अगले दिनों अखण्ड ज्योति की पाठ्य सामग्री!

इक्कीसवीं सदी का गंगावतरण एक सुनिश्चित तथ्य है। इसमें भागीदारी लेने के श्रेय से किसी भी प्रज्ञा परिजन को चूकना न चाहिए। इस ऐतिहासिक और अविस्मरणीय विशेष अवसर पर अखण्ड ज्योति के सदस्यों और अनुपाठकों को अपनी-अपनी मनःस्थिति और परिस्थिति के अनुसार रीछ, वानरों, ग्वाल-बालों, बौद्ध परिव्राजकों, सत्याग्रहियों का अनुकरणीय आदर्श मानते हुए किसी-न-किसी रूप में सहभागी बनना ही चाहिए। सर्वथा उपेक्षा अपनाना और जिस-तिस कारण की आड़ में मूकदर्शक बने रहना घाटे का सौदा ही रहेगा।

भविष्य का स्वरूप क्या बनने जा रहा है और उसके अनुरूप अपना चिंतन और व्यवहार बदलने की किस प्रकार तैयारी करनी चाहिए, इस संदर्भ में आगे से अब अखण्ड ज्योति के पृष्ठों पर विशेष पाठ्य-सामग्री रहा करेगी। संसार भर की मूर्धन्य प्रतिभाएँ इस संबंध में क्या सोचती और क्या परामर्श देती हैं, इसका अति महत्त्वपूर्ण सामयिक संकलन अखण्ड ज्योति के पृष्ठों पर ही मिल सकेगा।

प्रस्तुत विधा को फ्यूचरोलॉजी नाम से जाना जाता है। भविष्य के संबंध में वैज्ञानिकों-मनीषियों-नेतृत्ववेत्ताओं ने भी चिंतन किया है तथा समय-समय पर उनके अधिवेशन भी होते रहे हैं। प्रस्तुत किए गए शोधपत्रों, इस विधा से संबंधित विभिन्न विशेषज्ञों द्वारा लिखित पुस्तकों को न केवल शान्तिकुञ्ज में एकत्र किया गया है, वरन पत्र व्यवहार द्वारा उनसे संपर्क स्थापितकर यह जानने का प्रयास किया जा रहा है कि आज की परिस्थितियों व मानवी पराक्रम की भावी संभावनाओँ को देखते हुए भविष्य की, नवयुग की संरचना किस प्रकार संभव है? यह एक ऐसा विषय है, जिसे अभी तक आँकड़ों व वैज्ञानिक तथ्यों की भाषा में ही समझाया जाता रहा है, किंतु अखण्ड ज्योति के पाठक अध्यात्मपरक विवेचन, जो भविष्य विज्ञान से संबंधित हैं, आगामी माह की पत्रिका से इन पृष्ठों पर पढ़ते रह सकेंगे। जेनेटिक्स, माॅलीक्यूलर, बायोलॉजी, इलेक्ट्रोफिजियोलाॅजी, एस्ट्रोफिजिक्स, बायोमेट्रालाॅजी, काॅस्मोलाॅजी, बाॅयोकेमिस्ट्री, न्यूरोएंडोक्राइनालाॅजी, एंथ्रापोलाॅजी, आल्टरनेटिव सिस्टम आफ मेडीसिन, न्यूरोसाइकिस्ट्री आदि विधाओं के विशेषज्ञ आज के मानव को, भविष्य को, किस रूप में विनिर्मित करने की कल्पना कर रहे हैं, यह तथ्यपरक, रोचक सामग्री अखण्ड ज्योति में सार-संक्षेप में पाठकगण पा सकेंगे।

अखण्ड ज्योति के प्रकाशन के आरंभिक वर्ष में अब तक जो परिश्रम नहीं किया गया, वह अब इन्हीं दिनों छः माह की अवधि में ही किया गया है। निश्चित ही इससे पत्रिका की रोचकता बढ़ेगी, नवयुग की आधारशिला रखने के प्रयासों को मूर्त्तरूप भी दिया जा सकेगा। अन्यत्र ढूँढने में कदाचित ही कोई खोजी पाठक एक स्थान पर ऐसी सामग्री पाने में सफल हो सकेगा। संचालक मंडल ने इस स्तर की सामग्री एकत्रित करने में अपने नए सूत्र, नए आधार विशेष रूप से संजोए हैं एवं विश्वभर से संपर्क-सूत्र स्थापित किए हैं।

दूसरा महत्त्वपूर्ण प्रसंग जो इस पत्रिका में वरीयता पाने जा रहा है— वह है, अनुकरणीय आदर्शनिष्ठ जीवन-चरित्रों का प्रस्तुतीकरण, मनुष्य स्वभाव से अनुकरणप्रिय है। प्राचीनकाल में आदर्शवादी और परमार्थपरायणों की सत्ता-महत्ता और कार्यपद्धति अपने संपर्क-क्षेत्र में ही प्रचुर परिमाण में देखने को मिल जाती थी, इसलिए सर्वसाधारण को उनको अपनाने में कोई कठिनाई नहीं पड़ती थी। सतयुगी वातावरण इसी आधार पर विनिर्मित हुआ था। भारतभूमि 'स्वर्गादपि गरीयसी'  इसी आधार पर बन सकी थी। यहाँ के निवासी संसार में इसी प्रक्रिया को अपनाने के कारण देवमानव बन सके थे।

आज आदर्शवादियों के उदाहरण सामने न रहने के कारण एक प्रकार से मानवी गरिमा पर ग्रहण ही लग गया है। इस सामयिक कठिनाई का समाधान इस प्रकार ढूँढा गया है कि पिछले दिनों भारत में या संसार में अन्यत्र कहीं भी आदर्शवाद के क्षेत्र में बढ़-चढ़कर पुरुषार्थ करने वालों के जीवन-वृतांत और संस्मरण ढूँढ निकाले जाएँ और इन्हें अखण्ड ज्योति के पृष्ठों पर निरंतर प्रस्तुत किया जाता रहे। यों वर्त्तमान का अपना महत्त्व है, पर भूतकाल की प्रेरणाएँ भी ऐसी नहीं है, जिनका भावभरा स्मरण करने पर अंतराल में उस दिव्य धारा को अपनाने की उमंग-तरंग न उठे। गांधी जी बचपन में देखे हरिश्चंद्र नाटक से ही सत्यनिष्ठ होने को संकल्पित हो गए थे।

इन संस्मरणों के प्रस्तुतीकरण के संबंध में एक और भी अनुबंध अपनाया गया है, कि जिन संस्मरणों को उभारा जाए, वे ऐसी दिशा लिए हों, जो आज की परिस्थितियों में सामयिक कहलाएँ। इतिहास में राजा-रानियों की, मार-काट करने वाले योद्धाओं की कथा-गाथाओं का ही बाहुल्य है, या फिर मोरध्वज, शिवि जैसे अतिवादियों का उल्लेख। अखण्ड ज्योति के नए निर्धारण में उन घटनाओं का ही संकलन किया जाएगा, जिनमें आज की परिस्थिति में जो किया जाना आवश्यक है, उसी को प्रधान रूप में प्रस्तुत किया जा सकें। इसे युगधर्म का पृष्ठ-पोषण करने वाली सामग्री भी कहा जा सकेगा।

उपरोक्त दोनों विषय इस पत्रिका की पाठ्य-सामग्री में विशेष रूप से प्रतिष्ठित होते रहेंगे। इसके अतिरिक्त अध्यात्म दर्शन का व्यावहारिक विवेचन, साधना-प्रक्रिया का तत्त्व दर्शन, प्रकृति की विलक्षणताओं की आध्यात्मिक विवेचना जैसे विषय तो रहेंगे ही। इन सब के प्रभाव से यह होने की आशा है कि सामयिक उज्ज्वल भविष्य की संरचना में अपनी आज की भूमिका के संबंध में किसी उपयोगी निष्कर्ष पर पहुँचा जा सके।

इस अनोखे ढंग के प्रस्तुतीकरण में संपादन-तंत्र पर कितना अधिक भार पड़ेगा और उसका परिणाम कितने अधिक दूरगामी सत्परिणाम उत्पन्न करने वाला सिद्ध होगा, इसका अनुमान जो लगा सकें, उन भावनाशीलों से अनुरोध है कि अखण्ड ज्योति का प्रवाह-क्षेत्र बढ़ाने में अपना साधारण स्तर का नहीं, वरन असाधारण समझी जा सकने योग्य भूमिका संपन्न करने में जुटें।


आतंक में स्थिरता कहाँ है?

क्रिया की प्रतिक्रिया होने में देर तो लग सकती है, पर ऐसा नहीं समझना चाहिए कि यहाँ 'अंधेर नगरी बेबूझ राजा' का शासन चलता हैं, इसलिए एक सार्थक उक्ति प्रचलित है कि 'देर है अंधेर नहीं।' कुमार्ग पर कदम बढ़ाने वाले आज नहीं तो कल ठोकर खाए बिना नहीं रहते। कुकर्म और कुछ नहीं, मात्र कुविचारों की ही परिणति है। शरीर का अधिष्ठाता मन है। उसी क्षेत्र में आकांक्षाएँ उठती और नीतियाँ निर्धारित होती हैं। योजना भी इसी दफ्तर में बनती हैं और उसे कार्यान्वित करने के आदेश भी यहीं से निस्सृत होते हैं।

इन दिनों प्रचलनों के उलट जाने के कारण स्थिति कुछ ऐसी बन पड़ी है कि मानसिक अवांछनीयता भी स्वाभाविक जैसी लगने लगी है। वन्य प्रदेशों में रहने वाले यायावर कबीले भी अपने लोगों के बीच बढ़-चढ़कर बातें करते और अपनी-अपनी श्रेष्ठता बघारते हैं, पर सभ्य समाज के लोग उनकी वास्तविकता को समझते और वनविहार करते समय सुरक्षात्मक सावधानी बरतते हैं। अचिंत्य चिंतन से ग्रसित लोगों को भी एक प्रकार से कबाइली ही समझा जाना चाहिए और इन्हें सभ्य बनाने का प्रयास न बन पड़ता दिखे, तो कम-से-कम इतना तो करना ही चाहिए कि उनकी उच्छृंखलता उभरकर अनर्थ न रचने पाए, इस संबंध में सतर्कता बरती जाए। अनपढ़ लोग भी अविकसित बालकों की तरह होते हैं, जो उचित-अनुचित का सही निर्णय नहीं कर पाते और अक्सर ऐसी भूलें कर बैठते हैं, जिनसे उनके स्वयं का और दूसरों का अनर्थ ही होता है। बड़ी आयु हो जाने पर भी सभ्य स्तर की विचारशीलता न अपना सकने वालों की स्थिति भी ऐसी ही समझनी चाहिए। वे जितना कुछ सृजन-उत्पादन कर पाते हैं, उसकी तुलना में उत्पन्न की गई हानियाँ कहीं अधिक होती हैं।

यह सृष्टि एक व्यवस्था के अंतर्गत चल रही है। हर किसी को अपनी मर्यादा के अंतर्गत रहने में ही भलाई है, अन्यथा अनौचित्य बरतने वालों की खबर विश्व-व्यवस्था के नियंता लेते हैं और उनके लिए ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न कर देते हैं, जिसके लिए किसी को अनाचार-प्रक्रिया नियमित रूप से जारी रख सकने का अवसर न मिले। यदि ऐसा न होता तो दुष्ट-दुरात्माओं ने अब तक सभी शांतिप्रिय लोगों को मटियामेट बनाकर रख दिया होता।

कुविचार ही प्रकारांतर से कुकर्म है और कुकर्मों की परिणति निश्चित रूप से विपत्ति एवं विक्षोभ की स्थिति पैदा किए बिना रहती नहीं। अनाचार से उत्पन्न प्रतिक्रिया कष्टकारी ही होती है, इस शाश्वत नियम को झुठलाया नहीं जा सकता। ठगों, धूर्त्तों, प्रपंचियों, अनाचारियोँ, दस्युओं, तस्करों के समुदाय समय-समय पर उभरते रहे हैं। उनने अपने-अपने समय में रोमांचकारी अनर्थ पैदा किए हैं। इतने पर भी सृष्टि के नियतिक्रम पर दृष्टि डाली जाए तो पता चलता है कि उद्दंडता का आवेश देर तक टिक नहीं सका। प्रकृति ने अपने ढंग से कुछ ही समय में उसे ठिकाने लगा दिया। रावण, वृत्रासुर, भस्मासुर, हिरण्यकश्यप, कंस, जरासंध जैसे अनाचारियों की तात्कालीन समर्थता और साधनसंपन्नता को देखते हुए ऐसा भी अनुमान लगाया गया था कि उन्हें परास्त करना कदाचित— कभी किसी के लिए संभव न होगा, पर वह आशंका सही सिद्ध नहीं हुई। सृष्टि-व्यवस्था ने ऐसे कानून बना दिए कि आततायियों को अपनी मौत मरना पड़ा और वह भी ऐसे आश्चर्यजनक ढंग से, जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती।

रावण का त्रैलोक्यविजयी पराक्रम, स्वर्णखचित दुर्ग और लंकावासियों का सहयोग-समर्थन देखते हुए यह अनुमान लगा सकना कठिन था कि इतने विशालतम सरंजाम को रीछ-वानरों की एक छोटी-सी टुकड़ी बिस्मार करके रख देगी। पैदल चलने वाले दो तपस्वी बालक इतने समर्थ समुदाय को धराशाई करके दिखा देंगे। हिरण्यकश्यप को वरदान था कि वह दिन में, रात में, खुले में, बंद में, मनुष्य से, पशु से, मारा न जा सकेगा, पर विधाता की व्यवस्था का परिणाम ये निकला कि किसी नृसिंह वेशधारी का अद्भुत प्राकट्य हुआ और उसने उस महाबली का नखों से पेट फाड़कर अंत कर दिया। बलिष्ठता की असीम परिधि भी उसकी रक्षा कर सकने में समर्थ न हो सकी। किसी समय मधु-कैटभ, महिषासुर, शुंभ-निशुंभ की तूती बोलती थी और उन्हें निरस्त किए जाने की संभावना किसी ओर से भी दिखाई नहीं पड़ती थी, फिर भी एक आश्चर्य हुआ कि देवताओं की संघशक्ति महाकाली के रूप में प्रकट हुई और उसने उस भयावह परिकर को देखते-देखते समाप्त करके रख दिया।

पिछली शताब्दियों में तैमूर लंग, सिकंदर, चंगेज खाँ, नादिर शाह, हिटलर, मुसोलिनी आदि का आतंक ऐसा रहा है कि उनका स्मरण करने वालों तक में रोमांच हो आते हैं। विश्वविजय की उनकी योजना अपने समय में ऐसी ही लगती थी कि वे उपलब्ध साधनों के बल पर जो कुछ चाहते हैं, वही करके रहेंगे, पर परिस्थितियाँ आश्चर्यजनक ढंग से बदलीं और विश्वविजेता बनने का सपना संजोकर चलने वाले सृष्टि-व्यवस्था के सामने टिक न सके। ऐसे कारण उभरे, ऐसा माहौल बना कि जो कुछ नियोजित था, वह सब कुछ उलट गया और आतंकवाद को इस प्रकार भागना पड़ा, मानो उसे ऐसी ही किसी और भी समर्थ सत्ता ने पूर्व से ही नियोजित करके रखा था। विश्व-व्यवस्था के सूत्र-संचालन करने वाली सत्ता में इतनी सामर्थ्य है कि किसी भी छोटी-बड़ी अवांछनीयता के विरुद्ध वह ऐसी परिस्थितियाँ खड़ी कर दे कि विनाश को हार माननी पड़े और विकास अपनी निर्धारित सृजन-प्रक्रिया के निमित्त मंथर या द्रुतगति से आगे बढ़ सके।

नियति की सारी व्यवस्था यही बताती है कि स्रष्टा का मन और नियोजन यही है कि संसार में सौम्य, सदाशयता बनी रहे— बढ़े और फले-फूले। बीच-बीच में चुनौतियोँ की तरह उद्दंडता भी उभरनी तो आवश्यक है, ताकि सौम्य तत्त्वों को असंभावित उपेक्षा जैसी विसंगतियों से बचाया जा सके। इसी आधार पर लंबे समय से यह विश्व-व्यवस्था अपनी समर्थता और सुस्थिरता का परिचय देती रही है। अन्यथा वज्रपात, उल्कापात जैसे अनर्थ मिल-जुलकर इस विश्ववैभव को कब का समाप्त कर चुके होते। भूकंपों, ज्वालामुखियों, बाढ़, सूखा, दुर्भिक्ष, महामारी आदि विभीषिकाएँ इस धरती पर से जीवन का अस्तित्व मिटा देने में ही सफल हो गई होती। उद्दंडों ने विनाश तो बहुत किया है। समय-समय पर उनने अपने उभार से यह आतंक भी प्रस्तुत किया है कि जो श्रेष्ठ एवं शाश्वत है, उसे अधिक दिन स्थित न रहने दिया जाएगा, किंतु वह आशंका सदा निर्मूल ही होती रही है।

चूहों की, खरगोशों की, सूकरों की जन्मदर जितनी तेजी से बढ़ती है, उसे देखकर गणितज्ञों के सिर चकराने लगते हैं। वह सोचते हैं की यही क्रम निर्बाध गति से चलता रहे, तो यह अवांछनीय उत्पादन कुछ ही वर्षों में समूची धरती को घेर लेगा, अन्य किसी प्राणी को रहने की गुंजाइश ही न रहेगी; परंतु मनुष्य के गणित से स्रष्टा का अंकगणित, रेखागणित, बीजगणित भिन्न है। वह अतिवादियों पर नियंत्रण रखने के लिए अपने अंकुश को धारदार बनाए रहता है और सुखी मात्र वही रहता है, जो सृष्टी की सुस्थिरता में सहायक एवं सौम्य सृजन की सुव्यवस्था करने में संलग्न होता है।


सद्वाक्य

उच्च विचार सेना से अधिक बलवान है। जिसके पास सिद्धांतों की शक्ति है, वह कहीं भी हारता नहीं।


उत्कृष्टता का अभिनव उद्भव

एकता और समता नए युग का, नए विश्व का नया लक्ष्य है। यों सर्वत्र विषमता का इन दिनों बोलबाला है। गरीबों-अमीरों की, शिक्षित-अशिक्षितों की, समर्थ-असमर्थों की, नर और नारियों की, दुर्बल और सशक्तों की, शोषक-शोषितों की बिरादरियाँ स्पष्ट रूप से बढ़ी देखी जा सकती हैं और उनके बीच पाया जाने वाला अंतर इतना बड़ा प्रतीत होता है कि एक को खाई और दूसरे को टीले की उपमा दी जा सके। यह खाइयाँ किस प्रकार पटेंगी और हर क्षेत्र में फैली हुई विषमताएँ किस प्रकार मिटेंगी, यह समझना साधारण बुद्धि के लिए कठिन हो जाता है।

असमंजस इस बात का है कि मनुष्य की संकल्पशक्ति, उत्कंठा और तत्परता अभीष्ट परिवर्तन का पक्ष यत्किंचित ही लेती हैं। समर्थ प्रयत्न भी योजनाबद्ध रूप से बड़े परिमाण में नहीं हो पा रहे हैं। छुट-पुट आवाजें उठती ओर छोटे स्तर कि क्रिया-प्रक्रिया ही बन पड़ती दीख पड़ती है। मोटा अनुमान यही लगता है कि छुट-पुट प्रयत्नों का प्रतिफल यत्किंचित ही होना चाहिए और उसे सुगठित होने में बड़ा समय लगना चाहिए।

सार्थक मापदंड में इस प्रकार का असमंजस स्वाभाविक है, क्योंकि लोक-व्यवहार में छोटे प्रयासों की थोड़ी प्रतिक्रिया ही होती देखी गई है, किंतु यदि युगनिर्माण जैसे विश्वव्यापी और 600 करोड़ मनुष्यों का चिंतन, चरित्र और व्यवहार बदलना है, उनका स्वभाव, अभ्यास जिस दिशा में बह रहा है, उसके लिए कोई और समर्थ प्रयास सामने आना चाहिए। आतंक के दबाव में हुए परिवर्तनों का प्रतिफल देखा जा चुका है। उनसे नए प्रकार के आतंक फूटे हैं और परिणाम नफे के स्थान पर घाटे का ही रहा है।

तब इस प्रकार का असाधारण परिवर्तन कैसे संभव होगा? इसके लिए इस तथ्य और सत्य को ध्यान में रखना होगा कि इस वसुधा का निर्माता एवं नियंता कोई दूसरा है। मनुष्य की क्षमता बड़ी है, पर ऐसा नहीं कि इसी के सहारे सारी विश्व-व्यवस्था चलती रही है या चलेगी।

बड़े प्रयास मनुष्यों के प्रयत्नों से ही संपन्न हुए हैं, यह भी ठीक है, पर यह मान बैठना भी ठीक नहीं कि जिस संबंध में उसने उपेक्षा दिखाई है, वह बन ही नहीं पाता। दास-दासियों का क्रय-विक्रय लंबी अवधि से चला आ रहा था। यह भी आशा नहीं थी कि वे उत्पीड़ित व्यक्ति मिल-जुलकर समर्थों से टक्कर लेने और उन्हें परास्त करने में सफल होकर ही रहेंगे। उनकी किसी ने बड़ी वकालत भी नहीं की। उनके पक्ष में कोई युद्ध भी नहीं लड़ा गया। इतने पर भी इतिहासकारों ने आश्चर्यचकित होकर देखा कि जाग्रत विश्वात्मा के दबाव से वे निविड़ बंधन अपने आप ही छूटते गए और बिना युद्ध का सरंजाम जुटाए क्रांतिकारी योजनाएँ बनी, दुनिया में से दासप्रथा उठ गई। उसका समर्थन अपनी मौत मर गया, यद्यपि अमीरों को इससे कम हानि नहीं हुई, फिर भी वे मन मारकर बैठे रहने के सिवाय और कुछ कर नहीं सके। दैवेच्छा अपने ढंग से अपने समय पर पूरी होकर रही।

राजतंत्र की परंपरा युग-युगांतरों से चली आई है। राजा को भगवान मानने की बात न जाने क्यों, सीखी और सिखाई जाती रही है। उस समुदाय के पास शक्ति, क्षेत्र, सैनिक और साधनों की कमी नहीं, फिर भी न जाने क्या हुआ कि राजमुकुट धरती पर लोटते और धूल-धूसरित होते चले गए। उन्हें अपने वैभव की रक्षा करने का समय भी नहीं मिला और राज्य में राजा के रूप में सोए हुए सत्ताधारी भोर होते ही अपना समस्त वर्चस्व गँवाकर साधारण नागरिकों जैसे होकर रह गए।

जमींदारों, साहूकारों, सामंतों का भी एक वर्ग था, जो प्रजाजनों की खुशहाली का अपने आप को स्वामी मानता था। जिस तरह चाहे, उस तरह निचोड़ता रहता था, पर देखते-देखते वे परिस्थितियाँ न जाने किस हवा में विलीन हो गई। कर्ज की सुविधा बैंकों के माध्यम से सरलतापूर्वक ली जा सकती है।

और भी कई क्रांतियाँ अपने-अपने ढंग से हुई हैं। मनुष्य का पुरुषार्थ नगण्य और दैवी इच्छा के माध्यम से बन पड़ा संयोग अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है। परदाप्रथा अब कहीं किन्हीं कोंतरों में ही अपने नाममात्र के अस्तित्व की झलक-झाँकी देती देखी जाती है, अन्यथा संसार में से उसका प्रचलन एक प्रकार से उठ गया ही समझा जा सकता है। जाति-पाँति, ऊँच-नीच की मान्यता किन्हीं गिरे हुए खंडहरों में ही छिपी जब कभी दीख जाती है, पर उसका संवैधानिक और लोक-व्यवहार में प्रचलन समाप्त हुआ ही समझा जाना चाहिए। सतीप्रथा कभी गौरवान्वित रही है, पर अब तो उस पर कानूनी प्रतिबंध है और इसके लिए उकसाने तथा महिमामंडित करने पर कोई भी जेल की हवा खा सकता है।

अंग्रेजी साम्राज्य, जिसके क्षेत्र में कभी सूर्य-अस्त नहीं होता था, ऐसी परिस्थितियों से आ घिरा कि अपने बोरिया-बिस्तर हर कहीं से समेटकर अपने छोटे दायरे में सीमित रहने के लिए ही विवश हो गया। नैपोलियन, सिकंदर, चंगेज खाँ जैसे आततायियों की करतूतें अपनी परंपरा देर तक नहीं निभा सकी। आक्रांताओं की अपनी फूट ने ही उन गिरोहों का अस्तित्व समाप्त कर दिया, जो कभी अजेय समझे जाते थे। चंद्रमा पर मनुष्य चहल-कदमी करेगा, इसकी कल्पना कभी किसी ने नहीं की थी। अब तो अंतरिक्ष में बस्तियाँ बसाने की योजना कार्यान्वित होने जा रही है।

पुराणगाथाओं का अधिकांश कलेवर दैवी शक्तियों के चमत्कारी वर्णनों से ही भरा पड़ा है। अवतारों, संत, सिद्धों में से अधिकांश ऐसे हैं, जिनके द्वारा स्वयं ऐसे कार्य संपन्न किए तथा दूसरों से कराए गए हैं, जो मनुष्य की साधारण शक्ति के सहारे बन पड़े, ऐसा संभव प्रतीत नहीं होता, फिर भी वे हुए हैं। इसे देखते हुए इसी निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि उन्हें किसी अदृश्य शक्ति का अवलंबन मिला और उसके सहारे उनने प्रतिकूलताओं को अनुकूलताओं में परिवर्तित करने में विजय पाई।

दार्शनिकों, वैज्ञानिकों को प्रायः ऐसी ही अंतःस्फुरणा होती रही है, जिसके मार्गदर्शन में उनका अंतस् उस दिशा में चल पड़ा, जो उनके लिए ही नहीं, अन्य असंख्यों के लिए भी श्रेयस्कर सिद्ध हुआ। वस्तुतः दैवी अनुकंपा का दार्शनिक रूप यही है।

अदृश्य ईश्वर का दर्शन कर सकना किसी प्रकार भी संभव नहीं। इंद्रियों की सहायता से तो जड़ पदार्थ ही देखे जाते हैं। ईश्वर की भी यदि कोई छवि कल्पित की जाए तो भी वह किसी प्राणी या पदार्थ से मिलती-जुलती होने के कारण भौतिक ही कही जाएगी, जबकि सृष्टा की सत्ता अदृश्य एवं निराकार है। भक्तों की कल्पना उनकी इच्छानुसार भी ध्यान स्थिति में साकार रूप धारण कर सकती है, पर तत्त्वदर्शी उसे विराट ब्रह्म के रूप में देखते और विश्व-वसुधा में विद्यमान सत्प्रवृत्तियों के समर्थन में अपनी सेवा अर्पित करते हैं। यही वास्तविक पूजा-अर्चा है। उसका उपयोग एवं स्वरूप यही है कि उच्चस्तरीय आदर्शों का अवलंबन लेने के लिए भावना और क्षमता को पूरी तरह नियोजित कर सकने जैसी अदम्य उमंगें मन में उठें। इक्कीसवीं सदी में ऐसे ही अवलंबन के धनी अनेक प्रतिभाशाली उत्पन्न होंगे और वे नवसृजन की दिव्य योजना को पूरा करने में कार्यरत दिखाई पड़ेंगे।


सद्वाक्य

मनुष्य का अच्छा स्वभाव ही उसका सौंदर्य है। वह कुरूपता की कमी पूरी कर सकता है, किंतु बुरे स्वभाव के रहते देवताओं जैसे सौंदर्य का भी कोई मूल्य नहीं।


जिसने कारावास को साधनास्थली बनाया

बारह वर्ष का एक बालक सड़कों पर इधर-उधर चक्कर काट रहा था। उसके चेहरे पर बेचैनी, अकुलाहट व पीड़ा के चिह्न साफ नजर आ रहे थे। अचानक उसकी नजर सड़क के किनारे बने वर्कशाॅप पर पड़ी, दीवार पर टंगे बोर्ड पर लिखे बड़े-बड़े अक्षरों से जाहिर हो रहा था कि लोहे की मशीनें बनाने का कारखाना है। लड़के की आँखों में चमक आ गई। अगले ही क्षण वह चौकीदार की अनुमति लेकर प्रबंधक के कक्ष में था।

उसने रोते-गिड़गिड़ाते अनुनय के स्वर में कहा कि, "मैं काम की तलाश में आया हूँ।" "लेकिन तुम्हारे लिए यहाँ कोई काम नहीं"— सीधा-सपाट उत्तर था प्रबंधक का। "पर मैं पिछले तीन दिनों से भूखा हूँ।" "मैं कोई तेरी भूख का ठेकेदार हूँ।" प्रबंधक ने घंटी बजाई। आए हुए चपरासी से झल्लाते हुए कहा— "इसे निकाल बाहर करो।" दूसरे ही क्षण वह फिर सड़क पर था। आँखों की चमक विलुप्त हो चुकी थी। चेहरे को देखकर लगता था जैसे शरीर का सारा खून निचुड़ चुका हो। वह कई दिनों से भटक रहा था, पर किसी ने काम नहीं दिया। भला बारह वर्ष के बालक को रोजगार देकर कौन निर्दयी कहलाना चाहेगा। समाज की निगाहों में मूलतः यह प्रश्न मानवीय सहानुभूति का उतना नहीं था, जितना कि सामाजिक प्रतिष्ठा का। यही कारण कि वह जिनके पास गया, सभी ने इनकार में सिर हिला दिया। क्रूरता, निर्ममता भले ही अंतर में घर जमाए हो, पर भला कौन समाज की नजरों में क्रूर, निर्मम बनना चाहता।

"बुभुक्षेति किं न करोति'"—  भूखा क्या नहीं करता. के अनुसार एक बड़ी बदनाम मोटर कंपनी में नौकरी कर ली। यह मोटर कंपनी गैरकानूनी ढंग से अपने क्रियाकलाप चलाती थी। वह तो मेहनत व लगन से काम करता। उसे कंपनी की गतिविधियों से क्या लेना-देना। सीधा-सादा दिखने वाला यह लड़का किसी उलझन में न फँसा दे, यह सोचकर कंपनी के मालिक ने उसे एक केस में फँसा दिया, जिसके कारण उसे बारह वर्ष की सजा मिली।

जेल से छूटने पर सजायाफ्ता कैदी को रोजगार मिलना तो और मुश्किल था। कैद से छुटकारा पाए युवक में— हाँ! अब युवक हो चुका था— प्रतिशोध उमड़ा। विवश हो प्रतिशोध के आवेग में उसने एक डाकू दल बनाया। जिसने दो वर्ष में 50 से अधिक लूट-पाट और चोरियाँ कीं। उसे फिर पकड़ा गया। एक बार फिर वह जेलखाने के सीखचों में बंद था।

आवेग कब स्थाई रहता है। जेल में विगत जीवन, प्रयास, क्रियाकलापों की स्मृतियाँ एक-एक करके तैरने लगी। इस सबके साथ आँखों में आँसू भी तैरने लगे। विवशता और पीड़ा भरे स्वर में उसके मुख से निकला— "काश! मैं भी कुछ कर पाता।" उधर से जेल का पादरी गुजर रहा था, उसके कानों में वाक्य पड़े। वाक्य पड़ने के साथ उसके कदम मुड़े और कैदी के प्रकोष्ठ के सामने आकर खड़ा हो बोला—"तुम क्या करना चाहते थे युवक।"

"लेकिन अब इस सबसे क्या?" "नहीं, अभी कुछ नहीं बिगड़ा है। मनुष्य जिस क्षण से अपने को परिवर्तित करना चाहे, कर सकता है। जीवन का प्रत्येक क्षण अपने में अमूल्य अवसर है। आखिर बात क्या है? तुम मुझे बताओ तो।” पादरी के करुणा भरे मीठे वचनों के प्रभाव से उसने एक-एक करके अपने विगत जीवन की सारी घटनाएँ बयान कर डाली।

सब सुनने के बाद पादरी ने कहा—“जो हुआ उसे भूल जाओ। समझो! आज से मेरा नया जन्म हुआ। अब से इस जीवन को सुधारने का संकल्प लों। मैं तुम्हारी पूरी सहायता करने का वचन देता हूँ।” "फादर! पहली सहायता आप यह करिए। कागज, कलम, स्याही का इंतजाम कर दीजिए।" "ठीक है कर दूँगा"— पादरी ने आश्वासन दिया।

प्रायश्चित की आग में कल्मष जल चुके थे। अंदर की भावनाएँ लिखने की टीस से मिलकर कागज पर उतरने लगीं। जेल में रहते हुए अब वह युवक अपने को परिवर्तित कर रहा था। दिन-पर-दिन बीतते जाते। वह अपनी लेखनोपासना में मग्न रहता। कुछ समय बाद ही यह लेख— उसकी प्रथम रचना 'दी फ्रोट्रेस' के रूप में सामने आया। पादरी ने इस रचना को पश्चिम जर्मनी के एक प्रकाशक के पास भेज दिया। प्रकाशित होने पर यह रचना असाधारण रूप से लोकप्रिय हुई। न केवल रचना, बल्कि रचनाकार 'जाइगेर' भी।

हाँ! जीवनयात्रा के कड़वे,तीखे, कसैले और अब जीवन के रूपांतरण के बाद मधुर अनुभवों से गुजरने वाला वह बालक से युवा और युवक से प्रौढ़ अवस्था तक पहुँचने वाला जर्मनी का प्रसिद्ध और अप्रतिम साहित्यकार जाइगेर ही था, जिसने कारावास को साहित्य-साधना का केंद्र बना लिया। उन्होंने अनेकों कृतियाँ लिखी, जिसे साहित्य समीक्षकों ने उत्तम कृति के रूप में सराहा।

कहाँ एक मुजरिम— कहाँ एक लेखक। प्रत्यक्ष में विरोधाभास लगने पर भी आभास ही है, सत्य नहीं। बुराइयाँ तो आवरण भर है, जिनके कारण छिपा देवत्व जीवन की दिव्यता, अपनी अभिव्यक्ति नहीं कर पाती। बुराइयाँ भी और कुछ नहीं कुछ भूलें भर हैं। जिनका परिमार्जन करने पर पूर्णतया निखार आ जाता है। लैंप के शीशे पर कालिख जम जाने से अंदर की ज्योति प्रकाशित नहीं हो पाती। जलते रहने पर भी उसके बुझने की प्रतीति हो जाती है। जैसे ही शीशा साफ किया कि स्वयं की चमक के साथ पूरा परिवेश आलोकित हो जाता है।

हमारे जीवन में भी कालिख जमती रहती है। व्यक्तिगत असावधानी से और सामाजिक विषमताओं से समाज मनोविज्ञानियों के विवरण के अनुसार पूरे विश्व में बाल अपराधियों की संख्या एक करोड़ से ऊपर है। इन सबके भीतर जाइगेर छुपा है। सामाजिक कर्णधारों की अपने दायित्व के प्रति उदासीनता, समाज का गंदला होता जा रहा माहौल ही इसका प्रमुख कारण है। यही कारण है कि जिन्हें अपने भीतर की प्रतिभा को अंकुरित करने, पुष्पित-पल्लवित करने में जुटना चाहिए, वह पाशविक प्रवृत्तियों के दास बनते जा रहे हैं।

स्थिति परिवर्तित हो, इसके लिए बुद्धिजीवियों को जेल के पादरी की तरह आगे आने का साहस जगाना होगा। यदि यह साहस जग सका, किशोर मनों में कर्त्तव्यबोध जाग्रत हो सका, तो इस समूचे समुदाय का कायाकल्प हुए बिना न रहेगा। प्रयत्न और कर्म-साधना से सब कुछ शक्य है। जो भी इसमें जुटते हैं, उनके लिए सहायक परिस्थितियाँ अपने आप बनती चलती हैं। कभी एक मुजरिम रहे जाइगेर ने आगे चलकर समूचे विश्व की विचारणीय जनता को अपने साहित्य के द्वारा एक सर्वथा नई जीवन-दिशा दी। यह पादरी की प्रेरणा और उसके मन में जगे कर्त्तव्यबोध का संयुक्त परिणाम था। वह अपनी कर्म-साधना, प्रतिभा निखारने के लिए साहसपूर्ण प्रयास और अटूट धैर्य के कारण संभव हो सका। संभावना अभी भी है— सत्परिणाम आने के लिए आतुर है; यदि विचारशील वर्ग तथा भटके हुए किशोर युवक, पादरी और जाइगेर की अनुभूति कर सकें। इसकी शुरुआत जितनी शीघ्र हो उतना ही अच्छा है।


सद्वाक्य

कायर सुयोग की बाट जोहते रहते हैं, किंतु पराक्रमी हर समय को अपनी सूझ-बूझ और मेहनत के बलबूते सुयोग बना लेते हैं।


विज्ञान की समग्रता जीवन मूल्यों के साथ जुड़कर ही

विगत कुछ शताब्दियों से मानवीय जीवन में विज्ञान की भूमिका बढ़ गई है। वर्त्तमान जीवन के प्रत्येक आयाम पर इसकी छाप अंकित है। परिणामतः जीवन-पद्धति एवं दृष्टिकोण तीव्रगति से परिवर्तित हुए हैं। इसी के कारण समूचा संसार एक लघु परिधि में सिमट-सा गया है। इसी का परिणाम है कि जीवन बहुत आरामदायक बन गया है।

इतने पर भी इसकी प्राभाविकता का एक अन्य आयाम भी है, वह है— मानव मूल्यों का पतन। डॉ. राधाकृष्णन अपनी कृति— 'आध्यात्मिक सहचर्य' में इसका तात्पर्य 'शुद्ध मानवीय गौरव की प्रतिष्ठा का ह्रास' बतलाते हैं। उनके अनुसार यह तत्त्व व्यक्ति के जीवन तक सीमित न रहकर समूचे समाज में व्याप्त है।

विज्ञान समूचे समाज में परिव्याप्त इन मूल्यों के पतन का कारण क्यों बना? इसकी विवेचना हेतु विज्ञान के प्रति पूर्वकालीन तथा अद्यतन दृष्टिकोण पर विचार करना होगा। वैदिककाल में विज्ञान धर्म का ही एक अभिन्न अंग था। इस काल में कलाएँ, विज्ञान, प्रौद्योगिकी, नैतिक व सामाजिक व्यवस्था, दर्शन के मणि-मुक्तक जिस केंद्रीय सूत्र में पिरोए थे, वह था— अध्यात्म। प्रत्येक कार्य एवं प्रत्येक विधा का यही लक्ष्य था।

इसी कारण उस काल में प्रत्येक व्यक्ति निज के कार्य को करते हुए इन मूल्यों को अक्षुण्य बनाए रखता था। यही नहीं मनुष्यत्व के परिपाक के रूप में देवत्व की अनुभूति भी करता था। उसका स्वयं का कार्य ही धर्माचरण था। धार्मिक बनने के लिए उसे कुछ अलग से करने की आवश्यकता न थी। इस स्थिति को निरूपित करते हुए गीताकार का कहना है— "श्रेयान्स्वधर्मो हि"। बात भी औचित्यपूर्ण है। जब व्यक्तिगत एवं सामाजिक जीवन के प्रत्येक आयाम में मूल्यों की उत्कृष्टता अविच्छिन्न हो, तब श्रेष्ठता के अतिरिक्त और हो भी क्या सकता है?

