उपासना प्रतिदिन करनी चाहिये। जिसने सूरज, चाँद बनाये, फूल-फल और पौधे उगाये, कई वर्ण, कई जाति के प्राणी बनाये, उसके समीप बैठेंगे नहीं तो विश्व की यथार्थता का पता कैसे चलेगा? शुद्ध हृदय से कीर्तन-भजन, प्रवचन में भाग लेना प्रभु की स्तुति है उससे अपने देह, मन और बुद्धि के वह सूक्ष्म संस्थान जागृत होते है। जो मनुष्य को सफल, सद्गुणी और दूरदर्शी बनाते है, उपासना का जीवन के विकास से अद्वितीय सम्बन्ध है।
किन्तु प्रार्थना ही प्रभु का स्तवन नहीं है। हम कर्म से भी भगवान् की उपासना करते है। भगवान् कोई मनुष्य नहीं है, वह तो सर्वव्यापक एवं सर्वशक्तिमान क्रियाशील सत्ता है, इसलिये उपासना का अभाव रहने पर भी उसके निमित्त कर्म करने वाला मनुष्य बहुत शीघ्र आत्मज्ञान प्राप्त कर लेता है। लकड़ी काटना, सड़क के पत्थर फोड़ना, मकान की सफाई, सजावट और खलिहान में अन्न निकालना, आदि भी भगवान् की ही स्तुति हैं, यदि हम यह सारे कार्य कर्म इस आशय से करें कि इससे विश्वात्मा का कल्याण होगा। कर्तव्य भावना से किये गये कर्म, परोपकारों से भगवान जितना प्रसन्न होता है, उतना कीर्तन और भजन से नहीं। स्वार्थ के लिये नहीं आत्म-सन्तोष के लिये किये गये कर्म से बढ़कर फलदायक ईश्वर की भक्ति और उपासना पद्धति और कोई दूसरी नहीं हो सकती।
पूजा करते समय हम कहते हैं-”हे प्रभु तू मुझे ऊपर उठा, मेरा कल्याण कर, मेरी शक्तियों को ऊर्ध्वगामी बना दे और कर्म करते समय हमारी भावना यह कहती है हे प्रभु तूने मुझे इतनी शक्ति दी, इतना ज्ञान दिया, वैभव और वर्चस्व दिया वह कम विकसित प्राणियों की सेवा में काम आयें। मैं जो करता हूँ उसका लाभ सारे संसार को मिले।”
इन भावनाओं में कहीं अधिक शक्ति और आत्म-कल्याण की सुनिश्चितता है।
मनुष्यता भू लोक है। इस धरती के श्रेष्ठ नागरिक बन कर मानवीय कर्तव्यों को पूरा करते हुए हम भू लोक वासी सुर दुर्लभ मानव योनि का प्राणी कहला सकने का गर्व और गौरव अनुभव कर सकते हैं।
इससे ऊँचे लोक में जाने की इच्छा हो, स्वर्ग को पाने और उसमें रहने की इच्छा हो, तो हमें ऊँचा उठना होगा। कर्तव्यनिष्ठ नागरिक मात्र रतन भर से सन्तुष्ट न होकर करुणा और ममता का विकास करना होगा। पुण्य और परमार्थ अपनाना होगा। अपना चरित्र उस मार्ग-दर्शक स्तम्भ के रूप में विनिर्मित करना होगा जिसके प्रकाश में अगणित लोग सत्पथ पर चलने की प्रेरणा प्राप्त कर सकें।
आत्म-निर्माण मानवी कर्तव्य है, पर देव भूमिका की प्राप्ति आत्म-विकास से ही सम्भव है। अपनी अहन्ता जब संकीर्णता के बंधन तोड़ती हुई विशाल व्यापक बनती है, लोक-कल्याण ही आत्म-कल्याण लगता है, तब समझना चाहिए हम देव बने। देवताओं के लिए ही स्वर्ग बना है। हमारा विकसित देवत्व निश्चित रूप से हमें वहाँ पहुँचा देगा, जिसे स्वर्ग कहा जाता है। स्वर्ग ऊपर है, वहाँ पहुँचने के लिए ऊँचा उठना ही पड़ेगा। चरित्र, दृष्टिकोण और कर्म तीनों को ऊँचा उठाते हुए कोई भी व्यक्ति स्वर्ग के राज्य में सरलता पूर्वक प्रवेश कर सकता है।
नरक में जाने की इच्छा हो तो वह भी पूर्णतया अपने हाथ की बात है। नरक नीचे है। उसे अधः लोक कहते है। पतित जीवन जीने वाले, पतित दृष्टिकोण अपनाने वाले और पतित कर्म करने वाले अपने समग्र अधःपतन के के कारण सहज ही नरक पहुँच सकते हैं।
नीति और सदाचरण की मर्यादाओं का उल्लंघन - कर्तव्य धर्म की उपेक्षा, दूसरे के प्रति निष्ठुरता और दुष्टता का व्यवहार, इन्द्रियों का स्वेच्छाचार, मन की कुटिलता जिसने अपना ली, उसे नरक तक पहुँचने में कोई रुकावट नहीं रहती। वह फिसलता हुआ, उस स्थान तक स्वतः पहुँच जाता है, जिसे नरक कहा जाता है और जहाँ की असंख्य यंत्रणाओं का वीभत्स वर्णन किया जाता है।
मनुष्य को सर्वोपरि सम्पदा विचारणा की शक्ति के रूप में मिली हुई है। विचार-बल संसार का सर्व श्रेष्ठ बल है। पशु निर्विचार होता हैं इसलिये वे परस्पर अपनी भावनाओं का आदान-प्रदान नहीं कर सकते, उनकी कोई लिपि नहीं, भाषा नहीं। वे अपने प्रति किये जा रहे, अत्याचारों का प्रतिवाद भी नहीं कर सकते। इसलिए शारीरिक शक्ति में मनुष्य से अधिक सक्षम होते हुए भी वे पराधीन हैं। विचार शक्ति के अभाव में उनका जीवन क्रम एक बहुत छोटी सीमा में अवरुद्ध बना पड़ा रहता है।
विश्रृंखलित, ऊबड़ खाबड़ धरती को क्रमबद्ध व सुसज्जित रूप देने का श्रेय मनुष्य को है। घर, गाँव, शहर आदि की रचना सुविधा और व्यवस्था की दृष्टि से कितनी अनुकूल हैं। अपनी इच्छायें, भावनायें दूसरों से प्रकट करने के लिए भाषा-साहित्य और लिपि की महत्ता किससे छिपी है। आध्यात्मिक अभिव्यक्ति और साँसारिक आहृद प्राप्त करने के लिए कला-कौशल, लेखन, प्रकाशन की कितनी सुविधायें आज उपलब्ध है। यह सब मनुष्य की विचार शक्ति का परिणाम है। सृष्टि को सुन्दर रूप मिला है तो वह भी मनुष्य की विचार-शक्ति का ही प्रतिफल है।
विचारों की विशिष्ट शक्ति का स्वामी होते भी मनुष्य का जीवन निरुद्देश्य दिखाई दे तो इसे दुर्भाग्य ही कहा जायगा जिसके कार्या में कोई सूझ न हो, विशिष्ट आधार न हो उस जीवन! को पशु जीवन कहें तो इसमें अतिशयोक्ति क्या है?
सूर्य प्रतिदिन आसमान में आता है और लोगों को प्रकाश, गर्मी और जीवन देने का अपना लक्ष्य पूरा करता रहता है। वृक्ष, वनस्पति, वायु जल, समुद्र, नदियाँ सभी किसी न किसी लक्ष्य को लेकर चल रहे हैं। इस संसार में यह व्यवस्था है, तभी तो प्रत्येक वस्तु प्रत्येक पदार्थ अपनी अवस्था के अनुसार अपने कर्तव्य कर्म पर स्थित है। सोद्देश्य जीवन ही मानवोचित जिया जाने वाला जीवन है अपने निर्धारण ही उसे ऊँचा उठाते व गिराते है।
भविष्य का पूर्वानुमान किन आधारों पर संभव होता है, संभाव्य की जानकारी व्यक्ति को, समूहों की पूर्वचेतावनी अथवा संदेशों के रूप में किस प्रकार मिल जाती है, यह प्रतिपादित करने से पूर्व हमें कालचक्र पर एक दृष्टि डालनी होगी, उसकी संरचना को समझना होगा। काल के तीन खण्ड माने जा सकते है-भूत, वर्तमान एवं भविष्य। तीनों की ही अपनी अपनी जगह महत्ता है।
मनुष्य का, घटनाक्रमों का वर्तमान ही सामान्यतया सबसे परिचय में आता है। भूतकाल की उपयोगिता इतनी भर है कि उन स्मृतियों, घटनाक्रमों और अनुभूतियों के आधार पर वर्तमान को बनाया, सुधारा सँवारा जा सकता है, किन्तु भविष्य में क्या होना है? कैसे संभव होना है? इसको तो मात्र कल्पना के आधार पर आज के क्रिया कलापों को देखते हुए जाना जा सकता है। चिन्तन क्षेत्र का अधिकाँश हिस्सा भविष्य की कल्पनाओं में ही सदैव निरत रहता है। इसे यों कहना ठीक रहेगा कि भावी निर्धारणों का स्वरूप ही चिन्तन क्षेत्र की सबसे बहुमूल्य सम्पदा है। प्रत्यक्षतः भविष्य दिखाई न पड़ने पर भी शक्ति उन काल्पनिक निर्धारणों में सर्वाधिक व्यय होती है, जिनके माध्यम से आने वाले कल का ताना बाना बुन जाता है। समूहगत चिन्तन प्रवाह जिस दिशा में बहने लगता है, तदनुरूप ही उसकी नियति बन जाती है इसी को कहते है-भविष्य निर्धारण।
भविष्य निर्धारण में सबसे महत्वपूर्ण प्रसंग है-पूर्वाभास, पूर्वकथन या “प्रोफैसी”। घटनाक्रम घटने के पूर्व ही उसके स्वरूप की घटने के समय की लगभग सही भविष्यवाणी कर देना। समय को, काल खण्ड को बहुआयामी मानने वाले मनीषीगण कहते है कि भविष्य के बीजाँकुर वर्तमान में निहित होते हैं एवं इन्हें प्रस्फुटित कर उस भावी परिणति को जाना व वाँछित परिवर्तन कर पाना मनुष्य के लिए संभव है। एक माली बीज का पर्यवेक्षण कर बता सकता है कि वृक्ष का स्वरूप कैसा होगा? कैसे फल देगा? कब फल देगा? आर्चीटेक्ट, इंजीनियर्स, कल्पना शक्ति के आधार पर भव्य भवनों की, अट्टालिकाओं की आकृति अंकित कर एक प्रकार से संभाव्य को मूर्त रूप दे देते है। ऋतु बदलती है, तो लोग परिवर्तन के पूर्वानुमान के सहारे अपनी तैयारी कर लेते है। भविष्य ज्ञान ही तो यह है, जो व्यक्ति को चिरसंचित अनुभवों के आधार पर अपनी पूर्व तैयारी की दिशा देता है।
डरहम विश्वविद्यालय, इंग्लैण्ड के गणितज्ञ भौतिकविद् डॉ गेरहार्ट डीटरीख वासरमैन का कथन है कि मनुष्य को भविष्य का आभास इसलिए होता रहता है कि विभिन्न घटनाक्रम “टाइमलेस” (दिक्काल से परे) मेण्टल पैटर्न-चिन्तन क्षेत्र के निर्धारणों के रूप में विद्यमान रहते है। ब्रह्माण्ड का हर घटक इन घटनाक्रमों से जुड़ा होता है, चाहे वह जड़ हो अथवा चेतन।
स्वामी विवेकानन्द का मत था कि “यूनिवर्स-यह सृष्टि, जिसे मेक्रोकाँस्म नाम से जाना जाता है, अपने गर्भ में अगणित माइक्रोकाँस्म व्यष्टि घटकों को समाहित किए है। ये चेतना घटनाक्रमों एवं चलते-फिरते जीवों-मानवों के रूप में भी हैं तथा जड़ समझे जाने वाले पादप, वृक्ष वनस्पति एवं अन्य घटकों के रूप में भी। अणु में विभु, लघु में महान, क्षुद्र में विराट् के रूप में इसी संज्ञा को वर्णित किया जाता है। इस व्यष्टि घटक में समष्टि से संबंध स्थापित करने, तादात्म्य बिठाने की अभूतपूर्व सामर्थ्य होती है। यही भविष्य विज्ञान का, जो कुछ भी घटित होने वाला है, उसकी झलक-झाँकी अपने मन-मस्तिष्क में देख पाने का मूलभूत आधार है।
विल्हेम वाँन लिबनीज का कथन था कि “हर व्यक्ति में यह संभावना छिपी पड़ी है कि वह अपनी अन्तर्प्रज्ञा को जगा कर भविष्य काल को वर्तमान की तरह दर्पण में देख ले। जो भी दिव्य द्रष्टा मनीषी हुए है, वे इसी क्षमता को जगा कर भविष्य की संभावनाएँ व्यक्त कर सके एवं उस आधार पर वर्तमान के ढाँचे को बदलने की, परिष्कृत करने की सहमति दे सके”।
कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के भौतिकविद् प्रोफेसर एड्रियन डांस ने भविष्य कथन संबंधी अपनी प्रतिपादन एक सेमिनार में 1165 में प्रस्तुत करते हुए कहा था “कि भविष्य में घटने वाली हलचलें मानव की वर्तमान में एक प्रकार की तरंगें पैदा करती है, जिन्हें “साइट्रोनिकवेवफ्रण्ट” कहा जा सकता है। इन तरंगों की स्फुरणाओं को मानवी मस्तिष्क के घटक न्यूरान्स (स्नायु कोश) पकड़ लेते है एवं इस प्रकार व्यक्ति भविष्य का अनुमान लगा पाने की स्थिति में आ जाता है। मस्तिष्क की अल्फा तरंगों तथा साइट्रोनिक वेव्स की फ्रीक्वेंसी (आवृत्ति) एक ही होने से यह एक बड़ी सरल प्रक्रिया है। मात्र मस्तिष्क को सचेतन स्तर पर जाग्रत बनाये रहने की आवश्यकता है, ताकि संभावित घटनाक्रमों का खाका समझा जा सके।”
“सुपरेचर” पुस्तक के लेखक लायल वाट्सन के अनुसार “प्रिकाँग्नीषन” शब्द का अर्थ होता है पूर्वानुमान, जो कुछ घटित होने वाला हो, उसकी पहले से जानकारी हो जाना। वे एक पुस्तक “आइचिंग” अर्थात् “बुक ऑफ चेन्जेज’’ जो 3000 वर्ष पूर्व लिखी गई थी, का हवाला देते हुए लिखते है कि भावी निर्धारण एवं वर्तमान में जो किया जा रहा है, उसमें क्या कुछ परिवर्तन कर भविष्य को स्वयं अन्यों के लिए उज्ज्वल बनाया जा सकता है, यू पूर्णतः ज्यामितीय आधार पर गणना करके जाना जा सकता है। मानवी मस्तिष्क में वे सभी समाधान तथा संभावनाएँ उनके विकल्प विद्यमान है। क्रिस्टल बॉल के द्वारा श्रीमती जीन डिक्सन इसी आधार पर अपनी अंतः प्रज्ञा को जाग्रत कर भविष्य के गर्भ में झाँकी करती थी। वे लिखती है कि हर मनुष्य भविष्यवक्ता बन सकता है, किन्तु कुछ व्यक्ति कभी-कभी शत-प्रतिशत सही भविष्यवाणी बिना किसी पुरुषार्थ के करने की जो योग्यता रखते है, वह या तो देवी अन्तः स्फुरणा के आधार पर अथवा व्यष्टि चेतना का समष्टि से सीधे संपर्क होने पर व्यक्ति विशेष, समय विशेष अथवा परिस्थितियों की जानकारी प्राप्त हो जाने की क्षमता के कारण उनमें विकसित होती है। यह पूर्वजन्मों के आधार पर अर्जित विशेषता भी हो सकती है। नोस्ट्राडेमस, काण्ट लुई हेमन (कीरो) तथा महर्षि अरविन्द ऐसे ही दिव्य दृष्टि सम्पन्न व्यक्तियों में माने जाते है।
विलियम काक्स नामक एक अमेरिकी गणितज्ञ ने एक रोचक सर्वेक्षण कर यह जानने का प्रयास किया कि क्यों विभिन्न स्थानों पर बैठे व्यक्ति अचानक उन यात्राओं को, जो रेल या हवाई जहाज से की जाने वाली थी, स्थगित कर देते है व बाद में पता चलता है कि वे किसी दैवी प्रेरणा अथवा पूर्वानुमान के कारण एक ऐसी अभिशप्त यात्रा से बच गए, जो उन्हें सीधे मौत के मुँह में ले जाती उन्होंने दुर्घटनाग्रस्त रेलों का सर्वे करके पाया कि उस दिन उस विशेष यान अथवा रेल से यात्रा करने वालों की संख्या अपेक्षाकृत बहुत कम रही एवं कइयों ने अपने रिजर्वेशन स्थगित कराये। दुर्घटनाग्रस्त यान या रेलवे कोच में बैठने से पूर्व ही उन्हें पूर्वाभास हो जाने से जानबूझ कर उनने यात्रा को स्थगित कर दिया। विलियम काँक्स कहते है कि दुर्घटनाग्रस्त हुई ट्रेन अथवा वायुयान में यात्रा करने वालों एवं इनके पूर्व तथा बाद में यात्रा करने वालों की संख्या में इतना बड़ा अन्तर था कि इसे महज संयोग नहीं कहा जा सकता। आसन्न संकट की यह एक समष्टिगत चेतावनी मानी जा सकती है, जो संभव है, सबको मिली हो, पर जो काल के ग्रास हो गए, वे उसकी अवमानना करके उस डूम्ड वाहन में बैठे तथा जो बच गए उनने उसे गंभीरता से लिया व वे बच गए। इसे वे “कलेक्टिव अवेयरनेस” कहते है, जिसका शाब्दिक अर्थ है-आसन्न भवितव्यता के विषय में समूहगत जागरूकता एवं भावार्थ हुआ दैवी प्रेरणा-अन्त स्फुरणा-पूर्वाभास। “जनरल ऑफ अमेरिकन सोसायटी फार साइकिकल रिसर्च” (1156) में प्रकाशित विलियम काँक्स के विवरणानुसार 15 जून 1152 को शिकागो व इलिनायस के बीच यात्रा करने वाले “जार्जियन” नामक दुर्घटनाग्रस्त हुई ट्रेन के यात्री उस विशेष दिन मात्र नौ थे, जबकि उस घटना के 14 दिन पूर्व व बाद के 14 दिनों में उनकी संख्या औसतन बासठ व अड़सठ के बीच थी। संख्या का यह विरोधाभास उनने 15 दिसम्बर 1152 को दुर्घटनाग्रस्त हुई शिकागो व मिलवाऊकी के बीच चलने वाली ट्रेन में पाया। ऐसी लगभग 100 घटनाओं में से 10 से अधिक में यात्रा करने वालों को, जो जीवित बच गए, घटना का पूर्वाभास हो चुका था।
शुक्रवार 21 अक्टूबर 1166 के दिन सबेरे 1 बजकर पन्द्रह मिनट पर इंग्लैण्ड के “अबरफान” नामक वेल्श खदानों के क्षेत्र में स्थित एक गाँव में लगभग 5 लाख टन कोयला मिश्रित लावा एक भूस्खलन में एक सौ चालीस व्यक्तियों को मौत के मुँह में लेता हुआ गाँव को समूचा नष्ट कर गया। कईयों ने इस समाचार को पेपर में पढ़ा। इस दुर्घटना के संबंध में पूरे इंग्लैण्ड में अगणित व्यक्तियों को पूर्वाभास कुछ क्षणों से कुछ दिन पूर्व तक सतत् होता रहा था। एक व्यक्ति जिसने गाँव का नाम भी नहीं सुना था, उसने स्वप्न में “अवरफान” की स्पेलिंग लिख कर स्थानीय समाचार पत्र को भेज दी थी, कि ऐसा कुछ घटित होने वाला है। घटना में दिवंगत एरिल में जोन्स नामक 1 वर्षीय एक लड़की ने अपनी माँ को एक दिन पूर्व ही बताया था कि उसके स्कूल पर काला पहाड़ गिर पड़ा है व स्कूल नष्ट हो गया है-यह स्वप्न उसने देख है। माँ बच गई, किन्तु वह लड़की अपना पूर्वाभास बताकर काल का ग्रास बन गई। किसी ने लोगों की चीख पुकार, किसी ने पहाड़ टूटने, किसी ने जमीन में बड़ा गड्ढा होने-ऐसे स्वप्न लगभग दो सप्ताह पूर्व से घटना के दिन तक प्रतिदिन देखें। केण्ट का एक व्यक्ति, जिसने इस घटनाक्रम को यथावत् देखा, दो दिन पूर्व अपने सहकर्मियों को यह कहता पाया कि शुक्रवार को कुछ भयंकर वेल्ष में घटित होने जा रहा है। बाद में किए सर्वेक्षण से भी अधिक व्यक्तियों ने अपनी पूर्वाभास की सूचना दी। यह समूहगत पूर्वाभास की साक्षी देने वाली एक महत्वपूर्ण घटना है।
सिनसिनाटी, ओहियो (अमेरिका) के डेविड बूथ नामक एक ऑफिस मैनेजर को मई 1171 में एक दिन तक लगातार यह पूर्वाभास होता रहा कि अमेरिकन एयरलाइन्स का एक विमान आकाश में फट पड़ा व जलते यान के मलवे में, लपटों में कई शव पड़े है। वे कहते है कि यह स्वप्न नहीं था। बैठे बैठे उन्हें कई बार रोमाँचित कर देने वाली यह लोमहर्षक अनुभूति हुई जैसे वे टेलीविजन देख रहे हो। 22 मई 1171 को उन्होंने फेडरल एविएषन अथॉरिटी एवं सिनसिनाटी एयरपोर्ट के कार्यालयों में फोन पर यह सूचना भी दी एवं एक मनोचिकित्सक से संपर्क कर उसे भी सारा वृतान्त सुनाया। 26 मई को 4 दिन बाद शिकागो के अन्तर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे पर अमेरिकन एयरलान्स का एक डी सी 10 जेट जब दुर्घटनाग्रस्त हुआ एवं अमेरिका के इतिहास में भयंकरतम घटनाओं में से एक इसमें सभी 274 व्यक्ति जो इसमें सवार थे, मृत्यु को प्राप्त हुए तो सभी ने डेविड बूथ को हुए पूर्वाभास को याद किया। यह पूर्वाभास इतना सही था कि फेडरल एविएशन एडमिनिस्ट्रेषन जो इस एयरलाइन्स को चलाता था, को ही डेविड ने तीन तीन बार इसकी सूचना दी व कहा कि इस संभावित दुर्घटना को रोकिये” द अनएक्सप्लेण्ड मिस्ट्रीज ऑफ माइण्ड एण्ड स्पेस “(वाल्यूम अंक 6) में इस घटना को विस्तार से दिया गया है। भवितव्यता की पूर्व चेतावनी का यह एक अनोखा उदाहरण है।
अचेतन के ऐसे पूर्वाभास हममें से अनेकों को होते रहते है। कुछ उन्हें याद रखते है, कुछ भूल जाते है, पर उपरोक्त घटनाक्रमों में सामूहिक स्तर पर कईयों को अथवा एक व्यक्ति को भवितव्यता का पूर्वाभास हो चुका था। यह इस तथ्य का द्योतक है कि भविष्य को जानने की क्षमता-सामर्थ्य मनुष्य में विद्यमान है। यदि थोड़ी सी भी गंभीरता से अचेतन की स्फुरणाओं को लिया जाय, तो न केवल अशुभ अनिष्ट से बचा जा सकता है, शुभ या सुखद संभावनाओं को भी जाना जा सकता है।
एक चींटी चीनी के कारखाने में रहती थी नित्य भर पेट मीठा खाती और प्रसन्न रहती। एक दिन उसकी उस चींटी से भेंट हुई जो नमक के गोदाम में रहती थी और उस खारी पदार्थ से ही ज्यों त्यों करके पेट भरती।
चीनी गोदाम वाली चींटी ने अपने यहाँ की सुविधा का वर्णन किया तो नमक वाली चींटी के मुँह में पानी भर आया। शैली हमें भी अपने यहाँ ले चलो न, जो तुम खाती हो उसका आनन्द हमें भी दिलाओ न।
वह तैयार हो गयी। नमक वाली चींटी को साथ लाई और चीनी से भरे गोदाम को दिखाकर कहा-इसमें से जितना चाहों मन भर कर खाओ।
वह बहुत देर जगह-जगह घूमती रही पर उसे मिठास कहीं नहीं मिला। शिकायत की कि यहाँ भी तो नमक ही है, चीनी कहाँ है?
पहले वाली चींटी चकित रह गई। इसका कारण तलाश किया। मालूम हुआ कि दूसरी चींटी अपने घर से ही मुँह में नमक भर कर चली थी।
चीनी वाली ने कहा - पहले अपना मुँह खाली करों। इसके बाद चीनी का स्वाद चखना। बिना त्याग किये ऊँची उपलब्धियाँ किसी को मिलती कहाँ है?
विश्व के मूर्धन्य विचारक, मनीषी, ज्योतिर्विद् और अतीन्द्रिय द्रष्टा अब इस सम्बन्ध में एकमत है कि युग परिवर्तन का समय आ पहुँचा। सन् 1171 से सन् 2000 तक का समय इन सभी के अनुसार युगसन्धि की वेला हैं ऐसे ही अवसरों पर अनीति, अराजकता, अन्याय और परिस्थितियों की विषमता अपनी चरम सीमा पर पहुँच जाती है। एवं ईश्वरीय सत्ता इन असन्तुलन को सन्तुलन में बदलने के लिए कटिबद्ध होती है। दिव्यदर्शी परोक्ष जगत में चल रही, व्यापक परिवर्तनकारी हलचलों को देखने एवं भविष्य का पूर्वानुमान करने में समर्थ होता है।
मोटे तौर पर इन भविष्य वाणियों के चार आधार माने जा सकते है-(1) दिव्य दृष्टि सम्पन्न भविष्य के गर्भ में झाँकने में समर्थ मनीषी जनों के वचन, जो अन्तः स्फुरणा पर आधारित होते है। (2) ज्योतिर्विज्ञान एवं फलित ज्योतिष की गणनाओं पर आधारित भविष्यवाणियाँ (3) बाइबिल, कुरान, पुराण, रामायण, गीता, श्रीमद् भागवत जैसे धर्मशास्त्रों में उल्लिखित भविष्य वाणियाँ (4) आज की परिस्थितियों के आधार पर, कम्प्यूटर, आँकड़ों के विश्लेषण के माध्यम से किया गया भविष्य विज्ञानियों-(फ्यूचरालॉजिस्ट) द्वारा आकलन एवं इस विद्या से जुड़ी हुई संस्थाओं द्वारा किया गया अध्ययन।
उपरोक्त चारों ही आधारों को लेकर चलें और आज की परिस्थितियों का विवेचन करें तो हम पाते है कि उपर्युक्त सभी विचार धाराएँ एक ही निष्कर्ष पर पहुँचती है कि मानव जाति का भविष्य अभी भले ही अन्धकारमय नजर आता हो, परन्तु है सुनिश्चित रूप से उज्ज्वल ही। दृश्यमान प्रतिकूलताएँ निश्चित ही निरस्त होंगी। सघन तमिस्रा मिटेगी एवं नवयुग का अरुणोदय होगा।
अतीन्द्रिय क्षमता सम्पन्न मनीषियों के अभिवचनों का जब हम मूल्यांकन करते है तो यह पाते है कि इनमें से अधिकाँश के भविष्य कथन समयानुसार सही निकले। अंतर्दृष्टि के सहारे किये जाने वाले भविष्य कथनों में गणित की आवश्यकता नहीं पड़ती। यह तो दिव्य सामर्थ्य है जिसके सहारे परोक्ष जगत पर पड़े रहस्यमय पर्दे को हटाया जा सकता है और वह जाना जा सकता है। जो सामान्यतया चर्मचक्षुओं अथवा उपकरणों द्वारा संभव नहीं। अदृश्य दर्शन की दिव्य दृष्टि भविष्य के गर्भ में पक रही खिचड़ी की गन्ध लेकर यह बता सकती है कि उसमें क्या उबल रहा है और पक कर किस रूप में क्या आने वाला है? यह दिव्य क्षमता किन्हीं-किन्हीं में पूर्व संचित संस्कारों के कारण अनायास ही जग पड़ती है अथवा योग साधना द्वारा साधन स्तर के व्यक्ति इन्हें जाग्रत विकसित कर लेते हैं। सभी अदृश्य दर्शियों को योगी ऋषि तो नहीं कह सकते पर भविष्य दर्शन की विशिष्टता के कारण उन्हें मनीषी तो कहा ही जा सकता है।
ऐसे मनीषियों में जिन्हें मूर्धन्य माना जाता रहा है, वे है-आज से 400 वर्ष पूर्व जन्मे फ्रेंच चिकित्सक नोस्ट्राडेमस, फ्राँस के ही नार्मन परिवार में जन्मे श्री काउण्ट लुईहेमन, जिन्हें “कीरो” नाम से भी जाना जाता हैं प्रख्यात जर्मन दार्शनिक शोपेन हावर, इंग्लैंड के याकषायर में 16 वीं शताब्दी में जन्मी मदर शिप्टन, अमेरिका की सुविख्यात परामनोवेत्ता श्रीमती जीन डिक्सन, प्रसिद्ध अमेरिकी गुहयविद् एगर केसी, इजराइल के देवदूत की संज्ञा प्राप्त मनीषी प्रोफेसर हरार एवं वर्ल्डवाइड चर्च आफ गाड के अध्यक्ष और “प्लेन टुथ” पत्रिका के सम्पादक हर्बर्ट डब्ल्यू0 आर्मस्ट्राँग आदि इन सभी की गणना मूर्धन्य दिव्य दर्शियों में की जाती है। भारतीय मनीषियों में महर्षि अरविंद एवं स्वामी विवेकानन्द के नाम अग्रणी है। इस्लाम धर्म के ख्याति लब्ध विद्वान सैयद कुत्व की गणना भी इसी वर्ग में की जाती है। वस्तुतः ये कुछ गिने चुने उप मनीषियों के नाम के नाम है जिन्होंने अपनी अंतर्दृष्टि के आधार पर भविष्य के संबंध में जो देख और कहा वह प्रायः शत प्रेषित सच साबित हुआ। आगे भी अनेक कथनों के फलितार्थ में बदलने की संभावनाओं को सुनिश्चित माना जा सकता है।
अदृश्य दर्शियों-भविष्यवक्ताओं में सबसे प्रमुख एवं प्राचीन नाम नोस्ट्राडेमस का आता है। वह पेशे से एक चिकित्सक थे। सन् 1803 में जन्मे इस व्यक्ति को अपने जीवनकाल में तो कोई विशेष ख्याति नहीं मिली। किन्तु फ्राँस एवं विश्व के संबंध में की गई भविष्य वाणियों में से अधिकांश के सार्थक सिद्ध होने पर मरणोपरान्त उन्हें अभूत पूर्व प्रसिद्धि मिली। नोस्ट्राडेमस की 4000 भविष्य वाणियों का संकलन “सेंचुरीज” नामक पुस्तक में कई खण्डों में प्रकाशित हुआ है। सेंचुरीज-इसलिए कि उसके प्रत्येक खण्ड में 100-100 भविष्य वाणियाँ ह। 18 वीं सदी से लेकर अब तक के उनके भविष्य कथन समयानुसार सही उतरे है। उन्होंने सतयुग के आगमन से पूर्व तीन महाशक्तियों के अवतरण की चर्चा अपनी भविष्य वाणियों में की थी, ये है प्रथम नैपोलियन, द्वितीय हिटलर एवं तृतीय जो अब संभावित है एण्टी क्राइस्ट। यह सब वे नैपोलियन के जन्म से पूर्व ही लिख चुके थे। उनका मत था कि प्रथम दानों शक्तियाँ विश्व की परिवर्तनकारी एवं विनाशकारी हलचलों में महत्वपूर्ण भूमिकायें निभायेंगी। किन्तु अंततः जीत लोकमत की होगी। नैपोलियन के बारे में उन्होंने लिखा था कि इटली और फ्राँस की सीमा पर स्थित एक सामान्य परिवार में जन्मा एक बालक विश्व का सबसे बड़ा तानाशाह सम्राट बनेगा। साम्राज्यवादी विस्तार के लिए अमानवीय पुरुषार्थ करेगा किन्तु जीवन के उत्तरार्ध काल में उसे हेलेना नामक द्वीप में बन्दी का जीवन जीते हुए मृत्यु का वरण करना होगा। इतिहास में रुचि रखने वाले भली भांति जानते है कि यह सब घटनाएँ सच होकर रहीं। एक और आश्चर्य की बात यह है कि नोस्ट्राडेमस अपने जीवन काल में ही 1878 में सर्वसम्मत ईसाइयों के धर्म गुरु पोप का पद ग्रहण करने वाले व्यक्ति को पहचान चुके थे एवं उसकी घोषणा भी कर चुके थे।
हिटलर के निरंकुश शासक होने के रूप में उदित होने का उल्लेख भी सेंचुरीज में है। चार पंक्तियों के पद्यरूप में लिखी गई ये भविष्यवाणियाँ इस दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है कि हिटलर के जन्म से लगभग 380 वर्ष पूर्व इस दिव्य द्रष्टा ऋषि, ने थर्ड राइक, के नाम से उसके अमुक स्थान पर जन्म लेने, क्रमशः योरोप को दबोचने और इटली की मदद से नस्लवाद के सहारे सारे विश्व पर आधिपत्य जमाने के दुस्साहस की चर्चा की हैं नोस्ट्राडेमस हिटलर के अभ्युदय एवं पराजय-दोनों का ही इतिहास लिख गये थे। वे लिखे गए थे कि आग्नेयास्त्रों एवं विध्वंसक-महाविनाशक बमों के प्रहार से व्यापक विभीषिका का दृश्य खड़ा होगा तथा इसका समापन विश्व के पूर्वी क्षेत्र में स्थित जापान में संभावित एक संहार लीला से होगा। निश्चित ही यह संकेत हिरोशिमा और नागाशाकी पर संयुक्त सेनाओं द्वारा डाले गये परमाणु बमों की ओर था। इंग्लैंड के राजा एडवर्ड अष्टम का सिंहासन त्याग एवं राष्ट्र से निष्कासन, मुस्लिम राष्ट्रों में आँतरिक विग्रह पैदा होकर व्यापक विनाश, बीसवीं शताब्दी के अंतिम दो दशकों में बुद्धिवाद की चरम प्रगति, विज्ञान जगत में नवीनतम आविष्कार, प्रकृति के साथ छेड़ छाड़ करने से उत्पन्न दैवी प्रकोपों के घटाटोपों की घहराना तथा अंततः एशिया से मानव जाति के उज्ज्वल भविष्य के निर्धारण हेतु एक प्रचण्ड शक्ति का प्रादुर्भूत होना ये कुछ ऐसी भविष्य वाणियाँ है जो उनकी पुस्तक, सेंचुरीज एवं उसी पर आधारित एक समीक्षा-”द फ्यूचर आफ ह्ममेनिटी” में वर्णित है।
नोस्ट्राडेमस अपनी मृत्यु (सन् 1881) से पूर्व ही सन् 2037 की अवधि तक की भविष्य वाणियाँ कर चुके थे। उनकी हस्त लिखित पुस्तक को आक्सफोर्ढ की 17 वर्षीय छात्रा ऐरिका ने पुस्तकालय में से ढूँढ़ निकाला और पाया कि इसमें जो कुछ भी खा है वह सब या तो वास्तव में घटित हो चुका है अथवा आने वाले भविष्य के बारे में है। ऐरिका के अतिरिक्त 80 से भी अधिक विद्वानों ने “सेंचुरीज” का विषद अध्ययन किया है उन्होंने लिखा है कि तीसरी महाशक्ति एण्टीक्राइस्ट जिसको नोस्ट्राडेमस ने सतयुग के आगमन से पूर्व कलियुग की असुरता का चरमोत्कर्ष कहा है, की प्रभाव परिधि से ही विश्व इन दिनों घिरा हुआ है। विद्वत जन यह लिखते है कि कि नोस्ट्राडेमस उज्ज्वल भविष्य में विश्वास रखते थे। काव्यबद्ध “सेंचुरीज” का अध्ययन करने पर जो निष्कर्ष निकले है, वह बताते है कि संकट और चुनौती से भरे इस काल खण्ड में एक नयी आध्यात्मिक चेतना का उदय होगा जो सन् 1111 तक अपनी विकास यात्रा के चरम शिखर पर होगी। यह चेतना एशिया के भारत, चीन एवं जापान जैसे राष्ट्रों से उदित होगी तथा सारे विश्व को अपने लपेट में ले होगी। धर्म और विज्ञान का मिलन होगा। आध्यात्मिक अनुशासनों को वैज्ञानिक मान्यता मिलेगी एवं वैज्ञानिक निर्धारणों को आध्यात्मिक दिशा प्राप्त होगी। इससे संहार की संभावनाएँ समाप्त होगी और एक नये युग का सूत्रपात होगा। जिसे उन्होंने-”एज आफ दु्रथ” का नाम दिया। एण्टी क्राइस्ट अर्थात् मानवी दुर्बुद्धि विश्व सभ्यता को नष्ट नहीं कर सकेगी। साँस्कृतिक पूँजी से अभिपूरित भारतवर्ष एक महाशक्ति के रूप में अवतरित होगा जो एकता एवं समता से भरे नवयुग की प्रतिष्ठापना करेगा। वे अपनी अलंकारित भाषा में (क्वार्टन 16, भाग 10 सेंचुरीज में) लिखते है कि तीन ओर से सागर से घिरे धर्म प्रधान सबसे प्राचीन संस्कृति वाले एक प्रायद्वीप से वह विचार धारा निस्सृत होगी जो विश्व को विनाश के रास्ते से विरत कर विकास की ओर ले जायगी। सतयुगी संभावनाओं को साकार करेगी।
भविष्यवाणी के भाष्यकर्ता का मत है कि नोस्ट्राडेमस ने जिस सागर का उल्लेख किया है वह भारत के दक्षिण में स्थित विशाल हिन्द महासागर है। इसका नाम “हिन्द अर्थात् बृहत्तर भारत के नाम पर ही पड़ा है। नोस्ट्राडेमस ने “गे्रटचायरन” नाम से एक नेतृत्व के इस देश से उभरने की बात कही है जो कि मूलतः विचार प्रवाह के रूप में होगा। यह विचार प्रवाह समस्त विश्व में क्रान्ति ला देगा और जो भी परिवर्तन आज असंभव नजर आ रहा है, उसे संभावना में बदल देगा।
नोस्ट्राडेमस ने अपनी कृति में लगभग दो हजार से अधिक घटनाओं के घटित होने का उल्लेख किया है। यू0 सी0 एल॰ अमेरिका में व्याख्याता एवं सुप्रसिद्ध भविष्य विज्ञानी स्टीवर्ट रोब ने इस भविष्य वाणियों का बड़ी गंभीरता से अध्ययन किया है। उनके अनुसार अमेरिका जब वीरान था, रेड इन्डियन्स ही आदिवासियों के रूप में वहाँ विद्यमान थे, तब नोस्ट्राडेमस द्वारा यह कहा जाना कि इस वीरान क्षेत्र में एक विकसित सभ्यता का उदय होगा। सचमुच हतप्रभ कर देने वाला एक तथ्य है। इंग्लैंड, ग्रेट ब्रिटिश एम्पायर के जहाँ कभी सूर्य नहीं अस्त होता था, क्रमशः सिकुड़ कर एक छोटे से द्वीप तक सीमित रह जाने जैसी असंभव बात भी वे अपने दिव्य दर्शन के आधार पर चार शताब्दियों पूर्व लिख चुके थे। 20 वीं सदी के वैज्ञानिक आविष्कार, अंतरिक्ष धरती एवं समुद्र पर की जाने वाली यात्राएँ, भूगर्भ तथा ब्रह्माण्ड की खोज जैसे प्रकरणों की चर्चा भी वे 18 वी शताब्दी में लिख गये थे।
अभी तक अगणित विद्वानों ने नोस्ट्राडेमस के भविष्य कथन पर आधारित भविष्य की संभावनाओं का विश्लेषण विवेचन किया है। सभी एक मत से यह मानते है कि प्रस्तुत समय परिवर्तन की बेला है। युद्ध हिंसा और अनैतिकता का ताँडव नृत्य क्रमशः निरस्त होगा। दैवी प्रकोप व्यक्ति को सन्मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित एवं बाध्य करेगा। इक्कीसवीं सदी एक ऐसे उज्ज्वल भविष्य को लेकर आयेगी जिसमें सभी सुख शाँति से रह सकेंगे। भेदभाव समाप्त होंगे और सारे विश्व की व्यवस्था एकतंत्र के अंतर्गत चलेगी। निश्चय ही इसमें भारत की सबसे महत्वपूर्ण भूमिका होगी।
दो इतिहास वेत्ताओं में विवाद चल रहा था कि रामायण का घटनाक्रम प्रामाणित है या नहीं? वह इतिहास है या काव्य?
