कर्मों की फलती-फूलती खेती

मनुष्य-जीवन एक खेत है, जिसमें कर्म बोये जाते हैं और उन्हीं के अच्छे-बुरे फल काटे जाते हैं। जो अच्छे कर्म करता है वह अच्छे फल पाता है, बुरे कर्म करने वाला बुराई समेटता है। कहावत है-आम बोयेगा वह आम खायेगा, बबूल बोयेगा वह काँटे पायेगा। बबूल बोकर जिस तरह आम प्राप्त करना प्रकृति का सत्य नहीं, उसी प्रकार बुराई के बीज बोकर भलाई पा लेने की कल्पना भी नहीं की जा सकती।

मनुष्य जीवन में भी इस सत्य के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। भलाई का फल सुख, शाँति और प्रगति के अतिरिक्त और कुछ नहीं हो सकता, वैसे ही बुराई का प्रतिफल बुराई न हो-ऐसा आज तक न कभी हुआ, न आगे होगा। इतिहास इसका साक्षी है।

कार्य कभी कारण रहित नहीं होते और उसी तरह कोई भी क्रिया परिणाम रहित नहीं होती। स्थूल और सूक्ष्म दोनों दृष्टि से सृष्टि का यह मौलिक नियम है कि भाग्य कभी अपने आप नहीं बनते वरन् वह व्यक्ति के कर्मों की कलम से लिखे जाते हैं। अच्छा या बुरा भाग्य सदैव अपने ही कर्म का फल होता है।

व्यक्ति हो, समाज या राष्ट्र हो-वह बुराई से पनपा, यह भ्रम है। जीवन हर क्षण का लेखा जोखा रखता है। जल सदैव जल रहेगा। यदि वह कीचड़ से बहेगा, दुर्गंध रहित नहीं होगा तो वह जल होने का भ्रम उत्पन्न करके भी पेय नहीं बन सकता। उसी तरह धोखे की सफलताएँ अन्ततः पतन और अपयश का ही कारण बनती हैं। अन्त तक साथ देने वाली सफलता भलाई की है। उसी से मनुष्य का यह लोक और परलोक सुधरता है। कर्मफल तो अकाट्य है।


श्री रामकृष्ण परमहंस की सारगर्भित शिक्षायें

गीला, कच्चा घास आसानी से मोड़ा घुमाया जा सकता है पर सूख जाने पर वह मुड़ता नहीं टूट जाता है। उठती आयु में मन को संभाला सुधारा जा सकता है। बुढ़ापे में तो जड़ता जकड़ लेती है सो न आदतें बदलती हैं न इच्छायें सुधरती हैं।

वासना रहित मन सूखी दियासलाई की तरह है जिसे एक बार घिसने पर ही आग पैदा हो जाती है। मनोरथों में डूबा मन गीली दियासलाई की तरह है जिसे बार बार घिसने पर भी कुछ काम नहीं चलता है। भजन की सफलता के लिये मन को साँसारिक तृष्णाओं की नमी से बचाना चाहिए।

पत्थर वर्षों तक नदी में पड़ा रहे तो भी उसके भीतर नमी पहुँचती। तोड़ने पर सूखा ही निकलता है किन्तु मिट्टी का ढेला जरा सा पानी पड़ने पर भी उसे सोख लेता है और गीला हो जाता है। भावनाशील हृदय थोड़े से उपदेश को भी हृदयंगम कर लेता है पर धर्माडम्बर में डूबे रहने वालों का ज्ञान जीभ तक ही सीमित रहता है। वे उसे भीतर नहीं उतारते। फलतः बकवादी भर रह जाते हैं।

गीली मिट्टी से ही खिलौने, बर्तन आदि बनते हैं। पकाई हुई मिट्टी से कुछ भी नहीं बनता। लिप्सा की आग में जिसकी भावना रूपी मिट्टी जल गई उसका न भक्त बनना सम्भव है न धर्मात्मा।

बालू मिली शक्कर में से चींटी केवल शक्कर ही खाती है और बालू छोड़ देती है। इस भलाई-बुराई मय संसार में से सज्जन केवल भलाई ग्रहण करते हैं और बुराई की उपेक्षा करते हैं।

धागे में गाँठ लगी हो तो वह सुई की नोंक में नहीं घुस सकता मन स्वार्थ भरी संकीर्णता की गाँठ लगी हो तो वह ईश्वर में नहीं लग सकता और जीवनलक्ष्य प्राप्त नहीं कर सकता।

साँप के मुँह में जहर रहता है पैरों में नहीं। तरुणी स्त्रियों के चेहरा नहीं उनके चरण देखने चाहिए इससे मन में विकार उत्पन्न नहीं होता।

पतंगे को दीपक का प्रकाश मिल जाय तो फिर वह अँधेरे में नहीं लौटता भले ही उसे दीपक के साथ प्राण गँवाने पड़ें। जिन्हें आत्मा बोध का प्रकाश मिल जाता है वे अविद्या के अंधकार में नहीं भटकते। भले ही उन्हें धर्म के मार्ग में अपना सर्वस्व समाप्त करना पड़े।

बेटा नहीं, धन नहीं, स्वास्थ्य नहीं का रोना रोते बहुत लोग देखे जाते हैं पर ऐसे रोने कोई बिरले ही रोते हैं कि-प्रकाश नहीं, भगवान नहीं, सत्कर्म नहीं, सत्कर्म नहीं। यदि इनके लिए लोग रोने लगें तो उन्हें किसी बात की कमी न रह जाय।

बच्चा गन्दगी में लिपटने का कितना ही प्रयत्न करे, माता उसकी मर्जी नहीं चलने देती और बलपूर्वक पकड़ कर स्नान करा देती है भले ही बच्चा रोता चिल्लाता रहे। भगवान भक्त को मलिनता से छुड़ा कर निर्मल बनाते हैं। इसमें भले ही भक्त अपनी इच्छा में अवरोध उत्पन्न हुआ देखकर रोता चिल्लाता रहे।

चुम्बक पत्थर पानी में पड़ा रहे तो भी उसका लोहा पकड़ने और रगड़ते ही आग निकलने का गुण नष्ट नहीं होता। विषम परिस्थिति में घिरे रहने पर भी सज्जन अपनी आदर्शवादिता नहीं छोड़ते।


किंकर्तव्य विमूढ़ता जैसी परिस्थितियां,जो सँभल नहीं रहीं!

विज्ञान और बुद्धिवाद पिछली शताब्दियों की बड़ी उपलब्धियाँ हैं। उनसे सुविधा-साधनों के नये भी खुले, वस्तु-स्थिति समझने में सहायक स्तर की बुद्धि का विकास भी हुआ, पर साथ ही दुरुपयोग का क्रम चल पड़ने से, इन दोनों ही युग चमत्कारों ने लाभ के स्थान पर नई हानियाँ, समस्याएँ और विपत्तियाँ उत्पन्न करनी आरम्भ कर दी उत्पादनों को खपाने के लिए आर्थिक उपनिवेशवाद का सिलसिला चल पड़ा। युद्ध उकसाये गये, ताकि उनमें अतिरिक्त उत्पादनों को झोका-खपाया जा सके। कुशल कारीगरों ने कारखानों में स्थान तो पाया, पर गृह उद्योगों के सहारे जीवनयापन करने वाली जनता की रोटी छिन गयी। काम के अभाव में आज बड़ी संख्या में लोग बेकार-बेरोजगार हैं। परिस्थितियाँ गरीबी की रेखा से दिनोंदिन नीचे गिरती जा रही हैं। यों बढ़ तो अमीरों की अमीरी भी रही है।

कारखाने और द्रुतगामी वाहन निरन्तर विषैला धुआं उगल कर वायु मण्डल को जहर से भर रहे हैं। उनमें जलने वाले खनिज ईंधन का इतनी तेजी से दोहन हुआ है कि समूचा खनिज भण्डार एक शताब्दी तक भी और काम देता नहीं दीख पड़ता। धातुओं और रसायनों के उत्खनन से भी पृथ्वी उन सम्पदाओं से रिक्त हो रही हैं। उन्हें गँवाने के साथ-साथ धरातल की महत्त्वपूर्ण क्षमता घट रही है और उसका प्रभाव धरती के उत्पादन से गुजारा करने वाले प्राणियों पर पड़ रहा है। जलाशयों में बढ़ते शहरों का कारखानों का कचरा, उसे अपेय बना रहा है। साँस लेते एवं पानी पीते समय यह आशंका सामने खड़ी रहती है, कि उसके साथ कहीं मंद विषों की भरमार शरीरों में न हो रही हो? उद्योगों-वाहनों द्वारा छोड़ा गया प्रदूषण, ग्रीन हाउस इफेक्ट के कारण अन्तरिक्ष में अतिरिक्त तापमान बढ़ा रहा है, जिससे हिम-प्रदेशों की बर्फ पिघल जाने और समुद्रों में बाढ़ आ जाने का खतरा निरन्तर बढ़ता ही जा रहा है। ब्रह्माण्डीय किरणों की बौछार से पृथ्वी की रक्षा करने वाला ओजोन कवच, विषाक्तता का दबाव न सह सकने के कारण, फटता जा रहा है। क्रम वही जारी रहा, तो जिन सूर्य किरणों से पृथ्वी पर जीवन का विकास हुआ है, वे ही छलनी के अभाव में अत्यधिक मात्रा में आ धमकने के कारण विनाश भी उत्पन्न कर सकती है।

अणु-ऊर्जा विकसित करने का जो नया उपक्रम चल पड़ा है, उसने विकिरण फैलाना तो आरम्भ किया ही है, यह समस्या भी उत्पन्न कर दी है कि उनके द्वारा उत्पन्न राख को कहाँ पटका जायेगा? जहाँ भी वह रखी जायेगी, वहाँ संकट खड़े करेगी।

यह विज्ञान के उत्कर्ष के साथ ही उसके दुरुपयोग, की कहानी है, जिसमें कि सुखद अंश कम और दुखद भाग अधिक हैं। वह उपक्रम अभी भी रुका नहीं है, वरन् दिन-दिन उसका विस्तार ही हो रहा है। अब तक जो हानियाँ सामने आयी हैं-जो समस्याएँ उत्पन्न हुई हैं, उन्हीं का समाधान हाथ नहीं लग रहा हैं, फिर इस सबका अधिकाधिक संवर्धन अगले ही दिनों न जाने क्या दुर्गति उत्पन्न करेगा? इसका अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है कि कुछ ही समय के वैज्ञानिक दुरुपयोग का क्या नतीजा और अगले दिनों उसकी अभिवृद्धि से और भी क्या अनर्थ हो सकने की आशंका है?

विज्ञान का दर्शन प्रत्यक्षवाद पर अवलम्बित है। उसने दर्शन को भी प्रभावित किया है और मान्यता विकसित की है कि जो कुछ सामने है, उसी को सब कुछ माना जाय। इसका निष्कर्ष आज के प्रत्यक्ष लाभ को प्रधानता देना है। परोक्ष का अंकुश अस्वीकार कर देने पर ईश्वर, धर्म और उसके साथ जुड़े हुए संयम, सदाचार और पुण्य-परमार्थ के लिए भी कोई स्थान नहीं रह जाता। मर्यादाओं और वर्जनाओं को अन्धविश्वास कह कर, उनसे पीछा छुड़ाने पर इसलिए जोर दिया गया है, कि इससे व्यक्ति की निजी सुविधाओं में कमी आती है। पूर्ति का सिद्धांत यही कहता है कि जिस प्रकार भी जितना भी लाभ उठाया जा सके-उठाना चाहिए, उसमें सिद्धांतवाद को आड़े नहीं आने देना चाहिए। इसी मान्यता ने पशु-पक्षियों के वध को स्वाभाविक प्रक्रिया बना कर असंख्य गुना बढ़ा दिया है। अन्य प्राणियों के प्रति निष्ठुरता बरतने के उपरान्त जो बाँध टूटता हैं, वह मनुष्यों के साथ निष्ठुरता न बरतने का का कोई सैद्धांतिक कारण शेष नहीं रहने देता। मनुष्य को पशु-प्रवृत्तियों का वहनकर्ता ठहरा देने के उपरान्त, यौन स्वेच्छाचार न बरतने के पक्ष में भी कोई ठोस दलील नहीं रह जाती।

विज्ञान और बुद्धिवाद की नई धाराएँ खोजने के लिए और उनके आधार पर तात्कालिक लाभ के जादू-चमत्कार प्रस्तुत करने वाली आधुनिकता, नीति और सदाचार का एक सिरे से दूसरे सिरे तक उन्मूलन करती, मनुष्य को स्वेच्छाचारी बनाती जा रही है।

यह सब बातें कामुकता को प्राकृतिक मनोरंजन मानने और उसे उन्मुक्त रूप से अपनाने के पक्ष में जाती हैं। फलतः बन्धनमुक्त यौनाचार जनसंख्या वृद्धि की नयी विभीषिका खड़ी कर रहा हैं। गर्भ निरोध से लेकर भ्रूण हत्याओं तक को प्रोत्साहन मिलने के बाद भी जनसंख्या वृद्धि में तेजी से बढ़ोत्तरी हो रही है। पूरी पृथ्वी पर जन संख्या चक्रवृद्धि ब्याज के हिसाब से बढ़ रही है। एक के चार, चार के सोलह, सोलह के चौसठ बनते-बनते संख्या न जाने कहाँ से कहाँ तक जा पहुँचेगी। तीन हजार वर्ष पहले मात्रा तीस करोड़ व्यक्ति सारे संसार में थे, पर अब तो वे छः सौ करोड़ हो गये हैं। लगता है कि अगले बीस वर्षों में कम से कम दूने होकर ऐसा संकट उत्पन्न करेंगे, जिसमें मकान का, आहार का संकट तो रहेगा ही, रास्तों पर चलना भी मुश्किल हो जाएगा।

पृथ्वी पर सीमित संख्या में ही प्राणियों को निर्वाह देने की क्षमता है। वह असीम प्राणियों को पोषण नहीं दे सकती। बढ़ता हुआ जन समुदाय अभी भी अगणित संकट खड़े कर रहा है। खाद्य उत्पादन के लिए भूमि कम पड़ती जा रही है। आवास के लिए बहुमंजिले मकान बन रहे हैं, फिर भी खेती के अतिरिक्त अन्य कार्यों के लिए भी भूमि की बड़ी मात्रा में आवश्यकता पड़ रही है। जंगल बुरी तरह कट रहे हैं। उससे घिरी हुई जमीन को खालीकर लेने की आवश्यकता, कानूनी रोकथाम के होते हुए भी किसी न किसी तरह पूरी हो रही है। बन कटते जा रहे हैं। फलस्वरूप वायु प्रदूषण की रोक थाम का रास्ता बन्द हो रहा है। जमीन में जड़ों की पकड़ न रहने से हर साल बाढ़ें आती हैं, भूमि कटती है, रेगिस्तान बनते हैं। नदियों की गहराई कम होते जाने से पानी का संकट सामने आता है। फर्नीचर, मकान, और जलावन तक के लिए लकड़ी मुश्किल हो रही है। वन कटते की अनेक हानियों को जानते हुए भी, आवास के लिए, खाद्य के लिए सड़कों, स्कूलों और बाँधों के लिए जमीन तो चाहिए। यह सब जनसंख्या वृद्धि के दुष्परिणाम ही तो हैं। इन्हीं में एक अनर्थ और जुड़ जाता है, शहरों की आबादी का बढ़ना। बढ़ते हुए शहर, घिचपिच की गंदगी के कारण नरक तुल्य बनते जा रहे हैं।

कोलाहल, प्रदूषण, गंदगी, बीमारी आदि विपत्तियों से घिरा हुआ मनुष्य, दिनोंदिन जीवनी शक्ति खोता चला जाता है। शारीरिक और मानसिक व्याधियाँ उसे जर्जर किये दे रही हैं। दुर्बलता जन्य कुरूपता को छिपाने के लिए सजधज ही एक मात्र उपाय दीखता हैं।

शरीर और मन की विकृतियों को छिपाने के लिए बढ़ते श्रृंगार की आँधी, आदमी को विलासी, आलसी, अपव्ययी और अहंकारी बना कर एक नये किस्म का संकट खड़ा कर रही है।

चमकीले आवरणों का छद्म उघाड़ कर देखा जाय, तो प्रतीत होता है कि इन शताब्दियों में मनुष्य ने जो पाया है, उसकी तुलना में खोया कहीं अधिक है। सुविधायें तो निःसंदेह बढ़ती जाती हैं, पर उसके बदले जीवनीशक्ति से लेकर शालीनता तक का क्षरण-अपहरण बुरी तरह हुआ है। आदमी ऐसी स्थिति में रह सका है, जिसे उन-भूत-पलीतों के सदृश कह सकते हैं, जो मरघट जैसी नीरवता के बीच रहते और डरती-डराती जिन्दगी जीते हैं।

समृद्धि बटोरने के लिए इन दिनों हर कोई बेचैन है, किन्तु इसके लिए योग्यता, प्रमाणिकता और पुरुषार्थ परायणता-सम्पन्न बनने की आवश्यकता पड़ती है पर लोग मुफ्त में घर बैठे जल्दी जल्दी अनाप-शनाप पाना चाहते हैं।

इसके लिए अनाचार के अतिरिक्त और कोई दूसरा मार्ग शेष रह नहीं जाता। इन दिनों प्रगति के नाम पर सम्पन्न बनने की ललक ही आकाश चूमने लगी है। उसी का परिणाम है कि तृष्णा भी आकाश छूने लगी है। लोगों में अपव्यय और दुर्व्यसन अपनाने की लगन लगी रहती है इस मानसिकता की परिणति एक ही होती है, कि मनुष्य अनेकानेक दुर्गुणों से ग्रस्त होता जाता है। पारस्परिक विश्वास और स्नेह सद्भाव और सहयोग की जिन्दगी जी सकेगा, इसमें संदेह ही बना रहेगा।

अस्त-व्यस्तता और अनगढ़ता ने उभर कर, प्रगतिशील उपलब्धियों पर कब्जा कर लिया लगता है अथवा अभिनव उपलब्धियों के नाम पर उभरे हुए अति उत्साह ने, अहंकार बनकर शाश्वत मूल्यों का तिरस्कार कर दिया है। दोनों में से जो भी कारण हों, वे सर्वथा चिन्ताजनक।

समस्त विश्व के आधे प्रतिभाशाली लोग युद्ध उद्देश्यों के निमित्त किये जाने वाले उद्योगों में प्रकारान्तर से लगे हैं। पूँजी और इमारतें भी इसी प्रयोजन के लिए घिरी हुई हैं। बड़ों के चिंतन और कौशल भी इसी का ताना बुनने में उलझे रहते हैं। इस समूचे तंत्र का उपयोग यदि युद्ध में ही हुआ, तो समझना चाहिए कि परमाणु आयुध धरती का महा विनाश करके रख देंगे। तब यहाँ जीवन नाम की कोई वस्तुतः शेष नहीं रहेगी। यदि युद्ध नहीं होता है, तो दूसरे तरह का नया संकट खड़ा होगा, कि जो उत्पादन हो चुका है उसका क्या किया जाय? जन-शक्ति, धन-शक्ति और साधन-शक्ति इस प्रयोजन में लगी हैं उसे उलट कर नये क्रम में लगाने की विकट समस्या को असम्भव से सम्भव कैसे बनाया जाय?

किसी ने नियति से इस भेद भाव का कारण पूछा। उसने उतर दिया “अपनी-अपनी स्थिति के अनुरूप सभी लाभ हानि प्राप्त करते है।”

इन सबमें भयंकर है मनुष्य का उल्टा चिंतन, संकीर्ण स्वार्थ-परता से बेतरह भरा हुआ मानस, आलसी, विलासी और अनाचारी स्वभाव। इन सबसे मिलकर वह प्रेत पिशाच स्तर का बन गया हैं। भले ही ऊपर से आवरण वह देवताओं का, संतों जैसा ही क्यों न ओढ़े फिरता हो? स्थिति ने जन समुदाय को शारीरिक दृष्टि से रोगी, अभावग्रस्त, चिन्तित, असहिष्णु एवं कातर-आतुर बनाकर रख दिया है। इस सबका समापन किस प्रकार बन पड़ेगा? इन्हीं परिस्थितियों में रहते, अगले दिनों क्या कुछ बन पड़ेगा? इस चिन्ता से हर विचारशील का किंकर्तव्यविमूढ़ होना स्वाभाविक है। सूझ नहीं पड़ता कि भविष्य में क्या घटित होकर रहेगा?


Quotation

दो घड़े आँगन में रखे थे। एक का मुँह नीचे या दूसरे का ऊपर। घनघोर वर्षा हुई जिस घड़े का मुँह ऊपर था वह जल से लबालब भर गया। जिसका नीचे था वह खाली का खाली बना रहा।


सदुपयोग बन पड़े, तो ही परिवर्तन संभव

मनुष्य अनन्त शक्तियों का भण्डार है। उसमें से बहुत थोड़ा अंश ही शरीर व्यवसाय में खर्च हो पाता है। शेष शक्ति प्रसुप्त मूर्छित स्थिति में पड़ी रहती है। काम में न आने पर पैने औजारों को भी जंग खा जाती है। प्रतिभा के अंग-प्रत्यंगों का प्रयोग न होने पर मनुष्य भी मात्र कोल्हू के बैल की तरह किसी प्रकार जिन्दगी के दिन काटता रहता है। पर जब भी उसका उत्साह उभरता है, तभी तत्परता लगन, स्फूर्ति और गहराई तक उतरने, खाने-पाने की ललक, अपने जादू भरे चमत्कार दिखने लगती है। व्यक्ति कहीं से कहीं जा पहुँचता है और साधारण परिस्थितियों में भी ऐसा कुछ कर दिखाने लगता है जिनसे आश्चर्य चकित हुआ जा सकें।

पिछली तीन सदियों को आत्म जाग्रति का समय कहना चाहिए भले ही वह भौतिक प्रयोजनों के पक्ष में ही सीमित क्यों न रही हों। शक्ति का जहाँ भी प्रयोग होता है, वहाँ वह अपना काम करती है उसने किया भी। भौतिक प्रगति की दिशा में उसका रुझान जुड़ा, अन्वेषण चले और उसने प्रत्यक्षवाद के पुराने ढाँचे को एक नये दर्शन रूप में गढ़कर तैयार कर दिया। नयी स्फूर्ति के साथ जब नवीनता उभरती है, तो उसका परिणाम भी असाधारण होता हैं प्रगति के नाम पर बढ़ा-चढ़ा भौतिकवाद और प्रत्यक्षवाद संसार के सामने आया और उसने जन-जन को प्रभावित किया। आविष्कारों ने सुविधा-साधनों के अम्बार जमा किए। बुद्धिमत्ता के नाम पर इतनी अधिक जानकारियाँ एकत्रित कर ली गयीं, जो किसी को भी अहंकारी बनाने के लिए पर्याप्त हो सकती थीं-हुई भी। वैसे जानकारियाँ बढ़ना सराहना के योग्य कार्य है, इसलिए प्रगतिशीलता का श्रेय भी उन सबको मिला है, जिनने यह उत्साह और पुरुषार्थ दिखाया।

बात इतने पर ही समाप्त नहीं होती, वरन इससे भी बड़े रूप में सामने आती है। वह है सदुपयोग और दुरुपयोग में से एक के चयन की। स्वार्थपरता और अदूरदर्शिता का समन्वय जब भी होता है, तब एक ही बात सूझ पड़ती है, कि जो कुछ-जितना जल्दी बटोरा और उससे जितना भी कुछ मजा-मौज उठा सकना संभव हो वैसा कर लिया जाय। उतावले, बचकाने व्यक्ति यही करते हैं। वे उपलब्धियों को धैर्यपूर्वक सत्प्रयोजनों में खर्च कर सकने की स्थिति में ही नहीं होते। ऐसा कुछ करते हैं जैसा कि सोने का एक अण्डा रोज देने वाली मुर्गी का पेट चीरकर सारे अण्डे एक ही दिन में निकाल लेने की दृष्टि से आतुर व्यक्ति ने किया था।

सदुपयोग से, किसी भी वस्तु से अपना और दूसरों का हित साधन किया जा सकता है, पर जब उसी का दुरुपयोग होने लगता है, तो एक माचिस की तीली से सारा गाँव जल जाने जैसा अनर्थ उत्पन्न होता है। प्रगतिशील शताब्दियों में पाया तो बहुत कुछ, पर दूरदर्शिता के अभाव में उसका सदुपयोग न बन पड़ा और उपयोग ऐसा हुआ, जिससे आज हर दिशा में संकटों के घटाटोप घहरा रहे हैं।

शासकों और धनाढ्यों के हित को प्राथमिकता न मिली होती तो वैज्ञानिक उपलब्धियों ने जन साधारण का स्तर कहीं से कहीं पहुँचा दिया होता। जब मशीनें मनुष्य के काम-काज में हाथ बँटाने लगी थी, तो उन्हें छोटे आकार का बनाया गया होता। कम परिश्रम में, क्रम समय में निर्वाह साधन जुटा लेने का अवसर मिला होता और बचे समय को कला-कौशल में, व्यक्तियों को अधिक सुयोग्य बनाने में लगाया गया होता। परिणाम यह होता कि हर कहीं खुशहाली होती। कोई बेकार न रहा होता और किसी को यह कहने का अवसर न मिला होता, कि निजी व्यक्तित्व के विकास एवं समाज के बहुमुखी उत्कर्ष में योगदान तो दुरुपयोग है, उसके कारण अमृत भी विष बन जाता है।

बड़े शहर बसाने और बढ़ाने में लगी हुई बुद्धिमता यदि अपनी योजनाओं को ग्रामोन्मुखी बना देने की दिशा में मुड़ गयी होती, तो अब तक सर्वत्र मात्र छोटे-छोटे स्वावलम्बी और फलते-फूलते कस्बे ही दिखाई पड़ते। न शहरों को घिचपिच, गंदगी तथा विकृतियों का भार वहन करना पड़ता और न गाँवों से प्रतिभा पलायन होते जाने के कारण, उन्हें गई गुजरी स्थिति में रहने के लिए बाधित होना पड़ता।

युद्धों को निजी या सार्वजनिक क्षेत्रों में समान रूप से अपराध घोषित किया जाता। छोटी पंचायतों की तरह अन्तर्राष्ट्रीय पंचायतें भी विवादों को सुलझाया करतीं। आयुध सीमित मात्रा में पुलिस या अन्तर्राष्ट्रीय पंचायतों के पास ही रहते, तो युद्ध सामग्री बनाने में विशाल धन शक्ति और जन शक्ति लगाने के लिए वैसा कुछ न बन पड़ता, जैसा कि इन दिनों हो रहा है। यह जन शक्ति और धनशक्ति यदि शाखा संवर्धन, उद्योगों के संचालन, वृक्षारोपण आदि उपयोगी कामों में लगी होतीं, तो युद्ध के निमित्त लगी हुई शक्ति को सृजन कार्य में नियोजित करके इतना कुछ प्राप्त कर लिया गया होता, जो अद्भुत और असाधारण होता।

शिक्षा का प्रयोजन अफसर या क्लर्क न रहा होता और उसे जन-जीवन तथा समाज व्यवस्था के व्यावहारिक पक्षों के समाधान में प्रयुक्त किया गया होता, तो सभी शिक्षित, सभ्य, सुसंस्कृत होते और अपनी समर्थता का ऐसा उपयोग करते, जिससे सर्वत्र विकास और उल्लास का वातावरण बिखरा-बिखरा फिरता। हर शिक्षित को दो अशिक्षितों को साक्षर बनाने के उपरान्त ही यदि किसी बड़ी नियुक्ति के योग्य होने का प्रमाण पत्र मिलता तो अब तक अशिक्षा की समस्या का समाधान कब का हो गया होता। उद्योगों का प्रशिक्षण भी विद्यालयों के साथ अनिवार्यतः जुड़ा होता तो बेकारी गरीबी की कहीं किसी को शिकायत न करनी पड़ती।

प्रेस और फिल्म, यह दो उद्योग जन मानस को प्रभावित करने में असाधारण भूमिका निभाते हैं। विज्ञान की इन दिनों उपलब्धियों के लिए यह अनुशासन रहा होता, कि उनके द्वारा उपयोगी मान्यता प्राप्त विचारधारा को ही छपाया फिल्माया जायेगा, तो इनसे मनुष्य की बहुमुखी शिक्षा की आवश्यकता की पूर्ति होती, जन साधारण को सुविज्ञ और सुसंस्कृत बना सकने में सफलता मिल गयी होती।

दुनियाभर में बुद्धि के धनी भी एक प्रकार के वैज्ञानिक हैं। शासन और समाज के विभिन्न तंत्र उन्हीं के संकेतों तथा दबाव से चलते हैं। यदि सामाजिक, कुरीतियों और वैयक्तिक अनाचारों के विरुद्ध ऐसी बाड़ बनायी गयी होती, जो इनके लिए अवसर ही न छोड़ती, तो जो शक्ति बरबादी में लगी हुई है, उसे सत्प्रयोजनों में नियोजित देखा जाता। अपराधों का-अनाचारों का कही दृश्य भी देखने को न मिलता। सर्वसाधारण को यदि औसत नागरिक स्तर का जीवन-यापन करने की ही छूट रही होती, तो बढ़ी हुई गरीबी में से एक भी दृष्टिगोचर न होती। सब समानता और एकता का जीवन जी रहे होते। फिर न खाइयां खुदी दीखतीं और न टीले उठे होते। समतल भूमि में समुचित लाभ उठा सकने का अवसर हर किसी को मिला होता। तब इन शताब्दियों में हुई बौद्धिक और वैज्ञानिक प्रगति को हर कोई सराहता और उसके सदुपयोग से धरती का कण-कण धन्य हो गया होता।

नशेबाजी,-दुर्व्यसनों के लिए छूट मिली होने के कारण ही लोग उन्हें अपनाते हैं। उनका उत्पादन ही निषिद्ध रहा होता, पीने वालों को प्रताड़ित किया जाता, तो आज धीमी आत्म हत्या करने के लिए किसी को भी उत्साहित न देखा जाता। इस लानत से बच जाने पर लोग शारीरिक और मानसिक दृष्टि से संतुलित रहे होते और हर प्रकार की बरबादी-बदनामी से बच जाते। अन्यान्य दुर्व्यसनों से संबंधित इसी प्रकार के और भी अनेकों ऐसे प्रचलन हैं, जो सामान्य जीवन में घुल मिल गये हैं। कामुकता भड़काने वाली दुष्प्रवृत्तियाँ फैशन का अंग बन गई हैं। बनाव श्रृंगार, सज-धज के अनेकों स्वरूप शान बनाने जैसे लगते हैं। आभूषणों में ढेरों धन बरबाद हो जाता है। बढ़ा हुआ बुद्धिवाद यदि इन अपव्ययों का विरोध करता, उनकी हानियाँ गले उतारता, तो खर्चीली शादियाँ जो हमें दरिद्र और बेईमान बनाने का प्रमुख कारण बनी हुई हैं इस प्रकार अड़ी और खड़ी न रहतीं।

ऊपर चढ़ना धीमी गति से ही संभव हो पाता है, पर यदि पतन के गर्त में गिरना हो तो कुछ ही क्षणों में बहुत नीचे पहुँचा जा सकता हैं पिछले दिनों हुआ यही है। चतुरता के नाम पर मूर्खता अपनाई गई है। इसका प्रमाण यह है कि ठाट-बाट की चकाचौंध सब और दीखते हुए भी मनुष्य बेतरह खोखला हो गया है। चिन्ता, उद्विग्नता, आशंका, अशान्ति का माहौल भीतर और बाहर सब और बना हुआ है। किसी को चैन नहीं। कोई संतुष्ट नहीं दीखता। मानसिक दरिद्रता के रहते विस्तृत वैभव भी बेचैनी बढ़ने का निमित्त कारण बना हुआ है।

सामयिक परिस्थितियों में से यह कुछ की चर्चा भर है। यहाँ यह समीक्षा की गई है कि यदि भविष्य को सही बनाने की दिशा में प्रयास-पुरुषार्थ संभव होता, तो ही भला था। निराश मनःस्थिति ऐसे में बनना स्वाभाविक हैं, किन्तु निराशा की मानसिकता स्वयं में बड़ा संकट है। इससे मनोबल टूटता है, उत्साह में अवरोध आता है।

सृजन प्रयास सर्वथा बन्द हो गये हैं, यह बात नहीं। वर्तमान सुधारने व भविष्य को उज्ज्वल सम्भावनाओं से भरा बनाने हेतु किए जा रहे प्रयासों में शिथिलता भले ही हो, अभाव उनका भी नहीं है। यदि मनुष्य का हौंसला बुलन्द हो, तो प्रतिकूलताएँ होते हुए भी ऐसा कुछ किया जा सकता है, जिसे देखकर आश्चर्य होता रह सके। मिश्र के पिरामिड, पनामा की नहर, स्वेज कैनाल, चीन की विशाल दीवार जैसे प्रबल प्रयास आशावादी, साहस भरे वातावरण में ही संपन्न हुए हैं। जब कई व्यक्ति मिलकर एक साथ वजन धकेलते हैं तो उनकी संयुक्त शक्ति व मुँह से निकली “हेईशा” जैसी जादू भरी हुंकार वह उद्देश्य सम्पन्न कर दिखाती है।

ब्रिटिश प्रधानमंत्री सर विंस्टन चर्चित ने द्वितीय विश्वयुद्ध के दिनों में, हारते हुए ब्रिटेन वासियों का मनोबल बढ़ाने के लिए एक नारा दिया- ‘बी’ फाँर विकट्री। अर्थात् जीतना हमें ही है, चाहे शत्रु कितना ही क्यों न हो? इस संकेत सूत्र का इतना प्रचार हुआ कि यह सुनिश्चित विश्वास का-विजय का एक प्रतीक बन गया। इस हुंकार ने जादुई परिवर्तन कर दिखाया एवं युद्ध से विस्मार हो रहा यूरोप जागकर उठ खड़ा हुआ। टूटा हुआ जापान हिरोशिमा की विभीषिका के बावजूद भी सृजन प्रयोजनों में निरत रहा, मनोबल नहीं टूटने दिया व आज आर्थिक मण्डी सारे विश्व की उसी के हाथ में है। यह सुनिश्चित है कि लोगों की आस्थाओं को युग के अनुरूप विचार धारा को स्वीकारने हेतु उचित मोड़ दिया जा सके, तो कोई कारण नहीं कि सुखद भविष्य का, उज्ज्वल परिस्थितियों का प्रादुर्भाव संभव न हो सके? यह प्रवाह बदल कर उलटे को उलटकर सीधा बनाने की तरह का भागीरथी कार्य है, किन्तु असम्भव नहीं, पूर्णतः संभव है।


Quotation

मुर्गा समझता है कि सूर्य मेरा स्वर सुनने के लिए ही आता है। मुर्गी जब अण्डा देती है तो ऐसी अकड़ती है मानों किसी नक्षत्र को जन्म दे रही है। शुद्र लोग अपने नगण्य से कार्यों की ढोल बजाकर मुनादी कराते है।


जीवनी शक्ति एवं उसकी दृश्य चमत्कृतियाँ

मोटर का ढाँचा लोहे का बना होता है। उसके पहियों में रबड़, सीटों में रेगजीन, खिड़कियों में कब्जे आदि होते हैं। यह बात सही होते हुए भी उसका दौड़ना, मुड़ना, पीछे हटना आदि उस अग्नि पर निर्भर रहता है जो पेट्रोल, बैटरी, डायनेमो आदि के माध्यम से बनती है। उसकी भागदौड़ में भी बड़ी निमित्त कारण बनती है। पेट्रोल चुक जाय, बैटरी फ्यूज हो जाय तो समझना चाहिए कि वह आकार में ज्यों की त्यों होते हुए भी हरकत में नहीं आ सकेगी।

शरीर संरचना भी मोटर सदृश ही है। देखने में वह हाड़-माँस, रक्त, त्वचा आदि का बना होता है पर उसकी बाहरी और भीतरी हलचलें एक प्राणविद्युत पर निर्भर रहती हैं। प्राण के तिरोहित हो जाने पर अच्छा खासा मोटा-तगड़ा शरीर भी देखते देखते निर्जीव हो जाता है। धड़कने बन्द हो जाने पर तो मृत्यु तत्काल हो जाती है और कुछ समय पहले तक जो शरीर प्रबल पुरुषार्थ दिखा रहा था, वह सर्वथा निर्जीव हो जाता है। उसकी अंत्येष्टि न की जाय तो वह अपने आप सड़ने और नष्ट होने का उपक्रम अपना लेता है। जो श्वास, गिद्ध, चील, श्रृंगाल, सर्वथा दूर रहते थे, वे गंध पाते ही दौड़ पड़ते हैं और लाश को तेजी से उदरस्थ कर जाते हैं।

शरीर की स्थिति भी ऐसी है। बाहर से उसके हाथ-पैर आँख-कान-नाक आदि काम करते दिखाई पड़ते हैं, पर वस्तुतः जीवन आन्तरिक ऊर्जा पर निर्भर रहना है। यह अदृश्य ऊर्जा जीवन, जीवनीशक्ति, चेतना, प्राणविद्युत आदि नामों से जानी जाती है। वही जीवन संचालिका और विभिन्न हलचलों की अधिष्ठात्री है। स्वास्थ संतुलन और पुरुषार्थ पराक्रम पर निर्भर रहते हैं। जीवनीशक्ति बढ़ी−चढ़ी हो तो व्यक्ति एक से एक बढ़कर पराक्रम दिखापाते हैं और यदि उसमें दुर्बलता न्यूनता अथवा विकृत बढ़ने लगे तो शारीरिक ही नहीं, मानसिक रोग भी धर दबोचते हैं।

चिकित्सक रोग निवारण या दुर्बलता शमन के लिए अपने अपने ढंग से निवारण और उपचार करते हैं। वैद्य वात, पित्त, कफ का असंतुलन कहते हैं। हकीम उसकी जड़ आदी-बादी खदी प्रकृति के नाम से कहते हैं। होम्योपैथी में अमुक विषों की न्यूनता कारण है। बायोकेमिक में अमुक लवणों की कमी को प्रधान कारण माना जाता है। क्रोमोपैथी में रगों का असंतुलन कारण है। एलोपैथी वाले जीवाणु-विषाणु का आक्रमण बताते हैं। अनुभव की दुहाई देने वाले अनगढ़ उपचारों का तो कहना ही क्या?

