उज्ज्वल भविष्य की सुनिश्चित संभावना

सूर्य आये दिन ढलता और अस्त होता है। इतने पर भी किसी को यह नहीं सोचना चाहिए कि अगले प्रभात वह स्वर्णिम किरणें बिखेरता हुआ द्रुतगति से उदय होते हुए न दीख पड़ेगा। चन्द्रमा की कलाएँ कटती देखी जा सकती हैं पर इस तथ्य को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता कि शुल्क-पक्ष आते ही वह क्रमशः बढ़ता जाता है और पूर्णिमा के दिन पूर्ण होकर रहता है। समुद्र का जल नीचे उतरता तो है, पर यथा समय उसमें उफनते ज्वार भी आते रहते हैं।

पतझड़ में पत्ते ठूंठ रह जाते हैं, पर बसन्त आते ही उन्हें फूलों और फलों से लदा देखा जा सकता है। ग्रीष्म की तिलमिला देने वाली गर्मी-दुपहरी तभी तक चिलचिलाती है जब तक कि सावन की मेघमाला की घटाटोप बरसने में देरी रहती है। समय बदलते ही सूखी धरती हरितिमा की मखमली चादर ओढ़ कर मुस्कराती है।

जराजीर्ण काया बहुत दिनों तक कराहती नहीं रहती। नियति उसकी स्थिति को बदलती है और शैशव के नये अलंकारों से अलंकृत करती है। शरीर से बहुत कुछ हर दिन बाहर निकलता रहता है, पर यह भी स्पष्ट है कि उसकी पूर्ति नये अनुदानों से होती है व प्रकृति उस घाटे की पूरी तरह भरपाई करती रहती है। निराशा की घड़ियाँ आती तो हैं पर आशा का अभिनव उल्लास उसे खदेड़ कर रहता है। अवगति सामयिक और प्रगति शाश्वत है।

पिछले दिनों बहुत कुछ ऐसा घटित हुआ है जिसे अनर्थ कह सकते हैं। विपन्नता के बहुत अंश अभी भी मौजूद हैं। इतने पर भी जिन्हें नियतिचक्र पर विश्वास है, उन्हें यह आशा करनी ही चाहिए कि उज्ज्वल भविष्य का उदय हुए बिना रह नहीं सकता। इक्कीसवीं सदी ऐसे ही सुखद परिवर्तनों को साथ लेकर आ पहुँचे तो उसे सृष्टिचक्र की सुनिश्चित एवं सुखद संभावना ही समझना चाहिए।


द्रुतगामी परिवर्तनों से भरी प्रस्तुत संधिवेला

सृष्टि के आरम्भ से लेकर अब तक अनेक बार ऐसे अवसर आते रहे हैं जिनमें विनाश की विभीषिका इस रूप में सामने आई, मानों सर्वनाश जैसा कुछ होकर ही रहेगा। असुरता की परम्परा ऐसी ही है, जिसने अनीति को भड़काया और अनौचित्य का माहौल बनाया। वृत्रासुर, भस्मासुर, महिषासुर, हिरण्यकश्यप, रावण, कंस, दुर्योधन आदि नाम तो हैं ही, उनका अपना-अपना समुदाय भी रहा है, जिसमें अनेकों ने उन्हीं से स्तर की अवाँछनीयता को उग्र-उद्धत बनाने में योगदान दिया; किन्तु आतंक चरम सीमा तक पहुँचते पहुँचते ऐसी व्यवस्था बनी कि अनाचार का शमन करने वाले साधन उभरे, तन कर खड़े हुए और जो आतंक प्रलयंकर दीखता था, वह अपनी मौत मर गया।

अन्धकार हर संध्या के समय जोर-शोर से आक्रमण करता है। सर्वत्र हाथ को हाथ न सूझने वाली तमिस्रा बिखेर देता है। किन्तु उसका अंत होते हुए हम नित्य ही देखते हैं। उषाकाल के अरुणोदय के साथ अँधेरे का अंत हो जाता है और उदीयमान प्रकाश के कारण नव जागरण का, नव जीवन का माहौल बनता है। निशाचर और अधिक देर तक दाल गलती न देखकर कोंतरों में जा छिपते हैं। दिनमान का उदय होते ही, पक्षी चहकने, फूल खिलने और सभी जीवधारी अपने निर्धारित पुरुषार्थ करने में जुट जाते हैं। रात में जो आलस्य, अवसान छाया था, उसकी क्षति-पूर्ति सूर्योदय की अवधि में ही भली प्रकार हो जाती है। आज जब बीसवीं सदी का समापन हो रहा है, हम ऐसी ही युगान्तरकारी बेला से गुजर रहे हैं।

