ईश्वर का दर्शन और संभाषण

प्रतिमाओं में देखे जाने वाले भगवान बोलते नहीं, पर अन्तःकरण वाले भगवान जब दर्शन देते हैं तो बात करने के लिए भी व्याकुल दीखते हैं। यदि हमारे कान हों तो सुनें- वे एक ही बात कहते चले जायेंगे- “मेरे इस अनुपम उपहार-मनुष्य जीवन को इस तरह न बिताया जाना चाहिए - जैसे कि बिताया जा रहा है। ऐसे न गँवाना चाहिए- जैसे कि गँवाया जा रहा है। यह बड़े प्रयोजन के लिए है। ओछी रीति-नीति अपना कर मेरे प्रयास अनुदान का उपहास न बनाया जाना चाहिए।”

जब और भी बारीकी से उनकी भाव भंगिमा और मुखाकृति को देखें तो प्रतीत होगा वे विचार विनियम करना चाहते हैं और कहना चाहते हैं कि बताओ तो-इस जीवन सम्पदा का इससे अच्छा उपयोग क्या और कुछ नहीं हो सकता जैसा कि किया जा रहा है? वे उत्तर चाहते हैं और संभाषण को जारी रखना चाहते हैं।

अन्तरंग में अवस्थित भगवान की झाँकी, दर्शन, परामर्श और पथ-प्रदर्शन तक ही पर्याप्त नहीं है। उसमें गाय बछड़े जैसे वात्सल्य भी विह्वल दीखता है। परमात्मा हमें अपना अमृत दुग्ध-अजस्र अनुदान के रूप में पिलाना चाहते हैं। पति और पत्नी की तरह भिन्नता को अभिन्नता में बदलना चाहते हैं। आत्मसात् कर लेने की उत्कण्ठा कितनी प्रबल दृष्टिगोचर होती है।

हम ईश्वर के बनें, उसके लिए जियें। अपने को इच्छा और कामनाओं से खाली करदें। उसकी इच्छा और प्रेरणा के आधार पर चलने के लिए आत्म-समर्पण करदे, तो परमेश्वर को अपने कण-कण में लिपटा हुआ अनन्त आनन्द की वर्षा करता हुआ पायेंगे। ऐसा दर्शन कर सकें तो हम धन्य हो जायें।


भीड़ का नहीं न्याय का राज्य चले!

उन दिनों भीड़ का राज्य था। यों नाटक न्याय का ही रचा जाता था। पर भीड़ की चिल्लाहट में इंसाफ की आवाज इतनी धीमी पड़ती थी कि कोई उसे सुन ही न पाता था।

ईसा के तीखे उपदेश लोगों की धर्म भावनाओं को नई दिशा दे रहे और सुनने वालों को यथार्थता और परम्परा के बीच का अन्तर बता रहे थे। पुरातन पंथियों के लिए इस प्रकार के प्रयास सदा रोष का कारण बनते रहे हैं। ईसा भी उससे बच न सके।

उस वर्ष महायाजिक ‘हन्ना’ था धर्म पुरोहित ही अभियोग बनाते थे और हाकिम दण्ड देता था। हन्ना चाहते थे कि ढर्रे में अवरोध उत्पन्न करने वाले ईसा को प्राण दंड मिले। सो उनके अधीनस्थ पुरोहितों ने जाकर उन्हें पकड़ा और महायाजक के सामने उपस्थिति किया।

याजक ने पूछा-”क्या तुमने धर्म और राजा के विरुद्ध विद्रोह करने के उपदेश दिये है?”

ईसा ने कहा -”मैंने जो कुछ कहा है ख्ले में और मन्दिरों के आँगन में कहा है-सो सुनने वालों से ही पूछिये कि क्या मैंने ऐसा कुछ कहा है?”

एक पुरोहित ने ईसा को चाँटा मारा और कहा”महायाजक के सामने बढ़ चढ़ कर बोलता है?”

ईसा ने कहा-”मैं झूठ कहता हूँ तो कहो मैंने क्या झूठ बोला? बिना कारण मारने से क्या होगा?”

पुरोहित मण्डली के गवाह आगे आये। उसने कहा “यह कहता है पुराने मन्दिरों के स्थान पर नये मन्दिर खड़े होने चाहिए। पुराने राजा के स्थान पर नये राजा का शासन स्वीकार करना चाहिए।”

ईसा ने कहा- “मैंने मन्दिरों का नहीं उनकी आड़ में पलने वाली अधार्मिकता का विरोध किया है और धरती के राजा के विरोध में नहीं स्वर्ग के राजा के शासन के बारे में कहा है।”

महाजायक ने प्रतिवादी की एक न मानी और दोष लगाने वालों की बातों पर ही कान धरते रहे। उन्होंने अपराध लगाते हुए प्राण दण्ड देने की सिफारिश के साथ ईसा को न्यायाधिकारी पीलातुस के पास भेज दिया।

पीलातुस ने छानबीन की और ऐसा कुछ न पाया। वह चाहते थे इस निर्दोष को दण्ड न दिया जाय। पर भीड़ ने चिल्लाकर कहा “ईसा विद्रोही है उसे फाँसी पर लटकाया जाना चाहिए।” न्यायाधिकारी ने पूछा-”क्या कोड़े लगाने की सजा से काम चल सकता है? भीड़ के राज्य में न्यायाधिकारी की क्या चलती है। ईसा को क्रूस की ओर घसीटा जाने लगा तो पीलातुस ने एक और प्रयत्न किया उस दिन पर्व का दिन था। पर्व पर एक अपराधी को क्षमादान दिये जाने की प्रथा थी। सामने दो अपराधी थे। एक हत्यारा डाकू वरअब्वा, दूसरे ईसा। दोनों में से न्यायाधीश ईसा को छोड़ना चाहते थे। पर भीड़ चिल्लाई “वरअब्वा को भले ही छोड़ दिया जाय पर ईसा को तो क्रूस पर ही चढ़ना चाहिए।”

न्याय की एक न चली, हुआ वही जो भीड़ ने चाहा।

भीड़ में इतनी समझ कहाँ होती है कि वह विवेकपूर्ण निर्णय कर सके। आवेश के प्रवाह में लोग किधर भी बहते रहते हैं। इसलिए भीड़ की माँग को नहीं, न्याय की पुकार को मान्यता मिलनी चाहिए। ईसा के पवित्र बलिदान से निकले,यह निष्कर्ष अनन्त काल तक आकाश में गूँजता रहेगा।


वरिष्ठता और श्रेष्ठता सदैव अध्यात्म की ही

जब तक जीवन रहता है, सुन्दरता, समर्थता, प्रतिभा, बुद्धिमत्ता आदि अनेकों विशेषताएँ दीख पड़ती हैं। जीवन समाप्त होते ही उनमें से एकाएक तिरोहित हो जाता है। स्पष्ट है कि काया का दृश्यमान पक्ष पड़ तत्वों से विनिर्मित प्रत्यक्ष भौतिक विज्ञान का ही चमत्कार है। अदृश्य चेतना अध्यात्म है। दोनों के समन्वय से ही जीवन की स्थिरता रहती है। उनके विगठित होने पर जो कुछ बन पड़ता है, वह घिनौनी, अस्पृश्य, अनुपयोगी स्तर का ही होता है। संसार के संबंध में भी यही बात है। जब तक उसमें उपरोक्त दोनों महाशक्तियों का सही अनुपात में तालमेल है तभी तक उनकी महत्ता विद्यमान है। संतुलन बिगड़ने पर सब कुछ गड़बड़ा जाता है। व्हेल जैसे विशालकाय प्राणी शरीर की दृष्टि से विशालकाय होने पर भी चेतना के अविकसित रहने के कारण किसी प्रकार गहरे सागरों में दिन गुजारते है। मनुष्य की चपेट में आ जाने पर वे अपने प्राण भी गंवा बैठती हैं।

यहाँ प्रधानता भौतिक पदार्थ के असाधारण संचय होने की नहीं है। वरन वस्तुस्थिति ऐसी है कि चेतना का स्तर ऊँचा हो तो छोटे प्राणी भी अपनी विशिष्टता का परिचय देते देखे जाते हैं। चींटी और मधुमक्खी की जीवनक्रिया नजदीक से देखने पर प्रतीत होता है कि वे अपनी छोटी काया के भीतर भी कितना कौशल और अनुशासन संजोये हुए हैं। अस्तु प्रशंसा उन्हीं की होती है। व्हेल का तो तेल भर निकाला जाता है। आदि काल के महागज,महासरीसृप और महागरुड़ विशालकाय होते हुए भी प्रकृति की तनिक सी प्रतिकूलता सहन करने में असफल रहने पर अपना अस्तित्व गंवा बैठे जबकि मनुष्य की कुछ प्रजातियाँ ध्रुव प्रदेश क अति विकट परिस्थितियों में भी चिरकाल से अपनी सत्ता बनाये हुए हैं। यहाँ चेतना परक अध्यात्म को ही वरिष्ठ मानना पड़ेगा। सुविधा-साधनों वाला विज्ञान तो उसके उपयोग या उपभोग की उथली सी सामग्री मात्र है।

समझा यह जाना चाहिए कि यद्यपि पदार्थ संसार में विशाल आकार-प्रकार में विद्यमान है, दीख पड़ता भी वही है और उपयोग भी उसी का होता है। इसलिए मोटी दृष्टि यही बताती है कि यहाँ पदार्थ ही प्रमुख है। विज्ञान ने तो चेतना की परख न कर पाने पर यहाँ तक कहना शुरू कर दिया कि चेतना का कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है। पदार्थ की ही एक स्थिति चेतना बना जाती है और समयानुसार विलुप्त भी हो जाती है। पर वस्तुतः ऐसा है नहीं। चेतना के जड़ से अलग होने की स्थिति में भी अपना स्वतंत्र अस्तित्व बनाये रखने के प्रमाण मिले हैं। मरणोत्तर जीवन संबंधी सभी जानकारियाँ इसी तथ्य को प्रकट करती हैं कि पदार्थ की स्थिति विशेष को चेतना मानना ठीक नहीं। वरन सही यह है कि चेतना अपने संकल्प के अनुसार कलेवर विनिर्मित कर लेती है। विकासक्रम का इतिहास यही बताता है कि प्राणियों की जब जैसी इच्छा, आकाँक्षा, आवश्यकता प्रबल हुई तब उनने इसी प्रकार के आकार विकसित विनिर्मित करने आरंभ कर दिये। अमीबा से लेकर असंख्य प्राणियों की प्रजातियाँ इसी इच्छाशक्ति के आधार पर बनती और विकसित होती रही हैं।

सूक्ष्म शरीरधारी पितर एवं सिद्ध पुरुषों के प्रमाण यह बताते हैं कि चेतना एकाकी रहने पर भी पदार्थ प्रयोजनों की आवश्यकता अपनी संकल्प शक्ति से ही गढ़ लेती है और जीवित मनुष्यों से भी कहीं अधिक बढ़े चढ़े पराक्रम दिशा सकने में समर्थ रहती है।

पदार्थ में अपनी विशेषताएँ है। इसे मानने में किसी को कोई आपत्ति नहीं। पर उन विशेषताओं को प्रसुप्ति से जाग्रति में पहुँचाने का, रहस्यों को उद्घाटित करने का श्रम चेतना को ही जाता है। वैज्ञानिक आविष्कारों की भरमार बुद्धि वैभव के द्वारा ही बन पड़ी है। वे स्वयं अपने आप कहीं भी प्रकट नहीं हुए हैं। आदिमकाल का मनुष्य आग की, पहिये की, धारदार औजारों तक की विधा से अवगत न था, तब तक वनमानुषों की ही तरह अभावग्रस्त निर्वाह करना पड़ता था। सुविधाओं के अम्बार-आडंबर जिन आविष्कारों ने प्रस्तुत किये और मनुष्य को अतिशय शक्तिशाली बनाया, उसमें उसके बुद्ध वैभव का विकसित स्वरूप ही काम करता दिखाई पड़ता है। इतना सामान्य पर्यवेक्षण करने पर यही निष्कर्ष निकलता है कि हलचलें और प्रगति प्रक्रियाएँ बुद्धि की ही देन हैं। यद्यपि उपयोग स्थूल पदार्थों का ही होता है। बुद्धि को चेतना का प्रतीक माना जा सकता है और कहा जा सकता है कि संसार में दृश्यमान स्थूल पदार्थ ही सब कुछ नहीं है। उसे अनगढ़ स्थिति से उपयोगी और सर्वांग सुन्दर बनाने में विकसित चेतना की ही प्रधान भूमिका रही है। भविष्य में भी जो कुछ शुभ या अशुभ बन पड़ेगा, उसके पीछे भी बौद्धिक वरिष्ठता ही काम करती देखी जाएगी।

चेतना और पदार्थ का अपना-अपना अस्तित्व है। फिर भी दोनों को मिलाकर चलने में ही सुन्दरता और सुविधा-उपयोगिता बन पड़ती है। दोनों पृथक रहने लगें तो इनमें से किसी को भी अपनी विशिष्टता प्रदर्शित करने का अवसर न मिलेगा। अस्तु! यह विवाद समाप्त ही होना चाहिए कि मात्र पदार्थ ही सब कुछ है। मानना यह भी होगा कि चेतना की शक्ति अदृश्य होते हुए भी इतनी प्रचण्ड है कि अनगढ़ पदार्थ सामग्री को सुनियोजित करके इसी संसार में स्वर्गोपम सुखद परिस्थितियाँ उत्पन्न कर सकती है। भूतकाल की सतयुगी अवधि में ऐसा होता भी रहा है कि रचनात्मक उच्च प्रयोजनों में संलग्न रहकर स्वल्प साधनों की स्थिति में असीम सुविधाओं और मनोरम परिस्थितियों का रसास्वादन किया जाता रहा है। इसके विपरीत यह भी संभव है कि पिछले एक हजार वर्षों में बौद्धिक दुरुपयोग के कारण पदार्थ का युद्ध महायुद्धों के रूप में विनाशकारी दुरुपयोग बन पड़ा है। अणु आयुधों के विस्फोट से धरातल का अस्तित्व तक मिट सकता है, इसकी एक झलक झाँकी जापान पर गिराये गये दो बमों द्वारा पूर्व चेतावनी के रूप में अनुभव में लाकर दिखा दिया गया है।

इसलिये कहा जा रहा है कि विज्ञान और अध्यात्म का समन्वय होना चाहिए, दोनों को मिलाकर चलना चाहिए अर्थात् दूरदर्शी विवेकशील की तराजू पर तौलते हुए दोनों का संतुलन इस प्रकार बिठाया जाना चाहिए जिससे असंतुलनजन्य विग्रहों और बुद्धि के रूप में दृष्टिगोचर होने वाली चेतना ने उसका आधिपत्य स्वीकार कर लिया तो उस आधार पर मात्र संकीर्ण स्वार्थपरता का ही बोलबाला दीख पड़ेगा। फिर नैतिकता के लिए कोई स्थान न बचेगा। अधिक चतुरता मात्र अधिक स्वार्थ साधना के पक्ष में ही तर्क प्रस्तुत करती है और इसी के लिए मन लुभाता ललचाता है कि जिस प्रकार भी संभव हो, अपने स्वार्थ को अधिकार के रूप में परिभाषित प्रस्तुत करते हुए “जिसकी लाठी उसकी भैंस”, वाला मत्स्य न्याय चरितार्थ करके दिखाया जाय।

इसमें मुट्ठी भर सामर्थ्यवानों को तानाशाही बरतने का अवसर मिल सकता है, पर सर्व साधारण को तो शोषण-अपहरण और उत्पीड़न का ही सामना करना पड़ेगा। इसलिए इतिहास के पृष्ठों की साक्षी प्रस्तुत करते हुए यह कहा जा सकता है कि पदार्थ की वरिष्ठता और उसी के लिए ललचाने वाली बुद्धिमत्ता का यदि प्राधान्य बना रहा तो संसार भर में विजेता और पराजित में से किसी को भी चैन न मिलेगा, भले ही सम्पदा का बाहुल्य कितना ही बढ़ा-चढ़ा क्यों न हो?


श्रद्धा संवर्धन से ही नाव पार लगेगी

चेतना की मन, बुद्धि चित्त, अहंकार चेतन-अवचेतन, सुपरचेतन आदि अनेक परतें हो सकती हैं। पर यह सूक्ष्म पर्यवेक्षण है। मोटे तौर पर इन सबका समुच्चय “बुद्धि” के नाम से एक शब्द में भी प्रतिपादित किया जा सकता है। यह चेतना का व्यवहार में निरन्तर काम में आने वाला स्वरूप हैं।

“बुद्धि” एक प्रकार की तराजू है जो जिस पलड़े में अधिक वजन हो उसी की ओर झुक जाती है। आमतौर से लोभ, मोह,और अहंकार का उन्माद हर किसी पर छाया रहता है क्योंकि उसके आधार पर अधिक सुविधाएँ पाने, अहंता की अधिक तृप्ति होने का संयोग बनता है। प्रत्यक्ष में स्वार्थ सिद्धि ही सुखद प्रतीत होती है और उसमें से लाभ उठाने की रसास्वादन करने जैसी अनुभूति होती है। यही कारण है कि सामान्य बुद्धि जो कुछ सोचती है, निर्णय करती है और कर गुजरने का ताना-बाना बुनती है, उसके पीछे यही तथ्य काम करता है कि जो चाहा गया है, वही सरलतापूर्वक उपलब्ध हो। भले ही इसके लिए अधिकारों का अपहरण कर अनाचार बरतना पड़े तथाकथित बुद्धिमान यही करते देखे जाते हैं। बुद्धि के साथ ‘मान’ शब्द जुड़ा है। उससे स्पष्ट है कि बुद्धि + मन दोनों मिलकर बुद्धिमान बनते हैं। भ्रष्टाचार, षडयंत्र, विध्वंसकारी आविष्कार, वकीलों की दलीलें यही वर्ग अपनाता है।

इस स्थिति से निबटने का एक ही विकल्प है कि बुद्धि को भाव संवेदनाओं के साथ जोड़ा जाय, उसे हृदयपरायण बनाया जाय। इसी आस्था को श्रद्धा कहते हैं। इसी का दूसरा नाम भक्ति है, समर्पण है। सदाशयता का, शालीनता का, उत्कृष्टता एवं आदर्शवादिता का समुच्चय ही सद्भावना के नाम से जाना जाता है। इसी की पक्षधर होने पर विचारशक्ति को प्रज्ञा, मेधा, श्रद्धा आदि नामों से जाना जाता है। इस ओर बुद्धि को मोड़-मरोड़ देने की प्रक्रिया ही अध्यात्म साधना के नाम से जानी जाती है। इसी की प्रतिक्रिया व्यक्ति को निश्चिन्त प्रसन्न और प्रफुल्ल बनाती है। समीपवर्ती क्षेत्र में उसी की परिणति सज्जनता, सेवा साधना एवं धर्म धारणा के रूप में परिलक्षित होती है। मनुष्य अपने में स्नेह सौजन्य, सद्भाव और उदार शिष्टाचार बरतने लगे तो स्पष्ट है कि लोगों के बीच चलने वाला सद्व्यवहार ऐसी प्रतिक्रियाएँ उत्पन्न करेगा। जिससे तुष्टि, पुष्टि और शक्ति की कमी न रहे। समृद्धि और प्रगति का पथ प्रशस्त होता चले।

बुद्धि को भाव संवेदनाओं के साथ जोड़ा जाना चाहिए। आत्मा संयम एवं पुण्य परमार्थ इसी आधार पर बन पड़ता है। बहिरंग जीवन में जो उत्कृष्टता दीख पड़ती है, उसका कारण अन्तरंग की श्रेष्ठता ही होता है। दृष्टिकोण, रुझान और निर्धारण यदि सदाशयता की दिशा अपनाले तो समझना चाहिए कि वह उच्च स्तर प्राप्त हुआ जिसे अध्यात्म की भाषा में ‘भक्ति’ कहते हैं। श्रद्धा इसी का पर्यायवाचक है।

इन दिनों कोई अध्यात्म उपचारों की क्या व्याख्या करता है और उन्हें चरितार्थ करने के लिए क्या क्रिया कृत्य करता है, यह न विचारा जाय तो ही ठीक है। उलटी दिशा में चलने वालों का सोना भी यदि उलटा हो तो आश्चर्य क्या है? विडम्बनाओं और भ्रान्तियों के इस युग में श्रद्धा-भक्ति जैसी उच्चस्तरीय उपचारों के भी यदि दुर्दिन बने तो यही समझना चाहिए कि जब उलटा सोचने और उलटा करने का ही प्रचलन चल पड़ा है तो अध्यात्म तत्वज्ञान ही उससे अछूता कैसे रह सकता है? हमें लोक प्रवाह को नहीं वास्तविक तत्वदर्शन को महत्व देना और उसे ही अपनाना चाहिए।

तर्क और प्रमाण प्रस्तुत करने के फर में प्रायः बुद्धि उसी ओर झुकती है जिसमें तात्कालिक स्वार्थ की सिद्धि होती है। वकील अपने क्लाइण्ट के पक्ष में ही दलीलें देता और उसी को सही सिद्ध करने का प्रयत्न करता है। भले ही वास्तविकता विपरीत ही क्यों न हो? बुद्धि के संबंध में भी यही कहा जा सकता है। उसने इन दिनों अपने प्रतिपक्षी न्याय और प्रेम के प्रतिकूल इतने तर्क खोज निकाले हैं जिनके आधार पर यही प्रतीत होता है कि तात्कालिक लाभ जितनी जल्दी एवं जिस भी प्रकार उठाता जा सके, उसे उठाते में चूकना नहीं चाहिए। लोक चिन्तन का प्रवाह प्रायः इसी दिशा में बह रहा है और उसकी प्रतिक्रिया अनेकानेक अनर्थों के रूप में सामने आ रही है। हर अपराध कर्मी अपने कृत्यों के पक्ष में इतनी दलीलें और साक्षियां प्रस्तुत करता है कि साधारण सोच वाले को यही ठीक लगता है कि तत्काल लाभ को प्रधानता देने वाला बुद्धिपरक प्रतिपादन ही सही है। भ्रान्तियाँ इसी आधार पर पनपती हैं। अवांछनियताएं इसी रीति से बन पड़ती है फलतः व्यक्तिगत रूप में असंतोष भरी अशाँति की बाढ़ आती है। सामूहिक जीवन में इस निर्धारण के आधार पर चित्र-विचित्र स्तर के अनाचार बन पड़ते हैं। भ्रष्ट चिन्तन का परिणाम दुष्ट आचरण के रूप में ही परिलक्षित होता है।

घड़ी का पेंडुलम एक सिरे से दूसरे सिरे तक पहुँचने के उपरान्त फिर वापस लौटता है। वर्तमान सर्वव्यापी विक्षोभ से छुटकारा पाने के लिए मनुष्य को क्या करना होगा? इस संदर्भ में एक ही विकल्प अब सामने हे कि बुद्धि को शिखर से लौटकर भक्ति की ओर मुड़ने के लिए विवश किया जय। भाव संवेदनाओं के साथ जुड़ी उत्कृष्टताओं का महत्व समझने और समझाने का प्रयत्न किया जाय। नीचे गिरते चलने के उपक्रम पर ब्रेक लगाया जाय और दिशा परिवर्तन कर यह प्रयास किया जाय कि उस उत्कृष्टता को फिर से उपलब्ध किया जाय जिसके साथ कि उज्ज्वल भविष्य की संरचना सुनिश्चित रूप से जुड़ी हुई है।

साधनों, प्रतिभा व बुद्धि से जुड़ी विनाशलीला देखी जा चुकी। चैन किसी को नहीं है, शान्ति किसी को नहीं है। अगले दिनों के संबंध में निश्चिन्तता किसी को नहीं है। ऐसी दशा में वैज्ञानिक उपलब्धियों के प्रति किसी को भी ऐसी आशा या सहानुभूति नहीं कि वे शान्ति, सुरक्षा व प्रसन्नता का माहौल बना सकेंगी। चले ही वे अगले दिनों कितनी ही बढ़ी चढ़ी सम्पदा या सुविधा के रूप में ही प्रस्तुत परिलक्षित क्यों न हो?

सच्चा आनन्द भावनाओं में है। संतोष भी, सहयोग भी। सद्भाव ही परस्पर स्नेह सौजन्य का उद्भव करते हैं। उत्कृष्टता के प्रति उभरी हुई श्रद्धा ही, भावनाओं को तरंगित करती है और उसी के सहारे ऐसा कुछ सोचते करते बन पड़ता है जिससे स्वल्प साधनों में भी असीम आनन्द अनुभव किया जा सके। न्याय और नीति तक ही सीमित न रहकर जहाँ उदारता, सेवा और आत्मीयता का उद्भव होता है, वहाँ पारस्परिक सहयोग तो सघन होता ही है, आन्तरिक उल्लास की भी कमी चली रहती।

विज्ञजनों का यही अभिमत है कि स्वल्प साधनों का सदुपयोग भी आवश्यकता पूरी करने, शान्ति और प्रगति का माहौल बनाये रहने के लिए पर्याप्त हो सकते हैं। शर्त एक ही है कि व्यक्ति भाव संवेदनाओं का महत्व समझे, उन्हें अपनाये, बढ़ाये और ऐसा वातावरण उत्पन्न करे जिससे आत्मीयता विकसित होती हो, लेने की अपेक्षा देने में आनन्द अनुभव होता हो। ऐसी भाव श्रद्धा का संवर्धन ही ऐसी सद्बुद्धि का विकास करेगा जो विश्व शान्ति का चिरस्थायी आधार बन सके। आने वाला समय निश्चित ही भक्ति युग का होगा, यह दावे से कहा जा सकता है।


स्वर-लहरियों से मानव उपचार

विद्युत-प्रकाश और ताप की तरह ध्वनि-शब्द शक्ति भी प्रकृति की एक विशिष्ट शक्ति है। इसमें सृजनात्मक एवं ध्वंसात्मक दोनों ही क्षमताएँ विद्यमान है। मधुर स्वर लहरियों के रूप में इसमें जहाँ मनुष्यों सहित समस्त प्राणियों के रूप में पोषण-अभिवर्धन की सामर्थ्य सन्निहित है। वहीं अदृश्य एवं अश्रव्य ध्वनियों के प्रयोग से विनाशकारी दृश्य भी उपस्थित किये जा सकते हैं। कर्णप्रिय भावोत्पादक ध्वनियों का उपयोग रोग निवारण में अन्यान्य चिकित्सा उपचारों से कम प्रभावी नहीं है। संगीत इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है।

रोगोपचार प्रक्रिया में अब संगीत को वैकल्पिक चिकित्सा पद्धति के रूप में विकसित किया जा रहा है। साउण्ड थेरेपी के विशेषज्ञों का कहना है कि संगीत के साथ स्वरों की सात भिन्न स्वर लहरियों के अपने पृथक् सात रंग होते हैं। प्रत्येक स्वर की तरंगें अपने विशिष्ट रंग के साथ मानवी काया और मन को प्रभावित करती हैं। इस प्रकार रोग की प्रकृति के अनुरूप ध्वनि तरंग का निर्धारण कर उसे व्याधिग्रस्त पर डाला और रोग का निवारण किया जाता है। इस उपचार पद्धति के लिए वैज्ञानिकों ने “ओरोटोन” नामक एक ऐसा ध्वनि यंत्र विकसित किया है जिसमें सप्त स्वरों के साथ सात रंग भी उत्सर्जित होते हैं। यंत्र के ‘सी’ रीड से लाल रंग, ‘ई’ से पीला और ‘जी’ से नीला निकलता है। आवश्यकतानुसार रुग्ण व्यक्ति को जैसा रंग अभीष्ट होता है उसी रंग के स्वर का संगीत उसे सुनाया जाता है।

संगीत में विद्यमान सूक्ष्म ध्वनि -तरंगों का मनुष्य की मनोदशा पर गहरा प्रभाव पड़ता है। फलतः शरीर-रसायन तंत्र में भारी परिवर्तन परिलक्षित होने लगते हैं। रूसी वैज्ञानिक कुद्रयावत्सेव के अनुसार इन ध्वनि तरंगों से शरीर की अंतःस्रावी ग्रन्थियाँ सक्रिय हो उठती हैं और उनसे रिसने वाले हारमोन रसायन मानसिक स्थिति में परिवर्तन का स्पष्ट संकेत देते हैं। मधुर स्वर प्रकंपनों के प्रभाव से व्यक्ति जब प्रसन्नता की स्थिति में होता है, उस समय का रस-स्राव भिन्न प्रकार का होता है और जब कर्कश, कोलाहल युक्त ध्वनि सुनने को मिलती है, वह आवेश से भर उठता है। ऐसी स्थिति में काया में भिन्न प्रकार के रसायन उत्पन्न होते हैं। ध्वनियों में रासायनिक परिवर्तन की इस प्रचण्ड क्षमता को देखते हुए रसायनशास्त्रियों ने “ध्वनि-रसायन” नाम विज्ञान की एक अभिनव शाखा का ही विकास कर लिया है। प्रयोग परीक्षणों के दौरान उनने पोटेशियम आयोडाइड के घोल में जब शक्तिशाली परातंरगें डाली तो उसका रंग पीला हो गया। इसी तरह मरक्यूरिक क्लोराइड का घोल गंदले रंग के रसायन में परिवर्तित हो गया। उनका कहना है कि ध्वनि की उपयुक्त सूक्ष्म तरंगें न केवल मनुष्य में लाभकारी परिवर्तन प्रस्तुत करती हैं वरन् वनस्पतियों के लिए भी हितकारी सिद्ध होती हैं। इसके प्रभाव से बीजों के अंकुरण की प्रक्रिया तेज हो जाती है। मास्को के कृषि वैज्ञानिकों ने इस प्रक्रिया द्वारा गेहूं और जौ में 10 से 40 प्रतिशत उत्पादकता, बढ़ाने में सफलता पाई है।

पिछले दिनों जापान के ओसाका शहर के कृषि विज्ञानी योशितों ओशाई ने अपने बगीचे में लगी टमाटर, चुकंदर और तरबूज जैसी फसलों पर संगीत का प्रयोग किया। पाया गया कि इससे न केवल फलों के आकार और वजन में अभिवृद्धि हुई वरन उनके स्वाद के पौष्टिक गुणों में भी बढ़ोतरी हुई। कुछ ऐसे ही प्रयोग कनाडा के ओंटारियों क्षेत्र में वैज्ञानिकों ने गेहूँ की फसल पर किये और 60 प्रतिशत से अधिक उत्पादन प्राप्त किया था। भारतीय कृषि वैज्ञानिकों ने इस क्षेत्र में गहन अनुसंधान किये हैं। तमिलनाडु क अन्नामलायी स्कूल ऑफ बाँटनी, कोयम्बटूर के सरकारी कृषि विद्यालय एवं काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के विशेषज्ञों ने अपने विभिन्न प्रयोगों के आधार पर यह सिद्ध कर दिखाया है कि पेड़-पौधे के विकास पर क्रमबद्ध कृषि क्षेत्र की फसलों व अन्यान्य वृक्ष-वनस्पतियों पर संगीत की उपयुक्त स्वर लहरियाँ डाली तो न केवल उनके फलने-फलने की रफ्तार में तेजी आयेगी वरन् उनके वजन, गुण्क्ता एवं उत्पादन क्षमता में भी बढ़ोतरी की जा सकेगी। विंस्कासिन यूनिवर्सिटी में संगीत-शक्ति पर अनुसंधानरत सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक आर्थरलॉकर का तो यहाँ तक कहना है कि इसकी प्रभाव क्षमता से पौधों को ही नहीं मानव को भी रोगाणुओं से बचाया जा सकता है।

भारत सहित अनेक देशों में अब ध्वनि तरंगों द्वारा व्याधि-निवारण के चिकित्सकीय कार्य सम्पन्न किये जा रहे हैं। चिकित्सा विज्ञानी अब इस दिशा में प्रयासरत हैं कि किसी भी प्रकार के आपरेशन कार्य सम्पन्न करने के लिए औजारों की आवश्यकता ही न रहे। ध्वनि तरंगों से ही यह सब सम्पन्न होने लगे। फिलीपीन्स में से प्रयोग चल भी रहे हैं। अपने देश के दिल्ली सहित कितने ही अस्पतालों एवं क्लीनिकों में अल्ट्रासाउंड के माध्यम से शरीर की अंदरूनी विकृतियों का पता कैटस्कैनर की भाँति लगाया जाता है। नेत्र रोग, उदर रोग, हृदय रोग, अंतःस्रावी ग्रन्थियों से सम्बन्धित रोगों एवं प्रसूति चिकित्सा में रोग निदान तथा उसके उपचार में इसका उपयोग हानिरहित चिकित्सा के रूप में लाभकारी सिद्ध हुआ है।