पुराने जमाने में बुखार, खाँसी, दस्त आदि सीमित रोग थे पर अब तो उनका वर्गीकरण बढ़ी चढ़ी रोग तालिका के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। उनकी विभीषिका भी बढ़ी चढ़ी है। दमा, अल्सर, मधुमेह, रक्तचाप, हार्ट अटैक से लेकर एड्स और कैंसर जैसे भयानक रोगों का ज्वार ही बढ़ता जाता है। भाटा उठने और उतार दीख पड़ने की प्रतीक्षा निराशा बन कर रह जाती है। कब्ज, जुकाम, अनिद्रा जैसे रोगों का तो कहना ही क्या? वे तो एक नये फैशन के रूप में एक से अनेकों पर अपना आधिपत्य जमाते देखे जाते हैं। उपचारकर्ता अपनी पराजय की झेंप मिटाने और बढ़-चढ़ कर प्रशंसा करके रोजगार चलाने के लिए बचाव का कुछ तो लबादा ओढ़ते रहते हैं, पर सच्चाई अपनी जगह पर अड़ी रहकर पूछती है कि चिकित्सा तंत्र जब तूफानी गति से बढ़ रहा है तो सर्व साधारण को आरोग्य रक्षा का आश्वासन क्यों नहीं मिलता?

इस असमंजस के निवारण के लिए तनिक अधिक गहराई में उतरने की आवश्यकता है। खोजों का अन्तिम निष्कर्ष आज या कल एक ही निकलने वाला है कि मनुष्य की जीवनी शक्ति बेतरह घट रही है। इस दुर्बलता को भाँपकर बाहर से हवा में निरन्तर उड़ते रहने वाले और स्थान के चप्पे चप्पे में विद्यमान वायरस-बैक्टीरिया सफलतापूर्वक किसी भी मार्ग से शरीर में शरीर में प्रवेश कर जाते हैं। निरोधक शक्ति की दुर्बलताओं पर आसानी से टिकने की जगह खोज लेते हैं और उपयुक्त आहार पाकर बिना अवरोध का सामना किये तेजी से वंशवृद्धि करते रहते हैं। इसी स्थिति को बीमारियों के नाम से जाना जाता है और उनके चित्र−विचित्र नाम दे दिये जाते हैं।

बाहर से विषाणुओं का आक्रमण हो तो भीतर की अशुद्धियां ही सहज बनकर विषाक्तता का उत्पादन करती रहती हैं और वे भी लगभग वैसी ही भयंकर बन जाती हैं जैसी कि तथा कथित आक्रमणकारी विषाणुओं की फौज। भीतर की तोड़−फोड़ और बाहरी आक्रमण का दुहरा दबाव प्रायः कमजोर फौजें सहन नहीं कर पातीं और हथियार डालकर पराजय को स्वीकार कर लेती हैं।

भीतरी जीवनीशक्ति की दुर्बलता, घटोत्तरी एवं विकृत को यदि दुर्बलता और रुग्णता का प्रमुख कारण ठहराया जाय तो यह उचित निदान होगा। इन दिनों यही उपक्रम चल रहा है और आरोग्य की दृष्टि से लोग दिन-दिन दुर्बल बनते जाते हैं। अस्वस्थता आज की सबसे बड़ी समस्या है। उसी के कारण पुरुषार्थ करके प्रगति के सत्परिणाम उपलब्ध कर सकना कठिन पड़ता है। दर्द, सूजन, ताप, विस्फोट आदि की व्यथा-वेदना अलग से बेचैन किये रहती है। हितैषियों-परिचायकों पर अतिरिक्त दबाव पड़ता है, पैसा खर्च होता है और उत्पन्न गंदगी की छूत समीपवर्ती लोगों से लेकर दूरवर्तियों तक जा पहुंचने का खतरा रहता है। जो स्वयं सहायता का आकाँक्षी है, परन्तु जब स्वावलम्बन तक सँजो नहीं पाता, प्रगति कैसे करेगा? पुरुषार्थ कैसे दिखा पायेगा? दूसरों की सहायता करने की स्थिति तो विवशता में थोड़ी बहुत ही बन पाती है। यह स्थिति बहुत दयनीय है। रोगी को अपराधी न कहा जाय तो कम से कम अभागा तो कहा ही जाएगा जो जीवन के वास्तविक लाभ प्रगतिशीलता से प्रायः वंचित ही बना रहता है। स्थिति चिंता जनक है, विशेषतया जब लोगों में से अधिकाँश तीव्र या मंद शारीरिक रोगों से घिरे पाये जाते हैं। मानसिक रोगों की अपनी दुनिया है जो न तो पकड़ में आती है न समझ में। सनकी, दुर्गुणी अव्यवस्थित और अनाचारी प्रायः मानसिक रोगी ही होते हैं। उन पर चित्र−विचित्र आवेश चढ़े रहते हैं और ऐसे कृत्य करते हैं, जिन्हें अवाँछनीय ही नहीं, अमानवीय भी कहा जा सके। उनका त्रास विशेष रूप से स्वजन संबंधियों और निकटवर्तियों को भुगतना पड़ता हैं दूरवर्ती तो तभी नाक-भौं सिकोड़ते हैं जब उनके असली स्वरूप की थोड़ी बहुत झलक झोंकी मिलती है। ऐसे लोग समाज के लिए ही भार बने रहते हैं। उनसे सार्वजनिक प्रगति की सहायता करने की तो आशा ही क्या की जाय? जबकि वे स्वयं ही खोखले होने के कारण अपने और दूसरों के लिए चिन्ता का विषय बने रहते हैं।

शरीर क्षेत्र में संव्याप्त अनेक विग्रहों और संकटों के कारण तो अनेकों गिनाए जा सकते हैं पर वास्तविकता यह है कि जन साधारण के शरीर और व्यक्तित्व में जीवनीशक्ति की मात्रा बेहिसाब घटती चली जा रही हैं। दरिद्रता अन्य क्षेत्रों में भी पाई जाती है, पर वह ऐसी है जिसे किसी प्रकार सहा और रहते हुए भी किसी हद तक काम चलाया जा सकता है। पर जीवट की कमी तो ऐसी है जिसके कारण मनुष्य जीवित रहते हुए भी एक प्रकार से पूर्ण मृतक तो नहीं, पर अर्धमृतक जैसा तो निश्चित रूप से बनकर रहता है। शरीर देखने में सही होते हुए भी निर्जीव, निस्तेज, मस्तिष्क शिक्षित होते हु भी कठिनाइयों से उबरने में असमर्थ और प्रगति की इच्छा-चेष्टा करते हुए भी असफल। इसके पीछे एक ही व्यवधान काम करता है कि उस ऊर्जा का अनुपात और तर घटा हुआ रहता है जो प्रसन्नता, प्रफुल्लता समर्थता और सफलता की जन्मदात्री है। शरीर की कमजोरी, बीमारी, निराशा, उद्विग्नता के प्रत्यक्ष कारण जो भी हों, पर वास्तविकता यह है कि जीवट घट जाने की ही यह समस्त परिणतियाँ हैं। जब तक मूल कारण को समझा और निरस्त नहीं किया जाएगा तब तक शरीर क्षेत्र की दुर्बलता रुग्णता से लेकर मानसिक खिन्नता और विपन्नता से छुटकारा पाया जा सकना संभव न हो सकेगा। थोड़ी देर के लिए उन्हें दाब-ढँक लिया जाय और गम गलत कर लिया जाय, यह दूसरी बात है।

जीवन शरीर और मन तक ही सीमित नहीं है। उसमें पग-पग पर अवरोधों से जूझना भी पड़ सकता है और अपने ढंग से अपनी प्रगति के लिए रास्ता भी खुद ही बनाना पड़ता है। इसके लिए अभीष्ट शक्ति सामर्थ्य न हो तो कुछ करते-धरते बन नहीं पड़ता। किंकर्तव्य-विमूढ-हतप्रभ की तरह ज्यों का त्यों रह जाना पड़ता है। साँस तो लुहार की धौंकनी भी लेती रहती है। अनाज खाने और आटा नीचे निकाल देने का ढर्रा तो चक्की भी घुमाती रहती है। कोल्हू का बैल भी किसी प्रकार पिलने और पेलने में लगा रहता है। भूत पलीत मरघट में एकाकी रहकर डरने और डराने का जंजाल बुनते रहते हैं। पर यह सब मनुष्य जैसे असाधारण शक्ति सम्पन्न सृष्टि का मुकुटमणि कहलाने वाले को शोभा नहीं देता। उसे ऐसा कुछ करना चाहिए जिसके साथ उठने और उठाने की, बढ़ने और बढ़ाने की प्रक्रिया जुड़ी हुई हो। उसे अनुकरणीय और अभिनन्दनीय होने का सुयोग-सौभाग्य और सम्मान मिल सके। पर ऐसी प्रगतिशीलता किसी भी क्षेत्र में मिल तभी सकती है जब आन्तरिक ऊर्जा साथ दे। जीवट की परिणति ओजस् तेजस् और वर्चस् में विकसित हो सकने की व्यवस्था बन पड़े।

चर्चा शरीरचर्या से आरंभ हुई थी। उस पर विचार करते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि स्वस्थता के लिए आहार आवश्यक तो है पर पर्याप्त नहीं। सफाई निद्रा, आच्छादन, सुविधा साधन उपयोगी तो हैं पर मात्र उन्हीं के बलबूते किसी का स्वस्थ रह सकना संभव नहीं।

मानवी सत्ता के तीन पक्ष हैं-शरीर मस्तिष्क और अंतःकरण। इन्हीं को स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीर भी कहते हैं। इनमें काम करने वाली जीवट को ही प्राणाग्नि, “लोगौस” बायो इलेक्ट्रीसिटी, जीवनीशक्ति, विद्युतचेतना आदि नामों से जाना जाता है। यही क्रमशः ओजस् तेजस् और वर्चस् हैं। इनका सामान्य संतुलन आरोग्य के नाम से जाना जाता है। व्यक्तित्व या प्रतिभा यही है। उसे सही स्थिति में रखे रहना ही स्वास्थ्य रक्षा, समर्थता, बलिष्ठता, विशिष्टता आदि नामों से जाना जाता है। इसे गिरा देना संभाले रहना एवं प्रखर बनाना पूर्णतया मनुष्य के अपने हाथ में है, जबकि प्रतीत यह होता है कि यह भाग्यवश किसी को गई-गुजरी दशा में उपलब्ध होती है और किसी पर वरदान रूप में अदृश्य लोक से बरसती है।

आरोग्य का उद्गम यही है। नस नाड़ियों में, माँसपेशियों में, जीवकोषों में इसी का प्रभाव काम करता देखा जाता है। रोग निरोधक शक्ति यही है। इसी को टॉनिक के समतुल्य बलवर्धक स्थिति में देखा जाता है। मस्तिष्क में बुद्धिमत्ता, दूरदर्शिता, सूक्ष्म-निरीक्षण क्षमता इसी के चमत्कार हैं। विशिष्टों, साहसियों, वैज्ञानिकों, कलाकारों एवं विशिष्टजनों में इसी की विशिष्टता काम करती देखी जाती है। अंतःकरण में भाव संवेदनाओं के रूप में इसी को देखा जाता है। करुणा, सहिष्णुता और आदर्शवादी सराहनीय कृत्यों में इसी की गरिमा का परिचय मिलता है। यह कम मात्रा में हो तो समझना चाहिए कि व्यक्ति आये दिन बीमार पड़ेगा और अनेक नामों वाली अशक्तता रुग्णता से घिरा हुआ अपनी स्थिति निर्बल, दुर्बल, पीड़ित एवं आधि−व्याधियों से घिरी स्थिति में अनुभव करता हुआ कराहता रहेगा। मस्तिष्क में इसका अनुपात कम हो तो उसे अस्तव्यस्त, अनगढ़, असभ्य, अर्थ विक्षिप्त, सनकी स्तर का समझा जायगा। औंधी स्वभाव के कारण गलतियों, गलत फहमियों का शिकार बना रहेगा। ऐसा कुछ करते कहते देखा जाएगा जो सभ्यजनों को शोभा नहीं देता। अन्तःकरण की दृष्टि से हेय स्तर वाले निष्ठुर, निर्मम नीरस, स्वार्थी और पतित स्तर के आचरण करते और उपहास-अपमान को लालायित रहते हैं। जिनके पास यह सम्पदा जितनी कम है, उन्हें ही वस्तुतः दीन-हीन, पिछड़ा, दरिद्री एवं अभाव -ग्रस्त माना जाता है। क्षमता को विकृत कर लेने वालों को भ्रष्ट चिन्तन और दुष्ट आचरण में संलग्न देखा जाता है। इन सबका कारण वस्तुओं के अभाव, परिस्थितिकी विग्रह आदि को समझा जाता है। पर देखा गया है कि आतंक पर उतारू लोगों की अपेक्षा कहीं अधिक विषमताओं का सामना करने वाले अपनी सहिष्णुता और समझदारी के माध्यम से कई गुनी बड़ी चढ़ी विपन्नताओं को भी अपने ढंग से सुलझा लेने या सहलेने में सफल हो जाते है ईंधन न डालने पर आग के स्वयं बुझ जाने का सिद्धान्त सरलतापूर्वक सम्पन्न कर लेते हैं।

प्राथमिक और प्रथम कठिनाई रुग्णता और दुर्बलता को समझा जाता है। स्वास्थ्य इन्हीं दो कारणों से गड़-बड़ाने की बात सोची जाती है। रोगों के विषाणुओं का प्रभाव समझ कर उनके प्रतिकार हेतु मारक औषधियाँ सेवन की जाती हैं। इससे तात्कालिक लाभ भले ही दीखता हो पर प्रतिरोधक शक्ति क्षीण होती है और आक्रमण से जूझने वाले रक्त के स्वस्थ प्रहरी भी आहत होते हैं। फलतः तात्कालिक लाभ थोड़ और स्थायी हानि का अनुपात अधिक रहता है। मारक चिकित्सा अन्ततः महँगी पड़ती है। यही बात दुर्बलता निवारण के निमित्त लिये गये टॉनिकों के संबंध में भी है। पाचन क्रिया के दुर्बल रहने पर न तो वह गरिष्ठ आहार पचता है, जो शक्तिदायी माना जाता है और न वे औषधियाँ ही चिरस्थाई लाभ देती हैं जिन्हें बलवर्धक माना जाता है। वे नशा पीने जैसी क्षणिक उत्तेजना देकर कुछ ही समय में और भी अधिक थकान का कारण बनती हैं। यदि ऐसा न होता तो साधन सम्पन्न लोग महँगी से महँगी आरोग्यवर्धक वस्तुएँ लेकर पहलवानों जैसे बलिष्ठ बने रहते, सदा निरोग रहे होते और दीर्घ जीवन जीते, पर ऐसा होता कहाँ है? इसलिए इस भ्रान्ति को निरर्थक ही समझा जा सकता है जिसमें आरोग्य लाभ के लिए चित्र विचित्र आहारों की सूची थमाई और संजीवनी बूटी कहकर भड़कीले लेबिलों वाली औषधियां उदरस्थ कराई जाती हैं।

वास्तविकता यह है कि शरीर के कण-कण में, नस-नाड़ियों में माँसपेशियों और जीवकोषों के माध्यम से कण-कण तक पहुँचने वाली प्राण विद्युत की प्रचुरता ही वह आधार है जो साधन हीनों को भी निरोध और बलिष्ठ बनाये रहती है। जीवट इसी अमृतधूरि को कहते हैं। वही जीवनी-शक्ति के रूप में सर्वांगीण पोषण प्रदान करती है और मनुष्य को वैसा रखती है जैसा कि उस उत्साह भरी स्थिति में बने रहना चाहिए।

इसे दुर्भाग्य ही कहना चाहिए कि हम प्रत्यक्ष कलेवर भर को देखते हैं और उसके पीछे काम करने वाली अदृश्य सामर्थ्य का न मूल्याँकन कर पाते हैं और न महत्व ही समझते हैं। माँसपेशियों की पुष्टाई देखी जाती है पर यह भुला दिया जाता है कि वह बिजली ही शक्ति पुँज है जो अनेक उपकरणों को चलाती और जलाती है। बिजली की धारा न बह रही हो तो बल्ब, पंखे, हीटर कूलर आदि कितने ही सुन्दर या महँगे हों, वे अपना कार्य ठीक प्रकार नहीं कर सकते। इसी प्रकार जीवट के, जीवनीशक्ति के कम पड़ने पर शरीर, मन, अन्तःकरण सभी गड़बड़ा जाते हैं। विशेषतया स्वास्थ्य तो चौपट ही हो जाता है जैसा कि आजकल सर्वत्र दीख पड़ता है।


मनोबल की प्रचण्ड शक्ति एवं उसकी परिणति

घटना सन 1981 की है। इंग्लैण्ड की एक पैट्रिकमेरी नामक महिला के सीने में कैन्सर हुआ। पता तब चला जब डाक्टरों ने जाँच पड़ताल के उपरान्त यह बताया कि उसका कैन्सर सीने से बढ़कर सारे धड़ में फैल चुका है। इलाज तो चिन्ह पूजा है पर वह जीवित अधिक से अधिक छः महीने और रह सकेगी। महिला चिन्तित हुई। उसने पूछा “ क्या इसका उपचार नहीं हो सकता?” डाक्टरों ने सीधा सा उत्तर दिया कि “आपकी जाँच पड़ताल कुछ महीने पहले हो सकी होती और समय रहते वस्तु स्थिति का पता चल गया होता तो यह संभव था कि समय रहते इलाज हुआ होता और आपके प्राण बच सके होते” पहले जाँच पड़ताल क्यों नहीं हो सकी? इसका कारण एक ही था। इंग्लैण्ड में उस समय ऐसी परीक्षा मशीन जिसे “कैटस्कैनर” नाम से जाना जाता है मात्र एक ही थी, जिस पर जाँच करने के लिए अपनी पारी के लिए मरीजों को लम्बी प्रतीक्षा करनी पड़ती थी। तब तक बात बढ़कर कहीं से कहीं जा पहुँचती थी। पैट्रिकमेरी भी इसी प्रतीक्षा में असाध्य स्तर तक जा पहुँची।

महिला ने विचार किया कि जब मात्र छः महीने ही जीना है तो इस समय का श्रेष्ठतम उपयोग क्यों न कर लिया जाय। सोचते सोचते वह इस निष्कर्ष पर पहुंची कि मेरी हैसियत तो ऐसी नहीं है कि ऐसी अनेकों मशीनें देश में लगा सकूँ पर इतना तो हो ही सकता है कि यदि पूरी शक्ति इसी कार्य में झोंक दी जाय तो एक के स्थान पर दो तो हो ही जायँ और आधे रोगियों के तो प्राण बच ही जायँ। उन दिनों ऐसी एक मशीन प्रायः ढ़ाई करोड़ रुपयों में बनती थी।

पैट्रिक ने एक साँगोपाँग योजना बनाई। उस देश के टेलीविजन पर अपनी स्थिति, दुर्दशा और संभावना प्रसारित की और साथ ही वह भी कहा कि यदि पाँच करोड़ का प्रबंध हो जाय तो दूसरी मशीन कुछ ही दिनों में लग सकती है और मेरे जैसे आधी से अधिक संख्या के रोगियों के प्राण बच सकते हैं। उस प्रसारण को सुनकर बहुत से उदारचेता प्रभावित हुए और उनने अपनी श्रद्धानुसार राशि भेजना शुरू कर दी। महिला का हौंसला बढ़ा और उसने और भी उपकरणों का सरंजाम जुटाने में अपना सारा समय और मनोयोग लगा दिया। नियत अवधि में दूसरी मशीन बनने, चालू होने के लिए स्थान की जाँच कर्त्ताओं की सारी व्यवस्था जुट गई। कार्य आरंभ हो गया। इस बीच उसकी तत्परता और तन्मयता ऐसी रही जिसमें उसे अपनी बीमारी और चिकित्सा की चिन्ता ही न रही और अपने लिए जो सोचना-करना था उसे भुलाये ही रही।

संकल्पित कामों से निबटने के बाद साथियों के याद दिलाये जाने पर वह फिर डाक्टरों के पास अपनी जाँच पड़ताल कराने गई कि अब उसकी छः महीने की शेष वाली जिंदगी किस स्थिति में है? समय तो दो वर्ष से अधिक बीत चुका था। डाक्टरों ने उसके सारे शरीर की जाँच कर डाली, पर उसमें कही कैन्सर, का कोई नामों-निशान न था। हर दृष्टि से भली चंगी थी। इस आश्चर्यजनक कायाकल्प का कारण खोजने के लिए विभिन्न स्तर के विशेषज्ञों की समिति बनाई बिठाई गई। उसने लम्बे अन्वेषण के बाद एक ही प्रतिवेदन प्रस्तुत किया कि यदि मनुष्य का मनोबल मौत, बुढ़ापा, बीमारी आदि को भुलाकर उसके स्थान पर किसी उच्चस्तरीय परमार्थ में लगा दे तो ऐसी अद्भुत शक्ति भीतर से ही उपज सकती है जो भयंकर रोगों से भी निबट सके और उसके स्थान पर स्वस्थता सम्पन्न करने वाली सामर्थ्यों को उभार सके।

यह घटना एक उदाहरण है। उसके आधार पर यह अनुमान लगाया जा सकता है कि रोग निरोधक शक्ति जितनी औषधियों में, शल्य-क्रियाओं और चिकित्सकों के कौशल में समाहित है, उससे अनेक गुनी सामर्थ्य व्यक्ति के अपने मनोबल में सन्निहित है, बशर्ते कि उसे उभारा जा सके।

ऐसी घटनाएँ एक नहीं अनेक हैं। फ्लोरेंस की एक महिला उन दिनों नवयुवती थी। उसकी मँगनी हो चुकी थी। विवाह होने ही वाला था कि पति परदेश चला गया और उसे लौटने में बीस वर्ष लग गये। फिर भी वह निराश न हुई और सोचती यही रही कि जब विवाह हो तो उसका शरीर नवयुवती जैसा ही दृष्टिगोचर होना चाहिए। वह दिन में कई कई बार अपना मुँह दर्पण में देखती और विश्वास करती कि उसका यौवन घट नहीं रहा वरन दिन दिन अधिक निखर रहा है। बलवती आशा ने उसे सजधज का श्रृंगार करते रहने के लिए और भी अधिक उकसाया। बीस वर्ष बीत गये। तब वह चालीस वर्ष की हो चुकी थी, जबकि उसका मंगेतर बीस वर्ष बाद लौटा। उसे मिलने पर अत्यधिक प्रसन्नता हुई कि उसकी प्रेमिका का रूप लावण्य जाते समय जैसा था, उससे बढ़ा ही है, घटा नहीं। विवाह हो गया और वे सुखपूर्वक जिये। इस घटना में संकल्प शक्ति का ही चमत्कार है।

पुराणों में ऐसी घटनाओं का विस्तारपूर्वक बढ़ी चढ़ी संख्या में वर्णन है। हनुमान सुग्रीव के एक साधारण कर्मचारी थे। उनके सामने सीता की वापसी वाले संदर्भ में समुद्र पार करने का प्रश्न आया। वे अपनी सीमित शक्ति को देखते हुए वैसा कर सकने में अपने को असमर्थ पा रहे थे, पर जामवन्त ने जब उन्हें प्रोत्साहित किया और प्रसुप्त शक्तियों को जाग्रत होने पर कुछ भी कर सकने का स्मरण दिलाया तो वे असंभव को संभव कर दिखाने के लिए तत्पर हो गये और इसके उपरान्त वे जीवनभर क्या क्या करते रहे, इसके सुविस्तृत वर्णन से प्रायः सभी अवगत हैं।

भारत का अध्यात्म तत्वदर्शन और योगसाधना विश्व भर में विख्यात है और उसे मनुष्य में देवत्व उदय करने में सर्वथा समर्थ माना जाता है। वैसे अगणित प्रमाण उदाहरण भी हैं। शाप वरदान देने की शक्तियाँ ऋद्धि−सिद्धियों का परिचय देने का प्रसंग अगणित उदाहरणों समेत इतिहास प्रसिद्ध है। पिछली शताब्दियों में भौतिक विज्ञान के आविष्कारों ने संसार भर को चमत्कृत एवं लाभान्वित किया है। भारत की अपनी विशेषता चिर अतीत से विख्यात रही है। उसके आधार पर ऋषि मुनियों और महामानवों का इतना बड़ा परिकर उभरता रहा है, जिसने न केवल अपने देश को वरन् संपर्क में आने वाले सुविस्तृत परिकर को इतना समुन्नत बनाया, जिसे धरती पर स्वर्ग के अवतरण की संज्ञा दी जा सके। प्रगतिशीलता का इतिहास भारत के महामनीषियों की मनस्विता के आधार पर बन पड़े महान सृजनात्मक पुरुषार्थों के साथ जुड़ा हुआ है। उन्हीं का पराक्रम था, जो धरती पर स्वर्ग के अवतरण वाला सतयुग चिरकाल से संसार के अधिकांश भू भाग में अपनी गरिमा का परिचय देता रहा।

मनस्वी कौडिन्य ने मध्यपूर्व के सुविस्तृत क्षेत्र में ऐसा प्रचलन, प्रवाह उत्पन्न किया कि वह समूचा विशालकाय क्षेत्र न केवल हर दृष्टि से समुन्नत हुआ वरन् भारत का एक प्रकार से साँस्कृतिक उपनिवेश ही बन गया। कुमार जीव की कथा गाथा हर किसी के लिए अभी भी प्रकाश स्तम्भ का काम करती है। बिहार प्रान्त के एक निर्धन परिवार में वह जन्मा और पैदल चलकर काश्मीर के उत्तरी छोर पर बसे तक्षशिला के विश्व विद्यालय में पढ़ा। इस बीच उसकी दृष्टि चीन के विशालकाय क्षेत्र पर गई और उसने चीन को हिन्दू धर्म की बौद्ध शाखा का अनुयायी बनाने की ठानी। साधनों का अभाव रहते हुए भी वह गोबी के दलदल तिब्बत एवं खोखान के सुविस्तृत हिम रेगिस्तान को पार करते हुए प्राणों की बाजी लगाकर चीन जा पहुँचा। भाषा और संस्कृति के अपरिचय की कठिनाई को पार किया और वहाँ ऐसा मूर्धन्य प्रचारक बना कि न केवल चीन वरन् उसके समीपवर्ती साइबेरिया, कोरिया, जापान आदि को भी अपनी महान संस्कृति का अनुयायी बनाने में सफलता प्राप्त कर ली।

चाणक्य एक साधारण ब्राह्मण मात्रा था पर उसने अपने अपमान के प्रतिशोध में नन्द वंश की ईंट से बजा दी। एक मोर्चा पूरा हुआ तो भी वह चैन से न बैठा और निश्चय किया कि भारत पर आये दिन होते रहने वाले आक्रमण को यहाँ से उखाड़ फेंकना है, जहाँ से उनकी जड़े बार बार हरी होती है और अपने चमत्कार दिखाती हैं। उसने अपनी दिव्य दृष्टि से प्रतिभा के पुज चन्द्रगुप्त को चूना और इस बात के लिए तैयार किया कि वह निरन्तर युद्धरत रहकर आक्रांताओं के आतंकवाद की जड़ मूल से उखाड़ फेंके। चन्द्रगुप्त अचकचा रहा था और इस प्रयास में आने वाली असंख्यों कठिनाइयों को विस्तारपूर्वक सुना और गिना रहा था। सुनने वाले चाणक्य ने व्यंगोवित के साथ हँसते हुए बांहें तान कर कहा-”तुम दासी पुत्र हो। अपनी सहज भीरुता और दीनता की अभिव्यक्ति कर रहे हो। तुम्हें समझना चाहिए कि चाणक्य जो सोचता हैं, वही क्रियान्वित भी होता है ओर इतना ही नहीं वह फलित होकर भी रहता है। तुम बकवास मत करों। जो कहा जा रहा है, उसे करो और गाँठ बाँध लो कि चाणक्य निरर्थक योजनाएँ नहीं बनाता और न उनके कभी असफल रहने की आशंका आड़े आती है”। चन्द्रगुप्त नत मस्तक हो गया। उसने अक्षरशः अनुशासन पाला और वह कर दिखाया जिसे उसके पूर्णवर्ती असंभव मानकर चुप बैठे रहे थे और मन ही मन कुड़ कुड़ाते रहते थे।

मनोबल क्या नहीं कर सकता? इसका रहस्य जिनने भी समझा, वे व्यवधानों को चीरते हुए पर्वतों के ऊँचे शिखरों पर चढ़ दौड़ने में सफल हुए हैं। भारत का पुरातन विज्ञान “चेतना विज्ञान” है, जिसे तपश्चर्या-योग साधना आदि के नाम से जाना जाता है। उसके फलस्वरूप उपलब्ध हो सकने वाली ऋद्धि सिद्धियों से पुराण गाथाओं का पन्ना-पन्ना भरा पड़ा है। यह योगाभ्यास आखिर है क्या? इसकी गहराई तक उतरने वाले बताते हैं कि यह तितिक्षाओं के साथ जुड़ी हुई कर्मकाण्डों की प्रत्यक्ष फलश्रुति प्रतीत होते हुए भी वस्तुतः मनोबल को उभारने और प्रसुप्त प्राणाग्नि को प्रज्वलित करने की प्रक्रिया मात्र है देव शक्तियों का केन्द्र बिन्दु यही है। वृक्ष पर फल−फूल आकाश से टपककर चिपकते रहने की बात सोचने वाले वस्तुतः गलती पर होते हैं। जड़ों के द्वारा खींचा गया धरती का रस ही तने को मजबूत करता है। पल्लवों को हरितमा और वृक्षों से सुविस्तृत छायादार बनाकर उन्हें फल फूलों से लाद बैठा है। उसी जड़ के आधार पर वे आधी तूफानों से लड़ते है। वे अपनी जगह अकड़ कर चिरकाल तक खड़े रहते है। सिद्ध पुरुष अडिग प्रवृत्ति के उच्च शिखर पर पहुँचते हे। महापुरुषों की सफलताएँ का पुरुषों को पुचकारती और विजय श्री वरण कर सकने की शिक्षा प्रत्यक्ष प्रमाण बन कर देती है। उनसे उत्साहित होकर कभी कभी तो अर्धमृत और अर्ध मूर्छित भी देवदानवों जैसे पुरुषार्थ करके दिखाने लगते है।

शरीर इन सभी आराध्य देवों द्वारा बना हुआ है किन्तु उसे बलिष्ठ और सुंदर बनाने में मनुष्य की तीन चौथाई क्षमता का नियोजन होता रहता है। इतने पर भी सज्जा, उपकरण, बहुमूल्य आहार, औषधियों के पिटारे कुछ काम नहीं आते। अमीर, गरीबों की अपेक्षा अधिक दुर्बल, बीमार और अल्पजीवी पाये जाते है। चिकित्सा के व्यवसायी अपने परिवार समेत स्वयं तक बीमारियों के शिकार बने रहते हुए तथाकथित आहार विज्ञान से लेकर औषधि विडम्बना को प्रत्यक्ष न सही, मन मन तो कोसते ही रहते है।

मनोबल इससे सर्वथा भिन्न प्रकार की राह दिखाता है। अफ्रीका के मसाई मात्र भाले के सहारे बबर शेरों से भिड़ते और उन्हें मार कर अपनी शादी के लिए निश्चित शर्त को पीढ़ी दर पीढ़ी पूरी करते रहते है। विश्वविख्यात सेण्डो पहलवान जवानी की दहलीज तक पहुँचने तक हड्डियों का ढाँचा और जुकाम के जाल में पूरी तरह जकड़ा हुआ मरण की प्रतीक्षा में दिन गिनते रहने वाला मरीज था, पर जब उसके मार्ग दर्शक ने जीवन की नई विधा सुझाई तो वह दिन दिन स्वस्थ-बलिष्ठ होता गया और एक दिन वह संसार का माना हुआ पहलवान बन गया। भारत का हिन्द केशरी उपाधि वाला चन्दगीराम, अध्यापक की नौकरी करने वाला कई दिनों का तपेदिक का मरीज था और उसकी छूत न लग जाने के भय से हर कोई दूर रहता था। पर जब उसने अपना मानसिक कायाकल्प साहसपूर्वक कर डाला। आदतों को पूरी तरह उलट दिया तो प्रकृति देवी ने उस पर अजस्र वरदान बरसाया और हिंदुस्तान का जाना माना पहलवान बना दिया।

प्राचीनकाल में कायाकल्पों की कथा−गाथाएं च्यवन ऋषि से लेकर ययाति के बूढ़े से जवान हो जाने के रूप में प्रसिद्ध है। हनुमान बचपन से ही पवनपुत्र-प्राणपुँज कहलाने लगे थे और उनके पाहन पर गिरने से विशालकाय शिला चूर चूर हो गई थी। पार्वती की युगों तक तप करने से क्षीण हुई काया शिव का वरण करते ही त्रैलोक्य मोहिनी बन गई थी। अर्जुन के बाणों ने पाताल से जल धारा उभार कर मरणासन भीष्म-पितामह को ताजा जल पिलाया था। टिटहरी का समुद्र को सुखाकर अण्डे वापस लेने का संकल्प भले ही ऋषि अगस्त्य के माध्यम से पूरा हुआ हो पर वह अधूरा तो नहीं ही रहा।

जमदग्नि के पुत्र परशुराम जब पिता के साथ हुए अनाचार का बदला लेने के लिए उतारू हो गए तो उनने महाबली सहस्रबाहु की हजारों भुजाएँ हलके से फरसे से मूली की तरह काट कर रख दीं और मचले तो उनके सहयोगियों तक का सफाया करके रख दिया। हारी-हारी बातें करने वाले अर्जुन को महाभारत का विजेता बनाने का श्रेय कृष्ण के उस उद्बोधन को था जिसने उसे भर्त्सना की लताड़ और प्रोत्साहन भरी पुचकार देकर उसे वह बना दिया जिनका वह अधिकारी था।

इन दिनों मनुष्य को वैभव, स्वास्थ्य, और यश के अतिरिक्त और किसी की कामना दीख नहीं पड़ती। इसके लिए जो कुछ भी उचित-अनुचित बन पड़ता है उसे कमाने में औसत आदमी दिन रात जुटा रहता है। कुछ मिलता भी है प वह कम दीखता है और असंतोष पहले की अपेक्षा अधिक भड़का देता है। इस घोर असमंजस की बेला में हर किसी को यह समझना और समझाना चाहिए कि अगणित वैभवों का उद्गम प्राणाग्नि केन्द्र है, जिसको उभारना परम पुरुषार्थ और ईश्वर का एक मात्र अनुग्रह कहा जा रहा है। आज इसी के आवश्यकता है कि वैभव स्थिर रहे और दिन-दिन बढ़ता रहे और अन्ततः उस श्रेष्ठतम सदुपयोग में काम आ सके तो नन्हे से बीज से बढ़ कर अन्ततः विशालकाय वटवृक्ष के रूप में परिणत होता है।

वैभव किसका है? पराक्रम किसका है? विभूतियाँ किसकी हैं? इस सबका उत्तर देते समय नाम भगवान का ही लिया जा सकता है। पर भगवान क निकटतम और सुनिश्चित स्थान एक ही है-अन्तराल में विद्यमान प्राणाग्नि। उसी को जानने उभारने से वह सब कुछ मिल सकता है जिसे धारण कर सकने का पात्रता मनुष्य अर्जित करते हैं। मेघ-माला समय जलधारा बरसाती रहती हैं, पर वह जल राशि उन्हीं जलाशयों में एकत्र होती है जो उस संचय के लिए समुचित गहराई और पात्रता अर्जित कर सकने में समर्थ हो सकें। आकांक्षा ऋद्धि-सिद्धियों की हो या स्वर्ग-मुक्ति की, इन्हें प्राप्त करने के लिए उस प्राणाग्नि को प्रज्वलित किया जाना अनिवार्य है, जो दैवी शक्तियों का प्रत्यक्ष प्रतिनिधित्व करती हैं।