इस भारतीय चिंतन की प्राभाविकता को ग्रीक के क्लासिकल युग में देखा जा सकता है। इस काल में भी विज्ञान को तत्त्व दर्शन का एक अभिन्न अंग माना गया। तत्त्व दर्शन का संबंध वस्तुओं की प्रकृति तथा उसमें निहित सत्य के ज्ञान की खोज से होता है। इसमें देखने व विचारने की विधा समग्र होती है। विशिष्ट वस्तु की पहचान या उसके स्वरूप की जानकारी समग्रता की परिधियों में ही की जा सकती है।

जीवन का एक पक्ष अन्य दूसरे पक्षों से अभिन्नतापूर्वक जुड़ा हुआ है। अतएव किसी एक पक्ष की विवेचना संपूर्ण व्यवस्था के एक अंग के रूप में ही कर सकते हैं। इस कारण विज्ञान की एकाकी व्यवस्था न हो सकना स्वाभाविक है।

यह यथार्थ है कि वैदिक युगीन तथा क्लासिकल युगीन जीवन में विज्ञान का स्थान महत्त्वपूर्ण तो था, किंतु निरपेक्ष नहीं। निरपेक्ष स्थान न होने के कारण ही उसे धर्म तथा दर्शन की परिधि के अंतर्गत लिया जाता था। अतएव यह स्वाभाविक ही था कि जीवन के प्रत्येक कार्य का मूल्यांकन जीवन के लक्ष्य व आदर्शों के संदर्भ में किया जाए।

इसी कारण विज्ञान की गतिविधियों का मूल्यांकन अच्छा जीवन, अच्छा समाज, अच्छी व्यवस्था आदि आधारों पर किया जाता था। धर्म के बड़े घेरे में विज्ञान का संबंध मूल्यों से रहा। इन मूल्यों के द्वारा ही व्यक्ति अपने निजी हितों से ऊपर उठकर संपूर्ण समाज के हित में निर्णयात्मक कदम उठा सकता है।

पुनः जागरणकाल में विज्ञान के प्रति अपनाए गए दृष्टिकोण में पर्याप्त अंतर आया। कला की भाँति इसने भी धर्म से संबंध-विच्छेदकर स्वायत्त स्थान ग्रहण किया। इस स्वायत्तता के स्वरूप की नई व्याख्या सत्रहवीं शती के बेकन, हाब्स, देकार्ते आदि विचारकों ने प्रस्तुत की। वह विज्ञान जो पहले सुसंबद्ध एवं परिमार्जित जीवन के लिए प्रयोग किया जाता था, उसे मानवी शक्ति की अभिवृद्धि में प्रयोग किया जाने लगा। परिणामस्वरूप प्राकृतिक विज्ञान का उदय हुआ, जो दर्शन और धर्म दोनों से ही मुक्त था।

अन्य शब्दों में यहीं पर विज्ञान का लक्ष्य प्रकृति का विश्लेषणकर सत्य की शोध की अपेक्षा प्रकृति को जीतना हो गया। इस प्रवृत्ति की बढ़ती निरंतरता से विज्ञान को मानव इच्छाओं का दासत्व स्वीकारना पड़ा। व्यक्ति की बढ़ती हुई इच्छाओं ने नूतन उपभोक्ता सामग्री के अन्वेषण पर बल दिया।

परिणामतः व्यक्ति की सोच का दायरा इसी में सिमटता जा रहा है कि जीवन पहले से अधिक विलासितापूर्ण और आरामदेह कैसे मनाया जाए? यह सोच जीवन में लालच, ईर्ष्या, जोड़−तोड़ व विघटन उभारने वाली ही सिद्ध हुई है। फलतः व्यक्तिगत तथा सामाजिक जीवन से मानवीय मूल्यों का संबंध-विच्छेद हो जाना अस्वाभाविक नहीं है।

इस असामंजस्यपूर्ण स्थिति से बचने के लिए ही वैदिक चिंतकों ने समस्त विधाओं को अध्यात्म के सूत्र में पिरोया था। इसी से आग्रह करते हुए अरस्तू ने कहा था कि, “विज्ञान व तकनीक को यदि जीवन मूल्यों से मुक्त किया गया तो परिणाम खतरनाक होंगे”। संकीर्ण स्वार्थपरता से ग्रसित व्यक्ति एक छोटी-सी चीज को त्याग नहीं सकता है। इसके विपरीत जीवन-मूल्यों से प्रेरित व्यक्ति आदर्शों के लिए बड़ा-से-बड़ा त्याग करने में नहीं हिचकिचाते। यह प्रेरणा धार्मिक शिक्षाओं से ही मिल सकती है।

आधुनिक दृष्टिकोण ने विज्ञान का जो स्वरूप गढ़ा है, उसी का परिणाम मूल्यों के पतन के रूप में गोचर है। उसकी निषेधात्मक प्राभाविकता से व्यक्ति और समाज दोनों ही अछूते नहीं बचे हैं। व्यक्ति भिन्नता और अलगाव की भावन से ग्रसित होकर मात्र मशीन का पुरजा बनकर रह गया है। सामुदायिक स्नेह तथा लगाव का स्थान एकाकीपन ने ले लिया है। साधन-सुविधाओं की बहुलता भी व्यक्ति को संतुष्टि प्रदान नहीं कर रही है। जीवन में अस्त-व्यस्तता का ही वर्चस्व है।

कारक की खोज तथा मूल्यों की स्थापना के लिए एक समन्वय-साधना की आवश्यकता है। सामाजिकता का अभिनव गठन तभी संभव है, जब विज्ञान के प्रति हमारा दृष्टिकोण परिवर्तित हो। इसमें जीवन मूल्यों का समावेश हो। इसके लिए आवश्यक है— विज्ञान, दर्शन व धर्म का समन्वय। रूसो विज्ञान एवं दर्शन के समन्वय पर जोर देते हुए कहते हैं कि, "विज्ञान प्रस्तुत कर सकता है, तो दर्शन इस नई व्याख्या को अच्छी व्यवस्था का रूप दे सकता है।"

रूसो की यह मान्यता ठीक है, किंतु इस अच्छी व्यवस्था को व्यावहारिक स्तर की प्रायोगिकता में अवतीर्ण करना धर्म का कार्य है। यही दोनों में संतुलन स्थापित करता है। संतुलन की यह सामंजस्यपूर्ण स्थिति वैज्ञानिक अध्यात्म है, जिसे सिद्धांत के रूप में वैज्ञानिक अध्यात्मवाद कहा जा सकता है।

इसमें विज्ञान की सत्यनिष्ठापूर्ण शोधबुद्धि, दर्शन की मूढ़ मान्यताओं से मुक्त तर्कपूर्ण व्यवस्था तथा अध्यात्म के शाश्वत जीवन मूल्य सभी का समावेश है। इस सिद्धांत को आचरण में उतारकर व्यक्ति एक तरफ सामाजिक मान्यताओं, परंपराओं, मूल्यों को सुसंबद्धता का आधार प्रदान करके समाज को प्रगति की ओर बढ़ा सकता है। दूसरी ओर इससे व्यक्ति का निर्णय निजी स्वार्थ संकीर्णता से ऊपर उठेगा एवं सामूहिकता के, संघशक्ति के विकास के संबंध में भी सोचने लगेगा। यही समय की आवश्यकता भी है।


माया महाठगिनी

सद्ज्ञान की बहुत महिमा-महत्ता बताई गई है। कहा गया है कि ज्ञान से बढ़कर श्रेष्ठ इस संसार में और कुछ पवित्र नहीं है। ज्ञान को प्राप्त कर लेने पर बंधनमुक्ति निश्चित है। इस ज्ञान का अर्थ स्कूली शिक्षा से नहीं लिया जाना चाहिए। जो संबद्ध एवं दृश्यमान वस्तुओं के संबंध में विभिन्न प्रकार की जानकारी कराती है, वह शिक्षा भी उपयुक्त है। सभी धन-संपदा की तरह शिक्षा अर्जित करने का प्रयत्न करते हैं और करना चाहिए, ताकि जिस संसार में हमें रहना पड़ता है, उसके संबंध में व्यवहारकुशलता अर्जित कर सकें। यह शिक्षा है। अध्यात्म-क्षेत्र के ज्ञान और अनुभव को विद्या कहते हैं। विद्या का महत्त्व ही है, जिसकी उपलब्धि के संबंध में शास्त्रकार प्रशंसा करते-करते नहीं थकते और जिसे प्रकारांतर से अमृत कहते हैं— 'विद्ययाऽमृतमश्नुते।'

माया को तत्त्व दर्शन में निंदापरक शब्दों में प्रयुक्त किया गया है। वह इसलिए कि जो वस्तु जैसी है, उसे वैसी न दिखाकर कुछ-को-कुछ दर्शाती है और भ्रमित प्राणी उसके आकर्षण में उसी ओर खिंचता चला जाता है। इस मनोविनोद में समय और शक्तियों का अपव्यय तो बहुत होता है, इसमें रुचि भी रहती है, पर जब निष्कर्ष और प्रतिफल पर दृष्टि डाली जाती है, तो शून्य हाथ लगता दीखता है।

लगता है ईश्वर ने जहाँ अपने अंश— जीव को आत्मसत्ता के साथ जुड़ी हुई क्षमताएँ और विभूतियाँ मुक्तहस्त से प्रदान की हैं, वहाँ उसे बच्चा समझकर खिलौने भी इतने अधिक प्रकार के लाकर सामने पटक दिए हैं कि उन्हें छोड़ने को जी नहीं चाहता। बच्चों की रुचि कई दिन में पुराने खिलौनों से हट जाती है और उन्हें एक कोने में पटक देता है, किंतु मनुष्य है, जो उनमें कुछ सार न होने की बात देखते हुए भी समझ नहीं पाता।

प्रकृति का स्वरूप और उपयोग यों मोटी बुद्धि तथा इंद्रियों से समझ में आता है, किंतु गंभीर विचार करने पर उनकी वास्तविकता उजागर हो जाती है और प्रतीत होता है कि व्यर्थ की भटकन में इतना बहुमूल्य समय ऐसे ही गँवा दिया गया। यदि इसी समय और श्रम का उपयोग सारगर्भित कार्यों में किया गया होता तो कितना बड़ा लाभ मिल सकता था और कितना बड़ा उद्देश्य पूरा हो सकता था।

ज्ञान अर्जित करने का मोटा साधन हमारे पास मस्तिष्क है। वही ज्ञानेंद्रियों के माध्यम से जानकारियाँ एकत्रित करता है, पर कभी यह नहीं सोचा जाता कि यह माध्यम उपयुक्त भी है या नहीं?

वर्षा ऋतु में आकाश में इंद्रधनुष दिखाई देते हैं, वे सच मालूम पड़ते हैं, पर उसी वायुयान पर चढ़कर वहाँ पहुँचा जाए तो प्रतीत होगा कि वैसी कोई वस्तु नहीं है। छोटे-छोटे वर्षाबिंदुओं पर जो सूर्य के प्रकाशकण चमकते हैं, वही भ्रमवश आँखों को इंद्रधनुष के रूप में दिखाई पड़ता है। जो देखा जा रहा है, उसे झुठलाने की भी इच्छा नहीं होती और जब तथ्यों का अन्वेषण करते हैं, तो प्रतीत होता है कि आँखों के माध्यम से मस्तिष्क धोखा खा रहा है।

जमीन पर खड़े होकर जब पृथ्वी और अंतरिक्ष का मिलन-स्थल देखते हैं, तो वह प्रायः तीन मील का होता है, पर जब वायुयान पर चढ़कर ऊँचे से देखते हैं, तो वह क्षेत्र चौड़ा हो जाता है और सौ मील की दूरी से भी परे वह मिलन-स्थल चलता चला जाता है।

जरा सोचें कि यह संसार क्या है? वैज्ञानिकों की दृष्टि में वह परमाणुओं की बिखरती-सिकुड़ती धूलि भर है, पर उस आधार पर जो दृश्य आँखों को दिखते हैं, उन्हीं को सच्चा माना जाता है। विभिन्न वस्तुएँ संसार में बनी और बिखरी दिखती हैं। यह सब अणुओं का संगठन और विघटनमात्र है। आँखें उन्हें सही रूप में देख सकने की क्षमता वाली नहीं हैंं, इसलिए संसार को इसी रूप में देखती हैं, जैसा कि वह दिखाई पड़ता है। घास और पेड़-पौधों को हम हरा देखते हैं, पर वे वस्तुतः वैसे होते नहीं। पत्तियाँ सूर्य-किरणों के अन्य रंगों को अपने में जज्ब कर लेती हैं, मात्र हरे रंग को हजम नहीं कर पाती, इसलिए वह बाहर रह जाता है और हम किरणों का चमत्कार नहीं, पत्तियों की विशेषता ही हरेपन से भरी हुई अनुभव करते हैं।

स्वाद के संबंध में भी इंद्रियाँ अधूरी जानकारी देती हैं। खाद्य पदार्थ और मुँह से निकलने वाले स्राव, दोनों के मिलने में मस्तिष्क तक जो जानकारी पहुँचती है, वही स्वाद है। नीम की पत्तियाँ हमें कड़वी लगती हैं, पर ऊँट को नहीं, वह उन्हें बहुत रुचिपूर्वक खाता है। एक ही चीज की अनुभूति दोनों प्राणियों को दो तरह की होती है। इसका कारण वस्तुतः स्वाद नहीं, हमारे मुँह की संरचना भर है।

काम-वासना शरीरगत हारमोन रासायनिक पदार्थों की न्यूनाधिकता पर निर्भर है। उनमें कमी–बेशी होने पर स्थिति सर्वथा बदल जाती है। कोई अतृप्त कामुकता का शिकार होता है और किसी की मनःस्थिति नपुंसक जैसी होती है। किसी को वह प्रसंग बड़ा रुचिकर लगता है, किसी को उन बातों की चर्चा से घृणा और अप्रसन्नता होती है। इसी प्रकार विभिन्न प्राणियों की गतिविधियाँ, रुचियाँ एवं आदतें भिन्न-भिन्न होती हैं। यह शरीर संरचना की, मानसिक ढाँचे की भिन्नता पर निर्भर है, इस कारण जो मतभेद बनते-पनपते हैं, उसमें से किसे सच और किसे झूठ कहा जाए, यह बड़ा टेढ़ा प्रश्न है।

मनुष्य वस्तुओं को हस्तगत करता है और उन्हें अपनी निजी संपत्ति मानकर मनमाना उपयोग करने लगता है, जबकि वास्तविकता यह है कि हर वस्तु एक स्थान पर एक स्वरूप में रहने की अपेक्षा निरंतर आगे बढ़ती और स्वरूप में बदलती रहती है। अभी जो रंग-रूप सुहावना लगता है, वह कुछ ही समय में जरा-जीर्ण हो जाता है और कुरूप ही नहीं लगता, वरन मरण की स्थिति में भी जा पहुँचता है। धन उपलब्ध होने के साथ-साथ खरच के माध्यम से अन्यत्र चले जाने की तैयारी करने लगता है। यह कुछ उदाहरण हैं, जिन्हें देख-समझकर हम वस्तुस्थिति जानने के लिए इंद्रियों पर और मस्तिष्क पर निर्भर नहीं रह सकते। यहाँ जादूगरी जैसा तमाशा हर घड़ी होता रहता है और बच्चे, माँ अपना काम हरज करके भी मनोविनोद करते और समय गँवाते रहते हैं। उस स्थिति को 'माया' कहा गया है, जिसमें कुछ-का-कुछ सूझ पड़ता है। कस्तूरी हिरन अपनी नाभि से उठने वाली सुगंधि को कहीं अन्यत्र से आती हुई समझते हैं और उसे पाने के लिए दौड़-धूप के उपरांत थककर निराश हो बैठते हैं। रात की चाँदनी में सफेद बालू को जलाशय समझकर प्यासे हिरन उस ओर दौड़ते हैं और अंततः अपने प्रयास की निरर्थकता अनुभव करते हैं। संक्षेप में यही माया है, जिससे ग्रस्त होकर मनुष्य क्षण-क्षण में दुःख-सुख अनुभव करता और हंसते-रोते जिंदगी का बोझ ढोता है। प्राणी-समुदाय अपनी इच्छाओं और क्रियाओं से बाधित होकर बार-बार जन्म लेता है। किन्हीं दो स्वजन-संबंधी और किन्हीं को अपना-पराया मिलता है। वे जब विलग होते हैं, तो बिछोहजन्य पीड़ा से मनुष्य सिर धुनता है, जबकि मरना उसका स्वयं का भी निश्चित है।

तत्त्वज्ञान का निष्कर्ष यह है कि माया के प्रपंचों का क्रीड़ा-कौतुक तो देखें, पर उसमें इतने लिप्त न हों कि अपना लक्ष्य ही भुला दिया जाए और उसके बदले अज्ञान और अनाचार का बोझ सिर पर लाद लिया जाए।

मनुष्य ईश्वर का राजकुमार है और पिता की संपदा का अधिकारी। मनुष्य जन्म का एक अवसर ही ऐसा है, जिसमें अपनी विभूतियोँ का संवर्द्धन करके ईश्वर का मिलन— उसके समतुल्य बनने का सुयोग हस्तगत किया जा सकता है। इसलिए दूरदर्शिता इसी में है कि बालविनोद में समय न गँवाकर उन कर्त्तव्यों के परिपालन में लग जाएँ, जो आत्मविकास के लिए जीवन-सुयोग को सार्थक बनाने के लिए आवश्यक है।


बेसहारों का मसीहा

फ्रांस के सुविख्यात पादरी फादर आवेपियर पेरिस में रहते थे। जाड़ों की कड़कड़ाती सरदी की एक रात में जब वह लिहाफ में घुसे पलंग पर चैन की नींद सो रहे थे कि किसी ने दरवाजा खटखटाया। खट-खट की आवाज ने उनकी नींद भंग की।

इतनी रात गए कौन हो सकता है? मन-ही-मन फादर ने प्रश्न किया और उत्तर वहीं से आया, जहाँ से प्रश्न पूछा गया था— "शायद कोई मुसीबत का मारा व्यक्ति है।"

दरवाजा खोला तो सचमुच एक व्यक्ति, जिसके तन पर नाममात्र के वस्त्र थे, याचना की मुद्रा में खड़ा था। फादर ने कहा— "कहो बेटे! क्या बात है?"

“फादर ठंड लग रही है। आज आपके मकान में शरण चाहता हूँ"— व्यक्ति ने कहा।

ईसा की राह पर चलने वाले फादर न कैसे करते। उन्होंने उल्टे प्रेमपूर्वक डाँट ही लगाई।

“इतनी देर क्यों कर दी। कभी का आ जाना चाहिए था।" और वह व्यक्ति अंदर आ गया।

फादर ने उसके सोने, ओढ़ने का अच्छा प्रबंध कर दिया और वह रात भर चैन की नींद सोया।

सुबह हुई, दिन बीत गया, पर रात बिताने की इच्छा से आए उस व्यक्ति का जाने का मन नहीं हुआ। मौसम ही ऐसा था और उसने सारा दिन गुजार दिया। एक दिन, दो दिन, तीन दिन, चार-पाँच, पूरा सप्ताह ही बीत गया। न आए व्यक्ति की जाने की इच्छा हुई और न फादर ने उसे जाने के लिए कहा।

विपरीत इसके कुछ और लोग वातावरण के गिरते तापमान को देखकर के अपने आप को बचाने के लिए फादर के पास आकर रहने लगे।

जब आगंतुकों की संख्या बढ़ने लगी तो फादर का ध्यान उनकी ओर गंभीर हुआ। पूछा- “सारे नगर में तुम्हारे जैसे कितने लोग हैं?" "बहुत सारे"— उत्तर मिला।

"तो एक काम करो।" फादर ने कुछ विचार करने के बाद कहा— “उन सबको चर्च में इकट्ठा करो।”

संध्या समय ऐसे सभी लोग चर्च में इकट्ठे हुए और फादर ने उन्हें अपनी बात समझाते हुए कहा—"क्यों न हम लोग सब मिलकर जाड़े की समस्या का स्थायी हल ढूँढें। इसके लिए हमें मकान बनाना होगा”— उन्होंने बात आगे बढ़ाते हुए कहा। सुनकर सब लोग आश्चर्य और अविश्वास भरे भावों से उनकी ओर देखने लगे।

एक ने खड़े होकर कहा— “क्यों हँसी करते हैं फादर? हम लोग तन का कपड़ा और पेट की रोटी तो जुटा नहीं पाते, फिर भला मकान कैसे बनाएँगे।” फादर ने उत्साह भरते हुए कहा—“तुम नहीं जानते हो, सामूहिक प्रयासों में बड़ी ताकत होती है। यदि इस शक्ति का सही सदुपयोग किया जा सके तो क्रांतिकारी परिणाम सामने आ सकते हैं। हम लोग ऐसा ही करेंगे। मेरी योजना ध्यानपूर्वक सुनो। उचित लगे तो उत्साहपूर्वक क्रियाशीलता के लिए कटिबद्ध हों।”

और उन्होंने योजना बतानी शुरू की। इसके अनुसार बेघर लोगों ने शहर के तमाम कूड़े-कबाड़दानों को छान मारा, जो कि सड़कों के आस-पास कई स्थानों पर लगे थे। टूटी क्राकरी, टूटे−फूटे बरतन और पुराने टूटे फर्नीचर मिले। इन सब सामानों को जो व्यर्थ समझकर फेंक दिए गए थे, इकट्ठा किया गया और उनकी मरम्मतकर बाजार में सस्ते दामों में बेच दिया गया।

जो राशि इकट्ठी हुई, उससे पुनः वही धंधा चलाया गया। धीरे-धीरे रकम इकट्ठी हुई, जिससे कि एक साफ बस्ती के निर्माण की योजना को एक साकार रूप दिया जा सके। और जब वह योजना साकार होने की ओर अग्रसर हुई तो पेरिस ही नहीं, फ्रांस भर के समाचार पत्रों ने फादर की सूझ-बूझ और बेघर लोगों की श्रमशीलता की मुक्त कंठ से सराहना की। जनसहयोग भी प्राप्त हुआ। इस उपलब्धि से सूझ-बूझ और श्रमनिष्ठा की प्रेरणा मिलती रहे, इसलिए बस्ती का नाम भी 'रेग पिकर्स कॉलौनी' अर्थात कूड़ा-करकट बटोरने वालों की बस्ती रखा गया। काश! फादर आवेपियर की भाँति कोई साधक भारत में भी होता।


समर्पित साधिका

“यदि वह न होती तो शायद यह न कर पाता, जो कर सका।” ये शब्द साम्यवाद के जनक कार्लमार्क्स के हैं, जो उन्होंने अपनी पत्नी जेनी के लिए कहे थे। उनका सारा जीवन अभावों एवं कष्ट-कठिनाइयों में बीता। तब वह लंदन की ऐसी बस्ती में रहते थे, जो समूचे शहर में अपने गंदेपन के लिए प्रसिद्ध थी। यहाँ रहने का कारण सिर्फ एक ही था— सस्ता मकान। उनकी आय इतनी न थी कि वह किसी अच्छे मकान का किराया चुका सकें। जिस मकान में वह रहते थे, उसे भी कहाँ पूरा ले पाए थे, मकान के दो ही कमरे उनके हिस्से में थे, जिसके किराए के लिए समय-समय पर उन्हें झिड़कियाँ सुननी पड़तीं। कारण आमदनी का कोई अच्छा स्त्रोत न था। नए समाज की संरचना का नक्शा बनाने में ही सारा समय खप जाता। फिर पेट की रोटियों के लिए समय कहाँ था? पत्र-पत्रिकाओं में उनके जो लेख निकलते, उसके पारिश्रमिक से जैसे-तैसे निर्वाह चलता।

इन विषमताओं में रहते हुए भी 'दास कैपिटल' के रूप में वह कम्युनिज्म की सारगर्भित योजना प्रस्तुत कर सके, जिसे आज एक-तिहाई संसार मानता है। इन अमूल्य विचारों की उपलब्धि का श्रेय प्रत्यक्ष रूप से भले ही मार्क्स को जाता हो, पर वह जानते थे, उनकी इस चिंतन-साधना को सुचारु रूप से किसने गतिमान किया? यह और कोई नहीं, उनकी पत्नी थी— श्रीमती जेनी मार्क्स। इन्हें उतना ही श्रेयभाजन समझा जा सकता है, जितना कि स्वयं मार्क्स, बल्कि कुछ अर्थों में उनसे भी अधिक।

उस मकान में दो कमरे थे, जिनमें कि मार्क्स का परिवार रहता था। उन दोनों कमरों में ही रहना, बैठना, लिखना, पढ़ना, भोजन बनाना आदि काम संपन्न होते। सामान्य स्तर की स्त्री रही होती तो शायद यह अनभ्यस्त न होता, पर जेनी मार्क्स एक संपन्न घराने की बेटी थी। उनके पिता समृद्ध, उच्च पद प्रतिष्ठित होने के साथ-साथ दबंग और मिलनसार व्यक्तित्व के स्वामी थे। चाहा होता तो जेनी का संबंध ऐसे युवक के साथ हो सकता था, जहाँ जीवन की सारी सुविधाएँ और सुख-साधन जुटाए जा सकते, लेकिन जेनी ने अपनी हैसियत से साधारण ही नहीं, उम्र में भी चार वर्ष कम युवक मार्क्स को जीवनसाथी के रूप में चुना।

उन्होंने जब यह निश्चय किया कि वह मार्क्स की ही जीवन सहचरी बनेगी तो पिता और परिवार वालों पर मानो बज्र टूट पड़ा। बहुतेरा समझाया, दुबारा सोचने की सलाह दी। उस व्यक्ति के पास अभ्यस्त जीवन-सुविधाओं को प्राप्त कर पाना तो क्या, दो जून पेट भर भोजन पाना भी अनिश्चित होगा। इस पर जेनी ने उत्तर दिया— “तो क्या हुआ? हजारों लोग ऐसे भी तो है, जिन्हें एक जून भी खाना नसीब नहीं होता।” बात बढ़ाते हुए उसने कहा— “सामाजिक क्रांति जब जरूरी हो जाती है, तब विचार लोगों के जीवन में लागू होने के लिए जबरदस्ती अपना मार्ग ढूँढ निकालते हैं और समाज को एक नया स्वरूप प्रदान करते हैं। मार्क्स इसी महान घटनाक्रम के लिए विचार की खोज कर रहे हैं। उनके इस कार्य में सुख भी है, तृप्ति और शांति भी। मैं भी इसी की भागीदारी के लिए उनसे जुड़ रही हूँ”।

उसकी दृढ़ता के आगे सभी को झुकना पड़ा। बाद में वह कहा करती— “मेरा कर्त्तव्य हर परिस्थिति में पति का सहयोग देना है। मुझे अपने कष्टों के लिए चिंता नहीं, वरन गर्व है; इस बात का कि मैंने एक ऐसे व्यक्ति को अपना जीवनसाथी चुना है, जिसके अंतःकरण में पीड़ित मानवता के लिए अपार वेदना है।” जेनी को पाकर मार्क्स धन्य हो गए,

समाज के प्रति इस वेदना में शामिल होने के लिए आज भी ऐसे अनेकों की आवश्यकता है, जो समृद्धि को त्याग गरीबों को गले लगा सकें।


मानवी पुरुषार्थ का पूरक— अध्यात्मबल

मनुष्य जब चारों ओर से अपने को असहाय पाता है, उसका स्वयं का पुरुषार्थ साथ नहीं देता तो एक ही अवलंबन शेष रहता है— परम सत्ता का। दैवी अनुदान सुपात्रों को संकटों से बचाते व प्रगति का पथ-प्रशस्त करते हैं। दैवी चेतना ने सदा-सदा से यह दायित्व निभाया है कि जो आततायी और अधर्मी हैं, उन्हें बलपूर्वक सही रास्ते पर लाया जाए और अवांछनीयता का उन्मूलन किया जाए। साथ ही जो दुखी हैं, उनके आँसू पोंछे जाएँ, हिम्मत उभारी जाए और अभावग्रस्तों को पुरुषार्थ हेतु सामर्थ्य प्रदान की जाए।

ऐसे अनेकों पौराणिक आख्यान विभिन्न धर्मग्रंथों में मिलते हैं, जो समय-समय पर स्रष्टा के युवराज— मनुष्य को दैवी सहायता मिलते रहने के रूप में प्रमाणित करते हैं कि आत्मशक्ति के पूरक के रूप में परमात्मशक्ति का अस्तित्व है। भले ही वह आँखों से दृष्टिगोचर न हो, उसकी अजस्र अनुकंपारूपी क्रियाकलापों को एक से उदाहरणों में सहज ही देखा व उस सत्ता पर विश्वास किया जा सकता है।

द्रौपदी निस्सहाय अबला के रूप में कौरवों की राजसभा में खड़ी थी। दुराचारी कौरवों द्वारा चीरहरण किए जाने पर किसी मानव ने नहीं, दैवी सत्ता ने उसकी लाज बचाई थी। दमयंती का बीहड़ वन में कोई सहायक न था। सतीत्व पर आँच आने पर स्वयं भगवत्सत्ता उसके नेत्रों से ज्वाला रूप में प्रकट हुई और उसने व्याध को जलाकर भस्म कर दिया। प्रहलाद को दुष्ट पिता से मुक्ति दिलाने एवं ग्राह के मुख से गज को छुड़ाने स्वयं भगवान आगे आए थे। हिरण्यकश्यप की बहन होलिका को अग्नि में न जलने की सिद्धि प्राप्त थी, प्रह्लाद को लेकर लकड़ियों के ढेर पर बैठ गई। प्रज्वलित अग्नि में वह भस्म हो गई, पर प्रह्लाद बच गए। निर्वासित पांडवों की रक्षा स्वयं भगवान ने की। अपने प्रिय सखा अर्जुन का रथ जोता एवं गीता का उपदेश देकर धर्म दर्शन का निचोड़ मार्गदर्शन हेतु प्रस्तुत किया। साथ ही महाभारत की भूमिका बनाकर सतयुग की स्थापना हेतु स्वयं भूमिका निभाई। नरसी भगत के सम्मान की रक्षा व मीरा को विष के प्याले से बचाने हेतु स्वयं भगवत्सत्ता आगे आई थी। भगीरथ के तप को सफल बनाने एवं पवन पुत्र हनुमान को उनकी शक्ति का बोध कराने में असंभव पुरुषार्थ संभव कर दिखाने में परमात्मसत्ता ही मुख्य भूमिका निभा रही थी।

देव पक्ष अहंतावश या असंयम से— विलासिता से जब कभी अपनी क्षमताएँ नष्ट करता रहा है और असुर पक्ष उस पर हावी हुआ है। दैवी चेतना ने स्वयं अवतार धारणकर देवों को संयम की प्रेरणा देकर उनका मनोबल बढ़ाया और विजय के लक्ष्य तक पहुँचाया है। साथ ही जिन असुरों ने विद्वता में, शक्तिसंचय में, सिद्धि-सामर्थ्य में महारत हासिल की और दुर्मतिवश पथभ्रष्ट हुए, उन्हें नष्ट करने का प्रयोजन भी उसी परम सत्ता ने पूरा किया है, जिसने वरदान दिया था। रावण जैसे असुरों ने जब अनाचार की अति कर दी और अपनी सामर्थ्य से ऋषियों, तपस्वियों एवं देवों का जीना दूभर कर दिया, तो ऋषिरक्त को संचितकर स्वयं ईश्वरीय शक्ति ने सीता के रूप में अवतरित होने का निश्चय किया। इन्हीं सीता का रावण ने अपहरण किया और भगवत्सत्ता ने रामरूप में उस रावण के सारे वंश को समूल नष्ट कर दिया। अनीति देर तक टिकती नहीं।

ब्रह्मांडव्यापी समर्थ चेतनसत्ता जहाँ अपनी सूक्ष्मशक्तियों का प्रयोग अवांछनीयता के उन्मूलन और सत्प्रवृत्ति के संवर्द्धन में, देवत्व के विकास में करती है, वहीं अत्याचार-अन्याय के विरोध में भी वह आगे आती है। संसार में ऐसे अनेकों महामानव हुए हैं, जिन्हें अपने सुधारवादी दृष्टिकोण या आंदोलन के कारण तात्कालीन शासकों और प्रशासकों के कोप का भाजन बनना पड़ा, पर वे उनका कुछ न बिगाड़ सके। अन्याय व अत्याचार के विरुद्ध लड़ने वालों एवं सत्प्रयोजनों में निरत व्यक्तियों की रक्षा दैवी चेतना स्वयं करती है। संसार में ऐसे उदाहरणों को हर कहीं खोजा और देखा जा सकता है।

इंग्लैंड सरकार के विदेशी विभाग के सार्वजनिक कार्यालय में एक प्रत्यक्षदर्शी घटना की साक्षी में एक महत्त्वपूर्ण दस्तावेज मौजूद है। यह 22 जुलाई 1850 को महारानी विक्टोरिया के विशेष प्रतिनिधि सर जस्टिनशील का लिखा हुआ है। उसमें उल्लेख है कि बहाई धर्म के संस्थापक महात्मा बाव को प्राचीन परंपराओं से भिन्न स्थापनाएँ करने के कारण तात्कालीन शासकों ने मृत्युदंड सुनाया। उन्हें 9 जुलाई 1850 को प्रातः 10 बजे सरेआम तवरीज के मैदान में गोली से उड़ाया जाना था। 10 हजार दर्शक उपस्थित थे। महात्मा बाव और उनके एक अनुयायी को रस्सों से कसकर अधर में लटकाया गया और ढाई-ढाई सौ सैनिकों की तीन टुकड़ियाँ भरी हुई बंदूकें लेकर खड़ी की गई। व्यवस्था के अनुसार गोलियाँ बराबर दागी गईं, पर 750 में से एक भी गोली नहीं लगी और महात्मा बाव अपने अनुयायी सहित साफ बच गए।

उक्त घटना कोई किवदंती नहीं है, वरन उसकी प्रत्यक्षदर्शी पुष्टि की गई है। इसी तरह एक अन्य घटना में मैसूर के राजा ने नई तोप के उद्घाटन के अवसर पर उस क्षेत्र के एक प्रख्यात साधु से आशीर्वाद माँगा। इनकार किए जाने पर राजा बहुत क्रुद्ध हुआ और साधु को उसी तोप की नली से बाँधकर उड़ा देने का हुक्म दिया। वैसा ही किया भी गया, पर साधु मरा नहीं। पहली बार जब उसे बारूद भरी नली ने उड़ाया तो 800 फुट ऊँचाई पर उछलकर वह दूर खड़े हाथी के हौदे पर जा गिरा। पकड़कर लाया गया और दुबारा फिर उसे उसी प्रकार तोप से कसा और उड़ाया गया। उस बार वह एक दूरस्थ झोंपड़ी के छप्पर पर जा गिरा और बच गया। तीसरी बार उसे क्षमा-याचना के साथ छोड़ दिया गया।