तीसरे मध्यस्थ की सम्मति पूछी गई तो बोला, कि न तो मैं राम के समय में मौजूद था और न उसे लिखने वालों के साथ रहा हूँ। इसलिए उसकी ऐतिहासिक प्रामाणिकता के संबंध में तो कुछ नहीं कह सकता, पर इतना अपने अनुभव से कह सकता हूँ कि रामायण पढ़ने से मेरे जीवन पर भारी प्रभाव पड़ा है और उसके कारण सुधार परिवर्तन में भारी योगदान मिला है। इस दृष्टि से तो रामायण को प्रामाणित ही मानता है।
एक राज कुमार बड़े दुष्ट स्वभाव का था। एक दिन वह बाढ़ के पानी में बहने लगा। किसी ने उसे बचाया नहीं।
नदी में एक लट्ठा बहता जा रहा है। बाढ़ में पड़े हुए एक साँप और चूहे ने उस लट्ठे पर सवारी गाँव ली थी वह लट्ठा राज कुमार के हाथ भी पड़ गया वह भी उसे पकड़ कर तैरने लगा।
नदी तट पर साधु रहता था। उसने लट्ठे पर सवार तीन प्राणियों को बहते देखा तो दया वश वह नदी में कूद पड़ा और लट्ठे को घसीट कर किनारे पर ले आया। उन्हें अपनी झोपड़ी में ले गया। वे सर्दी से काँप रहे थे। उनकी ठंड छुड़ाने के लिए उसने आग जलाई जो पास में था वह भोजन कराया और उनके स्वस्थ हो जाने पर विदा किया। साँप ने कृतज्ञता व्यक्त की और कहा मैं पड़ोस में ही रहूँगा आपके दर्शन करता रहूँगा। मेरे पास कुछ धन है जब आपको जितनी आवश्यकता पड़ा करेगी उतना देता रहूँगा।
चूहे ने कहा आपने मेरे प्राण बचाये है। मैं आपके लिए ईधन जुटाता रहूँगा। पेड़ की टहनियाँ काट काट कर झोपड़ी के क्षेत्र में ढेर लगाता रहूँगा।
राजकुमार कृतघ्न था उस को इस बात का बहुत बुरा लगा कि उसका उचित सम्मान सत्कार नहीं मिला उसने पत्थर फैंक कर साधु की झोपड़ी उखाड़ कर फिंकवा दी।
उपकार भी हर किसी के साथ में नहीं करा चाहिए।
अतिमानसी चेतना को इस धरा पर उतारने वाले प्रख्यात दार्शनिक एवं महायोगी श्री अरविन्द ने अपनी अंतर्दृष्टि से इस विश्व के अतीत संघर्षमय वर्तमान परमोज्जवल भविष्य का दर्शन किया था।
उन्होंने कहा था कि यह समय साधारण नहीं है हम उस देव मुहूर्त में जीवन यापन कर रहें है जब पुराने आधार डगमगा जाते है और बड़ी अव्यवस्था खड़ी हो जाती है। इसमें ऐसी घड़ियां आती है जब हमारे जीवन सलिल पर भगवान का श्वास फैल जाता है, देव मनुष्यों के बीच विचरण करते है और ऐसा भी समय आता है, जब वे पीछे हट जाते है और मनुष्य अपने अहंकार की ही सामर्थ्य या निर्बलता से काम करने के लिए छोड़ दिया जाता है। प्रथम काल में, जो वर्तमान में है, थोड़ा सा भी प्रयत्न करने पर बड़े परिणाम पैदा होते है और भाग्य बदल जाता है और दूसरे काल में जरा से परिणाम के लिए बहुत प्रयत्न करना पड़ता है।
“इस भागवत बेला में अभागा है वह मनुष्य या राष्ट्र जो सोया हुआ रहे या उसके उपयोग के लिए तैयार न हो। पर कही अधिक अभागे वे हैं जो सशक्त और तैयार होते हुए भी उस शक्ति का अपव्यय करते है और उस मुहूर्त का दुरुपयोग करते है।”
सतयुग के अवतरण हेतु सब से अधिक दायित्व भारत वर्ष पर ही है। आधुनिक भाषा में सतयुग वह समय विशेष काल है जिसमें एक प्रकार का स्थाई और पर्याप्त सामंजस्य उत्पन्न होता है और मनुष्य कुछ समय के लिए कुछ अवस्थाओं और सीमाओं के अंतर्गत, अपनी सत्ता की पूर्णता को प्राप्त करता है। सामंजस्य एक सुप्रतिष्ठित पवित्रता की शक्ति के द्वारा उसकी प्रकृति में विद्यमान रहता है, परन्तु उसके बाद भंग होने लगता है। कलियुग में आकर यह पूर्ण रूप से ढह जाता है और नष्ट व समाप्ति की ओर है। प्राचीन ज्ञान और संस्कृति का बहुत अधिक नाश हो गया है। उसके कुछ अंश ही वेदों-उपनिषदों और अन्याय धर्म ग्रन्थों में हमारे लिए बचे हुए है। परन्तु अब वह समय आ गया है, जब ऊर्ध्वगमन के लिए पहला पग उठाया जा सकता है। एक नवीन सामंजस्य और पूर्णता को स्थापित करने के लिए प्रथम प्रयास किया जा सकता है।”
ईश्वरीय आदेश आ गया है। भगवान सदा ही अपने लिए एक ऐसा देश चुन कर रखते हैं जिसमें थोड़े या बहुत से लोग सब प्रकार की सम्भावनाओं और विपत्तियों में से गुजरते हुए भी उच्चतर ज्ञान को सदा सर्वदा सुरक्षित रखते है। और वर्तमान काल में कम से कम इस चतुर्वर्ग में वह देश है भारतवर्ष।”
केवल भारत वर्ष ही इस सामंजस्य को खोज पाएगा क्यों कि मनुष्य की वर्तमान प्रकृति में केवल थोड़ा बहुत हेर-फेर करके नहीं वरन् उसका आमूल-चूल परिवर्तन करके ही यह सामंजस्य विकसित किया जा सकेगा।
यह परिवर्तन राजनैतिक और सामाजिक मतवादों तथा दर्शन शास्त्रों के द्वारा होना सम्भव नहीं है। बल्कि होगा, अपने अंतर्जगत में भगवत् सत्ता की उपलब्धि करके और उस उपलब्धि के द्वारा जीवन को नए सांचे में ढाल कर” श्री अरविन्द कहते है कि हम सब इस भागवत मुहूर्त में अपने को परिष्कृत करें। अपनी अन्तरात्मा से अपने आप को धोखा देने की वृत्ति और झूठी आत्म प्रशंसा के विषपान से बचें। शुद्ध होकर .... भय को उखाड़ फेंके।
“यह घड़ी प्रायः भयंकर होती है यह आग, बवंडर और तूफान की तरह है और है इंद्र का ताण्डव नृत्य। परन्तु जो इसमें अपने उद्देश्य की सच्चाई के बल पर खड़ा रह सकता है, वही खड़ा रहेगा। अपना अस्तित्व बनाये रखेगा।
“सृजन का कार्य प्रारम्भ हो चुका है। विश्व की दृष्टि के सम्मुख भारत में एक विश्व राष्ट्र निर्मित हो रहा है। इस तीव्र अनुगम्य विधि आवश्यक सामग्री और दिव्य वस्तु कला को वे सभी देख सकते है जिनके पास प्रज्ञा एवं अंतर्दृष्टि है। भारत की सभ्यता और संस्कृति महानतम एवं प्राचीनतम है। अब वह समय आ गया है, जब यह समस्त विघ्न बाधाओं पर विजय पाकर ऊर्ध्वगामी होगा। इस सबका आकलन कोई दूरदर्शी दृष्टा ही कर सकता है।
यदि हम इस रूपांतरण को घटित होते हुए देखते है जो न केवल इस राष्ट्र अपितु विश्व के लिए आवश्यक है, तब हम बिना किसी भय या लालच के उस समय को नियोजित करेंगे जो हमारे पास है। भारत सभी देशों का गुरु है। अपने नए मधुर राग से मानव आत्मा की चिकित्सा करेगा। वह एक बार फिर विश्व के जीवन का कायाकल्प करके विश्वात्मा को शान्ति, प्रदान करेगा।”
“भारत जिसने अपने में प्राचीन रहस्य समाहित कर रखे हैं, इस युग सन्ध्या में जो तीव्रता से गुजर रही है, एक महान रूपांतरण का नेतृत्व करेगा। यही इसका उद्देश्य और मानव मात्र की सेवा होगी”
अब सभी को सुदृढ़ विश्वास होना चाहिए कि भारत अवश्य जाग्रत और महान होगा। प्रत्येक कठिनाई और प्रतिकूलता अब सहायक ही होगी और आगे इन प्रतिकूलताओं का अन्त होगा। अब प्रवृत्ति ऊर्ध्वमुखी है। अवनति का समय व्यतीत हो गया है। स्वर्णिम प्रभात आने को है। जैसे ही एक बार प्रकाश हुआ, पुनः कभी भी निशा का आगमन नहीं होगा। ऊषा अति शीघ्र पूर्णता को प्राप्त होगी। सम्पूर्ण क्षितिज पर सूर्य प्रकाशित होगा। भारत के भाग्य का सूर्य उदय होने पर अपने प्रकाश से न केवल भारत को अपितु पूरे एशिया, विश्व को आप्लावित कर देगा।
श्री माँ जिन्होंने ऋषि वर के कार्य को स्थूल जगत में आगे बढ़ाया, महायोगी के चिन्तन को आगे बढ़ाते हुए अपनी दिव्य दृष्टि से देखकर कहा था कि युग संधि की यह प्रसव बेला तभी तक है जब तक संसार नई सृष्टि का स्वागत करने के लिए तैयार नहीं है। उन्होंने स्पष्ट किया कि सन् 1162 के आरम्भ से ही इस नई सृष्टि की चेतना धरती पर काम में लगी है। सतत् सन् 2000 तक सक्रिय रहेगी। समस्त महान परिवर्तन अपनी पहली अमोघ शक्ति तथा प्रत्यक्ष निर्माणकारी सामर्थ्य एक व्यक्ति के या थोड़े से व्यक्तियों के श्रेष्ठ मन एवं उदात्त आत्म भाव से ही प्राप्त करते है। समुदाय तो अनुसरण करता है।
महर्षि कहते है कि “इस समय भारत को विशिष्ट प्राणवान व्यक्ति चाहिए। क्योंकि, जो कार्य करना है वह उतना ही बड़ा है, जितना कि जीवन और इसीलिए वे व्यक्ति जो पथ प्रदर्शन का काम करते है, मानव मात्र के अभ्युदय को ही अपना क्षेत्र बना लेते है। यह अग्रदूत किसी भी वस्तु को परकाया नहीं समझते, नहीं किसी चीज को अपने क्षेत्र से बाहर।”
जो दिव्य प्रकाश जन्म ले रहा है वह यदि तेज हो जाय, यदि उन व्यक्तियों की संख्या जो अपने अन्दर और जगत में इस अतिमानसिक अवतरण को चरितार्थ करना चाहते है बढ़ जाय तथा वे श्रेष्ठ मार्ग के अधिकाधिक निकट पहुँचने लगें तो वह परम आत्मा मनुष्य की आत्मा में तथा उन महान व्यक्तियों में जिनमें प्रकाश और शक्ति अत्यधिक मात्रा में है अधिक पूर्ण रूप से उतरेगी। तब वह परिवर्तन शीघ्र चरितार्थ हो जायगा, जो नवयुग की आधारशिला बनेगा।
ऋषि श्रेष्ठ स्वामी विवेकानन्द ने जो कुछ प्राप्त किया और जिसे अभिवर्धित करने का प्रयत्न किया वह अभी तक मूर्त नहीं हुआ। महायोगी कहते है कि “अब अधिक उन्मुक्त ईश्वरीय प्रकाश के अवतरण की तैयारी हो रही है। अधिक ठोस शक्ति प्रकट होने को है। प्रत्येक घड़ी प्रत्येक पल प्रत्येक क्षण इसे अति निकट ला रहा है। शीघ्र ही परम सत्ता, शाश्वत चेतना का कार्य सिद्ध होगा। शीघ्र ही नया युग उज्ज्वल संभावनाओं को लेकर आएगा।
अपने महाकाव्य सावित्री (पर्व 11 सर्ग 1) में महर्षि लिखते है कि अति मानस ही एक प्रकाश को लिए सारी जगती को अधिकृत कर लेगा॥ मुग्ध बने अन्तर को “ईश” प्रेम से, अपने को पुलकित, सिहरित कर देगा और प्रकृति के उस उन्नतमय शीर्ष पर प्रकाश के किरण को पहनायेगा। उसकी अकम्प सुदृढ़ नीव पर जा कर प्रकाश के शासन को स्थित कर देगा।
सिकन्दर ने अपने जीवन में विपुल सम्पदा एकत्रित की थी। मरने लगा तो उसने अपना सारा खजाना आँखों के सामने खुलवा कर रखा। दरबारियों से कहा ऐसा प्रबन्ध करो कि यह सब इसी रूप में मेरे साथ परलोक जा सके?
बहुत सोचने पर भी ऐसा कोई उपाय न निकल सका तब सिकन्दर ने अपने जनाजे में दोनों हाथ खुले हुए बाहर रखे जाने की व्यवस्था को ताकि लोग समझ सकें कि मनुष्य खाली हाथ ही आता है और उसे खाली हाथ ही जाना पड़ता है।
शिक्षा यह थी कि कोई अनावश्यक संचय के लिए पाप कर्म न करें। जितना समय अनावश्यक संग्रह के लिए लगाया जाता है उतना यदि सत्कर्म में लगाया जा सके तो उससे लोक और परलोक दोनों ही बनते है।
योगवाशिष्ठ में महर्षि वशिष्ठ ने राम को उपदिष्ट करते हुए कहा है कि-मनुष्य से श्रेष्ठ इस संसार में दूसरा कोई अन्य प्राणी नहीं है। निश्चित ही यह वरीसता मानव को उसकी दैहिक विशिष्टता के कारण कम अन्तराल की विशालता-विशिष्टता के कारण अधिक मिली है। करुणा, उदारता, साहसिकता, नैतिकता, सहृदयता, स्नेह-सौजन्य आदि सद्गुणों से ओत-प्रोत मानवी अन्तःकरण अवसर पाकर प्रस्फुटित होता और अन्यायों को अपने भाव तरंगों से आप्लावित-आच्छादित करता रहता है। इतर प्राणियों में इसके दर्शन नहीं होते। उच्चस्तरीय विचारणाओं-भावनाओं को गुण, कर्म, स्वभाव में समाहित करने तथा उन्हें व्यवहार के माध्यम ये प्रकट कर सकने की क्षमता मनुष्य में ही है। सृष्टा के विश्व उद्यान को अधिकाधिक सुन्दर समुन्नत बनाने में केवल वही सक्षम है। इसलिए मनुष्य को ईश्वर का वरिष्ठ राजकुमार कहा और धरती पर उसका उत्तराधिकारी माना गया हैं।
मनुष्य जन्म की श्रेष्ठता को प्रायः सभी धर्मों में मनीषियों ने एक मत से स्वीकारा है। सुप्रसिद्ध मानवता वादी विचारक कोरलिस लेमोण्ट ने अपनी पुस्तक ‘‘हयूमैनिज्म ऐजएफिलसफी” में कहा है -विश्व में आश्चर्य अनेक हैं, उनमें सबसे बड़ा आश्चर्य मनुष्य हैं प्रकृति की उससे महान कृति इस संसार में दूसरी नहीं। लेमोण्ट का यह कथन वस्तुतः ऋषि प्रणीत उस दार्शनिक प्रतिपादन की ही पुष्टि करता है जिसमें कहा गया है मनुष्य सृष्टा की सुकृति है, एक अनुपम अद्वितीय संरचना है जिसके अंतराल में महान संभावनाओं के बीज सूक्ष्म रूप में विद्यमान हैं। ऐतरेय उपनिषद् (213) में जहाँ मानव अपने रचनाकार की -विश्व शक्ति की सुकृति है वहीं शतपथ ब्राह्मण 2-5-111 में उसे नारायण के समीप बताया गया है। ऋषि प्रणीत आर्ष ग्रंथों की तरह बाइबिल के जेनेसिस 213, 61291, 512 से 716 में मनुष्य जन्म की विशिष्टता अद्वितीयता का विस्तृत वर्णन मिलता है। इसी तरह कुरान के सूरा 2 व 35135 में स्पष्ट किया गया है कि मनुष्य पृथ्वी पर अल्लाह का प्रतिनिधि है। इसी धर्म ग्रंथ के सूरा 15/7, 67/3, एवं 80/16 में कहा गया है कि अल्लाह ने मनुष्य को सर्वश्रेष्ठ आकार प्रदान किया है। तात्पर्य यह कि अपने सृष्टा को मस्त विभूतियाँ- सूक्ष्मशक्तियाँ बीज रूप में प्रत्येक व्यक्ति में अन्तर्निहित है। इस तथ्य को यदि हृदयंगम किया और उन्हें जाग्रत करने का पुरुषार्थ किया जा सके तो निश्चित ही मनुष्य श्रेष्ठ है।
मूर्धन्य मनीषी पू गोपीनाथ कवि राज ने अपने एक शोध निबन्ध “मनुष्यत्व” में इसी तथ्य को प्रति पादित किया है कि प्राचीन ऋषि प्रणीत शास्त्रों में ही नहीं अन्याय देशों के धर्म शास्त्रों में भी इतर-प्राणियों को जीव देह की अपेक्षा मानव देह को अधिक उत्कृष्ट माना गया है। आचार्य शंकर ने मनुष्यत्व मुमुक्षुत्व एवं महापुरुष संश्रय को अपनी कृति “विवेकचूड़ामणि” में अति दुर्लभ बताते हुए मनुष्यत्व को प्रथम स्थान प्रदान किया है।
जैन धर्म में भी मनुष्य जन्म की महत्ता का वर्णन आता है। उनकी मान्यता है कि यह शुभ का लक्षण है क्योंकि इसका उदय शुभ की सिद्धि के लिए हैं इस विषय में भगवान महावीर उत्तराध्ययन सूत्र 3/6 में कहते है कि जब अशुभ कर्मों का विनाश होता है, तभी आत्मा शुद्ध निर्मल ओर पवित्र करती है और प्राणी मनुष्य योनि को प्राप्त होता है इसी ग्रंथ के एक अन्य सूत्र 10/5 में तीर्थंकर महावीर कहते हैं संसारी जीवों को मनुष्य का जन्म चिरकाल तक इधर उधर भटकने के पश्चात् बड़ी कठिनाई से प्राप्त होता है वह उपलब्धता सहज नहीं हैं। बौद्ध धर्म में इसी तथ्य को प्रति पादित करते हुए कहा गया है कि मानव रूप प्राप्त होने पर सत्य ज्ञान की प्राप्ति हो सकती है। बुद्धत्व कर प्राप्ति इसी शरीर में संभव है। नैतिक, बौद्धिक एवं आध्यात्मिक विकास करते हुए निर्वाण स्थिति तक पहुँचना इसी शरीर में संभव है, किसी श्रद्धालु को यह सहज स्वीकार्य भले ही हो, किन्तु सत्यान्वेषी बुद्धि उसे तब तक किंचित मात्र भी स्वीकार न करेगी जब तक उसे क्यों का प्रत्युत्तर तर्क, तथ्य व प्रमाण सम्मत न प्राप्त हो। यह प्राप्ति आवश्यक भी है अन्यथा उपरोक्त स्वीकारोक्ति अंधश्रद्धा मात्र बन कर रह जायेगी।
इस क्यों का विश्लेषणात्मक विवेचन प्रस्तुत करते हुए महर्षि अरविंद अपनी अनुपम कृति “द लाइफ डिवाइन” में कहते है कि जीवन एक सार्वभौमिक शक्ति का रूप एक गतिशील प्रेक्षण है। यह उस परम चेतना की सतत क्रिया अथवा क्रीड़ा–कल्लोल है जो विभिन्न रूपों में क्रियाशील दिखती है।
यह प्रक्रिया मनुष्य सहित समस्त मानवेत्तर प्राणियों में समान रूप से गतिमान है। यही कारण है कि सभी जीव नवीन रूप धारण करते हैं। जीवन की निरन्तरता समाप्त नहीं होती। अव्यक्त, अव्यस्थित, मौलिक, निवर्तित अथवा विवर्तित जीवन सर्वत्र है। केवल उसके रूपों एवं व्यवस्थाओं में भिन्नता है। इस दृष्टि से सभी में जन्म, यौवन, वार्धक्य एवं मरण आदि अवस्थाएँ एवं उत्तेजनाओं के प्रति प्रतिक्रिया ही परिलक्षित होती है। परन्तु चेतनात्मक विकास की दृष्टि ये मनुष्य वरिष्ठ ठहरता है। उसका मानसिक विकास, संकल्प शक्ति की अद्भुत सामर्थ्य सम्पन्नता, ज्ञान-विज्ञान को जन्म दे सकने वाली विवेक बुद्धि-प्रज्ञा ऐसी विशिष्टताएं हैं जो इतर प्राणियों में किंचित मात्र भी नहीं देखी जाती। यह श्रेष्ठता ही मनुष्य को अन्यायों से अलग कोटि में रखती है। श्री अरविंद के अनुसार शक्ति की अभिव्यक्ति की उच्चता के अनुरूप मानव में समूचा संगठन भी उच्चतम कोटि का विनिर्मित हुआ है। शारीरिक संरचना, स्नायु संस्थान की एवं अंतःस्रावी विशिष्टताएं प्राणिक संघटन, मानसिक क्रिया विज्ञान, सूक्ष्म भाव संस्थान आदि अपने आप में अनेकों विशेषताएँ लिए हुए है।
जड़ पदार्थ में जीवन अचेतन रूप से क्रियाशील चेतना शक्ति के रूप में संगठित हुआ है। इस प्रक्रिया की त्रिविध अवस्थाएँ हैं - जड़ जीवन, प्राणात्मक जीवन और मानसिक जीवन। इसे अवचेतन, चेतन व आत्म चेतन के रूप में भी वर्णित किया जा सकता है। निम्नतम वह है-जिसमें स्पन्दन अभी भी जड़ की निद्रा में पूर्णतया अवचेतन है और पूर्णतया यंत्रवत प्रतीत होता हों। उदाहरणार्थ परमाणविक संरचना में इलेक्ट्रान प्रोटोन आदि कणों की गति। मध्यम स्थिति वह है जिसमें वह एक प्रतिक्रिया के योग्य हो जाता है जो अब भी अधिमानसिक है परन्तु उसकी सीमा पर है जिसको हम चेतना कहते हैं। विभिन्न पादपों एवं कनिष्ठ मनुष्येत्तर प्राणियों में इस के विविध स्तर दृश्यमान होते हैं। सर्वोच्च स्तर में जीवन मानसिक प्रत्यक्ष क योग संवेदन के रूप में चेतन मानसिकता का विकास करता है जो इन्द्रिय, मन, बुद्धि के विकास का आधार बनता है।
इस तरह जीवन त्रिविध अवस्थाओं में से हो गुजर कर गतिमान होता है। अपने प्रारम्भिक स्तर में वह एक विभाजित और अवचेतन संकल्प है। मध्य में मृत्यु, इच्छा, एवं सामर्थ्य हीनता जो कि वातावरण के अनुरूप आत्मा के विस्तार, अधिकार तथा नियंत्रण की ओर अस्तित्व के लिए संघर्ष को प्रेरित करता है। यह पशुओं में पाई जाने वाली उसी स्थिति का वर्णन है जिसका वर्णन डार्विन ने किया है। किन्तु यह मध्यवर्ती स्थिति मात्र है, जिसे डार्विन समग्र मान बैठे इसके पश्चात् मानस का परिपक्व स्तर आता है जो मनुष्य की अपनी विशिष्टता है। जैसे जैसे मानव कस अतिमानस की और प्रगतिक्रम बढ़ता जाता है अर्थात् विचारणा भावना में गुण, कर्म, स्वभाव में उत्कृष्टता का समावेश होता जाता है। इसी अनुपात से आत्मरक्षा और संघर्ष की प्रवृत्तियाँ तिरोहित होती चली जाती हैं उनका स्थान प्रेम, सहयोग और पारस्परिक सेवा सहायता जैसी सद्प्रवृत्तियाँ लेती हैं। क्रमशः यह परिवर्तन अधिकाधिक परिष्कृत, सार्वभौमिक तथा आध्यात्मिक बनता जाता है और मानव को पूर्णता की मंजिल समीप दीखने लगती है। मानवेत्तर जीवों में इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती है।
डार्विन के संघर्ष का प्रयत्न मध्यवर्ती स्थिति में है न कि सर्वोच्च स्थिति में। मनुष्य इस मध्यवर्ती स्थिति को पार कर चुका है और उस स्थिति में आ गया है जहाँ संघर्ष नहीं सहयोग की भावना प्रबल होती है। जड़ से जीवन श्रेष्ठ है और उससे भी उच्चस्तरीय मानस की परिपक्व अवस्था प्राप्त मानवी चेतना श्रेष्ठ है। जिन्हें अपनी गौरव गरिमा का ज्ञान नहीं है अथवा जिनकी मानसिक चेतना विकसित नहीं हुई है, उनके लिए शास्त्रोक्त वचन-”मनुष्य रूपेण मृगाश्चरन्ति “अर्थात् मनुष्य के रूप में पशु के विचरण करने का प्रतिपादन ही सटीक बैठता है।
मन तंत्र की प्रधानता-परिपक्वता ही वह आधार है जिसके द्वारा अतिमानसिक स्तर तक मनुष्य अपना विकास कर सकता है। तुच्छता से महानता की ओर अग्रसर हो सकता है। चेतना के निम्नस्तर स्तरों से उच्चतम आयामों की और आरोहण कर सकने की योग्यता क कारण ही उसे सृष्टि का मुकुटमणि कहा गया है। चीन के महान दार्शनिक कन्फ्यूशियस के शब्दों में मानव इस विश्व का सूत्र है। यदि समाधान कर लिया जाय। तो वहीं सर्वश्रेष्ठ स्थिति होगी। उनके अनुसार मनुष्य ईश्वर से तनिक ही नीचे हे। पाश्चात्य चिन्तक पास्कल ने अपना अभिमत प्रकट करते हुए कहा है कि सृष्टि में मानव जीवन सर्वोत्तम इसलिए माना गया है कि वह मनचाही दिशा में अपना विकास कर सकता है ख्यातिलब्ध दार्शनिक एल्डुअस हक्सले अपने ग्रंथ- “द पेरीनियल फिलासफी” में उपरोक्त तथ्य स सहमति व्यक्त करते हुए बताते है कि मानव की इसी प्रधानता तथा आदर प्रदान किया जाता रहा है। अमरीकी समाज शास्त्री अर्नेस्ट कैकसरर ने अपनी कृति ऐन ऐसे ऑन मैन में कहा है कि ईश्वर ने मानव को अपने ही प्रति रूप में बनाया है वह अपनी विकास यात्रा पूर्ण करके उसके समरूप हो सकता है।
हजरत उमर का नौकर उनके सोते समय पंखा झला करता था। एक दिन पंखा झलते झलते नौकर को नींद आ गई हजरत की आँख खुली तो वे सोते हुए नौकर पर पंखा झलने लगे।
उनके मित्र ने जब यह दृश्य देखा तो अचंभा करने लगे। हजरत ने कहा-सोने वाला पंखे का हकदार हैं। नौकर सो गया तो मेरा फर्ज है कि उसकी हवा करूं।
सूर्य भगवान नित्य नियमित रूप में संसार को प्रकाश और ताप देने के लिए परिभ्रमण किया करते थे।
एक दिन उनका मन अपनी आलोचना सुनने का हुआ। संयोगवश कुछ दोष ढूंढ़ने वाले ही सामने आये। एक कह रहा था कि सूर्य कितना अभागा है जिसे एक दिन की भी छुट्टी नहीं मिलती। दूसरा कह रहा था कि इसने पूर्व जन्म में कुछ ऐसे कर्म किये है जिसके कारण सवेरे जन्म और शाम को मरण होता है। तीसरा कह रहा था कि यह आग का गोला है जो न किसी के पास जा सकता है और न किसी को अपने पास बुला सकता है।
इन कटु आलोचनाओं से सूर्य को बहुत बुरा लगा और वे कोने में उदास होकर जा बैठे। पत्नी को कारण मालूम हुआ तो हंसते हुए कहा-छोटा कंकड़ कच्चे पड़े घड़े को फोड़ देता है पर वह जब समुद्र में गिरता है तो डूब जाता है। आप तो समुद्र हो कंकड़ जैसी आलोचनाएँ आपका क्या बिगाड़ सकती है। इस पर ध्यान न दें और अपने महान कार्य में नियम पूर्वक निरत रहें।
इन कटु आलोचनाओं से सूर्य को बहुत बुरा लगा और वे कोने में उदास होकर जा बैठे। पत्नी को कारण मालूम हुआ तो हंसते हुए कहा-छोटा कंकड़ कच्चे पड़े घड़े को फोड़ देता है पर वह जब समुद्र में गिरता है तो डूब जाता है। आप तो समुद्र हो कंकड़ जैसी आलोचनाएँ आपका क्या बिगाड़ सकती है। इस पर ध्यान न दें और अपने महान कार्य में नियम पूर्वक निरत रहें।
एक सेठ सेठानी बड़े सम्पन्न थे उनके एक ही पुत्र था। संयोगवश ऐसा हुआ कि सेठ सेठानी की एक साथ मृत्यु हो गई। बालक छोटा था, सम्पदा बहुत थी। पुराने जमाने की बात है संरक्षक ही देख भाल करते थे और इच्छानुसार अमानत में से अधिकाँश हड़प भी जाते। इस आशंका से सेठ ने बालक के गले में एक हीरे का कंठा बाँध दिया ताकि बड़ा होने पर उसे देखे समझे और अपना कोई व्यवसाय कर सके। बालक की संपत्ति संरक्षकों ने हड़प ली। यहाँ तक कि रोटी के लाले भी पड़ गये। बालक भीख माँग कर गुजारा करने लगा। इसी प्रकार कई वर्ष बीत गये। बच्चे की उम्र चौदह वर्ष के करीब हो गई
एक दिन उसने कहीं टँगे हुए बड़े दर्पण में अपना मुँह देखा, गले में कइ का चमकते पाया उसे हीरे को संबंध में कुछ सुनने को मिल गया था, अनुमान लगाया कदाचित यह हीरे का कंठा हो सकता हैं। उसे माँ बाप ने चतुरता पूर्वक बाँधा हो। घर आकर उसने वह कंठा उतारा उसके सभी दाने साफ करके छिपा कर रख लिये। एक दाने को लेकर वह जौहरियों की दुकानों पर लगवाता फिरा। एक जगह उसे एक लाख रुपये मिलें।
उस राशि से उसने अपना छोटा व्यवसाय आरंभ किया, चलने लगा तो उसे बढ़ाता रहा और हीरे बेच-बेच कर उस पूँजी को व्यवसाय में लगाता रहा। कुछ ही समय में वह उस नगर का धनी मानी सेठ बन गया। बाप की चतुरतापूर्वक दी गई सम्पदा उसके काम आई।
भगवान ने हर किसी को उसे सेठ बालक जैसी स्थिति का बना कर भेजा है। गुण, कर्म, स्वभाव, की उत्कृष्टता ही वह राशि है जिसे भुना कर कोई भी सुविकसित समुन्नत एवं संस्कृत बन सकता है। जब तक इस पूँजी का ज्ञान न हो तब तक उसे भिखारी बन कर दर दर भटकना पड़ता है। पर जब आत्म-बोध हो जाता है, अपनी शक्तियों का सदुपयोग बन पड़ता है तो किसी बात की कमी नहीं रहती।
सामान्यतया चेतना हर जीवधारी में होती है, पर उनमें उसका स्तर इतना निम्न होता है कि वे बस अपना जीवन संकट ही किसी प्रकार खींचते चलाते रह पाते हैं। सामान्य स्थिति में मनुष्यों में भी इसका स्तर कोई बहुत ऊँचा नहीं होता। उतना ही होता है, जिससे कि वह जीवन की आवश्यकताओं, समस्याओं व कठिनाइयों का किसी प्रकार हल निकाल सके। इस स्थिति में इससे अधिक वह और कुछ नहीं कर पाता, किन्तु इसी चेतना को जब परिष्कृत और परिमार्जित कर लिया जाता है, तो स्वयं वह इतना सशक्त और समर्थ बन जाती है, जिसे बन्दूक में भरी बारूद कहा जा सके। फिर उसे जिस भी दिशा में लक्ष्य कर छोड़ा जाता है, वहीं सफलता हस्तगत करती है।
वस्तुतः चेतना हे क्या? बोलचाल की भाषा, दर्शन एवं मनोविज्ञान में इसका प्रयोग भिन्न-भिन्न प्रकार से होता है। अंग्रेज दार्शनिक लाँक ने मानवी सूझबूझ नामक निबन्ध में अपना अभिमत व्यक्त करते हुए मानवी मस्तिष्क से गुजरने वाली घटनाओं के बोध को चूतना नाम दिया है और कहा है कि बोधगम्यता विचारणा, आकांक्षा, विवेक, शीलता, जैसी मानसिक अवस्थाओं को समयानुरूप अनुभव करने की क्षमता चेतना सत्ता ही रखती है।
वेब्स्टर ने इसे इंद्रियों का बोध और मस्तिष्क की कार्य प्रणाली को समझने की क्षमता रखने वाला तंत्र बताया है। हेलेक का कहना है कि चेतना की कोई परिभाषा नहीं दी जा सकती और न इसे किसी वैज्ञानिक प्रयोग शाला में ही सिद्ध किया जा सकता है। जबकि मौड्सले की अवधारणा है कि मनःसंस्थान की क्रिया प्रणाली पूर्णतः स्वतंत्र नहीं है। इसमें 10 प्रतिशत हस्तक्षेप ख्तना का रहता है। सर थामस रीड ने तो इस मनोदशा की भाँहत ही अनुभवशील बताया है और कहा है कि उसी की तरह यह परिवर्तनशील भी होती है। शरीर विज्ञानियों द्वारा किये गये परीक्षणों से ज्ञात हुआ है कि मनुष्य की स्वादेन्द्रिय इतना अधिक संवेदनशील होती है कि कुचला सत्व (स्ट्रिक्नीन) का एक भाग यदि 10 लाख भाग पानी के साथ मिला दिया जाय, तो भी वह उसका स्वाद सुगमता पूर्वक अनुभव कर लेती है। इसी प्रकार कान की श्रवण सीमा 10 से 20 हजार हर्ट्ज होती है, जबकि दृष्टि सीमा का निम्न स्तर 850 खरब और उच्चतम स्तर 650 खरब सेकेण्ड है। स्थूल अंगों की क्षमता के रूप में यह तो चेतना के एक छोटे से स्वरूप की दर्शन झाँकी हुई। इसकी सीमा भी अपरिमित होती है। जहाँ पर स्थूल इन्द्रियाँ कसम करना बन्द कर देती हैं, वहीं से चूतना के परिष्कृत विकसित स्वरूप का प्रारंभ होता है, इसे परिमार्जित कैसे किया? जाय इसके लिए अध्यात्म विज्ञान में योग साधनाओं का निर्धारणा है जिनके माध्यम से व्यष्टि चेतना का प्रखर परिष्कृत बनाया जाता है।
जर्मनी के जीव विज्ञानी अर्नेस्ट हैनरिक हेकेल ने चेतना को दो स्तरों में विभक्त किया है - एक पाशविक और दूसरी मानवी। दोनों में अन्तर स्पष्ट करते हुए हैकेल ने बताया है कि पाशविक चेतना को अन्य किसी दूसरे प्राणी में हस्ताँतरित करने की बात तो दूर जानवर स्वयं भी उसे समझने में सक्षम नहीं है। पाशविक चेतना शरीर प्रधान होती है, अतः उसे इन्स्टिंक्ट कहते हैं। जब कि मानवी चेतना मन प्रधान होने के कारण रीजन (विवेक) कहलाती है।
मूर्धन्य शरीर शास्त्री प्रो एल्स गेट्स के अनुसार सामान्य मनुष्य में मस्तिष्क की 10 प्रतिशत चेतन शक्ति अवचेतन रूप में दबी पड़ी रहती है। मात्र 10 प्रतिशत से ही जीवन व्यापार चलता है। यदि चेतना के इस बड़े भाग का भी किसी प्रकार उन्नयन-जागरण संभव हो सका, तो बहुत सारे ऐसे कार्य किये जा सकेंगे, जो समाज और संसार के लिए प्रगति का द्वार खोल सकें।
प्रख्यात गणितज्ञ डब्ल्यू. आर. हेमिल्टन एक बार अपनी पत्नी के साथ डबलिन वेधशाला घूमने को गये। इसी बीच अचानक उनके मस्तिष्क में एक ऐसी स्फुरणा हुई जिसके फलस्वरूप क्वाटर-नियन का प्रसिद्ध सिद्धान्त संसार को मिला जिसे आज गणित क्षेत्र में महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है। वस्तुतः यह चेतना की परिष्कृति का ही परिणाम है। जब यह सिलसिला चल पड़ता है, तो मस्तिष्क में ऐसे नये-नये तथ्य अनायास कौंध पड़ते हैं जिनकी पहले कल्पना तक नहीं की गई थी। प्रखर प्राण चेतना एक दिव्य अनुदान है जिसकी प्राप्ति हेतु किया गया पुरुषार्थ निश्चित ही फलित होता है।
परम पुरुष की प्राप्ति हेतु साधना उपासना के क्षेत्र में समर्पण का महत्व असाधारण है। निज के पुरुषार्थ के सहारे एक सीमा तक ही बढ़ना सम्भव है। निज के पुरुषार्थ के साथ अनुदानों का भी महत्व है। व्यवहारिक जगत में भी प्रगति हेतु जितना प्रयत्न स्वयं को करना पड़ता है उससे कहीं अधिक अनुकूलताएँ सुविधाएं सृष्टा ने प्रदत्त की हैं। यदि ये भी बनाये रखना कठिन ही नहीं, अपितु असंभव भी था। प्राण, वायु, सूर्य का प्रकाश, ताप इत्यादि मनुष्य विनिर्मित नहीं अपितु परम सत्ता का अनुदान ही हैं। पृथ्वी और उसमें भरी खनिज सम्पदा के बारे में भी यही बात है। जल तो मनुष्य के जीवन का आधार है। इस सम्पदा को जुटाने का श्रेय भी सृष्टा को ही है।
प्रयत्न पुरुषार्थ का अपना महत्व है और बाहरी अनुदान का अपना। यदि बाहरी सहयोग न हो तो प्रगति पथ पर आगे बढ़ सकना सम्भव नहीं होगा। बच्चे का विकास माता के अनुदान से ही सम्भव होता है। ऐसा न होने के विकास कर सकना सम्भव न हो सकेगा।
ऐसे अनेकों अनुदान हैं, जो लोग सभी को मिलते हैं उन्हें पाकर अपने-अपने प्रयत्न पुरुषार्थ के अनुरूप लोग सफलता अर्जित करते है। आत्मिकी क क्षेत्र में भी भौतिक जगत की तरह पुरुषार्थ का परिचय देना पड़ता है। आत्म परिष्कार हेतु सुयश, तप, तितिक्षा आदि शारीरिक मानसिक उपचार करने पड़ते हैं। आत्मिक प्रगति का आधार इन्हीं से विनिर्मित होता है। पर इन सबसे अधिक आवश्यक है, दैवी अनुग्रह की प्राप्ति। परिष्कृत अन्तराल में परमात्मा चेतना के अवतरण के बिना साधना के लक्ष्य की प्राप्ति नहीं होती है। इसके लिए समर्पण योग की साधना की आवश्यकता है।
समर्पण के भाव को रामकृष्ण ने रूपक की भाषा में बिल्ली के बच्चे की पद्धति कहा है। इसका तात्पर्य है, मन प्राण, बुद्धि का अन्त समर्पण। इसमें बाह्य समर्पण का भी समावेश है। जैसे जो चीजें साधना का विरोध करती हैं उनका त्याग करना। इस समर्पण प्रक्रिया का सारतत्त्व भगवान पर विश्वास और भरोसा साधक का यह भाव होना चाहिए कि मैं भगवान को चाहता हूँ अन्य किसी को नहीं। मैं अपने को पूर्णतया भगवान को ही देना चाहता हूँ और चूँकि मेरी अन्तरात्मा भगवान को ही पाना चाहती है, इसलिए में उनसे अवश्य मिलूँगा और प्राप्त करूंगा। इस भाव को अपने अन्दर बढ़ने देना चाहिए। इस तरह समर्पण की पूर्णता से भगवत चेतना का अवतरण मनुष्य के परिष्कृत अन्तराल में बन पड़ता है।
गीताकार ने भी “तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत सर्वधर्मान् परित्यज्यमामेकं शरणं ब्रज” आदि बातें कह कर समर्पण की प्रधानता उपदिष्ट की हैं।
इस प्रकार के शरणागति के आमंत्रणों में भगवान इतना ही कहते हैं कि अपनी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं को अहम् को, ईश्वर को समर्पित कर दें। इसके बाद सही माने में समर्पण का जो लाभ मिलना चाहिए वह प्राप्त होता है। अनेकों प्रकार के अनुग्रह भक्त को प्राप्त होते हैं। ईश्वर को समर्पण से तात्पर्य किसी व्यक्ति विशेष या सूक्ष्म शरीरधारी देवी देवताओं के साथ मित्रता बढ़ाने, से नहीं अपितु समष्टि चेतना के प्रति सर्वभाव से समर्पित होना है। दूसरे शब्दों में इसका अभिप्राय व्यष्टि का समष्टि में क्षुद्रता का महानता में विसर्जन करना है।
इसके चमत्कारी परिणाम सब जगह दृष्टि गोचर होते बट वृक्ष के बीज की सत्ता नगण्य ही होती है। पर ज वह अपनी क्षुद्रता के अहम् को त्याग पृथ्वी की विराटता में समर्पित हो जाता है तो उसमें नव जीवन अंकुरित होने लगता है। सूर्य कि किरणें, पवन, मेघ सभी का सहयोग दुलार उसे प्राप्त होता है। शनैः शनैः विकास करता हुआ विशाल वट वृक्ष के रूप में परिणत हो जाता है। जिसकी छाया में सैकड़ों जीव जन्तु विश्राम करते, पोषण प्राप्त करते और धूप, वर्षा से राहत पाते है। अपनी छोटी सी सामर्थ्य की गंगा में विसर्जित कर देने वाले नदी नाले भी वैसा ही सम्मान पाते और श्रद्धास्पद होते जैसा कि गंगा। मात्र उन्हें समर्पित होने का साहस अपने में पैदा करना होता है।
समर्पण का यथार्थ अभिप्राय अपनी सत्ता के विलय-विसर्जन से है। आग में पड़ने पर बबूल, आम, चन्दन सभी एक सा स्वरूप प्राप्त करते अर्थात् अग्नि मय हो जाते है। इसमें ये सब अपने गुणों को छोड़कर अग्नि के गुण प्राप्त करते, धारण करते है। भक्त को समर्पण के लिए भगवान जैसा, ही बनना होता हे। अपने व्यक्तित्व को उन्हीं गुणों से अलंकृत करना होता है जो परमात्मा में है। समर्पण वह प्रखर पराक्रम है जिसमें अपनी क्षुद्रता, संकीर्णता, स्वार्थपरता को पूरी तरह से त्याग कर परम सत्ता की दिव्यता, महानता से एक हो जाना पड़ता है। समर्पण का अर्थ निष्क्रियता नहीं है अपितु वासना, अहंकार का त्याग कर, फलासक्ति से रहित हो, अहंभाव से सर्वथा शून्य हो कर भगवान का कार्य भगवान के हाथ का यंत्र बन कर, भगवानमय होकर उन्हीं के लिए करना है। समर्पित व्यक्ति की कसौटी यही है कि वह अपनी स्वार्थ की संकीर्णता से ऊपर उठकर सदुद्देश्यों के लिए अपने शरीर और मन को लगाए। उसकी क्रियाशीलता, विचारणा, और निर्मल अन्तःकरण की उदारता व्यक्तिगत स्वार्थ में नहीं परमार्थ में नियोजित होगी।
भक्त की निष्ठा समर्पण से ही जानी जा सकती है। महाराष्ट्र के सुप्रसिद्ध सन्त तुकाराम ने अपने एक अभंग में बताया है कि समर्पण होने पर जीव अपनी अहंता से छुटकारा पा लेता है। उसके शरीर मन, बुद्धि, अन्तःकरण की विशेषताएं उच्चस्तरीय प्रयोजन में नियोजित हो जाती है। इस हेतु अपने अन्तराल में इस भावना को पुष्ट करना पड़ता है कि वह बूँद की तरह है इष्ट सागर की तरह। उनके प्रति प्रेम से भावित हो, द्वैत को समाप्त कर, अद्वैत, एकत्व की प्राप्ति के लिए अपनी सत्ता का अभिमान न रखकर उसे पूरी तरह से विलय करना होता है। विलय के पश्चात् जिस तरह बूँद-बूँद न रहकर सागर का स्वरूप प्राप्त करती है, ठीक उसी तरह से भक्त अपनी अहंता-ममता को मिटा कर जीव सत्ता के व्यष्टि अभिमान से ऊपर उठकर परमात्म सत्ता में विकसित होता है। उनसे एकाकार हो जाने पर उसका स्वरूप भी उन्हीं जैसा हो जाता है।
,निःसन्देह परमसत्ता के प्रति पूर्ण समर्पण भक्त को तद्रूप बना देता है। उनके दिव्य अनुग्रह स्वतः ही उसे प्राप्त होने लगते है। सत्-चित्-आनन्द का अजस्र स्त्रोत उसके अन्तराल में फूट पड़ता है। इससे ने केवल उसे स्वयं को ही परितृप्ति मिलती है अपितु निकट आने वालों को भी आनन्द-वृद्धि की सुखानुभूति होती है। ऐसे व्यक्ति प्रेरणा का स्त्रोत एवं प्रकाश का केन्द्र बनते है। उनका निज का जीवन तो धन्य होता ही है। उनके निकट का परिकर भी धन्य हो जाती है।
चार महिलाएँ कुण्ड पर पानी भर रही थीं। उन चारों के एक एक पुत्र था। चारों अपने लड़कों की विशेषता बखान रहीं थी।
एक ने कहा मेरा बेटा बहुत सुँदर है। दूसरी ने अपने को बुद्धिमान कहा तीसरी ने बलवान कहा था। चौथी जब तक कुछ कहने वाली थी कि उसका लड़का स्कूल से आ गया। उसने चारों महिलाओं के चरण स्पर्श किये। और अपनी माता वाला पानी भरा पड़ा सिर पर रख कर चलने लगा चौथी ने इतना ही कहा मेरे बेटे में तो एक ही गुण है शालीनता। शेष महिलाएँ सोचने लगी यदि हमारे बेटों में अन्य विशेषताओं की अपेक्षा यदि मात्र शालीनता होती तो उतना भी बहुत था।
शैतान पर एक बार आवेश पड़ा कि सन्त बनाना चाहिए उसने बैरागी बनने की ठानी और अपना सारा मास असहाय हान कर दिया।
इस प्रयास के बीच उसे कुछ असमंजस .... उसने इकट्ठे किये माल में से एक छोटी डिब्बी उठा कर जेब में रख ली।
एक सन्त यह देख रहा था। जब सब काम समाप्त हो गया तो सन्त ने शैतान के कान में पूछा यह एक छोटी डिब्बी कैसी है? उसे आपने क्यों बचा लिया? क्या छिपा कर जेब में रख ली?
