विषय सूची

वर्ष- 53

संस्थापक - वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं. श्रीराम शर्मा आचार्य

जनवरी 1989 अंक 1

वार्षिक चंदा 25

आजीवन 250

विदेश में 200


नियंता का दिव्य उपहार— आत्मविश्वास

पुलिस की सशस्त्र गारद साथ चलती है तो सुरक्षा की निश्चिंतता हो जाती है और निर्भय— आश्वस्त होकर चला जा सकता है। जिसे ईश्वर पर, उसकी सर्वशक्तिमान सत्ता पर विश्वास है, वह निर्भय होकर चलता है। जिसे ईश्वर पर भरोसा है, जो उसे हर समय अपने भीतर विद्यमान अनुभव करता है, उसे आत्मविश्वास की कमी क्योंकर होगी? ईश्वरविश्वास और आत्मविश्वास एक ही आस्था के दो पहलूमात्र हैं, जो स्वयं पर से अपनी महानता और संभावनाओं पर से आस्था खो बैठा, उसे नास्तिक के अतिरिक्त और क्या कहा जाएगा?

जो स्वयं पर भरोसा करता है, उसी पर दूसरे भी भरोसा करते हैं। जो अपनी सहायता आप करता है, उसी की सहायता ईश्वर भी करता है। हो सकता है कि कोई निष्ठावान असफल भी रहा हो, पर जितने भी सफल— संपन्न हुए हैं, उनमें से प्रत्येक आत्मविश्वासी अवश्य रहा है। संभव है, किसी कुशल किसान की फसल मारी जाए, पर जिनने भी कृषि में कमाई की है, उनमें से प्रत्येक को जोतने और बोने का श्रम करना पड़ा है। आत्मविश्वास ही शक्ति का स्रोत है। वस्तुतः ईश्वर का एकमात्र दिव्य उपहार जो मनुष्य को मिला है— आत्मविश्वास ही है।


सफलताएँ टिकी हैं प्रचंड मनोबल पर

भिक्षु संघ के साथ विहार करते हुए भगवान बुद्ध शाल्यवन में एक वटवृक्ष के नीचे बैठ गए। धर्मचर्चा के प्रसंग में एक शिष्य ने उनसे पूछा— "भगवन्! कई लोग दुर्बल और साधनहीन होते हुए भी बड़े-बड़े कार्य कर दिखाते हैं, जबकि अच्छी स्थिति वाले साधनसंपन्न लोग भी उन कार्यों को करने में असफल रहते हैं। इसका क्या कारण हैं? क्या पूर्वजन्मों के पाप अवरोध बनकर खड़े हो जाते हैं?"

‘नहीं’— तथागत ने कहा और एक कथा सुनाने लगे —“विराट नगर के राजा सुकीर्ति के पास लौहशृंग नामक एक हाथी था। राजा ने कई युद्धों में इस पर आरूढ़ होकर विजय प्राप्त की थी। शैशव से ही लौहशृंग को इस तरह प्रशिक्षित किया था कि वह युद्धकला में बड़ा प्रवीण हो गया था। सेना के आगे चलते हुए पर्वताकार लौहशृंग जब अपनी क्रुद्धावस्था में प्रचंड हुँकार भरता हुआ शत्रुसेनाओं में घुसता था, तो देखते-ही-देखते विपक्षियों के पाँव उखड़ जाते थे।

लेकिन जन्म के बाद जिस प्रकार सभी प्राणियों को युवा और जरावस्था से गुजरना पड़ता है, उसी क्रम से लौहशृंग भी वृद्ध होने लगा, उसकी चमड़ी झूल गई और युवावस्था वाला पराक्रम जाता रहा। अब वह हाथीशाला की शोभामात्र बनकर रह गया। उपयोगिता और महत्त्व कम हो जाने के कारण उसकी ओर पहले जैसा ध्यान भी नहीं था। उसे मिलने वाले भोजन में कमी कर दी गई। एक बूढ़ा सेवक उसके भोजन-पानी की व्यवस्था करता, वह भी कई बार चूक कर जाता और हाथी को भूखा-प्यासा ही रहना पड़ता।

बहुत प्यासा होने और कई दिनों से पानी न मिलने के कारण एक बार लौहशृंग हाथीशाला से निकलकर पुराने तालाब की ओर चल पड़ा, जहाँ उसे पहले कभी प्रायः ले जाया करता था। उसने भरपेट पानी पीकर प्यास बुझाई और गहरे जल में स्नान के लिए चल पड़ा। उस तालाब में कीचड़ बहुत था, दुर्भाग्य से वृद्ध हाथी उसमें फँस गया। जितना भी वह निकलने का प्रयास करता, उतना ही फँसता जाता और आखिर गरदन तक कीचड़ में फँस गया।

यह समाचार राजा सुकीर्ति तक पहुँचा, तो वे बड़े दुखी हुए। हाथी को निकलवाने के कई-कई प्रयास किए गए, पर सभी निष्फल। उसे इस दयनीय दुर्दशा के साथ मृत्युमुख में जाते देखकर सभी खिन्न थे। जब सारे प्रयास असफल हो गए, तब एक चतुर सैनिक ने युक्ति सुझाई। इसके अनुसार हाथी को निकलवाने वाले सभी प्रयत्न करने वालों को वापस बुला लिया गया और उन्हें युद्ध सैनिकों की वेशभूषा पहनाई गई। वे वाद्ययंत्र मँगाए गए जो युद्ध अवसर पर उपयोग में लाए जाते थे।

हाथी के सामने युद्ध-नगाड़े बजने लगे और सैनिक इस प्रकार कूच करने लगे, जैसे वे शत्रुपक्ष की ओर से लौहशृंग की ओर बढ़ रहे हैं। यह दृश्य देखकर लौहशृंग में न जाने कैसे यौवनकाल का जोश आ गया। उसने जोर से चिंघाड़ लगाई तथा शत्रु-सैनिकों पर आक्रमण करने के लिए पूरी शक्ति से कंठ तक फँसे हुए कीचड़ को रौंदता हुआ तालाब के तट पर जा पहुँचा और शत्रु-सैनिकों पर टूट पड़ने के लिए दौड़ने लगा। बड़ी मुश्किल से उसे नियंत्रित किया गया।

यह कथा सुनाकर तथागत ने कहा— “भिक्षुओ! संसार में मनोबल ही प्रथम है। वह जाग उठे तो असहाय और अवश प्राणी भी असंभव होने वाले काम कर दिखाते हैं तथा मनुष्य अप्रत्याशित सफलताएँ प्राप्त करते हैं।"


सद्वाक्य

सलाह उनसे पूछो, जिनने कोई मंजिल पकड़ी और दृढ़तापूर्वक चलते रहकर सफलता पाई।


हृदयगुहा में होते हैं— परमात्मा के दर्शन

मानवी कार्य संरचना का सबसे महत्त्वपूर्ण घटक हृदय है। भौतिकविदों एवं अध्यात्मवेत्ताओं ने इसकी श्रेष्ठता को अपने-अपने ढंग से माना और उसे क्रमशः शरीर एवं आत्मा का, परमात्मा का, केंद्रस्थल निरूपित किया है। शरीरशास्त्रियों के अनुसार— भौतिक दृष्टि से हृदय, सीने में बाईं ओर नाशपाती जैसे आकार की, साढ़े तीन सौ ग्राम की एक छोटी-सी माँसल संरचना है, जो अपने रचना-प्रयोजन के अनुसार समस्त शरीर को धमनियों और छोटी नलिकाओं द्वारा रक्त फेंकती और अशुद्ध रक्त को खींचती रहती है। इसकी हर धड़कन उस स्थान पर हाथ रखकर आसानी से पहचानी जा सकती है। इसी पर रक्तचाप की न्यूनाधिकता का प्रभाव पड़ता है और क्रियाकलाप थोड़ी देर के लिए रुकते ही प्राणांत हो जाता है।

अध्यात्म-क्षेत्र का हृदय भौतिक हृदय से भिन्न है। तत्त्वदर्शियों ने इसे 'गुफा' कहा है। शतपथ ब्रा॰ 11-2-6-5 का सूत्र 'तस्मादिदं गुहेव हृदयम्' अर्थात यह हृदय ही गुफा है, इसी तथ्य की पुष्टि करता है। अंधकार से प्रकाश की ओर, असत् से सत् की ओर और मृत्यु से अमृत की ओर जाने का मार्ग अंतर्मुखी होकर इस दिव्य गुफा में प्रवेश करने पर ही प्राप्त होता है। षट्चक्रों में इसे अनाहत चक्र का क्षेत्र माना है। इसे भौतिक हृदय की सीध में तनिक पीछे हटकर अपनी स्वतंत्र सत्ता बनाए रहने वाला माना गया है। संक्षेप में यही अंतराल या अंतःकरण है— आदर्शवादी भाव-संवेदनाओं का केंद्र। रक्तसंचार करने वाली ग्रंथि संरचना से यह सर्वथा भिन्न है। हिम्मत, साहस, बहादुरी, आत्मीयता, करुणा, उदारता, ममता आदि के संदर्भ में भी उसी आत्मिक हृदय का उल्लेख किया जाता है। इसी हृदयगुफा में एक ऐसी शक्ति काम करती है, जो सन्मार्ग पर चलने से प्रसन्न— संतुष्ट हुई दिखाई पड़ती है और कुपंथ अपनाने पर खिन्नता— उद्विग्नता का अनुभव करती है। अंतरात्मा की इसी परत में ईश्वरीय सत्ता को झाँकता हुआ देखा जा सकता है।

मनीषियों के अनुसार मस्तिष्क में मात्र कल्पना और सूझ-बूझ उठती है, पर वह उपलब्ध ज्ञान और मंथन से उत्पन्न हुए मंथन द्वारा ही उत्पन्न होती है। दिव्य प्रेरणाएँ हृदयदेश से ही उभरती हैं। ईश्वरीय संदेश वहीं मिलते हैं और वहीं से अविज्ञात प्रकृति रहस्यों की जानकारियाँ हस्तगत होती हैं। जिन वैज्ञानिकों ने अद्भुत आविष्कार किए हैं, उनसे जब पूछा गया कि ऐसा अनोखा विचार आपको कैसे हस्तगत हुआ तो उनमें से प्रत्येक ने यही कहा कि यह भीतर से उभरा। भीतर शब्द से उनका तात्पर्य मस्तिष्क से नहीं, वरन अंतराल में उभरने से है। यद्यपि दोनों परस्पर संबद्ध हैं। यही वह क्षेत्र है, जहाँ अतींद्रिय शक्तियों का भंडार है। बुद्धि-क्षेत्र से बाहर की कितनी ही बातें कभी-कभी ऐसी सूझ पड़ती हैं जो विलक्षण होती हैं, पर परीक्षा की कसौटी पर वे सही उतरती हैं। ऋद्धि-सिद्धियों का क्षेत्र यही माना गया है। जिस किसी का यह क्षेत्र लग पड़ता है या जो व्यक्ति हृदयगुफा में प्रवेश पा लेता है, उसे अविज्ञात भी— भूत और भविष्य भी उसी प्रकार दृष्टिगोचर होता है, मानो उसकी प्रत्यक्ष जानकारी उन्हें पहले से हो रही है।

मनोविज्ञानी-परामनोविज्ञानी, जिसे सुपर चेतन कहते हैं और जिसकी संगति अलौकिक आभासों के साथ जोड़ते हैं, वह मस्तिष्क का नहीं, वरन अंतःकरण का, हृदय का क्षेत्र है। मानसिक संरचना में चेतन और अचेतन के दो ही पक्ष हैं। मस्तिष्कीय संरचना का दो भागों में विभाजन हुआ है, अतः उसका कार्यक्षेत्र ज्ञानवान सचेतन और स्वसंचालित अचेतन के साथ ही जुड़ता है, जिसे अविज्ञात कहा गया है, जिसे सुपर चेतन भी कहते हैं, वह मनीषियों के अनुसार हृदयगुफा— हिरण्यमयकोश ही है।

उसे किन्हीं ग्रंथों में सूर्यचक्र भी कहा गया है। जिस प्रकार सूर्य का प्रकाश उदय होने पर अंधकार तिरोहित हो जाता है और प्रत्येक वस्तु प्रत्यक्ष दीख पड़ती है, उसी प्रकार इस कोश में प्रकाशित दिव्य ज्योति की छत्रछाया में व्यक्ति अपना स्वरूप, लक्ष्य और कर्त्तव्य भी देख सकता है। अभीष्ट वस्तु की उपलब्धि अपने भीतर अंतःकरण में ही होती है। तप करने से लेकर ईश्वरदर्शन करने तक प्रयोजन पूर्ण करने के लिए हृदयगुफारूपी तीर्थ को, तपोवन को ही एकमात्र उपयुक्त स्थान माना गया है। ब्रह्मोपनिषद् 4-5 के अनुसार हृदय में समस्त देवता निवास करते हैं। हृदय में ही प्राण और प्रकाश है। शंख संहिता का कथन है— हृदयदेश में परम ज्योति प्रकाशवान है। जीवात्मा का आश्रय स्थल यही है। उसी हृदयदेश में अँगूठे के अग्रभाग के बराबर आकार में जलती ज्योति के रूप में कठोपनिषद् का ऋषि उसका दर्शन करता है।

नाद्बिंदूपनिषद् के ऋषि इसी हृदय-क्षेत्र में अंगुष्ठमात्र उस परम ज्योति का ध्यान करने का निर्देश करते हैं। गीता 15-10 के अनुसार प्रयास करने पर योगीजन अपने हृदय-क्षेत्र में स्थित आत्मतत्त्व को खोज निकालते हैं, पर जिनका हृदय शुद्ध नहीं है, भावनाएँ दूषित हैं, वे प्रयत्न करने पर भी इस आत्मा को नहीं जान पाते। अंतःकरण की पवित्रता आत्मविद होने की अनिवार्य शर्त है।

हृदय-क्षेत्र अंतराल को दिव्य लोक भी कहते हैं। प्रख्यात ग्रीक दार्शनिक प्लेटो के अनुसार मनुष्य की आत्मा ईश्वर से सीधे प्रकट होकर इसी दिव्य लोक में प्रवेश करती और स्थूलशरीर से जुड़ती है। उनका कहना है कि जीवात्मा का धरती पर जब सर्वप्रथम अवतरण होता है तो वह दिव्य सूक्ष्मशरीर, वायवीय शरीर रूप में अवतरित होकर स्थूलदेह में प्रवेश करता है। यह सूक्ष्मशरीर आत्मा का पारलौकिक वाहन कहा जाता है। ईश्वर, जो चराचर जगत को केंद्र है, उसी के आदेश से जीवात्मा मनुष्य के हृदयगुफा में प्रवेश करता और अपने पारलौकिक वाहन अर्थात सूक्ष्मशरीर के माध्यम से स्थूल काया से जुड़ता है, उसे नियंत्रित-संचालित करता है।

हृदयस्थ आत्मा परमात्मा से मिलने की इच्छा करती है। मनुष्य आंतरिक शांति के लिए उसे जहाँ-तहाँ जिस-तिस निर्जीव जड़, पदार्थों-साधनों में ढूँढता भी रहता है, पर हस्तगत कुछ नहीं होता। व्यक्तियों का परिचय भी शरीर रूप में हो पाता है। वे कभी रुष्ट या पृथक भी हो सकते हैं, होते रहते हैं। ऐसी दशा में अभीष्ट लक्ष्य की पूर्ति नहीं हो पाती और न जिनकी तलाश है, वह परमात्मा ही मिल पाता है।

सर्वव्यापी होते हुए भी ईश्वर को किसी ऐसे स्थान पर जब नहीं पाया जा सकता तो फिर उसका मिलन कहाँ संभव हो? इस समस्या को सुलझाते हुए तत्त्वदर्शियों ने कहा है— "ऐसा स्थान केवल अपना हृदय है, जहाँ आत्मा का परमात्मा से साक्षात्कार होता है। यही दिव्य गुफा है, मंदिर है, जहाँ सूक्ष्मरूप में परम ज्योति के दर्शन होते हैं।" कठोपनिषद् में ऋषि ने उसे 'अणोरणीयान् महतो महीयान्' कहा है और उसका निवास जीव की हृदयरूपी गुफा में बताया है। गीता (10-20, 13-17, 15-15, 18-61) में भगवान कहते हैं— “ईश्वर सब प्राणियों के हृदय देश में रहता है, उसी का अनुग्रह प्राप्त करने से परम शांति का अनुभव होता है।” व्यास भाष्य में उल्लेख है, "उस परमेश्वर को देवालयों, सरिताओं, तीर्थों, वनों में, पर्वतों में कहीं भी ढूँढते रहा जाए, पर जब वह मिलेगा, तो हृदयगुफा ही उसका सुस्थिर स्थान दृष्टिगोचर होगा। जो वहाँ उसे ढूँढता है, तृप्त होकर रहता है।

अन्याय शास्त्रकारों, आप्तपुरुषों ने भी इसकी पुष्टि की है। योगवाशिष्ठ का कथन है— जो हृदयगुफा में निवास करने वाले भगवान को छोड़कर अन्यत्र ढूँढता फिरता है, वह हाथ की कौस्तुभमणि की उपेक्षा करके जहाँ-तहाँ काँच के टुकड़े बीनते फिरने वाले के समान है।

कस्तूरी होती मृग की अपनी नाभि में ही है, पर उस सुगंध को वह जहाँ-तहाँ ढूँढता-फिरता है। यही स्थिति मनुष्य की है। परमात्मा उसके अपने अंतःकरण में बैठा है, पर वह उसे बाह्यजगत में खोजता-फिरता है। तत्त्ववेत्ता उस अविनाशी परमेश्वर को अपनी आत्मगुहा में ही पाता और कृतकृत्य होता है। मुंडकोपनिषद् में कहा गया है—"इस संपूर्ण जगत को बनाने वाला और सब में समाया हुआ परमेश्वर ढूँढने पर हृदयगुफा में ही विराजमान मिलता है। वह प्रकाशस्वरूप है, जो उसे देखता है, वह उसी में विलीन होकर रहता है। परंतु जो लोग इस तथ्य को नहीं जानते, उनकी गणना शास्त्रकार अंधों में करते हैं।”

श्वेताश्वर उपनिषद् में उल्लेख है— "जो सूक्ष्म से भी सूक्ष्म हृदय प्रदेश में प्रवेश करके विद्यमान महेश्वर को नहीं देख पाता, वह अंधे के समान है।” ऐसे लोगों को न तो ईश्वरसाक्षात्कार का सुयोग मिलता है और न चिरस्थाई सुख-शांति ही उपलब्ध होती है। वे जहाँ-तहाँ भटकते रहते हैं।

जाबाल्युपनिषद् का कथन है कि परमेश्वर को हृदयदेश में ढूँढो। अन्यत्र मत भटको। वह प्रकाशरूप में आपके भीतर ही ज्वलंत है।

ज्ञान-विज्ञान के उद्गम केंद्र अंतःकरण में स्थित परब्रह्म को जो हृदय में देखता और उनका सान्निध्य अपनाता है, वह तद्रूप हो जाता है, ऐसा तैत्तरीय उपनिषद् का कथन है। इसी की पुष्टि महापनिषद्, योगकुंडल्युपनिषद् आदि ग्रंथों में की गई है और कहा गया है कि अंगुष्ठ आकृति की प्रकाश-ज्योति हृदयदेश में सदा जलती रहती है। उसी के फैले हुए प्रकाश में ध्यान करने वाला साधक अपने अभीष्ट को प्राप्त कर लेता है।

उपरोक्त तथ्यों को ध्यान में रखते हुए ही हृदय-क्षेत्र को अध्यात्म शास्त्रों में अत्यधिक महत्ता दी गई है और उसे निर्मल-पवित्र बनाए रखने पर जोर दिया गया है। महात्मा बुद्ध ने तो अंतःकरण की पवित्रता के लिए करुणा, मैत्री, मुदिता और उपेक्षा जैसे चार ब्रह्मविहार अपने शिष्यों के लिए अनिवार्य विधान बताए थे। महर्षि पतंजलि ने यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार आदि पाँच चरणों की व्यवस्था पहले बनाई, जिससे साधक अपने अंतराल को, उसमें सन्निहित भाव-संवेदनाओं को पवित्र एवं उत्कृष्ट बना सके। इसके बिना आत्मसाक्षात्कार अथवा ईश्वरदर्शन संभव नहीं।

ताओ धर्म के प्रणेता मनीषी लाओत्से कहते हैं— “मनुष्य अपने पथ को अविकारी बनाए, अशुद्धता से बाहर निकल आए तो फिर स्वतः ही आत्मसाक्षात्कार हो जाता है, जो वस्तुतः ईश्वरदर्शन ही है। वे कहते हैं कि ईश्वर असीम है, अनंत है, रोम-रोम में समाया हुआ है। हम मात्र उसकी अनुभूति अपने हृदयस्थल में कर सकते हैं, उसे कोई नाम नहीं दे सकते; इसीलिये वह सनातन होने के साथ-साथ अविकारी भी है।”

अतींद्रिय क्षमताएँ, प्रतिभा, कुशलता, विशिष्टता बाहर से नहीं उतरती, भीतर से ही उभरती हैं। ये आत्मसाक्षात्कार की ही चमत्कारी फलश्रुतियाँ हैं। प्रसुप्त रूप में उन समस्त संभावनाओं के बीज इसी हृदय प्रदेश में प्रसुप्त स्तर पर पड़े हुए हैं। उसमें प्रवेश पाकर जो, जिस मात्रा में उन्हें जगा लेते हैं, वे उसी अनुपात में देवात्मा होने का गौरव प्राप्त करते हैं।


जवाब तलब न करना पड़े (कहानी)

एक व्यक्ति संत कबीर के पास पहुँचा। बोला कि मेरा मन कभी गृहस्थ बनने को करता है, कभी विरक्त बनने को। बताइए दोनों में से किस मार्ग को अपनाऊँ?

कबीर ने कहा— "जो भी करो उच्चकोटि का करो। जो भी बनो उसके उत्तरदायित्व पूरी तरह निबाहो।" इसके लिए उनने दो उदाहरण भी प्रस्तुत किए। एक में अपनी स्त्री को आज्ञा दी कि दीपक जलाकर लाओ, ताकि बुनने में सुविधा हो। वह दीपक लेकर आई, उनने यह नहीं पूछा कि दोपहर का वक्त है, इस समय दीपक की क्या आवश्यकता। दूसरे उदाहरण को बताने के लिए वे आदमी को साथ लेकर टेकरी पर रहने वाले साधु के पास गए, पूछा कि आपकी आयु क्या है? उसने कहा— "अस्सी वर्ष।" थोड़ी देर बाद फिर आयु पूछी। साधु ने बिना झुँझलाए उन्हें उम्र बता दी। तीसरी बार कबीर ने उन्हें नीचे आने के लिए पुकारा। साधु नीचे पहुँचे। पूछा गया— "आपकी आयु क्या है?" उनने कहा— "तुम बार-बार भूल जाते हो। बताया था, अस्सी।"— उत्तर देकर वे बिना बोले टेकरी पर चले गए।

कबीर ने कहा— "संत बनना है तो ऐसे बनना और गृहस्थ बनना हो तो पति-पत्नी में ऐसा विश्वास पैदा करो कि किसी को किसी से जवाब तलब न करना पड़े।"


आभामंडल की प्रभाव-क्षमता अब संदेह से परे!

स्थूलशरीर को सतत स्पंदन देने वाली, उसकी सत्ता को अक्षुण्ण बनाए रखने वाली ऊर्जाशक्ति एक ही है, किंतु उसके नाम अनेक रूपों में जाने जाते हैं। चीन व जापान में इसे 'साय' या 'की एनर्जी' , रेड इंडियंस में 'आरैंडा', रूस में “बाॅयोप्लाज्मा” तथा आधुनिक पाश्चात्य जगत में इसे 'ऑरगाॅन एनर्जी' नाम से पुकारा जाता है। भारतीय दर्शन इसी शक्ति को प्राण-ऊर्जा कहता है।

चिकित्सा जगत के पितामह माने जाने वाले पैरासेल्सस की यही मान्यता थी कि मानवी काया बड़ी विलक्षण है। इसके भीतर निहित ऊर्जापुंज काया के बाहर भी एक प्रकाशपुंज के रूप में प्रतिभासित होता रहता है। इसे हम चाहें तो प्राण-शरीर कह लें अथवा प्राणमयकोष अथवा थियोसोफी की भाषा में इथरीक डबल, है यह प्राण-ऊर्जा का एक रूप ही। 'बैक थ्रू टू क्रिएटीविटी' नामक ग्रंथ में विद्वान लेखक आर्नल्ड जेंसन ने बताया है कि हमारे शरीर के इर्द-गिर्द ही नहीं, अपितु आर-पार फोटोन्स के माध्यम से निकलने वाले तीव्र प्रकाश का एक विद्युत चुंबकीय परिकर होता है, जो काया के अंग-प्रत्यंग को ही नहीं, समूचे परिकर को प्रभावित करता है। जो इसका क्षरण रोककर उसे संग्रहीत करता है, वह प्राणशक्तिसंपन्न बनता है, ऋद्धि-सिद्धियाँ उस पर बरसती हैं।

यह चर्चा मानवी चुंबकत्व से उपजे प्रभामंडल के संदर्भ में चल रही है। इस संबंध में प्रसिद्ध मनःचिकित्सक-लेखक जेफ्री मिशलोव ने अपने ग्रंथ 'रुट्स ऑफ कांशसनेस' में पाश्चात्य जगत में हुए प्रयोगों, जिनका मूल आधार भारतीय धर्मग्रंथ हैं, का उल्लेख किया है। उन्होंने ऑरा खंड में बताया है कि डॉ॰ किल्नर ने मनुष्य के हृदय से नीला, हाथ के अग्रभाग से नीला-हरा एवं जाँघ जननेंद्रियों के क्षेत्र से हरा रंग निस्सृत होते देखा व फोटोग्राफी द्वारा उसे रिकार्ड भी किया। विभिन्न व्यक्तियों पर प्रयोगकर वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि इन रंगों में भिन्नता मनुष्य की भावना-विचारणा, अंतःकरण की उत्कृष्टता-निकृष्टता के आधार पर निर्धारित होती है। वस्तुतः प्रभामंडल सूक्ष्म मनोवेगों से बना एक आयनमंडल है, जिससे चारों ओर एक उच्चस्तरीय ऊर्जा-क्षेत्र बनता है। रूस के ऑरासायकिएट्री इंस्टीट्यूट की प्रमुख थेल्मामाॅस ने भी इस दिशा में काफी प्रयोग किए हैं।

ईसाई धर्म के पवित्र ग्रंथ बाइबिल में इस शक्ति को 'ऑरेओला' नाम दिया गया है। अतींद्रिय क्षमतासंपन्न मनीषी स्वीडन बोर्ग ने अपनी 'स्प्रिचुअल डायरी' में लिखा है कि प्रत्येक जीवधारी का शरीर आध्यात्मिक प्रकाश से घिरा रहता है। इसका रंग मानवी स्वभाव, स्वास्थ्य, भावनाएँ, जीवनचर्या के संयम, नियम-अनुशासन, आत्मविश्वास के आधार पर बदलता रहता है।

डा॰ किल्नर से पूर्व रिचेन बेच ने मनुष्य की अंगुलियों के संवेदात्मक चित्र खींचकर इसे 'ओडिस फोर्स' नाम दिया था। रिचेन बेच के अनुसार— 'ओजस् एवं तेजस्' का दूसरा नाम ही तेजोवलय है। यह शरीर के चारों ओर छह इंच की दूरी तक फैला रहता है। चेहरे पर उसकी मात्रा, सघनता की परिधि अधिक होती है एवं इसे एक प्रकार की भाप ऊष्मा समझा जा सकता है। यह भाप निकट क्षेत्र में तो खुली आँखों से देखी जा सकती है: पर कुछ ऊँचा उठने के बाद वह विरल एवं अदृश्य हो जाती है, फिर भी उसका अस्तित्व बना रहता है। रात्रि में शीतलता का संपर्क होने पर जिस प्रकार सूर्य ऊष्मा घास-पात पर ओस बिंदु बनकर जमा हो जाती है, ठीक उसी प्रकार स्थूलशरीर एवं उसमें समाई हुई प्राण-चेतना की सक्रियता अंतरंग में बढ़ने के अलावा त्वचा के बाहर भी उसका फैलाव होने लगता है। यही ओजस् या तेजोवलय है।

'द ओरीजीन एंड प्रोपर्टीज ऑफ ह्यूमन ऑरा' के लेखक डाॅॅॅॅॅ॰ किल्नर ने स्पष्ट किया है कि पाशविक प्रवृत्तियाँ, निद्रा, भूख, प्यास, क्रोध, वासना, विषय लोलुपता आदि प्रभामंडल को काले रंगों से भर देते हैं। वे मस्तिष्क की विकृति का मूल कारण मस्तिष्क के अणुओं का रोगी होना मानते हैं।

तांत्रिक एवं थियोसोफिकल इसे हिंदू दर्शन द्वारा निर्धारित काया के षट्चक्रों से जोड़ते हैं, जो आध्यात्मिक प्रगति के साथ जाग्रत होते चले जाते हैं। अतींद्रिय क्षमतासंपन्न व्यक्तियों ने इसे विभिन्न आकार एवं रंगों में देखा है। कुछ वैज्ञानिक इसे मानव की जैव विद्युत का उत्पादन ही मानते हैं। जो व्यक्ति की भिन्न-भिन्न प्रकृति के अनुसार चारों ओर फैला रहता है।

'मैन विजीबल इनविजीबल' के लेखक डाॅ॰ लेडबीटर का मत है कि तेजोवलय वस्तुतः अंतरंग में समाहित प्राणशक्ति का बाहर झाँकता हुआ मंडराता हुआ स्वरूप है। वह उच्चस्तरीय भी होता है और निकृष्टतम भी। रूप-सौंदर्य वाले व्यभिचारियों में, वेश्याओं में, ठगों में, क्रूर आक्रांताओं में एवं निकृष्ट चिंतन वाले लोगों में यह अत्यंत निम्न स्तर का होता है। इसे असुरता का परिचायक कह सकते हैं। इसका सघन होना धारणकर्त्ता के पतन का द्वार खोलता है। जिस पर ऐसा प्रभामंडल प्रभाव छोड़ता है, उसे अशक्त-असहाय बनाकर निर्जीव-पराधीन की स्थिति में ला पटकता है। इस आसुरी तेजोवलय का रंग कालिख लिए होता है, ऐसा दिव्यदर्शियों का मत है।

मनीषियों का मत है कि कामोत्तेजना के कारण यदि व्यक्ति रोगी हो तो मस्तिष्क के अणुओं की आभा काले व गहरे लाल रंग की होगी एवं द्वेष से पीड़ित अणुओं की आभा हरे रंग की होगी। इसी प्रकार विभिन्न दुर्गुणों से पीड़ित होने पर अणु आभा अलग-अलग रंग की होती है एवं इस आधार पर व्यक्ति के अंतरंग को पहचाना जा सकता है।

संत-सज्जन एवं देव-प्रवृत्ति के लोगों का तेजोवलय पीली आभा लिए हुए होता है। वे समीपवर्त्ती लोगों को स्नेह, अनुग्रह, अनुदान अनायास ही देते रहते हैं। ऐसे व्यक्ति के समीप बैठने वाले एक विधेयात्मक आकर्षण, आंतरिक आनंद की, उल्लास की अनुभूति करते हैं। उनसे सतत संपर्क बनाए रखने से उनका आशीर्वाद पाने की आकांक्षा बनी रहती है। महामानवों, देवदूतों, देवमानवों के रूप में जो भी सिद्धपुरुष जन्मे हैं, उनके चहुँ ओर सदैव श्रेष्ठ लोगों का बाहुल्य इसी कारण पाया जाता रहा है।

सुप्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक मनीषी डाॅ॰ कोलीन विल्सन और स्टार्ट हालराइड ने अपनी किताब 'मिस्ट्रीज ऑफ द माइंड, में लिखा है कि देवताओं, अवतारों के चेहरे के चारों ओर जो प्रभामंडल चित्रित किया जाता है, वह वस्तुतः प्राण-ऊर्जा का ही प्रतीक है। यह उनकी आध्यात्मिक विशिष्टता का परिचय देता है। यों इसे खुली आँखों नहीं देखा जा सकता, किंतु जिनका अतींद्रिय ज्ञान जाग्रत है, उन्हें बहिरंग को देखकर ही व्यक्ति की मानसिक, आंतरिक स्थिति का परिचय मिल जाता है।

इसी प्रभामंडल का वैज्ञानिक विश्लेषण करने की दृष्टि से रूस के वैज्ञानिकों सीमेन, वेलेंटाइना एवं किर्लियन ने जब हाइ वोल्टेज विद्युत प्रवाहित की तो पाया कि जीव, प्राणियों, वनस्पतियों के चारों ओर प्रकाश-किरण का प्रवाह बिखरा पड़ा है, तब उसे उन्होंने बायोप्लास्मिक बॉडी नाम दिया। इन वैज्ञानिकों ने बताया कि प्रत्येक जीव इस बायोप्लास्मिक बाॅडी से घिरा रहता है। किर्लियन फोटोग्राफी में पौधों के पत्तों से निकलने वाली प्रकाश-किरणों को दिखाया गया। उन्होंने आगे स्पष्ट किया कि एक ही जाति के पत्तों में भिन्न-भिन्न रंग प्राप्त हुए, जो पत्तों में जीवनी शक्ति एवं रोगों की स्थिति की जानकारी देते हैं। विभिन्न बैक्टीरिया के प्रभाव से पूर्व इन रंगों में परिवर्तन होते भी देखा गया।

यह बायोप्लाज्मा मनुष्यों में संभावित रोगों के बारे में भी जानकारी देते हैं। बैग्नेल (लंदन) एवं रिगस (अमेरिका) वैज्ञानिकों के मतानुसार ऑरा का पूर्व मापन करके बताया जा सकता है कि अमुक व्यक्ति किस मनोविकार का शिकार है एवं भविष्य में इसे कौन-सा रोग हो सकता है? मस्तिष्क में रक्तस्राव, दमा, हृदयाघात, कैंसर संभावित रोगों में पूर्व से ही निदान की इस विधि में साठ से अस्सी प्रतिशत सफलता उन्हें मिली है। उन्होंने निषेधात्मक एवं विधेयात्मक चिंतन के औरा का भी गहरा विश्लेषण किया है।

पाश्चात्य परामनोवैज्ञानिकों ने 'बायोप्लाज्मिक बाडी' के प्रभाव को पूर्वार्त्त मनोविज्ञानियों की तरह ही स्वीकारा है। डाॅ॰ मांटेग्यू अलमेन ने 'सायकिक मेगेजिन' में लिखा है कि ये प्रकाशपुंज मनुष्य के मन एवं अंतःकरण से संबंधित हैं, जिनसे सारा वातावरण प्रभावित होता है। श्वेत एवं तेजस्वी वलय शरीर एवं मनोगत समर्थता का परिचायक है, इनमें सन्निहित रंगों का आभा मानसिक विशेषता को प्रदर्शित करती है, जबकि दिव्यताविहीन धुँधले कुहरे जैसा वलय मानसिक दृष्टि से गए-बीते एवं निकृष्ट चिंतन की ओर इंगित करता है। इस लेख में उन्होंने आगे लिखा है कि यह 'बायोप्लाज्मिक बॉडी' अपने आस-पास के वातावरण के घूमते कणों को अपनी शक्ति से चार्ज कर देती है। इस प्रक्रिया को उन्होंने 'आयोनाइजेशन' कहा है। जिस स्तर के प्राण-प्रवाह होते हैं, परिष्कृत अंतःकरण होता है, चिंतन का स्तर होता है, उसी अनुरूप औरा का निर्माण होता है एवं सारा वातावरण इन आयंस से चार्ज हो जाता है।

डाॅ॰ जार्ज मिक ने मानवी प्रभामंडल को तीन भागों में बाँटा है। पहला शरीर तक सीमित विद्युत विभव, दूसरा शरीर के बाहर तक निकला तेजोवलय एवं तीसरा शरीर को कवच की तरह चारों ओर से लपेटे 6 से 8 इंच व साधनात्मक प्रगति पर कई फीट तक का विस्तार वाला क्षेत्र। तीसरे प्रभावशाली आभा परिकर को उन्होंने 'जोन ऑफ एनर्जी' कहा है। पहले में बिंदु होते हैं, दूसरी में रेखाएँ और तीसरे में सघन आयनों का समुच्चय। पहले को स्थूलशरीर या बायोप्लाज्मा, दूसरे को प्लाज्मा एवं तीसरे को आयन विकिरण कहा गया है, जिसमें वास्तव में हीलिंग (चिकित्सा) की क्षमता होती है। प्राण-प्रत्यावर्तन में इसी की प्रधान भूमिका होती है। हाथ सिर पर या रुग्ण अंग पर रखकर चिकित्सा करने वाले आयन विकिरण-प्रक्रिया द्वारा ही यह सायकिक हीलिंग करते हैं।

मात्र स्थूलशरीर तक सीमित विद्युत विभव जो बिंदुरूप में क्रियाशील है, विशेष आभारूप में निकलता है, इसमें उपचार की शीघ्रगामी क्षमता है। प॰ जर्मनी के अतींद्रिय क्षमतासंपन्न वैज्ञानिक जार्ज मिचेल ने 'थियो-सोफिका प्रेक्टिका' में लिखा है कि इन बिन्दुओं से प्रकाश-किरणें निस्सृत होती रहती हैं। इसका संबंध उन्होंने चीन में चल रहे एक्यूपंक्चर चिकित्सापद्धति से जोड़ा है। एक्यूपंक्चर एवं जार्ज मिचेल द्वारा बताए गए बिन्दुओं में विलक्षण समानता पाई गई है। एक्यूपंचर विशेषज्ञों का कहना है कि शारीरिक स्वास्थ्य के लिए जीवनी शक्ति एक विशेष अदृश्य रेखाओं से आती है, जिनका संबंध संपूर्ण शरीर से है। उन बिंदुओं पर सुई का स्पर्श या थोड़ा-सा दबाव (एक्यूप्रेशर) दरद या रोग को तुरंत समाप्त कर देता है। विशेषज्ञों के अनुसार इन बिंदुओं को उत्तेजित करने पर उन विशेष बिंदुओं से विशेष आभा निकलती है, जिसके द्वारा स्थूलशरीर में दृष्टिगोचर होने वाले रोगों का उपचार किया जा सकता है। दरद को समाप्तकर व्यक्ति को कष्टमुक्त किया जा सकता है।

एक्यूपंक्चर के बिंदु, बायोप्लाज्मिक बॉडी, आयनीकरण इत्यादि सभी एक ही तथ्य की ओर संकेत करते हैं कि यदि अपने सूक्ष्म व कारणशरीर की संरचना को सुदृढ़ बनाया जा सके, प्रसुप्त केंद्रों को उत्तेजित किया जा सके तो जाग्रत प्राण-ऊर्जा के प्रभाव से न केवल स्वयं रोगमुक्त रहा जा सकता है, अन्यान्यों को भी लाभान्वित किया जा सकता है। प्रभामंडल एक प्रकार का छायापुरुष है। इसकी सिद्धि जो कर लेता है, वह न केवल सामने वाले के गुण, कर्म, स्वभाव को जाँचने-परखने में सिद्धहस्त हो जाता है, वरन उसे यह मार्गदर्शन दे सकने में भी समर्थ हो जाता है कि कैसे उसे अपनी आध्यात्मिक ऊर्जा को सशक्त बनाना चाहिए? इसके लिए क्या उपचार, किस प्रकार किए जाने चाहिए?

आभामंडल की जानकारी अब मात्र रोग-निदान उपचार तक ही नहीं सीमित रही है, इसका उपयोग आध्यात्मिक उपचार, शक्ति-संवर्द्धन, मनोबल व संकल्पशक्ति के उछालने में भी किया जा सकता है। यह क्रमशः स्पष्ट होता जा रहा है। भावी आत्मबलसंपन्न व्यक्तियों की पीढ़ी इसी आधार पर विनिर्मित होगी।


क्या ईश्वरीय सत्ता सर्वव्यापी नहीं है?

