व्यक्ति और समाज परस्पर अन्योन्याश्रित है। उद्दण्ड व्यक्ति अपने अनगढ़ कृत्यों से समूचे समाज को प्रभावित करता और अशांति फैलाता है। क्रिया की प्रतिक्रिया होती है। अवाँछनीय तत्वों को देर तक सहन नहीं किया जाता। उन्हें अवरोध उत्पन्न करने की छूट सदा ही नहीं मिल सकती।
व्यक्ति की अनुपयुक्त गतिविधियाँ व्यापक विक्षोभ उत्पन्न करती हैं और समाज तथा प्रकृति की ओर से ऐसे लोगों को नियंत्रण में लाने की, कड़वा सबक सिखाने की प्रतिक्रिया चल पड़ती है। इसी का नाम विपत्ति है। विपत्ति से घिरा व्यक्ति सीखता है कि अपने को उबारने के लिए उसे दूसरों की कठिनाई समझनी चाहिए जैसी कि बुद्धिमान लोग विपत्ति खड़ी होने से पूर्व ही कर लिया करते है।
सज्जनता किसी पर उपकार करना नहीं है, वरन् अपने आपको भर्त्सना, विरोध, आक्रोश से बचाना है। प्रकृति के कठोर विधान का व्यतिक्रम करके अपने ऊपर विपत्ति टूट पड़ने से समय रहते बचाव कर लेना है।
उद्दण्डता प्रकृति को असहनीय है। समाज भी उसका विरोध करता है और शासन भी। इन सबसे बड़ा अपना अन्तःकरण है जो उद्दण्डता की अवस्था छुड़ाने के लिए विपत्तियों को जहाँ-तहाँ से न्यौता बुलाता है। अनीति का यही उपचार भी है।
आपकी विजय सराहनीय है महाराज! आप सचमुच वीर है, ऐसा न होता तो आप गालव नरेश को तीन दिन में ही कैसे जीत लेते? राजपुरोहित पूर्णिक ने महाराज सिंधुराज की ओर किंचित मुस्कराते हुए कहा-बात का क्रम आगे बढ़ाते हुये वे बोले-किन्तु महाराज! सेना की विजय से भी बढ़कर विजय मन की है, जो काम, क्रोध, लोभ और मोह जैसी साँसारिक ऐषणाओं को जीत लेता है वही सच्चा शूरवीर है। उस विजय के आगे यह रक्तपात वाली, हिंसा वाली, शक्ति वाली विजय तुच्छ और नगण्य सी लगती है।
महाराज सिंधुराज ने कवच परिचायक को देते हुये कहा-आचार्य प्रदर! हम वैसी विजय भी करके दिखला सकते है। आपने लगता है हमारे पराक्रम का मूल्याँकन नहीं किया-सम्राट के स्वर में अहं मिश्रित रूखापन था।
राज पुरोहित पर्णिक की सूक्ष्म दृष्टि महाराज के उस मनोविकार को ही ताड रही थी, इसलिये वे निःशंक बोले-आपके पराक्रम को कौन नहीं जानता आर्य श्रेष्ठ! आपको सिंहासन पर आसीन हुये अभी दशक ही तो बीता है। इस बीच आपने कलिंग, अरस्ट्रास, मालव, विन्ध्य, पंचनद सभी प्रान्त जीत डाले, क्या यह सब पराक्रमी होने का प्रमाण नहीं? किन्तु यदि आप एक बार महर्षि बेन के दर्शन करके आते तो पता चलता कि वे आपसे भी कीं अधिक पराक्रमी हैं, विजयी है। उन्होंने राग-द्वेष सम्पूर्ण ऐषणाओं पर विजय पाली है।
सिंधुराज को अपने सामने वह भी राज पुरोहित के मुख से किसी और की प्रशंसा अच्छी न लगी। उन दिनों राज पुरोहित राज्य की आचार संहिता के नियंत्रक हुआ करते थे। सिंधुराज उनका कुछ कर नहीं सकते थे, तो भी उन्होंने महर्षि बेने के दर्शन का निश्चय कर लिया।
सूर्योदय होने में अभी थोड़ा विलम्ब था। महाराज सिंधुराज अस्तबल पहुँचें। वहाँ उनका अश्व सजा हुआ तैयार था वे उस पर आरुढ होकर महर्षि बेन के आश्रम की ओर चल पड़े। मार्ग में उन्हें एक वृद्ध जन दिखाई दिये, वह मार्ग में पड़े काँटे साफ कर रहे थे, कंटीली झाड़ियां काट कर उन्हें दूर फेंक रहे थे। उन्हें देखकर महाराज ने घोड़े को रोका और पूछा-महान् तपस्वी बेन का आश्रम किधर है? ओ वृद्ध!
वृद्ध ने एक बार महाराज की ओर देखा फिर अपने काम में जुट गये-महाराज को यह अवहेलना अखरी, उनका अहंकार जाग पड़ा-बोले-शठ! देखता नहीं मैं यहाँ का सम्राट हूँ। बता-बेन का आश्रम किधर है? वृद्ध ने पुनः आंखें उठाई-ओठों पर एक हल्की मुस्कराहट तो आई फिर वे उसी तरह अपने काम में जुट गये। महाराज का क्रोध सीमा पार कर गया। घोड़े को वृद्ध की ओर दौड़ा दिया, उन्हें रौंदता हुआ घोड़ा आगे बढ़ गया। इस बीच महाराज ने उसकी चाबुक से वृद्ध पर प्रहार भी किया और अपशब्द कहते हुये आगे बढ़ गये। वे अभी थोड़ा ही आगे गये थे कि महर्षि की प्रतीक्षा करते खड़े उनके शिष्य दिखाई दिये, महाराज ने पूछा-आपके गुरु बेन कहाँ हैं? शिष्यों ने बताया वे प्रतिदिन हम लोगों से पूर्व ही उठकर मार्ग साफ करने निकल जाते है।
आप जिधर से आये उधर ही तो होंगे वह. और तब महाराज का क्रोध पश्चाताप में बदल गया। वे उन्हीं पैरों लौटे, महर्षि उठकर खड़े हो गये थे, कटी हुई झाड़ियां ठिकाने लगा रहे थे। घोड़े से उतर कर महाराज उनके चरणों पर गिर कर क्षमा माँगने लगे-बोले भगवान्। पहले ही बता देते कि आप ही महर्षि हैं तो यह अपराध क्यों होता?
बेन मुस्कराये-बोले बेटा-तूने मेरी प्रशंसा की उससे मन में अहंकार उठा, उसे-मारने के लिये यह आवश्यक ही था। तेरा उपकार जीवन भर नहीं भूलूँगा। महाराज सिंधुराज पानी-पानी हो गये उन्होंने अनुभव किया-सच्ची वीरता दूसरों को नहीं, अपने को जीतने में है।
गान्धारी असाधारण रूपवती थी। उनका विवाह अन्धे धृतराष्ट्र के साथ हुआ। साथ ही वे कुरूप भी थे।
गान्धारी को अपना पतिव्रत धर्म निबाहना था। आशंका यह थी कि उनका रूप देख कर कोई उनके पीछे न पड़े, अथवा वे ही किसी अवसर पर फिसल न जायँ इसके लिए यह अनुशासन अपने ऊपर लगाया कि आँखों से जीवन भर पट्टी बाँधे रहने का व्रत ले लिया।
जैसे-तैसे बीसवीं शताब्दी की समापन वेला समीप आती जा रही है, विश्वभर के चिन्तकों, मनीषियों का ध्यान वर्तमान की सुधारने, भूत को भुलाने एवं भविष्य को सँवारने की दिशा में उद्यत होता प्रतीत होता है। ऐसे सृजनात्मक प्रयासों को बल मिलता है। उन पूर्वानुमानों से-पूर्वाभास के कथनों से जो समय-समय पर भविष्य के संबंध में सामान्य एवं विशिष्ट जनों को हुए एवं समय आने पर सत्य निकले। ऐसे कुछ प्रसंगों की चर्चा विगत अंक में की जा चुकी है। “प्रोफेसी” शब्द की व्याख्या करते हुए यह भी बताया गया था कि ऐसे महामानव-मनीषी समय-समय पर धरती पर अवतरित होते है जिन्हें रहस्यमयी अन्तःस्फुरणा समय-समय पर होती रहती है एवं वे घटना घटने के बहुत पूर्व भविष्य का लेखा-जोखा लिख कर चले जाते है। इन्हें प्रोफेट्स या भविष्य-वेत्ता कहा जाता है इस्लामधर्म, ईसाईधर्म, हिन्दूधर्म प्रायः सभी धर्मों में ऐसे मनस्वी तत्त्ववेत्ता अवतरित हुए हैं, होते रहे है, विद्यमान है, एवं आगे भी जन्म लेते रहेंगे।
प्रस्तुत पंक्तियों में मार्च 1989 अंक में प्रकाशित “दिव्य पर आधारित भविष्य कथन” लेख के प्रसंग को आगे बढ़ाते हुए प्रथम कोटि के दिव्य दृष्टि सम्पन्न भविष्य के गर्भ में झाँकने में समर्थ मनीषियों के कथनों की विवेचना की जा रही है।
इन सभी को समय-समय पर दैवी प्रेरणावश अन्तःस्फुरणा होती रही है। शेष तीन श्रेणियों ज्योतिर्विज्ञानियों, विभिन्न धर्म ग्रन्थों तथा भविष्य विज्ञानियों (फ्यूचरालॉजी विधा के आधार पर आंकड़ों के माध्यम से विश्लेषण करने वाले वैज्ञानिकों) का प्रसंग अगले लेखों व आगामी अंकों में किया जाता रहेगा।
प्रायः सभी दिव्यदृष्टि-सम्पन्न मनीषियों का मत है कि सन् 2000 के आगमन के पूर्व की विनाशकारी प्रलयंकर गतिविधियों, हलचलों को देखकर जन साधारण को निराश नहीं होना चाहिए। दिया बुझाने से पहले लौ तीव्र प्रकाश के साथ टिमटिमाती है। सूर्य उदय होने के पूर्व घना अंधकार छा जाता है, किन्तु तुरंत बाद सप्त रश्मियों का प्रकाशपुँज लेकर सूर्य भगवान प्रकट होते है व अरुणोदय की लालिमा उसका संकेत लेकर आती है।
मानवी स्वभाव का रुझान प्रायः निषेधात्मक ही होता है। तार्किक बुद्धि भी चिन्तन पर हावी रहती है। व कहती है कि जो कुछ भी सामने है, उसे देखते हुए तो नहीं लगता कि इक्कीसवीं सदी उज्ज्वल भविष्य का संदेश लेकर आ रही है। हर कोई दूसरे पर आक्षेप लगाता देखा जाता है। आत्मानुशासन एवं आत्म सुधार की ललक जागती नहीं। यह इसलिए की गीता का “यदा यदा हि धर्मस्य” वाला श्लोक तो उसे याद रहता है व कहता भी है कि अवतार आने वाला है, तब परिवर्तन आएगा। आखिर यह अवतार की प्रतीक्षा क्यों? महर्षि अरविन्द ने ठीक लिखा है कि “अवतार साधारण मनुष्यों में चेतना के विकास की परिणति का नाम है” उनका कहना है कि “देवी तंत्र अनुशासन के नियमों से आबद्ध है एवं जब उच्छृंखलता अपनी सीमा लाँघ जाती है तो अतिचेतन सत्ता का ही मानवी सत्ता में आरोहण होता है व ऐसी सत्ता को यदि अवतार कहा जाय तो कोई अत्युक्ति नहीं है”।
पौराणिक इतिहास की गवेषणा करें तो पाते है कि राम, कृष्ण, बुद्ध तक कुल नौ अवतार जन्म ले चुके व अपने-अपने समय की क्रान्ति कर चले गये। अब महाकाल की युग प्रत्यावर्तन प्रक्रिया व्यक्ति के रूप में नहीं, विचार शक्ति के रूप में अवतरित होगी व इसे निष्कलंक अवतार कहा जाएगा। यह व्यक्ति के विचारों, निर्धारणों एवं क्रिया-कृत्यों में आमूलचूल परिवर्तन के रूप में जन्म ले चुकी है एवं विगत कई शताब्दियों से गतिशील है। इस विचार-क्रान्ति का उदय पूर्वार्ध के रूप में बुद्धावतार के रूप में माना जा सकता है जिनने “बुद्धि” की शरण में जाने (बुद्धं शरणं गच्छामि) की प्रेरणा दी व मूढ़मान्यताओं को निरस्त किया। आद्य शंकराचार्य, कबीर, समर्थ रामदास, रामकृष्ण परमहंस, महर्षि रमण, स्वामी विवेकानन्द, रामकृष्ण अरविन्द आदि ने उसी प्रक्रिया को आगे बढ़ाया। विज्ञान के क्षेत्र में अपने ढंग से। सत्रहवीं शताब्दी का-न्यूटन के समय को विज्ञान कहाँ से कहाँ आ पहुँचा, देख कर अचम्भा होता है। मार्टिन लूथर नामक व्यक्ति बोपवाद को चुनौती देकर समाज सुधार की ऐसी व्यापक लहर पूरे विश्व में फैला सकता है, जानकर अचरज होता है। गाँधी जैसा मनस्वी व्यक्ति छोटे से देश हिन्दुस्तान में बैठकर मात्र “अहिंसा” असहयोग” के अपने मंत्र से साम्राज्य शक्ति को हिला सकता है यह हम सबने पिछले कुछ वर्षों में उपनिवेशवाद के अन्त के रूप में देखा है। रूसो की प्रजातंत्रवादी क्रान्ति तथा कार्ल मार्क्स की साम्यवाद की क्रान्ति विगत दो शताब्दियों की ही तो बात है।
सोचने की बात है कि वह सब जो कभी असंभव लगता था, वह संभव कैसे हो गया? यही विचार-क्रान्ति है, जो जनमानस को मथ डालती है, एवं परोक्ष जगत से एक ऐसी आँधी चलती है जो अवांछित को उखाड़-पछाड़ कर क्या से क्या कर डालती है। प्रस्तुत शताब्दी को ही लें तो विवेकानन्द, योगीराज अरविंद व महात्मा गाँधी ऐसे मनीषियों में माने जा सकते हैं जिन्होंने इक्कीसवीं सदी को उज्ज्वल बनाने की दिशा में सूक्ष्म जगत में वातावरण बनाया तथा उस सुदृढ़ नींव की स्थापना की, जिस पर आने वाले युग की आधार शिला रखी जाएगी, भवन विनिर्मित होगा व सतयुगी संभावनाएँ साकार होंगी।
स्वामी विवेकानन्द ने अपने मद्रास प्रवास में दिये गए भाषण में ओजपूर्ण शब्दों में कहा था कि भारत का भविष्य निश्चित रूप से उज्ज्वल है। “ भारत का भविष्य” शीर्षक से प्रकाशित “भारत में विवेकानन्द” (श्री राम कृष्ण आश्रम नागपुर) पुस्तक में स्वामी जी कहते है कि “इस महान राष्ट्र की अवनति व पतन की कथा-गाथा से भरे भूतकालीन इतिहास में ही भविष्य के भारत रूपी वृक्ष का अंकुर छिपा पड़ा है। उस शक्तिभर ऊर्ध्व मूल में वृक्ष का निकलना प्रारंभ हो चुका है। आने वाले वर्षों में शास्त्र ग्रन्थों में आध्यात्मिकता के जो रत्न विद्यमान है वे मठों में छिपे पड़े हैं, बाहर निकलेंगे! जन-जन तक इस व्यावहारिक अध्यात्म को पहुँचाया जाएगा। चाहे व्यक्ति संस्कृत जाने या न जाने पर ऐसी जन सुलभ भाषा में बोलचाल की भाषा में उन विचारों को जन-जन तक पहुँचाना होगा जो युगान्तरकारी होंगे। संस्कृत का भी भली-भाँति प्रचार-प्रसार होगा एवं वह विश्व भाषा बनेगी। ज्ञान नहीं, संस्कार ही शिक्षा के मूल होंगे एवं व्यापक स्तर पर संस्कारों की शिक्षा हेतु केन्द्र खुलेंगे।
“भविष्य में जो सतयुग आ रहा है, उस में ब्राह्मणेतर सभी जातियाँ फिर ब्राह्मण रूप में परिणत होंगी। ब्राह्मणत्व का अर्थ होगा मनुष्यत्व का चरम आदर्श। आने वाला युग एकता का-समता का होगा। न कोई छोटा होगा, न बड़ा। उसे आध्यात्मिक साम्यवाद भी कहा जा सकता है।”
“हर बड़े स्थान पर हमें मन्दिरों की आवश्यकता होगी। ये मन्दिर ही शिक्षण-संस्था की भूमिका निभायेंगे। हर मन्दिर चाहे वह अति पुरातन हो या नवीनतम धार्मिक प्रचारक तैयार करेगा जो लौकिक ज्ञान का भी शिक्षण लेंगे। सारे भारत में नव निर्माण के ऐसे जाग्रत केन्द्र बीसवीं सदी के अन्त तक बन कर तैयार हो जायेंगे। युवकों से मुझे बड़ी आशा है। वे ही इस योजना को कार्य रूप में परिणत करेंगे। जो फूल मसला नहीं गया है, ताजा है और सूँघा नहीं गया है वही भगवान के चरणों में चढ़ाया जाता है और उसे वे ग्रहण करते है। युवकों से मेरी अपेक्षा है कि वे वकील-बैरिस्टर बनने की अपेक्षा संस्कृति के उद्धारक-रक्षक बनेंगे और नया जमाना लाकर दिखायेंगे। जन साधारण में से ही महापुरुष पैदा होते है और वे ही क्रान्ति कर दिखाते है और यह अगले दिनों साकार होते आप स्वयं देखेंगे”।
वह विचार उस मनीषी के है जिसने भविष्य के गर्भ में झाँक कर परतंत्र भारत की अपार जन मेदिनी में छिपी शक्ति-सामर्थ्य को पहचान लिया था व तदनुसार ही सब कुछ आज से नब्बे वर्ष पूर्व कह दिया।
इजराइल के एक धर्म-निष्ठ यहूदी परिवार में जन्मे प्रोफेसर हरार को भी दिव्य द्रष्टा की मान्यता प्राप्त है। वे योरोप, उत्तरी अफ्रीका में वैसी ही ख्याति प्राप्त कर चुके है जो जीन डिक्सन एवं कीरो की तथा आचार्य वराहमिहिंर को प्राप्त है। अरब के शाह मोहम्मद के प्रधान माँगलिक सलाहकार के रूप में वे उन्हें समय-समय पर उन पर, महाद्वीप पर आने वाली आपदाओं की सूचना देते निवारण का मार्ग सुझाते रहते थे। वे प्रायः कहा करते थे कि “ प्रातः बेला में मुझे कई बार स्वप्न में यह देखने को मिला है कि भारतवर्ष एक विराट शक्ति के रूप में उभर रहा है। एक संस्था जो धर्म तंत्र का माध्यम बनाकर सत्प्रवृत्ति संवर्धन का सरंजाम जुटाएगी, अपने औदार्यभाव व सेवाभावी कार्य-कर्त्ताओं के कारण विभिन्न संस्थाओं से समन्वय स्थापित कर विचार क्रान्ति का विश्वव्यापी वातावरण बनाएगी। राजतंत्र की बागडोर भी चरित्रवान धर्मनिष्ठ व्यक्तियों के हाथ आ जाएगी व सन् 2000 तक देखा जाने लगेगा। सारी छोटी शक्तियाँ मिल कर एक में समा रही है, न कोई भाषा का बंधन है, न क्षेत्रीय विभाजन का। साम्प्रदायिकता अपनी चरम सीमा पर पहुँच कर नष्ट हो जायगी। सब एक होकर मिल जुल कर रहेंगे”।
यहाँ यह ध्यान देने योग्य बात है कि प्रो0 हरार की भविष्यवाणियाँ कभी असत्य नहीं निकलीं जो कुछ भी उनने कहा सच हो कर रहा। हमें आने वाले बारह वर्षों पर भी इसी दृष्टि से निगाह डालनी चाहिए।
अपनी “क्रिस्टलबाँल” के माध्यम से प्रोंफेसी करने वाली जीन डिक्सन भी बहुचर्चित महिला रही है। बचपन से ही उनमें यह क्षमता विद्यमान थी। ख्याति उन्हें द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान की गई। भविष्यवाणी तथा जान एफ॰ कैनेडी जो 1961-63 की अविध में अमरीका के राष्ट्रपति थे की मृत्यु के संबंध में बहुत पूर्व व्यक्त किये गए भविष्य कथनों से मिली। सन् 60 में कैनेडी के जीतते ही उनने कह दिया था कि नवम्बर 1963 के द्वितीय सप्ताह में राष्ट्रपति को दक्षिण (टेक्सास) की याख नहीं करनी चाहिए, क्योंकि उनकी हत्या किये जाने का डर है। गाँधी जी की हत्या, नेहरू के निधन, रूस में खुश्चेव के पतन की भविष्यवाणियाँ भी अपनी “क्रिस्टल बॉल” में देखकर कर चुकी थी।
अपनी पुस्तक “माईलाइफ एण्ड प्रोफेसीज” के अष्टम अध्याय में वे लिखती है कि इक्कीसवीं सदी नारी प्रधान होगी। कई राष्ट्रों में महिला नेतृत्व संभालेगी। शान्ति स्थापना की पहल पूर्व से ही होगी व इस में भारत की विशेष भूमिका होगी। राष्ट्रसंघ का मुख्यालय भारत में बनेगा व वैचारिक क्रांति के माध्यम से अध्यात्म-परक मूल्यों पर आधारित समतावादी शासन पूरे विश्व में स्थापित होगा”। वे तृतीय विश्व युद्ध की भयंकरता का वर्णन करते हुए उसके संभव व सफल होने की बात को नकारती है व लिखती है कि ठीक समय पर विधेयात्मक शक्तियों इस महाप्रलय से संसार को बचा लेंगी।
जीन डिक्सन की ही कुछ और अन्तःस्फुरणा स उपजी भविष्यवाणियाँ व अन्यान्य भविष्यवेत्ताओं के अभिमत इन्हीं पृष्ठों पर अगले अंक में पढ़ें।
एक अध्यापक बच्चों को पढ़ा रहे थे। उनने ब्लैकबोर्ड पर एक लम्बी लकीर खींची और कहा इसमें से कुछ बिना काटें मिटाये उसे छोटी कर दो।
लड़के वैसा कर न सके तब अध्यापक ने उसी के बराबर एक दूसरी बड़ी लकीर खींचदी और पूछा वह अब छोटी हो गई न।
निष्कर्ष बताते हुए अध्यापक ने कहा किसी से अपने को बड़ा बनना हो तो उसे काटने घटाने की जरूरत नहीं है। अपने को उससे अधिक सुयोग्य, पुरुषार्थी और प्रामाणिक बनालें इतने भर से उसे गिराने की आवश्यकता न पड़ेगी।
एक साधु बहुत मस्त रहता था। उसकी प्रसन्नता को चोरों ने सम्पत्ति का कारण समझा सोचा इसके पास कोई बड़ी सम्पदा होनी चाहिए अन्यथा इतना उल्लास क्या रहता?
चोरों ने साधु से पूछा-सच-सच बताओ तुम्हारी दौलत कहाँ है।
साधु को मसखरी सूझी। उसने कहा मैंने उसे जहाँ तहाँ जमीन में गाड़ रखा है उसकी पहचान यह है कि चंद्रमा की रोशनी में देखना। खोपड़ी के नीचे देखना, खोदने पर मिल जायगा।
चोर इसी आधार पर जगह-जगह खोदते फिरे। तमाम रात इसी प्रकार बीत गई झुंझलाते हुये चोर आये और कहा वहाँ तो कहीं कुछ नहीं मिला।
साधु ने कहा भाई मेरे कथन का मतलब समझो। आप लोगों को बताया गया कि खोपड़ी के नीचे। खोपड़ी के नीचे मन मस्तिष्क है उसी में सम्पदा प्रसन्नता और प्रगति भरे रहते है अपने विचारों को सही करो। चिन्तन में आदर्श, उत्साह और संतोष का समावेश करो। तुम देखोगे कि कुछ ही दिन में मेरी तरह प्रसन्न रहने का स्वभाव बन जायगा।
द्गद्म= द्गह्वद्ध"द्मद्ध द्धठ्ठह्र; ठ्ठभ्"कद्म द्दद्ध ह्वद्दद्धड्ड] /द्मर्द्गंफ्भ्स्नद्मद्मह्यड्ड ह्वह्य॥द्मद्म क्द्मह्ल द्यह्य 'द्मह्द्मद्धष्टठ्ठ;द्मह्यड्ड द्बर्ख्शं,ह्यद्यद्म स्रह्नहृ द्धब्[द्म स्रद्भ द्भ[द्म द्धठ्ठ;द्म द्दस् द्गद्मह्वद्मह्यह्यड्ड द्धब्[द्मह्वह्य शद्मब्द्मह्यड्ड ह्वह्य द्यष् स्रह्नहृ क्द्मँ[द्मद्मह्यड्ड स्रह्य द्यद्मद्गह्वह्य द्बभ्क्र;म्द्म?द्मद्धंकह् द्दद्मह्यह्ह्य ठ्ठह्य[द्मद्म द्दद्मह्य्न क्द्म"र्द्मं फ्भ्स्नद्मद्मह्यड्ड] स्रह्नद्भद्मह्व] ष्द्मड्ढद्धष्ब् ड्ढक्र;द्मद्धठ्ठ स्रद्ध फ्.द्मह्वद्म ड्ढद्दद्धड्ड द्गह्यड्ड द्दद्मह्यह्द्ध द्दस््न स्रद्दद्म ह्लद्मह्द्म द्दस् द्धस्र ;ह्य द्य॥द्मद्ध फ्भ्स्नद्म द्बद्भश्वद्बद्भद्मफ्ह् क्द्मड्ढ,्न द्यष्द्यह्य द्बद्दब्ह्य द्धद्दठ्ठख् /द्मर्द्गं स्रह्य स्रह्नहृ फ्भ्स्नद्मह्यड्ड द्बद्भ,स्र ठ्ठक्वद्ध"क रुद्मब्ह्यड्ड्न छ्वद्ध द्गठ्ठ−॥द्मद्मफ्शह्− स्रद्म द्गह्द्द स् द्धस्र स्रब्;ह्नफ् स्रद्म क्ह् द्यद्गद्धद्ब द्दस् श द्यश्वद्बभ्द्धह् ;ह्नफ्द्यड्डद्ध/द्मशह्यब्द्म श्चब् द्भद्दद्ध द्दस््न द्धस्रह्ह्न ;ह्नफ्द्मह्यड्ड स्रद्ध फ्.द्मह्वद्म स्रद्भह्वह्य शद्मब्ह्य,स्र द्गह् द्दद्मह्यह्वह्य ह्वद्दद्धड्ड ठ्ठद्ध[द्मह्ह्य्न द्य॥द्मद्ध क्द्बह्वह्य&क्द्बह्वह्य द्धद्दद्यद्मष् द्यह्य फ्.द्मह्वद्म स्रद्भस्रह्य स्रद्दह्ह्य द्दस् द्धस्र स्रद्धब्;ह्नफ् स्रद्म क्ह् द्दद्मह्यह्वह्य द्गह्यड्ड क्॥द्मद्ध स्रर्ड्ढं ब्म्द्म श"र्द्मं ष्द्मस्रद्ध द्दस््न फ्द्धह्द्मस्रद्मद्भ स्रद्म स्रस्नद्मह्व द्दस्&
द्यद्दरु=;ह्नफ्द्बस्नर्द्मंह्द्गर्द्द; )द्द−.द्मद्मह्यड्ड द्धशठ्ठह्नत्न्न
द्भद्मद्ध=ड्ड ;ह्नफ्द्यद्दरु=द्मह्द्मड्ड ह्ह्य.द्दद्मह्यद्भद्म=द्धशठ्ठद्मह्यड्ड ह्लह्वद्मत्न्न्नञ्च8ञ्च16 क्स्नद्मर्द्मंह्− **क्द्दद्भद्मह्य= स्रद्मह्य ह्क्रशह्त्न ह्लद्मह्वह्वह्य शद्मब्ह्य द्बह्न:"द्म ;द्द द्यद्ग>ह्ह्य द्दस् द्धस्र द्दह्लद्मद्भ द्गद्दद्म;ह्नफ्द्मह्यड्ड स्रद्म द्यद्ग; ष्भ्द्द−द्मठ्ठह्यश स्रद्म,स्र द्धठ्ठह्व द्दद्मह्यह्द्म द्दस् क्द्मस्द्भ,ह्यद्यह्य द्दद्ध,स्र द्दह्लद्मद्भ ;ह्नफ्द्मह्यड्ड स्रद्ध द्वह्वस्रद्ध द्भद्मद्ध= द्दद्मह्यह्द्ध द्दस्**्न द्बभ्द्धद्य) द्धश)द्मह्व] रुशह्ड्ड=ह्द्म द्यड्डफ्भ्द्मद्ग स्रह्य ;द्मह्य)द्म छ्व)ह्य; छ्वद्ध ब्द्मह्यस्रद्गद्म; द्धह्ब्स्र ह्वह्य फ्द्धह्द्म द्भद्दरु; द्गह्यड्ड द्धब्[द्मद्म द्दस् द्धस्र ड्ढद्य ;ह्नफ् फ्.द्मह्वद्म स्रद्म द्धशशह्यश्चह्व द्गद्दद्म॥द्मद्मद्भह्] द्गह्वह्नरुद्गक्वद्धह्,शड्ड ;द्मरुस्र द्धह्व:ष्ठह् द्गह्यड्ड क्द्मह् द्दस््न *शह्य स्रद्दह्ह्य द्दस् द्धस्र द्दद्गद्भद्म द्वश्र्द्मद्भद्म;.द्म ठ्ठह्यशह्द्मक्द्मह्यड्ड स्रद्म द्धठ्ठह्व द्दस् श ठ्ठद्धम्द्म.द्मद्म;ह्व द्वह्वस्रद्ध द्भद्मह् द्दस््न क्स्नद्मर्द्मंह्− ठ्ठद्मह्य क्;ह्वद्मह्यड्ड हृद्द&हृद्द द्गद्मद्य स्रद्म द्दद्गद्मद्भद्म,स्र श"र्द्मं ठ्ठह्यशह्द्मक्द्मह्यड्ड स्रह्य,स्र द्धठ्ठह्व द्भद्मह् स्रह्य ष्द्भद्मष्द्भ द्दद्मह्यह्द्म द्दस् द्दद्गद्मद्भह्य 360 श"र्द्मं ठ्ठह्यश द्यश्र्द्मद्मक्द्मह्यड्ड स्रह्य 360 द्धठ्ठह्व&द्भद्मह् क्स्नद्मशद्म,स्र श"र्द्मं स्रह्य द्यद्गस्रम्द्म द्दद्मह्यह्ह्य द्दस््न ;द्धठ्ठ ड्ढद्य द्बभ्स्रद्मद्भ ;ह्नफ्द्मह्यड्ड स्रद्ध स्रद्मब् फ्.द्मह्वद्म स्रद्ध ह्लद्म; ह्द्मह्य द्यह्−;ह्नफ् श्चद्मद्भ द्दह्लद्मद्भ श"र्द्मं] =ह्यह्द्म ह्द्धह्व द्दह्लद्मद्भ श"र्द्मं] )द्मद्बद्भ ठ्ठद्मह्य द्दह्लद्मद्भ,शड्ड स्रद्धब्;ह्नफ्,स्र द्दह्लद्मद्भ श"र्द्मं स्रह्य द्दह्न,्न ठ्ठद्मह्य ;ह्नफ्द्मह्यड्ड स्रह्य ष्द्धश्च द्गह्यड्ड यद्गज्द्मत्न श्चद्मद्भ द्यद्मस्] ह्द्धह्व द्यद्मस्] ठ्ठद्मह्य द्यद्मस् ह्स्नद्मद्म द्यद्मस् श"र्द्मं स्रद्म द्यड्डद्ध/द्मस्रद्मब्॥द्मद्ध क्द्मह्द्म द्दस््न द्यष् द्धद्गब्द्मस्रद्भ श्चद्मद्भद्मह्यड्ड ;ह्नफ्द्मह्यड्ड स्रद्म क्द्मद्धठ्ठ क्ह् द्यद्धद्दह् द्यड्डद्ध/द्मस्रद्मब् 2000 श"द्मद्मर्ह्यं स्रद्म द्दद्मह्यह्द्म द्दस््न ;ह्य ठ्ठद्मह्य द्दह्लद्मद्भ श"र्द्मं श द्यद्मड्ड[;द्गह्द्मह्वह्नद्यद्मद्भ श्चद्मद्भद्मह्यड्ड ;ह्नफ्द्मह्यड्ड द्गह्यड्ड ठ्ठद्य द्दह्लद्मद्भ श"र्द्मं स्रह्नब् द्धद्गब्द्मस्रद्भ ष्द्मद्भद्द द्दह्लद्मद्भ श"र्द्मं द्दद्मह्यह्ह्य द्दस्**्न फ्द्धह्द्म द्भद्दरु; द्बह्नरुह्स्र स्रद्ध॥द्मख्द्धद्गस्रद्म द्गह्यड्ड शह्य स्रद्दह्ह्य द्दस् द्धस्र द्यश्वद्बभ्द्धह् स्रद्धब्;ह्नफ् स्रह्य द्यद्गद्मद्बह्व श द्यह्;ह्नफ् स्रह्य क्द्मफ्द्गह्व स्रद्ध द्यड्डद्ध/द्मशह्यब्द्म श्चब् द्भद्दद्ध द्दस््न ञ्ज;द्मह्यद्धह्द्धर्शंय़द्मह्व॥द्मद्ध क्द्बह्वद्ध द्बभ्द्मद्गद्मद्ध.द्मस्र फ्.द्मह्वद्म स्रह्य क्द्म/द्मद्मद्भ द्बद्भ ;द्दद्ध स्रद्दह्ह्य द्दस् द्धस्र ड्ढद्य द्यद्ग; ष्भ्द्द−द्म द्भद्मद्ध= स्रद्म ह्द्गद्मह्यद्ग; द्यड्डद्ध/द्मस्रद्मब् द्दस््न
द्गह्वह्नरुद्गक्वद्धह् द्गह्यड्ड स्रद्दद्म फ्;द्म द्दस् द्धस्र **ष्भ्द्द−द्मह्लद्ध स्रह्य क्द्दद्मह्यद्भद्म= द्गह्यड्ड द्यक्वद्ध"क स्रह्य द्बस्ठ्ठद्म द्दद्मह्यह्वह्य द्गह्यड्ड ह्लद्मह्य ;ह्नफ् द्गद्मह्वह्य फ्, द्दस्] ड्ढद्य द्बभ्स्रद्मद्भ द्दस्&श्चद्मद्भ द्दह्लद्मद्भ श"र्द्मं क्द्मस्द्भ द्वह्ह्वह्य द्दद्ध 'द्मह् क्स्नद्मर्द्मंह्− श्चद्मद्भ द्यद्मस् श"द्म स्रद्ध द्बर्ख्शं द्यड्ड/;द्म क्द्मस्द्भ श्चद्मद्भ द्यद्मस् श"र्द्मं द्बर्ख्शं स्रद्ध द्वश्र्द्मद्भ द्यड्ड/;द्म] द्वद्य द्बभ्स्रद्मद्भ स्रह्नब् 4800 श"र्द्मं स्रद्म द्यह्;ह्नफ्] 3600 श"र्द्मं स्रद्म =ह्यह्द्म] 2400 श"र्द्मं स्रद्म )द्मद्बद्भ क्द्मस्द्भ ष्द्मद्भद्द द्यद्मस् श"र्द्मं स्रद्म स्रद्धब्;ह्नफ् द्दद्मह्यफ्द्म्न
दद्गह्वह्न0 रुद्गक्वद्धह् 1ञ्च67&69ड्ट
छ्वद्धद्गठ्ठ−॥द्मफ्शह् स्रह्य ह्क्वह्द्ध; रुस्र/द्म द्गह्यड्ड स्रद्दद्म फ्;द्म द्दस्&
श्चक्रशद्मद्भद्ध =द्धद्ध.द्म )स् श्चस्स्रह्य स्रक्वह्द्मद्धठ्ठ"द्मह्न ;स्नद्मद्म यद्गद्ग−्न
द्यड्ड[;द्मह्द्मद्धह्व द्यद्दरु=द्मद्ध.द्म द्ध)फ्ह्न.द्मद्मद्धह्व 'द्मद्मह्द्मद्धह्व श्च ्न्न
द॥द्मद्मफ्शह्− 3ञ्च1ञ्च19ड्ट
क्स्नद्मर्द्मंह्− श्चद्मद्भ] ह्द्धह्व] ठ्ठद्मह्य क्द्मस्द्भ,स्र,ह्यद्यह्य स्रक्वह्द्मद्धठ्ठ ;ह्नफ्द्मह्यड्ड स्रह्य ;स्नद्मद्मयद्ग द्ध)फ्ह्नद्ध.द्मह् द्यस्स्ररुह्यड्ड स्रद्ध द्यड्ड[;द्म ष्द्ध फ्;द्ध्न
ड्ढद्यद्ध ष्द्मह् स्रद्मह्य द्दद्धद्भशड्डज्द्म द्बह्नद्भद्म.द्म स्रह्य॥द्मद्धश"; र्द्बशं द्गह्यड्ड॥द्मद्ध द्यद्ग>द्मह्ह्य द्दह्न, स्रद्दद्म फ्;द्म द्दस् द्धस्र स्रद्धब्;ह्नफ् स्रद्ध द्बर्ख्शं द्यड्डद्ध/द्मशह्यब्द्म स्रद्म द्यद्गद्मद्बह्व क्द्गह्नस्र&क्द्गह्नस्र द्यद्ग; द्गह्यड्ड क्द्म,फ्द्म्न द्गद्दद्म॥द्मद्मद्भह् स्रह्य शह्वर्द्बशं द्गह्यड्ड स्रद्दद्म फ्;द्म द्दस् द्धस्र ह्लष्,स्र ;ह्नफ् द्यद्गद्मढ्ढह् द्दद्मह्यस्रद्भ ठ्ठह्नद्यद्भह्य ;ह्नफ् स्रद्म द्बभ्द्मद्भश्व॥द्म द्यद्गद्धद्ब क्द्मह्द्म द्दस्] ह्ष् द्यड्डद्यद्मद्भ द्गह्यड्ड द्यड्ड?द्म"र्द्मं क्द्मस्द्भ ह्द्धशभ् द्दब्श्चब्ह्यड्ड द्वक्रद्बह्व द्दद्मह्य ह्लद्मह्द्ध द्दस््न ह्लष् श्चठ्ठभ्] द्यर्ख्; क्द्मस्द्भ ष्क्वद्दरुद्बद्धह् ह्स्नद्मद्म द्बह्न"; ह्वम्द्म=,स्र द्भद्मद्धज्द्म द्बद्भ क्द्म;ह्यड्डफ्ह्यड्ड] ह्ष् द्यह्;ह्नफ् स्रद्म 'द्मह्न॥द्मद्मद्भड्ड॥द्म द्दद्मह्यफ्द्म्न ड्ढद्यस्रह्य ष्द्मठ्ठ 'द्मह्न॥द्म ह्वम्द्म=द्मह्यड्ड स्रद्ध स्रह्नद्बद्म श"द्मर्द्मं द्दद्मह्यह्द्ध द्दस््न
द्बठ्ठद्मस्नद्मद्मह्यर्ड्डं स्रद्ध शक्वद्ध) द्यह्य द्यह्न[द्म द्यद्गक्वद्ध) ष् ड्ढद्य द्बभ्स्रद्मद्भ द्बभ्रुह्ह्नह् द्यड्डद्ध/द्मशह्यब्द्म स्रद्मह्य,ह्यद्यद्म द्दद्ध द्गद्मह्वद्म ह्लद्म द्यस्रह्द्म द्दस् ष्ठ;द्मह्यड्डद्धस्र,ह्यद्यद्म ञ्ज;द्मह्यद्धह्द्धर्शंय़द्मह्वह्वद्ध; ;द्मह्यफ् क्॥द्मद्ध&क्॥द्मद्ध क्द्मस्रद्भ ह्लद्म श्चह्नस्रद्म द्दस्,शड्ड /शड्डद्यद्मक्रद्गस्र 'द्मद्धष्ठह्;द्मँ क्द्बह्वद्ध श्चद्भद्ग द्यद्धद्गद्म द्बद्भ॥द्मद्ध द्दस््न द्यद्मस्नद्म&द्यद्मस्नद्म द्यक्वह्लह्वद्मक्रद्गस्र द्बभ्;द्मद्य॥द्मद्ध श्चब् द्भद्दह्य द्दस््न
