स्वास्थ्य, शिक्षा, चिकित्सा, परम्परा, नीति न्याय आदि सभी विषय आते थे। इस सबका केन्द्र बिन्दु आस्तिकता को स्वीकारा गया था। उसकी सुविस्तृत परिधि में मानवी गरिमा से संबंधित सभी विषय आ जाते हैं। अस्तु जो भी निर्धारण किये जाते थे उनमें धर्म की मुहर लगती थी। जो कहा जाता था उसे धर्म की आस्तिकता की भूमिका में प्रस्तुत किया जाता था। यह सत्य भी था और प्रभावी भी। लोक का सम्मान सहयोग भी इसी आधार पर बनता था और लोक की स्वर्गीय सद्गति का भी निश्चय होता था और लोक की स्वर्गीय सद्गति कास भी निश्चय होता था। नरक, भवबंधन, योनियों में परिभ्रमण, रोग की दुर्गति का भय बना रहने को लोग सहज विश्वास के आधार पर कुकर्मों से बचते थे और जीवन को सर्वतोमुखी प्रगति सुव्यवस्था में जुटाये रहते थे। इस प्रकार धर्म धारण के सहारे लौकिक सुनियोजन भी सहज ही बन पड़ता था।
ऋषि युग के मनीषियों ने धर्मशास्त्रों की संरचना की। राजकीय अनुशासन शिथिल स्तर का रहने के कारण देवताओं का अदृश्य अनुशासन जन मानस पर प्रतिष्ठापित किया गया। देवताओं से वरदान मिलने और अप्रसन्न होने पर अभिशाप की प्रताड़ना करने का भय बना रहता था। यही वह आधार था जिसके कारण पुलिस, फौज, न्यायालय, जेल आदि के लिए प्रयत्न नहीं करना पड़ता। धर्म परायण व्यक्ति ऐसा कुछ करता ही नहीं जिसके लिए प्रताड़ना या रोकथाम का अनुबंध करना पड़े। धर्मशास्त्र उप दिनों का संविधान था जिसे श्रद्धा पूर्वक अपनाया और निष्ठा पूर्वक जीवन के हर पक्ष में उतरा जाता था। सतयुगी वातावरण इसी प्रकार बन पड़ा।
सूर्य पूर्व से उदय होता है। उसकी एक दिशा नियत प्रतीत होती है। उषा अवतरण और अरुणोदय सदा एक ही क्षेत्र से उदीयमान होता हैं। ठीक ऐसी ही प्रक्रिया देवमानवों का समुदाय उभरने, विकसित होने, समर्थ बनने के संबंध में भी हैं भारत भूमि को भूमंडल का पूर्व समझा जा सकता है। यहाँ की मृत्तिका की यह विशेषता रही है उसमें नंदनवन उगते रहे हैं, नंदनवन लहलहाते रहे हैं। चन्दन तरुवरों से मलयानिल प्रवाहित होती रहती है। चन्दन अपने समीपवर्ती झाड़–झंखाड़ों को भी सुवासित करता है। भारत भूमि पर उत्पन्न हुए नर-नारायणों ने भी ऐसा ही कर दिखाया और अपनी गतिविधियों से इस धरित्री को सर्वोपम कहलाने का श्रेय सौभाग्य दिलाया। सतयुग में जनसंख्या सीमित थी। पर उनके सामने समस्त धरातल को समुन्नत सुसंस्कृत बनाने का लक्ष्य था। सर्वतोमुखी प्रगति की सुव्यवस्थित योजना उन्हें बनानी थी। इस दायित्व को उन्होंने ईश्वरीय आदेश अनुशासन समझा और उसे पूरा करने में प्राणपण से लगे रहे। इस दिशा को अपनाने के लिए यह आवश्यक होता हैं कि मार्ग दर्शन करने वाले नेतृत्व के निमित्त कदम बढ़ाने वाले अपने आपको अन्यान्यों की अपेक्षा अधिक सुसंस्कृत बनायें कर्मठता की कसौटी पर पूरी तरह खरे उतरें। साँचा सही होने पर ही उसमें खिलौने पुर्जे सही ढलते है। नेतृत्व यदि अपने चरित्र व्यक्तित्व को आदर्श बनाकर उसे अनुकरण के निमित्त प्रस्तुत करे तो ही उपदेश का सही प्रभाव पड़ता हैं। तो ही उसके अनुगमन का क्रम जन साधारण द्वारा अपनाया जाता हैं। चूंकि जड़ धरित्री पर सुसंस्कृत स्तर के सचेतन तत्वों को उगाया बढ़ाया, फैलाया जाता था। इसका दायित्व नर-नारी नारायणों को देवमानवों को संभलना था। अस्तु सृजेता को उपार्जक-संयोजक की भूमिका निभानी थी। इसलिए आवश्यक समझा गया कि दायित्वों को ओढ़ने वाले सर्वप्रथम अपनी वरिष्ठता विकसित करें या इस प्रयोजन की पूर्ति तप साधना से ही हो सकती थी। इसलिए वरिष्ठों को अपनी प्रतिभा बढ़ाने के लिए सर्वप्रथम अपने आपको ही तपाना पड़ा। हर कसौटी पर खरा सिद्ध हो सकने योग्य बनाना पड़ा। आत्म निमार्ण, आत्म विकास ही अध्यात्म तत्वज्ञान का सार संक्षेप है। इस तथ्य एवं रहस्य को समझने वाले महा मनीषियों ने अपना विवेक विकसित किया। तत्वज्ञान का गहन मंथन किया। अन्त करण को देच उद्यान स्तर का बनाने के लिए आकाँक्षाओं भावनाओं, मान्यताओं, विचारणाओं, क्रिया–कलापों को आदर्शों से सरोवर बनाया। संयम बरतने और परमार्थ में संलग्न रहने की दिशा-धारा को अपनाया। इसके लिए भजन पूजन से लेकर व्रत नियम पालन करने में सहायता देने वाले कर्मकाण्ड भी अपनाने जरूरी थे। सो उनके अपनाने अभ्यास में उतारने के लिए भी संकोच न किया गया। हजारों सोने जैसे तराशे हुए हीरे जैसे चमकदार बहुमूल्य व्यक्तियों का नाम ही ऋषि था। वे ही अथक प्रयासों में संलग्न रहकर धरती पर सतयुग उतारने की कठिन अग्नि परीक्षा में उत्तीर्ण हुए। आज भी वही ऋषि सत्ता सतयुग को पुनः धरती पर अवतरित करने में सफल हो सकेगी।
लार्ड बेडेन पावेल स्काउट-आँदोलन के जन्मदाता थे। इस अन्तर को दूर करने तथा भारतीय बालकों के साहस को परखने के लिए जनवरी 1929 में तत्कालीन वाइसरास लार्ड चेम्सफोर्ड के आमंत्रण पर भारत पधारे।
उनके सम्मान में इलाहाबाद में सेवा समिति, वाँय स्काउट और इंडियन स्काउट संस्थाओं ने स्काउटों की विशाल रैली को आयोजन किया। स्काउट चुस्ती से खड़े मुख्य अतिथि की जय-जयकार कर रहे थे। रैली के प्रधान संचालक पं. श्रीराम बाजपेयी ने मुख्य अतिथि लार्ड बेडेन पावेल से झंडा फहराने की प्रार्थना की। लार्ड बेडेन पावेल ने झंडे की रस्सी खींची परन्तु रस्सी झंडे के शीर्ष पर लगी धिर्री में फँस गयी। लॉर्ड बेडेन पावेल के काफी प्रयास करने पर भी ध्वज नहीं खुल सका।
उपस्थित जन समूह के सिर लज्जा से झुक गये। पं. श्रीराम बाजपेयी ने तुरन्त पास खड़े एक स्काउट बालक को आँख के इशारे से ध्वज-स्तम्भ पर चढ़ने का संकेत कर दिया। बालक बड़ी फुर्ती से बाँस के बने ध्वज-स्तम्भ पर चढ़ने लगा। ज्यों-ज्यों बालक ऊपर की और बढ़ने लगा, त्यों-त्यों बाँस अधिक भार के कारण लचकता गया। बालक ध्वज-स्तम्भ के मध्य भाग से थोड़ा ही ऊपर चढ़ा होगा कि बाँस टूट गया। बालक भी अत्यन्त धैर्यवान और साहसी था। उसने गिरते-गिरते टूटे डंडे को अपने हाथ में ले लिया और धड़ाम से जमीन पर आ गिरा। पर लड़के ने फिर टूटे बाँस पर चढ़कर भी झंडे को ऊपर बाँध दिया।
ध्यान धारणा के अनेकानेक प्रकार और प्रयोग हैं। उनमें से किसी को अपनाने से पूर्व उसकी प्रक्रिया और परिणति के संबंध में गंभीरता पूर्वक विचार कर लेना चाहिए। अन्ध श्रद्धा से प्रेरित होकर किसी तथा कथित मार्गदर्शक के कथन, प्रोत्साहन को आंखें बन्द करके अपना नहीं लेना चाहिए। अन्यथा अनुपयुक्त चयन हानिकारक भी हो सकता है। जिस लाभ की कल्पना की गई थी। उसका मिलना तो दूर उलटे हानिकारक परिस्थितियों में फंसना पड़ सकता है।
ध्यान के प्रथम चरण में साधक को अपना समर्पण भाव इष्ट के साथ तादात्म्य करना पड़ता हैं। द्वैत को अद्वैत में बदलना पड़ता है। एकत्व को अछैत के स्तर तक पहुँचना पड़ता है। ईंधन आने को आग में झोंकता है तो वह कुछ ही देर में अग्नि रूप हो जाता है। इष्ट के साथ तादात्म्य स्थापित करने पर उस दिव्य केन्द्र की दिव्य-क्षमता का अवतरण साधक की समग्र सत्ता में होने लगता है। समर्पण की प्रतिक्रिया अवतरण है। रबड़ की गेंद जिस कोण से जिस स्थान पर जितने जोर से फेंकी जाती है। वह लक्ष्य से टकराने के बाद उतनी ही तेजी से उसी मार्ग से वापस लौटती है। ध्यान के साथ जुड़ी हुई श्रद्धा शक्ति बनकर प्रयोक्ता के पास शब्द बेधी बाण की तरह वापस लौटती है। लौटते समय वह अधिक परिष्कृत स्तर की होती है। उसमें इष्ट की विशेषता भी जुड़ी होती है। इसका प्रयोग किस हेतु किया जाय यह निर्णय करना साधक की अपनी विवेक बुद्धि पर निर्भर है। भागीरथ, पार्वती, दधीचि, विश्वामित्र वशिष्ठ आदि ने अपनी तपश्चर्या का प्रतिफल पुण्य प्रयोजनों के लिए किया था।
आमतौर से देवी देवताओं के ध्यान नहीं किए जाते है। आध्यात्मिक साधना में वही पुरातन प्रचलन है। पर देव वर्ग में से किसी को चुनने से पूर्व यह निरख–परख कर लेना चाहिए कि उपास्य की प्रकृति क्या है। अनेक देवी देवता तमोगुणी भी है। उनका स्वभाव, व्यवहार, प्रयास, चरित्र, जैसे पक्षों में अनैतिकताओं की भरमार होती है। इसमें से कई माँसभोजी, आक्रमणकारी युद्ध प्रिय होते हैं। उनकी उपासना साधक में उन्हीं दुर्गुणों का आविर्भाव करेगी। कुछ दिन में उसकी प्रकृति में उन्हीं दुर्गुणों की भरमार होने लगती है। तंत्र साधना में यही होता है और उस आधार पर मिले अनुदानों को मारण, उच्चाटन, वशीकरण, स्तंभन जैसे हेय प्रयोजनों के लिए प्रयुक्त किया जाता है। कर्म अपना प्रतिफल निश्चित रूप से देते हैं और लौट आते है। किसी का अनिष्ट करने वाले स्वयं भी उस कुकृत्य के दुष्परिणाम से बचे नहीं रह सकते। इस तथ्य को समझते हुए प्रारंभिक चयन में समुचित सावधानी बरती जानी चाहिए। सात्विकता का अवलम्बन ही श्रेयस्कर समझा जाना चाहिए। आदर्शवादी उदारचेताओं में हनुमान, नारद, बुद्ध जैसों की गणना होती है और देवियों में सरस्वती, पार्वती, गायत्री जैसे इष्टों को उच्चस्तरीय माना जाता है। उनमें आदर्शवादी विभूतियों की विशिष्टता गिनी जाती है।
जिन्हें देवी देवताओं में रुचि नहीं वे किन्हीं आदर्शों को अपने में विकसित करने के लिए उनका प्रतीक कमल पुष्प भी मान सकते हैं, इस मान्यता में मात्र छवि का ही ध्यान नहीं करना चाहिए वरन् उन पर आरोपित विभूतियों का भी समन्वय रखना चाहिए। यह तथ्य प्रत्येक ध्यान-केन्द्र के संबंध में लागू होता है। यदि मात्र छवि को ही आधार माना गया है और साथ अभीष्ट गुणवत्ता का आरोपण नहीं किया गया तो छवि दर्शन मात्र कौतूहल की ही पूर्ति करता है। साधक को वह अनुदान प्रदान नहीं कर सकता जो गुणवत्ता का समन्वय रखे रहने पर मिल सकता था।
महामानवों को भी इष्ट मानकर चला जा सकता है और उनके अनुकरण के लिए आतुर रहा जा सकता है। विवेकानन्द, दयानन्द, गाँधी, बिनोवा जैसे आदर्शों के धनी भी यदि अपनी ध्यान धारणा का केन्द्र रहे तो हर्ज नहीं। गाय जैसे पशु, हंस जैसे पक्षी, पीपल जैसे वृक्ष को भी आराधना के केन्द्र रखने पर अपनी सत्ता में समाहित विशेषताएं साधक को प्रदान करते रह सकते हैं।
वेदान्त दर्शन में अन्तरात्मा की उत्कृष्टता को ही परब्रह्म माना गया है। सोऽहम्, शिवोऽहम्, सच्चिदानंदोऽहम्, तत्वमसि, अयमात्मा ब्रह्म जैसे सूत्रों में आत्मा और परमात्मा की एकता का सिद्धांत स्वीकारा गया है। पर यहाँ यह ध्यान रखने योग्य है कि आत्मा का शुद्ध, श्रेष्ठ, उत्कृष्ट स्तर ही इस प्रतिपादन के अनुरूप बनता है। यदि दोष दुर्गुणों, दुर्व्यसनों के कीचड़ से सनी हुई चित्त चेतना को अपना स्वरूप मानने की भूल की गई तो जुड़े हुए दुर्गुण भी परब्रह्म के स्वरूप बन जायेंगे और साधक अपनी निकृष्टता को भी अपनाए रहेगा और उनके निराकरण की आवश्यकता ना समझेगा। वेदान्त का वास्तविक प्रतिपादन आत्मा में समाहित परमात्मा के दिव्य चेतना के साथ ही संबंध साधना है। उनके साथ माया जाल की तरह गुंथ गई निकृष्टता के प्रति तो तिरस्कार एवं परिशोधन का भाव रखना ही है। स्मरण रहे दृष्प्रवृत्तियों बिना संघर्ष के हटती नहीं है। इसके लिए तप तितीक्षा भी, संयम साधना और परमार्थ परायणता के त्रिविध अभ्यास भी अनिवार्य रूप से करने होते है।
सोऽहम् साधना यों प्राणायाम के माध्यम से भी चलती है। श्वांस खींचने के साथ “सौ” और छोड़ते समय “अहम्” की ध्वनि पर ध्यान एकाग्र करने के साथ ही यह भाव भी सघन रखना पड़ता है कि वह (परमात्मा) अहम् (आत्मा) दोनों के बीच सघन समन्वय और आदान-प्रदान का जो उपक्रम चलता है उसे अधिक स्पष्ट रूप से अनुभव किया जाये। इस प्रकार प्राणयोग द्वारा भी अद्वैत एकात्मकता की साधना हो सकती है। जप काल में इष्ट प्रतिमा को अन्तरात्मा के साथ अपनी आत्मा का समर्पण, विलय अनुभव करते रहने से भी यही परिणाम उपलब्ध किया जा सकता है।
छाया पुरुष या दर्पण साधना के पीछे भी यह उद्देश्य जुड़ा हुआ है। धूप में या प्रकाश की और पीठ करके खड़ा होने पर शरीर की छाया सामने आ जाती है। उसे अपना शुद्ध स्वरूप सामने उपस्थित समझा जा सकता है। इससे भी अधिक सुगम दर्पण साधना है। समस्त शरीर का प्रतिबिम्ब दिखा सकने वाला आदमकद दर्पण हो तो उत्तम। अन्यथा उसका साइज इतना ता होना ही चाहिए, जिसमें बैठने पर चेहरे की प्रतिछाया समान आकार में दीख पड़े। इसको विशुद्ध आत्मसत्ता की प्रत्यक्ष छवि माना जाय। उसमें दिव्य सद्गुणों का सघन समावेश अनुभव किया जाय। साथ ही उसके दुर्गुण, कषाय−कल्मष हिम-ऋतु में झड़ने वाले पत्तों की तरह झड़ते जाने की मान्यता को अधिकाधिक प्रखर किया जाये। यह आत्मदर्शन है।
इसकी महिमा भी देव दर्शन के समतुल्य है।
छवि निर्धारण, एकाग्र समर्पण की अवधारणा एवं उत्कृष्टता का आरोपण इन तीनों का समन्वय होने पर ही ध्यान की पूर्णता बनती है। मात्र छवि पर कल्पना को केन्द्रित करने से अध्यात्म प्रगति का उद्देश्य पूरा नहीं होता। उतने भर से तो मात्र एकाग्रता सम्पादन से थोड़ी सहायता भर मिलती है। यों एकाग्रता साधना भी भौतिक और आत्मिक प्रगति के काम आने वाली आवश्यक उपकरण जैसी उपलब्धि ही है। पर उतने तक सीमित रहकर आत्मोत्कर्ष का महान प्रयोजन पूरा नहीं होता।
परब्रह्म को सत्प्रवृत्तियों का समुच्चय मानना और उन विभूतियों का भक्ति भावना के माध्यम से जीवनचर्या में समावेश होना यहीं है। ध्यान धारणा का वास्तविक स्वरूप यहीं है। देव अनुग्रह और आध्यात्मिक प्रगति का स्पष्ट चिन्ह। इसी स्थिति को प्राप्त करने के लिए अनेक आकार प्रकार की विविध विधि ध्यान धारणाएं की जाती है। इस तथ्य को कभी भी विस्मृत नहीं करना चाहिए।
सर्वथा निराकार का ध्यान जिन्हें अभीष्ट हो वे नादयोग की साधना कर सकते है। कानों को बन्द करके अनाहत दिव्य ध्वनियाँ सुनी जाती है। गहराई में उतरने और अन्तराल में उठती दिव्य ध्वनियों के साथ संबंध जोड़ने पर कई प्रकार के चित्र विचित्र शब्द सुनाई पड़ते है। शंख, घंटा, घड़ियाल, मृदंग, नफीरी, गर्जन, वंशी, आदि से मिलते जुलते वे शब्द होते है। आरंभ में ध्वनियाँ अतीव मन्द होती है। और रुक-रुक कर सुनाई पड़ती है। पर अभ्यास करते रहने से उनमें स्पष्टता, समस्वरता आती जाती है। यह शब्द श्रवण भी श्वास में सोऽहम् की अनुभूति होने के सदृश्य है। छवियों का नेत्र बन्द कर लेने पर भी अभ्यास होते रहने में भी इसी तथ्य का समावेश है। इस स्तर की कोई भी साधना क्यों न हो उनके साथ उत्कृष्टता के पक्षधर भाव संवेदनाओं का जुड़ा रहना आवश्यक है। क्योंकि आत्म परिष्कार की बात इसी समन्वय के आधार पर बनती है। आत्म परिष्कार प्रवृत्ति दो स्वरूप धारण करती है। एक प्रत्यक्ष और परोक्ष दुष्प्रवृत्तियों का निराकरण और आदर्शवादी दिव्य सत्प्रवृत्तियों का संवर्धन। परम कल्याण का, ईश्वर साक्षात्कार का स्वर्ग मुक्ति कस यही आधार है। इस गन्तव्य तक पहुँचने के लिए ही अनेक स्तर की ध्यान धारणाओं में से किसी का या किन्हीं का चयन किया जाता है।
प्राण ही जड़ जगत एवं चेतना जगत दोनों की सर्वोपरि शक्ति है। यही जीवन का सार और प्रगति का आधार है। शास्त्रकारों ने इसे आदि एवं अनन्त कहा है। सृष्टि उसी से उत्पन्न होती और प्रलय काल में उसी में विलीन हो जाती है। कठोपनिषद् में कहा गया है कि सृष्टि का प्रारंभ ही प्राण ऊर्जा के कम्पनों से होता है- “यदिदंिकच जगर्त्सवम् प्राण एजतिनिस्सृतम।” अर्थात् जो कुछ इस सम्पूर्ण संसार में हैं वह प्राणों के ही कम्पनों की अभिव्यक्ति हैं। अथर्ववेद में उसी को नमन करते हुए कहा गया हैं।
“ प्राणाय नमो यस्य सर्वमिदं वशे। यो भूतः सर्वस्येश्वरो यस्मित्न सर्व प्रतिष्ठतम॥”
अर्थात् उस प्राण को नमस्कार है जिसके वश में समस्त संसार हैं। जो स्वयंभू हैं, सबका ईश्वर और जिसमें सब कुछ प्रतिष्ठित है।
शतपथ ब्राह्मण में प्राण तत्व को ही आदि ऋषि कहा गया है। प्रश्नोपनिषद् में उसके स्वरूप का वर्णन करते हुए ऋषि ने कहा हैं-
“स ईक्षाँचक्रे। कस्मिन्नहमुत्क्रान्त उत्क्रान्तो भविष्यामि। कस्मिन्वे प्रतिष्ठिते प्रतिष्ठास्यामीति॥”
अर्थात् परम पुरुष परमेश्वर ने महासर्ग के आदि में विचार किया कि ब्रह्मांड में ऐसा कौन-सा तत्व उत्पन्न किया जाय, जिसके निकल जाने पर मैं भी उससे निकल जाऊं और जिसके प्रतिष्ठित रहने पर मैं प्रतिष्ठित रह¡।
“स प्राणमसृजत, प्राणाच्छृद्वाँ खं वायुर्ज्योतिशपः पृथिवीन्द्रिय मनोडन्नम॥”
अर्थात् ऐसा विचार कर उस परम सत्ता ने प्राण तत्व उत्पन्न किया। फिर प्राण से श्रद्धा-बुद्धि तथा आकाश, वायु, ज्योति, जल एवं पृथ्वी में पंचभूत तत्व इंद्रियां, मन एवं अन्न की उत्पत्ति हुई हैं।
इससे स्पष्ट है कि सृष्टि का प्राथमिक तत्व प्राण हैं। वैज्ञानिक जानते है कि जड़ जगत में फोटोन, टैक्योन जैसी आधारभूत ऊर्जा तरंगें और इलेक्ट्रान, प्रोटान, मेसान, न्यूक्लियान जैसे तरंगमय मूल कण, जिनका शास्त्रीय नाम पंचमहाभूत है, उसी प्राण ऊर्जा के परिणाम हैं। चेतन जगत में इच्छा, क्रिया एवं ज्ञान के रूप में वहीं संव्याप्त है। सजीवता, सजगता और सक्रियता उसी के कारण है। जीवन तत्व वही हैं। समस्त विश्व ब्रह्मांड में संव्याप्त विभु सत्ता वह प्राण ही है। वही चेतना कहलाती हैं। जिसमें प्राण तत्व हैं। वही प्राणी कहलाता है। प्राण तत्व निकल जाने पर प्राणी निष्प्राण हो जाता हैं। तैत्तरीय उपनिषद् में कहा गया हैं - “ प्राणी हि भूतानामायुः तस्मात्सर्वायुषमुच्यते” अर्थात् प्राण ही प्राणियों की आयु है। इसीलिए इसे ‘सर्वायुष’ कहा जाता हैं।
मानव शरीरगत - प्राण ब्रह्मांड व्यापी महाप्राण का एक घटक हैं। यही चेतन प्रवाह अपनी प्रचंडता और उत्कृष्टता के आधार पर स्तर-भेद और रूप-भेद से विभिन्न प्रतिभाओं एवं ऋद्धि-सिद्धियों का उद्गाता सिद्ध होता हैं। इन्द्रियों की क्रियाशीलता, मन की सजगता और संकल्पशीलता, बुद्धि की प्रखरता तथा अंतःकरण की उदात्तता का आधार प्राण शक्ति है। प्राण की न्यूनाधिकता से ही व्यक्ति-व्यक्ति के बीच अन्तर पाया जाता है। विभिन्न शारीरिक-मानसिक क्रियाओं के संचालन का कार्य इसके द्वारा ही सम्पादित होता है। शरीर के पाँच प्रमुख भागों में अवस्थित होने से उसको पाँच प्राणों के नाम से सम्बोधित किया जाता हैं। इसके पाँच भेद हैं- प्राण, उदान, समान, अपान और व्यान। पाँच उप प्राण भी है। जिन्हें देवदत्त, कृकल, कूर्म, नाग और धनंजय के नाम से जाना जाता है। ये पाँच प्रमुख प्राणों के सहायक घटक हैं। कुछ वैज्ञानिक इसे “क्लाउड ऑफ आयन्य” अर्थात् आयनों का बादल कहते हैं। शरीर विज्ञानी इसी को ‘बायोप्लाज्मिक एनर्जी’ के नाम से संबोधित करते है। विभिन्न देशों में इसको भिन्न-भिन्न नामों से जाना समझा जाता हैं, जैसे चीन में ‘चीएनर्जी’ जापान में ‘की एनर्जी’ पाश्चात्य देशों में यूनीवर्सल एनर्जी, वाइटल फोर्स आदि। आइंस्टीन के सिद्धांतानुसार ऊर्जा का सम्मिलित स्वरूप ही पदार्थों के रूप में दिखाई देता हैं। इससे स्पष्ट हो जाता है कि भारतीय योग शास्त्रों में वर्णित ‘प्राण’ और ‘ऊर्जा’ एक दूसरे के पर्यायवाची हैं। भौतिक ऊर्जा को किस प्रकार चुम्बकीय क्षेत्र या विद्युतीय क्षेत्र से आकृष्ट किया जाता है। उसी प्रकार प्राण ऊर्जा को मनःशक्ति के द्वारा भी प्रभावित आकर्षित किया जा सकता है।
प्राण तत्व का वायु से सीधा संबंध हैं। श्वास-प्रश्वास के माध्यम से शरीर के अन्दर इसका निरन्तर प्रवाह होता रहता है। चेतन ऊर्जा के इस प्रवाह को जैविक विद्युत प्रवाह के समतुल्य कहा जा सकता है। सूर्य एवं चन्द्र नाड़ी जिन्हें क्रमशः पिंगला तथा इड़ा नाड़ियां अथवा नासिका का दायाँ और बायाँ स्वर भी कहा जाता हैं, के द्वारा यह चेतन तत्व वायु के साथ अवागमन करता है। काया की सक्रियता इसी प्राण विद्युत की ऊर्जा, ताप एवं प्रकाश के सहारे संभव होती हैं। इसी को स्पायरोमेट्री स्कीन पोटेन्शियल, इलेक्ट्रोकार्डियो ग्राफी, तथा इलेक्ट्रो एनसिफैलो ग्राफी के माध्यम से प्रत्यक्ष देखा जाता है। यह जैव विद्युत ही जीवन का सार है। समस्त एन्द्रिक गतिविधियाँ और मस्तिष्कीय उड़ाने इसी प्रवाह के द्वारा सम्भव होती है। शारीरिक कोशिकाओं में यह विद्युत शक्ति के रूप में भरी होती है। प्राणायाम प्रयोगों में इसी चेतन ऊर्जा के व्यवस्थित विकास का अभ्यास किया जाता है। हिप्नोटिज्म, मैस्मेरिज्म, साइकिक हीलिंग आदि में भी इसी शक्ति का उपयोग किया जाता हैं। इससे सम्पन्न लोग ही ओजस्वी, तेजस्वी और मनस्वी कहे जाते हैं। साहस, शौर्य, उत्साह तथा स्फूर्ति के रूप में यही विशेषता अभिव्यक्त होती हैं।
परामनोवैज्ञानिकों का कहना है कि चेतना के विभिन्न स्तरों में एक स्तर “आयर्नोप्लाज्मा” का होता है।जिसका हमारे मन और शरीर पर गहरा प्रभाव पड़ता है। वस्तुतः यह आयनोप्लाज्मा प्राण ऊर्जा ही हैं। जिसकी अभिवृद्धि के लिए पूर्वान्त दर्शन में प्राणयोग का सहारा लिया जाता हैं। इस विद्या में शरीर में प्रवाहित सूक्ष्म एवं शक्तिशाली प्राण चेतना को मन शक्ति के द्वारा श्रृंखलाबद्ध कर एक पंक्ति में प्रवाहित किया जाता है। जिससे मूलाधार से लेकर सहस्रार तक एक-एक का ‘बायोजेनरेटर’ स्पन्दित होने लगता हैं। इससे काया स्थित दक्षिणी ध्रुव-सहस्रार का मिलन संभव होता हैं। भौतिक समृद्धि एवं आत्मिक उन्नति का मूल यही हैं।
कनाडा के मूर्धन्य मनोविज्ञानी डॉ. हंसा सेल्ये के अनुसार मनुष्य की सर्वोच्च शक्ति-प्राण ऊर्जा का अधिकाँश भाग व्यर्थ के क्रिया–कलापों, कुकल्पनाओं एवं अचिन्त्य -चिंतन में ही समाप्त हो जाता है। मानसिक तनाव चिंता, अनिद्रा आदि भी प्राणशक्ति का असाधारण गति से क्षरण करते हैं। प्राणतत्व की यह न्यूवता ही अनेकानेक बीमारियों का कारण बनती हैं। इसकी कमी जीवन अवधि पूर्ण होने के पूर्व ही मनुष्य को काल का ग्रास बनने को बाध्य कर देती हैं।
योग विद्या विशारदों का कहना है कि प्राण विद्या के नियमों को जानने और अपनाने पर इस क्षरण को रोका जा सकता है और साथ ही व्यय हुए प्राणतत्व की क्षतिपूर्ति भी की जा सकती है। संयमित आहार-विहार एवं चिन्तन मनन में उत्कृष्टता का समावेश करके उस बहुमूल्य सम्पदा को कोष भी अंतरंग सत्ता में स्थापित किया जा सकता हैं। जो अपनी तथा दूसरों की विशेष आवश्यकताओं की पूर्ति में काम आता हैं।
प्राणशक्ति का अनावश्यक क्षरण रोकने, क्षरण से हुई क्षति की पूर्ति करते रहने तथा प्राणतत्व की अधिक मात्रा को आकर्षित कर अपना व्यक्तित्व अधिकाधिक समुन्नत, प्राणवान, परिष्कृत बनाये जाने की समग्र साधना पद्धति को ही प्राणविद्या या प्राणायाम साधना कहा गया है। इसी का अनिवार्य अंग संकल्प होता हैं। संकल्प शक्ति के सहारे उसी के चुम्बकत्व से ब्रह्मांड व्यापी समष्टिगत प्राणतत्व को आकाश से आकर्षित किया और श्रद्धा के बल पर उसे अपने में धारण किया जाता है। जो जिस सीमा तक समष्टिगत प्राण भी वशवर्ती हो जाता है और साधक प्राण जगत की अनेकानेक दिव्य क्षमताओं का स्वामी बन जाता हैं। यह मार्ग सभी साधकों के लिए समान रूप से खुला है।
क्रिया शक्ति में मात्र शरीर का ही नहीं मन का भी योगदान रहता है। दो पहिये की गाड़ी की तरह हमारी सारी गतिविधियाँ शारीरिक और मानसिक स्वस्थता पर निर्भर हैं। पागलों का शरीर स्वास्थ होता हैं। पर वे मन मस्तिष्क की दृष्टि से अस्त व्यस्त होते हैं इसलिए उनका क्रिया−कलाप न तो क्रमबद्ध होता है और न उसके साथ किसी सफलता की संभावना तारतम्य जुड़ता है। क्रियाशील होने के लिए मात्र शारीरिक स्वस्थता ही पर्याप्त नहीं वरन् उसके साथ वह स्फूर्ति भी रहनी चाहिए। जो मन संस्थान में उत्पन्न होती है।
यह ठीक हैं कि शुद्ध अन्न-जल और वायु से शरीर परिपुष्ट होता और उसमें काम करने की क्षमता रहती है। इतने पर भी यह नहीं भूलना चाहिए कि अंग अवयव रेल के डिब्बे मात्र है। उन्हें घसीट ले जाने की शक्ति इंजन में रहती हैं। वह और कुछ नहीं मात्र मन मस्तिष्क ही है।
प्रतिष्ठा का प्रश्न बना कर मनोयोग पूर्वक किये काम सर्वांग सुन्दर होते हैं। मूर्तिकार, चित्रकार, कुम्हार, स्वर्णकार आदि कारीगरों में से कुछ की कृतियाँ बहुमूल्य एवं नयनाभिराम होती है। इसके विपरित कुछ ऐसे भी होते है, जो परिश्रम तो बहुत करते है किन्तु मनोयोग से काम करने में कुबड़े ही रह जाते है। आकृति बनती है पर उसमें न आकर्षण होता है और न गरिमा सिद्ध करने वाला वर्चस्व। यह ऐसा परिस्थितिवश नहीं होता, साधनों का अभाव या घटियापन होना भी किसी कदर बाधक बनता है परन्तु सब से बड़ी कमी है-मनोयोग का समुचित रीति से समावेश न होना। घोंसला जैसा सर्वांग सुन्दर होता है वैसा दूसरों का नहीं। कारण एक ही है क्या घोंसले के तिनकों का चुनाव करते समय उनकी उपयोगिता को परखती है और साथ ही निर्धारण कार्य करते समय तिनकों को गूँथने का काम इस कुशलता से करती हैं। मानो उसे किसी अफसर पद की प्रतिस्पर्धा में सम्मिलित होने के लिए अपना काम पूरे मन इसे करना पड़ रहा है। चित्त के उदास होने पर काम करने की क्षमता तत्काल घटती है। बेगार भुगतने वाली कहावत चरितार्थ होती है। बेगार उसे कहते हैं जिसमें कम मूल्य अधिक मेहनत का अरुचिकर कार्य कराया जाता है। ऐसे कार्यों का न तो स्तर बन पाता है और न वे परिणाम में ही पर्याप्त होते है। भय, चिन्ता, निराशा, शोक, क्रोध जैसे अवसर आयोजनों पर हाथ पाँव फूलने लगते हैं और स्थिति ऐसी बन जाती है कि जिसमें कुछ करते धरते नहीं बनता। कारण स्पष्ट है कि मानसिक अस्वस्थता के रहते कामों की क्रमबद्धता और उत्कृष्टता का बन पड़ना संभव नहीं। इसके लिए मनुष्य को प्रसन्न चित्त तो होना ही चाहिए साथ ही काम में रस भी आना चाहिए। जिन कार्यों को रुचिपूर्वक प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाकर किया गया है। वे सदा ऐसे होते है। जिनकी निन्दा न की जा सके।