संत कबीर के जीवन की एक घटना है। बनारस के तात्कालीन मुगल शासक से कट्टरपंथी मुल्लाओं ने कबीर की शिकायत कर दी। उनसे कहा गया कि वे अल्लाह के नाम पर लोगों को बरगलाते हैं। शासक ने उन्हें हथकड़ी डालकर गंगा में फेंक देने का आदेश दिया। विज्ञसमुदाय ने जब ऐसा करने से उसे रोकना चाहा तो कहा गया कि यदि इसका भगवान या अल्लाह कोई सगा होगा तो नदी में डूबने और मरने से बचा लेगा। अतः उसके आदेशानुसार कबीर को नदी में फेंक दिया गया। थोड़ी ही देर में वे नदी के किनारे पर आकर बैठ गए। उन्हें देखकर दैवी कृपा के आगे अनाचारियों के मस्तक झुक गए। इसी तरह आचार्य शंकर को बलि चढ़ाने की इच्छा से एक तांत्रिक धोखे से उन्हें वधस्थल पर ले गया। आचार्य मुस्कुराते हुए खड़े रहे और वह उनके शरीर पर अपना खड्ग चलाता रहा। प्रत्येक बार में खड्ग शरीर के आर-पार यों निकलता रहा, मानों हवा में घूम रहा हो। इस दृश्य को देखकर तांत्रिक भयभीत हो उठा और उनके चरणों में गिर पड़ा।

आदिकाल से लेकर अब तक जितने भी संत, महापुरुष हुए हैं और जिन्होंने भी आत्मकल्याण तथा लोक-कल्याण की दिशा में कदम उठाया है, उन्होंने परमात्मा का आश्रय मुख्य रूप से लिया है। मनुष्य के पास शक्ति भी कितनी है। बहुत थोड़ा शरीरबल, उस पर विषयों के प्रलोभन, बहुत थोड़ा साधन-बल, उस पर भी सांसारिक गतिरोध। अपनी ही सामर्थ्य पर वह न तो आत्मकल्याण कर सकता है और न संसार की ही कुछ भलाई कर सकता है; पर जब भी उसने ईश्वर को अपना सहयोगी चुना और सहायता के लिए पुकार की, वह दौड़ा और उसकी शक्ति बनकर उसने उसका मार्गदर्शन किया है। दैवी चेतना ही सदैव शक्ति बनकर मनुष्य में अवतरित होती है एवं असंभव को भी संभव बनाकर दिखा देती है।

ईश्वर, जीव, प्रकृति की विवेचना ही अध्यात्म तत्त्वज्ञान का प्रमुख विषय है। इन तीनों की सत्ता मानवी काय-कलेवर में विद्यमान है। स्थूलशरीर प्रकृति का प्रतिनिधित्व करता है। सूक्ष्मशरीर जीव चेतना का और कारणशरीर अंतःकरण का तारतम्य परब्रह्म के साथ जोड़ता है। इस समस्त ब्रह्मांड का प्रसार— विस्तार मनुष्य की प्रत्यक्ष सत्ता में अप्रत्यक्ष रूप से अपने मनोरम स्वरूप को दर्शाता है।

क्रिया और कल्पना यह दोनों तत्त्व अन्यान्य प्राणियों में न्यूनाधिक मात्रा में पाए जाते  हैं। मनुष्य में जो अतिरिक्त भावतत्त्व है, वही उसकी आध्यात्मिक विशेषता है। यही वह सीढ़ी है, जिसके सहारे परब्रह्म के साथ सघन सायुज्य बनता है। यही वह विशेषता है, जिसके कारण उसे ईश्वर का युवराज कहा जाता है।

क्रियायोग को सांसारिक सफलता के लिए, वैचारिक तत्त्व दर्शन को प्रज्ञा की उपलब्धि के लिए और भावयोग को दिव्य तत्त्व के साथ एकात्मता प्राप्त करने के लिए आवश्यक माना जाता है, भक्तियोग सबसे ऊँचा है। मीरा कहती थी— 'सबसे ऊँची प्रेम सगाई'। प्रेम के बंधनों में बँधकर माता-संतान में, पति-पत्नी में, मित्र-मित्र में जो घनिष्टता पैदा होती है, उसका आनंद लेते सभी भावुकजन देखे जाते हैं। यही जब आदर्शों के समुच्चय— परब्रह्म के साथ जुड़ जाता है तो आत्मा परमात्मा में समर्पित होकर तद्रूप बन जाता है। इसी को जीवन का परम लक्ष्य माना गया है। चेतन जगत की विशालता ही परमेश्वर है, इसी के अनुरूप भक्तजन अपने को सुविस्तृत करते हैं। समर्पण साधना यही है। अद्वैत चिंतन इसी को कहते हैं। तादात्म्यता में ही ईश्वरदर्शन का ऐसा रसास्वादन मिलता है, जिसकी प्यास में जीव कस्तूरी के हिरन की तरह दिशा-दिशा में तलाशता-भागता फिरता है।

उच्चस्तरीय भाव-संवेदना विकसित करने के लिए आरंभिक अभ्यास यह है कि किसी परमार्थ प्रतीक को अपना इष्ट बनाकर उसके साथ आत्मीयता का सघन संबंध जोड़ा जाए। साकार उपासक इसके लिए किसी देव-प्रतिमा को अपना आराध्य बनाते हैं और उसकी प्रत्यक्ष स्थापना करके भावभरा सर्वोच्च रिश्ता जोड़ते हैं। देव-प्रतिमाओं के माध्यम से निराकार परब्रह्म की अचिंत्य छवि को दृश्यमान— साकार बनाते हैं। इस साकार उपासना में दो परिकल्पनाएँ करनी होती हैं। एक यह कि प्रस्तुत प्रतिमा धातु या पाषाण नहीं, वरन उच्च आदर्शों की संगठना है। उसके प्रत्येक अवयव में अपने-अपने स्तर की उत्कृष्टता छलकती है। इस प्रकार की मान्यता ‘विश्वास’ कहलाती है। इस स्थापना पर श्रद्धा का, आत्मीयता का आरोपण किया जाता है। उसके प्रति प्रेमभाव दर्शाने के लिए नवधा-भक्ति में प्रयुक्त होने वाले पूजा-अर्चन के पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य आदि अर्पित करने होते हैं। वस्तुओं का यह उपादान वस्तुतः अपनी विभूतियों को विराट ब्रह्म के लिए स्थायी समर्पण करने की मानसिकता को जगाता है।

प्रकारांतर से साकार पूजा-अर्चना इस मानसिक पृष्ठभूमि का निर्माण है कि आदर्शों के प्रति अपना समय, श्रम, मनोयोग एवं साधना इस स्तर का अर्पित किया जाएगा कि जिसमें उदासीनता का पुट नहीं, गहरी उमंगों का भावुक समावेश हो। इस प्रयास को परमार्थपरायणता की तैयारी कह सकते हैं। बद्ध जीव संकीर्ण स्वार्थपरता के छोटे दायरे में नाली के कीड़ों की तरह हाथ-पैर पटकता रहता है। गूलर के पेड़ों में उगते रहने वाले भुनगों की तरह अंधी हलचलें करता रहता है; पर जब उसके अंतराल में प्रेमभावना का उदय होता है तो ‘स्व’ को ‘पर’ में समर्पित करने के लिए वह आतुर हो उठता है।

प्रेम को प्रतिमा के माध्यम से गुरु या महामानव को आधार मानकर विकसित तो किया जा सकता है, पर उसे उस दायरे में सीमित नहीं रखा जा सकता। सूर्य पूर्व से उदय तो होता है, पर सदा उदयाचल पर ही नहीं बैठा रहता। उसे समस्त जगती पर अपनी ऊर्जा-आभा बिखेरनी पड़ती है। भक्तजन किसी छोटे भगवान के साथ लिपटकर छोटे नहीं बने रहते, वरन महान के साथ जुड़कर अपना दृष्टिकोण, चिंतन एवं प्रयास, संपर्क-क्षेत्र से आगे बढ़ाकर अधिकाधिक सुविस्तृत करते जाते हैं। अग्नि के लिए समर्पित होने वाला ईंधन अग्निरूप ही हो जाता है। भक्त की समस्त भाव-संवेदनाएँ ईश्वर जैसी उदार एवं महान बनती जाती हैं। उसे सत्प्रवृत्ति-संवर्द्धन के अतिरिक्त और कुछ सूझता नहीं।

निराकार साधना का एक ही उपाय-उपचार है— 'ध्यान'। तत्परता, तन्मयता, प्रतिक्रिया ही एकाग्रता के रूप में दृष्टिगोचर होती है। महान प्रयोजन के साथ जुड़ते ही चंचलता चली जाती है और उद्देश्य के प्रति ऐसी लगन लगती है कि अन्य कहीं मन दौड़ता ही नहीं। मनोनिग्रह को शक्तियों का, सिद्धियों का, विभूतियों का केंद्र माना गया है। यह मनोयोग साधने के लिए ध्यानयोग का आश्रय लेना पड़ता है। ध्यान का अर्थ है— " मानसिक बिखराव को रोककर उसे तीक्ष्ण बनाना और बाण की तरह निर्धारण में अपने साधनों को प्रविष्ट करवाना।" अर्जुन को मत्स्य-वेध की सफलता इसी आधार पर मिली थी। आतिशी शीशे के छोटे से दायरे में सूर्य-किरणों को एकत्रित करने पर केंद्रबिंदु पर आग जलने लगती है। ठीक इसी प्रकार ध्यान की सघनता से अन्यान्य विषयों पर मन नहीं भटकता। इष्ट और भक्त एक हो जाते हैं। ध्यानयोग की यही पृष्ठभूमि है।

जार्ज बर्नार्ड शाॅ जैसे साहित्य-सृजेता, राममनोहर लोहिया जैसे समाजसेवी बहुत आग्रह करने पर भी विवाह के लिए इसीलिए तैयार नहीं हुए, वे कहते थे— "इससे ध्यान बटेगा और जिस एकाग्रतापूर्वक निर्धारित लक्ष्य में लगे हैं, उतनी तन्मयता फिर न रह सकेगी और कार्य में व्यवधान आ जाएगा।" ध्यानयोग का स्वरूप यही है कि चित्तवृत्तियों की भगदड़ रुक जाए और एक केंद्र पर पूरी तरह टूटे। बिखरी भाप निरर्थक चली जाती है, पर जब उसे एक केंद्र पर नियोजित किया जाता है तो रेलगाड़ी ले दौड़ती है। बारूद फैली हुई रहे तो चिनगारी लगने पर ‘भक’ से जल जाती है, पर जब उसे बंदूक की छोटी नली से भरकर एक निशाने पर दागा जाता है तो उसे बिस्मार करके रख दिया जाता है। फायर ब्रिगेड का पानी भी जब एक छोटी नली में होकर फेंका जाता है तो उसकी तेज धार अग्निकांड को बात-की-बात में बुझा देती है।

ध्यान-धारणा के लिए कोलाहल और हलचलों रहित स्थान चुनना चाहिए। पूर्व में मुख रखें। प्रातःकाल का वह समय निकालें, जिसमें सूर्य क्रमशः उदय होता हो। ऐसा स्थान या तो सबसे ऊपर वाली छत पर हो सकता है या ऐसा मैदान जिसमें पहाड़ियों, पेड़ों की ऊंचाई प्रातःकालीन सूर्यदिशा में बाधा न पहुँचाती हो। एक-दो सेकेंड ही खुले सूर्य का दर्शन करके आँखें बंद कर लेनी चाहिए और भावना करनी चाहिए कि चारों ओर संव्याप्त प्रकाश को अपने तीनों शरीरों में खींचा— भरा जा रहा है।

शरीर के तीन शक्तिकेंद्र है। नाभिस्थल— शरीर से संबंधित। मस्तिष्क— सूक्ष्मशरीर का केंद्रबिंदु। हृदय— कारणशरीर की भाव-संवेदनाओं का उद्गम। इन तीनों ही स्थानों पर छोटे कमलकेंद्रों की स्थापना भावनापूर्वक नियोजित करनी चाहिए। सूर्य का प्रकाश पाते ही कमलपुष्प खिलने लगते हैं। वहीं उपक्रम अंतराल के तीनों कमलों को सविता देव के अरुणोदय प्रकाश से खिलते हुए अनुभव करना चाहिए। कमलपुष्पों के प्रातःकालीन सूर्य-प्रकाश के साथ खिलने की स्थूल और सूक्ष्मशरीरों सहित विशेषतया हृदयकमल खिलने की अनुभूति उभारनी चाहिए। खिले कमलपुष्प की सुगंध, शोभा, कोमलता और सात्विकता का अधिकाधिक समावेश होता जाता है। भावना करनी चाहिए कि कारणशरीर हृदयकमल में इसी प्रकार सर्वतोमुखी विकास के दिव्य अनुदानों से लाभान्वित हो रहा है। इस साधना का पंद्रह मिनट से आरंभकर क्रमशः बढ़ाते हुए आधे घंटे तक पहुँचाने का निर्धारण करना चाहिए। इस प्रक्रिया से जो उपलब्धियाँ हस्तगत होती हैं, वे साधक को निहाल कर देती हैं।


विचारशीलता का परिमार्जन

खेतों में अनाज, शाक, फूल आदि की मूल्यवान फसलें उगाने के लिए उनकी जुताई करनी पड़ती है। नमी और खाद की आवश्यकता पूरी करनी पड़ती है। समय-समय पर निराई-गुड़ाई की व्यवस्था करनी पड़ती है। कृमि-कीटक लग जाने पर उन्हें दवा छिड़ककर मारना होता है। साथ ही ध्यान रखना होता है कि पौधों की हरियाली पर जानवर टूट न पड़े। जब उनके पकने का समय आता है, दाना पड़ता है, तो पक्षियों के झुंड चढ़ दौड़ते हैं। इन सबसे बचाव करना होता है। जो किसान यह सब कर पाते हैं, वे ही धन-धान्य से कोठे भरते हैं।

श्रेष्ठ विचार भी पुष्पोद्यान की तरह लगाने और बढ़ाने पड़ते हैं। उनकी रखवाली का भी समुचित ध्यान रखना पड़ता है। जो इस संदर्भ में असावधानी बरतते हैं, उन्हें वह लाभ नहीं मिलता, जो इस संपदा के बढ़ने पर मिलता और निहाल करता है।

खरपतवार बिना किसी प्रयास के उग आते हैं। उन्हें पानी भी नहीं लगाना पड़ता और न देखभाल की आवश्यकता पड़ती है। जंगलों में अनायास ही झाड़ियाँ उग जाती हैं। आम, ढाक के पौधे बिना किसी संरक्षण के उगते और फैलते रहते हैं। बेशरम बेल के बीज भी हवा के साथ उड़ते चले आते हैं और जहाँ भी जगह पाते हैं, वहीं उगने, बढ़ने और फैलने लगते हैं। जलाशयों पर काई अनायास ही छा जाती है। तालाबों में जलकुंभी इतनी जल्दी फैलती है कि पूरे क्षेत्र को घेरकर बैठ जाती है। कुविचारों को जलकुंभी की बिरादरी का समझना चाहिए। वे न जाने कहाँ से आ जाते हैं और सहज ही फैलने, जड़ जमाने लगते हैं।

मनुष्य अनेक क्षुद्रयोनियों को पार करते हुए इस जन्म का सुयोग प्राप्त कर सका है। पिछली हेय योनियों में जिस प्रकार का जीवनयापन करना पड़ा है, जिस प्रकार स्वभाव रहा है। वे कुसंस्कार बीजरूप में मनुष्य योनियों में भी कहीं छिपे पड़े रहते हैं। तनिक-सा अवसर पाते ही वे उगने और बढ़ने लगते हैं।

समाज में सर्वत्र कुविचारों और कुकर्मों का प्रचलन है। अनपढ़ व्यक्तियों की कमी नहीं, वे स्वेच्छाचार बरतते हैं। मर्यादाओं के पालन का भी ध्यान नहीं रखते। अनुशासनहीन, उच्छृंखल, उद्दंडस्तर का जीवनयापन करते असंख्यों को देखा जा सकता है। उसका विस्तार विषाणुओं की तरह होता रहता है। चेचक, हैजा जैसी बीमारियाँ एक से दूसरे को छूत बनकर लगती हैं। कुविचार भी इसी प्रकार अपना विस्तार करते हैं।

किंतु सद्विचारों को उगाने में पूरे परिश्रम के साथ जुटना पड़ता है और पोषण की सभी सुविधाओं को एकत्रित करना पड़ता है। बबूल चाहे जहाँ उग आते हैं, पर संतरे उगाने के लिए पूरी सतर्कता से काम लेना होता है। सद्विचारों की कृषि करना ही मूल्यवान खेती उगाने की तरह है। जो उसमें सफल होते हैं, वे समृद्ध, संपन्न, और सुसंस्कृत बनते हैं। सत्प्रयोजनों में प्रगति के लिए सुविकसित व्यक्तित्व की आवश्यकता होती है। सद्गुणों की विभूतियाँ ही अनेक प्रकार की सफलताओं का सुयोग बिठाती हैं। प्रतिभावान और प्रामाणिक व्यक्ति ही दूसरों पर अपनी छाप छोड़ते हैं, सम्मान और सहयोग अर्जित करते हैं। इन्हें सत्परामर्श भी मिलता है और उपयुक्त सहकार भी। इस प्रकार अपनी योग्यता, तत्परता और दूसरों की सहकारिता, दोनों मिलकर अभीष्ट प्रगति के लिए आवश्यक वातावरण बनाती हैं। इसी क्रम में आगे बढ़ने का— सफल होने का सुयोग बनता है।

प्रतिभावान व्यक्तित्व सद्विचारों का ही प्रतिफल है। विचार मनःक्षेत्र में छाए रहते हैं। आकांक्षा उभारते हैं। योजना बनाते और जिस लक्ष्य तक पहुँचाना है, उसकी रूपरेखा गढ़ते हैं। इसी आधार पर यह सूझ पड़ता है कि प्रगति के लिए किन साधनों की आवश्यकता पड़ेगी। किनका परामर्श, मार्गदर्शन, सहयोग अभीष्ट होगा। इन आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए उपाय खोजे जाते हैं, तालमेल बिठाए जाते हैं और अंततः सफल होकर रहा जाता है। बुरे विचार भी इसी प्रकार फलित होते हैं और सद्विचारों का विस्तार भी इसी क्रम में होता है। विचार बीज है और स्वभाव उसका प्रस्फुटित अंकुर। व्यक्तित्व के रूप में वे ही वृक्ष बनते हैं, परिपक्व होने पर उन्हीं पर बीज के अनुरूप फल आते हैं।

कुविचार व्यक्ति को असभ्य-अनपढ़ बनाते हैं। अनेकों बुरी आदतें भी खरपतवार की तरह साथ ही  उग पड़ती हैं। दुर्व्यसनों की एक शृंखला साथ चलती है। कुकर्मी सहयोगी हर जगह आसानी से मिल जाते हैं। ऐसी दशा में आए दिन कुकर्म ही बन पड़ते हैं। परिणाम दुर्गति के रूप में सामने आता है। हेय आचरण अपनाने वाले भर्त्सना, प्रताड़ना सहते और पतन-पराभव के गर्त्त में गिरते हैं। एक की छूत दूसरे को लगती है, और देखते-देखते चांडाल चौकड़ी गठित हो जाती है। इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए शरीर को स्वस्थ और सुंदर बनाने के लिए जितना प्रयत्न किया जाता है, उससे भी बढ़कर विचारों के संशोधन का, परिमार्जन-परिष्कार का प्रयत्न करना चाहिए।

स्वास्थ्य प्रधानतया आहार और व्यायाम पर निर्भर है। ठीक उसी प्रकार मानसिक परिमार्जन के लिए स्वास्थ्य और सत्संग का आश्रय लिया जाना चाहिए। पुस्तकें पढ़ते रहना स्वाध्याय नहीं है, वरन इस प्रयोजन के लिए मात्र उसी साहित्य की जरूरत पड़ती है, जो जीवन की प्रस्तुत गुत्थियों का समय के अनुरूप समाधान प्रस्तुत कर सके। यह लिखा हुआ भी युग मनीषियों द्वारा ही होना चाहिए, क्योंकि वे बदलती हुई परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए व्यावहारिक समाधान सुझाते हैं। पुरातन कथा-गाथाओं को पढ़ते-दुहराते रहना निरर्थक है, क्योंकि वे उस समय को ध्यान में रखकर लिखी गई होती हैं, जो अब से बहुत पीछे रह गया और उन दिनों का चिंतन आज के लिए किसी प्रकार उपयोगी नहीं रहा। यही बात सत्संग के संबंध में भी है। जो समय के अनुरूप है, जिनमें सामयिक समाधान है, उन्हीं को सत्संग में सम्मिलित करने योग्य विचारधारा मानना चाहिए। इन दोनों आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए युगधर्म और व्यावहारिकता का पूरा-पूरा ध्यान रखना चाहिए। इस योग्य साहित्य और व्यक्ति कठिनाई से ही मिलते हैं, फिर भी ढूँढने पर वे किसी-न-किसी प्रकार कहीं-न-कहीं से मिल ही जाते हैं। प्रश्रय उन्हीं का लिया जाना चाहिए।

मनन और चिंतन भी प्रकारांतर से स्वाध्याय और सत्संग की आंशिक आवश्यकता पूरी करते हैं। अपनी तर्कबुद्धि विकसित की जानी चाहिए और सामने प्रस्तुत समस्याओं में से प्रत्येक पर पक्ष हो या विपक्ष दोनों को आधार मानकर विचार करना चाहिए। इस प्रकार अपनाया गया जीवनक्रम विचारशीलता को परिमार्जित करता है।


सद्विचार

जीवन एक संग्राम है, जिसमें सुख और दुःख दोनों समान रूप से आते हैं, दुःख के बाद ही सुख की अनुभूति सुखद लगती है। दुःख के बीच ही सुख है। मधु (शहद) मक्खियों के छत्ते से निकलता है। उन मक्खियों के जहरीले डंक होते हैं। उनके बटोरे हुए मधु को वही मनुष्य प्राप्त कर सकता है, जो उनके डंक से नहीं घबराता। गुलाब के पौधों में सुगंधमय पुष्पों के साथ-साथ काँटे भी लगे रहते हैं। उनके पुष्पों के सौरभ का आनंद वही मनुष्य लेता है, जिसे काँटों की पीड़ा सहन करने का साहस हो। संसार में जितने महान पुरुष हुए हैं, सबके मार्ग में विकट कठिनाइयों के जाल बिछे देखे गए हैं। वास्तव में महानता दुर्गम संकटों का आवाहन करती है और उनका निराकरण करके ही अपने अस्तित्व को सार्थक सिद्ध करती है। महानता गुलाब के फूलों की सेज से उठाकर काँटों की झाड़ी सहज पहुँचा देती है, किंतु साथ ही महानता के साथ अमरता— अमृत भी है, जबकि सांसारिक भोग-विलास में केवल दो घड़ी का मनोरंजन कराने वाली मदिरा।


मनीषी की सेवा-साधना

संत और शिल्पी, शिल्पी और संत। दोनों एकदूसरे के पूरक अथवा यों कहें, दोनों एक हैं। संत वही है, जिसने अपने को भली-भाँति गढ़ा हो। गढ़ने की समूची कुशलता अपने जीवनरूपी पत्थर पर दिखाई हो, उसे एक देवता के रूप में सँवारा हो, जिसमें यह कुशलता है, वही दूसरों को सँवार-निखार सकता है।

यह बात जीवन के संदर्भ में जितनी सच है, साहित्य रचना के संबंध में उतनी ही खरी उतरती है। साहित्य रचना सिर्फ शब्दों व अक्षरों का कौतुकपूर्ण विन्यास नहीं, वरन वाक्यों और रचना के माध्यम से रचनाकार उन भावों को उड़ेलता है, जिनसे उसका अंतर लबालब भरा हुआ है। रचना तभी जीवंत होती और अपना अनुकरण करने को बाध्य करती है। अन्यथा व्याकरण और शब्दों की दृष्टि से ठीक रहने पर भी निष्प्राण बनी रहती है।

आचार्य महावीर प्रसार द्विवेदी के ये विचार सिर्फ मन की तरंगें भर नहीं है। उनका समूचा जीवन इन्हीं भावों से ओत-प्रोत था। प्रभावी साहित्यकार के पीछे उनका प्रभावी जीवन था। जिसे उन्होंने इन्हीं विचारों के अनुरूप गढ़ा— ढाला था।

एक बार उन्होंने पुरुलिया कुष्ठाश्रम के बारे में एक लेख पड़ा। पढ़कर जो भाव आए उन्हें संपादक को लिख भेजा— "भाई! तुम्हारा लेख पढ़कर मैं रो पड़ा। मैं बड़ी देर तक विह्वल रहा। धन्य उफमैन साहब! मेरे हृदय में अजीब परिवर्तन हो गया है। दूसरों का दुःख सहन नहीं किया जा सकता। पेंशन के 7 रुपए में से 5 भेज दिए हैं। अब मन बेचैन है कि सातों क्यों नहीं भेजे जा सके?"

उनका यह अंतस् क्या किसी संत के अंतराल से कम है। वह कहा करते थे— "साहित्यकार को समाजसेवी होना आवश्यक है, तभी वह समाज में जाग्रति पैदा करने वाला साहित्य दे सकता है।" स्वयं उन्होंने ऐसा किया भी। उन्होंने अपने जीवन का बहुत समय किसानों की सेवा में बिताया। अंत तक इसे निभाते रहे। श्री बनारसी दास चतुर्वेदी ने उनके बारे में लिखा है— "द्विवेदी जी पूरी तल्लीनता से किसानों के पास जाते, उनकी समस्याएँ सुनते और निवारण के प्रयास करते। एक बार किसी किसान का लड़का जंगली खाद्यान्न की रोटी खा रहा था। आगे चले तो पाया कि एक किसान नया अन्न खाकर बीमार पड़ गया है। लौट चले घर की ओर, एक के लिए सब्जी, दूसरे के लिए दवा लेकर हाजिर हो गए।"

बनारसी दास जी के पूछने पर उन्होंने कहा— " सेवा और साहित्य रचना को दो समझना भूल है। ये दोनों ही एक सिक्के के दो पहलू भर है।" स्थिति को देखे, जाने और उसके साथ गहरा तादात्म्य बिठाए बिना भला समाधान कैसे प्रस्तुत किया जा सकता है? इससे एक लाभ और मिलता है कि विभिन्न अंचलों में रहने वाले जनसमुदाय की मानसिक संरचना के बारे में गंभीर और बारीक जानकारियाँ मिलती हैं। इसी आधार पर प्रभावी ढंग से शैली का परिवर्तन, गठन और सुधार किया जा सकता है।

फिर उन्होंने बर्नार्ड शॉ के कथन का उल्लेख करते हुए कहा— "साहित्य सृजन एवं समाज निर्माण दोनों एक हैं। जीवन का उपयोग इस महान उद्देश्य के लिए किया जाए। हम ईश्वर की एक शक्ति के रूप में विकसित हों, न कि क्लेश, शोक, और उपालंभों के ज्वरग्रस्त और क्षुद्र मृतपिंडों के रूप में।"

द्विवेदी जी ने स्वयं को ईश्वर की एक शक्ति के रूप में समझा और सेवा-सृजन को एक किया। गणेशशंकर विद्यार्थी, मैथिलीशरण गुप्त जैसे अनेकों को सामान्य से उठाकर मूर्धन्य बनाया। एक समूचा युग ही द्विवेदी युग के रूप में सँवारा। क्या आज के तथाकथित साहित्यकार इस साहित्यशिल्प के सर्वज्ञ से कुछ सीख ले पाएँगे?


अपना देश बनेगा सारी दुनिया का सरताज

भारतवर्ष के अतीत के गौरव से सभी भलीभाँति परिचित हैं व यह सभी जानते हैं कि सोने की चिड़िया कहा जाने वाला यह देश विगत दो सहस्राब्दियों से गुलामी के पाश में जकड़ा रहा। उसे स्वाधीनता मिली व अपनी गहरी सांस्कृतिक जड़ों के कारण उसने क्रमशः उठने का उपक्रम आरंभ किया।

‘टाइम पत्रिका' के 3 अप्रैल 1989 के अग्रलेख में आयुध बल की दृष्टि से भारत को अभी विश्व में रूस, चीन, अमेरिका के बाद चौथे नंबर पर मानते हुए लेखक श्री राॅस.एच.मुनरो लिखते हैं कि, "राष्ट्र के प्रति समर्पण की भावना, अपनी सांस्कृतिक विरासत, आध्यात्मिकता की गहरी जड़ें तथा वैज्ञानिक— मनीषा समुदाय की प्रखर मेधाशक्ति भारत को निश्चित ही मात्र महाद्वीप की नहीं, विश्वमात्र की एक महाशक्ति बनाकर रहेंगे।" उनका कथन अनेकानेक तथ्यों पर आधारित है, जो उनने अपने लेख में साक्षी रूप में प्रस्तुत किए हैं। वे कहते हैं कि अभी तक साँप व साधुओं, मच्छर व मलेरिया का देश माना जाने वाला भारतवर्ष सोया पड़ा था, किंतु यह दैत्य जाग उठा है। गत दो शताब्दियों में जन्मे महापुरुषों ने जनचेतना को प्रचंड रूप से उभारा है एवं अस्सी करोड़ से भी अधिक की आबादी की दृष्टि से विश्व की दूसरे नंबर की लोकशक्ति अगले दिनों अपने कर्त्तृ‌‍‌‌‌‌‌‍‌‍‌‍त्वों से एक जनक्रांति कर दिखाएगी, यह सुनिश्चित बना दिया है।

वस्तुतः भारत का आकलन एक उभरती हुई महाशक्ति के रूप में किए जाने की माँग पाश्चात्य देशों के बुद्धिजीवी वर्ग के मध्य से ही उठी है। वे भारत को अपनी आशा का, उज्ज्वल भविष्य का केंद्रबिंदु मानते हैं व कहते हैं कि पश्चिम जगत इस समय 'क्राइसिस ऑफ आयडियाज' (वैचारिक संकट) से गुजर रहा है। नैतिक मूल्यों पर अनास्था ने एक ऐसी वैचित्र्यपूर्ण स्थिति उत्पन्न कर दी है कि वे अब आगे 'क्या किया जाए, क्या न किया जाए?' इस असमंजस की स्थिति में स्वयं को पाते हैं। इसका विवरण अपनी पुस्तक 'द टर्निंग प्वाइंट' में देते हुए डाॅ. फ्रिट्जाफ काप्रा कहते हैं कि, “जब तक पूर्व से मार्गदर्शन लेकर बुद्धिजीवी एवं वैज्ञानिक स्वयं को मकड़ी के जाल से नहीं निकालते, तब तक सारे समाज में व्यापक चिंतन आ ही नहीं सकता।”

“हमारे सांस्कृतिक संकट (कल्चरल क्राइसिस) का मूल कारण यह है कि अग्रगामियों के पास— नेतृत्व करने वालों के पास बदलते युग के साथ न तो समस्याओं के समाधान हैं न कोई विकल्प है।” वे कहते है कि, “सारी मानव जाति इस समय उतरते हुए ज्वार, चढ़ते हुए भाटे के समान एक ऐसे बिंदु पर खड़ी है, जहाँ भविष्य का निर्धारण होना है। बदलाव के इस बिंदु को चीनी संस्कृति में 'वायंजी' नाम से संबोधित किया जाता है। इसका अर्थ होता है— "खतरों से भरी विभीषिका एवं बदलाव के अवसर उत्पन्न होने की परिस्थितियाँ”। इस प्रकार प्रकारांतर से युगसंधि की तमिस्रा एवं नवयुग के अरुणोदय का अभिनव सम्मिश्रण इस शब्द में है। डाॅ. काप्रा कहते हैं कि “पाश्चात्य समाजविद अब मान चुके हैं कि सारा विश्व इन दिनों परिवर्तन की संधिवेला से गुजर रहा है। पूर्वार्द्ध के रूप में मनोरोगों की बढ़ोत्तरी, युद्धोन्माद की स्थिति, बढ़ता आतंकवाद, सामाजिक विघटन हमारे सम्मुख है, किंतु उत्तरार्द्ध के रूप में शांति को संकल्पित भावी महामानवों की पीढ़ी यह आश्वासन दिलाती है कि जो कुछ अभी दिखाई दे रहा है, वह क्षणिक है। परिवर्तन की गतिशीलता यह बताती है कि इक्कीसवीं सदी उज्ज्वल भविष्य लेकर आ रही है व उसमें भारत की प्रमुख भूमिका होगी।” जो डाॅ. काप्रा के चिंतन के मूल में निहित परोक्ष प्रेरणा को समझेंगे, वे इनके इस कथन पर अविश्वास नहीं करेंगे।


मरण के बाद भी है एक विलक्षण दुनिया

मरणोपरांत जीव कहाँ होता है, उसकी क्या गति होती है? यह जानने की उत्सुकता जनसाधारण में देखी जाती है। इस संबंध में विभिन्न देशों, मतों, संप्रदायों में अनेकों किम्वदंतियाँ, दंतकथाएँ, मान्यताएँ, विश्वास और मत प्रचलित हैं। धरती के अधिकांश निवासी आज तक इसी भ्रम में हैं कि मरणोपरांत सब कुछ समाप्त हो जाता है। कुछ लोगों का मत है कि मरने के उपरांत जीव नरक, स्वर्ग, दोजख, हैवन में जाता है। जहाँ वह कर्मानुसार फल भोगता है। सदियों से इन्हीं विश्वासों से गुजरते हुए मनुष्य की जिज्ञासाएँ अभी भी पूरी नहीं हो सकी हैं। इस संबंध में अनेक देशों में शोध-प्रयास किए जा रहे हैं। विज्ञान के बौने हाथ अभी तक इस रहस्य से परदा उठाने में थोड़ी-बहुत ही सफलता पा सके हैं।

अध्यात्मवेत्ताओं की तरह सूक्ष्मदृष्टि न होने पर भी अपने अधिक प्रयास से विज्ञानवेत्ताओं ने यह ज्ञात कर लिया है कि प्रत्यक्ष जगत से जुड़ा एक अदृश्य जगत भी है, जिसकी प्रत्यक्ष अनुभूति तो नहीं होती, किंतु अस्तित्व का परिचय समय-समय पर अनेकानेक प्रमाणों से मिलता रहता है। शिकागो विश्वविद्यालय में साइकोलॉजी विभाग की प्राध्यापिका डाॅ. एलिजाबेथ कुबलर ने मृत्यु विज्ञान (थेनेटोलाॅजी) पर गहन अनुसंधान किया है। उन्होंने एक हजार से अधिक ऐसे व्यक्तियों से संपर्क साधने में सफलता प्राप्त की है, जो घंटों मृत अवस्था में रहे और प्रयास करने पर उनको पुनः जीवित किया जा सका। इस काल में मृतक रहने वाले व्यक्ति ने जो कुछ देखा, अनुभव किया, उन्हीं के बड़े रोचक और जानकारियों से परिपूर्ण संस्मरण एकत्रित किए हैं। इस कार्य में उन्हें सात वर्ष से भी अधिक का समय लगा।

श्रीमती कुबलर एक दस वर्षीय बालक, जो दो घंटे से भी अधिक समय तक मृत रहा, के संस्मरण लिखती हैं कि, "मरणोपरांत उसे उसका भाई मिला, जिसने उसे सांत्वना दी और ढांढस बँधाते हुए कहा कि उसे अभी यहाँ नहीं आना चाहिए था, अन्यथा माँ-बाप भी उसके गम में बच न सकेंगे। उसकी बात मानकर वह लौट आया, किंतु इस मृत बालक को इसके अभिभावकों ने पूर्व मृत भाई के बारे में कभी कुछ नहीं बताया था। यह जानकारी उसको अपने मृत भाई की आत्मा से मिली। इस घटना से स्पष्ट होता कि मृतात्मा के सगे-संबंधी अदृश्य लोक में निवास करते हैं। वे कब, किस जन्म से संबंधित रहे होते हैं, यह स्पष्ट नहीं कहा जा सकता।

सुप्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक अनुसंधानकर्त्ता सर राबर्ट कूक ने अपनी कृति 'टेक्नीक्स ऑफ एस्ट्रल प्रोजेक्शन' में बताया है कि मृतक व्यक्ति के मित्र, स्वजन कई प्रकार से सहायता पहुँचाते हैं। विशेषकर नवागत जब भय से त्रस्त होता है, तो वे उस का भय दूर करने का प्रयास करते हैं। ढांढस बँधाते, सांत्वना प्रदान करते हैं। उनके अनुसार बालकों की मृत्यु के मामले में एक सामान्य तथ्य उजागर हुआ है कि वे सर्वाधिक अपने माँ-बाप को चाहते हैं। मरणोपरांत उन्हें देवदूत अथवा निकट के परिजन से ही भेंट होने का अनुभव होता है। अधिकांश ने यही बताया कि मरणोपरांत वे अकेले नहीं रहे। उनकी भेंट किसी-न-किसी से अवश्य हुई। इससे सिद्ध होता है कि दृश्य जगत की तरह अदृश्य जगत में भी चहल-पहल और हलचल सतत बनी रहती है।