ईश्वर सर्वव्यापी है— कई लोग ऐसा नहीं मानते और आक्षेप लगाते हैं कि उसकी व्यापकता की मान्यता मानी ही नहीं जा सकती। इन सब में जान स्टुअर्ट मिल अग्रणी हैं। उनका तर्क है कि मानवीकृत वस्तुओं में उन्हें बनाने वाला व्यक्ति व्यापक कहाँ होता है? इतने पर भी क्या वह वस्तु काम करना बंद कर देती है अथवा अस्तित्व में ही नहीं रह पाती? महल बनाने वाले इंजीनियर प्रायः निर्माण के बाद फिर कहीं अन्यत्र इमारत बनाने के लिए चले जाते हैं, तो क्या वह मकान उनके जाते ही ढह जाता है? इंजन अपने निर्माण के बाद भी अपना अस्तित्व बनाए रखता है; जबकि वह निर्माता से कोसों दूर रहता है। पुस्तक अपने सृजेता से पृथक रहकर भी क्या अपने प्रयोजन पूरे करती नहीं रहती है? उनका कहना है कि जब मानवनिर्मित यंत्र-उपकरण निर्माण के उपरांत कर्त्ता के बिना भी अपने उद्देश्य पूरे करते रह सकते हैं, तो यह सर्वव्यापकता संबंधी नियम ईश्वर पर ही क्यों थोपा जाए, जबकि उसे मनुष्य से असंख्य गुना ज्ञानवान— बलवान बताया जाता है। उनका मत है कि यदि ईश्वर है, तो उसे सर्वव्यापी होने की आवश्यकता नहीं है। इसी प्रकार के अभिमत अन्य मतावलंबियों के हैं। कुछ ईश्वर को ऊपर कहीं आसमान में बताते हैं, तो कुछ इसकी तुलना सूर्य से करते हुए कहते हैं कि जिस प्रकार सूर्य एक स्थान पर रहते हुए भी समस्त संसार को प्रकाशित कर रहा है, उसी प्रकार यह ईश्वर है। वह एक स्थान पर रहकर पूरी सृष्टि का संचालन करता है।

स्थूलदृष्टि से देखा जाए तो मिल और अन्यों के कथन सत्य जान पड़ते हैं कि संसार में मनुष्य द्वारा रचित सारी वस्तुएँ जब उसकी व्यापकता के बिना ही क्रिया करती रहती हैं, तो परम सत्ता की व्यापकता सृष्टि के कण-कण में क्यों आवश्यक है? ऐसा विचार करते समय हम तथ्य की गहराई में नहीं उतरते, अन्यथा इसका उत्तर स्वतः मिल जाता कि क्रिया में परमेश्वर की उपस्थिति के बिना कोई कार्य संभव ही नहीं हो सकता। जब हम किसी मानवी क्रिया का उद्धरण प्रस्तुत करते हैं तो शायद यह भूल जाते हैं कि हमने क्रिया के सिर्फ एक अंश पर विचार किया है और दूसरे की उपेक्षा कर दी अथवा हमारी बुद्धि की पहुँच उस गहराई तक हुई ही नहीं।

वस्तुतः ऐसी क्रिया में मनुष्य और ईश्वर दोनों की व्यापकता होती है। यदि कोई यंत्र का निर्माण किसी व्यक्ति के जिम्मे है और वह उसके निर्माण में जुटे ही नहीं, तो वह अस्तित्व में ही कैसे आ पाएगा? उसका अस्तित्व में आना ही यह सिद्ध करता है कि उस दौरान कोई मानवी सत्ता निश्चय ही उसमें व्यापक रही होगी। बाद का कार्य चूँकि उसके वश का नहीं होता, अतः उसका संचालन ईश्वरीय सत्ता करती है।

इसे भली-भाँति समझने के लिए हमें सर्वप्रथम कार्य-कारण सिद्धांत समझना होगा। सर्वविदित है कि किसी भी क्रिया का संपादन निमित्त कारण की उपस्थिति में ही संभव हो पाता है। हलवाई की दुकान में बेसन, चीनी, मैदा, घी सब वस्तुएँ अलग-अलग रखी रहती हैं, पर हलवाई की इच्छा व क्रिया के बिना मिठाइयाँ नहीं बन पातीं। इसके लिए हलवाई को प्रयासपूर्वक उन्हें आपस में मिलाना पड़ता है, तब कहीं जाकर वे बन पाती हैं। यहाँ तक कि क्रिया हलवाई की थी और इस क्रिया का निमित्त कारण वह स्वयं था। इसमें बनाने वाले ने मिठाई को जो आकार दिया, उसके परमाणु उस आकार में चिपके क्यों रह गए? किस शक्ति ने उन्हें परस्पर बाँधे रखकर वह आकार बनाए रखने में सहयोग किया अथवा कोई मिठाई जल्दी एवं कोई विलंब से क्यों खराब हुई? इसका उत्तर हलवाई नहीं दे सकेगा, क्योंकि यह क्रियाएँ उसके अधीन नहीं होतीं। ये अभौतिक क्रियाएँ हैं और किसी भौतिक शक्ति के नियंत्रण में नहीं रहतीं। इसका नियंता कोई अदृश्य व्यापक सत्ता ही हो सकती है, जो हर वक्त, हर जगह व्याप्य में व्याप्त होती है और समय, परिस्थिति व आवश्यकता के अनुरूप कार्य करती है।

इसी प्रकार मूर्तिकार यदि मूर्ति बनाता है तो यह उस पर निर्भर करता है कि वह उसे पत्थर की बनाए या मिट्टी, संगमरमर की, पर प्रश्न यह है कि मिट्टी के परमाणु पत्थर एवं संगमरमर की तुलना में जल्दी टूटकर बिखर क्यों जाते हैं? मूर्तिकार इसे भली प्रकार जानता है, अस्तु वह पत्थर अथवा संगमरमर की ही मूर्ति बनाना पसंद करता है, क्योंकि वह टिकाऊ होती है। यह मजबूती या कमजोरी विग्रह को संगतरास द्वारा नहीं मिलती। वह तो मात्र वस्तु को एक आकार प्रदान करता है। परमाणुओं के कमजोर अथवा मजबूत बंधन के लिए वह कदापि जिम्मेदार नहीं है, कारण कि न तो वह परमाणुओं को मिलाता है, न उनके संयोग को स्थिर रखता है। मात्र वह उस स्थिति का लाभ उठता है। अतः यह कहना कि व्याप्य में अगोचर व्यापक सत्ता का सर्वथा अभाव है, उचित न होगा।

इसी प्रकार घड़ीसाज विभिन्न पुरजों को इकट्ठा करके घड़ी बना देता है, पर उनका चलना उसकी मरजी पर निर्भर नहीं करता। घड़ी के रूप में उनके चलने के लिए घड़ीसाज उत्तरदायी नहीं है, न इसमें जो नियम काम करता है, उसे ही उसने बनाया है। वह नियम पहले से ही विद्यमान था और उसका संचालन भी एक अदृश्य शक्ति के अधीन था। यहाँ भी घड़ीसाज की व्यापकता कार्य में बनी रहती है। हाँ! इतना अवश्य है कि उसकी यह व्यापकता पुरजों के अस्तित्वकाल तक न रहकर सिर्फ निर्माणकाल तक रहती है, पर रहती अवश्य है।

यदि सचमुच ही ईश्वर सर्वत्र व्यापक नहीं है, तो यह सृष्टि हमें इस रूप में नहीं दिखाई पड़ती। फिर उसे इसके संचालन के लिए राजा की भाँति अनेकानेक मातहत सत्ताओं, सामंतों का आश्रय लेना पड़ता और इसके अलग-अलग विभाग पृथक-पृथक सत्ताओं की देख-रेख में चलते। चूँकि राजा का अपनी प्रजा और नौकरों के मस्तिष्क पर नियंत्रण नहीं होता है, फलतः यदा-कदा वे स्वेच्छाचार बरतते और मनमानी करते भी देखे जाते हैं, जिसका समय-समय पर उन्हें उचित दंड मिलता है। चूँकि राजा अपने राज्य में सर्वत्र व्यापक नहीं होता, ऐसी अगणित बातें हो सकती हैं, जो राज्य-प्रशासन के विरुद्ध हों और राजा की नियमावली का उल्लंघन करती हों। यदि ईश्वरीय सत्ता भी चलाती तो निश्चय ही ऐसी अव्यवस्था एवं अराजकता कभी-कभी उत्पन्न हो जाती, पर विश्व-ब्रह्मांड की घटनाओं को देखने से उसमें किसी भी प्रकार की नियमविरुद्धता, असंबद्धता अथवा अव्यवस्था कहीं भी दृष्टिगोचर नहीं होती।

ईश्वर की निराकार सत्ता भी उसकी सर्वव्यापकता को सिद्ध करती है। ईश्वर को किसी ने देखा नहीं। जो निराकार है, वही सर्वव्यापी हो सकता है। हवा हमें दिखाई नहीं पड़ती, उसका अनुभव कर सकते हैं। इतने पर भी यह कहना कि कमरे के भीतर हमें वायु की अनुभूति नहीं हो रही है, अतः कमरे में हवा नहीं है और बाहर पेड़-पौधे हिलते-दीख रहे हैं, अतः यहीं केवल उसकी मौजूदगी है, किसी भी प्रकार सही न होगा। हमारा जीवित बना रहना, समस्त शारीरिक क्रियाओं का यथावत् चलते रहना ही उसके अस्तित्व प्रमाण के लिए काफी होगा।

इस प्रकार यह स्पष्ट हो जाता है कि भगवद्सत्ता सर्वव्यापी है, जिसे मनुष्य यह कहकर गर्व करता है कि यह मेरी रचना है, प्रकारांतर से उसमें भी उसकी उपस्थिति होती है। सच पूछा जाए तो उसकी विद्यमानता के बिना कोई कार्य संपादित हो ही नहीं सकता। जो मानवी कार्यों के साथ ईश्वर की तुलनाकर उसका वास एक स्थान पर बताते हैं, वे व्यापकता संबंधी नियम पर विचार करने में भूल करते हैं। इसी कारण यह भ्रम पैदा हो जाता है। वस्तुतः मनुष्य भी अपने कार्य की पूर्ति हेतु कुछ समय के लिए अस्तित्व में आता है और शेष कार्य ईश्वर अपनी सर्वव्यापकता द्वारा सिद्ध करता है। ऋषियों ने भी इसी का समर्थन करते हुए 'ईशावास्यमिदं सर्वं' का उद्घोष किया है।


यह जीवन प्रभुमय बन जाए!

भगवत् प्रार्थना में अलौकिक शक्ति और अनंत सामर्थ्य है। इसे आत्मचेतना को परमात्म सत्ता से जोड़ने, उससे बातें करने तथा उसमें निवास करने का सर्वोत्तम उपाय माना गया है। यह वह उपक्रम है, जिसके द्वारा मनुष्य अपनी अंतरात्मा की भूख को मिटाता है। शरीर की क्षुधा-पिपासा अन्न-जल से मिटती है और इससे शरीर को शक्ति मिलती है। वह परिपुष्ट और बलिष्ठ बनता है। उसी तरह अंतरात्मा अपनी आकुलता को मिटाने, अपने ऊपर चढ़े मल-विक्षेपों को हटाने की तथा उसमें प्रकाश भरकर अपूर्णता को दूरकर पूर्णता भरने की प्रार्थना भगवान से करती है।

ईश्वर के प्रति— आराध्य के प्रति 'पितु-मातु-सहायक-स्वामी-सखा' की भावना रखकर उसके सम्मुख निश्चयपूर्वक की गई पुकार कभी निष्फल नहीं जाती। विश्वासपूर्वक की गई भावभरी प्रार्थना पर परमात्मा दौड़े चले आते हैं। उन्हें जहाँ कहीं, जब कभी हार्दिक अभिव्यक्ति मिलती है तो उनकी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष सहायता उभरे बिना रह नहीं सकती।

द्रौपदी निस्सहाय अबला के रूप में कौरवों की राजसभा में खड़ी थी। दुराचारी कौरवों द्वारा चीरहरण किए जाने पर भी उपस्थित किसी मानव ने उसकी सहायता नहीं की। प्रार्थना करने पर ईश्वरीय सत्ता ने उसकी लाज बचाई। दमयंती का बीहड़ वन में कोई सहायक नहीं था। सतीत्व पर आँच आते देख उसने भगवत्सत्ता को पुकारा, जो उसकी नेत्रों की ज्वालारूप में प्रकट हुई और उसने व्याध को जलाकर भस्म कर दिया। प्रह्लाद को दुष्ट पिता से मुक्ति दिलाने एवं ग्राह के मुख से गज को छुड़ाने, उनकी प्रार्थना पर भगवान स्वयं आगे आए थे। निर्वासित पांडवों की रक्षा स्वयं भगवान ने की। अपने प्रिय सखा अर्जुन का रथ जोता एवं गीता का उपदेश देकर धर्म दर्शन का निचोड़ मार्गदर्शन हेतु प्रस्तुत किया, साथ ही महाभारत की भूमिका बनाकर सतयुग की स्थापना हेतु स्वयं भूमिका निभाई। नरसी भगत के सम्मान की रक्षा व मीरा को विष के प्याले से बचाने हेतु भगवत्सत्ता के आने के मूल में उनकी प्रार्थना की शक्ति ही थी।

ये सभी उदाहरण ऐसे हैं, जिन्हें पौराणिक गाथाएँ कहकर उनकी सत्यता से इंकार नहीं किया जा सकता। वस्तुतः प्रार्थना विश्वास की प्रतिध्वनि है। रथ के पहियों में जितना अधिक भार होता है, उतना ही गहरा और तीव्र निशान वे धरती में बना देते हैं। प्रार्थना की रेखाएँ लक्ष्य तक दौड़ी जाती हैं और मनोवांछित सफलता खींच लाती हैं। विश्वास जितना सघन होगा, परिणाम भी उतने ही श्रेष्ठ और प्रभावशाली होंगे। प्रख्यात अंग्रेज कवि टेनीसन के अनुसार— "संसार की काल्पनिक दौड़ जहाँ तक संभव है, उससे कहीं अधिक महान कार्यों का संपादन अंतःकरण की भावभरी प्रार्थना द्वारा किया जा सकता है। अतः हमारी प्रार्थना ऐसी हो, जो लक्ष्य को वेध सके। जिसमें केवल स्वर का महत्त्व प्रकट होता है, वह प्रार्थना नहीं, वरन हृदयहीन विडंबनाभर कही जाएगी। प्रार्थना वह होती है, जो हृदय से निकलकर सारे आकाश को प्रभावित करती और परमात्मा के हृदय में भी उथल-पुथल मचाकर रख देती है। ऐसी प्रार्थना निष्काम, सच्ची और सजीव ही हो सकती है। वर्षा का जल गिरता है तो सारी धरती गीली हो जाती है। प्रार्थना के प्रभाव से परमात्मा का अंतःकरण द्रवित होता है और साधक की उपासना से अधिक सत्परिणाम प्रस्तुत होता है।"

प्रार्थना का अर्थ याचना नहीं है। वह तो आत्मा की पुकार है। जब दृढ़ विश्वास के साथ आकुल हृदय से मनुष्य ईश्वर को पुकारता है, तो वही भावना प्रार्थना बन जाती है। ईश्वर से हृदय का मिलन, उसका एकीकरण ही प्रार्थना का उद्देश्य होना चाहिए। उसकी सफलता का उपाय बताते हुए रामकृष्ण परमहंस ने कहा है— "जब मन और वाणी एक होकर कोई वस्तु माँगते हैं, तो उस प्रार्थना का उत्तर अवश्य मिलता है। केवल वाणी द्वारा प्रार्थना पर्याप्त नहीं, उसमें अंतःकरण की तल्लीनता भी आवश्यक है। ऐसी प्रार्थनाओं में ही सजीवता होती है, चुंबकत्व होता है और वह अपना संदेश परमात्मा तक पहुँचाने में समर्थ होती हैं। सदुद्देश्यों के लिए की गई हृदय की, आत्मा की पुकार अनसुनी नहीं जाती। ईश्वर उसे अवश्य पूरी करता है।"

प्रार्थना से बुद्धि पवित्र बनती है। विवेक जाग्रत होता है, जिससे उलझी गुत्थियों को सुलझाने की सूझ-बूझ प्राप्त होती है, संकट की स्थिति में उचित मार्ग-निर्देशन मिलता है। महात्मा गांधी अपने उत्थान का प्रमुख आधार प्रार्थना को ही मानते थे। जीवन के अंतिम क्षणों तक इसकी नियमितता को उन्होंने बनाए भी रखा। उनका संपूर्ण जीवन प्रार्थनामय था। वह कहा करते थे— "प्रार्थना मेरी जीवनजड़ी है। जब-जब कोई कठिनाई आती है, मैं उसी का आश्रय लेता हूँ। मेरे सामने आने वाले राष्ट्रीय, सामाजिक तथा राजनीति के कठिन प्रश्नों की गुत्थियों का हल मुझे अपनी बुद्धि की अपेक्षा अधिक स्पष्टता और शीघ्रता से प्रार्थना द्वारा विशुद्ध अंतःकरण से मिल जाता है। प्रार्थना का सहारा न होता तो मैं कब का पागल हो गया होता। मेरी आत्मा के लिए इसकी उतनी ही अनिवार्यता है, जितना शरीर के लिए भोजन। प्रार्थना के बिना मैं कोई कार्य नहीं करता। सच्चे हृदय से की गई पुकार का परिणाम अवश्य महान प्रतिफल प्रस्तुत करता है।"

प्रार्थना एक सार्वभौम मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया है। सभी धर्मों ने इसकी महत्ता को स्वीकार किया है। तत्त्ववेत्ताओं ने इस पर गहन मनन और चिंतन किया है और इसे शक्ति प्राप्त करने की एक वैज्ञानिक पद्धति घोषित किया है। इसकी महत्ता पर प्रकाश डालते हुए प्रसिद्ध विचारक मनीषी डेल कार्नेगी ने कहा है— “यदि लोगों को यह ज्ञात हो जाता कि प्रार्थना से शांति और संतोष मिलता है, तो जो आत्महत्या की चेष्टा करते हैं अथवा पागल हो जाते हैं, उनमें से अधिकांश को बचाया जा सकता है।” उन्होंने चिंताओं-मनोविकारों से छुटकारा प्राप्त करने का उपाय प्रार्थना को बताया है। नोबेल पुरस्कार विजेता प्रसिद्ध वैज्ञानिक डाॅ॰ अलेक्सिस कैरेल ने अपनी पुस्तक  'मैन द अननोन' में लिखा है कि, "प्रार्थना द्वारा कठिन रोगों से भी छुटकारा पाया जा सकता है।" इसी तरह की मान्यता वैज्ञानिक अलबर्ट विल्क की भी है। उनने अपनी पुस्तक  'लेसन्स इन लिविंग' में कहा है कि, "प्रार्थना से स्वास्थ्य लाभ मिलता तो है, पर इसकी कामना इस रूप में करनी चाहिए कि आज उस परम सत्ता ने हमें इसलिए स्वस्थ कर दिया है कि कल हम कुछ अच्छा कार्य कर सकें। अपने लिए ही नहीं, वरन समाज के लिए भी उपयोगी सिद्ध हो सकें। सार्थक पुकार यही है।" इसे अधिक स्पष्ट करते हुए मनीषी रिबेका बीयर्ड ने अपनी कृति 'एवरी मैन्स सर्च' में कहा है— “प्रार्थना द्वारा विपरीत परिस्थितियों को भी अनुकूलता की दिशा में मोड़ा-मरोड़ा जा सकता है। शक्ति की इस धारा को शुभ दिशा में प्रवाहित करने के लिए आवश्यक है कि जिस परिणाम को हम उपस्थित देखना चाहते हैं, उस परिस्थिति को हम निर्मित करें।”

'थियालाजिका जर्मेनिका' नामक प्रसिद्ध पुस्तक में कहा गया है— “जब प्रार्थना द्वारा साधक ईश्वर के संपर्क में आकर उसमें आत्मसात हो जाता है तो वह अपनी खोई हुई शक्ति को पुनः प्राप्त कर लेता है। उसे शाश्वत जीवन की उपलब्धि होती है।" संत इगर्नेशियम के अनुसार— “प्रार्थना से हृदय में ईश्वर के प्रति पूर्ण निर्भरता का भाव जाग्रत होता है। अंतःकरण शुद्ध होकर उसमें देवत्व का विकास होता है, विनम्रता आती है और आत्मसंतोष का भाव पैदा होता है।"

निःसंदेह प्रार्थना में अमोघ शक्ति है। परोपकार, आत्मकल्याण और जीवन-लक्ष्य की प्राप्ति के लिए ही उसका सदुपयोग होना चाहिए। आत्मकल्याण और संसार की भलाई से प्रेरित प्रार्थनाएँ ही सार्थक हो सकती हैं। जब "असतो मा सद् गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय, मृत्योर्माऽमृतं गमय" के श्रद्धापूरित भाव, उद्गार अंतःकरण से उठेंगे, तो निश्चय ही जीवन में एक नया प्रकाश प्रस्फुटित होगा।


संकल्पशक्ति कुंजी है— प्रगति-पुरुषार्थ की

14 अगस्त, 1964 का दिन था। अमेरिका के साहित्य-जगत की एक उभरती प्रतिभा नारमन कजिन्स को अनायास ही एक ऐसी व्याधि ने अपने पाश में जकड़ लिया, जिसका कोई उपचार न उन दिनों चिकित्सक के पास था, न आज है। वह थी हड्डियों के बीच के कार्टिलेज की डिजेनरेटीव व्याधि, जिसने उन्हें 24 घंटों में बिस्तर पर लेटने को विवश कर दिया। एक सप्ताह में सभी जोड़— संधियाँ ऐसे जकड़ गए कि वे पीड़ा में कराहने लगे, निद्रा कोसों दूर भाग गई एवं जोड़ लगभग बँध से गए।

चिकित्सकों के समझाने के बावजूद कि इसका कोई उपचार नहीं है, वे पीड़ानाशक व मांसपेशियों के तनाव को कम करने वाली औषधियाँ लेते रहे, यदि कष्ट अधिक न हो तो मालिश करने दें, वे यह मानने को राजी नहीं हुए कि उनकी व्याधि असाध्य है। अब वे बिस्तर से उतर नहीं सकेंगे व जीवन भर—  जो अधिक लंबा नहीं है, ऐसी ही स्थिति रहेगी। उन्होंने अपने चिकित्सकों से दृढ़ मनोबल के साथ कहा कि, “मैं जल्दी हार मानने वाला नहीं हूँ। मैं जानता हूँ कि यह बीमारी एड्रीनल ग्रंथि के रसस्राव क्षीण हो जाने से हुई है। यदि तनाव व शारीरिक दबाव ऐसा कर सकता है, तो क्यों पुनः विधेयात्मक भाव-तरंगों द्वारा एड्रीनल को प्रभावितकर इन्हीं हारमोन्स को उत्सर्जित करना संभव नहीं हो सकता?” उनके तर्क में दम तो था, पर ऐसा कभी कोई कर पाया हो, ऐसा कोई केस चिकित्सकों के पास नहीं था। उन्होंने कहा—  "यदि आपकी इच्छाशक्ति इतनी ही प्रबल है तो कोशिश कर देखें।"

कजिन्स की मान्यता थी कि पॉजेटिव इमोशन्स, प्रसन्नता की—  प्रफुल्लता की भावना, हल्का-फुल्का मस्ती भरा जीवन जीने की आकांक्षा द्वारा पाॅजिटिव विद्युत धाराओं को शरीर में दौड़ा सकना संभव है। यदि भावनात्मक स्थिति को पलटा जा सकता है, तो एड्रीनल ग्रंथि की कार्यपद्धति को उलटना क्यों संभव नहीं है, जो कि तनाव, अवसाद के लिए उत्तरदायी मानसिक हारमोन्स का रसस्राव करती है। उन्होंने सोचा कि हँसी—  उन्मुक्त हँसी, खुले दिल से हँसी ही दूसरी श्रेष्ठ चिकित्सा है। 'कैंडिड कैमरा' नामक एक हास्य धारावाहिक उन्होंने उसी दिन अपने टीवी पर देखना आरंभ किया एवं हँसी में साथ देने के लिए अपने समस्त मित्रों को भी आमंत्रित किया। इस प्रयोग के बाद 10 मिनट की हँसी ने उन्हें दो घंटे की पीड़ामुक्त नींद में सुला दिया। अब वे अस्पताल से घर पहुँच गए, जहाँ वे स्वतंत्रता से कॉमिक मूवीज, टेलीविजन प्रोग्राम देख सकते थे तथा हास्यप्रधान चुटकुलों की पुस्तकें पढ़-पढ़कर खुद ही हँसते रह सकते थे। इस प्रयोग के 9 दिन बाद उनके एक अँगूठे, घुटने से दरद गायब हो गया व बिना दवा के वे 5 से 6 घंटे सोने लगे। तीन सप्ताह बाद चिकित्सकों ने उन्हें प्यूर्टोरिको के समुद्री बीच पर व्यायाम करते पाया। उनके एक्सरे किए गए, पता चला कि ऊतक नए सिरे से बनने लगे हैं। 4 माह बाद वे साइकिल चलाते हुए स्वस्थ स्थिति में कार्यालय आए। उनने बाद में अपने संस्करणों में लिखा कि, “मेरी जिजीविषा”—  जीने की अदम्य आकांक्षा ने मुझे हँसने व विधेयात्मक चिंतन के लिए प्रेरित किया व इसी ने असंभव को संभव कर दिखाया। इच्छाशक्ति से मैंने शरीर की रसायन-प्रक्रिया को बदल डाला। वस्तुतः जीवन जीने का नाम है व जीने के लिए जरूरी है—  संकल्पशक्ति, जो किसी भी अवरोध से जूझ सकती है।”

यह एक उदाहरण है, एक ऐसे व्यक्ति का, जिसने अपनी स्वयं की इच्छाशक्ति का सुनियोजनकर अपनी असाध्य व्याधि से मोर्चा लिया एवं एक कुशल सैनिक की भाँति जीतकर दिखाया। वस्तुतः इच्छाशक्ति के साथ प्राणि-समुदाय की प्रगति का इतिहास जुड़ा है। एककोशीय अमीबा के रूप में पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति हुई मानी जाती है। एक से बहुत होने की परब्रह्म की आकांक्षा को वह जीव अपने व्यवहार में उतारता गया। वह न केवल अपने को खंडित करते-करते एक से बहुत हुआ, वरन उसने अपनी आकृति-प्रकृति में भी बढ़ोतरी आरंभ कर दी। अनेक जलचरों की सृष्टि इसी क्रम में हुई। इतने पर भी प्रगतिक्रम रुका नहीं। वे जलचर ही क्रमशः थलचर और नभचर की स्थिति में विकसित, परिवर्तित होते गए। वह क्रम मनुष्य की सर्वांगपूर्ण सत्ता तक जा पहुँचने तक चलता चला आया। इतने पर भी उस उपक्रम का अंत नहीं हुआ। मनुष्य, वनस्पति और प्राणि जगत का भाग्यविधाता कहा जाता है। अब उसने प्रकृति का अधिष्ठाता बनने की बात भी ठानी है। वैज्ञानिक शोधों की प्रक्रिया इसी कारण तीव्र-से-तीव्र होती चली जा रही है। यह संकल्पशक्ति का चमत्कार है।

जिनकी मनोदशा चेतना-क्षेत्र की ओर मुड़ी, उनने धर्म का, दर्शन का, अध्यात्म का, परलोक का, देवी-देवताओं तक का सृजन कर डाला, अतींद्रिय क्षमताओं से संपन्न होकर सिद्धपुरुष बने और ऋषि-सिद्धियों के रूप में अपनी विभूतियों का परिचय देने लगे। जनसामान्य के मार्गदर्शन के लिए अपनी सूझ-बूझ को समग्र जताने लगे। आदिम मनुष्य और आज के विकसित व्यक्ति की तुलना की जाए तो जमीन-आसमान जैसा अंतर प्रतीत होगा। इस प्रगति के मूल में सदा से एक ही तत्त्व काम करता रहा है और वह है— उत्कंठा से, जिज्ञासा से भरा-पूरा संकल्पबल। उसके अभाव में प्राणि जगत की प्रगति का कोई आधार ही न बन सका होता। सभी नर-वानरों की तरह किसी प्रकार शरीर-रक्षा के साधन जुटाने भर तक सीमित होकर रह गए होते। अभी भी वन्य प्रदेशों में पाए जाने वाले कबीलों की स्थिति ऐसी ही है। उनके सामने कोई ऐसा उद्देश्य या कार्यक्रम नहीं होता, जिसे अपनाकर अपेक्षाकृत अच्छी स्थिति तक पहुँचा जा सके। यही कारण है कि वे आदिम युग के वनमनुष्य की तुलना में बहुत थोड़ी ही प्रगति कर सके हैं। उत्तरी ध्रुव पर बसे एस्किमो लोगों के रहन-सहन को देखकर इस तथ्य को भली प्रकार समझा जा सकता है कि इच्छाशक्ति का अभाव कितनी कठिन परिस्थितियों में भी यथावत् बने रहने के लिए बाधित किए रहता है।

मनुष्य ने भाषा और लिपि के अभिनव आधार खड़े करके परस्पर विचार-विनिमय का द्वार खोला। यह उपलब्धियाँ अनायास ही हस्तगत नहीं हो गईं, वरन इसके लिए पीढ़ियों तक समझदार लोग भरपूर प्रयत्न करते रहे। यदि उस संबंध में उत्सुकता न उमड़ी होती, तो मनुष्य भी अन्य वानर जातियों की तरह किसी प्रकार थोड़े संकेतों और शब्दों के सहारे पारस्परिक संबंधों को मात्र चला सका होता। आग का आविष्कार, पहियों का विज्ञान, वस्त्र निर्माण, आच्छादन, पशुपालन अपने युग की जिज्ञासाओं से उभरे पुरुषार्थ भरे कृत्य थे, जिनने आज की प्रगति का पथ-प्रशस्त किया।

निषेध अनुपयुक्त कल्पनाओं, जल्पनाओं और महत्त्वाकांक्षाओं का ही किया गया है, क्योंकि उन्हीं के कारण मनुष्य का बहुमूल्य समय, श्रम, कौशल बरबाद होता रहता है। वे ही कुमार्ग पर भटकातीं और अनेक संकटों को खींचकर बुलाती हैं। श्रेष्ठ इच्छाएँ-आकांक्षाएँ तो न केवल आवश्यक हैं, वरन श्रेयस्कर भी हैं। वेदांत दर्शन के प्रथम सूत्र में जिज्ञासा को सद्ज्ञानसंचय का प्रथम और प्रमुख उपाय माना गया है। जिस प्रकार ज्ञानसंचय में जिज्ञासा की प्रमुख भूमिका होती है, उसी प्रकार इच्छा-आकांक्षाओं की अभीष्ट प्रसंगों की दिशा में बढ़ चलने का प्रमुख आधार माना गया है। संकल्प का भारतीय संस्कृति के कर्मकांडों में प्रथम और प्रमुख स्थान है। किसी भी धर्मकृत्य में सर्वप्रथम संकल्प पढ़ा जाता है। यदि यही संकल्प जीवंतरूप में जीवन में उतर आए तो असंभव को संभव कर दिखाने वाला पुरुषार्थ परिणति रूप में दृष्टिगोचर होता है। आत्मक्षेत्र में लागू किए जाने पर यह न केवल गहरी घुसी दुष्प्रवृत्ति को निकाल बाहर करता है, वरन असाध्य मानी जाने वाली किसी व्याधि से भी मुक्त करने योग्य आत्मबल भी जुटा सकता है। परमाणु नाभिक की तरह अपने अंदर असीम सामर्थ्य संजोए हुए है— संकल्पशक्ति, आवश्यकता मात्र जगाने भर की है।


कैसे आएगा सतयुग?

धर्मराज युधिष्ठिर एक दिन चिंतित बैठे थे। उसी समय कहीं से देवर्षि नारद आ गए और चिंता का कारण पूछने लगे।

युधिष्ठिर ने कहा— "देव! अब कलियुग आ पहुँचा, उसने मेरे राज्य में अपने आगमन, प्रवेश और परिणाम की कष्टकर कथाएँ भी सुनाई, सो लगता है अब धर्मराज्य धरती पर से उठने ही वाला है।"

कलियुग के आगमन की बात तो नारद जी को भी मालूम थी, पर उन्हें इस बात पर आश्चर्य हुआ कि अंधकार और प्रकाश दोनों एक स्थान पर मिल कैसे गए? कलियुग और धर्मराज्य में प्रत्यक्ष भेंट हो सकना भला कैसे संभव हो सकता है? सो उसी प्रश्न को उठाते हुए नारद जी ने पूछा— “धर्म और अधर्म का प्रत्यक्ष मिलन कैसे संभव हो सका, घटना किस प्रकार घटी? सो हे पांडुपुत्र! विस्तार से वह सब विवरण सुनाइए।”

देवर्षि को उच्च आसन पर बिठाकर युधिष्ठिर ने वह प्रसंग बताना आरंभ किया— “भगवन्! एक दिन एक व्यापारी आया, उसके पास अद्भुत घोड़ा था। अर्जुन, भीम, नकुल, सहदेव उधर से आए तो घोड़े को देखकर मुग्ध हो गए और मनचाहा मोल देकर उसे बेच देने का आग्रह करने लगे।”

व्यापारी ने कहा— "धन की आपके यहाँ भी कमी नहीं और मैं भी कोई कंगाल नहीं हूँ। घोड़ा बेचना तो है, पर इसे धनी के हाथों नहीं, बुद्धिमानों के हाथों बेचना है, यदि आप लोग बुद्धिमान हों तो एक शर्त करें; मेरे चार प्रश्नों का उत्तर देना पड़ेगा। यदि उत्तर सही हुए तो घोड़ा मुफ्त दे दूँगा। यदि उत्तर न दिए जा सके या गलत हुए, तो मेरी खींची धर्मरेखा के भीतर आप लोगों को तब तक कैद रहना पड़ेगा, जब तक कि कोई आकर सही उत्तर न दे दे।”

युधिष्ठिर ने कहा— “देवर्षि! मेरे चारों भाइयों ने शर्त मान ली। उन्हें अपनी बुद्धिमत्ता पर और मेरे ज्ञान पर बहुत भरोसा था, सो मुफ्त में बहुमूल्य घोड़ा पाने का लोभ वे संवरण न सके और शर्त में बँधकर प्रश्न पूछने लगे।”

व्यापारी ने पहला प्रश्न भीम से पूछते हुए कहा— "मैं रास्ते में आ रहा था तो देखा कि एक भयंकर कूप है, उसके बीच में रस्सी से बँधा एक पैसा लटक रहा था। उस पैसे से बँधा सौ मन लोहा टँगा था। फिर भी वह रस्सी टूटती न थी, पैसा गिरता न था। इसका क्या रहस्य है?”

चारों भाइयों में से कोई उत्तर न दे सका, तो शर्त के अनुसार भीम को धर्मरेखा के भीतर कैद होने के लिए जाना पड़ा।

इसके बाद व्यापारी ने दूसरा प्रश्न पूछा— “उसी रास्ते पर चलते हुए मैंने एक जगह पाँच कुंड देखे। जिनका पानी अपने आप ऊपर निकलकर बहता था। चार कोनों के कुंड जब खाली हो जाते थे, तो बीच का कुंड उन्हें भर देता था: पर जब बीच का खाली होता तो चारों मिलकर भी उसे भर नहीं पाते थे और वह सूखा हुआ खाली ही पड़ा रहता था। राजकुमार बताओ इसका रहस्य क्या था?”

इस प्रश्न का उत्तर अर्जुन को देना था। वह तो क्या शेष भाई भी मिलकर कुछ समाधान न कर सके। तब शर्त के अनुसार अर्जुन को भी धर्मरेखा में कैद होना पड़ा।

देवर्षि! बात यहीं समाप्त नहीं हुई। व्यापारी ने और भी दो प्रश्न पूछे— (1) उसी रास्ते एक जगह प्रौढ़ गौ अपनी छोटी बछिया का दूध पीती पाई गई। (2) उसी यात्रा में एक विचित्र पशु देखा, जो मुँह से बुरे-बुरे शब्द उच्चारण करता था और मलद्वार से घास खाता था। इन दोनों दृश्यों का रहस्य बताओ?”

नकुल-सहदेव ने इस पहेली को सुलझाने का बहुत प्रयत्न किया, पर उन्हें भी कुछ नहीं सूझा। सो प्रश्न बिना उत्तर के ही रह गए और नकुल-सहदेव को भी धर्मरेखा के भीतर कैद होना पड़ा।

सेवकों ने समाचार मुझे दिया। अद्भुत घोड़ा— विचित्र प्रश्न, मुफ्त में खरीद की शर्त, धर्मरेखा में कैद, यह सभी बातें मुझे बहुत अटपटी लगीं, सो हे देवर्षि! मैं स्वयं उठकर द्वार पर पहुँचा और सारा घटनाक्रम देखकर चकित रह गया। फिर भी भाइयों को छुड़ाना तो आवश्यक ही था। सो मैंने साहस करके व्यापारी की पूछी गई पहेलियों के उत्तर देने आरंभ कर दिए।

(1) धूर्त लोग— एक पैसा दानकर के सौ मन यश लूटने का प्रयत्न करते हैं। सौ मन पाप को एक पैसे भर पुण्य के सहारे लटकाए रहना चाहते हैं। सो वह पतली रस्सी कुछ समय अधर में टँगी भले ही रहे, एक दिन वह सारी विडंबना कुएँ के गर्त्त में गिरेगी और सारा खेल खत्म हो जाएगा।

(2) बीच का कुआँ पिता है और चार कोनों के कुएँ पुत्र। अकेला पिता कर्त्तव्य-धर्म को स्मरण रखकर चारों पुत्रों का पालन-पोषण करता है, पर चारों स्वार्थी पुत्र अपने वृद्ध पिता की सेवा मिलकर भी नहीं कर पाते और वृद्ध अभिभावक दुखी-दयनीय स्थिति में शुष्क और नीरस जीवन बिताते हैं।

(3) पिता-माता गौ हैं और संतान उनकी बछिया। कितने ही पिता अपने लड़के बेचकर विवाह रचाते हैं और देन-दहेज धन कमाते हैं। इसी प्रकार कई ऐसे भी होते हैं, जो लड़की को वृद्धों के हाथ बेचकर संपत्तिवान बनते हैं। यही गाय द्वारा बछिया का दूध पिया जाना है।

(4) वह विचित्र जंतु था— साहित्यकार, कलाकार जो अपनी कृतियों द्वारा लोगों में दुर्बुद्धि उत्पन्न करता है और ऐसी कमाई खाता है, जो मलद्वार से खाने के समान घृणित है।

चारों ही प्रश्न-पहेलियों का रहस्योद्घाटन सही हो गया, सो शर्त के अनुसार व्यापारी को धर्मरेखा के बंधन से भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव मुक्त करने पड़े और वह अद्भुत घोड़ा भी मुफ्त देना पड़ा।

यह सब तो हो गया- पर मैंने आश्चर्यपूर्वक उस व्यापारी से पूछा— यदि प्रश्नों में पूछे गए सारे घटनाक्रम सही हैं, तब तो यह कलियुगरूपी पाप-साम्राज्य का ही परिचय है। मेरे धर्मराज्य में भला ऐसे कैसे हो सकता है? ऐसी अनीति कहीं कैसे प्रचलित हो सकेगी?

व्यापारी गिड़गिड़ाने लगा और बोला— धर्मराज! मैं ही कलियुग हूँ। अब मेरा पापराज्य आ पहुँचा, सो ऐसी घटनाएँ अनहोनी न रहेंगी। आए दिन पग-पग पर ऐसे ही अनाचार दृष्टिगोचर होंगे। मैं आपको वस्तुस्थिति बताने आया था, पर धर्म और अधर्म की न तो प्रत्यक्ष भेंट हो सकती थी और न खुले वार्त्तालाप की संभावना थी। सो मैंने व्यापारी का रूप बनाया और घोड़े के बहाने राजकुमारों के सामने वस्तुस्थिति की पहेली जैसे रहस्यमय प्रश्नों के साथ पूछा। मैं जानता था कि अंततः उत्तर आप ही दे सकेंगे और भेंट का सुअवसर मिल जाएगा और सूचना देने का प्रयोजन सध जाएगा?

युधिष्ठिर ने कहा—"भगवन्! मैं इसी से चिंतित था कि निकट भविष्य में जब लोग ऐसी दुष्ट गतिविधियाँ अपना लेंगे, तो उनके दुःखों का पारावार न रहेगा।”

नारद जी ने धर्मराज की चिंता दूर करते हुए कहा—"मनुष्य की आत्मा में विवेक का प्रकाश पूर्णतया कभी भी नष्ट नहीं हो सकता; इसलिए पाप का पूर्ण साम्राज्य कभी भी छा न सकेगा। विवेकवान आत्माएँ अपने समय की विकृतियों से लड़ती ही रहेंगी और बुरे समय में भी भलाई की ज्योति चमकती रहेगी।

पाप का पूर्ण साम्राज्य कभी भी स्थापित न हो सकेगा। इस आश्वासन से युधिष्ठिर का समाधान हो गया। क्या वह समय नहीं आ गया है, जब कलि का साम्राज्य जाने वाला है व सतयुग की लालिमा अरुणोदय का आभास देने लगी है?