अवतारों द्वारा किए गए समय के परिमार्जन की कथाएँ प्रख्यात है। उनने विनाश का ही अन्त नहीं किया है, वरन् पहले से भी अच्छी स्थिति का सृजन किया है। लंका दहन के उपरान्त ही राम राज्य की स्थापना हुई और सतयुग की वापसी जैसी सुखद संभावना अवतरित हुई। हिरण्यकश्यप ने जो विनाश किया था, उसकी भरपाई प्रहलाद काल में भली प्रकार हो गयी। पतझड़ में विशालकाय वृक्षों के पत्ते तक धराशायी हो जाते हैं और सर्वत्र ठूँठ ही दीख पड़ते हैं। पर इसके उपरान्त ही बसन्त का आगमन होता है। नई कोंपलें निकलती हैं और डालियाँ मुस्कराते फूलों से लद जाती हैं। ग्रीष्म का आतप अस्थाई ही होता है। तूफानों और बवन्डरों की भरमार से झोंपड़ों के छप्पर में उड़ जाते हैं। भूमि तवे जैसी जलने लगती है। जलाशय सूख जाते हैं। हरियाली का कहीं अता-पता भी नहीं दिखता। प्यास से होठ सूखते हैं, पसीना टपकता है और कुछ करते-धरते नहीं बन पड़ता। इतने पर भी वह आपत्ति काल बहुत लम्बा नहीं होता। कुछ ही दिनों बाद वर्षा की मेघ-मालाएँ घटाटोप की तरह उमड़ती हैं, घनघोर बरसती हैं और जल-थल एक कर देती हैं। सर्वत्र हरीतिमा का फर्श बिछा दीखता है। विनाशका आतंक दिल दहला देने वाला तो होता है, पर उसकी सत्ता और शक्ति सृजन से बढ़कर नहीं हैं यदि ऐसा न होता, तो संसार में जो प्रगति का अनवरत क्रम आगे आगे ही बढ़ता जा रहा है, वह संभव न होता।

मनुष्य आए दिन भूलें करते रहने के लिए बदनाम है; किन्तु साथ ही उसमें एक अच्छाई भी है कि ठोकरें लगने के बाद सँभल भी जाता है। गरम दूध से मुँह जलाने के बाद फिर छाछ को भी फूँक कर पीने लगता है। विनाश और कुछ नहीं, मात्र दुर्बुद्धि का ही प्रतिफल हैं मनःस्थिति में अवाँछनीयता भर जाने पर परिस्थिति विपन्न स्तर की बनती जाती है। जो बोया है वही काटना पड़ता है। सीधे मार्ग पर ही चलने वाले को झाड़ियों में क्यों भटकना पड़ेगा? भ्रष्ट चिन्तन और दुष्ट आचरण ही प्रकारान्तर से दैत्य-दानव की भूमिका निभाते हैं। गुम्बज में अपनी ही आवाज प्रति-ध्वनि बनकर गूँजती है। छोटी-बड़ी समस्याएँ हमारे अपने ही द्वारा आमंत्रित हैं। यदि क्रम उलट दिया जाय तो प्रतिकूलताओं को अनुकूलता में बदलते देर नहीं लगती। समय-समय पर अनेक बार यही होता रहा है।

इन दिनों विज्ञान के संचार साधनों ने लम्बी दूरी को निकटवर्ती बना दिया है। देख अब परस्पर गली मुहल्लों की तरह सिकुड़ कर और निकट आ गये हैं। पृथ्वी के एक छोर पर बैठा मनुष्य दूसरे छोर पर रहने वाले के साथ सामने बैठे जैसा वार्तालाप कर सकता है। छवि निहार सकता है। दूरदर्शन-रेडियो ने कभी के असंभव को अब प्रत्यक्ष बना दिया है। इन परिस्थितियों में एक स्थान पर होने वाली हलचल समूचे संसार को प्रभावित करती है।

पिछले दिनों जो कार्य लम्बे समय में सम्पन्न हुआ करते थे वे अब कहीं अधिक जल्दी पूरे होने लगे हैं। पहले कृषि विस्तार से लेकर रीति-रिवाजों, संस्कृतियों में मंथर गति से बहुत धीमा परिवर्तन हुआ करता था, पर अब ऐसी बात नहीं रही। विचार धाराएँ भी बड़ी तीव्र गति से व्यापक बनी हैं। साम्यवादी विचारधारा ने एक शताब्दी के भीतर ही संसार के दो तिहाई लोगों को अपने प्रभाव क्षेत्र में ले लिया, जबकि हजारों वर्ष पुरानी विचारधाराएँ कछुए की गति से चलती रहीं और यत्किंचित ही विस्तार पा सकीं। संस्कृतियों के संबंध में भी यही बात कही जा सकती है। अंग्रेजी सभ्यता अब विश्व अलभ्यता स्तर की मान्यता प्राप्त कर चुकी है। पिछड़े इलाकों तक में भी वही रहन-सहन वंश-विन्यास अपनाया जाने लगा है। यह सब समय की गति बदलने के प्रमाण हैं। इसे देखते हुए यह माना जा सकता है कि जो कार्य हजारों वर्षों में सम्पन्न हुआ करते थे, वे अब कुछ दशकों में विकसित परिवर्तित होकर रहेंगे।

पाँच सौ वर्ष पुराना कोई मनुष्य यदि कहीं जीवित हो और अपने समय के साथ आज की परिस्थितियों की समीक्षा करे, तो उसे लगेगा कि यहाँ सब कुछ बदल गया। वह किसी नयी जगह-किसी अन्य नगरी में आ पहुँचा। तथाकथित वर्णित ऋद्धि-सिद्धियाँ मनुष्य को करतलगत हो गई। इन्द्र देवता का विद्युत वज्र, आज घर-घर में प्रकाश डालता, पंखा झलता, कपड़े धोता, तथा सर्वत्र पानी की आपूर्ति करता देखा जा सकता है। वह लम्बे इलाकों को नल कूप में बैठ कर सींचता है। कर्ण पिशाच नाम की यक्षिणी, अपनी भूमिका टेलीफोन एवं रेडियो में बैठकर निभाती है। इसे चमत्कार नहीं तो और क्या कहा जाये?