छोटे बच्चे दिन भर कुदकते–फुदकते रहते हैं। इनके शरीर पर मीटर बाँध दिया जाय तो प्रतीत होगा कि वे दिन भर में एक श्रमजीवी जितना काम कर लेते हैं। बड़ी उम्र के लड़कों के संबंध में भी यही बात है। वे जब खेल के मैदान में प्रवेश करते है तो बाजी जीतने की तत्परता में इतनी दौड़ धूप करते है। जितनी सामान्य समय में नहीं बन पड़ती। खेल में जीतकर आने वाले टीम के हर सदस्य के मन में उत्साह होता है और उसे थकान जैसा कोई अनुभव नहीं होता। यह इच्छा शक्ति, मनः शक्ति और प्रसन्नता का समन्वय है जिसमें सामर्थ्य से अधिक काम कर लेने पर भी मनुष्य थकता नहीं। अन्वेषकों का मत है कि घरेलू काम काज में चलती फिरती रहने वाली एक महिला 90 वर्ष तक जीवित रहे तो इतनी दूरी पार कर लेती हैं जितनी कि पृथ्वी की छः बार परिक्रमा करनी पड़े तो वह अपने पुरुषार्थ के महिमा जिसे घरेलू कामकाज करने में किसी विशेष श्रम या भार का अनुभव भी नहीं होता। दिन भर अपने काम काज में लगी रहती है।
और यह अनुभव नहीं करती कि उसे इतना बड़ा काम करना पड़ रहा है।
शरीर अकेले ही सब कुछ नहीं कर लेता। उसे अपने प्रत्येक क्रिया−कलाप में मनोयोग लगाने की आवश्यकता पड़ती है। जो इस प्रयास को जितनी अच्छी तरह सम्पन्न कर लेता है। उसके लिए बिना थकान के अधिक देर तक अधिक मात्रा में तथा ऊंचे स्तर का काम कर सकना सरल पड़ता है।
मन की प्रकृति बंदर जैसी चंचल है। एक डाली से दूसरी पर फुदकते रहने की चंचलता जैसी बन्दरों में, पक्षियों में पाई जाती है वही प्रकृति मन की भी है। उसे सहज ही एकाग्रता, तन्मयता, तत्परता उसका स्वभाव नहीं है। इसके लिए उसे साधना सिखाना-पढ़ाना पड़ता है। इस आधार पर अनगढ़ स्वभाव के वन्य पशु सर्कसों में आश्चर्यजनक खेल दिखाने और मालिकों के लिए अच्छी कमाई करने लगते है। यह कुशल प्रशिक्षण का प्रतिफल है। विद्यार्थियों से लेकर विशेषज्ञों, कलाकारों, तक सभी महत्वपूर्ण व्यक्तियों को इसी प्रशिक्षण के नीचे होकर गुजरना पड़ता है। मन को सुसंयत एवं सुनियोजित बनाने का भी यह तरीका है।
मानसिक प्रशिक्षण स्वयं भी किया जा सकता है। इसके लिए दूसरे किसी अन्य अध्यापक की आवश्यकता नहीं पड़ती। हाथ के नीचे आये काम को ईमानदारी और जिम्मेदारी से करने को अपनी प्रतिष्ठा का, आन्तरिक गरिमा का आधार मानकर चलना चाहिए। कर्म को अपने आप में पूर्ण मानकर चलना चाहिए। उसका प्रतिफल इच्छित मात्रा में न मिलें तो भी संतोष करने के लिए इतना पर्याप्त समझा जाना चाहिए कि हमने अपनी और से सामर्थ्य भर प्रयत्न किया। इस प्रयत्नशीलता की समग्रता पर संतोष ही नहीं गर्व भी किया जा सकता है। इस प्रकार की मनोभूमि में किया गया काम, अधिक मात्रा में तथा सुन्दर समग्र तो होता ही है। अपने आप को प्रसन्नता भी प्रदान करता है और दूसरों की दृष्टि में अपनी प्रामाणिकता प्रयत्नशीलता, प्रवीणता की छाप छोड़ता है।
थकान ऐसी स्थिति में आती ही नहीं या कम से कम आती है। कर्मयोगी की मनःस्थिति में न थकान आती है और निराशा को वहन करने की आवश्यकता पड़ती है। काम को कर्तव्य या खेल समझ कर उसमें प्रसन्नता का, पौरुष का रसास्वादन करते हुए कोई भी व्यक्ति सामान्य शारीरिक या मानसिक स्थिति में अथवा परिस्थितियों की प्रतिकूलता रहते हुए भी इस प्रकार काम करता रह सकता है। जिसे कर चूकने के बाद थकान के स्थान पर प्रसन्नता की अनुभूति हो।
क्म लोकोपयोगी चुने जाये। उनमें नीतिकला का समावेश हो। यदि अनीतिपूर्ण अथवा जनहित के विपरित काम अपनाया गया है तो भी आत्मा कचोटती रहेगी पैर थकानभरी आत्मग्लानि का अनुभव करती रहेगी।
दो पंडित छात्र काशी पढ़कर अपने-अपने गाँव लौट रहे थे। उनके गाँव पास-पास ही थे। रास्ता पार करने के लिये दोनों साथ हो लिये।
रास्ते में एक गांव में रुके। परिचय पाकर गांव के मुखिया ने उन्हें अपने यहाँ ठहराने की व्यवस्था कर दी। दोनों को शौच स्नान से निवृत्त होकर तब भोजन करना था। सो दोनों बार-बारी बाहर गये।
एक पंडित बैडा हुआ था तो मुखिया ने दूसरे साथी की विद्वता के संबंध में पूछा- तो ईर्ष्यावश उसने कहा-वह तो मूर्ख हैं-निरा बैल। जब पहले वाला निवृत्त होने गया और दूसरा बैठा हुआ था तो मुखिया ने उससे भी वही प्रश्न किया वह भी ईर्ष्यालु न था। बोला पूरा गधा हैं।
जब दोनों निश्चिंत हो गये तो गृहपति ने धर भोजन के लिए बुलाया।
एक की थाली में घास रखी थी दूसरे की में भूसा। आश्चर्य से दोनों ने पूछा यह क्या?
विनयपूर्वक मुखिया ने कहा-आप लोगों ने ही तो एक दूसरे को परिचय में गधे और बैल के रूप में दिया था। उसी के अनुसार यह भोजन का प्रबंध है।
पंडितों की समझ में तब आया कि ईर्ष्या और पर-निंदा का क्या परिणाम होता है।
मानव जीवन आन्तरिक एवं बाह्यतः सुखी समुन्नत एवं शाँति पूर्ण संचालित होता रहे, इसके लिए आवश्यक है कि वह औचित्यपूर्ण नीतियों तथा मर्यादाओं का नियंत्रण एवं संरक्षण स्वीकार करे। यह नियम दैनंदिन जीवन में घटित होते देखा जा सकता है। पटरी का अनुशासन तथा राह की सावधानियों की मर्यादाओं का पालन करने वाली रेलगाड़ी ही अपने गन्तव्य पर सकुशल पहुंचती है। इन मर्यादाओं का उल्लंघन उसे मात्र राह से ही विचलित नहीं करता अपितु नष्ट भी कर देता है। ठीक यही तथ्य मानव विशेष तथा मानव समुदाय पर घटित होता है। यदि कोई व्यक्ति अकेला मर्यादाओं व नीतियों का उल्लंघन करे तो इससे होने वाली हानि उसके स्वयं के जीवन को नष्ट करने के साथ परिवेश को क्षति पहुंचाने वाली होती है। पर यदि मानव समुदाय ही मर्यादाओं नीतियों का उल्लंघन करने पर उतारू हो जाय तो परिणाम स्वरूप उत्पन्न होने वाली भयावह स्थिति की कल्पना भी दुयकर होगी।
वर्तमान समय लगभग ऐसी ही स्थिति से गुजर रहा है। बुद्धिवाद के युग में तथा मात्र वर्तमान की सोचने की अदूरदर्शिता ने स्थिति को जटिल बना दिया है। आज मनुष्य अपनी बुद्धि को इसी दिशा में प्रयुक्त कर रहा है कि अधिक से अधिक सुख सुविधाएं कैसे जुटाई जाये। वह तकन की ज्ञान तथा उसका उपयोग कैसे सम्भव बन पड़े, जो जादुई छड़ी की तरह सारी वासनाओं की पूर्ति करने के साथ मालामाल कर दे। प्रचलित अर्थों में आज की बुद्धि इसे ही सृजनात्मकता या रचनात्मकता का नाम दिया है।
बुद्धि के इस स्वरूप को देखकर सुप्रसिद्ध दार्शनिक डे वुड हूम की वह उक्ति सटीक प्रतीत होती हैं जिसे उसने अपने चिन्तनीय ग्रन्थ “ट्रीटाईज ऑन हूमन नेचर” स्कध्न्ध दी के भाग द्वितीय के तीसरे अनुभाग में उल्लेखित करते हुए कहा है कि “ बुद्धि वासनाओं की दासी है।”
किन्तु यदि यह बुद्धि वासनाओं के जाल-जंजाल में फस कर मानव समुदाय के अस्तित्व को ही विनष्ट करने पर उतारू हो जाए तो उसे क्षम्य तो नहीं माना जा सकता।
अस्तित्व के विनाश की स्थिति अद्यतन समय मानव और पर्यावरण के मध्यवर्ती संबंधों को देख सहज अनुमानित की जा सकती है। “सिस्टमैटिश-जियोबार्टेनिशेज इन्स्टीट्यूट देर यूनिवर्सिटेट गोटिन जेन” के प्राध्यापक जर्मन अध्येता डॉ. हेन्ज एलनवर्ग ने इन बिगड़ते जा रहे संबंधों तथा पर्यावरण नीति में अवमूल्यन के कारण उत्पन्न स्थिति की एक झलक दिखाते हुए “ब्रिटिश इकोलाजिकल सोसाइटी” में पढ़े गए शोध पत्र “मेन्स इन्फ्लूयेन्स ऑन ट्रापिकल माउन्टेन इफोसिस्टम्स इन साउथ अमेरिका” में बताया हैं “ पेड़–पौधे हमारे स्वाभाविक मित्र है वे हमसे भी अपनी ही जैसी मित्रता की अपेक्षा करते है। “उन्होंने आगे स्पष्ट करते हुए कहा कि मनुष्य ने स्वार्थ परता की अति के कारण पर्यावरण संबंधी जो परिवर्तन किए है और करता जा रहा है उसे निसंदेह घातक ही मानना चाहिए। परिस्थिति की तन्त्र में जल असन्तुलन, खनिज सम्पदा का असाधारण दोहन तथा प्राणियों, पादपों तथा सूक्ष्म जीवों की जनसंख्या गति का निरन्तर कम होना मानवीय भविष्य को खतरे में ही डालने वाला सिद्ध होगा।
उन्होंने पेरु, न्यूजीलैण्ड, अफ्रीका, अमेरिका आदि अन्य देशों में किए सर्वेक्षण के आधार पर बताया कि मात्र वन-सम्पदा ही नष्ट नहीं हुई, पादपों के साथ जन्तुओं का का विनष्टीकरण भी हुआ। स्थिति को स्पष्ट करते हुए वे बताते हैं कि कई वन तो नाम मात्र ही बन थे। क्योंकि उनमें वृक्षों एवं जन्तुओं की स्थिति दयनीय थी।
अन्य देशों की तरह यही स्थिति स्वयं भारत की भी है। वन सम्पदा तथा सुखद पर्यावरण के लिए अपना विशिष्ट स्थान रखने वाले इस देश में लगातार बढ़ते शहरीकरण तथा शहरीकरण तथा औद्योगीकरण ने वनों को कुल भूमि के मात्र 119 प्रतिशत वें भाग में समेट दिया है। कृषि के लिए उपजाऊ भूमि भी मात्र 1479 लाख हेक्टेयर या 49 प्रतिशत ही बची है। बढ़ता शहरीकरण तथा उद्योग इसको भी विनष्ट करने पर उतारू हैं।
मानवीय चिन्तन जब संकीर्णता तथा स्वार्थपरता में फस जाता है तो उसे यही यथार्थ व औचित्यपूर्ण भासने लगता है। इसी आभास के कारण विचलित और दिशाहीन बुद्धि तरह-तरह के ऐसे चित्र-विचित्र सिद्धांत गढ़ने प्रारम्भ करती है, जो किए गए कार्यों का समर्थन करें। जे0 बेन्थम प्रिन्सिपल ऑफ मारल्स एण्ड लेजिस्लेशन में ऐसे ही सुखवाद का सिद्धांत प्रतिपादित करते है। उनके अनुसार प्रत्येक वस्तु सुख का साधन मात्र है। सुख ही हमारा स्वाभाविक लक्ष्य हैं, इसे पूरा किया ही जाना चाहिए। सिरेक्स, एपीक्यूसिस, मिल खुले हृदय से इसका समर्थन करते है। उपरोक्त सिद्धांत की समीक्षा करते हुए जे0 सेथ का “ए स्टडी ऑफ इथिकल प्रिन्सिपल” में कहना है बेपरवाह, विचारहीन जीवन ही इनका आदर्श है। कर्लाअल ने इसी कारण इसको च्पह च्ीपसवेचील या शूकर दर्शन कहा है।
आज पृथ्वी के प्रत्येक भू-भाग में इसी शूकर दर्शन को व्यवहार में लाया जला रहा है। जिन्होंने तटस्थ भाव इसके विपरित औचित्यपूर्ण कहने का प्रयत्न किया, उसकी बात को कठोरतावाद का नाम देकर उपहास किया गया। यूनान के प्रख्यात विचारक एण्टीस्थीनीज ने ऐसे सुखों को मूर्खता का जीवन माना है। नीति-शास्त्री तथा आदर्शवादी जीवन के प्रवक्ता काण्ट ने सदिच्छा को शुभ तथा ईश्वर के लिए जीवन जीने को श्रेष्ठ माना है। वह पारस्परिक सहयोग की नीति को उच्च मानता है।
सुखों के पीछे भागते मनुष्य समुदाय को आदर्शवादी बाते समझ में आने से रही। उसे तो नीत्शे का कथन “तथ्य नैतिक नहीं होते” ही भाता है। उसे तो जगत की प्रकृति भी अनैतिक प्रतीति होती है।
यही निषेधात्मक चिन्तन अन्य भागों की तरह साँख्य एवं वेदान्त के प्रवर्तक भारत में भी व्यवहार में लाया जा रहा हैं। इसी चिन्तन में ओत-प्रोत हो जाने के कारण प्रकृति का संरक्षण
तथा उसके साथ सामंजस्य का तथ्य पूरी तरह विरुमृत ही नहीं अनौचित्यपूर्ण भी लगता है।
श्रसियन चिन्तक अन्टोली गोरेलोव तथा अलेक्जेन्डर शातालोव मानव की समझ पर तरस खाते हुए “प्राब्लम्स ऑफ द कन्टेम्पारेरी वर्ल्ड” नामक पुस्तक में “मैन एण्ड दि इनवायरमेण्ट मेथडोलाजिकल एस्पेक्टस ऑफ दि प्राब्लम” शीर्षक के अंतर्गत कहते है प्रकृति का सौंदर्य नष्ट करने के साथ मनुष्य अपने वर्तमान और भविष्य को भी नष्ट कर रहा है। पर्यावरण संरक्षण के औचित्य की महत्ता व आवश्यकता बताते हुए वे कहते हैं-वह तकनीकी एवं वैज्ञानिक प्रगति जो पर्यावरण का विनाश करती हैं, पूर्णतया अनैतिक है।
इसके अनुसार मनुष्य के और प्रकृति मध्य संबंधों की समस्या भौतिक न होकर दार्शनिक और नैतिक है। प्रकृति को पूर्णतया जड़ न मानकर इसके भावनात्मक स्वरूप और संबंध का भी ध्यान रखना चाहिए। मास्को से प्रकाशित “फ्रामअर्ली वर्क्स” में के0 मार्क्स व एक एन्जेल्स भी स्पष्ट करते है मनुष्य प्रकृति के द्वारा जीता है। इस कारण उसे मृत्यू की अपेक्षा जीवन का भरण करने के लिए अपने एवं प्रकृति मध्य संबंधों को मधुर बनाना चाहिए।
गोरेलोव और शातालोव बताते है कि मानव व्यक्तित्व मात्र जैविक एवं सामाजिक आयामों में ही नहीं सिमटा हैं, उसका एक इकोलाजिक आयाम भी है। इसकी स्वाभाविक अभिन्नता के कारण इसके सुप्रभाव व कुप्रभाव भी अभिन्न ही होंगे। मनुष्य ने जिस तरह जैविक एवं सामाजिक आयाम में अपने स्वरूप का निखारने का प्रयत्न किया हैं, उससे कही अधिक आवश्यकता इस बात की है कि पर्यावरण संबंधी आयाम को सुविकसित और सौंदर्यवान बनाया जाये।
इस महत्वपूर्ण कार्य के सम्पादन के लिए वे पर्यावरण नीति शास्त्र के गठन तथा उसके परिपालन की सलाह देते है। उसके अनुसार यह नीति शास्त्र चिकित्सा नीतिशास्त्र से भी अधिक पवित्र व भावनायुक्त होना चाहिए। चिकित्सा नीति की जो संकटपूर्ण स्थिति है उससे कहीं अधिक ऊपर उठकर विचार किया जाना चाहिए। मनुष्य के जीवन रक्षण से भी अधिक महत्वपूर्ण वनस्पतियों तथा प्रकृति के अन्य घटकों का रक्षण करना। लाभ की दृष्टि से भी प्रकृति के ये घटक कहीं अधिक उपकारी है। ऐसे सुहदों को संरक्षण तथा पोषण न प्रदान कर उनका वध करना कितना हेय और निन्दनीय हैं इसकी कल्पना ही की जा सकती हैं
आँग्लदेशीय सी0 जे0 स्टार्स भी “एनवायरमेण्टल इथिक्स एण्ड बियान्ड” में उपरोक्त मत का समर्थन करते हुए कहते हैं मनुष्य ने अपने धर्म तथा व्यवहार को मात्र अपने स्वार्थ तक सीमित कर लिया है। इसे वह। दजीतवचवबमदजतपब (मानव केन्द्रित) का नाम देते है। उनके अनुसार प्रकृति के विभिन्न घटकों से भी इसी स्तर का व्यवहार किया जाना चाहिए।
आँग्लदेश के ही लन्दन निवासी मनीषी जाँन॰ जे0 काम्पटन “साइन्स एण्ड गाड्स एक्शन इन नेचर” में प्रतिपादित करते हैं कि प्रकृति ईश विनिर्मित हैं, जिसे स्वार्थांध विज्ञान ने ध्वस्त किया है। इसके पीछे मानवीय विचारहीनता ही झाँकती हैं। मनुष्य को अपने विचारों को परिष्कृत पर्यावरण के साथ वैसा ही संदय और सुहद व्यवहार करना चाहिए जैसा वह अपन सगे सम्बन्धियों के साथ करता है। अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त चिन्तक बर्ट्रेंड रसेल अपने ग्रन्थ साइन्अिफिक आउटलुक में बताते है कि एक नये नैतिक मूल्य की आवश्यकता है वह यह कि मनुष्य प्रकृति के विभिन्न घटकों के साथ सम्मान और सहयोग का व्यवहार करें।
इसी तथ्य को कनाडा के पर्यावरण शास्त्री नारमन एवं मोर्स कानाडियन इनवायरमेण्टल एडवाइजरी काउंसिल में पढ़े गए अपने शोध पत्र” “इनवायरमेण्टल इथिक्स इट्स फंक्शन एण्ड इम्पलीकेशन” को प्रतिपादित करते हुए बताया है कि पश्चिमी संस्कृति में हमने अपनी नैतिकता का दायरा मनुष्यों तक ही सीमित कर लिया है। सीमाबद्धता की यह संकीर्णता ही आज की सबसे बड़ी समस्या हैं जिससे ग्रसित होकर प्रकृति के साथ हम अपने संबंधों एवं दायित्वों को भूल बैठे है। अब वह समय आ गया है जब हमें अपने इन मधुर संबंधों का स्थापन कर लेना चाहिए। हमें ऐसे नीतिशास्त्र का निमार्ण करना चाहिए जिसके आधार पर हम इन मधुर संबंधों को चिरस्थायी बना सके।
अमेरिका की काउंसिल आँन् इन्वायरमेण्टल क्वालिटी एण्ड दि डिपार्टमेण्ट ऑफ स्टेट न्यूयार्क के जी0 ओ॰ बारनी तथा उनके सहयोगियों ने राष्ट्राध्यक्ष को प्रस्तुत अपनी रिपोर्ट “ग्लोबल-1000” में उल्लेखित किया है कि हमारा वर्तमान नीतिशास्त्र हमें पर्यावरण को गाली देना व विनष्ट करना ही सिखा रहा है। इसी कारण हम केवल प्रकृति घटकों से डकैती भर डालते है। इससे जसे हानियां हुई है। उसके कारण सारे स्त्रोत समाप्त होते जा रहे हैं। इसी कारण हमने जल प्रदूषित किया, वन समाप्त हुए, हवा खराब हुई तथा जंगली जानवरों का खात्मा हुआ। अपनी इसी रिपोर्ट में वह आगे बताते है कि हम केवल मनुष्यों की जनसंख्या बढ़ा रहे हैं। इसके परिणामस्वरूप प्रति कैपिटा जनसंख्या के अनुसार पर्यावरण उसकी आवश्यकताएं नहीं पूरी कर पायेगा। उससे जो कुछ मिलेगा भी वह सभी जहरीला होगा। इस संकट पूर्ण स्थिति के निवारण के लिए पर्यावरण और मनुष्य के बीच नैतिक संबंधों का स्थान तथा दृढ़ता से परिपालन होना चाहिए।
इन नैतिक संबंधों का आधार एवं स्वरूप क्या हो? किस तरह उनका स्थापन किया जाये? यह समस्या वर्तमान विश्व के सामने है। इस समस्या का औचित्यपूर्ण समाधान करते हुए अमेरिका में न्यूयार्क के अध्येताइयान जी0 बारबर “टेक्नोलॉजी व एन्वायरमेण्ट एण्ड हूमेन वैल्यूज” में कहते है कि इसका सरल समाधान अध्यात्म विशेषतः भारतीय अर्थों में अभिप्रेत अध्यात्म है। प्रथमतः इस विधि के द्वारा मनुष्य स्व व्यक्तित्व को सुरक्षित बनाये रख सकता है। द्वितीय यह मनुष्य को यथार्थ और आदर्श का समन्वित रूप समझाते हुए प्रकृति को भी चेतना सत्ता का स्वरूप समझने पर बल देता तथा उसके प्रति सदय व स्नेह युक्त व्यवहार की प्रेरणा देता है। तृतीय जहाँ धर्म विहीन तकनीकी ज्ञान हमें अपने को नष्ट करने की शक्ति प्रदान करता है। वहीं अध्यात्म सौम्यता तथा स्वार्थपरता से मुक्ति सिखता तथा स्वयं के साथ अपने परिवेश जिसे मानव, मानवेत्तर प्राणी व प्रकृति के घटक सम्मिलित हैं, के साथ सहयोग व सद्भाव का व्यवहार सिखाता है।
श्री बारबर का यह कथन भले ही किसी को उपहासास्पद या अतिशयोक्तिपूर्ण प्रतीत हो किन्तु उपरोक्त तथ्य पर गम्भीर मनन, नीति विषयक क्षेत्र में भारतीय आध्यात्म का गौरव व महत्व स्वीकारे बिना नहीं रह सकता। वैदिक ऋषि इस नीति के कितने मर्मज्ञ थे, प्रकृति के साथ उन्होंने कितना सौजन्यपूर्ण संबंध स्थापित किया था। इसे वैदिक वाङ्मय के अवलोकन से जाना जा सकता है। यजुर्वेद के 13 वे मण्डल के 29 सूक्त की एक ऋचा के अनुसार जो चिरन्तन नियम (सौजन्यतापूर्ण नीति) का पालन करेगा उसके लिए वायु मधुरता से भरी होगी, नदियाँ उसे मधुरता प्रदान करेंगी। सारी वनस्पति उसके लिए मधुर होगी।
इस नीति को और अधिक स्पष्ट करते हुए मुण्डक उपनिषद् का ऋषि द्वितीय मुण्डक के 9 वीं श्रुति में कहता है मनुष्य के साथ पशु पक्षी वनस्पतियाँ सभी परम सत्ता द्वारा ही उपजाए है। इसी कारण पारस्परिक सहयोग का भाव ही अपेक्षित है। इसी भाव से भावित वातावरण को संरक्षण प्रदान करता हुआ ऋग्वेद का ऋषि इसके पाँचवें मण्डल 71 वे सूक्त के 11,12 वे मंत्र (आपो औषधि स्याद्रे) में वातावरण से मानव समाज की कल्याण कामना करता हुआ कहता है “ पौणे-वृक्ष हमें संरक्षण प्रदान करें।”
वैदिक वाङ्मय में इसी तरह अनेकों मंत्र हैं जो पर्यावरण नीति को स्पष्ट करते है। गुलेफ विश्व विद्यालय कनाडा के प्राध्यापक डॉ. ओ॰ पी0 द्विवेदी वर्ल्ड हेल्थ आर्गनाइजेशन साउथ ईस्ट ऐशिया रीजन के लिए 30 सितम्बर 1974 को तैयार की गई अपनी रिपोर्ट “प्रपोज्ड नेशनल इन्स्टीट्यूट ऑफ इनवायरमेण्टस एण्ड रीजनल सेर्न्टस एण्ड दि स्टेट ऑफ इन्डार मेण्टल एजुकेशन इन दि स्टेट आँ उत्तरप्रदेश, इण्डिया” में कहते हैं। कि पर्यावरण क सन्तुलन के लिए मानविकी तथा समाज विज्ञान के ही सदृश पर्यावरण नीतिशास्त्र के अघ्ययन को प्रारम्भ करना चाहिए। साथ ही इन नीतियों का व्यापक स्तर पर प्रचार तथा परिपालन होना चाहिए। डॉ. द्विवेदी इंटरनेशनल रिव्यू एडमिनिस्ट्रेशन सर्विसेज के वाल्यम 40 में प्रकाशित अपने एक शोध पत्र “इण्डिया वाँल्यूशन कन्ट्रोल पालिसी एण्ड प्रोग्राम” में अपना मन्तव्य स्पष्ट करते है कि “औद्योगिकीकरण के बल पर विकसित कहे जाने वाले राष्ट्रों की तकनीक उधर लेकर प्रदूषण का सुधार करना भारत के लिए लाभदायक नहीं हैं।”
निःसंदेह डाद्ध द्विवेदी के कथन में यथार्थता है। शहरों के विकेन्द्रीकरण तथा बड़े उद्योगों के स्थान पर कुटीर उद्योगों को स्थान दिए बिना पर्यावरण के सन्तुलन की आशा दुराशा ही होगी। मानव की सामाजिक तथा पर्यावरण संबंधी नीति का आधार प्रस्तुत करते हुए गीताकार इसके तीसरे अध्याय के 11 वें श्लोक में कहता हैं “देवान्भावयतानेन ते देवा भवयन्तुव। परस्पर भवयन्त ज्ञेख् परमवाप्स्यथ॥ 11॥” अर्थात् प्रकृति पर्यावरण के विभिन्न घटक रूप देवताओं जल (वरुण), वायु (मरुत), पृथ्वी की तुम सब उन्नति करो, वे तुम लोगों की उन्नति करेंगे। इस प्रकार आपस में कर्तव्य समझ कर उन्नति करते हुए तुम सब परम कल्याण को प्राप्त होगे।”
निश्चित ही सर्व नीतियों का परम आधार गीता के उपरोक्त श्लोक में हैं। इसको अपनाकर मानव व्यक्ति व समुदाय बाह्य समृद्धि व उन्नति तथा आन्तरिक शान्ति एवं आनन्द सहज ही प्राप्त कर सकता है। सुखभोग-वाद की नीति तथा बुद्धिवाद की दिशाहीनता से जो अस्तित्व संकट तथा अंधकार पूर्ण भविष्य की काली छाया दिखाई पड़ रही है। उसके दूर होने के आसार निश्चित रूप से सम्भव बन सके। इक्कीसवीं सदी अनेकों संभावनाएं सामने लेकर आ रही है। इसमें नैतिकी को परिस्थितिकी को दिशा देनी होगी। ताकि पर्यावरण से की गई खिलवाड़ का प्रायश्चित किया जा सके। ऐसा हो सका तो ही हम सतयुगी व्यवस्था की आधारभूमि खड़ी कर सकेंगे।
पैर मल-मल कर धोये और उससे एक बड़ा कलश भर लिया। उसी को ज्यों का त्यों पिलाने लगे। एक बूँद देने भर की कृपणता भी उनने नहीं अपनाई। इतने पर भी किसी को कोई लाभ नहीं हुआ। सभी रोगी निन्दा करने अपशब्द कहने और झगड़ने लगे।
ऐसा क्यों हुआ? उसका समाधान पूछने के लिए गुरु शिष्य के पास पहुँचे। सारा हाल बताया। शिष्य ने ध्यानपूर्वक सुना और प्रार्थना पूर्वक कहा-देव, मेरे मन में आपके प्रति आपके चरणोदक के प्रति असीम श्रद्धा है। वह श्रद्धा ही जल में मिलकर चमत्कार दिखाती है। आपने अपने पैर धोते समय अहंकार का समावेश किया फलतः संजोया गया जल निष्फल हो गया।
मंत्र शक्ति के संबंध में भी यही बात है। जहाँ उसके जप में नियमोपनियमों का पालन करना चाहिए वहीं निर्धारित साधना के प्रति अटूट श्रद्धा भी होनी चाहिए। लक्ष्य ऊँचा रखना चाहिए जिससे मनोकामनाओं के पूरे होने न होने पर कोई अन्तर न आये। जप से उद्भूत हुए अक्षर अपने अपने सम्बद्ध सूक्ष्म केन्द्रों पर प्रभाव डालते और उन्हें उत्तेजित करते हैं। इस प्रसुप्ति के जागरण में अतिरिक्त स्तर की क्षमताएँ जागती हैं। योग्यताएँ उभरती हैं। उपयोगी परिवर्तन की श्रृंखला बनती है। इन सबका परिणाम यह होता है कि हाथ में लिये काम सही दिशा धारा मिलने से सफल होने लगते हैं। प्रतिभा का विस्तार दिन दिन होने लगता है। व्यक्तित्व का विकास सफलताओं की गारंटी है। इसी परिणति को मंत्र सिद्धि कहते हैं।
दूसरा वर्ग प्राणायाम है। श्वास से संकल्प शक्ति के सहारे चुम्बकत्व भरा जाता है और उसके सहारे से वायुमंडल में भरे हुए प्राणतत्व को खींच निकाला जाता है। इसकी अवधारणा से साहसिकता उभरती है। आत्मविश्वास बढ़ता है और जीवनी शक्ति का अभिनव संचय होता है। प्राणायामों की अनेकानेक शाखा प्रशाखाएँ हैं पर उनसे सरलतम प्राणाकर्षण प्राणायाम चुनने से भी काम चल जाता है। साँस खींचते समय प्राण का प्रवेश, रोकते समय प्राण का भंडारण, छोड़ते समय विकृतियों का निष्कासन भाव भरना, यह है संक्षेप में प्राणाकर्षण प्राणायाम। इससे साँस लेने छोड़ने का समय सामर्थ्य भर बैठाना चाहिए और रोकने का समय अधिक रखना चाहिए। तीनों क्रियाओं से मिला हुआ एक समग्र प्राण संचार प्राणायाम माना जाता है। इसे दस मिनट से आरंभ करके आधे घंटे तक पहुँचाया जा सकता है। स्वच्छ खुली हवा में प्रातः काल के समय प्राणायाम किया जाय। मेरुदंड को सीधा रखा जाय। आँख अधखुली रखकर नासिका के अग्रभाग पर दृष्टि जमाई जाय।
