ऐतरेय ब्राह्मण में गायत्री शब्द का अर्थ करते हुए कहा गया है “गयान् प्राणान् त्रायते सा गायत्री” अर्थात् -जो गय (प्राणों की) रक्षा करती है वह -गायत्री है। प्राहते हैं-चैतन्यता एवं सजीवता को। हमारे भीतर जो गति, क्रिया, विचार शक्ति विवेक एवं जीवन धारण करने वाला तत्व है, वह प्राण कहलाता है। इस प्राण के कारण हम जीवित हैं। जब प्राण निकल गया तो जीवन का अन्त ही समझिये, प्राण रहित देह से कुछ प्रयोजन नहीं सधता। उसे तो नष्ट कर देना ही हितकर समझा जाता है। इसलिए उसे गाड़ या जला देते हैं। प्राण होने के कारण जीव को प्राणी कहते हैं, विना प्राण का पदार्थ तो जड़ होता हैं। जब किसी प्राणी का प्राण निर्बल पड़ जाता है तो उसका वाह्य शरीर ठीक दिखाई देते हुए भी वह भीतर ही भीतर खोखला हो जाता है। कई व्यक्ति शरीर से मोटे दीखते हुए भी भीतर से बड़े निर्बल होते हैं। कोई कष्टसाध्य परिश्रम उनसे नहीं होता, वे थोड़ा-सा श्रम करने में बेतरह थक जाते हैं। सिर घूमने लगता है, हाथ-पाँव शिथिल हो जाते हैं, दम फूलने लगता है। उनका चेहरा, निस्तेज, प्रभाव रहित, आंखें गीली मटीली होती हैं और वाणी में जरा भी प्रभाव नहीं होता। कोई छोटी मोटी बीमारी हो जाने पर उसे ठीक होने में मुद्दत लग जाती है। इस प्रकार की भीतरी निर्बलतायें शरीर में दीख पड़ती हैं। उन में बलवीर्य की बहुत न्यूनता हो जाती हैं।
प्राणशक्ति के अभाव में मन का बुरा हाल हो जाता है भय या अनिष्ट की आशंकाएँ अकारण मन में उठती रहती हैं, ऐसा लगता रहता है कि कही-अमुक प्रकार की आपत्ति न आ जाय। कहीं अमुक संकट उपस्थित न हो जाय। कोई विपत्ति सचमुच ही ऊपर आ जाय तब तो इनका बुरा हाल हो जाता है। हर घड़ी दिल धड़कता हैं। रात को नींद नहीं आती ऐसा अनुभव होता है मानो कोई उसे बुरी तरह कुचल रहा है। भीरुता एवं निराशा उसे घेरे रहती है जिस काम को करने की सोचता है उसी में असफलता सूझती है। दुनिया के सब लोग स्वार्थी धूर्त,बेवकूफ एवं शत्रु दिखाई पड़ते हैं। किसी की सचाई सदाशयता एवं सद्भावना पर विश्वास नहीं होता। यह सब प्राण की कमी के लक्षण हैं। दुःस्वप्न घबरा जाना, चिन्तातुर रहना, धैर्य खो देना, निराशा-जनक भविष्य की कल्पनायें करते रहना, नास्तिक-सा बन जाना आदि बातें प्राणशक्ति की न्यूनता से होती है। निष्प्राण तो उसे कहते हैं जो पूरी तरह प्राण रहित हो जाता है, जड़ बन जाता है पर न्यूनप्राण उसे कहते हैं जो भीतरी और बाहरी दृष्टि से निर्बल हो गया है और उन निर्बलताओं का दुःख प्रतिक्षण भुगतता रहता है।
प्राणवान की स्थिति इससे भिन्न होती हैं। उसकी नस-नस में उत्साह होता हैं, मन में हर घड़ी नई तरंगें उठती हैं, हृदय में दृढ़ता साहस, धैर्य, आशा एवं स्फूर्ति की भावनाएँ गूँजती रहती हैं। वह प्रत्यक्षतः चाहे दुबला पतला दिखाई देता हो, कम पढ़ा लिखा हो, पिछड़ी हुई परिस्थितियों में रहता हो तो भी वह अपने प्राण बल के आधार पर ऐसे-ऐसे अवसर प्राप्त करता हैं, ऐसे-ऐसे कार्य कर दिखाता है जिसे देखकर अधिक साधन सामर्थ्य रखने वाले व्यक्तियों को भी आश्चर्य से दाँतों के तले उँगली दबानी पड़ती है। मनुष्य में जो शक्ति है वह हाड़, माँस, रक्त, रस की नहीं, प्राण की शक्ति है। मरने के बाद हाड़ माँस सब मौजूद रहते हैं, पर केवल प्राण निकल जाते हैं। इस प्राण के हटते ही शरीर के सारे कल पुर्जे निरर्थक सिद्ध होते हैं। जीवन का सार प्राण है, क्योंकि सभी प्रकार की भौतिक शक्तियाँ प्राण के अंतर्गत रहती हैं। जिसका प्राण जितना ही सबल है अधिक हैं, सुरक्षित है, वह उतना ही पुरुषार्थी एवं शक्तिशाली है और अपने प्रयत्न से वह सब बात प्राप्त करेगा, जिसके द्वारा आन्तरिक और वाह्य सुख शान्ति को प्राप्त किया जा सकता है।
इन सब तथ्यों पर विचार करने से प्रकट हो जाता है कि जीवन का सार प्राण है। यह प्राण स्वभावतः परमात्मा ने हमें प्रचुर मात्रा में दिया है। प्राण का अक्षय भंडार हमारे चारों ओर लहलहा रहा है। उस में से मनमानी मात्रा में हम अपने लिए ग्रहण कर सकते हैं। इतना होने पर भी जो लोग निर्बल प्राण देखे जोते हैं, वे अपनी इस दैवीशक्ति को सुरक्षित नहीं रखते हैं। उनकी प्राण शक्ति का बहुत सारा अंश निरर्थक खर्च हो जाता है। इस व्यय को रोकने से मनुष्य प्राणवान बन सकता हैं। व्यय किस तरह रुके, इसका समाधान ऐतरेय ब्राह्मण ने कर दिया है। श्रुति का कथन है कि गायत्री प्राणों की रक्षा करती है। ऐसे अन्य प्रमाण भी मिलते हैं जिनसे प्रकट होता है कि गायत्री नाम इस लिए पड़ा है कि वह प्राणों की रक्षा करती है।
“प्राणागयाइति प्रोक्तात्रायते तानथपि वा।” -भारद्वाज
अर्थात्- गय प्राणों को कहते हैं और जो प्राणों की रक्षा करती है वह गायत्री है।
“तद्यत्प्राण त्रायते तस्ताद् गायत्री।” -वृहदारण्यक 5/24/4
अर्थात्- जिससे प्राणों की रक्षा होती है वह गायत्री है।
गयान् त्रायते गायत्री -शंकरभाष्य
अर्थात्-प्राणों की रक्षा करे वही गायत्री है।
गायस्त्रायते देवि! त्द्गायत्रीति गद्यसे।
गयःप्राण इति प्रोक्तस्तस्य त्राणादपीति वा। - वाशिष्ठ
अर्थात्- हे देवि। तुम उपासक की रक्षा करती हो इसलिए तुम्हारा नाम गायत्री पड़ा हैं। गय प्राणों को कहते हैं प्राणों की रक्षा करने से गायत्री नाम होता है।
गायत्री प्रोच्यते तस्माद् गायर्न्ता त्रायते यतः। -याज्ञवल्क्य
अर्थात्- उसे गायत्री इसलिए कहा जाता है क्योंकि वह प्राणो की रक्षा करती है।
आद्य शंकराचार्य अपने भाष्य में लिखते हैं- “गीयते तत्वमनया गायत्रीति” अर्थात् -जिससे परम तत्व को जाना जाये, वह गायत्री है। जिस विवेक बुद्धि से, ऋतंभरा प्रज्ञा से तत्व को, वास्तविकता को जाना जा सकता है, वह गायत्री है।
तत्व और अतत्व का, सत्य और असत्य का, श्रेय और अश्रेय का जो बुद्धि निर्णय कर देती है, हमें क्या करना क्या न करना, इसका निर्णय दिव्य प्रकाश के आधार पर करने वाली ऋतम्भरा बुद्धि एक ऐसी अद्भुत शक्ति है जिसकी तुलना में विश्व की और कोई शक्ति मनुष्य के लिए हितकारी नहीं। तमसाच्छादित बुद्धि में चाहे कितना ही चातुर्य क्यों न हो। चाहे वह कितनी ही तीक्ष्ण, कितनी ही उपजाऊ कमाऊ क्यों न हो, उससे मनुष्य का सच्चा हित नहीं हो सकता और न उससे आत्मिक सुख शान्ति के दर्शन हो सकते हैं। भोग विलास के थोड़े से उपादान वह जरूर जमा कर सकती है, पर उन उपादानों के कारण चिन्ता, भय, आशंका,तृष्णा, मोह, मद आदि की मात्रा इतनी बढ़ जाती हैं कि उनका भार आत्मा के लिए असाधारण रूप से कष्टदायक सिद्ध होता है। जो संपत्ति नीति-अनीति का ध्यान न रख कर इसलिए कमाई जाये कि, इससे सुख की वृद्धि होगी, वह उलटा परिणाम उपस्थित करती हैं। थोड़ी-सी बाहरी तड़क-भड़क दिखाकर भीतर का सारा आनन्द नष्ट कर देती है। उस आँतरिक अशान्ति के कारण छोटे मोटे अनेकों शारीरिक, मानसिक एवं आत्मिक रोग उपज पड़ते हैं, और वे हर घड़ी उस आदमी को बेचैन बनाये रहते हैं, जो अपने को बुद्धिमान समझने का दम भरता है। तमसाच्छन्न बुद्धि जितनी अधिक तीक्ष्ण होगी उतना अधिक विपत्ति का कारण बनेगी, ऐसी बुद्धि तो जितनी मन्द हो उतना ही उत्तम है।
गायत्री उस बुद्धि का नाम है जो सतोगुणी दैवी-तत्वों से आच्छादित होती है, जिसकी प्रेरणा से मनुष्य का मस्तिष्क और शरीर ऐसे मार्ग पर होता हैं, जिस पर चलते हुए पग-पग पर कल्याण के दर्शन होते हैं, जिससे हर कदम पर आनन्द का संचार होता है। सात्विक विचार और कार्यों को अपनाने से मनुष्य की प्रत्येक शक्ति की रक्षा और वृद्धि होती है। उनकी प्रत्येक क्रिया उसे अधिक पुष्ट सशक्त एवं सुदृढ़ बनाती है और वह दिन दिन अधिक शक्ति सम्पन्न बनता है।
तमसाच्छादित बुद्धि द्वारा उत्पन्न हुए विचार और कार्य हमारी प्राण शक्ति को दिनों दिन घटाते हैं। भोग प्रधान कार्यों से शरीर दिनों दिन क्षीण होता है, स्वार्थ-प्रधान विचारों से मन दिनों-दिन अथाह पाप पंक में फँसता है, इस प्रकार जीवन की पैंदी में असंख्य छिद्र हो जाते हैं जिन में हो कर सारी उपार्जित शक्ति नीचे नष्ट हो जाती है। चलनी में चाहे कितना भी दूध दुहा जाय, सब नीचे गिर जायगा और चलनी खाली की खाली रह जायेगी, यही बात तमसाच्छन्न बुद्धि के लोगों के बारे में है कितना ही कीमती भोजन हो सब विषय -भोगों की चटोरपन की उष्णता में जल जायेगा। वे चाहे जितनी बुद्धि दौड़ाकर नई कमाई करें पर तृष्णा, स्वार्थपरता, भय, अहंकार-लोभ आदि कारणों से चित सदा दुखी ही रहेगा और उससे मानसिक शक्तियाँ नष्ट होती रहेंगी। इन दोनों कारणों से प्राण निर्बल होता रहेगा और वह न्यूनप्राण व्यक्ति संसार में नाना प्रकार के उद्वेगों में किसी प्रकार हीन जीवन ही व्यतीत करता रहेगा।
सतोगुणी, ऋतम्भरा विवेक बुद्धि हमारे शारीरिक आहार-विहारों को सात्विक रखती है। संयम, ब्रह्मचर्य,अस्वाद, श्रमशीलता, सादगीमय प्राकृतिक दिनचर्या होने से बल-वीर्य बढ़ता और शरीर सक्रिय रहता है और दीर्घायुष्य की प्राप्ति होती है। मन में अपरिग्रह परमार्थ, सेवा, त्याग, सहिष्णुता, तितीक्षा, दया, श्रद्धा, ईश्वरपरायणता आदि की भावना काम करती है। यह भावना जहाँ रहती हैं, वहाँ के परमाणु सदैव प्रफुल्ल और चैतन्य रहते हैं तथा उनका विकास होता है। इस प्रकार गायत्री सद्बुद्धि दे कर हमारी प्राण रक्षा का हेतु बनती हुई अपने नाम को सार्थक करती है।
अज्ञानान्धकार में भटकते हुए माया बन्धनों से बँध कर तड़पड़ाते हुए निम्न स्तरीय तत्वों के दल-दल में फँसे हुए प्राणी इस दुर्लभ जीवन को दुःख–दारिद्रय की यातनाओं में घुला-घुलाकर नष्ट करते हैं। उनके लिए गायत्री एक प्रकाश है। एक आशा पूर्ण सन्देश है। एक दिव्य प्रकाश है, जिससे कि उनके अंतर्गत समस्त भौतिक, आध्यात्मिक, साँसारिक और मानसिक आनन्दों का स्त्रोत खुला हुआ है। वह हमारे मुँदे हुए विवेक के तृतीय नेत्र को खोलती है,उसे ज्योति देकर इस योग्य बनाती है कि संसार को हम विवेक दृष्टि से देख सकें और जीवन-लक्ष्य को प्राप्त कर सकें। यही गायत्री का तत्व दर्शन है।
वर्ष 53 संस्थापक - वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं. श्रीराम शर्मा आचार्य फरवरी 1989 अंक 2 वार्षिक चन्दा 25 आजीवन 250 विदेश में 200
जीवन एक वन है, जिसमें एक फूल भी है और काँटे भी है। जिसमें हरी–भरी सुरम्य घाटियाँ भी है और ऊबड़–खाबड़ जमीन भी। अधिकतर वनों में वन्य पशुओं ओर वनवासियों के आने जाने से छोटी-मोटी पगडण्डियाँ बन जाती है। सुव्यवस्थित दीखते हुए भी ये जंगलों में जाकर लुप्त हो जाती है। आसानी आरे शीघ्रता के लिए बहुधा यात्री इन पगडण्डियों को पकड़ लेते है व सही रास्ते से भटक जाते है।
जीवन-वन भी ऐसी ही पगडण्डियों से भरा हुआ है जो बहुत है, छोटी दीखती है, पर गन्तव्य स्थान तक पहुँचती नहीं है। जल्दबाज पगडण्डियाँ ही ढूंढ़ते है किन्तु उनको यह मालूम नहीं होता कि ये अन्त तक नहीं पहुँचती ओर जल्दी काम हो जाने का लालच दिखाकर दल दल में फँसा देती है।
पाप ओर अनीति का मार्ग जंगल की पगडण्डी, मछली वंशी ओर चिड़ियों, के जाल की तरह है। अभीष्ट कामनाओं की जल्दी से जल्दी, अधिक से अधिक मात्रा में पूर्ति हो जाय, इस लालच से लोग वह रास्ता पकड़ते है जो जल्दी ही सफलता की मंजिल तक पहुँचा दे। जल्दी ओर अधिकता दोनों ही वाँछनीय है, पर उतावली में उद्देश्य को नष्ट कर देना तो बुद्धिमत्ता नहीं कही जाएगी।
जीवन वन का राजमार्ग सदाचार ओर धर्म है। उस पर चलते हुए लक्ष्य तक पहुँचना समय साध्य तो है, पर जोखिम उस में नहीं है। हम पगडण्डियों पर न चले, राज मार्ग पर, न्यायोचित मार्ग पर चले। देर में सही, थोड़ी सही, पर जो सफलता मिलेगी, वह स्थायी भी होगी ओर शान्ति दायक भी।
काल के तीन खण्ड है-भूत, वर्तमान ओर भविष्य तीनों का अपना-अपना महत्व हैं तीनों को मिला कर एक समग्र व्यक्तित्व की संरचना होती है।
“ बचपन प्रायः अभिभावकों की सहायता से विनिर्मित होता है। उन दिनों बालक चेष्टाएँ तो स्वयं करता है, पर उनके मार्गदर्शन में योगदान परिजनों का ही प्रमुख रहता है। बालक पुरी तरह आत्मनिर्माण के अनुभव ओर सामर्थ्य के अभाव में स्वयं उठ नहीं पाता। इसलिए अभिभावकों ओर अध्यापकों की सहायता आवश्यक होती है। किशोरावस्था के साथ-साथ समझदारी बढ़ने से मनुष्य निजी अनुभव, रुझान ओर प्रयोग के बलबूते अपने कर्तव्य का परिचय देने लगता है। इसी को इतना ही दीख पड़ता है। मनुष्य का वर्तमान ही सर्व साधारण के परिचय में आता है। भूत विस्मृत होता रहता हे। उसको बहुत कुरेदने पर ही कुछ पता चलता है। भूतकाल की स्मृतियाँ घटनाओं ओर अनुभूतियों के आधार पर वर्तमान को विनिर्मित करने में सहायता करती है। इतनी भर ही उसकी उपयोगिता है। स्वभाव -निर्माण में ज्ञान भण्डार भरने में भी भूतकाल की उपयोगिता रहती है। “
वर्तमान अनुभूतियों ओर क्रियाओं का परिचय देता है। शरीरगत पीड़ा, सुविधा, रसास्वादन जैसा कुछ वर्तमान में ही चलता है। कौन क्या कर रहा है। इसकी जानकारी में वर्तमान का ही योगदान होता है। इन सबसे इतना भर बन पड़ता है कि किसकी योग्यता क्या है ओर क्या कर रहा है।
किन्तु इतना सब पर्याप्त नहीं। जीवन की विगत एवं प्रस्तुत जानकारी ही भूत ओर वर्तमान मिलकर दे पाते हे। भविष्य में जो बन पड़ना है।, सम्भव होना है, उसका ऊहापोह मस्तिष्क की भविष्य कल्पनाओं के साथ ही जुड़ता हे। कौन क्या योजना बना रहा, उसे क्या रूप देने जा रहा है-इस आधार पर ही भविष्य का स्वरूप विनिर्मित होता है। मनः स्थिति ही परिस्थिति की जन्मदाता ह। मनः स्थिति का थोड़ा अंश ही भूत के स्मरण ओर वर्तमान के निर्धारण में लगता हे। शेष अधिकाँश चिंतन तो भविष्य की कल्पनाओं में ही निरत रहता हे। कामनाएँ आरे कुछ नहीं, भविष्य की लालसा ही है। उन्हीं के अनुरूप यह निश्चित किया जाता है कि गले दिनों के लिए जो निर्धारण किया गया है उसका ताना बाना कैसे बुना जाय? सरंजाम कैसे जुटाया जाय? इसलिए तीनों काल खण्डों में भविष्य की अवधारणा ही अधिक महत्वपूर्ण है, क्योंकि उसी के आधार पर अगले कार्यक्रमों का निर्धारण किया जाता है ओर तदनुरूप प्रतिफल उभर कर समाने आता है। “मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप है” इसी उक्ति के पीछे इस उक्ति के पीछे एक ही तथ्य जुड़ा हुआ है। कि कौन क्या सोच रहा है आरे उस सोच को क्रियान्वित करने के लिए क्या तैयारियाँ कर रहा है? इसलिए जहाँ तक चिन्तन का सम्बंध है, वहाँ तक यही कहना पड़ेगा कि भावी निर्धारणों का स्वरूप ही चिन्तन क्षेत्र की सबसे बहुमूल्य सम्पदा है। यों प्रत्यक्षतः उसका कोई स्वरूप या महत्व दीख नहीं पड़ता। इतने पर भी शक्ति उसी में सबसे अधिक होती है, जो जैसा सोचता है, वह वैसा बन जाता है। इसी को कहते है - भविष्य-निर्धारण।
एक दिशाधारा यह है कि भविष्य को जैसा भी विनिर्मित बनना देखना चाहते है, उसके अनुरूप सोचने, योजना बनाने, क्रिया पद्धति बनाने का निर्धारण करे, तदनुरूप प्रयासों को गतिशील करे, वैसे ही साधन जुटाये ओर जिनके सहयोग की उस प्रयास में आवश्यकता पड़ेगी उनके साथ सम्बंध जोड़ने के लिए अग्रसर हों
दूसरी दिशाधारा इससे अधिक सरल और सुनिश्चित हैं कि भविष्य में जो होने की सम्भावना है, उसका सही अनुमान लगा लिया जाये ओर उस भवितव्यता के अनुरूप अपने प्रयासों को चिन्तन तथा व्यवहार में सम्मिलित किया जाय। इसी पद्धति को आम लोग अपनाते ओर विश्वासपूर्वक कदम उठाते है। भविष्य-ज्ञान का मोटा अनुभव सरलतापूर्वक दूरदर्शी समझदारी के सहारे अर्जित किया जा सकता है। यों सर्वथा सही, अनुकूल, एवं सुनिश्चित भविष्य की सही आरे पुरी जानकारियाँ प्राप्त कर लेना तो किसी के लिए भी सम्भव नहीं है। अविज्ञात को कैसे बनाया जाय? जो घटित ही नहीं हुआ है, उसका घटित जैसा स्वरूप निखर कर किस प्रकार सामने आये? इसलिए भविष्य कथन पुरी तरह तो किसी के लिए भी संभव नहीं होता। फिर भी इतनी जानकारी तो चिन्तन में दूरदर्शिता सम्मिलित हो। जाने पर मिल ही जाती है, जिसके सहारे भवितव्यता के अनुरूप अपनी विचारणा ओर क्रिया को मोड़-मरोड़ कर अभीष्ट परिणामों के सन्निकट पहुँचा सके।
ऋतु परिवर्तन के साथ बदलती परिस्थितियों का अनुमान रहता है। लोग तदनुरूप ही अपनी पूर्व तैयारी करते है। वर्षा ऋतु आने से पूर्व छप्पर को दुरुस्त करने, छाता खरीदने, खेत जोतने, मेंड़ बनाने, बीज इकट्ठा करने जैसी तैयारियों में लग लग जाते है। वह भविष्य-ज्ञान के सहारे ही सम्भव होता है।
आँचीटैक्ट, इंजीनियर अपने-अपने विषय क विशालकाय ढाँचे कागजों पर ही अंकित कर लेते है। उनकी कल्पना शक्ति इतनी पैनी होती है कि जो करना है, उसे व्यावहारिकता से तालमेल बिठाते हुए प्रायः इस स्तर का बना लेते है, जिसमें भूल होने की गुंजाइश कम से कम रहे। यह भविष्य ज्ञान का ही एक प्रकार है।
क्रिया की प्रतियां ओर भविष्य की सम्भावना दोनों के बीच असाधारण संबंध है। खेत में गेहूं बोने से गेहूं ओर चना बोने चना पैदा होता है।वनस्पतियों बोने ओर उगाने के सम्बंध में किसान ओर माली अच्छा खासा ज्ञान रखते हे।
उनकी अनुभवपूर्ण क्रियाओं ओर योजनाओं को कदाचित ही चुनौती दा जा सकती है। मनुष्य के स्वभाव को देखते हुए उसके उत्थान-पतन का अनुमान लगा लिया जाता है। आदतों को देखते हुए उत्थान-पतन का जो अनुमान लगाया जाता है वह लगभग ठीक ही बैठता है। प्रवाह में किसी कारण असाधारण उलट पुलट बन पड़े तो ही पूर्व कल्पना में व्यतिरेक उत्पन्न होता है।
वैज्ञानिकों का मानस अपने आविष्कारों के संदर्भ में वागिकियों को ध्यान में रखते हुए सम्भावनाओं की कल्पनाएँ किया करता रहता है। उनकी संरचनाओं का एक बड़ा भाग मस्तिष्क क्षेत्र में ही सम्पन्न हो जाता है। प्रयोगशाला में परीक्षण करके ही वे इतना भर निष्कर्ष निकालते है कि जो सोचा गया था वह व्यवहार में कहाँ तक खरा ठहरा? साहित्यकार, कवि, कलाकार, चित्रकार अपनी संरचनाओं का अधिकाँश भाग कल्पना क्षेत्र में ही पुरा कर लेते है लेखनी, तूलिका, छैनी, हथौड़ी तो इसके उपरान्त चलती है। उपकरण तो योजना को मूर्त रूप देने में प्रत्यक्ष भूमिका भर निभाते है। इन सब बातों पर यदि गंभीरतापूर्वक विचार किया जाय तो सिद्ध होता है कि भविष्य का ढाँचा मनः क्षेत्र में खड़ा किया जाना सम्भव है।
भविष्य का अनुमान लगाने की हर किसी को उत्कंठा-उत्सुकता रहती है ताकि वह उपलब्धियों की सम्भावना को सार्थक करने में अधिक उत्साहपूर्वक अधिक कार्य कर सके। अशुभ भविष्य को टाल सकने के लिए जो बन पड़े उसके लिए रोकथाम के उपाय कर सके। अनेक प्रकार की उत्कंठाओं में वह भी एक सहज उत्सुकता है कि किस का भविष्य क्या होगा? अपना ही नहीं अपने मित्र शत्रुओं का भी भविष्य लोग जानना चाहते है। उत्सुकता की प्रबलता ने ही ज्योतिष विद्या को जन्म दिया। राशि, लग्न, ग्रहदशा,जन्म कुण्डली, कलित, मुहूर्त आदि का विशालकाय ताना-बाना इसी एक आकाँक्षा पर आधारित है कि
का भविष्य होना है? शुभ के शीघ्र फलित होने ओर अशुभ को टालने के लिए क्या किया जा सकता है। इसके उपाय उपचारों में पूजापरक अनेकानेक कर्मकाण्डों को जन्म दिया। देवी देवताओं का अनुग्रह माँगने ओर उनके रास का समाधान करने क लिए अनेकानेक उपाय सोचे अपनायेगा जो अभी भी अपने अपने क्षेत्रों में अपने अपने ढंग से क्रियान्वित होते देखे जाते हे। वरदान पाने आशीर्वाद माँगने की प्रक्रिया भी इसी के साथ जुड़ी हुई है कि भवितव्यता के साथ जुड़ी हुई प्रतिकूलता का निर्धारण ओर अनुकूलता का अधिक मात्रा में कम समय में प्रतिफलित होना किस प्रकार बन पड़े। प्रकारांतर से यह समूची प्रक्रिया भविष्य संदर्भ के साथ ही जुड़ी हुई समझी जानी चाहिए।
वैज्ञानिक क्षेत्र में इसी प्रयोजन की पूर्ति के लिए भू-गर्भ का वायुमण्डल का प्रकृति प्रवाह का स्वरूप ओर परिणाम जानने के लिए खगोल पर्यवेक्षण के अनेकानेक उपकरण ओर आधार विनिर्मित हुए है, हो रहे है। एक से एक नई डिजाइन के कम्प्यूटर इसी प्रयोजन के लिए बन रहै है कि भावी परिणामों का अनुमान वर्तमान परिस्थितियां के साथ आकलन करते हुए लगाया जा सकना सम्भव हो सके।
इसी प्रकार मरणोपरान्त स्वर्ग ओर मुक्ति मिलने की व्यक्ति की आकांक्षा भविष्य से ही सम्बंधित है। दीर्घ जीवन, कायाकल्प, पुनरुत्थान, भाग्योदय आदि की सुखद सम्भावनाओं की खिचड़ी भविष्य के गर्भ में ही पकती है। यहाँ तक कि अनिष्टों की आशंका भविष्य के साथ ही जुड़ी होती हे। दुर्दिनों के आ धमकने, आक्रमण होने विपत्ति टूटने, घाटा पड़ने जैसी डरावनी चिंताएं भी अगले दिनों की गड़बड़ी से ही सम्बंध रखती है। नरक-भविष्य की डरावनी विभीषिका ही हैं प्रलय जैसी जैसी संभावनाएं इसी प्रकार का उपक्रम हे। मस्तिष्क इसी प्रकार के शुभ अथवा अशुभ के ताने बाने बुनता रहता है। इस सब सम्मिलित एक नाम दिया जाय तो उसे भविष्य चिंतन कह सकते है।
यह सर्वथा निरर्थक भी नहीं। इन्हें चिन्तन के ज्वार-भाटे कह कर भी निश्चित नहीं हुआ जा सकता। क्योंकि इस प्रवाह के साथ असाधारण शक्ति जुड़ी हुई पायी जाती है। मनुष्य जैसा सोचना है उसी क अनुरूप बनने टलने लगाता है। कीट-पतंगों का उदाहरण प्रख्यात है। भृंग की आकृति ओर प्रकृति में तन्मय होकर कीट तद्रूप बन जाता है। टिड्डे गर्मी के दिनों के बस ओर पोलापन छाया देख कर अपना रंग भी पीना बना लेते है। वर्षा आने पर हरीतिमा बिखरी देखने पर टिड्डे अपना रंग बदलते ओर हरे हो जाते है। भयभीत रहने वाले लोग अपना स्वास्थ्य गवाँ बैठते है। इसके विपरीत जिन्हें अगले दिनों बड़ी सफलताएँ मिलने का विश्वास जमा होता है वे अपेक्षाकृत अधिक स्वस्थ सुन्दर आरे समर्थ बनते चले जाते है। यह भावी चिन्तन की भावी परिणति के प्रत्यक्ष प्रमाण है।
“मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप है” इस उक्ति के साथ इतना ओर जोड़ना चाहिए कि इस हेतु उसे उल्लास भरा चिन्तन ओर प्रचण्ड पुरुषार्थ-परक प्रयास भी सँजोये रहना चाहिए।
एक वृद्ध जराजीर्ण हो गया। घर छोटा था। बेटे की नई बहु आई। वृद्ध था दरवाजे के पास पौली में जगह मिली। फिर भी खाँसी आदि से घर में कुछ तो व्यतिरेक रहता ही है। बेटे की बहु को यह बर्दाश्त न हुआ। वह बुड्ढे से पीछा छुड़ाना चाहती थी।
एक दिन उसने हठ ठान ली कि या तो यह बुड्ढा घर में रहेगा या मैं रहूंगी। पति वधू को छोड़ने के लिए तैयार न था। अन्त में बाप से पीछा छुड़ाने की बात निश्चित हुई। योजना बनी कि बैलगाड़ी में ले जाया जाय। उसी में मार कर किसी खड्ड में लाश को उल दिया जाय। वैसा ही किया भी गया। बुड्ढे बाप से पीछा छूटा।
समय बीता। नव विवाहित लड़का भी समयानुसार बुड्ढा हुआ। उसके बेटे का भी विवाह हुआ। उसी प्रकार वधू ने बुड्ढे से पीछा छुड़ाने की हठ ठानी। अनंतः बैलगाड़ी में किसी बाने बिठाकर ले जाने ओर उसे मारकर गड्ढे में फेंक देने की योजना बनी। वह भी पुरी कर दी गयी। पति पत्नी पुरे घर में आनंद से रहने लगे।
उसके भी बेटा हुआ। ब्याह हुआ। वधू आई। बाप को वैसा ही बुढ़ापा आ गया। उसे भी पौली में जगह दी गयी। नव वधू ने बुड्ढे बाप से पीछा छुड़ाने की ठान ली। बैलगाड़ी सँजोई गई और उसे भी खड्डे में तक ले जाया गया।
बुड्ढे ने बेटे से कहा - अब यह परम्परा बन्द होनी चाहिए अन्यथा पीढ़ियों तक यही क्रम चलता रहेगा। मैं स्वेच्छापूर्वक चला जाता हूँ और भीख माँगकर किसी प्रकार दिन पुरे करूंगा। मेरे पिता ओर बाबा की भी यही दुर्गति हो चुकी है। प्रमाण स्वरूप दोनों की हड्डियाँ उसे दिखाई।
लड़के का दिमाग बदला। वह बाप को घर वापस ले आया। पत्नी को तीन पीढ़ी का सारा किस्सा सुनाया। तब उसकी भी समझ में आया कि बुड्ढे सहित ही गुजारा करना चाहिए।
समझा यह जाता है कि दूसरों से सीखने पर ही जानकारी मिलती या बढ़ती है। यह कथन आँशिक रूप से सही है क्योंकि विद्यालयों, अध्यापकों, अभिभावकों आदि के माध्यम से इसी आवश्यकता की पूर्ति की जाती है। परिभ्रमण प्रयोगशाला में परीक्षण आदि भी असीम निमित्त होते हे। यह सब कुछ सही होने पर भी इस तथ्य को भुला नहीं दिया जाना चाहिए कि मनुष्य की रहस्यमयी शक्तियों में एक अन्तः स्फुरणा भी है। जिसके आधार पर कभी कभी किसी को भी अनायास ही ऐसी जानकारियाँ किल जाती है। जिनका कोई प्रत्यक्ष आधार न होते हुए भी अन्तराल के गहन स्त्रोतों से ऐसे संकेत मिलते हे। जो सच्चाई की कसौटी पर खरे उतरते हे ओर अत्यन्त महत्वपूर्ण सिद्ध होते है। इतने पर भी इनकी व्याख्या विवेचना नहीं हो सकती कि अकस्मात् वह अनुभूति हुई कैसे व किस आधार पर?