गत वर्ष चीन के वैज्ञानिकों ने एक ऐसी म्यूजिक मशीन का विकास किया है जिसका मधुर स्वर लहरियों से पाचन संस्थान, हृदय और स्नायुतंत्र की बीमारियों का उपचार किया जाता है। यह श्रव्य ध्वनियों के चमत्कारिक परिणाम हैं जो मनःसंस्थान के भावना क्षेत्र को प्रभावित करके अपना परिणाम प्रस्तुत करती हैं। किन्तु एक से पाँच मेगाहट्ज आवृत्ति की श्रवणातीत अश्रव्य ध्वनियों को अनुसंधान कर्ताओं ने काय चिकित्सा के लिए अधिक उपयुक्त पाया है। इन सूक्ष्म तरंगों के आघात से शरीर के अन्दर गुर्दे या पित्ताशय की पथरी को बारीक कणों में बदल देने में उनने सफलता प्राप्त कर ली है। पश्चिम जर्मनी के म्यूनिख स्थिति डोर्नियर मेडिकल टेक्नोलॉजी के विज्ञानियों ने “लिथोट्रिप्टर” नाम एक यंत्र विकसित किया है जिससे निकलने वाले ध्वनि प्रकंपन 30-40 मिनट के अन्दर पित्ताशय एवं दुर्गे की पथरी को चूर्ण रूप में बदल देती है, जो बाद में शरीर से बाहर निकल जाता है। यह उपकरण भारत में अब उपलब्ध है।

इसी प्रकार आँखों के मोतियाबिंद का आपरेशन परा श्रव्य ध्वनियों से सरलतापूर्वक बिना किसी रुधिर स्राव के किया जाने लगा है। यह ध्वनि तरंगें न केवल आँख के लेन्स के अपारदर्शी भाग को सूक्ष्म कणों में परिवर्तित कर निकाल बाहर करती हैं, वरन आँख की अन्यान्य बीमारियों की भी जानकारी दे देती हैं। अब इन्हीं ध्वनि तरंगों का उपयोग करके अंधों को राह दिखाने वाले उपकरण विकसित किये गये हैं।

समुद्रों में छिपी पनडुब्बियों का पता एक विशेष प्रकार के “सोनार तंत्र” द्वारा लगाया जाता है। इनमें पराध्वनि का ही प्रयोग होता है। इसी तरह वायुयानों की जानकारी ‘रैडार’ द्वारा प्राप्त की जाती है। अब अमेरिकी वैज्ञानिक इन ध्वनि तरंगों को शक्तिशाली हथियार के रूप में प्रयुक्त करने में अनुसंधानरत हैं। वाशिंगटन के हेरीडायमण्ड प्रयोगशाला के अनुसंधान विभाग के निदेशक जान रुसडो का कहना है कि यह तरंगें इतनी शक्तिशाली होंगी कि शत्रु क्षेत्र में इनकी बौछार करने मात्र से उनके समस्त शस्त्रास्त्र नाकाम हो जायेंगे। इनसे विमानों और टैंकों तक को पंगु बनाया जा सकेगा। उनका मत है कि पराश्रव्य ध्वनियों की क्षमता 10 अरब वाट के बराबर होगी जो किसी भी सीमित क्षेत्र के जन जीवन को क्षत विक्षत कर सकती है।

ध्वनि सिर्फ मनुष्यों, जीवधारियों अथवा वनस्पतियों को प्रभावित करती हो, ऐसी बात नहीं। उसका प्रभाव जड़ पदार्थों पर भी पड़ता है। हीरे जैसी कठोर वस्तु को काटने में इसकी सूक्ष्म तरंगें प्रयुक्त होती हैं। ध्वनिकंपन से बड़े-बड़े पुल टूट जाते हैं। खिड़कियों के शीशे चटक कर बिखर जाते हैं। वियना के ‘मारसिल्स’ इंस्टीट्यूट के विज्ञानक्ता प्रो. गावराँड ने इस संबंध में गहन खोजें की है। उनने स्वनिर्मित पराध्वनि उत्पादक यंत्र से कुछ प्रयोग किये और पाया कि उससे निस्सृत तरंगें आधे मील की परिधि तक में खिड़कियों के काँच तोड़ देती हैं। बाइबिल में उल्लेख है कि जेरिकों की तुरहियों की ध्वनि से एक समूचा नगर नष्ट हो गया था। ज्यूरिच के सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक डा. हैन्स जेनी ने अपनी पुस्तक “सिमेटिक्स” में इस तथ्य की पुष्टि की है और कहा है कि ध्वनि में निर्माणकारी तथा ध्वंस करने वाली दोनों ही क्षमताएँ विद्यमान है। यह पदार्थ का रूपांतरण करने में भी सक्षम है।

शारीरिक मानसिक विकारों के उपचार में मधुर स्वर लहरियाँ अपनी कारगर भूमिका तो निभाती ही हैं, परिष्कार-सुधार का भी कार्य सम्पन्न करती हैं। आवश्यकता उसके सृजनात्मक पक्ष को विकसित करने और उस शक्ति से लाभान्वित होने की है। मानव स्वभाव को नियंत्रित करने एवं अन्तराल में सन्निहित शक्तियों को उभारने का संगीत सर्वोत्तम माध्यम है। जो गहन अनुसंधान की अपेक्षा रखता है।


लोक चिन्तन को उलटने का उपयुक्त अवसर यही

मनुष्य के संकल्प और सुनियोजित पुरुषार्थ का महत्व कम नहीं है। फिर भी समय की अनुकूलता हो तो सफलता कम समय में और अधिक तेजी से मिलती है। हवा का रुख पीछे से आगे धकेलने वाला हो तो पैदल चलने वाले या साइकिल सवार को कम परिश्रम में अधिक दूरी पार कर लेने का अवसर मिलता है। ढलान पर बिना पेट्रोल खर्च किए ही मोटर लुढ़कने लगती है। नदी के बहाव में नावें भी गति पकड़ लेती हैं। लकड़ी के मोटे लट्ठे नदी में तैरते हुए इतनी लम्बी दूरी पार कर लेते हैं जिसके लिए परिवहन वाले ढेरों किराया माँगते। हवा का रुख अनुकूल देखकर बच्चे पतंगें उड़ाने के लिए दौड़ पड़ते हे। पनचक्की वाले अपनी मशीन चालू कर देते हैं। किसान बरसात के दिनों में बुवाई करते हैं और फसल को तेजी से बढ़ती पकती देखते हैं। माली भी ऋतु के अनुरूप पेड़ - पौधे लगाते और उद्यान की अभिवृद्धि में चमत्कारी प्रगति होती देखते हैं। कुम्हार भी सूखा मौसम देख कर आवा पकाता है।

रूस में लेनिन जेल में बन्द थे। जब उन्हें मुक्त किया गया तो आश्चर्य चकित होकर उन्होंने पूछा इतनी जल्दी सत्ता परिवर्तन का कठिन काम कैसे सम्पन्न हो गया? विवरण सुनने के उपरान्त उनने जाना कि क्रान्तिकारियों के प्रयासों का समय ने भी साथ दिया और कठिन कार्य सरल हो गया।

भारत की स्वतन्त्रता में सैनानियों का त्याग बलिदान तो प्रमुख था ही, पर उन दिनों अन्तर्राष्ट्रीय परिस्थितियाँ भी ऐसी बन गई थीं जिनमें ब्रिटेन इतनी दूरी पर इतने जाग्रत देश पर देर तक शासन कर सकना सम्भव नहीं देख रहा था। दबाव और झुकाव ने मिल-जुलकर अनुकूलता बना ली। ऐसे घटनाक्रम संसार में अन्यत्र भी बहुत बार घटित हुए हैं। जिनमें मूर्धन्य प्रतिमाओं का उफनता संकल्प, साथ ही लोक मानस का उस संदर्भ में भाव भरा उत्साह मिलकर ऐसी शक्ति बने जिसके कारण इतनी बड़ी और इतनी महत्वपूर्ण सफलताएँ मिलीं जिन्हें देखकर देखने वाले आश्चर्यचकित होकर रह गए थे। वर्षा की अनुकूलता किसान के श्रेय को अनेक गुना लाभदायक बना दिया है।

नवयुग के संदर्भ में प्रथम आवश्यकता यह समझी गई है कि अवाँछनीय चिन्तन को उलट दिया जाय आज हम सब भ्रान्तियों के युग में जी रहे हैं। भटकाव की दिशा में चल रहे हैं। परिणामतः सुख-सुविधा के लिए किए गए प्रयास कुछ ही समय में अनेक गुनी हानि लेकर सामने आ उपस्थिति होते हैं। फुरती उत्तेजना के लिए पिया गया नशा कुछ समय तो अपना चमत्कार दिखाता है पर थोड़े ही दिनों में पीने वाले के शरीर को पोला और मन को ढीला बना कर रख देता है। अर्थसंकट, परिवार विग्रह अपयश जैसी अनेकों हेय प्रतिक्रियाएँ सामने आ खड़ी होती हैं। इन दिनों का जीवन दर्शन किसी भी कीमत पर तात्कालिक लाभ उठा लेने का बन पड़ा है। भले ही पीछे वह अनीति मूलक होने के नाते कितने ही बड़े संकट क्यों न खड़े करे? छोटे-बड़े अपने अपने क्षेत्र में अपने अपने ढंग से इसी प्रवाह में बह रहे हैं। आदर्शों के प्रति आस्था टूटती जा रही है। मानवी गरिमा के साथ जुड़े हुए गौरव और वर्चस्व की उपेक्षा हो रही है। विवेक को दकियानूसी बताकर पीछे धकेल दिया गया है और मन मर्जी की उच्छृंखलता बरतना बड़प्पन समझा जाने लगा है। यह प्रचलन कुछ एक बलिष्ठों को ही अच्छा लगा। सर्व साधारण को उसका भारी त्रास सहना पड़ा। सोचा जाने लगा कि प्रचलित अनाचार का अन्त होना चाहिए। जिस दुश्चिन्तन को अपनाकर अच्छे भले आदमी अनाचारी वर्ग में जा सम्मिलित होते हैं उसका अन्त होना चाहिए। ऐसी व्यापक जन भावना ही ईश्वर इच्छा भी बन जाती है। अनाचार की प्रतिक्रिया का नाम ही दैवी अवतार है। प्रतिभाएँ जब संशोधन कार्य में जुटती हैं तो उनकी सहायता में दैवी अनुकूलन का सहयोग भी मिलता है। ध्रुव, प्रहलाद, हरिश्चंद्र से लेकर गाँधी - बुद्ध तक को देवी सफलताएँ हस्तगत हुई, जिन्हें मानवी सहयोग के साथ दैवी अनुग्रह भी जुड़ा हुआ कह सकते हैं। महाकाल की अदृश्य व्यवस्था सूक्ष्म जगत में इसका ताना-बाना बुनती रहती है। अनीति को हटाने और नीति को जिताने में उसकी बड़ी भूमिका रहती है। इस तथ्य के पक्ष में इतिहास के अनेकों घटनाक्रम ढूंढ़ें और प्रस्तुत किए जा सकते हैं।

यह स्वीकारा जाना चाहिए कि इस समय की सबसे बड़ी आवश्यकता विचारक्रान्ति है। लोगों की सोच उस मान्यता के साथ जुड़ गयी है जो तुर्त फुर्त असीम लाभ पाने के लिए औचित्य को ताक पर उठाकर रख देती है। कहने को कोई नीति सदाचार का समर्थन वाणी से भले ही करे पर अधिकाँश लोगों का आचरण अन्धविश्वासों, ललक, लिप्साओं और चतुरता के सहारे कुछ भी कर गुजरने का स्वभाव बन गया है। इसी आधार पर वे विभूतियाँ उपज पड़ी है। इसी आधार पर वे विभूतियां उपज पड़ी उनके कारण अनाचार का बोलबाला होता दिखता है। सार्वजनिक हित बुरी तरह आहत होता है।

इस तथ्य को सभी जानते हैं कि मनःस्थिति के अनुरूप ही विचार संस्थान काम करता है। साधन और सहयोग जुटते हैं। फलतः परिस्थितियाँ बन कर खड़ी हो जाती हैं। परिस्थितियों का प्रत्यक्ष उपचार भी किया जाना चाहिए पर यह भुला नहीं दिया जाना चाहिए कि सड़ी कीचड़ की खाई कृमि कीटकों, विषाणुओं और दुर्गन्ध भरे उफानों का सृजन करती ही रहेगी। जब तक उस उद्गम में भरी सड़न को हटाया न जाएगा। तब तक ऊपर से सुर्खी गीली का छिड़काव अथवा अगरबत्ती जलाने जैसे उपचार से स्थाई समाधान बन नहीं पड़ेगा। चेचक की फुन्सियों पर मरहम लगाने में कुछ हर्ज नहीं पर काम रक्त शोधक उपाय से ही चलेगा। अन्यथा फुन्सियाँ अच्छी होते ही अन्य प्रकार के रोग विस्फोट उभरते रहेंगे। रक्त के अशुद्ध रहते रुग्णता से निश्चिंतता कहाँ मिलती है? विष वृक्ष के पत्ते तोड़ने से नहीं उसकी जड़ काटने से काम चलता है।

इन दिनों सुविधा साधन पहले की अपेक्षा कहीं अधिक बढ़े चढ़े हैं पर उनके कारण लाभ मिलने के स्थान पर हानिकारक माहौल ही बन रहा है। इस उलटबाँसी का रहस्य इतना भर है कि जन मानस में दुर्बुद्धि भर जाने से दुरुपयोग का स्वभाव और अभ्यास बन गया है। फलतः अवांछनीय रीति से प्रयुक्त किया गया अमृत भी विष का काम करता है। शक्तियों का, साधनों का, साधनों का दुरुपयोग होते देखकर एक शब्द में यही कहा जा सकता है कि यह दुर्बुद्धि का कौतूहल है। यदि औचित्य की पक्षधर गतिविधियाँ अपनाई गयी होतीं, तो उनके प्रयोक्ता धन्य हो जाते और प्रस्तुत साधनों के सदुपयोग भर से इन समस्याओं में से एक भी टिक न पातीं जो जन जन तक को अभावों और अनाचारों के शिकंजे में कस कर नीबू की तरह निचोड़े जा रही हैं।

प्रकृति का उत्पादन इतना कम नहीं है कि प्रस्तुत समुदाय की उचित आवश्यकताओं को पूरा न कर सके। हर पेट को रोटी और हर हाथ को काम मिल सके, इसकी व्यवस्था अत्यन्त सरलतापूर्वक जुटाई जा सकती है। यदि मूर्धन्यों के निहित स्वार्थ आड़े न आएं और कुछ लोक कुबेर जैसे सम्पन्न बनने की ललक छोड़ दें तो जितना कुछ इन दिनों उपलब्ध है उसी को मिल बाँट कर खाने पर सभी को सुखपूर्वक जीने का अवसर मिल सकता है। बुद्धिमानों की बुद्धि यदि अनपढ़ और अशिक्षितों को ऊँचा उठाने में लगे तो कोई कारण नहीं कि एक शिक्षित दो अशिक्षितों को पढ़ा लेने का व्रत लेकर आज की संव्याप्त अशिक्षा का समापन देखते -देखते सम्भव न कर सके, व्यक्तिगत विलासिता और अहमन्यता यदि इतने स्वेच्छाचार पर न उतरे तो तथाकथित सुविकसितों का वैभव-श्रम, कौशल और चिंतन सर्वसाधारण की समस्याओं का सुझाव प्रस्तुत न कर सके।

पिछड़े लोगों पर आलस्य, प्रमाद जैसी नासमझी छाई हुई है तो विकसित वर्ग पर निजी लिप्सा-लालसा भूत पिशाच की तरह हावी है। इन्द्र से कम क्लासी और कुबेर से कम सम्पत्तिवान बनने की किसी की महत्वाकाँक्षा है नहीं। ऐसी दशा में एक ओर खड्ड खुदेंगे और दूसरी जगह टीले उठेंगे। समानता और एकता के अभाव में बिखराव और संग्रह वाली धनीवृत्ति आए दिन संकट खड़े करती रहेगी। भले ही उनके लिए दम दिलासा देने वाले कुछ उपचारों का सिलसिला चलता रहे।

व्यक्ति अपना जीवनचक्र शालीनता का निर्वाह करते हुए किस प्रकार सुनियोजित करे यदि यह समझ जन जन में जगाई जा सके तो समझना चाहिए कि संसार की आधी समस्याओं का समाधान हो गया। प्रतिमाह यदि औसत नागरिक स्तर का निर्वाह स्वीकार कर सके तो उनके पास जो असाधारण स्तर की क्षमताओं के भण्डार शेष रह जाते हैं वे पिछड़ों को उठाने में लग सकते हैं और खड्ड टीलों को पाटते हुए समतल भूमि बनाने की युग समस्या का सरलतापूर्वक समाधान कर सकते हैं।

व्यक्तिपरक संकीर्ण स्वार्थपरता, अदूरदर्शिता, उद्धत अहंता, ललक, लिप्सा, वासना, तृष्णा यदि किसी रूप में बनी और बढ़ती रहीं तो समझना चाहिए कि चल रहे सुधार उपचार मन बहलाव के कौतुक कौतूहल बनकर रह जाएंगे। सही रूप में स्थायी समाधान तभी सम्भव होगा जब मनुष्य की मानवी गरिमा, मर्यादा और .... .... प्रति निष्ठा उत्पन्न होगी। यह उत्पादन .... भी जिसके यहाँ भी, जब भी उठ खड़ा .... समझना चाहिए कि उसकी शक्ति और .... हजार गुनी हो गई और इतने भर से लोग मिल जुल कर उन सभी समस्याओं का हल कर लेंगे जिनका घटाटोप भावी विकास की अनन्त सम्भावनाएँ लेकर उमड़ रहा है।

व्यक्तियों से मिलकर समाज बना है। व्यक्ति गया-गुजरा होगा तो समाज की दुर्दशा बनी ही रहेगी। दुरुपयोग के रहते उस सभी उपार्जन का सत्यानाश होता रहेगा जो धन, बल, बुद्धि, कौशल आदि के नाम से जाना जाता है। इसके आधार पर कुछ लोक सुखी सम्पन्न हो सकते हैं पर सर्व साधारण के पिछड़ेपन को वे मुँह मोड़कर ही देखते रहेंगे। उपलब्धियों का अपव्यय ही करते रहेंगे।

विचार शक्ति इस विश्व की सबसे बड़ी शक्ति है। उसी ने मनुष्य के द्वारा इस ऊबड़-खाबड़ दुनिया को चित्रशाला जैसी सुसज्जित और प्रयोगशाला जैसी सुनियोजित बनाया है। विनाश करना होगा तो भी वही करेगी। दीन, हीन और दयनीय स्थिति में पड़े रहने देने की जिम्मेदारी भी उसी की है। उत्थान पतन की अधिष्ठात्री भी तो वही है। वस्तुस्थिति को समझते हुए इन दिनों करने योग्य एक ही काम है, “जन मानस का परिष्कार”। इसी को विचारक्रान्ति का नाम दिया गया है। इसी की सफलता - असफलता पर विश्व का, मनुष्य का उत्थान पतन पूरी तरह निर्भर है। प्रमुखता और प्राथमिकता इसी को मिलनी चाहिए। विश्वात्मा की यहीं माँग है। दैवी शक्तियां इसी को सम्पन्न करने के लिए उद्यत हैं। प्रयोजन की पूर्ति के लिए जो कदम बढ़ायेंगे वे पाएंगे कि हवा अनुकूल चल रही है। ऐसी अनुकूल जिसमें अभीष्ट की सफलता अत्यन्त सरल सम्भव होती दीख पड़े।


चरित्र निष्ठा ही सर्वोपरि

आचार्य अश्वत्थ को महाराज देवरथ ने यज्ञ का ब्रह्मा नियुक्त किया है, उन्हें आज ही आश्रम से प्रस्थान करना है। समस्त विद्यार्थीगण प्रातःकाल से ही चुप हैं। महर्षि के चलें जाने पर वे सब स्नेह शून्यता सी अनुभव किया करते। आश्रम के प्रत्येक बालक पर उनका पितृतुल्य प्यार था। इसलिये छात्र उन्हें अपनी माँ के समान मानते और जब कभी उनका वियोग होता तो दुःखी हो जाते। मनुष्य की आँतरिक निर्मलता और स्नेह में कितनी शक्ति है जो औरों को भी सगा सम्बन्धी बना लेती है।

आचार्य अश्वत्थ चले गये। जब तक वे बहार रहेंगे तब तक घर की सारी व्यवस्था वार्क्षी करेगा वे ऐसी व्यवस्था कर गये हैं -- यह बात विद्यार्थियों को अच्छी न लगी। वार्क्षी राजकुमार है इसलिये आचार्य प्रवर उसे अधिक महत्व देते हैं। यह बात सोचकर सभी छात्रों को क्षोभ उत्पन्न हुआ पर महर्षि उस बालक में कुछ और ही बात देखते थे जो अन्य किसी भी बालक में देखने को न मिलती थी।

छात्रों ने अपना क्षोभ गुरुमाता के सम्मुख व्यक्त किया तो उन्होंने समझाया भी - तात! वार्क्षी राजकुमार है सही, वह वैभव विलासिता पूर्ण वातावरण में पला है यह भी ठीक है, तो भी उसकी चरित्रनिष्ठा सर्वोपरि है तात! कर्तव्य के आगे सौंदर्य आकर्षण भी उसे बाँध नहीं पाते, इस विशेषता के कारण ही वह महर्षि प्रिय - पात्र बन सका है।

आचार्य महिषी के इस कथन पर भी उन्हें सन्तोष नहीं हुआ उन्होंने निश्चय कर लिया इस बार जब महर्षि वापस आयेंगे तब वे अपनी बात उनके समक्ष आवश्यक प्रकट करके उचित निराकरण की माँग करेंगे।

जब यह प्रसंग चल रहा था वार्क्षी लकड़ियां लेने गया हुआ था। वार्क्षी का सुगठित शरीर ओर राज्यकुलों वाली आभा का आकर्षण पहले ही क्या कम था पर आज जब कि वह साधारण वेष में ही लकड़ियाँ लेकर लौटा तो परिश्रम से तप्त मुखाकृति कुछ और अधिक ही गौरवर्ण और आकर्षक हो उठी थी। उसे देखते ही आचार्य अश्वत्थ की कन्या वेदवती का अन्तःकरण आन्दोलित हो उठा। वे पहले ही वार्क्षी से प्यार करती थी पर आज तो उसे सर्वथा एकाकी पाकर उसकी काम-वासना उद्दीप्त हो उठी। वह निःसंकोच वार्क्षी के समीप आ गई और पूछने लगी-”वार्क्षी! - अच्छा यह तो बताओ बसन्त ऋतु आती है तो कलियाँ उमंग से क्यों भर जाती हैं, क्यों वे अपना परिमल पराग सारे वातावरण में बिखेरने लगती हैं?”

वार्क्षी ने एक बार वेदवती की आँखों में अपनी आँखें डाली। आँखों में वारुणि-पान की सी अरुणाई झाँक रही थी। वार्क्षी ने हँसकर कहा”भद्रे! सम्भव है कली यह सब भ्रमर को आकर्षित करने के लिये करती हो किन्तु मुझे तो ऐसा लगता है कली स्वयम् नहीं हँसती उसमें साक्षात् ब्रह्म का सौंदर्य उल्लसित होता है”।

पर तुम मेरे अन्तःकरण की बात क्यों नहीं समझते वार्क्षी! यह कहते कहते वेदवती वार्क्षी के बिलकुल समीप आ गई। वार्क्षी की भुजायें वे अपने हाथों में लेना ही चाहतीं थीं किन्तु वार्क्षी पीछे हट गये और वहाँ से चुपचाप अपने पर्ण कुटीर की ओर चल पड़े। यौवन की उमंग, चरित्र के शान्ति-प्रवाह पर विजय न पा सकी।

सामने खड़ी आचार्य महिषी सब देख रहीं थी। वार्क्षी की इस दृढ़ता पर वे मुग्ध हुये बिना न रह सकीं। महर्षि वापस आये तो उन्होंने सारी बातें बताई-महर्षि ने कहा-भद्रे! जो साँसारिक आकर्षण में भी अपने आपको बचाकर अपने कर्तव्य की रक्षा करता है वही महानता का अधिकारी होता है। उन्होंने वार्क्षी को दुर्लभयोग -साधनायें सिखाई, विद्याध्ययन के उपरान्त वेदवती का पाणिग्रहण भी वार्क्षी के साथ ही करा दिया।


प्रतिभा पुरुषार्थ द्वारा विकसित की जाती है!

मानवी क्षमताओं की सुनियोजित क्रियाशीलता का दूसरा नाम प्रतिभा है। जिस अनुपात में क्षमताएँ किसी में क्रियाशील होती हैं, उसी अनुपात में उसे प्रतिभाशाली कहा जाता है। यद्यपि मूल रूप से ये शक्तियाँ मनुष्य मात्र में समान रूप से पायी जाती है। पर इस समानता के बाद भी इनमें से अधिकाँश प्रायः सुप्त अथवा अक्रिय अवस्था में होती हैं। निष्क्रिय को सक्रिय बनाना, सुप्त को जाग्रत करना ही वह प्रक्रिया है, जिसे प्रतिभा जागरण का नाम दिया जाता है।

हरेक को जन्मजात रूप से तीन तरह की ताकतें मिली हैं। उन्हें शारीरिक शक्ति, विचार शक्ति एवं कल्पना शक्ति तथा भावनाओं की शक्ति नाम दिया जा सकता है। बाकी अन्य छोटी-बड़ी सामर्थ्य इन्हीं के इर्द-गिर्द घूमती रहती हैं। शारीरिक शक्ति की बलिष्ठता शरीर व प्राण की स्थिति पर निर्भर है। विचारों व कल्पनाओं की प्रखरता का आधार बुद्धि है। इसी तरह संवेदनाओं की उदात्तता अन्तराल की गहराइयों में स्थिति पवित्रता पर टिकी है। यों इन शक्तियों की झलक थोड़े बहुत रूपों में हम सभी के जीवन में दिखाई पड़ती है। हममें से सभी कुछ न कुछ काम करते सोचते, विचारते कल्पना करते रहते हैं। पर गहराई से देखने पर इनके विकास का स्तर एक दूसरे से अलग दिखाई पड़ता है।

इसका एक छोर मूढ़ता है- इसमें समूची सामर्थ्य सोई रहती है, बीच की स्थिति औसत मनुष्य की है। इसे अर्द्ध जाग्रत स्थिति कहा जा सकता है। दूसरा छोर प्रतिभाशाली होना है। इस दशा में मानवी क्षमताएँ अपनी भरपूर क्रियाशीलता प्रकट करती हैं। अपनी वर्तमान स्थिति से इस पूर्ण क्रियाशील स्थिति को पाना प्रतिभा का विकास है।

सामान्यतया यह विकास जीवन के किसी एक पहलू में दिखाई देता है। शारीरिक क्षमता को विकसित करने वाले अच्छे खिलाड़ी, पहलवान के रूप में नजर आते हैं। जिन्होंने विचार शक्ति को विकसित किया है उन्हें दार्शनिक, मनीषी, वैज्ञानिक के रूप में जाना जाता है। इसी तरह कल्पना और भाव शक्ति को विकसित करने वाले को कवि, कलाकार, साहित्यकार, युग सृजेता के रूप में पहचाना जाता है। इनमें से प्रत्येक अपने अपने क्षेत्र में प्रतिभाशाली है

यद्यपि एक पक्ष के उत्कर्ष के साथ ऐसा नहीं है कि दूसरा पक्ष समाप्त हो गया हो। पहलवान अथवा खिलाड़ी में प्रधानता तो शारीरिक शक्ति की रहती है, पर सोचने विचारने व कल्पना करने की क्षमताएँ भी होती हैं, भले कम हों, अन्यथा दाँवपेच सीखना कैसे बन पड़ेगा। दार्शनिक, वैज्ञानिक बुद्धिप्रधान जीवन जीते हैं पर उनका शरीर भी सक्रिय रहता है। यही बात कलाकार, कवि के साथ लागू होती है। कहने का तात्पर्य यह है कि विकसित स्थिति में एक पक्ष प्रधान होता है, दूसरा पक्ष गौण।

प्रतिभा शरीर, बुद्धि एवं मन तीनों की होती है। पर इसे न समझ पाने के कारण साधारणतया हम उसी को प्रतिभाशाली मानते हैं जिसमें बौद्धिक विकास काफी मात्रा में हुआ हो। यह मान्यता गलत तो नहीं पर आँशिक रूप से सत्य है। बुद्धि का स्थान शरीर की अपेक्षा कहीं ऊँचा है, अतएव शरीर इसका अनुसरण करे तो कोई गैर नहीं। किन्तु इसके बाद भी शरीर के महत्व को इनकारा नहीं जा सकता। सही माने में प्रतिभाशाली बनने का मतलब है अपनी सारी क्षमताओं को जाग्रत करना। अपने यहाँ इसी समग्रता को आदर्श माना गया है। इसी कारण हनुमान प्रतिभा के प्रतीक के रूप में स्वीकारे गए। उनमें प्रबल शारीरिक क्षमता के साथ, बुद्धि की प्रखरता भी है जिसके कारण उन्हें “बुद्धिमताँ वरिष्ठ” कहा गया। इसके अलावा कवित्व की प्रतिभा जो हनुमान्नाटक में देखने को मिलती है। यह समग्रता वर्तमान युग में दयानन्द, विवेकानन्द आदि के जीवन में देखी जा सकती है।

आज की स्थिति में मानव समुदाय का अवलोकन करने पर दो स्थितियाँ सामने आती हैं। एक स्थिति जड़ता अथवा मूढ़ता की हैं। बहु संख्यक समुदाय इस दशा में पड़ा हुआ हैं उसकी सारी क्षमताएँ सुप्त हैं। जीवन में तमोगुण का इतना घना अंधेरा छाया रहता है कि कुछ करने सोचने विचारने की बात सुझाई नहीं देती है। इस समुदाय के लोगों की दशा उस अफीमची अथवा शराबी की तरह है, जो अपनी गरिमा व सामर्थ्य को भुला कर किसी नाली अथवा कूड़े के ढेर में पड़ा रहता है। जिन्दगी के दिन ज्यों-त्यों करके गुजरते हैं।

प्रतिभा सिर्फ क्षमताओं का जागरण ही नहीं अपितु उनका सुनियोजन भी है। हममें से हरेक के भीतर चन्द्रशेखर आजाद जैसी बलिष्ठता व कर्मठता, अरविन्द, विवेकानन्द सी दार्शनिकता,कालिदास, होमर, दाँते जैसा कवित्व समाया हुआ है। इन अद्भुत क्षमताओं को न पहचानने के कारण ही हम गई गुजरी स्थिति में रह रहे हैं मनुष्य होकर भी मरी-गिरी स्थिति में कीड़े-मकोड़ों-सी जिन्दगी गुजार रहे हैं। इसका कारण है- हमारी जड़ता और उन्माद। दोनों ही दशाओं में हम अपने को भूले रहते हैं।

गर्भ से प्रतिभाशाली बिरले होते हैं। इन्हें नियम न कह कर अपवाद कहना ठीक होगा। नियमानुसार तो प्रायः सभी यहीं पर अपने को विकसित करते हैं। जर्मन के विख्यात कवि गेटे ने एक स्थान पर कहा है कि प्रकृति ने हमें वे सारी चीजें दी है जिनकी समय और परिस्थितियों के अनुसार आवश्यकता है। हमारा अपना कर्तव्य है इनका सुनियोजित विकास। श्री अरविन्द आश्रम की माताजी ने पृथ्वी को प्रतिभा जागरण की प्रयोगशाला माना है। उनके अनुसार हमारे जीवन और परिवेश की अन्तःक्रिया सिर्फ इसीलिए है कि हमारी सुप्त क्षमताएँ जागें और उपयोगी बनें।

विभिन्न प्रतिभाशाली लोगों के जीवन में यह तथ्य देखा जा सकता है। विश्व विख्यात वैज्ञानिक आइन्स्टीन ने अपनी किताब - “वर्ल्ड एज आई सो” में अपने जीवन की एक घटना का उल्लेख करते हुए लिखा है कि बचपन में उनकी गणना मूर्खों में होती थी। स्कूल में वे सबसे बुद्धू थे। उनकी बुद्धिहीनता से तंग आकर उनके एक शिक्षक ने यहाँ तक कह दिया तुम कभी कुछ नहीं बन पाओगे- अल्बर्ट। किन्तु बचपन के बुद्धू अल्बर्ट ने जब विचार शक्ति का जागरण किया तो उनकी गणना दुनिया के महानतम वैज्ञानिकों में हुई। कवियों में श्रेष्ठ माने जाने वाले कालिदास के बारे में भी यही बात है। मूर्ख कालीदास में कल्पनाशीलता के जागरण ने उन्हें कवि कुल-शिरोमणि बना दिया।