वेदों से आख्यायिका

ऐतरेय ब्राह्मण और ऐतरेय उपनिषद् भारतीय वाङ्मय के मान्य ग्रंथ हैं। उनके सृजेता थे तत्त्वज्ञानी ऐतरेय। उन्हें महामनीषी के रूप में जाना जाता और सम्मानित किया जाता है।

इतरा दासी या रखैल को कहते हैं। उसकी संतान को उन दिनों सम्मानित नागरिक नहीं माना जाता था। फिर भी ऐतरेयवंश के आधार पर नहीं, गुणों के आधार पर उच्च सम्मान के अधिकारी बने।


विचित्र— विलक्षण यह सृष्टि

मनुष्य नियंता की बुद्धिमत्तापूर्वक विनिर्मित संरचना है। उसे सोचने-समझने के लिए मस्तिष्क दिया गया है। इस शक्तिशाली कम्प्यूटर के सहारे ही वह अपनी जिज्ञासा को जगाते हुए अविज्ञात को कुरेदता रहता, रहस्यों पर से परदा उठाता चला आया है। यही कारण है कि वैज्ञानिक आविष्कारों की इस सदी की समापन अवधि में जी रहे हम सब जो भी कुछ अपने चारों ओर देखते हैं, उसे विलक्षण, अद्भुत पाते हैं। आदिमानव ने अग्नि से जो आविष्कार शृंखला आरंभ की थी, वह पहिए बनाने, आच्छादन जुटाने से लेकर अंतरिक्ष में मानव भेजने की वर्त्तमान स्थिति तक आ पहुँची है। लगता है कि हम यांत्रिक सभ्यता के चरम शिखर पर पहुँचते-पहुँचते जो जीवन जिएंगे, वह आज से बिलकुल ही अलग, नया, अत्याधुनिक होगा। वैज्ञानिक यूटोपिया अब सत्य होते लगते हैं व प्रतीत होता है कि जो कुछ भी एच॰जी॰ वेल्स ने इस सदी के प्रारंभ में टाइम मशीन के बारे में लिखा था, सच होकर ही रहेगा।

इतना सब कुछ होते हुए भी, वैज्ञानिक प्रगति की चरमावस्था में पहुँचने पर भी लगता है कि अभी भी इतना कुछ है, जो अबूझ है, ज्ञात नहीं है, ज्ञात है तो उसका कारण — विज्ञानसम्मत स्पष्टीकरण नहीं है। पिंड व ब्रहमांड दोनों में ही अविज्ञात के गर्भ में इतने रहस्य छिपे हैं, जो परिलक्षित तो होते हैं, पर यह समझ नहीं आता कि विधाता की व्यवस्था में यह विचित्रता अपवाद रूप में कैसे विद्यमान है? प्रकृति नटखट तो है नहीं, जो स्वतः ऐसी विचित्रताएँ रच दे; पर जो दृष्टिगोचर होता है, उस पर अविश्वास भी तो नहीं किया जा सकता। लगने लगता है कि अभी हमें बहुत कुछ जानना शेष है। शोध की यात्रा का अंतिम पड़ाव अभी बहुत दूर है, यह यात्रा अंतहीन भी हो सकती है। इस अंतहीनता में ही छिपा है नियंता का अचिंत्य, अगम्य, अगोचर स्वरूप।

मानवी मस्तिष्क की हम चर्चा कर रहे थे। उसे ही लें। हम यही मानते रहे हैं कि मानवी मस्तिष्क का 87 प्रतिशत अविज्ञात-क्षेत्र प्रतिभा, अतींद्रिय क्षमता, विलक्षण सामर्थ्य का केंद्र है। यहीं कहीं 'डार्क एरिया' — 'सायलेंट एरिया ऑफ ब्रेन' है, जिसमें मानवी मस्तिष्क के विकास की अनंत संभावनाएँ छिपी पड़ी हैं, पर पिछले दिनों एक गणित के छात्र ने इस तथ्य को झुठला दिया। विश्वास नहीं होता, पर यह सत्य है कि मात्र पौने दो इंच की मोटाई की चपटी ग्रे मैटर की बाह्य परत वाली अल्प मात्रा के रूप में अपनी सामान्य से बड़ी खोपड़ी में मस्तिष्क को धारण करने वाले शेफील्ड यूनिवर्सिटी इंग्लैंड के इस छात्र को अत्यंत प्रतिभाशाली पाया गया। विश्वविद्यालय के चिकित्सक ने जुकाम की शिकायत लेकर आए इस किशोर के मस्तिष्क को देखते ही यह डायग्नोसिस कर ली कि इसकी खोपड़ी औसत से काफी अधिक बड़ी है एवं इसे हायड्रोसिफेलस नामक बीमारी है। विश्वविद्यालय ने प्रसिद्ध स्नायु विज्ञानी प्रो. फेसर जाॅन लोर्बर से संपर्ककर उनसे निवेदन किया कि 180 'इंटेलीजेन्सक्बोशेंट' वाले इस मेधावी छात्र की जाँच करें व बताएँ कि मस्तिष्क के स्थान पर पानी भरा होने के बावजूद यह औरों की तरह अल्पमंद क्यों नहीं है? यह एक सर्वविदित तथ्य है कि ऐसे रोगियों के मस्तिष्क के वेंट्रीकल्स में पानी भर जाने के कारण दबता-पतला होता चला जाता है, यहाँ तक कि मात्र पाँच प्रतिशत मात्रा उसकी होती है एवं ऐसे रोगी न केवल अल्पमंद-विकलांग होते हैं, चिकित्सा न की जाए तो शीघ्र ही मृत्यु को प्राप्त हो जाते हैं।

प्रो. लोर्बर ने कैट (कम्प्यूटराइज्ड एम्जियल टोमोग्राफी) स्कैनिंग तथा पैट (पाॅजीट्रान इमीशन टोमोग्राफी) स्कैनिंग जैसे अत्याधुनिक परीक्षण किए व यह निष्कर्ष पाकर दंग रह गए कि इस छात्र में मस्तिष्क नाममात्र को भी नहीं है, सब कुछ पानी-ही-पानी है। यह पानी और कुछ नहीं, सेरिब्रोस्पाइनल फ्ल्यूड (सी॰एस॰एफ॰) होता है, जो मस्तिष्क व सुषुम्ना की पोली नलियों व गह्वरों में विद्यमान होता है। सतत बनता व शिराओं द्वारा अवशोषित होता रहता है। हाइड्रोसिफेलस नामक व्याधि में यह अवशोषण प्रक्रिया बंद हो जाती है एवं द्रव्य खोखली खोपड़ी में भरता व लिबलिबे मस्तिष्कीय ग्रे मैटर को हटाता चला जाता है, जब तक कि दबाव से वह नगण्य के बराबर न रह जाए। ऐसी खोपड़ी का व्यास भी सामान्य से सवा या डेढ़ गुना अधिक होता है। इस द्रव्य को एक नली द्वारा शंट करके पेट की पेरिटोनियम नामक झिल्ली तक लाकर छोड़कर अवशोषित किए जाने की प्रक्रिया एक ऑपरेशन द्वारा पूरी की जाती है। यह समय पर कर ली जाए तो मस्तिष्कीय ग्रे मैटर को अपरिवर्तनीय हानि से बचाया जा सकता है, पर बहुसंख्या में ऐसा हो नहीं पाता।

डाॅ. लोर्बर ने इस अपवादी रोगी को पाने के बाद जिंदा रहे बड़ी खोपड़ी वाले हाइड्रोसिफेलस के सौ से भी अधिक रोगी ढूंढ निकाले हैं व सभी को सामान्य से अधिक मेधावान, प्रतिभाशाली पाया है। वे कहते हैं कि समझ में नहीं आता कि सामान्यतया प्रतिभा वाला कार्य जो मस्तिष्क के दो हेमीस्फियर (गोलार्ध) पूरा करते हैं, वह कहीं और स्वल्प मात्रा में बचे ग्रे मैटर या किसी अविज्ञात केंद्र द्वारा कैसे संपन्न होने लगता है? इसका अर्थ यह भी हो सकता है कि मस्तिष्क नहीं, कोई और ही सत्ता शरीर में है, जो प्रतिभा-मेधा-बौद्धिक विकास के लिए उत्तरदायी है। अतः स्थूल मस्तिष्क में कुरेदबीन एक व्यर्थ का ही शगल है, जिसे स्नायुविज्ञानी नहीं करें तो अच्छा। डा॰ लोर्बर के निष्कर्ष पुस्तक 'स्ट्रेंज स्टोरीज अमेजिंग फैक्ट्स' 2 आर.डी.आय. पब्लिकेशन 1988 में छपे हैं व सारे वैज्ञानिकों को चुनौती देते हैं कि बताओ — शरीर में प्रतिभा का केंद्र कहाँ है। वस्तुतः ऐसे अविज्ञात रहस्यों का कोई जवाब नहीं।

खब्बू व्यक्तियों की चर्चा प्रायः होती रहती है कि वे प्रतिभाशाली होते हैं। खब्बू अर्थात बायें हाथ से काम करने वाले लोग, जिनका दायाँ मस्तिष्क, बायें से अधिक सक्रिय है, विश्व की पूरी जनसंख्या में यह अनुपात 10 से 15 प्रतिशत का है। सामान्यतया दायें हाथ से काम करने वाले ही अधिक पाए जाते हैं एवं यह निर्धारण आनुवांशिकी के आधार पर दो वर्ष के प्रारंभ तक हो जाता है कि कौन बायें हाथ से काम करने वाला होगा, कौन दायें हाथ से? विजुअल स्किल्स (देखकर कुशलता हासिल करना) कल्पनाशीलता एवं कलाकारिता जैसी कुछ विशेषताएँ दायें मस्तिष्क के निर्धारण हैं। पाया गया है कि कलाकारों में चालीस प्रतिशत से अधिक बायें हाथ से काम करने वाले होते हैं। इनमें चित्रकार भी हैं, गायक भी, लेखक भी तथा शिल्पी भी; किंतु इन सब के मूल में एक तथ्य और रह जाता है, जो हमें अविज्ञात की ओर ले जाता है। वैज्ञानिक कहते हैं कि आनुवांशिकी के अलावा एक और कारण है, जो किसी को खब्बू बनाता है। थोड़ी-सी, पकड़ में न आने वाली मस्तिष्कीय चोट, जो गर्भगुहा से बाहर आते समय मस्तिष्क को हो जाती है, चालीस प्रतिशत बायें हाथ से काम करने वालों में मूल कारण होती है। इसके अतिरिक्त तीस प्रतिशत में कोई बड़ी चोट होती है, जो गर्भकाल में या बाहर आते समय बच्चे के मस्तिष्क को प्रभावित करती है, किंतु यह चोट काम करती है। खब्बू लोगों के दोनों मस्तिष्क गोलार्धों को जोड़ने वाला 'कार्प-कैलोजम' नामक तंतु समूह, दायें हाथ से काम करने वालों की तुलना में अधिक सशक्त होता है। संभवतः यही कारण है कि ऐसे लोग हर विधा में प्रवीण होते हैं। कौन-सा कारण किसी को खब्बू बना देता है, यह अभी भी अविज्ञात ही है?

आँसू तो सब एक जैसे ही होते हैं, यह मोटी दृष्टि से कोई भी कह सकता है। पर वैज्ञानिक शोधों ने विश्लेषण द्वारा यह पाया गया है कि किसी बाह्य कारण से जैसे प्याज के कारण निकले आँसू व करुणा भरे रुदन से निकले आँसू रासायनिक दृष्टि से भिन्न होते हैं। लेक्राइमल ग्लैंड नामक एक ही ग्रंथि, जो आँख के बायीं ओर ऊपरी पलक में स्थित होती है, वैसे दो भिन्न प्रकार के आँसू बनाती है, यह अभी तक समझा नहीं जा सका है। मिनीसोटा के सेंटपाल — रैम से मेडीकल सेंटर के बायो केमिस्ट डाॅ. विलियम एच. फ्रे ने दो स्वयंसेवक दल बनाए। एक को एक घंटे तक अंदर तक दुखी कर देने वाली करुण फिल्म दिखाई गई, दूसरे दल की आँखों के सामने ताजे कटे प्याज रखकर आँसू एकत्र किए गए। मात्रा दोनों में समान थी। आँसुओं को एकत्रकर विश्लेषण करने पर पाया गया कि भाव-संवेदनाओं से उत्पन्न आँसुओं में उत्तेजना से उत्पन्न आँसुओं की तुलना में प्रोलेक्टीन, ए॰सी॰टी॰एच॰ एवं ल्यूसीन एनसेफेलीन जैसे प्रोटीन बाउंड हारमोन्स अच्छी खासी मात्रा में पाए गए। प्रोलेक्टीन का आँसुओं में पाया जाना एक और तथ्य बताता है कि महिलाएँ पुरुषों की तुलना में संवेदनशील क्यों अधिक होती हैं? क्यों अधिक रोती हैं? डाॅ. फ्रे का कहना है कि, "प्रोलेक्टीन महिलाओं में स्तन में दुग्ध निर्माण व उत्सर्जन प्रक्रिया के लिए उत्तरदायी है। इसी कारण इसका अनुपात महिलाओं में अधिक पाया जाता है" वस्तुतः कौन दुखी है, कौन भावुक है? संवेदनशील है? यह रक्तविश्लेषण, मनोविश्लेषण से नहीं, आँसुओं के विश्लेषण से भली−भाँति पता लगाया जा सकता है: पर यह सब क्रिया कहाँ से होती है? कौन संरचना में तुरंत अंतर लाकर गिने-चुने प्रोटीन्स, हारमोन्स बढ़ा देता है? यह अभी तक समझा नहीं जा सका है।

मानवी काया की साधारण संरचना में निहित विलक्षणता का वर्णन किसी पुस्तक तक सीमित नहीं किया जा सकता। जितना भी विज्ञानवेत्ताओं द्वारा संभव है, इन गुत्थियों को सुलझाने, ज्ञानसंपदा बढ़ाने का प्रयास करते रहते हैं, पर कई व्यक्ति ऐसे अपवाद रूप में जन्म लेते हैं, जिनकी एक अद्भुतता हमें अचंभित कर देती है। कहीं कोई वैज्ञानिक समाधान हमें इनमें विद्यमान उस सामर्थ्य के मूल में छिपे कारण मिल नहीं पाता। 'चलते फिरते मानव चुंबक' इसी श्रेणी में आते हैं। जाॅपलिन-मिसूरी (यू॰एस॰ए॰) के फ्रेंक मैंकिंस्ट्री को घर से बहार जाते समय यह ध्यान रखना होता था कि कहीं भी वे रुकें नहीं। रुकते ही उनके पैर सड़क से चिपक जाते थे, मानो चुंबक लोहे से चिपक जाता है। वे प्रतीक्षा में रहते थे कि कोई व्यक्ति आए, उन्हें खींचकर सड़क से अलग करे व आगे बढ़ाए।

नारमंडी फ्रांस की 14 वर्षीय एंजेलीक काॅटिन नाम की लड़की वर्षों तक वैज्ञानिकों के लिए एक गुत्थी बनी रही। उसमें कारखाने में बैठे-बैठे दस्ताने बुनते-बुनते एक क्षमता उभर आई। वह जिन लकड़ी के करघों पर काम करती, उसका हाथ स्पर्श होते ही वे मुड़ जाते, बिस्तर पर लेटती, तो वह खड़ा हो जाता, कुर्सी पर बैठती तो वह पीछे खिसक जाती। उसकी उँगली के स्पर्श मात्र से कमरे का फर्नीचर लट्टू की तरह गोल घूमने लगता था। पेरिस की साइंस अकादमी के वैज्ञानिकों ने उसे जाँचा-परखा व विद्युत चुंबकीय क्षमता का चमत्कार मानकर आगे कुछ कह न सकें। क्रमशः दस सप्ताह बाद यह क्षमता उसकी घटते-घटते समाप्त हो गई व वह सामान्य लड़की की तरह जीवन जीने लगी।

जो हम नहीं जानते, जानने का प्रयास करते हैं, पर समझ नहीं पाते, वह क्या है? प्रकृति की इस विराट व्यवस्था में बहुत कुछ ऐसा है, जिसका कोई बुद्धिसम्मत उत्तर नहीं, कोई ऐसा समाधान नहीं, जो उस घटना या स्थिति का कारण बता सके। विचित्र-विलक्षण-अविज्ञात की यह शृंखला बहुत बड़ी है। जितना मनुष्य गुत्थियाँ हल करता है, उस विराट को, नियंता को, जिसने यह सृष्टि बनाई, मानवमात्र को बनाया — 'अणोरणीयान् महतो महीयान्' कहकर मनीषी चुप हो जाते हैं। उस विराट-अगोचर-अद्भुत सत्ता का एक अंश भी हमारे अंदर समा सके तो हम कृतकृत्य हो सकते हैं।


सदुक्ति

दूध में पानी मिलाया जाए तो घुल जाएगा, किंतु उसी से निकला हुआ मक्खन ऊपर तैरता रहेगा। आत्महीनताग्रस्त लोग मनुष्यों की भीड़ में वैसे ही बन जाते हैं, किंतु ज्ञानी पुरुष अपना व्यक्तित्व बुरों के बीच भी ऊँचा बनाए रखते हैं।


जिन खोजा तिन पाइयाँ

पृथ्वी जलाती थी पाँव और शीश झुलसा रहा था सूरज। न पेट भर अन्न और न रात काटने के लिए बिछावन। झरना मिला, उसी का जल पी लिया और कहीं से कंद-मूल, फल-फूल मिल गए, उसी से अपनी क्षुधा शांत कर ली। एक गोल पत्थर पर सिर टिकाकर किसी चट्टान पर सो लिए, दोपहर किसी वृक्ष की छाँव में बिता ली। ऐसे करते-करते सात दिन बीत गए। स्नातक धन्वंतरि गुरुकुल की सीमा छोड़कर हिमालय की मध्यवर्त्ती उपत्यिकाओं तक जा पहुँचे, किंतु कोई भी ऐसी जड़ी-बूटी न मिली, जो अपनी पीठ पर हुए व्रण की उपयुक्त औषधि हो सकती।

धन्वंतरि का शरीर थककर आधा हो गया था, पर बाहरी लगन! धन्य रे! ऐसे तप— कि ऐसी बूटी की खोज, जो किसी भी फोड़े से पीड़ित का अचूक उपचार सिद्ध हो सके, धन्वंतरि को उसके पीछे ही लगाए रखा।

धन्वंतरि भिषगाचार्य के अंतिम वर्ष में शोध कर रहे थे। औषधिशास्त्र का उन्होंने ऐसा अध्ययन किया था कि स्वयं उपकुलपति भी कई बार उनसे आवश्यक जानकारियाँ उपलब्ध किया करते थे। आयुर्वेद का ऐसा गहन अध्ययन इतिहास में शायद ही कोई और कर सका हो। एक-एक ऋचा पर उन्होंने कितना-कितना परिश्रम किया, यह तो वह स्वयं ही जानते थे, पर आयुर्वेद का निधान धन्वंतरि आज कई दिन से भ्रमण कर रहा है। एक-एक जड़ी एक-एक बूटी का प्रयोग कर डाला है उन्होंने, पर एक भी तो पत्ती ऐसी नहीं निकली, जो उनके पीठ पर हो गए फोड़े के घाव को ठीक कर देती।

रात-दिन की निरंतर खोज के उपरांत भी सफलता हाथ न लगने पर निराशा स्वाभाविक थी। युद्ध में पराजित सैनिक की भाँति हारे-थके धन्वंतरि पुनः गुरुकुल की ओर लौट पड़े। वहाँ तक पहुँचते-पहुँचते भी हजारों बूटियों का प्रयोग करके देख लिया; किंतु अंततः असफलता-ही-असफलता। धन्वंतरि को न कोई बूटी मिली और न पीठ का फोड़ा अच्छा हुआ। धन्वंतरि की मुखाकृति देखकर वीभत्सता को भी करुणा आ जाती, पर उनकी खोज की जिज्ञासा शांत न हुई।

सूखे मुख, रूखे-मुरझाए बालशिष्य की ऐसी खिन्न मुद्रा देखते ही गुरु की आँखें छलक उठीं। उन्होंने स्पष्ट ताड़ लिया कि धन्वंतरि को कोई उपयुक्त औषधि मिल नहीं पाई।

तात! बड़ा कष्ट पाया तुमने कहते हुए आचार्य प्रवर ने बड़ी करुणा, बड़े स्नेह से धन्वंतरि के उत्तरीय वस्त्र को हटाकर देखा— घाव घटा नहीं था, कुछ बढ़ ही गया था। उत्तरीय वस्त्र को वैसे ही छोड़कर आचार्य श्रेष्ठ ने कहा— वत्स! आओ मेरे साथ आओ। तुम्हारा उपचार तो यहीं मेरे पास है। यह कहकर वे आश्रम से दक्षिण दिशा की ओर चल पड़े।

थोड़ी ही दूर पर एक बूटी खड़ी थी। गुरु ने उसे तोड़ा, एक पत्थर पर रखकर पीसा और रखकर कहा कि, “वत्स! चलो, अब तुम्हारा घाव दो दिन में अच्छा हो जाएगा।”

निराश और दुखी धन्वंतरि ने निःश्वास छोड़ते हुए कहा—”गुरुदेव! बूटी विद्यालय के इतने समीप ही थी, तो मुझे व्यर्थ ही पंद्रह मील तक क्यों दौड़ाया, इतना कष्ट देकर आपने क्या पा लिया।

मौन ऋषि ने अत्यंत सकरुण नेत्रों से धन्वंतरि की ओर देखा भर बस, कहा कुछ नहीं। वह तो उनकी आत्मा थी, जिसने आप ही उत्तर दे दिया— तात! इतनी कठिन साधना नहीं करते तो यह जो हजारों औषधियों का ज्ञान प्राप्त हुआ, वह कहाँ से प्राप्त हो जाता?


इच्छाशक्ति के सुनियोजन से असंभव भी संभव

मनुष्य के द्वारा जो भी कृत्य होते हैं, उनकी पृष्ठभूमि में इच्छाशक्ति को ही कार्यरत देखा जा सकता है। चेतना की यह शक्ति असीम, अप्रत्याशित एवं विलक्षण है। इस पर यदि नियंत्रण साधा जा सके तो मनुष्य न केवल अपनी शारीरिक गतिविधियों को नियंत्रित कर सकता है, वरन व्यक्ति, पदार्थ एवं वातावरण पर भी वह अपना प्रभाव डाल सकता है और उन्हें बदलने तक में आश्चर्यजनक रूप से समर्थ हो सकता है।

फ्रांस के प्रख्यात परामनोविज्ञानवेत्ता डाॅ. पाल गोल्डीन के कथनानुसार मनुष्य के पास असीम सामर्थ्य के रूप में इच्छाशक्ति विद्यमान है, जो सभी इंद्रियों से अधिक शक्तिशाली एवं अद्भुत है। यह अकेले ही समस्त इंद्रियों एवं शक्तियों के कार्य कर सकती है। इसी प्रकार कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के मूर्धन्य वैज्ञानिक डाॅ. ह्वाटले कैरिंगटन ने अपने अनुसंधान निष्कर्ष में बताया है कि प्रत्येक व्यक्ति में इच्छाशक्ति होती है, पर प्रायः यह क्षीण एवं अस्त-व्यस्त होती है। जो लोग इसे प्रबल एवं व्यवस्थित बना लेते हैं, वह अद्भुत शक्ति-सामर्थ्ययुक्त हो जाते हैं। कुछ लोगों में यह अपने आप विकसित हो जाती है और कुछ लोग प्रयत्नपूर्वक अभ्यास से इसे विकसित करते— प्रचंड बनाते हैं। ऐसे अनेकानेक उदाहरण विद्यमान हैं, जिसमें व्यक्तियों ने अपनी प्रबल इच्छाशक्ति से जड़ वस्तुओं में हलचल पैदा करने, बादलों को हटाने, वर्षा कराने अथवा वर्षा रोकने के सफल प्रदर्शन किए हैं। अमेरिका के मनोवैज्ञानिक डाॅ राॅल्फ एलेक्जैंडर ने सन् 1951 में बादलों को इच्छाशक्ति से एकत्रकर बूंदा−बांदी करने तथा फिर हटाने में ख्याति प्राप्त की थी, इसका विवरण तो बहुत समाचार पत्रों में मिलता है, पर एक व्यक्ति इस सदी में ऐसा भी हुआ है, जिसे 'कमांडर ऑफ नेचर', 'किंग ऑफ क्लाउड कंपेलर्स' की उपाधि मिली व जिसने शर्त्त लगाकर सानडियागो कैलीफोर्निया में मूसलाधार बरसात करके दिखाई। इस व्यक्ति का नाम था 'चार्ल्स हैटफील्ड।' कहते हैं कि ग्वाटेमाला में वह तीस वर्ष तक आदिवासियों से सीखी विद्या के आधार पर झीलों को भरने, फसल बचाने के चमत्कार दिखाता रहा, पर वैज्ञानिकों को उस पर कोई विश्वास नहीं था। उसने लंदन शहर पर छाए कुहासे को हटाकर उसे सहारा रेगिस्तान पर बरसाकर हरियाली लाने का भी दावा किया, पर इसे मजाक समझकर किसी ने उसे गंभीरता से नहीं लिया।

28 दिसंबर, 1915 को वह सानडियागो के मेयर के पास पहुँचा व पेशकश रखी कि दस हजार डालर के बदले वह मोरेना डैम नामक शहर की पूर्ति करने वाले जलाशय को भर देगा। यदि वर्षा न हुई तो उसे कुछ नहीं चाहिए, यदि जलाशय भर गया, तो वे उसे वांछित राशि देंगे। 15 अरब गैलन क्षमता वाला जलाशय इच्छाशक्ति से भरा जा सकता है, यह किसी के लिए भी हँसी का विषय बन सकता था। मेयर ने हँसी-हँसी में यह सौदा कर लिया, क्योंकि पहले पूरी वर्षा होने पर भी वह जलाशय निर्माण की तिथि से अब तक कभी भी एक-तिहाई से अधिक नहीं भरा था। चूँकि तीन वर्ष से वर्षा हो भी नहीं रही थी, जल संकट था ही, ऐसी शर्त्त बदने में नुकसान क्या है? यही सोचकर मेयर महोदय ने मौखिक सौदा कर लिया।

एक जनवरी, 1916 को हैट फील्ड सालडियागो से 60 मील पूर्व स्थिति मोरेना डैम के समीप जा पहुँचा। पहले उसने बीस फीट ऊँचा एक लकड़ी का टावर बनाया, इसके ऊपर बड़ी गैल्वेनाइजिंग ट्रे रखी, जिनमें उसका विशिष्ट आर्द्रता आमंत्रक द्रव्य उसने फैला रखा था। फिर उसने अपनी गुप्त-प्रक्रिया द्वारा उस पर ध्यान केंद्रितकर उस सम्मिश्रण को, जो वनौषधि से बना था, वाष्पीकृत करना चालू किया, साथ ही कुछ मंत्र बुदबुदाना भी। यह क्रम बिना विश्राम के 5 जनवरी तक चलता रहा। उसी शाम से बादल घुमड़ आए, पहले बूंदा−बांदी हुई, क्रमशः दस जनवरी तक यह मूसलाधार बरसात में बदल गई, जो दस वर्ग मील के घेरे मात्र में थी। बीस जनवरी तक पानी इतना बरसा कि सानडियागो के नागरिक प्रार्थना करने लगे, किसी तरह पानी रुक जाए। सारा व्यापार ठप्प हो गया। सड़कों पर नदियों के रेले बहने लगे। कई मकान बह गए। कुछ दिन पानी रुका, सूर्य देवता बादलों से झाँकी देकर चले गए। काम-काज चालू हुआ ही था कि 26 जनवरी को एक बार फिर भयंकर गर्जना के साथ तूफान आया, पानी बरसने लगा एवं मोरेना डैम में 2 फीट प्रति घंटे की दर से पानी बढ़ने लगा। जब तक कि वह ऊपरी तल से 5 इंच नीचे नहीं रह गया, तब तक पानी बरसना रुका नहीं।

इसमें पचास व्यक्तियों की जान चली गई। 200 पुल बह गए। बत्तीस दिन तक न गाड़ियाँ चलीं, न रेलें। जब सब कुछ ठीक ठाक हो गया, दैनंदिन व्यापार चलने लगे तो हैटफील्ड अपनी फीस लेने पहुँचा, किंतु उल्टे उस पर आरोप लगाकर कि उसने शहर व आसपास के क्षेत्र का नुकसान किया है, हरजाना भरने तक सिटी कौंसिल द्वारा जेल में बंद कर दिया गया। लोगों के अनुरोध पर उसे छुड़ाया गया, पर उसे वह फीस नहीं मिली, क्योंकि सबने इसे मानवी इच्छाशक्ति का चमत्कार नहीं ,एक्ट ऑफ गाॅड कहकर— सृष्टा का क्रियाकलाप कहकर उसे भगा दिया। फिर भी उसे लोग भूले नहीं। 1947 में उसकी मृत्यु तक उसे उसके इस चमत्कार के कारण बराबर याद किया जाता रहा। संभवतः वह अपनी इच्छाशक्ति का प्रयोग बाढ़ की विभीषिका रोकने में नहीं कर सका, नहीं तो वह इतिहास में अमर हो जाता। अंत तक उसने अपने विशिष्ट सम्मिश्रण का फार्मूला किसी को नहीं बताया।

सन् 1964 की कुआलालंपुर मलेशिया की उस घटना से सभी अवगत है, जिसमें वहाँ की सरकार द्वारा घनघोर वर्षा को रोकने के लिए प्रसिद्ध तांत्रिक रैंबो को बुलाया गया था, ताकि राष्ट्रमंडलीय हॉकी मैच संपन्न हो सके। ध्यान एकाग्रकर रैंबो ने वर्षा के बादलों को स्टेडियम से दूर हटा दिया, जब तक कि मैच पूरा न हो गया।

लुंका में प्रवाहित होने वाली ओसर नदी में जबरदस्त बाढ़ आई हुई थी। सारा नगर कुछ ही क्षणों में जलमग्न हो जाने वाला था। इंजीनियरों के सारे प्रयास विफल हो गए थे। सभी नगर-निवास जलसमाधि की प्रतीक्षा कर रहे थे। उसी समय कुछ व्यक्तियों ने फ्रीडियन नामक प्रख्यात संत से जाकर प्रार्थना की— महात्मन्! इस दैवी आपदा से बचाव का कुछ उपाय आप ही कीजिए। कहते हैं कि महात्मा फ्रीडियन ने ओसर नदी की प्रचंड धारा को अपनी इच्छाशक्ति से दूसरी ओर मोड़ दिया और नगर को डूबने से बचा लिया।

यह सत्य है कि मानव मन शरीर के बाहर स्थित सजीव एवं निर्जीव पदार्थों पर भी व्यक्ति की क्षमतानुसार इच्छानुकूल प्रभाव डाल सकता है। मनीषियों का कहना है कि यह एक निर्विवाद तथ्य है कि इच्छाशक्ति द्वारा स्थूल जगत पर नियंत्रण संभव है।

बहुचर्चित पुस्तकें 'स्ट्रेंज हैपनिंग्स, एवं 'बिटवीन टू वर्ल्ड्स' में इच्छाशक्ति के प्रदर्शन की कई घटनाओं का वर्णन किया गया है। प्रख्यात मनोविज्ञानी फ्रायड इस तरह की शक्तियों में विश्वास नहीं करते थे, किंतु 25 मार्च 1901 की एक घटना ने इच्छाशक्ति की महत्ता को मानने के लिए उन्हें बाध्य कर दिया। हुआ यों कि उनके समकालीन प्रसिद्ध मनःचिकित्सक कार्ल जुंग उस दिन उनके घर पर उपस्थित थे। उनने अपनी मानवी एकाग्रता की क्षमता का प्रदर्शन करके फ्रायड के कमरे में रखी वस्तुओं में हलचल पैदा कर दी। वस्तुएँ इस तरह थरथराने लगीं, मानो कोई तूफान या भूकंप आ गया हो। इस दृश्य को देखकर फ्रायड आश्चर्यचकित रह गए।

मानवी कायपिंड में अनंत-असीम सामर्थ्य विद्यमान है। मनसतत्त्व की एकाग्रता द्वारा जड़ व चेतन को प्रभावित कर असंभव को भी संभव कर दिखाना संभव है, यह उपरोक्त घटनाक्रमों से प्रमाणित होता है। यदि मनुष्य इस संकल्पशक्ति को अपने अंतःकरण को जगाने, परम तत्त्व को जानने व उससे अपना संबंध जोड़ने में सुनियोजित कर सके, तो उससे बड़ा सौभाग्यशाली कोई और नहीं।


परस्पर जुड़े हुए हैं अंतःकरण एवं पर्यावरण

'मनुष्य और प्रकृति' दोनों ही शब्दों में निहित गूढ़ भाव प्रारंभ से ही मनीषियों के लिए चिंतन का विषय रहे हैं। पूर्व तथा पश्चिम दोनों ही क्षेत्रों में उस पर व्यापक शोधनात्मक चिंतन हुआ है। पूर्व विशेषतया भारत में जहाँ ये अध्येता, ऋचाओं व श्रुतियों के दृष्टा ऋषि तथा दर्शनकार मनीषी रहे हैं, वहाँ इस क्षेत्र में पश्चिम में प्लेटो, एपीक्यूरस हेगल, ब्रॅडले, बर्गसाॅ, लाइ बिलित्ज, बोंसाके स्पेंसर जैसे चिंतकों का विश्वविख्यात समूह रहा है।

वर्त्तमान समय में इस शोध की एक अन्य धारा निःसृत हुई है, जिसे वैज्ञानिक चिंतन की धारा कहा जा सकता है। गंभीरता से अवलोकन करने पर स्पष्ट होता है कि इसके अध्ययन का विषय भी मनुष्य और प्रकृति ही है। विज्ञानविदों ने अपनी शोध को मानवी काया तथा इसकी विभिन्न आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु प्रकृति के विभिन्न घटकों पर केंद्रित किया है।

इस त्रिविध शोधात्मक स्वरूपों का तुलनात्मक विवेचन करने पर उद्घाटित तथ्य प्रकट करता है कि प्राच्य ऋषियों के अध्ययन में मनुष्य की परा-प्रकृति (जीवसत्ता) एवं अपरा-प्रकृति के सूक्ष्म एवं स्थूल संबंधों पर व्यापक चिंतन करके, प्रकृति के विकासक्रम को पूर्ण करके इससे उर्ध्व स्तरों पर आरोहण का निर्देश दिया गया है। पश्चिम का दार्शनिक चिंतन उर्ध्व स्तरों की चर्चा न कर मात्र मानव तथा प्रकृति के संबंधों को सूक्ष्म व स्थूल स्तर पर लेता है, जबकि आधुनिक वैज्ञानिक चिंतन में इन संबंधों का दायरा केवल स्थूल स्तर तक ही सिमट जाता है।

अध्ययन के इस क्रम में प्राप्त लक्ष्यों पर विचार करने पर स्पष्ट होता है कि प्राच्य ऋषियों का उद्देश्य बाह्य प्रकृति से अंतःप्रकृति में प्रवेशकर तथा उसे पारकर आनंद पाना था। पश्चिमी दार्शनिकों में से अधिकांश का लक्ष्य बाह्य प्रकृति के साथ अंतःप्रकृति का संबंध स्थापितकर अंतरण में रमणकर सुख की प्राप्ति था। जबकि आज वैज्ञानिक चिंतन में यह लक्ष्य बाह्य प्रकृति से अधिकाधिक उपलब्धकर मात्र उसका उपयोग करना रह गया है।

भोग की इसी प्रवृत्ति ने शोषण का क्रम प्रारंभ किया। इस क्रम के अनुसार प्रकृति के प्रत्येक घटक को जिस किसी तरह निचोड़ लेना ही एकमात्र उद्देश्य रह गया है। विज्ञानविद् जो अन्य प्राणियों का अध्ययन करते समय सहजीवन प्रणाली की सराहना करते हैं, स्वयं परजीवी बनने की प्रेरणा देने लगे हैं। इसमें दोषी कोई व्यक्ति अथवा समाज का अंग विशेष नहीं है, अपितु चिंतन की अपूर्णता तथा मानव व प्रकृति के मध्य पारस्परिक संबंधों को न समझ पाने की विवशता है।

निर्वनीकरण, औद्योगीकरण, भू-गर्भ के साधनों का उत्खनन, भू-क्षरण, जनजीवन में अस्त-व्यस्तता, आधुनिकता की दौड़ ने जहाँ अचिंत्य चिंतन को बढ़ावा दिया है, वहाँ मनुष्य को प्रकृति से पृथक्कर एक व्यापक असंतुलन भी पैदा कर दिया है। इससे प्रदूषणजन्य शारीरिक रोगों में तो बढ़ोतरी हुई ही है, अप्रत्यक्ष रूप से मनोविकारग्रस्त रोगियों की संख्या में करोड़ों की संख्या में अभिवृद्धि हुई है। 'द स्ट्रक्चर ऑफ साइंटिफिक रेवाॅल्युशन' एवं 'सायकिएट्री एंड इट्स क्रिटीक्स' जैसे शोधग्रंथों के विद्वान लेखक एम॰ रुथने बढ़ती हुई मनोरोगों की दर के लिए पर्यावरण की गड़बड़ियों को जिम्मेदार माना है। इन अध्येताओं के साथ कैम्ब्रीज विश्वविद्यालय के मनःशास्त्री डाॅ इग्लेवी की भी यह मान्यता है कि पर्यावरण के साथ मनुष्य का प्रगाढ़ भावनात्मक संबंध है। दोनों ही एकदूसरे से सूक्ष्म रूप से जुड़े हुए हैं।

पर्यावरण में विघटन का तात्पर्य है— अंतःकरण में विघटन। इस विघटन को मनोविद् फ्रस्ट्रेशन का नाम देते हैं। 'इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन' के प्रवक्ता मनोविद् डाॅ. बी.आर. शर्मा उपरोक्त तथ्य का स्पष्टतया समर्थन करते हुए अपनी कृति 'फ्रस्ट्रेशन-रिएक्शन्स ऑफ गवर्नमेंट एक्जीक्यूटीव्स' में कहते हैं कि, "फ्रस्ट्रेशन अर्थात आशाभग्नता का स्पष्ट कारण पर्यावरण संबंधी विकृति है।" इसको और अधिक सुस्पष्ट करते हुए येले विश्वविद्यालय के प्राध्यापक जे. डौलार्ड, एल. डब्ल्यू. डोस, एन.ई. मिलर एवं ओग्मोरर ने अपने संयुक्त अध्ययन 'फ्रस्ट्रेशन एंड एक्शन' में कहा है कि, "यह भग्नता व्यक्ति को आक्रामक बनाती है। यह आक्रमकता ही हिंसा में वृद्धि करती है।"

मनोवैज्ञानिक इस तथ्य पर अपने मंतव्य को स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि पर्यावरण के विघटन के कारण हुआ अंतःकरण का विघटन अपनी अभिव्यक्ति द्विविध रूपों में कर सकता है। प्रथम तो यह कि अंतःकरण के विघटन का ज्वालामुखी, व्यक्ति के अंतःकरण को नष्ट करने के साथ बाहर उभरकर दूसरों को चपेट में ले ले। हिंसा आदि की अधिकांश घटनाएँ प्रायः उपरोक्त कारण की उपज होती हैं। द्वितीय यह कि इस विघटन में व्यक्ति अंदर-ही-अंदर घुटता हुआ अपने को नष्ट करता रहे। व्यवहार विज्ञानियों का मानना है कि ऐसा व्यक्ति हिंसा भले न करे, किंतु वह पारिवारिक व सामाजिक स्तर पर टूटने के साथ स्वयं अपने से भी टूट जाता है। इन दोनों में कौन प्रकार— किस व्यक्ति में कैसे व कब घटित होगा? वह व्यक्ति की अंतःकरण की संरचना तथा निकटस्थ पर्यावरण के विघटन की स्थिति पर निर्भर करता है।

विघटन की इस स्थिति को डाॅ. इशप्रोग्राफ तथा अन्य मनःशास्त्रियों ने एक नाम और दिया है 'डिसईंटेग्रेशन ऑफ पर्सनालिटी' अर्थात व्यक्तित्व का विघटन। डाॅ. हाइसेनवर्ग ने 'इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ वर्ल्ड कल्चर' से प्रकाशित अपनी कृति 'साइकोलॉजिकल इन सिक्यूरिटी इन माडर्न मैन' में इस स्थिति की गंभीरता स्पष्ट करते हुए कहा है कि, "यह विघटन ही मनुष्य के मानवी समाज में व्याप्त अनिश्चितता एवं अनास्था के माहौल का कारण है।"

इन मनोवैज्ञानिकों ने बताया है कि संक्रामक रोग की तरह जनमानस में फैल रहा विघटन फ्रायड द्वारा बताई गई कामुक वासनाओं के दमन के कारण नहीं, अपितु पर्यावरण तथा अंतःकरण के संबंधों को विस्मृत करने तथा पर्यावरण में विघटन उत्पन्न करने के ही कारण है। इस विघटन के कारण में मनोविद् मनुष्य की संकीर्ण स्वार्थपरता की भावना को मुख्य मानते हैं। इस तरह की समाजगत, समूह स्तर पर पाई जाने वाली भावना को डब्ल्यू. एलन. वाट्स साइको थैरेपी ईस्ट एंड वेस्ट में मोशियोसेस्ट्रिक अर्थात मनुष्य समाज का अपने ही दायरे में संकुचन नाम देते हैं।

इस स्थिति पर गंभीरता से विचार करते हुए मनीषी चिंतक पाॅल टिलिच कहते हैं कि, "वर्त्तमान समय में मनुष्य जीवन के मूल्यों को भुला बैठा है। उसने उथलेपन के चक्कर में गहराई के आयाम को गँवा दिया है। आज मनुष्य, चिंतन के इस एकांगीपन के कारण ही संव्याप्त रिक्तता को उथले साइंटिज्म के द्वारा भरने का प्रयास कर रहा है; किंतु यह प्रयास पूर्णता के स्थान पर रिक्तता को ही बढ़ाते जा रहे हैं। इस रिक्तता में तनाव, विघटन, अनिश्चितता— जिन्हें मनोविज्ञान की भाषा में 'एन्क्जायटी कांप्लेक्स' भी कह सकते हैं, डेरा जमाए है। किसी स्थिति में ये निकलने का नाम नहीं लेते।"

इटेलियन मनोअध्येता फ्रांको वासाग्लिया अपनी कृति 'द इंस्टीयूजीएने नेगेटा' में स्पष्ट करते हैं कि वर्त्तमान में मनोरोगों की नैदानिक पद्धति तब तक असफल व व्यर्थ सिद्ध होगी, जब तक 'प्रज्ञा अपराध' नाम से जानी जाने वाली इस व्याधि के मूल कारण का निवारण नहीं किया जाता। आयुर्वेद का ऋषि कहता है— निवारण व उपचार एक ही है, पर्यावरण व अंतःकरण के संबंधों की पुनर्स्थापना।

इसके बिना प्रगति के सभी द्वार अवरुद्ध ही पड़े रहेंगे। डीप इकॉलाजी का प्रतिपादन करने वाले कहते हैं कि समय आ गया है कि अब व्यक्ति के चिंतन को मोड़कर समाज के हित-साधन की दिशा में चलने के लिए बाधित किया जाए। समाज का हित पर्यावरण की रक्षा में है एवं पर्यावरण स्वस्थ है तो व्यक्ति भी स्वस्थ रहेगा। मानव जाति को भटकने से, महाविनाश से बचाना है तो यही एकमात्र उपचार अब बचा है।


कौन है इस अनुशासित सृष्टि का नियंता?