छ्वद्धद्गठ्ठ−॥द्मद्मफ्शह्− द्बह्नद्भद्म.द्म ड्ढह्ह्वद्म द्बह्नद्भद्मह्ह्व फ्भ्स्नद्म द्दस् द्धस्रह्ह्न ड्ढद्यद्गह्यड्ड॥द्मफ्शद्मह्व छ्वद्धस्रक्व".द्म स्रह्य द्बद्भद्ग/द्मद्मद्ग द्ब/द्मद्मद्भह्वह्य द्यह्य ब्ह्यस्रद्भ स्रद्धब्;ह्नफ् स्रह्य क्द्मफ्द्गह्व ह्स्र स्रद्ध द्यद्मद्भद्ध॥द्मद्धश";&शद्मद्ध.द्म;द्मँ शद्ध.र्द्मंह् द्दस्] ह्लद्मह्य द्बख्.र्द्मंह्त्न द्यद्दद्ध द्धह्वस्रब्द्ध द्दस््न द्गद्दद्मह्वठ्ठ स्रह्य द्वठ्ठ; द्यह्य ब्ह्यस्रद्भ द्गद्मर्स्;शड्डज्द्म स्रह्य ह्वद्भद्बद्धह्;द्मह्यड्ड स्रद्म 'द्मद्मद्यह्व] क्ह्वद्मरुस्नद्मद्म स्रद्म ष्द्मद्दह्नंघ;] द्ग/;;ह्नफ् स्रद्म क्द्मफ्द्गह्व] ;शह्वद्मह्यड्ड स्रद्म क्द्मयद्ग.द्म] द्यड्डरुस्रद्मद्भ 'द्मख्;ह्द्म स्रद्म ष्ह्यह्यड्डफ्ह्य,शड्ड ह्ष् द्यह्य द्दद्ध द्यह्−;ह्नफ् स्रद्म 'द्मह्न॥द्मद्मद्भड्ड॥द्म द्दद्मह्यफ्द्म्न द्यह्−;ह्नफ् स्रस्द्यद्म द्दद्मह्यफ्द्म झ्र ड्ढद्यस्रह्य द्यड्डष्ड्ड/द्म द्गह्यड्ड ष्द्मंघद्गद्धद्धस्र द्भद्मद्गद्म;.द्म ;ह्न) स्रद्म.रु 'ब्द्मस्स्र 95 द्यह्य 106 ह्स्र छ्वद्ध द्भद्मद्ग श्चद्धद्भह्द्गद्मह्वड्डद्य दद्वश्र्द्मद्भस्रद्म.रुड्ट स्रद्ध श्चद्मस्द्बद्मर्ड्ढं;द्मह्यड्ड दठ्ठद्मह्यद्दद्म ष्द्धद्य द्यह्य श्चद्मस्ष्द्धद्य ह्स्रड्ट द्बद्भ ठ्ठक्वद्ध"क रुद्मब्द्ध ह्लद्म द्यस्रह्द्ध द्दस्] द्धह्लद्यद्यह्य रुद्ब"क द्दद्मह्यह्द्म द्दस् द्धस्र शद्द छ्वह्य"क्च द्यद्ग; ह्लष् श्चद्मद्भद्मह्यड्ड क्द्मह्यद्भ द्यद्गह्द्म&,स्रह्द्म स्रद्म द्यड्डद्यद्मद्भ द्दद्मह्यफ्द्म] क्द्ध/द्मस्र ठ्ठख्द्भ ह्वद्दद्धड्ड द्दस्ड्ड्न ड्ढह्व द्बद्भ द्धशरुह्क्वह् द्धशशह्यश्चह्व क्फ्ब्ह्य क्ड्डस्रद्मह्यड्ड द्गह्यड्ड द्धस्र;द्म ह्लद्मह्द्म द्भद्दह्यफ्द्म्न ष्द्मड्ढष्ब् स्रद्ध क्द्मह्यंघरु कह्यरुंकद्मद्गह्य.क ह्लद्मह्य र्ड्ढंद्यद्म स्रह्य ह्लद्ग द्यह्य द्बद्दब्ह्य द्धब्[द्मद्ध फ्;द्ध स्नद्मद्ध] द्गह्यड्ड **द्यह्यशह्व कद्मड्ढश्वद्य** ह्वद्मद्ग द्यह्य॥द्मद्धश";शद्मद्ध.द्म;द्मँ द्धब्[द्मद्ध फ्;द्ध द्दस््न ;ह्य शष् यद्गज्द्मत्न र्ड्ढंद्यद्म स्रह्य क्शह्द्भ.द्म द्यह्य ब्ह्यस्रद्भ क्ष् ह्स्र द्यक्र; द्धद्य) द्दद्मह्यह्द्ध फ्;द्ध द्दस््न **रुह्यद्धह्व;ब्** ह्स्नद्मद्म ** द्भह्यशह्यब्ह्यज्द्मह्व ह्वद्मद्गस्र** क्/;द्म;द्मह्यड्ड द्गह्यड्ड :द्बस्र 'द्मस्ब्द्ध द्गह्यड्ड स्रद्दद्म फ्;द्म द्दस् द्धस्र ह्लष् ष्द्धद्यशद्धड्ड द्यठ्ठद्ध स्रह्य द्यद्गद्मद्बह्व द्बद्भ ह्व;द्म ह्लद्गद्मह्वद्म क्द्म,फ्द्म द्वद्यस्रह्य द्बर्ख्शं द्बभ्स्रक्वद्धह् स्रद्म द्भद्मह्य"द्म क्द्बह्वद्ध श्चद्भद्ग द्यद्धद्गद्म द्बद्भ द्दद्मह्यफ्द्म्न ष्रुद्ध द्यड्ड[;द्म द्गह्यड्ड ब्द्मह्यफ् ञ्जशद्मब्द्मद्गह्न[द्मद्ध द्धशरुक्तद्मह्यंक] क्स्रद्मब्]॥द्मख्स्रश्वद्ब] द्गद्दद्मद्गद्धद्भ;द्मह्यड्ड क्द्मद्धठ्ठ द्यह्य द्गद्भह्वह्य ब्फ्ह्यड्डफ्ह्य्न श्चद्मद्भद्मह्यड्ड ह्द्भक्त शफ्फ्ह्] द्यश्वद्बभ्ठ्ठद्म;फ्ह् ब्रुद्मर्ड्ढं;द्मँ द्धहृरु ह्लद्म,फ्द्ध्न द्यद्मस्द्भ स्रब्ड्डस्रद्मह्यड्ड स्रह्य स्रद्मद्भ.द्म द्बभ्स्रक्वद्धह्फ्ह् द्धश॥द्मद्धद्ध"द्मस्रद्म,॥द्मद्ध स्रद्ग॥द्म;द्मशद्द ह्वद्दद्धड्ड द्दद्मह्यड्डफ्द्ध्न द्बभ्द्धद्य) द्बह्नद्भद्मह्क्रश शह्यश्र्द्मद्म,शड्ड द्धद्दष्ख् द्धब्द्धद्ब स्रह्य द्धशज्द्मह्य"द्मय़ रुद्म0 द्धष्द्धब्;द्ग क्ब्ष्भ्द्मड्ढंक,शड्ड ह्लह्यश्वद्य फ्भ्द्मड्डंक ह्वह्य ड्ढह्व॥द्मद्धश";शद्मद्ध.द्म;द्मह्यड्ड स्रद्म द्यद्ग; द्धह्व/द्मर्द्मंद्भ.द्म स्रद्भह्ह्य द्दह्न, स्रद्दद्म द्दस् द्धस्र /शड्डद्य स्रद्म ;द्द द्यद्ग; 1980 श द्यह्व− 2000 स्रह्य ष्द्धश्च श्चद्भद्गद्यद्धद्गद्म द्बद्भ द्दद्मह्यफ्द्म्न श्चख्द्धस्र ;ह्य॥द्मद्धश";शद्मद्ध.द्म;द्मँ र्ड्ढंद्यद्म द्यह्य ब्फ्॥द्मफ् 6 द्यद्मस् श"र्द्मं द्बर्ख्शं द्धब्[द्मद्ध फ्;द्ध स्नद्मद्ध श **द्यह्यशह्व कद्मड्ढद्गद्य** द्गह्यड्ड,स्र द्यद्ग; स्रद्म द्गद्मह्व 360 श"र्द्मं द्गद्मह्वद्म द्दस्] ;द्द द्यद्ग; ह्ष् द्यह्य द600ष्द्ध-द्यद्ध- द्यह्यड्ट क्ष् ह्स्र 2520 श"र्द्मं ष्स्क्चह्द्म द्दस््न क्स्नद्मर्द्मंह्− द्दद्ग द्वद्य द्यद्ग; द्यह्य द्दद्ध फ्ह्नह्लद्भ द्भद्दह्य द्दस््न द्वद्यद्गह्यड्ड ;द्द॥द्मद्ध द्धब्[द्मद्म द्दस् द्धस्र ड्ढद्य द्यठ्ठद्ध दष्द्धद्यशद्धड्डड्ट स्रह्य क्ह् द्गह्यड्ड रुशफ् स्रद्म द्बद्भद्गह्यज्शद्भ,स्र,ह्यद्यद्म द्भद्मञ्ज; रुस्नद्मद्मद्धद्बह् स्रद्भह्यफ्द्म ह्लद्मह्य क्ह्वह् स्रद्मब् ह्स्र ह्व कख्कह्यफ्द्म्न ड्ढद्यह्य द्वद्दद्मह्यड्डह्वह्य रुशफ्द्ध; द्भद्मञ्ज;] द्यह्;ह्नफ्द्ध द्भद्मञ्ज; स्रद्ध द्यड्डय़द्म ठ्ठद्ध द्दस्स् ह्लद्दद्मँ ह्व स्रद्मह्यर्ड्ढं शफ्] द्यश्वद्बभ्ठ्ठद्म; द्गह्॥द्मह्यठ्ठ द्दद्मह्यफ्द्म] ह्व द्धस्रद्यद्ध द्बभ्स्रद्मद्भ स्रद्म ठ्ठह्नत्न[द्म&ष्ठब्ह्यज्द्म्न
,स्र द्गद्धद्दब्द्म ष्द्दह्नह् द्यह्य ह्लह्यशद्भ द्बद्दह्वह्य स्नद्मद्ध्न शद्द द्वद्यह्य द्धस्रद्यद्ध स्रह्य द्यह्नद्बख्ठ्ठ स्रद्भ द्धह्वद्धज्श्चह् द्यद्मह्यह्वद्म श्चद्मद्दह्द्ध स्नद्मद्ध्न द्वद्यह्वह्य द्यद्मद्धस्नद्म;द्मह्यड्ड स्रद्मह्य क्द्बह्वद्ध क्द्मशज्;स्रह्द्म ष्ह्द्मर्ड्ढं्न द्यद्मद्धस्नद्म;द्मह्यड्ड द्गह्यड्ड,स्र क्ह्लह्वष्द्ध स्नद्मद्म्न द्वद्यस्रद्ध श्चह्य"कद्म,ह्यड्ड॥द्मद्ध द्धशज्शरुह्द्मह्यड्ड ह्लस्द्यद्ध ह्व स्नद्मद्ध्न द्वद्यह्वह्य ह्लह्यशद्भ द्गद्मँफ्ह्यड्ड्न द्गद्धद्दब्द्म ह्वह्य ठ्ठद्मह्यंकख्स्र द्गह्वद्म स्रद्भठ्ठद्ध्न ;द्द क्द्मद्बस्रद्मह्य ह्वद्दद्धड्ड द्धद्गब् द्यस्रह्ह्य्न ष्द्मठ्ठ द्गह्यड्ड द्वद्यस्रद्म,स्र द्यफ्द्म द्यड्डष्ड्ड/द्मद्ध द्यद्मद्गह्वह्य क्द्म;द्म द्वद्यस्रद्ध र्ड्ढंद्गद्मह्वठ्ठद्मद्भद्ध स्रद्मह्य शद्द ब्श्वष्ह्य द्यद्ग; द्यह्य ह्लद्मह्वह्द्ध स्नद्मद्ध्न ;स्त्रद्धद्ब द्वद्यह्वह्य ह्लह्यशद्भ द्गद्मँफ्ह्य ह्वद्दद्ध ड्डह्द्मह्य॥द्मद्ध द्वद्यह्वह्य क्द्मफ्भ्द्दद्बर्ख्शंस्र द्वद्यह्य द्यद्मस्ड्डद्ब द्धठ्ठ;ह्य्न शद्मद्बद्य ह्व द्धद्गब्ह्वह्य ह्लस्द्यद्म द्यड्डठ्ठह्यद्द द्वद्यस्रह्य द्गह्वद्गह्यड्ड ह्द्धह्वस्र॥द्मद्ध ह्वद्दद्धड्ड द्वक्चद्म्न ष्द्मह् र्ड्ढंज्शद्भ स्रद्ध स्रक्वद्बद्म क्ह्वह्नस्रश्वद्बद्म क्द्मस्द्भ शद्भठ्ठद्मह्व क्द्मज्द्मद्धशर्द्मंठ्ठ स्रद्ध द्दस््न शह्य द्दद्भ द्धस्रद्यद्ध स्रद्मह्य ह्वद्दद्धड्ड द्धद्गब्ह्ह्य्न ह्लद्मह्य द्बभ्द्मद्गद्मद्ध.द्मस्र द्यद्ग>द्म ह्लद्मह्द्म द्दस् क्द्मस्द्भ द्धह्लद्य द्बद्भ द्धशज्शद्मद्य द्दद्मह्यह्द्म द्दस् द्धस्र ष्ठ;द्म द्धठ्ठ;ह्य ष्ठड्ड;द्मह्यड्ड स्रद्ध ष्ह्यद्धद्दश्चस्र ब्द्मस्कद्म ठ्ठह्यफ्द्म द्वद्यस्रद्मह्य शह्य द्धठ्ठ;ह्य ह्लद्मह्ह्य द्दस्स््न
क्कद्मद्भद्मह्यड्ड क्द्मह्यद्भ द्यह्न[द्म 'द्मद्मड्डद्धह् स्रद्म रुशद्ध.र्द्मंद्ग शद्मह्द्मशद्भ.द्म हृद्म ह्लद्म,फ्द्म्न क्द्मज्श्च; स्रद्ध ष्द्मह् द्दस् द्धस्र द्यद्मह्यब्द्दशद्धड्ड 'द्मह्द्मष्टठ्ठद्ध स्रह्य ठ्ठभ्"कद्म द्गह्वद्ध"द्मद्ध ह्वद्मह्यरुंकऊद्मरुह्यद्गद्य त्त्द्मद्भद्म ष्ह्द्म;ह्य फ्;ह्य द्यड्डस्रह्यह्॥द्मद्ध ड्ढद्यद्ध क्शद्ध/द्म द्यह्य द्यड्डफ्द्धह् [द्मद्मह्ह्य द्दस््न ह्लद्दद्मँ द्वद्दद्मह्यड्डह्वह्य,.कद्धयद्मड्ढरुंक स्रद्ध श्चश्चद्मभ् स्रद्ध द्दस्] शद्दद्मँ द्यस्कद्मद्धह्वस्र द्बद्मंखशद्भ दज्द्मस्ह्द्मह्व स्रद्ध 'द्मद्धष्ठह्ड्ट स्रह्य ह्द्धशभ्ह्द्ग द्दद्मह्यह्वह्य श द्धक्तद्भ ह्व"क द्दद्मह्यह्वह्य स्रद्म द्बभ्द्यड्डफ्॥द्मद्ध द्धब्[द्मद्म द्दस््न
रुद्म0 र्ड्ढं- रुंकद्मंकह्व ह्वह्य,स्र द्बह्नरुह्स्र द्धब्[द्मद्ध द्दस् ** शह्द्गद्मह्व,शड्ड द्धह्वस्रंक॥द्मद्धश"; स्रद्ध॥द्मद्धश";शद्मद्ध.द्म;द्मह्यड्ड** शह्य ष्द्मड्ढष्ब् स्रह्य द्बद्मँश्चशह्य क्/;द्म; स्रद्म द्वंघब्ह्य[द्म स्रद्भह्ह्य द्दह्न, द्धब्[द्मह्ह्य द्दस् द्धस्र द्यक्तह्यठ्ठ द्भड्डफ् स्रह्य?द्मद्मह्यरुह्य द्बद्भ द्यशद्मद्भ,स्र?द्मह्नरुद्यशद्मद्भ ह्वह्य यद्गज्द्मत्न द्यद्मह् द्गह्नद्दद्भह्यड्ड [द्मद्मह्यब्द्धड्ड,शड्ड ठ्ठह्य[द्मह्ह्य&ठ्ठह्य[द्मह्ह्य ब्द्मह्यफ्द्मह्यड्ड स्रद्म द्धशश्चद्मद्भ द्बभ्शद्मद्द ष्ठ्ठब्ह्द्म श्चब्द्म फ्;द्म द्धष्ह्वद्म द्भष्ठह्&द्बद्मह् स्रह्य द्वद्यह्वह्य क्ह्वस्रद्मह्यड्ड स्रद्म स्रद्म;द्मस्रंघद्ब स्रद्भ द्धठ्ठ;द्म] ठ्ठह्न"कह्द्म स्रद्मह्य द्यड्डद्यद्मद्भ द्यह्य द्धद्गंकद्म द्धठ्ठ;द्म्न **रुह्यद्धह्व;ब्** क्/;द्म; द्यद्मह्&13] 14 द्गह्यड्ड द्धब्[द्मद्म द्दस् द्धस्र **द्गस्ड्डह्वह्य ठ्ठह्य[द्मद्म द्धस्र ष्द्मठ्ठब्द्मह्यड्ड द्गह्यड्ड द्यह्य द्वह्द्भ स्रद्भ स्रद्मह्यर्ड्ढं द्गद्मह्वश क्द्म द्भद्दद्म द्दस्] शद्द द्बद्भद्ग द्धद्बह्द्म द्बद्भद्गह्यज्शद्भ स्रह्य द्यद्मस्नद्म द्दस््न द्वद्य ;ह्नफ् द्बह्न:"द्म ह्वह्य द्वद्यह्य 'द्मद्मद्यह्व स्रद्म क्द्ध/द्मस्रद्मद्भ द्धठ्ठ;द्म ह्द्मद्धस्र द्यद्मद्भद्ध द्बक्वस्नशद्ध द्बद्भ,स्र॥द्मद्म"द्मद्म द्दद्मह्य],स्र 'द्मद्मद्यह्व द्दद्मह्य] द्य॥द्मद्ध स्रद्मस्द्गह्यड्ड द्वद्यस्रद्म द्यश्वद्गद्मह्व स्रद्भह्य**्न ड्ढद्य ;ह्नफ् द्बह्न:"द्म स्रद्मह्य॥द्मद्ध ह्र;द्म[;द्मस्रद्मद्भ ह्वह्य द्बर्ख्शं द्यह्य द्वद्धठ्ठह् द्दद्मह्यह्द्म द्धठ्ठ[द्मद्म;द्म द्दस् श,स्र द्धशद्धश्च= द्यद्गद्मह्वह्द्म द्यक्तह्यठ्ठ?द्मद्मह्यरुह्य द्बद्भ ह्ब्शद्मद्भ ब्ह्यस्रद्भ क्द्मह्वह्य शद्मब्ह्य द्बह्न:"द्म स्रह्य द्धश"द्म; द्गह्यड्ड स्रद्धंघस्र क्शह्द्मद्भ,शड्ड द्धयद्धज्श्च;ह्व /द्मर्द्गं स्रह्य ड्ढद्य ;ह्नफ् द्बह्न:"द्म द्गह्यड्ड द्दस््न द्यक्तह्यठ्ठ द्यह्य क्स्नर्द्मं द्दस् 'द्मद्मद्धह् स्रद्म द्बभ्ह्द्धस्र] ह्ब्शद्मद्भ द्यह्य क्स्नर्द्मं द्दस् द्धशश्चद्मद्भद्मह्यड्ड स्रद्ध स्रद्मंकस्रद्भ ष्ह्नद्ध)शद्मठ्ठ स्रह्य द्गद्म/;द्ग द्यह्य ह्वद्मद्धरुह्स्रह्द्म स्रद्मह्य द्धद्गंकद्मह्वह्य शद्मब्द्म] ह्ह्यह्लद्ध द्यह्य श्चब्स्रद्भ क्द्मह्वह्य स्रद्म क्स्नर्द्मं द्दस्&ड्ढह्ह्वद्ध ह्ह्यह्लद्ध द्यह्य द्धशश्चद्मद्भयद्मद्धह् द्धशज्शह्र;द्मद्बद्ध द्दद्मह्य ह्लद्म,फ्द्ध द्धस्र द्यष् क्द्मज्श्च; स्रद्भह्यड्डफ्ह्य्न द्धक्तद्भ श्चद्मद्भद्मह्यड्ड क्द्मह्यद्भ 'द्मद्मद्धह् श रुशफ्द्मर्ह्यंद्बद्ग द्भद्मञ्ज; हृद्मह्वह्य स्रद्ध श्चश्चर्द्मं ठ्ठद्मह्यह्वद्मह्यड्ड /द्मर्द्गंफ्भ्स्नद्म श ह्र;द्म[;द्मस्रद्मद्भ स्रद्भह्ह्य द्दस््न
**रुह्यद्धह्व;ब्** 2ञ्च44 द्गह्यड्ड द्दद्ध द्धब्[द्मद्म द्दस् द्धस्र **द्धस्रफ्ड्डरुद्ग क्द्मंखक्त फ्द्मंखरु शद्धब्स्रद्ग ड्ढह्व द्बद्मंखशद्भ्न ड्ढंकद्धशब् क्द्यर्द्बं क्द्मंखब् क्स्नर्द्मंब्द्ध द्धस्रफ्ड्डरुद्ग−द्य,.रु द्धशब्,रुंकह्यष्ब्द्धज्द्म,;ख्द्धह्वशर्द्यंब् द्धस्नद्म;द्मह्ययह्यद्यद्ध** क्स्नद्मर्द्मंह्− **द्बद्भद्ग द्बभ्॥द्मह्न स्रद्म द्भद्मञ्ज; **ज्द्मद्धष्ठह्** स्रह्य :द्ब द्गह्यड्ड द्दद्मह्यफ्द्म] ह्र;द्धष्ठह् स्रह्य ह्वद्दद्धड्ड्न शद्द द्यद्मद्भह्य क्;द्म; द्बक्वस्नशद्ध स्रह्य द्भद्मञ्ज;द्मह्यड्ड स्रद्मह्य ह्व"क स्रद्भ,स्र द्यर्द्मशं॥द्मद्मस्द्ग /द्मर्द्गंठ्ठज्द्मह्व स्रद्ध क्द्मश्चद्मद्भ द्यड्डद्धद्दह्द्म द्यष् द्बद्भ ब्द्मफ्ख् स्रद्भह्यफ्द्म**्न
ड्ढद्यद्ध द्बभ्स्रद्मद्भ ह्लह्यह्वह्यद्यद्धद्यद्मह्य द18ञ्च32&33ड्ट,शड्ड ह्लद्मह्यह्वद्मद्द द3ञ्च8ड्ट द्गड्डह्य॥द्मद्ध ;द्दद्ध द्बभ्द्यड्डफ् ठ्ठह्नद्दद्भद्म;द्म फ्;द्म द्दस््न
ड्ढरुब्द्मद्ग/द्मर्द्गं ;द्द द्गद्मह्वह्द्म द्दस् द्धस्र ष्द्धद्यशद्धड्ड द्यठ्ठद्ध स्रद्म द्यद्गद्मद्बह्व द्वह्वस्रद्ध श्चद्मस्ठ्ठद्दशद्धड्ड द्यठ्ठद्ध स्रद्म द्यद्गद्मद्बह्व॥द्मद्ध द्दस््न द्धक्तद्भ स्र;द्मद्गह् क्द्म,फ्द्ध्न **ड्ढरुब्द्मद्ग॥द्मद्धश"; स्रद्ध क्द्मज्द्मद्म** ह्वद्मद्गस्र द्बह्नरुह्स्र छ्वद्ध द्यस्;ठ्ठस्रह्नक्रश त्त्द्मद्भद्म द्धब्[द्मद्ध] द्गर्स्रंह्लद्म द्गष्ठह्ष्द्म ड्ढरुब्द्मद्गद्ध द्धठ्ठंघब्द्ध त्त्द्मद्भद्म द्बभ्स्रद्मद्धज्द्मह् स्रद्ध फ्;द्ध द्दस््न शह्य द्धब्[द्मह्ह्य द्दस् द्धस्र ड्ढष्ठस्रद्धद्यशद्धड्ड द्यठ्ठद्ध स्रद्म 'द्मह्न॥द्मद्मद्भड्ड॥द्म द्बठ्ठद्मस्नर्द्मं द्धशय़द्मह्व श /द्मर्द्गं स्रह्य द्यद्गश; द्यह्य द्दद्मह्यफ्द्म्न शह्य रुद्म0 स्रस्द्भह्यब् स्रक्वह् **क्य़द्मह् द्गद्मह्वश** द्बह्नरुह्स्र स्रद्म द्दशद्मब्द्म ठ्ठह्यह्ह्य द्दह्न, द्धब्[द्मह्ह्य द्दस् द्धस्र द्यद्मद्भद्ध द्धज्द्मम्द्मद्म द्ब)द्धह् क्द्मद्गख्ब्श्चख्ब् ष्ठ्ठब्ह्यफ्द्ध,शड्ड द्यड्डरुस्रद्मद्भ द्बभ्/द्मद्मह्व द्धज्द्मम्द्मद्म द्दद्ध श्चद्मद्भद्मह्यड्ड क्द्मद्भह्य द्यड्डह्र;द्मढ्ढह् द्दद्मह्यफ्द्ध ह्लद्दद्मँ ह्वश;ह्नफ् स्रह्य द्गद्दद्मद्गद्मह्वशद्मह्यड्ड स्रद्म द्यक्वह्लह्व द्दद्मह्यफ्द्म्न द्गह्वद्मह्यद्धशस्रद्मद्भ श क्ह्वस्द्धह्स्रह्द्म द्यह्य ह्लद्गह्यह्य द्भद्मह्यफ्द्मह्यड्ड स्रद्म द्वद्बश्चद्मद्भ क्/;द्मक्रद्ग द्गड्डश्च द्यह्य द्दद्मह्यफ्द्म श ह्वशद्ध द्गद्मह्वशह्द्म ह्लद्ग ब्ह्यफ्द्ध क्द्मद्धस्नर्द्मंस्रद्ध स्रह्य द्धशज्द्मह्य"द्मय़ द्यष्स्रद्मह्य द्यद्गद्मह्व द्धशह्द्भ.द्म द्बद्भ ह्लद्मह्यद्भ ठ्ठह्यह्वह्य ब्फ्ह्यड्डफ्ह्य श श्चद्मद्भद्मह्यड्ड क्द्मह्यद्भ द्यद्गह्द्म स्रद्म द्भद्मञ्ज; द्दद्मह्यफ्द्म्न द्धशय़द्मह्व स्रद्म द्यह्नद्धह्व;द्मह्यह्लह्व द्यक्वह्लह्वद्मक्रद्गस्र स्रद्म;द्मर्ह्यं स्रह्य द्धब्, द्दद्मह्यफ्द्म ह्व द्धस्र द्धशह्वद्मज्द्म स्रह्य द्धब्;ह्य**्न
**द्बह्नरुह्स्र **स्रह्नद्भक्द्मह्व द्यद्मद्भ** द्गह्यड्ड द्धशह्वद्मह्यष्द्म ह्वह्य द्धब्[द्मद्म द्दस् द्धस्र **स्र;द्मद्गह् स्रह्य द्धठ्ठह्व] र्ड्ढंज्शद्भ द्बह्नह्व:क्रस्नद्मद्मह्व स्रह्य द्धठ्ठह्व ह्स्र,ह्यद्यद्म द्बभ्स्रद्मज्द्म हृद्म ह्लद्म;ह्यफ्द्म द्धस्र द्दद्गह्यज्द्मद्म द्धठ्ठह्व द्भद्दह्य] स्र॥द्मद्ध द्भद्मद्ध= ह्व क्द्म,्न स्र;द्मद्गह् द्यह्य द्बर्ख्शं,ह्यद्यद्म द्यद्ग; क्द्म;ह्यफ्द्म द्धह्लद्य द्गह्यड्ड द्यद्मद्भद्ध द्धशज्शद्मक्रद्गद्म स्रद्मह्य 'द्मद्मद्धह् द्धद्गब्ह्य**्न द्धह्वद्धज्श्चह् द्दद्ध द्धशह्वद्मह्यष्द्म स्रद्म क्द्मज्द्म; द्बभ्रुह्ह्नह् शह्यब्द्म स्रह्य द्वञ्जह्लशब् द्यड्ड॥द्मद्मशह्वद्मक्द्मह्यड्ड द्यह्य॥द्मद्भद्म द्दद्मह्यह्वह्य द्यह्य द्दस््न ड्ढद्य द्बभ्स्रद्मद्भ ह्द्धह्वद्मह्यड्ड द्दद्ध द्बभ्द्गह्न[द्म द्धशज्श/द्मर्द्गं॥द्मद्धश"; स्रह्य द्धश"द्म; द्गह्यड्ड ह्लद्मह्य स्रह्नहृ स्रद्दह्ह्य द्दस्] द्वद्यस्रह्य द्धशशह्यश्चह्व द्यह्य,स्र द्दद्ध द्धह्व"स्र"र्द्मं द्धह्वस्रब्ह्द्म द्दस्&द्वञ्जह्लशब्॥द्मद्धश"; द्दद्गद्मद्भह्य )द्मद्भ द्बद्भ [द्मरुद्म द्दस््न
द्धस्रद्यद्ध द्यद्म/द्मह्न स्रद्मह्य,स्र द्बस्द्यद्म द्भद्मरुह्ह्य द्गह्यड्ड द्बरुद्म द्धद्गब्द्म्न द्वह्वह्वह्य द्वद्यह्यह्य द्वक्चद्म ह्द्मह्य द्धब्;द्म] द्बद्भ द्धशश्चद्मद्भ स्रद्भह्वह्य ब्फ्ह्य ड्ढद्यस्रद्म ष्ठ;द्म स्रद्भह्वद्म श्चद्मद्धद्द, झ्र ष्ह्नद्ध) ह्वह्य स्रद्दद्म ह्लद्मह्य द्यष्द्यह्य क्द्ध/द्मस्र फ्द्भद्धष् द्दद्मह्य द्वद्यह्य ठ्ठह्य ठ्ठह्यह्वद्म श्चद्मद्धद्द,्न द्यद्म/द्मह्न द्यष्द्यह्य क्द्ध/द्मस्र फ्द्भद्धष् स्रद्ध ह्ब्द्मज्द्म द्गह्यड्ड द्धह्वस्रब् द्बरुह्य क्द्मस्द्भ फ्द्मँश&फ्द्मँश ड्ढद्यद्ध स्रद्म द्बह्द्म ब्फ्द्मह्ह्य?द्मख्द्गह्ह्य द्भद्दह्य्न
फ्द्भद्धष् ह्द्मह्य ष्द्दह्नह् द्धद्गब्ह्य द्बद्भ द्यष्द्यह्य क्द्ध/द्मस्र स्रद्दह्य ह्लद्मह्वह्य ;द्मह्यंग; स्रद्मह्यर्ड्ढं ह्व द्धद्गब्द्म्न फ्द्भद्धष् स्रद्दह्य ह्लद्मह्वह्य शद्मब्द्मह्यह्यड्ड स्रह्य द्बद्मद्य॥द्मद्ध स्रह्नहृ ह्वह्य स्रह्नहृ द्गद्मब्कद्मब् द्धद्गब्द्म्न द्यक्तब्ह्द्म ह्व द्धद्गब्ह्वह्य द्बद्भ शह्य क्द्मफ्ह्य ष्,स्र द्धठ्ठह्व ठ्ठह्य[द्मद्म द्धस्र,स्र द्भद्मह्लद्म द्यह्यह्वद्म द्यद्धद्दह् स्रद्दद्धड्ड ह्लद्म द्भद्दद्म स्नद्मद्म्न द्यद्म/द्मह्न ह्वह्य द्वद्यस्रद्ध ड्ढद्य ;द्म=द्म स्रह्य ष्द्मद्भह्य द्गह्यड्ड ह्लद्मह्वस्रद्मद्भद्ध द्बभ्द्मढ्ढह् स्रद्ध ह्द्मह्य द्बभ्ह्द्धह् द्दह्नक्द्म द्धस्र द्भद्मह्लद्म स्रह्य द्बद्मद्य /द्मह्व ठ्ठद्मस्ब्ह् ह्द्मह्य ष्द्दह्नह् द्दस् द्बद्भ द्धस्रद्यद्ध ठ्ठख्द्यद्भह्य द्भद्मह्लद्म स्रह्य टद्बद्भ श्च द्यद्म/द्मह्न ह्वह्य क्द्बह्वद्म क्द्ध॥द्मद्बभ्द्म; द्बख्द्भद्ध ह्द्भद्द स्रद्द द्यह्नह्वद्म;द्म्न द्भद्मह्लद्म द्यद्मह्यश्चह्वह्य ब्फ्द्म द्धस्र ष्ठ;द्म द्यद्म/द्मह्न स्रद्ध ष्द्मह् फ्ब्ह् द्दस् झ्र द्गस्ड्ड क्ह्वद्धद्धह् द्बर्ख्शंस्र /द्मह्व ष्कद्मह्यद्भह्वह्य ह्लद्म द्भद्दद्म द्दख् ह्द्मह्य द्यष्द्यह्य क्द्ध/द्मस्र फ्द्भद्धष् द्दद्ध ह्द्मह्य द्दह्नक्द्म्न ब्ञ्जह्लद्म द्यह्य द्वद्यस्रद्म द्धद्यद्भ >ह्नस्र फ्;द्म्न द्यद्म/द्मह्न स्रद्मह्य हृद्मह्यरु द्धठ्ठ;द्म फ्;द्म्न द्भद्मह्लद्म ह्वह्य द्यह्यह्वद्म स्रद्मह्य शद्मद्बद्य ब्द्मस्क श्चब्ह्वह्य स्रद्म द्दह्नष्ठद्ग द्धठ्ठ;द्म्न
द्धशश्चद्मद्भह्क्रश॥द्मद्ध द्बभ्द्म.द्मह्क्रश स्रह्य द्यद्गस्रम्द्म द्दस््न शह्य श्चह्यह्ह्व ह्लफ्ह् द्गह्यड्ड द्धठ्ठह्र; ह्द्भड्डफ्द्मह्यड्ड स्रह्य :द्ब द्गह्यड्ड द्धह्वद्भह्द्भ फ्द्धह्ज्द्मद्मद्धब् द्भद्दह्ह्य द्दह्य्न द्बभ्द्म.द्मह्क्रश स्रद्ध द्धशशह्यश्चह्वद्म ;द्मह्यफ्] ह्द्ब क्द्मस्द्भ द्बभ्द्म.द्म द्बभ्क्र;द्मशह्ह्व द्बभ्द्यड्डफ् स्रद्ध ह्लद्मह्द्ध द्भद्दद्ध द्दस््न ;द्दद्मँ द्धशश्चद्मद्भ द्धशय़द्मह्व द्बद्भ द्दद्ध स्रह्नहृ द्बभ्स्रद्मज्द्म रुद्मब्द्म ह्लद्म द्भद्दद्म द्दस््न
द्धशश्चद्मद्भ द्गह्वह्न";द्मह्यड्ड स्रह्य द्गद्धरुह्"स्रद्मड्डड्डह्य द्गह्यड्ड द्यह्य द्धह्वस्रब्ह्वह्य शद्मब्ह्य,स्र द्धशज्द्मह्य"द्म द्बभ्स्रद्मद्भ स्रह्य स्रश्वद्बह्व द्दस् ह्लद्मह्य द्धश्चह्ह्व स्रद्ध ह्द्धशभ्ह्द्म क्द्मस्रद्मज्द्म द्गह्यड्ड क्तस्ब् ह्लद्मह्ह्य द्दस््न शह्य॥द्मद्मद्ब स्रद्ध ह्द्भद्द द्वरुह्ह्य क्द्मस्द्भ क्द्मस्रद्मज्द्म द्गह्यड्ड?द्मख्द्गह्वह्य ब्फ्ह्ह्य द्दस््न क्द्बह्वह्य द्यद्गस्रम्द्म रुह्द्भ स्रह्य क्; द्बभ्शद्मद्दद्मह्यड्ड स्रद्मह्य ह्लष् शह्य द्बद्मह्ह्य द्दस््न ष्द्मठ्ठब्॥द्मद्ध ड्ढद्यद्ध द्बभ्स्रद्मद्भ ष्ह्वह्ह्य द्दस््न ह्लद्दद्मँ&ह्द्दद्मँ द्यह्य॥द्मद्मद्ब द्वक्चस्रद्भ टद्बद्भ द्धद्गब्स्रद्भ?द्मह्वद्ध॥द्मख्ह् द्दद्मह्य ह्लद्मह्द्ध द्दस््न ;द्धठ्ठ क्द्ध/द्मस्र द्यड्ड[;द्म द्गड्डह्य द्गह्वह्न"; क्द्मशह्यज्द्म फ्भ्रुह्ह्न द्धशश्चद्मद्भ स्रद्भह्ह्य क्द्मस्द्भ क्द्मस्रद्मज्द्म द्गह्यड्ड क्तस्ब्ह्ह्य द्भद्दह्यड्ड ह्द्मह्य द्वह्वस्रद्म द्धद्गब्द्मह्लह्नब्द्म रुश:द्ब,स्र 'द्मद्धष्ठह् द्बभ्शद्मद्द स्रद्म :द्ब /द्मद्मद्भ.द्म स्रद्भ ब्ह्यह्द्म द्दस् क्द्मस्द्भ क्द्मस्रद्मज्द्म द्गह्यड्ड द्बद्धद्भ॥द्मभ्द्ग.द्म स्रद्भह्वह्य ब्फ्ह्द्म द्दस््न द्बह्यरुद्मह्यड्ड स्रद्म क्द्मस्र"र्द्मं.द्म ष्द्मठ्ठब्द्मह्यड्ड स्रद्मह्य [द्मद्धड्डश्च स्रद्भ क्द्बह्वह्य म्द्मह्य= द्गह्यड्ड ष्द्भद्यह्वह्य स्रह्य द्धब्, ष्द्मद्ध/द्मह् स्रद्भह्द्म द्दस््न ड्ढद्यद्ध द्बभ्स्रद्मद्भ द्यह्य द्धद्ग= द्बभ्स्रक्वद्धह् स्रह्य द्गद्धरुह्"स्र ष्भ्द्द−द्मद्म.रु ह्र;द्मद्बद्ध द्धशश्चद्मद्भद्मह्यड्ड स्रद्मह्य क्द्बह्वद्ध क्द्मह्यद्भ [द्मद्धड्डश्च ब्ह्यह्ह्य द्दस््न क्तब्ह्त्न द्वह्वद्गह्यड्ड क्द्ध/द्मस्र द्यद्गस्नर्द्मंह्द्म द्वक्रद्बह्व द्दद्मह्य ह्लद्मह्द्ध द्दस््न॥द्मब्ह्य ;द्म ष्ह्नद्भह्य द्धशश्चद्मद्भद्मह्यड्ड शद्मब्ह्य ब्द्मह्यफ् द्गद्म= क्द्बह्वह्य द्धश्चह्ह्व स्रह्य द्दद्ध /द्मह्वद्ध ह्वद्दद्धड्ड द्भद्दह्ह्य शद्भह्व− द्वद्दह्यड्ड द्वद्यद्ध रुह्द्भ स्रद्ध द्यख्>ष्ख्> क्ह्वह् क्द्मस्रद्मज्द्म द्यह्य॥द्मद्ध द्धद्गब्ह्द्ध द्दस् क्द्मस्द्भ ;ह्य क्॥द्मद्ध"क द्धठ्ठज्द्मद्म द्गह्यड्ड ष् क्द्धंगह्व स्रद्म क्द्बह्वद्म फ्ह्न.द्म] रुश॥द्मद्मश क्द्मस्द्भ द्धश/द्मद्मह्व द्दस् द्वद्यद्यह्य॥द्मब्द्म ;द्म ष्ह्नद्भद्म ह्लस्द्यद्म॥द्मद्ध श्चद्मद्दद्म ह्लद्म; द्बभ्;द्मह्यफ् द्दद्मह्य द्यस्रह्द्म द्दस््न क्द्मफ् द्यड्डह्लद्धशह्वद्ध द्भद्यद्म;ह्वह्यड्ड ष्ह्वद्मह्वह्य स्रद्ध द्बभ्द्धय;द्म॥द्मद्ध द्बख्द्भद्ध स्रद्भह्द्ध द्दस् क्द्मस्द्भ ;द्धठ्ठ क्द्धंगह्वस्रद्म.रु स्रह्य द्धब्, द्वद्यस्रद्म द्बभ्;द्मह्यफ् द्धस्र;द्म ह्लद्म; ह्द्मह्य शस्द्यद्म॥द्मद्ध द्दद्मह्य द्यस्रह्द्म द्दस् ष्भ्द्द−द्मद्म.रुह्र;द्मद्बद्ध द्धशश्चद्मद्भ द्यद्गह्नक्कश्च; स्रद्ध द्गह्य?द्म द्गद्मब्द्मक्द्मह्यड्ड स्रद्मह्य छ्वह्य"क्च ह्लह्वद्मह्यड्ड स्रद्ध ह्द्भद्द द्धह्वस्रक्व"क ह्लह्व॥द्मद्ध क्द्बह्वह्य क्॥द्मद्ध"क स्रह्य क्ह्वह्न:द्ब क्द्मस्रद्ध"र्द्मंह् स्रद्भ द्यस्रह्ह्यड्ड द्दस््न क्द्यह्नद्भह्द्म स्रह्य स्रह्यठ्ठभ् ह्लद्दद्मँ॥द्मद्ध द्भद्दह्य द्दस् शद्दद्मँ द्वह्वह्वह्य क्द्बह्वह्य रुह्द्भ स्रद्ध क्ठ्ठक्वज्; 'द्मद्धष्ठह् स्रद्ध द्यद्दद्म;ह्द्म द्बभ्द्मढ्ढह् स्रद्भ ब्द्ध द्दस््न ठ्ठ.रुस्रद्मद्भ.; द्गह्यड्ड [द्मद्भठ्ठख्"द्म.द्म द्बभ्स्रक्वद्धह् स्रह्य,स्र द्यह्य,स्र ष्द्मद्दह्नष्ब्द्ध ठ्ठद्मह्वशद्मह्यड्ड स्रद्म ह्लद्ग?द्मंक,स्रद्ध=ह् द्दद्मह्य फ्;द्म स्नद्मद्म्न ब्ड्डस्रद्म द्गह्यड्ड ;द्दद्ध द्बभ्;द्मह्यफ् ष्रुह्य द्बद्धद्भद्गद्म.द्म द्गह्यड्ड द्दह्नक्द्म स्नद्मद्म क्द्मस्द्भ द्वद्य म्द्मह्य= स्रह्य क्द्ध/द्मस्रद्मड्डज्द्म ह्र;द्धष्ठह् द्वह्व द्धठ्ठह्वद्मह्यड्ड ठ्ठस्क्र; रुह्द्भ स्रह्य ष्ह्व फ्;ह्य स्नद्मह्य्न ड्ढद्यद्गह्यड्ड द्वह्वस्रद्म द्धह्वह्लद्ध द्बद्भद्मयद्ग ह्द्मह्य स्नद्मद्म द्दद्ध] श्चह्यह्ह्वद्म ह्लफ्ह् द्यह्य [द्मद्धड्ड[ ष्ह्नब्द्मर्ड्ढं फ्ड्ढ 'द्मद्धष्ठक्र द्यश्वद्बठ्ठद्म स्रद्म॥द्मद्ध स्रद्ग द्यद्द;द्मह्यफ् ह्व स्नद्मद्म] क्;स्नद्मद्म,स्र द्दद्ध रुस्नद्मद्मह्व द्बद्भ ड्ढह्ह्वद्ध 'द्मद्धष्ठह् स्रस्द्यह्य,स्रद्ध=ह् द्दद्मह्य ह्लद्मह्द्ध झ्र
,स्रद्मस्रद्ध द्धश्चह्ह्व क्द्बह्वद्ध रुशंघद्ब 'द्मद्धष्ठह् स्रह्य स्रद्मद्भ.द्म ठ्ठह्नष्ब् द्दद्मह्यह्द्म द्दस् क्द्मस्द्भ द्वद्यस्रह्य द्यद्दद्मद्भह्य द्गद्म= क्द्बह्वद्म द्धह्वह्लद्ध द्बभ्;द्मह्यह्लह्व द्दद्ध द्यद्धद्धद्गह् द्गद्म=द्म द्गह्यड्ड द्बख्द्भद्म स्रद्भ द्बद्मह्द्म द्दस््न क्द्ध/द्मस्र ब्द्मह्यफ्द्मह्यड्ड स्रद्म क्द्ध/द्मस्र द्यद्द;द्मह्यफ् द्यठ्ठद्म द्यद्गद्धशह् 'द्मद्धष्ठह् स्रद्म द्धह्वद्धद्गह् स्रद्मद्भ.द्म क्द्मस्द्भ द्बभ्ष्ब् द्गद्मह्वद्म ह्लद्मह्द्म द्भद्दद्म द्दस््न हृद्मह्यंकह्य&हृद्मह्यंकह्य ह्वद्मब्द्मह्यड्ड द्यह्य द्धद्गब्स्रद्भ,स्र ष्रुद्ध ह्वठ्ठद्ध ष्ह्वह्द्ध द्दस् क्द्मस्द्भ द्वद्यस्रद्म द्बभ्शद्मद्द ठ्ठह्य[द्मह्ह्य द्दद्ध ष्ह्वह्द्म द्दस््न हृद्मह्यंकद्ध हृद्मह्यंकद्ध >द्मद्धरु;द्मँ द्धद्गब्स्रद्भ,ह्यद्यद्म द्य?द्मह्व >ह्नद्भद्गह्नंक ष्ह्वद्म ब्ह्यह्द्ध द्दस्] द्धह्लद्यह्य द्बद्मद्भ स्रद्भह्वद्म क्क्र;ह् स्रद्धक्चह्व द्दद्मह्य ह्लद्मह्द्म द्दस््न ष्ठ्ठद्भद्मह्यड्ड स्रह्य द्यद्गख्द्द द्यह्य हृह्यरु[द्मद्मह्वद्ध स्रद्भह्वह्य स्रद्ध द्धद्दश्वद्गह् स्रद्दद्मँ द्बरुह्द्ध द्दस् झ्र द्धंकरु−रुद्ध ठ्ठब् ह्लष् कख्कह्द्म द्दस् ह्ष् [द्मह्यह्द्मह्यड्ड स्रद्मह्य द्यक्तद्मश्चंक द्दद्ध स्रद्भह्द्म ह्लद्मह्द्म द्दस््न द्बद्भ शद्द द्यक्तब् स्रद्दद्मँ द्दद्मह्यह्द्म द्दस् झ्र श्चद्धड्डद्धंक;द्मँ] ठ्ठद्धद्गस्र] द्ग/द्मह्नद्गद्धष्ठ[द्म;द्मँ >ह्न.रु ष्ह्वद्मस्रद्भ द्दद्ध ठ्ठह्नष्ब् द्दद्मह्यह्ह्य द्दह्न,॥द्मद्ध द्दंकद्मह्वह्य स्रद्म द्बभ्;ह् स्रद्भह्वह्य शद्मब्द्मह्यड्ड स्रद्मह्य श्चह्नह्वद्मस्ह्द्ध ठ्ठह्यह्द्ध द्भद्दह्द्ध द्दस््न द्यद्मद्गख्द्धद्दस्रह्द्म क्द्मस्द्भ द्वद्य क्द्म/द्मद्मद्भ द्बद्भ क्द्बह्वद्मर्ड्ढं फ्ड्ढ द्बभ्;क्रह्वज्द्मद्धब्ह्द्म स्रद्म द्बभ्द्धह्क्तब् श्चद्गक्रस्रद्मद्भद्ध द्दद्ध द्दद्मह्यह्द्म द्दस््न ड्ढद्यस्रह्य द्वठ्ठद्मद्दद्भ.द्म ठ्ठह्यश क्द्मस्द्भ ठ्ठस्क्र; म्द्मह्य=द्मह्यड्ड द्गह्यड्ड द्यद्गद्मह्व :द्ब द्यह्य द्वद्बब्ष्ट/द्म द्दह्न, ठ्ठह्य[द्मह्य ह्लद्म द्यस्रह्ह्य द्दस््न छ्वक्वद्ध"द्म&द्गह्नद्धह्व द्धद्दद्गद्मब्; द्बद्धद्भस्रद्भ द्गह्यड्ड ;द्म ह्वस्द्धद्गद्यद्मद्भ.; क्द्मद्धठ्ठ म्द्मह्य= द्गह्यड्ड द्य?द्मह्व ष्ह्व स्रद्भ द्दद्ध द्भद्दह्ह्य स्नद्मह्य क्द्मस्द्भ ठ्ठस्शद्ध 'द्मद्धष्ठह् स्रह्य क्शह्द्भ.द्म स्रद्म ब्द्म॥द्म द्वद्य द्य?द्मह्वह्द्म स्रह्य क्द्म/द्मद्मद्भ द्बद्भ क्द्ध/द्मस्र द्गद्म=द्म द्गह्यड्ड द्वद्बब्ष्ट/द्म स्रद्भह्ह्य स्नद्मह्य्न द्धशश्चद्मद्भ द्धशय़द्मह्व म्द्मह्य= स्रह्य क्द्म/द्मद्मद्भ द्बद्भ॥द्मद्ध ;द्दद्ध द्बद्धद्भब्द्धम्द्मह् द्दद्मह्यह्द्म द्दस् द्धस्र क्द्ध/द्मस्र शद्मह्यंकद्मह्यड्ड द्यह्य श्चह्नह्वद्मश ह्लद्धह्ह्वह्य स्रद्ध ह्वद्धद्धह् शद्दद्मँ॥द्मद्ध स्रद्मद्ग स्रद्भह्द्ध द्दस््न,स्र द्बभ्स्रक्वद्धह् स्रह्य ब्द्मह्यफ् ह्लष्॥द्मद्ध ह्लद्दद्मँ॥द्मद्ध द्यड्डफ्द्धक्चह् द्दद्मह्यह्ह्य द्दस् शद्दद्धड्ड द्वद्दह्यड्ड ह्व स्रह्यशब् द्बद्मद्भरुद्बद्धद्भस्र द्यद्दस्रद्मद्भ द्यह्य ब्द्म॥द्मद्धशह् द्दद्मह्यह्वह्य स्रद्म क्शद्यद्भ द्धद्गब्ह्द्म द्दस्] शद्दद्मँ श्चह्यह्ह्वद्म द्यड्डद्यद्मद्भ स्रह्य द्यख्म्द्ग द्बभ्॥द्मद्मशद्मह्यड्ड द्यह्य॥द्मद्ध शह्य क्द्बह्वह्य रुह्द्भ स्रद्म क्ठ्ठक्वज्; ब्द्म॥द्म द्वक्चद्म ब्ह्यह्ह्य द्दस््न
द्धद्बहृब्ह्य द्धठ्ठह्वद्मह्यड्ड ;द्दद्ध द्दह्नक्द्म द्दस््न शस्य़द्मद्धह्वस्र क्द्मद्धश"स्रद्मद्भ क्द्मस्द्भ क्द्मस्स्त्रद्मह्यफ्द्धस्रद्भ.द्म स्रह्य द्यद्गश; द्यह्य श्चह्नह्द्भ ब्द्मह्यफ्द्मह्यड्ड स्रद्मह्य क्द्यद्म/द्मद्मद्भ.द्म क्द्मद्धस्नर्द्मंस्र ब्द्म॥द्म द्दह्नक्द्म्न स्रद्गद्मह्वद्म द्यद्भब् क्द्मस्द्भ द्बश्चद्मह्वद्म द्गह्नद्धज्स्रब््न द्यठ्ठद्मज्द्म;ड्डह्द्म स्रद्म &ह्वद्धद्धह्द्गश्र्द्मद्म स्रद्म स्ररुद्म क्ड्डस्रह्नज्द्म ह्व द्दद्मह्य ह्द्मह्य क्द्यद्धद्ग द्गद्म=द्मद्म द्गह्यड्ड द्वद्बब्ष्ट/द्म द्दह्नद्मक् शस्॥द्मश द्गह्वह्न"; स्रद्मह्य द्गठ्ठद्म/द्म द्दद्ध ष्ह्वद्मह्द्म द्दस् क्द्मस्द्भ ठ्ठह्न"द्बभ्शक्वद्धश्र्द्म;द्मँ क्द्बह्वद्मह्वह्य स्रह्य द्धब्, द्बभ्द्मह्यक्रद्यद्मद्धद्दह् स्रद्भह्द्म द्दस््न द्दह्नक्द्म ;द्दद्ध द्दस््न ठ्ठद्मह्य 'द्मह्द्मद्धष्टठ्ठ;द्मह्यड्ड द्यह्य द्दद्मह्यह्द्म ;द्दद्ध श्चब्द्म क्द्म;द्म द्दस््न क्द्बभ्क्र;द्मद्धज्द्मह् द्यक्तब्ह्द्मक्द्मह्यड्ड ह्वह्य,ह्यद्यद्म द्वद्गद्मठ्ठ द्वक्रद्बह्व द्धस्र;द्म ह्लद्मह्य क्ह्वद्मश्चद्मद्भ रुह्द्भ ह्स्र द्वह्द्भ क्द्म;द्म्न क्शद्मड्डहृह्वद्ध; द्धश्चह्ह्व स्रद्ध?द्मंकद्म, द्यख्म्द्ग ह्लफ्ह् द्गह्यड्ड फ्ह्लह्व ह्ह्लह्व स्रह्य द्यद्मस्नद्म?द्मह्नद्गरुह्वह्य ब्फ्द्धड्ड्न द्वह्वह्वह्य क्द्ध/द्मस्रद्मड्डज्द्म ब्द्मह्यफ्द्मह्यड्ड स्रद्मह्य द्बभ्॥द्मद्मद्धशह् द्धस्र;द्म्न ट्ठह्ह्न,॥द्मद्ध ह्द्मह्य क्द्बह्वह्य क्द्बह्वह्य द्यद्ग; द्बद्भ क्द्बह्वद्म द्बभ्॥द्मद्मश द्धठ्ठ[द्मद्मह्द्ध द्दस््न द्धशश्चद्मद्भद्मह्यड्ड स्रह्य द्यद्गह्नक्कश्च; ;द्धठ्ठ शह्य क्द्मद्यह्नद्भद्ध द्बभ्स्रक्वद्धह् स्रह्य द्दद्मह्यड्ड] ह्द्मह्य क्द्मस्द्भ॥द्मद्ध क्द्ध/द्मस्र ष्द्धब्"क्च ष्ह्वह्ह्य द्दस् क्द्मस्द्भ ष्द्म ;द्दद्ध द्दस् क्ठ्ठक्वज्; ह्लफ्ह् स्रद्म ब्ह्य[द्मद्म ह्लद्मह्य[द्मद्म] द्धह्लद्य द्बद्भ ठ्ठक्वज्; ह्लफ्ह् स्रह्य द्गह्वद्मह्यद्भद्ग शस्॥द्मश स्रद्मह्य द्यद्दह्ल द्दद्ध द्धह्वहृद्मशद्भ द्धस्र;द्म ह्लद्म द्यस्रह्द्मद्म द्दस् ड्ढद्य ह्स्न; द्बद्भ द्धशज्शद्मद्य द्धस्र;द्म द्दद्ध ह्लद्मह्वद्म श्चद्मद्धद्द, द्धस्र ठ्ठक्वज्; स्रद्ध द्वक्रद्बद्धश्र्द्म क्ठ्ठक्वज्; द्यह्य द्दद्ध द्दद्मह्यह्द्ध द्दस््न द्यश्र्द्मद्म स्रद्म द्ग/; :द्ब द्दद्ध ठ्ठक्वद्ध"कफ्द्मह्यश्चद्भ द्भद्दह्द्म द्दस््न द्वद्यस्रद्ध द्बर्ख्शं द्धरुस्नद्मद्धह्॥द्मद्ध क्ठ्ठक्वज्; द्दद्मह्यह्द्ध द्दस् क्द्मस्द्भ द्बद्धद्भशह्ह्व स्रद्ध?द्मरुद्ध क्द्मह्वह्य द्बद्भ शद्द द्धक्तद्भ क्ठ्ठक्वज्; द्दद्ध ष्ह्व ह्लद्मह्द्ध द्दस््न ड्ढद्यद्धब्, ह्लफ्ह् स्रद्म,स्र द्यद्मद्गद्म;॥द्मद्मफ् द्दद्ध ठ्ठक्वद्ध"कफ्द्मह्यश्चद्भ द्दद्मह्यह्द्म द्दस््न द्बह्यरु स्रह्य ह्ह्वह्य कद्दह्वद्ध] द्बक्रह्ह्य] क्तख्ब् क्तब् द्दद्ध क्द्मँ[द्मद्मह्यड्ड स्रह्य द्यद्मद्गह्वह्य द्दद्मह्यह्ह्य द्दस््न ह्लरुद्मह्यड्ड स्रद्ध फ्द्दद्भद्मर्ड्ढं क्द्मस्द्भ ड्ढह्वस्रह्य त्त्द्मद्भद्म॥द्मख्द्धद्ग द्यह्य [द्मद्धड्डश्चद्म ह्लद्मह्वह्य शद्मब्द्ध द्भद्य स्रद्दद्मँ द्गद्मह्यंकद्ध ह्लद्मह्वस्रद्मद्भद्ध द्गह्यड्ड क्द्मह्द्म द्दस् झ्र ह्लष् द्धस्र शक्वम्द्म स्रद्म ष्द्मद्द−द्म स्रब्ह्यशद्भ द्वद्यद्ध द्भद्य द्बद्मह्य"द्म.द्म द्बद्भ द्धह्व॥र्द्मंद्भ द्भद्दह्द्म द्दह्य्न
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एक चोर किसी सन्त के पास नित्य जाता, कहता भगवान के दर्शन करा दीजिए। बाबा उसे टालते रहे। पर एक दिन वह मरने-मारने पर उतारू हो गया। आप पहुँचे हुए सन्त है फिर क्यों नहीं करा देते?
