आपके जीवन में कोई दुःख है तो समझिये कि आपके साथ कोई निर्बलता अवश्य बँधी हुई है। शरीर की कमजोरी से रोग घेरते, मानसिक कमजोरी से चिन्तायें सताती हैं। अपनी बौद्धिक क्षमतायें दुर्बल पड़ी हों तो यह निश्चित है कि आप पराधीनता के पाश में जकड़े होंगे। अपनी उन्नति के लिए किसी और की गाँठ टटोल रहे होंगे। साँस्कृतिक, सामाजिक और राष्ट्रीय दृष्टि से जो जातियाँ संगठित नहीं होती, उन्हें ही बाहरी आक्रमण सताते हैं। कैसी भी हों दुर्बलतायें ही नारकीय यन्त्रणाओं का कारण होती हैं। इसीलिये निर्बलता पाप है। पापी व्यक्ति की तरह निर्बलों को भी पृथ्वी पर सुख से जीने का अधिकार प्रकृति नहीं देती है।
ऐश्वर्य की इस संसार में कोई कभी नहीं सम्पदायें और विभूतियाँ पग-पग पर बिछी पड़ी हैं। सुखोपभोग के साधनों के लिए भटकना नहीं पड़ता। शर्त इतनी है कि आपके पास उन्हें प्राप्त करने और उपभोग करने का बल और शक्ति भी है अथवा नहीं। यदि आप निर्बल हैं तो आपके पास की रही सही सम्पत्ति और विभूतियाँ भी छिनने ही वाली हैं। इसीलिए श्रुति कहती है-”बैलमुपास्व” अर्थात् बल की उपासना करो। शक्ति के अभाव में ही पाप पनपते हैं, इसलिये यदि आप शक्तिशाली नहीं हैं तो कितना ही ईश्वर भक्त क्यों न हों, पाप की वृद्धि के आप भी भागीदार हैं।
चाहे अपनी भलाई के लिए अथवा संसार के कल्याण के लिए, शक्ति जीवन की अनिवार्य आवश्यकता है, इसलिये सर्वप्रथम शक्ति का संचय करें। उसी से सुख-संपत्ति, ऐश्वर्य तथा पारलौकिक हित की रक्षा कर सकेंगे।
“श्रावस्ती नरेश चन्द्रचूड़ आपका दर्शन करना चाहते हैं भगवन्। सुना है, अनेक धर्म, अनेक सम्प्रदायों की परस्पर विरोधी मान्यताओं के कारण राजन् अत्यधिक विभ्रमित हैं। कल्याणप्रद धर्म को जानने की जिज्ञासा ही उन्हें आपके दर्शनार्थ खींचकर लाई है! आर्य आदेश हो तो उन्हें आपके सम्मुख उपस्थित करूं?” एक भिक्षुक ने भगवान् बुद्ध से निवेदन किया।
तब वे श्रावस्ती के एक सघन एकान्त में बने संघाराम में विश्राम कर रहे थे।
तथागत मुस्कराये और भिक्षुक की ओर एक खोजपूर्ण दृष्टि डालते हुए बोले-”तात! चन्द्रचूड़ महान् धर्मात्मा सम्राट हैं उन्हें शीघ्र ही यहाँ लेकर आओ।”
भिक्षुक चला गया। थोड़ी ही देर में महाराज चन्द्रचूड़ तथागत भगवान बुद्ध के समीप आ पहुँचे। देवमूर्ति को मंगल प्रणाम निवेदन कर वे एक सामान्य अभ्यागत की भाँति एक ओर बैठ गये। जिज्ञासु की उपयुक्त श्रद्धा ही साधक के अन्तःकरण में सत्य का प्रकाश लाती है। श्रद्धा अर्थात् समर्पण-अपने मन को कोरा कागज बनाकर प्रस्तुत करना ताकि सत्य का प्रतिबिम्ब उसमें यथावत् झाँक सके। भगवान् महाराज की विनम्रता से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सके। पर उन्हें इस बात का हार्दिक दुःख भी हुआ कि व्यक्ति की श्रद्धा का तथाकथित स्वार्थ और सम्प्रदायवादी साधु-सन्त किस तरह शोषण करते हैं। श्रद्धा से सत्य की प्राप्ति होती है सन्देह नहीं किन्तु बुद्धिहीन श्रद्धा-जहर मिले दूध की तरह अभिशाप भी है जो शिष्य और मार्गदर्शक दोनों का ही अहित करती है।
बात थोड़ी टेड़ी थी। चन्द्रचूड़ का समाधान-सारी प्रजा का समाधान हो सकता था, इसलिए बात इस ढंग से समझानी आवश्यक थी, जिससे चन्द्रचूड़ को मतमतान्तरों का वितण्डावाद फिर विभ्रमित नहीं कर पाता और उनकी श्रद्धा का विनाश भी बच जाता। दिग्भ्रान्त बुद्धि ही नास्तिकता है वे यह बात जानते थे। अतएव जिज्ञासु का समुचित समाधान आवश्यक ही नहीं अनिवार्य भी था।
तब तो उन्होंने महाराज के विश्राम की व्यवस्था कराई और सामान्य कुशल मंगल की चर्चा तक ही विचार-विमर्श सीमित रखा किन्तु जैसे ही प्रातःकाल हुआ संघाराम में निवास करने वाले स्नातक-अभ्यागत यह देखकर आश्चर्यचकित रह गये कि-वहाँ प्रातःकाल से ही एक मोटा, बलवान् हाथी खड़ा है और एक ओर श्रावस्ती के अनेक जन्मान्ध बैठे हुए कुछ चर्चा कर रहे हैं।
महाराज चन्द्रचूड़ को साथ लेकर तथागत वहाँ जा पहुँचे, उन्होंने अन्धों से प्रश्न किया-”बान्धव! आप लोगों ने हाथी देखा है क्या”? “नहीं भगवन्”-सबने करबद्ध एक स्वर से निवेदन किया। ठीक है कहकर बुद्ध ने एक-एक अन्धे को हाथी दिखाया। हाथ से टटोलते हुए किसी किसी ने हाथ की पीठ, किसी ने सूंड, किसी ने कान, दाँत तथा पाँव को देखकर ही उन्होंने उसी अंग को हाथी समझा तथा यह जानकर बड़े प्रसन्न हुये कि आज उनकी हाथी से पहचान हो गई।
अब तथागत ने प्रश्न किया-”बताइये हाथी कैसा होता है”? एक ने उत्तर दिया खम्भे की तरह-उस बेचारे ने हाथी के पाँव स्पर्श किये थे-तो कान वाले ने हाथी की आकृति सूप जैसी बताई-पूँछ वाले ने उसे रज्जौयथा बताया सिर वाले ने पत्थर के समान यह सब सुनते ही महाराज चन्द्रचूड़ हँस पड़े और बोले भगवन्! यह सब तो हाथी के किसी अंग भर की जानकारी दे रहे हैं, हाथी तो इन सब जानकारियों से मिली-जुली आकृति का होता है। भगवान बुद्ध ने कहा-”तात! धर्म का सनातन स्वरूप भी ऐसा ही है। मत-मतान्तर एक-एक अंग की समीक्षा, प्रशंसा और प्रचार करते हैं। उनसे घबड़ाने की आवश्यकता नहीं उन सबके समन्वय में ही धर्म का मर्म छिपा हुआ है। उठो! अपनी विवेक बुद्धि से हर ग्रन्थ, हर पन्थ को टटोलो तो सत्य धर्म का स्वरूप अपने आप प्रकट हो जायेगा।”
विश्व इतिहास में कितनी ही ऐसी महाक्रान्तियाँ हुई हैं, जो चिरकाल तक स्मरण की जाती रहेंगी और लोकमानस को महत्वपूर्ण तथ्यों से अवगत कराती रहेंगी। छिटपुट उलट पुलट तो सामयिक तथा क्षेत्रीय समस्याओं के समाधान हेतु होती ही रहती है, पर विश्लेषण और विवेचन उन्हीं का होता है जिनमें व्यापकता के साथ साथ प्रवाह परिवर्तन भी जुड़ा होता है। ऐसी घटनायें ही महाक्रान्तियाँ कहलाती हैं।
पौराणिक काल का समुद्र मंथन, वृत्रासुरवध, गंगावतरण, हिरण्याक्ष के बन्धनों से पृथ्वी की मुक्ति परशुराम द्वारा कुपथगामियों का ब्रेन-वाशिंग आदि ऐसी ही महान घटनाओं को प्रमुख माना जाता है, जिनने कालचक्र के परिवर्तन में महान भूमिका निभाई, ऐसा कहा जा सकता है। अन्य देशों के मिथकों में भी ऐसे ही मिलते जुलते अलंकारिक वर्णन हैं। यदि वे सब सही हैं तो मानना होगा कि महाक्रान्तियों का सिलसिला चिरपुरातन है।
इतिहास काल में भी कुछ बड़े शक्तिशाली परिवर्तन हुए हैं, जिनमें रामायण प्रसंग, महाभारत आयोजन और कुछ बुद्ध का धर्मचक्र प्रवर्तन प्रमुख हैं लंकाकाण्ड के उपरान्त रामराज्य के साथ सतयुग की वापसी संभव हुई। महाभारत काल के उपरान्त भारत को विशाल भारत-महान भारत बनने का लक्ष्य पूरा हुआ। बुद्ध के धर्मचक्र प्रवर्तन से तत्कालीन वह विचारक्रान्ति सम्पन्न हुई जिसकी चिनगारियों ने अगणित क्षेत्रों के अगणित प्रसंगों को ऊर्जा और आभा से भर दिया। वह दावानल अनेक मंचों, धर्म सम्प्रदायों, सन्त, समाज-सुधारकों और शहीदों के रूप में पिछली शताब्दी तक अपनी परम्परा को विभिन्न रूपों में कायम रखे रहा। प्रजातंत्र और साम्यवाद की सशक्त नई विचारणा इस प्रकार उभरी जिसने लगभग समूची विश्ववसुधा को आन्दोलित करके रखा दिया। पिछली क्रान्तियों के संदर्भ में इतने ही संकेत पर्याप्त होने चाहिए, जिनसे सिद्ध होता है कि मनीषा जब भी आदर्शवादी ऊर्जा से अनुप्राणित होती है, तो अनेकों सहचरों को खींच बुलाती है और वह कार्य कर दिखाती है जिसे आमतौर से मानवी कहना, गले न उतरने पर दैवी अनुग्रह की संज्ञा दी जाती है। पुरातन कालों के ऐसे ही महान परिवर्तनों के साथ जुड़े हुए झंझावातों को अवतार की संज्ञा देकर संतोष कर लिया जाता है। असंभव को संभव कर दिखाने वाले महा पराक्रमों को मनीषा की प्रखरता भी जनसहयोग के सहारे सम्पन्न कर सकती है, इसे सामान्य स्तर का जनसमुदाय स्वीकार भी तो नहीं करता।
पिछले महान परिवर्तनों को युगान्तर या युग-परिवर्तन भी कहा जाता रहा है। इन दिनों ऐसे ही प्रचण्ड प्रवाह के अवतरण का समय कहा जा सकता है, जिसे पिछले समस्त परिवर्तनों की संयुक्त शक्ति का एकात्म समीकरण कहा जा सकता है। पिछले परिवर्तनों में कितना समय लगता रहा है, इसके संबंध में सही विवरण तो उपलब्ध नहीं, पर वर्तमान महाक्रान्ति का स्वरूप समग्र रूप से परिलक्षित होने में प्रायः सौ वर्ष का समय महत्वपूर्ण होगा। यों उसका तारतम्य पहले से भी चल रहा है और पूरी तरह चरितार्थ होने के बाद भी कुछ समय और लगेगा।
अपने समय का महा-परिवर्तन “युगान्तर” के नाम से जाना जा सकता है। युग परिवर्तन की प्रस्तुत प्रक्रिया का एक ज्वलन्त पक्ष तब देखने में आया, जब प्रायः दो हजार वर्षों से चले आ रहे आक्रमणों-अनाचारों से छुटकारा मिला। शक, हूण, कोल, किरात, यवन लगातार इस देश पर आक्रमण करते रहे हैं। यहाँ का वैभव बुरी तरह लुटता रहा है। विपन्नता ने इतना पराक्रम भी शेष नहीं रहने दिया था, कि आक्रान्ताओं को उल्टे पैरों लौटाया जा सके। फिर भी महा-क्रान्ति ने अपना स्वरूप प्रकट किया। दो विश्व युद्धों ने अहंकारियों की कमर तोड़ दी और दिखा दिया कि विनाश पर उतारू होने वाली कोई भी शक्ति नफे में नहीं रह सकती। दोनों महायुद्धों का विनाश-विवरण सामने है, पर उससे भी बढ़ कर विधेयक पक्ष उभर कर ऊपर आया। भारत ने लम्बे समय से चली आ रही राजनैतिक पराधीनता का जुआ देखते-देखते उतार फेंका। दावानल इतने तक ही रुका नहीं। अफ्रीका महाद्वीप के अधिकाँश देश साधारण से प्रयत्नों के सहारे स्वतंत्र हो गये। इसके अतिरिक्त छोटे-छोटे द्वीपों तक ने राजनैतिक स्वतंत्रता प्राप्त की ली।
इसी बीच सामाजिक क्रान्ति का किसी क्षेत्र विशेष तक सीमित परिवर्तन नहीं हुआ वरन् उसने समस्त विश्व को प्रभावित किया। दास-दासियों की लूट-खसोट और खरीद फरोख्त बन्द हुई। इतने पुराने प्रचलन को इतनी तेजी से उखाड़ना संभव हुआ, मानो किसी बड़े तूफान ने सब कुछ उलट-पुलट कर रख दिया हो। राजतंत्र का संसार भर में बोल-बाला था। सामंतों की सर्वत्र तूती बोलती थी। अमीर-उमरा और जमींदार ही छत्रप बने हुए थे। वे न जाने किस हवा के झोंके के साथ टूटी पतंग की तरह उड़ गये। वैभव के प्रतीक विशालकाय और लोहे जैसे सुदृढ़ स्तर के दुर्ग अब केवल खण्डहरों की तरह किसी समय की स्थिति का परिचय मात्र देते हैं। स्त्री और शूद्र के रूप में तीन चौथाई जनता, किसी प्रकार अपने मालिकों के अनुग्रह पर निर्भर रह कर जीवन-यापन भर के साधन मात्र स्वीकार कर लेने पर काम चलाऊ मात्रा में जीवन यापन कर पाती थी। वह स्थिति अब कहाँ रही? “नर और नारी एक समान”, “जाति वंश सब एक सामान” का निर्धारण प्रायः विश्व के अधिकाँश भागों में सिद्धान्ततः स्वीकार कर लिया गया है। व्यवहार में उतरते-उतरते कुछ समय तो लग रहा है और कठिनाई भी अड़ रही है, पर देर सबेर में यह समस्या भी पूरी तरह सुलझ जायेगी। समय की बदलती हुई चाल को देखते हुए विश्वास किया जा सकता है।
यह सारे परिवर्तन प्रायः इसी बीसवीं शताब्दी में सम्पन्न हुए हैं, जबकि इन प्रतिगामिताओं को जड़ जमाने में हजारों वर्ष लग गये थे।
भूतकाल की समीक्षा आसानी से बन पड़ती है, क्योंकि तथ्यों की रूपरेखा बन चुकी होती है और प्रमाणों का संकलन क्रमबद्ध रूप से हो चुका होता है। वर्तमान का आकलन कठिन पड़ता है क्योंकि बिखरा हुआ होता है और अपरिपक्व स्थिति में भी। फिर भी जो परिस्थितियों का आकलन और पर्यवेक्षण कर सकते हैं, वे देखते हैं कि इन दिनों भी परिवर्तन का प्रवाह कम तीव्र गति नहीं अपनाये हुए है।
कठिनाई एक ही अड़ गई है कि विज्ञान, बुद्धिवाद ने तात्कालिक लाभ को प्रमुखता देना और दूरदर्शिता की उपेक्षा करना एक प्रकार का दुराग्रह बना लिया है। इस आवेश के सामने आदर्शवादिता का पक्ष अपनी उपयोगिता और प्रामाणिकता पूरी तरह प्रस्तुत नहीं कर पा रहा है। तात्कालिक लाभ उठाने का प्रचलन इतना अधिक कार्यान्वित होने लगा कि मानवी गरिमा के उपयुक्त आदर्श उपस्थित करने वाले उदाहरण कठिनाई से ही जहाँ-तहाँ दीख पड़ते हैं। इस निराशा ने यह मान्यता बना दी है कि संकीर्ण स्वार्थपरता ही व्यावहारिक और लाभदायक है। भले ही उसके लिए कितने ही छल, प्रपंच, अनाचार, आतंक आदि का सहारा क्यों न लेना पड़े।
भवितव्यता उत्कृष्टता का पक्ष लेते हुए उसे फलित करने का वातावरण बना रही है, पर निहित स्वार्थों का समुदाय इतना बड़ा बन और बढ़ गया है कि उसे हटाना और उखाड़ना सहज नहीं दीख पड़ रहा है। बुझता हुआ दीपक पूरी लौ उठाता है। रात्रि के अन्तिम चरण में अँधेरा सबसे अधिक गहरा होता है। हारता जुआरी दूना दुस्साहस अपनाता है। “मरता सो क्या न करता” वाली उक्ति ऐसे ही समय पर चरितार्थ होती है। वैसा ही इन दिनों भी हो रहा है। नीति और अनीति के बीच इन दिनों घमासान युद्ध हो रहा है। कुहराम और धकापेल का ऐसा माहौल है जिसमें सूझ नहीं पड़ता कि आखिर हो क्या रहा है? इस आँख मिचौनी में धूप छाँह में किसे पता चल पा रहा है कि हो क्या रह है? इतने पर भी अदृश्य को देख सकते हैं, वे सुनिश्चित आधारों के सहारे विश्वास करते हैं कि सृजन ही जीतता है। विजय सत्य की ही होती है। अतः उज्ज्वल भविष्य का दिनमान उदय होकर रहेगा और आँखों को धोखे में डालने वाला तम मिटेगा।
महा-क्रान्ति के वर्तमान दौर में क्या हो रहा है? क्या होने जा रहा है? क्या बन रहा है? क्या बिगड़ रहा है? इसका ठीक तरह-सही स्वरूप देख पाना सर्वसाधारण के लिए संभव नहीं? दो पहलवान जब अखाड़े में लड़ते हैं तो दर्शकों को ठीक तरह पता चल नहीं पाता कि कौन हार रहा है और कौन जीतने जा रहा है? पर यह असमंजस अधिक समय नहीं रहता। वास्तविकता सामने आकर ही रहती है। वर्तमान में बिगाड़ होता अधिक दीखता है और सुधार की गति धीमी प्रतीत होती है फिर भी प्रवाह की गति को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि हम पीछे नहीं हट रहे, आगे ही बढ़ रहे हैं। अनौचित्य का समापन और औचित्य का अभिवर्धन ही निष्कर्ष का सार संक्षेप है।
भविष्य का सुनिश्चित निर्धारण तो नहीं हो सकता क्योंकि मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप है, वह उसे बना भी सकता है और बिगाड़ भी। बदलती हुई परिस्थितियाँ भी पासा पलट सकती हैं। इतने पर भी अनुमान और आकलन यदि सही हो तो संभावना की पूर्व जानकारी का अधिकतर पता चल जाता है। इसी आधार पर संसार की अनेक योजनाएँ बनती और गतिविधियाँ चलती हैं। यदि भावी अनुमान के संबंध में स्थिति सर्वथा अनिश्चित रहे तो किसी महत्वपूर्ण विषय पर कुछ सोच सकना ही संभव न होगा। अग्रगमन की दिशा में कदम भी न उठ सकेंगे।
यह महाक्रांति की बेला है, युग परिवर्तन की भी। अशुभ की दिशा से शुभ की ओर प्रयाण चल रहा है। प्रवाह बह रहा हे। तूफान की दिशा और गति को देखते हुए अनुमान लगाया जा सकता है कि वस्तुओं को किस दिशा में धकेला और बढ़ाया जाता है। नदी के प्रवाह में गिरे हुए झंखाड़ बहाव की दिशा में ही दौड़ते चले जाते हैं। तूफानों की जो दिशा होती है उसी में तिनके पत्ते और धूलि कण उड़ते चले जाते हैं। महाक्रान्ति सदा सृजन और संतुलन के निमित्त उभरती है। पतन और पराभव की विडम्बनाएँ तो कुसंस्कारी वातावरण आये दिन रचती रहती हैं। पेड़ पर लगा हुआ फल नीचे की ओर गिरता है। पानी भी ढलान की ओर बहकर निचाई की ओर चलता जाता है। किन्तु असंतुलन को संतुलन में बदलने के लिए जब महाक्रान्तियाँ उभरती हैं तो उसका प्रभाव-परिणाम ऊर्ध्व गमन, उत्कर्ष, अभ्युदय ही होता है। इसलिए उन्हें ईश्वरेच्छा या भगवान का अवतार भी कहा जाता है। उस उभार को देखते हुए यह सहज विश्वास किया जा सकता है कि भविष्य उज्ज्वल है। हम सब शान्ति और प्रगति का लक्ष्य पाने की दिशा में चल रहे हैं। प्राप्त करके भी रहेंगे।
तीन शक्तियों की प्रभुता और महत्ता सर्व विदित है (1) बुद्धिबल जिसमें विज्ञान और साहित्य कला भी सम्मिलित हैं, (2) शासन-सत्ता, उसके साथ जुड़े हुए साधन और अधिकारी भी, (3) धनशक्ति, जिसमें उद्योग व्यवसाय, निजी संग्रह एवं बैंक आदि को सम्मिलित किया जाता। देखा जाता है कि इन्हीं तीनों के सहारे छोटे बड़े, भले-बुरे सभी काम सम्पन्न होते हैं, प्रगति एवं अवगति का श्रेय इन्हीं तीन शक्तियों को मिलता है। सरस्वती, लक्ष्मी, काली के रूप में इन्हीं की पूजा भी होती है। जन-साधारण की इच्छा अभिलाषा इन्हीं को प्राप्त करने में आतुर रहती है। बड़प्पन की यही तीन कसौटियाँ इन दिनों बनी हुई हैं। इनके सहारे वह सब कुछ खरीदा जाता है जो इच्छानुकूल सुविधा साधन अर्जित करने के लिए आवश्यक प्रतीत होता है।
इन तीनों में भी इन दिनों धन का वर्चस्व और भी अधिक है। उसके सहारे अन्य दो को खरीदा जाता है। ऐसे लोग कम ही हैं जो प्रलोभन की उपेक्षा करते और सिद्धान्त पर अड़े रहकर स्वल्प सुविधा साधनों से काम चलाते हैं और कीचड़ के तालाब में कमलवत् मानवी गरिमा को अक्षुण्ण बनाये रहते हैं।
नवयुग के अवतरण में चौथी उस शक्ति का उदय होगा जो अभी भी किसी प्रकार कहीं कहीं जीवित है, पर उसका वर्चस्व कहीं कहीं कभी-कभी ही दीख पड़ता है। इसी की दुर्बलता अथवा न्यूनता के कारण अनेकानेक विकृतियाँ उग पड़ी हैं और उनने जलकुम्भी की तरह जलाशयों को अपने प्रभाव से आच्छादित करक वातावरण को अवाँछनीयता से घेर लिया है।
इस चौथी शक्ति का नाम है “प्रखर-प्रतिभा” सामान्य प्रतिभा तो बुद्धिमानों, क्रिया कुशलों, व्यवस्थापकों और पराक्रम परायणों में भी देखी जाती है। इनके सहारे वे प्रचुर सम्पदा कमाते, यशस्वी बनते और अनुचरों से घिरे रहते हैं। आतंक उत्पन्न करना भी इन्हीं के सहारे संभव होता है। छद्म अपराधों की एक बड़ी श्रृंखला भी चलती है। इस सामान्य प्रतिभा से सम्पन्न अनेकों व्यक्ति देखे जाते हैं और उसके बल पर बड़प्पन का सरंजाम जुटाते हैं। तत्काल उसे हुण्डी की तरह भुना लिया जाता है। अच्छे वेतन पर अधिकारी स्तर का लाभदायक काम उन्हें मिल जाता है, किन्तु प्रखर प्रतिभा की बात इससे सर्वथा भिन्न है। प्रखरता से यहाँ तात्पर्य आदर्शवादी उत्कृष्टता से लिया जाना चाहिए। सज्जन और समर्पित संत इसी स्तर के होते हैं। कर्तव्य क्षेत्र में वे सैनिकों जैसा अनुशासन पालन करते हैं। देवमानव इन्हीं को कहते हैं। महामानव युगपुरुष आदि नामों से भी इस स्तर के लोगों का स्मरण किया जाता है।
इनमें विशेषता उच्चस्तरीय भाव संवेदनाओं की होती है। श्रद्धा, प्रज्ञा और निष्ठा जैसे तत्व उन्हीं में देखे पाये जाते हैं। सामान्य प्रतिभावान मात्र धन, यश या बड़प्पन का अपने निज के हेतु अर्जन करते रहते हैं। जिसे जितनी सफलता मिल जाती है वह अपने को उतना ही बड़ा मानता है। लोग भी उसी से प्रभावित होते हैं। उसके सहारे कुछ उपलब्ध कर लेने की इच्छा से अनेकों चाटुकार पीछे फिरते हैं। अप्रसन्न होने पर वे अहित कर सकते हैं। इसलिए भी कितने ही उनका दबाव मानते हैं और इच्छा न होने पर भी सहयोग करते हैं। यह सामान्य प्रतिभा का विवेचन है।
प्रखर प्रतिभा संकीर्ण स्वार्थपरता से ऊँची उठी होती है। उसे मानवी गरिमा का ध्यान रहता है। उसमें आदर्शों के प्रति अनन्य निष्ठा का समावेश रहता है। लोक मंगल और सत्प्रवृत्ति-सम्वर्धन में उसे उतनी ही रुचि रहती है। जितनी कि किसी लालची में किसी भी कीमत पर इच्छापूर्ण करने के लिए आतुरता पाई जाती है।
प्रखर प्रतिभा का दिव्य अनुदान एक प्रकार से दैवी अनुग्रह गिना जाता है। जबकि सामान्य लोगों को लोभ मोह के बन्धनों से क्षण भर के लिए भी छुटकारा नहीं मिलता तब प्रखर प्रतिभा-सम्पन्न लोग जन समस्याओं पर ही विचार करते और उनके समाधान की योजना बनाते रहते हैं। भावनाएँ उभरने पर मनुष्य बड़े से बड़ा त्याग और पुरुषार्थ कर दिखाने में तत्पर हो जाता है। ऐसे लोग असफल रहने पर शहीदों में गिने और देवताओं की तरह पूजे जाते हैं। यदि वे सफल होते हैं तो इतिहास बदल देते हैं। प्रवाहों को उलटना उन्हीं का काम होता है। मनुष्य शक्ति का पुँज है। उसकी बर्बादी तो लिप्सा, लालसा के क्षुद्र प्रयोजनों में होती रहती है। पर यदि कोई सामान्य स्तर का व्यक्ति भी लोक कल्याण के महान प्रयोजनों में जुट जाता है तो फिर उसका अनवरत श्रम चींटी के गिरि-शिखर पर जा पहुँचने का उदाहरण बनता है।
आकाश बहुत बड़ा है पर उसमें सीमित संख्या में ही तारे चमकते दिखाई पड़ते हैं। उसी प्रकार जनसमुदाय को पेट-प्रजनन के अतिरिक्त और कुछ सोचते करते नहीं बन पड़ता किन्तु जिन पर दैवी अनुकम्पा की तरह प्रखर प्रतिभा अवतरित होती है उनका क्रियाकलाप ऐसा बन पड़ता है जिसका चिरकाल तक असंख्यों द्वारा अनुकरण अभिनन्दन होता रहे। भावुक जन इन्हीं को देवदूत, युग अवतार आदि नामों से पुकारते हैं।
साहित्य सत्संग, प्रेरणा परामर्श आदि द्वारा भी सन्मार्ग पर चलने का मार्गदर्शन मिलता है पर वह सब गले उन्हीं के उतरता है, जिनके अन्दर भाव संवेदनाएँ पहले से ही जीवित हैं। उनके लिए थोड़ी सी प्रेरणा भी क्रान्तिकारी परिवर्तन कर देती है। सीप में जल की एक बूँद ही मोती उत्पन्न कर देती है पर रेत में गिरने पर वह अपना अस्तित्व ही गवाँ बैठती है। यही बात आदर्शवादी परमार्थों के सम्बन्ध में भी है। कई बार तो उपदेशकों तक की करनी कथनी में जमीन आसमान जैसा अन्तर देखा पाया जाता है। भावनाओं की प्रखरता रहने पर व्यक्ति अपने व्यस्त कार्यों में से भी समय और मनोबल निकाल लेता है जिससे अपनी सदाशयता को खाद पानी देकर बढ़ाता रहे और संपर्क में अपने वालों को भी अपने परामर्शों के साथ गहन भाव-संवेदनाओं का समन्वय करके इतना प्रभावित कर सके कि उनके लिए भी कुछ कर गुजरने में रुकना कठिन पड़े।
आम लोग व्यस्तता का बहाना बनाकर युगधर्म के निर्वाह में असमर्थता बताते रहते हैं पर बात वस्तुतः ऐसी है नहीं। निर्वाह के लिए अनेकों समाधान निकल सकते हैं। अपनी पूर्व मान्यता पर अड़े रहना और उसी तरह हल निकालने और समय की पुकार पर कदम न बढ़ाने का हठ हो तो समझना चाहिए कि गाड़ी ऐसे खड्ड में गिर गई जहाँ से उसका निकलना कठिन है। अन्यथा विचार करने पर संचित सम्पदा से लेकर परिवार के अन्य साथियों के काम में लगाने जैसे अनेकों मार्ग ऐसे निकल सकते हैं जिनके सहारे शरीर और परिवार के गुजारे के साधन जुटते रहें और साथ ही युगधर्म के परिपालन की दिशा में भी बहुत कुछ करते बन पड़े। अविवाहित रहने पर भी तो हर कोई युगधर्म के परिपालन में बहुत कुछ कर सकता है। रिटायर्ड लोगों को पूरा समय मिलता है। अन्य कितने ही व्यक्ति ऐसे होते हैं जो घर के आवश्यक काम निबटाने के बाद भी ढेरों समय पाते हैं जिसे आलस्य प्रमाद में गँवाने की अपेक्षा अपने निकटवर्ती क्षेत्र से ही सृजन प्रयोजनों में लगकर साथी सहयोगियों की सहायता से आश्चर्यजनक युग साधना सम्पन्न कर सकते हैं।
सूक्ष्म जगत में भी कई बार समय समय पर ज्वार भाटे जैसे उतार चढ़ाव आया करते हैं। कभी स्वार्थी, लालची, अपराधी, क्रूरकर्मी समाज में बढ़ जाते हैं। स्वयं तो कुछ लाभ उठा भी लेते हैं पर प्रभाव क्षेत्र के अन्य अनेकों का सर्वनाश करते रहते हैं इसे आसुरी प्रवाह प्रचलन कहा जा सकता है। पर जब प्रवाह बदलता है तो उच्च आत्माओं की भी कमी नहीं रहती। एक जैसे विचार ही असंख्यों के मन में उठते हैं और उन सब की मिली जुली शक्ति से सृजन स्तर के कार्य इतने अधिक और इतने सफल होने लगते हैं कि दर्शकों को इसका अवलोकन करके आश्चर्यचकित रह जाना पड़ता है। उसे दैवी प्रेरणा कहने में भी कुछ अत्युक्ति नहीं है।
इक्कीसवीं सदी में नई दुनिया बनाने जैसा कठिन कार्य किया जाना है। इसके लिए प्रचुर परिमाण में प्रखर प्रतिभा का उफान तूफान आना है। अनेक व्यक्ति उस संदर्भ में कार्य करेंगे। आँधी तूफान आने पर पत्ते तिनके और धूलि कण तक आकाश तक जा पहुँचते हैं। दैवी प्रेरणा का अदृश्य प्रवाह इन्हीं दिनों ऐसा आवेगा जिसमें सृजन सैनिकों की विशालकाय सेना खड़ी दिखाई देगी और उस प्रकार के चमत्कार करेगी जैसे कि खण्डहर बने जापान को वहाँ के निवासियों ने अणु बम गिरने के बाद भी अपने देश को पहले से भी कहीं बेहतर बना लिया है। रूस, जर्मनी आदि ने भी कुछ ही दशाब्दियों में क्या से क्या चमत्कार कर दिखाये उसे अद्भुत ही कहा जा सकता है और इतिहास में अनुपम भी। सृजन शिल्पी इसी प्रकार संसार के कोने कोने में प्रकट होंगे। प्रखर प्रतिभा वे दैवी अनुकम्पा के रूप में अनायास ही प्राप्त करेंगे। प्रवाह कुछ ऐसा चलेगा जिसमें हर प्रतिभाशाली के लिए सृजन, सुधार और परिवर्तन ही रुचि का विषय रह जायगा।
दुर्बुद्धि ने पिछली एक शताब्दी में कितना कहर ढाया है, यह किसी से छिपा नहीं है। दो विश्व युद्ध इसी शताब्दी में हुए। प्रदूषण इतना बढ़ा जितना कि लाखों-वर्षों में भी बढ़ नहीं पाया था। वन बिस्मार हुए। रेगिस्तान बढ़े। अपराधों की बढ़ोत्तरी ने कीर्तिमान स्थापित किया। मद्य, माँस और व्यभिचार ने पिछले रिकार्ड तोड़ दिये। जन संख्या में बढ़ोत्तरी भी अद्भुत क्रम से हुई। जन-साधारण का व्यक्तिगत आचरण लगभग भ्रष्टाचार स्तर पर जा पहुँचा और भी न जाने ऐसा क्या क्या हुआ जिसकी चर्चा सुनकर यही कहना पड़ता है कि मनुष्य क तथाकथित वैज्ञानिक बौद्धिक और आर्थिक प्रगति से समस्याएँ, विपत्तियाँ और विभीषिकाएँ ही खड़ी कीं। आश्चर्य होता है कि प्रायः एक शताब्दी में ही इतना अनर्थ किस प्रकार जुटाना और द्रुतगति से क्रियाशील किया जाना संभव हुआ। अब रात्रि के बाद दिनमान का उदय होने जा रहा है। दूसरे स्तर का प्रवाह चलेगा। मनुष्यों में से असंख्यों में भाव संवेदनाओं का उभार आयेगा और वे सभी सृजन की, सेवा की, उत्थान की, आदर्श की बात सोचेंगे। इस में लोगों का एक बड़ा समुदाय उगता उभरता दृष्टि-गोचर होगा। गर्मी के दिनों में घास का एक तिनका भी कहीं नहीं दीखता पर वर्षा के आते ही सर्वत्र हरियाली छा जाती है। नये युग का दैवी प्रवाह अदृश्य वातावरण में अपनी ऊर्जा का विस्तार करेगा। फलस्वरूप जिनमें भाव संवेदनाओं के तत्व जीवित बचे होंगे वे अपनी सामर्थ्य का एक महत्वपूर्ण भाग नवसृजन के लिए नियोजित किये हुए दृष्टिगोचर होंगे। व्यस्तता और अभावग्रस्तता के बहाने एक मजाक बन जायेंगे। उनकी आड़ लेकर कोई भी न अपनी आत्म-प्रवंचना कर सकेगा और न सुनने वालों में से किसी को इस बात का विश्वास दिला सकेगा कि बात वस्तुतः ऐसी भी हो सकती है जैसी कि बहकावे के रूप में समझी या कही जा रही है।
इक्कीसवीं सदी निकट है। तब तक ही इस अवधि में प्रखर प्रज्ञा के अनेकों छोटे बड़े उद्यान रोपे, बढ़ाये और इस स्तर पर पहुँचाये जा सकेंगे जिन्हें नन्दन वनों के समतुल्य कहा जा सके। जिन्हें कल्पवृक्ष उद्यानों की समता ही जा सके।
श्रेष्ठ मनुष्यों का बाहुल्य ही सतयुग है। उसी को स्वर्ग कहते हैं। नरक और कुछ नहीं दुर्बुद्धि का बाहुल्य और उसी का व्यापक प्रचलन है। नरक जैसी परिस्थितियाँ उसी में दृष्टिगोचर होती हैं। पतन और पराभव से अनेक अनाचार उसी के कारण उत्पन्न होते हैं, होते रहे हैं। समय परिवर्तन के साथ सदाशयता बढ़ेगी। नव सृजन की जन-जन के मन में उमंग उठेगी और प्रखर प्रज्ञा की दिव्य आलोक सर्वत्र अपना चमत्कार उत्पन्न करता दिखाई देगा। यह चौथी शक्ति नवयुग की अधिष्ठात्री कही जायेगी।
इन दिनों अध्यात्म और विज्ञान के समन्वय की चर्चा विज्ञ समाज में सर्वत्र होती रहती है। इतने पर भी यह नहीं उजागर किया जाता कि उस प्रतिपादन का उद्देश्य और स्वरूप क्या है? और क्यों इसकी आवश्यकता समझी जा रही है। वस्तुतः प्रश्न ही तद्-विषयक भ्रान्ति पर आधारित है। विज्ञान और अध्यात्म सदा से एक दूसरे के पूरक रहे हैं। विलग होने पर कोई भी अपना स्वतन्त्र अस्तित्व बनाये नहीं रह सकता है। अस्तित्व किसी रूप में बने भी रहें तो उनमें से किसी की भी उपयोगिता का प्रमाण नहीं मिल सकता। सौर मण्डल को ही लें उसमें नौ ग्रह और तैंतीस उपग्रह अब तक प्रकाश में आ चुके हैं। अगले दिनों इस संख्या में और भी अभिवृद्धि होने वाली है। अविज्ञातों को खोजा निकाला जा रहा है। उस परिवार के किसी घटक में बुद्धिमान प्राणियों का अस्तित्व नहीं पाया गया है। इसका कारण एक ही हो सकता है कि या तो वहाँ जीवधारी इच्छाशक्ति से अनुकूल वातावरण बना नहीं सके अथवा प्रकृति की प्रतिकूलता के कारण वहाँ प्राणियों की समर्थ प्रजातियों का उद्भव संभव नहीं हो सका। इसे जड़ और चेतन की विलगता कह सकते हैं।
ब्रह्माण्ड के अन्य ग्रह गोलकों की भी यही स्थिति रही होगी। जहाँ जीवन रहा होगा वहाँ नीरवता के अतिरिक्त और कुछ भी दृष्टिगोचर न रहा होगा। इसका तात्पर्य यही है कि जड़-चेतन के मध्य वहाँ तालमेल बनने का सुयोग नहीं बन सका। जहाँ वह व्यवस्था रही है, वहाँ हर परिस्थिति में जीवधारियों ने अपना अस्तित्व बनाये रखने और विभिन्न प्रकार की हलचलें करते रहने का प्रमाण दिया है।
पृथ्वी की उत्तरी ध्रुव और दक्षिणी ध्रुव में असाधारण शीत है, फिर भी इन दोनों क्षेत्र में जीव-धारियों के अपने-अपने ढंग के क्रिया-कलाप पाये गये हैं। इस सुयोग के अभाव में समुद्र के मध्य उठे हुए अनेक द्वीप अभी भी सुनसान पड़े हैं। इससे प्रमाणित होता है कि जड़ और चेतन का मिलन ही हलचलों का केन्द्र है और वे महत्वपूर्ण तब बनती हैं जब उन दोनों को उभारने-सुधारने वाला विज्ञान एवं अध्यात्म उपयोगी सीमा तक विकसित हो सकता हो।
यह समन्वय-सुयोग अनादि और अनन्त है, जहाँ वे दोनों बिछुड़ जायँ तो सर्वत्र न सही उस क्षेत्र में तो प्रलय के सूखे-गीले, गरम ठंडे दृश्य दिखाई ही देंगे। इसलिए दोनों के समन्वय के प्रश्न को उभारने में कोई प्रत्यक्ष दम नहीं है।
यदि सचेतन प्राणियों की उत्पत्ति से पूर्वकाल पर दृष्टि डाली जाय तो भी आदि कारण को खोजते-खोजते वहाँ पहुँचना पड़ेगा जहाँ चेतन की इच्छा या प्रेरणा के उपरान्त पदार्थ का अस्तित्व प्रकाश में आया। श्रुति वचनों में उसका उल्लेख भर है। ‘एकोहम् बहुस्यामि’ सूत्र में यही प्रतिपादन है कि स्रष्टा को शून्य स्थिति में रहना अखरा तो उसने इच्छा की, ‘एक से बहुत हो जाऊँ,’ फलतः परा और अपरा प्रकृति के रूप में दो प्रवाह फूट पड़े और सृष्टि का आरंभ हो गया। ब्रह्मा जी द्वारा सृष्टि के रचे जाने का अलंकारिक मिथक भी प्रकारान्तर से इसी स्थिति पर प्रकाश डालता है।
पदार्थ विद्या भले ही अपने परिकर द्वारा ही विश्व को ओत-प्रोत सिद्ध करे, उसी को प्रधान माने, फिर भी यह स्वीकार किये बिना उनका कथन भी समग्र नहीं बन पड़ता कि कोई अदृश्य इच्छाशक्ति पदार्थ सत्ता का उद्भव, संचालन, अभिवर्धन और परिवर्तन जैसे खेल खिला रही है। यहाँ हर पदार्थ के पीछे एक सुव्यवस्था का समावेश है। परमाणु, जीवाणु, विषाणु स्तर के अदृश्य घटकों को भी किसी सुनियोजित रीति-नीति का प्रतिपादन करने के लिए विवश रहना पड़ता है। यदा-कदा उच्छृंखलता दीख पड़ती है। वह भी किन्हीं सशक्त नियमों के आधार पर ही दृश्यमान होती है। भले ही उन नियमों के संबंध में मनुष्य की जानकारी, कुछ आभास पाने तक ही सीमित क्यों न रही हो?