यह समूचा विश्व-ब्रह्मांड, उसके सारे घटक इतने सुनियोजित ढंग से अपना कार्य कर रहे हैं, जिसे देखकर किसी-न-किसी नियामक सत्ता की कल्पना करनी ही पड़ती है। इसके बिना ब्रह्मांड की व्याख्या और उसकी निरंतरता की विवेचना पूर्णरूप से नहीं की जा सकती। इसे मात्र संयोग भी नहीं कहा जा सकता कि इस अनंत ब्रह्मांड के असंख्य सौरमंडल, उनके समस्त ग्रह-नक्षत्र अपना-अपना अलग अस्तित्व बनाए हुए, अपनी कक्षाओं पर भ्रमण करते हुए अपना निर्धारित क्रियाकलाप चला रहे हैं। इनका कोई उद्देश्य नहीं— परस्पर कोई संबंध नहीं, ऐसा मानना अविवेकपूर्ण होगा।

सूक्ष्म पर्यवेक्षण करने पर हर कोई यह समझने में समर्थ हो सकता है कि यह सारे ग्रह-नक्षत्र एक ही सत्तासूत्र में— धागों में मनकों की तरह पिरोए हुए हैं और ग्रह-नक्षत्र की यह माला एक ही दिशा में— एक ही नियंत्रण में गतिशील हो रही है। इतना ही नहीं, उनका परस्पर भी अति घनिष्ट संबंध है। एक ही परिवार के सदस्य जैसे मिल-जुलकर कुटुंब का एक ढाँचा बनाए रहे हैं, उसी प्रकार समस्त ग्रह-नक्षत्र— सृष्टि के समस्त घटक एकदूसरे के पूरक बने हुए हैं और परस्पर बहुत कुछ लेने-देने का क्रम चलाते हुए ब्रह्मांड की वर्त्तमान स्थिति बनाए हुए हैं। यह सब एक विश्वव्यापी प्रेरक और नियामक सत्ता द्वारा ही संभव है।

वस्तुतः इस संसार में 'अकेला' नाम का कोई पदार्थ नहीं। यहाँ सब कुछ सुगठित और सुसंबद्ध है। पदार्थ की सबसे छोटी इकाई परमाणु भी अपने गर्भ में कितने ही घटक संजोए हुए एक छोटे सौरमंडल परिवार की तरह प्रगतिशील रह रहा है। इलेक्ट्रॉन, प्रोट्रॉन आदि घटकों की परतें खुलती जा रही हैं और पता लग रहा है कि उनके गर्भ में भी और कितने ही समूह वर्ग विराजमान हैं। यह सभी निरंतर गतिशील रहते हुए किसी उद्देश्य की पूर्ति की दिशा में व्यवस्थित क्रम से क्रियारत हैं, इन्हीं सब बातों को देखते हुए सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक कार्ल सांगा ने अपनी कृति में लिखा है कि, "संसार का हर परमाणु एक निर्धारित नियम व्यवस्थानुसार कार्य करता है। यदि इसमें तनिक भी व्यतिक्रम और अनुशासनहीनता दृष्टिगोचर होती तो विराट ब्रह्मांड एक क्षण भी अपने वर्त्तमान अस्तित्व को नहीं रख पाता तथा क्षणमात्र में विस्फोट से इस प्रकृति में आग लग जाती और यह संसार अग्नि की लपटों में घिरा एक तप्त पिंड भर होता; परंतु देखने में ऐसा नहीं आता। अतः यह किसी चेतन समष्टि सत्ता का अस्तित्व में होना प्रमाणित करता है।

सृष्टि-चक्र में सर्वत्र अन्योन्याश्रय का सिद्धांत काम कर रहा है। जड़-चेतन से विनिर्मित यह संपूर्ण विश्व-ब्रह्मांड एकता के सुदृढ़ बंधनों में बँधा हुआ है। एक से दूसरे का पोषण होता है और हर किसी को दूसरों का सहयोगी होकर रहना पड़ रहा है। यह पारस्परिक बंधन की सृष्टि के शोभा, सौंदर्य का, उसकी विभिन्न हलचलों का, उत्पादन-विकास एवं परिवर्तन का उद्गम केंद्र है। इनके मूल में अदृश्य, किंतु सर्वशक्तिमान सत्ता ही कार्यरत है। प्रख्यात विचारक मनीषी रुडाल्फ ओटो को सुदूर आकाश में जाज्वल्यमान ग्रह-नक्षत्रों, सुसज्जित तारों को देखकर यही अनुभूति हुई थी कि जिस क्रमबद्धता, सुगढ़ता और अनुशासन से ये सब ग्रह-नक्षत्र गतिमान हैं, निश्चय ही इसके पीछे किसी विशिष्ट प्रेरक शक्ति का हाथ है। उनके अनुसार विश्व-ब्रह्मांड के सभी घटकों में विद्यमान नियमितता, अनुशासनात्मक गतिशीलता और पारस्परिक आदान-प्रदान को देखकर यह सहज ही विश्वास होता है कि कोई दिव्य और महान चेतना अवश्य है, अन्यथा इतनी सुंदर सृष्टि की महान कल्पना भला कौन कर सकता?

रुडाल्फ का कहना है कि जब प्रकृति की अनुपम छटा का अवलोकन करते हैं तो सृजनकर्त्ता के इस कृत्य में निश्चित ही एक सृजनात्मक लक्ष्य परिलक्षित होता है। नियमितता, सहकारिता, विकासशीलता की— सत्यम्, शिवम्, सुंदरम् की ही झाँकी जड़-चेतन में सर्वत्र दिखाई पड़ती है। समस्त प्रकृति उस परम सत्ता का अभिव्यक्तिकरण है, जो सुंदरता और मनोहारी दृश्यों से ओत-प्रोत है। सौंदर्यबोध से उसकी अनुभूति होती है। मनुष्य को विलक्षण एवं अलौकिक शक्तियों से भरपूर मस्तिष्क इसीलिए प्रकृतिप्रदत्त अनुदान रूप में मिला है कि उसके माध्यम से वह उस कलाकार की सुंदर रचना की अनुभूति कर सके और उसका सदुपयोगकर सुखी-समुन्नत बन सके।

प्रख्यात वैज्ञानिक मनीषी फ्रांसिज मेसन ने अपनी पुस्तक में लिखा है कि प्रकृति एक ईश्वरीय विधान है— एक व्यवस्था है। यह कोई अनगढ़ या बेतुकी उपज नहीं, वरन योजनाबद्ध ढंग से विनिर्मित एक कृति है, एक दिशा है, जिसके अंतराल में एक महान और उच्चस्तरीय बुद्धिमत्ता सन्निहित है। यह न तो दैवयोग की सृष्टि है और न ही यांत्रिकी संयोग है, वरन इस विश्व-ब्रह्मांड में एक ऐसी परम सत्ता काम कर रही है, जिसे स्पिरिट या विश्वात्मा कहा जा सकता है। उसकी महानता, दिव्यता, सर्वसमर्थता एवं सौंदर्य का बोध कराने के लिए ही ग्रह-नक्षत्रों सहित समस्त जड़-चेतन की उत्पत्ति हुई है। यह सब उसी महासत्ता के घटक हैं।

सभी ग्रहगोलक अपनी-अपनी कक्षा में निर्बाध रूप से गतिमान हैं। एक पर्यवेक्षक की तरह यदि पूरे ब्रह्मांड के ग्रहपिंडों की अपनी गतियों, उनके सतह की परिस्थितियों और उनके पारस्परिक संबंधों का सूक्ष्मता से अध्ययन करें, तो हमें ज्ञात होगा कि इनकी व्यक्तिगत विशिष्टताएँ सोद्देश्य हैं। उदाहरण के लिए सूर्य को ही लें, तो यह हमारी धरती से 13 लाख 90 हजार किलोमीटर दूर स्थित है। इसका व्यास 8 लाख 80 हजार मील तथा भार पृथ्वी से 3 लाख 33 हजार गुना अधिक है। जितने भी ग्रह सौरमंडल में विद्यमान हैं, सूर्य का भार उनसे ठीक एक हजार गुना अधिक है। सूर्य आग का जलता हुआ एक गोला है, जिसका बाह्य तापमान करीब 6000 डिग्री सेंटीग्रेट तथा भीतरी लगभग 15 करोड़ डिग्री सेंटीग्रेट है, इसके एक वर्ग इंच क्षेत्र में 60 अश्वशक्ति के बराबर ऊर्जा है। यदि उसके संपूर्ण क्षेत्र की प्रचंड ऊर्जा एक साथ पृथ्वी पर फेंक दी जाती तो यह धरती भी एक धधकता सूर्यपिंड बन जाती, पर ऐसा नहीं होता। सूर्य की ताप-ऊर्जा का जो अनुदान पृथ्वी को मिलता है, उसकी वितरण प्रणाली में भी एक प्रकार का बुद्धिमत्तापूर्ण नियंत्रण दिखाई देता है। एक सुनिश्चित दूरी पर अवस्थित सूर्य की सतह पर जो तापमान है, उसका 220 करोड़वाँ भाग मात्र ही पृथ्वी को मिल पाता है। इस संतुलित प्रकाश-ऊर्जा को पृथ्वी तक पहुँचने में केवल आठ मिनट लगते हैं। इसी से मनुष्य सहित समस्त प्राणि-समुदाय एवं विशाल वनस्पति जगत की संपूर्ण आवश्यकताएँ तथा ऋतु-संचालन की सारी क्रियाएँ संपन्न होती रहती हैं। यदि सूर्य की इस दूरी में तनिक भी न्यूनाधिकता होती तो यहाँ जीवन धारण योग्य वातावरण नहीं रह पाता। निकटता में गरमी बढ़ती और दूरी से शीतलता आती। दोनों ही स्थितियों में जीवन असंभव होता।

इस बात को अब वैज्ञानिक भी स्वीकारने लगे हैं कि यदि सूर्य का प्रकाश दो प्रतिशत भी न्यून हो जाए तो पृथ्वी पर जाड़े की ऋतु के स्थान पर सदा के लिए शीतयुग हो जाएगा। यदि उसकी गरमी केवल 13 प्रतिशत घट जाए तो संपूर्ण धरती एक मील मोटी बरफ की चादर से ढँक जाएगी। इसी तरह यदि सूर्य का तापमान 30 प्रतिशत अधिक हो जाए तो उत्पन्न गरमी के तपन से यहाँ एक भी प्राणी का नामोनिशान देखने को नहीं मिलेगा। सभी विनष्ट हो जाएँगे, पर पृथ्वी इस संदर्भ में अन्य ग्रह-नक्षत्रों से कहीं अधिक सौभाग्यशाली है। वैज्ञानिकों का कहना है कि सूर्य से इसकी दूरी तथा कक्षा में स्थिति इतनी सुनियोजित एवं व्यवस्थित ढंग की हुई है कि उससे प्राणियों का जन्म, ऋतु अनुकूलता एवं शोभा-सुषमा का सृजन संभव हो सका। यह स्थिति अन्य ग्रहों की नहीं है। उनका तापमान या तो इतना अधिक या इतना कम है कि उनमें जीवन-विकास हो ही नहीं सकता। संभवतः यही कारण है कि अन्यान्य ग्रहों पर अभी तक जीवन को खोजा नहीं जा सका है।

फ्रांसिज मेशन के अनुसार अपने सौरमंडल में जो अगणित ग्रहपिंड सम्मिलित हैं, उनका संचालन और व्यवस्थापन निश्चित ही किसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए हो रहा है। जिस प्रकार बैठने के एक कक्ष में सजावट, सुव्यवस्था, सुंदरता के दर्शन होते हैं, सभी वस्तुएँ उचित स्थान पर रखी जाती है, उसी प्रकार इस ब्रह्मांड में सृष्टिकर्त्ता ने अनेकानेक ग्रह-नक्षत्रों, नदी-पहाड़ों, झरनों, वृक्ष-वनस्पतियों, प्राणियों को एक व्यवस्थित क्रम से संजोकर रखा है। इस सुव्यवस्था और सुंदरता के पीछे अवश्य ही कोई महान लक्ष्य सन्निहित है। मनुष्य अपनी अल्पज्ञता के कारण स्रष्टा के उस सर्वोच्च उद्देश्य को नहीं समझ पाता और उसकी सृष्टि-व्यवस्था को बेतुका मानता और व्यतिरेक उत्पन्न करता रहता है। जिस आश्रयस्थल पर निवास करता है, उस पृथ्वी के बारे में ही उसे बहुत कम जानकारी है। जबकि इसका वातावरण और परिस्थितियाँ इतने विवेकपूर्ण ढंग से विनिर्मित हैं कि यदि उनसे छेड़खानी न की जाए तो इसके चारों ओर गैसों के जो अनेक सुरक्षाकवच बने हुए हैं और अनावश्यक हानिकारक ब्रह्मांडीय विकिरणों से हमारी रक्षा करते हैं, वे अनंतकाल तक वैसे ही बने रह सकते हैं। पृथ्वी की दैनिक और वार्षिक गतियाँ भी इसी तरह निर्धारित हैं कि जीवन-धारण के लिए वे तनिक भी अन्यथा नहीं पड़तीं। ऐसे ही अन्य सभी ग्रह-नक्षत्र भी हैं, जो अपनी-अपनी कक्षा में निर्बाध रूप से गतिमान हैं। उनसे अब तक किसी तरह का व्यतिरेक नहीं आया।

इस प्रकार इन सभी तथ्यों पर गंभीरतापूर्वक विचार करें तो इन्हें सहज संयोग कहकर नहीं टाला जा सकता। इनके पीछे सुव्यवस्था, सुसंतुलन, सुनियोजन, सुनियंत्रण का जो अद्भुत सामंजस्य दिखाई पड़ता है, वह निश्चय ही किसी अदृश्य नियंता के बिना शक्य नहीं। संभव है ब्रह्मांड की इन्हीं सब विशिष्टताओं को देखते हुए प्रसिद्ध वैज्ञानिक मनीषी सर जेम्स जीन्स के यह उद्गार निकल पड़े हों कि, “यह विश्व-ब्रह्मांड किसी तीर-तुक्के की परिणति नहीं, वरन सुनियोजित ढंग से विनिर्मित किसी बुद्धिमत्तापूर्ण सत्ता की सुंदरतम अभिव्यक्ति है।” दार्शनिक स्पिनोज भी अपना मत प्रकट करते हुए यही कहते हैं कि, “यह ब्रह्मांड ईश्वर के ही विचारों का मूर्तरूप है।” महान वैज्ञानिक पास्कल का कहना था कि “दृश्य पदार्थों में अदृश्य रूप से काम करने वाली एक ही सत्ता है, वही इस विराट विश्व का संचालन करती है।” प्रख्यात भौतिकविद् फ्रांसिस थामसन ने सृष्टि संरचना पर अपने उद्गार व्यक्त करते हुए लिखा है कि “संसार की समस्त वस्तुएँ एक अखंड सत्ता से जुड़ी हैं। चाहे वे बड़ी हों या छोटी, उनका परस्पर संबंध इतना प्रगाढ़ व सुनियोजित है कि सभी को आश्चर्य होता है। उसी अचिंत्य-अगम्य सत्ता के इशारे पर सृष्टि के सारे क्रियाकलाप संचालित होते हैं।”

सर फ्रांसिस का यह कथन वस्तुतः उस आप्तवचन की ही याद दिलाता है, जिसमें कहा गया है कि ईश्वर की सृष्टि के कण-कण में व्याप्त है। उसी ने समस्त जगत को आच्छादित कर रखा है। अतः यह न तो कुछ अनगढ़ है और न बेतुका, वरन सब कुछ योजनाबद्ध ढंग से एक अनुशासित सत्ता द्वारा संचालित हो रहा है। उसी के अनुशासन को जीवन में उतारकर व्यक्ति सही अर्थों में आस्तिक बन सकता है। भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को, श्रीराम ने कौशल्या व काकभुशुंडी को जो विराट रूप दिखाया था, वह यही परब्रह्म का, नियामक सत्ता का रूप है। इसकी उपस्थिति सृष्टि के कण-कण, अपने रोम-रोम में मानते हुए जो अपनी क्रियापद्धति का, जीवनचर्या का सुनियोजन करता है, वही सही अर्थों में ईश्वर का श्रेष्ठ पुत्र— 'युवराज मानव' कहलाने का अधिकारी है।


प्रकृति नारायण जैसी (कहानी)

एक साधक ने अपना जीवन आदर्श के ढाँचे में ढाला। पवित्रता और प्रखरता बढ़ने से वह नर नारायण समझा जाने लगा। उसकी आकृति मात्र नर की थी, पर अंतराल में विद्यमान प्रकृति नारायण जैसी थी।

कोई भी व्यक्ति नर से नारायण बन सकता है।


जीवन-साधना के कुछ निश्चित सूत्र

उपासना-पक्ष के चार चरणों की चर्चा पिछले अंक में की जा चुकी है— (1) प्रातःकाल आँख खुलते ही नया जन्म,  (2) रात्रि को सोते समय नित्यमरण, (3) नित्यकर्म से निवृत्त होने के बाद जप-ध्यान वाला भजन, (4) मध्याह्न के मनन के क्रम में अपनी स्थिति का विवेचन और उदात्तीकरण। कुछ दिन के अभ्यास से इन चारों को दिनचर्या का अविच्छिन्न अंग बना लेना सरल संभव हो जाता है।

इष्टदेव के साथ अनन्य आत्मीयता स्थापित कर लेना, उसके ढाँचे में ढलने का प्रयत्न करना, यही सच्ची भगवद् भक्ति है। द्वैत को अद्वैत में बदलना इसी आधार पर बन पड़ता है। सत्प्रवृत्तियों के समुच्चय— परमात्मा के साथ लिपटने की वास्तविकता को इसी आधार पर परखा जा सकता है। जीवनक्रम में शालीनता, सद्भाव, उदारता, सेवा, संवेदना जैसी उमंगे अंतराल में उठती हैं या नहीं? आग के संपर्क में आकर ईंधन भी अग्नि बन जाता है। ईश्वरभक्त में अपने इष्टदेव की अनुरूपता उभरनी चाहिए। इस कसौटी पर हर किसी की भक्ति-भावना में कितनी यथार्थता है, इसकी जाँच-परख की जा सकती है। भगवान का अनुग्रह भी इस आधार पर जाँचा जाता है। जहाँ सूर्य की किरणें पड़ेंगी, वहाँ गरमी और रोशनी अवश्य दृष्टिगोचर होगी। ईश्वर का सान्निध्य निश्चित रूप से भक्तजनों में प्रामाणिकता और प्रखरता की विभूतियाँ अवतरित करता है। इस आधार पर उसका चिंतन, चरित्र और व्यवहार, उत्कृष्ट आदर्शवादिता की हर कसौटी पर खरा उतरता चला जाता है। सच्ची और झूठी भक्ति की परीक्षा हाथों-हाथ होती चलती है। यह प्रतीत होता रहता है कि समर्थ सत्ता का अनुग्रह हाथों-हाथ प्राप्त होने की मान्यता पर उपासना खरी उतरी या नहीं।

आत्मोत्कर्ष का दूसरा अवलंबन है— साधना। साधना अर्थात अस्त-व्यस्तता को सुव्यवस्था में बदलना। इसके लिए दो प्रयास निरंतर जारी रखने पड़ते हैं। एक अभ्यस्त दुष्प्रवृत्तियों को बारीकी से देखना, समझना और उन्हें उखाड़ने के लिए अनवरत प्रयत्नशील-संघर्षशील रहना। दूसरा कार्य है— जिन मानवी गरिमा के अनुरूप सत्प्रवृत्तियों की अभी कमी मालूम पड़ती है, उनकी आवश्यकता उपयोगिता को समझते हुए, उसके लिए आकुलता स्तर का मानस बनना। यह उभयपक्षीय क्रम जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में व्यवहृत होते चले तो समझना चाहिए कि जीवन-साधना साधने का सरंजाम जुटा।

माना कि कार्य समयसाध्य और श्रमसाध्य है, फिर भी वह असंभव नहीं है। कछुआ धीमी चाल से चलकर भी बाजी जीत गया था। असफल तो वे खरगोश होते हैं, जो क्षणिक उत्साह दिखाने के उपरांत मन बदल लेते और इधर-उधर भटकते हैं। तत्परता और तन्मयता हर प्रसंग में सफलता का श्रेष्ठ माध्यम बनती है। जीवन-साधना के लिए भी किया गया प्रयत्न सफल होकर ही रहता है।

किसान अपने खेत में से खरपतवार उखाड़ता रहता है, कंकड़-पत्थर बीनता रहता है, इसे परिशोधन कहा जा सकता है। जानवरों, पक्षियों से खेत की रखवाली करना भी इसी स्तर का कार्य है।

खेत में खाद-पानी लगाना पड़ता है। यह परिपोषण पक्ष है। निराई-गुड़ाई का एक उद्देश्य यह भी है, जमीन पोली बनी रहे। जड़ों में धूप-हवा की पहुँच बनी रहे। फसल को उगाने का यही तरीका है। जीवन को सुविकसित करना भी एक प्रकार का कृषि कार्य है। इसके लिए भी इसी नीति को अपनाना होता है।

शरीरयंत्र में मल, मूत्र, पसीना, कफ आदि के द्वारा सफाई होती है। स्नान का उद्देश्य भी यही है। सफाई से संबंधित अनेक उपक्रम भी इसीलिए चलते हैं कि विषाणुओं का आक्रमण न होने पाए। सरदी-गरमी से बचने के लिए अनेक प्रयत्न भी इसी उद्देश्य से किए जाते हैं कि हानि पहुँचाने वाले तत्त्वों से निपटा जाता रहे। जीवन भी एक शरीर है। उसे गिराने के लिए पग-पग पर अनेकानेक संकट, प्रलोभन, दबाव उपस्थित होते रहते हैं। उनसे निबटने के लिए सतर्कता न बरती जाए तो बात कैसे बने। चोर, उचक्कों, ठगों, उद्दंडों की उपेक्षा न होती रहे, तो वे असाधारण क्षति पहुँचाए बिना न रहेंगे।

दुष्प्रवृत्तियाँ जन्म-जन्मांतरों से संचित पशु-प्रवृत्तियों के रूप में स्वभाव के साथ गुँथी रहती हैं। फिर निकटवर्त्ती लोग जिस राह पर चलते और जिस स्तर की गतिविधियाँ अपनाते हैं, वे भी प्रभावित करती हैं और अपने साथ चलने के लिए ललचाती हैं। जो कुछ बहुत जनों द्वारा किया जाता दीखता है, अनुकरण प्रिय स्वभाव भी उसकी नकल बनाने लगता है। इतना विवेक तो किन्हीं विरलों में ही पाया जाता है कि वे उचित-अनुचित का विचार करें, दूरवर्त्ती परिणामों का अनुमान लगावें और सन्मार्ग पर चलने के लिए बिना साथियों की प्रतीक्षा किए एकाकी चल पड़ने का साहस जुटाएँ। आमतौर से लोग प्रचलित ढर्रे पर चलते देखे गए हैं। पत्ते और धूलिकण हवा के रुख के साथ उड़ने लगते हैं। दिशाबोध उन्हें कहाँ होता है। यही स्थिति लोक-मानस के संबंध में भी कही जा सकती है। नीर-क्षीर की विवेक-बुद्धि तो कम दीख पड़ने वाले राजहंसों में ही होती है। अन्य पक्षी तो ऐसे ही कूड़ा-कचरा और कीड़े-मकोड़े खाते देखे गए हैं।

किसी वस्तु का प्राप्त कर लेना एक बात है और उसका सदुपयोग बन पड़ना सर्वथा दूसरी। स्वास्थ्य सभी को मिला है, पर उसे बनाए रखने में समर्थ विरले ही होते हैं। अधिकांश तो असंयम अपनाते और उसे बरबाद ही करते हैं। बुद्धि का सदुपयोग कठिन है, चतुर कहे जाने वाले लोग भी उसे कहाँ कर पाते हैं? धन कमाते तो सभी हैं, पर उसका आधा-चौथाई भाग भी सदुपयोग में नहीं लगता। उसे जिन कामों में जिस तरह खरचा जाता है, उससे खरचने वालों की, उनके संपर्क में आने वालों की तथा सर्वसाधारण की बरबादी ही होती है। प्रभाव का उपयोग प्रायः गिराने, दबाने, भटकाने में ही होता रहता है। इसे समझदार कहे जाने वाले मनुष्य की नासमझी ही कही जाएगी। यह व्याधि सर्वसाधारण को बुरी तरह ग्रसित किए हुए हैं। इसी को कहते हैं राजमार्ग छोड़कर मृगतृष्णा में, भूल-भुलैयों में भटकना। जीवन-संपदा के संबंध में भी यही बात है। जन्म से मरणपर्यंत पेट, प्रजनन जैसी सामयिक बातों में ही आयुष्य बीत जाता है। आवारागरदी में दिन कट जाता है।

हर व्यक्ति की मनःस्थिति एवं परिस्थिति अलग होती है। यही बात दुर्गुणों और सद्गुणों की न्यूनाधिकता के संबंध में भी है। किसे अपने में क्या सुधार करना चाहिए और किन नई सत्प्रवृत्तियों का संवर्द्धन गुण-कर्म-स्वभाव के क्षेत्र में करना है। यह आत्मसमीक्षा के आधार पर सही विश्लेषण होने के उपरांत ही संभव है। इसके लिए कोई एक निर्धारण नहीं हो सकता है। यह कार्य हर किसी को स्वयं करना होता है। दूसरों का तो थोड़ा बहुत परामर्श ही काम दे सकता है। नित्य-निरंतर हर कोई किसी के साथ रहता नहीं। फिर रोग का कारण और निदान जानते हुए उपचार का निर्धारण कोई अन्य किस प्रकार कर सके? थोड़े समय तक संपर्क में आने वाला केवल उतनी ही बात जान सकता है, जितनी कि मिलनकाल में उभरकर सामने आती है। यह सर्वथा अधूरी रहती है; इसलिए अन्यान्यों के परामर्श पर पूरी तरह निर्भर नहीं रहा जा सकता। यह कार्य स्वयं अपने को ही करना पड़ता है। इसमें भी एक कठिनाई यह है कि मानसिक संरचना के अनुसार हर व्यक्ति अपने को निर्दोष मानता है, साथ ही सर्वगुणसंपन्न भी समझता रहता है। यह स्थिति सुधार और विकास दोनों में बाधक है। जब तक कमी का आभास न हो, तब तक उसकी पूर्ति का तारतम्य कैसे बने? अस्तु आत्मविकास के मार्ग पर चलने वाले, जीवन-साधना के मार्ग पर अग्रसर होने के इच्छुक प्रत्येक व्यक्ति को चाहिए कि निष्पक्षता की मनोभूमि विकसित की जाए। खासतौर से अपने संबंध में उतना ही तीखापन होना चाहिए, जितना कि आमतौर से दूसरों के दोष-दुर्गुण ढूँढने में हर किसी का रहता है। आरोप जगाने और लांछित करने में हर किसी को प्रवीण पाया जाता है। इस सहज वृत्ति को ठीक उल्टा करने से ही आत्मसमीक्षा की वह प्राथमिक आवश्यकता पूरी होती है, जिसके बिना व्यक्तित्व का निखार प्रायः असंभव ही बना रहता है। वह न बन पड़े तो किसी को भी महानता अपनाने और प्रगति के उच्च शिखर तक पहुँच सकने का अवसर मिल ही नहीं सकता।

क्या करें?  इस प्रश्न के उत्तर में एक पूरक प्रश्न यह उत्पन्न होता है कि क्या नहीं हो रहा है? और ऐसा क्या अनुपयुक्त हो रहा है, जिसे नहीं सोचा या नहीं किया जाना चाहिए था? किन्हीं सुविकसित और सुसंस्कृत बनने वालों के निजी दृष्टिकोण, स्वभाव और दिशा-निर्धारण को समझते हुए यह देखा जाना चाहिए कि वैसा कुछ अपने से बन पड़ रहा है या नहीं? यदि नहीं बन पड़ रहा है तो उसका कारण और निवारण क्या हो सकता है? इस प्रकार के निर्धारण जीवन-साधना के साधकों के लिए अनिवार्य रूप से आवश्यक हैं। जो अपनी त्रुटियों की उपेक्षा करता रहता है, जो अगले दिनों अधिक प्रखर और अधिक प्रामाणिक बनने की बात नहीं सोच सकता, उस प्रकार की योजना बनाकर उनके लिए कटिबद्ध होने की तत्परता नहीं दिखा सकता, उसके संबंध में यह आशा नहीं की जा सकती कि वह किसी ऐसी स्थिति में पहुँच सकेगा, जिसमें अपने को गर्व-गौरव अनुभव करने का अवसर मिल सके। साथ ही दूसरों का सहयोग-सम्मान पाकर अधिक ऊँची स्थिति तक पहुँच सकना संभव हो सके।

साधक के लिए आलस्य, प्रमाद, असंयम, अपव्यय एवं उन्मत्त और अस्त-व्यस्त रहना प्रमुख दोष हैं। अचिंत्य चिंतन और अकर्मों को अपनाना पतन-पराभव के यही दो कारण हैं। संकीर्ण स्वार्थपरता में अपने को जकड़े रहने वाले अपनी और दूसरों की दृष्टि में गिर जाते हैं। उत्कृष्टता और आदर्शवादिता से रिश्ता तोड़ लेने पर ओछे लोग समझते हैं कि इस आधार पर नफे में रहा जा सकेगा, पर बात यह है कि ऐसों को सर्वसाधारण की उपेक्षा सहनी पड़ती है और असहयोग की शिकायत बनी रहती है। अपना चिंतन, चरित्र, स्वभाव और व्यवहार यदि ओछेपन से ग्रसित हो तो उसे किसी प्रकार धो डालने का प्रयत्न करना चाहिए, जैसे कि कीचड़ से सन जाने पर उस गंदगी को धोने का अविलंब प्रयत्न किया जाता है। गंदगी में सने फिरना किसी के लिए भी अपमान की बात है। इसी प्रकार मानवी गरिमा से अलंकृत होने पर भी क्षुद्रताओं और निकृष्टताओं का परिचय देना न केवल दुर्भाग्यसूचक है, वरन साथ में यह अभिशाप भी जुड़ता है कि कोई महत्त्वपूर्ण, उत्साहवर्द्धक और अभिनंदनीय प्रगति कर सकने का आधार कभी हाथ ही नहीं आता। पेट भरने और परिवार के लिए मरते-खपते रहना किसी भी गरिमाशील के लिए पर्याप्त नहीं हो सकता। इस नीति को पशु-पक्षी और कीट-पतंग ही अपनाते रहते हैं और मौत के दिन किसी प्रकार पूरे कर लेते हैं। यदि मनुष्य भी इसी कुचक्र में पिसता और दूसरों को पीसता रहे, तो समझना चाहिए कि उसने मनुष्य जन्म जैसी देवदुर्लभ संपदा को कौड़ी मोल गँवा दिया।

नित्य आत्मविश्लेषण, सुधार सत्प्रवृत्तियों के अभिवर्द्धन का क्रम यदि जारी रखा जाए तो प्रगति के लक्ष्य उपलब्ध करने की दिशा में अपने क्रम से बढ़ चलना संभव हो जाता है, यह एक प्रकार का तप है। तप से संपत्ति और संपत्ति से सिद्धि प्राप्त होने का तथ्य सर्वविदित है। दुष्प्रवृत्तियों से अपने को बचाते रहने की संयमशीलता किसी को भी सशक्त बना सकने में समर्थ हो सकती है। यह राजमार्ग अपनाकर कोई भी समुन्नत होते हुए अपने आपको देख सकता है।

समझदारी, ईमानदारी, जिम्मेदारी और बहादुरी के चार सद्गुण यदि अपने व्यक्तित्व के अंग बनाए जा सकें, उन्हें पुण्य-परमार्थ स्तर का माना जा सके तो अपना आपा देखते-देखते इस स्तर का बन जाता है कि अपने सुख बाँटने और दूसरों का दुःख बँटा लेने की उदार मनोदशा विनिर्मित होने लगे। जीवन-साधना इसी आधार पर सधती है। मनुष्य जन्म को सार्थक इन्हीं आधारों को अपनाकर बनाया जा सकता है।


सद्वाक्य

हँसते और हँसाते रहो, पर यह कार्य व्यंग्य-उपहास के आधार पर मत करो, अन्यथा मैत्री के स्थान पर दुर्भाव बढ़ेगा।


सहयोग-सहकार पर निर्भर जीवन-व्यापार

इस विश्व में कोई भी पूर्णतया एकाकी अपने बलबूते समर्थ, सक्षम नहीं है। पारस्परिक सहयोग पर ही प्रगतिक्रम निर्भर है। विज्ञान की अनेकानेक विधाएँ भी एकदूसरे से अविछिन्न रूप से जुड़ी हुई हैं। यदि इन्हें अलग-अलग कर दिया जाए तो सर्वांगपूर्ण प्रगति पूर्णतया असंभव है। सृजेता का यह शाश्वत विधान है एवं अस्तित्व हेतु एक अनिवार्य शर्त है कि सभी में पारस्परिक सहयोग एवं तालमेल हो।

प्रकृति, जंतु एवं वनस्पति परस्पर एकदूसरे से घनिष्ठतापूर्वक संबंधित हैं। पृथ्वी-जल-वायु तथा गणित जीवनोपयोगी पदार्थ प्रकृति के घटक हैं। प्राणियों तथा वनस्पतियों के रूप में गतिशील जीवन का इन सबके आपसी सहयोग एवं संतुलन के आधार पर ही अपना अस्तित्व है। प्रतीत भर होता है कि सभी घटक अलग-अलग हैं, पर सच्चाई यह है कि एक अभिन्न चक्र से सभी जुड़े हैं। एक ही माला के दाने हैं। एक की गति, स्थिति से समूचा चक्र प्रभावित होता है और तदनुरूप प्रतिक्रिया दर्शाता है। इकॉलाजी के विशेषज्ञों का मत है कि प्रकृति-चक्र की अपनी स्वसंचालित प्रक्रिया है। यदि उसमें छेड़खानी न की जाए तो वह सतत गतिमान रहते हुए भी अनेकानेक अनुदानों से जीव-जगत की सेवा करता रह सकता है।

प्रकृति जगत के उदाहरणों की ही शृंखला में वातावरण में घुली गैसों को देखें। गैस रूप में विद्यमान ये रासायनिक तत्त्व जीवधारियों के द्वारा अवशोषित होकर पोषक तत्त्वों में बदल जाते हैं। कार्बन डाई ऑक्साइड— कार्बोहाइड्रेट में तथा नाइट्रोजन— प्रोटीन में बदल जाती है। आहारचक्र के अंतर्गत अन्यान्य अंग-अवयवों से गुजरते हुए वे अपने मूल स्वरूप में उत्सर्जन-श्वसन के माध्यम से वापस कर दिए जाते हैं। भूमिगत रासायनिक तत्त्वों का चक्र भी इसी प्रकार संचालित होता रहता है। वहाँ विद्यमान बैक्टीरिया की भूमिका भी उसी प्रकार की है।

पत्थरों के अपक्षयन से खनिज उत्पन्न होते हैं, जो लवणों के रूप में मिट्टी अथवा समुद्र, झरना, नदी आदि में मिल जाते हैं और जलचक्र के अभिन्न अंग बन जाते हैं। पौधे, प्राणी इन खनिज लवणों को ग्रहण करते हैं और फिर आहारचक्र की शुरुआत हो जाती है। अवशिष्ट पदार्थों के नियोजन तथा अंगों के अपक्षरण से खनिज तत्त्व पुनः लवण एवं जल के रूप में वातावरण को हस्तांतरित कर दिए जाते हैं। इस प्रकार यह चक्र सतत चलता रहता है। कभी भी इसमें कोई व्यतिक्रम नहीं आता।

इस 'बायो जियो केमिकल साइकिल्स' द्वारा जीव-जगत से उत्पन्न अवशेषों का प्रयोग दूसरे समुदाय द्वारा कर लिया जाता है, यह और भी महत्त्वपूर्ण है। एक का अवशिष्ट पदार्थ, दूसरे का ऊर्जास्रोत अथवा आहार बन जाता है। प्राणियों के अवशिष्ट पदार्थों में मिली नाइट्रोजन जीवाणुओं का आहार बन जाती है। जीवाणु भूमि को उपजाऊ बनाते हैं। मिट्टी से पौधे पोषण प्राप्त करते हैं। पौधों से पशुओं को आहार मिलता है। जीवों द्वारा उत्सर्जित विष के समान कार्बन डाई ऑक्साइड पौधों का जीवनाधार है। यह इस प्रकार एक अविराम गतिचक्र चलता रहता है।

इसी प्रकार प्रजनन, पोषण, अभिवर्द्धन, परिशोधन एवं संतुलन का स्वसंचालित गतिचक्र प्रकृति में चलता रहता है, जो प्रकृति के विभिन्न घटकों के पारस्परिक सहयोग पर आधारित है। जन्म एवं विकास की तरह मृत्यु एवं विनाश भी उस जीवन चक्र के गति एवं संतुलन के लिए आवश्यक है। पदार्थों के गतिचक्र में दृष्टिगोचर सहयोग-सहकार तथा उनसे उत्सर्जित होने वाले ऊर्जा-प्रवाह पर ही जीवों का जीवन अवलंबित है। जड़ समझे जाने वालों में भी यह सहयोग चक्र गतिशील है। जल के वाष्पीकरण, जमाव तथा पत्थरों के उद्भव एवं कटाव के रूप में भी इसी सहजीवी चक्र की क्रियाशीलता नजर आती है।

प्रत्येक जीवनदायी पदार्थ में जलीय अंश होता है। जीवधारी जब उन्हें ग्रहण करते हैं तो उसका जल कार्बन, हाइड्रोजन, ऑक्सीजन, फास्फोरस एवं सल्फर को कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, वसा तथा अन्य पोषक तत्त्वों में बदल देता है। पौधे मिट्टी से पोषक तत्त्वों के रूप में नाइट्रेट, अमोनिया  एवं सल्फेट आदि प्राप्त करते हैं। वे प्रकाश-संश्लेषण की प्रक्रिया से ऑक्सीजन को वायुमंडल में छोड़ते रहते हैं। वातावरण में प्रचुर मात्रा में पाई जाने वाली नाइट्रोजन एक निष्क्रिय गैस है, जो जीवधारियों द्वारा सीधे प्रयोग नहीं की जा सकती, जबकि यह जीवन की प्रमुख इकाई है; पर पारस्परिक सहयोग की महत्ता एवं प्रकृति की व्यवस्था विलक्षण है। एक अन्य प्रक्रिया से इस गैस को प्रयोग योग्य बना देती है। जीवाणुओं की कुछ जातियाँ तथा एल्मी की कुछ जातियाँ इस गैस को उपयोग में लाती हैं तथा वायुमंडल से खींचकर मिट्टी में छोड़ देती हैं। मिट्टी के जीवाणु नाइट्रोजन को अमोनिया में बदल देते हैं।

इस तरह प्रकृति में विभिन्न प्रकार के सहयोग चक्र सतत चलते रहते हैं। अपनी अलग-अलग भूमिका संपन्न करते हुए भी वे परस्पर एकदूसरे से अन्योन्याश्रित रूप से जुड़े हुए हैं। जल का भी एक सहयोग चक्र है, जो पृथ्वी, सूर्य और समुद्र के सहयोग से गतिशील है। पृथ्वी एवं समुद्र का जल सूर्य के प्रकाश से वाष्पीभूत होकर वायुमंडल में पहुँचता, घनीभूत होकर बादलों में बदलता तथा पुनः वर्षा के रूप में पृथ्वी एवं नदियों को लौटा दिया जाता है, जो पुनः समुद्र में जा पहुँचता है। जल के विश्वव्यापी वितरण का लेखा-जोखा लिया जाए तो ज्ञात होगा कि जलवृष्टि से पृथ्वी को प्राप्त जल की मात्रा, वाष्पीकृत जल के ही समतुल्य होती है। आस्ट्रेलिया एवं अफ्रीका में सूखे की स्थिति बनी रहने का कारण यह है कि वहाँ वर्षा के जल का तीन-चौथाई भाग वाष्पीभूत हो जाता है।

जल एवं गैसों के अतिरिक्त ऊर्जा का भी सहयोग चक्र सर्वत्र सक्रिय है। गति अथवा विकास के लिए चेतन, प्रेरणा एवं शक्ति पादप एवं जंतु उसी से प्राप्त करते हैं। इस चक्र के अध्ययन की तकनीक भी रेडियो, आइसोटोप, माइक्रो कैलोरी मेट्री स्पेक्ट्रोफोटोमैट्री कम्प्यूटर साइंस एवं एप्लायड गणित के सम्मिलित सहयोग से ही विकसित हुई है। ऊर्जा का प्रमुख स्रोत सौर विकिरण है। इसका कुछ अंश आटोट्राय प्रक्रिया द्वारा जैविक पदार्थ में बदल दिया जाता है, जिससे समस्त भूमंडल की आवश्यकता की पूर्ति होती है, आहारचक्र में जीवधारियों के एक समुदाय की आहार-ऊर्जा परिवर्तित रूप में दूसरे समुदाय को हस्तांतरित कर दी जाती है।

प्रकृति के इन विभिन्न चक्रों के युग्म एवं पारस्परिक सहयोग से सृष्टि में जीवन विविध रूपों में अठखेलियाँ कर रहा है। एक की गति-स्थिति में परिवर्तन का सीधा प्रभाव समूचे इकोलाजिकल चक्र पर पड़ता है। पादपों, जंतुओं, सूक्ष्म जीवाणुओं, मनुष्यों तथा संबंधित पर्यावरण के सह अस्तित्व एवं सम्मिलित जटिलतम प्रणाली को इकोसिस्टम कहा जाता है। इस संतुलन के कारण ही प्रकृति के सभी व्यापार ठीक ढंग से चलते हैं। प्रत्येक इकोलाजिकल सिस्टम हजारों-हजार जैविक समुदायों के सहयोग से मिलकर बना है, जो ऊर्जा रासायनिक द्रव्यों का हस्तांतरण सुनियोजित ढंग से एक से दूसरे में करता रहता है।

प्रकृति ही नहीं, समस्त मानव जाति भी परस्पर सहकार के जीवन चक्र में बँधी हुई है। एक की स्थिति दूसरे को प्रभावित करती है। सब की सुख-शांति, प्रगति-उन्नति इसी बात पर आधारित है कि हर व्यक्ति अपने को विराट परिवार का अभिन्न अंग माने, उसके विकास, अभिवर्द्धन में सहयोग दे। व्यक्तिगत स्वार्थ की भी स्थाई रूप से आपूर्ति तभी संभव है, जब समाज सर्वतोमुखी विकास की ओर चले। संकीर्णता जहाँ कहीं भी अंकुरित होगी, विलगाव का विषवृक्ष ही पुष्पित-पल्लवित होगा। हिल-मिलकर रहने, सहयोग-सहकार की रीति-नीति अपनाने तथा उपलब्धियों के आदान-प्रदान की उदारता बरतने का संदेश मानवमात्र को प्रकृति सतत देती रहती है।