द्रुतगामी वाहन, विशालकाय कारखाने, पनडुब्बी, वायुयान, राकेट, अणुबम आदि के बारे में आधुनिक जानकारियाँ पाकर पाँच सौ वर्ष पुराना मानव यही कहेगा कि दुनिया बदल गयी है। करेंसी नोट, बैंक, शेयर चक्र, इलेक्ट्रानिक्स के क्षेत्र में आई क्रान्ति आदि को देखकर यही कहा जा सकता है कि इस अवधि में मनुष्य ने असंभव को संभव कर दिखाया है।

यह गतिशीलता अगले दिनों घटने वाली नहीं, है वरन और भी अधिक तेजी पकड़ेगी। जो कार्य सहस्राब्दियों में सम्पन्न हुआ करते थे वे अब दशाब्दियों में पूरे हो दीख पड़ेंगे। यह हर क्षेत्र में होगा। विज्ञान की दिशा में भी और बौद्धिक क्षेत्र में भी। गतिविधियाँ भी बदलेगी और रीति रिवाज भी। नये तरीके खोजे ही नहीं, अपनाये भी जायेंगे। वह अपनाना भी ऐसी तेजी से होगा, मानो उसके बिना गति ही नहीं, मानो वह रीति शताब्दियों से कोई सुनिश्चित प्रक्रिया बनकर चली आ रही हो? इस महान परिवर्तन की सशक्त पृष्ठभूमि इन्हीं दिनों बन रही है, भले ही उसके बीज अदृश्य की जमीन में ही कुलबुला क्यों न रहे हों?

अब से बारह वर्ष बाद शताब्दी ही नहीं, सहस्त्रताब्दी भी बदलने वाली है। इतिहास साक्षी है कि सहस्राब्दियों के परिवर्तन के साथ अति महत्वपूर्ण परिवर्तन होते रहे है। काल चक्र के उस उपक्रम को सही सिद्ध करने के लिए अनेकों प्रमाण सामने आ खड़े होते हैं। प्रातः और सायं का संध्या काल ऐसी ही असाधारण हलचलों से भरा होता है। प्रभात होते ही जागरण और पुरुषार्थ का माहौल बन जाता है। सन्ध्या होते ही अन्धकार अपना साम्राज्य स्थापित करने के लिए घुड़दौड़ लगता चला आता है। प्रसव काल भी एक प्रकार की संध्या है। उसमें एक ओर जननी को .... पीड़ा सहनी पड़ती है, दूसरी ओर शिशु जन्म की प्रसन्नता से परिवार भर के चेहरों पर उत्सुकता भरी मुस्कान छाई होती ही। शीत के समापन और ग्रीष्म के आगमन के मध्यवर्ती समय अपने आप में असाधारण विशेषताएँ भरे होते हैं एवं ऋतु संधि काल कहलाते हैं। बसन्त का वैभव उन मध्यवर्ती दिनों में देखते ही बनता है।

पिछली सहस्राब्दियों के समय जो परिवर्तन हुए होंगे, उनकी तुलना में इस बार की हलचलों को हर दृष्टि से अद्भुत माना जाना चाहिए। नई सदी को प्रभात कालीन अरुणोदय की बेला कहा जा सकता है। विश्वास किया जाना चाहिए कि अशुभ का अन्त ओर शुभ का उदय होने जा रहा है। इक्कीसवीं सदी मनुष्य के दुष्परिणाम भोगने के उपरान्त, सही मार्ग पर चलने की प्रायश्चित बेला कही जा सकती है। उसमें आश्चर्यचकित करने वाले परिवर्तन होकर रहेंगे, इस विश्वास को जितनी दृढ़तापूर्वक अपनाया जाय उतना ही मानव मात्र के लिए हितकारी है।

पिछले दिनों उपलब्धियों के उत्साह भरे उन्माद में भूलों पर भूले होती चली आ रही है। उनका प्रतिफल भोगे बिना गति नहीं। फोड़ा पकने के दिनों में दर्द भी अधिक करता है, साथ ही फुट कर मवाद निकाल फेंकने की तैयारी में लगा रहता है। बीसवीं सदी के अन्त को यदि ऐसी ही उथल पुथल से-कड़वी -मीठी अनुभूतियों से भरा हुआ माना जाय तो कुछ अनुचित न होगा।

पिछले दिनों अनेकों भविष्यवाणियाँ -चेतावनियाँ सामने आती रही हैं। क्रिया की प्रतिक्रिया का पर्यवेक्षण करने वाले कहते हैं कि दुष्टता के परिणाम बिना प्रताड़ना दिए रहने वाले नहीं हैं। भविष्यवक्ताओं, अदृश्य-दर्शियों के द्वारा भी ऐसी ही संभावनाएँ बताई जाती रही हैं और उनका समय प्रायः बीसवीं सदी के अन्त वाला ही बैठता है। ईसाई धर्म में “सेवन टाइम्स” भविष्यवाणियों में मानवजाति पर विपत्तियाँ टूटने की भयावह चर्चा है। इस्लाम धर्म में “हिजरी” की चौदहवीं सदी को कयामत ढाने वाली बताया गया है। भविष्य पुराण में भी ऐसे ही उल्लेख हैं। व्यक्तिगत रूप में भी अनेकों मनीषी ऐसा ही कुछ कहत रहते हैं। उनकी संगति बीसवीं सदी के अंत काल के साथ बैठती हैं। प्रकृति प्रकोपों के साथ उतरने वाली ईश्वरीय दण्ड प्रक्रिया से भी किसी हद तक इसकी संगति बैठती है।