अमेरिकन सोसाइटी फॉर साइकिकल रिसर्च के वरिष्ठ अनुसंधानकर्त्ता डाॅ. कार्लेसिस के अनुसार मृत व्यक्ति के स्वजन-संबंधी अपने मृत मित्र को लेने उसी तरह आते है, जैसे कि वह किसी सुदूर यात्रा से लौटकर आ रहा हो। अपने मृत स्वजनों को देखकर उसे बड़ी शांति अनुभव होती है और मृत्यु का कष्ट और बिछुड़ने का शोक कम हो जाता है। उन्होंने अपनी शोध में स्पष्ट किया है कि आत्मा का अस्तित्व मस्तिष्क से अलग है। 'आउट ऑफ बॉडी एक्स्पीरियन्सेस' नामक अपनी पुस्तक में मरणोत्तर संपर्क के, अपने निजी अनुभव के संबंध में उन्होंने एक सत्य घटना का वर्णन किया है। उनके अनुसार सियान्स नगर, अमेरिका में एक ट्रक ड्राइवर था। रात को गाड़ी चलाकर जा रहा था कि आइसलैंड की शीतभरी रात से बचने के लिए नदी किनारे ट्रक रोक दिया। जहाँ अतिशीत के कारण उसकी मृत्यु हो गई। ड्राइवर की लाश लावारिस पड़ी रही। जहाँ पशु-पक्षियों ने खा डाली, उसको विधिवत दफनाया नहीं जा सका। उसके टाँग की बची हड्डी को पास में रहने वाले बढ़ई ने अपने घर की दीवार में सुरक्षित रख दिया। मृतक ट्रक ड्राइवर की आत्मा बरसों भटकती रहीं। उसे सद्गति न मिल सकी। एक दिन स्वप्न में प्रकट होकर अपने भाई से उसने प्रार्थना की कि यदि आप मेरी टाँग की हड्डी को बढ़ई की दीवार से निकालकर पास के कब्रगाह में दफना दें तो आपका बड़ा उपकार होगा। स्वप्न में बताए गए ठौर-ठिकाने का अता-पता भी भाई को बता दिया गया। सत्यता की जाँच करने उसका भाई बतलाए गए स्थान पर पहुँचा। वास्तव में वहाँ बढ़ई रहता था और उसने दीवार में हड्डी लगा रखी थी। सारा वृतांत बताने पर वह हड्डी उसके भाई को सौंप दी गई, जहाँ पास के कब्रगाह में उसे विधिवत दफना दिया गया तथा बाद में प्रार्थना की गई। उस रात मृतक ड्राइवर की आत्मा पुनः अपने भाई के समक्ष प्रकट हुई और कहा कि अब वह पूर्ण संतुष्ट है।

'फ्रन्टियर्स ऑफ द आफ्टर लाइफ' के लेखक एडवर्ड सी. रेंडेल ने भी एक ऐसी दिवंगत आत्मा के अनुभवों को निम्न शब्दों में व्यक्त किया है— “मरने के बाद मैंने स्वयं को चारों ओर से स्वजन-संबंधियों से घिरा हुआ पाया, जो आत्माएँ मुझे लेने आई वे चलने को कह रही थी, किंतु उस समय सगे-संबंधी रो-धोकर मुझे न जाने के लिए बाध्य कर रहे थे” इसी तरह का कथन मूर्धन्य परामनोविज्ञानी डाॅ. जे. आर्थर फिडले का भी है। उन्होंने अपनी कृति 'व्हेयर टू वर्ल्ड्स मीट' में लिखा है कि मरणशय्या पर लेटे व्यक्ति को अपने विगत जीवन की पूरी फिल्म दिखाई देने लगती है। जो व्यक्ति दूसरी दुनिया में प्रयाण के पूर्व ही लौट आए, वे इसका प्रमाण देते हैं। ऐसे कोई 1300 हवाले उन्होंने एकत्र किए हैं। डाॅ. रेमंड मूडी का इस विधा पर किया गया अध्ययन तो अपने आप में एक मिसाल है।

पूर्वार्त्य दर्शन की मान्यता है कि जन्म और मृत्यु तो इस शरीर के साथ घटित होने वली प्रक्रियाएँ है। आत्मा अजर, अमर, अविनाशी है तथा मरणोपरांत भी कोई दुनिया होती है, पूर्णतः तथ्यसम्मत है। यदि मनुष्य इस मान्यता को परिपक्व करता चले तो आस्तिकता उसके जीवन का एक अविच्छिन्न अंग बनकर रहेगी।


प्रतिकूल मौसम से भी मोर्चा लीजिए

प्रतिकूलताओं से मोर्चा लेने हेतु मनुष्य के पास जो सबसे बड़ी ताकत है, वह है— जीवनी शक्ति का अकूत भांडागार। यही है, जो उसे मानसिक तनाव से लेकर शरीर पर पड़ने वाले वातावरण के उद्दीपनों से बचाता व उसके स्वास्थ्य की रक्षा करता है, किंतु पिछले दिनों इस संबंध में चिकित्सा विज्ञान ने जो शोधकार्य किया है, वह इस निष्कर्ष पर पहुँचा है कि प्रचुर जीवनी शक्ति होते हुए भी मनुष्य कभी-कभी प्रतिकूल मौसम या वातावरण में विद्यमान आयन्स से मात खा सकता है।

मौसम की यह प्रतिकूलता या आयन्स की यह कमी क्या होती है व कैसे शरीर व मन को प्रभावित करती है? इस पर व्यापक वैज्ञानिक अनुसंधान हुए हैं। प्रयोगों से यह निष्कर्ष निकला है कि अगर वायु में ऋणात्मक आवेश वाले आयन अपेक्षाकृत अधिक हों तो मानव मन शांत रहता है, सृजनात्मकता बढ़ती है एवं वातावरण प्रफुल्लित बन जाता है। इसके विपरीत धनात्मक आवेश वाले आयनों की अधिकता व्यक्ति को चिड़चिड़ा व बेचैन बना देती है, काम करने में मन नहीं लगता तथा कभी-कभी उन्मादग्रस्त मनःस्थिति हो जाती है।

ऋण आयन अधिकतर समुद्रीतटों, नदी के किनारों, पहाड़ों, पर्यटनस्थल पर स्थित होते हैं। ऐसे वातावरण में मनुष्य का मन तथा शरीर स्फूर्ति तथा ताजगी महसूस करता है। इसके विपरीत प्रदूषित वातावरण में, औद्योगीकृत स्थानों पर, भीड़ भरी जगहों पर, निर्वनीकृत स्थानों पर, वातानुकूलित कक्षों में, धन आवेश युक्त प्रधान कण अधिक होते हैं।

मौसम अपने इन आयन्स के कारण किस प्रकार जनमानस को प्रभावित करता है, इस पर 'बायोमेटिऑरालाॅजी' नामक विद्या पिछले दिनों तेजी से विकसित हुई है। न्यूयार्क के डाॅ. स्टीफन रोजेन ने एक पुस्तक लिखी है— 'वेदर सेन्सीटिविटी' (संवेदनशील मौसम)। इस पुस्तक में वे लिखते हैं कि, "मानवी स्वास्थ्य के लिए मौसम एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। वातावरण में तापमान व नमी में अचानक हुए परिवर्तन मन के ऊपर गहरा प्रभाव डालकर शारीरिक क्रियापद्धति को बुरी तरह झकझोर देते हैं। कभी-कभी कोई व्यक्ति यह शिकायत करे कि मौसम में परिवर्तन के कारण उसे जल्दी थकान आने लगी है, वह चिड़चिड़ा हो उठा है व बेचैनी उसे परेशान करती है, रात्रि को नींद उसे ठीक से नहीं आती, सारा बदन टूटता-सा लगता है, स्नायविक शिथिलता अनुभव होती है, अवसाद व उत्तेजना के दौरे आने लगते हैं, तो हमें यह नहीं सोचना चाहिए कि वह बहानेबाजी कर रहा है। कभी-कभी यह सब वातावरण की विद्युत का चमत्कार भी हो सकता है। ये सभी लक्षण जब सामान्यतया स्वस्थ व्यक्ति में दृष्टिगोचर होने लगे तो समुचित उपचार की व्यवस्था की जानी चाहिए। यह बात अलग है कि अत्यधिक भावुक, संवेदनशील व्यक्तियों में ये लक्षण अधिक तीव्रता से प्रकट होते हैं व मनोबल की दृष्टि से मजबूत, संतुलित व्यक्ति में कम तीव्रता से। मौसम के मानव पर पड़ने वाले प्रभाव संबंधी इस तथ्य के संबंध में चिकित्साजगत में न केवल संदेह-शंका संव्याप्त है, यह भी कहा जाता रहा है कि यह केवल एक बहाना है अथवा मनोवैज्ञानिक अनुभूति है।

हंगरी, रूमानिया, यूगोस्वालिया, आस्ट्रिया, जर्मनी, रूस के चिकित्सकों की यही मान्यता है कि मानवी स्वास्थ्य सुनिश्चित रूप से वातावरण में विद्यमान घटकों से प्रभावित होता है एवं इस पर किए गए उनके शोध-निष्कर्ष भी उनकी मान्यताओं के पक्ष में गए हैं। जबकि अमेरिकन, ब्रिटिश इन मान्यताओं, आँकड़ों से इतना सहमत नहीं हैं। जहाँ तक जनमान्यताओं का प्रश्न है, पूरे विश्व में दो-तिहाई व्यक्ति इस बात को मानते हैं कि मौसम प्रतिकूल रूप से मानवी मन को प्रभावित करता है। इसी कारण मौसम का पूर्वानुमान ज्ञात करने की जिज्ञासा बढ़ती ही चली जा रही है, ताकि समय रहते सावधान रहा जा सके। वैज्ञानिक कहते हैं कि हमारा शरीर वातावरण से लगातार बिजली पीता रहता है। माध्यम बनते हैं— फेफड़े। ली गई श्वास के माध्यम से ये आवेशित कण अंदर प्रवेश कर जाते हैं। यदि यह बिजली न हो तो शरीर जी ही न सके, किंतु हवा में तैरते ये आयन्स फेफड़ों के टीश्यूज के माध्यम से स्नायु संस्थान को व समस्त अंग-अवयवों को प्रभावित करते हैं। चूँकि ऑक्सीजन प्राणवायु के साथ फेफड़ों में स्थित सूक्ष्म रक्तवाही नलिकाओं, (कैपीलरीज) द्वारा ही प्रवेशकर अंग-प्रत्यंग तक पहुँचती है, इसके साथ ऋणात्मक आवेश वाले कण भी पहुँच जाते है, यदि वे वातावरण प्रदूषित है तो धन आयन्स अंदर पहुँच जाएँगे व जीवनी शक्ति प्रतिरोधी सामर्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डालेंगे। बहुसंख्य व्यक्तियों में आज यही हो रहा है।

स्वतंत्र इलेक्ट्राॅन से चिपके न्यूट्रल परमाणु का आवेश निगेटिव कहलाता है, जबकि इलेक्ट्राॅनरहित परमाणु पाॅजेटिव आयन कहलाता है। यह विद्युत वातावरण में चारों ओर बिखरी पड़ी रहती है, जिसमें हम साँस लेते हैं। कुछ आयन्स भारी होते हैं व कुछ हलके। धूल, धुआँ और धमाके के साथ जुड़कर ये भारी, धनात्मक व घने हो जाते हैं तथा एलर्जी, दमा जैसी स्थिति पैदा कर सकते हैं।

आयन मानवी काया के सामान्य क्रिया-व्यापार के लिए बहुत जरूरी है। जहाँ भी वृक्ष-वनस्पति, प्राकृतिक वातावरण, निर्झर, निर्मल नदी या सरोवर, समुद्री किनारा, पर्वत आदि होंगे व प्रदूषण की मात्रा कम होगी, वहाँ ऋण आयन्स का वास सर्वाधिक होगा। चिकित्सक इसीलिए ऐसे वातावरण में जाने व कुछ दिन रहकर स्वास्थ्य लाभ की सलाह देते हैं। सेनेटोरियमों का प्रचलन इसी कारण बढ़ा है। जहाँ ऐसा वातावरण नहीं होता— व्यक्ति अवसाद, तनाव, सिरदरद, उदासी से घिर जाता है, जल्दी-जल्दी उत्तेजित होने लगता है, रक्त का दबाव बढ़ जाता है व बीमारी के लक्षण विद्यमान हों तो और भी अधिक बीमार पड़ने के अवसर बढ़ जाते हैं। जबकि इसके विपरीत ऋण आवेशयुक्त वातावरण रोगी को भी स्वस्थ कर देता है। यही कारण है कि आजकल पश्चिम जगत में कार्यालयों में, टैक्सियों में नेगेटिव आयन जेनरेटर खुलकर प्रयुक्त होने लगे हैं।

वैज्ञानिकों का मत है कि असंतुलित प्रतिकूल मौसम, जिसमें नेगेटिव आयन घट जाते हैं, छाती के दरद, बेहोशी, दमा, खाँसी, अपच, आँखों के अंदर तनाव में वृद्धि (ग्लाकोमा), सरदी, जुकाम, एलर्जिक बुखार, पेट का अल्सर, न्यूराइटिस, जोड़ों में दरद आदि रोगों के लक्षणों को बढ़ा सकता है। इसमें आर्द्रता, कुहासा, ठंडक का होना प्रमुख भूमिका निभा सकते हैं। वे यह भी कहते हैं कि काम में लगन, सिरदरद, मूड, निद्रा, दुर्घटना तथा आत्मघात जैसे लक्षण इस सीमा तक प्रभावित होते हैं कि व्यक्ति की कार्यक्षमता कुंठित हो जाती है एवं बहुसंख्य आत्महत्या के अवसर इसी समय पर बढ़ते हैं।

प्रश्न यह उठता है, किया क्या जाए? क्या प्रतिकूल मौसम के समक्ष हाथ टेक दिए जाएँ? मनश्चिकित्सक कहते हैं कि "नहीं"। व्यक्ति को जूझने का प्रयास करना चाहिए एवं प्राणायाम, ध्यान, शिथिलीकरण, प्राकृतिक साह्चर्य आदि का यथासंभव अधिक अवलंबन लेना चाहिए। इससे प्रतिरोधी सामर्थ्य बढ़ती है व प्रतिकूलताओं से मोर्चा लेने का साहस जागता है। यदि मनोबल बनाए रहा जा सके तो मस्तिष्करूपी चुंबक, ऋण आयंस को आकर्षित भी करता रह सकता है। आयंस की महिमा निराली है, उतना ही विलक्षण, क्षमतासंपन्न है— 'मनुष्य'। उसे हार नहीं मानना चाहिए। किसी भी स्थिती में नहीं।


कहानी & सद्विचार

कहानी

बुद्ध के पास यदि कोई ध्यान सीखने जाता तो वे उससे कहते— "पहले तीन महीने मरघट पर रहकर आओ", किंतु वह कहता— "मैं ध्यान सीखने आया हूँ। मरघट से आपका क्या मतलब?" बुद्ध कहते कि, "जो आदमी मौत के प्रति नहीं जागा, वह अंतर्मुखी कैसे हो सकता है? पहले तुम देखकर आओ कि जिंदगी का अंतिम परिणाम क्या है? तब तुम्हारी बहिर्मुखता टूटेगी। पहले तुम देखो कि जो सफल हुए थे, वे कहाँ गए या जा रहे हैं? जिंदगी में जिन्होंने सब कुछ पा लिया, वे भी अरथी पर बँधे मरघट पहुँच रहे हैं। पहले तुम मरघट पर रहकर देख आओ कि बहिर्मुखता का अंतिम परिणाम क्या है? तब तुम अंतर्मुखी होने अर्थात ध्यान की विधा आसानी से सीख सकोगे। मुक्ति का मर्म समझ सकोगे।"

सद्विचार

किसी बात को इसलिए महत्त्व न दें कि वह पुरानी है या बड़े लोगों द्वारा अपनाई गई है। न किसी बात का महत्त्व इसलिए कम करें कि उसका प्रतिपादन कम समय से हुआ है अथवा थोड़े लोग उसका अनुकरण करते हैं। विवेक की कसौटी पर जो खरा उतरे, वह अपनाया जाना चाहिए, भले ही वह नया हो या पुराना। बड़ों ने किया है या छोटों ने कहा है, इसे भी महत्त्व नहीं मिलना चाहिए।


संपदा का उपभोग नहीं, उपयोग

समूचे संसार में ख्यातिप्राप्त मोटरगाड़ी के निर्माता एवं संस्थान के मालिक हैनरी फोर्ड जो कोट पहनकर ऑफिस आए, वह बहुत पुराना और एक स्थान पर फटा हुआ था।

फोर्ड अपने काम में इतने व्यस्त रहते कि उन्हें अपने कपड़ों का ध्यान नहीं रहता, पर इतने बड़े धनपति, उद्योगपति का ऐसा फटा कोट पहनना उनके सेक्रेटरी को उनके सम्मान के अनुरूप नहीं लगा। उसने मालिक का ध्यान कोट की ओर दिलाते हुए कहा— साहब! अब आप नया कोट सिलवा लें तो ठीक रहेगा। इतने बड़े आदमी होकर फटा कोट पहन रखा है, लोग क्या कहेंगे”?

सेक्रेटरी की बात सुनकर किंचित मुस्कुराते हुए वे बोले— "मुझे अमेरिका के सभी लोग जानते हैं। वे कहेंगे क्या? इसी कोट की मरम्मत करवा लेंगे तो यह नए का रूप ले लेगा”। साहब के मुँह से ऐसी बात सुनकर वह उनकी इस सादगी से बहुत प्रभावित हुआ और चकित भी।

दूसरे दिन सेक्रेटरी उनके पास दिन भर के कामों के बारे में आदेश लेने के लिए पहुँचा तो उन्होंने दिन भर के अन्य व्यावसायिक कामों के साथ एक काम यह भी लिखाया— अपने पुराने कोट की मरम्मत करवाना। पुराना कोट रफू होकर आ गया, वे उसे ही पहनते रहे, नया नहीं सिलवाया।

कुछ दिनों के बाद उन्हें अपने व्यावसायिक कामों के सिलसिले में इंग्लैंड जाना पड़ा। तब भी वे वही फटा कोट पहने थे। इस बार सेक्रेटरी ने साहस बटोरकर पुनः कहा— "आप विदेश यात्रा पर जा रहे हैं, अब तो इस कोट को बदल लें”

हैनरी फोर्ड फिर मुस्कराए और बोले— ”भाई! वहाँ तो मुझे कोई सूरत से जानता भी नहीं है कि मैं ही हेनरी फोर्ड हूँ, फिर कोट बदलने की क्या आवश्यकता” और उसी कोट को पहने इंग्लैंड चले गए।

सेक्रेटरी की समझ में यह बात नहीं आई कि धनवान होते हुए वे पुराना कोट ही क्यों पहने रहते हैं, नया क्यों नहीं बनवा लेते? वह भले ही न जानता रहा हो, पर फोर्ड तो जानते थे कि धन की अपनी उपयोगिता है। उसका उपयोग करना चाहिए उपभोग नहीं। अतः जब तक पुराना कोट पहनने लायक रहता है, नया क्यों बनवाया जाए?

एक बार उनके पौत्र ने एक छोटे सिक्के को यों ही फेंक दिया। वह पौत्र द्वारा इस प्रकार सिक्का फेंकना देख रहे थे। उन्होंने पूछा— "बेटे! तुमने सिक्का क्यों फेंक दिया?" "दादा जी! आपके पास तो ढेरों धन है, फिर एक सिक्का फेंक देने से क्या फरक पड़ेगा।” — बालक ने उत्तर दिया।

हेनरी फोर्ड ने बालक को धन का महत्त्व बताया—  "बेटा! हमारी तरह सभी के पास धन नहीं होता और हमारे पास जो धन है, वह भी फेंकने के लिए नहीं है। हमें यह धन इसलिए मिला है कि हम उसका ऐसा उपयोग करें, जिससे जिनके पास धन नहीं है, उन्हें भी उसका लाभ मिले”। बच्चे को समझाते हुए उनने बताया कि हमारे कारखाने में जो मजदूर काम करते हैं, उन्हीं की तरह मैं भी एक दिन गरीब था। अपने पुरुषार्थ से धनी बना। हमारे पास जो संपदा आज है, उसे हम कारखाने में लगाते हैं, जिससे कितने ही लोगों को रोजगार मिलता है। यह धन समाज का है। उसी से हमें मिला है। अतः उसे फेंकना या अपनी शौक— मौज के लिए खरच करना उचित नहीं।”

फोर्ड ने पैसे की कीमत को जाना था, साथ ही उसके नियोजन की रीति को भी। धन कमाना अच्छी बात है, पर उसे नष्ट करना अथवा दुरुपयोग करना बुरी बात है। उस धन को मनुष्य व समाज की सेवा में खरच होना चाहिए। हेनरी फोर्ड इसी औचित्य मान्यता में विश्वास रखते थे। उनको सामान्य कृषक पुत्र से विश्व विख्यात धनपति बनाने में सादगी के अतिरिक्त उनका धन के प्रति यह उदात्त मानवतावादी दृष्टिकोण भी एक महत्त्वपूर्ण कारण था।


संकल्प जो फलीभूत हुआ

चौदह वर्ष की आयु में वह विवाहित हो गए। पत्नी अच्छी हिंदी जानती थी। उसके मुख से हिंदी भाषा सुनकर मन में इसे सीखने और निष्णात होने की लालसा जागी। इसे अनुपयुक्त भी नहीं कहा जा सकता। कुछ लज्जावश और कुछ भविष्य के प्रति आश्वस्त न होने के कारण वह अपनी आकांक्षा उसे बता नहीं सका। फिर पत्नी पितृगृह चली गई। युवक की कामना मन-की-मन ही रह गई। विवाह के चार वर्ष बाद पत्नी का देहांत भी हो गया।

पत्नी के मरने के साथ हिंदी सीखने की अभीप्सा नहीं मरी। उलटे वह बलवती होती गई, किंतु अहिंदीभाषी बंगाल में हिंदी किससे सीखी जाए? यदि मन में संकल्प उभरे, कुछ करने की तड़प जागे तो साधन भी जुट जाते हैं। भले वह अत्यल्प हों, पर अभीप्सु तो कम-से-कम में साध्य की प्राप्ति की कला जानते हैं। यही उनकी विशेषता है। यहाँ भी मन में सीखने की अदम्य चाह ने रास्ता सुझा दिया। उसने ‘सरस्वती’ पत्रिका के अंक पढ़कर अपने अध्यवसाय के बल पर अच्छी हिंदी लिखना आरंभ कर दिया। सरस्वती पत्रिका ने अपनी इस विशेषता के कारण हिंदी भाषा के उन्नयन में बड़ा योग दिया था। इसका श्रेय उसके तात्कालीन संपादक आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी को जाता है, जिन्होंने कुशल शिल्पकार की तरह अपना दायित्व निबाहा था।

अब तो वह आगे बढ़ा एवं हिंदी में कविताएँ लिखने लगा। कविताएँ तो लिखीं, पर इन्हें छापे कौन? इनके प्रकाशन के लिए तो पत्र-संपादकों पर निर्भर रहना पड़ता है। उसकी सभी कविताएँ लौटकर आने लगी।

पर युवक ने निराश होना सीखा न था। वह जानता था, निराशा का परिणाम है— निष्क्रियता, हताशा, भय, उद्विग्नता और अशांति; जबकि जीवन का अमर्त्य है— सक्रियता, उल्लास, प्रफुल्लता। दोनों परस्पर विरोधी हैं। जीवन है— प्रवाह, निराशा है— सड़न। जीवन पुष्प की तरह उष्ण किरणों के स्पर्श से खिलता है, मुस्कराता है, निराशा का तुषार उसे कुम्हलाने के लिए मजबूर करता है। उसने निराशाजनक भ्रांति को झटक दिया। संघर्ष की राह पर चलने की ठानी। पहले भी उसने अध्यवसाय के सहारे हिंदी सीखी थी। साहित्यकार बनने के लिए तो इसकी कुछ अधिक ही मात्रा अनिवार्य थी।

यद्यपि विपरीतताएँ तो बहुत थीं, तथापि उसने प्रकाशकों से संघर्ष किया। स्वयं पत्रिकाओं का संपादन किया। वहाँ भी यही स्थिति आई। अब संपादकों का स्थान पत्र के मालिकों ने ले लिया था।

संघर्ष चलता रहा। पास में संपदा नहीं, न कोई डिग्री, जिसके सहारे धन कमाया जा सके। उसने छोटे-से-छोटा काम किया। दवाइयों के पैंफलेट लिखे। कभी कुछ किया, पर अंदर में संकल्प था कि जनभाषा के रूप में उभर रहीं हिंदी के माध्यम से ही जनता को जीवनदायी विचार प्रदान करूंगा।

अंत में विजय हुई। एक कविता संग्रह प्रकाशित हुआ, जिसने छायावाद को नई दिशा दी। रामकृष्ण वचनामृत, विवेकानंद साहित्य जैसे उत्कृष्ट साहित्य को अनूदित करके हिंदी भाषियों के सामने रखा। जीवन-साधना में निरत यह कर्मयोगी थे—सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'।जिनके साहित्य में पीड़ित मानवता की वाणी गूँजती थी। जो स्वयं में एक औलिया फकीर की मस्ती में जीते थे। उनकी कर्म-साधना निराशा की अंधेरी गलियों में भटके राही के लिए प्रकाशदीप है। जिसके आलोक में हम अपना जीवन संवार-सुधार सकते हैं।


सदुक्ति

जीवन को ‘क्षणभंगुर' कहा जाता है। इसका तात्पर्य यह है कि उसका एक क्षण भी बरबाद न किया जाए।


विचारणीय— मननीय

उज्ज्वल भविष्य को साथ लिए इक्कीसवीं सदी, गंगावतरण की तरह, अपनी इस धारित्री को सुखद संभावनाओं से भरा-पूरा करने के लिए, अगले ही दिनों जन-जन को अपने अवतरण का आभास कराने के लिए चल ही पड़ी है। यह प्रभातपर्व उसी सूचना का उद्घोष कर रहा है। गंगा का प्रवाह गोमुख— गंगोत्री से एक पतली धारा के रूप में निःसृत हुआ है। बाद में वह अनेकानेक भागीदार नदी-नालों को अपने साथ समेटता हुआ, सोनपुर-पटना में कई मील चौड़ा हो गया है और गंगासागर के महामिलन तक पहुँचते-पहुँचते सहस्रधाराओं में विभाजित दीख पड़ने लगा है। युगचेतना का मत्स्यावतार भी इसी प्रकार अपने क्षेत्र-कलेवर का विस्तार करते-करते, समस्त विश्व पर छा जाने का मानस बना चुका है। युगसंधि इसी प्रसव वेदना की घड़ी है। इस सुनिश्चित संभावना को हम में से अधिकांश अपनी इन्हीं आँखों से देख सकने में समर्थ होंगे।

शुभारंभ एक क्षेत्र-बिंदु से होता है और उसका विस्तार समयानुसार-क्रमानुसार होता चला जाता है। नवस्थापित भ्रूण, सुई की नोंक के बराबर होता है। अभिवृद्धि का क्रम उसे एक समग्र शिशु ही नहीं बनाता, वरन क्रमानुसार वह परिपूर्ण प्रौढ़ मनुष्य बन जाता है। बीज को वृक्ष में विकसित होते हम सभी देखते हैं। नव्य समाज की भव्य संरचना का नियोजन, अपने दायरे में समेटेगा तो समस्त संसार को, किंतु उसका आरंभिक शिलान्यास छोटे रूप में शान्तिकुञ्ज परिकर में होता देखकर किसी को भी आश्चर्य नहीं करना चाहिए।

आरंभ अपने घर से ही होता देखा गया है। उज्ज्वल भविष्य की संरचना के लिए जिस भागीरथी प्रयत्न की आवश्यकता है, उसे कर गुजरने का भार नियंता ने अखण्ड ज्योति परिवार की छोटी मंडली को सौंपा है। क्रमशः उसके विकास-विस्तार की संभावना भी बढ़ेगी ही। इन दिनों सूत्रधार उसी का ताना-बाना बुन रहा है, श्रेयाधिकारियों को उनके संचित सुसंस्कारों के आधार पर एक छत्र-छाया के नीचे एकत्रित कर रहा है। यही है वह निर्धारित भूमिका, जिसे अनौचित्य का निवारण और औचित्य का अभिवर्द्धन करने में समर्थ देवताओं के संग्रहित बल पर आधारित, पौराणिक दुर्गावतरण के समतुल्य ही समझा जाना चाहिए। राम के रीछ-वानर, कृष्ण के ग्वालबाल, बुद्ध के परिव्राजक, गांधी के सत्याग्रही, निजी स्थिति में तो अकिंचन ही थे, पर उनके साथ जुड़ी हुई दिव्य सत्ता ने ही उनके माध्यम से वे प्रयोजन पूरे करा लिए थे, जिन्हें मोटे रूप में असंभव नहीं तो आश्चर्यजनक से कम नहीं समझा जा सकता। इस शृंखला में एक कड़ी अखण्ड ज्योति परिजनों की भी जुड़ती है, जो अपनी तुच्छ संख्या और शक्ति के होते हुए भी, विश्व-व्यवस्था में असाधारण हेर-फेर कर देने की तैयारी में लगे हैं। इनके संकल्प और पराक्रम नगण्य हो सकते हैं, पर तूफानों के साथ जुड़कर धूलिकणों को भी आकाश पर छा जाते जिनने देखा है, उनके लिए इसमें अनहोनी जैसी कोई बात लगेगी नहीं।

दशरथ कुमार विश्वामित्र आश्रम में अभीष्ट साधना करने और शिक्षा प्राप्त करने के लिए गए थे। वसुदेव पुत्र भी संदीपन आश्रम की पढ़ाई के साथ बहुत कुछ साथ लेकर लौटे थे। बुद्ध विहारों ने धर्मचक्र-प्रवर्तन में, देखने में साधारण, किंतु पुरुषार्थ में अत्यंत शक्तिशाली महामानव विनिर्मित करके दिए थे। नालंदा, तक्षशिला की इमारतें भले ही साधारण रहीं हों, पर उन खदानों में ऐसे नररत्न उभरे, जिनने समूचे वातावरण को अपने समय में ऊर्जा और आभा से भर दिया। पुरातन गुरुकुलों का इतिहास भी ऐसा ही है।

अखण्ड ज्योति पत्रिका के छपे पृष्ठ, प्रस्तुत परिकर के सदस्यों को उच्चस्तरीय प्रेरणा पहुँचाते रहे हैं। उनके पाठकों ने अपने में उच्चस्तरीय प्रेरणाएँ उभरते देखी हैं। इस संकेत पर उन्हें लगने लगा है कि युग-परिवर्तन की इस संधिकाल में उन पर भी कुछ अतिरिक्त उत्तरदायित्व डाले जा रहे हैं। वे भारी-भरकम होते हुए भी ऐसे नहीं हैं कि किसी के निर्वाह और परिवार की व्यवस्था को गड़बड़ाएँ। अपनी उपलब्ध शक्तियों का एक बहुत छोटा अंश नवसृजन के लिए लगाते रहने पर भी इतना कुछ बन पड़ सकता है, जिसे अविस्मरणीय, अभिनंदनीय एवं ऐतिहासिक कहा जा सके। प्रतिभा परिष्कार का निजी लाभ मिलने के अतिरिक्त ऐसे पुण्य-परमार्थ का संचय भी, इस अनुपात में पड़ सकता है, जिसकी प्रतिक्रिया आत्मसंतोष, लोक-सम्मान और दैवी अनुग्रह के रूप में हाथों-हाथ देखी जा सके।

इसके लिए व्यक्तित्वों में सुधार-परिष्कार को किसी-न-किसी प्रकार समाविष्ट करना ही होगा। इस आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए, शान्तिकुञ्ज हरिद्वार में अखण्ड ज्योति परिजनों के लिए अतिरिक्त प्रशिक्षण, साधना-संदर्भ एवं परामर्श-अनुदान की विशेष व्यवस्था की गई है। यों यहाँ पहले से ही एक-एक मास के युगशिल्पी सत्र और नौ-नौ दिन के साधना-सत्र निरंतर चलते रहे हैं, पर वर्ष 1990 में एक विशेष व्यवस्था बनाई गई है कि इस अवधि में मात्र अखण्ड ज्योति के स्थायी सदस्य ही शान्तिकुञ्ज आएँ और वे पाँच दिन का एक सत्र संपन्न करें। पाँच-पाँच दिन के सत्र इसलिए रखे गए हैं कि लाखों परिजनों को इस एक वर्ष में ही अभीष्ट प्रेरणा देकर लाभान्वित किया जा सके। हर महीने पाँच सत्र होंगे (1) ता. 1 से 5 (2) ता. 7 से 11 (3) ता. 13 से 17 (4) ता. 19 से 23 (5) ता. 25 से 29; बीच का एक-एक दिन आने-जाने वालों की सुविधा के लिए छोड़ा है। इसके लिए शान्तिकुञ्ज में भी अखण्ड ज्योति परिजनों की एक नई सूची रखी जाने की व्यवस्था की गई है, ताकि जब वे आने का आवेदन करें, तो उनके संबंध में आवश्यक जानकारी यहाँ सहज ही तत्काल मिल जाए और मथुरा से सूचनाएँ मँगाने-भेजने में व्यर्थ समय नष्ट न हो।

इस लेख के साथ अतिरिक्त जानकारी-पत्रक जोड़ा गया है। आशा की गई है कि वर्त्तमान सदस्य, अपने संबंध में आवश्यक जानकारियाँ भरकर यथासंभव जल्दी भेज देंगे, ताकि महत्त्वपूर्ण प्रयोजनों के लिए यहाँ उनका संग्रह और उपयोग किया जा सके।

साथ वाले पत्रक में हर परिजन की जन्मतिथि या तारीख, जन्मस्थान एवं समय की भी माँग की गई है। इस जानकारी के आधार पर उनके निमित्त विशिष्ट विधि से प्रेरणा अनुष्ठान किया जाता रहेगा और जन्मदिन के उपलक्ष्य में शुभकामनाओं और परामर्शों का एक पत्रक भी डाक से भेजा जाता रहेगा। चूँकि चर्चा आध्यात्मिक स्तर की है, अतः इन पंक्तियों में उनका सीमित उल्लेख ही किया जा रहा है। पाठकों की नवयुग के अनुरूप विशिष्ट भूमिका को देखते हुए इस संदर्भ में बहुत कुछ समझा-समझाया और किया जाना है। पत्रक के साथ छोटे साइज के फोटो भी माँगे गए हैं। इसके आधार पर व्यक्तित्वों का स्तर जाना जा सकना तो सरल रहेगा ही, इसके साथ चित्रों की एक विधा यह भी है कि उन तक ऐसा कुछ पहुँचाया जा सके, जो प्रगति-पथ पर अग्रसर करने में सहायक हो।

'इक्कीसवीं सदी में अखण्ड ज्योति परिजनों का योगदान' के नाम से एक विशाल ग्रंथ अनेक खंडों में प्रकाशित करने की भी योजना है, जिसमें उन प्रतिभाओं का सचित्र उल्लेख रहे और जिससे असंख्यकों को यह प्रेरणा मिल सके कि सामान्यों के लिए भी असामान्य पुरुषार्थ कर सकना कैसे संभव हो सकता है? प्रस्तुत इतिहास, असंख्यों में उत्साह भरने एवं नवचेतना उभारने में खरा सिद्ध हो सकेगा, ऐसा विश्वास है। जिनके पास फोटो न हो, उनके लिए शान्तिकुञ्ज में भी अति सस्ती व्यवस्था कर दी गई है।

सन् 90 के आरंभ में ही उपरोक्त जानकारी संपन्न कर ली जानी है, इसलिए आशा की गई है कि जिन्हें यह सब भेजने में आपत्ति न हो, वे इस कार्य को यथासंभव जल्दी ही पूर्ण करेंगे।

उपरोक्त विषयक पत्र, शान्तिकुञ्ज, हरिद्वार के पते पर भेजें। अखण्ड ज्योति, मथुरा में तो प्रकाशन, मुद्रण प्रेस ही है; अस्तु चंदे का हिसाब-किताब ही वहाँ रहता है।


अखण्ड ज्योति सदस्यों का निजी परिचय

नाम

पूरा पता (जिस पर पत्रिका पहुँचती है)

सन् 1989 का आपका ग्राहक नंबर क्या रहा?

यदि पत्रिका किसी के माध्यम से मँगाते हैं, तो उसका पता व ग्राहक नं.

जन्मतिथि तथा समय  _ _ _ _ _ _                                               स्थान जन्म  _ _ _ _

कब से पत्रिका के ग्राहक हैं?