टालमटोल में काम चलता न देख कर सन्त ने उसे कल प्रातः काल बुलाया। वह नियत समय पर पहुँचा। कहा गया सामने वाली ऊँची टेकरी पर से भगवान के दर्शन होंगे,। वह छः पत्थर सिर पर रख कर ले जाने पड़ेंगे, पूजा विधान के लिए। चोर तैयार हो गया। पत्थर सिर पर रखकर धीरे-धीरे पहाड़ी के शिखर पर चलने के लिए प्रयत्न करने लगा। थोड़ी दूर चल कर चोर ने कहा यह तो बहुत भारी है, इतना वजन लेकर चलना चढ़ना दोनों काम नहीं हो सकते। सन्त ने एक पत्थर उतार दिया। पाँच को लेकर आगे चला। पर फिर भी दूर तक न चला जा सका। अस्तु एक और उतारना पड़ा। यही क्रम आगे भी चलता रहा। अन्त में जब सभी पत्थर हटा दिये गये तब कहीं शान्त चित्त चलना और चढ़ना संभव हो सका।
शिखर पर दोनों पहुँचे। एक शिला पर बैठ कर सुस्ताने लगें, साथ ही सन्त ने मार्मिक उपदेश भी दिये कि जिस प्रकार छः पत्थर लेकर इस शिखर तक पहुँच सकना संभव नहीं हो सका। उसी प्रकार काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर सभी छः अंधों को सिर पर लादे हुए कोई भगवत् प्राप्ति का आनन्द नहीं ले सकता। मार्ग एक ही है कि इन षट् शत्रुओं से छुटकारा पाकर मलीनता का परिशोधन किया जाय। जो इतना कर लेते है उनके लिए भगवान को प्राप्त करना इतना ही सरल है जितना कि भार रहित स्थिति में इस शिखर तक चढ़ जाना।
चोर का समाधान हो गया उसने दर्शन की रट लगाना बंद कर दिया और अपने गुण, कर्म स्वभाव में सात्विकता के समावेश करने के प्रयत्न में जुट गया।
मानव जीवन को किसी निर्दिष्ट ढाँचे में ढाल देने वाली सबसे प्रबल एवं उच्चस्तरीय शक्ति का नाम “श्रद्धा” है। यह अन्तःकरण की दिव्यभूमि में उत्पन्न होकर समस्त जीवन को हरियाली से सजा देती है। श्रेष्ठता के प्रति अटूट आस्था का नाम ही “श्रद्धा” है। यह जब सिद्धांत एवं व्यवहार में उतरती है। तो उसे “निष्ठा कहते है। जब वही आत्मा के स्वरूप, जीवन दर्शन एवं ईश्वर भक्ति के क्षेत्र में प्रवेश करती है तो श्रद्धा कहलाती है। ईश्वर प्राप्ति के लिए आत्मकल्याण के लिए इस शक्ति का उभार एवं अवलम्बन आवश्यक है। रामायण में श्रद्धा को भवानी और विश्वास को शंकर की उपमा देते हुए कहा गया है कि इनकी सहायता के बिना अन्तरात्मा में बैठा हुआ परमात्मा किसी को मिल नहीं सकता।
श्रद्धा के अभिसिंचन से पत्थर में भी देवता का उदय संभव हो जाता है। एकलव्य ने मिट्टी की द्रोणाचार्य की प्रतिमा द्वारा उतनी शिक्षा प्राप्त कर ली थी, जितनी पाण्डव जीवन्त द्रोणाचार्य से भी प्राप्त न कर सके। मीरा, सूर, तुलसी का भगवत दर्शन-रामकृष्ण परमहंस का काली साक्षात्कार उनकी गहन श्रद्धा के आधार पर ही संभव हुआ था। ईश्वर, कर्मफल, .... कर्तव्य पालन, आत्मा की गरिमा जैसे तथ्यों पर सघन श्रद्धा रखने वाले लोग ही महामानवों की पंक्ति में बैठ सकते है।
साधना में श्रद्धा की ही अपरिमेय शक्ति काम करती है। यदि विश्वास न हो तो उपासनात्मक कर्मकाण्डों का उतना ही फल मिलेगा जितना कि उतने समय तक किये गये हल्के-फुलके-शारीरिक परिश्रम का। उसी साधन को करते हुए एक व्यक्ति चमत्कारी फल प्राप्त करता है और दूसरे को असफल रहना पड़ता है। इसमें श्रद्धा की मात्रा में न्यूनाधिकता का होना ही प्रधान कारण होता है। नारद पुराण-पूर्व भाग प्रथम पाद 4/1 में कहा गया है “श्रद्धा से सब कुछ सिद्ध होता है और श्रद्धा से ही भगवान-सन्तुष्ट होते है”।
सामान्य लोक व्यवहार में भी दृढ़ता श्रद्धा-विश्वास के आधार पर ही आती है। आत्म-विश्वास के बल पर ही कोई बड़े कदम उठा सकना संभव होता है। शौर्य और साहस आत्मविश्वास से ही जन्म लेते है। जश्न और उत्साह के मूल में आत्मविश्वास ही काम करता है परिवार में एक दूसरे को स्वजन, घनिष्ट एवं आत्मीय होने की मान्यता ही उन्हें पारस्परिक स्नेह-सहयोग के सुदृढ़ सूत्रों में बाँधे रहती है। यह मात्र श्रद्धा ही है। जिसके आधार पर परिवारों में स्नेह-दुलार का अमृत बरसता है और एक दूसरे के लिए बढ़े-चढ़े त्याग करने को तत्पर रहता है। श्रद्धा की कड़ी टूट जाय तो फिर परिवारों का विघटन सुनिश्चित है। वे तनिक−सी बातों पर अन्तःकलह के अखाड़े बनेंगे और देखते-देखते बिखर कर अस्त व्यस्त हो जायेंगे।
श्रद्धा और विश्वास के बिना भौतिक जीवन में भी गति नहीं, फिर अध्यात्म क्षेत्र का तो उसे प्राण ही कहा गया है। आदर्शवादिता में प्रत्यक्षतः हानि ही रहती है, पर उच्चस्तरीय मान्यताओं में आस्था रखने के कारण ही मनुष्य त्याग-बलिदान का कष्ट सहन करने के लिये खुशी-खुशी तैयार होता है।
बौद्धग्रन्थ-सुत्तनिपात/1/4/2 में श्रद्धा को बीज एवं तप-त्याग को वर्षा माना गया है और कहा गया हे कि-”सद्य तरती ओधं” (सुत्तनिपात 1/10/4) अर्थात् इसी के बल पर मनुष्य संसार-सागर को पार कर जाता है।” आस्था का प्रामाणिकता से घनिष्ट संबंध है। वह प्रामाणिकता व्यक्तित्व ही लोक-आस्था को दृढ़ एवं दीर्घजीवी बना सकते है। आधुनिक युग में महात्मा गाँधी इसके प्रत्यक्ष एवं प्रबल प्रमाण माने जा सकते है। उन्होंने स्वयं अपनी आस्था को हर श्वास में ज्वलन्त जीवन्त रखा तदनुरूप आचरण की साधना की। कभी क्षण भर को गाँधी जी इस आस्था से विचलित नहीं हुए कि वही एक सार्वभौम सत्ता है और वही परम यथार्थ है। इस आस्था ने आत्मशक्ति के उस चमत्कार को जन्म दिया, जिसके सामने सहस्त्रों अणुबमों की शक्ति भी तुच्छ है। गाँधी जी कहा करते थे कि जिसमें श्रद्धा है, उसकी बुद्धि तेजस्वी रहती है। श्रद्धावान मनुष्य पहाड़ों को भी लाँघ सकता है। “ उनके अनुसार श्रद्धा ही जीवन का सूर्य है। श्रद्धावान को कोई परास्त नहीं कर सकता, जबकि बुद्धिमान को सदैव पराजय का भय बना रहता है”।
समर्थ गुरु रामदास ने समाज में जिस आस्था को जन्म दिया, वह शिवाजी के उत्कर्ष का आधार बनी। सन्त पुरुष वहीं कहे जाते है जिन में यह आस्था प्रखर होती है। सुप्रसिद्ध मनीषी विलियम जेम्स ने “द वेरायटीज आफ रिलीजियस एक्सपीरेन्स” नामक पुस्तक में लिखा है कि विश्वकल्याण हेतु वे सद्गुण नितांत आवश्यक हैं जिन्हें संत अपनी अटूट आस्था के बल से अर्जित करते है। श्रद्धा के आधार पर ही महानता अर्जित की जाती है।
वस्तुतः आस्थाएँ ही प्रेरणा भरती है, गति देती है। बढ़ने के लिए गति और सोचने के लिए प्रकाश प्रस्तुत करती है। उत्कृष्टता की दिशा में बढ़ सकना आस्थाओं की उपस्थिति के बिना हो ही नहीं सकता। निष्ठा से संकल्प उठता है और संकल्प से साहस और पराक्रम उभरकर आता है। तन्मयता और तत्परता इसी अन्तःस्थिति में किसी प्रयास से नियोजित होती है और मन एवं कर्म का ऐसा स्तर बन पड़ने पर ही महत्वपूर्ण प्रगति संभव होती है। बुद्धि की अपनी उपयोगिता होते हुए भी श्रद्धा की शक्ति असीम है। इसी के आधार पर आदर्शों एवं मर्यादाओं का पालन संभव हो पाता है। प्रख्यात योरोपीय इतिहासकार अर्नाल्ड टायनबी ने कहा है कि प्रतिभाशाली महापुरुषों के जीवन में यह विशेषताएँ प्रधान रूप से होती है। इसी के आधार पर वे लोक-प्रचलित प्रवाह, .... व्यवहार से अपने को पूरी तरह काट लेते है, लेकिन लोकहित उनका सदैव ध्येय बना रहता है और इस रूप में वे समाज से सदा जुड़े रहते है। इसका कारण क्या है? समाधान देते हुए प्रसिद्ध मनीषी डब्ल्यू0 डी0 स्टेस ने “रिलीजन एण्ड द माडर्न माइण्ड” नामक अपनी पुस्तक में कहा है कि-ईसा तथा बुद्ध जैसे नैतिक प्रतिभा-सम्पन्न महापुरुषों ने यह पाया कि मनुष्य सुखी नहीं हो सकता, जब तक उसके चारों ओर सब सुखी नहीं है क्योंकि व्यक्ति समष्टि का एक अंग है, मानवता से अभिपूरित है। मानव का जाति के सुख में ही उसका सुख है। यह इन महापुरुषों की खोज थीं इसी का उन्होंने मान्यता दी और जीवन पर्यन्त दृढ़ता के साथ उसी पर आरुढ रहे। उत्कृष्टता के प्रति दृढ़ आस्था ने ही उन्हें महानता के उच्च शिखर पर पहुँचाया। धार्मिकता, नैतिकता-आदर्शवादिता के प्रति श्रद्धा एवं आस्था का अभाव मनुष्य को ठूँठ व खोखला बना देता है। उसके जीवन का लक्ष्य मात्र पशुवत् पेट एवं प्रजनन के सुखों तक ही सीमित रह जाता है।
बौद्धिकता की चरम सीमा तक विकास कर लेने पर भी आत्म-निष्ठा विहीन ऐसे व्यक्तियों को यंत्रवत् जीवन जीते एवं अन्धी यश लिप्सा, क्षुद्र भोग लिप्सा और मिथ्याचार में अपादमरतक सने देखा जाता है। प्रतीत होता है कि इससे प्रभावित होकर ही मूर्धन्य विद्वान कार्ल .... ने अपनी पुस्तक “मैन इन द माडर्न एज” में लिखा है कि आज कारखाने का एक श्रमिक या किसी बड़े संस्थान का एक कर्मचारी मशीन का वह पुर्जा बन कर रह गया है जिसके अपने विशिष्ट .... का कोई भी .... जिसे कभी भी वैसे ही दूसरे पुर्जे सेअ?बदला जा सकता है। इस विचार दर्शन से लोक जीवन में आस्थाहीनता की स्थिति उत्पन्न होती है। स्वयं की अपने ऊपर आस्था का न होना आत्मपलायन है। ऐसी स्थिति में व्यक्ति बाह् एवं अन्तःक्षेत्रों में परावलंबी एवं परमुखापेक्षी बन जाता है। आत्म-विश्वास बना रहे तो ही साहस एवं उत्साह जीवित रह सकता है अतः वैयक्तिक प्रगति एवं सामाजिक समृद्धि के लिए उच्चस्तरीय उद्देश्यों के प्रति-उत्कृष्टता के प्रति आस्था-प्रखर निष्ठा का होना अनिवार्य है।
आत्म विश्वास-आत्म निष्ठा मनुष्य जीवन की अत्यन्त उच्चस्तरीय विभूतियों में से एक है। उसके सहारे मनुष्य आदर्शों के प्रति अपनी श्रद्धा को सुदृढ़ बनाये रह सकता है। प्रलोभन और भय उसे विचलित नहीं कर पाते। ऐसी दशा में व्यक्तित्व के विकास में आने वाले अन्य सभी अवरोध घटते मिटते है। उनके कारण उनका मार्ग रुका नहीं रहता। श्रद्धा की शक्ति को मानवी गरिमा का उत्कृष्ट अलंकार कहा जाना चाहिए। मनुष्य का व्यक्तित्व जिसमें संस्कारों का आदतों का गहरा पुट रहता है, वस्तुतः श्रद्धा की परिपक्वता के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। व्यक्तित्व की श्रेष्ठता-निकृष्टता का आधार यही है। श्रद्धा की गरिमा व्यक्त करते हु गीताकार ने कहा है श्रद्धाममोण्यं पुरुषों यो यच्छ्रद्धः स एवं सः अर्थात् “ व्यक्ति श्रद्धामय हैं जिसकी जैसी श्रद्धा होती है वह वैसी ही बन जाता है” नारद पुराण-(पूर्व भाग, प्रथम पाद 4/6) के अनुसार “श्रद्धा से ही कामनाओं की पूर्ति होती है। तथा श्रद्धालु पुरुष ही मोक्ष पाता है”। इसका तात्पर्य यह है कि बुराइयों के प्रति श्रद्धा व्यक्ति को रामरचाओं में कैद कर देती है तो आदर्शों के प्रति आस्था मनुष्य जीवन को सुख-शान्ति और प्रसन्नता से भर देती है। संत इमर्सन भी कहते थे कि श्रद्धा से बढ़कर कोई शक्ति नहीं। विश्वास से बढ़कर कोई और साधन नहीं “फार्म्स आफ गाडर्न फ्रिक्शन” नामक पुस्तक क लेखक .... मनीषी डब्ल्यू बी0 कोनार लिखते है कि-युग की विशेष प्रेरणायें प्रायः श्रद्धावान भाव विभोर अंतःकरणों से ही फूटती है। इसका आश्रय लेकर ही व्यक्ति अपने दिव्य “.... “ को प्रकट करता है और वातावरण को दिव्यता से भर देता है। आत्मिक प्रगति का सर्वोपरि आधार श्रद्धा ही है। बौद्ध ग्रन्थ मिलिन्द प्रश्न 2/1/8 के अनुसार-मन में प्रसन्नता और बड़ी आकाँक्षा पैदाकर देना ही श्रद्धा की पहचान है।
निश्चय ही श्रद्धा मानव जीवन को सर्वोपरि सामर्थ्य के रूप में समझी जा सकती है। व्यक्तित्व का निर्धारण इसी से होता है। श्रद्धा से अनेक क्रिया-कलापों का सूत्र संचालन और उन्हें सफलता के उच्चस्तर तक पहुँचा सकना संभव होता है। आत्मा का सबसे विश्वस्त और सबसे घनिष्ट सचिव श्रद्धा ही है। उसी के सहारे आत्मिक प्रगति से लेकर सिद्धि चमत्कार के वरदान पाने और आत्म साक्षात्कार से लेकर ईश्वर दर्शन तक के समस्त दिव्य उपहार प्राप्त होते है। साधना की सिद्धि श्रद्धा की प्रगाढ़ स्थिति में ही संभव है। श्रद्धा चाहे वह गुरु के प्रति हो, महामानवों के प्रति अथवा निराकार परब्रह्म की सत्ता के प्रति, हर स्थिति में मानव जीवन का सम्बल है, प्रगति पथ का षाधेय है एवं .... का मूलभूत आधार है।
एक राजा संन्यासी बनने के लिए बहुत उतावला था। पर दीक्षा किसी पहुँचे हुए सन्त से लेना चाहता था।
संयोगवश एक तत्वज्ञानी सन्त उधर आ निकले। राजा ने अपना अभिप्राय उन्हें कहा।
सन्त ने उत्तर दिया। तुम अपना सारा वैभव मुझे दान कर दो। इसके बाद मेरे प्रतिनिधि के रूप में राज काज चलाते रहो। इतने सच्चे मन से करते रहने से तुम्हें संन्यास का लाभ मिल जायगा।
इसी को गान्धी जी टूस्टी शिप कहते थे। सम्पदा भगवान की समझें और जो हाथ में है उसका श्रेष्ठतम सदुपयोग करें।
साधु किसी गाँव में होकर निकले। हल जोतते किसान से बोले ....! दिन रात कोल्हू के बैल की तरह लगा रहा है। परलोक का भी ध्यान है कुछ भजन भाव किया कर। किसान को ऐसी कुछ जानकारी न थी। सो उसने पूछा-”भगवान्! आप ही कुछ बता दीजिए सो करता रहूँ।
सन्त ने ‘सोल्हम? मंत्र जपने के लिए बता दिया। किसान का मन लग गया और भावनापूर्वक उसे जपने लगा।
कुछ दिन बाद एक और संत उधर से निकले। उस गाँव में वही एक भक्त था सो किसान के पास गये और उसकी पूजा अर्चा पूछी। किसान ने बताया हुआ मंत्र सुना दिया।
इस पर नये संत क्रुद्ध हुए। बोले यह गलत है। इससे अनिष्ट हो जायगा। सही हम बताते है “बासोहम्” ऐसा जप करो। किसान वैसा ही करने लगा। पर संशय मन में घर कर गया। कहीं यह भी गलत न हो। चित में संदेह बुरा जाने से अस्थिरता चढ़ गई। कुछ दिन बाद तीसरे संत आये। पता लगते उनके पास पहुँचे और दुबारा बताये मंत्र को गलत बताते हुए बोले। उसे छोड़ो। “स्वदा-सोल्हम्” जपा करो। किसान का संदेह .... हो गया। श्रद्धा चली गई। मन उचट गया। जब तक एक बताने वाला-एक मार्ग-एक विश्वास न हो तब तक पूजा भी जंजाल है। सो उसने वह सब छोड़-छाड़ दिया व पहले की तरह बिना भजन के दिन गुजारने लगा।
नदी किनारे चार सहेलियाँ रहती थी। छिपकली, चुहिया, लोमड़ी और बकरी। चारों साथ-साथ रहती और आपस में हँसती-हँसाती।
एक दिन उनका मन नदी पार जाने और सेर करने को हुआ। कछुआ भी वहीं रहता था चारों ने कहा हम सच्ची सहेलियाँ है भाई कछुआ। तुम हम चारों को पीठ पर लिटाकर पार कर दो तो बड़ी कृपा हो।
कछुए ने पहले तो आनाकानी की। पर सच्ची सहेलियाँ होने की बात उसे बहुत भाई। उसने कहा यदि ऐसी बात है तो तुम चारों मेरी पीठ पर बैठ जाओ पार कर दूंगा।
चारों ने सवारी गाँठी, कछुआ चल पड़ा। कुछ दूर चलने पर उसने कहा। वजन बहुत हो गया। तुममें से एक को उतरना पड़ेगा। मुझसे ढोया नहीं जा रहा है। चुहिया ने छिपकली को पानी में ढकेल दिया। कुछ दूर चलने पर एक और के उतारने की बात कहीं गई। लोमड़ी ने चुहिया को गहरे पानी में उतार दिया। कुछ दूर और चलने पर एक को और उतारने का आग्रह हुआ। बकरी लोमड़ी से तगड़ी थी और उसने सींग गढ़ा कर लोमड़ी को बीच धार में धकेल दिया। अकेली बकरी शेष रह गई
कछुए ने कहा तुम चारों सच्ची सहेली बनती थी। तब साथ ही उतरना पार होता था। जब सबके द्वारा निर्बल को धकेले जाने का सिलसिला चल रहा है तो तुम्हारी मित्रता झूठी हुई न। मैंने तो सच्ची सहेलियों को पार करने का वायदा किया था। यह कहकर कछुए ने डुबकी लगाई और बकरी को उसी प्रकार .... दिया जैसे कि पहिले तीन यहीं थी।
किसी की पूर्व संचित सुसंस्कारिता- तपश्चर्या किस स्तर की है? किसकी उज्ज्वल भविष्य के साथ जूड़ी हुई भवितव्यता किस रूप में प्रकट होगी, इसका अनुमान लगाने की एक ही कसौटी है, उसके भीतर उमगने वाली महत्वाकाँक्षा, अदम्य अभिलाषा। उसका स्तर यदि एक उच्चस्तरीय है तो निश्चय ही अनेक प्रलोभनों को चीरता हुआ लक्ष्य एक ही निशाने पर टिकेगा, वह है प्रतिभा परिवर्धन। लोक सम्मान, आत्म संतोष और देवी अनुग्रह की त्रिवेणी इसी आधार पर घर बैठे दौड़ती चली आती है। प्रतिभा के बीजाँकुर जिस खाद पानी को पाकर पल्लवित पुष्पित और फलित होते है उनका नाम है “पुष्य और परमार्थ” पुष्य अर्थात् अपने में ब्राह्मणोचित प्रवृत्तियों का बाहुल्य। परमार्थ अर्थात् ऐसी उदात्त भाव संवेदना, जो देवताओं की तरह देवत्व के अभिवर्धन में आकुलता और आतुरता-पूर्वक जुट पड़े। किसी भी व्यवधान के रोके न रुके।
कहा गया है कि तप और योग साधना से सिद्धि प्राप्त होती ह तप के यों हठयोग जैसे कुछ अतिवादी प्रयोग भी है पर जिसे सरल और सर्व सुलभ कहा जा सके, वह है सर्वतोमुखी संयम जिसके चार चरण होते हैं-इन्द्रिय संयम, अर्थ संयम, समय संयम और विचार संयम। इनका समन्वय बन पड़ता है ऐसी तत्परता में, जिसके साथ सादा जीवन उच्च विचार का तत्वज्ञान सघनतापूर्वक जुड़ा हो। इसे ब्राह्मणोचित जीवन अर्थात् औसत नागरिक स्तर को पर्याप्त मानने की अवधारण भी कह सकते है।
तप के उपरान्त ही योग साधना का कदम उठता है। संयमी ही आदर्शों के समुच्चय पर ब्रह्म के साथ तादात्म्य मिलाने में सफल होता है। संयम के रूप में तप साधना का अनवरत क्रम चह और बन पड़ता है, जिसे अनेकानेक लिप्सा लालसाएँ नोंचती कचोंटती रहतीं है। जिन्हें .... तृष्णा और अहंता की पूर्ति के लिए व्याकुलता सदा सताती रहती है वे विलासिता और अमीरी के अतिरिक्त और क्या कुछ सोच पायेंगे? इनकी खनक ऐसी मदोन्मत्त होती है कि भगवत् चेतना के साथ जुड़ सकने की कोई संभावना ही नहीं रहती। भले ही इस प्रगति को खेल खिलवाड़ समझने वाले कुछ पूजा पत्री जैसे कर्मकाण्डों की लकीर पीटकर मन समझा लिया करें। संयम जन्य पवित्रता अपनाये बिना किसी भी भगवत् दर्शन कर सकने जैसा दृष्टि कोण प्राप्त नहीं होता। स्वर्ग तो परलोक में अपनी पवित्रता के रूप में साथ लेकर जाना पड़ता है। साँसारिक प्रलोभन ही तो भव बन्धन है। जो भौतिक महत्वाकाँक्षा के साथ बुरी तरह कसा बँधा है, उसके लिए मुक्ति की कल्पना करना उपहासास्पद है। कर्म काण्डों की कागज वाली नाव किसी को भी वैतरणी के उस पार तक पहुँचाने में समर्थ नहीं हो सकती। उसके लिए मजबूत आधार ढूढंना होता है, जो निजी जीवन में तप, संयम और बहिरंग जीवन में सद्भावना संवर्धन वाले परमार्थ के अतिरिक्त और कुछ हो ही नहीं सकता। तप और योग वस्तुतः कोई कौतुक कौतूहल नहीं है और न बाजीगरों जैसी हाथ फेरी से कोई उच्चस्तरीय प्रयोजन सधता है। इसके लिए तो जीवन में उत्कृष्टता के समावेश की भावभरी और अनुशासन में जकड़ी हुई जीवनचर्या अपनानी पड़ती है। इससे कम में ऐसी कोई पगडंडी है नहीं, तो राजमार्ग पर चलने के स्थान पर यक्ष गंधर्वों जैसी उड़ान भरकर कहीं से कहीं जा पहुँचने का .... जुटा सके।
तप और योग के पुण्य और परमार्थ के साथ अविछिन्न रूप से जूड़ी हुई साधना नकद धर्म की तरह है। उसका प्रतिफल हाथों हाथ मिलता है। न देवेच्छा उपलब्ध करने के लिए गिड़गिड़ाने की आवश्यकता पड़ती है और न जन्म जन्मान्तरों तक प्रतिफल प्राप्त होने की आशा लगाये बैठे रहने की विवशता से फला पड़ता है। यथार्थता तुरन्त फलित होती है। विशेषतया आत्मिक प्रगति के क्षेत्र में। संयमी वह है जिसने प्रलोभनों को परास्त करके शरीर सज्जा में इतनी कटौती कर ली, जितने में कि जीवन यात्रा भर निभती रहे। न संग्रह करना पड़े, न अहंकार का दर्प दिखाने के लिए प्रदर्शनों के जंजाल में फँसना पड़े। तपस्वी अपना परिवार .... के समुच्चय रूप में बढ़ाते है। कुटुम्बियों के प्रति तो उनके मन में कर्त्तव्य निर्वाह भर की बात रहती है। विवाहित होने पर भी ऐसे लोग संतान संवर्धन के ऐसे भार से नहीं लदते जिसे वहन करते-करते व्यस्तता और अभावग्रस्तता ही निरन्तर सिर पर छाई रहें। कुटुम्बियों को सुसंस्कारी और स्वावलम्बी बनाना तो न्यायोचित है पर उन्हें लालची, विलासी और व्यसनी बनाने के लिए अनावश्यक सम्पदा सजाने का विवेक की दृष्टि से कोई औचित्य बनता ही नहीं। लोभ और मोह पर अंकुश लगाने वाला कोई भी व्यक्ति तपस्वी संयम या पुण्यात्मा होने का श्रेय प्राप्त कर सकता है।
इस पूर्वार्ध को पार कर लेने के उपरान्त उत्तरार्ध में कोई कठिनाई शेष नहीं रहती है। परमार्थ के लिए ढेरों समय, श्रम, साधना, मनोयोग एवं कौशल बच रहता है। उसके बदले भगवत् कृपा का अजस्र अनुदान सहज स्वाभाविक रूप से किसी भी विवेकवान को प्रचुर परिणाम में हस्तगत होता चलता है।
परब्रह्म के छवि निरूपण में शास्त्रकारों और तत्वदर्शियों ने उसे प्रकाश पुँज माना है। इसी प्रयोजन के लिए प्रायः सविता के ध्यान एवं त्राटक प्रयोग की प्रक्रिया अपनाई जाती है। पर यहाँ और भी गहराई में उतरने की आवश्यकता है और प्रकाश पुँज की संगति देवात्मा स्तर की प्रतिमा के साथ बिठानी चाहिए। देवात्माओं के मुख-मण्डल पर चित्रित किया जाने वाला आभा-मण्डल वस्तुतः उनका तेजोवलय ही है, जिसे मनुष्य प्राणियों में प्रतिभा के रूप में जाना, आँका जाता है। ओजस्वी, तेजस्वी, मनस्वी यों दीपकों की तरह जगमगाते नहीं, फिर भी उनका व्यक्तित्व अलग से निखरे हुए स्तर का प्रतीत होता है। उनकी प्रभाव शक्ति अनेकों को ऊँचा उठाने वाला मार्गदर्शन करती है। ऐसे व्यक्तित्व अज्ञान एवं अनाचार की तमिस्रा में भयावहता को बहुत हद तक कम करते है। उनका संपर्क क्षेत्र उस आलोक का अनुभव करता है, जिसे मानवी गरिमा के अनुरूप ऊर्जा या आभा कहा जा सकता है। यह नकद धर्म है जो प्रतिभावानों द्वारा अर्जित होते देखा जा सकता है।
सघन अन्धकार वाली निविड़ निशा में दिग्भ्रान्त एवं भटकावग्रस्त पथिकों के लिए आकाश में जगमगाते तारागण अवलम्बन बनते है और लक्ष्य तक पहुँचने में दूरवर्ती होते हुए भी निकटवर्तियों की तरह सहायता करते है। प्रतिभाओं के संबंध में यह उदाहरण पूरी तरह लागू होता है। उनके अस्तित्व और क्रिया-कलाप ऐसा वातावरण बनाते है, जिसमें भटकाव की गुंजाइश कम होती चली जाय। फिर उच्च उद्देश्यों की सहायता हेतु चन्द्रमा की चाँदनी उगती है। देर सबेर में अरुणोदय वाली ऊषा भी पुण्य प्रभात लेकर आ उपस्थित होती है।
प्रतिभाओं की सशक्तता सर्वविदित है। उनने इस ऊबड़-खाबड़ धरती को सुषमा, सम्पदा और सुन्दरता से सुनियोजित बनाया है। विज्ञान, अर्थतंत्र, शासन, दर्शन, धर्म, अनुशासन उसी की देन है। यहाँ तक कि ईश्वर के प्रज्वलित स्वरूपों को भी उन्हीं ने गढ़ा है। संसार में जहाँ भी, जो भी चमत्कार दीख पड़ते है उनके पीछे प्रतिभाओं का ही कौशल एवं वर्चस्व काम करते देख जा सकता है। उपलब्ध उदाहरणों में अनेकानेक एकसे गिने और गिनाये जा सकते हैं जो विपन्न परिस्थितियों में उत्पन्न हुए, साधन रहित, अभावों के बीच भी उनने इतनी बड़ी उन्नतियाँ कर दिखाई, जिन्हें देखते हुए आश्चर्य चकित रह जाना पड़ता है। संसार के महामानवों में से कितने ही इसी स्तर के है। कईयों ने छोटे सिपाही से बढ़ कर सेनाध्यक्ष और शासनाध्यक्ष बनने का अवसर पाया। कईयों ने अपने निर्माण कार्यों में अपने कौशल का असाधारण परिचय दिया। चीन की दीवार, मिश्र के पिरामिड, भारत का ताजमहल, अमेरिका की “स्टेच्यू ऑफ लिबर्टी,” पीसा की मीनार, अंगकोरवाट के खण्डहर, ईस्टर द्वीप की दैत्याकार मूर्तियाँ आदि देखने के लिए संसार के कोने कोने से लोग पहुँचते रहते है और सोचते है कि यह सब कैसे बन पड़ा होगा? स्वेज और पनामा की नहरों का निर्माण समुद्रों के साथ खिलवाड़ करने जैसा है। नीदरलैण्ड वालों ने तो समुद्र के आधिपत्य वाला एक विशाल भू-भाग अपने कब्जे में ले लिया और बनाये हुए बाँध से लहरों को टकराने और वापस लौटते रहने के लिए बाधित कर दिया। सामन्त-काल के मध्य में जो घटित होता रहा और कुप्रचलनों के रूप में लोक मान्यता का अंग बनता रहा, उस अनय विजय की अपनी दर्द भरी कथा गाथा है। पर यह सब किया गया उन्हीं के द्वारा, जो देखने में तो सामान्य जनों जैसे ही लगते थे पर उनमें प्रतिभा का भण्डार भरा अवश्य पड़ा था। भले ही उसका दुरुपयोग हुआ हो, भले ही उसे स्वार्थपूर्ति के लिए, अहमन्यता का दर्प दिखाने के लिए प्रयुक्त किया गया हो, पर इतना तो मानना ही पड़ेगा कि उनकी साहसिकता और कर्म निष्ठा असाधारण थी। अदम्य उत्साह ने मार्ग के अवरोधों और प्रतिद्वंद्वियों से टक्कर ली और दृढ़ निश्चयों के सहारे दुर्गम प्रतीत होने वाले पर्वतों पर चढ़ते हुए ऊँचाई के चरम शिखर पर जा पहुँचे। यह बीजाँकुर हर किसी के भीतर जन्मजात रूप से विद्यमान है। अन्तर इतना ही है कि कुछ उन्हें विस्मृत उपेक्षित किये रहते है और गई गुजरी, अनगढ़ एवं लगभग परावलम्बी स्थिति में गुजारा करते है। कुछ है जिन्हें बड़प्पन दिखाने के लिए उद्दण्डता अपनाने का मार्ग सरल पड़ता है।
सज्जनता की आम प्रकृति झंझटों से बचे रहने और विग्रहों को अनदेखा करते रहने की होती है। उसमें उन्हें सुविधा दीखती है। इसलिए उसे दया, क्षमा, अहिंसा आदि का आवरण उठाकर सम्मानित सद्भावना की देवी बनाकर प्रतिष्ठित कर देते है। प्रतिरोध के अभाव में उद्दण्डता का क्षेत्र विस्तार होना स्वाभाविक है। प्रतिरोध के अभाव से अनाचार को जो सस्ती सफलता मिलती है उसके कारण उसका दुस्साहस दिन दूना रात चौगुना बढ़ता रहता है। अनीति के अभिवर्धन का एक बड़ा कारण वही है-उसका संगठित प्रतिरोध न होना। जबकि आतंकवादी संगठित होकर परस्पर एक दूसरे को समर्थन सहयोग देते हुए एक दूसरे की हिम्मत बढ़ाते रहते है। संसार में अनाचार की जीत बोलने के असंख्यों घटनाक्रम है। अभी भी वे छोटे बड़े छद्म प्रकट रूप में अपनी बलिष्ठता का श्रेय प्रतिरोध की दुर्बलता को ही जाता है। उद्दण्डता तो आतिशबाजी की तरह कुछ समय ही कौतुक दिखाती है और धूमधड़ाका दिखाकर अपनी मौत मर जाती है। ध्वंस के कौतुक इसी प्रकार के होते है। स्थायित्व और सृजन का वर्चस्व तो उस प्रतिभा में ही पाया जाता है जो आदर्श के साथ सुसम्बद्ध एवं समर्पित बनकर रहती है।
बड़े अनर्थ दिशाभूल से ही होते है। जंक्शन पर खड़ी रेलगाड़ी गलत लीवर दब जाने के कारण निर्धारण दिशा की अपेक्षा दूसरी ओर चल पड़ती है और अनचाहे स्टेशनों को पार करती हुई कहीं से कहीं जा पहुँचती है। सामान्य जन तो छोटे दायरे में ही बनाव बिगाड़ करते रहते है। उनकी प्रतिक्रिया भी छोटी ही होती है। पर जब मदोन्मत्त हाथियों का झुण्ड आक्रोश में भरकर बिगाड़ पर उतारू होता है तो फसल को रौंदता, पेड़ों को उखाड़ता, झोपड़ों को उछालता और प्राणियों को कूटता कुचलता कुहराम मचा देता है। आज का बहुमुखी विनाश और कुछ नहीं मात्र प्रतिभाओं के हाथ में पहुँची हुई शक्ति का दुरुपयोग मात्र है। उसी ने तत्व दर्शन पर प्रत्यक्षवाद की आड लेकर करारा आक्रमण किया है और नियामक शक्ति की कर्मफल व्यवस्था पर से विश्वास उठा दिया है। उद्दण्डता आवेशग्रस्त हो तो वह जो कुछ भी न कर गुजरे कम है। लोक मानस पर छाई हुई अनाचार उसी का प्रतिफल है। निरंकुश अनाचारों का प्रचलन उसी के कारण संभव होता है। धर्म के साथ कर्तव्य पालन आत्म संयम, उदार व्यवहार जैसी मानवोचित मर्यादाओं का परिपालन भी सम्मिलित है। यदि उसकी जड़ कटेगी तो शालीनता का प्रचलन बन कैसे पड़ेगा? मर्यादाओं और .... का नियंत्रण स्वीकार कौन करेगा? इन दिनों ऐसी ही उच्छृंखल स्वतंत्रता ने मानव स्वभाव में अपनी गहरी जड़ें जमाली है।
मनःस्थिति परिस्थितियों की जन्मदात्री है। विचार कार्य का रूप धारण करता है। आकाँक्षा अग्रगामी योजना बनाती और साहस भर पुरुषार्थ में जुट पड़ती है। इन दिनों यह प्रयोग ध्वंस के लिए हो रहा है। तात्कालिक लाभ को ही सर्वोपरि मानने की यह परिणति है इसे प्रतिभाओं का भटकाव कहा जा सकता है। यदि प्रतिभाओं को सही दिशा दी जा सके, उनकी शक्ति को सुनियोजित किया जा सके तो पुनः सतयुगी परिस्थितियाँ अवतरित कर पाना संभव है। यह सुनियोजन यदि सुनिश्चित हो सके तो उज्ज्वल संभावनाएँ अगले दिनों ही देखी जा सकेंगी।