उपरोक्त जप प्राणायाम के दोनों अभ्यास ऐसे हैं जिनमें शारीरिक क्रिया को सुनिश्चित रखा जाता है। साथ ही प्रयत्न यह भी किया जाता है कि मनोयोग का संकल्प शक्ति का भी उसमें समावेश किया जाय। मन की चंचलता कुख्यात है। वह बन्दर की तरह उछलता और चिड़ियों की तरह फुदकता रहता है। मच्छर की तरह उसे एक स्थान पर बैठना सुहाता ही नहीं। इस उच्छृंखलता पर अंकुश करने के लिए आरंभिक प्रयोग जप को प्राणायाम के रूप में करना पड़ता है। इन दोनों का प्रयोग मन को घेरना और खूँटा पहिचानने, अस्तबल में रहने के लिए सहमत करने के लिए किया जाता है। हर घड़ी बेसिर पैर की उड़ाने उड़ने की अपेक्षा किस सत्प्रयोजन उच्च उद्देश्य पर जमने के लिए उसे उपरोक्त बाड़ों में कैद रहने के लिए विवश करता है। यों इस स्थिति को भी वह सहज स्वीकार नहीं करता और बीच-बीच में उछालें लगाता रहता है। रस्सी तुड़ाकर भागने की भरपूर चेष्टा करता रहता है। किन्तु उसे घेर बटोर कर सीमाबद्ध रखने के लिए बाधित करने वाला प्रयत्न करता रहना पड़ता है। अभ्यास को निष्ठापूर्वक चलाते रहने से हर काम में सफलता मिल कर रहती है। मन का बाँधना असंभव नहीं है। यद्यपि ऊँचे उद्देश्यों के साथ जोड़ सकना कठिन तो है। अधोगामी हरकतों में तो सहज सरक जाता है पर ऊर्ध्वगामी बनाने के लिए वैसा ही आड़ा–टेड़ा प्रयत्न करना पड़ता है जैसा कि सरकस वाले अपने जानवरों को चित्र विचित्र काम दिखाने के लिए प्रशिक्षित करते हैं। यह एक महती कला है। मनुष्य की सचेतन शक्तियाँ यदि उद्देश्यपूर्ण उत्कृष्टता के साथ दृढ़ता पूर्वक जुड़ सकें तो समझना चाहिए कि महामानव बनने जैसी संभावना सुनिश्चित हो गई। सफलताओं के अनेकों ताले विकसित व्यक्तित्व की एक ही चाबी से खोलते जाने की संभावना हस्तगत हो गई। वैज्ञानिकों से लेकर कलाकारों, योगियों से लेकर सिद्ध पुरुषों तक को यह सफलता अनिवार्य रूप से प्राप्त करनी है कि मन को समग्र तन्मयता के साथ अपने निर्धारित लक्ष्य में नियोजित करें ताकि शरीर को इस अनुशासन के अंतर्गत अपने क्रिया−कलाप तदनुरूप करते रहने के लिए विवश होना पड़े। प्रगति चाहे भौतिक क्षेत्र की हो या आत्मिक क्षेत्र की उसमें समग्र मनोयोग अनिवार्य रूप से नियोजित करना पड़ता है। हो सकता है कि किसी ने मानसिक नियंत्रण अपने सामान्य क्रिया−कलाप से, मानसिक संयम से अर्जित कर लिया हो पर यह निश्चित है कि इसके बिना अभ्युदय की दिशा में बढ़ सकना संभव नहीं। जिनका मन डाँवाडोल रहता है, रंगीन कल्पनाओं के आकाश में बेसिरपैर की उड़ाने भरता रहता है उसका आधे अधूरे मन से किया गया निजी कार्य प्रायः असफल रहता है। किसी भी दिशा में महत्वपूर्ण यशस्वी उत्कर्ष ऐसा चंचल मन वालों के साथ नहीं लगता।
जप और प्राणायाम की चंचलता का शमन करके उसे एकाग्रता, एकनिष्ठा से अभ्यास करना पड़ता है। यह अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि है। निग्रहित मन एक दैवी-वरदान है, उसे जिस भी काम में लगा दिया जाय अवरोधों को चीरते हुए सफलता का लक्ष्य प्राप्त करके रहता है। यों जप की मंत्र शक्ति और प्राणायाम द्वारा संचित प्राप्त शक्ति अपना विशिष्ट प्रतिफल व्यक्तित्व के विकास और प्रखरता के उभार से अपनी प्रतिक्रिया का परिचय देती है। मन स्थिति ही परिस्थितियों की जन्म दात्री है। जप और प्राणायाम मन स्थिति को सत्प्रवृत्तियों से सुसम्पन्न करते हैं। फलतः उसका प्रतिफल अभीष्ट आकाँक्षाओं को पूरा करने में दैवी अनुग्रह की वरदान उपलब्धि जैसा प्रतीत होता है। प्राणायाम वाले प्राणवान बनते हैं और जप कर्त्ताओं की श्रद्धा बलवती होती है। आशा के आरोपण से पत्थर के खिलौने भी मीरा के गिरधर नागर, नरसी के रणछोड़ जी बनकर चमत्कारी दिव्य दर्शन देने लगते हैं। राम कृष्ण परमहंस की काली, एकलव्य के द्रोणाचार्य उनकी भाव श्रद्धा का सघन आरोपण होने से ही चमत्कारी प्रतिफल उत्पन्न कर सकने वाले सिद्ध हुए थे। पाषाण प्रतिमाएँ इसी आधार पर देवत्व का प्रतिनिधित्व करती हैं।
साधना का तीसरा आधार है ध्यान। इसमें शारीरिक अंग अवयवों का योगदान नहीं रहता है। समूचा कार्य चेतना को ही करना पड़ता है। कल्पना प्रायः धुँधली और अस्थिर होती है। उसे स्पष्ट, स्थिर और विश्वस्त बनाया जाय। तभी ध्यान धारणा बन पड़ती है। इसके लिए कोई इष्ट निर्धारित करना होता है। उसी पर मन जमाना होता है। चित्र या प्रतिमा को सामने रख कर उसके अंग प्रत्यंगों, बाल, आभूषणों आयुधों वाहनों के सज्जा सज्जित कलेवर को परिपूर्ण उत्सुकता और भावना के साथ देखते रहा जाया करे तो इस तन्मयता भरे देव के दर्शन से भी ध्यान की आरंभिक भूमिका सम्पन्न होती है। चित्रों और प्रतिमाओं का निर्माण तथा अवलम्बन इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए किया जाता है। प्रतिफल उसी अनुपात से मिलता है, जितनी गहरी साधक की भाव संवेदना होती है। यदि उपेक्षापूर्वक अवस्था की मन स्थिति से उन्हें देखा गया है तो प्रतिफल मात्र छवि दर्शन का लाभ आँखों को एक कौतूहल देखने भर का मिलेगा। किन्तु यदि श्रद्धा का गहरा पुट लगा होगा तो जड़ प्रतिमा भी जागृत स्तर में अपना परिचय देने लगेगी।
निराकार ध्यान इससे ऊँचा है। क्योंकि उसकी संरचना किसी दृश्य के अनुरूप अपने को ही करनी पड़ती है। इसका पुरातन इतिहास स्मरण करने की आवश्यकता नहीं पड़ती। क्योंकि जिसका भी इतिहास होगा उसमें मनुष्य में पायी जाने वाली त्रुटियों का भी समावेश रहेगा ही। ध्यान से तादात्म्यता आती है। इसके साथ साधक एकीभूत होता है। ध्यान से भी आग ईंधन जैसा एकात्मता का भाव बन जाता है। शर्त एक ही है कि उसके साथ सघन आत्मीयता जुड़ी हुई है। निराकार ध्यान में भी इतना तो करना ही है।
प्रातः काल के उदीयमान स्वर्णिम सूर्य का ध्यान सर्वोत्तम है। दृश्यमान सूर्य अपने आप में भी प्राण पुँज है। फिर ध्यानकर्ता अपनी आस्था का आरोपण करके उसे और भी शक्तिदाता बना देता है। गायत्री का अधिष्ठाता, विश्व का निर्माता सविता ही है और परब्रह्म की सत्ता का प्रतीक भी। ध्यान उस सत्ता का भी कर उसके प्रकाश से स्वयं को आलोकित हुआ अनुभव किया जा सकता है।
हो सकता है कि किसी को किसी कार्य को करने पर भी आनन्द न मिलें, पर इतना निश्चित है कि आनन्द उसी को मिला है जिसने कर्तव्य मार्ग पर चलते रहने का निश्चय किया।
संसार-चक्र में विपरीतताएँ कम नहीं। दिन और रात का युग्म चलता है इनमें से किसी एक को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता और न हटाया जा सकता है। इतना ही संभव है कि उन परिवर्तनों के अनुरूप अपने को ढालें और यथासंभव तालमेल बिठाने का प्रयत्न करें।
शरीर मल मूत्र की गठरी भी है और आत्मा के निवास का पवित्र देवालय भी। यह संयोग बने रहने का नाम ही जीवन है। शरीर के प्रति उसके अनुरूप वाहन का दृष्टिकोण रखें और साथ ही आत्मा की गौरव गरिमा को भी गिरने न दें।
संसार में शैतान और भगवान का पाप और पुण्य का सुनिश्चित अस्तित्व है। पाप को इतना हलका किया जा सकता है कि वह पुण्य के मार्ग में रोड़ा न बने। पुण्य को भी अतिवादी होने से बचाया जा सकता है कि वह जहाँ कहीं अनुपयुक्तता देखे वहीं तलवार लेकर पिल न पड़े।
समन्वय और सामंजस्य की नीति अपनाकर ही हम प्रकृति प्रयोजनों को पूरा कर सकते हैं। चलने में एक कदम आगे और दूसरा पीछे तो रहेगा ही।
यहाँ घृणा और प्रेम की चर्चा की जा रही है। एक को ही सब कुछ मान लेने और दूसरे की अवज्ञा करने से संतुलन बिगड़ेगा और परिणाम ऐसे होंगे जिनसे अव्यवस्था ही उत्पन्न हो।
प्रेम को अतिवाद में कुछ धर्मों को सर्वोपरि माना है और अपने उत्पीड़न सहने पर सामने वाले का हृदय बदल जाने की बात कही है। प्रतिरोध का निषेध किया है इस अतिवाद का दुष्परिणाम प्रत्यक्ष है। भारत के इस प्रेम प्रतिपादन ने मध्य एशिया के आततायियों का हौसला बढ़ाया और आक्रमणों पर आक्रमण होने की धूम मच गई। देश बुरी तरह घाटे में रहा। क्योंकि प्रतिरोध के लिए जिस तत्परता और समर्थता की आवश्यकता थी उसे अहिंसा धर्म के अतिवादी प्रभाव में आकर उपेक्षित कर दिया गया था। उस भूल का दंड अपने को लुटाने और पराधीन बनने के रूप में लम्बे समय तक सहना पड़ा।
यही बात घृणा के संबंध में भी है। अपनी मान्यताओं के साथ जहाँ भी तालमेल न बैठता हो उसे शत्रु माना जाय और हर संभव उपाय से उसे नष्ट करने का प्रयत्न किया जाय। इस मान्यता के कारण एशिया और योरोप में धर्म के नाम पर भारी रक्तपात हुआ और असंख्य निर्दोषों को असह्य त्रास सहना पड़ा।
तानाशाही की भी यही मान्यता है कि अपने साथ तालमेल न बिठा पाने वालों का अस्तित्व ही समाप्त करके रहना चाहती है। हिटलर ने समूची कौम को अपना शत्रु समझा। विपक्षी देशों पर भी अमानुषिक अत्याचार किये। घृणा पर अवलम्बित साम्यवाद ने पूँजीपतियों और पुरातन पंथियों को सहन करने सुधारने की अपेक्षा उनका सफाया करना ही उचित समझा। रूस और चीन में साम्यवादी शासन स्थापित होते समय प्रजाजनों पर जो बीती वह किसी से छिपी नहीं है। यह घृणा का अतिवाद है।
प्रेम और घृणा मनुष्य में और समाज में विद्यमान हैं पर दोनों में किसी को भी अतिवादी नहीं होना चाहिए। सफाई से हम प्रेम करें और गंदगी को हटाने के लिए घृणा करें। यह विपरीत मान्यताएँ यथोचित स्थान पर यथोचित रीति में चल सकती हैं। यह समन्वय-वादी सौजन्य है।
ओस की बूँदें दीखती तो मोती जैसी हैं। पर वे स्थिर कहाँ रह पाती हैं? आकर्षण भी ओस बिन्दुओं की तरह हैं।
विज्ञान व अध्यात्म दोनों ही सत्यान्वेषण की द्विविध प्रक्रियाएँ हैं। अन्वेषण प्रक्रिया की भिन्नता के बावजूद भी इनमें अद्भुत साम्य है। वैज्ञानिक अपना कार्य क्षेत्र पदार्थ विज्ञान को बनाता है और लगातार अन्वेषण प्रक्रिया में संलग्न रहते हुए सत्य तक पहुँचने का प्रयास करता है जब कि अध्यात्म मार्ग का पथिक अपना क्षेत्र चेतना को चुनता है तथा निरन्तर अपनी शोध प्रक्रिया में संलग्न रहकर परम तत्व की प्राप्ति हेतु स्वयं को तत्पर करता है।
यह साम्य मात्र इतना ही हो, ऐसा नहीं है। अन्वेषण की पद्धति में भी एकरूपता है। किसी भी वैज्ञानिक ज्ञान को निरूपित करने वाले सिद्धान्त सूत्र की प्राप्ति सामान्यतया तीन चरणों में की जाती है। प्रथम चरण है- परिकल्पना-हाइपोथीसिस। द्वितीय चरण में इसमें निहित सत्य को उजागर करने के लिए प्रयोग में एकाग्रतापूर्वक अपनी सारी मनः सामर्थ्य को नियोजित करना पड़ता है। यह स्थिति ध्यान से कम नहीं है। तृतीय स्थिति अन्तिम निष्कर्ष के अनुभव की है। इस अनुभव को ही बाद में संकेत सूत्र-सिद्धान्तों द्वारा उल्लेखित किया जाता रहता है। शोध प्रक्रिया के यह तीन चरण महत्वपूर्ण हैं, पर काम इतने से ही चल जाता हो, ऐसी बात नहीं है। इसके पूर्व प्रयोगशाला, संदर्भ ग्रन्थों सम्बन्धित उपकरणों की बाह्य तैयारियाँ करने के साथ उपयुक्त मानसिकता भी बनानी पड़ती है। तब कहीं यह क्रम शुरू हो पाता है।
वेदान्त में उपदिष्ट राजयोग इसी तरह पूर्णतया वैज्ञानिक-प्रक्रिया है। इसमें बताए गए आठ चरणों में प्रथम पांच अर्थात् यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार ऐसे हैं, जिन्हें पूर्व की तैयारी माना जा सकता है। यह तैयारी कुछ इसी स्तर की है जिसे प्रयोगशाला, संदर्भ ग्रन्थों-सम्बन्धित उपकरणों के जुटाने जैसा कहा जा सके। कारण कि चेतना क्षेत्र में किए जाने वाले इस प्रयोग में शरीर और मन ही प्रयोगशाला तथा सम्बन्धित उपकरण हैं। इन दोनों की साफ-सफाई उपयुक्तता-यम नियम, आसन, प्राणायाम से बन पड़ती है। प्रत्याहार का तात्पर्य है कि मन को अन्य बाह्य विषयों से हटाकर प्रयोग में जुट पड़ने के लिए तैयार करना।
यहाँ से सारी तैयारियाँ पूर्ण हो जाती हैं। इसके बाद “धारण” का क्रम आता है। यहाँ धारणा प्रकारान्तर से वैज्ञानिकों की “हायपोथिसिज” ही है। जिसमें मन को एक विषय पर ला देना होता है। सूत्रकार पातंजलि इस स्थिति को स्पष्ट करते हुए इसे देश “बन्धश्चित्तस्य धारणा” (319) बताते हैं। इसके बाद वह स्थिति आती है जिसमें अन्तराल में प्रविष्ट हो प्रयोग में जुट पड़ना होता है। इसे ही राजयोग में “ध्यान” की संज्ञा प्रदान की गयी है।
इस स्थिति में चेतना की विभिन्न परतों को पार करते हुए परम तत्व तक पहुँचने का प्रयास करना होता है। इस चरण में होने वाले चित्र-विचित्र विलक्षण अनुभव किसी भी भौतिकीविद् या रसायनविद् के अनुभवों से किसी प्रकार कम नहीं।
इसके अनन्तर वह स्थिति आती है जब निष्कर्ष की अनुभूति होती है। सत्य की यह अनुभूति ही ज्ञान है। अनुभव प्राप्त की इस उच्चतम अवस्था को ही भारतीय चिन्तक “समाधि” की संज्ञा प्रदान करते हैं। ऐसे दिव्य अनुभव को प्राप्त करने वाला ऋषि-अपने इस ज्ञान को संकेत सूत्र सिद्धान्तों द्वारा व्यक्त करता है।
ये संकेत भौतिकविदों के गणितीय संकेतों की ही तरह हैं। क्योंकि यहाँ भाषा मौन हो जाती है। इन अनुभूतियों को पूर्णतया व्यक्त करने में असमर्थ होकर ही ऋषियों ने “अवाँगमानसगोचरम्” तथा “अप्राप्य मनसासह” कहा है। भाषा की-अल्प क्षमता तथा न्यूनत को आत के वैज्ञानिक भी स्वीकारते हैं। सुविख्यात क्वाँटम भौतिकविद् प्रो. वारनर हाइजेन बर्ग अपने ग्रन्थ “फिजिक्स एण्ड फिलाँसाफी” में स्पष्ट करते हैं-कि “क्वाँटम थ्योरी को पूरी तरह से समझाने में सबसे बड़ी समस्या भाषा की है। यदि यह कहा जाए कि यहाँ सारी भाषाएँ मौन हो जाती हैं तो कोई अत्युक्ति नहीं। इसमें प्राप्त निष्कर्षों को गणितीय संकेतों से ही स्पष्ट किया जा सकता है।”
भारतीय चिन्तन का प्रभाव ग्रीक दर्शन पर पड़ने तथा इसका व्यापक प्रसार होने के कारण आध्यात्म की वैज्ञानिकता के कुछ प्रयत्न पश्चिमी चिन्तकों ने भी किए हैं। इसके बारे में दार्शनिक बटेर्रन्ड रसेल ने अपनी पुस्तक “हिस्ट्री ऑफ वेर्स्टन फिलासफी” में बताया है कि पश्चिमी जगत में विज्ञान और दर्शन के समन्वय सामंजस्य का इतिहास पाइथागोरस से आरंभ होता है। सेण्ट आगस्टिन, थामस एक्वीनस, देवर्ति, देकार्ते, स्पिनोजा, लेष्निज ने भी न्याय और तर्क के आधार पर समझाने की कोशिश की है।
इनका यह प्रयास सराहनीय तो अवश्य है, पर इसे पूर्ण नहीं कहा जा सकता। क्योंकि यह प्रयत्न मात्र तर्क एवं विचारणा की शक्ति पर ही आधारित है। प्रायोगिक स्तर का सफल प्रयत्न जैसा वेदान्त में मिलता है, वैसा अन्यत्र नहीं। “ताओ ऑफ फिजिक्स” के लेखक डॉ. फिटजोक काप्रा ने अपनी इस पुस्तक में इसको स्वीकार करते हुए कहा है- बौद्धों के माध्यमिक तथा जैन सम्प्रदाय चीन के ताओ धर्म की अपेक्षा सर्वाधिक वैज्ञानिकता हिन्दू वेदान्त में है।
इसकी प्रयोग विधि को विज्ञान की प्रयोग विधि के समानान्तर बताते हुए कहा गया है कि जिस प्रकार भौतिकशास्त्री उत्तम तकनीक एवं बाह्य सुविधाओं को प्राप्त कर अपना कार्य प्रारम्भ करता है, ठीक उसी प्रकार अध्यात्मवेत्ता एकान्त में ध्यान में अपना कार्य करता है। इन दोनों प्रयोगों में एक साम्य और है कि दोनों को ही पदार्थ व चेतना का आश्रय लेना पड़ता है। कोई वैज्ञानिक कितने ही आधुनिक एवं महंगे उपकरणों से सुसज्जित प्रयोगशाला अनेकानेक संदर्भ ग्रन्थ तथा अन्यान्य सुविधाएँ क्यों न जुटाले, पर मनोयोग एवं बुद्धि के बिना ये सारे सरंजाम बेकार ही रहेंगे।
मनुष्य तथा संसार दोनों के यथार्थ स्वरूप के ज्ञान का अनुभव करने वाले आध्यात्म-वेत्ता इस समस्या का सही और समुचित हल प्रस्तुत करते हैं। नीति, आचार, व्यवहार, वह तौर तरीके बताते हैं जिनसे कि विज्ञान की उपलब्धियों का सही उपयोग किया जा सके। डायनामाइट का उपयोग ऊबड़-खाबड़ पहाड़ों को तोड़ जनहित के लिए सड़कें बनाने के काम में भी हो सकता है, तथा चमकते-दमकते चहल-पहल से परिपूर्ण-भव्य-भवनों का विनाश कर श्मशान बनाने में भी। इसी प्रकार परमाणु ऊर्जा से विद्युत आदि उत्पन्न कर ऊर्जा की विकट समस्या का समाधान भी किया जा सकता है तथा-परमाणु बम के रूप में प्रयुक्तकर हिरोशिमा-नागासाकी जैसी घटनाओं की पुनरावृत्ति भी की जा सकती है।
इसमें क्या औचित्यपूर्ण है क्या अनौचित्यपूर्ण। इसका विवेकयुक्त निर्णय आध्यात्म-वेत्ताओं द्वारा प्रतिपादित सिद्धान्तों के परिपालन से ही सम्भव है। इतना ही नहीं इससे आत्मिक विकास का पथ भी प्रशस्त होता है।
इन दोनों के सर्वविधि साम्य को देखकर प्रो. सी. ई. एम. जोड़ ने विज्ञान को वधू तथा आध्यात्म को वर की संज्ञा दी है। उन्होंने अपने ग्रन्थ फिलासफिकल एस्पेक्ट ऑफ माँडर्न साइन्स में बताया है कि “वधू की सार्थकता वर के संरक्षण में ही है। इसी में इसकी गरिमा व महिमा सुरक्षित है। इनके मधुर परिणय का समय हो चुका है। दोनों ने एक-दूसरे को भली भाँति समझ भी लिया है। इनके इस मंगल, परिणय से ही मानवता समग्र विकास की ओर बढ़ेगी।”
प्रो.ए.एन. हृइट हेट ने “साइंस एण्ड दि माडर्न वर्ल्ड” तथा डॉ. इरोल, ई0हैरिस ने “नेचर माइन्ड एण्ड माँडर्न साइन्स” में इन दोनों के पारस्परिक सम्बन्धों पर व्यापक विचार कर यह स्पष्ट किया है कि विज्ञान का भटकाव अध्यात्म के यथार्थ तत्वदर्शन की जानकारी के अभाव के कारण था। वेदान्त के प्रचार से यह भटकाव दूर हो गया है। विज्ञान भी प्रौढ़ता की स्थिति में पहुँच चुका है। पदार्थ के नित्य परिवर्तनशील तथा ऊर्जा रूप होने से सारा झगड़ा समाप्त हो चुका है अब इन दोनों के एक होने से समस्त मानव जाति एक अद्भुत उत्कर्ष को प्राप्त करेगी।
विज्ञानवेत्ताओं के इन कथनों में पूर्ण सार्थकता है। दोनों की सत्यान्वेषण प्रक्रियाएँ मानवता के हित साधन के लिए हैं। इनका सामंजस्य मानव और मानवता के लिए हितकारी ही सिद्ध होगा।
भूतकाल के अनुभवों, वर्तमान की परिस्थितियों तथा प्रयासों के आधार पर आमतौर से भविष्य का अनुमान लगाया जाता है और निष्कर्ष निकाला जाता है। यह सुविधा अन्य प्राणियों को प्राप्त नहीं है। उनका बुद्धिबल मात्र शरीरचर्या के निमित्त अभी क्या करना चाहिए, इतना ही परामर्श दे पाता है, जबकि मनुष्य बहुत आगे की बात सोच लेता है और उस आधार पर भविष्य को अधिक सुनिश्चित एवं सुखद बनाने के लिए प्रयत्नशील रहता है।
गणित इस संबंध में बहुत सहायक होता है। उसने विज्ञान के आविष्कारों में असाधारण सहायता की है। व्यवसाय एवं प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण निर्णय-निर्धारण अंकगणित के सहारे किया जाता है। साँख्यिकी के आधार पर आवश्यकताओं का आँकलन किया जाता है और भविष्य में प्रस्तुत होने वाली परिस्थितियों का अनुमान लगाया जाता है। पुरुषार्थ की दिशा किस ओर मोड़ी जाए जिससे असंतुलन - संतुलन में बदले, यह निर्णय परिस्थितियों के आधार पर सोची गई संभावनाओं के आधार पर ही निकलता है।
ग्रहगणित का नाम ही ज्योतिर्विज्ञान है। खगोल विद्या के समस्त आकलन गणित के आधार पर ही संभव हो पाते हैं। ग्रहों की चाल, धुरी पर भ्रमण, कक्षा में परिक्रमा आदि की जानकारियों को देखते हुए कितने ही प्रकार के निष्कर्ष निकाले जाते हैं। कितने घण्टे का दिन व कितने घण्टे की रात होगी? सूर्य कब उदय और अस्त होगा? चन्द्रमा किस रात्रि को किस समय उदय और अस्त होगा और उसका आकार क्या रहेगा? यह निर्णय ग्रहगणित के आधार पर पंचाँग बनाने वाले आसानी से कर लेते हैं। इसी प्रकार सौरमण्डल का कौन ग्रह किस समय उदय-अस्त होगा? कब किस दिशा में उसे देखा जा सकेगा, यह बता देना खगोलविदों के लिए अत्यन्त सरल है। सभी इस पर एकमत हैं कि यदि यह विद्या हस्तगत न हुई होती तो अन्तरिक्षयानों को निर्धारित यानों में भेज पाना संभव न रहा होता। ग्रहगणित का फलित पक्ष पक्ष भले ही विज्ञान सम्मत न माना जाए, अंधविश्वास परक समझा जाय, परन्तु उसका गणित पक्ष तो ऐसा है जिसकी जानकारी के आधार पर हमारी दिनचर्या और कार्यविधि बहुत कुछ निर्भर करती है। ऋतु परिवर्तन से प्राणि समुदाय और वातावरण किस प्रकार प्रभावित होते हैं, यह किसी से छिपा नहीं है। उस जानकारी से हमारी दैनिक गतिविधियाँ पूरी तरह प्रभावित होती हैं। बदले हुए वातावरण के आधार पर हम अपने क्रिया कलापों को भी बहुत कुछ बदलते रहते हैं।
सौरमण्डल की सूक्ष्म प्रभाव क्षमता भी कम आश्चर्यजनक नहीं होती। ऋतुराज बसन्त गतिशील सौरमण्डल के कारण वातावरण की बदली हुई परिस्थिति ही है। प्राणियों में प्रजनन का उत्साह और प्रयास बहुत कुछ ऋतुओं पर आधारित चेतनात्मक हलचलों पर निर्भर रहता है। अन्तरिक्षीय परिवर्तनों के अनेकानेक उतार चढ़ाव मानव एवं जीव जगत पर, वातावरण परक परिस्थितियों पर बहुत कुछ प्रभाव डालते हैं। उनके पीछे ज्ञात और अविज्ञात कारणों की एक बड़ी श्रृंखला जुड़ी होती है। साधारणतया मोटी बुद्धि से उसका आकलन नहीं किया जा सकता, किन्तु विशेषज्ञ भविष्य विज्ञान के आधार पर संभावनाओं को बहुत कुछ जान लेते हैं और प्रतिकूलताओं को अनुकूलताओं में बदलने के लिए समय रहते प्रयास करते हैं। जो इस संबंध में अनजान और निष्क्रिय बने रहते हैं, वे बदलते हुए समय के दबाव में अपना अस्तित्व तक गँवा बैठते हैं।
भूतकाल में पृथ्वी पर प्राणियों की जितनी प्रजातियाँ थी, उनमें से अधिकाँश इसी कालचक्र में पिसकर लुप्त हो गयीं। कभी इस धरातल पर महागजों, महासरीसृपों, महाव्याघ्रों और महागरुड़ों का बाहुल्य था। वे बड़े सशक्त भी थे और बहुसंख्या में पृथ्वी के अधिकाँश भागों पर छाये हुए भी थे। उनकी शारीरिक स्थिति, मजबूती और विशालता ऐसी थी कि वे सामान्य प्रतिकूलताओं में भी अपना अस्तित्व बनाये रख सकते थे। उन दिनों उनके लिए प्रत्यक्षतः कोई खतरा नहीं था। कोई चुनौती भी उनके आगे अड़ी हुई न थी। आहार निवास आदि की कोई कमी भी न थी न कोई समर नीति बाधित कर रही थी। फिर भी बदलते वातावरण ने उन सब पर ऐसा दबाव डाला जिससे प्रतिकार के बारे में सोच न सके और अपनी सत्ता पूरी तरह गँवा बैठे। अब उनका एक भी वंशज कहीं दृष्टिगोचर नहीं होता।
यह विशालकाय महाप्राणियों की बात हुई। साधारण आकार और स्तर के प्राणी तो प्रकृति के छोटे-छोटे दबावों और परिवर्तनों को भी सहन कर सकने में समर्थ न रहे और अपना समुदाय पूरी तरह समाप्त कर बैठे। ऐसे प्राणियों की संख्या करोड़ों में है जिनका कभी पृथ्वी पर बाहुल्य था। पर अब उनके भूमि उत्खनन में जहाँ तहाँ अनुमान लगा सकने के लिए साक्षी रूप में फाँसिल्स-अवशेष ही जहाँ तहाँ मिलते हैं। प्राकृतिक परिवर्तनों में मनुष्य का आदि वंशज नर वानर भी अब कहीं दृष्टिगोचर नहीं होता। उसके समकक्ष सजातीय ही किन्हीं सघन वन प्रदेशों में गोरिल्ला, चिंपेंजी, वन मानुष आदि के रूप में पाये जाते हैं।
प्रकृतिगत परिवर्तनों का अपना दबाव होता है। वह कई बार इतना कठिन और असह्य होता है कि असाधारण प्रतिरोध करने पर भी इनका सामना करते नहीं बन पड़ता। भूकम्पों, ज्वालामुखी विस्फोटों, बाढ़ों, दावानलों, दुर्भिक्षों तूफानों में अनेक बार जानमाल की असीम क्षति हुई है और उसकी पूर्ति में शताब्दियों के कठिन प्रयास किसी सीमा तक सफल हो पाये हैं। जल प्रलयों, हिम प्रलयों के कुचक्र इतिहास में अनेक बार आये हैं और उनने दुर्बल नगण्य प्रजातियों का तो सदा सर्वदा के लिए अस्तित्व ही समाप्त कर दिया। मनुष्य ही एक ऐसा है जो अपना स्थान और स्वभाव का आधार बदल जाने पर भी किसी प्रकार अपनी सत्ता आँशिक रूप में बचाये रह सका है। कुछ बीज बचे रहने पर ही उनकी वंश वृद्धि का क्रम चल सका और कभी का जन संकुल क्षेत्र ज्यों-त्यों करके अपना समुदाय बढ़ा सका। इन महा परिवर्तनों में उसे प्रस्तुत परिस्थितियों के अनुरूप अपने स्वभाव, रहन सहन और क्रिया कलाप में कायाकल्प स्तर के परिवर्तन करने पड़े हैं। धरती पर रहने वाले प्राणि जगत में समय-समय पर हुए असाधारण परिवर्तनों का इतिहास खोजने पर इस निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि मनुष्य कितना ही बुद्धिमान या साधन सम्पन्न रहा हो, उसे भी प्रकृतिगत परिवर्तन समय-समय पर असाधारण चुनौतियाँ देते रहे हैं। जितने अंश में बचाव करते उससे बन पड़ता उसी अनुपात में उसकी अस्तित्व रक्षा कर सकना संभव होते रहा।
सामने उपस्थित पर्वत को उठा कर नहीं फेंका जा सकता। उसे पार करने या शिखर तक चढ़ने के लिए मार्ग ढूँढ़ना या साधनों का आश्रय लेना ही एकमेव उपाय रह जाता है। समुद्रों को तैर कर पार नहीं किया जा सकता उस हेतु जलयानों का ही आश्रय लेना पड़ता है। भार रहित और वायु रहित अन्तरिक्ष में उड़ान भरने के लिए आवश्यक साधनों का प्रबंध साथ लेकर योजना बनानी पड़ती है। हवा में तैरना कठिन है उसके लिए वायुयानों की व्यवस्था बनानी ही पड़ती है। प्रकृति का एक सीमा तक दोहन तो क्षमा किया जा सकता है पर उसे उस सीमा तक नहीं दबाया जा सकता कि कुपित होकर प्रतिशोध पर उतारू हो चले। ऐसी छेड़छाड़ को सिंहनी की माँद में प्रवेश करने और उसे छेड़ने के समान ही भयंकर समझा जायगा।
प्राकृतिक परिवर्तन अपने ढंग से अपने नियमानुसार भी होते रहे हैं। उनका काम ब्रह्माण्ड में सौरमंडल का संतुलन बनाये रहना होता है। वे परिवर्तन इस बात की परीक्षा भी करते हैं कि जीवनी शक्ति में कौन कितना जुझारू, सुदृढ़, सिद्ध और समय के अनुरूप अपने को बदलने में समर्थ होता है। यह प्रकृति की अपनी विधा और नियति है। उसमें प्रत्यक्ष हस्तक्षेप कर सकना नियन्ता एवं उसकी नियति के लिए ही संभव है।
इतने पर भी अनुमान इतना तो कर ही सकता है कि अपने कौशल से प्रकृति की अनुकूलता का लाभ उठाता रहे अथवा उसके साथ अनुचित छेड़छाड़ करके अपने लिए संकट खड़े करे। बर्र के छत्ते में हाथ डालने, साँप की बांबी को कुरेदना, बाघिन की माँद में प्रवेश करना इसी को कहते हैं। सीमा में रहना ही उपयोगी होता है। सीमाओं को तोड़ने से खतरे ही खतरे हैं। अनाड़ी बच्चे फुलझड़ी जलाने और पटाखे चलाने के खेल में कई बार इतने अधिक उत्साही हो जाते हैं कि उन्हें अपने कपड़े, शरीर तक घर, सामान तक जला लेने का ध्यान नहीं रहता। कौतुक अनर्थ में बदल जाता है तब पता चलता है कि समय रहते उच्छृंखलता न बरतने का ध्यान क्यों नहीं आया?