शैतान ने अपने मन की बात बताई और कहा कि मन में यह संदेह उठा क्योंकि यह सब माल न बिका तो फिर शैतानी करनी पड़ेगी। अपनी माया फिर फैलानी पड़ेगी। अपना समुदाय फिर खड़ा करना पड़ेगा। इसलिए इस डिब्बी में एक करामात छिपा कर रखी है जिसके प्रभाव से भले अच्छा आदमी को शैतानी के जाल में फँसाया जाये।
सन्त का आश्चर्य और भी बड़ा। उसने ध्यान किया ऐसी चीज क्या है जो मनुष्य को शैतानी के जाल में फँसाया जाये।
सन्त के उनके प्रश्न का उत्तर देते हुए शैतान ने उस डिब्बी को खोल कर दिखाया। उसमें जो वस्तु थी उसका नाम था आलस।
आलसी आदमी को निश्चय ही अनेक हड़प कर लेते हैं और शैतान के समुदाय में सम्मिलित हो जाता है।
प्रकृति का जो प्रवाह सुनियोजित क्रमबद्ध रूप से चलता रहता है, उसके विपरीत कभी अपवाद रूप में ऐसे घटनाक्रम घटते देखे जाते है, जिन्हें देखकर दाँतों तले उँगली दबानी पड़ती है। मनुष्य तो पौधा नहीं है, वह कोई भी करिश्मा अपनी जीवनी शक्ति के सहारे अथवा अचेतन को जगा कर मन शक्ति के माध्यम से दिखा सकता है। किन्तु यदि ऐसा ही कोई चमत्कार पेड़ पौधे करने लगें व यह करिश्मा प्रकृति के नियमों के विपरीत हो तो क्या कोई जवाब दे पाना वैज्ञानिकों के लिए संभव है? संयोग या अपवाद कहकर किसी घटना को सरलता से नकारा जा सकता है किन्तु जब ऐसे विलक्षण घटनाक्रम कई जगह दिखाई देने लगे तो समष्टिगत ब्राह्मी चेतना के अस्तित्व को स्वीकारना ही पड़ता है। वस्तुतः ऐसी घटनाएँ चुनौती है-उस खोज पूर्ण मस्तिष्क के लिए जिसने विज्ञान जगत के नये नये आविष्कार संपन्न कर दिखाये है।
सर जगदीश चन्द्र बसु ने अपनी पुस्तक “वनस्पतियों के स्वलेख” में वृक्षों से संबंधित अनेक विस्मयकारी घटनाओं का वर्णन किया है। उनने अपनी उक्त पुस्तक में फरीदपुर पू बंगाल के एक अद्भुत ताड़ वृक्ष का वर्णन किया है। यह पेड़ सबेरे अन्य सभी पेड़ों की भाँति जमीन पर सीधा खड़ा रहता, परन्तु शाम में आरती के समय जब मन्दिरों में घण्टे घड़ियाल बजने लगते, तो वह अपनी प्रकृति के विपरीत जमीन पर लेट कर प्रार्थना की मुद्रा में प्रार्थना करने लगता। यह उसका नियमित क्रम था और पूरे वर्ष बिना किसी व्यतिक्रम के चलना रहता। इस विचित्र घटना की जब चर्चा फैली, तो प्रतिदिन दूर दूर से लोग इस विलक्षण वृक्ष की प्रार्थना को देखने के लिए आने लगे, जिससे वहाँ एक प्रकार से मेला सा लगने लगा। समीप वर्ती लोगों का कहना था कि इस पेड़ के समझ मनौतियाँ मनाने अथवा भेंट चढ़ाने से मनोरथ पूरे होते एवं शारीरिक मानसिक रोग आश्चर्यजनक ढंग से दूर हो जाते थे।
यह तो सुना जाता है कि पशु-पक्षी स्नान पसंद होते है और अवसर आते ही जलाशयों में स्नान कर लेते है, पर अब तक यह नहीं देखा सुना गया है कि वृक्ष वनस्पति भी स्वयं को शुद्ध रखने के लिए ऐसा करते हों। ऐसा ही एक स्नान-पसंद ताड़ वृक्ष फरीदपुर में था जिसका उल्लेख श्री बसु ने अपनी उक्त पुस्तक में किया है। वह वहाँ एक सरोवर के तट पर लगा हुआ था और प्रतिदिन शाम के समय उसमें स्नान करता था। प्रत्यक्ष दर्शियों के अनुसार दिन भर वह पेड़ समग्र रूप से खड़ा रहता। उसमें कोई हलचल नहीं दिखाई पड़ती, पर जैसे ही संध्या होने को आती वह सरोवर के पवित्र जल में स्नान करने के लिए मचलने लगता। उसकी उस समय की तड़फड़ाहट लोगों को स्पष्ट दिखाई पड़ती। कई प्रयासों के बाद वह स्वयं को पत्तों समेत सरोवर के जल में डुबो लेता। कुछ समय तक जल में निमज्जित रहने के उपरांत जब उसकी स्नान-क्रिया समाप्त हो जाती, तो वह धीरे-धीर पुनः अपने को जल सतह से ऊपर कर लेता और अपनी पूर्व स्थिति में आ जाता। ऐसा कोन सा कारण था, जो उसे अपनी प्रकृति के विपरीत स्नान करने के लिए विवश करता था, ज्ञात न हो सका। उसकी इस प्रकृति के कारण लोग उसे “स्नान करने वाला ताड़” के नाम से पुकारने और उसकी नित्य पूजा-आरती करने लगे थे।
ऐसी बात नहीं, कि पेड़ों से संबंधित ऐसी विलक्षण घटनाएँ सिर्फ भारत में ही घटित हुई हो। अन्य कई देशों में ऐसे शुद्ध, पवित्र, धर्मप्रिय व प्रार्थनारत वृक्ष हुए है। लिवरपुल (इंग्लैण्ड) के ऐसे ही एक तरुवर का वर्णन करते हुए श्री बसु अपनी पुस्तक में लिखते है कि यह वृक्ष इंग्लैण्ड में तब बड़ी चर्चा का विषय बन गया था और तत्कालीन समय के प्राय सभी ब्रिटिश पत्रों ने इसका समाचार छापा था। प्रतिष्ठित पत्र “लिवरपुलमरकरी” ने आश्चर्यजनक घटना नामक शीर्षक से मुख पृष्ठ में सुर्खियों में यह समाचार पाथा कि लिवरपुल में शिप्टन के निकट एके छोटी नहीं बहती है। वहाँ एक विलो का पेड़ है, जो काफी मोटा और ऊँचा हे। विश्व के अन्य प्रार्थनारत पेड़ों से यह उस मामले में भिन्न था, कि वह यदा कदा ही प्रार्थना किया करता था। प्रार्थना का ढंग अन्यों की भाँति ही था। वह पूरी लम्बाई में दण्डवत, धरती पर लेट जाता और अभ्यर्थना पूरी होते ही पुनः सामान्य स्थिति में खड़ा हो जाता। एक अन्य विलक्षणता उसके साथ यह थी कि वह सदा प्रातः ही वन्दना करता।
ऐसी ही एक घटना दक्षिण अफ्रीका की है। “फरीदपुर का प्रार्थनारत ताड़ वृक्ष” शीर्षक अध्याय में श्री बसु इस का उल्लेख करते हुए लिखते है कि अफ्रीका के एक कृषक के खेत में नारियल के कुछ पेड़ लगे हु थे। एक बार ये समुद्री तूफान में पड़ कर एक और कुछ झुक से गये। तभी से इन वृक्षों को न जाने क्या हुआ कि वे प्रायः दिन−प्रतिदिन जमीन पर लेट कर संख्या-वन्दन करने लगे। दिन भर ये सीधे खड़े रहते और शाम होते ही प्रार्थना की मुद्रा में लेट जाते। उनके मालिक किसान का कहना था कि तूफान में पड़ कर वृक्षों को जो क्षति उठानी पड़ी, वैसी किसी आगामी क्षति से बचने के लिए ही संभवतः उन में यह बदलाव आया हो और उनकी वृति ऐसी हो गयी हो तब से उनकी “दैनिक प्रार्थना” का यह क्रम कभी नहीं टूटा।
ऐसे ही, फ्लोरिडा के समुद्र तटीय क्षेत्र में एक राइजोफोरा का पेड़ है। इसके बारे में कहा जाता है कि जब समुद्र में तेज ज्वार-भाटे आते है और इसके कारण जल जब उस वृक्ष के निकट पहुँचता है तो उसकी टहनियों में विलक्षण हलचल दिखाई पड़ने लगती है। शाखाएँ जल को दूने के प्रयास में बार-बार नीचे झुकती और ऊपर उठती है। यह क्रम तब तक जारी रहता है, जब तक शाखाएँ जल का स्पर्श न कर लें। जड़ पदार्थों में इस प्रकार की गतिविधियाँ विरले ही देखने को मिलती है। पौराणिक गाथा के अनुसार एक बार यमुना के जल ने इस प्रकार का कौतुक दिखाया था, और श्री कृष्ण के चरणों का स्पर्श पाने के बाद ही उसकी लहरें थमी और अप्रत्याशित रूप से जल स्तर घटता चला गया। पर राइजोफोरा के पत्र-पल्लव क्यों समुद्र-जल का स्पर्श करना चाहते है? यह आज तक नहीं जाना जा सका है।
यह तो तरुवर की धार्मिक प्रवृत्ति की चर्चा हुई, पर पेड़ को हर्ष और शोक की अनुभूति भी होती है और मनुष्यो की तरह वे इसका प्रदर्शन भी करते है, ऐसा कम ही देखने-सुनने को मिलता है। श्री बसु ने ऐसी ही एक घटना का वर्णन “आम्र वृक्ष का रुदन” नामक अध्याय में किया है। घटना कलकत्ता के एक उपनगर के एक आम्र वृक्ष की है। यह पूर्ण रूप से विकसित एक 40 फुट लम्बा पेड़ था। इसके तने की परिधि लगभग 37 इंच थी और पत्र-पल्लवों से लदी इसकी टहनियों का विस्तार करीब सौ वगै गज में था। यह प्रतिदिन अपराह्न 1 बजे से न जाने क्यों रोना आरंभ कर देता था? और मनुष्यों एवं पशुओं की ही भाँति उसके आँसू गिरने लगते थे। फिर शाम पाँच बजते-बजते उस के आँसू पूर्णतः थम जाते और उसका रुदन बन्द हो जाता। पता नहीं इस प्रकार रोकर वह किस दुख को अभिव्यक्त करना चाहता था।
अब मास्को विश्वविद्यालय के रूसी वनस्पति शास्त्रियों ने यह निर्विवाद रूप से सिद्ध कर दिखाया है कि पेड़-पौधे भी विलाप करते है। उनने लिल्ली के पौधों पर प्रयोग-परीक्षण किये। उनके जो आँसू निकले, जब उन्हें चख कर देख गया तो उनका सल बिलकुल मानवी आँसू के सदृश्य नमकीन था।
जो चेतना मनुष्यों व अन्य जीवधारियों में है, वही वृक्ष-वनस्पतियों में भी विद्यमान है। इसीलिए भगवान कृष्ण ने अश्वत्थ (पीपल) के अंदर स्वयं का वास होने की बात कही है। भारती संस्कृति में आम, बरगद, पीपल, शमी जैसे वृक्षों की पूजा की जाती है, उसके मूल में मनश्चेतना को स्वीकारने का दर्शन ही है। प्रकृति में परब्रह्म की चेतना के कण-कण में संव्याप्त होने की यथार्थता की ही झाँकी दिखाती है, ऐसी चमत्कारी घटनाएँ।
एक चिकित्सक अमोघ चिकित्सा के लिए प्रख्यात थे। वे स्वयम् भी निरोग रहते और असाध्य रोगियों तक को रोग मुक्त करते। दिन भर वे लकड़ी काटने का काम करते और जंगल में रहते थे।
एक दिन किसी असाध्य रोग से पीड़ित एक श्रीमान उन्हें खोजते हुए जंगल में पहुँचे। व्यथा सुनकर उन्होंने वहीं एक महीने के लिए सेवन योग्य दवा दी और कहा इसे अपने माथे के पसीने में गीली करके प्रातः सायं खाया करना।
पसीना निकालने में उस बड़ी मेहनत करनी पड़ती। इस आधार पर निठल्लापन दूर हुआ साथ ही रोग मुक्त होने का अवसर भी मिला।
वह श्रीमान बहुत दिन बाद चिकित्सक का उपकार जताने और कुछ भेंट देने फिर पहुंचे साथ ही उस औषधि का नाम बताने तथा बनाने का विधान समझाने का आग्रह किया, ताकि जरूरत पड़ने पर उसे स्वयम् ही बना लिया करें।
चिकित्सक ने समझाया। औषधि तो सूखी घास भर थी पर उसका अनुपान पसीने से मिलाना था। कड़ी मेहनत ही वह दवा है जिससे सभी रोग दूर हो सकते है। आलसी को ही सब रोग घेरते है।
आधुनिक तकनीकी युग में मनुष्य के बौद्धिक मानसिक स्तर का विकास तो हुआ है पर अन्तः चेतना की गई गुजरी स्थिति में रहने के कारण वह अनेकानेक समस्याओं में उलझा असहाय-अपंगों की तरह बेचैन दिखाई देता हैं मानवी अन्तराल में विपुल शक्तियों का भण्डार भरा पड़ा है। बुद्धि से भी ऊँची दिव्य चेतना की परतें उसमें विद्यमान है परन्तु संकल्पों की दुर्बलता अथवा बौद्धिक अहंता उन तक पहुँचने नहीं देती। आत्मानुभव करना एवं अति मानवी क्षमताओं का विकास तो दूर रहा वह सुख-शाँति से भी वंचित रह जाता है।
यद्यपि बुद्धि मन का परिष्कृत पक्ष है और उसकी जीवन में उपयोगिता भी सर्वाधिक है। बुद्धि के द्वारा ही समस्याओं और योजनाओं पर विचार किया और उनका समाधान ढूँढ़ा जाता है। वैज्ञानिक आविष्कारों का उद्गम भी यह बुद्धि संस्थान है। सामाजिक, राजनैतिक एवं अंतर्राष्ट्रीय समस्याओं के समाधान भी बुद्धि विवेचन के द्वारा ही संभव होते है। परन्तु इससे आगे की प्रगति की आशा बुद्धिवाद से नहीं की जा सकती। इसके लिए हमें प्रज्ञा का-भाव संवेदना मिश्रित विवेक बुद्धि का आश्रय लेना होगा। मनुष्य के उज्ज्वल भविष्य की कल्पना इसी आधार पर की जा सकती है।
अब वैज्ञानिक भी मानने लगे है कि मात्र बुद्धि की बौद्धिक चेतना के बल पर इस विश्व ब्रह्मांड के रहस्य को जाना समझा नहीं जा सकता और न ही इससे व्यक्ति की गुत्थियों का समाधान निकाला जा सकता है। सद्बुद्धि के बिना विश्व में चिरकालिक शाँति की स्थापना भी संभव नहीं। लौकिक बुद्धि में सत्य के साथ असत्य, सद् के साथ असद्, धर्म के साथ अधर्म की मलीनताएं भी धुली रहती है। ऐसी दशा में सत्य तक पहुँच पाना संभव नहीं। भारतीय तत्वदर्शी ऋषियों ने इस तथ्य को बहुत पहले जान लिया था और बुद्धि से भी ऊँची परत सद्बुद्धि की “प्रज्ञा” की विशिष्ट क्षमता का ज्ञान प्राप्त कर लिया था। मन, बुद्धि, चित्त से भी उच्च स्तरीय चेतना की परत ऋतम्भरा प्रज्ञा अन्तःकरण की दिव्य चेतना के अधिक समीप है। तत्वदर्शियों का कहना है कि तीर से बंधी हुई नाव की तरह जहाँ बुद्धि आगे न बढ़कर कुंठित हो जाती है, विचार भी अपने पैर पीछे हटाता हुआ जहाँ से दूर हट जाता है और तर्क भी जहाँ जाने का उत्साह नहीं करता, वहाँ प्रज्ञा की पहुंच है। सत्य का आत्मानुसंधान का कार्य इसी के द्वारा सम्पन्न होता है। यदि मानवी बुद्धि दीपक के समान मानी जाय तो प्रज्ञा की तुलना सूर्य से की जा सकती है जिन्हें यह प्राप्त हो जाती है वे तत्ववेत्ता ऋषि मूर्धन्यों में गिने जाते है। प्रज्ञा को ही “चैतन्याग्नि” कहा गया है। शास्त्रकारों का कथन है कि जिन्हें इस नीर−क्षीर विवेक बुद्धि की उपलब्धि हो जाती है वे चैतन्याग्निरूढ़ होकर द्यौलक गमन की क्षमता वाले हो जाते हैं। उनके लिए स्व-लोक का मार्ग ज्योतिर्मय और प्रकाशित हो जाता है। यही देवयान है।
वैयक्तिक मोक्ष से लेकर विश्व की उलझी हुई समस्त उलझनों को सुलझाने में तत्वदर्शी प्रज्ञा की शक्ति का प्रयोग आवश्यक मानते है। उनका कहना है कि बुद्धिमान मनुष्य भी जब दुर्बुद्धि ग्रस्तों जैसी विनाशलीला रचने का उद्यत हो जाता है तो स्पष्ट है कि बुद्धिवाद से स्थायी सुख शाँति की उपलब्धि नहीं हो सकती। पास्कल, किर्केगार्ड, हेनरी वर्सो, मार्टिन हेडेगर एवं हेनरी काल्डरवुड जैसे प्रख्यात दार्शनिक को ने एक स्वर से बुद्धिवाद की कटु आलोचना की है और कहा है कि अब यदि आगे भी बुद्धिवाद पर ही आश्रित रहा गया तो दुनिया का सर्वनाश सुनिश्चित है। इससे बचने का एक मात्र विकल्प सुझाते हुए इन्होंने कहा है कि मनुष्य सद्बुद्धि का आश्रय ग्रहण करके चेतना के उच्च धरातल पर पहुँच सकता है, भ्रांतियों पर विजय पर सकता है। धरती पर स्वर्ग का अवतरण एवं मनुष्य में देवत्व का उदय भी इसी आधार पर संभव है कि मानवी चेतना को मन, बुद्धि तक सीमित न रहने देकर प्रज्ञा के साथ जोड़ा जाय। व्यक्तित्व को उच्च स्तरीय, प्रखर एवं प्रचंड बनाया जाय।
यों तो मनुष्य ने अपनी बुद्धिमत्ता का पूर्ण उपयोग भौतिक उन्नति में किया है और उसके परिणाम भी सभ्य जीवन के रूप में प्राप्त किये है। प्रगति एवं समृद्धि के लिए यह आवश्यक भी था और भविष्य में भी रहेगा। परन्तु यह उन्नति आधी-अधूरी ही कही जायगी क्योंकि बौद्धिक चेतना का अधिकाँश उपयोग ऐसे कृत्यों एवं निर्माणों में किया है जिससे समस्त मानव सभ्यता के विनष्ट हो जाने की संभावना प्रत्यक्ष सामने खड़ी दीखती है। ऐसी स्थिति में बुद्धि की आलोचना करना स्वाभाविक ही है।
पाश्चात्य जगत के प्रख्यात मनीषी एवं चिकित्सा विशेषज्ञ अलेक्सिस कैरल का कहना है कि बुद्धिवाद के नाम पर आत्मोत्कर्ष के शाश्वत सिद्धान्तों की खिल्ली उड़ाकर मनुष्य ने अपने लिए विपत्ति ही अर्जित कर ली है। उनके मतानुसार विनाश के कगार पर खड़ी आधुनिक मानव सभ्यता को तभी बचाया जा सकता है जब उसकी विवेक बुद्धि का विकास हो। तकनीकी बुद्धि का विकास तो मनुष्य ने खूब कर लिया है पर अब उसमें वे नैतिकता चाहिए, आध्यात्मिक सामर्थ्य चाहिये जो विज्ञान से उत्पन्न शक्तियों को नियंत्रण में रख सके। उनका कहना है कि मैटर के साथ स्प्रिट को भी जानना होगा अर्थात् भौतिक उन्नति के साथ आत्मोन्नति की ओर भी ध्यान देना होगा और उन सद्गुणों को वापस लाना होगा जो धर्म के साथ विकसित हुए थे।
महर्षि अरविंद कोरी बुद्धि की भर्त्सना करते हुए कहते है कि मात्र बुद्धिमता ही सब कुछ नहीं है। अपनी प्रख्यात कृति “सावित्री महाकाव्य” में उन्होंने कहा है कि अगर बुद्धि ही सब कुछ होती तो फिर दिव्य आनन्द की आशा छोड़ देनी चाहिए, क्योंकि बुद्धि सत्य के शरीर का स्पर्श कभी भी नहीं कर सकती, न वह ईश्वर को-आत्मा को ही देख सकती है। बुद्धि की पहुँच केवल ईश्वर की छाया तक है, वह ईश्वर की हँसी नहीं सुन सकती” उनकी दृष्टि में यह मनुष्य की बौद्धिकता का ही कमाल है कि उसने भौतिक विकास की चरम अवस्था को छू लिया है और प्रकृति पर पूर्ण नियंत्रण की तैयारी में है, फिर भी आज वही बुद्धि उसके मार्ग की सबसे बड़ी बाधा बन गई है। आज वह अपने ही विनाश की तैयारी कर मरण के किनारे पहुँच गया है। आज जो भी अनैतिक आचरण बरता जा रहा है, वह बुद्धि से प्रेरित होकर ही किया जा रहा है। इन्हें न तो भाषणों-प्रवचनों के बल पर समाप्त किया जा सकता है और न प्रशासनिक तरीके से सुधारना संभव है। यदि बौद्धिक स्तर पर ही इनका निराकरण किया जाना संभव होता तो अब तक समस्त पाप अत्याचार दमन, युद्ध आदि इस विश्व से मिट गये होते, पर ऐसा संभव नहीं हुआ। श्री अरविन्द के अनुसार इसके उपचार का मात्र एक ही उपाय है कि मनुष्य बुद्धि के धरातल से ऊपर उठे और मन उच्चतर धरातल अतिमन को प्राप्त करे, जिस पर पहुँच कर मनुष्य सर्वज्ञ बन जाता है। मनुष्य के विकास की अगली मंजिल वही है। ज्ञान तभी जन्म लेता है जब बुद्धि की मृत्यु होती है। मनुष्य अपनी भौतिकवादी दृष्टिकोण का अतिक्रमण करके ही अध्यात्मिक विकास की ओर अग्रसर हो सकेगा। जब तक वह अपनी चेतना का परिष्कार करके अतिमानस के-प्रज्ञा के क्षेत्र में प्रवेश नहीं करता, उसका कल्याण संभव नहीं।
बुद्धि आखिरी शब्द नहीं है और न ही बुद्धिजीवी प्रकृति का सर्वश्रेष्ठ निर्माण है। मनुष्य के अंदर दिव्य क्षमताओं की संभावनाओं का एक सम्पूर्ण महासागर लहलहा रहा है। उसमें से प्रज्ञा को, बद्बुद्धि को जाग्रत करके मनुष्य समस्त समस्याओं का समाधान प्राप्त कर सकता है और अपने उज्ज्वल भविष्य की संरचना कर सकता है क्योंकि प्रज्ञा द्वारा सत्य ही देखा जाता है, सत्य ही प्रकट किया जाता है। सत्य ही ग्रहण किया जाता है। पतंजलि योग दर्शन के समाधिपाद के 41 वें श्लोक में ऋतम्भरा प्रज्ञा अर्थात् सत्य को धारण करने वाली बुद्धि की विशेषता का वर्णन करते हुए कहा गया है कि- ऋति और अनुमान से प्राप्त बुद्धि की अपेक्षा ये ऋतम्भरा प्रज्ञा विशेष रूप से अर्थ का साक्षात्कार करा देती है। अर्थात् सत्य पर आधारित होने से उसके द्वारा छिपे हुए रहस्यों का उद्घाटन हो जाता है जो साधारण बुद्धि से नहीं जाना जा सकता वह भी साक्षात्कार हो जाता है। अतः आत्मा तथा संसार के प्रत्येक पदार्थ के वास्तविक स्वरूप को समझने एवं संकटों और कुसंस्कारों से छुटकारा पाने के लिए प्रज्ञा का आश्रय लेना आवश्यक है भव-बन्धनों से मुक्ति दिलाने में प्रज्ञा ही समर्थ है।
वस्तुतः अन्तःकरण का विकास-चेतना का उदात्तीकरण” ही वह एक मात्र राजमार्ग है। जो मनुष्य को वर्तमान संकटों से छुटकारा दिला सकता है और उसे महानता के पथ पर आगे बढ़ा सकता है। महानता का सीधा सम्बन्ध अन्तर्ज्ञान से है। ऋतम्भरा का प्रज्ञा से है। नैतिकता, सदाचरण एवं आत्मसंयम का अवलंबन लिए बिना इसकी उपलब्धि नहीं हो सकती और विवेक बुद्धि के बिना आत्म साक्षात्कार, बन्धन मुक्ति संभव नहीं। अतः हर परिस्थिति में मनुष्य को सद्बुद्धि का आश्रय लेना ही पड़ेगा, इसी में उसका कल्याण सन्निहित है। गायत्री तत्व दर्शन इसी प्रयोजन की पूर्ति करता है।
शाहजहाँ अपने समय का सुविख्यात प्रतिभावान व्यक्ति था। उसका पराक्रम, कौशल और व्यक्तित्व तीनों ही बढ़े-चढ़े थे। उसने अपना राज्य बढ़ाया और कई तरह की सफलताएँ पाई। पर यहाँ चूक गया कि उपार्जित संपदाओं एवं सफलताओं का उपयोग कहाँ किया जाय? “उसने अपने बैठने के लिए तख्त ताऊस” बनवाया और अपनी बीबी की कब्र के रूप में ताजमहल खड़ा किया। यह दोनों ही रचनाएँ अद्भुत थी।
शाहजहाँ का रत्न प्रेम प्रसिद्ध है। उसने विश्व प्रसिद्ध कोहिनूर हीरा भी ग्वालियर नरेश से प्राप्त किया था। मोर की आकृति का एक बहुमूल्य सिंहासन भी उसने अपने बैठने के लिए बनवाया था, जिसका नाम “तख्त ताऊस” था। उसकी लागत इस समय के 12 करोड़ रुपया थी। यह स्वर्णखचित था। बहुमूल्य रत्नों से वह जड़ा था। पन्ना के बने पाँच खंभे उसमें थे। शाहजहाँ के बाद वह औरंगजेब के पास और अन्त में मुहम्मद शाह के कब्जे में रहा।
ईरान के बादशाह नादिरशाह ने काबुल जीत लेने के बाद भारत पर चढ़ाई करदी और मुहम्मदशाह को परास्त कर दिया। जो विपुल सम्पत्ति नादिरशाह ने लूटी उसमें तख्त ताऊस भी शामिल था। इसे लेकर वह वापस लौट ही रहा था कि कुर्दों ने उसकी हत्या कद दी और लूटी हुई सम्पत्ति भी उन लुटेरों ने आपस में बाँट ली। तख्त ताऊस के भी टुकड़े करके बँट गये। बहुत समय बाद नादिरशाह के वंशजों ने लुटेरों को पकड़ा और लूटी हुई सम्पत्ति उगलवाली जिसमें तख्त ताऊस के टुकड़े भी शामिल थे। उन्हें जोड़-मोड़कर फिर लगभग पहले जैसा ही उसे बना लिया गया यद्यपि बहुत से बहुमूल्य रत्न उसमें से गायब हो चुके थे।
अठारहवीं सदी में वह सिंहासन अँग्रेजों के हाथ लगा। उसे पूर्ण गोपनीयता के साथ लंका के त्रिणकोंमाली बन्दरगाह से जलयान पर चढ़ाकर इंग्लैंड रवाना किया गया। वह जहाज सही सलामत इंग्लैंड रवाना किया गया। वह जहाज सही सलामत इंग्लैंड नहीं पहुँच सका। 4 अगस्त 1772 को पूर्वी अफ्रीका के समुद्र में चट्टानों से टकराकर वह डूब गया, साथ ही वह उन दिनों बीस करोड़ रुपया कीमत का आँका गया सिंहासन भी।
इसके बाद समुद्र तल से उसे निकालने के अनेकों प्रयत्न किये जाते रहे। 1162 में कुछ रत्न, सोना और अवशेष प्राप्त कर लिए गये। इससे यह अनुमान तो लग गया कि वह किस क्षेत्र में डूबा पड़ा है, पर तब से अनेक प्रयत्न करने पर भी उसका पूरा पता कहीं भी नहीं चला वह रत्न राशि अभी भी कहीं अविज्ञात स्थान में डूबी पड़ी हे।
डूबा हुआ “तख्त ताऊस” अपनी मौन भाषा में अभी भी प्रतिभाशाली व्यक्तियों को एक सन्देश देता है कि आप लोग बड़े समझे जाते और समर्थ होते हुए भी इतनी अदूरदर्शिता का परिचय क्यों देते है? जिसमें प्रतिभा कला और सम्पदा का मात्र दुरुपयोग ही बन पड़ता है।
जितना धन, श्रम और कौशल “तख्त ताऊस” के बनाने में लगाया गया उसका प्रयोजन इतना भर था कि एक राजा की बढ़ी-चढ़ी सफलता का, बढ़े चढ़े भाग्यवान का अहंकारी प्रदर्शन कर सके। यह क्यों भुला दिया गया कि इस उद्धत अहंकार की पूर्ति में जितना श्रम लगाया गया था उतने से सार्वजनिक प्रगति के अनेकों उपयोगी कार्य चल सकते थे और उससे पीड़ा और पतन के निवारण में, जन-जीवन के परिष्कार में भारी मदद मिल सकती थी।
उद्धत अहंकारी प्रदर्शन ने अनेकों के मस्तिष्क लालच से खराब कर दिये। उसे झपटने के लिए कितनों ने आक्रमण किये और कितनों को अपना विनाश देखना पड़ा। अनावश्यक मात्रा में संग्रहित सम्पत्ति दुष्प्रवृत्तियों की कितनी बड़ी श्रृंखला रखकर खड़ी करती है और अन्त में किस प्रकार नष्ट होती है इसका जीता जागता उदाहरण “तख्त ताऊस” है।
धनी सेठ का स्वर्गवास हुआ तो अगले जन्म में बकरा हुआ। दुकान से उसे बहुत मोह था। सो भाग दौड़ कर उसी को देख भाल के लिए चला आता और बेटे को हानि न होने देने के लिए चौकीदारी करता था।
बकरे को दुकान पर बार-बार आते देख कर बेटे को क्रोध आया और उसने पीठ पर दंडा जमाया ताकि दुबारा उधर न आय।
एक संन्यासी उधर से निकले उनने बकरे को पूर्व जन्म का ज्ञान कराया और कहा परिवार का अनावश्यक मोह करने में पिटने के अतिरिक्त और कुछ हाथ नहीं आता।
मानव जीवन में गंध की महत्ता और उपयोगिता सर्वोपरि मानी गयी है। आँख, कान, जीभ, त्वचा की तरह ही नाक की गणना पंच ज्ञानेन्द्रियों में की जाती है। प्राणशक्ति का ज्ञान इसी से होता है। गंध की क्षमता सूक्ष्म होते हुए भी इतनी अधिक सुविस्तृत और प्रचंड है कि अचेतन मन तक को प्रभावित करने की सामर्थ्य रखती है। सुगंध या सुवास कहीं से भी आ रही हो मानव मन को तरंगित किये बिना नहीं रहती। यह बात अलग है कि अस्वाभाविक एवं कृत्रिम साधनों, तीव्र सुगंधित पदार्थों का उपयोग करके उसके प्रभाव को नगण्य बना दिया गया है। इससे जहाँ व्यक्ति की प्राणशक्ति का ह्रास होता है वहीं उसकी प्रतिक्रिया निष्क्रिय-निस्तेज जीवन जीने को विवश करती और अनेकानेक मनोविकारों मनोरोगों को जन्म देती है। घ्राणेन्द्रियों की स्वस्थता पर बहुत कुछ हमारी स्मरण शक्ति की प्रखरता निर्भर करती है, साथ ही व्यक्तित्व के भावनात्मक विकास से भी इसका घनिष्ट संबंध है। अतः सुवासित प्राकृतिक तत्वों का समुचित लाभ उठाया जाना ही श्रेयष्कर माना जाता है।
मानवेत्तर प्राणियों में गंध एक विशिष्ट प्रकार की प्रेरक शक्ति का कार्य करती है। छोटे-छोटे कीड़े-मकोड़ों से लेकर पशु-पक्षी तक घ्राणेन्द्रिय की सहायता से एक दूसरे की शत्रु-मित्र की पहचान करते, आहर-व्यवस्था जुटाते सहयोगी-सहचर ढूँढ़ते और संकटकालीन परिस्थितियों की जानकारी प्राप्त करके स्वयं की तथा साथियों की रक्षा करते है। उदाहरण के लिए रेशमकीट, जिसे “बौम्बिसमोरी” के नाम से जाना जाता है, उसकी घ्राणशक्ति इतनी तीक्ष्ण होती है कि वह अपने मादा कीट द्वारा ग्रंथियों से उत्सर्जित स्राव को गंध के आधार पर दो मील से भी अधिक दूरी होने पर भी उसे खोज निकालता है। हार्वर्ड विश्वविद्यालय के प्रमुख जीव विज्ञानी डा विलसन ने “प्राणि जगत में गंधानुभूति उनके जीवन को किस प्रकार से प्रभावित करती है, पर गहन अनुसंधान किया है। उनका कहना है कि गंधों में जीवन को आमूलचूल परिवर्तन कर देने की क्षमता सन्निहित होती है। जीवधारियों का तो समूचा जीवन इसी के इर्द-गिर्द चक्कर काटता है। गंध की अति सूक्ष्म मात्रा भी कितनी प्रभावशाली है, इसे चींटियों से स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। उनके अनुसार चींटियों के शरीर से निकला हुआ मात्र एक मिलीग्राम फेरोमोन उनकी एक कतार के-लम्बी पंक्ति के लिए इस समूची पृथ्वी के तीन बार चक्कर लगाने के लिए मार्गदर्शन करने हेतु पर्याप्त होता है। वस्तुतः घ्राणशक्ति ही परस्पर वार्त्तालाप का जीव जंतुओं, कीटों का मूल आधार होता है।
अन्य जीवधारियों में मछलियों को लिया जाय तो हम पाते है कि गंध ग्रन्थि की सहायता से ही वे अपनी उदर पूर्ति करने में सक्षम होती है। सेलेमेण्डर गंध के आधार पर ही अपनी मादा को ढूँढ़ सकने में सफल होता है। पक्षियों का समूह भी इसी की सहायता से एकत्रित होता और वन विहार की योजना बनाने में सफल होता है। कुत्ते की घ्राण शक्ति तो व्यक्ति की अपेक्षा दस लाख गुना अधिक होती है जिसके परिणाम स्वरूप वह गढ़े खजानों को, छिपाई गई वस्तुओं को बताने और चोर तथा अपराधियों को पकड़ सकने में समर्थ सिद्ध होती है। मौसम बदलने और किसी प्रकार के प्रकृति प्रकोप उभरने का पूर्वाभास भी कितने ही प्राणी पालते है और संकट आने से पूर्व अपना स्थान बदलने तथा सुरक्षित स्थान पर पहुँचने का प्रयत्न करते है।