आदिकाल में अग्नि का कही अता−पता न था। उसके प्रयोग कर सकने की तो सम्भावना थी ही नहीं, किन्तु एका एक किसी को सूझ पड़ा कि लकड़ियों के घिसने पर एक ऐसी शक्ति प्रकट हो सकती हे। जो प्रयोग अभ्यास कने पर काम में लाई जा सकती है। जिसे स्फुरणा हुई थी, उसको अपनी उमंग पर और असाधारण विश्वास था। प्रयोग में जुट पड़ा ओर फलतः अग्नि क प्रादुर्भाव हुआ। उससे शीत भगाने से लेकर भोजन पकाने आरे हिंसक पशुओं का डराने तक का काम लिया जाने लगा। आज वही अग्नि मानव जीवन की अनिवार्य आवश्यकता बनकर रह गयी है।
कपास या ऊन को कात ओर उससे कपड़ा बुना जा सकता है, यह रहस्य सृष्टि के अनय किसी प्राणी को विदित नहीं है। मात्र मनुष्य ही ऐसा कर सकता हे। इस विज्ञान का आविर्भाव आरम्भ में अन्तः स्फुरणा क आधार पर ही हुआ होगा? अन्यथा उसे किसी अन्य से सीखने की सुविधा कहाँ से मिलती? भाषा का उच्चारण और लिपिका लेखन भी ऐसी ही अन्त स्फुरणा के साथ आरम्भ हुआ माना जा सकता है। विज्ञान की अभूतपूर्व समझी जाने वाली अनेकानेक धाराओं का आरम्भ इसी आधार पर सम्भव हुआ है। यही वह दिव्य उपलब्धि है। जो जिस किसी को भी किसी क्षेत्र में उपलब्ध हुई हैं उसे दृष्टा कहा गया हे। प्रचलन चल पड़ने पर उसमें सुधार विकास कर सकने की तो ढेरों गुँजाइश है। उसमें बुद्धि कौशल भी काम दे जाता है, पर जहाँ कोई पूर्व आधार या संकेत ही नहीं हो, वहाँ आकस्मिक या अप्रत्याशित सूझ का उभर पड़ना तो व्यक्ति, प्रकृति या दिव्य सत्ता की रहस्यमयी उपलब्धि ही कही जा सकती है, जो सामान्यजनों की पहुँच से बाहर होती है इसलिए ऐसा कुछ सामने आने पर आश्चर्य भी किया जाता है।
धर्म शास्त्रों के बारे में भी यही मान्यता है कि वे ईश्वर की वाणी के रूप म किसी व्यक्ति विशेष के माध्यम से प्रकट हुए है। इतिहास “अपौरुषेय” शब्द इसी संदर्भ में प्रभु के लिए व्यक्त किया जाता है।
“भविष्य कथन” इसी वर्ग में आता है। उसके उसी रूप में घटित होने पर यह मान्यता भी बन जाती है, यह तीर–तुक्का नहीं है। इसके पीछे कुछ न कुछ आधार होना चाहिए। जब चंद्रग्रहण ओर सूर्यग्रहण के समय ओर स्वरूप की भविष्यवाणी की जाने लगी तो उसके आधार पर ज्योतिष को सर्वसाधारण द्वारा मान्यता भी मिल गयी। भले ही वह खगोल विद्या का ग्रह गणित ही क्यों न हो, पर जिस भी आधार पर भविष्य बताया जा सकता है। उसे अद्भुत या देवी ही समझा गया।
अनुसंधानों ने यह बताया कि मनुष्य के अन्दर विलक्षणता भी है जो प्रत्यक्ष ही नहीं अप्रत्यक्ष को भी जान सकती है। ईश्वर, परलोक, देवता आदि क सम्बंध में भी बहुत कुछ कहा गया। भले ही आज उन प्रतिपादनों में से बहुतों की यथार्थता पर ही प्रश्न चिन्ह लगने लगा है। सिद्ध पुरुषों के शाप वरदान ओर भावी सम्भावनाओं के सम्बंध में इसी आधार पर पूछताछ की जाती है। ज्योतिष का वर्तमान स्वरूप तो मात्र भविष्य कथन के साथ ही सम्बंध है।
इसी सदी के प्रारम्भ से मध्य तक अनेक लब्धप्रतिष्ठित लेखकों ने कितनी ही “युटोपियाए” प्रकाशित की है। जिनमें भविष्य में घटित होने वाली घटना क्रमों का अनुमान लगाया ओर ऐसी उपन्यास शैली में उल्लेख किया है। मानों कोई आँखें देखा या सुनिश्चित घटनाक्रम ही प्रस्तुत किया जा रहा हो।
अमेरिका के आँकलन विशेषा कार्ल साँगा तथा वर्ल्डवाच इंस्टीट्यूट के लसटर ई - ब्राउन ने अनेक विषयों पर उँगली उठाई है ओर भूतकाल में किये गये कार्या का परिणाम इन दिनों किस प्रकार प्रस्तुत हो रहा है, उसका सटीक वर्णन किया है। साथ ही अपनी इस चिन्तन पद्धति के आधार पर यह अनुमान लगाया है कि यदि प्रचलित क्रम यथावत बना रहा तो उसके भावी परिणाम क्या हो सकते है? यह कम्प्यूटर आधारित प्रक्रिया है। किन्तु प्रवाह एक रस ही बहता। उतार-चढ़ाव भी आते हे। किन्तु ऋतु प्रभाव से तूफान, बवण्डर, चक्रवात भी उठते रहते हैं, मानसून दिशा बदलते रहते हे। फलतः हवा के प्रवाह वर्षा के स्वरूप ओर परिणाम में अन्तर भी पड़ जाता है। ऐसी ही सम्भावनाओं को ध्यान में रखते हुए वर्तमान के अवाँछनीय व्यवहार की प्रतिक्रिया की परिणतियाँ सुधार परिष्कार के रूप में दृष्टिगोचर होने का उल्लेख मनीषी द्वय कार्लसाँगा व लस्टर ई॰ ब्राउन ने किया हे। उनके अनुसार इक्कीसवीं शताब्दी के पूर्वार्ध में ही उपयोगी, मानव मात्र के लिए कल्याणकारी परिवर्तन होने चाहिए।
एच.जी वेल्स ने विज्ञान की सामयिक प्रगति को देखते हुए “टाइम मशीन” एवं अपनी अन्य कृतियों में भावी सम्भावनाओं का स्वरूप प्रस्तुत किया था। इसी आधार पर आगे चलकर फ्रिटजाफ काप्रा एल्विन टॉफलर, मार्गेट मीड तथा हरमन काहन प्रभृति चिन्तकों ने भावी समस्याओं का समाधान विज्ञान के आधार पर खोजा। मिलती है। इनके अध्ययन के आधार पर भावी पीढ़ियों के सुखी-समुन्नत होने की संभावनाएं इक्कीसवीं सदी में ही प्रत्यक्ष होने की बात की गयी है। यह अन्तः स्फुरणा ही है जो चिन्तकों को भविष्य के विषय में चिन्तन करने व निर्धारण की प्रेरणा देती है।
उपरोक्त उल्लेखों में वैज्ञानिक प्रवाह को प्राथमिकता दी गयी हे। विज्ञान बुद्धि की उपज हे, बुद्धि की अवमानना नहीं की जा सकती। क्योंकि मनुष्य की लगभग सभी योजनाएं बुद्धि के आधार पर ही बनती है ओर प्रायः कल्पना एवं निर्धारण के अनुरूप सही भी बैठती है। इतने पर भी नाजुक विषयों का उद्गम केन्द्र अतीन्द्रिय क्षमता वाली”मेधा” की भूमिका कम नहीं होती। संसार की अति महत्वपूर्ण सम्भावनाओं का उद्भव इसी क्षेत्र से हुआ है। वैज्ञानिकों में से अधिकाँश को अपने आविष्कार की आरंभिक उमंग अन्तः प्रेरणा के आधार पर ही मिलती रही हे। इसी के सहारे लोग बढ़ते हुए वे ऐसे निर्माणों में सफल हुए है जिन्हें अभूतपूर्व और आश्चर्यजनक माना गया। ऐसे कई आविष्कार जो अन्तः स्फुरणा से उभरे व आगे चलकर लोकप्रिय हुए में राइट बंधुओं का वायुयान, गैल्वेनी द्वारा खोजी गयी विद्युतधारा, जीन बैपटिस्ट जाँली की डायक्लीनिंग मशीन, आथभर जील्टर की डीडीटी खोज लिथोग्राफी प्रिटिंग की जोआन, नेपोमक एलायज सेनेफेल्स् द्वारा आविष्कृत विधाओं का नाम लिया जा सकता है।
न केवल विज्ञान के सम्बंध में यह बात कही जा सकती हैं वरन् संसार के इतिहास में ऐसे प्रयासों की भी कम चर्चा नहीं है, जिसके सम्बंध में किसी पूर्व प्रचलन के अनुकरणों का कोई सहारा नहीं लिया गया, वरन् चिंतन विशेष को ऐसा कुछ सूझ पड़ा जो साधारणतया असम्भव ओर अटपटा लगता था, पर जब कल्पनाकार ने उसे आग्रह पूर्वक सम्भव माना ओर प्रयास को आगे बढ़ाने में सब कुछ झोंक दिया तो ऐसे साधन बनते चले गये जिनके आधार पर असम्भव कभी आगे चलकर सम्भव बनता चला गया। मिस्र का पिरामिड, चीन की दीवार, ताजमहल, कुतुबमीनार, पनामा नगर, स्वेज नहर, हालैंड द्वारा समुद्र में डुबा बड़ा इलाका छीनकर मनुष्यों के रहने लिए बनाया जाना, नोट करेंसी का प्रचलन, डाक व्यवस्था जैसी बातें जिन्हें सूझी, उनकी प्राथमिक स्फुरणा को अतीन्द्रिय क्षमता की देन कहा जा सकता है। सम्भवः धर्म, दर्शन, परलोक, ईश्वर, आदि के वर्तमान स्वरूप निर्धारणकर्ताओं को भी इन प्रतिपादनों के सम्बंध में अन्तः स्फुरणा ही मार्ग दर्शन करती रही हो।
व्यक्तिगत योजनाओं के सम्बंध में कुछ तो अनुभव अनुकरण काम देता है। कुछ इच्छा आवश्यकता नई सोच प्रदान करती है पर कुछ ऐसा भी होता है जिसे असाधारण सूझ बुझ का परिचायक कहा जा सकता है। उसे अतीन्द्रिय क्षमता के साथ जोड़ा जा सकता है।
आम लोग थोड़ी दूर का ही देख पाते है ओर कानों के लिए सुनना भी एक निकटवर्ती सीमा तक ही सम्भव होता है किन्तु कुछ के लिए अविज्ञात आधारों को अपनाने पर दूर दर्शन भी सम्भव हो जाता है। इतना ही नहीं भविष्य में क्या घटित होना चाहिए पर क्या होने जा रहा है? इसका अनुमान लगा लेना भी कठिन नहीं होता। ऐसे लोगों की इन दिनों यही मान्यता है कि अगला इक्कीसवीं वदी वाला समय उज्ज्वल भविष्य साथ लेकर आ रहा है। उसमें सतयुग की सौम्य परिस्थितियों का सुखद समावेश होगा। अतः स्फुरणा इन्हीं परिस्थितियों के संकेत दे रही हे।
मीरा के पति का स्वर्गवास हो चुका था। वै वैधव्य को घर बैठे रोते कलपते नहीं बिताना चाहती थी। उनका विचार था कि ज्ञान, कर्म ओर भक्ति का जन-जन में प्रसार किया जाय। विशेषतया महिला समाज में।
ससुराल वाले सभी विरोधी थे। पितृ गृह से भी कोई समर्थन न था। सामंतवादी प्रतिबंधों के अनुसार उन्हें पर्दे की ओट ले कर धर में ही दिन काटने चाहिए। इन प्रतिबंधों को मीरा की आत्मा स्वीकार करने को तैयार न थी। वे धर्म प्रचार के लिए जीवन लगाना चाहती थी। प्रतिबंध बुरी तरह आ रहे थे, फिर भी उनकी आत्मा ने उस दबाव को स्वीकार न किया। प्रचार प्रव्रज्या के लिये वे घर छोड़ कर निकल पड़ने के लिए व्याकुल हो रही थी।
मीरा के समकालीन सन्त मानस रचयित तुलसीदास जी के पास मार्गदर्शन के लिए एक पत्र भेजा।
“जाके प्रिय न राम बैदेही। तजिये ताहि कोटि बैरी सम, यद्यपि परम स्नेही॥ तज्यों पिता प्रहलाद, विभीषण बंधु, भरत महतारी॥ बलि गरु तत्यो, कंत ब्रज बनिता, भये सब मंगलकारी॥”
पद बड़ा था। पर उपरोक्त पंक्तियों से ही उन्हें समाधान मिल गया। वे निकल पड़ी और जन साधारण को अपने द्वारा उत्पन्न किये गये भाव सरोवर में स्नान करते हुए दिशा बोध का लाभ दिलाती रही। मीरा को इस प्रसंग में ससुराल वालों के त्रास, रूढ़िवादियों के व्यंग-उपहास सहने पड़े पर वे किसी की परवाह न करके आजीवन अपने उमंग भरे कदम उठाती ही रही। उन्होंने अनेक गीत रचे ओर उन्हें अभिनय के साथ जन साधारण को सुनाते हुए जीवन बिताया।
वर्तमान की परिस्थितियों को देखकर मनुष्य भविष्य का अनुमान लगाता है। यदि समय का प्रवाह अनुपयुक्त हो तो यही सोचते बनता है कि अगले दिन कठिनाइयों और असफलताओं से भरे होंगे। प्रसन्नता, प्रगति और सफलता की सम्भावना के साथ जुड़ी रहती है। यह दुर्दिनों का माहौल बनता दीख पड़े तो उदासी एवं निराशा छा जाना स्वाभाविक है। कहना न होगा कि खिन्नता की मन स्थिति में हाथ पाँव फूल जाते हे। उत्साह ठण्डा हो जाता है। नए सिरे से नया साहस जुटाने का उल्लास भी शिथिल हो जाता है।
इन दिनों आम चर्चा परिस्थितियों की विपन्नता पर होती सुनी जाती हे। कुछ तो लोगों का स्वभाव ऐसा है कि आशंकाओं को बढ़ा चढ़ा कर कहने में सहज रुचि रहती है। कुछ वास्तविकतायें भी ऐसी है जो अगले दिनों के प्रति निराशा भरा चित्र खिंचती है। उत्साह उभारने के अनेक कारण भले ही गतिशील हो पर उन्हें साधारण मानने और उपेक्षा करने का स्वभाव ही प्रमुखता अपनाये हुए दीखता है।
भट्टियों से उभरता प्रदूषण हवा का आरे कारखानों का कचरा जलाशयों को दूषित करता हे। ईंधन के अधिक उपयोग से अन्तरिक्ष का बढ़ता तापमान ध्रुवों के पिघलने, समुद्र में ज्वार आने का संकेत करता है। ऊंचे अन्तरिक्ष में “ओजोन” की परत फटने से ब्रह्मांडीय किरणों के धरातल को भूनने की चर्चा है। युद्धोन्माद के लिए बढ़ते जा रहे अणु आयुधों की विभीषिका कम डरावनी नहीं। विकिरण की अभिवृद्धि सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए प्रत्यक्ष संकट है।
कटते जा रहे वन, वर्षा की कमी, भूक्षरण, रेगिस्तानों की बढ़ोत्तरी, लकड़ी का अभाव, वायु शोधन में अवरोध जैसे संकटों का सृजन करते है। द्रुत गति से बढ़ती हुई जनसंख्या हर क्षेत्र में अभाव उत्पन्न करती है और प्रगति कार्यक्रमों को सफल न होने देने के लिए चुनौती बनती जा रही हे। नशेबाजी जिस तेजी से बढ़ रही है उसे देखते हुए लगता है कि लोग कही अर्ध विक्षिप्त स्तर के बन कर न रह जाय। घटती हुई जीवनी शक्ति व स्वच्छंद यौनाचार एड्स जैसी महामारियों को जन्म दे रहे है।
चटोरेपन की आदतें और कामुकता के दुष्परिणाम मस्तिष्क को विकृत करते चले जा रहे हे। असंयम हर क्षेत्र में बढ़ रहा है। विलासिता और फिजूलखर्ची से आर्थिक कठिनाइयों में कमी नहीं होने पाती। महंगाई, बेरोजगारी की दुहरी मार बड़ी जनसंख्या को बुरी तरह प्रभावित करती है। खर्चीली शादियाँ जन साधारण को दरिद्र ओर बेईमान बनाती जा रही है। कुरीतियों ओर अन्ध विश्वासों में न जाने कितने घर, समय साधन बरबाद होते रहते है। मिलावट, नकली वस्तुओं की भरमार से हर कोई पग पग पर ठगा जाता है। अपराधों की बाढ़ इस तेजी से आ रही है कि इसकी चपेट में शान्ति ओर सुव्यवस्था पर भारी संकट लदता चला आ रहा है। पारस्परिक स्नेह-सहयोग ओर विश्वास में कमी पड़ते जाने से समय पर ऐसा आता दीखता है कि अपनों की सद्भावना पर से विश्वास उठ जाय।
जिनके जिम्मे सुधार परिष्कार की जिम्मेदार है वे अपने कर्त्तव्यों का वैसा पालन नहीं कर रहे है जैसा कि करना चाहिए। राजनैतिक पार्टियों की आपसी उठा पटकी उनकी प्रामाणिकता कम कर रही है। सामाजिक और धार्मिक संगठन कुछ ठोस काम कर सकते थे पर वे भीतर से पोले खोखले बनते जा रहे है।
अंतर्राष्ट्रीय सूझबूझ भी विश्व शान्ति की बात नहीं सोचती वरन् सुरक्षा व्यय से हर देश की कमर टूटी जा रही है। साहित्यकार, कलाकार, गायक, अभिनेता उस स्तर का सृजन कर नहीं पा रहे है जैसा कि ऐसी विषम वेला में सर्वतोभावेन होना चाहिए था। सम्भवतः इन्हीं सब को दृष्टि में रखते हुए सुप्रसिद्ध टाइम पत्रिका ने 1988 का “मैन ऑफ द ईयर” चुना है।
सामयिक कठिनाइयों में से यह कुछ सार संक्षेप है, जिनके साथ वास्तविकता का एक बड़ा अंश भी जुड़ा हुआ है। छुटपुट चर्चा इन्हीं की होती है। अखबारों में समाचार भी ऐसे विघटन के पढ़ने को मिलते है। प्रतिपादनकर्ता अगले दिनों की विभीषिकाओं को ही अच्छा खासा रंग दे कर इस प्रकार प्रस्तुत करते है जिससे वर्तमान की अवाँछनीयता ओर भविष्य की अशुभ संभावना ही उभर कर सामने आती है। ऐसी दशा में निराशा का वातावरण बनना स्वाभाविक है।
कहना न होगा कि निराशा की मनः स्थिति अपने आप में एक बड़ा संकट है। उसके रहते व्यक्ति समर्थ होते हुए भी कुछ ऐसा सोच नहीं पाता, कुछ ऐसा कर नहीं पाता जो उचित भविष्य की संरचना कर सकने वाले विचारों को कार्यों को अग्रगामी बनाने में सहायक सिद्ध हो सके। डरावने भविष्य की कल्पना करने से मनोबल टूटता है। उत्साह आरे उल्लास में भारी कमी पड़ती है। ओर अभिनव सृजन के लिए जिस साहस की आवश्यकता है उसे जुटा सकने में भारी कठिनाई पड़ती है।
सृजन प्रयासों का क्रम सर्वथा बन्द हो गया हो ऐसी बात भी नहीं। वर्तमान को सुधारने ओर भविष्य को उज्ज्वल बनाने के लिए जिन प्रयत्नों की आवश्यकता है उनमें शिथिलता भले ही हो पर अभाव उनका भी नहीं है। इतने पर भी मनुष्य स्वभाव की विसंगति ही कहना चाहिए कि जो अशुभ है इसी को बढ़ा चढ़ा कर डरावने रूप में प्रस्तुत किया जाता है। ओर सृजन की नियोजित प्रयत्नशील का जैसी भी कुछ वह है उससे भी हल्का आँका जाता है। यह माहौल मानसिक दृष्टि से ऐसा है, जिसे द्रुतगामी प्रगति प्रयासों के लिए जन साधारण का उल्लास उभारने के लिए अपर्याप्त ही का जा सकता है। उत्साह के अभाव में प्रगति प्रयासों को अभीष्ट बल मिलता नहीं है। पराक्रम शिथिल रहे तो भविष्य की संरचना के लिए जिन प्रचण्ड प्रयासों की आवश्यकताएँ है, उसमें कमी ही बनी रहती है सुखद संभावनाएँ बन पड़ने की गति धीमी होती जाती है।
हौंसले बुलन्द हो तो कठिनाइयों के बीच भी व्यक्ति मिल जुल कर थोड़े ही समय में इतना कुछ कर सकता है, जिसे देखकर आश्चर्य चकित रहा जा सके। पनामा की नहर, स्वेज कैनाल, चीन की दीवार, मिश्र क पिरामिड जैसे अनेकों प्रबल प्रयास उत्साह भरे वातावरण में ही सम्पन्न हुए है। बड़ा वजन जब श्रमिक मिल जुल कर आगे धकेलते है तो उनकी “हेइशा” जैसी हुँकार असर दिखाती है। युद्ध के बाजे सैनिकों में नया जोश भर देते है ओर वे दूने उत्साह में मोर्चा संभालते है।
इतिहास का एक पृष्ठ खोल कर देखा जाय। जिन दिनों इंग्लैंड पर जर्मनी की लगातार बमबारी हो रही थी तब वह देश बुरी तरह तहस नहस हो गया। आशा की कोई किरण दीख नहीं रही थी। उन दिनों तत्कालीन ब्रिटेन के प्रधानमंत्री चर्चिल ने एक नया नारा दिया - “वी” फाँर विक्ट्री। विजय के सुनिश्चित विश्वास के प्रतीक “वी” अक्षर को दीवार पर, वाहनों पर, वस्तुओं पर, पोशाकों पर, पुस्तकों पर हर कही ‘वी’ अंकित किया गया ओर उस संकेत सत्र का अर्थ समझाया गया” विजय अर्थात् अन्ततः जीतना अपने को ही है इस हुँकार प्रभाव पड़ा। बाल वृद्ध सभी अपने स्तर के सृजन कार्या में असाधारण उत्साह के साथ जुट गए। फलतः न केवल पराजय विजय में बदली वरन् उस खंडहर देश को नए सिरे से, पहले से भी अधिक शानदार बना कर खड़ा कर दिया गया।
दार्शनिक मनुष्य को भटका हुआ देवता मनते और कहते हैं कि यदि वह अपनी शक्ति को पहचान ले ओर उसे उच्च प्रयोजनों में नियोजित करे तो नैपोलियन ही नहीं हर कोई अपने क्षेत्र में अपने कौशल का सर्व समर्थ बन सकता है। फिर असंभव कुछ रहेगा ही नहीं।
जामवंत के उद्बोधन से हनुमान को शक्तिबोध हुआ ओर समुद्र लांघने पर्वत उखाड़ने में वे सफल हो गये। कृष्ण के उद्बोधन ने अर्जुन से गाण्डीव उठवाया ओर थोड़े साधन रहते हुए भी महाभारत जीत दिखाया। चाणक्य, समर्थ, रामदास, रामकृष्ण परमहंस ने भी अपने शिष्यों में प्रेरणा भर के उन्हें चक्रवर्ती चन्द्रगुप्त, छत्रपति शिवाजी ओर भारतीय संस्कृति के विश्व विख्यात विवेकानन्द के रूप में ऐसा कुछ कर दिखाने में समर्थ बनाया जिसे कभी विस्मरण नहीं किया जा सकता। बुद्ध का धर्मचक्र प्रवर्तन प्रसिद्ध है। उनके एकाकी अग्रगमन ने लाखों धर्म प्रचारकों को विश्व के भावनात्मक काया कल्प में जुटाया था। गाँधी ने “करो या मरो” के नारे से जन-जन का खून खौलाया व सोये भारत को जगाया।
आज की घड़ी में समस्त विश्व के लिए विशेषतया भारत के नवीन अभ्युदय के लिए “इक्कीसवीं सदी बनाम उज्ज्वल भविष्य” का नारा सर्वथा उपयुक्त एवं तथ्यपूर्ण है। इक्कीसवीं सदी के सम्बंध में भविष्य वक्ताओं, मनीषियों, दिव्यदर्शी एवं आकलन कर्ताओं, ने बहुत कुछ कहा है ओर बताया है कि अँधेरे का समापन ओर अभिनव प्रभात पर्व के अरुणोदय का यही सबसे महत्वपूर्ण अवसर है। इन दिनों सृजेता की ऐसी दिव्य प्रेरणा का अवतरण होगा जो जन-जन के मन मन में से निराशाजन्य अशक्ति को तो दूर करेगा ही ओर ऐसा उल्लास उमगायेगा कि उसके प्रभाव में हर किसी को उज्ज्वल भविष्य की संरचना में बढ़-चढ़ कर काम करने की प्रेरणा मिले। साहस ओर पराक्रम में सहारे बड़े से बड़े काम सम्पन्न होते रहे है। विश्व में दर्जनों राजक्रान्तियाँ सम्पन्न हुई। राजतंत्र का स्थान प्रजातंत्र ने ग्रहण किया। दास प्रथा मिटी, जमींदारों की सामन्ती सतत भूमिधर किसान के चरणों में आ गिरी। तो फिर वर्तमान की स्थिति बदल पाना क्यों सम्भव नहीं?
इसे एक संयोग या तथ्य ही कहना चाहिए कि इक्कीसवीं सदी में नवयुग के आगमन, नवसृजन ओर सर्वतोमुखी अभ्युदय की भविष्यवाणियाँ किन्हीं ज्योतिषी पंडितों ने नहीं वरन् ऐसे लोगों ने की है। जिन्हें अपने अपने क्षेत्र में अतीव प्रामाणिक माना जाता रहा है। फिर समय की माँग एवं परिवर्तन प्रक्रिया का सूक्ष्म अवलोकन करने से भी आभास मिलता है कि कठिनाइयों ओर विसंगतियों के दुर्दिन लद गए ओर अगला समय ऐसा आने वाला है जिसमें जिन संकटों संभावनाओं को अब तक असाधारण माना जाता रहा है। व लोक मानस के परिवर्तित प्रवाह में अशुभ आतंक से मुक्ति पा लेगी ओर ऐसी परिस्थितियां उत्पन्न करेगी जो नये युग की नई संभावनाओं का अवतरण उद्भव करती चली जायेगी।
यह कार्य जन मानस के परिष्कार द्वारा सम्पन्न होगा। इसी का दूसरा नाम “विचार-क्रान्ति” दिया गया है। लोगों को अभ्यस्त अशुभ चिंतन से विरत होना पड़ेगा और ऐसी अन्तःस्फुरणा से प्रेरित होना पड़ेगा जो दूरदर्शी विवेकशीलता अपनाने के लिए जन जन को बिता करे। क्रिया कलापों, प्रचलन एवं प्रयासों में ऐसे तत्वों का समावेश करे जिसके आधार पर हर क्षेत्र में औचित्य अपनाया जाना दृष्टिगोचर होने लगे। मनः स्थिति ही परिस्थितियों को जन्म देती हे। यदि नये युग का अनुरूप विचार धारा को स्वीकार करने ओर औचित्य को कार्यान्वित करने के लिए उत्साह उमड़ पड़े तो कोई कारण नहीं कि सुखद परिस्थितियों का प्रादुर्भाव संभव हो न सके।
आवश्यकता इस बात कि है कि वर्तमान की विसंगतियों को बदलने ओर सुखद संभावनाओं के चल पड़ने की बात को एक सुनिश्चित संभावना की तरह लोक मानस में प्रतिष्ठित किया जाय। नव सृजन की रूपरेखा जन जन के सम्मुख प्रस्तुत की जाय ओर प्रतिभाओं के अग्रगमन से ऐसा माहौल बनाया जाय कि उसी राजमार्ग पर चल पड़ने की उत्कृष्ट अभिलाषा सर्व साधारण में जग पड़े।
दृष्टिगोचर हो रही अनेक अशुभ संभावनायें अचिन्त्य चिन्तन ओर अवाँछनीय गतिविधियाँ अपनाने से ही उत्पन्न हुई है। यदि इस प्रवाह को बदला जा सके तो उलटे को उलट देने पर सीधा बन जोन की उक्ति सुनिश्चित रूप से चरितार्थ होती दृष्टिगोचर होगी।
नवयुग का शुभारम्भ “इक्कीसवीं सदी बनाम उज्ज्वल भविष्य” के उद्घोष के साथ किया जाना चाहिए। धार्मिक, राजनैतिक, सामाजिक, आन्दोलनों के अपने अपने नारे होते है। समय की आवश्यकता यही है कि सतयुग की वापसी पर विश्वास किया जाय ओर नवसृजन के सर्वतोमुखी प्रयोजन में जुट पड़ने के लिए सर्व साधारण को कटिबद्ध किया जाय। इस महान आन्दोलन का यही प्राणवान उद्घोष होना चाहिए- “इक्कीसवीं सदी बनाम उज्ज्वल भविष्य” यह नारा सर्वत्र अंकित एवं मुखरित होने लगेगा, इस उसका विश्वास दिन-दिन सुदृढ़ होता जाता है।
ईश्वर चन्द्र विद्यासागर कलकत्ता में अध्यापन कार्य करते थे। वेतन का उतना ही अंश घर परिवार के लिए खर्च करते जितने में कि औसत नागरिक स्तर का गुजारा चल जाता। शेष भाग वे दूसरे जरूरतमंदों की, विशेषता छात्रों की सहायता में खर्च कर देते थे। आजीवन उनका यही व्रत रहा। वे गरीबी में पढ़े थे ओर निर्धनों के लिए आवश्यकताएँ पुरी करने में लगा देते। एक दिन वे बाजार में चले जा रहे थे। एक हताश युवक ने भिखारी की तरह उनसे एक पैसा माँगा। विद्यासागर दानी तो थे पर सत्पात्र की परीक्षा किये बिना किसी की ठगी में ने आते। युवक से जबानी में हट्टे कट्टे होते हुए भी भीख माँगने का कारण पूछा। सारी स्थिति जानने पर माँगने का औचित्य लगा। सो एक पैसा तो दे दिया पर उसे रोककर उससे पूछा कि यदि अधिक मिल जाय तो क्या करोगे? युवक ने कहा कि यदि एक रुपया मिल तो उसका सौदा लेकर गलियों में फेरी लगाने लगूंगा ओर अपने परिवार का पोषण करने में स्वावलम्बी हो जाऊंगा।
विद्यासागर ने एक रुपया उसे ओर दे दिया। उसे लेकर उसने छोटा व्यापार आरंभ कर दिया। काम दिन दिन बढ़ने लगा। कुछ दिन में वह बड़ा व्यापारी बन गया।
एक दिन विद्यासागर उस रास्ते से निकल रहे थे कि व्यापारी दुकान से उतरा उनके चरणों में पड़ा ओर दुकान दिखाने ले गया ओर कहा - यह आपका दिया एक रुपया पूंजी का चमत्कार है। विद्यासागर प्रसन्न हुए ओर कहा जिस प्रकार तुमने सहायता प्राप्त करके उन्नति की उसी प्रकार का लाभ अल्प जरूरतमंदों को भी देते रहना। पात्र उपकरण लेकर ही निश्चिंत नहीं हो जाना चाहिए वरन् वैसा ही लाभ अन्य अनेकों को पहुंचाने के लिए समर्थता की स्थिति में स्वयं कभी उदारता बरतनी चाहिए। व्यापारी ने वैसा ही करते रहने का वचन दिया।
प्रकृति का दृश्य एवं परोक्ष लीला जगत ऐसी विलक्षणताओं से भरा पड़ा है जिन्हें देखकर कारण समझ में ने आने पर दांतों तले उँगली दबानी पड़ती है। यही विश्वास सुदृढ़ होने लगता है कि विज्ञान की पहुँच से परे भी कोई विलक्षण सत्ता है जिसके क्रियाकलापों को अभी गहराई से जाना नहीं जा सका। वारमूडा त्रिकोण से तो सब भली−भांति परिचित है जो कि अमरीका के पूर्वी समुद्री हिस्से में स्थिति है, जहाँ अदृश्य, ब्रह्मांडीय चुम्बकीय शक्ति, वस्तु, जलयान, वायुयान को खिंचकर न जाने किस लोक में ले जाती है, जहाँ प्रवेश का कोई लौटकर नहीं आया। इसका अभी तक समाधान खोजा नहीं जा सका कि यह क्या होता है कि इसी बीच भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र से ऐसी ही रहस्यमयी घटनाएँ प्रकाश में आने लगी है।
जटिंगा (आसाम) जो पहाड़ों के बीच घाटियों में स्थित है, पिछले दिनों प्रकाश में समक्ष आत्म हत्या करने वाले पक्षियों की प्रति वर्ष विशिष्ट अवधि में होने वाली घटनाओं के कारण विज्ञान जगत में बहुचर्चित रही है। अनगिनत पंखी रात्रि के अंधेरे में आते है एवं जलते लैम्पों, लालटेनों, बल्ब आदि के सामने गिरकर दम तोड़ देते है, पर कोई समाधान न पा कर वैज्ञानिक मात्र तीर-तुक्का, अटकलें मात्र लगाकर अपना कौतूहल शान्त करते रहे है। अब पश्चिम बंगाल, आसाम, मेघालय, अरुणाचल वाले भारत के पूर्वांचल के इसी क्षेत्र से संबंधित कुछ ओर अद्भुत घटनाएँ प्रकाश में आयी है। वे भी उतनी ही विलक्षण तर्क बुद्धि की सीमा से परे है, जितनी कि वारमूडा त्रिकोण व जटिंगा क्षेत्र की घटनाएँ रही है।
अरुणाचल क्षेत्र में पिछले दिनों एक झील जो स्थानीय लोगों के लिए रहस्यों से भरी है, जन सामान्य की जानकारी में आई। इसके बारे में जनश्रुति है व देख हुआ तथ्य है कि वहाँ पहुँचने वालों में से कोई वापस लौटकर वापस नहीं आत, मनुष्य अथवा पशु-पक्षी ही क्यों न हो?
यह आश्चर्यजनक ओर जीवों को अपना ग्रास बनाने वाली झील अरुणाचल प्रात को चीन के यूनान प्रदेश से जोड़ने वाली स्टिलबसे रोड नामक प्रसिद्ध सड़क से कुछ फासले पर स्थित है जो पनासु के पास बर्मा की सीमा को भी स्पर्श करती है। यहाँ से देखने पर यह झील जो विशाल दलदल है।, घास के बड़े मैदान के रूप में दृष्टिगोचर होती है। इस सुनसान क्षेत्र में एक भी पशु-पक्षी नजर नहीं आत। इस झील का पता तब चला जब द्वितीय विश्वयुद्ध के समय भारत ब्रिटेन तथा जापान के हजारों सैनिक अपने अस्त्र शस्त्रों सहित इस क्षेत्र में पहुँच कर विलुप्त हो गये ओर खोज बीन करने पर उनके पद चिन्ह तक ढूंढ़ने से भी नहीं मिले। हुआ यह था कि सड़क का निर्माण कार्य पूर्ण होते ही जापानियों ने असम पर आधिपत्य करने के उद्देश्य से बर्मा की की सीमा पर भारी सैन्य दल जमा कर लिया था। इधर ब्रिटिश सरकार ने इस आक्रमण को असफल बना देने की ठान रखी थी ओर अवसर पाते ही स्टिलबेस रोड से अंग्रेज ओर भारतीयों की मिलीजुली कई सैन्य बटालियनों को चीन ओर बर्मा की ओर भेज दिया। उधर से हार जीत का जब कोई संदेश न मिला तो ओर अधिक संख्या में सैन्य दल रवाना किया गया। परन्तु तब आश्चर्य का ठिकाना न रहा जब उनमें से एक भी जीवित व्यक्ति ने तो गन्तव्य स्थल पर पहुँचा ओर नहीं वापस लौटा। अधिकारियों ने बहुत ढूंढ़ खोज की तो पाया गया कि सभी सैनिक पनासु तक अवश्य पहुँची थी पर इसके आगे उनका क्या हुआ? वे कहाँ अदृश्य हो गये? इसका पता नहीं चल सका।
यही हश्र जापानी सैनिकों का भी हुआ। असम को जीतने का सपना लिए भारी तादाद में उनका सैन्य दल भारत की ओर बढ़ रहा था। रास्ते उनका प्रतिरोध करने वाला भी कोई नहीं था। अतः वे उसी सड़क से आगे बढ़ते गये। परन्तु यह क्या? जैसे ही वे उस दलदली झील के निकट पहुँचे। सभी को झील निगल गयी। जापान की कई सैन्य टुकड़ियां आई ओर आगे बढ़ने के प्रयास में झील में समाती चली गई।
आरम्भ में दोनों ही पक्षों को यह ज्ञात नहीं हो सका था कि उनके सैनिक कहाँ गायब हो जाते है? जब खोजी दलों ने गहन सर्वेक्षण किया तो मात्र इतना ही जाना जा सका कि पनासु सीमा तक दोनों ओर की सेनाएँ पहुँची थी पर आगे रहस्यमयी दलदल झील में जन जाने कहाँ खो गई? हवाई सर्वेक्षणकर्ताओं ने उस क्षेत्र के फोटो चित्र लेने के लिए अपने कैमरे संभाले ओर अनेकों बार उसे क्लिक भी किया। रील धुलकर जब आई तो पाया गया कि उस क्षेत्र के किसी भी कोने का कोई अंश उभरकर नहीं आया। चित्र खींचने के सभी प्रयास असफल रहे। कुछ अन्वेषकों का कहना है कि वह दलदल नहीं अपितु घास की सघन सतह से ढंका एक विशाल गढ्ढा है, तो कुछ उस क्षेत्र को अंतरिक्ष वासियों का एक सुरक्षित अड्डा मानते है जिसकी सुरक्षा व्यवस्था कुछ इस प्रकार से की जाती है कि वहाँ मनुष्य तो क्या परिंदे भी पास नहीं फटक पाते ओर यदि उस वर्जित क्षेत्र में किसी प्रकार प्रविष्ट कर ही जाएँ तो जीवित नहीं बचते। गायब हो जाते है। दलदल होने पर यह दलील तो समझ में आती है कि उसमें जाने अनजाने लोग पैर रख कर विलुप्त हो जाते है। पर पक्षियों का न होना, उस क्षेत्र का निर्जन होना, समझ में नहीं आता। कारण जो भी हो, आने को बुद्धिमान कहने ओर प्रकृति को वश में कर लेने का दम भरने वाला मनुष्य अभी तक उस प्राकृतिक झील का रहस्य समझ सकने में समर्थ नहीं हो सका। कोई भी वैज्ञानिक सर्वेक्षणकर्ता या अभियान दल अभी भी उस क्षेत्र में प्रवेश करने का साहस नहीं जुटा पाता।
इसी तरह की कुछ रहस्यमयी झीलें विश्व के अन्यान्य भागों में भी पायी गयी है। वेस्टइंडीज के त्रिनिडाड द्वीप में एक ऐसी झील है जिसमें निर्मल जल की जगह तारकोल भरा हुआ है। यह पदार्थ सर्वत्र समान रूप से एक जैसा स्वरूप वाला न हो कर कही ठोस रूप में है तो कही तरल रूप में। कहीं कहीं इसमें बड़े बड़े बुलबुले उठते रहते है। इसमें भरे पदार्थ के आधार पर ही झील का नाम “तारकोल झील” पड़ गया। अमेरिका के रेगिस्तानी साबुन की झील कहते है। इसमें वस्त्र धोने पर उनमें उतनी चमक नहीं आती जितना कि सामान्य साबुन या वाशिंग सोडे से धोने पर। फिर भी उसमें उठने वाला झाग मानव निर्मित सभी डिटरजेंट साबुनों की अपेक्षा कही ज्यादा बना रहता है। हवाई द्वीप में एक आग की झील भी है जिससे सतत आग की लपटें ओर धुंआ बाहर निकलता रहता है। पर इन सबसे अद्भुत प्राकृतिक करिश्मा है - आयरलैण्ड की अनोखी -”पत्थर की झील” वैज्ञानिकों का कहना है कि उसमें जो भी वस्तु फेंकी या डाली जाती है वह पत्थर बन जाती है। विश्लेषण करने पर मात्र इतना ही ज्ञात हो सका है। कि उक्त झील में किसी भी पदार्थ की परत जम जाती हे। साथ ही अन्दर से भी वह वस्तु बहुत कुछ परिवर्तित हो जाती है। परन्तु ऐसा क्यों होता है? वैज्ञानिक इस रहस्य को अभी तक नहीं समझ पाये है। हिमालय के उत्तराखण्ड क्षेत्र में भी काफी ऊंचाई पर ऐसी अविज्ञात झीलें है जो रहस्यों के घेरे में है।
बादलों के टकराने-बिजली चमकने अथवा भूकम्प आने वे पूर्व तीव्र गर्जना की ध्वनि सुनाई देती है। इनसे उत्पन्न ध्वनि तरंगों को “शाँकवेव्स” के नाम से जाना जाता है, जिनके प्रघात से प्रतिवर्ष सहस्त्रों लोग अपनी जान गवाँ बैठते है। तोपों की गड़गड़ाहट एवं जेट विमानों का शोर भी मनुष्य द्वारा जान पहचाना है। किन्तु कभी कभी प्रकृति क अन्तराल से अथवा निर्मूल शून्य आकाश में उत्पन्न होने वाली विचित्र ध्वनियां या गड़गड़ाहट सुनाई देती है जिनका हम सही अर्थ नहीं समझ पाते। पश्चिम बंगाल के सुन्दरवाल से सटे बारीसाल क्षेत्र में सदियों से धाँय-धाँय के विस्फोट वहाँ के निवासी सुनते आ रहे हे। परन्तु इस की विस्तृत जानकारी लोगों को तब मिली जब सन् 1926 में अंग्रेज वैज्ञानिक जी.बी. स्काट ने उस क्षेत्र का दौरा किया और उस प्राकृतिक रहस्य का विवरण “नेचर “ नाम प्रसिद्ध आँग्ल विज्ञान पत्रिका में प्रकाशित किया।
जी.बी. स्काट के अनुसार उस वक्त उस क्षेत्र में न तो कोई सैनिक छावनी थी, न दूर कही कोई सैनिक अभ्यास हो रहा था ओर नहीं लोगों के पास बन्दूक या तोपें थी, फिर भी तोप दागने की आवाज बराबर स्पष्ट सुनाई दे रही थी। उस समय रात को या दिन में कोई बादल भी नहीं थे। आसमान साफ था परन्तु यह स्पष्ट नहीं हो सका था परन्तु स्पष्ट नहीं हो सका कि धाँय धाँय की इस गर्जना भरी आवाज का मुख्य स्त्रोत क्या है? यह ध्वनियाँ किसी स्थान विशेष से उत्पन्न न होकर जहाँ तहाँ कहीं से भी फूट पड़ती है। इस संबंध में ख्यातिलब्ध वैज्ञानिक ए.जी. इन्गलेस का कहना है कि इस प्रकार के रहस्यपूर्ण “एअरक्वेक” की दिशाएँ बदलती रहती है, जिस तरह इन्द्र-धनुष का मूल दिखता कहीं है ओर होता कहीं है। स्थान परिवर्तन के साथ ही दर्शक को दृश्य परिवर्तन का आभास जिस तरह उनमें होता हे, उसी तरह आवाजें भी दिशाओं में परिवर्तन करती अनुभव होती है। वानडेन ब्रुक जैसे वैज्ञानिकों का मत है कि वायुमण्डल में एक विशेष प्रकार के विद्युत प्रसार के एकत्र होने से इस तरह के वायु विस्फोट हो सकते है।
अमेरिका के अटलांटिक के उत्तर पूर्व में भी अस तरह की -”बुर्मीग-धाँय-धाँय करने वाली आवाजें सुनी गई है। सर्व प्रथम सन् 1988 में जब ऐसे विस्फोट सुने गये तो एकाएक लोगों को विश्वास नहीं हुआ कि शून्य आकाश भी बिना बादलों के कभी गरज सकता है। पर्यवेक्षणकर्ताओं ने बताया कि उस मसय उक्त क्षेत्र में न तोपें चली थी और नहीं काकर्ड जेट विमान ही उड़े थे। कुछ वैज्ञानिकों ने इसे विशिष्ट प्रकार की हवा के घनत्व ओर तापमान के कारण उत्पन्न होने वाली सामान्य गड़गड़ाहट बताया ओर उसकी तुलना मृगमरीचिका से करते हुए इसे पवन मरीचिका नाम दिया है।
ये घटनाक्रम सतत घटित होते हरते है, पर कोई विज्ञान सम्मत कारण न मिलने पर अविज्ञात के गर्भ में छिपे पड़े रहते है। खोजी अन्वेषक सतत प्रयासरत है कि इन घटनाओं के मूल कारण को जाना जाय। यह प्रयास सराहनीय है व ये रहस्य मानवी जिजीविषा को एक चुनौती है। फिर भी एक तथ्य तो स्पष्ट है कि कि विराट के एक घटक प्रकृति को अभी पुरी तरह जान पाना सम्भव नहीं हो पाया है। यही हमें उस सत्ता के दर्शन होते है, जिसे अचिंत्य, अगोचर, अगम्य कहा गया है। परब्रह्म की सत्ता को इस रूप में भी मानते हुए आस्तिकता की अपनी मान्यताओं को परिपुष्ट परिपक्व बनाया जा सकता है। यह अंध विश्वास नहीं, वरन् जो कुछ दृश्यमान सत्य है, उसकी अनुभूति है कि यह सब उस परमसत्ता की विनिर्मित रचनाएँ है। जिसे हम आँखों से नहीं देख पाते। इसी भावना को आधार बनाकर रहस्यों की बारीकी में भी जा पाना सम्भव है।
एक व्यक्ति सर्व सुखी बनना चाहता था। इस कामना पूर्ति के लिए किसी पहुँचे हुए सिद्ध महात्मा के पास पहुँचा। महात्मा ने उसका मनोरथ जाना ओर कहा- इसके लिए एक छोटा सा काम करना पड़ेगा कि किसी सर्व सुखी व्यक्ति का पहना हुआ छोटा सा कपड़ा ले आओ। बात साधारण थी। इस खोजबीन में वह निकल पड़ा। असंख्यों से मिला। कई वर्ष बीत गये। पर सर्व सुखी कोई न मिला। हर किसी को कोई न कोई असंतोष, अभाव कष्ट घेरे हुए था।
जब वह निराश होकर वापस लौटने को ही था, तो एक अलमस्त अबुधत मिला। उसके पास मात्र एक कोपीन थी। उसने अपने का सर्व सुखी तो बताया पर वस्त्र देने से इन्कार कर दिया। कोपीन दे नहीं सकता था ओर इसके अतिरिक्त ओर कुछ उसके पास नहीं था।
कामनाग्रस्त कई वर्ष सुखी का कपड़ा खोजने में लगा रहा और अन्त में निराश होकर उन्हीं सन्त के पास पहुँचा।
महात्मा ने उसे पास बिठाया ओर समझाते हुए कहा बेटा, संसार में कोई शरीरधारी सुखी नहीं है। कामनाग्रस्त हो तो कुछ न कुछ अभाव संकट बने ही रहते हैं। निष्काम लोग ही सुखी रह सकते हैं पर वह स्थिति तब आती है जब लोभ, मोह और अहंकार का परित्याग कर दिया जाता है।
आँखों से प्रकृति पदार्थ दीखता है। इंद्रियों द्वारा भी वही अनुभव किये जाते है। ईश्वर चेतना है। वह निराकार होती है। साकार तो उसका कलेवर भर दीखता है। ईश्वर का दृश्य स्वरूप यह विराट ब्रह्माण्ड है। अर्जुन, यशोदा, काकभुशुण्डि, कौशल्या आदि का मान जब ईश्वर दर्शन के लिए व्याकुल हुआ तो उन्हें इसी रूप में दिव्य दर्शन कराये गये। इसके लिए दिव्य नेत्र दिये गये। कारण कि चर्म चक्षुओं से तो विराट् विश्व को एक बारगी नहीं देखा जा सकता। आँखों की देख सकने की परिधि तो बहुत छोटी है। फिर सुविस्तृत कैसे देखा जाये।
जिन्हें पूर्व कथानकों के अनुरूप दर्शन ही भक्ति भावना की सफलता का आधार दिखाई पड़ता है। उनके लिए प्रतिमा प्रतीकों का निर्धारण किया गया, यह प्रतिमाएँ भी मनुष्य क अपने कलेवर में नर या नारी जैसी होती है। जब व्यापक चेतना की सत्ता तो सभी प्राणियों में समान रूप से विद्यमान है। मात्र शरीरधारी आकार ही चाहिए तो फिर भगवान की आकृति किसी भी प्राणी के रूप में हो सकती है। पर यह परिकल्पना रास नहीं आती आरे मनुष्य शरीर अपना अभ्यास होने के कारण अधिक मनभावन प्रतीत होता है। इसलिए प्रतिमाओं में मनुष्याकृति को ही प्रमुखता दी गयी है। यों तत्वदर्शियों ने मत्स्य, कूर्म, वाराह, नृसिंह आदि को भी भगवान के अवतार ही बताकर प्राणी मात्र में दिव्य सत्ता का दर्शन करने का संकेत दिया है। पर वह प्रतीक सब में प्रतिष्ठित न हो सकीं।
देवी देवताओं के वाहनों के रूप में पशु पक्षियों का चित्रण किया गया है ओर समझने का प्रयत्न हुआ कि प्राणी मात्र में भी देव सत्ता का आधार टिका हुआ माना जा सकता है। पर वह भी सम्मानास्पद रही बन सका, इष्ट देव का स्थान न पा सका चित्रों म प्रतिमाओं में देवी देवताओं का वाहन पशु पक्षी है तो पर उन्हें सेवक भर की मान्यता मिल सकी। आराध्य पद व न पा सके। यद्यपि निर्धारण कर्ताओं का अभिप्राय यही था कि प्राणिमात्र में ईश्वर की झाँकी की जाय ओर उनके साथी भी वैसा ही व्यवहार किया जाय जैसा कि दिव्य संरचना के हर घटक के साथ किया जाना उचित है। शिव का नन्दी, सरस्वती का रस, लक्ष्मी का हाथी, दुर्गा का सिंह तो प्राय चित्रण में आते ह। पर नवग्रहों तथा अन्य देव समुदाय के वाहनों की उपेक्षा होती है। भैरव के वाहन कुत्ते को, शीतला के वाहन गधे को कौन पूछता है? कौन पूजता है?