अपना पासपोर्ट साइज का फोटो साथ भेज सकना संभव हो, तो इस फार्म के साथ भेजें।

शिक्षा

व्यवसाय

विवाहित-अविवाहित

परिवार का विवरण

क्या सन् 1990 में आपका किसी पाँच दिवसीय सत्र में सम्मिलित हो सकना संभव होगा? याद रखें सन् 1990 मात्र अखण्ड ज्योति के पाठकों के लिए सुरक्षित है। किस माह के, किस सत्र में शामिल हो सकेंगे? जो तिथियाँ आप लिखेंगे, उस सत्र की स्वीकृति भेज दी जाएगी। वह भर गया हो तो उससे अगले सत्र की स्वीकृति भेजी जाएगी। वांछित तिथियाँ  ......................

दिसंबर 1989 अखण्ड ज्योति


निम्नलिखित दो उत्तरों को विस्तार से लिख दें

अ. जीवनचर्या के विशेष घटनाक्रम:-

ब. इन दिनों की मनःस्थिति तथा परिस्थिति :-

दिनाँक - - - - - - - - - - -                                                                                                                                            - - - - - - - - - - -                                                                                                                                                                                                                            हस्ताक्षर

(इस परिपत्र को भरकर शान्तिकुञ्ज हरिद्वार के पते पर भेजें।)


दैवी सत्ता द्वारा अदृश्य सहायता

ब्रह्मविद्या के गूढ़ रहस्यों के प्रतिपादनकर्त्ता एवं थियोसोफिकल सोसायटी के संचालकों ने अध्यात्म तत्त्वज्ञान के अनेकानेक पक्षों पर प्रकाश डालते हुए यह प्रतिपादन विशेष रूप से किया है कि दिव्य सत्ताएँ, उदात्त चरित्र व व्यक्तित्व वाले लोगों को तलाशती रहती हैं और उनकी कसौटी पर खरे उतरने पर उन्हें ऊँचे उठने, आगे बढ़ने की प्रेरणा और सहायता समय-समय पर प्रदान करती रहती हैं। इन देव सत्ताओं को उन्होंने 'इनविजिबल हेल्पर्स', 'मास्टर्स' जैसे कई नामों से संबोधित किया है।

संस्था के मूर्धन्य संचालकों यथा— मैडम ब्लैवेटस्की, ओलिवरलॉज, लेडबेटर, एनी बेसेंट आदि लोगों ने इस संबंध में कई प्रामाणिक पुस्तकें लिखी हैं, जिनमें 'टाक्स ऑन दि पाथ ऑफ आकल्टिज्म', ' दि लाइट ऑन दि पाथ', 'एट दि फीट ऑफ दि मास्टर्स' प्रमुख हैं। इन पुस्तकों का प्रधान प्रतिपाद्य विषय यही है कि यदि मनुष्य स्वयं को प्रखर, पवित्र और सात्विक बना ले, स्वार्थ को त्यागकर परमार्थ की ओर प्रवृत्त होने लगे एवं जनकल्याण और समाजोत्थान के कार्यों में अभिरुचि दिखा सके, तो उसे देवात्माओं का अदृश्य अनुदान और वरदान अनायास ही हस्तगत होता रह सकता है।

इन मान्यताओं की पुष्टि में उन अनेकानेक घटनाओं और व्यक्तियों के उदाहरण दिए जा सकते हैं, जिनमें उन लोगों ने सत्प्रयोजनों में निरत रहकर अदृश्य सहयोग अर्जित किए। इन उदाहरणों में यह संभव है कि लोगों को उन सत्ताओं से साक्षात्कार न हुआ हो अथवा किन्हीं विशेष परिस्थितियों में हो भी गया हो, पर यह अनुभव प्रायः प्रत्येक को हुआ कि उसने अवश्य ही किसी असाधारण कार्य किए हैं, उसमें अवश्य ही किसी परोक्ष सत्ता का पुरुषार्थ भी काम करता रहा है। यह मात्र उसके स्वयं के बलबूते की बात नहीं हो सकती।

इसमें प्रथम उदाहरण थियोसोफिकल की संस्थापिका मैडम ब्लैवेटस्की के जीवन का है। जीवन के अंतिम दिनों में वे एक महत्त्वपूर्ण ग्रंथ 'सीक्रेट डॉक्ट्रिन' के प्रणयन में लगी हुई थी। आधा ग्रंथ लिखा जा चुका था और आधा शेष था। इन्हीं दिनों वह गंभीर रूप से बीमार पड़ीं। ऐसा लगता था कि इस बीमारी से वह उबर न सकेंगी, पर इस संभावना को गलत सिद्ध करती हुई आश्चर्यजनक ढंग से वह स्वस्थ हो गईं। बाद में उनने बताया कि इसी मध्य एक देवसत्ता, जिसे वह प्रायः 'मास्टर' कहकर पुकारती थीं, प्रकट हुई और यह संदेश दे गई कि यद्यपि तुम्हारी मृत्यु अवश्यंभावी है, पर तुम तब तक जीवित रहोगी, जब तक तुम्हारा ग्रंथ पूरा न हो जाए। इसमें मैं तुम्हारी सहायता करूँगा। हुआ भी ऐसा ही। उनका ग्रंथ पूरा हुआ और कुछ दिन पश्चात उनकी मृत्यु हो गई।

इस ग्रंथ के बारे में वह प्रायः कहा करती थीं कि यह उनके जीवन का सर्वश्रेष्ठ और महानतम ग्रंथ है। इसमें उनने अध्यात्म के उन गूढ़ और अनुभूत तत्त्वों का विवेचन किया है, जो अन्यत्र कहीं नहीं मिलता। यह उत्कृष्ट रचना यदि अधूरी रह जाती, तो संस्था और समाज एक अनूठी और अनमोल कृति से वंचित ही रह जाते, पर ‘मास्टर’ की सहायता ने ऐसा कुछ न होने दिया। ग्रंथ पूरा हुआ एवं अपने समय का एक विश्वकोष कहलाया, जिससे अगणित व्यक्ति प्रेरणा-प्रकाश पाते हैं।

टीपू सुल्तान की गणना अपने समय के सफलतम शासकों में होती है। सन 1799 में इस अप्रतिम योद्धा ने श्रीरंगपट्टम में जब युद्ध करते हुए वीरगति पाई, तो राजमहल से उसकी एक व्यक्तिगत डायरी प्राप्त हुई, जिसमें उसने अपने जीवन की महत्त्वपूर्ण घटनाओं का उल्लेख कर रखा था। डायरी से यह भी ज्ञात हुआ कि सुल्तान को महत्त्वपूर्ण विषयों पर समय-समय पर दैवी चेतना की अंतःप्रेरणा भी होती थी। उसी के आधार पर वह अपनी नीति का निर्धारण करता था। उसे अपने साथ होने वाले कुचक्रों व युद्धमृत्यु की जानकारी भी बहुत समय पूर्व मिल गई थी। इसका उल्लेख भी उसने डायरी में किया था।

कभी-कभी साधारण, किंतु निर्मल हृदय वाले व्यक्तियों पर भी दैवी अनुकंपा बरसती है। ऐसी ही एक घटना का उल्लेख डॉ. एलेक्सिस कैरेल की 'अन टू दि अननोन' नामक पुस्तक में है। जिसमें दैवी सहायता एक किसान को मिली थी। बकिंघमशायर में बर्नहालवियो ग्राम के निकट एक किसान अपने खेत में काम कर रहा था। उसने अपने दो छोटे बच्चों को समीप के एक पेड़ के नीचे खेलता छोड़ दिया। किसान काम में इतना व्यस्त हुआ कि उसे अपने बच्चों का ध्यान ही न रहा। दोनों बालक खेलते-खेलते घने जंगल में चले गए और रास्ता भटक गए।

किसान शाम को जब घर पहुँचा तो बच्चों को न पाकर चारों ओर उसकी ढूँढ-खोज शुरू की। अब तक अँधेरा बढ़ चुका था। इधर-उधर खोजने के बाद किसान व उसके कुछ पड़ोसी उस वृक्ष की ओर चल पड़े, जहाँ बालक खेल रहे थे। दूर से उन्होंने वहाँ एक दिव्य, नीली ज्योति जलते देखी। जब निकट पहुँचे, तो वह ज्योति धीरे-धीरे जंगल की ओर बढ़ चली। सभी लोगों ने उसका अनुसरण किया। बढ़ते-बढ़ते वह ज्योति ठीक वहीं पहुँची, जहाँ दोनों सकुशल बच्चे एक पेड़ के नीचे सोए हुए थे। माता-पिता ने बच्चों को जैसे ही गोद में उठाया, वह अद्भुत प्रकाश अंतर्ध्यान हो गया। वस्तुतः वह दैवी चेतना ही थी। जिसने प्रकाश रूप में माँ-बाप को मार्गदर्शन और बच्चों को संरक्षण दिया।

युद्ध के दौरान एवं उसके उपरांत अनेकानेक रूपों में कितने ही पूर्वाभास द्वितीय विश्वयुद्ध के हीरो ब्रिटिश प्रधानमंत्री श्री चर्चिल को होते रहे थे। इन्हें उनने 'इनर वायस' अथवा 'अंतः की पुकार' नाम दे रखा था। इसे दैवी प्रेरणा, परोक्ष सहायता, पूर्वाभास, अदृश्य दर्शन, परोक्ष श्रवण कुछ भी कहा जा सकता है। जो इन्हें ग्रहण करने की सामर्थ्य रखते हैं अथवा दूसरे शब्दों में यह कह सकते हैं कि जिनमें लोकमंगल की उमंगे उठती और क्रियान्वित होती हैं, उन सबको अदृश्य दैवी सत्ता का सहयोग और मार्गदर्शन सदा उपलब्ध होते रहते हैं। इसे परोक्ष सत्ता की ओर से दैवी चेतना का अटल आश्वासन समझा जा सकता है।


अपराधबोध— सच्चा पश्चात्ताप (कहानी)

सम्राट अचानक कैदियों की व्यवस्था देखने कारागृह में जा पहुँचा। सूचना मिलते ही सारे कैदी दौड़कर राजा के पास पहुँचे। सबने झुक-झुककर अभिवादन किया। राजा ने एक-एककर सबके जुर्म, दंड एवं व्यवस्था के बारे में जानकारी ली। सबके सब चालाक, एक से बढ़कर धूर्त्त, सभी बड़े दीन, गरीब बने गिड़गिड़ाए-घिघियाए। घड़ियाली आँसू टपकाते हुए सभी ने कहा— "उन्हें निर्दोष फंसाया गया है। झूठे आरोप में लाया गया है।" किसी ने कहा— "हमें होश ही नहीं था। पुलिस यहाँ उठा लाई। कोई सुनने वाला ही नहीं है।" अंततः सभी ने अपने को निर्दोष सिद्धकर सजा माफी करानी चाही, किंतु एक कोठरी में कोने में एक कैदी सिर झुकाए बैठा था। सम्राट ने पूछा— "तुम्हें भी कुछ कहना है।" वह बोला— "महाराज! मैंने जघन्य अपराध किया है। उसे देखते हुए सजा बहुत हल्की मिली है। पता नहीं भरपाई हो सकेगी या नहीं अथवा पाप की गठरी सिर पर लादे ही चला जाऊँगा।" सम्राट ने जेल के मुख्य अधिकारी को बुलाकर कहा— "कोठरी में सिर झुकाए जो कैदी बैठा है, उसे तुरंत मुक्त कर दें, अन्यथा ये धूर्त्त न स्वयं सुधरेंगे, न किसी को सुधरने ही देंगे। इन्हें अपनी करतूतों पर कोई पछतावा तक नहीं है।"


प्रगतिशील अध्यात्म ही युगानुकूल

देखने-सुनने में धर्म और विज्ञान एकदूसरे के विरोधी प्रतीत होते हैं, पर वास्तविकता इससे भिन्न है। यह न तो परस्पर विरोधी हैं, न एकदूसरे से पृथक, वरन ये एकदूसरे के सहयोगी और पूरक हैं।

इस दिशा में भूल तब हुई, जब दोनों को एकदूसरे से पृथक मान लिया गया, पर वास्तव में ऐसा है नहीं। दोनों एक रथ के दो पहियों के समान हैं, जिसमें एक के बिना दूसरे की गति संभव ही नहीं है। इस संबंध में अंग्रेज भौतिकविद डाॅ. फ्लेमिंग का कथन है कि, "यदि विज्ञान, धर्म से अलग होता, तो यह सृष्टि-संरचना आज हम भलीभाँति नहीं समझ पाते। इसे ठीक-ठीक समझने के लिए दोनों का ही आश्रय लेना पड़ता है।" कोई वस्तु 'कैसे' बनी? इसका उत्तर विज्ञान देता है, किंतु जब यह पूछा जाता है कि आखिर यह वस्तु 'क्यों' बनी? तो यहाँ विज्ञान मौन हो जाता है। यही विज्ञान की अंतिम सीमा है। इसके बाद धर्म की शुरुआत होती है। इस 'क्यों' का उत्तर वही दे सकता है। उदाहरण के लिए इस विश्व-ब्रह्मांड को लिया जा सकता है। इसकी रचना कैसे हुई? इसका उत्तर विज्ञान यह कहकर देता है कि अति आरंभकाल में एक महाविस्फोट हुआ और इसी से यह सृष्टि बनी, पर यह सृष्टि बनी क्यों? इसका उत्तर अध्यात्म देता है कि इसके पीछे भगवत् इच्छा थी। इसी प्रकार जीवन की उत्पत्ति संबंधी विज्ञान की मान्यता है कि जीवन का विकास कुछ रसायनों के संयोग से हुआ, पर प्रश्न यह है कि जड़ समझे जाने वाले इन तत्त्वों में गति कहाँ से आई? चलकर मिलने की प्रेरणा किसने दी? इसका उत्तर धर्म देता है, कहता है कि इसके पीछे परम सत्ता के एक से अनेक बनने की इच्छा ही मुख्य भूमिका निभाती है और प्रेरणा का उद्गम स्रोत बनकर सबको क्रिया के लिए प्रेरित करती है।

इस प्रकार देखा जाए तो ज्ञात होगा कि धर्म और विज्ञान एकदूसरे के सहयोगी हैं, विरोधी नहीं। जब एक ही वस्तु से संबंधित दो प्रश्नों में से एक का उत्तर धर्म देता है और दूसरे का विज्ञान तो यह कैसे कहा जा सकता है कि दोनों एकदूसरे से पूरक नहीं हैं। इससे तो दोनों का एक समग्र युग्म बनता है। इस युग्म में से यदि किसी एक को भी निकाल दिया जाए तो हमें जो ज्ञान प्राप्त होगा, वह अधूरा होगा। विज्ञान को पृथक करने से हम संरचना संबंधी ज्ञान से अनभिज्ञ रहेंगे, जबकि धर्म— अध्यात्म के अभाव में हमें रचना के पीछे का प्रयोजन समझ में नहीं आएगा। अतः समग्रता दोनों के मिलने में ही संभव है।

कुछ लोगों का कहना है कि विज्ञान धर्म का समर्थन नहीं करता, पर इस कथन में यथार्थता की कमी नजर आती है। विज्ञान अपने विभिन्न प्रकार के प्रयोग-परीक्षणों से यही सिद्ध कर रहा है कि इस सृष्टि में सब कुछ सुनियोजित और सुसंबद्ध है। निष्प्रयोजन यहाँ कुछ भी नहीं। अध्यात्म इसी को दूसरे शब्दों में कहता है कि इस सृष्टि का सृजेता एक परोक्ष व्यवस्था तंत्र है और उसी की अभिव्यक्ति यह सुंदर-सुव्यवस्थित संसार है। इस तरह जब दोनों एक ही सच्चाई को अपनी-अपनी भाषा में अपने-अपने ढंग से अभिव्यक्त करते हैं, तो दोनों में भिन्नता कैसी? विज्ञान तर्क, तथ्य, प्रमाण का सहारा लेता है, तो अध्यात्म आस्था और विश्वास पर टिका हुआ है। विज्ञान प्रत्यक्षवाद को मानता है और किसी निष्कर्ष पर पहुँचने के लिए तर्क, तथ्य, प्रमाण को कसौटी मानकर चलता है, जबकि धर्म— अध्यात्म व्यक्ति की अंतःसत्ता को परिष्कृतकर सच्चाई की जड़ तक पहुँचाता है। संभवतः इसीलिए अंग्रेज विद्वान ओलिवर लॉज ने कहा है कि, "धर्म और पूर्णताप्राप्त विज्ञान का क्षेत्र एक ही है।" यह सही भी है, क्योंकि भौतिक जगत में विज्ञान जो कार्य कर रहा है, उसी का संपादन अध्यात्म जगत में धर्म कर रहा है। अंतर सिर्फ इतना भर है कि एक प्रत्यक्ष है, तो दूसरा परोक्ष। अतः दोनों एकदूसरे के विरोधी कैसे हुए?

विज्ञान एवं धर्म— अध्यात्म का एकदूसरे का विरोधी तो तब कहा जाता है, जब यथार्थ चिंतन की उपेक्षा करके किन्हीं पूर्वाग्रहों के साथ चिपके रहने पर बल दिया जा रहा हो। प्रायः हम इसे भुला देते हैं कि हमारी प्रगति क्रमशः ही हुई है और ऐसे ही अनंतकाल तक होती रहेगी। पूर्ववर्त्ती लोगों ने जो कुछ कहा या किया था, वह अंतिम था और सुधार की तनिक भी गुंजाइश नहीं, यह मान बैठने से प्रगति-पथ अवरुद्ध हो जाता है और सत्य की ओर अग्रगामी कदम रुक जाते हैं। विज्ञान ने अपने को इस स्थिति से अलग रखा एवं पिछली जानकारी से लाभ उठाकर आगे की उपलब्धियाँ हस्तगत करने के लिए प्रयत्न-पुरुषार्थ जारी रखा। अतः वह क्रमशः अधिक सफल— समुन्नत होता चला गया। अध्यात्म ने ऐसा नहीं किया और 'बाबा वाक्यं किं प्रमाणं' की नीति अपनाकर पहले के लोगों द्वारा कहे एवं पुस्तकों में लिखे वचनों को ही पत्थर की लकीर मानकर चलता रहा, जिससे वह उसी स्थिति में पड़ा रहा। इस बीच एक लंबा समय गुजर गया, परिस्थितियों में परिवर्तन आया और वर्त्तमान परिप्रेक्ष्य में पुरातन धर्म प्रतिगामी नजर आने लगा, जबकि होना यह चाहिए था कि समय और परिस्थिति के अनुरूप उसमें भी सुधार होते। विज्ञान ने इस दिशा में अधिक उदारता और साहस का परिचय दिया; फलतः आज वह अपनी आरंभिक अविकसित स्थिति से सुविकसित स्थिति में जा पहुँचा है, जबकि धर्म— अध्यात्म के साथ ऐसा न हो सका।

यों कहने को तो धर्म को शाश्वत, सनातन और अपरिवर्तनशील माना जाता है, पर तनिक सूक्ष्मदृष्टि से विचार करें, तो ज्ञात होगा कि यह न तो अनादि है, अनंत और न अपरिवर्तनीय ही। समय और परिस्थिति के अनुरूप समय-समय पर इसमें भी सुधार, परिवर्तन होते रहे हैं। उच्चस्तरीय आत्माएँ, अवतारी, महापुरुष इसी प्रयोजन के लिए अवतरित होते रहे हैं। हाँ! इतना अवश्य है कि इस दिशा में इसकी गति विज्ञान की तुलना में धीमी रही है, पर यह नहीं कहा जा सकता कि धर्म आज भी अपने मूल रूप में पड़ा हुआ है और इसमें किसी प्रकार का विकास-परिवर्तन हुआ ही नहीं। सच्चाई तो यह है कि विज्ञान की भाँति इसका भी क्रमिक विकास होता आया है और आगे भी होता रहेगा। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि दोनों ही प्रगतिशीलता के पक्षधर हैं और बदलते काल के साथ-साथ युगानुकूल सुधार-परिवर्तन की आकांक्षा रखते हैं। ऐसे में दोनों को एकदूसरे का विरोधी कहना किसी प्रकार समीचीन न होगा।

वस्तुतः धर्म और विज्ञान एक ही वस्तु के दो पक्ष हैं। एक हमें सच्चाई को तर्क, तथ्य, प्रमाण की कसौटी पर कसना सिखाता है, तो दूसरा नैतिक नियमों व उच्च आदर्शों के प्रति आस्थावान बनाता है। एक उपार्जन की विधा बताता है, तो दूसरा 'शतहस्त समाहरं सहस्रहस्तं संकिर' कहकर उसके श्रेष्ठतम सदुपयोग का निर्देश देता है, तरीका बताता व प्रयोजन समझाता है। एक प्रत्यक्षवाद पर आधारित है और दूसरा परोक्षवाद पर। एक के अनुसंधान का विषय पदार्थ जगत है, तो दूसरे का आत्मजगत। एक पदार्थ सत्ता का अन्वेषण स्थूलयंत्र उपकरणों के माध्यम से करने का प्रयास कर रहा है, तो दूसरा आत्मसत्ता का उद्घाटन साधना प्रयासों द्वारा करता है। दोनों मूल सत्ता के ही दो रूप हैं। विज्ञान— अध्यात्म उन्हें ही अपने-अपने ढंग से ढूँढ़ने का उपक्रम कर रहे हैं। दोनों के साथ रहने में ही समग्रता बनती है। अतः दोनों एकदूसरे के पूरक हैं, विरोधी नहीं। जीवन में अध्यात्म का, धर्म-धारणा का भी उतना ही महत्त्व है, जितना विज्ञान का। अस्तु जीवन में दोनों का समावेश ही कल्याणकारी हो सकता है। यह आज की सर्वोपरि आवश्यकता भी है।


सद्विचार

प्रसन्नता पुरस्कार नहीं, वरन सही ढंग से सोचने की आदत का परिणाम है। इसी प्रकार दुःख कोई दंड नहीं है, वरन गलत ढंग से सोचने की सहज प्रतिक्रिया है।


अंतरंग को स्वस्थ व निर्मल बनाएँ

जैसे-जैसे हमारी गति स्थूल से सूक्ष्म में होती जा रही है, वैसे-वैसे हमें संकटों और अभावों के वास्तविक कारणों को समझने में सुविधा मिलती जा रही है। मोटी बुद्धि हमेशा संकटों का कारण बाहर ढूँढती है। व्यक्तियों, परिस्थितियों पर ही सबका दोष थोपकर निश्चिंत हो जाती है। समझदारी बढ़ने पर पता चलता है कि घटिया व्यक्तित्व ही पिछड़ेपन से लेकर समस्त विपन्नताओं की जड़ है। व्यक्तित्व का घटियापन सूझ ही न पड़े, उसके सुधार की कोई योजना ही नहीं बने तो परिस्थितियों की विपन्नता का समाधान हो ही नहीं सकता, वे एक से दूसरा रूप भर बदलती रहेगी।

बहुत समय पहले शारीरिक व्याधियों का कारण भूत-पलीतों का आक्रमण समझा जाता था। बाद में वात-पित्त-कफ के ऋतु-प्रभाव का कारण उन्हें माना गया। उसके बाद रोग-कीटाणुओं के आक्रमण की बात समझी गई। शोध के इस प्रगति-क्रम में उतरते-उतरते इन दिनों आरोग्य शास्त्र के पंडितों ने इस तथ्य को खोज निकाला है कि शारीरिक रोगों के संदर्भ में आहार-विहार, विषाणु, आक्रमण आदि तो बहुत स्वल्प मात्रा में दोषी हैं, रुग्णता का वास्तविक और मूल कारण तो व्यक्ति की मनःस्थिति में अंतर्निहित है।

इन शोध प्रयासों से जो नए-नए तथ्य सामने आए हैं, उससे पता चलता है कि शरीर की प्रत्यक्ष एवं परोक्ष क्रियाओं पर पूरी तरह मानसिक अनुशासन काम करता है। अचेतन मन की छत्र-छाया में श्वास-प्रश्वास, ग्रहण-विसर्जन, रक्त-परिसंचरण आदि अनैच्छिक कहलाने वाली क्रियाएँ चलती रहती हैं। चेतन मन के द्वारा बुद्धिपूर्वक किए जाने वाले क्रियाकलापों और लोक-व्यवहारों का क्रम चलता है। इस तरह शरीर की परोक्ष और प्रत्यक्ष क्षमता पूर्णतया अचेतन और चेतन कहे जाने वाले मनःसंस्थान के नियंत्रण में रहती है।

यह स्थूलक्रम हुआ। बारीकी में उतरने पर पता चलता है कि अमुक शारीरिक रोग, अमुक मनोविकार के फलस्वरूप उत्पन्न होते हैं और वे तब तक बने ही रहते हैं, जब तक कि मानसिक स्थिति में कारगर परिवर्तन न हो जाए। इस अनुसंधान ने उस असमंजस को दूर कर दिया है, जिसके अनुसार सारी गड़बड़ियों की जड़ बाहर मानकर उसे दूर करने के लिए बाहरी प्रयत्नों को ही सब कुछ माना जाता था।

अब आरोग्य दशा और रोग-निवृत्ति की दोनों ही जरूरतों की पूर्ति के लिए मनःसंस्थान की खोज-बीन करना जरूरी हो गया है और समझा जाने लगा है कि यदि मनुष्य के चिंतन-क्षेत्र में घुसी गड़बड़ियों की ओर ध्यान नहीं दिया गया, वहाँ जमी वितृष्णाओं और विपन्नताओं का समाधान न किया गया, तो आहार-विहार का संतुलन बनाए रहने पर भी रुग्णता से पीछा छूट नहीं सकेगा। अब नए शोध-प्रयासों ने कुछ दुर्घटना, जैसे आकस्मिक कारणों से उत्पन्न होने वाले रोगों को ही शारीरिक माना है और लगभग समस्त बीमारियों को मनःक्षेत्र की प्रतिक्रिया घोषित किया है। गहरी खोजों के फलस्वरूप आरोग्य जैसे मानव जीवन के अति महत्त्वपूर्ण प्रयोजन पर नए सिरे से विचार करना होगा।

इस तरह के विचार का शुभारंभ मनोविद् एरिक फ्राम ने अपनी रचनाएँ 'मैन फार हिमसेल्फ' में किया है। उनका मानना है कि अधिकांश मानसिक विकृतियों का कारण नैतिक होता  है। छल-दुराव एवं ढोंग-पाखंड के कारण दो व्यक्तित्त्व उत्पन्न हो जाते हैं। एक वास्तविक, दूसरा पाखंडी। दोनों के बीच भयंकर अंतर्द्वंद्व खड़ा रहता है।  दोनों एकदूसरे के साथ शत्रुता बनाए रखते हैं और विरोधी को कुचलकर अपना वर्चस्व बनाने का प्रयत्न करते हैं। मनोअध्येता फ्रायड ने इसे 'ईड' और 'सुपर ईगो' के बीच का द्वंद्व माना है । इस तरह विग्रह के फलस्वरूप अनेकों रोग उठ खड़े होते हैं और वैसी ही मानसिक स्थिति में बने रहने तक हटने का नाम नहीं लेते।

मानसिक रोगियों में प्रायः विक्षिप्त, अर्धविक्षिप्त स्तर के ऐसे लोग गिने जाते हैं, जो अपना सामान्य काम-काज चला सकने में असमर्थ हो गए हों, जिनका शरीर-निर्वाह एवं लोक-व्यवहार विपन्नताग्रस्त हों। ऐसों की संख्या भी लाखों से बढ़कर करोड़ को, अपने देश में ही छूने लगी हैं। उन लोगों की कोई गणना ही नहीं, जो रोजी-रोटी तो कमा लेते हैं, खाते और सोते समय भी साधारण लगते हैं, पर उनका चिंतन विकृत एवं हेय होता है। कितने ही दुष्टता की भाषा में सोचते हैं और हर किसी पर दोषारोपण करते हुए, उन्हें शत्रुता की परिधि में लपेटते हैं।  कितने ही आशंकाओं—आक्षेपों—संदेहों के अभ्यस्त होते हैं। कुछ शेखचिल्लियों की तरह मनसूबे बाँधते, असंभव का विचार किए बिना अपने सपनों की एक अनोखी दुनिया बसाते रहते हैं। परिस्थिति का मूल्यांकन कर सकना, दूसरों की मनःस्थिति समझ सकना उनके लिए संभव नहीं होता। किसी महत्त्वपूर्ण प्रसंग में ऐसाें का परामर्श तनिक भी काम का सिद्ध नहीं होता। अपनी कार्यपद्धति को किसी उद्देश्य के साथ जोड़ सकना, उनसे नहीं बन पड़ता। इन्हें पागल तो नहीं कह सकते, पर व्यक्तित्व की परख की दृष्टि से उससे कुछ अच्छी स्थिति में भी उन्हें नहीं समझा जा सकता।

मनःशास्त्री जे.वान. क्लासविट्ज ने अपने अध्ययन 'माडर्न सोसाइटी एण्ड ह्यूमन बिहेवियर' में आज की सामाजिक स्थिति को स्पष्ट करते हुए कहा है कि, "विक्षिप्त, अर्धविक्षिप्त और विक्षिप्तता के सन्निकट— सनकी लोगों से प्रायः आधा समाज भरा पड़ा है। ऐसे लोगों में विवेकबुद्धि एवं विवेचनात्मक चिंतन का अभाव रहता है। स्वतंत्र चिंतन के प्रकाश में उनकी आंखें चौंधिया जाती हैं। इस वर्ग के लोगों को मानसिक दृष्टि से अविकसित, नर-पामरों की श्रेणी में ही रखा जा सकता है।

सोचने की बात है, यह सब होता क्यों है? मनुष्य का प्रत्यक्ष दोष दिखाई नहीं देता। जान-बूझकर ऐसा कुछ किया हो, जिससे उन शारीरिक व्याधियों और मानसिक आधियों का दुःख सहना पड़े, ऐसा कुछ समझ में नहीं आता। फिर क्या कारण है कि समाज में इनकी संख्या स्वस्थ लोगों से कहीं बढ़ी-चढ़ी दिखाई पड़ती है।

इस असमंजस का समाधान देते हुए मनःशास्त्र आचार्य व्ही.गोर्डन चाइल्ड ने अपने अध्ययन 'सोसाइटी एण्ड नोलेज' में बताया है कि अनैतिक एवं असामाजिक चिंतन और कर्तृत्व से मनःक्षेत्र में उत्पन्न होने वाला अंतर्द्वंद्व दुहरा व्यक्तित्व रच देता है और इससे निरंतर उठने वाली आंतरिक कलह सारी मनोभूमि को क्षत-विक्षत करके रख देती है। संचालन के आहत, घायल एवं परेशान होने पर उसके आधीन काम करने वाले तंत्र की दुर्दशा होना स्वाभाविक है।

इतना सब जान लेने पर हमें एक ही निश्चय पर पहुँचना पड़ता है कि चेतन की मूल सत्ता अंतःकरण को प्रभावित करने वाले नैतिक और अनैतिक विचार एवं कर्म ही हमारी भली-बुरी परिस्थितियों के लिए उत्तरदायी है। इसी उद्गम से हमारे उज्ज्वल भविष्य का आधार खड़ा होता है और यहीं से विपत्तियों का वज्र गिराने वाली दुःखद संभानाएँ विनिर्मित होती हैं। इस मूलकेंद्र का परिशोधन करना ही समस्या का वास्तविक निदान है। प्रस्तुत संकटों से छुटकारा पाने और निकट भविष्य में फलित होने वाले संचित संस्कारों का निराकरण करने के लिए आंतरिक परिशोधन का प्रयास इतना अधिक आवश्यक है कि उसे अनिवार्य की संज्ञा दी जा सकती है।

इस परिशोधन का स्वरूप समझाते हुए मानविकी विद्या के आचार्यों का मत है कि उन्नत चिंतन एवं उत्कृष्ट कर्म का सामंजस्य ही वह उपाय है, जिससे अचेतन में नूतन लिपि लिखी जा सकती है। इनमें से एक का भी अभाव होने से प्रयोजन की समग्रता नहीं घटेगी। इससे न केवल जीवनक्रम सामान्य बनेगा, बल्कि अंतस्तल में उन दिव्य शक्तियों का अविरल प्रवाह प्रवाहित होने लगेगा, जिनके कारण सामान्य मनुष्य महामानवों और प्रतिभावानों की पंक्ति में जा बैठता है।


आत्मविश्वास— एक जीवन मूरि

आत्मविश्वास मानव जीवन की दृढ़ पतवार है। जो उसे अनेकों विषमताओं, उलझनों में ही गतिशील और सुस्थिर बनाए रखती है। इसकी डोर से बँधी हुई जीवन नौका डगमगा नहीं सकती। अनेकों समस्याएँ— झंझावात— तूफान भी उस व्यक्ति को अपने ध्येयपथ से विचलित नहीं कर सकते, जो अपने आप में अटूट विश्वास किए चल रहा है। जीवन में प्रकाश देने वाले सभी दीप बुझ जाएँ, किंतु मनुष्य के अंतर में यदि अपने विश्वास की ज्योति जलती रहे तो वह निविड़ अंधकार में अपना पथ स्वयं ढूँढ निकालेगा। इस ज्योति के सम्मुख पथ की तमिस्रा छिन्न-विछन्न हो जाती है।

कवि रविंद्र ने अपने प्रसिद्ध गीत 'एकला चलो रे' में आत्मविश्वास के बारे में अपने भाव को बड़े ही मार्मिक ढंग से अभिव्यक्त किया है। उस गीत के भाव हैं— "यदि कोई तुझसे कुछ न कहे, तुझे भाग्यहीन समझकर सब तुझसे मुँह फेर लें, तो भी तू अपने पर विश्वास रखकर अपनी बात कहता चल।”

"अगर तुझसे सब विमुख हो जाएँ, यदि गहन पथ-प्रस्थान के समय कोई तेरी ओर फिरकर भी न देखे, तब पथ के काँटों को अपने लहू-लुहान पैरों से दलता हुआ अकेला चलता चल।”

“यदि प्रकाश न हो, झंझावात और मूसलाधार वर्षा की अँधेरी रात में जब अपने घर के दरवाजे भी तेरे लिए लोगों ने बंद कर दिए हों, तब उस वज्रानल में अपने वक्ष के पिंजर को जलाकर उस प्रकाश में अकेला चलता चल।"

निःसंदेह हर परिस्थितियों में मनुष्य का एकमात्र साथी अपने पर विश्वास ही है। महापुरुषों ने इसी के बल पर संसार में अनेकों महान कार्य किए हैं। महात्मा गांधी के प्रबल आत्मविश्वास ने ही देश की आजादी का स्वप्न साकार किया। लोकमान्य तिलक के अंतः में यह प्रबल विश्वास था कि स्वराज्य हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है और हम उसे लेकर ही रहेंगे। उनका यह दृढ़विश्वास ही कालांतर में मूर्त्त हुआ। इसी के बल पर लिंकन ने दासमुक्ति का महान कार्य किया। दुनिया को अमेरिका की जानकारी देने वाले कोलंबस तथा पुर्तगाल से भारत आने वाले वास्कोडिगामा ने अपने अंतर के विश्वास के बल पर साहसिक यात्राएँ संपन्न की। नेपोलियन को एक विजय अभियान के समय यह बताया गया कि मार्ग में आल्प्स है, आगे नहीं बढ़ा जा सकता। इस पर उसने कहा — “यदि हमारा मार्ग रोकता है तो आल्प्स नहीं रहेगा।” और सचमुच उस विशाल पहाड़ को काटकर रास्ता बना लिया गया।

आत्मविश्वास सफल जीवन का मूलमंत्र है। स्वामी विवेकानंद ने अपने अनुभवों के आधार पर इसकी महत्ता श्री ई.टी. स्टर्डी को लिखे गए पत्र में बताते हुए कहा है— “हमारे गुरुदेव के शरीर त्याग के बाद हम लोग बारह निर्धन और अज्ञात नवयुवक थे। हमारे विरुद्ध अनेक शक्तिशाली संस्थाएँ थीं, जो हमें नष्ट करने का भरसक प्रयत्न कर रही थीं, परंतु श्री रामकृष्ण देव ने हम सबके भीतर जो आत्मविश्वास की ज्योति जलाई थी, उसके प्रभाव से सारे अंधकार नष्ट हो गए और प्रभु की शिक्षाएँ दावानल की तरह फैल रहीं हैं।''

सचमुच आत्मविश्वास से दुर्गम पथ भी सुगम हो जाता है। बाधाएँ भी मंजिल पर पहुँचने वाली सीढ़ियाँ बन जाती हैं। प्रसिद्ध वैज्ञानिक डॉ जगदीश चंद्र बसु 'पौधों में जीवन है', इस प्रतिपादन को इंग्लैंड की वैज्ञानिक मंडली के सम्मुख प्रयोग द्वारा सिद्ध करने जा रहे थे। कुछ ईर्ष्यालु लोगों ने तीक्ष्ण जहर पोटेशियम सायनाइड की जगह सामान्य चूर्ण रख दिया। चूर्ण के घोल की सुई पौधे में इंजेक्ट करने पर कोई असर नहीं हुआ। उन्होंने आत्मविश्वास भरे स्वर में कहा— "यदि इससे पौधा नहीं मरता है तो मैं भी नहीं मरूंगा।" और सारा चूर्ण खा गए। ईर्ष्यालुओं का मुख लज्जा से नत हो गया। असली पोटैशियम साइनाइड लाया गया और उन्होंने सफल प्रयोग करके दिखा दिया।

श्री बसु के बाद वनस्पति जगत में एक और आत्मविश्वास की धनी प्रतिभा आई— डाॅ. पंचानक महेश्वरी, जिन्होंने एकाकी प्रयत्न के बल पर सर्वप्रथम परखनली में फूल वाले पौधे परागण से लेकर भ्रूण अवस्था तक उगाए। इस विभूति को जब लंदन की वैज्ञानिक संस्था रॉयल सोसाइटी द्वारा विशेष फेलोशिप के लिए चुना गया तो लोगों ने दाँतों तले अंगुली दबा ली।

यही विश्वास कूट-कूटकर भरा था, सुप्रसिद्ध रसायनज्ञ एवं समाजसेवी डाॅ.पी.सी.राय में। एक बार उनके एक अंग्रेज अधिकारी ने कहा— मि. राय! यदि आपको अपने पर इतना विश्वास है तो खुद ही कोई काम क्यों नहीं करते? प्रो. राय ने इस उलाहने को चुनौती के रूप में स्वीकार किया और बंगाल केमिकल्स की स्थापना की। इसके अतिरिक्त विश्व के रसायनशास्त्रियों द्वारा अभिनंदित ग्रंथ 'हिंदू रसायन शास्त्र' की रचना भी की।

इसी तरह सुविख्यात न्यायविद् डाॅ. सच्चिदानंद सिन्हा लंदन विश्वविद्यालय से पी.एच.डी. तथा रॉयल विश्वविद्यालय यूट्रेचर से डी.लिट. प्राप्त सुविख्यात साहित्यकार आचार्य रघुवीर, वनस्पति जगत के मूक साधक एवं नोबल पुरस्कार विजेता भौतिकशास्त्री सी.वी. रमन आदि ने अपने ऊपर अटूट विश्वास बनाए रखकर अपने लक्ष्य को पाने में सफलता पाई।

वस्तुतः आत्मविश्वास का मूल स्वरूप है— आत्मसत्ता पर विश्वास करना। जिसे अपने आत्मा की अजेय शक्ति— महानता पर विश्वास है, जो अपने जीवन की सार्थकता, महत्ता, महानता स्वीकार करता है, उसी में आत्मविश्वास का श्रोत उमड़ पड़ता है और वह जीवन-पथ के अवरोधों-कठिनाइयों को चीरता हुआ, राह के रोड़ों को धकेलता हुआ, अपना मार्ग स्वयं निकाल लेता है। प्रकृति भी आत्मविश्वासी पुरुष का साथ देती है।

अहंकार, महत्त्वाकांक्षा और आत्मविश्वास में बड़ा अंतर है। अहंकार का आधार भौतिक पदार्थ, स्थूल सामग्री और मनोविकार होते हैं। यह शोषण, निर्दयता, पीड़ा का कारण बनता है। हिटलर, मुसोलिनी, चंगेज खाँ, तैमूरलंग, नादिरशाह आदि में यही था, जो उनके और जनसमाज के लिए अहितकर सिद्ध हुआ।

मनुष्य आपने आप पर विश्वास रखकर ही तुच्छता से महानता की ओर अग्रसर होता है। सामान्य से असामान्य बनता है। स्वेट मार्डेन ने कहा है— "आत्मविश्वास हम में जितना अधिक होगा, उतना ही हमारा संबंध अनंत जीवन और अनंत शक्ति से गहरा और दृढ़तर होता जाएगा। जब चारों ओर विपत्तियों के काले बादल गहरा रहे हों, संसार सागर की गर्जन-तर्जन के बीच जीवननौका को किनारा न मिल रहा हो, नाव अब डूबे, तब डूबे की स्थिति में हो, ऐसी स्थिति में आत्मविश्वास ही मनुष्य को बचा सकता है।"

आत्मविश्वास की इस ज्योति को जलाने, उसे प्रज्वलित रखने के लिए आंतरिक स्वाधीनता की आवश्यकता है। जो मनुष्य अपने मानसिक विकारों, चिंता, भय आदि से जकड़ा हुआ है, वह स्वाधीन नहीं हो सकता। वह तो परतंत्र है, उसे ये विकार अपनी इच्छानुसार जहाँ-तहाँ भटकाते हैं। ऐसी परतंत्रता में आत्मविश्वास का निवास नहीं होता। जो अपने आंतरिक, बाह्यजीवन पर शासन करता है, वही इसकी शक्ति को पाता है और इसी से मनुष्य की साधारण शक्तियाँ असाधारण बन जाती हैं और वह महान कार्य कर सकने में सक्षम होता हैं।

हमें अपने जीवन को महान, उत्कृष्ट उपयोगी बनाने के लिए, संसार पर अपनी अमिट छाप छोड़ने के लिए आत्मविश्वास की ज्योति अपने हृदय मंदिर में जलानी होगी। अपने अंतर के दिव्य गुणों एवं शास्त्रियों का परिचय प्राप्त करना होगा। इस दिव्य ज्योति के सहारे ही हम संसार के दुर्धर्ष पथ पर जीवननौका रथ को बढ़ा सकेंगे। विश्वास! विश्वास! अपने आप में विश्वास! अपने आत्मदेव की अपार शक्तियों में विश्वास! यही जीवन की सफलता और महानता का रहस्य है।


स्वप्न दिखते क्यों हैं?