प्रतिभा के बीजाँकुर हर किसी में विद्यमान

सड़क पर मोटर के मोटर के पहिए दौड़ते दीखते हैं, पर इंजन का पर्दा उठाकर देखने पर प्रतीत होगा कि उसके भीतर तेल जलकर ऊर्जा उत्पन्न कर रहा है। उस उत्पादन में भी बैटरी और डायनुमो की अपनी भूमिका है। उसी शक्ति से अनेक कलपुर्जे अपने-अपने ढंग से घूमते और मोटर को सड़क पर गतिमान बनाते हैं। मानवी सत्ता के संबंध में भी यही बात है। उसकी प्रत्यक्ष हलचल, हाथ, पैर, सिर, धड़, आँख, मुँह आदि माध्यम से कार्य करती दीख पड़ती है। पर त्वचा का ढक्कन उठा कर देखने से कुछ और ही प्रतीत होता है। हृदय का रक्त संचार, माँस-पेशियों का आकुंचन-प्रकुंचन, श्वास-प्रश्वास आदि हरकतें भीतरी अवयव करते हैं और उनके घर्षण से ऊर्जा का वह उत्पादन होता है, जिसके माध्यम से भीतर अंग अवयव अपनी-अपनी निर्धारित क्रिया-प्रक्रिया सम्पन्न करते रहने में समर्थ होते हैं।

इन सब के भीतर भी एक गहरी परत है, जो मस्तिष्क के मध्यभाग-ब्रह्मरंध्र में विद्युत प्रवाह के उद्गम स्रोत का काम करती है। इस उद्गम का भी स्वतंत्र कर्तृत्व नहीं है। वह अखिल ब्रह्मांड में संव्याप्त महाऊर्जा से संबंध जोड़कर जितना आवश्यक है उतना ग्रहण करती है। अंग-अवयवों की बनावट तो रक्त, माँस, अस्थि, मज्जा आदि से विनिर्मित प्रतीत होती है, पर वस्तुतः इनके मध्यवर्ती अरबों खरबों जीवकोषों-ऊतकों की ऐसी क्रियाशीलता काम करती दिखाई देती है मानो किसी स्वतंत्र विश्व का उद्भव, अभिवर्धन परिवर्तन उनके बीच हो रहा हो। यों जीवकोष अपने स्थान पर व्यवस्थित रूप से विद्यमान दीखते हैं, पर वे तेजी से अपना काम करते हुए अपनी सीमित सत्ता को समाप्त कर लेते हैं ओर साथ ही एक और आश्चर्य प्रस्तुत करते हैं कि अपने समकक्ष उत्तराधिकारी कोष बनाकर अपने मरण से पूर्व स्थानापन्न कर देते हैं ताकि रिक्तता उत्पन्न न होने पावे। मृतक कोष कचरे के रूप में त्वचा छिद्रों द्वारा बाहर निकलते रहते हैं। साथ ही अन्न, जल वायु जैसे आवश्यक पोषण माध्यमों को ग्रहण करने से लेकर पचाने तक में लगे रहते हैं।

आकलन कर्त्ताओं ने हिसाब लगाया कि यदि शरीर के छोटे-बड़े अनेकानेक अंग-प्रत्यंगों की बिजली को एकत्रित किया जा सके तो उसकी शक्ति किसी विशालकाय बिजली घर से कम न होगी। इतनी आपूर्ति किये बिना जन्म से लेकर मरण पर्यन्त जो असंख्य क्षेत्रों की अनेक स्तर की गतिविधियाँ बिना रुके अनवरत रूप से काम करती रहती हैं, उनका इस प्रकार क्रियाशील रह सकना संभव न हुआ होता। औसत पाँच फुट छः इंच का यह कलेवर अपने भीतर इतनी शक्ति सामर्थ्य छिपाये हुए है जिसे यदि वैज्ञानिकों द्वारा स्थूल उपकरणों के माध्यम से उत्पन्न किया जाय तो उसके लिए मीलों लम्बे विशालकाय बिजली घर की आवश्यकता पड़ेगी। रासायनिक साधन-सामग्री जितनी मात्रा में जिस स्तर की जुटानी पड़ेगी, उसका लेखा जोखा लिया जाय तो उसे भी बन्दरगाहों पर बने विशालकाय गोदामों से कम आकार और कम मूल्य का न आँका जायेगा। इसीलिए इसे विधाता की अनुपम कृति और उपलब्ध कर्ता पर बरसाई गई असीम अनुकम्पा कहा जाता है।

साधारणतया इस विद्युत प्रवाह का एक बहुत छोटा अंश ही काम में आता है। उतना जिससे हलकी-फुलकी दिनचर्या चलती रहे। आजीविका, उपार्जन, परिपालन, निद्रा, जाग्रति तथा और छिटपुट काम भी इसके द्वारा सम्पन्न हो पात हैं। क्रियाशील उतना ही अंश रहता है, जो काम में आता रहता है। प्रतीत यह होता है कि मानवी चेतना मात्र उतनी ही मात्रा में विद्यमान है जिससे निर्वाह का साधारण उपक्रम किसी प्रकार चलता रहे। पर वस्तुतः बात इतनी छोटी है नहीं। मानवी विद्युत भण्डार की असीमित उपयोगिता और महत्ता-क्षमता का यदि आकलन किया जा सके तो प्रतीत होगा कि वह इतनी अधिक है कि जिसके सहारे अपना और दूसरों का इतना अधिक हित साधन हो सकता है जितना कि कभी कभी मनुष्य कृत ऐतिहासिक चमत्कारों की बात पढ़ कर हतप्रभ हो जाना पड़ता है। प्रचलित भाषा में इन्हें दैवी वरदान के नाम से पुकारा जाता है। ऋद्धि-सिद्धियों का भंडार कहा जाता है। अथवा विभूतियों के नाम से उनकी चर्चा होती रहती है। ऐसे संदर्भ प्रायः सही ही होते है तब मानना पड़ता है कि मनुष्य वस्तुतः असीम शक्तियों का भंडार हैं। इसी बात को इस प्रकार भी कहा जा सकता है कि वह तप के बल पर देवताओं से उच्चस्तरीय विभूति-वरदान उपलब्ध कर सकता हैं किन्तु वास्तविक इतनी ही है कि जो कुछ उभरता है, भीतर से ही उफन कर ऊपर आया हुआ होता है। नदियों और निर्झरों के उद्गम किसी भूखण्ड से ही उद्भूत होते हैं। पेड़-पौधे यों जमीन से ऊपर दीख पड़ते हैं, पर सच बात यह है कि उनकी जड़े जमीन के भीतर भी गहराई तक जमी होती हैं। सड़क पर-दौड़ती मोटर को मात्र पहियों की ही करामात नहीं मान लेना चाहिए, वरन अनुमान यह भी लगाना चाहिए कि पर्दे की ओट में शक्ति का उत्पादन और भण्डारण करने में कोई विशेष व्यवस्था काम कर रही है।

जिन्हें पेट-प्रजनन की ही गरज है, जो लोभ, मोह और अहंकार से ऊँचे उठ सकने की आवश्यकता ही नहीं समझते, उनके संबंध में तो कुछ कहा ही क्या जाय? किन्तु जिन्हें कोई महत्वपूर्ण लक्ष्य प्राप्त करना है उनके लिए एक ही उपाय है कि प्राप्त शक्तियों को जाग्रत करके उन्हें उस स्तर का अभ्यास करायें जिसके बल-बूते बड़े काम किये जाते और बड़े लाभ अर्जित किये जाते है। दूसरों की सहायता की बात उतनी अधिक नहीं सोचनी चाहिए, जितनी कि मनोकामनाओं से ग्रसित लोग आसमान से उपलब्धियाँ उतरने की बात सोचते और व्यर्थ की अपेक्षा करते रहते हैं। अपना पुरुषार्थ जगे तो यह स्वाभाविक है कि खिलते हुए फूल को देख कर उस पर तितलियाँ मँडरायें और भौंरे यश गीत गाने की झड़ी लगायें। सफलता अर्जित करने वालों की जय जयकार करने के लिए अपरिचित भी भीड़ में सम्मिलित हो जाते हैं। पर जब कठिन समय सामने आता है तो कोई विरले ही पास फटकते हैं। हारे हुए को तो व्यंग-उपहास सुनने और मूर्ख कहलाने के अतिरिक्त स्वजनों तक से और कुछ नहीं मिलता।

अध्यात्म दर्शन का सार निष्कर्ष इतना भर है कि अपने को जानो “आत्मानं विद्धि आत्मावाद के शताव्य” अपने को विकसित करो और ऐसी राह पर चलो जो कहीं अपने लक्ष्य तक पहुँचती हो। यह शिक्षा अपने आपके लिए है। इसे स्वीकार-अंगीकार करने के उपरान्त ही वह प्रयोजन सधता है जिसमें दूसरों से कुछ समर्थन, सहयोग, अनुदान पाने की आशा की जाय। देवता भी तपस्वियों को ही वरदान देते हैं, बाकी तो फूल प्रसाद के दोने लिए देवस्थानों के इर्द-गिर्द चक्कर लगाते रहते हैं। भिखारी कितना कुछ कमा, लेता है, इसे सभी जानते हैं। उन्हें जीवन भर अभावों की, उपेक्षा की शिकायत ही बनी रहती है। श्रीमन्तों की मुट्ठियाँ भी उनके लिए सिकुड़ी हुई ही रहती हैं।

वस्तुस्थिति समझने के उपरान्त उसी निमित्त उन्मुख होना चाहिए कि अपने को अधिक प्रामाणिक और अधिक प्रखर बनाने में जुट पड़ा जाय। मनौती मनाते रहने की अपेक्षा यही अवलम्बन सही और सच्चा है। इस हेतु कुछ कदम बढ़ाने से पूर्व यह अनुमान लगा लेना चाहिए कि अपने भीतर सामर्थ्य का अपरिमित भण्डार भरा पड़ा है। स्रष्टा ने मनुष्य को असाधारण सफलताएँ उपलब्ध कर सकने की संभावनाओं से भरा पूरा बनाया है। आवश्यकता मात्रा इतनी है कि अवरोध की झीनी दीवार को गिराने के लिए साहस जुटाया जाय। अण्डे में जब चूजा समर्थ हो जाता है तो वह भीतर से जोर लगाता है और छिलके को तोड़कर बाहर आता है। इसके बाद तो उसकी माता ही सहायता करने लगती है। प्रसव वेदना का कारण एक ही है कि गर्भस्थ शिशु बाहर निकलने के लिए अपनी शक्ति प्रयोग करता है। यदि भ्रूण अति दुर्बल और मृत, मूर्छित हो तो प्रसव की संभावना अत्यंत दुष्कर हो जाती है।

गर्मी संघर्ष से उत्पन्न होती है। हलचल और प्रगति भी उसी के सहारे बन पड़ती है। प्रतिभा परिष्कार के लिए भी यही करना पड़ता है। अखाड़ों में कड़ी मेहनत किये बिना कोई पहलवान कैसे बने? सैनिकों को अनेक प्रकार के कठिन अभ्यास आये दिन करने पड़ते हैं। नदियों का प्रवाह अनेक चट्टानों को उलटता हुआ आगे बढ़ता है। मोर्चा जीतने के लिए रण क्षेत्र में अपने कौशल का परिचय देना होता है।

तपश्चर्या का तात्पर्य अपने आप को जानबूझकर कठिनाइयों से भरी तितीक्षा में लगाना है। इससे पौरुष जगता और कुसंस्कारों से पीछा छुड़ाने का अवसर मिलता है। प्रतिभा को परिष्कृत करने का प्रथम सोपान यही है कि अपने व्यक्तित्व को घेरी हुई अवांछनियताओं से आक्रोशपूर्वक गुंथ पड़ा जाय, जो उथली विचारणा के बलबूते सहज ही अपना कब्जा छोड़ती नहीं। उनसे संघर्ष करना पड़ता है। विद्युत हो या गर्मी, रगड़ से ही पैदा होती है। अग्नि का प्रकटीकरण भी इसी प्रकार होता है। जीवन का आरंभ भी घर्षण के साथ ही आरंभ होता है। प्रतिभा परिष्कार की भी यह आरंभिक शर्त है। इस हेतु आलस्य और प्रमाद से सर्व प्रथम लड़ना पड़ता है। उसमें स्थिति पर चुस्त-दुरुस्त रहने की जागरूकता की अवधारणा करनी पड़ती है। निराशा, अनुत्साह, चिन्ता, खिन्नता जैसे मानसिक दुर्गुणों के साथ तब तक संघर्ष करना पड़ता है। जब तक कि उनके स्थान पर आशा, प्रसन्नता, उमंग, निश्चिन्तता, निर्भयता और शिष्टता जैसी सत्प्रवृत्तियाँ अपने आपको प्रतिष्ठित न कर लें। यह नित्य ध्यान रखने और निरन्तर अभ्यास करने का विषय है। जिसे बिना थके-बिना हारे अनवरत रूप से क्रियान्वित करते रहना चाहिए।

प्रतिभा त्रिवेणी संगम की तरह है। जिसमें शारीरिक ओजस् मानसिक तेजस् और अंतराल में समाहित वर्चस् को जगाना, उभारना और प्रखरता सम्पन्न बनाने के स्तर तक उठाना पड़ता है। संयम सध सके तो स्वस्थ रहने की गारंटी मिल जाती है। उपयुक्त काम का चुनाव करते हुए उसमें अभिरुचि, एकाग्रता और तत्परता का नियोजन किये रखा जाय तो साधारण काम काज भी इस अभ्यास के सहारे अधिकाधिक बुद्धिमता और कुशलता प्रदान करता चलता है। इसी आधार पर शारीरिक ओजस् और मानसिक तेजस् की उतनी मात्रा उपलब्ध हो सकती है। जिस पर संतोष और गर्व अनुभव किया जा सकें।

सदाशयता पर सघन श्रद्धा के होने का नाम ही वर्चस् है। आदर्शवादिता इसी अवलम्बन को अपनाती है और उत्कृष्टता को इससे कम में चैन नहीं पड़ता। वर्चस् जिसके भी अन्तराल में उभरता है उसमें शालीनता की, सदाशयता की, सज्जनता की कमी नहीं रहती। इस दिव्यता का जितना अंश जिसके हाथ लग जाता है वह उतने ही अंश में धन्य हो जाता है। आत्म साधना की यही तीन उपलब्धियाँ हैं। जिनने ओजस् तेजस् और वर्चस् की साधना की, समझना चाहिए कि वह सच्चे अर्थों में तपस्वी और मनस्वी हो गया। मानवी गरिमा के साथ जुड़ी हुई सिद्धियाँ और विभूतियाँ उसके पैरों पर लौटेगी।

उच्चस्तरीय प्रतिभा ही “ब्रह्मतेजस्” है उसी को “ब्रह्मवर्चस” भी कहते हैं। उसे जिसने जिस अनुपात में अर्जित कर लिया है वह शरीर सीमित होते हुए भी अपनी तुलनात्मक प्रखरता के सहारे ऐसे पुण्य प्रयोजन सम्पन्न करने में समर्थ रहा है कि जिसे अनुकरणीय भी माना जाय और अभिनन्दनीय भी। भगवान बुद्ध का उदाहरण प्रत्यक्ष है। उनने अपने जीवन काल में एक लाख भिक्षु-भिक्षुणियाँ परिव्राजक बनाकर विश्व के कोने-कोने में धर्म चक्र प्रवर्तन के लिए भेजे थे और वे सभी एक से एक बढ़ी चढ़ी सफलता करने में सफल हुए थे। अशोक और हर्षवर्धन ने उनके प्रतिबंध से प्रभावित होकर अपना विपुल-वैभव उनके निर्देशों पर न्यौछावर कर दिया था। आम्बपाली और अंगुलिमाल जैसों ने निकृष्टता का परित्याग कर उत्कृष्टता स्तर का कायाकल्प कर लिया। एकाकी संकल्प ने असंख्यों को अनुप्राणित करके उन्हें दिशा उलट देने के लिए बाधित कर दिया था। मनस्वी गान्धी का उदाहरण भी लगभग इसी से मिलता जुलता हैं नालन्दा विश्वविद्यालय की स्थापना करने से लेकर उसके संचालन तक की जिम्मेदारी का निर्वाह चाणक्य की प्रतिभा ही करती रही थी। चुम्बक अपने समकक्षी को खोजता-जुटाता तो अनायास ही रहता है।

महामना मालवीय जी आरंभ में सामान्य वकील और सम्पादक भर थे, पर जब उन्होंने हिन्दू विश्व विद्यालय के निर्माण का संकल्प लिया तो प्रायः पचास करोड़ की सम्पत्ति उन लोगों से जुटाई जिनके साथ उनकी कोई पूर्व जान पहचान तक नहीं थी।

अर्जुन ने पाताल से गंगा उभार कर भीष्म मो ताजा जल पिलाया था भीष्म भी कुछ कम न थे। शर शय्या पर पड़े हुए असह्य वेदना सहते हुए भी उनने मौत से कह दिया कि अभी मरने की फुरसत नहीं है। यह लौट गई और तब आई जब उत्तरायण मुहूर्त में उनने चलने का मुहूर्त निश्चिततः किया था। मनस्वी के आगे नियति भी पानी भरती है। सावित्री ने यमराज के हाथ से अपने पति का मुर्दा वापस लौटा लिया था। दमयन्ती के नेत्र तेज से व्याध का जल जाना प्रसिद्ध है। सगर पुत्रों की गौतम ऋषि के शाप से क्या दुर्गति हुई थी, इतिहास प्रसिद्ध हैं

राणा साँगा अस्सी गहरे घावों से आहत होते हुए भी मृत्यु पर्यन्त शत्रुओं से लड़ते रहे थे वाल्टेयर ने अस्पताल की चारपाई पर पड़े-पड़े ही इतने महत्वपूर्ण ग्रन्थ लिखे थे-कि उनके पुरुषार्थ को देखते हुए आश्चर्य चकित हुए बिना रहा नहीं जाताँ संसार के इतिहास में ऐसे अनेकों करोड़पतियों का उल्लेख है जिनकी निजी योग्यता और पूँजी नहीं के बराबर थी। उनने अदम्य उत्साह और सूझबूझ के सहारे धन कुबेर बनने का सुयोग प्राप्त किया। बाटा, टाटा, बिड़ला से लेकर रॉकफेलर फोर्ड तक की बड़ी नामावली इसी पंक्ति में खड़ी दीख पड़ती हैं।

विनोबा के भुदान आन्दोलन की सफलता, पटेल द्वारा बागी रियासतों को भी भारत में विलय के लिए सहमत कर लिया जाना-ऐसा कार्य है जिसमें उनके महान व्यक्तित्व की झलक झाँकी मिलती है। बारडोली सत्याग्रह में भी वे अपना कमाल दिखा चुके थे। जापान के गान्धी कागाबा ने एक गँदे मुहल्ले से सेवा कार्य आरंभ करते हुए अन्ततः जापान के पतितोद्धारक के रूप में अद्भुत प्रतिष्ठा अर्जित की थी। बिहार का हजारी किसान अपनी लगन के बल पर उस क्षेत्र में एक हजार आम्र उद्यान लगाने में सफल हुआ था।

ऐसे उदाहरणों की कमी नहीं। वे भूतकाल में भी असंख्यों थे और अब भी जहाँ-तहाँ एक से एक बढ़ी-चढ़ी सफलताएँ अर्जित कर रहे हैं। इसमें व्यक्ति विशेष का नहीं वरन् उसी परिष्कृत प्रतिभा का ही चमत्कार दृष्टिगोचर होता है। यह हर किसी के लिए संभव है। आवश्यकता इतनी भर है कि लगन सच्ची हो और उसके लिए योजनाबद्ध रूप से पुरुषार्थ करने में कुछ उठा न रखा जाय।


प्रसुप्ति का महान जागरण में प्रत्यावर्तन

प्रत्यक्ष दीख पड़ने वाली शक्तियों और विशेषताओं में मनुष्य जीवन में दो को ही प्रधानता मिलती रहती है। एक शारीरिक बलिष्ठता, दूसरी मानसिक प्रखरता। इन्हीं दोनों के बल पर धन, यश, गौरव, सफलता, सहयोग आदि के अनेकानेक साधन बन पड़ते हैं। व्यक्ति दुर्बल और बीमार हो तो अपनी उभय पक्षीय विशेषताएँ तो खो ही बैठता है, साथ ही संबंधियों को सेवा, सहायता में जुटाये रहता है। उन्हें भी कोई उपयोगी काम नहीं करने देता। अनावश्यक अपव्यय भी होता है। स्वयं भी हैरान होता है, औरों को भी हैरान करता है।

कहा जा सकता है कि बीमारियाँ मनुष्य जान-बुझ कर तो बुलाता नहीं। वे तो न जाने कहाँ से दैवी विपत्ति की तरह आ धमकती हैं। हो यह भी सकता है, पर ऐसी दुर्घटनाएँ कभी यदा-कदा ही होती है और उसके लिए चिकित्सक और चिकित्सालय जरूरत से ज्यादा संख्या में विद्यमान हैं। आवश्यकता मात्र इस बात की है कि व्यक्ति को संयमशील, सुव्यवस्थित, चुस्त-दुरुस्त भर बने रहने के लिए प्यार से धमका कर उज्ज्वल भविष्य की संभावना बताते हुए और स्वेच्छाचार बरतने पर अपने को दीन-दयनीय बन जाने की विभीषिका को विस्तारपूर्वक समझाया और गले उतारा जाय।

इस संदर्भ में कठिनाई एक ही है कि मनुष्य वस्तुस्थिति समझते हुए भी अपनी आदतों से लाचार है। विशेषतया बुरी आदतें ऐसी हठीली होती हैं कि वे समझदारी के अनुरोधों को सदा अँगूठा दिखाती रहती हैं। चाहने पर भी मनुष्य कुटेवों से पीछा छुड़ाने में अपने को असमर्थ पाता है। नशेबाजी इसका बहुत मोटा उदाहरण है। जरा बारीकी में उतरा जाय तो जीभ का चटोरापन, समय की अंधी बरबादी कर देने वाला आलस, कामुक विचारों से अकारण मानसिक शक्ति का धुआँ बखेरते रहना, कटु भाषण, अहंकार का प्रदर्शन और कार्य पद्धति में अस्तव्यस्तता का भरा रहना, ऐसी स्व-उपार्जित विपत्तियाँ है, जो आदमी को हर दृष्टि से बरबाद एवं चौपट करती हैं। यद्यपि उन्हें साधारण मानवी स्वभाव कहकर टाल दिया जाता हैं।

धीमी आत्महत्या कही जा सकने वाली इन स्वनिर्मित विपत्तियों से लोग छूटते क्यों नहीं? उन्हें छोड़ते का प्रयत्न क्यों नहीं करते? करते हैं तो सफल क्यों नहीं होते? हार क्यों मान लेते हैं? इस व्यापक समस्या का समाधान खोजना किसी बड़े महत्वपूर्ण वैज्ञानिक आविष्कार से कम वजनदार नहीं है। कारण कि कुछेक को छोड़कर अधिकाँश व्यक्ति अपने क्षमता भण्डार में अनजाने ही आग लगाते रहते हैं और दीन-हीन, उपेक्षित, तिरष्कृत होकर किसी प्रकार मौत के दिन पूरे करते हैं। कुछ ऐसा नहीं कर पाते हैं, जिससे जीवन लीला समाप्त करने पर लम्बे समय तक जीवित रहने के संबंध में ऐसा कुछ कह सकें कि उसने जन समुदाय से अधिक बढ़कर और कुछ किया? कोल्हू में बैल की तरह पिसते-पीसते रहने के सिवाय ऐसा कुछ किया जिस पर सिर उठाकर संतोष व्यक्त कर सकें या उपलब्धियों का विवरण गिना सकें।

मनुष्य अपने को सुधार पाये और ऊँचा उठा पाये, वस्तुतः यह कुछ कठिन नहीं है। क्योंकि जब शरीर के अन्य अंगों को इच्छानुसार चलाते रहने का क्रम निरन्तर बना रहता है तो कोई कारण नहीं कि मन के उचक्केपन पर लगाम खींचने और ऐड़ लगाने पर सीधी राह चलने के लिए बाधित न किया जा सके। पर गाड़ी यहाँ आकर रुक जाती है कि ऐसी ऐड़ लगाये कौन? प्रचण्ड संकल्प शक्ति का परिचय दे कौन? मनोबल जगाने और प्राणाग्नि प्रज्ज्वलित करने का इकहरा तक कोई सीखता-सिखाता नहीं। वातावरण में भी ऐसा प्रचलन दीख नहीं पड़ता जिसमें आदर्शवादिता की पक्षधर हिम्मत को काम करते हुए देखा जा सके। संसार भर में वस्तुतः यह ही परिद्य ऐसा है जिसकी शाखा-उपशाखाओं के रूप में अनेकानेक दुर्गुणों का विषाणुओं से भी बढ़कर उत्पादन हुआ है। यदि सौ योजनाओं में से संयम और योजनाबद्ध कार्य करना की प्रतिभा को किसी प्रकार जीवित किया जा सके तो समझना चाहिए कि हमें जीवित मुर्दों को नव जीवन से भरा पूरा बना देने वाली संजीवनी बूटी हाथ लग गई।

इक्कीसवीं सदी का, नवयुग का, उज्ज्वल भविष्य का,, सतयुग का सरंजाम जुटाने के लिए प्राथमिक आवश्यकता यह पूरी करनी होगी कि मनुष्य में उस साहस और शौर्य-पराक्रम को जगाया जो अपने समुदाय के और वातावरण पर कब्जा जमाये बैठे अनौचित्य के साथ लड़ने के लिए सीना तान कर, कमर कस कर खड़ा हो सके। बात सरल है। जब जानवरों से लेकर अनेकानेक मनुष्यों को इच्छानुसार चलने के लिए विवश करने पर जोर लगाया जा सकता है तो अपने आपको सही रास्ते पर चलने के लिए ललकारा समझाया क्यों न जा सके जब डंडे के जोर से अनेक टेढों को सीधा किया जा सकता है तो कोई कारण नहीं कि असंख्य परिस्थितियों की अपनी प्रवृत्ति को सही समुचित बनाने के लिए समुन्नत न बनाया जा सकें। पर इस असमंजस को क्या कहा जाय, जिसके कारण लोग अपने को समुन्नत बनाने की अपेक्षा दूसरे हर एक को सुधारने और वशवर्ती बनाने के लिए फटा बाँस पटकने में बहादुरी जताते हुए हर कहीं देखे जाते हैं। यह बात भूल ही जाते हैं कि जो अपने को मनस्वी बनाने में सफल नहीं हो सका वह प्रगति की अनेकानेक कल्पना-जल्पना करते रहने में बेवकूफ शेखचिल्ली का उदाहरण बनने और उपहास का पात्र बनने के अतिरिक्त और कुछ नहीं बन सकता।

मनोबल मनुष्य को ईश्वर प्रदत्त ऐसा शब्द बेधी बाण है जिसका निशाना कभी चूकता ही नहीं। जो लक्ष्य को बेधे बिना किसी भी व्यवधान से टकरा कर हार मानने का नाम लेता ही नहीं। इसी को अध्यात्म-भाषा में ‘प्राणाग्नि’ कहते हैं और इतनी महिमा बखानते हैं कि उसे पाने वाले सच्चे अर्थों में ईश्वर का राजकुमार कहला सकें और हर क्षेत्र में तिल से ताड़, राई से पर्वत बनाकर खड़ा कर सकें। वस्तुतः ईश्वर प्रदत्त यही एक विभूति ऐसी है जिसे कल्पवृक्ष का अलंकारिक नाम देकर भी यह कहा जा सकता है कि उसमें समस्त मनोकामनाओं की पूर्ति हो सकती है। वह जिसके पास है उसे पारसमणि का अधिष्ठाता कहा जा सकता है। वह जिनके पास है, वे अमृत पीने वालों की तरह मरने के उपरान्त भी युग युगान्तरों तक जीवित रहते हैं।

शरीर बल, जिसमें सौंदर्य और आकर्षण भी सम्मिलित है, प्रत्यक्ष विभूतियों में से एक है। दूसरी है बुद्धि, वैभव, जिसके सहारे संसार की अनेकानेक सम्पदाएँ-सफलताएँ हस्तगत हुई हैं। दोनों को भौतिक जीवन की ऋद्धियाँ-सिद्धियाँ भी कहा जा सकता है पर उन्हें प्राप्त करने के लिए लोग पौष्टिक आहार और स्कूली पढ़ाई को ही सब कुछ मानते रहते हैं। जबकि वे लँगड़े की बैसाखी की तरह मात्र ऐसा सहारा है जो थोड़ी सहायता भर करती है। अभीष्ट उद्देश्य की पूर्ति करने में दिखावटी सहायता ही रहती है, कोई ठोस प्रयोजन पूरा नहीं कर पाती। ठोस काम तो प्राणाग्नि के सहारे ही बनता है। संकल्प शक्ति, इच्छाशक्ति, मनस्विता आदि इसी को माना जाता है। उसी के सहारे गूँगे को वाचाल और पंगु को गिरि शिखर पर चढ़ दौड़ने की सफलता मिली है। जिसके पास मनोबल है उसके पास और कुछ भी न हो तो भी चुम्बक की तरह अनायास ही बहुत कुछ खिंचता चला आता है।

कालिदास करी जन्मजात मूर्खता से सभी परिचित हैं। मानसिक स्तर को देखते हुए कोई आशा नहीं करता था कि यह कभी शिक्षित तो क्या साक्षर भी बन सकेगा या नहीं। पर विवाह के बाद पत्नी द्वारा धिक्कारे जाने पर उसके अन्तराल में इतनी करारी चोट लगी की प्रसुप्त प्राणाग्नि तिलमिला गई और उसने जहाँ पढ़ना आरंभ किया तो महाकवि के नाम से विश्व-विख्यात बन कर ही रहा। वरदराज विद्यार्थी काल में “बैल” कह कर साथियों द्वारा चिढ़ाया जाता था। पर विद्यालय छोड़कर घर लौटते समय जब उसने एक कुएँ की जगत पर रस्सी की रगड़ पड़ने से निशान पड़े हुए देखे तो सोचा कि मोटी बुद्धि पर रगड़ डाली जाय तो मेरा भोंदूपन विद्वता में क्यों नहीं बदल सकता? सच्ची इच्छा जागी तो वह स्कूल वापस लौट गया और ऐसी लगन से पढ़ा कि अन्ततः वरदराजाचार्य के नाम से मूर्धन्य विद्वानों में गिना गया।

अब्राहम लिंकन रोटी की दुकान पर छोटी नौकरी करते थे पर प्रतिभा की आराधना-कामना मन ही मन करते रहने पर वे सीढ़ी दर सीढ़ी पार करते हुए वहाँ जा पहुँचे जहाँ उन्हें अमेरिका के राष्ट्रपति के सर्वोच्च पद तक जा पहुँचना था। साथी मल्लाह कोलम्बस की इतनी असंभव लगने वाली योजनाओं में सहभागी बनने पर अत्यंत क्रुद्ध थे और उसे मारकर समुद्र में फेंक देने की योजना बना रहे थे। पर कोलम्बस के मनोबल के सामने उन्हें झुकना ही पड़ा और इतनी दूर आगे भी चलने के लिए तैयार हो गये जहाँ स्वर्ण खदान समझे जाने वाले अमेरिका पहुँचने का लक्ष्य प्राप्त हो गया। मनोबल इतनी प्रचंड शक्ति है जिसके सामने वह संभव हो जाता है जिसे प्राप्त करने के लिए लोग कल्पना तक नहीं करते थे। वैज्ञानिक आविष्कारों का इतिहास ऐसा ही है। उन सभी उपलब्धियों के पीछे एक ही उपक्रम काम करता रहा है कि अन्वेषकों ने अपनी समूची तत्परता, तन्मयता एक केन्द्रीभूत कर ली और उस नई सामर्थ्य से प्रकृति में अनादि काल से छिपे रहस्यों में से एक के बाद एक दूसरा प्रकट होता चला गया।

देखा जाता है कि क्रोध के आदेश में व्यक्ति इतना आक्रामक हो जाता है जितना बल उसकी सामान्य स्थिति में कभी भी देखने को नहीं मिलता। प्राण जाने की आशंका उत्पन्न होने पर व्यक्ति सिर पर पाँव रख कर भागता है और दौड़ने में कीर्तिमान स्थापित करने वालों को पीछे छोड़ देता है। यह असाधारण शक्ति एकाएक कहाँ से प्रकट हो जाती है? उसका एक ही उत्तर है कि यह आन्तरिक शिथिलता का कारणवश उत्तेजित होने का ही प्रतिफल है। इसका अर्थ यही हो सकता है कि अन्तरंग में विद्यमान शक्ति भंडार का समय आने पर पूरे उपयोग का मार्ग खुल जाना। अनेक उद्देश्यों में असाधारण रूप से सफल होने वाले व्यक्तियों ने अपना महत्व समझा और उसे सुनियोजित करके इस प्रकार स्वयं को काम में लगाया कि वे प्रभाव क्षमता का समुचित परिचय दे सकने में सफल हुए।

सुर्य की किरणें छोटे से आतिशी शीशे के माध्यम से एक छोटे बिन्दु प केन्द्रित करते ही आग प्रकट हो जाती है। मात्र भक से जलने में समर्थ बारूद को जब कारतूस में सीमाबद्ध करके निशाना साधकर चलाया जाता है तो वह दूरवर्ती कठोर लक्ष्य को भी बेधती हुई आरपार निकल जाती है।

इण्डोनेशिया के एक प्रौढ़ ने अपनी पत्नी को तलाक देकर दूसरा विवाह करने की ठानी। उसका बारह वर्ष का बच्चा इसे सहन न कर सका। पिता की हविस और माता की दुर्गति का अनुमान लगा कर वह आपे से बाहर हो गया। उसने बैठे हुए प्रौढ़ बाप पर इतने कस कर दो घूँसे जमाये कि वह उन्हें सहन नहीं कर सका और देखते-देखते दम तोड़ दिया। निहत्थे लोग शेरों और खूँख्वार जानवरों को पछाड़ने का कीर्तिमान स्थापित करते रहे हैं। अन्धी, गूँगी और बहरी-एक प्रकार से सर्वथा अपंग महिला हेलन कीलर ने अपनी विद्वता को चरम सीमा पर पहुँचा दिया। संसार के अठारह विश्वविद्यालयों ने उसे डाक्टरेट की मानद उपाधि दी। अंधे की ब्रेललिपि की मूल आविष्कारक उसी को मानते हैं। मानवी प्रतिभा की ध्वजा उड़ाते हुए वह विश्व के कोने-कोने में घूमी और प्रत्यक्ष प्रमाण की तरह अपना परिचय इस प्रकार प्रस्तुत करती रही कि मनुष्य की जीवट ही सब कुछ हैं। साधन तो क्या यदि शरीर भी अपंग हो तो भी कुछ बनता बिगड़ता नहीं। मलेशिया की एक गठिया ग्रस्त महिला चलने-फिरने में लाचार थी। मल-मूत्र त्याग जैसी शारीरिक क्रियाएँ भी उसे विवशता की स्थिति में चारपाई पर ही करनी पड़ती थीं। पर जब एक दिन घर में भयंकर आग लगी तो वह प्राण बचाने को इस प्रकार दौड़ी कि उसने सुरक्षित स्थान पर ही पहुँच कर दम लिया। लोग चकित थे कि इतने लम्बे समय से अपंग की स्थिति में पड़ी हुई महिला ऐसा दुस्साहस कर सकने में किस प्रकार सफल हो सकी?

मनोबल के चमत्कारों की कथा-गाथा प्राचीन पौराणिक मिथक और आधुनिकतम शोध-कर्ता समान रूप से प्रतिपादित करते रहे हैं। दोनों ने ही उसकी असामान्य शक्ति को एक प्रकार से मान्यता दी है। विश्व विख्यात विज्ञान वेत्ताओं में मूर्धन्य अलबर्ट आइन्स्टीन बचपन में मूढ़मति थे। स्कूल के बच्चों में सबसे अधिक फिसड्डी। उनके मास्टर ने एक दिन बालकों के अभिभावकों से कहा-इसे स्कूल से उठा ले जाइये। यह गधा पढ़ने में कभी भी सफल न हो सकेगा। अभिभावक सिर पीटते हुए बच्चे को घर वापस ले गये और दुर्भाग्य पर रोना रोते हुए अक्सर कहा करते थे कि ऐसी संतान पैदा करने की अपेक्षा तो हम लोगों ने एक पिल्ला पाल लिया होता तो अच्छा रहता। बच्चा बात को समझ रहा था। उसने अन्तर को जगाया और क्रिया-कलाप को व्यवस्थित किया। प्रगति दौड़ती चली गई और समय आया कि वही वज्रमूर्ख एक दिन नोबुल पुरस्कार विजेता, अणु-शक्ति के आविष्कारक, सापेक्षवाद के प्रणेता आदि नामों से प्रख्यात हुआ और अपनी बिरादरी में सर्वोच्च पद तक जा पहुँचा।

यह कोई जादू-चमत्कार नहीं है, न दैवी-देवताओं का वरदान, न भाग्यवाद और न संयोग-अपवाद। कोई भी व्यक्ति यदि अपनी पर उतर आये और निजी जीवन में व्यस्तता-तन्मयता और व्यवहार क्षेत्र में दूरदर्शिता पर आधारित व्यावहारिक बुद्धि अपना ले तो किसी को भी ऐसे ही उत्कर्ष का श्रेय अपने क्षेत्र में निश्चित रूप से मिल सकता है। कुँभकरण के बारे में जनश्रुति है कि वर्ष भर सोता रहता था। एक दिन जागता था उस दिन असीम भोजन कर उतने से हैरत में डालने वाले पुरुषार्थ कर दिखाता था। उसका आकार भी सामान्य जनों की अपेक्षा अनेक गुना बड़ा था। क्या वस्तुतः ऐसा कोई व्यक्ति रहा होगा, इसे तथ्यान्वेषी लोग स्वीकार नहीं कर सकते, पर अलंकारिक रूप से इस कथन में समाहित तथ्य सोलहों आने सच हैं। सामान्य जन लुहार की धौंकनी की तरह साँस लेते हैं और किसी तरह जीवन काटते रहते हैं। उनकी इच्छाएं, मान्यताएँ, क्रियाएँ-कामुकता और अर्ध लोलुपता के इर्द-गिर्द मँडराती रहती हैं और उसी अपने बुने मकड़ जाल में उलझाते-सुलझाते अपनी जीवन चर्या को समाप्त कर लेते हैं। इनके व्यक्तित्व की मक्खी-मच्छरों, कीड़े-मकोड़ों से बढ़कर तुलना नहीं की जा सकती। पर जाग्रत आत्माएँ ऐसी होती हैं जो अपने साहस और सुनियोजन, के बल पर इतना कुछ कर गुजरती हैं कि सामान्यजन उसे भाग्योदय जैसे नाम देकर अपनी हीनता पर पर्दा डालते रहते हैं। जबकि वास्तविकता यह है कि असीम शक्ति का भाण्डागार मनुष्य अपने प्रसुप्त से जग पड़ने और उपलब्ध साधनों के श्रेष्ठतम सदुपयोग के लिए कटिबद्ध हो जाय तो उस स्तर का हर व्यक्ति अपने कार्य क्षेत्र में कुँभकरण के अलंकारिक वर्णन को सही सिद्ध कर सकता है।


आत्मबल ही सर्वोपरि है!