मनुष्य की प्राणशक्ति देखने, सुनने और रसास्वादन को प्रमुखता मिलने के कारण दब गई है। गंध विज्ञान के विशेषज्ञों का कहना है कि हमारे सूंघने की क्षमता स्वाद चखने की अपेक्षा दस हजार गुनी अधिक है। इसका एक प्रमुख कारण यह भी है कि गंध के परमाणु वायु से भी सूक्ष्म होते है अर्थात् एक लीटर वायु में 0.00004 मिली ग्राम गंध की मात्रा घुली होती है। नासिका के संवेदी तन्तु इन्हें शीघ्र सहज ही पकड़ लेते है। किन्तु जिस वस्तु का उपयोग न हो अथवा दुरुपयोग किया जाय, तो वह निष्क्रिय और निरर्थक सिद्ध होगी। अपनी नाके के साथ भी यही हुआ है। मानवी दुर्बुद्धि ने दुर्गन्ध पैदा की है और समूचे वायुमंडल तथा वातावरण को विषाक्त बनाकर छोड़ा है। परिणाम स्वरूप घ्राणेन्द्रियों की स्वाभाविक क्षमता कुँठित होती जा रही है और गंध तन्मात्रा से सम्बद्ध सूक्ष्म संस्थान विकृतियों से भरत चले जा रहे है। शारीरिक कार्य क्षमता घटने और मानसिक संतुलन गड़बड़ाने में दुर्गन्ध या प्रतिकूल गंधों की महत्वपूर्ण भूमिका पाई गई है।
येल विश्वविद्यालय के सुप्रसिद्ध न्यूरोसाइंटिस्ट गौर्डन शैपर्ड का कहना है कि सुगंध व दुर्गन्ध का हमारे जीवन पर गहरा प्रभाव पड़ता है। इन से भावनाओं को उद्दीपन मिलता है और कई बार तो व्यवहार में ये ऐसा परिवर्तन ला देती है जिनसे खुशगवार या कष्टदायक बन जाता है गुलाब या चम्पा की सुगंध जहाँ मन को मोह लेती है और शरीर की हारमोन ग्रंथियों को स्वास्थ्यवर्धक रसायनों के स्राव में अभिवृद्धि करने को प्रेरित करती है, वही दूसरी ओर कुछ, अन्य गन्ध हमें भयभीत करती और यहाँ तक कि प्राण हरण करके छोड़ती है। उदाहरण के लिए तहखानों या पुराने मकबरों की सीलन भरी गंध, गंदी नालियों की सड़ाँध स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होती है। कई बार दुर्गन्ध मनुष्य को खतरे से भी रक्षा करती है। हाइड्रोजन सल्फाइड, फास्जीन, जैसी जहरीली गैसें यदि फेफड़े में प्रवेश कर जावें तो प्राण हरण करके छोड़ती है परन्तु इनकी गंध इतनी तीव्र होती है जिसकी वजह से हम उनसे मीलों दूर से ही परिचित हो जाते हैं होर समय रहते बचने के उपाय कर लेते है। इसका श्रेय घ्राणशक्ति को ही जाता है।
अधिकांश व्यक्तियों में दस हजार विभिन्न प्रकार की गंधों को सूँघ सकने की क्षमता होती है। पर जिनकी घ्राणशक्ति क्षीण हो जाती है या जो ऐनास्मियो नामक रोग से ग्रस्त होते है उन्हें इसके साथ ही अनेक प्रकार की आधि−व्याधियों से त्रस्त पाया जाता है। घ्राणेन्द्रिय में मामूली से उत्पन्न विकार से व्यक्ति को “पैरानैस्मिया” नामक बीमारी जकड़ लेती है। ऐसी स्थिति में व्यक्ति को मस्तिष्क सम्बन्धी अनेकानेक विकृतियों का सामना करना पड़ता है। कई तरह के शारीरिक मानसिक रोग पनपने लगते है।
पुरुषों की अपेक्षा नारियों का गंध ज्ञान अधिक विकसित होता है। दोनों ही वर्गों में आयु वृद्धि के साथ इसमें गिरावट आने लगती है। पंसिलवानिया यूनीवर्सिटी के क्लीनिकल स्मेल एण्ड टेरट रिसर्च सेंटर के चिकित्सा विज्ञानियों ने अपने अनुसंधान निष्कर्ष में बताया है कि जैसे जैसे मनुष्य की उम्र बढ़ती जाती है-घ्राणेन्द्रियों की क्षमता क्षीण होने लगती है। परीक्षणकर्ताओं ने पाया है कि गंध ज्ञान की न्यूनता के कारण कई व्यक्ति मानसिक विकृतियों से घिर जाते है। विचित्र सनकों, अपराधी-उच्छृंखल प्रवृत्तियों, अचिन्त्य चिंतन, दुर्भावनाओं का शिकार प्रायः ऐसे ही लोग बनते देखे गये है। उनका मानना है कि आस पास के वातावरण में फैले दुर्गन्ध के सूक्ष्म परमाणु नासिका छिद्र से प्रविष्ट होने के पश्चात् मस्तिष्क के अति संवेदनशील घ्राण केन्द्र को पंगु बना देते हैं जिससे न केवल मानसिक विकृतियाँ उपजती है वरन् शरीर का रसायन तंत्र भी गड़बड़ा जाता है और नई-नई व्याधियों को जन्म देता है।
कुछ ऐसी ही मान्यता सोवियत रूस की एकेडमी आफ साँइसेज के जीव भौतिक विज्ञानी डा0 कोनोवलोव की है। अपने अनुसंधान में उन्होंने बताया है कि हाइपरटेंषन जैसा प्राणघातक रोग दुर्गन्ध और दुर्भावनाओं के कारण पैदा होता है इसके लिये वे उत्पन्न मानसिक तनाव को मूल कारण मानते है। उदाहरण प्रस्तुत करते हुए उन्होंने कहा है कि दुर्गन्ध के कारण न केवल त्वचा का स्वेदन बढ़ता है, रंग और तापमान परिवर्तित होता है वरन् शरीर रोग कारक कीटाणुओं का अड्डा बनने लगता है। उनके अनुसार नवजात बच्चों की बायोलॉजिकल फील्ड में गंध की एक विशिष्ट प्रक्रिया देखी गई है। तीव्र सुगंधित द्रव्यों को लगाने या जलाने से उसके स्वास्थ्य पर तीव्र असर पड़ता है। जन्मदात्री द्वारा विनिर्मित स्वच्छ सुगन्धित प्राकृतिक वातावरण में ही शिशुओं का समुचित शारीरिक मानसिक विकास संभव है।
चिकित्सा क्षेत्र में अब मल, मूत्र, रक्त आदि परीक्षणों की तरह रोग निदान के लिए शरीर से निकलने वाली गंध को भी माध्यम माना जाने लगा है। तथ्यतः प्रत्येक रोग शरीर में एक विशिष्ट प्रकार की गंध को जन्म देता है जिसे घ्राण शक्ति विकसित कर लेने वाला कोई भी चिकित्सक सरलतापूर्वक जान सकता है। प्रसिद्ध चिकित्सा शास्त्री डा हैनिकन के अनुसार मानव शरीर की गंध सदैव एक सी नहीं रहती वरन् समय-समय पर उसमें परिवर्तन होता रहता है। प्रमुख रूप से यह परिवर्तन रोगों के आक्रमण पर ही आता है। उदाहरण के लिए खसरा की बीमारी में शरीर से गरम चपाती जैसी, मलेरिया में खरगोश जैसी एवं प्लेग में मीठी खुशबू का अनुभव होता है। यूरीमिया व लीवर फैल्योर की गंध भी सूँघने पर तुरंत पहचान में आ जाती है। गंध शक्ति विकसित करके चिकित्सा उपचार की इस नवीन विधा का लाभ हर चिकित्सक निदान हेतु उठा सकता है।
विशेषज्ञों कहना है कि शारीरिक मानसिक व्याधियों के निराकरण में समुचित सुगंधित द्रव्यों या पुष्पों के माध्यम से महत्वपूर्ण सहायता मिल सकती है। सुरक्षित द्रव्यों के छिड़काव से या अग्नि में डालने से जहाँ वातावरण का परिशोधन होता है वही शुद्ध वायु का लाभ भी मिलता है परन्तु यही पदार्थ जब अत्यधिक तीव्र एवं उत्तेजक होते है तो स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डालते है। सात्विक, संतुलित और उपयोगी प्राकृतिक गंध वह है जो मिट्टी वनस्पतियों और उनके महकते-खिलते पुष्पों से अथवा वनौषधियों को वाष्पीभूत करने पर निकलती है। चंदन व केशर की सुगंध सिरदर्द को ठीक कर देती है। पीली मिट्टी को सूँघने से नकसीर का बहना रुक जाता है। हिमालय के ऊँचाई वाले क्षेत्रों में पाये जाने वाले ब्रह्मकमल के सुरभित वातावरण में जाने पर मस्तिष्क तनाव रहित हो जाता है और देर तक ठहरने पर गहरी योग निद्रा लग जाती है। खुशबू के माध्यम से तनावग्रस्तता को दूर करने में वैज्ञानिकों ने भी सफलता अर्जित की है। येल विश्व विद्यालय के मूर्धन्य वैज्ञानिक गैरी प्रवार्टज तथा इंटरनेशनल फ्लेवर्स एण्ड फ्रैगनेन्स, न्यूयार्क के क्राइग वारेन ने खोज निकाला है कि सेब की ताजी सुगंध से मानसिक तनाव को घटाया जा सकता है। इन्होंने लगभग 200 लोगों पर इस तरह के परीक्षण किये और पाया कि ताजे सेबों को सूँघने से उच्च रक्त दाब सामान्य स्तर पर आ जाता है और व्यक्ति हलका-फुलका महसूस करने लगता है।
वैशेषिक दर्शन में र्पामि आन्हिक के छटे सेत्र में चौबीस गुणों की व्याख्या की गयी है परन्तु उनमें प्रधानता गंध को ही मिली है। शब्द, स्पर्श, रूप, रस आदि गुणों में गंध को मुख्य और स्वाभाविक माना गया है। पार्थिव परमाणु का प्रमुख उपादान कारण गंध तन्मात्रा है, शेष तो उसके सहयोगी सहायक भर है विश्व विख्यात शल्य क्रिया विशेषज्ञ डा क्रिश्चेन बनार्ड ने भी अपनी कृति बाडी बशनी में कहा है कि पंच तन्मात्राओं में गंध प्रमुख है। उनके अनुसार गंध की प्रभावशीलता न केवल पार्थिव शरीर की गतिविधियों तक सीमित है, वरन् मन-मस्तिष्क भी इससे अछूता नहीं रहता। भाव-संवेदनाओं के विकास में सुगंधित सुरभित वस्तुओं का सान्निध्य, एवं सुवासित वातावरण अधिक लाभ प्रद समझा जाता है। मनुष्य के स्वभाव, आचरण और चिंतन की दिशा धारा को भी विशेष गंधें अपने ढंग से मोड़ती-मरोड़ती रहती है।
यही कारण है कि पूजा-उपासना के विविध अध्यात्म उपचारों में अगरबत्ती, धूपबत्ती, कपूर, चन्दन, लोबान, दीपक तथा हवन-अग्निहोत्र एवं वनौषधियों की धूनी धूम आदि सुगंध उत्पन्न करने वाले कृत्यों को सम्मिलित किया गया है। जिनके सहारे मानसिक परिष्कार और वातावरण परिशोधन का उभय पक्षीय प्रयोजन पूरा होता रहे। अग्निहोत्र में जलाये गये सुगंधित पदार्थ वायुभूत होने के पश्चात् समूचे वातावरण में सुगंध फैलाते है साथ ही मानवी मन को भी सकारात्मक दिशा धारा प्रदान करते है अतः गंध ज्ञान को विकसित करके प्रवृत्तियों के परिशोधन का नया ढाँचा खड़ा किया जा सकता है, गंध से संबंधित मस्तिष्कीय केन्द्र भी सीधे भाव संवेदनाओं के केन्द्र हाइपोथैलेमस एवं लिम्बित सिस्टम से जुड़े होते है। जो गंध मन को अच्छी लगती है, वह प्रसन्नता दायक न्यूरो हारमोन्स स्रवित करती है। इस प्रकार गंध साधना द्वारा भी ध्यान योग की प्रक्रिया पूरी कर तनाव मुक्त होना तथा उच्च स्तरीय आनंद को प्राप्त करना सींव है।
ब्रह्माजी ने सृष्टि का सृजन आरंभ किया। अनेकानेक जीव जन्तु बनाते चले गये। उनके मन में विचार आया कि कोई आलोचक नियुक्त करना चाहिए जो निर्माण में रहने वाली कमियों को बताता चले साथ ही सुधारने का परामर्श देता रहे।
इसके लिए एक विद्वान नियुक्त किया गया। उसने गौर से देखना और खोट बताना शुरू किया। हाथी को देखकर कहा यह ऊपर तो देख ही नहीं पाता। ऊंट को देखकर कहा - इसे पैरों तले की वस्तुएँ तक तो दीखती नहीं। इसी प्रकार बन्दर को नटखट और अजगर को आलसी बताया। विद्वान ने हर जीव की कमियाँ बताई। पर उसे यह ने सूझा कि सुधार किस प्रकार क्या किया जाय?
ब्रह्माजी रुष्ट हुए और बोले आपको छिद्रान्वेषण भर आता हैं सुधार का उपाय बताकर मेरी सहायता कहाँ कर पाते है। अच्छा अब अधिक कष्ट न कीजिए सिर्फ इतना बता कर बात समाप्त कीजिए कि आपकी बिरादरी वाले मनुष्य में क्या कमी है।
विद्वान ने सकपकाते हुए इतना ही कहा - यह बड़ा धूर्त है। इसके मन और व्यवहार में पाखंड भरा रहता है। यदि संभव हो तो इतना कर दीजिए कि इसके मस्तिष्क में एक खिड़की बना दीजिए ताकि संपर्क में आने वाले व्यवहार पर ही न लुभा जाय उसके मन की स्थिति भी देख सकें।
यों हर मनुष्य की गतिविधियाँ अपना प्रभाव वातावरण पर छोड़ती है पर उनमें से प्रतिभाओं के बढ़े प्राण की मात्रा प्रचलन प्रवाह विनिर्मित करने में विशेष भूमिका निभाती है। जिन दिनों ऋषि मुनियों का, तपस्वी मनीषियों का साधु ब्राह्मणों का युग था, उन दिनों उनकी संयुक्त समरस गतिविधियाँ ऐसा वातावरण बनाती थी कि उसके प्रवाह में सर्व साधारण को अपनी गतिविधियों में शालीनता सहकारिता जैसे तत्व भरने पड़ते थे। सर्वत्र स्नेह सौजन्य की धारा बहती थी। मध्यकाल में जब सामन्ती रौब–दौब था, तब न केवल उनके मुसाफिर जमींदारों ने वैसा ही तौर तरीका अपनाया वरन् साधारण प्रजाजन भी उसी की नकल बनाने लग। बड़ों का आतंक छोटों के लिए सहज स्वाभाविक बन गया। अंग्रेजी शासन में बड़ों का अनुकरण करते हुए सामान्य लोगों ने भी वैसी ही वेश भूषा पहनना आरम्भ कर दी। उसी भाषा को बोलने में रुचि दिखाई। आहार-विहार में भी वही अनुकृति सहज स्थान पाती चली गई यह फिल्मों का जमाना है, इन दिनों हर युवक-युवती पर वैसा ही स्वभाव एवं रहन सहन व्यवहार अपनाने की उतावली पड़ी हुई है। बुद्ध, ईसा, गाँधी की भी अपने-अपने समय में प्रचण्ड लहरें चली थी और उनसे बहुत बड़ा जन समुदाय प्रभावित होता चला गया।
अमीरी का नशा सम्पन्नता के क्षेत्रों में उद्भूत हुआ है। मालदारों के ठाट बाट, रहन सहन, श्रृंगार, सज्जा, अपव्यय, दुर्व्यसन जन साधारण के द्वारा अपनाये जा रहे है ताकि वे भी इस आधार पर धनी मानी समझे जाने की लालसा किसी प्रकार पूरी कर सकें। अन्य अवसरों पर तो उतना नहीं होता पर विवाह शादियों के दिनों यह ललक चरम सीमा तक पहुँच जाती है। दुल्हन के लिए बड़े जेवरों की ऐसी सज्जा सजाई जाती है मानों वह किसी करोड़ पति की बेटी हो और ससुराल वाले कुबेर के खानदान वाले हों। बारात की सज धज, महंगे प्रीतिभोज, बैंड, आतिशबाजी आदि में पैसा इस तरह उछाला जाता है मानों इन लोगों के घरों में सोने चाँदी के खजाने गढ़े हो। दहेज भी इस प्रकार माँगा जाता है मानो देने वाला जो चाहा जाय वही देने में समर्थ है। इसे एक प्रकार का उन्माद ही कह सकते है, जो विवाह शादी के दिनों चरम सीमा पर देखा जाता है पर उसकी खुमारी आगे पीछे भी बनी रहती है।
कामुक दृष्टिकोण भी अब नशेबाजों की तरह परस्पर प्रतिस्पर्धा का विषय बनता जा रहा है। देह व्यापार की खुली दुकानें भी कम नहीं है। फिर लुक छुप कर जो होता है उसे तो अति विनाशकारी ही कहा जाता है। नशों पर रोक भी लगती जा रही है, दूसरे उन्हें महँगा भी किया जा रहा है फिर भी उसकी खपत के आँकड़े तूफानी गति से ऊपर उठते जा रहे है।
यह सब क्या है? इसे एक प्रकार से प्रचलन प्रवाह की चित्र-विचित्र धाराएँ ही कहा जा सकता है। जो कुछ प्रतिभावानों द्वारा चलाई जाती है और उन्हें सामान्य जन आँखें मूंदकर अपनाते गले उतारते जाते है। सम्प्रदायों और दार्शनिक राजनैतिकवादों को छोड़ने अपनाने में भी समय पर अदृश्य प्रवाह चलते है। जब तक उनके पीछे प्रेरणाएं रहती है तब तक वे गतिशील भी रहते है।
वन प्रदेशों में रहने वाले आदिवासी अभी भी ऐसी परम्पराओं को अपनाते देखे जाते है जो इतिहास की दृष्टि से सदियों पुरानी और विचारशीलों की दृष्टि से सर्वथा निरर्थक हो गयी। फिर भी उन कबीलों के क्षेत्र में इस प्रकार जड़ जमाये हुए है मानों उनके विश्वास ही सनातन धर्म है। अन्यत्र भी ऐसी ही अनेक प्रकार की परम्पराएँ विद्यमान हैं और समर्थन प्राप्त किए हुए है जिन्हें विवेक की कसौटी पर कसे जाने के उपरान्त उनकी कुछ भी उपयोगिता सिद्ध नहीं होती। धर्म सम्प्रदाय भी अपने समय की प्रचण्ड लहर के रूप में अनेक लोगों द्वारा अपनाये जाते है पर दूसरा कोई मोड़ आ जाने पर नये मोड़ पर चल पड़ना भी आश्चर्यजनक ढंग से अपनाया जाने लगता है। चीन क्षेत्र में कभी बौद्ध धर्म का बोलबाला था रूस के प्रभाव क्षेत्र में ईसाई और मुसलमान धर्म का बोलबाला था पर अब वहाँ सर्व साम्यवाद के जय जयकार होते जाते है। अफ्रीकी देशों में पूर्वजों की मान्यता अब कहाँ रही है वहाँ के अधिकांश निवासियों ने सभ्य कहे जाने वाले लोगों द्वारा अपनाये धर्मो को अपनाना आरम्भ कर दिया है।
उपरोक्त पंक्तियों में विचार प्रवाहों का उल्लेख है जो प्रवाहित तो अदृश्य आकाश में होते पर प्रभावित जन साधारण को करते है। यह ठीक है कि प्रतिभाशाली स्तर के मनुष्य अपनी प्रखरता के आधार पर प्रचंड विचार प्रवाहों को उत्पन्न तथा अग्रगामी करते है पर यह भी गलत नहीं है कि चलते प्रवाह के साथ ढेरों कूड़ा कचरा उसी दिशा में साथ साथ बहता चला जाता है। इसी को “माँब” मेन्टेलिटी या मास मूवमेण्ट कहते है। जब किसी प्रकार के खेल तमाशे चलते है तो देखा देखी जगह-जगह उनकी पुनरावृत्ति होने लगती है। धर्म क्षेत्र में एक उफान संकीर्तनों के प्रवचन का आया था। कभी देवालय बनाने पर लोग अपने को धर्मध्वजी मानते थे। अब राजनैतिक आन्दोलनों का बोलबाला है।
तालाब में ढेला फेंकने पर उसकी लहरें सभी दिशाओं में बहने लगती है। आन्दोलनों के संबंध में भी यही बात है। कभी कभी तो हड़तालें भी दनादन होने लगती है। एक मूर्धन्य द्वारा उठाया गया कदम दूसरों के लिए अनुकरण या प्रतिष्ठा का प्रश्न बन जाता है। नर नारी आये दिन फैशन बदल बदल कर कपड़ों का प्रयोग करते देखे जाते है। यह भी एक प्रकार से हवा का प्रवाह ही है।
राजनेता जब आवश्यक समझते है, जन जन मन में अपने प्रचार माध्यमों से युद्धोन्माद पैदा करते है और आवेश इस सीमा तक उभार देते है कि युद्ध आरम्भ करना उन राजनेताओं की विवशता बन जाती है। साम्प्रदायिक दंगे भी ऐसी ही अफवाहों अथवा तथ्यों के आधार पर उभारे गये आक्रोश के फलस्वरूप ही होते है। चुनावों के समय भी ऐसे ही तनाव उत्पन्न हो जाते है।
यह अदृश्य वातावरण में चलती रहने वाली अनेक प्रकार की प्रवाह धाराओं को शक्ति सामर्थ्य का उल्लेख है। इन दिनों में यही हो रहा है। अवांछनियताओं ने लोक मानस पर बुरी तरह अधिकार जमाया है। बुराई में भलाई की तुलना में अधिक आवेश होता है। इसलिए उसका प्रवाह और भी अधिक तेजी से गति पकड़ लेता है। जबकि भलाई का प्रवाह सौम्य एवं सामान्य गति से ही प्रवाहित होता है। पेट्रोल और बारूद जितनी जल्दी आग पकड़ते है उतनी ज्वलन शक्ति सामान्य पदार्थ में नहीं होती। बुराई तेजी से फैलती है जबकि भलाई की परम्पराओं को अग्रगामी बनाने में समय लगता है और प्रबल प्रयास करना पड़ता है।
दृश्य जगत के प्रयास प्रयत्नों का अपना महत्व है। उसके लिए अनौचित्य को रोकना और औचित्य को बढ़ाना, अनेक रचनात्मक और सुधारात्मक कार्यक्रम अपनाकर सम्पन्न करना पड़ता है। यह उचित भी है और आवश्यक भी। किया भी जाता है, किया भी जा रहा है। किन्तु साथ ही उस पक्ष को भी नजर अन्दाज नहीं करना चाहिए, जो अदृश्य जगत में चल रहे सूक्ष्म प्रवाहों के कारण दृश्य जगत को जन साधारण को प्रभावित करता है।
इस क्षेत्र के उपायों में जन जीवन में सदाशयता के समुचित समावेश की आवश्यकता है। नीतिनिष्ठा और समाजनिष्ठा को आस्था जगत में व्यवहारिक जीवन में समुचित स्थान मिले ऐसे प्रयत्न करने चाहिए। साथ ही यह भी नहीं भुला दिया जाना चाहिए कि उत्कृष्ट प्रेरणाओं से भरे पूरे आध्यात्मिक स्तर की सामूहिक तप साधनाओं की भी अनिवार्य रूप से आवश्यकता पड़ती है। उनकी उपयोगिता समझी और प्रक्रिया भी अपनायी जानी चाहिए।
एक राजा था। महल में सोने के पलंग पर सोया हुआ था। गहरी नींद आई तो सपना देखने लगा।
देखा, वह भिखारी हो गया है। दुर्भिक्षग्रस्त क्षेत्र में दरिद्र लोगों के यहाँ भीख माँ रहा है। भूख की पीड़ा उससे सहन नहीं हो रही थी। ज्यों त्यों करके एक जून की खिचड़ी पकाने लायक धान्य मिला। मिट्टी के बर्तन में उसे पकाया और ठंडी करने के लिए केले के पत्ते पर फैलाया।
इतने में देखता है कि दो दुर्दान्त साँड़ लड़ते हुए उसके समीप आये। उन्होने खिचड़ी रौंद डाली। साथ ही वे परस्पर का मल्ल युद्ध छोड़ कर भिखारी बने राजा पर चढ़ दौड़ें सींगों पर उठा उठा कर उसे कई बार पटका।
राजा इस भयंकर स्वप्न से हड़बड़ा गया। उसकी घिग्घी बंध गई। पलंग पर बैठ गया और बदहवास जैसी हरकतें करने लगा।
रानियाँ दौड़ी आई इस प्रकार की बेचैनी का कारण पूछा जाने पर उसके मुँह से तो कुछ शब्द भी न निकल रहे थे।
जब चित्त शान्त हुआ तो उत्तर देने के स्थान पर उपस्थित जनों से पूछना आरंभ किया कि “यह सपना है या वह सपना था” और तो कोई कुछ न कह सका पर विचारशील मंत्री ने कहा - राजन् यह दोनों ही सपने है। जब आप जागृति में होंगे तो अपने का आत्मा के क्षेत्र में रमण करता हुआ पायेंगे।
कई बार हम बनाना कुछ चाहते हैं और बन कुछ जाता है। करना कुछ चाहते है, पर संयोगवश हो कुछ जाता है। ऐसे संयोगों ने विज्ञान को कई महत्वपूर्ण आविष्कार दिये है। ऐसी कई खोजें तो इतनी महत्वपूर्ण साबित हुई कि यदि ये मनुष्य को उपलब्ध नहीं होती, तो अनेक ऐसी सुविधा साधनों और आवश्यकताओं का आनन्द-लाभ हम उठा ही नहीं पाते, जो अब उठा रहे है।
एक तरह से दृष्टिकोण बदलकर देखा जाय तो हम पायेंगे कि ये महज संयोग नहीं है। आर्थर कोस्लर ने अपनी पुस्तक “द रुट्स ऑफ काइन्सीडेन्स” में लिखते है कि अविज्ञात के गर्भ में सारा ज्ञान छिपा पड़ा है जो अपनी अंत सामर्थ्य को जगा कर उससे तादात्म्य स्थापित कर लेता है, वह अपनी तन्मयता व मानसिक रुझान के अनुरूप उस जानकारी को पा लेता है।” यह सही है। इसे महज संयोग नहीं कहा जा सकता कि कोई उपयोगी वस्तु अनायास ही खोजली जाती है। इसमें प्रकृति प्रेरणा एवं अंत स्फुरणा दोनों का योगदान होता है।
घटना सन् 1103 की है। मूर्धन्य फ्राँसीसी रसायनवेत्ता एडपोर्ड बैनेडिंक्ट्स अपनी प्रयोगशाला में काम कर रहे थे। सामने की शेल्फ में विभिन्न प्रकार के रसायनों से भी अनेक शीशियाँ रखी थी। इन्हीं के बीच सेल्युलाइड से भरी बोतल भी रखी थी। उनने कुछ परीक्षण के लिए सेल्युलाइड की बोतल उठानी चाही, पर अचानक वह हाथ से छूट कर जमीन पर गिर पड़ी। बोतल तो टूट गई, पर उसके टुकड़े बिखरने की बजाय परस्पर जुड़े रहे। बैनेडिंक्ट्स ने जब यह देखा, तो उन्हें आश्चर्य हुआ। वे यह जानने के लिए कि आखिर इसका कारण क्या है। बोतल को उठा कर उसका निरीक्षण करने लगे। इसमें ज्ञात हुआ कि बोतल की भीतरी सतह पर सेल्युलाइड की एक पतली पर्त चढ़ गई थी। इसी के कारण काँच बिखरे नहीं।
इस घटना को देखकर उनके मन में एक विचार कौंधा कि काँच के निर्माण के समय बीच में नाइट्रो सेल्यूज की एक पर्त चढ़ा दी जाय तो एक विशेष प्रकार के मजबूत काँच का निर्माण हो सकता है और बस, इसी के उपरान्त ऐसे शीशे बनने लगे, जिनका उपयोग आज मोटर गाड़ियों में किया जाता है।
कई बार संयोग वश कुछ ऐसा हो जाता है, जो अन्ततः वरदान सिद्ध होता है। यही स्थिति एक बार प्रसिद्ध वैज्ञानिक लुई पाश्चर के साथ प्रस्तुत हुई 1770 में वे मुर्गियों के चूजों में पाये जाने वाले हैजे के रोग पर अनुसंधान कर रहे थे। उन दिनों यह बीमारी मुर्गियों में बड़ी तेजी से पनप रही थी। प्रतिदिन अगणित बच्चे मर जाया करते थे। इसीलिए वे इस व्याधि का अध्ययन कर कोई उपयुक्त उपचार ढूँढ़ना चाहते थे। अध्ययन से यह तो पता चला गया, कि यह बीमारी एक विशेष प्रकार के के रोगाणु के कारण होती है, पर इसे समाप्त कैसे किया जाय? यह गुत्थी नहीं सुलझ पा रही थी। प्रतिदिन वे मुर्गियों के चूजों पर नये-नये प्रयोग परीक्षण कर रहे थे, पर फल कुछ नहीं निकल पा रहा था। एक दिन इसी क्रम में उनसे एक छोटी चूक हो गई कई दिनों तक मुर्गियों की हड्डियों का एक्स्टै्रक्ट एक बर्तन में रखा रह गया। जब उन्हें इसका पता चला, तो एक नया परीक्षण करने को सोचा। वे बीमार मुर्गियों में एक्स्टै्रक्ट का इंजेक्शन लगा कर उसका परिणाम जानने को उत्सुक हुए। उनका विश्वास था कि इससे मुर्गियाँ तुरन्त ही दम तोड़ देंगी, पर हुआ इसके विपरीत। रोगग्रस्त चूजे धीरे-धीरे स्वस्थ होने लगे। यह देखकर उन्हें बहुत आश्चर्य हुआ और जब उस रस का परीक्षण किया, तो पता चला कि उसमें हैजे के रोगाणुओं को मारने का औषधीय गुण है और इस प्रकार मुर्गियों के हैजे रोग के लिए टीके का संयोगवश आविष्कार हो गया।
कागज को दबाने के लिए पेपर क्लिप की हर पढ़ने-लिखने वाले को आवश्यकता पड़ती है, पर इसकी खोज कैसे हुई? इसे कम ही लोग जानते होंगे। हुआ यों कि एक बार एक युवक वाशिंगटन (अमेरिका) की सड़कों पर निकटवर्ती शहर जाने के लिए किसी वाहन की तलाश में था। बस के आने में देरी होते देख वह युवक वहीं चहल कदमी करने लगा। इसी क्रम मतें सड़क पर उसे एक तार का टुकड़ा मिल गया। वह उसने उठा लिया और निरुद्देश्य उसे मोड़ने-मरोड़ने लगा। वह बार-बार उसे टेढ़ा एवं सीधा करता। इसी बीच उसके मस्तिष्क में विचार आया कि इस तरह तार के टुकड़े को मोड़ कर पेपर क्लिप (यू पिन) बनाया जा सकता है। इस प्रकार यू पिन उस युवक-मस्तिष्क की खोज साबित हुई, जो अकस्मात ही हो गई। उपयोगिता की वस्तुएँ जितनी भी आविष्कृत हुई है, इनके मूल में यह अंत स्फुरणा प्रमुख भूमिका निभाती रही है।
चिकित्सा विज्ञान जब अल्प विकसित स्थिति में था, उन्हीं दिनों की घटना है। 1122 से पूर्व रक्ताल्पता रोग की कोई दबा नहीं थी। सामान्य रोगियों को लौह तत्व खिला कर किसी प्रकार ठीक कर लिया जाता था, पर जो घातक रक्ताल्पता (परनीशियम एनीमिया) के शिकार होते थे, उन्हें निश्चय ही मौत के मुँह में जाना पड़ता था। इसकी औषधि की खोज की भी एक विलक्षण कथा है। इस आविष्कार का श्रेय संयुक्तरूप से तीन लोगों को जाता है।
घटना इस प्रकार है। अमेरिका में न्यूयार्क के डा मेनाट ने एक निजी अस्पताल खोल रखा था, जिसमें कई प्रकार के रोगों की चिकित्सा होती थी। सन् 1122 में उन्होंने वही के डा मर्फी को अपना सहयोगी बनाया, जो स्वयं भी एक कुशल चिकित्सक थे। डा मर्फी को अध्ययन का बड़ा शौक था। वे पत्र पत्रिकाओं के पठन पाठन में बड़ा रस लेते थे इसी क्रम में एक पत्रिका में उन्हें डा विपेल का एक चिकित्सा संबंधी लेख पढ़ने को मिला, जिसमें बताया गया था कि पशुओं पर किये जाने वाले प्रयोगों से कुत्ते से बारम्बार खून लिया जाता है। रक्त की अतिशय कमी के कारण ये एनीमिया रोग के शिकार हो जाते है, पर जब उन्हें दूसरे जन्तुओं का यकृत खिलाया जाता है तो धीरे-धीरे स्वस्थ हो जाते है। इस लेख को पढ़ कर डा मर्फी के मन में विचार उठा कि क्यों न रक्ताल्पता के मरीजों पर यह प्रयोग किया जाय उस समय उनके चिकित्सालय में घातक एनीमिया के कई रोगी थे। डा मेनाट ने डा मफी को उन रोगियों पर प्रयोग करने की अनुमति दे दी। उक्त रोगियों में एक उग्र स्वभाव की महिला भी थी, जो यकृत खाने के लिए तैयार ही न हो रही थी इस पर परिश्रम पूर्वक यकृत का एक्स्ट्रैट तैयार किया गया और उस महिला को दवा के नाम पर इसे पिलाया जाने लगा। एक सप्ताह बाद उसके रक्त परीक्षण से व्याधि में सुधार दिखाई पड़ने लगा और फिर बड़ी तेजी से वह स्वास्थ्य लाभ करने लगी। डा मर्फी को आश्चर्य इस बात का हुआ कि प्राणलेवा एनीमिया से ग्रस्त यह महिला स्वस्थ कैसे होने लगी? चूँकि उस चिकित्सालय में यह इस प्रकार की पहली घटना थी, अतः अचम्भा होना स्वाभाविक ही था। सामान्य रक्ताल्पता वाले मरीजों में लोहे की कमी पूरी कर देने भर से काम चल जाता था और पीड़ित व्यक्ति ठीक हो जाता था, पर रोग की जानलेवा स्थिति में इने मात्र से कोई काम नहीं बनता था, अतः डा मर्फी ने एक्स्टै्रट का विश्लेषण करने का निश्चय किया। जब इसका परीक्षण किया गया, तो उसमें लौह तत्व के अतिरिक्त विटामिन बी-12 भी उपस्थित पाया गया। जाँच के रूप में जब विटामिन बी-12 को ऐसे रोगियों को दिया गया, तो परिणाम पहले जैसा प्राप्त हुआ। इस प्रकार जब यह निश्चय हो गया कि उक्त बीमारी में विटामिन बी-12 ही अपना औषधीय चमत्कार दिखाता है, तो बाद में इसे संश्लेषण द्वारा दवा के रूप में विकसित किया गया। इस महत्वपूर्ण उपलब्धि के लिए सन् 1126 में डा मेनाट, मर्फी और विपेल को संयुक्त रूप से चिकित्सा विज्ञान का नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया। इस सम्पूर्ण घटना का वर्णन अमेरिका के डॉ लेविस थामस ने अपनी पुस्तक “दि यंगेस्ट साइन्स” में विस्तारपूर्वक किया है।