आइन्स्टीन और कालिदास के जीवन में घटे तथ्य हमारे अपने जीवन में भी घट सकते हैं। प्रतिभा का जागरण कोई संयोग नहीं है। इसका सम्बन्ध भाग्य, देवता, ग्रह, नक्षत्र से भी नहीं है। किसी भी क्षेत्र में नियोजित की गई सतत् अभ्यास की कर्मठता उस क्षेत्र विशेष की सोई शक्तियों को जगाने वाली होती है। हम जिस स्थिति में है उसीमें रहकर इन्हें क्रियाशील बना सकते हैं।

इसके लिए सर्व प्रथम आवश्यक है अपने में निहित शक्तियों में दृढ़ विश्वास। इस विश्वास के बल बूते ही सही कर्मठता बन पड़ती है। विश्वास के अभाव में पहले ही हाथ पैर ढीले पड़ जाते हैं। इसके साथ ही जरूरी है धैर्य पूर्वक कर्मठता को लगातार उच्चतर उद्देश्यों के लिए नियोजित किए रहना। उन्हें प्रतिभावान बनने के दो चरणों के रूप में समझा जा सकता है। जैसे-जैसे ये चरण गतिमान होंगे, अन्तर्निहित शक्तियाँ अभिव्यक्त होंगी। समूचा जीवन इनके प्रकाश से कान्तिमान हो सकेगा। जरूरत इस ओर बढ़ चलने की है। ऐसा करके हम अपने को प्रतिभाशालियों की कतार में खड़ा कर सकते हैं जिनकी कि आज प्रबल आवश्यकता है।


ईश्वर एक बुद्धिमत्तापूर्ण सत्ता का नाम

जे.एस.मिल. लाँग एवं हक्सले आदि विद्वज्जनों ने सृष्टि में अनेकानेक प्रकार की त्रुटियाँ गिनाते हुए कहा है कि यदि कोई इसका सृजेता है, तो निश्चय ही वह निर्दयी, अज्ञानी है। अनेकानेक अवगुणों से युक्त है। उनका कहना है कि यदि सृष्टिकर्ता कोई बुद्धिमान प्राणी होता तो निस्संदेह उसकी रचना त्रुटिहीन होती; पर देखने-सुनने में ऐसा कहाँ प्रतीत है? आये दिन उसकी कोई न कोई कमी उजागर होती रहती है। ऐसा इन नास्तिकों का अभिमत है।

जो ऐसा सोचते हैं, वस्तुतः भारी भूल करते हैं। ईश्वर की सृष्टि न तो अपूर्ण है, न त्रुटियुक्त। वास्तव में इस संसार में उसकी अपने प्रकार की व्यवस्था है। उसी के हिसाब से उसने हर प्रकार की रचनाएं उत्पन्न की हैं। इसमें जो हमें दोष नजर आते हैं, सही अर्थों में न तो वह दोष हैं, न रचनाकार की अयोग्यता। यदि उसकी कोई कृति हमें दोषपूर्ण दीखती भी है, तो आवश्यक है, उसे त्रुटि कैसे कहा जा सकता है? उदाहरण के लिए जर्मन दार्शनिक प्रो. हेल्महोल्ज की शिकायत है कि मनुष्य को जो दृष्टि मिली है, उसमें अन्यान्य प्रकार की कमियों के अतिरिक्त एक महत्वपूर्ण कमी यह है कि उसकी दृष्टि सामर्थ्य अत्यन्त न्यून है। इस प्रसंग पर विचार करने से पूर्व उस बालक पर विचार करना उपयुक्त होगा, जो सामने के बगीचे का दृश्यावलोकन करने के लिए दूरबीन की माँग करता है। पिता उसे .... वाली एक रुपये की दूरबीन लाकर दे देता है। इतने से ही प्रसन्न होकर वह खेलता व तरह-तरह के दृश्य निहार कर खुश होता रहता है। उसकी आवश्यकता पूर्ति इतने से ही हो जाती है। जब बाजार में बिकने वाले खिलौने से ही बालक का कम चल जा रहा है, जो पिता के लिए उसे महंगा दूरबीन देने की कोई ...., ....। उसे देने से तो उल्टे पिता की विवेक-हीनता ही सिद्ध होगी; क्योंकि बालक न तो इसका सदुपयोग कर पायेगा, न इसके कीमती होने का अनुमान लगा पायेगा। अस्तु ऐसी स्थिति में वह इसका भी खिलौने की भाँति ही प्रयोग करेगा और तोड़-मरोड़ कर रख देगा। अतः विवेक यही कहता है कि बालक को जिस स्तर की दूरबीन की आवश्यकता है, उसे उसी स्तर की दी जाय। इसी में पिता की बुद्धिमानी है। इस दृष्टि से मनुष्य को जो आंखें मिली हैं, उस आधार पर ईश्वर को न तो अज्ञानी ठहराया जा सकता है, और न अविवेकी ही। अज्ञानी-अविवेकी तो वह तब कहलाता, जब मनुष्य को आवश्यकतानुरूप दृष्टि ने मिली होती, किन्तु हम देखते हैं कि जो भी दृष्टि-सीमा हमें मिली हुई है, उसी से बिना किसी कठिनाई के भली-भाँति अपना क्रिया-व्यापार चलाते रहते हैं। ऐसा भी नहीं कि परमसत्ता इससे अधिक दृश्य-सामर्थ्य दे ही नहीं सकती। यदि ऐसी बात होती हो उतुँग आकाश में मँडराने वाले चील-गिद्धों को दूरदृष्टि न मिली होती। जन्तुओं में भी कितने ही ऐसे जन्तु हैं, जिन्हें विशेष स्तर की अवलोकन-क्षमता प्राप्त हे। बिल्ली, शेर जैसे जानवर रात और दिन दोनों ही स्थितियों में दृष्टि संबंधी समान प्रकार की क्षमता प्रदर्शित करते हैं। उलूक वस्तुओं को रात में उसी विशिष्टता से देख-समझ सकता है। जितना कोई अन्य जन्तु दिन में। उकाब की आँखें इतनी तीक्ष्ण होती हैं, कि जितनी दूर तक दूरबीन के सहारे भी नहीं देख सकते, उतनी दूरी वह अपनी आँखों से स्पष्टतापूर्वक देख सकता है।

इन सब पर विचार करने से ऐसा लगता है, कि परमेश्वर ने सोच-समझ कर ही हमें यह दृष्टि सामर्थ्य ही है; क्योंकि उसमें अधिक भी देने की क्षमता है और कम भी। वह अधिक दृश्य सामर्थ्य भी दे सकता था और अल्प भी। दूरदृष्टि का मनुष्य जीवन में कोई महत्व है नहीं और अल्प दृष्टि से उसका काम चल नहीं सकता। इसी कारण उसने मध्यम दृष्टि का समावेश मनुष्य में किया जिससे मनुष्य अपना सारा कार्य सुगमतापूर्वक सम्पादित करता रहता है। किसी प्रकार की कठिनाई इससे प्रस्तुत नहीं होती। इस प्रकार स्रष्टा पर लगाया गया यह आक्षेप कि मनुष्य को, इस संसार का सर्वश्रेष्ठ प्राणी होने के नाते दृष्टि भी श्रेष्ठ मिलनी चाहिए, निरस्त हो जाता है।

इतना ही नहीं, अन्य अनेक क्षेत्रों में विचार करने से भी मनुष्य मानवेत्तर प्राणियों से पिछड़ा हुआ ही प्रतीत होता है। कितने ही जन्तुओं में गंध ग्रहण करने की अद्भुत सामर्थ्य होती है। कुत्तों के बारे में सर्वविदित है कि वह इसी आधार पर अपराधी को ढूंढ़ निकालता है। हिरन गंध के आधार पर ही अपने-अपने क्षेत्र की पहचान बनाये रहते हैं। पक्षियों में दिशा ज्ञान की विलक्षण क्षमता होती है। वह वहां में उड़ सकते हैं। मछलियाँ तथा अन्य जलीय जीव पानी में निवास कर सकते हैं। साँप अपनी त्वचा से सुनते हैं। इस पर कोई यह कहे हि चूँकि मनुष्य सृष्टि का मुकुटमणि है, अतः इन सभी विशिष्टताओं का समावेश उसमें होना चाहिए था, यह पक्षपातपूर्ण होगा। कोई सृष्टि का श्रेष्ठ प्राणी है, मात्र इसलिए उसमें सारी श्रेष्ठ क्षमताएँ होनी चाहिए, ऐसा नहीं कहा जा सकता जिसकी जिसमें आवश्यकता ही नहीं, उसे प्रदान करने से तो सृजेता की नासमझी ही साबित होती। मनुष्य को यदि गंध संबंधी विशिष्ट स्तर की सामर्थ्य मिल भी जाती, तो उसका वह क्या करता? कुत्तों-हिरनों में तो इसे इसलिए दिया गया, ताकि भोजन ढूंढ़ने में सुगमता हो और शत्रु से अपनी सुरक्षा का उपाय समय रहते ही ढूंढ़ पायें। मानव में इन दोनों समस्याओं के हल के रूप में हाथ-पैर जैसे वैकल्पिक अंग दिये गये है। इनसे वह भोजन जुटाने और आत्मरक्षा करने के दोनों काम समाज दक्षता से कर सकता है। फिर इसी काम के लिए किसी अधिक उच्चस्तरीय व्यवस्था का कोई औचित्य रह नहीं जाता।

इस तरह ईश्वरीय सत्ता की क्षमता-वितरण प्रक्रिया पर विचार करने पर जो एक बात सामने आती है, वह यह कि सृष्टि रचना के समय उसने उपयोगितावाद पर निश्चय ही ध्यान दिया होगा और विवेकपूर्वक यह विचार किया होगा कि किस जन्तु में किस अंग की कितनी उपयोगिता होगी। बाद में इसी आधार पर विभिन्न जन्तुओं की विभिन्न इन्द्रियों में भिन्न स्तर की क्षमताओं का समावेश किया होगा। वस्तुतः यह परम सत्ता की न्याय बुद्धि का परिचायक है।

कुछ लोग सृष्टि में चलने वाले जन्म-मृत्यु के चक्र को दोषपूर्ण बताते हैं और इसे रचयिता का अज्ञान प्रदर्शित करने वाली क्रिया की नृशंसता कह कर संबोधित करते हैं।

ऐसा समझने वाले पहली भूल तो यह करते हैं कि वे सृष्टि को नित्य समझ बैठे हैं। वस्तुतः सृष्टि किसी समर्थ सत्ता की अनित्य रचना है। जो अनित्य है, उसके प्राणी नित्य कैसे हो सकते हैं? जो बना है, उसका बिगड़ना सुनिश्चित है। जिसका निर्माण हुआ है उसका ना भी जरूरी हैं यदि संसार में यह व्यवस्था नहीं होती, तो कोई भी प्राणी अपने अनादि-अनन्त जीवन की एकरसता से जल्दी ही ऊब और असंतुष्ट हो जाता। ऐसी स्थिति में मनुष्य से कोई काम होना तो दूर, जीवन ढोना भी भार भूत बन जाता। फिर वहाँ भी ईश्वर की इस व्यवस्था पर आक्षेप लगने आरंभ हो जाते कि आखिर उसने ऐसा संसार बनाया ही क्यों, जिसमें जीवन का आदि अन्त ही न हो। दूसरे असीम जीवन में किसी प्रकार का दुःख तकलीफ लगातार सह पाना उसके लिए कठिन हो जाता, यदि संसार-चक्र की व्यवस्था न होती। जन्म-मृत्यु की सृष्टि में तो वह अपने दुःखों से कुछ समय के लिए अवकाश पा लेता है और उस दौरान पुनः तरोताजा होकर इस स्थिति में आ जाता है कि दुबारा कठिन परिस्थिति का वह भली भाँति साहसपूर्वक सामना कर सके। यदि दुनिया में जीवन-मरण का प्रवाह


Quotation

तालाब के कितने ही घाट होते हैं। उनमें से किसी में जाकर घड़ा भरा जा सकता है। धर्म एक है। सम्प्रदाय उसके घाट हैं। जो सरल पड़े वहाँ से प्यास बुझाई जा सकती है। अपना जल या अपना घाट उत्तम है। इसके लिए हठ करना व्यर्थ है।

न होता, और सिर्फ जन्म ही होता चला जाता, तो प्राणियों की संख्या इतनी अधिक हो जाती कि वह संसार ही उसके लिए अपर्याप्त साबित होता। फिर साथ-साथ इतनी विशाल संख्या का रह पाना मुश्किल हो जाता। इसके साथ ही तरह-तरह की समस्याएँ उत्पन्न होने लगतीं, जिनमें आवास और भोजन संबंधी मुख्य होतीं। ऐसी सृष्टि में तब डार्विन का “स्ट्रगल फाँर एग्जिस्टेन्स” और “सरवाइवल ऑफ दि फिटेस्ट” का सिद्धान्त और मत्स्य न्याय का जंगली कानून सर्वत्र दृष्टिगोचर होता।

इन्हीं सब व्यावहारिक कठिनाइयों को ध्यान में रख कर ईश्वर ने ऐसी सृष्टि बनायी है, जिसमें जीवन चक्र की उपयोगिता के आधार पर जीवधारियों में भिन्न-भिन्न प्रकार की क्षमताओं की व्यवस्था की है। इससे सृजेता की बुद्धिमत्ता का ही परिचय मिलता है। इस प्रकार यह कहना कि इस संसार का रचनाकार अल्पज्ञ और मन्दमति है, सर्वथा अनुचित होगा।


निन्दक नहीं, समीक्षक बनें!

समीक्षा एक ऐसी प्रक्रिया है, जिसमें गुण-दोषों का ठीक-ठीक विवेचन किया जाता है। उसे पहले उसके गुणों से अवगत करा दिया जाता है। इस तरह उसकी मनः स्थिति स्वयं के बारे में बहुत कुछ जानने को तैयार होती है ऐसी स्थिति में भद्रतापूर्वक यह कहना बन पड़ता है कि उसमें कतिपय ऐसे दोष हैं जो उसके जीवनक्रम के लायक नहीं हैं। इस भाँति धीरे धीरे इन दोषों के प्रति हम अन्यों को जागरूक करते हैं। इन्हें ठीक तरह से समझ लेने पर इनसे छुटकारा पाना भी सहज हो जाता है।

समीक्षक की स्थिति एक सच्चे मित्र और हितैषी की है। उसकी मनोवृत्ति का रचनात्मक होना जरूरी है। साथ ही इस प्रक्रिया का उद्देश्य-स्वस्थ पद्धति का निर्माण है। रचनात्मक और उद्देश्यपूर्ण होने के अतिरिक्त जिस एक अन्य बात की इसके लिए महत्ता है, वह है समीक्षक का स्वयं उन दोषों से मुक्त होना। उसके द्वारा उन्हीं दोषों का विवेचन किया जा सकता है जिनसे वह स्वयं मुक्त हैं। क्योंकि इसी स्थिति में उसे स्वस्थ मार्गदर्शन दे पाना सम्भव है।

समीक्षा के इन महत्वपूर्ण बिन्दुओं से परिचित न होने के कारण इसका स्थान निन्दा ने ग्रहण कर लिया है। इसे एक बड़ी भूल कहना ठीक होगा, कारण कि समीक्षा और निन्दा में ठीक उतना ही अन्तर है जितना कोयले ओर हीरे में। आकार-प्रकार, गुण-प्रकृति सभी कुछ एक दूसरे से बिलकुल अलग हैं। निन्दा करने में मनोवृत्ति लक्षित व्यक्ति को अपने से छोटा सिद्ध करने की होती है। जबकि अपने बारे में यही विश्वास रखा जाता है कि उसमें कमियाँ लेश मात्र नहीं हैं। फलतः उसे लगता है कि वह अन्य सभी की अपेक्षा श्रेष्ठ है। आत्म श्रेष्ठता की इस ग्रन्थि को पोषण देने की प्रकृति निन्दा की वृत्ति से छुटकारा नहीं पाने देती।

निन्दा और समीक्षा के इस सूक्ष्म अन्तर के सम्बन्ध में अध्यापक पूर्ण सिंह ने अपनी रचना “बायोग्राफी ऑफ स्वामी राम” में एक घटना का उल्लेख किया है। इसके अनुसार स्वामी रामतीर्थ हिमालय के टिहरी क्षेत्र में रह रहे थे। पूर्ण सिंह अपने एक मित्र के साथ उनसे मिलने गए। स्वामी रामतीर्थ ने उन्हें समझाते हुए कहा यहाँ निन्दा वर्जित है। पूर्ण सिंह लिखते हैं कि उस समय मुझ में ग्रह कुवृत्ति थी। मैं निन्दा करने लगा। स्वामी जी के टोकने पर जवाब था “समीक्षा कर रहा हूँ।” स्वामी रामतीर्थ ने हँसते हुए कहा कि समीक्षा का अर्थ दोषों का बखान नहीं हैं। इसका यथार्थ भाव है गुणों का प्रोत्साहन और दोषों का निवारण। निन्दक दूसरों की कितनी हानि करेगा इसका ठीक आकलन तो परिस्थितियों के अनुसार सम्भव है। पर वह स्वयं अपनी मानसिकता पर कुठाराघात किया करता है।

आधुनिक मनोवैज्ञानिक भी इस मत को स्वीकारने लगे हैं। ब्रिटिश मनोविज्ञानी जे. हक्सले ने अपनी अध्ययन “डोअर्स आफ पर्सनेलिटी” में स्पष्ट करते हुए कहा है कि वाणी से लगातार दोषों के वर्णन के द्वारा हम मन की गहराइयों में इन्हें अंकित करते हैं। यह एक सहज स्वाभाविक प्रक्रिया है। क्योंकि वाणी से इन्हें बोलने पर पहले सुनने वाले हम स्वयं होंगे यदि लगातार इन पर चर्चा की जाय तो समूची मानसिकता में कलुष घुलता जाता है। धीरे धीरे चिन्तन की यह विकृति समूचे जीवनक्रम को दोषपूर्ण बनाती है।

यही कारण है कि उपनिषदों ने “भद्रं कर्णेभिः --श्रृणुयाम” एवं “वाँग में मनसि प्रतिष्ठता” जैसे सूत्रों को प्रतिपादित किया है। ये सूत्र स्पष्टतया कल्याणकारी वचनों को बोलने तथा मन और वाणी की अविच्छिन्नता को प्रतिपादित करते हैं। इस के बाद भी हम सभी के जीवन में कुछ न कुछ निन्दा की वृत्ति घुली हुई है। इसका पूर्णतया निष्कासन भी तुरन्त सम्भव नहीं है। इसके लिए एक ही सरल व सर्वजनीन उपाय है निन्दा का समीक्षा में परिवर्तन।

इसमें औचित्यपूर्ण यही है कि शुरू में समीक्षा का क्षेत्र दूसरों का जीवनक्रम न होकर स्वयं का जीवन व अपने ही क्रिया-कलापों को बनाया जाय। इसकी शुरुआत व्यावहारिक गतिविधियों से करनी होगी। गुण और दोषों की कुछ न कुछ मात्रा हम सभी में होती है। पूर्णतया गुण विहीन या दोष विहीन शायद कोई हो। अन्यथा कम या अधिक अनुपात में ये दोनों तत्व हमारे जीवनक्रम में समाए रहते हैं तटस्थ भाव अपनाकर पहले गुणों को देखा जाय उनके प्रति आदर भाव जगाया जाय। इसके बाद इन्हीं गुणों के प्रकाश से दोषों को ढूँढ़ निकालने का प्रयास करें। इस साफ कपड़े का महत्व मालूम है वह अपने कपड़ों में तनिक सी गन्दगी नहीं देख सकता इसे तुरन्त दूर हटा देने में भलाई सूझती है। ठीक ऐसी ही स्थिति आत्म सीमारक्षक की है- जब उसे अपने जीवन में गुणों तथा इनके महत्व का पता चलता है। दोष-दुर्गुण बुराइयां असहनीय लगने लगती हैं। इनको जिस किसी तरह निकाल बाहर करने में ही कल्याण दिखाई पड़ता है आत्म समीक्षा के पथ पर बढ़ते हुए कदम उसे समीक्षक की योग्यता प्रदान करते हैं।

समीक्षक का काम सर्जन की तरह है। वह चीर -फाड़ तो करता है पर बेतरतीब नहीं। इसके लिए अनेकों साल मुर्दा शरीरों पर दत्त हो अभ्यास में जुटना पड़ता है। इसी तरह समीक्षक भी वर्षों अपनी क्रिया-कलापों एवं चिन्तन की समीक्षा करता है। उसके सामने औचित्य का स्वीकरण और अनौचित्य का निवारण करके व्यक्तित्व गठन ही एक मात्र उद्देश्य रहता है। सर्जन की कुशलता उसे शल्य क्रिया के लिए चुस्त - दुरुस्त बनाती है। हमारी अनपढ़ आँखें भले उसके चाकू-छुरी चलाने की बारीकी न समझ पाएँ। पर उसे पूरी तरह ध्यान रहता है कि कहीं कोई शिरा धमनी जरूरी अंग अवयव यों ही न फट जायँ।बिना किसी तरह की क्षति पहुँचाए विकृतियों को बाहर कर देना उसका अपना कौशल है। समीक्षक की यही दशा है गुणों को बिना चोट पहुँचाए, दोषों को जीवन से मिटा देने में उसकी कुशलता, प्रमाणित समझी जाती है।

निन्दक का काम बदमाशों जैसा है जो बिना किसी परवाह के यों ही चाकू चला देते हैं। निन्दालु व्यक्ति को भी किसी के गुण दोषों से क्या मतलब उसे जिस तिस तरह अपनी वृत्ति की तुष्टि में सुख सूझता है। परिणाम स्वरूप उसे अपने चारों ओर शत्रुता--अप्रामाणिकता के आक्षेपों से सारे जीवन, परेशान होना पड़ता है। इन सारे झंझटों से छुटकारा पाने के लिए ठीक यही है कि इसके स्थान पर आत्म समीक्षा की वृत्त अपनाई जाय। इससे दोष देखने का कौशल लाभदायक बन सकेगा, साथ ही गुण देखने -परखने की एक नई विद्या हाल लग सकेगी। जैसे जैसे इसमें प्रवीणता हासिल होती जाएगी निज के व्यक्तित्व का विकास एक कुशल समीक्षक के रूप में हो सकेगा। इस तरह न केवल हम खुद पहले के दोष-दुर्गुणों से छुटकारा पाएँगे बल्कि दूसरों को भी इन विकृतियों से अलग कर सकने में सहायक बन सकेंगे। व्यक्तित्व के समग्र विकास की समीक्षा एक महत्वपूर्ण कुँजी है।


भाव संवेदनाओं का भांडागार- कारण शरीर

सामान्य बुद्धि काया को ही अपना समझ स्वरूप मानती है और उतने तक ही प्रसन्नता को सीमाबद्ध रखती है। शारीरिक स्वार्थ ही मनुष्य के लक्ष्य बन कर रहते है। उसी को अपना समग्र स्वरूप मानते हुए सोचने और करने की परिधि सीमाबद्ध कर लेते हैं। शोभा, सज्जनता, समर्थता, सम्पन्नता, सरसता ही शरीर को रुचते हैं। इसलिए उन्हीं के निमित्त समूचा प्रयास नियोजित रहता है। पर प्रायः यह भुला ही दिया जाता है कि स्थूल के भीतर दो अन्य सत्तायें भी विद्यमान हैं।

सूक्ष्म शरीर को मोटे रूप से समझने के लिए चेतना के उस पक्ष को आधार मानना पड़ेगा जिसे कल्पना या विचारणा कहते हैं। कुशलता, चतुरता भी। स्वभाव और रुझान इसी स्तर के साथ जुड़ा हुआ है। शिक्षा, अनुभव अभ्यास के आधार पर विचार सत्र का उत्कर्ष किया जाता है। इस दिशा में प्रगतिशील व्यक्तियों को पैनी सूझ बूझ वाला, चतुर, विद्वान् आदि के नाम से जाना जाता है। यह शरीर के साथ संचित कल्मषों के बंधनों से भी बँधा रहता है। इसीलिए उसकी दौड़धूप, कल्पना, इच्छा प्रायः बहिरंग जीवन के निमित्त ही क्रियाशील रहती है। जबकि मस्तिष्कीय गतिविधियों को कायिक निर्वाह के लिए सोचने और साधन जुटाने में संलग्न पाया जाता है।

कारण शरीर का तत्वज्ञान तो बढ़ा चढ़ा है, पर उसे सामान्य परिचय में भाव संवेदना कह सकते हैं। भावना, आस्था, प्रेरणा, साहस, विश्वास, आदर्श जैसे तत्व इसी क्षेत्र में उभरते हैं। किसी को महामानव स्तर तक विकसित करने की अलौकिकता इसी क्षेत्र में उतारना है। उसकी विकसित स्थिति इतनी समर्थ है कि एकाकी निर्धारण कर सके। अकेला चल सके। आदर्शों के लिए कठिनाइयों को सहन कर सके। बिना डगमगाये उच्च लक्ष्य तक पहुँच सके। योगी, तपस्वी, मनीषी, सुधारक, सृजेता इसी स्तर के होते हैं जो मात्र उत्कृष्टता की दिशा में ही कदम बढ़ाते हैं। विचार तंत्र और क्रिया तंत्र को साथ साथ घसीट ले चलने की क्षमता परिष्कृत कारण शरीर में ही होती है। साथ ही यह बात भी है कि इस क्षेत्र पर यदि अनैतिक, अवाँछनीयता, अधिकार जमा ले तो व्यक्ति का घिनौने स्तर का अपराधी आततायी और असुर बना देवी है। इसलिए व्यक्तित्व का स्वरूप निर्धारित करने एवं उसे भला-बुरा, .... -अतः पतित बनाने वाली उमंगे भी कहीं से उठती हैं। मानवीय गरिमा के अनुरूप जीवन जी सकना और महामानवों का स्तर अपना सकना जिस आधार पर संभव होता है उसे कारण शरीर ही कहना चाहिए।

कर्म स्थूल शरीर से बन पड़ते हैं। विचार सूक्ष्म शरीर में उठते हैं और भाव संवेदनाओं का उद्गम कारण शरीर को समझा जा सकता है। उदारचेता, संवेदनशील, आदर्शवादी, परमार्थी स्तर उन्हीं का होता है जिनका कारण शरीर परिष्कृत हो।

सूक्ष्म शरीर के विकृत, विपन्न होने पर कुकल्पनायें उठती हैं। चंचलता छायी रहती है। असंबद्ध भटकाव का दौर चढ़ा रहता है। आदतें बिगड़ती हैं और स्वभाव घटिया हो जाता है। फलस्वरूप मानसिक उद्वेग बने रहते हैं। क्रोध, आतुरता, निराशा, चिन्ता, ईर्ष्या, प्रतिशोध, महत्वाकाँक्षाओं का ऐसा उफान उठता रहता है जिसे समुद्र में उठने वाले ज्वार भाटे या उष्ण वायु में बनने वाले चक्रवात के समतुल्य समझा जा सके। मानसिक तनाव रहने पर शरीर भी स्वस्थ नहीं रह सकता क्योंकि मात्र आहार विहार पर ही स्वस्थता निर्भर नहीं है वरन उस तंत्र के संचालन के उपयुक्त ऊर्जा मनः क्षेत्र में ही मिलती है। उद्वेग उभरने पर भूख, प्यास, नींद तक गायब हो जाती है और असंतुलित मनः स्थिति में व्यक्ति सनकी, विक्षिप्त, उन्मादी, जैसा आचरण करने लगता है। दूरदर्शिता कुँठित हो जाने पर सामान्य गतिविधियाँ एवं निर्धारणाएँ भी ठीक तरह नहीं बन पड़ती है। इतना ही नहीं, भीतरी अंग अवयवों पर इतना दबाव पड़ता है कि जहाँ तहाँ से, जिस तिस प्रकार की रुग्णता उभरने लगती है। बाह्य प्रभाव की प्रतिकूलता से जितना अनिष्ट होता है उससे कहीं अधिक अनर्थ मानसिक असंतुलन से होता है। स्वास्थ्य बिगड़ता है और निर्णय निर्धारण क्रिया कलाप उलटे होने लगते है।

यदि शारीरिक स्वास्थ्य की तरह मानसिक सुसंतुलन का ध्यान रखा जाए तो उस स्थिति में बाह्य परिस्थितियों की प्रतिकूलता भी हँसते हँसते सहन करली जाती है। सही चिन्तन चलता रहे तो स्वभाव में ऐसी आदत सम्मिलित नहीं हो पाती जो स्वास्थ्य बिगाड़े, मस्तिष्क तनावग्रस्त रहे। बेतुके आचरण अपनाये और व्यवहार कुशलता के अभाव में जैसे असहयोग तथा विग्रह का सामना करना पड़ता है, उस प्रकार का त्रास सहना पड़े।

मनः स्थिति की विपन्नता ही अकर्म करने के लिए प्रेरित करती है और उसी कारण परिस्थितियाँ ऐसी बनती हैं जिन्हें दुखद या दुर्भाग्यपूर्ण कहा जा सके। एक जैसी परिस्थितियों में जन्मे और पले व्यक्तियों में से कुछ लोकप्रिय होते हैं साथ ही तेजी से प्रगति पथ पर दौड़ लगाते हैं। चुम्बक अपने प्रभाव से लोह खण्डों को घसीटकर अपने साथ चिपका लेता है उसी प्रकार विचारशील व्यक्ति अपने सही चिन्तन को सद्गुणों में बदलता है और सद्गुणों के लिए चिरस्थायी सम्मान एवं सहयोग सुरक्षित रहता है। सही निर्णय, सही स्वभाव, सही आचरण यहीं श्रृंखला अनेकानेक सफलताओं का आधारभूत कारण बनती है। जो इस तथ्य को नहीं समझते वे विचार तंत्र को उच्छृंखलता के खाई खंदकों में भटकने देते हैं फलस्वरूप उनका व्यक्तित्व अवाँछनीय हेयस्तर का बन जाता है। पग पग पर ठोकरें लगती हैं। हर दिशा में तिरस्कार, उपहास, विरोध बरसता है। ऐसा व्यक्ति स्वयं तो दुखी रहता ही है साथ ही सम्बद्ध लोगों को, मित्र परिजनों को भी विषम विपन्नता में धकेलता है। कुसंस्कारिता अपने आप में एक विपत्ति है। वह जहाँ भी रहती है वहीं अपने स्तर के अनेक सहयोगियों को न्यौता बुलाती है। ऐसी विसंगतियों से भरा हुआ कोई व्यक्ति न तो स्वयं चैन से रहता है और न ही जिसके साथ जुड़ता है उसे चैन से बैठने देता है। ऐसों की दुर्गति ही होती है वे कभी कहने योग्य सफलता और सज्जनों के द्वारा की गई प्रशंसा के पात्र नहीं बन पाते।

स्वास्थ्य सुधारने और सुन्दर सम्पन्न दीखने के लिए जितना प्रयत्न किया जाता है उतना ही यदि मन को सुसंस्कारी बनाने के लिए भी किया जाय तो अपेक्षाकृत कहीं अधिक लाभ में रहा जा सकता है। उपलब्धियां - साधन सम्पदाएँ कितनी ही अधिक क्यों न हों उनका सदुपयोग करने की दूरदर्शी विवेकशीलता का अभाव रहे तो दुरुपयोग से अमृत भी विष बन सकता है। कुबेर को भी अभाव रहा सकता है और इन्द्र जैसा सर्व सम्पन्न भी पतित, निंदित एवं अभिशप्त स्थिति में पहुँच सकता है।जिन्हें इस वस्तु स्थिति का ज्ञान है वे सूक्ष्म शरीर को, विचार तंत्र को, परिष्कृत परिमार्जित बनाने पर पूरा पूरा ध्यान देते हैं और हर परिस्थिति में हँसता हँसता हुआ खिलता खिलाता हुआ जीवन जीते हैं। यही है सूक्ष्म शरीर का सामान्य जीवन में सदुपयोग।

कारण शरीर में भाव संवेदनाओं का भण्डार है। असीम शक्ति का स्रोत यहीं से उभरता है। स्थूल शरीर को विकसित करने के लिए कर्मयोगी का, सूक्ष्म शरीर की प्रगति के लिए ज्ञान योग का और कारण शरीर को समृद्ध बनाने के लिए भक्ति योग का आश्रय लेना पड़ता है।


सूर्योपासना से आरोग्य की प्राप्ति

वैदिक संस्कृति में सूर्य उपासना से लेकर उसकी समीपता तक की विशेषताओं का भरपूर लाभ उठाने के लिए कहा गया है। ऋषि युग के व्यक्ति कटिवस्त्र और उत्तरीय जैसे हलके और न्यूनतम वस्त्र धारण करते थे और शरीर को अधिकतर खुली हवा एवं सौर ऊर्जा का लाभ लेने के लिए खुला रखते थे। रोग निवारण में सूर्योपचार से कैसे लाभ उठाया जा सकता है, इसकी विधि-व्यवस्था भी उन दिनों सर्वविदित थी। उनके दीर्घ जीवन एवं सुदृढ़ आरोग्य के कारणों में सूर्य सेवन भी अति महत्वपूर्ण रहा है।