भगवान की प्रतिमा एवं उनके प्रतीक मानने में भी निर्माताओं ने अपने मनोनुरूप ही उनकी आकृति का विनिर्मित किया है। दक्षिणी भारत की, उत्तर भारत की, असम, मणिपुर, की देव प्रतिमा वहाँ के निवासियों जैसे चेहरे की होती है, इससे स्पष्ट है कि ईश्वर की कोई नियम छवि नहीं है। वह भक्तजनों की मान्यता के अनुरूप बनी बदलती रहती हे। कृष्ण, शिव आदि के स्वरूप किशोरियां नव यौवन वाली वय के है यदि वे सचमुच मनुष्य आकृति में विकसित हुए होते तो उनका शरीर बाल किशोरों वृद्धों जैसा भी देखने को मिलता। पर ऐसा कही देखा नहीं जाता था वैसे चित्र ही मिलते हैं ओर न मूर्तियां ही इससे स्पष्ट है कि प्रतिमाएं अथवा तस्वीरें ईश्वर के वास्तविक स्वरूप की नहीं है, वरन् उन्हें साधकों ने अपनी प्रिय परिस्थिति के अनुरूप गढ़ा है। उन्हें वस्तु स्थिति का परिचायक नहीं माना जाना चाहिए।
भगवान को या देवताओं को, विशिष्टता ओर विचित्रता युक्त प्रतिपादित करने के पीछे भी संभवतः यही भाव रहा होगा कि उन्हें सामान्य जनों की तुलना में अधिक महत्ता देकर मान्यता दी जाय। उनकी विचित्रता ध्यान धारणा को अधिक आकर्षित करती रहे। ब्रह्मा के चार मुख विष्णु के चार हाथ दुर्गा के अनेक मुख ओर अनेक .... अपनी अपनी अभिरुचित एवं परिकल्पना है या जिनने आकृतियों के झंझट से बचना चाहा है उनने शिवलिंग या शालिग्राम जैसे सरलता पूर्वक सरिता व समुद्रतटीय क्षेत्रों में मिलने वाले गोल आकार वाले पत्थरों को ही भगवान के रूप में प्रतिष्ठित कर लिया है। इसमें उन्हें सरलता प्रतीत हुई ओर बिना भाग दौड़ के प्रतिमा मिल गई। कही कही तो गोबर से गोवर्धन भगवान की प्रतिमा बन गई। यह भक्तजनों की अपनी भावना का प्रतिबिम्ब है।
फिर ईश्वर दर्शन का लाभ, जो वास्तविक रूप में प्राप्त करना चाहता है उन्हें क्या सोचना ओर क्या करना चाहिए? इस प्रश्न के उत्तर में एक ही बात की जा सकती है कि ईश्वर का बसने का निकटवर्ती स्थान अपना अन्त करण समझना चाहिए। उसमें दिव्य संवेदना का उभार जब भी उभरे तब समझना चाहिए कि उतनी मात्रा में दिव्य चेतना का अवतरण आत्मसत्ता में हो रहा है। चेतना में जो उत्कृष्ट आदर्श वादिता के उभार है। उन्हीं से मनुष्य को परब्रह्म की अनुभूति हो सकती है।
क्रौंच पंखी के अवतरण को सुनकर जब अन्त करण की करुणा जागी तो महर्षि बाल्मीकि आदि कवि बन गये ओर उनकी लेखनी से अजस्र काव्य धारा प्रवाहित हो चली। इसी प्रकार की उच्च स्तरीय संवेदनाएँ जब भी उभरती हे। तब अपने ही अंतराल में भगवान का आँशिक अवतरण हुआ समझा जा सकता है।जब वे सद्भावनायें क्रिया रूप में परिणित होने के लिए मचल पड़े, लोभी मोह के बन्धनों से बँधने में इनकार करने लगें तो समझना चाहिए दिव्य अनुकम्पा का आवेश आत्म चेतना पर अपना अनुग्रह बरसाने लगा ऋषि व देवों में महामानव प्रायः प्रायः दिव्य प्रेरणाओं से अनुप्राणित ही कर ऐसा आदर्श उपस्थित करते है जिससे असंख्यों को उत्कृष्टता की दिशा में अग्रगमन कर सकने का प्रकाश एवं साहस उपलब्ध हो सके। इस प्रकार के महामानवों के यदि ईश्वरीय प्रकार का उपलब्ध-कर्ता माना जाय तो इसमें कुछ भी अत्युक्ति न होगी।
शक्तियाँ सदा निराकार होती है। पवन का आकार कहाँ है? पर वह जब अंधड़ के साथ हुड़ जाता है। तो आँधी ही वायु के रूप में दर्शन देती है।
शब्द निराकार है जब जिह्वा, होंठ कर आदि के माध्यम से वाणी मुखर होती हो तो उन अंगों का परिचालन वाणी का साकार स्वरूप दीख पड़ता है। वाद्य यंत्र भी ध्वनि के उद्गम के रूप में दृष्टिगोचर होते है। कई बार तो वाद्य यंत्र ओर ध्वनि प्रवाह को पृथक करना तक समझ के लिए कठिन पड़ता है। इसीलिए उच्च उद्देश्यों में निरस्त महामानवों को भी बहुधा अवतार की, भगवान की संज्ञा दी जाने लगती है। श्रेष्ठ अभाव सम्वेदनाओं की तरह ही आदर्शवादी क्रिया कलाप भी दैवी अनुग्रह से गतिशील हुए माने जाने लगते है। जब प्रतिमाओं ओर तस्वीरों को भगवान का प्रतीक माना जाता है। तो भगवत् उद्देश्यों के लिए समर्पित आत्माओं के प्रति भी श्रद्धा क्यों न संजोई जाय? प्रतीक पूजन में इतना ही तथ्य है कि प्रतिमाओं को आधार तथा मनोनुरूप माध्यम बना कर उस निराकार सत्ता के प्रति सघनता भर स्थापित की जाती है। जो सर्वव्यापी, न्यायकारी एवं उत्कृष्टता का पक्षधर है।
प्रतिष्ठा उन कामों में नहीं जिनसे हम प्रख्यात होते है, वरन् उनसे है जो हमारे स्वभाव की नम्रता में है।
जन्म से लेकर मृत्यु तक जीवनधारियों विशेषकर मानव जीवन में एक लयबद्ध चक्रीय परिवर्तन सतत होता रहता है। विज्ञान की भाषा में इसे “बोयारिट्म” के नाम से जाना जाता है। यह वह जैविक गतिविधि या हलचल है, जो एक निश्चित अन्तराल के पश्चात् प्रकट होती रहती है, आरे शारीरिक, मानसिक एवं व्यावहारिक जीवन को प्रभावित करती है। कास्मिक किरणों, ग्रह गोलकों, सूर्य धब्बों एवं सौर गति तथा चन्द्रमा की स्थिति के अनुसार भी “बायोरिट्म” की आवर्ती दशा में सतत परिवर्तन होता रहता है। व्यक्ति की उम्र, लिंग एवं जीवन-मरण के साथ भी इसका गहरा सम्बंध है।
“एन साइक्लोपिडियाँ ऑफ एसोटेरिक मैन” नामक पुस्तक में मनीषी बेंजामिन वाकर ने कहा कि यह सर्वविदित तथ्य है कि मान जीवन में एक निश्चित लयबद्ध उतार चढ़ाव आता रहता है। जो शारीरिक-मानसिक क्रिया कलापों को प्रभावित करता है। इस प्रकार की लय कुछ क्षणों माइक्रो सेकेंड से लेकर वर्षों तक चलती रह सकती है। ओर ध्यान न देने पर जीवन को संकट में भी डाल सकती है। दिन प्रतिदिन के जीवन में होने वालने परिवर्तनों को गहराई से निरीक्षण न करने के कारण ही प्रायः लोग खीजते ओर परेशान रहते हे। यदि “बायोरिट्स” को समझा जा सके ता न केवल जीवन में आने वाले उतार-चढ़ावों को .... नियमित किया जा सकता है। वरन् उनसे होने वाली हानियों से भी बचा जा सकता ह। इस तथ्य को सितम्बर 1989 के “अमेरिकन जनरल ऑफ साइकियेट्री” नामक पत्रिका में विन्स्टेड, स्बार्ज, बट्रेन्ड जैसे ख्यातिलब्ध फैक्ट्स “अरि सुपर स्टिशन” नामक खोजपूर्ण लेख में उद्घाटित किया है।
“बायोरिट्म” वस्तुतः एक व्यक्ति परक विज्ञान है जो जीवन के चक्रीय लक्षणों को प्रकट करता है। अमेरिका के वरिष्ठ अनुसंधानकर्ता वैज्ञानिक बर्नार्ड गटेल्सन ने अपनी पुस्तक “बायोरिट्म” में कहा है कि हममें से सभी लोग तीन आन्तरिक चक्रों (इन्टरनल साइकल्स) द्वारा जीवन पर्यन्त प्रभावित होते रहते है। ये चक्र है - फिजिकल साइकल (शरीर चक्र) इमोशनल साइकल (भावनात्मक चक्र) एवं इन्टलेक्चुअल साइकल अर्थात् बौद्धिक चक्र। मनुष्य का स्वभाव इन्हीं तीन चक्रों का मिला जुला स्वरूप होता है। इस सिद्धांत के अनुसार फिजिकल चक्र शरीर के बहुत बड़े क्षेत्र को प्रभावित करता है, जिसमें काया की रोग प्रतिरोधी क्षमता, शक्ति, समन्वय, गति, कार्यिकी आदि प्रक्रियाएं सम्मिलित हैं। इस चक्र को पूर्ण होने में 23 दिन लगते है। यह तीनों चक्र बारी-बारी से एकान्तर क्रम से अथवा एक साथ भी चलते रह सकते है। मनुष्य जन्म के साथ ही यह आरम्भ हो जाते है। आरम्भ में यह जीरो बसेलाईन पर अर्थात् नगण्य प्रभाव वाले होते है। परन्तु मध्यकाल में अर्थात् साढ़े ग्यारह दिन 24 दिन ओर साढ़े सोलह दिन में क्रमशः तीनों चक्र अपने निम्न स्तर पर आ जाते हे। ऊर्जा की अधिकता प्रत्येक चक्र के अन्तिम चरण में होती है।
विशेषज्ञों के अनुसार जीवन चक्र (बायोरिट्म) मानव व्यवहार की एक विशेष तरीके से प्रभावित करता है। वैज्ञानिक बर्नार्ड गिटेल्सन का कहना है कि किसी व्यक्ति को उस समय सबसे अधिक खतरा रहता है, जब वह एक फेज से दूसरे फेज में अर्थात् पॉजेटिव से निगेटिव में प्रवेश करता है। इन्हें किट्रिकलडे - संकटपूर्ण कि दिन कहा गया है। उनके अनुसार मनुष्य के जीवन में प्रायः इस तरह के 20 प्रतिशत दिन आते है, शेष 70 प्रतिशत मिश्रित प्रक्रिया वाले होते हैं। उस दिन मनुष्य शारीरिक रूप से दुर्घटनाओं, बीमारियों आदि का शिकार बन सकता है। भावनात्मक रूप से असंतुलित मनः स्थिति के कारण अकारण लड़ाई- झगड़ा मोल ले सकता है। अथवा तनाव, दबाव, खीज आदि से ग्रस्त हो सकता है। बौद्धिक रूप से स्मरण शक्ति में कमी, किसी बात को सुस्पष्ट करने में असमर्थता, निर्णय लेने में गलती करने जैसी कमजोरियों का उसे सामना करना पड़ सकता है। अपनी “बायोरिट्म” का क्रमबद्ध अध्ययन करके कोई भी व्यक्ति उपरोक्त संकटों को टाल सकता है। जीवन को व्यवस्थित बनाकर उन पर नियंत्रण साधा जा सकता है। “बायोदिम “ का रिकार्ड रखने पर यह सहज ही मालूम किया जा सकता है कि भौतिक, भावनात्मक एवं बौद्धिक चक्रों में से कोन चक्र अपनी चरम अवस्था में है ओर उनसे उबरने अथवा उनका लाभ उठाने के लिए कितनी शक्ति सँजोनी होगी ओर कि न उपयोग को अपनाना होगा। शिकागो के मूर्धन्य चिकित्सा विज्ञानी डा0 अनेटीलाटर एवं स्विट्जरलैंड के डा0 फ्रिटज वेहरिल का कहना है कि अपनी बायोरिदम् का अध्ययन नियमित चार्ट के आधार पर करके समय विशेष में आने वाली कठिनाइयों का समाधान हर व्यक्ति स्वयं खोज सकता है। औद्योगिक जगत में काम करने वालों के लिए इस प्रकार का अध्ययन महत्वपूर्ण भूमिका संपन्न कर सकता है।
इस संदर्भ में जापानी चिकित्सा विदों के साथ मिलकर वहाँ के मिलिट्री पुलिस अधिकारियों ने गहन अनुसंधान किया है ओर बताया है कि 42 प्रतिशत वाहन दुर्घटनाएँ चालक के (संकट कालीन) “किट्रिकलडे में होती है। इसी प्रकार का निष्कर्ष टोकियो मेट्रोपोलिटन पुलिस का है। उसने अपने अध्ययन में पता लगाया है कि 82 प्रतिशत दुर्घटनाएँ ऐन मौके पर रही निर्णय ने ले पाने के कारण घटित होती है। उनके अनुसार वस्तुतः यह समय वाहन चालकों के जीवन चक्र का क्राँतिक बिन्दु होता है। जिसमें मनः संतुलन डगमगा जाता है। आस्ट्रेलिया केक्वीन्सलैण्ड के विशेषज्ञों का भी यही मत है कि वाहन दुर्घटनाओं के शिकार अधिकाँश व्यक्ति उस समय अपने “बोयारिद्म” के ऋणात्मक -धनात्मक चक्र के भंवर में फँसे रहते है। किसी प्रकार यदि इस संकट कालीन क्षण से वे उबर सके तो कुछ ही समय पश्चात् बेहतर निर्णय लेने की स्थिति में पहुँच सकते है। वायुयान दुर्घटना में याँत्रिक कमियाँ जितनी जिम्मेदार होती है, उससे कही अधिक गड़बड़ी उसे उड़ाने वाले चालकों की असंतुलित मनः स्थिति होती है। यू0एस॰ आर्मी एविएशन स्कूल के विशेषज्ञों ने जब इस प्रकार की जाँच पड़ताल की तो पाया कि 42 प्रतिशत या आधी वायु दुर्घटना चालकों के संकट कालीन दिनों में ही घटित हुई थी। इस प्रकार की अनेकों घटनाएँ है जिनकी संगति मनुष्य के “बोयारिद्म” से बैठती है। इसका अर्थ यह नहीं लिया जाना चाहिए कि व्यक्ति अपनी गलती के लिए “बायोरिद्म” को जिम्मेदार ठहरा दे व स्वयं को निर्दोष कहे।
न्यूयार्क के प्रसिद्ध मनोविज्ञानी प्रोफेसर-डोनाल्ड ई॰ कार्लवर्ट ने गहन अध्ययन के पश्चात् यह निष्कर्ष निकाला कि कर्मचारियों के “बायोरिद्म” से संबंधित संकटकालीन दिन ओर दुर्घटनाओं में गहरा संबंध है। “क्रिटिकलफेज” ज्ञात होने पर उस संकट को टाला जा सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि 25 सितम्बर 1989 को डियागो गार्सिया में पी.एस.ए. 727 नामक एक वायुयान 240 व्यक्तियों सहित इसलिए दुर्घटना ग्रस्त हो गया था कि उसका पायलट डेवटि बोस- भौतिक एवं भावनात्मक चक्रों के क्रिटिकल फेज में था। कई बार चेतावनी देने का भी उस पर कोई असर नहीं पड़ा। अपने आपको सँभालने में वह असमर्थ बना रहा। “बायोरिद्म ए साइन्टिफिक एक्सप्लोरशन इन टू दी लाइफ साइकल्स ऑफ दी इन्डिविजुअल्स” नामक अपनी कृति में अमेरिका के प्रख्यात मनोविज्ञानी जे.एच. वेनली ने बता है कि “साइकोलॉजिकल बाडी चार्टिग” द्वारा किसी भी व्यक्ति के “बायोरिद्म” को मापा जा सकता है। मूड एवं भावनाओं में आये उतार-चढ़ाव का अध्ययन कर तदनुरूप उनका निराकरण किया ओर गतिविधियों का नियंत्रित का जा सकता है। उनके अनुसार जापान की ओमी रेलवे कम्पनी ने अपने 500 वाहन चालकों में से प्रत्येक के “बायोरिद्म” चार्ट का कम्प्यूटर में भर लिया है जिस दिन उनके बुरे दिन आने वाले होते है, उन्हें सूचित एवं सतर्क कर दिया जाता है। साथ ही अतिरिक्त सावधानी बरतने को कहा जाता है। इस युक्ति द्वारा कितने ही चालक अपने स्वभाव, मूड, व्यवहार, भावातिरेक में परिवर्तन करते ओर दुर्घटनाओं का शिकार होने से बच जाते है। सन् 1969 में जब इस प्रयोग को सर्व प्रथम क्रियान्वित किया गया तो पर्यवेक्षण करने पर सड़क दुर्घटनाओं में 50 प्रतिशत की कमी पायी गयी। इंग्लैंड के माटिघंम शायर में टाउन काउंसिल द्वारा वहाँ के प्रत्येक नागरिक को उसके “बायोरिद्म” चार्ट उपलब्ध कराये गये है। इससे सड़क दुर्घटनाओं को कम करने में भारी सफलता मिली है। रूस में इस समय पाँच हजार से अधिक वाहन चालक “बायोरिद्म” का प्रयोग कर रहे है। संभावित तिथियाँ ज्ञात होने पर उन दिनों विशेष सतर्कता ही नहीं बरतते बायोफीड बैंक पद्धति द्वारा अपनी प्रतिरोधी क्षमता बढ़ाते है।
बर्लिन के ख्यातिलब्ध - शल्य चिकित्सक डा0 बरनर आँबेल “बायोरिद्म” के विशेषज्ञ माने जाते है। उनका कहना है कि रोगी के “बायोरिद्म” के अनुसार उसका ऑपरेशन करने पर शत् प्रतिशत सफलता मिलती है। इससे न तो उस पर एनस्थेशिया का दुष्प्रभाव पड़ता है ओर न रक्त ही अधिक बहता है।”बायोरिद्म” की जानकारी रखने से मात्र रोगी व्यक्ति को ही लाभ पहुँचता वरन् स्वस्थ व्यक्ति भी यदि अपने जीवन चक्र का क्रमबद्ध चार्ट बनाकर रखे तो उससे उन्हें प्रगति पथ में अग्रसर होने में भारी सहायता मिल सकती है। डा0 बरनर के अनुसार हमारे शरीर का तापमान प्रातः काल सबसे कम होता है। यदि उस समय गहरा चिंतन किया जाय तो ज्ञान विज्ञान के सर्वथा नये ओर उच्चस्तरीय आयाम खुल सकते है। इसी तरह क्रमशः जैसे-जैसे शरीर का ताप दिनमान के साथ बढ़ता जाता है ओर 2 से 40 सेंटीग्रेड तक अधिक हो जाता है। तो उस वक्त शारीरिक ऊर्जा की क्रियाशीलता बढ़ी-चढ़ी होती है। उस समय शारीरिक श्रम का सर्वोत्तम सदुपयोग हो सकता है। सबसे अधिक मेहनत का काम उस समय किया जाय तो स्वास्थ्य एवं उपार्जन दोनों ही दृष्टि से लाभकारी सिद्ध होता है। सर्वोत्तम मेहनत का काम सर्वाधिक तापमान पर होता हे। भारतीय मनीषियों को इसकी जानकारी वस्तुतः प्राचीन काल से ही थीं। यही कारण है कि प्रातः कालीन
समय को उन्होंने चिन्तन-मनन के लिए उपासना साधना के लिए उपयुक्त बताया है। ओर परिश्रम के लिए उपार्जन के लिए लोक आराधना के लिए पुरे दिन को रखा है।
मनुष्य जैसे विकसित एवं जटिल जीवन में वस्तुतः अनेकानेक सूक्ष्म एवं विस्तृत जैविक चक्र चलते रहते है। “बायोरिद्म” उनमें से एक है जिस पर गहन अनुसंधान किये जाने की आवश्यकता हे। इस लयात्मक चक्र का शरीर, मन, एवं भावनाओं से गहरा संबंध है। यदि इसे जाना, समझा ओर उस पर नियंत्रण साधा जा सके तो केवल स्वास्थ्य एवं जीवन की रक्षा की जा सकती है। वरन् ज्ञान- विज्ञान के महत्तर आयामों को भी हस्तगत किया जाना संभव हो सकता है।
एक रास्ता बड़ा कटीला था। उसमें कंकड़ भी बिऐ थे। जो उस पर चलता उसके पैर लहूलुहान हो जाते।
एक व्यक्ति ने उन काँटों ओर कंकड़ों को बीनना प्रारम्भ किया। रास्ता बहुत लम्बा था। फिर नये काँटे ओर कंकड़ उभार आते थे। उसके इस श्रम को देख कर किसी समझदार ने कहा, इस रास्ते वर चलने वाले को जुते पहनने चाहिए। कांटों रहित रास्ता बन सकना कठिन है।
संसार में विग्रह कांटों की तरह है। उन्हें हटाया नहीं जा सकता हम अपने व्यक्तित्व को गुण,कर्म, स्वभाव को ही ऐसा बना सकते है कि किसी अड़चन से परास्त न होना पड़े।
जिन्होंने सत्य को जीवन में उतारा है, आचरण में ढाला है उन्हीं के कार्य सफल हुए है। जिन्होंने जीवन भर अहिंसा व्रत का आचरण किया है। ऐसे लोग बैरभाव छोड़ देते है। जीवन में अस्तेय का व्रत जिन्होंने लिया है उन्हें धनाभाव कभी नहीं रहा जिस प्रकार ब्रह्मचारी का वीर्यवान बनना आवश्यक है उसी प्रकार सत्याचरण अपनाने वाले का ओजस्वी, तेजस्वी, मनस्वी होना स्वाभाविक है।
कहा गया है कि सत्य में हजार हाथियों के बराबर बल होता है। शास्त्र वचन है कि सत्य ही जीतता है असत्य नहीं। प्रतिफल मिलने में देर हो सकती है पर ऐसा नहीं है कि उत्कृष्ट आचरण अपनाने वाले को हेय स्थिति में पड़ा रहना पड़े।
सत्य बोलना, सत्य आचरण करना ओर प्रत्येक कार्य को सत्य की कसौटी पर कसकर करना ये तीनों बातें भिन्न है। सत्य बोलना आसान है। ओर कितने ही लोग प्रतिदिन सत्य बोलते है किन्तु आचरण सत्य से भिन्न होने के कारण उनके जीवन में कोई न कोई फल मिलता है न कोई सत्य को कोई चमत्कार उनके जीवन में उन्हें दिखाई देता है, क्योंकि मन, वचन ओर कर्म में सदैव भिन्नता बनी रहने से योग नहीं बनता ओर कोई फल नहीं निकलता।
गाँधी जी ने जिस सत्य को अनुभूत किया ओर आचरण में उतारा, उसके बल बूते वे ब्रिटिश साम्राज्य की नींव हिला सकें। अन्यथा गाँधी जी से पहले भी कितने ही लोग सत्य बोलते ओर महात्मा भी थे। सत्य दैवी सम्पदा ओर ईश्वर के समतुल्य है, जिन्हें यह विश्वास होता है, अटूट श्रद्धा होती है, ऐसा सत्य जीवन में फलदायी भी होता है।
व्यक्तित्व विकास के लिए मन, वाणी और कर्म की एकता साधनी चाहिए, किन्तु मन वाणी ओर कर्म में एषणा अहन्ता ओर लोभ आदि अनेकों ऐसे विग्रह उत्पन्न करते है जो व्यक्तित्व का विकास नहीं होने देते। सत्य को वाणी का तप कहा गया है। इसका तात्पर्य है उसमें मन की चोरी की कोई गुँजाइश नहीं होनी चाहिए। जिनके मन वाणी आरे कर्म की अभेदता सध चुकी होती है उन्हें सत्य का साक्षात्कार अवश्य होता है। सत्य का मूलाधार मनुष्य का निज का स्वभाव हैं चित्ता में मानव की अभिरुचि, शक्ति, आवेश आदि प्रवृत्तियों का समावेश होता है। स्वभाव अनुवाँशिक संस्कार, सामाजिक संयोग, शिक्षा, ओर संयम से बनता हे। इसी लिए गीता में कहा गया है क जैसा स्वभाव वैसा मनुष्य। स्वभाव जितना सरल, कुंठामुक्त, पूर्वाग्रहरहित, शान्त, तथा, सत्याचरण से युक्त होगा, मनुष्य उतना ही देवत्व से अभिपूरित होगा।
सत्य सामुदायिक नहीं व्यक्तिगत विषय है। सत्य सीखने का नहीं अनुशीलन ओर आचरण का विषय है। सत्यान्वेषी को सदैव मन की चालाकी ओर चतुराई पर ध्यान रखना चाहिए जब भी चूक होगी तब मन की ओर से सत्य आचरण में ऊपरी दिखावा अथवा किसी प्रकार की चालाकी हस्तक्षेप कर देगी। यदि चालाकी चली जा रही होगी तो निश्चय ही व्यक्तित्व विकास अथवा किसी प्रकार की प्रगति की आशा नहीं की जानी चाहिए। व्यक्ति को निरन्तर आत्म–पर्यवेक्षण करना ओर अपने पर संयम बरतना चाहिए। सत्य अनुशीलन का विषय है न कि बोलचाल, दिखावे ओर प्रदर्शन का।
सत्य को धर्म का प्रथम लक्षण माना गया है। पर उसका अर्थ मात्र सच बोलने तक ही सीमित नहीं किया जाना चाहिए। मोटेतौर पर सच बोलने के अर्थ में प्रयुक्त है। जो बात जैसी सुनी या समझी है, उसे उसी रूप में कह देना सच बोलता माना जाता है।सामान्य प्रसंगों में यह ठीक भी है। इस नीति को अपनाने वाले भरोसेमंद माने जाते है। उनका कथन सुनने के उपरान्त असमंजस अविश्वास नहीं रह जाता है। किन्तु यह स्पष्ट समझ लिया जाना चाहिए कि “सत्य बोलना” धर्म का एक छोटा सा अंग है। वास्तविक सत्य वाणी तक सीमित न रहकर जीवन क समस्त विधि व्यवस्थाओं में समाहित होता है। चिन्तन, चरित्र ओर व्यवहार उससे पुरी तरह प्रभावित हो रहा हो तो समझना चाहिए कि सत्य को पहचाना एवं अपनाया गया। वास्तविकता तो यह है कि हमारा समूचा आचरण समूचा जीवन सत्यमय होना चाहिए।
यह दृश्य संसार अनेकानेक विचित्रताओं, विलक्षणताओं से भरा पड़ा है। इन सभी के मूल में स्रष्टा की क्या इच्छा रही होगी, समझ में नहीं आता? हो सकता है, उसने मनुष्य की जिज्ञासा वृति को सतत जीवन्त बनाये रखने के लिए यह लीला रची हो। कुछ भी हो, प्रकृति के रहस्यों की खोज करने वालों की पराक्रम भरी गाथाओं के निष्कर्ष सदैव यही सिद्ध करते रहेंगे कि इस विराट् के समक्ष मनुष्य तुच्छ है, नगण्य है कि फिर भी वह कभी हर मानने वाला नहीं है। वह उत्तरी ध्रुव से दक्षिणी ध्रुव तक, अलास्का से जापान के तुच्छ द्वीपों तक ज्ञात-आत क्षेत्रों में विचरण करता रहा है एवं कई खोजे ऐसी की है जिनने मनीषा को चमत्कृत कर दिया है। नेशनल ज्याँग्राफी सोसायटी के एण्डी डेविस के नेतृत्व में तीन यात्रियों का जो दल 25 जनवरी 1981 को निकला, उसे अनुमान भी नहीं था कि वे विश्व सबसे बड़ी गुफा का पता लगाने जा रहे है, जिसे अगले दिनों “ब्लैक होल”(भूगर्भीय) नाम से पुकारा जाएगा। एण्डीडेविस के साथ थे डेव चेकले एवं टोनी, व्याइट। ये तीनों दक्षिण-पूर्व एशिया के बोनिर्यो द्वीप के उत्तरी भाग में सारावाक के मुलु जंगलों में घूम रहे थे। चुन की प्रचुरता वाले एक पहाड़ की गहरी खाई में स्थित एक गुफा जो बहुत संकरी थी। में तीनों ने प्रवेश किया रेंगते रेंगते वे अंधकार में बढ़ते चले गए। करीब 2000 फीट चलने के बाद वे एक विशाल कक्ष में पहुँच उनका प्रारम्भिक अन्दाज था कि यह तीन सौ फीट चौड़ी होगी। चौड़ाई का पता चलाने के लिए चलते चलते उन्हें अपने तेज लैम्पों के बावजूद कोई किनारा नजर नहीं आ रहा था। 80 फीट से भी अधिक ऊंचे चूने के बोर्ल्डस की बाधाओं को पार करते हुए वे जब एक खुले क्षेत्र में पहुँचे तो जो कुछ वे हेड लैम्पस् से देख रहे थे, उस पर दृष्टि पड़ते ही हतप्रभ से रह गए। एक अत्यन्त विशाल खुला पठारी क्षेत्र उनके सामने था, जिसका कोई अन्त नजर नहीं आ रहा था। लगभग दो सौ तीस फुट लम्बी जिस गुफा में ये तीनों व्यक्ति पहुँचे उसे विश्व की अब तक की ज्ञात भूगर्भ की बड़ी गुफा, जो न्यूमैक्सिको के कार्ल्स बड कैवर्न में स्थित है, से तीन गुनी अधिक बड़ी मापा गया, जिसमें दस जुम्बों जेट सिरे से सिरा मिलाकर एक सिरे से दूसरे सिरे तक जा सकते थे। इस गुफा को सारावाक चेम्बर अथवा ब्लैकहोल नाम दिया गया। एक अनुमान के अनुसार यह गुफा इतनी बड़ी थी, जिसमें 38 फुटबाल फील्डस् समा सकती थी यह विशालतम भूगर्भीय गुफा गत 9 वर्षों से खोजकर्ताओं के लिए अनुसंधान का विषय बनी हुई है कि कैसे प्रकृति ने इतना विशाल क्षेत्र अपने गर्भ में थोड़ी सी गहराई में छिपा रखा है? कैसे ये बनी? प्रश्न अनुत्तरित है।
समुद्र अपनी गहराइयों में इसी प्रकार कई रहस्य छिपाये बैठा है। यो तो समुद्रतल की सर्वांगपूर्ण शोध बीसवीं सदी के प्रारम्भ में ही शुरू हो चुकी थी, विस्तार में इसकी जानकारी पिछले बीस वर्षों में अधिक मिली है। यहाँ तक कि समुद्र की सतह से एक मील नीचे जहाँ सामान्यतया तापमान 3 डिग्री फारेनहाइट होता है। 660 डिग्री जैसे ऊंचे तापमान पर उबलती जल धाराएँ भी पाई गई है, जो कहाँ से आती व निकलती ह? पता नहीं चलता। प्रायः यह उन स्थानों पर पाई गई है, जहाँ भूतल की गहराइयों में टेक्येनिक प्लेट्स् एक दूसरे से दूर खिसकती है, विशेष रूप से प्रशान्त व एटलाँटिक महासागर के नीचे। पृथ्वी में चार मील गहराई तक जहाँ उसमें क्रेक्स हैं, समुद्र का ठण्डा पानी स्पर्श करता है एवं गर्म मैग्मा,जो कि उबलती स्थिति में चार हजार डिग्री से0 ग्रेड तापमान पर होता हे, तक पहुँच जाता है। इससे यह ठण्डा जल सुपरहीटेड हो जाता है व गर्म पानी के फव्वारे वहाँ से छूटने लगते हे। यही समुद्री धरातल पर आकर हाँटस्प्रिंग्स बनाते हैं। वैज्ञानिकों की जानकारी बस यहीं तक है। यह कुछ स्थान विशेष पर ही क्यों होता हे? इस संबंध में जानकारी अभी अविज्ञात है।
जहाँ जहाँ से ये गर्म पानी की तेज धारा ऊपर छूटती हैं, वहाँ समुद्र विज्ञानियों ने 200 फीट ऊँची व 600 फीट चौड़ी खनिजों की दीवारी से बनी चिमनियाँ खोज निकाली हैं। इनमें से निकलने वाला गर्म जल इतना गहरे रंग का व कुहासे से भरा होता है कि इनकी संज्ञा “ब्लैक स्मोकर्स “ नाम से दी गयी है। सूडान एवं सऊदी अरेबिया के मध्य “रेड” सी में लगभग 23 वर्ग मील का एक क्षेत्र है जहाँ ऐसे कई “ब्लेकस्मोकर्स “ हैं। ऐसी ही खनिज प्रधान चिमनियाँ साइप्रस के समीप भूमध्य सागर में भी पाई गई हैं। जो कि रेड सी से अधिक दूर नहीं हैं। चूँकि समुद्री गर्भ से खनिज सम्पदा ढूँढ़ निकालने के लिए विज्ञान ने अपने साधनों को काफी विकसित कर लिया है, अब क्रमशः मनुष्य इन विशाल चिमनियों के समीप तक पहुँचने लगा है। इससे और भी महत्वपूर्ण जानकारियां हाथ लगने की संभावना है। कुछ भी हो भूगर्भ की तरह समुद्री गर्भ भी गर्म ठण्डी जल धाराओं को लिए तथा स्थान स्थान पर फव्वारों एवं खनिज भण्डारों को समाहित किये रहस्यमयी सम्पदा को छिपाए बैठा है। वह भी मानवी पुरुषार्थ को सतत चुनौती देता रहता है।
भूगर्भ-समुद्र से ऊपर चलते हुए भूतल की चर्चा करें तो पाते हैं। वहाँ भी ऐसी ही विलक्षणताएँ हैं। ऐसी अनेकों में से एक है स्काँटिश बीच की गाने वाली, म्युजिकल धुन स्पर्श के साथ देने वाली बलुई रेत। उत्तरी इंग्लैंड के स्काटलैण्ड क्षेत्र में पश्चिमी तट पर एक निर्जन द्वीप है” ऑयल ऑफ आईग”। स्थूल दृष्टि से देखने पर यह औरों की तरह सामान्य बीच दृष्टिगोचर होता है किन्तु यदि इस बीच की सफेद बालू पर चला जाय या उन्हें स्पर्श मात्र किया जाय तो वे पियानो की धुन की तरह विविध प्रकार का संगीत सुनाने लगती हैं, ज्यों ज्यों हौले हौले हाथ की उंगलियां बालू को छूती हैं, दबाव क्रमानुसार विभिन्न धुनें निकलने लगती हैं। ये ऊँची “ सोप्रेनो “ स्तर की ध्वनि ( मानव द्वारा गाई जाने वाली सबसे ऊँची पिचकी ध्वनि ) से लेकर “ लोबाँस “ सबसे धीमी स्तर की संगीत भरी धुनें होती हैं। वैज्ञानिक जिनने इस प्रक्रिया का अन्वेषण किया है,इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि यह संगीत रेत की विशिष्ट संरचना के कारण जन्मता है। समुद्र की लहरों के संपर्क में आने वाले महीन रेत के कण घिसते घिसते गोल हो जाते हैं। इनके चारों ओर हवा का एक घेरा होता है एवं रेतीले दानों तथा हवा में परस्पर घर्षण से यह संगीत पैदा होता है, ऐसी वैज्ञानिकों की मान्यता है। यदि
वातावरण में आर्द्रता अधिक हो तो संगीत बदल जाता है। किन्तु यहीं की रेत ही क्यों संगीतमय है? एवं कहीं ओर ले जाने पर क्यों संगीत उनसे नहीं निकलता? यह प्रश्न सभी के समक्ष है। इसका कोई समाधान किसी के पास नहीं है व यह जादुई रेत अपना संगीत सुनाने हेतु इसी बीच पर स्पर्श की प्रतीक्षा सतत करती रहती है। क्या कोई तर्क सम्मत उत्तर दे पाना संभव है? यह चुनौती मनीषा को देती रहती है। मानवी बुद्धि से परे ऐसी अलौकिकताएँ एक नहीं अनेकानेक हैं एवं एक ही संदेश देती हैं कि अभी भी बहुत कुछ ऐसा है जो खोजा नहीं जा सका। मानवी बुद्धि अपने मुँह मियाँ मिट्ठू बनती रहे, वह बात अलग है पर प्रकृति के रहस्य प्रज्ञा को सतत चुनौती देते रहे हैं, उसकी जिज्ञासवति को झकझोरते रहे हैं यही तो हमारे मानसिक विकास का मूलभूत आधार भी है।
ऐसा कोई अक्षर नहीं जिससे मंत्र न बन सके। ऐसी कोई वनस्पति नहीं जो औषधि का काम न करे। ऐसा कोई व्यक्ति नहीं जो किसी काम को सिद्ध न कर सके। आवश्यकता केवल नियोजनकर्ता की है।
मानवी जीवन में गतिशीलता और दिशा का बड़ा महत्व है। यदि मनुष्य समय की रफ्तार के साथ-साथ नहीं चले, तो वह विकास की दौड़ में पीछे रह जायेगा ओर पिछड़ा कहलायेगा। इसी प्रकार जीवन की कोई दिशा नहीं हुई, तो वह प्रगति अंधी दौड़ के समान होगी ओर प्राण संकट खड़े करेगी। अतः विकास क साथ-साथ प्राण-रक्षा भी होती रहें, इसके लिए जीवन में गति और दिशा दोनों का होना नितान्त आवश्यक है।
मनुष्य को गति विज्ञान से मिलती है, जब कि धर्म उसे दिशा प्रदान करता है। विज्ञान की स्थिति अब अत्यन्त उन्नत हो चली है। पिछले समय की अपेक्षा आज हमें जो साधन-सुविधाएँ प्राप्त हैं, उस में मुख्य भूमिका विज्ञान के उत्कर्ष की ही रही है। पिछले सौ वर्षों में विज्ञान का जितना विकास हुआ है, उसने हमें भौतिक सम्पन्नता की दृष्टि से कई दशक आगे पहुँचा दिया है। नित नई खोजों और शोधों ने हमें जितना कुछ दिया है, उससे सारी दुनिया एक कमरे तक में सिमट गई है। घर बैठे ही हम देश-विदेश के समाचार क्षण मात्र में जान लेते है। पृथ्वी के एक छोर से दूसरे छोर की दूरी भी सिकुड़ कर न्यून हो गई है। कुछ ही घंटों में हम एक- देश से दूसरे देश की यात्रा कर लेते है। इतना ही नहीं, ग्रह नक्षत्रों की स्थिति परिस्थिति भी अब हमसे अज्ञात नहीं रही। निरन्तर परीक्षण - पर्यवेक्षण के आधार पर उनके सारे रहस्यों का पता लगा कर विज्ञान ने खगोल जगत में भी अपना वर्चस्व स्थापित किया है और अब उन में बस्ती बसाने की बात सोच रहा हे। इससे आगे एक कदम तब और बढ़ गया, जब उसने मानव का विकल्प यंत्र मानव निर्माण किया एवं उसमें बुद्धि का समावेश किया। निश्चय ही इन्हें विज्ञान के वरदान कहा जा सकता है और उसका यह प्रयास सराहनीय व लाभकारी भी है। पर पिछले दिनों उसने मनुष्य और समाज का जो अहित किया,वह भी नहीं भुलाया जा सकता है। अस्त्र-शस्त्रों की होड़ से जो संकट उत्पन्न हुआ है,उसने संपूर्ण संसार को विनाश के कगार पर ला खड़ा किया और मनुष्य जाति के अस्तित्व के आगे प्रश्न चिन्ह लगा दिया है।
दूसरी ओर धर्म और अध्याय की अवगति होती चली गई। कभी ऋषि काल में इनकी तूती बोलती थी, मगर अब यह प्राणहीन कलेवर जैसी स्थिति में यह गये हैं, तब धर्म को जीवन का प्रमुख अंग माना जाता था और सारी रीति-नीति इसी के आधार पर निर्धारित की जाती थी। चाहे युद्ध क्षेत्र हो य कर्मक्षेत्र, मनुष्य हो या अन्य प्राणी,स्वजन अथवा दुर्जन,सर्वत्र धर्म भावना का परिचय देकर अपने उच्च मानदण्डों को प्रतिष्ठित रखने में गौरव अनुभव किया जाता था। स्वार्थ की तुलना में परमार्थ को अधिक महत्व मिलता और अधिसंख्यक ऐसे कार्या में निरत रहते, जिससे समाज और समुदाय का अधिक कल्याण हो। अपने और पराये जैसी भेद-भाव की दृष्टि नहीं थी। सबों को समान भाव से देखा जाता ओर अपने वृहद कुटुम्ब को सदस्य माना जाता, पर आज स्थिति उससे सर्वथा भिन्न है। न तो अब लोगों में वह धर्म भावना रही और न जीवन के वह नीति-नियम समाज-सेवा के प्रति न तो पहले जैसा उत्साह रहा। अभिरुचि आज का सर्वोपरि धर्म व्यक्तिगत स्वार्थ सिद्धि माना जाने लगा है।
ऐसी स्थिति में किसी एक का अवलम्बन लेकर हम जीवन को सफल समुन्नत नहीं बना सकते। विज्ञान के एकाँगी विकास ने भौतिक सम्पन्नता तो बढ़ायी है पर इसके विपरीत दिनों दिन धर्म के अभाव में हम आत्मिक दृष्टि से विपन्न बनते चले गये। इसके अतिरिक्त समय के साथ-साथ दोनों में अनेकानेक प्रकार की त्रुटियां घुस पड़ीं। अस्तु दोनों में से किसी की भी स्थिति आज ऐसी नहीं, जो हमें मार्ग दर्शन दे सके और जिसके एकल अवलम्बन द्वारा हम आगे बढ़ सकें प्रगति करें और लक्ष्य तक पहुँचे। धर्म के पास दिशा है, पर गति नहीं, जब कि विज्ञान के पास गति है किन्तु दिशा नहीं। सफलता और प्रगतिशीलता के लिए जीवन में इन दोनों तत्वों का समावेश होना अत्यावश्यक है। गति हो तो जड़ता आयेगी और दिशाहीन गतिशीलता जीवन संकट खड़े करेगी। अतः जीवन में धर्म और विज्ञान का संतुलित समन्वय आज की सर्वोपरि आवश्यकता है जिसे हर हालत में पूरा किया जाना चाहिए, तभी हम भौतिक और आत्मिक दोनों दृष्टि से सफल हो सकेंगे।
वैसे तो विज्ञान का मोटा अर्थ मशीन अथवा कल कारखाने से लगाया जाता है, पर इसका तात्त्विक अर्थ कुछ और है, विज्ञान कहते हैं-प्रगतिशीलता को वैज्ञानिक दृष्टिकोण को। हम जो सोचें, जो भी करें, उसमें वैज्ञानिकता का समावेश हो, कथन और कर्तव्य की प्रामाणिकता है। आज इसकी उपयोगिता उपादेयता इसलिए भी महसूस की जा रही है, क्योंकि वर्तमान समाज कुप्रथाओं और कुप्रचलनों से ग्रस्त हो कर जर्जरित हो चला हैं, जिससे उसकी उन्नति-प्रगति में एक प्रकार का ठहराव आ गया है।उसके इस रुग्णावस्था से मुक्तकर स्वस्थ-समुन्नत बनाना, इसकी जिम्मेदारी विज्ञान की है। विज्ञान ही इस कार्य को भली-भाँति सम्पन्न कर सकता है।
धर्म-नीति, नियम, और आदर्शों के परिपालन को कहते हैं। दूसरे शब्दों में इसे कर्तव्य परायणता भी कहा गया है। हम परिवार समाज और राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्यों को समझें और निष्ठापूर्वक उसका निर्वाह करें-धर्म की यही शिक्षा है। वह हमें सदाचरण सिखाता और दुराचरण पर अंकुश लगाता है। चिन्तन चरित्र और व्यवहार में उत्कृष्टता आदर्शवादिता और शालीनता धर्म की देन है। इसी के कारण मनुष्य मर्यादाओं में बँधा रहता और मानव होने का गौरव प्राप्त करता है। वह जब भी नीति निष्ठा की मर्यादाओं का परित्याग कर वर्जनाएँ अपनाता है, मनुष्य कहलाने का श्रेय सम्मान गवाँ बैठता है। इसी से व्यक्तिगत जीवन में अनुशासन और सामाजिक जीवन में लोकश्रद्धा का सुयोग मिल पाता है। यह धर्म ही है, जो विज्ञान के कुतर्कों को अपनी आदर्शनिष्ठा की कसौटी पर कस कर उसे निरस्त करता और अभिनव मार्गदर्शन मार्गदर्शन देता है।
इस दृष्टि से भी धर्म और विज्ञान के समन्वय को आज अति महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इनकी जोड़ी वही भूमिका सम्पन्न करती है जो बैल और गाड़ी का युग्म। बैल दिशा प्रदान करते हैं और गति पहियों की होती है। दोनों को यदि एक दूसरे से पृथक कर दिया जाय जो मूल प्रयोजन ही पूरा न हो सकेगा और वे स्वयं भी अधूरे बने रहेंगे। तब न तो गाड़ी अपनी जिम्मेदारी निभा सकेगी न बैल अपना कर्त्तव्य पूरा कर सकेंगे। गाड़ी की जिम्मेदारी है- सामान ढोना, उसे गति प्रदान करना एवं बैल का कर्त्तव्य है- उस दायित्व को पूरा करना, गाड़ी की मदद करना तथा उसे दिशा निर्देश देना। यह प्रयोजन दोनों के साथ रहने से ही सध सकता हे।