असुरता के सम्मुख जब जब प्रतिकार का खतरा उत्पन्न हुआ है, तब तब उसने भयंकर उत्पात किये हैं। भागती हुई शत्रु सेना पीछा करने वाले सैन्य दल के लिए कठिनाइयाँ उत्पन्न करने के लिए पुल तोड़ती, कुओं में जहर घोलती, सफल को जलाती, प्रजाजनों को लूटती चलती है। इन कुकृत्यों के पीछे वही दुरभिसंधि काम करती देखी जाती है कि मात्र अपना ही विनाश क्यों सहा जाय? प्रतिपक्षी के मार्ग को कठिन मनाने के लिए जो किया जा सकता है, क्यों न किया जाय? बीसवीं सदी का अन्त ऐसी ही कुछ दुर्घटनाओं विपत्तियों से भरा हो सकता है। फिर औचित्य को भी तो अपनी वरिष्ठता सिद्ध करने के लिए प्रबल पुरुषार्थ की परीक्षा देनी पड़ती है, उत्तीर्ण होना पड़ता है।

अनीति के स्थान पर नीति की स्थापना के लिए कुछ संघर्ष तो होना ही है। इस उठा पटक को अप्रत्याशित नहीं मानना चाहिए। असाधारण से निबटने के लिए, असाधारण का आह्वान करने के लिए, असाधारण व्यक्तियों द्वारा असाधारण तैयारी करनी ही पड़ती है। उन्हें भगीरथ, हनुमान, अर्जुन, दयानन्द, विवेकानन्द जैसों का अनुकरण करते हुए, अपने लिए कष्टसाध्य भूमिका निबाहने के लिए तैयार होना पड़ता है। परिवर्तन की इस प्रभात बेला में यही दिव्य प्रेरणा है, जिसे अपनाने में ही हर दृष्टि से हर किसी का कल्याण है।


दारिद्रय और संकट (kahani)

एक व्यक्ति दूसरे साथी से कह रहा था कि अपने तीन जन्म का हाल तो मुझे ही मालूम है। उतना तो मैं भी बता सकता हूँ। साथी ने आश्चर्य से पूछा-चलो बताओ तो? पहला व्यक्ति बोला- पिछले जन्म में कुछ श्रेष्ठ जैसा किया नहीं। इसलिए इस जन्म में दारिद्रय और संकट सहना पड़ा है। इस जन्म में कुछ करते बन नहीं पड़ रहा है। इसलिए तीसरे ....


परोक्ष दर्शन पर आधारित प्रामाणिक भविष्य कथन

अदृश्य दर्शन की दिव्य दृष्टि भविष्य के गर्भ में पक रही गतिविधियों की गंध लेकर यह बताने में सक्षम है कि वर्तमान क्रियाकलाप जिस प्रकार चल रहे हैं, भविष्य उस आधार पर कैसा होगा? जितने भी मूर्धन्य, तत्ववेत्ता, दिव्यदर्शी मनीषी हुए हैं उन सभी में दिव्य क्षमता विद्यमान थी; इसी कारण जो कुछ भी उन्होंने कहा- वह शत प्रतिशत सही निकला।

प्रकृति के भी अपने कुछ नियम होते हैं। मानव मात्र को इन अनुशासनों में आबद्ध होकर अपने क्रियाकलाप चलाने पड़ते हैं। कभी-कभी प्रकृति के नियमों में भी अपवाद प्रतीत होने वाले घटनाक्रम देखने को मिलते हैं, जिनसे लगता है कि अचिन्त्य, अगोचर, अगम्य सत्ता के क्रियाकलापों को एक परिधि में बाँध सकना संभव नहीं है। दिव्य दर्शन के रूप में भविष्य कथन इसी श्रेणी में आते है। इन्हें अन्धविश्वास या सनक कहकर भी नहीं टाला जा सकता, क्योंकि विगत का सर्वेक्षण करने पर अधिकाँश भविष्य कथन सत्य निकलते हैं।

इन दिनों विश्व मानवता ‘अगले दिनों क्या होगा’? इसी असमंजस में उलझी पड़ी है। भविष्य को जानने की जिज्ञासा न केवल साधारण व्यक्तियों बल्कि पढ़े लिखे बुद्धिजीवी वर्ग के व्यक्तियों, यहाँ तक कि वैज्ञानिकों में भी उठती है। ज्योतिर्विज्ञान पर, फलित ज्योतिष पर चाहे कितनी ही उँगली उठाई जाती रहे, यह एक अटल सत्य रहेगा कि अपना भविष्य जानने की जिज्ञासा हर व्यक्ति के अंतर्मन में दबी पड़ी है। ज्यों ज्यों हम इस शताब्दी के समापन के पास आ रहे हैं त्यों त्यों चिंतकों, सर्वसाधारण की व्यग्रता बढ़ती ही चली जा रही है, क्योंकि माहौल कुछ अनिश्चित सा हो गया है। सम्भवतः मनुष्य की इसी व्यग्रता से जुड़ी प्रकृति को मध्य नजर रख विधाता ने भविष्य के रहस्यों की पिटारी बंद रखी है। हर किसी को आगत के सम्बन्ध में स्फुरणा नहीं होती, क्योंकि यदि ऐसा होता तो सबका कर्म पर से विश्वास उठ जाता। कर्म का परिपाक ही भविष्य बनाता है। किये जाने वाले कृत्यों की परिणति ही भविष्य का खाका बनाती है। क्रिया की प्रतिक्रिया एक सुनिश्चित सिद्धान्त है जिसे न्यूटन ने तीसरे नियम के रूप में प्रतिपादित किया है।