वेदों में सूर्य सेवन के लाभों पर जहाँ तहाँ महत्वपूर्ण प्रकाश डाला गया है और उससे लाभान्वित होते रहने का परामर्श दिया है यथा ‘उद्यन्नादिव्य रश्मिभिः शीर्ष्णो रोग मनीनशः।’ (अथर्ववेद-....) अर्थात् प्रातःकाल की आदित्य किरणों से अनेकों व्याध्यों का नाश होता है। इस संदर्भ में सुश्रुत का कथन है-’सूर्य रश्मियों के दैनिक प्रयोग से मनुष्य कफ, पित, और वायु दोषों से उत्पन्न रोगों से मुक्त होकर सौ वर्ष पर्यन्त जीवित रह सकता है।

सूर्य का वाहन सप्तअश्व वाला रथ है। यह सात अश्व सात रंग की सात किरणें हैं जो प्रकृति क अनेकानेक गतिविधियों का सूत्र संचालन करती हैं। साथ ही उनमें सन्निहित सात रंग रोगों की निवृत्ति और आरोग्य की अभिवृद्धि में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इस संदर्भ में सूर्य रश्मिचिकित्सा क्रोमोथेरैपी का आविष्कार हो चुका है और उसका उत्साहवर्धक विस्तार हो रहा है।

सामान्यतः सूर्य किरणों में सातों रंग मिले रहते हैं, पर उनमें से किसी या किन्हीं रंग को आवश्यकतानुसार ग्रहण करने या छोड़ने की व्यवस्था भी बन सकती है। सूर्य किरण चिकित्सा का यही आधार हैं रंगीन काँच में से छन कर आने वाली धूम में यह विशेषता है कि वह काँच के रंग वाली किरणों को ही पार होने देती है और शेष को ऊपर ही रोक लेती है। शरीर और सूर्य के बीच में जिस रंग का काँच रखा जायगा उसी वर्ण की किरणों का लाभ मिलेगा। इससे चिकित्सा उपचार में जिन्हें अनावश्यक -समझा जायगा उन्हें उसी अवरोध को मध्यवर्ती बनाकर अलग रखा जा सकेगा।

आधुनिक चिकित्सा विज्ञानियों ने सूर्य की सप्तवर्णी किरणों में सन्निहित जीवनदायी क्षमताओं को खोज निकाला है और पाया है कि इन रश्मियों से जीवनीशक्ति को बढ़ाया-या घटाया जा सकता है। इन्फ्रारेड, अल्ट्रावायलेट, एक्सरे आदि की क्षमता तो चिकित्सा जगत में सर्वविदित ही है। वैज्ञानिकों ने अब लेसर जैसी मृत्यु किरणों का भी आविष्कार कर लिया है। जिसके माध्यम से क्षेत्र विशेष के प्राणियों तक का संहार किया जा सकता है। इन किरणों का प्रयोग जहाँ विघातक प्रतिफल प्रस्तुत करता है वहीं स्वास्थ्य रक्षा से लेकर समस्त प्राणियों एवं वनस्पतियों के जीवन की रक्षा करता है। इनमें इन्फ्रारेड किरणें मानवी काया सहित समस्त प्राणियों को गरम रखने एवं जैव रासायनिक क्रियाओं को तीव्र करने का कार्य करती हैं। अल्ट्रावायलेट किरणों से हमारे शरीर में विटामिन ‘डी’ का निर्माण होता है। सूर्य चिकित्सा पर अनुसंधानरत सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक विलियम फिल्डिंग ने अपने विभिन्न परीक्षणों के आधार पर निष्कर्ष निकाला है कि इन रश्मियों के प्रकंपन रक्त कणिकाओं विशेषकर लाल रक्त कणों की संख्या में आश्चर्य जनक रूप से अभिवृद्धि करते है। हैं। कैल्शियम, फास्फोरस आदि खनिज लवणों को शरीरोपयोगी बनाने का कार्य भी इन्हीं के द्वारा सम्पन्न होता है। लेसर किरणों को कृत्रिम रूप से पैदा करके रोगों के उपचार में अब प्रयोग होने लगा है। प्रकाश रश्मियों का प्रत्यक्ष रूप से उपयोग अन्य कृत्रिम उपायों से प्राप्त लाभों की अपेक्षा कहीं अधिक अच्छा रहता है।

प्रकाश के अभाव में शरीर का बाह्य स्वरूप ही प्रभावित नहीं होता, वरन् उसके आतंकित-अवयवों और उनकी प्रक्रियाओं पर भी उतना ही कुप्रभाव पड़ता है। परिणाम स्वरूप व्यक्ति को विभिन्न प्रकार के रोगों का शिकार बनना पड़ता है उसकी जैविकलय बायोलॉजिकल रिद्म गड़बड़ा जाती है और मानसिक विकृतियाँ घेर लेती है। इस संदर्भ में यू.एस. एस.आर.एकेडेमी के वरिष्ठ सदस्य एवं इंस्टीट्यूट ऑफ साइटोलॉजी एण्ड जेनेटिक्स के संचालक डा. डी.के बेलियायेव ने गहन अनुसंधान किया है। सिद्ध कर दिखाया है कि सूर्य संपर्क से मनुष्य अपने जीवन लय को व्यवस्थित एवं नियमित बना सकता है। इतना ही नहीं वह इसे नियंत्रित कर वाँछित दिशा में मोड़-मरोड़ कर अभीष्ट लक्ष्य की पूर्ति भी कर सकता है।

जर्मनी के प्रख्यात चिकित्सा विज्ञानी डा. लुईकुनी का कहना है कि सूर्योपासना में रोगों को नष्ट करने एवं प्राणी मात्र को स्वास्थ्य और नवजीवन प्रदान करने की अपूर्व प्राकृतिक शक्ति है। उन्होंने कई रोगों के उपचार के लिए सूर्य-किरणों का उपयोग सफलतापूर्वक किया। इसी तरह द्वितीय महायुद्ध के समय प्रसिद्ध चिकित्सक डा. सोरेल ने भी घायल सिपाहियों के उपचार के लिए रवि रश्मियों का उपयोग किया था। पहले तो उन्होंने केवल घावों पर सूर्य रश्मियों का प्रयोग किया, बाद में पूरे शरीर पर प्रयोग करके देखा तो अपेक्षाकृत अधिक लाभ हुआ। पाश्चात्य चिकित्सा विज्ञानी हिपोक्रेट्स सूर्य किरणों द्वारा लोगों की चिकित्सा करने के लिए विख्यात थे। अमेरिका के चिकित्साशास्त्री डा. जॉन ठोन ने इस माध्यम से क्षय जैसी प्राणघातक बीमारी से कितने ही रोगियों की जीवन रक्षा की है।

सूर्य चिकित्सा विज्ञानियों का कहना है कि सभी प्रकार के रोगों में सूर्य की किरणों से लाभ प्राप्त किया जा सकता है। भूख ने लगना, डिसेन्ट्री, खाँसी, त्वचा विकार, नेत्र रोग, मानसिक असन्तुलन आदि सबसे सूर्य किरणों की लाभदायक शक्ति का उपयोग हो सकता है। कैल्शियम की कमी एवं विटामिन ‘डी’ की अल्पता में तो इन रश्मियों का उपयोग लाभप्रद है ही।

इस संदर्भ में सुप्रसिद्ध सूर्य चिकित्सा विज्ञानी डा. स्किली का कहना है कि रोगों से छुटकारा पाने, स्वस्थ होने के लिए रवि-रश्मियों का विधिवत् उपयोग अत्यन्त लाभकारी होता है। प्रातः धूप में बैठना शारीरिक कान्ति वृद्धि के लिए असीम उपयोगी है। फेफड़े के टी.वी. में प्रकाश किरणें सीधे शरीर पर न पड़ने पायें बल्कि कपड़े या काँच से छनकर आती हुई किरणों का उपयोग किया जाय।

शीत प्रधान देशों में जब धुन्ध और बदली नहीं रहती और स्वच्छ प्रकार धरती पर आता है तो लोग सूर्य सेवन के लिए आतुर हो उठते है। शरीर को लज्जावस्त्र के अतिरिक्त निर्वस्त्र करके उस पर खुली किरणें देर तक पड़ने देते हैं। उन देशों में सूर्य सेवन को अलभ्य अवसर मानकर उसका लाभ आतुरता पूर्वक उठाने के लिए अनेक विधि-विधान बनाये गये हैं। पर भारत जैसे देशों में तो वह सहज सुलभ है। इसलिए यहाँ मध्याह्न की तेज धूप से बचने एवं प्रातःकाल की स्वर्णिम रश्मियों को अधिक हितकारक मानने का जो प्रचलन है उसी को पर्याप्त माना जा सकता है। सूर्य सान्निध्य शक्ति सम्वर्धन एवं रोग निवारण दोनों ही दृष्टियों से एक दैवी वरदान है।


Quotation

जो कर्तव्यों से बचेगा, वह लाभों से वंचित रहेगा।


नियमितता का शिक्षण प्रकृति की पाठशाला में!

मानव जीवन एक बहुमूल्य निधि है। इसमें निहित प्रत्येक पल इतना कीमती है, जिसकी तुलना संसार की सर्वाधिक मूल्यवान वस्तु से भी नहीं की जा सकती। इनका यदि सही ढंग से सुनियोजन किया जा सके, जो उन्नति, प्रगति व सफलता का उत्कर्ष सहज ही उपलब्ध किया जा सकता है। प्रगति की लालसा किसे नहीं है? जब यह इतनी सहज है, जो सभी क्यों नहीं प्राप्त कर लेते है? दैनिक जीवन में उँगलियों में गिनने जितने लोग ही इस दिशा में सफल होते क्यों देखे सुने जाते है? इन प्रश्नों पर विचार करने तथा लोगों के जीवनक्रम को देखने से यह तथ्य स्पष्ट हो जाता है कि अस्तव्यस्त जीवन प्रणाली व नियमितता का अभाव ही सफलता का अवरोधक है।

किसी भी कार्य की सफलता मुख्य रूप से इस बात पर निर्भर करती है कि व्यक्ति ने उसमें नियमितता का पालन किया या नहीं। कई बार मनोयोगपूर्वक कार्य करने के बावजूद भी व्यक्ति अपने कार्य में अनियमित था। जब मन आया, जैसा चाहा वैसा कर लिया, आज किया, कल नहीं। अभी क्या जल्दी पड़ी है-ऐसे विचारों से युक्त मनःस्थिति के लोग सफलता के नाम पर खाली हाथ रहते तथा हताश होते देखे जाते है।

नियमितता के इस असाधारण महत्व के कारण ही प्रकृति अपने विभिन्न घटकों द्वारा मनुष्य को अपनी मूक वाणी में इसकी सतत प्रेरणा देती रहती है। मनीषियों का कथन भी है कि सच्चा उपदेश वाणी से नहीं आचरण से दिया जाना चाहिए। प्रकृति द्वारा इस दिशा में दिया जाने वाला उपदेश भी कुछ इसी प्रकार का है। वह अपने सारे क्रिया-कलाप में नियमितता का निष्ठापूर्वक पालन करती है चाहे वह जड़ समझा जाने वाला खगोल जगत हो अथवा वनस्पति जगत। इनकी गतिविधियों में समय संबंधी तनिक भी व्यक्तिक्रम नहीं दिखाई पड़ता। समस्त ग्रह-नक्षत्र अपनी नियत निर्धारित कक्षा में सदा धावमान रहते हैं। इनकी गति संबंधी नियमितता में यत्किंचित भी अनियमितता नहीं दिखाई पड़ती। सूर्यदेव नित्य प्रति समय से ही उदयाचल से निकलते और अस्ताचल में डूबते हैं। चन्द्रमा सहित अन्य ग्रहों के साथ भी यही बात देखी जाती है। वृक्ष-वनस्पति समय पर फूलते फलते देखे जाते है। जीव-जन्तु भी अपने प्रत्येक कार्य में समय संबंधी नियमितता का सदा ध्यान रखते हैं। प्रत्येक नियत कार्य समय पर करने के लिए प्रकृति ने नासमझ करहे जाने वाले इन वृक्ष-वनस्पतियों, जीव-जन्तुओं को न जाने कौन सी घड़ी द रखी है, कि वे अपना प्रत्येक कार्य नियत निर्धारित समय पर ही करते हैं। अपने चारों ओर जिधर भी दृष्टि पसार कर देखा जाय, उधर ही समय संबंधी नियमितता दृष्टिगोचर होती है।

मधुमक्खी, तिलचट्टे चींटी, चूहे, केकड़े आदि की दिनचर्या उनके निर्धारित क्रम से ही आरंभ होती है। उनके क्रियाकलापों में व्यवधान उत्पन्न करने के लिए चाहे जितने प्रयास किए जायँ वे इस भूल-भूलैया में नहीं फँसते। कृत्रिम प्रकाश या कृत्रिम अंधकार उत्पन्न करके उनकी अन्तःचेतना को भुलावे में डालने के लिए वैज्ञानिकों ने कितने ही प्रयोग किये, पर उनमें से एक भी सफल नहीं हुआ। इन कीड़ों ने हर बार अपना कार्यक्रम अपनी अभ्यस्त चेतना के आधार पर ही आरंभ किया और चतुरता के साथ रचे गये उस श्रम जंजाल में उलझने से स्वयं को मुक्त बनाये रखा।

फाँस के वैज्ञानिकों ने इस संदर्भ में एक प्रयोग किया। कुछ मधुमक्खियों को सवा आठ बजे सुबह शरबत घोल चाटने के लिए दिया जाने लगा। कुछ दिनों तक यह क्रम चलने से मधुमक्खियां इसकी अभ्यस्त हो गई। अब उस छत्ते को, जिसमें मधुमक्खियों को सवा आठ बजे घोल दिया जाता था हवाई जहाज से अमेरिका भेज दिया गया। पेरिस में जब सवा आठ बजते हैं, तो अमेरिका में रात के सवा तीन बजते हैं साधारणतया मक्खियाँ उस समय विश्राम किया करती हैं, पर देखा गया कि रात के सवा तीन बजे उन मक्खियों के छत्तों में भिनभिनाहट शुरू हुई और वे पास में रखे शरबत के घोल पर टूट पड़ी। तीन हजार मील की दूरी मक्खियों के समय ज्ञान संबंधी चेतना को भुलावे में न डाल सकी।

समुद्र तट पर पाया जाने वाला विशेष प्रकार का केकड़ा दिन के उतार चढ़ाव के साथ अपने रंग बदलता है। इन्हें पकड़ कर घोर अँधेरे में रखा गया, ताकि उन पर सूर्य का प्रभाव न पड़े, तो भी उनका रंग समय के हिसाब से बदलने का क्रम जारी रहा। इसके साथ-साथ उस केकड़े का रंग गहरा होने में कृष्णपक्ष और शुक्लपक्ष के हिसाब से 40 मिनट का अन्तर आता रहता हैं उस केकड़े को समुद्र से एक हजार मील दूर पहुँचाया गया और वायुयानों में अधिक ऊँचाई पर रखा गया, ताकि समुद्री ज्वार भाटे का उस पर असर न पड़े। तब भी उसकी प्रकृति नहीं बदली और अँधेरी रातों में 40 मिनट के अन्तर में जो रंग में गहरा हलकापन आया करता था, वह यथावत् जारी रहा। इसे देख कर ऐसा लगता है जैसे केकड़े के भीतर कोई घड़ी लगी हो, जो बाहरी परिवर्तन के बावजूद अपने ढंग और क्रम से चलती ही रही।

प्रसिद्ध अमेरिकी प्राणी शास्त्री डा.केनाफिम्न ने पक्षियों और छोटे जीव-जन्तुओं के क्रिया-कलापों का लम्बे समय तक अध्ययन करने के बाद जो विवरण प्रस्तुत किया है वह निश्चय ही आश्चर्यजनक है। उनका कहना हैं कि मनुष्य घड़ी के सहारे समय का ओर कंपास के सहारे दिशा का ज्ञान प्राप्त करता है। आकाश के सूर्य, चन्द्र तारे आदि भी दिशा का ज्ञान प्राप्त कराने में सहायक सिद्ध होते हैं, परन्तु छोटे जीव-जन्तुओं के पास इस प्रकार के कोई उपकरण नहीं होते, फिर भी वे अपनी आवश्यकतानुरूप दिशा और समय संबंधी ज्ञान अपने अन्तराल की प्रकृति प्रदत्त प्रेरणा को स्वीकारने तथा उसके अनुसार जीवनक्रम को चलाने में तनिक भी अन्तर कनिष्ठ माने जाने वाले इन प्राणियों में नहीं दिखाई पड़ता हे। कैलीफोर्निया और औरेगान के निकट समुद्रतट पर पाई जाने वाली मछली वसन्त ऋतु के शुक्लपक्ष में ही अण्डे देती है। सामौन द्वीप में ‘पलाले’ नाम का कीड़ा अक्टूबर-नवम्बर की खास तारीखों में ही अण्डे देता है। किसान खेती संबन्धी सब कार्या को छोड़कर उन अण्डों को साफ करने में लग जाते हैं और खेती की रक्षा करते हैं।

इसी तरह पक्षियों का सांय होते ही घोंसले में लौटना और प्रभात होते ही उड़ जाना प्रातः सांय का चहचहाना बताता है कि मानों उन्होंने घड़ी बाँध रखी हो। उड़ते हुए विभिन्न दिशाओं में जाना और लम्बी उड़ान के बाद बिना भटके अपने आशियाने पर आ जाना, इस बात का प्रमाण है कि उनका समय और दिशा ज्ञान असंदिग्ध होता है, जिसके आधार पर वे अपना मार्ग निर्धारित करते और अनुकूल समय आने पर फिर वापस लौट आते हैं।

इस संदर्भ में “पक्षीतीर्थ” का उल्लेख करना अप्रासंगिक न होगा। महाबलिपुरम से मद्रास की ओर सात मील दूर एक छोटा सा नगर है “पक्षी तीर्थम।” वहाँ पहाड़ी पर एक मन्दिर है। इसके पीछे 10 फुट लम्बी 15 फट चौड़ी एक ढलवाँ चट्टान है। इस पर दिन में 11-12 बजे के मध्य एक श्वेत गिद्ध का जोड़ा मन्दिर का प्रसाद ग्रहण करने नित्य आता है। प्रतिमा-दर्शन से अधिक लोग इनके दर्शन करते हैं। दर्शकों की भारी भीड़ के बीच मंदिर का पुजारी दोनों हाथों में प्रसाद की दो कटोरियां लेकर खड़ा हो जाता है। गिद्ध नियत समय पर आते और चोंचों में प्रसाद भरकर पुनः आकाश में उड़ जाते हैं।

क्षुद्र समझे जाने वाले इन प्राणियों का जीवन नियमितता और नियमबद्धता के कारण ही टिका रह पाता है। जिस दिन ये प्रकृति प्रेरणा की उपेक्षा कर अनियमित बन जायेंगे उसी दिन से इनका जीवन का विनाश सुनिश्चित हो जायेगा। आश्चर्य तो इस बात का होता है कि नियम पालन संबंधी इस अनुशासन में चेतन प्राणी ही नहीं, जड़ समझे जाने वाले पदार्थ भी पीछे नहीं रहते। समुद्र में नियत समय पर ही ज्वार भाटे आते हैं। हे समुद्र को भी घड़ी घण्टों व तिथियों की जानकारी किसी ने दे दी है। कलियों और पुष्पों का रात में सिकुड़ना और दिन में खिलना रात में कम, दिन में अधिक बढ़ना-इस बात का प्रतीक है कि उन्हें समय का ज्ञान रहता है।


पौरुष और पराक्रम (kahani)

महाभारत युद्ध जोरों पर चल रहा था। कौरव दल के प्रमुख सेनापति मारे जा चुके थे। किन्तु कर्ण का पराक्रम और शस्त्र कौशल कमाल कर रहा था। उसे देखते हुए पाण्डवों में आतंक छाया हुआ था। लगता था अकेला कर्ण भी कौरवों को विजयी बनाने में समर्थ हो सकता है। कर्ण की तरह ही उसका रथ संचालक शल्य भी बड़ा विकट था। कर्ण का बाण और शल्य की सूझबूझ मिल कर ऐसा माहौल बना देते थे जिसकी काट करना पाण्डवों के लिए कठिन पड़ता था।

परिस्थिति की विषमता को देखते हुए कृष्ण ने कूटनीति से काम लिया। शल्य से एकान्त वार्ता करके इस बात पर सहमत कर लिया कि वह कर्ण का बातों ही बातों में उत्साह ठंडा करने के साथ साथ मनोबल भी तोड़ता रहेगा।

शल्य ने अपनी नई नीति को चरितार्थ करने का कोई अवसर न जाने दिया। समय समय पर ऐसी बातें कहता रहता जिसमें पाण्डवों की जीत होने की ही संभावना प्रकट होती हो। कर्ण के मारे जाने के अपशकुन सामने आने और पराजय के स्वप्न दीखने जैसे प्रसंगों को वह गढ़ता और कहता रहता था। शल्य कर्ण का विश्वासी था इसलिए उसकी बातों को सही भी मानता था। कर्ण का मनोबल टूटता रहा और उसका पुरुषार्थ अनायास ही घटता रहा। एक दिन ऐसा आया कि उसका रथ कीचड़ में फँस गया और वह इससे निकल न सका। अर्जुन ने अवसर पाकर उसे धर दबोचा और पाण्डवों की जीत का शंख बज गया। हिम्मत हारना, मनोबल गिराने की इतनी बड़ी क्षति है जिसके साथ में पौरुष और पराक्रम अस्त व्यस्त हो जाता है।


आप जैसे है, वैसे ही रहें!

मनुष्य जब तक अपनी सही-सच्ची स्थिति में बना रहता है, तब तक वह अनेक प्रकार की मुसीबतों से बचा रहता है, किन्तु जैसे ही मिथ्या आडम्बर और स्वयं को बढ़ा चढ़ा कर प्रदर्शित करने की प्रवृत्ति उसमें विकसित होती दिखाई पड़े, समझा जाना चाहिए कि दुर्दिन निकट हैं और मुसीबतों का पहाड़ टूटने ही वाला है।

यह एक बहुत बड़ा अवगुण है कि लोक अपनी शक्ति के बाहर और स्थिति के बिलकुल प्रतिकूल खर्च करते हैं। इससे लाभ तो कुछ होता नहीं हाँ, महत्वाकाँक्षा की पूर्ति अवश्य हो जाती है कि लोग उन्हें अमीर समझें, बड़ा आदमी मानें। इस भ्रम में पड़ कर ऐसे व्यक्ति धन की बरबादी तो करते ही हैं, मन को भी इन्हीं भ्रम-जंजालों में उलझाये रहते हैं। परिणाम यह होता है कि जिस ऊर्जा को विकास योजनाओं में लगना चाहिए, वह बाह्याडम्बर जैसे तुच्छ कार्य की उधेड़बुन में पड़ कर नष्ट हो जाती है और व्यक्ति पतन पराभव की दिशा में लगातार बढ़ता चला जाता है। आज की गलती का परिणाम सारे जीवन भर भोगना पड़ता है। इस दिशा में ध्यान देने योग्य बात यह है कि जिस धन का अपव्यय प्रदर्शन जैसे कार्य में किया जा रहा है, उससे वैयक्तिक और सामाजिक अनेकों प्रकार के कार्य किये जा सकते हैं, पर दिखावे में लगकर वह धन यों ही बर्बाद हो जाता है।

बाहरी सजधज को जो मान प्रतिष्ठा का आधार मानते हैं, वे वस्तुतः भ्रम में रहते हैं। विवेकवान पुरुष बाहरी वेश-विन्यास और वस्त्राभूषणों के आधार पर लोगों का मूल्याँकन नहीं करते, वरन वे इसके लिए आन्तरिक गुणों को मापदण्ड मानते हैं। मनुष्य की शिष्टता और शालीनता उसकी सादगी में झाँकती है, न कि बाह्य दिखाते में। सदाचरण और सादगी का परस्पर घनिष्ट संबंध होता है। जहाँ सादगी होगी, वहीं सत्कर्म होंगे। जहाँ सत्कर्म होंगे, वहाँ सुख और सुव्यवस्था भी होगी। मनुष्य के लिए यही स्थिति अभीष्ट भी है। अतः आडम्बर की तुच्छ प्रवृत्ति में न पड़ कर हर एक को सीधे-साधे ढंग से रहने में ही अपनी शान और बड़प्पन समझना चाहिए।

अपनी वास्तविक स्थिति में अन्ततक बिना दिखावे के साथ बने रहना मनुष्य का नैतिक बल भी प्रदर्शित करता है। संभव है आज की परिस्थिति में मन में इसके लिए कुछ झिझक और संकोच उत्पन्न हो, किन्तु एक सी स्थिति में सुखी और संतुष्ट जीवन बिताने के लिए यह सर्वश्रेष्ठ मार्ग है कि अपनी स्थिति और स्तर का अतिक्रमण न किया जाय। गरीब होना पाप नहीं है, किन्तु जब येन-केन प्रकारेण गरीबी छिपा कर अमीरी का आवरण ओढ़ने का प्रयत्न किया जाता है, तो गरीबी तो ज्यों की त्यों बनी रहती है, अनेकों अन्य मुसीबतें उठ खड़ी होती हैं। निर्धनता का उपहास कुछ दिन हो सकता है, मगर झूठा प्रदर्शन तो सम्पूर्ण जीवन को प्रभावित करता एवं वास्तविक स्थिति को और भी दयनीय बना देता है।

झूठ जब तक बोलने चालने तक सीमित हो तब तक उससे विशेष हानि की संभावना नहीं रहती, किन्तु योजनाबद्ध ढंग की झुठाई के परिणाम असाधारण होते हैं। मिथ्या आडम्बर एक प्रकार के झूठ का व्यवस्थित और शक्तिशाली कथन है, अतः इसका प्रभाव-क्षेत्र और भी व्यापक होता है। व्यक्ति और समाज दोनों ही इसकी चपेट में आते हैं। इसलिए हम जिस स्थिति में हैं, अपने जीवन को उसी अवस्था स्थिति में दूसरों के सामने रखें, इसी में अपनी और समाज दोनों की भलाई सन्निहित है।


महत्वाकाँक्षाओं के व्यामोह में न उलझें!

महत्वाकाँक्षा का मतलब है महत्व को जिस-तिस तरह हथिया लेने की ललक। इस तरह के लोगों के प्रयत्न-पुरुषार्थ इसी घेरे में सिमट कर रह जाता हैं। उन्हें न किसी की हानि से मतलब होता है न लाभ से। समूची शक्तियों की खपत इसी में होती रहती है कि महत्व को कैसे पाया जाय?

आकाँक्षाएँ अपने आप में बुरी नहीं यदि उनका नियोजन सदुद्देश्य में किया जाय। इनसे जीवन में क्रियाशीलता बनी रहती है। सामान्य इच्छाओं के दायरे से ऊपर उठे महापुरुष भी लोक कल्याण की आकाँक्षा बनाए रखते हैं, उनकी सारी सक्रियता इसी में नियोजित होती रहती है। आकाँक्षा का स्वरूप एवं सक्रियता का समुचित नियोजन उन्हें महानता की प्राप्ति कराने वाला होता है। किन्तु यदि आकाँक्षाओं का दायरा-सिर्फ महानता के महत्व पाने भर में सिमट जाय-तो छद्म पनपना स्वाभाविक है।

अक्सर लोग महान बनने की आकाँक्षा और महत्वाकाँक्षा को एक दूसरे का समानार्थी मान लेते हैं। किन्तु असलियत में यह एक भूल है। महान बनने का प्रयत्न एक साधना है। इसमें व्यक्ति को गुणवान बनने के लिए लगातार पुरुषार्थ करना होता है इसके बाद कहीं महानता की सीढ़ी पर चढ़ पाना बन पड़ता है इन महान लोगों के सम्मुख सहज ही लोगों का मस्तक नत होता है। इसे कमाना कष्ट साध्य हैं महत्वाकाँक्षी व्यक्ति की रुचि इन कष्ट साध्य प्रयत्नों में नहीं होती। महानता के महत्व को वह जैसे-तैसे पाना चाहता है, ताकि लोग उसे भी प्रणाम करें, गरिमापूर्ण समझें। इसे यों भी कहा जा सकता है कि उसकी चाहत होने की नहीं दिखाने की है।

इतिहास ऐसे लोगों के क्रियाकलापों से भरा पड़ा है। इन्होंने महत्व को अपनी झोली में डालने के लिए जो कुछ किया, उससे मानवता का सिर शर्म से झुक जाता है। सिकन्दर, हिटलर आदि राजाओं को विश्व विजयी होने के सम्मान पाने के लिए लाखों-करोड़ों लोगों को मारने- काटने में तनिक भी तकलीफ नहीं हुई। यही बात नेपोलियन, मुसोलिनी के सम्बन्ध में भी है। भारत के इतिहास में भी ऐसे अनेकों उदाहरण हैं, जिन्होंने अपने पिता को मार कर राज सिंहासन के महत्व को हथियाया। इनकी दृष्टि में किसी भी स्नेह पूर्ण सम्बंध मर्यादाओं का कोई स्थान नहीं है इन्हें चाहिए सिर्फ महत्व।

धार्मिक महत्वाकाँक्षा किसी भी व्यक्ति को धूर्त और पाखण्डी बना देते के लिए काफी है। जो होता नहीं ऐसी अच्छाइयों को दिखाने का प्रयत्न और भीतर की कमजोरियों को छुपाने की कोशिश पाखंडीपन की शुरुआत है, जो बढ़ते बढ़ते विषवृक्ष का रूप ले लेती है। इस क्षेत्र में जिस तपोमय जीवन की अनिवार्यता है, उसके लिए तो हिम्मत नहीं पड़ती। सरल यही लगता कि धार्मिक होने का जो महत्व है उसे जिस किसी तरह समेट लिया जाय। इसी समेटने के चक्कर ने सैकड़ों भगवान, अवतार, लाखों गुरु पैदा कर दिए हैं। धार्मिक उपकरण, वेश विन्यास, परिवेश भोग और सम्मान के सेवक बनते चले जा रहे हैं।

यही दशा सामाजिक क्षेत्र में है। महत्व लूटने की चाह ऐसे अवसर स्थितियाँ तलाशती रहती हैं जिसको पाकर इस चाहत को पूरा किया जा सके। यही कारण है कि सम्मान पाने के लिए नकली समाज सेवी, पनपते हैं। अमीरी पाने के लिए चोरी, बटमारी, तस्करी फैलती है। धनिक बनने के लिए सही तरीके भी है पर इसके लिए जो जरूरी है उसे करने की आवश्यकता नहीं समझी जाती।

पारिवारिक क्षेत्र में यही स्थिति है। हर परिवार की यही चाहत रहती है कि उसे श्रेष्ठ समझा जाय। श्रेष्ठता पाने के अनेक तरीके हैं, पर उद्देश्य श्रेष्ठ बनना नहीं श्रेष्ठ दिखना है। इस दिखावट के लिए भाँति- भाँति के फैशन असली नकली जेवर खुद के अथवा उधार माँगे कपड़े और न जाने क्या क्या इस्तेमाल किया जाता है। कोशिश यही रहती है, जनमानस के द्वारा हमें सम्मान मिले।’

महत्व को पाने की ललक ऐसा विष है, जो जिस क्षेत्र में घुलेगा, उसे विषैला बनाएगा इसकी टोह में लगा आदमी अन्दर से नीति, मर्यादाओं, अनुशासन की अवहेलना करते हुए बाहर से नैतिक, मर्यादित और अनुशासनप्रिय दिखाने का प्रयत्न करता है। क्योंकि उसकी नियत नीति-मर्यादाओं से मिलने वाले महत्व अर्थात् लोक सम्मान को किसी भी तरह पाने की होती है।

इस तरह नैतिकता या अच्छाई का खोल ओढ़े लोगों से अनैतिक अमर्यादित दिखने वाले लोगों की अपेक्षा कहीं अधिक खतरा है। बुराई बुराई हे पर अच्छाई के गर्भ में बुराई को भरण-पोषण मिलना और अधिक भयंकर है पाप को समझ लेने के बाद उससे बचा जा सकता है, लेकिन जो पाप पुण्य की आड़ में किया जाता है। किसी निश्चित चीज को हथियाने के लिए पाप को पुण्य बताने और स्थापना करने की हिमाकत की जाती है, उससे बच पाना बहुत कठिन है। बुराई का अपना कोई स्थान नहीं वह अच्छाई में घुसकर पनपती है।

शत्रु से बचाव आसान है, पर मित्र बने शत्रु से बच पाना असम्भवप्राय है। जितने व्यक्ति जहर से नहीं मरते उतने मिठाई में जहर छिपा कर दिये जाने से समाप्त हो जाते हैं। डाकू को पहचानना और उससे बचना सामान्य क्रम है किन्तु साधु के वेष में घूमने वाले डाकू से बच पाना आसान नहीं है। डाकू संसार की जितनी हानि नहीं करते तथा कथित सफेद पाश उससे कहीं अधिक परेशानी खड़ी करते हैं।