एल्युमिनियम के पहले पाइपों का प्रयोग विभिन्न प्रयोजनों में किया जाता है। यह घर में विद्युत तारों की वायरिंग में भी प्रयुक्त होता है और दूसरे कार्यों में भी काम आता है। पर इसका निर्माण भी सोद्देश्य नहीं, वरन् अनायास ही हो गया। हुआ यों कि न्यूयार्क (अमेरिका) का जाँर्जली नामक एक व्यक्ति कमीज में प्रयुक्त होने वाले बटन बनाने का बड़ा इच्छुक था। इससे पूर्व बटन, प्राय प्लास्टिक के बनते थे, पर वह धात्विक बटन बनाना चाहता था, वस्तु बाजार से बटन बनाने वाली एक मशीन और एल्युमीनियम की चादर खरीद लाया और बटन बनाना शुरू किया। उसने मशीन में चादरें डालनी शुरू की और बटनों के निकलने का इन्तजार करने लगा, पर जाँर्जली के आश्चर्य की सीमा न रही, जब उसने देखा कि बटन की जगह मशीन से धात्विक नलियाँ बन कर निकल रही है। वस्तुतः मशीन की डाई में कुछ त्रुटि रह गई थी। इसी कारण चपटे बटनों के स्थान पर नलियाँ बनने लगी थी और इस प्रकार अचानक ही एक नया आविष्कार हो गया। इसी के बाद से धात्विक नलियों का निर्माण व्यापारिक स्तर पर आरंभ हुआ।
रंगों की दुनिया भी बड़ी विलक्षण है। कई बार सुन्दर आकर्षक रंग ही हमें तरंगित उत्तेजित करते है और कई बार मन इसके कारण वितृष्णा से भर उठता है। पर्व-त्योहारों एवं खुशी के मौकों पर हम नये व रंगीन कपड़े पहन कर मौज मस्ती मनाते और प्रसन्नता जाहिर करते है, पर इतना निश्चित है कि रंग न होता, तो दुनिया रंग के आविष्कार की कहानी भी कोई कम मनोरंजक नहीं है।
एक बार हेनरी पारकिन नामक अंग्रेज बालक क्रिसमस की छुट्टियाँ मनाने अपने घर आया। वह अपने घर से दूर एक अन्य शहर में रहकर पढ़ता था और बड़ी खोजी वृत्ति का लड़का था। रसायन शास्त्र के प्रति उसकी विशेष अभिरुचि थी। इसी कारण से अपने घर पर भी एक छोटी प्रयोगशाला उसने बना रखी थी, जिसमें विभिन्न प्रकार के रसायनों की ढेर सारी बोतलें थी। उसकी इच्छा थी कि वह सिन्थेटिक क्वीनाइन अथवा उस जैसी कोई नयी चीज बनाये। इसीलिए एक दिन उसने कुछ रसायनों को परस्पर मिला कर उसका सम्मिश्रण तैयार किया एवं कुछ समय के लिए उसे यों ही छोड़ दिया। थोड़े समय उपरान्त तरल रसायनों के मिश्रण वाले फलास्क की दीवार में एक काली पर्त चढ़ गई। उसने जब इसे अल्कोहल से साफ करना चाहा, तो उसके संपर्क में आते ही काला रंग बदल कर बैंगनी हो गया। यह मात्र एक संयोग ही था, जिस के कारण बैंगनी रंग बन कर तैयार हुआ। यही रंग विश्व का पहला अप्राकृतिक और कृत्रिम रंग साबित हुआ। इस आविष्कार के बाद हेनरी पारकिन की गणना वैज्ञानिकों में होने लगी और इसके उपरान्त उसने विभिन्न प्रकार के न छूटने वाले कृत्रिम रासायनिक रंग तैयार किये। आज इन्हीं रंगों के सहारे टेक्सटाइल मिल में अनेकानेक प्रकार के रंगीन और आकर्षक कपड़े तैयार किये जाते है। रंगों की चित्र विचित्र दुनिया जो जन्मी उसके मूल में यह खोज ही थी।
इस प्रकार संयोगवश अथवा भूलवश हुई घटनाओं की उपेक्षा न कर यदि सहज मिल रही उस अन्त प्रेरणा पर ध्यान दिया जाय, उसका अध्ययन कर कारणों का पता लगाया जाय, तो कई बार नये तथ्यों व सत्यों की जानकारी मिलती है, जो आगे चल कर काफी महत्वपूर्ण साबित होती है। ऐसी बात नहीं, कि ऐसे संयोग सिर्फ किन्हीं-किन्हीं के साथ घटित होते है। होते तो यह प्रायः प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में है, पर हर व्यक्ति उस पर ध्यान नहीं दे पाता, उसकी उपेक्षा कर देता है, फलतः जो महत्वपूर्ण उपलब्धि उसे मिल सकती थी, जो यश और गौरव वह प्राप्त कर सकता था, उससे वंचित रह जाता है। ऐसे अवसरों पर जो जिज्ञासा दिखाते एवं खोजबीन की वृति प्रदर्शित करते है, वहीं श्रेय के भागी बनते है। विज्ञान की आज की प्रगति का श्रेय मानवी जिज्ञासा एवं अंत से उपजी प्रेरणा को, अंतर्प्रज्ञा को दिया जाय तो यह अत्युक्ति न होगी।
एक व्यक्ति नितान्त निर्धन था। अनुशासित भी। वह कोई बड़ा पुण्य परमार्थ करने की भावना से आकुल था। समाधान के लिए किन्हीं तत्वज्ञान के पास पहुँचा।
पूरी बात समझ कर उनने परामर्श दिया कि जो तालाब उथले हो गये है उन्हें खोदते रहने की तप साधना में लगा। इससे पशुओं को, धोबियों को, गहरे कुओं को, पक्षियों को, मनुष्यों को, नित्य प्रति लाभ मिलेगा। यह पुण्य तुम्हारी स्थिति में बिल्कुल उपयुक्त और महत्वपूर्ण फलदायक सिद्ध होगा। उसने वही किया।
राजा और मंत्री में विवाद चल रहा था। राजा कहता था कि मनुष्यों में अधिकाँश सच्चे होते है। मंत्री कह रहा था कि यदि समुचित निगरानी रखी जाय तभी लोग सच्चे रह सकते है। निगरानी के अभाव में सभी अवसर का लाभ उठाते है और बेईमान बन जाते है।
विवाद का अन्त न होते देखकर मंत्री ने अपनी बात प्रमाणित करने का दावा किया। राजा ने बात मान ली। एक पक्का तालाब बनवाया गया। जब वह पूरी तरह तैयार हो गया तो नगर में मुनादी कराई गई कि इस तालाब में हर घर से एक लोटा दूध डाला जाय। रात के समय डालना होगा। तालाब पर कोई चौकीदारी न रहेगी।
रात में लोग आये। सभी ने सोचा जब सभी दूध डालेंगे तो मेरे एक लोटे में यदि पानी रहे तो किसी को पता भी न चलेगा। यही विचार सभी के मन में अनायास ही घूम गया। सभी ने पानी के लोटे डाले।
दूसरे दिन राजा और मंत्री दोनों तालाब को देखने आय। देखा तो पूरा तालाब पानी से भरा था। उसमें एक लोटा भी दूध का न था।
आत्म विस्तार के क्रम में प्रथम शरीर, द्वितीय चिन्तन, तीसरे उपयोग में आने वाले साधनों की बारी आती है। इन तीनों के साथ सुव्यवस्थित, सुनियोजित और जागरूक स्तर का दृष्टिकोण रखा जा सकें तो समझना चाहिए कि देखने में जितना मन मोहक संपर्क क्षेत्र लगेगा उससे भी अधिक प्रयोक्ता की वह सूक्ष्म बुद्धि विकसित होती रहेगी, जिसके आधार पर लोग बड़े बनते और बड़े काम सम्पन्न करते है।
गुण, कर्म और स्वभाव को सुसंस्कृत बना लेना ऐसी बड़ी जादुई सफलता है जिसके सहारे शत्रुता बरतने वालों को ठंडा और अन्य मनस्क लोगों को मित्र में परिणित किया जा सकता है। फूल के भीतर से निकलने वाली महक ही मनुष्यों से लेकर तितलियों तक को अपना प्रशंसक बनाती है। दुर्गन्ध जहाँ से उठती है उस स्थान से सभी दूर भागते है। दुर्गुणी व्यक्ति अपने समर्थक, प्रशंसक सहयोगी घटाता जाता है। विरोधी बढ़ते जाते है। ऐसी दशा में मनुष्य घाटे में ही रहता है॥ आग जहाँ भी रहती है सर्व प्रथम उसी को जलाती है। दुर्गुणों के सम्बन्ध में भी यह बात है। वे भले ही प्रत्यक्षतः किसी की उतनी बड़ी हानि न कर सकते हो पर उससे विरोध बैर भाव का वातावरण तो बनता ही है। जिसमें कि किसी को भी, कभी भी कुछ लाभ हुआ नहीं है।
अव्यवस्थित वाणी सबसे अधिक खतरनाक है। निन्दा चुगली से अन्य लोगों के प्रति तो विद्वेष पैदा होता ही है पर अपने स्वयं को भी यह अनुभव होने लगता है कि अपनी कही बात इसके पेट पड़ जाने पर इधर उधर फैले बिना रहेगी नहीं। इस आशंका के कारण उसे अविश्वासी बनकर रहना पड़ता है और कोई स्वजन भी उसके सामने पेट खोलकर बात नहीं करता।
क्रोध, आवेश के द्वारा होने वाली क्षति का हाथों हाथ दुष्परिणाम देखा जा सकता है। कटुवचन और अशिष्ट व्यवहार के रूप में प्रकट होता हैं। यह दोनों ही परस्पर एक दूसरे से बढ़कर है। इनके योग से मिला हुआ कटुभाषण यो दृश्य रूप में तो कोई बड़ी बात प्रतीत नहीं होता पर उसकी परिणति ऐसी होती है जिसके कारण खोदी गयी खाई कदाचित कभी भी न पाटी जा सकें।
शिष्टता और शालीनता का ध्यान रख कर बोली गयी वाणी सदा नम्रता और मधुरता से भरी पूरी ही होती है। इसका प्रभाव बदले हुए तेवरों को यथास्थान लाने में समर्थ होता है। मधुर भाषी लोग वैमनस्य को शान्त करते और सद्भावना का नये सिरे से शुभारम्भ करते देखे गये है। इस बुराई को छोड़ देना और उसे अच्छाई के रूप में बदल लेना यह कुछ ही दिनों के अभ्यास पर निर्भर है। अपने पर नम्रता का आरोपण करते हुए दूसरों को मानवोचित सम्मान प्रदान करते हुए यह सोच समझ कर बिना उतावली अपनाये बोला जाय तो उसका सत्यपरिणाम सुखद प्रतिक्रिया के रूप में परिलक्षित होता देखा जा सकेगा। शिष्टता, सज्जनता, मधुरता जैसी विशेषताओं से संभाषण कर सकना थोड़े दिनों के अभ्यास पर निर्भर है। कटु वचनों को सर्प के दाँत और बिच्छू के डंक के समतुल्य माना जाय तो कुछ अत्युक्ति न होगी। जिनमें यह दुर्गुण जितने अंशों में स्वभाव का अंग बन गया हो उन्हें उसका निराकरण करने के लिए तत्काल प्रबल प्रयत्न आरम्भ कर देना चाहिए। यह कौए का कोयल में बगुले का हंस में कायाकल्प हो जाने जैसी कहावत का प्रत्यक्ष दर्शन है। अव्यवस्था का दूसरा नाम है-असंयम, अनुशासन हीनता और उच्छृंखलता भी इसी को कहते है। यही कभी अराजकता जैसी दुर्धर्ष और दूरगामी दुष्परिणाम उत्पन्न करती देखी गई है। असंयम का स्वरूप होता है उपलब्ध उपयोगी वस्तुओं को निरर्थक या हानिकारक प्रयोजनों में बिखेर देना। इसे स्वेच्छापूर्वक लुटेरों का शिकार होने जैसी मूर्खता भी कहा जा सकता है।
असंयमों में चार प्रमुख है (1) इन्द्रिय असंयम (2) अर्थ असंयम (3) समय असंयम (4) विचार असंयम। समझा जाना चाहिए कि ये चारों ईश्वर प्रदत्त आदि महत्वपूर्ण शक्तियों को बड़े छिद्रों वाले फूटे घड़े में डालकर बहा देने के समान है। यदि इन छिद्रों को बन्द कर दिया जाय तो दैवी अनुकम्पा की तरह निरन्तर बरसती और अन्तराल के उद्गम से उभरती रहने वाली क्षमताओं के भण्डार किसी भी व्यक्ति को अति समर्थ एवं असाधारण कार्य कर सकने योग्य बना सकते है।
देखा यह जाता है कि सामान्य जन चटोरेपन की आदतों में निरत रह कर अपना स्वास्थ्य खोखला कर लेते है। दुर्बल और रोगी रहकर अकाल मृत्यु मरते है। यदि जिह्वा और जननेन्द्रिय को संयम में रखा जा सके तो शरीर समर्थ एवं मन समुन्नत स्तर का बना रहेगा। अर्थ संयम रखा जाय-सादा जीवन उच्च विचार की नीति का परिपालन किया जाय-औसत नागरिक स्तर का निर्वाह अपनाया जाय तो ईमानदारी से सीमित आजीविका कमाते हुए भी व्यक्ति सुखी और संतुष्ट रह सकता है।
समय ही जीवन है। एक एक क्षण को बहुमूल्य मणि मुक्तक मानकर उसका सदुपयोग करते रहा जाय तो व्यक्ति एक ही जीवन में कई जीवनों जितने महत्वपूर्ण कार्य कर सकता है। व्यस्त रहने वालों को न तो खुराफातें सूझती है और न कुसंग में पड़कर दुर्व्यसन सीखने की संभावना रहती है।
विचारों की शक्ति असाधारण है। यदि मस्तिष्क में कल्पनायें, आकाँक्षायें, योजनायें उच्च स्तरीय बनती रहें तो पतन की आशंका समाप्त होगी और सर्वतो मुखी अभ्युदय की पृष्ठभूमि बनती चलेगी। विचार ही व्यक्ति को ऊँचा उठाते है। आवश्यक संपर्क बनाते और साधन जुटाते है। इन चारों का असंयम ही व्यक्ति की अगणित क्षमताओं का अपहरण कर लेता है। इन्हें बचाया जा सके तो समझना चाहिए कि लुट जाने वाला वैभव अपने ही हाथों रह गया। अगले ही दिनों उसके बढ़ जाने और बीज से वृक्ष की तरह विस्तार पाने की संभावना से जुड़ गया।
व्यवस्था बनाने व सिखाने के लिए आमतौर से किसी कारखाने, उद्योग, परिसर विभाग आदि की की आवश्यकता पड़ती हे। वह शिक्षार्थी को उपलब्ध होती ही रहे, यह आवश्यक नहीं। फिर जहाँ प्रबन्ध करने के लिए पहुँच गया है, वह आवश्यक साधन एवं सहयोग मिल ही जाय, इसका कोई निश्चय नहीं। ऐसी दशा में यही सबसे सरल पड़ता है कि अपने आप में व्यवस्था प्रक्रिया का अभ्यास किया जाय। अपने शरीर पर अपना पूरा अधिकार है। तनिक सी इच्छा शक्ति का दबाव देते ही उसे कुछ भी करने के लिए तत्पर किया जा सकता है। शरीर सध गया तो समझना चाहिए कि सुदृढ़ स्वास्थ्य और दीर्घ जीवन का आधार–स्त्रोत हाथ लग गया। पैसे का अपव्यय न हो तो कम कमाने वाला व्यक्ति भी आय के अनुरूप व्यय का बजट बनाकर काम चलाता और सुखी संतुष्ट रह सकता है। समय की बर्बादी न हो तो योग्यता, सम्पादन और साधनों के उपार्जन में आश्चर्यजनक सफलता मिल सकती है। विचारों का उत्पादन हम स्वयं ही करते हे। उसकी लगाम पूरी तरह अपने हाथ है। इस बहुमूल्य पूँजी की अस्त व्यस्त रूप में बिखेरने के स्थान पर यदि उन्हें किन्हीं रचनात्मक कामों में लगाते रहा जाय तो कोई भी व्यक्ति अपने अभीष्ट प्रयोजनों में आशातीत सफलता प्राप्त कर सकता है। महामानवों के जीवन इतिहास इसी तथ्य को साक्षी देते हुए सर्वत्र पाये जायेंगे।
दूसरों को समझाना, संभालना, सुधारना कठिन हो सकता है। पर अपने सुधार परिष्कार में तो मनोबल की कमी के अतिरिक्त और कोई बाधा हो ही नहीं सकती। हिम्मत और दूरदर्शिता को अपनाये रहा जाय तो अपने शरीर और मन को ही नहीं, गुण, कर्म, स्वभाव को भी उच्च स्तरीय बनाने में सफलता मिल सकती है। आदतें बदली और सुधारी जा सकती है। जिस वातावरण में हम रहते है वह अपना ही चुना और पसन्द किया हुआ है। यदि उत्कंठा हो तो उसे पूरी तरह बदला जा सकता है। जिस प्रकार पिछले दिनों हेय स्तर का संपर्क बनाया गया था, उसी प्रकार उच्च स्तरीय वातावरण के साथ भी संपर्क साधा और प्रगति पथ पर बढ़ चलने के लिए उत्साहवर्धक वातावरण में प्रवेश किया जा सकता है। परिष्कृत व्यक्तित्व और वातावरण के साथ जुट जाना ही अभ्युदय की अनेकानेक संभावनाओं से भरा-पूरा रहना है।
काम में आने वाली वस्तुओं को भी अपने लिए परीक्षा के प्रश्नपत्र मानकर चलना चाहिए, जो सदा यह देखते रहते है कि हमें सँभाल कर सँजोकर ठीक तरह देखा गया या नहीं। जिनकी उपेक्षा की गयी है वे कुरूप लगेंगे और समय से पहले ही समाप्त होकर पलायन कर जायेंगे। इसके विपरीत यदि उन्हें सम्मान दिया गया है। संभाल कर सम्मानपूर्वक यथा स्थान रखा गया है तो बदले में वे हाथों हाथ उस सदाशयता को प्रतिफल प्रदान करेंगे। लोगों की आँखों में सुसंस्कारिता की शोभा सज्जा एवं कलाकारिता की छाप बिठायेंगे। बाहर वाले उस स्थान में प्रवेश करते ही यह अनुभव करेंगे कि यहाँ कोई सभ्य, सुसंस्कृत एवं कलाकार स्तर का व्यक्ति निवास करता है। इसके विपरीत बिखरी हुई, बेतरतीब पड़ी वस्तुएँ हर किसी से यह चुगली करती है कि जिसके के यहाँ वह आया है, वह आदत में फूहड़ किस्म का और सभ्यता की कसौटी पर अनपढ़ स्तर का है। भले ही वह पैसे वाला या अधिक पढ़ा लिखा ही क्यों न हो।
परिवार में कई सदस्य रहते है। उन सभी को साफ सुथरा और कायदे करीने का बनाना पड़ता है। उनमें से कुछ ही बेशऊर होते और आने वाले पर पूरे परिवार के सम्बन्ध में बुरी छाप छोड़ते है। ठीक इसी प्रकार यदि प्रयोग में आने वाली वस्तुएँ अस्वच्छ एवं अव्यवस्थित स्थिति में रखी हुई है तो वे निर्जीव होते हुए भी सजीव मुखर लोगों की तरह से इशारे में सारी पोल खोलकर रख देगी। धन, पद और शिक्षा आदि के आधार पर बड़प्पन की छाप डालने की जो कोशिश की गयी थी उस पर पानी फिर जायगा। मैली-कुचैली, अस्त व्यस्त, टूटी फूटी, बेसिलसिले रखी हुई वस्तुएँ घर में रहने वालों के घटिया स्वभाव और व्यवस्था बुद्धि से अपरिचित होने का इजहार करती है। स्वयं ही अपने आपको उपेक्षित अनुभव करती है और वहाँ से जल्दी ही कही चले जाने का मन बनाती है। भले ही वे चोर के हाथ में पड़े या कबाड़ी की दुकान में जाकर आधे चौथाई दाम में बिकें। ऐसे लोग पुरानी वस्तुओं को गँवाते और नई खरीदते रहने में इतना पैसा लुटाते है, जिसकी बचत से कितनी ही उपयोगी एवं आवश्यक वस्तुएँ खरीदी जा सकती थी।
लोग अपने घरों को सजाने के लिए कई प्रकार की तस्वीरें, खिलौने तथा दूसरी कीमती चीजों को खरीदते सुसज्जा की आकर्षक स्थिति बनाने का प्रयत्न करते हे। जिनके पास फालतू पैसा है, उनके लिए यह सब कठिन भी नहीं किन्तु मध्यम श्रेणी के लोग तो उतना खर्च नहीं कर सकते। इतने पर भी वे वस्तुओं को सुव्यवस्थित रखकर धनिकों से अधिक सुसंस्कृत सिद्ध हो सकते है। अपनी घरेलू वस्तुओं को यदि बिखरी हुई स्थिति में रखा जाय तो वे कूड़ा करकट भर प्रतीत होंगी। यदि इन्हें ढंग से रखा जाय तो वे सुरुचि का परिचय देने लगती है।
सभ्यता का पहला शिक्षण यही है कि अपने घर में रखी जाने वाली वस्तुओं में से प्रत्येक को सही प्रकार से सुनियोजित और सुव्यवस्थित ढंग से सजाकर रखा जाय। यदि यह सब सीखा जा सके तो समझना चाहिए कि व्यवस्था बुद्धि में एक महत्वपूर्ण मंजिल पार कर ली। अध्यात्म का क, ख, ग, यहाँ से आरंभ हुआ समझना चाहिए। एक सुव्यवस्थित व्यक्ति ही श्रेष्ठ साधक बन सकता है।
स्वामी विवेकानन्द के प्रवचनों से प्रभावित होकर किसी ने कहा-लगता है आपकी पहुंच ईश्वर तक है। आप मुझे उस तक पहुंच दीजिए। उसके मिलने का स्थान बता दीजिए।
स्वामीजी ने कहा आप अपना पता मुझे लिखा जाइए। जब ईश्वर को फुरसत होगी तब उसे आपके घर भेज दूँगा।
वह व्यक्ति अपने मकान का पता लिखाने लगा।
स्वामीजी ने कहा - यह तो ईंट चूने से बने घरौंदे का पता है। आप स्वयं अपना पता बताइये कि आप कौन है? किस प्रयोजन के लिए नियत थे और क्या कर रहे है?
व्यक्ति इनके प्रश्न में छिपी दार्शनिकता का संकेत समझा और इस नतीजे पर पहुँचा कि पहले आत्मसत्ता के स्वरूप और उद्देश्य का पता लगना चाहिए। बाद में ही ईश्वर के मिलन की बात बनेगी।
एक राजकुमार उस गाँव में दौरे पर आया तो एक ग्रामीण युवती पर आसक्त हो गया। उसके पिता पर उस लड़की का विवाह उससे कर देने का दबाव डालने लगा।
लड़की तैयार न थी। वह राजमहलों में अन्तःपुरों का उत्पीड़न जानती थी। उसने स्पष्ट मना कर दिया। पिता भयभीत था कि उस पर कोई आफत न आव।
लड़की ने समझ से काम लिया और राजकुमार से कहलवाया कि दस दिन बाद पधारें। तब उत्तर मिलेगा। राजकुमार चला जाय।
लड़की ने उसी दिन से दस्तों की दबा ले ली। भोजन बन्द कर दिया। मल को एक घड़े में बंद करती रही। दस दिन में शरीर पुरी तरह सूख गया। नहाई नहीं सो शरीर से बदबू आने लगी। खुले बालों में जुएं पड़ गये। मरणासन्न सूखी लकड़ी जैसी उसकी आकृति बन गई।
राजकुमार आया। उस युवती के पास गया उसकी दुर्दशा देखी। पूछा तुम्हारे रूप लावण्य का क्या हुआ? युवती ने मल संग्रह वाले घड़े की ओर इशारा किया कि उसमें बंद है। खोलकर देखा गया तो उसमें संचित मल की भयंकर बदबू आ रही थी।
राजकुमार सोचने लगा कि क्या इसी का नाम सौंदर्य है? उसने विचार बदल लिया। वापस लौट गया। युवती को भी संतोष की साँस लेने का अवसर मिला। ज्ञान से आवेशों को उतारा जा सकता है।
अन्यान्य शक्तियों की तरह मानवी चेतना की प्रगति में जैव चुम्बकत्व की भी एक महत्वपूर्ण भूमिका है। यह शक्ति समस्त संसार में वायु एवं आकाश तत्व, क्वान्टा तरंगों, सूक्ष्म बिखरे प्रकाश किरणों के रूप में समाई हुई है। मानवी काया ही नहीं वरन् जीव-जन्तुओं में यही जैसे चुम्बकत्व कभी प्रत्यक्ष चुम्बक के रूप में एवं कभी प्रकाश किरणों के रूप में परिचय देता है, किन्तु जीवितों में यह जैव चुम्बक जो प्रमुख कार्य करता है, वह है इसकी उपस्थिति से शरीर की टूट फूट का अपनी पूर्व की स्थिति को प्राप्त कर लेना।
“द रुट्स आफ काशीयसनेस” नामक पुस्तक में प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक जेफरे मिशलोव ने लिखा है कि पाश्चात्य देशों में इस जैव चुम्बकीय शक्ति का पता लगाने हेतु अनेक प्रयोग सम्पन्न हुए है। सुप्रसिद्ध रूसी मनोवैज्ञानिक अलेक्जेन्डर गोवौच ने अपनी शोध के दौरान पाया है कि प्रत्येक जीवित पदार्थों के जीव कोशों से अदृश्य विकिरण निःसृत होता है। इसे उन्होंने जैविक विकिरण नाम दिया। ठीक ऐसी ही जानकारी मास्को विश्वविद्यालय में वायोफिजिक्स के चेयरमैन डा बोरिस ने भी दी है। डी बोरिस के अनुसार जीव-जन्तुओं के जीव कोशों से निकलने वाला चुम्बकीय प्रकाश ठीक वैसा ही है जैसे इन्फ्रारेड किरणों क्षरा प्रकाश निस्सृत होता है। अंधेरे में भी इससे गुप्तचरी की जा सकती है। उन्होंने देखा कि पौधों के प्रत्येक स्वतंत्र जैव कोशों से हल्का चमकीला दृश्य प्रकाश निकलता है जो पत्तों में परिलक्षित होता है इन प्रकाश किरणों में चुम्बकीय शक्ति विद्यमान रहती है। यह प्रकाश निरुद्देश्य अथवा अस्त व्यस्त नहीं निकलते वरन् पौधों के चयापचय एवं प्रकृति के अनुरूप निकलते है। इन किरणों का सम्बन्ध रोगों से भी है, जिनके बारे में अब पूर्व ही पता लगाया जा सकता है। पौधों में यह प्रकाश जड़ में निहित नमक, लवण, खाद की अधिकता अथवा न्यूनता एवं बैक्टीरिया, फन्गस के हमलों पर निर्भर करता है। इससे स्वस्थ एवं रोगी पौधों में भिन्नता का परिचय मिलता है। ठीक ऐसी ही चुम्बकीय प्रभा मनुष्य के शरीर से भी निःसृत होती है, जो तेजोवलय से भिन्न दिखाई पड़ती है। जिसमें रोग के आगमन की पूर्व चेतावनी का संकेत रहता है। अमेरिका के वैज्ञानिक विलियम जोइन्ल ने इस सम्बन्ध में गहन अध्ययन के उपरान्त विशेष तथ्यों को उजागर किया है। पाश्चात्य जगत में इस आधार पर रोगी बनने से पूर्व ही सुरक्षा के उपाय किये जाने एवं रोग मुक्त रहने के विभिन्न प्रयोग चल रहे है। यह चुम्बकीय शक्ति वास्तव में प्राण ऊर्जा का ही एक रूपांतरित स्वरूप है। यह प्राण जिस प्राणी में जिस अनुपात में होता है, वह व्यक्ति उतना ही स्फूर्तिवान, तेजस्वी एवं साहस का धनी होता है जबकि इसका अभाव मनुष्य को निस्तेज, उदास मुरझाये फूल सा लुंज पुंज एवं वीर्यहीन बना देता है।
यह चुम्बकीय शक्ति मात्र रोगों के बारे में ही जानकारी नहीं देती है वरन् हड्डियों की टूट फूट को ठीक करने, एवं अस्त व्यस्त ऊतकों को व्यवस्थित करने में इसकी अहम् भूमिका होती है। इस सम्बन्ध में अमेरिका के मूर्धन्य शरीर शास्त्री डा हेराटड एम्बर ने वरिष्ठ मनोविशेषज्ञ लेबनार्ड जे राबिट्ज के साथ “जीवन विकास के विद्युत चक्रीय सिद्धान्त” पर गहन अनुसंधान किया है। सूक्ष्मग्राही यंत्र-उपकरणों के माध्यम से संवेदनाओं की शरीर पर प्रतिक्रिया का अध्ययन करने पर उन्होंने पाया है कि जीवित प्रोटोप्लाज्म के विकास के लिए एवं टूट फूट की मरम्मत हेतु यह जैव विद्युत चुम्बकीय शक्ति महती भूमिका निभाती है। इसे उन्होंने “लाइफ-फील्ड” नाम से सम्बोधित किया है। उनके अनुसार लाइफ फील्ड का मानवी गुण कर्म-स्वभाव से सीधा सम्बन्ध है। व्यक्ति के चिन्तन, चरित्र, दृष्टिकोण एवं व्यवहार के अनुसार इसमें घट बढ़ होती रहती है मनुष्य की प्राणशक्ति यही है जो शरीर के अंग-अवयवों, कोशिकाओं की विकृतियों को दूर करती और टूटी हड्डियों को शीघ्र जुड़ने में सहायक होती है। भावनात्मक स्तर में उत्कृष्टता की अभिवृद्धि के साथ जीवन क्षेत्र अधिकाधिक सघन होता चला जाता है, फलतः व्यक्ति पूर्णतः स्वस्थ सन्तुलित एवं सुखी समुन्नत बनता चला जाता है। इसकी विरलता व्यक्ति की आन्तरिक कमी को दर्शाती है। यह मस्तिष्क के आसपास विशेष रूप से दृष्टिगोचर होती है जिसका चित्रांकन करना अभी सम्भव नहीं है अब इसमें आने वाला उतार चढ़ाव व्यक्ति की बाह्य बनावट से सम्बन्धित नहीं है। वरन् आन्तरिक बनावट एवं पर्यावरण के विद्युतीय दबाव से सम्बन्धित है। वातावरण के आयन मण्डल में जब कोई गम्भीर उथल पुथल होती है, उसका प्रत्यक्ष प्रभाव हमारे शरीर की सामान्य जैव विद्युत चुम्बकीय शक्ति पर पड़ता है। उससे सामान्य क्रियाशीलता गड़बड़ा जाती है। उस उथल पुथल व असंतुलन से ही शरीर में कई तरह की मानसिक व शारीरिक व्याधियां उठती दिखाई देती है। किन्तु वातावरण के आयनों का प्रभाव कमजोर अंतःकरण एवं हीन वृत्तियों वाले मनुष्यों पर अधिक पड़ता देखा गया है, जबकि सबल शक्ति वाले इसे यो ही झेले लेते है। यही जीवनी शक्ति या जैव चुम्बकीय शक्ति का चमत्कार है।
डा राबिट्ज ने पाँच सौ व्यक्तियों पर विलिय प्रयोग किये तथा पाया कि मनोरोगी की विभिन्न मनोदशाओं के अनुरूप इस जीवन क्षेत्र में परिवर्तन दिखाई देता है। यह मनोविकृति से विशेष सम्बन्धित है। हीन भावना एवं आत्मबल शक्ति रहित व्यक्तियों का यह क्षेत्र सीमित एवं घटते वाला होता है जिसमें तन्तुओं एवं शारीरिक गड़बड़ियों को ठीक करने की क्षमता कम होती है। फलस्वरूप शारीरिक रूप से स्वस्थ दिखाई पड़ने वाले व्यक्ति इसकी न्यूनता के कारण, थोड़े थोड़े संकट, कष्ट कठिनाइयों से डर कर आत्म-हत्या जैसे .... कृत्य करते देखे गये है एवं ऐसे व्यक्तियों की शारीरिक निवृत्ति लम्बे समय तक बनी रहती है। विशेष उपचार करने पर भी टूट फूट की भरपाई जल्दी नहीं हो पाती। जबकि इसकी अधिकता, अर्थात् निर्मल, आत्मबल सम्पन्न व्यक्ति युद्ध के मैदान में घायल होने, अंग भंग होने की दशा में भी लड़ते रहते है। इससे इसकी महत्ता का अनुमान लगाया जा सकता है।
इस सम्बन्ध में न्यूयार्क अस्पताल के डा0 राबर्ट ओवेकर ने उभयचर जीवों पर ऐसे कई प्रयोग किये जिससे जाना जा सके कि इन के पैरों की चोट कैसे ठीक हो जाती है, एवं हड्डियां टूटने पर जल्दी कैसे जुड़ जाती है। उन्होंने देखा कि चोट पहुँचे पैरों की हड्डियां वहाँ से तुरंत “करेन्ट आफ इन्जरी” (चोट लगने का सन्देश) प्रवाहित करती है, जो मस्तिष्क के पुनः उत्पादक तन्तुओं से जुड़ी होती है, वहाँ से तत्काल पुनः उत्पादक शक्ति आकर अपनी सक्रियता के द्वारा टूटे अंगों को ठीक कर देती है। बेकर ने आगे बताया है कि यही सिद्धान्त मनुष्य की टूटी हुई हड्डियों, अथवा तन्तुओं को छोड़ने में लागू होता है। यह विद्युत धारा प्रचण्ड रूप से संवेदना सम्पन्न, भावना एवं आत्मबल सम्पन्न व्यक्तियों में तत्काल उत्पन्न होती है और व्यक्ति को स्वस्थ बना देती है। जबकि संवेदना रहित व्यक्तियों में अधिक समय लगता है।
मनोविशेषज्ञ डा डी. एच विल्सन के मतानुसार इस चुम्बकीय क्षेत्र का विभिन्न तन्तुओं, रक्त दबाव, त्वचा की क्षतिरोधक क्षमता आदि से कोई सम्बन्ध नहीं है, क्योंकि शारीरिक बनावट में एकता है किन्तु मानसिक कमी अथवा मानसिक रूप से सबल होने पर इसका प्रभाव भिन्न देखा गया है। इससे स्पष्ट होता है कि आध्यात्मिक जीवन चर्या का सम्बन्ध स्वस्थ शरीर और सुसंस्कृत मन के निर्माण से है इसके विपरीत जीवन चर्या अपनाने पर तन्तुओं की टूट-फूट-मरम्मत करने वाली जीवनी शक्ति निरन्तर बढ़ती ही जाती है।
मानवी काया इच्छाओं, भावनाओं, विचारणाओं द्वारा संचालित है। जैव चुम्बकत्व की इसमें प्रधान भूमिका देखी जा सकती है। यदि चिन्तन का बिखरा हुआ प्रवाह ऊर्ध्वगामी है। तो चुम्बकीय धाराएँ शक्ति संवर्धन एवं मनोबल संकल्प बल में प्रचण्ड बुद्धि करती देखी जा सकती है। यही प्रवाह अधोगामी होने पर शक्ति का क्षरण करता व काय संतुलन को अस्त व्यस्त कर देता है। एकाग्रता व संयम द्वारा शक्ति का निग्रह व उसे ऊर्ध्वगामी बनाने में ही मनुष्य की समझदारी है।
सम्राट अशोक ने बुद्ध धर्म के प्रचार के लिए सौ करोड़ मुद्राएँ दान करने का संकल्प लिया था। उसके हाथ जितना पैसा आता उसे तत्काल निर्धारित प्रयोजन के लिए भेजा जाता।