पूर्वानुमान एवं अन्तःस्फुरणा जिन किन्हीं मनीषियों को होती है वह प्रायः समष्टिगत होती है। एक व्यापक परिकर पर उसका प्रभाव पड़ता है। शास्त्रकारों ने इसीलिए साधना पुरुषार्थ से इस प्रसुप्त क्षमता को जगाने का विधान बताया है, ताकि भविष्य को जानकर अशुभ सम्भावनाओं को निरस्त करने के लिए वर्तमान के क्रियाकलापों में ही तत्परता पूर्वक कटिबद्ध हुआ जा सके एवं शुभ सम्भावनाओं से लाभ उठाने लिए अपनी एवं औरों की पात्रता विकसित की जा सके। वे महामानव जिन्हें इतिहास में अपनी भविष्य दर्शन की क्षमता के कारण अच्छी खासी ख्याति मिली हुई है, एक मत से कहते हैं कि आने वाली सदी आशाभरी, उमंग और उल्लास से भरी, उज्ज्वल संभावनायें लेकर आ रही हे। आज की परिस्थितियाँ हमें विचलित न करने पायें, सम्भवतः इसीलिए उन्होंने भविष्य के उज्ज्वल पक्ष को पहले से ही लिखकर सामने रख दिया है। ऐसे मनीषियों में सोलहवीं सदी में जन्मे नास्ट्राँडेमस, महायोगी अरविन्द, स्वामी विवेकानन्द एवं प्रो. हरार की चर्चा पिछले अंकों में की जा चुकी है। क्रिस्टल बॉल के माध्यम से भविष्य की झलक झाँकी देखने और दिखाने वाली जीन-.... की आँशिक चर्चा भी हम पहले कर चुके हैं। इसी श्रृंखला में पीटर हरकौस, जॉन सैवेज, एण्डरसन, काउन्ट लुई हैमन (कीरा), जोसेफ डी.लुई, एडगर कैसी, एडवर्ड पिअर्सन, एलेक्सटेनस फ्रेडरिक डेविस, मेरी डी लाँग, मदर ...., आयरिन हयूजेज, जेन्डोलीन मार्क्स कैथी सोत्का, इसाक एसिमोव, थियोडोर-गार्डन, माल्टन डेविस, हर्मन कान, ब्लादीमीर एलेक्सन ड्रोविच काटेलनी कोव, गार्डन मक्डोनाल्ड, फ्रीट्जाफ कापरा, एल्विनटाफ्लर, जेराल्ड ओनेरी, जूल्स बर्न, इत्यादि का नाम आता है।

जीनडिक्सन जब छोटी बच्ची थीं, तब उन्हें एक जिप्सी महिला ने उनकी अंतर्दृष्टि की क्षमता को पहचानते हुए एक क्रिस्टल बॉल दी थी। यह जिप्सी महिला भारतीय मूल की थी। इसने जीनडिक्सन का पूर्व जन्म का वृतान्त उनके माता पिता को बताते हुए कहा कि यह भारतवर्ष में हिमालयवासी एक प्रसिद्ध योगी के साथ साधना कर चुकी हैं। प्रारब्धवश पुनः इन्हें जन्म लेना पड़ा और वह भी अमेरिका में। फिर भी इनकी अन्तर्चेतना सदैव भारत से जुड़ी रहेगी। वह भारत जो साँस्कृतिक विरासत का धनी है और अगले दिनों विश्व का नेतृत्व करेगा। जीन के माता-पिता ने हँसते हुए क्रिस्टल बॉल खिलौने के रूप में खेलने के लिए उन्हें दे दी। पर जब 14 वर्ष की आयु में वे शत-प्रतिशत सही भविष्यवाणी करने लगीं तो उनके आश्चर्य का ठिकाना न रहा। तबसे ही जीन डिक्सन चर्चा का विषय बनी हुई हैं। उन्होंने तीन पुस्तकें भी लिखी हैं ‘माइ लाइफ एण्ड प्रोफेसिज’ ‘ए गिफ्ट आफ प्रोफेसी’ एवं ‘द काल टू द ग्लोरी’। उनकी सही प्रमाणित हो चुकीं भविष्यवाणियों में से कुछ इस प्रकार है।

--1945 में फ्रेंकलिन रूजवेल्ट (तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति) की मृत्यु की पूर्व घोषणा।

--1945 में ही उन्होंने द्वितीय विश्वयुद्ध के हीरो इंग्लैण्ड के प्रधानमंत्री श्री विंस्टन चर्चिल को कहा था कि वे उस वर्ष चुनाव नहीं जीत पायेंगे किन्तु इस हार के कुछ वर्षों बाद पुनः प्रधानमंत्री चुने जायेंगे। यह सब सही निकला।

--1947 में भारत के विभाजन, स्वतंत्रता प्राप्ति एवं 1948 में महात्मा गाँधी की हत्या की पूर्व घोषणा।

--1953 में जीन ने जोसेफ स्टालिन की मृत्यु की पूर्व घोषणा तब की, जब वे चरम शिखर पर थे। उनकी मृत्यु के बाद जार्जी मेलेनकोब तथा उनके दो साल बाद मार्शल निकोलाई बुल्गानिन के उनका स्थान लेने की पूर्ण रूपेण सत्य घोषणा भी वे तब ही कर चुकी थी।

--1961 में संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव डेग हेमर शल्ड के प्लेन क्रेश में अकाल मृत्यु का ग्रास बनने की घोषणा भी वह महिला पहले कर चुकी थी।