पोले आकाश में असंख्य ग्रहगोलकों, वाष्पीभूत महामेघों के चक्रवातों की इकाइयाँ अधर में टँगी हुई हैं। एक दूसरे के साथ वे मजबूत रस्सों से बँधी हुई हैं। गतिशीलता उनमें आकर्षण शक्ति बनाये हुए है। सब के बीच एक अत्यन्त सुव्यवस्थित क्रिया-प्रक्रिया काम कर रही है और अणु से लेकर विभु तक के पसारे वैभव का इस प्रकार सुसंचालन किए हुए है कि उसे अकारण नहीं कह सकते। उसके पीछे निश्चित ही कोई सुनियोजित चेतना तालमेल बिठाये हुए है।
वनस्पतियाँ, प्राणियों, सूक्ष्म-जीवियों जलचरों की जीवन लीला और गतिविधियों पर गंभीरतापूर्वक दृष्टिपात करने से प्रतीत होता है कि यह सब आकस्मिक रूप से नहीं चल रहा है। हर घटक के पीछे कोई उच्चस्तरीय बुद्धिमत्ता काम कर रही है, अन्यथा बिखराव और टकराव का ऐसा माहौल दीख पड़ता, जिसके कारण उत्पन्न हुई अव्यवस्था और अराजकता उड़ते गुबार के अतिरिक्त और कुछ भी दीख न पड़ती। किसी पदार्थ का कोई स्वरूप ही न बन पाता और न वह कुछ क्षणों तक स्थिर ही रह पाता। सचेतन ही अचेतन पर नियन्त्रण कर सकता है। पदार्थ की छोटी इकाई के अंतर्गत जिस प्रकार जितने परिकर काम करते और अपनी धुरी-कक्षा में भ्रमण करते देखे जाते हैं, उनसे स्पष्ट है कि यह नियमित अनुशासन भी किसी व्यापक सत्ता का ही इच्छापूर्वक अवस्था के अंतर्गत रखा गया खेल है। प्राणियों के शरीरों में देखे जाने वाले अंग, अवयव, रसायन, जीवाणु अपने-अपने कार्य में इतने अधिक तल्लीन हैं, मानों किसी ने उन्हें किसी आश्चर्यजनक कम्प्यूटर की तरह सुनियोजित किया हो। प्राणियों को क्षुधा निवृत्ति और वंशवृद्धि के कर्मों में इस प्रकार जोता हुआ है कि वे अपनी व्यस्त जीवनचर्या को सरसतापूर्वक पूर्ण करते रह सकें। इन दोनों प्रयोजनों के लिए आवश्यक साधनों का सृजन भी इस प्रकार किया गया है कि वे हर किसी को सरलतापूर्वक उपलब्ध हो सकें। इतना ही नहीं ऋतुचक्र भी इस प्रकार का विनिर्मित है कि उससे निबटने के लिए हर जीवधारी को अपने कौशल का, समुचित अभिवर्धन करने का अवसर प्राप्त होता रहे। वनस्पतियों और प्राणियों का एक दूसरे का पूरक बनकर रहना भी कितना विचित्र है कि यह विश्वास किये बिना रहा नहीं जाता कि यह समस्त विस्तार किसी बुद्धिमान तंत्र के संरक्षण में चल रहा है।
चेतना का अस्तित्व सुनिश्चित है। वह ब्रह्माण्डव्यापी विराट् भी है और प्रत्येक प्राणी तथा परमाणु में अपने अस्तित्व का सुनियोजन के आधार पर परिचय भी देती है। इसी प्रकार पदार्थ को उसके विभिन्न रूपों में विद्यमान देखा जा सकता है। वायुभूत होने पर वह दृष्टिगोचर भले ही न होती हो, पर उसका परिचय तो ठोस द्रव और गैस के रूप में विद्यमान है ही। दोनों के बीच सघनता भी इतनी है कि एक के बिना दूसरे का काम चल ही नहीं सकता। उनका अस्तित्व भी जाना और समझा नहीं जा सकता विलग होने की स्थिति में यहाँ कुछ भी शेष न रहेगा। ताप, शब्द और प्रकाश की जो तरंगें काम करती हैं, जड़ चेतन को एक सूत्र में बाँधती हैं, उनका भी कहीं अता-पता न चलेगा क्षीरसागर में विष्णु के सो जाने पर महाप्रलय हो जाती है। क्षीरसागर और विष्णु-जड़ चेतन के यही दो समन्वय अन्त में रह जाते हैं। आरंभ भी कमल पुष्प पर बैठे ब्रह्मा द्वारा सृष्टि का सृजन होने से यही तात्पर्य है कि ब्रह्म और प्रकृति वैभव का मिल जुल कर बना आधार ही सृष्टि के सृजन का मूल कारण बना।
कोई जड़ ऐसा नहीं है, जिसमें चेतना का कोई-न-कोई अंश विद्यमान न हो। पत्थरों तक में मंदगामी हलचल होती है। धातुओं तक को जंग लगती और क्षरण-परिवर्तन होता है। समुद्र उफनते हैं। हवा में अन्धड़ चलते हैं। पृथ्वी में भूकम्प आते हैं, आकाश में इन्द्रधनुष देखे जाते हैं, पानी बरसता है। भाप उड़ती है, मौसम बदलते हैं। इन सबके साथ एक सूक्ष्म नियम व्यवस्था काम करती है। उसे सचेतन का ही एक प्रकार कहा जा सकता है। पड़ी लकड़ी में से कुकुरमुत्ते उग पड़ते हैं। गोबर में, कीचड़ में कृमियों का जन्म होने लगता है। यह सब तथ्य बताते हैं कि जड़ नितान्त निर्जीव एवं गति विहीन नहीं है। इसी प्रकार चेतन के सम्बन्ध में भी यही कहा जा सकता है कि उसका स्वरूप देखना तो दूर कल्पना तक कर सकना कठिन है। उथली चेतना होने के कारण मनुष्येत्तर प्राणी ईश्वर के स्वरूप और नियमों के संबंध में कोई कल्पना तक नहीं कर सकते। मनुष्य भी निष्कलंक ब्रह्म के संबंध में अपनी सुनिश्चित आस्था नहीं जमा पाता। धर्म धारणा और ध्यान साधना के माध्यम से ईश्वर के साथ सम्बंध जोड़ने की प्रक्रिया में उसे किसी-न-किसी आकार को कहीं न कहीं ठहरा हुआ कल्पित करना पड़ता है। विभिन्न संप्रदायों और सघन परम्पराओं ने ईश्वर का कोई-न-कोई ऐसा स्वरूप निर्धारित किया है, जिसका ध्यान बन पड़े और उसके साथ भक्ति-भावना का आरोपण संभव हो सके। नितान्त निराकार की कल्पना तक नहीं बन पड़ती।
इकालॉजी सिद्धान्त के अनुसार समूची विश्व व्यवस्था में अति सघनता के साथ अनुशासन का समावेश है। सर्वत्र व्यवस्था ही व्यवस्था है। यहाँ तक कि यदा कदा भूकम्प, तूफान जैसे व्यतिक्रम जो दीख पड़ते हैं, वे भी उन विशिष्ट नियमों के साथ जुड़े हुए हैं जिनका मनुष्य की समझ अभी तक पूरी तरह पता नहीं लगा पायी है।
जड़ को अव्यस्थित होना चाहिए, किन्तु यहाँ किसी को भी वैसी छूट नहीं मिली हुई है। शरीर के जीवाणु, तन्तु ऊतक, घटक इस क्रमबद्धता का परिचय देते हैं कि कायिक ढाँचा तक नियमबद्ध है। मनुष्य कभी-कभी नैतिक
नियमों का उल्लंघन कर तात्कालिक लाभ उठाता देखा जाता है। इससे कर्मफल की व्यवस्था में संदेह होता है पर कुछ ही समय में क्रिया की प्रतिक्रिया सामने आकर रहती है। इससे विदित है जड़ और चेतन का पारस्परिक समन्वय अविच्छिन्न है।
पदार्थ का प्रतिनिधित्व विज्ञान करता और चेतना का अध्यात्म। दोनों के बीच सघन समन्वय न रहने पर तो यहाँ कुछ भी बन या चल न सकेगा। ऐसी दशा में यह मान्यता गलत है कि दोनों सत्ताएँ एक दूसरे से पृथक् हैं। ऐसी दशा में यह चर्चा भी बाल विनोद जैसी लगती है कि अध्यात्म और विज्ञान का समन्वय होना चाहिए। जो विलग हैं ही नहीं, उनका समन्वय करने की आवश्यकता और चेष्टा भी किस प्रकार बन पड़ेगी?
नाव स्वयं ही नदी पार नहीं करती। पीठ पर अनेकों को भी लाद कर उतारती है। सन्त भी अपनी सेवा भावना का उपयोग इसी प्रकार किया करते हैं।
आत्मोत्कर्ष के लिये जितनी भी साधनाएँ हैं, प्रायः उन सब में मंत्र जप का समावेश किसी न किसी रूप में अवश्य होता है। क्योंकि मंत्र विद्या मनुष्य के अंतरंग में सोई उन शक्तियों और क्षमताओं को जाग्रत करती है जो उसे उच्च आध्यात्मिक लक्ष्य तक पहुँचाती हैं। अन्य मंत्र साधनाओं में फिर भी अन्यान्य कर्मकाण्ड करने पड़ते हैं, पर गायत्री मंत्र की साधना एक ऐसी साधना है जो अपने आप में सर्वांगपूर्ण है।
अकेला गायत्री मंत्र ही वे सभी उपलब्धियाँ प्रदान करने में समर्थ है जो अन्य बहुत सी साधनाओं के करने से प्राप्त होती हैं। इस मंत्र की साधना को सफल बनाने में चार तथ्यों का समावेश है- 1-शब्द शक्ति 2- मानसिक एकाग्रता 3-चारित्रिक श्रेष्ठता और 4-अटूट श्रद्धा।
गायत्री मंत्र का प्रथम आधार है-शब्द शक्ति शब्द शक्ति चेतना का ईंधन है। इसी कारण इस मंत्र में अक्षरों का गुँथन एक ऐसे विशिष्ट क्रम में किया गया है जो शब्द शास्त्र के गूढ़ सिद्धान्तों पर आधारित है। यों अर्थ की दृष्टि से गायत्री मंत्र सरल है। उसमें परमात्मा से सद्बुद्धि की याचना की गई है। इस शिक्षा को भी समझना चाहिए पर मंत्र की शक्ति इन शिक्षाओं में ही नहीं उसकी शब्द रचना में भी जुड़ी हुई है। वाद्य यंत्रों को अमुक क्रम से बजाने पर ध्वनि प्रवाह निस्सृत होता है। कण्ठ को अमुक आरोह-अवरोहों को अनुरूप उतार चढ़ाव के स्वरों से युक्त करके जो ध्वनि प्रवाह बनता है उसे गायन कहते हैं। ठीक इसी प्रकार मुख से उच्चारित मंत्र को अमुक शब्द क्रम के अनुसार बार-बार लगातार संचालन करने से जो विशेष प्रकार का ध्वनि प्रवाह संचारित होता है वही मंत्र की भौतिक क्षमता है। मुख से उच्चारित मंत्राक्षर सूक्ष्म शरीर को प्रभावित करते हैं। उसमें सन्निहित तीन ग्रंथियों, षटचक्रों- षोडश मातृकाओं चौबीस उपत्यिकाओं एवं चौरासी नाड़ियों को झंकृत करने में मंत्र का उच्चारण क्रम बहुत काम करता है। दिव्य शक्ति के प्रादुर्भूत होने में यह शब्दोच्चार भी एक बहुत बड़ा कारण एवं माध्यम है।
मंत्र विद्या में मुख से तो धीमे और हल्के प्रवाह क्रम से ही शब्दों का उच्चारण होता है पर उनके बार-बार लगातार दुहराये जाने से सूक्ष्म शरीर के शक्ति संस्थानों का ध्वनि प्रवाह बहने लगता है। वहाँ से अश्रव्य कर्णातीत (सुपरसोनिक) ध्वनियों का प्रचंड प्रवाह प्रादुर्भूत होता है। इसी से मंत्र साधक का व्यक्तित्व ढलता है और उन्हीं के आधार पर वह अभीष्ट वातावरण बनता है जिसके लिये मंत्र साधना की गई। मंत्र का जितना महत्व है, साधना विधान का जितना महात्म्य है उतना ही आवश्यक यह भी है कि साधक अपनी श्रद्धा तन्मयता और विधि प्रक्रिया में निष्ठावान रहकर अपना व्यक्तित्व और विधि प्रक्रिया में निष्ठावान रहकर अपना व्यक्तित्व इस योग्य बनाये कि उसका मंत्र प्रयोग सही निशाना साधने वाली बहुमूल्य बंदूक का काम कर सके।
शब्द शक्ति का महत्व विज्ञानानुमोदित है। स्थूल, श्रव्य शब्द भी बड़ा काम करते हैं फिर सूक्ष्म कर्णातीत अश्रव्य ध्वनियों का महत्व तो और भी अधिक है। मंत्र जप में उच्चारण तो धीमा ही होता है। उससे अतीन्द्रिय शब्द शक्ति को ही प्रचंड परिमाण में उत्पन्न किया जाता है।
ध्वनि तरंगें पिछले दिनों उच्चारण से उद्भूत होकर श्रवण की परिधि में ही सीमित, रहती थीं। प्राणियों द्वारा शब्दोच्चारों एवं वस्तुओं से उत्पन्न आघातों से अगणित प्रकार की ध्वनियाँ निकलती हैं। उन्हें हमारे कान सुनते हैं। सुनकर कई तरह के ज्ञान प्राप्त करते हैं। निष्कर्ष निकालते हैं, और अनुभव बढ़ाते हुए उपयोगी कदम उठाते हैं। यह शब्द का साधारण उपयोग हुआ। विज्ञान ने ध्वनि तरंगों में सन्निहित असाधारण शक्ति को समझा है और उनके द्वारा विभिन्न प्रकार के क्रिया-कलापों को पूरा करना अथवा लाभ उठाना आरम्भ किया है। वस्तुओं की मोटाई नापने-धातुओं के गुण दोष परखने का काम अब ध्वनि तरंगें ही प्रधान रूप में पूरा करती हैं। भवन ध्वस्त करने से लेकर धातुओं की ढलाई, शरीर में विद्यमान पथरी को तोड़ा जाना भी अब ध्वनि तरंगों द्वारा संभव है।
इलेक्ट्रॉनिक्स के उच्च विज्ञानी ऐसा यंत्र बनाने में सफल नहीं हो सके तो जो श्रवण शक्ति की दृष्टि से कान के समान संवेदनशील हो। कानों की जो झिल्ली आवाज पकड़कर मस्तिष्क तक पहुँचाती है उसकी मोटाई एक इंच के ढाई हजारवें हिस्से के बराबर है। फिर भी वह कोई चार लाख प्रकार के शब्द भेद पहचान सकती है और उनका अंतर कर सकती है। अपनों के पदचाप की, अपनी गाय द्वारा उच्चारित ध्वनि की या मोटर की आवाज को हम अलग से पहचान लेते हैं यद्यपि लगभग वैसी ही आवाज दूसरी गायों की या मोटरों की हो सकती है, पर जो थोड़ा सा भी अंतर उनमें रहता है, अपने कान के लिये उतने से ही अंतर कर सकना और पहचान सकना संभव हो जाता है। कितनी दूर से, किस दिशा से, किस मनुष्य की आवाज आ रही है यह पहचानने में हमें कुछ कठिनाई नहीं होती। यह कान की सूक्ष्म संवेदनशीलता का ही चमत्कार है। टेलीफोन यंत्र कान के समान ही संवेदनशील है। पर सुनता उससे भी ज्यादा है। मनुष्य के कान तो उन्हीं बातों को सुनते हैं जिनमें उनकी दिलचस्पी होती है अन्यथा पास में बहुत कुछ बकझक होते रहते पर भी अपने पल्ले कुछ नहीं पड़ता किन्तु यदि दिलचस्पी की बात हो तो फुसफुसाहट से भी मतलब की बातें आसानी से सुनी जा सकती हैं। प्रकारान्तर से कहा जा सकता है कि श्रवण शक्ति का पूरी तरह संबंध मानसिक एकाग्रता से है।
मनुष्य के कान केवल उन्हीं ध्वनि तरंगों को अनुभव कर सकते हैं जिनकी संख्या प्रति सेकेंड 20 से लेकर 20 सहस्त्र तक की होती है। इससे कम और अधिक संख्या वाले ध्वनि प्रवाह होते तो हैं, पर वे मनुष्य की कर्णेन्द्रियों द्वारा नहीं सुने जा सकते।
इस तथ्य को समझने पर मानसिक जप का महत्व समझ में आता है। उच्चारण आवश्यक नहीं। मानसिक शक्ति का प्रयोग करके-ध्यान भूमिका में सूक्ष्म जिव्हा द्वारा मन ही मन जो जप किया जाता है उसमें भी ध्वनि तरंगें भली प्रकार उठती रहती हैं। उनसे पूरा लाभ उठाया जा सकता है।
रेडियो यंत्र केवल कुछ सीमित और संबंधित फ्रीक्वेंसी पर चल रही ध्वनि तरंगों को ही पकड़ पाते हैं। समीपवर्ती फ्रीक्वेंसी के साथ यदि उनका संबंध न हो तो वे यंत्र सुन नहीं सकेंगे। कान की स्थिति उनकी अपेक्षा लाख गुनी अच्छी है। वे अनेक फ्रीक्वेन्सियों पर चल रहे शब्द प्रवाहों को एक साथ पकड़ और सुन सकते हैं।
नादयोग द्वारा आकाश-व्यापी, अंतर्ग्रही तथा अन्तःक्षेत्रीय दिव्य ध्वनि संकेतों को सुना जाना संभव है और उस आधार पर वैसा बहुत कुछ जाना जा सकता है जो स्थूल मस्तिष्कीय चेतना अथवा उपलब्ध साधनों से जान सकना संभव नहीं है। विश्व-व्यापी शब्द समुद्र में मंत्र साधक अपनी प्रचण्ड हलचलें समाविष्ट करता है और ऐसे शक्तिशाली ज्वार-भाटे उत्पन्न करता है, जिनके आधार पर अभीष्ट परिस्थितियाँ विनिर्मित हो सकें। यही है मंत्र विद्या के चमत्कारी क्रियाकलाप का रहस्य।
शब्द शक्ति एवं मानसिक एकाग्रता के बाद शेष आधार साधक को स्वयं प्रयत्नपूर्वक खड़े करने पड़ते हैं। इन्हें चेतनात्मक आधार भी कहा जा सकता है। चारित्रिक श्रेष्ठता और लक्ष्य के प्रति अटूट श्रद्धा साधक को सफलता की ओर अग्रसर करती है तथा उसे अभीष्ट लक्ष्य तक ले पहुँचती है।
चारित्रिक श्रेष्ठता के लिये-मंत्र साधक को यम-नियमों का अनुशासन पालन करते हुए श्रेष्ठता का अभिवर्धन करना चाहिए। क्रूर कर्मी, दुष्ट दुराचारी व्यक्ति किसी भी मंत्र को सिद्ध नहीं कर सकते। ताँत्रिक शक्तियाँ भी ब्रह्मचर्य आदि की अपेक्षा करती हैं। फिर देव शक्तियों का अवतरण जिस भूमि पर होना है उसे विचारणा, भावना और क्रिया की दृष्टि से सतोगुणी पवित्रता से युक्त होना ही चाहिए।
इन्द्रियों का चटोरापन मन की चंचलता का प्रधान कारण है। तृष्णाओं में-वासनाओं में और अहंकार तृप्ति की महत्वाकाँक्षाओं में भटकने वाला मन मृगतृष्णा एवं कस्तूरी गंध में यहाँ वहाँ असंगत दौड़ लगाते रहने वाले हिरन की तरह है। मन की एकाग्रता अध्यात्म क्षेत्र में सबसे महत्वपूर्ण शक्ति है। उसके संपादन के लिये अमुक साधनों का विधान तो है, पर उनकी सफलता मन को चंचल बनाने वाली दुष्प्रवृत्तियों का अवरोध करने के साथ जुड़ी हुई है। जिसने मन को संयम समाहित करने की आवश्यकता पूर्ण कर सकने योग्य अंतःस्थिति का परिष्कृत दृष्टिकोण के आधार पर निर्माण कर लिया होगा, वही सच्ची और गहरी एकाग्रता का लाभ उठा सकेगा, ध्यान उसी का ठीक तरह जमेगा और तन्मयता के आधार पर उत्पन्न होने वाली दिव्य क्षमताओं से लाभान्वित होने का अवसर उसी को मिलेगा।
अभीष्ट लक्ष्यों में श्रद्धा जितनी गहरी होगी, उतना ही मंत्र बल प्रचण्ड होता चला जायेगा। श्रद्धा अपने आप में एक प्रचण्ड चेतना शक्ति है। विश्वासों के आधार पर ही आकाँक्षाएँ उत्पन्न होती हैं और मन, संस्थान का स्वरूप विनिर्मित होता है। बहुत कुछ काम तो मस्तिष्क को ही करना पड़ता है। शरीर का संचालन भी मस्तिष्क ही करता है। इस मस्तिष्क को दिशा देने का काम अंतःकरण के मर्मस्थल में जमे हुए श्रद्धा-विश्वास का है। वस्तुतः व्यक्तित्व का असली प्रेरणा केन्द्र इसी निष्ठा की धुरी पर घूमता है। गीतकार ने इसी तथ्य का रहस्योद्घाटन करते हुये कहा है- ‘‘यो यच्छूद्धः स एव सः” जो जैसी श्रद्धा रख रहा है वस्तुतः वह वैसा ही है। अर्थात् श्रद्धा ही व्यक्तित्व है। इस श्रद्धा को इष्ट लक्ष्य में-साधना की यथार्थता और उपलब्धि में जितनी अधिक गहराई के साथ-तन्मयता के साथ-नियोजित किया गया होगा, मंत्र उतना ही सामर्थ्यवान बनेगा। तांत्रिक की चमत्कारी शक्ति उसी अनुपात से प्रचण्ड होगी। इन तीनों चेतनात्मक आधारों को महत्व देते हुए जिसने मंत्रानुष्ठान किया होगा, निश्चित रूप से वह अपने प्रयोजन में पूर्णतया सफल होकर रहेगा।
इन चारों आधारों के अपनाने पर ही मंत्र साधना के सत्परिणाम प्राप्त होते हैं। उथली एकाँगी साधना करने से तो उसके सत्परिणामों से वंचित ही रहना पड़ता है। शब्द शक्ति, मानसिक एकाग्रता, चारित्रिक श्रेष्ठता, लक्ष्य के प्रति अटूट श्रद्धा यह चार आधार ले कर की जाने वाली मंत्र साधना कभी निष्फल नहीं होती, यह एक सुनिश्चित तथ्य है।
जो सदा शंकाशील रहता है, उसकी गुत्थियाँ उलझती ही जाती है। शंका अशुभ भविष्य की कल्पनायें गढ़ कर सामने खड़ी कर लेती है और फिर उस झाड़ी के भूत से ही भयभीत होती और जो सहज संभव था, उसे कठिन बना लेती है।
‘छोटी आयु में बड़ी प्रतिभा’-यह कहने सुनने में आश्चर्यजनक भले ही लगता हो, पर यह अविश्वसनीय तथ्य नहीं है जो भारतीय शास्त्रों में वर्णित पुनर्जन्म सिद्धान्त’ को मानते हैं, वे जानते हैं कि मरने के बाद भी मानवी सत्ता ज्यों-की त्यों बनी रहती है। मरता शरीर भर है, आत्मा नहीं। वह तो अमर अविनाशी है, परमात्मा का अंशधर है और उसी में एकाकार हो जाना उसका अन्तिम लक्ष्य है। जब तक वह अपने इस चरम लक्ष्य को प्राप्त नहीं कर लेती, तब तक बार-बार शरीर धारण करती रहती है। अतः जो व्यक्ति आज इस संसार में है, उनके बारे में यह नहीं कहा जा सकता कि यह उनका प्रथम जन्म है। इससे पूर्व भी वे कई बार जन्म ले चुके हैं। इन पिछले जन्मों में व्यक्ति का प्रयास-अभ्यास जिस दिशा में चलता है, धीरे-धीरे वही परिपुष्ट होता जाता और अगले जन्म में विशिष्टता अल्पायु में प्रतिभा के रूप में विकसित होती और समय-समय पर अपना प्रमाण-परिचय देती रहती है।
हमें दैनन्दिन जीवन में ऐसे व्यक्ति देखने को मिलते हैं, जिनकी प्रतिभा उनकी आयु से मेल नहीं खाती। अब आय. क्यू. की परिभाषा ही बदली जा चुकी है व यह कहा जाता है कि प्रतिभा किसी भी क्षेत्र में अपनी झलक दिखा सकती है। प्रयास उसे परिपुष्ट करने का होना चाहिए।
इंग्लैंड के डेवोन स्थान में एक पत्थर तोड़ने वाले श्रमिक का दो वर्षीय पुत्र जार्ज, गणित में अपनी अद्भुत प्रतिभा प्रदर्शित करने लगा। चार वर्ष की आयु में उसने गणित के अत्यन्त जटिल प्रश्नों का दो मिनट में मौखिक उत्तर देना आरम्भ कर दिया, जिन्हें कागज, कलम की सहायता से गणित के निष्णात् आधा घण्टे से कम में किसी भी प्रकार नहीं दे सकते थे। उसकी प्रतिभा भी दस वर्ष की आयु पोषण न मिल पाने के कारण समाप्त हो गई। फिर वह सामान्य लड़कों की तरह पढ़ कर कठिनाई से सिविल इंजीनियर बन सका।
फिल्मी दुनिया में तहलका मचाने वाला बाल अभिनेता विलियम हेनरी वेट्टी बाल्यकाल से ही अपनी विलक्षण प्रतिभा का परिचय देने लगा। उसके अभिनय ने सारे यूरोप का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर दिया। 11 वर्ष की आयु तक पहुँचते पहुँचते वह फिल्म दर्शकों का सुपरिचित प्रिय-पात्र बन गया। ऐसा ही एक दूसरा बालक था लन्दन का काँवेट गार्डन, उसका अभिनय देखने के लिए आकुल भीड़ को हटाने के लिए एकबार तो सेना बुलानी पड़ी थी। उसे इतना अधिक पारिश्रमिक मिलता था, जितना पाने का अन्य किसी कलाकार को सौभाग्य न मिला। एकबार तो ‘हाउस आफ कामन्स’ का अधिवेशन इसलिए स्थगित करना पड़ा कि उस दिन काँवेट गार्डन द्वारा ‘हैमलेट’ नाटक का अभिनय किया जाना था और सदस्यगण उसे देखने के लिए आतुर थे।
जर्मनी की बाल प्रतिभा का कीर्तिमान स्थापित करने वालों में जान फिलिप वैरटियम को कभी भुलाया न जा सकेगा। उसने दो वर्ष की आयु में ही पढ़ना ‘लिखना सीख लिया। छै वर्ष की आयु में वह फ्रेंच और लैटिन भी धारा प्रवाह रूप से बोलता था। सात वर्ष की आयु में उसने बाइबिल का ग्रीक भाषा में अनुवाद करना आरम्भ कर दिया। सात वर्ष की आयु में ही उसने अपने इतिहास, भूगोल और गणित सम्बन्धी ज्ञान से तत्कालीन अध्यापकों को अवाक् बना दिया। सातवें वर्ष में ही उसे बर्लिन की ‘रॉयल एकेडेमी’ का सदस्य चुना गया तथा डाक्टर ऑफ फिलासॉफी की उपाधि से सम्मानित किया गया। वह भी अधिक दिन नहीं जिया। किशोरावस्था में प्रवेश करते-करते संसार से विदा हो गया।
अत्यन्त छोटी आयु में विलक्षणता का परिचय देने में समस्त विश्व इतिहास को पीछे छोड़ देने वालों में लुवेक, जर्मनी में उत्पन्न हुआ बालक फ्रेडरिक हैनिकेन था। वह सन् 1721 में जन्मा। जन्मने के कुछ दिनों के बाद ही वह बातचीत करने लगा। दो वर्ष की आयु में बाइबिल के सम्बन्ध में पूछी गई किसी भी बात का विस्तार पूर्वक उत्तर देता था और बताता था कि वह प्रकरण किस अध्याय के किस मन्त्र में है। इतिहास और भूगोल में उसका ज्ञान अनुपम था। डेनमार्क के राजा ने उसे राजमहल में बुलाकर सम्मानित किया।
वरमाँट निवासी आठ वर्षीय बालक जेराकोलबर्न ने बिना गणित का क्रमबद्ध अध्ययन किये-और बिना कागज कलम की सहायता के दिमागी आधार पर कठिन प्रश्नों के उत्तर देने की जो क्षमता दिखाई उससे बड़े-बड़े गणितज्ञ चकित रह गये। जिन कठिन सवालों को केवल अच्छे गणित ज्ञाता ही काफी समय लगाकर हल कर सकते थे उसने उन्हें बिना हिचके आनन-फानन में कैसे हल कर दिया, इसे देखकर सब दंग रह जाते थे। आश्चर्य यह था कि पुस्तकीय आधार पर उसे गणित के सामान्य नियम भी ज्ञात न थे। हमारी संस्कृति के अग्रदूतों में रामचरित मानस रचयिता तुलसीदास, शुकदेवजी एवं मुनि अष्टावक्र की बाल्यकाल में ही प्रतिभासित विलक्षण प्रतिभा के उदाहरण से विज्ञपाठक परिचित हैं ही।
फ्राँस में जन्मे लुईस कार्डेक चार वर्ष की आयु के थे। तभी अँग्रेजी, फ्राँसीसी, जर्मनी तथा अन्य योरोपीय भाषायें बोल लेते थे। इससे भी बड़ा आश्चर्य यह था कि वह 6 माह की आयु में ही बाइबिल पढ़ लेते थे। 6 वर्ष की आयु तक पहुँचने पर कोई भी प्रोफेसर गणित, इतिहास और भूगोल में उनकी बराबरी नहीं कर पाता था। जो ज्ञान और बौद्धिक क्षमतायें इतने अधिक अध्ययन और अभ्यास से विकसित हो पाती हैं और वैज्ञानिक मान्यता के अनुसार क्रमशः समयानुसार ही बढ़ना चाहिये था, वह शारीरिक विकास के अभाव में इतने विकास तक कैसे जा पहुँची? यह एक अनसुलझी गुत्थी है।
ब्लेइस पास्कल ने 12 वर्ष की आयु में ही ध्वनि-शास्त्र पर निबन्ध प्रस्तुत कर सारे फ्राँस को आश्चर्य में डाल दिया था। जीन फिलिप बेरोटियर को 14 वर्ष की आयु में ही डाक्टर आफ फिलासफी की उपाधि मिल गई थी। उनकी स्मरण शक्ति इतनी तीव्र थी कि दिन याद कराने भर की देर होती थी एवं वे उस दिन की व्यक्तिगत, राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय घटनायें भी टेप की भाँति दुहरा सकते थे। जाँनी ले नामक आस्ट्रेलियाई बालक को जब तीन वर्ष की आयु में विद्यालय में प्रवेश कराया गया तो वह उसी दिन से 8 वीं कक्षा के छात्रों की पुस्तकें पढ़ लेता था। उसे हाईस्कूल में केवल इसलिए प्रवेश नहीं दिया जा सका, क्योंकि उस समय उसकी आयु कुल 5 वर्ष थी, जबकि निर्धारित आयु 12 वर्ष न्यूनतम थी।
कोई भी अल्पबुद्धि व्यक्ति यह समझ सकता है कि यह असामान्य ज्ञान पूर्व जन्मों के ही संचित संस्कार हो सकते हैं। हमारे मनीषी निरन्तर स्वाध्याय की आवश्यकता अनुमोदित करते रहे और यह बताते रहे कि ज्ञान आत्मा की भूख-प्यास की तरह है। उससे उसका विकास होता है। यह बात समझ में आने वाली है कि चेतना का विकास मात्र ज्ञान की साधना से ही सम्भव है, जो अद्भुत क्षमता के रूप में हर किसी को सहज उपलब्ध है। बालकों के आहार, वातावरण, पोषण आदि की समान सुविधायें होने पर भी बौद्धिक स्तर में असमानता प्राच्यदर्शन की मान्यताओं का ही समर्थन करती हैं। यह एक तथ्य और दर्शाती हैं कि ज्ञानार्जन, सत्साहित्य का पठन-मनन कभी व्यर्थ नहीं जाता। जितनी अवधि तक सार्थक जीवन जीना हो, मनुष्य को अपनी प्रसुप्त क्षमताओं को जमाने, प्रतिभा को खरादते रहने, स्वाध्यायशील ही बने रहने का प्रयत्न करना चाहिए। यह प्रयास क्रिया की प्रतिक्रिया की तरह सुनिश्चित प्रतिफल देता है।
साधना का तात्पर्य है, साध लेना, सधा लेना। पशु प्र
शिक्षक यही करते रहते हैं। अनगढ़ और उच्छृंखल पशुओं को वे एक रीति नीति सिखाते हैं। उनको अभ्यस्त बनाते हैं और उस स्थिति तक पहुँचाते हैं जिसमें उस असंस्कृत प्राणी को उपयोगी समझा जा सके। उसके बढ़े हुए स्तर का मूल्याँकन हो सके। पालने वाला अपने को लाभान्वित हुआ देख सके। सिखाने वाला भी अपने प्रयास की सार्थकता देखते हुए प्रसन्न हो सके।
समझा यह जाता है कि भक्त भगवान को साधना है। उसको मूर्ख समझते हुए उसकी गलतियाँ निकालता रहता है। तरह तरह के उलाहने देता है। साथ ही गिड़गिड़ा कर नाक रगड़ कर खीसें निपोर कर अपना उचित अनुचित उल्लू सीधा करने के लिए जाल जंजाल बुनता है। प्रशंसा के पुल बाँधता है। छिटपुट भेंट चढ़ाकर उसे फुसलाने का प्रयत्न करता है। समझा जाता है कि सामान्य लोगों से व्यावहारिक जगत में आदान प्रदान के आधार पर ही लेन देन चलता है, पर ईश्वर या देवता ऐसे हैं जिन्हें वाणी की वाचालता तथा शारीरिक मानसिक उचक-मचक करने भर से वशवर्ती किया जा सकता है। यह दार्शनिक भूल मनुष्य को प्रकारान्तर से प्रच्छन्न नास्तिक बना देती है। एक नास्तिक वह है जो प्रत्यक्षवाद के आधार पर ईश्वर की सत्ता स्पष्ट दृष्टिगोचर न होने पर उसकी मान्यता से इनकार करते हैं। दूसरे प्रच्छन्न नास्तिक वे हैं जो उससे पक्षपात की, मुफ्त में लम्बी चौड़ी मनोकामनाओं की पूर्ति चाहते रहते हैं। मनुष्य विधि व्यवस्थाओं को तोड़ता छोड़ता रहता है पर ईश्वर के लिए यह संभव नहीं कि अपनी बनाई कर्मफल व्यवस्था का स्वयं उल्लंघन करे या दूसरों को ऐसा करने के लिए उत्साहित करे, तथाकथित भक्त लोग ऐसी ही आशाएँ किया करते हैं। अन्ततः उन्हें निराश होना पड़ता है। इस निराशा की खीज और थकान से वे या तो साधना विधान को मिथ्या बताते हैं या ईश्वर के निष्ठुर होने की मान्यता बनाते हैं।