प्रकृति की दयालुता, उदारता और अनुकम्पा में कोई संदेह नहीं। पर उसकी एक सीमा है। माता का दूध पिया जा सकता है, पर यदि बच्चे उसको काटने लगेंगे तो फिर प्रताड़ना भी भुगतनी पड़ेगी। इन दिनों यही हो रहा है। पिछली कुछ ही शताब्दियों से प्रकृति के दोहन और रहस्योद्घाटन का क्रम असाधारण उत्साह के साथ चला है। इसी को वैज्ञानिक आविष्कारों का युग कहा जाता है। इसमें असीम साधनों की उपलब्धियाँ हस्तगत हुई हैं। इस सफलता से मनुष्य गौरवान्वित भी हुआ है और सुगम साधनों का अधिष्ठाता भी बना है। इन उपलब्धियों का यदि नीति मर्यादाओं के दायरे में उपयोग हुआ होता, मिल जुलकर रहने और मिल बाँट कर खाने की रीति अपनाई गई होती तो निश्चय ही इन दिनों स्थिति ऐसी रही होती जिसे सतयुग की वापसी या धरती पर स्वर्ग एवं मानव में देवत्व का अवतरण कहा जा सका होता।
सभ्यता, सुसंस्कारिता और प्रगति दूरदर्शी विवेकशीलता पर आधारित है। उसके अभाव में गुरुत्वाकर्षण के दबाव से नीचे गिरना और ढलान की ओर लुढ़कना ही संभव होता है, हुआ यही है। प्रकृति दोहन से उपलब्ध साधनों का बुरी तरह दुरुपयोग होता रहा है। इससे सामयिक कौतुक-कौतूहल मात्र बढ़ा है। सुविधाओं की भी एक सीमा है, व एक सीमा तक ही पेट में खाया जा सकता है, एक सीमा तक ही चला जा सकता है। इन्द्रिय भोग भी एक सीमा तक ही हो सकते हैं। अतिवाद अपनाते ही अनर्थ प्रस्तुत होता है। अनाचार के दुष्परिणामों से कोई शासन या समाज के दण्ड से तो किसी कदर बच भी सकता है पर प्रकृति व्यवस्था में कठोर न्यायाधीश की तरह क्षमा करते का कोई विधान नहीं है। यदि दरगुजर होते रहने की ढीलपोल चलती तो जड़ चेतन जगत का सारा क्रम, अनुशासन एवं विधान ही लड़खड़ा जाता। पिछली शताब्दियों में आरंभ हुई और इन दिनों हुई शोध में चल रही प्रकृति के विरुद्ध उच्छृंखलता, उद्दण्डता और अनुशासनहीनता की प्रवृत्ति चरम सीमा तक जा पहुँची है। उसके परिणाम क्रमशः आना आरंभ हो गए हैं और वह दिन दूर नहीं, जब आज की भड़काई जा रही चिनगारी कल जलकर ज्वालमाल बन कर दावानल के रूप में प्रगट होगी।
यह सुनिश्चित है कि आग में हाथ डालने पर वह जलेगा। जहर खाने वाले मौत के मुँह में ही चले जाते हैं। प्रकृति के साथ उद्दंडता पूर्ण खिलवाड़ करना भी ऐसा ही दंडनीय अपराध है, जिसमें न केवल कर्ता को, वरन् किसी भी रूप में संबद्ध सहयोगी परिकर को भी उसके लिए प्रताड़ित होना पड़ता है। आग से खेल खेलने वाला अकेला ही क्षतिग्रस्त नहीं होता वरन् उसके समीपवर्ती परिकर में उस हानि के भागीदार बनते हैं। यह सब प्रत्यक्ष होते हुए भी व्यवहार में अप्रत्यक्ष जैसा बनकर रह गया है। अपराधियों को दण्ड मिलने की, पुलिस, कानून, कचहरी, जेल जैसी व्यवस्था मौजूद है, पर प्रकृति के साथ अनुचित खिलवाड़ करना तो बारूद के ढेर में चिनगारी फेंकने के समान है। उसके दुष्परिणाम समूचे क्षेत्र को भुगतने पड़ते हैं।
सभी प्राणी शान्तिपूर्वक रहते और चैन के साथ समय गुजारते हैं। सीधी राह चलने वालों का न काँटों से पाला पड़ता है और न ठोकरें खानी पड़ती हैं। कठिनाइयों और विपत्तियों में से आकस्मिक तो कभी-कभी कुछ ही होता है। आमतौर से उद्दंडता और अव्यवस्था का व्यतिरेक ही ऐसी प्रतिक्रिया उत्पन्न करता है जिन्हें विपत्ति, कठिनाई उलझन एवं विपन्नता-विभीषिका का नाम दिया जा सके। सर्प, सिंह आदि को छेड़ने तथा बर्रों के छत्ते में हाथ डालने की प्रतिक्रिया विपत्ति उत्पन्न किए बिना नहीं रहती। प्रकृति की विधि-व्यवस्था का उल्लंघन करने की उद्दण्डता भी ऐसी ही दुर्बुद्धि है, जिसने किसी को भी मजा चखाने बिना नहीं छोड़ा। इस तथ्य को हर किसी को गाँठ बाँध कर रखना चाहिए।
कौआ कहीं से एक मीठा पुआ उठा लाया था। पेड़ की टहनी पर ऊँचे बैठ कर उसे स्वाद से खा रहा था।
एक चालाक लोमड़ी उधर से गुजरी उसने सोचा किसी प्रकार कौए से पुआ हथियाना चाहिए।
उसने कौए से कहा, आपके मधुर स्वर की प्रशंसा सारे जंगल में फैली हुई है। उसी से आकर्षित होकर मैं आपके पास दौड़ी आई। कृपाकर एक छोटा गीत मुझे भी सुना दें तो बड़ा अनुग्रह हो।
कौआ अपनी प्रशंसा सुनकर फूला न समाया। तुरन्त काँव-काँव को रट लगाने लगा।
पुआ चोंच से छूट कर नीचे गिरा और उसे लेकर लोमड़ी चम्पत हुई।
प्रशंसा के भूखे लोग इसी प्रकार चापलूसों द्वारा ठगे जाते हैं।
पारसी पैगम्बर जरथुस्त्र ने जिस समय जन्म लिया था, उनका देश अजरबेजान अन्धविश्वासों, अधर्म और पापों में बुरी तरह डूबा हुआ था। आडम्बरी जादूगर सारे समाज पर छाये हुये थे। मंत्र तंत्र और बाजीगरी दिखला कर जनता को भयभीत करते और अपनी जेब भरा करते थे। न जाने कितने प्रकार के देवी-देवताओं की पूजा होती थी। धर्म के नाम पर पाप और पाखण्ड का बोलबाला था। लोग धर्म और ईश्वर को बिल्कुल भूल गये थे। जरथुस्त्र ने इस अंधकार में डूबी जनता को प्रकाश दिया। सर्व शक्तिमान एक ईश्वर की उपासना का उपदेश दिया और एक सर्द्धम का पथ दिखाया। उन्होंने पुरा जीवन ही इस उपकार में लगा दिया और उसके लिये जो भी कष्ट सहने पड़े, सहे।
जरथुस्त्र बाल्यकाल से ही बड़े ईश्वर भक्त, निर्भीक, सत्यवादी और अन्धविश्वासों के विरोधी थे। एक बार बहुत से जादूगर जरथुस्त्र के पिता पुरशस्थ के पास आये और बहुत से चमत्कार दिखला कर कहने लगे- “हमारा जादू ही भगवान है। तुम इसी पर विश्वास करो और हमसे दीक्षा ले लो।” जरथुस्त्र के भोले पिता जादूगरों को देखकर डर गये और उन आडम्बरियों से प्रभावित होने लगे।
सात वर्षीय जरथुस्त्र भी उस समय वहाँ पर उपस्थित थे। भगवान में अटल विश्वास रखने के कारण उन पर जादूगरी का कोई प्रभाव नहीं पड़ा। उसने साहस पूर्वक जादूगरों को संबोधित करते हुये कहा-- “तुम लोग सब छलजीवी हो। अपने जादू का भगवान बतलाना अथवा उस पर विश्वास करना घोर नास्तिकता है। जादू की पूजा तो नरक में ले जाने वाली है। इसलिये उस शक्तिमान परमात्मा में विश्वास करें। इसी से तुम्हारा कल्याण होगा और तुम्हारे पाप छूटेंगे।”
बालक जरथुस्त्र न केवल भक्त अथवा निर्भीक ही थे, वरन् बड़े दयालु और जन-सेवक भी थे। वे अपने गोदाम से भूसा चारा निकाल कर दूसरे भूखे जानवरों को खिला दिया करते थे। जब घर में पर्याप्त चारा नहीं होता था, तो जंगल से इकट्ठा कर लाते थे और बूढ़े, असहाय और लंगड़े, भूखे जानवरों को खिलाते थे। उनके इस उपकार से जानवर उन्हें इतना प्यार करने लगे थे कि देखते ही चारों ओर जमा हो जाते थे। जरथुस्त्र सबको समान रूप से प्यार करते थे और इस तरह उनका दुःख पूछते थे, मानो वे भी उन्हीं की तरह मनुष्य हों।
एक बार रास्ते में जाते हुए जरथुस्त्र ने देखा कि कोई उदार व्यक्ति गरीबों को आटा बाँट रहा है। लेकिन भीड़ इतनी है कि उससे प्रबन्ध नहीं हो पा रहा है। जरथुस्त्र दौड़ कर गये और उनकी मदद करने लगे। निवृत्त होकर उस व्यक्ति ने जरथुस्त्र को धन्यवाद दिया और कहा- “बड़े अच्छे बालक हो।” जरथुस्त्र ने बड़ी विनम्रता से उत्तर दिया- ‘आप एक परोपकारी व्यक्ति हैं। मेरे लिये यही बहुत बड़ा परिचय है। आपको आटा बाँटते देख कर मुझे ऐसा लगा, जैसे आप स्वर्ग के हमारे साथी हैं और भूमि पर दीनों तथा असहायों की सहायता करने आये हैं।” उस परोपकारी ने जरथुस्त्र में एक श्रेष्ठ आत्मा के दर्शन किए और आगे चलकर उनकी सेवा साधना - लोक मंगल के कार्यों में बड़ा सहयोगी सिद्ध हुआ।
आत्म-ज्ञान प्राप्त करने के लिए जरथुस्त्र ने बड़ी कठोर साधना की। पन्द्रह वर्ष की आयु में ही वे साधना करने लगे थे और बाईस वर्ष तक करते रहे। बीच के इन सात वर्षों में उन्होंने दूध के सिवाय न अन्न खाया, न फलाहार किया। अंत में उन्हें आत्म-ज्ञान की प्राप्ति हुई और वे उसका प्रकाश संसार को देने के लिये चल पड़े। उनका लक्ष्य एक ही था- “अयंनिजःपरोवेति गणनालधुचेतसाम्। उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्।”
जरथुस्त्र अपने आचरण, साधन और लोक मंगल के बल पर एक पैगम्बर बने और उन्होंने पारसी धर्म का प्रवर्तन किया। बिना साधना के कोई कुछ महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ हस्तगत नहीं कर पाता और साधना करने वाला लोग मंगल के क्षेत्र में सेवा कार्य किये बिना रह ही नहीं सकता। जरथुस्त्र को उनकी परमार्थ साधना एवं आडम्बरों से भरे संसार में विवेकशीलता के विस्तार हेतु सदैव याद किया जाता रहेगा।
मानवी काया का संगठन छोटी-छोटी कोशिकाओं के माध्यम से होता है। समान संरचना और कार्यपद्धति वाले कोशिका समूह मिलकर ऊतकों का निर्माण करते हैं और ऊतकों से विभिन्न शारीरिक अंग अवयवों का विकास होता है। चेतना के सर्वव्यापी होने के कारण प्रत्येक कोशिका एक जीवन चैतन्य केन्द्र होती है और अपने-अपने स्तर की प्राण ऊर्जा की किरणें बखेरती रहती हैं जिससे शरीर के सामान्य क्रिया-कलाप सम्पन्न होते रहते हैं। मनुष्य शरीर के अन्दर कुछ विशिष्ट शक्ति केन्द्रों का भी निर्माण होता है जहाँ चैतन्य ऊर्जा की बहुलता होती है। शरीर की समस्त कोशिकाओं को जाग्रत एवं विकसित कर सकना हर किसी के लिए संभव नहीं है। अतः प्राण शक्ति की अधिकता वाले विशिष्ट केन्द्रों को ही सक्रिय बनाने-जाग्रत करने का प्रयत्न विभिन्न साधनाओं; यौगिक क्रियाओं के माध्यम से सिद्धि पथ के साधकों द्वारा किया जाता है।
मनोवैज्ञानिकों के अनुसार सामान्य परिस्थितियों में चैतन्य ऊर्जा के केन्द्र कषाय-कल्मषों के तमसावरण में छिपे प्रसुप्त स्थिति में पड़े रहते हैं। इनमें सन्निहित गुप्त शक्तियाँ प्राण ऊर्जा के अपरिष्कृत होने के कारण अपना सही स्वरूप प्रकट नहीं कर पातीं। उनसे निकलने वाली ऊर्जा रश्मियों से मात्र काय कलेवर की विभिन्न गतिविधियाँ ही सम्पन्न होती रहती हैं और उनके धुँधलके प्रकाश में मनुष्य को पेट-प्रजनन के अतिरिक्त आगे की बात नहीं सूझती। आत्मोत्थान और लोक कल्याण की बात लोगों के समझ में नहीं आती। लोभ, मोह और संकीर्ण स्वार्थपरता के क्षुद्र दायरे में ही सिमटकर अपने जीवन की इति श्री कर लेते हैं।
प्राचीन ऋषियों, योगियों ने शरीरस्थ शक्ति स्रोतों को जाग्रत करने के लिए विज्ञान सम्मत साधना विज्ञान का आविष्कार किया था। जिसके अनुसार विभिन्न यौगिक क्रियाओं के नियमित एवं सतत् अभ्यास एवं गुण, कर्म, स्वभाव में उत्कृष्टता का समावेश करने पर चैतन्य केन्द्रों का जागरण और प्रसुप्त शक्तियों का स्फुरण होता है। तंत्रशास्त और योगशास्त्रों में चैतन्य ऊर्जा केन्द्रों को “कमल” या “चक्र” के नाम से संबोधित किया गया है। शरीर शास्त्रियों एवं चिकित्सा-विशेषज्ञों ने इन केन्द्रों की संगति विशिष्ट ग्रंथों से बिठाई है जिन्हें “अंतःस्रावी ग्रंथियाँ” इण्डोक्राइन ग्लैण्ड कहते हैं। वैज्ञानिकों तथा एक्यूपंचर विशेषज्ञों ने इन्हें विशेष प्रकार के “बायोइलेक्ट्रोमैग्नेटिक फील्ड़” जैव विद्युत चुम्बकीय क्षेत्र माना है। तो कुछ ने इसे “नर्व फोर्स, वाइटल फोर्स, एक्टीनियम, बायोइलेक्ट्रिसिटी” आदि नामों से सम्बोधित किया है।
भारतीय योग शास्त्रों में मनुष्य शरीर के पृष्ठभाग में कशेरुकाओं के मध्य इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना नामक तीन प्रमुख नाड़ियों का वर्णन किया गया है। सुषुम्ना के अन्दर षट् चक्रों की उपस्थिति बताई गई है जिनकी स्थिति ऊपर से नीचे की ओर क्रमशः सहस्रार, आज्ञा चक्र, विशुद्धि चक्र, अनाहत चक्र, मणिपूर चक्र, स्वाधिष्ठान चक्र और मूलाधार चक्र हैं। इसके अतिरिक्त शरीर के अन्दर अनेकों शक्ति श्रोत मर्म स्थान, उपत्यिकाएँ, मातृकाएँ आदि होती हैं जिनमें शक्ति का विपुल भाण्डागार छिपा होता है।
शरीर शास्त्रियों के अनुसार काया में तंत्रिका तंत्र और ग्रन्थि तंत्र दो प्रमुख प्रणालियाँ होती हैं जिनके माध्यम से समस्त शारीरिक एवं मानसिक गतिविधियों का संचालन और नियंत्रण होता रहता है। तंत्रिका तंत्र का प्रमुख केन्द्र मस्तिष्क है। तंत्रिका तंत्र विशेषज्ञों के अनुसार मानव मस्तिष्क हैं तंत्रिका तंत्र विशेषज्ञों के अनुसार मानव मस्तिष्क दो भागों में विभक्त होता है- दांया भाग और बाँया भाग। दोनों भाग चेतना से सम्बद्ध होते हैं। मस्तिष्क का बाँया भाग भाषा, गणित, तर्क आदि में व्यस्त रहता है। दाँये भाग को ज्ञान, विज्ञान एवं प्रज्ञा का केन्द्र माना जाता है। मस्तिष्क के मध्य में पिट्यूटरी नामक अंतःस्रावी ग्रन्थी होती है जिसे मस्तिष्क का चैतन्य केन्द्र कहते हैं। योगशास्त्रों में इसे ही सहस्रार- सहस्र दल कमल कहा गया है। यह स्थान अतीन्द्रिय क्षमताओं एवं दिव्यज्ञान का केन्द्र है जिसके विकसित होने पर सहस्र दल कमल से असंख्य ऊर्जा किरणें प्रस्फुटित होकर मस्तिष्क के सम्पूर्ण गुप्त केन्द्रों को बाँधती हुई सिर के चारों ओर प्रकाशमान घेरे का निर्माण करती है। इसे प्रभाव मंडल कहते हैं। सहस्रार के विकास के साथ अन्तः और बाह्य वृत्तियाँ शान्त और सुस्थिर हो जाती हैं। मन के कषाय-कल्मष समाप्त होने लगते हैं और अंतः प्रज्ञा जाग्रत हो जाती है। ऐसे साधक के व्यक्तित्व में ओजस, तेजस और वर्चस की झाँकी सुस्पष्ट रूप से देखी जा सकती है। सहस्रार का विकास कैसल्य प्राप्ति का जीवन मुक्ति का परिचायक माना जाता है।
सहस्रार दल के नीचे ललाट मध्य में दोनों भौंओं के नीचे “आज्ञाचक्र” स्थित होता है। इसे दिव्य दृष्टि अथवा तृतीय नेत्र भी कहते हैं। शरीर शास्त्रियों में आज्ञा चक्र की संगति “पीनियल ग्रन्थि” से बिठाई है जिसे मास्टर ग्लैण्ड के नाम से भी जाना जाता है। इस ग्रन्थि से निस्सृत रसायन शरीर के सम्पूर्ण ग्रन्थि तंत्र के परिष्कार से अनेकों शारीरिक एवं मानसिक विषमताओं का निराकरण होता है। मन में उठने वाले विभिन्न आवेग एवं आवेशों का शमन करने वाला यह केन्द्र जाग्रत होने पर साधक को ऊर्ध्वरेता एवं दिव्य दर्शन की क्षमता प्रदान करता है। तृतीय नेत्रोन्मीलन से गुप्त एवं प्रसुप्त अतीन्द्रिय शक्तियों के जागरण का विज्ञान साधक को हस्तगत हो जाता है। बहिर्मुखी प्रवृत्ति का स्थान अन्तर्मुखी स्वभाव ले लेता है और ऐसा व्यक्ति किसी भी क्षेत्र में प्रगति कर सकता है।
काया के ग्रीवा वाले भाग में पाई जाने वाली अंतः स्रावी ग्रन्थि को “थाइराइड ग्लैण्ड” कहते हैं। शरीर शास्त्रियों अनुसार संरचना एवं कार्यिकी के दृष्टिकोण से शरीर में इस ग्रन्थि का महत्वपूर्ण योगदान होता है। चयापचय की क्रिया-प्रक्रिया को कार्यान्वित एवं नियंत्रित करने में थाइराइड ग्रन्थि महत्वपूर्ण भूमिका सम्पन्न करती है। थाइराइड को सक्रिय बना लेने पर चयापचय सम्बन्धी सभी दोषों का शमन हो जाता है। मन की चंचलता को दूर करने में इस ग्रन्थि का बहुमूल्य योगदान होता है। योग विद्या विशारदों ने कंठ भाग में स्थित इस ग्रन्थि के आसपास स्नायु प्रवाह को विशुद्धि चक्र सम्बोधित किया है और इसे भावना शुद्धि का केन्द्र माना है। मानसिक असंतुलन को दूर करने के लिए विशुद्धि चक्र का शोधन आवश्यक माना गया है। कंठ कूप स्थित विशुद्धि चक्र पर ध्यान करने से भूख-प्यास जैसे सुख-दुःख कारक द्वंद्वों पर विजय पाई जा सकती है। आवेश जन्य गति विधियों पर नियंत्रण एवं नीचे के चैतन्य केन्द्रों के जागरण में आने वाली कठिनाइयों का सहज समाधान भी इस चक्र की साधना से सध जाता है।
अनाहत चक्र को हृदय स्थान स्थित चैतन्य शक्ति का भावना प्रधान केन्द्र माना गया है। शरीर शास्त्रियों ने इसे “थाइमसग्रन्थि” के आसपास स्थित माना है। मनुष्य की मस्तिष्कीय चेतना ज्ञान, बुद्धि एवं तर्क प्रधान होती है। हृदय स्थित चेतना का सम्बन्ध संवेदना प्रधान होने के कारण मनुष्य दुःख-सुख के छोटे-बड़े थपेड़ों से उद्वेलित एवं आनन्दित होता रहता है। अनाहत चक्र के जाग्रत होने पर द्वंद्व की स्थिति समाप्त हो जाती है और व्यक्ति के जीवन में अनिर्वचनीय आनन्द का साम्राज्य छा जाता है। अनाहत चक्र की साधना जीवन मृत्यु के वास्तविक रहस्य को सुलझाती है और उससे छुटकारा पाने का मार्ग उद्घाटित होता है।
हृदय के नीचे स्थान में मणिपूर चक्र स्थित होता है। प्राण ऊर्जा का केन्द्र होने के कारण वैज्ञानिकों ने इसे सोलर प्लेक्सस एवं पाचन संस्थान से जुड़े होने के कारण एपीगैस्ट्रियल प्लेक्सस नाम दिया है और इसका संबंध पैन्क्रियाज नामक ग्रन्थि तंत्र से भी जोड़ा है। शरीर शास्त्रियों ने अपने अनुसंधान निष्कर्ष में बताया है कि नाभि स्थान स्थित चैतन्य केन्द्र का सम्बन्ध स्नायु तंत्र से होता है। इसमें स्नायु तंतुओं का जाल सा बिछा होता है तथा मस्तिष्क की भाँति इसमें भी एक लिबलिवा भूरा पदार्थ- “ग्रे मैटर” भरा होता है इस केन्द्र को “एबडामिनल बे्रन” की संज्ञा दी गई है और बताया गया है कि चेतना शक्ति का वह प्रमुख केन्द्र है जिसकी साधना करने से शरीर में प्राण ऊर्जा का - तेजस् शक्ति का अभिवर्धन और पाचन संस्थान का शुद्धिकरण होता है।
नाभि चक्र के नीचे पेडू के पास स्वाधिष्ठान चक्र स्थित होता है। इसे “जीवनी शक्ति केन्द्र” भी कहते हैं। वैज्ञानिकों ने इसे एड्रीनल ग्रन्थि माना है और कहा है कि यह भाग वीर्य रक्षा एवं जीवनी शक्ति के पोषण-रक्षण का मुख्य केन्द्र है। स्वाधिष्ठान चक्र की साधना करने से काम वासना पर नियंत्रण सधता है और साधक ब्रह्मचारी एवं ऊर्ध्वरेता बनता है।
सुषुम्ना के सबसे निचले भाग में मूलाधार चक्र स्थित होता है। इसकी स्थिति गुदा द्वार एवं जननांगों के मध्य बताई गई है। योगशास्त्रों में इसे चेतन शक्ति का प्राण ऊर्जा केन्द्र कहा गया है। इसी आधार केन्द्र में कुण्डलिनी महाशक्ति कुण्डली मारे प्रसुप्त मुद्रा में दबी पड़ी रहती है और यौगिक साधनाओं के माध्यम से जाग्रत होने पर षट्चक्रों का भेदन करती हुई सहस्रार की यात्रा करती है तथा अनेकानेक अतीन्द्रिय दिव्य क्षमताओं का गुह्य भाण्डागार साधक के सामने खोल देती है। मस्तिष्क को प्राण विद्युत की शक्तिधारा की आपूर्ति इसी केन्द्र के द्वारा होती रहती है। वैज्ञानिकों ने इस केन्द्र का सम्बन्ध प्रजनन ग्रंथों से जोड़ा है। यह शक्ति केन्द्र है जिसमें काम वासना की अधिकता होती है और इसे साधित, नियंत्रित एवं परिष्कृत करके उच्चस्तरीय शक्तियों का स्वामी बना जा सकता हैं मूलाधार चक्र, की साधना करने वाला साधक वीर्यवान एवं ओजस्वी तेजस्वी बनता है। वह अद्वितीय एवं अनुपम मेधा शक्ति का धनी प्रतिभावान व्यक्तित्व वाला होता है।
योगविद्या विशारदों के अनुसार सृष्टि संरचना में उत्तरी और दक्षिणी ध्रुवों की तरह मनुष्य के शरीर में भी चैतन्य ऊर्जा के दो प्रमुख स्त्रोत हैं। पहला मस्तिष्क मध्य में सहस्रार और दूसरा जननांगों और गुदाद्वार के मध्य स्थान सुषुम्ना के निम्नवर्ती आधार में स्थित मूलाधार चक्र है। दोनों ध्रुवों के मध्य आदान-प्रदान होते रहने-तालमेल बने रहने पर ही मानवी काया के सभी क्रिया कलाप संतुलित एवं सुव्यवस्थित रूप से सम्पन्न होते रहते हैं। यदि इनमें से एक ने एक ने भी अपना अनुदान सहयोग देना बन्द कर दिया अथवा उसमें कटौती कर दी तो दूसरे के समस्त क्रिया कलाप लड़खड़ा जाते हैं और व्यक्तित्व में असन्तुलन पैदा हो जाता है। मनुष्य दीन-हीन, दयनीय स्थिति में पहुँच जाता है।