--न केवल प्रसिद्ध अमेरिकन राजनेता जॉन एफ. कैनेडी की 1963 में हत्या किए जाने की उन्होंने पूर्व घोषणा की, अपितु हत्यारे का नाम “ओसवाल्ड” बताकर एफ.डी.आई. की परोक्ष रूप से मदद भी की। जॉन कैनेडी के हत्या के पूर्व वे तीन बार राष्ट्रपति भवन तक चेतावनियाँ भेज चुकी थीं किन्तु भवितव्यता होकर ही रही।

--उन्हें जॉन कैनेडी के छोटे भाई सिनेटर राबर्ट कैनेडी की 1968 में हुई हत्या का भी पूर्वानुमान हो चुका था एवं इसकी घोषणा समाचार पत्रों में वे कर चुकीं थी।

--1971 में आरम्भ हुए वाटर गेट काँड की पूर्व चेतावनी प्रेसीडेन्ट निक्सन को वे 1968 में ही दे चुकी थीं। इसके अतिरिक्त अमेरिका और चीन में शान्ति सन्धि होने, 1974 और 1988 के बीच प्रकृति विक्षोभों के प्रकोप विश्व भर में तेजी से बढ़ने की पूर्व चेतावनियाँ भी उनकी सत्य निकली हैं।

अब से आने वाले बारह वर्षों के बारे में उनकी कुछ भविष्यवाणियाँ इस प्रकार हैं।

(1) अमेरिका का व्यापक स्तर पर मध्य पूर्व के युद्ध में उलझ जाना एवं स्वयं अपने राष्ट्र में गृह युद्ध की स्थिति उत्पन्न हो जाना।

(2) वैकल्पिक ऊर्जा के स्रोतों का प्रचुर परिणाम में उपलब्ध होने लगना ताकि विश्व की ईंधन आपूर्ति होती रह सके एवं मनुष्य प्रकृति से अनावश्यक छेड़छाड़ न करे।

(3) पूरे विश्व भर के उच्चकोटि के वैज्ञानिक एक मंच पर एकत्रित होकर विश्व मानवता के भविष्य के लिए नये नये आविष्कार रचेंगे।

(4) यूरोपीय सभ्यता को अन्ततः युद्ध की नीति एवं भोगवादी जीवन पद्धति छोड़कर पूर्व का अनुकरण कर भारतीय संस्कृति के जीवन मूल्यों को अपनाना होगा।

(5)मनुष्यों का मानसिक विकास एवं अतीन्द्रिय क्षमताओं का जागरण इस सीमा तक हो जायेगा कि वे विचार सम्प्रेषण के माध्यम से परस्पर संपर्क किया करेंगे एवं इस प्रकार विश्व एक सूत्र में आबद्ध हो जायेगा।

(6) शिक्षा की वर्तमान पद्धति में आमूलचूल परिवर्तन हो जायेगा एवं बच्चे बाल-संस्कार-शालाओं में सुसंस्कारिता की संस्कार शिक्षा लेने लगेंगे।

जीन डिक्सन कहती हैं “अनीति और नीति की लड़ाई सन् दो हजार तक चलती रहेगी, किन्तु अन्ततः सत्प्रवृत्तियों को अपनाने वाली शक्तियों की ही विजय होगी। सन् 2020 तक धरती पर स्वर्ग जैसी परिस्थितियाँ विनिर्मित हो जायेंगी। न किसी को व्याधि होगी न भुखमरी से मरना पड़ेगा। चिकित्सा विज्ञान की प्रगति इस सीमा तक हो जायगी कि अंग विच्छेद होने पर तुरंत नये कृत्रिम अंग उपलब्ध करा दिये जाऐंगे। सारा विश्व प्रदूषण रहित हो जायगा एवं लोग बड़े शहरों की तुलना में छोटे कस्बों में रहना पसंद करेंगे। अन्तरिक्षीय यात्रायें प्रकाश से भी तीव्र गति से चलने वाले यानों के माध्यम से होंगी एवं विश्व के एक कोने से दूसरे कोने तक यात्री कुछ ही क्षणों में पहुँच जायेंगे। एक विश्व सत्ता के अधीन सारे मानवजाति का क्रिया व्यापार चलेगा एवं यह सब सन् 2020 तक पूरा हो जायेगा।

जीन डिक्सन के उपरोक्त भविष्य कथन पर किसी को भी सन्देह नहीं करना चाहिए क्योंकि परिस्थितियाँ वैसा ही मोड़ ले रही हैं, जैसा कि वे ऊपर कह गई हैं।

अधिकतर भविष्यवाणियाँ “ट्राँस” की स्थिति में अथवा पूर्वाभ्यास के रूप में अपने हाथ में ली हुई क्रिस्टल बॉल को घूरते हुए उसमें घटती हुई घटनाओं के रूप में उन्हें प्रत्यक्ष दिखी। ऐसी ही क्राँतिकारी भविष्यवाणी उनने पूर्व में उदित हुए एक शक्तिशाली विचार प्रवाह के रूप में की है, जिसे वे ‘चाइल्ड फ्राम द इस्ट’ कहती हैं। वे बताती हैं कि 5 फरवरी 1962 में जब वे ध्यान साधना में निरत थीं, तब उन्होंने पूर्व दिशा से एक कौंधती हुई बिजली की लहर देखी एवं उसमें एक भारतीय वेशभूषाधारी महिला के गोद में एक सुन्दर गौरवर्ण बच्चा देखा। उस बालक के मस्तक पर अर्धचन्द्र बना हुआ था। इस अलंकारिक भविष्यवाणी की व्याख्या करते हुए कहती हैं कि यह बालक आने वाले युग के क्रान्तिकारी विचार प्रवाह का प्रतीक है जो संघशक्ति का समन्वित रूप भी हो सकता है अथवा संस्कृति .... करने वाला एक देवदूत .... वह आशय नहीं लिया जाना चाहिए कि वह बालक रूप में उन क्षणों में ही जन्मा है जिनमें ध्यानरत जीन डिक्सन ने उसकी झलक देखी। बालक से आशय है उसका निश्छल, भोलाभाला, निष्कलंक सत्ता के रूप में होना, चाहे शारीरिक आयु कितनी ही क्यों न हो।