आवश्यकता है भ्रान्तियों से निकलने और यथार्थता को अपनाने की। इस दिशा में मान्यताओं को अग्रगामी बनाते हुए हमें सोचना होगा कि जीवन साधना ही आध्यात्मिक स्वस्थता और बलिष्ठता है। इसी के बदले प्रत्यक्ष जीवन में बिना मरण की प्रतीक्षा किये स्वर्ग, मुक्ति और तृप्ति का रसास्वादन करते रहा जा सकता है। उन लाभों को उपलब्ध किया जा सकता है, जिनका उल्लेख अध्यात्म विद्या की महत्ता बताते हुए शास्त्रकारों ने विस्तार पूर्वक किया है। सच्चे सन्त भक्तों का इतिहास भी विद्यमान है। खोजने पर प्रतीत होता है कि पूजा पाठ भले ही उनका-न्यूनाधिक रहा हो पर उनने जीवन साधना के क्षेत्र में परिपूर्ण जागरूकता बरती। इसमें व्यतिक्रम नहीं होने दिया। न आदर्श की अवज्ञा की और न उपेक्षा बरती। भाव संवेदनाओं में श्रद्धा-विचार बुद्धि में प्रज्ञा और लोक व्यवहार में शालीन सद्भावना की निष्ठा अपनाकर कोई भी सच्चे अर्थों में जीवन देवता का सच्चा साधक बन सकता है। उसका उपहार वरदान भी उसे हाथों हाथ मिलता चलता है।
ऋषियों, मनीषियों, सन्त सुधारकों और वातावरण में ऊर्जा आभा भर देने वाले महामानवों की अनेकानेक साक्षियाँ विश्व इतिहास में भरी पड़ी हैं। इनमें से प्रत्येक को हर कसौटी पर जांच−परख कर देखा जा सकता है कि उनमें से हर एक को अपना व्यक्तित्व उत्कृष्टता की कसौटी पर खरा सिद्ध करना पड़ा है। इससे कम में किसी को भी न आत्मा की प्राप्ति हो सकी, न परमात्मा की। न ऐसों का लोक बना और न पर लोक। पूजा को श्रृंगार माना जाता रहा है। स्वास्थ्य वास्तविक सुन्दरता है। ऊपर से वस्त्राभूषणों से, प्रसाधन सामग्रियों से उसे सजाया भी जा सकता है। इसे सोना सुगन्ध का मिश्रण बन पड़ा माना जा सकता है। जीवन साधना समग्र स्वस्थता है। उसके ऊपर पूजा पाठ का श्रृंगार भी सजाया जाय तो शोभा और भी अधिक बढ़ेगी किन्तु यह नहीं माना जाना चाहिए कि मात्र श्रृंगार साधनों के सहारे सुन्दरता बढ़ती है। किसी जीर्ण जर्जर, रुग्ण या मृत शरीर पर श्रृंगार सामग्री चढ़ा ली जाय तो भी कुछ प्रयोजन कहाँ सधता है? उससे तो उपहास ही होगा। इसके विपरीत यदि कोई हृष्टपुष्ट पहलवान मात्र लँगोट पहन कर अखाड़े में उतरता है तो भी उसकी शोभा बन जाती है। ठीक इसी प्रकार जीवन को सुसंस्कृत बना लेने वाले यदि पूजा अर्चा के लिए कम समय निकाल पाते हैं तो भी काम चल जाता है।
अध्यात्म विज्ञान-तत्वदर्शी को अपने दृष्टिकोण में मौलिक परिवर्तन आरंभ करना पड़ता है। उसे सोचना होता है कि मनुष्य जीवन की बहुमूल्य धरोहर का इस प्रकार उपयोग करना है जिससे शरीर निर्वाह और लोक व्यवहार भी चलता रहे पर साथ ही आत्मिक अपूर्णता को पूरी करने का चरम लक्ष्य भी प्राप्त हो सके। ईश्वर के दरबार में पहुँचने पर सीना तान कर यह कहा जा सके कि जो अमानत जिस प्रयोजन के लिए सौंपी गई थी उसे उसी हेतु सही रूप में प्रयुक्त किया गया।
इस मार्ग में सबसे बड़े व्यवधान तीन हैं। इन्हीं को रावण, कुम्भकरण, मेघनाद कहा गया है। यही देवी भागवत के महिषासुर, मधुकैटभ, रक्तबीज हैं। कंस, दुर्योधन, जरासंध भी यही हैं। यह प्रायः साथ लगे रहते हैं और पीछा नहीं छोड़ते। इन्हीं के कारण मनुष्य पतन और पराभव के गर्त में गिरता है। पशु, प्रेत और पिशाच की जिन्दगी जीता है। नर बानर और पामर इन्हीं के चंगुल में फँसे हुए लोगों को देखा जाता है। वे हैं (1) लोभ (2) मोह (3) अहंकार। वासना, तृष्णा और लिप्सा इन्हीं के कारण उत्पन्न होती हैं।
लोभ विजय के लिए सादा जीवन उच्च विचार का सिद्धान्त अपनाना पड़ता है। औसत नागरिक स्तर को निर्वाह में संतोष करना पड़ता है। ईमानदारी और परिश्रम की कमाई पर निर्भर रहना पड़ता है। लालची के लिए अनीति अपनाये बिना अपनी तृष्णा की पूर्ति कर सकना किसी भी प्रकार संभव नहीं होता। संसार में इतनी ही सम्पन्नता उपजती है कि उससे हर किसी को जीवन धारण भर की सुविधा मिल सके। जो अधिक विलासी खर्च करेगा, वह प्रकारान्तर से दूसरों को उतना ही अभावग्रस्त रहने के लिए बाधित करेगा। इसीलिए शास्त्रकारों ने परिग्रह को पाप बताया है। विलासी, संग्रही और अपव्ययी की भी ऐसी ही निन्दा की है।
अधिक कमाया जा सकता है पर उसमें से निजी निर्वाह में सीमित व्यय करके शेष बचत को गिरों को उठाने, उठों को उछालने और सत्प्रवृत्तियों के संवर्धन में लगाया जाना चाहिए। राजा जनक, हर्षवर्धन जैसे उदाहरणों की कमी नहीं। मितव्ययी अनेकों दुर्व्यसनों और अनाचारों से बचता है। ऐसी हविस उसे सताती नहीं, जिसके लिए अनाचार पर उतारू होना पड़े। साधु ब्राह्मणों की यही परम्परा रही है। सज्जनों की शालीनता भी इसी आधार पर फलती फूलती है, अन्यथा लालची को अपना सारा समय, श्रम कौशल इसी निमित्त खपाते रहना पड़ता है। उस पर व्यस्तता छाई रहती है। जीवन लक्ष्य की पूर्ति कराने वाली परमार्थ परायणता अपनाने के लिए उसका न मन होता है और न कुछ करते बन पड़ता है। इसलिए जीवन साधना के इस प्रथम अवरोध को नियंत्रित करने वाला दृष्टिकोण हर जीवन साधना के साधक को अपनाना ही चाहिए।
मोह वस्तुओं से भी होता है और व्यक्तियों से भी। छोटे दायरे में आत्मीयता को सीमाबद्ध करना ही मोह है। इसके रहते हृदय की विशालता चरितार्थ हो ही नहीं पाती। अपना शरीर और परिवार ही सब कुछ दीख पड़ता है। उन्हीं के लिए मरने खपने के झंझट में फँसे रहना पड़ता है। “आत्मवत् सर्वभूतेषु’ और “वसुधैव कुटुम्बकम्” के दो आत्मवादी सिद्धान्त हैं। इनमें से एक को भी मोहग्रस्त कार्यान्वित नहीं कर सकता। इसलिए अपने में सब को और सब में अपने को देखने की दृष्टि विकसित करना जीवन यज्ञ के लिए आवश्यक माना गया है।
परिवार छोटे और छोटा रखा जाय। पूर्ववर्ती अभिभावकों, बड़ों और आश्रितों के ऋण चुकाने की ही व्यवस्था नहीं बन पाती तो नए अतिथि क्यों न्यौत बुलाये जाँय? समय को, परिस्थितियों को देखते हुए अनावश्यक बच्चे उत्पन्न करना और परिवार का भार बढ़ाना परले सिरे की भूल है। समान विचारों के साथी सहयोगी मिलें तो विवाह करने में हर्ज नहीं। पर वह एक दूसरे की सहायता सेवा करते हुए प्रगति पथ पर अग्रसर होने के लिए ही की जानी चाहिए। इस घोर महँगाई और उत्पादन की कमी को देखते हुए जनसंख्या का भार बढ़ाना प्रत्यक्ष विपत्ति मोल लेने के समान है। परिवार को स्वावलम्बी और सुसंस्कारी बनाना ही पर्याप्त है। औलाद के लिए विपुल सम्पदा उत्तराधिकार में छोड़ मरने की भूल तो किसी को करनी ही नहीं चाहिए। मुफ्त का माल किसी को भी हजम नहीं होता। वह दुर्बुद्धि और दुर्गुण ही उत्पन्न करता है। संतान पर यह भार लदेगा तो उसका अपकार ही होगा।
पारिवारिक उत्तर दायित्वों को निबाहा जाना चाहिए उस कीचड़ में इतनी गहराई तक नहीं फँसना चाहिए कि उबर सकना संभव ही न हो सके। मोह को भवबन्धनों में से प्रमुख माना गया है। उस संकीर्ण दायरे में जकड़े हुए लोग लोकमंगल का कर्तव्य पालन कर ही नहीं पाते। जिन्हें सभी के प्रति पारिवारिकता का भाव अपनाने का अवसर मिलता है, उनके लिए हर किसी को आत्मीय मानने का, सभी की सेवा सहायता करने का आनन्द मिलता है।
अहंकार मोटे अर्थों में घमंड समझा जाता है। अकड़ कर उद्धत अशिष्ट व्यवहार करने, क्रोध ग्रस्त रहने को अहंकार माना जाता है पर वस्तुतः वह है अधिक सूक्ष्म और व्यापक। आत्म प्रदर्शन में, ठाटबाट में बढ़ चढ़ कर अपनी बड़ाई का रौब जमाना अहंकार का वास्तविक स्वरूप है। फैशन, सज-धज, श्रृंगार, ठाट बाट, अपव्यय, शेखी, बड़प्पन आदि अहंकार के स्वरूप हैं। लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने के लिए, बड़प्पन जताने के लिए, शेखीखोरी के लिए लोग ढेरों समय, श्रम और पैसा गँवाते हैं। यह भी एक प्रकार का नशा है जिसमें अपने को भले ही मजा आता हो पर हर विचारशील को इसमें क्षुद्रता की, बचकानेपन की ही गंध आती है। इस विडम्बना के लिए चित्र विचित्र प्रवंचनायें रचनी पड़ती हैं। ईर्ष्या-द्वेष उत्पन्न करने में भी अहंता की ही प्रमुख भूमिका रहती है। कलह और विग्रह भी प्रायः इसी कारण उत्पन्न होते हैं। अहंकार को आत्मघाती शत्रु माना गया है। ऐसे लोगों से आत्म साधना तो बन ही नहीं पाती। उन पर उद्दण्डता का भूत और चढ़ा रहता है जो दूसरों को गिराने, नीचा दिखाने की ही ललक उठाती रहती है। अपनी प्रशंसा और दूसरों की निन्दा करने में ही ऐसे लोग लगे रहते हैं। इन परिस्थितियों में आत्मोत्कर्ष और आत्म परिष्कार का आधार कैसे बन पड़े?
लोभ, मोह और अहंकार के तीन भारी पत्थर जिसने सिर पर लाद रक्खे हों उसके लिए जीवन साधना की लम्बी और ऊँची मंजिल पर चल सकना, चढ़ सकना असंभव हो जाता है। भले ही कोई कितने ही पूजा पाठ करते रहें, जिन्हें तथ्यान्वेषी बनना है उन्हें
कई अवसरों पर देखा जाता है कि भविष्य में जो घटनाएँ घटित होने वाली होती हैं, चाहे वह व्यक्तिगत जीवन से संबंधित हों, अथवा सामुदायिक जीवन से, उनका यदा-कदा आभास लोगों को मिल जाता है। ऐसे अवसर पर यदि उस दृश्य-संकेत को गंभीरतापूर्वक लिया जा सके, उसका सही अर्थ लगाया जा सके, तो अनेक बार इन पूर्वाभासों के माध्यम से आपदा विपदा, एवं दुर्घटनाओं से बचना तथा उनसे होने वाली क्षति को कम कर सकना भी संभव हो जाता है।
घटना इंग्लैण्ड की है। 8 दिसम्बर 1978 के दिन एडवर्ड पियरसन नामक एक व्यक्ति ट्रेन से लन्दन, की यात्रा कर रहा था, बिना टिकट सफर करने के अपराध में पकड़ा गया। जब उसे इस जुर्म में पकड़ कर न्यायालय में प्रस्तुत किया गया तो न्यायाधीश ने इसका कारण जानना चाहा। उससे इसका स्पष्टीकरण करते हुए कहा कि,”न तो मैं यह अपराध करने का इरादा रखता था और न मैं कोई अपराधी किस्म का ही व्यक्ति हूँ, पर परिस्थितियाँ कुछ ऐसी हो गई, जिसके कारण मुझे इस स्थिति में यात्रा करने के लिए बाधित होना पड़ा। वस्तुतः मुझे कुछ देर हो गयी थी। जब प्लेटफार्म पर पहुँचा, तो ट्रेन जाने के लिए तैयार खड़ी थी। इस स्थिति में जब तक मैं टिकट खरीदने के लिए टिकट-खिड़की तक जाता, वह ट्रेन छूट जाती और मुझे दूसरी ट्रेन के आने तक इन्तजार करना पड़ता, किन्तु कार्य इतना आवश्यक था, कि मैं दूसरी गाड़ी की प्रतीक्षा न कर सका और उक्त ट्रेन से बिना टिकट ही चल पड़ा, जिसके कारण अब मैं आपके सम्मुख खड़ा हूँ।”
उत्सुकतावश जब न्यायाधीश ने यह जानना चाहा कि आखिर वह कौन सा कार्य था, जिसके कारण यह स्थिति प्रस्तुत हुई? तो उसने आगे कहना आरंभ किया-”वस्तुतः मुझे यदा-कदा भविष्य में घटित होने वाली घटनाओं और विभीषिकाओं का पूर्व ज्ञान हो जाया करता है, जो प्रायः सच साबित होता है। कल मुझे ऐसा ही एक पूर्वाभास हुआ कि “ग्लासगो” में एक भारी भूकम्प जल्द ही आने वाला है, जिसमें बड़ी संख्या में जन-जीवन की हानि होगी। इसी की पूर्व सूचना देने मैं मौसम-विज्ञान कार्यालय, लन्दन जा रहा था, ताकि इस आकस्मिक आपदा में कुछ बचाव किया जा सके।”
सामान्यतः ऐसी स्थिति में ऐसी बातों पर तुरन्त ही विश्वास नहीं हो पाता और समझा जाता है कि अपराधी स्वयं को बचाने के लिए यह सब कौतुक गढ़ रहा है। एडवर्ड पियरसन के साथ भी यही हुआ। न्यायाधीश ने उसकी बातों पर विश्वास नहीं किया और सजा सुना दी। उस पर अविश्वास करने का एक अन्य कारण यह भी था, कि ब्रिटिश द्वीप-समूह में भूकम्प विरले ही आया करते हैं, किन्तु इसके ठीक तीन सप्ताह बाद “डैण्डी कोरियर एण्ड एडवर्टाइजर” नामक दैनिक पत्र ने अपने 6 दिसम्बर वाले अंक में “बिना टिकट वाले की भविष्यवाणी” नामक शीर्षक से सुर्खियों में यह खबर छापी कि “ग्लासगो” में भयंकर भूकम्प से धन-जन की भारी क्षति हुई है” और इस प्रकार अन्ततः पियरसन का पूर्वाभास सत्य सिद्ध हुआ। इस सम्पूर्ण घटना का विस्तृत उल्लेख “दि अन एक्सप्लेन्ड मिस्ट्रीज ऑफ माइण्ड, स्पेस एण्ड टाइम” पुस्तक में किया गया है।
पूर्वाभास की इस महत्वपूर्ण भूमिका को देखते हुए लन्दन के प्रतिष्ठित मनःचिकित्सक डा. जे.सी. बास्कर ने 1967 में “ब्रिटिश प्रीमोनीशन्स ब्यूरो” नामक एक ऐसी संस्था की स्थापना की, जिसमें लोग अपने पूर्वाभासों को दर्ज करा सकें, ताकि समय रहते प्राकृतिक विभीषिकाओं से बचाव कार्य किया जा सके। न्यूयार्क में भी ऐसी एक संस्था “सेन्ट्रल प्रीमोनीशन्स रजिस्ट्री” नाम से कार्यरत है। अमेरिका में इस संस्था की स्थापना राबर्ट डी.नेल्सन नामक शरीरशास्त्री के प्रयासों से हो सकी। इससे पूर्व वे पूर्वाभासों और स्वप्नों पर विश्वास नहीं करते थे, किन्तु एक बार उन्हें भी एक दुर्घटना का पूर्वाभास हो गया था तभी से उनकी आस्था इसके प्रति दृढ़ हो गई। एक शरीर विज्ञानी होने के नाते उनने इन पूर्वज्ञानों की वैज्ञानिक व्यवस्था भी की है। पूर्वाभास पूर्णतः विज्ञान सम्मत हैं, अब यह स्थापित हो चुका है।
प्रगति की दिशा में पिछले दिनों बहुत कुछ हुआ है। विज्ञान, उद्योग, शिक्षा और कला के क्षेत्र में इतनी अधिक उपलब्धियाँ हस्तगत की जा चुकी हैं कि उन पर गर्व किया जा सकता है। पाँच सौ वर्ष पूर्व का कोई व्यक्ति यदि कहीं जीवित हो और आकर आज की समृद्धि का अवलोकन करे तो उसे आश्चर्यचकित रह जाना पड़ेगा।
अणुबमों और रासायनिक अस्त्रों, मिसाइलों के माध्यम से एक मनचला व्यक्ति क्षणभर में संसार का विनाश कर सकता है। उपग्रह सौर मण्डलों को खोजने के उपरान्त अब अन्तर्ग्रही उड़ानों पर निकल रहे हैं और ब्रह्माण्डव्यापी सभी प्रकृति रहस्यों को खोज निकालने के प्रयत्न चल रहे हैं। समुद्र की गहराई और आकाश की ऊँचाई कोई ऐसी समस्या नहीं है जहाँ तक मनुष्य की पहुँच न हो सके। आविष्कारों का नित नया उद्घाटन हो रहा है। लगता है कि मनुष्य सृष्टि का मुकुटमणि बनने तक संतुष्ट न रह कर सर्वशक्तिमान पद पाने के लिए आतुर है एवं उसी आकाँक्षा से सरंजामों को जुटा रहा है।
इस एक सदी के अन्दर समृद्धि का असाधारण उत्पादन हुआ है। भले ही वह मुट्ठीभर लोगों तक सीमित क्यों न हो? किलों, महलों, कोठियों, बंगलों के साथ जुड़े हुए वैभव को देखकर प्रतीत होता है कि सम्पदा कुबेर के घर से चलकर धरती पर आ गई है, भले ही उसका उपयोग मुट्ठी भर लोग ही क्यों न कर पा रहें हों? कला के सभी पक्ष पशु प्रवृत्तियाँ भड़काने वाले प्रयोजनों की सेवा नौकरी करने में लग गये हैं। प्रेस ने साहित्य तो सृजा है पर ऐसा नहीं जिसको पढ़कर पाठक की अन्तरात्मा आदर्शों को अपनाने के लिए मचले। लोकरंजन के अनेकानेक साधन विकसित हुए हैं, पर उनमें वह जीवट देखने में नहीं आती जो साथ-साथ लोक मंगल का प्रयोजन भी पूरा करे। जन साधारण को लोकतंत्र में प्रतिपादित मौलिक अधिकारों का लाभ तो मिला है पर उनका उपयोग अवाँछनीय स्वेच्छाचार में प्रमुख रूप से हो रहा है।
इन शताब्दियों की भौतिक प्रगति से तो इनकार नहीं किया जा सकता, पर चिन्ता का प्रधान विषय यह है कि ऐसे व्यक्तियों का निर्माण नहीं हो रहा है; जो प्रगति के साथ साथ उपलब्धियों का सदुपयोग कर पाते? यह एक ऐसा कठिन प्रश्न सामने है, जिसके बिना जो कुछ कमाया पाया गया है वह सब कुछ बेकार हो जाता है। दुरुपयोग से तो अमृत भी विष हो जाता है। धन का दुरुपयोग मनुष्य की वासना, विलासिता और अहमन्यता के अभिवर्धन में ही सहायक होता है। बढ़ी हुई तृष्णा सामर्थ्य को अनाचार स्तर के कार्य करने के लिए प्रेरित कर रही है। विज्ञान ने विकसित आयुधों द्वारा विश्व विनाश का खतरा उत्पन्न कर दिया है। बढ़ती बुद्धिमत्ता प्रत्यक्षवाद की पक्षधर होती चली जा रही है और उसे तात्कालिक लाभ ही सब कुछ दीखता है। भले ही कुछ समय उपरान्त उसके भयावह दुष्परिणाम भुगतने पड़ें। प्रचलनों ने एक से दूसरे को अधिक संकीर्ण-स्वार्थी बनने में प्रतिस्पर्धा करने के लिए प्रेरित किया है। माँसाहार की बढ़ती प्रवृत्ति से पशु पक्षियों की जान पर बन आई है। कामुकता का उन्माद इस स्तर तक बढ़ चला है कि नर नारी के बीच सदाचरण का सेतु बाँधे रहने वाली शालीनता का तिरोधान ही होता जा रहा है। यही है वह विकृति जिसने प्रजनन के बाहुल्य का संकट खड़ा किया है और धरती ने बढ़ती जनसंख्या का भार वहन करने से इनकार कर दिया है। प्रजनन विकार अगले दिनों अणुबमों के विस्फोट से अधिक खतरनाक सिद्ध हो सकते हैं। इस प्रकार की अगणित विभीषिकायें आर्थिक, सामाजिक क्षेत्रों में बढ़ रही हैं। फलतः भ्रष्टाचार सर्वत्र उपस्थित शैतान की तरह अपनी पतन पराभव से जुड़ी हुई भयंकरता का परिचय दे रहा है। वह आर्थिक क्षेत्र तक सीमित न रह कर सामाजिक, पारिवारिक व्यक्तिगत क्षेत्रों को भी घेरता चला आ रहा है। चिन्तन चरित्र और व्यवहार के सभी क्षेत्रों पर उसका प्रभाव और दबाव बढ़ रहा है।
तथाकथित प्रगति के प्रत्यक्ष लाभों की तुलना में वे विनाशकारी दुष्प्रवृत्तियाँ कहीं अधिक भयावह हैं जो मानवी गरिमा के स्तर को बुरी तरह गिराने में लगी हुई हैं। पतनोन्मुख व्यक्ति या समुदाय अपने आप में खोखला बनता है विनाश के गर्त में तेजी से गिरता है। अधिक साधन मिलने पर यह उपक्रम और भी अधिक तेज हो जाता है। अशिक्षित और अनगढ़ व्यक्ति जितनी हानि पहुँचा सकता है उसकी तुलना में अधिक योग्य, अधिक शिक्षित, अधिक सम्पन्न व्यक्ति अपेक्षाकृत कहीं अधिक विनाश लीलायें रचा कर खड़ी कर सकता है। कर भी रहा है।
साधनों की वृद्धि प्रसन्नतादायक और सुख शान्ति के सम्वर्धन में सहायक तभी हो सकती है, जब उपलब्धियों का सदुपयोग बन पड़े। इसके लिए आवश्यक है कि व्यक्तियों में शालीनता का समुचित सम्पुट भी लगा रहे, अन्यथा वह प्रगति अवगति से भी महँगी पड़ेगी जो अनैतिक लोगों द्वारा अवाँछनीय प्रयोजनों के लिए प्रयुक्त की जाने लगे। माचिस की उपयोगिता सर्वविदित है पर यदि कोई उद्धत व्यक्ति उसे खिलवाड़ का साधन बना कर घर की वस्तुओं को जलाने में प्रयुक्त करने लगे तो अपना घर ही नहीं, पड़ोस से लेकर समूचा गाँव अतिवायु से भस्म हो सकता है। अस्तु साधनों के उपार्जन के साथ साथ यह अंकुश भी रहना ही चाहिए कि उपलब्धियों का मात्र सदुपयोग भी बन पड़े।
सुदपयोग मात्र सज्जनों से ही बन पड़ता है। उत्कृष्ट चरित्र और सुसंस्कृत व्यक्ति ही साधनों का सदुपयोग कर सकते हैं। गये गुजरे लोग तो पतन ही सोचते और विनाश की ही संरचना करते हैं। जितने अधिक साधन उनके पास होते हैं, उसी अनुपात में उनका अनाचार भी बढ़ता जाता है।
तथ्यों पर गंभीरतापूर्वक विचार करने से इस निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि व्यक्तियों में सुसंस्कारी शालीनता का समावेश उससे भी आवश्यक है जितना कि सम्पदा और योग्यता का अभिवर्धन है।
इन दिनों कारखानों और योजनाओं को बनाने में मूर्धन्य लोगों की क्षमता एकात्म भाव से जुड़ी हुई है। उन्हें इसी में समाज की भलाई दीखती है। इस आवेश में यह भुला दिया जा रहा है कि चरित्रवान आदर्शवादियों का अभिवर्धन भी आवश्यक है जिनके सहारे सौंपे हुए कार्य ईमानदारी और तत्परता के साथ सम्पन्न किये जा सकें। अन्यथा कैसी ही अच्छी मशीन या योजना क्यों न हो, गये गुजरे लोग प्रमाद ही बरतेंगे, उनमें से व्यक्तिगत स्वार्थसिद्धि के उपाय ही सोचेंगे, कारखाने बनें, पर उन्हें चलाने के लिए प्रखर प्रतिभायें भी तो चाहिए। बन्दूक कैसी ही अच्छी क्यों न हो पर चलाने वाला अभ्यस्त नहीं है तो उसका प्रयोग अनर्थकारी ही होगा। इंजन कितना ही कीमती क्यों न हो, ड्राइवर की उच्छृंखलता उस गाड़ी में लदे सामान और बैठे मुसाफिरों के लिए संकट बन कर ही रहेगी। साधनों की अभिवृद्धि कुछ समय के लिए रोकी भी जा सकती है किन्तु प्रामाणिक व्यक्तियों के निर्माण की आवश्यकता ऐसी है जिसे प्रमुखता प्राथमिकता ही मिलनी चाहिए। समझा और समझाया जाना चाहिए कि साधनों की प्रगति वास्तविक प्रगति नहीं है। निष्ठावान व्यक्ति तो कम साधनों में भी हँसते हँसाते गुजर कर लेते हैं पर उद्दण्डता और अनगढ़ता बनी रहने पर विपुल साधन भी मात्र विग्रह अनाचार और विनाश के ही सरंजाम जुटाती हैं। साधनों की प्रगति में उत्साह दिखाये जाने में हर्ज नहीं पर व्यक्तित्व को घटिया रहने देना उस तथा कथित प्रगति पर पानी फेरना ही हो सकता है।
परमात्म सत्ता की विधि व्यवस्था इस विराट ब्रह्माण्ड का संचालन बड़ी निराली सुदक्षता के साथ कर रही है। इसका प्रत्येक प्राणी-प्रत्येक घटक अपना जीवन क्रम निर्बाध रूप से चला सके, इसलिए उसने सभी को परिस्थितियों के अनुरूप सक्षम बनाया है। यद्यपि मनुष्य को अनेकानेक विभूतियाँ एवं विशेषताएँ मिली हैं इसी कारण वह सभी जीवों में ज्येष्ठ एवं श्रेष्ठ है। पर इसका यह तात्पर्य नहीं है कि मनुष्येत्तर प्राणियों के प्रति उसकी उदारता व प्यार में न्यूनता है।
जीवजगत का अध्ययन करने पर पता चलता है कि इन कनिष्ठ समझी जाने वाली अन्यान्य सन्तानों को भी ऐसी विलक्षण एवं अद्भुत क्षमताएँ प्रदान की हैं जिससे कि वे सभी अपने जीवन व्यापार का निर्वाह सक्षमता और सफलता पूर्वक कर सकें।
जीव जन्तुओं की नाना विधि विलक्षणताएँ उनकी उपयोगिता आवश्यकता के अनुरूप ही हैं। सभी जीवधारी अपनी दृष्टि, श्रव्य, घ्राण आदि संवेदन क्षमताओं के आधार पर विश्व उद्यान में सफलता पूर्वक विहार करते और इसी आधार पर सहयोग सहकार अपनाते देखे जाते हैं। इनमें दृष्टि क्षमता एक ऐसी विभूति है, जिसके द्वारा इस विश्व उपवन की सुन्दरता को देखा एवं उसमें से उपयोगी को चुना जा सकता है। पक्षियों में यह क्षमता आश्चर्यजनक रूप से अधिक होती है। बहुत ऊँचे उड़ने वाले गीध, बाज जैसे पक्षी ऊपर से ही छोटे-छोटे कीड़ों को देख लेते हैं और उन्हें उठाकर आहार बना लेते हैं। इनकी यह दृष्टि क्षमता मनुष्य की अपेक्षा आठ गुनी अधिक है।
कुछ अन्य जन्तु जो दृष्टि क्षमता में हीन होते हैं उनमें वैश्व चेतना ने इस अभाव को विशिष्ट प्राण शक्ति को देकर उन्हें आश्चर्यजनक रूप से सक्षम बनाया है। उदाहरण के लिए कुत्तों में जहाँ रंग बोध प्रायः नहीं के बराबर होता है और वे संसार को धुँधले धूसर रंग का ही देख पाते हैं। वहीं उनकी घ्राण शक्ति विलक्षण रूप से विकसित होती है। एक एलसेशियन कुत्ते में लगभग 2200 लाख घ्राण कोशिकाएँ पायी जाती हैं। मनुष्य में इन कोशों की संख्या मात्र 50 लाख होती है अतः वह केवल अधिकतम 10 हजार प्रकार की गंधों को पहचान सकता है, जबकि कुत्तों में लाखों गुना अधिक गन्धों को पहचानने की क्षमता पाई जाती है।
नेवले के सूँघने की शक्ति मनुष्य तो क्या कुत्ते से भी अधिक होती है। कोलम्बों के अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर मादक पदार्थ की तस्करी की रोकथाम के लिए प्रशिक्षित नेवलों का उपयोग किया जाता रहा है। तस्करी का माल ढूंढ़ निकालने या विस्फोटक सामग्री को खोज निकालने में इन क्षुद्र कहे जाने वाले जीवों की अद्भुत क्षमता देखते ही बनती है। इस कार्य के लिए नेवलों को प्रशिक्षित करने का कार्य अमेरिका में बृहद् पैमाने पर किया जा रहा है। प्राणि विशेषज्ञों का कहना है कि नेवला एक अत्यधिक समझदार और सूझबूझ वाला प्राणी है। किसी भी प्रकार की सूक्ष्म गंध को सूँघ सकने में वह सक्षम है।
कुछ जीवधारी ऐसे भी हैं, जिसमें मात्र निज के उपयोग की एक ही प्रकार की गंध पहचानने की अद्भुत सामर्थ्य है। जैसे कि एक प्रकार के गुबरैले का लार्वा। यह अपना भोजन अंगूर की जड़ों से प्राप्त करता है। इनसे निकलने वाली कार्बन डाई आक्साइड गैस की गंध को यह आश्चर्यजनक रूप से पहचानता है। भूमि के ऊपर से इस गंध को पहचान कर उसके सहारे जमीन के अन्दर घुसकर जड़ों तक पहुँच जाता है।
कुछ जीव-जन्तुओं की परिस्थितियाँ एवं विहार काल असामान्य होते हैं और तदनुरूप उनका व्यवहार भी। जैसे कि रात्रि विचरण। ऐसे जन्तुओं में दृश्येन्द्रियों का कोई विशेष महत्व उपयोग नहीं होता। अतः इनमें परम सत्ता की कृपा एक अन्य विशिष्टता-श्रव्य क्षमता के रूप में प्रस्फुटित होती है। चमगादड़ प्रतिध्वनि द्वारा स्थिति का निर्धारण शत प्रतिशत सही ढंग के करते हैं। ये जन्तु कुछ विशिष्ट प्रकार की ध्वनियाँ उत्पन्न करते हैं जिनमें से मात्र कुछ एक ही मनुष्य के लिए श्रव्य हैं। इनकी प्रतिध्वनियों द्वारा ये अपने शिकार का पता लगा लेते हैं साथ ही उड़ते समय मार्ग में पड़ने वाले अवरोधों, विघ्नों को भी जान लेते हैं। इस प्रकार बिना किसी विघ्न-बाधा के सुरक्षित विचरण करते हैं। प्रत्येक अपनी स्वतः उत्पन्न की हुई ध्वनि की प्रतिध्वनि द्वारा ही मार्गदर्शन प्राप्त करता है और साथ साथ अपने अन्य साथियों की प्रतिध्वनियों से भ्रमित भी नहीं होता। उनकी यह अप-श्रव्य-पराश्रव्य ध्वनि एवं प्रतिध्वनि उत्पादन तथा वर्गीकरण प्रक्रिया वैज्ञानिकों के लिए आज भी एक रहस्य बनी हुई है।
एक और अन्य आश्चर्यजनक सुनने का तरीका उत्तरी अमेरिका की इक्न्यूमान मक्खी में पाया जाता है। इसके पैरों में कान होते हैं। इनका अधिकाँशतया उपयोग वह हार्नटेल लारबा के लकड़ी चबाने से उत्पन्न ध्वनि को सुनने में करती है।