इस संदर्भ में शरीर विज्ञानियों का कहना है कि प्राण ऊर्जा का प्रवाह निम्न गामी होने पर वह अतृप्त वासनाओं एवं कुँठाओं को जन्म देता है। शरीर के एक छोर पर मस्तिष्क मध्य में द्विदलीय चक्र रूप में पिट्यूटरी ग्रन्थि स्थित होती है तो दूसरे सिरे पर जननाँगों से सम्बन्धित एड्रीनल ग्रन्थि। फिजियोलॉजी की दृष्टि से इन दोनों ग्रन्थियों की उपयोगिता बहुत महत्वपूर्ण होती है। इनका मनुष्य के आचरण, व्यवहार और स्वभाव से सीधा सम्बन्ध होता है। एड्रीनल ग्रन्थि काम वासना के आवेग को उत्तेजित करती है तो पिट्यूटरी ग्रन्थि उस आवेश को शान्त कर देती है अथवा उसकी दिशाधारा को उत्कृष्टता की रचनात्मक प्रवृत्तियों की ओर मोड़ देती है। इसी कारण ग्रंथि तंत्र का शुद्धिकरण जैव ऊर्जा के ऊर्ध्वगमन का सर्वश्रेष्ठ उपाय माना गया है।
स्थूल शरीर के अंदर गहराई में छिपे ये मर्मस्थल वस्तुतः विराट शक्ति के भाण्डागार हैं। परमाणु का विखंडन करके जिस प्रकार बड़े परिमाण में ऊर्जा उपलब्ध की जाती है, लेसर व मेसर ऊर्जा के माध्यम से जिस प्रकार अगणित असंभव समझे जाने वाले कार्यों को सम्पन्न कर लिया जाता है, ठीक उसी प्रकार चेतना के ईंधन शब्द शक्ति का सुनियोजन कर ध्यान धारणा द्वारा सुपात्र साधक सुयोग्य मार्गदर्शन में इन शक्ति केन्द्रों को प्रस्फुटित करते व उपलब्धियों की आध्यात्मिक फलश्रुतियों से लाभान्वित होते हैं। यह एक असाधारण स्तर का योग पुरुषार्थ है। बहुधा इसे हल्की फुलकी, चर्चा के स्तर पर ऐसा मान लिया जाता है, मानों स्विच ऑन करने की तरह यह भी एक याँत्रिक प्रक्रिया है। यह क्रम जहाँ तक संभव हो दूर किया जाना चाहिए। साथ ही एक और तथ्य पर ध्यान दिया जाना चाहिए कि योगग्रन्थों में वर्णित षट्चक्रों की जो संगतियाँ शरीरगत ग्रंथियों और गुच्छकों से बिठाई जाती हैं, वस्तुतः वह शरीर विज्ञानियों के अन्दर स्थूल रूप में आत्मा नाम की संरचना खोजते रहे हैं और समस्त संभावनाओं को काय कलेवर की परिधि में ही लपेटते रहे हैं। अन्यथा ये सभी शक्ति केन्द्र अति सूक्ष्म होते हैं तथा योगाभ्यास, विचारणा-भावना की पवित्रता एवं गुण कर्म स्वभाव की उत्कृष्टता के आधार पर विकसित हुई अन्तःप्रज्ञा द्वारा अनुभूत होते हैं।
दो व्यापारियों की आमने-सामने दुकान थी। दोनों में आपस में भारी ईर्ष्या रहती थी। फलतः वे दोनों ही आन्तरिक आग में जलते और दुबले होते जाते थे। यहाँ तक कि दोनों ही बिमारियों से ग्रस्त हो गये।
एक ऊँचे चिकित्सक को बुलाया गया उसने वास्तविक कारण समझा और दवाई करने की अपेक्षा एक उपाय बताया कि आप दोनों एक दूसरे की दुकान पर बैठें। समझे कि मालिक दूसरा है और हम उसके नौकर है। इस प्रकार ईर्ष्या मिट जायेगी और उसके स्थान पर आत्मीयता जड़ जमा लेगी। इतना करने भर से ही आप दोनों का बीमारियों से पीछा छूट जायेगा। वैसा ही हुआ भी। इस परिवर्तन से दोनों ही स्वस्थ हो गये और उनकी आमदनी भी बढ़ गई। मित्र भी बन गये।
नीरस जीवन अपने लिए भारभूत और दूसरों के लिए उपहासास्पद बना रहता है। ऐसा जीवन निरुपयोगी होने के कारण अपनी अवधि जल्दी ही खत्म कर लेता है। पैंदे में फूटे होने के कारण ही यह उतने समय नहीं जलता जितने के लायक उसमें तेल बाती है।
समय से पूर्व मरने के कई कारण हैं। बीमारियों से घिरा हुआ व्यक्ति पूरी जिन्दगी नहीं जी पाता। अभावग्रस्त व्यक्ति के संबंध में भी यही बात कही जा सकती है। खाद पानी जिसे न मिलेगा उस पेड़ को समय से पहले ही सूखना होता है। अन्न वस्त्र के अभाव में दरिद्र कंगाल व्यक्ति ज्यों त्यों करके गाड़ी खींचते हैं और मंजिल तक पहुँचने से पहले ही लड़खड़ा जाते हैं। जड़ों में दीमक लग जाने पर तने से लेकर पत्तों तक सभी बीमार मालूम पड़ते हैं और आयुष्य पूरी नहीं कर पाते। चिन्ताग्रस्त आदमी तेज हवा में चौराहे पर रखे हुए दीपक की शमा के समान है। जिसका बुझना कभी भी संभव है।
मानसिक सरसता हिल-मिल कर रहने और सामूहिक जीवन जीने में उपलब्ध होती है। अकेलापन ऐसा है जैसे रेगिस्तान का पेड़। दूसरों के सुख-दुख में शामिल रहने से जीवन में सरसता बनी रहती है। जो लोग प्रसन्न, संतुष्ट, सुखी है उनके समीप रहने से उनकी प्रफुल्लता अपने हिस्से में भी आती है। चंदन के नजदीक उगे हुए पेड़ पौधे अनायास ही महकने लगते हैं। अपने हिस्से का सुख कोई किसी को बाँटता नहीं। पर उस वातावरण की सरसता समीपवर्ती लोगों के हिस्से में आये बिना नहीं रहती। विवाह, शादी दूल्हा-दुल्हन का होता है पर बराती और अतिथि आगंतुक उसमें प्रसन्नता से हिस्सा बँटाते हैं। यहाँ तक कि उसे देखने के लिए गाँव वाले और बच्चे लोग मजा लेने लगते हैं।
जीवन की संरचना समन्वय के आधार पर हुई है। प्रसन्नता को देखकर प्रसन्नता बढ़ती है। उत्साह भरे जुलूस प्रदर्शन दर्शकों को भी प्रमुदित करते हैं। यही बात दुख के संबंध में भी है। किसी कष्ट पीड़ित को देखकर अपनी भी करुणा उमड़ती है। मृत्यु हो जाने पर स्वजन संबंधी सहानुभूति के लिए पहुँचते हैं। इन आगन्तुकों को देख कर दुखी जनों का भी मन हल्का होता है। एकाकी व्यक्ति न सुख हजम कर सकता है न दुख पचा पाता है।
सहानुभूति रहित मन वाले अपने काम से काम रखते हैं। जिन्हें अपने मतलब से मतलब, ऐसे व्यक्ति जीवन में एक भारी कमी अनुभव करते हैं। उन्हें सब कुछ नीरस प्रतीत होता है। चौबीसों घंटे कोई काम से नहीं लगा रह सकता। खाली समय में सूनेपन से घिरा होता है तो श्मशान जैसा कर्कश लगता है। ऐसा व्यक्ति नीरसता के भार से लद जाता है और समय काटना भारी पड़ता है। जिसका सारा समय अपने लिए ही लगता है। जिसके लिए अपनी समस्याएँ ही समस्या हैं। जो अपना काम निपटा कर खाली शरीर और खाली मन रहता है उसकी नीरसता ही उसकी जिन्दगी को घटाती जाती है। उदासी अपने आपमें एक भार हैं जिससे लद जाने पर मनुष्य बीस गधों से लदा होने जितना कष्ट साध्य जीवन जीता है। उसके लिए न आगे बढ़ने की गुंजाइश न पीछे हटने की।
कई व्यक्ति सर्विस से रिटायर होने पर बाल बच्चों की जिम्मेदारियों से निवृत्त होने की प्रतीक्षा करते हैं और उस निश्चिन्तता में मौज के दिन बिताने की कल्पना करते हैं पर वास्तव में वैसा होता नहीं। जब तक जिम्मेदारियाँ हैं। जब तक काम का बोझ है तब तक मनुष्य स्वस्थ भी रहता है और प्रसन्न भी। कुछ आगे की बात सोचता है और कुछ समस्याएँ निपटाने के लिए योजनाएँ बनाता है, सोचता है, दौड़−धूप करता है। जब कुछ भी सामने नहीं रहता तब समय का एक-एक घंटा काटना पहाड़ की तरह भारी पड़ता है। ऐसा नीरस जीवन पीठ पर लाद कर कोई दीर्घजीवी नहीं बना सकता।
काम अपना हो या दूसरों का उसमें व्यस्तता चाहिए। वानप्रस्थ जीवन में पूरे समाज की जिम्मेदारी उठानी पड़ती है लोक हित के कामों को अपनी निजी कामों की तरह तत्परता पूर्वक करते रहना पड़ता है। जो अपना भी नहीं करते पराया भी नहीं करते भगवान उनके नीरस दिनों में कटौती कर देते हैं और वे असमय में ही मरते हैं।
मनुष्यों में ही नहीं मनुष्येत्तर प्राणियों में भी ऐसी विशेषताएँ पायी जाती हैं जो इन्द्रिय शक्ति की परिधि से बाहर की बात है। रक्त, चर्म एवं अस्थि के संयोग से बना पंचभौतिक शरीर उन्हीं नियमों का पालन करेगा जो उसके लिए निर्धारित हैं। इसी प्रकार मस्तिष्क भी उतना ही सोचेगा जो उसने सीखा है। परन्तु सामान्य लौकिक ज्ञान की परिधि का उल्लंघन करके कई बार ऐसा कुछ देखने को मिलता है जिससे विदित होता है कि काया के भीतर एक ऐसी विशिष्टता सम्पन्न चेतन सत्ता विद्यमान है जो अतीन्द्रिय जगत की जानकारी भी प्राप्त कर लेती है। प्राणियों की अन्तःचेतना के विकास का अस्तित्व अनेक बार प्रत्यक्ष भी दिखाई पड़ता है जिसे झुठलाया नहीं जा सकता। मनुष्य अपने को ही महत्वपूर्ण मानता रहे और दूसरे प्राणियों को तुच्छ समझे यह उसे शोभा नहीं देता।
सृष्टि ने हर प्राणि को उसकी स्थिति और आवश्यकता के अनुरूप ऐसे साधन दिये हैं जिसमें किसी के साथ पक्षपात या अन्याय हुआ न कहा जा सके। मनुष्य में बुद्धिमत्ता तो है पर उसका विकास तभी होता है जब दूसरों की सहायता मिले। पढ़ाये-प्रशिक्षित किये बिना कोई मानवी संतान क्रिया कुशल नहीं बन सकती। यदि कोई उचित सहयोग-संपर्क न मिले तो जन्मजात बुद्धिमत्ता रहने पर भी मनुष्य अविकसित स्थिति में पड़ा रह सकता है अथवा कुसंग में कुमार्गगामी हो सकता है। इस दृष्टि से पशु-पक्षी जैसे प्राणी कहीं आगे हैं। प्रकृति ने उन्हें ऐसी अद्भुत सूझबूझ दी है कि बिना किसी शिक्षा दीक्षा के इतना सुन्दर सुव्यवस्थित जीवन यापन करते हैं कि उनकी सुरुचि, अनुशासनशीलता और बुद्धिमत्ता पर आश्चर्य चकित रह जाना पड़ता है।
मनुष्य जिस वस्तु को अनावश्यक और अनुपयोगी समझकर छोड़ देता है, पक्षी उसी को जीवनोपयोगी समझकर इस्तेमाल करते देखे गये हैं। जूता, कपड़ा फटने और पुराना हो जाने पर विलासी लोगों द्वारा कूड़ा करकट समझकर फेंक दिया जाता है पर पक्षी उसी से कपड़ा और मकान जैसी जीवन की अनिवार्य आवश्यकताओं को जुटाकर सपरिवार बड़े हर्षोल्लास के साथ रहते-जीवन बिताते हैं। इनके घर–घरौंदों की संरचना बड़ी ही विलक्षण होती है। धनेश पक्षी तो इतना कुशल इंजीनियर होता है कि अपना घोंसला कंकरीट से भी सख्त बनाता है। अबाबीलें तो कीचड़ की सहायता से ऊँची से ऊँची दीवारों पर अपने घर बसाते हैं। उनकी कलाकारिता को देखकर यही कहा जा सकता है कि भौतिक विज्ञानी काफी पीछे हैं।
यदि भौतिक विज्ञान प्राणियों को जड़ प्रकृति का ही एक तुच्छ उत्पादन मानता रहेगा तो उसे उस अतीन्द्रिय चेतन सत्ता का कभी कोई आधार एवं कारण नहीं मिलेगा जो इस सृष्टि का नियामक है एवं उसके प्रत्येक कण में विद्यमान है। जब प्राणी एक चलता-फिरता पेड़-पादप ही ठहरा तो उसकी शारीरिक एवं मानसिक हलचलें भी शरीर ज्ञान से बाहर कैसे जा सकती हैं। पर ऐसा नहीं होता। काय कलेवर के भीतर विद्यमान आत्मचेतना दिक्-काल से परे की भी असीम जानकारियाँ रखती हैं जिसके प्रमाण यदाकदा सबके सम्मुख आते भी रहते हैं। ऐसी दशा में भौतिक विज्ञान को जड़ जगत की हलचलों तक ही अपने को सीमाबद्ध नहीं रखना होगा वरन् आत्मा की अलौकिक सत्ता को भी स्वीकार करना होगा। जीव चेतना का उसकी क्रिया कुशलता का समाधान तभी मिल सकता है।
पक्षियों को ही लें तो उनकी कलाकारिता, पारस्परिक स्नेह-सहयोग, अतीन्द्रिय क्षमता आदि की व्याख्या विवेचना विज्ञान कहाँ कर पाता हैं? पक्षियों की क्रिया-कुशलता देखते ही बनती है। अपने घोंसले के रंग का चयन भी वे प्रकृति के नियमानुसार ही करते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि उनका जीवन प्रकृति के साथ कितना अविच्छिन्न रूप से गुँथा है। सुरक्षा का दृष्टिकोण रखते हुए अंडों के रूप रंग के अनुरूप वातावरण चुनते और तदनुरूप घोंसला बनाते हैं। टिटहरी खुली या पथरीली जमीन पर अंडे देती है जिससे उनका रंग मृत्तिका अथवा कंकड़ों के समान ही दिखाई देता है। उस वातावरण में घुलमिल कर अंडे आक्रामक दुश्मनों की आँखों से बच जाते हैं। कुररी रेत में अपनी प्रजनन क्रिया सम्पन्न करती है और उसके अंडे रेत के समरूप ही दिखने लगते हैं। जलीय पक्षी तैरते हुए पेड़-पौधों पर अपने घोंसले बना लेते हैं और अंडे देते हैं। वनस्पतियों के संपर्क से उनके अंडे बच्चे भी हरा रंग ग्रहण कर लेते हैं और माँसाहारी समुद्री जीवों से अपनी रक्षा करने में समर्थ होते हैं। इससे प्रतीत होता है कि इन प्राणियों को प्राकृतिक परिवर्तनों का पूर्ण ज्ञान होता है बया पक्षी अपने घोंसले के निर्माण में तो उच्चस्तरीय शिल्पकला का परिचय देती है जिसे मौसम की प्रतिकूलता भी नष्ट नहीं कर सकती। वस्तुतः यह सभी निर्धारण चेतना के द्वारा ही संभव हो सकते हैं।
पक्षी विशेषज्ञों ने अपने अध्ययन में बताया है कि अधिकाँश पक्षी अपनी मर्यादाओं का पत्नीव्रत एवं पतिव्रत धर्म का निष्ठापूर्वक पालन करते हैं। दुर्भाग्यवश यदि वियोग की स्थिति आ भी पड़े तो वे आजीवन विधुर या विधवा के रूप में रहकर गृहस्थ धर्म का निर्वाह समान रूप से करते देखे गये हैं। मातृत्व एवं पितृत्व की जिम्मेदारी निभाने में उन्हें गौरव की अनुभूति होती है। इसी तरह ह्वेल मछलियों की पारिवारिक भावना देखते ही बनती है। परिवार के किसी सदस्य के घायल होने, चोट लग जाने पर वे मिल जुल कर उसकी सेवा-सुश्रूषा करती हैं। ध्रुव प्रदेशों में पाये जाने वाला पेन्गुइन पक्षी में अण्डे सेने और बच्चों की देखभाल करने का सारा काम नर पक्षी करता है दो माह तक बिना कुछ खाये पिये वह उनकी तब तक रक्षा करता रहता है जब तक बच्चे चलने-फिरने योग्य नहीं हो जाते।
कुछ प्राणी तो अपने को मानव समुदाय का ही सदस्य समझते हैं और उसी के आसपास अपना डेरा डाल देते हैं। मैना और गौरैया इसी श्रेणी के अंतर्गत आते हैं। खंजन, बया, अबाबील और चातक पारस्परिक सहयोग-सहकार के आधार पर अपने-अपने गृह निमार्ण की योजनाओं को पूरा करते हैं। हिंस्र जातियों से अपनी संतति को बचाने के लिए डोम काग और पीलक पेड़ के ऊपर बसने में ही अपनी कुशलता समझते हैं। प्राकृतिक अनुदानों का भरपूर लाभ उठाते हुए कठफोड़वा पक्षी पेड़ों के गड्ढों में अपना परिवार बसाता और आसानी से गुजर-बसर कर लेता है। अपने साथी एवं संतान की सुख सुविधा का ये पूरी तरह ध्यान रखते हैं। गड्ढों में लकड़ी के बुरादे से कालीन जैसा काम लेकर अपना और अपने परिवार की कठोरताजन्य कठिनाइयों से रक्षा करते हैं।
कुछ प्राणी तो इतने बुद्धिमान होते हैं जिन्हें देखकर मानवी बुद्धि भी हतप्रभ रह जाती है। आस्ट्रेलिया में “बोवर बर्ड” नामक एक धब्बेदार चिड़िया पाई जाती है। इसकी विशेषता यह है कि वह विभिन्न प्रकार के जीव-जन्तुओं और यहाँ तक कि मशीनों की आवाजों की भी बड़ी दक्षतापूर्वक नकल उतार लेती है। पक्षी विशेषज्ञों के अनुसार यह चिड़िया कम से कम तीस विभिन्न प्रकार की पक्षी प्रजातियों की बोलियों की नकल कर सकती है। “फ्लैमिन्गस” नामक चिड़िया को जब अण्डे देना होता है तो कीचड़ में वह एक ऊँची और कपनुमा सुन्दर संरचना बनाती है और फिर उसमें अण्डे देती है। “गैलापागोस” चिड़िया को जब भूख लगती है तो वह काँटेदार कैकटस की छोटी टहनी को अपनी चोंच से दबाकर पेड़ के कोटरों व दरारों में डालती हैं। जैसे ही कोई कीट बाहर निकलता वह टहनी को अपने पैरों से बाहर को धकेल देती है। उसको खाकर पुनः उसी काम में जुट जाती है। टैक्सास यूनिवर्सिटी के सुप्रसिद्ध जीवशास्त्री विलियम काडले के अनुसार अमरीकी गोध घनघोर वर्षा में भी अडिग रहकर अपने परिवार की रक्षा करता एवं तप-तितीक्षा का परिचय देता है। इसे वहाँ का राष्ट्रीय पक्षी घोषित किया गया है।
मूर्धन्य वैज्ञानिक डॉ. डी.सी. जर्निस अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “फोल्ड मेडिसिन” में लिखते हैं कि प्राणियों में प्रकृति-नियमों की उपयोगिता की जानकारी आश्चर्यजनक रूप से पायी जाती है। कुछ तो जड़ी-बूटियों की अचूक उपयोगिता और बीमारियों को दूर करने की शक्ति के बारे में भी पूरी जानकारी रखते हैं। भालू “फर्न” के मूल को पसन्द करता है तो नेवला जहरीले साँप के काटे जाने पर एक जड़ी विशेष को चबाता है और सर्प विष के प्रभाव से सर्वथा मुक्त हो जाता है। जंगली गीध अपने बच्चों को एक मसाले के पौधे की पत्तियाँ खाने को बाध्य करता है। अधिकाँश प्राणी शुद्ध वायु सेवन करते और प्राकृतिक चिकित्सा से ही अपने स्वास्थ्य को अक्षुण्ण बनाये रखते हैं।
प्राणियों का बौद्धिक विकास भले ही मनुष्य की तुलना में कम हुआ हो फिर भी उनमें प्रकृति प्रदत्त उदात्त भाव संवेदनाएँ, प्रेम, सहानुभूति, सहयोग-सहकार, कृतज्ञता, कर्तव्य परायणता आदि के तत्व कूट-कूट कर भरे होते हैं। अपने को सभ्य और सुशिक्षित कहने वाला मानव इन निरीह कहे जाने वाले प्राणियों से बहुत कुछ सीख सकता है।
विचारशीलता और तर्कों का अपना महत्व है। पर उन्हीं को सब कुछ मान बैठना पर्याप्त न होगा। मस्तिष्क में जो कल्पनाएँ उठती हैं उनकी अपनी किसी न किसी सरसता की पूर्ति एवं कामना की उपलब्धि का तथ्य काम करता रहा है। चूँकि मस्तिष्क शरीर का एक अंग है। मन ग्यारहवीं इन्द्रिय है इसलिए उस क्षेत्र की सारी घुड़दौड़ इसी क्षेत्र में चक्कर काटती रहती है। कल्पनाएँ सरसता के खूँटे से बँधी रहती है और वे सरसताएँ इन्द्रिय भोग लिप्साओं और मानसिक भोग लालसाओं से आगे नहीं बढ़ पातीं।
इन लिप्सा-लालसाओं का आवेग आकाँक्षा बन जाता है और इच्छा, अभिलाषा, आकाँक्षा जिस प्रकार का साधन चाहती है बुद्धि उसी के अनुरूप ताना बाना बुनने लगती है। उसी प्रकार के बानक बनाने और सुझाव सुझाने लगती है। इसीलिए देखते हैं कि जिसका मस्तिष्क जितना पैना होता है वह उसी प्रकार के छल छद्म और पाखण्ड रचता है। अपना मतलब साधने और दूसरों को मूर्ख बनाने में ही बुद्धिमानों की बुद्धि काम करती दीखती है। किसी क्षेत्र के जरूरत से ज्यादा समझदार उस प्रदेश में अधिक से अधिक कुचक्र रचते और अपराध करते पाये जायेंगे। जेलखानों में तो ऐसे ही प्रतिभाशाली लोगों का बाहुल्य भरा रहता है।
जिन मुकदमों की वास्तविकता की जानकारी हो, उनके मुजरिमों के बयान और वकीलों द्वारा प्रस्तुत किये गये तर्कों को देख सुनकर आश्चर्यचकित रहा जा सकता है कि दिमाग की दौड़, किस प्रकार सही को गलत और गलत को सही सिद्ध करने में कमाल दिखा सकती है। यही प्रपंच सामान्य जीवन में भी चलता रहता है कि फुसलाने, बहकाने, ठगने वाले के छद्मों को देख सुनकर दंग रहा जा सकता है। दिमाग किसी भी दिशा में कुछ भी काम कर सकता है। उसकी औसत गतिविधियाँ उचित को अनुचित, अनुचित को उचित सिद्ध करने में दलीलों के ढेर लगाती रहती हैं। इतने बड़े ढेर जिन्हें देख सुनकर सामान्य बुद्धि को हतप्रभ रह जाना पड़े।
प्रायः 60-70 वर्ष पूर्व शास्त्रार्थों का जमाना था। प्रतिगामी और प्रगतिशील सम्प्रदायों में अपनी-अपनी बात तर्कों और प्रमाणों से सिद्ध करने की प्रथा थी। उनमें सुनने वाले भी चोंचें लड़वाकर तमाशा देखने के लिए पहुँचते थे। जिस पक्ष के वक्ता अधिक दबंग होते थे उसी पक्ष की धाक जम जाती थी। न्याय और विवेक किसके पक्ष में गया यह कोई नहीं देखता था। आज भी विभिन्न प्रयोजनों में अलग ढंग में यही होता रहता है। चुनावी वक्तृताओं के सुनते समय यही लगता है कि इनमें से हर पक्ष सत्य हरिश्चन्द्र का अवतार है और जन कल्याण के अतिरिक्त इन प्रत्याशियों में से किसी की कोई कामना नहीं है। पर जीत जाने के उपरांत उनकी गतिविधियों को देखा जाता है तब पता चलता है कि इन दिनों जो कहा गया था वह छलावा मात्र था।
तर्क के सहारे हर पक्ष अपने को सही सिद्ध कर सकता है। वह अपने समर्थन में इतने प्रमाण और तथ्य प्रस्तुत कर सकता है कि उस मान्यता में कोई खोट निकालना कठिन पड़े। किन्तु जब प्रतिपक्षी की बात सुनी जाती है तब भी ठीक वैसा ही प्रतीत होता है जैसा कि पूर्व पक्ष अपनी बात को सही सिद्ध करने के लिए जोर लगा रहा था। ऐसी दशा में किसी निष्कर्ष पर कैसे पहुँचा जाय, किसी प्रतिपादन को कैसे अपनाया जाय।
पशुओं के, पक्षियों के और मछली जैसे जलचरों के संबंध में अर्थशास्त्री यही दलील देते हैं कि इनको बढ़ते रहने दिया जाय तो मनुष्य के लिए संकट खड़ा हो जाएगा और यह समस्त प्राणी अपनी बढ़ती संख्या के आधार पर भूखों मरने लगेंगे। इस प्रतिपादन को साँख्यिकी के बल पर सिद्ध करने के पक्ष में वे बूढ़े और बहुसंख्यक प्राणियों के बंध को एकमात्र उपाय बताते हैं और उन्हें जीवित रहने देने की अपेक्षा मृत शरीर का उपयोग करने में लाभ बताते हैं। अर्थशास्त्र के आधार पर अलाभकर पशुओं को कसाई खाने भेज देना ही बुद्धिमत्ता है। इस उपाय से भूमि तथा खाद्य को बचाकर मनुष्य के काम लाया जा सकता है। इस दलील को तर्क और साँख्यिकी के आधार पर काटा नहीं जा सकता।