योगसूत्र में स्वप्न की विवेचना करते हुए बताया गया है कि जब व्यक्ति स्वेच्छापूर्वक अथवा स्वभावतः स्मृति से विस्मृति में, चेतनावस्था से अचेतनावस्था में प्रविष्ट होता है, तो चेतन और अचेतन की सम्मिश्रित प्रक्रिया यानी अर्द्धचेतन स्थिति में चला जाता है। इसी को स्वप्नावस्था कहा गया है। इस अवस्था में व्यक्ति अपनी शारीरिक एवं मानसिक प्रवृत्तियों के अनुरूप निद्रा में जो दृश्य देखता है, उन्हीं को स्वप्न कहते हैं। पित्त-प्रधान प्रवृत्ति वाले अग्नि और प्रकाश, वात-प्रधान व्यक्ति को आकाशगमन तथा कफ-प्रधान व्यक्ति को जल-जलाशयों से संबंधित चित्र-विचित्र दृश्य दृष्टिगोचर होते हैं।

अमेरिका के विश्वप्रसिद्ध स्वप्न विशेषज्ञ प्रो. कैल्विन हाॅल के कथनानुसार निद्रावस्था के समय उठने वाली परिकल्पनाओं के अंतर्गत दिखने वाले दृश्यों को स्वप्न कहते हैं। उनकी विचारधाराएँ भारतीय तत्त्वदर्शियों से पूरी तरह मेल खाती हैं। उनने स्वप्न को एक प्रकार की मानसिक-प्रक्रिया ही बताया है। प्रायः देखा जाता है कि निद्रावस्था में मनुष्य की मानसिक प्रवृत्तियाँ सर्वथा निर्जीव-निस्तेज नहीं हो जाती। जाग्रत अवस्था में जो शृंखला मानसिक वृत्तियों की दिखती हैं, वह अवश्य नष्ट हो जाती हैं। ऐसी स्थिति में अनेकानेक तरह की कल्पनाएँ और दृश्य अंतर्मन में उभरकर आते हैं, उन्हीं को स्वप्न कहा गया है। सपनों में कहने-सुनने की अपेक्षा दृश्य वाले भाग की ही बहुलता होती है। इसलिए सामान्य बोल-चाल की भाषा में स्वप्न देखना ही कहते हैं।

स्वप्न दिखते क्यों हैं? इसका जवाब भौतिक विज्ञान के पास नहीं। इनके आदि कारणों की खोज करना तो अध्यात्म विज्ञान का विषय है। मानवी मस्तिष्क की तुलना एक ऐसे विलक्षण कम्प्यूटर से की गई है, जो अरबों-खरबों की संख्या में स्थूल और सूक्ष्म स्मृतियों को सुरक्षित रखने में पूर्णतः सक्षम है। हम जो कुछ भी देखत-सुनते, पढ़ते अथवा अनुभव करते हैं, उसकी छाप हमारे स्मृतिपटल पर पड़े बिना नहीं रह सकती। वही स्वप्न के माध्यम से प्रत्यक्ष अथवा सांकेतिक रूप से व्यक्त होती रहती है।

रूस की ओस्कौरोखोदोवा, जो पाँच वर्ष की आयु में ही अंधी, बहरी, गूँगी हो गई थी, ने अपनी अक्षमताओं के बावजूद भी लेखनकला में प्रवीणता— पारंगतता हस्तगत कर दिखाई है। उनने 'माई परसेप्शन एंड कंसेप्शन ऑफ द वर्ल्ड' एक पुस्तक लिखी है, जिसमें स्वप्नों की सार्थकता पर ही प्रकाश डाला है। उनके मतानुसार आँखों से देखे बिना भी घटनाओं का आभास स्वप्न में होने लगता है। वैज्ञानिकों ने इस तथ्य का विवेचन करते हुए बताया है कि अंधों को स्वप्न में भले ही चित्रांकन होता दिखाई न पड़े, फिर भी उनके संकेतों को ध्वनि और गंधों के माध्यम से समझ करने में वे पूरी तरह सफल होते हैं। सपने मनुष्य की प्रवृत्ति और प्रकृति के अनुरूप ही दिखाई देते हैं।

ब्रह्मसूत्र में महर्षि वेदव्यास ने स्पष्ट किया है कि स्वप्न भविष्य में घटित होने वाले शुभ-अशुभ घटनाक्रमों के प्रतीक होते हैं। यह व्यक्ति की इच्छाशक्ति व विवेकशीलता पर निर्भर है कि वह अशुभ को टाले, शुभ का लाभ उठाए। स्वप्न विज्ञान की नवीनतम खोजों ने यह सिद्ध कर दिया है कि स्वप्नावस्था में अवचेतन मन अधिक सक्रिय रहता है, विवेक का अनुगामी और संवेदनशील भी। सपने अपनी प्रतीकात्मक भाषा में कहीं हमें परामर्श देते हैं तो कहीं उपयुक्त मार्गदर्शन। सपनों के समुचित विश्लेषण से मानव मन की दुःखद ग्रंथियों और कुंठाओं की उपचार-व्यवस्था भी बिठाई जा सकती है। जटिल-से-जटिल समस्याओँ का समाधान भी संभव है। स्वप्न चिकित्सा का मूलभूत आधार यही है।


प्रार्थना की प्रचंड शक्ति

ब्रिटेन निवासी रिबेका बीयर्ड ने प्रार्थना के बारे में अपनी कृति 'एवरी मैंस सर्च' में कहा है कि, "प्रार्थना करते समय हमें शुभ परिवर्तन का ही ध्यान करना चाहिए। जिस बात के लिए हम चिंता प्रकट करते हैं, उसके विपरीत भाव का हमें चिंतन करना चाहिए। अशुभ का चिंतन करके उसे शुभ में परिवर्तित नहीं कर सकते। हमें उस परिस्थिति का स्वयं निर्माण करना होगा, जिसमें हम अपनी भावनाओं को सुस्थिर, संतुलित और सुचारु रूप से देखना चाहते हैं। इस तरह हम ईश्वरीय शक्ति के कार्य में आने वाले अवरोधों को समाप्त करते हैं।"

साइकिक हीलिंग की विशेषज्ञ रिबेका का समूचा जीवन प्रार्थना के दिव्य अनुभवों से भरा है। उन्होंने अपने जीवन की एक घटना का वर्णन इसी पुस्तक में किया है। वह लिखती हैं कि, "मेरे कार्यालय में एलिस न्यूटन नाम की स्त्री आई। वह कैंसर रोग से ग्रसित थी। उसका उदर बुरी तरह फूला हुआ था। वह अत्यंत कमजोर थी और हाँफ रही थी। डाॅक्टरों की चिकित्सा से कोई लाभ न होते देखकर मैंने उसे ईश्वर से प्रार्थना करने की सलाह दी।" उसने उसी दिन से प्रार्थना आरंभ कर दी और अपने स्वास्थ्य लाभ के समय की प्रतीक्षा करने लगी। एक रात उसने सपने में एक प्रकाश देखा तो वह जाग पड़ी, पाया कि उसका पेट समतल और पिचका हुआ था। डाॅक्टर ने एलिस से आते ही पूछा कि, "क्या खून निकला था, पानी बहा था?", "कुछ नहीं।" एलिस का जवाब सुनकर डाॅक्टर आश्चर्य में पड़ गया। एक सप्ताह बाद एलिस का वजन लिया गया, जो बीमारी के समय के वजन से अड़तीस पौंड कम था। पेट फूलने से ही इतना वजन अधिक था, जो अब समाप्त हो गया था।

रिबेका बियर्ड इस घटना का उल्लेख करते हुए लिखती हैं कि, "हमारी सारी परेशानियों, अक्षमताओं का कारण यह है कि हमने दैवी शक्ति के लिए अपने कपाट बंद कर रखे हैं। यदि हम इन्हें खोलकर दैवी शक्ति का आह्वान कर सकें तो सर्वत्र शिवत्व ही दृष्टिगोचर होगा। उसकी सहायता उपलब्ध हुए बिना न रहेगी।"

इस संदर्भ में महर्षि अरविंद कहा करते थे कि, "व्यक्ति की सच्ची प्रार्थना—पुकार—अभीप्सा ही अदृश्य शक्तियों की सहायता को अपने तक आकर्षित कर सकने में समर्थ होती है।" उन्होंने अपने निजी जीवन का उदाहरण देते हुए स्पष्ट किया है कि ऐसी सहायताएँ उन्हें अनेकों बार प्राप्त हुईं।

एक बार जब वह यौगिक साधन नामक ग्रंथ लिख रहे थे। उस समय राजा राममोहन राय की आत्मा ने आकर पुस्तक की विषयवस्तु को स्पष्ट किया। जब वह पुस्तक को लिखना प्रारंभ करते, उस समय वह उपस्थित हो जाती और जब तक लेखन चलता, उपस्थित रहती। ग्रंथ की समाप्ति तक ऐसा निरंतर चलता रहा।

साध्यवार्त्ता में नीरोद बरन को बताते हुए 18 दिसंबर 1938 को उन्होंने कहा था कि, "मैने सुपरमाइंड (अतिमानस) को समझने में पहले कई गलतियाँ की। मैं तब इसके मध्यवर्त्ती स्तरों को ठीक से नहीं जानता था। उन दिनों अलीपुर जेल में स्वामी विवेकानंद ने ध्यान के क्षणों में उपस्थित होकर मेरा मार्गदर्शन किया। चेतना की उच्चस्तरीय और गहरी परतों को दिखाया। भावी जीवन व कार्यक्रम के बारे में निर्देशन व मार्गदर्शन प्रदान किया। उन्होंने लगातार लगभग एक महीने आकर यह सहायता प्रदान की।" सच्चे मन से की गई प्रार्थना अपना सत्परिणाम प्रस्तुत किए बिना नहीं रहती। चाहे वह आत्मसंतोष एवं लोक-सम्मान के रूप में उभरे अथवा जनसहयोग तथा दैवी अनुग्रह के रूप में। प्रार्थना के परिणाम समष्टिमात्र के लिए कल्याणकारी होते हैं, इसीलिए कहा गया है कि, "प्रार्थना को दैनंदिन जीवन में भोजन से भी अधिक महत्त्व देना चाहिए।"


परंपराएँ कभी शाश्वत नहीं होती

सदियों से जड़ जमाए बैठी मान्यताएँ समय के प्रवाह के साथ टूटती चली जा रही हैं व मनुष्य समुदाय यह दावा करने लगा है कि वह न केवल प्रकृति की चरम सीमा पर पहुँच चुका है, वरन धरती, अंबर, पाताल सभी तक पहुँचने की क्षमता भी रखता है। इतना होने पर भी हम पाते हैं कि मानव समाज का प्रगतिशील कहा जाने वाला तबका ही उन रूढ़िवादी अंधपरंपराओं, रीति-रिवाजों को अभी भी स्वयं से ऐसे चिपकाए बैठा है, मानों वे उसका पीछा नहीं छोड़ रही हैं। विवाह संबंधी प्रचलन व विकृतियाँ इसी श्रेणी में आती हैं।

आदिवासियों को, जनजातियों को हम पिछड़े समुदाय का मानते हैं व स्वयं को विकसित, प्रगतिशील चिंतन का पक्षधर, किंतु व्यवहार में उलटा ही देखने को मिलता है। आज भी जनजातियों में इस पवित्र बंधन के साथ जुड़े जो अनुबंध हैं, वे तुलनात्मक दृष्टि से पिछड़ों में कहीं अधिक श्रेष्ठ स्तर के हैं व हमें प्रेरणा देते हैं।

संथाल बिहार की एक जनजाति है। कहने को तो पहाड़ी अंचल में रहने वाले ये आदिवासी लोग हैं, पर विवाह के क्षेत्र में इनमें एक परिपक्वता यह पाई जाती है कि जहाँ अन्य भारतीय जनजातियों में लड़के-लड़की का जल्दी ही विवाह रचा डालने का उतावलापन दिखाई पड़ता है, वहीं संथाली लोग इसके पक्के विरोधी होते हैं। उनकी बिरादरी में लड़के की आयु 25 वर्ष और लड़की की आयु 20 वर्ष जब तक नहीं हो जाती, तब तक शादी की बात सोची तक नहीं जाती। एक बार विवाह बंधन में बँध जाने के बाद फिर ये सदा-सदा के लिए दो शरीर एक प्राण होकर रहते हैं। पत्नी को त्यागना अथवा विवाह के पवित्र-बंधन को तोड़ना इनमें पाप माना जाता है। अतः एक बार जिससे शादी हो जाती है, मन, वचन और प्राण से जीवनपर्यंत उसके साथ निर्वाह कर लेते हैं। इनमें विवाह की प्रथा भी विलक्षण होती है। लड़के-लड़की मेले, बाजार अथवा अन्य किसी सार्वजनिक स्थान में मिलकर स्वयं ही एकदूसरे को पसंद करते और विवाह तय करते हैं। जन्मदर भी इनकी कम है।

नागालैंड की जनजातियों में लड़के का साहसी और बहादुर होना विवाह के लिए प्रथम अनुबंध माना जाता है। ऐसा वर प्राप्त होने के बाद सगाई के रूप में वरपक्ष, वधूपक्ष को एक दुधारू गाय भेंट करता है और एक वर्ष तक लड़का, लड़कीवालों के यहाँ रहकर उनके कृषि एवं विभिन्न प्रकार के अन्य कार्यों में सहयोग करता है। इस बीच दोनों पक्ष यदि एकदूसरे से संतुष्ट हुए तो वर और कन्या की शादी कर दी जाती है। इसे वे एक पवित्र बंधन के रूप में स्वीकारकर जीवन भर सुख-दुःख, हर्ष-विषाद में एकदूसरे का साथ निभाते हैं। दूसरे विवाह की प्रथा नागा जाति में भी नहीं पाई जाती। हमें यह विचित्र लग सकता है कि वधूपक्ष के स्थान पर वरपक्ष को क्यों देना पड़ता है? पर हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि मान्यताएँ समय से नहीं बँधी रहती। हो सकता है कि आने वाले दिनों में सारे समाज में यही प्रचलन चल पड़े कि गुणवत्ता की कसौटी पर खरा उतरने वाला वर ही सुपात्र माना जाएगा।

उत्तर प्रदेश के गढ़वाल और कुमाऊँ जिले के 'भोटिया' जनजाति में भी वर-वधू का चयन स्वतंत्र रूप से लड़के और लड़की पर छोड़ दिया जाता है। वे स्वयं एकदूसरे को पसंदकर विवाह तय करते हैं। विवाह-प्रथा बड़ी विचित्र होती है। लड़के ने लड़की को पसंद कर लिया, इसकी जानकारी वधूपक्ष के माँ-बाप को लड़का भेंट के रूप में कुछ रुपए भिजवाकर देता है। इसी समय इस परिणय की सूचना वह अपने अभिभावक को भी देता है। दोनों पक्षों के सहमत हो जाने पर बारात लड़की वालों के यहाँ आती है और बिना किसी धूम-धाम और नेग-दहेज के वधू को ले जाती है।

“गोंड’ जनजाति में विवाह के अवसर पर किसी प्रकार का धार्मिक कृत्य अथवा उत्सव आयोजन नहीं मनाया जाता। इसमें सीधे-सीधे ढंग से एकदूसरे का चयन कर लेना ही विवाह माना जाता है।

सामान्य प्रचलन के अनुसार हमारे समाज में लड़की पक्ष द्वारा लड़के की तलाश करने की प्रथा ही देखी जाती है, किंतु कुछ जनजाति आदिवासियों में परंपरा इसके ठीक विपरीत है। उनमें वरपक्ष वाले ही कन्या की ढूँढ-खोज करते हैं।

ऐसा ही एक आदिवासी कबीला उत्तर-पूर्व के सीमावर्त्ती क्षेत्रों में निवास करता है। ‘चकमा’ जाति के नाम से जाने जानेवाले इन कबाइलियों में जब पुत्रवधू का चयन कर लिया जाता है और इसकी सूचना उसके पिता को दे दी जाती है तो लड़की का पिता गाँववालों की एक पंचायत बुलाता है, जिसमें गाँव के सभी वयोवृद्ध सम्मिलित होते हैं। इस पंचायत में सभी मिलकर लड़की की सुरक्षा की दृष्टि से उसकी कीमत तय करते हैं। यह कीमत प्रायः इतनी अधिक होती है, जिसे आसानी से दे पाना वरपक्ष के लिए मुश्किल होता है। शादी के अवसर पर इस मूल्य को चुकाना आवश्यक नहीं होता और न लड़की वालों की ओर से वरपक्ष को ऐसा करने के लिए बाधित किया जाता है। यह तो एक प्रकार की अनुबंध-राशि होती है। जिसे निश्चित करना इसलिए आवश्यक होता है कि यदि ससुरालवालों की प्रताड़ना से तंग आकर कन्या अपने जीवन को जोखिम में डाल ले, आत्मघात कर ले तो यह भारी राशि वरपक्ष, कन्यापक्ष को पंचायत के समक्ष चुकाएगा।

विश्व में एक अंचल ऐसा भी है, जहाँ नर का जा पाना और जीवित रह पाना मुश्किल है। ब्राजील के जंगलों में बसे इस क्षेत्र में स्त्रियों का ही वर्चस्व है। इस स्त्रीराज्य की एक मुखिया होती है। इसी का शासन संपूर्ण राज्य में होता है। इसकी झोपड़ी के आगे दो शेर बँधे रहते हैं, यही इस राज्य की रानी की पहचान होते हैं। इसके अतिरिक्त यहाँ की अन्य सामान्य महिलाओं से रानी एक और बात से भिन्न होती है कि उसके शरीर में बालों का अभाव होता है, जबकि दूसरी सभी स्त्रियों के शरीर में लंबे-लंबे बाल होते हैं, जो शरीर ढकने के लिए आवरण का काम करते हैं। यदा-कदा जब ये बाल अधिक लंबे हो जाते हैं, तो इन्हें काटकर इनसे रस्सी भी बनाई जाती है, जो जानवरों के बाँधने के काम आती है।

जब यहाँ पुरुष है ही नहीं, तो यह स्त्रीराज्य बना कैसे? इसकी भी एक रोचक गाथा है। वस्तुतः ब्राजील का यह क्षेत्र स्वर्ण-संपदा से भरा पड़ा है। यहाँ सोने का विशाल भांडागार है। इसी की लोभ-लिप्सा में आकर दूसरे क्षेत्र के लोग उस स्त्रीराज्य को अपनी कन्या भेंट देकर बदले में सोना प्राप्त करते हैं। यह व्यापार-विनिमय एक पहाड़ी पर नियत स्थान पर होता है। जो व्यक्ति अपनी कन्या के बदले सोना प्राप्त करना चाहता है, वह अपनी बेटी को उस स्थान पर ले जाता है, जहाँ स्त्रीराज्य की कुछ प्रतिनिधि पहले से मौजूद रहती हैं। वह उस व्यक्ति से बालिका प्राप्तकर बदले में उसे सोना देकर विदा करती हैं। जिस दिन बालिका उस महिला राज्य में पदार्पण करती है, उसी दिन से उसका विभिन्न क्षेत्रों में प्रशिक्षण आरंभ हो जाता है। राज्य के रीति-रिवाज, नियम-कानून के साथ युद्ध-विद्या का भी अभ्यास कराया जाता है, फलतः जब वह वयस्क होती है तो एक वीरांगना के रूप में उभरकर सामने आती है। पुरुषों का इस राज्य में प्रवेश निषेध होता है। जो कोई पुरुष इस नियम का उल्लंघन करता है, वह फिर जीवित लौटकर नहीं जा पाता।

यह वर्णन मात्र कौतूहलवर्द्धन हेतु नहीं, वरन सामने रखने के लिए प्रस्तुत की गई एक सच्चाई है । नारी एवं विवाह के संबंध में हमारा दृष्टिकोण अब आमूल-चूल बदलना चाहिए। प्रगति सही अर्थों में तभी मानी जाती है, जब विवेक एवं औचित्य की कसौटी पर मान्यताओं को कसा जाए। मनुष्य को अपने चिंतन का पिछड़ापन स्वीकार करने में कोई लाज नहीं आनी चाहिए एवं हर परिवर्तन को खुले दिमाग से स्वीकारना चाहिए।


प्रकृति और मानव परस्पर अन्योन्याश्रित

मानवी जीवन और प्राकृतिक परिवेश एकदूसरे से घनिष्टतापूर्वक जुड़े हैं। एक की गड़बड़ी से दूसरा प्रभावित हुए बिना नहीं रहता। व्यवहारविज्ञानियों ने इन दिनों एक नए आयाम की खोज की है। उनके अनुसार समूचे संसार में फैले मानव समाज की व्यावहारिक गड़बड़ियों का एक महत्त्वपूर्ण कारण पर्यावरणीय असंतुलन है। इनका मानना है कि अच्छे समाज, अच्छे आदमी के लिए जरूरी है कि प्रकृति संपन्न और समृद्ध हो।

बात भी सही है। आजकल प्रकृति एवं समाज की पारस्परिक अंतःक्रिया इतनी व्यापक है कि उससे समूची मानव जाति प्रभावित हो रही है। पर्यावरणीय बिगाड़ का कारण औद्योगीकरण, नगरीकरण, ऊर्जा और कच्चे माल के पारंपरिक साधनों की घटोत्तरी, प्राकृतिक असंतुलनों के विघटन, विभिन्न जानवरों व पेड़-पौधों के खाने-पीने के साधनों के विनाश को बताया जाता है।

स्वच्छंद वैज्ञानिक प्रगति तथा तकनीकी सामर्थ्य ने मनुष्य को काफी ताकत दे दी है। हम पर्वतों को हटा सकते हैं। नदियों का मार्ग बदल सकते हैं। नए सागरों का निर्माण कर सकते हैं। मतलब यह कि हम प्राकृतिक जगत में काफी फेर-बदल कर सकते हैं, परंतु कौन−सी फेर-बदल उचित है, कौन-सी अनुचित? क्या करने से सत्परिणाम सामने आएंगे, क्या करने से दुष्परिणाम? इसे बिना सोचे-विचारे कोई काम करने लगा जाए तो इसे मूर्खता के सिवा और क्या कहा जाएगा?

अमेरिकन विद्वान जे.एम. हाक 'बिहैवियरल इकाॅलॉजी' में कहते हैं कि आज यह जाहिर हो गया है कि हम प्राकृतिक जगत पर अपने अंतहीन आक्रमण तथा बगैर सोचे-विचारे उसमें बड़े फेर-बदल करके इस अधिकार का अविवेकपूर्ण उपयोग नहीं कर सकते और हमें करना भी नहीं चाहिए; क्योंकि इसके परिणाम हानिकारक होंगे। आधुनिक अनुसंधानों से मालूम हुआ है कि जैवमंडल पर मनुष्य के अनवरत एकतरफा और काफी हद तक अनियमित प्रभाव से हमारी सभ्यता एक ऐसी सभ्यता में तब्दील हो सकती है, जो मरुभूमियों को मरुद्यानों में रूपांतरित करने के स्थान पर मरुद्यानों को रेगिस्तानों में प्रतिस्थापित कर देगी।

व्यवहारविज्ञानी जे. स्टैनले के अनुसार जहाँ-जहाँ इस तरह वातावरण अस्त-व्यस्त हुआ है। वहाँ के निवासियों की मानसिक स्तर की अस्त-व्यस्तता प्रत्यक्ष दिखाई देती है। उनके व्यवहार में चिड़चिड़ाहट, झल्लाहट, मारपीट, आक्रामकता को स्पष्टतः देखा जा सकता है। स्टैनले ने अपनी किताब 'माइंड एण्ड इकॉलाॅजी' में इसे समझाते हुए कहा है कि, “व्यवहार के बीज मनुष्य के मन में रहते हैं। मानसिकता के अनुरूप ही शरीर की विभिन्न गतिविधियाँ, क्रियाकलाप संचालित होते हैं। परिवेश की गड़बड़ियों का सीधा असर चेतन और अवचेतन मन पर पड़ता है।”

श्रीमद्भागवत गीता में इस बात को और अधिक ढंग से समझाया गया है। इसमें प्रकृति के आठ अंग बताए गए हैं। इन्हें अष्टधा कहा गया है। पहले पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि आदि पाँच बाहरी और मन, बुद्धि अहंकार तीन आंतरिक। ये बाहरी और आंतरिक घटक आपस में खूब जुड़े हैं। बाहरी प्रकृति की हलचलें आंतरिक प्रकृति को हिलाए-डुलाए बिना नहीं रहती।

इसी सबको मद्देनजर रखते हुए ए व्हाइट का 'डि ह्यूमनाइजेशन आफ मैन' में कहना है कि, "प्रकृति पर अपनी मानवीय विजयों के कारण हमें आत्मप्रशंसा में विभोर नहीं हो जाना चाहिए; क्योंकि ऐसी हर विजय हमें अमानव बनाने वाली होती है। यह सही है कि हरेक विजय से पहले वे ही परिणाम मिलते हैं, जिनका हमने भरोसा किया था; पर दूसरी और तीसरी बार में उसके बिलकुल भिन्न तथा अप्रत्याशित परिणाम होते हैं, जिनसे अक्सर पहले परिणाम का असर जाता रहता है। पिछली सदी तथा मौजूदा सदी के पूर्वार्द्ध में मनुष्य का लालच इतना बढ़ा-चढ़ा नहीं था, जो सारी मानव जाति के अस्तित्व की आवश्यक शर्त के रूप में सोचने को विवश करता, यह तकाजा करता कि समाज और उत्पादन के सिलसिले में प्रकृति पर हमारे हस्तक्षेप के दूरगामी परिणामों पर विचार किया जाए, लेकिन अब यह फौरी और आवश्यक हो गया है।

अब यह साफ जाहिर हो गया है कि मनुष्य द्वारा भौतिक चीजों के लिए प्रकृति के शोषण की शैली, जीवन जीने की शैली को भी बरबाद करती है और यह ऐसे बड़े पैमाने पर होता है कि समूची मानव जाति तथा अन्य जीवधारी उसकी चपेट में आ जाते हैं।

हमारा जीवन सरल, सौम्य और मृदुल बने, इसके लिए जरूरी है कि हम पृथ्वी पर जीवन-प्रणाली के विभिन्न तत्त्वों पर अपने प्रभाव को सावधानीपूर्वक देखें, समझें और सुधारें। पर्यावरण को मनुष्य की आवश्यकताओं के अनुरूप रूपांतरित करना एक सीमा तक तो ठीक है। विनाशक प्राकृतिक शक्तियों जैसे भूकंपों, टाइफूनो, चक्रवातों, बाढ़ व सूखा, चुंबकीय और सौर आँधियों से भी संघर्ष करना पड़ेगा, परंतु यह केवल उन नियमों के अनुसार ही किया जा सकता है, जिनके द्वारा जैवमंडल एक अखंड व स्वनियामक प्रणाली के रूप में काम करता तथा विकसित होता है। आज का पर्यावरणीय सवाल महज प्रदूषण तथा मनुष्य के आर्थिक क्रियाकलापों के दूसरे नकारात्मक परिणामों तक सीमित नहीं है। यह हमारी जीवनशैली को गढ़ने से भी संबंधित है।

विशेषज्ञों का कहना है कि इस शताब्दी के उत्तरार्द्ध में पहले के वीरान क्षेत्रों में नई-नई बस्तियाँ बस जाने, जहरीले पदार्थों के व्यापक उपयोग तथा प्रकृति के निर्मम शोषण की वजह से विभिन्न जीव-जातियों के गायब होने की दर तेजी से बढ़ गई है। जीवाश्मवेत्ताओं का मानना है कि इसके इस खात्मे में इनका पारस्परिक आक्रामक व्यवहार भी एक बड़ा कारण है।

पिछले 2000, वर्षों में जो जातियाँ गायब हुई हैं, उनमें आधी से अधिक 1900 के बाद हुई हैं। जैविकीविदों की मान्यता है कि पिछले 350 सालों में, 19 वीं सदी के मध्य तक प्रति दस साल में प्राणियों की एक जाति या उपजाति नष्ट हुई है।

प्रकृति व प्राकृतिक साधनों के एक अंतर्राष्ट्रीय रक्षा संगठन ने अनुमान लगाया है कि अब औसतन हर साल एक जाति या उपजाति लुप्त हो जाती है। इस समय पक्षियों और जानवरों की लगभग 1000 जातियों के गायब होने का खतरा है।

इस जैविकीय दारिद्रीकरण का प्रभाव बताते हुए एक व्यवहारविज्ञानी एफ.ए. बीमान का 'बिहेवियरल एग्रेशन एण्ड एनवायरनमेन्ट' में कहना है कि वर्त्तमान शती में पर्यावरण ध्वस्त होने के साथ शनैः शनैः मनुष्य का व्यवहार भी अधिकाधिक आक्रात्मक होता गया है। इससे पहले के मानवीय इतिहास के पृष्ठ सिर्फ कुछ व्यक्तियों की व्यावहारिक विकृतियों को ही बताते हैं। इन कुछ को छोड़कर शेष दुनिया के आदमियों ने पारस्परिक सरलता और सौम्यता ही पसंद की है, पर अब बदलते माहौल में सभ्य दुनिया के हर कोने में मानवीय व्यवहार के अमानवीकरण की झलक देखी जा सकती है।

इस अमानवीकरण को हटाने के लिए जरूरी है कि प्रकृति के साथ मनुष्य जाति के व्यवहार के तौर-तरीके बदलें। इसके लिए उस नीति को बदलना होगा, जिसके अंतर्गत प्रकृति पर विजय प्राप्त करने, उसके विभिन्न साधन-स्त्रोतों से मनचाही लूट-खसोट करने को ही सामाजिक लक्ष्य मान लिया गया है।

हम हँसी-खुशी की जिंदगी जी सकें, इसके लिए संतुलित रीति हर हालत में आख्तियार करनी ही होगी। इसके प्रयोग के तौर-तरीके, स्थान-परिवेश और उसकी अवस्थाओँ-आवश्यकताओं के अनुरूप अवश्य भिन्न हो सकते हैं। सहयोग, संरक्षण, सद्भाव का यह प्रवाह हमारे व्यावहारिक विकारों को धीरे-धीरे दूरकर निर्मल करता जाएगा। इसके लगातार बने रहने के लिए जरूरी है— हम सभी का एकजुट प्रयास, जो एकदूसरे में निरंतर इसके लिए प्रेरणा भरता रहेगा। यही 'डीप इकाॅलाॅजी' का तत्त्व दर्शन है।


अभिनेता नहीं, युग सृजेता बनें

मनुष्य स्वभावतः महत्वाकांक्षी है। सुखोपभोग की इच्छा हर प्राणी में पाई जाती है। इसी हेतु वह अनेक प्रकार के क्रियाकलापों में संलग्न रहता पाया जाता है। घटियास्तर के व्यक्ति मात्र शरीरचर्या तक सीमित रहते हैं। वे अच्छा खाने, अच्छा  पहनने, मनोरंजक दृश्य देखने, कामुकता की ललक सँजोने में लगें रहते हैं। शृंगार-सज्जा इसी के अंतर्गत आती है। इसके एक कदम आगे बढ़ने पर महत्वाकांक्षी के मन को उल्लसित करने वाले पक्ष सामने आ खड़े होते हैं। ठाट-बाट, संपत्ति संग्रह, पदवीधारी, सत्ताधारी होने की इच्छाएँ मनःक्षेत्र में ही उठती हैं। दूसरों से अधिक समर्थ, संपन्न होने की अभिलाषा से प्रेरित होकर लोग अनेक प्रतिस्पर्धाओं में उतरते हैं और विजयी होने पर गर्व जताते हैं। चुनाव जीतने में लोकसेवा की भावना कम और अपने को विशिष्ट सिद्ध करने की आकांक्षा अधिक होती है। अखबारों में नाम छपाने, समारोहों में प्रमुख पद पर आसीन होने, तीर्थयात्रा आदि के माध्यम से लोगों की दृष्टि में धर्मात्मा जंचने जैसे ताने-बाने इसीलिए बुने जाते हैं। विवाह-शादियों, प्रीतिभोजों में खरचीली धूमधाम खड़ी करने में भी अपनी संपन्नता का विज्ञापन करने का भाव ही प्रधान होता है। किसी की जीवनचर्या का लेखा-जोखा लेने पर प्रतीत होता है कि निर्वाह के साधन तो सरलतापूर्वक कम समय और कम परिश्रम में भी जुट सकते हैं, पर निरंतर व्यस्तता में ग्रसित रहने का प्रमुख कारण एक ही पाया जाता है— दूसरों की तुलना में अपनी विशिष्टता सिद्ध करना। इसी का सरंजाम जुटाने में जीवन का अधिकांश समय, श्रम एवं कौशल खप जाता है। इन्हें मृगतृष्णा ही कहना चाहिए, जिनकी आकर्षक छवि मनुष्य को अपनी ओर खिंचती है और उसकी बहूमूल्य क्षमता को चूस लेती है।