अन्याय जन्तु संवेदनात्मक संकेतों के प्रति आग्रही होते हैं। उनके क्रिया-कलापों का संचालन इन्हीं पर निर्भर है, उदाहरणार्थ मधुमक्खी पहले फूलों की गंध से अत्यधिक आकर्षित होती है। वे पत्तियों के आधार पर उनकी आकृति एवं रंग की पहचान करती हैं। भोजन चूस लेने के पश्चात् वे सीधे अपने छत्ते की ओर आकर्षित होती हैं। ठीक उसी प्रकार जिस तरह पूर्व में पुष्पों की ओर थी। अब कोई भी पुष्प चाहे कितना ही आकर्षक एवं सुगंधित क्यों न हो उन्हें लुभा नहीं सकता। नियामक सत्ता ने एक विशिष्टता इन्हें प्रदान की है। वह है पराबैगनी किरणों के प्रति संवेदनशीलता। इसी क्षमता के द्वारा वह सूर्य की सही स्थिति का निर्धारण करने में सक्षम होती हैं। चाहे वह कितने ही घने बादलों में क्यों न छिपा हो? इसी से दिशा-निर्धारण प्रक्रिया सम्भव होती है।
परमात्मा को अपनी सृष्टि के प्रत्येक घटक से कितना प्यार है, उसने उनकी आवश्यकतानुरूप कैसी कैसी विचित्रता- विशिष्टता प्रदान की हैं। इसके अनेकानेक उदाहरण वैज्ञानिकों द्वारा की जा रही नित्य निरन्तर नवीन खोजों के रूप में सामने आ रहे हैं। इन्हें हम भले ही अपने मनोनुकूल किस भी भाषा या शब्दावली में व्यक्त करें। किन्तु हर दशा में यह समस्त विशिष्टताएँ विभूतियाँ वस्तुतः परमसत्ता की सरल समदर्शिता को ही प्रदर्शित करती हैं।
ऐसी ही एक नवीन विलक्षणता का पता सन् 1952 में कैलीफोर्निया विश्वविद्यालय के प्रो.डा. टी.एच. बुलाँक ने लगाया। उन्होंने बताया कि रैटिल सर्प में तृतीय नेत्र भी पाया जाता है। यह नासाद्वार एवं आंखों के बीच 2 छोटे गढ्ढों के रूप में होते हैं और ऊष्मा संवेदन के सिद्धान्त पर कार्य करते हैं। इनके माध्यम से वह रात्रि विचरण के समय घोर अँधेरे में भी अपना शिकार भली प्रकार खोज लेते हैं।
ऐसी अनेकों विशेषताएँ-विलक्षणताएँ परम पिता ने अपनी सन्तानों को उनकी आवश्यकता एवं परिस्थिति के अनुरूप प्रदान की है। ताकि वे सब इस विश्व वाटिका में सुगमता एवं सक्षमता पूर्वक विहार कर सकें।
सचमुच उस सत्ता का स्नेह प्यार अगाध है। संसार का कोई पदार्थ या व्यक्ति जितना समीप हो सकता है उसकी अपेक्षा ईश्वर की निकटता और भी अधिक है। फिर भी आश्चर्य है, इतना सब होते हुए सृष्टि का सर्वाधिक बुद्धिमान कहा जाने वाला मनुष्य अपनी बुद्धि के आवरण में लिपटा उससे अरबों-खरबों-कोसों दूर है। उसकी समीपता की अनुभूति के साथ जिस परम आनन्द और सन्तोष का अनुभव होना चाहिए वह उसे कभी हुआ ही नहीं।
मृत्यु भी जन्म की ही तरह निश्चित है। जो जन्मा है सो मरेगा। मरने के बाद स्वर्ग नरक के दरवाजों में प्रवेश करना पड़ता है। पुनर्जन्म का, नयी काया धारण करते रहने का सिलसिला चलता रहता है। इन तथ्यों को सभी स्वीकारते हैं कि भले बुरे कर्मों का फल यदि इसी जन्म में न भुगता गया हो तो वह अगले जन्म में प्रकट एवं फलित होता है।
आश्चर्य इस बात का है कि जीवन के साथ गुथी हुई इस गहरी सच्चाई को लोग गम्भीरता से नहीं देखते और उस महायज्ञ की पूर्व तैयारी इस प्रकार नहीं करते जैसी कि उन्हें करनी चाहिए।
समझा जाता है कि अन्य लोग ही मरेंगे। हमारे सामने यह भयंकर समस्या कभी भी न आयेगी, जिसमें शरीर छोड़ना पड़े, संसार से बिछुड़ना पड़े और अनिश्चितता के धरातल पर हवा में तैरते रहना पड़े। उपेक्षायें सभी बुरी होती हैं विस्मरण को भारी कमी माना जाता है, पर मृत्यु को भूल जाने का तो ऐसा दुष्परिणाम सामने आता है जिसकी क्षतिपूर्ति आगे चलकर भी कभी पूरी नहीं हो सकती।
जीवन एक अनुपम सुयोग है। अन्य प्राणियों में से किसी की भी शारीरिक संरचना और मानसिक संगठन ऐसी उच्चकोटि की नहीं है, जिसे देखकर देवताओं का भी मन ललचाए और वे इसी के साथ जुड़े रहने में प्रसन्नता अनुभव करें। इस काया को सुरदुर्लभ होने की मान प्रतिष्ठा मिले।
ऐसा शरीर खाने-पीने के ही कोल्हू में पिलते हुए समाप्त हो जाय। कुछ महत्वपूर्ण न बन पड़े तो समझना चाहिए कि जन्म व्यर्थ ही चला गया। पेट और प्रजनन के लिए जीवित रहने वाले प्राणियों में तो मनुष्य की स्थिति सर्वोत्तम है और इस योग्य है कि महान उपलब्धि के अनुरूप अपनी कृतियों को भी ऐसी बना सके जिसे अभिनन्दनीय कहा जा सके, जिसे देखकर लोग अनुकरणीय और अभिवन्दनीय कहें, उससे प्रेरणा प्राप्त करने का प्रयत्न करें। किन्तु ऐसा होता नहीं। मौत की चर्चा करने पर बुरा मनाया जाता है। इस प्रकार के कथन को अशुभ कहा जाता है। किसी के सम्मुख उसके मरण की कामना भर कर देना गाली देने से भी बुरा माना जाता है। रात के सपने में अपनी या अपने किसी प्रियजन की मृत्यु का दृश्य दीख पड़े तो उदासी छा जाती है, किसी अनिष्ट की आशंका से दिल धड़कने लगता है।
मृत्यु हर घड़ी सिर पर सवार रहे, यह बुरा है। पर यह उससे भी अधिक बुरा है कि उसे एक प्रकार से विस्मृत ही कर दिया जाय। भुला देने पर मनुष्य अहंकारी हो जाता है। उद्दण्डता और दुष्टता करने लगता है। कर्मफल की-ईश्वर के दरबार में पेश किए जाने की और कर्मों के अनुसार दण्ड मिलने की यथार्थता इतनी धुँधली हो जाती है कि उसका अस्तित्व ही एक प्रकार से आँखों से ओझल हो जाता है।
सुन्द-उपसुन्द, वृत्रासुर, रावण, हिरण्यकश्यप आदि ने स्वेच्छामरण का वरदान प्राप्त कर लिया था। इस मान्यता के मन में बसते ही वे दुष्कर्मों पर उतारू हो गए। जब मरना ही नहीं है तो फिर डर किस बात का? संसार वालों को डरा या फुसला कर अपने वशवर्ती बना लेने की योग्यता तो अपने में है ही। फिर अनीति अपना कर मन चाहे लाभ तत्काल प्राप्त कर लेने के अवसरों को हाथ से क्यों जाने दिया जाय? निरंकुश, निर्भय और निश्चिन्त व्यक्ति यदि उद्धत स्तर के हैं तो अपनी उद्दण्डता को चरम सीमा तक पहुँचाए बिना रहते नहीं। संसार के आतताइयों का इतिहास पढ़ने से विदित होता है कि उनकी कोई आवश्यकता नहीं अड़ी हुई थी, जिसके कारण वे अत्याचार एवं अपराधों के पहाड़ जमा कर लेने की बात सोचने पर प्रवृत्त होते। मौत को भुला देने से मनुष्य इस बात को भूल जाता है कि यह जीवन ही सब कुछ नहीं है। इसकी तुलना में कहीं अधिक लम्बे समय तक आत्मा को ऐसी स्थिति में रहना पड़ता है जहाँ सत्कर्मों के अतिरिक्त और कोई भी सहायक नहीं होता, ईश्वर भी नहीं। क्योंकि वह कर्मों के आधार पर ही किसी का मान या तिरस्कार करता है।
मृत्यु को न भूलना इससे कम भयंकर नहीं है। उससे सिर पर एक ऐसा भय समा जाता है, जो काल्पनिक नहीं वास्तविक होता है। फिर मौत का कोई ठिकाना नहीं, वह बालक, युवक प्रौढ़ या वृद्ध का अन्तर नहीं करती और न उसके आगमन का कोई निश्चित समय ही मानती है। ऐसी दशा में भावुक या यथार्थवादी किसी भी समय मौत के आगमन की संभावना देखते रहते हैं। ऐसी दशा में उनका जीवन ही नीरस और भारभूत हो जाता है। हर घड़ी व्याकुलता बनी रहती है। स्वजन सम्बन्धी भी विराने और बिछुड़ने वाले लगते हैं। उत्साहपूर्वक काम करने का भी मन नहीं करता। क्योंकि जब मेले के यात्री जैसी अपनी स्थिति है तो फिर किसी प्रयोजन में व्यर्थ सिर खपाना किस काम आएगा? ऐसी ही उदासीनता के वातावरण में राजा परीक्षित ने अपने राज-पाट का काम छोड़ दिया था और कथा श्रवण करके सद्गति के एकाकी प्रयास में जुट गए थे। किन्तु यह तो सही तरीका नहीं?
घर पर डाकुओं का आक्रमण होने के समाचार से दिल दहल जाता है। उनकी सूचना गलत भी हो सकती है और उनका आक्रमण निष्फल भी बन सकता है। किन्तु मृत्यु के बारे में तो कुछ नहीं कहा जा सकता कि उसका आक्रमण कब चढ़ दौड़े और देखते-देखते गरदन मरोड़ कर स्थिति में आमूलचूल परिवर्तन कर दे। गम्भीरता पूर्वक यदि कोई मृत्यु की उपस्थिति निकटवर्ती अनुभव करने लगे तो उसकी स्थिति विक्षिप्त जैसी हो जाएगी। उससे कुछ भी करते धरते न बन पड़ेगा।
जब मृत्यु का स्मरण और विस्मरण दोनों ही विपन्नता उत्पन्न करते हैं, तो उसके सम्बन्ध में क्या दृष्टिकोण अपनाया जाय जिससे सामान्य, स्वाभाविक और सही स्थिति बनी रहे।
इस संदर्भ में गीतकार ने एक सही दृष्टिकोण दिया है कि आत्मा को अमर माना जाय और मरण को नए कपड़ा बदलने जैसा अनुभव किया जाय। मृत्यु को अपनी सत्ता का अन्त न माना जाय। वरन् लम्बी यात्रा के बीच-बीच पड़ने वाली धर्मशाला की तरह अपनी स्थिति का अनुभव किया जाय। इसके फलस्वरूप दूरदर्शिता का उदय होता है। पिछले जन्मों में भुगती गई भ्रान्तियों की कठिनाइयाँ तथा परिस्थितियाँ याद आती हैं और जी सोचता है कि उन बुरे दिनों की पुनरावृत्ति न होना चाहिए। इसलिए ऐसा एक भी कर्म न बन पड़ना चाहिए, जिसके कारण हेय परिस्थितियों में फिर से पिसना-पिलना पड़े। यह भय कर्तव्य पालन की प्रेरणा देता है ताकि उज्ज्वल भविष्य की सम्भावनाओं की विनिर्मित होते चलने की सम्भावना स्पष्ट होती रहे।
मृत्यु के समय इस पंच भौतिक शरीर का ही अन्त होता है, किन्तु इसके बाद भी सूक्ष्म शरीर की सत्ता बनी रहती है। सूक्ष्म शरीर के साथ योग्यता, क्षमताएँ, आदतें एवं धारणाएँ साथ जाती हैं और उन्हीं के साथ उलझ-सुलझ क जीवधारी स्वर्ग नरक का सुखद दुखद अनुभव करता रहता है। इसलिए सत्प्रयत्नों को निरंतर अन्तिम समय तक जारी रखा जाय ताकि अगले जन्म में भी वह संचित सुसंस्कारिता साथ रहे और जन्म के साथ ही वे संस्कार एवं सुविधा साधना उपलब्ध हो सकें, जो सामान्यतया बहुत प्रयत्न करने पर बहुत दिन में हस्तगत होते हैं।
मरण के सम्बन्ध यही सन्तुलित दृष्टिकोण सही है कि शरीर बदलते हैं, आत्मा नहीं मरती। साथ ही वह पिछला आत्मिक उपार्जन भी साथ लेकर प्रयाण करती है। इस आधार पर हर कोई अपने इस लोक के साथ परलोक को भी समुज्ज्वल बना सकता है। इसकी प्रेरणा आत्मा की अमरता वाले सिद्धान्त से ही मिलती है और वही सदा संतुलन भी बनाए रहती है।
आगे बढ़ने, ऊँचा उठने, कीर्तिमान स्थापित करने की महत्वाकांक्षा उस हद तक सराहनीय भी मानी जाती है और अन्यान्यों के लिए प्रेरणाप्रद भी बनती है जब वह नीति-मर्यादाओं के अन्दर रहती है। आतुरता अपनाकर जब लोग बड़े बनने के लिए अनीति का अपवाद अपनाते हैं तो उन प्रगति प्रयासों का स्वरूप अनाचार जैसा बन जाता है। उस तरह अपनाई गई सफलता भी गर्हित मानी जाती है और बड़प्पन लूटने की अभिलाषा को जन समुदाय की दृष्टि में हेय एवं घृणित बना देती है।
अपने देश में संतोष के उच्च अध्यात्म आदर्श को आलस्य और प्रमाद में परिणत कर लिया जाता है। फलतः उत्कर्ष की प्रगतिशीलता अपनाने के लिए मन में उत्कण्ठा ही नहीं उभरती। उभरती भी है तो उस संदर्भ में यह समझा जाता है कि इसके लिए अनीति अपनाना चालबाजी धोखेबाजी, बेईमानी का आश्रय लेना अनिवार्य है। वे उसी कुपंथ पर चल पड़ते हैं और इस प्रकार जो कमाते हैं उसकी तुलना में अपनी बहुमूल्य प्रामाणिकता गवाँ बैठते हैं। दबाव या प्रलोभन के बिना उस सहयोग को अर्जित नहीं कर सके जो प्रगति का मूलभूत आधार है।
एकाकी व्यक्ति अपने बलबूते एक छोटी सीमा तक ही उत्कर्ष कर सकता है। व्यापार से लेकर लोक-नेतृत्व तक में किसी न किसी प्रकार जन सहयोग की आवश्यकता पड़ती है। यह सम्बन्ध घनिष्ट और भाव भरे होने चाहिए। आत्मीयता और मैत्री का आधार यही है। शिष्टाचार लोकाचार से तो मात्र इतना ही लाभ है कि गाड़ी अपनी लाइन पर चलती रहे। किसी से टकराये नहीं। उसे उस स्तर तक विकसित करना जिससे स्वेच्छा सहयोग एवं आत्मभाव उभरने लगे-यह अनायास उपलब्ध नहीं होता। इसके लिए आवश्यक तो प्रतिफल लेकर लौटने वाली सेवा सहायता भी चाहिए पर उतना न बन पड़े तो भी इतना तो होना ही चाहिए कि व्यक्ति को कमेठ और प्रामाणिक समझा जाय। इसके बिना श्रद्धा नहीं जगती और सहयोग नहीं मिलता।
जिस प्रकार बड़े क्षेत्र में नेतृत्व करने वाले लोगों को जनता का व्यापक समर्थन चाहिए उसी प्रकार अपने क्षेत्र में जिनसे काम लेना है जिनकी सहायता करनी पड़ती है उनकी सद्भावना अर्जित करना न्यूनतम वह कार्य है जो सफलता एवं प्रगति के इच्छुकों को करना ही चाहिए। परिवार को अनुशासित, सुसंस्कारी, प्रगतिशील एवं समुन्नत बनाने के लिए यह आवश्यक है कि उस परिकर में सद्भावना का स्तर बढ़ा चढ़ा हो। इसके उपरान्त उन्हें मार्गदर्शन देना किसी दिशा में मोड़ना सरल पड़ता है। अन्दर दुर्भावनाएँ भरी हो तो सत्परामर्श का भी उपहास उड़ाया जाता है और अनुशासन के शिकंजे में कसने पर विद्रोह खड़ा होता है। परिवार की तरह व्यवसाय, कारोबार, उत्पादन, संगठन आदि के बारे में यही बात है। प्रगतिशीलता के इतिहास में इन्हीं तथ्यों का समावेश है। आकाश से टूटकर अनायास ही सफलता तो किसी विरले को ही मिलती है। जमीन में गड़ा खजाना तो किसी को कदाचित ही मिलता है।
वैज्ञानिक, विद्वान, पहलवान, धनवान स्तर के लोगों के प्रगतिक्रम का पर्यवेक्षण किया जाय तो उनमें से कदाचित ही कुछ मिलें जो सरलतापूर्वक सस्ती सफलताएँ पा सके हों। उन सभी ने अध्यवसाय का आश्रय लिया है। अपने स्वभाव को मृदुल एवं लगनशील बनाया है। जिम्मेदारियों को समझा है और कठोर परिश्रम नियमित रूप से करने का उपक्रम बनाया है। वैज्ञानिकों, विद्वानों, संगठनों, सृजेताओं में अन्य विशेषताओं की तुलना में यही वर्चस्व बहुलतापूर्वक पाया गया है जिसमें सफलताओं के पीछे परिष्कृत व्यक्तित्व काम करता हुआ दिखाई देता है।
अमेरिका और योरोप के देशों में कितने ही व्यक्ति ऐसे हैं जिनकी जन्मजात परिस्थितियाँ गई गुजरी थीं पर उनकी प्रगति आकाँक्षा सही दिशा में चली और सफलता के घेरे में सीमा तक पहुँची। कार्यक्षेत्र कोई भी क्यों न हो, उपलब्धियाँ किसी भी प्रकार की क्यों न हों पर उन सब के मूल में एक ही तथ्य काम करता है-कर्मनिष्ठ उत्तरदायित्वों से भरा साहसी और मधुर जीवन, मिलनसार स्वभाव और आत्मीयता सद्भावना। इसी आधार पर वे संपर्क क्षेत्र के कार्यकर्ताओं को विशिष्ट सहयोगी बना सके। उनकी प्रशंसा सहकारिता के आधार पर ऊँचे उठ सके, आगे बढ़ सके।
गत वर्ष अमेरिका के अरबपतियों की गणना हुई। जिनके पास अरबों खरबों की सम्पदा थी उनकी संख्या 400 के लगभग पाई गई। इनमें से मात्र 5 ही ऐसे थे जिन्हें पैतृक सम्पदा के रूप में कुछ काम आरम्भ कर सकने योग्य पूँजी मिली थी। शेष सभी ऐसे थे जिनने गरीबी की स्थिति में जन्म लेते हुए भी अपने सद्गुण बढ़ाये और संपर्क में आने वालों को अपनी प्रामाणिकता से प्रभावित करके उनके सहयोग आकर्षित किये। इसी आधार पर उनके व्यवसाय पनपते रहे और बढ़ते रहे।
उपरोक्त 400 अरबपतियों में 78 महिलाएँ भी हैं। उनमें से कुछ की शिक्षा तो मैट्रिक से भी कम है। वे धनिकों की पत्नियाँ या बेटियाँ भी नहीं हैं। उनने अपने स्वतन्त्र अध्यवसाय और परिश्रम से प्रगति की। इस मार्ग में सबसे अधिक कारगर हुआ उनका मधुर स्वभाव, प्रामाणिक व्यक्तित्व तथा दृढ़तापूर्वक अपनाया गया आत्मानुशासन।
यह ठीक है कि प्रगति के लिए परिस्थितियों की अनुकूलता भी अपनी महती भूमिका निभाती है। सम्पन्न देशों में फलने फूलने वाले व्यवसाय आसानी से हाथ लग जाते हैं और उनके गति पकड़ने में देर नहीं लगती। निर्धन देशों की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं है जिसमें सफलतापूर्वक धनी बना जा सके। फिर भी इतना तो निश्चित है कि समृद्धि के सम्बन्ध में अपवाद मानते हुए भी अन्यान्य सभी क्षेत्र ऐसे हैं जिनमें आसानी से प्रगतिपथ पर बढ़ा जा सकता है। उदाहरणार्थ स्वास्थ्य और ज्ञान जैसे क्षेत्र ऐसे हैं जिनमें आत्मानुशासन और उत्साह भरा प्रयास ही अनेकानेक उपलब्धियाँ प्रस्तुत कर देता है। कालिदास और बरदाज जैसे जन्मतः मूढ़मति समझे जाने वाले भी जब धुरन्धर विद्वान बन सकते हैं तो कोई कारण नहीं कि मध्यवर्ती मानसिक संरचना के व्यक्ति अध्ययन शील बनकर मन की तत्परता एवं तन्मयता के सहारे आरम्भिक स्थिति की तुलना में असाधारण रूप से प्रगतिशील न बन सकें। यही बात स्वास्थ्य के सम्बन्ध में भी है। सुविधा साधनों की दृष्टि से गई बीती स्थिति में रहने का व्रत लेकर गान्धी, विनोबा कबीर और बुद्ध जैसे व्यक्ति भी दीर्घजीवन के अधिकारी बन सके।
वैज्ञानिकों में से कितने ही ऐसे हैं जिन्हें पिता की प्रयोगशाला या खोज के लिए आवश्यक पूँजी नहीं मिली फिर भी वे अपनी आकाँक्षा के अनुरूप वातावरण एवं सहयोग प्राप्त कर सके और ऐसे आविष्कार कर सकने में सफल हुए जिनकी परिणति पर संसार भर को चकित होना पड़ा है। यह लगनशीलता और प्रामाणिकता ही है जो किसी को भी प्रगतिपथ पर आगे बढ़ाने में समर्थ होती है।
दूध में पानी मिलाया जाय तो वह घुल जायगा। किन्तु उसी से निकला हुआ मक्खन ऊपर तैरता रहेगा। आत्महीनता-ग्रस्त लोग मनुष्यों की भीड़ में वैसे ही बन जाते है, किन्तु ज्ञानी पुरुष अपना व्यक्तित्व बुरों के बीच में भी ऊँचा रखते है।
संसार को विज्ञान की आँखों से देखा जाय तो ब्रह्माण्ड भर में ताप, प्रकाश और ध्वनि की तरंगें भर दौड़ती दृष्टिगोचर होंगी। अणु परमाणुओं के अन्धड़ चलते दृष्टिगोचर होंगे। पदार्थों के बीच आकर्षण विकर्षण का क्रम चलता दीखेगा। जादू की नगरी की तरह कोई बाजीगर यहाँ चित्र विचित्र खेल-खिलवाड़ रचता और बिगाड़ता प्रतीत होगा। यही है संसार का वास्तविक रूप जो दीखता तो स्थिर है पर उसके अन्तराल में भारी हलचलें चलती हुई समझी जा सकती हैं। पदार्थ अपने अपने पृथक रंग रूप में विद्यमान दीख पड़ते हैं। पर वे देर तक स्थिर नहीं रहते। उनमें तेजी से परिवर्तन होता रहता है। शरीर के भीतर जीवाणु जिस क्रम से चलते और कार्यरत रहते हैं, उन्हें देखकर आश्चर्य होता है। विश्व की समस्त संरचना आश्चर्य चकित करने वाली है। उसकी गतिशीलता सामान्य बुद्धि की समझ में नहीं आती। स्थिरता जैसी प्रतीत होती है। पर वह है कोरी भ्रान्ति।
इस गतिशीलता को जीवन के साथ जोड़ा जाय तो हम यथार्थता के अधिक निकट पहुँचते हैं। शुक्राणु और डिम्बाणु के सम्मिश्रण से बना बिंदु-कलल क्रमशः भ्रूण के रूप में विकसित होता है। गर्भ रूप में पकता है। पककर संसार में आता है। शैशव, बचपन के रूप में विकसित होते हुए किशोरावस्था और यौवन की वय आ पहुँचती है। ढलान आता है। वार्धक्य आ धमकता है। शरीर निर्बल, जराजीर्ण होता जाता है और काया मृत्यु के मुख में चली जाती है। दृश्य अदृश्य बनता है और फिर नये जन्म के लिए जिस तिस दिशा में भटकता है। फिर वही क्रम, फिर वही गति, फिर वही नियति। हम परिवर्तन चक्र में परिभ्रमण करते हैं। जो दिन बीत जाता है, फिर लौटकर नहीं आता। जन्म से आरम्भ होकर मरण तक पहुँचने वाली यात्रा निरन्तर चलती रहती है। फिर भी आश्चर्य यह है कि मनुष्य अपने को स्थिर ही मानता है। परिवर्तन और विघटन पर ध्यान नहीं देता। वर्तमान में ही उलझा रहता है भविष्य की बात सोचता तक नहीं। इस भ्रान्ति का दुष्परिणाम तब सामने आता है जब समय बीत चुका होता है और पछतावे के अतिरिक्त और कुछ शेष नहीं रहता।
वर्तमान को सब कुछ और चिरस्थायी मान बैठने की भ्रान्ति ऐसी है जिसे समझदार भी ना समझे की तरह ही अपनाये रहते हैं। समय बदलने के साथ परिस्थितियाँ भी बदल जाती हैं। शैशव की स्थिति बचपन में नहीं रहती। बचपन जवानी आते ही विदा होता है। बुढ़ापे में जवानी का भी कोई चिन्ह नहीं बचता। इस पर भी मनुष्य है जो समझदारी के दिनों में भी तेजी से चल रहे परिवर्तन पर ध्यान नहीं देता और स्थिति के अनुरूप जो सोचा जाना चाहिए, उसे नहीं सोचता। जो करना चाहिए उसे नहीं करता।
दृष्टि भविष्य पर रहनी चाहिए। उसके साथ तालमेल बिठाते हुए वर्तमान की रूप रेखा विनिर्मित करनी चाहिए। बच्चे सयाने होने पर अभिभावक उनकी शिक्षा, शादी, आजीविका के बारे में गहराई से सोचते हैं और उसकी व्यवस्था बनाने के लिए आवश्यक भागदौड़ करते हैं। वर्षा आने से पूर्व खेत की मेंड़ ठीक की जाती है और छप्परों की मरम्मत के लिए आवश्यक प्रबंध कर लिया जाता है। जाड़े के कपड़े सिल लिए जाते हैं और गर्मी आने से पूर्व उसके अनुरूप व्यवस्था बदल ली जाती है। पर जीवन में चलते परिवर्तन को देखते हुए भविष्य को सही बनाये रहने के लिए क्या पूर्व तैयारी करनी चाहिए इस पर ध्यान नहीं दिया जाता। इसे वैचारिक जड़ता कहना चाहिए ऐसी भूल तो किसान भी नहीं करता। वह बीज बोने के उपरान्त उसमें खाद पानी देने की रखवाली करने की तत्परता पूर्वक तैयारी करता है। स्वयं न करे तो उसे फसल काटने का अवसर न मिलेगा। बोया हुआ बीज भी व्यर्थ चला जायगा।
मनुष्य जन्म सुर दुर्लभ उपहार है। भगवान की वह सर्वोपरि कला–कृति है। अन्य प्राणियों को यह सुविधा सरंजाम नहीं दिया गया। मात्र मनुष्य को ही इसलिए सौंपा गया है कि वह उसकी जिम्मेदारी समझेगा और इस स्तर का सदुपयोग करेगा जिससे वह अपनी अपूर्णता को पूर्णता में बदल सके। स्रष्टा के विश्व उद्यान को अधिकाधिक सुरम्य बनाने में अपने कौशल का प्रदर्शन कर सके। यही है वह दूरदर्शी विवेक-शीलता, जिसका सत्यपरिणाम स्वर्ग स्तर के सुखी जीवन और मुक्ति स्तर के दृष्टिकोण के रूप में प्राप्त किया जा सकता है।
पर यह सब बन पड़े तब जब वर्तमान की महत्ता और भविष्य की संभावना को ध्यान में रखते हुए निर्धारण किया जाय और कार्यक्रम बनाया जाय। यह बन तभी सकता है जब विश्व व्यवस्था के साथ साथ जीवन क्रम की बदलती परिस्थिति को भी ध्यान में रखा जाय। साथ ही उज्ज्वल भविष्य के निर्धारण में भी चूक न की जाय। तत्वदर्शियों ने आश्रम धर्म का चार भागों में विभाजन इसीलिए किया है कि जीवन के चार मोड़, चार चौराहे अपनी अपनी दिशा का संकेत और प्रयत्न की प्रेरणा देते रहें।
बचपन में युवावस्था की आवश्यकताओं को ध्यान में रख कर शरीर को स्वस्थ और मस्तिष्क को विकसित प्रशिक्षित बनाने के लिए उस स्थिति के अनुरूप जुटे रहना पड़ता है। जिसका बचपन सही मार्ग अपनाये रह सका, समझना चाहिए कि उसका यौवन समर्थ और सुव्यवस्थित हो गया। जिसने यौवन में पारिवारिक जिम्मेदारियों को हल्का करते रहने का, अर्थव्यवस्था को जीवन के अंतिम दिनों तक काम देने योग्य बना लिया, समझना चाहिए कि विवेक से काम लिया। संयम साधना का भी यही समय है। जिस प्रकार बचपन में व्यायाम और अनुशासन में रुचि ली जाती है। उसी प्रकार यौवन में संयम और पुरुषार्थ का निर्वाह पूरी तरह किया जाना चाहिए। अन्यथा ढलती आयु खोखलेपन के कारण कष्टदायक भी होगी। वानप्रस्थ की ढलती प्रौढ़ावस्था को सदुपयोग इसी में है कि जिस जीवन निर्वाह में असंख्यों का असंख्य प्रकार से सहयोग मिला है, उसका ऋण चुकाने के लिए लोक सेवा प्रयोजनों में, सत्प्रवृत्ति संवर्धन में प्राण पण से जुटा जाय। इस अवधि में परिवार के लोगों को स्वावलम्बी और सुसंस्कारी बनाने का क्रम लगभग पूरा हो जाता है। इसलिए पूरा या अधूरा यह समय लोक मंगल के लिए ही समर्पित किया जाना चाहिए। चौथी अवस्था संन्यास की निर्धारित थी। अब समय के अनुसार उसे वानप्रस्थ में ही जोड़ देना चाहिए। आयुष्य का पूर्वार्ध भौतिक प्रयोजनों के लिए और उत्तरार्ध परमार्थ कार्यों के लिए सुनिश्चित रखना चाहिए। यह आश्रम व्यवस्था व्यक्तित्व के विकास और समाज के अभ्युदय का प्रयोजन पूरा करने के लिए सब प्रकार श्रेयस्कर है।
पर यह निर्धारण कार्यान्वित नहीं हो पाता। लोग आदि से अंत तक गृहस्थ ही बने रहते हैं। दूरगामी सत्परिणाम उत्पन्न करने वाले आदर्शों को अपनाने की अपेक्षा समूची आयु, प्रायः स्वार्थ साधना में ही निकल जाती है। लोभ, मोह और अहंकार के अतिरिक्त और कुछ सूझता ही नहीं। वासना तृष्णा की खाई पाटने का प्रयत्न किया जाता है पर वह इतनी गहरी है कि सब कुछ खपा देने पर भी उसे पूरा करने की संभावना बन नहीं पाती। तथ्यों को विस्मृत कर देने का ही यह परिणाम है।
वर्तमान वस्तुतः भूत और भविष्य के मध्यवर्ती कुछ क्षण हैं, जिन्हें दौड़ते हुए समय के साथ जोड़ा जा सकता है। यह वर्तमान ही सौभाग्य की चमकती हुई बिजली है, जिसकी श्रेष्ठतम सदुपयोग करने से चूका नहीं जाना चाहिए। आलस्य और प्रमादरूपी दो दानव इसे नष्ट करते रहते हैं। इस आक्रमण से शरीर को बचाया जाना चाहिए और वह किया जाना चाहिए जिससे भविष्य बनता हो। यह सोचना चाहिए जिससे अगले दिनों के लिए अभ्युदय की स्थिति बनती हो।
जन्म से पूर्व और मृत्यु के पश्चात् की स्थिति को ध्यान में रखना चाहिए। चौरासी लाख क्षुद्र योनियों में भ्रमण करने के उपरान्त यह जन्म मिला है। उसकी अवधि भी स्वल्प है। पूरी आयु तो आधे लोग भी नहीं जी पाते। शेष आधे तो अल्पायु में ही अकाल मृत्यु के ग्रास बनते देखे गए हैं। कौन जाने किसके साथ क्या बीते? समय तेजी से आगे खिसकता जाता है और यात्रा तो मृत्यु की मंजिल पूरी करने के लिए द्रुतगति से आगे बढ़ती रहती है। जो काम का समय है, वह आज का ही है। कल कोई भी ऐसी स्थिति आ सकती है जिसमें लम्बे समय तक चलने वाली रुग्णता या अपंगता घेर ले। ऐसी दशा में स्वयं कुछ कर सकना तो दूर, यह भी हो सकता है कि परावलम्बी तिरस्कृत उपेक्षित बन कर रहना पड़े। इन आशंकाओं को भुला नहीं दिया जाना चाहिए। सतर्कता इस तथ्य पर नियोजित करनी चाहिए कि भविष्य को उज्ज्वल बनाने वाले प्रयासों में शिथिलता न आने पाये। सतर्कता में इतनी कमी न आने पाये, जिसके कारण कुछ सूझ ही न पड़े। कुछ करते धरते ही न बन पड़े।
स्वार्थ वह नहीं है जिसकी परिणति अनर्थ में होती है। वास्तविक आवश्यकता स्वल्प है। शरीर का निर्वाह औसत नागरिक स्तर अपना कर भी भाँति चलाया जा सकता है। महत्वाकाँक्षाओं का दमन किया जा सकता है और संयम के साथ सादगी में जिया जा सकता है। यह रीति अपनाने पर उस परमार्थ के लिए अवसर अवकाश मिल सकता है जो संतोष, सम्मान, सहयोग और प्रतिष्ठा प्रशंसा का कारण बन सकता है। यह लौकिक लाभ हुए। परमार्थ के साथ लोक और परलोक का उज्ज्वल भविष्य भी जुड़ता है। परमार्थिक जीवन के लिए विपुल संसाधनों की आवश्यकता नहीं है। उनके अभाव में बहुत कुछ हो सकता है। श्रम, समय की पूँजी भी कम महत्व की नहीं है आत्मीयता, उदारता, नम्रता, सज्जनता और सेवा भावना अपना कर भी अपना स्वभाव देवोपम बनाया जा सकता है। सामान्य लोक व्यवहार के साथ सेवा सहायता का पुट लगाये रहा जा सकता है। इतने भर से परमार्थ सध जाता है। सामान्य क्रियाकलापों में भी आदर्श जुड़ा रह सकता है।