यह सुनिश्चित है कि युग परिवर्तनकारी सत्ता का प्राकट्य हो चुका है, एवं वह अपना कार्य अपनी आचार संहिता के अनुसार यथाविधि सम्पन्न कर रही है। चाहे हम उसे बालमति होने के कारण तलाश पाने में असफल रहे हों, अथवा चिन्तन के निषेधात्मक होने के कारण युग परिवर्तन असंभव मानते हों। यह तथ्य सुनिश्चित रूप से समझ लिया जाना चाहिए कि दैवी प्रवाह से जुड़ने वाला हर व्यक्ति आने वाले दिनों में श्रेय सम्मान का श्रेयाधिकारी बन सकेगा साथ ही नवयुग की आधारशिला रखने वाला नींव का पत्थर बनने का यश भी अर्जित करेगा।


सेवा समर्पण का व्रत (kahani)

एक सूखा वृक्ष खड़ा था। ठूँठ रह गया था। उसे भी लोग काटने की तैयारी करने लगे। ठूँठ ने लोगों पर कृतघ्नता का आरोप लगाते हुए कहा। यही है वे लोग जो मेरी छाया में फल सम्पदा का भरपूर लाभ उठाया करते थे। अब जब कि मैं सूख गया हूँ तो इन्हें मेरा अस्तित्व बना रहना भी सहन नहीं होता

पास में खड़ा दूसरा वृक्ष मुस्कराया। उसने कहा-मित्र! अपने सोचने का ढँग बदलों। यह कहो कि जब हरा था तब भी लोगों की सेवा करता रहा और जब सूख गया हूँ तो भी उनके जलाने के काम आता हूँ। सेवा समर्पण का व्रत अन्त तक निभता रहा। यह क्या कम सौभाग्य की बात है?


पूर्वाभास के रहस्य भरे घटनाक्रम

मार्गन राबर्ट्सन नामक एक लेखक ने अन्तःस्फुरणा के आधार पर सन् 1898 में एक काल्पनिक उपन्यास लिखा। नाम था “रेक आफ द टाइटन आर फ्युटीलिटी”। इसमें अटलाँटिक महासागर की पहली बार यात्रा कर रहे एक विशाल जलयान-टाइटेन के हिमशिला से टकराकर ध्वस्त होने एवं विशाल जनसमूह के जल समाधि लेने का वर्णन था। कितनों ने इसे पढ़ा, पर यह उपन्यास बहुचर्चित तब हुआ जब ठीक चौदह वर्ष बाद सन् 1912 में “टाइटैनिक” जिसे कभी न डूबने वाला तथा अपने समय का श्रेष्ठतम जलयान आँका गया था, अपनी पहली यात्रा पर निकला और 16 अप्रैल 1912 को तक हिमखण्ड से टकराकर पानी में डूब गया। चौदह सौ से भी अधिक व्यक्तियों ने जल समाधि ले ली। मात्र आठ सौ आदमी बच पाये। जलयान के डूबने एवं 1998 में लिखित उक्त उपन्यास के वर्णन में इतनी समानता थी कि लगता था मानों रार्बटसन ने 14 वर्ष पूर्व ही भविष्य का चित्र खींच कर रख दिया हो। बाद में प्रकाशित मार्टिन ऐबन की पुस्तक “प्रोफेसी इन अवर टाइम” में तथा न्यूयार्क टाइम्स में दिये गये विवरण के अनुसार दुर्घटना का महा, यात्रियों की संख्या जीवन रक्षक नौकाओं की संख्या, यान का वजन, लम्बाई तथा जिस गति से टाइटैनिक हिमखण्ड से टकराया आदि में विलक्षण समानता पायी गयी।

इस प्रसंग की चर्चा वहाँ इस .... में रही है कि “भविष्यदर्शन” - “पूर्व कथन” बुद्धिजीवियों को प्रायः एक अंधविश्वास प्रतीत होता है एवं वे तर्क, तथ्य, प्रमाणों की कसौटी पर कसे जाने की चर्चा करने लगते हैं। उनका कथन सही हो सकता है, पर अपवाद संयोग रूप में हमेशा नहीं घटते रहते हैं, यह भी जानलेना चाहिए। .... के ग्रंथ ऐसी अनेकों प्रामाणिक .... से भरे पड़े हैं, जिनमें वर्णित घटनाओं की संगति .... रह गए। ‘टाइटैनिक’ जहाज का उपरोक्त उदाहरण तो उस जखीरे का एक दशाँश मात्र है। विश्व भर के पुस्तकालय ऐसी घटनाओं से रंगी पुस्तकों का भांडागार बने हुए है।