राजा नहुष ने सौ यज्ञ किये। इससे उन्हें स्वर्ग जाने का अवसर मिला और इन्द्र .... के अधिकारी हो गये। वैभव पाकर नहुष की मानसिकता मदान्ध हो गई। वे सभा की बात भूल कर उपभोग की लिप्सा में सभी सखियों को उनकी सेवा में रहना चाहिए। सूचना इंद्राणी तक पहुँची तो बड़ी विचलित हुई। बचने का उपाय सोचने लगीं। उनने कूटनीति चली और नहुष से कहला भेजा कि वे सप्तऋषियों को पालकी में जोतकर उस पर बैठ कर अन्तःपुर में आयें तभी उनका स्वागत होगा।
मदान्ध को भला बुरा नहीं सूझता। उसने तत्काल वह प्रस्ताव स्वीकृत कर लिया। ऋषियों को पालकी में जोतकर अन्तःपुर चले। मार्ग की दूरी में लगने वाला विलम्ब उनसे सहा नहीं जा सका। ऋषि धीरे-धीरे चल रहे थे। यह उनसे सहन नहीं हुआ। उन्हें दौड़ने का आदेश देते हुए अपनी भाषा में .... कहने लगे। ऋषियों से यह अपमान सहा न गया उनने पालकी को धरती पर पटक दिया और शाप दिया कि .... सर्पि कहने वाले को सर्प की योनि मिले।
नहुष धरती पर आ ये और सर्प की योनि में बुरे दिन बिताने लगे।
मदान्धों को दुर्बुद्धि उपजती है और वही फिर उनकी दुर्गति का कारण बनती है।
मनुष्य में निज की बुद्धि और विचारणा भी है। इसी के बल पर उसने दर्शन, विज्ञान, भाषा आदि की अनेक दिशाधारायें खोजी है। साहित्यकार, कलाकार, कवि, वैज्ञानिक, प्रभृति के लोग निजी चिन्तन के सहारे ही कल्पनायें करते, योजनायें बनाते है। निष्कर्ष निकालते है। भूत से शिक्षा ग्रहण करना और भविष्य की परिकल्पनायें अपनाना भी अपनी निजी विशेषतायें है। उन्हीं के आधार पर प्रतिभाएँ ऊँचा उठतीं, आगे बढ़ती है या पतन की दिशा में चल पड़ती है। यह कथन बहुत अंश में सच है कि किसी पेड़ पर दो पत्ते एक जैसे नहीं होते। हर पत्ते की बनावट में अन्तर रहा है। जो पूर्णरूपेण समान हो ऐसी कृति किसी पदार्थ या प्रणी की नहीं देखी जाती। मोटी दृष्टि से एक जैसी दीखने पर भी बारीकी से देखने पर हर किसी में अन्तर पाया जाता है-प्राणियों में भी। भेड़ें एक जैसी लगती है, पर उनका पालक हर एक के बीच पाये जाने वाले अन्तर को समझता है। इसी आधार पर वह अपने झुण्ड की एक भेड़ दूसरे झुण्ड में जा पहुँचने पर उसे पहचानता और पकड़ लाता है। यह वैयक्तिक भिन्नता है। प्रकृति ने भी अपनी हर संरचना में अन्तर रखा है। प्राणियों में भी, मनुष्यों में भी। इसके अतिरिक्त रुचि-स्वभाव में भी अन्तर पाया जाता है। हर बात में एक जैसे सिद्ध होने वाले दो व्यक्ति कहीं भी दीख नहीं पड़ते। कुछ न कुछ अन्तर रहता ही है। यह अन्तर ही निजी व्यक्तित्व है। इसका अस्तित्व मालूम पड़ता है, अन्यथा कुछ व्यक्ति तो भीतर और बाहर से सर्वथा एक जैसे रहे ही होते। घनिष्ट मित्रों में भी एकात्मता एक सीमा तक ही रहती है। दाम्पत्य जीवन में-मित्र मण्डल में भी तालमेल बिठाकर ही चलना पड़ता है। समग्र एकता और एकात्मता कदाचित ही कहीं अपवाद रूप में दीख पड़ती है।
इस निजी व्यक्तित्व को आमतौर से निजी सम्मान, निजी चिन्तन और निजी निर्णय पुरुषार्थ के आधार पर विकसित किया जाता है। इसमें दूसरों का परामर्श भी किसी सीमा तक काम करता है। साहित्य का भी प्रभाव रहता है। फिल्म अभिनय जैसे दृश्य भी निजी व्यक्तित्व के विकास में सहायता करते है। पूर्व-संचित संस्कारों की वंश परम्परा की भी किसी अंश में भूमिका रहती है। कोई घटना विशेष भी ऐसा मोड़ लेती है कि पिछला उपक्रम बदलता और नई दिशा में चल पड़ने के लिए उत्साह भरता है। व्यक्तित्व निर्माण के लिए प्रायः स्वाध्याय सत्संग का-सघन संपर्क का, चिन्तन मनन का सहयोग रहता है। इस क्षेत्र की सशक्तता को नकारा नहीं जा सकता और व्यक्ति निर्माण के लिए, व्यक्तिगत संपर्क की उपेक्षा नहीं की जा सकती। चरित्रवान और क्रियाकुशल व्यक्ति देश की, समाज की सबसे बड़ी आवश्यकता है। यह कार्य प्रधानता व्यक्ति को सद्गुणों की सत्प्रवृत्तियों क ओर अग्रसर करने से ही हो सकता है। इसमें उत्कृष्टता का अभ्यास भी साथ में जुड़ा रहना चाहिए।
प्राचीनकाल में यह कार्य सदाशयता- सम्पन्न परिवारों में होता था। बचपन से ही हर बालक को अपने बड़ों से उस स्तर का प्रशिक्षण मिलता था। पहला शिक्षण बालक परिवार के लोगों से शब्दों को सुनकर ही प्राप्त करता है। अपने को लड़की या लड़का मानने की भिन्नता परिवार के बताने पर ही मान्यता बनती है। खान-पान की, पहनाव-उढाव की, आदतें भी परिवार में जो होता है, उसी को देखकर अपनाई जाती है। यह आरम्भ ही क्रमशः अभ्यास में उतरते रहने पर परिपक्व हो जाता है और अपने ढंग का व्यक्तित्व ढल जाता है।
इसी प्रक्रिया का अगला चरण है- गुरुकुलीय शिक्षा-प्रणाली। उसमें प्राचीनकाल में ज्ञान सम्वर्धन के साथ-साथ पारिवारिकता का वातावरण भी रहता था। छात्र भी कच्ची आयु से भर्ती होते थे। गीली लकड़ी को आसानी से मोड़ा जा सकता है। गीली मिट्टी से ही कुम्हार मन चाहे पात्र या खिलौने बनाता है। सूखी मिट्टी मुश्किल से ही किसी ढाँचे में ढलती है। सूखी लकड़ी को मोड़ना कठिन पड़ता है। जब ऐसा करना अनिवार्य हो जाता है तो गलाई-ढलाई का कष्टसाध्य तरीका काम में लाना पड़ता है। धनुष तेज आग की भट्ठी में तपा कर नरम किए जाते है। इसके बाद ही उसे किसी साँचे में ढाल सकना संभव होता है। कड़े पत्थर से मूर्तियाँ गढ़ना हर किसी के वश बूते का काम नहीं है। इसके लिए छेनी हथौड़े का संतुलित उपयोग कर सकने वाले मूर्तिकार चाहिए। उसके मस्तिष्क में प्रतिमा की इतनी स्पष्ट परिकल्पना उठनी चाहिए कि गढ़ते समय हाथ सही प्रयोग कर सके। छेनी हथौड़े की चोट इस कौशल के साथ पड़ सके कि प्रतिमा बिना विखंडित हुए कल्पना के अनुसार सही आकार-प्रकार की बन सके। उसकी भावभंगिमा वैसी ही रहे जैसी कि बनाने से पूर्व परिकल्पना की गई थी।
अपने आप स्वयं को गढ़ने का भी एक तरीका है जिसे साधना विज्ञान के नाम से जाना जाता है। इन दिनों तो उसमें भी भ्रष्टाचार घुस पड़ा है और लोग देवता को रिझा कर अपनी उचित अनुचित मनोकामनाओं को पूरी कराने के लिए उसका प्रयोग करते हे। भटकते और निराश होते है, किन्तु उसका वास्तविक उद्देश्य और सिद्धान्त यही है कि अपने प्रयास से अपने व्यक्तित्व को अभीष्ट स्तर का ढाला जाय। इष्ट सिद्धि इसी को कहते है। साधना से सिद्धि की चर्चा आमतौर से होती रहती है। यह सिद्धिदायिनी साधना और कुछ नहीं केवल अपने मनोबल से अपने व्यक्तित्व को अभीष्ट ढाँचे में ढालने वाले उपाय उपचारों को अपनाना ही है। ध्यान-धारण का तप-तितिक्षा का योगाभ्यासपरक क्रिया-कृत्यों का यही प्रयोजन है। जो लोग साधना का सही उद्देश्य समझते है और उसका उपयोग करते हुए निर्धारित तत्वदर्शन और आचरण-अनुशासन का ध्यान रखते है, वे अपने पुरुषार्थ से अपने को बदलने, सुधारने, अभीष्ट ढाँचे में ढालने में समर्थ और सफल हो जाते है।
लाभ और हानि का सही अन्तर समझने वाले को इस निष्कर्ष पर पहुँचना चाहिए कि व्यक्तित्व में शालीनता-सद्भावना का अधिकाधिक समावेश ही सर्वतोमुखी प्रगति का एक मात्र आधार है। गुण कर्म स्वभाव की सदाशयता ही किसी को प्रामाणिक बनाती है। जिनका चरित्र, चिन्तन और व्यवहार मानवीय गरिमा के अनुरूप है, जिन्हें उत्कृष्ट आदर्शवादिता अपनाने पर गहरी आस्था है, वे प्रचलन से प्रभावित नहीं होते, वरन् अपनी रीति-नीति एवं दिशाधारा स्वयं निर्धारित करते है। इतना ही नहीं उस ऊँचाई पर ले जाने वाले मार्ग पर एकाकी चल पड़ने का साहस भी बटोरते है। उन्हें समीपवर्ती वातावरण से एकाकी जूझना पड़ता है, कारण कि पानी के ढलान की तरफ बहने की भाँति ही लोक प्रवाह में भी पतन की आरे ले जाने वाले-पशुता की ओर लौटाने वाले तत्व ही भरे होते है। वे अपने साथ चलने के लिए लोभ और भय बताते हुए दबाव डालते है। इन्हें नकारना उच्चस्तरीय साहस है। तिनके, पत्ते और धूलि कण, हवा के प्रवाह के साथ उड़ते है। पतन की आँधी भी उसी दिशा में उड़ती है जिसके लिए हवा का दबाव बाधित करता है। इस चक्रव्यूह को बेधना हर किसी का काम नहीं है। मनस्वी और तपस्वी ही ऐसा कर पाते है, किन्तु जो सामान्य जन श्रद्धापूर्वक इस दिशा में चल पड़ते है, वे अपने व्यक्तित्व में देवत्व का उदय कर सकने में निश्चय ही सफल होते है।
सेवाधर्म अपनाने में जितना दूसरों का भला होता है उससे अधिक लाभ अपने को मिलता है। व्यक्तित्व की गरिमा, भावना की कोमलता, सहानुभूति तो प्रत्यक्ष लाभ हैं जो मनुष्य को ऊँचा उठाते आगे बढ़ाते है। इससे भी बड़ा लाभ है-आन्तरिक सन्तोष और उल्लास जिसकी तुलना किसी भी उपलब्धि से नहीं की जा सकती।
विद्योत्तमा अपने समय की असाधारण विदुषी थी। उनने अपने से अधिक विद्वान के साथ विवाह करने की प्रतिज्ञा कर रखी थी। अनेक विद्वान आते और शास्त्रार्थ में परास्त होकर लौट जाते। इन असफल विद्वानों ने ईर्ष्यावश विद्योत्तमा को नीचा दिखाने के लिए एक षडयंत्र किया। एक मूर्ख को मौन व्रतधारी कहकर साथ ले आये और संकेतों से शास्त्रार्थ करने की बात पर दोनों की सहमति प्राप्त कर ली। मूर्ख के समर्थक सभी पंडित बन गये थे। संकेतों को ऐसा अर्थ निकालते जिसका तात्पर्य ऐसा निकलता जिसमें विद्योत्तमा परास्त हो जाती।
अन्तः उस अशिक्षित से विद्योत्तमा का विवाह हो गया। जब वे बोलने लगे तो पता चला कि उन्हें धोखा हुआ। संकेतों के बहाने उसे छला गया। विवाह तो उसने स्वीकार कर लिया पर विवाह के उत्तरदायित्व तय तक न निभाने की बात स्पष्ट कर दी और कहा जब आप मुझ से बढ़ कर विद्वान होंगे तभी दाम्पत्य जीवन की शुरुआत होगी।
उस पुरुष का नाम कालिदास था। उन्हें लाज लगी, तिलमिला गये और उस चुनौती को स्वीकार करके विद्याध्ययन में पूरे परिश्रम और मनोयोग के साथ लग गये। समय आया कि कालिदास भारत के माने हुए विद्वान बने। उनकी प्रतिभा निखारने में विद्योत्तमा ने भी पूरा योगदान दिया।
सृष्टि के कण-कण में दृश्यमान प्रत्येक रंग की अपनी-अपनी विशेषता-विशिष्टता है। वस्तुओं के गुण-धर्मो में इसी आधार पर भिन्नता पाई जाती है। पदार्थ जिन रंग-रश्मियों को अधिक मात्रा में अवशोषित कर लेते है, वह उसी रंग के दृष्टिगोचर होने लगते है। मानवी काया पर भी इन रंगों को न्यूनाधिक प्रभाव पड़ता है। जिस प्रकार आवश्यक रासायनिक पदार्थ कम होने पर जीवनी-शक्ति घटती और कई प्रकार के रोग एवं असंतुलन उत्पन्न होते है उसी प्रकार प्रकाश रंगों की उपयुक्त मात्रा में कारणवश कमीवेशी हो जाने पर भी स्वास्थ्य संकट उत्पन्न होता है। इससे न केवल शारीरिक स्वास्थ्य गड़बड़ाता है वरन् व्यक्ति मानसिक एवं भावनात्मक रूप से भी रुग्ण रहने लगता है। अतः जहाँ चिकित्सा उपचार में वनौषधियों, क्षारों और खनिजों का उपयोग करके तद्विषयक घट-बढ़ को ठीक किया जाता है, उसी प्रकार विशेष रंगों की न्यूनाधिकता हो जाने के संबंध में भी जाँच-पड़ताल करते है और उपयुक्त वर्ण का चुनाव कर उसकी क्षतिपूर्ति करते है। इससे मानसिक एवं भावनात्मक चेतना को उद्वेलित आन्दोलित करने तथा व्यवहार को मोड़ने-मरोड़ने-प्रभावित-परिवर्तित करने में भी आशातीत सफलता मिलती है।
रंगीन वस्तुएँ प्रायः उन्हीं रंगों की किरणें अपने में ग्रहण एवं धारण करती है जिसकी कि वे स्वयं होती है। इस प्रकार खिले पुष्पोद्यान, रंगे हुए वस्त्र-परिधान, दृश्य चित्रावली या पदार्थ न केवल नेत्रों को आकर्षक एवं मनमोहक प्रतीत होते है। वरन् अपने स्तर की विशेषताओं से भरे रहने के कारण जहाँ रहते है, या जिनके प्रयोग में आते है, प्रभावित करते है। सौंदर्य या सज्जा में प्रयुक्त होने वाली साधारण वस्तुएँ भी रंगों के कारण आकर्षक-सुन्दर लगने लगती है। प्रकृति का सौंदर्य तो वर्षों की विविधता के कारण ही है। यदि यह जानकारी उपलब्ध हो सके कि कौन सा रंग उचित रहेगा तो उससे सर्वसाधारण को वाँछित वर्ण चुनकर लाभान्वित होने का अवसर भी मिलेगा एवं अवाँछनीयता से होने वाली हानि से वे बच भी सकेंगे।
सुप्रसिद्ध रंग चिकित्सा विज्ञानी मेरी एंडरसन का कहना है कि जिस प्रकार मानव स्वास्थ्य पर भवन संरचनाओं (ज्यामितीय आकार प्रकार) का अभाव पड़ता है, ठीक उसी तरह उनमें किये गये रंग-रोगनों का साज-सज्जा का भी अनुकूल या प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। यही कारण है कि भवन-निर्माण के साथ अब “रंग-योजना” को भी प्रमुखता दी जाने लगी है। इसके आधार पर कमरे आकर्षक सुन्दर तो बनते ही है साथ ही उनके आकार में, लम्बाई-चौड़ाई में भी परिवर्तन दृष्टिगोचर होने लगता है। लाल, नारंगी और पीले रंग से पुते कमरे अंदर से आकार में छोटे दिखते है जबकि सफेद, आसमानी और नीले रंग के कमरे आकार में लम्बे प्रतीत होते है। हरा रंग सही अनुपात दर्शाता है। इन रंगों का प्रभाव मानवी व्यक्तित्व पर पड़े बिना नहीं रहता। आसमानी रंग व्यक्ति के अहं को विस्तृत करता और वातावरण के साथ तालमेल बिठाकर चलने को प्रेरित प्रोत्साहित करता है। लाल रंग व्यक्ति को स्वकेन्द्रित बनाता है, जब कि हरा रंग हृदय के लिए अत्यन्त हितकारी सिद्ध होता है।
रूस के प्रख्यात गुह्विद जार्ज इवानोविच गुरजिएफ के अनुसार रंगों के कुछ निश्चित सम्मिश्रण शान्तिदायक प्रभाव डालते है। तो कुछ रंगों का प्रभाव मानवी काया एवं मन पर विघातक भी होता है। “व्यूज फ्राम दी रियल वर्ल्ड” नामक पुस्तक में उनके प्रवचनों का संग्रह प्रकाशित किया गया है जिसमें बताया गया है कि प्रत्येक रंग का अपना विशिष्ट गुण होता है और नियम विशेष के आधार पर वे कार्य करते है। उनकी रासायनिक भिन्नता ही अनुकूल या प्रतिकूल प्रभाव उत्पन्न करती है। उदाहरण के लिए रंग के प्रकंपन क्रोध दिलाते रोष उत्पन्न करते है जबकि आसमानी रंग के वाइब्रेशन्स प्रेम, सहानुभूति को सहृदयता की भावना को जाग्रत करते है। पीलापन युयुत्सा को भड़काता है।
प्रत्येक रंग का एक सम्पूरक रंग होता है। उदाहरण के लिए लाल रंग का आसमानी, नारंगी का बैंगनी, पीले का बैंगनी, हरे रंग का बैंगनी, लाल आसमानी का लाल नीले का नारंगी तथा बैंगनी का पीला रंग अनुपूरक है। सात वर्णों के अतिरिक्त भी अन्य सैकड़ों कलर है जो दो या अधिक वर्णों के सम्मिश्रण से बनते है। इनका भी रंग योजनाओं या रंग चिकित्सा में प्रयोग होता है। ये है-जामुनी (पर्पिल) सिंदूरी (स्कारलेट), लेमन कलर, मैजेन्टा कलर और टारक्वाइज अर्थात् फीरोजी रंग। मिश्रित रंगों के अपने-अपने गुण, प्रभाव और परिणाम होते है। जिन्हें ध्यान में रखते हुए प्रयुक्त किया जाना ही हितकर होगा। गहरे रंगों की प्रतिक्रिया भी गहरी होती है जो प्रतिकूल पड़ने पर कई बार अधिक हानिकारक भी सिद्ध होती है। स्वस्थ मनःस्थिति के लिए सामान्यतः हल्के रंग ही उपयुक्त पड़ते है।
विशेषज्ञों का कहना है कि उद्विग्न-अशान्त व्यक्ति भी रंग-बिरंगे फूलों के बीच बैठ कर नया उल्लास उपलब्ध करता है, जो इस तथ्य की पुष्टि करता है कि मिश्रित रंगों की प्रभावोत्पादक क्षमता सामान्य एकाकी वर्णों की तुलना में अधिक होती है। उसमें उनकी शोभा, सुषमा, सुगन्ध के अतिरिक्त रंगों को मात्र शोभा-सज्जा के लिए ही नहीं प्रयुक्त किया जाना चाहिए वरन् उनके प्रभावों परिणामों को भी ध्यान में रखते हुए प्रयुक्त किया जाना अधिक उपयुक्त होता है। यह एक ऐसा महत्वपूर्ण विज्ञान है जिसकी जानकारी बने रहने पर सामान्य जीवन को अधिक सुखद एवं प्रसन्न बनाया जा सकता है।
शारीरिक मानसिक स्फूर्ति और उत्तेजना प्रदान करने में रंगों की प्रभावकारी भूमिका के संबंध में मेक्सिको विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने गहन अनुसंधान किया है। रंगों का खिलाड़ियों पर पड़ने वाले प्रभाव को जाँचने -परखने के लिए उन्होंने खिलाड़ियों के कपड़े तथा फुटबाल जैसे खेल उपकरणों को भिन्न-भिन्न रंगों से रंगवा कर यह देखा कि इसका हार-जीत पर किये गये परीक्षणों से जो निष्कर्ष उभर कर सामने आये उनसे पता चला कि रंग मात्र नेत्रों को ही सुरुचिपूर्ण-कुरुचिपूर्ण नहीं लगते, वरन् उनका प्रभाव मानसिक स्थिति पर भी पड़ता है। फलतः हार जीत के साथ उसका संबंध जुड़ता है। इस अध्ययन में पाया गया कि लाल रंग वाला पक्ष प्रायः शिथिल रहा, जबकि पीला एवं हल्का नीला रंग सफलता दिखाता रहा।
एक प्रयोग में शिकागो खेल निर्देशकों ने खिलाड़ियों की थकान उतारने के लिए विभिन्न रंगों से कमरे पुतवाये और उनमें उन्हें ठहराया। मैदान में जाते समय उन्हें नारंगी रंग वाले कमरे में कपड़े बदलने और चाय पीने के लिए बुलाया जाता था। परीक्षण करने पर इससे उनमें स्फूर्ति और उत्तेजना का अनुपात बढ़ा हुआ पाया गया।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने भी रंग के प्रभाव रोगियों पर जाँचने के लिए अनेकों प्रयोग परीक्षण किये है। उनने निष्कर्ष निकाला है कि जिन रोगियों को शान्ति एवं शीतलता की आवश्यकता थी, उनके लिए नीले रंग से पुते कमरे-जिनमें उसी रंग पर्दे लगे हुए थे, अधिक लाभदायक सिद्ध हुए। मानसिक रोगियों को तो इससे विशेष रूप से राहत मिली। काले रंग का प्रभाव जीमिचलाने, चक्कर आने, ऊब लगने जैसा देखा गया। जिन जलयानों या वायुयानों के कमरे इन रंगों में रंगे थे, उन्हें परेशानी रही, किन्तु जब उनकी रंगयोजना बदल दी गई तो यात्री प्रसन्नता अनुभव करने लगे। उन्हें उन्हीं कमरों में अच्छा लगने लगा। पीले रंग से विचार शक्ति और स्मरण शक्ति अभिवृद्धि होती देखी गयी है। विद्यार्थियों पर इसका अनुकूल प्रभाव पड़ता है। विशेषज्ञों का कहना है कि बुद्धिजीवी वर्ग को विशेष कर हल्के पीले रंग के वस्त्रों तथा उपकरणों का प्रयोग करना चाहिए। इससे वे उद्विग्न होने से बचे रहेंगे और एकाग्र रहने में सहायता मिलेगी।
रंगों के प्रभाव पर गंभीर अनुसंधान करने वाले सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक हावर्ड कीथ का कहना है कि “उपयुक्त रंग हमें ताजगी, स्फूर्ति प्रदान करते है जबकि अनुपयुक्त वर्णों से उद्विग्नता उत्पन्न होती और थकान आती है। आहार में जो महत्व स्वाद का है, वही दृष्टिक्षेत्र में रंगों का है। वे मात्र नयनाभिराम ही नहीं होते, वरन् शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर भी सीधा असर डालते है।
डा0 कीथ ने अपने प्रयोग परीक्षणों में पाया है कि रंगों की प्रभाव-क्षमता अतिविलक्षण है। एक भोजनालय को उनने गहरे नीले रंग से पुतवाया जिससे उसमें आने वाले आगंतुकों की संख्या घटने लगी। कारण यह था कि वहाँ बैठने वालों को ठंड लगने, जी मिचलाने जैसी अनेक शारीरिक मानसिक परेशानियों का शिकार होना पड़ा। कीथ ने जब उन कमरों को उसी ऋतु बदलने की चर्चा करने लगे।
मूर्धन्य रंग चिकित्सा विज्ञानी एम0जी0 हिब्बन ने अपने प्रयोगों में भोजन के रंगों का पाचन पर पड़ने वाले प्रभावों का अध्ययन किया है। एक बहुमूल्य सुस्वादु व्यंजन वाले भोज में उनने रंगीन बिल्व इस प्रकार जलाये कि पदार्थों का रंग कुछ से कुछ प्रतीत होने लगा। इसका परिणाम खाने वालों पर यह हुआ कि उनकी भूख मर गई और वे आधे-अधूरे ही भोजन कर सके। इसके विपरीत हिब्बन ने एक दूसरी पार्टी आयोजित की, जिसमें सामान्य से खाद्य-पदार्थ परोसे गये, किंतु रंगीन प्रकाश ऐसा अच्छा था कि थालियाँ, कटोरियाँ जिन वस्तुओं से सजी थी वे सभी बहुमूल्य और सुस्वादु लगने लगी। फलतः मेहमानों आशा से अधिक खाया और दावत की हर वस्तु को सराहा। रंगों ने अपनी प्रभावशीलता की अमिट छाप शिक्षण-तंत्र पर भी छोड़ी है। छोटे बच्चों की पुस्तकों में रंगीन चित्रों का होना आवश्यक है। इसके बिना पढ़ने के लिए उनका उत्साह ही नहीं उभरता। बच्चों की भाव-संवेदनाओं को उभारने में वर्णों से काफी सहायता मिलती है। लास एंन्जिल्स के प्रख्यात चिकित्सक डा0 ब्राइट हाँस ने रंगों के माध्यम से विद्यार्थियों की शारीरिक क्षमता एवं बौद्धिक प्रखरता घटाने-बढ़ाने के अनेकों प्रयोग भी किये है। इसके लिए उन्होंने एक जैसी स्थिति के छात्रों को वर्गों में बाँट कर उन पर लाल, नीले और पीले रंग के प्रभावों को देखा। उनने पाया कि आलसी और मंदबुद्धि वालों में उत्तेजना लाने के लिए लाल रंग अच्छा रहा, जबकि चंचल और आवेशग्रस्त रहने वालों को हल्के नीले रंग से शान्ति मिली। पीले वर्ण की प्रतिक्रिया मध्यवर्ती रही। मध्यवर्ग के विद्यार्थी अपनी कुशलता और प्रसन्नता में पीले रंग से अभिवृद्धि होने की बात कहते थे। अधिकाँश को वही रुचिकर भी लगा।
यही प्रयोग कामकाजी व्यापारी वर्ग के लोगों पर भी किये गये। उनकी घड़ियां ले ली गई और कई रंग के कमरों में बैठकर वार्तालाप करने के लिए उनके कई वर्ग योजनानुसार बिठा दिये गये। लाल रंग वाले कमरों में बैठ कर बात करने वालों ने दो घन्टे काटे, पर उन्हें चार घंटे जितने थकाने वाले लगे। उनमें गर्मा-गर्मी होती रही और किसी निष्कर्ष पर पहुँचे बिना ही उठ गये। उसके विपरीत नीले रंग वालों ने वार्ता के समय को वास्तविक के विपरीत आधा बताया। साथ ही हँसते मुस्कराते बाहर निकले उनने घनिष्टता बढ़ाई और दुबारा ऐसी ही मिलन की आवश्यकता बताई पीले रंग वाले कमरों के लोगों को समय का अनुभव उतना ही हुआ जितना कि वस्तुतः बीता था। उनने उतनी ही अवधि में कितनी ही समस्याएँ सुलझाई और कितने ही सौदे पक्के कर लिए। सभी सफलता पर प्रसन्न देखे गये। आत्म-विश्वास बढ़ा हुआ पाया गया।
गुणों के अभिवर्धन के संबंध में भी रंगों की उपयोगिता है। पीला रंग सात्विक, नीला राजसिक और लाल रंग तामसिक माना जाता है। प्रकृति की परख और सद्गुणों की अभिवृद्धि के लिए भी रंगीन वस्त्रों, तथा उपकरणों का प्रयोग किया जाता है। ब्रह्मचारी, वानप्रस्थ एवं साधु प्रकृति के धर्म परायण लोग पीले वस्त्र धारण करते है। भगवान राम एवं कृष्ण का वर्ण नील कमल जैसा माना गया है। आकाश एवं समुद्र का रंग नीला है। उन्हें वैभव एवं वर्चस्व का प्रतीत मानते है। रक्त और आग का रंग लाल होता है। क्रोधावेश में आंखें लाल पड़ जाती है। इनमें तमोगुण का दर्शन होता है। रंगों के उपयोग से उपरोक्त गुण-स्वभाव में घट-बढ़ की जा सकती है। आरोग्य वृद्धि के साथ-साथ मानसिक एवं भावनात्मक स्थिरता को अक्षुण्ण रखने के लिए उपयुक्त रंग का चुनाव किया जाय तो उसके फलितार्थ भी वैसे ही मिलते है। वर्णों का संसार जितना चित्र विचित्र है, उतना ही हमारे दैनन्दिन जीवन में महत्व भी रखता है।
एक अन्धे को किसी अपराध में जन्म भर की कैद हो गई। उसे जेल में बन्द कर दिया गया। एक दिन राजमंत्री जेल का मुआयना करने आये तो उन्हें अन्धे कैदी पर दया आई और अधिकारियों को नोट करा दिया कि यदि यह अन्धा जेल के फाटक से बाहर निकल रहा हो तो उसे रोका न जाय। अन्धे को इस सूचना से बड़ी प्रसन्नता हुई। वह जेल का फाटक बाहर निकलने के लिए तलाश करने लगा। इस के लिए उसने उपाय सोचा कि जेल की दीवार पकड़ ली जाय और घूमते-घूमते जब भी फाटक आये तभी बाहर निकल जाय।
अन्धे के सिर में खाज थी। ठंड लगते ही वह बढ़ जाती थी। जेल के फाटक पर फव्वारे लगे थे। उन्हें छूकर ठंडी हवा आती थी। फाटक आते ही ठंडी हवा से खाज बढ़ जाती। अन्धा दीवार छोड़कर दोनों हाथों से सिर खुजाने लगता साथ ही चलता भी रहता। इसी बीच फाटक निकल जाता और उसे फिर जेल पूरा चक्कर लगाना पड़ता। इस प्रकार उसे कितने ही चक्कर काटने पड़े पर कभी सौभाग्य न आया कि वह फाटक से बाहर निकल सके।
मनुष्य जन्म ही फाटक है। जीव अन्धा कैदी। जब जीवन मुक्ति का सुयोग आता है तब मनुष्य लोभ मोह की वासना तृष्णा की खुजली खुजाने लगता है। और उसी भव-बंधन में चक्कर काटता रहता है।
कुछ लोग बाहर से तो बड़े हृष्ट-पुष्ट, स्वस्थ निरोग दिखाई पड़ते है, क्रिया-कलाप भी उनके बहादुरों जैसे होते है, पर अन्दर से इतने कमजोर व डरपोक होते है जिसकी कल्पना भी नहीं की जाती। आश्चर्य तो तब होता है, जब इस परिकर में आज के बुद्धिजीवी कहे जाने वाले लोग भी सम्मिलित होते है।
रीडर्स डायजेस्ट प्रकाशन की एक पुस्तक “ आँड वर्ल्ड एराउण्ड अस” में एक घटना की चर्चा है। फिलिप ल्योनार्ड एक जर्मन वैज्ञानिक थे, जिनका आयुष्य-काल सन् 1862 से 1974 के बीच था। कैथोड रे तथा परमाणु संरचना पर उनके विशिष्ट कार्य से सन् 1904 में उन्हें नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था, पर अपने से सौ वर्ष पूर्व हुए ब्रिटिश वैज्ञानिक सर आइजैक न्यूटन के नाम से उन्हें बड़ा डर लगता था। कोई यदि उनके समक्ष कक्षा में बोर्ड पर न्यूटन का नाम भर लिख दे, तो इतने मात्र से उन्हें साँप सूँघ जाता था, उनकी घिग्घी बँध जाती थी और जब तक उसे मिटा नहीं दिया जाता तब तक वे कुछ स्पष्ट बोल नहीं पाते थे, पढ़ाने की बात तो दूर रही।
लीवरपूल यूनिवर्सिटी इंग्लैण्ड में एक छात्रा अध्ययन करती थी-मेरी डायना। वह प्रायः कहा करती थी कि “मैं काँच की बनी हूँ यदि गिर गई, तो मर जाऊँगी”। इसलिए वह सँभल-सँभल कर जमीन पर पैर रखती और प्रायः अत्यन्त मन्द चलती। यदि उसे कहीं पैदल जाना होता, तो सामान्य चाल से गन्तव्य तक पहुँचने में जितना समय लगता उससे डेढ़-दो घंटे पूर्व ही वह घर से निकल पड़ती, और धीमी-धीमी चाल स चल कर वहाँ पहुँचती। वैसे, ऐसे अवसर उसके जीवन में कम ही आये, जब वह घर से पैदल चलकर कहीं गई हो। बाहर जाने के लिए प्रायः वह गाड़ी का प्रयोग करती, चाहे उसे कुछ ही दूर क्यों न जाना हो। दिन दुर्भाग्य से कक्षा के अन्दर प्रवेश करते समय वह फिसल कर गिर गई और सचमुच इतने में ही उसकी मृत्यु हो गई।
व्यक्ति यदि अनावश्यक भय से मुक्त हो जाय, तो वह कितने ही संकटों और परेशानियों से बच सकता है। किन्तु ऐसा होता कहाँ है? देखने में बड़े विलक्षण वर्णन आते है। रूस के तस्मानिया प्रान्त में एक बड़े ही हट्टे-कट्टे और छः फुट के पुलिस अफसर थे-एस॰ फेडेरोव। काम तो उनका था चोर, उचक्कों और बदमाशों को पकड़ना, उनका सामना करना, पर जब बाल कटाने अथवा सँवारने की बारी आती, तो उनका सारा साहस एक ओर धरा रहता और भय हावी होता जाता ऐसी बात नहीं, कि फेडेरोव को छुरे और कैंची से डर लगता था। वह अपनी ही शक्ल से भय खाते थे। अतः यदि कभी गलती से आईने में स्वयं की छवि से उनका सामना पड़ जाता तो वे चीख कर दूर खड़े हो जाते। इसी कारण से वे बाल कटाने अथवा सँवारने के समय सामने दर्पण नहीं रखते थे।
कहा जाता है कि हिटलर को बिल्ली से बड़ा डर लगता था। एक दिन जब वे भोजन करने जा रहे थे, तो कमरे में सिर्फ इस कारण न प्रवेश कर सके क्योंकि वहाँ पहले से ही एक बिल्ली मौजूद थी।
जब बिल्ली को भगाया गया तभी वे शांतिपूर्वक भोजन कर सके। इस नृशंस व्यक्ति ने कितने ही यहूदियों का सफाया कराया, कितने ही क्रूर कृत्य किये ऐसे कृत्य जिन्हें सुनकर ही दिल बैठने लगता है, किन्तु जब एक साधारण बिल्ली से पाला पड़ता, तो उनका दुस्साहस धरा का धरा रह जाता है।
इन सारी घटनाओं पर दृष्टिपात करने से एक ही बात सामने आती है कि यह व्यक्ति की एक मानसिक कमजोरी है। बड़े और भारी भरकम कार्यों के लिए शरीर बल तो अभीष्ट है ही, पर यदि मन कमजोर हो तो शारीरिक बल के बावजूद वह लक्ष्य सिद्धि नहीं कर पाता। इससे शंकाडायन-मनसाभूत की उक्ति ही चरितार्थ होती है।
सुकरात को विचार-क्रान्ति सुलगाने के आरोप में मृत्यु दंड हुआ। उनके शिष्यों ने एक योजना बनाई कि जेल तोड़ कर उन्हें मृत्यु दंड से पहले ही भगा ले जाया जाय। सुकरात ने इस योजना में सम्मिलित होने से इन्कार कर दिया और कहा हमें जो भी काम करना हो सही साधनों से और खुले रूप में करना चाहिए। लुक छुप करते कुछ भी न किया जाय वह भले ही किसी उद्देश्य की पूर्ति क्यों न करता हो?