वनौषधियों की सूक्ष्मीकृत उपचार-प्रक्रिया

यह एक व्यावहारिक तथ्य है कि आयुर्वेद पद्धति में वनौषधियों के पंचांग को कूटकर खाने में, उसे बड़ी मात्रा में निगलना कठिन पड़ता है। यही स्थिति ताजी स्थिति में कल्क बनाकर पीने में उत्पन्न होती है। इससे तो गोली या वटिका बनाकर सेवन करने में मनुष्य को कम कठिनाई अनुभव होती है। सूखी स्थिति से भी क्वाथ, अर्क, आसव, अरिष्ट अधिक सुविधाजनक रहते है और प्रभावी भी होते है। ठोस और द्रव की उपरोक्त दोनों विधाओं से बढ़कर वाष्पीकृत औषधि की प्रभाव क्षमता अधिक व्यापक एवं गहरी होती है। नशा करने वाले मुँह से भी गोली या मादक-द्रव लेते है व अपनी नशों में भी इंजेक्शन लगाते है, पर इससे भी अधिक तीव्र नशा उन्हें नाक से सूँघी हुई औषधि या धूम्रपान द्वारा आता है। यह इसलिए कि वाष्पीभूत मादक-द्रव्य नासिका एवं फेफड़ों के माध्यम से अंदर पहुँचकर प्रभावी हो जाते है। इस प्रकार स्पष्ट है कि ठोस, द्रव और गैस के तीन रूपों में पाया जाने वाला पदार्थ एक के बाद दूसरे, दूसरे की अपेक्षा तीसरे स्तर पर अधिक क्षमतावान होता चला जाता है।

अग्निहोत्र विद्या के साथ भी ऐसे ही अनेक कारण जुड़े हुए है, जिनके कारण उसे प्राचीनकाल में उच्चकोटि की प्रतिष्ठा मिली थी। आज भी उस मान्यता को पुनः प्राण मिलने की स्थिति है। वनौषधियाँ वाष्पीकृत स्थिति में फेफड़ों से होती हुई मस्तिष्क आदि अवयवों में होकर शरीर के जीवकोषों तक पहुँचती व अपनी इस सीधी पहुँच के कारण ही प्रभाव दिखा पाने में सक्षम हो पाती है। ऐसा अनुमान है कि फेफड़ों में विद्यमान वायुकोष्ठकों का औसत क्षेत्रफल लगभग सौ वर्ग मीटर का तथा दस माइक्रो मीटर पतला होता है। एक बार में साधारण श्वास द्वारा वायु का 500 मिली लीटर एवं गहरी श्वास द्वारा 900 से 950 मिली लीटर आयतन अंदर प्रवेशकर इसके बदले में कार्बन डाइ ऑक्साइड को बाहर भेज देता है। ऐसी श्वास-प्रश्वास प्रक्रिया एक मिनट में 15 से 18 बार होती है। इस प्रकार एक मिनट में, जब तक हृदय लगभग 70 से 80 बार धड़क चुका होता है, श्वास मार्ग द्वारा 7550 मिलीलीटर वायु का एक्सचेंज हो चुका होता है। इन आँँकड़ों से एक अनुमान इस सशक्त माध्यम का लगाया जा सकता है, जिससे वनौषधि यजन-प्रक्रिया द्वारा वाष्पीभूत धूम्र शरीर में प्रविष्ट कराए जाते है। यजन-प्रक्रिया के अनेकानेक आध्यात्मिक लाभों के अतिरिक्त उसका प्रभाव शरीर और मन के सभी महत्त्वपूर्ण अवयवों तक पहुँचाने की मान्यता का वस्तुतः तर्कपूर्ण आधार है।

मस्तिष्कीय उपचार अपने आप में एक ऐसी विधा है, जिसकी आवश्यकता शरीरोपचार से भी अधिक समझी जानी चाहिए। इन दिनों मनोविकारों— मानसिक रोगों की भरमार शारीरिक बीमारियों से कहीं अधिक है, किंतु इसे विडंबना ही कहना चाहिए कि समस्त चिकित्सा-पद्धतियाँ मात्र शारीरिक व्यथाओं के इर्द-गिर्द ही अपने प्रयासों को सीमित रख रही है। संसार में अनेकानेक चिकित्सा-पद्धतियों का प्रचलन है, किंतु उनमें से एक भी ऐसी नहीं है, जो मनोविकारों पर ध्यान देती है और उनके समाधान खोजती हो। गेस्टाल्ट साइकोथेरेपी से लेकर विहेवियोरल साइकोथेरेपी तक अनेकानेक पद्धतियाँ प्रचलन में हैं, पर वे मानस की स्थूल परत तक ही अपनी पैठ बिठा पाती है। भारतीय मनोविज्ञान में जिसे अंतःकरण चतुष्ट्य कहकर संबोधित किया गया है, उसके उपचार का विधान मात्र अग्निहोत्र उपचारपद्धति में देखने को मिलता है। आत्महत्या की प्रवृत्ति से लेकर विभिन्न भ्रांतियों सनक वाले रोगी जेल स्तर पर पागलखानों में कैद कर दिए जाते है, बहुसंख्यकों को बिजली के झटके भी लगा दिए जाते है, किंतु इस उपचार से कितने रोगी अच्छे हो पाते है, यह नहीं कहा जा सकता। शामक एवं मस्तिष्क को संज्ञाशून्य करने वाली औषधियाँ ही प्रचलन में दिखाई पड़ती है। हो सकता है, इससे उन्माद में कुछ घट-बढ़ होती हो, पर जनसमुदाय में से अधिकांश को जिन हलके मनोरोगों का शिकार बनकर रहना पड़ रहा है, उनके निराकरण का कोई विकल्प नजर नहीं आता।

इन दिनों अन्यान्य प्रदूषणों के साथ एक प्रदूषण और आ जुड़ा है—  वह चिंतन का, आस्थाओं का प्रदूषण। आशंका, अविश्वास, अकारण चिंता, भय, उत्तेजना, असंतुलन आदि से कितने ही लोग घिरे देखे जाते है। सोचने की सही पद्धति हाथ न लगने के कारण कितने ही लोग बौखलाए फिरते रहते हैं। कईयों को निराशा, उदासी घेरे रहती है। मनोबल, संकल्पशक्ति का नितांत अभाव दिखाई पड़ता है, कई कल्पनाएँ गढ़ते और उनमें उलझकर इस प्रकार रहते हैं मानों उन पर कोई विपत्ति का पहाड़ टूटने वाला हो। कुकल्पनाएँ चित्र-विचित्र मोड़ लेकर बहकाती रहती है। इन विकारों से व्यक्तित्व टूट जाते है। कईयों के परस्पर विरोधी कई व्यक्तित्व उभर आते है। सोचते कुछ, कहते कुछ और करते कुछ है। अवास्तविक को वास्तविक मानते है। इनकी विक्षिप्तता स्वयं अपने को बेतुके असमंजसों में डाले और हैरानियों में उलझाए रहती है। ऐसी सनक न्यूनाधिक मात्रा में असंख्यों पर छाई रहती है; प्रत्यक्षतः दिखाई भले न पड़ती हो, पर थोड़े से संपर्क से ही उभरकर सामने आ जाती है। जिन्हें विवेकशील और संतुलित व्यक्तित्व वाला कहा जा सके, ऐसे कोई बिरले ही व्यक्तित्व दिखाई देते है।

ब्रह्मवर्चस् के वैज्ञानिक गहन मनोवैज्ञानिक जाँच-पड़ताल के बाद व्यक्तित्व संबंधी इन विकृतियों का निदान करते हैं। आत्मप्रत्यय, व्यक्तित्व विश्लेषण एवं विभिन्न मनो-आध्यात्मिक प्रश्नावलियों के माध्यम से उन प्रसुप्त मनोविकारों की जाँच-पड़ताल की जाती है, जो बहिरंग में नजर आ रहे लक्षणों-शारीरिक रोगों के मूल में निहित होते है। प्रायश्चित्त परंपरा के माध्यम से साधकों, परीक्षार्थियों से उनके विगत के चिंतन क्रियाकलाप वर्त्तमान मनःस्थिति तथा भविष्य के प्रति दृष्टिकोण को जानने का प्रयास किया जाता है। चिकित्सा तंत्र के प्रति आस्था एवं वातावरण में विद्यमान विशिष्टता उनकी गहरी-से-गहरी ग्रंथि खोलने में सहायक होती है। पाॅलिग्राफ, लाई डिटेक्टर नामक यंत्र इस प्रक्रिया में सहायता करता है। इसमें त्वचा का विद्युतीय प्रतिरोध, माँसपेशियों की विद्युत तथा मस्तिष्क की अल्फा वेव्स को भी मापे जाने एवं 'बायो फीडबैक' यंत्र द्वारा परीक्षार्थियों को क्रमशः ग्रंथिमुक्त होने का शिक्षण दिए जाने की भी व्यवस्था है। साधारण स्थिति में यही उपकरण व्यक्ति की ध्यान-एकाग्रता में वृद्धि तथा मनःशक्ति संवर्द्धन द्वारा विद्युतीय त्वचा-प्रतिरोध में अंतर के रूप में परीक्षण के काम आते है।

इन दिनों उद्धत स्वभाव की तरह अपराधी कृत्यों की, आत्महत्याओं, बलात्कारों की बाढ़ आ रही है। अभक्ष्य भक्षण, नशेबाजी का दौर बेहिसाब चल रहा है। इन सबका भी जनमानस पर कम कुप्रभाव नहीं पड़ रहा है। चिंतन और चरित्र की गिरावट का भी मनोविकारों की अभिवृद्धि में योग होना ही चाहिए। यही कारण है कि शारीरिक और मानसिक रोगों की व्यापकता और गहराई दोनों बढ़ती जा रहीं है। रोगों में रक्तचाप वृद्धि, पाचनतंत्र की विकृतियाँ, रक्तविकार, दमा, जननेंद्रियों की बीमारियाँ तथा मानसिक तनाव आदि का बाहुल्य है। नई दवाएँ नित्य निकलती हैं, किंतु कुछ ही दिनों में गुणहीन होने लगती है।

ऐसी दशा में वनौषधियों की सूक्ष्मशक्ति का उपयोग आवश्यक हो गया है। वे वायुभूत बना लेने पर साँस के द्वारा मस्तिष्क के अनेक क्षमता क्षेत्रों और शरीर के अंतरंग अवयवों तक आसानी से पहुँचाई जा सकती है। उनकी प्रभाव क्षमता अधिक एवं स्थाई है। इन औषधियों के कार्यकारी घटकों, अंतरंग इसका परीक्षण— अवयवों तक तुरंत पहुँच जाने की सामर्थ्य एवं प्रभाव के रूप में किया जा सकता है। 'रेडियो इम्यूनो एसे' तथा 'स्पेक्ट्रो फोटोमेट्री' द्वारा यह देखा जा सकता है कि किस शीघ्रता से विभिन्न औषधि संघटक जीवकोषों तक पहुँचते व अंतःस्रावों को सक्रिय करते हैं। यह प्रक्रिया ठोस— चूर्णरूप एवं क्वाथ— द्रवरूप में प्रयोग किए जाने की अपेक्षा अधिक लाभदायक सिद्ध होती है।

जिस अवयव में जिन रसायनों की, जिन ऊर्जातत्त्वों की कमी पड़ती है, वह उपयुक्त सामग्री सामने प्रस्तुत होने पर अग्निहोत्र वाष्प में से खींच ली जाती है और आवश्यकता पूर्ति हो जाती है। जो कुछ भी कमी रहती है, वह यज्ञावशिष्ट भस्म एवं चरुसेवन के माध्यम से पूरी हो जाती है। यही अग्निहोत्र-प्रक्रिया अपनी उष्मा से वायुभूत तैलीय औषधि-तत्त्वों का फेफड़ों से अवशोषण बढ़ा देती है। साथ-साथ अल्पमात्रा में त्वचा से होने वाली श्वसन-प्रक्रिया की गति बढ़ा देती है। इसे वायटेलोग्राफ (स्पायरोमेट्री) द्वारा लंगफंक्शन्स तथा 'प्लेथिज्मोग्राफी' द्वारा हृदयंदर एवं रक्त का आयतन ज्ञातकर मापा जाता है। यह कार्य ब्रह्मवर्चस् की प्रयोगशाला में चल रहा है। अग्निहोत्र उपचार की यही विशेषता है कि शारीरिक एवं मानसिक रोगों में जिन तत्त्वों की कमी पड़ जाती है, उन्हें धूम्र में से आसानी से खींच लिया जाता है। साथ ही प्रश्वास द्वारा भीतर घुसी अवांछनीयता को बाहर धकेलकर सफाई का आवश्यक प्रयोजन पूरा कर लिया जाता है। बहुमुखी संतुलन बिठाने का माध्यम हर प्रकार की विकृतियों का निराकरण करने में असंदिग्ध रूप से सफल होता है।

अग्निहोत्र उपचार एक प्रकार की समूह चिकित्सा है, जिससे एक ही प्रकृति की विकृति वाले विभिन्न रोगी लाभान्वित हो सकते है। यह सुनिश्चित रूप से त्वरित लाभ पहुँचाने वाली, सबसे सुगम एवं सस्ती उपचार-पद्धति है। जब वाष्पीभूत होने वाले औषधि तत्त्वों को साँस के साथ घोल दिया जाता है, तो रक्तवाही संस्थान के रास्ते ही नहीं, कण-कण तक पहुँचाने वाले वायु-संचार के रूप में भी वहाँ जा सकता है, जहाँ उसकी आवश्यकता है।

यह बहुविदित तथ्य है कि उसकी हाइपॉक्सिया (कोमा) के रोगी की अथवा वेंटीलेशन में व्यतिक्रम आने पर, साँस लेने में कठिनाई उत्पन्न होने पर नलिका द्वारा नाक से ऑक्सीजन पहुँचाई जाती है, किंतु इस ऑक्सीजन को शुद्ध रूप में नहीं दिया जाता, इसमें कार्बन डाइ ऑक्साइड की लगभग पाँच प्रतिशत मात्रा का भी एक संतुलित अंश होता है, ताकि मस्तिष्क के केंद्रों को उत्तेजितकर श्वसन-प्रक्रिया नियमित बनाई जा सके। अग्निहोत्र में उत्पन्न वायु-ऊर्जा में भी यही अनुपात गैसों के सम्मिश्रण का रहता है। विशिष्ट समिधाओं के प्रयुक्त होने से उत्पन्न ऊर्जा इस सम्मिश्रण को उपयुक्त स्तर का बना देती है। किन समिधाओं व किन वनौषधियों की कितनी मात्रा ऊर्जा उत्पन्न करने हेतु प्रयुक्त की जाए, यह इस विद्या के विशेषज्ञ जानते हैं एवं तदनुसार परिवर्तन करते रहते है।

शारीरिक रोगों एवं मनोविकारों से उत्पन्न विपन्नता से छुटकारा पाने के लिए अग्निहोत्र चिकित्सा एक श्रेष्ठ एवं सांस्कृतिक आधारों पर टिकी उपचार-पद्धति है, पूर्णतः विज्ञानसम्मत है, यह सब सुनिश्चित होता जा रहा है। अन्य शोध कार्यों से समन्वितकर इसे लोकप्रिय बनाया जा सके तो यह युग की सबसे बड़ी सेवा होगी।


हैसियत का अधिकतम अंशदान है— महायज्ञ (कहानी)

एक संपन्न व्यक्ति ने चार यज्ञ किए। उनका बहुत सारा पुण्यफल देवताओं के कोष में जमा हो गया।

एक बार वही व्यक्ति कहीं परदेश जा रहा था। साधन सब समाप्त हो गए थे। मात्र एक जून का भोजन शेष रहा था। उसे खाने बैठा तो कोई नितांत भूखा उधर आ पहुँचा। याचना की, तो उसने सारा भोजन उसी को दे दिया। स्वयं भूखा रहा। दूसरे दिन उसने श्रम करके जो पाया, उससे पेट भरा।

जब परलोक में उस संपन्न का जाना हुआ तो पुण्यफल के बहीखाते देखे गए। चार सामान्य यज्ञों का लेखा-जोखा था और पाँचवाँ महायज्ञ भी जमा पाया गया। पाँचवाँ महायज्ञ कौन है? इस पर उस व्यक्ति को भी आश्चर्य हुआ, पूछने पर बताया गया कि चार यज्ञ तो अपनी हैसियत के एक अंश से ही किए गए थे; इसलिए उन्हें साधारण गिना गया, पर जिसमें अपना सारा भंडार खाली कर दिया गया, वह भूखे को भोजन उस स्थिति में देना था, जिसमें स्वयं को भूखा रहना पड़ा, इसलिए उसे महायज्ञ माना गया। दान में राशि का महत्त्व नहीं। महत्त्व इस बात का है कि अपनी सामर्थ्य का कितना बड़ा अंश अर्जित किया गया।


विभूति का दुरुपयोग न हो

धर्मनिष्ठा और तप-साधना के प्रतिदान— प्रतिफल के रूप में महाराज युधिष्ठिर को अक्षयपात्र मिल गया। अक्षयपात्र की विशेषता यह थी कि उससे जब भी माँगा जाता, वह स्वादिष्ट और मधुर व्यंजन प्रदान करता। परीक्षा हेतु उसी दिन हस्तिनापुर की समग्र जनता को मनपसंद व्यंजन और पकवान ग्रहण करने का सार्वजनिक निमंत्रण दिया। हर किसी को इस अक्षयपात्र से लाभ उठाने की छूट थी।

अक्षयपात्र अपने ढंग से प्रयुक्त होता रहा और तो सब ठीक ढंग से चलता रहा, लेकिन युधिष्ठिर को दंभ होने लगा कि मुझ जैसा कोई दानी नहीं है। इस दंभ को पुष्ट करता रहा— आश्रित ब्राह्मणों का जयगान। एकाध व्यक्ति ही किसी की प्रशंसा करने लगे तो मनुष्य का भाल गर्वोन्नत होने लगता है, फिर वहाँ तो समाज के सोलह हजार प्रबुद्ध व्यक्ति युधिष्ठिर का यशोगान करते थे। यह ठीक है कि युधिष्ठिर ने अपने जीवन का एक बड़ा भाग कठोर तप-साधनाओं में गुजारा था, परंतु कुछ कमजोरियाँ अभी भी शेष थीं, जिन्हें विजित करना था और उनमें एक था— यह सात्त्विक अभिमान।

भगवान कृष्ण ने जब यह देखा कि धर्मराज युधिष्ठिर अभिमान के मद में चूर होते जा रहे हैं, तो उनसे यह सहन न हुआ। भगवान प्रणत जनों की सब ओर से रक्षा करने वाले हैं। उन्हें यह सहन भी कैसे होता कि एक साधारण-सी बात उनके शिष्य के पतन का कारण बने। उनकी दृष्टि में अक्षयपात्र और सोलह हजार ब्राह्मणों को प्रतिदिन भोजन कराना तो साधारण बात है। कई बार भगवान ने उन्हें परोक्ष रूप से समझाया भी सही, परंतु युधिष्ठिर समझने में असमर्थ ही रहे। एक बार अवसर देखकर श्री कृष्ण ने प्रत्यक्षतः भी कहा कि, "धर्मराज मैं मानता हूँ कि ब्राह्मणों के लिए तुम भोजन की व्यवस्थाकर पुण्यकार्य में संलग्न हो, परंतु उसके लिए अभिमान नहीं करना चाहिए।"

“परंतु प्रभु! मैंने तो ऐसी कोई बात नहीं की, जिससे अभिमान टपकता हो”— युधिष्ठिर ने कहा।

“अभिमान बातों से नहीं, क्रियाओं से व्यक्त होता है। भगवान ने कहा और युधिष्ठिर को लेकर महाराज बलि के पास पहुँचे। बलि को युधिष्ठिर का परिचय देते हुए उन्होंने कहा— "दैत्यराज! ये हैं पाण्डवों में अग्रज महादानी युधिष्ठिर। इनके दान से मृत्युलोक के प्राणी इस तरह उपकृत हो रहे हैं कि वे तुम्हारा स्मरण भी नहीं करते।

“परंतु मैंने स्मरण किए जाने जैसा कार्य भी क्या किया था”— बलि ने कहा— “मैंने वामन को केवल तीन पग जमीन देने का वचन दिया था और वही पूरा किया भी। अब यह बात अलग है कि वह वामन विराट बन गया।”

“महाबली! तुमने सब कुछ खोकर भी अपना वचन पूरा किया, इसलिए तुम्हारी ख्याति अमर हुई। धर्मराज की कीर्ति भी तुम्हारे यश की होड़ कर रही है। तुम दोनों पुण्यात्माओं का मिलन निश्चय ही सौभाग्य है।”

बलि ने युधिष्ठिर की कोई पुण्यगाथा सुनाने के लिए भगवान से कहा। भगवान कृष्ण ने उनके पूर्व जीवन का संपूर्ण विवरण क्रमवार सुनाया और अक्षयपात्र, सोलह हजार ब्राह्मणों को भोजन कराने की नियम-परंपरा का भी उल्लेख किया। युधिष्ठिर के चेहरे की दर्पभरी मुस्कान तब विलुप्त हो गई, जब दानवेंदु ने कहा— “आप इसे दान कहते है, लेकिन यह तो महापाप है। स्पष्ट करते हुए महाबलि ने कहा— धर्मराज! केवल अपने दान के दंभ को पूरा करने के लिए ब्राह्मणों को आलसी बनाना पाप ही है। मेरे राज्य में तो किसी याचक को नित्य भोजन की सुविधा दी जाए तो भी स्वीकार नहीं करेगा।”

युधिष्ठिर का मद चूर हो गया एवं वे चूँकि धर्मावतार थे, उसी रूप में पुनः पुण्य-पुरुषार्थ में विनम्रतापूर्वक जुट गए।


प्रतिभा का निखार— व्यवस्था-बुद्धि का विकास

भगवान ने मनुष्य को कैसा विलक्षण शरीर और मन दिया है, इसको देखते हुए लगता है कि ऐसी अनुपम विभूतियों से भरा-पूरा जीवन मनुष्य को अकारण-अनायास ही नहीं दिया गया है, उसके पीछे कोई महान उद्देश्य सुनिश्चित रूप से छिपा होना चाहिए, अन्यथा मनुष्य को इतनी बड़ी संपदा का अनायास ही उपलब्ध होना अन्य प्राणियों के साथ अन्याय और एक प्राणी के साथ किया गया पक्षपात माना जाता। परब्रह्म के समदर्शी और न्यायकारी होने पर संदेह उठता और कलंक लगता।

शरीर की विलक्षणता तब दीख पड़ती है, जब उसे मूर्तिकारों, चित्रकारों, संगीतज्ञों, अभिनेताओं, पहलवानों, कठिन प्रतिस्पर्धाओं में जीतने वालों के कौशल के रूप में देखकर चकित रह जाना पड़ता है। प्रतिभा-मेधा के धनी, साहित्यकार, विशेषज्ञों, प्रतिपादकों, दार्शनिकों, शोधकर्त्ता वैज्ञानिक, सर्जन, विद्वान, तार्किक, दूरदर्शी स्तर के मनीषियों को अपनी अतिरिक्त सफलता का प्रदर्शन करते देखते हैं, यह चमत्कार और कुछ नहीं विद्यमान क्षमता का निखार भर है। हीरे को खराद पर तराशने से उसकी जगमगाहट देखते ही बनती है और कीमत कहीं-से-कहीं पहुँच जाती है। जंग लगे, भोंथरे शस्त्रों को जब धार रखकर तेज कर दिया जाता है तो वे एक ही झटके से एक बलिष्ठ को दो भाग में बाँट देते देखे गए हैं। सोया हुआ मनुष्य भी अर्द्धमृत जैसी स्थिति में पड़ा रहता है, पर जब वह जगता है तो अपने पराक्रम और कौशल से उपार्जनों के ढेर लगा देता है। स्रष्टा ने बीजरूप में सबको समान वैभव दिया है। यह अपनी इच्छा के ऊपर निर्भर है कि जो मिला है, उसे अपेक्षित, अनगढ़ स्थिति में पड़ा रहने दिया जाए या किसान के बीज बोने की तरह खाद-पानी दें और धन-धान्य के कोठे भरकर अपने पौरुष का प्रदर्शन करें।

अगणित विशेषताओं से युक्त मानवी काय-कलेवर की उपलब्धि ईश्वर की देन है। इसे सँजोना-सँभालना उपलब्धकर्त्ता का अपना काम है। कोई चाहे तो निर्वस्त्र रहकर पागलों की तरह उपहासास्पद स्थिति में भी बना रह सकता है। किसी में शऊर हो, तो उसी काया को परिधान-आच्छादनों से शृंगारित-सुसज्जित करके मनमोहक बनाया जा सकता है। यह अपनी मरजी और रुझान का विषय है। भगवान ने मानव की बुद्धिमत्ता और पात्रता को इसी कसौटी पर परखा है कि वह दिए गए अनुदान को उपयोग करने में अपनी कुशलता और प्रगतिशीलता का परिचय दे सकता है या नहीं। भावी प्रगति या अवगति की संभावना इसे कसौटी पर कसे जाने के उपरांत बन पड़ती है।

आलस्य मन का प्रथम शत्रु है। शरीर को वह सजीव होते हुए भी निर्जीव स्तर का बनाकर रख देता है। जब स्फूर्ति, उत्साह और परिश्रम को अपनाया ही न जाएगा तो काया स्वयं ही दौड़ती और कुछ उपयोगी काम करती रह सके, ऐसा कहाँ बन पड़ेगा? आलसी व्यक्ति न अपनी कमी खोज पाते है और न उसमें सुधार करने का कुछ प्रयास करते है। फलतः दिन ज्यों-त्यों करके गुजरते रहते हैं। शरीरयात्रा किसी प्रकार चलती रहती है, किंतु निरंतर श्रमशील न रहने की कुटेव उनके लिए कोई ऐसी उपलब्धि नहीं बुला सकती, जिसके आधार पर समुन्नत कहलाने का श्रेय मिल सके। जब आलस्य शरीर से आगे बढ़कर मन तक पर सवार हो जाता है, तब उसे प्रमाद कहते हैं। प्रमादी को न अवनति अखरती है और न उन्नति के लिए उमंग उठती है। यथास्थिति बनी रहने में ही उसका चिंतन-स्तर सिकुड़ जाता है। न उसे सीखने की इच्छा होती है और न ऐसी योजना बनाने की, जिसके आधार पर आज की तुलना में कल अधिक समर्थ और समुन्नत बन सकें। ऐसे लोगों को जब कभी दीनता-हीनता का आभास होता है तो किसी अन्य को व्यवधान मानकर उसी पर दोषारोपण करने लगते हैं। भाग्य, विधि-विधान, ईश्वर की इच्छा, समय का फेर, ग्रह-नक्षत्रों द्वारा उत्पन्न किए गए अवरोधों की बात सोचकर संतोष कर लेते हैं। बहुत हुआ तो शासन, समाज, वातावरण, कलियुग या किन्हीं व्यक्तियों को दोषी मानकर उनके प्रति बैरभाव जमा लिया जाता है। आलसी और प्रमादी प्रायः इसी अवसाद एवं अचिंत्य-चिंतन से घिरे रहते हैं और ज्यों-त्यों करके जिंदगी के दिन पूरे कर लेते हैं।

कल्पित व्यक्तियों पर आक्रमण-प्रत्याक्रमण का कुचक्र चल पड़ता है। विचारणा इसी जंजाल में उलझ जाती है। योजनाएँ इसी परिधान में बनती रहती है। ऐसी दशा में यह सोचने या सूझने की गुंजाइश ही नहीं रहती कि प्रगति के लिए क्या किया जा सकता है और उसे किस प्रकार संपन्न करना चाहिए? घृणा और आक्रोश से कितनों की ही बहुमूल्य शक्तियाँ विघटन और विनाश खड़ा करने में लग जाती हैं। यह काम प्रायः इतना लंबा और भारी होता है कि उससे निबटने में ही जिंदगी का बड़ा भाग खप जाता है।

स्रष्टा के शारीरिक- मानसिक विशिष्टताओं वाले दिव्य अनुदानों का सही प्रकार से सही उपयोग बन सके, इसके लिए चिंतन-चेतना को सदा हलका-फुलका बनाए रखने की आवश्यकता है। उसे सदा तीक्ष्ण बनाने और क्रियाशील रखने की आवश्यकता है, संयम अपनाने, सूझ-बूझ उभारने और दूरवर्त्ती परिणामों को ध्यान में रखते हुए जागरूकता बनाए रखने की आवश्यकता है। इसी मनःस्थिति को प्रतिभा कहते हैं। प्रस्तुतः आधारों के अनेक पक्षों पर विचार करने के साथ ही अपनी तथा दूसरों की गतिविधियों का निर्धारण सुव्यवस्था के आधार पर बनाए रखना प्रतिभावानों के लिए ही संभव होता है। प्रमादी तो आरंभ का कुछ कार्य करते और शेष को फिर कभी के लिए, किसी और की ओर खिसका देने के लिए अधूरा छोड़ देते है। फलतः वह आरंभ किया गया थोड़ा-सा काम भी उपहार और तिरस्कार के निमित्त किया जाता है। जिम्मेदार व्यक्ति जिस कार्य को भी हाथ में लेते हैं, उसे पूरी तरह सँजोते हैं और आरंभ वाला उत्साह अंत तक बनाए रखकर समग्रता का, कुशलता का प्रमाण देकर अपनी जिम्मेदारी का परिचय देते हैं।

प्रतिभा निखारने के लिए जिस सूक्ष्मदृष्टि को अपनाना पड़ता है, उसका आरंभिक अभ्यास निरंतर बनी रहने वाली दो समस्याओं के साथ जोड़ा जाना चाहिए। शरीर से लंबे समय तक महत्त्वपूर्ण काम लेने है; इसलिए इस मशीन को इस प्रकार चलाया जाए कि उसमें न कहीं अड़चन खड़ी हो और न गतिशीलता में न्यूनता ही पड़े। इसके लिए इतनी सतर्कता भर से काम चल जाता है कि उसके आहार, विश्राम एवं क्रियाकलाप को सही संतुलित भर रखा जाए। स्वस्थता की गारंटी इन तीन प्रयोजनों को सही रखने भर से सुनिश्चित हो जाती है।

प्रतिभा का प्रथम चरण स्वास्थ्य-संरक्षण की सफलता को देखकर लगाया जा सकता है। इससे अगली सीढ़ी है— चिंतन को गड़बड़ाने न देना। अवसादग्रस्त या उत्तेजित न होना। शांतचित्त रहने पर ही सही निष्कर्ष निकलना और निर्धारण करना संभव होता है। जब तक कार्य की सुसंतुलित रूपरेखा न बने, तब तक उसको इस रूप में संपन्न नहीं किया जा सकता कि करने वाले की गरिमा एवं दक्षता बढ़ी-चढ़ी समझी जा सके। अच्छी तरह किए गए काम ही सफल होते तथा अपनी विशिष्टता का परिचय देकर प्रशंसा का विषय बनते है।

शरीर और मन की व्यवस्था बना लेना बाह्य जीवन या बहिरंग की सफलताओं का पूर्वार्द्ध पूरा कर लेना है। यह दोनों हर घड़ी साथ रहते है। इन्हें टटोलने और सुधारने का कार्य अवसर मिलते ही निर्धारित किए जाते रह सकते है। बुद्धि की तीव्रता अनुशासन की साधना और गतिविधियों का निर्धारण इन दो माध्यमों के सहारे विकसित की जाती रहे तो समझना चाहिए कि उसका पैनापन कुछ ही समय में इतनी बढ़ी-चढ़ी स्थिति अपना लेगा, जिसके सहारे उलझनों को सुलझाना और श्रेयस्कर दिशाधारा अपना सकना संभव हो सके। प्रतिभा का निखार एवं व्यवस्था-बुद्धि का विकास इन्हीं कुछ आधारों पर अवलंबित है।


गीता का दिव्य संदेश

वेदांत का भव्य भवन जिन तीन सशक्त आधारों पर टिका है, गीता उनमें से एक है। इसे भारतीय सांस्कृतिक, दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक चिंतन का प्रतीक—  प्रतिनिधि माना जाता है। अन्य दो आधार ब्रह्मसूत्र व उपनिषद् प्रकारांतर से इसमें समाहित है। इसमें जहाँ दार्शनिक चिंतन के उदात्त भाव हैं, वहीं नीति, आचार-व्यवहार की विस्तीर्णता— विशालता भी है।

इस महाग्रंथ की वैचारिक उत्कृष्टता एवं व्यावहारिक उपादेयता का आकलनकर समय-समय पर अनेकानेक मनीषियों ने अपने विचारों के लिए इसी से समुचित आधार प्राप्त किए हैं। यही नहीं उसने अपनी बात की प्रामाणिकता इस प्रकार का अवलंबन स्वीकारकर ही की है। इस प्रकार का अवलंबन आज से नहीं, अपितु आचार्य शंकर के भी पूर्ववर्त्ती आचार्यों— बोधायन, एकायन तथा भृत प्रपंच आदि से लेकर परवर्त्ती आचार्यों— रामानुज, मध्वश्रीधर, मधुसूदन, आनंदगिरि आदि ने प्राप्त किया है। प्राचीनकाल की ही तरह विवेकानंद, अरविंद, गांधी, तिलक, विनोबा, राधाकृष्णन आदि ने भी अपने विचारों का संबल ज्ञान के इस महासमुद्र में ही पाया। पूर्व की ही भाँति सर एडविन एरनाल्ड, किस्टोफर ईशरउड, जान डेविड, थोरो, राल्फ वाल्डो इमर्सन, जान डेविस, शोपेनहावर, हर्टमान, पाल डायसन, ई॰ डब्लू हापकिन्स आदि पाश्चात्य विद्वानों ने भी इसका अध्ययन, मनन, चिंतनकर स्वयं को कृतकृत्य किया।

इन सभी मनीषी चिंतकों के देश-काल-मत की भिन्नता के बाद भी सबका एक स्वर से गीता की प्रशंसा करना इसकी समन्वयवादिता तथा सार्वभौमिकता को स्पष्ट कर देता है। सचमुच इसका दिव्य संदेश किसी जाति-देश विशेष के लिए उपादेय न होकर संपूर्ण मानव जाति के लिए है। ऐसा भी नहीं कि इसका लाभ मात्र उन्नत श्रेणी के ज्ञानी या विचारक ही ले सकते है। गांधी जी के शब्दों में यह तो सर्वसाधारण का मार्गदर्शक ग्रंथ है। इसका मातृसुलभ वात्सल्य प्रौढ़ ज्ञानियों की अपेक्षा अबोध— अज्ञानी शिशुओं को अधिक प्राप्त होता है।

यह केंद्रीय भाव, जिसे गीता का महावाक्य भी कहा जा सकता है, इसके अंतरतम का सारतत्त्व है। गीतोपदेश के समस्त जीवन और प्राण का श्वास-प्रश्वास केंद्र है। इसी से उस पवित्र भाव की निर्झरिणी प्रवाहित होती है, जिसके सहारे मनुष्य सीमित मन के रास्ते से असीम— अनंत की ओर चलता है। गीता का यह केंद्रस्थ विचार निर्झरिणी की त्रिविध धाराओं की त्रिवेणी का संगम-बिंदु है। इस पवित्र स्थल की सारी महत्ता एक ऐसी भावना की समन्वय साधकता है, जहाँ मानव की समूची प्रकृति को मान्यता मिलती है। यह महान दार्शनिक संप्रदायों के पीछे रहे हुए मूल औपनिषद् वेदांत के समीप जाती है, क्योंकि यहीं हमें आत्मा, मानव, जीव तथा समष्टि जगत का अत्यंत व्यापक, गंभीर, जीवंत एवं समन्वित दर्शन होता है, परंतु यहाँ जो कुछ अंतर्ज्ञान मंत्ररूप तथा सांकेतिक भाषा से समाहित होने के कारण बुद्धि के समक्ष खुलकर नहीं आ पाता, उसे गीता विचारणा तथा स्वानुभूति के प्रकाश से खोलकर सामने रखती है। इसको देखने के लिए हमें अंदर अज्ञान का आवरण भेदने की अदम्य लालसा जगानी पड़ेगी। बाकी हमारी सत्ता के स्वामी स्वयं देख लेंगे और पूरा करेंगे। यही गीताकार का कथन है।

परम जीवन के इस व्यापक दर्शन के उद्घाटन में ही गीता का एकीभूत अर्थ— गांभीर्य और अनुपम श्री संवर्द्धन है। यहाँ सारे आवरणों को उठा वह स्पष्ट करती है कि वे परमेश्वर सर्वव्याप्त हैं, अतएव मनुष्यों को सबके साथ आत्मैक्य ढूंढ निकालना तथा समस्त पदार्थों व प्राणियों को 'आत्मौक्येन सर्वत्र' अनुभवकर तदनुसार कर्म करना होता है। इसी संगमस्थल में अवगाहन से भागवत सत्ता के अंतर्दर्शन होते हैं तथा सारा अंतर्जगत विश्वमय हो जाता है। यह मिलन उन्हीं परम प्रिय से है, जो माता-पिता-सखा सर्वभूतों के अंतरात्मा के आश्रय हैं। गीतोक्त उपदेश का यही परम और पूर्ण अर्थ है। यही वह ज्ञान है, जिसे प्रकट करने के लिए भगवान वचनबद्ध हुए थे। इस ज्ञान की प्राप्ति के विविध साधनरूप ज्ञान, कर्म और भक्ति को निरूपणकर— इन सबको समन्वयकर वे उस परम वचन को कहते हैं, जिसे अभी रख छोड़ा था। यह छोड़ना मात्र इसलिए था, क्योंकि अभी तक अर्जुन की बुद्धि तर्क-प्रवण थी; पर उसने तर्क की जगह ग्रहणशीलता तथा विनम्रता अर्जित कर ली है। उस परम वचन कहने के पूर्व 'बौद्धिकता का अहं गया कि नहीं', इसका पुनः परीक्षण अथ 'चे त्वमहंकारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि' कहकर करते हैं। ग्रहणशीलता, तर्क-प्रवणता की जगह भाव-प्रवणता के बारे में आश्वस्त हो पुनः निष्कर्ष रूप वचनों का गांभीर्य प्रकट करने के लिए 'परमं वच' शब्द का प्रयोग करते है।

पूर्व कथन को— 'इति ते ज्ञान भारव्यातं गुहृयाद् गुह्यतरं मया' अर्थात गुह्य और गुह्यतर बताते हुए महावाक्य की श्रेष्ठता एक बार पुनः इंगित करते हुए उसे सर्वगुह्यतमं बताकर वे भूयः श्रुणु मे परमं वचः' कहते है। इस प्रकार बार-बार निरीक्षण-परीक्षण करने, स्वतः इसको सर्वगुहृतम् तथा परम वचन स्वीकारने से इस महावाक्य की दिव्यता-श्रेष्ठता स्वतः प्रमाणित हो जाती है। इस उपदेश को सुनने का अधिकारी अर्जुन सहज ही हो गया हो, ऐसा भी नहीं है। उसने मन और बुद्धि को परम पुरुष के चरणों में समर्पितकर वह पात्रता अर्जित की थी, जिसके कारण उन्होंने स्वयं कहा— 'ते प्रीयमाणाय वक्ष्यामि हितकाम्यया इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम्' आज भी कोई अंतःकरण व हृदय से इस भाव को ग्रहण करे तो वह अर्जुन की तरह अंततः स्वयं भगवत्सत्ता से इस अंतिम आदेश को सुनने का अधिकारी हो सकता है।

इस महावाक्य के महान संगीत का परम स्वर गीता अपने अंतिम श्लोकों में घोषित करती है। "मन्मना भव मद्भक्तो, मद्याजी मां नमस्कुरु। मामैवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे॥” “सर्व धर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं ब्रज। अहं त्वां सर्वपायेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच॥”

यह महावाक्य ज्ञान-कर्म-भक्ति तीनों की समन्वय साधना का साध्यस्थल है। यहाँ सब कुछ एकत्व में परिणत हो जाता है। अद्वैत, एकमेवाद्वितीयं के उत्कर्ष का स्थल यही है, पर इसका यह चरम लाभ मात्र इसको तोते की तरह रटते रहने मात्र से प्राप्त नहीं होता। इसके लिए तो अर्जुन की तरह 'करिष्ये वचनं तव' की कठोर प्रतिज्ञा में आबद्ध होना पड़ता है। निज की क्षुद्र आकांक्षाओं— अभिलाषाओं को भागवत इच्छा में समाहितकर उसी को सहज स्वीकार करना पड़ता है। ऐसा करने पर ही भागवत प्रतिज्ञा साकार रूप में परिणत होगी।

यह ऐसा संगमस्थल है, जहाँ सारे मत अपना वैचित्र्य त्यागकर एकरूप हो जाते हैं। विलक्षण बुद्धि वाला हो या बुद्धिहीन, सभी यहाँ शांति प्राप्त करते हैं, क्योंकि सारा मर्म आचरण में निहित है। आचरण ही इस महावाक्य की व्याख्या है। इस महावाक्य का चालीस वर्षों तक निरंतर मननकर आचरण में उतारने वाले गांधी जी ने गीता माता में अपने सार-निष्कर्ष को स्पष्ट करते हुए लिखा है— “गीता के अनुसार आचरण करने में प्रतिदिन निष्फलता प्राप्त होती है, इस निष्फलता में हम सफलता की उगी हुई किरणों की झाँकी देखते है।"

उनके ये शब्द यथार्थ हैं। प्रारंभ में हमारा अनगढ़ मन संभव है निष्फल हो, पर परिपूर्ण निष्ठा से 'करिष्ये वचनं तव' की प्रतिज्ञा पूरी करने के लिए जुट पड़ने से हमारा जीवन वर्त्तमान जटिलताओं से उबरकर ज्योतिर्मय शिखरों तक सुनिश्चित रूप में जा पहुँचेगा।