ऐसा ही युग्म धर्म और विज्ञान भी बनाते हैं। उनकी पृथक कल्पना नहीं की जा सकती। वस्तुतः वे एक दूसरे के पूरक हैं। एक के बिना
दूसरे की गति प्रगति संभव नहीं है। दिशा के बिना गति शक्य नहीं है और गति के बिना दिशा की सार्थकता नहीं है। दोनों के मिलने से ही समग्रता आती है। इसीलिए जीवन में दोनों की आवश्यकता पर बल देते हुए विश्व विख्यात वैज्ञानिक आइन्स्टीन ने कहा था कि-धर्म के बिना विज्ञान अंधा है और विज्ञान के बिना धर्म लंगड़ा परस्पर उनके मिलन से ही अंधे-पंगे की जोड़ी बन कर संकट से उबरने जैसा सुयोग बन सकता है।
अस्तु दोनों के बीच पारस्परिक संतुलन और जीवन में उनके धारण से ही हमारी प्रगति संभव है। पृथक-पृथक दोनों में वह सामर्थ्य नहीं कि हमें उन्नति के मार्ग पर अग्रसर कर सकें। विज्ञान का मार्ग विनाशकारी हो चला है और धर्म में रूढ़ियों अवांछनियताओं के घुस पड़ने से वह विकृत हो।
गया है। विज्ञान हमें विनाश का रास्ता दिखाता है और धर्म अध्यात्म का वर्तमान स्वरूप प्रतिगामी बनने के लिए बाधित करता है। इस स्थिति से हम तभी उबर सकते हैं,जब दोनों को साथ ले कर चलें। एक पर दूसरे का नियंत्रण रहने से ही उन्नति-प्रगति ठीक हो पाती है। विज्ञान हमें गति दे तो धर्म दिशा दिखाये। विज्ञान की निरंकुशता पर अध्यात्म का अंकुश लगे और तथा कथित धर्म अध्यात्म की मूढ़ताजन्य अपंगता को विज्ञान की बैसाखी प्राप्त हो। इस प्रकार जीवन में दोनों के अवधारण से ही उनकी स्वयं की सार्थकता और मनुष्य की सफलता संभव हो पाती है। अतः मानवी व्यक्तित्व में दोनों के समन्वय को स्थान मिलना ही चाहिए।
इंग्लैंड उन दिनों युद्ध में फंसा था। युवक और प्रौढ़ मोर्चा संभाल रहे थे। अस्पताल में घायलों की सेवा के लिए वयोवृद्ध और दूसरे हलके स्तर के लोग आ गये थे। आहतों की समुचित सेवा नहीं बन पड़ रही थी।
इस अभाव को, समय की आवश्यकता को किशोरी बेनिट ने समझा उन दिनों उसकी विवाह की चर्चा चल रही थी। उसने उस विचार को तिलाँजलि दे दी और युद्ध का दूसरा मोर्चा घायलों की सेवा करने के कार्य में जुट गई। उसने अपने को नर्स रूप में पूर्ण-संलग्न किया और साथ ही कुमारिकाओं में जाकर उनसे देश सेवा के लिए कुछ साहस दिखो का भी उत्साह भरा। देखते देखते इंग्लैंड में नर्सों की इतनी बड़ी मण्डली तैयार हो गई कि उनने न केवल घायलों की सेवा वरन् देश के स्वास्थ्य विभाग को पूरी तरह सम्भाल लिया।
ब्रह्मांडीय ग्रह-गोलकों का मानव जीवन से अविच्छिन्न सम्बन्ध है। प्राणी जगत, वनस्पति समुदाय एवं पर्यावरण पर ग्रह मण्डलों के छोटे से परिवर्तन का भी प्रभाव परिलक्षित होता है। मनुष्य भी इससे अछूता नहीं। वातावरण एवं परिस्थितियों से सम्बन्धित होने के कारण वह मूकदर्शक बना प्राकृतिक हलचलों का अनुगमन करता और प्रतिकूलताओं का कष्ट भुगतता रहता है। किन्तु वह पुरुषार्थ करे तो इनको बदलने मोड़ने-मरोड़ने में सफल हो सकता अथवा समाप्त करके अनुकूल परिस्थितियाँ विनिर्मित कर सकता है। तथ्य भी यही है कि हमारे और प्रकृति के मध्य अन्योन्याश्रित सम्बन्ध हैं। हमारे सम्मिलित प्रयास प्रकृति के शाश्वत नियमों को बदलने के लिए बाध्य कर सकते हैं। हम चाहें तो अपनी अंतः शक्ति को अध्यात्म साधनाओं द्वारा जाग्रत करके अदृश्य प्रतिकूलताओं को परिवर्तित कर लाभकारी परिस्थितियों को जन्म दे सकते हैं।
वैज्ञानिकों का कहना है कि परोक्ष जगत के क्रिया-कलापों में होने वाली हलचलों का प्रत्यक्ष प्रभाव जीव-जन्तुओं में स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है। यह परिवर्तन बिना पूर्व अभ्यास के ही उनका मार्ग दर्शन करता और जीवन की गतिविधियों को नियंत्रित करता रहता है।
“एनसायक्लोपीडिया आफ स्काई एवं ओसन” के अनुसार सालमन मछली वर्षों तक समुद्र में रहती है और जब कभी वह अपने जन्म स्थान की याद करती है तो समुद्र से चलकर अनेक बड़ी नदियों, सहायक नदियों की यात्रा करती हुई ठीक उसी स्थान पर पहुँच जाती है, जहाँ उसका जन्म हुआ था। यदि उसे विपरीत दिशा में मोड़ने का प्रयत्न भी किया जाये या धोखा देने का प्रयास किया जाये तो भी उसे बहकाया नहीं जा सकता। वह फिर लौटेगी अपने सही स्थान को ही जैसे कि अदृश्य चेतना उसका मार्गदर्शन कर रही हों।
टिड्डियां किसी उपयुक्त स्थान पर अड्डे दे कर उड़ जाती है। पीछे बिना अभिभावकों की देखरेख के अड्डों से बच्चे निकल आते हैं और अपने पूर्वजों के पीछे पीछे यात्रा पर उसी दिशा में चल पड़ते हैं और कुछ समय पश्चात अपने अपने संबंधियों से जा मिलते हैं। इसी तरह प्रवासी पक्षी एक ऋतु कहीं गुजारते हैं दूसरी के लिए कठिन यात्रायें करके ठीक उसी स्थान पर जा पहुँचते हैं जहाँ उनके वंशधर आते जाते रहे हैं। यह कार्य वे ऐसे करते हैं जैसे कोई पायलट उनकी अगवानी कर रहा हो।
ईल मछली के जीवन में तो सर्वाधिक आश्चर्यजनक घटना घटती है। संसार की समस्त ईल मछलियाँ चाहे वे नार्थ सी की हों, या हिन्द महासागर की, अण्डे बच्चे वे अटलाँटिक के वारमूडा क्षेत्र में जहाँ समुद्र अत्यन्त गहरा है, में ही देती हैं। वहीं से वे संसार के भिन्न भिन्न भागों में पहुँच जाती हैं। बिना किसी निर्देशक के अज्ञात शक्ति से प्रेरित हो लीला की ईलें, वहां से निकलने वाली नदियों से होकर समुद्र और समुद्र से अटलाँटिक महासागर और वहां से वारमूडा जा पहुँचती है। जहां बच्चे देकर वह अपनी जीवन लीला समाप्त कर देती हैं। जिस मछली ने कोई भूगोल नहीं पढ़ा जिसे महाद्वीपों का ज्ञान नहीं फिर भी जन्म लेने के उपरान्त वह अपने पैतृक देश को चल देती हैं और बड़े बड़े महासागर पार कर ठीक वहीं जा पहुँचती हैं, जहाँ उनके जन्म दाता कभी जीवनयापन किया करते थे।
ततैया की तरह का कीड़ा वैस्प ऐसा जीव है, जिसके बच्चों को विकास के लिए जीवित प्राणियों का ही माँस चाहिए मृत का नहीं। वैस्प घास के कीड़े को पकड़ता है और उसे मिट्टी में इस तरह गाड़ देता है जिससे वह मरता नहीं वरन् मूर्च्छित हो जाता है। इस तरह अर्ध जीवित जन्तुओं से ही यह बच्चे अपना विकास भरण-पोषण करते और विकसित होते है। यह बुद्धि का खेल नहीं वरन् किसी अदृश्य सत्ता की सुनिर्धारित नियंत्रण एवं प्रेरणा है। यदि बुद्धि की बात होती तो हाथी विधिवत खेती कर रहे होते, शेर अपने बच्चों के लिए विद्यालय खोले हुए होते, भेड़ियों की मनुष्य से मित्रता हो गई होती। किन्तु यह किसी परोक्ष सत्ता की चेतना के संचार से ही संभव है।
उपरोक्त उदाहरणों के माध्यम से यह स्पष्ट किया जा रहा है कि समय विशेष के वातावरण, अथवा काल में ऐसा प्रवाह उत्पन्न होता है, जिससे अनायास ही जीव-जन्तु, पेड़ - पौधे चर-अचर असम्भव कृत्य करने को विवश हो जाते हैं।
इसी सम्बन्ध में नोबेल पुरस्कार विजेता प्रो0ई0पी0 विगनर का कहना है कि जिन कारणों से चेतना में उभार,उतार चढ़ाव परिवर्तन आते हैं और उत्थान पतन के आधार खड़े होते हैं वे तब कुछ और ही हैं। वस्तुओं को जिस आधार पर प्रभावित परिवर्तित किया जाता है एवं मनुष्य जिस आधार पर आयामही बल पड़ता है, वे किसी प्रकार काम नहीं आ सका। परिष्कृत चेतना शरीर के एक अवयव की दृश्यों का विश्लेषण तो कर सकती है, पर उस आधार पर किसी के विचार को बदलने या सम्वेदनाओं को प्रभावित करने वाले प्रयोजन बहुत ही स्वल्प मात्रा में सफल हो सकते हैं। यहाँ आशय किसी अदृश्य विराट् चेतन सत्ता से ही है।
पदार्थ विज्ञान प्रकृति के विवरण प्रस्तुत कर सकता है, पर उसकी संरचना एवं हलचलों के पीछे सन्निहित उद्देश्यों पर प्रकाश नहीं डाल सकता। परमाणु उपपरमाणु, जीन, जीवाणु, कम्पन,ऊर्जा, प्रकाश, विकिरण का केवल स्वरूप ही भौतिकी हमें बता सकती है पर, यह नहीं बता सकती कि ब्रह्माण्ड में भरा हुआ पदार्थ किस लिए द्रुत गति से कहाँ दौड़ता चला जा रहा है? इस सम्बन्ध में इतिहास को सुनियोजित करने वाले प्रमुख इतिहास वेत्ता इर्विन श्रोडिगर ने “सीक फाँर दि रोड” में लिखा है कि सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड स्वनियंत्रित सत्ता के हाथों संचालित हो रहा है जिसे अदृश्य जगत भी कह सकते हैं। वैज्ञानिकों ने शोध के दौरान पाया हे कि सूर्य, चंद्रमा, तारे ग्रह-नक्षत्र मनुष्य को अवश्य ही प्रभावित करते हैं किन्तु मनुष्य स्वयं में संकल्पवान हो तो इनके दुष्प्रभावों से बचकर अच्छे प्रभावों से वाँछित लाभ प्राप्त कर सकता है।
विज्ञानी माइकेलसन के अनुसार अमावस्या-पूर्णिमा को पृथ्वी पर पड़ने वाले सूर्य चन्द्र के प्रभावों से प्रभावित होकर न केवल समुद्र में ज्वार भाटे आते हैं वरन् पृथ्वी भी प्राय नौ इंच फूलती धंसकती है। संसार में विभिन्न समयों पर आये बड़े भूकम्पों का इतिहास यह बताता है कि प्राय अमावस्या,पूर्णिमा के इर्द-गिर्द ही वे आते रहे हैं। डाक्टर बुडाईन के अनुसार चन्द्रमा का प्रभाव जड़ पदार्थों एवं कम चेतना वाले जीव जंतुओं पर विशेषरूप से पड़ता है। मनुष्यों में इसी स्तर के व्यक्तियों में भी प्रायः इन्हीं तिथियों में मिरगी, उन्माद, और कामुक दुर्घटनाओं का दौरा आता है क्यों कि इन दिनों ऐसे कमजोर एवं जड़ प्रकृति के व्यक्तियों के पिट्यूटरी थायराइड,एड्रीनल आदि हारमोन स्रावी ग्रन्थियाँ उत्तेजित होकर शरीर एवं मन की स्थिति में असाधारण प्रतिक्रियाएँ उत्पन्न करती है। दुर्घटनाओं और अपराधों का दौर इन्हीं दिनों अधिक बढ़ जाता है। यह प्रभाव उन लोगों पर विशेष रूप से पड़ता है। जो अपनी विचारणा भावना एवं संवेदना पक्ष को सही दिशा धारा नहीं दे पाते। इन्हें उचित दिशा में नियोजित करने के लिए इस समय विशेष आवश्यकता पड़ती है। अतः जप,तप,पूजा,उपासना आदि उपचारों से इनका दुष्प्रभाव मनुष्य के ऊपर नहीं पड़ता।
ब्रिटेन के वैज्ञानिक आरनाल्ड मेयर और डा0 कोलिस्को के पर्यवेक्षणों ने यह सिद्ध किया है कि चन्द्रमा की स्थिति मनुष्यों सहित समस्त प्राणियों एवं वनस्पतियों को प्रभावित करती है।
आर्नल्ड एल॰ व्लीवर की पुस्तक “द लूनर इफेक्ट्स,” रोनाल्ड आर्फीख की पुस्तक “ मूडस्विंग” में बताया गया है कि जब भी पृथ्वी, सूर्य तथा चन्द्रमा एक सीध में एक दूसरे के निकट स्थित होते हैं,ऐसी परिस्थितियाँ उपस्थित होती हैं जो शरीरगत हलचलों एवं मन के क्रियाकलापों को प्रभावित करने लगती हैं। चन्द्रमा का गुरुत्वाकर्षण हमारे आन्तरिक बायोलॉजिकल टाइड्स (ज्वार भाटों) को भी उसी प्रकार प्रभावित करता है, जिस प्रकार समुद्री भाटों को मनुष्य की आक्रामक प्रवृत्ति का,चन्द्रमा की कलाओं के घटने बढ़ने से गहरा सम्बन्ध है। विशेषकर शराबियों नशीली दवा खाने वाले अभ्यस्तों, अपराधियों तथा मानसिक रूप से अस्थिर व्यक्तियों एवं अति भावुक लोगों के व्यवहार पर चन्द्रकलाओं का अधिक प्रभाव पड़ते देखा गया है। आगे उन्होंने लिखा है कि पृथ्वी की सतह की तरह मनुष्य शरीर में भी लगभग अस्सी प्रतिशत जलीय तथा बीस प्रतिशत ठोस का अंश विद्यमान है। इसी कारण अमावस्या तथा पूर्णिमा के दिनों मानव पर चन्द्र कलाओं का सर्वाधिक प्रभाव होता देखा गया है।
डा0 क्लोरेन्स एमिट्स ने अपनी खोज पूर्ण पुस्तक “क्लाइमेट मेक्स दि मैन” में ऐसे आँकड़े प्रस्तुत किये हैं जिनसे स्पष्ट है कि मौसम के उतार चढ़ाव के अनुसार अमुक बीमारियाँ घटती और अमुक बढ़ी हैं। इसी प्रकार लोगों की प्रसन्नता, अप्रसन्नता शान्ति तथा उद्विग्नता में भी अनायास ही अन्तर आता है। जुलाई अगस्त में यदि सर्दी गर्मी बढ़ती घटती है,तब अक्सर पारिवारिक कलह बढ़ते है। अप्रैल से अगस्त तक में सामूहिक उपद्रवों की बाढ़ आती है। मौसम की गर्मी में लोगों का पारा गरम कर देती हैं। मानसून आने पर इस प्रकार के फसाद कम हो जाते है। कुहरा अधिक होने पर आत्महत्या की प्रवृत्ति पर क्या प्रभाव पड़ता है, इसका विशद अध्ययन प्रो0ई0डेक्सटर ने किया है। उन्होंने चालीस हजार अपराधों की घटनाओं की जाँच पड़ताल करके यह पाया कि जैसे जैसे मौसम गरम होता गया, वेसे वैसे अपराध बढ़ते गये और जैसे जैसे क्रम में ठण्डक आती गई, उसी अनुपात से अपराधों की संख्या घटती चली गई।
जार्ज स्टीवर्ट ने अपने ग्रन्थ “ स्टाँर्म” में यह दर्शाया है कि मौसम के उतार चढ़ाव राज सत्ताओं को उखाड़ सकने वाले उपद्रवों की पृष्ठभूमि तक बना सकते है। इसीलिए सही निर्णय सही मौसम में लिये जाने चाहिए।
बसन्त ऋतु मनुष्यों में ही नहीं अन्य प्राणियों में भी कामोत्तेजना उत्पन्न करती है। गर्भ धारण का आधा औसत उन्हीं दो महीने में पूरा हो जाता है, जब कि शेष दस महीनों में कुल मिलाकर उतनी ही मात्रा पूरी होती है।
सूर्य विशेषज्ञों के कथनानुसार जिन दिनों सूर्य कमें लम्बे धब्बों की लाइनें बनती हैं, भयंकर विस्फोट होते हैं, उन दिनों लोगों की मनःस्थिति और परिस्थितियों में भी भयंकर उथल पुथल होती है। अमेरिकी क्रान्ति फ्राँसीसी क्रांति, रूसी क्रान्ति उन्हीं दिनों हुई, जिन दिनों सूर्य में विस्फोट के चिन्ह धब्बों के रूप में दिखाई पड़ रहे थे,सौर लपटें तीव्रतम स्थिति में थीं। अमेरिकी वैज्ञानिक जॉन नेल्सन ने मंगल,शुक्र और बुध ग्रहों की स्थितियों का आयन मण्डल पर प्रभाव परखा है। उनका कहना है कि पृथ्वी चुम्बकीय गतिविधियों पर इसका असर पड़ता है। ग्रहों की स्थिति से विकिरणों की बौछार भी होती है। ये वंशानुक्रम में भी परिवर्तन कर देते हैं। इस प्रकार समष्टिगत परिवर्तन काय पिण्ड पर सुनिश्चित प्रभाव डालते हैं।
उपरोक्त उद्धरणों से स्पष्ट होता है कि वरिष्ठ समझा जाने वाला मनुष्य अपने चारों ओर के वातावरण एवं अदृश्य वेतन शक्तियों पर पूर्णतया आश्रित है। किन्तु यदि वह अपनी मनःस्थिति के आधार पर ब्राह्म परिस्थितियों को परिवर्तित कर सकता है, तो क्या वह इन्हीं परिस्थितियों के वशीभूत होकर रहेगा? फिर तो मानवी पुरुषार्थ को सर्वथा नकारना पड़ेगा। ग्रह-नक्षत्र हमारे अनुकूल नहीं हैं तो व्यर्थ प्रयास किया ही क्यों जाय? यह मान्यता सर्वथा अनुचित है। जिस तरह ग्रह नक्षत्र हमें प्रभावित करते हैं ठीक उसी तरह हम भी सृष्टि के घटक होने के कारण अपने चहुँओर के वातावरण को प्रभावित कर सकते हैं। इसमें मानवी पुरुषार्थ की प्रमुख भूमिका होती है।
सोवियत संघ के प्रमुख विज्ञानवेत्ता जिथोजारजी गिआरडी का कहना है कि समूचा ब्रह्माण्ड एक शरीर है और उसका कोई भी अंग अलग नहीं वरन् संयुक्त रूप से एकात्म है। चूँकि मनुष्य भी उसी का एक घटक है अतः उसके क्रिया-कलाप,चिन्तन, चरित्र - व्यवहार सम्पूर्ण विश्व को प्रभावित करते हैं। इनको उच्चस्तरीय बना कर वह अपने समीपवर्ती वातावरण को अनुकूल बनाने में समर्थ तो है, ग्रह-नक्षत्रों एवं अदृश्य शक्तियों के कुप्रभाव को रोकने में व्यक्तिगत अथवा सामूहिक प्रयास अधिक एवं समर्थ होते हैं। सामूहिक उपासनाएँ, प्रार्थनाएँ, धर्मानुष्ठान इसी आधार पर सफल होते हैं।
भौतिकी के आचार्य राबर्ट मायर ने ऊर्जा के दर्शन पर जो खोजे की हैं, वे बताती हैं कि उसकी अधिकाधिक सूक्ष्म स्थिति में जो तत्व शेष रह जाता है उसे चेतना की संज्ञा दी जा सकती है। इसका उत्पादन और विलियन क्रम तो स्थूल रूप से ही चलता है मनुष्य की समष्टिगत चेतना जब सामूहिक लोक कल्याण के निमित्त एकाग्र हो जाती है, तो उससे ब्रह्माण्ड में हो रही हलचलें भी विशेष रूप से प्रभावित होती है। इनका प्रभाव लेसर किरणों जैसा सूक्ष्म होता है। जिससे भविष्य में अनिष्ट होने की आशंका समाप्त प्राय हो जाती है। इसी कारण शास्त्रों में सामूहिक अनुष्ठानों एवं सामूहिक साधनाओं का विधान है। जब भी इस धरा पर विपत्ति के बादल गहराये हैं तब-तब ऐसे ही सामूहिक प्रयत्न हुए हैं जिससे अनिष्ट का निवारण हुआ और सम्पूर्ण मानवता पर गहराते महा विनाश के बादल छटे। प्रस्तुत समय की प्रच्छन्न विभीषिका के निराकरण में सामूहिक अनुष्ठानों की महती भूमिका होगी। यह निश्चित है।
कौआ जहाँ भी जाता तिरस्कार पाता। उसे कोई अपनी मुँडेर तक पर नहीं बैठने देता।
खिन्न होकर उसने उदास मन से कहीं अन्यत्र जाने की बात सोधी और प्रवास की तैयारी करने लगा।
पड़ोस में की टहनी पर घोंसला बना कर रहने वाली कोयल को इसका पता चला तो उसने कौए को रोका और कहा-बन्धु! जब तक आप वाणी की कर्कशता न छोड़ेंगे तब तक कहीं भी जाकर न सम्मान पा सकेंगे न संतोष।
मानवी काय सत्ता का बहिरंग पक्ष जो हाड़ माँस से बना स्थूल रूप में दिखता है, उसका अदृश्य सूक्ष्म शरीर जिन प्राण स्फुल्लिंगों के समुच्चय से बना है, वह अपने आप में अद्भुत एवं अपरिमित शक्तियों का पुँज है। यही कारण है कि शास्त्रकारों ने आप्त पुरुषों ने इस शरीर को देव मन्दिर की संज्ञा दी है। पर सामान्य मान्यता यह है कि दृश्यमान समर्थता स्थूल शरीर की ही देन है, जब कि उसका क्षेत्र इतना व्यापक है वह समीपवर्ती क्षेत्र में बाहर भी विद्यमान रहती है और संपर्क में आने वाली वातावरण को भी प्रभावित करती है और सान्निहित सूक्ष्म प्राण चेतना है जो प्रकाश किरणों के रूप में शरीर बाहर भी फैली रहती है। यह आन्तरिक शक्तियों का बहिरंग में परिचय और परिष्कृत कर लेता है, उसी अनुपात में दिव्य क्षमताओं का, अतीन्द्रिय सामर्थ्यों का स्वामी बनता चला जाता है। इससे न केवल अपना हित साधन होता है वरन् दूसरों को भी लाभान्वित किया जा सकता है।
ईसाई धर्म ग्रंथों में वर्णित है कि एक प्रकाश क्षेत्र मनुष्य को चारों ओर से सतत घेरे रहता है जिसकी सघनता सिर के इर्द-गिर्द अधिक होती है। कहा जाता है कि जब मूसा ईश्वरीय नियम खुदे पवित्र पत्थर को लेकर पर्वत से नीचे उतर रहे थे, उस समय इजराइल के बच्चे उन्हें देखने में असमर्थ रहे क्योंकि उनके चेहरे से तीव्र प्रकाश किरणें प्रस्फुटित हो रही थीं। विभिन्न साहित्यों में इसका विस्तृत वर्णन भी मिलता है। इसी तरह सेंट पाल के बारे में प्रचलित है कि उपदेश देते समय उनके मुख मंडल से प्रकाश रश्मियाँ निकल कर आस पास के वातावरण में फैल जाती थीं। ईसामसीह का तेज विलय इतना तीव्र होता था कि जिसकी तुलना किसी भी प्राकृतिक या कृत्रिम प्रकाश से नहीं की जा सकती। सेंट फिलिप तथा सेंट चार्ल्स बोरोमेओ ने इसका अलग वर्णन किया है। वैज्ञानिक जगत में इसे ही आभा मण्डल-प्रभामंडल आदि नामों से जाना है और कहा जाता है कि जब कोई व्यक्ति दिव्य चिंतन और आध्यात्मिक साधना में निमग्न हो जाता है,उस समय प्रभामंडल के रंग और अधिक चमकदार एवं प्रभावकारी हो जाते हैं। इसका सीधा संबन्ध व्यक्ति के चिन्तन और भावना क्षेत्र से हे जिसमें आये क्षणिक परिवर्तन से भी इस में अंतर आ जाता है और अपने चारों ओर के वातावरण को प्रभावित करता है।
मस्तिष्क की तरह सम्पूर्ण शरीर के चारों ओर प्रकाशित क्षेत्र को “औराओला “ कहा गया हैं। उत्कृष्ट चिन्तन एवं आदर्शवादी कर्तृत्व से इसमें अभिवृद्धि होती है। इस संदर्भ में गुहा .. के प्रसिद्ध ग्रंथकार पैरासेल्स ने कहा है कि सूक्ष्म मर्म स्थानों से निस्सृत इस तेजस्वी ऊर्जा का विनाश नहीं होता वरन् शरीर से बाहर निकलने के पश्चात् चारों ओर वलय रूप में घिरी रहती है। उसके अनुसार यह अर्ध प्राकृतिक किरणें हैं जो यह प्रदर्शित करती हैं कि मनुष्य उत्कृष्ट चिन्तन तथा श्रेष्ठ भावना सम्पन्न है अथवा निकृष्ट विचारों एवं दूषित अंतःकरण से ग्रसित है। जीवन के मूल तत्व यही दोनों माने गये हैं जिनके दूषित होने पर शरीर रोगग्रस्त हो जाता है जिससे चेहरे–मुहरे से सुन्दर व्यक्ति उदास, निस्तेज, आलसी होने पर मरा गिरा सा टूटा हुआ प्रतीत होता है। जब कि उत्कृष्ट चिन्तन वाला व्यक्ति स्वस्थ,सुसन्तुलित एवं काला कुरूप होने पर भी प्रभावोत्पादक,व्यक्तित्व का स्वामी होता है। ऐसा व्यक्ति जहाँ जाता है, अपनी उपस्थिति से वातावरण प्रभावशाली बना देता है।
इसी ग्रन्थ में तेजोवलय को पाँच भागों में विभक्त किया गया है। (1) स्वास्थ्य आँरा (2) मर्मस्थान का आँरा (3) कायिक आँरा जो मनुष्य की पाशविक प्रवृत्ति को बताता है (4) चरित्र का आँरा (5) आध्यात्मिक प्रकृति का तेजोवलय।
स्वास्थ्य वलय रंगहीन होता है परन्तु इसे त्रिज्मीय रेखाओं द्वारा अनुभव किया जाता है, यह शरीर की सभी दिशाओं से निकलता है। दूसरा वलय शरीर से निश्चित दूरी पर होता है एवं इच्छा शक्ति द्वारा परिवर्तित परिवर्धित होता रहता है। सामान्य अवस्था में गुलाबी रंग एवं समय समय पर गहरे गुलाबी रंग में परिणत हो जाती है। तीसरा आँरा अभिव्यक्ति को स्पष्ट करता है। यह एक ऐसा दर्पण है जहाँ प्रत्येक इच्छाएँ, कामनाएँ भावनाएँ परावर्तित होती हैं। इनके परिवर्तन पर ही रंग बदलते रहते हैं। क्रोधी एवं मानसिक उत्तेजना वाले व्यक्ति अपने आँरा को काले क्षेत्र में गहरे लाल रंग के धब्बों से भर देते हैं जब कि भय इसे तुरन्त भूरे रंग में परिणत कर देता है। चौथे प्रकार का वलय भूतकालिक जीवन चरित्र को स्पष्ट करता है। पाँचवें प्रकार का वलय उच्चस्तरीय आध्यात्मिक स्थिति प्राप्त कर लेने वालों में ही देखा जाता है। बाहर दिखने वाला तेजोवलय व्यक्ति की आध्यात्मिक उन्नति के स्तर को स्पष्ट करता है कि उसने कितनी प्रगति की है। यही वह सूक्ष्म आभा है,जो दिव्य स्थलों में,आश्रमों में तीर्थ स्थलों में विद्यमान रहती है जिसे प्राप्त करने के लिए तीर्थ यात्रा का विधान है। थियोसाफी ग्रन्थों में हिमालय क्षेत्र में ऐसा ही प्रकाश पुँज छाये रहने की बात उल्लिखित है। इसमें निहित गुलाबी रंग शुद्ध भावना,तेज लाल को क्रोध एवं उत्तेजना को,गाढ़ा लाल इन्द्रियलिप्सा एवं कामुकता को,पीला चमकदार बुद्धि क्षेत्र के पैनेपन को, वासन्ती रंग बौद्धिक क्षमताओं को, जिस का अंत स्वार्थपरता एवं,अहंकार में होता है। भूरा रंग कंजूस प्रवृत्ति को प्रकट करता है। हरा रंग प्रभावशाली रंग है, इस प्रवृत्ति का व्यक्ति दूसरों को भी अपने जैसा समझता है, इसका हल्कापन क्रूरता एवं बर्बरता को स्पष्ट करता है, नीला रंग धार्मिक प्रवृत्ति एवं भक्ति की ओर प्रेरित करता है। इस में निहित छाया साधना के स्तर एवं चेतना की महानता को बताती है कि व्यक्ति कितना आदर्शवादी है। नील लोहित रंग मानसिक प्रखरता, आध्यात्मिकता,की जागृति, एवं गुहा विद्या की पूर्णता का परिचायक है।
तेजोवलय में निहित रंगों के सम्बन्ध में अब वैज्ञानिक भी इस बात का समर्थन कर रहे हैं कि यह मनुष्य के अन्तराल में छाये भावनाओं की अभिव्यक्ति ही है। विचारणा,भावना-कल्पना क्षेत्र में आने वाले उतार-चढ़ावों से आभामण्डल में होने वाले परिवर्तनों को जाँचने-परखने के लिए स्टेनफोर्ड-विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक द्वय विलियम टिलर एवं डेविड वायरस ने विशिष्ट प्रकार के संवेदनशील यंत्रों का विकास किया है। उनका कहना है कि विचारणाएँ-भावनाएँ इतनी तीव्रता के साथ बदलती हैं जिन्हें सामान्य उपकरणों के माध्यम से नहीं पकड़ा जा सकता। व्यक्ति को क्षणभर में उत्कृष्टता से निम्नगामिता की ओर लुढ़कते देखा जाता है। यही कारण है कि प्राचीन मनीषियों ने कठिन साधना विधानों का अध्यात्म उपचारों का निर्माण किया था जिस से मनुष्य का स्थायी परिमार्जन-परिष्कार हो सके। अपने प्रयोग- परीक्षणों में उन्होंने पाया कि भावना-विचारणा के परिवर्तन के साथ ही सफेद,नीली एवं लाल रंग की प्रकाश रश्मियों में भारी फेर–बदल होता है। उत्तेजना - आवेश-ग्रस्तता की स्थिति में गहरे लाल रंग की किरणें निस्सृत होती है। इससे स्पष्ट होता है कि मनुष्य की भावनाएँ - विचारणाएं कितनी प्रचंड होती है जो अल्ट्रावायलेट किरणों,लेसर किरणों की तरह क्षण भर में कहीं से कहीं भी जा पहुँचती हैं। इसका सुनियोजन श्रेष्ठता की दिशा में होने पर व्यक्ति महामानव, देवता सन्त-ऋषि बनता है एवं उसकी निष्कृष्टता से उसी व्यक्ति को नर पिशाच-नरपशु -दुष्ट-अत्याचारी बनते देखा गया है।
ड्यूक यूनिवर्सिटी में कार्यरत वैज्ञानिक-स्टीवेन्सन और टिलर ने अपने अनुसंधान में पाया है कि ध्यान की अवस्था में जब शरीर-मन उत्तेजना रहित होता है; उस समय लाल रंग की किरणों का निष्कासन समाप्त हो जाता हे, किन्तु यदि ध्यान के पश्चात् साधक उत्तेजित होता है तो इन किरणों की मात्रा द्विगुणित वेग से निकलने लगती है। सामान्य स्थिति में आवेश-उत्तेजना उतनी हानि कारक नहीं होती जितनी कि साधनाकाल में। काम, क्रोध, आवेश, अहंकार जैसे मनोवेगों की छोटी लहर भी साधक को पतन पराभव की ओर धकेल देती हे। अतः इस समय विशेष सावधानी एवं संयम बरतने की आवश्यकता है।
सोवियत संघ के प्रख्यात वैज्ञानिक डा0 किर्लियन का कहना है कि मानसिक परिवर्तन के साथ साथ व्यक्ति के आभा मण्डल में भी परिवर्तन होता रहता है। त्वचा के कुछ विशेष बिन्दुओं पर नीले एवं स्वर्णिम आभा के कण दिखाई देते हैं जो मानसिक-अस्थिरता एवं निस्तेजता को प्रकट करते हैं। कुछ दीप्ति कण त्वचा के एक स्थान से शरीर के एक बिन्दु से दूसरे बिन्दु एवं एक व्यक्ति से दूसरे की ओर जाते रहते हैं जहाँ वे अवशोषित कर लिये जाते हैं। जब तक पहला समूह पूरी तरह से अवशोषित नहीं हो जाता तब तक दूसरा समूह नहीं निकलता। इस सम्बन्ध में उन्होंने किर्लीयन व आर्गोग फोटोग्राफी द्वारा चित्र भी खींचे हैं। वे धीरे धीरे चमकती हुई जाती है एवं अंत में तीव्र आभा के रूप में चमक कर अपने केन्द्र पर पहुँच कर बुझ जाती हैं। इनका रंग नीलिमा लिए सफेद,एवं भूरा होता है। ये बुझे मुरझाये प्रकाश समूह अनिर्धारित अस्त व्यस्त एवं हीन संकल्प शक्ति को व्यक्त करते हैं। यही कारण है कि धर्म शास्त्रों में हेय विचार वाले कुसंस्कारियों से दूर रहने के लिए कहा गया है। छुआ छूत का निर्धारण इसी आधार पर किया गया था। जातिगत आधार पर नहीं। कामी,व्यभिचारी लोलुप, मिथ्याचारी, दम्भी व्यक्तियों के संसर्ग में रहने से उनके सूक्ष्म संस्कार अनायास ही अच्छे संस्कार वालों को प्रभावित करते हैं। इसलिए न तो उनके संपर्क में रहें, नहीं उनके द्वारा प्रयोग किये वस्त्रों अथवा सामानों का उपयोग करें, क्योंकि उसमें भी उनका प्रभाव आ जाता है।
रूस स्थिति औरों साइकियेट्रिक इन्स्टीट्यूट की प्रमुख महिला विज्ञानी डा0 थेल्मा माँस ने भी अपने प्रयोग परीक्षणों में पाया है कि ध्यान, सम्मोहन अथवा ट्रग्स की स्थिति में अँगुलियों के अग्रभाग से निकलने वाली प्राण रश्मियों में भारी परिवर्तन होता है। तनाव, उत्तेजना अथवा निषेधात्मक चिंतन की स्थिति में अवस्थिति जिन व्यक्तियों के विर्लियन चित्र उतारे गये तो देखा गया कि फिल्म पर गहरे लाल रंग के चकते पड़ जाते हैं। इसका सर्वाधिक प्रभाव हाथ पर ही होता है। इससे स्पष्ट होता है कि मनुष्य के भले बुरे अणुओं की आभा हाथों से प्रकट होती और संपर्क में आने वालों को प्रभावित करती है। धर्म ग्रन्थों में इसीलिए कहा गया है वे हाथ काट डालने योग्य हैं जो पाप कर्म में प्रवृत्त होते हैं तन की बात सर्वविदित है। स्पर्श से उनकी दिव्य प्राण ऊर्जा का लाभ अनायास ही लोगों को मिल जाता है। उनके चरणों को छूने के पीछे यही विज्ञान काम करता है। समर्थ गुरु अपने शिष्य पर शक्ति पात में यही क्रिया दुहराते हैं। रामकृष्ण परमहंस द्वारा विवेकानन्द को, रामदास द्वारा शिवाजी को,विरजानन्द द्वारा दयानन्द को प्राण ऊर्जा का दिव्य अनुदान इसी प्रकार हस्तांतरित हुआ था। इसी आधार पर उदारमना तपस्वी अनेक चार दीन दुखियों की भी सेवा सहायता करते रहते हैं और प्रसन्नता अनुभव करते हैं। न्यूजीलैंड का एक गड़रिया अपने या पराये झुण्ड की जिन भेड़ों पर हाथ फेर देता था वे उसी के साथ चल पड़ती और मालिकों द्वारा खींचने पर भी वापस न लौटती। गड़रिया ही उलटा हाथ किया कर उन्हें अपनी पकड़ से मुक्त करता, तब वे वापस ..... इसने भी हाथ के माध्यम से सूक्ष्म शक्ति द्वारा भेड़ों को प्रभावित करना ही है।
संकल्प शक्ति एवं एकाग्रता द्वारा प्राण शक्ति का अभिव्यक्ति एवं प्रकाश अपुण्य के रंगों में परिवर्तन भी हो सकता है। इस सम्बन्ध में है इस रूप ने अपने भी हो सकता है। इस सम्बन्ध में है ..... ने अपने संस्मरण में लिखा है कि एक बार इथेल रोगी का उपचार कर रही थीं। उस समय उसके हाथ से वासन्ती रंग निकल रहा था। उन्होंने कहा में चाहूँ तो हरा भी हो सकता है” हमने पुनः यंत्र के माध्यम से चित्र लिए तो उसी अवस्था में हरे रंग की आभा मिली। पूछने पर उन्होंने बताया कि मनुष्य के मन में हो रहे क्षण,क्षण परिवर्तन उनसे निकलने वाले प्रकाश प्रवाह को बदलते रहते हैं, चूँकि यह विचारणा, भावना एवं संकल्प शक्ति से सुसम्बद्ध है। अतः चाहें तो हम में से हर कोई इसे विधेयात्मक रूप देकर अपनी मनः शक्तियों - अतीन्द्रिय सामर्थ्यों को विकसित कर सकता है अथवा निषेधात्मक विचार प्रवाह उत्पन्न कर स्वयं को पतनोन्मुख की दिशा दे सकता है। ऐसे व्यक्ति से सभी दूर बने रहेंगे। एक निगेटिव आँरा उससे सतत निकलता रहता है। विचारों की शक्ति व्यक्ति को एक चलता फिरता चुम्बक बना देती है जो आकर्षित भी कर सकता है विकर्षित भी। चेतन सत्ता का विलक्षण खेल है यह!
दुष्ट की मित्रता प्रातः के सूर्य की तरह लम्बी होती है। फिर क्रमशः घटती जाती है। सज्जन को मित्रता ढलते सूर्य की तरह पहले छोटी होती है फिर लम्बी होती जाती है।
एक साधु ने गाँव के समीप रास्ते के किनारे झोपड़ी बना रखी थी जो उधर से निकलते उन्हें जल पिलाता। छाया में बिठाता और कुशल समाचार पूछता।
बातों बातों में ही चर्चा भी चलती कि आगे वाले गाँव के लोग कैसी प्रकृति के है। राहगीरों के इस प्रश्न के उतर में वह उलटा यह प्रश्न पूछता “ कि तुम्हारे गाँव के लोग कैसे है “? वे कहते कि “ तुम्हारे गाँव के लोग कैसे है”?
जो राहगीर कहते कि हमारे यहाँ भले लोग हैं उनको वह उत्तर देता “ सामने गाँव वाले गाँव के लोग बहुत भले है”। जो कहते ‘ उनके यहाँ बुरे लोग रहते है”। उनको वह कहता “ इस गाँव के लोग भी कम बुरे नहीं है”।
दो प्रकार की बातें करते सुनने वालों ने पूछा” आप दो तरह की बातें क्यों करते है।”? साधु ने कहा-” जो लोग अपने यहाँ बुराइयां पैदा करते है वे यहाँ भी वैसा ही करेंगे और जैसे खुद हैं वैसी ही प्रतिक्रिया यहाँ भी देखेंगे”।
सन्तान प्राप्ति की चिर आकाँक्षा पूर्ण हुई तो महर्षि अत्रि की प्रसन्नता का पारावार न रहा। महर्षि पुत्र और पुत्री में कोई भेद नहीं करते थे। दोनों में वे एक ही आत्मा के दर्शन करते थे। इसलिये पुत्री होने पर भी उन्हें उतनी ही प्रसन्नता थी, जितनी किसी को पत्र पाकर होती है। नामकरण संस्कार से लेकर विद्यारम्भ तक सारे संस्कार विधिवत अपने हाथ सम्पन्न कराये कराये उन्होंने उसका नाम रखा अपाला।
किन्तु अपाला ज्यों-ज्यों बढ़ती गई,महर्षि की प्रसन्नता त्यों-त्यों घटती गई। अपाला की त्वचा में पहली बार श्वेत कुष्ठ देख कर वे चौके भर थे। विश्वास यह था कि औषधोपचार से वह ठीक हो जायेगा पर आयुर्वेद के पन्ने पलट-पलट कर महर्षि थक गये, जो भी सम्भव प्रयोग थे, उन्होंने एक-एक कर सब कर डाले, किन्तु त्वचा दोष दूर न हुआ।
समाज की कैसी विडंबना है कि पुरुष के अनेक दोष क्षमा हो जाते हैं पर कन्या का रूप रंग साधारण होना भी अस्वीकार्य होता है। फिर अपाला तो एक ऐसे रोग को शरीर में पाल रही थी, जिसे अपने समाज में न केवल रोग वरन् पाप भी माना जाता है। परिस्थितियों से निराश महर्षि अत्रि ने अब अपना सारा ध्यान अपाला को ज्ञानवान् बनाने में केन्द्रित कर दिया। वेद,उपनिषद्,ब्राह्मण,आरण्यक आदि सम्पूर्ण आर्ष ग्रंथों के अध्यापन के साथ महर्षि अत्रि ने अपाला को व्याकरण,मीमाँसा ओर दर्शन ग्रंथों का भी अनुशीलन कराया। अपाला ने संगीत विद्या भी सीखी और इस तरह वह अपने अपूर्व तेज और यश के साथ तत्कालीन शीर्षस्थ विद्वानों की श्रेणी में जा पहुँची।
अपाला अब यौवन के द्वार पर खड़ी थी। स्वाभाविक था कि महर्षि उसके हाथ पीले करने की बात सोचते पर ऐसा आदर्शनिष्ठ युवक उन्हें मिलता कहाँ?जो जीवन के भौतिक और लौकिक आकर्षणों से ऊपर उठकर विवाह को दो आत्माओं का पुनीत सम्बन्ध मानकर अपाला को स्वीकार करता। धर्म और आत्म-तत्व की बातें करना सरल हैं पर अनेक कठिनाइयों एवं संघर्षों में अपनी हानि सहकर भी उसे व्यवहार में लाने वाले तो कोई बिरले ही साहसी सपूत होते हैं।
महर्षि ने दृष्टि दौड़ाई तो उन्हें ऐसा लगा कि पृथ्वी अभी वीर-विहीन नहीं हुई। कुशाश्व जो अभी उनके स्नातक रह चुके थे, उन्होंने अपाला को सहर्ष स्वीकार कर लिया। वैदिक रीति से कृशाश्व और अपाला एक दाम्पत्य सूत्र में आबद्ध हो गये।
दाम्पत्य सम्बन्ध का प्रारम्भिक आकर्षण कुछ कम हुआ तो कृशाश्व के मन में भी अपाला के प्रति विरक्ति आने लगी। वासना का जाल ऐसा भयंकर है कि वह जहाँ भी उदीप्त होता है,प्रेम की पावनता को उपेक्षा और तिरस्कार में परिवर्तित कर देता है। जो कृशाश्व अब तक प्रेम के कारण त्वचा दोष वाली अपाला में गुण ही गुण देखते थे, अब उन्हें अपाला जैसी विदुषी नारी भी माँस - पिंड मात्र लग रही थी, उनकी अन्यमनस्कता विचारशील अपाला से छिपी न रह सकी। अपाला इस अपमान से छटपटा उठी और अन्ततः एक दिन पूछ ही बैठी-आर्य श्रेष्ठ अपाला इन दिनों आपके स्नेहपूर्ण सम्बोधन और सम्मान से भी वंचित हो रही है,कोई अपराध तो नहीं हो गया?