इन सब परेशानियों से बचने एवं स्वयं के जीवन तथा सामाजिक परिवेश को परिष्कृत करने के लिए अच्छा यही है कि महत्वाकाँक्षी बनने की अपेक्षा महानता को वरण करना सीखें। वास्तविक महत्ता गरिमा, तो इसी को जीवन में उतारने पर प्रस्फुटित होती है। ज्यों-ज्यों गुणवान होने की ओर कदम बढ़ते हैं, सुख-संतोष की यथार्थता अनुभव होने लगती है। जबकि केवल महत्व को तलाशने वाला इसे पा लेने पर भी अन्तर के ताप से सन्तप्त रहता है। उसे स्वयं की स्थिति में किसी तरह सन्तोष नहीं होता, हमेशा यही डर बना रहता है कि कहीं भेद न खुल जाय। कोई विरोधी हमारी स्थिति को झटक न ले।

जबकि महानता कमाई जाती है इसे किसी तरह छीनना-झपटना सम्भव नहीं। अच्छा यही है कि हम जैसे हैं, वैसे ही बाहर दिखें। अपनी स्थिति को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाने का प्रयत्न विकास की राह से भ्रष्ट कर देता हैं। स्वयं की स्थिति का यथार्थ भाव रहने पर ही आगे बढ़ने के लिए पुरुषार्थ कर पाना सम्भव बन पड़ता है। धीरे-धीरे किन्तु सतत् इस ओर बढ़ने से जैसे-जैसे गुणों का विकास होता जाता है महानता उसी अनुपात में आती जाती है। इसका सम्बन्ध किसी बाह्य पद प्रतिष्ठा, सम्मान से न होकर अन्तराल की विकसित स्थिति से है।

कबीर-रैदास के पास किसी तरह का बाहरी सम्मान न था किन्तु इसके बाद भी उनकी महानता पर सन्देह नहीं किया जा सकता। महानता के साथ महत्व भी जुड़ा हुआ है पर दूसरे से मिलने वाला महत्व नहीं आत्म गौरव से गौरवान्वित होने का महत्व। जिसे एक बार पा लेने पर फिर वंचित नहीं होना पड़ता। इसे पा लेने पर शारीरिक स्तर पर सुख मानसिक स्तर पर शान्ति एवं आत्मिक स्तर पर आनन्द का सतत् अनुभव किया जा सकता है। इसे उपलब्ध करने के ब्यामोह में न उलझ कर हमारे कदम महानता की ओर बढ़ें।


वैचारिक क्रान्ति बनाम बन्धनमुक्ति

हर कोई स्वतन्त्र रहना चाहता है। ढूँढ़ने खोजने पर भी न मिलेगा, जिसे बन्धन में रहना अच्छा लगता हो। परिवर्तनों की समूची कड़ी के पीछे किसी न किसी रूप में यही चाहत छुपी है। इन परिवर्तनों को क्रान्ति का नाम भी दिया गया है। इनमें से पहले नम्बर पर है-वैज्ञानिक क्रान्ति। इसके तहत आदमी के हाथ पैरों एवं दिमाग के क्रियाकलापों की स्थानापन्न मशीनें ढूंढ़ निकाली गई। इन तकनीकी सुविधाओं को सभी तक पहुँचाने हेतु एक और क्रान्ति हुई जिसे औद्यौगिक क्रान्ति कहा गया। इनके द्वारा यह आशा बाँधी गयी थी कि मनुष्य को तमाम कामों की उलझनों से छुटकारा मिल जाएगा।

मनोवैज्ञानिक एरिक फ्राँम ने अपनी रचना “एस्केप फ्राँम फ्रीडम” में इसी तथ्य को और अधिक स्पष्ट किया है। उनके अनुसार सारे बदलाव चाहे वे राजनीतिक हों या औद्योगिक अथवा वैज्ञानिक सभी का मकसद स्वतन्त्रता व सक्षमता को पाना रहा है। स्वतन्त्र होना मनुष्य की मूल भूत वृत्ति है। इसी के लिए उसने व्यक्तिगत और सामूहिक रूप से तरह तरह के प्रयास किए हैं।

इनमें पूरी तरह सफल न होने का कारण है इसे बाहरी तत्व मान लेना। जबकि यह बाहरी न होकर आन्तरिक है। प्रख्यात विचारक जॉन डीवी अपनी किताब “फ्रीडम एण्ड कल्चर” में कहते हैं स्वतन्त्रता व सक्षमता एक दूसरे से बहुत घनिष्टतापूर्वक जुड़े हैं। शारीरिक मानसिक, बौद्धिक ताकत का सही व समुचित उपयोग तभी बन पड़ता है जब इनका संचालन स्व अर्थात् आत्मा के विधान से हो। इसके अभाव में इन सामर्थ्यों का जखीरा आदमी को उस पशु के रूप में बदल देता है जो दूसरों की तबाही के साथ खुद को भी तबाह कर लेता है।

श्री डीवी अपने इसी अध्ययन में बताते हैं स्वतन्त्र होने के लिए किए जाने वाले उपायों का असली क्षेत्र स्वयं का अन्तराल है। इसमें जरूरी फेर-बदल कर ठीक करने वाली क्रान्ति ही हमें सही माने में स्वतन्त्रता दिला सकती है। डीवी के इस कथन में भगवद्गीता के 16 वें अध्याय की विषय वस्तु तथा छान्दोग्य व बृहदाण्यकोपनिषद् में बताये देवासुर संग्राम की झलक देखी जा सकती है। इनमें यह बताया गया है कि अन्दर के असुरत्व को परास्त कर आत्मा का राज्य स्थापित करना वास्तविक क्रान्ति है।

पर आधुनिक चिन्तन संसार में केवल बाहरी बदलाव लाकर समाज में सुख शान्ति स्वतन्त्रता को स्थापित करने में जुटा हुआ है। इन प्रयासों व परिणामों को देखने से साफ होता है कि इनका आधार स्वतन्त्रता न होकर स्वच्छन्दता है इससे जुड़ने पर सक्षमता निर्माण के स्थान पर ध्वंस ही करती है।

स्वतन्त्रता और स्वच्छन्दता एक सी लगने पर भी पूरी तरह विरोधी हैं। पहले में व्यक्ति ओर समूह आत्मा को जीवन का केन्द्र मानता हुआ ऊँचे उद्देश्यों एवं आदर्शों के लिए जीता है। दूसरे में जीवन के आधार सुख-भोग भर रह जाते हैं। इनमें किसी तरह की विघ्न-बाधा बर्दाश्त नहीं होती। ऐसी दशा में व्यक्ति और समाज दोनों ही साधन सुविधाओं की बढ़ोत्तरी को सब कुछ मान बैठते हैं।

आजकल क्रान्ति अथवा बदलाव का दायरा इसी सीमा में सिकुड़ गया है। इस तरह के प्रयास संसार में पूरी तरह बदलने पर जोर देते हैं, पर भोग-सामग्रियों को जैसे का तैसा रखना चाहता है। फलतः शान्ति दूर भागती है और “अशान्तस्य कूतःसुखम” के तथ्य के अनुरूप वास्तविक सुख का नामोनिशान नहीं रह जाता। इतने पर भी स्वतन्त्रता के आभासी स्वच्छंदता को पाने के लिए साधना गतिविधियाँ, क्रियाकलाप लगातार बढ़ते जा रहे हैं।

इन क्रियाकलापों में जुटे लोगों की स्थिति कुछ वैसी है, जैसे कोई नदी के किनारे खड़ा होकर इसलिए परेशान हो कि नहीं ठहर जाय। नदी नहीं ठहरती, इसलिए वह दुःखी है। क्योंकि उसकी धारणा है कि नदी ठहर जाय तो मैं सुखी हो सकता हूँ। जबकि असलियत यह है कि सुखी होना मनकी स्थिति पर निर्भर है न कि नदी के ठहरने पर। इसी तथ्य को बताते हुए एरिक फ्राँम का कहना है कि स्वतन्त्रता की समस्या मनोवैज्ञानिक है न कि भौतिक।

स्वतन्त्रता के नाम पर स्वच्छन्दता के लिए किए जा रहे इन परिवर्तनों तथा तरह तरह के प्रयासों ने समाज में असुरक्षा व अनिश्चितता का माहौल पैदा किया है। यही मानसिकता व्यावहारिक धरातल पर हिंसा व अपराध के रूप में दिखाई पड़ती है। इसको समझाते हुए मनोवैज्ञानिक जॉन गाल्टुँग का कहना है कि प्रत्येक वह काम जो मनो-सामाजिक विकास तथा जीवन बोध में बाधा पैदा करे, उसे अपराध की ही श्रेणी में रखा जाएगा।

इस तरह के क्रियाकलापों की पैदाइस का कारण स्वच्छन्दता है। आवश्यकता इस भ्रम को दूर करने की है। सही कहा जाय तो यह पशुओं का गुण धर्म है। उन्हें यह मालूम नहीं कि स्वतन्त्र होना हमारी ही कोई अवस्था है अथवा किन्हीं वस्तुओं का गुण है। अथवा यह कहा जाय कि उन्हें इस पर विचार करने के लिए रुचि अथवा समय नहीं। वह सहज ही इसे वस्तुओं में अथवा इस पर निर्भर मानकर देखा-देखी उन्हें जुटाने में समय और ताकत खपाता चला जाता है। चो उसे बार-बार धक्के क्यों न लगें, जीवन ही संकट में क्या न दिखाई देने लगे। उसमें न सृजन की भावना होती है न भावी कल्याण की चिन्ता।

आज स्थिति कुछ ऐसी ही है। डा. एरिक फ्राम के शब्दों में बौद्धिक व तकनीकी प्रगति की दृष्टि से मानव भले इक्कीसवीं सदी की ओर बढ़ रहा हो, पर भावनाओं की दृष्टि से वह अभी भी पाषाण युगीन है। बटे्रण्ड रसेल ने इसी को व्यक्त करते हुए “अथॉरिटी एण्ड इण्डिविजुअल” में कहा है कि उन्नत भावनाओं की उपेक्षा से हृदय का स्रोत लगातार सूखता जा रहा है। इसको बनाए रखने के लिए जरूरी है मानवीय स्वतन्त्रता का स्थापन।

श्री अरविन्द का “आइडियल ऑफ ह्यूमन यूनिटी” में इस की उपलब्धि के बारे में कहना है कि यह न तो वैज्ञानिक क्रांति से मिलेगी, न औद्यौगिक क्रान्ति से। राजनीतिक क्रान्ति भी इसके लिए काफी नहीं है। सही माने में इसका पाना तभी सम्भव है जब मानसिकता में बदलाव आए विचारों के परिवर्तन हो। इसके लिए अपेक्षित हे वैचारिक क्रान्ति।

इस क्रान्ति का क्षेत्र है मनुष्य का मन और साधन है सद्विचार। इस कल्याणकारी क्रान्ति की शुरुआत व्यक्तिगत और सामूहिक दोनों ही स्तरों पर करनी होगी। इसमें जुट पड़ने का मतलब है आदर्श परायण जीवन जीने के लिए जुट पड़ना। आदर्शवादी जीवन शैली का तात्पर्य है शारीरिक और मानसिक शक्तियों का सुदपयोग, सेवा, सहायता कर्तव्य परायणता के निर्वाह में करना न कि सुख भोग में। जीवन सही ढंग से आत्मा का यन्त्र बन सके। इसके विविध क्रियाकलापों में पवित्रता प्रखरता, सदाशयता आदि गुण स्थान पा सकें। इसके लिए बिना रुके प्रयत्न करना होगा। जैसे-जैसे मानसिकता में उच्चचिन्तन का शासन स्थापित होता जायगा। क्रान्ति की गति बढ़ती जाएगी। बढ़ती गति के साथ इसका प्रभाव क्षेत्र भी बढ़ेगा। जिससे व्यक्ति और समाज दोनों अपना खोया सौंदर्य पा सकेंगे।


प्राणशक्ति से शारीरिक और मानसिक उपचार

प्राणवायु में आक्सीजन अंश का कितना महत्व है इसे सभी जानते हैं। पर साथ में यह समझना विस्मृत ही बना रहता है कि उसमें विश्वव्यापी चेतना का एक बड़ा अंश भी घुला रहता है जो शरीर में जीवनीशक्ति एवं मस्तिष्क में प्रतिभा के रूप में उभरती है। यह शक्ति साँस के साथ इतनी सूक्ष्मता में घुली रहती है कि उसे संकल्पशक्ति की प्रखरता के सहारे ही पकड़ा और आत्मसात किया जा सकता है।

यहाँ हमें संकल्पशक्ति के महत्व को समझना चाहिए। विचारणा की क्षमता इतनी प्रबल है कि वह मनुष्य को हेय, हीन एवं वरिष्ठ भी बना सकती है। जैसे पानी को भगवान के चरणामृत रूप में लिया जाय, शक्कर के थोड़े से दानों को प्रसाद भावना का आरोपण करते हुए सेवन किया जाय तो उसका प्रभाव तत्काल मन की शान्ति के रूप में मिलता है और शक्ति भावना बढ़ाता है। उसी को उपेक्षा या अनखपूर्वक लिया जाय तो लाभ मिलना तो दूर उलटी हानि भी हो सकती है। किसी युवानारी को पुत्री और बहिन की भावना से देखा जाय तो पवित्रता उमगेगी और यदि उसी को कामुकता की कुदृष्टि से देखा जाय तो मन अश्लील कुविचारों से भरते भी देर न लगेगी। संसार को भवबन्धन समझा जाय तो उससे छुटकारा पाने को मन करेगा और उसे भगवान का विराट रूप माना जाय तो उसकी सेवासाधना करने ओर संपर्क जोड़ने, सद्व्यवहार करने के लिए मन करेगा।

विश्वव्यापी चेतना एक तथ्य है पर अविश्वास करने से यह पदार्थ पिण्डों का जमघट मात्र है। यह विश्व चेतना प्रचण्ड जीवनीशक्ति के रूप में भी अपने ऊपर उतर सकती है और ओजस्- तेजस् वर्चस् के रूप में अपने चमत्कारी प्रभाव दिखा सकती है। अविश्वास उपेक्षा की मनःस्थिति में वह जहाँ की तहाँ बनी रहती है। यदि फेफड़े फैलने-सिकुड़ने की क्रिया बन्द कर दें तो साँस का आवागमन भी रुक जाएगा। इसी प्रकार संकल्प शक्ति का उपयोग न किया जाय तो उच्चस्तरीय उपलब्धियों का द्वार बन्द हो जायगा। मात्र खाने-सोने भर का ढर्रा लुढ़कता रहेगा।

ब्रह्मांडव्यापी प्राणचेतना के अस्तित्व पर हमारा विश्वास सुदृढ़ होना चाहिए। यह यथार्थता भी है। क्रियाशीलता के रूप में अणु से लेकर विभु तक की सुनियोजित हलचलें चल रहीं हैं। वे विचारयुक्त भी हैं और नियम बद्ध भी। इसी क्रियाशक्ति को चेतन ब्रह्म कहा गया है। वह हमारी साँसों के साथ शरीर और मन में भी आता जाता रहता है। पर उपेक्षा बरतने पर उसका लाभ नहीं उठाया जा सकता। उस तत्व को आकर्षित तो हमारा संकल्प चुम्बक ही करता है। यदि वह खिंचाव न हो तो साँस हवा मात्र बनी रहेगी। उसमें गैसों का प्रभाव भर सम्मिलित रहेगा। किन्तु यदि संकल्पपूर्वक साँस खींची जाय तो उसमें घुला रहने वाला प्राणतत्व हमारी पकड़ में आ जायगा। व्यक्तित्व को प्राणवान बनाने में सहायता करेगा। इसके लिए प्राणाकर्षण प्राणायाम करना पड़ता है। सीधा स्थिर शरीर रखकर लम्बी साँस खींचते हुए भावना करनी पड़ती है कि साँस के साथ मिलकर प्राण भी शरीर में प्रवेश कर गया। साँस रोकते समय विश्वास किया जाय कि साँस में जो प्राणतत्व था वह शरीर के प्रत्येक घटक द्वारा सोख लिया गया। साँस छोड़ते समय भावना की जाय कि भीतर भरी हुई दुर्बलताएं-दुष्प्रवृत्तियाँ साँस के साथ मिलकर बाहर निकल गयीं। इसी क्रिया को पन्द्रह मिनट से आरम्भ करके आधा घंटा तक पहुँचा देने की प्रक्रिया को बार बार करते रहने की प्रक्रिया प्राणाकर्षण प्राणायाम बन जाती है।

उपरोक्त प्रारंभिक अभ्यास पूरा होने पर दूसरा चरण यह हो सकता है कि प्राणतत्व को शरीर के किसी अंग या मस्तिष्क के किसी केन्द्र में विशेष रूप से भण्डार भर लिया जाय।

शरीर का कोई अवयव दुख रहा हो या गड़बड़ा रहा हो तो भावना करनी चाहिए कि प्राणसत्ता संकल्प बल से खिंच कर इस स्थान पर केन्द्रित हो रही है और अपनी ऊर्जा में वहाँ से संचार संचालन को, प्रवाह को तीव्रगामी बना रही है। जमा हुआ विजातीय द्रव्य उस स्थान से बिखर कर चारों ओर छितरा रहा है और उसके लघु कण साँस के सहारे निकल कर बाहर हवा में उड़े जा रहे हैं। इस विधि से किसी भी पीड़ित दुर्बल अंग की अशक्तता को सशक्तता में बदला जा सकता है। साथ ही रोग से छुटकारा पाया जा सकता है। चिकित्सा उपचार की तरह ग्रह प्राण उपचार भी कुछ दिनों लगातार अभ्यास में उतारना पड़ता है।

मस्तिष्क में प्रतिभा के अनेक केन्द्र हैं। मनःशास्त्र के विशेषज्ञों ने उनके नियत स्थान भी खोज लिए हैं। उन स्थानों पर प्राण केन्द्रित करने और वह विशिष्टता बढ़ाने का भी ध्यान किया जा सकता है।

दूसरा सिद्धान्त यह है कि मस्तिष्क के हर क्षेत्र में हर शक्ति का व्यापक विस्तार है। अस्तु किसी स्थान विशेष पर ध्यान केन्द्रित करने की अपेक्षा समूचे मस्तिष्क यंत्र को कल्पना क्षेत्र में प्रतिष्ठापित करते हुए यह संकल्प करते रहा जा सकता है कि अमुक विशिष्टता हमारे मस्तिष्क क्षेत्र में विशेष रूप से उग उभर रही है।

खेत एक ही होता है। उसी में किसान मनमर्जी की फसल उगा सकता है और समुचित लाभ उठा सकता है। उसी प्रकार मस्तिष्क रूपी खेत में जो विशेषता अतिरिक्त रूप से बढ़ानी हो उसके लिए उसी स्तर का संकल्प करना चाहिए कि प्राणऊर्जा उस विशिष्टता को उभार रही है। उसकी कमी पूरी कर रही है। वर्षा होने पर जिस प्रकार पौधें में नई हरियाली दौड़ जाती है उसी प्रकार यह भाव संकल्प भी इसी क्रिया के साथ जोड़ा जा सकता है कि अमुक मानसिक विशेषता की फसल लहलहाने लगी और ऊँची उठने लगी। इस प्रकार साँस में घुले हुए प्राणतत्व को संकल्पशक्ति में आकर्षित करके मस्तिष्कीय दुर्बलताओं को दूर किया जा सकता है उन्हें पिछड़ेपन के अभिशाप से छुड़ाकर घुड़दौड़ के विजयी घोड़े की तरह अग्रिम पंक्ति में खड़ा किया जा सकता है।

प्राणशक्ति द्वारा शरीर और मन को दुर्बलताओं व्यथा, विकृतियों से छुड़ाया और परिपुष्ट भी बनाया जा सकता है।

चेहरे का सौंदर्य, आँखों की चमक, होठों की मुसकान, त्वचा की कोमलता आदि को भी इसी प्रक्रिया के सहारे बढ़ाया जा सकता है। मन की कल्पना और स्वभाव की गरिमा पर यदि ध्यान आकर्षण के सहारे प्राणऊर्जा को एकत्रित किया जाता रहे तो उसका प्रभाव अपना चमत्कार दिखाये बिना न रहेगा। यह आधार अभीष्ट दिशा में अपनी अभीष्ट आवश्यकताओं को बढ़ाने में सहायक हो सकती है।

प्राणतत्व भौतिक बिजली के सामान है। बिजली का झटका लगाकर किसी अवयव को उत्तेजित और रोगमुक्त करने की एक सुनियोजित प्रणाली है। चुम्बक चिकित्सा भी प्रख्यात है। प्राणचिकित्सा उनमें किसी से कम क्षमता सम्पन्न नहीं। क्योंकि उनमें जीवन तत्व की वह मात्रा भी सम्मिलित है जो अन्य उपचार पद्धतियों में नहीं है। सबसे बड़ी बात यह है कि कोई भी व्यक्ति इस आधार पर स्वचिकित्सा भी कर सकता है।


विशेष लेखमाला - “समयदान ही युगधर्म” दान और उसका औचित्य

दान-पुण्य शब्द एक साथ मिला कर बोले जाते हैं और इनके प्रतिफल भी समानान्तर .... होते हैं। अध्यात्म भाषा में उसकी विवेचना स्वर्ग, मुक्ति, सिद्धि, वरदान, चमत्कार आदि के रूप में बताई जाती है और बोल-चाल की भाषा में उसे प्रगति, सफलता, वरिष्ठता प्रदाता तक बताया जाता है।

दान अर्थात् “देना”। यही पुण्य है। लेना अर्थात् अधिकारों का अपहरण। यही पाप है। पाप की परिणति लौकिक और पार-लौकिक क्षेत्र में अवगति-दुर्गति स्तर की होती है। नरक इसी का अलंकारित प्रतिपादन है। दोनों में से अपनी गतिविधियाँ किस पक्ष के साथ विनियोजित करना यह मनुष्य की अपनी इच्छाओं की बात है। परिस्थितियाँ कई बार इस चयन के विपरीत दबाव भी डालती देखी गई हैं पर अन्ततः होता वही है, जिस पर इच्छाशक्ति संकल्प बनकर केन्द्रीभूत होती है।

हरिश्चंद्र, कर्ण, बलि, दधीचि, भामाशाह आदि की कथाएँ इसी तथ्य का प्रतिपादन करती हैं। स्वर्ग जाने वाले और मुक्ति पाने वालों को इससे भी बढ़कर आत्म समर्पण करना पड़ता है। भक्ति का एक ही स्वरूप है- अपनी इच्छा आकाँक्षाओं को आराध्य के साथ घुला मिला देना। ईंधन इसी आधार पर तुच्छ होते हुए भी दावानल बनकर जाज्वल्यमान होता है। भगवान को भक्तवत्सल कहा गया है। वह समर्पण कर्ता के हाथों अपने को सौंप देता है और उसके इशारे पर नाचता है। मीरा के साथ सहनृत्य करना, सूर की लकुटी पकड़ कर सेवक की तरह कार्यरत रहना, ऐसे ही उदाहरण हैं। सुदामा, चैतन्य, हनुमान, अर्जुन आदि की गणना ऐसे ही भक्तों में होती है। जिनने भगवान के खेत में अपना सर्वस्व उदारतापूर्वक बोया और बीज की तुलना में हजार गुना अन्न भण्डार अपने कोठे के भरे पूर रूप में सँजोया। यह भगवत भक्ति और कुछ नहीं, आदर्शों के प्रति अपना आत्म समर्पण हैं धन दान तो इस भाव संवेदना का प्रतीत चिन्ह है।

धन दान हर व्यक्ति नहीं कर सकता है। जिसका अपना पेट ही खाली रहता है वह अन्नदान की चिन्ह पूजा ही कर सकता है। जो खुद ही ठंडक में पैर पेट में ठूँस कर सिकोड़ता हुआ सोता है, वह वस्त्रदान कैसे करे? जो स्वयं ही अनपढ़ है, उससे विद्यादान की आशा कैसे की जाय? कारण एक और भी है कि अभाव ग्रस्तों की करुणा भी सो जाती है। शास्त्रकारों ने कृपण नरों के निष्करुण होने की बात बहुत हद तक ठीक ही कही है।

दूसरी ओर दान की आवश्यकता भी अपरिहार्य है। उससे बच निकलने का भी कोई शॉटकट नहीं। माता यदि अपना शरीर निर्वाह कर भ्रूण का परिपोषण न करे तो यह पुत्रवती कैसे कहलाए। बीज गलना स्वीकार न करे तो वृक्ष स्तर के कैसे पहुँचें? बादल न बरसे तो प्रजा कैसे जिये? धरती यदि उपजाने-उगलने का धर्म छोड़ दे तो यहाँ सूखी चट्टानों से भरी नीरवता के अतिरिक्त और कहीं क्या कुछ दीख पड़े?

श्रद्धास्पद श्रेष्ठ जनों को देवमानव कहा जाता है। उनके अनुदानों के प्रति सृष्टि का कण कण अपनी कृतज्ञता प्रकट करता है। यहाँ समस्त महामानव मात्र एक ही अवलम्बन अपना कर उत्कृष्टता के प्रणेता बन सके हैं कि उनने संसार में जो पाया उसकी तुलना में उसका प्रतिफल स्वरूप असंख्य गुना करने का व्रत निबाहा। यदि कृपणता उन्हें घेरे रही होती तो प्रेत पिशाचों की पंक्ति में ही गिने जाने योग्य बने रहते। भले ही उनकी संचित सम्पदा और विशेषता कितनी ही बढ़ी चढ़ी क्यों न रही हो?

सच्चाइयां कितनी ही कष्ट साध्य क्यों न हो, अपने स्थान पर अकेले ही समुद्र के बीच अवस्थित प्रकाशस्तम्भ की तरह अपने स्थान पर अविचल ही बनी रहती हैं ऐसी ही सच्चाइयों में से एक यह भी है कि जो जितना देता है, वह उसी अनुपात में पाता है। मसखरी करने वालों को बदले में उपहास ही हाथ लगता है। यह बात इस संदर्भ में कही जा रही है कि देने के नाम पर अँगूठा दिखाने वाले और लेने के लिए कंधे पर बड़ा थैला लादे फिरने वाले मात्र निराशा थकान और खीज ही लेकर लौटते हैं। भले ही उन्होंने मुफ्त में तुर्त फुर्त बहुत कुछ पाने का शेखचिल्ली जैसा सपना ही क्यों न सँजो रखा हो?

संसार में व्यावहारिकता का ही प्रचलन है। यहाँ इस बाजार में एक से एक बढ़िया वस्तुएँ भरी और आकर्षक ढंग से सजी पड़ी हैं। पर उसमें से एक को भी मुफ्त में पा सकना कठिन है। जो ऐसी चेष्टा करते हैं, वे चोरों की तरह पकड़े जाते हैं या फिर भिखारियों की तरह हर द्वार से दुत्कारे जाते हैं।

दुनिया का सम्मान और सहयोग उन के लिए सुरक्षित है जो देते बहुत हैं, पर बदले में कम पाने पर भी काम चला लेते हैं। कम देना और बहुत पाना तो प्रबंधकों, पाखण्डियों और अनाचारियों के ही गले उतरता है। वस्तुतः इस प्रत्यक्ष संसार और अप्रत्यक्ष परलोक का एक ही शाश्वत क्रम है कि पहले दो बाद में पाओ। पहले पाने और बाद में उसका एक अंश खैरात कर देने की नीति तो लुटेरे ही अपनाते हैं। उनकी भी घात सदा नहीं लगती।

तो क्या सचमुच ही ऐसा है कि कुछ महत्वपूर्ण पाने के लिए वैसा ही महत्वपूर्ण किये बिना काम नहीं चल सकता? इस प्रश्न का प्रत्युत्तर दसों दिशाओं से गूँजते सुना जा सकता है कि “दो और पाओ” “बोओ और काटो” “बाँटो और झोली को कभी खाली होते न पाओ।” इस शाश्वत सत्य को कृपणता अनादि काल से झुठलाती चली आ रही है, फिर भी यथार्थता को अपने स्थान से एक इंच .... हटाया नहीं जा सका है।

प्रश्न फिर घूमकर वहीं आ जाता है कि जब अधिकाँश लोग अभावों से ग्रसित है और गरीबी की रेखा से नीचे रहकर दिन काटते हैं, तब दान पुण्य की परम्परा चरितार्थ कैसे बन पड़े? प्रश्न में बालकों जैसे भोलेपन की झलक-झाँकी मिलती है। समझा जाता है कि धनदान ही एक मात्र दान है। क्योंकि हर जगह उसी का बोल बाला दीख पड़ता है। चर्चा और प्रशंसा उसी की होती है। प्रचलन को देखते हुए ऐसी मान्यता बन जाना कुछ आश्चर्यजनक भी नहीं है।

जो रिश्वत की, उपहार की, करामात जानते हैं उनका दावा है कि बेचारा मनुष्य तो चीज ही क्या है? देवताओं तक को भेंट उपहार के स्तवन, मनुहार के सहारे अपने पक्ष में बनाया जा सकता है। भले ही वह अनुग्रह कितना ही अनैतिक व अवाँछनीय क्यों न हो? इस मान्यता वालों का एक बड़ा समुदाय है।

ऐसी दशा में यदि दान शब्द का अर्थ धन दान के साथ जुड़ गया हो और फिर मनोविनोद तक के लिए किये जाने वाले अपव्यय को भी खर्च की मद में लिखे जाने के कारण दान समझा जाने लगा हो, इसमें आश्चर्य ही क्या है? कानून शास्त्र में अश्लील हरकतों को रक्तदान वीर्यदान जैसे नामों से पुकारा गया है। बुद्धकाल में पूजा पाठ में एक विधि पशु वध की भी सम्मिलित थी और उसे बलिदान कहा जाता था। हरिजनों को कभी जूठन दान दिया जाता था, जिसे अब उन्होंने अपना अपमान माना है और लेने से अस्वीकार कर दिया है। रोगियों के उतरे हुए कपड़े कभी जाति विशेष के लोग खुशी खुशी ले जाते थे। पर अब इस “उतरन दान” को स्वाभिमानी नितान्त निर्धन भी स्वीकार नहीं करते। विवाह शादी की धूमधाम में उलीचा गया धन कन्यादान, बागदान आदि के नाम से जाना जाता है। इस प्रकार दान शब्द का दुरुपयोग जहाँ तहाँ भिन्न भिन्न रूपों में देखा जा सकता है।

संग्रहित धन का आयकर से बचत हेतु किसी मान्यता प्राप्त संस्था को देकर दुहरा लाभ उठा लिया जाता है। टैक्स की बचत और दान वीरों की श्रेणी में अपनी गिनती। चंदा माँगने वालों का दबाव, कुटुम्बी संबंधियों पर अनुग्रह, तीर्थ यात्रा के नाम पर पर्यटन-पिकनिक भी दान है। मनोरंजन के लिए उद्यान पार्क, स्विमिंगपूल इत्यादि बना देना भी जनहित कहकर मन को समझाया जा सकता है। रिश्वत में दी गई राशि भी उदारतापूर्वक दी जाने के कारण दान ही है। यहाँ तक कि नशा पीने से पहले उसे शंकर भगवान को अर्पण कर दिये जाने पर वह भी भोग प्रसाद बन जाता है। यश के लिए कहीं जैसा देकर प्रतिष्ठा प्राप्त करना और उस “इमेज” का लाभ किसी दूसरी प्रकार से भुना लेना भी दान की श्रेणी में गिना जा सकता है। इस प्रकार दान शब्द व्यवहार में जिस प्रकार प्रयुक्त होता है उसे आदान-प्रदान कहा जाय तो अधिक उपयुक्त हो सकता है। उद्योगपतियों की विज्ञापन मद में खर्च की गई राशि जहाँ टैक्स में राहत दिलाती है, वहाँ उन अखबारों को कृतज्ञ बनाकर उसके बदले में प्रशंसा के पुल बँधवाने में भी सहायक होती है। इन सम्भावनाओं को देखते हुए पुण्य का पर्यायवाची शब्द बन सकने योग्य दान के किस स्वरूप को मान्यता दी जाय यह कह सकना अति कठिन है।

दान को पुण्य उसी आधार पर कहा जा सकता है कि उसको प्रामाणिक माध्यमों से उच्चस्तरीय सत्प्रयोजनों के लिए प्रयुक्त किया जाय। इसके विपरीत इस मद में खर्ची गई राशि यदि आलस्य, प्रमाद, पाखण्ड, प्रवंचना, दुर्व्यसन, अन्धविश्वासों के विस्तार में निमित्त कारण बनती है, तो उससे ठीक उलटा प्रतिफल भी हो सकता है। परिणाम और प्रयोग के साथ जुड़ी हुई उत्कृष्टता ही पुण्य का आधार बनती है और उसकी प्रतिक्रिया पुण्य के साथ जुड़ने वाले अनेक कल्याण-कारक रूपों में सामने आती है। इसके विपरीत यदि उससे दुर्जनों का, दुष्प्रयोजनों का परिपोषण हुआ तो समझना चाहिए कि वह देने की तरह खर्च किये जाने पर भी ऐसे दुष्परिणाम भी उत्पन्न कर सकती है, जो नरक जाने की तरह अपने तथा दूसरों के लिए अनेकों संकट खड़े करती है।

प्रवंचनाओं के अतिरिक्त दान क्षेत्र में और भी अनेकों व्यवधान हैं मुफ्तखोरी की आदत बढ़ाना किसी के अधःपतन का द्वार खोलना है। आपत्तिग्रस्तों को सामयिक सहायता देकर उसे अपने पैरों खड़े होने की स्थिति तक पहुँचा देना एक बात है और मुफ्तखोरी की आदत डालकर वैसा स्वभाव बना देना एक प्रकार से भले चंगे को अपाहिज बना देने के समान है।

ऐसी दशा में यह अति विचारणीय है कि न्यायोपार्जित धन इतनी मात्रा में कहाँ से पाया जाय जिसे प्रशंसा पाने योग्य स्तर पर दान के नाम पर बिखेरा जा सके। वस्तुतः धनिकों का दान उनके संचित पापों का प्रायश्चित है। फोड़े से भरे मवाद को निचोड़ देने के बाद इसमें लेने वाले की कम और देने वाले की भलाई अधिक है।

औचित्य इस बात में है कि हर व्यक्ति औसत नागरिक स्तर का जीवन जिये। “सादा जीवन उच्च विचार” की नीति अपनाये। न्यायोपार्जित पसीने की कमाई पर संतोष करें। चोरी बदमाशी का इस हेतु प्रयोग न करें। यदि अपने खर्च से बच जाता है तो उसे बिना रोके अवाँछनीयता जैसी अव्यवस्थाओं से निबटने के लिए खर्च कर दें। सत्प्रवृत्तियों के सम्वर्धन की व्यवस्था न जुट पाने से ही श्रेष्ठता और प्रगतिशीलता की पौध सूख रही है। उसे सींचने के लिए जो भी कुछ बन सकता हो करें यही सतयुगी परम्परा रही है, यही किया भी जाना चाहिए।


अवसर प्रमाद बरतने का है नहीं!