सद्वाक्य

शत्रुओं से बचो, पर मित्रों से सावधान रहो।


सूक्ष्मजगत— प्रकृति और पुरुष के रूप में

आमतौर से संसार उतना ही बड़ा दीखता हैं, जितना कि वह इंद्रियों या उपकरणों के सहारे अनुभव में आता है। उतने को ही सब कुछ समझा जाता है। उतने से ही संपर्क रखा जाता है। ध्यान रखने और व्यवस्थित करने के लिए भी उतने को ही पर्याप्त माना जाता है, पर वह उतना सीमित है नहीं, जितना कि मोटी समझ बताती है।

शरीर प्रत्यक्ष है, इसलिए उसी की आवश्यकता, व्यवस्था एवं सज्जा के लिए उपाय बरते जाते हैं। मन, बुद्धि, चित्त आदि के चेतना-पक्ष अदृश्य हैं, इसलिए उनके संबंध में कुछ सोचने में, व्यवस्था बनाने में उपेक्षा बरती जाती रहती है। इसे अदृश्य की अवमानना भी कह सकते हैं।

पानी-मिट्टी से रोज ही वास्ता पड़ता है, पर यह कभी ध्यान भी नहीं आता कि उनमें विद्यमान रसायन एवं जीवाणु हमारे लिए कितने उपयोगी-अनुपयोगी भूमिका निभाते हैं।

आकाश में तारे, सूर्य, चंद्र या बादल भर दीख पड़ते हैं, पर उस परिवार में जीवनतत्त्व का अनंत शक्तिस्रोतों का प्रवाह चलता है। यह विशेषज्ञों के अतिरिक्त सामान्य बुद्धि की पकड़ में नहीं आता। अंतरिक्ष में बहती रहने वाली हवा का ऑक्सीजन भाग ही जीवधारियों का जीवन-प्राण है। वह न रहे या घट जाए तो दम घुटने से सभी का प्राणांत हो जाए। जीवन अन्न-जल पर निर्भर माना जाता है, पर वस्तुतः उसका उद्गम-स्रोत आकाश है, जो मात्र नीली पोल भर प्रतीत होता है।

रेडियो तरंगें, एक्सरे, अल्फा, अल्ट्रासोनिक, लेजर आदि किरणों-तरंगों का आकाश में साम्राज्य है। वे ईश्वर के ब्रह्मांडव्यापी महासागर में क्रीड़ा-कल्लोल करती रहती हैं। पृथ्वी इसलिए जीवधारियों से और वनस्पतियों से सुसज्जित बन सकी कि उस पर सौर-ऊर्जा संतुलित परिमाण में आती है, यदि ऐसा न होता तो समीपवर्त्ती होने पर वह भी बुध की तरह आग का गोला बन जाती अथवा दूरी अधिक होने पर प्लूटो की तरह अतिशीतल-निस्तब्ध बनकर रह गई होती। पृथ्वी पर जो कुछ भी है, उसे वस्तुतः अंतरिक्ष का अनुदान ही माना जा सकता है।

सूर्य ही नहीं, ब्रह्मांडव्यापी घटकों से भी पृथ्वी को कुछ-न-कुछ उपहार निरंतर मिलता रहता है। पृथ्वी और सूर्य को यदि माता-पिता माना जाए तो अन्य ग्रह-नक्षत्रों को चाचा-ताऊ, भाई-भतीजा, नाना आदि मानकर चलना होगा, जिनका दुलार, सहयोग एवं अनुदान भी कम मूल्यवान नहीं होता। इतने पर भी कितने यह समझ पाते हैं कि अपने पुरुषार्थ के अतिरिक्त अपने वैभव-सौभाग्य में कोई और भी साझीदार है।

अदृश्य जगत की विशालकाय सत्ता है। उसकी तुलना में पृथ्वी तो एक छोटी मछली के समान है। समुद्र का पानी जब तक सही स्थिति में है, तभी तक मछली का भी अस्तित्व है, अन्यथा विपरीत स्थिति आने पर उसके लिए तो महाप्रलय ही आ खड़ी होगी।

अंतरिक्ष और पृथ्वी के बीच उपयुक्त तालमेल बना रहे, इसकी भूमिका उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव निभाते हैं। जो भला-बुरा पृथ्वी पर आकाश से निरंतर बरसता रहता है, इसमें से उपयोगी अंश उत्तरी ध्रुव की छलनी छानकर रख लेती है और शेष कचरे को दक्षिणी ध्रुव में होकर फिर उसी अनंत गह्वर में धकेल देती है। प्रकृति-संपदा का इसी प्रकार आदान-प्रदान होता रहता है। कहने वाले तो यहाँ तक कहते हैं कि जीवन पृथ्वी की अपनी उपज नहीं है। वह किसी अन्य विकसित ग्रहपिंड से यहाँ संयोगवश आ उतरा है। मनुष्य भटका हुआ देवता इसी आधार पर कहा जाता है।

यह प्रकृति-परिकर में जड़-जीवन की चर्चा हुई। इसके अतिरिक्त 'चेतन' का एक और पक्ष है, जिसे जड़-जगत से असंख्य गुना महत्त्वपूर्ण माना जा सकता है। कोई शरीर कितना ही समर्थ व सुंदर क्यों न हो, पर उसकी समस्त गतिविधियाँ अदृश्य स्तर की मानसिक चेतना के माध्यम से ही संचालित होती है। उसके मूर्छित हो जाने पर शरीर गहरी प्रसुप्ति में चला जाता है और बड़े परेशान होने पर भी कुछ पता नहीं चलता। यदि प्राण निकल जाए तो प्रौढ़ शरीर के लिए हिलना-डुलना तो दूर, कुछ समय भी लाश का अस्तित्व बनाए रहना संभव न हो सकेगा। कीड़े-कौवे ही उसका सफाया कर देते हैं। इस दुर्गति से बचाने के लिए ही उसे मिट्टी में दबाने या आग में जलाने का उपक्रम किया जाता है। शरीर का सब कुछ दृश्य प्रतीत होता रहने पर भी वस्तुतः वह प्राणशक्ति की कठपुतली भर है। जो शरीर के नष्ट हो जाने पर भी अपनी सत्ता किसी-न-किसी रूप में बनाए रहती है और परलोक आदि में भ्रमण करती हुई नया जन्म धारण करती है। उसे अनादि-अनंत और अजर-अमर भी कहा गया है। महत्ता उसी की है, गरिमा भी उसी की।

प्रकृति से संबंधित सूक्ष्मजगत का रहस्योद्घाटन भौतिक विज्ञान के अंतर्गत निरंतर होता चल रहा है। उसी जानकारी के आधार पर रेडियो, टेलीविजन आदि काम करते हैं। एक्सरे, लेजर आदि का प्रयोग होता है और उपग्रहों को पृथ्वी की कक्षा में घुमाने से लेकर अंतर्ग्रही खोज पर भेजा जाता है। जो अभी तक जाना गया है, अगले दिनों उससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण जानकारियाँ प्राप्त करने की तैयारी है; तब मनुष्य के हाथ में पवन-बादल आदि की लगाम होगी और सूर्य ईंधन की आवश्यकता की पूर्ति करने लगेगा। हो सकता है अंतरिक्ष में नगर बसने लगें और ग्रह-उपग्रहों के बीच आदान-प्रदान चल पड़े।

इससे अधिक व्यापक और अधिक समर्थ चेतनापरक सूक्ष्मजगत है। पदार्थसत्ता से भरे सूक्ष्मजगत की कुंजियाँ पदार्थ विज्ञानियों के हाथ लगती रही, पर चेतनसत्ता वाले सूक्ष्मजगत के संबंध में अधिक जानकारियाँ सचेतन तेजपुंज ही अनुभव करते हैं। उससे लाभ लेते व उसे प्रभावित करके अभीष्ट अनुदान हस्तगत करते हैं।

यह आत्मा और परमात्मा का विषय है। आत्मा अणु है, परमात्मा विभु। आत्मा बिंदु है और परमात्मा सिंधु। दोनों के बीच वैसा ही तादात्म्य है जैसा कि परमाणु और सौरमंडल के बीच। इन दोनों के बीच आदान-प्रदान और सहयोग-सहकार जिन महान नियमों और सिद्धांतों के आधार पर बना हुआ है, इसी का अनुसरण परमाणु और उसके सहयोगी घटक भी करते हैं। ब्रहमांडीय चेतना को ही परब्रह्म या परमात्मा कहते हैं। इसका एक छोटा किंतु दिव्य सत्ता के अंतर्गत विधान सभी शक्तियों का प्रतीक-प्रतिनिधि है। दोनों के बीच यों प्रत्यक्ष संबंध सदा ही दृष्टिगोचर नहीं होता। दोनों की स्थिति पृथक-पृथक है। फिर भी दोनों एकदूसरे के साथ परोक्ष रूप से एक ही संबंध-सूत्र में जुड़े हुए हैं, जिसे विकसित कर लेने पर आदान-प्रदान का उपक्रम अधिक बड़े रूप में चल पड़ता है। ऋषिकल्प आत्माएँ इसी प्रक्रिया में प्रवीण-पारंगत हो चुकी होती हैं। मानव में देवत्व के उदय का अर्थ है— जीवन में ब्रह्मसत्ता की अपेक्षाकृत अधिक मात्रा में अवधारणा— अवतरण होना।

जीवात्माओं का चौरासी लाख योनियों में परिभ्रमण का उपक्रम इसी चेतना के सूक्ष्मजगत में संपन्न होता है, जिसे परलोक कहते हैं। कर्मफल के चरितार्थ होने की व्यवस्था इसी क्षेत्र में बनती है। मरण के उपरांत नया जन्म लेने तक प्राणी इसी क्षेत्र में विहार करता है— स्वर्ग-नरक भोगता है। देवशक्तियों की प्रचंड हिलोरें इसी महासागर में उठती रहती हैं और वे प्राणियों के नियंत्रण-परिपोषण-परिवर्द्धन की भूमिकाएँ संपन्न करती हैं। ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र आदि नामों से इन्हीं दिव्य तरंगों को जाना जाता हैं।

तपस्वी अपनी दिव्य आकर्षणशक्ति को असाधारण रूप से विकसित करके इस स्थिति में पहुँचते हैं कि चेतना के महासमुद्र में से अपने उपयोग के लिए आवश्यक मणिमुक्तक ढूंढ निकालें। ऋद्धि-सिद्धि इन्हीं उपलब्धियों को कहा जाता है। स्वर्गमुक्ति का आनंद इस चेतना-महासमुद्र में तैरते हुए ही लिया जाता है। नरक की व्यवस्था इसी के एक कोने में है। अध्यात्म का समूचा आधार इस अदृश्य लोक पर टिका है, जो निखिल विश्वब्रह्मांड में परमात्मा बनकर और आत्मा बनकर मानवी अंतराल में विद्यमान है।


इक्कीसवीं सदी की समझदारी को चुनौती

यों समझदारी का अस्तित्व कभी मिटता नहीं और प्रगति-पथ पर बढ़ता हुआ मानवी प्रयास कभी रुकता नहीं। फिर भी इन दिनों जो व्यापक विपन्नताएँ सब ओर छाई और घनीभूत हो रही हैं, उन्हें अनदेखा भी नहीं किया जा सकता। वे आज भले ही चिनगारी के रूप में हो, पर अगले दिनों उनके दावानल बनने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता। समय रहते गंभीर समस्याओं पर विचार करना और उन्हें सुलझा लेना ही बुद्धिमानी है।

औद्योगीकरणजन्य प्रदूषण की बढ़ोत्तरी मानवी अस्तित्व के लिए चुनौती है। हवा में विषाक्तता इस सीमा तक घुलती जाती है कि अगले दिनों प्राणी-समुदाय के घुट मरने का खतरा है। उद्योगों से निस्सृत रसायन और नगरों की गंदगी जलस्रोतों को अपेय बनाती जा रही है। ऊर्जा के अत्यधिक प्रयोग से जहाँ एक ओर संसाधन खत्म होते चले जा रहे हैं, वहाँ विश्वभर में सामान्य तापमान भी बढ़ता चला जा रहा है। ध्रुवों के पिघलने और समुद्रों में उफान आने की संभावना है। इस उथल-पुथल में जल-प्रलय आ सकती है और मौसम परिवर्तन का चक्र हिम-प्रलय की स्थिति भी उत्पन्न कर सकता है। इससे अंतरिक्ष बुरी तरह प्रभावित हो रहा है। ओजोन की परत के फटने का सिलसिला कुछ दिन इसी प्रकार और चला तो ब्रह्मांडीय किरणें धरातल की सुषमा को चना-चबैना की तरह भूनकर रख सकती है।

औद्योगीकरण की आतुरता— खपत के लिए मंडियाँ हथियाने की होड़ में तीसरे विश्वयुद्ध की तैयारियों में जुटी है। अणु-आयुधों ने विश्वविनाश की विभीषिका को फुलझड़ी जलाने जैसा सरल बना दिया है। सुरक्षा के नाम पर बढ़ती सैन्यशक्ति में देशों की जनशक्ति और धनशक्ति बुरी तरह खप रही हैं। साधन दूसरी दिशा में मुड़ जाने के कारण विकासक्रम बुरी तरह अवरुद्ध हो रहा है। अणुशक्ति के उद्भव ने उसके विकिरण के विषाक्त कचरे को ठिकाने लगाने का प्रश्न एक अनबूझ पहेली बना दिया है।

धातुओं और खनिज, तेलों-कोयले की खपत इस तेजी से बढ़ रही है कि आदिकाल से संचित उस बहुमूल्य संपदा का समापन एक शताब्दी के भीतर हो सकता है। ऐसी दशा में कारखाने और वाहन किस आधार पर चल सकेंगे, उन्हें बंद होना पड़ेगा तो जो स्थिति बनेगी, उससे निबटना कैसे संभव होगा?

जनसंख्या की अनियंत्रित वृद्धि अपने समय की असाधारण समस्या है। धरती के साधन उसकी तुलना में कम पड़ते जा रहे हैं। धरातल को रबड़ की तरह खींचा और फैलाया न जा सकेगा। ऐसी दशा में आहार, निवास, शिक्षा, आजीविका आदि के साधन कहाँ से मिलेंगे? सरकारी विकास-प्रयास कितने ही क्यों न तेजी से चलें, बढ़ती हुई माँग उससे सदा आगे रहेगी और पिछड़ापन हटाने का स्वप्न साकार किस प्रकार हो सकेगा? ईंधन और आवास की आवश्यकता पेड़ों के कटने के रूप में निकलेगी तो वर्षा घटेगी, रेगिस्तान बढ़ेंगे, भू-क्षरण होगा और अशुद्ध वायु की बढ़ोत्तरी जैसे अनेक संकट खड़े होंगे।

प्रकृति का माता की तरह दूध तो पिया जा सकता है, पर जब महत्त्वाकांक्षी लालसाएँ उसके साथ अतिवादी आक्रमण रुख अपनाएगी तो प्रतिक्रिया भयावह रूप में ही सामने आ सकती है। आए दिन बाढ़, सूखा, दुर्भिक्ष, भूकंप, तूफान जैसे संकटों का बढ़ता अनुपात उस खतरे की निशानी है, जिसमें प्रकृति का अतिक्रमण इतना महँगा पड़ सकता है, जिसका समय निकल जाने पर कोई भी प्रायश्चित संभव न हो सके। जलाशयों का बढ़ता प्रदूषण जलचरों का प्राणहरण करने पर उतारू है। वे न रहेंगे तो समुद्र, सरोवरों, नदियों की सफाई कैसे होगी? आकाश में उपग्रहों का कचरा जमा होता जाता है। स्टार वाॅर, लेसर वाॅर, केमीकल वाॅर जैसी तैयारियाँ जनसाधारण व भावी पीढ़ी के लिए क्या संकट खड़े करेगी, इसका अनुमान लगाने से वह कहानी याद आती है, जिसमें एक व्यक्ति अपनी एक सोने का अंडा रोज देने वाली मुर्गी का पेट चीरकर सारे अंडे एक ही दिन में जमा करने के लालच में आतुर होकर उस मुर्गी से ही हाथ धो बैठा था।

यह विश्वव्यापी प्रत्यक्ष समस्याओं में से कुछ है, पर इतने भर से ही विभीषिकाओं का अंत नहीं मान लेना चाहिए। लोक-मानस पर संकीर्ण स्वार्थपरता, भावी परिणामों को नजर अंदाज करने वाली अदूरदर्शिता, आतुर भोगलिप्सा, दूसरों के हितों की उपेक्षा जैसी दुष्प्रवृत्तियाँ मानव स्वभाव का अंग बनती जा रही है। परिणाम इस रूप में सामने आ रहे हैं कि मानवी गरिमा के साथ जुड़ी हुई मर्यादाओं का परिपालन और वर्जनाओं पर नियंत्रण एक प्रकार से उपहासास्पद ही बनता चला जा रहा है। स्वेच्छाचार से लेकर अनाचार तक पर उतारू रहना फैशन बन गया है। बढ़ता हुआ अहंकार प्रदर्शन और अपव्यय के रूप में पनप रहा है, विलगाव और टकराव तो उसका सहज स्वभाव है ही। इन दुष्प्रवृत्तियों के अभिवर्द्धन ने संयुक्त परिवार जैसी पुण्यपरंपरा को तहस-नहस करके रख दिया है। समाजनिष्ठा का बुरी तरह ह्रास हुआ है। अनुशासन और अंकुश अपनाने के लिए कम ही लोग तैयार दीखते है। तात्कालिक लाभ के लिए भविष्य को दाँव पर लगाने वाली अदूरदर्शिता ने अब लोक-प्रचलन का रूप ले लिया है। बहुमत इसी ढाँचे में ढल रहा है। सज्जनों का बिखराव विशृंखलित और उदारवादी कायरता ओढ़ लेने के बाद ऐसा नहीं रह गया है कि वह अवांछनियताओं से लोहा लेने का कोई कारगर प्रयत्न कर सके। ऐसी दशा में अनौचित्य का दिन-दूनी रात-चौगुनी गति से बढ़ते जाना स्वाभाविक है। यही है— असंख्य समस्याओं में से कुछ, जिन पर विचार करने से विचारशीलों को भविष्य अंधकारमय दीखता है।

इन परिस्थितियों में सबसे बड़ा मार्मिक तथ्य यह है कि लोग निराश होते जा रहे हैं। ऐसी किरणें उदय होती देख नहीं पा रहे हैं, जिनसे उपरोक्त सभी संकटों के निराकरण का विश्वास बँध सके, आशा जग सके और उसके आलोक में उज्ज्वल भविष्य की संभावना पर विश्वास जम सके। इसके बिना इतने प्रबल प्रयत्न बन नहीं पड़ेंगे, जो प्रस्तुत घटाटोप के हर पक्ष से निबटने के लिए सृजन प्रयोजनों में जुट सकें। इस तथ्य को समझ ही लिया जाना चाहिए कि बिना सच्चे जनसमर्थन और सहयोग के ऊपर से थोथी कोई योजना पूरी तरह सफल नहीं हो सकती। सरकारें भी अपने बलबूते कुछ सीमित ही कर पाती हैं। इतना सीमित जिसे सराहा भर जा सकता है और सब कुछ समय रहते ठीक हो जाने पर सहज विश्वास नहीं किया जा सकता।

आखिर किया क्या जाए? गतिरोध से निबटा कैसे जाए? सघन तमिस्रा के बीच प्रकाश का कोई कारगर आधार खड़ा कैसे किया जाए? इसके उत्तर में कईयों को कई बातें सूझ सकती हैं, पर इन पंक्तियों में यह अभिव्यक्ति प्रकट की जा रही है कि किसी प्रकार जनमानस की निराशा हटाकर उसके स्थान पर उज्ज्वल भविष्य की संभावना का ऐसा विश्वास उत्पन्न किया जाए, जिसके आधार पर लोकशक्ति में अभिनव स्फुरणा उत्पन्न हो और उसका स्तर इस सीमा तक उठे कि हर व्यक्ति योग्यता, क्षमता एवं परिस्थिति के अनुरूप सृजन-प्रयोजनों में जुट पड़े। सृजन-अभिवर्द्धन का दूसरा पक्ष अवांछनियताओं का उन्मूलन भी माने। इस हेतु कारगर सक्रियता अपनाए।

लोक-मानस जब विधेयात्मक चिंतन करता है तो लोकशक्ति के रूप में प्रकट होता है और वह उज्ज्वल भविष्य की संरचना जैसे लक्ष्य के साथ यदि नियोजित किया जा सके तो उसका परिणाम चमत्कारी हो सकता है— होता रहा है, इसका इतिहास साक्षी है।

बुद्ध ने लोक-मानस को झकझोरा और उसे तात्कालीन अवांछनियताओं से लड़ पड़ने के लिए जुटाया, तो लाखों भिक्षु-भिक्षुणियों का समुदाय धर्मचक्र-प्रवर्त्तन की उमंगों से भरपूर होकर संसार भर के कोने-कोने में पहुँचा। सघन अंधकार में प्रकाश उत्पन्न करने में समर्थ हुआ।

गांधी की आँधी अभी कुछ दिन पूर्व ही आई थी। उनने सत्याग्रहियों की— क्रांतिकारियों की विशाल सेना मैदान में लाकर खड़ी कर दी। टकराने वाले ब्रिटिश साम्राज्य को उलटे पैरों लौटना पड़ा।

जर्मनी के साथ जूझने में इंग्लैंड की एक समय प्रायः कमर टूट गई थी। तात्कालीन प्रधानमंत्री विस्टन चर्चिल ने एक छोटा-सा नारा दिया था— उंगलियों को 'वी' की मुद्रा में बनाकर 'वी फार विक्ट्री।' उस नारे को हर वस्तु पर अंकित कर दिया गया। निराशा उत्साह में बदली। टूटा मनोबल जुड़ा और अंततः ब्रिटेन व साथी राष्ट्र जीतकर ही रहे। हिटलर की 'मीनकेंफ' और 'माओ की लाल किताब' ने यूटोपिया की तरह जनजीवन में उनके उज्ज्वल भविष्य के सपने ही संजोएँ। नेपोलियन, जोन ऑफ आर्क, लिंकन आदि में यही विशेषता थी कि अपने मनोबल के सहारे साथियों को तनकर खड़ा होने के स्तर तक उछाल देते थे।

हनुमान ने रीछ-वानरों को उल्लसितकर उनमें वह उत्साह जगाया कि अति महत्त्वपूर्ण रामकाज कर सकना उस क्षुद्र मंडली के लिए संभव हो सका। कृष्ण द्वारा अर्जुन को ऐसा ही उद्बोधन दिया गया था। निराश व्यक्तित्व उत्साहित हुआ तो वह न केवल बड़ी सेना खड़ी कर सका, वरन विशाल कौरव दल को परास्त करके विजयश्री का वरण भी कर सका। संसार भर में अनेक क्षेत्रों में एक से बढ़कर एक महत्त्वपूर्ण चमत्कारी कार्य उल्लसित जनमानस के सहारे ही संभव हो सके हैं। राजतंत्र के स्थान पर प्रजातंत्र और साम्यवाद जैसी स्थापनाएँ इसी आधार पर संभव हुई। दासप्रथा को लोकमत ने ही उखाड़ फेंका। अगणित कुरीतियों का उन्मूलन भी इसी आधार पर संभव हुआ।

समय की महती आवश्यकता यह है कि निराशा के— परस्पर दोषारोपण के माहौल को बदला और उसके स्थान पर आशा भरा, उत्साह-सत्साहस भरा प्रकाश जनमानस में प्रतिष्ठित किया जाए। इस उभार को उन सृजनात्मक कार्यों में लगाया जाए जो समय की महती आवश्यकता को पूरा करे। कार्यों का चुनाव हर व्यक्ति अपनी योग्यता, क्षमता एवं परिस्थिति के अनुरूप कर सकता है। अभ्युदय के निर्मित हर क्षेत्र में ऐसे कार्य करने पड़े हैं, जिनमें हर किसी को किसी-न-किसी प्रकार सहयोगी बनने का अवसर मिल सकता है।

आज का नारा होना चाहिए— 'इक्कीसवीं सदी बनाम उज्ज्वल भविष्य' (ट्वेंटी फर्स्ट सेंचुरी एडवेंट ऑफ ब्राइट फ्यूचर)। अभी बारह वर्ष इस बीसवीं सदी के पूरा होने में शेष हैं। इस अवधि में हमें खेत जोतने, गुड़ाई करने, मेड़ बाँधने, खाद डालने, बीज बोने जैसी वे आवश्यकताएँ पूरी कर लेनी चाहिए, जो हर किसान को फसल लहलहाती देखने से पहले करने होते हैं। युग बदलने के लिए लंबा समय अपेक्षित है, बिगाड़ की दिशा में पिछली दो शताब्दियों में द्रुतगति से बढ़ा गया है। बिगड़ने की अपेक्षा बनाने में स्वभावतः अधिक समय लगता है। बहुत तेजी की जाए तो भी एक सदी लग जाना स्वाभाविक है; इसलिए इक्कीसवीं सदी को नवसृजन की शताब्दी के नाम से जाना जाए तो यह उचित ही होगा। बीसवीं सदी के अंतिम बाहर वर्ष तो उसी दिशा में सोचने— योजना बनाने में लगने चाहिए।

बीसवीं सदी के अंतिम दिन कष्टकर होने और इक्कीसवीं सदी से 'सतयुग की वापसी' का माहौल दीख पड़ने की बात अनेक भविष्यवक्ता दिव्यदर्शी, विश्व समीक्षक, दार्शनिक आदि अपने ढंग से कहते रहते हैं। अब इस दिशा में किया यह जाना चाहिए कि हर स्तर के लोग तर्क, तथ्य, प्रमाण और आधार प्रस्तुत करते हुए इस निष्कर्ष पर पहुँचने और पहुँचाने का प्रयत्न करें कि हम विनाश से विरत होकर विकास की दिशा में बढ़ने के लिए कटिबद्ध हो सकें। बीसवीं सदी के अंत वाले प्रस्तुत बारह वर्षों में हम इतना कुछ कर चुके होंगे कि इक्कीसवीं सदी में वर्षा ऋतु जैसी हरियाली का मखमली फर्श चारों ओर बिछा दीख पड़ेगा। इस दिशा में विश्वास तो हर किसी के मन में जगाना चाहिए। यह आगे की बात है कि मूर्धन्य अथवा साधारण लोग इसके लिए क्या और किस प्रकार कुछ करें?


रंगों में छिपे हैं बड़े-बड़े गुण

ऋग्वेद में सूर्य को जगत की आत्मा कहा गया है। वस्तुतः इस संसार में जो कुछ भी विकासक्रम चल रहा है— हलचलें दृष्टिगोचर हो रही हैं, उन सबका शक्तिस्रोत सूर्य— सविता देवता ही है। यदि उनका अस्तित्व न होता तो हमारी धरती एक अंधकारमय, निस्तब्ध, शीतल, निर्जीव पिंड के अतिरिक्त और कुछ न होती। जो कुछ भी हरीतिमा का मखमली कवच, जीव-जगत में स्पंदन विद्यमान है, वह सूर्य के ही कारण है।

संसार की अनेकानेक आवश्यकताओं की पूर्ति के अतिरिक्त सूर्य मनुष्य को आरोग्य भी प्रदान करता है। शास्त्रवचन है— 'आरोग्यं भास्करादिच्छेत्' अर्थात आरोग्य की सूर्य से याचना करें। सूर्यसंपर्क में रहने से आरोग्य सुरक्षित रखा जा सकता है और रोगों के उपद्रवों को भी सूर्य-किरणों की महाशक्ति के सहारे दूर किया जा सकता है।

सूर्य की किरणों में तीन रंग ही प्रमुख माने गए हैं। ये है पीला, लाल और नीला। विशेषज्ञों की मान्यता है कि पीला रंग वायुप्रधान, लाल रंग पित्त का तथा नीला रंग कफ का प्रतिनिधित्व करते हैं। आयुर्वेद में चिकित्सा उपचार का मूलभूत आधार भी शरीर में वात, पित्त और कफ की स्थिति को माना गया है और कहा गया है कि इन तीनों दोषों के प्रकुपित होने से ही विभिन्न रोग उत्पन्न होते हैं। उसमें तीनों दोषों के अलग-अलग रंग बताए गए हैं, जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है। वात का रंग पीला, पित्त का लाल और कफ का नीला वर्ण माना गया है। इसके अतिरिक्त इनके मिश्रित रंग और उनके प्रभाव भी अलग-अलग होते हैं। वात-पित्त के सम्मिश्रण से नारंगी रंग, वात और कफ के मिश्रण से हरा एवं पित्त-कफ के मिलन से बैंगनी रंग उत्पन्न होने की बात कही गई है। त्रिदोषजन्य विकार से सन्निपात की उत्पत्ति मानी जाती है। उसमें प्रायः सभी रंग-प्रकंपनों की कमी हो जाती है, जिससे शरीर सफेद दिखाई देने लगता है। इस प्रकार इन तीनों दोषों और उनके मिश्रित स्वरूप को जानकर विशेषज्ञ संबंधित रंगीन रश्मियों के माध्यम से उसका उपचार कर सकते हैं। वेदों में कहा भी गया है— सूर्य-किरणों के दैनिक प्रयोग से मनुष्य वात, पित्त और कफ नामक त्रिदोषों से उत्पन्न होने वाले समस्त रोगों से छुटकारा पाकर सौ वर्षों तक जीता रह सकता है। निश्चय ही विभिन्न रंग मानव जीवन की गतिविधियों को प्रभावित करते हैं। सूर्य की प्रकाश-किरणों के केवल सात रंगों का ही हमें ज्ञान है, किंतु उनके हल्के-भारी सम्मिश्रणों से प्रायः 10 लाख रंग बन सकते हैं। इनमें से विभिन्न जीव-जंतु अपनी−अपनी नेत्र-क्षमता के अनुरूप ही रंग देख सकते हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि इससे आगे के रंग-प्रकंपन हमारी आँखों की ग्राह्य क्षमता से बाहर हैं।

रंग-चिकित्सा-विशेषज्ञों के अनुसार रंगों से विशेष प्रकार का वातावरण बनता है। वस्त्रों में, कमरे की दीवारों में, फर्नीचर में किस प्रकार के रंग लगे होते है, वे अपना प्रभाव उनका उपयोग करने वालों पर भी छोड़ते हैं। लाल रंग गरमी, उत्तेजना और चिड़-चिड़ापन उत्पन्न करता है। इससे स्नायुविकार उत्पन्न हो सकते हैं। इसके विपरीत नीला रंग शीतल और शांतिदायक होता है। गरमी वाले मौसम या स्थान में नीले रंग का उपयोग करने से आंखों के माध्यम से शरीर को भी राहत मिलती है। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण हरे चश्मों का प्रयोग है। लाल काँच वाला चश्मा लगाकर निकला जाए तो चारों ओर आग बरसती दिखाई पड़ेगी और मस्तिष्क गरम होने लगेगा। इसके विपरीत हरा या नीला चश्मा लगाकर निकलने पर कड़ी धूप भी हलकी प्रतीत होती है और बदली-सी छाई लगती है।

कायिक संरचना में भाग लेने वाले तत्त्वों एवं शरीर की क्रियापद्धति पर रंगों का प्रभाव होता है। रंग-चिकित्सा विज्ञान का आधार भी यही है। सरदी-गरमी की मात्रा घटाने-बढ़ाने में भी रंग सहायक होते हैं। इसके अतिरिक्त उनका मनोवैज्ञानिक प्रभाव भी कम नहीं है। हर रंग में कुछ विशेष भावनाएँ— उत्तेजित एवं शांत करने का गुण है। जो लोग जिस प्रवृत्ति की विशेषता अपने भीतर बनाए होते हैं, वे तदनुरूप रंग पसंद करते और चुनते हैं। इसी प्रकार जिन्हें जिस भावना से प्रेरित-प्रभावित करना होता है, उनके लिए उस रंग के आवरण-आच्छादन जुटाने का प्रबंध आवश्यक होता है। फूलों के बगीचे में परिभ्रमण करने, उन्हें घर-आँगन में लगाने, मेज पर गुलदस्ता सजाने से— रंगों से मन-मस्तिष्क को प्रभावित करने की आवश्यकता पूर्ण होती है।

रंग-विशेषज्ञों का कहना है कि नीले रंग के साथ स्नेह-सौजन्य, शांति, पवित्रता जैसी प्रवृत्तियाँ जुड़ती हैं। लाल रंग उग्रता, उत्तेजना, संघर्ष का प्रतीक है। सफेद में सादगी, सात्त्विकता, सरलता की क्षमता है। चाकलेटी रंग में एकता, ईमानदारी, सज्जनता के गुण हैं तो पीले रंग में संयम, आदर्श, पुण्य, परोपकार का बाहुल्य है। हरे रंग में ताजगी, उत्साह, स्फूर्ति एवं शीतलता का प्रभाव है। काला रंग तमोगुणी है, उसमें निराशा, शोक, दुःख एवं बोझिल मनोवृत्ति का परिचय मिलता है। नारंगी जीवन में आत्मविश्वास तथा साहस की जानकारी देता हैं। गुलाबी रंग में आशाएँ, उमंगें और सृजन की मनोभूमि बनाने की विशेषता है।

सुप्रसिद्ध रंग-विशेषज्ञ एंथोनी एल्डर के अनुसार बहिर्मुखी जीवन लालिमाप्रधान होता है। अंतर्मुखी जीवन में नीलाकाश जैसी उदात्त मनःस्थिति होती है। पीले रंग को कर्मठता तत्परता और उत्तरदायित्व निर्वाह की भावचेतना का प्रतीक माना जा सकता है। हरे रंग को स्थिरता और बुद्धिमत्ता का प्रतिनिधि समझा गया है। एल्डर कहते हैं कि स्वभावगत विशेषताओं को घटाने-बढ़ाने के लिए उन रंगों का उपयोग या बहिष्कार करना चाहिए, जिनमें अभीष्ट विशेषताओं का समावेश है। प्रख्यात मनोरोग-चिकित्सक डाॅ. गोल्ड स्फेन ने विभिन्न रोगों से या कठिनाइयों से ग्रसित लोगों पर रंगों का प्रयोग किया है और उनके समाधान प्रस्तुत करने में सफल हुए हैं। उन्होंने विभिन्न रंग प्रयोगों का विवरण प्रकाशित करते हुए बताया है कि मात्र आकर्षण के लिए प्रयुक्त किए जाने वाले रंगों का अतिरिक्त प्रभाव क्या होता है, या क्या हो सकता है? उनने अपने अनुभव से पाई अनेक घटनाओं का विवरण प्रस्तुत किया है, जिनमें से कुछ इस प्रकार है—

एक अन्य घटना में पैन अमेरिकन एयरवेज में सामने एक संकट आया, जिसमें यात्रियों को आकाशीय बीमारी मितली की शिकायत बढ़ गई। कारणों की खोज की गई तो इसका प्रमुख कारण रंग को पाया गया। वायुयान के अंदर चाकलेटी रंग से पुताई की गई थी, अतः उसे बदला गया और उसके स्थान पर हरा रंग कराया गया। फलतः उभरी हुई शिकायतें भी दूर हो गईं।

इसी प्रकार एक कारखाने के श्रमिकों को अधिक प्यास लगने और अधिक बार पेशाब जाने की शिकायत बढ़ गई। फलतः बीच-बीच में काम छूटता और उत्पादन कम होता। इस नई व्यथा का कारण विशेषज्ञों को बुलाकर तलाश कराया गया, तो प्रतीत हुआ कि कमरे काले रंग के पुते हुए थे। वह रंग हटाकर हरा रंग पुताया गया तो उस व्यथा से सहज छुटकारा मिल गया। एक दूसरे कारखाने में मजदूर जिन लोहे के बक्सों को ढोते थे। उनके अधिक वजनी होने की शिकायत करते थे। जब उनका रंग बदलकर हरा करा दिया गया तो सभी की शिकायतें दूर हो गईं और अपेक्षाकृत बक्से हलके लगने लगे।

लंदन की थेम्स नदी के पुल पर से कूदकर आत्महत्या करने वालों की संख्या जिन दिनों असाधारण रूप से बढ़ गई थी, उन दिनों इसका कारण तलाशने वालों में से कुछ विशेषज्ञों ने यह सलाह दी थी कि पुल पर लगाए गए काले रंग को हटाकर उसे बदल दिया जाए। वैसा करने पर देखा गया कि आत्महत्याओं की संख्या आश्चर्यजनक रूप से घट गई।

रंग चिकित्सा वैज्ञानिकों ने विभिन्न अनुसंधानों के आधार पर निष्कर्ष निकाला है कि रंगों का मानव स्वास्थ्य एवं स्वभाव पर असाधारण रूप से प्रभाव पड़ता है। इस संबंध में अनेक अस्पतालों में कमरों के परदों के रंगों में हेर-फेर करके उनका प्रभाव देखा गया तो परिणाम सामने आया कि लाल रंग गरमी-उत्तेजना बढ़ाता है तथा नीला और हरा रंग ठंडक पहुँचाता है।

रंगों के माध्यम से रोगियों को स्वास्थ्य लाभ प्रदान करने, उनकी मनोदशा बदलने में आड्रियन हिल नामक प्रसिद्ध चित्रकार ने असाधारण सफलता पाई है। उन्होंने अपनी पुस्तक 'आर्ट वर्सेज डिसीज' (कला बनाम रोग) में रंगीन चित्रकला को स्वास्थ्य-संवर्द्धन और रोग-निवारण के लिए महत्त्वपूर्ण माध्यम बताया है। पुस्तक में उनने अपनी अस्पताल में व्यतीत की गई लंबी अवधि का वर्णन किया है, जिसमें लिखा है कि,  "इन दिनों मुझे पीड़ा, असमर्थता, निराशा और ऊब के अतिरिक्त कोई साथी दीखता न था। डाॅक्टर और नर्स के अपना-अपना काम करके चले जाने पर निरंतर साथ रहने को कोई तैयार न था। निदान के लिए  मैने समीपवर्त्ती मेज पर रखे हुए रंग-बिरंगे तथा विभिन्न आकार-प्रकार के फूलों को रुचिपूर्वक देखना आरंभ किया। कितने कोमल और कितने उमंग भरे थे वे सब। बच्चों जैसी मुस्कान बखेरते देख उन सबको तो मेरा मन बहुत हलका हो गया और उन्हीं की बिरादरी में सम्मिलित हो गया। इस नए सहचरत्व में नया जीवन मिला और मन की मुरझाई दूब हरी-भरी हो गई। मेरे स्वास्थ्य सुधार में इस नई रंग-बिरंगी बिरादरी ने डाॅक्टरों और औषधियों से किसी प्रकार कम सहायता नहीं की।"

अस्पताल से छुट्टी पाने के बाद उसने अपने पुराने प्रकृति पर्यवेक्षण वाले रुझान को कला में सम्मिलित करने और आजीविका का आधार बनाने का निश्चय किया, फलतः सतत अभ्यास से न केवल प्रकृति चितेरा बना, वरन अन्य स्तर की कलाकृतियाँ बनाने में भी समर्थ हुआ।

उसने अपनी चित्र चिकित्सा— 'आर्ट थैरेपी' चलाई। जिसका आधार रंगों को दृश्य रूप में प्रस्तुत करके रोगियों की मनोदशा में परिवर्तन करना था।

यह समझने-समझाने में देर नहीं लगी कि मानसिक परिवर्तन का किस प्रकार स्वास्थ्य सुधार के साथ संबंध है। रोगी भरती हुए और अच्छे होते गए। उसने अन्य अस्पतालों को भी अपनी सेवाएँ दीं और विशेषतया विकृत मनःस्थिति वाले रोगियों को रंग-उपचार से प्रभावित करने का सिलसिला शुरू किया। इस प्रयास में आशाजनक सफलता मिली। सन् 1942 में आड्रियन हिल की आर्ट थैरेपी की ख्याती अपने चरम सीमा पर पहुँच गई। उसके चिकित्सा उपचार-प्रक्रिया की माँग बढ़ती गई, जिसकी पूर्ति वह रेडियो पर अपने भाषण प्रसारित कर करने लगे। लोग इसे बड़े चावपूर्वक सुनते, नोट करते और लाभ उठाते।

ठीक ऐसा ही प्रसंग एक यहूदी चित्रकार का भी है। उसका नाम था— हिमन सिनाल। वह सर्वप्रथम बाल मनोरंजन के लिए रंग-बिरंगे चित्र बनाता था और उनमें पेड़-पौधों-फूलों और पशु-पक्षियों की आकृतियाँ बनाकर रंगों से सुसज्जित करता था। जब उसकी आकृतियाँ बालकों में लोकप्रिय हुई, तो उसने बड़ों के लिए भी इस कला का लाभ देने का निश्चय किया। उसने सैकड़ों रंग-बिरंगे चित्र बनाए। वे कलाप्रधान नहीं थे, वरन विभिन्न मनुष्यों की मानसिक स्थिति का समाधान-संवर्द्धन करने के लिए उन्हें बनाया गया। रंग समायोजन की उसकी प्रमुख विशेषता थी। उसका यह अभिनव प्रयोग लोगों की मनोदशा सुधारने में बहुत सफल रहा।

निश्चित ही सूर्य का संपर्क मानवमात्र के स्वास्थ्य के लिए हितकारी है, क्योंकि सभी वर्ण अपने प्राकृतिक रूप में उसमें विद्यमान होते हैं। शरीर की आवश्यकतानुसार रंगीन काँचों के माध्यम से रुग्ण अंग पर उसी रंग की सूर्य-किरणें भी बरसाई जा सकती है।

सूर्य का— सविता का ध्यान आध्यात्मिक प्रगति का द्वार तो खोलता ही है, साथ ही जीवनी शक्ति भी बढ़ाता है व प्रकृति विशेष के अनुसार प्रयुक्त होने पर रुग्णता को मिटाकर अंदर निहित प्रसुप्त केंद्रों की जागृति में भी सहायक सिद्ध होता है। सर्वसुलभ इस चिकित्सा का लाभ उठाकर निश्चित ही शारीरिक, मानसिक, आध्यात्मिक तीनों ही क्षेत्रों में प्रगति संभव हैं।


सरल आसनों द्वारा अंगों को सक्रिय कैसे बनाएँ?