भारत इस समस्त धरातल के हर क्षेत्र में अपने ढंग की अनोखी प्रतिष्ठा प्राप्त करता रहा है। उसकी महानता, समृद्धि, उदारता, उपलब्धियाँ विचित्रता जन-जन के लिए आश्चर्य का विषय रही हैं और भावभरी श्रद्धांजलि अनेकों प्रकार से प्रस्तुत करती रही हैं। ज्ञान और मार्गदर्शन का प्रकाश दे सकने की विशेषता के अनुरूप उसे जगद्गुरु कहा जाता है। शासन, सुव्यवस्था और प्रगति का व्यापक सरंजाम जुटा सकने की विशेषता के कारण उसके नेतृत्व को चक्रवर्ती की संज्ञा दी गई। जो दरिद्रों को संपन्न बना सके, उसकी सम्पन्नता पर कौन संदेह करेगा? यही कारण है कि उसे सोने की चिड़िया और रत्नों की खदान के नाम से पहचाना जाता रहा। स्वर्ण-सम्पदाओं का स्वामी समझे जाने की, यह साधनों के सदुपयोग से उत्पन्न होने वाली सुसम्पन्नता ही उसकी समृद्धि समझी गई, भले ही यहाँ के लोग व्यवहारतः औसत नागरिक स्तर का जीवन यापन ही क्यों न करते रहे हों?

भारत की अपनी साँस्कृतिक परम्परा इतनी उत्कृष्ट और इतनी सशक्त रही है कि नर-वानर का जीवन जीने वाले अनगढ़ लोग यह कल्पना तक न सके कि कोई अपनी निजी प्रतिभा को परिष्कृत करके दूसरों की तुलना में असंख्यगुना वजनदार भी बन सकता है। बात समझ में न आने से यह मान कर संतोष करना पड़ा कि यह लोग किसी असामान्य वर्ग के हैं इनमें कोई चमत्कारी देव आवेश प्रदेश कर गया जो हम जैसों में नहीं हो सकता। इस मान्यता ने संसार भर के लोगों के मनों में यह मान्यता जतादी कि भारत भूमि पर रहने वाले देव मानव हैं। इसी धारणा का दूसरा चरण यह है कि जहाँ देवता बसते हैं वह स्वर्ग होता है। यह कसौटी भी खरी उतरती रही कि देव मानवों में सौजन्य, सहयोग और सेवा साधना में निरत होने के कारण वैयक्तिक सम्बन्धों, सामाजिक प्रचलनों और स्नेह-सौहार्द के आधार पर उभरते-बिखरते आनन्द उल्लास की भी यहाँ कमी नहीं है। तब यह मान्यता सहज ही बनती है कि भारत की भूमि पर ही स्वर्ग का अवतरण हुआ है और धरित्री ही “स्वर्गादपि गरीयसी” है। भगवान के अवतार जितने भी हुए हैं वे 10 या 24 जन्मे इसी धरित्री पर हैं। आकाश में उड़ने और अदृश्य रहने वाले अजर अमर, देवताओं को पकड़ पाना तो मुश्किल था, पर ऋषियों, मुनियों और मनीषियों की प्रज्ञा और आश्चर्यजनक पुरुषार्थ परायणता, कर्तव्यनिष्ठ तत्परता को देखते हुए मान्यता बना ली गई कि देवता संदेह भारत भूमि पर विचरण करते हैं और उनने ही किसी अविज्ञात लोक में अवस्थित धरती पर स्वर्ग को उतार कर ठीक वैसी ही अनुकृति यहाँ तैयार कर ली है।

संसार भर के मनुष्य समुदाय ने भारतीय देव मानवों को कुछ भी कर सकने में समर्थ पाया और उनके नेतृत्व का भर पूर लाभ उठाया।

युग निर्माण योजना द्वारा प्रकाशित-”समस्त विश्व को भारत के अजस्र अनुदान” ग्रन्थ में अगणित और ऐतिहासिक साक्षियों समेत यह सिद्ध किया है कि इस देश के निवासी अपने अपने निवास क्षेत्र तक ही अपनी महान गतिविधियों को सीमित नहीं करते रहे। वरन् उनने भूमण्डल के समस्त खण्डों, उपखण्डों, क्षेत्रों देशों की अतिकष्ट साध्य बाधाएँ करके इस बात का प्रबल प्रयास किया कि पिछड़ापन किसी भी क्षेत्र में अपनी जड़ जमाये न बैठा रहे। उसे आवश्यक उत्साह और पुरुषार्थ के लिए उभार कर उस तरह खदेड़ दिया जिस प्रकार कि सत्ता को अनायास ही तिरोहित कर देता है। जिन्हें इस संदर्भ में विस्तृत जानकारी की अपेक्षा हो वे उपरोक्त पुस्तक प्रथम श्रृंखला को ध्यानपूर्वक पढ़ लें। यही है भारतीय संस्कृति की महान परम्परा, जिसे अपनाने वाले को स्वयं देवोपम, चरित्रवान और आदर्शवादिता के पक्षधर पुरुषार्थ के लिए समर्पित होना पड़ता है

कोलम्बस ने यही यश गाथा अपने देश स्पेन-में जन-जन से सुन रखी थी। वह इस सोने की खदान में कुछ पाने-बटोरने के लिए आकुल-व्याकुल होकर एक जलयान में बैठकर खोजने निकल पड़ा। सही दिशा ज्ञान न होने से भारत तो न पहुँच सका, पर अमेरिका के तट पर जा पहुँचने पर उसे ही भारत समझ लिया और वहाँ के निवासियों की लाल चमड़ी देखकर उन्हें ‘‘रेकड इंडियन’’ नाम दे दिया। यह घटना बताती है कि यहाँ की प्रगतिशीलता को धरती के हर कोने पर किस दृष्टि से देखा जाता था।

दूसरे यात्री भी संभवतः इसी टोट में लम्बी कष्ट साध्य यात्राएँ करते हुए वहाँ जा पहुँचे और जो कुछ देखा उसका आँखों देखा परिचय बताने के लिए सुविस्तृत ग्रन्थ लिखे। ऐसे यात्रियों में फाह्मान, ह्वेनसाँग, मैकबर्नर आदि के नाम से प्रसिद्ध हैं। महाप्रभु कहे जाने वाले ईसा ने अपनी जिन्दगी की लम्बी अवधि इसी देश में रह कर बितायी और जो प्रकाश पाया, उसे अपनी भाषा में अपने ढंग से कहा और फैलाया। ईसाई धर्म को बौद्ध धर्म की अनुकृति के रूप में पर्यवेक्षकों ने माना और कहा है।

यह सिलसिला लम्बी अवधि से चलता रहा हैं पाल ब्रण्टन भारत के माध्यम से चमत्कारों की खोज में आये। उनने अपने अनुभवों के रूप में आश्चर्य चकित करने वाला साहित्य प्रकाशित किया है। फ्रांस की श्री माँ, इसी उद्देश्य से भारत आई और वे अरविंद आश्रम की अविच्छिन्न सदस्य बन कर यहीं रह गयी। एनीबेसेन्ट, गान्धी आश्रम की मिस स्लेड और “संरक्षण या विनाश” की सुप्रसिद्ध लेखिका सरला बेन जो ब्रिटिशमूल की थीं जीवन के अंत तक यहीं रहीं। विवेकानन्द की सहायिका के रूप में यहीं निवास करने वाली, सिस्टर निवेदिता का नाम हर किसी ने सुना है। पादरी सी.एफ.एन्ड्रयूज की भारत व प्रवासी भारतीयों के लिये की गई सेवाओं को कोई भुला नहीं सकेगा। इस आकर्षण का अन्त कुछ व्यक्तियों का उल्लेख करने भर से देखा नहीं जा सकता। इस देश की आबादी का पर्यवेक्षण करने पर पता चलता है कि यहाँ पारसी, मुस्लिम, ईसाई आदि अन्यान्य धर्मावलम्बी किस उत्साह के साथ आये और वातावरण को देखते हुए सदा सर्वदा के लिए यहीं बस गये। कल्पवृक्ष की छाया में बैठने के बाद उससे वापस लौटने का मन भला किसका होगा? और क्यों होगा? इस संदर्भ में आश्चर्यचकित होने वालों ने यहाँ विशेष रूप से अपनाई गई ‘योग विद्या’ को महत्व दिया है और उसे चमत्कारों की जन्मदात्री कहा है। बात सच भी है पर भ्रान्तियों, अत्युक्तियों और निहित स्वार्थ के जाल-जंजाल ने उसका स्वरूप ऐसा विचित्र बना दिया जादूगरी, बाजीगरी के आधार पर अजूबे दिखाने और शिगूफे छोड़ने के स्तर की ठग विद्या के अतिरिक्त और कुछ कहा नहीं जा सकता है। पर बात वस्तुतः ऐसी है नहीं। योग एक अत्यंत उच्चकोटि की विज्ञान सम्मत विद्या है। जिसे दो तथ्यों पर आधारित माना जा सकता है। इनमें से एक है-तपश्चर्या, जिसका बोलचाल की भाषा में अर्थ होता है-संयम अपनाना, अनुशासित रहना और लक्ष्य प्राप्ति के लिए तितीक्षा के रूप में कष्ट साध्य परिस्थितियों का सामना करने के लिए अपने को अभ्यस्त बनाना। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए कई प्रकार के साधना विधान, कर्म काण्ड, व्रत, उपवास, पदयात्रा आदि करने के विधान हैं। पर उन्हें साधन मात्र ही माना जा सकता हैं, साध्य नहीं। साध्य नहीं। साध्य तो व्यक्तित्व में परिपक्वता, प्रखरता और शालीनता का ऐसा समावेश करना है जो आकर्षणों और दबावों के आगे डगमगाये नहीं। आन पर अड़ा रहे। अनीति में सहगामी या सहयोगी बने से स्पष्ट इन्कार कर दे भले ही इसके बदले आततायियों का कितना रोष, आक्रमण, आतंक सहन करना पड़े। ऐसी मनःस्थिति को परिपक्व किये बिना ही तपश्चर्या के नाम से जाने वाले काय कष्टों की गणना होती रहती है। आश्चर्य इसी बात का है कि लोग लक्ष्य को भुला कर कर्मकाण्डों की पूर्ति भर से और अर्थ लगाने लगते हैं कि उन्हें इन कसरतों के सहारे ही सिद्ध पुरुष बनने का अवसर मिल जायगा।

तपश्चर्या का दूसरा पक्ष है योग साधना। तपश्चर्याएं शरीर प्रधान होती हैं और योग मन को अवांछनियताओं से मुक्ति दिला कर आत्म विस्तार की परिधि में प्रवेश करने को कहते हैं। इस और भी अधिक स्पष्ट एवं सरल रूप में समझना हो तो यों कहा जा सकता है कि अपने कार्यक्षेत्र को ऐसा बनाया जाय जिसमें सुनियोजित व्यवस्था उपक्रम के अतिरिक्त और कुछ दीख न पड़े। मनीषियों को यही सोचना और यही करना होता है। वे अव्यवस्था जन्य दुष्प्रवृत्तियों को लुहार की तरह घन बजाकर सीधी करती हैं और अपेक्षित धातु खण्ड की गलाई-ढलाई करके उन्हें अति महत्वपूर्ण उपकरण का स्वरूप प्रदान करते हैं। इसके लिए प्राणायाम, जप, प्रत्याहार, ध्यान, धारणा, समाधि आदि कई प्रकार के मार्ग अपनाये जाते हैं। ज्ञानयोग, भक्तियोग, कर्मयोग की त्रिपदा विद्या भी इसी निमित्त विनिर्मित हुई। अनुष्ठान, पुरश्चरण, व्रतधारण आदि का निर्धारण भी इसी निमित्त हुआ है। इतने पर भी यदि इन सब चित्र-विचित्र कर्मकाण्डों के पीछे अन्तःकरण का विस्तृतीकरण ध्यान में नहीं है तो समझना चाहिए कि उसे बच्चों के खिलवाड़ से और अधिक कुछ भी नहीं कहा जा सकेगा।

जिस योगविद्या के कारण भारत को स्वर्ग की उपमा दी जाती थी, वह वस्तुतः व्यक्तित्व में सन्निहित प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष क्षमताओं का ऐसा विकास ही है जो अपने कण-कण को प्रतिभा से सुसम्पन्न कर शरीर को ओजस्वी, मन को तेजस्वी और अन्तःकरण को ब्रह्मवर्चस् से अभिभूत करने में अपनी यथार्थता का प्रत्यक्ष प्रमाण नकद धर्म की तरह हाथों हाथ प्रस्तुत कर सकें। ऐसे योगी साधारण रहन-सहन छोड़कर चित्र-विचित्र वेष धारण करें, यह बिलकुल ही आवश्यक नहीं है।

गान्धी को इंग्लैण्ड की सरकार के आदेश पर वायसराय ने मिलने बुलाया। वे गये थे। उपयोगी वार्तालाप भी हुआ। पर वायसराय ने इंग्लैण्ड के प्रधानमंत्री की यह बात पूरी तरह ध्यान में रखी कि गान्धी से आँख में आँख डालकर बात न करें। वे जादूगर हैं, जिस पर नजर डालते हैं उसी को वशीभूत कर लेते हैं। मान्यता सर्वथा झूठी भी नहीं थी। जब असहयोग आन्दोलन शुरू हुआ तो इंग्लैण्ड यही कहता कि दमन उसी सीमा तक किया जाय जिससे गान्धी फट न पड़े। यह 16 पौण्ड का बमगोला यदि फट पड़ा तो ब्रिटिश शासन का कही अता पता भी न चलेगा। गोलमेज कान्फ्रेंस में गान्धी जी इंग्लैण्ड गये और अनेक लोग उस सम्मेलन में थे पर शासक पक्ष के हर वरिष्ठ अधिकारी की आँखें गान्धी पर ही टिकी थीं और यही उत्सुकतापूर्वक जाना जा रहा था कि यह व्यक्ति आखिर कहता क्या है। उनके एक एक शब्द का वजन तौला गया और उन दिनों तो कम से कम यही लग रहा था कि गान्धी जी पूरी तरह जीत कर वापस लौट हैं।

योगी वर्ग में एक नाम विनोबा का भी हे जिनने-’आराम हराम है’ का मंत्र अपनी जीवन चर्या के हर कण में समा और बसा लिया था। उन्होंने बड़ी योजनाएँ बनाई और उनकी व्यावहारिकता अभीष्ट सफलता के सहारे सिद्ध करके दिखाई। भू-दान, श्रमदान, सर्वोदय आदि की प्रवृत्तियाँ उन दिनों इतने जादुई क्रम से सफलता के शिखर पर पहुँची कि लोग हतप्रभ और आश्चर्यचकित होकर रह गये। इसे कहते है अध्यात्म शक्ति जिसके कारण गान्धी जी ने उन्हें अपना उत्तराधिकारी बनाकर व्यक्तिगत सत्याग्रह का प्रमुख बनाया था।

महान आन्दोलनों के जन्मदाता किस प्रकार कोटि-कोटि लोगों पर हावी हो गये इसकी गाथाएँ भी इन्हीं दशाब्दियों के इतिहास के पृष्ठों पर नजर डाल कर उदाहरणों का ढेर सामने खड़ा देखा जा सकता है। लेनिन के आरंभिक निजी जीवन को समझने वाला कोई भी व्यक्ति यह आशा नहीं कर सकता था कि यह व्यक्ति अपने देश को इतने आश्चर्यजनक ढंग से कुशासन से मुक्त करा लेगा और आधी दुनिया के विचारों पर हावी हो जायेगा। कितने ही देशों में साम्यवादी शासन का प्रचलन कर सकने में सफल होगा।

वेडैनपावेल का स्काउटिंग आन्दोलन अपने समय की महत्वपूर्ण देन है। दास-दासी प्रथा से लेकर जमींदारों की तानाशाही के अभेद्य दीखने वाले किले मनस्वियों की प्रबल चेतना के आधार पर ही ढह सके जिनके बारे में कुछ दिन पूर्व तक कोई यह कल्पना तक नहीं करता था कि वह सब संभव हो सकेगा।

यदि किसी को पुरातन भारत की सशक्त महानता का आधार अध्यात्म योग मानने का शब्द मोह है तो उसके साथ इतना और जोड़ना चाहिए कि उसका भव्य भवन दो आधार पर ईंट चूने की तरह विनिर्मित हुआ था। उनमें से एक था तप अर्थात् व्यक्तित्व को उच्चस्तरीय साहसिकता से भरा-पूरा प्रतिभा सम्पन्न बनाना और दूसरा सुव्यवस्था बना सकने की प्रवीणता का प्रतिनिधित्व कर सकने वाले कौशल का पक्षधर दृष्टिकोण परिमार्जित करना। इन दोनों के लिए यदि चरमस्तर का प्रयत्न बन पड़े तो समझना चाहिए कि अध्यात्म योग का वास्तविक अर्थ समझ लिया गया। उस स्तर की प्राप्ति ही उन सफलताओं को प्रस्तुत करती है जिन्हें ऋद्धि-सिद्धियों के नाम से जाना जाता है। वे किसी पर आसमान से पुष्प वर्षा होने की तरह बरसती नहीं है।

दक्षिणमुखी गंगाप्रवाह को मोड़ते मरोड़ते गंगा को पूर्व की ओर बहने के लिए बाधित करने वाले तपस्वी भागीरथ की कथा-गाथा प्रसिद्ध है। उन्हीं को भागीरथी का पिता कहलाने का श्रेय प्राप्त है। ऐसा ही एक प्रयास अनुसुइया ने चित्रकूट के समीप मंदाकिनी को अभीष्ट दिशा में ले जाने का किया था। कहते तो यहाँ तक हैं कि उनके तेजस् से प्रभावित होकर ब्रह्मा, विष्णु, महेश तक बालक बनकर अनुशासन पालने के लिए विवश हुए थे। पाण्डवों के छोटे से समुदाय ने कौरवों की विशाल सेना को परास्त करके रख दिया था। इस अद्भुत सफलता के पीछे योगेश्वर कृष्ण की योजना बद्ध रणनीति काम कर रही थी। वे ही रथ के घोड़े चला रहे थे। हनुमान के पर्वत उखाड़ लाने जैसे पराक्रम के पीछे उनकी प्रत्यक्ष नहीं परोक्ष शक्ति ही काम कर रही थी। वही जामवन्त के उद्बोधन पर जगी और लंका दहन में महत्वपूर्ण भूमिका सम्पन्न करने में सफल हुई थी। परशुराम के कुल्हाड़े और अर्जुन के गांडीव की शक्ति सुनने वालों तक को रोमाँचित करती है।

राजा छत्रसाल जब आक्रमणकारियों से लड़ने में भारी आर्थिक कठिनाइयों में पहुँच गये थे, तब उनके गुरु प्राणनाथ ने वरदान दिया था कि पहाड़ी पर रातभर घोड़े दौड़ाते रहो। जहाँ भी टाप पड़ेगी वहीं हीरे-पन्नों के भण्डार निकलेंगे। बात सच निकली और उनकी आर्थिक कठिनाई दूर हो गई। आज का पन्ना छतरपुर वही क्षेत्र है। विवेकानन्द को संसार भर में भारतीय संस्कृति की पताका फहराने में उनके समर्थक सहायक रामकृष्ण परमहंस की दिव्य क्षमता काम करती रही। ऐसे अगणित प्रसंग हैं जिनसे प्रतीत होता है कि अद्भुत शक्तियों और सफलताओं का उद्भव मनुष्य के अन्तराल से होता है। योग-तप जैसे उपचारों से उसे अपने भीतर से ही जगाया एवं उभारा जाता है।


बड़े कामों के लिए वरिष्ठ प्रतिभाएँ

मजबूत किलों का विस्मार करने के लिए अष्टधातु तोपों की गोलाबारी ही काम आती है। पहाड़ों को समतल बनाने के लिए डायनामाइटों की सुरंगों का प्रयोग करना पड़ता है। रेल के डिब्बे पटरी पर से उतर जाने पर उन्हें उठाने के लिए बड़ी ताकत वाली क्रेन ही अभीष्ट उद्देश्य पूरा करती हैं। कठिन मोर्चे जीतने के लिए प्रवीण पारंगत दुस्साहसी सेनापति ही विजय श्री वरण करता है। ऐसे बड़े कामों के लिए छिटपुट साधनों का उपयोग निरर्थक सिद्ध होता है।

बड़े कामों का दायित्व उठाने और उन्हें पूरा करने की जिम्मेदारी असाधारण क्षमता सम्पन्नों को ही सौंपी जाती है। यों महत्व गधों और बकरों का भी है, पर उनकी पीठ पर हाथी वाली अम्बारी नहीं कसी जा सकती। सौ खरगोश मिल कर भी एक चीते से दौड़ में आगे नहीं निकल सकते। बड़े कामों के लिए बड़ों की ही तलाश करनी पड़ती है।

इन दिनों बड़ी उथल-पुथल होने जा रही है। शताब्दियों से संचित सड़ाँध भरे कचरे को हटाया और ठिकाने लगाया जाना है। कँटीली झाड़ियों वाले जंगल के स्थान पर सुरम्य उद्यान खड़े करना सहज काम नहीं है। धुल भरे तवे के समान जलते रेगिस्तान को भी लोगों ने लहलहाती हरियाली से सुरम्य बनाया है, पर इसके लिए पैनी सूझबूझ का परिचय देने और विपुल साधन जुटाने की आवश्यकता पड़ी हैं। समुद्र को छलाँगने और संजीवनी बूटी वाला पर्वत उखाड़ कर लाने का चमत्कार हनुमान ही प्रस्तुत कर सके थे। हर बन्दर ऐसा दुस्साहस कर दिखाने की हिम्मत नहीं कर सकता। असुरता का व्यापक साम्राज्य ध्वस्त करने और उसके स्थान पर सतयुगी रामराज्य का वातावरण बनाने के लिए बड़ी योजना और उपयुक्त साधन जुटाने की क्षमता ही अभीष्ट उद्देश्य पूरा कर सकी थी। ऐसी आशा हर साधारण से नहीं की जा सकती। समुद्र सोखने की चुनौती ऋषि अगस्त्य ही स्वीकार कर सके थे।

इन दिनों अनौचित्य की बाढ़ को रोकने और दलदल को मरुस्थल बनाने जैसी समय की चुनौती सामने है। विनाश के ताण्डव को रोकना और विकास का उल्लास भरा सरंजाम जुटाना ऐसा ही है, जैसे खाई को पाटने के साथ साथ उस स्थान पर ऊँची मीनार खड़ी करने जैसे दुहरे पराक्रम का काम करना। इस प्रवाह को उलटना ही नहीं, उल्टे का उलट कर सीधा करना भी कह सकते हैं। यों मनुष्य ही असंभव को संभव कर दिखाते रहे हैं, पर उसके लिए कटिबद्ध होना ही नहीं, अपने को क्षमता सम्पन्न सिद्ध करके दिखाना दुहरे पराक्रम का काम है। युग परिवर्तन की इस विषम बेला में ऐसा ही कुछ बन पड़ने की आवश्यकता है जैसा कि घोर अंधकार से भरी तमिस्रा का स्वर्णिम आभा वाले अरुणोदय के साथ जुड़ना। इति और अथ का समन्वित संधिकाल यदा कदा ही आता है। इसकी प्रतीक्षा युग-युगान्तरों तक करनी पड़ती है। इन दिनों ऐसा ही कुछ होने जा रहा है।

विभीषिकाओं का घटाटोप हर दिशा में गर्जन-तर्जन करता देखा जा सकता है। जो चल रहा है, उससे विपत्तियों का संकेत ही मिलता हे। दुर्बुद्धि ने चरमसीमा तक पहुंच कर ऐसी संभावना प्रस्तुत कर दी है, जिसे बुरी किस्म की दुर्गति ही कह सकते हैं। अधोगामी प्रवाह को और अधिक उत्तेजित कर देना सरल है, पर उसे उलट कर सृजन की दिशा में योजनाबद्ध रूप से नियोजित कर सकना ऐसा है, जिसकी विश्वकर्माओं से ही आशा की जा सकती है। उन्हीं की पुकार दसों दिशाओं में है। समय की गुहार उन्हीं को खोज निकालने या नये सिरे से ढालने की मची हुई है। बड़े काम आखिर बड़ों के बिना कर कौन पायेगा?

प्रश्न क्षेत्र विशेष की परिस्थितियों से निबटने का नहीं है और न समुदाय विशेष से निबटने का। अभावों को दूर करने का भी नहीं है। और न साधन जुटाने की अनिवार्यता जैसा। अति कठिन कार्य सामने यह है कि संसार भर के मानव समुदाय पर छाई हुई विचार-विकृति का परिशोधन किस प्रकार किया जाय? यह कार्य लेखनी, वाणी एवं प्रचार माध्यमों से भी एक सीमा तक ही हो सकता है, सो भी बड़ी मंदगति से, जबकि आवश्यकता इस बात की है कि लोक चिन्तन में गहराई तक घुसी हुई भ्रष्टता से कैसे निबटा जाय और उसके फलस्वरूप जो दृष्ट आचरण का सिलसिला चल पड़ा है, उसके उद्गम को बन्द कैसे किया जाय? धूर्तता इन दिनों इस कदर बढ़ी हुई है कि वह कानूनी दण्ड-व्यवस्था से लेकर धर्मावेश स्तर की नीति-मर्यादा को भी अंगूठा दिखाती है। सदाशयता का जोर-शोर से समर्थन करने वाले ही जब नये-नये मुखौटे बदल कर कृत्य-कुकृत्य करने की दुरभिसंधियाँ रचते रहें, तो उन्हें कौन किस प्रकार समझाये? जागते हुए को क्या कह कर सोते से जग पड़ने की आवश्यकता समझाये?

उपाय एक ही शेष रह जाता है कि ऐसी प्रतिभाएँ नये सिरे से उभरें जो अपना निज का आदर्श प्रस्तुत करते हुए यह सिद्ध करें कि सही मार्ग पर चलना न तो घाटे का सौदा है, न असंभव और अव्यावहारिक। खरा उदाहरण प्रस्तुत करना ही एकमात्र ऐसा उपाय अभी भी शेष है, जिसके आधार पर आदर्श अपनाने के लिए भी लोगों को सहमत एवं प्रोत्साहित किया जा सकता है। विशेषतः तब, जब चोर जुआरी, लबार, व्यभिचारी, नशेबाज, अनाचारी अपनी कथनी और करनी में एकता दिखा कर अनेकों को अपने साथ चलने के लिए सहमत कर सकें।

प्रतिभाओं को दुहरे मोर्चे पर लड़ने का अभ्यास करना चाहिए। उनमें से एक है दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन और दूसरा सत्प्रवृत्ति−संवर्धन। इन प्रयासों का शुभारंभ अपने निज के जीवन क्रम से आरंभ करके परिवार में प्रचलित किया जा सकता है। इसके बाद पड़ोसियों, स्वजन-संबंधियों, परिचितों, घनिष्ठों और उन सब को आलोक वितरण से लाभान्वित किया जा सकता है, जो अपने प्रभाव परिचय क्षेत्र में आते हैं।

अपनी आदतों में ऐसी अनेकों हो सकती हैं, जिनके स्वभाव में समाहित हो जाने के कारण अखरने की नौबत तो नहीं आती, पर लकड़ी में लगे घुन की तरह निरन्तर खोखला करने में वे अनवरत रूप से लगी रहती हैं। निबटने के लिए मोर्चेबंदी यही से आरंभ करनी चाहिए। सबसे बुरी किन्तु सर्वाधिक प्रचलित कुटेव एक ही है, वह है-आलस्य। चोरी अनेक तरह की होती हे, किन्तु अपने आप को और संगे संबंधियों को सबसे अधिक हानि पहुँचाने वाली है “कामचोरी”। इसमें प्रतीत भर ऐसा होता है कि आराम से रह रहे हैं, मजे के दिन कट रहे हैं, पर सच बात तो यह है कि इस कुटेव के कारण आदमी दिन-दिन अनुपयोगी, अनगढ़, अयोग्य, अक्षम, अशक्त होता जाता है। प्रगति की समस्त संभावनाएँ आलसी को दूर से ही नमस्कार करके उल्टे पैरों लौट जाती हैं। पड़े रहने पर चाकू को जंग खा जाता है, बीज अपनी उपजाने की शक्ति गँवा बैठता है। पान सड़ जाना और घोड़े का बँधे-बँधे अड़ियल हो जाना प्रसिद्ध हे। शरीर परिश्रम से जी चुरायेगा, तो मस्तिष्क भी अपनी बौद्धिक तीक्ष्णता गँवा बैठेगा। आलसी क्रमशः अधिकाधिक प्रभावी बनते चले जाते हैं। उन्हें दरिद्रता लिपटती चली जाती है। न स्वच्छता रह पाती है और न सुधार स्तर की, किसी विधि-व्यवस्था को कार्यान्वित करने की गुंजाइश रह जाती है। निकम्मे व्यक्ति का सम्मान न अपनी आँख में रहता है और न स्वजन-संबंधी ऐसों की इज्जत करते हैं। इन्हें अर्ध मृतक नहीं तो जागते हुए भी सोते रहने वाले मूर्छित कहना चाहिए। इनकी योग्यताएँ क्रमशः पलायन करती जाती हैं और आत्महीनता छाई रहने पर जवानी में ही बूढ़ों से गई-गुजरी स्थिति बन जाती हे।

समय ही धन है। उसे श्रम के साथ नियोजित करके भी दिशा में अग्रसर हुआ जा सकता है। आलसी को भी तो निर्वाह खर्च तो चाहिए ही, पर श्रम के अभाव में उत्पादन घटता जाता है। इसमें आर्थिक, शारीरिक, मानसिक हानि-ही हानि है। जो परिश्रम से जितना जी चुराता है, उसे अभागा कहना चाहिए। न उसका भाग्य जगता है और न भविष्य बनता है। इन्हें अपने लिए अन्यों के लिए, समाज के लिए, राष्ट्र के लिए और विश्व के लिए भारभूत ही कहा जा सकता है, भले ही वे अपनी आरामतलबी को सौभाग्य का चिन्ह मानते रहें सड़ी कीचड़ में अनेकों घिनौने कृमि-कीटक उपजते और दुर्गन्ध से लेकर बिमारियों तक के निमित्त कारण बनते हैं। इसी प्रकार आलसी प्रमादी की अस्तव्यस्तता उसे अन्यान्य दुर्व्यसनों का अभ्यस्त बना देती है।

पसीने की हर बूँद मोती है। जीवन की बहुमूल्य श्रृंखला क्षणों के छोटे-छोटे कणों से मिल कर बनी है। समुन्नत वे रहे हैं, जिन्होंने समय का मूल्य समझा और उसकी हर इकाई का श्रेष्ठतम एवं क्रमबद्ध व्यस्त उपयोग करने का तारतम्य बिठाया। जो आलस-प्रमाद में उसे गँवाते रहते हैं, धीमी गति और तारतम्य में उसे ज्यों-त्यों करके काटते रहते हैं, वे किसी प्रकार अपनी मौत के दिन पूरे भर कर पाते हैं और तो कुछ मिलना ही उन्हें क्या था, प्रतिभा परिवर्धन के सहज लाभ तक से वे वंचित रह जाते हैं। यह दुर्घटना अपने या अपने किसी प्रिय पात्र के जीवन घटने न पाये, इसका विशेष सतर्कतापूर्वक ध्यान रखे जाने की आवश्यकता है। लम्बे समय के भारी और कठिन काम करने वालों को बीच-बीच में थोड़ा सुस्ताने की आवश्यकता अवश्य पड़ती है, पर उसकी क्षतिपूर्ति थोड़ी देर के लिए काम या मन बदलने भर से पूरी हो जाती है। हृदय जन्म के दिन से लेकर मरण पर्यन्त धड़कता रहता है इसी अवधि में वह कुछ मिली सेकेंड का विश्राम भी ले लेता है। हमारे भी काम और विश्राम के बीच इसी प्रकार का तालमेल बिठाया जाना चाहिए।

दार्शनिक पाप-पुण्य की और स्वर्ग नरक की परिभाषा दूसरी तथा उच्च स्तर की है, पर व्यावहारिक धर्म विज्ञान में आलस को पाप और सुनियोजन को पुण्य माना जाय, तो ही ठीक रहेगा, क्योंकि इनका प्रतिफल नकद धर्म की तरह हाथों-हाथ मिलता है। सुनियोजन का अर्थ है-सुव्यवस्था। यह ऐसा गुण है, जिस पर अन्य सभी गुण निछावर किये जा सकते हैं। अपनी, अपनों की, अपने दायित्वों की क्रमबद्ध व्यवस्था बना लेना इस बात का प्रमाण है कि व्यक्ति की दूरदर्शिता, विवेकशीलता और कार्यकुशलता उच्चस्तर की है। कारखानों दफ्तरों में मैनेजरों की योग्यता पर उनका संभलना-बिगड़ना निर्भर रहता है। शासन में गवर्नर प्रान्तों के संरक्षक माने जाते हैं। अंग्रेजी शासन के जमाने में भारत के प्रधान व्यवस्थापक को गवर्नर जनरल कहते थे। वह पद सबसे ऊँचा माना जाता था।

“सुपरिण्टेण्डेण्ट” शब्द भी प्रायः इसी अर्थ का बोधक है।

महत्वपूर्ण सफलताएँ जब भी जहाँ भी, जिन्हें भी, मिली हैं, उसमें व्यवस्था तंत्र की प्रमुख भूमिका रही है। सेनापतियों का कौशल उनकी रणनीति के आधार पर आँका जाता है। योजनाबद्ध उपक्रम बनाकर ही विशालकाय निर्माण कार्य बन पड़ते है। श्रमिकों को-साधनों को पर्याप्त मात्रा में जुटा लेने पर भी इस बात की गारण्टी नहीं होती कि जितनी जिस स्तर की सफलता अभीष्ट थी, वह मिल ही जायेगी। वह संभावना इस बात पर निर्भर रहती है कि आज के उपलब्ध साधनों का किस प्रकार श्रेष्ठतम उपयोग करते बन पड़ा। यह इस बात पर निर्भर रहता है कि हाथ के नीचे जो काम है, उसके अनुकूल और प्रतिकूल पक्ष की हर हलचल और समस्या को कितनी गंभीरता और यथार्थता के साथ आँका गया, समय रहते उनसे निबटने का किस प्रकार जुगाड़ बिठाया गया। सफलता ऐसे ही लोगों को वरण करती हे। श्रेयाधिकारी वे ही बनते हैं, जो मात्र अपने जिम्मे के काम को किसी प्रकार बेकार भुगत लेते हैं उन्हें श्रमिक भर कहा जा सकता है। व्यवस्थापक का श्रेय तो उन्हें मिल ही नहीं पाता।

परिपूर्ण दिलचस्पी, एकाग्र मनोयोग, समुचित उत्साह और आगे बढ़ने का अदम्य साहस मिलकर ही ऐसी स्थिति विनिर्मित करते हैं, जिसमें बड़े काम सध सकें, भले ही प्रयत्न कर्त्ता साधारण साधनों, साधारण योग्यताओं वाला ही क्यों न हो। ऐसे लोग परिस्थितियों की प्रतिकूलता से भयभीत नहीं होते। उन्हें अनुकूल बनाने में अपनी समग्र क्षमता को दांव पर लगाते हैं। ऐसे ही लोग नेतृत्व करने के अधिकारी होते हैं। यों ऊँची कुर्सी पर बैठने और ऊँची पदवी पाने के लिए तो नर वानर भी लालायित रहते है।