मनुष्य शरीर की संरचना अन्य प्राणियों की तुलना में इतनी अधिक समुन्नत है कि उसे निर्वाहजन्य किसी असुविधा के सहन करने का कोई कारण ही कहीं दृष्टिगोचर नहीं होना चाहिए। जब सभी जीव−जंतु क्रीड़ा कल्लोल करते हुए जीते हैं, कुहकते, फुदकते, चहचहाते दिन गुजारते हैं तो फिर विकसित मनुष्य को ही ऐसी कठिनाइयों से घिरा क्यों पाया जाना चाहिए जिनसे कि वह इन दिनों बुरी तरह ग्रसित देखा जाता है? रोग, शोक, अभाव, क्लेश, विद्वेष, अशान्ति के अनेकानेक कारण गर्दन दबोचे रहते हैं। चिन्ताओं, आशंकाओं से दिल धड़कता रहता है। हर कोई अपने ढंग की अनेकानेक समस्यायें गिनाता और आपत्तिग्रस्तों की तरह अपने को दयनीय परिस्थितियों में फँसा पाता है। इसे आश्चर्य ही कहना चाहिए। सृष्टि के समस्त प्राणियों की तलना में हर दृष्टि से सुसम्पन्न प्राणी इस तरह दिन गुजारे मानों विपन्नताओं ने सभी ओर से घेर रखा हो।

तनिक गंभीरता से विचार करने पर कारण स्पष्ट हो जाता है। वासना, तृष्णा और अहंता के निविड़ भव बन्धनों ने उसे ऐसी बुरी तरह जकड़ रखा है कि चौबीसों घन्टे उन्हीं उलझनों द्वारा कसे गये जाल जंजाल बेतरह त्रास देते रहते हैं। लोभ, मोह और अहंकार की पूर्ति के लिए मनुष्य इतना आकुल व्याकुल बना रहता है कि चैन की साँस ले सकने की फुरसत ही नहीं मिलती। कुछ उपलब्धियाँ हाथ भी लगती हैं तो आग में पड़ने वाले ईंधन की तरह जलन को और भी अधिक भड़काती है। मद्यपों जैसे कभी न पूरी होने वाली रट इस बुरी तरह खुमारी की तरह चढ़ी रहती है कि ‘और अधिक चाहिए’ के अतिरिक्त न तो कुछ और सोचते बनता है और न ऐसा कुछ समाधान ढूँढ़ने के लिए उत्साह उमंगता है कि मकड़ी की तरह अपने बुने हुए जाल को समेटने और जकड़न से त्राण पाने का मार्ग खोजा जा सके।

स्वाभाविक आवश्यकतायें स्वल्प हैं। उन्हें कुछ ही घंटों में अपने बलबूते ही पूरी किया जा सकता है। किसी से माँगने की तो आवश्यकता ही नहीं पड़नी चाहिए। अपना उत्पादन ही इतना अधिक है कि उसे यदि उर्वर भूमि में बोया जा सके तो एक से हजार, हजार से लाख का सिलसिला अनवरत रूप से चलता रह सकता है और प्रसन्नता लेकर प्रफुल्लता तक का आनन्द हर घड़ी अनुभव किया जा सकता है।

जीवधारी का सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह है कि उसे उल्टी बुद्धि से पाला पड़ता है। फलतः जिस डाल पर बैठता है उसी को काटता है। पतंगे को न जाने क्या लगता है कि जलते दीपक पर फटकता है और उससे कुछ पाना तो दूर अपने पर जलाकर बिलखता, कलपता हुआ मरता है। चींटियों और मछलियों को बिना परिश्रम का चारा तो सुहाता है पर यह नहीं दीखता कि इसके साथ कितना प्राणघातक जाल तना है। बालू को जलाशय समझने वाला हिरन मृगतृष्णा में भटकता प्यास प्यास करता मरता और नाहक बदनाम होता है। कस्तूरी के हिरन पर न जाने क्यों ऊत चढ़ती है कि नाभि से निकलने वाली गंध को कहीं अन्यत्र खोजता और थक थक कर दम दौड़ता है। सारंगी अजगर जब भूखा होता है तो अपनी ही पूँछ को निगलने लगता है और अपने आपे को स्वयं भक्षण करता हुआ दर्शकों के लिए अजूबा बनता है। कुत्ता सूखी हड्डी चबाता है और जबड़ा छिलने पर निकलने वाले रक्त को सूखी हड्डी का रस समझ कर अपने खून का प्यास आप बनता है। आस्ट्रेलिया का ओपोसम जानवर इतने बच्चे जनता है कि वे कुछ बड़े होते होते अपनी मादा पर लद लेते हैं और उतना भार न सह सकने के कारण जन्मदात्री माता के लिए प्राणघाती बनते हैं। कामातुर मकड़ी आनन्ददायक नर मकड़े को दबोच कर उसे उदरस्थ करती है ओर सोचती है कि इस इस आनन्द को सदा सर्वदा के लिए में ही क्यों न भर लें। मक्खी का पेट भरने के लिए रत्तीभर चासनी पर्याप्त हो सकती है पर वह भरी कड़ाही में इसलिए कूदती है कि इस भण्डार से प्रलय काल तक मौज उड़ाती रहूँ। मनोरथ कहाँ पूरा होता है? पंख चिपक जाने पर वह उसी कड़ाही में डूब मरती है। चिड़िया शीशे में अपनी आकृति देखकर उससे लड़ती और चोंच को लहूलुहान करती है। काँच के महल में बन्द कुत्ता चारों और अपने ही प्रतिद्वन्द्वी भौंकते देखता है और उन्हें मजा चखाने की धुन में लड़ते लड़ते स्वयं ही दम तोड़ देता है। हिरन और साँप वंशी के धुन पर इतना मस्त हो जाते हैं कि इतना तक समझना कठिन पड़ता है कि यह सब उन्हें बन्दी बनाने के लिए रचा गया षड्यन्त्र मात्र है। रबड़ की हथनी को सहचरी बनाने के व्यामोह में हाथी पत्ते से ढके गड्ढे में गिरते और जंजीरों में जकड़े जाने पर गुलामी की जिन्दगी जीत हैं। कीटभक्षी पौधे अपनी सुन्दरता पर मोहित होकर दौड़ती आने वाली मक्खियों का खूब मजे से खून चूस लेते हैं। परले सिरे की ऐसी मूर्खतायें अन्य प्राणी भी करते रहते हैं। रोटी के टुकड़े के लालच में चूहे पिंजड़े में फँसते हैं और अन्तिम सांसें उसे में गिनते हैं। गधा गरदन के साथ बंधी हुई लकड़ी पर टँगी घास लपकने के लिए तेजी से आगे बढ़ता है पर दौड़ लगाते लगाते मुद्दतें बीत जाने पर भी वह घास मुँह तक नहीं पहुँच पाती।

मनुष्य से आशा की जाती है कि वह बुद्धिवादी के जाने के कारण अधिक समझदारी का परिचय देगा। देता भी है किन्तु जहाँ तक लालच बटोरने का प्रश्न है वह उस पागल जैसा आचरण करता है जो कूड़े में से निरर्थक चीजें बीनकर झोली भरता है और फिर उसमें आग लगाकर लपटें उठाने की सफलता पर अट्टहास करता है। अंधी भेड़ें एक के पीछे एक चलती ओर एक ही खड्ड में गिरकर मरती हैं। टिड्डियों का समुदाय तो बड़ा होता है पर जब वह उड़ने योग्य होता है तो फिर निरुद्देश्य किसी भी दिशा में दौड़ पड़ता है। फलतः वे सभी किसी रेगिस्तान में गुलसती अथवा समुद्र जैसे जलाशय में डूबकर मरती हैं। ऐसा ही कुछ मनुष्य भी करने लगे तो हैरत होती है कि बाहरी दुनिया में चकित कर देने वाली करामातें दिखाने वाला मनुष्य अपनी बारी आने पर क्यों इतना मूर्ख बनता है कि खुशी खुशी आत्मघात करने के लिए साज सँजोये और रोकने समझाने वाले से खम ठोंक कर लड़ने आये। नशेबाजी का खेल ऐसा ही है, जिसमें पैसा, स्वास्थ्य, समय परिवार, यश विश्वास सभी कुछ बरबाद होता है और अपने बुलाये यमदूतों द्वारा मनुष्य पिटते-पिटते दम तोड़ता है। तथ्य से अवगत होने पर भी नशेबाजी का प्रचलन दिन-दूनी, रात चौगुनी गति से बढ़ ही रहा है।

चतुरता और बुद्धिमत्ता को दो भागों में विभाजित किया जा सकता है। एक वह है जो दुनिया और क्रियाकलापों में किसी भी प्रकार सफलता प्राप्त कर दिखाती है। इसके ऊपर नीति अनीति का दबाव प्रायः नहीं के बराबर होता है। जिस प्रकार भी अपना उल्लू सीधा होता है उसी को बहिरंग पक्ष ग्राह्य मानता है और बिना किसी हिचक के कर दिखाने के लिए जमीन आसमान के कुलावे मिलाता है।

मनुष्य का अन्तरंग पक्ष वह है जिसमें नीति, मर्यादा को प्रमुखता मिलती है। समझदारी, ईमानदारी, जिम्मेदारी, बहादुरी की कसौटी पर कसने के उपरान्त कोई निर्णय किया तथा कदम उठाया जाता है। इसमें अपनी ही तरह दूसरों के हितों का भी ध्यान रखा जाता है और इस संदर्भ में आत्मा का परमात्मा का अभिमत भी सुना जाता है।

इन दिनों बहिरंग पक्ष को ही प्रमुखता मिल रही है। गौरवर्ण, युवा वय और साज−सज्जा यदि आकर्षक हो तो यह देखने की आवश्यकता नहीं समझी जाती कि पर्दे के पीछे एड्स सिफिलिस, टी.वी., कैन्सर जैसे रोगों के विषाणु संपर्क में आने वाले पर छूत का आक्रमण करने को तैयार तो नहीं बैठे हैं। चालाक और उद्दंड व्यक्ति हर कहीं रौब गाँठते और किसी को भी डराने-दबाने में सफल होते हैं। सम्पन्नों में भी अधिकाँश लोगों की सम्पदा औचित्य के सहारे ही कमाई हुई नहीं होती। नेतृत्व स्तर की आदर्शवादी स्पीचें झाड़ने वाले बहुधा रँगे सियार और बगुला भगत पाये जाते हैं।

इसके ठीक विपरीत ऐसे लोग भी होते हैं जो प्रामाणिकता और प्रखरता को अक्षुण्ण बनाये रहने के लिए बड़े से बड़ा कष्ट सहने और ऊपर से दूनी कीमत चुकाने के लिए भी तैयार होते हैं। उनकी काया नहीं, चरित्र प्रेरणा का स्त्रोत बनता है और असंख्यों को ऊँचा उठाने आगे बढ़ाने में सफल होता है महामानवों को इसलिए ऐसे ही लोग गढ़ते और मानवीय उत्कृष्ट आदर्शवादिता की रक्षा करते हैं। अनुकरणीय और अभिनन्दनीय बनकर वे ही रहते हैं।

किन्तु उन अनगढ़ों को क्या कहा जाय जो चतुरता, विडम्बना और ठाटबाट की सज्जा के अतिरिक्त और किसी का लोहा मानने के लिए तैयार ही नहीं होते। उन्हें न देवता की जय बोलने में आपत्ति है और न दैत्य की अभ्यर्थना करने में। समर्थ से कुछ पाने या उसके दबाव से हैरान न होने का तानाबाना बुनते रहने में ही उन्हें अपनी खैर दीखती है। बहुमत इसी विडम्बना का होने से लोगों का झुकाव भी उन्हीं की ओर पाया जाता है। इसलिए तथाकथित लोकमत को न तो मान्यता दी जा सकती है और न उसके अनुसरण से गरिमा की रक्षा ही होती है।

बड़ों का विस्तार देखकर चमत्कृत होने की अपेक्षा औचित्य इसी में है कि महानता का अवलम्बन अभिवन्दन किया जाय। भले ही वह दुर्बल या पराजित ही क्यों न रह रहा हो।

यहाँ चर्चा बड़ों की नहीं की जा रही क्योंकि वे पानी के बबूले की तरह उबलते और तनिक ही उछल कूद दिखाकर अदृश्य के गत में समा जाते हैं। यहाँ विवेचन उनका हो रहा है, जिन्हें धरती खण्ड या समुद्र में दीप्तिमान प्रकाशस्तंभ कहते हैं। शेषनाग फन पर धरती को धारण किये हैं या नहीं, इसमें मतभेद हो सकता है। पर यह बात निर्विवाद है कि मनुष्य की गरिमा और महिमा मात्र उन आदर्शवादियों के कंधे पर टिकी हुई है, जिन से चिरस्थायी शान्ति और प्रगति की आशा की जा सकती है। विचारशील ओर विवेकवान इन्हीं को कहा जा सकता है।

चतुर लोग प्रचलित क्रियाकलापों में अपनी विशिष्टता का परिचय देते और जिस तिस प्रकार लाभ अर्जित कर दिखाते हैं किन्तु विवेकवानों को तो वही सोचना एवं करना पड़ता है जिससे मर्यादाएँ निभती रहें और शालीनता की उमंगे उभरती रहें। इन्हीं गौरवशाली मान्यता के धनी लोगों के सामने तीन समस्याएँ प्रमुख रहती हैं। एक यह कि अन्य प्राणियों के लिए सर्वथा सुलभ इतना कलात्मक जीवन स्रष्टा ने किस प्रयोजन के लिए प्रदान किया और उस विशिष्ट अनुदान का अधिकारी समझा? दूसरा यह कि जो आवश्यक साधन एवं वैभव प्राप्त है उसका आज की परिस्थितियों में सर्वश्रेष्ठ उपयोग क्या हो सकता है? तीसरा यह कि जन्म की तरह मरण निश्चित है। वह कल भी हो सकता है और परसों भी। तब जिस परिवार में हाजिर होना होगा, वहाँ किस प्रकार किस रूप में अपनी जीवनचर्या का निर्धारण प्रस्तुत करना पड़ेगा? इन तीन प्रश्नों का सही उत्तर देने के लिए जो परीक्षार्थी विद्यार्थी की तरह तैयारी करता रहता है जो सही उत्तर देकर ससम्मान उत्तीर्ण होता है। उसी के बारे में समझा जाना चाहिए कि उसने मनुष्य जीवन का महत्व समझा और तदनुरूप व्यवहार करके उपलब्धियों को सार्थक कर दिखाया ऐसे लोग संख्या में भले ही थोड़े हों पर प्रतिभा, प्रखरता और प्रामाणिकता से सम्पन्न उन्हें ही कहा जायगा।

जिन्हें इन प्रश्नों से कुछ लेना देना नहीं है, जो इस तरह कभी सोचते नहीं, सोचने की आवश्यकता नहीं समझते, फुरसत नहीं पाते, उन्हें मनुष्य समुदाय के एक घटक तो कह सकते हैं पर है वे वस्तुतः किसी अन्य लोक के प्राणी। उन्हें पृथ्वी के यक्ष, गंधर्व, किन्नर भले ही कह सकते हैं। फूहड़ शब्दों में इन्हें बड़े आदमी, चतुरता के धनी, बहेलिये, कलावंत भी कह सकते हैं। सफलताओं के तमगे तो वे अनेकों लटकाये फिरते हैं पर वस्तुतः वे अपने आप में ही तन्मय, एकाग्र, समाधिस्थ बने रहते हैं। इन्हें दीन दुनिया से कुछ लेना देना नहीं। वे अपनी चतुरता के बल पर खोटे सिक्के की तरह दाव लगाने पर चल तो जाते हैं पर मनुष्यता की हर कसौटी पर अनुपयुक्त ही सिद्ध होते हैं। खरे सोने वे हैं जो कसौटियों पर सके जाने और आदर्शों की आग में तपने पर भी अपनी गरिमा अक्षुण्ण बनाये रहते हैं। यही तो पवन की तरह प्राण बाँटते रहते हैं। बादलों की तरह बरसते और सूर्य की तरह स्वयं प्रकाशवान गतिशील रहकर हर कहीं आभा ऊष्मा बखेरते हैं इन्हीं के लिए उन तीन प्रश्नों का उत्तर सही रूप से दे सकना संभव होता है कि जीवन किस लिए मिला? उसके साथ किन कर्तव्य उत्तरदायित्वों का अनुबंध जुड़ा?

साधारण समय में साधारण रीति से भी सोचा और धीमा कदम उठाया जा सकता है। किन्तु कभी कभी ऐसे समय भी आते हैं जिनमें निर्णय तुरन्त करने और कदम अविलम्ब उठाने पड़ते हैं। पड़ोस में अग्निकाण्ड भड़क रहा हो और उसकी चिनगारियाँ अपने छप्पर तक पहुँच रही हों तो ऊँघते नहीं रहा जा सकता। रेल प्लेटफार्म पर खड़ी हो, गार्ड की सीटी बजने वाली हो तो चढ़कर अपनी जगह पकड़ने में फुर्ती ही दिखानी पड़ती है। परीक्षा की अवधि में पूरी एकाग्रता से पर्चे हल करने पड़ते हैं। उन क्षणों में कुकल्पनाओं में निरत रहना भारी घाटे का सौदा होता है। दुर्घटना घटित होने पर आहत का उपचार तुरन्त करना पड़ता है अन्यथा रक्तस्राव न रुकने पर प्राण संकट का खतरा स्पष्ट है। इन दिनों ऐसा ही समय है जिसमें एक पैर उत्थान की और दूसरा पतन की नाव पर रखा है। दोनों में से एक चयन करने में विलम्ब नहीं किया जा सकता, अन्यथा विपरीत दिशा में जाने वाली नौकाएँ असमंजस वाले मुसाफिर का कबाड़ा ही बना कर रख देंगी। गया समय फिर वापस लौटता कहाँ है? हनुमान ने, विभीषण ने, अर्जुन ने, बुद्ध ने अपने निर्णय तत्काल कर लिए थे।

यदि वे बात को फिर कभी के लिए टालते रहते तो उस सुयोग से वंचित ही रह जाते जो उन्हें समय को पहचान लेने के कारण सरलतापूर्वक उपलब्ध हो सका। फसल के बोने और काटने की कुछ दिन की अवधि निर्धारित रहती है जो उसे गँवा देते हैं उनके हाथ से फसल की आधी कमायी निकल जाती है। प्रमाद यों सदा ही अतिशय घाटे का निमित्त कारण है। पर कईबार अलभ्य अवसर सामने होता है और वे अन्यमनस्कता तनिक भी सहन नहीं करते। घुड़दौड़ में अच्छे घोड़े वाला भी यदि अस्तव्यस्त गति का हो तो उसके हाथ पराजय के अतिरिक्त और क्या लगने वाला है। नारद का परामश्र मानने में जिनने आना कानी नहीं की वे ध्रुव, प्रहलाद, उमा, सावित्री की तरह अजर अमर हो गये। अन्यथा मूढ़मति बहुमूल्य संकेतों और संदेशों को भी इस कान सुनते और उन कान निकालते रहते हैं। ज्ञान की सार्थकता कर्म के साथ जुड़ने पर ही बन पड़ती है। इस प्रयोजन को चरितार्थ करने का ठीक यही समय है।


Quotation

सभी साधक व उनके पच्चीस भागीदार साथी अपना पंजीकरण एक परिपत्र पर अपना नाम, पता, साथियों की संख्या व उनके नाम पते लिखकर शाँतिकुँज भेजकर करालें। यह कार्य पिछली गायत्री जयंती से आरंभ हो चुका है। भावी पत्र व्यवहार भी इसी आधार पर ही चलेगा


अभूतपूर्व समय जिसे चूका न जाय

समय साधारण भी होते है और असाधारण भी। साधारण समय को जिस-तिस प्रकार काट लेना भी बहुत भारी नहीं पड़ता पर जब निर्णायक घड़ियाँ हों तो फैसला करने में अचकचाते रहना, असमंजस में अवसर गँवा देना बहुत भारी पड़ता है। समर्थ गुरु रामदास को विवाह मंडप में जब ‘सावधान’ कहा गया तो उनने उस संकेत को कप्तान के अनुशासन की तरह शिरोधार्य किया और ऐसे घटनाक्रम से बच गये जिसमें पड़ने के उपरान्त वे कोल्हू का बैल बने रहने के अतिरिक्त और कुछ नहीं कर सकते थे। बाहरी संकेत को अन्तरात्मा ने गंभीरतापूर्वक अपना लिया तो वे वह बन गये, जिसका स्वरूप राष्ट्र उद्धारक के रूप में अनादिकाल तक स्मरण किया जाता रहेगा। शंकराचार्य, विवेकानन्द, दयानन्द, विनोबा आदि ने भी अपना लक्ष्य निर्धारित करने में वर्षों का समय नहीं गँवाया था। ईसा सच ही कहते थे कि -”महानता अपनाने के लिए बायाँ हाथ सक्रिय हो तो उसी से पकड़ लें। ऐसा न हो कि दाहिना हाथ सँभलने की थोड़ी सी अवधि में ही शैतान बहकाले और जो सुयोग बन पड़ रहा था वह सदा-सदा के लिए अपनी राह चला जाय।”

प्रसव काल की लापरवाही जच्चा और बच्चा दोनों के प्राण हरण कर सकती है। मोटर दुर्घटनाओं में भी ड्राइवर की तनिक सी असावधानी गजब ढा देती है। निशाना साधने वाले का हाथ जरा-सा हिल जाय तो तीर कहीं से कहीं चला जायेगा। मनुष्य जीवन ऐसा ही अलभ्य अवसर है। यह किसके पास कितने दिन ठहरेगा, इसकी कोई गारंटी नहीं।

यह युग संधि की बेला है। बीसवीं सदी विदा हो रही है और इक्कीसवीं सदी का प्रभात पर्व की तरह अरुणोदय हो रहा है। संध्याकाल की महिमा सर्वत्र असाधारण बतलाई गई है। चिड़िया तक उसका स्वागत करने में चहचहाने का स्वागत गान गाने में चूकती नहीं। हर जीवन्त प्राणी अपने-अपने ढंग की क्रियाशीलता अपना लेता है। रात का अँधेरा हटते-हटते हर किसी को कोई अदृश्य संदेशवाहक झकझोर कर उठा देता है। निष्क्रियता को सक्रियता में बदलते देर नहीं लगती। सूर्योदय की भाँति ही सूर्यास्त का समय भी असाधारण हलचलों से भरापूरा होता है। पशु-पक्षी तक अपने विश्राम स्थलों को लौट जाते हैं। कार्यरत व्यक्ति नींद भर सोने की व्यवस्था बनाते हैं। प्रकृति की शोभा दोनों ही अवसरों पर देखते बन पड़ती है। यह समय पूजा-अर्चना के लिए विचारवानों ने अनादिकाल से निर्धारित किया हुआ है।

युगसंधि का अवसर असाधारण है। ऐसे ही अवसर पर मेघ गहराते और पेड़-पौधे एक बसन्ती परिधान ओढ़कर सजते हैं। जन्म का आरंभ और मरण का समापन भी कुछ विचित्र प्रकार का माहौल बनाते और नई तरह के संवेदन उभारते हैं। इन दिनों भी ऐसा ही कुछ है जीवन्तों को कुछ ऐसे निर्णय करने पड़ते हैं जो उनकी गरिमा के अनुरूप हों।

इन दिनों स्रष्टा की अदम्य और प्रचण्ड अभिलाषा एक ही है कि सड़ी दुनिया को बदलने में उसके लिए काया कल्प जैसा नया सुयोग बनाया जाय। यही है “इक्कीसवीं सदी बनाम उज्ज्वल भविष्य”। यही है मनुष्य में देवत्व का उदय एवं प्रतिभा परिष्कार का महा अभियान। इसी को लोक विचार क्राँति की लालमशाल का प्रज्वलन भी कहते हैं। इस दैवी उत्कंठा की पूर्ति में जो जितना सहायक बनेंगे, वे उतना ही अपने को समग्ररूप से कृतकृत्य हुआ अनुभव करेंगे।


समयदान-महादान

दान के साथ जो पुण्यार्थ बोधक मान्यता जुड़ी हुई है, उसके साथ पूर्व मान्यता यह भी जुड़ी रहती है कि सत्प्रयोजनों के लिए श्रद्धासिक्त भाव संवेदना के साथ दान की शर्त आरंभ में ही पूरी कर ली गई है। यदि ऐसा नहीं है व उसके साथ दुरभिसंधियाँ जुड़ी रहें तो प्रतिक्रिया और परिस्थिति के अनुरूप वह पाप के समकक्ष है और देने वाले तथा लेने वाले दोनों को ही बदनाम करने के साथ साथ उनके लिए अनर्थ भी उत्पन्न कर सकता है। इसलिए दान भावना को चरितार्थ करने के साथ साथ उत्कृष्टता और विवेकशीलता की शर्त भी पूरी कर ली गई होगी, यही अपेक्षा रखी जाती है। यह अनुभव पूरा होने पर ही यह आशा की जाती है कि दान के साथ जुड़ा हुआ पुण्य-परमार्थ सभी के लिए सब प्रकार श्रेयष्कर होगा। अवाँछनीयता जुड़ जाने पर तो वह अनुचित ही नहीं अहितकर भी कहा जायेगा।

प्रीतिभोज पर बुलाये गये आमंत्रकों को सुस्वादु भोजन परोसने के साथ साथ यदि किसी कारण उसमें विषाक्तता मिल जाय तो खाने वाले बीमार पड़ेंगे और खिलाने वाले को पुलिस कचहरी में धमकाया जायेगा। खोटे सिक्के दान करने वाले को उन्हें चलाने का व्यवसायी मानकर शासन के शिकंजे में कसा जायगा। मरणासन्न गाय का दान करने पर वह वैतरणी पार करवा, देगी, यह आशा नहीं की जानी चाहिए। विक्षिप्त लड़की का कन्यादान कर देने पर पता चलते ही ससुराल वाले धोखा धड़ी का इल्जाम लगायेंगे। धन दान का दान शब्द के साथ जुड़ा हुआ सम्मान और श्रेय तभी मिलता है जब उसका औचित्य हर कसौटी पर कसे जाने के उपरान्त और भी खरा उतरता है। उसके साथ सत्प्रवृत्ति संवर्धन -उत्कृष्ट भाव संवेदना का समुचित समावेश रखा गया हो।

दान परिवार में धन के उपरान्त दूसरे पदार्थ ‘समय’ की ही गणना होती है। वह सर्व साधारण के लिए सुलभ भी है और उसके सदुपयोग की जाँच-पड़ताल मोटी बुद्धि से भी करते बन पड़ती है। विचारशीलों से परामर्श करने का उसके लिए सहज मार्गदर्शन भी मिल जाता है। स्वार्थी बहुत देर तक उसका अनुचित शोषण भी नहीं कर पाते।

श्रम जनित स्वेद कणों की तुलना मणि मुक्तकों से की गई है। महामानवों के श्रेष्ठ सत्कार्य इसी आधार पर बन पड़े हैं। कारण कि समयदान के साथ-साथ भाव श्रद्धा का गहरा पुट लगा रहना आवश्यक है। अन्यथा व्यस्तता जैसे अनेकों बहाने सहज अभ्यास के अनुरूप बन जायेंगे।

महान मनीषियों की साधना “समय” की तपशिला पर बैठ कर ही संभव हुई हैं उनने जो सोचा, जो सृजा है उसके पीछे उनकी तन्मयता भरी समय साधना ही रही है। वैज्ञानिकों-आविष्कारकों ने अपना मानस और समय प्रमुखतापूर्वक निर्धारित लक्ष्य पर केन्द्रित न किया होता तो सफलता की आशा कहाँ बन पड़ती? लोक सेवियों ने अपने समय दान के सहारे एक से एक बड़े कार्य सम्पन्न कर दिखाये हैं। धन से अर्थ सम्पादन सधता है, पर समय को साथ लेकर तो फरहाद जैसे साधन हीन भी अपनी कुदाली के बल पर बत्तीस मील लम्बी नहर खोद कर ला सकने में सफल हो सकते हैं। जिनने इस ऊबड़-खाबड़ धरती को समतल और क्रियाकलाप के उपयुक्त बनाया उनने श्रम साधना को ही अपना आधार बनाया। प्रगति में यों साधनों का भी अपना योगदान रहा है पर उन्हें भी जुटाने में श्रम ही प्रमुख रूप से काम करता दिखाई देता है। साधन तो कुपात्रों के हाथ पड़कर अनर्थ भी कर सकते हैं, जबकि समझदारी के साथ की गई श्रम साधना के सुखद सत्परिणाम देखने को मिलते हैं। यहाँ इतना और याद रखना चाहिए कि समयदान की चर्चा करते समय उसके साथ लगन, मेहनत, हिम्मत और विवेक को भी पूरी तरह समाविष्ट समझा जाय, तभी बात पूरी तरह बन पड़ती है। अन्यथा समय तो किसी तरह भिखारी, आलसी, आवारा और दुर्व्यसनी भी काटते ही रहते है।

भारत की पुरातन गरिमा पर दृष्टिपात करते हैं तो उसके मूल में एक ही तथ्य उजागर होता है-साधु-ब्राह्मणों का-वानप्रस्थ परिव्राजकों का भावभरा योगदान। यह पुरोहित वर्ग न्यूनतम निर्वाह में अपने काम चलाता रहा और शेष सारा समय परिपूर्ण लगनशीलता के सहारे लोक मंगल की सामयिक आवश्यकताओं को पूरा करने में जुटता रहा। उनकी सेवा साधना ने जन-जन का मन जीता और परामर्श-प्रतिपादनों को जीवनक्रम में उतारने में कुछ उठा न रखा। व्यक्तित्वों में सन्निहित प्रतिभा इसी आधार पर प्रसुप्ति से विरत होकर जाग्रत कर्म निष्ठा में परिणत हुई और सर्वतोमुखी प्रगति का वातावरण बन बया। यही है, सतयुग में समुन्नत वातावरण बने रहने का प्रमुख कारण।

अनाचारों की रोकथाम के लिए शासन का राजदंड भी काम करता है, पर सद्भाव संवर्धन के लिए धर्मतंत्र की भाव-संवेदनाएँ ही समर्थ हो सकती हैं। सुख-शान्ति उसके अवलम्बन से बन पड़ती हैं। उत्कर्ष, अभ्युदय और विकास का आधार भी इसी के सहारे खड़ा होता है। इतिहास साक्षी है कि भारतीय परिव्राजकों ने विश्व के कोने-कोने में पहुँचने की कष्ट-साध्य यात्राएँ सम्पन्न कीं और वहाँ के पिछड़ेपन को हटाने एवं उत्कर्ष का बहुमुखी सरंजाम जुटाकर परिस्थितियों में जादुई परिवर्तन कर दिखाया। देशव्यापी आदर्शवादिता और उत्कृष्टता को अक्षुण्ण बनाये रहने में इस साधु-ब्राह्मण वर्ग का ही अथक प्रयास कार्यरत रहा है। उपयोगिता और गरिमा का मूल्याँकन करने वालों ने उन्हें भूसुर देवमानवों की पंक्ति में प्रतिपादित किया हैं। उनके अभिनंदन, सान्निध्य, मार्गदर्शन का अपने सर्वतोमुखी कल्याण का वर्णन किया है।