भौतिक जगत में शक्ति स्त्रोत के साधनों में अग्नि, ताप, गैस, तेल, विद्युत, परमाणु और लेसर आदि का जितना महत्व है, उससे कहीं अधिक उपयोगिता प्राणियों के लिए उस प्राण ऊर्जा की है, जो उनके शरीरों में पाई जाती है। मानवी काया तो इस विद्युत-शक्ति का अजस्र भाण्डागार है। शरीर का सारा क्रिया-कलाप उसी ऊर्जा संचार के माध्यम से गतिशील रहता है। हमारा नाड़ी संस्थान पूर्णतया जैव विद्युतधारा से ही सुसंचालित होता है। मस्तिष्क ही वह बिजलीघर है जहाँ से शरीर के समस्त अंग अवयवों को विद्युतधारायें पहुँच कर सारा क्रिया-कलाप नियंत्रित करती है। इस विद्युत-प्रवाह को ई.ई.जी. तथा ई.सी.जी. जैसे यंत्र उपकरणों पर देखा मापा जा सकता है। लौह चूर्ण और चुम्बक जिस प्रकार परस्पर चिपके रहते हैं उसी प्रकार हमारी जीवसत्ता काया के समस्त जीवकोषों को इस माध्यम से परस्पर संघटित किये रहती है। उनकी सम्मिश्रित चेतना से जीव संचार व्यवस्था कायम रहती है।
शरीर में कार्यरत प्राण विद्युत की गर्मी से ही विभिन्न अंग अवयव सक्रिय बनते और अपना-अपना काम करते रहते है। इस ऊर्जा का प्रभाव शरीर संचालन तक सीमित रहता है। किन्तु कुछ अपवाद ऐसे भी मिले है जिनमें शरीरगत ऊष्मा ने याँत्रिक बिजली की भूमिका निबाही और उस जैसे ही स्पर्शकर्ता को झटके महसूस हुए। सोसाइटी आफ फिजिकल रिसर्च के अनुसंधानकर्ता वैज्ञानिकों ने विश्व में ऐसे सैकड़ों व्यक्तियों को खोज निकाला है जिन्हें विद्युत आवेशधारी कहा जा सके। उनके अनुसार यह सामान्य-सा शारीरिक व्यतिक्रम है जिसमें जीवकोषों के आवरण ढीले पड़ जाते है और उनमें निहित विद्युत आवेश ‘लीक’ करने लगते है। अकारण भी किसी में यह अनायास प्रकट हो जाते है। प्रयत्नपूर्वक इसे उभारा भी जा सकता है।
कितनी ही बार यह विद्युत इतना भयावह रूप धारण कर लेती है कि स्वयं को ही जलाकर भस्म कर देती है। विज्ञान की भाषा में इसे “आटो-कम्बशन” स्वतः दहन कहा जाता है। जिसके कारणों को विज्ञानवेत्ता अभी तक नहीं जान पाये है। चेम्सफोर्ड, इंग्लैण्ड में सन् 1983 में एक ऐसी ही घटना घटित हुई जिसमें नृत्य करती हुई एक महिला के शरीर से अनायास आग के शोले फूट पड़े। दर्शक भय के कारण इधर-उधर भागने लगे। उसे बचाने के सभी रक्षात्मक उपाय उपचार व्यर्थ गये। देखते-देखते वह युवती राख के ढेर में बदल गई।
इंग्लैण्ड के ही बर्मिघम प्रान्त में पिछले दिनों दो शिशु स्वतः दहन के शिकार हो गये। इनके अचानक रहस्यमय आग स जल जाने की घटना को वहाँ के प्रमुख पत्रों ने प्रकाशित किया था। 1973 में हुई एक घटना के अनुसार सात महीने की परमिंदर कौर अपने पिता के कमरे में झूले में बैठी थी। एकाएक उसके शरीर से अग्नि-ज्वाला फूट निकली और नीली लपटों ने उसे चारों ओर से घेर लिया। पिता को किसी तरह अग्नि बुझाने में सफलता मिली और उसे बर्मिघम के अस्पताल में भर्ती कराया। अग्निकाण्ड का कारण अज्ञात ही बना रहा। इसी तरह की एक अन्य घटना का विवरण बर्मिंघम से प्रकाशित पत्रिका-”ईवनिंग मेल” के 26 अगस्त 1974 के अंक में प्रकाशित हुआ था, जिसके अनुसार 6 माह की लिसा टिप्टन अपने ही शरीर की ज्वाला से जलकर भस्म हो गई थी। पर आश्चर्यपूर्वक शरीर से लिपटे कपड़ों में से अधिकाँश बच गये थे।
मनुष्यों के स्वतः जल जाने की प्रक्रिया पर अनुसंधान कर रहे वैज्ञानिकों का कहना है कि पिछले 400 वर्षों के भीतर संसार भर में स्वतः मानव दहन की घटनायें 200 से भी अधिक संख्या में प्रकाश में आई है। इस तरह से मरने वालों की आयु 4 माह से लेकर 114 वर्ष तक थी, जिसमें नर-नारी दोनों ही वर्गों की संख्या लगभग समान थी। सिद्ध योगियों के बारे में प्रचलित है कि इच्छानुसार अपनी पंचभौतिक काया को वे योगाग्नि को समर्पित कर देते थे। सती का योगाग्नि में दहन एक पौराणिक सत्य है। यह मान्यता आज भी सही हो सकती है। किन्तु जब जन सामान्य चलते-फिरते, नाचते-गाते,मोटर-गाड़ी
चलाते हुए अपने ही शरीर से फूट पड़ी अज्ञात ज्वाला से भस्मीभूत हो जाते है तो उसका कोई कारण समझ में नहीं आता।
सुप्रसिद्ध विज्ञानवेत्ता चार्ल्स फोर्ट ने इस संदर्भ में गहरी छानबीन की है और सन् 1861 के पश्चात् हुए आकस्मिक अग्नि प्राकट्य स जल जाने वालों का विस्तृत विवरण अपनी पुस्तक में प्रकाशित किया है। इनमें से बहुचर्चित एवं सर्वाधिक रहस्यमय घटना पैनासिलवानिया के वेस्ट फिलेडेल्फिया की 18 वर्षीय एक विधवा का है। 18 मई 1957 को अन्ना मार्टिन नामक यह महिला अपने एक कमरे में जली हुई अवस्था में पाई गई थी जहाँ अग्नि का कोई स्त्रोत भी नहीं था। उसके मात्र जूते ही शेष बचे थे। समीप पड़ा अखबार आग से अछूता था।
इसी तरह की एक अद्भुत घटना का विवरण विख्यात नृवंशवेत्ता डा0 विल्टन क्रागमैन ने “द जनरल मैगजीन एण्ड हिस्टोरिकल क्रोनिकल” में प्रकाशित किया है। उसके अनुसार 1 जुलाई 1951 को .... के सेंटपीटर्सवर्ग में मेरी हार्डी रीसर नामक 67 वर्षीय वृद्धा कुर्सी पर बैठे-बैठे जल कर राख हो गई थी। अवशेष के रूप में मात्र कुर्सी के स्प्रिंग और उसकी खोपड़ी बची थी जो सिकुड़ कर छोटी सी गेंद की शक्ल में बदल गई थी। निरीक्षण कर्ता डा0 क्रागमैने का कहना है कि किसी भी व्यक्ति के अस्थिपिंजर को जलाने गलाने के लिए 3 हजार डिग्री सेंटीग्रेट से अधिक की गर्मी चाहिए। फिर भी कपाल का इस स्थिति में मिलना और इतने उच्च ताप पर समीप पड़े समाचार पत्र तथा रेशमी चादर का न जलना अपने आप में रहस्यमय पहेली थी।
सितम्बर 1966 की ठिठुरनभरी एक रात को उत्तरी पैनसिलवानिया के काउडस्पार्ट नगर में वहाँ के जाने माने 92 वर्षीय चिकित्सक डा0 जे0 इरिविंग .... अपने घर में एकाएक कायाग्नि के भड़क उठने से राख में परिवर्तित हो गये थे। मात्र उनके दायें पैर का घुटने से नीचे वाला हिस्सा ही खोजने पर मिल सका था। इसका पता तब चला जब उनके एक सहयोगी डा0 गाँसनेल उस कमरे में प्रविष्ट हुए जहाँ से हल्के-मीठे गंधयुक्त नीला धुंआ निकल रहा था। अस्वाभाविक मौतों के कारणों का अन्वेषण करने वाले चिकित्साशास्त्री डा0 ग्रेनोबल के कथनानुसार किसी लाश को जलाने के लिए कम से कम 2200 डिग्री फारेनहाइट तापक्रम की आवश्यकता पड़ती है। किन्तु डाक्टर बेंटली अत्यधिक ठंड में जिस तरह जलकर मृत्यु को प्राप्त हुए वह अपने आप में विचित्र घटना है।
“एक्टा मैडिका एण्ड फिलोसोफिका हैपनैशिया” नामक प्रसिद्ध पुस्तक में एक शराबी व्यक्ति के अचानक अपनी ही देह की ज्वाला से जलकर मर जाने का उल्लेख है। पेरित का रहने वाला यह व्यक्ति बेहद पियक्कड़ था। एक रात चटाई पर पड़े-पड़े ही स्वतः दहन का शिकार बन गया। चटाई भी आधी झुलस गई थी।
फ्लोरिडा से प्रकाशित मेडिकल जनरल के अनुसार अमेरिका में अब तक इस तरह की सौ से अधिक मृत्युएँ हो चुकी है। इसमें वैज्ञानिकों ने हैरानी प्रकट की है कि मनुष्य शरीर में 73 प्रतिशत भाग जल होता है। उसे जलाने के लिए 5000 डिग्री फारेनहाइट की ऊर्जा चाहिए। वह अचानक शरीर में कैसे पैदा हो जाती हे। शरीर कोषों में अग्नि स्फुल्लिंग “प्रोटोप्लाज्म” में सन्निहित तो रहते है किन्तु वे इतने व्यवस्थित रहते है कि शरीर के जल जाने की कोई गुंजाइश नहीं रहती। प्रोटोप्लाज्म उच्च प्लाज्मा में बदलने पर ही अग्नि बन सकती है। यह सब एकाएक कैसे घटित हो जाता है और इतनी तीव्र आग की लपटें फूट पड़ती है कि जलाँश अधिक मात्रा में रहने पर भी काया भस्मीभूत बन जाती है। इस रहस्य को वैज्ञानिक अभी तक नहीं समझ सके है।
मानवी काया रहस्यमय तो है ही, अपनी जटिल संरचना के कारण विलक्षण अद्भुत है। सूक्ष्म संरचना का जाल जो साधना विज्ञान में नाड़ी गुच्छकों, चक्र उपत्यिकाओं, प्राणाग्नि-योगाग्नि-कुण्डलिनी आदि के नाम से जाना जाता है, संभव है स्वतः दहन की इन घटनाओं से जुड़ा हो। अभी शरीर के इस सूक्ष्म विद्युत संस्थान पर शोध की काफी गुँजाइश है, ऐसी चुनौती अपवाद स्वरूप होते रहने वाले ये घटनाक्रम देते है।
तथागत को एक बिहार का निर्माण करना था। इसके लिए उन्होंने सर्व-साधारण से साधना की और अभीष्ट राशि जमा हो गई।
कोषाध्यक्ष से पूछा गया कि किसकी सबसे बड़ी राशि थी। उसने बताया-एक बुढ़िया ने जिन्दगी भर में एक रुपया जमा किया था। उसने अपनी कमाई का शत प्रतिशत दान कर दिया। जिसके पास विपुल धन था उनने उसमें से सैकड़ों भर दिये थे। जो उनकी पूँजी का एक प्रतिशत भी नहीं था। बिहार पर शिला लेख लगा। उसमें बुढ़िया की उदारता को श्रद्धापूर्वक सराहा गया।
सतयुग में देवशक्ति का वर्चस्व था। पृथ्वी पर निवास करने वाले देवता भूसुर-ब्रह्मवेत्ता अपनी दिव्य-दृष्टि से सद्ज्ञान का निर्धारण करते थे और उसे जन-जन तक पहुँचाने के लिए अलख जगाने जैसी योजनाएँ कार्यान्वित करते थे। ऋषिवाणी, देववाणी को वेदवाणी कहा और माना जाता था। उसे लोग ईश्वरीय निर्देश की तरह अपनाते थे। चिन्तन और व्यवहार को तद्नुरूप ढालते थे। सही मार्ग पर चलने वाले सरलतापूर्वक लक्ष्य तक पहुँचते थे। सुख शान्ति की प्रगति और समृद्धि की उन दिनों कहीं कमी न थी। यह सतयुग का विवेचन हुआ।
बाद में राजसत्ता की प्रधानता हुई। शक्ति शासकों के हाथों केन्द्रित हुई उनने अपने महल, वस्त्राभूषण, इस प्रकार धारण किये मानों वे ही प्रजापति और भूपति है। जन उपार्जित धन, कर तथा लूट के रूप में उनके भंडारों में जमा होने लगा। धन के बल पर बलिष्ठ योद्धाओं की शक्ति खरीदी गई। विद्वान पंडितों चारणों की भीड़ भी धन लाभ के निमित्त उसी छत्रछाया में एकत्रित होती गयी। प्रजाजनों का जिस किसी भी ढाँचे में ढालना, किसी भी दिशा में मोड़ना तब छात्रों के हाथों में था। राजाओं की उन दिनों शक्ति असीम थी। न्याय उनके वचन तथा रुझान तक सीमित होकर रह गया था। इसे मध्ययुग भी कह सकते है, शक्तियुग भी। हिंसक आक्रामक लुटेरे एक दूसरे को सहन नहीं कर सकते। उनके बीच घमासान द्वन्द्व छिड़ा ही रहता है। मध्यकाल में युद्ध एक प्रमुख व्यवसाय बन गया था। समर्थ लूटते थे, दुर्बल लुटते थे। सामन्ती अन्धकार युग के नाम से भी इसी काल को जाना जाता है। योद्धाओं ने नये शस्त्र और पंडितों ने ग्रन्थ रचे। उनमें शासन का रुझान एवं संकेत ही प्रमुख रूप से झलकता था। अधिक प्रसन्न करने वाले ही तो अधिक पुरस्कार पाते थे।
अब पाँच शताब्दी से धन का वर्चस्व उभर कर ऊपर आया। ऐसी विधायें उभरी जिनसे बुद्धिवाद और विज्ञान की नवोदित शक्तियों द्वारा अधिक धनोपार्जन संभव हो सका। पूँजी के द्वारा पूँजी कमाने का एक नया सिद्धान्त निकला। इसमें कर्म−कौशल को कम और पूँजी नियोजन की चतुरता को प्राथमिकता मिली।
पूँजी के पैर पसारे और उसने विकराल से प्रमुखता प्राप्त राजसत्ता को भी अपनी कठपुतली बना लिया। राजतन्त्र अनुपयुक्त लगा और उसका स्थान प्रजातन्त्र ने ग्रहण किया। संसार भर में इस परिवर्तन की लहर आयी। प्रजा ने सोचा, सत्ता उसके हाथ आई और अपने भाग्य का स्वयं निर्णय कर सकने का अधिकार उसे मिला। सिद्धांततः यह कथन सही भी था पर व्यवहार में वह आशा कसौटी पर खरी न उतरी। मतदान के माध्यम से वस्तुतः जनता शासन अपने हाथ में ले सकती थी। पर अनगढ़ और अनपढ़ जनता न तो अपने मताधिकार का सही उपयोग कर सकी और न सही प्रतिनिधि सही स्थान पर पहुँच कर उन सभी कामों को सम्पन्न कर सके जिनसे प्रतीत होता कि वस्तुतः वही हो रहा है जो जनता के हित में तथा प्रजाजनों की इच्छानुरूप है। इसे अभीष्ट उद्देश्य की आँशिक सफलता कह कर ही सन्तोष किया जा सकता है।
जनमानस का उपयुक्त स्तर पर उभार और जनशक्ति का उच्च उद्देश्यों के लिए नियोजन इन दिनों उन लोगों के हाथ में है, जो आर्थिक दृष्टि से साधन सम्पन्न है। विशालकाय कल कारखाने चलाते है और ऐसा उत्पादन करते है जिनकी प्रतिद्वंद्विता में कुटीर उद्योगों का विकास संभव नहीं फलतः बेकारी-बेरोजगारी बढ़ती है।
प्रेस प्रकाशन अपने समय का सबसे प्रबल तन्त्र है। उस माध्यम से जो छपकर आता है उसके संबंध में यह नहीं कहा जा सकता है कि चिरकाल से पिछड़े हुए जनमानस को समर्थ समुन्नत बनाने के लिये इस का उत्पादन पर्याप्त एवं सन्तोषजनक है। लम्बे समय से कुंभकरण निद्रा में सोये हुए जनमानस को करवट बदलने और उनींदे उठ खड़े होने के साथ-साथ बौद्धिक भूख की उपयुक्त खुराक देने के लिए जिस आहार की आवश्यकता थी, वह नहीं के बराबर विनिर्मित हो रही है।
अखबार भी क्या करें? उनके आश्रयदाता विज्ञापन देने वाले स्त्रोत है। उनकी मर्जी को ध्यान में न रखा जाय तो सस्तेपन की प्रतिद्वंद्विता में पत्र पत्रिकाओं का चलना कठिन हो जायगा। विवशता उनकी भी है।
पुस्तकें भी अब उस स्तर की छापना प्रायः बन्द हो गयी है, जो आन्दोलनों के समय प्रचार भावना से प्रकाशित होती थी। अब सजधज वाली महंगे मोल की पुस्तकों से ही बड़े बुकसेलरों की दुकानें सजी दीखती है, जिन्हें पैसे वाले ही अपनी अलमारियाँ सजाने के लिए महंगे मोल में खरीदते है। उनके विषय भी खरीददारों की अभिरुचि के अनुरूप होते है। प्रजातंत्र में जिस प्रजा को जागरूक और विवेकवान बनाने के लिए जिस साहित्य की जरूरत है, उसका लेखन-प्रकाशन-विक्रय नहीं के बराबर हो रहा है।
प्रवक्ताओं, प्रचारकों, गायकों के अपने विषय है जो लोर रंजन की आवश्यकता पूरी करते है। सरकारी प्रचारतन्त्र का अपना विशेष दृष्टिकोण है। आर्थिक सुविधा संवर्धन, स्कूल, अस्पताल, कारखाने आदि का संचालन अन्यान्य प्रकार के सुविधा संवर्धन उनके तात्कालिक उद्देश्यों में प्रमुख रूप से सम्मिलित है।
इन दिनों पूँजी एक पलड़े में और शासन से लेकर कलाकार, साहित्यकार आदि मिलकर दूसरे पलड़े में रखे जा सकते है। कभी धर्म की भी अपनी शक्ति थी पर अब तो अपने ही भारी और खर्चीले ढाँचे को किसी प्रकार वहन कर सकने की स्थिति में रह पा रही है। उसके माध्यम से समय की माँग को पूरा कर सकने की आशा यत्किंचित ही उभरती है।
दिखाई सब ओर अँधेरा ही दीखता है फिर भी समय की आवश्यकता एक ही है कि तीसरी युगशक्ति का नए सिरे से जागरण हो। उसे नए सिरे से सोचने का अवसर मिले। वह अपनी सामर्थ्य को समझे और जागरूकता अपनाकर ऐसा कुछ करे ताकि जन साधारण अपनी भविष्य निर्माता की भूमिका सम्पन्न करने में प्राणपण से प्रयत्नरत कटिबद्ध दिखाई देने लगे।
तीसरी शक्ति का अर्थ है-”जनशक्ति”। यही है दूसरे शब्दों में युगशक्ति। इसी के माध्यम से प्रस्तुत समस्याओं, उलझनों, कठिनाइयों एवं विकृतियों का निराकरण हो सकेगा। मूर्धन्य लोग अपने लिए उपयुक्त एवं पर्याप्त साधन उपलब्ध आधारों के सहारे सँभालते है। कठिनाई उनके सामने है, जो पिछड़ी या सामान्य स्थिति में रहकर अपने निर्वाह की व्यवस्था बनाने में ही जुटे रहते है और कुछ अधिक शानदार सोचने के लिए न समय ही निकाल पाते है और न प्रेरणायें ही प्राप्त करते है।
सुसम्पन्नों एवं मूर्धन्यों की संख्या समाज में दस बीस प्रतिशत से अधिक नहीं हे। शेष तो सामान्य स्तर के लोग ही कहे जा सकते है। वस्तुतः यही है जनशक्ति। इसी को समझा जा सकता है-शक्ति, समृद्धि और प्रगति का अक्षय भण्डार। किन्तु किया क्या जाय? मूर्छित स्थिति में पड़े रहने पर तो कोई योद्धा भी अर्धमृतक की स्थिति में बना पड़ता रहता है। मक्खी-मच्छर भी उसे काटते रहते है। कोई गाली देता रहे, चोरी करता रहे तो भी मन पर प्रभाव नहीं पड़ता। कपड़े बदन पर से हट जाँय और बेपर्दगी बन पड़े तो भी उस निद्राग्रस्त को कुछ पता नहीं चलता और जीवित होते हुए भी कुछ भी ऐसा नहीं कर सकता जो करने योग्य है।
जनशक्ति के शक्ति-स्त्रोत को कुछ करने की स्थिति में पहुँचाया-जगाया जा सके तो एक ऐसी क्षमता का उद्भव दृष्टिगोचर हो सकता है, जिसके सामने अब तक प्रकाश में आई सभी शक्तियाँ गौण दृष्टिगोचर होंगी। सम्पन्नता, सत्ता और विद्वता की सामर्थ्य से कोई इनकार नहीं कर सकता। विशेषतया आज की परिस्थितियों में, जब कि संसार भर के प्रमुख सशक्त साधन उसी वर्ग के हाथ में है।
यहाँ किसी वर्ग पर कटाक्ष या दोषारोपण नहीं किया जा रहा हैं। मात्र स्वाभाविकता की चर्चा हो रही है। जागरूक, क्रियाशील और पुरुषार्थ-परायण ही अभीष्ट सफलताएँ प्राप्त करते है। उपार्जन को परमार्थ में लगाया जाय यह सिद्धान्त तो देववर्ग का है। सामान्य स्तर की रीति-नीति यही है कि अपना वैभव अपने सुख साधनों के लिए प्रयुक्त किया जाय। इसी प्रथा का प्रचलन सर्वत्र दृष्टिगोचर होता है। फिर प्रवाह को रोका कैसे जाय? वनराज, गजराज ही सुविस्तृत वन प्रदेश पर अपना अधिकार जमाये दिखाई देते है। अन्यों को तो उनके अनुग्रह पर जीवित रहना पड़ता है।
यहाँ चर्चा उस बहुसंख्यक जन-समुदाय की हो रही है जो वस्तुतः सर्वतोमुखी शक्ति का अजस्र भण्डार है। समस्त प्रकार की सामर्थ्य इसी मध्यवर्ती वर्ग में सन्निहित है। वनस्पतियाँ खाकर समस्त प्राणी जीवित है। खाने वाले दहाड़ते और द्वन्द्व मचाते देखे जाते है पर घास की महत्ता समझने की चेष्टा नहीं की जाती जिसको उदरस्थ करके प्राणी अपनी-अपनी कुशलता और विशेषता का प्रदर्शन करते है। गाय दूध देती है पर वस्तुतः वह घास का उत्पादन है। घोड़ा दौड़ लगाता है पर वस्तुतः घास द्वारा प्रदत्त शक्ति ही हे। मनुष्य बुद्धिमान कहलाता है पर बुद्धि भी खेतों में उपजने वाली अनाज वर्ग की उत्पत्ति का ही प्रतिदान है। अमृतोपम जड़ी बूटियाँ और कुछ नहीं, मात्र घास वर्ग की सदस्य ही है। जन शक्ति ही है जिसकी क्षमता का थोड़ा-थोड़ा अंश लेकर सत्ता, विद्वता, सम्पन्नता, कला के क्षेत्र में काम करने वाले तथा कथित मूर्धन्य प्रभावशाली लोग अपना वर्चस्व बढ़ाते है, समर्थ भाग्यशाली कहलाते है।
शासन का राजस्व तथा मिलने वाले टैक्सों से भण्डार भरते है। उस तंत्र के अंतर्गत विभिन्न गतिविधियों का संचालन होता है। यह सब और कुछ नहीं, जनशक्ति के एक छोटे से अनुदान का विस्तार मात्र है। पूँजी आसमान से नहीं गिरती। लोग वस्तुयें खरीदते है और उसी के सहारे कारखाने चलते और उद्योगपतियों को सुसम्पन्न बनाते है। विशालकाय कारखानों की श्रृंखला खड़ी करते है। साहित्यतंत्र, कलामंच, धर्मतन्त्र जैसे अनेकों प्रतिष्ठान जनशक्ति के द्वारा दिए गए छोटे-छोटे सहयोगों पर ही उत्पन्न होते एवं फलते-फूलते है।
इतने अधिष्ठानों का पोषण करते हुए भी जनशक्ति का अजस्र भण्डार चुकता नहीं। प्रजाजन अपना तथा अपने परिवार का निर्वाह भी भली प्रकार करते रहते है और थोड़ा बहुत आमोद-प्रमोद, सुविधा-साधन एवं बचत आवश्यकताओं के लिए भी कुछ जमा करते रहते है। चन्दा, चुंगी, टैक्स आदि के लिए बहुत कुछ देते रहने पर भी इस अन्नपूर्णा जनशक्ति का भण्डार न अब तक चुका है और न कभी भविष्य में चुकेगा ही। यह सदा अक्षुण्ण ही बनी रहेगी।
अब नवयुग की अनेकानेक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए इसी जनशक्ति का आश्रय लिया जाना है। उसके पास शक्ति के, सम्पदा के अजस्र भण्डार भरे पड़े है। कठिनाई एक ही है कि वे बिखर गए है और किसी सुनियोजित उच्चस्तरीय प्रयोजन के लिए प्रयुक्त नहीं किए गए है। बिखराव से तो हर वस्तु छिन्न-भिन्न हो जाती है और अपना मूल्य गवाँ बैठती है किन्तु यदि उस भूल को सुधारा जा सके तो एकीभूत क्षमता ऐसे प्रयोजन पूरे कर सकती है, जिन्हें अद्भुत, आश्चर्यजनक और अभूतपूर्व कहा जा सके।
कथा है कि हारे हुए देवताओं को जिताने के लिए प्रजापति ने उन सब की शक्तियों का थोड़ा-थोड़ा अंश लेकर संघबद्ध किया था। उससे प्रचण्ड चण्डी महाकाल की अधिष्ठात्री काली का अवतरण हुआ। उसी ने उन सभी विपत्तियों का निराकरण कर दिया। जिनके कारण सर्वत्र हाहाकार संव्याप्त था। नवयुग की जिन समस्याओं का हल और सुविधाओं का संवर्धन करना है, उसकी आवश्यकता की पूर्ति यह नव-जागृत-शक्ति ही पूरा करेंगी, जिस का नाम तीसरी शक्ति भी दिया जा सकता है।
चन्द्रमा उदास रहने लगा। उसे शारीरिक रोग तो कम पर मानसिक दबाव अधिक था। सो उसकी कलाएं एक-एक करके क्षीण होने लगीं।
और पन्द्रह दिन में ही स्थिति मरणासन्न जैसी हो गई। धन्वंतरि को बुलाया गया और कहा गया कि वह हँसने की आदत डालें। दिन भर मुस्कराते और हँसते रहें। इसी उपचार को अपनाने पर वे पूर्ववत् सुन्दर और समर्थ हो जागेंगे। चन्द्रमा ने वही उपक्रम अपनाया वे हर खड़ी प्रसन्न रहने लगे। कठिनाइयों और चिन्ताओं का निराकरण तो करते पर उन्हें सिर पर सवार न होने देते।
चन्द्रमा का खोया हुआ स्वास्थ्य सुधरने लगा। तेजस्विता में एक-एक कला बढ़ने लगी। पूर्णिमा आने तक उनकी सभी कलाएँ लौट आई और वैसे ही पूर्ण हो गये जैसे कि पिछली पूर्णिमा को थे।
चरक दिनों गुरुकुल में पढ़ते थे। उनके जिम्मे वनौषधियों की खोज का काम था।
एक बार उन्हें एक छोटा फोड़ा निकला। गुरु ने उसे अच्छा करने के लिए एक विशेष वनौषधि की आवश्यकता बताई। ढूंढ़ कर लाने के लिए कहा। साथ ही यह भी कहा वह औषधि न मिलने पर छोटा रोग भयंकर हो सकता है। चरक उस वनस्पति को ढूंढ़ने के लिए निकल पड़े। दूर-दूर तक गये, सैकड़ों वनस्पतियों को देखा जाता और उनके प्रभाव का निरीक्षण किया जाता। इस प्रकार उन्हें इस कार्य में लम्बा समय लग गया।
जब वे निराश लौटे तो गुरुदेव ने कहा, वह वनस्पति आश्रम के पिछवाड़े मौजूद है। उसे उखाड़ लाओ। सेवन करो, वैसा ही किया गया, वे कुछ ही दिन में रोग मुक्त हो गये।
एक दिन चरक ने गुरु से पूछा जब वह वनौषधि आश्रम के पीछे मौजूद थी तो आपने मुझे उस लम्बी खोजबीन में क्यों लगाया?
गुरु ने कहा-”शोध की लगन जगाना अधिक महत्वपूर्ण है उसके कारण असंख्यों का भला होता है। उस प्रयास में तुम्हारी तन्मयता लग सके और वैसा ही स्वभाव बन सके। इसी कारण तुम्हें उस कठोर प्रयत्न में जुटाया गया था”। चरक का समाधान हो गया।
नादब्रह्म-शब्दब्रह्म की विधा का अध्यात्म क्षेत्र में अपना महत्वपूर्ण स्थान है। आत्मोत्कर्ष के लिये किये जाने वाले अनेकानेक उपक्रमों में से सर्वाधिक महत्वपूर्ण इसे ही माना जाता है। शब्द शक्ति को चेतना का ईंधन माना गया है। जब इस ईंधन की पूर्ति में कमीवेशी होने लगती है तो व्यक्ति का समूचा व्यक्तित्व ही असंतुलित हो जाता है। मानसिक बिखराव, उद्विग्नता, संक्षोभ-विक्षोभों के रूप में इसे देखा जा सकता है। इसकी पूर्ति हेतु किये जाने वाले अनेकों प्रयोगों में से संगीत की सृजनात्मक शक्ति द्वारा किया जाने वाला उपचार भी एक है।
प्राचीनकाल में समय-समय पर वेदमंत्रों के सस्वर उच्चारण का प्रयोग स्वर विद्या के रूप में मानवी विकास के लिए एवं उसके मार्ग में शारीरिक रोगों तथा मनोविकारों के रूप में उत्पन्न अवरोधों का समाधान करने के लिए किया जाता रहा है। स्वर शास्त्र के अनुसार कायकलेवर में सात सूक्ष्मनाद सतत् उठते रहते है। इन्हें स्थूल जगत में सप्तस्वरों सा, रे, ग, म, प, ध, नि, के रूप में पहचाना जाता है। सूक्ष्म स्वरूप के दबने उभरने से जो शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य असन्तुलन उत्पन्न होता है, उसे स्वर-विज्ञान के आधार पर उपयुक्त स्वरों के समुचित सम्मिश्रण व उन के गायन के विधान से सन्तुलित किया जा सकता है। स्वर-योग की साधना कर मनुष्य मात्र सुन्दरम् को ही नहीं सत्यम् एवं शिवम् को भी प्राप्त कर लेता है, ऐसी मनीषियों की मान्यता है।
मनुष्य जाति को भगवान ने अनेक दिव्य वरदान दिये है। उनमें से स्वर-योग-संगीत भी एक है। संगीत की विशिष्ट ध्वनि तरंगें मानसिक और शारीरिक रोगों के निवारण में चमत्कारी लाभ प्रस्तुत करती रहीं है। संगीत अब मनोरंजन मात्र नहीं रहा वरन् एक से एक महत्वपूर्ण शक्ति स्वीकार कर लिया गया है। गायन को एक प्रकार का योगाभ्यास एवं वक्ष तथा कंठ संस्थान के समीपवर्ती अवयवों का महत्वपूर्ण व्यायाम माना गया है। भारतीय संगीत शास्त्र के आचार्यों के अनुसार गायन में आवाल नाभि केन्द्र (सोलर प्लेक्सस) से उठती है और अनाहत चक्र से होती हुई ब्रह्मरंध्र तक पहुँचती है। इस मध्य तालु, कंठ, फुफ्फुस, हृदय, आमाशय, यकृत एवं आँतों को प्रभावित करती हुई एक गतिचक्र बनाती हुई पुनः अपने उद्गम स्थान नाभि तक पहुँचती है। यह गतिचक्र न केवल सूक्ष्म अंग प्रत्यंग के व्यायाम के प्रयोजन को पूरा करता है, वरन् उनको प्राणचेतना का अतिरिक्त अनुदान भी देता है। संभवतः इन्हीं कारणों से प्राचीन समय में संगीत को एक महत्वपूर्ण और अनिवार्य विद्या के रूप में अपनाया गया था। यद्यपि अब वह बात नहीं रही, पर धीरे-धीरे लोग उसकी उस सामर्थ्य से परिचित होते जा रहे है।
संगीत की सामर्थ्य को अब न केवल भारत में, अपितु संसार के अधिकाँश देशों में समझा, स्वीकारा, और उपयोग में लाया जा रहा है। जिस प्रकार भारत में प्राचीन समय से संगीत को चिकित्सा क्षेत्र में प्रयुक्त किया जाता रहा है, उसी प्रकार पाश्चात्य जगत में इसे चिकित्सा के एक प्रमुख साधन के रूप में पूर्वकाल में अपनाया गया था। मिश्र के संगीत के सर्वाधिक प्राचीन ग्रन्थ “मेडिकल पेपिरी” में इस बात का उल्लेख है कि प्राचीन समय में मिश्र में संगीत का उपयोग महिलाओं सहित अन्य पालतू जानवरों की प्रजनन क्षमता बढ़ाने में किया जाता था। संगीतज्ञा टिमाथियस ने अपने एक ग्रन्थ में लिखा है कि एक बार जब सिकन्दर अचेत हो गया था और अन्य कोई उपचार कारगर नहीं हो रहा था, तो “लायर” नामक वाद्य यंत्र बजा कर उसकी चेतना को वापस लाया गया था। बाइबिल में भी संगीत चिकित्सा का विवरण मिलता है उसमें डेविड नामक एक संगीतज्ञा का संदर्भ देते हुए कहा गया है कि जब राजा साओल का स्वास्थ्य दिन प्रतिदिन गिरने लगा, तो डेविड ने ही संगीत-चिकित्सा द्वारा उसे स्वस्थ बनाया था।
प॰ जर्मनी में भी संगीत-चिकित्सा का इतिहास काफी पुराना माना जाता है। वहाँ एक वाद्य यंत्र पर अंकित है कि किसी भी प्रकार के दुःख-दर्द को मिटाने में जब सभी प्रकार की औषधियाँ असफल हो जाती है, तो संगीत उपचार ही काम आता है पूर्व जर्मनी के “कार्लमारिया बोन बेवर संगीत कॉलेज” में एक विशेष प्रकार की विंग अलग खोली गई है, जिसमें बुखार तथा अन्यान्य प्रकार की पीड़ा जनक बीमारियों के इलाज के लिए संगीत का ही इस्तेमाल किया जाता है। वहाँ के हृदय क्लीनिक और दंत चिकित्सा केन्द्रों में संगीत की ध्वनियों का ही अब प्रयोग होने लगा है, क्योंकि इस चिकित्सा से दाँत उखाड़ने में जरा-सी भी तकलीफ रोगी को नहीं होती है। वहाँ एक प्रसूति विशेषज्ञ ने प्रसव पीड़ा से पीड़ित महिलाओं पर भी इस तरह के सफल प्रयोग कर दिखाये हैं, जिससे वहाँ के कई प्रसूतिगृहों में मोजार्ट द्वारा रचित भावनात्मक संगीत की धुनों को सुनाने का कार्य प्रारंभ किया गया है। डर,, तनाव, आतंक एवं मनः दौर्बल्य में तो संगीत को रामबाण औषधि माना जाता है।
पूर्वी जर्मनी के गीटिंग शहर के डा0 जौहान्स शूमिलिन ने संगीत उपचार द्वारा अनेक कष्ट साध्य रोगों से ग्रस्त मनुष्यों को ही नहीं, पशुओं को भी रुग्णता से छुटकारा दिलाया है। इस कार्य के लिए मिश्र के चिकित्सक दवा के अतिरिक्त संगीतमय मंत्रों का भी उच्चारण करते थे। अफ्रीका के आदिवासी आज भी मुख से विशेष प्रकार की सुरीली ध्वनि का उच्चारण करके अथवा उन्हीं के बनाये वाद्ययंत्र बजाकर रोगोपचार किया करते हैं। पाश्चात्य देशों में प्रायः सभी मानसिक रोगों के अस्पतालों में पागलों और सनकियों भ्रान्तिग्रस्त व्यक्तियों की चिकित्सा संगीत ध्वनियों से भाव विभोर कर की जाती है। इससे उनका उन्माद घटता है और मनःस्थिति में आशाजनक सुधार होता है। अमेरिका के डा.एस. जे. लोडन ने गायकों-वादकों एवं संगीत में रुचि लेने वालों का स्वास्थ्य-परीक्षण करने पर यह पाया कि वे दूसरों की अपेक्षा कहीं कम बीमार पड़ते हैं। न्यूयार्क के डा. एडवर्ड पोडोलाँस्की के अनुसार स्वास्थ्य-रक्षा की दृष्टि से संगीत एक बहुत मृदुल और सुन्दर व्यायाम है। उसका लाभ बाल-वृद्ध, दुर्बल, समर्थ सभी अपने अपने ढंग से प्राप्त कर सकते हैं इंग्लैंड की डा. मीड के अनुसार संगीत से नाड़ी संस्थान में एक विशेष प्रकार की उत्तेजना उत्पन्न होती है। तथा कुछ विशेष धुनों-प्रकम्पनों द्वारा पाचन संस्थान संबंधी शिथिलता दूर होती है। जापान के संगीतकार शिनीची सुजुकी का कहना है कि संगीत मनुष्य में भाव-संवेदना, अनुशासन, सहिष्णुता और कोमलता जगाता है। फ्रांसीसी प्राणिशास्त्री वास्तोव आन्द्रे के अनुसार संगीत प्रायः प्रत्येक जीवधारी के मस्तिष्क एवं नाड़ी संस्थान पर आश्चर्यजनक मर्मस्पर्शी प्रभाव डालता है।उनकी प्रकृति और मनःस्थिति के अनुरूप यदि संगीत बजे, तो उन्हें मानसिक प्रसन्नता और शारीरिक उत्साह प्राप्त होता है। इसी प्रकार अमेरिका के राल्फ लारेन्स और उनकी पत्नी जब आत्मविभोर होकर गाते तो हाथ-पैरों की जकड़न से रुग्ण एक महिला इतनी मुग्ध हो जाती कि अधिक व्यथित होने पर उनके गीत सुनकर ही इसे आराम मिल जाता था।
संगीत में शामक ही नहीं, उत्तेजक शक्ति भी है। युद्धों में तो सदा से ही इसके इस वरुप का उपयोग होता रहा है। भगवान कृष्ण ने शंख बजाकर महाभारत-युद्ध का उद्घोष किया था। बिगुल,नगाड़े, भेरी, मृदंग,बीन झाँझ जैसे वाद्यों के उपयोग का वर्णन युद्ध इतिहासों में मिलता है। वर्तमान समय में भी शत्रुपक्ष के सैनिकों में भयग्रस्तता उत्पन्न करने वाली ध्वनि लहरियाँ उत्पन्न की जाती हैं, जिससे प्रतिपक्षी को परास्त किया जा सके। युद्धबंदियों के बीच ऐसी ध्वनियाँ बजाई जाती हैं, जिससे वे भविष्य में युद्ध करने योग्य हीं न रहें और उनसे किसी पराक्रम की आशा न की जा सके। विज्ञान के विकास के साथ-साथ एक ध्वंसात्मक अभिशाप यह भी जन्मा है कि मस्तिष्कीय जनम देने वाली ध्वनि तरंगों, का प्रयोग अब विभिन्न राष्ट्र करने लगे हैं। रूप ने तो एक बार ध्वनियुद्ध का यह प्रयोग उत्तरी कनाडा के एक बहुत बड़े क्षेत्र पर कर भी डाला। परिणाम स्वरूप अगणित नागरिकों में अकारण बेचैनी, तनाव, चिड़चिड़ापन आतिद के चिन्ह विकसित होते देखे गये। आत्म-हत्या करने वालों की संख्या अचानक बढ़ गई। पता चला कि एक विशिष्ट फ्रीक्वेंसी पर उत्तरीध्रुव के एक द्वीप से सोवियत रूप द्वारा प्रसारित रेडियो तरंगों के कारण यह विनाशकारी स्थिति उत्पन्न हुई है। यह ध्वनि तरंगों का निषेधात्मक उपयोग है। वस्तुतः ध्वनि का उपयोग तो सृजनात्मक प्रयोजनों में मनःशक्ति संवर्धन, मनोविकारों से मुक्त करने में होना चाहिए।
जिस प्रकार रसों में हास्यरस, वीर, श्रृंगार, शान्त, रौद्र आदि नौ रसों को प्रमुखता मिली है, उसी प्रकार संगीत में भी इन्हीं के आधार पर नौ रस गायब विधा के अंतर्गत आते हैं। प्रत्येक के लिये विशेष राग रागनियों और विशेष समय पर ही बजाये जाने का विधान है। समय,राम और रस के सम्मिश्रण से एक विशेष प्रकार का ध्वनि-प्रवाह उत्पन्न होता है, जिससे मानसिक रोगों की चिकित्सा होती है।
संगीत के साथ जब नृत्य का समन्वय होता है, तो उससे कितने ही स्थूल-सूक्ष्म अंग अवयवों का व्यायाम होता है, जो जीवन में उल्लास भरी परिस्थितियां उत्पन्न करते हैं। इसी कारण गायक, वादक और नर्तक सामान्य रूप से स्वस्थ तो होते हीं हैं, प्रफुल्लित और स्फूर्तिवान भी देखे जाते हैं यह संगीत-नृत्य का प्रत्येक अनुदान है।
संगीत के ऐसे अय चिकित्सीय लाभों को उपलब्ध कराने के लिए वेल्स विश्वविद्यालय में विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संस्थान के डा. डायलान जोन्स को 31 हजार पौण्ड का सरकारी अनुदान मिला है, ताकि वह संगीत की रोगवारक क्षमता को जनसाधारण के समक्ष प्रस्तुत करने से प्रयोग-परीक्षण द्वारा भली-भाँति जाँच सकें। डा. जोन्स ने ध्वनि तरंगों के शरीर पर पड़ने वाले प्रभावों का बड़ी गहनता से अध्ययन किया है। उनके मतानुसार मन ही मन गुन गुनाने का भी उतना ही प्रभाव शरीर एवं मन पर पड़ता है, जितना कि उच्च स्वर से गाने का। वे प्रतिदिन प्रातः सायं की वेलो में मंद स्वर में गाने की महत्ता बताते हैं व कहते हैं कि इससे व्यक्ति सदैव निरोग बना रहता है। “सोहम्” जप व भजन की महत्ता इसीलिए बतायी गयी है।
केन्द्रीय इलैक्ट्रो रसायन अनुसंधान संस्थान कराईकुड़ी के वैज्ञानिक डा. पी.वी.माथुर के अनुसार संगीत के सातों स्वरों कीर संरचना काल्पनिक नहीं, एक गणितीय सिद्धान्त के आधार पर ही संभव हुई है। उनने संगीत की 22 श्रुतियों का भी रहस्योद्घाटन किया है। प्रत्येक राग में इनमें से 14 की उपस्थिति होना नितान्त आवश्यक है। संगीत के स्वरों में एक क्रमबद्धता और लयबद्धता है। उसी को सरगम के नाम से जाना जाता है। श्रुतियों का प्रमुख कार्य स्वरों में भावतरंगों उत्पन्न करने का होता है। प्रायः देखने में आता है कि भारतीय रागों में 13 स्वरों का ही प्रयोग होता चला आ रहा है और शेष स्वचर क्रम को किसी भी राग में नहीं जोड़ा जाता। यदि इस क्रम को भी मिला लिया जाय तो संगीत से भाव-संवेदनाओं का उभार कई गुना बढ़ सकता है और उसकी आरोग्य-वर्धिनी-शक्ति भी तदनुरूप बढ़ जाती है।
इसे दुर्भाग्य ही कहा जाना चाहिए कि आजकल संगीत मात्र नट विद्या गलेबाजी की कला मात्र बनकर रह गया है। भोग-विलास की तृप्ति के काम आने वाला एक नशा बन गया है। एक ऐसा नशा जो धुत्त थिति में व्यक्ति को पतन-पराभव की ओर ले जाता है। स्वर-साधना को पहले कला के अंतर्गत रा गया था, पर आज ऐसील बात नहीं रही। वह अब गायकी बन गई है। कुत्साओं के उभार के लिए उसका प्रस्तुत किया जाना जनजीवन को मात्र विषपान ही कराता है।
जिस प्रकार हर वस्तु के भला और बुरा, अच्छा और खराब दो पक्ष होते हैं, उसी प्रकार संगीत के भी दो पहलू हैं। पिछले दिनों उसके बुरे स्वरूप को ही उभारा गया था, जिसके कारण उसकी क्षमताएँ कुँठित हुई और वह बदनाम हो गया। अगला समय भावप्रधान आने वाला है, जिसमें संगीत की अहम् भूमिका होगी। भाव-चेतना को झकझोरने और जगाने के लिए उसे एक महत्वपूर्ण उपचार के रूप में अपनाया जायेगा। इसके लिए आवश्यक है कि उसके स्वस्थ स्वरूप को उभारा जाय, तभी वह अपनी रोगनिवारक क्षमता का सही सही परिचय दे सकता है और नादयोग के रूप में शिवत्व प्राप्ति का पाथेय बन सकता है। शास्त्रों में उसकी इसी क्षमता विशेषता के कारण इसका इतना गुणगान किया गया है। इसके इसी स्वरूप की प्रतिष्ठा की आज महती आवश्यकता है। इस क्षेत्र में और भी गहन अनुसंधान कर उन निष्कर्षों से जन−जन को लाभान्वित किया जा सकता है।
राजा चित्रकेतु का इकलौता बेटा मर गया। वह सुन्दर भी था और सद्गुणी भी। अभिभावक ही नहीं दूसरे भी उसे असीम प्यार करते थे। मरने पर सभी शोकाकुल भी थे। राजा इस शोक से विह्वल होकर मरणासन्न होता जाता था।
महर्षि धौम्य उधर से निकले। वे अपने समय के परम तपस्वी भी थे। शोक समाचार सुनकर साँत्वना देने राजमहल पहुँचे। उस परिवार से उनकी घनिष्टता भी थी। शोकातुर परिवार ने महर्षि से प्रार्थना की कि यदि मृतक जीवित नहीं हो सकता तो उसकी आत्मा को बुला कर एक बार दर्शन तो करा दिया जाय। महर्षि ने कहा मैं बालक को जानता नहीं। राजा का सूक्ष्म शरीर साथ लेकर स्वर्ग जा सकता हूँ। वहाँ वे अपना पुत्र पहचान लें। यदि वह आने को रजामंद हो तो उसकी आत्मा को साथ लेते आवें। चित्रकेतु प्रसन्न हुए और महर्षि के साथ मृत्युलोक के लिए चल पड़े।
चित्रकेतु ने पुत्र की आत्मा पहचान ली। उससे लिपट कर रोये भी। पर बालक की आत्मा असमंजस में पड़ गई। उसने कहा-मुझे यहाँ आकर सौ जन्मों की स्मृति जाग पड़ी है। सौ पिता और सौ माता मुझे स्मरण आते है आप कौन-से जन्म के मेरे पिता है और आपका नाम क्या है और निवास कहाँ है?