अशोक बुद्ध हो गये। उनकी सम्पदा पर दूसरों का अधिकार हो गया। अब कुछ दे सकने की स्थिति में वे न थे। मरते समय उनने आसपास की सारी सामग्री पर नजर दौड़ाई किन्तु सूखे आंवले के अतिरिक्त उनके पास और कुछ भी न था। उनने वह आँवला ही बिहार भेज दिया। उस दिन बनी दाल में उस आंवले को पीसकर डाल दिया।
सबने एक स्वर में घोषणा की कि अशोक के संकल्प में अब कुछ भी कमी नहीं रही। उन्होंने, जो कुछ था उसका सर्वस्व दान कर दिया।
साधारणतया मनुष्य को अपने निकट परिसर की तथा सम्बन्धित वस्तुओं और घटनाओं की ही जानकारी रहती है। वर्तमान से अधिक भविष्य तथा विगत जन्मों की घटनाओं का उसे ज्ञान नहीं होता। यह एक सीमित दिशा में देख, सुन, समझ, सोच सकता है। जो उसका सम्बन्ध असीम सत्ता से है। किन्तु इसकी भी जानकारी प्रत्येक मनुष्य को कहा रहती है। कुछ ऐसी घटनाएँ दैनिक जीवन में यदा कदा घट जाती है जिनके आधार पर कहा जा सकता है कि मनुष्य में कोई विलक्षण शक्ति कार्य करती है जो भूत, भविष्य, वर्तमान में झांकने की शक्ति रखती है। जिसके आधार पर मनुष्य को त्रिकालदर्शी होने तथा पूर्वाभास, भविष्य दर्शन, भविष्य कथन करने की शक्ति प्राप्त हो जाती है। कितने ही व्यक्तियों में यह अनायास उभरती है। कितने ही प्रयत्न पूर्वक उसे विकसित कर लेते है।
पृथ्वी की ऊपरी परत को देखने से तो ऐसा लगता है कि उसमें घास-पास, वृक्ष वनस्पति उगाने भर की क्षमता है किन्तु उसकी गहराई में खोदने पर बहुमूल्य रत्न राशि मीठे तत्व का अगाध महासागर तथा अनेकों प्रकार की बहुमूल्य खनिज सम्पदा छिपी पड़ी मिलती है। ठीक इसी प्रकार शरीर की दृश्य श्रम शक्ति और मनन चिन्तन की शक्ति से भी परे गहराई में जाने पर उन क्षमताओं का अस्तित्व सामने आता है जिन्हें अतीन्द्रिय क्षमता अथवा दैवी अनुकम्पा के नाम से जाना जाता है। वस्तुतः वह व्यक्ति की अविज्ञात उच्च स्तरीय सामर्थ्य ही है, जिसे प्रयत्नपूर्वक जाग्रत किया और बढ़ाया जा सकता है। इन समस्त अलौकिक क्षमताओं के केंद्र व्यक्ति के मस्तिष्क में विद्यमान है जो चेतना से सम्बन्धित है तथा अतिसूक्ष्म है। ये व्यष्टि सत्ता को समष्टि से जोड़ते है।
प्रयत्न पूर्वक अतीन्द्रिय क्षमता विकसित कर लेना एक विज्ञान सम्मत प्रक्रिया है किन्तु जब यह शक्ति स्वयमेव उभरती है और भूत भविष्य की घटनाओं की जानकारी सामने आती है तब अनायास कोई विज्ञान सम्मत समाधान नहीं सूझ पड़ता है। अतः चमत्कार मानने पर लोगों को विवश होना पड़ता है। जबकि होता यह है कि किन्हीं व्यक्तियों के पास पूर्व संचित ऐसे संस्कार होते है जो परिस्थितियों वश अनायास ही उभर आते है। वर्षा के दिनों में ऐसे कितने ही पौधे घास पास के रूप में उपज पड़ते है, क्योंकि उनके बीच जमीन में पहले से ही दबे पड़े रहते है। यही बात उन व्यक्तियों पर लागू होती है, जो बिना किसी प्रकार की अध्यात्म साधनाएँ किये अलौकिक क्षमताओं का परिचय देने लगते है।
पिछले दिनों इस क्षेत्र में काफी शोध अनुसंधान हुआ है और उन प्रयासों के फलस्वरूप उपयोगी निष्कर्ष भी सामने आये है। परामनोविज्ञान, मैटाफिजिक्स, डाइकोसाइबरनेटिक्स, साइकोलाइनेसिस जैसी कितनी ही चेतनात्मक विधाएँ अब रेडियो, इलेक्ट्रानिक्स, कम्प्यूटर विज्ञान आदि की तरह विकसित हो रही है। अचेतन मन, सुपर माइण्ड आदि की सामर्थ्य के सम्बन्ध में जैसे-जैसे जानकारियों के परत खुल रहे है वैसे स्पष्ट होता जा रहा है कि साधारण सा लगने वाला मनुष्य असीम-अनन्त शक्तियों क्षमताओं का भण्डार है। कठिनाई मात्र इतनी भर है कि उसकी अधिकांश अंतः शक्तियाँ प्रसुप्त अविज्ञात स्थित में पड़ी है जिन्हें अब तक जाग्रत होने का उसने अवसर ही नहीं प्रदान किया। जन्म-जन्मान्तरों के अथवा वर्तमान जीवन में एकत्रित कषाय-कल्मषों की मोटी परत को हटाना यदि संभव बन पड़े तो हम में से हर कोई अतीन्द्रिय सामर्थ्यों का पुंज दृष्टिगोचर होगा।
पाश्चात्य परामनो विज्ञानियों ने अतीन्द्रिय क्षमताओं को चार मुख्य भागों में विभक्त किया है (1) परोक्ष दर्शन अर्थात् वस्तुओं और घटनाओं की वह जानकारी जो ज्ञान प्राप्ति के सामान्य आधारों के बिना ही उपलब्ध हो जाती है (2) भविष्य ज्ञान बिना किसी मान्य आधार के भविष्य के गर्भ में झाँककर घटनाओं को घटित होने से पूर्व जान लेना (3) भूत कालिक ज्ञान। (रिट्रोकोग्नीशन) बिना किसी साधन के अविज्ञात भूतकालीन घटनाओं की जानकारी (4) टेलीपैथी - अथवा विचार सम्प्रेषण-बिना किसी आधार अथवा यंत्र के अपने विचार दूसरों के पास पहुँचाना तथा दूसरों के विचार ग्रहण करना। इनके अतिरिक्त भी साइकोकाइनेसिस, हिप्नोसिस साइकिक फोटोग्राफी हाऊसिंग, “आईलैस”। साइट, बायोरेपर्ट जैसी अनेकानेक विधाएँ है जो दर्शाती है कि अतींद्रिय सामर्थ्य का, इ.एस.पी. का क्षेत्र कितना बड़ा है।
शास्त्र कारों ने इसका आधार विज्ञान मय कोष को माना और उसे विशिष्ट क्षमता सम्पन्न बताया है। जिसका केन्द्र अचेतन मन है। इसका आधार प्राण विद्युत को माना गया हैं। यह एक ऐसा चुम्बक है जो सांसारिक जीवन में प्रभावोत्पादक शक्ति एवं प्रतिभा के रूप में दृष्टि गोचर होता है। उनका कहना है कि इस तत्व को यदि अधिक सक्षम बनाया जा सके तो कितनी ही विशेषताएँ उत्पन्न हो सकती है, जिनसे व्यक्तित्व में असाधारण परिवर्तन संभव है। इस ऊर्जा में वह शक्ति है जो सूक्ष्म जगत के प्रवाहों को अपनी ओर मोड़ सकने, और उसके संपर्क से कई महत्वपूर्ण कार्य सिद्ध कर सकने की सामर्थ्य रखती है। विज्ञानमय कोष को साधने उसे परिष्कृत, परिमार्जित करने के उपाय-उपचारों का आश्रय लेकर अतींद्रिय क्षमताओं का विकास किया जाना संभव है, वैज्ञानिक अब इस तथ्य को स्वीकारने लगे है।
इस संदर्भ में अमेरिकी मनोवैज्ञानिक डा. नेलसन बोल्ट का कथन है कि मनुष्य के अन्दर एक बलवती आत्म चेतना रहती है, जिसे जिजीविषा या प्राणधात्री शक्ति कह सकते हैं। यह न केवल रोग निरोधक एवं अस्तित्व संरक्षण के अविज्ञात साधन जुटाती हैं वरन् चेतना जगत में चल रही उन हलचलों का पता लगा लेती है जो संकट या विपत्ति बन कर अपने या अपनों से संबंधित परिजनों पर आ सकती हैं। सुख-सुविधा जैसी परिस्थितियों के संकेत अविज्ञात से भले ही न मिले किन्तु अनिष्ट की आशंका या अस्तित्व के संकट की सूचना अविज्ञात के अंचल से मिलती रहती है। इससे यह सिद्ध होता है कि दृश्य जगत से परे कोई परम चेतन सत्ता विश्व ब्रह्मांड की संतुलन व्यवस्था, कर्म बद्धता, बनायें हुए है और उसका संचालन संरक्षण सतत् करती रहती है।
सुविख्यात परामनोविज्ञानी डा. हैराल्ड के अनुसार यह आवश्यक नहीं कि पूर्वाभास के संकेत स्वप्न, तन्द्रा या निद्रावस्था में ही मिलते हो। अपितु जाग्रत और चेतन अवस्था में ही कितनी ही बार मनुष्यों को ही नहीं वरन् पशु पक्षियों तथा अन्य जीवधारियों तक को संकटों से बचने जीवन रक्षा के संकेत प्रकृति से मिलते रहते है, जिनका सामयिक परिस्थितियों से कोई संबंध नहीं होता। पूर्वाभास के संबंध में दो व्यक्तियों की परस्पर सघन आत्मीयता का बहुत बड़ा हाथ रहता है। जर्मन मनः शास्त्री डा. हेमब्रुक ने अपने शोध निष्कर्षों में इस बात का उल्लेख किया है कि अतींद्रिय क्षमता शक्ति पुरुषों की अपेक्षा नारियों में अधिक पाई जाती हैं, क्योंकि उनके स्वभाव में में कोमलता हृदय में करुणा, दया, ममता, उदारता जैसे सद्गुणों का बाहुल्य रहता है। इसी कारण नारियों को अध्यात्म क्षेत्र में अधिक शीघ्र सफलता भी मिलती है।
योगशास्त्रों में वर्णित है कि सतत् साधना एवं योगाभ्यास करते-करते मनुष्य में दिव्य शक्तियों का प्रादुर्भाव होने लगता है कि जिन्हें सिद्धियों के नाम से जाना जाता हैं। दिव्य दर्शन, दिव्यश्रवण, दूर दृष्टि भूत भविष्य कथन, महिमा, लघिमा, गरिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व, वशित्व आदि अनेकों सिद्धियों का उल्लेख हैं। वैज्ञानिक आधारों के अभाव में अब तक इन्हें कल्पित माना जाता था, किन्तु अनेकानेक घटनाक्रमों, सिद्धि अवस्था को प्राप्त महामानवों ऋषिकल्प व्यक्तित्वों का विश्लेषण-परीक्षण करने पर वैज्ञानिकों ने पाया है कि अतीन्द्रिय सामर्थ्य केवल कहने सुनने तक सीमित नहीं है वरन् यह तथ्य पूर्ण और विज्ञानसम्मत प्रक्रिया है। मनोनिग्रह योग-साधना की विविध प्रक्रियाएँ अपनाकर इन्हें उभरा जा सकता है और उसके द्वारा विश्व-ब्रह्माण्ड में संव्याप्त परम चेतना से तादात्म्य स्थापित कर लाभान्वित हुआ जा सकता है।
साम्यवाद के जन्मदाता महर्षि कार्लमार्क्स अपना अमर ग्रन्थ कैपीटल लिखने में लगे हुए थे। उन्हें पूरा समय पुस्तकालयों से नोट एकत्रित करने में लगाना पड़ता था। परिवार निर्वाह एक समस्या थी। उसका हल हुए बिना न बच्चों का पालन होता था, न साहित्य सृजन की सामग्री जुटती थी मार्क्स की धर्मपत्नी ने वह कार्य अपने ऊपर ओढ़ा। वे घर का काम बच्चों का पालन तो करती ही थी साथ ही उनने एक सस्ते दाम में चल सकने वाला ग्रह उद्योग आरंभ किया। वे कबाड़ियों के यहाँ से पुराने कोट खरीद के लाती। उनमें से छोटे बच्चों के कई तरह के कपड़े बनाती और फिर उन्हें सिर पर रखकर गरीबों के मुहल्लों में बेचने जाती। पति के आदर्शवादी कार्य में सहायता करने के लिए उतना कठिन श्रम करना उनने ने खुशी-खुशी स्वीकार किया। इसी सहायता के बल पर मार्क्स इतना महान कार्य सम्पन्न कर सकें।
मानवीय जीवन की बाह्य गतिविधियाँ व विविध क्रिया माप अन्तराल की जिन हलचलों से संचालित हो तदनुरूप क्रियान्वित होते हैं, ..... षियों ने उसे भावना का नाम दिया है। यह भावना विचारणा के रूप में परिपक्व होती तथा क्रिया के रूप में अपनी अभिव्यक्ति करती है।
मनस्तत्वविदों ने अपने अध्ययन में स्पष्ट किया है कि भावनाओं का उद्गम क्षेत्र मनुष्य का अपना अन्तराल है। सम्मिश्रित क्रिया के आधार पर इनकी ब्राह्माभिव्यक्ति होती है। इस सम्मिश्रित प्रक्रिया के आधार पर ही इनके दो वर्ग किये गये है, सद्भावनाएँ व दुर्भावनाएँ। इनकी परिपक्वावस्था के इसी तरह दो रूप है- सद्विचार, दुर्विचार। परिपक्वता के बाद इनकी अभिव्यक्ति भी विविध रूपों में होती है, सत्कर्म-दुष्कर्म।
मनःशास्त्रियों तथा व्यवहार विज्ञानियों ने अपने व्यापक अध्ययन के आधार पर यह स्पष्ट किया है कि यदि भावनाओं को परिष्कृत करना सम्भव बन पड़े तो व्यवहार भी उन्नत और प्रखर बन पड़ेगा। अध्येताओं ने बताया है, कि विकास की प्रक्रिया के अनुरूप भावात्मक क्षेत्र का विकसित होना भी अनिवार्य हैं।
अल्बर्ट आइन्स्टीन कॉलेज आफ मेडिसिन, न्यूयार्क में साइकियाट्री के प्राध्यापक तथा ‘प्रोग्राम इवाल्यूशन एण्ड क्लीनिकल्रिसर्च’ के निदेशक राबर्ट प्लुतचिक अपनी कृति “ए जनरल साहकोइवल्यूशनरी थ्योरी आफ इमोशन” में बताते है कि भावनात्मक विकास की सामान्य गति पशुत्व से मनुष्य की ओर होती है। पाशविक भावनाओं का जिक्र करते हुए फिलाडेल्फिया के डी.ओ.एवं. “ द बुक आफ साइकोलॉजी” में कहते है पशुओं में भावनाओं का दायरा प्रायः कामुकता, घृणा, द्वेष, संतान के प्रति मोह आदि तक सीमित रहता है। इसी के अनुरूप उसकी अभिव्यक्ति अपनी जनसंख्या में वृद्धि करने भोजन खोजने आदि में होती है। डार्विन ने पशु व्यवहार की व्याख्या इसी परिधि में की है।
विकास के परिणाम स्वरूप मनुष्य स्तर पर भावनात्मक व व्यवहारिक क्षेत्र भी विकसित होते है। किन्तु इस विकास के दौरान यह पाशविक संस्कार पूर्णतया नष्ट नहीं होते अपितु अवशेषी रूप में मन के अवचेतन स्तर में सतत् बने रहते है।
मनोविद फ्रायड ने इसी कारण अवचेतन को गतिशील और आदिम कहा है। इसको उसने दमित इच्छाओं और स्मृतियों का भण्डार बता कर मानव को बर्बर, बालक और पशु का प्रतिनिधि के रूप में निरूपित किया है। फ्रायड की सीमित दायरे में सिमटी खोज को मनोविज्ञानी जूँग न और अधिक फैलाया है। उनके अनुसार अचेतन व्यक्तिगत भी और सामूहिक भी है। व्यक्तिगत अचेतन में फ्रायड के अधोचेतन अवचेतन सम्मिलित है। सामूहिक अचेतन में मूल प्रवृत्तियाँ एवं आर्चीटाइप्स है।
फ्रायड की अध्ययन की सीमा बद्धता इस कारण है कि उसने समूचे मानवीय व्यवहार को इसी अचेतन क्षेत्र से उपजी पाशविक भावनाओं के द्वारा, संचालित बताया है। इसी को उसने मानवीय प्रकृति कहा है जबकि वह मानवीय प्रकृति न होकर इस में उत्पन्न विकृति है। कार्लजुँग ने उनकी विवेचना की संकीर्णता का कारण स्पष्ट करते हुए कहा है कि फ्रायड ने चूँकि सारे विकृति मानसिकता वाले मानोरोगियों का अध्ययन किया इसी कारण वह मात्र इसी पक्ष देख सके।
तथ्य भी है अचेतन क्षेत्र जिसमें अवशेषी पाशविक संस्कार हैं, बाह्य उद्दीपन प्राप्त होने पर पाशविक भावनाओं को जन्म देते है। तद्नुरूप विचारणा व क्रिया में भी पाशविकता की झलक दिखाई देती है।
श्री अरविन्द ने इस स्तर को अचेतन कहा है। उनके अनुसार यह अवचेतन सभी परिवर्तनों का विरोध करता है। वह उस आलस्य, दुर्बलता, अस्पष्टता, अज्ञान कोसता को स्थिर रखता और वापस लाता है जो कि भौतिक शरीर मानव और प्राण को प्रभावित करता है, अथवा छिपे हुए भय इच्छाओं, क्रोध और वासनाओं को जाग्रत करता है।
फ्रायड अपना मनोविज्ञान इसी क्षेत्र तक सीमित कर दिया है। अवचेतन स्तर के उपर्युक्त परिणाम बाह्य उद्दीपनों की सम्मिश्रित क्रिया के बाद ही घटित होते है। इसी स्तर में निहित पाशविक संस्कारों को नष्ट करने की प्रक्रिया भारतीय चिन्तन में मानसिक विकास के नाम से जानी जाती है। इसी विनष्टीकरण की प्रक्रिया को वेदान्त ने मनोदशा का नाम दिया।
मनोविश्लेषण वादी यह मानते है कि यौन वासनाओं व कला, धर्म साहित्य का एक ही समान क्षेत्र अचेतन है। इस विरोधाभासपूर्ण उक्ति का समाधान और औचित्य पूर्व दिशा दर्शन देते हुए श्री अरविंद स्पष्ट करते है कि मानव जीवन कर उच्चतर प्रक्रियाएँ कला, धार्मिक व गुह्य अनुभव अतिचेतन स्तर से संबंधित है। वे “पैसेज आफ योग” में बताते है अवचेतन नहीं अतिचेतन ही वस्तुओं का यथार्थ आधार है। वस्तुतः यही हमारी वास्तविक प्रकृति है।
किन्तु वर्तमान परिवेश में भावनात्मक स्तर व्यवहारिक क्रियाकलापों पर दृष्टि डालने से स्पष्ट होता है कि इनका संचालन क्षेत्र अवचेतन होकर रह गया है। इसका एकमात्र कारण है-तद्नुरूप बाह्य उद्दीपनों की भरमार। सिनेमा और टेलीविजन द्वारा नंगे फूहड़ दृश्यांकन, अश्लील साहित्य की बाढ़ चारों तरफ व्याप रहा प्रदूषित व तनाव पूर्ण वातावरण जो अवचेतन के इन्हीं पशु संस्कारों को उद्दीप्त कर ऐसी भावनाओं का सृजन कर रहा है जिसे दुर्भावनाओं की संज्ञा दी जानी उचित है। परिणाम स्वरूप दुर्विचार दुश्चिन्तन में अभिवृद्धि हो रही है एवं दुष्कर्म ही अवाय गति से मानव स्वभाव के अंग बनते रहे है।
मनोविदों ने भावनाओं की इस गति को रिट्रोग्रेसिव नाम दिया है। जिसका सीधा तात्पर्य है मनुष्य का पशुत्व को ओर उन्मुख होना। यदि यह गति देवत्व की ओर होती है तो इसे प्रोगेसिव कहा जाता है। किन्तु स्थिति की विपरीतता के कारण प्रथम लक्षण अधिक उभरता दिखाई देता है।
भौतिक वादी सभ्यता जिस राष्ट्र, जिस समाज व जिस क्षेत्र में जितनी अधिक बढ़ी है उतने ही अधिक अवाँछनीय उद्दीपन जन मानस के अवचेतन स्तर को प्राप्त हुए है। तद्नुरूप विचार और व्यवहार भी अधोमुखी बना है। मनो विज्ञानियों ने भारत की स्थिति का सर्वेक्षण करने के उपरान्त बताया है कि यहाँ के बड़े नगर जो भौतिकता की दृष्टि से उन्नत व सक्षम माने जाते है उसी अनुपात में पाशविक उद्दीपन निस्सृत कर रहे है। अवचेतन के ऊपर इनकी क्रिया उसी के अनुपात में पाशविक घटनाओं, अपराधों की बाढ़ पैदा कर रही है।
मनःशास्त्री इराप्रोगोफ ने अपने ग्रंथ -”साइकोलॉजी .... ए रोड टू पर्सनल फिलासफी” में कहा हैं कि भोगवादी संस्कृति जिस गति से बढ़ेगी उसी गति से जन मानस का उद्दीपन प्राप्त करता रहेगा। परिणाम स्वरूप विचारणीय क्रिया भी पशुत्व की ओर करेगी। ऐसी स्थिति में हिंसा अपराध विघटन बढ़ते ही रहेंगे। इनको रोकने के लिए किए जा रहे सभी उपाय उसी तरह सिद्ध होंगे जैसे पेड़ को बचाने के लिए उसकी जड़ को न सींच कर खाद्य पानी पत्तियों को देकर उन्हें हरा भरा रखने का प्रयत्न करना। भावनाओं की इस रिट्रोग्रेसिव गति के कारण मानव समुदाय पुनः पशुओं के झुण्ड के रूप में परिवर्तित हो जाएगा। अतः यह आवश्यक हो गया है कि जन मानस के चिन्तन की उल्टी दिशाधारा को उलट कर सीधा किया जाये। उसे सही दिशा में सोचने और करने का विवश किया जाये। भावनाओं के परिष्कार में ही उज्ज्वल भविष्य की संभावनाएँ निहित है।
मठ के पड़े महन्त तीर्थ यात्रा पर गये। एक शिष्य को अपना स्थानापन्न बना गये थे। अनुपस्थिति में भी चढ़ावे के पैसे और मिष्ठान पकवान की भरमार होती रही।
शिष्य सोचने लगा कि महन्त को यहाँ से भगाया जा सके और वह स्थान मुझे बैठने के लिए मिल जाए तो अच्छी जिन्दगी कटे। वह उसी के लिए तरकीब ढूँढ़ने लगा। तो एक दांव−पेंच उसकी समझ में भी आ गया।
उसने अफवाह फैला दी कि महन्त जी को तीर्थ यात्रा के बीच भारी सिद्धि मिल गई है। उनकी दाढ़ी के हर बाल में ऐसी करामात उत्पन्न हो गई है कि उसे कोई ताबीज में बन्द करके रख ले तो सभी मनोकामनाएँ पूर्ण हो जाय। इस क्षेत्र के सभी लोग महन्त जी के आगमन के प्रतिक्षा करने लगे।
आने पर आवभगत बाद सभी ने एक-एक बाल मांगना शुरू कर दिया। हजारों बाल उखाड़-उखाड़ देने में वे आना कानी करने लगे। तो भीड़ टूट पड़ी और महन्त जी के सिर के ही नहीं दाढ़ी के बाल भी नोंच डाले। वे लहू लुहान हो गये।
महन्त जी ने समझ लिया कि अब यहाँ ठहरने में खैर नहीं। अन्यत्र पदार्पण कर गये। शिष्य ने अपनी धूर्तता के बल पर उस मठ पर कब्जा जमा लिया।
विश्व में कितने ही स्थान, महल, वस्तुएँ ऐसी है जिनके साथ कोई न कोई अभिशाप जुड़ा हुआ है। जिसने भी इन पर आधिपत्य करना चाहा, असमय ही उसे काल .... लित होना पड़ा। आज भी वह वस्तुएँ अपने निर्माता या उत्पादन कर्ता के दुष्कृत्यों-दुष्कर्मों की स्वभाव में घुली भली-बुरी प्रवृत्तियों के अमिट संस्कारों की कथा गाथा का परिचय .... तब अपने संपर्क में आने वालों को देती रहती है। अनीति पूर्वक दुष्कर्मों द्वारा अर्जित सम्पदाओं के बारे में प्रायः ऐसा ही होता है कि जब तक वह उत्पादन कर्ता के पास रहती है, उसे चैन से बैठने महीं देवी। अपने स्वामी का प्राण हरण करके ही छोड़ती है ऐसी दुरात्माएँ मरणोपरांत भी असंतुष्ट, अतृप्त- .... बनी रहती है और अपनी प्रिय वस्तु के माध्यम से दूसरों को हानि पहुँचाती-नाना प्रकार के संकट उत्पन्न करती रहती हैं। उनके सूक्ष्म संस्कार लम्बे समय तक उन पदार्थों पर छाये रहते हैं और अधिग्रहण करने वालों के लिए प्राण संकट तक खड़े करते देखे जाते है।
बस्वी नामक एक ऐसी ही अभिशप्त कुर्सी है जो अपने निर्माण काल सन् 1702 से लेकर 1177 तक कितने ही लोगों की मौत का कारण बनी। उस कुर्सी पर जो कोई बैठता उसकी किसी न किसी प्रकार से मृत्यु हो जाती। लन्दन से एडिनवरो के रास्ते पर एक पंथशाला, जहाँ यह रखी हुई है। कहा जाता है कि यार्कशापर का बस्बी नामक एक अत्याचारी डकैत जब भी उस पंथशाला में आता था उसी कुर्सी पर बैठता था। जब तक वह जीवित रहा, अपनी उपस्थिति में उस पर किसी को बैठने नहीं दिया। प्रयास करने वालों को मौत के घाट उतार देता। सभी उसके नाम से खौफ खाते थे एक बार बस्बी ने लूट-पाट के गोरख-धंधे में अपनी बुड्ढ़े श्वसुर को भी सम्मिलित करना चाहा निहायत ईमानदार व नेक इंसान था। मना करने पर उसने उस वृद्ध की फावड़े से हत्या कर दी। हत्या के अभियोग में बस्बी को मौत की सजी दी गई। मरने के बाद भी उस दुरात्मा की आसक्ति उस कुर्सी से नहीं छूटी इस घटना के पश्चात भी जो व्यक्ति सराय की उस कुर्सी पर बैठता अज्ञात करणों से उसकी मृत्यु हो जाया करती। अंततः उसका नाम ही मौत की कुर्सी पड़ गया।
“स्टै्रन्ज हैपनिंग्स नामक से सुप्रसिद्ध पत्रकार बाल बेनीस्टर ने लिखा है कि जब वह उक्त सहाय में उसके मालिक से मिले और कुर्सी देखने और उससे जुड़े इतिहास का जानने का आग्रह किया तो अस्तबल के एक कोने में पड़ी वह कुर्सी उन्हें दिखाई गई। बताया गया कि छः वर्ष की अवधि में जब से वह इस होटल के मालिक बने तब से सात व्यक्ति उस कुर्सी पर बैठे और स्वर्ग सिधार गये थे जिसमें दो उनके निकट सम्बन्धी भी सम्मिलित थे। मरने वालों में दो वायुयान कर्मचारी थे जिन्होंने उनका नाम और प्रभाव तो सुन रखा था पर उसे देखा नहीं था। अतः दुराग्रह पूर्वक उस कमरे को खुलवाया और कुछ देर बैठकर उसका लुफ्त उठाया। इसके पश्चात् जब वह अपनी कार में बैठे घर की ओर जा रहे थे कि अचानक उनकी गाड़ी एक पेड़ से टकरायी और वह दोनों वहीं ढेर हो गये।
इस घटना के कुछ दिन बाद ही उस सराय सारजन्ट मेजर नामक एक खिलाड़ी आया और शराब के नशे में धुत वो बस्बी की कुर्सी पर बैठ कर चला गया। तीसरे दिन वह अचानक मृत पाया गया इसके बाद तो होटल मालिक ने उस कमरे के बाहर कुर्सी की भयानकता का पूर्ण विवरण लिखा एक बोर्ड टाँग दिया कि जानकारी होने पर उसके दुष्प्रभाव से अपनी जान न गवानी पड़े। इतने पर भी कुछ दिन बाद समीप ही भवन निर्माण में लगा एक नवयुवक आया और उसकी अभिशप्तता का परीक्षण वापस काम पर लौट गया। कुछ ही क्षण बीते थे कि ईंट ढोने के मंच से वह एकाएक गिरा और मर गया कुछ यही घटना होटल मालिक के दो मित्रों के साथ घटित हुई। तब से कुर्सी को एक कमरे में बन्द कर दिया गया। फिर भी कुछ लोगों में आग्रह पूर्वक कमरा खुलवाया और उस पर बैठे या स्पर्श किया, पर इनमें से बचा कोई भी नहीं। उपरोक्त घटनाओं की छानबीन करने पर बेनीस्टर पुलिस रिकार्डों के आधार पर सत्य पाया है।
इसी तरह की कुछ कहानी ब्रिटिश म्यूजियम में रखी एक ममी की हैं जो अपने में अभिशाप समेटते हुए है। सन् 1164 में अरब देश में एक खुदाई में यह प्राप्त हुई थी। जिसकी सुन्दरता से प्रभावित होकर ब्रिटिश पूँजीपति -बाब सिसरो ने उसे खरीद लिया था। ममी का घर में आना क्या हुआ- मानों सिसरो पर विपत्तियों का भारी पहाड़ टूट पड़ा। दो माह के अन्दर ही व्यापार में उसे जबरदस्त घाटा हुआ जिसके धक्के को वह सहन नहीं कर सका और हृदय घात के कारण उसकी मृत्यु हो गयी यह वज्रपात न केवल मालिक पर टूटा वरन् ममी की देख रेख कर रहे दो नौकर भी अपने-अपने बिस्तरों पर मृत पाये गये। सिसरो के एकमात्र पुत्र को एक ट्रक दुर्घटना में अपने दोनों पैर कटाने पड़े। इन घटनाओं के बाद उसे अभिशप्त समझकर जे.एस.सैम्सन एक फोटो ग्राफर को मुफ्त में ही दे दिया गया जिसने उसके चित्र लिये। फोटो फिल्म धोने के पश्चात् सेम्सन यह देखकर आश्चर्य चकित रह गया कि उसमें एक सुन्दर नव युवती का चित्र उभर आया है। दूसरे दिन से वह भी पागल हो गया और कुछ दिनों के पश्चात् मृत्यु की गोद में सो गया। दुःखी एवं भयभीत पत्नि ने तब उस ममी को ब्रिटिश म्यूजियम को सौंप दिया लेकिन वहाँ भी ममी के साथ-साथ मौत का साया बराबर छाया रहा छूने-और फोटो लेने वालों को त्रास देता रहा।
उक्त घटनाओं को देखकर म्यूजियम के अधिकारियों ने ममी का चित्र लेना आदि वर्जित कर दिया साथ ही पुरातत्व वेत्ताओं का इतिहास खोजने के लिए कहा। पर्यवेक्षण कर्ताओं ने पाया की ममी मिश्र की एक महिला की थी जिसने अनैतिक विपुल संपदा एकत्र की थी पर अंतिम दिनों में संपत्ति दूसरों द्वारा हड़प लिये जाने पर पगलाकर मर गई थी। मरणोपरान्त उसे जिस ताबूत में बन्द किया गया था उसको छूने-छेड़ने वालों में से कितने ही व्यक्तियों का अपने जीवन से हाथ धोना पड़ा।
ब्रिटेन की ही एक अन्य घटना का वर्णन अपनी इस पुस्तक “स्टे्रज हैपनिंग्स” में किया है। उसके अनुसार वन विभाग के तत्कालीन अध्यक्ष को एक मकान से सुन्दर चित्र मिला जो नीले पेपर पर काले रंग से बनाया गया था। ध्यान से देखने पर उसमें से बिल्ली जैसी दो आंखें घूरती हुई दृष्टिगोचर होती थी। शयन कक्ष की शोभा सज्जा बढ़ाने की दृष्टि से अध्यक्ष ने उसे अपने कमरे में टाँग लिया। कुछ ही दिन बीते थे कि उसने आत्महत्या कर ली। पत्नि को मृत्यु का रहस्य समझते देर न लगी और उसने चित्र को काउंट एलेक्जेण्डर नामक व्यक्ति को बेच दिया। उसका भी यहीं हश्र हुआ। जब भी वह उस चित्र की और देखता तो खूंख्वार हिंस्र आंखें घूरती हुई नजर आती। एक दिन विक्षिप्तावस्था में उसने स्वयं को गोली मार ली। इसके बाद तो आत्महत्याओं का ताँता लग गया। काउंट के बाद उसका युवा पुत्र, एक रिश्तेदार क्रमशः आत्मघात कर बैठे दोनों ने ही अपने-अपने संग्रह की शोभा बढ़ाने के लिए रखना चाहा था।
वस्तुतः वह चित्र जहाँ से उपलब्ध हुआ था, वह एक ऐसे अपराधी गिरोह के सरदार का घर था जो अपनी नृशंसता के लिए कुख्यात था जिसका पूरा विवरण वहाँ इन्टेलीजेन्स डिपार्टमेन्ट में दर्ज था। खोज कर्ताओं का कहना हैं कि वह रहस्यमय चित्र उस गिरोह का कोई संकेत था जिसके माध्यम से उन्हें अनेकों अपराध कर्मों में सहायता मिली थी। गिरोह का सरदार उसे सदैव अपने पास रखता था कि यहीं कारण था कि मरने के बाद भी उसकी आसक्ति उक्त चित्र के बराबर रही और जहाँ भी, जिन भी हाथों में वह गया, उन्हें उस दुरात्मा की क्रूरता का शिकार बनना पड़ा।
स्थानों एवं वस्तुओं से जुड़े हुए जितने भी अभिशप्त घटनाक्रम अभी तक प्रकाश में आये है वे मात्र संयोग नहीं है, उनके पीछे कुसंस्कारों की प्रबलता, उनका स्थान विशेष पर प्रभाव एवं क्रूरता के साथ जुड़ा हुआ होना है। ये घटनाक्रम सतत् प्रेरणा देते रहते है कि बिना प्रायश्चित किये स्थान अथवा वस्तु को सुसंस्कारित किये दुष्कर्मजन्य कुसंस्कारों से पीछा नहीं छुड़ाया जा सकता। यह एक शाश्वत सत्य है, था और आगे भी रहेगा।
एक भूत ने किसी आदमी पर सवारी गाँठी। उससे दिन भर काम लेता। भूखा रखता और जब तक पिटाई भी कर लेता।
जब तक ....चलता रहा चलता रहा। एक हैरान होकर मनुष्य ने हिम्मत दिखाई और काम करने से मना कर दिया। रोज−रोज इस तरह दुःखी होने की अपेक्षा तो मरना अच्छा। आप खुशी से मार डालिये। पर मैं इस प्रकार काम न करूंगा। गतिरोध उत्पन्न हो गया।
भूत समझदार था। एक बार में इसे खा लेने से काम क्या चलेगा। काम का आदमी हैं। बीस काम आते है इससे राजीनामा कर लेना ही ठीक है। उसने कहा भाई! अब तुम्हारी जितनी मर्जी होगी उतना ही काम करना और भरपेट भोजन दिया करूंगा।