योगाभ्यास में आसनों की बारी यम-नियम के उपरांत आती है। आसन का मोटा अर्थ परिश्रम— व्यायाम समझा जाता है और अवयवों को सक्रिय— सुदृढ़ रखने के लिए उनका महत्त्व अनिवार्य रूप से स्वीकार किया जाता है।

आसनों की संख्या कितनी ही है, उनमें 64 या 84 प्रसिद्ध हैं। इनके स्वरूपों में भिन्नता प्रतीत होती है, किंतु वास्तविक उद्देश्य तलाश करने पर यही प्रतीत होता है कि जिन अवयवों पर साधारण व्यायामों का असर नहीं पड़ता, उन पर ही इस प्रकार का दबाव पड़े कि उनकी शिथिलता सक्रियता में बदल सके।

दंड बैठक जैसी कसरतों में हाथ, सीने, जंघाओं पर ही जोर पड़ता है, किंतु भीतरी अवयव उस क्रियाशीलता से वंचित ही बने रहते हैं। हृदय, फुफ्फुस, यकृत, गुर्दे, आँते. मूत्राशय, नितंब, रीढ़ आदि कई अवयवों पर सामान्य व्यायामों का नगण्य प्रभाव पड़ता है, जबकि हाथ,पैर आदि पर ही अधिक दबाव पड़ता है। इस असंतुलन को दूर करने में योगासनों की विशेष भूमिका है। उन्हें शृंखलाबद्ध करने से शरीर के सभी अवयवों को उतना प्रभाव पहुँच जाता है, जिससे उनकी सक्रियता सतेज हो सके और निष्क्रियताजन्य विकृतियों से छुटकारा मिल सके।

पुराने समय के कुक्कुटासन, मत्स्यासन, मयूरासन आदि पशु-पक्षियों की व्यायाम-पद्धति का अनुसरण करके विनिर्मित किए गए हैं; पर उनमें कठिनाई यह है कि छोटी आयु से ही उनका अभ्यास किया जाए तो मुलायम हड्डियाँ और माँसपेशियाँ उनका अभ्यास आसानी से कर लेती हैं, पर जब आयु बड़ी हो जाती है, तो इन सब में कड़ापन आ जाता है। ऐसी दशा में वे ठीक तरह बन नहीं पड़ते। झुककर हाथों में पैरों के अंगूठे छूना बचपन में तो आसानी से हो जाता है, पर बड़ी उम्र हो जाने पर टखने की नसें कड़ी पड़ जाती हैं और रीढ़ की हड्डी भी एक सीमा तक ही झुक पाती है।

अधिक दबाव सहन करने से वह इनकार कर देती है। जबरदस्ती करने पर लाभ की जगह हानि होने का खतरा बढ़ जाता है। पुराने जमाने में लोगों को आरंभ से ही अभ्यास रहता था। ऐसी दशा में उन्हें आसनों की प्रणाली कठिन नहीं पड़ती थी, किंतु अब स्थिति बदल गई है। तदनुसार व्यायामों के आसान पक्ष पर भी नए सिरे से समयानुसार विचार करने की आवश्यकता हैं।

बच्चों से लेकर बुड्ढों तक के लिए, नर-नारी सभी के लिए यह शैली उत्तम है कि विभिन्न अवयवों को क्रमशः धीरे-धीरे सिकोड़ने और फैलाने की शैली अपनाई जाए। इसमें दंड बैठकों की तरह जल्दबाजी न की जाए, वरन धीमी गति रखी जाए। धीमापन अधिक लाभदायक और महत्त्वपूर्ण है। साइकिल को भगा ले जाना उतना कठिन नहीं है, जितना कि उसे धीमे, अति धीमे चलाना। उसमें अपना और साइकिल का बैलेंस अधिक ध्यानपूर्वक संभालना पड़ता है।

यही बात आसनों के संबंध में है। उन्हें ऊपर से नीचे की ओर करते चला जाए। गरदन को पहले बाईं ओर मोड़ा जाए, पीछे दाहिनी ओर। वह अधिक-से-अधिक जितनी मुड़ सके, उतनी मोड़नी चाहिए। अब ऊपर और नीचे ले जाने का क्रम आरंभ करना चाहिए। सिर जितना पीछे जा सके, ठोढ़ी जितनी ऊँची उठ सके उतनी उठानी चाहिए। इसके उपरांत उसे नीचे लाना चाहिए, यहाँ तक कि ठोढ़ी छाती से लगने की स्थिति में आ जाए। बायें-दाहिने या ऊपर-नीचे-ऊपर मोड़ने में इस बात का ध्यान रखा जाए कि गति धीमी रहे और मोड़ने की क्रिया आसनी से जितनी अधिक की जा सके, उतनी करनी चाहिए। अब कंधों की बारी आती है, उन्हें भी बायें-दाहिने तथा नीचे-ऊपर करना चाहिए, इसके बाद कोहनियों पर से हाथ को ऊपर लाने, नीचे ले जाने की क्रिया करनी चाहिए।

यही बात कलाइयों, हथेलियों एवं उँगलियों को नीचे-ऊपर, दाहिने-बायें ले जाने के संबंध में चलनी चाहिए। इसी सिलसिले में पूरे हाथ को ऊपर ले जाने, नीचे लाने का अभ्यास करना चाहिए। हाथ जोड़ने के ढंग से आगे लाने और पीछे जितने जा सकें, उतना प्रयत्न करना चाहिए।

पेट के भीतरी अवयवों के लिए भी यही शैली काम दे जाती है। फेफड़ों में अधिक-से-अधिक हवा भरके उन्हें फैलाना और फिर हवा निकालते हुए उन्हें सिकोड़ना चाहिए। आँतों और आमाशय के व्यायाम के लिए झुकना पड़ता है। हाथ टखनों पर जमा लेने पड़ते हैं और फिर उन्हें बाहर लाने, भीतर खींचने की चेष्टा करनी होती है। यह जितना संभव हो, उतना ही करना चाहिए। सीमा का सदा ध्यान रखना चाहिए। दबाव तो डालना चाहिए, पर वह इतना अधिक न हो कि अंग दुखने लगें या अनख लगने लगे। यों पेट एक है, पर इच्छाशक्ति के सहारे उसके यकृत, गुर्दे, मूत्राशय आदि को फैलाने-सिकोड़ने की क्रिया चल सकती है। चूँकि इसमें इच्छाशक्ति को भी प्रयत्न करना पड़ता है, पर अभ्यास होता नहीं, इसलिए सफलता कुछ देर में मिलती है, फिर भी अभ्यास तो जारी रखना चाहिए। पेट की भीतरी अवयवों का अभ्यास भी इसी तरह हो जाता है और उसमें सफलता मिलने लगती है।

रीढ़ की हड्डी के व्यायाम का तरीका यह है कि जमीन या तख्त पर सीधे लेट जाया जाए। नितंब जहाँ के तहाँ जमें रहें। ऊपर के धड़ को बिना कोहनियों का सहारा दिए ऊपर उठाना चाहिए। जब पूरी तरह बैठ जाने जैसी स्थिति बन जाए तो पहले की स्थिति में चित्त लेट जाने का उपक्रम करना चाहिए। इसमें भी रीढ़ को झुकने और सीधे होने का अवसर मिलता है। कमर को भी इसी प्रकार बाँये-दाँये और आगे-पीछे झुकाने का प्रयत्न करना चाहिए।

पैरों का व्यायाम अपेक्षाकृत सरल है। उन्हें एक-एक करके आगे-पीछे ले जाना चाहिए तथा चौड़ाने-सिकोड़ने का प्रयत्न भी करना चाहिए। घुटनों पर जोर देने का तरीका यह है कि ऊपर से नीचे बैठा जाए और फिर नीचे से ऊपर उठा जाए। पैर के पंजों और उँगलियों का व्यायाम भी इसी क्रम से हो सकता है।

जिन दुर्बल शरीर वालों से खड़े होकर यह क्रियाएँ न हो सकें, उन्हें जमीन पर पीछे लेटकर अवयवों को ऊँचा-नीचा और दायाँ-बायाँ करने का अभ्यास करना चाहिए। वह अपेक्षाकृत सरल पड़ता है।

स्कूलों में बच्चों को प्रायः इसी क्रम में ड्रिल अभ्यास कराए जाते हैं। स्काउटिंग में भी इसी से मिलती-जुलती पद्धति काम आती है। इन दिनों की स्थिति को देखते हुए विभिन्न अंग-अवयवों को सिकोड़ने-फैलाने की पद्धति ही हानिरहित और करने में सुगम पड़ती है। सभी अंगों के संचालन में आरंभ में आधा घंटा लगाना चाहिए। बाद में क्रमशः बढ़ाते हुए इस प्रक्रिया को एक घंटे तक ले जाया जा सकता है। शरीर के सक्रिय होने पर मन पर भी उसका असर पड़ना स्वाभाविक है।


भिखारी का दृष्टिकोण बदला (कहानी)

एक व्यक्ति था तो शरीर से हट्टा-कट्टा, पर अपने को निर्धन कहकर भीख माँगता रहता था। एक बुद्धिमान ने उससे पूछा— "तुम्हारे पास इतनी संपदा मौजूद है, फिर क्यों भीख माँगते हो?" भिखारी ने उलटकर कहा— "मेरे पास संपदा कहाँ है?"

बुद्धिमान ने उससे पूछा— "शरीर के अंग-अवयव के प्रत्यारोपण का विज्ञान अब निकल आया है। सभी अंगों का मुँह माँगा मोल मिल सकता है। इतनी कीमत तो मैं ही देने को तैयार हूँ, अधिक मिल जाए तो तुम्हारा भाग्य।"

दोनों हाथ तीस-तीस हजार, दोनों पैर दस-दस हजार, आँख पचास हजार, नाक पंद्रह हजार, दिल एक लाख, गुर्दे पचास हजार। बोलो— "इनमें से तुम क्या बेचने को तैयार हो?" भिखारी बेचने को कुछ भी तैयार न हुआ, पर उसे एक नई दृष्टि मिली कि मेरे पास इतना बहुमूल्य शरीर है। उसके सभी अंगों का यदि पूरी तरह सही सदुपयोग किया जाए तो किसी प्रकार का अभाव नहीं रह सकता।

भिखारी का दृष्टिकोण बदला तो वह नए उत्साह से तत्परतापूर्वक परिश्रम करने लगा और थोड़े ही दिनों में सुसंपन्न बन गया।


प्राणशक्ति के संवर्द्धन हेतु प्रयोग-उपचार!

साँस को जीवन कहते हैं। मनुष्य को कितना जीना है, यह अनुमान उसकी श्वास-प्रश्वास की क्रिया को देखकर सहज ही लगाया जा सकता है। मृत्यु का मोटा ज्ञान साँस चलना बंद हो जाने से किया जाता है। नाड़ी की धड़कन बंद होना श्वास बंद होने का ही लक्षण है। श्वास का सामान्य आवागमन ही फेफड़ों में तथा अन्य अंग-अवयवों में सिकुड़ने-फैलने की हलचल उत्पन्न करता है। उसी से दिल धड़कता है— रक्तसंचार होता है और माँसपेशियों का आकुंचन-प्रकुंचन क्रम चलता है। जिस प्रकार पेंडुलम का हिलना घड़ी की गतिविधियों को स्वसंचालित रखने का आधार होता है, उसी प्रकार श्वास-प्रश्वास क्रिया को एक प्रकार से समस्त हलचलों का उद्गम केंद्र कहा जा सकता है।

फेफड़ों का आकुंचन-प्रकुंचन— उसकी क्रियाशीलता जीवन का प्रथम चिह्न है। गर्भस्थ शिशु के फेफड़े तो होते हैं और दिल भी लप-डप करता रहता है, पर यह भी एक तथ्य है कि उसके फेफड़े तब बंद रहते हैं। रक्त की सफाई— प्राणवायु की आपूर्ति माँ के श्वसनतंत्र द्वारा ही संपन्न होती रहती है। प्रसवोपरांत जैसे ही नवजात शिशु प्रथम बार रुदन करता है, उसके फुफ्फुसीय कोश खुल जाते हैं और स्वतंत्र रूप से अपना कार्य करने लगते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि फेफड़ों को क्रियाशील होने की आरंभिक प्रक्रिया में यदि तीन मिनट की देर हो जाए तो बच्चे की मृत्यु हो जाती है। इससे कम समय में ऑक्सीजन का मानसिक स्तर गिर जाता है, चिकित्सा विज्ञान भाषा में जिसे— 'ऐनोक्साया ऑफ दी ब्रेन' कहते हैं। इससे अल्पमंदता, मिर्गी जैसे कई मनोविकार पैदा हो जाते हैं। फेफड़े और हृदय शरीर के स्थूल अवयव मात्र दिखते हैं, पर इनमें रक्तसंचार और वायु के आवागमन के अतिरिक्त जीवनदायी सूक्ष्मप्राण का भी सतत प्रवाह होता रहता है। यदि इसके नियंत्रण-नियमन का विज्ञान जाना-समझा जा सके तो शारीरिक अवयवों की क्रियाशीलता को अक्षुण्ण रखा और बीमारियों से छुटकारा पाया जा सकता है। तब निरोग एवं दीर्घ जीवन का सुयोग सहज ही उपलब्ध हो जाता है।

सामान्यतया हम में से अधिकांश व्यक्ति साँस की— प्राण की महत्ता को नहीं जानते और साधारण रूप से चलने वाली उथली तथा अव्यवस्थित श्वसन क्रिया पर ही निर्भर रहते हैं। इसमें फेफड़ों के 1/6 वें भाग का ही श्वसन क्रिया में उपयोग हो पाता है, शेष निष्क्रिय पड़ा रहता है। इस प्रकार आधे-अधूरे, अस्त-व्यस्त तरीके से चलने वाली साँस से न केवल फेफड़ों की कार्यक्षमता घटती है, वरन अनेकानेक शारीरिक-मानसिक आधि−व्याधियों का शिकार बनना पड़ता है। यदि श्वास-प्रश्वास क्रिया का विस्तार किया जा सके, प्राण के आयाम को बढ़ाया जा सके, तो शारीरिक-मानसिक आरोग्य के साथ ही शक्ति उपार्जन का लाभ भी सहज ही उपलब्ध हो सकता है। श्वास-प्रश्वास की क्रिया को क्रमबद्ध-लयबद्ध-तालबद्ध करने— उसकी साधारण अनवरत प्रक्रिया की अव्यवस्था को दूरकर व्यवस्था के बंधनों में बाँधने की प्रक्रिया का नाम 'प्राणायाम' है। अध्यात्म साधनाओं में आंतरिक परिशोधन, पवित्रता संवर्द्धन, प्राण-ऊर्जा के उन्नयन का महत्त्वपूर्ण कार्य इसी के माध्यम से संपन्न होता है। शारीरिक आरोग्य का लाभ तो इससे सर्वविदित ही है। फेफड़े सुदृढ़ होने, अधिक मात्रा में प्राणवायु के शरीर में प्रवेश करने से जीवन तत्त्व भी अधिक मिलते हैं और परिशोधन की गति भी तीव्र होती है। स्थूल और सूक्ष्मशरीरों पर स्वास्थ्य-संवर्द्धन और मानसिक परिष्कार में प्राणायाम का प्रत्यक्ष प्रभाव होता है। कारणशरीर के भाव-संस्थान पर भी इस साधन की उपयुक्त प्रतिक्रिया होती है। कुसंस्कारों, दोष-दुर्गुणों का निराकरण होता है, अंतरंग की पवित्रता बढ़ती है। अंतःकरण में श्रेष्ठ संस्कारों का उभार होने लगता है। ऐसी स्थिति बनती चले तो आत्मिक प्रगति में किसी प्रकार का संदेह न रह जाएगा। मनुस्मृति एवं अमृतनादोपनिषद् में कहा भी है— "जिस प्रकार अग्नि में डालने-तपाने से सोने आदि धातुओं के मल जल जाते है, उसी प्रकार प्राणायाम करने से इंद्रियों के विकार दूर हो जाते हैं। अतः मनुष्य को सर्वदा प्राणायामपरायण होना चाहिए।"

पाश्चात्य जगत के वैज्ञानिक भी अब प्राणायाम की महत्ता को समझने और उस पर गहन अनुसंधान करने में निरंतर लगे हुए हैं। यद्यपि उनकी पहुँच अभी ‘डीप ब्रीदिंग’ और उसकी फलश्रुति स्वास्थ्य-संवर्द्धन तक ही सीमित हैं। इन विशेषज्ञों के अनुसार मनुष्य को भोजन से मिलने वाली शक्ति मात्र 30 प्रतिशत ही होती है। शेष 70 प्रतिशत शक्ति तो श्वसन द्वारा स्नायुतंत्र को प्रदान की गई क्षमता से प्राप्त होती है। प्राणायाम से स्नायुतंत्र को पर्याप्त मात्रा में शक्ति मिलती है और वह बलिष्ठ बनता है। खाद्य पदार्थों की अपेक्षा प्राणवायु में पोषक तत्त्व अधिक मात्रा में होते हैं। अनुसंधानकर्त्ता वैज्ञानिकों ने परीक्षणोपरांत पाया है कि जीवनदायी वायु से पोषक तत्त्व श्वसन द्वारा सीधे रक्त-प्रवाह में घुल जाते है। एक सामान्य स्वस्थ व्यक्ति प्रतिदिन 24 घंटे में 13000 लीटर वायु का सेवन करता है, जबकि भोजन मात्र एक किलो और पानी दो लीटर उदरस्थ करता है।

मूर्धन्य वैज्ञानिक डाॅ. थ्रिसे ब्रूजे ने फेफड़ों और हृदय के क्रियाकलापों पर प्राणायाम के प्रभावों का गहन अध्ययन किया है। उनका कथन है कि प्राणयोग का साधक अपनी इच्छाशक्ति में अभिवृद्धि करके हृदय की गति को नियंत्रित कर लेता है, साथ ही उसकी क्रियाशक्ति भी अप्रत्याशित रूप से बढ़ जाती है, जिसे वैज्ञानिक उपकरणों द्वारा मापा जा सकता है। उनके अनुसार सामान्य व्यक्ति की तुलना में प्राणायाम का साधक इस प्रक्रिया के फलस्वरूप अपनी काया में 10 प्रतिशत प्राणवायु की अतिरिक्त मात्रा धारण करने में सक्षम हो सकता है।

प्राणायाम की आरंभिक क्रिया नियमित, नियंत्रित एवं लयबद्ध तरीके से पूरी गहरी साँस लेने से आरंभ होती है। आमतौर से व्यक्ति असावधानीपूर्वक अस्त-व्यस्त तरीके से उथली साँस लेता है। इससे जीवनीशक्ति घटती और विभिन्न प्रकार की व्यथाएँ प्रकट होती हैं। साँस द्वारा खींची गई वायु यदि फेफड़ों को पूर्णता से नहीं भर पाती तो इससे उसका जो हिस्सा रिक्त बना रहता है, वह धीरे-धीरे निष्क्रिय हो जाता है और विषाणुओं का आश्रयस्थल बन जाता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि प्रायः व्यक्ति अपने फेफड़ों की कुल क्षमता का छठवाँ भाग ही उपयोग कर पाता है, यदि इसकी पूरी क्षमता का सदुपयोग किया जा सके तो टी.बी. जैसी प्राणघातक बीमारियों से सहज ही छुटकारा पाया जा सकता है। गहरी श्वास-प्रश्वास-प्रक्रिया से जीवनदायी प्राणवायु की अधिकतम मात्रा का धारण करना संभव है। हर सामान्य श्वास के साथ जहाँ आम मनुष्य 21 प्रतिशत ऑक्सीजन की मात्रा को ग्रहण करता और 12 प्रतिशत विषाक्त, 'कार्बन डाइ ऑक्साइड' को निष्कासित करता है, प्राणायाम के अभ्यास द्वारा इस अनुपात को कई गुना बढ़ाया जा सकता है।

पूरी और गहरी साँस लेने का यदि अभ्यास डाला जा सके तो इससे फेफड़े भी मजबूत होते हैं, साथ ही शुद्ध रक्तसंचार से हृदय की दुर्बलता दूर होने लगती है। धमनियों में प्रवाहित रक्तकणों की प्रचुरता, लालिमा और चमक जीवनीशक्ति को बढ़ाती है। इसकी अभिवृद्धि प्राणवायु की अधिकता से ही संभव हो पाती है। शिराओं में बहने वाले रक्त में रक्तकण न्यून, धीमी गति वाले और नीले रंग के होते हैं। यह रक्त की अशुद्धता का परिचायक है, जो ऑक्सीजन की कमी के कारण उत्पन्न होती है। इससे व्यक्ति में निराशा और निष्क्रियता आती है। फेफड़ों का प्रमुख कार्य वायुकोशों की सहायता से शरीर के सभी अंग-अवयवों तक चौबीस घंटे की अवधि में 35 हजार पिंट रक्त की मात्रा पहुँचाकर उन्हें प्राणवान एवं क्रियाशील बनाए रखना है। रक्त और ऑक्सीजन का सम्मिश्रित स्वरूप ही ऑक्सीहीमोग्लोबिन है। व्यवस्थित एवं क्रमबद्ध तरीके से ली गई गहरी श्वास-प्रश्वास का अर्थ है शरीर में ऑक्सीहीमोग्लोबिन नामक जीवनदायी तत्त्व की प्रचुरता, उत्साहवर्द्धक स्फुरणा की सक्रियता की जाग्रति इसी की परिणति है। जीर्ण-शीर्ण कोशिकाओं, विषैले पदार्थों को भी निकाल बाहर करने में इससे सहायता मिलती है। प्राणायाम, गहरी साँस लेने का अभ्यास बना लेना स्वास्थ्य के लिए अति लाभदायक सिद्ध होगा।

साधारणतया एक स्वस्थ व्यक्ति 18 से 20 श्वास प्रति मिनट लेता है। श्वसन की गति प्राणी जगत की विभिन्न जातियों में अलग-अलग, किंतु लगभग स्थिर हैं, जो प्राणी प्रति मिनट कम-से-कम साँस लेता है, उसी अनुपात में उसका जीवनकाल निर्धारित होता है। श्वसन दर का आयु से घनिष्ट संबंध है। हृदय की धड़कन, जिस पर सामान्य स्थिति में कोई ऐच्छिक नियंत्रण नहीं रहता, श्वास की गति से चौगुनी गति के साथ स्पंदित होती रहती है। यदि साँस की गति 18 प्रति मिनट हैं, तो हृदय की गति 82 स्पंदन प्रति मिनट होगी। इसी तरह माँसपेशियों में सन्निहित मायोग्लोबिन नामक प्रोटीन के प्रवाह की गति हृदय गति से ठीक चार गुनी अधिक होगी।

इसे मनुष्य की मूर्खता ही कहना चाहिए कि प्रकृति में भरपूर परिमाण में जीवनदायी प्राणवायु विद्यमान है, पर श्वास लेने और प्राण-ऊर्जा के आकर्षण की सही विधि ज्ञात न होने के कारण वह स्मृति-प्रदत्त अनुदानों का लाभ नहीं उठा पाता। शारीरिक रुग्णता, मानसिक उद्विग्नता, विकार ग्रस्तता से घिरे जीवन की इतिश्री करता रहता है। हम में से कितने ही लोग मुँह से साँस लेते हैं, जबकि अधिसंख्य व्यक्ति 'कालर बोन ब्रीदिंग' और 'रिब ब्रीदिंग' के अभ्यस्त होते हैं। यह तीनों ही श्वसन-पद्धतियाँ स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होती है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार मुँह से साँस लेने वालों को प्रायः नजला, जुकाम, खाँसी आदि गले की बीमारियों का शिकार होते देखा गया है। नाक द्वारा साँस लेने से अंदर प्रविष्ट होती वायु में जो धूलकण, गंदगी, रोगकारक जीवाणु आदि मिले होते हैं, वे नासिका मार्ग में ही रोक लिए जाते हैं, फेफड़ों तक उनकी पहुँच नहीं हो पाती है। 'कालर बोन ब्रीदिंग' में फेफड़ों को पर्याप्त मात्रा में ऑक्सीजन उपलब्ध नहीं हो पाती, क्योंकि इसमें कंधे ऊपर उठाकर श्वास खींची जाती है। स्वास्थ्य के लिए इस प्रकार की श्वसन-प्रक्रिया को उत्तम नहीं माना जा सकता। इसी तरह 'रिब ब्रीदिंग' के अंतर्गत पेट को नीचा करने के कारण कुछ ऑक्सीजन की मात्रा फेफड़ों तक पहुँचती अवश्य है, पर वह भी पर्याप्त नहीं होती। प्राणायाम उक्त तीनों ही श्वसन-पद्धतियों से भिन्न गहरी एवं लयबद्ध प्रक्रिया हैं, यह प्राणतत्त्व के नियंत्रण की जीवनीशक्ति के संवर्द्धन की प्रक्रिया हैं।

अध्ययनरत चिकित्सा विज्ञानियों ने अब प्राणायाम को उपचार हेतु प्रयोग करने की विधि-व्यवस्था अपनाई है। उनका कथन है कि त्वचा के छिद्रों तथा श्वास के साथ जो हानिकारक जीवाणु और रोगकारक विषाणु शरीर में प्रविष्ट हो जाते हैं। उन्हें निकाल बाहर करने में प्राणायाम-प्रक्रिया पूर्ण सक्षम है। जीवनीशक्ति के संवर्द्धन में इसकी महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। सामान्य श्वास-प्रश्वास से मात्र जीवनचर्या चलती है, पर अधिक सशक्तता प्राप्त करने के लिए हमें अतिरिक्त ऊर्जा की आवश्यकता होगी। महत्त्वपूर्ण शारीरिक, मानसिक या आध्यात्मिक कार्य संपन्न करने के लिए जिस प्राण-ऊर्जा की आवश्यकता होती है। उसका उत्पादन-अभिवर्द्धन प्राणयोग की साधना द्वारा ही हस्तगत होता है। श्वास-प्रश्वास पर नियंत्रण साधने से ही मन की एकाग्रता सधती, चित्त दृढ़ और स्थिर बनता है। मानसिक विकास इसी से होता हैं।

प्राणायाम द्वारा प्राणतत्त्व को वशवर्त्ती करने, उसके द्वारा स्वास्थ्य को अक्षुण्ण रखने एवं रोगों को मार भगाने का काम तो होता ही है, दीर्घ जीवन प्राप्त करने और स्वभाव में प्रसन्नता एवं साहसिकता भरने का काम भी प्राणयोग की साधना से संभव है। इस आधार पर शरीर तक सीमित आत्मा ब्रह्मांडव्यापी परमात्मा के साथ अपना सघन संपर्क बनाने और जीवन का लक्ष्य पाने में भी सफल हो सकती है।


ध्यान-साधना का वैज्ञानिक आधार

ध्यानयोग भौतिक एवं आध्यात्मिक सफलताओं में महत्त्वपूर्ण योगदान प्रस्तुत करता है। उसके आधार पर अपना भी हित-साधन हो सकता है और दूसरों का भी किया जा सकता है। मन-मस्तिष्क एवं अंतराल की बिखरी तथा प्रसुप्त शक्तियों को जाग्रत एवं केंद्रित करके मनचाही दिशा में प्रगति की जा सकती है। आरोग्य की उपलब्धि, मनोबल की प्रखरता, संकल्पशक्ति की परिपक्वता, भविष्य निर्माण से जुड़ने वाली महती भूमिका में सघन विचारधारा का उन्नयन जैसी सफलताओं का मूल आधार ध्यान-साधना में ही सन्निहित है। संसार के सफलतम व्यक्तियों, महानतम विभूतियों की यह एक अनिवार्य विशेषता रही है कि उनका अपने मस्तिष्क पर नियंत्रण बना रहा है। मस्तिष्कीय चेतना को उन्होंने बिखरने नहीं दिया, जो निश्चय किया, उसी पर अविचल भाव से चलते रहे। मानसिक शक्तियों, ऊर्जा-तरंगों के बिखराव को रोककर एक सुनिश्चित केंद्रबिंदु पर केंद्रित करने की कला जिन्हें ज्ञात है, वे उस मनःस्थिति में जो काम हाथ में लेंगे— सफल होकर रहेंगे।

एकाग्रता संपादन ध्यान का प्रत्यक्ष लाभ है। चित्तवृत्तियाँ प्रायः अनियंत्रित और उच्छृंखल बनी अव्यवस्थित रूप से अस्त-व्यस्त परिभ्रमण करती रहती है। इस बिखराव में बहुमूल्य मानसिक शक्तियों का अपव्यय ही होता है। बहुत करके तो चिंतन की इस विशृंखलता के साथ-साथ अवांछनीय तत्त्व ही लिपट पड़ते हैं। यदि विचारों को व्यवस्थित एवं उपयोगी कार्यों में लगाया जाएगा, तो उसके अभाव का लाभ आसुरी तत्त्व उठावेंगे और पतनोन्मुख पशु-प्रवृत्तियों का मनःक्षेत्र पर अधिकार सघन होता चला जाएगा। एकाग्रता से बिखराव सिमटता है, शक्ति उत्पन्न होती है। मस्तिष्कीय बिखराव का केंद्रीकरण मनुष्य में अद्भुत प्रतिभा एवं क्षमता का विकास करता है। उसमें अतींद्रिय सामर्थ्य विकसित हो जाती है एवं वह असंभव को  भी संभव कर दिखा पाने की स्थिति में आ जाता है। ध्यान-प्रक्रिया में यही किया जाता है।

ध्यानयोग इन दिनों वैज्ञानिकों के लिए अनुसंधान का एक महत्त्वपूर्ण विषय बन गया है। मनःशास्त्रियों एवं अध्यात्मवेत्ताओं की भाँति वे भी अब इस बात को स्वीकारने लगे हैं कि प्रवीणता और प्रतिभा निखारने के लिए प्रगति का मार्ग प्रशस्त करने के लिए ध्यानजन्य एकाग्रता का संपादन आवश्यक है। शरीरगत संयम बरतने से मनुष्य स्वस्थ रहता है और दीर्घजीवी बनता है, उसी प्रकार मनोगत संयम— एकाग्र भाव संपादित करने से वह बुद्धिमान विचारकों, मनीषियों की श्रेणी में पहुँच सकता हैं।

सतत एवं नियमित रूप से ध्यान-साधना करने वाले योगसाधकों पर किए गए विभिन्न प्रयोग-परीक्षणों के आधार पर विशेषज्ञों ने जो निष्कर्ष निकाले हैं, उनके अनुसार ध्यान-प्रक्रिया के अभ्यास से उद्विग्नता मिटती, तनाव घटता और मस्तिष्क शांत होता है। चंचलता मिटती और मन में स्थिरता आती है। नाड़ी की गति कम होती और श्वसन दर घटती है, तथा शरीर का तापमान नीचे उतर जाता है। इससे शारीरिक-मानसिक शक्ति की यथेष्ट बचत होती है तथा अतिरिक्त प्राण-ऊर्जा का भंडारण होता है। परीक्षणों में पाया गया है कि ध्यान की गहराई में उतरने पर साधक की श्वसन की सामान्य गति 18 से घटकर 5 या 6 श्वास प्रति मिनट एवं हृदय दर 72-80 से घटकर 50-60 प्रति मिनट तक जा पहुँचती है। इस मध्य ऑक्सीजन की खपत में भी 20 प्रतिशत की कमी आँकी गई है। रक्त में उपस्थित लैक्टिक एसिड की मात्रा भी 50 प्रतिशत तक कम हो जाती है। रक्त में इस तत्त्व की उपस्थिति से मस्तिष्क भय, चिंता, उदासी, तनाव जैसे विकारों से भरा रहता है। शरीर के अवयव अव्यवस्थित एवं थकानग्रस्त बने रहते हैं। ध्यान-साधना से इसके रक्तस्तर में कमी आती है और व्यक्ति के अंदर उत्साह, उमंग और स्फूर्ति की नवीन चेतना की लहरें हिलोरें मारने लगती हैं। शरीर की प्रतिरोधी क्षमता— 'इम्यून सिस्टम' में भी आमूल-चूल अभिवृद्धि हो जाती है। त्वचा की प्रतिरोधात्मक क्षमता बढ़ जाने पर उसके संपर्क में आने वाले रोगकारक जीवाणुओं का प्रभाव समाप्त हो जाता हैं। मानसिक क्षमता के केंद्रीकरण प्रयोग से कोई भी मंदबुद्धि, दुर्बलकाय मनुष्य अपना कायाकल्प कर सकता हैं।

ध्यानयोग का प्रमुख उद्देश्य मस्तिष्कीय बिखराव को रोककर एक चिंतन-बिंदु पर केंद्रित कर सकने की प्रवीणता प्राप्त करना है। इस प्रयोग से जिसे जितनी सफलता मिलती जाती है, उसकी अंतःचेतना में उसी अनुपात से वेधक-प्रचंडता उत्पन्न होती जाती है। शब्दवेधी बाण की तरह लक्ष्यवेध कर सकना उसके लिए सरल हो जाता है। यदि अध्यात्म उसका लक्ष्य होगा तो उस क्षेत्र में आशाजनक प्रगति होगी और विभूतियों से— दिव्य रिद्धि-सिद्धियों से उसका व्यक्तित्व भरा-पूरा दिखाई पड़ेगा। यदि लक्ष्य भौतिक उन्नति है तो भी इस एकाग्रता का समुचित लाभ मिलेगा और अभीष्ट प्रयोजनों में आशाजनक सफलता मिलती जाएगी। शक्ति का जब जिस भी दिशा में प्रयोग किया जाएगा, उसी में सत्परिणाम प्रस्तुत होते जाएँगे।

पैरासाइकोलॉजी पर शोध कर रहें मूर्धन्य शास्त्रियों का मत है कि ध्यान-प्रक्रिया द्वारा मस्तिष्क के भीतर अनेकों प्रकार के रासायनिक परिवर्तन किए जा सकते हैं तथा मस्तिष्कीय क्रियाकलापों पर नियंत्रण करके एनकेफेलीन, इण्डाॅर्फिन्स जैसे एंडोजीनस दरदनिवारक तत्त्वों की मात्रा घटाई-बढ़ाई जा सकती है। यह तत्त्व मस्तिष्कीय तंतुओं में पाए जाते है। ध्यान ऐसी निरापद आध्यात्मिक प्रक्रिया है, जिसके अगणित लाभ हैं। विशेषज्ञों के अनुसार दरद को दबाने वाली तीव्र शामक औषधियों के प्रयोग के स्थान पर ध्यान की प्रक्रिया अपनाने पर संज्ञाशून्यता उत्पन्न की जा सकती है और एनेस्थेशिया का प्रयोग किए बिना शल्यक्रिया संपन्न की जा सकती है।

लोकमान्य तिलक के जीवन का संस्मरण प्रसिद्ध है कि उनके अंगूठे का ऑपरेशन होना था। चिकित्सकों ने दवा सुँघाकर बेहोश करने का प्रस्ताव रखा तो उनने कहा—'मैं गीता के प्रगाढ़ अध्ययन में लगता हूँ, आप बेखटके ऑपरेशन कर लीजिए।, डाॅक्टर को तब बहुत आश्चर्य हुआ, जब उन्होंने बिना हिले-डुले शांतिपूर्वक ऑपरेशन करा लिया। पूछने पर तिलक ने इतना ही कहा— "तन्मयता इतनी प्रगाढ़ थी, जिसमें शल्यक्रिया की ओर ध्यान ही नहीं गया और दरद भी अनुभव नहीं हुआ।”

वस्तुतः यह ध्यान-प्रक्रिया द्वारा उत्पन्न की गई 'अल्फा स्टेट' होती है, जिसमें मस्तिष्क से लगातार अल्फा-तरंगें ही प्रस्फुटित होती रहती हैं। 'पाली' में इस अवस्था को ज्ञान कहते है। चीनी साधकों का 'चान' और जापानी योगसाधकों की 'जेन' भी यही प्रक्रिया है। प्रख्यात ग्रीक दार्शनिक प्लेटों ने अपने निबंध-संग्रह में बताया है कि एक बार सुकरात ध्यान की गहन अवस्था में पहुँच गए और 24 घंटे लगातार बिना हिले-डुले एक स्थान पर खड़े रह गए। इसी तरह महान संत थाॅमस एक्विनास के बारे में कहा जाता है कि एक बार वे ईश्वर के ध्यान में इतने अधिक निमग्न हो गए कि पास रखी आग पर उनकी अंगुलियांँ झुलसती रहीं और कोई कष्ट तक अनुभव नहीं हुआ। मस्तिष्क विज्ञानियों का कहना है कि इस प्रकार ध्यान में प्रगाढ़ता आने पर व्यक्ति की अल्फा-तरंगों की धारा में अकल्पित वृद्धि हो जाती है और वह उसके अंदर अदम्य धैर्य, स्थिरता एवं गहन शांति उत्पन्न कर देती है। ऐसी स्थिति में चेतना उच्च आयामों पर आरोहण कर जाती है। अवैध का आभास तक नहीं होता।

'द साइकल्स आफ हेवन' नामक अपनी पुस्तक में वैज्ञानिक द्वय जी. प्लेफेयर तथा स्कॉट हिल ने बताया है कि मानवी मस्तिष्क में निरंतर प्रचंड विद्युत-प्रवाह उत्पन्न होता रहता है और उसके शक्तिशाली कंपन ऐसे ही दुर्बल विचार-तरंगों से लिपटे अनंत आकाश में उड़ते, बिखरते और नष्ट होते रहते हैं। यदि इस प्रवाह को ध्यान-प्रक्रिया द्वारा केंद्रित करके किसी विशेष लक्ष्य पर नियोजित किया जा सके, तो उसके आश्चर्यजनक परिणाम हो सकते हैं। एकाग्रता से मस्तिष्क में उत्पन्न होते रहने वाली विचार-तरंगों के निरर्थक बिखराव को निग्रहित करने में असाधारण रूप से सहायता मिलती है। केंद्रीकरण से उसकी आज की क्षमता अगले दिनों अनेक गुनी हो सकती है और प्रभाव-क्षेत्र विश्वव्यापी बन सकता है।

ध्यान-साधना द्वारा मस्तिष्क को विश्राम देकर उसके मेधा-प्रज्ञा क्षेत्रों को विकसित, परिष्कृत किया और समाधिपरक परमानंद का लाभ उठाया जा सकता है। वैज्ञानिकों के अनुसार मानवी मस्तिष्क से उसकी भावना, विचारणा एवं मनःस्थिति के अनुरूप विभिन्न प्रकार की ऊर्जा-तरंगें प्रस्फुटित होती रहती है। यह मस्तिष्कीय धाराएँ अल्फा, बीटा, थीटा, डेल्टा इन चार भागों में बँटी होती हैं, जिन्हें ई.ई.जी. मशीन द्वारा अलग-अलग अंकित किया जाता है। परीक्षणकर्त्ता विशेषज्ञों ने पाया है कि जिस समय मस्तिष्क से अल्फा-तरंगें निस्सृत हो रही है, उस समय व्यक्ति गहन शांति की स्थिति में होता है। अल्फा-तरंगों की आवृत्ति 8 से 23 साइकल्स प्रति सेकेंड होती है। इन तरंगों को ई.ई.जी. माॅनीटर अथवा अल्फा ई.ई.जी. बायो फीडबैक या अल्फाफोन मशीन के माध्यम से फिल्टर किया जा सकता है और अभ्यास द्वारा इनका वर्चस्व बढ़ाकर मस्तिष्कीय चेतना का विकास किया जा सकता है। अल्फा स्थिति में साधक पृथ्वी के चारों और चक्कर लगा रही भू-चुंबकीय धाराओं 'शूमेंसरेजोनेन्स' से तादात्म्य स्थापित कर लेता है। यह एक ज्ञात तथ्य है कि ये तरंगें भी 8 से 23 आवृत्ति प्रति सेकेंड की गति से पृथ्वी की परिक्रमा करती हैं। इस तरह व्यष्टि मन  समष्टि मन से संबंध स्थापित कर लेता है।

अध्यात्म साधनाओं में अल्फा-स्थिति उत्पन्न करने के लिए साधक को यम-नियम से लेकर धारणा-ध्यान के विविध योगिक उपक्रमों का आश्रय लेना पड़ता है। सतत अभ्यास से जैसे-जैसे कषाय-कल्मषों का परिशोधन होता जाता है, स्वभाव संचित आदतों, व्यवहार एवं विचारणा में उत्कृष्टता की मात्रा बढ़ती जाती है। धीरे-धीरे समूचे व्यक्तित्व का ही कायाकल्प हो जाता है। साधक की मस्तिष्कीय चेतना जितनी अधिक समय तक प्रचुर परिमाण में अल्फा-तरंगों से आच्छादित रहेगी, उसी अनुपात से उसकी अंतःक्षमताओं का विकास होगा। शांत मस्तिष्क से ही एकाग्रता सधती है और तदनुरूप सत्परिणाम भी सामने आते हैं। सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक डब्ल्यू. पेनफील्ड तथा एच. एच. जैस्पर का कहना है कि विश्वविख्यात वैज्ञानिक आइंस्टीन की उपलब्धियाँ अल्फा-स्टेट की ही देन है। उनके ई.ई.जी. का विश्लेषण करने पर पाया गया कि उनके मस्तिष्क से सदैव लयबद्ध अल्फा-तरंगें ही प्रधान रूप से निकलती रहती थीं। कठिन-से-कठिन गणितीय सूत्रों के समाधान ढूंढते समय भी वह अपने आपको इसी अवस्था में बनाए रखते थे। एकाग्रता-तन्मयता-तत्परता उनके जीवन के रग-रग में बस गई थी।

चैतन्य सत्ता की गहनता तक पहुँचने तथा उसमें सन्निहित विभूतियों-संपदाओं को हस्तगत करने के लिए नादयोग, त्राटक, भावातीत ध्यान आदि अनेकानेक विधि-विधानों का प्रचलन है। विभिन्न तरह की योग-साधनाएँ की जाती हैं, जिसमें मस्तिष्कीय तरंगों का एकत्रीकरण किया और ब्रह्मांडीय तरंगों से— परम चेतना से उनका सामंजस्य बिठाया जाता है। मंत्रोच्चार के साथ इसकी विशिष्टता बढ़ती मानी गई है। यह साधना यदि भावना और श्रद्धापूर्वक की जाए तो उससे उत्पन्न होने वाली तरंगें निश्चित ही साधक को श्रेयपथ पर अग्रसर करती हैं।