निजी जीवन में प्रतिभा परिष्कार का शुभारंभ आलस्य और प्रमाद से निबटने का लक्ष्य सामने रखकर करना चाहिए। छोटे काम सहायकों से कराते हुए बड़े, कठिन और वजनदार कार्यों का दायित्व अपने कँधे पर ओढ़ना चाहिए। हलके काम तलाश करने और किसी प्रकार मौज-मजे में समय काटने की आदत मनुष्य को आजीवन अनगढ़ ही बनाये रहती है। जो अपने हिस्से के काम के साथ-साथ समूचे सम्बद्ध क्षेत्र के हर पक्ष के उतार-चढ़ावों का ध्यान रखते हैं और सम्बद्ध व्यक्तियों को उसमें सुधार के आवश्यक परामर्श, प्रस्ताव के रूप में नम्रतापूर्वक देते रहते हैं, वस्तुतः उन्हीं को सूत्र संचालक समझा जाता है और उन्हीं की अवस्था बुद्धि प्रस्तुत योजना को अनेक भँवरों में से पार निकालती हुई किनारे तक ले जाती है। पर ऐसे लोग अहंकारी और आग्रही नहीं होते। आदेश भी नहीं देते। अपने प्रस्ताव इस प्रकार प्रस्तुत करते हैं जिसमें अपने अहंकार के, विशेषज्ञ होने की गंध न आती हो और दूसरों पर आक्षेप या दोषारोपण न लदता हो। सत्परामर्श की नहीं, तिरस्कार पूर्ण आदेश की ही अवहेलना होती है, कारण कि इससे दूसरों के स्वाभिमान को चोट जो लगती है।

कोल्हू का बैल भी अपने नियत काम में लगा रहता है। विशेषता उसकी है जो सम्बद्ध परिकर के हर पक्ष पर ध्यान रखता है। संभावनाओं की कल्पना करता है और शतरंज की गोटियों की तरह सतर्कता पूर्वक बाजी जीतने वाली चाल चलता रहता है व्यवस्थापक ऐसे ही लोग बन पाते हैं और वे न केवल काम का वरन समूचे सम्बद्ध परिकर की सुनियोजन कर सकने की क्षमता सिद्ध करते हुए अगले दिनों अधिक ऊँची श्रेणी का दायित्व सौंपे जाने का श्रेय उपलब्ध करते हैं। व्यावहारिक क्षेत्र का धर्मात्मा ऐसे ही लोगों को कहना चाहिए। अहिंसा, सत्य, ब्रह्मचर्य आदि।

दार्शनिक सद्गुण तो प्रथम डिवीजन में उत्तीर्ण होने के उपरान्त की सफलतापूर्वक संचित किये जा सकते हैं। आरंभ तो निजी जीवन में उत्साह भरी व्यस्तता अपनाने से होता है और परिवार क्षेत्र में व्यवस्था सम्बन्धी प्रगति-प्रयोग करना सरल पड़ता है। परिवार के सदस्यों से निरन्तर संपर्क रहता है उनके साथ आत्मीयता भरा बन्धन भी रहता है इसलिए अनुशासन पालने के लिए उन्हें अनुरोध एवं आग्रह के आधार पर अधिक अच्छी तरह सुनियोजित किया जा सकता है। इसी अभ्यास को जब व्यवसाय या समाज क्षेत्र में प्रयुक्त किया जाता है तो उस बड़े क्षेत्र की बड़ी सफलता का श्रेय भी अधिक मिलता है और व्यक्तित्व में प्रतिभा-परिवर्धन का लाभ भी अनवरत रूप से मिलता चला जाता है।


प्रतिभा-संवर्धन की दो महानतम उपलब्धियाँ

एक कहावत है कि “ईश्वर मात्र उनकी सहायता करता है, जो अपनी सहायता आप करते हैं। “ इसी से जुड़ती हुई एक और उक्ति है-”जिसमें दैव पर दुर्बल का घातक” होने का आरोप लगाया गया है। गीताकार का कथन है “मनुष्य अपना शत्रु आप है और स्वयं अपना मित्र भी, वह उसकी इच्छा पर निर्भर है कि अस्तव्यस्तता अपना कर अपने को दुर्गति के गर्त में धकेले अथवा चुस्त दुरुस्त रहकर प्रगति के शिखर पर निर्बाध गति से आगे बढ़ता चला जाय। गीता में आगे चल कर श्रीकृष्ण ने अर्जुन के बहाने हर विचारशील से आग्रह किया है कि “अपने को उठाने में लगो, गिराते चलने की धृष्टता मत करों।”

संसार कितना सुखद, सुन्दर, सुविधाजनक क्यों न हो, पर अपने में त्रुटियाँ रहने पर वह सारा पसारा निरर्थक बन कर रहेगा। अपनी आंखें बाँध कर रखें तो संसार भर का दृश्य और सौंदर्य समाप्त हुआ ही समझा जाना चाहिए। श्रोताओं की श्रवण शक्ति चली जाय तो प्रवचनकर्ता, परामर्शदाता और गायक-वादक निरर्थक बन गये ही समझे जा सकते हैं। दिमाग खराब हो चले, तो समझना चाहिए कि संसार का मनुष्य उतावली चाल चल रहा है। पेट खराब हो जाय या रक्त में विषाक्तता घुस पड़े, तो दुर्बलता-रुग्णता से लेकर अकाल मृत्यु तक का भयंकर आक्रमण अब तब में होने ही जा रहा है, ऐसा समझ लेना चाहिए।

प्रगति का इतिहास सुनियोजित तन्मयता और तत्परता के आधार पर ही बन पड़ा है। इनके अभाव में किसी को पूर्वजों की कमाई या सुविधाजनक परिस्थितियों का अम्बार ही हाथ क्यों न लग जाय, वह सारे वैभव को फुलझड़ी की तरह जला कर क्षण भर का मनोरंजन कर लेगा और फिर सदा-सर्वदा पश्चाताप से सिर धुनता रहेगा, भले ही उसके पास वैभव की मात्रा कितनी ही बढ़ी-चढ़ी क्यों न हो। आवेशग्रस्तों की आतुरता उनके सामने ऐसे घटनाक्रम उपस्थित करती हैं, जिसे मूर्खता का अभिशाप ही कहा जा सकता है। मात्र समझदार दूरदर्शी ही ऐसे होते हैं, जो वस्तुस्थिति का सही मूल्याँकन कर सकें। और अपनी हैसियत के अनुरूप कदम उठा सकें।

शरीर का भारी, लम्बा-तगड़ा होना एक बात है और हिम्मत का होना सर्वथा दूसरी। तगड़ापन कुछ अच्छा और आश्चर्यजनक तो लगता है, पर उसमें इच्छाशक्ति संकल्पशक्ति, हिम्मत ओर प्राण ऊर्जा की कमी हो, तो उसे कायरता और भीरुता के कारण चिन्तित, शंकाशंकित, खिन्न, उद्विग्न ही देखा जायेगा। तनिक−सी कठिनाई आ जाने पर राई को पर्वत की तरह बखानेगा और किसी प्रकार बचने-बचाने की ही कामना छाई रहेंगी। पर यह समझ ही नहीं सकता कि कठिनाइयाँ कागज के बने हाथी की तरह बड़ी और डरावनी तो होती हैं, पर मनस्वी के प्रतिरोध की एक ठोकर खाने की भी उसमें सामर्थ्य नहीं होती। इसके ठीक विपरीत यह भी देखा गया है कि चींटी, दीमक, आदि अपने लघु कलेवर के होते हुए इस स्तर के सुविधा-साधन जुटा लेते हैं कि आनन्द भरा जीवन जिया जा सकें।

हर रेतकण के छोटे परमाणु में अजस्र शक्ति भरी होती है। यदि उसके विस्फोट का नियोजन किया जा सके, तो प्रतीत होगा, न कुछ दीखने वाला सब कुछ स्तर की सशक्तता से भरा हुआ है, आवश्यकता मात्र प्रसुप्ति के जागरण भर की है। औसत आदमी का मात्र इतना ही नगण्यता स्तर जाग्रत रहता है, जिसमें कि वह घर, पेट, परिवार को किसी प्रकार गाड़ी धकेलता रहे, पर जिनके अन्तराल में सुनियोजित उच्चस्तर की महत्वाकांक्षाएं अपना ताना-बाना बुनती रहती हैं, वे इतने बड़े कार्य सम्पन्न कर लेते हैं, जिन्हें देख कर साथियों को आश्चर्यचकित रह जाना पड़े। बाह्य दृष्टि से एक जैसे लगने वाले व्यक्तियों के बीच भी जमीन-आसमान जितना अन्तर पाया जाता है। यह अन्तर कहीं बाहर से आ धमका हुआ नहीं होता, वरन् व्यक्ति ने उसकी संरचना अपने हाथों स्वयं ही की होती है।

झाड़ी अन्धेरे में भूत बन कर दिल दहला देती है। रस्सी को साँप समझने वाले को अँधेरे के माहौल में घिग्घी बँध जाती हे। “शंका डायन, मनसा भूत” की कहावत सोलहों आने सच है। हिम्मत वाले लम्बी दुर्गम यात्राएँ एकाकी पूरी करते हैं, कायरों को रात के समय पेशाब करने बाहर जाना पड़े, तो किसी साथी को जगाना पड़ता है। भीष्म पितामह का शरीर घुसे हुए वाणों के ऊपर टँगा हुआ था। थोड़ी बहुत चेतना थी, पर उनने मौत से स्पष्ट कह दिया कि उत्तरायण सूर्य आने में अभी बहुत देर है, तब मृत्यु को वापस लौट जाना चाहिए और फिर तब लौटना चाहिए, जब इच्छित मुहूर्त आ जायें। मौत को मनस्वी का कहना मानना ही पड़ा किसी ने सच ही कहा है- बहादुर जिन्दगी में एक बार मरते हैं, पर कायरों को तो पग-पग पर मरना पड़ता है। वे आत्महत्या वाला प्रपंच रचते रहने के अतिरिक्त और कुछ कर ही नहीं पाते। इसे दुर्भाग्य ही कहना चाहिए कि मनुष्य अपनी मानसिक क्षमता का मात्र सात प्रतिशत ही शरीर यात्रा के साधन जुटाने भर में गँवाता खपाता रहता है, जबकि उसकी 93 प्रतिशत सामर्थ्य सोई, खोई, मरी, मूर्च्छित और अविज्ञात स्थिति में ही पड़ी रहती है। अपनी दौलत भरी तिजोरी की चाबी खो देने पर कोई दरिद्रों की तरह दुर्गतिग्रस्त फिरे, तो उसके लिए कोई क्या कुछ कहे?

यदि आत्मनिर्माण में जुटा जा सके, बुरी आदतों को कूड़ा-करकट की तरह बुहारा जा सके, दृष्टिकोण में मानवी गरिमा के अनुरूप मान्यताओं का संस्थापन किया जा सकें, तो समझना चाहिए कि वनमानुष के नर-नारायण में बदल जाने जैसा काया कल्प उपलब्ध होगा। यह शत प्रतिशत अपने हाथ की बात है। जो दूसरों को सुधारने और काबू में लाने की डींगें हाँकते हैं, यदि वह अपनी कुटेवों तक को कड़ाई के साथ धकेल न सकें, तो समझना चाहिए मनुष्य की आकृति में ढला कोई गोबर का खिलौना मात्र ही अपने अस्तित्व का परिचय दे रहा हैं आत्मनिरीक्षण, आत्म सुधार आत्मनिर्माण, आत्म विकास का उपक्रम अपनाये रहने पर वह आज नहीं तो कल-परसों अपनी सफलता घोषित ही करके रहेगा।

प्रबंध कर सकना यों एक बहुत मामूली विशेषता पड़ती हैं, पर सही बात यह है कि उससे बढ़ कर और कोई गौरवास्पद वैभव-वरदान है नहीं।

सेनापति भी आरंभ में मामूली सिपाही की तरह भर्ती होता है, पर अधिकारी देखते रहते है कि इनमें से किसमें व्यवस्था बुद्धि है। वह अनुपात जिनमें जितना बढ़-चढ़ा पाया जाता है, वह उतनी ही भारी जिम्मेदारियाँ उठाता और अपने कौशल के बल पर असंभव को संभव कर दिखा देता है। विजयी सेनाध्यक्षों में से प्रत्येक को इसी कसौटी पर खरा सिद्ध होना पड़ा है। वे गौरवान्वित इसी आधार पर होते रहे है। मिलों, फैक्ट्रियों, कारखानों, उद्योगों की प्राणशक्ति कुशल प्रबन्ध संचालकों पर केन्द्रित रहती है। उन्हीं की दूरदर्शिता से छोटे कारोबार बढ़ कर आशातीत प्रगति का श्रेय पाते और अपने कौशल से हर किसी को अचंभे में डालते हैं। शानदार संस्थाओं और आन्दोलनों को छोटे शुभारंभ से आगे बढ़ाते हुए आशातीत सफलता अर्जित करके दिखाते हैं। वस्तुतः वे ही हैं, जो सम्पदा, यशस्विता, वरिष्ठता और सफलता के ढेर जमा करते हैं और दूसरों को यह बताते हैं कि यदि ऐसी ही प्रबन्ध शक्ति अर्जित की जा सके, तो अभावों और कठिनाइयों के बीच भी बहुत कुछ किया जा सकता है।

अंग्रेजी जमाने में प्रान्तों के शासनाध्यक्ष “गवर्नर” कहलाते थे। केन्द्रीय सरकार का सूत्र संचालक गवर्नर जनरल (वायसराय) कहलाता था। ‘गवर्न’ शब्द का सीधा अर्थ है प्रबन्धक अपनी इसी विशेषता के कारण इंजीनियर बड़े-बड़े निर्माण कार्य सम्पन्न करते है। व्यवसायी छोटा-सा उद्योग खड़ा करके देखते-देखते धनकुबेर बनते हैं। विकृतियों से जूझने वाले और प्रगति के महत्वपूर्ण आधार खड़े करने में जो भी सफल हुए हैं वे अपनी निजी साहसिकता और सुसंबद्ध प्रबन्धशक्ति का विकास करके ही ऐसा कुछ कर सके हैं, जिसे सराहनीय, अनुकरणीय, अभिनन्दनीय कहा जा सकें।

शक्ति, शक्ति है। उसे भले काम की तरह बुरे काम में भी लगाया जाता है। दैत्य-दानव, आततायी, आतंकवादी, और अनाचारी तक इसी विशेषता के आधार पर रोमाँच खड़े कर सकने वाले दुष्कर्म कर सके हैं। अनीति का आचरण करते हुए भी अपने आतंक से दूर-दूर तक विपन्नता खड़ी कर देने वाले दस्यु और तस्कर तक अपनी सफलता का ढिंढोरा पीटते समय कारण एक ही बताते हैं। कि उनने अपने आप को अपने ढाँचे में अपने हाथों ढाला और व्यवस्था क्षेत्र में ऐसा कौशल दिखाया कि शान्ति और सुरक्षा के मजबूत आधारों तक को लड़खड़ा कर रख दिया। -दुर्बल व्यक्तित्व और व्यवस्था बुद्धि से रहित मस्तिष्क तो मात्र अनुचर रह कर ही अपना श्रम बेच कर किसी प्रकार रोटी कमाते हैं।

सद्गुणों में अनेक धर्म-धारणाओं और व्रत-अनुशासनों का वर्णन किया जाता है। उनके कारण स्वर्ग-मोक्ष की, ऋद्धि-सिद्धि की विभूतियां हस्तगत होने की बात कही जाती हैं ऐसे प्रतिपादन प्रायः संयम और परमार्थ की महत्ता ही ठीक बताते हैं। इन समस्त उपचारों का उद्देश्य एक ही है- व्यक्ति हर दृष्टि से स्फूर्तिवान श्रमशील, एवं मनोयोगपूर्वक कार्य में संलग्न होने में अपनी प्रतिष्ठा वरिष्ठता एवं सफलता-समर्थता की अनुभूति करें। काम से जी चुराने वाली आवारागर्दी में दिन गुजारने वाले ज्यों-त्यों करके धीमी गति से आधे-अधूरे काम निबटाने वालों की आदतें ऐसी दुष्प्रवृत्तियाँ हैं, जिन्हें कोई चाहे तो युग के परिप्रेक्ष्य में बढ़ा-चढ़ा पाप भी कह सकता है। पुराने जमाने में पाप’-पुण्य की परिभाषा में अन्तर था। उन दिनों तपश्चर्या और परमार्थ से जुड़े हुए काम ही पुण्य में गिने जाते थे, पर अब उसे सुव्यवस्था कह कर युगधर्म के अनुरूप उचित परिभाषा की जा सकती है।

कहा यह भी जाता रहा है कि “अपना सुधार संसार की सबसे बड़ी सेवा है।” अपने की सुधार लेना संसार को सुधार लेने की क्षमता का परिचय देता हैं। जो दूसरों को जीते वह वीर, जो अपने को जीते वह महावीर। मानवी गरिमा के अनुरूप अपने गुण, कर्म, स्वभाव को विनिर्मित कर लेना संसार में एक नये देवता की अभिवृद्धि करना है। व्यक्ति के बहिरंग पर जो कुछ आच्छादित है, उसका अनेकानेक अनुकरण करते और प्रभाव से अनुप्राणित होते हैं। यहाँ तक कि उनके मरने के उपरान्त भी हरिश्चन्द्र-भागीरथ जैसों की कथा-गाथा अक्षुण्ण बनी रहती और अनेकानेकों को प्रकाश देती रहती है। यही बात अंतरंग के संबंध में भी है। चिन्तन, चरित्र, व्यवस्था, आस्था, विश्वास श्रद्धा, प्रज्ञा, निष्ठा की यदि उच्चस्तरीय स्थिति हो तो उसका प्रभाव-परिणाम धारणकर्ता तक ही सीमित नहीं रहता, वह उड़ते बादलों की तरह अपने कार्यक्षेत्र में अन्न-जल से लेकर प्राण ऊर्जा तक न जाने क्या-क्या बरसाते रहने में लगा रहता है। उसका तेजोवलय न जाने कितनों पर विशेषतया संपर्क क्षेत्र वालों पर शक्ति पात की, उठाने-उछालने की क्रिया-प्रक्रिया सम्पन्न करता है। तेजोवलय अन्तरिक्ष में उड़ता और जहाँ भी पहुंचता है, वही अपने अनुरूप चेतना-वसन्त खिलाता चलता है। पारस को छूकर लोहा सोना बनता है या नहीं, इसमें अभी संदेह है, पर यह सुनिश्चित है, प्रतापी व्यक्ति असंख्यों को अपना अनुयायी-सहयोगी बना लेते हैं। महामानवों में से अधिकाँश की जीवनगाथा यही बताती है कि अपनी प्रामाणिकता और प्रखरता के बल पर हर दिशा से संग्रह करते हुए न जाने कहाँ से चल कर कहाँ जा पहुँचे। मात्र अपने प्रभाव से दूसरों द्वारा ऐसे-ऐसे कृत्य करा लेने में सफल हुए, जिन्हें वे कदाचित् स्वयं हाथ में लेते, तो न कर पाते। दिव्य क्षमताओं को अर्जित कर लेना और उनसे अनेकों की अस्तव्यस्तता को सुयोग्यता में बदल देना, यही पुण्य-परमार्थ है। दान देने की तरह दान दिलाना भी पुण्य माना जाना चाहिए। साहसिकता और सुव्यवस्था के ही दो गुणों से जिस किसी को भी अभ्यस्त-अनुशासित किया जाय, समझना चाहिए कि उसकी सर्वतोमुखी प्रगति का द्वार किसी ने खोल दिया। भले ही उस अविज्ञात शक्ति पुँज का जय−जयकार कहीं न होता हो।

मनुष्यों में से अधिकाँश की आकृति-प्रकृति लगभग मिलती-जुलती है। उनका खाना-पीना, सोना-जागना आदि भी एक-सा ही होता है, फिर भी कोई जहाँ का तहाँ पड़ा रहता है, उल्टा गुणों की दृष्टि से घिसता-घटता देखा जाता है, किन्तु साथ ही यह भी देखा गया है कि किसी की प्रतिभा उन्हीं साधन-अवसरों के रहते चौगुना-सौगुना अभिवृद्धि करती रहीं। वह उनका यश, प्रभाव और कौशल इतना बढ़ा देती है कि देखने वाले तक आश्चर्य-चकित रह जाते हैं, साथ ही सहयोगियों की सेना भी अनायास ही खिंचती-घिसटती चली आती है। रीछ−वानरों की, ग्वाल-बालों की, भिक्षु-परिव्राजकों की, सत्याग्रहियों की टोलियों को नियंत्रित या गठित करने कौन वहाँ गया था? फूलों पर तितलियाँ और मधु-मक्खियाँ न जाने कहाँ कहाँ से दौड़ती चली आती हैं। महामानवों के असुविधा भरे जीवन भी ऐसे ही आकर्षक होते हैं। उसी कष्टसाध्य परिपाटी को अपनाने के लिए अनेकानेक आतुर होते और कदम-से कदम मिलाते आदर्शवादी संरचना के लिए प्रयाण करते देखे गये हैं।

समय को देखते हुए अगणित पतन-पराभवों के निमित्त कारण आलस्य, विलास अनुत्साह जैसे दुर्गुणों को प्रधानता दी जाती रही है। सौभाग्य के चमकते तारे की-तरह निर्धारित कार्यक्रमों में तत्परता-तन्मयता के साथ जुट पड़ने की प्रवृत्ति को दैवी वरदान माना जा सकता है और उसका भविष्य बिना हस्तरेखा देखे या ग्रह गणित किये निस्संदेह उज्ज्वल होना घोषित किया जा सकता है। यह किसी के भी भाग्योदय की प्रथम किरण हैं। दूसरा सोपान यह है कि उसकी व्यवस्था-बुद्धि काम करें। अपने समय, श्रम, चिन्तन एवं कौशल को उपयोगी कार्य में निरन्तर लगाये रहे, तो कहा जा सकता है कि रुग्णता और दरिद्रता में से एक भी उसके पास फटकने न पायेगा। दीर्घजीवी प्राय वहीं हुए हैं, जिनने अपने आप को प्रचण्ड पुरुषार्थ के साथ सर्वदा नियोजित रखा। आलसी और प्रमादी तो जीवित रहते हुए भी मृतकों में गिने जाते हैं।

संसार में जितनी भव्यताएँ दीख पड़ती हैं, वे मात्र साधनों के सहारे ही खड़ी नहीं हो गई उनके पीछे किन्हीं सृजनशिल्पियों की मेधा ने ऐसा जादू-चमत्कार दिखाया है कि प्रकट होने से पहले ही उसकी योजना बना ढाँचा खड़ा किया, उसमें प्रयुक्त होने वाले तारतम्य को बिठाया और फिर स्वप्नों को साकार बनाने में अपने आपे को पूरी तरह खपा दिया। इसी प्रक्रिया का नाम सफलता है। उसे वरण करने के लिए किन्हीं दूसरों की मनुहार करने की जरूरत नहीं है। यदि व्यक्ति अपनी समझ को क्रमशः तेज करता चले, क्रमशः अधिक बड़ी जिम्मेदारियाँ कंधों पर उठाता और उन्हें पूरी करता चले, तो समझना चाहिए कि इसी विकसित प्रबन्ध शक्ति के आधार पर वह जहाँ भी जाएगा, सरताज बन कर रहेगा।


विशिष्टता का सुनियोजन हो संचय नहीं!

अभावग्रस्तों को कठिनाइयों का सामना करना पड़े तो बात समझ में आती है। पर आश्चर्य तब होता है जब विपुल साधन अपने अधिकार में होने पर भी जानकारी के अभाव में लोग हैरान फिरते पाये जाते हैं। ऐसी घटनाएँ जब सुनने को मिलती हैं तो उस अनजानेपन को दुर्भाग्य का प्रतीक मान कर खेद व्यक्त किया जाता है।

कहते हैं कि किसी अनाड़ी ने बाप के छोड़े हीरों को काँच समझ कर व्यापारियों के हाथों बेच दिया था और खुद जीवन भर महा-दरिद्री बना रहा। लाल मणियों की एक माला पड़ी मिलने पर एक भीलनी उन्हें कौड़ियों के मोल बेच आई थी। हिरन की नाभि में कस्तूरी रहती है, पर वह सुगंधि की तलाश में निरंतर दौड़-धूप करता और थक कर प्राण गँवा देता है। माचिस जेब में होने की बात याद न रहने पर ढेरों घास फूस पास रहने पर भी एक व्यक्ति ठंड में सिकुड़ कर मर गया था। घर के आँगन में खजाना गढ़े होने की बात विदित न होने पर उस झोपड़ी के निवासी को जब तब मजदूरी मिलने पर आधे पेट सोना पड़ता था। ऐसी घटनाएँ प्रायः कौतूहलपूर्वक सुनी जाती हैं। तो सुनने वालों तक को हैरानी होती है।

दिशा भूल जाने पर बनजारे रात भर चलते रहने पर भी बेकार भटकते रहते हैं और भूल का पता चलने पर वापस लौटते हैं। खण्डहरों में भूल भुलैया बनी पाई जाती हैं। उनमें घुस जाने के बाद यह ख्याल नहीं रहता कि वापस लौटने का दरवाजा कौनसा है। हड़बड़ी उस मानसिकता को और भी अधिक बेकार कर देती हैं सुना है कि कई तो इस भटकाव में कई दिन घिरे रहने पर मर तक जाते हैं कोलम्बस भारत की तलाश में निकला था पर दिशा चूक हो जाने पर वह अमेरिका के समीप उजाड़खंड वेस्ट इंडीज में जा निकला। बालू को पानी समझ भटकने वाले हिरनों की मृग-तृष्णा का उदाहरण वक्ता लोग प्रायः दिया करते हैं। वह कहानी प्रसिद्ध है कि सिंह का बच्चा भेड़ों के समूह में मिलने पर अपने को भेड़ ही समझने लगा था बाद में जब उसे आत्म-बोध कराया गया तो वहाँ से हट कर सिंहों के समूह में चला गया। सपने की स्थिति में भी लोग बेतुके स्वप्न देखते रहते हैं। नशेबाजों की खुमारी भी ऐसी ही होती है, जिसमें ऐसा सूझता-समझ में आता है जिसकी वास्तविकता के साथ दूर की भी संगति नहीं बैठती।

इस प्रकार की घटनाएँ वस्तुस्थिति की सही जानकारी न होने के कारण होती हैं। पर अचंभा तब, होता है जब आम आदमी ऐसी ही विसंगतियों भरे भटकाव में कुछ दिन ही नहीं गँवाता, वरन सारी जिन्दगी ही दांव पर लगा देता है। आम आदमी अपने-अपने ढंग की उलझने कठिनाइयाँ-समस्याएँ चिन्ताएँ-व्यथाएँ, सिर पर लादे रहता है और उनके समाधान के लिए भी जिस तिस का आसरा ताकता है। स्पष्ट है कि कभी-कभार किसी की छोटी मोटी सहायता हाथ लग भी जाती है पर जब पूरा जीवन ही उलझन भरा है तो कौन, किसकी, कब तब, कितनी सहायता कर सका है? विशेषतया तब जबकि हर किसी को अपनी-अपनी समस्याओं में ही इतना उलझा रहना पड़ता है कि दूसरों की सहायता करने जैसी न तो स्थिति ही रह जाती है और न वैसी अभिरुचि दिखाने की फुरसत ही मिलती है।

अपनी गलती ढूँढ़ने या खोजने की किसी को आदत नहीं है। भ्रमों में से एक बड़ा भ्रम हर आदमी में यह भी पाया जाता है। अपनी अकल और दूसरों की दौलत चौगुनी-सौगुनी समझ पड़ती है। बल्कि वस्तुतः सर्वथा निभ्रान्त व्यक्ति कदाचित कोई भी नहीं, होता। पर अपनी गलती कोई सोचे कैसे? इसमें हेठी जो जोती है, नाक जो कटती है, अपनी सर्वज्ञता पर आँच जो आती है? इसलिए काम बिगड़ने पर उसका लाँछन अपने ऊपर न लगने देने के लिए यही सस्ता हाथ लगता है कि दोष किसी दूसरे पर थोप दिया जायं

तथाकथित पढ़े लिखे लोग भी दुर्भाग्य आदि पर दोषारोपण के उतने ही शिकार पाये जाते हैं जितना कि नितान्त पिछड़े समझे जाने वाले लोग। भूतों की करतूत के संबंध में मान्यता बहुतों को हैरान करती है। शकुन विचार करने वाले छिपकली, बिल्ली आदि की हलचलों के मनमाने अर्थ लगा लेते हैं। कई तो रोज के स्वप्नों की ही व्याख्या करते रहते हैं और उनमें भक्तिब्धता के छिपे संकेतों के समाधान खोजते रहते हैं। अभिभावकों की समुचित सहायता न मिलना भी अपना हलका करने का ऐसा बहाना है जिसे कोई भी लगा सकता है। मित्रों की रुखाई, संबंधियों की उपेक्षा का दोषारोपण कोई भी आसानी से लगा सकता है। बच्चे का जन्म अशुभ घड़ी में होना, पत्नी का गृह प्रवेश भारी पड़ना आदि कुछ भी मनगढ़ंत कहा जा सकता है। इसके लिए अपने संदेह की पुष्टि में कुछ सबूत देने की भी आवश्यकता नहीं पड़ती। जब अपने को निर्दोष मानने के लिए अशुभ का दोष किसी न किसी पर मढ़ने की बात ठान ली गयी तो कल्पना भर की आशंका तक सीमित न रहने देकर किसी को भी कितना ही दोषी ठहरा देना अपने हाथ की बात है। कुकल्पना को भी बहुत लोग सच्चाई मान बैठते हैं और निर्दोषों पर भी बरस पड़ते हैं।

ऐसा अनौचित्य अनेकों द्वारा अनेकों बार अपनाया गया देखा जाता है। पर एक कुकल्पना से ग्रसित अधिकाँश लोग पाये जाते हैं कि अपनी निजी सामर्थ्य अकिंचन हैं उसे बढ़ाने के लिए हम क्या कर सकते हैं? उत्कर्ष के लिए सुयोग मिलना अपने हाथ में कहाँ है? जितना प्रयत्न अच्छे के लिए किया जा चुका है, उससे अधिक और कुछ करने का अवसर ही कहाँ था? आदि-आदि बातें सोच कर आत्म समीक्षा आत्म सुधार आत्म संवर्धन और आत्म विकास का अवसर ही गँवा दिया जाता है। उपाय न सूझ पड़ने पर कुड़-कुड़ाते खीझते, झल्लाते, उद्विग्न रहने और चिंतातुर रहने के अतिरिक्त और कुछ बाना भी तो नहीं बन पड़ता अपने को तनावग्रस्त मान लेना तो कुकल्पनाओं के आधार पर भी सरल संभव हो जाता है। सो ही लोग करते भी रहते हैं।

इसे व्यापक भ्रान्ति का महामारी जैसा प्रकोप कहा जाय तो इसमें तनिक भी अत्युक्ति नहीं मानी जा सकती। जब साधारण को यह समझने और समझाने का सुयोग ही नहीं मिल पाता कि मनुष्य की अन्तर्निहित शक्तियाँ इतनी अधिक हैं कि यदि उन्हें प्रसुप्ति से विरत करके जाग्रत एवं क्रियाशील बनाया जा सके तो हर सामान्य समझा जाने वाला व्यक्ति अपने को असामान्य सिद्ध करके दिखा सकता है। उसमें कोई रहस्यवाद नहीं है। न कुछ ऐसा है जिसे अमान्य ठहराया जा सके। पुरातन इतिहास के पृष्ठ पलटने या अर्वाचीन के इर्द-गिर्द की गतिविधियों पर तनिक गंभीरता पूर्वक नजर डालने से ऐसे असंख्यों उदाहरण आँखों देखे और कानों सुने जा सकते हैं जिनमें आत्मविश्वास और प्रचण्ड साहस के बलबूते प्रगति की दिशा में चलने की सूझ के साथ प्रयत्न किया और वे क्रमशः अधिक उपयुक्त अवसर पाते चले गये। अन्ततः इतनी ऊँचाई पार कर सके जिसे देखते हुए आश्चर्य लगता रहा और किसी दैवी वरदान का भ्रम होता रहा। इसके विपरीत ऐसे उदाहरण भी कम नहीं देखे जा सकते, जिनमें अपार साधन और अवसर होते हुए भी व्यक्ति दुर्गुणों के शिकार रह कर दिन-दिन पतन पराभव की और लुढ़कते चले जाते रहे ओर अन्त में वहाँ पहुंच गए जिसे दुर्गति या दुर्भाग्य ही कहा जा सकता है।

साधारण समझ से अपनी पृथ्वी जहाँ की तहाँ स्थिर खड़ी दीखती है। पर जिनने कुछ अधिक जानकारी प्राप्त की है, वे विश्वास पूर्वक कह सकते हैं कि वह अपनी धुरी पर लट्टू की तरह घूमती रहती है। सूर्य की परिक्रमा के लिए तीर की तरह सनसनाती हुई दौड़ती है। मनुष्य के संबंध में भी यही बात है। उसकी जीवन चर्या के लिए अग्रगमन की प्रगति संभावनाएँ कूट-कूट कर भरी हुई हैं। कमी केवल इस बात की है कि वस्तु स्थिति समझने और उस पर विश्वास करने का विवेक जगा ही नहीं। जब-तब दीनता और हीनता की परतें इतनी मोटी जमा होती रहती हैं कि वे ही अपना वास्तविक स्वरूप प्रतीत होती हैं। जैसा भी कुछ कट रहा है, वह कटते रहने दिया जाय, इस स्त्र का मानस बन जाने पर तो विद्यमान क्षमताएँ और गहरे गर्त्त में चली जाती हैं। जब उमंगे ही मर गई तो फिर अग्रगमन का-अभ्युदय का अवसर छप्पर फाड़कर आकाश से आँगन में क्योंकर आ धमके? संसार में पैसे की चमक-दमक बहुत देखी जा सकती है और उसके आधार पर जो खरीदा जा सकता है उसकी सज-धज भी अपनी चमक दमक दिखाती, आँखों में चकाचौंध उत्पन्न करती देखी जा सकती है। किन्हीं किन्हीं का रूप लावण्य भी मन मोहक दीख पड़ता है। कलाकार व्यवसायी गुणी भी कई देखे जाते हैं, पर ऐसे कम ही दीख पड़ते है जिन्होंने अपने साहस और पौरुष के सहारे अवरोधों से टकराते हुए प्रगति का पथ प्रशस्त किया हों। जिन्होंने गिरों को उठाया, उठों को चलाया, चलतों को दौड़ाया और दौड़तों को उछाला हो। अपनी राह तो सभी चल लेते हैं। पर सराहना उनकी है जो अपनी नाव पर बिठा कर कईयों को खेते हुए उन्हें इस पार से उस पार पहुँचा सकें। मल्लाह की भूमिका सबसे बड़ी भूमिका है।

इसे दुर्भाग्य ही कहना चाहिए कि ऐसी प्रचण्ड सामर्थ्य हर किसी के भीतर होते हुए भी उसका सदुपयोग कर सकना तो दूर पहचानना तक नहीं बन पड़ता यह ‘आत्म विस्मृति’ ह वह अभिशाप है जिसे लोग जाने अनजाने में स्वयं अपनाते हैं और कंधे पर लाद कर चलते हैं। इसी को कहते हैं प्रतिभा का अभाव, जो कभी कभी तो मोटे पहलवानों को भी ग्रस्त कर लेता हैं। उन्हें आन्तरिक दृष्टि से खोखला देख कर आश्चर्य किया जाता है। शारीरिक बल का प्रदर्शन करते हुए तो मेंढ़ों और भैंसों को भी आपस में टक्करें मार कर दर्ज जताते देखा गया है। तीतरों और मुर्गों को भी चोंचे लड़ाते और अहंता में अग्रणी होने का दर्ज जताते हम देखते हैं। यह वास्तविक बलिष्ठता का प्रयोग नहीं है। उस गहराई तक जाना हो तो देखना पड़ेगा कि मन की क्या दिशाधारा उस बल का प्रयोग कर रही है। गुण्डे, आतंकवादी, आततायी, अनाचारी, अपनी अकड़ दिखाते और रौब जमाते देखे गये हैं। दूसरों पर धाक जमाना और उन्हें डर दिखा कर उचित-अनुचित करा लेना, यही उनका प्रयास व्यवसाय रहता है। ऐसे लोगों की शारीरिक बलिष्ठता कैसे सराही जा सकेगी? यही बात बुद्धि बल, धन बल आदि के संबंध में है। उसका दुरुपयोग करने वाले अपने लिए भर्त्सना और दूसरों के लिए विपत्ति ही खड़ी करते हैं। कला का दुरुपयोग भी कम नहीं हुआ है। शृंगारिकता, विलासिता अनैतिकता जैसी दुष्प्रवृत्तियों को भड़काने में संगीत, चित्रकला, सिनेमा, साहित्य आदि का कम सहारा नहीं लिया गया है। ऐसी दशा में उस कला को किस प्रकार सराहा जाय? जो आकर्षित और प्रभावित तो अनेकों को करती है, बदले में पूरी कीमत बटोर लेने में भी सफल रहती हैं परंतु उसके परिणामों को देखा जाय तो यही कहना पड़ता है कि यदि ऐसे प्रख्यात कलाकार अव्यवस्थित अनजान लोगों की तरह साधारण स्थिति में रह रहे होते तो कहीं अच्छे थे। तब वे चमत्कृत करके कुमार्ग पर चलने के लिए ललचाने वाला कुकृत्य तो न कर सके होते?