राजा गंभीर हो गये। उनने समझ लिया कि जीवित रहने तक के ही नाते रिश्ते है इसके बाद तो आत्मा एकाकी एवं सर्वत्र बन जाती है।
चित्रकेतु ने पुत्र की आत्मा से आग्रह करना उचित न समझा और शोकमुक्त होकर वापस लौट आये। उनने राजमहल में सब लोगों को वह विवरण सुनाया और उन्हें भी बीते को विसार देने की शिक्षा दी।
दाँत चाहे कितने ही टूटे, टेड़े क्यों न हों पर जब वे मुस्कान के कारण अपनी स्वच्छता, चमक को होठों का पर्दा उठा कर तनिक सी झाँकी देने लगते हैं तो उनकी स्थिति खिले फूल जैसी हो जाती है फूल जब कली की स्थिति में होता है या मुरझा जाता है तो दोनों ही परिस्थितियों में वे अनाकर्षण लगते हैं पर जब खिली हुई नवयौवना जैसी स्थिति होती है तो सुन्दरता की आभा निखरने लगती है। ऐसे लोगों के संपर्क में आने के लिए, मित्र भाव बनाने के लिए हर किसी का मन चलता है। दर्पण के सहारे इस अभ्यास को कोई भी करता और सफलता की दिशा में चलता रह सकता है।
होठों के उपरान्त सौंदर्य का दूसरा केन्द्र है-आँखें। आँखों में सुरमा काजल आँजने की आवश्यकता नहीं है। वे जैसी भी कुछ अपनी बनावट के अनुसार हैं, अपनी जगह ठीक हैं। पर उनकी विशेषता यह है कि जिसकी ओ निहारती हैं, उसके साथ अपने संबंधों को प्रकट करती हैं। बच्चों के प्रति वे वात्सल्य प्रकट करती हैं, मित्रों के मिलने पर प्रसन्नता, बड़ों के प्रति सम्मान की अभिव्यक्ति मात्र इतने से ही प्रकट हो जाती है कि दोनों आँख खोलकर एक दूसरे को देख भर लें। मित्रता का आत्मीयता का परिचय सहज ही मिल जाता है। मैत्री का आकर्षण, आमंत्रण एवं उभार प्रकट करने में आँखें अपनी महती भूमिका निभाती हैं। उपेक्षा, अवज्ञा एवं शत्रुता का भी इसी माध्यम से प्रकटीकरण होता रहता है। आँखें, मस्तिष्क और भाव संस्थान की खुली खिड़की है जिनमें होकर किसी के अन्तराल को समझने के लिए गहराई तक प्रवेश किया जा सकता है।
आत्मीयता की, मित्रता की दृष्टि से संपर्क में आने वाले लोगों को देखना आरंभ किया जाय-अपनी नम्रता और दूसरे के प्रति सम्मान का भाव प्रदर्शित किया जाय तो विरानों को भी अपना बनाया जा सकता है।
अपरिचितों को परिचितों की श्रेणी तक ले जाय जा सकता है। परिचित अधिक घनिष्ट एवं आत्मीय बन सकते हैं।
यों समूचे चेहरे पर मँडराती रहने वाली अनेकानेक भावभंगिमाएँ मनुष्य का भीतरी अभिप्राय प्रकट करती रहती हैं। तो भी होंठ और नेत्र यह दोनों ही माध्यम जितनी अच्छी तरह इस उद्देश्य की पूर्ति करते हैं, उतने दूसरे अवयव नहीं। सद्भावना, प्रसन्नता के प्रकटीकरण का अभ्यास निरन्तर करते रहा जाय तो वे दोनों ही अपना प्रयोजन साधनों में प्रवीण बन जाते हैं। सुन्दरता में चार चाँद लगा देते हैं।
स्वच्छता सर्वांगीण सौंदर्य का प्रत्यक्ष प्रतीत है। भड़कीले आवरण धारण करने की अपेक्षा सादगी और स्वच्छता का परिचय देते रहने से न केवल सुन्दरता बढ़ती है, वरन् उससे शालीनता सुसंस्कारिता का भी परिचय मिलता है।
मधुर भाषण अपने आप में अनोखी कला है जो न केवल दूसरों का ध्यान आकर्षित करती है वरन् उनका मन भी मोहती है। मनों में अपने लिए जगह बनाती है। मधुर भाषण के कुछ थोड़े से ही आधार हैं जिन्हें समझा और स्वभाव में उतारा जा सके तो दूसरों पर अपनी गरिमा की छाप छोड़ी जा सकती है। इनमें से एक है विनयशीलता दूसरी है दूसरों के सद्गुणों की सतकृत्यों की मुक्त-कंठ से प्रशंसा। इसमें कृपणता बरतने पर यह प्रकट नहीं होता कि आगन्तुक के प्रति मन में समुचित सद्भाव है। मिलन संभाषण में बरते जाने वाले शिष्टाचार को, बड़े लोगों के पारस्परिक व्यवहार को देखकर सीखा, समझा और अपनाया जा सकता है। व्यवहार कुशलताओं में सबसे बढ़कर है-”शिष्टाचार का निर्वाह” जो उसमें प्रवीणता प्राप्त कर लेते हैं वे कुरूप होते हुए भी सुन्दर लगते हैं।
सुदामा सौराष्ट्र में एक महत्वपूर्ण गुरुकुल चलाते थे। उनके आश्रम में दूर दूर से बड़ी संख्या में छात्र पढ़ने आते थे। प्राचीन परम्परा के अनुरूप छात्रों के निर्वाह तथा निवास आदि का प्रबंध गुरुकुल संचालक को ही करना पड़ता था।
उन दिनों छात्रों की संख्या बढ़ गई। समीपवर्ती क्षेत्र में दुर्भिक्ष पड़ा। दान मिलना कठिन हो गया। गुरुकुल को बन्द करने जैसी स्थिति सामने आ गई यदि ऐसा करना पड़ता तो उस टकसाल में नर रत्न ढलने का जो कार्य सफलतापूर्वक चलता था वह बन्द हो जाता। स्थिति विषय थी। सोचते सोचते यह सूझा कि द्वारका श्री कृष्ण के पास जाया जाय। वे सम्पन्न भी थे और गुरुकुल में सुदामा जी से परिचित भी।
सुदामा जी द्वारका पहुँचे। भगवान ने उनका भावभरा सत्कार किया। उनके आगमन का अभिप्राय समझा। इससे बड़ा सौभाग्य और कोई हो नहीं सकता था कि सम्पदा का श्रेष्ठ कार्य में सदुपयोग करके धन्य बना जाय। श्री कृष्ण ने अपने निर्वाह की थोड़ी सी सम्पदा पास रख कर शेष समस्त सम्पदा द्वारिकापुरी में सुदामा गुरुकुल को स्थानान्तर करा दी। दाता और गृहीता दोनों ही धन्य हो गये।
मोटर के पहियों में भरी हवा धीरे धीरे कम होने लगती है। उसमें थोड़े समय के बाद नई हवा भरनी पड़ती है। रेल में कोयला पानी चुकता है तो दुबारा भरना पड़ता है। पेट खाली होता है तो नई खुराक लेनी पड़ती है। जीवन का एक-सा ढर्रा नीरस बन जाता है, तब उसमें नई स्फूर्ति संचारित करने के लिए नया प्रयास करना पड़ता है। पर्व त्यौहार इसीलिए बने हैं कि एक नया उत्साह उभरे और उस आधार पर मिली स्फूर्ति से आगे का क्रिया-कलाप अधिक अच्छी तरह चले। रविवार की छुट्टी मनाने के पीछे भी नई ताजगी प्राप्त करना और अगले सप्ताह काम आने के लिए नई शक्ति अर्जित करना है। संस्थाओं के विशेष समारोह भी इसी दृष्टि से किये जाते हैं कि उस परिकर में आयी सुस्ती का निराकरण किया जा सके। प्रकृति भी ऐसा ही करती रहती है। घनघोर पुरुषार्थ की कमाई इन दो आरम्भों को भी मनुष्य सदा स्मरण रखता है। उनमें उत्साह-वर्धक नवीनता है।
जीवन साधना के दो विशेष पर्व हैं-एक साप्ताहिक, दूसरा अर्द्ध-वार्षिक। साप्ताहिक आमतौर से लोग रविवार, गुरुवार को रखते हैं। पर परिस्थितियों के कारण यदि कोई अन्य दिन सुविधाजनक पड़ता है तो उसे भी अपनाया जा सकता है। अर्द्धवार्षिक में आश्विन और चैत्र की दो नवरात्रियाँ आती हैं। इनमें साधना नौ दिन की करनी पड़ती है। इन दो पर्वों की विशेष उपासना को भी अपने निर्धारण में सम्मिलित रखने से बीच में जो अनुत्साह की गिरावट आने लगती है, उसका निराकरण होता रहता है। इनके आधार पर जो विशेष शक्ति उपार्जित होती है उससे शिथिलता आने का अवसाद निबटता रहता है।
साप्ताहिक विशेष साधना में चार विशेष नियम विधान अपनाने पड़ते हैं। यह हैं (1)उपवास (2) ब्रह्मचर्य (3) प्राणसंचय (4) मौन। इनमें से कुछ ऐसे हैं जिनके लिए मात्र संयम ही अपनाना पड़ता है। दो के लिए कुछ कृत्य विशेष करने पड़ते हैं। जिव्हा और जननेन्द्रिय यही दो दसों इंद्रियों में प्रबल हैं। इन्हें साधने से इन्द्रियसंयम सध जाता है। यह प्रथम चरण पूरा हुआ तो समझना चाहिए कि अगले चरण मनोनिग्रह में कुछ विशेष कठिनाई न रह जायगी।
जिव्हा का असंयम अतिमात्रा में अभक्ष्य भक्षण के लिए उकसाता है। कटु असत्य, अनर्गल और असत्-भाषण भी उसी के द्वारा बन पड़ता है। इसलिए एक ही जिव्हा को रसना और वाणी इन दो इन्द्रियों के नाम से जाना जाता है। जिव्हा की साधना के लिए अस्वाद का व्रत लेना पड़ता है। नमक, मसाले, शक्कर, खटाई आदि के स्वाद जिव्हा को चटोरा बनाते हैं। तल-भुने तेज मसाले वाले, मीठे पदार्थों में जो चित्र-विचित्र स्वाद मिलते हैं उनके लिए जीभ ललचाती रहती है। इस आधार पर अभक्ष्य ही रुचिकर लगता है। ललक में अधिक मात्रा उदरस्थ कर ली जाती है, फलतः पेट खराब रहने लगता है। सड़न से रक्त विषैला होता है और दूषित रक्त अनेकानेक बीमारियों का निमित्त कारण बनता है। इस प्रकार जिव्हा की विकृतियाँ जहाँ सुनने वालों को पतन के-विक्षोभ के गर्त में धकेलती हैं, वहाँ अपनी स्वार्थता पर भी कुठाराघात करती हैं। इन दोनों विपत्तियों से बचाने में जिव्हा का संयम एक तप साधना का प्रयोजन पूरा करता है। नित्य न बन पड़े तो सप्ताह में एक दिन तो जिव्हा को विश्राम देना ही चाहिए, ताकि वह अपने उपरोक्त दुर्गुणों से उबरने का प्रयत्न कर सके।
उपवास पेट का साप्ताहिक विश्राम है। इससे छः दिन की विसंगतियों का संतुलन बन जाता है और आगे के लिए सही मार्ग अपनाने का अवसर मिलता है। जल लेकर उपवास न पड़े तो शाकों का रस या फलों का रस लिया जा सकता है। दूध, छाछ पर भी रहा जा सकता है। इतना भी न बन पड़े तो एक समय का निराहार तो करना चाहिए। मौन पूरे दिन का न सही किसी उचित समय दो घण्टे का तो कर ही लेना चाहिए। इस चिन्ह पूजा से भी दोनों प्रयोजनों का उद्देश्य स्मरण बना रहता है और भविष्य में नि मर्यादाओं का पालन किया जाता है उस पर ध्यान केन्द्रित बना रहता है। साप्ताहिक विशेष साधना में जिव्हा पर नियन्त्रण स्थापित करना प्रथम चरण है।
द्वितीय आधार है-ब्रह्मचर्य। नियत दिन शारीरिक ब्रह्मचर्य तो पालन करना ही चाहिए। यौनाचार से तो दूर ही रहना चाहिए, साथ ही मानसिक ब्रह्मचर्य अपनाने के लिए यह आवश्यक है कि कुदृष्टि का, अश्लील कल्पनाओं का निराकरण किया जाय। नर नारी को देवी के रूप में और नारी नर को देवता के रूप में देखे तथा श्रद्धा भरे भाव मन पर जमायें। भाई-बहिन, पिता-पुत्री, संतान की दृष्टि से ही दोनों पक्ष एक दूसरे के लिए पवित्र भावनायें उगायें। यहाँ तक कि पति-पत्नी भी एक दूसरे के प्रति अधाँग की उच्चस्तरीय आत्मीयता सँजोयें। अश्लीलता को अनाचार का एक अंग मानें और उस प्रकार के दुश्चिन्तन को पास न फटकने दें। सम्पूर्ण ब्रह्मचर्य तभी सधता है जब शरीर संयम के साथ-साथ मानसिक श्रद्धा का भी समन्वय रखा जाय। इससे मनोबल बढ़ता है और कामुकता के साथ जुड़ने वाली अनेकानेक दुर्भावनाओं से सहज छुटकारा मिलता है। सप्ताह में हर दिन इस लक्ष्य पर भावनायें केन्द्रित रखी जायँ तो उसका प्रभाव भी अगले छः दिनों तक बना रहेगा।
तीसरा साप्ताहिक अभ्यास है- प्राणसंचय। एकान्त में नेत्र बंद करके अन्तर्मुखी होना चाहिए और ध्यान करना चाहिए कि समस्त विश्व में प्रचंड प्राणचेतना भरी हुई है। आमंत्रित आकर्षित करने पर वह किसी को भी प्रचुर परिमाण में कभी भी उपलब्ध हो सकती है। इसकी विधि प्राणायाम है। प्राणायाम के अनेक विधि-विधान हैं। पर उनमें से सर्वसुलभ यह है कि मेरुदंड को सीधा रखकर बैठा जाय। आंखें बंद रहें। दोनों हाथ दोनों घुटनों पर। शरीर को स्थिर और मन को शान्त रखा जाय।
साँस खींचते समय भावना की जाय कि विश्वव्यापी प्राण चेतना खिंचती हुई नासिका मार्ग से सम्पूर्ण शरीर में प्रवेश कर रही है। उसे जीवकोष पूरी तरह अपने में धारण कर रहे हैं। प्राण प्रखरता से अपना शरीर, मन और अन्तःकरण ओत-प्रोत हो रहा है। साँस खींचने के समय इन्हीं भावनाओं को परिपक्व करते रहा जाय। साँस छोड़ते समय यह विचार किया जाय कि शारीरिक और मानसिक क्षेत्रों में घुसे हुए विकार सांस के साथ बाहर निकल रहे हैं और उनके वापस लौटने का द्वार बन्द हो रहा है। इस बहिष्करण के साथ अनुभव होना चाहिए कि भरे हुए अवाँछनीय तत्व हट रहे हैं और समूचा व्यक्तित्व हल्कापन अनुभव कर रहा है। प्रखरता और प्रामाणिकता की स्थिति बन रही है।
चौथा साप्ताहिक अभ्यास-मौन वाणी की साधना है। मौन दा घंटे से कम का नहीं होना चाहिए। मौन काल में प्राणसंचय की साधना साथ-साथ चलती रह सकती है। इस निर्धारित कृत्य के अतिरिक्त दैनिक साधना, स्वाध्याय, संयम, सेवा के चारों उपक्रमों में से जो जितना बन सके उसके लिए उतना करने का प्रयास करना चाहिए। सेवा कार्या के लिए प्रत्यक्ष अवसर सामने ने हो तो इसके बदले आर्थिक अंशदान की दैनिक प्रतिज्ञा के अतिरिक्त कुछ अधिक अनुदान बढ़ाने का प्रयत्न करना चाहिए। यह राशि सद्ज्ञान संवर्धन के-ज्ञानयज्ञ के निमित्त लगनी चाहिए। पीड़ितों की सहायता के लिए हर अवसर पर कुछ न कुछ करते रहना सामान्य क्रम में भी सम्मिलित रखना चाहिए।
जापान के सेनापति नावुनाना को एक भयंकर लड़ाई लड़नी पड़ रही थी। शत्रु का मोर्चा प्रबल था। जापानी सेनापति के पास थोड़े सैनिक रह गये थे। उनका भी मनोबल टूट रहा था। सेनापति को आधे बचे सैनिकों में नया साहस और विश्वास भरने की आवश्यकता अनुभव हो रही थी। इस आवश्यकता की पूर्ति के लिए उसने एक चतुराई बरती। एह कुछ प्रमुख सैनिकों समेत देवता के मंदिर में गया और जीतने के लिए सिक्के उछालने का उपाय निकाला। चित्त गिरे तो जीत और पट्ट गिरे तो हार।
चतुर सेनापति ने ऐसे सिक्के बनवा रखे थे जो दोनों ही ओर से चित्त थे। वे उछाले गये तीनों ही बार वे चित्त गिरे उपस्थित सैनिकों का मनोबल चौगुना हो गया। जब देवता हमारे साथ है और उसकी शक्ति हमारी विजय में साथ देगी तो जीत होकर ही रहेगी। समाचार पूरी टुकड़ी में पहुँचा दिया गया। जो सैनिक बचे खुचे थे, वे इतने उत्साह और कौशल के साथ लड़े कि अन्ततः विजय उन्हीं की हुई।
मनोबल और विश्वास की शक्ति का सभी ने अनुभव किया।
ज्ञानयज्ञ तो उच्चस्तरीय ब्रह्मयज्ञ है, जिसके साथ प्राणिमात्र का कल्याण जुड़ा हुआ है। साप्ताहिक साधना का दिन ऐसे ही श्रेष्ठ सत्कर्मों में लगाना चाहिए।
अर्धवार्षिक साधनाएँ आश्विन और चैत्र के नवरात्रियों में नौ-नौ दिन के लिए की जाती हैं। इन दिनों गायत्री मंत्र के 24 हजार जप की परम्परा पुरातन काल से चली आती है। उसका निर्वाह सभी आस्थावान साधकों को करना चाहिए। बिना जाति या लिंग भेद के इसे कोई भी अध्यात्म प्रेमी निःसंकोच कर सकता है। कुछ कमी रह जाने पर भी इस सात्विक साधना में किसी प्रकार के अनिष्ट की आशंका नहीं करना चाहिए। नौ दिनों में प्रतिदिन 27 माला गायत्री मंत्र के जप कर लेने से 24 हजार की निर्धारित जप संख्या पूरी हो जाती है। अन्तिम दिन कम से कम .... आहुतियों का अग्निहोत्र करना चाहिए। अन्तिम .... अवकाश न हो तो हवन किसी अगले दिन किया जा सकता है।
अनुष्ठानों में कुछ नियमों का पालन करना पड़ता है-(1) उपवास अधिक न बन पड़े तो एक समय का भोजन या अस्वाद व्रत का निर्वाह तो करना ही चाहिए। (2) ब्रह्मचर्य पालन-यौनाचार एवं अश्लील चिन्तन का नियमन। (3) अपनी शारीरिक सेवाएँ यथा संभव स्वयं की करना। (4) हिंसायुक्त चमड़े के उपकरणों का प्रयोग न करना। पलंग की अपेक्षा तख्त या जमीन पर सोना। इन सब नियमों का उद्देश्य यह है कि नौदिन तक विलासी या अस्त-व्यस्त निरंकुश जीवन न जिया जाय। उसमें तप, संयम की विधि-व्यवस्था का अधिकाधिक समावेश किया जाय। नौ दिन का अभ्यास अगले छः महीने तक अपने ऊपर छाया रहे और ध्यान बना रहे कि संयमशील जीवन ही आत्मकल्याण तथा लोक-मंगल की दुहरी भूमिका सम्पन्न करता है। इसलिए जीवनचर्या को इसी दिशाधारा के साथ जोड़ना चाहिए। अनुष्ठान के अंत में पूर्णाहुति के रूप में प्राचीन परम्परा ब्रह्मभोज की है। उपयुक्त ब्राह्मण न प्राचीन परम्परा ब्रह्मभोज की है। उपयुक्त ब्राह्मण न मिल सकने के कारण इन दिनों वह कृत्य नौ कन्याओं को भोजन करा देने के रूप में भी पूरा किया जाता है। कन्याएँ किसी भी वर्ण की हो सकती है इस प्रावधान में नारी को देवी स्वरूप में मान्यता देने की भावना सन्निहित है। कन्याएँ तो ब्रह्मचारिणी होने के कारण और भी अधिक पवित्र मानी जाती है।
ब्रह्मभोज का दूसरा प्रचलित रूप प्रसाद वितरण भी है। यों प्रसाद में कोई मीठी वस्तु थोड़ी-थोड़ी मात्रा में बाँटने का भी नियम है। इसमें अधिक लोगों तक अपने अनुदान का लाभ पहुँचना उद्देश्य है, भले ही वह थोड़ी-थोड़ी मात्रा में ही क्यों न हो? एक का पेटभर देने की अपेक्षा सौ का मुँह मीठा कर देना इसलिए अच्छा माना जाता है कि इसमें देने वाले तथा लेने वालों को उस धर्म प्रयोजन के विस्तार की महिमा समझने और व्यापक बनाने की आवश्यकता का अनुभव होता है।
यह कार्य मिष्ठान्न वितरण की अपेक्षा सस्ता युग साहित्य वितरण करने के रूप में अभीष्ट उद्देश्य की पूर्ति कर सकता है। “युग निर्माण सत्संकल्प” एवं ऐसी ही अन्य छोटी पुस्तिकाएँ भी युग निर्माण योजना द्वारा प्रकाशित हुई है उन्हें बाँटा या लागत से कम मूल्य में बेचने का प्रयोग किया जा सकता है। नवरात्रि अनुष्ठानों में यह ब्रह्मभोज के सत्साहित्य के रूप में प्रसाद वितरण की प्रक्रिया भी जूड़ी रहनी चाहिए।
स्थानीय साधक मिल-जुलकर एक स्थान पर नौ दिन की साधना करें। अन्त में सामूहिक यज्ञ करें सहभोज का प्रबन्ध रखें, साथ ही कथा-प्रवचन, कीर्तन, उद्बोधन का क्रम बनाये रह सकें तो उस सामूहिक आयोजन से सोने में सुगंध जैसा उपक्रम बन पड़ता है। यह प्रकारान्तर से समष्टिगत सूक्ष्म जगत के उपचार की प्रक्रिया है। नवरात्रि के दिनों तो इनका विशेष महत्व ही है।
मथुरा जिले की एक लड़की बचपन में ही विधवा हो गई। माता-पिता ने दूसरा शादी का प्रयत्न किया पर उनसे स्पष्ट इनकार कर दिया। घर में अकेली होने के कारण बाद में उसका भरण पोषण कौन करेगा? इस प्रश्न के उत्तर में उसने अपने दोनों हाथ ऊंचे करके दिखाये और कहा-कोई नहीं है तो क्या हुआ यह मेरे दोनों हाथ दो भाइयों की तरह मेरी रक्षा भी करेंगे और पेट भी भरेंगे।
उसने चक्की पीसने का धंधा अपनाया। पिसाई मिल जाती थी। गुजर होने लगी। उस कार्य में से वह दो पैसे नित्य धर्म कार्य के लिए अलग से बचा कर रखती।
जब वह लड़की बूढ़ी हुई तो गाँव के प्रमुख लोगों को बुलाया। पैसों से भरा हुआ घड़ा दिखाया और कहा आप लोग प्रयत्न करके किसी उपयुक्त जगह पर इसका एक पक्का कुआँ बनवा दें।
सड़क किनारे कुआं बनवाया गया। उसका पानी बहुत ठंडा और मीठी निकला। जबकि उस इलाके का पानी खारापन लिए हुए था। दूर-दूर से लोग उस पानी को पीने आते। छोटी-मोटी बीमारियाँ इस पानी से ही अच्छी हो जाती। उस कुंए का नाम पिसनहारी का कुआं प्रख्यात हो गया।
समीप के खेतों में किसानों ने आम के बगीचे लगा दिये। उधर से निकलने वाले यात्रियों के लिए विश्राम करने की और भी आकर्षक जगह बन गई। अभी भी कुंए पर मेला सा लगा रहता है। रुकने वाले पिसनहारी के .... की भूरि-भूरि प्रशंसा भी करते है।
पेरिस के एक सभाभवन में प्रति रविवार को 10 बजे एक गोष्ठी आयोजित होती है। जिसमें वहाँ के वैज्ञानिक हँसी पर भाषण देते है। चुटकुले सुनाये जाते है। अंत में सभी कक्षों में प्रकाश मंद कर दिया जाता है और लोगों के कह-कहे गूँजने लगते है। मन के सुखद भावों को बाहर लाने के लिए हँसी सर्वोत्तम उपाय है। जो स्वयं को ही प्रसन्न नहीं करती वरन् आसपास के लोगों और मित्रों को भी प्रफुल्लित कर देती है। हास्य शरीर की स्वाभाविक तथा आवश्यक क्रिया है जो दैनन्दिन जीवन में आने वाले व्यतिक्रमों का कुप्रभाव नष्ट करती है।
जब किसी के व्यवहार से दुःख पहुँचता है, कोई नैराश्यपूर्ण स्थिति आ जाती है और संयोग से उसी समय हँसी आ जाय तो सारा क्रोध और चिन्ता दूर होकर मन झूम उठता है। यह प्रत्यक्ष अनुभूत किया जा सकता है। मुस्कान और हँसी के द्वारा अंतर्जगत में एक ऐसा स्निग्ध वातावरण बनता है जो अंदर ही अंदर से हृदय को शीतलता प्रदान करता है।
इस शुभ प्रभाव का कारण हँसी की मनोवैज्ञानिक प्रतिक्रिया है। व्यथा, क्रोध, चिड़चिड़ापन थके हुए मन में ही ज्यादा उत्पन्न होते है। जबकि हास्य मन के सारे तनावों और ग्रंथियों को दूर कर देता है, खोल देता है। एक फ्रांसीसी मनोविज्ञ रोग चिकित्सक डा पौस्किड ने लम्बे समय तक इस विषय में अन्वेषण किया। लगभग 180 प्रयोगों के द्वारा वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि हँसने से मनुष्य के मन और मज्जा तंतुओं को स्फूर्ति और सजीवता प्राप्त होती है तथा थकान और चिन्ता का भार कम हो जाता है। हँसी एक ऐसा मनोवैज्ञानिक व्यायाम जो मन को ही नहीं शरीर के अवयवों तथा माँसपेशियों को भी अनावश्यक दबाव से मुक्त कर देता है।
हँसी के बारे में सर्व सम्मत सिद्धान्त है कि इससे खून बढ़ता है। यह केवल कल्पना मात्र ही नहीं है। अमेरिका के डॉक्टरों ने इस सिद्धान्त की सच्चाई को परखने के लिये बालकों के दो समूह लिए और दोनों को अलग-अलग रखा। एक समूह को दोपहर के भोजन के बाद एक मसखरा तरह-तरह से हँसाता रहता। दूसरे समूह के लिए कोई व्यवस्था नहीं की गयी। एक मास बाद दोनों समूह के बच्चों का परीक्षण किया गया तो पता चला कि हँसने वाले बच्चों का स्वास्थ्य पहले की अपेक्षा और अच्छा हो गया है। वे पढ़ने लिखने में भी तेज हो गये है।
परन्तु यह सब होता तब है जब दिल खोल कर हँसा जाय। बहुत से अवसरों पर हम औपचारिक रूप से ही हँस पाते है। वह भी अपने साथी मित्रों का मन रखने के लिए। ऐसी पौन इंच की मुस्कान का कोई परिणाम नहीं होता है। बनावटी और लगती है।
मुस्कान भी हँसी का ही एक स्वरूप है। यह सदा बनी रहने वाली स्थिति है। चौबीसों घंटे खिलखिलाते रहना असंभव हो सकता है। दर्पण में खिला हुआ मुखकमल देखकर मन आह्लादित हो उठता है। मुस्कराते हुए व्यक्तियों के समीप क्रोध, ईर्ष्या और प्रतिहिंसा फटकती तक नहीं। प्रतिहिंसा की अग्नि को शान्त करने वाली यह अचूक औषधि है।
कभी-कभी घर में पति-पत्नी के बीच कलह होता है, या कोई मित्र रूठ जाता है तो मुस्कराने का नुस्खा आजमाकर इस दुःस्थिति को आसानी से सम्हाला जा सकता है। मन पर जमा हुआ सारा मैल मुस्कान के प्रवाह में बह जाता है।
मनोवैज्ञानिकों का मत है कि मुस्कान के द्वारा मन को एक स्वस्थ संकेत मिलता है, जैव-विद्युत पर प्रभाव पड़ता है। इसका दूसरा अर्थ यह निकलता है कि हमारा मन मधुर कल्पनाओं, सद्भावनाओं तथा पवित्र विचारों से ओत-प्रोत है मानसिक स्वास्थ्य का प्रभाव शरीर, आयु और इंगित करते हुए श्रीमती एलिजाबेथ सैफोर्ड ने लिखा है कि “सौ वर्ष जीने के लिए चारों ओर से जवान और हंसमुख मित्रों से घिरे रहो”।
प्रसन्नता उनके साथ रहेगी जो अन्तरात्मा के अनुकूल ही काम का चयन करते और उसमें पूरा मन से संलग्न होते है।
अन्न को ब्रह्म कहा गया है। काया का समूचा ढ़ाँचा प्रकारान्तर से खाद्य की ही परिणति है। व्यक्ति का गुण, कर्म स्वभाव का मूलभूत ढ़ाँचा आहार के आधार पर ही बनता है। शिक्षा आदि से तो उस ढांचे को सँभाला सँजोया भर जाता है। यही कारण है कि अध्यात्म विज्ञान में आहार की उत्कृष्टता को अन्तःकरण, विचारतंत्र एवं कायकलेवर की पवित्रता प्रखरता का सर्वोपरि माध्यम माना गया है। आहार की शुद्धता पर ही मन का स्तर एवं उसकी शुद्धता निर्भर है। खान-पान जितना सात्विक होगा, मन उसी अनुपात से निर्मल बनता चला जायगा।
“जैसा खाये अन्न वैसा बने मन” वाली उक्ति अक्षरशः सत्य है। तामसिक और राजसिक भोजन करने से न केवल शारीरिक स्वास्थ्य की जड़ खोखली होती है वरन् उनका प्रभाव मानसिक स्तर पर भी पड़ता है। आहार के अनुरूप ही मानसिक स्थिति में तमोगुण छाया रहता है। कुविचार उठते हैं। उत्तेजनायें छाई रहती हैं। चिन्ता, उद्विग्नता और आवेश का दौर चढ़ा रहता है। ऐसी स्थिति में न तो एकाग्रता सधती है और न ध्यान धारणा बन पड़ती है। मन की चंचलता ही इन्द्रियों को चंचल बनाये रखती है। शरीर भी उसी के इशारे पर चलता है। इस विघ्न को जड़ से काटने के लिए अध्यात्म पथ के पथिक सर्व प्रथम आहार की सात्विकता पर ध्यान देते है।
मन की ग्यारहवीं इन्द्रिय कहा गया है। वह भी शरीर का ही एक भाग है। अन्न से रस, रस से रक्त, रक्त से माँस, माँस से अस्थि और मज्जा, मेद वीर्य आदि बनते - बनते अन्त में मन बनता है इसमें चेतना का समावेश तो है पर मस्तिष्क संस्थान वस्तुतः अन्न शरीर का ही एक भाग है। इसलिए स्वाभाविक है कि जैसा स्तर आहार का होगा वैसा ही मन बनेगा। शरीर शास्त्री और मनोवैज्ञानिक भी इस सम्बन्ध में प्रायः एक मत हैं कि आहार से मन का स्तर बनता है। प्रकृति की कैसी विचित्रता है कि जहाँ मन की प्रेरणा से शरीर को चित्र विचित्र काम करने पड़ते हैं वहाँ यह भी एक रहस्य है कि मन का स्तर शरीर द्वारा बनता है। वह शरीर जो आहार का अन्न का उत्पादन है जिसके आधार पर वह बनता बढ़ता, परिपुष्ट बनता और उसी का पाचन समाप्त होने पर अथवा उसमें विषाक्तता रहने पर वह मर भी जाता है। शरीर जहाँ मन को अनुचर है वहाँ उसकी स्थिति को बनाने में प्रमुख भूमिका भी निभाता है। इस उलझन को देखते हुए यह नहीं कहा जा सकता कि शरीर प्रधान है या मन। गुत्थी इस तरह सुलझती है कि दोनों का सृजेता अन्न है। इसीलिए शरीर और मन-दोनों का सूत्र संचालन मन को कहा जाय तो कुछ अत्युक्ति न होगी।
प्रत्येक जीवन का आधार आहार को ही माना गया है। इसके आधार पर ही शरीर बनता और बढ़ता है। इसकी शुद्धता क्यों आवश्यक है, इस सम्बन्ध में शास्त्रकार कहते हैं - “अन्नमयं हि सोम्य मनः” अर्थात् “हे सोम्य! यह मन अन्नमय है” इसे अधिक स्पष्ट करते हुए छान्दोग्य उपनिषद् के छटे अध्याय के पाँचवें खंड में उद्दालक ऋषि ने कहा हैं - “ जो अन्न खाया जाता है, वह तीन भागों में विभक्त हो जाता है। स्थूल अंश मल, मध्यम अंश रस-रक्त माँस तथा सूक्ष्म अंश मन बन जाता है। अगले खण्ड में कहा है-”हे सोम्य! मन्थन करने से जिस प्रकार दही का सूक्ष्म भाग इकट्ठा होकर ऊपर का चला जाता है और घी बनता है, ठीक इस प्रकार निश्चित रूप से भक्षण किए अन्न का जो सूक्ष्म भाग है वह ऊपर जाकर मन बनाता है। इसी तरह पिये हुए जल का सूक्ष्म भी ऊपर जाकर प्राण और घी तेल आदि का सूक्ष्म भाग ऊपर जाकर वाणी बनता है। इससे सिद्ध है कि अन्न का कार्य ही मन है।”
अतः जीवन का-व्यक्तित्व का स्तर निर्धारित करने के लिए सर्व - प्रथम अन्न के स्वरूप को सँभालना पड़ता है। क्योंकि वही शरीर को विनिर्मित करता है और उसी के अनुरूप मन की प्रवृत्ति बनती है। इस प्रधान आधार की शुद्धता पर ध्यान न दिया जाय तो न शरीर की स्थिति ठीक रहेगी और न मनकी दिशाधारा में औचित्य बना रह सकेगा।
अध्यात्म विधा के वैज्ञानिक ऋषियों ने आहार के सूक्ष्म गुणों का - उसके समस्त आयामों का अत्यन्त गंभीरता पूर्वक अध्ययन किया था और यह पाया था कि प्रत्येक खाद्य पदार्थ अपने में सात्विक, राजसिक और तामसिक गुण धारण किये हुए है। और उनके खाने से मनोभूमि का निर्माण भी वैसा ही होता है। साथ ही यह भी शोध की गई थी कि आहार में निकटवर्ती स्थिति का प्रभाव ग्रहण करने का भी एक विशेष गुण है। दुष्ट, दुराचारी, दुर्भावना युक्त या हीन मनोवृत्ति के लोग यदि भोजन पकायें या परोसें तो उनके वे दुर्गुण आहार के साथ सम्मिश्रित हो कर खाने वाले पर अपना प्रभाव अवश्य डालेंगे। न्याय और अन्याय से पाप और पुण्य से कमाये हुए पैसे से जो आहार खरीदा गया है। उससे भी वह प्रभावित रहेगा। अनीति की कमाई से जो खाद्य सामग्री बनेगी, वह अभक्ष्य है। उसका सेवन उपभोक्ता को अपनी बुरी प्रकृति से अवश्य ही प्रभावित करेगा।
इन बातों पर भली प्रकार विचार करके ऋषियों ने साधक को सतोगुणी आहार ही अपनाने पर जोर दिया है। उनका भोजन स्वयं परम् सात्विक होता था। महर्षि कणादि अन्न के दाने बीन कर गुजारा करते थे। पिप्पलाद का आहार था, पीपल वृक्ष के फल। वैसी स्थिति यद्यपि आज कहीं नहीं पायी जा सकती, पर जितना कुछ संभव है, आहार की सात्विकता और व्यवस्था पर अधिकाधिक अंकुश रखना साधना की सफलता के लिए नितान्त जरूरी है। मद्य एवं अन्यान्य नशीले पदार्थों का सेवन, माँस, प्याज, लहसुन, चटपटे एवं उत्तेजक मसाले, गरिष्ठ, वासी-बुसे, तमोगुणी प्रकृति के लोगों द्वारा बनाया हुआ अथवा अनीति से कमाया हुआ आहार भी सर्वथा त्याज्य है। इन बातों का ध्यान रखते हुए स्वास्थ्य के लिए या जीवन रक्षा के लिए जो खाद्यान्न मिताहार औषधि रूप समझ कर, भगवान का प्रसाद मानकर ग्रहण किया जायगा, वह शरीर और मन में सतोगुणी स्थिति पैदा करेगा और उसी के आधार पर साधना मार्ग में सफलता मिलनी संभव होगी।
तैत्तरीय उपनिषद् में इस सम्बन्ध में अधिक प्रकाश डाला गया है और आत्मकल्याण के इच्छुकों को आहार -शुद्धि का विशेष रूप से ध्यान रखने का निर्देश किया गया है। कहा गया है-” आहार शुद्वो सत्वशुद्विः सत्वशुद्वौ ध्रुवा स्मृतिः।” अर्थात् जब आहार शुद्ध होता है तब सत्व यानी अन्तःकरण शुद्ध होता है। अन्तःकरण शुद्ध होने पर विवेकबुद्धि ठीक काम करती है उस विवेक से अज्ञान जन्य बन्धन ग्रन्थियाँ खुलती हैं, फिर परमतत्व का साक्षात्कार हो जाता है। पाशुपत ब्रह्मोपनिषद् में भी कहा है कि-”आहार में अभक्ष्य त्याग देने से चित्त शुद्ध हो जाता है। आहार की शुद्धि से चित्त की शुद्धि स्वयमेव हो जाती है। जब चित्त शुद्ध हो जाता है तो क्रम से ज्ञान होता जाता है और अज्ञान की ग्रंथियाँ टूटती जाती है” यही बात छान्दोग्य उपनिषद् में कही गई है। उसके अनुसार “आहार शुद्ध होने से अन्तःकरण की शुद्धि होती है। अन्तःकरण के शुद्ध हो जाने से भावना दृढ़ हो जाती है। और भावना की स्थिरता से हृदय की समस्त गाँठें खुल जाती हैं।
बाल्मीकि रामायण में अन्तःकरण को देवता के रूप में प्रस्तुत किया गया है और कहा गया है-”यदंन्न पुरुषो भवति तदन्नास्तस्य देवताः।” अर्थात् मनुष्य जैसा अन्न खाता है वैसा ही उसके देवता खाते हैं। कारण देवताओं का सबसे निकटवर्ती निवास स्थान अपनी देह है। इस मानव शरीर में सभी देवता निवास करते हैं। विभिन्न अंग प्रत्यंगों में विभिन्न देव शक्तियों का निवास है। जैसा कुछ हम खाते पीते हैं, उसी के अनुरूप उनकी पोषण मिलता है और वे सशक्त अथवा दुर्बल बनते हैं। सात्विक खान-पान देव तत्वों की पुष्ट करता है और आसुरी तमोगुणी आहार करने से देव शक्तियाँ केवल मुख के द्वा ही आहार .... लेती वरन् प्रत्येक इंद्रियों द्वारा ही उसकी उचित-अनुचित प्रक्रियाओं द्वारा पुष्ट या अशक्त बनती है।
इसलिए साधक को आहार-विहार की शुद्धता .... साथ ही व्रत, संयम, उपवास, ब्रह्मचर्य एवं .... तपश्चर्याओं द्वारा अपने शरीर एवं मन को इस योग बनाना चाहिए कि उसमें निवास करने वाली .... शक्तियाँ जागृत होकर अपनी सजातीय महाशक्ति .... सूक्ष्म जगत में से अपनी ओर आकर्षित कर .... अतः आहार की शुद्धता अभीष्ट सिद्धि के .... नितान्त आवश्यक है।
एक गरीब महिला मंदिर में नित्य दर्शन करने जाया करती और देवता से मनौती मनाती कि उसकी नाक के लिए सुन्दर नथ बन जाय। पति भी पत्नी को प्रसन्न करने के लिए उसकी इस इच्छा को पूरी कर के लिए प्रयत्नशील रहता था। आखिर व सुयोग आयो कि नथ बन ही गई।
उसे पहन कर महिला सर्वप्रथम मंदिर में देवता को और पुजारी को प्रमाण करने गई। असमय के .... आगमन से पुजारी चौंका। उसने सिर उठाकर देखा तो प्रतीत हुआ कि उसे नई नथ मिल गई है।
पुजारी ने कहा! बेटी उनको धन्यवाद देना जिन्होंने यह उपहार तुम्हें दिया पर साथ ही उसका भी .... गाती रहना जिसने तुम्हें नथ पहनने लायक नाक दी।
मनुष्य का कलेवर लघु होते हुए भी संपर्क क्षेत्र एवं पारस्परिक संबंधों की दृष्टि से इस अति-विषल ही मानना होगा। संभवतः इसी विशालता का आकलन कर प्राचीन ऋषियों ने इसे लघु ब्रह्माँड की उपमा से गौरवान्वित किया है। जहाँ इसकी गति - विधियों से पर्यावरण का प्रभावित होना बताया जाता हैं, वहीं पर्यावरण की परिवर्तित परिस्थितियाँ इसे प्रभावित किये बिन नहीं रहतीं।
इन परिस्थितियों को स्थूल नेत्रों से भले न देखा जा सकें किन्तु अब यह मान्यता प्रयोग एवं परीक्षणों से सत्यापित की जा सकती है कि मौसम आदि के अदृश्य परिवर्तन मनुष्य को शारीरिक एवं मानसिक रूप से प्रभावित करते हैं। कैनैडियन क्लाइमेट सेंटर के एक अध्ययन से ज्ञात हुआ है कि जिस दिन हवा तेज हो, आर्द्रता बढ़ रही हो वायुदाब घट रहा हो और तापमान में तेजी से उतार चढ़ाव आ रहा हो उस दिन तनाव - जन्य माइग्रेन जैसे रोग होने की बहुत अधिक संभावना रहती है। इस रोग से पीड़ित व्यक्ति ऐसे मौसम में आत्मघात करते देखे जाते हैं, साथ ही चिड़चिड़ेपन, पारस्परिक कलह के अवसरों भी बढ़ोत्तरी पाई गई है।
कोलम्बिया युनिवर्सिटी स्कूल आफ पब्लिक हेल्थ की डा इन्जगोल्ड स्टीन ने अपने अध्ययन निष्कर्ष में बताया है कि उच्च वायु दाब से मौसम ठंडा रहता है तथा उस दौरान वर्षा नहीं होती। इससे दमे के मरीजों को कुछ राहत मिलती है। आर्द्रता बढ़ने के साथ दमे के रोग में भी बढ़ोत्तरी देखी गई इलिनाँय मेडिकल सेन्टर विश्वविद्यालय की डा अनीता बेकर ने बताया है कि दिल का दौरा भी बहुधा मौसम में परिवर्तन के परिणाम स्वरूप ही उत्पन्न होता है। अध्ययन के दौरान उन्होंने पाया कि दो दिन पूर्व हुई वर्षा के दौरान पुराने हृदयाघात से मरने वालों की संख्या सामान्य दिनों की तुलना में 30 प्रतिशत अधिक थी।
जार्मन वेदर ब्यूरो द्वारा मौसम विज्ञान पर आधारित दैनिक स्वास्थ्य बुलेटिन प्रकाशित किया जाता है जो मौसम के शरीर पर पड़ने वाले प्रभावों की पूर्व चेतावनी पहले से ही लोगों को देता रहता है। नित्य बनते बिगड़ते उच्च और न्यून दाब केंद्रों और गर्म-ठण्डी हवा के चाल के आधार पर यह मौसम पूर्वानुमान तन्त्र मौसम को छः चरणों में विभाजित करता है। मौसम विज्ञानियों के अनुसार प्रत्येक चरण स्वास्थ्य की भिन्न भिन्न अवस्थाओं के बारे में स्पष्ट जानकारी देता है। सामान्यतया उच्च वायु दाब जन सामान्य में स्वास्थ्य की अच्छी स्थिति की ओर संकेत करता है, जबकि न्यून दाब और गर्मी की स्थिति स्वास्थ्य में आने वाली गिरावट की ओर इंगित करती है। तीरी दुनियाँ के कितने ही चिकित्सकों ने अब मौसम विज्ञान पर आधारित सेटेलाइट की गणना पर आधारित स्वास्थ्य बुलेटिनों का प्रयोग अपने मरीजों पर करना प्रारंभ भी कर दिया है। समय पूर्व चिकित्सक सारा सरंजाम जुटा लेते हैं ताकि वैसी विषम स्थिति आ धमकने पर उससे निबटा जा सकें।
ब्रिटिश खगोलज्ञ और सुप्रसिद्ध दूरबीन विशेषज्ञ-सर विलियम हर्षेल ने सूर्य की स्थिति का धरती पर पड़ने वाले प्रभावों का गहरा अध्ययन किया है और निष्कर्ष निकाला है कि वनस्पतियों के विकसित और फलित होने से लेकर प्राणियों के शरीर और मनुष्यों के मनःस्तर पर सूर्य परिवर्तन का असाधारण प्रभाव पड़ता है। उस देखते हुए यह प्रतीत होता है कि सूर्य से पृथ्वी के न केवल ऋतु परिवर्तन चक्र प्रभावित होते हैं, वरन् प्राणियों का शारीरिक और मानसिक स्तर भी उठता गिरता है। उजवेकिस्तान (सोवियत रूस) के विज्ञानी-एन. केनोसरिन ने सूर्य के धब्बों के साथ पृथ्वी पर दल दल बढ़ने घटने की संगति बिठाई है। मास्को के प्रो0 शिझेब्स्की ने पता लगाया है कि धरती के इतिहास में जब जब सूर्य में तीव्र प्रति क्रियाएँ हुई हैं, तब तब हैजा, प्लेग, टाइफाइड, आदि बीमारियों का संसार में भारी प्रकोप हुआ है उनके अनुसार सुर्य में होने वाले परिवर्तनों के कारण मनुष्य के स्वभाव में हेर-फेर होता रहता है। मानव स्वास्थ्य पर दूरवर्ती अन्यान्य ग्रह-नक्षत्रों से आने वाली अदृश्य बौछारों का भी प्रभाव पड़ता है। इस संदर्भ में चलते रहे-विभिन्न वैज्ञानिक अनुसंधानों ने इस तथ्य को सत्य प्रमाणित किया है कि पूर्णिमा के चाँद का मनुष्य पर न केवल जैविक असर पड़ता है अपितु भावनात्मक प्रभाव भी पड़े बिना नहीं रहता है। इस संबंध में किये गये अध्ययनों में जो निष्कर्ष सामने आये हैं उनके अनुसार पूर्णिमा काल काया में बढ़ा देते हैं रक्तचाप, हृदय, धड़कन, उपापचय प्रक्रिया में भी इस समय तीव्रता अनुभव की गई है।
शिकागो के इलिवान्स युनिवर्सिटी के फार्मोकाँलोजी विभाग के प्रो0 डा राल्फ डब्लू. मोरिस ने अध्ययनोपरांत पाया कि रक्त-स्राव अन्य अवसरों की तुलना में इस दिन अधिक क्रियाशील रहता है। पूर्ण चन्द्रमा से निकलने वाली विशिष्ट ऊर्जा तरंगें रक्त बहाव को रोकने वाले ब्लैड प्लेटमेट्स के निर्माण में बाधा उत्पन्न करती हैं। फलस्वरूप अधिक मात्रा में रक्तसक्ति हो जाता है। पाया गया है कि मधुमेह के रोगियों में इन्हीं दिनों ब्लडशुगर चरम स्थिति में पहुँच जाती है।
अनुसंधानकर्ता चिकित्सा विज्ञानियों का कहना है कि चन्द्रमा की कलाओं का महिलाओं के मासिक चक्र पर विशेष प्रभाव पड़ता है। पूर्णिमा अवधि में उनमें अवसाद और तनाव जैसे मनोविकारों की बहुलता देखी गई है। कुछ महिलाएँ रक्तस्राव और हारमोनों के घट-बढ़ के कारण क्रमशः स्थायी रूप से मानसिक अवसाद का शिकार बनती चली जाती हैं। उनके द्वारा की जाने वाली हत्याओं व आत्म-हत्याओं की घटनाएँ प्रायः इसी अवधि में देखी गई हैं। वस्तुतः इस प्रकार के कृत्यों के पीछे मानसिक दुर्बलता ही प्रमुख करण होती है। सबल मनःस्थिति वाले व्यक्तियों पर इन परिवर्तनों का कोई विशेष प्रभाव परिलक्षित नहीं होता।
मनः चिकित्सकों तथा पुलिस विभाग के अध्ययनकर्ता विशेषज्ञों का कहना है कि पूर्णिमा का मनोविकारों में बढ़ोतरी करता है। मनःशास्त्रियों के अनुसार इस दिन व्यक्ति की हठधर्मिता व आक्रामकता अन्य दिनों की अपेक्षा बढ़ जाती है। अपराधिक घटनाओं में आश्चर्यजनक अभिवृद्धि इसी अवधि में पायी गई है। उस दिन सामान्यजनों के व्यवहार में परिवर्तन भी होते देखा गया है। न्यूयार्क के वैज्ञानिकों ने अपने खोजपूर्ण अध्ययन में बताया है कि इस काल में आगजनी एवं हिंसा की घटनाएँ अधिक होती हैं। साथ ही देश व्यापी हत्याओं में 50 प्रतिशत की अभिवृद्धि देखी गई है। डा मौरिस ने अपने तथ्यों के समर्थन में एक रोचक उदाहरण प्रस्तुत करते हुए कहा है कि डेविड बरकोलिए नामक डाक तार विभाग के कर्मचारी ने “सैन आफ सैम” नामक कुख्यात हत्याकाँड आठ रातों में सम्पन्न किया इन आठ में से पाँच रातें पूर्णिमा की थीं।
डा मौरिस के अनुसार मनुष्य के व्यवहार चिन्तन में उन्माद लाने वाले चन्द्र प्रभावों की व्याख्या करना अत्यन्त जटिल है क्योंकि पूर्णिमा काल में पृथ्वी सूर्य और चन्द्रमा तीनों ही एक सीधी रेखा में आ जाते हैं। उस वक्त उनके सम्मिलित विद्युत चुम्बकीय प्रभाव एवं गुरुत्वाकर्षण में जो परिवर्तन होता है-वह काया के सूक्ष्म विद्युतीय प्रवाहों पर सीधा प्रभाव डालता है और उसमें परिवर्तन लाकर स्वास्थ्य को सीधे प्रभावित करता है।
प्राचीन काल के ऋषि माने जाने वाले शोधकर्ताओं ने विभिन्न ग्रह उपग्रहों के इन अदृश्य प्रवाहों-इनके परिणामों की संभावनाओं को देखते हुए तदनुरूप विभिन्न व्रत-उपवासों आध्यात्मिक साधनाओं की पद्धति को प्रचलित किया था। जिसका अवलम्बन व्यक्ति को सदैव ही निषेधात्मक परिणामों से बचाने वाला सिद्ध होता है। आज भी इनकी वैज्ञानिकता यथावत् है। इसका पुनः निरीक्षण-परीक्षण व अवलम्बन व्यक्ति के शरीर-मन को स्वस्थ रूप से सुसंचालित करने में अब भी महती भूमिका निभा सकता है।
एक लोमड़ी किसी जंगल में रहती थी। उसी क्षेत्र में गधों की भरमार थी। लोमड़ी को उनसे असुविधा होती। उसके खाने योग्य साधन गधों की बहुलता से अस्त-व्यस्त हो जाते।
लोमड़ी ने एक चालाकी भरी योजना बनाई कि किसी प्रकार यहाँ से इन गधों को डरा कर भगाया जाए। वह गधों के पास पहुँची और बोली तुम्हें एक गुप्त सूचना देती हूँ। मछलियों ने मिल कर एक सेना गठित की है और वे दलबल के साथ तुम सब गधों का बंठाधार करने वाली है।
गधों ने वास्तविकता जानने का प्रयत्न तो किया नहीं डर से भयभीत हो कर गाँव की ओर भागे जहाँ उन्हें पनाह मिल सके।