कृशाश्व क्या उत्तर देते? उन्होंने स्वीकार किया कि वह मन की वासना के आगे पराभूत हैं, प्रेम के स्थान पर सौंदर्य की अभिलाषा ने उनके आदर्श को तोड़ डाला है।
जो निराशा एक दिन शरीर से कुष्ठ के छोटे देखकर हुई थी,उससे अधिक पीड़ा हुई पति की उपेक्षा से। आज प्रथम बार अपाला के मन में स्वाभिमान जाग्रत हुआ और उन्हें इस बात का बोझ हुआ कि संसार में पराश्रय सदैव दुःख देता है। आत्म विश्वास, अपनी शक्ति अपने पैरों पर खड़े होने का भरोसा ही सच्ची शक्ति है, उसी से मनुष्य साँसारिक अपमान से अपनी सुरक्षा कर सकता है।
अपाला ने पतिगृह का परित्याग कर दिया। रही वह अपने पिता महर्षि अत्रि के आश्रम में ही, किन्तु उन्होंने दीनता वहाँ भी किसी से प्रकट नहीं की। अपाला ने गम्भीरता धारण की। वह स्थैर्य ही धीरे-धीरे तपश्चर्या में बदल गया। अपाला ने देखा किसी भी वस्तु का सच्चा पता उसके मूल से ही लगाया जा सकता है। आत्मा ही वह केन्द्र-बिन्दु है, जिस पर एकाग्र होने से अपनी परिस्थितियों का सम्यक् ज्ञान प्राप्त हो सकता है। यह विचार आते ही अपाला आत्म-शोध की साधना में तल्लीन हो गई।
मनुष्य के मन में बड़ी शक्ति हैं, जिधर लगा दे, उधर से ही अज्ञातभूत के समान ज्ञान के कोष के कोष एकत्रित कर देता है। आत्मा शोध करते हुए अपाला ने अनुभव किया, मनुष्य जीवन विकार, कष्ट और यन्त्रणायें ईश्वर प्रदत्त नहीं उसकी निजी भूले और पाप होते हैं। परमात्मा तो उनके प्रक्षालन में सहायता करता है, आत्मा को शुद्ध और सुघड़ बनाने की शक्ति प्रदान करता है।
अपाला ने इन्द्र की उपासना इसी रूप में की। जप तप, हवन, व्रत, उपवास आदि तप और तितीक्षाओं के द्वारा उन्होंने अपना अन्तः करण नितान्त शुद्ध कर लिया। शास्त्र अनुशीलन और वेदों की शोध में अपने जीवन का एक-एक क्षण घुला दिया। शेष संसार से सम्बन्ध टूट गया। अपाला ने आत्म-साक्षात्कार की साधना में दिन-रात एक कर दिये। भगवान् को और क्या चाहिये? उन्हें तो निष्ठा भर की परख होती है, अन्यथा अपने भक्त की सहायता के लिये तो वे अहिर्निशि तत्पर रहते हैं।
कार्तिक की शरदपूर्णिमा का दिन। जब सारा संसार निद्रा की गोद में पड़ा आनन्द लें रहा था, अपाला आश्रम के एक नीरव नीड में बैठी प्रज्ञा–चक्षुओं से विश्व के अनन्त विस्तार को हृदयंगम कर रही थी। रजनीकान्त अपनी सम्पूर्ण उज्ज्वलता पृथ्वी पर बिखेर कर आत्म-सुख अनुभव कर रहे थे, वैसे ही अपाला अपनी आत्म-चेतना को भगवान् इन्द्र के प्राण-शरीर में हवन करती जा रही थी। देखते लघुता महानता में, अणु विधु में एकाकार हो चले। आत्मा ने अपने को परमात्मा के साथ एकाकार कर लिया।
“में हूँ तुम्हारा प्रिय उपास्य”, देवराज इन्द्र ने स्नेह और वरदान का हाथ ऊपर उठाते हुए कहा।
“देवेश”! भावावेश में अपाला इतना ही कह सकी। पुत्री अपने पिता को पाकर जिस तरह विह्वल हो उठती है, वैसे ही विह्वल अपाला की आंखों से झर-झर आँसू झरने लगे। भाव नेत्र निर्निमेष अपने साध्य को देख रहे थे। चिर-प्यास, तृप्ति का आनन्द ले रही थी।
मैं तुम्हारा त्वग्दोष दूर करता हूँ भद्रे! भगवान इन्द्र ने वात्सल्य भरे हृदय से कहा पर उनकी वाणी सुनने को ध्यान डिगाना भी अपाला के लिये कष्टकारक था।
उन्होंने विनम्र निवेदन किया-”देव! यह शरीर तो आज नहीं कल छूटने ही वाला है, वह रुग्ण रहे या रोग मुक्त उससे क्या बनता-बिगड़ता है, आप तो मुझे वह शक्ति दें, वह सामर्थ्य दें, विद्या और प्रकाश दें, जिससे मैं इस प्रसुप्त, भौतिक आकर्षणों में भ्रमित संसार को कुछ ज्ञान दान दें सकूँ। संसार का कुछ कल्याण कर सकूँ।
एवमस्तु कहकर महावान् अदृश्य हो गये पर वे अपनी सम्पूर्ण कान्ति, शक्ति और प्रज्ञा अपाला पर छोड़ गये। अपाला ऋषि हो गई, यह सम्वाद क्षण भर में सारे आश्रम और राष्ट्र में गूँज गया।
कृशाश्व ने सब कुछ सुना तो दूसरे दिन ही अपाला को लेने महर्षि अत्रि के आश्रम में पहुँचे। बड़ी ऽऽऽऽ विनय की उन्होंने पर अपाला ने पूर्व उपेक्षा दर्शाने वाले पति के साथ जाने से इनकार कर दिया शेष जीवन पिता के पास रहकर उन्होंने धर्म और समाज सेवा में ही बिताया। अन्ततः कृशाश्व ने स्वयं भी अपाला से वेदाँग का अध्ययन किया। बहिरंग ही नहीं अंतरंग का सौंदर्य ही सबसे बड़ा सौंदर्य है। उसी में सच्ची शक्ति आत्मबल की सामर्थ्य सन्निहित है।
कठिनाई और विरोध यह दो आधार ऐसे हैं जो तुम्हारे पराक्रम को निखारते हैं।
कर्म के भले बुरे होने की पहचान आत्मबल सम्पन्न ही कर सकते हैं। उन्हें ही समग्र मनुष्य कहना चाहिए। जिनमें यह समग्रता उत्पन्न नहीं हुई है उन्हें नर पशु वर्ग में गिनना चाहिए। वन मानुषों की आकृति मनुष्यों से मिलती जुलती है। कितने ही प्राणी मनुष्यों जैसे शब्दों का उच्चारण कर लेते हैं। तोता मैना जैसे पक्षी और चिंपेंजी जैसे पशु मनुष्यों द्वारा बोले जाने वाले शब्दों की नकल कर लेते हैं। अनुकरण में बंदर अग्रणी है। वह दूसरों को जैसा कुछ करते देखता है वैसी ही नकल करने लगता है। इतने पर भी उन्हें मनुष्य संज्ञा में नहीं गिना जाता है।
मनुष्य काया में भी कई ऐसे हैं जिन्हें कर्म कुकर्मों का मध्यवर्ती अन्तर नहीं मालूम। मालूम भी है तो परिपालन में जिनकी निष्ठा नहीं। उन्हें जीवधारियों में तो गिना जा सकता है पर मानवी गरिमा को अपनाने वाले मनुष्यों में नहीं। ऐसे लोग हेय स्तर के हैं। उनके कर्म भी बालको जैसे होते हैं और उनके प्रतिफल भी क्षमा कर देने जैसे स्तर के। छोटे बालक माता के साथ सोते हुए भी मल मूत्र त्याग देते हैं। उनकी बड़ों जैसी भर्त्सना नहीं होती। कोई बड़ी आयु का व्यक्ति ऐसे अनुचित कर्म करे तो उसकी भर्त्सना भी की जायगी और प्रताड़ना भी दी जायगी। विवेकहीन मनुष्य भी इसी श्रेणी में आते हैं और चेतना की दृष्टि से गये बीते हुए भी। वे पशु प्रवृत्तियां अपनाने पर दण्डनीय नहीं माने जाते।
दण्ड पुरस्कार के योग्य मनुष्यों में वे ही माने जाते हैं जो आचार की दृष्टि से भले बुरे का अन्तर समझते है और उनका परिपालन करने पर दण्ड पुरस्कार का प्रतिफल समझते हैं। मानवी गरिमा का उत्तरदायित्व मिला और उसके निबाहने, न निबाहने का दण्ड पुरस्कार प्रकृति, ईश्वर या समाज की और से अवश्य मिलेगा।
मनुष्य अपने आप में औचित्य अनौचित्य के अन्तर को समझता है, साथ ही उन्हें अपनाने पर अपने भीतर जो प्रतिक्रिया होती हैं, वही विकसित चेतना की प्रतीक हैं। उसी स्तर की आत्मा अपने आप दण्ड पुरस्कार प्राप्त कर लेती है। आत्म प्रताड़ना और लोक भर्त्सना की पीड़ा उन्हें उतनी ही असह्य प्रतीत होती है जितनी किसी अविकसित को चाबुकों से पीटने की पीड़ा। इसी से उनके पुण्य परमार्थ के कारण दूसरों को जो सुख सुविधा बनती है उज्ज्वल भविष्य का आधार बनता है उसका परिणाम कर्ता को अधिक सुखद अनुभव होता है। जिन्हें प्रत्यक्ष लाभ है वे तो उस सुविधा को ही समझा पाते है किन्तु कर्ता को सत्कर्म करने से आत्मा में जो पवित्रता और प्रखरता का अंश बढ़ता है वह अपेक्षाकृत कहीं अधिक श्रेयस्कर होता है।
इस मिले हुए श्रेय के आधार पर महामानव, देवात्मा ऋषि, सिद्ध पुरुष बनने का अवसर मिलता है। सत्कर्म कर्ता इतने भर से यह अनुभव करता चलता है कि उसने स्वर्ग और मुक्ति जैसा प्रतिफल प्राप्त कर लिया है। स्वर्ग उच्चस्तरीय दृष्टिकोण को कहते हैं एवं मुक्ति भव बन्धनों से, हेय कर्मों से छुटकारा पा लेने वाली प्रवृत्ति को। ऐसे व्यक्ति नर होते हुए भी नारायण, पुरुष होते हुए भी पुरुषोत्तम कहलाते हैं। अपने आप को वे वैसा ही ऊँचा उठा हुआ अनुभव करते हैं। उनके द्वारा जो श्रेष्ठ कृतियाँ बन पड़ती हैं, वे कमल पुष्प की तरह महकती हैं और व्यक्ति अपने आप में आनन्द विभोर बना रहता है। दूसरे उनका अभिवंदन और अनुकरण करते हैं। आत्मिक क्षेत्र में विकसित मनुष्यों के लिए इतना उपहार परिपूर्ण संतोष दायक होता है।
ऐसे मनुष्य जाने अनजाने में किसी के साथ दुर्व्यवहार कर बैठते हैं तो उसका दुख उन्हें अपने निज के दुख से कही अधिक कष्ट कारक होता है। “आत्मवत् सर्वभूतेषु” की मान्यता अन्त करण में विकसित हो जाने पर किसी के साथ अन्याय बरतने का साहस ही नहीं पड़ता। भ्रम या आवेश में कुछ ऐसा बन भी पड़े तो उसे आन्तरिक पीड़ा तब तक सताती है, जब तक वह क्षति पूर्ति का प्रायश्चित नहीं कर लेता। इस स्थिति को नरक यातना से किसी भी प्रकार कम कष्ट ऽऽऽऽ नहीं मानते। क्योंकि अब न सही आगे चलकर दुष्कर्मों का प्रतिफल तो भुगतना पड़ेगा। जिनकी अन्तरात्मा जितनी विकसित है, उसी अनुपात में उन्हें शुभ अशुभ काम करने का आनन्द और कष्ट भी होता है। इतना ही नहीं इसी आधार पर उन्हें प्रगति शील बनने का अवसर मिलता है, जब कि ऽऽऽऽ कर्म बन पड़ने पर जन सहयोग और प्रगति का अवसर हाथ से निकल जाता है।
मनुष्य का चित ही पौराणिक चित्रगुप्त के बही खाते में सब भले बुरे कर्म लिखे जाते हैं और समयानुसार उनको दण्ड पुरस्कार मिलते हैं। यह अपना चित ही है, जिस पर टेप रिकार्डर के टेपों की तरह सब कुछ अंकित होता रहता है और समयानुसार उसका प्रतिफल सामने आता जाता है। यह स्वसंचालित प्रक्रिया हैं। इसके लिए अन्य किसी न्यायाधीश की आवश्यकता नहीं पड़ती।
विकसित मनुष्य में अपना शरीर और मन ही नहीं अपना समाज भी मिल जाता है। यही तीनों देवता है समाज गत दंड पुरस्कार भी शासन की ओर से मिलते हैं। इसीलिए व्यक्ति की तरह ही समाज को भी प्रबुद्ध एवं न्यायशील होना चाहिए। उसे कानून, सबूत, वकील जैसे जाल जंजाल में न फँस कर स्वयं अपनी ओर से प्रजाजनों के चरित्रों तथा कृत्यों का पता लगाना चाहिए। समाज भगवान का प्रतीक है। जिसे शासन द्वारा प्रताड़ित तिरस्कृत किया गया उसकी अप्रामाणिकता उन्नति के विकास के द्वार अवरुद्ध कर देती है और वह अपना स्तर गिरा कर पाप का समुचित दण्ड प्राप्त कर लेता है। जिसने सत्कर्म करके प्रशंसा पाई और जिसमें शासन ने कोई खोट नहीं ढूंढ़ा, वह व्यक्ति ईश्वरीय पुरस्कार का भागी बन गया।
भगवान को एक एक व्यक्ति के कर्म और स्तर का लेखा जोखा रखने और तदनुरूप स्वर्ग नरक में भेजने की आवश्यकता नहीं पड़ती। उनका बनाया स्वसंचालित तंत्र ही ऐसा समर्थ है, जिसके अनुसार हर व्यक्ति अपने कृत्य एवं स्तर के अनुरूप अपनी अन्तरात्मा-समाज तथा शासन द्वारा दण्ड पुरस्कार प्राप्त करता रहता है।
दुष्प्रवृत्तियां मनः क्षेत्र में एक प्रकार का कुहराम मचाये रहती हैं। फलतः अन्तराल में ऐसी विपन्नता छाई रहती है जो शारीरिक और मानसिक रोगों का सृजन करती रहे और उस आधार पर व्यक्ति हाथों हाथ दण्ड पुरस्कार प्राप्त करता रहे। शरीर की विधि व्यवस्था मात्र रक्त माँस से ही नहीं चलती। उसका सूत्र संचालन करने वाले प्राण शक्ति का उद्गम मस्तिष्क में रहता हैं। अवाँछनीय कृत्यों द्वारा यह मस्तिष्कीय चेतना विकृत स्तर की बनती है। फलतः अनेकों रोग उठ खड़े होते हैं और वे साधारण दवा दारु से भी अच्छे नहीं होते। यह प्रत्यक्ष दण्ड व्यवस्था है।
जिसे सत्कर्म करने, सद्भाव एवं सज्जनतापूर्ण व्यवहार का अभ्यास रहता है, उसकी प्राण चेतना में प्रगतिशील तत्व भरे रहते हैं। अतएव उनके गुण, कर्म, स्वभाव में ऐसे तत्वों का बाहुल्य रहता है, जिसके सहारे मन प्रसन्न रहे। उत्साह, साहस और परमार्थ भरी उमंगों की कमी न पड़े। ऐसे व्यक्ति सर्वोपयोगी योजनाएँ बनाते हैं और आपके आत्मबल के सहारे उन्हें पूरी कर गुजरते हैं। जिस व्यक्तित्व का पर्यवेक्षण करने से अनेकों का उत्साह बड़े, अनेकों सन्मार्ग पर चलें, अनेकों अपनी कुचाल का परित्याग करें, समझना चाहिए कि वह मनुष्य से ऊँचा उठ कर देव श्रेणी में गिना जाने योग्य हो गया। देवता पारस पत्थर के समान होते हैं जो भी संपर्क में आता है वह सोने का बन जाता हैं। जिनने अपने जीवन में ऐसी विभूतियाँ अर्जित करली, उनका जीवन हर दृष्टि से धन्य ही माना जाता है। वे देव मानव, ऋषि बन जाते हैं। भूसुर कहलाते हैं। वे स्वर्ग स्तर का जीवन यहीं जीते हैं यही मुक्ति पाते हैं।
एक लकड़हारा जंगल से नित्य लकड़ी काट कर लाता और उन्हें बेच कर अपना गुजारा करता।
एक दिन लकड़हारा नदी किनारे के पेड़ पर लकड़ी काट रहा था। अचानक कुल्हाड़ी हाथ से छुट कर गहरी नदी में गिर पड़ी। निराश लकड़हारा पेड़ के नीचे बैठ कर रोने लगा। परिवार का पेट कैसे भरेगा।
डस पेड़ पर एक देवता रहता था उसे उस गरीब के ऊपर दया आई और सहायता करने का मन बना। देवता नदी में उतरा एक सोने की कुल्हाड़ी लेकर आया लकड़हारे को दी। उसने कहा यह मेरी नहीं है। मेरी तो लोहे की थी बही चाहिए।
देवता ने दूसरी डुबकी लगाई। अब की बार चाँदी की लाया। उसे भी लकड़हारे ने वही उत्तर देकर वापस कर दी। तीसरी बार तांबे की कुल्हाड़ी निकल आई वह भी लकड़हारे ने उसी उत्तर के साथ वापस कर दी।
अन्त में देवता लोहे की कुल्हाड़ी आया उसे उसने प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार कर लिया और देवता को सहायता के लिये हार्दिक धन्यवाद दिया।
देवता लकड़हारे की ईमानदारी पर बहुत प्रसन्न हुआ। उसने सोने की, चाँदी की, लोहे की तीन कुल्हाड़ियां उसे उपहार स्वरूप प्रदान की। ईमानदारी अपना कर लकड़हारा नफे में भी रहा और देवता का कृपा पात्र भी हुआ। यशस्वी भी बना।
जिंदगी का सबसे बड़ा सत्य है- मृत्यु। मरने के पश्चात् जीवन क्या होगा? क्या नहीं होगा? कुछ भी निश्चयपूर्वक नहीं कहा जा सकता है पर मृत्यु अवश्य होगी। यह एक ऐसी घटना है जिसकी अनिवार्यता सुनिश्चित है। अन्य घटनाओं की सम्भावनाओं को टाल पाना भी शायद संभव बन पड़े। पर इसको टालना किसी के लिए किसी भी तरह संभव नहीं।
अस तथ्य से सभी सुपरिचित हैं फिर भी जाने का, काया को छोड़ने का भय लोगों को कँपा देता है। जितना भय मरने से होता है उतना शायद किसी से भी नहीं। इसके प्रमुख कारणों में से एक वह भी है कि मरने से अस्तित्व का नष्ट होना मान लिया जाता है, जब कि वास्तविकता ऐसी नहीं है। भारतीय दर्शन मृत्यु को आत्मा का देह परिवर्तन मात्र मानता है। पुराने कपड़े उतार कर नये कपड़े पहनने की तरह आत्मा पुराना जीर्ण शीर्ण शरीर छोड़ कर नया शरीर धारण करती है। यह तथ्य दार्शनिक ही नहीं, अपितु विज्ञान सम्मत भी है।
तुरन्त देह धारण न करने की स्थिति में आत्मा सूक्ष्म लोकों में निवास भी करती है। रामकृष्ण लीला प्रसंग कं रचनाकार तथा उनके ही शिष्य स्वामी सारदानंद ने एक घटना का उल्लेख करते हुए कहा है “परमहंसदेव की मृत्यु के बाद माँ शारदा बहुत दुखी हुई उनके दुख को शाँत करने के लिए राम कृष्ण ने उनके समक्ष सूक्ष्म ज्योतिर्मय शरीर से प्रकट हो कर कहा चिन्ता क्यों करती हो? मैं मरा कहाँ बस एक कमरे से दूसरे कमरे में आया हूँ और कुछ नहीं” निश्चित ही मृत्यु ऐसी ही है।
मरने से भयभीत होने का अन्य कारण है कि लोग मृत्यु को बहुत ही यंत्रणादायक एक दुःखदायी प्रक्रिया मानते है। समझा जाता है कि मरने के समय भयंकर वेदना होती है। तथ्यों का अन्वेषण करने पर यह धारण भी निर्मूल सिद्ध हुई हैं। वैज्ञानिकों ने एकत्र किए गये तथ्यों के आधार पर यह स्पष्ट किया है कि यह धारणा गलत है। यह तथ्य उन घटनाओं का संकलन है जिन में व्यक्ति आकस्मिक मृत्युँ को प्राप्त हुए एवं पुनः जीवित हो गये या जिनकी थोड़े समय के लिए मृत्यु हुई थी।
इस विषय पर तमाम पुस्तकें भी लिखी गई हैं जिस में एक है-”जौन वेस्ट” जिस के रचयिता हैं-एस॰ एस॰ वार्ड उन्होंने अपने शोध अध्ययन का आधार उन व्यक्तियों को चुना है जो थोड़े समय के लिए मरे थे। घटनाओं की इसी श्रृंखला में एक व्यक्ति की घटना को उसी के शब्दों में वर्णन करते हुए कहा है-”मृत्यु के आगमन पर मुझे एक बोझ सा अनुभव होने लगा। धीरे-धीरे ऐसा लगा कि बोझ खिसकता जा रहा है। कुछ ऐसी अनुभूति थी जैसे हाथ को दस्ताने से खींचा जा रहा हो। अंधकार जो पहले गहन था बाद में समाप्त हो गया। अब मैं बिल्कुल मुक्त था और अपने शरीर को विस्तर पर पड़े देख रहा था। उस समय का संस्मरण याद है जब किसी ने कहा अब यह चला गया। बाद में कमरा एवं अन्य वस्तुएँ लुप्त होती गई और तब मैं खूब सूरत दुनिया में था।
ऐसी ही घटनाओं का अध्ययन “डेथ एन इन्टरेस्टिंग जर्नी “ नामक पुस्तक में शो एन्विन ने किया है। उन्होंने व्यापक छान-बीन एवं जाँच पड़ताल के आधार पर इस पुस्तक की रचना की है इस में उन्होंने स्पष्ट किया है कि मृत्यु के समय घटना बहुत तेज घटती है एवं जीवात्मा एक ऐसी दुनियाँ में प्रवेश करती है जहाँ बहुत तेज कंपन होते हैं। मृत्यु के समय होने वाले अनुभवों का आधार अपना अपना विश्वास होता है किन्तु यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि जीवात्मा की चेतना शरीर चेतना बोध शक्ति से बहुत सूक्ष्म एवं आगे होती है। इसलिए वह पुराने मकान को छोड़ने के लिए पहले से ही तैयार रहती है। यहाँ तक कि दुर्घटना घटने की स्थिति में जीवात्मा पहले ही शरीर को छोड़ देती है। इसी कारण इस तरह मरने वाले व्यक्तियों को अपने शरीर के चोट का टूट−फूट का ना तो भान होता है और न हों किसी प्रकार की पीड़ा होती है।
आकस्मिक मृत्यु को प्राप्त हुए व्यक्तियों को इस लिए भी पीड़ा की अनुभूति नहीं होती क्योंकि उनकी जीवात्मा पहले ही शरीर छोड़ चुकी होती है। उदाहरण के तौर पर एक सैनिक को, जिसे युद्ध भूमि में लड़ते हुए मस्तिष्क में गोली लगती हे कुछ अनुभव नहीं होता बल्कि वह पूरे होश में देख पाता है कि एक क्षण पूर्व वह क्या था,यद्यपि स तरह की घटनायें बाह्य दृष्टि से बड़ी दर्दनाक एवं कारुणिक दिखती है किंतु जो मर जाते हैं उनके लिए मृत्यु कोई विस्मय कारक घटना नहीं होती।
उक्त पुस्तक में वर्णित एक अन्य विवरण के अनुसार स्विट्जरलैंड निवासी जैसोन एक बार बर्फीले तूफान में भटक गये। वहाँ उनकी प्राणाँत जैसी स्थिति हो गयी। बाद में जब उन्हें ढूंढ़ा गया और चिकित्सा उपचार से वह सौभाग्य से पुनर्जीवित हो गये तो उन्होंने बताया कि-मैं मार्ग की तलाश में कई घंटे तक भटकता रहा जब मार्ग नहीं मिला तो थक कर गिर पड़ा इसके बाद होश नहीं रहा। केवल इतना याद है कि में उस अवस्था में बहुत सुख एवं आनंद अनुभव कर रहा था।
मृत्यु के संबंध में जितने भी लोगों को अनुभव करने का अवसर मिला है या जिन व्यक्तियों ने भी इस तरह के विवरण या दुष्टाँव संकलित किये हैं, उन सभी का यही मंतव्य है कि मृत्यु कोई दुखद घटना नहीं है।
इसी तरह का प्रतिपादन स्वामी अभेदानंद ने अपने ग्रन्थ “लाइफ आफ्टर डेथ” में किया है। उन्होंने अपने गहन अध्ययन के आधार पर निष्कर्ष प्रस्तुत किया है कि मृत्यु दुखद के स्थान पर सुखद ही है क्योंकि पुराने शरीर के स्थान पर नवीन शरीर धारण करने का सुअवसर मिलता है जिस पर जीर्ण वस्त्र के स्थान पर नवीन वस्त्र धारण करने पर लोगों को प्रसन्नता होती है। उसी तरह उससे भी अनन्त गुनी प्रसन्नता जीवात्मा को नया शरीर पाने पर होती है।
दुःख की उत्पत्ति का एक मात्र कारण”आसक्ति ही हे वह चाहे शरीर से हो या कुटुम्बियों से जिसने इस आसक्ति पर विजय पाली वह कबीर की ही तरह मस्ती में गाता है”जिस मरने से जग डरे, मेरे आनंद “ गीता में में भी यही तत्व दर्शन समझाया गया है-” जिस प्रकार जीवात्मा इस शरीर में रहते हुए युवा एवं जरावस्था के परिवर्तन को प्राप्त होता है उसी प्रकार देह परिवर्तन भी है इससे धीर पुरुष मोह ग्रस्त, भयभीत नहीं होते।”
इस तत्व दर्शन को गम कर लेने पर मृत्यु एक सुखद यात्रा भर लगती है। इससे भयभीत होने का न तो कोई कारण है न औचित्य
गुरु शिष्य साथ साथ लम्बी तीर्थ यात्रा पर जा रहे थे। नित्य कर्म का विषय यह बताया था कि एक शोध जाता दूसरा कुएँ पर बैठा रहता। दूसरा जब लौट कर आता तो उसे जल देता स्नान कराता। इस प्रकार बारी बारी दोनों निबट लेते।
जब कभी शिष्य की बारी शौच जाने की आती तो पोटली तो उन्हें सौंप जाता पर यह आगाह करना न भूलता कि चोर उठाईगीरों से सावधान रहना चाहिए। समय बड़ा खराब है।
जब यह आगाही नित्य नियम बन गई तो गुरु के मन में खटका हुआ कि जरूर दाल में कुछ काला है। उनने एकान्त पाकर उस पोटली को धीरे से खोला। उसमें सोने का बड़ा सा टुकड़ा रखा था। वह उसने बड़े प्रयत्नपूर्वक जमा किया था और सदा साथ रखता था। चोर आदि का भय उसी के कारण लगा रहता था।
गुरु ने सारी परिस्थिति का अनुमान लगाया और उस सोने को गहरे कुएं में पटक दिया। जोर की आवाज हुई। तो कोई खतरा समझ कर शोध कृत्य को अधूरा छोड़ कर उस की ओर भागा। गुरु से पूछा -क्या हुआ? आवाज बहुत जोर की हुई थी। गुरु ने कहा-बेटा! तेरे साथ चलने वाला चोर तुम्हें बहुत हैरान करता था। रात को भी चैन की नींद नहीं लेने देता था। आज मैंने उसे पकड़ लिया और इतना गहरा पहुँचा दिया कि अब वापस लौटने की उम्मीद नहीं है।
इसके बाद शिष्य निश्चित भी रहने लगा और रात को पूरी नींद सोने भी लगा। अनावश्यक धन जहाँ भी रहता है वहाँ विपदा का कारण बनता है। डर भी उसी कारण सताता रहता है। यदि उसे संचय न करके किन्हीं उपयोगी कामों में लगाया जाय तो उससे सदा प्रसन्नता और निश्चिंतता बनी रह सकती है। शिष्य का निश्चित बन सकना इस उपाय से संभव हुआ।
सभी प्राणी स्वच्छंद विचरते है। उनके लिए कोई निर्धारण या आचार- विचार- व्यवहार निश्चित नहीं होते। इसलिए वे न अपने निजी व्यक्तित्व को गरिमा सम्पन्न बना पाते है ओर न जीवन निर्वाह के अतिरिक्त ऐसा कुछ कर पाते है जिसे महत्वपूर्ण ओर अभ्युदय स्तर का समझा जा सके गौरव गरिमा के आधारों को जो न अपना सके उन्हें गया गुजरा ही कहा जा सकता है। पशु-पक्षी, कीट पतंगे तो इस स्तर के होते ही है, परन्तु कुछ मनुष्य देहधारी भी वैसा ही जीवन जीते ही है, परन्तु कुछ मनुष्य देहधारी भी वैसा ही जीवन जीते है। वे ऐसे स्वेच्छाधारी रहते है, जिन्हें मनुष्यों के साथ जुड़े कर्त्तव्यों का ज्ञान रहता है, न उत्तरदायित्वों का। वे न मर्यादाओं से बचने की उन्हें चिन्ता रहती है। ऐसे लोगों को नर पामरों में गिना जाता है। अनगढ़ ओर असभ्य उन्हीं को कहते है उनकी अन्तः चेतना अनुशासन में बँधने को तैयार नहीं होती। भूत–पलीतों की तरह श्मशान सुनसान में निवास ओर डरते-डराते हेय स्तर का जीवन बिताते है।
अनुशासन के अनुबंधों को लागू करने कराने के लिए अपने अपने ढंग से धर्म, शासन ओर समाज सभी ने जोर दिया है। धर्म, कर्त्तव्य, पुण्य, परमार्थ, संयम तप आदि के माध्यम से दिशा निर्देश ओर स्वर्ग नरक के प्रलोभन अथवा भय इसी उद्देश्य से दिए जाते रहे है। शासकीय संविधान नियम दण्ड संहिता आदि की रचना भी इसलिए की गयी है। समाज में भी उद्दण्ड उच्छृंखल लोगों के प्रति भर्त्सना-प्रताड़ना बरती जाती है। उनके प्रति घृणा उपेक्षा, विरोध ओर बहिष्कार जैसे क्रम भी अपनाये जाते है। अप्रमाणिक समझे जाने वालों पर से सबका विश्वास उठ जाता है। किन्हीं महत्वपूर्ण कामों को प्राप्त करने का अवसर उनके हाथ से निकल जाता है। इसलिए मानव समाज के सभ्य सदस्य बनने के अनुशासनों का परिपालन सहज अभ्यास के साथ अविच्छिन्न रूप से जुड़ा रहना चाहिए।
इन अनुशासनों के परिपालन के संदर्भ में स्काउटिंग आन्दोलन के विचार अधिक समीचीन है। उस निर्धारण के सूत्रधारों ने ऐसी आचार संहिता बनायी है, जिसे हलके फुलके मानसिक विकास वाले भी प्राथमिक शिक्षा की तरह अपना सके। किसी को उनकी अनिवार्यता स्वीकारने ओर अभ्यास में उतारने की तत्परता बरतने में कोई बड़ी कठिनाई अनुभव न हो, ऐसी दृष्टि रखी गयी है। स्काउट आन्दोलन को व्यक्तित्व की गरिमा, नागरिकता का निर्वाह ओर सामाजिक शालीनता का सामान्य परिपालन भी कह सकते है। इतना सीख लेने के उपरान्त ही कोई किसी महत्वपूर्ण एवं उच्चस्तरीय क्षेत्र में प्रवेश कर सकने योग्य बनता है। प्रगति ओर प्रतिष्ठा की इस आचार संहिता को अक्षर ज्ञान जैसा श्री गणेश भी कह सकते है।
एक वर्ष को होते-होते बच्चे को अभिभावक उँगली पकड़कर चलना सिखाते हे। सही रीति से पैर रखने ओर सही दिशा में चलना अबोध बालक इसी प्रकार सीखता है। सभ्यता के क्षेत्र में प्रवेश करते हुए भी किसी व्यक्ति को रास्ते पर बायीं ओर चलना, पंक्ति बद्ध होकर रास्ता पार करने की, काम पर जाने की विधि सीखनी पड़ती है यह प्रथम नागरिक अनुशासन है। यदि लोग भेड़ चाल चलने लगे, तो एक दूसरे से टकराये ओर धमा चौकड़ी का माहौल बनने लगे। बाँयी ओर चलने ओर लाइन लगाने की रीति नीति हर किसी के अभ्यास में लायी जानी चाहिए। ढेरों दुर्घटनाएं सभ्यता के इन सूत्रों की उपेक्षा, उनके उल्लंघन के कारण ही होती है। वाहन चलाने वाले रास्ता चलने वाले का ध्यान नहीं रखते, मन माने ढंग से चलते है। राहगीर भी बेतरतीब चलते है ओर वाहनों की चपेट में आकर नुकसान उठाते, जान भी गँवाते है। नुकसान केवल उन्हें ही नहीं होता, बचाने वालों, चिकित्सकों, संबंधियों ओर शासन को भी इस असभ्यता के कारण हैरानी उठानी पड़ती है। पर्व त्योहारों, मेलों आदि के हर्ष भरे वातावरण में थोड़ी सी असभ्य आदतें माहौल ही बदल देती है। ऐसे प्रसंगों पर हर वर्ष दुर्घटनाएं होती रहती है। सैकड़ों लोग भीड़ के दबाव में पैरों तले कुचलकर मर जाते है। यह सब अनगढ़पन के ही चिन्ह है। सभ्य देशों में स्टेशन पर रेलगाड़ियां कुछ ही मिनट रुकती हे। व्यवस्थित, पंक्तिबद्ध क्रम के अभ्यस्त यात्रियों के उतरन चढ़न की क्रिया मिनटों में सरलता से पुरी हो जाती है। इसके विपरीत धमा चौकड़ी मचाने वालों में किन्हीं की जेब कटती है, किन्हीं के कपड़े फटते है तो किसी का सामान छूटता-टूटता है। यह सब उपरोक्त अनुशासनों के उल्लंघन के ही फल हैं। सभ्यता के इन प्राथमिक अभ्यासों को स्काउटिंग प्रक्रिया में प्रथम नियम मानना उचित ही है।
अनुशासन शक्तिपुँज है। बिखराव में समर्थ भी असमर्थ बन जाता है। सूर्य किरणों को केवल एक इंच परिधि के आतिशी शीशे द्वारा केंद्रित किया जाय तो देखते-देखते आग लग जाती है। बंदूक की नली के अनुशासन में रहने वाली बारूद लम्बी दूरी तक गोली से लक्ष्य भेद करती है। केन्द्रीकृत भाप से इंजन में शक्ति आती है मनुष्य के कण-कण में अजस्र सामर्थ्य है, पर वह अनियमित रहने से बिखरी और अस्त व्यस्त रहती है। उससे कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं होता। सेना को शक्ति मान माना जाता हैं, क्योंकि उस में अनुशासन रहता है। संख्या तो भीड़ की अधिक होती है पर वह केवल गंदगी फैलाती और समस्यायें पैदा करती है। चर्चाओं में सैनिक अनुशासन सराहा जाता है। स्काउटिंग का केन्द्रीय दर्शन भी यही है। उस धारा को अपनाने वालों को अनुशासित ही रहना पड़ता है।
अनुशासन की मनोवृत्ति और प्रवृत्ति भली प्रकार विकसित, पुष्ट होती रहे इसके लिए स्काउटिंग में वर्दी से लेकर कवायद, ट्रेनिंग आदि में पग-पग पर ध्यान रखा जाता है। यह सामयिक एवं प्राथमिक अभ्यास है। वस्तुतः उसका चरम लक्ष्य यह है कि इस विद्या का आश्रम लेकर व्यक्ति पूरी तरह अनुशासित और कर्तव्यपरायण बने। एकता, समता को निरंतर चरितार्थ करता रहें। इसी हेतु स्काउट से कई प्रकार के क्रिया कलाप कराये जाते हैं। कई प्रतिज्ञाओं से, सिद्धान्तों से और आदर्श के अनुबंधों से बांधा जाता है। तत्वतः यह सभ्यता का शुभारंभ है।
स्काउटों को ईश्वर के प्रति, राष्ट्रीय कर्तव्यों के प्रति स्काउट अनुशासन-सेवा व्रत के प्रति पूर्ण वफादारी बरतने की प्रतिज्ञा करनी होती है। संक्षेप में इसे आदर्शों के प्रति असीम अविच्छिन्न आस्था कहा जा सकता है, इसका निर्वाह अनीश्वरवादी भी कर सकते हैं। मानव जीवन की सार्थकता एवं सुन्दरता इसी में है। स्वेच्छाचारी तो हेय योनियों के प्राणी होते हैं। वे किसी का भी खेत चर सकते हैं। किसी रिश्ते को ध्यान में रखे बिना स्वच्छंद यौनाचार कर सकते है। गंदगी में लोटपोट होते रह सकते हैं। परन्तु मनुष्य के लिए यह सब आचरण हेय हैं। उसे स्वच्छंद से लेकर शिष्टाचार तक तथा आत्मीयता से औचित्य तक सभी पक्षों का ध्यान और संतुलन रखना पड़ता है।
स्काउट में सैनिकों जैसे अनुशासन एवं पराक्रम तथा श्रेष्ठ नागरिक की शालीनता का समावेश किया जाता है। उन्हें अपनी वर्दी स्वच्छ ओर सुव्यवस्थित रखनी होती है पूरी पोशाक, बैज, स्कार्फ सभी करीने से धारण करने होते हैं। कदम मिलाकर चलना, परेड में पूर्ण सैनिक अनुशासन मानना, आदेश का तत्काल पालन करना, उनके सहज क्रम में घुले मिले रहें, इसका प्रयास किया जाता है। खेल कूद में बौद्धिक और शारीरिक दोनों के विकास के अनुरूप क्रम अपनाये जाते हैं। स्वस्थ स्पर्धा, आगे निकलने, साहस दिखाने, पराक्रम का परिचय देने जैसे सजग मनुष्य में रखे जाने योग्य अनेक गुणों का विकास किया जाता है। अपना भोजन पकाना, अपनी सुरक्षा व्यवस्था बनाना और कैम्प फायर के माध्यम से स्वस्थ मनोरंजन की व्यवस्था भी स्वयं बनाना उनके अभ्यास में लाया जाता है यह सभी गुण हर प्राणवान नागरिक में विकसित किये जाने चाहिए, चाहे यह प्रक्रिया स्काउटिंग के अवलम्बन से संपन्न हो अथवा अध्यात्म की प्राथमिक कक्षाओं में पढ़ कर। सच्चा अध्यात्मवादी वही है, जो अनुशासित है। यह एक ध्रुव सत्य है।
शेखसादी रोज मस्जिद नमाज के लिये जाया करते थे। उनके पैर में टूटे जूते थे। एक दिन एक रईस नमाज के लिये आया। उसके पैर में सुनहरी मीनाकारी के जूते थे। शेखसादी ने पूछा-आप कितने दिन बाद नमाज के लिये आते है? उसने कहा वर्ष में एक बार। शेखसादी चुप हो गये उनने मन ही मन ईश्वर को कोसा और कहा मैं रोज पाँच वक्त नमाज पढ़ता हूँ। मेरे पास फटे जूते और यह रईस वर्ष में एक बार आता है इसके लिये सोने की जरी वाले जूते। थोड़ी देर बाद एक दूसरा व्यक्ति मस्जिद में आया उसके पैर ही नहीं थे। घिसट घिसट कर चलता था। इसके साथ अपना मुकाबला करते हुए उन्होंने कहा- धन्य है परमेश्वर! तूने मुझे जूते न सही पैर तो सही सलामत दिये हैं जिनके द्वारा जिन्दगी के सारे काम चला लेता हूँ। संपन्नों के साथ मुकाबला करने पर हर किसी को अपने अभावों का भान होता है किन्तु यदि गये गुजरों के साथ अपनी तुलना की जाय जो संतोष के पर्याप्त आधार मिल जाते है।...