उपलब्धि क्या हस्तगत हुई? यही देखना भर पर्याप्त नहीं है। जाँचा यही जाना चाहिए कि उसका उपयोग लोकहित के लिए किस प्रकार और कितना बन पड़? यदि इस कसौटी को छोड़ दिया तो सर्प बिच्छुओं की शारीरिक संरचना भी प्रशंसा की पात्र बनेगी। चीते और भेड़िये भी दूसरों की तुलना में अधिक बलिष्ठ होने के कारण प्रशंसा पाने के अधिकारी समझे जायेंगे तब मार से डरने और बचने की क्या आवश्यकता रहेगी? सराहनीय वही बल कौशल है जिसका उपयोग सदुद्देश्य के लिए बन पड़े। अन्यथा बढ़ी हुई प्रतिभा बारहसिंगों के बढ़े हुए सींगों की तरह है, जो देखने में कौतूहलवर्धक तो लगते हैं पर अपना पराया प्रयोजन कुछ भी साध सकने में समर्थ नहीं होते।

जिस प्रकार पड़ी हुई वस्तु खराब हो जाती है, लोहे में जंग लग जाती हे, लकड़ी नमी व धुन का शिकार होकर किसी काम की नहीं रहती, मानवी कौशल-प्रतिभा भी आत्म विस्मृति की विडम्बना एवं सुनियोजन के अभाव में कुछ भी सार्थकता सिद्ध नहीं कर पाते। एक बुद्धिमान प्रतिभाशाली प्रशंसा के योग्य है कि उसने इतना कुछ पढ़ प्रखरता अर्जित की किन्तु यदि वह ज्ञान-सम्पदा स्वयं तक सीमित रही, किसी के काम नहीं आयी तो व्यर्थ है। उसका लाभ यदि समाज को नहीं मिला तो फिर उसके होने का क्या प्रयोजन? संगीतकार कई धुन बजाना जानता है पर वह अभ्यास भर तक ही सीमित रहता है किन्तु दूसरों को न तो सुनाता है, न ही सिखाता है तो उस प्रतिभा का क्या लाभ?

जो भी विभूतियाँ अपने पास हैं, उन्हें यदि अपने चहुं और बिखेर दिया जाय, समाज परिकर को उनका लाभ लेने दिया जाय तो उनकी उपयोगिता भी है एवं उस व्यक्ति के जीवन की सार्थकता भी। प्रतिभा को न तो जंग लगनी चाहिए, नहीं वह संकीर्ण परिधि में बँधी रहनी चाहिए।


व्यसनों और संकटों में फँसाने वाला सोना (kahani)

एक सन्त मरने पर परलोक पहुंचे। चित्रगुप्त ने उनके कर्मों का लेखा जोखा पूछा ताकि उनके अनुरूप उन्हें स्थान दिया जा सके।

सन्त ने कहा वे आधे जीवन गृहस्थ रहे। आधे जीवन विरक्त। गृहस्थ में परिवार को विकसित किया। दूसरों को सहायता भी की और सम्बन्धियों के बीच प्यार दुलार भी मिलता रहा। पर विरक्त होने पर तो उदासीन रह, भिक्षा माँगने और अपने ही भविष्य की कामनायें करते रहने में समय गुजारा। भजन पूजन भी इसी लिए किया कि परलोक में अच्छा स्थान मिले। चित्रगुप्त ने यही खाते देखकर कहा आधे जीवन की आपकी सेवा साधना पिछले आधे जीवन की विडम्बना में खप गई। अब आपका कोई पुण्य शेष नहीं है जिसके कारण स्वर्ग की सद्गति मिल सके उन्हें वापस मनुष्य लोक में आना पड़ा। और साधारण स्थिति का जीवन अपनाना पड़ा।

एक साधु के संबंध में मान्यता थी कि वह सोना बनाने की विद्या जानता है। पर यह विधि को गुप्त रखता है। सीखने के लिए कितने ही व्यक्ति भक्त बनकर आते और रहस्य पूछने का प्रयत्न करते। साधु सबको एक ही बात कहता, दस वर्ष साथ रहो। सेवा करो। तब रहस्य बताया जायगा। इस शर्त को पूरा करने के लिए कोई तैयार न होता सभी निराश वापस लौट जाते।

एक व्यक्ति ऐसा आया जो इस शर्त का पालन करने के लिए तैयार हो गया। उसने डेरा डाल दिया और साथ रहने लगा। सत्संग का प्रभाव ऐसा पड़ा कि वह सच्चा अपरिग्रही संत बन गया।

दस वर्ष पुरे हुए साधु ने उसे एकान्त में बुलाया और सोना बनाने की विधा का रहस्य सीख लेने के लिए कहा, अपरिग्रही शिष्य ने उत्तर दिया “अब में स्वयं ही सोना बन गया। व्यसनों और संकटों में फँसाने वाले सोने का क्या करूंगा”।


अभ्युदय का आधार और उद्भव!

प्रतिभा मनुष्य जीवन की मौलिक सम्पदा है। जिन्हें दृश्यमान भौतिक सम्पदा समझा जाता है वे सभी संसार के बाजार में प्रतिभा की कीमत पर खरीदी जाती हैं। अनेकों सुविधा सामग्रियाँ पैसों के मोल पर खरीदी जाती हैं। बिना मूल्य चुकाए यहाँ किसी को कुछ भी उपलब्ध नहीं होता। यहाँ तक कि चोर उचक्के तक अपनी सूझबूझ, फुर्ती और चतुरता के बदले ही कुछ बटोर पाते हैं। उत्तराधिकार में मिली सम्पदा अपनी निजी की न सही, पूर्वजों के पुरुषार्थ द्वारा उपार्जित की गई होती है। प्रतिभा के अभाव में तो मनुष्य छूँछ रह जाते हैं। असहाय अपंगों की तरह दिन गुजारते हैं। दूसरों की सहायता से भी यदि किसी से कुछ मिले भी, तो भी समझा यही जाय कि उदार चेता के हाथ में जो दान देने योग्य था वह उसने पुरुषार्थ से ही कमाया होगा।

मनुष्य जन्म से ही प्रायः सभी एक जैसी स्थिति के होते हैं। कुछ अपवाद इससे भिन्न भी होते हैं व उनके बीच आरम्भ से ही असाधारणता पाई जाती है। ऐसे प्रसंगों के सम्बन्ध में भी यही कहा जाता है कि यह उनके पूर्व जन्मों का उपार्जन है। यदि वंश परम्परा की बात मानी जाय तो भी श्रेय पूर्वजों को ही जाता है।

शरीर और मस्तिष्क की बनावट में छोटे मोटे उतार चढ़ावों के अतिरिक्त कोई विशेष अन्तर नहीं पाया जाता। फिर भी उनकी फलश्रुतियों के बीच जमीन आसमान जितना अन्तर पाया जाता है। कई अपनी योग्यता की ऊँची कीमत वसूल करते देखे जाते हैं। तो किन्हीं के दिनभर काम में जुटे रहने पर भी आधे पेट भूखे सोना पड़ता है। कोई प्रतिष्ठित, प्रख्यात, यशस्वी और गण्यमान्य श्रेणी में गिने जाते हैं, तो कोई उपहास, तिरस्कार सहते दर दर से दुत्कारे जाते हैं। इस अन्तर को काई चाहे तो विधि का विधान, समय का चक्र, भाग्य का फेर आदि भी कह सकते हैं। अथवा दूसरे किन्हीं के बाधक या सहायक होने की बात भी कह सकते हैं। पर यह आत्म प्रवंचना के अतिरिक्त और कुछ है नहीं। मनुष्य का अपना स्तर ही जाँचा परखा जाता है और नियति का व्यापारी उसी के आधार पर वह थमा देता है, जिसका वह पात्र था। मूल्याँकन में गड़बड़ी हो सकती है। समाज व्यवस्था पर अन्याय बरते जाने का दोष भी लगाया जा सकता है। पर सामान्य प्रचलन यही है कि यहाँ पात्रता के अनुसार ही काई कुछ हस्तगत कर सकता है।

बीज अपनी ही मौलिक क्षमता से अंकुरित होकर पौधा बनता और क्रमशः परिपक्व वृक्ष बनकर फूल फलों से लदकर शोभायमान होता है। दूसरे उसके इस अभिवर्धन प्रयास में सहायक भर होते हैं। अपेक्षा के अनुरूप सहायता की व्यवस्था इस प्रकृति का नियम है। वह मक्खी, मच्छर, साँप, बिच्छू, जीवाणु, विषाणु तक को मिलती रहती है। फिर जिसमें प्रगति की उमंगें उभार रही हों उसका कार्य अवरुद्ध बना पड़ा रहे ऐसा हो ही नहीं सकता। पुरातन और आधुनिक समय के ऐसे अगणित उदाहरण अपने इर्द−गिर्द ही प्रचुर परिणाम में बिखरे पाये जा सकते हैं, जिनमें साधनहीन, अभावग्रस्त परिस्थितियों में उत्पन्न हुए लोग अपने बलबूते आगे बढ़े और असुविधाओं से टकराते ठुकराते हुए अपने लिए उपयुक्त मार्ग खोज निकालने में सफल हुए। उन्नति के उस उच्च शिखर पर जा पहुँचे, जहाँ से पुराने साथी अपनी जगह पर जमे रहने के कारण बौने जैसे दीख पड़ेंगे। इसके ठीक विपरीत ऐसा भी होता है कि जिन्हें पूर्वजों की छोड़ी सम्पदा अथवा आकस्मिक लाभ-अवसर मिले, पर उनका सदुपयोग न बन पड़ने पर दुरुपयोग किये जाने पर दुर्व्यसनों की लानत सिर पटक-पटक कर न जाने कहाँ से कहाँ तिरोहित हो गई। धनिकों की सन्तानों में से अधिकांश दौलत को चिरस्थाई समझकर उसका दुर्व्यसनों में अपव्यय करते रहते हैं। फलतः थोड़े ही दिनों में उस गई गुजरी स्थिति में जा पहुँचते हैं, जिसे दुर्भाग्य के अतिरिक्त और क्या नाम दिया जाय यह सूझ नहीं पड़ता।

बात साधनों की हो या सहयोगियों की। अपना निजी व्यवहार ही सामान्य जनों को अपनी आदत के अनुरूप ढालता रहता है। किसी को शत्रु बढ़ते जाने की शिकायत बनी रहती है जबकि किसी के मित्र इतने अधिक बढ़ते रहते हैं मानो शक्कर की गंध पाकर कहीं से चींटियां, मक्खियाँ बिना बुलाए ही दौड़ी चली आ रही हों। आश्चर्य है कि वे ही व्यक्ति जो कुछ के साथ सद्व्यवहार करते हैं, वे ही दूसरों के प्रति कठोरता और शत्रुता का व्यवहार करते पाए जाते हैं। यह हो सकता है कि उसमें उनके निजी स्वार्थ की कोई भूमिका रही हो। किन्तु आमतौर से देखा यह गया है कि कटु कर्कश, अशिष्ट, अहंकारी व्यक्ति अपने विरुद्ध स्वयं ही वातावरण बनाता है और मकड़ी के जाले की तरह अपने बुने ही जंजाल में स्वयं ही फँस जाता है।

सोचने का साधारण प्रचलन यह है कि “हम हर बात में हर तरह निर्दोष हैं जबकि दूसरे ही दुष्टता की खदान हैं और अकारण उलझते हैं।” कई बार बात ऐसी भी होती है जिसमें दुर्जनों को दुष्टता बरते बिना चैन ही नहीं मिलता। फिर भी ऐसे लोग शक्ति विहीन होते हैं और बड़बड़ाते रहने, लाँछन लगाते रहने के अतिरिक्त और कुछ कर नहीं पाते। हानि तो अपने आप ही अनुपयुक्त होने पर इतनी पहुँचाता रहता है जिसकी क्षति पूर्ति करना कई बार तो असंभव न सही कठिन तो अवश्य ही हो जाता है। फिर भी आश्चर्य इस बात का है कि इस पग पर कार्यान्वित होते रहने वाले तथ्य को लोग देखते हुए भी अनदेखा करते रहते हैं। जानते हुए भी अनजान बने रहते हैं। ऐसी दशा में उन्हें अपने को निर्दोष और दूसरे को दोषी ठहराने में ही अपना समय और प्रयास खर्च करते देखा जाता है।

बाहर के लोग या घटनाक्रम नुकसान नहीं पहुँचाते हैं, यहाँ ऐसा कुछ नहीं कहा जा रहा। इस गुण दोष से भरे संसार में उचित या अनुचित सभी कुछ हानिरहित है। फिर अपना बचाव कैसे हो। इसका उत्तर इतना ही दे सकना सरल है कि पैरों में मजबूत जूते पहन लेने पर कँटीले और पथरीले रास्ते पर चलते जाना भी सरल हो जाता है लम्बी राह पर से काँटे बीनना और कंकड़ हटाना कठिन है। योजनों लम्बी सड़क को हर दिन बुहार कर निष्कंटक बनाते रहना कठिन है। सरलता इसी में है कि अपने पैरों में मजबूत जूते पहने जाँय तो ऊबड़ खाबड़ रास्ते को भी बिना किसी कठिनाई के पार कर लिया जायेगा।

पुरानी मान्यता थी कि पृथ्वी स्थिर है। और सूर्य ही उसकी परिक्रमा करता है पर अब खोजने पर पता चला है कि पृथ्वी भी चुप नहीं बैठती। वह धुरी पर भी घूमती है और सूर्य के आसपास चक्कर भी लगाती है। दिन रात की परस्पर विरोधी परिस्थितियाँ उसके अपनी धुरी पर घूमने के कारण बन पड़ती हैं। ऋतुओं का परिवर्तन कोई देव दानव नहीं करता वरन् उसकी परिक्रमा परिधि ही इसके लिए जिम्मेदार है। दिन और रात जैसे आश्चर्यजनक परिवर्तन और ऋतुओं का अद्भुत हेरफेर करते रहने का कोई और जिम्मेदार नहीं। धरती की अपनी ही दौड़धूप इस विचित्र लगने वाले संयोग को बनाती बुलाती और भगाती रहती है। ठीक सही बात मनुष्य की अपनी परिस्थितियों के सम्बन्ध में भी कही जा सकती है। उसके लिए व्यक्ति की मनःस्थिति ही पूरी तरह जिम्मेदार है। यदि ऐसा न होता तो प्रायः एक जैसा खान, पान, शयन, जागरण की रीति नीति का निर्वाह करने वाले लोग एक जैसी परिस्थितियों में रहते पाए जाते। असाधारण भिन्नताओं का कारण अप्रत्याशित परिस्थितियों में नहीं खोजना चाहिए, वरन् यह देखना चाहिए अपने आपने कहीं चुंबक की तरह सजातीय धातु कणों को खींच बढ़ाकर इकट्ठा तो नहीं कर लिया है? इस तरह की ढूँढ़ खोज आरम्भ हो जाना ही आध्यात्म के स्वर्ग सोपान में प्रवेश करना है। इसके अभाव में प्रतिकूलताओं के सारे दोष किन्हीं ज्ञात या अविज्ञातों पर थोपने को मन चलता रहेगा। इस प्रयास में कदाचित ही किसी को कोई उपयोगी मिली हो। तानाशाह ही अपने हर प्रतिपक्षी का देखते देखते सिर कलम करा दिया करते थे। पर अब वह जमाना नहीं रहा। कानून भी आड़े आता है और समाज में उभरी चेतना भी वैसी मनमानी बरतने की छूट नहीं देती। अन्तःकरण भी अब अपेक्षाकृत अधिक बलिष्ठ हो गया है। इस कारण अनौचित्य बरतने वाले के मित्र भी शत्रु बन जाते हैं। कम से कम असहयोग करने और मतभेद जताने का साहस तो दर्शाने ही लगते हैं।

किसी जमाने में शत्रुओं से अपने को घिरे हुए समझे जाने का मानस था और सारा चिन्तन प्रायः इसी में लगा रहता था कि विरोधियों का सफाया करते न बन पड़े तो कम से कम उन्हें नीचा तो दिखा ही दिया जाय। सामर्थ्य का अधिकाँश भाग इसी उधेड़बुन और उठक पटक में लग जाता था। पर वैसी बात नहीं रही। प्राथमिकता इसको मिलने लगी है कि अपने उत्कर्ष, अभ्युदय, सुधार परिष्कार के निमित्त क्या किया जाय? ताकि योग्यता की, पात्रता की अभिवृद्धि के साथ अधिक अनुकूलता अर्जित करने, अधिक तेजी से प्रगति पथ पर बढ़ चलने का अवसर मिले। यही बुद्धिमत्तापूर्ण भी है। किसी रेखा को छोटी करना है तो उसे काटे बिना ही वह काम अधिक सरलता के साथ हो सकता है। इसी के बराबर बड़ी लम्बाई की लकीर खींच दी जाय। दोनों की तुलना करने वाले सहज ही बता देंगे कि छोटी कौन−सी है। दूसरों को गिराकर प्रतिशोध लेने की अपेक्षा यह कहीं अच्छा है कि यह सोचा जाय कि अपना अभ्युदय किस प्रकार संभव हो सकता है? इस गौरवपूर्ण प्रयास में किस प्रकार सफल हुआ जा सकता है यह ढूँढ़ लेना और पा लेना भी संभव है साथ ही सरल भी। उपाय सीधा साफ-सा है और व्यवहार में बिना किसी अतिरिक्त प्रयास का भी। उसे अपनाने के लिए दूसरों की किसी बड़ी सहायता की भी आवश्यकता नहीं है। होना इतना भर चाहिए कि अन्तराल में ऐसी हुक भर उठने लगे कि हमें सही दिशा में ऊर्जा उठना है। इस संकल्प शक्ति के उभरते ही उस मार्ग पर चलने का साहस मिलता है जो यदि पानी के बबूले की तरह की तरह क्षण भंगुर न हो और बीज की तरह उपजाऊ भूमि में जड़े जमाले तो समझना चाहिए कि तिल से ताड़ और राई से पहाड़ बनने की सम्भावना बन गई।

मनुष्य शरीर का बाह्य कलेवर कितना ही बढ़ा बुद्धिमान और सम्भावनाओं से भरा क्यों न दीख पड़े, पर वस्तुतः उसकी समस्त गतिविधियाँ प्राण चेतना पर अवलम्बित हैं। यदि वह विलग हो जाय तो अच्छी भली दीखने वाली काया अस्पृश्य बन जाती है। उसे जल्दी से जल्दी ठिकाने लगा देने की उतावली काम करने लगती है। इस प्राण का अपना सुविस्तृत तत्वदर्शन है। उसे समझने का सुविधान है तो भी इतना तो समझ लेना चाहिए कि संकल्प ही उत्कर्ष का मूल मंत्र है। इसकी शक्ति के सहारे जब आततायी तक अपनी करामात कुछ क्षण के लिए दिखा देते हैं तो कोई कारण नहीं कि सत्य प्रयोजन के लिए सन्मार्ग पर चलने का निश्चय कर लेने पर उस दिशा में बढ़ चलने का सुयोग संयोग न मिले। उत्कृष्ट आदर्शवादिता एक ऐसी सच्चाई है जिससे हजार हाथी की बराबर बल होता है। उद्देश्यपूर्ण संकल्पों के सफल होने की संभावना इसलिए भी अधिक रहती है कि उनके पीछे दैवी सहयोग का सुनिश्चित तारतम्य जुड़ा होता है।


विश्व की सबसे बड़ी शक्ति प्रतिभा

संसार के सुविस्तृत इतिहास का भूतकालीन पर्यवेक्षण करने पर इसी एक निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि लालसा, वासना और आकाँक्षाओं से पीड़ित तो अनेकानेक रहते चले आये, पर उनमें से सफल थोड़े से ही हुए। कारण कि मूल्य चुकाने के लिए जेब में कुछ न होने के कारण उस सजीधजी दुकान को देखते हुए भी निराश होकर उन्हें वापस लौटना पड़ा। इस हाट में बिकता तो एक-से-एक बड़ा आकर्षण है, पर सभी तो बदले की नीति चाहते हैं। यदि वह अपने पास न हो तो फिर मृगतृष्णा में भटकने पर थकने और निराश भरे निःश्वास छोड़ते रहने के अतिरिक्त और क्या कुछ हाथ लगने वाला है? दूसरी ओर वे हैं, जो लाखों का माल-असवाव कुछ ही देर में खरीद-बेच कर मुनाफे से थैली भर लाते हैं।

संसार में निर्माण एक-से-एक बढ़ कर हुए। पनामा और स्वेज की नहरें, पीसा की हिलती मीनार, चीन की दीवार, अंगकोरवाट के खण्डहर, मिश्र के पिरामिड, आगरा का ताजमहल, हावडा, का पुल जैसे महान निर्माणों को देख कर लोग आश्चर्य तो बहुत करते हैं, पर यह भूल जाते हैं कि इन्हीं साधनों का ढेर भर बनाकर पीछा नहीं छुटेगा। देखना यह भी होगा कि इनके पीछे कितनों की कल्पना ने योजना बन कर प्रत्यक्ष ढाँचा खड़ा करने में कितनी कुशलता और एकाग्रता निभाई है। सार-संक्षेप में, मनुष्य का वर्चस्व जो जहाँ भी चमकता है, वहाँ आकाश की बिजली की तरह कड़कता और अपनी क्षमता से अवगत भी करता हैं।

डार्विन के कथनानुसार औसत आदमी को बन्दर की औलाद या वनमानुष मानने में कोई आपत्ति न होनी चाहिए। प्राणि विकास के विज्ञानी एक ही बात कहते हैं कि सृष्टि के आदि में मात्र अमीबा स्तर के एककोशीय प्राणि उत्पन्न हुए, पर उनमें प्रचण्ड इच्छाशक्ति विद्यमान थी, वही हलचल बनी और मनोबल युक्त क्रियाकलाप के बल पर उचित स्तर के काय-कलेवर बनते चले गये। अंग प्रत्यंग बने, स्वभाव अभ्यास बनें, और उन्हें अपने-अपने निर्वाह साधना जुटाने के अवसर मिलते चले गये। वे यह भी कहते हैं कि जड़ माने जाने वाले पदार्थों पर भी प्राणि समुदाय की प्रचण्ड इच्छाशक्ति काम करती है और प्रतिकूलताओं के बीच भी अनुकूलता उत्पन्न कर लेती है। समुद्र की गहराई में उगे उद्यान और पर्वत शिखरों पर दौड़ते पाषाण-कच्छप, यह बताते हैं कि अस्तित्व में कितने आश्चर्य जनक परिवर्तन हो सकते हैं। इसे सम्पन्न करने में एक ही शक्ति विभिन्न प्रकार से अपने रूप दिखाती और चमत्कार उत्पन्न करती है।

लोगों को पैसे का, रूप का, सौंदर्य का, शिक्षा का, पद का, सम्पन्नता-सहयोग का मूल्य तो मालूम है और उनके लिए ललचाते हुए सिर पर पैर रखकर दौड़ने जैसी भागदौड़ भी मचाते हैं, पर कहने लायक उपलब्धि उन्हीं के हाथ आती है, जो अपने को अर्धमूर्छित, अर्धमृतक, आलसी, प्रमादी, निराश-हताश स्तर की कीचड़ में फँसे रहने से इन्कार कर देते हैं। भीतर से उभरी शक्ति बाहर के हर क्षेत्र में अपने वर्चस्व का प्रमाण-परिचय पग-पग पर प्रस्तुत करती है। सभी प्रजातियाँ सभी संरचनाएँ यह प्रमाण परिचय देती हैं कि वे अपने संकल्प बल से उभरीं और वर्तमान सामुदायिक रूप धारण करने में समर्थ हुई हैं। उसने अपने निर्वाह साधन इसी आधार पर जुटाये हैं और प्रकृति की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए किसी अज्ञात प्रेरणा से बाधित होकर अपने आपको ढाला है। यह संकल्प शक्ति ही हैं, जो प्राणियों और पदार्थों में विद्यमान रह कर अपनी अद्भुत शक्ति का परिचय देती है। प्राणियों में मनुष्य सचमुच महान है। सृष्टि को ईश्वर की संरचना माना जाता है, पर ईश्वर को वर्तमान स्वरूप में किसने गढ़ा, इसका उत्तर खोजने समय इसी निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि उसे मनुष्य ने बनाया, अन्यथा अन्य जीवधारी क्यों उसकी सत्ता-सहायता को मान्यता दे देते?

इतिहास साक्षी है कि जब-जब जिन वर्गों ने जिस क्षेत्र में पराक्रम सँजोया है, उसने उसी क्षेत्र में आशातीत सफलताएँ पाई हैं।-अग्नि प्रज्वलन से लेकर पहिये के आविष्कार तक इसका परिचय मिलता है, जिसने अनेकानेक साधनों, नमूनों, उदाहरणों को जन्म दिया व आज की प्रगति की रूपरेखा बनाई। कभी उसने कृषि, पशुपालन, वस्त्र निर्माण भवन निर्माण, व्यवसाय आदि के सहारे प्रगति के नये आयाम खोले होंगे। भाषा और लिपि का आविष्कार अपने समय में अति क्रान्तिकारी माध्यम माना गया होगा। धर्म, समाज और शासन के गठन में उन लोगों की यही भारी सफलता थी, उनकी जो वनवासी की तरह यायावर जीवन बिताते आदि काल की उपहासास्पद स्थिति में रहते थे? वैज्ञानिक आविष्कारों से सुसज्जित दुनिया जब गढ़ी जाने लगी, तब तो मानों प्रकृति पर विजय पाने का नगाड़ा ही बजने लगा। अब तो उन अणु आयुधों के जखीरे भी जमा हो गये हैं कि सृष्टा की इस सुन्दर संरचना धरती को देखते-देखते धूलि बना कर अंतरिक्ष में उड़ा दिया जाय। इस प्रकार मनुष्य ईश्वर का समर्थ सहायक भी सिद्ध होता है और दुर्धर्ष प्रतिद्वंद्वी भी। यह चेतना के नाम से जाने जाने वाली सत्ता वस्तुतः किसी प्रचण्ड संकल्प शक्ति की वशवर्ती है और इसी के इशारे पर कठपुतली की तरह नाचती रहती है। इसी की न्यूनाधिकता से मनुष्य क्षुद्र और महान बनता है। उसके उच्चस्तरीय होने पर देव और निकृष्टता अपनाने पर दैत्य का उद्भव होता है। देवी शक्तियों से सम्पन्न ही सिद्धपुरुष या देवमानव कहलाता है। वस्तुतः मनुष्य एक भटका हुआ देवता है। यदि उसे भ्रम जंजालों में न भटकना पड़े तो निस्संदेह किसी भी लक्ष्य को शब्दबेधी बाण की तरह वेध सकता है। जो कुछ भी यहाँ आश्चर्यजनक देखा, सुना जाता है, उसका उद्गम मनुष्य का संकल्प ही है। जिसे दूसरे शब्दों में प्राण या प्राणाग्नि भी कहा जा सकता है। जिसने उसे जिस अनुपात से जिस क्षेत्र में अर्जित कर लिया, समझना चाहिए कि उस स्तर तक कृतकृत्य हो गया।

बुद्धिमत्ता, प्रतिभा, व्यवस्था, संरचना, परिवर्तन आदि के अनेक प्रयोग जहाँ तहाँ होते रहते हैं और उनके प्रयोक्ता महाबली कहलाते हैं। पर यह भुला नहीं दिया जाना चाहिए कि समस्त कला-कौशलों, निर्माणों और सफलताओं की जन्मदात्री वह संकल्प शक्ति रूप प्राणाग्नि ही है जो चिनगारी से बढ़ते-बढ़ते दावानल का रूप धारण करती देखी जाती है। उत्थान और पतन उसी के दो चित्र विचित्र खिलौने है।

जिन दिनों इंग्लैण्ड पर जर्मनी द्वारा दिन रात भयंकर वर्षा अणुबम के रूप में हो रही थी तब सर्व साधारण को यही सोचते-कहते देखा जाता था कि इंग्लैण्ड का पतन अब हुआ, तब हुआ। इन घोर निराशा के दिनों में भी उस देश के प्रधानमंत्री चर्चित ने यही कहा कि इंग्लैण्ड हार नहीं सकता। यह आज नहीं तो कल जीतकर रहेगा। उनने एक नये उद्घोष के रूप में ‘बी’ शब्द घर-घर और हर सामान पर अंकित कराने के निर्देश दिये जिसका अर्थ होता था-विजय। ‘बी’ फार विक्ट्री।

जब द्वितीय महायुद्ध के समय विनाश के घटाटोप छाये हुए थे और मित्र देशों की हार अत्यंत निकट थी। तब सायप्रस द्वीप (माल्आ) में स्टालिन रूजवेल्ट एक जलयान पर गुप्त योजना बनाने निकले। दोनों साथी पराजय का दबाव हलका करने वाली योजनाएँ बना रहे थे। चर्चित अकेले ही असहमत थे। उनने कहा-आपके देशों का जो भी हो पर हमारा इंग्लैण्ड तो जीत कर ही रहेगा। इतने प्रगाढ़ आत्म विश्वास को देख कर दोनों साथी दंग रह गये और फिर अन्तिम पराजय से निबटने के स्थान पर विजय के उपरान्त उठाये जाने वाले कदमों का निर्णय करके लौटें। पावसी पर उनने ऐसी योजना कार्यान्वित की कि देखते-देखते पासा पलट गया और मित्र राष्ट्र विजयी होकर रहे।

स्मृति की तरह विस्मृति भी मनुष्य के स्वभाव में सम्मिलित है। पर उस दुर्गुण के इस सीमा तक पहुँच जाने को क्या कहा जाय? उससे क्या अपने-अपने आत्म गौरव को, ओजस् तेजस् बर्धस् को ही भुला दिया जाय? आज कुछ ऐसा ही सम्मोहन-व्यामोह किसी शैतान द्वारा बिखेरा दीखता है, जिससे हतप्रभ होकर हम अपने को दीन-दुर्बल, अशक्त, असहाय, अभागे आदि समझने लगे हैं। यदि उन्हें अपनी जीवट पर विश्वास हुआ होता तो कठिन से कठिन विघ्न-बाधाओं को चुनौती देते हुए अब तक न जाने कहाँ से कहाँ पहुँचे होते।

कुछ समय पहले की ही खबर है। साइबेरिया के हिम प्रदेश में बन्दी बनाये गये कुछ कैदी उस दुर्गम क्षेत्र से भाग निकले। प्रायः चार हजार मील के अति दुर्गम, आहार सामग्री से रहित क्षेत्र को पार करते हुए किसी प्रकार भारत आ पहुँचे। इसके बाद उन्हें उनके देश पोलैण्ड सम्मान सहित पहुँचाया गया। वह असाधारण स्थिति का असामान्य पराक्रम है।

अनगिनत आन्दोलनों के योजनाकार अपनी लगन को साकार-बना कर रहे है। इसके पीछे सुयोग और सहयोग का भी एक भाग हो सकता है पर प्रधानता उस प्रचंड आत्म विश्वास की ही रही है। प्रगति का ढाँचा उसी पर खड़ा होता है। साधन अनायास नहीं जुट जाते उनके लिए अपने आपको इतना प्रामाणिक और प्रखर सिद्ध करना होता हे कि स्वेच्छा सहयोग बरसने में कहीं कोई कमी न रहे।

आत्म विस्मृति के दल-दल में से उबार कर मनुष्य समुदाय के एक वर्ग को इन्हीं दिनों प्रबल प्रतिभा का धनी बनाना है। इस प्रयास को सर्वोच्च प्राथमिकता मिलनी है। कारण कि अत्यधिक महत्वपूर्ण इन्हीं दिनों किये जाने के लिए किन्हीं समर्थों की प्रतीक्षा परोक्ष चेतना कर रहीं है। मनुष्य स्वभाव में प्रचलन में, समर्थता के क्षेत्र में इतनी अधिक अवांछनियताएं एकत्रित हो गई है। उस नरक जैसे दुर्गन्धित कचरे को हटाने के लिए ऐसी जुझारू प्रवृत्ति चाहिए जो तूफान बन कर बरसे और जो हटाया मिटाया जाना ही है, उसे स्थानान्तरित करके ही रहे। यह कार्य विकसित प्रतिभाएँ ही कर सकती हैं।

सृजन इतना, इस स्तर का होना है, मानों खण्डहरों को बटोर कर उस स्थान पर नये सिरे से भव्य भवन खड़े किये जा रहे हों। इसके लिए बादलों जैसे सशक्त समुदाय की आवश्यकता है। जो तपते धरातल को अपनी वर्षा से जलमग्न कर दें। धरित्री पर हरी घास उगा कर उसे मखमली हरीतिमा से महिमा मंडित कर दें।

सैन्य, शिक्षण, व्यवसाय-विद्यालयों व्यायामशालाओं, विद्यालयों, कलाकेन्द्रों की कमी नहीं। पर दुर्भाग्य इसी एक बात का है कि प्रतिभा परिष्कार की साँगोपाँग व्यवस्था कहीं पर नहीं है। कठिनाई इस मार्ग में कहीं अधिक है कि प्राण चेतना अन्तःकरण में अन्तराल में से उभरती है किन्तु उस गहन गह्वर तक पहुँचने, कुरेदने, उभारने वाले उपकरणों का एक प्रकार से सर्वथा अभाव ही हो गया। इसी कमी के रहते अन्य किसी क्षेत्र का विकास भले ही हो जाय, पर प्रचण्ड प्रतिभा सम्पन्न ऐसे व्यक्तित्वों का दर्शन हो नहीं सकेगा, जो नवयुग की महती आवश्यकताओं को देखते हुए ध्वंस से जूझने और सृजन को साकार बनाने में अपनी अतिरिक्त जीवट का परिचय दे सकें।


प्रतिभा बनाम तेजस्विता बनाम तपश्चर्या

दुर्भाग्यों में बुरे किस्म का अनिष्ट है-”भटकाव”। रास्ता भूलकर बनजारा कहीं से कहीं जा पहुँचता है रात भर चलता है थकान सहता है .... चलता है कि दिशा भूल जाने की भारी गलती हुई। वापस लौटना पड़ेगा और वहीं वापस जाना पड़ेगा जहाँ से कि चलना आरंभ किया था। यदि वह भूल न की गयी होती तो गलत दिशा में चलने और फिर लम्बी परिक्रमा लगाने का दुहरा घाटा न उठाना पड़ता। जितनी देर तक भटकाव में शक्ति का अपव्यय हुआ, उतनी देर में अभीष्ट मार्ग पर बहुत दूर तक चलकर लगभग मंजिल तक पहुँचना संभव हुआ होता। पर उस भटकाव को क्या कहा जाय जिसे पहले से ही बुद्धिमानीजन बुरे किस्म का दुर्भाग्य कह गये हैं। मृगतृष्णा का इसी प्रसंग में उल्लेख होता है। प्यासा हिरन चमकीली बालू को जल सरोवर समझ कर उस और दौड़ लगाता रहता है और उस कभी प्राप्त न होने वाले लक्ष्य तक पहुँचने से पहले ही प्यास दम तोड़ देता है। कस्तूरी की गंध को पाने के लिए आकुल व्याकुल हिरन भी सभी दिशाओं में दौड़ लगाता है पर वह मिले कहाँ? वह तो उसकी अपनी नाभि में विद्यमान है, जबकि समझा यह जा रहा है कि वह कही बाहर है। ऐसी दशा में अभीष्ट की उपलब्धि कैसे हो? भेड़ के झुँड में पले हुए सिंह शावक की कहानी भी ऐसी ही है। जब तक वस्तुस्थिति समझ में न आई तब तक उसी झुँड में रमकर दिन बिताता रहा और घास खाकर जीता रहा। परिस्थिति तो तब बदली जब उसने परछाई में अपना वास्तविक स्वरूप देखा और अपने स्तर से अवगत होकर अपना रवैया बदला। मनुष्य के संबंध में भी ऐसा ही कुछ कहा जाना अत्युक्ति न होगी। आत्म विस्मृति का घटाटोप हम सब पर छाया रहता है।

यह पृथ्वी अनादि काल से ऊबड़-खाबड़ खाई खड्डों से भरी हुई अनगढ़ जीव−जंतुओं की क्रीड़ास्थली रही होगी। उसे आज की स्थिति में लाने और “स्वर्गादपि गरीयसी” बनाने में मनुष्य की कलाकारिता की ही प्रधान भूमिका रही है। वन मानुष या नर वानर के आदिम स्थिति से ऊँचा उठकर उसने अपने को क्या से क्या बना लिया इसे देखकर हैरत में रह जाना पड़ता है। प्रकृति की रहस्यमयी शक्तियाँ कभी अविकसित रही होगी पर आज तो उसने परमाणु में विद्यमान शक्ति स्रोतों को हस्तगत कर लेने से लेकर अन्तरिक्ष पर साम्राज्य स्थापित करने की ठान ठानी है। दर्प इतना सँजोया है कि अणु आयुधों के प्रहार से इस धरती को धूलि बनाकर अन्तरिक्ष में उड़ा देने तक की दबंग चुनौती उसने दी है। इस वर्ष के पीछे तथ्य भी है। मनुष्य सचमुच वही है, जो कुछ इस ब्रह्माण्ड में महान से महानतम हो सकता है।

आश्चर्य इस बात का है कि उसे भटकाव ने इस बुरी तरह जकड़ा कि अपने अस्तित्व, महत्व और स्तर के संबंध में इतना अधिक दिग्भ्रांत हो गया है कि उसे भटकाव की चरम सीमा कहा जा सकता है।

भटकाव का पहला सोपान वहाँ से आरंभ होता है जहाँ मनुष्य अपनी सत्ता महिमा, गरिमा और क्षमता के संबंध में लगभग पूरी तरह विस्मृति की खुमारी में चला जाता है। और अपनी आकृति प्रकृति की भिन्नता को तो देखता है, पर यह नहीं सोच पाता कि वह पशु स्तर के प्राणियों से चेतना के क्षेत्र में कुछ विशिष्ट है। प्राणी पेट भरने और प्रजनन के कौतुक का रसास्वादन करने के लिए जीवित रहते हैं। उन्हें न मर्यादाओं के प्रति श्रद्धा होती है और न वर्जनाओं से बचने की आस्था। बंधनों, प्रताड़नाओं और अवरोधों से बाधित होकर ही वे अनुचित को अपनाने से रुक पाते हैं। स्वच्छन्दता और क्षमता रहने की स्थिति में उन्हें मर्यादा पालन में कोई उत्साह नहीं रहता। आवश्यकता और मनमर्जी ही उनकी प्रेरणा के स्रोत होते हैं। मनुष्य की भावना और धारणा भी ऐसी ही हो तो उसे नर पशु से अधिक और कुछ नहीं कहा जा सकता। जिनने लोभ, मोह और अहंकार की लिप्सा लालसा को ही अपना लक्ष्य मान लिया है, वे उचित अनुचित का कोई अन्तर किस प्रकार कर पायेंगे? संकीर्ण स्वार्थपरता से, भवबंधनों से छुटकारा पा सकना उससे कैसे बन पड़ेगा? जिन्हें सम्पन्नता की तृष्णा और बड़े कहलाने की महत्वाकांक्षायें जकड़े रहती हैं उनके लिए विचारशीलता के स्वच्छन्द-आकाश में पंख फड़फड़ाना कैसे संभव हो? आम आदमी साधनों और क्षमताओं की दृष्टि से वैसा ही क्यों न दीख पड़े, पर उसे आदर्शों की उमंगे प्रभावित ही नहीं करतीं। उत्कृष्टता की गरिमा अपनाने के लिए उमंगें ही नहीं उठती। पुण्य और परमार्थ का प्रसंग तो एक प्रकार से छूट ही जाता है, जिसके लिए स्रष्टा ने मानवी उत्कृष्टता का लगभग देवोपम स्तर का सृजन विशेष रूप से किया है। उसे पूरी तरह छूट जाने के उपरान्त व्यक्ति क्षुद्र कृमि कीटकों की गई-गुजरी श्रेणी में ही गिने जाने योग्य रह जाता है। भले ही वह परोपकारी, पदवीधारी, सम्पन्न, कुशल एवं विभूतिवान ही क्यों न समझा जाता हो?