गाँव धोबियों का था। उनने गधों की भय-व्याकुलता देखी। कारण पूछा - और सहायता करने का आश्वासन दिया। गधों के दम में दम आया और उनने लोमड़ी से सुनी सारी बातें कह सुनाई।
धोबियों ने उन्हें बचा लेने का आश्वासन दिया। साथ ही उनके गले में रस्सी बाँधकर खूँटे से बाँध भी दिया। गधे स्थाई रूप से बंधन में बँध गये। डर जो न कराये सो थोड़ा।
घ्राणेन्द्रियों को अभी तक गौण माना जाता रहा है और कहा जाता रहा है कि गन्ध सामर्थ्य के होने न होने से कोई अन्तर नहीं पड़ता किन्तु अब मस्तिष्कीय विकास पर शोध करने वाले जैव रसायनविदों एवं व्यवहार विज्ञानियों ने यह निष्कर्ष निकाला है कि गन्धशक्ति मानवी मस्तिष्क के व्यवहार एवं चिन्तन सम्बन्धी दोनों ही पक्षों के विकास क लिए उत्तरदायी है। यही कारण है कि प्राचीनकाल के अध्यात्मवेत्ताओं ने स्वास्थ्य संवर्धन एवं मानसिक-आत्मिक विकास में गंध साधना को एक अनिवार्य अंग के रूप में सम्मिलित किया। पूजा-उपासना-जैसे धर्मानुष्ठानों से लेकर वातावरण परिशोधन के विविध उपक्रमों में सुगंधित द्रव्यों को रखने या जलाने का अनिवार्य प्रचलन रखा। पूजा में सुवासित पुष्प इसी की पूर्ति करते है।
रंगों की तरह मानवी मस्तिष्क गंधों से घनिष्टता के साथ जुड़ा हुआ है। अनुकूल गंध न केवल घ्राणेन्द्रियों को सशक्त बनाती है वरन् मस्तिष्कीय चेतना के विकास-परिष्कार में भी बढ़ा चढ़ा योगदान प्रस्तुत करती है। जबकि दुर्गंध, प्रदूषित वायु या उत्तेजक गंध घ्राणेन्द्रियों में विकृति उत्पन्न करती है। परिणाम स्वरूप मनुष्य में उत्तेजनापरक मनोविकार एवं हिंसक वृत्ति पनपती है।
इस संदर्भ में ‘नेशनल इन्स्टीट्यूट ऑफ मेण्टल हैल्थ’ अमेरिका एवं नीमहन्स बैंगलौर के मूर्धन्य वैज्ञानिकों ने गहरी खोज-बीन की है और निष्कर्ष निकाला है कि मनुष्य के मस्तिष्क की सबसे भीतरी परत को-जिसे रेप्टीलियन ब्रेन या एनीमल ब्रेन कहकर नकारा जाता रहा है, गन्ध शक्ति से जुड़ा हुआ है। इसमें आलफैक्टरी स्ट्राएटम, कार्पस स्ट्राएटम तथा ग्लोबरनाकु जैसी महत्वपूर्ण मस्तिष्कीय संरचनाएँ जुड़ी हुई है। इस पूरे समुच्चय को उन्होंने आर. कांप्लेक्स नाम दिया है और मनोविकारों के लिए इसे ही उत्तरदायी बताया है। उनके अनुसार व्यवहार विकास सम्बन्धी अनेकानेक पक्षों के लिए यह भाग अत्यधिक महत्वपूर्ण है। किन्तु घ्राणशक्ति को महत्व न मिलने के कारण यह उपेक्षित पड़ा रहता है और धीरे-धीरे विकृतियों मनोविकारों का प्रमुख उत्पादक केन्द्र बन जाता है। आज की बढ़ती हिंसक प्रवृत्ति, तनाव, बेचैनी, आवेश आतुरता एवं मास हिस्टीरिया जैसे मनोविकारों के मूल कारणों में यह भी एक प्रमुख कारण है। अतः गन्ध के माध्यम से इन केन्द्रों पर शामक प्रभाव डाल कर मनुष्य की वृत्ति को, यहाँ तक कि व्यक्तित्व को आमूल-चूल बदला जाना संभव है। कारण मस्तिष्क को तीनों भाग-रेप्टीलियन ब्रेन, लिम्बिक ब्रेन और निओकार्टेक्स क्रमशः एक के ऊपर दूसरी परत के रूप में चढ़े और सुसंबद्ध होते हैं। जिस प्रकार एक की विकृति दूसरे को भी अछूता नहीं छोड़ती उसी प्रकार एक का विकास-परिष्कार अपने सहयोगी केन्द्रों को भी इसके लिए उत्तेजित करता है।
डा मैक्लीन ने आर. कांप्लेक्स पर अधिक जोर देते हुए कहा है कि मनुष्य के व्यवहार की कुँजी इस अन्तःमस्तिष्क में छिपी पड़ी है। अचेतन मस्तिष्क की इस आदिम परत-रेप्टीलियन ब्रेन पर गंध शक्ति का सर्वाधिक प्रभाव पड़ता है। गन्ध सम्बन्धी संवेदनशील ज्ञानतन्तु नासिका अवस्थित होते हैं। यहाँ से गन्ध सीधे स्नायु-तंतुओं के माध्यम से अग्र मस्तिष्क एवं फिर वहाँ स्थित आलफक्टरी कार्टेक्स में जाती है। नाक को जान बूझ कर विधाता ने आँखों और कानों के मध्य बनाया ही इसलिए है कि अचेतन सम्बन्धी महत्वपूर्ण जानकारियाँ व उत्तेजना सतत् अंतःमस्तिष्क को मिलती रहे। यही अचेतन, व सचेतन को प्रभावित उत्तेजित करता है। इस कारण गन्ध का घ्राणेन्द्रिय का महत्व मानव के व्यवहार विकास में और अधिक बढ़ जाता है। अतः नासिका को कम महत्व का नहीं माना जाता चाहिए।
पशु-पक्षियों में तो आत्मरक्षा का-सम्प्रेषण का एक मात्र माध्यम गन्ध होती है। नासिका का सर्वाधिक उपयोग होने से उनका रेप्टीलियन ब्रेन भी अधिक विकसित एवं सक्रिय होता है। इस गन्ध शक्ति के सहारे ही समस्त जीवधारी अपनी जीवन यात्रा चलाते हैं। हिंसक पशु गन्ध के माध्यम से ही जंगल में अपने शिकार को खोज निकालते हैं, जबकि छोटे जन्तु आत्म-रक्षा हेतु अपनी घ्राणशक्ति का ही सहारा लेते हैं। खतरा देखते ही वे गन्ध के सहारे तुरंत चौकन्ने हो भाग निकलते हैं। जीव−जंतु बोल पाते नहीं, लिख सकते नहीं, किन्तु जंगल में क्षेत्र विभाजन, अधिकार-भाव, प्यार-दुलार जैसी वृत्तियों का आदान-प्रदान इसी घ्राणशक्ति के सहारे बन पड़ता है। इस केन्द्र को उत्तेजित करके या नष्ट करके पशुओं में हिंसक वृत्ति या आत्मरक्षा वृत्ति को घटाने-बढ़ाने में वैज्ञानिकों ने आशातीत सफलता पाई है। मधुमक्खी, तितली, चींटियां, एवं अन्यान्य कृमि कीटक इस गन्ध की भाषा का ही आश्रम लेकर अपना काम चलाते हैं।
वैज्ञानिकों ने गन्ध की भाषा को मनुष्य की सबसे पुरानी एवं प्रभावशाली भाषा माना है। उनका मत है कि गन्ध की प्रतिक्रिया फेरोमोन नामक रसायन समूह की शरीर के हारमोन से प्रतिक्रिया के फलस्वरूप होती है और इसी कारण गंध अपने विविध रूपों में पहचानी जाती है। जिनमें से कुछ हैं-कैम्फरलाइक, विनगरी, ऐथेरियल, प्यूट्रीड, पिपरमिन्ट्रय, मस्की और फ्लोरल गंध आदि सामान्यतया व्यक्ति न्यूनतम 4000 प्रकार की तथा अधिकतम 10,000 किस्म की गन्धों को पहचानने की क्षमता रखते हैं। मनुष्य लगातार लाखों रासायनिक संदेश गंध के माध्यम से पकड़ता-छोड़ता रहता है। जिन्हें सिर्फ हमारी नाम जानती है और जिनका विश्लेषण करने की क्षमता हमारे मस्तिष्क मध्य के गन्ध सम्बन्धी केन्द्रों में है।
मानव जीवन में गंध को बड़ा महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। इससे न केवल व्यक्तित्व विकास में अपितु रोगों के निदान उपचार में भी सहायता मिली है। जार्जटाउन मेडिकल सेन्टर, यू.एस.ए. के प्रमुख चिकित्सा शास्त्री डा शबर्ट हैनकिन ने मानवी घ्राणशक्ति पर गहन अनुसंधान किया है। उनके अनुसार गन्ध द्वारा बेचैनी, तनाव, जैसे मनोविकारों को सरलता से दूर किया जा सकता है। उपयुक्त गन्धों का प्रयोग करके श्रमिकों की कार्यक्षमता बढ़ाई जा सकती है। अपराधियों की अपराधवृत्ति-हिंसक प्रवृत्ति को काफी हद तक कम किया जा सकता है। घ्राणशक्ति के माध्यम से आधुनिक चिकित्सा-विज्ञान में शारीरिक रोगों-मानसिक विकृतियों के-निवारण में गंध चिकित्सा को अत्याधिक प्रभावशाली माना जाने लगा है। फ्राँस के पाश्च्यौर संस्थान के चिकित्सा विशेषज्ञों ने लम्बी अवधि तक किये गये विभिन्न प्रयोग परीक्षणों के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला है कि विविध प्रकार को .... वनस्पतियों-वनौषधियों से तथा पुष्पों और फलों से निकाले गये गंध युक्त तेलों में न केवल रोग कारक जीवाणुओं को विनष्ट करने की क्षमता है वरन् इसके प्रयोग से मानसिक परिष्कार का भी प्रयोजन पूरा होता है। शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत बनाने में इनकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। एक परीक्षण में पाया गया है कि कमे लिया-लैवेन्डर का सुगंधित तेल बारह घंटे के अंदर क्षय रोग के विषाणुओं को नष्ट करने जैसे रोगों की चिकित्सा में सुगंधित कमल पुष्प का प्रयोग किया जाता है। इसी तरह ज्योतिष्मती (मालकंगनी) के बीजों का सुगंधित तेल शारीरिक-मानसिक क्षेत्र की विभिन्न बिमारियों का शमन करता है।
गन्ध विज्ञान की उपेक्षा न हो इसलिए विदेशों में बड़े-बड़े केन्द्र इस माध्यम से चिकित्सा के प्रतिपादन हेतु खोले गये है। सत्रहवीं शताब्दी के मध्य में लंदन में ऐसे सार्वजनिक सुगंधित स्नानगृहों का निर्माण कराया गया था जिन में स्नान करने के उपरान्त स्वास्थ्य संवर्धन का लाभ स्वतः ही उपलब्ध होता रहता था। चीन के एक प्रमुख नगर हौलबोर्न का “हमाम” नामक स्नानगृह सुगंध चिकित्सा के लिए विख्यात है। विभिन्न प्रकार की सुवासित एवं मनमोहक गंध वाली जड़ी बूटियों के सम्मिश्रण से युकत यह स्नानगृह रोगियों को आरोग्य प्रदान करने के लिए सदैव खुला रहता है। स्वस्थ लोगों को भी इसमें नहाने से विशिष्ट प्रकार के आनन्द की अनुभूति होती है।
अपने देश में मानवी मन मस्तिष्क को विधेयात्मक दिशा-धारा प्रदान करने में सुगंधियों का प्रयोग प्राचीन काल से ही चला आ रहा है। हर धर्म-मत के कर्मकाण्डों में प्रायः इसका प्रयोग जुड़ा हुआ है। धूप, अगरबत्ती, हवन के माध्यम से सुगन्धमय वातावरण बनाने तथा उपस्थिति व्यक्तियों की चिकित्सा का अपना पूरा विधान है। सुगंधित पदार्थ अग्नि में जलकर वायुभूत बनते और समूचे वायुमंडल में फैलकर उसे सुवासित बनाते हैं। जिससे प्रदूषित वायु का परिशोधन तो होता ही है, साथ ही वायुभूत बने गंधों के सूक्ष्म परमाणु मनुष्य की नासिका में प्रवेश होते और मस्तिष्क की भीतरी परत तक पहुँच कर उस सकारात्मक दिशा में मोड़ने मरोड़ने का काम करते है। वेद, पुराण, कुरान, बाइबिल, जेन्दावस्ता आदि धर्मग्रन्थों में वर्णित विभिन्न प्रकरणों से इस मत की पुष्टि होती है कि सुगन्धियों का प्रयोग आदिकाल से होता हो रहा है।
प्रकृति में सुगंधियां तेल और रेजिन के रूप में पौधों में छिपी पाई जाती हैं। असली तेल ही वस्तुतः प्रयोग में लाये जाने चाहिए, संश्लेषित नहीं, क्योंकि उन्हीं का वाँछित प्रभाव मनःमस्तिष्क पर देखा जाता है। अभी तक पंजीकृत सुगन्धियों की संख्या विश्वभर में दो लाख से भी ऊपर है।
वैज्ञानिकों ने गन्ध शक्ति के द्वारा क्रुद्ध भीड़ को नियंत्रित करने के अतिरिक्त वाँछित सुगंध के प्रयोग से स्मरण शक्ति बढ़ाने, पढ़ाई में अधिक मन लगे, ऐसे प्रयोग भी सफलता पूर्वक किये हैं। उनका कहना है कि मानव की वृत्तियों को बदलने और व्यक्तित्व में आमूल चूल परिवर्तन लाने जैसे क्रांतिकारी प्रयोग गन्ध के माध्यम से संभव हैं। इन दिनों हिंसक वृत्ति बढ़ती जा रही है। बढ़ते औद्योगिक प्रदूषण व आबादी की घिच-पिच से मनुष्य चिड़चिड़े स्वभाव का बनता और तनाव-ग्रस्त होता चला जा रहा है। उसके स्वभाव को बदलने हेतु गंध शक्ति का प्रयोग बड़ी सफलता पूर्वक किया जा सकता है।
कामोद्दीपन जैसी पशु प्रवृत्तियों को उभारने के प्रयोग के स्थान पर यदि गन्ध शक्ति के विधेयात्मक स्वरूप को, जो सदा-सदा से भारतीय अध्यात्मविद् अपनी अग्निहोत्र एवं धूप आदि से युक्त उपासनाचर्या में प्रयुक्त करते आये हैं, उभारा और प्रतिपादित किया जा सके तो उपलब्ध अनेकानेक सुगन्धियों से मानव जाति को अभूतपूर्व लाभ दिया जा सकता है। मूल प्रवृत्तियों के आदिम रूप को देवत्व परक मोड़ मिलने पर घ्राणेन्द्रियों की उपलब्धि की सार्थकता भी सिद्ध होगी।
एक गाय बगीचे में घुस गई उसने नये पौधे चर लिये। मालिक को गुस्सा आया। उसने जोर की लाठियाँ जमाई। गाय मर गई।
पंचायत जमा हुई बगीचे के मालिक को गौहत्या का दोष लगाया गया।
मालिक चतुर था पढ़ा लिखा भी। उसने कहा-हाथों ने गाय मारी है। हाथ इन्द्र के संकेतों पर चलते हैं। इसलिए पाप इन्द्र को लगना चाहिए। पाप इन्द्र के दरबार में पहुँचा और दंड भुगतने के लिए कहने लगा।
इन्द्र ने पूरा विवरण सुना तो सारी चालाकी समझ गया। वह एक राहगीर का वेश बनाकर पाप के साथ उसी बगीचे में पहुँचा। राहगीर ने मालिक से सामने बगीचे को बड़ी प्रशंसा की और कहा यह किनने लगाया है? उनके दर्शन करना चाहता हूँ। मालिक ने श्रेय अपने जिम्मे लिया और हाथ ऊँचे करके कहा यह इन्हीं की करामात है। इन्द्र ने पास से कहा जब इसके हाथों की करनी का श्रेय इस बता रहा हूँ तो उनके किये पापों का दंड इसे क्यों न भुगतना पड़े?
पाप ने इन्द्र को छोड़ दिया और कुकृत्य करने वाले मालिक की गरदन पर सवार हो गया।
शंका का निवारण करने के कलए वे जनक के दरबार में पहुँचे और अपना अभिप्राय कहा।
जनक ने उन्हें दूसरे दिन प्रातः उत्तर पाने के लिए दरबार में आने के लिए कहा, यथा समय पहुँचे भी।
राजा ने एक बग्घी पर शुकदेव को बिठाया नगर की शोभा देखकर आने के लिए कहा। साथ ही उनके हाथ पर तेल का भरा एक कटोरा रख दिया। कहा तेल फैलने ने पाये फैल गया तो सभी बाजारों में, देखा कुछ नहीं।
जनक ने अपनी स्थिति भी वैसी ही बताई। धर्म कर्तव्यों के पालन का पूरा ध्यान रहता है तो शरीर के इर्द गिर्द घूमने वाले विलास साधन अपना कोई प्रभाव छोड़ नहीं पाते।
अभिमन्यु की चक्रव्यूह बेधते समय मृत्यु हो गई। सुभद्रा का वह इकलौता बेटा था। कृष्ण उसके भाई थे सुभद्रा ने कृष्ण को बुलाकर अनेक उलाहने दिये और कहा तुम्हें भगवान कहा जाता है। अर्जुन को सखा, मुझे बहन मानते हो और अभिमन्यु को अपना भानजा। इन रिश्तों का तो ध्यान करना चाहिए था। अभिमन्यु को तो बचा लेना चाहिए।
उसके उत्तर में कृष्ण ने सुविस्तृत तत्व-दर्शन महाभारत में वर्णन किया है और कहा है कि कर्मफल की मर्यादा में मनुष्यों से लेकर भगवान तक सभी बँधे हुए है। सभी को प्रारब्ध भोग भोगने पड़ते है और सभी को पुरुषार्थ के उपरान्त नियति की प्रधानता मानते हुए संतोष करना पड़ता है। सुभद्रा को भी संतोष करना पड़ा।
विचारणा एवं भावना का मनुष्य के शारीरिक मानसिक-स्वास्थ्य से गहरा सम्बन्ध है। मानसिक अवस्था के अनुरूप शारीरिक क्रिया-कलापों में परिवर्तन होता रहता है। यद्यपि यह विषय जलवायु की अपेक्षा अधिक सूक्ष्म है, इसलिए बहुत कम लोग ही इसके महत्व को समझ पाते हैं, परन्तु इसमें तनिक भी संदेह नहीं कि जिन लोगों का मन अशांत तथा विकारयुक्त अवस्था में रहेगा वे कभी वास्तविक स्वस्थ जीवन का सुख प्राप्त नहीं कर सकते।
आजकल लोगों का जीवन जैसा वासनामय हो गया है और पारस्परिक प्रतिद्वन्द्विता, ईर्ष्या आदि के कारण जो क्रोध, लोभ, शत्रुता, छल-कपट के भाव मन में उठते रहते हैं, उनके कारण मनुष्य की मानसिक शान्ति प्रायः नष्ट हो जाती है और उसके भीतर सदा दूषित विचारों की आँधी उठा करती है इन हानिकारक विचारों का प्रभाव हमारे भीतरी अंगों पर भी पड़ता है, सम्पूर्ण स्नायु प्रणाली-नर्वस् सिस्टम, तनाव की स्थिति में रहती है। फलतः मांसपेशियों में, पाचन संस्थान एवं श्वसन संस्थान आदि के कार्यों में विकृतियाँ उत्पन्न हो जाती हैं। अतः अंदरूनी तनाव चाहे वह स्थूल कारणों से अथवा सूक्ष्म करणों से हो रोग के रूप में फूट निकलता है।
चिकित्सकों एवं मनोवैज्ञानिकों के अनुसार वर्तमान समय में 50 प्रतिशत से अधिक लोग तनाव की प्रतिक्रिया स्वरूप रोगग्रस्त पाये गये हैं। उनका कहना है कि लगातार सिरदर्द, चक्कर आना, आँखों में सुर्खी आना, काम में मन न लगना और लकवा आदि जैसे रोगों का आक्रमण हो जाना ये सभी अत्याधिक तनाव के ही दुष्परिणाम हैं। ऐसे लोग प्रायः रागों की उत्पत्ति के लिए कभी मौसम को, कभी आहार को, कभी दूसरों को तो कभी परिस्थितियों आदि को दोष देते हैं जबकि रोगों का मूलकारण मन में ही छिपा होता है। तनाव शरीर व मन दोनों के लिए हानिकारक है। सुप्रसिद्ध स्नायु विज्ञानी डा0 एडमण्ड जैकबसन के अनुसार-हृदय-रोग, रक्त-चाप की अधिकता, अल्सर, कोलाइटिस आदि असामान्य दिखाई देने वाली बीमारियाँ प्रकारान्तर से तनाव के ही कारण उत्पन्न होती हैं। स्नायुदौर्बल्य, अनिद्रा चिन्ता, खिन्नता आदि अनेक रोग तनाव के ही भिन्न भिन्न रूप हैं।
मेक्सिको के प्रख्यात मनःचिकित्सा शास्त्री डा0 अरनेस्टो कन्ट्रैरख के अनुसार विकसित कहलाने वाले पश्चिमी देशों के लोग हाइपर-टेंशन, कैंसर, कोरोनरी डिसीजेज, (सी.ए.डी.) जैसी घातक बीमारियों से अधिक त्रस्त हैं। मोटापा, मधुमेह, पेप्टिक अल्सर, कोलाइटिस, आर्थ्राइटिस, दमा आदि रोगों का मूलकारण उन्होंने मानव की विकृत मनःस्थिति और उसके स्वरूप-व्यवहार को माना है। उनका कहना है कि प्रायः विश्व के सभी प्रमुख चिकित्सा शास्त्री एवं मनोरोग विशेषज्ञ इस बात को मानने लगे हैं कि 75 प्रतिशत रोगों का मूलकारण उद्वेगजन्य मनःस्थिति ही है।
अमेरिका के “नार्थ-वेस्ट रिसर्च फाउंडेशन” के प्रमुख अनुसंधानकर्ता वैज्ञानिक बेर्नानरिले ने गहन शोध के पश्चात् निष्कर्ष निकाला है कि कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी जीवन में भय, तनाव,अत्याधिक चिन्ता आदि के कारण होती है। अमेरिका के ही एक दूसरे रिसर्च केन्द्र “हीलिंग आर्ट्स सेन्टर” के चिकित्सा मनोविज्ञानियों ने कैंसर रोग का प्रमुख कारण मन को माना है।
अमेरिका के “नार्थ-वेस्ट रिसर्च फाउंडेशन” के प्रमुख अनुसंधानकर्ता वैज्ञानिक बेर्नानरिले ने गहन शोध के पश्चात् निष्कर्ष निकाला है कि कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी जीवन में भय, तनाव,अत्याधिक चिन्ता आदि के कारण होती है। अमेरिका के ही एक दूसरे रिसर्च केन्द्र “हीलिंग आर्ट्स सेन्टर” के चिकित्सा मनोविज्ञानियों ने कैंसर रोग का प्रमुख कारण मन को माना है।
मन का संकल्प और शरीर का पराक्रम यदि किसी काम में पूरी तरह लगा दिया जाय तो सफलता मिल कर रहेगी।
प्रकृति का अपना समय चक्र होता है जिसके आधार पर ऋतु-परिवर्तन से लेकर मौसम सहित सभी क्रियाकलापों में हेर-फेर होता रहता है। ग्रीष्म, वर्षा, शिशिर, हेमन्त आदि ऋतुएँ एक के बाद दूसरी आती रहती हैं और तदनुरूप ही धरती की शोभा सुषमा परिलक्षित होती है। अपनी जैसी घड़ी के द्वार वह वृक्ष-वनस्पतियों से लेकर जीव जन्तुओं तक की क्रियाशीलता पर शासन करती है। प्रकृति के इस अनुशासन को जाने-अनजाने रूप से सभी को पालन करना पड़ता है। इसी घड़ी के सहारे भोर होते ही मुर्गे बाँग लगाने लगते हैं। अँधेर कमरे में रखे पिंजड़े में कैद पक्षी सबेरा होते ही चहचहाने लगते हैं और उन्मुक्त वातावरण में उड़न के लिए पर फड़फड़ाने लगते हैं। इस प्रबल प्रेरक शक्ति के सहारे ही समस्त प्राणियों का जीवन व्यापार चलता है।
प्राणिवेत्ताओं का कहना है कि अन्यान्य जीवधारियों की तरह मनुष्य का भी अपना एक दैनिक सक्रियता चक्र होता है। अर्थात् शिथिलता और सर्वोच्च सक्रियता की क्षमता युक्त अवधियाँ होती हैं इनमें से सर्वाधिक सक्रियता वाली अवधि को यदि जाना और उसका सुनियोजन किया जा सके तो कठिन से कठिन कार्य भी सरलतापूर्वक उस समय चक्र में सफल सम्पन्न हो सकते हैं।
इस संबंध में क्रोनोबायोलाँजी के विशेषज्ञों ने गहन अनुसंधान किया है और पाया है कि मानवी मन अपनी आन्तरिक घड़ी के अनुसार सक्रिय रहा करता है और जब कभी बाह्म समय का आन्तरिक समय से तालमेल नहीं बैठता व्यक्ति थका हारा तनावग्रस्त दीखने लगता है। उनके अनुसार प्रत्येक व्यक्ति की बायोलॉजिकल क्लाँक भिन्न होती है। जिसके कारण उनकी सक्रियता में भी भिन्नता पाई जाती है। किसी को अपने जटिल कार्यों लेखन साहित्य सृजन आदि को पूर्ण करने में सुबह का समय उपयुक्त लगता है, तो किन्हीं किन्हीं को अन्य समयों में कार्यों के प्रति अभिरुचि जगती और सक्रियता-कर्मठता का तारतम्य बैठता है। दैनिक जीवन के कार्यों का पर्यवेक्षण कर अपने जीवन के सर्वोच्च सक्रियता वाले समय का निर्धारण प्रत्येक व्यक्ति स्वयं कर सकता है जानकारी होने पर होना तो यह चाहिए कि इस अवधि को अतिमहत्त्वपूर्ण कार्यों के लिए सुरक्षित रखा जाय। शेष समय में सामान्य कार्यों को निबटाया जाय। यद्यपि जीवन का प्रत्येक क्षण बहुमूल्य है फिर भी सक्रियता वाले समय का सदुपयोग वाँछित सत्परिणाम प्रस्तुत करता है।
अन्य जीवों की भाँति मनुष्य की जैव घड़ी भी सूर्य से प्रभावित होती है। जिस क्रम से सूर्य ऊपर की ओ चढ़ता जाता है और 12 से 2 बजे के मध्य अपनी चरम अवस्था में रहता है, उसी प्रकार व्यक्ति की ऊष्मा भी बढ़ती और सक्रियता आती है। शरीर गर्म होने पर मनःमस्तिष्क भी उससे प्रभावित हुए बिना नहीं रहता। यही कारण है कि उस समय शारीरिक परिश्रम वाले क्रियाकलापों को सम्पन्न करने की सलाह मूर्धन्य लोग दिया करते हैं। उस वक्त श्वसन दर एवं रक्त-प्रवाह भी तीव्रतर होता है। व्यक्ति अपने कार्य की श्रेणी परखकर उसे उचित समय में करते रहने का कार्यक्रम अपना सकता ह। मोटे हिसाब से मानसिक कार्य दिन के पूर्वार्द्ध में और शारीरिक श्रम उत्तरार्द्ध में निबटाने का नियम है परन्तु जहाँ नियम हैं वही अपवाद भी देखने को मिलते हैं। अमेरिकी राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन एवं यूलियस एस. ग्रान्ट चिन्तन मनन वाले कठिन कार्या को सर्वोत्कृष्ट क्षमता वाले अपने उस जैवसमय में किया करते थे जब सायं अँधेरा छाने लगता। विख्यात वैज्ञानिक थामस एडीसन को तो रात में ही काम करने का शौक था किन्तु सबसे बड़ी बाधा अँधेर की थी इसे दूर करने में भी उनने सफलता पाई और विधुत बल्ब का आविष्कार इसी अवधि में कर डाला। इसी तरह पाश्चात्य सिनेमा के जाने माने कलाकार फ्रैंस सिनाट्रा को राम में कार्य आरंभ करने और सफलता तक पहुँचने की धुन सवार रहती थी। अपनी प्रसिद्ध फिल्म-”एहोल इन दी हेड” को उसने एक रात्रि में पूर्ण कर दिखाया जबकि उस समय आम प्रचलन दिन में ही कार्य करने का था।
जिस प्रकार लोगों की शक्ल-सूरत विचार, रुचि-रुझान आदि में विभिन्नता होती है, ठीक उसी तरह हम सबके जैविक-लय में भी भिन्नता होती है। कई व्यक्ति सक्रियता वाले तापमान पर हाथ में लिए कार्यों को शीघ्रता से पूरा कर लेते हैं तो अन्य दीर्घसूत्री होते हैं। कुछ में यह जैवसक्रियता जगने से लेकर दो-चार घण्टे तक बनी रहती है तो दूसरों में पाँच-छः घण्टे बाद आती है। एडीसन जैसे व्यक्तियों में यह उनके जागरण के 12 घण्टे के बाद ही चरमोत्कर्ष पर पहुँचती थी। ऐसे ही देर से सक्रिय होने वालों में विख्यात वैज्ञानिक डा सिडनी माडर थे। वह कहा करते थे “हमारा शरीर सुबह बिस्तर से जब उठता है तब बेमन रहता है, जैसे वह भीनी-भीनी आतिशबाजी हो। दोपहर-भोजन के पश्चात भी वह पूर्ण चैतन्य नहीं होता। उसकी सक्रिय क्षमता तो रात्रि आगमन के साथ ही उभरती है।”
जैविकलय के अनुसार सर्वाधिक क्रियाशील समय किस व्यक्ति का कब है? यह उसके रहन-सहन चिन्तन-मनन, आचार विचार, संस्कृति एवं व्यक्तिगत रुचि रुझान पर निर्भर करता है। बाह्म याँत्रिकी घड़ी में तो एक रूपता होती है किन्तु भीतरी जैविक घड़ी में भिन्नता क्यों है? इसका उत्तर गहन अनुसंधान के पश्चात ढूँढ़ निकाला है - बोस्टन विश्वविद्यालय के वरिष्ठ मनोविज्ञानी डा विलियम एस काँडन और उनके सामर्थ्यों ने उनके अनुसार नवजात शिशु की जैव घड़ियों का तारतम्य आरंभ के कुछ घण्टों तक अपनी जन्मदात्री माँ से मिला रहता है। किन्तु ज्योंही उस अन्य लोगों की आवाजें सुनने को मिलती हैं वह उन लयों के अनुसार अपने को ढालने लगता है। यह जीवंत घड़ियाँ याँत्रिकी घड़ों की तरह ठीक समय पर टिक-टिक तो नहीं करती पर प्रकृति की लय के साथ अवश्य मिली होती हैं। इसकी उपलब्धता मनुष्य समेत समस्त प्राणियों के पास होती है। इसी के सहारे केकड़े को पता चल जाता है कि कब धारा बदलने वाली है। चूहे, तिलचट्टे, उल्लू जैसे रात्रिचर प्राणी सायंकाल आरम्भ होते ही सक्रिय हो जाते है। चमगादड़ भोजन की खोज में उड़ चलते हैं। इन सभी के जीवन आन्तरिक लय के अनुसार चला करते हैं, परन्तु मनुष्य वह चेतन प्राणी है जो वातावरण, परिस्थितियों के साथ-साथ अपनी आन्तरिक लय को बदलने में एवं उसे इच्छित दिशा में मोड़ने-मरोड़ने में सक्षम है।
योरोप के प्रसिद्ध विज्ञानवेत्ता डा क्लीटमैन अपने सहयोगी डा ब्रस रिचार्डसन के साथ केंटकी मैमथ की अन्धेरी गुफा में 32 दिनों तक इसलिए रह कि क्या वह 19 घण्टे काम और 9 घण्टे विश्राम वाले 28 घण्टे के दिन की संगति बिठा सकते हैं। प्रयोग सफल रहा। उनका कहना था कि “गर्मियों में दिन और सर्दियों की रात बड़ी होती हैं। फिर भी हमारी जैविक घड़ियाँ अपने आप इन परिवर्तनों के अनुकूल बनती जाती हैं। दुर्घटनाओं के शिकार लोग प्रायः बताते है कि दुर्घटना के समय हर बात बड़ी धीमी गति से होती है जिससे पता चलता है कि मस्तिष्क में कोई ऐसी सक्षम व्यवस्था है जो मनुष्य को बोध क्षमता को सामान्य से कई गुना अधिक बढ़ा देती है। जिसके परिणाम स्वरूप संसार का घटना चक्र भी धीमी गति से चलता हुआ प्रतीत होता है। यही वह समय होता है जिसमें दुर्घटना में फँसा व्यक्ति अपने बचाव का उपाय सोचता”है।
पाश्चात्य मनोविज्ञानियों ने अपने विविध प्रयोग-परीक्षणों के आधार पर बताया है कि अधिकांश व्यक्ति अपने सर्वाधिक सक्रियता वाले क्षणों का मात्र दो घण्टे तक ही सदुपयोग कर पाते हैं। यह देखा भी गया है कि इस सीमित अवधि में वे दिन के किन्हीं अन्य समयों की अपेक्षा अधिक चैतन्य रहते और स्वस्थ-सक्रिय अनुभव करते हैं। इस अवधि के पश्चात् उन्हें बेमन से कार्य करते और तनाव ग्रस्त रहते देखा गया है। तन्मयता-तल्लीनता के अभाव में ही ऐसा बन पड़ता है अन्यथा जटिल कामों की संगति आन्तरिक लयबद्धता के साथ बिठाकर अभ्यास द्वारा उस अवधि को बढ़ाया जा सकता है।
मस्तिष्क विज्ञानियों ने उपकरणों से परीक्षण करने पर पाया है कि उषाकाल में व्यक्ति के मन-मस्तिष्क पर अल्फातरंगों की प्रधानता होती है। चिन्तन मनन का वह सबसे उपयुक्त समय होता है। विद्यार्थियों के अध्ययन का भी यही समय सर्व श्रेष्ठ माना गया है। अध्यात्म वेत्ताओं ने तो उषाकाल को आध्यात्मिक क्रियाकृत्यों हेतु सबसे अच्छा समय बताया है। आसन-प्राणायाम, ध्यान धारणा जैसे योगाभ्यासपरक अध्यात्म उपचारों को अपनाकर जैविक लय की सक्रियता को बढ़ाया और चिरस्थायी बनाया जा सकता है।
कैलीफोर्निया का एक धनी किसान था स्टेनफोर्ड उसका छः हजार एकड़ का एक बड़ा कृषि फार्म था। करोड़ों की आमदनी हर साल होती थी।
उसने बच्चों को स्वावलम्बी बनाया और वह समूची सम्पदा एक विश्वविद्यालय खड़ा करने में लगा दी। इस असाधारण त्याग से अनेकों को जीवन में यथासंभव उदारता बरतने की प्रेरणा मिली।
जहाँ स्तब्धता और नीरसता का साम्राज्य है, वहीं स्थिरता रहती है। यह पसन्द भी पहाड़ों और चट्टानों की है। वे जहाँ के तहाँ जकड़े रहते हैं। न आगे बढ़ते हैं, न ऊँचे उठते हैं, न अन्य किसी प्रकार की गतिशीलता अपनाते हैं। वास्तविक जड़ उन्हें ही कहना चाहिए जो एक स्थिति में प्रसन्न होते रहें। किसी प्रकार निर्वाह होता रहे और समय कटता रहे, इतने में ही उनका संतोष सीमाबद्ध होकर रह जाता है। किन्तु जिनमें अस्तित्व रक्षा और गतिशीलता की उमंग है वे हलचलें अपनाये बिना नहीं रहते।
समुद्र में ज्वार - भाटे आते रहते हैं और पवन में झकोरे - अन्धड़, चक्रवात। नदियाँ उद्गम में ही पालथी मारकर नहीं बैठती। वे दौड़ लगाती हैं और समुद्र तक जा पहुँचती हैं। स्वच्छन्द पशु पक्षी धमाचौकड़ी मचाते और उछलते कूदते, चहचहाते हैं और मौज–मस्ती का परिचय देते हैं। बालक अकारण ही इधर से उधर भागते दौड़ते रहते हैं। कृमि - कीट को एक जगह बैठे चैन नहीं पड़ता। मेघ मालायें अपने यौवनकाल में लम्बी यात्रा पर निकलती हैं और जहाँ जी आता है वहीं घनघोर घटाटोप बरसाती हैं।
पक्षी समूहों को भी प्रवासी जीवन बिताने में मजा आता है। साइबेरिया के पक्षी ऋतु प्रभाव को ध्यान में रखते हुए भारत तक दौड़ आते हैं और जब रुचिकर परिवर्तन होता है तो वहाँ से छोड़छाड़कर अपने पुराने परिचित क्षेत्र में जा पहुँचते हैं। इस कार्य में वे पूरे आवेश के साथ जुटते हैं। हजारों मील लम्बे समुद्रों के ऊपर से उड़ानें भरते हुए बिना विश्राम किए अभीष्ट लक्ष्य तक जा पहुँचते हैं।
जीवन टीले या खड्डे की तरह नहीं है। वह सुदूर क्षेत्रों में बिखरा पड़ा है। खाद्य प्राप्त करने के लिए सभी जीव−जंतुओं को न जाने कहाँ कहाँ भटकना पड़ता है। पानी और छाया की तलाश में भी कम दौड़धूप नहीं करनी पड़ती। शत्रुओं के आक्रमणों से सतर्क रहने एवं बचने के लिए भी सुरक्षित स्थान ढूँढ़ना या बनाना पड़ता है। सर्दी गर्मी की अति होने पर भी अनुरूप वातावरण ढूँढ़ने के लिए एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र की उड़ान भरनी है। यदि ऐसा न होता तो सरोवरों, नदियों और खेतों के लिए यह अतीव कठिन था कि वे अपने स्थान से उठ उठ कर बादलों तक पहुँचते और पानी की याचना करते। हिमाच्छादित शिखर ही गलते हैं और नदी बनकर समुद्र तक पहुँचते हैं। इस प्रकार का लाभ समस्त जड़ चेतन को मिलता है। गति ही व्यवस्थिति रीति से अनुगमन करते हुए प्रगति में परिवर्तित होती है। समृद्धि इसी प्रकार बढ़ती है।
जो जहाँ बैठा है वह वहीं अड़ा न रहे। यदि दुराग्रह अपना रखे हैं तो वापस लौटे। यदि जड़ता ने जकड़ रखा है तो ही यह कहा जाना चाहिए कि स्थिरता ही हमें प्रिय है। ऐसी दशा में अपने को भी यथास्थान रहना पड़ेगा और दूसरों की कुछ सेवा सहायता न वन पड़ेगी।
तीर्थयात्रा की प्रक्रिया इसीलिए भारतीय धर्म में पुण्य मानी गई है कि उस आधार पर प्रगतिशील लोग पिछड़े क्षेत्रों, तक पहुँचते थे, जिस प्रकार अभिभावक अध्यापक पर अपने शिष्य पुत्रों को अपनी बराबरी तक पहुँचाने या उससे भी अधिक ऊँचाई तक ले जाने का प्रयत्न करते हैं। यह इसी आधार पर बन पड़ता है जिस प्रकार स्वाति की बूंदें आकाश से चलकर समुद्र की तलों में पहुँचती हैं और उपयुक्त सीपियों में अपने को घुलाकर नये मोती बनाती हैं। हमें सीमाबद्ध न होकर असीम होना चाहिए और भाषाई, सम्प्रदाई, जाती, लिंगवादी परिबंधनों से ऊँचा उठकर विश्व कल्याण की बात सोचनी और उसी में अपनी क्षमता नियोजित करनी चाहिए।
एक फ्रांसीसी पादरी अफ्रिका के नीग्रो समुदाय के बीच उसकी सेवा के लिए डेरा डाल कर रहते थे। जो थोड़ी बहुत सफलता मिलती उस पर संतोष करते। कभी कभी बहुत अन्ध विश्वासी लोगों से भी उनका पाला पड़ता। वे अति कठोर और कर्मठ भी थे। मत भेद होने पर जान लेने के लिए उतारू हो जाते थे।
ऐसे ही लोगों के बीच एक दिन उन फ्रांसीसी पादरी को फँसना पड़ा। मौत निकट थी। बचने का कोई उपाय न देखकर उन्होंने उन लोगों के अन्धविश्वासों का लाभ उठाना चाहा। उनने अपने को देवता कहा। मुंह में नकली दाँत लगे थे। वे मुँह से बाहर निकाल कर दिखाये और फिर जहाँ के तहाँ लगा दिये। उन समुदाय के सामने यह ऐसा आश्चर्य था जिसे देवता ही दिखा सकते है।
पादरी के पास एक बड़ा दर्पण भी था। उनने सभी जंगलियों को एक एक करके बुलाया और कहा उन्हें अपने देवता का दर्शन करायेगा। इससे पहिले उन लोगों ने कभी दर्पण देखा नहीं था।
हर एक ने दर्पण में अपनी सूरत देखी। वह उन्हें देव प्रतिमा लगी। सभी आदिवासी उनका लोहा मान गये और किसी तरह की हानि न पहुँचाकर सदा उनकी सहायता करते रहने के लिए वचनबद्ध हुए इस कहते है काँटों से काँटा निकालने की चतुरतायुक्त नीति।
ताँत्रिकी के अंतर्गत गुह्य विज्ञान के प्रायः छः प्रमुख अंग हैं-मारण, मोहन, उच्चाटन, वशीकरण, आकर्षण और स्तम्भन। इनमें से पाश्चात्य जगत में जिस शाखा को इन दिनों सबसे अधिक प्रयोग में लाया जा रहा है, वह है मोहनी विद्या। मोहन अर्थात् सम्मोहन। अँग्रेजी में इसे “हिप्नोटिज्म” के नाम से जाना जाता है। ग्रीक भाषा में इसे ही ‘हिप्नोज’ कहा गया है। आखिर यह है क्या? व इसका लाभकारी प्रयोग क्या हो सकता है? इस दिशा में काफी कार्य पाश्चात्य देशों में हुआ है।
सम्मोहन विद्या के अंतर्गत व्यक्ति के शरीर को स्पर्श किये बिना ही कृत्रिम निद्रा का आभास कराया जाता है। मनुष्य को मोह-निद्रा में निमग्न करने का यह एक सर्वश्रेष्ठ तरीका वैज्ञानिकों की समझ में आने लगा है। सम्मोहनकर्त्ता, व्यक्ति की मनःस्थिति को निरख परख कर ही अपनी इच्छा शक्ति के माध्यम से संकेत सूचनाएँ संप्रेषण की क्रिया पूरी करता है।
न्यूयार्क की रुटजर्स यूनिवर्सिटी के चिकित्सा विज्ञानी डा ग्रिफिथ विलियम ने अपनी पुस्तक “एक्सपेरीमेण्टल हिप्नोसिस” में इस तथ्य को उजागर किया है कि क्यों कोई व्यक्ति किसी समय भाव - विभोर हो उठता है? एवं धार्मिक उत्सवों कथा - कीर्तनों अथवा मधुर संगीत को सुनकर अपना सुध-बुध खो बैठता है और सम्मोहन जैसी स्थिति में आ जाता है? इसका कारण बताते हुए वे कहते हैं कि ऐसे समय उसकी प्राण-चेतना निर्दिष्ट और अभीष्ट व्यक्ति अथवा वस्तु की ओर प्रेरित आकर्षित होने लगती है। इस सम्मोहित अवस्था को उनने ‘सोमनोबुलिज्म’ के नाम से संबोधित किया है, उनके कथनानुसार कोई व्यक्ति जब अपनी चेतन अवस्था को विस्मृत करके अचेतन स्थिति में जा पहुँचता है तो मनोविज्ञान की भाषा में इसे ‘हिप्नोगौजिक’ कहा गया है और जाग्रति की अवस्था को ‘हिप्नोपौम्पिक। दोनों ही प्रकार की अवस्था के सम्मिश्रित स्वरूप को ‘हिप्नोइडल ट्राँस’ के नाम से पुकारा जाता है। कृष्ण मूर्ति ने इसी को ‘च्वाइसलैस अवेयरनेस’ की संज्ञा दी है। जिसके अंतर्गत व्यक्ति अनिश्चय की स्थिति में हो जाता है कि क्या करना चाहिए और क्या नहीं? यही अवस्था है जिसमें व्यक्ति के पिछले जन्मों के इतिहास को सुगमता पूर्वक जान सकना संभव हो पाता है।
भारतीय मनःशास्त्र के विशेषज्ञों का कथन है कि व्यक्ति के मनःसंस्थान की गति विधियों के संचालन में जाग्रति स्मृति और धृति तीन प्रकार की अवस्थाएँ दृष्टिगोचर होती हैं। जाग्रतावस्था में मन प्रत्यक्षतः ज्ञानेन्द्रियों की अनुभूतियां उपलब्ध करता है। जन्म जन्मान्तरों की चिरसंचित ज्ञान-सम्पदा का बोध “स्मृति” के माध्यम से होता है। जबकि “धृति” मन की सूक्ष्मतर अवस्था है, जिसमें विचार-संप्रेषण की विधि-व्यवस्था बिठाकर एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति की मनःस्थिति एवं परिस्थितियों से अवगत हो सकता है। हठयोग प्रदीपिका में लिखा है कि एकाग्रचित्त होकर मनुष्य किसी सूक्ष्म वस्तु को सामने रख कर तब तक देखे जब तक आँखों में आँसू न आ जायें। योग विद्या के निष्णातों ने इसे त्राटक साधना कहा है जिससे नेत्र रोग तंद्रा और आलस्य दूर होते हैं। दूसरे के मन की बातें जान लेना, प्रभावित करता, मूर्छित करना इसी के द्वारा संभव है। योग-ग्रन्थों में वर्णित ध्यान बिन्दु साधना इसी को कहा गया है, जिसमें बिना आँख बंद किये दोनों भौंहों के बीच ध्यान किया जाता है। पाश्चात्य चिकित्सा विज्ञानी इस को “सेल्फ हिप्नोटिज्म” और ‘औटोहिप्नोटिज्म’ के नाम से पुकारने लगे हैं।
कोलम्बिया यूनिवर्सिटी के चिकित्सा विज्ञानी डा हरवर्ट स्पेगल ने सम्मोहन विद्या के ऊपर लम्बे समय तक शोध कार्य किया है। तदुपरान्त वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि सम्मोहन विद्या की चिकित्सा संबंधी सफलता सम्मोहनकर्त्ता की योग्यता एवं कुशलता पर निर्भर करती है। सम्मोहन विद्या के निष्णात का सर्व प्रथम कार्य तो रोगी को कृत्रिम ढंग से निद्रा का आभास कराना होता है फिर उसके अंतर्मन में संकेत सूचनाएँ पहुँचाना निद्रावस्था में शरीर तो प्रायः निष्क्रिय पड़ जाता है, पर मन की गति अविरल बनी रहती है। अतः मन को साँसारिक विषयों से हटा कर विचार शून्य बनाया जाता है। फिर उसके मस्तिष्क में सत्प्रवृत्तियों के प्रविष्ट होने का अवसर मिलता है।
व्यक्ति में आत्म-विश्वास उत्पन्न करके उसकी मानसिक दुर्बलताओं को हटाने, मिटाने की यह सर्वोत्तम चिकित्सा समझी गयी है।
मौन्टीफायोर हॉस्पीटल न्यूयार्क के मनःचिकित्सक एवं शारीरिक गठान विकृति रोग विशेषज्ञ (औनकोलोजिस्ट) डा पाँलसेसरडोट के अनुसार समस्त आधि-व्याधियों का एक मात्र कारण मानसिक विकृति ही है। सम्मोहन-चिकित्सा का मूल प्रयोजन मनःसंस्थान के धृति क्षेत्र की इसी विकृति को परिष्कृत एवं परिमार्जित करना होता है, जिसके फलस्वरूप रोगी अपने किये हुए दुष्कृत्यों पर आगे खेद प्रकट न करने का संकल्प बल उभारता और आरोग्य लाभ प्राप्त करता है। उनने अपने प्रयोग परीक्षणों से यह सिद्ध कर दिखाया है कि सम्मोहन के द्वारा लम्बे समय से चली आ रही मानसिक आधियों में 20 प्रतिशत तक पूर्णतः कमी आई और 60 प्रतिशत तक आँशिक। इस विद्या का प्रयोग शारीरिक और मानसिक दोनों प्रकार के रोगों में सफलतापूर्वक और किया जा सकता है। दमा, आँतों की सूजन, दुर्बलता नपुंसकता अधशीषी और उच्च रक्त चाप जैसे रोगों के उपचार में इससे काफी सफलता मिल चुकी है। इतना ही नहीं, मानसिक तनाव से मुक्ति पाना भी इस उपचार पद्धति के माध्यम से सरल हो गया हैं
हारवर्ड मेडिकल स्कूल के सम्मोहन विद्या विशेषज्ञ एवं मनःचिकित्सक डा फ्रेड फ्रैंकल ने सम्मोहन चिकित्सा में ध्यानमुद्रा को अधिक प्रभावशाली बताया है, जिसके अंतर्गत सर्व प्रथम मांसपेशियों को तनाव मुक्त किया जाता है। तदुपरान्त रोगी अपने निषेधात्मक दृष्टिकोण समाविष्ट करने का उपक्रम करता है। रोगोपचार की इस विधि−व्यवस्था को उनने “सल्फ-सजेशन” अर्थात् “आत्म-निर्देशन” की संज्ञा दी है। उनने इस उपचार पद्धति के चार स्वरूप बताये हैं, जो इस प्रकार है। (1) इनडक्शन (2) डीपनिंग (3) सजश्षन (4) कमिंग आउट इत्यादि। इनडक्शन के अंतर्गत रोगी व्यक्ति स्वयं को सबसे पहले शिथिलीकरण मुद्रा में लाता है, जिससे उसका शारीरिक एवं मानसिक तनाव कम हो। सम्मोहन की “डीपनिंग” प्रणाली में मनःक्षेत्र की गहराई में उतरा जाता है, जिसके परिणाम स्वरूप व्यक्ति अपनी मूलसत्ता को समझ सके। भारतीय योग विद्या में जिस तरह मानसिक परिष्कार के लिए जप का विधान है, पाश्चात्य जगत में इसी प्रयोजन के लिए ‘डीपनिंग’ का निर्धारण है। सजेशन की प्रणाली को क्रियान्वित करने के लिए व्यक्ति अपने अचेतन मन को विधेयात्मक पोषण देता है। इस नियमित पोषण के कारण मन धीरे धीरे उसे स्वीकार लेता है और स्वयं का उसी रूप में अनुभव करने लगता है। “कमिंग आउट” समग्र प्रक्रिया का अन्तिम और चौथा चरण है। इसके द्वारा क्रिया की समाप्ति की जाती है।
सुप्रसिद्ध सम्मोहन चिकित्सक एवं “सेल्फ हिप्नोसिस” पुस्तक के लेखक विलियम जे. ओसकी ने भारतीय योगशास्त्र का बड़ी गहनता से अध्ययन किया है। उसमें वर्णित ध्यान बिन्दु योग के बारे में उनका कहना है कि यह “हिप्नोसिस” का ही एक प्रकार है और इसके माध्यम से भी वही लाभ हस्तगत किये जा सकते है, जो सम्मोहन द्वारा। इसी कारण उनने इसका नाम “सेल्फ हिप्नोटिकट्राँस” रखा है।
भारत की इस प्राचीन विद्या की प्रशंसा करते हुए प्रमुख अमेरिकी पत्रिकी “र्नोथवेस्ट मेडिसिन” में सेनफ्राँसिस्कों के सुप्रसिद्ध स्त्रीरोग विज्ञानी डा डैविड चीक कहती हैं कि यह खुशी की बात है कि आज इस पौर्वात्य विद्या का लाभ समस्त संसार उठा रहा है। अकेले कैलीफोर्निया में इसके 930 चिकित्सक हैं, जो विभिन्न प्रकार के शारीरिक मानसिक रोगों में अब तक अच्छी सफलता प्राप्त कर चुके हैं। उनका कहना है कि यदि इस विद्या का सही ढंग से उपयोग किया जा सके, तो लम्बी और क्राँनिक मानी जाने वाली मानसिक व्याधियों व मनोविकारों से छुटकारा पाया जा सकता है। यही आज सबसे अधिक संख्या में जनमानस में घर किए बैठी हैं। यदि यह उपचार व्यावहारिक स्तर पर जन सुलभ बनाया जा सके तो मानव जाति की अच्छी सेवा की जा सकती है।
पत्थर की एक बड़ी चट्टान शिकायत कर रही थी कि वर्षा के दिनों मेरे चारों ओर वाले खेतों में हरियाली छा जाती है पर मुझे ऐसे ही दुर्भाग्य से घिरा रहना पड़ता है, एक घास का तिनका तक मेरे ऊपर नहीं उगता विधाता का कैसा पक्षपात है?