आवश्यक नहीं कि कोई स्मारक खड़ा करके ही अपना यश चिरस्थायी बनाया जाय। यह भी हो सकता है कि जीवन इस तरह जिया जाय जिससे दूसरे लोग उत्कृष्टता अपनाने की प्रेरणा ग्रहण करें। कुमार्ग छोड़कर सन्मार्ग पर चलें। यह परोक्ष अनुदान ऐसा है जिसके बदले व्यक्ति विशेष की ही नहीं, समूचे समाज की अन्तरात्मा कृतज्ञ बन सकती है। विनम्र एवं उदार व्यवहार से दूसरों का मन जीता जा सकता है। सज्जनता की प्रतिक्रिया सज्जनता के रूप में ही होती है। इस परम्परा को चलाना और बढ़ाना ऐसा कृत्य है जिससे सर्वतोमुखी श्रेय सम्पादन होता है। अपना ही नहीं, दूसरों का भी भविष्य उज्ज्वल बनता है।
शालीनता अन्तरात्मा के गहन स्तरों तक प्रवेश कर जाती है और वह जन्म जन्मान्तरों तक साथ जाती है। पुण्यात्मा का भविष्य अन्धकारमय नहीं बन सकता। मनुष्य जीवन की सार्थकता ऐसी विधा अपनाने में ही है। आवश्यक नहीं ऐसी उत्कृष्टता प्राप्त करने के लिए कोई बहुत बड़े तप किये जायँ। सज्जनता भरा जीवन यापन कर सकना भी एक योग साधन है। जो सबके लिए सरल भी और सुलभ भी।
भूलों में सबसे भयंकर भूल यह है कि आत्मसत्ता के अस्तित्व एवं हित-अनहित को भुला दिया जाय। शरीर की वासना तृष्णाओं को सब कुछ मान कर उनके लिए मरते खपते रहा जाय। जीवन का महत्व और उद्देश्य न समझा जाय। मृत्यु को भुला कर अपनी सुविधा भरी स्थिति को चिरस्थायी मानकर उन बचकानी बाल क्रीड़ाओं में समय गँवाया जाय, जिनका मनोरंजन कालक्षेप के अतिरिक्त और कोई महत्व नहीं है। अच्छा हो, समय रहते वस्तुस्थिति को समझा जाय और भविष्य को शानदार बना सकने वाले उपक्रम को अपनाया जाय।
वास्तविक गौरव वह है जो विचारशीलों द्वारा श्रद्धा सम्मानपूर्वक सहज स्वाभाविक रूप में प्रदान किया जाय। ऐसी गरिमा सज्जनता-शालीनता के बदले ही उपलब्ध होती है। सद्गुणों की सम्पदा ही ऐसे ऊँचे स्तर की है कि उसके कारण अपनी छाप हर किसी के मन पर पड़ती है। इसी की प्रतिक्रिया गौरव गरिमा के रूप में अपने को उपलब्ध होती है। इसी का प्रतिफल आत्मसंतोष के रूप में हस्तगत होता है।
थोपा हुआ बनावटी प्रदर्शन-बड़प्पन के आधार पर गढ़ हुआ दिखावा केवल दूसरों की आँखों में चकाचौंध पैदा करता है। कुछ क्षण के लिए वस्तुस्थिति समझने से वंचित कर देता है पर यह स्थिति देर तक नहीं रहती। वस्तुस्थिति प्रकट होकर ही रहती है। न भी हो तो भी किसी का वैभव किसी दूसरे को लाभान्वित नहीं करता। जिससे लाभ न हो उसके प्रति सहानुभूति कैसी?
सजधज के आधार पर मात्र यह सिद्ध किया जा सकता है कि प्रदर्शन के निमित्त किस हद तक पैसे और समय की बर्बादी की गयी? यह एक प्रकार से रिश्वत देकर ली गयी वाहवाही है। इसकी जड़ें नहीं होती। बालू की भीत में टिकाऊपन कहाँ होता है? कभी ठाटबाट की चकाचौंध दूसरों की आँखों में बड़प्पन की धाक जमाना माना जाता रहा होगा पर अब तो यही सोचा जाता है कि जिसके पास सजधज के लिए मौजमस्ती के लिए, लोगों को चकित करने के लिए फालतू पैसा है, उसका व्यक्तित्व ओछा बचकाना होना चाहिए। समझा जाता है कि हराम की कमाई ही गुलछर्रे उड़ाने में खर्च हो सकती है। जिसने परिश्रम पूर्वक कमाया होगा वह तो हजार बार सोचेगा और जो अत्यन्त उपयोगी है उसी के लिए खर्च करेगा।
निष्ठुरता अपनाये बिना किसी के पास भी सम्पत्ति जमा नहीं हो सकती। उदारचेता मिल बाँट कर खाते हैं। कमाने में जिनका श्रम सहयोग लगा है उन्हें भी अपनी ही तरह सुख सुविधा प्रदान करते हैं। ऐसी मनोवृत्ति रहने पर किसी के पास व्यक्तिगत धन इतनी मात्रा में जमा नहीं हो सकता कि उसे शान शौकत के लिए खर्च किया जा सके।
विवेकवान पैसे का उपयोग समझते हैं। उसे नीतिपूर्वक ही कमाते है और नीति-मर्यादा के अनुरूप ही खर्च करते हैं। अपव्यय का समर्थन चाटुकार, चापलूस ही कर सकते हैं। जिनका उससे कुछ निजी स्वार्थ सधता हो, वे भी उसके लिए प्रोत्साहित कर सकते हैं। पर विचारशीलों की बिरादरी में ऐसा बचकानापन ओछी बुद्धि का ही चिन्ह माना जायगा।
साहस, कौशल, विवेक जैसे सद्गुण भी सूक्ष्म स्तर के वैभव ही हैं। वितरण इनका भी होना चाहिए। दुर्गुणों को भी दरिद्रता से कम नहीं आँका जाना चाहिए। धन का सम विभाजन औचित्य का प्रत्यक्ष स्वरूप है। उसे एक निमित्त तो माना जाना चाहिए पर यह नहीं समझ लेना चाहिए कि यही सब कुछ है उसके अतिरिक्त अभ्युदय के लिए प्रचण्ड पुरुषार्थ भी एक बड़ी बात है। व्यक्तित्व को विकसित करने वाले सद्गुण भी एक पूँजी हैं। इन्हें मात्र अपने पास ही बटोर कर बैठ जाना भी अनौचित्य का एक पक्ष है। सम्पन्नता की तरह ही सज्जनता का अभिवर्धन, उन्नयन एवं समान वितरण होना चाहिए। गौरवशाली जीवन उन्हीं का है जो सबकी उन्नति एवं सबकी प्रसन्नता में अपनी प्रसन्नता मानते हैं।
समाधि को अष्टाँग राजयोग का अन्तिम चरण माना जाता है। बुद्धि की चंचलता एवं विडम्बना को श्रेष्ठ सम्यक् बनाने से प्राप्त हुई सफलता है। “धी” बुद्धि को कहते हैं जिसको सम्यक् अर्थात् स्थिर एवं सन्मार्गगामी बना लेने पर देवलोक में प्रवेश पाने की भूमिका बन जाती है। राजहंस का अनुकरण करने वाली नीर−क्षीर विवेकबुद्धि मेधा या प्रज्ञा कहलाती है। जो मात्र ब्रह्मभाव में रमण करती है उसे “भूमा” कहते हैं। इन्हें दृष्टिकोण की भिन्नता भी कहा जा सकता है और दूरदर्शी विवेकशीलता की सूझबूझ भी। यही ब्रह्मपरायणता भी है और धर्म चेतना भी। योग विज्ञान की दृष्टि से इसे समाधि की संज्ञा दी जाती है।
बुद्धि की उत्कृष्टता का यही चिन्ह है कि वह उत्कृष्टता को ही चिन्तन क्षेत्र में स्थान दे। आदर्शयुक्त कार्यों को ही आचरण में उतरने दे। किसी के साथ भी ऐसा व्यवहार न होने दे, जो मानवी गरिमा की दृष्टि से हेय पड़ता हो। यह व्यावहारिक समाधि है। सर्वसुलभ भी और सर्वोपयोगी भी। इस स्थिति को प्राप्त करने के लिए बुद्धि की गतिविधियों पर निरन्तर निरीक्षण-परीक्षण करते रहने वाला तंत्र बिठाना पड़ता है। खरा खोटा परखने वाली कसौटी सोने को घिसते ही उसका स्तर प्रकट कर देती है। बुद्धि तो संकीर्ण स्वार्थ परता में आदतों से प्रभावित रहती है। उसका काम अपने यजमान “मन” की हाँ में हाँ मिलाना, उसकी इच्छाओं को पूरी करते रहना है। आम आदमी की बुद्धि ऐसी ही होती है किन्तु विवेक का परीक्षण यह जाँच सकता है कि किस निर्णय का औचित्य है, किसका नहीं? इतना ही नहीं वह लिप्सा लालसाओं को अस्वीकृत कर देने में भी समर्थ होता है।
उससे ऊँची कक्षा “प्रज्ञा” की है। जिसे समाधि भी कहते हैं। जिस मानस पर प्रज्ञा का आधिपत्य होता है वह मात्र आदर्शों को ही अपनाती है। उत्कृष्टता की कसौटी पर हर विचारणा, निर्धारणा एवं योजना को कसती है। महामानवों जैसे पुण्य परमार्थ से भरे पूरे निश्चय करती और मार्ग चुनती है। उच्चस्तरीय चिन्तन और चरित्र उन्हें नर-नारायण का स्तर प्रदान करता है। ऐसे लोग देवात्मा पुण्यात्मा एवं पुरुष-पुरुषोत्तम जैसी विभूतियों से अलंकृत किए जाते हैं। उनकी परादृष्टि की स्थिति को “समाधि” नाम से भी संबोधित करते हैं। सामान्य परिस्थितियों में भी उनकी मनः स्थिति उच्चकोटि की बनी रहती है। मनुष्य कलेवर में वे देवों की तरह रहते और लोकोपयोगी कार्यों में निरत रहते हैं।
समाधि का एक क्रिया पक्ष भी है, जिसमें संकल्प बल को इस सीमा तक विकसित करना पड़ता है कि मनः क्षेत्र पर पूरा नियंत्रण प्राप्त किया जा सके। यहाँ तक कि उसकी हलचलों को भी बन्द किया जा सके। ऐसे लोग उस शून्यावास्था में चले जाते हैं, जिसमें रक्त संचार तो जारी रहता है पर मस्तिष्क चेतना विहीन हो जाता है। यह प्रयोग उचित समय के लिए संकल्प लेकर किया जाता है। अवधि पूरी होने पर जाग्रति स्वयमेव वापस लौट आती है। यह एक चमत्कारी कृत्य है, जिसे हठयोग के साथ जुड़ा हुआ समझा जाता है। विचार प्रणाली को अवरुद्ध करना, हृदय की धड़कन घटादेना, श्वास-प्रश्वास को शिथिल कर देना और जाग्रत अवस्था में ही निद्रा की स्थिति में पहुँच जाना, यह संकल्प बल के चमत्कार हैं। अच्छा शक्ति में न केवल विचारों को अपने साथ ले चलने की उन्हें ऊँचा उठाने-नीचा गिराने की सामर्थ्य है वरन् उसमें प्रचण्डता आने पर यह स्थिति भी आ जाती है कि शरीर के किसी अंग की क्षमता को घटाया या बढ़ाया जा सके। हठयोग की समाधि इसी अभ्यास के बढ़े-चढ़े रूप का प्रमाण है। इतने पर भी यह नहीं सोचना चाहिए कि समाधि लगाने वाला व्यक्ति मनो जप कर चुका-मेधा, प्रज्ञा को जगा सकने में समर्थ हो चुका। ऐसी स्थिति जब तक प्राप्त नहीं हो जाती, तब तक आत्मिक उत्कर्ष का प्रयोजन पूरा नहीं होता। आत्मबल बढ़े बिना मनुष्य का देवत्व जगता नहीं। इस अभाव के रहते शाप, वरदान दे सकने जैसी ऋद्धि-सिद्धियों का दर्शन भी नहीं होता। वह भाव-संवेदना का विषय है, जब कि शरीर को शिथिल, तान्द्रित (ट्राँस की स्थिति) या विनष्ट कर देना मात्र संकल्प शक्ति बढ़ा लेने का चमत्कार है। यह सरकस में दिखाए जाने वाले अजूबों के समतुल्य है। जिनमें अभ्यास करने वाले जानवर भी कितने ही ऐसे कौतुक दिखाने लगते हैं, जिन्हें देखकर आश्चर्यचकित रह जाना पड़ता है।
हाट बाजारों में समाधि लगाने का प्रदर्शन करने वाले गड्ढे में बैठने उठने और पुजापा बटोरने जैसी प्रदर्शन-कर विडम्बनाएँ रचते रहते हैं जिसे कोई सच्चे अर्थों में सिद्धि क्षेत्र तक पहुँचा हुआ व्यक्ति नहीं दिखा सकता। आत्म साधनाएँ और उनकी सिद्धियाँ तो प्रायः गोपनीय रखी जाती हैं। उन्हें प्रदर्शन से बचाया जाता है। कौतुक-कौतूहल का रूप देकर भीड़ इकट्ठी नहीं की जाती। इस आधार पर भावुक लोगों की जेबें भी खाली नहीं कराई जातीं। इन कौतूहलों को देखकर सामान्य जन भ्रम में पड़ते हैं और उद्देश्यों को भूल कर इन तथाकथित सिद्ध पुरुषों के आगे पीछे मनोकामनाएँ पूर्ण कराने के निमित्त चक्कर लगाते हैं। यह साधनारत योगी जनों के लिए तथा सर्वसाधारण के लिए अहितकर ही है।
वस्तुतः समाधि उत्तरोत्तर विकसित होने वाली एक उच्चस्तरीय सुदृढ़ मनोभूमि है जिसमें अनगढ़ अनाड़ी तथा अनियंत्रित मन को शनैः शनैः साधा एवं दीक्षित किया जाता है। ललक-लिप्साओं-वासना-तृष्णाओं से पीछा छुड़ाया जाता है। अन्तर्निहित दोष-दुर्गुणों, कषाय-कल्मषों को चुन कर उखाड़ फेंकना होता है। कर्मेन्द्रियों तथा ज्ञानेन्द्रियों को इसलिए नियंत्रित किया और निर्मल बनाया जाता है ताकि वे अनभ्यस्त स्थिति में शक्ति सम्पन्नता की बाढ़ में बहने न पायें। हाईवोल्टेज की बिजली के लिए अधिक सक्षम कन्डक्टर तथा शक्तिशाली तार लगाये जाते हैं। वर्षा आने से पूर्व नवीन बाँध को हर प्रकार से सुदृढ़ कर लिया जाता है। कहीं भी राई रत्ती भर लीकेज या कमजोरी नहीं रहने दी जाती। फसल में उर्वरक डालने से पूर्व कृषक अनावश्यक घास पात उखाड़ देता है अन्यथा लपककर वे ही सारा खाद पानी उदरस्थ कर लेते हैं। ध्यान धारणा जैसी योगपरक विधा अपनाने से साधक की अंतःसामर्थ्य बढ़ जाती है। दुर्भाग्य से यदि कोई दोष-दुर्गुण अनियंत्रित रह गये तो प्रगति की दिशा अवरुद्ध हो जाती है और वही जीवन पर हावी होते जाते हैं।
दोष-दुर्गुणों को क्रमशः समाप्त करने तथा जाग्रत शक्तियों को धारण कर चिरस्थायी बनाये रखने के लिए योग साधक को विभिन्न प्रक्रियाओं से होकर गुजरना पड़ता है। सत्य, अहिंसा, ब्रह्मचर्य जैसे यम-नियमों की तुलना समाधि क्षेत्र में गहरे नींव के पत्थरों से की गई है। प्रत्याहार, धारणा का अनुशासन इसलिए बनाया गया है कि क्रमशः विकास करने से अतीन्द्रिय क्षमताओं का जागरण होने लगता हैं जागृत शक्तियों का कहीं दुरुपयोग न होने पावे इसके लिए प्रज्ञास्तर की विवेक बुद्धि का आश्रय लिया और संयम साधा जाता है। ध्यान धारणा की इसमें विशिष्ट भूमिका होती है।
योग के तत्त्वदर्शन की खोज करने वाले साधक जिज्ञासुओं का इतना ही जानना और साधना पर्याप्त है कि सिद्धावस्था तक पहुँचते- पहुँचते विचारणाओं और भावनाओं पर पूरी तरह नियंत्रण हो जाता है। न मन निरर्थक कल्पनाएँ करता है और न भावनाओं में हीनता आती है। सुदृढ़ सुनिश्चित मान्यताओं का परिपक्व होना और आत्मजय प्राप्त कर लेना ही समाधि का व्यावहारिक रूप है जिसकी ओर क्रमशः बढ़ा जा सकता है।
मनुष्य अपने आस-पास के वातावरण से बहुत गहराई से जुड़ा हुआ है। इसमें किसी तरह के परिवर्तन उसे प्रभावित किए बिना नहीं रहते। बदलते मौसम में खाँसी-जुकाम बुखार आदि आदि की बातों से हम सभी परिचित हैं। पर वर्तमान मनोविज्ञान ने अपने अध्ययन के द्वारा एक और चीज प्रमाणित की है। वह है पर्यावरण की हलचलें जो न केवल हमारे शरीर को प्रभावित करती हैं, बल्कि हमारा मन भी उससे बड़ी नजदीकता से जुड़ा हुआ है। इस सम्बन्ध में अध्ययन कर्ताओं का मत है कि पर्यावरण और अन्तःकरण दोनों को एक दूसरे से बड़ा घनिष्ट संबद्ध मानना होगा।
कैलीफोर्निया विश्वविद्यालय के मनो विशेषज्ञ ई. ब्रुन्सविक ने “सिस्टेमेटिक एण्ड रिप्रेजेन्टेटिव डिजाइन ऑफ साइकोलॉजिकल एक्सपेरीमेण्टस” में पहले पहल इस चीज का विवरण प्रस्तुत किया। उनके अनुसार प्राकृतिक वातावरण की अच्छाई-बुराई हमारे व्यवहार को बहुत हद तक प्रभावित करती है। किसी न किसी रूप में सभी इससे प्रभावित होते हैं भले कुछ कम हों और कुछ ज्यादा।
पिछले दिनों मनुष्य ने विकास की दौड़ में प्रकृति के साथ बड़ी नोंच खसोट की है। इस तरह के बर्ताव ने समूचे पर्यावरण को चरमरा दिया है। डब्लू. के. इस्टेस ने “सोशल इकालॉजी एण्ड ह्यूमन विहेवियर” में इसके प्रभावों की चर्चा करते हुए कहा कि “इससे मनुष्य की मानसिकता विकृत हुई है, जिसके परिणाम हिंसा, अपराध, विघटन आदि के रूप में दिखाई पड़ रहे हैं”।
विकसित अथवा विकासशील देशों में जहाँ भी वातावरण गड़बड़ाया है, किया गया अध्ययन उपरोक्त बात को सही साबित करता है। अमेरिका को दुनिया का सबसे अधिक विकसित देश माना जाता है। यहाँ के न्यूयार्क, वाशिंगटन, न्यूजर्सी जैसे बड़े शहरों के साथ कस्बे भी ध्वनि प्रदूषण, वायु प्रदूषण आदि से ग्रसित हैं। यहाँ का अध्ययन करके अपराध मनोविज्ञानियों ने एक ब्यौरा प्रस्तुत किया है। इसके अनुसार हर पांचवें सेकेंड में एक डकैती होती है। हर छठवें मिनट में किसी नारी के साथ बलात्कार की घटना होती है। हर पच्चीसवें मिनट में एक हत्या हो जाती है। हर अड़तीसवें सेकेंड में एक व्यक्ति पर प्राणघातक हमला होता है। हर तीसरे सेकेंड में एक आर्थिक गड़बड़ी का अपराध दर्ज हो जाता है। हर दसवें सेकेंड में सेंधमारी होती है, जबकि औसत अमरीकी की आय बीस हजार डालर से अधिक है। हर चौथे सेकेंड में तस्करी का एक मामला दर्ज होता है। हर छब्बीसवें सेकेंड में एक मोटर गाड़ी चोरी हो जाती है। यही नहीं सर्वेक्षण कर्ताओं के अनुसार वहाँ के मैनहट्टन क्षेत्र में स्थिति यहाँ तक है कि कुछ सड़कों में रात सात बजे के बाद निकलना बाहरी व्यक्ति के लिए जान हथेली पर ले निकलने जैसा है। यह स्थिति सबके लिए समान है चाहे वे विदेशी हों अथवा अमेरिकी।
पर्यावरण की गड़बड़ी से मनःस्थिति को गड़बड़ाने की व्याख्या सोशल साइन्स रिसर्च इन्स्टीट्यूट, सदर्न कैलीफोर्निया विश्वविद्यालय के प्राध्यापक सरनाँफ मेडनिक ने की है। उनके अनुसार वातावरण की विकृति मन के चेतन स्तर पर तनाव पैदा करती है। साथ ही अवचेतन स्तर के पाशविक संस्कारों को उद्दीपित भी करती है। तदनुरूप ही दुर्भावनाएँ-दुर्विचार पनपते हैं।
इसकी प्रक्रिया बतलाते हुए आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के प्राध्यापक डा.जे.जेड यंग का “प्रोग्राम्स आफ दि ब्रेन” ग्रंथ में कहना है कि पशु संस्कारों का उभार चेतन मन पर प्रतिक्रिया करता है। इन दोनों की मिली-जुली क्रिया स्नायुतंत्र एवं अंतःस्रावी तंत्र में परिवर्तन लाने वाली होती है। डा. मेडिनक ने डेनमार्क के अपराधी मानसिकता वाले युवकों का अध्ययन करने पर पाया कि ऐसे लोगों में मस्तिष्क की अल्फा तरंगों की क्रियाशीलता कम होती चली जाती है। डा. यंग का कहना है कि इसके साथ तंत्रिकाएँ उद्दीपित हो एड्रीनल ग्रन्थि को एड्रीनेलिन निकालने हेतु उत्तेजित करती हैं, जिससे व्यक्ति आक्रामक बनता है।
इन वैज्ञानिक अध्ययनों की गहराई भले न समझ में आने वाली हो पर एक बात तो स्पष्ट हो ही जाती है, कि प्रकृति के साथ खिलवाड़ करना कितना खतरनाक है। इस काम को जिस डाल पर बैठे है, उसी को काटने की संज्ञा दी जा सकती है। इसके स्थान का क्षेत्र बहुत लम्बा चौड़ा और गहरा है।
वैज्ञानिक अनुसंधानों से जो नतीजे सामने आए हैं, उनसे यह भी पता चलता है कि पर्यावरण की प्रदूषित स्थिति मन में गड़बड़ी पैदा करने, प्राणों में उत्तेजना लाने तथा व्यवहार को हिंसक बनाने तक सीमित नहीं है। जेनेटिक्स के विशेषज्ञों ने बताया कि अपराध की प्रवृत्ति व्यक्ति के गुणसूत्रों तथा जीन्स में परिवर्तन लाने वाली सिद्ध होती है। जे.लायन तथा एम.पेना ने अपने संयुक्त अध्ययन “द स्टडी ऑफ ह्यूमन एगे्रशन” में बताया है कि अपराधी व्यक्तियों के गुण सूत्र असामान्य हो जाते हैं। यह असामान्यता एक अतिरिक्त वाई गुणसूत्र के रूप में दिखाई देती है। इससे लिपटे जीन्स अपराध का सन्देश एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुँचाने वाले होते हैं।
सम्भव है अपराधी के लड़के में अपराध प्रवृत्ति न दिखाई दे। पर इसका कारण यह नहीं है कि उसमें यह जीन्स नहीं पहुँचे। अपराधी व्यवहार के दिखाई न देने का कारण इन जीन्स का अप्रभावी होना है जो आनुवांशिकी के नियमानुसार किसी भी अगली पीढ़ी में अपने गुण धर्म को प्रकट कर सकते हैं।
कितना गहरा है वातावरण का हमारे ऊपर प्रभाव। इसको बेडौल और कुरूप करने का मतलब है अपने को बेडौल और कुरूप बना लेना। प्रकृति से लूट-खसोट का मतलब है अपने आधार को समाप्त कर लेना। मनुष्य जाति के वर्तमान क्रियाकलापों को सरल ढंग से समझाते हुए विख्यात दार्शनिक बर्ट्रेण्डरसेल का “इम्पैक्ट ऑफ साइन्स आन सोसाइटी” में कहना है कि हम एक ऐसे जीवन प्रवाह के बीच हैं-जिसका साधन है मानवीय दक्षता और साध्य है मानवीय मूर्खता। अगर मूर्खता ही लक्ष्य हो तो उसको पाने के लिए उठाया गया हर कदम बुराई की ओर ले जाता है। रसेल की बात कड़वी होने पर भी पूरी तरह सही है। विकसित बनने के फेर में सही गलत का अन्तर मिटा दिया है। ऐसी दशा में परिणाम बुरे हों तो अस्वाभाविक नहीं है।
बिगड़ी हुई स्थिति को बनाने के लिए जरूरी है उल्टे को सीधा करना। प्रकृति सीधी सौम्य गाय भी है और रुष्ट सिंहनी भी। यदि उसके साथ अनर्गल और अनौचित्यपूर्ण व्यवहार न किया जाय तो अनन्त काल तक अपने दूध रूपी अनेक तरह की सम्पदाओं से हमारा पालन पोषण करती रह सकती है। पर यदि नोंच खसोट, छीना झपटी का दुर्व्यवहार किया तो क्रुद्ध सिंहनी की तरह अंग भंग करने-चीरने फाड़ने में भी वह कोई कसर नहीं छोड़ेगी।
अच्छा यही है कि हम उसकी गोल में फलें-फूलें। इसके लिए ध्यान रखना होगा कि हम अपने आस-पास के वातावरण को सुरम्य और सौम्य बनाएँ। मनोवैज्ञानिकों ने अपने अध्ययन से स्पष्ट किया है कि जो स्थान प्राकृतिक सम्पदा से भरपूर हैं जहाँ हरियाली, नदी-तालाब हैं, प्रदूषण से मुक्त हैं। वहाँ जाने पर अपने व्यवहार में सौम्यता एवं मन में प्रसन्नता का अनुभव किया जा सकता है। ऐसे स्थानों पर स्वास्थ्यवर्धक ऋण आयन्स भी प्रचुर मात्रा में पाये गए हैं।
इससे सिद्ध होता है कि यदि प्रकृति को संरक्षण दिया जाय तो वह हमें भी संरक्षण प्रदान करेगी। सोशल इकालॉजी के विद्वान ए.एम.शू ने सामाजिक परिवेश के उन्नत और अपराध मुक्त होने के उपायों को अपनी रचना “सोसाइटी एण्ड इनवायरन्मेण्ट” में सुझाया है। उनके अनुसार यह “जिम्मेदारी विश्व वसुधा पर रहने वाले हममें से प्रत्येक की है कि वह आचरण और व्यवहार में नैतिक मूल्यों का समावेश करें। इसका पहला कदम यही है कि स्थान और परिस्थिति के अनुसार प्रकृति का संरक्षण करें, उसे प्रदूषित होने नष्ट होने से रोक कर उसे बढ़ाने में सहायक बनें।
भारतीय चिन्तन में प्रकृति की विभिन्न शक्तियों को देवता माना गया है। इसके अनुसार मनुष्य जाति इनसे सहयोग का व्यवहार करके प्रसन्न बने रहकर समृद्धि से भर पूर हो सकेगी। गीतकार के शब्दों में -”इन देवताओं को मनुष्य संरक्षण दे तो देवता मनुष्य को संरक्षण देंगे”। दोनों इस प्रकार सहयोग का आचरण करते हुए उन्नति व विकास को प्राप्त होंगे। यही है वह मार्ग-जिस पर चलकर पशुता की ओर जा रही मानव जाति देवत्व की ओर बढ़ सकती है।
मस्तिष्कीय क्षमताओं में ‘स्मरण शक्ति’ का बहुत बड़ा योगदान है। इसकी प्रखरता से मनुष्य अधिक विचारशील समझा जाता है ओर इसके ज्ञान की परिधि अधिक बड़ी होती जाती है। जबकि भुलक्कड़ लोग महत्वपूर्ण ज्ञान संचय से तो वंचित रहते ही हैं साथ ही दैनिक कामकाज में भी जो आवश्यक था उसे भी भूल जाते हैं और दैनन्दिन जीवन में घाटा उठाते और ठोकरें खाते देखे जाते हैं। विस्मृति को बहुधा कोई रोग मान लिया जाता है और उसके निवारण के लिए तरह-तरह के औषधि उपचारों का सिल-सिला चलता है। जो पत्तों का जल सींचने के समान ही सिद्ध होता है।
स्मरण शक्ति कितनों में ही जन्मजात रूप से असाधारण मात्रा में पाई जाती है। पर इसका अर्थ यह नहीं के दूसरे लोग यदि चाहें तो प्रयास करने पर उस विशेषता के अधिकारी नहीं बन सकते। जो काम एक व्यक्ति कर सका, जो एक को उपलब्ध हुआ वह सिद्धान्ततः दूसरे को भी मिल सकता है। सफलता, असफलता की न्यूनाधिकता की बात पुरुषार्थ पर ही टिकती है।
समझा जाता है कि बचपन में “स्मरण शक्ति” तीव्र होती है और पीछे आयु बढ़ने साथ-साथ मन्द होती जाती है, पर बात वस्तुतः ऐसी है नहीं। छोटी आयु में मस्तिष्क के ऊपर बोझ कम रहता है। विचारणीय प्रश्न कम रहते हैं, घटनाएँ, और समस्यायें भी उन दिनों थोड़ी ही रहती हैं। फलतः बोझ कम रहता है और जो सोचना, याद रखना है वह आसानी से निबट जाता है। किन्तु बड़े होने के साथ-साथ कार्य क्षेत्र बढ़ता जाता है, साथ ही स्मरण रखने, निष्कर्ष निकालने एवं निर्णय करने का भार भी। ऐसी दशा में बहुत काम करते रहने पर भी कुछ में अधूरापन रह जाना अप्रत्याशित नहीं। .... कुछ सही रीति से पूरा हो गया, उसकी ओर से ध्यान दिया नहीं गया, पर जो कमी रह गई .... को मस्तिष्क की कमजोरी या स्मरणशक्ति की कमी मान लिया गया। ऐसे ही प्रसंगों को लेकर दिमागी शक्ति घट जाने की बात सोच ली जाती है और चिन्ता होने लगती है। कारण है कि स्मृति की कमी का शिकायत वृद्ध ही नहीं .... भी करते पाये जाते हैं।
विस्मृति के तीन प्रमुख कारण है- (1) किसी बात को स्मरण रखे रहने के पूर्व इच्छा का .... होना (2) प्रस्तुत विषयों की पूरे .... समझने का प्रयत्न न करना (3) प्रसंगों में .... और उपेक्षा का भाव रहना, उनका महत्व स्वीकार न करना। यही है वह .... जिसमें देखी, सुनी बातों को उथले और आधे-अधूरे रूप में ग्रहण किया जाता है। रुचि की गहराई न होने से वे बातें चिन्तन के लिए काम करने वाले मस्तिष्कीय कोशों में गहराई तक प्रवेश नहीं करती और जल्दी ही विस्मरण के गर्त में गिरकर खो जाती हैं। इसके विपरीत जिन प्रसंगों में अपनी दिलचस्पी होती है, उन्हें ध्यानपूर्वक सुना, देखा और समझा जाता है। फलतः उनके मानस चित्र अधिक स्पष्ट बनते हैं और स्मृति पटल पर उनका अंकन इतना गहरा हो जाता है कि आवश्यकतानुसार उसे फिर पूर्ववत् देखा जा सके। यों समय बीतने के साथ-साथ सभी स्मृतियाँ धुँधली पड़ती जाती हैं, फिर भी जिन्हें मनोयोगपूर्वक अपनाया गया है, उनकी रेखायें अमिट न सही, चिरस्थायी तो बनी ही रहती है।
मस्तिष्क विज्ञान डा. डेविड हेराल्डफिक का कहना है कि “मानसिक तनाव भी मस्तिष्क की सक्रियता को शिथिल करता है”। उनके अनुसार एकाग्रता का जितना अधिक प्रयास किया जाता है, मानसिक तनाव उसी अनुपात में बढ़ना है और इसका प्रभाव स्मृति कोशों पर पड़ता है। .... अथवा भय की स्थिति में आया तनाव मस्तिष्क की समस्त सृजनात्मक प्रक्रियाओं को अवरुद्ध कर देता है।
स्मरण शक्ति की विशिष्ट क्षमता कोई दैवी वरदान या जन्मजात सौभाग्य नहीं है। वह अन्य शारीरिक क्षमताओं की तरह एक सामान्य सामर्थ्य है, जिसे प्रयत्न पूर्वक आसानी से बढ़ाया जा सकता है। यदि स्मरण रखने की पद्धति का ज्ञान हो और स्मरण तंत्र की संरचना को ध्यान में रखते हुए तदनुरूप घटनाओं को स्मरण रखने की विधि व्यवस्था बना ली जाय तो फिर विस्मृति की उतनी शिकायत न रहे, जैसी कि आमतौर से रहती है। दत्तचित्त होकर सावधानी एवं दिलचस्पी के साथ कोई बात सुनी या पढ़ी जाय तो वह न केवल भली प्रकार समझ में आ जायगी वरन् चिरकाल तक स्मृति पटल पर भी बनी रहेगी। विस्मृति के गर्त में चले जाने पर भी आवश्यकतानुसार उसे “रिकाल” करके टैप रिकार्ड की तरह चलाते हुए स्नायु कोशों को उत्तेजित कर फिर से सुना जा सकता है।