जब यह दलील सही है तो बूढ़े माँ-बाप को भी उसी रास्ते मौत के घाट उतारते चलने में क्या हानि है? वरन् उनका स्थान और अन्न वस्त्र की बचत होने से बुद्धिमत्ता के आधार पर लाभ ही लाभ है।
इस प्रतिपादन के पक्ष में एक ही तथ्य आड़े आता है जिसे कहते हैं “भावना।” जिन माता-पिता ने इतना कष्ट सहकर बड़ा किया और अपनी क्षमता एवं सम्पदा को पूरी तरह निछावर कर दिया उनके प्रति कृतज्ञता का भाव रखते हुए ऋण चुकाने की आवश्यकता का अनुभव करते हुए वृद्धावस्था में उनका पोषण ही नहीं सेवा सहायता का भी मन करता है। वह मन की भावना ही है-जो पुण्य-परमार्थ, दान-सेवा आदि उच्च स्तरीय क्रिया-कलापों में संलग्न होने की प्रेरणा देती है। इसका दमन कर डालने पर मनुष्य का आन्तरिक स्तर पशुओं से भी गया बीता पिशाच स्तर का बन जाता है। यदि तर्क को प्रधानता देते हुए जिसमें लाभ हो वही करना हो तो और भी कितने ही तरीके हैं जिनका भौतिकवादी दार्शनिकों ने प्रतिपादन किया है। उपनिवेशवाद, साम्राज्यवाद, पूँजीवाद, अधिनायकवाद आदि के पक्ष में बहुत कुछ लिखा, छपा और कहा गया मिल सकता है। दूसरे देशों की जनता को मार डालने, लूट लेने, अपंग बना देने और जो कुछ हाथ लगे उसे अपने देशवासियों की सुख-सम्पदा बढ़ाने के लिए लगा देना-सामन्तवाद है। युद्ध इसी की देन है। इसके पक्ष में पहले भी बहुत कुछ कहा जाता था और अब अणु युद्ध की-आकाश युद्ध की तैयारी में संलग्न देश ऐसी लच्छेदार भाषा में अपने प्रयासों का समर्थन करते हैं मानों विश्वशाँति की ठेकेदारी इन्हीं के चिन्तन और कृत्यों पर निर्भर है। दास-दासियों को वन्य पशुओं की तरह पकड़ने और बेचने वाले अपने पक्ष में अनेकों दार्शनिक दुहाइयाँ देते रहे हैं। वे उसे असभ्यों को सभ्य बनाने का प्रशिक्षण बताते और मानवी सेवा का एक उपयोगी प्रचलन चलाने की बात कहते रहे। दलीलें उनके पास भी कम नहीं थीं।
विरोध में भावना ही सामने आई। उसके समर्थन में मानवी गरिमा की, न्याय, विवेक की, परमार्थ और सेवा परोपकार की ही बहुलता थी जिनका हृदय समर्थन करता है। अन्तःकरण ही त्याग, बलिदान की, आदर्शों की, उत्कृष्टताओं की भाव भरी प्रेरणा भरता है। दलीलों के हिसाब से व्यक्तिगत रूप से इनमें घाटा ही उठाना पड़ता है।
दलील कहती है “जिसकी लाठी उसकी भैंस” का जंगली कानून जीव जन्तुओं में चलता है। बड़ी मछली छोटी को खा जाती है वैसा ही दौर मनुष्यों में क्यों चले? पुलिस कचहरी आदि की क्यों जरूरत पड़े? भावना कहती है कि मनुष्य के साथ जुड़ी हुई एक अन्तरात्मा भी है जो औचित्य, न्याय, विवेक, पुण्य परमार्थ आदि का समर्थन करती है पर भौतिक प्रचलनों के आधार पर उनका समर्थन दलीलों से नहीं हो सकता। प्रकृति प्रचलनों के उदाहरण प्रस्तुत नहीं किये जाते हैं। मनुष्य के लिए मानवी मर्यादा और गरिमा का एक स्वतंत्र विधान है, जो भावनाओं पर टिका हुआ है। उसी आधार पर दया-धर्म की, त्याग बलिदान की, संयम-सेवा की परम्परा निभती है। यदि मनुष्य पशु नहीं है तो उसे उत्कृष्टताओं की उन भावनाओं का अनुगमन करना पड़ेगा जा तथ्यतः उसकी महानता के साथ जुड़ सकती हैं।
विश्वकर्मा को प्रजापति ने पृथ्वी पर भेजा। दो घड़े दिये उनमें एक खाली था दूसरा भरा।
भरे घड़े में सुख था और खाली में थोड़ा सा ज्ञान। कहा गया कि सुख बाँटना और ज्ञान बटोरना।
रास्ते में विश्वकर्मा भूल गये घड़ों का क्रम। उनने ज्ञान बाँटना और सुख बटोरना आरंभ कर दिया। उस गलती को अब तक मनुष्य दुहराते चले आ रहे हैं।
प्रकृति गौमाता की तरह उपकारी भी है और आक्रामक सिंहनी की तरह खूँखार भी। गाय को ठीक तरह पालने वाले उससे दूध, बछड़े आदि के रूप में बहुत कुछ प्राप्त करते हैं। किन्तु जो सिंहनी की माँद पर पत्थर फेंक कर उसे छेड़ने पर उतारू होता है उन्हें बदले में ऐसा दंड भी सहना पड़ता है, जिसे देखने वाले तक कुछ नसीहत ग्रहण कर सकें। दर्पण में अपना ही मुँह दीखता है। गुम्बज में अपनी ही आवाज गूँजती है। छाया दिशा का अनुगमन करती है जिसे चलने वाला अपनाये हुए होता है। प्रकृति व्यवस्था और उसकी रीति नीति भी इसी प्रकार की है।
विषपान जैसे उद्धत आचरण करने वाले मौत के मुँह में जाते रहते हैं। जिन्हें आरोग्य से प्रेम है वे बलिष्ठ बनने के लिए आवश्यक संयम व्यायाम अपनाते और कुछ ही दिनों में पहलवान बन जाते हैं। क्रिया की प्रतिक्रिया का यह नियम सर्वत्र सर्वदा चलता रहता है। भोजन पकने भी कुछ देर तो लग ही जाती है। आवे में कुम्हार के बर्तन तत्काल ही कहाँ पकते हैं? बीज को वृक्ष बनने में भी देर लगती है। इस विधा को गंभीरता पूर्वक न समझ पाने वाले आतुर लोग ही ऐसा सोचते हैं कि कोई कुछ भी मन-मर्जी का करते रह सकता है और अपनी चतुराई के बल पर परिणति की सुनिश्चित विधा से बचा रह सकता है। पर अदूरदर्शी समझ प्रायः गलत ही निकलती है।
निजी जीवन में किये गये भले बुरे कृत्यों का परिणाम व्यक्तिगत रूप से भुगतना पड़ता है पर जो गतिविधियाँ सामूहिक प्रचलन के रूप में चल पड़ती हैं, उनका प्रतिफल समूचे समाज में संसार को भुगतना पड़ता है। कारण कि हर मनुष्य एक समग्र समाज का अविच्छिन्न अंग है। उसका कर्तव्य बनता है कि न केवल स्वयं सही रीति नीति को अपनाये वरन् दो कदम आगे बढ़ कर अन्यान्यों को भी अनीति छोड़ने एवं नीति अपनाने के लिए प्रभावित एवं बाधित करे। जो अपनेपन की परिधि निजी जीवन तक ही सीमित करना चाहते हैं, वे भूल करते हैं। जब उनका निर्वाह और विकास सार्वजनिक सहयोग के आधार पर चलता है तो कोई कारण नहीं कि सामाजिक गतिविधियों की उपेक्षा की जाय। छत की मजबूती देखना और समय रहते संभालना उन सभी का कर्तव्य था जो कि उसके नीचे बैठकर ऋतु प्रवाह से बचने का लाभ उठाते थे। सावधानी मात्र अपने संबंध में ही बरती जाय यह पर्याप्त नहीं। समुदाय के एक अविच्छिन्न अंग होने के नाते हर किसी का यह कर्तव्य बनता है कि अन्यान्यों की गतिविधियों का भी पर्यवेक्षण का और समर्थन देने या विरोध करने का निश्चय करे।
इन दिनों प्रकृति मनुष्य समुदाय से रुष्ट है। जो कुछ चल रहा है उसे देखते हुए लगता है कि वह अगले दिनों आपे से बाहर होने स्तर का क्रोध व्यक्त करेगी। इस संभावना के संबंध में सूक्ष्मदर्शी लोग बुरी तरह आशंकित और आतंकित हैं। अदृश्य जगत में चल रही गतिविधियों का गंभीर पर्यवेक्षण करने वालों का कथन है कि वातावरण का तापमान “ग्रीन हाउस प्रभाव “ के कारण तेजी से बढ़ रहा है। यही क्रम चलता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब ध्रुवों की बर्फ तेजी से गलेगी और समुद्र के पानी की सतह मीटरों ऊँची उठ जायेगी जिससे समुद्र तट पर बसे हुए नगर तथा नीचे बसे भू भागों में इतना पानी भर जायगा जिसमें वर्तमान आबादी और सम्पदा का बहुत बड़ा भाग उस विपत्ति के गर्भ में चला जाएगा।
नदियों-जलाशयों में औद्योगिक कारखानों का कचरा तथा उस क्षेत्र के निवासियों द्वारा उत्पन्न होते रहने वाली गंदगी गिरते रहने का अनुपात निरन्तर बढ़ रहा है। फल यह होता है कि इन जलाशयों में रहने वाले जीव जन्तु मर जाते हैं और गंदगी की सफाई के जिस कार्य को वे निरन्तर करते रहते थे वह समाप्त हो जाएगा। उस जल को समुद्री पानी की तरह न तो सिंचाई में काम लिया जा सकेगा और जो उसे पीकर जीवित रहते हैं, न उनके जीवित रहने का कोई आधार बचेगा। उस स्थिति में कितने लोग स्वस्थ रह सकेंगे कितने जीवित बचेंगे यह कहा नहीं जा सकता। जापान की “मिनी माता “ बीमारी की विभीषिका अभी तक सबको भली भाँति स्मरण होगी। यह अपने ढँग की अनोखी विपत्ति है जो इन दिनों के औद्योगीकरण से पूर्व कभी भी सामने नहीं आई। इससे किस प्रकार विश्वस्तर पर निपटा जा सकेगा, कुछ कहा नहीं जा सकता। सरिता, समुद्रों एवं जलाशयों को विषाक्त करने के मूल्य पर बढ़ाई जा रही सुविधा और सम्पदा तब कितनों के लिए कितने काम आ सकेगी? इसकी भयावह कल्पना कर सकना किसी के लिए भी कुछ कठिन नहीं होना चाहिए।
आहार, जल और वायु यह तीन जीवन की प्रारम्भिक आवश्यकताएँ हैं। आहार में कमी इसलिए पड़ती जा रही है कि धरती की उर्वरता जितना उत्पादन कर सकती है उसकी एक सीमा है। पर खाने वाली जनसंख्या तो दिन दूनी और रात चौगुनी बढ़ती जा रही है। उन सबके लिए खुराक आयेगी कहाँ से? शहरों की तेजी से अभिवृद्धि और कारखाने, निवास आवासों का विस्तार भी उपजाऊ जमीन को निरन्तर हड़पता जा रहा है। शेष जितनी भूमि बचती है, वह बढ़ी हुई आबादी के लिए निश्चित रूप से अपर्याप्त होगी। उससे इतना उत्पादन कहाँ हो सकेगा जिसके आधार पर हर किसी का पेट भर सकेगा। यह भुखमरी की पूर्व तैयारी है जिसे उत्साहपूर्वक अपनाया जा रहा है। इसे वर्तमान में इथियोपिया के भीषण अकाल एवं यू. एस. ए. के मध्य व दक्षिणी भाग में छाए अभूतपूर्व सूखे के रूप में देखा जा सकता है।
अधिक उत्पादन की आवश्यकता को देखते हुए ऐसे तात्कालिक लाभों को ही सब कुछ मान बैठने की नीति अपनाई जा रही है। भले ही उसका दुष्परिणाम अगले दिनों कितने ही भयंकर रूप में सामने क्यों न आ खड़ा हो? इस संदर्भ में उर्वरता बढ़ाने के लिए रासायनिक खादों का और फसलों को बचाने के लिए कीट नाशक दवाओं का अन्धाधुन्ध प्रयोग चल पड़ा है। रासायनिक खाद अपना जादुई चमत्कार दिखाकर कुछ दिनों उत्पादन तो अधिक कर सकती है पर उनके कारण धरती की भौतिक उर्वरता नष्ट होने पर भविष्य में ऊसर बंजर के रूप में खेतों के परिणति हो जाने का खतरा नजर अन्दाज ही किया जा रहा है। इसी प्रकार कीट नाशक औषधियाँ उस खाद्य का अंग बनती हैं जिसे इन विषों के माध्यम से बचाया गया था। विषैली वनस्पतियों की फसल मनुष्यों, पशु, पक्षियों को तो हानि पहुँचाती है। इन प्राणियों के तथा जलाशयों के माध्यम से वे मनुष्यों के शरीरों में भी जा पहुँचती है। एक अध्ययन के अनुसार यह मात्रा 01 से 03 पार्ट पर मिलियन (पी. पी. एम.) तक पायी गयी है।
आहार और जल के क्षेत्र का संकट अगले दिनों भयावह रूप में उत्पन्न होने जा रहा है इसका अनुभव सामान्यजनों को भले ही न लगे पर जो परिस्थितियों का विश्लेषण कर सकता है उन विशेषज्ञों के लिए यह तथ्य मानवी विकास के साथ दिन-दिन भयावह होता और निकट आ रहा स्पष्ट दीख पड़ता है।
अन्तरिक्ष में शुद्ध वायु की एक सीमित मात्रा है जिसे साँस द्वारा ग्रहण करके प्राणी जीवित रहता है। इस क्षेत्र में कारखाने का धुआं, अन्यान्य कामों में प्रयुक्त होने वाले ईंधन वायु मंडल में विकिरण की मात्रा निरन्तर बढ़ाते जा रहे हैं। उसके परिशोधन के लिए वृक्षों का अस्तित्व ही सबसे बड़ी ढाल रही है। अब वनों की कटाई भी बुरी तरह हो रही है। भारत में प्रतिवर्ष एक सौ तीस मिलियन टन (लगभग 13 करोड़ टन) लकड़ी काटी जाती है। ईंधन की, फर्नीचर की, इमारतों, खेतों तथा निवास की बढ़ती हुई आवश्यकता मात्र एक ही हल सुझाती है कि वृक्ष सम्पदा को तेजी से काटकर उपरोक्त तात्कालिक आवश्यकताओं की पूर्ति की जाय। लोग इस कारण होने वाले वर्तमान तथा भावी विपत्ति की विभीषिका को सुनते समझते तो हैं पर ऐसा कुछ कर नहीं पाते जिससे वनों का विनाश कारगर ढँग से रोका जा सके। भले ही यह मजबूरी हो, पर उसका परिणाम तो भुगतना ही पड़ेगा। साँस के काम आने वाली हवा निरन्तर दूषित और गरम होती जा रही है। फलतः प्राणी समुदाय की जीवनीशक्ति घटने से अनेकानेक चित्र-विचित्र रोगों का शिकार होना पड़ रहा है।
तेजी से बढ़ते हुए रेगिस्तान, उपजाऊ भूमि को बेदर्दी से उदरस्थ करते चले आ रहे हैं। लगातार बाढ़ें आती हैं। एक अनुमान के अनुसार प्रतिवर्ष छह से सात हजार मिलियन टन भूमि की ऊपरी उपजाऊ परत बहकर समुद्र में चली जाती है। जड़ों के कारण भूमि में जो नमी बनी रहती थी उसका, वृक्षों के अभाव का आधार न रहने से कुओं का पानी निरन्तर गहरा होता जाता है जिसे ऊपर खींचने में महंगी मेहनत तो लगती ही है साथ ही पानी भी कम मात्रा में मिलता है। एक ओर नये सुविधा साधनों के लिए पानी की मात्रा में असाधारण वृद्धि होती चले जाना और दूसरी ओर उसकी शुद्धता तथा मात्रा में कमी पड़ना ऐसा संकट है जिसका समाधान सहज नजर नहीं आता। ग्रामीण क्षेत्रों में बहुत समय से जंगलों से ही लाकर लकड़ी प्राप्त कर ली जाती थी पर अब वे स्रोत समाप्त प्रायः होते जाने से गोबर के उपले जलाने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं पा रहा है। इसके कारण खेतों में उपयुक्त खाद न पहुँचने का जो विकट संकट खड़ा होने जा रहा है उससे किसी को भी बेखबर नहीं रहना चाहिए।
प्रकृति के साथ असाधारण रूप में की गई छेड़ छाड़ उसे दबाने दबोचने जैसा है। मनुष्य को जितना अधिकार और हिस्सा सहज रूप से मिला है, उतने से संतुष्ट न रह का अन्य सम्पदा प्रयोजनों के लिए प्रकृति के गर्भ में छिपा कर रखी गई सम्पदा का असाधारण उत्खनन हो रहा है। कोयला, गैस, तेल आदि को धरती की नीची परतों से उखाड़ कर ऊपर लाया जा रहा है। धातुओं की बढ़ती आवश्यकता भू-गर्भ के असाधारण उत्खनन से ही उपलब्ध की जा रही है। यह सीमित भण्डार एक शताब्दी तो दूर पच्चीस वर्षों से भी कम समय तक काम आ सकने योग्य बना है। उसके समाप्त हो जाने पर याँत्रिक सभ्यता ऊर्जा साधनों के अभाव में बेमौत मरेंगी और फिर मानवी श्रम तथा पशु श्रम पर ही उन कार्यों का आधार शेष रहेगा जा इन दिनों विशालकाय कारखाने द्रुतगामी वाहनों विशाल जलयानों द्वारा पूरा किया जाता है। सब कुछ विषाक्त कर लेने के उपरान्त भी यदि वैकल्पिक व्यवस्था स्थायी रूप से न बन पड़ी तो इसे शीत निवारण के लिए घर की झोंपड़ी जला लेने जैसी अदूरदर्शिता ही कहा जायगा।
क्रुद्ध प्रकृति, बाढ़, भूकम्प, भूविस्फोट, तूफान महामारी, सूखा, दुर्भिक्ष जैसे संकट महाविनाश की विभीषिका लेकर सामने आ खड़ी हुई है। अन्तरिक्ष की ओजोन परत में छेद हो जाने के कारण लगता है कि ब्रह्माँडीय किरणों की बौछार धरती पर होगी और उनके कारण प्रचलित व्यवस्था में भारी गड़बड़ी होगी। एक दूसरे प्रकार के वैज्ञानिक सर्वेक्षण ने यह निष्कर्ष निकाला है कि अब हिमयुग अति निकट है। पिछली जल-प्रलय, हिम-प्रलय अपनी-अपनी अवधि में धरती का नक्शा ही बदल कर रख गई हैं और उनके कारण ऐसा कुछ हो गया है कि इससे पूर्व की दुनिया और आज की दुनिया में असाधारण रूप से अन्तर उत्पन्न हो गया है। अगले दिनों भी कुछ इसी प्रकार की उथल पुथल हो तो किसी को आश्चर्य नहीं मानना चाहिए।
मनुष्य-कृत सामूहिक दुष्कर्मों का एक बड़ा पाप युद्धोन्माद है। अपना वर्चस्व आधिपत्य बढ़ाने के लिए समर्थ राष्ट्र कोई न कोई बहाना ढूँढ़ कर ऐसा युद्ध मनुष्य समुदाय पर लादने की तैयारी कर रहे हैं जिनके दुष्परिणामों में आक्रामक भी अछूता न बच सके। आयुधों में बढ़ चढ़ कर प्रमुखता प्राप्त करने और उन्हें दिग्भ्रान्त कर उकसाकर खरीदने के लिये बाधित करने वाला दुष्चक्र कम तेजी से नहीं घूम रहा है। महायुद्ध भले ही दूर हो पर छुट पुट क्षेत्रीय युद्ध तो अनेक स्थानों पर आये दिन चलते ही रहते हैं। इनके स्थानीय कारण भी हो सकते हैं पर प्रमुख कारण है आयुधों के निर्यात की मंडी खोजना। वर्चस्व स्थापित करके नयी मण्डियों को अपने प्रभाव क्षेत्र में लेना। इस निर्माण के कारण भी विकिरण पैदा होता है व उसे देखते हुए लगता है कि रासायनिक एवं आणविक आयुध संग्राम में प्रयुक्त न होने पर भी अपने निर्माण एवं भण्डार के हेतु ही अपार धन−जन का, कौशल एवं साधनों को विनाश कर चुके होंगे। यह मानवता के प्रति अपराध है। इसे रोकने के लिए उन्हें आगे बढ़कर प्रयत्न करना चाहिए जा विश्व शाँति की उपयोगिता एवं आवश्यकता समझते हैं।
उपरोक्त विनाश विभीषिकाएँ काल्पनिक नहीं, वास्तविक एवं तथ्यों पर आधारित हैं। इनको रोकने के लिए प्रकृति प्रकोप को शान्त करना होगा। इसका उपाय एक ही है कि उस मन स्थिति को बदलने का समर्थ एवं व्यापक प्रयत्न किया जाय जो अनाचार को प्रश्रय देती और विनाश संकट को न्यौत-न्यौत कर बुलाती है। इस समाधानकारक उपाय का नाम ही है- “विचार क्रान्ति अभियान।” जिसमें हर विचारशील को सम्मिलित होना चाहिए।
निस्सन्देह इस संसार में कष्ट और दुःख बहुत हैं। ऐसे दुःख और कष्ट आकस्मिक रूप से आकर मनुष्य को विक्षुब्ध बनाते हैं ऐसी आपत्तियाँ जो मनुष्य की नियंत्रण शक्ति से बाहर होती हैं जैसे अकाल, युद्ध, अतिवृष्टि, अनावृष्टि, मृत्यु, बिछोह, दुर्घटना आदि। निश्चय ही इनमें से किसी के भी मानव जीवन में आने से उसके सामान्य क्रम में व्यवधान उपस्थित हो जाता है और मनुष्य अपना मानसिक संतुलन खो बैठने की स्थिति में स्वयं को पाता है। वह नहीं समझ पाता कि ऐसी आकस्मिक आपत्तियों का कैसे सामना करें, क्या करें अथवा कहाँ जाएँ। इन कष्टों या दुःखों को क्यों वह खोजने पर सामान्यतया नहीं खोज पाता। परंतु सभी प्रतिकूल परिस्थितियाँ, वे चाहें हमारे शारीरिक कष्ट का कारण हों अथवा मानसिक, चाहे वे हम पर प्रत्यक्ष रूप से आक्रामक हों, बहुधा आती ही रहती हैं और हमें अनचाहे भी उनका सामना करना पड़ता है।
दुःखों को जीवन से सर्वथा हटाया तो नहीं जा सकता परन्तु अपनी समझदारी एवं सद्गुणों का आश्रय लेकर कम अवश्य किया जा सकता है। दुःखों को जीवन में अपरिहार्य जानकर अपनी मनोभूमि को पहले से ही उनसे लड़ने तथा संतुलन बिगड़ने न देने का अभ्यस्त बनाकर तात्कालिक कठिनाई को बहुत कुछ कम किया जा सकता है। दुःखों से जूझने के लिए पहले से तैयार मनोभूमि ही मनुष्य पर पड़ने वाले उनके प्रभाव को कम करके जीवन के आनन्द को बनाये रख सकते हैं। दुर्बल मनोभूमि जीवन को आनन्द से वंचित रखती है जिसके परिमाण स्वरूप मनुष्य को कोई न कोई वेदना-व्यक्तिगत अथवा सामाजिक अवश्य सताती रहेगी। वास्तव में कष्टों का प्रभाव उतना तीव्र होता नहीं है जितना दुर्बल मनोभूमि के लोग अनुभव करते हैं। कष्ट धरती पर हैं और बहुत हैं। परन्तु व्यक्ति यदि चाहे तो धैर्यवान बनकर बिना दुःख मनाये उन्हें सहन कर सकता है। इतिहास साक्षी है उन अनेकों लोगों के धैर्य और साहस का जिन्होंने कितनी-कितनी विकट वेदनाएँ हँसते-हँसते सही हैं। लोगों ने हँसते-हँसते मृत्यु को गले लगाया है, अपने बच्चों को दृढ़ मनोभूमि वाला बनाकर उन्हें स्वयं अपनी आँखों के आगे दीवार में चुने जाते देखा है। फिर कोई कारण नहीं कि छोटे-मोटे कष्ट से हम प्रभावित हों और अपना मानसिक संतुलन बिगाड़कर मन की दुर्बलता को प्रकट करें। इसलिये विज्ञजनों ने सबल मनोभूमि बनाने पर जोर दिया जिससे वह विपरीत परिस्थितियों से विशेषरूप से प्रभावित न हों।
इसी कष्ट सहिष्णुता की प्रक्रिया को तितीक्षा कहते हैं। कष्टों को अपना सहचर बना लें तो वे हमारे लिए व्यथा का कारण कभी नहीं होंगे। सुख के दिन तो प्रसन्नता देते ही हैं, परन्तु दुःख के दिनों में भी वही प्रसन्नता कायम रहे, वही संतुलित स्थिति जीवन के उद्देश्य और आनन्द की ओर ले जाने वाली होती है। आज सुखी, कल दुःखी परिस्थिति हमें कठपुतली की तरल हँसने या रोने को विवश करे-ऐसी स्थिति मनुष्य की गरिमा के योग्य नहीं है। भगवान ने हमें परिस्थितियों का दास नहीं, स्वामी बनाकर भेजा है। वे हम पर विजय पाने के लिए नहीं वरन् हम उन पर विजय पाने के लिये बने हैं। तो फिर क्यों न दुःखों की स्थिति में भी अपने जीवन क्रम में सुख की प्रसन्नता को बनाए रखें? आज सुखी, कल दुःखी, यह भी कोई जिन्दगी है?