भारतीय धर्मतंत्र का एक अनिवार्य पक्ष रहा है-वानप्रस्थ। साँसारिक प्रयोजनों में जीवन की आधी अवधि लगाने के उपरान्त शेष आधी को लोक मंगल के लिए लगाया जाना आवश्यक माना जाता था। गृहस्थ की जिम्मेदारियाँ हलकी-फुलकी रखी जाती थीं। कोई बुद्धिमान ऐसे परिवारों का सृजन नहीं करता था जिनका भार वहन करते-करते ही जिन्दगी का कचूमर निकल जाय। जो गृहस्थ में प्रवेश करते थे, वे भी न्यूनतम संख्या में सन्तानोत्पादन आरंभिक दिनों में ही पूरा कर लेते थे, ताकि अधेड़ होते-होते घर-परिवार के बंधन में इस बुरी तरह न बँधे रहें वैसा कुछ करते-धरते ही न बन पड़े, जिसके साथ मानव जीवन की सार्थकता अविच्छिन्न रूप से जुड़ी हुई है। स्वावलम्बन और सुसंस्कारिता के लिए समुचित मार्गदर्शन ही अभिभावकों को कर्तव्य रहता था। उत्तराधिकार में धन छोड़ मरने की बात तो कोई सोचता तक न था। कमाऊ व्यक्ति मिल जुलकर असमर्थ अविकसितों का भरण-पोषण कर लेते थे। हर घर पीछे एक व्यक्ति पूरे समय के लिए लोक मंगल के लिए समर्पित होता था। इसी में किसी गृहस्थ की शान समझी जाती थी। राजपूतों में से हर घर पीछे एक व्यक्ति सेना में भर्ती होता था। सिखों में से एक को गुरु कार्या के लिए समर्पित होकर रहना पड़ता था। उदारचेता, धर्मनिष्ठ परिवारों में से एक सदस्य जनकल्याण के लिए समर्पित किया जाता था। उसके हिस्से में आने वाली जिम्मेदारियों को घर के अन्य लोग मिलजुल कर पूरी कर लिया करते थे। यही थी वह महान परम्परा जिसके कारण भारत भूमि “स्वर्गादपि गरीयसी” रही और यहाँ के नागरिकों को देवमानव के रूप में समस्त संसार जानता था। इन देवमानवों की सेवा साधना ने ही इस देश को ज्ञानक्षेत्र में जगद्गुरु, विज्ञान क्षेत्र में चक्रवर्ती शासक और व्यवसाय क्षेत्र में स्वर्ण सम्पदाओं का स्वामी बनाया था। इतिहास अपनी वज्र चट्टान पर अभी भी अवस्थित है और तुमुलनाद के साथ उद्घोष करता है कि उन पुरातन परम्पराओं को यदि किसी प्रकार फिर जीवन्त किया जा सके तो सतयुग लौट आने की संभावना फिर सुनिश्चित हो सकती है। दुर्बुद्धि के दावानल में जलती हुई दुनिया को फिर से नये वातावरण में साँस लेने की सुखद संभावनाएँ हस्तगत हो सकती हैं।

इन दिनों असल की नकल बनाने में मनुष्य की चतुरता ने कमाल हासिल कर लेने जैसी प्रवीणता प्राप्त कर ली है। खिलौने वाले की दुकान पर खड़े होकर सभी जानकारी के नमूने थोड़े से पैसे खर्च करके खरीदे जा सकते हैं। इतना ही नहीं जिस देवता की भी चाहें मिट्टी की मूर्तियाँ बिना किसी कठिनाई के खरीदी जा सकती हैं। इतने पर भी असली और नकली का अन्तर लोग समझ ही लेते हैं और क्रियाशीलता रहित होने के कारण उन्हें असली मान बैठने के भ्रम में नहीं पड़ते। खिलौना गाय दूध कहाँ देती है? खिलौना हाथी की पीठ पर बैठकर लम्बा सफर कहाँ किया जा सकता है? खिलौना मुर्गी अंडे कहाँ देती है? और मिट्टी का बैल हल में चलने के लिए मारने पीटने पर भी तैयार नहीं होता। यही कारण है कि असली जानवर खरीदने और उनसे लाभ उठाने के लिए पूरा सरंजाम जुटाना पड़ता है, जब कि खिलौने स्तर के प्राणी एक बार थोड़े पैसे खर्च कराने के बाद आजीवन आलमारी की शोभा बढ़ाते है पर प्रकृति के साथ दूर का भी रिश्ता नहीं रहता।

यही बात सुखी और समुन्नत संसार में सतयुगी वातावरण बनाये रखने वाले देव मानवों के संबंध में भी है। वे संख्या में इन दिनों भी साठ लाख के लगभग हैं। धर्मप्रचार की आड़ में जिस तिस बहाने अनुदान और सम्मान बटोरने वालों की इतनी बड़ी संख्या है कि आश्चर्यचकित रह जाना पड़ता है कि इतने धर्मसेवकों के रहते विश्व का न सही तो देश का अभ्युदय तो चरम स्तर पर रहा ही होता। पर दीख इससे ठीक उलटा पड़ता है। जिन्हें देश का-विश्व का भार उठाना चाहिए था वह उलटे भारभूत बन कर रह रहे है।

यहाँ दान धर्म की विवेचना करते हुए सर्वसुलभ समयदान की चर्चा की जा रही है और इस विचारणा में सम्मिलित होने के लिए प्रत्येक व्यक्ति को आमंत्रित किया जा रहा है कि फिर से लोक मंगल के लिए समयदान की प्राचीन परम्परा को किसी प्रकार पुनर्जीवित कर सकना क्या संभव हो सकता है? उज्ज्वल भविष्य की संरचना में प्रमुख भूमिका निशा सकने में समर्थ इस महान प्रचलन को अपनाने के लिए विचारशील पीढ़ी में क्या नया उल्लास-नया आवेश उपजाया जा सकता है?

प्रतिभावान तस्कर, आक्रान्ता और दुष्ट-दुराचारी अपने अनुरूप वातावरण बना लेते हैं। ढेरों साथी-सहयोगी उत्पन्न कर लेते हैं, फिर कोई कारण नहीं कि यदि परमार्थ परायण उदारचेता समयदानी उत्पन्न होने पर प्रस्तुत अवांछनियताओं का उन्मूलन करने में सफल-समर्थ न हो सकें।

सच्चे अर्थों में समयदान करते तभी बन पड़ता है, जब अन्तराल की गहराई से आदर्श पर चलने के लिए बेचैन करने वाली टीस उठती हो, ऐसे लोग अपने प्राणप्रिय लक्ष्य की दिशा में बढ़ चलने के लिए आकुल-व्याकुल होकर तीर की तरह सनसनाते हुए चलते हैं। प्रलोभन और अवरोध उनके मार्ग में न आते हों सो बात नहीं, पर उस ओर उपेक्षा बरते जाने पर दबाव अनुभव ही नहीं होता और लगता है, जो मच्छर काटने जैसा दिनचर्या का अंग है, जो ध्यान भर बँटाता है, पर ऐसा कुछ नहीं कर पाता जिससे मार्ग बदलने जैसा कुछ सोच आड़े आये। ऐसी दशा में उन अवरोधों और आकर्षणों का उनकी दृष्टि में कुछ महत्व ही नहीं रह जाता है जो संकल्पहीन व्यक्तियों को बहकाने, बरगलाने, फुसलाने और रास्ता भुला देने के लिए पर्याप्त होते हैं।

पूर्व संचित कुसंस्कार, प्रचलन का प्रभाव, लालच का दबाव, तथा कथित हितू जनों का प्रभाव मिलकर एक ही सूझ सुझाते हैं कि जिस तरह भी संभव हो अधिकाधिक सुविधा-साधन जुटाने और मनमौजी उपयोग करना ही प्रसन्नता का मार्ग हैं। स्वार्थ ही सर्वोपरि है। सोचना अपनी सुविधा के बारे में ही चाहिए, इसके लिए दूसरों को असुविधा हो तो परवाह नहीं करनी चाहिए। नीति-अनीति का अन्तर कहने सुनने भर का विषय है। व्यवहार में इस झंझट से दूर रहना चाहिए। अधिक से अधिक इतना हो सकता है कि प्रतिष्ठा अर्जित करने के लिए सफेद पोशों जैसा आवरण ओढ़ लेना चाहिए। व्यवहार में भले ही इससे ठीक उलटा आचरण क्यों न करना पड़े। उदाहरण के लिए इर्द-गिर्द से ही ऐसे असंख्यों उदाहरण गिनाये जा सकते हैं जो देशभक्ति की, समाज कल्याण-जनहित की, आदर्शों के समर्थन की चित्र-विचित्र बोलियाँ बोलते हैं, किन्तु भीतर जो मान्यताएँ भरी होती हैं उनमें कथनी और करनी के साथ कोई संगति नहीं बैठती ऐसे लोग फोटो खिंचवाने, अखबारों में नाम छपाने में किसी संस्था के अधिकारी बनने में तो रुचि दिखाते हैं, पर वैसा कुछ ठोस कदम उठा नहीं पाते जिससे सत्प्रवृत्ति संवर्धन के लिए कुछ कहने योग्य ठोस कार्य करते बन पड़े। औसत आदमी का मन इस दुहरी चाल को चलने में ही अपनी चतुरता अनुभव करता है और जब-तब न्यूनाधिक सफलता भी उस दुरंगी चाल से प्राप्त कर लेता है।

पर यह सब है एक प्रकार का प्रहसन-अभिनय ही, जो मंच पर क्रीड़ा कौतुक दिखाकर पानी के बुलबुले की तरह समाप्त हो जाता है। छल छिपता नहीं। वस्तु स्थिति कल नहीं तो परसों प्रकट होकर रहती है। ऐसी दशा में बहुरूपियापन विचारशीलों की दृष्टि में उपहासास्पद बन कर ही रह जाता है। बच्चे ही उस छलावे को न समझ पाने के कारण कुछ देर तक तालियाँ बजा सकते हैं। इस अर्थ-प्रधान युग में किसी को भी खरीद कर उससे कुछ भी कहलाया, कराया या लिखवाया जा सकता है, पर इस समूचे प्रपंच में इतना दम नहीं होता कि प्रस्तुत प्रपंच को लम्बे समय तक जीवित रख सकें। फिर उस खिलवाड़ से बालू के महल सजाये भले ही जायँ, पर वे कुछ ही क्षणों में गिर कर धराशायी हो जाते हैं। ऐसी विडम्बनाएँ आये दिन रची जाती और उजड़ती देखी जा सकती है। इसे कौतुक-कौतूहल के अतिरिक्त और क्या कुछ कहा जाय? ऐसों का व्यक्तित्व उपहासास्पद बन जाता है और पता चलने पर निकटवर्तियों से लेकर सहयोगियों तक पल्ला झाड़ कर अलग हो जाते हैं। सूक्तिकार ने ठीक ही कहा है कि-पाखंडी से बढ़ कर अभागा और कोई नहीं जिसका बुरे दिन में भी साथ दे सकने वाला कोई साथी-सहयोगी बच सके।”

बातें बड़े महत्वपूर्ण, निस्वार्थी, उपयोगी और प्रेरणाप्रद कार्यों की चल रही हैं। उनका बन पड़ना मात्र उन्हीं से बन पड़ता है जिसकी आदर्शवादिता से जुड़ी हुई लगन टीस बन कर हर घड़ी टसकती रहती है और समय ही नहीं, कौशल और साधनों को भी अभीष्ट के प्रति समर्पित करने में गर्व गौरव का अनुभव कराती है। संसार भर के इतिहास का एक ही निष्कर्ष है कि आदर्शवादी घटनाक्रम अभियान-आन्दोलन चलाने और व्यापक बनाने में मात्र वे ही लोग सफल हुए हैं जिन्होंने उत्कृष्टता को अपने जीवन का अविच्छिन्न अंग बनाया और आदर्शों को प्रतिष्ठापित करने में अपना सर्वस्व दाँव पर लगाया। समयदानी इन्हीं को कहते हैं। इनका लक्ष्य पाना न बीच में रुकता है, न पथभ्रष्ट होता न गड़बड़ाता है। श्रेयाधिकारी ऐसे ही लोग बनते हैं। महादानी इन्हीं को कहना चाहिए। छुटपुट दान-विज्ञापन करते रहने वाले तो हर गली कूचे में कुछ न कुछ आडम्बर पहने जहाँ-तहाँ घूमते देखे जा सकते हैं।


दृष्टिकोण बदले तो परिवर्तन में देर न लगे!

कब किस दान की महिमा अत्यधिक बढ़ी चढ़ी मानी जाती है? इस प्रश्न के उत्तर में एक ही बात कही जा सकती है कि जब जिस विपत्ति का अत्यधिक प्रकोप हो, तब उसके निराकरण का उपाय ही सर्वश्रेष्ठ दान है। प्यास से संत्रस्तों को पानी, भूख से तड़पतों को अन्न, अग्निकाण्ड का शमन करने के लिए जल, बाढ़ की चपेट में घिरों को नाव, दुर्घटनाग्रस्तों को चिकित्सा उपचार जैसे उन साधनों की आवश्यकता पूर्ति की जाती है जिनके कारण संकटग्रस्तों को अत्यधिक त्रास सहन करना पड़ रहा है।

वर्तमान समय में आस्था संकट के रूप में घोर दुर्भिक्ष जन-जन के ऊपर प्रेत पिशाच की तरह चढ़ हुआ है। लोग बेतरह भूल भुलैयों में भटक रहे हैं। दृष्टिकोण में ऐसी विकृति समा रही है कि उलटा सीधा और सीधा उलटा दीखता है। कौरवों को नवनिर्मित राज महल में प्रवेश करते समय जल में थल ओर थल में जल दीख पड़ा था। इस कारण वे मति भ्रम में पड़े, दुर्गति को प्राप्त हुए और उपहासास्पद भी बने।

इन दिनों जो चिन्तन, प्रचलन, व्यवहार एवं लक्ष्य अपनाया जा रहा है, वह लगभग उलटे स्तर का है। हर किसी को आपाधापी पड़ी है। जो जितना भी, जिस प्रकार भी बटोर सकता है उसमें कमी नहीं रहने दे रहा है। साथ ही जो उपलब्ध है, उसका भौंड़ा उपयोग करने में ही अहंकार की पूर्ति मानी जा रही है। उद्दण्डता ही समर्थता का पर्यायवाचक बनने का प्रयत्न कर रही है। आदतों में घुसी पड़ी विकृतियाँ अशान्ति और उद्विग्नता को दिन दिन बढ़ावा दे रही हैं। असंतोष खीझ, थकान, निराशा के साथ-साथ आक्रमण और प्रतिशोध का कुचक्र ऐसा चल रहा है जिसका ओर छोर कहीं दीख नहीं पड़ता।

अपने समय में सबसे बड़ा अभाव और कष्ट यह है कि लोगों को मानवोचित स्तर पर सोच सकना और तदनुरूप क्रिया-कलापों को काल सकने में सफल होना कठिन जान पड़ता है। पानी ढलान की ओर से सहज बह निकलता है पर ऊँचे उठाने में असाधारण कठिनाई का सामना करना पड़ता है। इस सत्साहस के क्षेत्र में चरम सीमा की दुर्बलता छाई हुई है। भ्रष्ट चिन्तन अपनाते ही दुष्ट आचरण बन पड़ने का सिलसिला तो तेजी से चल पड़ता है। यही सामाजिक विकृतियों की उद्गम स्थली है। जहाँ उभरने वाला प्रवाह अपने प्रभाव क्षेत्र में कीचड़ ही कीचड़ भरता है। पाचन तंत्र खराब हो जाने पर बढ़ती हुई विषाक्तता असंख्यों आकार प्रकार के रोग उत्पन्न करने लगती है। ठीक इसी प्रकार विकृत चिन्तन का अन्धड़ उमड़ पड़ने पर आँखों में धूल भर जाती है और यथार्थता को सही रीति से देख पड़ना कठिन पड़ता है। क्रियाएँ अपने आप नहीं बन पड़ती। उनके पीछे आकाँक्षाओं, मान्यताओं एवं विचारधाराओं का गहरा पुट रहता है। शरीर मन का वाहन है। उसे वही करना पड़ता है, जिसके लिए मन रूपी संचालक उसे निर्देश देता और दबाव डालता है। दृश्यमान अनाचार के पीछे बौद्धिक दुश्चिन्तन ही अपनी समग्र भूमिका निभाता है। कठपुतली को बाजीगर के इशारे पर ही तो नाचना पड़ता है।

सुधार का उपचार करना हो तो एक ही उपाय अपनाना पड़ेगा कि कुविचारों के प्रभावों को मोड़ा और उसकी दिशाधारा को सदुद्देश्यों के साथ जोड़ा जाय। इतना बन पड़ने पर वह सब सरल हो जायेगा, जो इन दिनों सर्वत्र अपेक्षित है। विचारों की गंदगी यथावत् बनी रहने पर मनुष्य रच तो सज्जनता और उदारता के पाखण्ड भी सकता है। पर उनके पीछे श्रेष्ठ आधार न होने पर रची हुई विडम्बना कागज की नाव जैसी अपनी असमर्थता प्रदर्शित करने लगती है।

संसार के कोने कोने में स्थानीय परिस्थितियों और प्रचलनों के अनुरूप असंख्यों प्रकार की अवांछनियताएं अनेक रूप में उभरती देखी जाती है। सोचने वाले उन सब को स्वतंत्र समस्या समझकर सामयिक एवं स्थानीय उपाय ही अपनाते हैं। इसका परिणाम आहत स्थान पर सुन्न करने वाले लेप लगा देने जैसा होता है। हाथों हाथ तो कुछ सुधार दीख पड़ता है पर जैसे ही उस लेप का प्रभाव हलका होता है व्यथा ज्यों की त्यों फिर उभर आती है। इस खिलवाड़ में समय नष्ट करते रहने की अपेक्षा उपयुक्त यही है कि विचारक्रान्ति का तूफानी सरंजाम जुटाया जाय और उसे इतना प्रबल-प्रचण्ड बनाया जाय कि जो कुछ भी कचरा जहाँ भी जाता है वह अन्धड़ के साथ उड़ता और कहीं से कहीं पहुँचता जाता दिखाई पड़े। प्राकृतिक सफाई तो तूफानी अन्धड़ और घटाटोप वर्षा का प्रबल प्रवाह ही व्यापक रूप से सम्पन्न कर पाता है यों घर आँगन में बुहारी लगा कर सफाई की चिन्ह पूजा तो किसी प्रकार होती ही रहती है।

भटकाव में पड़ने की अपेक्षा हमें लक्ष्य निर्धारित करना चाहिए और उसे प्राप्त करने के लिए अपनी समूची तन्मयता एवं तत्परता को उसी में नियोजित करना चाहिए। इसके लिए तर्क और तथ्यों पर आधारित यथार्थता का प्रबल प्रतिपादन बहुत हद तक काम दे जाता है। इन शताब्दियों में प्रजातंत्र और साम्यवाद की तो विचारधारा मनीषियों ने इस प्रकार प्रस्तुत की कि उनने संसार के दो तिहाई मस्तिष्कों को अपने प्रभाव की परिधि में जकड़ लिया। जो एक तिहाई शेष हैं, वे अपने निहित स्वार्थों की वकालत में ही असहमति प्रकट करते देखे जाते हैं। विरोध उनका उथला होता है और ऐसा होता है जिसका खंडन किये जाने पर बगलें झाँकने और सीखें निपोरने के अतिरिक्त और झाँकने और कुछ बन नहीं पड़ता। शालीनता की पक्षधर विचारक्रान्ति की दृढ़ता और यथार्थता के सम्बंध में भी यही बात कही जा सकती है। उसके प्रयोग जहाँ कहीं, जहाँ किसी, जितनी सशक्तता के साथ प्रयुक्त किये गये हैं उनने अपना चमत्कारी प्रतिफल प्रस्तुत किया है। यह बात अगल है कि उन विचारों में संभवतः व्यावहारिकता न रही हो और संकीर्ण स्वार्थों का समूह उनके साथ पूर्वाग्रह की तरह जुड़ा हुआ हो और जैसा प्रभाव-परिणाम हो सकता हो, वैसा न हुआ हो। विचार क्रान्ति का ही परिणाम है कि उसके एक झकझोर ने इन्हीं दिनों राजशाही सामंतशी, साहूकारी, व्यवसाय, जातिगत ऊँच-नीच दास-दासीप्रथा, सती प्रथा जैसे चिरकाल से जड़ जमाये बैठे अनौचित्यों को जड़मूल से उखाड़ कर फेंक दिया है। अब उनके खण्डहरों पर इतिहास के विद्यार्थियों की ही नजर पड़ती है। पुरातन काल जैसा वैभव और जलजला उनका कहीं भी दिखाई नहीं पड़ता।

नई विचार क्रान्ति में व्यक्तित्वों का परिमार्जन प्रमुख है। इन दिनों निजी जीवन में व्यक्तिवादी संकीर्ण स्वार्थपरता का बोलबाला है। इसके स्थान पर प्रतिष्ठापना यह की जाती है कि मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। उसकी समाज निष्ठा अक्षुण्ण रहनी चाहिए। भले ही इसके लिए निजी लोभ, मोह और अहंकार को नियंत्रित अनुबंधित करना पड़े। नीर-क्षीर विवेक वाली दूरदर्शिता को प्रश्रय मिले, भले ही इसके लिए कितने ही पुराने प्रचलनों को ताक पर उठाकर रखना पड़ता हो। जन-जन को ऐसी रीति-नीति अपनाने के लिए बाधित किया जाय, जिससे मानवी गरिमा के साथ जुड़ी हुई सद्भाव सम्पन्न शालीनता के अनुरूप ही आचरण करते बन पड़ें। सहकार, शिष्टाचार एवं सज्जनता के उदार समावेश का हर कार्य में भली प्रकार सम्पुट हो।

इन दिनों मनुष्य की निजी आदतों से लेकर समाज, शासन व्यवसाय आदि में अवाँछनीयता के ऐसे तत्वों का असाधारण रूप से समावेश हो गया है जिन्हें नहीं ही पनना चाहिए था। आवश्यकता इसी सफाई की है। इसके लिए प्रतिभाशाली हर व्यक्तित्व को अपनी क्षमता के अनुरूप योगदान देना पड़ेगा। मनीषियों की लेखनी और वाणी को सशक्त अस्त्र–शस्त्रों की भूमिका निभानी चाहिए। वक्ता की वाणी इतनी मुखर होनी चाहिए कि उसकी यथार्थता मिश्रित ओजस्विता हर सुनने वाले को ध्यान देने और अनौचित्य से विरत होने के लिए बाधित कर सके। युग गायक सरसता की ऐसी स्वर लहरी निर्धारित कर सकता है जिससे उसके ऊपर लगा कामुकता भड़काने का कलंक धुल सके। धनिकों के लिए प्रायश्चित का ठीक यही समय है। व्यक्तिगत सम्पदा को शासकों से लेकर ईर्ष्यालुओं तक कोई भी सहन न करेगा। उसकी प्रधान प्रकृति भी दुर्व्यसनों अपव्ययों, विपत्तियों, विग्रहों के साथ विदा होने की है। अगले दिनों की उथल पुथल पर यह बिजली सबसे पहले संचित सम्पदा पर ही गिरेगी क्योंकि अनेकानेक समस्याओं, संकटों और विडम्बनाओं का प्रमुख कारण उसी लोभ, लिप्सा को माना जाता रहा है। अच्छा हो जिनके पास अनावश्यक संग्रह है, वे उसे युगधर्म की पुकार को सुनने समझने के उपरान्त उसी हेतु विसर्जित कर दें।

जन मानस को प्रभावित करने वाले और भी अनेक तंत्र है। इसमें प्रेस ने अपना मजबूत स्थान बना लिया है। अभिनय भी बल कौशल का प्रतीक प्रतिनिधि बनकर रह रहा है। जिनमें नेतृत्व कर सकने की प्रतिभा हो वे उन्हें अपनी विशिष्टता सिद्ध करने के लिए यश लोलुपता में खर्च न करें वरन् लोक मानस के साथ गुँथकर ऐसा प्रबल प्रयत्न करें कि बुद्ध, गाँधी, शंकर, दयानन्द, विवेकानन्द, विनोबा की तरह सही मार्गदर्शन की आवश्यकता पूरी कर सकें। इस संबंध में किसी को भी अपनी क्षमता कम करके नहीं आँकनी चाहिए। टिटहरी का समुद्र सुखाने का संकल्प अगस्त्य की सहायता से पूरा होकर रहा था। कार्लमार्क्स, लेनिन, रूसो जैसे विचारक किसी युनीवर्सिटी के प्राध्यापक नहीं थे। कबीर और रैदास जैसों ने यथार्थता के प्रतिपादन में इतना साहस दिखाया कि जमाने के सामने अकेले ही अड़ जाने की उनकी प्रतिज्ञा अन्त तक निभी रहीं। हजारी किसान ने नितान्त अनपढ़ होते हुए भी अपने संपर्क क्षेत्र में हजार आम्र उद्यान लगाने में सफलता पाई थी। धुन के धनी इतने शक्ति सम्पन्न होते हैं कि साधनों और सहयोगियों की परवाह न करते हुए भी वे अपनी नाव चलाते और उसमें बिठा कर अनेकों को पार करते हैं।

युगधर्म ने जिस एक आधार को प्रमुख घोषित किया है वह है “विचार क्रान्ति” जनमानस का परिष्कार। प्रचलनों में विवेक सम्मत निर्धारणों का समावेश। यह सब क्रिया परक कम और भावना प्रधान अधिक है। इसके लिए विचारणा से लेकर भावसंवेदनाओं की मानसिकता को झकझोरने से काम चल जायगा। दृष्टिकोणों में बदलाव आने पर प्रचलनों में उलट पुलट होकर रहेगा। जिस दिशा में प्रतिभाएँ समूचे मनोयोग के साथ बढ़ेगी, उस पर पीछे चलने वाले अनुयायियों की कमी रहने वाली है ही नहीं।

आँखों पर जिस रंग का चश्मा पहन लिया जाता है सभी वस्तुएँ उसी रंग की दिखाई पड़ती हैं। दर्पण में अपना ही चेहरा दीखता है। गुम्बद में अपनी ही आवाज गूँजती है। छाया अपने साथ-साथ ही चलती है। मनुष्य का विकसित व्यक्तित्व जब आदर्शवादी मार्ग पर चलने का संकल्प करता है तो उसकी शक्ति हजारों गुनी हो जाती है। सहयोगियों और साधनों की कमी नहीं रहती। आवश्यकता केवल एक है- अपनी मनस्वी सत्ता के जागरण की और उसको उत्कृष्टता के साथ जोड़ते हुए आदर्शवादिता के मार्ग पर धकेल देने की।


प्रभावोत्पादक समर्थता

आम शिकायत एक ही सुनी जाती है कि हम लोगों को सिद्धान्तवादी परामर्श देते हैं, पर वे ध्यान नहीं देते, स्वीकारते नहीं इस कान से सुनते, उस कान से निकाल देते हैं। प्रभाव नहीं पड़ता और जो कहा गया है, उस पर चलने के लिए कोई तैयार नहीं होता।

असफलता की यह शिकायत पूरी तरह सही है। यदि वह गलत रही होती तो जितने धर्मोपदेशक आज हैं, उससे पहले वाले दिनों में भी कम नहीं थे, उनने जमाने को बदल दिया होता। कभी देश में प्रधान सात ऋषि थे। कुछ उनके शिष्य भक्त भी होंगे और उनका व्यक्तिगत संपर्क भी काम करता होगा। पर वह सब नगण्य ही था। उनके निजी व्यक्तित्व इतने प्रभावशाली थे कि कहते हैं कि सातों ने सात द्वीपों में-समूचे संसार में धर्मधारणा की ऐसी हवा चलाई जिससे कोई भी प्रभावित हुए बिना न रहा। देश में साधु-ब्राह्मण सीमित संख्या में थे, पर वे स्थानीय समस्याओं के समाधान से लेकर बिखरे हुए देश के कोने-कोने में पहुँचते थे और उन्हें अनगढ़पन से छुड़ाकर कर्मठता एवं सद्भावना से अनुप्राणित करते थे। जब प्राचीनकाल में धर्मप्रचार के जादुई चमत्कार देखने को मिलते रहे है तो आज उस प्रक्रिया के विपरीत शिकायत करनी पड़े? इसके पीछे कोई बड़ा रहस्यमय कारण होना चाहिए। अन्यथा जो पहले पानी बरसाते थे और अब क्यों धूलि बरसाये और क्यों हर किसी को शिकायत का मौका दें।

यहाँ समझने योग्य बात एक ही है कि वरिष्ठ व्यक्तित्व ही सामान्य जनों को प्रभावित करते हैं। घटिया लोगों में इतनी क्षमता नहीं होती कि हर किसी को अपने कथन की प्रामाणिकता का विश्वास दिला सकें। जो उत्कृष्टता के पक्षधर परामर्श को अपनाने के लिए किसी को सहमत कर सके।

वक्ता ऊँचे मंच पर बैठा करते हैं और श्रवणकर्ता उनसे तनिक नीचे बैठे होने पर कही गई बात को आसानी से सुन लेते हैं। यदि वक्ता नीचे गड्ढे में बैठा हो तो ऊपर बैठे श्रवण कर्ताओं तक बात पहुँचाना कठिन होता है। प्रसंग जब आदर्शों को अपनाने का होता हे तो वक्ता को उसकी कसौटी पर हर दृष्टि से कसे जाने के उपरान्त सही सिद्ध होना चाहिए, अन्यथा कथन-प्रतिपादन हवा में उड़कर रह जायगा।

लोगों का भी अनुमान यही है कि आदर्शों की बात कहने-सुनने भर तक ही सीमित रखने योग्य हे। उसे व्यवहार में नहीं उतारा जा सकता। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण यह है कि यदि यह संभव रहा होता तो प्रतिपादन पर इतना जोर लगाने वाले पंडित उसे अपने निजी जीवन में अवश्य कार्यान्वित कर सके होते। लोग वक्तृता सुनने से कहीं अधिक दिलचस्पी इस बात में लेते हैं कि जो कहा जा रहा है उसे उपदेशक ने अपने निजी जीवन में किस हदतक अपनाया?