अभक्ष्य भोजन के दुष्परिणाम

आहार से अपराधों का क्या संबंध है? इसका अन्वेषण करने के लिए 'फ्लोरिडा करैक्शन्स कौंसिलेट' द्वारा विद्यार्थियों और जेल के कैदियों पर खाद्य पदार्थों का हेर-फेर करके यह जाँचा गया कि इस कारण मनुष्य के चरित्र पर क्या प्रभाव पड़ता है? पाया गया है कि शाक और अन्न पर निर्भर रहने वाले प्रायः शांत और विनम्र रहते हैं। उनकी अपराधी प्रवृत्तियाँ पनपती नहीं, यदि वे पहले से रही हो तो शांत हो जाती हैं।

इसके विरुद्ध पाया गया कि मसालेदार और तले-भुने पदार्थ खाने से मनुष्य की प्रवृत्ति आवेशग्रस्त रहती है और वह छोटे-छोटे कारणों से उत्तेजित होकर झगड़े कर बैठता है, साथ ही अन्य अपराधी प्रवृत्तियाँ अपनाने लगता है। यह परिवर्तन उनमें भी होते देखे गए हैं, जो सात्विक भोजन करने के कारण विनम्र और सज्जन थे।

बाल्टीमोर विश्वविद्यालय के क्रिमिनोलोजी विशेषज्ञ डाॅक्टर फिका बोन ने अनेक विनम्र व्यक्तियों को उत्तेजक पदार्थ खिलाकर स्वभाव बदलते और सात्विक आहार से अपराधियों को सज्जनता अपनाते देखा।

न्यूयार्क के सिनाई मेडीकल सेंटर में भी यह प्रयोग दस वर्ष तक चले। इसके साइकियेट्री विभाग के अध्यक्ष साचिया ठी ने भी यही निष्कर्ष निकाला है कि आहार का न केवल शरीर पर, वरन मन पर भी भला-बुरा प्रभाव पड़ता है।

वर्जीनिया के चेसाॅपीक मेडीकल सेंटर ने छोटे बालकों की बिगड़ैल प्रवृत्तियों के लिए उनकी माताओं को दोषी ठहराया, जो गर्भकाल में उत्तेजक आहार खाती रहीं और बच्चों के बढ़ने पर शाकाहार के स्थान पर उत्तेजक मसालों आदि के अलावा माँस जैसे गरिष्ठ पदार्थ खिलाने शुरू कर दिए। फलतः उसका न केवल बच्चों के पाचनतंत्र पर बुरा प्रभाव पड़ा, वरन उनका स्वभाव भी झगड़ालू तथा दुराव करने वाला बन गया।

ब्रिटिश जेलखानों के सर्जन इन चीफ डाॅक्टर नारमनरीड ने शाकाहारी भोजन पर निर्भर रहने वाले कैदियों के स्वभाव में आश्चर्यजनक परिवर्तन पाया। वे जेल में प्रवेश करते समय जितने उद्दंड थे, आहार परिवर्तन के बाद वे वैसे न रहे और ऐसा व्यवहार करने लगे, मानों उनने कभी अपराध किया ही न हो।

न्यूयार्क से निर्वाचित सिनेटर एल्फ गोल्ड स्टीन ने विभिन्न विभागों में काम करने वाले कर्मचारियों के साथ संपर्क साधकर यह पता लगाया कि आहार का मनुष्य के स्वास्थ्य और स्वभाव से क्या संबंध है? लंबे समय के अन्वेषण के उपरांत वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि हल्का, सादा और भूख से कम खाया आहार मनुष्य को न केवल बीमारियों से बचाता है, वरन उसके स्वभाव में भी नम्रता तथा ईमानदारी की वृद्धि करता है।

मेरीलेंड विश्वविद्यालय के आहार विशेषज्ञ डाॅ. राॅवर्ट फैंचर ने अपनी खोजों का लंबा निष्कर्ष निकाला है, कि यदि अपराधी स्वभाव से छुटकारा पाना हो तो भोजन में सुधार करना आवश्यक है।

'आर्का इव्य आफ हैल्थ' के अध्यक्ष डाॅक्टर मेरीलेंड का कथन है कि माँस जैसे देर में हजम होने वाले पदार्थ शरीर की मजबूती भले ही बढ़ा दें, किंतु स्वभाव में से सज्जनता का अंश अवश्य ही घटा देते हैं। अपराधी स्वभाव के मनुष्य यदि अपने को बदलना चाहें तो उन्हें नमक और चीनी की मात्रा घटा देनी चाहिए।

बौद्धिक क्षमता का संबंध ज्ञान और अनुभव से हो सकता है, पर भावनाएँ अंतःक्षेत्र से उफनती हैं। सज्जनता का विद्वत्ता और संपन्नता से सीधा संबंध नहीं है। कई व्यक्ति उच्च शिक्षित होते हुए भी हेय आचरण करते देख गए हैं। कइयों के पास साधनों की कमी न होते हुए भी वे उन वस्तुओं को दुष्टतापूर्वक उपलब्ध करना चाहते हैं, जिन्हें वे पैसे के बलबूते सहज खरीद सकते थे; पर दुष्ट आचरण द्वारा आय प्राप्त करने में वे अपने अहंकार की पूर्ति अनुभव करते हैं और चतुरता का दावा करते हैं। कोई बड़ा उद्देश्य सामने न होने पर भी लोग आत्मतृप्ति के लिए नियम और मर्यादाओं के उल्लंघन में अपना गौरव अनुभव करते हैं।

ऐसी उमंगें उन्हें क्यों उठती हैं? इसका एक बड़ा कारण जहाँ वातावरण का प्रभाव होता है— संगति का दोष होता है, वहाँ आहार का भी असाधारण प्रभाव पड़ता है। अनीति उपार्जित धान्य खाने और अन्याय द्वारा प्राप्त की गई वस्तुओं का उपभोग करने में भी मन का स्तर ऐसा बन जाता है, जिससे कुकर्म की ही उमंगे उठती हैं। इस स्थिति में परिवर्तन करना हो तो आहार का परिमार्जन आवश्यक है। चरित्रगठन की दृष्टि से पौष्टिक भोजन उतना आवश्यक नहीं, जितना कि उसका सतोगुणी होना। इसका प्रभाव इस प्रकार भी देखा जा सकता है कि किसी अच्छे स्वभाव के आदमी को अभक्ष्य भोजन कराना आरंभ कीजिए, वह थोड़े ही दिनों में अच्छे से बुरा बन जाएगा।

अभक्ष्य भोजन में वह अन्न और शाक-भाजी भी शामिल हैं, जिन पर रासायनिक पदार्थों का कीड़े मारने के लिए प्रयोग किया गया हो अथवा बहुत दिन कोल्ड स्टोरेजों में सुरक्षित रखने के लिए सड़न रोकने वाले रसायनों का प्रयोग किया गया हो। सीवर लाइनों का कच्चा पानी सिंचाई के काम लाने पर फसल में वे दोष आ जाते हैं। उपयोगी खाद तब बनती है, जब उसका कच्चापन पूरी तरह गल जाए और वह उस गंध से रहित हो जाए, तो पशुओं तथा मनुष्यों के मल-मूत्र में आरंभिक दिनों में पाई जाती है। सड़न के लिए उतने दिनों की प्रतीक्षा करने की झंझट से बचने के लिए कच्ची खाद, उर्वरता बढ़ाने के नाम पर रासायनिक खादों का प्रयोग करके फसल जल्दी या अधिक मात्रा में उपजाने के लिए प्रयोग की जाती है। ऐसे अन्न-शाक अपना स्वाभाविक स्वाद खो बैठते हैं, साथ ही शरीर के साथ मन को स्वस्थ रखने की विशेषता भी।

माँस निकालने में जीवित प्राणी का वध करना पड़ता है, उस समय उसे कितनी पीड़ा होती होगी, इसका अनुमान हम अपने शरीर में चाकू जैसी हलकी धारदार वस्तु चुभो-चुभोकर देख सकते हैं। यह पीड़ा सूक्ष्म रूप में माँस के साथ जुड़ी रहती है और उसे खाने वाले की मानसिक स्थिति में निष्ठुरता एवं क्रूरता का समावेश करती हैं।

इससे भी बड़ी यह है कि पाले हुए पशुओं का आहार-विहार प्राकृतिक न रहने के कारण उनके रक्त-माँस में कितने ही प्रकार के रोगों का प्रवेश हो जाता है। इनमें से कुछ विषाणु ऐसे होते हैं, जो पकाने पर भी नष्ट नहीं होते और खाने वाले के शरीर में पहुँचकर कई प्रकार की शारीरिक बीमारियाँ पैदा करते हैं। मन के ऊपर तो उनका बुरा प्रभाव पड़ता है।

बढ़ती हुई तथाकथित सभ्यता के अनुसार खाद्य पदार्थों में कई तरह के रंग-सुगंधि तथा मसाले मिलाए जाते हैं। वे खाते समय स्वादिष्ट भले ही लगते हों, पर उनकी स्वाभाविकता नष्ट होती चली जाती है। इसका दुष्प्रभाव न केवल शरीर पर, वरन मन पर भी पड़ता है।

'जैसा खाए अन्न, वैसा बने मन' की चिरपुरातन उक्ति बहुत ही सारगर्भित है। कुधान्य से मतलब सड़ा, गला, बासी, बुसा अन्न ही नहीं, वरन वह भी है जो अचार, जैली, बिस्कुट, ब्रेड, चाकलेट आदि की तरह बहुत दिन रखने योग्य बनाकर रखे जाते हैं। ऐसे पदार्थों को फैशन या बड़प्पन के नाम पर पेट में भरते रहने से— आवश्यकता से अधिक मात्रा में खा जाने में जहाँ पेट खराब होता है— अपचजन्य बीमारियों का दौर बढ़ता है, वहाँ खाने वाले का चिंतन और चरित्र भी हेयस्तर का बनता है;  इसलिए जहाँ तक हो, अभक्ष्य भोजन से बचा ही जाना चाहिए।


सद्वाक्य

पतझड़ हुए बिना, पेड़ों पर फल नहीं लगते। कठिनाई सहे बिना, मनुष्य ऊँचे नहीं उठते।


जड़ें गहरी और मजबूत हों

जिनकी जड़ें सड़ गईं, उन खोखले पेड़ों को आँधी का एक झोंका उखाड़ फेंकने के लिए पर्याप्त है। जब वे गिरते हैं, तब औंधे मुँह गिरते है और फिर उठने का अवसर कभी भी प्राप्त नहीं करते। इसके विपरीत जिनकी जड़ें गहरी और मजबूत हैं, वे तूफानों का सहज ही सामना करते रहते हैं। आँधी प्रचंड हो, तो भी उनकी कुछ शाखाएँ ही टूटती हैं, तना फिर भी अप्रभावित ही रहता है। वह भी टूट जाए तो जड़ें फिर नये अंकुर देती हैं और टूटे हुए वृक्ष जैसा ही एक नया वृक्ष चंद दिनों में फिर बनकर खड़ा हो जाता है। टूटा हुआ तना यदि थोड़ा भी जुड़ा रहा तो उसमें भी नई डालियाँ लहलहाने लगती हैं, यह सारे चमत्कार मजबूत जड़ों के हैं। पेड़ की जिंदगी, सुरक्षा और प्रगति एवं शोभा उन्हीं पर निर्भर रहती है।

मनुष्य की जड़ें उसकी मनोवृत्तियाँ हैं। हिम्मत, निष्ठा, लगन, श्रमशीलता, स्फूर्ति जैसी अंतःवृत्तियों को जड़ों की संज्ञा दी जा सकती है। वे मजबूत होंगी तो जीवन-संग्राम में आए दिन आते रहने वाले आँधी-तूफानों का आसानी से सामना किया जा सकेगा। यदि विपरीत परिस्थितियों ने कुछ अवरोध या व्यवधान उपस्थित किए, तो उस आगत विपत्ति को भी सहन कर लिया जाएगा। क्षतिपूर्ति का भी मार्ग निकाल लिया जाएगा। मनस्वी व्यक्तियों को भी अन्यान्य व्यक्तियों की तरह कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, पर वे उन्हें हँसी-खेल समझकर निबटते रहते हैं और मन पर उदासी की छाप नहीं पड़ने देते, जबकि दुर्बल मन वाले व्यक्ति तनिक-सी कठिनाई को देखकर भयभीत हो उठते हैं। आगत विपत्ति से पूर्व मात्र आशंका ही उनके धैर्य को तोड़ देती है।

शरीर से परिपुष्ट दीखने से ही कोई व्यक्ति बलिष्ठ नहीं हो जाता। शक्तिवान वे हैं, जिनमें मनोबल की अभीष्ट मात्रा मौजूद है। दुर्बल काया लेकर कर्मक्षेत्र में उतरे ऐसे महापुरुषों की संख्या अगणित है, जिन्होंने अपने मनोबल के कारण अपने को ऊँचा उठाया और अगणित लोगों के भविष्य का निर्माण किया। गांधी जी जैसे दुर्बलकाय, किंतु मनोबल के धनी व्यक्ति कितने महत्त्वपूर्ण काम कर सकने में समर्थ हुए हैं, ऐसे उदाहरणों से इतिहास के पन्ने भरे पड़े हैं। आद्य शंकराचार्य जैसे भयानक भगंदर व्रण से रुग्ण व्यक्ति भी अपने छोटे-से जीवन में चकित कर देने वाली सफलताएँ प्राप्त करते रहें हैं। शरीर बल की नहीं, मनोबल की महत्ता को ही यह उदाहरण प्रतिपादित करते हैं। शरीर बल और मनोबल की तुलना करनी हो तो विशालकाय हाथी और मनस्वी सिंह के मल्ल युद्ध का प्रतिफल हमें सहज ही वस्तुस्थिति समझा सकता है।

हमें जीवन की जड़ों को मजबूत बनाना चाहिए और उन्हें सींचने में दत्तचित्त रहना चाहिए। शरीर को मजबूत और निरोग बनाने के लिए जितना ध्यान रखा जाता है, साधन जुटाया जाता हैं, उससे अधिक प्रयत्न यह रहना चाहिए कि हमारी मनःस्थिति की दृढ़ता बढ़ती चली जाए। हिम्मत कम न पड़े, परिश्रम में उदासी न आए, आशा की ज्योति धूमिल न पड़े। कठिनाइयाँ सामने आने पर उनसे लड़ने की बहादुरी इतनी अधिक बनी रहे कि संघर्षों से निबटना एक मनोरंजक खेल भर बनकर रह जाए।

अभीष्ट प्रयोजन की पूर्ति में हमारी आशा और चेष्टा इतनी बलवती होनी चाहिए कि परीक्षा के लिए समय-समय पर आते रहने वाले आँधी-तूफान अपना कुछ बिगाड़ न सकें। जड़े जितनी गहरी होंगी, सफल जीवन की अभिव्यंजना का उतना सुखद रसास्वादन उपलब्ध रहेगा।


एक ही सत्य एक ही लक्ष्य!

प्रत्येक ज्ञान का स्रोत अनुभव है। विश्व में धर्म ही एक ऐसा है, जिसमें एक मत नहीं है, क्योंकि इसका शिक्षण अधिकांशतया अनुभव के आधार पर नहीं होता है; इसीलिए सुविख्यात भौतिकशास्त्री एवं चिंतक श्री अलबर्ट आइंस्टीन अपने एक निबंध में कहते हैं कि, “यदि मुझसे कोई जिज्ञासा करे कि विज्ञान क्या है? तो में पूरे साहस के साथ कह सकूंगा कि शताब्दियों के कठिन प्रयत्नों से हुए प्रयोग-परीक्षणों से प्राप्त तथ्यों का सुसंबंध ज्ञान है, किंतु यदि मुझसे कोई जानना चाहे कि धर्म क्या है? तो मुझे इसका उत्तर देना अत्यधिक कठिन होगा।

वह स्पष्ट करते हुए कहते है कि, “धर्म के बारे में मेरे मानस में यह कल्पना उठती है कि जिस व्यक्ति ने धर्म को आत्मसात किया है, वह कैसा होगा? धर्म के दिव्य प्रकाश से अभिपूरित व्यक्ति अवश्य ही योग्यता-प्रतिभा में सर्वोत्तम विशाल हृदय वाला, स्वार्थपूर्ण इच्छाओं तथा पूर्वाग्रहों से मुक्त होगा। इस सबके अतिरिक्त उसमें एक ऐसी शक्ति होगी, जो उसे परमसत्ता से एक करती है। अन्यथा बुद्ध और स्पिनोजा जैसे व्यक्तियों को भी धार्मिक कहना असंभव होता।”

धर्म का शिक्षण भी अनुभव के आधार पर ही होना चाहिए। यद्यपि ऐसे अनुभव प्राप्त व्यक्ति कम ही होते हैं, किंतु इनका सर्वथा अभाव किसी काल में नहीं होता है। पश्चिमी जगत में इन्हें रहस्यवादी कहते हैं। यह व्यक्ति किसी भी धर्म के हों, एक समान सत्य का शिक्षण करते हैं।

चर्च या किसी अन्य धार्मिक स्थल पर तथा कथित धार्मिक लोग पहले धर्म का शिक्षण करते तदुपरांत अभ्यास करते हैं। उनका शिक्षण अनुभव के आधार पर नहीं, अपितु विश्वास के आधार पर होता है। जबकि रहस्यवादी पहले स्वयं इस परम सत्य को अपनी आत्मा के अनुभव करते हैं, तत्पश्चात् इसका शिक्षण देते हैं।

भारतीय विचारकों ने इस सबका समाधान शताब्दियों-सहस्राब्दियों पूर्व ही कर दिया था। वस्तुतः धर्म तत्त्वज्ञान के शाश्वत सत्य को उसी प्रकार समझाता है, जैसे कोई रसायनज्ञ अथवा प्रकृतिशास्त्र का पंडित भौतिक जगत के तथ्यों को निरंतर प्रयोग-परीक्षणों के आधार पर समझाते हैं। हमारा मन और हृदय विज्ञान जिस विद्यालय में सीखा जाता है— वह है प्रकृति। अध्यात्मवादी विज्ञान के सत्यों से अनभिज्ञ रहने के कारण ही दुविधा में पड़ते हैं; क्योंकि उन्होंने मात्र अंतर्जगत का ही अध्ययन किया है। इसी प्रकार वैज्ञानिक धर्म के बारे में कुछ नहीं जानता, क्योंकि वह बहिर्जगत में ही उलझा रहता है।

विज्ञान के विविध विषयों के शिक्षा की विविध विधियाँ हैं। इसी प्रकार अध्यात्म विज्ञान की शिक्षण विधियाँ भी भिन्न हैं। वाह्यजगत की तरह मानवमात्र का स्तर भी समान नहीं होता। प्रकृति की विभिन्नता के कारण शिक्षण विधियों की भिन्नता स्वाभाविक ही है। फिर भी यह शाश्वत सत्य स्वीकार किया जाना चाहिए कि लक्ष्य इन सबका एक ही परमसत्य की खोज है।

यह एक जाना-माना, सुनिश्चित तथ्य है कि प्रत्येक धर्म का अंत और उद्देश्य परम सत्ता को जानना और उससे एक हो जाना ही है। सबसे बड़ा शिक्षण यही है कि हम ब्राह्मजगत के कर्म तथा अंतर्जगत का चिंतन निस्वार्थ भाव से— ईश्वर के प्रति समर्पित भाव से करें। प्रत्येक व्यक्ति अपने आदर्शों का चुनावकर निष्ठा के साथ उन्हें आत्मसात करने के लिए प्रयास -पुरुषार्थ करे। श्री रामकृष्ण ने इन सबको एक ही सूत्र में स्पष्ट किया है। 'जतो मत-ततो पथ।'


व्यक्तित्व विकास हेतु संस्कार आयोजन

प्रत्यक्ष शिक्षण के दृश्य-प्रयोजनों के अतिरिक्त भारतीय संस्कृति के पुरोधाओं ने ऐसे उपाय भी खोज निकाले थे, जिनके आधार पर अंतराल की गहराई तक प्रवेश करने और कारणशरीर को प्रभावित करके आस्था-क्षेत्र को परिपक्व किया जा सकता था। उस प्रभाव से विचारणा में उत्कृष्टता का आरोपण होता था, तदुपरांत क्रियापद्धति में आदर्शवादिता का प्रवाह चल पड़ता था। यह प्रयास संस्कार नाम से जाने जाते हैं। जीवन में सोलह मोड़ आते हैं। इस दृष्टि से संस्कार आयोजनों की संख्या भी सोलह रखी गई थी। हर मोड़ पर एक संस्कार।

आज की रीति-नीति में न तो उतने मोड़ रहें हैं और न महंगाई, व्यस्तता, अश्रद्धा आदि के कारण सर्वसाधारण की स्थिति ऐसी रह गई है कि उन सबको यथाविधि उत्साहपूर्वक संपन्न कराएँ; इसलिए अब घटा-बढ़ाकर उतने कर लिए गए हैं, जो अधिक महत्त्वपूर्ण और अधिक समीचीन हैं।

व्यक्ति मानवी गरिमा के अनुरूप श्रेष्ठता के साथ जुड़ा रहे, इसी निर्मित संस्कारपरंपरा का प्रचलन था। किसी समय इनकी संख्या सोलह थी, हर किसी को जीवन में सोलह बार इस प्रकार के आयोजना करने पड़ते थे, जिनमें असंबद्ध व्यक्ति को उसके परिजनों, संबंधियों की उपस्थिति में ऐसा बहुत कुछ बताया समझाया जाता था, जो उत्कृष्ट आदर्शवादिता को अपनाए रहने के लिए उल्लास भरी चेतना उभारने के लिए आवश्यक था।

माता के गर्भ में जीव के स्थिर होने पर पुंसवन नामक संस्कार कराया जाता था, जिसका उद्देश्य था— गर्भिणी को उसके शारीरिक-मानसिक दायित्वों को समझाना, उनका पालन करने पर वह अपना स्वास्थ्य और गर्भस्थ शिशु का उज्ज्वल भविष्य बनाने में समुचित भूमिका निभा सकती थी। यह सभी संबंधीजनों की उपस्थिति में होता था, ताकि वे सब भी उस मर्यादा के पालन करने में गर्भिणी को समुचित सहयोग-संरक्षण प्रदान करते रहें।

इसी प्रकार शिशु के अबोध रहने तक कई संस्कार संपन्न हो जाते थे। इनमें से नामकरण, अन्नप्राशन, मुंडन, विद्यारंभ आदि का प्रचलन अभी भी है। अबोध शिशु तो समारोहों के समय उपलब्ध कराए गए मार्गदर्शन को समझ नहीं पाता था, पर परिवार के सभी सदस्य और संबंधीगण उस मार्गदर्शन को भली-भाँति समझ लेते थे और अभिभावक तथा संबंधीजन मिल-जुलकर ऐसी रीति−नीति अपनाते थे, जिससे बालक की समग्र प्रगति में इन सभी का समुचित योगदान जुड़ता रहे।

यज्ञोपवीत के समय तक बालक इतनी समझदारी प्राप्त कर लेता था कि अपने विकास की दिशा-धाराओं के संबंध में कुछ करने की स्थिति में पहुँच सके। उपनयन को दूसरा जन्म भी कहते हैं, द्विजत्व भी। जन्मजात रूप में से सभी अनगढ़ होते हैं। सुसंस्कारिता तो निजी पारिवारिक प्रयत्न से अर्जित करनी पड़ती है। उसमें सामाजिक वातावरण भी सहभागी होता हैं, उपनयन के अवसर पर इसी का ऊहा-पोह होता हैं। शिक्षा का उद्देश्य समझाया जाता है और मानवोचित मर्यादाओं का पालन तथा वर्जनाओं का उल्लंघन न करने के लिए प्रतिज्ञाबद्ध किया जाता है, यही व्रतबंध है। दूसरा जन्म भी।

यह सब सामूहिक रूप से इसलिए किया जाता था कि अन्य लोग भी इसमें सहयोगी बनें और अपने अपने कार्यक्षेत्र में भी इन परंपराओं के निर्वाह में प्रयत्नशील रहें।

इसके उपरान्त विवाह संस्कार आता है। इन दिनों उसे क्रीड़ा, विनोद एवं गृह-व्यवस्था पर आधारित माना जाता है। रूप-लावण्य, दहेज आदि को आधार मानकर जोड़ों का चुनाव होता है। हाथ पीले करने और घर बसाने जैसे क्षुद्र-क्षुद्र प्रयोजनों तक ही उसे मान्यता मिल रही है, पर वास्तविकता इससे कही अधिक आगे है। दो परिवारों का एकजुट होने, दो व्यक्तियों के परस्पर समर्पित होने और मिल-जुलकर ऐसे उद्देश्य पूरे करने की वह विद्या है, जिसका प्रभाव परिणाम दूरवर्त्ती हो। समूचे समाज को उनके संयुक्त प्रयास से अनुकरणीय प्रेरणा मिले। परिवार निर्माण की ऐसी उच्चस्तरीय व्यवस्था बने, जिससे सर्वतोमुखी प्रगति का द्वार खुले। वधू अपनी ससुराल को और वर अपनी ससुराल को अधिक प्रगतिशील बनाने के लिए प्रभावशाली भूमिका संपन्न करे। समय के अनुरूप प्रजनन पर अंकुश लगाने की प्रतिज्ञा भी अब इसी संस्कार में सम्मिलित कर दी गई है। गृहस्थ जीवन से संबंधित अनेक कर्त्तव्यों और उत्तरदायित्वों की शिक्षा भी इसी अवसर पर दी जाती है और उनके परिपालन का वातावरण बनाने के लिए अभीष्ट सहयोग देने की उपस्थितजनों से भी प्रतिज्ञा कराई जाती है। इस माध्यम से प्रशिक्षित हुए सभी उपस्थित जन अपने परिकर में भी वैसा ही निर्धारण करने के लिए प्रोत्साहन प्राप्त करते हैं।

वानप्रस्थ भी गृहस्थ प्रवेश की तरह ही महत्त्वपूर्ण आश्रम माना गया है। आधा जीवन निजी विकास और परिवार निर्वाह के लिए लगाया जाए। शेष आधे को लोक निर्माण के लिए उत्सर्ग करने की योजना ध्यान में रहे। यह भारत की देव संस्कृति की अनादि परंपरा है। इसी आधार पर समाज को बड़ी संख्या में सुयोग्य लोकसेवी मिलते थे और उनके निरंतर लगन भरे प्रयत्नों से व्यक्ति की, समाज की सर्वजनीन प्रगति का पथ-प्रशस्त होता था। शासकीय कर्मचारियों के बिन ही अनेकों सृजनात्मक प्रयोजनों पूरे होते रहते थे। उस प्रचलन के बंद हो जाने से समाज को असाधारण क्षति उठानी पड़ रही है। शान्तिकुञ्ज के प्रयत्नों से उस महान परंपरा का अब पुनर्जीवन संभव हुआ है।

इन वानप्रस्थों के लिए वैराग्य लेने या घर छोड़ देने जैसे प्रतिबंध नहीं हैं। परिवार की देखभाल रखने, वही से अपना निर्वाह लेने और आधा समय सामाजिक प्रयोजन के लिए देते रहने से यह परंपरा निभ जाती है। नये बच्चे उत्पन्न न करना ही ब्रह्मचर्य पालन की आधुनिक परंपरा मानी जा सकती है। इस प्रकार वानप्रस्थ व्रतधारी कार्यकर्त्ताओं की एक नई बिरादरी का उदय होने से लोक-हित के नवसृजन के अनेक प्रयोजनों के प्रगतिशील होने की संभावना बन पड़ना सुनिश्चित है।

जन्मदिन और विवाह दिन मनाने के दो वार्षिक संस्कारों को अब संस्कार-प्रयोजनों में नया समावेश किया गया है। जन्मदिन पर मनुष्य जीवन की महत्ता का बोध और उसके श्रेष्ठतम सदुपयोग का नये सिरे से चिंतन किया जाता है और शेष जीवन को अधिक उत्कृष्ट बनाने के लिए नया संकल्प लिया जाता है। विवाह दिन पर पति-पत्नी दोनों एक प्रकार से विवाह कर्त्तव्यों को पुनः दुहराते हैं और पिछले दिनों यदि कुछ व्यतिरेक होता रहा हो तो उसे आगे न होने देने का प्रायश्चितपूर्वक प्रण करते हैं। इस प्रकार वैवाहिक पारिवारिक जीवन को नए सिरे से प्रगतिशील बनाने का इस संस्कार के माध्यम से नया शुभारंभ होता है।

अंत्येष्टि संस्कार तो सब लोग अपने-अपने ढंग से कर लेते हैं। प्रथा के अनुसार शुद्धि संस्कार भी होते रहते हैं। परिवार वालों का कर्त्तव्य बनता हैं कि पूर्वजों के प्रति, देव मानवों के प्रति वार्षिक श्रद्धांजलि अर्पण करें। कर्मकांड तो तर्पण जैसी सरल प्रक्रिया से पूरा हो जाता है, पर श्राद्ध तब बन पड़ता है, जब उनकी आत्मा को शांति देने के लिए वृक्षारोपण, प्रौढ़शिक्षा, प्रसार जैसे उपयोगी कार्यों को स्मृति के रूप में हर वर्ष किया जाता रहे। यही पूर्वजों का सच्चा श्राद्ध तर्पण हो सकता है

प्राचीनकाल में तीर्थों के दिव्य वातावरण में ऋषिकल्प महाप्राणों के सानिध्य में इन संस्कारों को कराने के लिए लोग जाया करते थे, पर अब वैसी परिस्थितियाँ बहुत ढूँढने पर भी कही नहीं दीख पड़तीं। कहीं भी चिह्नपूजा करने की अपेक्षा यही अच्छा है कि संभ्रांत समुदाय की उपस्थिति में उन संस्कारों को मिल-जुलकर सामूहिक रूप से कर लिया जाए। श्रेष्ठजनों के समुदाय को भी पुरोहित की मान्यता दी जा सकती हैं।


बदलेगा निश्चित समाज— यह संकल्प पुनः दुहराते हैं

आस्था संकट की विभीषिका से जूझ रहे समुदाय को जब कही प्रकाश-स्तंभ दृष्टिगोचर होता है, तो उन्हें हिम्मत बँधने लगती है कि समय की धारा के विपरीत चलने वाला आदर्शवादी जनमानस अभी भी जिंदा है। पूरे भारत में संपन्न हो रहे प्रज्ञा आयोजन नवगठित प्रज्ञा मंडलों की गतिविधियाँ शतवेदीय से लेकर चौबीस हजार वेदीय दीपयज्ञों के भव्य आयोजन इसकी प्रत्यक्ष गवाही देते हैं।

संवेदन जागा जन-जन में, अब न अकेली रही व्यथाएँ।

नवयुग का इतिहास गढ़ रहा, बलिदान की नई कथाएँ।

जे.के.कालोनी, कानपुर— सहस्रवेदीय दीपयज्ञ भावपरक वातावरण में संपन्न हुआ। लगभग पंद्रह सौ स्त्री-पुरुष इस विशाल आयोजन में सम्मिलित हुए। स्टेशन कमांडर एयरफोर्स एयरकमोडोर आर. रामामूर्ति मुख्य यजमान के रूप में उपस्थित थे। जिलाधिकारी कानपुर, ज्येष्ठ पुलिस अधीक्षक कानपुर, मैनेजिंग डायरेक्टर निर्यात निगम तथा जे.के. ग्रुप के अधिकारियों ने भी आयोजन में भाग लिया। महिलाओं के एवं पुरुषों के पंद्रह-पंद्रह मंडल तैयार हुए हैं, जिनने 12 वर्ष तक सतत सत्संग-स्वाध्याय का क्रम चलाते रहने का संकल्प लिया है।

हटा (दमोह) म.प्र.—चौबीस हजार दीपों का गायत्री में महायज्ञ नवंबर माह के तृतीय सप्ताह में भव्य-गरिमामय वातावरण में संपन्न हुआ। लगभग पाँच हजार परिजनों की मंगल कलशयात्रा ही एक किलोमीटर लंबी थी, जिसका जगह-जगह विभिन्न धर्मावलंबियों के समूह द्वारा स्वागत किया गया। संध्या को विशाल आयोजन में हरिद्वार से आए परिजनों द्वारा युगसंधि महापुरश्चरण की समय के अनुरूप आवश्यकता— सत्प्रवृत्ति-संवर्द्धन एवं दुष्प्रवृत्ति-उन्मूलन की महत्ता को प्रतिपादित किया गया। महिला विचारगोष्ठी का भी आयोजन इस अवसर पर जारी जागरण कार्यक्रम के अंतर्गत हुआ। विद्युत व्यवस्था बीच-बीच में गड़बड़ाने के बावजूद जल रहे चौबीस हजार दीपों ने कोई व्यवधान न आने दिया व संकेत दिया कि अगणित दीपों का आदर्शवादी दुस्साहस ही प्रतिकूलताओं से अगले दिनों जूझेगा।

बागपत, मेरठ (उ.प्र.)— शुगर मिल बागपत में शतवेदीय दीपयज्ञ आयोजन संपन्न हुआ। जनरल मैनेजर सहित अधिकाधिक संख्या में अधिकारी उपस्थित रहे। दीपयज्ञ का प्रबुद्ध समुदाय पर अत्यधिक प्रभाव पड़ा। शान्तिकुञ्ज में चल रहे सत्रों में सम्मिलित होने हेतु अधिकांश ने आवेदनपत्र भरे।

फतेहगढ़, फर्रुखाबाद (उ.प्र.)— दीपयज्ञायोजन सानंद संपन्न हुआ। युगसंधि महापुरश्चरण में सम्मिलित होने के लिए उपस्थित जनसमुदाय ने संकल्पपत्र भरे। 18 प्रज्ञामंडलों का गठन किया गया तथा 190 अखण्ड ज्योति पत्रिका के नए सदस्य बनाने का संकल्प लिया गया।

करनलगंज, इलाहाबाद (उ.प्र.)— महिला शाखा के प्रयास से शतवेदीय दीपयज्ञ संपन्न हुआ। लगभग 250 महिलाओं की उपस्थिति में 20 प्रज्ञामंडलों की स्थापना की गई। 20 नए अखण्ड ज्योति के सदस्य बनाए गए।

पेपरमिल कालोनी, लखनऊ (उ.प्र.)— दीपयज्ञ आयोजन सोल्लास संपन्न हुआ। इस अवसर पर लखनऊ नगर में 24 दीपयज्ञ संपन्न कराने, हर घर, दुकान, वाहन में स्टीकर चिपकाने, अखण्ड ज्योति पत्रिका की संख्या दुगुनी करने तथा 108 भावनाशीलों को शान्तिकुञ्ज सत्रों में भेजने का संकल्प लिया गया।

तारपुर, (खेड़ा)— गायत्री परिवार शाखा के कर्मठ सदस्यों द्वारा समीपवर्त्ती क्षेत्र में मेलों के समय साहित्य स्टाल लगाकर हर शिक्षित तक प्रज्ञा साहित्य पहुँचाने का सफल प्रयास किया जा रहा है। अब तक लगभग 25 हजार रुपये तक का साहित्य जन-जन तक पहुँचाया गया। इसके साथ ही युगशक्ति गायत्री के नए सदस्य बनाने में भी अभूतपूर्व सफलता मिल रही है।

सूदना, पलामू (बिहार)— साप्ताहिक दीपयज्ञों की शृंखला आशाजनक सत्परिणाम हस्तगत करा रही हैं, प्रति रविवार को नए स्थान पर दीपयज्ञ रखा जाता है। प्रातः घर-घर पीले अक्षत पहुँचाने, स्टीकर लगाने, सद्वाक्य लिखने का क्रम अपनाया गया है। दोपहर में दीपयज्ञ के माध्यम से परमपूज्य गुरुदेव के विचार पहुँचाए जाते, अखंड ज्योति के नए सदस्य बनाए जाते तथा प्रज्ञामंडलों की स्थापनाएँ की जाती हैं। इन प्रयासों से अधिकांश नए परिजन उभरकर आगे आ रहे हैं।

चायल, इलाहाबाद (उ.प्र.)— स्थानीय दीपयज्ञों की शृंखला के अंतर्गत 12 स्थानों पर दीपयज्ञ संपन्न हुए। दीपयज्ञ के माध्यम से प्रत्येक मुहल्ले में स्टीकर लगाने, सद्वाक्य लिखने तथा अखण्ड ज्योति के नए सदस्य बनाने का कार्य सफलतापूर्वक किया गया।

अलताहार, पूर्णिया (बिहार)— रचनात्मक कार्यक्रमों के क्रियान्वयन के साथ इस वर्ष प्रज्ञामंडलों की स्थापना करने, अखण्ड ज्योति पत्रिका की सदस्य संख्या दुगुनी करने तथा शान्तिकुञ्ज में चल रहे सत्रों में भावनाशीलों को भेजने का कार्य व्यापक स्तर पर सामूहिक प्रयासों से, दीपयज्ञों के माध्यम से किया जा रहा है।

शाहजहाँपुर (उ.प्र.)— सहस्रवेदीय दीपयज्ञायोजन अभूतपूर्व सफलता के साथ संपन्न हुआ आयोजन के समय ही 65 प्रज्ञामंडलों की स्थापना की गई। ज्ञानरथ नियमित रूप से चलाने, स्टीकर आंदोलन को गति देने तथा भावनाशीलों को शान्तिकुञ्ज सत्रों में भेजने के लिए संकल्प लिए गए।

तिलौरा, गोरखपुर (उ.प्र.)— दीपयज्ञायोजन भावपूर्ण वातावरण में संपन्न हुआ। स्थानीय कार्यकर्त्ताओं द्वारा 8 प्रज्ञामण्डलों की स्थापना तथा युगसंधि महापुरश्चरण में भागीदारी संकल्प लिया गया।

सहजनवाँ, गोरखपुर (उ.प्र.)— दीपयज्ञायोजन की मंगल-कलशयात्रा का उद्घाटन जिला विद्यालय निरीक्षक श्री रतूड़ी द्वारा कराया गया। दीपयज्ञ का शुभारंभ जनपद में जिलाधीश ने दीप प्रज्ज्वलित करके किया। कार्यक्रम रचनात्मक कार्यक्रमों के क्रियान्वयन के संकल्प के साथ समाप्त हुआ।

टांडा (उ.प्र.)— दीपयज्ञायोजन प्रेरणादायी वातावरण में संपन्न हुआ। कार्यक्रम में विद्वमंडली आई तो थी शास्त्रार्थ करने, पर दीपयज्ञ की प्रेरणा से प्रभावित होकर शान्तिकुञ्ज तक पहुँचने के लिए तैयार हो गई। इसे समूचे क्षेत्र में बहुत बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है। स्थानीय कार्यकर्त्ताओं ने अधिकाधिक अखण्ड ज्योति के सदस्य बनाने तथा प्रज्ञामंडलों की स्थापना करने का संकल्प लिया।

नदवई, भरतपुर (राज)— दीपयज्ञ आयोजन संपन्न हुआ। विशाल जनसमूह की उपस्थिति में दीपयज्ञ की भाव भरी प्रेरणा जन-जन के मन में भरी गई। परीणामस्वरूप लगभग पचपन प्रज्ञामंडलों का गठनकर रचनात्मक कार्यक्रम पूरा करने के संकल्प लिए गए।

डिहिया, जौनपुर (उ.प्र.)— भव्य कलशयात्रा की छाप पूरे गाँव में पड़ी। बाल, वृद्ध नर-नारी सभी के अंदर कार्यक्रम के प्रति अभूतपूर्व उत्साह था। प्रज्ञामंडलों के गठन के साथ-साथ प्रति रविवार को साप्ताहिक सत्संग चलाने, अखण्ड ज्योति की सदस्य संख्या बढ़ाने का संकल्प लिया गया।

खोलीपुर, सुलतानपुर (उ.प्र.)— अध्यापकों विद्यार्थियों तथा अभिभावकों की उपस्थिति में कार्यक्रम सोल्लास संपन्न हुआ। प्रति मंगलवार को विद्यालय में सामूहिक रूप से युगसंधि पुरश्चरण साधना करने की व्यवस्था बनाई गई। संपर्क-क्षेत्र में अधिकाधिक पत्रिकाओं को हर शिक्षित तक पहुँचाने के प्रयास किए जा रहे हैं।

मौदहा, हमीरपुर (उ.प्र.)— 24 प्रज्ञामंडलों की स्थापना के साथ दीपयज्ञ आशातीत सफलताओं के साथ संपन्न हुआ। संपर्क-क्षेत्र में हर शिक्षित तक अखण्ड ज्योति पहुँचाने की व्यापक व्यवस्था बनाई जा रही है।

इंगोहरा, हमीरपुर (उ.प्र.)— विद्यालय प्रांगण में आयोजित सहस्रवेदीय दीपयज्ञ कार्यक्रम अभूतपूर्व सफलताओं के साथ संपन्न हुआ। शिक्षकों, विद्यार्थियों एवं अभिभावकों का सहयोग सराहनीय रहा। जल कलशयात्रा के साथ दीवाली लोकनृत्य आकर्षण का केंद्र रहा। पूरा गाँव यह अभूतपूर्व जुलूस देखने के लिए उमड़ पड़ा। 50 प्रज्ञामंडलों का गठन किया गया।

मझगवां (म.प्र.)— दुष्प्रवृत्ति-उन्मूलन एवं सत्प्रवृत्ति-संवर्द्धन के संकल्प के साथ दीपयज्ञ आयोजन सानंद संपन्न हुआ। 11 प्रज्ञामंडलों का गठन हुआ। शान्तिकुञ्ज में चल रहे सत्रों में सम्मिलित होने के लिए कई भावनाशील परिजनों ने आवेदनपत्र भरे।

*समाप्त*