यह याद रखा जाना चाहिए कि प्रतिकूलताएँ जीवन में कभी आती ही नहीं, ऐसा कभी नहीं होता है। ये तो जीवन को एक अनिवार्य अंग हैं। जो अपरिहार्य है, उससे डरने की कोई जरूरत नहीं। उसका प्रतिरोध करने की क्षमता का विकास करना चाहिए। यदि ऐसी पूर्व तैयारी की जा सके तो निश्चय ही कठिन परिस्थितियों के बीच भी धैर्य और संतुलन के साथ समस्वरता का निर्वाह करते हुए जीवन जिया जा सकता है, जीवन को और भी हल्का फुलका सरस, जीन योग्य बनाया जा सकता है।
दया और क्षमा को उदारता का द्योतक माना गया है। इन गुणों की प्रशंसा भी बहुत होती है। जो इन्हें चरितार्थ कर पाते हैं उन्हें विशाल हृदय का समझा जाता है और संत सज्जनों में गिना जाता है। इतने पर भी यह समझने योग्य तथ्य है कि क्या हर किसी के साथ वही व्यवहार किया जा सकता है? क्या उसके फलस्वरूप हर कोई हृदय परिवर्तन कर सकता है सुधर कर वैसा ही बन सकता है जैसा कि क्षमाशील ने चाहा था।
यहाँ पात्रता को परखने का प्रसंग आता है। समान प्रवृत्ति के लोग नहीं पाये जाते हैं उनमें से कुछ विचारवान, संवेदनशील होते हैं कुछ इतने निष्ठुर होते हैं जिन्हें पाषाण से भी अधिक निर्मम कहा जा सकता है। संवेदनशील ही सज्जनता से प्रभावित होते हैं और उपकार से प्रभावित होकर अपने को बदलने की बात सोचते हैं। कई बार ऐसा देखा भी गया है कि सद्व्यवहार से प्रभावित होकर कुछ दुर्जनों ने अपना रवैया बदला, पर यह अपवाद स्वरूप ही होता है। दुष्टता पर उतारू प्रायः वे ही होते हैं जिनकी भाव संवेदना गुम गई। वे निष्ठुर निर्दयता के अभ्यस्त हो जाते हैं। कसाई को पेशा जिनके यहाँ पीढ़ी दर पीढ़ी से चला आता है, जिनका जन्म और भरण पोषण निष्ठुरता भरे वातावरण में हुआ है। उनकी कुसंस्कारिता सहज रूप से इतनी परिपक्व हो जाती है कि उसे सत्परामर्शों से बदला-सुधारा जाना कदाचित ही कभी संभव होता है। ऐसा परिवर्तन यदि कभी दीख पड़े तो उसे अपवाद ही समझना चाहिए। ऐसे दुष्ट प्रकृति के लोग दया को दुर्बलता, भीरुता, कायरता के अर्थ में लेते हैं। सोचते हैं कि शक्ति या साहस न होने के कारण ही आक्रमण करने पर मौन साध लेने का अर्थ मात्र यह निकालते हैं कि अपनी जान बचाने के लिए गिड़गिड़ाया भर जा रहा है। अन्यथा अनीति का प्रतिरोध करना मानवी गरिमा के प्रतिकूल नहीं अनुरूप है। यदि क्षमा आततायियों पर भी लागू होता तो लंका दमन और महाभारत के सरंजाम न जुटे होते। अवतारों में से प्रत्येक ने धर्म स्थापना के साथ अधर्म उन्मूलन के लिए अनाचरण के दमन का प्रयोग प्रयत्न न किया होता।
वह कहानी सर्व-प्रसिद्ध है जिसमें एक साधु ने जल में बहते बिच्छू को दया वश बार-बार निकाला था और उसने उसे बार-बार डंक मार कर पीड़ित किया था। इस उदाहरण से व्यक्ति विशेष की सज्जनता का भान होता है पर उस समस्या का तनिक भी समाधान नहीं होता जिससे बिच्छुओं द्वारा अनेक निर्दोषों को आये दिन काटा और संत्रस्त किया जाता है। जुएँ, चींटी, खटमल, पिस्सू, मक्खी, मच्छरों से पीछा छुड़ाने के लिये उनके साथ कड़ाई भी बरतनी पड़ती है। शरीर पर आक्रमण करने वाले विषाणुओं को सूर्यताप से या औषधि उपचार से मारा न जाय तो उसका परिणाम उन बालकों को या बीमारों के लिये प्रायः घातक ही सिद्ध होंगे जिन पर रोगों का आक्रमण हो चुका है।
दया अच्छा सद्गुण है। क्षमा इस मनोभूमि का परिचय देता है कि व्यक्तिगत लाभ-हानि की अपेक्षा दूसरे के प्रति उदार आत्मीयता का परिचय दिया गया। घर परिवार इसी आधार पर चलते हैं। मैत्री इसी आधार पर निभती है। सामुदायिक सद्-भावना की अभिवृद्धि इसी आधार पर बढ़ती है। इसलिए इस प्रवृत्ति की सराहना तो की ही जायगी साथ ही अपकारी के प्रति ‘क्षमा करो और भूल जाओ ‘ की उदारता अपनाने के लिए भी मोटे तौर पर परामर्श दिया जायगा। आक्रमण का प्रतिशोध लेने पर उतारू होने पर वह कुचक्र चलता ही रहेगा। आक्रोश का प्रतिशोध और प्रतिशोध का फिर प्रतिशोध यह श्रृंखला अनंत काल तक चलती रहे तो फिर दोनों पक्षों का विनाश ही होकर रहेगा। इसलिए विष बेल को जड़ से या मध्य से काट देने का ही परामर्श दिया जायगा। सौजन्य यही है।
इतने पर भी पात्रता और प्रतिक्रिया को ध्यान में रखना ही होगा। यदि कुसंस्कारी, कुपात्रता इस सीमा तक बढ़ गई है कि सज्जनता का मूल्याँकन ही नहीं करती और उसे दुर्बलता, कायरता समझ कर झुकने के स्थान पर दूनी चौगुनी अकड़ती है तो फिर तरीका स्थिति के अनुरूप अपनाना पड़ेगा। असुरता को यदि नम्रता से झुकाया जा सका होता तो उसमें राम सफल हो गये होते और जैसे को तैसा की नीति न अपनाते। जानवरों को लाठी के सहारे चलाने की आवश्यकता न पड़ती। विनय और अनुरोध द्वारा उन्हें सीधे मार्ग पर चलने के लिए सहमत कर लिया गया होता। लगाम, नकेल, नाथ, अंकुश आदि के प्रतिबंध लगाने-खूँटा गाढ़ कर रस्से के सहारे सीमित क्षेत्र में रहने से पूर्व ही पशु वर्ग को धर्मोपदेशों, अनुरोधों, तर्कों द्वारा अपनी मर्यादा में रखना संभव हो गया होता।
धर्मोपदेशों की महिमा को कम नहीं किया जा रहा है। दया, धर्म को चरितार्थ करने से किसी को रोका नहीं जा रहा है। पर यह स्मरण तो दिलाना ही होगा कि यह व्यवहार विचारशीलों, मानवी पुरुषों से परिचित लोगों के साथ ही बरता जाना चाहिए। हर पात्र कुपात्र के साथ एक जैसा नीति नहीं अपनाई जानी चाहिए। यदि सज्जनता सर्वजनीन रही होती तो नीतिकारों को साम, दाम, दंड, भेद के विभिन्न उपचारों का प्रतिपादन न किया होता। तब दया, धर्म से ही काम चल गया होता और पुलिस कचहरी, जेल, फाँसी आदि के अनुबंधों की राजदंड में व्यवस्था न रही होती।
स्वास्थ्य रक्षा के नियमोपनियम सीखने सिखाने की आवश्यकता अपनी जगह महत्वपूर्ण है। सभी नियम संयम बरतें तो रोग उभरने की पृष्ठभूमि ही न बने किन्तु यदि किसी कारण विषव्रण उठ ही खड़ा हुआ है और संयम बरतने की शिक्षा से कोई काम चल नहीं रहा है तो गहरे आपरेशन की आवश्यकता पड़ेगी ही। मवाद निकाल बाहर किये बिना भयंकर पीड़ा उठती रहेगी। इतना ही नहीं सड़ा हुआ भाग निकटवर्ती स्वस्थ अंगों को भी सड़ाकर उस स्थिति तक पहुँचा देगा कि उस विकृति के सारे क्षेत्र को काटकर अलग करना पड़े। आततायियों को प्रताड़ना के अतिरिक्त और किसी उपाय से रोका नहीं जा सकता। दया करने से तो उनकी उद्दंडता दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ेगी। साँप को दूध पिलाने पर उसका विष बढ़ता है और पिलाने वाला तक जोखिम में पड़ता है।
दया अपने स्थान पर एक पक्ष है। दूसरा उसी के समतुल्य प्रताड़ना दूसरा पक्ष। दोनों का ही उपयोग विनयपूर्वक पात्रता देखते हुए और प्रतिक्रिया की संभावना का अनुमान लगाते हुए ही किया जाना चाहिए। अग्नि और जल दोनों ही अपने-अपने स्थान पर सही हैं। दाह को मिटाने के लिए जल का उपयोग करना पड़ता है। किन्तु कचरे को जलाने के लिए आग की भी आवश्यकता है अन्यथा सड़न की गंदगी समूचे वातावरण को प्रदूषण से भर देगी। शीत निवारण के लिए जल की नहीं अग्नि की आवश्यकता पड़ती है। दया जल है, आक्रोश अग्नि दोनों का यथा-स्थान उपयोग करने की बुद्धिमत्ता अपनाना ही व्यावहारिक है। यदि भेड़ियों पर दया दिखाते रहा जाय तो उनके झुण्ड बढ़-कर गाँव में आतंक मचा देंगे और किसी दुर्बल प्राणी को जीवित न रहने देंगे। वे दया और क्षमा की भाषा समझते ही नहीं। जो जिस भाषा का अभ्यस्त है उसे उसी का प्रयोग करके औचित्य अपनाने के लिये सहमत किया जा सकता है।
कृष्ण में ऐसे अनेक सद्गुण थे जिनने उन्हें भगवान स्तर का गौरव प्रदान किया।
वे अपनी विनम्रता में कमी नहीं रहने देते थे और साथी को अधिकाधिक श्रेय देने की उदारता बरतते थे।
अर्जुन को रथ पर बिठाया। महाभारत विजय का श्रेय उसी को दिलाया। पाण्डवों के राजसूय यज्ञ में उन्होंने अतिथियों के पैर धोने का काम अपने जिम्मे लिया और अधिष्ठाता के रूप में युधिष्ठिर को उच्च आसन पर बिठाया।
चरित्र निष्ठा मनुष्य की सर्वोपरि सम्पदा है। विश्व रूपी रंगमंच पर अवतरित होते रहने वाले महापुरुषों की सफलता एवं उनकी महानता का आधार उनका श्रेष्ठ आदर्श चरित्र ही रहा है। इस अक्षुण्ण सम्पदा के आधार पर ही मानव महात्मा, युग पुरुष, देवदूत अथवा अवतार स्तर तक ऊँचा उठने में समर्थ होता है, ऐसे ही चरित्रनिष्ठ व्यक्तित्वों ने विश्व वसुन्धरा को अभिसिंचित कर इस विश्व उद्यान की श्रीवृद्धि की है। उनने मानवी गरिमा को बढ़ाकर महान कार्य सम्पादित किया हैं। ऐसे ही व्यक्ति प्रकाश स्तंभ की भाँति स्वयं प्रकाशित रहते हुए अन्यों को प्रकाश एवं प्रेरणा देने में सक्षम होते हैं। उनके पार्थिव शरीर भले ही जीवित न हों पर उनका अमर यश सर्व-साधारण के लिए हमेशा प्रकाश दीप बनकर युग-युग तक मार्ग दर्शन करता रहेगा, वे जन श्रद्धा के अधिकारी बने रहेंगे।
ऐसे ही चरित्रवान पुरुषों को भगवान की, देवमानव की, पैगम्बर की संज्ञा दी गई है। शास्त्रों में भी इसका समर्थन है। पद्मपुराण (सं0 7 वा0 अ॰ 1) में कहा गया है कि- ‘धर्मोपदेशक, दयावान, छल−कपट से शून्य, पाप मार्ग के विरोधी ये चारों भगवान के समान हैं।’ इसी प्रकार नारद पुराण (पूर्व खण्ड अ॰ 7) में कहा है- ‘अन्यों के दुख में दुखी, दूसरों के हर्ष में जो हर्षित होता है, वह चरित्रवान व्यक्ति नर के रूप में जगत का ईश्वर है।’ कभी इस धरा पर ऐसे चरित्रवान महामानवों की बहुलता थी जो अपने आचरणों के द्वारा सामान्य जनता के प्रेरणा स्रोत थे। उदात्त, चरित्रवान, आदर्शभूत संतों, आचार्यों, ऋषियों के पुनीत आचरण से प्रेरित प्रभावित हो-होकर उनके शिष्यों के मन में ऐसी पवित्र श्रद्धा एवं धारणा उत्पन्न होती थी कि- “हम भी इन्हीं के समान बन जांय।” तब वे भी उन्हीं के समान बनने का प्रयत्न करते थे। यह एक तथ्य भी है कि मनुष्य का स्वभाव अनुकरण प्रिय है। जैसा उसको आदर्श मिलता है, जैसा वह सोचता और करता है, वैसा ही वह बन जाता है।
मानवीय गरिमा की वृद्धि करने वाली सम्पत्ति में चरित्र की सम्पदा का ही नाम अग्रणी है। अन्य सम्पत्ति इससे कम महत्व की है। कहा भी गया है कि- धन तो आता जाता रहता है। उसकी क्षति कोई बड़ी क्षति नहीं मानी जा सकती। स्वास्थ्य गड़बड़ाने पर कुछ हानि हुई समझी जा सकती है परन्तु यदि कोई मनुष्य चरित्रहीन हो जाय तो समझना चाहिए उसका सर्वनाश हो गया। अतः बुद्धिमान पुरुष को विवेकवान व्यक्ति को अनीति एवं दुराचरण का त्याग कर सदैव अपने चरित्र की रक्षा करना चाहिए। इस सम्पत्ति के धनी व्यक्ति ही अन्य प्रकार की भौतिक सम्पत्तिवानों के हृदय पर अपना प्रभुत्व जमा सकता है। चरित्रवान व्यक्ति अपनी मौन भाषा से ही समाज को उपदेश देता है। ऐसे व्यक्तियों के संपर्क में आने वाले व्यक्ति सन्तोष का अनुभव करते हैं। ऐसे व्यक्ति ही जनश्रद्धा के पात्र बनते हैं। गाँधी, विनोबा, विवेकानन्द, दयानन्द, विद्यासागर आदि सदाचारी महामानवों के धवल चरित्र इसके प्रत्यक्ष प्रमाण हैं।
आत्मोत्कर्ष के मार्ग में चरित्रनिष्ठा का सम्बल पाकर ही आगे बढ़ा जा सकता है। इसमें बाधक बनने वाले रोड़ों तथा कंटकों में इन्द्रिय लिप्सा तथा वासनाएँ प्रमुख हैं। इनके ऊपर अंकुश न रखा गया तो चरित्र भ्रष्ट होने की संभावना बनी रहती है। वासना के थोड़े से झोंके में आचरण की नींव न हिल जाय, इसके लिए इन्द्रियों पर अंकुश रखा जाय। इन्द्रियों पर अंकुश रखा जाना चारित्रिक उत्कृष्टता का आधार है जिसके कारण श्रेष्ठतम स्तर का बना जा सकता है। शास्त्रों में इसकी महत्ता स्वीकार की गई है और कहा गया है कि कामेंद्रिय और जिह्वा ये दोनों जिनके वश में हैं उनकी तुलना परमेश्वर से की जा सकती है।
जैन धर्म में चरित्र निष्ठा को मानवी उत्कर्ष का एक प्रमुख आधार माना गया है एवं इसकी गणना ‘त्रिरत्न’ में की गई है। उसके अनुसार मनुष्य की धार्मिकता उसके चरित्र से जानी जाती है। चरित्र ज्ञान से बनता है तथा ज्ञान शास्त्रों के अध्ययन से मिलता है। चरित्र निर्माण के लिए भगवान महावीर ने अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य एवं अपरिग्रह नामक पंच महाव्रतों के परिपालन को अनिवार्य बताया है। चीन के प्रख्यात दार्शनिक कन्फ्यूशियस कहा करते थे कि हृदय में पवित्रता हो तो चरित्र में सौंदर्य होगा। चरित्र में सौंदर्य होगा तो परिवार में संतुलन रहेगा। परिवार में संतुलन होगा तो समाज में राष्ट्र में सुव्यवस्था होगी और इससे संसार में शाँति का वातावरण बनेगा। वे युवकों को सदैव चरित्रवान बनने की प्रेरणा दिया करते थे। वे उनसे कहा करते थे कि- जब कोई अपने से बड़ा या अच्छा आदमी देखो तो सोचो-कि मैं उससे क्या सीख सकता हूँ। किन्तु जब कोई छोटा या बुरा आदमी देखो तो अपने चरित्र के भीतर झाँककर देखो कि कहीं वह बुराई या भ्रष्टता अपने अंदर तो नहीं छिपी पड़ी है। यदि है तो उसे उखाड़ फेंको। महानता की गगनचुम्बी दीवार सच्चरित्रता की नींव पर ही खड़ी होती है। मानव की सर्वोच्च सम्पदा यही है। इसके बिना मनुष्य नैतिक नहीं रह सकता।
बुद्ध, ईसा मसीह, मुहम्मद, जरथुस्त्र आदि सभी मनस्वी महापुरुष चरित्र के धनी थे और उसी के बल पर उन्होंने लोगों को अभीष्ट पथ पर चलने को बाधित किया। आज के तथाकथित उपदेशक-धर्म प्रचारक आकर्षक प्रवचन भर देते हैं और लोग उनके इस कला की प्रशंसा भी करते हैं। पर उनमें से ऐसे कोई नहीं होते जो उन उपदेशों पर चलने को तैयार हों। कारण स्पष्ट है कि उसमें प्रतिपाद्य विषय का दोष नहीं वरन् उस मनोबल की-प्राण ऊर्जा की कमी ही वह प्रधान कारण है जो चारित्रिक निर्मलता से प्राप्त होती है और जिसके बिना सुनने वालों के मस्तिष्क में हलचल उत्पन्न किया जा सकना-अंतःकरण को छू सकना संभव नहीं। समर्थ गुरु रामदास, रामकृष्ण परमहंस, गुरु गोविंद सिंह, कबीर आदि मनस्वी महामानवों ने अपने सदाचरण से ही असंख्यों को उपयोगी प्रेरणायें दीं और अभीष्ट पथ पर चलने के लिए साहस उत्पन्न किया। गाँधी जी की प्रेरणा से स्वतंत्रता संग्राम में अगणित व्यक्ति त्याग बलिदान करने के लिए किस उत्साह के साथ आगे आये, यह पिछले दिनों की घटना है। वस्तुतः चारित्रिक उत्कृष्टता के आधार पर ही शक्ति अर्जित होती है। पात्रता इसी आधार पर विकसित होती है और दैवी अनुग्रह का पारलौकिक एवं जनश्रद्धा व जन सहयोग का लौकिक लाभ प्रस्तुत करती है। अर्जुन, कच, शिवाजी आदि की चरित्र निष्ठा ही उनके लिए दैवी वरदान और विजय का आधार बनी थी।
चरित्र ही जीवन की आधार शिला है। भौतिक एवं आध्यात्मिक सफलताओं का मूल भी यही है। विश्वास भी लोग उन्हीं का करते हैं जिनके पास चरित्र रूपी सम्पदा है। चरित्रवान साधक की ही साधनायें सफल होती हैं। मर्यादाओं का पालन करने वाले निष्ठावान साधकों का उत्साह और मनोबल देखते ही बनता है।
वस्तुतः चरित्र मनुष्य की मौलिक विशेषता एवं उसका निजी उत्पादन है। व्यक्ति इसे अपने बलबूते विनिर्मित करता है। इसमें उसके निजी दृष्टिकोण, निश्चय संकल्प एवं साहस का पुट अधिक होता है। इसमें बाह्य परिस्थितियाँ तो सामान्य स्तर के लोगों पर ही हावी होती हैं। जिनमें मौलिक विशेषता है, वे नदी के प्रवाह से ठीक उलटी दिशा में मछली की तरह अपनी भुजाओं के बल पर चीरते-छरछराते चल सकते हैं। निजी पुरुषार्थ एवं अन्त शक्ति को उभारते हुए साहसी व्यक्ति अपने को प्रभावशाली बनाते व व्यक्तित्व के बल पर जन सम्मान जीतते देखे गये हैं। यह उनके चिन्तन की उत्कृष्टता, चरित्र की श्रेष्ठता एवं अन्तराल की विशालता के रूप में विकसित व्यक्तित्व की ही परिणति है। जिसे भी इस दिशा में आगे बढ़ना हो, उसके लिए यही एकमात्र राजमार्ग है।
चरित्र-विकास ही जीवन का परम उद्देश्य होना चाहिए। इसी के आधार पर जीवन लक्ष्य प्राप्त होता है। इस सम्पदा के हस्तगत होने पर ही जीवन का वास्तविक आनन्द प्राप्त किया जा सकता है। यही सम्पत्ति वास्तविक सुदृढ़ और चिरस्थायी होती है। अतः हर स्थिति में इस संजीवनी की रक्षा की जानी चाहिए।
गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने मानव शरीर को रथ की उपमा देते हुए कहा है कि इन्द्रिय इसके घोड़े हैं, मन सारथी और आत्मा स्वामी। शरीर और मन का संबंध शासित और शासक जैसा है। शरीर वही कुछ करता है जिसका मन निर्देश देता है। मन जिधर लगाम खींचता है, शरीर रथ के घोड़े उधर ही दौड़ पड़ते हैं और उसके संकेतों पर विराम लगा देते हैं। ऐसा कोई शारीरिक क्रिया−कलाप नहीं जो मन की इच्छा के विपरीत सम्पन्न होता हो।
जिसकी इच्छा आज्ञा के बिना कोई क्रिया व्यापार सम्पन्न न होता हो, उसे अधिपति नहीं तो और क्या कहा जायगा? मन के कारण ही शरीर में गड़बड़ियाँ उत्पन्न होती हैं। शरीर में ऐसा कोई घटक नहीं है जो मन की उपेक्षा कर सके। मन से बलवान आत्मा है और उससे सशक्त कोई इकाई शरीर में है ही नहीं। निर्विवाद रूप से शरीर पर मन एवं आत्मा का ही एक छत्र राज्य है। इस तथ्य को जानने के बाद यह मानने से इंकार करने का कोई कारण नहीं है कि मन का असंतुलन शोक संताप तथा उद्वेगों के साथ रोग बीमारियों के रूप में भी अपना प्रभाव उत्पन्न करे। विज्ञान भी अब क्रमशः इस निष्कर्ष पर पहुँचता जा रहा है कि रोगों का कारण शरीर में नहीं मन में है। वहीं से सारे रोग जन्म लेते है और शरीर को विभिन्न तरह से खोखला बनाते हैं। अमेरिका के मन शास्त्री और मनोरोग चिकित्सक राबर्ट डी0 राँप ने व्यापक सर्वेक्षण के बाद यह प्रतिपादित किया है कि असाध्य समझे जाने वाले अधिकाँश रोगों का कारण मनुष्य के मन में रहने वाली दुश्चिन्ताएँ, कुँठाएँ, उलझनें, ग्रंथियाँ और चिंतन की विकृतियाँ हैं। उनका कथन है कि जटिल से जटिल रोग भी वहीं से उपजते हैं एवं चिकित्सा वहीं की की जानी चाहिए।
कनाडा के एक शरीर शास्त्री और मनोविज्ञानी डॉ. डैनियल कापोने के अनुसार तमाम उपचारों के बावजूद भी काबू में न आने वाला साधारण सा रोग जुकाम केवल मानसिक कारणों से ही उत्पन्न होता है। शरीर शास्त्रियों के अनुसार जुकाम का निमित्त कारण विषाणु का आक्रमण होता है पर उनकी प्रकृति अन्य विषाणु सजातियों से सर्वथा भिन्न होती है। चेचक, खसरा आदि रोगों का आक्रमण एक बार होने पर शरीर में उनके रोगाणुओं से लड़ने की शक्ति आ जाती है। फलतः इन रोगों के दुबारा उत्पन्न होने का खतरा नहीं रहता लेकिन रोजमर्रा के कष्ट सर्दी जुकाम पर यह बात लागू नहीं होती। वह कई बार होता और लगातार बना रहता है। जब तक मानसिक तनाव कम नहीं होता, वह नियंत्रण में आता भी नहीं, चाहे कितनी ही एण्टीबायोटिक्स, एण्टीएलर्जिक ड्रग्स ली जा रही हों। सामयिक रूप से यों तो जुकाम दवाओं से एक बार अच्छा हो जाता है किन्तु तुरंत बाद होने पर दुबारा उससे अच्छा नहीं होता। मन बहलाने के लिये चाहे जो दवायें ली जाती रहें, लेकिन सही बात यही है कि जुकाम की कोई दवा नहीं होती, क्योंकि कारण कहीं और है, चिकित्सा कहीं और की हो रही है।
रोगों का कारण शरीर में नहीं मन में है इस तथ्य को चिकित्सा-विज्ञान ने सिद्धान्ततः स्वीकार कर लिया है और इस आधार पर रोगों के उपचार की नई पद्धतियाँ भी खोजी तथा अपनायी जाने लगी हैं। बड़े शहरों में साइक्रियाट्रिस्ट तथा फिजीशियन उपचार करते समय रोग परीक्षण के साथ रोगी के मनोविश्लेषण पर भी ध्यान देने लगे हैं। उपचार की यह समन्वित पद्धति काफी सफल रही है। और काई आश्चर्य नहीं कि अगले दिनों प्रचलित चिकित्सा पद्धति की उपयोगिता को नकार दिया जाए तथा उसके स्थान पर मानसोपचार एवं औषधोपचार की मिश्रित चिकित्सा पद्धति अपनाई जाए। आज से लगभग 25 वर्ष पूर्व ब्रिटेन के डॉ. हैरी एडवर्डस् ने तो बिना दवा और बिना औजार के एक नई ही चिकित्सा पद्धति विकसित की थी जिसे उन्होंने “स्पिरीचुअलहीलिंग” अथवा “आध्यात्मिक चिकित्सा” का नाम दिया था।
डॉ. हैरी एडवर्डस् ने अपनी पुस्तक “ट्रुथ अबाउट स्प्रिचुअल हीलिंग” में इस चिकित्सा पद्धति के सिद्धान्तों और विधियों का उल्लेख करते हुए ऐसे कई रोगियों के विवरण दिये हैं जिन्हें डाक्टरों ने लाइलाज घोषित कर दिया था किन्तु डॉ. एडवर्डस् ने उन्हें अल्पावधि में ही आध्यात्मिक चिकित्सा से ठीक कर दिया। लंदन की एक महिला एलिजाबेथ विल्सन की रोग गाथा और उससे मुक्त होने की कथा बड़ी और विचित्र भी है। सन् 1929 में जब वह कुल साढ़े तीन वर्ष की थी, उसकी रीढ़ की हड्डी में दर्द हुआ। दर्द इतना भयंकर था कि उसे पूरे एक वर्ष तक बिस्तर पर सीधे लिटाये रखा गया और उसका इलाज भी कराया गया। लेकिन रोग ठीक होने के बजाय गंभीर ही होता चला गया। चौदह वर्ष तक पहुँचते-पहुँचते तो पीड़ा असहनीय हो चुकी थी और वह चलने फिरने में असमर्थ हो गई। एलिजाबेथ पूरे 35 वर्षों तक यह पीड़ा झेलती रही। चिकित्सकों ने हार मान ली और उसके मर्ज को लाइलाज बताया। सन् 1960 में एलिजाबेथ के अभिभावकों को किसी ने डॉ. एडवर्डस् के संबंध में बताया। वे उपचार के लिये डॉ. एडवर्डस के पास ले गए। आश्चर्य की बात है कि कुछ ही हफ्तों की मनःचिकित्सा तथा सहानुभूतिपरक वनौषधियों के इलाज से वह ठीक हो गई।
डॉ. हैरी एडवर्डस् ने अपनी इस चिकित्सा पद्धति के सम्बन्ध में अपनी पुस्तक “ट्रुथ अबाउट स्पिरिचुअल हीलिंग” में लिखा है कि आध्यात्मिक चिकित्सा पद्धति पूर्वार्त्त दर्शन द्वारा प्रतिपादित एक निश्चयात्मक विधि है और इसका परिणाम भी तर्कसंगत है। वे कहते हैं कि नारंगी अच्छी होती है। यदि ऐसा न होता तो उसके उगने और विकसित होने का कोई मतलब नहीं होता। यदि पेड़ पर से तोड़ने के बाद नारंगी खराब पाई जाती है तो इसका अर्थ यह नहीं है कि उसके उगने का उद्देश्य गलत था। खराब नारंगी एक बीमार नारंगी है और इसके लिये नारंगी दोषी नहीं है। दोष या तो किसी जन्मजात कमी के कारण होता है अथवा उसका कोई बाह्य कारण होता है। संभवतः नारंगी को टहनी से जोड़ने वाली डंडी कमजोर हो। इससे नारंगी गिर सकती है और गिर कर खराब हो सकती है या फिर उसकी बीमारी का कारण बाहरी हो सकता है। कहने का आशय यह है कि कारण चाहे जो भी हो, उसे दूर किया जा सकता है, उसका उपचार किया जा सकता है। नारंगी की तरह ही आदमी भी भीतरी कमजोरी या बाहरी आक्रमण का शिकार हो सकता है। अतः जिस प्रकार वृक्ष का पोषण करने के साथ नारंगी की टहनी से जोड़ने वाली कड़ी को मजबूत बनाना जरूरी है, उसी तरह उस कड़ी को भी मजबूत बनाना आवश्यक है जो मनुष्य को उसके उद्गम से जोड़ती है। स्वास्थ्य का अर्थ है सामान्य और प्राकृतिक स्थिति। बीमारी का अर्थ है स्थिति सामान्य-प्राकृतिक नहीं है और उसे सामान्य बनाने की आवश्यकता है। यह काम अध्यात्म चिकित्सा द्वारा हो सकता है तथा होना चाहिए। चिकित्सा का मूलभूत प्रयोजन इतना होना चाहिए कि मनुष्य का संबंध सूत्र उसके उद्गम से अन्तःकरण से जुड़ जाए। आध्यात्मिक चिकित्सा का काम मनुष्य और उसके सर्जक के बीच के संबंधों को पुनर्स्थापित करना है।
प्रचलित चिकित्सा पद्धति मनुष्य को कुछ रासायनिक तत्वों का योग भर मानकर चलती है और स्वास्थ्य में खराबी का कारण इन रासायनिक संतुलनों का गड़बड़ा जाना मात्र समझती है। दवाएँ परहेज, उपचार और शल्य चिकित्सा आदि सभी उपाय इस लड़खड़ाते संतुलन को साधने के लिये किये जाते हैं। यह रासायनिक संतुलन दवा और उपचार से कुछ समय के लिए स्थापित भी हो जाते हैं। किन्तु डॉ. एडवर्डस् के अनुसार स्वास्थ्य की सही सिद्धि अपने मूल स्त्रोत से जुड़ जाने पर पूरी होती है। वह मूल स्त्रोत आध्यात्मिक सत्ता या परम चेतना है। सही कारण है कि जिन कई रोगों को आधुनिक चिकित्सा असाध्य अथवा दुःसाध्य मानती है, “स्पिरिचुअल हीलिंग” द्वारा उन्हें बड़ी सरलता से थोड़े ही समय में ठीक कर दिया गया।
डॉ. एडवर्डस् इसे कोई चमत्कार नहीं मानते। उनका कहना है कि चमत्कार का अर्थ तो यह है कि जो असामान्य हो और साथ ही जिसका कोई कारण समझ में न आए। लेकिन अध्यात्म चिकित्सा सुनिश्चित नियमों और तर्क संगत कारणों के आधार पर अपना प्रभाव उत्पन्न करती है। अतः उसे सामंजस्य बिठाने वाली प्रक्रिया भर माना जाना चाहिए। बात सही भी है।
कहा जा चुका है कि मन शरीर का संचालक और नियामक है। मनः शास्त्री इसे शरीर का स्वामी मानते हैं। परन्तु भारतीय तत्वदर्शन मन को शरीर संचालन के लिये आत्मा द्वारा नियुक्त एक कर्मचारी मात्र मानता है अर्थात् स्वास्थ्य, सुव्यवस्था और शरीर के सुसंचालन में आत्मिक शक्ति की न्यूनता या प्रबलता ही लड़खड़ाने अथवा सम्हालने का आधार बनाती है। जो चेतना शक्ति अपने संकल्प मात्र से इतने बड़े विश्व ब्रह्माण्ड का सृजन कर सकती है, उसे बना और बिगाड़ सकती है, उससे संबद्ध न होने पर शरीर अस्वस्थ हो जाता है तो इसमें आश्चर्य किस बात का?