वैज्ञानिकों के अनुसार यदि मनुष्य जागरूक रहे, ज्ञानवर्धन में सावधान और सतर्कता बरते तो 75 वर्ष की उम्र तक उसके मस्तिष्क में सामान्यतया 50 करोड़ खरब सूचनाएँ, जानकारियाँ आकृतियाँ आदि स्मृति पटल पर अंकित हो जाती हैं। इनमें से अधिकाँश समय बीत जाने पर मस्तिष्क के किसी कोने में जा छिपती हैं, परन्तु नष्ट कभी नहीं होती। जब कभी आवश्यकता पड़ती है अथवा सोचने समझने का काम मस्तिष्क के पास नहीं होता तो वह मानस पटल पर उभर आती हैं। प्रयत्न पूर्वक किसी भी विस्मृत बात को पुनः उभारा जा सकता है। प्रख्यात मस्तिष्क वेत्ता डा. विल्डर पेनफील्उ ने मस्तिष्क के कार्टिकल रीजन में एक ऐसी पट्टी का पता लगाया है जो स्मरणशक्ति का मूलभूत आधार है। उन्होंने उस स्थान में इलेक्ट्रॉड का स्पर्श कराकर वहाँ अंकित पुरानी स्मृतियों, घटनाओं और बातों को ज्यों का त्यों मानस पटल पर उभारने में सफलता पाई है। उनके अनुसार प्रत्येक बात हर समय याद नहीं रहती। विशेष प्रयत्न से उन्हें उभारा जा सकता है और कितनी ही पुरानी देखी-सुनी जा सोची बात फिर से उसी स्पष्टता के साथ सजग की जा सकती है।
मस्तिष्क विज्ञानी स्मरण शक्ति की आधार उस विद्युत धारा को मानते हैं जो सम्वाद वाहिनी तंत्रिकाओं में गतिशील रहती है। न केवल स्मृतियों का अंकन और पुनर्जागरण वरन् मस्तिष्कीय संरचना को अपना काम ठीक प्रकार से करने योग्य बनाये रहने में भी इसी विद्युत धारा की प्रधान भूमिका रहती है। नाड़ियों में रक्त परिभ्रमण की तरह तंत्रिका तंत्र में विद्युत धारा का भी प्रवाह सतत् होता रहता है। ध्यान धारणा का उपक्रम अपनाकर इस प्रवाह को न केवल यथावत् सक्रिय बनाये रखा जा सकता है, वरन् मस्तिष्कीय प्राण विद्युत का बिखराव रोका और उस तंत्र में ऐसी उत्तेजना उत्पन्न की जा सकती है जिसमें तंत्रिकाओं का मध्यवर्ती सहयोग प्रखर हो उठे और स्मरण शक्ति का अभाव अनुभव न हो। इसके लिए ध्यान अभ्यासों में से जो भी अपने लिए उपयुक्त हों उन्हें चुन लेना चाहिए। एकाग्रता बढ़ाने वाले सभी अभ्यास मनोबल बढ़ाते और स्मरण रखने की क्षमता को सतेज कर देते हैं।
मेधाशक्ति को बढ़ाने में प्राणायाम की साधना विशेष लाभकारी सिद्ध हुई। इलिनायस विश्व विद्यालय के अनुसंधानकर्ता वैज्ञानिकों ने अपने शोध निष्कर्षों में बताया है कि मस्तिष्क की स्मृति क्षमता और आक्सीजन में घनिष्ट सम्बन्ध है। अपने प्रयोग परीक्षणों में उन्होंने देखा कि जिन बच्चों को हल्की साँस अर्थात् आक्सीजन की मात्रा लेने को कहा गया उनकी याददाश्त एवं मेधा में कमी पाई गई। उनके अनुसार आक्सीजन मस्तिष्कीय कोशिकाओं को सही तरीके से अपना काम करने के लिए ईंधन की तरह प्रयुक्त होता है। इसकी आपूर्ति में कमी प्रायः श्वास प्रश्वास की क्रिया को सही रीति से न संपन्न करने के कारण ही होती है। आयु बढ़ने के साथ रक्तवाही नलिकाओं की दीवारें कठोर पड़ जाती है और रक्त संचार उतनी अच्छी तरह नहीं हो पाता जितना कि बचपन में होता है। फलतः तंत्रिका कोशिकाओं को पर्याप्त मात्रा में आक्सीजन न मिलने के कारण वे कमजोर होती जाती हैं और आयु के बढ़ने के साथ-साथ स्मरण शक्ति भी घटती जाती है। प्राणायाम उपचार द्वारा न केवल स्मरणशक्ति को दीर्घकाल तक बनाये रखा जा सकता है वरन् मस्तिष्क की समग्र क्षमता को उभारा और प्रखर बनाया जा सकता है। बुद्धिमत्ता समस्त स्मृतियों के मन्थन का ही नवनीत है जो वाणी, लेखनी किसी भी माध्यम से प्रकट हो सकती है।
ओरेगाँन विश्वविद्यालय के मेडीकल स्कूल के वैज्ञानिकों ने भी अपने विभिन्न खोज-परीक्षणों के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला है कि हल्की और उथली साँस से मस्तिष्कीय कोशिकाओँ की क्रियाशीलता और क्षमता घटती है। जिस अनुपात से आक्सीजन की आपूर्ति में कमी होगी उसी के अनुरूप मानसिक दक्षता में कमी आयेगी। इसके साथ यदि रक्त-अभिसरण में भी न्यूनता हो तो उसका प्रभाव मस्तिष्क पर विपरीत प्रतिक्रियायें उत्पन्न करेगा। इस कमी को प्राणायाम द्वारा दूर किया जा सकता है।
भगवान ने स्मृति की तरह विस्मृति को भी एक वरदान की तरह सृजा है। उपयोगी बातें याद रक्खें और आवश्यकता के समय सहायक बनें यह उत्तम है। इसी प्रकार यह भी ठीक है कि द्वेष-दुर्भाव, शोक-संताप की कटु स्मृतियाँ धुँधली हानि, वियोग आदि का स्थिति में मन जितना उद्विग्न होता है यदि उतना ही संताप बना रहे तो जीवन कठिन हो जाय। एक बार जिनसे मनोमालिन्य हो जाय फिर कभी सद्भाव बन ही न सके। मस्तिष्क में यों करोड़ों ग्रन्थों के समा सकने जितना स्मृति क्षेत्र है पर क्षण-क्षण में जो विविध जानकारियाँ मस्तिष्क को मिलती रहती हैं उनका विस्तार तो स्मृति क्षेत्र की तुलना में बहुत अधिक है। ऐसी दशा में पुराने को हटाकर ही नयों के लिए जगह मिल सकती है। रेलगाड़ी के मुसाफिर खानों में बैठे यात्री यदि वहाँ जमे बैठे रहें तो नये आगंतुकों को जगह कहाँ मिलेगी?
भुलक्कड़पन वस्तुतः कोई रोग नहीं, वरन् एक पाली हुई आर्क है, जो दिलचस्पी एवं एकाग्रता की कमी वाले क्षेत्रों को ही प्रभावित करती है। नोटबुक को साथी बना लेने, उसमें करने योग्य आवश्यक काम नोट करते रहने और उन पृष्ठों को सामने खुला रखने तथा बार-बार पलटते रहने से सभी महत्वपूर्ण बातें याद रक्खी जा सकती हैं। मेमोबुक के साथ जैसे सामान्य से उपचार से विस्मृति की वह कमी दूर हो सकती है जिसके कारण बहुत से लोग बुरी तरह घबराते और खर्चीले इलाज कराते फिरते हैं। न्यूयार्क स्थिति रोचेस्टर के स्ट्रोंग मेमोरियल हॉस्पीटल के वरिष्ठ चिकित्सा विज्ञान डा. डगन मैहिनी के अनुसार स्मरण शक्ति की अभिवृद्धि हेतु प्राचीन पद्धति “लोसी” बहुत उपयोगी है। इसी के आधार पर प्राचीन ग्रीक लेखक और वक्ता लम्बे-लम्बे उदाहरण दे सकने में सफल होते थे। “लोसी” लैटिन शब्द से बना है जिसका अर्थ स्थान एवं घटना विशेष से होता है। एक तरह से स्मृति को ताजा करने के लिए तन्मय होने की प्रक्रिया है।
स्मरण शक्ति मानवी मस्तिष्क की प्रमुख क्षमता है, जिससे व्यक्ति की आयु, बुद्धिमत्ता, ज्ञान, सामर्थ्य, विश्वसनीयता, मैत्री, ईमानदारी, आदि की भावनायें पूरी तरह प्रभावित होती हैं। किसी निर्धारित कार्य तथ्य, आँकड़े घटनाएँ, नाम, आकृतियाँ, चेहरे आदि विस्मृत होने का अभिप्राय व्यक्ति की अविश्वसनीयता को मान लिया जाता है। सुप्रसिद्ध मनीषी डेविड ह्यूम के अनुसार किसी की स्मृति-क्षमता उसके सुगढ़ व्यक्तित्व का परिचायक है। अतः इस तंत्र को तरोताजा रखना आवश्यक है।
जिस प्रकार व्यायाम-भोजन आदि से शरीर को सुदृढ़ बनाया जाता है, उसी प्रकार मस्तिष्कीय प्रखरता स्मृति क्षमता की भी अभ्यास द्वारा अभिवृद्धि की जा सकती है। असावधानी, उपेक्षा और अनुत्साह की मनःस्थिति ही विस्मृति का प्रमुख कारण है। सतत् स्वाध्याय प्राणायाम एवं ध्यान धारणा के उपचार उपक्रमों का आश्रय लेने से अनेक लाभों में जहाँ आध्यात्मिक लाभ मिलता है वहीं इसके अतिरिक्त चिन्तन तंत्र पर छाई शिथिलता-मलीनता भी दूर होती है। साथ ही विस्मृति की शिकायत नहीं पनपने पाती।
मनुष्य जिस व्यक्ति या आकृति-प्रकृति क अधिक चिन्तन करता है वह उसी ढाँचे में ढलता जाता है। यह एक प्रसिद्ध एवं सर्वविदित मानसिक तथ्य है। तत्वज्ञानी इस संदर्भ में कीट-पतंगे का उदाहरण देते रहते हैं। इष्टदेव का ध्यान करके उन्हीं विशेषताओं से अपने का ढालने का प्रयत्न किया जाता है।
टिड्डा जब तक हरी घास रहती है, तब तक हरे रंग का रहता है और तब घास सूखकर पीली पड़ जाती है तो उसका शरीर भी पीला पड़ जाता है। यह दृष्टि के सामने रहने वाले पदार्थ के अनुरूप ढलने की प्रक्रिया है जो सर्वत्र किसी न किसी रूप में देखी जाती है। उदाहरण के लिए कुसंग और सत्संग के कारण मनुष्यों का चिन्तन और चरित्र उसी ढाँचे में ढल जाता है।
यह प्रसंग नर-मादा प्रसंगों में भी अत्यधिक लागू होता है। पुरुष प्रकृति का नारी के ढाँचे में ढलना और नारी का पुरुष स्थान ग्रहण करने का उत्साह बहुत कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि किसकी मनोदशा पर किसका प्रभाव तन्मयता और किस गहराई तक चढ़ा रहता हैं
पति-पत्नी का सहयोगी प्यार एक बात है। नारी का नर के विषय में अत्यधिक चिन्तन करना या नर का नारी के रूप यौवन विशेषतया जननेन्द्रियों की कल्पना करते रहना आरंभ में प्रतिपक्ष के प्रति थोड़ा आकर्षण तो बढ़ाता है, पर कुछ ही दिनों में ऐसी मनःस्थिति बन जाती है कि इष्ट के प्रति समर्पित होने की भावना बलवती होने लगती है। हिजड़ों में वही देखा गया है। वे या तो नर होकर नारी वेषभूषा या मनः स्थिति के प्रति अपने को समर्पित करते हैं या नारी अपनी स्थिति को अपर्याप्त मानकर पुरुष के गौरव, वर्चस्व या सौंदर्य के प्रति अपने को समर्पित कर देती है। ऐसी दशा में पुरानी संरचना और नवीन आकर्षण के बची द्वन्द्वयुद्ध चल पड़ता है और स्थिति मध्यवर्ती बन जाती है।
विगत 50 वर्षों में लिंग परिवर्तन के आपरेशन जितने हुए हैं, इतने इससे पहले कभी नहीं हुए थे। नपुँसकता का अनुपात भी बढ़ा है। नारी अपने नारीत्व को हीन मानती है और नर में अपने से विपरीत पक्ष के प्रति इतना आकर्षण बढ़ जाता है कि वह उसी प्रकार की रतिक्रिया में आनन्द की कल्पना करता है। ऐसी स्थिति में आतुरता की परिणति मध्यवर्ती नपुँसकता में होती है।
चूँकि समाज में नर का प्रभुत्व है। मादा की अपेक्षा उसे सुविधाएँ, स्वावलम्बन और वर्चस्व अधिक प्राप्त है। इसलिए नारी की महत्वाकाँक्षा नर की स्थिति में पहुँचने की होती है। ऐसी महिलाएँ उन कार्यों में रस लेती हैं, जिनमें उन्हें पुरुष जैसा काम करने का अवसर मिले। नौकरियों में भी ऐसे काम ढूँढ़ती हैं जिनमें उन्हें संकोचशीलता के बंधनों में न बँधकर पुरुषोचित पराक्रम दिखाने का अवसर मिले। सेना में, पुलिस में, व्यवसाय में नारी का बढ़ता उत्साह इसी मनोवृत्ति का परिचायक है।
सामान्य रहन-सहन में भी इन दिनों इस तथ्य की झाँकी मिलती है। लड़के दाढ़ी-मूँछ रखना पसंद नहीं करते। बाल भी अपेक्षाकृत ऐसा रखते हैं, जिसे देखने से नर-नारी की पहचान न हो सके। लड़कियाँ इस संबंध में एक कदम और आगे हैं। उनकी अभिरुचि पुरुष वेश की ओर बढ़ रही है और ऐसे खेलों में अपनी वरिष्ठता वह सिद्ध कर रही है, जिनमें पहले पुरुषों का ही एकाधिकार था।
नर-नारी की समानता और मानवीय मौलिक अधिकारों की दृष्टि से इसमें कोई हर्ज नहीं, वरन् अच्छा ही है कि नर-नारी सभी एक स्तर पर रहें और मिल-जुल कर साथी-सहयोगी की तरह सहकारिता का सिद्धान्त अपनायें।
पर चिन्ता की बात तब बनती है, जब कामुकता की दृष्टि से कोई पक्ष दूसरे पक्ष की ओर इस कदर आकर्षित और चिन्तनरत होता है कि उसे अपनी स्थिति पर असंतोष और दूसरे पक्ष का वर्चस्व प्रतीत होने लगे। ऐसी दशा में मनःस्थिति, शारीरिक स्थिति और सामाजिक व्यवस्था में व्यतिक्रम उत्पन्न होता है और यह अतिवाद बड़ी उपहासास्पद और चिन्ताजनक समस्याएँ उत्पन्न करता है।
अच्छा यही है कि आत्म गौरव को न गँवाया जाय। अपने को हेय और दूसरे को श्रेष्ठ न माना जाय। प्रकृति ने जो जिम्मेदारी सौंपी है, समाज परम्पराओं ने आकृति-प्रकृति के अनुरूप जो परम्परा चलाई है, उसे यथावत् चलने दिया जाय।
संगीत की सृष्टि नाद से होती है। जिस प्रकार मिट्टी या पत्थर से प्रतिमा, रंग-रोगन से चित्र और ईंट से भवन तैयार होते हैं, उसी प्रकार संगीत का उपादान नाद है। इसी से उसकी रचना होती है। अध्यात्म क्षेत्र में इस नाद को ब्रह्म का स्वरूप माना गया है और इसे “शब्द-ब्रह्म नाद-ब्रह्म” कह कर अभिहित किया गया है। यह कोई अलंकारिक अभिव्यक्ति नहीं, वरन् इसके पीछे सचाई छिपी हैं मस्तिष्क का बुद्धि-विपर्यय और चिन्तन का विकृत विचार-प्रवाह का निराकरण करने में यह शत-प्रतिशत सफल सिद्ध होता है। जब अकेले नाद में इतनी सामर्थ्य है, तो नादों के समुच्चय-संगीत में कितनी शक्ति होगी, इसका सहज अनुमान लगाया जा सकता है। नाद की यह शक्ति सभी जीवधारियों में समान रूप से सक्रिय देखी जा सकती है।
इस तथ्य को और अच्छी तरह स्पष्ट करते हुए डार्विन ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “डिसेण्ट ऑफ मैन” में अनेक वैज्ञानिक साक्षियों के आधार पर यह बताया है कि पशु-पक्षियों की ध्वनियों में मात्र एक नाद नहीं होता, वरन् अनेक नादों का उसमें सम्मिश्रण होता है, फलतः उनकी बोलियाँ संगीतमय होती हैं। वे आगे लिखते हैं कि उनकी ध्वनियों में भिन्न-भिन्न स्वरों के अन्तराल पाये जाते हैं, जिनका उपयोग मनुष्य समाज अपनी संगीत कला में शुरू से ही करता आ रहा है। उनके अनुसार ‘कुत्ते’ पालतू होने के बाद पाँच स्पष्ट स्वरों में बोलते हैं। ‘घरेलू मुर्गे’ बारह स्फुट स्वरों में बोलते हैं। रेवरेण्ड लौकवुउ ने अमेरिका में पाये जाने वाले एक विशेष जाति के चूहे का वर्णन किया है। उन्होंने बताया है कि यह चूहा अपने गले से अर्ध स्वर तक का सच्चा अन्तराल निकालता है। यह कभी-कभी अपने स्वर को ठीक-ठीक एक अष्टक नीचे उतारता है। उन्होंने इस चूहे के प्राकृतिक संगीत की स्वर लिपि भी तैयार की है। बहुतेरे पक्षियों में जो गायक जाति के समझे जाते हैं, गले के स्वरों के नियमानुसार ऊपर-नीचे करके संगीतमय धुन निकालने की विलक्षण क्षमता होती है।
वैज्ञानिकों का यह मत है कि पक्षियों में संगीत का उपयोग विशेष रूप से निराशा, भय, क्रोध, विजय या केवल आनन्द के भाव प्रकट करने में होता है। मनुष्यों में न का कण्ठ-रज्जु स्त्रियों के कण्ठ-रज्जु की अपेक्षा लम्बाई में तिगुना होता है। ऐसा समझा जाता है कि विकास के आदिम काल में प्रेम, क्रोध, ईर्ष्या आदि के भिन्न-भिन्न स्वरों के कारण कण्ठ के बार-बार व्यवहार से नर का कण्ठ-रज्जु लम्बा एवं स्वर कड़ा होता चला गया है। भिन्न-भिन्न भावों को प्रकट करने में पशु-पक्षी भी भिन्न-भिन्न स्वरों के संयुक्त रूपों का प्रयोग करते हैं और वहीं से संगीत का आरंभ होता है। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि जीव-जन्तुओं का संगीतमय भाव-प्रदर्शन प्रकृति की देन है।
सर जेम्स जीन्स ने अपनी पुस्तक “साइन्स एण्ड म्यूजिक” में लिखा है कि संगीत का विकास पशु-पक्षियों से लेकर मनुष्य तक लगातार होता चला आया है और इसलिए मानव संगीत का विकास भी मानव जाति के विकास के साथ ही साथ हुआ है। आदिम काल में, पशु-पक्षियों की तरह ही मानव जाति में भी संगीत की प्रेरणा प्रेम, ईर्ष्या, द्वन्द्व, विजय आदि भावों के प्रदर्शन के लिए होती थी। मैक्समूलर आदि विद्वानों, नृतत्त्वविदों की यह धारणा है कि भाषा की उत्पत्ति के पहले संगीत की उत्पत्ति हुई, क्योंकि विकास की दृष्टि से यह स्पष्ट है कि अन्य जीवों की भाँति मनुष्य को भी पहले शुद्ध और व्यापक भावों को व्यक्त करने की प्रेरणा होती है जो केवल स्वर संघातों से किया जाता है। पहले मनुष्य एक विशेष स्वर संघात से प्रेम, दूसरे स्वर संघात से ईर्ष्या और तीसरे स्वर संघात से विजय की भावना की घोषणा करता था, आगे चलकर जब मनुष्य का मस्तिष्क विकसित हुआ तो उसके एक एक व्यापक भाव में विचारों की अनेकानेक धाराएँ खुल पड़ी। इसी प्रकार प्रेम, ईर्ष्या, द्वन्द्व, विजय आदि शुद्ध व्यापक भाव जटिल होने लगे। यहीं से भाषा की उत्पत्ति हुई, तथा भावमय स्वर संघात में स्वर के उतार चढ़ाव में, व्यंजनमुक्त शब्दों और वाक्यों को गूँथकर किसी व्यापक भाव की, अनेक प्रतिक्रियाओं की अभिव्यक्ति होने लगी।
संगीत का अर्थ केवल प्रेम, श्रृंगार या प्रसन्नता के भावों से ही नहीं है। यह मनुष्य के सारे भाव, सारी कामनाओं की अभिव्यक्ति का साधन है। अब भी यह देखा जाता है कि शोक या दुःख के समय विशेष रूप से स्त्रियों का विलाप संगीत के रूप में ही होता है। अफ्रीकावासी हब्शी जब उत्तेजित होते हैं, तो उनके मुँह से वाक्य संगीत में ही निकलते हैं। दूसरा हब्शी भी उसका जवाब संगीत में ही देता है। धीरे धीरे सारी मण्डली एक स्वर से गाने लगती है। आरम्भ में मानव जाति के सारे भावों को संकेत संगीत के द्वारा ही किया जाता था। आगे चलकर जब भाषा प्रस्फुटित हुई, तो संगीत की उपयोगिता कम हो गई। फिर भी जहाँ समष्टि रूप से आनन्द या प्रसन्नता के भावों को अभिव्यक्त करना या सारे समुदाय को युद्ध के लिए उत्तेजित करना होता था वहाँ संगीत को ही प्रमुखता मितली थी। इसी से आदिम जातियों में समुदाय संगीत और आगे चलकर सभ्य मानव समाज में ग्राम्य संगीत लोक संगीत का प्रादुर्भाव हुआ।
आज भी यह देखा जाता है कि जब किसी विचार को भावों से अनुप्राणित करना होता है या श्रोताओं के हृदय में विचारों के द्वारा किसी भाव की उत्तेजना पैदा करने की आवश्यकता होती है, तो वक्ता एक स्वर के बदले स्वरों के उतार चढ़ाव या अन्तराल से काम लेता है, अर्थात् सार्थक वाक्यों में संगीत का पुट डालता है। ऐसा न करने वाला वक्ता सफल नहीं होता। ऐसे लोग भावों को एक ही धारा के द्वारा अभिव्यक्त नहीं कर पाते। साधारण बोलचाल में भी वाक्यों का उच्चारण समरसता की स्थिति में या एक स्वर में नहीं होता।
इस प्रकार यह देखा जाता है कि वार्तालाप, व्याख्या प्रक्रिया में भी संगीत के मूलभूत नियमों का ही पालन करना पड़ता है, तभी वह प्रवचन य वार्तालाप प्रभावी सिद्ध होता है और सामने वाले पर अपनी छाप छोड़ पाता है। ऐसा इसलिए, क्योंकि भावों के उतार चढ़ाव के लिए स्वरों का उतार-चढ़ाव आवश्यक है। यदि कोई वक्ता एक ही प्रकार के स्वर में बोलता चला जाय तो वह भिन्न-भिन्न भावों को अभिव्यक्त करने में सर्वथा विफल रहेगा और तब उसकी वार्ता प्रायः निष्फल ही साबित होगी।
इस प्रकार संगीत स्वरों के उतार-चढ़ाव का ही दूसरा नाम है। जिस संगीत में स्वरों अथवा नादों का आरोह-अवरोह नहीं, वह संगीत नहीं हो सकता अथवा यों कहा जाय कि वह संगीत निष्प्रभावी साबित होता है शास्त्रों में जिस संगीत की विरुदावली गायी गई है, वह प्राकृतिक संगीत ही है। प्राकृतिक संगीत अर्थात् पशु-पक्षियों की आरोह-अवरोहयुक्त बोलियों के आधार पर विकसित संगीत। ऐसे ही संगीत के लिए शास्त्रों में “नाद ब्रह्म” जैसे शब्द का प्रयोग किया गया है और इसी में वह सामर्थ्य भी है, जो चिकित्सीय प्रयोजनों के लिए काम आ सके। पर दुर्भाग्यवश आज संगीत अपने उस शुद्ध और प्राकृतिक स्वरूप को खोता चला जा रहा है। अब उसकी जगह राँक और पाँप जैसी पश्चिमी धुनें लेती जा रही हैं, जो न सिर्फ अप्राकृतिक हैं, वरन् आरोग्य-लाभ देने की क्षमता से वंचित भी। अतः संगीत को उसके विशुद्ध चिरपुरातन प्राकृतिक रूप में पुनः प्रतिष्ठित करने की आवश्यकता है, तभी हम शब्द-ब्रह्म की शक्ति से लाभान्वित हो सकती हैं।
भौतिक विज्ञान प्रकृति क्षेत्र में बिखरे पड़े अनगढ़ पदार्थ को उपयोगी उपकरण बनाने के लिए अपनी प्रक्रिया तीन चरणों में पूरी करता है। एक उसकी कुरूप मलिनता का परिशोधन करके काम में आ सकने योग्य स्थिति तक पहुँचाना। दूसरा उसे ऐसी स्थिति में लाना जिससे उसे कोई अच्छी शकल देना संभव हो सके। तीसरा उसे उन उपकरणों की शकल में ढालना जो महत्वपूर्ण यन्त्र उपकरणों के रूप में प्रयुक्त हो सके। तीनों चरणों में से गुजरने पर ही विज्ञान की हर चेष्टा को सफलता के स्तर तक पहुँचाया जाता है।
लेहा खदान में से निकलता है तब उसमें मिट्टी मिली होती है। लोहकण भी अस्त-व्यस्त जंग खाये जैसे होते हैं। उस कच्चे माल को भट्ठी में तपाया जाता है ताकि अनावश्यक मिलावट जल जाय और शुद्ध लोहा हाथ लगे। यह एक चरण हुआ। शुद्ध लोहे को किसी मशीन के रूप में ढालना होता है तो उसे फिर भट्ठी में डालकर नरम बनाया जाता है यह दूसरा चरण हुआ। तीसरे कदम में उसे साँचे में ढाला और खराद पर घिस कर उसे पूर्णता प्रदान की जाती है। इस तीसरे चरण के पूरे होने पर एक प्रक्रिया पूरी हो जाती है।
कुम्हार भी यही करता है। मिट्टी के ढेलों को तोड़ता, गलाता, गूँथता है। जब मिट्टी लोच पर आ जाती है तब उसे चाक पर घुमाकर इच्छित बर्तन बनाता है। चिकित्सक भी यह करते हैं। मूल द्रव्य को शोधते हैं, कूटते-पीसते हैं फिर उसे गोली, कैप्सूल, अवलेह, शरबत आदि की शकल देते हैं। रस भस्में भी इसी प्रकार बनती हैं। भौतिक विज्ञान की यही कार्यपद्धति है। इसी को कार्यान्वित करते हुए वह उपेक्षित सामग्री को इस स्थिति तक पहुँचाता है कि उसे अति उपयोगी एवं बहुमूल्य आँका जा सके।
यह सब करने से पूर्व प्रयोग में आ सकने योग्य सिद्धान्तों का आविष्कार, निर्धारण करना पड़ता है। यदि उसकी बौद्धिक व्याख्या सही न हो तो कार्यान्वयन की मेहनत और लागत बेकार जायेगी, असफलता हाथ लगेगी।
इतना समझ लेने के उपरान्त की तुलनात्मक दृष्टि से असंख्य गुनी क्षमताओं संभावनाओं से भरे पूरे चेतना विज्ञान की दार्शनिक एवं क्रियापरक शैली का निरीक्षण परीक्षण करना चाहिए। यह तथ्य सर्वमान्य होना चाहिए कि पदार्थ को जिस प्रकार कुछ से कुछ बनाया जा सकता है-शरीर में अनेकों प्रसुप्त क्षमतायें विकसित की जा सकती हैं, उसी प्रकार चेतना का भी परिष्कार एवं उन्नयन हो सकता है। परिष्कृत वस्तु का स्तर एवं मूल्य स्वाभाविक अधिक होना चाहिए। कोयला अमुक तापमान तक पहुँचने पर हीरा बन जाता है। सस्ते गरापाची से अभ्रक भस्म बनती है। बनाने वाले जानते हैं कि इस परिवर्तन की मध्यवर्ती प्रक्रिया कितनी पेचीदा होती है और उसे पूरा करने के लिए कितनी सतर्कता बरतनी पड़ती हैं, कितने सहायक उपकरण जुटाने पड़ते हैं। कितने दिनों कितनी मुस्तैदी के साथ उसके साथ खपता पड़ता है। कुम्हार, सुनार, लुहार, मोची, दर्जी, रंगरेज, संगीतकार शिल्पी आदि सभी कलाकार अपने अपने क्षेत्र में नये निर्माण करते और दर्शकों को चमत्कृत करते हुए खरीदने वालों को प्रसन्नता प्रदान करने वाली उपलब्धियाँ हस्तगत कराते हैं। यह प्रक्रिया अध्यात्म विज्ञान के कार्यान्वयन में भी अपनानी पड़ती है।
पूर्व इसके कि चेतना क्षेत्र को समुन्नत करने वाले विज्ञान के कार्यान्वयन की, विधिविधानों की चर्चा की जाय, अच्छा हो उसके मूलभूत सिद्धान्तों को समझ लिया जाय। सिद्धान्तों के आधार पर सही दिशा में प्रयास करते बन पड़ता है और वही सफल भी होता है।
चेतना विज्ञान का दूसरा नाम अध्यात्म या आत्मिकी भी है। उसके दो पक्ष हैं-एक तथ्यात्मक, दार्शनिक, सैद्धान्तिक। दूसरा है क्रियापरक-विधिविधानों और कर्मकाण्डों का समुच्चय। लोग दूसरे पक्ष से आरंभ करना चाहते हैं। सिद्धान्तों और आधारों को समझने में रुचि नहीं लेते। फलतः क्रियाकृत्यों का स्वरूप अस्तव्यस्त हो जाता है। उनका प्रतिफल कहीं पतंग जैसा अनिश्चित ही रहता है। सिद्धान्तों की डोरी जब तक कर्मकाण्डों के साथ जुड़ी रहती है तभी तक वह आकाश में छटा दिखाने वाली पतंग जैसी आकर्षक स्थिति में रहती है। चेतना का अथाह और असीम समुद्र इस समूचे ब्रह्माण्ड में लहलहा रहा है। उसी में जल जन्तुओं की तरह हम सब रहते हैं। मछली अपना आहार जलाशय से ही प्राप्त करती है। जीवसत्ता के लिए संभव है कि ब्रह्म सत्ता के साथ जुड़े और उसमें से पोषक तत्व प्राप्त करती रहे। उस उपलब्धि के आधार पर अपने को अधिकाधिक समर्थ बनाती चली जाय और महात्मा, देवात्मा के रूप में अपनी स्थिति सिद्धपुरुषों, महामानवों जैसी विनिर्मित करे। ब्रह्म परायण होने के लिए प्रथम आधार के रूप में अपनी पात्रता विकसित करनी पड़ती है। कुछ महत्वपूर्ण प्राप्त करने और उसे सुरक्षित रखने के लिए तदनुरूप आधार खड़े करने पड़ते हैं।
वर्षा में असीम जलराशि बरसती है पर वह कहीं टिकती उतनी मात्रा में है जहाँ जितना गहरा गड्ढा होता है। सूर्य की किरणें उन्हीं घरों में प्रवेश करती हैं जिनके खिड़की दरवाजे खुले हों। सुन्दर दृश्यों को देखने का लाभ उन्हीं को मिलता है जिनकी आँखें सही हों। बहरे लोग इर्द−गिर्द के वार्तालाप को, गायन, वादन को कहाँ सुन पाते हैं? अपना मस्तिष्क ही गड़बड़ा रहा हो तो संसार की समस्त गतिविधियाँ उल्टी हो रही जान पड़ती हैं। आँखों पर रंगीन चश्मा पहन लेने पर सभी वस्तुएँ उसी रंग में रँगी हुई प्रतीत होती हैं। आत्मसत्ता का अन्तराल यदि गई गुजरी स्थिति में पड़ा हो तो लोक व्यवहार भी सही तरह निभ नहीं पाता। साथियों से भी मधुर सम्बन्ध रह नहीं पाते, ऐसी दशा में परब्रह्म की ब्रह्माण्डीय चेतना के साथ घनिष्टता स्थापित करना और उसके अनुग्रह अनुदान से लाभान्वित हो सकना किस प्रकार बन पड़े? अनुदान प्रदान करने वाला पख न तो दुर्बल है, न सीमित, न कृपण। पर उसे भी देते समय यह ध्यान रखना पड़ता है कि जिसे दिया जा रहा है वह उसका सदुपयोग करेगा या नहीं। जहाँ ‘नदी’ की आशंका होती है वहाँ दाता के उदार हाथ भी सिकुड़ जाते हैं। उसकी खुली हुई मुट्ठियाँ बन्द हो जाती हैं। वरिष्ठ संस्थानों की तरह ईश्वर भी पात्रता परखता और उसके बाद ही अपने अनुदानों की झड़ी लगता है।
रेगिस्तानों में बादल बरसते नहीं। वे उसके ऊपर होकर छवि मात्र दिखाते हुए अन्यत्र चले जाते हैं। बैंक कर्ज बाँटती हैं। लाखों करोड़ों का उधार देती है, पर देने से पूर्व यह जाँच लेती हैं कि वह किस कार्य के लिए माँगा जा रहा है। उसमें लाभ होने और उसके वापस लौटने की संभावना है या नहीं। संदेह होने पर ऋण पाने के लिए दिया गया प्रार्थना पत्र रद्द हो जाता है। कन्या का पिता अपनी सर्वगुण सम्पन्न पुत्री के विवाह योग्य होने पर सुयोग्य लड़के की तलाश में भारी दौड़धूप करता है। जहाँ आशा की झलक दिखाई देती है वहाँ बराबर चक्कर लगाता है, मनुहार करता है। उपहार देने का भी प्रलोभन दिखाता है, सिफारिशें करवाता है और जब अभीष्ट सम्बन्ध हो जाता है तो प्रसन्नता अनुभव करता है। इतने पर भी यदि कोई कृपात्र, अयोग्य व्यक्ति उस लड़की को पाने के लिए अपनी ओर से प्रार्थना करे, मनुहार करने, उपहार देने की पेशकश करे तो भी कन्यापक्ष उसके कथन को अस्वीकार ही नहीं करता, उसे धृष्टता बताता और फटकार लगाता है। एक ओर अनुग्रह का आग्रह और दूसरी और तिरस्कार भरी फटकार, इन दोनों प्रकार के व्यवहारों में सुयोग्य-अयोग्य का, पात्र-कुपात्र का अन्तर ही प्रधान कारण है।