यह समझौता तब हो सका। जब आदमी तन कर बैठा और हिम्मत दिखाई। चुपचाप व्यस्त रहता तो ऐसे ही बेमौत मरता।
परमात्मा ने जीवात्मा को ऐसी अद्भुत विलक्षण चादर में लपेट कर इस संसार में भेजा है जिसकी संरचना और उपयोगिता शरीर के किसी भी जटिलतम अंग अवयव से कम नहीं। मनुष्य की ही नहीं, वरन् प्रत्येक प्राणी की त्वचा जन्म से मरण पर्यन्त साथ बनी रहती है। उसके आकार प्रकार में परिवर्तन भले ही हो जाय किन्तु समूल रूप से परिवर्तन नहीं होता। यह इतनी समर्थ होती है कि सभी प्रकार के सर्द, गर्म ऋतु प्रभावों को झेलने में समर्थ है। टुड्रा जैसे अति ठण्डे और सहारा जैसे अति गर्म तथा विषुवत–रेखा जैसे देशों में जहाँ वर्षा निरन्तर होती रहती है, वहाँ भी वनवासी जातियाँ खुले बदन रहती है। बहुत हुआ तो थोड़ा बहुत बल्कल, पते, आदि से शरीर का कुछ हिस्सा भले ही ढक लेते हो किन्तु उनकी त्वचा इतनी समर्थ होती है कि बदलते ऋतु प्रभावों को सहन कर सके।
वस्त्राभूषण और परिधानों का प्रचलन भले ही हो गया है किन्तु हाथ-पैर मुंह, नाक, गला आदि तो अब भी खुले ही रहते हैं। वहाँ की त्वचा खुली रहने पर भी शीत ताप की अभ्यस्त बनी रहती है। वह किसी प्रकार के वस्त्रों की अपेक्षा नहीं करती। यह बात अलग है कि सम्पन्न लोग कितने वस्त्र परिधान लाद लें। किन्तु ऋतु प्रभाव से संरक्षण कर सकने में पूर्णतया समर्थ है। वस्त्रों से यों सुविधा, सुरक्षा भले ही मिली हो किन्तु शारीरिक दुर्बलता, और परावलम्बन भी बढ़ा हैं। अन्यथा अन्य जीव जन्तु पक्षी प्रकृति प्रदत्त त्वचा आवरण से सुसज्जित आत हैं और जीवन भर वैसे ही बने रहते हैं। इतना टिकाऊ परिधान अभी तक मनुष्य निर्मित नहीं कर सका है, जो आजीवन साथ दे सके और जिसकी टूट-फूट मरम्मत स्वयमेव होती रहे। मजबूत से मजबूत वस्त्र भी कुछ ही वर्षों तक साथ देते हैं और जीर्ण होकर चीथड़ों में बदल जाते हैं किन्तु त्वचा के साथ ऐसी बात नहीं है।
शरीर शास्त्रियों के अनुसार सामान्य मनुष्य की त्वचा का भार लगभग 6 पौण्ड होता है जिसे यदि फैलाया जा सके तो वह 250 वर्गफुट की जगह घेरेगी। इसकी सबसे पतली परत पलकों पर होती है जबकि सर्वाधिक मोटाई वाली परत पैर के तलवों एवं ऐड़ी पर चढ़ी होती है। इसमें जगह-जगह पर अगणित बारीक छिद्र पाये जाते हैं जिन से पसीने का निष्कासन होता रहता है। त्वचा के प्रतिवर्ग सेंटीवर्ग क्षेत्र में प्रायः 15 सिवैसियस ग्लैण्डस, 100 स्वेद ग्रंथियां, 10 रोमकूप, चार मीटर तंत्रिकाएँ और अनेक सैकड़ों अंतिम छोर, तथा एक मीटर रक्तवाही नलिकाएं विद्यमान रहती है। मनुष्य शरीर के दो वर्ग मीटर बाह्य सतह पर 20 लाख स्वेद ग्रंथियाँ पाई जाती है जिनमें से प्रत्येक से सवा मीटर लम्बी नलिकाएँ निकल कर त्वचा की गहरी परत-डमिर्स में धँसी होती है। यदि इन छोटी-छोटी नलिकाओं को सूत्रबद्ध किया जा सके तो इनकी कुल लम्बाई 1 किलोमीटर तक मापी जा सकती है। इन्हीं के द्वारा रक्त के दूषित अंशों, जल, लवण का अवशोषण एवं शरीर के बाहर निष्कासन होता रहता है। दिन-रात के 24 घंटे में औसतन 500 ग्राम से 600 ग्राम तक पसीना निकलता हैं। गरमी पड़ने या अधिक परिश्रम करने पर इसकी मात्रा बढ़ जाती है। गरमी के दिनों में फुटबाल खेल रहे एक खिलाड़ी के शरीर से कुल 6 किलो तक पानी चौबीस घण्टों में नन्हें छिद्रों से निकल कर बाह्य वातावरण में मिल जाता है। सर्दियों में शरीर को गरम रखने की दृष्टि से स्वेद ग्रंथियाँ सिकुड़ जाती है जिससे अंदर की गर्मी बाहर नहीं निकल पाती और इस तरह से त्वचीय संरचना शरीर को वातानुकूलित बनाये रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
त्वचा के छिद्र केवल पसीना ही निकालते हों ऐसी बात नहीं। वे साँस लेने की फुफ्फुसीय क्रिया की भी पूर्ति करते हैं साथ ही नासिका के काम में भी सहयोग करते रहते हैं। यदि इन रोमकूपों को सर्वथा बन्द कर दिया जाय तो आदमी घुट कर ही मर जाय। पुराने जमाने में अपराधियों को मृत्यु दण्ड देने का एक यह भी अनोखा तरीका था कि उसके समूचे शरीर पर मोम पोत दिया जाता था और उसके हाथ पैर बाँध दिये जाते थे जिससे वह मोम हटा न सके। त्वचा के समस्त छिद्र बन्द होने से वह घुट घुट कर मर जाता था। कुछ दिन पहले ऐसा ही एक विवरण समाचार पत्रों में छपा था जिसमें एक लड़के ने लंगूर का स्वाँग बनाने के लिए शरीर पर शीरा पोत कर रुई चिपकाली थोड़ी ही देर में वह ब.... गया यदि रुई को जल्दी न निकाला गया होता तो उसकी मृत्यु सुनिश्चित थी। स्नान का महत्व भी इसी लिए बताया गया है कि चमड़ी पर मैल की पर्तें न जमा हो अन्यथा स्वास्थ्य के लिए अहित कर है।
साँप के केंचुली की तरह मनुष्य की त्वचा भी प्रति 26 दिन बाद बदलती रहती हैं किन्तु उसके बदलने का क्रम बहुत हल्का एवं धीमा होता है। जो दिखाई नहीं पड़ता। किसी रोगी के बहुत दिन तक चारपाई पर पड़े रहने के बाद उसकी चमड़ी पर से भूसी उतरती देखी जा सकती हैं। सिर में भी अक्सर भूसी जमी रहती है। शरीर के रगड़ने पर मैल की तरह मृत त्वचा के अंश अथवा सिर में जमी भूसी उतरती है। हमें दिखाई भले ही न दे पर चमड़ी की कोशाएं मरती रहती है और उनका स्थान नई कोशाएं ग्रहण करती रहती है। इस प्रकार केंचुली बदलने का क्रम अनवरत चलता रहता है। साँप की केंचुली एक साथ उतरने का कारण सीधा है कि उसे रगड़ने स्नान करने की सुविधा अक्सर प्राप्त नहीं है। उसके हाथ एवं पैर भी नहीं होते। स्वेद कणों की परत शरीर पर मैल के रूप में जमती है तथा त्वचा की मृत कोशाएं जमने से ही यह केंचुली बनती है।
मनुष्य की त्वचा केवल चादर की तरह ही नहीं है। वरन् इसमें ज्ञान तन्तुओं का जाल भी बिछा हुआ है। जो इतना संवेदनशील होता है कि हल्का हवा का झोंका अथवा मच्छर भी शरीर पर बैठता है तो उसकी सूचना त्वचा के ज्ञान तन्तु मस्तिष्क के बड़ी फुर्ती के साथ भेज देते है, जहाँ से प्रतिरोधी निर्देश मिलते है। इन ज्ञान तन्तुओं की लम्बाई लगभग 45 मील आँकी गई है। इन तन्तुओं के अतिरिक्त अन्य प्रकार के तन्तु भी है जो दृश्य, गंध, ध्वनि, दबाव, शीत, ताप जैसी विविध अनुभूतियाँ नाक कान, आँख, जीभ आदि ज्ञानेंद्रियों के माध्यम से कराने में योगदान करते है। ज्ञान तन्तुओं के अतिरिक्त त्वचा में एक विशेष प्रकार की चिकनाई भरी पर्त पाई जाती है जिसे “कोरियम” के नाम से जाना जाता है। इसी से सौंदर्य झलकता है। इसी में मेर्लोनन नामक रंग के कण होते हैं जो मनुष्य की त्वचा का काला, गोरा, गेहुआ, पीला रंग निर्धारित करते है।
त्वचा की पतों में केशग्रन्थि, स्वेदग्रन्थि, बाह्मत्वचा, तैल ग्रन्थि, अन्तः त्वचा, 77 स्नायु और मज्जा कोष, रक्त नलिकाएं आदि प्रमुख रूप से विद्यमान रहती है। इस स्थूल रचना एवं आवरण के अतिरिक्त एक सूक्ष्म चेतना और भी रहती है जिसकी जानकारी महत्व पूर्ण हैं। क्योंकि वह भी रूप, रस, गंध की तरह स्पर्श इन्द्रिय का कार्य सम्पन्न करती है। त्वचा में इतनी अद्भुत शक्तियाँ भरी पड़ी है यदि उन्हें विकसित कर लिया जाय तो अन्य समस्त ग्रंथियों का काम कर सकती है। लगता तो आश्चर्य है किन्तु यह सत्य है कि त्वचा देखने, सुनने, सूँघने, स्पर्श करने जैसी अन्य इन्द्रियों के कार्य सम्पादित कर सकने में समर्थ हैं। क्योंकि उस में हलचल मचाने वाली अन्तः चेतना समाई रहती है। काम में न आने के कारण वह प्रसुप्त पड़ी रहती हैं। योग साधनाओं द्वारा त्वचा की संवेदन शीलता को यदि जाग्रत किया जा सके तो आँख आदि की कमी पूरी की जा सकती है।
हमारे शरीर की त्वचा अत्यन्त संवेदनशील होती है। उससे एक्सरे मशीन की तरह काम भी लिया जा सकता है। यदि उस की संवेदनशीलता विकसित की जा सके तो एक्सरे के स्थान पर अपनी त्वचा के संस्पर्श से ही अज्ञात और अदृश्य का एक बड़ा भाग जानकारी में आ सकता हैं। बेल लिपि में जन्माँधो द्वारा पड़ा जाना स्पर्श इन्द्रिय का ही कमाल हैं। पोरुओं की त्वचा में विशेष चेतना विद्यमान रहती है, जो स्पर्श करते ही अभीष्ट वस्तु अथवा संकेतों को पकड़ती और मस्तिष्क केन्द्र तक पहुँचा देती है। सोवियत संघ में इस संदर्भ में अनुसंधान प्रयोग किये जा रहे है कि उंगलियों के पोरुओं के अतिरिक्त क्या यह क्षमता शरीर के दूसरे भागों में भी पाई जाती है। बांहें, कंधा पीठ की त्वचा पैर की उंगलियां आदि में भी संवेदनशीलता खोजने और उसे विकसित करने के प्रयास किये जा रहे है। यद्यपि हाथ की उंगलियों के पोरुओं में स्पर्श संवेदन सर्वाधिक पाई जाती है।
रूस के मनोविज्ञान शाखा के वरिष्ठ शोध कर्ता कोन्स्टाटिन प्लाटोनोव के अनुसार मानवी चेतना विद्युत रूप में हर जीव के रोम-रोम में व्याप्त हैं। कितने ही जीवधारियों की आंखें नहीं होती, कितनों के कान नहीं होते, फिर भी देखने सुनने का काम स्पर्श इन्द्रिय अर्थात् त्वचा कर संवेदन शक्ति के आधार पर चलाते है। इनके मस्तिष्क करे बाह्य खतरे की सूचना त्वचा के ज्ञान .... देते रहते हैं। अनाज में पाये जाने वाले घुन, चींटी, दीमक, केंचुआ आदि पर कितने ही प्रयोग किये गये हैं। देखा गया है कि व अपने शत्रु को अथवा अवरोध पाकर गन्तव्य मार्ग बदल लेते हैं। ऐसे ही विचार प्रो0 एलेक्जेण्डर स्मिनोंव के हैं। वे कहते हैं कि यह कोई अलौकिक बात नहीं वरन् सामान्य विज्ञान सम्मत सिद्धांतों का ही प्रतिपादन है। एक अंग की चेतना दूसरे अंग की चेतना दूसरे अंग में काम कर सकती है।
उन्होंने अनेक छात्राओं पर प्रयोग किये तो पाया कि दाहिने हाथ की उँगलियों के पोरुओं की त्वचा में अतीन्द्रिय क्षमता अधिक रहती है। आयु बढ़ने के साथ साथ इन ज्ञान तन्तुओं में कठोरता आ जाती है। जिसके कारण त्वचा में उतनी संवेदनशीलता नहीं रहती।
शास्त्रों में त्वचा को स्पर्शेन्द्रिय की संज्ञा दी गई है। अन्य इन्द्रियों की तरह यदि इसकी अन्तः चेतना को विकसित किया जा सके तो मनुष्य की शक्ति सामर्थ्य में वृद्धि सम्भव है। साधना विज्ञान में त्वचा साधना को स्पर्शास्पर्श कहते हैं त्वचा में अति संवेदनशील व्यापक और प्रभावोत्पादक क्षमता होती है। इसे दैनन्दिन जीवन में प्रयुक्त होते हुए उन व्यक्तियों में देखा जा सकता है जिनकी अन्य ज्ञानेन्द्रियाँ, तन्मात्रायें किसी कारण वश विकसित नहीं हो पातीं। मनुष्य को उपलब्ध एक सामर्थ्य का अभाव जब दूसरी इन्द्रियों में अति चेतना क्षमता को जन्म दे सकता है तो कोई कारण नहीं कि सामान्यस्तर का व्यक्ति अध्यात्म अनुशासनों को, योग पुरुषार्थ सम्पन्न करते हुए अपनी स्पर्शेन्द्रियों को अतीन्द्रिय स्तर तक विकसित न कर सके।
विभिन्न योगाभ्यासों के अंतर्गत स्पर्श साधना को, तन्मात्राओं की सिद्धि को विशेष महत्व दिया गया है। स्थूल संरचना की दृष्टि से ही जब त्वचा इतनी विलक्षण है कि उसका वर्णन हमें हतप्रभ कर देता है तो उसके सूक्ष्म एवं कारण पक्षों का विकास मनुष्य को अनेकानेक ऋद्धि सिद्धियाँ प्रदान करता है।भय की परिणति बताते हुए एक ऋषि अपने शिष्यों को उसकी भयंकरता एवं परिणति समझा रहे थे। उदाहरण के रूप में कह रहे थे कि आसमान ऊपर से न टूट पड़े इस भय से गिलहरी ऊपर को पैर करके सोती है ताकि वह गिरे तो पैरों पर उसे समेट कर अपना बचाव कर सके। बन्दर पेड़ से बार-बार नीचे उतरता रहता है कि कही धरती नीचे तो नहीं खिसक रही। केंचुआ इसलिए मिट्टी खाता है कि संसार में अनाज उपजना कम हो गया तो भी भूखों मरना पड़ सकता है। इसलिए समय रहते मिट्टी खाने की आदत डाल कर अपने को सुरक्षित क्यों न बना ले। भय की हड़बड़ाहट में प्राणी अनुपयुक्त सोचता और करता हैं।
रावण सीता को हरण करके लिये जा रहा था। रोकने बचाने वाला वहाँ कोई था नहीं। जो थे वे अपनी जान बचाने के लिए छिपकर बैठ गये थे।
पेड़ पर एक गिद्ध बैठा था जटायु। आयु की दृष्टि से वह वृद्ध हो चुका था। ....कम भी थक गया था। रावण को पराजित कर सपना उसके पते की बात नहीं थी। फिर भी उसने सोचा अनीति को चुप रहकर देखते रहने की अपेक्षा तो यह अच्छा है कि विरोध और संघर्ष करते हुए जान गँवा दी जाए। सफलता भले ही ना मिले पर आदर्श अपनाने का उदाहरण तो बना रहेगा। वह लड़ने के लिए तैयार हो गया रावण पर टूट पड़ा युद्ध में जीतना तो कठिन था, वह घायल होकर जमीन पर गिर पड़ा
राम जब सीता को तलाश करते हुए उधर से निकले। घायल जटायु सारा वृतान्त सुना तो वह भाव विभोर हो गए। छाती से लगाया और नयन जलों से उसके घाव धोये।
दिल्ली के राजा पृथ्वीराज चौहान ने स्वयंवर में संयोगिता को पाया। वह असाधारण सुन्दरी थी। पृथ्वीराज उनके आने पर अतिशय आसक्त रहने लगे और अधिकाँश समय राजमहल में ही बिताने लगे। राजकाज चलाना मंत्रियों के जिम्मे चला गया।
इस समाचार ने शत्रुओं की हिम्मत बढ़ाई और वे आक्रमण करके दिल्ली लूटने की तैयारी करने लगे। देश और विदेश के शत्रुओं का गठबंधन हो गया। भीतर से विद्रोह और बाहर से आक्रमण का दुहरा सिलसिला चल पड़ा। राज काज चलाने के साथ-साथ शत्रुओं से निपटना भी मंत्रियों के हाथ चला गया वे इस दुहरी आपत्ति को संभालने में सफल न हो सके।
पृथ्वीराज की विलासिता की सर्वत्र निंदा होने लगीं। साथ ही संयोगिता की नादानी पर भी उँगली उठने लगी। क्षति को न देखकर जिन्हें निजी विलास सुहाये उनकी भर्त्सना स्वाभाविक भी थी।
पृथ्वीराज स्वयं न समझ पाये तो संयोगिता को आगे आना पड़ा। राजा का विरोध करके उन्हें शासन संभालने के लिए प्रेरित करना पड़ा। पर तब तक बहुत देर हो चुकी थी। प्रमाद ने पृथ्वीराज का विलास वैभव और यश सभी छीन लिया और उन्हें राज ही नहीं प्राण भी त्यागने पड़े।
मरघट में निवास जीवन के साथ मृत्यु को भी स्मरण रखने का तथा निर्भयता का प्रतीक है। निर्जीवता आये नहीं तथा मृत्यु का स्मरण रखकर संतुलन बना रहे, यह आवश्यक हैं।
शिव के कमर में व्याघ्र चर्म दुष्टात्माओं की चमड़ी उधेड़ने का तथा हाथ में त्रिशूल-अज्ञान, अभाव और आसक्तियों के संहार के लिए एवं दुर्विचारों,दुर्भावनाओं के पीछे उनका त्रिशूल अपने आप भागता है। उनका डमरू ज्ञान, कला, साहित्य और विजय का प्रतीक है। वह पुकार-पुकार कर कहता है कि शिव कल्याण के देवता है। उनके विचारों रूपी खेत में कल्याणकारी योजनाओं के अतिरिक्त और किसी वस्तु की उपज नहीं होती। विचारों में कल्याण की समुद्री लहरें हिलोरे लेती हैं। उनके हर शब्द में सत्यम् शिवम् की ही ध्वनि निकलती है। डमरू से निकलने वाली सात्विकता की ध्वनि सभी को मंत्र मुग्ध-सा कर देती है और जो भी उनके समीप आता है, अपना सा बना लेती है।
भगवान का वाहन वृषभ है वह सज्जनता, सौम्यता और कर्मठता श्रमशीलता का प्रतीक है। तात्पर्य यह कि शिव का साहचर्य उन्हें मिलता है जो स्वभाव से सरल और सौम्य होते है, जिनमें छल छद्म आदि विकार नहीं होते। साथ ही जिनमें आलस्य न होकर निरन्तर काम करने की दृढ़ता होती है। वस्तुतः यही वह जीवन-व्यवस्था है जो व्यक्ति को असाधारण बनाती है। जो शक्ति शिव में पाई जाती है, उसी शिव उपासकों में भी वह वृत्तियां घुली हुई होनी चाहिए।
गृहस्थ होकर भी पूर्ण योगी होना शिव जी के जीवन की महत्वपूर्ण घटना है। सांसारिक व्यवस्था को चलाते हुए भी वे योगी रहते है, पूर्ण ब्रह्मचर्य का पालन करते है। वे अपनी धर्म पत्नी को भी मातृ शक्ति के रूप में देखते हैं। यह उनकी महानता का दूसरा आदर्श है। ऋद्धि सिद्धियां उनके पास रहने में गर्व अनुभव करती है। यहाँ उन्होंने यह सिद्ध कर दिया है कि गृहस्थ रहकर भी आत्म-कल्याण की साधना असंभव नहीं। जीवन में पवित्रता रख कर उसे हँसते खेलते पूरा किया जा सकता है।
संक्षेप में कहा जा सकता है कि शिव मानव जीवन की उन सभी आध्यात्मिक विशेषताओं के प्रतीक हैं जिनके बिना मनुष्य जीवन पाने का अर्थ हल नहीं होता। मनुष्य का धर्म उसकी विवेक वृद्धि है। जिसके सहारे वह ज्ञान-विज्ञान की ओर अग्रसर होता है और मनुष्य से देव-नर से नारायण बनने में समर्थ होता है। इसकी सामर्थ्य प्राप्त करके ही आत्म कल्याण और लोकहित की परम्परा जीवित रखी जा सकती है। यह सन्देश हमें आदि काल से भगवान शिव देते चले आ रहे है। इन आध्यात्मिक रहस्यों को हृदयंगम करना और तद् अनुरूप जीवन की रीति नीति बनाना सच्चे शिव भक्त का परत लक्ष्य है। अच्छा हो शिवरात्रि के दिन हम मात्र पूजा कर्मकाण्ड तक सीमित न रहे देवाधिदेव महादेव से जुड़ी दिव्य विभूतियों का चिन्तन करें, उन गुणों को अपने जीवन में उतारने का प्रयास करें।
उन क्षेत्रों में फूस क बने झोपड़ों में ही लोग गुजारा करते थे। माचिस का प्रचलन था नहीं। भोजन पकाने के लिए चूल्हें में आग सुलगा कर रखनी पड़ती थी। तेज हवा चलने पर चूल्हें की आग उड़कर झोपड़ी में लगती और उन्हें जलाकर राख कर देती। आच्छादन विहीन अनेकों हो जाते और प्रजाजनों का भारी कष्ट सहन करना पड़ता। कारण इसका एक ही था चूल्हे में सुरक्षित रखी आग को दाब ढक्कन न रखा जाता।
राजा विमबसार उस क्षेत्र के शासक थे। आये दिन की अग्नि दुर्घटनाओं पर उन्हें गंभीरता पूर्वक विचार करना पड़ा। कानून बनाया गया कि जिसके घर में आग लगेगी एक वर्ष श्मशानवास करना पड़ेगा। इस अनुबंध से सतर्कता बढ़ी और दुर्घटनाएँ कम होने लगी।
संयोगवश राजमहल के एक फूस से बने कक्ष में आग लगी और वह राख हो गया।
राजा ने उस नियम को अपने पर भी लागू किया और वे एक वर्ष तक स्वेच्छापूर्वक श्मशान में रहे।
मंत्रियों ने कहा भी कि कानून तो प्रजा के लिए है राजा पर लागू नहीं होते। आप महल में ही रह सकते है पर राजा ने उस परामर्श को यह कहकर अस्वीकार कर दिया कि यदि राजा अपने बनाये कानूनों पर स्वयं चलेंगे तो प्रजा उनका पालन क्यों करेगी?
सज्जन कष्ट भोगते हैं और दुष्ट-दुराचारी मौज मजा कराते हैं। ऐसे अवसरों पर लोग यह कहते देखे गये हैं कि भगवान के यहाँ न्याय नहीं हैं अथवा सज्जनता का जो महात्म्य बताया जाता है, वह सही नहीं है।
ऐसा कहने वाले सन्त सज्जन की परिभाषा सही रीति से कर नहीं पाते और अधूरी-अधूरी बात का वह प्रतिफल चाहते हैं जो पूरी का मिलना चाहिए। भोजन तैयार करने में मात्र आटा दाल का पास में होना ही पर्याप्त नहीं, उसके लिए आग पानी और पकाने का बर्तन भी चाहिए अन्यथा दाल होने मात्र से किसी का पेट भरेगा।
सज्जनता की परिभाषा सत्य, अहिंसा, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह मात्र नहीं है। यह भी सज्जनता के अंग हैं, किन्तु इतने मात्र से ही किसी को सत्पुरुष कहलाने का अधिकार नहीं मिल जाता।
पराक्रम, पुरुषार्थ, साहस, उत्साह, लगन भी व्यक्तित्व विकास के आवश्यक अंग हैं, जिससे इन गुणों का अभाव होगा, वह उपार्जन न कर सकेगा, सफलता प्राप्त न कर सकेगा। चाहे वह सत्यवादी, ब्रह्मचर्य ही क्यों न हो। सद्गुणों में क्षमा, दया, दानशीलता आदि की गणना करना अच्छी बात है, पर इन्हें ही पूर्ण नहीं मान बैठना चाहिए अन्यथा जो लाभ अधूरी परिभाषा के अंतर्गत आते हैं वे मिल जायेंगे, किन्तु जिन्हें नहीं अपनाया गया है उनका प्रतिफल कैसे मिलेगा।
भौतिक सफलता के लिए मनुष्य को परिश्रमी और लगन शील होना चाहिए जो कार्य हाथ में ले उसे पूरा करके छोड़ने के लिए शारीरिक तत्परता और मानसिक तन्मयता की आवश्यकता है। शारीरिक श्रम और मानसिक लगन जिस कार्य में नियोजित होगी वह सफल होगा। उनके अभाव में आलसी प्रमादी को असफलता ही मिलेगी, भले ही वह सन्तोषी सदाचारी ही क्यों न हो?
इस संसार में दुष्ट दुराचारियों की कमी नहीं। वे सभी पर अपना हाथ साफ करते हैं। वे अपनी घात चलाने के लिए सबसे पहले उन्हें चुनते हैं, जिन्हें चौकन्ना रहने की और आत्मरक्षा की जागरूकता नहीं। वे समझते हैं कि वे स्वयं जैसे सत्यवादी हैं वैसा ही दूसरों को समझते होंगे और दुष्टता की चाल या घात को समझ नहीं रहे होंगे, इस लिए उन पर आक्रमण करने में सरलता रहेगी। वे चौकन्ने और हिम्मत वाले पर कुचक्र चलाते हुए डरते हैं और साथ ही प्रतिरोध का मजा चखाने की संभावना सोच कर अवसर देखकर ही हाथ डालते हैं। सज्जन को मूर्ख समझा जाता है और पग-पग पर उन्हें ठगा जाता है। हानि उठाने के उपरान्त वे कहते हैं कि भगवान के यहाँ न्याय नहीं। सज्जन को घाटा सहना पड़ा और दुर्जन ने लाभ उठाया यह कथन गलत है। कहना यह चाहिए कि सतर्कता और साहसिकता के अभाव में उन्हें घाटा पड़ा। यह गुण भी सज्जनता के अंतर्गत ही आते हैं कि दुरात्माओं की भरमार दुनियाँ में है, दन की घातें चलती रहती हैं। उन से चौकन्ना रहना चाहिए और प्रतिरोध के जिए साहस जुटाना चाहिए। इसके अभाव में भगवान से यह आशा करना कि वे हर किसी की चौकीदारी करते फिरेंगे गलत है।
ब्रह्मचर्य परीक्षा में फेल हो गये और अब्रह्मचारी पास। इससे ब्रह्मचारी होने न होने का कोई संज्ञा नहीं। कितनी लगन और परिश्रम के साथ पढ़ा गया यह प्रसंग महत्वपूर्ण है। जो काम हाथ में लिया जाय, उसे पूरे मन से किया जाय, यह भी आध्यात्मिकता है। आलसी, प्रमादी, आपने को संतोषी और भगवत् भक्त कहकर श्रम से बचना चाहे और भगवान को दोष दे, तो यह गलत है।
चोर, उचक्के अपनी बुद्धिमानी, साहसिकता और सूझबूझ का लाभ उठाते हैं, यह सद्गुण है। भले ही वह चोर के पास क्यों न हो। साहसी और पराक्रमी विजयी होता है, भले ही वह दुष्ट- .... दूर ही क्यों न हो? दुरात्मा होने का दुर्गुण उसको निन्दनीय, अप्रामाणिक सिद्ध करेगा और दोष के बदले दूसरों का विश्वास खो देने से लेकर राज दण्ड मिलने तक की प्रताड़ना का भाजन बनावेगा, किन्तु साहस के बदले सफलता भी उपलब्ध करा देगा।
भूल यहाँ होती है जब लोग दया, क्षमा, सत्य, अहिंसा, ब्रह्मचर्य आदि को ही आध्यात्मिक गुण मानकर उतने भर से सफलताओं की आशा करते हैं उन्हें समझना चाहिए कि भला आदमी होने से आत्म संतोष और लोक सम्मान जैसी उपलब्धियाँ मिल सकती हैं, पर सांसारिक सफलता के लिए जिन लौकिक गुणों की आवश्यकता है, उनकी भी उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। भगवद् भक्त होने के लिए माला जपना और सत्य बोलना ही पर्याप्त नहीं, साथ में हनुमान, अंगद, भीम, अर्जुन जैसा पुरुषार्थ भी होना चाहिए अन्यथा दुष्ट-दुरात्माओं के साथ प्रतिस्पर्धा बन सकेगी।
सद्गुणों की परिभाषा में दान, दया को ही सम्मिलित करें और पराक्रम, पुरुषार्थ को उस में से हटा दे तो बात सर्वथा अधूरी रहेगी। अधूरी बात का अधूरे काम-अधूरे व्रत का प्रतिफल भी अधूरा ही होना चाहिए। पूरी बात तब बनती है जब सद्गुणों की सज्जनता की परिभाषा में दया, धर्म के साथ-साथ प्रतिरोध और पराक्रम को भी सम्मिलित किया जाय।
कोई समय था जब सज्जनों का बाहुल्य था। उनके बीच सद्गुणों का शालीनता का परिचय देना ही उचित था। जिन दिनों भौतिक उन्नति की आवश्यकता नहीं थी उन दिनों पीपल के फलों से गुजारा करने वाले पिप्पलाद और खेत में गिरे हुए दाने बीनकर पेट भर लेने वाले कणाद भी शान्ति पूर्वक गुजारा कर लेते थे। सुविस्तृत जंगलों में एक दो गाय पालना कुछ भी कठिन नहीं था जंगलों में चर करके पेट भर लेती थी और पालने वालों को दूध मुफ्त में मिल जाता था, पर आज तो पूरे परिवार के लिए इस महँगाई के जमाने में पूरा शारीरिक और मानसिक श्रम करने से ही गुजारा चलता है। अब धनी, परोपकारी, राजा श्रीमन्त भी नहीं रहे। इसलिए सन्त सज्जनों को भी रोटी कमाने के लिए कठोर शारीरिक और मानसिक श्रम की आवश्यकता पड़ती है। अब आलस्य और प्रमाद अपनाने वालों के लिए यह आशा करना व्यर्थ है कि भगवान सब का पेट भर देते हैं।
दुष्ट-दुरात्माओं से भगवान ने भक्तजनों की रक्षा तो की थी, पर वह हो सका तभी, जब सुग्रीव की सेना उनकी सहायता के लिए जुट गई और पाण्डव परिवार ने संघर्ष को सच्ची भगवद् भक्ति समझा। आज भौतिक स्थिरता और प्रगति के लिए लौकिक जीवन में सफलता प्रदान करने वाले गुणों से तो दूर रहा जाय और यह आशा की जाय कि भगवान अभीष्ट सफलताएँ भी प्रदान करेंगे और सताने वालों को स्वयं सुदर्शन चक्र चला कर मार, पीट कर भगा देंगे, तो वह आशा, दुराशा मात्र है।
सन्त सज्जनों को संयमी, सदाचारी भी होना चाहिए और पुरुषार्थी पराक्रमी भी। इन सब विशेषताओं को अर्जित करने पर ही यह आशा करनी चाहिए कि भगवान हमारी सहायता करेंगे। यह समय द्रौपदी और गज की तरह अनायास ही प्रचुर सहायता प्राप्त करने जैसा नहीं है।
देवताओं पर संकट आया। दैत्यों ने उन्हें परास्त कर दिया। वृत्रासुर के नेतृत्व में दैत्य समुदाय हर दृष्टि में तगड़ा पड़ता था।
विष्णु के पास देवगण गये तो उनने कहा। सब से अधिक शक्तिशाली तप होता है जिसके कण कण में तप रम गया हो ऐसे ऋषि की अस्थियों का वज्र बन सके और उसका प्रहार दैत्यों पर हो सके तो देव समुदाय को विजय मिले।
ऐसे तपस्वी उन दिनों मात्र दधीचि थे। देवता उनकी तपस्थली पर अस्थि याचना के लिए पहुँचे। ऋषि ने अपनी दिव्य दृष्टि से उनका मनोरथ जान लिया। बिना माँगे ही दिव्य प्रयोजन के लिए अपना प्राणदान देना स्वभाग्य माना और देखते देखते प्राण त्याग दिये। उनकी अस्थियों से इन्द्र वज्र बना देवता जीते। सबने जाना कि तपस्वी की अस्थि कितनी प्रबल प्रचंड होती है।
भौतिक जगत में अनेकानेक शक्तियाँ हैं, जिनमें मान्यता प्राप्त पाँच हैं। ये हैं-विद्युत, ताप, प्रकाश, चुम्बकत्व एवं ध्वनि। कहा गया है व दैनन्दिन जीवन में देखा भी जाता है कि ये परस्पर एक दूसरे में बदल भी जाती हैं। सृष्टि का एक शाश्वत नियम है कि शक्ति कभी नष्ट नहीं होती, एक ऊर्जा मात्र दूसरी ऊर्जा में बदल जाती है।
जब हम चेतन जगत की चर्चा करते है, तो पाते हैं कि ब्राह्मी चेतना के मूल में भी एक ही शक्ति सक्रिय है, जो भिन्न- भिन्न रूपों में चेतन घटकों में गतिशील देखी जाती है। यह मूलभूत शक्ति है-शब्द की। यह चेतना क्षेत्र का ईंधन है, जो परोक्ष जगत में सक्रिय हो प्रगति हेतु मूलभूत भूमिका निभाती देखी जा सकती है। शब्दशक्ति-ध्वनिऊर्जा-अनहत नाद-शब्द एवं नाद ब्रह्म-इन सब नामों से इसे जाना जाता है। इसके कई रूप हैं, किन्तु जो प्रत्यक्ष है, वह वैखरी वाणी-प्रत्यक्ष वार्तालाप के रूप में दैनिक जीवन में नित्य गतिशील देखी जा सकती है। इसी की भली व बुरी प्रतिक्रियाएँ भी देखी जा सकती है। वाणी सत्परामर्श के रूप में भी प्रयुक्त हो सकती हैं, शिष्ट हास्य के रूप में भी व्यंग्यात्मक अभिव्यक्ति तथा कुमार्ग पर चलने की प्रेरणा के रूप में भी। शब्द एक से होते हुए भी उनकी प्रतिक्रिया इस आधार पर भिन्न हो सकती है कि उन्हें किस स्तर के व्यक्ति ने किस भाव से कहा?