श्रद्धाभाव से मनी गुरुपूर्णिमा
भोपाल (म. प्र.) स्थानीय शक्तिपीठ के अतिरिक्त हनुमान मन्दिर, शिव मंदिर तथा गुफा मंदिर में भी श्रद्धा के साथ गुरु पूर्णिमा मनाई गई इस पर्व से रचनात्मक कार्यक्रमों के क्रियान्वयन में गति लाने की व्यापक व्यवस्था बनाई गई।
बाराबंकी (उ. प्र.) गुरु पूर्णिमा के अवसर पर सभी कार्यकर्ताओं ने समूचे क्षेत्र में सभी सार्वजनिक स्थानों व प्रत्येक घरों में स्टीकर लगाकर मूक प्रेरणा देने का संकल्प लिया।
अहमदाबाद (गुज.) गुरु पूर्णिमा के दिन कार्यकर्ताओं द्वारा दस हजार स्टीकर समूचे क्षेत्र में घर-घर जाकर लगाये गये। इसे परिजनों ने गुरु पर्व की श्रद्धाँजलि मानते हुए पूरे वर्ष अधिकाधिक स्टीकर लगाकर इस वर्ष के स्टीकर आन्दोलन को सफल बनाने का संकल्प लिया।
सीसावाली, कोटा (राज.) शक्तिपीठ में गुरु पूर्णिमा पर्व सामूहिक रूप से वृक्षारोपण अभियान के शुभारंभ के साथ मनाया गया। स्टीकर आन्दोलन से समूचे क्षेत्र को मूक प्रेरणा देने की भी व्यापक व्यवस्था बनाई जा रही है।
सतना (म. प्र.) स्टीकर आन्दोलन का शुभारंभ पत्र पूजन के साथ ही आरम्भ हुआ। समीपवर्ती क्षेत्र में इस वर्ष दीप यज्ञों के माध्यम से महाप्रज्ञा के प्रसाद की व्यापक व्यवस्था बनाई गई।
धुर्वा, राँची (बिहार) सामूहिक दीप यज्ञ के साथ गुरु पूर्णिमा पर्व सामूहिक रूप से समारोह पूर्वक मनाया गया। रचनात्मक कार्यक्रमों के अंतर्गत स्टीकर आन्दोलन, नारी जागरण शाखाओं की स्थापनाओं जैसे सुगम कार्यक्रमों को पूरा करने के लिए संकल्प लिए गये।
कुँभराज, गुना (म. प्र.) गुरु पूर्णिमा पर्वोत्सव अखण्ड जप के साथ ही भावनात्मक वातावरण में सम्पन्न हुआ। ज्ञान रथ के नियमित संचालन के लिए स्थायी कार्यकर्ता की नियुक्ति करके टेप रिकार्डर व लाउडस्पीकर की भी व्यवस्था की गई।
दारेस्सलाम (तंजानिया) गुरु पूर्णिमा के पुण्य पर्व पर शक्ति को सुन्दर ढँग से सजाया गया। जप, पूजन के साथ साँस्कृतिक कार्यक्रम तथा खेल-कूद का भी आयोजन कर विजेताओं को पुरस्कार वितरण किया गया। वातावरण ने लोगों का मन मोह लिया।
सूरत (गुज.) गुरु पूर्णिमा के पुण्य अवसर पर स्थानीय सभी कार्यकर्ताओं द्वारा 24 स्थानों पर दीप यज्ञ कराने, स्टीकर आन्दोलन से जन-जन को प्रेरित करने, महिला मंडलों के अधिकाधिक मंडल बनाने का संकल्प सामूहिक रूप से लेकर गुरु पर्व की सच्ची श्रद्धाँजलि समर्पित की गई।
वासणा, अहमदाबाद (गुज.) श्री जगदीश भाई भट्टा द्वारा गुजरात में सभी पुस्तकालयों में युग साहित्य पहुँचाने की योजना गुरु पर्व से बनाई गई है। सम्पन्नों से आर्थिक सहयोग देकर पुस्तकें खरीदने तथा पुस्तकालयों में पहुँचाने का काम सफलता पूर्वक किया जा रहा है। अब तक 5000 पुस्तकें विभिन्न पुस्तकालयों में वितरित की जा चुकी है।
वसना रायपुर (म. प्र.) पावन पर्व गुरु पूर्णिमा समारोह पूर्वक मनाया गया। क्षेत्रीय विधायक राजा महेन्द्र बहादुर सिंह भी गुरु पूजन के अवसर पर उपस्थित रहे। समूचे क्षेत्र में सद्वाक्य लेखन तथा स्टीकर आन्दोलन के माध्यम से मूक देने की व्यापक व्यवस्था की जा रही है।
जयपुर (राज.) गुरु पर्व की वेला में परिजनों द्वारा एक अभिनव संकल्प लिया गया - जयपुर गायत्री शक्तिपीठ ब्रह्मपुरी से बाटिका प्रज्ञापीठ तक इक्कीस किलोमीटर की पद यात्रा का। आशा से अधिक परिजन एकत्र हुए। सभी में बड़ा उत्साह था। शंखनाद के साथ यात्रा आरम्भ हुई रास्ते भर नव निर्माण की प्रेरणा देने वाले, राष्ट्रीय एकता के मिशन के नारों को सुनकर नागरिकों की भीड़ उमड़ती हुई देखने को मिली रास्ते में आदर्श वाक्य लेखन भी हुआ तथा स्टीकर्स भी चिपकाये गये कुछ ही सप्ताह पूर्व हुए विशाल दीपयज्ञ के उत्तरार्ध के रूप में आयोजित इस पद यात्रा ने परिजनों में नूतन प्रेरणा का संचार किया है।
पटना (बिहार) गुरु पूर्णिमा का पावन पर्व हर्ष और उल्लास के वातावरण में सम्पन्न हुआ। रिजर्व बैंक कालोनी, डार्क्टस कालोनी तथा प्रोफेसर्स कालोनी से गुरु पूजन के समय विशाल जन समूह उमड़ पड़ा। इस अवसर पर नगर के कई पदाधिकारी भी उपस्थित रहे। डॉ. चन्द्र भूषण मिश्र द्वारा गुरु शिष्य के पावन सम्बन्ध की भावपूर्ण विवेचना की गई। कार्यकर्ताओं द्वारा रचनात्मक कार्यक्रमों के क्रियान्वयन के लिए भाव-भरे संकल्प लिए गये।
महोबा (उ. प्र.) अखण्ड जप एवं गुरु पर्व पूजन का कार्य समारोह पूर्वक श्रद्धासिक्त वातावरण में सम्पन्न हुआ। प्रत्येक मंगलवार को सायं 5 बजे से 6 बजे तक सभी कार्यकर्ताओं ने नियमित रूप से एकत्रित होकर रचनात्मक कार्यक्रमों के क्रियान्वयन की प्रगति समीक्षा करने का संकल्प लिया।
भादरवा, बड़ोदा (गुज.) गुरु पूर्णिमा पर्व सामूहिक दीप यज्ञ के साथ भाव भरे वातावरण में मनाया गया। स्थानीय कार्यकर्ताओं द्वारा 108 स्थानों पर दीप यज्ञ कराने, महिला मण्डलों के गठन करने तथा समूचे क्षेत्र में स्टीकर आन्दोलन के अंतर्गत मूक प्रेरणा देने का संकल्प लिया गया।
रींवा (म. प्र.) गुरु पूर्णिमा पर्व सामूहिक रूप से समारोह पूर्वक मनाया गया। स्थानीय कार्यकर्ताओं ने अधिकाधिक महिला मण्डलों की स्थापना, स्टीकर आन्दोलन के माध्यम के अधिकाधिक लोगों को मूक प्रेरणा देने तथा जिले के प्रत्येक गाँव तक पहुँचकर दीप यज्ञ कराने के भाव-भरे संकल्प लेकर गुरु पर्व पर सच्ची श्रद्धाँजलि समर्पित की गई।
विविध गतिविधियाँ
बहराइच (उ. प्र.) गायत्री शक्तिपीठ में स्थानीय स्तर पर दस दिवसीय साधना सत्र आयोजित किया गया। इसमें समीपवर्ती शाखाओं के अधिकाधिक भावनाशील परिजन सम्मिलित हुए। उपस्थित साधकों को विभिन्न तरीके से जनजागरण के प्रयासों में सहयोगी बनने की प्रेरणा दी गई। अपनी-अपनी शाखाओं में महिला मण्डलों के गठन तथा सभी रचनात्मक कार्यक्रमों को पूरा करने का संकल्प लिया गया।
इन्दौर (म. प्र.) स्थानीय महिला मंडल के प्रयासों से गायत्री शक्तिपीठ में बाल संस्कार शाला की स्थापना की गई। अभी तक लगभग 50 बच्चे इस पाठ्यक्रम से लाभान्वित हो रहे हैं। संस्कार शाला के अतिरिक्त सिलाई स्कूल तथा प्रौढ़ शिक्षा विद्यालय की भी स्थापना की गई है। यह कार्यक्रम प्रज्ञा आलोक के विस्तार में अतीव उपयोगी सिद्ध हो रहे हैं।
करेली कालोनी, इलाहाबाद (उ. प्र.) शाखा की महिला सदस्याओं द्वारा महिला मंडलों के गठन तथा रचनात्मक कार्यक्रमों के क्रियान्वयन की व्यापक व्यवस्था बनाई जा रही है। स्टीकर आन्दोलन, वृक्षारोपण तथा दीप यज्ञायोजनों के माध्यम से प्रज्ञा आलोक के प्रयास आरम्भ हो गये हैं।
महिला मंडलों की मंगल स्थापनाएँ
छुरिया, राजनाँदगाँव (म. प्र.) गायत्री जयन्ती के पुण्य अवसर पर पाँच सदस्यीय महिला मंडल का गठन किया गया। श्रीमती ललिता बेन पटेल, श्रीमती दक्षबेन पटेल, श्रीमती मीनाबेन पटेल, कु0 कमला सिन्हा एवं कु0 दीप कश्यप ने अपने साथ चार-चार और सदस्य जोड़कर नियमित रूप से साप्ताहिक सत्संग गोष्ठी चलाने का संकल्प लिया है।
राउरकेला (उड़ीसा) स्थानीय महिला शाखा की सदस्याओं द्वारा पूज्य गुरुदेव के आह्वान पर प्रत्येक सेक्टर में सक्रिय महिला मंडलों की स्थापनाओं का प्रयास व्यापक स्तर पर किया जा रहा है। प्रत्येक सेक्टर में गोष्ठी आयोजित कर हर सेक्टर में अधिकाधिक मंडलों की स्थापना कर स्टीकर आन्दोलन ज्ञान रथ संचालन तथा साप्ताहिक गोष्ठी के लिए प्रयास किए जा रहे हैं।
आदर्श विवाह संपन्न
मुजफ्फरपुर (बिहार) पत्रकार श्री महावीर प्रसाद सिन्हा ने जातीय एवं पारिवारिक विरोध की परवाह न करते हुए अपनी बच्ची आयु0 नमिता का विवाह चि0 शशिभूषण प्रसाद के साथ आदर्श एवं सादगी भरे वातावरण में करने का साहसिक कदम उठाया है। समूचे क्षेत्र में आदर्श के निर्वाह में यह विवाह चर्चा का विषय बना हुआ है।
धनसार, धनवाद (बिहार) गायत्री शक्तिपीठ प्राँगण में सामूहिक आदर्श विवाह सम्पन्न कराये गये। चि0 पारसमणि, चि0 किशोरी तथा चि0 नन्दलाल के विवाह क्रमशः आयु0 दयामणि, आयु0 रेणु तथा आयु0 कीर्ति के साथ बिना दहेज एवं धूमधाम के सादगी भरे वातावरण में सम्पन्न हुए।
बीसवीं सदी का अन्त और इक्कीसवीं सदी का आरंभ युग सन्धि का ऐसा अवसर है जिसे अभूतपूर्व कहा जा सकता है। शायद भविष्य में भी इसकी पुनरावृत्ति कभी न हो। विज्ञान ने सुविस्तृत संसार को किसी गली-मुहल्ले की तरह निकटवर्ती बना दिया है। व्यक्ति और समाज की समस्याएँ आपस में गुँथ गई हैं। साथ मरने साथ जीने जैसा माहौल बन गया है इसलिए समस्याओं और समाधानों की खोज नये किन्तु व्यापक दृष्टि से करनी होगी। अपने मतलब से मतलब रखने का आदिम कालीन सोच अब चल न सकेगा।
इन दिनों महाविनाश एवं महासृजन आमने-सामने खड़े हैं। इनमें से एक का चयन सामूहिक मानवी चेतना को ही करना पड़ेगा। उस चेतना को, जिसका प्रतिनिधित्व जाग्रत और वरिष्ठ प्रतिभाएँ करती रही हैं। ऐसी प्रतिभाएँ जो प्रामाणिकता एवं सुप्रखरता से सुसम्पन्न हों। उन्हीं को युग समन्वय का निर्णायक भी कहा जा सकता है।
विस्फोटक गति से बढ़ती हुई जनसंख्या, खाद्य और खनिज पदार्थों में निरन्तर होती जा रही कमी, बढ़ता हुआ वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण, आणविक विकिरण, वनों का अत्यधिक कटाव, धरती की उपजाऊ परतों का क्षरण और रासायनिक भरमार से उसकी उर्वरता का समापन, बढ़ते शहर-घटते गाँव, औद्योगीकरण के कारण बढ़ती बेरोजगारी, नशेबाजी, व्यभिचार जैसी दुष्प्रवृत्तियाँ लोभ, मोह, विलास और प्रदर्शन से भरी पूरी संकीर्ण स्वार्थपरता, कुप्रचलनों के प्रति दुराग्रह जैसी अनेक समस्याएँ इन दिनों तूफानी गति से उभर रही हैं। उनकी बढ़ती तूफानी दिशा-धारा मानवी गरिमा को अपने प्रवाह में बहा ले जा सकती हैं और महाप्रलय के दृश्य उपस्थित कर सकती हैं। धरती का बढ़ता तापमान जल प्रलय, हिम प्रलय, प्रचंड तपन, भुखमरी, सूखा, महामारी जैसे स्तर के संकट उत्पन्न कर सकते हैं जिससे मानवी सत्ता और सभ्यता का अता-पता भी न चले।
एक ओर जहाँ यह सर्वभक्षी विभीषिकाएँ इस सुन्दर विश्व उद्यान को तहस-नहस करने पर तुली हुई हैं। वहीं आशा की ऊषाकाल जैसी एक क्षीण किरण नवोदय का युग-परिवर्तन का संकेत भी दे रही है। ऐसी विषम परिस्थितियों में विनाश का दमन और विकास का अभ्युदय करने हेतु महाकाल की नियामक चेतना अवतरित होती रही है और संकटों को टालती रही है। “यदा यदा हि धर्मस्य” वाली उक्ति में इस युग-युग में घटित होने वाली सम्भावना का आश्वासन भी है। सृष्टि अपनी इस अनुपम कलाकृति धरित्री, मानवी सत्ता और उसकी महत्ता का सर्वथा विनाश न होने देने का चमत्कारी सरंजाम भी जुटाती रही है। इस बार वैसा न हो, ऐसी निराश किसी को भी नहीं अपनानी चाहिए। उज्ज्वल भविष्य का नाम ही इक्कीसवीं सदी से आरंभ होने वाला सृजन पर्व है।
महाकाल का अवतार जाग्रत आत्माओं की आदर्शवादी अन्तः चेतना में ही प्रकट और प्रखर होता है। व्यापक समाधान उसी तूफानी उभार के आधार पर संभव है। महान परिवर्तनों का श्रेय अग्रगामी लोगों को मिले यह स्वाभाविक है पर वस्तुतः अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ता। सृजन की संयुक्त शक्ति की युग परिवर्तन जैसे महान कार्य सम्पन्न करती है। अवतार की दार्शनिकता इसी केन्द्र में खोजी जा सकती है। देवताओं की संयुक्त शक्ति से दुर्गावतार हुआ था। ऋषियों के एक संचय से सीता का उद्भव और असुरता का दमन संभव हुआ था। राम के रीछ, वानर, कृष्ण के ग्वाल बाल, बुद्ध के भिक्षु, गाँधी के सत्याग्रही इस प्रकार की भूमिकाएँ सम्पन्न करते हुए असंभव को संभव बनाते रहे हैं। इस बार भी वही होने जा रहा है।
विनाश के दमन और विकास के सृजन के इस आपत्तिकाल में महाकाल ने प्राणवान प्रतिभाओं को जाग्रत आत्माओं को सहयोगी और सहभागी बनाने के लिए आमंत्रण भेजा है। प्रमादी और कुसंस्कारी इसे अनदेखी, अनसुनी करके उपेक्षा भी बरत सकते हैं पर जिनके भीतर आदर्शों की उत्कृष्टता, दूरदर्शी विवेकशीलता विद्यमान है वे समय चूककर सदा पछताते रहने की भूल नहीं कर सकते। महत्वपूर्ण अवसरों की अवमानना करने वाले ही अभागे कहलाते हैं। साहसिक तो सहज सम्भावना में भागीदार बनने के लिए पाण्डवों जैसी साहसिक सूझबूझ का परिचय देते हैं।
यह प्रसव वेदना की घड़ी है। एक ओर असह्य वेदना, दूसरी ओर सुसंतति का लाभ प्राप्त करने का सुयोग। रात्रि के अवसान पर तमिस्रा धीरे-धीरे धीमी हो जाती है। दूसरी ओर ब्रह्म मुहूर्त की अवचेतन ऊर्जा और आभा बन कर अरुणोदय की तैयारी में जुटती हैं। इस संधि पर कृपण कायर ही असमंजस अनुभव करते हैं। जिसकी उमंगें भरी नहीं हैं वे प्रातः काल में जग पड़ते हैं। रात्रि वाली रीति-नीति बदलते और प्रभात कालीन नये क्रिया कलापों, नये उत्तरदायित्वों का वहन करते हैं।
इन दिनों ऐसे मणिमुक्तकों की तलाश हो रही है जिनका सुगठित हार युग चेतना की महाशक्ति के गले में पहनावा जा सके। ऐसे सुसंस्कारियों की तलाश युग निमंत्रण पहुँचा कर की जा रही है जो जीवित होंगे करवट बदलने में उठ खड़े होंगे और संकट काल शौर्य प्रदर्शित करने वाले सेनापतियों की तरह अपने को विजय श्री वरण करने के अधिकारी के रूप में प्रस्तुत करेंगे। कृपण और कायर ही कर्तव्यों की पुकार सुनकर काँपते, घबराते और किसी कोतर में अपना मुँह छिपाने की विडम्बना रचते हैं। एक दिन मरते तो वे भी हैं पर खेद पश्चाताप की कलंक कालिमा सिर पर लादे हुए।
महाविनाश की विभीषिकाएँ अपनी मौत मरेंगी। अरुणोदय अगले ही क्षणों जाज्वल्यमान दिवाकर की तरह उगेगा। यह संभावना सुनिश्चित है। देखना इतना भर है कि इस परिवर्तन काल में युग शिल्पी की भूमिका सम्पादन करने के लिए श्रेय कौन पाता है? किसके कदम समय रहते श्रेय पथ पर आगे बढ़ते हैं।
जाग्रत आत्माएँ इस अवसर पर अपना दायित्व सँभालें इसलिए उन्हें खदानों में छिपे मुक्तकों की तरह प्रयत्न पूर्वक खोजा जा रहा है। जगाया और बुलाया जा रहा है। इस ढूँढ़ खोज के लिए दीप यज्ञों की पुनीति ज्वाला जलाई गई है। अंधकार में खोई हुई वस्तुओं को प्रकाश जलाकर ही खोजा उठाया जाता है। जन-जन को झकझोरने वाली श्रृंखला के सुविस्तृत और सुनिश्चित अभियान की तरह ही दीपयज्ञ अभियान को चलाया जा रहा है। धार्मिकता के भावनात्मक वातावरण में ऐसी ढूँढ़ खोज सहज ही बन भी पड़ती है। देव आरती में बच्चे तो पाई पैसा चढ़ाकर भी मन बहला लेते हैं पर प्रतिभाओं को तो छोटी नाली की तरह गंगा नर्मदा जैसी दिव्य धारा में अपने को समर्पित ही करना पड़ता है। हनुमान, अंगद, अर्जुन, भागीरथ, हरिश्चंद्र, शिवा, भामाशाह, विनोबा, दयानन्द, विवेकानन्द जैसे महामना ऐसा ही साहस दिखाकर कृतकृत्य हुए थे। कृपण तो सड़ी कीचड़ में जन्मने वाले कृमि कीटकों की तरह उपजते और उसी नरक में मरकर अन्तर्ध्यान हो जाते हैं।
दीप यज्ञों के प्रकाश में ज्योतिर्मय आत्माएँ उभरती, झिलमिलाती दीख पड़ेंगी और अपनी उपयुक्त जगह ग्रहण करेंगी ऐसी आशा रखी गई है। महाकाल का यह शंखनाद निष्फल नहीं जा सकता। उसे सुनकर मूर्च्छितों, प्रसुप्तों में भी चेतना का संचार होगा। जो सर्वथा मर चुके हैं उनकी बात दूसरी है।
सर्वप्रथम आगे आने वाले युग सृजेताओं को व्रतधारी प्रज्ञा पुत्र कहा जायगा वे उपासना, साधना, आराधना के आधार पर आत्म परिष्कार करेंगे। धार को पैनी करेंगे और इतनी अन्तः क्षमता अर्जित करेंगे जिसके आधार पर उनसे कुछ महत्वपूर्ण कार्य करते बन पड़ें।
उपासना अर्थात् दिव्य सत्ता के लिए बैठना, उसके साथ गुँथ जाना, आग ईंधन की तरह, सूर्यार्घ के समय अर्पित किये गये जल की तरह। कर्मकाण्ड के रूप में गायत्री जैसे मंत्र का अर्थ सहित ध्यान एवं जप और उदीयमान सूर्य का ध्यान किया जा सकता है। यह नियमित होना चाहिए। उपासना से आत्मबल बढ़ता है प्राण ऊर्जा का रोम-रोम में संचार होता है। इस कृत्य को दैनिक जीवन में किसी न किसी प्रकार गुँथा ही रखना चाहिए।
साधना का पूरा नाम है जीवन साधना। जीवन को सुव्यवस्थित बनाना। जीवन सम्पदा को आत्म परिष्कार और लोक मंगल के पुण्य परमार्थ के साथ जोड़ कर, उसे सब प्रकार कृतकृत्य बनाना। इसके लिए आत्म निरीक्षण, आत्म सुधार, आत्म निर्माण और आत्म विकास जैसी चेष्टाएँ करनी पड़ती हैं। इन्द्रिय संयम, अर्थ संयम, समय संयम, विचार संयम अपनाना होता है। सादा जीवन उच्च विचार का मंत्र हृदयंगम किया जाय। औसत नागरिक स्तर का निर्वाह पाकर संतुष्ट रहा जाय। अपने परिवार के सदस्यों को स्वावलम्बी और सुसंस्कारी बनाना पर्याप्त माना जाय उनके लिए उत्तराधिकार में बड़ी सम्पदा छोड़ मरने की ललक न संजोयी जाय। यही है प्रामाणिकता, प्रखरता और प्रतिभा अर्जित करने का राजमार्ग।
आराधना का अर्थ है विराट ब्रह्म की- विशाल विश्व की - विश्व मानव की सेवा साधना में समुचित उत्साह और तत्परता रखना। इसी परमार्थ परायणता को ईश्वर की आराधना कहते हैं। यही वह पूजा है जिससे आत्म संतोष, लोक सम्मान एवं देवी अनुग्रह के दोनों लाभ प्राप्त होते हैं। स्वार्थ और परमार्थ की समन्वित सिद्धि होती है। लोक परलोक दोनों बनते हैं।
कहना न होगा कि इन दिनों सबसे बड़ा परमार्थ लोक मानस का परिष्कार ही है। इस क्षेत्र में घुसी विकृतियों के कारण ही, दरिद्रता, रुग्णता, आपदा जैसी पिछड़ेपन की जन्मदात्री हीनताएँ मनुष्य के सिर पर चढ़ती हैं। आज की समस्त समस्याएँ आर्थिक संकट के कारण ही उत्पन्न हुई हैं। उन सब का एक ही समाधान है जन-मानस का परिष्कार सत्प्रवृत्ति, संवर्धन। इन्हीं पुण्य प्रयोजनों को प्रमुखता देनी चाहिए।
शान्तिकुँज का प्रज्ञा अभियान इस युग धर्म की सुनिश्चित योजना के अंतर्गत संगठित रूप से चल रहा है। उसी के अंग बन कर समर्पण को सार्थक बनाया जा सकता है। तिनके धागे अलग-अलग रहकर कुछ काम नहीं आते हैं। उनके एकजुट होने पर ही रस्से और कपड़े बनते हैं बंधी सींकें बँधकर बुहारी बनती हैं। बूँदों के समन्वय से जलधार बनती व बहती है। युग धर्म के निर्वाह में यह परमार्थ आराधना धन्य होती है कि नव सृजन के विशालकाय सम्पादन में अपनी ही भागीदारी और अलग-अलग एक चावल की खिचड़ी- ढाई ईंट की मस्जिद न बना कर हीरक हार की तरह संयुक्त शक्ति का परिचय दिया जाय। युग सन्धि के इस आपत्ति काल में तो इसी रीति नीति के अपनाये जाने की और भी अधिक आवश्यकता है।
इस सिद्धान्त को व्यवहार में परिणत करने की प्रारंभिक प्रक्रिया यह है कि दैनिक जीवन में समयदान और अंशदान को नियमित रूप से इस प्रयोजन के लिए नियोजित रखा जाय। न्यूनतम दो घन्टे का समयदान और बीस पैसे का अंशदान तो उदारचेताओं को निकालते ही रहना चाहिए। इस समय व अंशदान को किस प्रयोजन के लिए कहाँ लगाया जाय, इसके लिए सुलभ और सरल उपाय यही है कि अपने संपर्क वाले प्रभाव क्षेत्र में युग चेतना का आलोक वितरण करने के लिए इसे नियोजित किया जाय। आजीविका उपार्जन और परिवार पालन के साथ साथ और इतना तो बन पड़ ही रहता है। उनकी बात अलग है जो वानप्रस्थ, परिव्राजकों की तरह प्राचीन काल की साधु ब्राह्मण परम्परा का निर्वाह करें और घरेलू दायित्वों को दूसरे मजबूत कंधों पर छोड़कर स्वयं जन जीवन में आदर्शवादी प्राण चेतना भरने के लिए बरसते बादलों की तरह, बहते पानी की तरह निकल पड़ें। ऐसा भाव जिनका है वे शान्तिकुँज से संपर्क साधें और अपनी मान्यता तथा परिस्थिति के अनुरूप अपने कार्यरत होने का मार्ग खोजें।
समय दान और अंश दान की नियमितता के संकल्प लेने वाले ही अब “व्रतधारी” प्रज्ञापुत्र कहलायेंगे। व्रतधारी इसलिए कि वे अपने संकल्प को बार-बार तोड़ेंगे-छोड़ेंगे नहीं। पानी के बबूलों जैसे क्षणिक उत्साह दिखाकर उपहासास्पद न बनेंगे। “प्रज्ञापुत्र” इसलिए कि उनका एक ही लक्ष्य है- सद्भावना और सत्प्रवृत्तियों का अभिवर्धन ही अपना प्रधान लक्ष्य और कर्तव्य बनाना। आज की समस्त समस्याओं का हल भी यह एक ही है। यह विनाश का निराकरण और उज्ज्वल भविष्य के विकास प्रक्रिया का संवर्धन इसी आधार पर संभव हो सकता है। आपत्ति कालीन युगधर्म भी यही है। इसके लिए स्वाध्याय और सत्संग को प्रधान अस्त्र−शस्त्र मान कर इन्हीं के आधार पर युग सृजन को संभव कर पाना संभव हो सकता है।
सतयुग की वापसी इसी प्रकार संभव होगी। जिन दिनों मनुष्य में देवत्व का उदय और धरती पर स्वर्ग का अवतरण प्रत्यक्ष दीख पड़ता था उन दिनों चिन्तन, चरित्र और व्यवहार की उत्कृष्टता ही इस प्रकार की सुखद परिस्थितियाँ उत्पन्न कर रही थी। उनमें सभी चैन से रहें और रहने दे सकें। हँसती-हँसती, खिलती-खिलाती, उठती-उठाती जिन्दगी इस आधार पर बितायी जा सकती है। स्वयं पार उतरना और असंख्यों को अपनी नाव पर बिठाकर पार कराना इसी आधार पर सम्भव हो सकता है। कभी इस देव भूमि में सतयुग था तब समस्त संसार उसका लाभ उठाता था। अब फिर उस पुण्य प्रक्रिया का पुनर्जीवन संभव होने जा रहा है। इसी सुनिश्चित संभावना का नाम है - सतयुग की वापसी।
विगत आधी शताब्दी से युग निर्माण योजना और गायत्री परिवार के अंतर्गत नव सृजन आन्दोलन किसी न किसी रूप से चल रहा है। उसके लाखों समर्थक और सहयोगी भी हैं। परन्तु उसमें ऐसों का अनुपात कम हैं। जो नियमित रूप से इस पुण्य प्रयास के लिए समयदान और अंशदान देकर अपनी सक्रियता और निष्ठा का सघन प्रमाण देते हों। अब नये सिरे से नया निर्धारण यह किया गया है, कि नियमित रूप से अपनी सक्रियता का परिचय देने वालों का नये सिरे से पंजीकरण किया जाय, और उन्हें “व्रतधारी प्रज्ञापुत्र” के नाम से जाना जाय।
- हर व्रतधारी प्रज्ञापुत्र न्यूनतम बीस पैसा और एक घंटा समय प्रतिदिन-नियमित रूप से सृजन कार्यों के लिए लगाया करें। स्वयं तो क्रियाशील रहें ही, अपने जैसे चार और साथी खोजकर पाँच कर्मनिष्ठों का एक प्रज्ञामण्डल गठित करें। यह पाँचों अपने चार-चार साथी बनायें। इस प्रकार पाँच से पच्चीस का समुदाय बन जाये पर उसे पूर्ण- विकसित “प्रज्ञामण्डल” की संज्ञा दी जायेगी। यों पंजीकरण तो पाँच कर्मठों को मण्डल बनने पर ही हो जाता है।
- जहाँ बड़ी शाखायें- प्रज्ञापीठें हैं, वहाँ भी पाँच-पाँच कर्मठों की मण्डलियाँ नये सिरे से गठित कर ली जायें। वे पास-पास रहने वाले हों, जो सहजता से मिलजुल सकें- परामर्श करते रह सकें। वे अपने क्षेत्र में नव जागरण के लिए सक्रिय प्रयास करें, निर्धारित कार्यक्रम चलायें। सक्रिय-कर्मठों की संख्या और क्षेत्र का विस्तार देखते हुए अनेक प्रज्ञा मंडल एक ही क्षेत्र में गठित किए जा सकते हैं। बड़े आयोजनों और आन्दोलनों में वे सभी मिल-जुलकर, एक संगठित श्रृंखला के रूप में कार्य करेंगे।
- पुरुषों के प्रज्ञा मण्डलों की तरह महिलाओं के अलग से “महिला मण्डल” गठित किए जाने हैं। जब तक पाँच प्रतिभावान महिलायें न मिलें, तब तक उन्हें प्रज्ञा मण्डल में ही संयुक्त रखा जा सकता है। संभावना बनते ही महिला मण्डलों को स्वतंत्र रूप से बढ़ने देना चाहिए। इक्कीसवीं सदी में, भावना क्षेत्र में वरिष्ठ होने के कारण नारी को पर्याप्त उत्तरदायित्व उठाने होंगे। उसके लिए उन्हें विकसित किया जाना है। अनुभव की कमी से उनके संगठन गड़बड़ाने न पायें, यह देखभाल प्रज्ञामण्डल के अनुभवी परिजनों को रखनी चाहिए।
- प्रत्येक व्रतधारी प्रज्ञापुत्र के दैनिक जीवन में तीन प्रक्रियायें नियमित रूप से चलनी चाहिए - (1) उपासना, (2) साधना, (3) आराधना। यह तीनों दैनिक जीवन में, आहार परिश्रम-विश्राम, अन्न, जल, और वायु की तरह गुँथे रहने चाहिए। युग साहित्य के नियमित स्वाध्याय को इस प्रयास के लिए मुख्य आधार माना जाय।
-प्रज्ञा मण्डल और नारी मण्डल के सभी सदस्य अंशदान समय दान का, व्यक्तिगत उपासना, स्वाध्याय का क्रम चलाने के साथ-साथ सप्ताह में एक बार सामूहिक उपासना, सामूहिक स्वाध्याय परामर्श का क्रम चलायेंगे। इस साप्ताहिक सत्संग कहा जाय। सप्ताह में सुविधानुसार एक दिन का समय इसके लिए पूर्व- निर्धारित रहे। यह सत्संग किसी एक स्थान पर अथवा सदस्यों के घरों पर बदल-बदल कर चलाए जाते रह सकते हैं। इन सत्संगों के लिए पाँच क्रम निर्धारित हैं (1) सामूहिक उपासना- दीपयज्ञ, (2) सहगान- युग संगीत, (3) सामूहिक स्वाध्याय समीक्षा, (4) युग साहित्य विस्तार प्रक्रिया, (5) सामूहिक सूर्यार्घ्य दान।
सामूहिक उपासना दीप यज्ञ के माध्यम से की जाय। देव मंच के पास थाली में दीपक और अगरबत्तियाँ सजाकर रखें। सब का सिंचन, सर्वदेव नमस्कार, स्वस्तिवाचन के क्रम पूर्ण कर के दीपक और अगरबत्तियाँ प्रज्वलित करें। भावना करें कि युग शक्ति महाप्रज्ञा हमारे अंदर संघ शक्ति का जागरण कर रही है। युग साधना के सामूहिक प्रयोग करने की क्षमता हम सब में बढ़ रही है।
- मिशन के निर्धारित गीतों, संकीर्तनों का सामूहिक गायन किया जाय। उनमें भगवान के नाम स्मरण के साथ प्रेरणाओं का भी संचार होता है। इन्हें प्रारम्भ, मध्य और अंत में तीन भागों में भी बाँटा जा सकता है अथवा आधा घंटे तक लगातार भी किया जा सकता है यदि अच्छे कंठ के गायक न हो, तो ही कैसेटों की सहायता लेनी चाहिए। प्रत्यक्ष सहगान से भावनाएँ अधिक उभरती हैं।
हारने लगे, तुम्हें पुकारने लगे। श्वास-श्वास में, तुम्हें गुहारने लगे॥
हार ने हमें, पुकार का पता दिया। हार ने हमें उदार का पता दिया॥
आह- अश्रु में, उसे निहारने लगे॥
वेदना से वेद-ज्ञान, की दिशा मिली। बोध की प्रभा लिये, हुए उषा मिली॥
प्राण-दीप, आरती उतारने लगे॥
दर्द-दाह की दुआ मिली, कृपा हुई। कराह प्रार्थना बनी, विभाजगा गई॥
तार-तार यों बजा, सितार तारने लगे॥
गीत बन गया, हृदय-पुकार वेदना। छन्द-छन्द में व्यथा, उतार भेजना॥
भीग-भीग अश्रु, छवि सँवारने लगे॥
अभाव यों मिले, स्वभाव प्पार हो गया। भाव से भरा हृदय, उदार हो गया॥
प्रहार वार ही हमें उबारने लगे॥
जो न पास आ रहे थे, दूर-दूर थे।
लुटा के प्यार-कोश सभी वारने लगे॥ हारने लगे तुम्हें पुकारने लगे।
श्वास-श्वास में, तुम्हें गुहारने लगे॥
- लाखन सिंह भदौरिया ‘‘सौमित्र’’
*समाप्त*