गाय अपने बच्चे को दूध पिलाती है। दूसरी जाति के पशु शावकों को थन तक नहीं फटकने देती। छात्रवृत्ति ऊँचे नम्बर लाने वाले परिश्रमी, प्रतिभाशाली छात्रों को ही मितली है जबकि फेल होने वालों को अगली कक्षा में प्रवेश पाना तक कठिन हो जाता है। अफसरों की भर्ती में चुनाव आयोग के सम्मुख प्रस्तुत होना पड़ता है। योग्यता के आधार पर ही चयन होता है। उसका प्रमाण न दे सकने वाले निराश वापस लौटते हैं।
इन सब तथ्यों को भली प्रकार समझा जाना चाहिए और ब्राह्मी चेतना से व्यष्टि चेतना को कोई महत्वपूर्ण अनुदान मिले ऐसी आशा लगाने से पहले अपनी स्थिति का पर्यवेक्षण करना चाहिए और जीवन के जिस क्षेत्र में जितनी गन्दगी हो उसे बुहार कर साफ करना चाहिए। किसी सम्भ्रान्त अतिथि के घर आने पर घर के फर्श फर्नीचर की सफाई कर ली जाती है। ब्रह्मसत्ता के जीवन क्षेत्र पर अवतरित होने की स्थिति आने से पूर्व अपने आपे की सफाई कर लेनी चाहिए। धुले कपड़े पर ही रंग चढ़ता है। जुते खेत में ही बीज उगता है। बढ़िया बन्दूक में भरा गया कारतूस ही सही निशाना बेधता है। लकड़ी की बन्दूक वह काम नहीं कर सकती भले ही कारतूस कितनी ही अच्छी क्यों न हो? उपासना का विधि-विधान कारतूस समझा जा सकता है। उसके उपयुक्त प्रतिफल प्रस्तुत कर सकने की संभावना तभी बनती है जब साधक का व्यक्तित्व परिष्कृत स्तर का हो।
अध्यात्म विज्ञान का प्रथम चरण यही है कि अपनी पात्रता विकसित की जाय। व्यक्तित्व को परिष्कृत, प्रखर एवं समुन्नत स्तर का बनाया जाय। यह आत्मिक प्रगति के क्षेत्र में सफलता की पहली शर्त है। इसे पूरा किए बिना अधिक कुछ पाने, कमाने की व्यवस्था बनती नहीं। भटकावों में भटकना और निराश रहना पड़ता है।
समझा जाता है कि पेड़ पर जो पके फल दृष्टिगोचर होते हैं वे आसमान से रातों रात टपकते हैं और आ चिपकते हैं। पर वस्तुतः वैसा होता नहीं। जड़ें जमीन से रस खींचती हैं, वह तने में, टहनियों में होकर ऊपर पहुँचता है और पहले फूल बाद में फल बनता है। जड़ें खोखली हो चलें और जमीन से रस खींचने में सफलता न मिले तो पेड़ मुरझाता, सूखता चला जायेगा। पत्ते झड़ेंगे, फूलों के, फलों के दर्शन दुर्लभ होंगे। व्यक्ति को आध्यात्मिक ही नहीं, भौतिक क्षेत्र की सफलतायें भी उसे समुन्नत व्यक्तित्व के आधार पर ही मिलती हैं। यह दूसरी बात है कि साँसारिक क्षेत्र में परिश्रम और कौशल काम करता है तो आध्यात्मिक क्षेत्र में उसी के समतुल्य सेवा और संयम के समन्वय की, व्यक्तित्व के विकास, परिष्कार की आवश्यकता पड़ती है।
अध्यात्म क्षेत्र, की ऋद्धियों, सिद्धियों, विभूतियों की चर्चा प्रायः होती रहती है। उन्हें प्राप्त करने की ललक-लालसा भी हर साधक में पायी जाती है। किन्तु यह भुला दिया जाता है कि उसके लिए साधना-विधानों से भी अधिक आत्म परिष्कार आवश्यक है। देव पूजन के लिए स्थान, उपकरण सभी स्वच्छ, सुसज्जित किए जाते हैं। मैला-कुचैला, दुर्गन्धित, कुरूप वातावरण देखकर वे आने की तैयार नहीं होते, आते हैं तो वापस लौट जाते हैं। यह बात दैवी शक्तियों के अवतरण, अनुग्रह के सम्बन्ध में भी है, उन्हें स्वच्छता और सदुपयोग कर सकने योग्य पात्रता का निरीक्षण परीक्षण करना होता है। इसके उपरान्त ही वह बात बनती है कि दैवी अनुग्रह से लाभान्वित हुआ जाय। घर-आँगन में आये दिन जमा होने वाला कचरा झाडू से बुहारा जाता है, बालों और वस्त्रों की सफाई पानी और साबुन से होती है। मन में आन्तरिक दुर्बलता और बाहरी कुप्रभावों से मनुष्य स्वभावतः वैसे आचरण करता है जैसे कि वह कीट-पतंगों और पशु-पक्षियों की पिछड़ी योनियों में करता रहा है। उस पतनोन्मुख प्रवाह को विवेक और संयम के द्वारा मर्यादाओं और वर्जनाओं के अनुबन्धों द्वारा रोका जाता है। इस नियन्त्रण और परिष्कृत परिवर्तन के लिए काम करने वाली प्रक्रिया का नाम ही अध्यात्म है।
मुस्काने की कला आधे बोझ हलके कर देती है।
गाँधी जी ने स्वतंत्रता संग्राम के दिनों सत्याग्रह आन्दोलन चलाया था। तब लोक समझते थे कि इस आन्दोलन से जुड़ना ही सत्याग्रही बनना है; पर क्या यह परिभाषा सही है? क्या किसी आन्दोलन से अपना संबंध जोड़ लेना ही सही सत्याग्रही का सही मापदण्ड है? कदाचित् नहीं।
उन दिनों गाँधी जी ने एक बार अपने एक भाषण में कहा था-”सत्याग्रही की ईश्वर में निष्ठा होनी चाहिए।” किन्तु तब लोग इस वाक्य में छिपे भाव को न समझ कर भ्रम में पड़ गये थे और सोचने लगे थे कि आखिर कौन और किसके ईश्वर में श्रद्धा करूं-ईसाई के? ताओ के? पारसी के? अथवा निरीश्वरवादी जैन, बौद्ध, साँख्यों के? या सगुण-निर्गुण-किसमें?
वस्तुतः सत्याग्रही के लिए किसी प्रकार की कोई शर्त का निर्धारण नहीं है। उसके लिए ऐसा कोई आवश्यक अनुबन्ध नहीं कि किसी आन्दोलन से जुड़ने अथवा किसी मत-मतान्तर से संबंध रखने से ही वह इसका अधिकारी बन सकता है, वरन् सत्याग्रह तो वह तीव्र ‘भावना’ है, जो किसी किसी के हृदय से प्रस्फुटित होकर बारह अभिव्यक्त होती है। यह भावना सामान्य इन्द्रियों के विषयों की अथवा संकल्प-विकल्पों की नहीं है, अपितु यह एक ऐसी प्रतीति है, जिसके कारण उस व्यक्ति में यह विश्वास पैदा हो जाता है कि उसके अन्दर कोई ऐसी बलशाली प्रेरणा शक्ति काम कर रही है, जो विश्व की अन्य सभी शक्तियों से अधिक सबल है, और जो उसकी काया और चेतना की तुलना में उससे कहीं अधिक निकट है।
यही वह शक्ति है, जिसे कई लोग ‘अध्यात्म बल’ कहते हैं; कई इसे ‘नैतिक बल’ कहते हैं; कुछ ‘आत्म बल’ के नाम से पुकारते, अन्य कइयों ने इसको ‘प्रतीति बल’ कहा है’ पर अधिकाँश इसे ‘ईश्वर-निष्ठा का बल’ मानते हैं। इसी बल के कारण महामानव त्याग-पुरुषार्थ करने और परीक्षा की घड़ी में भी अपने आदर्शों पर डटे रहने में समर्थ हो पाते हैं। समाज सेवी स्वयं कष्ट-कठिनाई उठाकर दूसरों को सुख बाँटने और देशभक्त, राष्ट्र के लिए अपना सर्वस्व निछावर करने का साहस सँजो पाते हैं। कई-कई लोग खुद दीन-दयनीय स्थिति में रह कर भी समय और समाज के लिए इतना कुछ कर जाते हैं, जो उन्हें महान बना देता है। प्रकारान्तर से इसमें वही बल काम करता है। गुरु गोविन्द सिंह के पुत्रों ने किस बल के कारण दीवार में चुने जाने का पराक्रम दिखाया? वह कौन-सा बल था, जिसने गैरीबाल्डी और मेजिनी में इटली को स्वाधीन बनाने के लिए मन्यु जगाया? विनोबा में दूसरों के लिए कष्ट-सहन का साहस किसने पैदा किया? वस्तुतः इन सभी में उसी बल की शक्ति काम करती देखी जाती है पर इस बाल की पहचान क्या हो? कोई यह कैसे समझे कि उसके अन्दर जो शक्ति काम कर रही है, वह वही शक्ति है, जो महामानवों में क्रियाशील रहती अथवा सत्याग्रह पर डटे रहने के लिए आवश्यक होती है? इस संबंध में गाँधी जी का कथन है कि इसकी एक ही कसौटी है-यदि संकट की घड़ी में भी उच्च आदर्शों के परिपालन के प्रति मन में उमंग उत्साह और हृदय में साहस बने रहें तथा कार्य करने के लिए सदा कर्ता को प्रेरित करते रहें, तो समझा जाना चाहिए कि यह उसी बल की शक्ति है। फिर चाहे इसे ईश्वर-आत्मा-गॉड-अल्लाह अथवा नैतिक बल-मनोबल किसी भी नाम से पुकारें-सब एक है।
जो लोग अपने जीवन में नैतिकता, सदाचार और उच्च आदर्शों को प्रश्रय देते हैं, वस्तुतः वही अन्त तक सत्याग्रह के मार्ग पर डटे रह सकते और सत्याग्रही बनने का गौरव प्राप्त करते हैं; किन्तु जो मात्र बाह्य साधनों के बल पर सत्याग्रह पर आरूढ़ रहने की बात सोचते हैं, वह सही अर्थों में सत्याग्रही नहीं कहला सकते; क्योंकि सत्याग्रही का बल उसके अन्तः का ही उपार्जित वैभव होता है जिसे आत्मबल, वर्चस आदि नामों से पुकारा जाता है।
दृश्य और अदृश्य प्रकृति का परिकर-समूचा ब्रह्माण्ड चेतन पिण्डों का एक समुच्चय है, जिसके सभी घटक एक दूसरे से जुड़े हुए हैं। इसके एक सिरे पर जो कुछ भी घटित होता है, तो अन्यान्य स्थानों पर भी उसकी प्रतिक्रिया परिलक्षित होती है। इस तथ्य का प्रतिपादन एवं रहस्योद्घाटन करने का विज्ञान, भारत में प्राचीन काल से प्रचलित ज्योतिर्विज्ञान के नाम से जाना जाता रहा है। इसका लक्ष्य था-अन्तर्ग्रही सम्बन्धों की वैज्ञानिक विवेचना करना तथा इनके जड़ व चेतन प्रकृति पर पड़ने वाले प्रभावों से जन-जन को अवगत कराना।
शीत ऋतु के आगमन की पूर्व जानकारी पाकर व्यक्ति ठंड से बचने के लिए गरम कपड़ों की व्यवस्था कर लेता है। वर्षा का पूर्वानुमान होने पर कृषक खेत बाने की तैयारी करता है। लोग बाहर पड़े सामानों को छाया तले रख लेते हैं, ताकि भीग ना पाये। महामारी फैलने की सूचना पाकर सामान्य जन भी खान-पान में संयम करना प्रारम्भ कर देते हैं, अपने गली कूचों की सफाई कर लेते हैं ताकि वे महामारी के प्रकोप से बच सकें। यदि ये पूर्वानुमान न हो सकें तो मनुष्य समुदाय अनेक प्रकार के संकटों-मुसीबतों का सामना करता है, कभी कभी तो उसे व्यक्तिगत हानि तो कम उठानी पड़ती है, किन्तु सामूहिक प्रतिकूलता समूचे समाज को प्रभावित करती हैं यहीं पर ज्योतिर्विज्ञान की उपादेयता मनुष्य को समझ में आती है। प्राचीनकाल में लब्ध प्रतिष्ठित यह विज्ञान रूपी विधा कालान्तर में लुप्त हो गयी और उसका स्थान फलित ज्योतिष की मूढ़ मान्यताओं एवं भ्राँतियों ने ले लिया। निश्चित मुहूर्त में विवाह, शादियों का आयोजन, बच्चों के मंगले-मंगली होने में भेद, व्यक्ति पर शनि ग्रह का प्रकोप एवं उसके शान्ति हेतु विशिष्ट जप-तप, विशेष मणि-माणिक्य धारण करना, यात्रा करते समय दिशानुकूल तिथि देखना, विशेष तिथियों में शुभ कर्म न करना जैसी अनेकानेक मूढ़ मान्यताओं ने समाज को पंगु बना दिया है, जिसे देखकर विज्ञजनों ने इस विधा की उपेक्षा ही की है। इस विधा ने भाग्यवाद का स्थान ले लिया, जिससे ज्योतिर्विज्ञान अपने प्राचीन सच्चे स्वरूप से पदच्युत हो गया। क्योंकि वर्तमान के फलित ज्योतिष के इस स्वरूप ने व्यक्ति को भाग्य के भरोसे रहना सिखा दिया।
प्रातःकाल में ज्योतिर्विज्ञान में सत्यता के समावेश के लिए ही गणितीय आकलन को स्थान दिया गया था। यही कारण था कि ज्योतिषशास्त्र के नाम पर भाग्य फल बताने वाले आज जैसे पोंगपंथियों के लिये उसमें कोई प्रावधान नहीं था। सभी शोधार्थी वैज्ञानिक थे। दिल्ली, जयपुर, बनारस जैसे भारत के प्रमुख शहरों में ऐसी वेधशालाओं की स्थापना हुई, जिनसे अन्तर्ग्रहीय स्थिति एवं प्रभावों को देखा एवं समझा जा सके। विशेषज्ञों के सहयोग से सूर्य पंचाँग बनवाये गये। पृथ्वी का आकार विभिन्न आयामों-कोणों से देखने के लिए उनके द्वारा कई प्रकार के चक्र विनिर्मित कराये गये। ज्योतिर्विज्ञान, खगोलविज्ञान कितना बढ़ा-चढ़ा था, इसका प्रमाण इस बात से मिलता है कि 12000 से 1800 ई॰ के बीच उपरोक्त विषयों से सम्बन्धित लगभग दस हजार पुस्तकें संस्कृत, अरबी, फारसी आदि भाषाओं में लिखी गई। मौलिक पुस्तकें ही नहीं, पुरातन ग्रंथों की टीका में तथा अनुवाद के कार्य में भी तात्कालिक विद्वान गहरी अभिरुचि रखते थे।
ज्योतिर्विज्ञान का एक और पक्ष है, अन्तर्ग्रही प्रभावों में हेर-फेर कर सकने की क्षमता का जन शक्ति द्वारा उपार्जन। चेतना की शक्ति का तत्वज्ञान जिन्हें विदित है, वे यह भी समझते हैं कि जड़ पर नियमन करने की सामर्थ्य भी उसे प्राप्त हैं। शरीर के बहुमूल्य यंत्र को प्राण की चेतना ही चलाती है, और जीवित रखती है। रेल, मोटर, जहाज स्वसंचालित यंत्र उपग्रह आदि चलते भले स्वयं हों पर उनका संचालन विचारशील मनुष्य ही करते हैं। यंत्रों में प्रचण्ड शक्ति विद्यमान तो है पर वे मात्र अपनी धुरी पर ही परिभ्रमण कर सकते हैं। यंत्र को दिशा देनी हो अथवा उलट पुलट करनी हो तो उसमें चेतना को ही अपना पुरुषार्थ प्रकट करना होगा। ठीक इसी प्रकार अन्तर्ग्रही प्रवाहों में सामर्थ्यानुसार चेतना द्वारा अतिरिक्त अभीष्ट परिवर्तन लाया जाना संभव है। इसके लिए मनुष्य की प्रचंड चेतना शक्ति को नियोजित करना होगा। अन्तर्ग्रही शक्तियों की विशालता और प्रचण्डता अद्भुत और कल्पनातीत है, इतने पर भी यह तथ्य समझा जाना चाहिए कि चेतना की प्राण शक्ति का प्रभाव उस प्रवाह में सारे अभीष्ट परिवर्तन उत्पन्न कर सकता है। ऐसे परिवर्तन जो पृथ्वी के प्राणियों के लिए आसन्न अविज्ञात कठिनाइयों को रोकने और अदृश्य अनुदानों को बढ़ाने में समर्थ हो सकें। ग्रह विज्ञान की पूर्णता इसी में है कि वह स्थिति की जानकारी तक सीमित न रहकर अभीष्ट हेर-फेर कर सकने की सामर्थ्यवान भी हो। ज्योतिर्विज्ञान न केवल ग्रह नक्षत्रों की स्थिति से अवगत कराता है वरन् सूक्ष्म जगत में उनके अदृश्य प्रभावों प्रवाहों के अनुकूलन का भी प्रबंध करता है।
चिरपुरातन ज्योतिर्विद् यह भली भाँति जानते थे कि ग्रह नक्षत्रों, सौर मण्डल का गतिविधियों, उनके आपसी सम्बन्धों और परस्पर एक दूसरे पर, पृथ्वी के वातावरण, वृक्ष, वनस्पति एवं जीवधारियों पर पड़ने वाले प्रभावों की जानकारी देने के अतिरिक्त भी ज्योतिर्विज्ञान का एक पक्ष है-सूक्ष्म अन्तरिक्ष में चलने वाले चैतन्य प्रवाह और उनकी भली-बुरी प्रतिक्रियाओं से मानव को अवगत कराना। इसीलिए उस काल के ज्योतिर्विज्ञान के आचार्य न केवल अन्तर्ग्रही गतिविधियों के ज्ञाता होते थे वरन् आत्म विज्ञान-चेतना के क्षेत्र में भी उनकी पहुँच होती थी। फलतः सौरमण्डल की जानकारियाँ प्राप्त करने के साथ-साथ उनमें अभीष्ट उथल-पुथल करने के आध्यात्मिक उपचारों से परिचित होने के समय-समय पर इस प्रकार के प्रयोग-परीक्षण, अनुष्ठान- उपचार, सामूहिक आध्यात्मिक प्रयोग किये जाते थे।
इस दिशा में प्राचीन भारतीय ज्योतिर्विदों ने गहन अनुसंधान किये एवं निष्कर्ष निकाले हैं। आर्यभट्ट का ज्योतिष सिद्धान्त, काल क्रिया पाद, गोलपाद, सूर्य सिद्धान्त और उस पर नारदेव, ब्रह्मगुप्त के संशोधन परिवर्धन, भास्कर स्वामी के महाभास्करीय आदि दुर्लभ और अमूल्य ग्रन्थ अनेकानेक रहस्यों एवं निष्कर्षों से भरे पड़े हैं। ज्योतिष सिद्धान्त पुस्तक के प्रथम पाद में गणित का सम्बन्ध ज्योतिर्विज्ञान से स्थापित किया गया है। काल क्रिया पाद में खगोलशास्त्र का विशद वर्णन है। इसी तरह उसका अन्तिम पाद पचास श्लोकों का अध्याय ‘गोलपाद’ अपने में ज्योतिष विज्ञान के महत्वपूर्ण रहस्यों पर प्रकाश डालता है। अपने “पंच सिद्धान्तिक” में वाराह मिहिर ने पौलिश, रोपक, वाशिष्ठ, सौर और पितामह नामक पाँच ज्योर्तिसिद्धान्तों का वर्णन किया है, जो ज्योतिर्विज्ञान पर विस्तृत प्रकाश डालते हैं।
मौसम से लेकर राजनैतिक घटनाक्रमों तक का पूर्वानुमान लगाकर लोग अपनी योजनाओं का निर्धारण परिवर्तन करते रहते हैं। ग्रहों की स्थिति से उत्पन्न प्रभावों के सम्बन्ध में यह तथ्य कम महत्वपूर्ण नहीं है। इसकी जानकारी देने वाला ज्योतिर्विज्ञान मात्र फलित ज्योतिष, ग्रह नक्षत्रों के प्रभावों को बताकर लोगों को भयभीत करने वाली प्रपंचविधा नहीं है, वरन् गणितीय आधार पर अनुकूलताओं का-सम्भावनाओं का पूर्वानुमान लगाकर अपने क्रियाकलापों में हेर-फेर करने की सूचना देने वाली एक विज्ञान सम्मत विधा है। इसके प्रयोग से वैयक्तिक एवं सामूहिक सुख शान्ति एवं प्रगति के ऐसे सूत्र मिल सकते हैं, जो संभवतः उज्ज्वल भविष्य की संरचना में अत्यंत लाभदायक सिद्ध हो सकें। आने वाले समय में ज्योतिर्विज्ञान की उपयोगिता इसी क्षेत्र में होगी ताकि मूढ़ मान्यताओं, भाग्यवाद आदि को बढ़ावा न मिले एवं अनिष्ट का निवारण तथा अनुकूलता का लाभ उठाने के लिये सामूहिक धर्मानुष्ठानों का प्रचलन जन–जन में चल पड़े।
भारतीय संस्कृति की यह विशेषता रही है कि शारीरिक, मानसिक व आध्यात्मिक शक्ति के सामंजस्यपूर्ण विकास को मानव जीवन का उद्देश्य माना जाता रहा, जिसका सम्बन्ध मनुष्य के शरीर, मन और आत्मा से है। ये विशेषताएँ ऐसी थी, जिनके कारण यहाँ के व्यक्तियों में समन्वयवादिता, उदारता, सहिष्णुता, गतिशीलता, सूक्ष्मदर्शिता जैसे दिव्यगुणों का समावेश था। चूँकि व्यक्तियों के संस्कार से ही संस्कृति का निर्माण होता है अतः यहाँ की संस्कृति में भी ये गुण पाये गये।
भारतीय संस्कृति समन्वयात्मक है। यहाँ के मनीषियों ने जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में हमेशा मेल-मिलाप करने का ही सफल प्रयास किया। यह संस्कृति ऐसे सार्वभौम सत्यों पर खड़ी है कि किसी भी संस्कृति के साथ इसका टकराव हो ही नहीं सकता, वरन् विभिन्न धाराएँ जैसे समुद्र के गर्भ में समा जाती हैं, वैसे ही विभिन्न देशों की संस्कृतियाँ भी इसमें समाहित हैं। साँस्कृतिक दृष्टि से वह देश और वह जाति अधिक शक्तिशाली और महान समझे जाने चाहिए, जिसने विश्व के अधिक से अधिक देशों, अधिक से अधिक जातियों की संस्कृतियों को अपने भीतर समा करके, पचा करके नये साँस्कृतिक रस का निर्माण किया हो। टकराहट के कटुता का वातावरण बनता है, जिसमें विकास की कोई संभावना नहीं रहती है। चाहे वह व्यक्ति हो या संस्कृति। भारतीय संस्कृति इस दृष्टि से संसार में सबसे महान है, क्योंकि यहाँ की संस्कृति में अधिक से अधिक जातियों की संस्कृतियाँ समाई हुई हैं। रविंद्रनाथ टैगोर ने अपनी रचना ‘एई महामानेवर सागर तीरे’ में कहा है “किसी का भी अब अलग अस्तित्व नहीं है। वे सबके सब मेरे भीतर विराजमान हैं। मुझसे कोई भी दूर नहीं है। मेरे रक्त में सबका सुर ध्वनित हो रहा है।” इसकी समन्वयवादी महत्ता को रामधारी सिंह दिनकर ‘संस्कृति का प्राण’ कहते हैं।
भारतीय संस्कृति की दूसरी प्रमुख विशेषता उसकी उदार प्रवृत्ति है। विद्वान बर्ट्रेण्ड रसेल ने संस्कृति का स्वरूप प्रस्तुत करते हुए कहा है- “दूरदर्शी, विवेकवान, चरित्रनिष्ठ और उदारमना नागरिकों का होना इस बात का चिन्ह है कि संस्कृति को समझा और अपनाया गया।” ‘व्हाट लाइफ शुड मी टू यू’ ग्रन्थ में एडल लिखते हैं-”अपनत्व को परिवार एवं धन वैभव की संकीर्ण सीमा में केन्द्रित न हरने देकर यदि उसे व्यापक बनाया जा सके, तो समझना चाहिए कि यहाँ मानवी संस्कृति ने अपना प्रभाव छोड़ा है” भारतीयों का यह व्रत रहा है कि अपने विकास की साथ ही दूसरों के विकास तथा उत्थान की भी चेष्टा तथा सहायता की जाती रहे। भारत भूमि को “स्वर्गादपि गरीयसी” इसीलिए कहा जाता है कि यहाँ के शिक्षित, सभ्य, सुसंस्कृत लोगों की यह नीति रही है, जो पाया है, उसे बिना अपने पराये का भेदभाव किये बाँटा-बिखेरा। इस विभाजन वितरण में विशेषता अधिक जरूरतमंदों को प्राथमिकता देने की नीति का पूरा पूरा समावेश किया गया। सूर्य की उष्मा, बादलों की सरसता एवं वायु की सजीवता बनकर यहाँ के निवासी उदारमना दृष्टिकोण से सम्पूर्ण भूमण्डल में ज्ञान का आलोक फैलाते रहे।
स्वर्गलोक के निवासियों की सम्पदा उन्हीं के काम आती है। धरती वाले उस वैभव की लाभ कहाँ उठा पाते हैं? देवताओं में देने की प्रवृत्ति तो है, पर साथ ही यह इस स्तर की है कि, जो अनुनयपूर्वक माँगे उसी को अनुग्रह रूप में दिया जाय। बिना माँगे स्वतः विपन्नता को तलाशना एवं बिना याचना के उस विषमता को निरस्त करने के लिए जा पहुँचना, यह विशेषता धरती के देव मानवों में ही पाई जाती है। इन्हीं देवमानवों ने भारतीय संस्कृति की आधारशिला रखी है।
त्याग एवं उदारता की इस पराकाष्ठा पर आकर भारतीय संस्कृति विदेशियों को भी मुग्धकर लेती है किसी भी संस्कृति के आदर्शों को अपनाने में भारतीय को कभी कोई हिचकिचाहट नहीं हुई। यह भारतीय संस्कृति की अनुपम उदारता का ही लाभकारी परिणाम था कि अनेकों संस्कृतियों ने अपने आपको भारतीयता के रंग में रंग कर भारतीय कहलाने में गौरव समझा।
भारतीय संस्कृति के बहिरंग में वैविध्य या अनेकता दिखाई पड़ती हैं परन्तु अन्तरैक्य ने इस वैविध्य और अनेक्य को अपने आँचल में समेट रखा है। यहाँ की मूल विशेषताओं में एक है-”अनेकत्व में एकत्व की भावना।” सारे देश के मनुष्य चाहे कहीं भी रहते हों, उनकी कोई भी भाषा हो, उनके संस्कार भिन्न ही क्यों न हों, यह अनुभव करने के लिए बाध्य हैं कि सभी भाई-भाई हैं। यहाँ के लोगों की मान्यता है “अध्यात्म का सार, नवनीत; अनेकता में एकता” का हमने अपनी माँ के दूध के साथ ही पान किया है। अनेक सम्प्रदाय, धार्मिक अनुष्ठान तथा उपासना पद्धति बाह्य रूप में भले ही भिन्न दिखाई देती हों, परन्तु उसका मूल “एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति” में निहित है। यह एक ऐसे गुलदस्ते के समान है, जिसमें अनेक पुष्प सुशोभित हो रहे है। यह उस इन्द्र धनुष के समान है, जिसमें सात रंगों की चमक स्पष्टतः दृष्टिगोचर होने पर भी वह रहता एक ही है।
‘अवसरानुकूलता लचीलापन तथा गतिशीलता” इस संस्कृति की एक महत्वपूर्ण विशेषता है। परिवर्तन और क्रान्ति के द्वार सदा खुले रहते हैं। तीव्र आँधी में लता की तरह जो आँधी के बहाव के साथ झुक जाते हैं वही अपनी अमरता को बनाये रखते हैं। इसके विपरीत जो नहीं मुड़ते, अपने पूर्वाग्रहों हठवादिता को नहीं छोड़ते, स्थिर बने रहते हैं, उन्हें जड़ मूल सहित उखड़ना पड़ता है। युगों के परिवर्तन के साथ यहाँ के आदर्श और प्रचलन के मानदण्ड बदलते रहते हैं। प्रत्येक दिशा या द्वार से आने वाली प्रेरणा या प्रकाश को प्राप्त करने के लिए अपने मस्तिष्क और मन के गवाक्ष पूर्णतः खुले रहने की भावना यहाँ रहती है। यही कारण है कि यह संस्कृति प्रत्येक युग में सतत बढ़ती और विकसित होती रही है, जबकि इस अवधि में कई संस्कृतियाँ नष्ट हो गयीं, विलुप्त हो गयीं।
यहाँ के लोग भौतिक की तुलना में पराभौतिकता, स्थूल की तुलना में सूक्ष्म, जड़ की तुलना में चेतन एवं तत्व चिन्तन को प्रधानता देते रहे। यही कारण है कि इस पुण्य भूमि पर विचारक मनीषियों की न्यूनता कभी नहीं रही। प्राचीन भारत के ऋषियों ने जीव व ब्रह्म की गुत्थियों को सुलझाकर उनमें एकत्व के दर्शन किये। परमात्मा को आदर्शों एवं सिद्धान्तों के समुच्चय के रूप में देखा एवं अपनाया। मानव सेवा को ही परमात्म सेवा समझा। सहस्रों वर्षों पूर्व के युग में विश्व के अन्य देशों में रहने वाले लोग अन्न वस्त्र जैसी दैनिक जीवन और भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए प्रयत्नरत थे, उसी समय भारत के ऋषि इसकी पूर्ति से निश्चित और इनसे बहुत ऊपर उठकर लोक से परे के रहस्योद्घाटन में व्यस्त थे। “भारत का प्रत्येक व्यक्ति दार्शनिक है” यह धारणा सर्वथा निर्मूल नहीं। भारतीय संस्कृति के आदि काल से ही व्यक्त की अपेक्षा अव्यक्त और स्थूल की अपेक्षा सूक्ष्म को अधिक महत्व दिया जाता रहा है। स्थूल की अपेक्षा सूक्ष्म की अधिक महत्व देने की प्रवृत्ति ने जहाँ दार्शनिकता का विकास किया, वहीं दूसरी ओर भौतिक की अपेक्षा आत्मिक विभूतियों को श्रेय मानने की प्रवृत्ति ने भारतीय आचार शास्त्र तथा नीतिशास्त्र को प्रभावित किया।
समन्वयवादिता, उदारता, सहिष्णुता अनेकता में एकता, अवसरानुकूलता, गतिशीलता, पराभौतिकता एवं सूक्ष्मता ऐसे दिव्य गुण हैं जो शाश्वत एवं सनातन हैं। इन्हीं गुणों के आधार पर व्यक्ति, परिवार, समाज, राष्ट्र सही अर्थों में प्रगति कर पायेगा। आने वाले दिनों में सारे विश्व के व्यक्ति इन गुणों को अपने जीवन में स्थान देकर भारतीय संस्कृति की गौरव-गरिमा बढ़ायेंगे एवं इन्हीं सूत्रों के द्वारा यह बृहत्तर भारतवर्ष पुनः “स्वर्गादपि गरीयसी” कहलायेगा।
बालकों में चंचलता का बाहुल्य होता है। वे देर तक एक स्थान पर नहीं बैठ सकते। एक कार्य में मन नहीं लगा सकते। एक चीज को पकड़े नहीं रह सकते। चपलता उनके स्वभाव में भरी होती है। वे दिन भर भागदौड़ करते हैं। उछलते-मचलते हैं। किन्हीं वस्तुओं को पाने के लिए आग्रह करते हैं, किन्तु उसे प लेने पर भी सन्तुष्ट नहीं होते। जिसके लिए अभी-आतुर हो रहे थे, आग्रह कर रहे थे, उसे पाने के उपरान्त कुछ ही देर में ऊब जाते हैं और फिर जो हाथ में है उसे फेंककर नई ढूँढ़ते और उसे पाने के लिए वैसी ही आतुरता प्रकट करते हैं, जैसी पहले वाली के लिए कर रहे थे। बचपन प्रायः इसी अस्थिरता में बीत जाता है। उनका उत्साह और परिश्रम कम नहीं होता। उसकी मात्रा बड़ों की अपेक्षा अधिक ही होती है पर उसके सहारे कुछ बनता नहीं। कुछ पल्ले भी नहीं पड़ता। भाग दौड़ निरर्थक ही सिद्ध होती हैं परिश्रम निष्फल चला जाता है।
जिनका मानसिक विकास भली प्रकार नहीं हुआ होता उनकी ललक अस्थिरता में ही रमी है। चंचलता के इशारे पर ही वे इधर-उधर उचकते मचलते रहते हैं, बिना उद्देश्य बिना प्रयोजन। बन्दर वृत्ति इसी को कहते हैं। पेट भरने की दौड़-धूप समझ में आती है, पर जब वैसी आवश्यकता नहीं रहती, जहाँ से कुछ मिलने वाला भी नहीं है। उधर उछल-कूद करना किस कारण होता है? इसका अनुमान भी नहीं लगाया जा सकता। बन्दर छोटे हों या बड़े एक टहनी से दूसरी पर, एक पेड़ से दूसरे पर उन्हें चढ़ते-उतरते देखा जा सकता है। पक्षियों के पास खाली समय बहुत होता हैं। पेट तो वे थोड़े से ही प्रयत्न से भर लेते हैं। कोई बड़ी जिम्मेदारी भी उनके कन्धों पर नहीं होती। फिर भी वे चैन से नहीं बैठते। फिर यह भाग दौड़ क्यों? यदि इसे मनोरंजन कहा जाय तो वह भी नहीं कहते बनता। मनोरंजन में दूसरों को क्रिया करनी पड़ती है। दर्शक देखते हुए रस लेते हैं। जिसमें स्वयं ही खटना पड़े, उसमें विनोद क्या?