धर्मचर्चा तो कई लोग करते और सुनते रहते हैं, पर होता वह सब कुछ खोखला ही है। लोग पूजा-पाठ के कर्मकाण्डों, तीर्थ पर्यटनों, दान प्रदर्शनों जैसी विडम्बनाओं से मन बहलाते और अपने को धर्मध्वजी मानते देखे गये हैं पर बात वस्तुतः वैसी है नहीं। कर्मकाण्डों का एक मात्र मन्तव्य यह है कि चिन्तन चरित्र और व्यवहार में अधिकाधिक शालीनता का समावेश करे। जिन्हें धर्म में वस्तुतः कुछ रुचि है उन्हें देवोपम स्तर का जीवन यापन करते देखा जाना चाहिए। उनका अंतरंग और बहिरंग दोनों ही प्रमाणिकता एवं प्रखरता से भरे होने चाहिए। अनौचित्य को अपना कर भी लोग सुविधाओं का संग्रह और चारण चाटुकारों के माध्यम से मिल सकने वाली प्रशंसा बटोर लेते हैं, पर उनमें न तो गहराई होती है और न स्थिरता। धुएँ में बने बादल कितने ही घने क्यों न हों, हवा के एक झोंके से जिधर तिधर बिखर जाते हैं। छलावा पानी के बबूले की तरह कुछ ही क्षण में अपना अस्तित्व गँवा बैठता है।

प्रतिभा के विपुल भण्डार मनुष्य की अन्तःसत्ता में भरे पड़े हैं, पर उन्हें उभरने प्रकट होने का अवसर उन दबावों के कारण आने ही नहीं पाता, जो कषाय−कल्मषों के रूप में आत्मसत्ता के ऊपर स्वेच्छापूर्वक लाद लिये गये हैं। लकड़ी को पानी पर तैरते रहना चाहिए पर यदि उस पर भारी चट्टानें बाँध दी जायँ तो अपना स्वाभाविक गुण तैरना भी दबकर रह जाता है। विभूतिवान होते हुए भी मनुष्य निकृष्टता की चट्टान सिर पर लाद लेने के उपरान्त तैरने और अपना वास्तविक स्वरूप दिखा पाने की स्थिति में रह ही नहीं जाता।

प्रसुप्त प्रतिभा को जगापाने का अवसर मिले, इसके लिए आवश्यक है कि भ्रष्ट चिन्तन से अन्तराल को और दुष्ट आचरण से कायकलेवर को बचाये रहने का प्रयत्न किया जाय। यह तभी बन पड़ेगा जब अवाँछनीय महत्वाकाँक्षाओं की हथकड़ी बेड़ी से हाथ पैर खुल रहें। लोगों की उत्सुकता और उत्कंठा धनवान बनने में रहती है ताकि विलासिता के विपुल साधन जुटाये जा सकें। साथ ही अभावग्रस्तों की बिरादरी से अपने को बढ़ा-चढ़ा सिद्ध करने की मूंछें मरोड़ी जा सकें। इतनी छोटी सीमा में जिनका अन्तराल केन्द्रीभूत होकर रह गया है, वे महान कार्यों के प्रति उन्मुख हो ही, नहीं सकते, जो मानवी गरिमा चार चाँद लगाते हों। खूँटे से बँधी हुए नाव चप्पू चलाते रहने पर भी आगे कहाँ बढ़ पाती है? संकीर्ण स्वार्थपरता से ग्रसित व्यक्ति न तो आदर्शवादिता अपना सकता है और न ऐसा कुछ कर सकता है जिसे उत्कृष्ट कहा जा सके। सज्जा को विडम्बना कहें तो कुरूप और रुग्ण वैश्याएँ भी अपने को परी जैसी सुन्दर दिखाने की विडम्बना रचती है।

प्रतिभा कही बाहर से बटोरनी नहीं पड़ती उसे सदैव भीतर से ही उभारा गया है। इसके लिए उन आवरणों को हटाना अनिवार्य है, जो भारी चट्टान की तरह उत्कृष्टता के मार्ग में भयानक अवरोध बनकर अड़े होते है। इस संदर्भ में स्मरण रखने योग्य तथ्य यही है कि औसत नागरिक स्तर का निर्वाह अंगीकार किया जाय अन्यथा तृष्णा और वासना की लिप्सा इतनी सघनता के साथ छायी रहेगी कि अपनी सामर्थ्य की तुलना में अकिंचन औसत पुरुषार्थ भी करते न बन सकेगा। यह खाइयाँ इतनी चौड़ी और इतनी गहरी हैं कि छोटे से जीवन का समूचा समय, श्रम, कौशल खपा देने पर भी उन्हें भरा नहीं जा सकता। फिर वह बन ही कैसे पड़ें, जो उत्कृष्टता के साथ अति सघनतापूर्वक जुड़े हुए प्रतिभा परिष्कार का पुण्य प्रयोजन सन्तोष जनक मात्रा में उपलब्ध कर सके।

लालसा जन्य भौतिक महत्वाकांक्षाओं में कटौती किये बिना किसी के पास भी इतना समय,श्रम, साधन बच नहीं सकता जिसके सहारे से आत्मकल्याण और लोककल्याण की दिशा में कुछ कहने लायक कदम उठ सकें। साधु और ब्राह्मणों को भूसुर की-पृथ्वी के देवता की उपमा दी जाती रही है। वह इसलिए कि उनने संयम, अपरिग्रह, सन्तोष की राह अपनायी। अपने निजी बड़प्पन में जिसकी जितनी अभिरुचि होगी, वह उतना ही अपने को व्यस्त और अभावग्रस्त अनुभव करेगा। सदा यही कहता रहेगा कि अपनी समस्याओं से ही घिरा हुआ हूँ। जब कि वास्तविक समस्याएँ मनुष्य के सामने होती ही कितनी हैं? फिर यदि उन्हें व्यावहारिक बुद्धि द्वारा समझदारी के साथ सुलझाया जाय तो सब कुछ इतनी सरलता पूर्वक निबट जाता है, मानो इनका अस्तित्व था ही नहीं,। भ्रान्तियों के कारण वे गढ़ी भर गयीं थीं।

संयम नियम के कितने ही अनुबन्ध हैं। जिसमें आहार विहार की शुद्धि सज्जनता, सद्भावना श्रमशीलता, मितव्ययता, स्वच्छता, सहकारिता, अनुशासन प्रियता आदि प्रमुख हैं। यह सब देखने सुनने में बहुत ही नगण्य सा लगता हे। पर वस्तुतः है संकीर्ण स्वार्थपरता और स्वेच्छाचार की पैदा की हुई औलाद ही। इनमें से एक एक को गिनना और रोकथाम करना मेंढक तौलने के समान है। बिस्तर को धूप में डाल देने के उपरान्त खटमल और उनके अण्डे-बच्चे सभी मर जाते हैं। इसी प्रकार दृष्टिकोण को उदात्त बना लेने के उपरान्त अपना स्वरूप, लक्ष्य और कर्तव्य तीनों ही सूझ पड़ते हैं। उस प्रकाश के जलते ही उन डरावने भूत-पलीतों से छुटकारा मिल जाता है जो अँधेरे के कारण डरावने बन कर डराते और त्रास देते थे। दृष्टिकोण में विशालता का समावेश होते ही परमार्थ ही परमस्वार्थ है। इसके बराबर लाभ और किसी व्यवसाय में नहीं, इस तथ्य को इतिहास प्रसिद्ध सभी महामानवों से लेकर सामयिक श्रद्धा-भाजन व्यक्तियों के ऊपर बरसती हुई सद्भावना को देखकर सहज अनुमान लगाया जा सकता है कि व्यक्तिगत लाभ की बात सोचने वाले भी यदि दूरदर्शी हों तो उन्हें परमार्थ प्रयोजनों में अपना समस्त लगाने के उपरान्त बदले में कई गुना अधिक मिलता है। एक बीज बोया जाता है, पर हजार गुना होकर लौटता है। यही नीति महामानवों की रहती है। वे समाज के खेत में पुण्य परमार्थ के बीज बखेर देते हैं और उस फसल को अपने लिए ही नहीं, समाज के लिए भी काटते व विश्व वसुधा को लाभान्वित करते हैं। यही प्रतिभा का चिन्ह है।

प्रतिभा, तेजस्विता को कहते हैं। यह चेहरे की चमक या चतुरता नहीं वरन् मनोबल पर आधारित ऊर्जा है। गान्धीजी 16 पौण्ड वजन और 5 फुट दो इंच के थे। रंग काले और कुरूप भी। पर उनका तेजस् ऐसा था कि जन साधारण से लेकर देश के वरिष्ठ मूर्धन्यों को उनका आदेश शिरोधार्य करते देखा जाता था। वहाँ तक कि विशाल साम्राज्य के अधिपति अँग्रेज भी उनकी हुंकार से प्रभावित होकर बिस्तर गोल करके चले ही गये। यह तेजस् निजी और सामूहिक जीवन के हर पक्ष को जगमगाता है। उसे प्रखरता भरी ऊर्जा से जाज्वल्यमान बना दिया है।

तेजस्विता तपश्चर्या की उपलब्धि है, जो निजी जीवन में संयम साधना और सामाजिक जीवन में परमार्थ परायणता के फलस्वरूप उद्भूत होती है। संयम-अर्थात् अनुशासन का, नीति मर्यादाओं का कठोरतापूर्वक परिपालन। इसके लिए मनुष्य को तृष्णा, वासना और अहंता के त्रिविधि नागपाशों से छूटना पड़ता है। “सादा जीवन-उच्च विचार” का ब्राह्मणोचित, औसत नागरिक स्तर का जीवन यापन करना पड़ता है। जो इतना कर सके, उसी से परमार्थ सधता है और योगियों में पाई जाने वाली सिद्धियों, शक्तियों, और विभूतियों का अन्तराल में उद्भव और अखिल अन्तरिक्ष से अभिवर्धन होता है। अनुग्रह या वरदान भी इसी को कहते हैं।

कर्मकाण्ड परक इसके साधना विधान अनेक हैं। पर सर्वसुलभ प्रक्रिया यही है कि निजी जीवन इतना हलका-फुलका रखा जाय कि उसका निर्वाह न्यूनतम श्रम और समय में ही संभव होता रहे। इसके उपरान्त ही श्रम, समय और साधन इतनी मात्रा में बच पाते हैं कि उनके आधार पर परमार्थ में निरत रहकर ब्रह्म के साथ आत्मसात् होने का रसास्वादन किया जा सके। देवोपम जीवन जीने का आनन्द लाभ उठाया जा सके।

किस प्रयोजन के लिए किस अवसर पर, किस प्रकार क्या संयम बरता जाय, यह व्यक्ति विशेष की परिस्थिति और मनःस्थिति को देखते हुए निर्णय निर्धारण करना पड़ता है। जिसके जीवन का जो पक्ष उद्धत हो चला हो, उसे सरकस के जानवरों की तरह बल चातुर्य प्रयोग करते हुए कला कौशल दिखा सकने के लिए प्रशिक्षित करना पड़ता है। शरीर और मन दोनों को ही शालीनता अपनाये रहने के लिए अभ्यस्त करना पड़ता है। संयम योग यही है। जो इतना कर सका वही पुण्य परमार्थ अर्जित करने का भी अधिकारी है। उद्धत आचरण वाला व्यक्ति कीचड़ से कीचड़ धोने के प्रयत्न से क्या कुछ सफलता प्राप्त कर सकेगा? शालीनता और परमार्थ परायणता मिल कर ही तपश्कर्ता बनते हैं और उन्हीं के आधार पर प्रतिभा की ऊर्जा अपनी प्रचण्डता का परिचय देती है।

इतिहास साक्षी है कि सफलताएँ उन्हीं को हस्तगत हुई जिनने निजी जीवन में कठोरता अपनायी, स्वयं पर कड़ा अंकुश लगाकर आत्मानुशासन का अभ्यास किया एवं फिर अपनी बचायी हुई ऊर्जा को सुनियोजित किया। जो प्रतिभाशाली होते हुए भी जीवन सम्पदा को कौड़ी के मोल गँवाते रहे; उनके बारे में इतिहास में यही लिखा पाया जाता है कि सब कुछ होते हुए भी यह व्यक्ति सफलता के शिखर तक नहीं पहुंच पाया, नहीं किसी को कुछ मार्ग दर्शन दे पाने में सक्षम हुआ। ऐसों को अभागा कहकर संबोधित किया जाता रहा हैं व मात्र कौतुक के लिए उनके वृत्तान्त पढ़े जाते हैं। यदि अनुकरणीय, अभिनन्दनीय बनना है तो मार्ग एक ही है-तपश्चर्या से स्वयं को अनुशासित कर ऊर्ध्वगामी बनाना, व्यवहार में सज्जनता-शालीनता को समन्वित करना एवं उदारता को अपनाते हुए बाँटने में संतोष अनुभव करना। शताब्दियों से जनमनीषा ऐसे ही युग नेतृत्व करने वालों के सम्मुख अपना सिर झुकाती आयी है। आज इन्हीं प्रतिभावानों का उद्भव होना है। इन्हीं से युग परिवर्तन की भूमिका बनेगी।


प्रतिभा संवर्धन हेतु निर्धारित विज्ञान सम्मत प्रयोग उपचार

बुद्धि का विकास एक मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया है। उसके लिए अनेक आधार अवलम्बन अपनाये जा सकते हैं। कोई कटकर शान संवर्धन में बुद्धि का विकास समझता है। छोटी आयु से बच्चों को विभिन्न डिजाइनों के टुकड़ों को जोड़कर एक बनाने, लकड़ी के टुकड़ों को जोड़ जोड़ कर कुछ बनाते रहने, स्थापित आविष्कारों के मॉडल बनाकर उनमें कुछ जोड़-घटाकर नया बनाने, कोई रचनात्मक कार्य के द्वारा बुद्धिलब्धि के विभिन्न तरीके अपनाये जाते हैं। धार्मिक क्षेत्र में कतिपय कर्मकाण्ड भी इसी प्रयोजन के लिए प्रयुक्त किये जाते रहे हैं। शारीरिक बल-बुद्धि यों आहार-विहार और श्रमसंतुलन पर निर्भर है, फिर भी उस प्रयोजन के लिए अखाड़ों में डम्बल, मुद्गर जैसे उपकरण काम में लिए जाते हैं। हथियार की धार तेज करने के लिए घूमने वाले पत्थर पर उसे रगड़ा जाता है। यद्यपि धार निकलना हथियार के अपने ही निजी स्तर पर निर्भर है, फिर भी पत्थर का महत्व अपनी जगह है। स्नायु-तंत्र यों चमड़ी के भीतर है पर उन्हें मजबूत करने के लिए शरीर पर तेल मालिश करने का प्रावधान चिकित्सक बताते हैं व वह किसी सीमातक भी सिद्ध होता है।

प्रतिभा परिष्कार के लिए व्यक्ति की प्रमाणिकता और प्रखरता के दोनों पक्ष समान रूप से मजबूत बनाने पड़ते हैं। भावभरी, उमंग-उत्साहों से सनी एकाग्र तन्मयता उभारनी पड़ती है। साथ ही समय को श्रम के साथ अविछिन्न रूप से जोड़े रहने वाली तत्परता या श्रमशीलता कार्यान्वित करनी पड़ती है। संकीर्ण स्वार्थपरता के दायरे से आगे बढ़ना होता है ताकि सादा जीवन उच्च विचार की रीति-नीति अपनाने के साथ ही बचे समय, श्रम और साधनों को सत्प्रवृत्ति संवर्धन में-लोक सेवा में लगाया जा सके। उच्चस्तरीय प्रतिभा का संवर्धन इसी प्रकार होता है। यों दुस्साहसी आततायी भी भयानक संकट खड़े करते और उन विनाशकारी कार्यों को ही अपनी प्रतिभा के रूप में परिणत करते रहते हैं। पर इससे उचित का सत्परिणाम और अनुचित का दुष्परिणाम झुठलाया तो नहीं जा सकता।

यहाँ प्रतिभा से सदैव आशय आदर्शोन्मुख बुद्धि व भावना के समन्वित विकास से लिया जाना चाहिए ऐसे प्रतिभा सम्पन्न ही स्वयं को प्रेरणापुँज आदर्शों के प्रतीक के रूप में ही उभारते व स्वयं को ही नहीं, समय को भी निहाल करते हैं। चर्चा इसी प्रतिभा के विकास से संबंधित उपचारों की चल रही है।

क्या ऐसा भी संभव है कि बालकों को लिखने की पट्टी पर मनके सरका कर गिनती सिखाने एवं तीन पहिए की गाड़ी का सहारा लेकर चलना सिखाने की तरह किन्हीं अभ्यासों के माध्यम से जनसाधारण को भी प्रतिभा संपादित करने की दिशा में अग्रसर किया जा सकता है? उत्तर हाँ में भी दिया जा सकता है। जनसामान्य शारीरिक अप-अवयवों की पुष्टाई के लिए अखाड़े जाने की विधि व्यवस्था बताते हैं। अखाड़ों में निर्धारित अभ्यासों को अपनाना, शारीरिक अंगों को सशक्त बनाने के लिए व्यायामों का उपक्रम, बुलवर्कर का प्रयोग आदि, आहार में परिवर्तन अभीष्ट माना जाता है। ऐसे ही कतिपय साधना उपक्रम प्रतिभा परिष्कार के संदर्भ में भी निर्धारित हैं और वे बहुत हद तक सफल होते भी देखे गए हैं। ऐसे कुछ आधारों का जिनका ब्रह्मवर्चस् की शोधप्रक्रिया में प्रयोग किया जाता है अथवा जिन्हें वर्तमान या संशोधित रूप में प्रयुक्त किये जाने की संभावना है, का उल्लेख यहाँ किया जा रहा है। (1) स्वसंकेत (आँटोसजेशन्)-शान्त वातावरण में स्थिर और एकाग्र मन से बैठा जाया। भावना की जाय कि अपने मस्तिष्क केन्द्र से निस्सृत केन्द्र से निस्सृत प्राण विद्युत का समुच्चय शरीर के अंग अवयवों में अपेक्षाकृत अधिक मात्रा में प्रवाहित हो रहा है। उस आधार पर प्रत्येक अवयव पुष्ट हो रहे हैं। इन्द्रियों की क्षमता का अभिवर्धन हो रहा है। चेहरे पर चमक बढ़ रही है। बौद्धिक स्तर में ऐसा उभार आ रहा है जिसका अनुभव प्रतिभा परिवर्धन के रूप में अपने को तथा दूसरों को हो सके। वस्तुतः स्वसंकेतों में ही मानसिकता कायाकल्प का मर्म छिपा पड़ा है। श्रुति की मान्यता है कि “यो यच्छूद्ध स एव सः”। अर्थात् जो जैसा सोचता और अपने संबंध में भावना करता है, वह वैसा ही बन जाता है। विधेयात्मक चिन्तन, महापुरुषों के गुणों के अपने अन्दर समावेश होने की भावना से सजातीय विचार खिंचते चले आते हैं व वाँछित विद्युत्प्रवाहों को जन्म देने लगते हैं।

मनोवैज्ञानिक इसी आधार पर व्यक्तित्व में विचार प्रवाह में परिवर्तन लाने की बात कहते हैं। उनका मन है कि जैसे पृथ्वी के चारों ओर आयनोस्फियर है, इसी प्रकार मानवी मस्तिष्क के चारों ओर भी एक “आयडियो स्फियर” होता है। यह वैसा ही होता है जैसा मनुष्य का चिन्तन क्रम होता है। क्षणमात्र में यह बदल भी सकता है व पुनः वैसा ही सोचने पर पूर्ववत् भी हो सकता है। इसी चिन्तन प्रवाह के आदर्शोन्मुख, श्रेष्ठता की और गतिशील होने पर व्यक्ति का मुख मण्डल चमकने लगता है। दूसरों को आकर्षित करना है एवं ऐसे व्यक्ति के कथन प्रभावोत्पादक होते हैं, इस सीमा तक कि अन्य अनेकों में भी परिवर्तन ला सके। एक प्रकार से स्वसंकेतों द्वारा अपने आभामण्डल को एक सशक्त चुंबक में परिणत किया जाता है। मनोवैज्ञानिक कहते है-”चिंक एण्ड गा्रे रिच” अथवा “एडाँप्ट पॉजेटिव प्रिंसिपल टूडे”। आशय यह कि सोचिये, विधेयात्मक सोचिये एवं अभी इसी क्षण सोचिये ताकि आप स्वयं को श्रेष्ठ बना सकें। सारे महामानव स्वसंकेतों से ही महान बने हैं। गाँधीजी ने हरिश्चंद्र के नाटक को देखकर स्वयं संकेत दिया कि सत्य के प्रयोगों को जीवन में उतारो व उसके परिणाम देखो। उनके शिखर पर चढ़ने के मूल में इसकी कितनी महान भूमिका थी, यह सभी जानते हैं।

ब्रह्मवर्चस् की शोध प्रक्रिया में आडियो एवं वीडियो कैसेट का आश्रय लेकर ईयरफोन द्वारा संकेत दिये जाते हैं। कुछ विराम के बाद पुनः उन सभी प्रसंगों पर चिन्तन करते रहने को कहा जाता है। इससे प्रभावशाली विद्युतप्रवाह जन्म लेने लगता हे। इसकी प्रत्यक्ष परिणति जी.एस.आर. बायोफिडबैक के रूप में देखी जा सकती है जिसमें व्यक्ति चिन्तन द्वारा ही अपनी त्वचा प्रतिरोध घटाता-बढ़ाता व स्वयं भी उसे देखता है। इसी प्रकार श्वसनदर, हृदय की गति, रक्तचाप आदि को स्वसंकेतों से प्रभावित किया जा सकता है। विपश्यना ध्यान एवं जेन ध्यान पद्धति इसी स्वसंकेत पद्धति पर आधारित हैं। कोई कारण नहीं कि सही पद्धति का आश्रय लेने पर प्रतिभा में वाँछित परिवर्तन न उत्पन्न किया जा सकें। (2) दर्पण साधना-यह मूलतः आत्मावलोकन की, आत्मसुधार व आत्मपरिष्कार की साधना है। बड़े आकार के दर्पण को सामने रखकर बैठा जाय। सुखासन में जमीन पर या कुर्सी पर बैठा जा सकता है। खुले शरीर के प्रत्येक भाग पर विश्वास भरी दृष्टि से अवलोकन किया जाय। पहले अपने आपके बारे में चिन्तन कर अंतः के दोष-दुर्गुणों से मुक्त होते रहने की भावना की जाय। वह परमसत्ता बड़ी दयालु है। भूत को भुलाकर अब यह अनुभूति की जाय कि भीतरी संरचना में प्राणविद्युत बढ़ रही है और उसकी तेजस्विता त्वचा के ऊपरी भाग में चमक बढ़ाने से लेकर अंग अंग से फूटी पड़ रही है। पहले जो निस्तेज-क्षीण दुर्बल काय सत्ता थी, वह बदल गयी है एवं शरीर के रोम-रोम में विद्युतशक्ति की छायी हुई है। विकास क्रम में उभार आ रहा है। प्रतिभा-परिवर्धन के लक्षण निश्चित रूप से दीख पड़ रहे हैं एवं सामने बैठी आकृति में अपना अस्तित्व पूर्णतः विलीन हो रहा है। अब वह पहले जैसा नहीं रहा। वह ध्यान प्रक्रिया लययोग की ध्यान साधना कहलाती है और व्यक्ति का भावकल्प कर दिखाती है।

(3) रंगीन वातावरण का ध्यान-हर रंग में सूर्य किरणों के अपने-अपने स्तर के रसायन, धातुतत्व एवं विद्युतप्रवाह होते हैं। वे शरीर और मस्तिष्क पर अतिरिक्त प्रभाव छोड़ते हैं। इनमें से किसी का अनुपात घट-बढ़ जाता है अथवा विकृत असंतुलित हो जाता है तो कई प्रकार के रोग-उत्पात उठ खड़े होते हैं। इस हेतु रंगीन पारदर्शी काँच के माध्यम से अथवा विभिन्न रंगों के बल्बों द्वारा पीड़ित अंग पर अथवा अंग विशेष पर उसकी सक्रियता बढ़ाने के लिए रंगीन किरणों को आवश्यकतानुसार निर्धारित अवधि तक लेने का विधान है। प्रतिभा परिवर्धन हेतु उचितरंग विशेष का आंखें बन्द करके ध्यान भी किया जाता है। कुछ देर तक सप्तवर्णों के क्रम में से निर्धारित रंग (बैंगनी, नीला, आसमानी, हरा, पीला, नारंगी, लाल) के फ्लेशेज-स्ट्रोबोस्कोप यंत्र द्वारा चमकाये जाते हैं एवं आँख पर, पहने चश्मे में वही वर्ण विशेष सतत दीखता रहता है। इसका प्रभाव मस्तिष्क के सूक्ष्म केन्द्रों-चक्र संस्थानों आदि पर पड़ता है। नियमित रूप से कुछ देर के ध्यान के क्रमशः अभ्यास करने, करते रहने पर वाँछित परिवर्तन प्रक्रिया आरंभ हो जाती है। ध्यान यह किया जाता है कि संसार भर में सर्वत्र उसी एक रंग की सत्ता है, जो अपने शरीर में प्रवेश करके अभीष्ट विशेषताओं की ऊर्जा शरीर में प्रवाहित करती हे। यह ध्यान पाँच से दस मिनट तक किया जाता है। विशेषज्ञों के द्वारा भिन्न भिन्न प्रकृति के साधकों के लिए भिन्न भिन्न वर्णों का निर्धारण करके ही वह प्रक्रिया आरंभ की जाती है।

(4) प्राणाकर्षण प्राणायाम-इस समस्त ब्रह्माण्ड में प्राणतत्व भरा पड़ा है। उसमें से साधारणतया प्राणी को उतनी ही मात्रा मिलती है जिससे वह अपना जीवन निर्वाह चलाता रहे। इससे अधिक मात्रा खींचने की आवश्यकता तब पड़ती है, जब किन्हीं उच्च उद्देश्यों के लिए प्राण चेतना का अधिक अंश आवश्यक हो। शरीरयतः प्राण एवं समष्टिगत महाप्राण का संयोग शरीर स्थित प्राण का नवीनीकरण ही नहीं करता, प्राणधारण कर उसे प्रयुक्त करने की क्षमता को भी बढ़ाता है। चेतन जगत में प्राण ही एक ऐसी शक्ति है जो विद्युत्ऊर्जा के रूप में, “नेगेटिव आयन्स” के रूप में विद्यमान है इनकी कमी व्यक्ति को रोगी, निस्तेज, प्राणहीन बनाती है, उसकी प्रभावोत्पादकता को कम करती है एवं प्रचुर मात्रा उसे निरोग, तेजस्वी, प्राणसंपन्न बनाकर उसकी प्रभाव क्षमता में अभिवर्धन करती है प्रतिभा परिवर्धन के लिए एक विधान प्राणाकर्षण प्राणायाम का है। इसकी विधि यह है कि कमर सीधी, सरल पालथी, हाथ गोदी में, मेरुदण्ड सीधा रखकर बैठा जाय। ध्यान यह किया जाय कि बादलों जैसी शक्ल के प्राण का उफान हमारे चारों और उमड़ता चला आ रहा है और हम उसके बीच निश्चित प्रसन्न मुद्रा में बैठे है। नासिका के दोनों छिद्रों से धीरे धीरे साँस खीचते हुए भावना की जाय कि साँस के साथ ही प्रखर प्राण की मात्रा भी धुली हुई है और वह शरीर में प्रवेश कर रही है। अंग अवयवों द्वारा वह धारण की जा रही है। खींचते समय प्राण के प्रवेश करने की व साँस रोकते समय अवधारण की भावना की जाय। धीरे धीरे साँस बाहर निकालने के साथ यह विश्वास किया जा य कि जो भी अवांछनियताओं के दुर्बलता के तत्व भीतर थे, वे साँस के साथ घुलकर बाहर जा रहे हैं, फिर लौटने वाले नहीं है। इस प्राणायाम को आरंभ में पाँच से दस मिनट करना ही पर्याप्त हैं क्रमशः यह अवधि बढ़ाई जा सकती है। शोध संस्थान द्वारा यह जाँचा जाता है कि प्राण धारण क्षमता कितनी बढ़ी व रक्त में से दूषित तत्व कितनी मात्रा में निकले तथा रक्त आक्सीजन का अनुपात कितना बढ़ा। यही निरोगता का, प्रतिभाशीलता का चिन्ह है।

(5) सूर्य वेधन प्राणायाम-ध्यान मुद्रा में बैठा जायं कपड़े शरीर पर कम से कम रहें। मुख पूर्व की ओर हो। समय अरुणोदय का हो। ध्यान किया जाय कि आत्मसत्ता शरीर में से निकलकर सीधे सूर्य लोक तक पहुंच रही है। जिस प्रकार सुई में पिरोया हुआ धागा कपड़े से होकर जाता है, जलती अग्नि में से छड़ आर-पार निकल जाती है, उसी प्रकार आत्मचेतना प्रातःकालीन सूर्य का वेधन करती हुई आर-पार जा रही है। सूर्य ऊर्जा से अपनी चेतना भर रही है। दायीं नासिका से खींचा श्वास अंदर तक जाकर सूर्य चक्र को आन्दोलित-उत्तेजित कर रहा है। ओजस्-तेजस् वर्चस् की बड़ी मात्रा अपने में धारण करके वापस बायीं नासिका से सारे कल्मष निकल रहे हैं। पहले की अपेक्षा अब अपने में प्राणऊर्जा की मात्रा भी अधिक बढ़ गई है, जो प्रतिभा परिवर्धन के रूप में अनुभव में आती है। क्रिया को गौण व भावना को प्रधान मानते हुए यह अभ्यास नियमित रूप से किया जाय तो निश्चित ही फलदायी होता है,

(6) चुम्बक स्पर्श- चुम्बक का चिकित्सा में बड़ा योगदान माना गया है। एक्युपंचर, एक्युप्रेशर, शरीरके सूक्ष्म संस्थानों को मुद्रा-बंध द्वारा प्रभावित करना एवं चुम्बक चिकित्सा में अद्भुत साम्य है। हमारी धरती एक विराट चुम्बक है व निश्चित मात्रा में प्राण उत्तरीध्रुव से खींचती व अनावश्यक कल्मषों को दक्षिण ध्रुव से फेंक देती हैं। चुम्बक स्पर्श में भी यही सिद्धान्त प्रयुक्त होता है। लौह चुम्बक का सहज क्षमता वाला पिण्ड लेकर धीरे धीरे मस्तिष्क, रीढ़ और हृदय पर बायें से दायीं और गोलाई में घुमाया जाता है। गति धीमी रहे। कण्ठ से लेकर नाभिछिद्रों से ऊपर होते हुए जननेन्द्रियों तक उस चुम्बक को पहुँचाया जाय। स्पर्श कराने-घुमाने के उपरान्त उसे धो दिया जाय ताकि उसके साथ कोई प्रभाव न जुड़ा रहे। चुम्बक से प्रभावित जल तथा विद्युतचुंबक का प्रयोग भी इसी क्रम में किया जाता है व किसी कमी के लिए किस रूप में किस प्रकार किया जाना है, इसका निर्धारण विशेषज्ञों द्वारा किया जाता है।

(7) प्राणवानों का सान्निध्य-शक्तिपात की तांत्रिक क्रिया तो करने कराने में कठिन है व जोखिम भरी भी। किन्तु यह सरल है कि किन्हीं वरिष्ठों-प्राण चेतना सम्पन्न व्यक्ति के यथा संभव निकट पहुँचने का प्रयत्न किया जाय। चरणस्पर्श जैसे समीपता वाले उपक्रमों से लाभ उठाया जाय। अप्रत्यक्ष रूप से यह ध्यान किया जा सकता हे कि हनुमान भागीरथ, जैसे किसी प्राणवान के साथ अपनी भावनात्मक एकता बन रही है और पारस्परिक आदान-प्रदान का सिलसिला चल रहा है। साबुन जिस प्रकार अपनी सफेदी प्रदान करता है और कपड़े का मैल हटा देता है, उसी प्रकार की भावना इस सघन संपर्क की ध्यान धारणा में करते रही जा सकती है। दृश्य चित्र व उन महामानव के कर्तृत्वों के गुणों का चिन्तन इसमें सहायक होता है। इस आधार पर भी प्राण चेतना बढ़ती है, उसी प्रकार जिस प्रकार माँ के स्तनपान से बालक एवं गुरु की शक्ति से शिष्य लाभान्वित होता हैं

(8) नादयोग-वाद्ययंत्रों और उनकी ध्यान लहरियों के अपने अपने प्रभाव हैं। उन्हें कोलाहल रहित स्थान में सुनने का अभ्यास भी प्रतिभा परिवर्धन में सहायक होता है। यह कार्य शब्दशक्ति जो चेतना का ईंधन है, कि श्रवण से अंतः के ऊर्जा केन्द्रों को उत्तेजित व जगाकर संभव है। टेपरिकार्डर से संगीत की धुन सुनकर भी यह कार्य संभव हैं एवं स्वयं उच्चारित मंत्रों या संगीत पर ध्यान लगाकर भी। सुनकर ध्यान लगाना उचित रहता है। अपने लिए उपयुक्त संगीत का चयन भी इस विषय के विशेषज्ञों द्वारा ही निर्धारित कराना चाहिए। एक ही वाद्य व समयानुकूल राग का चयन किया जाना चाहिए। यह श्रवण आरंभ में पाँच से दस मिनट तक ही किया जाय। क्रमशः अभ्यास के साथ बढ़ाया जा सकता है। इस विषय पर विभिन्न स्तर के व्यक्तियों के लिए धुनों का चयन कर संगीत कैसेट बनाने का कार्य शांतिकुंज द्वारा संपन्न हो रहा है।

(9) प्रायश्चित-अभिचार, छल, धन, अपहरण जैसे दुष्कर्मों से भी प्राण शक्ति क्षीण होती है। और प्रतिभा का अनुपात घट जाता है। इसके लिए दुष्कर्मों के अनुरूप प्रायश्चित किया जाय। क्रिश्चियन धर्म में कन्फेशन की बड़ी महत्ता बतायी गयी है। दुष्कर्मों की भरपाई कर सकने जैसे कोई सत्कर्म किये जायँ। चान्द्रायण जैसे वृत उपवास भी उस भार को उतारने में सहायक होते हैं। कौन किन दोषों के बदले क्या प्रायश्चित करे, इसके लिए गुरु सत्ता जैसे विशेषज्ञों से अपनी पूरी बात कहकर परामर्श कर लेना चाहिए। इससे काफी हल्कापन आ जाता है। व आगे कुछ नया करने की दिशा मिलती है। प्रायश्चित धुलाई की मनोवैज्ञानिक आवश्यकता पूरी करता है। प्रतिभा संवर्धन हेतु अंतरंग की धुलाई उतनी ही जरूरी भी है।