बादलों ने कहा इसमें हमारा दोष नहीं है। खेतों ने अपनी मिट्टी को सीली रखा है और उसमें उर्वरता सजाई है। इसी कारण वे वर्षा होते ही लहलहाने लगते हैं। एक तु हो जिनने कठोरता और कृपणता की नीति अपना रखी है न किसी को सहयोग देते हो न किसी से लेते हो ऐसी दशा में संकीर्ण लोगों को जिस प्रकार खाली हाथ रहना पड़ता है वही हाल तुम्हारा भी होता है।
विचारों की शक्ति पर अपने समय में काफी विचार हुआ है और यह माना गया है कि ध्वनि, प्रकाश और ताप की तरह चेतना क्षेत्र में विचारों की भी एक जीवन्त शक्ति है। इसकी महत्ता मानते हुए अध्ययन अध्यापन का क्रम चला है। स्वाध्याय और सत्संग की व्यवस्था हुई है। परामर्श और प्रवचन की शैली का विकास हुआ है। सही सोचने के सत्परिणाम और गलत ढंग से सोचने के दुष्परिणामों का विस्तारपूर्वक विवेचन हुआ है।
विचारों ने विचारों का काटा है और विचारों ने विचारों का समर्थन एवं पोषण किया है। एकता और विग्रह के मूल में सशक्त विचारों को ही काम करते पाया है। व्यक्तियों और समाजों को ऊँचा उठाने और नीचे गिराने में विचारों की असाधारण भूमिका रही है। पिछली शताब्दी में दो महान क्रान्तियाँ हुई हैं। एक में राजतंत्र की अनुपयुक्तता सिद्ध करके उसके स्थान पर जनतंत्र की महत्ता प्रतिपादित की है। रूसो के इस प्रतिपादन को समस्त संसार में आँधी तूफान जैसी मान्यता मिली। इसके थोड़े ही समय उपरान्त शासन का स्वरूप साम्यवाद परक हो, इसकी वकालत कार्लमार्क्स ने की और वे विचार आज आधे से अधिक जन समूह में मान्यता प्राप्त कर चुके हैं। शासन को छोड़कर समाज का स्वरूप निर्धारण करने में विचारों की प्रचण्ड लहरें अपना जादुई प्रभाव प्रस्तुत करती रही हैं। दास प्रथा का उन्मूलन, नारी को समानता के अधिकार, जन साधारण के मौलिक अधिकारों की मान्यता विचारों की प्रचण्ड लहरों के फलस्वरूप ही सींव हो सकी। कारखानों में मजूरों के अधिकारों की मान्यता जैसे परिवर्तन इन्हीं दिनों व्यवहार में आये हैं। नर-नारी की समानता, जमींदारी उन्मूलन जैसे कार्यों के लिए कोई बड़े संघर्ष नहीं हुए, विचारों के तीव्र प्रवाह ने ही इन्हें सहज संभव कर दिखाया। सहकारी, आन्दोलन की स्थापना और प्रगति ने जमींदारी, साहूकारी प्रथाओं को उखाड़ फेंका। छूत अछूत का भेदभाव समाप्त होना प्रगतिशील विचारों का ही प्रतिफल है।
कुछ समय पहले तक मान्यता थी कि धनबल, बाहुबल और शस्त्रबल ही किसी की प्रगति का आधार हैं। अब वह सामंती विचारणा पीछे पड़ गई और माना जाने लगा है कि व्यक्तिगत जीवन का उत्थान-पतन विचारों की उत्कृष्टता निकृष्टता पर निर्भर है। अब समाज सैन्यबल पर नहीं विचार बल पर समर्थ और दुर्बल बनते हैं। विचार विनिमय अब कूटनीति का भी एक महत्वपूर्ण पहलू बन गया है। राष्ट्रों और जातियों की मजबूती और कमजोरी में विचारधारा की प्रमुखता की प्रधान भूमिका रहती है। व्यक्ति निजी जीवन में किस कारण उठता गिरता हैं इसे अब विचारों के आधार पर निर्भर मान लिया गया है। शासन सत्ताएँ इसी आधार पर आये दिन उलट-पुलट होती रहती हैं। जन मानस को दिशा दे सकने में समर्थ व्यक्तियों को अब सच्चे अर्थों में बलवान माना जाने लगा है। पत्र-पत्रिकाओं और पुस्तकों को अब मनोरंजन का विषय नहीं सामर्थ्य का पुँज माना जाने लगा है।
विचार-माध्यम से ही विज्ञान का आविर्भाव हुआ है। विज्ञान की अनेकानेक शाखा प्रशाखाओं का आज प्रचलन हैं उनके प्रयोग परीक्षण के लिए यंत्र उपकरणों का निर्माण हुआ है किन्तु उसके मौलिक आविष्कार की रूपरेखा चिन्तन के माध्यम से ही संभव हुई है। विज्ञान का प्रयोग मशीनों के माध्यम से होता है। पर उन मशीनों का आविष्कार, आविर्भाव मनुष्य के बुद्धिबल से ही हुआ है। आकाशगमन, उपग्रह, कम्प्यूटर, अणु शक्ति आदि अनेकों, एक से एक विचित्र विज्ञान की शाखाएँ कार्यरत दिखाई पड़ती हैं। पर यह सब आकाश से नहीं टपका है। मनुष्य के चिन्तन ने ही इनका सूत्रपात किया है और उन्हें क्रियारत होने की स्थिति तक पहुँचाया है।
विचार विज्ञान की ही एक शाखा श्रद्धा है। इसके वैज्ञानिक प्रयोग हिप्नोटिज्म माध्यम से होते हैं। व्यक्ति को सम्मोहित करके उसके बिना दर्द के आपरेशन होने लगे हैं। दाँत उखाड़ने में तो यह कला बहुत आगे बढ़ गई हैं सूत्र करके दाँत उखाड़ने की अब आवश्यकता नहीं पड़ती जादुई खेलों में इसका अच्छा खासा उपयोग होता है। दर्शकों के समूह में मतिभ्रम उत्पन्न करके कुछ के बदले कुछ दृश्य दिखाये जाते हैं। रस्सी पर मनुष्य का चढ़ जाना और ऊपर से शरीर के टुकड़े-टुकड़े करके गिराना। बाद में असली शरीर को ज्यों का त्यों दिखा देना। हिप्नोटिज्म का खेल है। इस दिशा में अब भारी प्रगति हो चुकी है।
यह साधारण खेल खिलवाड़ जैसी बात हुई। शारीरिक और मानसिक चिकित्सा में अब इस विद्या के महत्वपूर्ण प्रयोग होने लगे हैं। यह श्रद्धा विज्ञान का एक अंश है। भूत, प्रेत और देवी देवताओं द्वारा विचित्रताएँ प्रदर्शित होने और लाभ हानि के प्रतिफल सामने आने की घटनाएँ श्रद्धा पर अवलम्बित हैं। “शंका डाकिन मनसा भूत” की उक्ति शत प्रतिशत चरितार्थ होती है। रात्रि के अँधेरे में डरपोक व्यक्तियों को झाड़ी भूत बनकर दिखाई देती है। पीपल के पत्तों की खड़खड़ाहट में ऐसा डर लगता है जिससे भयभीत होकर कई व्यक्ति बीमार पड़ जाते और हृदय की धड़कन बन्द हो जाने जैसी विपत्ति के ग्रास बन जाते हैं।
पारिवारिक सम्बन्धों में छोटों को बड़ों के प्रति जो विश्वासयुक्त प्रेम होता है उसे भी श्रद्धा कहते हैं। बच्चों का अभिभावकों के प्रति, पत्नी का पति के प्रति, छात्रों का गुरुजनों के प्रति जो गहरा सद्भाव है। वह श्रद्धा कहा जाता है। यह अनुशासन के रूप में दृष्टिगोचर होता है। यह सद्गुण है। इसका परिणाम दोनों पक्षों के लिए श्रेयस्कर होता है। यदि छोटे बड़ों के प्रति श्रद्धा रखेंगे तो उसके कार्यों के प्रति गहरी सद्भावना रहेगी। जो कहा गया है, पढ़ा गया है उस पर गहरी आस्था रहेगी और कथन हृदयंगम होता चला जायगा। बदले में बड़ों का सहज वात्सल्य भी मिलेगा। दोनों ओर का यह आदान-प्रदान शिक्षा की सफलता के लिए श्रेयस्कर है। इसका प्रतिफल अनुशासन के रूप में दृष्टिगोचर होगा। ऐसे परिवारों में सद्भाव का सहज आदान-प्रदान होता रहता है और दोनों पक्ष एक दूसरे के लिए असाधारण सहायक सिद्ध होंगे। इसमें दोनों पक्षों का हित है।
महापुरुषों के सम्बन्ध में श्रद्धा होने का अर्थ है उनके जीवन से प्रभावित होना। उनकी शिक्षाओं का हृदयंगम करना उनके निर्देशों और क्रिया-कलापों में हाथ बँटाना। इससे परोक्षतः महापुरुषों को भी अपने मिशन का विस्तार करने में सहायता मिलती हैं उनकी शिक्षाओं से लोग अधिक लाभ उठा पाते हैं। श्रद्धा जो व्यक्तियों को परस्पर जोड़ने का सर्वोत्तम माध्यम है। मित्रों के बीच छोटे बड़े का अन्तर रहने पर भी गुणों के आधार पर गहरी श्रद्धा हो सकती है। यह सामान्य मित्रता से बहुत आगे की चीज है।
आदर्शों के प्रति श्रद्धा होने का अर्थ है कि उनका परिपालन भली प्रकार हो सकेगा और निभ सकेगा। आदर्शों की सामान्य जानकारी समझना और औचित्य मानना एक बात है और श्रद्धा होना दूसरी। जिन सिद्धांतों के प्रति श्रद्धा होगी व्यक्ति उन्हें तोड़ने के लिए ललचायेगा नहीं वरन् दृढ़ता पूर्वक उनका निर्वाह करता रहेगा। यदि मान्यता उथली है तो कहा नहीं जा सकता कि परीक्षा की घड़ी आने पर वह निभेगा या नहीं।
अध्यात्म क्षेत्र में तो श्रद्धा ही सफलता का मूलभूत आधार है। किसी देवता या मंत्र के प्रति श्रद्धा है तो उसकी सामान्य साधना बन पड़ने पर भी उसके चमत्कारी परिणाम होते हैं। इसके विपरीत श्रद्धा के अभाव में कोई उपासनात्मक कर्म-काण्ड ढेरों समय लगाकर करते रहने पर भी कहने लायक प्रतिफल नहीं होता।
रामायण में श्रद्धा को भवानी और शिव को विश्वास की उपमा दी है और कहा है कि इन दोनों के बिना हृदय में विराजमान होते हुए भी इष्ट देव का दर्शन, अनुग्रह नहीं होता। इससे प्रकट है कि जितनी किसी देवता या मंत्र में शक्ति है उसकी तुलना में सघन श्रद्धा किसी प्रकार कम नहीं पड़ती।
किसी कार्य की गरिमा के प्रति श्रद्धा रखते हुए सच्चे मन और पूरे परिश्रम के साथ जुड़ जाना सफलता का सुनिश्चित पथ प्रशस्त करना है।
एक व्यक्ति को सिद्धि प्राप्त करने की इच्छा थी। इसके लिए वह ऐसे देवता की तलाश करने लगा जो सबसे अधिक प्रतापी हो।
इस दृष्टि से उसने सूर्य को ठीक पाया और उनकी पूजा करने लगा। एक दिन घने बादल आये। बादलों ने सूर्य को ढक लिया। उसने सूर्य की पूजा बन्द करके बादलों की आराधना आरम्भ कर दी। इस प्रकार कुछ ही यमष् बाद देखा कि पवन में अधिक शक्ति है वह बादलों को देखते देखते उड़ा ले जाता है। अब उसने पवन को इष्टदेव बनाया। कुछ दिन बाद उसने देखा कि पर्वत पवन को प्रवाह रोककर उसे उलटा लौटा देता है। अब पर्वत पूजन आरंभ हुआ।
विचार करने पर देखा गया है कि मनुष्य ही पहाड़ों को तोड़ फोड़ देता है। उन्हें काट कर रास्ते और जल-प्रवास निकालता है। अस्तु मनुष्य बड़ा ठहरा। उसने अपने आपे को ही पूजना समुन्नत सुसंस्कृत बनाना आरंभ कर दिया और उसका प्रतिफल भी हाथों हाथ मिला।
निराश मानवजाति को इन दिनों आशा की किरण कहीं नजर आती है तो वह पूर्व की ओर भारत की ओर ही दृष्टि डालते है। हमारी आज की परिस्थितियाँ, गरीबी, असंतोष, विग्रह, आदि देखकर किसी को आश्चर्य हो सकता है कि यह देश किस बलबूते नेतृत्व कर सकेगा? आइये! जरा नजर डाले - मनीषियों, चिन्तकों, भविष्यवेत्ताओं की दूरदृष्टि सम्पन्न महामानवों के मंतव्यों पर!
भारत विश्व का नेतृत्त्व करेगा -हरमन काँन,
मागरेट मीड“दुनिया कहाँ जा रही है?” इस शीर्षक से फिल्म बना रहे अमेरिकन टेलीविजन संवाददाता केल्विन सैर्ण्डस ने डा. मार्गरेट मीड (अब स्वर्गीय), हरमन काँन एवं विलियम थामसन का इंटरव्यू कुछ वर्ष पूर्व लिया था। यू. एस. आई. एस. द्वारा प्रकाशित पत्रिका “स्पाँन” में छपे इस साक्षात्कार में अमेरिकन म्यूजियम ऑफ नेचुरल हिस्ट्री की अध्यक्षा, नृतत्व विज्ञानी स्व0 मार्गरेट मीड तथा हडसन फ्यूचरालॉजी इंस्टीट्यूट के निदेशक हरमन काँन ने यह आशावादी भविष्यवाणी की कि निश्चित ही तृतीय विश्व का भविष्य उज्ज्वल है। उसे अंततः पूरी मानवजाति का नेतृत्त्व जो करना है। उनका कहना था कि इक्कीसवीं शताब्दी में प्रवेशकर जो पीढ़ी भविष्य का फैसला करेगी, वह भारत, जापान व चीन में जन्म ले चुकी है। इन तीनों देशों का अगुआ भारत होगा एवं यह राष्ट्र पाश्चात्य देशों की तनावभरी, गलैमरभरी दुनिया से विश्व मानवता को उबार कर विकेन्द्रीकृत - प्राकृतिक जीवन - व्यवहार की नीति संबंधी मार्गदर्शन करेगा। वे कहते हैं कि हमारी भविष्यवाणी तीर–तुक्का नहीं, बल्कि आँकड़ों व वर्तमान की गतिविधियों पर आधारित है। हरमन कान का मत था कि गाँधीवादी अर्थशास्त्र ही अगले दिनों विश्व की अर्थ संबंधी आचार संहिता बनेगा। “ पूर्व की अध्यात्म प्रधान भौतिकता से समन्वित एवं समग्र विश्व संस्कृति का अगले एक दशक में विकास” वे एक सुनिश्चित संभावना कहते हैं। इसे उनने “पैथेगोरियन सिन्थेसिस” नाम दिया है।
भारत बनेगा एक सुपरपावर
अमेरिका के आर्थिकी विशेषज्ञ एवं कम्प्यूटर के आधार पर सही - सार्थक भविष्यवाणी करने वालों में प्रमुख लिन्डन एच. लाराँच का मत है कि भारत अन्यान्य साधनों की दृष्टि से तो समृद्ध है ही, अपने प्रखर प्रतिभाशाली युवा बुद्धिजीवियों के कारण वह साँस्कृतिक, आर्थिक एवं भौतिक सभी क्षेत्रों में “सुपर पॉवर” बनकर ही रहेगा। इस अवधि को उनने 1995 से 2005 में मध्य बताते हुए पी. टी. आय को दी हुई एक भेंटवार्ता में कहा कि अगले कुछ वर्षा की राजनैतिक उथल-पुथल के बाद अध्यात्म शक्ति सम्पन्न तेजस्वी भारतवासी क्रमशः एशिया एवं फिर सारे विश्व की महाशक्तियों का अगुआ बनकर उन्हें मार्गदर्शन देंगे।
इक्कीसवीं सदी युवकों की होगी
युवा वर्ष के उद्घाटन भाषण में पिछले दिनों हमारे प्रधानमंत्री श्री राजीव गाँधी ने कहा कि “भारत में इकहत्तर प्रतिशत जनसंख्या युवा वर्ग की है, भारत के साँस्कृतिक परिवेश में पला-बढ़ा युवा वर्ग जितना शक्तिशाली है उसे देखकर हमें विश्वास करना चाहिए कि आने वाली सदी इन्हीं युवकों की होगी।”
यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि इन दिनों विश्व में मनीषियों-राजनीतिज्ञों को सबसे बड़ा खतरा है - युवा वर्ग पर बढ़ता हुआ दवाओं के जहरीले नेश का शिकंजा! राष्ट्रीय सुरक्षा बजट के समकक्ष ही नई अमेरिकी सरकार ने नशे से लड़ने का बजट रखा है। इससे ज्ञात होता है कि विश्व-मानवता भटकी हुई युवा चेतना से कितनी चिन्तित है। ये वही युवक हैं जिनके विषय में स्वामी विवेकानन्द ने कहा था कि “यदि भारत के सौ युवक भी जाग जायँ तो सारे विश्व को उलट - पलट कर रख देंगे।” स्वामी जी की वाणी भारत से ही साकार होगी, यह सुनिश्चित लगता है।
आ रहा है तारनहार इन बारह वर्षों में
जाँन हाँग नामक एक मनीषी जिन्होंने नाँस्ट्राडेमस की भविष्यवाणी की व्याख्या नये सिरे से की है, इसी विषय के विशेषज्ञ माने जाते हैं। उनकी हाल की प्रकाशित पुस्तक “नास्ट्राडेमस एण्ड दी मिलेनियम” में उनने लिखा है कि ‘संकट और चुनौती से भरे आगामी बारह वर्षीय कालखण्ड में एक नई साँस्कृतिक चेतना का उदय होगा, जो सदी के अंत तक अपनी चरम सीमा पर होगी। यह नई चेतना विश्व चेतना में रूपांतरित हो जायेगी, एवं उसके फलस्वरूप हमारे इस सुन्दर ग्रह पृथ्वी पर हक हजार वर्षों एक शान्ति ही शान्ति सभी ओर संव्याप्त होगी, इसे “एज आफ ट्रूथ” कहा जायेगा तथा अध्यात्म एवं विज्ञान का अद्भुत समन्वय होगा। यह वे नाँस्ट्राडेमस की लिखी हुई भविष्यवाणी की नये सिरे से की गयी व्याख्या के संदर्भ में लिखते हैं।
ऐसी होगी इक्कीसवीं सदी की दुनिया
मद्रास में जन्मे ब्रिटिश नागरिक “राबर्ट वाँल्ड” जिसकी गिनती विश्व के जाने माने भविष्य विज्ञानियों में होती है, ने अपनी पत्नि के साथ एक पुस्तक लिखा है “टेम्स ....”। वे अपनी इस क्रान्तिकारी पुस्तक में लिखते हैं कि “आने वाले दिनों में संचार माध्यम एक व्यापक क्रांतिकारी मोड़ से गुजरेंगे। टेलीविजन के माध्यम से अखबार पढ़े जायेंगे जिन्हें मुद्रित करके भी टेलीविजन दे देगा। एक साथ चालीस कार्यक्रम टेलीविजन पर देखे जा सकेंगे एवं मनोरंजन के स्थान पर टेलीविजन ज्ञान संचार का, लोकमानस के परिष्कार का काम करेगा।” सूचना बंक और इलैक्ट्रानिक डिलीवरी का कार्य भी यही संचार माध्यम करेगा। स्टूडियो में बैठे अध्यापक सुदूर देहातों में बैठे विद्यार्थियों को, नव साक्षरों को ज्ञान-विज्ञान की नवीन जानकारी देते रहेंगे एवं इस प्रकार खुले विश्वविद्यालय की भूमाक निभायेंगे।” लेखक द्वय कहते हैं कि “अगले दिनों माँस का विकल्प सोयाबीन तथा समुद्र की काई के रूप में उपलब्ध होने के कारण लोग क्रमशः माँसाहार छोड़ देंगे एवं उनका चिंतन सात्विक होता हुआ चला जायगा। जनसंख्या बढ़ेगी तो स्थान की कमी होगी उसे रेगिस्तानों में शीत गृह बसाकर एवं समुद्र की लहरों पर तैरते हुए शहर बसाकर इस कमी को पूरा कर लिया जायगा। जिस विधि से पौधे भोजन का निर्माण करते हैं उसी विधि से मानव भी प्रयोगशाला में ढेरों भोजन बनाने लगेगा। अगली सदी में शुद्ध हवा के लिए प्रति व्यक्ति ढ़ाई वर्ग मीटर घास उपलब्ध रहेगी एवं लोगों को डाक्टरों की दुकानों पर लम्बी लाइनें लगाने से मुक्ति लिए जायेगी। यह इसलिए कि रागों के लक्षण, रोगी की स्थिति तथा निदान के परिणाम स्वयं रोगी अपने कम्प्यूटर में भर कर, न केवल अपना बल्कि ऐसे हजारों व्यक्तियों का नुस्खा तैयार करके दे देगा। संचार उपग्रहों से शल्य चिकित्सा सम्पन्न की जायेगी।”
भारत की संसार को जरूरत है-महर्षि अरविंद
अपने निर्वाण से कुछ दिनों पूर्व श्री अरविंद ने कहा था कि भारत नष्ट नहीं हो सकता। क्योंकि सम्पूर्ण मानवजाति के भविष्य के लिए भारत की सर्वाधिक आवश्यकता है। अगले दिनों भारतवर्ष से ही सारे संसार का धर्म निकलेगा - वह शाश्वत सनातनधर्म जो सब धर्मो में विज्ञान और दर्शन में समन्वय करेगा और मानवजाति को एक झण्डे तले ला खड़ा करेगा। नैतिक क्षेत्र में अभी भारत को मानवजाति की म्लेच्छता, गँवारुपन एवं अशिष्टता मिटाकर सारे संसार को आये बनाना है और इसी कार्य के लिए भारतवासी सर्वप्रथम अपने आपको गढ़ेंगे एवं परिवर्तन चक्र पूरे विश्व में फैलायेंगे।
भारत दुनिया का सरताज होगा-एडमंड हिलेरी
शेरपा तेनसिंग के साथ एवरेस्ट के प्रथम विजेता एवं सम्प्रति भारत में न्यूजीलैण्ड के उच्चायुक्त सर एडमंड हिलेरी ने पिछले दिनों भारत के साँस्कृतिक परिवेश से अपनी तादात्म्यता का परिचय देते हुए कहा कि “विश्व का यह सबसे बड़ा लोकतान्त्रिक देश चुनौतियों को स्वीकार करने की क्षमता रखता है। अपने साँस्कृतिक विरासत के बलबूते ही भारत विश्व की महाशक्ति क रूप में विकसित होकर रहेगा।
प्रिय व्यक्ति के लिये भी मानवता के सिद्धांत ताक पर मत रखिये।
अब यह स्पष्ट होता जा रहा है कि युग संधि के बारह वर्षों में समस्त विश्व को समझदारी, ईमानदारी, जिम्मेदारी, बहादुरी और दयानतदारी का पाठ नये सिरे से पढ़ाना होगा। बिखराव और टकराव को एकता-समता के केन्द्र पर केन्द्रीभूत करना पड़ेगा। इसके बिना शक्तियों का दुरुपयोग रोकना और उन्हें सृजन के सत्प्रयोजनों में नियोजित कर सकना संभव न होगा। उज्ज्वल भविष्य की संभावना इतना बन पड़ने पर ही सुनिश्चित हो सकतीं हैं। इस अति महत्वपूर्ण और अति व्यापक तैयारी के लिए करोड़ों की संख्या में सृजन शिल्पियों को विभिन्न मोर्चों पर उतरना पड़ेगा। अभाव साधनों का नहीं है। शक्ति सम्पादन के स्रोत भी अगणित हैं। कुशलता भी बड़ी मात्रा में मनुष्य समुदाय ने अर्जित कर ली है। कमी केवल एक ही पड़ रही है - उदारमना, प्रतिभाशाली व्यक्तित्वों की। यदि उन्हें जुटाया जा सके तो अन्य सभी कमियों को पूरा करना और समस्याओं को हल कर लेना कुछ भी कठिन न रह जाएगा।
इस दिनों करने योग्य तो अनेक काम हैं। गरीबी हटाओ, शिक्षा बढ़ाओ, साधन जुटाओ जैसे कार्यों को प्रमुखता दी जा रही है सो ठीक है, पर इससे भी अधिक प्रमुखता देकर उस कमी को पूरा करना है जिसके आधार पर जनज न में नव चेतना का संचार संभव हो सके। स्मरण रहे कि जले हुए दीपक ही दूसरे को जला पाने में समर्थ हो सकते हैं। दीपकों का अनुकरण करने के लिए प्रत्यक्ष आधार खड़े करना ही वह समर्थ माध्यम है जिसके सहारे विचारणाओं, मान्यताओं और तदनुरूप गतिविधियों का उच्चस्तरीय सूत्र संचालन संभव हो सकता है। इन बारह वर्षों में इसी अभाव को पूरा करने की बात को प्रमुखता दी जानी चाहिए।
अखण्ड-ज्योति परिवार ने अपने समुदाय में से एक लाख सृजन शिल्पी विश्व मानवता के चरणों पर अर्पित करने का संकल्प लिया है। उस पूरा करने में प्राणपण से कटिबद्ध भी होना है। योजनाबद्ध रूप से प्रयत्नशील होने पर ही भारी भरकम लक्ष्य तक पहुँचना संभव हो सकेगा। यों समग्र आवश्यकता को देखते हुए सृजन शिल्पियों की यह संख्या दिखती तो है बहुत कम, परन्तु आशा की जानी चाहिए कि प्रचलन चल पड़ने पर पुर्जा दूसरे को धकेलते घसीटते हुए समय की महती माँग का, कुछ कहने लायक अंश पूरा कर सकेगा।
संबद्ध लोगों में से भावनाशीलों को शान्तिकुँज में नौ दिवस वाले और एक महीने वाले वरिष्ठ परिजनों के लिए निर्धारित सत्रों में सम्मिलित होने के लिए बुलाया गया है। औसत साढ़े आठ हजार वार्षिक अर्थात् प्रायः 700 व्यक्तियों को प्रतिमाह आवश्यक प्रेरणा और प्रतिभा देकर उन कार्यों में जुटाना है, जिनके आधार पर नव युग का वातावरण बन सके, इक्कीसवीं सदी के उज्ज्वल भविष्य का आधार बनने वाला प्रभात पर्व अपने उदय का प्रमाण परिचय दे सके। यह अपनी हिस्सेदारी है। आशा की जानी चाहिए कि इस मॉडल को खड़ा होते देख कर अन्यान्य प्रतिभाएँ भी अपने अपने हिस्से का दायित्व सम्हालेंगी और समग्रता के लिए जो शेष है उसे पूरा करेंगी।
धर्मतन्त्र को माध्यम बनाकर, लोक शिक्षण की प्रक्रिया आशातीत उत्साह के साथ चल रही है। कोटि व्यक्तियों के दरवाजों पर अलख जगाने और नव सृजन की प्रेरणा उभारने का काम चल रहा है। दीप यज्ञों को प्रचार आयोजनों का स्वरूप दिया गया है। उनमें सम्मिलित होने वाले युग चेतना को ज्वलन्त बनाने के लिए समय दान-अंशदान का संकल्प लेते हैं। युग साहित्य के पठन श्रवण से, साप्ताहिक सत्संकल्पों के माध्यम से उनकी संगठन-आत्म साधना और नव सृजन के क्रिया-कलापों को कार्यान्वित करने की विधा, क्रमबद्ध रूप से चलती रहती है। इसी समुद्र मंथन में से कुछ उदीयमान प्रतिभाएँ हस्तगत होती हैं। इन्हें शान्तिकुँज के सत्रों में सम्मिलित होने की प्रेरणा दी जाती है। कुम्हार अपने कच्चे बर्तनों को सुखाकर इकट्ठे करता और आँवे में एक साथ पकाता है। इसी प्रक्रिया का एक रूप शान्तिकुँज की शिविर योजना है, जो इन सत्रों के माध्यम से आरम्भ से ही चल रही है और लक्ष्य पूरा होने तक अनवरत रूप से चलती ही रहेगी।
स्कूली शिक्षण तो गाँव गाँव चल सकता है। उसके लिए उपयुक्त शिक्षा प्राप्त शिक्षक भी पाठ्यक्रम पूरा करा सकते हैं। पर जहाँ तक भाव संवेदनाओं के लिए अमेरिका ने भारत सरकार से वैसी ....प्राप्त करने के लिए प्रयत्न भी किया है। .... उपयुक्त स्थान संसार में अन्यत्र मिला नहीं। ....के कजाकिस्तान व अजरबेजान क्षेत्र में जितनी ....आयु के जीने वाले दीर्घजीवी होते हैं, संसार .... अन्यत्र नहीं देखे जाते। वायु का दबाव जैसा .... में है, वैसा अन्यत्र कहीं नहीं। पवन .... उस देश में जितनी सफल हुई हैं उतनी .... किसी देश में नहीं। तिब्बत से आगे लम्बा ....का पठार ऐसा है, जिसे नितान्त ठंडा परन्तु .... ही कहा जा सकता है, यह अन्यत्र कहीं नहीं ....।
पृथ्वी का चुम्बकीय ध्रुव केन्द्र एक ही स्थान पर .... वह इतना संतुलित और संवेदनशील है कि वहाँ .... घूँसा भी कस कर मार दिया जाय तो पृथ्वी की .... और कक्षा का वर्तमान क्रम ही बदल जाय। .... ध्रुव और दक्षिणी ध्रुव की अपनी-अपनी .... हैं। उनके-प्रदान चलता है।
शान्तिकुँज की स्थापना के समय भी ऐसी दिव्य .... उस क्षेत्र में खोजी गयी और युग साधना .... लिए सामर्थ्यवान साधकों को विनिर्मित करने के .... उसे अनेकों विशेषताओं से सम्पन्न किया गया।....परम्पराओं और नवीनतम विशिष्ट साधनाओं का .... समावेश किया गया है, ताकि वातावरण .... ऊर्जा भरी रहे और इस अध्यात्म संगम का .... करने वाले समुचित लाभ ले सकें।
गंगा की गोद हिमालय की छाया सप्तऋषियों की .... होने के कारण, शान्तिकुँज के स्थान की .... को आध्यात्मिक त्रिवेणी संगम कहा जा .... है। स्थापना के अवसर पर चौबीस लाख .... चौबीस महापुरश्चरणों का यहाँ आयोजन किया ....। 65 वर्ष से जलने वाली अखण्ड-ज्योति की .... अनुपम स्थापना है। नौ कुण्डों की यज्ञशाला .... अनुष्ठानी साधकों द्वारा हजारों आहुतियों का यज्ञ .... है। स्थानीय निवासी तथा बाहर के आगन्तुक .... अपनी साधना बड़ी मात्रा में करते हैं, जो प्रतिदिन कितने ही लक्ष मंत्र ज पके समकक्ष हो जाती है। यह प्रत्यक्ष है। परोक्ष वह है जिसमें हिमालय की देवात्मा सप्तऋषियों का प्रतीत पूजन अदृश्य सत्ताओं को आकर्षित करता रहता है। संस्थापक ऋषियुग्म की तपश्चर्या अपना विशेष प्रभाव उत्पन्न करती है।
साधना, स्वाध्याय, संयम और सेवा प्रक्रिया को, शिक्षार्थियों को अन्तराल की गहराई तक उतारने की व्यवस्था का सत्रों में समुचित समावेश है। मनोबल और आत्मबल बढ़ाने वाले आहार के साथ दिव्य औषधियों का सेवन भी आवश्यकतानुसार जुड़ा रहता है। ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान में बहुमूल्य यंत्रों द्वारा मूर्धन्य वैज्ञानिक, हर शिविरार्थियों की जाँच पड़ताल करते हैं। साधना की सफलता का अनुमान बहुत कुछ इस आधार पर भी लग जाता है।
शान्तिकुँज आश्रम के निवासियों में से अधिकाँश उच्च शिक्षित, सेवा साधना में उच्चस्तरीय तत्परता के साथ निरत और ब्राह्मणोचित निर्वाह में पूरी तरह संतुष्ट और उल्लसित रह कर देखने वाले यह समझ सकते हैं, कि व्यवहार में अध्यात्म तत्वज्ञान और नीति संयम का समावेश कितना सहज और सुखद है।
पुरातन तीर्थ स्थानों में उच्चस्तरीय विशेषताएँ आदि से अन्त तक भरी रहती थीं। प्रयत्न किया गया है कि लगभग वैसा वातावरण यहाँ अक्षुण्ण रूप से बना रहे। तक्षशिला, नालंदा विश्वविद्यालयों में ऐसी ही विशेषताएँ थीं जिनके कारण वहाँ शिक्षा साधना करने वाले नर रत्न बनकर निकले।
युगसंधि के बारह वर्षों में जो युगशिल्पी सत्रों की योजना बनी है उसके साथ एक लाख पुरोहित वर्ग की प्रतिभाएँ उभारने का संकल्प भी साथ जुड़ा हुआ है। आशा की जानी चाहिए कि उपयुक्त प्रयास, उपयुक्त वातावरण, ऐसे व्यक्तित्व निखारने में सफल होगा जो इक्कीसवीं सदी के अवतरण में अपनी छोटी किन्तु उच्चस्तरीय भूमिका निभाने में सफल हो सके।
याज्ञवल्क्य और जनक का संवाद चल रहा था। जनक पूछ रहे थे कि जब प्रकाश के माध्यम न हों तो फिर मार्गदर्शन का अभिप्राय किस प्रकार पूरा हो?
याज्ञवल्क्य ने सूरज, चंद्र, तारक, अग्नि, दीपक आदि के नाम बताये। गुरुजनों और शास्त्रों का भी संकेत किया। पर राजा यह चाहते थे कि जब सारी व्यवस्थाएँ - सारे माध्यम समाप्त हो जाये तो प्रकाश कहाँ से प्राप्त हो?
याज्ञवल्क्य ने तब अन्तिम आधार बताया तर्कयुक्त विक्क इन्हें तेल बाती की तरह प्रयोग करके न सूझ पड़ने वाला मार्ग उपलब्ध किया जा सकता है।
*समाप्त*