उत्साह और प्रेरणा के दो शब्दरण क्षेत्र में जा रहे सैनिकों में नये प्राण फूँक देते हैं। द्रौपदी द्वारा कौरवों के प्रति व्यंग्य में कही गयी एक पंक्ति महाभारत की विभीषिका रच सकती है। अच्छे खासे साहसी व हट्टे-कट्टे व्यक्ति का मनोबल मात्र दो शब्द गिरा सकते हैं। शब्दों में वस्तुतः चमत्कारी शक्ति भरी पड़ी है। यह मात्र इस बात पर निर्भर है कि किसने इस सामर्थ्य का कितना, किस रूप में, किस उद्देश्य के लिए सुनियोजित किया। शाप और वरदान इस शब्द शक्ति के ही दो चमत्कारी रूप भर है।
वैज्ञानिकों के अनुसार वाणी और ध्वनि के लिए मनुष्य के मस्तिष्क में 50 से 60 प्रतिशत स्थान सुरक्षित हैं। लेखन व हाथ की अन्य क्रियाओं को दूसरा महत्व पूर्ण स्थान प्राप्त है। ये क्रमशः बा्रेकाज क्षेत्र तथा हाथ का कर्म क्षेत्र कहलाते हैं। यह प्रतिनिधित्व एनाटॉमी की दृष्टि से हैं, किन्तु क्रिया की दृष्टि से यह अनुपात रूप में अच्छा खासा महत्वपूर्ण स्थान घेरे बैठा हैं।
पुरुषार्थ और साहस जब व्यक्ति की वाणी से अभिव्यक्ति लेते हैं तो गजब कर दिखाते हैं। सुभाषचन्द्र ने जब कहा-”तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूँगा,” तो एक बड़ा जन समुदाय उनके पीछे हो लिया। “नेपोलियन बोनापार्ट ने कहा था- आल्प्स पर्वत यदि तू मेरा रास्ता रोकेगा, तो तुझे चीर कर यह नेपोलियन आगे बढ़ जायगा। “इन शब्दों के पीछे पुरुषार्थ की शक्ति थी।
लोकमान्य तिलक ने कहा -आजादी हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है और हम इसे लेकर ही रहेंगे। इन क्रान्तिकारी शब्दों के पीछे मात्र नारा नहीं व्यक्ति का परम पुरुषार्थ ही बोलता है और उसी का प्रभाव जनता पर पड़ता है। यही शक्ति अन्तः के प्रस्तुत सामर्थ्य को उभारती, मनस्विता को जगाती एवं उसे चमत्कारी महामानव बनाती है। इंग्लैंड के सम्राट् पंचम का भारतीय ब्रिटिश सरकार को निर्देश था कि उनका कोई वायसराय या उच्च अधिकारी महात्मा गाँधी से आमने-सामने न मिले। उनकी आँखों के तेज से फिरंगी डरते थे। उन्हें भय था कि कुल 16 पौण्ड का दुबला-पतला किन्तु मनस्वी महापुरुष कहीं हिप्नोटाइज कर किसी उच्चाधिकारी को अपने पक्ष में न कर ले। कार्यालय से केवल पत्र ही उनके नाम भेजे जाते थे, क्योंकि उनकी आत्मशक्ति का तेज उनके बिना बोले भी सामने वाले व्यक्ति को प्रभावित करता था।
द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जब इंग्लैण्ड की पराजय हुई, तो वहाँ के तत्कालीन प्रधान मंत्री चर्चिल ने टूटे मनोबल को बढ़ाने के लिए एक नया नारा दिया “वी फार विक्ट्री” इस नारे को उन्होंने बड़े पैमाने पर दिवारों, पाठ्य- पुस्तकों, पोस्टरों पर लिखवाया और प्रचारित किया था। फलतः इसका प्रभाव भी अनुकूल साबित हुआ।
नेपोलियन के जीवन की एक घटना है। उनकी लगातार पराजय हो रही थी। सैनिकों के मनोबल बुरी तरह टूट चुके थे। इस पर नेपोलियन ने एक युक्ति निकाली। उन्होंने अपने सैनिकों को इकट्ठा किया और कहा-जाओ, अपने आराध्य देव से पूछें कि इस बार हमारी जीत होगी या नहीं। पूछने का तरीका सिक्का उछालने का रखा गया। उन्होंने सैनिकों से बताया कि यदि हैड निकला, तो इसमें देव की सहमति जीत की होगी और टेल निकली तो इसका अर्थ पराजय होगा। सिक्का उछाला गया। हैड को देखकर सैनिक प्रसन्न हो उठे। दूसरी बार पुनः सिक्का उछाला गया। इस बार फिर हैड निकला। इससे सैनिक खुशी से उछल पड़े। उन्हें यह दृढ़ विश्वास हो चुका था कि देव वाणी मिथ्या नहीं हो सकती। सब युद्ध के लिए निकल पड़े और सचमुच इस बार उनकी विजय हुई। युद्ध के बाद इस विजय का रहस्योद्घाटन करते हुए नेपोलियन ने सैनिकों से कहा- इसमें न तो देवता का कोई आशीर्वाद था न भविष्यवाणी जैसी कोई बात। वस्तुतः यह उस देव-वाणी का परोक्ष प्रभाव है, जिसने जीत की बात कर सैनिकों को उत्साहित किया और उनका मनोबल बढ़ाया। “इसके बाद नेपोलियन ने सिक्का दिखाते हुए कहा -यह ऐसा सिक्का है, जिसमें दोनों ओर ही हैड बने हुए हैं। टेल इसमें है ही नहीं। यह देख सैनिक आश्चर्य में पड़ गये। उन्हें सही अर्थों में वाणी की सामर्थ्य कस असर इसके बाद मालूम पड़ा।
शब्द शक्ति महात्म्य के कई प्रसंग आर्ष वांगमय में भी देखने को मिलते हैं। एक घटना राजा दशरथ से संबंधित है। महाराज दशरथ पुत्रेष्टि यज्ञ कराना चाहते थे। यज्ञ संचालन कार्य पारंगत कुलगुरु वशिष्ठ जी ने स्वयं न लेकर श्रृंगी ऋषि को अनुरोध पूर्वक दिया। उनकी परिमार्जित वाक्शक्ति का प्रभाव था, कि दशरथ का यज्ञ सफल हुआ और राम लक्ष्मण जैसे चार पुत्रों की प्राप्ति हुई। सुपात्र द्वारा प्रयुक्तवाणी की शक्ति में ही वह बल होता हैं, जो किसी भी महान प्रयोजन को पूरा कर दिखाता है। इन्हीं श्रृंगी ऋषि की वाणी में शाप देने की भी शक्ति थी। राजा परीक्षित आखेट करते हुए एक बार जंगल में घूम रहे थे, ध्यानस्थ लोपश ऋषि से रास्ता पूछने लगे। कोई उत्तर न पाकर खीज उठे तथा एक मरा हुआ सांप उनके गले में डालकर आगे बढ़ गये। जब उनके पुत्र श्रृंगी ऋषि ने अपने पिता का यह अपमान देखा तो शाप दिया-जिस किसी ने भी यह अपमान मेरे पिता का किया हैं, हे सर्प! तू जाकर उसे डंसले इतना कहते ही तक्षक जी उठा और चल दिया अपने निर्देशित लक्ष्य को पूरा करने। सातवें दिन उसने राजा को काट खाया। यहाँ मरे साँप के जीवित होने की या अनजान को पहचानने की कहानी नहीं कही जा रही, वरन् प्रयुक्त किये इन वाक्यों के पीछे उस ऋषि की प्रचण्ड शब्द शक्ति का प्रभाव बतलाया जा रहा है जिसकी वाणी से वरदान और अभिशाप दोनों निकले और फलीभूत हुए थे।
शब्दों का स्थूल उपयोग भाषा में है। ज्ञान और अनुभव के आदान-प्रदान में वार्तालाप में सत्यता, नम्रता और शिष्टता का अपना प्रभाव है और कटुता या स्वार्थपूर्ण वार्ता का अपना। वस्तुतः वाक् ऊर्जा एक प्रकार का ऐसा शक्तिशाली ईधन है जो शरीर के सूक्ष्म शक्ति केन्द्रों को प्रभावित करता है। जप जैसे कृत्यों में शब्दों का प्रभाव षट्चक्रों तथा ग्रन्थियों के सूक्ष्म संस्थानों पर भी पड़ता है एवं मन और आत्मा की शक्तियों का विकास करता हैं, दूसरी और बनावटी, स्वार्थी और कपट पूर्ण शब्दों का अभ्यास अन्तः करण पर मलीनता की पर्त चढ़ाता है।
यह भली−भांति समझा जाना चाहिए कि वाणी एक महत्वपूर्ण सामर्थ्य है, जो परिशोधित होने पर अमृत बन सकती है और विकृत होने पर विष का भी काम कर लेती है। शोधित वाणी ही वस्तुतः वाक् शक्ति है-जो इस तथ्य को हृदयंगम करते और तद्नुरूप प्रयास अभ्यास करते हैं, वही हर क्षेत्र में सहयोग-सहकार अर्जित कर पाते हैं। इसके लिए स्थूल परिमार्जन और वाह्य अनुशासन ही आवश्यक नहीं है, आन्तरिक और सूक्ष्म परिष्कृत भी अनिवार्य है, तभी वाणी में वह बल पैदा हो सकता है, जो महामानवों और महापुरुषों में दिखाई पड़ता है।
एक बार नाना साहब हाथी पर सवार होकर घूमने जा रहे थे। वे मन का नहीं ले गये। बालिका रूठ गई। उसके पिताजी ने समझाया- हम गरीब है, हमारे भाग्य में हाथी कहाँ? इस पर मन ने तनक कर कहाँ - एक क्या, ऐसे सैकड़ों हाथी हैं मेरे भाग्य में। आत्मविश्वासपूर्वक कही गई बात सच निकली। वह बड़ी होने पर झाँसी के राजा गंगाधरराव की पत्नी बनी और सैकड़ों हाथियों की स्वामिनी थी।
मनु नामक उक्त बालिका ही झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई थीं जिनने वह सिद्ध कर दिया कि आत्म- विश्वास की भावना दृढ़ हो तो मनुष्य एक साधारण स्थिति से ऊपर उठकर उच्च स्थिति पहुँच जाता है।
रंग चिकित्सा का आधार सूर्य की किरणें, उनका प्रकाश और रंग है। सम्पूर्ण वनस्पति जगत एवं जीव जगत इन्हीं से प्रकाशित, संचालित और प्रेरित होता है। प्रकृति के संतुलन का आधार भी यही है। तत्वों के निर्माण की अद्भुत क्षमता से युक्त रंगीन रश्मियों में जीवाणु, पोशाक बल वर्धक-पुष्टिदायक गुण विद्यमान हैं। इनमें चुम्बकत्व, विद्युत, उष्णता, प्राण और ऑक्सीजन जैसे जीवनदायी तत्वों के प्रचुर परिमाण में उपस्थित होने की पुष्टि वैज्ञानिक खोजों से भी हो चुकी है। अतः स्वास्थ्य संतुलन का उपक्रम इनसे सहज ही बैठ जाता है। अपनी प्रकृति के अनुरूप उपयुक्त वर्णों का चुनाव किया और उनसे लाभ उठाया जा सकना सबके लिए संभव है। ध्यान मिश्रित प्राणायाम प्रक्रिया द्वारा रंग-रश्मियों का आकर्षण अवधारण न केवल शारीरिक मानसिक व्याधियों से छुटकारा दिलाता है वरन् अभ्यासकर्ता को ओजस्वी-तेजस्वी-मनस्वी भी बनाता है। गहराई में प्रवेश करने पर ब्रह्मवर्चस् का-आत्मोत्कर्ष का लाभ भी हस्तगत होगा।
योग साधनाओं-अध्यात्म उपचारों में मन को वशवर्ती बनाने के लिए ध्यान-धारणा की विधा अपनाई जाती है। इससे पूर्व शारीरिक मानसिक परिशोधन की प्राणायाम प्रक्रिया का आश्रय लिया जाता है जो जटिल, समय -साध्य एवं जोखिम भरी होती है। किन्तु जब इसे रंगों का ध्यान करते हुए प्राणाकर्षण प्राणायाम की तरह संयुक्त रूप से सम्पन्न किया जाता है तो वह सरल भी पड़ती है और प्रतिफल भी जल्दी सामने आते है। “कलरब्रीदिग” की विधा ऐसी ही है जो उक्त दोनों ही प्रयोजनों की पूर्ति करती है। यह हानि रहित भी है।
इस संबंध में वैज्ञानिकों ने गहन अनुसंधान किया है और पाया है कि वातावरण में अथवा सूर्य किरणों में घुले रंगीन परमाणु श्वास द्वारा प्राणवायु के साथ अंदर प्रविष्ट होते और स्वास्थ्य संतुलन बिठाते है। उथली एवं हल्की श्वास-प्रश्वास के कारण शरीर को न तो आवश्यक मात्रा में आक्सीजन की प्राणवायु की आपूर्ति हो पाती है और न ही रंगों की आवश्यक मात्रा शरीर को मिल पाती है। फलतः शरीर और मन दोनों बीमार रहने लगते हैं। विख्यात सूर्य चिकित्सा विज्ञानी डा0 एडविन बेबिट एवं डा0 इवान बी. हाइटेन के अनुसार इस असंतुलन को गहरे श्वास-प्रश्वास के साथ रंगों के भाव भरे आकर्षण के द्वारा आसानी से दूर किया जा सकता है। इनका कहना है कि मस्तिष्कीय चेतना जहाँ श्वसन प्रक्रिया से जुड़ी हुई है वहीं रंगों का भी मन से घनिष्ट संबंध है। उचित मात्रा में उपयुक्त रंग उद्दीपन मिलने पर मस्तिष्क सक्रिय और सशक्त बनता है जबकि प्रतिकूल वर्ण उत्तेजना उत्पन्न करते और मन को विकार ग्रस्त बनाते हैं।
मूर्धन्य चिकित्सा शास्त्री डा0 स्टीवेन्सन के अनुसार सूर्य के प्रकाश में दो हजार रंग हैं जिनमें से सात प्रमुख हैं। इनकी अलग-अलग प्रकृति और भिन्न-भिन्न प्रभाव हैं। सातों वर्ण सात प्रकार की औषधियों का काम करते है, परन्तु इनमें से प्रायः नारंगी, हरे और नीले रंग को ही उपचार प्रक्रिया में प्रयोग करते हैं। रक्तसंचार में वृद्धि करने तथा माँस-पेशियों को शक्ति प्रदान करने के साथ ही मानसिक विकास, इच्छा शक्ति संवर्धन, एवं इच्छाओं मनोभावों के विकास परिष्कार में नारंगी रंग का प्रयोग लाभदायक होता हैं। हरा रंग माध्यम प्रकृति का होता है। इसे संतुलन बिठाने वाला एवं शोधक बताया है। पीले और नीले रंगों के सम्मिश्रण से बना हरा रंग प्राकृतिक रंग है। अतः शरीर को स्वस्थ एवं मन को प्रसन्न रखने में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। रक्तशोधक होने से यह रंग शरीर में से विजातीय विषैले पदार्थों को निकाल बाहर करता है मस्तिष्क सहित सम्पूर्ण तंत्रिकातंत्र को पोषण प्रदान करने में यह किरणें अग्रणी मानी गयी हैं। मनोभावों के परिशोधन एवं त्वचा रोगों को दूर करने में काफी सहायता मिलती है।
नीला रंग शीतल, सुखद एवं संकोचक प्रकृति को होता है। इसका प्रभाव मुख्य रूप से मन मस्तिष्क पर पड़ता है। अतः मानसिक उत्तेजनाओं को शाँत करने, शमन करने, मन को शीतलता प्रदान करने से लेकर मानसिक, आत्मिक विकास में इस रंग का प्रमुख रूप से उपयोग होता है। ध्यान प्रयोजनों में एवं प्राण ऊर्जा के उन्नयन में नीला रंग अधिक प्रभावकारी माना गया हैं। मनोवैज्ञानिक एवं अध्यात्मविद् भी इसकी पुष्टि करते हैं।
जीवनीशक्ति के अभिवर्धन में जो महत्वपूर्ण स्थान प्राणाकर्षण प्राणायाम का है लगभग उसी स्तर का प्रतिफल “कलर ब्रीदिंग” प्रस्तुत करता है। इस संदर्भ में रंग चिकित्सा शास्त्री इवान बी0 हाइटेन ने गहन खोजे की हैं और पाया हैं कि ऊर्जा के संवर्धन में तथा शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को सशक्त बनाने में “कलर ब्रीद्रिग” महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। उनके अनुसार शारीरिक रुग्णता, मानसिक असंतुलन और अदक्षता को साँस द्वारा रंगों का प्रयोग करके आसानी से दूर किया जा सकता है। शरीर में अथवा अंग अवयव- विशेष में जिस रंग की कमी हो, उसी रंग का ध्यान करते हुए गहरी श्वास लेने एवं पीड़ित अंग पर प्रगाढ़ भावना द्वारा आरोपित करने से धीरे-धीरे वह भाग स्वस्थ हो जाता है। इस प्रक्रिया में प्राणायाम क साथ रंग विशेष के धुले हुए की भावना की जाती है। मानसिक चेतना के विकास परिष्कार में इससे अभूतपूर्व सहायता मिलती है।
सुप्रसिद्ध रंग चिकित्सा विज्ञानी मेरी एंडरसन ने भी अपनी कृति “कलर हीलिंग” में कहाँ है कि “कलर ब्रीदिंग” अर्थात् रंगों के प्राणायाम की प्रक्रिया द्वारा शरीर में रंग प्रकम्पनों की पूर्ति की जा सकती है। इस उपचार पद्धति में गहरी श्वास, प्रश्वास के साथ रंग विशेष को प्राणवायु क साथ प्रवेश करने की सुदृढ़ भावना-कल्पना मन ही मन करनी पड़ती हैं। जिस तरह प्राणायाम प्रक्रिया में शरीर के समस्त अंग अवयवों प्रत्येक घटकों में प्राण संचार की ऊर्जा भण्डारण की गहन कल्पना करनी पड़ती है ठीक उसी पद्धति का अनुसरण “कलर ब्रीदिंग” में किया जाता है। पूरक, कुँभक एवं रेचक का समय भी वही रखना पड़ता है जो प्राणायाम में रखा जाता है। अर्थात् यदि श्वास खींचने को समय दस सेकेंड है तो उसे अन्दर दस सेकेंड तक रोकना होगा और उसी मध्य नथुनों द्वारा वायु प्रवेश के साथ इच्छित रंग के प्रविष्ट होने एवं अंग विशेष में प्रतिष्ठित होने और उसके स्वस्थ बनने की भावना की जाती है। इस प्रक्रिया में प्राणायाम और ध्यान दोनों साथ-साथ सम्पन्न होते है, फलतः परिणाम भी अपेक्षाकृत जल्दी मिलता है। इससे शरीर को स्नायु प्रणाली और अंतः भावी ग्रन्थि दोनों सक्रिय हो उठती है और शरीर में एकत्र विषाक्तता को निकाल बाहर करती हैं।
“कलर ब्रीदिंग” का सर्वोत्तम समय सुबह का अरुणोदय काल होता है, जिस समय सम्पूर्ण क्षितिज स्वर्णिम आभा से परिपूर्ण रहता है। सूर्यास्त के समय भी प्रायः यही स्थिति रहती है। उस समय भी इसे किया जा सकता है। खाली पेट या भोजन करने के कम से कम दो तीन घंटे बाद ही इस प्रकार का रंगाकर्षण प्राणायाम करना लाभ प्रद रहता है। इसके लिए खुले में अथवा कमरे के अंदर खुली खिड़की के पास का स्थान उपयुक्त रहता है जहाँ रोशनी का प्रवेश और शुद्ध वायु का आदान-प्रदान हो। प्रक्रिया इस प्रकार है-सर्व प्रथम सुखासन में बैठकर शरीर को शिथिल और मन को शान्त किया जाता है। तदुपरान्त फेफड़ों की पूरी वायु नासिका छिद्रों से बाहर निकाल दी जाती है और लगभग दस सेकेंड तक बाह्मकुँभक की स्थिति में रहा जाता है। इसके पश्चात् दोनों नथुनों से गहरी श्वास खींची जाती है और भावना की जाती है कि प्राण वायु के साथ घुलकर इच्छित रंग की प्रकाश रश्मियाँ शरीर के अन्दर प्रवेश कर रही हैं। कुंभक
के समय इन रंग प्रकम्पनों को प्रभावित अंग तक संकल्प बल द्वारा पहुँचाने और उसके स्वस्थ होने-परिपुष्ट बनने की दृढ़ भावना की जाती है। तत्पश्चात् विजातीय विषैले तत्वों सहित वायु को रेचक प्रक्रिया द्वारा बाहर निकाल दिया जाता हैं। यह एक प्राणायाम हुआ। आरंभ में 5 मिनट से लेकर 15 मिनट तक इसे दोहराना पर्याप्त होगा। पीछे अभ्यास के परिपक्व हो जाने पर इसे आधे घंटे तक बढ़ाया जा सकता है।
सम्पूर्ण काया की रंगों की आवश्यकता की पूर्ति के लिए प्रायः लाल, पीली एवं नारंगी प्रकाश किरणों को पृथ्वी की ओर से उठते हुए तथा नाभिचक्र में सकेन्द्रित होने की भावना करनी पड़ती है। साथ ही आसमानी, नीली एवं बैगनी रंग रश्मियों को अंतरिक्ष मंडल से अपने ऊपर बरसते हुए अंदर प्रविष्ट होने तथा हरे रंग की किरणों को समतल रूप से बहने और अपने अंदर प्रवेश करने की भावना- कल्पना करनी होती है। इससे पूरा वातावरण ही विभिन्न रंग रश्मियों से ओत-प्रोत दिखाई देने लगता है। अभ्यास कर्ता को इसका प्रतिफल न केवल स्वस्थ और दीर्घायुष्य के विकास का लाभ भी हस्तगत होता है।
तपस्या से देवाराधना एवं सिद्धियाँ भागते रहने का क्रम देव-असुरों से लेकर सामान्य मनुष्यों तक अनवरत चलता आया है। सुपात्रों को उनकी अंतः करण की पवित्रता, धारण करने की सामर्थ्य के अनुसार भगवत् सत्ता वरदान देती आयी हैं। यह क्रम भी अनुशासित विधि व्यवस्था के क्रिया-कलापों का ही एक अंग है-पूर्णतः सुनियोजित एवं कर्मफल व्यवस्था पर आधारित। अनुदान फलित भी तभी होते हैं जब साधक सभी अनिवार्य शर्तों को पूरा करता हो।
एक तपस्वी सिद्धपुरुष थे। उनने ब्रह्मा की आराधना की। कड़ी तपस्या से उनने प्रजापति -देवाधिपति को प्रसन्न कर लिया। वर माँगने और देने का प्रसंग आया तो सिद्ध ने अनुरोध किया कि भगवान्! मुझे आपसे कुछ भी नहीं चाहिए। मात्र प्रातःकाल मुझे नित्य ध्यान के समय निमिष मात्र को दर्शन दे जाया करें। साथ ही जब कभी संकटकाल में, विपत्ति के समय में आपका स्मरण करूं तो भी सहायता करने के लिए पधार आया करे। ब्रह्मदेव ने शर्त स्वीकार करली एवं वे प्रतिदिन प्रातःकाल सिद्ध के पास दर्शन देने के लिए आने लगे। सिद्ध कृतार्थ हो गया।
एक दिन एक असाधारण घटना घटी। उनका दुष्टों से तो कभी पाला नहीं पड़ा था अतः शरीर बलवाला क्षेत्र उनका कमजोर था। एक दुष्ट चोर संत की झोपड़ी में घुस आया। उनकी झोपड़ी का सारा सामान बटोर कर जाने लगा। साथ ही उन्हें बुरी-बुरी गालियाँ सुनाने और गन्दे आक्षेप लगाने लगा। सामान तो ऋषि के पास था ही क्या? दुःख उसके जाने का नहीं था। बुरी-बुरी गालियाँ -आक्षेप सुनने पर क्रमशः वे धीरज खो बैठे। नशे में उन्मत्त वह व्यक्ति उनके समझाने पर सुनता तो क्या, गुत्थम गुत्था और हो गया। शरीर से बलवान दुष्ट, दुर्बल काया वाले संत पर हावी हो गया। इस द्वंद्व युद्ध में दुष्ट पलड़ा भारी रहा, संत की जमकर पिटाई हुई। दुःखी मन से सिद्ध ने अपने देवता ब्रह्मदेव का आह्वान किया, गुहार की, सहायता के लिए पुकारा। बड़ी देर प्रतीक्षा में बीत गए कोई मदद को न आया। सिद्ध पुरुष को बड़ा धक्का लगा। एक तो पिटाई से शरीर का अंग-अंग पीड़ा दे रहा था। मन और भी दुखी था। वे मन ही मन देवता को वचन भंग का दोष देकर कटु शब्द कहने लगे। आवेश में व्यक्ति को ध्यान भी तो नहीं रहता कि वह क्या कह रहा है? वे बड़बड़ाते रहे-व्यर्थ है ऐसी तपस्या व वरदान, जिसमें मौका पड़ने पर तो देवता दर्शन न दें, सहायता न करें। दिन भर इसी प्रकार आकुल-व्याकुल बने रहे। दूसरे दिन नित्यक्रमानुसार ब्रह्मदेव सिद्ध पुरुष को दर्शन देने आए। उनके आने की देर भर थी कि साधक ने लाँछनों की झड़ी लगादी। वचनभंग करने, वरदान के व्यर्थ होने व आपत्ति के समय सहायता न करने का दोष दिया।
शान्तिपूर्वक सारी बातें सुनते हुए प्रजापति ब्रह्मा बोले कि -”मैं दिव्य दृष्टि से बस कुछ देख रहा था। बहुत देर तक असमंजस रहा कि आप दोनों में कौन दुष्ट है? व कौन भक्त? क्रोध में दोनों ही आपे से बाहर हो रहे थे। सूझ नहीं पड़ा रहा था कि किसे बचाया जाय, किस पर प्रहार किया जाय? आवेशग्रस्त स्थिति में दोनों को देखते हुए मैंने न आने का निर्णय लिया। गलत प्रहार से बचाव करना भी तो अनुचित होता?
शान्तिपूर्वक सारी बातें सुनते हुए प्रजापति ब्रह्मा बोले कि -”मैं दिव्य दृष्टि से बस कुछ देख रहा था। बहुत देर तक असमंजस रहा कि आप दोनों में कौन दुष्ट है? व कौन भक्त? क्रोध में दोनों ही आपे से बाहर हो रहे थे। सूझ नहीं पड़ा रहा था कि किसे बचाया जाय, किस पर प्रहार किया जाय? आवेशग्रस्त स्थिति में दोनों को देखते हुए मैंने न आने का निर्णय लिया। गलत प्रहार से बचाव करना भी तो अनुचित होता?
बुराई आदमी को पहले अज्ञानी व्यक्ति के सम्मान मिलती हैं और हाथ बाँधकर नौकर की तरह उसके सामने खड़ी हो जाती हैं। फिर मित्र बन जाती हे और निकट आ जाती हैं, फिर मालिक बनती है और आदमी के सिर पर सवार हो जाती है एवं उसको सदा के लिए अपना दास बना लेती है।
परमात्मा हमें अपनी गोदी में लेने के लिए-छाती से लगाने के लिए दोनों भुजाएँ पसार कर खड़ा है। एक भुजा है पीड़ितों, पतितों और पिछड़े हुओं का क्रन्दन। दूसरी भुजा है - सत्प्रवृत्तियों के अभिवर्धन की पुकार। यह निनाद दिशाओं के अन्तराल में गूंजता रहता है। बहरे कान उसे सुन नहीं पाते - जो इन नादों को सुन सके समझना चाहिए, उसके कानों ने ईश्वर का सन्देश सुन लिया।
परमात्मा के पास एक ही सर्वोपरि उपहार है - मानव शरीर। इससे बढ़कर और कोई बड़ी सम्पदा उसके भंडार में है नहीं। जिस प्राणी को यह उपहार मिला, समझना चाहिए वह कृतकृत्य हो गया। सृष्टि के किसी भी जीवधारी को जो सुविधाएँ उपलब्ध हैं, वे मनुष्य को मिली है। यह उसी का काम हैं कि इस विभूति का बुद्धिमत्तापूर्ण उपयोग करके उस उच्चस्तर तक जा पहुँच जहाँ स्वयं परमात्मा विराजमान है। चेतना के साथ जुड़े हुए बहुमूल्य साधनों का मूल्यांकन न कर पाने और उनके सदुपयोग की व्यवस्था न बना पाने के कारण ही हमें दुःख-दैन्य की कँटीली झाड़ियों में भटकना पड़ता है। जीवन लक्ष्य को समझना और उसके लिए समुचित प्रयास करना यदि किसी के लिए संभव हो सके तो निश्चित रूप से उसे नर-पशु से आगे बढ़कर नर-देव की दिव्य भूमिका में प्रवेश करने का सुअवसर मिल सकता है।
मनुष्य शरीर का अनुपम उपहार देने के उपरान्त परमात्मा अपने अन्तिम अनुग्रह का एक और अनुदान देने का इच्छुक है। इसी के लिए वह अपने लाड़लों को पास बुलाना चाहता है, गोदी में लेना चाहता है, छाती से लगाना चाहता है और उस अनुदान को देना चाहता है जिसे प्राप्त करने के बाद और कुछ पाना शेष नहीं रह जाता, इसी आमन्त्रण के लिए उसने अपनी भुजाएँ पसारी हुई है। जो उनमें आबद्ध हो सका वही प्रभु की समीपता और उसकी दुलार भरी मनुहार का अधिकारी बन सका।
पतन और पीड़ा से ग्रसित पिछड़े हुए मनुष्य भले ही अपने अकर्म या अज्ञान का फल भुगत रहे हो, पर वे हमारी दृष्टि में इसी उद्देश्य से आते हैं कि सहानुभूति और सेवा, सहयोग द्वारा उन्हें ऊँचा उठाने-सहारा देने का प्रयास करते हुए अपनी बहुमूल्य आत्मिक चेतना को उभारें। दया, करुणा, उदारता, सेवा जैसी दिव्य संपदाओं में अपने को सुसज्जित करें। इस प्रकार के प्रयासों में जो समय, श्रम, मनोयोग एवं धन खर्च होता है उसकी तुलना में लाखों गुने मूल्य का आत्मबल और आत्म-सन्तोष मिलता है। व्यक्तित्व में देवत्व का उदय होता है। प्रयत्नों में हुए खर्च और परिणाम में मिले लाभ को यदि ठीक तरह तोला जा सके तो प्रतीत होगा कि जो खोया गया, उसमें लाखों गुना पा लिया।
भगवान की पहली भुजा संसार में व्याप्त अधःपतन के प्रति अधिकाधिक सहृदय होने का आमंत्रण लेकर पसारी हुई है। दूसरी भुजा का आह्वान यह है कि इस विश्व वसुधा को सुन्दर समुन्नत बनाने वाली सत्प्रवृत्तियों के अभिवर्धन में योगदान दिया जाय। कोई व्यक्ति एकाकी सुख सम्पदा एकत्रित करके सुखी नहीं बन सकता। कुटुम्ब, परिवार को सुखी बनाने का प्रयत्न करते हुए मनुष्य अपनी सुखानुभूति को कई गुना बढ़ाता है। यदि ऐसा न होता तो परिवार पालन में जो कष्ट उठाना पड़ता है और त्याग करना पड़ता है उसके लिए कोई कदापि तैयार न हुआ होता। इस सुख का जितना अधिक विस्तार करना अभीष्ट हो उतना ही अधिक है। यह आत्मविस्तार, सहज ही अधिक लोगों को अधिक सुख किस प्रकार संभव हो यही सोचता है और अपनी क्षमता का भाग इसी के लिए नियोजित करता है। कहना न होगा कि सत्प्रवृत्तियों और सद्भावनाओं के अभिवर्धन से ही व्यक्ति और समाज की सर्वतोमुखी प्रगति का पथ-प्रशस्त होता है।
ईश्वर को पाने के लिए हमें अपनी ओर से कुछ नहीं करना हैं केवल उसकी पसारी हुई भुजाओं में प्रवेश करना है। उसके आह्वान को सुनना और उसके आमंत्रण को स्वीकार करना भर ईश्वर मिलन का प्रयोजन पूरा करने के लिए पर्याप्त हैं।
काल का पहिया घूमते घूमते क्रमशः उस मोड़ पर आ गया है जिसे युगान्तरीय परिवर्तन वाला कहा जा सके। ऐसी स्थिति में जब इक्कीसवीं सदी मात्र 12 वर्ष दूर खड़ी हो, विश्व चेतना में व्यापक हलचलें देखी जा सकती हैं। ये दोनों ही प्रकार की हैं। एक महाविनाश की सूचक दूसरी ओर सृजन संभावनाओं का संकेत देने वाली शुभ रचनात्मक गतिविधियाँ। हमारी दृष्टि दोनों ही पर रहनी चाहिए एवं विषेयात्मक चिन्तन बनाये रख यह विश्वास सँजोना चाहिए कि भावी समय उज्ज्वल भविष्य की संभावनाओं को लेकर आ रहा है। इन दिनों विश्व में क्या कुछ घटित हो रहा है, होने जा रहा है? उसका विवेचन यहाँ किया जा रहा है।
नक्षत्र युद्ध कार्यक्रम दम तोड़ रहा है -
सुप्रसिद्ध अमेरिकी वैज्ञानिक डा0 फिलिप माँरिसन ने पिछले दिनों जनवरी 77 के अंतिम सप्ताह में आयोजित एक सेमिनार में हैदराबाद (आँध्रप्रदेश) में संवाददाताओं को संबोधित करते हुए कहा कि श्री रेगन का कार्यकाल समाप्त होने के साथ ही उनका प्रिय “स्टारवार” कार्यक्रम (एस.डी.आय.) भी धीरे दम तोड़ रहा है। प्रेस ट्रस्ट के हवाले से प्रकाशित इस समाचार में यह कहा गया कि नक्षत्र युद्ध एक कपोलकल्पित वैज्ञानिक फैन्टेसी मात्र था, जो कभी साकार नहीं हो सकता। इस कार्यक्रम को लेकर जो उत्साह अमेरिकी वैज्ञानिकों के मन में था, वह अब समाप्त हो चुका है। करोड़ों
डालर खर्च करने के बाद अमेरिकी प्रशासन को यह समझ तब आयी जब इसकी विनाशकारी संभावनाओं को मद्देनजर रखते हुए इस कार्यक्रम के भागीदार वैज्ञानिकों ने अपनी अंतः कि पुकार सुनते हुए क्रमशः त्यागपत्र दे दिये। एक साथ इतने वैज्ञानिकों का विरोध व अरबों-खरबों डालर के खर्च से चरमराती अर्थव्यवस्था ने अब नये अमेरिकी राष्ट्रपति जार्ज बुश को यह कहने के लिए बाध्य कर दिया है कि यह कार्यक्रम व्यावहारिक नहीं हैं, अतः इसे गंभीरता से नहीं लिया जाना चाहिए। यहाँ एक सुविदित तथ्य है कि ऊपर उल्लिखित डा0 मारीसन “मेनहट्टनप्रोजेक्ट” के भी सदस्य रहे हैं, जो 1145 में लागू किया गया था एवं जिसके तहत् परमाणु बम विस्फोट किया गया था। लगता है बड़े राष्ट्रों ने अपनी गलतियों से सीख लेते हुए भूलों को सुधारने को क्रम आरंभ कर दिया है।
रूस के 150 शस्त्र कारखाने खाद्य संसाधन केन्द्रों में बदलेंगे
सोवियत नेता वहाँ के राष्ट्रपति मिखाइल गोर्बाचेव जब से सत्ता में आये है, चर्चा का विशेष रहे है। उनने अपनी पार्टी की नीतियों में बड़े व्यापक परिवर्तन किये हैं एवं कभी “आयरन करटेन” माने जाने वाले सोवियत रूस के द्वारा अपनी “ग्लासनोस्त”एवं “पेरेस्त्रोइका” नीतियों के माध्यम से सबके लिए खोल दिये है। इसी का परिणाम था कि पिछले दिनों आर्मेनिया व तजाकिस्तान में आये विनाशकारी भूकम्प के बाद विश्व के हर राष्ट्र ने रूस का हाथ बटाया व यथा संभव मदद दी।
सबसे महत्वपूर्ण वह संदेश है जो इस वर्ष के प्रारंभ में श्री गोर्बाचेव ने रूस के नागरिकों को दिया। एपी न्यूज एजेन्सी के हवाले से प्रकाशित एक समाचार के अनुसार सोवियत नेता ने राष्ट्र वासियों को नव वर्ष का सन्देश देते हुए कहाँ कि वह 1171 में किसी चमत्कार की आशा न रखे। देश की आर्थिक स्थिति को दृष्टि में रखते हुए उनने घोषणा की कि नये वर्ष में हथियारों के 150 कारखानों को खाद्य संसाधन केन्द्रों में बदल दिया जायेगा ताकि अस्त्र निर्माण के स्थान पर हर व्यक्ति के लिए आहार जुटाया जा सके। हथियारों के उत्पादन में भारी कटौती की गई एवं देशवासियों से यह अपेक्षा की गई है कि वे अन्न उत्पादन के क्षेत्र में आत्म निर्भर बनेंगे। अड़तालीस हजार सोवियत उद्यमियों के लिए यह आदेश पारित किया गया है कि वह अपना खर्च चलाने की व्यवस्था स्वयं करे। पहले सरकारी अनुदानों से यह व्यवस्था चलती थी। यह एक व्यापक एवं शुभ संभावनाओं से भरी परिवर्तन प्रक्रिया है, जिसे आज से कुछ माह पूर्व तक असंभव माना जाता था।
यदि इसी प्रकार अस्त्रनिर्माण केन्द्र पूरे विश्व में बन्द होते चले गए व इन कार्यों में नियोजित जन शक्ति का सुनियोजन संभव हो सका तो युग परिवर्तन सुनिश्चित है।
भारत एक महाशक्ति बन रहा है
अमेरिका के रक्षा जान टाँवर ने पिछले दिनों असोशिएटेड प्रेस के हवाले से अमेरिकन सीनेट के समक्ष दिये गए वक्तव्य में कहा कि बहुत शीघ्र हम भारत को एक “सुपरपावर” के रूप में उभरते देखेंगे। पूर्व के तीन राष्ट्र भारत, चीन, जापान की प्रौद्योगिकी वे कलाकौशल के विकास की गति पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि हमें कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि यह जानकर कि इक्कीसवीं सदी में यह तीनों राष्ट्र समग्र विश्व का नियंत्रण करने लगेंगे एवं सृजन प्रयोजनों में निरत होने की प्रेरणा देंगे। उनने कहा कि कल तक जो भू-भाग उपनिवेश थे, वे अपनी साँस्कृतिक विरासत के कारण महाशक्ति के रूप में उभर रहें है एवं उनमें भी भारत का शीर्ष स्थान होगा। उन्होंने यह भी स्वीकार किया की उनके अपने राष्ट्र के विकसित होने का मूल कारण भी अमेरिका में जा बसें भारतीय व जापानी वैज्ञानिक तथा उद्योगपति है जिनका मुकाबला पाश्चात्य स्किल नहीं कर सकती।
भारत उठेगा एवं नेतृत्व करेगा
शीर्षक से एक समाचार पिछले दिनों समाचार पत्रों में छपा था जिसमें अमेरिका में बसें भारतीय आर्थिक विशेषज्ञ श्री खीबत्रा ने कहा था कि “इक्कीसवीं सदी विश्व का नेतृत्व भारत करेगा”। उनका मत है कि पूँजी का अनियंत्रित निवेश पाश्चात्य देशों की आर्थिक व्यवस्था को ले डूबेगा एवं यह “ग्रेट डिप्रेशन ऑफ 1110 के रूप में अगले दो वर्षों में सामने आएगा। साथ ही उनने यह भी कहा कि आर्थिक की, “प्रोगे्रशिव युटिलाइजेशन थ्योरी” के अनुसार भारत अपने संसाधनों का सुनियोजित करते हुए विश्व की आर्थिक मण्डियों का नियंत्रण अपने हाथ में ले लेगा एवं इस सदी के अंत तक एक महाशक्ति के रूप में ....कर सामने आयेगा। इस का मूल आधार होगा-भारत की आध्यात्मिक विरासत तथा बड़ी संख्या में उपलब्ध सुनियोजित बुद्धि-कौशल। यह एक सुविदित तथ्य है कि श्री बत्रा की सभी भविष्य वाणियों को विश्व भर में बड़ी गंभीरता से लिया जाता हैं क्योंकि वह साँख्यिकी एवं अर्थशास्त्र के तर्कसम्मत सिद्धान्तों पर आधारित होती हैं।
भारत उभर रहा है एक महाशक्ति के रूप में
12 दिसम्बर 1177 की “न्यूज वीक” पत्रिका के अंक में डा0 हेनरी कीसिंगर का एक वक्तव्य छपा है जिसमें उनने यह मन्तव्य व्यक्त किया है कि इस सदी के अंत तक भारत- वर्ष अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में ऐसी महान शक्ति के रूप में उभर कर आयेगा जिसके जिम्मे वे सारे दायित्व होंगे जो इन दिनों अमेरिका पूरे विश्व के लिए निभा रहा हैं। पूरे मध्य व पूर्व एशिया में उभरती इस शक्ति के अस्तित्व वे अंततः नेतृत्व को सभी को स्वीकारना ही पड़ेगा। वे कहते है कि इन दिनों भले ही भारत व अमेरिका में मतभेद नजर आता हो, पर अंततः यह दोनों महाशक्तियाँ मिलकर सृजन प्रयोजनों में तत्पर होगी। डा0 कीसिंगर हार्वड विश्व विद्यालय के प्रख्यात प्रवक्ता, अमेरिका के भूतपूर्व विदेश मंत्री रहे है एवं अन्तर्राष्ट्रीय मामलों पर उच्च कोटि के विशेषज्ञ माने जाते है।
ध्यान इन बातों का भी रहे
हम भविष्य की उज्ज्वल संभावनाओं की चर्चा तो करते है पर उपेक्षा उस पक्ष की भी नहीं की जानी चाहिए जो इन दिनों नंगे सत्य की तरह सामने दृश्य रूप में दिखाई पड़ रहा है। रचनात्मक प्रयास अपनी गति से चल रहे हैं पर उनमें कितनी तेजी लानी है, इसे भी नकारा नहीं जाना चाहिए।
प्रति मिनट चौबीस की मृत्यु
प्रेस ट्रस्ट के हवाले से प्रकाशित 21 जनवरी 1171 एक समाचार के अनुसार पिछले 150 वर्षों में दुनिया भर में क्राँतियों, हत्याओं युद्ध से जितने व्यक्ति मरे है उससे अधिक पिछले छः वर्षों में भूख से मरे है। दुनिया भर में 24 लोग प्रति मिनट भूख से मर जाते है।
डेढ़ लाख एड्स की चपेट में
विश्व स्वास्थ्य संगठन की ताजा के अनुसार 1177 के अंत तक विश्व के 177 देशों में एक लाख बत्तीस हजार नौ सौ छिहत्तर एड्स के रोगियों के मामले सामने आ चुके है। इनकी संख्या में आगामी दो वर्षों में पाँच गुनी एवं 10 वर्षों में पचास गुनी वृद्धि होने की संभावना है, यदि समय रहते रोक थाम नहीं की गयी।
*समाप्त*