(10) अंकुरों का कल्क एवं वनौषधि सेवन-अन्न और जड़ी-बूटी, वनस्पतियों के अपने प्रभाव हैं। वे जब अंकुर स्थिति युग होता है। जो अपनी आवश्यकता के अनुकूल निर्धारित हो, उसके सात गमले एक-एक दिन के अंतर से लगाये जायँ। सातवें दिन अंकुरों को पीसकर कल्क बनाकर तीन माशे व पानी एक तोला लेकर छानलें व प्रातःकाल खाली पेट मधु या उचित अनुपान के साथ लें। ये टॉनिक तेजस् की अभिवृद्धि, मेधाबुद्धि जीवनीशक्ति संवर्धन में सहायक होते हैं। अंकुरित न मिलने पर सूखे चूर्णों का भी कल्क बनाकर ग्रहण किया जा सकता है। निर्धारण विशेषज्ञ करते हैं। किन्हीं स्थितियों में वाष्पी भूत रूप में अग्निहोत्र प्रक्रिया से नासिका मार्ग द्वारा ग्रहण किये जाने का भी प्रावधान है।

यहाँ संक्षेप में प्रतिभा संवर्धन के निर्धारित दस उपचारों की चर्चा की गयी है। विस्तार से इन्हें अगले अंकों में व प्रत्यक्ष शांतिकुंज आने पर समझाया जाता रहेगा।


श्री माताजी (kahani)

योगी अरविन्द उन दिनों पांडिचेरी में साधना रत थे। साथ ही वे अध्यात्म प्रशिक्षण का आश्रम भी चला रहे थे। दुहरे कार्य में उनकी व्यस्तता अत्यधिक बढ़ गई थी। सहायक का अभाव बुरी तरह खल रहा था।

पेरिस के सम्प्रान्त परिवार के रिचर्ड दंपत्ति उस आश्रम में आए कुछ दिन ठहरे और आश्रम की गतिविधियों तथा आवश्यकताओं को उन लोगों ने गंभीरता पूर्वक समझा।

रिचर्ड अपने व्यवसायिक कार्यों में व्यस्त रहना चाहते थे। पर उनने अपनी धर्मपत्नी से कहा यदि तु चाहों तो इस महान कार्य में अपने को खपा सकती हो। विचार विनिमय के उपरान्त बात निश्चित हो गई वह फ्राँसीसी महिला पाण्डिचेरी आश्रम के संचालन में जुट गई और जीवन भर यही रही। उन्हें श्री माताजी, कहा जाता था। अरविंद का अधिकाँश कार्य भार उनने बटा लिया था।


अनुपलब्धि की शिकायत न करनी पड़ेगी

प्रतिभा किसी पर आसमान से नहीं दमकती। उसे पुरुषार्थ पूर्वक मनोबल के सहारे अर्जित करना पड़ता है। अब तक के प्रतिभाशालियों के प्रगति क्रम पर दृष्टिपात करने से एक ही निष्कर्ष निकलता है कि अपनाये गये काम में उल्लास भरी उमंगों का उभार उमगता रहा मानसिक एकाग्रता के साथ तन्मयता जुटाई गयी और पुरुषार्थ को प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाकर अवरोधों से जूझा गया। प्रतिकूलता को अनुकूलता में बदल कर अपनी प्रखरता का परिचय दिया गया। सफलतायें हमेशा इसी आधार पर मिलती हैं। सफलता मिलने पर हौंसले बुलंद होते हैं। दूने उत्साह से काम करने को जी करता है। इस प्रयास में प्रतिभा विकसित भी होती है, परिपक्व भी बनती है। उत्कर्ष यही है। अभ्युदय का श्रेय सौभाग्य इसी आधार पर आँका जाता है। इक्कीसवीं सदी प्रतिभावानों की क्रीड़ा स्थली होगी। उन्हीं के द्वारा वह कर दिखाया जायगा जो असंभव नहीं तो कष्टसाध्य तो कहा ही जाता रहा है

हवा का रुख पीठ पीछे हो तो गति में अनायास ही तेजी आ जाती हैं। वर्षा के दिनों में बोया गया बीज सहज ही अंकुरित होता है और उस अंकुर को पौधे के रूप में लहलहाते देर नहीं लगती। बसन्त में मादाएँ गर्भधारण का कीर्तिमान बनाती हैं।

किशोरावस्था बीतते-बीतते जोड़ा बनाने की उमंग अनायास ही उभरने लगती है। वातावरण की अनुकूलता में उस प्रकार के प्रयास गति पकड़ते हैं और प्रायः सफल भी होते है।

दिव्यदर्शी अंतःस्फुरणा के आधार पर यह अनुभव करते हैं कि समग्र के परिवर्तन की ठीक यही बेला ह। नवयुग के अरुणोदय में अब अधिक विलम्ब नहीं है। जनमानस वर्तमान अवांछनियताओं से खीज और ऊब उठा है। उसकी आकुलता-चतुरता के साथ वह दिशा अपना रही है, जिस पर चलने से मुक्ति मिल सके और चैन की साँस लेने का अवसर मिल सके। साथ ही विश्व वातावरण ने भी ऐसा ही निश्चय बनाया है कि अनौचित्य को उलटकर औचित्य को प्रतिष्ठित करने में अब अनावश्यक विलम्ब न किया जाय।

निकटतम भविष्य की कुछ सुनिश्चित संभावनाएँ ऐसी हैं जिनमें हाथ डालने वाले सफल होकर ही रहेंगे। अर्जुन की तरह नियति द्वारा पहले से ही मारे गये विपक्षियों-अनीति के पक्षधर कौरवों का हनन करके अनायास ही श्रेय और प्रेय का दुहरा लाभ प्राप्त करेंगे। इसी माहौल में उन्हें प्रतिभा परिवर्धन का यह लाभ भी मिल जायगा जिसके आधार पर मूर्धन्य युगशिल्पियों में गणना हो सके।

अगले दिनों प्रचलित दुष्प्रवृत्तियों में से अधिकाँश अपनी मौत उसी प्रकार मरेंगी जिस प्रकार शीतऋतु में मक्खी-मच्छरों का प्रकृति परम्परा के अनुसार अन्त हो जाता है। अन्ध-विश्वास, मूढ़मान्यताएं, रूढ़ियों, अन्ध परम्पराएँ आदि दूरदर्शी विवेकशीलता का उषाकाल प्रकट होते ही उल्लू चमगादड़ों की तरह अपने कोंतरों में जा घुसेंगे। संग्रही और अपव्ययी जिस प्रकार अपना दर्प दिखाते हैं, उसके लिए तब कोई गुंजाइश न रहेगी। संग्रही, लालची और आलसी तब भाग्यवान होने की दुहाई न दे सकेंगे। एक और भी बड़ी बात यह होगी कि चिरकाल से उपेक्षित नारी−वर्ग न केवल अपनी गरिमा को उपलब्ध करेगा, वरन् उसे नर का मार्गदर्शन, नेतृत्व करने का गौरव भी मिलेगा। पिसे हुए, पिछड़े हुए ग्राम उभरेंगे और उन सभी सुविधाओं से सम्पन्न होंगे, जिनके लिए उस क्षेत्र के निवासियों को आज शहरों की ओर भागते देखा जाता है। समता और एकता के मार्ग में अड़े हुए अवरोध एक-एक करके स्वयमेव हटेंगे और औचित्य के विकसित होने का मार्ग साफ करते जायेंगे। सम्मान वैभव को नहीं, उस वर्चस्व को मिलेगा जो आदर्शों के लिए उत्सर्ग करने का साहस संजोया है। पाखण्ड का कुचक्र पिछले दिनों कितना ही सघन क्यों न रहा हो, अगले दिनों उसके लम्बे समय तक पैर टिकाये रहने की कोई संभावना नहीं है।

इन तथ्यों के प्रकटीकरण पर विश्वास करते हुए जो तदनुरूप अपनी गतिविधियों में परिवर्तन करेंगे, वे हार दृष्टि से नफे ही नफे में रहेंगे। आज का दृष्टिकोण जिसे घाटा बताता है, उपहासास्पद बताता है, कल वैसी स्थिति न रहेगी। लोग वास्तविकता को अनुभव करेंगे और समय रहते अपनी भ्रान्त-मान्यताओं को बदल लेंगे।

जीवन्तों और जाग्रतों को इन दिनों युगचेतना अनुप्राणित किये बिना रह नहीं सकती। उनमें ढर्रे का जीवन जीते रहने से ऊब उत्पन्न करेगी और अन्तराल में ऐसी हलचलों का समुद्र मंथन खड़ा करेगी जिसके दबाव में वे ऐसा कुछ करने को आगे आवेंगे, जो समय को बदलने के लिए अभीष्ट एवं आवश्यक है। साँप नियत समय पर केंचुल बदलता है। अब ठीक यही समय है कि प्राणवान, प्रज्ञावान, अपना केंचुल बदल डालें। अपना समग्र पुरुषार्थ सँजोकर दृष्टिकोण का कायाकल्प कर डालें।

अब तक जो मान्यताएं दृष्टिकोण में समाई रहीं, आदतों में सम्मिलित रहकर क्रिया-कलापों का निर्धारण करती रहीं। उनको इन दिनों नये सिरे से परखें नई कसौटी पर कसें और देखें कि समझदारी, ईमानदारी, जिम्मेदारी, बहादुरी का कितना पुट उनमें रहा है। जो खोट दीख पड़े, उन्हें बदल लेने के लिए आज का समय ही सर्वोत्तम मुहूर्त है। आदर्शों को प्रमुखता देनी है। यह न सोचे कि संचित आदतें किस ओर घसीटती हैं और तथा कथित सगे संबंधी क्या परामर्श देते हैं? प्रहलाद, विभीषण, भरत आदि को कुटुम्बियों का नहीं आदर्शों का अनुशासन अपनाना पड़ा था। उच्च स्तरीय साहस के प्रकटीकरण का वही केन्द्र बिन्दु है कि जीवन को श्रेय साधन से ओतप्रोत करके दिखाया जायं यह प्रयोजन संयम और अनुशासन अपनाये जाने की अपेक्षा करता है। प्रचलन तो ढलान की ओर लुढ़कने का है। पानी नीचे की ओर बहता है। ढेला ऊपर से नीचे गिरता है। उत्कृष्टता की ऊँचाई तक उछलने के लिए शूरवीरों जैसा साहस दिखाना पड़ता है। इस प्रदर्शन को अभी टाल दिया गया तो संभव है वैसा अवसर फिर कभी आवे ही नहीं।

मेघ मंडल जब घटाटोप बन कर उमड़ते-गरजते हैं, तो कृषि कर्मियों के मन आशा उत्साह से भर कर बल्लियों उछलने लगते हैं। इन्द्र बज्र सौ-सौ बार झुककर उनकी सलामी देता है। अँधेरा आकाश प्रकाश से भर जाता है। मोर नाचते और पपीहे कूकते हैं। हरीतिमा उनकी प्रतीक्षा में मखमली चादर ओढ़े मुस्कराती पड़ी रहती है। यह मनुहार मेघों की ही क्यों? खोजने पर पता चलता है कि वे संचित जलराशि समेत अपने आपको अति विनम्र होकर धरती पर बिखेर देते हैं।

प्रतिभा परिवर्धन के उद्दण्ड उपाय तो अनेकों हैं। उन्हें आतंकवादी-अनाचारी तक अपनाते और प्रेत पिशाचों की तरह अनेकों को भयभीत कर देते हैं। किन्तु स्थिरता और सराहना उसी प्रतिभा के साथ जुड़ी रहती है जो शालीनता अपनाती और आदर्शों के प्रति अपने वैभव का उत्सर्ग करने से चूकती नहीं। ऐसे लोग शबरी, गिलहरी एवं केवट स्तर के ही क्यों न हों, अपने को अजर अमर बना लेते हैं और अनुकरण के लिए अनेकानेकों को आकर्षित करते रहते हैं। उनकी चुम्बकीय विलक्षणता न जाने क्या-क्या कहाँ से बटोर लाती है और तिल को ताड़ बना कर खड़ा कर देती है।

प्रतिभा परिष्कार का अजस्र लाभ उठाने के लिए इन दिनों स्वर्ण सुयोग आया है। युग संधि की बेला में जीवट वाले प्राणवानों की आवश्यकता अनुभव की गई है। अवांछनियताओं से ऐसे ही जूझते हैं और हनुमान-अंगद जैसे अनगढ़ होते हुए भी लंका को धराशायी बनाने के राम राज्य का सतयुगी वातावरण विनिर्मित करने के दोनों मोर्चों पर अपनी समर्थ क्षमता का परिचय देते है। ऐसी परीक्षा की घड़ियाँ सदा नहीं आती। जो समय को पहचानते और बिना अवसर चूके अपने साहस का परिचय देते हैं, उन्हें प्रतिभा का धनी बनने में किसी अतिरिक्त अनुष्ठान करने की आवश्यकता नहीं पड़ती। संयम और साहस का मिलन ही वरिष्ठता के लक्ष्य तक पहुँचा देता है। पुण्य और परमार्थ का राज-मार्ग ऐसा है, जिसे अपनाने पर वरिष्ठता का लक्ष्य हर किसी को मिल सकता है। आत्म साधना और लोक साधना दोनों एक ही तथ्य के दो पहलू हैं। जहाँ एक को सही रीति से अपनाया जायेगा, वहाँ दूसरा उसके साथ अविच्छिन्न रूप से जुड़ जायेगा।

लक्ष्य और उपक्रम निर्धारित कर लेने के उपरान्त यह निर्णय करना अति-सरल पड़ता है कि कौन अपनी मनःस्थिति और परिस्थिति के अनुसार संपर्क परिकर की आवश्यकताओं को देखते हुए किन क्रियाकलापों में हाथ डाले और प्रगति का एक एक चरण उठाते हुए अन्ततः बड़े से बड़े स्तर का क्या कुछ कर गुजरे? यहाँ पर भी ध्यान रखने योग्य यह है कि व्यक्ति अपन प्रभामण्डल-संपर्क क्षेत्र के साथ जुड़ कर ही पूर्ण बनता है। अकेला चना तो कभी भी भाड़ फोड़ सकने में समर्थ नहीं होता। अपने जैसे विचारों के अनेक घनिष्ठों को साथ लेना और सहयोगपूर्वक बड़े कदम उठाना ही वह रीति नीति है, जिसके सहारे अपनी और साथियों के प्रतिभा समुच्चय में साथ-साथ चार चाँद लगते हैं।

समस्याओं और संकटों के जाल जंजाल में यह खोजने की आवश्यकता नहीं है कि उलझनों में से किसको प्रमुख मानें और उनको सुलझाने का सिलसिला कहाँ से आरंभ करें। स्पष्ट है कि न यहाँ साधनों की कमी है और न परिस्थितियों की विपन्नता। विपत्ति मात्र एक है विचारणाओं की विकृति। चिन्तन से चरित्र प्रभावित होता है और चरित्र के अनुरूप व्यवहार बन पड़ता है। विकृति इसी क्षेत्र घुस पड़े तो रंगीन चश्मा पहनने पर सब कुछ उसी रंग का दीख पड़ने की तरह कुछ का कुछ समझ पड़ने की स्थिति बन जाती है। तथ्य को समझते हुए इसी निष्कर्ष पर पहुंचना पड़ता है कि अपनी और अपने परिकर की मनःस्थिति को सुधारा जा सके तो प्रतिकूलताओं को अनुकूलताओं में बदलने में देर न लगे। विचार क्रान्ति के अंचल में नैतिक क्रान्ति बौद्धिक क्रान्ति और सामाजिक क्रान्ति तीनों ही महान परिवर्तन समाहित हैं। यदि वैसा कुछ बन पड़े तो समझना चाहिए कि विपन्नताओं के उन्मूलन का राज मार्ग मिल गया और वह सब कुछ हाथ लग गया जिसकी कि इन दिनों जन-जन को आवश्यकता है।

सत्प्रवृत्तियों का समुच्चय परब्रह्म परमात्मा प्रतिभाओं का पुँज है। उसके साथ संबंध जोड़ने पर संकीर्ण स्वार्थपरता में तो कटौती करनी पड़ती है, पर साथ ही यह भी तथ्य है कि अग्नि के साथ संबंध जोड़ने वाला ईंधन का ढेर ज्योतिर्मय ज्वाल-माल की तरह धधकने लगता है। उत्कृष्टता के साथ जुड़ने वालों में से किसी को भी यह नहीं कहना पड़ता कि उसे प्रतिभा परिकर के भाण्डागार में से किसी प्रकार की कुछ कम उपलब्धि ही हस्तगत हुई।

दिशा निर्धारित कर लेने पर मार्ग दर्शक तो पग पग पर मिल जाते हैं। कोई न भी मिले तो अपनी ही अन्तरात्मा उसकी आवश्यकता की पूर्ति कर देती है।

प्रतिभा का धनी न कभी हारता है और न कभी अभावग्रस्त रहने की शिकायत करता है। उसे किसी पर दोषारोपण करने की भी आवश्यकता नहीं पड़ती कि उन्हें अमुक सहयोग नहीं दिया या प्रगति पथ को रोके रहने वाला अवरोध अटकाया। प्रतिभावान ही तो शालीनता और प्रगतिशीलता का अधिष्ठाता सिद्धपुरुष होता है।


महाकाल की संकल्पित संभावना

मनुष्य की अपनी विचारणा, क्षमता, लगन, हिम्मत, उमंग और पुरुषार्थपरायणता की महत्ता भी कम नहीं। इन मानसिक विभूतियों के जुड़ जाने पर उसकी सामान्य दीखने वाली क्रिया प्रक्रिया भी असामान्य स्तर की बन जाती है। और दैवी विभूतियों की पटतर करने लगती है। फिर भी उनकी समय सीमा निर्धारित है और सफलता का भी एक मापदण्ड है। किन्तु यदि अदृश्य प्रगति प्रवाह की इच्छाशक्ति उसके साथ जुड़ जाय तो परिवर्तन इतनी तेजी से होता है कि आश्चर्यचकित रह जाना पड़ता है। सहस्राब्दियों में बन पड़ने वाला काम दशाब्दियों में वर्षों महीनों में सम्पन्न होने लगता है। यह अदृश्य उपक्रम अनायास ही नहीं किसी विशेष योजना एवं प्रेरणा के अंतर्गत होता है। उसके पीछे अव्यवस्था को हटाकर व्यवस्था बनाने का लक्ष्य सन्निहित रहता है।

आँधी तूफान आते हैं तो उड़ती हुई धूल के साथ मुद्दतों का जमा कचरा कहीं से कहीं पहुँच जाता है। खंदक भर जाते हैं और भूमि समतल बनने में इतनी फुर्ती दिखाती है, मानों जो करना है उसे कुछ ही क्षणों में कर गुजरे। रेगिस्तानी टीले पर्वत आज यहाँ, तो कल वहाँ उड़कर पहुँचते प्रतीत होते हैं। घटाटोप बरसते हैं, तो सुविस्तृत थल क्षेत्र जल ही से आपूरित दीख पड़ता है। अस्तव्यस्त झोपड़ों का पता भी नहीं चलता और बूढ़े वृक्ष तेजी से धराशायी होते चले जाते हैं और भी न जाने क्या क्या अजूबे सामने आ खड़े होते हैं, जिनकी कुछ समय पहले तक कल्पना भी न थी। मनुष्य की समाज चेतना जब कभी कुछ विशेष आवश्यकता अनुभव करती है और उसके लिए व्यग्र आतुर होती हे, तो देखा गया है कि नियति भी उसके औचित्य को ध्यान में रखते हुए अपना रुख बदल लेती है और ऐसा कुछ विनिर्मित करने में सहायता करती है, जिसका कि औचित्य समर्थन करता है।

विज्ञान की उमंग उभरी तो दो तीन शताब्दियों में ही रेल, मोटर, जलयान, वायुयान बिजली आदि ने धरती के कोने कोने में अपनी प्रभुता का परिचय देना आरंभ कर दिया। अन्तरिक्ष में उपग्रह चक्कर काटने लगे। रेडियो, टेली-विजन एक अच्छा खासा अजूबा है। राकेटों ने इतनी गति पकड़ ली है कि वे धरती के एक कोने से दूसरे पर जा पहुंचते हैं। रोबोटों ने मानवी श्रम का स्थानापन्न होने की घोषणा की है और कम्प्यूटर मानव मस्तिष्क की उपयोगिता को मुँह बिचका कर चिढ़ाने लगे हैं।

अब वर्तमान पर दृष्टि डालें तो प्रतीत होता हे कि इक्कीसवीं सदी की शुभ संभावनाएँ हरी दूब की तरह अपनी उगती पत्तियों में दीख पड़ने के स्तर तक पहुँच रही है। प्रतिभा परिष्कार की सामयिक आवश्यकता लोगों द्वारा स्वेच्छापूर्वक अपनाये जाने में आनाकानी करने पर भी बसन्त ऋतु के पुष्प पल्लवों की तरह अनायास ही अपने वैभव का परिचय देती दीखती हैं। नस नस में भरी हुई कृपणता और लोभ लिप्सा पर न जाने कौन ऐसा अंकुश लग रहा है जैसे कि उन्नत हाथी पर कुशल महावतों द्वारा काबू पाया जाता है। भागीरथ की, सप्तऋषियों की बुद्ध, शंकर, दयानन्द, विवेकानन्द, गाँधी, विनोबा, की कथाएँ अब कभी प्रत्यक्ष बनकर सामने आ सकेंगी या नहीं, इस शंका आशंका से ग्रसित होते हुए भी नियति की परिवर्तन प्रत्यावर्तन की क्षमता का समापन हो जाने जैसा विश्वास नहीं किया जा सकता। महाकाल की हुँकारें जो दिशाओं को प्रतिध्वनित कर रही हैं, उन्हें अनसुना कैसे किया जाय? युग चेतना के प्रभात पर्व पर उदीयमान सविता के आलोक को किस प्रकार भुलाया जाय? युग अवतरण की संभावना गंगावतरण की तरह अद्भुत तो है, पर साथ ही इस तथ्य से भी इनकार कैसे किया जाय कि जो कभी चरितार्थ हो चुका है, वह फिर अपनी पुनरावृत्ति करने में असमर्थ ही रह जायगा? युग संधि की वर्तमान बेला ऐसी ही उथल पुथल से भरी हुई है। इसमें ज्वार भाटों के उतार चढ़ाव अपने कीर्तिमान स्थापित करने के लिए आतुर हो रहे हैं। इस पर अविश्वासियों को भी विश्वास करने हेतु बाधित होना पड़ेगा। प्रत्यक्ष को असंभव मानते रहने की हठ धर्मिता कितने दिन टिक सकेगी?

अभी दो माह पूर्व के घटनाक्रम पर गौर किया जाय। गाँवों में सत्ता का विकेंद्रीकरण महात्मा गाँधी के आरंभिक दिनों का सपना था। उस पर चर्चाएँ होती-परियोजनाएँ भी समय-समय पर बनती रही हैं। पर यह किसी को भी भरोसा न था कि 1989 के कुछ महीने ही इस संदर्भ में क्रांतिकारी परिवर्तन इतनी सरलता से कर गुजरेंगे। राज्य परिवर्तन खून खराबी के बिना आक्रोश विद्रोह उभरे बिना कहाँ होते हैं? पर समर्थ हाथों से छिनकर सत्ता निर्धनों के -पिछड़ों के हाथों इतनी आसानी से चली जायेगी? यह बात गले के नीचे उतरती नहीं। फिर भी जो प्रत्यक्ष है, उससे इन्कार कैसे किया जाय?

पिछड़ों का सत्ता के स्तर तक पहुँचना असाधारण रूप से समय साध्य और कष्ट साध्य माना जाता है पर पिछड़ों को अशिक्षितों को दमित महिलाओं को इतना आरक्षण मिलना के उन्हीं का बहुमत बन पड़ें इस तथ्य के सही होते हुए भी समझ यह स्वीकार नहीं करती कि यह सब इतनी जल्दी और इतनी सरलता के साथ सम्पन्न हो जायेगा? इसे मानवी अन्तराल का उफान या महाकाल का विधान कुछ भी कहा जाय, तो असंभव लगते हुए भी संभव होने जा रहा है।

इस एक उफान के बाद परिवर्तन की घुड़दौड़ समाप्त हो जायगी, ऐसा कुछ किसी को भी नहीं सोचना चाहिए। नई उमंगे नई घटा की तरह दूरदर्शी आँखें देख सकती हैं कि इसके बाद ही सहकारी आन्दोलन पनपेगा और भ्रष्टाचार की ठेकेदारी अपना रास्ता नापती दीखेगी।

कहा जाता रहा है कि बिचौलिये 94 प्रतिशत डकार जाते है और उपभोक्ता के पल्ले मात्र छै प्रतिशत पड़ पाता है। इतने बड़े व्यवधान से निबटना किस बलबूते पर संभव हो? जिनकी दाढ़ में खून का चस्का लगा है उन्हें किस प्रकार विरत होने के लिए सहमत किया जा सकेगा? इसका उत्तर एक ही है घोड़े के मुँह में लगाई जाने वाली लगाम, ऊँट की नाक में डाली जाने वाली नकेल, बैल को बाधित करने वाली नथ हाथी को सीधी राह चलाने वाले अंकुश की तरह जब सहकारिता के आधार पर अर्थ नियोजन चल पड़ेगा तो वह अँधेरे-गर्दी कहाँ पैर टिकाये रह सकेगी जो प्रगति योजनाओं को निगल-निगल कर मगर की तरह मोटी होती जाती हैं।

राज्यक्रान्ति में पंचायत राज्य के दूरगामी परिणामों को देखते हुए उसे अभूतपूर्व कहा जा सकता है। इसके पीछे-पीछे सट कर चली आ रही सहकारिता क्रान्ति है जिसके सही रूप में चरितार्थ होते ही धन की मध्यस्थों द्वारा हड़प लिये जाने की संभावना लुँजपुँज होकर रह जायगी। भले ही उसका अस्तित्व पूरी तरह समाप्त होने में कुछ देर लगे।

शिक्षा के क्षेत्र में प्रौढ़ शिक्षा गले की हड्डी की तरह अटकी हुई है। जिनके हाथ में इन दिनों समाज की बागडोर है वे .... पेन्शन उपभोक्ता ढेरों हैं। समय की माँग और शर्म विद्यार्थी बालको से लेकर अध्यापकों तक को बाधित करेगी कि वे अपने संपर्क क्षेत्र में किसी को अशिक्षित रहने देने में अपने ऊपर सीधा कलंक अनुभव करेंगे।

हराम की कमाई खाने वालों को जब अपराधी माना जायगा और तिरस्कृत किया जायगा और दूसरी और श्रमशीलों को पुण्यात्मा मान कर उन्हें मान महत्व दिया जायगा तो उस माहौल में उन अपराधियों का पत्ता साफ हो जायगा जो जिस-तिस बहाने समय तो काटते हैं, पर उपार्जन में, अभिवर्धन में योगदान तनिक भी नहीं देते। पाखंडी, अनाचारी, निठल्ले प्रायः इन्हीं लबादों को ओढ़े अपनी चमड़ी बचाये रहते हैं।

परिश्रम की कमाई को ही ब्रह्म समझा जायगा तो फिर दहेज प्रथा, प्रदर्शन, अपव्यय, अहंकार जैसी अनेकों अव्यवस्थाओं की जड़ कट जायगी। कुर्सी में शान ढूंढ़ने वाले तब हथौड़ा और फावड़ा चला रहे होंगे। बूढ़े भी अपने ढंग से इतना कुछ करने लगेंगे जिससे उन्हें अवशा न सहनी पड़े, वरन् किसी न किसी उपयोगी उत्पादन में अपने को खपाकर अधिक स्वस्थ अधिक प्रसन्न और अधिक सम्मानित अनुभव कर सकें। चोरों में कामचोर जब सबसे बुरी श्रेणी में गिने जाने लगेंगे तो श्रम की जो बरबादी आज होती है वह कल न होगी। वैभव बढ़ेगा, स्वास्थ्य, ज्ञान और संतोष भी।

यह क्रान्तियाँ रेलगाड़ी के डिब्बे की तरह एक के पीछे एक दौड़ती चली आ रही हैं। उनका द्रुतगति से पटरी पर दौड़ना हर आँख वाले का दृष्टिगोचर होगा। अवाँछनीय लालच से छुटकारा पाकर औसत नागरिक स्तर का निर्वाह स्वीकार करने वालों के पास इतना श्रम, समय मानस और वैभव बच रहेगा जिसे नवसृजन के लिए नियोजित करने पर इक्कीसवीं सदी के साथ जुड़ी हुई सुखद संभावनाओं की फलित होते इन्हीं दिनों इन्हीं आँखों से प्रत्यक्ष देखो जा सकें। नियति की अभिलाषा है कि मनुष्यों में से अधिकाँश प्रतिभावान उभरें। अपने चरित्र और कर्तव्य से अनेकों को अनुकरण की प्रबल प्रेरणाएं प्रदान करें। प्रतिभा वह नहीं जो दस्युओं, तस्करों और नृशंसों के ऊपर असुरता की तरह चढ़ी रहती है। प्रतिभा परिष्कार का तात्पर्य उस सृजन क्षमता से है जो अग्रिम पंक्ति में रहकर आदर्श की प्रतिष्ठापना के लिए उपहास, व्यंग, लांछन, विरोध जैसे अवरोधों से टकराकर अपनी उत्कृष्टता का पग-पग पर प्रमाण परिचय प्रस्तुत कर सकें।

यह कुछ संकेत हैं, जो युग संधि के इन बारह वर्षों में अंकुर से बढ़कर छायादार वृक्ष की तरह शोभायमान दीख सकेंगे। यह आरंभिक और अनिवार्य संभावनाओं के संकेत हैं। इनके सहारे उन समस्याओं का भार अगले ही दिनों हलका हो जायगा जो विनाशकारी विभीषिकाओं की तरह गर्जन तर्जन करती दीख पड़ती हैं। इतना बन पड़ने से भी उस उद्यान को पल्लवित होने का अवसर मिल जायगा जिस पर अगले दिनों ब्रह्मकमल जैसे पुष्प खिलने और अमरफल जैसे वरदान उभरने वाले हैं।

हममें से प्रत्येक को गिरह बाँध कर रखना चाहिए कि नया भवन बन रहा है। नवयुग की आधार शिला रखी जा रही है। यह होकर रहेगा, भले ही कृपणों का सहयोग उस निमित्त नियोजित न भी हो। स्मरण रखा जाना चाहिए कि अगला समय उज्ज्वल भविष्य के साथ जुड़ा हुआ है। जो इसमें अवरोध बनकर अड़ेंगे, वे मात्र दुर्गति ही सहन करेंगे।

विश्वात्मा ने, परमात्मा ने नवसृजन के संकल्प कर लिए हैं। इसके पूर्ण होकर रहने में संदेह नहीं किया जाना चाहिए। इक्कीसवीं सदी बनाम उज्ज्वल भविष्य का उद्घोष थोथा नारा नहीं है। इसके पीछे महाकाल का प्रबल संकल्प सन्निहित हैं। इसको चरितार्थ होते हुए प्रतिभा परिष्कार के रूप में देखा जा सकेगा। अगले दिनों इस धरित्री रूपी कोयले की खदान में से ही बहुमूल्य मणिमुक्तक उभरते और चमकते दिखाई देंगे।


विश्व पटल पर तेजी से बदलते घटनाक्रम

परिवर्तन की और गतिशील सोवियत रूस

इन दिनों समाचार पत्रों पर दृष्टि डालें तो प्रतीत होगा कि परिवर्तन की एक विश्वव्यापी लहर तेजी से कालचक्र को गतिशील बना रही है। उदाहरण के लिए अफगानिस्तान से फरवरी 89 के अन्त तक रूसी सेनाओं की वापसी को प्रथम चरण के रूप में देखा जा सकता है। विगत 8 वर्षों से टिकी इस सेना जिसका संख्या 15000 से अधिक थी को अफगानिस्तान में डटे देखकर लगता था कि कहीं वह भी एक वियतनाम न बन कर रह गया किन्तु यू.ए.एस.आर. के राष्ट्रपति मिखाईल गोर्बाचेव को श्रेय जाता है कि उनने प्रतिष्ठा का प्रश्न न बना कर अपने सैनिक वापस बुला लिए।

दो और सराहनीय कदम

इसी श्रृंखला में श्री गेर्वाचेय के दो कदम और प्रशंसनीय हैं व लगता है कि इस विश्वनेता की पेरेस्नोइका व ग्लासनोस्ट की नीति क्रमशः पूरे विश्व में तनाव मुक्ति का वातावरण बनाएगी। एक कदम है- मंगेलिया व चीन से लगी अपनी सीमा पर सुरक्षा हेतु तैनात दो लाख से अधिक सैनिक को वापस बुलाकर बैरकों में न भेजकर रचनात्मक कार्यों में लगा देना ताकि रूस से गरीबी हटे व सुरक्षा व्यय कम हो। इस संबंध में चीनी नेताओं के साथ एक संधि पत्र पर हस्ताक्षर कर 18 मई 1989 को इनने एक इतिहास लिख डाला।

दूसरा कदम है अमेरिका की धुड़की से न डरने वाले पश्चिमी जर्मनी के चाँसलर हेलमट कोहल से वह समझौता करना कि वे यूरोप के मोर्चे से हथियारों की कटौती क्रमशः उसी अनुपात में करते जायेंगे, जिस अनुपात में श्री कोहल करेंगे। यह एक क्रान्तिकारी कदम है। इस नाते कि श्री कोहल अमेरिका की अगुआई में बने मोर्चे नाटो सदस्य देश के प्रमुख हैं, द्वितीय विश्वयुद्ध की मुख्य रणभूमि ए जर्मनी के प्रमुख हैं एवं अब अमेरिका के इच्छा के विपरीत संभावित विनाश से राष्ट्र को बचाने के लिए इस संधि पर राजी हो गए हैं, कि हथियारों में तेजी से कटौती कर तनावमुक्ति का माहौल बनायेंगे। प्रेरणा श्री गोर्वाचेय की रही है व क्रियान्वयन श्री कोहला का।

प्रजातंत्र लाने हेतु अहिंसक आंदोलन बीजिंग के छात्रों द्वारा

कभी असंभव सा लगता था कि कम्यूनिज्म के गढ़ चीन में उनके नेताओं के विरुद्ध ही इतनी तीव्र प्रतिक्रिया होगी कि तानाशाही हटाकर प्रजातंत्र को वापस लाने के लिए लाखों की संख्या में विश्व विद्यालय के छात्र यहाँ के प्रमुख केन्द्र तिआननमेन स्क्वेयर में एकत्र होकर अनशन पर उतारू हो जायेंगे। मई के मध्य में इन विद्यार्थियों ने बढ़ते भ्रष्टाचार एवं निरंकुशवाद के खिलाफ कड़ा संघर्ष करने के लिए कमर कस ली एवं इस सीमा तक अहिंसक प्रतिरोध पर उतर आए कि स्वयं राष्ट्रपति व महासचिव को उन्हें यह आश्वासन देना पड़ा कि वे दमन की कोई कार्यवाही तब तक नहीं करेंगे जब तक छात्र अपनी ओर से शान्त हैं। लाखों छात्र इन पंक्तियों के लिखे जाने तक बीजिंग के इस चालीस हेक्टेयर चौड़े में अनशन पर बैठे हैं। इससे लगता है कि पूरे विश्व में किस तेजी से युग परिवर्तन की प्रक्रिया गति पकड़ रही है।

एक आदर्श उदाहरण हालैंड

85 करोड़ की आबादी वाला भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है लेकिन लोकताँत्रिक व्यवस्था में आचरण कितना आदर्श होना चाहिए- वह मात्र डेढ़ करोड़ की आबादी वाले समृद्ध यूरोपीय देश नीदरलैंड (हालैंड) ने एक नमूना प्रस्तुत करके दर्शाया है। पर्यावरण प्रदूषण की समस्याओं के प्रति सचेत इस छोटे राष्ट्र में प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों व कारों पर कर लगने में असफल रहने पर श्री टैण्ड लुयर्स की सरकार ने पिछले दिनों नैतिक आधार पर त्याग दे दिया, यद्यपि वे ऐसा करने को विवश न थे। अन्तर्राष्ट्रीय पर्यावरण के लिए सचेत व सक्रिय संगठनों व राष्ट्रों को इससे क्या कोई प्रेरणा नहीं मिलती?

भारत हथियार घटायेगा। नैतिकता के क्षेत्र में अगुआई करेगा

यह भविष्यवाणी है- 1962 में शान्ति के लिए नोबेल पुरस्कार प्राप्त श्री लिनीस पाँलिंग की, जिनकी एक पुस्तक आय.सी.सी.आर. ने पिछले दिनों प्रकाशित की है-”साइंस एण्ड वर्ल्ड पीस”। वे लिखते हैं कि यद्यपि पिछले दो दशकों में भारत ने सैन्य शक्ति बढ़ायी है पर वह अब क्रमशः अस्त्रों व सुरक्षा बलों को घटाकर अन्यान्य राष्ट्रों का नेतृत्व ही नहीं करेगा, मोरेलिटी (नीति) एवं सेनिटी (विवेकशीलता) के क्षेत्र में भी शेष विश्व का नेतृत्व करेगा।

*समाप्त*