कभी समझा जाता था कि हृदय मनुष्य का जीवन केन्द्र है। उसकी धड़कन ही जीवन तंत्र का सूत्र संचालन करती है। रक्त का भण्डार उसी पर आश्रित है आर साहस का शक्ति का प्रतीक भी वही है। पर अब शरीर विज्ञान के शोध कर्ताओं ने वह मान्यता बदल दी है। अब मस्तिष्क के मध्य केन्द्र को शक्ति का पुँज माना जाने लगा है। उस में भरा हुआ भूरा-लिवलिवा पदार्थ ग्रे मैटर चिन्तन के काम आता है। कल्पना, बुद्धि विचारणा आदि उसी के माध्यम से क्रियारत रहते है। सूझ-बूझ समझदारी और योजनाओं का निर्माण इसी क्षेत्र में होता है। यह अगला भाग है। पिछले भाग में अचेतन की स्वचालित गतिविधियों का स्वसंचालित तारतम्य बनता है। स्वास–प्रश्वास, आकुँचन-प्रकुँचन, निमेष-उन्मेष, निद्रा जागरण आदि का ढर्रा उसी की प्रेरणाओं से गतिशील रहता है। भीतरी अवयव उसी की प्रेरणा से काम करते हैं और विभिन्न प्रकार के पाचन स्राव इसी केन्द्र के नियंत्रण में अपनी गति विधियाँ चलाते हैं।
इसलिए प्राण शक्ति का प्रमुख केन्द्र अब मस्तिष्क को माना जाने लगा है। उसके सही रहने पर मनुष्य साधारण साधनों से भी स्वस्थ एवं परिपुष्ट बना रहता है। इसके विपरीत उसका संतुलन बिगड़ जाने पर अनेकों अवयव लड़खड़ा जाते हैं और अनेकों रोग उठ खड़े होते हैं। अब संसार भर के शरीर विज्ञानी इस निष्कर्ष पर पहुँचते जा रहे है कि शरीर को निरोग रखने या रोग मुक्त करने के लिए मानसिक तंत्र को संभाला सुधारा जाना चाहिए। उसके बिना दवा दारु और शल्य क्रिया अपना वह उद्देश्य पूरा नहीं कर सकती जो उसे करनी चाहिए। इस लिए अब प्रधानता हृदय से हट कर मस्तिष्क पर आधारित हो गयी है। धड़कन बन्द से अब मृत्यु नहीं मानी जाती वरन् यह देखा जाता है कि मस्तिष्क की विद्युत तरंगों का उठना बन्द हुआ या नहीं।
व्यक्ति ब्रह्मांड का एक घटक है। उसी प्रकार धरती इस निखिल विश्व की छोटी इकाई। पृथ्वी के पास जो वैभव है वह उसका नहीं है वरन् अन्तर्ग्रही है। उसे उर्वरता तक सूर्य से मिलती है। इसके अतिरिक्त धरातल पर काम करने वाली अनेकानेक क्षमतायें अन्यान्य ग्रह नक्षत्रों से उपलब्ध होती हैं। वे उतरी ध्रुव को चुम्बकत्व द्वारा खींची जाती है और जितनी मात्रा आवश्यक है उतनी काम में लेने के पश्चात् दक्षिणी ध्रुव मार्ग से निकाल बाहर की जाती है। इसी आधार पर पृथ्वी की विशिष्टता और वरिष्ठता बनी हुई है।
मस्तिष्क का मध्य केन्द्र रेटिकुलर एक्टीवेटिंग सिस्टम है। उस में से हर क्षण विद्युतीय चिनगारियाँ उछलती रहती हैं। यही है वह विद्युत उत्पादक केन्द्र जो समस्त शरीर को जीवनीशक्ति की प्राण विद्युत की पूर्ति करता है। जीवन और मृत्यु का दारोमदार इसी के द्वारा उत्पन्न किये स्फुल्लिंगों पर निर्भर है।
यह उद्गम उद्भव मात्र शरीर में काम आने वाली क्षमताओं का ही उत्पादन नहीं करता वरन् आध्यात्मिक स्तर के दिव्य अनुदान भी इसी केन्द्र द्वारा ब्रह्म चेतना के विपुल भंडार से खींचे जाते है और व्यक्ति दिव्य शक्तियों के साथ ताल–मेल बिठाने के लिए इसी केन्द्र के सहारे अग्रगामी होती है।
इस केन्द्र के रहस्योद्घाटन पौराणिक उपाख्यानों में अनेक प्रकार से हुये हैं। इसे कैलाश मानसरोवर बता कर उस पर उमा महेश की स्थापना की गई हैं। यही क्षीरसागर हैं। इसी में सहस्त्र मुखी शेष शैया पर लक्ष्मी नारायण शयन करते हैं। वस्तुतः यह दिव्यशक्तियों का निरूपण है। यहां स्वर्ग लोक से पृथ्वी पर ज्ञान गंगा का अवतरण होता है। यहाँ विष्णु नाभि से निकला वह कमल पुष्प है, जिस पर ब्रह्म विराजते हैं, सृष्टि रचते हैं और उसमें वेद ज्ञान का सम्पुट लगाते हैं।
वृक्ष का कलेवर ऊपर होता है और उसकी जड़ नीचे होती है। वृक्ष की शोभा सम्पदा ऊपर दीखती है पर उसकी जड़ जमीन में दबी रहती है। समझना चाहिए कि समूची काया एक पेड़ है और उसकी जड़ तालु में है। तालु की बनावट भी नीची ऊँची ऊबड़ खाबड़ है। उसके पीछे जो माँस पिण्ड लटकता है- जिसे युव्युला भी कहते हैं, यह समूचा भाग ब्रह्मरंध्र में अवस्थित चुम्बकत्व का अधोभाग है। उस में भी दिव्य रस भरा रहता है। कोई चाहे तो उसका खेचरी मुद्रा द्वारा रस पान कर सकता है। इस में अन्य साधनाओं की भाँति स्थिर शरीर और शाँत चित्त रखने की प्रथम शर्त तो पालन करी ही पड़ती है। इसके अतिरिक्त जिह्वा को उलट कर जितना अधिक पीछे ले जाना संभव हो उसके लिए प्रयत्न करते रहना चाहिए। जब जीभ कुछ पीछे जाने लगे और उसकी नोंक का निचला भाग जब तालु के भीतरी भाग को छूने लगे तब समझना चाहिए कि अब स्थिति ठीक बन गई।
तलु का अगला भाग तो भोजन में बोलने में काम आता रहता है उसी प्रकार जीभ की ऊपरी सतह, पिछला भाग तथा नोंक भी स्वाद बताने तथा मुँह को गीला रखने के लिए रस बहाने में लगी रहती है। अध्यात्म प्रयोजनों में जीभ का निचला भाग और तालु का पिछला भाग ही काम आता है प्रयत्न यह करना चाहिए कि जिह्वा त्रिकुटी करने लगे जैसे कि बच्चा माँ का दूध चूसता है।
यहाँ भृकुटी और त्रिकुटी का अन्तर हमें समझना चाहिए। दोनों भौहों के बीच का स्थान भृकुटी कहलाता है। तृतीय नेत्र का स्थान यही है। त्रिकुटी उसे कहते हैं, जिसमें एक रेखा दोनों कानों के बीच खींची जाय और दूसरी भृकुटी के पिछले भाग तक। तब वे दोनों जहाँ कहीं भी मिलेगी, वह स्थान त्रिकुटी कहलायेगा। साधारणतया उसे कानों के मध्यवर्ती भाग में अवस्थित समझना चाहिए। लगभग यहीं गले का माँस पिण्ड थन की तरह लटकता रहता है।
इसी त्रिकुटी स्थान में खेचरी मुद्रा का अभ्यास किया जाता है। यही ब्रह्मरंध्र का अधोभाग है। उसी को अमृत भाव-स्थली कहते हैं।
जिह्वा के निचले भाग को इसी तालु के पृष्ठ भाग से स्पर्श करना चाहिए और बहुत ही धीमी गति से इसे परस्पर रगड़ना चाहिए। यह रगड़ ऐसी हो जिससे दोनों में से किसी भी भाग पर दबाव न पड़ने पावे। रगड़ में कोई क्षति न हो वरन् ऐसा लगे मानो गुदगुदाया-सहलाया जा रहा है। छोटे बच्चे माँ का दूध पीते समय इसी स्तर की क्रिया करते है। इनके होंठ भी कोमल होते हैं और माता का चुँचुक भाग भी। तनिक सी सहलाने की क्रिया चलते ही दूध स्रवित होने लगता है। खेचरी मुद्रा में भी स्थिति होती है।
देव लोक में अमृत घट है। यह पौराणिक उपाख्यान है। समुद्र मंथन के उपरान्त थोड़ा-थोड़ा भाग देवताओं को पिलाने के उपरान्त उस घट को धन्तन्तरी की सुपुर्दगी में देव लोक में सुरक्षित रखा गया है। यह मस्तिष्क रूपी स्वर्ग का रूपक है। ध्यान धारणा यहीं की की जाती है। ब्रह्मा, विष्णु, महेश का निवास इसी में है। क्षीरसागर, मानसरोवर अमृत घट की स्थापना यहीं है। ईश्वर दर्शन और आत्मदर्शन यहीं होता है। समाधि यहीं लगती है और तुरीयावस्था का आनंद इसी स्थान पर मिलता है।
जिह्वा द्वारा तालु को सहलाने-गुदगुदाने की क्रिया द्वारा मस्तिष्क में सुरक्षित अमृत का एक भाग ऊपर से नीचे उतरता है और वह शरीर के अन्यान्य भागों में चला जाता है। ऐसी अध्यात्मवादियों की मान्यता है।
खेचरी मुद्रा के अभ्यास से आशा,उत्साह, स्फूर्ति एवं उमंग का शरीर क्षेत्र में अनुभव होता है। ज्ञानेन्द्रियाँ अपना काम तो पूर्ववत करती है पर उनका दृष्टिकोण बदल जाता है क्रिया कलाप में उत्कृष्टता का समावेश होने लगता है और क्रियाशक्ति में उत्साह जनक अभिवर्धन हुआ दीख पड़ता है। शास्त्रों में खेचरी मुद्रा के और भी अनेक प्रभावों का वर्णन है। मस्तिष्क होती हैं और चेतना शरीर अपेक्षाकृत अधिक वेग से ऊपर उभरने लगता है।
युधिष्ठिर ने जीवन में एक बार झूठ बोला था- ‘‘नरोवा कुँजरोवा” सो अन्त समय उन्हें एक दिन नरक में और सौ वर्ष स्वर्ग में रहने का निर्णय सुनाया गया। पूछा गया पहले नरक भोगेंगे या स्वर्ग।
युधिष्ठिर ने नरक का भार उतारना समझा ओर उसी के लिए अपनी सम्मति प्रदान की। तदनुसार उन्हें नरक भेज दिया गया।
युधिष्ठिर के नरक पहुँचने पर वहाँ का वातावरण बदल गया। कठोर व्यवहार करने वाले यमदूत नरम हो गये और सद्व्यवहार करने लगे। अन्य व्यवस्थाएँ भी बदलीं और कष्टकारक न रहीं। यह सब युधिष्ठिर के वहाँ रहने का ही प्रताप था।
दूसरे दिन जब उनके विदा होने का समय आया तो सभी नरकवासी दीनतापूर्वक अनुरोध करने लगे। आपके यहाँ से हमें बड़ी राहत मिलती है। हो सके तो यही रहें।
युधिष्ठिर का हृदय भर आया। उनने सदा के लिए नरक रहना स्वीकार कर लिया। अपना स्वर्ग ले जाने वाला पुण्य उन दुखियों में बाँट कर उनका त्रास हल्का कर दिया।
उनके वहाँ रहने पर नरक के वातावरण में आमूलचूल परिवर्तन हो गया। नरक की स्थिति स्वर्ग के समतुल्य बन गई।
सूर्य जिसे विश्वात्मा कहा गया है। अपनी सप्त रश्मियों के माध्यम से सृष्टि के करण-करण में सतत प्राणों का संचार करता रहता है। चाहे”वनस्पति फोटो सिन्थेसिस” प्रक्रिया द्वारा वायुमण्डल से आहार खींचकर क्लोरोफिल बनायें अथवा मनुष्य कंद, फल? हरी पत्ती का उद्गम केन्द्र एक ही है, पोले आकाश में संव्याप्त सौरशक्ति का भाण्डागार।
वैज्ञानिकों का मत है कि मनुष्य को जहाँ तक सम्भव हो, सूर्य के संपर्क में रहना चाहिए। यह केवल निरोग रहने के लिए भी जरूरी है। बलवर्धक टॉनिकों के समान कार्य करने वाली इन सप्त रश्मियों की प्रभाव क्षमता का जब विवेचन किया जाता है तो मनुष्य चमत्कृत हो उठता है।
सुप्रसिद्ध भौतिक विज्ञानी फ्रेउ रीनफेल्ड अपनी पुस्तक “किरणें दृश्य ओर अदृश्य” में लिखते है कि सौर विकिरण की तरंग दैर्ध्यों के अध्ययन के फलस्वरूप भौतिक शास्त्रियों ने अब कितने ही तत्वों को खोज निकाला है। जो सूर्य में उपस्थित है। उनके अनुसार पृथ्वी पर पाये जाने वाले सभी तत्व सूर्य और उनकी रंगीन रश्मियों में समान अनुपात में विद्यमान है। मात्र हाइड्रोजन ओर हीलियम ही अधिक मात्रा में है। प्रख्यात भौतिक विद सर नार्मन लाकयर एवं सर विलियम रैम्जे अपने अनुसंधानों के आधार पर रंगीन सूर्य रश्मियों में हीलियम तत्व को सबसे पहले खोज निकाला था। वर्णक्रममापी स्पेक्ट्रोस्कोप की सहायता से अब तक कितने ही तत्व खोजे जा चुके है। विशेषज्ञों का कहना है कि पीले रंग में पारा, आसमानी में एल्युमीनियम, हरे रंग में सीसा, लाल में लोहा, नीले में ताँबा, नारंगी रंग में सोना, ओर बैंगनी रंग में चाँदी का समावेश है। इनमें सेजिस खनिज तत्व की कमी शरीर में अनुभव हो उसे असंबंधित रंगोपचार से दूर किया ओर निवृत्त हुआ जा सकता है।
यह एक सुविदित तथ्य है कि इस सृष्टि में प्रत्येक वस्तु कुछ न कुछ रंग लिये विद्यमान है। इन रंगों के अपने -अपने कंपन होते है। शरीर के विभिन्न घटकों का भी अपना प्रकंपन होता है। इनकी कमी-वेशी शारीरिक मानसिक रोगों का कारण बनती है, जिन्हें रंग विशेष के सेवन या ध्यान द्वारा दूर किया जा सकता है।
विभिन्न रंग शारीरिक क्रिया कलापों को कई तरह से प्रभावित करते है। सुप्रसिद्ध रंग चिकित्सा विज्ञानी मेरी एंडरसन कृत “कलर हीलिंग” में बताया गया है कि लाला रंग अग्नि तत्व का द्योतक है जिससे रक्त एवं तंत्रिका तंतु प्रभावित उत्तेजित होते है। इस रंग का सेवन शरीर में ऐड्रिनलिन हार्मोन की मात्रा को बढ़ाता है साथ ही संवेदी तंत्रिकाओं स्नायुओं को क्रियाशील बनाता एवं रक्त प्रवाह को तीव्र करता है। सिंपेथैटिक नर्वस सिस्टम एवं सेरिबों स्पाइनल नर्वस सिस्टम इस रंग सक्रिय हो उठते है।
जिनके हाथ पैर सदैव ठंडे रहते हो उनके लिए लाल रंग लाभदायक होता है। विद्युतीय गुण वाला होने के कारण यह शारी के निष्क्रिय पड़े अंगों तक को चैतन्य बना देता है। इसके प्रभाव से लकवा ग्रस्त अपंग व्यक्ति भी ठीक हो जाते है। शरीर के जिस किसी भाग में गति न हो रही हो वहाँ लाल रंग का प्रकाश डालने से उक्त अंग अवयव सक्रिय एवं जीवन्त हो जाता है। वायु विकार से ग्रस्त नस-नाडियों, सर्दी के कारण उत्पन्न हुई सूजन आदि विभिन्न स्नायु मंडल को सभी रोग इस रंग रश्मि से दूर किये जा सकते है।
वैज्ञानिकों के अनुसार सूर्य के रश्मि पुँज में 80 प्रतिशत लाल तथा इन्फ्रारेड किरणें होती है। इन तप्त किरणों को हमारी त्वचा शत प्रतिशत सोख लेती है। नर्वस सिस्टम को उत्तेजित करना इन रक्त वर्ण किरणों का प्रमुख कार्य है। लाल रंग शरीर में गरमी बढ़ाता है। यही कारण है कि सर्दियों में लाल रंग के कपड़े पहने जाते है। लाल रग के कमरे में रहने से व्यक्ति सदैव उत्तेजित रहता है। इसकी अधिकता से उसकी पाचन क्रिया गड़बड़ा जाती है। वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि पृथ्वी पर पड़ने वाले सूर्य किरणों के मध्य में मंगल ···· vk tk; rks i`Foh ij yky fdj.ksa iMsaxh] ifj.kke Lo:i ml Hkw Hkkx esa jgus okys O;fDr;ksa o v;k; izkf.k;ksa esa dkyjk] pspd] ewPNkZ tSls jksx miu gks tk;saxs vkSj egkekjh Qsy tk;xhA mlh rjg ftu ioZr Ja[kykvksa dk jax yky gksxk] mldsa pgq vkSj fuokl djus okyksa dk LokLF; [kjkc jgsxkA jax fpfdRlk esa izk; gn; jksfx;ksa dks yky jax ds diMsa iguuk oftZr ekuk tkrk gSA ;gk vklekuh] gydsa uhys ;k lQsn diMsa iguus dh lykg nh tkrh gSA
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रंग चिकित्सा विशेषज्ञों का कहना है कि पीले रंग के प्रकंपन तंत्रिकातंत्र की मोटर तंत्रिकाओं को सक्रिय बनाते हैं और माँसपेशियों में ऊर्जा पैदा करते हैं। पाचन−तंत्र पर इस रंग का प्रयोग तत्सम्बन्धित रोगों का निवारण करता और यकृत को सामर्थ्य प्रदान करता हैं। रक्तशोधन एवं त्वचा रोगों को दूर करने के गुण भी इस रंग में विद्यमान हैं। लसिका ग्रंथियाँ भी इससे सक्रिय बनती और सही रूप से अपना कार्य करती हैं।
प्रकाश वर्ण क्रम में हरा रंग मध्य में आता हैं। कककक फ्ह्न.द्म क्द्मस्द्भ द्बभ्॥द्मद्मश द्गह्यड्ड॥द्मद्ध ;द्द द्ग/;द्ग द्गद्मह्वद्म फ्;द्म द्दस्ड्ड्न द्दद्भह्य द्भड्डफ् स्रद्म /;द्मह्व ;द्म द्यह्यशह्व द्धद्बंक−;ख्कद्भद्ध फ्भ्ड्डद्धस्नद्म स्रद्मह्य द्यष्द्यह्य क्द्ध/द्मस्र द्बभ्॥द्मद्मद्धशह् स्रद्भह्द्म द्दस््न द्गद्मरुंकद्भ फ्भ्ड्डद्धस्नद्म द्दद्मह्यह्वह्य स्रह्य स्रद्मद्भ.द्म शरीर की समस्त अंदरूनी संरचनाओं एवं क्रियाकलापों को प्रेरित प्रोत्साहित करने में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका होती हैं। हरे रंग के प्रकंपन इस ग्रंथि में उत्तेजना पैदा करते हैं फलतः उससे स्रवित रस शरीर वमन के तनावों को दूर करता और माँसपेशियों को दृढ़ता प्रदान करता हैं। शरीर की प्रतिरोधी सामर्थ्य बढ़ती हैं।
आसमानी रंग चयापचय (पेटाँबालिज्म) की प्रक्रिया को बढ़ाने वाला एवं मास-मज्जा आदि की वृद्धि में सहायक माना गया हैं। यह रंग सब रोगों में प्रयुक्त होता और लाभदायक सिद्ध होता हैं। शीतल प्रकृति का होने और नीले रंग के कपड़े पहनना लाभकारी माना जाता है। जब शरीर का कोई भाग अथवा समस्त शरीर अधिक गरम हो, तनाव अधिक हो तो उस वक्त आसमानी रंग का प्रयोग करना चाहिए।
नीला रंग सबसे श्रेष्ठ माना गया हैं। प्राणि मात्र का नैसर्गिक जीवन इसी रंग पर निर्भर करता है। समस्त जीवधारियों को जीवनीशक्ति एवं पोषण इन्हीं रंग रश्मियों से प्राप्त होता हैं। आकाश का रंग गहरा नीला हैं। उस ओर दृष्टि डालने से मनुष्य अनायास ही शान्ति के अगाध समुद्र में डूबने तैरने लगता है। यही कारण है कि धर्मशास्त्रों अध्यात्म शास्त्रों में बहिरंग त्राटक के ध्यान के लिए इस रंग को चुना गया हैं। ईश्वर के साकार रूपों को नीले रंग का बताया गया है और उन पर ध्यान केन्द्रित करने को कहा गया हैं। यह रंग मनुष्य में भक्ति,प्रेम,अनुराग आदि की भावनाओं को जाग्रत करता एवं उन्हें सशक्त बनाता हैं। रंग चिकित्सा की दृष्टि से हल्का आसमानी रंग अधिक उपयुक्त माना जाता है। हलकेपन में ठंडक होती है जब कि गहरे आसमानी में गरमी अपेक्षातया अधिक होती है।
इन रंग प्रकम्पनों में विद्युतीय शक्ति होती हैं, यह पौष्टिक भी होते हैं। अतः इनका अत्यधिक सेवन कुछ कब्जकारक होता हैं। गरमी की अधिकता से पैदा होने वाले ज्वर, सिरदर्द, पेचिस अतिसार, दमा संग्रहणी, डायबिटीज, पथरी, मूत्र विकार आदि जैसे रोग इस रंग के सेवन से ठीक हो जाते हैं। आग से जलने से ···· gyds uhys jax ls tYnh Hkj tkrs gSaA lnh] ···· mPp jDr pki] ydok] gzn; dh nqcZyrk vkfn jksxksa ds fuokj.k esa bl jax ls dkQh lgk;rk feyrh gSA,d vkSj fo’ksष बात यह है कि यदि कोई व्यक्ति नीले रंग को प्रधान स्थान पर चुनता है तो यह इस तथ्य का द्योतक है कि उसे भावनात्मक विश्रान्ति एवं सद्भावना की आवश्यकता है।
गहरे नील वाला इण्डिगो रंग ठण्डी प्रकृति का संकोचकारी, स्नायुओं को बल देने वाला एवं विद्युतीय गुणयुक्त होता है। यह रंग पैराथायराइड नामक अतः स्रावी ग्रंथि को प्रभावित उत्तेजित करता है। जिस व्यक्ति में थायराइड ग्रंथि अधिक सक्रिय होती है उसके लिए नीले रंग का ध्यान या रश्मि सेवन बहुत लाभ दायक सिद्ध होता है। इससे इस ग्रंथि का प्रभाव कम और पैराथायराइड का अधिक हो जाता है। फलतः थायरोक्सिन की अधिकता से होने वाली हानियों से स्वास्थ्य रक्षा हो जाती है। प्राणेन्द्रियों नेत्रों एवं कर्णेन्द्रियों को स्वस्थ बनाये रखने तथा रक्तशोधन में इन रंग रश्मियों से बहुत सहायता मिलती है। रक्तस्राव को रोकने एवं हृदय रोग में भी इसका प्रयोग होता है। तिल्ली में बनने वाले फैगोसाइट्स नामक जुझारू रक्त–कणिकाओं के निर्माण की प्रक्रिया इस रंग से तीव्र हो जाती है। इण्डिगो रंग एण्टीसेप्टिक का भी काम करता है।
बैंगनी रंग (वायलेट) रंग की गणना भी ठंडे रंगों में की जाती है। सूर्य की बैगनी रश्मियों को चेतन ऊर्जा सम्पन्न विद्युत किरणें भी कहते हैं जिन पर समस्त प्राणियों का जीवन निर्भर है। मानवी काया में यह रंग पोटैशियम -सोडियम संतुलन को पुनर्जीवित करता है। मोटर तंत्रिकाओं की उत्तेजकता को मंद करने, लिम्फैटिक सिस्टम, कार्डियक सिस्टम को संतुलित बनाने में इस रंग की महती भूमिका होती है। इस में रक्त शोधन की एवं जीवनी शक्ति बढ़ाने वाले ल्यको माइट्स नामक रक्तकणों के निर्माण की क्षमता विद्यमान होती है। मस्तिष्कीय दुर्बलता में यह टॉनिक का काम करता है। शरीर का ताप कम करने में भी इसका प्रयोग होता है। रंग चिकित्सा विज्ञानियों का कहना है कि बैंगनी रंग के प्रभाव से कैंसर जैसे घातक रोग तक ठीक हो सकते हैं। इस रंग का स्वास्थ्य पर अनुकूल प्रभाव पड़ता है। यदि इस रंग के नीचे ध्यान किया जाय तो मन का केन्द्रीकरण बहुत जल्दी होता है। ऐसा विद्वज्जनों का अनुभव है। उदासी दूर करने तथा भूख मिटाने में भी इन रंग रश्मियों का उपयोग होता है।
सप्तवर्णी किरणों के अतिरिक्त सूर्य से इन्फ्रारेड तथा अल्ट्रावायलेट नामक दो महत्व पूर्ण अदृश्य प्रकाश रश्मियाँ निकलती हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार इनमें से इन्फ्रारेड किरणें अदृश्य गरमी की किरणें है जो पृथ्वी में गहराई तक प्रवेश कर जाती हैं और वृक्ष-वनस्पतियों को नव जीवन प्रदान करने का काम करती मनुष्य की त्वचा पर भी इन रश्मियों का प्रभाव पड़ता है। रक्ताल्पता तथा रक्त का शरीर में असामान्य वितरण, शोध, जोड़ों का दर्द, संक्रामक रोग आदि के उपचार में इनका प्रयोग होता है। अदृश्य होने और प्रकाश पुँज से इन्हें विलय करने में कठिनता के कारण यद्यपि इनका प्रयोग बहुत कम हो पाता है। प्रायः इन किरणों को कृत्रिम रूप से इन्फ्रारेड लैम्पों के माध्यम से प्राप्त किया और उपचार के काम में लाया जाता है। इन से वह लाभ प्राप्त नहीं हो पाता जो सामान्यतया प्रकाश में विद्यमान इन्फ्रारेड किरणों से हस्तगत होता है।
अल्ट्रावायलेट या नीलोत्तर किरणों को अष्टम किरणें भी कहा जाता है। अदृश्य होने के कारण इन्हें वर्णक्रम में नहीं देखा जा सकता। इनका स्थान बैंगनी किरणों के ठीक नीचे होता है। मनुष्य शरीर में इनका प्रमुख कार्य कैल्शियम -फास्फोरस के चयापचय में एवं विटामिन डी के निर्माण का होता है। अंतः स्रावी ग्रंथियों की प्रक्रिया को सामान्य बनाने तथा सिम्पैथेटिक नर्वस सिस्टम को उत्तेजित कर दर्द दूर करने में इन किरणों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इन किरणों में जीवनी शक्ति बढ़ाने वाले स्वास्थ्यवर्धक तत्व मौजूद होते है। इनकी अधिकाँश मात्रा सुबह सूर्योदय के समय ही हम तक पहुँचती है। शेष समय नमी, धूल आदि के कारण धरती तक पहुँचने के इनके रास्ते में अनेक व्यवधान खड़े हो जाते हैं। जिन्हें पार करना बेधना इन किरणों के लिए मुश्किल पड़ता है। शरीर पर लिपटे वस्त्रों तक को बेधन में यह किरणें सफल नहीं होती। यही कारण है कि चिकित्सा विज्ञानी सुबह के समय नंगे बदन सूर्य सेवन का परामर्श देते है। धार्मिक क्रिया कृत्यों में सूर्यार्ध्य देने के पीछे भी यही विज्ञान काम करता है कि पानी की धारा त्रिपार्श्व काँच का काम करती है और उस से छनकर अल्ट्रावायलेट किरणें सूर्यार्ध्य देने वाले ऊपर सीधी पड़ती हैं जिनका लाभ उसे शारीरिक स्वास्थ्य के रूप में मिलता है। नंगे बदन पर पड़ने से यह किरणें तुरन्त त्वचा में गहराई तक प्रवेश कर जाती हैं और वहाँ पहुँचकर उन तत्वों को पोषण देती है जिन्हें जीवनी शक्ति का मूलभूत आधार कहा जा सकता है।
सुप्रसिद्ध सूर्य चिकित्साविद् डा0 बर्नर मैक फैडन ने अपने अनुसंधान निष्कर्ष में बताया है कि इन किरणों में स्वास्थ्य सम्वर्धन की अद्भुत क्षमता है। शरीर में प्रविष्ट होते ही यह किरणें रक्त में कैल्शियम की मात्रा में वृद्धि कर देती हैं। विश्व के प्रायः सभी प्रख्यात चिकित्सा विज्ञानियों जैसे बैनेडिक्ट लस्ट, स्टेनली लीफ, डा0 बेब्बिट आदि ने इन किरणों पर गहन अनुसंधान किया है और पाया है कि इनमें रक्त के लाल कणों श्वेत कणों में कैल्शियम, फास्फोरस, फास्फेट आयोडीन और आयरन आदि तत्वों में समन्वय सामंजस्य बिठाने की आश्चर्य जनक क्षमता है।
अल्ट्रावायलेट किरणों के रोग नाशक प्रभाव को सभी वैज्ञानिकों ने एक मत से स्वीकार किया है। ये किरणें शरीर के आँतरिक और बहिरंग स्वास्थ्य दोनों के लिए लाभदायक हैं। ग्वायटर एवं रिकेट जैसे घातक रोग इसके सेवन से दूर हो जाते है। बच्चों की हड्डियों के टेढ़ा होने रोग अल्ट्रावायलेट किरणों से बहुत जल्दी ठीक हो जाते हैं। जो माताएँ इन प्रकाश रश्मियों का सेवन करती हैं। उनके बच्चे भी पूर्ण स्वास्थ्य देखे गये हैं। क्षय रोग से त्राण पाने तथा इस रोग के विषाणुओं को नष्ट करने में वैज्ञानिकों को इस रंग से काफी सफलता मिली है।
वस्तुतः वर्णों का संसार जादुई प्रभावी शक्ति सामर्थ्य से भरा पूरा है। क्रोमोपैथी, टेलिकाँस्मो थेरेपी, कलर हिलींग इत्यादि के द्वारा सौर किरणों को फिल्टर करके वांछित रश्मि प्रवाह मनुष्य के अंगों पर डाल कर उन्हें प्रभावित किया जा सकता है, यह वैज्ञानिक प्रयोग सिद्ध कर चुके हैं। इतनी सब कुछ प्रत्यक्ष जानकारी होते हुए भी सर्वोपलब्ध इस शक्ति आगार के लाभों से हम वंचित बने रहें तो हम से बड़ा अभागा कोई नहीं।
महाराणा प्रताप देश की स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ रहे थे। यों युद्ध तो आये दिन चलते रहते थे, पर वे अतिक्रमण या आत्म रक्षा के लिए होते थे। व्यापक सुरक्षा के लिये प्रताप ही जूझ रहें थे।
इतने बड़े मुगल साम्राज्य के विरुद्ध छोटी सेना के सहारे लड़ते लड़ते उन्हें असाधारण कठिनाइयों का सामना करना पड़ता। हिम्मत तो न हारते पर युद्ध सामग्री तो चाहिए ही। सैनिकों का पेट भरना और तन ढकना आवश्यक था। यह सब जब समाप्त होने लगे तो युद्ध को जारी रखना एक विकट प्रश्न हो गया। कुछ सूझ नहीं पड़ रहा था कि आगे क्या किया जा सकता है? राणा की चिन्ता का समाचार भामाशाह तक पहुँचा, वे नगर सेठ थे। पर परिवार भी बड़ा था। वे सब भी उन्हीं के व्यवसाय पर अपनी आजीविका चलाते थे।
भामाशाह ने सोचा परिवार के सभी छोटे सदस्यों को निजी पुरुषार्थ से सामान्य निर्वाह पर संतोष करने के लिये कहा जाये और जो कुछ जमा पूँजी है उस सब को राजा के चरणों में रख दिया जाय। उनने बही किया। करोड़ों की संपत्ति राणा को मिल गई। उनने नये उत्साह से नये साधनों के सहारे सेना का नया गठन किया और इस प्रकार युद्ध संचालन किया कि विपक्षियों के पैर उखड़ गये।
भामाशाह को अन्तर तो इतना ही पड़ा कि कुटुंबियों को जो ठाट बाट से रहने की सुविधा मिलती थी वह चली गई और परिश्रम के साथ मितव्ययता-पूर्वक गुजारा करना पड़ा।
पर लाभ यह हुआ कि उनके आदर्श का अनेकों ने अनुकरण किया, यश अक्षय हुआ और स्वतंत्रता संग्राम के संचालन में सहयोगी हो कर सच्ची देश-भक्ति का परिचय देते बन पड़ा।
अलग-अलग दीखते हुए भी वस्तुतः हम सभी चेतना के धरातल पर एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। मनुष्य में जो चैतन्य-सत्ता क्रीड़ा कल्लोल कर रही हैं वही सम्पूर्ण जगत एवं प्राणी -पदार्थ में विद्यमान है। शास्त्रकारों एवं आप्त पुरुषों ने इसे ही व्यक्त करते हुए कहा है कि ब्रह्माण्ड और पिण्ड में व्यष्टि और समष्टि में, जितनी भी शक्तियाँ काम कर रही हैं, वह सभी प्राण चेतना के ही भिन्न-भिन्न रूप हैं, कल्प के आदि से ही अपने मूल रूप “महाप्राण” से उद्भूत हो कर यह सत्ता अनंतः पुनः उसी में समाहित हो जाती है। समत्व एवं एकत्व का दृष्टिकोण अपनाकर चलने और विचारणा, भावना, तथा संवेदना को उच्चस्तरीय बना लेने पर नियन्ता की अनुभूति हर किसी को हो सकती है। पूर्णता स्तर तक का विकास तभी संभव है।
पाश्चात्य मनीषी भी उपरोक्त तथ्य को स्वीकारते हैं। सुविख्यात मनोविज्ञानी कार्ल जुँग का कहना है कि परोक्ष व सूक्ष्म रूप से हम एक दूसरे से सुसम्बद्ध हैं। हम जो भी करते अथवा सोचते हैं, उससे दूसरे अवश्य प्रभावित होते हैं। इसे उन्होंने “कलेक्टिवकान्शसनेस” अर्थात्-सामूहिक अवचेतन नाम दिया है। विज्ञान का “पास्कलला” नाम का एक प्रसिद्ध नियम है, जिसके अनुसार जब किसी द्रव में दबाव पड़ता है, तो वह दबाव बिना घटे सम्पूर्ण द्रव क्षेत्र में संचारित होता है। यह सिद्धान्त यहाँ भी लागू होता हैं। हमारी चिन्तन-चेतना जैसी होती है, उसी रूप में वह इस चेतना के समुद्र में संचारित हो जाती है, पर इसे ग्रहण करना पूर्णतः ग्रहीता पर निर्भर करता हैं। यहाँ भी ग्रहण अवधारण नियमानुसार होता है। जिस प्रकार समान धर्मी व्यक्ति और विचार परस्पर मिलते और घनीभूत होते हैं वही बात चेतना के संबंध में भी कही जाती है। चिन्तन-चेतना जिस स्तर की होती है, वह उसी ओर आकर्षित होती है। उत्कृष्ट स्तर की चेतना सदा सजातीय की ओर खिंचती चली आती है, जब कि निकृष्ट स्तर की प्राण चेतना निकृष्टतम की ओर प्रवाहित होती है।
विज्ञानवेत्ताओं ने समस्त भौतिक शक्तियों को जो कि चेतना के ही रूपांतरण हैं, पाँच भागों में विभक्त किया है। ये हैं (1) एलेक्ट्रो मैगनेटिक फोर्स अर्थात् विद्युत चुम्बकीय बल (2) वीक फोर्स अर्थात् अल्पसत्व (3) स्ट्राँग फोर्स (महा सत्व) (4) ग्रैवीटेशनल फोर्स (गुरुत्वाकर्षण बल) और (5) एण्टी मैटर-एण्टी यूनिवर्स (प्रति पदार्थ, प्रति विश्व) विज्ञानियों ने इन्हीं सत्ताओं के समष्टिगत रूप में चेतना-जगत की, झाँकी देखी है। परामनोविज्ञानी रिचार्ड मोरिस बक ने अपनी पुस्तक “काँस्मिक्कान्ससनेस” में चेतना के चार स्तर बताये हैं। उनके अनुसार (1) परसिप्चुअल माइण्ड यह चेतना का निम्न स्तर है, जो निम्न स्तर के जीव धारियों में विद्यमान है। (2) रिसिप्चुगल माइण्ड- यह कुछ उन्नत स्तर की चेतना है, जो उच्च स्तर के जीवधारियों में पायी जाती है। (3) कन्सेप्चुअल माइण्ड को उन्होंने आत्म चेतना युक्त मानवी चेतना के रूप में वर्णन किया है। अंतिम (4) चौथी प्रकार की चेतना को उन्होंने ब्राह्मी चेतना नाम दिया है। उनका कहना है कि यह चेतना की सर्वोच्च स्थिति है जिस में व्यक्ति को एकत्व और अद्वैत स्थिति का बोध होता है। सब में स्वयं को और स्वयं में सब को देखने की विशालता इसी अवस्था में विकसित होती है। महर्षि अरविंद ने भी चेतना को चार मुख्य सोपानों में विभाजित किया है। ये हैं- क्रमशः उच्चतर मनः प्रकाशित मन, संबुद्ध मन और ओवर माइण्ड” चेतना के उच्चतर आयाम को उन्होंने “सुपर माइण्ड” कहा है। उनके अनुसार चेतना के इस सर्वोच्च स्तर का सम्पूर्ण मानव जाति में अवतरण तभी हो सकेगा जब वह अपने गुण, कर्म, स्वभाव में परिष्कार लाकर विचारणा भावना और संवेदना को उच्चस्तरीय बना सके। साथ ही ईश्वर के प्रति श्रद्धा भाव रखते हुए पूर्णरूपेण आत्म समर्पण कर दे। इस सम्पूर्ण प्रक्रिया को उन्होंने कककक और इन्वोल्यूशन का नाम दिया हैं। इवोल्यूशन अर्थात् आरोहण में आत्म परिष्कार कर स्वयं को ऊँचा उठाया जाता है और अन्वोल्यूशन अर्थात् अवरोहण में प्रयास पूर्वक भगवद् करुणा को नीचे उतारा जाता है। व्यक्तित्व और चेतना का पूर्ण विकास तभी संभव बन पड़ता है और देवत्व की प्राप्ति भी तभी होती है। इस स्थिति को प्राप्त व्यक्ति को उन्होंने नाँस्टिक बींइग अर्थात् अध्यात्म जीवी कहा है। रिचार्ड मोरिस बक ने चेतना की इसी स्थिति को “ब्रह्माण्डीय चेतना” नाम दिया है और कहा है कि व्यक्ति में यह अस्थायी रूप से तब तक प्रकट और लुप्त होती रहेगी, जब तक यह उसका स्थायी गुण धर्म न बन जाये या दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि जब तक मानव जाति अपनी आत्म चेतना को उसके अनुरूप उच्च स्तरीय न बना ले, तब तक वह “चेतना” स्थायी रूप से अवतरित नहीं हो सकती।
हम जो चिंतन करते हैं, वही इच्छा, आकाँक्षा के रूप में शब्द शक्ति बन कर निकलता है। विज्ञान ने शब्द को शक्ति के रूप में स्वीकारा है। उसके अनुसार शक्ति का न तो नाश होता है न निर्माण, वरन् रूपांतरण होता है। वह अपने मूल रूप में भी रह सकती है अथवा दूसरे में बदल सकती है, पर उनका विनाश कभी नहीं होता। इस आधार पर वैज्ञानिक अन्तरिक्ष में अब तक के छोड़े गये विचारों को एक विशेष क्षेत्र में अवस्थित बताते हैं। आयनोस्फियर, एटमोस्फियर की तरह इस क्षेत्र का नाम उन्होंने आइडियोस्फियर दिया है। इस क्षेत्र में घूमने-फिरने वाली विचार चेतना में से वैज्ञानिक अब यंत्रों के माध्यम से उन तरंगों को ग्रहण करने का प्रयास कर रहे हैं, जो महाभारत युद्ध के दौरान गीत के उपदेश के रूप में निकली थीं। यह तो विज्ञान का अपने ढंग का प्रयास है, पर जन सामान्य तो आइडियोस्फियर से अपनी स्वयं की चेतना के स्तर के अनुरूप ही लाभ उठा पाता है। उपरोक्त चेतनात्मक स्तर में से वह जिस स्तर का प्रतिनिधित्व करता हैं, उसी स्तर की अंतरिक्षीय चेतना विचार चेतना के रूप में उसकी ओर खिंची चली आती हैं और अपने अनुरूप क्रिया कलाप अपनाने के लिए व्यक्ति को बाधित करती है। यदि ऐसी बात नहीं होती तो स्वतंत्रता संग्राम के दिनों श्री अरविंद को संपर्क ब्राह्मी चेतना से न हुआ होता। इसी महत् चेतना के निर्देश पर उन्होंने स्वाधीनता संग्राम के अपने सक्रिय जीवन से संन्यास लिया एवं अध्यात्म साधना में प्रवृत्त हो कर अपनी प्रचण्ड चेतना द्वारा वातावरण को प्रभावित किया और स्वतंत्रता प्राप्ति के कार्य को आसान बनाया।
हमारी वर्तमान चेतना निम्न स्तरीय है, फलतः अनायास उसी स्तर की चेतना हमारी ओर आकर्षित होती रहती है, और हमें वैसे ही कार्य करने की प्रेरणा देती है। इसके अतिरिक्त हम स्थान और वस्तु विशेष से जुड़ी चेतना से भी प्रभावित होते हैं। हम जो भी कार्य करते हैं, वह सूक्ष्म रूप से पूरे वातावरण को तो प्रभावित करता ही हैं, पर संपर्क क्षेत्र वाले स्थान और वस्तु को विशेष रूप से प्रभावित करता है। यह प्रभाव चेतना के स्तर के आधार पर भला बुरा दोनों प्रकार का हो सकता है। होपडायमण्ड और कोहिनूर हीरे के बारे में कहा जाता है, कि ये जिन जिन के पास गये, उन-उन को त्रास ही दिया और तबाही मचायी। ऐसी ही जनश्रुति महाभारत की युद्ध भूमि और श्रवण कुमार के बारे में भी है। कहा जाता है कि महाभारत युद्ध के लिए भगवान कृष्ण ने जान बूझ कर ऐसी भूमि का चयन किया, जिसका इतिहास रक्तरंजित था। उन्हें आशंका थी कि भाई-भाई का प्रेम असमय ही न उमड़ पड़े और मुख्य उद्देश्य अधूरा रह जाये, इसलिए उन्होंने ऐसी अभिशप्त युद्ध भूमि के चयन का निर्देश दिया था जिसकी विकृत चेतना अन्त तक सब के मन-मस्तक पर छायी रहे। श्रवण कुमार के बारे में कथा है कि एक बार जब से अपने मात-पिता को तीर्थयात्रा के लिए ले जा रहे थे, तो एक जंगल से गुजरते हुए उनके मन में विचार आया कि इन्हें काँवर से उतार देना चाहिए और ऐसा ही किया भी।