यह भूला दिया जाता है कि संसार में एक-से-एक बढ़कर 'बड़े आदमी' भरे पड़े हैं। उनकी तुलना में भरपूर प्रयत्न करने पर भी कदाचित अपनी बढ़ी-चढ़ी सफलता भी नगण्य समझी जा सके। फिर उत्साह तभी तक रहता है, जब तक इच्छित वस्तु या स्थिति प्राप्त नहीं हो जाती। उपलब्धि के कुछ क्षण ही पानी के बुलबुले जैसा उत्साह प्रदान करते हैं। इसके बाद तो जो मिलता है उसका बोझ और दायित्व बहन करते रहना ही कठिन पड़ जाता है। विवाह से पूर्व जोड़ीदार के संबंध में परीलोक जैसी कल्पनाएँ मस्तिष्क में ज्वार-भाटे की तरह उठती रहती हैं, पर जब कुछ ही दिन में गृहस्थी की भारी-भरकम गाड़ी खींचने की बारी आती है, तब पता चलता है कि ललक ने सुविधा कम और झंझट बहुत भारी लाद दिया। जो पाया है, उसे बनाए रहना भी कठिन होता है। ईर्ष्यालु उठ खड़े होते हैं और छीनने या नीचा दिखाने की दुरभिसंधियाँ रचने लगते हैं। फिर जो हर्ष या यश मिला था, वह भी थोड़े समय स्थिर रहता है। व्यस्तताग्रस्त दूसरे लोग तो उसे कब तक स्मरण रखे रहेंगे। स्वयं अपने को ही अपनी पिछली बातें याद नहीं रहतीं। नए काम ही इतने आ जाते हैं कि पिछलों की याद बनाए रहना संभव ही नहीं होता।

इन सब तथ्यों का गंभीर विवेचन करने वाले तत्त्वदर्शियों ने क्षुद्र महत्वाकांक्षाओं को हेय माना है। उनकी उपमा बालकौतुक से दी है और कहा है कि जीवन को सार्थक बनाने वाले विचारशीलों को इस क्षुद्रता भरी भूल-भुलैया से बचना चाहिए। शक्ति गँवाने और बदले में मिथ्या अहंकार सिर पर लाद लेने में कोई बुद्धिमानी नहीं है। आकांक्षा से शक्ति उत्पन्न होती है और प्रयास में निरत रहने का उत्साह उभरता है। इस तथ्य को प्रगति की प्रारंभिक स्थिति के अनुरूप मानते हुए भी यह देखना चाहिए कि क्या इनकी अपेक्षा ऐसे महत्त्वपूर्ण निर्धारणों का चयन किया जा सकता है, जो आत्मसंतोष के साथ-साथ चिरकाल तक टिकने वाला श्रद्धाभरा लोक-सम्मान प्रदान कर सकें। इस प्रकार का चयन न कर पाने से ही लोग अजगर को खिलौना मानकर उसकी और लपकते रहते हैं। पीछे लाभ के स्थान पर भारी घाटे में रहते हैं।

उच्चस्तरीय महत्वाकांक्षा एक ही है कि अपने को इस स्तर तक सुविस्तृत बनाया जाए कि दूसरों का मार्गदर्शन कर सकना संभव हो सके। यही सच्चा नेतृत्व है। अभिनेता स्तर के नेता क्षणिक, उथली और सस्ती वाह-वाही लूटकर अपना मन बहलाते हैं। बाहुल्य आज इन्हीं का है। ऐसा बनने के लिए जो प्रपंच रचने पड़ते हैं, उसी में वह बहुमूल्य क्षमता खप जाती है, जिसका यदि उच्च उद्देश्यों में नियोजन हुआ होता तो अपना और दूसरों का कल्याण कर सकने का ऐसा सुयोग बन पड़ता, जिसका अनुकरण और अभिनंदन करते हुए लोग अपने को धन्य मानते रहते।

सेवा का प्रत्यक्ष पक्ष दीन-दुखियों की सेवा करना, पिछड़ों को ऊँचा उठाना, पीड़ितों की व्यथा पूछना, अभावग्रस्तों के लिए साधन जुटाना है। यह सभी कार्य उचित हैं और दया-धर्म की अभिवृद्धि करते हैं। अपने निर्वाह की तरह दुखियारों को भी अपने सुख साधनों में सहभागी बनाना मानवोचित कर्त्तव्य है। इसका निर्वाह हर सद्गृहस्थ को करना और उदारचेता नागरिक बनने का प्रयत्न करना चाहिए।

इससे ऊँची दूसरी सेवा-साधना हैं, जिसे धर्मधारणा कहा जाता है। इसका स्वरूप है— अव्यवस्था को व्यवस्था में और अनगढ़ता को संस्कारिता में बदलने वाले मार्गदर्शन हेतु कटिबद्ध होना। यही सच्चा नेतृत्व है। इसी पर वैयक्तिक और साहसिक प्रगति का आधार बनता है। लोग अभावों से जितने पीड़ित हैं, उसकी अपेक्षा कहीं अधिक इसलिए दुःखी हैं कि वे प्रगति र्और शांति का मार्ग ढूँढने और अपनाने का सुयोग प्राप्त न कर सके। इस अभाव की पूर्ति कर सकने वाले ही भौतिक एवं आध्यात्मिक अभ्युदय का राजमार्ग विनिर्मित करते हैं। साधु, ब्राह्मण, पुरोहित और लोकसेवी इसलिए जन-जन के श्रद्धाभाजन बनते हैं कि उनमें अपने जीवन भर सर्वसाधारण को अधिक उत्कृष्ट के मार्ग पर चलाने का प्रयत्न किया और उसमें तत्परता बरतने के कारण सफाई भी पाई। ऐसे मार्गदर्शकों को ऋषिकल्प माना जाता है और उनकी गणना भू-सुरों में, देवताओ में होती है। किसी समय इसी समुदाय की बहुलता थी। फलतः सतयुगी वातावरण बना रहा। स्वल्प साधनों में भी लोग हिल-मिलकर रहें। मिल-बाँटकर खाते, स्नेह-सौजन्य बरसते एवं भावना, विचारणा और क्रियाकलाप का स्तर ऊँचा उठाने की ही परिणति थी कि मनुष्य में देवत्व की झलक-झाँकी का आभास मिलता रहा। आज की विषम परिस्थितियों में ऐसे मार्गदर्शकों की महत्ती आवश्यकता अनुभव की जा रही है। उन्हीं के अभाव में सर्वत्र समस्याओं और विपत्तियों का सामना करना पड़ रहा है। अच्छा होता मनीषी वर्ग की प्रतिभाएँ अपनी लेखन, आदर्शवादी जीवनचर्या के आधार पुरातन ब्राह्मण धर्म का परिपालन करतीं और पिछड़ेपन को सर्वतोमुखी प्रगतिशीलता में परिवर्तित कर सकती। इस समूची प्रक्रिया का सुसंस्कारिता का अभिवर्द्धन कह सकते है। धर्म और अध्यात्म का यही वास्तविक क्षेत्र भी है।


कहानी

जब फ्रांस के अतुल पराक्रमी नैपोलियन बोनापार्ट ने एक स्टाफ ऑफिसर से किसी कठिन कार्य के संपादन के लिए प्रस्ताव किया तो उसने उत्तर दिया कि 'यह कार्य असंभव है।' नैपोलियन ने चिल्लाकर कहा कि असंभव शब्द मात्र मूर्खों के लिए है, साहसियों के लिए नहीं।


परस्पर जुड़े हैं, जुड़े ही रहें!

तितलियाँ, मक्खियाँ एक फूल से उड़कर दूसरे पर बैठती रहती हैं। उनके परों और पैरों के साथ उनके पराग एक से दूसरे तक पहुँचते रहते हैं। इसी निषेचन-प्रक्रिया के फलस्वरूप फूलते-फलते हैं। यदि सहक्रिया रुक जाए तो फूलों को फलित होने का अवसर न मिले। पक्षी आकाश में स्वच्छंद विचरते रहते हैं। वे दुर्गम क्षेत्र में जा पहुँचते हैं और वहाँ बीट करके उसमें भरे हुए बीजों को वृक्ष बनने का अवसर देते हैं। यह पारस्परिक सहकार का ही चमत्कार है, जिसके बलबूते वनस्पतियाँ फलित होती और वंशवृद्धि करती हैं। इसके अभाव में वनस्पति वर्ग सिकुड़ता और समाप्त होता चला जाएगा।

इकालॉजी सिद्धांत के अनुसार यह समस्त विश्व-ब्रह्मांड परस्पर सहयोग पर ही टिका हुआ है। इसका प्रत्येक घटक एकदूसरे के साथ आदान-प्रदान की विधि-व्यवस्था के साथ जुड़ा हुआ है। यदि यह शृंखला टूट जाए तो समझना चाहिए कि जहाँ भी इक्कड़पन चलेगा, वहाँ अभावग्रस्त स्थिति में समाप्ति का सिलसिला चल पड़ेगा। जलचक्र, वनस्पतिचक्र, प्राणिचक्र के पीछे प्रकृति की यही नियति काम करती है। समुद्र का जल भाप बनकर ऊपर उठता है, बादल बनकर बरसता है, वह जल नदी-नालों के माध्यम से फिर समुद्र तक जा पहुँचता है। जलचक्र के सुव्यवस्थित रूप से चलते रहने पर ही वनस्पतियों और प्राणियों को, उपयोग के लिए जल मिल जाता है। भूमि की उर्वरता भी बढ़ जाती है। यदि यह क्रम अस्त-व्यस्त हो जाएगा तो फिर सर्वत्र सूखा ही दृष्टिगोचर होगा। यहाँ तक कि समुद्र भी सूख जाएगा। पेड़ों के पत्ते झड़ते हैं, नीचे वाली भूमि को खाद देते हैं। फलों में बीज निकलते हैं, बीज नए पौधे उगाते हैं। यदि यह क्रम न चले तो वनस्पतियों का वंश नष्ट ही हो जाए। प्राणी प्रजनन का कष्टसाध्य क्रम यौन उत्साह से प्रेरित होकर अपनाते हैं। बच्चों को सहज, स्वाभाविक उत्साह स्फुरण से प्रेरित होकर पालते हैं और पीढ़ियाँ बनती-बढ़ती चली जाती हैं। कचरा खाद्य बनता है और उर्वरता का निमित्त कारण बनता है। मरण के उपरांत पुनर्जन्म की भूमिका बनती है। यह ध्वंस और सृजन के रूप में दीख पड़ने वाला उपक्रम वस्तुतः सहयोग का प्रकृति-क्रम ही है। ग्रह-नक्षत्र एकदूसरे को अपनी आकर्षणशक्ति से बाँधकर अधर आकाश में लटके हुए हैं। जिधर भी दृष्टि दौड़ाई जाए, उधर ही सहयोग का सिलसिला चलता प्रतीत होता है। उसमें जहाँ भी, जब भी शिथिलता आती है, वहीं अवरोध का, विनाश समापन का लक्षण प्रकट होने लगता है।

मनुष्य जीवन की प्रगतिशीलता तो पूरी तरह इसी आधार पर अवलंबित है। यहाँ जितनी प्रगतिशीलता, सुविधा, सफलता दीख पड़ती है, उसके मूल में सहकारिता ही काम करती दृष्टिगोचर होती है। जहाँ दरिद्रता, कुरूपता, अवगति बन दुर्दशा के असभ्यता के लक्षण उभरे दिखते हैं, समझना चाहिए वहाँ सहकारिता का समुचित सुयोग नहीं बन पाया। इसी के अभाव में मनोमालिन, विग्रह-कलह, विद्वेष, आक्रमण, अपराध आदि का विक्षोभ उभरता है। दुःख और दरिद्रता सहयोग के अभाव का दूसरा नाम है। जो जितना एकाकी है, वह उतना ही दुर्बल है। उसका भविष्य उतना ही अंधकारपूर्ण है।

अध्यात्म तत्त्वदर्शन को जीवन की सर्वतोमुखी सफलता का आधार माना गया है। अध्यात्म का मोटा अर्थ है— अपनापन। सरसता के भंडार उसी में भरे पड़े हैं। जिस वस्तु या व्यक्ति को अपना समझते हैं, वहीं प्रिय लगता है। जब उस पर से किसी कारणवश अपनेपन का भाव हट जाता है और पराएपन की मान्यता बन जाती है, फिर इस बात की परख नहीं रहती कि वह किस स्थिति में है। उसे संभालने या विकसित करने में भी रुचि नहीं रहती। लोग अपने बच्चों को, अपने परिवार को चावपूर्वक पालते हैं, उनके लिए समय भी लगाते हैं और पैसा भी खरच करते हैं, पर दूसरों के प्रति जिनमें कोई लगाव नहीं है, उनकी परवाह कौन करता है? जिनकी परवाह नहीं, उनके सुख-दुःख में साझेदारी कैसी? यह परायापन ही अनात्मतत्त्व है, जिसे पातक माना और असुरता का प्रकोप कहा गया है। अध्यात्मवाद का व्यावहारिक स्वरूप प्रेमभाव है। प्रेम को परमेश्वर कहा गया है। भक्ति और प्रेम एक ही बात है। उसी रसानुभूति को परमात्मा का मिलन या परमपद का रसास्वादन कहा गया है।

'आत्मवत् सर्वभूतेषु' का सूत्र अध्यात्म का सारतत्त्व है। जब हम दूसरों को भी अपने समान ही मानते है, उनके सुख-दुःख में अपनी प्रसन्नता या व्यथा को अनुभव करते हैं तो फिर दुर्व्यवहार बन पड़ना संभव हीं नहीं। अपने आपको चोट कौन पहुँचाता है, व्यथित होने के सरंजाम कौन इकट्ठे करता है? तब दूसरों को भी आत्मीयता की चादर में लपेट लेने के उपरांत यह कैसे संभव है कि उसके साथ छल किया जाए, अनाचार बरता जाए और आक्रमण करके कष्ट पहुँचाया जाए। अपने शरीर को स्वस्थ, मन को प्रसन्न, कलेवर को सुंदर, परिवार को समुन्नत बनाने के लिए निरंतर प्रयत्नशील रहा जाता है, तो फिर आत्मभाव का विस्तार कर लेने पर अन्यान्यों को भी अपना मान लेने के उपरांत इनकी भलाई के लिए ही सोचते या करते बन पड़ेगा। आघात पहुँचाने के लिए तो सोचते ही न बन पड़ेगा।

जो अपने सद्गुणों के कारण जितनों का, जिस स्तर का, सहयोग अर्जित कर सका, वह उसी अनुपात में सुखी रहा है और प्रगति के पथ पर अग्रसर होने में सफल रहा है। उपेक्षा बरतने और पराएपन की विद्वेष भावना से ग्रसित रहने वाले व्यक्ति सदा प्रेत-पिशाच की तरह अशांत रहते हैं। एकाकीपन की क्षुद्रता जिनके मन में बसी हुई है, उन्हें संकीर्ण-स्वार्थपरता से ग्रसित रहते और अवांछनीयता अपनाते, कुकृत्य करते ही देखा गया है। संसार में जितनी भी कठिनाइयाँ बढ़ती दिखाई पड़ रहीं हैं, उनका प्रमुख कारण सहकारिता की सद्वृत्ति का घटते जाना ही कहा जा सकता है।

सद्भावना, सहकारिता और प्रगतिशीलता, प्रसन्नता लगभग एक ही बात है। प्रगति और समृद्धि भी इसी मनोवृत्ति के साथ जुड़ी हुई है, इसलिए मनुष्य को सर्वोपरि प्राणी होने के नाते इस अनुबंध में बाँधा गया है कि वह न केवल परिवार बनाकर सामुदायिकता की रीति-नीति अपनाए, वरन इस सद्व्यवहार को अधिकाधिक क्षेत्र में व्यापक-विस्तृत करें। 'वसुधैव कुटुंबकम' की मान्यता जितनी विकसित एवं व्यापक बनती जाएगी, उतनी ही 'सर्वतोमुखी अभ्युदय' का माहौल सहज बनता चला जाएगा।

एक साथ तो एक बाड़े में भेड़े भी रहती हैं, सरायों में मुसाफिर ठूंसे रहते हैं। जेलखाने में कैद ठूंसे रहते हैं। प्लेटफार्मों, सड़कों, सिनेमाघरों में भीड़ एक साथ बंधी चलती है। इतने पर भी उनके बीच सहकार-सद्भाव न होने पर उसे मात्र भीड़ ही कहा जाता है। भीड़ अव्यवस्था, असुविधा और गंदगी ही फैलाती देखी गई है। इसके विपरीत सैनिकों की छावनियों में सुव्यवस्था,स्वच्छंदता देखते ही बनती है। विश्वविद्यालयों के छात्रों-अध्यापकों में भी प्रायः अनुशासन अपनाते देखा जाता है।

प्रयोगशालाओं में भी सब कार्य विधि-व्यवस्थापूर्वक होते हैं। पब्लिक स्कूलों और उच्चस्तरीय छात्रावासों, आश्रमों में भी सद्भाव और सहकार का जहाँ उपयुक्त वातावरण रहता है, वहाँ जाने वाले, देखने वाले तक सराहना करते लौटते हैं। फिर उस परिकर में रहने वालों की प्रसन्नता और निश्चिंतता का तो कहना ही क्या?

घर की चहार दीवारी से बाहर निकलने के उपरांत भी हर किसी को जनसंपर्क में आना पड़ता है। सड़क पर चलते समय भी राहगीरों से, वाहनों से वास्ता पड़ता है। हाट-बाजार से सौदा खरीदने में, दफ्तरों में, कारखानों में काम करने जाना पड़ता है। इससे एकदूसरे के साथ वास्ता तो थोड़े समय का ही पड़ता है, फिर भी वह अपेक्षा रखता है कि इस सामान्य संपर्क में भी शिष्टाचार और अनुशासन बरता जाए और ऐसा कुछ न बन पड़े, जिससे किसी को अव्यस्था, अनुशासनहीनता और अशिष्टता का आभास हो। सहयोग-सद्भाव को अभ्यास ऐसे ही अवसरों पर काम आता है।


सदुक्ति

सुख और दुःख घटनाओं और वस्तुओं पर उतने निर्भर नहीं, जितने कि दृष्टिकोण और संवेदनाओं पर।


विश्व एकता की दिशा में एक अकिंचन प्रयास

पोलैंड का एक युवक अपने एकांत कमरे में बैठा विचार कर रहा था— "निरंतर होते जा रहे वैज्ञानिक आविष्कारों से धरती के विभिन्न भू-भाग एकदूसरे से नजदीक होते जा रहे हैं, किंतु इस नजदीकता के बावजूद मनुष्य एकदूसरे से दूर क्यों हैं? उसे अपने ही आकार-प्रकार वाले प्राणियों के बीच परायापन क्यों अनुभव होता है?" इस चिंतन के मध्य उसे अनेकानेक कारणों में एक महत्त्वपूर्ण कारण समझ में आया— 'भाषा'। इसकी विविधता, विचित्रता मनुष्य को अपने देश में बेगाना बना देती है। इसी के कारण अनेकानेक विवाद उपजते और टकराव के अवसर आते हैं।

भाषायी एकता की स्थापना मनुष्य को अनेकों विसंगतियों से उबारकर पारस्परिक भावनात्मक एकता को स्थापित करने में समर्थ हैं। अगले दिनों विश्व एक राष्ट्र के रूप में सूत्रबद्ध होगा। इस सूत्र की दृढ़ता का आधार सांस्कृतिक जीवन की निकटता, एकता और मजबूती है। इसका एक ही माध्यम है, भाषा का एक होना, क्योंकि इसी के द्वारा भावनाओं एवं विचारों का पारस्परिक आदान-प्रदान एवं आपसी घनिष्टता संभव है। बस प्रयत्न की शुरुआत यूरोपीय भाषाओं को एक सूत्र में पिरोने से हुई। इस नई भाषा के आविष्कार ने अपनी इस भाषा का नाम रखा 'ऐस्पेरेन्टो' और यह आविष्कार थेा— डाॅ एल.एल. जैमन हाॅफ।

उनके इस कार्य से दूसरों को भी प्रेरणा मिली। डाॅ. एल. विनेम ने भाषा की एकता का व्यवहारिक स्वरूप अपनी 'लोगोग्राफी' के द्वारा प्रस्तुत किया। जब तक विश्वभाषा का प्रचलन नहीं होता, इसका प्रयोग आसानी से किया जा सकता है।

इसका आधार शब्दों के स्थान पर अंक है। इसके नियमों को समझकर कोष के आधार पर लोगोग्राफी का लाभ उठा सकना संभव है। इसके लिए कोई नवीन लिपि भी नहीं सीखनी पड़ती।

माना टहलने के लिए लोगोग्राफी में न. आठ हैं। नं. 8 जहाँ लोगोग्राफी द्वारा प्रयोग में आया है। वह प्रत्येक भाषा में इसी अर्थ में प्रयोग होगा। अपनी-अपनी भाषा में वह व्यक्ति इसका वैसा ही अर्थ निकाल लेगा।

इसके आविष्कार में भाषासंबंधी अन्यान्य खोजों से भी लाभ मिला। डेनमार्क के मि. नारडाड ने अपने अध्ययन से नतीजा निकाला कि सभी भाषाओं के समाचारपत्र तथा सामान्य किताबों में प्रायः 100 शब्द ही बार-बार प्रयोग में आते हैं और आधी से ज्यादा जगह घेरते हैं। इसी तरह अमेरिकन भाषाविद थानडाइक ने बताया कि अमेरिकी भाषा में सामान्यता व्यवहार में लगभग 20,000 शब्द हैं।

लोगोग्राफी का निर्माण इन सारी चीजों को ध्यान में रखते हुए किया गया। यद्यपि यह काम बहुत श्रमसाध्य भी था, पर लगनशीलों के समक्ष असंभव भी क्या?

डा. विनेम और डा. जैमन हाफ दोनों ही यह मानते हैं कि बहुत संभव है कि उनके द्वारा अन्वेषित भाषाएँ भावीयुग में यथावत काम में न आएँ, परंतु एक ऐसी भाषा अवश्य विश्वभाषा के रूप में उभरकर आएगी, जिसमें स्त्रीलिंग, पुल्लिंग का कोई भेद न रहेगा। जो भावी युग में विश्वराष्ट्र की एकता, समता, सुव्यवस्था की संस्कृति के अनुरूप होगी।

समय आ रहा है कि शीघ्र ही विश्व को भावनात्मक तथा सांस्कृतिक स्तर पर एक होना ही पड़ेगा। साथ ही इन मनीषीगणों के अंतर में विश्वभाषा के जो स्वप्न उभरे हैं, वह भी मूर्त्त होंगे। हम सभी इस सांस्कृतिक एकता व विश्वराष्ट्र के निर्माण को अपनी जिम्मेदारी समझें और निभाने के लिए तत्पर हों।


मधु-संचय

“करुणा-प्रवाह”


मधु संचय— करुणा-प्रवाह (kavita)

आप करुणा उड़ेला किए इस तरह,

आपने प्राण, मन, तर-बतर कर दिए।

बेसुरा-राग गाती रही जिंदगी,

आपने प्रीति से स्नात स्वर कर दिए॥

जिंदगी का सभी साज, बेसाज था,

ज्ञान तक था नहीं शब्द, स्वर ताल का।

लड़खड़ाता हुआ गीत थी जिंदगी,

बोध तक था नहीं साँस की चाल का॥

प्राण की बीन खुद ही पुलकने लगी,

आपने प्राण में प्राण वे भर दिए।

बेसुरा-राग गाती रही जिंदगी,

आपने प्रीति से स्नात स्वर कर दिए॥

साँस के तार को आपकी उंगलियाँ,

स्नेह-संस्पर्श दे झनझनाती रही।

साँस मेरी हुई आपकी,

और वह आपके गीत ही गुनगुनाती रहीं॥

ओंठ मेरे थिरकते हुए से लगे,

छंद अपने मुखर आपने कर दिए।

बेसुरा-राग गाती रही जिंदगी,

आपने प्रीति से स्नात स्वर कर दिए॥

जिंदगी बन गई गीत अब आपके,

आपका स्नेह, स्वर छलछलाने लगे।

आपकी भावना-संवेदनाजन्य स्वर,

विश्व बंधुत्व के गीत गाने लगे॥

विश्व की वेदना घुल गई प्राण में,

आपने प्राण की पीर के स्वर दिए।

आप करुणा उँडेला किए इस तरह,

आपने प्राण, मन, तर-बतर कर दिए॥

- (मंगल विजय)


जागरण गान (कविता)

कल्पनाओं जागरण का शंख फूँको,

भावनाओं रश्मियों के गीत गाओ।

ऊर्जा चैतन्य की, गंगा बहाती,

फूटती है प्राण से जीवन-प्रभाती,

रश्मियों का तेज यों उफना रहा है,

आदमी की चेतना है, थरथराती।

प्राण कवि के गुनगुनाओ, गुनगुनाओ,

आदमी की जिंदगी के गीत गाओ।

भावनाओं, रश्मियों के गीत गाओ॥

हार को गलहार जीवन भर बनाया,

जिंदगी को भार जीवन का बनाया,

प्यार की रसधार भी संसार को दो,

श्वास को अंगार जीवन भर बनाया।

प्रेरणाओं प्यार का संगीत छेड़ो,

साधनाओं आदमी की प्रीति गाओ,

कल्पनाओं, जागरण का शंख फूँको,

भावनाओं, रश्मियों के गीत गाओ।

-लाखन सिंह भदौरिया 'सौमित्र'


प्यार भरा संसार (कविता)

आज जरूरत है तोड़ें हम नफरत की दीवार।

और बसाएँ सब हिल-मिलकर प्यार भरा संसार।

मेरा तेरा हो न घरों में, लड़े न अपना खून।

खाएँ बाँटकर, तो पालेंगे, सब रोटी दो जून॥

बस शालीन भाव रखकर हम थोड़े बने उदार॥

इसी तरह है व्यर्थ धर्म का, जाति वर्ग का भेद

गागर भरो किंतु मत होने दो तुम उसमें छेद

अपनी तो मान्यता यही है-विश्व एक परिवार॥

मिलकर रहने में है मेरे बंधु! बहुत आनंद,।

प्यार-सुर, मीरा, तुलसी और बाल्मीकि का छंद॥

घृणा नहीं,अब बने प्यार ही जीवन का आधार।

टुकड़े कर लो चादर, कोई भी न ओढ़ पाएगा।

बाँटा आँगन तो मंडप कैसे छापा जाएगा।

सबको सुविधा है यदि जीवित रखते हो सहकार।

-माया वर्मा


जीवन तुम्हीं से भगवन (कविता)

जीवंत है जगत में कण-कण तुम्हीं से भगवन।

है विद्यमान जड़ और चेतन तुम्हीं से भगवन॥

आकाश में तुम्हीं से संव्याप्ति नीलिमा की,

तुम ताप सूर्य के हो, तुम शीत चंद्रमा की,

पुष्पों और पल्लवों में पुलकन तुम्हीं से भगवन।

हैं विद्यमान जड़ और चेतन तुम्हीं से भगवन॥

तुम स्फूर्ति भोर की हो, शाश्वत जिजीविषा हो,

दिग्भ्रांत हर पथिक की प्रेरक तुम्हीं दिशा हो,

है प्राण-तत्त्व तुमसे, जीवन तुम्हीं से भगवन।

हैं विद्यमान जड़ और चेतन तुम्हीं से भगवन॥

अनुदान से प्रफुल्लित होते कृतज्ञ प्राणी,

आभास पर तुम्हारा पाते न अज्ञ प्राणी,

नियमित प्रकृति तुम्हीं से, हर क्षण तुम्हीं से भगवन।

हैं विद्यमान जड़ और चेतन तुम्हीं से भगवन॥

-शचींद्र भटनागर


स्वच्छता, सुगढ़ता के पक्षधर— जीव-जंतु

मनुष्येत्तर प्राणियों की दिनचर्या, आदतें, स्वभाव देखकर लगता है कि वे मनुष्य से कहीं अधिक अपने शरीर की, निवासस्थान की सफाई पसंद करते हैं। कुछ पशु-पक्षी तो नित्य स्नान करते देखे जा सकते हैं। कुछ आवश्यकतानुसार करते हैं, किंतु ऋतुओं के संधिकाल में वृहद सफाई का आयोजन करते हैं। इन सबके पीछे प्रकृति प्रेरणा ही रही होती है, जिसका पालन वे नियमपूर्वक एवं कड़ाई से करते हैं। इससे न केवल वे स्वस्थ और प्रसन्न रहते हैं, वरन् जीवन की रक्षा भी होती है।

ऋतुओं के संधिकाल में साँप अपने शरीर से केंचुल उतार देते हैं। सीपी, घोंघा आदि भी अपने शरीरों के खोल बदल देते हैं। मछलियाँ अपनी शक्ल में परिवर्तन कर लेती हैं। पक्षी अपने पंखों की निर्वाचन क्रिया कर डालते हैं। जिस प्रकार शीतऋतु बीतने पर वृक्ष अपने पुराने पत्ते गिरा देते है। अनेक जीव-जंतु अपने मुलायम रोए अथवा बालों को गिराकर नवीन बालों से सुसज्जित हो जाते हैं, किंतु यह क्रिया ऋतुचक्र कहकर टाल दी जाती है। यहाँ एक विचारणीय प्रश्न यह उपस्थित होता है कि यह अभियान प्रकृति द्वारा क्यों चलाया जाता है? विशेषज्ञों का इस संबंध में कहना है कि, "ऐसा इसलिए भी किया जाता है कि जीवधारियों की त्वचा की ऊपरी परत में मैल जमा हो जाता है और परजीवी पलने लगते हैं। त्वचा, में टूट−फूट भी हो जाती है। इसलिए बदलना आवश्यक हो जाता है। इसीलिए ऋतुओं के संधिकाल में प्रकृति द्वारा विशेष स्वच्छता अभियान चलाया जाता है, जिसके परिणामस्वरूप प्रकृति के अधिकांश जीव-जंतु, वृक्ष-वनस्पति इस शोधन-प्रक्रिया में संलग्न देखे जाते हैं।"

कितने ही पक्षी नित्य स्नान करते हैं और अपने पंखों में छिपी गंदगी, पसीना तथा मैल और परजीवी जंतुओं को निकाल फेंकते हैं। वर्षा व गरमी के अतिरिक्त वे सर्दियों में भी स्नान करते हैं। कुछ पक्षियों के पंखों के नीचे तैलीय ग्रंथियाँ भी होती हैं, जिन्हें चोंच से नोंचकर वे तेल निकालते और परों पर तेल की कंघी जैसी करते देखे गए हैं। जलस्नान के बाद वे खुली धूप में अपने पंख सुखाते हैं, जिससे उन्हें विटामिन 'डी' प्राप्त होता है और वे वर्षभर स्वस्थ बने रहते हैं। कुछ पक्षी बालू, रेतस्नान का भी आनंद लेते हैं। इस का रहस्य यह है कि उनके परों में परजीवी पलने से खुजली होती है, अतः उन्हें नष्ट करने के लिए मृतिकास्नान करते हैं। मृतिकास्नान के उपरांत वे जलस्नान भी करते है। अतः शरीर की स्वच्छता का उन्हें पूर्ण ध्यान रहता है।

पक्षियों के अतिरिक्त पशु भी अपनी सफाई और स्नान का ध्यान रखते हैं। वे भी धूल में लेटकर परजीवियों से छुटकारा पाने का प्रयत्न करते हैं अथवा कीचड़ और पानी में घुसकर उनसे मुक्ति पा लेना चाहते हैं। हिरन, गाय, बैल, हाथी स्वच्छ जल में स्नान करना पसंद करते हैं। हाथी, गैंडा, भैंसा आदि घंटों पानी में पड़े रहकर क्रीड़ा-कल्लोल करते रहते हैं। माँसाहारी और हिंसक जीव शेर, चीता, लकड़बग्घा तक स्नान करते हैं। हाथी धूल -मिट्टी में भी स्नान करना पसंद करता है, किंतु सुअर या भैंसे की तरह गंदी कीचड़ में लेटना पसंद नहीं करता।

शारीरिक सफाई के अतिरिक्त पशु-पक्षी अपने बिल, कोंतर, गुफा, घोंसले की सफाई का भी पूरा ध्यान रखते हैं और कितने ही पक्षी अपने घोंसलों में रोशनी तथा सुरक्षा का भी पूरा प्रबंध कर लेते हैं। सबसे विलक्षण घोंसला 'होर्नबील' पक्षी का होता है। होर्नबील की मादा वृक्ष की कोंतर में अंडे देती है, जिसे नर होर्नबील ऊपर से मिट्टी और घास-फूँस से इस तरह बंद कर देता है कि मादा केवल चोंच बाहर निकालकर केवल दाना, पानी और हवा ही ले सके तथा कोई शत्रु आक्रमण न कर सके। इतनी चतुराई से बनाए गए आवास की सफाई का होर्नबील को पूरा ध्यान रहता है। मादा अपनी अथवा बच्चों की बीट चोंच से बाहर निकाल देती है। जब बच्चे बड़े हो जाते हैं, तब कोंतर का मुँह बड़ा कर दिया जाता है। मादा बच्चे बाहर निकलकर धूप, मृतिका और पानी से स्नान करते हैं। बाद में अपने पंखों का निर्वाचन भी।

इसी प्रकार वया पक्षी जिसे दरजी चिड़िया या बीवर्स के नाम से जाना जाता है, भी बड़े कलात्मक ढंग से अपना घोंसला बनाती है तथा बच्चों के रहने के लिए अलग प्रकोष्ठ की व्यवस्था बनाती है। पशु-पक्षियों में कम ही ऐसे पक्षी पाए जाते हैं, जो अपने रहने के स्थान को मल-मूत्र से गंदा करते हैं। चूहे, खरगोश, नेवला आदि बिल बनाकर रहते हैं। बच्चों के रहने के लिए अलग कक्ष की व्यवस्था भी रखते हैं। उनके नीचे घास-फूँस का बिछौना भी बिछाते हैं, किंतु कीड़े-मकोड़े परजीवी जंतु हो जाने पर बिछौना बदल देने में आलस नहीं करते तथा अपने निवासस्थान को को मल-मूत्र से गंदा भी नहीं करते। जहाँ तक बन पड़ता है। वे बिल के बाहर ही मल-मूत्र त्यागते हैं और भोजन के अवशेष गिराते हैं।

सहयोग, संगठन, सक्रियता की दृष्टि से ही नहीं, सफाई के मामले में मधु-मक्खियों की व्यवस्था देखते ही बनती है। इतने बड़े छत्ते में सारे काम-काज व्यवस्थित ढंग से बाँटे गए होते हैं। श्रमिक, मजदूर शहद एकत्रित करते हैं। छत्ता बनाने वाले कारीगर छत्ता बनाते हैं। यदि कहीं गंदगी नजर आती है अथवा किसी सहयोगी की मृत्यु हो जाती है तो मृतक लाश को छत्ते में नहीं रहने दिया जाता। उसे उठाकर मजदूर मक्खियाँ दूर फेंक आती हैं। इसी प्रकार कुत्ता, बिल्ली, बंदर आदि सब अपनी-अपनी तरह अलग-अलग ढंग से किसी न किसी तरह सफाई की व्यवस्था जुटा लेते हैं। बंदरों के यदि जुँए हो जाते हैं तो वे परस्पर एकदूसरे का सहयोग करके उन्हें पकड़कर निकाल फेंकते हैं। इसी प्रकार प्रत्येक जीव अपने शरीर एवं निवास की सफाई सुरक्षा का ध्यान रखता है और प्रकृतिप्रदत्त स्वच्छता एवं सुरक्षा की प्रेरणा का अनुसरण करता है। इस नियम की वे कभी उपेक्षा या अवहेलना नहीं करते।

यह तो मनुष्य है, जो बुद्धि चातुर्य में तो स्वयं को प्रवीण-पारंगत मानता है, किंतु सफाई, सुगढ़ता के मामले में पक्षियों, जीव-जंतुओं से कहीं पीछे है। अस्वच्छता-अनगढ़ता ही रोगों को आमंत्रित करती है। यदि आत्मशोधन की आवश्यकता समझते हुए मनुष्य दर्शन-अध्यात्म की प्रेरणाओं को हृदयंगम करना जरूरी मानता है तो इसके बहिरंग पक्ष स्वच्छता से उसे शुभारंभ करना चाहिए। इसके लिए चाहें तो वह प्रकृति से, जीवों से प्रेरणा ले सकता है।