बच्चे खिलौनों से खेल रहे हों तो उसे विनोद कहा जा सकता है। लोरियाँ, नानी की कहानी आदि सुन रहे हों तो भी एक बात है। पर रोने, चिल्लाने, दौड़ने, उठाने, पटकने में क्या कुछ मिलता है। फिर भी बच्चे-बन्दर, पक्षी पतंग यही सब करते हैं, इन हलचलों में चंचलता ही काम करती दीखती है। मन किसी प्रयोजन के लिए उमगता है पर इतना धैर्य नहीं होता कि जो चाहा गया है उसे योजनाबद्ध रूप में किया जाय। कुछ समय धैर्यपूर्वक एक काम पर टिका जाय। आरंभ के साथ-साथ ही वे समापन भी करते रहते हैं। यह अपने की थकाने वालाल कौतुक है। इसे आवारागर्दी भी कहा जा सकता है। मनुष्यों में से जिनकी ऐसी प्रवृत्ति होती है उन्हें बाल बुद्धि या अर्द्ध विक्षिप्त स्थिति का कहा जा सकता है। ऐसे कौतुक को दर्शक उपहासास्पद ही मानते हैं।
एक पौधे को अभी यहाँ लगाया जाय, पीछे दूसरी, तीसरी, चौथी जगह लगाया जाय तो उसकी जड़ें बेकार हो जाएँगी और वह पौधा पनप न सकेगा? जिन इमारतों का नियमित नक्शा नहीं बना होता जिन्हें जरूरत के मुताबिक औंधा-तिरछा बनाया जाता रहता है, वे बेढंगी-बेतुकी बन जाती हैं। चूल्हे पर अभी एक चीज-अभी दूसरी चीज चढ़ाई जाती रहें तो पूरी तरह पकने का अवसर न मिलने पर वे सभी पदार्थ कच्चे रहेंगे। यात्री कुछ देर पूरब को, कुछ देर पश्चिम-दक्षिण को चले तो एक दायरे में घूमता रहेगा। किसी निश्चित लक्ष्य तक पहुँचने की सुनियोजित यात्रा न कर सकेगा।
एक क्षेत्र में चालीस फुट जमीन खोदने पर पानी निकलता था। कुआं खोदने के लिए उतनी खुदाई करने की आवश्यकता थी पर उतावले खोदने वाले ने दस फुट खोदने के बाद पानी निकलते न देखा तो दूसरी जगह खोदना आरम्भ कर दिया। वहाँ न निकला तो दूसरी जगह-तीसरी जगह चौथी जगह वही प्रयास दुहराया। खुदाई तो पूरी 40 फुट हो गई पर वह छितराई हुई थी। एक भी गड्ढे में पानी न मिला। परिश्रम बेकार हुआ और अच्छी खासी जमीन भी ऊबड़-खाबड़ हो गई। उतावली का परिणाम हर कहीं यही होता है चंचलता-अस्थिरता किसी को किसी काम में सफल नहीं होने देती।
पेड़ पर फल लगते हैं। उनके पकने में निर्धारित समय लगता है। यदि तब तक की प्रतीक्षा न की जाय और जल्दी ही उस लाभ को उठाने के लिए आतुर बना जाय तो कच्चा फल टूट गिरेगा। उसके स्वाद-गुण और मूल्य से वंचित होना पड़ेगा। बरगद, खजूर जैसे पेड़ पूरी लम्बाई तक पहुँचने और प्रौढ़ विकसित होने में लम्बा समय चाहते हैं। जिन्हें अधीरता है, उन्हें निराशा हाथ लगेगी और एक स्थापना में फलित होने में देर लगते देखकर दूसरी को आरम्भ कर देंगे। इस प्रकार की अधूरी कृतियाँ अपने दुर्भाग्य का रोना रोती रहेंगी और बताती रहेंगी कि उन्हें सँजोने वाला उतनी लगन से उतने समय तक प्रतीक्षा न कर सका जितनी कि अभीष्ट थी। इस प्रकार चंचलता कार्य सिद्धि में बाधक ही होती ह। वह देखने में सक्रियता-स्फूर्ति जैसी प्रतीत होती है पर दिशाबद्ध न होने से कौतुक-कौतूहल मात्र बन कर रह जाती है।
आलसी और मूढ़ कबूतर टेढ़ी-मेढ़ी मोटी-पतली लकड़ियों को बिना उपयुक्त स्थान का चुनाव किए कहीं भी औंधा तिरछा घोंसला बना लेता है फलतः उसके अण्डे, बच्चे जरा सा धक्का या तेज हवा का झोंका लगते ही जमीन पर आ गिरते हैं। इसके विपरीत बया पक्षी समग्र मनोयोग के साथ उपयुक्त तिनके ढूँढ़कर घोंसला बनाता है। वह देखते में भी सुन्दर लगता है और मजबूत तथा सुरक्षित भी होता है। यही तथ्य हर कहीं लागू होता है।
सक्रियता, स्फूर्ति और काम को जल्दी पूरा करने की इच्छा बलवती होना उत्तम लक्षण है। पर यह नहीं भूल जाना चाहिए कि हर कार्य अपनी पूर्ति होने के लिए आवश्यक तत्परता, तन्मयता, सावधानी तथा आवश्यक साधन सामग्री चाहता है। यह सब जुटाने में समय लगता है। वैसे अवसर पाने के लिए धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा करनी पड़ती है। जो इस तथ्य को अनुभव नहीं करते वे उथली, हल्की सफलता पर ही सन्तोष कर बैठते हैं। प्रवीण या पारंगत नहीं बन सकते हैं।
विद्वान, पहलवान, कलाकार किसी भी विषय का विशेषण बनने के लिए अपने निर्धारित लक्ष्य को पूरा करने में लम्बी अवधि तक एक निष्ठ साधना करनी पड़ती है। निर्वाह के लिए साधारण क्रिया कलाप तक उपेक्षापूर्वक किए जाने पर अस्त व्यस्त और फूहड़ ढंग के ही बन पड़ते हैं। उनसे अनाड़ीपन झलकता है। बुद्धिमानों पर भी अयोग्यता का लाँछन लगता है। इसका कारण एक ही होता है कि क्रिया को प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाकर मनोयोगपूर्वक नहीं किया गया होता। प्रवीणता के स्तर तक पहुँचने के लिए जितना अभ्यास, अध्यवसाय नियोजित किया जाना चाहिए था, उसमें कमी रही होती है। प्रगति की ऊँचाई तक पहुँचने की निष्ठा जिनमें नहीं होती उनकी मनःस्थिति स्वल्प संतोषी जैसी रहती है। सफलता का तनिक सा आभास मिलने भर से मन भर जाता हैं और फिर दूसरी ओर मुँह मोड़कर नया का ढूँढ़ने लगते हैं। ऐसे व्यक्ति कई विषयों में चंचु प्रवेश करते देखे गए हैं। पर प्रवीण पारंगत किसी भी क्षेत्र में नहीं हो पाते। अपने कृत्यों की बहुलता जताने की अपेक्षा यह कहीं अच्छा है कि एक ही दिशाधारा को मजबूती से पकड़ा जाय और उसके विशेषज्ञ बनकर रहा जाय। ऐसा संकल्प उन्हीं से बन पड़ता है जो वस्तुस्थिति और परिस्थितियों को देखते हुए अपने निर्धारण का चयन करते और फिर उसी में निमग्न हो जाते हैं।
प्रगति का प्रकाश ज्यों-ज्यों प्रखर होता जा रहा है त्यों-त्यों लोग शिक्षा का महत्व समझने लगे हैं। गाँव-गाँव स्कूल-कालेज खुल रहे हैं। कन्याओं को भी पढ़ा जा रहा है। प्रयत्न यह भी किया जा रहा है कि प्रौढ़ों में से भी कोई अनपढ़ न रहने पाये। जब शिक्षा का महत्व नहीं समझा जाता था, तब गाँव पीछे एक दो पंडित, पुरोहित, जमींदार, साहूकार ही पढ़े होते थे। शेष लोग इस झंझट में पड़ने से यह कह कर मना कर देते थे कि हमारे पास खेती बाड़ी है, कोई नौकरी थोड़े ही करना है, जो पढ़ने लिखने में बेकार समय खराब किया जाय।
अपने समय का वह भी प्रचलन रहा होगा; पर अब स्थिति बदल गई है। लोग समझने लगे है कि बिना पढ़े की स्थिति हर दृष्टि से गई गुजरी होती है। वह न उपयुक्त ज्ञान सम्पादित करके सभ्य जनों की पंक्ति में बैठ सकता है। और न उसका उपार्जन ही बढ़-चढ़ कर हो सकता है। श्रेय सम्मान तो मिले ही कैसे? समय में सुधार होने के उपरान्त विद्यार्थी, अभिभावक, सरकार सभी को यह चिन्ता पड़ी है कि शिक्षा संवर्धन को महत्व दिया जाय अन्यथा लोग अनगढ़ गई-गुजरी स्थिति में ही पड़े रहेंगे। सामाजिक, राष्ट्रीय प्रगति के सपने भी धरे रह जायेंगे। तथ्य को ध्यान में रखते हुए सर्व साधारण को शिक्षित बनाने का काम पूर उत्साह के साथ हाथ में लिया गया है।
इससे भी अधिक महत्वपूर्ण तथा आवश्यक उपलब्धि है-”सुसंस्कारिता”। गंभीरतापूर्वक विचार किया जाय तो इसका वजन शिक्षा से कम नहीं, वरन् अधिक ही बैठता है। उच्चस्तरीय चिन्तन में संस्कृति की सराहना में बहुत कुछ कहा जाता है। धर्म, अध्यात्म, दर्शन आदि का उसे आधार माना जाता है। भारतीय देव संस्कृति पर हम सभी गर्व करते हैं और कहते हैं कि जब सुसंस्कारिता का वातावरण था, तब सतयुग विराजता था। मनुष्य का व्यक्तित्व देवोपम था। शालीनता और सज्जनता का प्रचलन रहने पर इसी धरती पर स्वर्ग विराजता था। “संस्कृति” शब्द पर अधिक गंभीरतापूर्वक विचार करने की आवश्यकता है, साथ ही यह भी सोचना है कि उसे शिक्षा की तुलना में कम नहीं वरन् अधिक महत्व क्यों दिया जाता है? अब उसके संबंध में उपेक्षा बरते जाने के कारण जन साधारण का स्तर क्यों गिर गया है और उसके कारण क्यों अगणित समस्याओं, संकटों और विभीषिकाओं का सामना करना पड़ रहा है?
संस्कृति का अर्थ है-”सुसंस्कारिता”। सज्जनता-शालीनता, मानवी गरिमा के अनुरूप मर्यादाओं का परिपालन, वर्जनाओं से बचे रहने का अनुशासन, इन्हीं विशेषताओं के कारण मनुष्य सच्चे अर्थों में मनुष्य बनता है। उसके चिन्तन, चरित्र और व्यवहार में उत्कृष्टता का समावेश रहता है। गण, कर्म, स्वभाव की दृष्टि से वह उस ऊँचाई पर बना रहता है, जिस की कि सृष्टि के मुकुटमणि समझे जाने वाले सृष्टा के युवराज। मनुष्य से आशा-अपेक्षा की जाती है।
शिक्षा के आधार पर मनुष्य सुयोग्य बनता है उसकी जानकारियों की परिधि बड़ी हो जाती है। इस आधार पर उसका लौकिक क्रिया-कलाप ऐसा बन पड़ता है जिसके सहारे-साधन सुविधाओं का अधिक उपार्जन हो सके। विचार करने का क्षेत्र अधिक व्यापक हो सके। देखते भी हैं कि अशिक्षितों की तुलना में शिक्षित अधिक सुयोग्य माने जाते हैं और वे प्रगति का लाभ भी अधिक उठाते हैं। इतने पर भी यह ध्यान रखने की बात है कि यदि सुसंस्कारिता की कमी रही तो शिक्षित होना मात्र चतुरता जन्य लाभ उठा सकने की स्थिति ही बना सकेगा। सुसंस्कारिता ही है जिसके गुण, धर्म, स्वभाव के साथ जुड़े हुए अनुबंध किसी को सज्जन, प्रामाणिक, प्रतिष्ठिता एवं प्रखर-प्रतिभासम्पन्न बनाते हैं। इसी आधार पर व्यक्ति अपना स्तर ऊँचा उठाने और अपने क्रिया-कलाप से सर्व साधारण का हित साधन करने में समर्थ होता है। ऐसे ही लोग अनुकरणीय, अभिनन्दनीय माने जाते हैं, महामानवों में गिने जाते और समाज में नर रत्न कहे जाते हैं। शिक्षा की सच्ची सार्थकता उसके साथ सुसंस्कारिता जुड़ने पर ही बन पड़ती है, अन्रुथा कुसंस्कारी लोग शिक्षित होने पर भी अनगढ़ माने जाते हैं। वे अनाचार अपनाते, असभ्यों जैसी रीति-नीति अपनाते और बिना पढ़े की तुलना में अपनी चतुरता के आधार पर अधिक अनर्थ करते हैं।
शिक्षा संवर्धन के लिए भरपूर प्रयत्न किया जाना चाहिए, किन्तु यह भुला नहीं दिया जाना चाहिए कि सद्गुणों पर आधारित सुसंस्कारिता का अपना मूल्य है। इसके बिना पर वानर बने रहने की ही स्थिति बनी रहती है चाहे शिक्षा किसी भी कक्षा तक क्यों न प्राप्तकर ली जाय। इसके विपरीत यदि मनुष्य सत्प्रवृत्तियों को अपनाये हुए है तो अन्य अभावों के रहते हुए ही वह ऋषिकल्प जीवन जी सकता है और दवे मानव बन सकता है।
संस्कृति की उपलब्धि के लिए कुछ आधार सर्वविदित हैं। सत्साहित्य का स्वाध्याय- सत्संग-श्रेष्ठ समुदाय के साथ संपर्क- उच्चस्तरीय वातावरण के सहारे व्यक्तित्व निखरते हैं। इसके अतिरिक्त कला, साहित्य, संगीत अभिनय, तीर्थाटन, परिभ्रमण के सहारे भी मनुष्य किसी विशेष ढाँचे में ढलते हैं। प्रचलनों का प्रवाह भी प्रभावित करता है। मनुष्य समाज को बनाता हैं। यह उक्ति-उच्चस्तरीय लोगों पर लागू होती है; पर साधारण लोगों के संबंध में तो यही देखा जाता है कि समाज के, सामाजिक वातावरण के द्वारा व्यक्तियों को ढाला जाता है, इसलिए मूर्धन्य जन इस प्रयास में भी निरत रहते हैं कि समर्थ सज्जन ढालने वाले वातावरण बने। इस निमित्त प्राचीन काल में बालकों के लिए गुरुकुल, तरुणों के लिए तीर्थ, प्रौढ़ों के लिए आरण्यक विनिर्मित किए जाते थे। देवालयों, धर्म संस्थानों को उसी प्रयोजन के लिए कार्य करना पड़ता था। साधु ब्राह्मण, वानप्रस्थ परिव्राजक समाज को सुसंस्कारी बनाने के लिए ही निरन्तर कार्यरत रहते थे। शिक्षा संवर्धन तो उस प्रयास का आरंभिक चरण था।
सुसंस्कारिता के प्रतिपादन एवं अभिवर्धन के लिए एक अतिरिक्त धार्मिक प्रयोजन भी प्रचलन में समाविष्ट था। प्रयोग-परीक्षणों ने उसकी उपयोगिता सिद्ध की। सम्पूर्ण मानव जीवन के आवश्यक कृत्यों में उसे सम्मान भरा स्थान मिला।
यह विधा है-संस्कार प्रक्रिया। धर्मशास्त्रों में समय-समय पर मनुष्य के सोलह संस्कार आयोजन किए जाने का विधान है। आयु वृद्धि के साथ-साथ जीवन में अनेक मोड़ आते हैं। उत्तरदायित्वों में हेर-फेर होता है। उसका साँगोपाँग शिक्षण करने के लिए समय-समय पर पारिवारिक समारोहों के रूप में संस्कार आयोजन सम्पन्न किए जाते थे। उन दिनों फुरसत और सुविधा का समय था, इसलिए हर व्यक्ति के सोलह संस्कार मनाये जाने के रूप में परिवार संस्था के समग्र शिक्षण क प्रयास निर्बाध रूप में चलता रहता था; पर अब वैसी बात नहीं रही। व्यस्तता, महँगाई और धर्म प्रयोजनों के लिए उपेक्षा बढ़ जाने के कारण उनमें कटौती भी करनी पड़ गयी और विधान को अपेक्षाकृत अधिक सरल भी बनाया गया। समय के प्रवाह के अनुरूप शान्तिकुँज ने संस्कार प्रक्रिया का समयानुसार निर्धारण एवं प्रचलन किया है।
इन दिनों आवश्यक संस्कार इतने चलते रहे तो भी सुसंस्कारिता संवर्धन का प्रवाह अपनी प्राचीन परम्परा बनाये रहेगा और उनसे मिलने वाले लाभों से लाभान्वित होता रहेगा। सामयिक संस्कार जिनकी गिनती वैसे तो सोलह है, पर उनमें से सात एवं दो सामयिक जन्म दिवसोत्सव तथा विवाह दिवसोत्सव मनाये जाते रहें तो वह महत्वपूर्ण प्रयोजन सध सकता है, जिसके निमित्त इनका प्रावधान भारतीय संस्कृति में रखा गया था। (क्रमशः)
सन् 1980 के बसन्त पर्व पर अकस्मात एक संकल्प उतरा कि देश के प्रमुख तीर्थों में चौबीस प्रज्ञा पीठें विनिर्मित होना चाहिए जो सभी अपने संपर्क क्षेत्र में युग चेतना का आलोक वितरण करने में लगी रहें।
अपने पास सदा काम चलाऊ साधन कही जुटते रहे हैं। ऐसे धनी मानी भी संपर्क में नहीं हैं जो हर निमार्ण पर लाखों खर्च कराने की स्थिति में हों। असमंजस तो बहुत था, पर विश्वास यही बना रहा कि जो निर्देश आते हैं, वे न गलत होते हैं, न असंभव। प्रयत्न चालू कर ही देना चाहिए। सो मन्तव्य प्रकाशित कर दिया।
एक प्रकार से चमत्कार ही हुआ कि परिजनों का उत्साह अंधड़ की तरह उमड़ पड़ा। जिनकी कोई निजी हैसियत नहीं थी, वे भी मण्डली बनाकर संकल्प लेने आये और अपने घर का समेट बटोर निमार्ण कार्य में जुट गए। शुभारंभ रुका नहीं और पूर्ण होकर ही रहा। 24 की बात थी, पर एक वर्ष में वे 240 बन गयीं, दूसरे वर्ष 2400 बनकर रुकीं, और भी बनतीं, पर रोक इसलिए लगानी पड़ी कि कहीं यह मन्दिर मात्र बनकर न रह जायँ। युग चेतना को आलोक विस्तार की बात न भूल जायँ। उस ओर से उपेक्षा न बरतने लगें। अन्यथा देश में ढेरों पड़े खण्डहर-मन्दिरों में कुछ दिन बाद इनकी भी गणना होने लगेगी और उपहास होने लगेगा।
यह एक कीर्तिमान है कि एक परिवार के लोग इतने अधिक निमार्ण कर गुजरें और उनके द्वारा सृजनात्मक और सुधारात्मक प्रवृत्तियाँ जारी रहें।
अब चलते चलाते, एक दूसरा चरण, यों कहिये कि अन्तिम संकल्प इसी वर्ष उतरा है, जो इस गायत्री जयन्ती पर प्रकट किया जा रहा है कि चलती फिरती प्रज्ञापीठें घर-घर गली मुहल्ले युग चेतना को पहुँचायें, जन-जन से संपर्क स्थापित करें और लोक मानस को परिष्कृत करने में कुछ उठा न रखें। यह ज्ञान रथों की स्थापना-संचालन की योजना है। देवालय “अचल” ही नहीं, चल भी होते हैं। जगन्नाथ आदि अनेक मन्दिरों की रथ यात्राएँ निकलती हैं। गंगा जल को काँवर पर रखकर लोग गाँव गाँव धर्म प्रचार करते हुए निर्धारित केन्द्र पर जल चढ़ाते हैं। अनेक मेले, फूलडोल ऐसे होते हैं, जिनमें प्रतिमाओं को मन्दिर से बाहर लाकर उन्हें सर्व साधारण के सम्मुख प्रस्तुत किया जाता है। अशक्त मरीजों के घर डाक्टरों को ही जाना पड़ता है।
देवालयों का उद्देश्य धर्म धारणा और ज्ञान-साधना का वातावरण विनिर्मित करना है। ज्ञान रथों की संस्थापना और संचालन इसी प्रयोजन के लिए होना है। साइकिल के पहियों वाली मन्टिरनुमा एक हल्की किन्तु सुसज्जित गाड़ी पर युग साहित्य ले जाया जायेगा और उसे उस क्षेत्र के शिक्षितों को बिना भूले, घर बैठे नियमित रूप से पढ़ने के लिए दिया जाया करेगा। पढ़ने पर वापस लेने के लिए भी देने वाला ही पहुँचेगा। यही ज्ञान साधना है। प्रचार प्रमुख है, विक्रय गौण।
पिछले दिनों भी ज्ञान रथ बनते रहे हैं, पर उनमें एक कमी रही है कि संगीत और प्रभावी प्रवचन की विधा से रहित होने के कारण घुमाने वाले उन्हें एक फेरी लगाकर वापस लौटा लाते थे। इस बार नये संस्करण में उनका यंत्रीकरण कर दिया गया है। टेपरिकार्डर और लाउडस्पीकर इनमें फिट रहेगा। टेप बजते रहेंगे और जिधर से भी ज्ञान रथ निकलेंगे, प्रभात–फेरियों का, नुक्कड़ सभाओं का माहौल बनाते रहेंगे। स्वाभाविक है कि इसे सुनने-देखने के लिए जगह-जगह भीड़ हो। मिशन का परिचय मिले। लोग पुस्तकें उलट-पुलट कर देखें। जो स्थायी सदस्य हैं वे पिछली किताबें लौटा कर नई लेवें। इस प्रकार न केवल साहित्य माध्यम से वरन् गायन, वादन और प्रवचन का सुयोग जुड़ जाने से ज्ञान रथ वक्ता-मण्डली की भूमिका भी सम्पन्न कर दिया करेगा। जिधर से निकलेगा उधर जन समुदाय को इर्द−गिर्द एकत्रित करेगा। प्रतिपादन ऐसे सशक्त हैं कि जो इन्हें सुनेगा, पढ़ेगा, वह प्रभावित हुए बिना न रहेगा।
इस नये संस्करण में बैटरी की भी व्यवस्था की गयी है। बैटरी दिन भर में चुक जाती है। अतः साथ में बैटरी चार्जर अतिरिक्त दिया जा रहा है। इस प्रकार ज्ञान रथ, साथ का साहित्य व 4 अतिरिक्त उपकरण मिलकर छह यंत्र एक साथ रहेंगे। कीमत लगभग पाँच हजार बैठी है। यह लागत इतनी है जिसे कोई एक व्यक्ति चाहे तो भी उस भार को वहन कर सकता है। अन्यथा मिल जुलकर तो उसकी पूर्ति कोई भी प्रतिभावान मित्रमण्डली के घरों पर एक फेरा भर लगा देने भर से पूरी कर सकता है।
इस बार प्रावधान यह है कि कोई एक भावनाशील व्यक्ति न्यूनतम दो घण्टे रोज उसे चलाये। रोज न चल सके तो सप्ताह में एक या दो दिन जितना भी बन पड़े, उतने समय तक पूजा मानकर अवश्य स्वयं चलायें या फिर अपनी मण्डली की पारी बांटकर मिल जुलकर चलने की व्यवस्था बनायें।
ईसाई मिशन साहित्य घर घट पहुँचाने के लिए उस समुदाय के शीर्ष व्यक्ति साहित्य लेकर पढ़ाने या विक्रय हेतु स्वयं निकलते हैं। साम्यवादी प्रचार में भी यही विधा अपनायी जाती रही है। युग चेतना का आलोक घर घर पहुँचाना हो, जन-जन को हृदयंगम कराना हो तो बड़प्पन को मिटाना व अहंकार को छोड़ना होगा। यह संकोच का नहीं, गौरव का विषय है। उत्कृष्ट प्रयोजन के लिए किया गया श्रमदान अन्य सभी दानों की तुलना में अधिक पुण्यफलदायक है।
इन दिनों देश के कोने कोने में दीपयज्ञों की धूम है। जहाँ वे आयोजन होते है, वहाँ प्रज्ञा–मण्डलों का गठन भी होता है और उन संगठनों को अपने साप्ताहिक सत्संग चालने पड़ते हैं। इनमें जप, ध्यान, दीपदान, सहगान कीर्तन, सप्ताह भर का कार्य निर्धारण, चल पुस्तकालय उपक्रम यह प्रायः दो घण्टे चलता ह। इसमें भी प्रायः उन सभी उपकरणों की आवश्यकता पड़ती है जो ज्ञानरथों में फिट रहते हैं। गाड़ी में से निकालकर उन्हें आयोजनों में प्रयुक्त किया जा सकता है।
दीपयज्ञों के साथ ही प्रज्ञा–मण्डल अपने सदस्यों के घरों पर उनके जन्म दिन आयोजन भी कराते हैं। उनमें भी पड़ोसियों-संबंधियों की अच्छी खासी भीड़ हो जाती है। ज्ञानरथ वाले उपकरण यहाँ भी काम दे जाते हैं। कई अन्य हर्षोत्सवों, संस्कार, त्यौहारों आदि में भी संगीत और प्रवचन आवश्यक होते हैं। यह सभी साधन बिना अतिरिक्त खर्च किये उसी पूँजी से उपलब्ध होते रहते हैं जो ज्ञानरथ बनाते समय लगाई गई थी।
चौबीस प्रज्ञापीठों को विनिर्मित करने का संकल्प तूफानी गति से सफलता की दिशा में अग्रसर हुआ और 100 गुना होकर 2400 का है पर यदि अदृश्य से उतरने वाले प्रेरणा प्रवाह उसी स्तर पर उतर आयें तो इन निर्माणों की संख्या 24000 भी हो सकती है। कहना न होगा कि इतना शक्तिशाली तंत्र कोटि कोटि जन मानस को नवसृजन की आदर्शवादी प्रेरणा से अनुप्राणित करके रहेगा।
जिनके मन में श्रेय लेने का उत्साह उमड़े, वे शान्तिकुँज हरिद्वार से पत्र व्यवहार कर लें। संकल्प यदि उथले बबूले स्तर के न हों और सुनिश्चित दृढ़ता के साथ उभरें तो उनकी सफलता सर्वथा सुनिश्चित ही मानी जा सकती है।
*समाप्त*