शिल्प विज्ञान, गणित, भाषा आदि कि अतिरिक्त जहाँ तक लोकशिक्षण का विषय है वहाँ आत्म परिष्कार और सृजन समाधान के प्रसंग प्रमुख हैं। देश, धर्म, समाज और संस्कृति का अभ्युदय इसी पर निर्भर है कि इससे सम्बन्धित व्यक्ति अपने व्यक्तित्व की गरिमा से संपर्क में आने वालों को उस विशिष्टता से प्रभावित करे जो आडंबर बनाने से नहीं वरन् भावना, श्रद्धा और जीवनचर्या के साथ जुड़ी हुई निष्ठा पर अवलम्बित है।

बुरे लोग यदि दबंग होते हैं तो साधारण स्तर के अनेक लोगों को अपने दुर्व्यसनों में सहयोगी बनाने के लिए घसीट लेते है। नशेबाजों की मण्डलियाँ बन जाती हैं। चोर लफंगे भी गिरोह बना लेते हैं। वेश्यावृत्ति जहाँ कहीं पैर जमाती है वहीं देखते देखते दायरा बढ़ा लेती है और चाण्डाल चौकड़ी का विस्तार कर लेती है। उद्दण्डता और अनाचारियों के साथी सहयोगी प्रायः बनते रहते हैं। इसका कारण मात्र यही नहीं है कि दुष्प्रवृत्तियों की ओर कुसंस्कारी मन सहज ही आकर्षित होता है। वरन् उससे भी बड़ा कारण यह है कि इस प्रकार के सूत्र संचालकों की कथनी और करनी में एकता होती है। भले ही वह बुरे स्तर की ही क्यों न हो? बिजली के दो तार मिलने पर ही करेन्ट चालू होता है। .... में प्रभाव तभी उत्पन्न होता है जब कहने वाला वैसा ही आचरण कर रहा हो, वैसे ही नियंत्रण अपने पर किये हो जैसा कि अन्यों के सामने उसने अपनी बात प्रस्तुत की है।

आदर्शों के उपदेशकों के लिए एक कड़ी परीक्षा यह है कि वह जिस स्तर पर लोगों को उठाना चाहता है, जैसा परिवर्तन औरों में कर दिखाना चाहता है उसका नमूना अपने को बना कर दिखाये। अन्यथा लोग यही मानते रहे हैं कि वह कथन निभा रहा होता तो उसे उपदेष्टा ने अपने जीवन में ही चरितार्थ करके क्यों न दिखाया होता। जब इतने जोर शोर से अन्यान्यों में बदलाव लाने की बात करता है और उसका महात्म्य फलितार्थ भी उच्च कोटि का बताता है तो उसे अपने आचरण में क्यों नहीं लाता? इस प्रश्न के उत्तर में दो ही बातें उभर कर आती हैं। एक तो यह कि कथन व्यावहारिक नहीं है। सुधार संभव नहीं है। आम लोग जो रीति-नीति अपनाए हुए हैं वही ठीक है। यदि सुधारवादी कथन ठीक है और उसका मार्गदर्शन करने वाले उपदेष्टा उसे स्वयं करने से कतराता है तो यह समझा जा सकता है कि कहने वाला ठग है। दूसरों को फुसलाने वालों से अपना सम्मान कराना चाहता है और स्वयं घटियापन अपनाकर उन लाभों को उठाना चाहता है जिन्हें स्वार्थपरायण लोग अपने ढंग से अपनाते और लाभ उठाते रहे हैं। यही वे सन्देह हैं जिनके कारण आदर्शवाद के उपदेशकों पर से जनसाधारण की निष्ठा उठती जाती है। उनकी वाणी का सम्मोहन ही पसन्द किया जाता है और मात्र उत्सव की शोभा के लिए उन्हें बुलाते हैं। मदारी और दर्शक दोनों ही अपने अपने ढंग से प्रसन्न हो लेते हैं पर उस शक्ति का उदय होता ही नहीं जो जन जीवन में उल्लास उत्पन्न करती है। अपने में बदलाव लाने पर साथियों का विरोध करती है और अन्य आदर्शवादियों की तरह लौकिक रूप से घाटे में भी रहती है। सिद्धान्तवादिता अपनाने पर तो उसकी वास्तविकता अवास्तविकता को हर पैमाने से नापा जाता है। यह गृहस्थियों, तपस्वियों, संत ब्राह्मणों और महामानवों का कार्य है। इस पर चलने वाले तक को निष्ठावान बनना पड़ता है, फिर उसका नेतृत्व मार्गदर्शन जो लोग करते हैं उनका निजी स्तर तो और भी ऊँचा होना चाहिए। वह न बन पड़े बेल पेड़ पर कैसे चढ़े उपदेश गले कैसे उतरे? उस कथन पर कोई ध्यान कैसे दे? उसे अपनाने पर ढर्रा बदलने वालों को जो अड़चने उठानी पड़ती हैं उन्हें क्यों और किस लिए उठायें? साँचे में खिलौने और पुर्जे ढाले जाते हैं। जहाँ ढाँचा ही टेढ़ा हो तो उसमें ढलने वाली वस्तु किस प्रकार सही बने? क्यों कर सही उतरे?

विचार क्रान्ति वकीलों जैसी दलीलें देने से संभव नहीं हो सकती है। उसमें तो अधिक से अधिक यह हो सकता है कि भ्रान्तियों का निवारण बन पड़े। किन्तु कुप्रचलन मात्र इसी कारण नहीं चल पड़े होते हैं। उनके पीछे व्यक्तिगत स्वार्थपरता, अहमन्यता, दूसरों के प्रति उपेक्षा जैसी दुष्ट मान्यताएँ भी छद्म रूप से काम कर रही होती हैं यदि उन पर अंकुश लगाते न बन पड़े तो तथा कथित सुधारक भी मुखौटे बदलते रहने वाले बहुरूपिये मात्र बन कर रह जाते हैं। देखा गया है कि बेटी का विवाह सामने होने पर सभी लोग दहेज विरोधी बनते हैं। पर जब बेटे के व्याह की बारी आती हैं तो प्रकट या गुप्त रूप से लाभ उठाने में चूकते नहीं है। यही कारण है कि “खर्चीली शादियाँ हमें दरिद्र और बेईमान बनाती है “ का उद्घोष करते तो अनेकों हैं, पर उसका पालन करने का समय आने पर वे उद्घोषकर्ता ही मुखौटे बदल लेते हैं और वह अति महत्वपूर्ण आन्दोलन मात्र प्रोपेगैंडा का उपहासास्पद विषय बन कर रह जाता है।

धर्मोपदेश देने वाले सच्चे अर्थों में पालन करें, तो कोई कारण नहीं कि अनुकरणकर्ताओं की कमी रहे। ऐसे अनेक सन्त हुए है जिनने अपने सशक्त प्रचार से लोगों को आन्दोलित ही नहीं उन प्रतिपादनों को कार्य रूप में परिणत करते हुए घाटा और संकट भी उठाया है। नानक, कबीर जैसे सन्तों की प्रामाणिकता और प्रखरता भावनाशीलों को असाधारण रूप से आन्दोलित करती और असंख्यों को ऐसे अनुयायी बनाती रही है जो कष्ट कठिनाइयों की कसौटियों पर भी लगातार खरे उतरते रहे।

मैले कपड़े को धोने के लिए अच्छा साबुन और साफ पानी चाहिए। कीचड़ से कीचड़ को धोया जा सकना संभव नहीं। काँच को तराशने के लिए हीरे की नोंक वाली कलम चाहिए। इससे कम में उसके टूटने का खतरा है। पानी की भाप बनाने के लिए उबलने जितनी गर्मी का तापमान चाहिए। सही साधनों से ही सही प्रयोजन सधते हैं। धारदार चाकू ही कड़ी चीजें काटने के काम आते हैं। ऊँचे उद्देश्यों की प्राप्ति और पूर्ति के लिए ऐसे व्यक्तित्व चाहिए जो वाणी या लेखनी से उपदेश देने की प्रक्रिया अपनाकर कर्तव्य की इतिश्री न मान लें। वरन् ऐसे प्रतिभाशाली चाहिए जो प्रयोग को अपने ऊपर करने के उपरान्त दूसरों को यह विश्वास दिला सकें कि उपदेष्टा की अपने प्रतिपादन पर कितनी गहरी निष्ठा है। इस प्रकार का विश्वास दिलाने के लिए अपने आप या चमचों द्वारा प्रशंसा के पुल बाँधना अपर्याप्त है क्योंकि लोगों का मन इन दिनों कम शंकाशील नहीं है। दूध का जला बिना फूँके छाछ को भी पीने के लिए तैयार नहीं। प्रभावित मात्र वे ही होते हैं जिनने निकट से किसी को जाना परखा है। इससे कम में कोई किसी पर इतना विश्वास नहीं कर सकता कि अपनी अभ्यस्त मान्यताओं को बदले और ऐसे राह अपनाये जिसमें अपने आप से तथा दूसरे सहकर्मियों के साथ झंझट मोल लिए बिना परिवर्तित दिशा में चल पड़ना संभव ही नहीं हो सकता।

प्रस्तुत कठिनाइयों से निबटने का निर्धारण लगभग सही स्तर का मिल गया है कि लोक मानस को भ्रान्तियों से उबारा और परिष्कार कर विवेकशीलता अपनाने के लिए तर्क, तथ्य, अनुभव और प्रमाणों के आधार पर सहमत किया जाय। यही विचार क्रान्ति हैं इसका दूसरा चरण है क्रियात्मक परिवर्तन। इसे दुष्प्रवृत्तियों का उन्मूलन और सत्प्रवृत्तियों का संवर्धन भी कह सकते हैं। प्रवाह को रोकने और उलटे को उलटने के लिए साहस भरा पुरुषार्थ चाहिए। प्रतिभा परिष्कार इसी का नाम है। इन दिनों यही दो चरण बढ़ाते हुए महाक्रान्ति का लक्ष्य पूरा करना संभव है। सतयुगी प्रचलन के लिए वातावरण बनाना इसी आधार पर बन पड़ेगा।

निर्णायक निर्धारण यह है कि इसके लिए जीवट के धनी प्राणवान् प्रतिभाओं का भावभरा समयदान चाहिए। दानों में सर्वोत्कृष्ट समयदान इसलिए माना गया है कि उसमें ईश्वर प्रदत्त समय, शरीरगत पुरुषार्थ का प्रत्यक्ष रूप श्रम और अन्तःकरण की भावसंवेदना का गहरा पुट रहने पर ही यह प्रक्रिया सशक्त रूप में बन पड़ती है। प्रभावी समयदान वही है जिसमें समय, श्रम और संकल्प का त्रिविध समन्वय परिपूर्ण रूप में हुआ हो। ऐसा समयदान ही युग परिवर्तन की महान प्रक्रिया सम्पन्न कर सकने में समर्थ हो सकता है।


प्रामाणिकता और प्रखरता ही सर्वत्र अभीष्ट

दार्शनिक उतार चढ़ावों के परिप्रेक्ष्य में श्रेय लक्ष्य तक पहुँचने के लिए कई सुझाव सुझाये और मार्ग बताये गये हैं। ईश्वर दर्शन, आत्मोद्धार, स्वर्ग-मुक्ति सिद्धि, देवाराधन से मनोकामनाओं की पूर्ति कर्मकाण्डों की चमत्कारी शक्ति, तीर्थ यात्रा की पुण्य परिणति आदि की चर्चाएँ भी होती रही हैं और प्रयोग अभ्यर्थनाएं भी। उनकी उपयोगिता अनुपयोगिता पर प्रकाश डालना यहाँ समीचीन न होगा। सामयिक विचार मंथन का निष्कर्ष एक ही है कि हम सब भ्रान्तियों के युग में रह रहे हैं और मानवी गरिमा के अनुरूप मर्यादा परिपालन में भटक गये हैं। सुधार इन दोनों का ही बन पड़े तो समझना चाहिए उस उपाय का अवलम्बन मिल गया जो युग समस्याओं का समाधान कर सकने में पूरी तरह समर्थ है।

भव बंधनों में बाँधने वाली तीन जंजीरें प्रख्यात हैं। उनका उल्लेख कहीं लोभ, मोह, अहंकार के रूप में किया गया है। कहीं इनकी गणना तृष्णा, वासना, और अहंता के साथ में कराई गई है। दोनों ही प्रतिपादन एक ही तथ्य को अलग अलग शब्दों में व्यक्त करते हैं। लालची को आवश्यक अनावश्यक धन बटोरने की ललक चढ़ी रहती है। इसके लिए वह अनाचार तक करता है और उसके प्रभाव से खिंचते चले आने वाले दुर्व्यसनों का शिकार बनता है। जिसमें लौकिक और परलौकिक दोनों ही स्तर के चित्र विचित्र अनर्थ खड़े होते हैं।

औसत नागरिक स्तर का निर्वाह किसी के लिए कठिन नहीं है। वह कुछ ही घंटों के परिश्रम से जुट जाता है और शेष समय का सदुपयोग पुण्य परमार्थ जैसे दिव्य प्रयोजनों में ही हो सकता है। इसी प्रकार दूसरा भव बंधन है- मोह। जिसका तात्पर्य है स्त्री बच्चों का आश्रित परिवार इतना बड़ा और भारी बना लेना जिसका भार वहन निरन्तर जुते रहने पर ही किसी प्रकार पूरा हो सके। ऐसे लोग मनोरंजन के रूप में ही कुछ परमार्थ कर सकते हैं। पति-पत्नी तभी एक और एक मिल कर ग्यारह बनते हैं जब वे उच्च उद्देश्यों के लिए एक दूसरे के सहयोगी बनते हैं। संतान के दायित्व नहीं के बराबर दीखते हैं। अन्यथा उनका निर्वाह और अमीर बनने का मंसूबा जीवन तत्व का सारा रस निचोड़ लेता हैं परिवार के अन्य सदस्यों की सेवा सहायता करने से विमुख होकर जब अपने निज के बच्चे बढ़ाते चलने का व्यामोह जंजीरों में पकड़ ले तब उसे मोह कहते है। वासना का प्रतिफल भी यह विषफल हैं। सन्तान रहित विवाहों में तो परमार्थ के लिए थोड़ी गुंजाइश भी रहती है। पर जब यह आकर्षण बढ़ता जाता है तो श्रम का नियोजन और मनोयोग उसी प्रयोजन में खप जाता है। यदि परिवार को स्वावलम्बी सुसंस्कारी भर बनाने तक का लक्ष्य सीमित रखा जाय, उस पर बड़प्पन थोपना अनिवार्य न समझा जाय तो विवाह बंधन नहीं बनता और न वह भार बन कर सिर पर लदता है। जहाँ एक मन और लक्ष्य के दो साथी मिल जायँ वहाँ एक और एक अक्षरों को समानान्तर रखने पर वे ग्यारह हो जाते हैं। यदि प्रतिकूल दृष्टिकोण हो तो एक में से एक घटा देने पर शून्य ही बचा रहता हैं जो भी हो जिस प्रकार लोक सेवियों के लिए निर्वाह व्यय में कटौती करना संभव है वहाँ यह भी उचित है कि परिवार के उद्यान में रहकर दायित्वों के निर्वाह की शिक्षा तो प्राप्त करें पर उसे हथकड़ी बेड़ी की तरह इतना कठोर न बना लें कि उसके अतिरिक्त और कुछ सोचना या करना ही न बन पड़े।

संग्रहित सम्पत्ति को बेचकर बैंक में डाल देने से भी उसका ब्याज पाने की कितने ही लोग व्यवस्था बना लेते हैं कि घर खर्च आसानी से चल सके। पूर्वकाल में घर में अन्य कमाऊ लोग परिवार का एक सदस्य परमार्थ के लिए समर्पित करके अपनी गौरव भी परम्परा चलाते रहते थे। सतयुग के ब्राह्मण परिवारों में से एक सदस्य परिव्राजक की तरह भ्रमण शील सेवा साधना में निरत रहता था। आज भी चिन्तन को थोड़ा झकझोरा जा सके तो वैसे पुनरावर्तन की व्यवस्था फिर नये सिरे से बन सकती है और रिटायर्ड व्यक्तियों, ब्रह्मचारियों, विधवाओं, विधुरों, परित्यक्ताओं का एक बड़ा समूह पारिवारिक लदान से लदा होने का बहाना ढूंढ़ने से बच सकता है। प्राचीनकाल में लोक सेवियों को विशेषतया चिन्तन और चरित्र के क्षेत्र में भाव परक उत्कृष्टता भरने वाले अध्यात्म प्रयास में निरत रहते देखा जाता था और देश की मान मर्यादा को उच्च शिखर पर बनाये रखने का श्रेय सम्पादित करता रहता था। इन दिनों आदर्शवादी आकाँक्षाओं में बुरी तरह गिरावट आई है। अपनी जीवनचर्या से दूसरों को कारगर प्रकाश दे सकने वाले प्राणवान ढूंढ़े नहीं मिलते। बकवादी तो पहले से भी अधिक बढ़ गये हैं जो कथनी और करनी में भारी अन्तर रहने के कारण गंदगी बखेरते और अश्रद्धा का वातावरण बनाते देखे जाते हैं।

तीसरा व्यवधान है - अहंकार। समान स्तर के सज्जन व्यक्ति को अपना आपा नम्रता से भरा पूरा रखना चाहिए और दूसरों के साथ व्यवहार वार्तालाप इस स्तर का करना चाहिए जिसमें आदर सम्मान की भावना छलकती हो। अच्छे संबंध बनाये रखने का, अपने को समीपता देने का, अवसर इसके बिना मिलता ही नहीं। अहंकारियों का अनाचरण ठीक इसका उलटा होता है। वे अपने बड़प्पन का ढिंढोरा पीटते हैं। चर्चा में भी प्रायः उसी का बखान करते हैं। दूसरों की कमियाँ बता कर अपने को उन सबसे श्रेष्ठ सिद्ध करने का प्रयास करते हैं। इसका परिणाम यह होता है कि जिससे भी संपर्क साधा गया है वह अपने को तिरस्कृत किया जा रहा अनुभव करता है और कहने वाले को अहंकार के दुर्गुण से घिरा हुआ मान लेता है। ऐसे लोग किसी का सच्चा स्नेह सम्मान भी नहीं पा सकते। उल्लू सीधा करने वाले चापलूसों के अतिरिक्त और कोई न तो सच्चा मित्र होता है और न आड़े समय में काम आता है। ऐसी दशा में उसके परामर्शों प्रतिपादनों में बहुत कुछ औचित्य होते हुए भी व्यक्तिगत संबंधों में गांठ पड़ जाने पर जो उचित है उसे भी स्वीकार करने में आना-कानी करता है। इसलिए अखबारों में नाम फोटो छपवाने के लिए अपने को कोई बड़ा पदाधिकारी के रूप में प्रस्तुत करने के लिए लालायित व्यक्ति ओछे समझे जाते हैं और असहयोग के भाजन बनते हैं। देखा गया है कि अच्छी संस्थाओं में भी उनके साथ महत्वाकाँक्षी बड़प्पन पाने के लिए लालायित लोग ही अनेकों विग्रह खड़े करते हैं। विद्वेष के बीज बोते, पार्टियाँ बनाते और अन्ततः उस संगठन को ही बरबाद कर देते हैं।

युग साधना के लिए अवकाश पाने के लिए लोभ, मोह और अहंकार को जितना अधिक घटाया जा सकेगा उतना ही स्तर इस योग्य बनता जायेगा कि लोग सच्चे मन से आदर भाव रखें और उनके द्वारा दिये गये परामर्श में अपना हित साधन समझें तथा स्वीकार करें।

इस समूचे प्रतिपादन का तात्पर्य एक ही है कि लोक सेवा के क्षेत्र में पदार्पण करने वाले को उपयुक्त बनाने से पूर्व अपने को उन दोष दुर्गुणों से निवृत्त कर लेना चाहिए जो सर्व साधारण तक के लिए अहितकर हैं। फिर जो पुरोहित स्तर का देवमानव बनना चाहता है उसके लिए तो यह किए प्रकार से अनिवार्य ही है कि मार्गदर्शक कहलाने से पूर्व उस मार्ग का स्वयं तो अभ्यास कर ही ले जिस पर चलने वाला अपेक्षाकृत अधिक ऊँचा उठता है।

इन दिनों सेवा क्षेत्र में करने योग्य तो अनेकानेक क्रिया-कलाप हैं। स्वास्थ्य, शिक्षा सम्पन्नता के लिए अभी बहुत कुछ किया जाना है। सुविधा संवर्धन के साधन जुटाना भी आवश्यकता है। पर सबसे अधिक महत्वपूर्ण यह है कि व्यक्ति उत्कृष्ट चिन्तन का अभ्यासी बनाने के साथ साथ अपनी समस्याओं का अपने बलबूते स्वयमेव हल खोज सके। अपने बलबूते स्वावलम्बी बन सके। स्थायित्व इसी में है। अन्यथा दूसरों के साधन अनुदानों का आसरा तकते तकते आन्तरिक दृष्टि से भी दीन हीन बन बैठेगा और देवताओं से लेकर श्रीमंतों शक्तिशालियों के सामने गिड़गिड़ा कर कुछ प्राप्त कर लेने की तरकीबें ढूँढ़ता रहेगा। दीनता हीनता की स्थिति अपना लेगा। स्वाभिमान और स्वावलम्बन की दृष्टि से यह अनुपयुक्त ही है।

गुण, कर्म, स्वभाव की उत्कृष्टता ही वास्तविक सशक्तता है। जिसके द्वारा व्यक्ति प्रामाणिक विश्वस्त एवं कर्तव्यपरायण समझा जाता है। जहाँ भी जाता है वहीं सम्मान पाता है और समर्थन-सहयोग का वातावरण सहज ही बनता दीख पड़ता है।

वानप्रस्थ में प्रवेश करने से पूर्व परमार्थ मार्ग पर चलने वालों को आरण्यक आश्रमों में रहकर आत्म साधना की तपश्चर्या करनी पड़ती है। साधु और ब्राह्मण भी कार्य क्षेत्र में उतरते हैं जब वे आत्म परिष्कार की कसौटी पर खरे सिद्ध हो पाते हैं। इस प्रकार की आध्यात्मिक सम्पदा में जहाँ ईश्वर भक्ति का, जप-तप का, विधान है वहाँ उससे भी पूर्व यम नियमों के दस अनुशासन पालन करते हुए इस स्तर की तैयारी करने का विधान है, जिसमें मानवोचित सामान्य गुणों से आग बढ़ कर देवोपम पद ता जा पहुँचने का निर्धारण है। ऐसे लोगों को लोभ, मोह की लिप्सा-लालसा में कटौती करके सेवा साधना के उपयुक्त निरहंकारिता को स्वभाव के हर कण में सम्मिलित करना चाहिए। अहंकारी यश लोलुप और अपना वर्चस्व बढ़ाते रहने के लिए लालायित व्यक्ति सेवा साधना के उस उच्च पद के अधिकारी ही बने रहते हैं। जिन्हें अनायास ही सर्व साधारण का विश्वास और सहयोग प्राप्त होते रहना चाहिए।

इक्कीसवीं सदी के अवतरण में भगीरथ जैसे तपस्वी व्यक्तियों की आवश्यकता है। ऐसे तपस्वी जो मानवी सद्गुणों अभ्यास करने के उपरान्त देवोपम विशेषता के क्षेत्र में प्रवेश पा चुका हो। जो दूसरों के अवगुणों पर जीत पा लेता है, वह ‘वीर’ कहलाता है पर इससे भी अगली श्रेणी का ‘महावीर’ वह है जिसने अपने आप को जीत लिया। ऐसे महामानव ही हनुमान स्तर के रीति नीति अपनाने और आदर्शों के समुच्चय भगवान के प्रति सर्वतोभावेन समर्पित रह कर जन जन की श्रद्धा के भाजन बनते हैं। दैवी अनुग्रह तो उन पर अजस्र रूप से बरसता ही है। यह धारणा ठीक है कि अपना पुरुषार्थ भी कम न था, पर उसे सफल बनाने के लिए अदृश्य लोक से जितने अनुदान बरसे उनका महत्व भी कम करके नहीं आँका जा सकता।

खरे सोने की ही पूरी कीमत उठती है भले ही उसे स्वर्ण विक्रेता की दुकान पर क्यों न ले जाया जाय। खोटे सिक्के पर जगह दुत्कारे जाते हैं, उनकी असलियत तो अंधा भिखारी भी अनुमान लगाने भर से जान लेता है। बड़े कामों के लिए बड़ी हस्तियाँ ही अभीष्ट होती हैं। इक्कीसवीं सदी के साथ एक से एक बढ़ कर वजनदार और महत्वपूर्ण कार्य जुड़े हुए हैं। उन्हें सम्पन्न करने के लिए मनोबल के धनी और चरित्र बल में मूर्धन्य स्तर के व्यक्ति ही चाहिए। तलाश उन्हीं की हो रही है। प्रतिभा परिष्कार का अभियान इसी दृष्टि से चलाया जा रहा है उस परिष्कार से तप कर निकले हुए व्यक्ति न केवल अपने में अग्रगामी वरिष्ठ जनों में गिने जाने योग्य बनेंगे, वरन दूसरों को ऊँचा उठाने, आगे बढ़ाने, में भी अपनी विशिष्टता का परिचय दे सकेंगे। अगले दिनों ऐसे ही बहुमूल्य मणि मुक्तकों की आवश्यकता पड़ेगी। उनकी ढूँढ़ खोज करने के प्रयास इन्हीं दिनों अति तीव्र किये जाने की आवश्यकता है।


समय का एक बड़ा अंश नवसृजन में लगे।

अति महत्वपूर्ण सामर्थ्यों की इस दुनिया में कमी नहीं पर विधि की कुछ ऐसी विडम्बना है कि वे प्रायः प्रसुप्त स्थिति में उनींदी पड़ी रहती हैं। प्राणि समुदाय का निर्वाहक्रम किसी प्रकार चलता रहे उतना ही पक्ष क्रियाशील रहता है। यदि उस अति शक्तिमान उद्देश्य को क्रियान्वित करना हो तो उसके विशिष्ट जनों को विशेष प्रयत्न करना पड़ता है, अन्यथा इतना ही कुछ दृश्यमान होता है जिससे समय चक्र किसी प्रकार अपनी धुरी पर लुढ़कता रहे, ढर्रा किसी प्रकार चलता रहे।

समुद्र में विपुल सम्पदा अनादि काल से छिपी पड़ी थी। उसका किसी को पता तक न था पर जब प्रजापति के परामर्श से देव-दानवों ने मिलजुल कर प्रयत्न-पुरुषार्थ किया तो वे चौदह रत्न निकले जिनके कारण धरती से लेकर स्वर्गलोक तक में चमत्कारी सम्पदाओं का बाहुल्य उभर पड़ा। विष्णु क्षीरसागर में लम्बी चादर तान कर अपनी विभूति लक्ष्मी के साथ सदा सोते ही रहते हैं। आड़े समय में आवश्यकता पड़ने पर ऋषियों की गुहार और देवताओं की जुहार ही उन्हें जगाती है और अड़े हुए अवरोध उनसे दूर करती है। ऐसी पौराणिक मान्यता चली आयी है। समय-समय पर अवतारों का प्रकटीकरण इसी आधार पर हुआ है। ब्रह्मा के कमंडलु में तैरती छोटी सी मछली जब मन्त्रशक्ति से तिलमिलाई गई तो मत्स्यावतार बनकर समूचे समुद्र में छा गई। देवता प्रायः चतुर्मास के चार महीनों में सोते रहते हैं तथा देवोत्थान एकादशी को जब सक्रिय जन कोलाहल मचाते हैं तो देवता भी उनका साथ देने और सहयोग के लिए चल पड़ते हैं। सूर्य तक के बारे में कहा जाता है कि मुर्गा बाँग लगाकर उन्हें जगाता है। प्रभातकालीन ब्रह्ममुहूर्त उन्हें बिस्तर छोड़ने के लिए विवश करता है। शंकर की समाधि भी सदैव लगी रहती है। तपस्वी जन ही अपने प्रचंड पुरुषार्थ से उन्हें आँख खोलने पर सहमत करते हैं। उन्हें हरकत में लाने के लिए तो कामदेव तक कमर कस कर क्षुभित करने में सफल हो गया था। सड़ी गली प्रकृति को विश्राम देने और उसकी नये सिरे से संरचना करने के लिए शिव ताँडव की ही भूमिका अभीष्ट उद्देश्य पूरा करती है। देवता तो देवता, दैत्य तक अपने आलस्य के लिए प्रसिद्ध हैं। कुम्भकरण, रावण से अधिक बली और विशाल था पर वह इस आदत से लाचार था कि छै महीने सोव और मात्र एक दिन के लिए जगे। जब जगता था तब कहर ढाता था। यदि वह वर्ष भर जगता रहता तो न जाने क्या कहर ढाता।

इन दिनों करने योग्य एक ही काम है-‘‘जन जागरण’’ सोया हुआ मनुष्य अर्द्धमृत जैसी स्थिति में पड़ा रहता है पर जब जगकर कार्यरत होता है तो विशालकाय जलयानों को चलाता और वायुयानों को उड़ाता दीखता है। प्रकृति की अदृश्य क्षमता को और नियति की महती संभावना मात्र उसके आह्वान की प्रतीक्षा करती रहती है। पुकारा जाय तो वे गंगा की तरह स्वर्ग से धरती पर दौड़ी दौड़ी आने के लिए सुर्त फुर्त तैयार हो जाती हैं।

अवाँछनीयता की जकड़न और प्रगति की तड़पन अनुभव तो सभी करते हैं, पर गाड़ी यहीं अड़ जाती है कि दैवी गरिमा की प्रतीक प्रतिनिधि मानवी क्षमता को जगाने के लिए तैयारियाँ कहीं होती नहीं दीखतीं। यदि नारद जैसे कुछ ही लोग जागृत गान गाने में निरत रहे होते तो मानवी पराक्रम और दैवी अनुग्रह का सुयोग सहज ही बन जाता और परिवर्तन भरा ऐसा वातावरण उद्भूत होता जिसे युग परिवर्तन का कायाकल्प हुआ समझा जाता।

युग परिवर्तन की योजना भले ही अदृश्य सत्ता की हो, पर उसे क्रिया रूप में परिणत करने के लिए तो मनुष्य को ही आगे आना पड़ेगा। यहाँ मनुष्य शब्द से अर्थ-प्रतिभावानों का है। अग्निकाण्ड, बाढ़, महामारी, दुर्भिक्ष, दुर्घटना जैसे आपत्तिकाल सामने होने पर कोई भावनाशील निष्क्रिय बैठा ही नहीं सकता, उसे अपनी सामर्थ्य भर निवारक उपाय अपनाने के लिए बाधित होना ही पड़ेगा। इसके बिना अन्तरात्मा ऐसी बुरी तरह कचोटने लगेगी कि पलभर बैठ सकना दुर्लभ हो जायगा। यह हो भी रहा है। यही होने भी जा रहा है।

युगधर्म है- जनजागरण के लिए प्रचण्ड पुरुषार्थ में जुट पड़ना। यही होने भी जा रहा है। प्रतिभाएँ अग्रिम मोर्चे पर एकत्रित हो रही हैं और व्यापक जन जागरण की क्रमबद्ध सुव्यवस्थित योजना बना रही हैं। विकृत चिन्तन आगे भी इसी स्थिति में नहीं रहेगा।

विचार परिवर्तन यदि- ब्रेन वाशिंग स्तर का करना हो और उसकी परिधि संसार भर में बसने वाले 600 करोड़ व्यक्तियों तक सुविस्तृत करनी हो, तो उसके लिए बड़े कदम उठाने होंगे और उस कार्य में रीछ-वानरों की तरह हर छोटे बड़े का अपने-अपने ढंग का योगदान होगा।

विचार परिष्कार के लिए लेखनी और वाणी के दृश्य और श्रव्य स्तर के सभी माध्यमों का उपयोग करना होगा। इस संदर्भ में युग साहित्य से जन-जन को अवगत कराने की आवश्यकता पड़ेगी। कार्ल मार्क्स, रूसो, हेरियट स्टो जैसों की क्रान्तिकारी लेखनी का चमत्कार और परिणाम अनेकों ने देखा है। तीन चौथाई दुनिया को उस प्रतिपादन ने अपनी प्रभाव परिधि में ले लिया है।

युग साहित्य को झोला पुस्तकालयों और ज्ञानरथों के माध्यम से घर बैठे बिना शुल्क हर शिक्षित तक पहुँचाने का प्रयत्न किया जा रहा है। साथ ही अनुबंध भी जोड़कर रखा गया है कि बिना पढ़ो को उसे सुनाते रहा जाय। यह कार्य प्रधान रूप से अभी हिन्दी भाषी क्षेत्रों में सम्पन्न हुआ है। अगले ही दिनों उसे देश की-विश्व की समस्त भाषाओं में समुद्री ज्वार-भाटे की तरह फैलता और कुहराम मचाते देखा जायगा।

श्रव्य प्रयोजनों के लिए बिना खर्च वाले दीपयज्ञों की इतनी विशाल योजना चल पड़ी है कि गाँव गाँव इस माध्यम से युग चेतना का आलोक वितरण का सिलसिला द्रुतगति से चलता रहेगा। विचारशील वर्ग की अतिरिक्त गोष्ठियों का क्रम भी चल पड़ा है जिसके आधार पर समझदारी, ईमानदारी, जिम्मेदारी और बहादुरी जीवन में उतार कर दिखाने के लिए हर जाग्रत आत्मा का प्राण हलसने लगे।

टैपरिकार्ड माध्यम से उद्बोधनों और संगीतों को घर-घर पहुँचाने की योजना बन रही हे। अभिनय भरे संगीत के आयोजन का सरल माध्यम नये रूप में अपनाया गया है। बन पड़ा तो इसके लिए वीडियो, स्लाइड प्रोजेक्टरों का ऐसा उपक्रम अपनाया जायगा जो देश की गरीब जनता तक अपनी पहुँच को बहुत आगे तक ले जा सके।

सूर्य पूर्व से उदय होता है। इतिहास साक्षी है कि भारत ने ही समय-समय पर विश्व का प्रगतिशील मार्गदर्शन किया है। इस बार भी बारी उस की है न केवल भारतवासी नवयुग की विचार धारा से अनुप्राणित होंगे, वरन भाषायी समस्या के अनुरूप यदि प्रबन्ध बन पड़ा तो संसार भर की प्रतिभाओं को आगे आना होगा एवं परिवर्तन कर अपने अपने ढंग से अपना-अपना योगदान प्रस्तुत करते देखा जा सकेगा।

प्रचार प्रक्रिया के साथ लोकसेवा का गहरा पुट लगा होना आवश्यक है। ईसाई मिशन इसी रीति-नीति को अपना कर प्रायः एक सहस्त्राब्दी से कम में आधी दुनिया को अपना मतावलम्बी बना चुके हैं। युग निर्माण की जन जागरण योजना के दो विधेयात्मक और दो निषेधात्मक कार्यक्रम प्राथमिकता के स्तर पर हाथ में लिए गये हैं।

जिनमें से एक है-हर शिक्षित द्वारा न्यूनतम दो अशिक्षितों को शिक्षित बनाया जाय। इससे

*समाप्त*