हिमाकत क्यों करता (कहानी)

महामना मालवीय जी को एक विद्वान ने चुनौती दी— “आप मुझे कोई भी चुनकर सौ गालियाँ देकर देख लें। मुझे क्रोध नहीं आएगा।” मालवीय जी ने कहा— “भला यह भी कोई चुनौती हुई, इससे तो मैं हार ही जाऊँगा, क्योंकि पहली बात न मुझे सौ गालियाँ याद हैं और यदि याद भी होती तो मैं अपनी जुबान क्यों फूहड़ करता और अभद्र बनने की हिमाकत क्यों करता।”


महानता का प्रगति-पथ

छोटे-से-छोटे परमाणु में शक्ति का इतना विशाल भंडार भी होगा, यह कौन सोच सकता है? पर अकल्पनीय-सी लगने वाली यह बात शत प्रतिशत सच है। शक्ति का यह भंडार अनेकानेक शहरों का नामोनिशान मिटा सकता है। इसका सृजनात्मक उपयोग न जाने कितने शहरों को विद्युत प्रदान कर सकता है।

मनुष्य के अपने जीवन में भी यही स्थिति है। उसके द्वारा किए जाने वाले छोटे-छोटे काम उसे महानता की ओर ले जाने अथवा पतन के गहरे गर्त्त में गिराने का सोपान बनते हैं। आत्मनिरीक्षण करके निरंतर प्रगति करता हुआ साधारण बालक गंगाधर लोकमान्य तिलक बन जाता है। सामान्य और मंदबुद्धि समझा जाने वाला बालक महान वैज्ञानिक आइंस्टीन बन जाता है।

समय की छोटी-से-छोटी इकाई क्षण बीतते-बीतते दिन, महीने तथा वर्षों गुजर जाते हैं। जो अपने जीवन में इन छोटे-छोटे क्षणों का सही, समुचित सदुपयोग कर सकें, उन्हीं ने जीवन में महान कार्य संपादित किया।

महानता का आधार लघुता ही रही है। जिसने इसे समझा और लघुता को अपनाया, वह महान बनता गया। एक ही छलाँग में पहाड़ की चोटी पर जा पहुँचने की बात कभी चरितार्थ नहीं होती। इसके लिए तो छोटे-छोटे कदमों के सहारे बढ़कर ही शीर्ष स्थान पर पहुँचा जाता है।

जिस किसी ने लघु समझी जाने वाली बातों का महत्त्व समझ लिया, उसे बड़ी उपलब्धियाँ हासिल करते देर नहीं लगी। महापुरुषों के जीवन में महानता का कारण यही रहा है। उन्होंने अपने प्रत्येक छोटे और साधारण नजर में उपेक्षित समझे जाने वाले क्रियाकलापों को औचित्य व विवेक की कसौटी पर जाँचा-परखा। जो सही था, उसे अंगीकार किया। इसी नीति ने उन्हें महानता के पद पर प्रतिष्ठित कर दिया।

जो छोटे-छोटे सेवाकार्य हम कर सकते हैं, वे नहीं करते। जो नन्हीं-नन्हीं भूलें हम रोज दुहराते हैं, उन्हें दूर नहीं करते, जो लघु सद्गुण हम अपना सकते हैं, उन्हें नहीं अपनाते, तो समझना चाहिए कि हम स्वयं के उत्कर्ष के प्रति उदासीन तथा मानवीय गरिमा के अर्जन के लिए प्रयत्नशील नहीं है।

छोटे समझे जाने वाले लोगों की सम्मिलित शक्ति ने व्यापक और प्रबल आंदोलन का स्वरूप लिया है। इन्हीं लोगों के सामूहिक प्रयासों ने समाज का स्वरूप बदला है। इसे अंधेरे और कंटीले वर्त्तमान से निकालकर उज्ज्वल भविष्य में ला सके हैं। जिन ईसा के मत में आधी दुनिया दीक्षित है, वह अपने निजी जीवन में बहुत छोटे आदमी थे।

छोटे होने का यह मतलब नहीं है, वह कुछ कर नहीं पाता। एक गरीब कुरूप, तिरस्कृत ब्राह्मण चाणक्य में भारत के टूटते, बिखरते, नष्ट होते स्वरूप को देखकर संवेदना जागी। अपने अपमान के विष को तो वह पचा गया था, पर सामान्यजन की छटपटाहट उससे देखी न गई, मातृभूमि का दरद सहा न गया। बस उभरती कर्मठता, सुनियोजित बौद्धिक क्षमता ने 'वृहत्तर भारत' को जन्म दिया।

भारी-भरकम दिखने वाले शरीर में प्राण का स्वरूप अत्यंत लघु है। जिसका कोई भार नहीं है, किंतु इसके निकलते ही शरीर निष्प्राण हो जाता है। इसे इतना बेकार समझा जाता है कि जलाने, गाड़ने में ही भलाई सूझती है। महत्ता लघु प्राणों की है, वृहत शरीर की नहीं।

छोटे-छोटे आदमी आज यह संकल्प लें कि इस भारी-भरकम दिखने वाली अनैतिकता, स्वार्थपरता, संकीर्णता, दोष, दुष्प्रवृत्तियों, कुरीतियों, मूढ-मान्यताओं से जूँझकर नवसृजन का नवविहान इस धरती पर लाएँगे तो देखते-ही-देखते यह निविड़ अंधकार मिट जाएगा। नवयुग के नवप्रभात की रश्मियाँ हमारे वैयक्तिक, पारिवारिक व सामाजिक जीवन में प्रकाश उड़ेलती नजर आएँगी। अपने सामने खड़े उत्तंग शिखर की ओर टकटकी लगाने और भयभीत, निराशा होने की बजाय अपने छोटे-छोटे पाँवों की क्षमता को पहचानें, जो उस पर विजय पाने के लिए मचल रहे हैं।


नवयुग महर्षि अरविंद की दृष्टि में

वर्त्तमान में मानव समाज देश, जाति, समूह, रंग जैसी न जाने कितनी विषमताओं की खंदक-खाइयों से गुजर रहा है एक ऋषि, दिव्यद्रष्टा, गुह्यवेत्ता, मनीषी के रूप में श्री अरविंद ने स्थिति को स्पष्ट करते हुए कहा है कि, “मानव जाति एक लंबे अरसे से एक अँधेरी,ऊबड़-खाबड़ सुरंग से गुजरती हुई मुहाने पर आ पहुँची है। शीघ्र ही वह ज्योतिर्मय क्षेत्र में प्रवेश करने वाली है।"

यह अवश्यंभावी प्रवेश जीवन वैयक्तिक व सामाजिक-क्षेत्र में क्रांतिकारी परिवर्त्तन लाने वाला होगा। एकता, समता, सुव्यवस्था एक नूतन विश्वसंस्कृति के रूप में पल्लवित होगी। इसका प्रसार-क्षेत्र होगा— विश्वराष्ट्र। महर्षि अपने ग्रंथ 'आइडियल आफ ह्यूमन यूनिटी' में बताते हैं कि," इसका मतलब सिर्फ भौगोलिक एकीकरण नहीं है और न ही यह विविध बलों की जबरदस्ती अथवा बुद्धि की ढेरों युक्तियों पर आधारित होगा, किंतु यह विशिष्ट प्रयास मानवीय न होकर स्वयं भगवान का, उनकी सृजनकर्त्ती शक्ति— प्रकृति द्वारा हो रहा है।"

इसकी परिणति के रूप में मनुष्य केवल मनुष्यत्व को देखेगा। जन्म, पद, वर्ग, वर्ण, समुदाय, राष्ट्रीयता के सभी भौतिक संयोग भुला दिए जाएँगे। जिस प्रकार एक राष्ट्रीय 'अहं' भाव पनपा, जिसने स्वयं का राष्ट्र के भौगोलिक शरीर से एक करके उसमें राष्ट्रीय एकता की मनोवैज्ञानिक प्रवृत्ति विकसित की। उसी प्रकार सामूहिक मानव 'अहं' भाव भी विश्वशरीर में विकसित हो जाएगा और उसमें वह मानव एकता की सहज मनोवैज्ञानिक वृत्ति विकसित कर लेगा।

इस विकास का क्रम राष्ट्रीयता से 'अंतर्राष्ट्रीयता की ओर चलता हुआ। विश्वपरिवार, पृथ्वी परिवार के रूप में दिखाई पड़ने लगेगा। आज की स्थिति में हम संयुक्त राष्ट्रसंघ के रूप में विश्वसंघ की हलकी और अस्पष्ट झलक निहार सकते हैं। अस्पष्टता के बावजूद वैश्व एकता का प्रबल भाव विभिन्न भू-भागों में बसे मनीषियों, ग्रहणशीलों को बुरी तरह झकझोर रहा है। धीरे-धीरे इसका फैलता दायरा न केवल मनीषियों का, वरन सभी को अपने आगोश में ले लेगा। इसके स्पष्ट, सक्रिय स्वरूप को क्रमशः विश्वराष्ट्र, विश्वपरिवार के रूप में देखा जा सकेगा।

इस विश्व परिवार के सदस्यों का संघटन सूत्र होगा— मानव धर्म। इसका तात्पर्य वर्त्तमान में किए जाने वाले बौद्धिक एकीकरण से नहीं, अपितु अध्यात्म की समग्रता से है। जिसके आधार पर समझा जा सकेगा कि मानव जाति वह देवता है, जिसकी मनुष्य को पूजा करनी चाहिए, सेवा करनी चाहिए। मनुष्य और मनुष्य जीवन का सम्मान, उसकी सेवा और उन्नति साधन ही मानवात्मा के प्रधान कर्त्तव्य और मुख्य लक्ष्य होंगे। इसी आधार पर द्रुत वेग से ऐसे बहुत सारे कार्य संपन्न हो सकेंगे, जिनको 'पुराणपंथी धर्म' सफलतापूर्वक नहीं ही कर सका।

इसी के द्वारा अध्यात्म के त्रिविध भाव-स्वतंत्रता समानता और भातृभावना सर्वत्र गोचर होंगे। ये तीन वस्तुएँ वास्तव में आत्मा के स्वभाव हैं, क्योंकि स्वतंत्रता,समानता और एकता आत्मा के सनातन गुण हैं। इनकी उपस्थिति व अभिव्यक्ति का मतलब है, अध्यात्म राज्य की उपस्थिति व अभिव्यक्ति। निश्चित ही विश्व परिवार इसी के प्रकाश से आवृत व प्रकाशित होगा।

इसके लिए आवश्यक कदम तो उठ चुके हैं। मानव जाति का भविष्य भी सुनिश्चित हो चुका है। अब वह युग अंतिम साँसें गिन रहा है। जिसमें न सुलझाई गई समस्याओं, कठिनाइयों, अनिश्चित अवस्थाओं,बड़े विप्लवों तथा विशाल और रक्त से सने संघर्षों से मानव जाति को परेशान होना पड़ा। अब हम शीघ्र ही एक नए युग में प्रवेश करने को हैं, जिसमें समूची मानव जाति को एक परिवार के रूप में देखा जा सकेगा। हमारी इसमें सदस्यता, भागीदारी हो, उत्कृष्ट स्थान मिले सके, इस हेतु संकीर्ण स्वार्थपरता छोड़ें और वैश्व हितों के लिए तत्पर हों।


नवयुग का मत्स्यावतार

ब्रह्माजी प्रातःकाल संध्यावंदन के लिए बैठे। आचमन के लिए हाथ में जल लिया तो कमंडल में एक कीड़ा विचरते देखा। उनके देखते-देखते वह कीड़ा आकार में इतना बढ़ता चला गया कि सारा कमंडल उससे भर गया। अब उसे अन्यत्र भेजना आवश्यक हो गया। समीपवर्ती जलाशय में छोड़ा गया। देखा गया कि सरोवर भी उस छोटे से जीव से जो कि मत्स्य की आकृति का था, भर गया। इतनी तेजी, से विस्तार को देखकर आश्चर्यचकित सृष्टिकर्त्ता प्रजापति उसे समुद्र में पहुँचा आए, किंतु कुछ ही समय में सारी जगती के जल-क्षेत्र को उसी बृहद् मत्स्य ने घेर लिया। इतना विस्तार आश्चर्यजनक, अभूतपूर्व, समझ में न आने योग्य था। जीवनधारियों की भी कुछ सीमा-मर्यादाएँ होती हैं। विकासगति सृष्टि के नियमों के अधीन ही चलती है, पर यहाँ तो सब कुछ अनुपम था। बुद्धि के काम न देने पर ब्रह्माजी ने स्वयं ही उस महामत्स्य से पूछ लिया कि, 'यह सब क्या व किसलिए हो रहा है? आप वस्तुतः हैं कौन?' महामत्स्य ने कहा— "मैं जीवधारी दीखता भर हूँ, वस्तुतः परब्रह्म हूँ। इस अनगढ़ संसार को जब भी सुव्यवस्थित करना होता है, तो उस सुविस्तृत कार्य को परिस्थिति विशेष के अनुरूप आकार ग्रहणकर अपनी सत्ता को नियोजित करता हूँ, तभी अवतार प्रयोजन की सिद्धि बन पड़ती है”।

ब्रह्माजी व महामत्स्य सृष्टि को सुंदर-समुन्नत करने की योजना बनाते रहे व अतंतः मत्स्यावतार सुसंतुलन की जिम्मेदारी प्रजापति को सौंपकर अंतर्ध्यान हो गए। कह गए कि अव्यवस्था को व्यवस्था में बदलने का कार्य तुम्हें करना है। मैं अदृश्य रूप में प्रेरणा देता रहूँगा। श्रेय तुम्हें ही मिलेगा लेकिन क्षमता मेरी ही काम करेगी। तुम्हें व अन्याय मनीषियों को समझाने के लिए ही मैंने अद्भुत विस्तार करके यह समझाने का प्रयत्न किया है कि महान प्रयोजन यदि दैवी प्रेरणा से संपन्न किए जाते हैं और कर्त्ता अपनी प्रमाणिकता-प्रतिमा को अक्षुण्ण रखता है तो असंभव भी संभव होकर रहता है।

हुआ भी वही। उन्होंने सृष्टि को रचा। अगले चरण के रूप में मनुष्य स्तर के प्राणियों में जो उपयुक्त थे, उन्हें दिव्य चेतना से, दूरदर्शी विवेकशीलता से,प्रज्ञा और मेधा से सज्जित किया ताकि वे स्वयं तथा औरों को समुन्नत-सुसंस्कृत बना सकें। इसके लिए वेदज्ञान दिव्यलोक से अवतरित हुआ। ब्रह्माजी की लेखनी ने उसे लेखबद्ध किया। देवमानवों ने उसे पढ़ा, समझा और अपनाया। सारी धरती पर स्वर्ग जैसा वातावरण बनने का क्रम चल पड़ा।

लघु से महान, तुच्छ से विशाल होने में अचंभे जैसा व्यक्तिक्रम तो मालूम पड़ता है, पर जिस प्रयोजन के लिए दैवीसत्ता की इच्छा और योजना काम करती है, उसके द्रुतगामी विस्तार में कोई शंका नहीं रह जाती।

एक बीज से हजारों बीज, अगणित वृक्ष उत्पन्न होने की बात सर्वविदित है। मनुष्य बीज जैसी विकासक्रम अपनाने वाली कोई वस्तु अपने बलबूते नहीं बना सकता, पर स्रष्टा का कर्तृत्त्व और सुनियोजन इतना अधिक समर्थ है कि उसकी तुलना सामान्य लोक-व्यवहार के आधार पर चलने वाले क्रियाकलापों से हो ही नहीं सकती। बादलों के बरसने, बसंत के पुष्प–पल्लवों से सुसज्जित होने की प्रक्रिया मनुष्य अपने बलबूते नहीं कर सकता। यह 'एकोहं बहुस्यामि' की कल्पना करने वाली दैवीसत्ता का कमाल ही है जो समूची सुसज्जित प्रकृति संपदा को दिव्य विभूतियों से भरकर गतिशील सुव्यवस्थित बना देती है।

ऐसा ही एक उदाहरण इन दिनों आश्चर्यचकित कर देने वाले विस्तार के रूप में प्रकट हुआ है।यह है— 'अपने समय का मत्स्यावतार'। दूसरे शब्दों में इसे युग परिवर्तन का सुनियोजन भी कह सकते हैं। इसमें टूटे खंडहरों की सफाई भी की जा रही है और उसके स्थान पर भव्य भवन भी खड़े किए जा रहे हैं। इतिहास पर दृष्टि डालें तो हम पाते हैं कि मत्स्यावतार से लेकर बुद्धावतार तक एवं शताब्दियों से पराधीन भारत की आजादी जैसी महाक्रांति तक का एक-एक घटनाक्रम अपने आप में आश्चर्यजनक है जिसमें मानवी पुरुषार्थ कितना ही क्यों न लगा हो, पर दिव्य सत्ता द्वारा प्रतिकूलता में बदल दिए जाने वाली बात से इनकार नहीं किया जा सकता, भले ही उस अदृश्य रहस्य को प्रत्यक्ष रूप में देखा और दिखाया, समझा और समझाया न जा सके।

इक्कीसवीं सदी के उज्ज्वल भविष्य वाले गंगावतरण की परिकल्पना और संभावना इसी आधार पर गले उतरती है कि उसके पीछे कोई अदृश्य सत्ता काम कर रही है। अन्यथा समय के दैत्य को देवत्व में बदल देने वाले विश्वव्यापी कायाकल्प पर कैसे विश्वास किया जा सकेगा? इन प्रयोगों में समर्थ सत्ता का हस्तक्षेप होने की मान्यता अपनानी ही पड़ती है। अन्यथा प्रतिपादन को लोकमान्यता मिल सकना प्रायः असंभव ही रहेगा। शान्तिकुञ्ज और उसके सूत्र-संचालक अपनी असमर्थता और साधनों की न्यूनता से भली प्रकार परिचित होते हुए भी किस आधार पर युग परिवर्तन के महाप्रयाण में झंडाबरदाज बनकर आगे चल रहे हैं, इसके उत्तर में उस विश्वास को ही साक्षी रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, जिसकी सुनिश्चित परिपक्वता अनेक प्रयोग-परीक्षणों के बाद ही बन पड़ी है।

पिछले दिनों जो कदम उठे और प्रयास बने, वे कितनी आश्चर्यजनक रीती से सफल-संपन्न हुए, उसकी कथा-गाथा ऐसी है, जिसे कल्प-कथाओं की तरह संशयग्रस्त नहीं माना जा सकता। जो बन पड़ा है, उसका जो परिणाम निकला है, उसकी जाँच-पड़ताल करने के लिए हर किसी के लिए द्वार खुला पड़ा है।

ऐसे असंख्य प्रसंगों में से यहाँ कुछेक का उल्लेख कर देना बटलोई में पकते भात में से कुछ चावल निकाल पकने, न पकने की बात जानने की तरह पर्याप्त हो सकती है।

(1) अखण्ड ज्योति पत्रिका तथा उसकी सहेलियों का प्रायः पाँच लाख की संख्या में छपना। उस साहित्य का अनेक भाषा-भाषियों द्वारा अत्यंत श्रद्धापूर्वक पढ़ा जाना। पत्रिका के सदस्यों द्वारा पाँच विचारशीलों को उनका बाँटा जाना और इस प्रकार उनका वाचन,श्रवण के अतिरिक्त प्रेरणाओं को जीवनचर्या में उतारा जाना। इस प्रकार 24 लाख विचारशीलों का परिकर जुट जाना।

(2) युगसाहित्य के रूप में प्रायः एक हजार छोटी-बड़ी पुस्तकों का लिखा जाना और कई-कई संस्करण उनके प्रकाशित होना, घर-घर पहुँचना और अनेक भाषाओं में उनका अनुवाद होना।

(3) प्रज्ञा संस्थानों के रूप में देशों के कोने-कोने में प्रायः 2000,इमारतों का विनिर्मित होना और उस तंत्र द्वारा अपने-अपने क्षेत्रों में नवसृजन के क्रियाकलापों को क्रियान्वित करते रहना।

(4) अब तक प्रायः ऐसे दस हजार आयोजनों-समारोहों का उत्साह भरे वातावरण में संपन्न होना, जिनमें धर्म तंत्र के माध्यम से लोक-शिक्षण की उच्चस्तरीय प्रेरणा द्वारा असंख्यों को अनुप्राणित किया गया।

(5) युगसंधि पुरश्चरण के माध्यम से लोक-मानस में नवसृजन का उल्लास उमंगना और लाखों व्यक्तियों का उसमें सम्मिलित होना।

(6) युगसंधि के आगामी दस वर्षों में एक लाख सृजनशिल्पी उभारना, प्रशिक्षित करना और कार्यक्षेत्र में उतारना। उसे प्राचीनकाल के साधु, ब्राह्मण, वानप्रस्थ, परिव्राजक स्तर के प्रचलन को पुनर्जीवित किया जाना भी कहा जा सकता है। तेजी से चल रहे प्रयासों द्वारा उस लक्ष्य की ओर बढ़ा जा रहा है, जिसमें एक करोड़ विचारशीलों को समर्थक-सहयोगी बनाना एवं पूर्णाहुति के अवसर पर एकत्रित किया जाना संभव हो सकेगा।

(7) विज्ञान और अध्यात्म के समन्वय के लिए ब्रह्मवर्चस् शोध-संस्थान द्वारा इन आविष्कारों,निर्धारणों को प्रस्तुत करना, जो अगले दिनों लोगों को नई प्रेरणा एवं नई दिशा दे सकते हैं।

प्रकाशन, प्रचार एवं संगठन के लिए युगनिर्माण योजना,गायत्री तपोभूमि एवं अखण्ड ज्योति संस्थान तंत्र का अनवरत रूप से तत्पर रहना भी एक ऐसी उपलब्धि है, जिसके आधार पर उपरोक्त सारी गतिविधियां चलती रही हैं। लागत मूल्य पर घर-घर युग-साहित्य को पहुँचाना प्रस्तुत समय की सबसे बड़ी सेवा— महती उपलब्धि है।

ऊपर प्रारंभिक पंक्तियों में चुल्लूभर जल से उत्पन्न हुए मत्स्यावतार के विराट विश्व पर छा जाने और उसकी एक ही रटन, एक ही ललक का वर्णन किया था-विस्तार! विस्तार!विस्तार! वही आकांक्षा युगचेतना के रूप में अवतरित हुए आज के प्रज्ञावतार आंदोलन की है। उसे सुविस्तृत हुए बिना चैन नहीं। युग परिवर्तन की उज्ज्वल भविष्य की संरचना का लक्ष्य भी यही है।

चुल्लूभर पानी से उत्पन्न हुई मछली 'अखण्ड-ज्योति' परिकर को समझा जा सकता है।यह पत्रिका मात्र छपे कागज का पुलिंदा नहीं है। यह अखण्ड ज्योति ही है जिसने अपने पाठकों को एक विशेष स्तर तक समुन्नत करने में सफलता पाई है। यह परिकर अपनी विशिष्टता को चिंतन, चरित्र और व्यवहार में निरंतर स्थान देता चला आया है। विगत आधी शताब्दी से वटवृक्ष की तरह उसकी गरिमा समुन्नत,सुविस्तृत ही होती चली आई है।यह कैसे संभव हुआ? इसका श्रेय उस अदृश्य ऊर्जा को ही जाता है, जो अपने लिए उपयुक्त एक केंद्र विशेष पर अवतरित होती और अपनी गरिमा के आँचल में आश्चर्यजनक रीती से लाखों को समेटती चली जा रही और करोड़ों को अपनी छत्र-छाया में शांति और प्रगति से लाभांवित होने के लिए आमंत्रित करने का दुस्साहस जैसा उपक्रम अत्यंत उत्साहपूर्वक सँजोती चली जाती है।

नवसृजन की प्रारंभिक ऊर्जा अखण्ड ज्योति के रूप में अवतरित हुई है। वह अपने से जुड़े अनेक घटकों-पाठकों का तद्नुरूप बनने-ढालने के लिए बाधित एवं अनुप्राणित कर रही है।

'इक्कीसवीं सदी-उज्ज्वल भविष्य' का नारा इसी परिकर से उठा एवं दिग-दिगंत में प्रतिध्वनित हुआ है।

अखण्ड ज्योति परिजन अभी मात्र पाँच लाख हैं। इस छोटी मंडली द्वारा युग का गोवर्धन उठेगा नहीं। 600 करोड़ आबादी वाले संसार का कायाकल्प जैसा पुरुषार्थ कर दिखाने के लिए यह समुदाय जलते तवे पर एक बूँद पानी की तरह नगण्य ही कहा जा सकता है। संख्या और क्षमता अनेक गुनी बढ़ने की आवश्यकता है। आशा ही नहीं, विश्वास है कि विस्तारक्रम रुकने वाला नहीं है। यह परिकर भी मत्स्यावतार की तरह बढ़ेगा एवं एक करोड़ सृजनशिल्पियों का विनिर्मित करके रहेगा।

इस दिशा में इस वर्ष का सीमित लक्ष्य यह है कि एक से पाँच, पाँच से पच्चीस बनने वाली गुणन-अभिवर्द्धन-प्रक्रिया में कहीं कोई व्यवधान अड़ना नहीं चाहिए। अब तक पाठक इस परंपरा को निष्ठापूर्वक निबाहते रहे हैं कि पहुँचने वाला ही हर अंक कम-से-कम पाँच द्वारा पढ़ा जाता रहे। इसी आधार पर तो पाँच लाख के परिकर के अनुपाठकों समेत पच्चीस लाख गिना और और अपने परिवार को इतना बड़ा माना व समझा जाता है। अब एक ऊँची छलाँग लगाने का दूसरा ही सोपान नई चुनौती लेकर सामने आ खड़ा हुआ है। एक से पाँच नहीं, अब पाँच से पच्चीस होना चाहिए।वे अनुपाठक जो मांगकर अपनी जिज्ञासा शांत करते रहे हैं, उन्हें सहायता पर निर्भर रहना छोड़कर तरुणों जैसी वह रीति-नीति अपनानी चाहिए, जिससे बढ़े-चढ़े पुरुषार्थ की अपेक्षा की जाती की जाती है। अनुपाठकों को अब स्वयं सदस्य बनना चाहिए और अपनी पत्रिका के पाँच-पाँच अनुपाठक बनाकर पाँच से पच्चीस वाला विस्तारक्रम पूरा कर दिखाना चाहिए।

इन दिनों अखण्ड ज्योति का हर सदस्य चार और नए सदस्य बनाकर अपनी मंडली पाँच की गठित करे। उसके अनुपाठक तो पच्चीस सहज ही हो जाएंगे। इस अभिनव विस्तार से संख्या सवा करोड़ पाठकों से आरंभ होकर एक अरब छप्पन करोड़ की संख्या तक पहुँच जाएंगे। इसे अत्युक्ति भी मान लें तो यह तो कह ही जा सकता है कि पाँच नए अनुपाठक चार-चार नए स्थान बनाकर पच्चीस की मंडली के सूत्र- संचालक बन जाएं एवं इस प्रकार न्यूनतम तीस करोड़ संख्या को तो अपने प्रभाव-क्षेत्र में ले ही लेंगे। जिस गति से पिछले दिनों गतिशीलता का उपक्रम रहा है, उसकी तुलना में अगले दिनों प्रगति का अनुपात पाँच गुना अधिक बढ़ जाने से वह एक वर्ष में ही बन पड़ेगा। जिसे पिछली सफलता की तुलना में अगणित गुना अधिक तीव्रगति से चलने वाली प्रगति कहा जा सके। इस प्रकार कुछ ही छलाँगों में हम मत्स्यावतार का उपक्रम अपनाने वाले युगसाधक सच्चे अर्थों में बन सकते और नवसृजन के क्षेत्र में वह चमत्कार कर दिखा सकते हैं, जिसे सुनने में तो सर्वसाधारण रुचि की बात लेता है, पर व्यवहार में प्रत्यक्ष बन पड़ने की बात को संदेह एवं असमंजस जैसा ही कुछ मानता है।

अखंड ज्योति के पाठकों, अनुपाठकों से यह अनुरोध भी किया गया है कि वे अपनी मंडली के हर सदस्य का, अपना जन्मदिन मनाए और विचार-विनिमय का, आदर्शवादी प्रतिपादन के क्रियान्वयन का उपक्रम चलाए। जन्मदिन के उपलक्ष्य में अभ्यस्त बुराइयों में से एक को छोड़ने और एक नई सत्प्रवृत्ति बढ़ाने का अवलंबन भी लिया जा सकता है। प्रत्येक पाठक अपने जन्मदिन की सूचना शान्तिकुञ्ज भेजे, ताकि उसे यहाँ भी मनाया जा सके एवं अगणित व्यक्तियों का अभिनंदन उनके जन्मदिन की गरिमा के साथ जुड़ सके। इस अवसर पर यहाँ से सूत्र-संचालक के आशीर्वचनोंयुक्त एक अभिनंदन पुस्तिका भी भेजी जाएगी। पाँच सदस्य, पच्चीस अनुपाठक व इसके मित्र-सहयोगी एकत्र होने पर एक अच्छा-खासा समारोह मन सकता है। इस अवसर पर आयोजित दीपयज्ञ से उपस्थित सभी परिजनों को दिव्य प्रेरणाओं से अनुप्राणित होने का सुयोग मिलेगा।

जिस प्रकार बैटरी चार्ज करने के लिए उसे बार बार विद्युतप्रवाह के साथ जोड़ना पड़ता है। ठीक इसी स्तर का एक प्रसंग यह भी है कि प्रज्ञा परिजन शांतिकुंज की गंगोत्री यात्रा छः माह में नहीं तो वर्ष में एक बार तो कर ही लेने की योजना बनाये रहे। युगसंधि के शेष दस वर्षों में यह उपक्रम नियमित रूप से चलता रहे तो खर्च हुए समय और पैसे की तुलना में कुछ अधिक ही मिल सकेगा। भले ही वह चेतना क्षेत्र का अनुदान चर्मचक्षुओं से न दीख पड़े। सन् 20 से सन् 2000 तक युग सृजन परिकर के प्राणवान परिजनों के लिए समूची अवधि में नौ-नौ दिन के सत्र शांतिकुंज में अनवरत रूप से चलते रहेंगे। युग साधकों को प्राण प्रेरणा से अनुप्राणित होने का अवसर मिले, इसलिये अगले दस वर्षों में 1 दिवसीय सत्रों में अधिकाधिक व्यक्तियों को शाँतिकुँज आमंत्रित किया जा रहा है। ये सत्र हर माह 1 से 2, 11 से 12 तथा 21 से 22 तारीखों में चलते रहेंगे। ये परामर्श सत्र सतत् चलते रहेंगे ताकि अखण्ड ज्योति पाठकों से सूत्र संचालकों के आदान-प्रदान की प्रक्रिया व्यापक स्तर पर संपन्न हो सके। इसी निमित्त शांतिकुंज में नये कमरे बनाये गये है, आवास व्यवस्था का विस्तार किया गया है।

सज्जनों का, सत्प्रवृत्तियों का विस्तार ही नवयुग के अवतरण का प्रधान लक्षण है। दुर्मतिजन्य दुर्गति का निवारण और निराकरण संयमशील-उदारचेता ही अपने विस्तार-पुरुषार्थ से संभव कर सकते है। उन्हीं का उत्पादन, अभिवर्धन और प्रशिक्षण नवसृजन प्रक्रिया का प्रधान अंग है।

अपने समय का प्रज्ञावतार ही प्राचीन का मत्स्यावतार है। उसकी रटन लगन और ललक निरन्तर विस्तार पर ही केन्द्रित रही। अब हममें से प्रत्येक को एक से अनेक बनाने का व्रत लेना चाहिए और विस्तार के इस लक्ष्य को पूरा करने में कुछ ऐसा कर गुजरना चाहिए जो अनुकरणीय और अभिनन्दनीय कहकर सराहा जा सके।


अधिक घनिष्ठता और निकटता की आवश्यकता

अखण्ड ज्योति और उसके परिजनों के बीच मात्र लेखन-वाचन के संबंध नहीं है। उनके बीच ऐसी घनिष्ठता भी विकसित होती रही है जिसके आधार पर संबद्ध घटकों का स्तर निरन्तर ऊँचा उठता रहे और उनके संयुक्त प्रयत्नों से धरती पर स्वर्ग के अवतरण का सुनहरा स्वप्न प्रभातकालीन अरुणोदय की तरह दृश्यमान हो सके।

इस घनिष्ठता को अभी ओर प्रगाढ़ होना चाहिए। आदान-प्रदान का उपक्रम मात्र लेखन-पाठन तक न सीमित रहकर इस रूप में चल पड़ना चाहिए जिससे न केवल दो पक्ष कृतकृत्य हो सकें वरन् उस सघनता का स्वरूप नवजागरण के नव सृजन के रूप में दृष्टिगोचर होने लगे।

इस संभावना को मूर्तिमान बनाने के लिए नए सूत्रों का निर्धारण किया गया है, जिसमें एक है-मिशन के साथ उसके सदस्यों का पारिवारिक स्तर पर जुड़ना। इसके लिए मिलन, संपर्क और पत्र व्यवहार-भाव संप्रेषण का नया आधार इन्हीं दिनों खड़ा किया जा रहा है।

अखण्ड ज्योति परिजनों का (1) पारिवारिक परिचय (2) पत्र व्यवहार का पता, ग्राहक नम्बर सहित (3) जन्म दिन की तारीख और समय (4) संभव हो तो पासपोर्ट साइज का फोटो यह जानकारियाँ माँगी गई है। इनके आधार पर उनके विषय की एक फाइल बन जाएगी और ऐसे अनुदान एवं प्रकाश कण प्रेषित करने का प्रयत्न शाँतिकुँज हरिद्वार से चलता रहेगा, जिनके आधार पर परिजनों की भौतिक एवं आत्मिक क्षेत्रों की प्रगति का नया सिलसिला चल पड़ें।

मिलन के संदर्भ में परिजनों को युग संधि के विशेष वर्षों में हर वर्ष न सही तो दो वर्ष में एक बार हरिद्वार पहुँचने एवं पाँच दिन का एक छोटा साधना सत्र सम्पन्न करते रहने का प्रयत्न करना चाहिए। यदि वे न आ सकें तो शाँतिकुँज के प्रतिनिधियों की टोलियाँ ऐसे स्थानों पर भेजते रहने का प्रयत्न किया जायगा, जहाँ अधिक परिजन एक स्थान पर बैठकर एक पारिवारिक गोष्ठी स्तर का छोटा मिलन समारोह कर सकें। यह जीवन-प्राण चेतना का मिलन उपक्रम हुआ। इसकी आवश्यकता इसलिये पड़ती है कि अखण्ड ज्योति के पन्नों पर छपे प्रतिपादन मात्र विचार क्षेत्र को ही एक सीमा तक प्रभावित कर सकते है। वह कमी बनी ही रहती है, जो प्राण चेतना के निकटवर्ती होने पर एक नवीन चेतना का पारस्परिक प्रत्यावर्तन संभव दिखाती है जो दूर संचार की तरह छपे कागजों द्वारा एक सीमा तक ही बन पड़ता है।

पोथी पत्री से भी सामान्य कार्य ही किसी प्रकार निपटाये जा सकते है। वे प्रयोजन पूरे नहीं हो पाते जिनके लिए आत्मा से मिलने के लिए आकुल-व्याकुल रहती है। पति पत्नी, माता-पुत्र आदि दूर देशों में रहें तो पत्र व्यवहार से वह मिलन उपक्रम पूरा नहीं हो सकता। विवाह, शादियों, मरण संवेदनाओं के अवसर पर दौड़ कर संबंधियों से मिलने की आवश्यकता पड़ती है। यह कर्म यों तो चिन्ह पूजा की तरह पोस्ट कार्ड लिखकर भी पूरा किया जा सकता है, पर वह आवश्यकता कहाँ पूरी होती है जो सान्निध्य, संपर्क और भावनात्मक आदान-प्रदान की आवश्यकता पूरी हुए बिना चैन नहीं लेने देती।

विचारों के आदान प्रदान का अपना महत्व है पर मात्र इतने भर से ही वह सब कुछ संभव नहीं हो जाता। रेडियो, टेलीविजन में हम बहुत कुछ सुन-समझ पाते हैं फिर भी वह प्रयोजन पूरा नहीं हो पाता जो नारद मुनि के प्रत्यक्ष परामर्श और सान्निध्य से अनेकों ने असाधारण स्तर का साहस एवं परिवर्तन अपने में पाकर स्वयं को कृतकृत्य अनुभव किया था।

अखण्ड ज्योति परिजनों और शान्तिकुँज के ऊर्जा-उद्गम के साथ अधिक घनिष्ट, अधिक प्रत्यक्ष और अधिक प्राणवान आदान प्रदान चल पड़े इसके लिए इन्हीं दिनों विशेष रूप से नया ताना बाना बुना जा रहा है। परिजन उसके लिए पूरी तरह सन्नद्ध और कटिबद्ध हो।

*समाप्त*