सूक्ष्म द्रष्टा पिता कारण जान कर चुप रहे। उन्हें मालूम था कि उक्त स्थान बहुत पहले एक असुर का कार्य क्षेत्र रह चुका है और इसी का सूक्ष्म प्रभाव बेटे पर पड़ा है। उस स्थान को पार करते ही जब उनकी सद्बुद्धि लौटी तो इसका उन्हें बहुत पश्चाताप हुआ।
इसी तरह उच्चस्तरीय चेतना का महा मानवों की प्राण ऊर्जा का संपर्क-सान्निध्य भी उत्तम होता हैं। कहा जाता है कि ऋषियों की तपःस्थली में हिंस्र जन्तु भी पालतू पशु का सा व्यवहार करने लगते थे। सिंह और गाय के एक ही घाट पानी पीने की कथा प्रसिद्ध है। इसी प्रकार देखा जाता है कि जब कभी मन्दिर आदि पवित्र स्थल अथवा तीर्थ, उत्तराखण्ड जैसे पवित्र क्षेत्रों में कोई प्रवेश करता है, तो अनायास ही उसकी सद्भावनाएं हिलोरें लेने लगती हैं। वस्तुतः यह उस स्थान अथवा क्षेत्र में संव्याप्त उच्चस्तरीय चेतना का ही प्रभाव होता है।
यह तो स्थान और क्षेत्र विशेष से जुड़ी प्रचण्ड चेतना हुई, जो हमें भले बुरे ढंग से प्रभावित आकर्षित करती है। ब्राह्मी चेतना तो कण-कण में विद्यमान है, पर उसकी अनुभूति के लिए आत्मशोधन आवश्यक है।
इससे कम में हम उसकी प्रतीति नहीं कर सकते। यदि यह चेतना कण-कण में नहीं होती, तो इस विश्व ब्रह्माण्ड में जो नियम और व्यवस्था हमें दिखाई पड़ती है, वह कदापि नहीं होती। फिर सर्वत्र अव्यवस्था के ही दर्शन होते। सूर्य चन्द्र ग्रह-नक्षत्र में से कोई भी समय के पाबन्द नहीं होते। पेड़-पौधों में असमय ही फल-फूल लगते और उनमें किस्म और प्रजाति का कोई भेद-भाव नहीं होता। जब चाहे तब आम के पेड़ में अमरूद और अमरूद में केले उत्पन्न होते। जन्तुओं में भी ऐसी ही अनियमितता और अव्यवस्था देखने को मिलती। तब गाय के बिल्ली और बिल्ली के खरगोश उत्पन्न होने में तनिक भी संदेह नहीं रह जाता। जन्तुओं में भ्रूणावस्था में एक और महत्वपूर्ण बात देखने को मिलती है। देखा गया है कि भ्रूणावस्था में प्रायः सभी जन्तुओं के बच्चों का आकार-प्रकार एक जैसा ही होता है। बाद की अवस्था में ही उन में विभेद उत्पन्न होता है और अलग-अलग प्रकार के रूप आकार ग्रहण करते हैं। यह विभेद उत्पन्न करने वाला कौन है? जो जन्तुओं के रूप और आकार को निर्धारित करता है। निश्चय ही यह वही अदृश्य चेतना हैं, जिसके कारण इस संसार की गति,प्रगति,और नियम-व्यवस्था की हुई हैं। जड़ चेतन उसी से ओत-प्रोत हैं।
दैत्य कुल के दो भाई सुन्द उपसुन्द दोनों महाबली थे। उनने शिवजी को प्रसन्न करके अमर होने का वरदान पाने के लिए कठोर तप किया।
शिवजी प्रसन्न हुए। उनका मनोरथ सुना और कहा जन्म मरण तो प्रकृति का नियम है उसे मिटा देना तो मेरे बस की बात नहीं है पर इतना किया जा सकता है कि तुम दोनों ही एक दूसरे को मार सकोगे। किसी तीसरे कारण से तुम्हारी मृत्यु न हो सकेगी।
दोनों आपस में घनिष्ट मित्र थे। वे क्यों एक दूसरे का अनर्थ करेंगे? इस वरदान से भी उनका काम चल गया और प्रसन्न हो गये।
बहुत दिन वे लोग प्रसन्नता पूर्वक रहे। विस्तृत भूमि पर अधिकार जमा लिया। सुख साधनों की कमी न रही। उनके आतंक से सभी भय खाते थे और प्रतिरोध करने के लिए कोई भी उद्धत न होता था।
भगवान ने उनके आतंक को देखा और उनसे धरती को उबारने का प्रयत्न किया। एक माया रूपी अप्सरा रची। नाम था उसका तिलोतमा। वह अलग अलग अवसर ढूंढ़ती और एकान्त में प्रणय निवेदन करती। दोनों ही उसे चाहते। पर पत्नी बनाने की नौबत आती।
तिलोतमा दोनों के कान में कहती में तो तुम्हें ही चाहती हूँ पर तुम्हारा मित्र मार्ग में बाधक है। वही रोकता और डराता है। इस प्रसंग को लेकर दोनों में विद्वेष उत्पन्न हो गया। दोनों ही अप्सरा को चाहते थे और मार्ग में आये हुए काँटे को निकालना चाहते थे।
द्वेष एक दिन युद्ध के रूप में परिणत हो गया। दोनों का एक दूसरे पर भयंकर आक्रमण हुआ। दोनों इतने आहत हुए कि मृत्यु के मुख में चले गये।
तिलोतमा भी यह कह कर अदृश्य हो गई कि लोलुपता मनुष्य का जितना नाश करती है उतना और नहीं कर सकता।
एक निर्धन शिष्य की भक्ति भावना से प्रसन्न होकर सिद्ध पुरुष ने उसे पारसमणि देने का अश्वासन दिया और प्राप्त करने का एकान्त समय और स्थान बता दिया।
शिष्य बड़ी प्रसन्नता और उत्साह के साथ नियत समय पर पहुँचा। साधु ने उसे एक स्थान खोदने और वहाँ से एक छोटी डिब्बी खोद निकालने के लिये कहा। शिष्य ने वैसा ही किया। साधु ने बताया कि इसी में यह पारसमणि हैं।
शिष्य को विश्वास न हुआ। उसने अनमने हो कर पूछा-यदि इस लोहे की डिब्बी में पारस रहा होता तो कम से कम यह तो सोने की ही हो गई होती।
सन्त कुछ उत्तर तो न दिया पर डिब्बी को खोल कर उसे दिखाया। पारस के ऊपर मोटे कपड़े का खोल लिपटा हुआ था जिससे लोहे और पारस को परस्पर मिलने का अवसर ही नहीं मिलता था। जब खोल हटा कर दूसरे लोहे को छुआया गया तो वह डिब्बी भी सोने की हो गई और दूसरा टुकड़ा भी।
पारस पाकर शिष्य निहाल हो गया। साथ ही उसने यह निष्कर्ष निकाला कि जब तक जीवन पर मलीनताओं का खोल चढ़ा रहता हैं तब तक वह भगवान को, सद्गति को, प्राप्त कर सकने में समर्थ नहीं हो पाता।
इन दिनों प्रायः हर स्तर का व्यक्ति ऐसी परिस्थितियों से घिरा रहता है जिससे उनका मनः संस्थान खिन्न उद्विग्न रहने लगे। तनाव का आक्रमण हर किसी पर छाया दीखता है। मन मस्तिष्क पर तनाव ग्रस्तता छाई रहे तो उसकी परिणति समूची काया के गतितंत्र को अस्त-व्यस्त कर देगी और विरासत में अनेकों रोग, पाप, अपराध जैसे प्रतिफलों को दे जायगी।
यों तो इन शताब्दियों में साधन सुविधाओं में भारी अभिवृद्धि हुई है। शिक्षा और सम्पन्नता में भी बढ़ोत्तरी हुई है। फिर क्या कारण है कि इतना सब कुछ होते भी हँसता-हँसता जीवन कम मनुष्य के हाथ से छूटता जा रहा है। शान्ति और सन्तोष, प्रसन्नता और निश्चिन्तता मात्र कहने-सुनने की बातें रह गई हैं। गंभीरता पूर्वक कारणों की तलाश करने से इसी निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि अब मनुष्य मानसिक दृष्टि से अधिक दुर्बल होता चला जा रहा है। आदर्शों का परित्याग करने, मानवी मर्यादाओं का उल्लंघन करने के उपरान्त उद्विग्नता, अनिश्चितता और एकाकीपन में बढ़ोत्तरी होना स्वाभाविक है। व्यक्तिगत दृष्टिकोण, स्वभाव एवं जीवन-यापन का क्रम भी ऐसा बन गया है जो इस विपत्ति को बढ़ाने में बड़ा कारण बनाता है। उसकी प्रत्यक्ष प्रतिक्रिया बढ़ती हुई उद्विग्नता-तनाव ग्रस्तता के रूप में दृष्टिगोचर होती है। स्वास्थ्य की दृष्टि से खोखला होने और बीमारियों के चंगुल में फँसने का इसे प्रमुख कारण माना जा सकता हैं।
मनःचिकित्सकों का मत है कि मानसिक असन्तुलन ही समस्त आदि व्याधियों का प्रमुख कारण है। इस क्षेत्र में की गई नवीनतम खोजों ने अस तथ्य की पुष्टि कर दी है कि आवेश, चिन्ता, भय, ईर्ष्या, निराशा को मनः स्थिति ऐसी उत्तेजना उत्पन्न करती है जिसके कारण तनाव रहने लगे। क्रोधावेश और कामोत्तेजना जैसे विकार भी शरीर और मन पर दूषित एवं स्थायी प्रभाव छोड़ते हैं। प्रसिद्ध मनोविज्ञानी डा0 किन्से ने इन दोनों आवेग आवेशों को एक ही श्रेणी में रखा हैं। अपने अनुसंधान निष्कर्ष में उन्होंने बताया है कि इससे शरीर और मन पर प्रतिकूल प्रभाव तो पड़ता ही है चिन्तन क्षेत्र भी बुरी तरह लड़खड़ा जाता है। फलतः ज्ञानेन्द्रियों की ग्रहण क्षमता को भारी आघात पहुँचता है और व्यक्ति असामान्य गतिविधियाँ अपनाने लगता है। इन आवेगों के प्रभाव से आँखों की पुतली फैल कर बड़ी हो जाती है। श्वास प्रश्वास और हृदय गति बढ़ जाती है। साथ ही रक्त का दबाव भी ऊँचा हो जाता है। आमाशय एवं आंतों की सक्रियता में कमी आ जाती है। रक्त में एड्रीनलीन हारमोन के बढ़ जाने तथा ऐच्छिक माँस पेशियों में तीव्रता आ जाने से व्यक्ति गुस्से में काँपने लगता है। कामोत्तेजना में भी यही सब कुछ होता है तनाव के निमित्त कारण यही मनो विकार है जिनसे शरीर और मन की प्राकृत अवस्था चरमरा जाती है और वह व्याधि ग्रस्त रहने लगता है। निद्रा से भी उसे विश्राम नहीं मिलता। अशान्त मन स्वप्न में भी बड़बड़ाता रहता है।
मूर्धन्य मनोविज्ञानी डा0 रोजर्स ने तनाव, दबाव और मनोविकारों के लिए दुराव, छिपाव और मनोग्रंथियों को जिम्मेदार ठहराया है। जब तक दोष-दुर्गुण, पाप अपराध जीवन में किसी विश्वसनीय व्यक्ति के समक्ष प्रकट नहीं किये जाते अथवा उनका प्रायश्चित नहीं हो जाता, तब तक चिंत में बेचैनी मन में अप्रसन्नता खिन्नता, व्यग्रता उदासी छायी रहती है। ऐसे ही लोगों को अनेकों शारीरिक मानसिक रोग सनक, वहम, उन्माद, अवसाद, आदि घेरे रहते हैं। यदि जीवन में ईमानदारी, नैतिकता जैसे सद्गुण सम्मिलित कर लिये जाते है तो उक्त विकारों से और तद्जन्य व्याधियों से सहज ही छुटकारा मिल सकता है। मनुष्य का मन भी तभी हल्का और उमंग से भरा पूरा रह सकता है। ऐसे व्यक्तियों को हँसती हँसाती, खिलती खिलाती मस्ती भरी जिन्दगी जीते देखा जा सकता है। ऐसे व्यक्ति अन्यों की अपेक्षा अधिक स्फूर्तिवान और क्रियाशील बने रहते हैं। इन्हें बुढ़ापा भी घेर ले तब भी उन में बालकों जैसा उत्साह उमंग और स्फूर्ति बनी रहती है।
मनोविकारों से ग्रसित मनुष्य अपने को गलाते घुलाते हैं तथा दूसरों के लिए भी सिर दर्द बने रहते हैं। चिन्ता, भय, निराशा, निरुत्साह जैसी दुष्प्रवृत्तियां हर समय बेचैन बनाए रहती हैं और यही आन्तरिक क्षमताएँ नष्ट भ्रष्ट कर मनुष्य को दयनीय बना देती हैं। कई बार ऐसे व्यक्तियों में क्रोध क्रूरता जैसे दोष अपना अड्डा बना लेते है तथा ईर्ष्या, कुढ़न जलन जैसी बुराइयाँ भी परिलक्षित होने लगती हैं।
ईर्ष्या और डाह, घृणा और द्वेष उत्तेजना और बढ़ावा देते हैं। इन्हीं के करण जीवन में मनोमालिन्य बढ़ते और विरोध पैदा होते हैं। मनुष्य टूटा सा, हारा सा, उदास खिन्न रहने लग जाता है। इनके के लिए सुख शान्ति सपने की सी मृगतृष्णा हो जाती है।
आवेश, आवेग, उत्तेजना और आक्रोश मनुष्य की चिन्तन प्रणाली को बुरी तरह गड़बड़ा देते है। प्रत्यक्ष न सही छिपा आक्रोश दुर्भावना, डाह, निन्दा, चुगली जैसी दुरभि सन्धियों के रूप में प्रकट होती है। ऐसे जाल जंजाल में उलझे व्यक्ति की मन स्थिति अधिकाधिक विपन्न होती चली जाती है और आन्तरिक अशान्ति की प्रतिक्रिया मनोविकारों के रूप में शारीरिक रोगों, कष्टों क्लेशों के रूप में फूट पड़ती है। मन की उद्विग्नता और अशान्ति मनुष्य की नैसर्गिक क्षमताओं को भी नष्ट-भ्रष्ट कर डालती है। इतना ही नहीं इससे भावना और विचारणा का क्षेत्र भी ऊपर बंजर मरुस्थल जैसा बन जाता है। हृदय तो असह्य आघात झेलता ही है।
वर्ल्ड हेल्थ आर्गनाइजेशन के अनुसार समृद्ध प्रमुख देशों में आधी मृत्युएँ हृदय रोग से होने लगी है। इस अभिवृद्धि में साधनों की कमी या परिस्थितियों की प्रतिकूलता उतना बड़ा कारण नहीं है जितना कि मनुष्य का खिन्न-उद्विग्न रहना। तनाव खीज और उदासी आदमी को तोड़कर रख देती है और वह कभी भी हृदय रोग जैसे विपत्ति में फँस सकता है।
सैन फ्रांसिस्को के जाने माने हृदय रोग विशेषज्ञ डा0 फ्रीडमैन तथा रोज मैन ने सैकड़ों महत्वाकाँक्षी, स्पर्धी, असंयमी तथा इसके विपरीत नैतिक, संयमशील, व्रती, नियमित दिन चर्या और आहार व्यवहार वाले दोनों प्रकृति के लोगों का गहन अध्ययन किया है और पाया है कि महत्वाकाँक्षी असंयमी, अनैतिक और प्रतिस्पर्धी व्यक्ति अधिक तनाव ग्रस्त रहते हैं। फलतः हृदय रोग की पकड़ में भी वही सबसे अग्रणी पाये जाते है। अन्यान्य हृदय रोग विशेषज्ञों का भी यह मत है कि मनोभाव दबाने से तनाव पैदा होता है जिससे एड्रीलीन ग्रँथियों से हारमोन्स अधिक स्रावित होने लगता है, जिसके कारण रक्त धमनियां सिकुड़ जाती हैं और हृदय तक रक्त पहुँचने से पीड़ा होने लगती है। एक और तथ्य स्पष्ट होता है कि रोग स्त्रियो में कम पुरुषों को अधिक होता है।
सुप्रसिद्ध अमेरिकी हृदय रोग विशेषज्ञ प्रयोग, परीक्षण के उपरान्त हृदय रोग का स्थायी निदान और समाधान बताते हैं कि ऐसे हृदय रोग से पीड़ित व्यक्तियों को सहृदयता बरतनी चाहिए और संयम निभाना चाहिए। उतावली और हड़बड़ाहट से असन्तुलन और व्यग्रता बढ़ेगी और अस्थिरता तथा मतिभ्रम से न कुछ करते बनेगा वरन् उल्टे तनाव, अपच अनिद्रा जैसे स्थायी रोग शरीर को दबोच लेंगे।
डा0 इरविन भी आन्तरिक शान्ति और आत्म विश्वास को तनाव दबाव और हृदय रोग की राम बाण औषधि मानते हैं इन गुणों को चिरस्थायी पूंजी बनाने के लिए जीवन में परोपकार और परमार्थ जैसे कृत्य करते रहने की वे सलाह देते हैं।
प्रख्यात मनोरोग चिकित्सक डा0 स्टेकल के अनुसार मनुष्य का स्वास्थ्य और संतुलन उसके आहार व्यवहार पर कम मानसिक स्तर पर अधिक निर्भर रहता है। रोगियों में से अधिकांश की व्यथा मन की गहराई में अपनी जड़ें जमाकर बैठ जाती है और दवा दारु की भर मार होने पर भी टलने का नाम नहीं लेती। इसके विपरीत मनोबल सम्पन्न विपरीत परिस्थितियों के दबाव को सहन करते हुए भी बलिष्ठ बने रहते हैं। रुग्णता रहने पर भी उस स्तर के लिए अपने उत्साह और साहस में तनिक भी कभी नहीं पड़ने देते। ऐसे लोग न केवल आशाजनक सफलताएँ प्राप्त करते है वरन् अपनी विशिष्टताओं के कारण अपने समुदाय का नेतृत्व भी करते हैं।
अतः व्यक्ति को चाहिए कि अपने आस-पास अनुकूलताएँ तलाश करे और प्रिय पात्र, प्रिय पदार्थ, प्रिय दृश्यों का अवलोकन कर चिन्तन और दृष्टि को विधेयात्मक बनाये रखें। सदैव मुस्कान बिखेरने और आत्मीयता बाँटने से बदले में प्यार, सम्मान मिलता है। छोटे छोटे बच्चों की उछल कूद भोलापन और तोतली वार्ता में सम्मिलित रहकर पार्क, उद्यानों, नदी-सरोवरों का भ्रमण करके भी मन को प्रसन्न रखा जा सकता है। अपनी आन्तरिक स्थिति और चारों ओर का वातावरण यदि अपने अनुकूल नहीं है तब तक सहज और सरल जिन्दगी नहीं जी जा सकती। आन्तरिक शान्ति से ही मन को प्रसन्न रखा जा सकता है और अनेकों मनो रोगों से बचा जा सकता है। सज्जनता शिष्टता एवं आदर्शवादिता का समुचित मात्रा में अवलम्बन ही वह प्रमुख आधार है जो मनुष्य की मानसिक उद्विग्नता तनाव ग्रस्तता एवं मनो शारीरिक रोगों का समाधान प्रस्तुत कर सकता है।
वैज्ञानिक भी अब यह मानने लगे हैं कि शरीर के ऽऽऽऽ पर कोई ऐसा तत्व विद्यमान रहता है, जिसमें ऽऽऽऽ जन्म की स्मृतियाँ और गतिविधियाँ सँजोई रहती है भारतीय दर्शन में इसे “आत्मा अथवा जीव चेतना” ऽऽऽऽ दिया गया है और कहा गया कि “शरीर की प्राप्ति पर इसका अस्तित्व समाप्त हो जाता हैं। ऐसी ऽऽऽऽ नहीं है। आत्मा शरीर के मरने के बाद भी अपनी तंत्र सत्ता उसी प्रकार बनाये रखती है और पुनः पुनः ऽऽऽऽ धारण करती रहती है। इस तथ्य की सत्यता तब ऽऽऽऽ असंदिग्ध बन जाती है, जब आये दिन इससे अधिक घटनाएँ देखने सुनने को मिलती हैं।
घटना अलास्का प्रदेश की है। विलियम जेम्स नियर नामक व्यक्ति एक मछुआरे बाप का बेटा था। ऽऽऽऽ की यह आर्दिक इच्छा थी कि मरने के बाद यदि ऽऽऽऽ पुनः जन्म हो तो वह अपने पुत्र का पुत्र बन कर ऽऽऽऽ “पर इसकी पहचान कैसे हो कि नवजात शिशु रूप में आप ही हैं? पुत्र के इस प्रश्न पर पिता ने ऽऽऽऽ कि यदि सचमुच ही मैं तुम्हारे पुत्र के रूप में आया, तो मेरे शरीर के सारे चिन्ह उस शिशु में विद्यमान है।
पिता प्रायः हर दिन समुद्र में मछली पकड़ने जाया ऽऽऽऽ थे। सन् 1939 के अगस्त माह की 20 तारीख को वे नित्यप्रति की तरह मछली पकड़ने के लिए निकले इस दिन समुद्र कुछ अशान्त था। ज्वार-भाटे ऊँचे ऽऽऽऽ आ रहे थे। किन्तु इसकी परवाह न कर वे निकल ऽऽऽऽ क्योंकि ऐसे अनेक अवसरों पर सफलतापूर्वक मछली पकड़ कर वे सकुशल वापिस आये थे। मगर बार वे गये, तो पुनः लौट नहीं सके। पुत्र व पुत्रवधू ऽऽऽऽ तक उनका इन्तजार करते रहे, पर जब वे नहीं ऽऽऽऽ तो यह मान लिया गया कि पिता अब इस संसार नहीं रहे। इस घटना के ठीक छः माह बाद विलियम ऽऽऽऽ की पत्नी गर्भवती हुई। कुछ माह उपरान्त उसने एक पुत्र को जन्म दिया। नाम रखा गया विलियम जेम्स जूनियर। इस बालक के साथ विचित्र बात यह थी कि उसके दादा में जो-जो शारीरिक चिन्ह विद्यमान थे वें सारे चिन्ह बालक में भी मौजूद थे। इतना ही नहीं जेम्स जूनियर जब कुछ बड़ा हुआ और चलने फिरने, बोलने–चालने लगा, तो इसकी बात व्यवहार के ढंग भी उसके दादा से बिल्कुल मिलते जुलते थे। मछली पकड़ने के अपने पारिवारिक पेशे में भी अल्प आयु में ही वह अपनी कुशाग्रता और विलक्षण सूझबूझ का परिचय देने लगा, जिसे देख सभी को आश्चर्य होता था। उस बालक में जो एक और विशेष बात थी वह थी उसकी आवाज। जूनियर जेम्स की आवाज हूबहू सीनियर जेम्स के पिता की तरह थी।
इस प्रकार जेम्स सीनियर के पिता ने मृत्यु के पूर्व जो कुछ कहा था और पहचान के जो जो चिन्ह बताये थे, वह सब कुछ उस बालक में प्रत्यक्ष दीख रहे थे, जो इस बात के प्रमाण हैं कि मृत्यु के उपरान्त जीवात्मा का पुनः जन्म होता है। प्रत्यक्ष चिन्हों के आधार पर यह कहा जा सकता था कि जेम्स सीनियर के घर जन्म लेने वाला बालक और कोई नहीं वरन् उसका पिता ही था।
मरणोत्तर जीवन और पुनर्जन्म का समर्थन करते हुए प्रकाश बल्ब के आविष्कारक टामस एडीसन ने अपनी पुस्तक “द अल्टीमेट साइन्स” में लिखा है कि मरणोपरान्त प्राणी की सत्ता उच्चस्तरीय विद्युत अणु गुच्छकों के रूप में तब भी बनी रहती है, जब वह शरीर से पृथक हो जाती है। मृत्यु के उपरान्त यह गुच्छक विधिवत क्रमबद्ध तो नहीं। जिस प्रकार मधुमक्खी छत्ता छोड़ कर आकाश में विचरण करती है, उसी प्रकार वे विचरते हैं। मधु मक्खियाँ पुराना छत्ता भी एक साथ छोड़ती हैं और नया भी एक साथ बनाती हैं। इसी प्रकार पुनः जीवन चक्र में प्रवेश करते और नया जन्म धारण करते समय उच्चस्तरीय विद्युत अणुओं के ये गुच्छक अपने साथ स्थूल शरीर से आस्थाओं, भावनाओं सम्वेदनाओं का समुच्चय साथ लेकर आते हैं। इसी कारण दूसरे जन्म में भी व्यक्ति के विचार व्यवहार और क्रिया कलाप पहले जन्म से काफी कुछ मिलते-जुलते हैं।
पुनर्जन्म की ऐसी ही एक अन्य घटना का उल्लेख स्वामी शिवानन्द सरस्वती ने अपनी पुस्तक “ह्राट बिकम्स ऑफ दि सोल आफ्टर डेथ” में किया है। घटना करीब 20 वर्ष पुरानी है। कलकत्ते के जामा पुकुर नामक ग्राम के एक कृषक परिवार में एक अठारह वर्षीय लड़का अपनी लम्बी बीमारी के बाद मृत्यु शय्या पर पड़ा-पड़ा अपनी मौत के अन्तिम दिन गिन रहा था। माँ-बाप ने उसके हर प्रकार के उपचार करवाये पर स्वास्थ्य में कोई प्रगति नहीं हुई। अन्त में हार कर उन्होंने एक ग्रामीण वैद्य की शरण ली और इलाज उसके संरक्षण में चलने लगा, पर यहाँ भी कोई लाभ नहीं हुआ। इस पर क्रुद्ध लड़के की चाची उस वैद्य को कोसने लगी। बीमार लड़का वही शय्या में लगभग अचेतावस्था में पड़ा हुआ था। वाद विवाद से लड़के में कुछ हलचल दिखाई पड़ी। वह अपने कुटुम्बियों को सम्बोधित करते हुए कहने लगा-”मैं स्वस्थ न हो सका” इस में इन वैद्य जी का कोई दोष नहीं है। हमारा पिछला जीवन ही ऐसा था, जिसके कारण आज मुझे इतना कष्ट उठाना पड़ रहा है। विगत जीवन में मैं एक रेलवे आफिस में काम करता था और आपसी मनमुटाव के कारण मैन अपने ही एक सहयोगी की हत्या कर दी। हत्या के बाद मैं पकड़ लिया गया। मुकदमा चला वहाँ फाँसी की सजा से तो मैं बच गया, पर कठोर कारावास के दण्ड से न बच सका। वह पिछला कुकर्म ही आज मुझे इस फलितार्थ के रूप में प्राप्त हुआ है। अब मैं कभी स्वस्थ न हो सकूँगा, पर क्या आप (अपनी माँ की ओर इशारा करते हुए) जानती हैं कि हमारे बुरे कर्मों का फल मेरे साथ आपको क्यों भोगना पड़ रहा है? मेरे कारण आपको क्यों संताप झेलना पड़ रहा है? पिता की ओर इशारा करते हुए उसने पुनः कहना प्रारंभ किया गत जन्म में ये मेरे बेटे थे। उस समय इनाक एक ही प्रयास रहता कि किस तरह अधिक से अधिक मुझे दुःख पहुँचे। इसी कारण विधाता की मर्जी के अनुसार मुझे यहाँ जन्म लेना पड़ा और आप लोगों को इतने कष्ट उठाने पड़े।
इतना कह कर वह कुछ क्षण रुका और फिर कहा “बस यही मेरी विगत जीवन गाथा है। अब मैं चलता हूँ।” इसके उपरान्त उस लड़के की मृत्यु हो गई।
यह सारे उदाहरण इस बात के स्पष्ट प्रमाण हैं कि मृत्यु के बाद ही जीवन का अन्त नहीं हो जाता, वरन् वह एक प्रवाह के रूप में बना रहता है। जीवन के बाद मृत्यु और मृत्यु के बाद पुनः जीवन का अविच्छिन्न चक्र तब तक चलता रहता है, जब तक जीव अपने परम लक्ष्य को प्राप्त कर परमात्मा में न समाहित हो जाय। इस बीच उसका जन्म लेना और पिछले जन्म में किये कर्मों का फल भोगने का क्रम चलता रहता है। यह तथ्य विज्ञान सम्मत भी है, शास्त्र सम्मत भी। हमें इस ध्रुव सत्य पर विश्वास करना चाहिए।
एक धोबी नदी तट पर कपड़े सुखा रहा था। उसकी स्त्री हड़बड़ा कर कह रही थी। संध्या आ चली, जल्दी चलना चाहिये नहीं तो रास्ते में परेशान होना पड़ेगा।
समीप ही एक शेर झाड़ी में छिपा यह सुन रहा था। उसने सोचा कि संध्या कोई बड़ी मुसीबत हैं। वह डर के मारे एक समीपवर्ती पेड़ के नीचे जा छुपा। इधर कुम्हार का गधा भी कहीं गायब हो गया। धोबी उसे अँधेरे में ही खोजने निकला। देखा तो पेड़ के नीचे शेर बैठा था उसने उसी को गधा समझा और डंडे से पीटता हुआ वहाँ ले आया जहाँ उसकी स्त्री ने कपड़े समेट कर रखे थे। शेर कपड़े पर कपड़े लादे और उसे डंडे से हाँकता हुआ घर ले चला। शेर पुरी तरह घबराया हुआ था कि उसे संध्या ने घेर लिया अब उससे बचना मुश्किल है। रात भर उसने बाड़े में बंद हो कर गुजारी। दूसरे दिन सवेरा हुआ तो उसने वस्तुस्थिति समझी और जंगल के लिये चम्पत हो गया। सोचा संध्या कुछ थी नहीं। अपने भय की अँधेरे में उपजी भ्रान्ति ही थी।
भक्ति का तात्पर्य है उच्चस्तरीय प्यार। लौकिक ऽऽऽऽ में आदान प्रदान मुख्य होता है। जिसमें कोई ऽऽऽऽ प्रयोजन पूरा होता हो या होने की संभावना हो। ऽऽऽ में सहज प्यार नहीं उपजता जिसमें कुछ पाना हो, ऽऽऽऽ दोस्ती बढ़ाई जाती है। इस बढ़ावे में भेंट उपहारों का अनुनय विनय का सिलसिला चलता है। प्रशंसा के पुल बाँधना भी एक विशेष प्रकार की रिश्वत है। जिस पर शिष्टाचार, निर्वाह, अतिवाद की सीमा तक पहुँच पाता है। अपने को इस रूप में व्यक्ति प्रस्तुत करता है, मानो सब ओर से मन हटा कर एक लक्ष्य पर ही केन्द्रित किया है। इस आधार पर चमचे, चापलूस और चारण अपना काम चलाते हैं और आशा करते हैं कि लाभ दृष्टि से लोकाचार का निर्वाह चलते ही रहना चाहिए।
सम्पन्न और समर्थ लोगों से ऐसा शिष्टाचार बरता ऽऽऽऽ जाता है। उनकी प्रशंसा में परिचित लोग प्रतिस्पर्धा भी करते हैं और अपनी भक्ति को अधिक ऊँची सिद्ध करने के लिए पंखा झलना, तलवे सहलाने जैसे कृत्य भी करते रहते हैं। उनकी सुरक्षा सफाई एवं मनचाही को पूरा करने के लिए अपनी ओर से प्रयत्न करते है।
परमेश्वर के प्रति ऐसी प्रवंचनाओं का आश्रय लेना व्यर्थ है क्योंकि घट घटवासी होने के कारण क्रिया के पीछे छिपे उद्देश्य को वह भली−भांति जानता है। उसे ऽऽऽऽ समझने में देर नहीं लगती कि यह मनुहार किस प्रयोजन की पूर्ति के लिए की जा रही हैं। इतना अंतर तो हर कोई जानता है कि स्वार्थ साधना के लिए मनोकामना पूर्ति का लक्ष्य रखकर की गयी मनुहार खिलवाड़ ही होती है। उस पर समझदार ध्यान नहीं देते और किसी की अकारण आकस्मिक पूजा पाठ पर उतरने के साहस से अनभिज्ञ नहीं रहते।
ईश्वर नियम स्वरूप है। व्यापक चेतना के रूप में भी। उसके नियम अनुबन्धों को पालन करने वाले ही प्रगति करते हैं कहने लायक सफलताएँ प्राप्त करते हैं। संसार की तरह आत्मिक क्षेत्र में भी पुरुषार्थ की प्रतिष्ठा है। यह पुरुषार्थ सामने वाले की चापलूसी करने के लिए अपनी पात्रता विकसित करने की दिशा में थोड़ी जानी चाहिए। वर्षा का जल बरसता तो सर्वत्र है पर एकत्रित वहीं होता है जहाँ जितना गहरा गड्ढा है। टीले की चोटी पर जल भण्डार का जमा होना कठिन हैं। इसके लिए बादलों से अनुरोध करने की अपेक्षा टीले के शिखर को खोदकर इतना गड्ढा बनाने का परिश्रम करना चाहिए जिससे कि किसी कदर जल राशि समा सके। तात्पर्य यह है कि अपने व्यक्तित्व को इतना गहरा करना चाहिए जिससे अपने चिन्तन चरित्र व्यवहार में उत्कृष्ट आदर्शवादिता की अधिकाधिक मात्रा का समावेश हो सके।
कई तथा कथित भक्तजनों की पूजा परिचर्या की कसौटी यह बनती है कि प्रथम भगवान के दर्शन हों। दर्शन होने पर यह पता चलेगा कि उनके ऊपर हमारी बातों का पूजा प्रतिष्ठा का प्रभाव हुआ या नहीं? जब एक बार दर्शन हो गये तो समझना चाहिए कि घनिष्टता पक्की हो गई। अब बार बार भी वैसा होता रह सकता है। तब किसी मौके पर अपनी आकांक्षा का प्रकटीकरण जोर दे कर इतने आग्रह पूर्वक भी किया जा सकता है कि उस पूर्ति के लिए उन्हें बाध्य किया जा सके। वे चाहते हैं कि इष्टदेव की जैसी भी प्रतिमा उनके मनः क्षेत्र में चढ़ी है वही साकार बन कर सामने आ खड़ी हुआ करे।
समझा जाना चाहिए कि व्यापक शक्तियों का कोई आकार नहीं होता। पवन सर्वव्यापी है, इसलिए उसके प्रभाव का परिचय पेड़ों के पते हिलते हुए देखकर किया जा सकता है, पर ऐसा अवसर कभी कदाचित ही किया जा सकता है, पर ऐसा अवसर कभी कदाचित ही आता है कि भगवान स्वरूप धारण करके पेड़ के पास पहुँचे और उसकी डालियाँ हिलायें। निराकार को साकार रूप में चक्षुओं से देख सकना कठिन है। अन्तरात्मा में उसका दर्शन श्रद्धा, प्रज्ञा और निष्ठा की अभिवृद्धि के रूप में ही जाना जा सकता है। आकार बनाकर प्रकट होने पर वे एकाँगी रह जाते है। जब एक स्थान पर रहने वाला कलेवर बनायें तो यह कठिनाई खड़ी होती है कि सारे संसार की व्यवस्था कौन चलायेगा। एक देशीय सत्ता तो अपने निकटवर्ती क्षेत्र को ही प्रभावित कर सकती है। एक ही दृश्य या कृत्य में संलग्न हो सकती है उसका सर्वव्यापी या सुविस्तृत होना कठिन है।
कर्मफल का सिद्धान्त अकाट्य है। बुराई का दुष्परिणाम और अच्छाई का सत्परिणाम मिलना ही चाहिए। यदि यह उपक्रम ठीक चल रहा हो तो किसी को यह भ्रम नहीं होना चाहिए कि परमेश्वर न्याय और व्यवस्था के रूप में हर जगह विद्यमान नहीं है। उसके अस्तित्व का बोध चर्म चक्षुओं से नहीं, वरन् उसकी क्रिया पद्धति को देख कर किया जा सकता है।
ईश्वर हमारे अनुरोध के अनुसार अपनी कर्मफल व्यवस्था बनाता है, यह सोचना व्यर्थ है। अनेक भक्तजन यदि ऐसी ही खींच तान करते रहें तो उनकी इच्छा का मर्जी का विधान बनाते रहना पड़ेगा। तब यह संभव न हो सकेगा कि अपने निर्धारित नीति नियमों का परिपालन उसके लिए संभव हो सकें। नियमों का व्यतिक्रम चल पड़े तो फिर समझना चाहिए कि स्रष्टा को अपने नियम और मर्यादाओं को परित्याग करने के लिए कहा जा रहा है। ऐसी आशा अपेक्षा तो किसी नौकर अथवा चापलूस से ही की जा सकती है। हमें यह आशा नहीं करनी चाहिए कि जो हम कर सकते हैं, उसे न करके सीधे भगवान को ही बार-बार पुकारे और उसी आधार पर अपनी इच्छित कष्ट कठिनाइयों की पूर्ति कर लिया करें।
भक्ति का तात्पर्य है- “प्यार”! सच्चे प्यार में देने की ही उत्कंठा होती है। लेने की आकांक्षा के लिए उत्कंठा मन में उठती ही नहीं। यदि भक्ति सच्ची है तो साधक की एकमात्र इच्छा यही रहती है कि किसी प्रकार भगवान के काम आऊँ। किस प्रकार उसके उद्यान में शोभायमान फूल की तरह खिलूँ। संस्थापक का गौरव बढ़ाऊं। भक्त की स्वयं की कोई कामना नहीं रही है। न ही वह जिस-तिस पूर्ति के लिए पूजा प्रार्थना ही करते है। प्रभु के विश्व उद्यान को अधिक सुन्दर और समुन्नत बनाने की भावना यदि खिल उठे और लोक मंगल के निमित्त प्रस्तुत करते हुए वह अपने व्यक्तित्व को इस कदर निखारे कि वह अपने आपको नियंता की तरह आत्मशोधन और परमार्थ परिपालन में निरन्तर निरत करता रहे। यदि ऐसा बन पड़े तो समझना चाहिए कि भक्ति का स्तर सही है। अस्तु उसकी पूर्ति में भी किसी प्रकार का संदेह नहीं। स्वर्ग, मुक्ति, सिद्धि, चमत्कार दिखाने या ईश्वर को बुला लेने का मनोरथ भक्ति नहीं है। उस में तो भक्ति और स्रष्टा का स्तर भी गिरता है। हमें भक्त और भक्ति की गौरव गरिमा समझनी चाहिए और समझने के उपरान्त उसे सही रूप में ही कार्यान्वित करना चाहिए।
निजी जीवन में सादगी सात्विकता अपनाने वालों की सदा असाधारण प्रतिष्ठा रही है।
पेशवाओं के राजगुरु तथा वरिष्ठ न्यायाधीश राम शास्त्री उच्चतम सम्मान प्राप्त थे पर उनका रहन सहन ब्राह्मणोचित अपरिग्रह के साथ जुड़ा हुआ था। वे चाणक्य की तरह छोटी कुटिया में रहते थे और निर्धनों जैसी सादगी से निजी खर्च चलाते थे।
एक दिन उसकी पत्नी का राजमहल से बुलावा आया वे गई। रानियों ने उन्हें भरपूर सम्मान दिया और विदा करते समय बहुमूल्य वस्त्रों तथा आभूषणों से लाद कर पालकी में विदा किया।
घर आई तो उन्हें देखते ही कहा- यह तो कोई रानी है मेरी ब्राह्मणी नहीं। उन्हें वापस भेज दिया और घर का दरवाजा बन्द कर लिया। वे पति का इशारा समझ गई।
राजमहल पहुँच कर शास्त्री जी की पत्नी ने सारे वस्त्र-आभूषण उतार दिये। अपने पुराने परिधान धारण कर लिये। घर लौटी तो शास्त्री जी ने उनका स्वागत किया और कह-ब्राह्मणी को औसत नागरिक से बढ़ कर रहन सहन नहीं अपनाना चाहिए।
शारीरिक स्वस्थता के तीन चिन्ह :- (1) खुलकर भूख, (2) गहरी नींद (3) काम करने के लिए स्फूर्ति। आत्मिक समर्थता के भी तीन चिन्ह हैं - (1) चिन्तन में उत्कृष्टता का समावेश, (2) चरित्र में निष्ठा और (3) व्यवहार में पुण्य परमार्थ के पुरुषार्थ की प्रचुरता। इन्हीं को उपासना साधना और आराधना कहते हैं। आत्मिक प्रगति का लक्षण है मनुष्य में देवत्व का अभिवर्धन। देवता देने वाले को कहते हैं। दूसरे शब्दों में इसे धर्म धारणा या सेवा साधना भी कह सकते हैं। व्यक्तित्व में शालीनता उभरेगी तो निश्चित रूप से सेवा की ललक उठेगी। सेवा साधना से गुण, कर्म, स्वभाव में सदाशयता उभरेगी तो परमार्थरत हुए बिना रहा नहीं जा सकेगा। पृथ्वी पर मनुष्य शरीर में निवास करने वाले देवताओं को भूसुर कहते हैं। यह साधु और ब्राह्मण वर्ग के लिए प्रयुक्त होता है। ब्राह्मण एक सीमित क्षेत्र में परमार्थरत रहते हैं। और साधु परिव्राजक के रूप में सत्प्रवृत्ति संवर्धन का उद्देश्य लेकर जहाँ आवश्यकता है वहाँ पहुँचते रहते हैं। उनकी गतिविधियाँ पवन की तरह प्राण प्रवाह बिखेरती हैं। बादलों की तरह बरस कर हरीतिमा उत्पन्न करती हैं। आत्मिक प्रगति से कोई लाभान्वित हुआ या नहीं, उसकी पहचान इन्हीं दो कसौटियों पर होती हैं कि चिन्तन और चरित्र में मानवी गरिमा के अनुरूप उत्कृष्टता दृष्टिगोचर होती है या नहीं। साथ ही परमार्थ परायणता की ललक कार्यान्वित होती है या नहीं।
मोटे तौर पर दान पुण्य को परमार्थ कहते हैं। पर इसमें विचारशीलता का गहरा पुट रहना आवश्यक है। दुर्घटना ग्रस्त, आकस्मिक संकटों में फँसे हुओं को तात्कालिक सहायता आवश्यक होती है। इसी प्रकार अपंग, असमर्थों को भी निर्वाह मिलना चाहिएं। इसके अतिरिक्त अभाव ग्रस्तों, पिछड़े हुओं की ऐसी परोक्ष सहायता की जानी चाहिए जिसके सहारे वे स्वावलम्बी बन सकें। उन्हें श्रम दिया जाय, साथ ही श्रम का इतना मूल्य भी, जिससे मानवोचित निर्वाह संभव हो सके। गाँधी जी ने खादी को इसी दृष्टि से महत्व दिया था कि उसे अपनाने पर बेकारों को काम मिलता है। अन्य कुटीर उद्योग भी इसी श्रेणी में आते है। बेरोजगारी दूर करने के साधन खड़े करना प्रकारान्तर से अभावग्रस्तों की सहायता ही है। मुफ्तखोरी को बढ़ावा देना दान नहीं हैं। इस में निठल्लेपन की आदत पड़ती है। प्रसाद और व्यसन पनपते हैं। लेने वाले की हीनता की अनुभूति होती है और देने वाले का अहंकार बढ़ता है। यह दोनों ही प्रवृत्तियां दोनों ही पक्षों के लिए अहितकर हैं। इसलिए औचित्य और सही परिणाम को दृष्टि में रखते हुए ही दान किया जाना चाहिएं। अन्यथा दान के नाम पर धन का दुरुपयोग ही होता है और उससे स्वावलम्बन का उत्साह घटता है।
दोनों में सर्वोपरि ज्ञान दान को माना जाता है। इसे ब्रह्मयज्ञ भी कहते हैं। सद्भावनाएँ और सत्प्रवृत्तियां जिन प्रयत्नों से बढ़ सकें उसी को सच्चा परमार्थ कहना चाहिए। सत् चिंतन के अभाव में ही लोग अनेकों दुर्गुण अपनाते और पतन पराभव के गर्त में गिरते हैं। यदि सही चिन्तन कर सकने का पथ प्रशस्त हो सके तो समझना चाहिए कि सर्व समर्थ मनुष्य को अपनी समस्याएँ आप हल करने का मार्ग मिल गया। अपंगों, असमर्थों या दुर्घटना ग्रस्तों को छोड़कर कोई ऐसा नहीं है जो सही चिंतन करने का मार्ग मिल जाने पर ऊँचा उठ न सके, आगे न बढ़ सके, अपनी समस्याओं का आप हल न कर सके। इसलिए आत्मिक प्रगति के लिए प्रधानतया यही नीति अपनानी चाहिए कि लोक मानस के परिष्कार के लिए, सत्प्रवृत्ति सम्वर्धन के लिए अपनी योग्यता और परिस्थिति के अनुसार भरसक प्रयत्न किया जाय।
समय की अपनी समस्यायें हुआ करती है। और परिस्थिति के अनुरूप उनके समाधान भी खोजना पड़ते है। प्राचीन कथा पुराणों और धर्मशास्त्रों से युग धर्म का निरूपण नहीं हो सकता। उसके लिए आज के प्रवाह प्रचलन और वातावरण को ध्यान में रखना होगा। इस हेतु युग मनीषियों को ही सदा से मान्यता मिलती रही है। इन दिनों भी इसी प्रक्रिया को अपनाना होगा। इस के लिए युग चेतना का आश्रय लेना होगा। युग मनीषियों के प्रतिपादनों पर ध्यान देना होगा। सद्ज्ञान संवर्धन का सही तरीका यही हो सकता है। साक्षरता की तरह ऐसे सद्ज्ञान संवर्धन की भी आवश्यकता है जो व्यक्ति और समाज के सम्मुख उपस्थिति समस्याओं के संदर्भ में समाधान कारक सिद्ध हो सके। आत्मोत्कर्ष के लिए खोजना होगा। लोक मानस का परिष्कार और सत्प्रवृत्ति-संवर्धन को सर्वोच्च स्तर का आधार मानते हुए बौद्धिक, नैतिक और सामाजिक क्षेत्रों में युग धर्म की प्रतिष्ठापना की जानी चाहिए।
कहा जाता है कि विचार क्रान्ति की, ज्ञान यज्ञ की साधना में सभी दूरदर्शी विवेकवानों को लगना चाहिए। इसी निमित्त लेखनी, वाणी तथा दृश्य श्रव्य आधारों का ऐसा प्रयोग करना चाहिए जिससे सर्व साधारण को युग धर्म पहचानने और कार्यान्वित करने की प्रेरणा मिल सकें। सर्वजनीन और सार्वभौमिक ज्ञान-यज्ञ ही आज का सर्वश्रेष्ठ इसकी उपेक्षा करके, सस्ती वाहवाही पाने के लिए कुछ भी देते, बखेरते और कहते लिखते रहने से कुछ वास्तविक प्रयोजन सिद्ध होने वाला नहीं है।
इस चेतना का प्रखर प्रज्वलित करने के लिए युग साहित्य की प्राथमिक आवश्यकता है। उसी के आधार पर पढ़ने, पढ़ाने, सुनने, सुनाने की बात बनती है। शिक्षितों को पढ़ाया और अशिक्षितों को सुनाया जाये तो लोक प्रवाह को सही दिशा दी जा सकती है। इसके लिए प्रज्ञा युग के साधकों को झोला पुस्तकालय चलाने के लिए अपना समय और पैसा लगाना चाहिए। सत्साहित्य खरीदना सभी के लिए कठिन है, विशेषता ऐसे समय में जब लोगों को भौतिक स्वार्थ साधनों के अतिरिक्त और कुछ सूझता ही नहीं। आदर्शों की बात सुनने पढ़ने की अभिरुचि है ही नहीं ऐसे समय में युग साहित्य पढ़ाने वापस लेने के लिए शिक्षितों के घर जाया जाये, उन्हें पढ़ने योग्य सामग्री दी जाती और वापस ली जाती है, तो इतने से सामान्य कार्य से ज्ञान यज्ञ का महत्वपूर्ण प्रयोजन हर क्षेत्र में पूरा होने लगेगा। अशिक्षितों को सुनाने की बात भी इसी के साथ जोड़ कर रखनी चाहिए।
विचार गोष्ठियों, सभा सम्मेलनों, कथा प्रवचनों का अपना महत्व है। इसे सत्संग कहा जा सकता है। वाणी के माध्यम से यह दोनों कार्य किसी रूप में हर कही चलते रह सकते है। अपना उदाहरण प्रस्तुत करना सबसे अधिक प्रभावोत्पादक होता है। लोग समझने लगें है। कि आदर्शों की बात सिर्फ कहने सुनने के लिए होती है। उन्हें व्यावहारिक जीवन में नहीं उतारा जा सकता। इस भ्रान्ति का निराकरण इसी प्रकार हो सकता है। कि ज्ञान यज्ञ के अध्वर्य-विचार क्रान्ति के प्रस्तोता जो कहते हैं दूसरों से जो कराने की अपेक्षा है। उसे स्वयं अपने व्यवहार में उतारकर दिखायें अपने को समझाना ढालना दूसरों को सुधारने का अपेक्षा अधिक सरल है। उपदेष्टाओं को आत्मिक प्रगति के आराष-नारत होने वालों को अपनी कथनी और करनी एक करके दिखानी चाहिए।
आदर्शवादी लोक शिक्षण के लिए इस प्रकार आवश्यकता अनिवार्य रूप से रहती है। फिर भी यह आवश्यक नहीं की पूर्णता प्राप्त करने तक हाथ पर हाथ रखकर बैठे रहा जाय। छठी कक्षा का विद्यार्थी पांचवीं कक्षा वाले की तो कुछ सहायता कर ही सकता है। अपने से कम योग्यता एवं स्थिति वालों का मार्ग दर्शन करने में कोई भी समर्थ एवं सफल हो सकता है।
इन दिनों उपरोक्त प्रयोजन यंत्रों की सहायता से भी बहुत कुछ हो सकता है। प्राचीन काल में पुस्तकें हाथ से लिखी जाती थीं पर अब तो वे प्रेस में मशीनों से छपती हैं इसी प्रकार दृश्य और श्रव्य माध्यम भी अनेकों सुलभ है। उसका प्रयोग ज्ञान यज्ञ का विस्तार करने के लिए किया जा सकता है। स्लाइड प्रोजेक्टर (प्रकाश चित्र यंत्र) कम लागत का और लोक रंजन के साथ लोक मंगल का प्रयोजन पूरा करने वाला उपकरण हैं वीडियो कैसेट इस निमित्त बनाये और जहाँ टीवी है वहाँ दिखाये जा सकते है। टेप प्लेयर पर टेप सुनाये जा सकते है।
दीवारों पर आदर्श वाक्य लेखन एक अच्छा तरीका है। इसका यान्त्रिक संस्करण है। फर्नीचर पर हैंड बैगों पर चिपकाए जाने वाले स्टीकर इस आधार पर भी सद्भावनाओं का अच्छा प्रचार हो सकता है।
संगीत टोलियां जहाँ भी थोड़े व्यक्ति एकत्रित हो वही अपना प्रचार कार्य आरम्भ कर सकती है। लाउड स्पीकरों पर रिकार्ड या टेप बजाये जा सकते है। इस संदर्भ में दीप यज्ञों की आयोजन प्रक्रिया अतीव सस्ती सुगम और सफल सिद्ध होती है। इस माध्यम से कर्मकाण्ड के माध्यम से आत्मनिर्माण, मध्याह्न काल के महिला सम्मेलन में परिवार निर्माण और रात्रि के कार्यक्रम में समाज निर्माण की सुधार प्रक्रिया और संस्थापन विधा का समावेश किया जा सकता है।
परिवार में रात्रि के समय कथा कहानियाँ कहने के अपने लाभ है। इस प्रयोजन के लिए प्रज्ञा पुराण जैसे कथा ग्रन्थ अभीष्ट आवश्यकता की पूर्ति कर सकते है। परस्पर विचार विनिमय वाद विवाद प्रतियोगिता कविता सम्मेलन भी कम उपयोगी नहीं है। हर व्यक्ति स्वयं कविता तो नहीं कर या कह सकता, पर दूसरों की बनाई हुई प्रेरणा प्रद कविताएं सुनाने की व्यवस्था तो कहीं भी हो सकती है। चित्र प्रदर्शनियाँ भी जहाँ सम्भव हों, इस प्रयोजन की पूर्ति में सहायक हो सकती है।
खोजने पर ऐसे अनेकों सूत्र हाथ लग सकते हैं जो ज्ञानयज्ञ की विचार क्रान्ति की सत्प्रवृत्ति संवर्धन की दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन के लिए कौन, क्या, किस प्रकार कुछ कर सकता है। इसकी खोज बीन करते रहने पर हर जगह किसी को कोई न कोई मार्ग मिल सकता है। ढूंढ़ने वाले अदृश्य परमात्मा तक को प्राप्त कर लेते हैं फिर ज्ञानयज्ञ की प्रक्रिया को अग्रगामी बनाने के लिए मार्ग न मिले, ऐसी कोई बात नहीं है। आवश्यकता है उसका महत्व समझने की उस पर ध्यान देने की।
उपासना से भावना जीवन साधना से व्यक्तित्व का और आराधना से क्रियाशीलता का परिष्कार और विकास होता है। आराधना उदार सेव्य साधना से ही सधती है। सेवा कार्यों में सामान्यतः वे सेवायें है जिनसे लोगों को सुविधाएं मिलती है। श्रेष्ठतर सेवा वह है जिससे किसी को पीड़ा का अभावों का निवारण होता है। श्रेष्ठतम सेवा वह है जिससे व्यक्ति पतन से हटकर उन्नति की ओर मोड़ा जा सके। सुविधा बढ़ाने और पीड़ा दूर करने की सेवा तो कोई धन सम्पन्न भी कर सकते है। परन्तु पतन निवारण की सेवा तो कोई आत्म चेतना सम्पन्न ही कर सकता है। यह सेवा भौतिक सम्पदा से नहीं दैवी सम्पदा से की जाती है। दैवी सम्पदा देने से घटती नहीं बढ़ती है। इसलिए भी वह सर्वसुलभ और श्रेष्ठ मानी जाती है।
संत और ऋषि स्तर के व्यक्ति पतन निवारण की सेवा को प्रधानता देते रहे है। इसीलिए वे संसार में पूज्य बने। जिनकी सेवा की गई वे भी महान बने। सेवा की यह सर्वश्रेष्ठ धारा ज्ञान यज्ञ के माध्यम से कोई भी अपना सकता है। स्वयं लाभ पा सकता है। और अगणित व्यक्तियों को लाभ पहुँचाकर पुण्य का भागीदार बन सकता है।
तेज वेग वाली गहरी नदी में दो बच्चे बहते जा रहे थे। उन्हें निकालने के लिये उनकी माँ नदी के किनारे बैठी चिल्ला रही थीं। पर दर्शकों में से किसी की भी हिम्मत न पड़ रही थी कि बचाने के लिये कूदे और अपने को जोखिम में डाले।
इस असमंजस की घड़ी में एक पुक्क नदी में कूदा और तीर की तरह तैरकर डूबते उतरते बच्चों के पास जा पहुँचा और उन्हें अपनी पीठ पर लाद कर किनारे पर वापस लौट आया। दर्शक उसकी उदार साहसिकता को दष्ख कर बंध रह गये।
यह लड़का इसी उदार साहसिकता के बल बूते प्रगति करता चला गया और अन्त में अमेरिका के राष्ट्रपति जार्ज वाशिंगटन के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
पिछड़े समुदाय की लोकचेतना पूर्वाग्रहों से भरी जड़ प्रकृति की होती है। उसे प्रचलनों का समर्थन ही नहीं गर्व करते भी देखा जाता है। परिवर्तन की बात सुनने और उस दिशा में कुछ कदम बढ़ाना उनके लिए अति कठिन होता है।
सुधारकों को इन्हीं परिस्थितियों में काम करना पड़ता है। सहमति की तुलना में असहमति से ही अधिक पाला पड़ता है। यह अस्वीकृति इस आधार पर उभरती है कि उन पर कितना दबाव पड़ा। बदलने की आवश्यकता अनुभव करने के लिए उन्हें तर्क या व्यवहार की दृष्टि से कितना बाधित होना पड़ा।
जब दबाव का तापमान कुछ और बढ़ता है तो उपहास उड़ाया जाने लगता है। उपहास इस बात का प्रतीक है। कि जो कहा गया था उसकी क्षमता को समझा गया और मान्यता दी गई।
जब सुधार प्रयासों की शक्ति बढ़ती है और लगता है कि वे सफलता की दिशा में चल रहे हैं तो विरोध खड़ा किए जाते हैं पर्चे बाजी होती है एवं विरोधी यह प्रयत्न करते हैं कि उनकी जीत मानी जाये ओर प्रतिपादन कर्त्ता को हारा हुआ या बदनाम सिद्ध कर दिया जाये।
अन्तिम शस्त्र है आक्रमण। जब कोई उपाय नहीं सूझता तो मूढ़मति लोग आक्रमण का सहारा लेते हैं शारीरिक चोट पहुँचाने से लेकर दुरभिसन्धियाँ रचने तक आरोप आक्षेप लगाकर चरित्र हनन तक की नीति अपनाते है। ऐसा प्रायः सभी
सुधारवादियों को सहन करना पड़ता है। जब तक आन्दोलन शिक्षित सामान्य स्तर तक रहता है, तब तक उपहास, तिरस्कार का आश्रय लेकर ही प्रतिपक्षी काम चलाते रहते है। पर जब अवाँछनीयता के अस्तित्व को अपने लिए खतरा खड़ा होते दीखता, है तो वह प्रतिरोध पर उतर आती है। निहित स्वार्थों के दाँव में लगा हुआ कानून का चक्कर जब हाथ से जाता दीखता है तब वे अपने आक्रोश को एकत्रित करके हमला बोलने लगते है। देवासुर संग्राम का समूचा इतिहास इसी एक तथ्य के ईद−गिर्द घूमता है। शहीदों के बलिदान के पीछे इसी उपक्रम की पुनरावृत्ति होती देखी जा सकती है।
सन्त सुधारक और शहीद की एक सुनिश्चित श्रृंखला है। महान परिवर्तन के प्रणेता को सर्वप्रथम सन्त की भूमिका निभानी पड़ती है, ताकि उसके चिन्तन और चरित्र लोक श्रद्धा अर्जित करके अपने व्यक्तित्व और प्रभाव का दुहरा दबाव डाल कर प्रस्तुत तर्कों, तथ्यों प्रमाणों को सशक्त बना सकें और अनेकानेक विचारशीलों समर्थक, सहयोगी बन सकें। इसके बाद सच्चे मन से अपनाया गया प्रतिपादन कार्य रूप में परिणित होने लगता है। लोग उसे करने भी लगते है। जो उनने समझा और सही माना था।
सुधारकों की यही सफलताओं है। इसके उपरान्त जब विचारशील उस प्रयास का अभिनन्दन करते हैं वह निहित स्वार्थ आक्रमण का आश्रय लेते हैं और अपने प्रतिपक्षी मोर्चे को तहस नहस करने का प्रयत्न करते है संघर्ष चल पड़ने पर कभी एक पक्ष को चोट लगती कभी दूसरे को। असुरता हारती है तो प्रगति का पार प्रशस्त होता है पर यदि औचित्य पर भी आघात हो लगे, तो भी हानि नहीं। भावनायें उमड़ती है और छू हुए काम में लक्ष्य तक पहुँचने में सहायता करती है। ईसा सुकरात मंसूर दयानन्द आदि के प्राण ही लिए गये इतने पर भी उनका छूटा प्रयास रुका नहीं वरन् और भी अधिक तेजी पकड़ता गया इसी निष्कर्ष को ध्यान में रखते हुए तत्वदर्शियों ने कहा है कि अन्ततः सत्य की विजय होती है।
21 वीं सदी को उज्ज्वल बनाने वाला आधार यों सुदृढ़ हो चला
चिन्तन और चरित्र के पतन ने आज सर्वत्र संकट खड़े किये है। मनुष्य जाति को उसने बचाने का एक ही मार्ग है। सद्विचारों की प्रतिष्ठापना और सन्मार्ग का अवलम्बन। प्रज्ञा अभियान के छोटे छोटे जान पड़ने वाले हमारे कार्यक्रम मनुष्य जीवन को उसी दिशा में उसी प्रकाश की ओर गतिशील कर रहें है। इन आयोजनों को देखने वाला प्रत्येक व्यक्ति इस बात से आश्वस्त हुए बिना नहीं रहता-यह कार्यक्रम 21 वीं सदी के मनुष्य को निश्चित ही सुखी समुन्नत बना कर रहेंगे।
पटना (बिहार) गायत्री शक्तिपीठ कंकडबाग में दीप यज्ञायोजन के अवसर पर पूरा मेला लग गया। महाराणा प्रताप हॉल में नगर के सभी वरिष्ठ अधिकारियों एवं प्रभावशाली डॉक्टरों की गोष्ठी रखी गई। मिशन के कार्यक्रमों का उपस्थित समुदाय पर अनुकूल प्रभाव पड़ा। प्रादेशिक समाचारों में कार्यक्रम की पूरी रिपोर्ट दी गई। प्रदेश सरकार के राज्य श्रम मंत्री डा विजय कुमार सिंह ने दीप प्रज्वलित कर कार्यक्रम का शुभारम्भ किया।
गया (बिहार) समूचे क्षेत्र में प्रज्ञा आलोक के विस्तार के संकल्प के साथ दीप यज्ञायोजन सोल्लास सम्पन्न हुआ। सम्मेलन तथा दीप यज्ञायोजन प्रेरणादायी वातावरण में सम्पन्न हुआ। हर धर्म सम्प्रदाय के प्रतिनिधि सम्मिलित हुए। 22 प्रज्ञा मण्डलों का गठन हुआ।
अम्बिकापुर-सरगुजा (म0प्र0) नगर के प्रभावशाली एवं गण्यमान्य व्यक्तियों तथा
प्रशासनिक अधिकारियों उपस्थिति में दीपयज्ञ सम्पन्न हुआ। 34 प्रज्ञा मण्डलों का गठन हुआ। 1500 पत्रिकाओं के नये सदस्य बनाने के संकल्प लिए गये।
गोरखपुर (उ0प्र0) समीपवर्ती क्षेत्र में दीपयज्ञ श्रृंखला के निर्धारित कार्यक्रम आशातीत सफलताओं के साथ दहेज उन्मूलन कार्यक्रम के अंतर्गत बिना दहेज के विवाह करने के लिए सैकड़ों नवयुवकों ने संकल्प लिया।
सारसा-खेडा (गुज0) पचास हजार भावनाशील नर नारियों की उपस्थिति में चौबीस हजार वेदीय दीपयज्ञ आयोजन अभूतपूर्व सफलताओं के साथ सम्पन्न हुआ। समूचे क्षेत्र में सत्प्रवृत्ति संवर्धन एवं दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन के लिए व्यापक स्तर पर प्रयास किए जा रहे है। युग शक्ति गायत्री के अधिकाधिक सदस्य बनाने के संकल्प लिए गये।
शहडोल (म0प्र0) श्री मुक्ता सिंह असि0 डायरेक्टरष् कृषि तथा प्रेम कुमार गुप्ता डिपों मैनेजर म0प्र0 राज्य परिवहन के सराहनीय प्रयासों से दीप यज्ञायोजन आशातीत सफलताओं के साथ सम्पन्न हुआ। 15 प्रज्ञा मण्डलों का गठन किया गया। संपर्क क्षेत्र में एक हजार पत्रिकाओं के नये सदस्य बनाने के संकल्प लिए गये।
डाल्टन गंज -पलामू (बिहार) राष्ट्रीय एकता सम्पन्न हो रहे है। शिक्षण संस्थानों में पूज्य गुरुदेव का संदेश पहुँचाने की व्यापक व्यवस्था बनाई गई है। अब तक 34 विद्यालयों में कार्यक्रम सम्पन्न हों चुके है। विद्यार्थियों में नैतिक शिक्षा उपदेश से नहीं बल्कि आचरण एवं व्यवहार में समावेश करके ही दी जा सकती है। यह संदेश विद्यार्थियों एवं अध्यापकों में अनुकूल प्रभाव डालता है।
देवगढ़ बगीचा पंचमहाल (गुज0) गुजरात कृषि विश्व विद्यालयों के प्रधानाचार्य श्री नारायण भाई आर॰ पटेल तथा नगर के गण्यमान्य व्यक्तियों की उपस्थिति में दीपयज्ञ आयोजन सम्पन्न हुआ। युग शक्ति गायत्री के 1000 सदस्य बनाने के संकल्प लिए गये।
धमतरी-रायपुरी (म0प्र0) शक्तिपीठ प्राँगण में दीपयज्ञ आयोजन श्रद्धासिक्त वातावरण में सम्पन्न हुआ। समूचे नगर को स्टीकरों से सजाने एक हजार पत्रिकाओं के सदस्य बनाने तथा 107 परिजनों को सत्रों में भेजने के संकल्प लिए गये।
सतना (म0प्र0) समीपवर्ती क्षेत्र में दीपयज्ञायोजनों की व्यापक श्रृंखला निर्धारित की गई है। अब तक सतरी, खम्हरिया, उचेहरा, सिंहपुर रहिकगरा, सिमरवारा, नागौद, अटरा, लहरौरा, रामपुर बधेलान तथा छिबौरा में 501 वेदीय दीपयज्ञ निर्धारित किए गये है।
जशपुर (रामगढ, म0प्र0) समीपवर्ती 70 शाखाओं के परिजनों की उपस्थिति में दीपयज्ञ सम्पन्न हुआ। इस वर्ष एक हजार पत्रिकाओं के नये सदस्य बनाने के संकल्प लिये गये।
जबलपुर (म0प्र0) 50 प्रज्ञा मण्डलों के गठन तथा युग संधि पुरश्चरण में भागीदारी के संकल्प के साथ दीप यज्ञ आयोजन भाव भरे वातावरण में सम्पन्न हुआ। समीपवर्ती क्षेत्र में मुहल्ले-मुहल्ले दीप यज्ञ कराने, समूचे क्षेत्र को स्टीकरों से सजाने, 107 पत्रिकाओं के नये सदस्य बनाने का भी संकल्प सामूहिक रूप से लिया गया।
विन्ध्य क्षेत्र (म0प्र) सतना, रीदा, सीधी, शहडोल, पन्ना, दमोह, कटनी, जिलों से आठ बसों का सुसज्जित काफिल समूचे मार्ग में आलोक वितरण करता हुआ शान्ति कुँज पहुँचा सम्मिलित कार्यकर्ताओं द्वारा समूचे क्षेत्र को युगचेतना से अनुप्राणित करने के लिए भाव-भरे संकल्प लिये गये एक हजार दीप यज्ञों की श्रृंखला बनाने दो हजार के लगभग परिजनों को शान्ति कुँज में चल रहे साधना सत्रों एवं युगशिल्पी सत्रों में भेजने के लिए क्षेत्रीय स्तर पर अलग अलग संकल्प पत्र भरे गये। स्थानीय दस टोलियों के माध्यम से दीप यज्ञ सम्पन्न कराने की व्यवस्था बनाई जा रही है।
वाराणसी (उ0प्र0) उदय प्रताप कालेज के विशाल मैदान में सहस्रवेदीय दीपयज्ञ कार्यक्रम अभूतपूर्व सफलताओं के साथ सम्पन्न हुआ। नगर के चौबीसों प्रज्ञा मण्डल पाँच से पच्चीस के विस्तार के लिए संकल्पित हुए। इस वर्ष से लगभग एक हजार नये सदस्यों तक पत्रिकायें पहुंचाने की व्यवस्था की जा रही है।
बक्सर(बिहार) समूचे क्षेत्र में प्रज्ञा आलोक के विस्तार के संकल्प के साथ दीप यज्ञायोजन सम्पन्न हुआ। शिक्षण संस्थानों से जुड़े प्राध्यापकों तथा अधिकारियों का कार्यक्रम की सफलता में सराहनीय योगदान रहा। प्रत्येक विद्यालय में सद्वाक्य लिखने तथा विद्यार्थियों के माध्यम से घर घर स्टीकर लगाने के प्रयास के लिए जा रहे हैं पत्रिकाओं के एक नये सदस्य बनाने के संकल्प लिए गये।
अरगाघाट-गिरीडीह (बिहार) दीप यज्ञायोजन प्रेरणादायी वातावरण में सम्पन्न हुआ। दीप यज्ञ की व्याख्या से शिक्षित वर्ग अत्यधिक प्रभावित हुआ। 712 पत्रिकाओं के नये सदस्य बनाने के संकल्प लिये गये।
कानपुर राजकीय श्रम हितकारी केन्द्र जाजमऊ श्रमिक बस्ती में आयोजित त्रिदिवसीय सह स्रवेदउीय दीप यज्ञायोजन एवं सद्भावना सम्मेलन अत्यन्त भव्यता के साथ सम्पन्न हुआ। सम्मेलन में प्रबुद्ध नागरिकों के अतिरिक्त एअर कमौंडोर आर॰ रामापूर्ति राकेशकुमार मिततल प्रबन्ध निदेशक उ॰ प्रदेश राज्य निर्यात निगम श्री कृष्ण देव त्रिपाठी भी सम्मिलित हुए। कार्यक्रम में लगभग 50 वायुसेना के वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित रहें। एक हजार अखण्ड ज्योति के नये सदस्य बनाये गये।
सीधी (म0प्र0) 19 प्रज्ञा मण्डलों के गठन तथा युग संधि महापुरश्चरण में भागीदारी के संकल्प के साथ दीपयज्ञ कार्यक्रम सम्पन्न हुआ। नौ दिवसीय साधना सत्र के लिए सैकड़ों परिजनों आवेदन पत्र भरे।
सिरमौर, रीवा दीप यज्ञायोजन प्रेरणादायी वातावरण में सम्पन्न हुआ। इस आयोजन से नवयुवक वर्ग अत्यधिक प्रभावित हुआ। स्टौकर आन्दोलन को गति देने अधिकाधिक प्रभावित हुआ। स्टीकर आन्दोलन को गति देने अधिकाधिक प्रज्ञा मण्डलों के गठन करने, साप्ताहिक सत्संग तथा युग संधि पुरश्चरण साधना करने साप्ताहिक सत्संग तथा युग संधि पुरश्चरण साधना करने के साथ साथ 140 नये पत्रिकाओं के सदस्य बनाने का संकल्प लिया गया।
बमौरी-गुना (म0प्र0) सहस्रवेदीय दीपयज्ञ आयोजन के अवसर पर मेला जैसा दृश्य उपस्थित हो गया। समीपवर्ती 10 गाँवों से श्रद्धालु जनता कार्यक्रम में सम्मिलित हुई श्री मोती लाला चौकसे द्वारा गायत्री शक्ति पीठ के निर्माण के लिए भूमि दान स्वरूप दी गई। 14 अखण्ड-ज्योति के सदस्य कार्यक्रम के समय ही बने।
सीतापुर-सरगुजा (म0प्र0) आकर्षक जल कलश यात्रा के फलस्वरूप कार्यक्रम में सम्मिलित होने के लिए जन समूह उमड़ पड़ा 14 स्थानों पर दीप यज्ञ कराने दीवाल लेखन करने तथा शिक्षण सत्रों में भावनाशील को भेजने का संकल्प लिया गया।
धर्मजयगढ-रायगढ नगर के अधिकारियों एवं गण्यमान्य व्यक्तियों की उपस्थिति में दीप यज्ञ आयोजन प्रेरणादायी वातावरण में सम्पन्न हुआ। 50 अधिकारियों द्वारा साधना सत्र में सम्मिलित होने के लिए आवेदन पत्र भरे गये। 107 स्थानों पर दीपयज्ञ कराने, सद्वाक्य लिखने तथा पत्रिकाओं के सदस्य बनाने के संकल्प लिए गये।
भौतिक जीवन में अवगति के दो प्रमुख कारण है एक आलस्य दूसरा प्रसाद आलस्य की परिधि निष्क्रियता तक ही सीमित नहीं है वरन उसमें दुष्प्रवृत्तियों भी सम्मिलित होती है जो शरीराभ्यास में बुरी आदतों के रूप में जड़ जमा लेती है। शरीर की श्रमशक्ति द्वारा बन पड़ने वाले पराक्रम उसी कुटेव के कारण उभरने नहीं पाते और मनुष्य ज्यों - त्यों करके गया गुजरा जीवन बिताता है। आर्थिक अभावों में जिस दरिद्रता को कोसा जाता है, वह वस्तुतः क्रियाशीलता का व्यतिरेक ही है। निष्क्रियता और दुष्प्रवृत्तियाँ मिलकर ऐसा माहौल बनाती हैं जिनके कारण पिछड़े जकड़ लेता है और अभाव जन्य अनेकानेक संकट सामने ला खड़े करता है।
प्रमाद का अर्थ दीर्घसूत्रता तो है ही। आगा पीछा न सोच सकने की और बुरे लोगों से प्रभावित होकर चिन्तन को भ्रान्तियों और विकृतियों से लपेट लेने का तात्पर्य है मूढ़मति। यह प्रसाद की ही प्रतिक्रिया है। अवांछनियताएं कुरीतियाँ मूढ मान्यताएं उन्हीं के मानस पर अधिकार जमाये रहती है। जो चिन्तन में न्यून या क्षीण होती है।जो भटकाव से ग्रसित हो कर अचिन्त्य चिन्तन में निरत रहते हैं और इस निष्कर्ष पर पहुँच नहीं पाते कि अवांछनीय प्रचलन से हट कर अपने लिए किस मार्ग का चयन करें? संपर्क क्षेत्र के सम्मुख क्या उदाहरण प्रस्तुत करें? जिसके आधार पर स्वयं पार होने ओर दूसरों को पार करने का सुयोग बन सकें।
आवश्यक इस प्रकार की शिक्षा की है जो आलस्य और प्रमाद से छुटकारा दिला कर ऐसी प्रतिभा उभार सके जो बुद्धिमत्ता और क्रियाशीलता उभार सके।
आवश्यकता इस प्रकार की शिक्षा की है जो आलस्य और प्रसाद से छुटकारा दिला कर ऐसी प्रतिभा उभार सके जो बुद्धिमत्ता और क्रियाशीलता उभार सके। यह न बन पड़ने पर स्कूली पढ़ाई जो लम्बे समय तक पढ़ी जाती है। वह भी व्यक्तित्व परिष्कार के काम नहीं आती और आलस्य प्रसाद जन्य दुष्प्रवृत्तियों से छुटकारा दिलाने में समर्थ नहीं हो पाती।
जब सूर्य चन्द्र नहीं चमकते तो अल्प साधना और मूल्य वाला दीपक ही जलना चमकना आरम्भ कर देता है। शान्ति कुँज ने वही आदर्शवादी दुस्साहस किया है। उसकी प्रत्यक्ष प्रशिक्षण प्रक्रिया में ऐसे तत्वों का समावेश है जो आलस्य प्रमाद को उखाड़ने और उसके स्थान पर तत्परता-तन्मयता के ढाँचे में चिन्तन और स्वभाव को विनिर्मित कर सकें। बुद्धिमत्ता और कुशलता के अनुदानों से लाद सकें।
यहाँ एक महीने के और नो दिन के सत्रों की श्रृंखला इसी प्रयोजन की पूर्ति के लिए चलाई गई है। शांतिकुंज की वह प्रक्रिया सफल भी पूरी तरह हो रही है। उस प्रशिक्षण में व्यक्ति निर्माण परिवार निर्माण और समाज के तीनों तथ्य जुड़े हुए है। आशा की जानी चाहिए कि यह प्रशिक्षण वह कार्य पूरे कर सकेगा जिसे अपने समय की सबसे बड़ी माँग और आवश्यकता समझा जाता है। आज जिसके अभाव में प्रगति की अनेकानेक दिशाएं अवरुद्ध पड़ी है।
एक महीने के सत्र-युग शिल्पी सत्र
(1) विचार क्रान्ति के संदर्भ में आवश्यक संभाषण कला कौशल कथा प्रवचन विचार विनिमय शंका समाधान वार्ता में शिष्टाचार का निर्वाह शिक्षण।
(2) सुगम संगीत-लोकगायन ओर सरल अभ्यास में उतरने वाला वादन ढपली मजीरा घुंघरू करताल चिमटा बंगाली तानपूरा आदि वाद्य यंत्रों का अभ्यास। सहगान कीर्तन की कला। कहीं भी भीड़ जमा कर लेने और विचार वितरण का प्रयोजन पूरा करने का कौशल।
(3) दीपयज्ञ-समस्त शुभ कार्यों के शुभारम्भ एवं धार्मिक प्रयोजन के माध्यम से विचारशील जनता को बड़ी संख्या में एकत्रित कर लेना और भाव संवेदना को उभार कर युग के अनुरूप वातावरण बनाना।
(4) स्वास्थ्य संवर्धन-स्काउटिंग,आसन-प्राणायाम, फर्स्टएड होमनर्सिंग आहारविज्ञान शरीरविज्ञान जड़ी बूटी उत्पादन और उनका सरल उपचार।
(5) गृह उद्योग- (1) सूत और ऊन की कताई (2)बुनाई (3) सिलाई (4)घरेलू तेल कोल्हू (5) साबुन बनाना (6) घरेलू शाकवाटिका (7) बेकरी डबल रोटी बिस्कुट (8) पाप बनाना (9) मशीनों से स्टीकर्स बनाना (10) धूमरहित चूल्हा बनाना (11)सौर ऊर्जा से अनेक प्रयोजन के लिए ईंधन का काम लेना (12) मधुमक्खी पालन इत्यादि इसी प्रकार के बीस उद्योग हैं, जिनका साधारण अभ्यास इसी अवधि में हो जाता है प्रवीणता घर जा कर परिपक्व करनी होती हैं ये कुटीर उद्योग आलस्य एवं प्रमाद भगाने के अच्छे उपचार है। उनसे रचनात्मक शक्ति बढ़ती है और आर्थिक उपार्जन में भी सहायता मिलती है।
भाषण गायन के आधार पर सत्प्रवृत्ति सम्वर्धन और दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन का कार्य सरलता पूर्वक सम्भव हो सकता है। इस में निजी प्रतिभा का परिष्कार और लोक मंगल का पुण्य परमार्थ दोनों ही प्रयोजनों का समावेश है।
व्यक्ति निर्माण, परिवार में सत्प्रवृत्तियों का सम्वर्धन और दुष्प्रवृत्तियों का उन्मूलन इस शिक्षण का एक अंग है। साथ ही समाज को युग के अनुरूप अभिनव संरचना के तत्व भी इसी विद्या में हृदयंगम कराए जाने का प्रावधान है। शिक्षार्थी के गुण कर्म स्वभाव को परिष्कृत करने का भी समुचित मार्ग दर्शन दिया जाता है। ये सत्र हर माह 1 से 29 तारीख तक अनवरत चलते रहते है।
नौ दिन वाले सत्र
जिनके पास समय की कमी है व्यस्तता अधिक रहती है। उनके लिए नौ दिन वाले सत्र भी काम चलाऊ आवश्यकता पूरी करते है। संगीत कुटीर उद्योग आदि का कम समय में समग्र अभ्यास तो नहीं बन पड़ता है, इसकी जानकारी 9 दिन में मिल जाती है। ये सत्र 9 से 9-11 एवं 21 से 29 तक की तारीखों में चलते है। ये सत्र जीवन जीने की कला का शिक्षण भी उस अवधि में देते है।
18 से 54 वर्ष की आयु वाले शिक्षित, शारीरिक और मानसिक दृष्टि से स्वस्थ अनुशासन प्रिय सभी लोग इन में सम्मिलित हो सकते है। छोटे बच्चों तथा नासमझों को साथ लाने पर रोक है वे शिक्षण के व्यस्त कार्यक्रम में ध्यान बंटाते और अड़चन उत्पन्न करते है।
उपरोक्त दोनों सत्रों का प्रत्यक्ष प्रयोजन व्यक्ति के गुण कर्म स्वभाव में अपने लिए तथा दूसरों के लिए प्रगतिशील संभावनाओं का अभिवर्धन करना है। पर इसके अतिरिक्त इस सत्र श्रृंखला के साथ एक अन्य महत्वपूर्ण प्रयोजन भी समाहित है, जिसका लाभ अनायास ही मिलता है। वह है आत्मबल का अभिवर्धन। प्रतिभा परिष्कार युग धर्म की चुनौती स्वीकारने में आवश्यक भूमिका निभा सकने योग्य भाव संवेदनाओं का अभिवर्धन इसे युग साधना भी कहा जा सकता है। आश्रम का वातावरण तथा शिक्षण के साथ जुड़ा हुआ मार्ग दर्शन ऐसे है जो आदर्शवादी उत्कृष्टता अपनाने के लिए शिक्षार्थियों को स्वतः प्रेरणा देते है।
आत्मोत्कर्ष की शिक्षा साहित्य शिक्षण की तरह हर किसी जगह संभव नहीं हो सकती उसके लिए उच्चस्तरीय वातावरण भी चाहिए शान्तिकुँज में उस स्तर का माहौल मौजूद है। गंगा का तट हिमालय की छाया सप्त ऋषियों की तपो भूमि साधना से ओत प्रोत वातावरण प्राणवान संरक्षण स्वाध्याय संस्कारों से जुड़ क्रिया कलाप। जिस प्रकार सेनेटोरियमों में रह कर वहाँ की जलवायु की विशिष्टता के कारण अपेक्षाकृत अधिक लाभ पाते देखे जाते है। वैसा ही लाभ यहाँ मिलता है आत्मबल जो अन्य सब बलों की तुलना में अधिक महत्वपूर्ण माना जाता है। इसी वातावरण का प्रतिफल हैं। ओजस तेजस और वर्चस इसकी विशेष उपलब्धियाँ है। भाव सम्वेदना का उपभोग किसी को भी देव मानव बनाने में समर्थ हो सकता है। यह परोक्ष उपलब्धियाँ उपरोक्त सत्रों के साथ साथ ही अपने ढंग से चलती रहती है।
दोनों सत्रों के शिक्षार्थी अध्यात्मिक उपासनाएं भी शिक्षण क्रम के साथ ही पूरी करते रहते हैं जप ध्यान प्राणायाम की प्रक्रिया साथ साथ चलती रहती है। प्रभावी वातावरण में सम्पन्न किये जाने के कारण वह फलित भी अधिक होती है। यह अतिरिक्त लाभ ऐसा है जो शिविर सत्रों के साथ दीख पड़ने वाले प्रयोजनों से सीधी प्रकार कम नहीं है।
यह युग संधि की बेला है। शान्तिकुँज में उसकी सूक्ष्म सत्ता को बलिष्ठ बनाने के लिए बारह वर्षीय महापुरश्चरण चल रहा है। इस में भाग लेना अपनी निजी प्रखरता को बढ़ाना तथा युगधर्म के निर्वाह हेतु भावभरी तैयारी करना हैं सूक्ष्म जगत में चल रहीं उथल पुथल को सही दिशा में अग्रसर करने के लिए इस सामूहिक साधना की अपनी विशिष्टता है। इस महत्व को समझने वाले इन दिनों शाँतिकुँज में रहकर साधना करने की उपयोगिता उससे कहीं अधिक समझते हैं जो शिविर सत्रों के माध्यम से योग्यता अभिवृद्धि के रूप में सभी छात्रों को मिलती हैं यही कारण है कि कितने ही साधकों ने निश्चय किया है कि वे बारह वर्ष के प्रस्तुत युग धर्म में हर वर्ष न्यूनतम एक लघु पुरश्चरण करने के लिए तो अगले वर्षों में नियमित रूप से आया करेंगे।
इस वर्ष प्रज्ञा मण्डलों और महिला मण्डलों का गठन सर्वत्र हुआ है। कहा गया है कि वे अनिवार्यता नौ दिन का या एक महीने का सत्र शान्ति कुँज आकर पूरा करें। यह कच्ची मिट्टी के बर्तनों को आवे में लगाकर पक्का करने के सदृश एक अनोखी आवश्यकता पूरी करता हैं आयुर्वेद में रस भस्में बनाने के लिए कई कई अग्नि पुट दिये जाते है। इन सत्रों में सम्मिलित होना कच्ची धातु को रसायन बनाने की समतुल्य समझा जा सकता है।
गरीब अमीर सभी समान रूप से लाभ उठा सकें इसे ध्यान में रखते हुए निवास भोजन प्रशिक्षण उपकरण आदि निःशुल्क उपलब्ध होते है। साथ ही यह आशा भी रखी जाती है कि जो समर्थ हैं इस प्रशिक्षण प्रक्रिया को भविष्य में भी चालू रखने के लिए सामर्थ्य भर अंशदान भोजन भण्डार में जमा करेंगे
स्थान सीमित और इच्छुक अधिक होने से स्वीकृति प्राप्त करके अपने पारी पर ही आने की प्रतीक्षा करनी पड़ती है। शिक्षार्थी आवेदन पत्र भेज कर समय से पूर्व स्वीकृति प्राप्त करें। आवेदन हाथ से ही लिख दें उन में इन बातों का उल्लेख होना चाहिए। (1) किस मास के किस सत्र में आना है? (2) पूरा नाम (3) पूरा पता (4) आयु (5) व्यवसाय (6) शिक्षा (7) जन्मतिथि, (8) शरीर और मन में स्वस्थ होने का आश्रम के अनुशासनों का पालन करने का आश्वासन। पत्र शान्तिकुँज हरिद्वार के पते पर दें। इस सुयोग को कोई भी नये-पुराने परिजन हाथ से न जाने दें।
अब से कोई ढाई हजार वर्ष हजार पूर्व नैतिक बौद्धिक और सामाजिक भ्रष्टाचार बुरी तरह फैला हुआ था। वातावरण में कलुष–कल्मषों की भरमार थी। धर्म के नाम पर तरह तरह के अनाचार और पाखण्ड फैले हुये थे।
बुद्ध जब समझदार हुए तो उन्हें तत्कालीन प्रचलनों के प्रति भारी रोष आया वे औरों की तरह मन हीं मन कुड़कुड़ाते किन्तु चुप बैठे रहने की नीति स्वीकार न कर सकें वरन् वातावरण को बदलने के लिये एक कर्मवीर की तरह कर्मक्षेत्र में उतर पड़े।
उसकी पत्नी भी थी और पुत्र भी। पर उसी छोटे समुदाय के लिये प्रहरी बन कर घर बैठे रहना उन्हें स्वीकार न हुआ। वे समाज के लिए घर को छोड़ देने की नीति अपनाने पर आरुढ हो गये धर्मचक्र प्रवर्तन नाम उनके आविर्भाव का पड़ा।
उन्होंने साधना से जीवन को संयमी बनाया। ज्ञान का भण्डार भरा। आदर्श जीवन जिया। परिव्राजकों का बड़ा संगठन खड़ा किया। उनके प्रशिक्षण और निर्वाह के लिये अनेक मठ बिहार बनाये। देश के कौने कौने से निकटवर्ती अन्य देशों से भी सर्वतोन्मुखी सुधार कार्यक्रम की योजना बनाई।
प्रतिगामी तो उनके सब विरोधी रहे जो विचाराशील थे उनने पूरा पूरा सहयोग दिया। उनकी योजना को सफल बनाने वाले आधार स्वयं जुटते गये। युद्ध के अनेकों कार्यक्रम और प्रयास ऐसे थे जिनने उनके आदर्श जीवन को खरे सोने की तरह चमका दिया। उन्हें भगवान का पद मिला।