ऐसी ही एक घटना अगस्त 1918 के मध्य की है अमेरिकी पत्रकार यूजीन, पी, लाइल (जूनियर) ने “एवरीबडीज मैगजीन” नामक पत्रिका में प्रकाशनार्थ एक लेख दिया-”द वार आफ 1938” जो कि सितम्बर माह में छपा-इस लेख में श्री लाइल ने एक चेतावनी दी थी कि जर्मनी को यदि मूलतः नष्ट न किया गया तो यह पुनः उठ खड़ा होगा। एक तानाशाह इसका संचालन करेगा तथा महामारी की तरह यह सारे विश्व को अपनी चपेट में ले लेगा। इंग्लैण्ड पर हमला, फ्राँस का कुछ ही दिनों में पतन यह सब 1918 में यह पत्रकार लिख चुका था। विश्वास किसी को भी नहीं हुआ क्योंकि प्रथम विश्व युद्ध हो चुका था। जर्मनी बड़ी शर्मनाक हार से गुजर चुका था तथा 11 नवम्बर 1918 को अन्ततः शाँति की संधि भी हो चुकी थी जिसमें जर्मनी ने विभिन्न राष्ट्रों की सारी शर्तें मान ली थी।

परंतु अमेरिका, ब्रिटेन तथा यूरोप के विभिन्न राष्ट्रों की यह खुशफहमी कुछ ही वर्ष रही। 1920 के बाद ही जर्मनी ने पुनः हथियार एकत्र करना आरंभ किये। चिली से नाईटे्रट व अन्यान्य राष्ट्रों से कच्चा माल एकत्रित कर भारी पानी बनाना चालू कर दिया गया। पचास हजार से अधिक की फौज बनकर खड़ी हो गयी एवं हिटलर का नाजीबाद तेजी से उभर कर आया। अन्ततः लेख लिखने के बीस वर्ष बाद उसमें वर्णित एक-एक घटनाक्रम 1939 के बाद यथावत् होता चला गया। लेखक श्री लाइल अपने पूर्वानुमान में,द्वितीय विश्वयुद्ध को एक वर्ष पूर्व 1938 में होने की छोटी सी गलती कर बैठे थे। शेष सभी घटनाक्रम ठीक वैसे ही घटे। यदि 1918 में यूजीन लाइल की “गिफ्टेड प्रोफेसी” को ध्यान में रखा गया होता तो संभवतः द्वितीय विश्वयुद्ध न होता व आज का इतिहास और विश्व का स्वरूप कुछ और ही होता। किंतु भवितव्यता पर विश्वास कम ही लोग करते हैं व उसे काल्पनिक यूटोपिया भर मान कर उसकी उपेक्षा कर देते हैं।

“द अनएक्सप्लेन्ड मिस्ट्रीज ऑफ माइण्ड एण्ड स्पेस” में द्वितीय विश्वयुद्ध के हीरो विंस्टन चर्चिल, जो कि अवकाश प्राप्ति के बाद पुनःयुद्ध में ध्वस्त इंग्लैण्ड का आत्म विश्वास लौटाने के लिए ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बनाये गये थे, के जीवन से जुड़े ऐसे पूर्वाभासों की चर्चा है जो बताते हैं कि दैवी चेतना नहीं चाहती थी कि वे अकाल मृत्यु के शिकार बनें उन्हें समय-समय पर आसन्न संकटों का पूर्वाभास होता रहा और वे बचते रहे।

एक रात्रि वे 10, डाउनिंग स्ट्रीट जो कि ब्रिटिश प्रधानमंत्री का अधिकृत निवास स्थान है, में अपने विश्वस्त मंत्रियों के साथ उच्चस्तरीय विचार विमर्श कर रहे थे। उसी समय जर्मनी के बम-वर्षक लन्दन के आकाश में मंडरा रहे थे। सायरन बज रहे थे परन्तु विचार विमर्श जारी था। अकस्मात चर्चिल उठे, अपने भोजन कक्ष में पहुँचे जहाँ उनका रसोइया भोजन बना रहा था। उनने उस रसोइये व उसके सहायक से खाना गर्म तवे पर दूसरे कक्ष में रखकर तुरन्त भोजन कक्ष खाली कर उन्हें बंकरों में जाने को कहाँ। 3 मिनट बाद ही एक बम गिरा एवं उसी भोजन कक्ष के पिछवाड़े एवं सारे किचन को ध्वस्त कर गया। किन्तु चमत्कारिक रूप से चर्चिल व उनके मंत्री बच गए बाद में उनने कहा कि मुझे पूर्वाभास हुआ था कि भोजन कक्ष पर बम गिरेगा अतः उन्हें चेतावनी दे आया।

चर्चिल स्वयं हवाई जहाजों पर हमला करने वाली तोपों, बैटरीज का निरीक्षण करने युद्ध स्थल पर जाया करते थे। एक बार जब वे निरीक्षण करके वापस आए व कार में बैठ ही रहे थे तो एक क्षण दरवाजे पर खड़े रहे, फिर घूमकर दूसरी ओर से आकर उस दरवाजे की ओर बैठ गए जिधर वह कभी नहीं बैठते थे। ड्राइवर को आश्चर्य तो हुआ पर उसने कुछ कहा नहीं। गाड़ी वापस प्रधानमंत्री निवास की ओर चलदी। एकाएक एक बम विस्फोट हुआ व उनकी गाड़ी का दूसरा हिस्सा जो मुश्किल से उनसे दो फुट दूरी पर था, दूर जाकर गिरा। किसी तरह बिना उलटे गाड़ी चलती चली गयी व लगभग नष्ट हुई उस गाड़ी से उतर कर वे घर में प्रवेश कर गए। बाद में उनने अपनी पत्नी व साथियों को बताया कि मैं जब उस द्वार की ओर से बैठने लगा, जिधर हमेशा बैठता था तो मुझे लगा कि कोई कह रहा है”रुको! दूसरी ओर जाकर बैठो यंत्र चालित सा मैं उधर जाकर बैठा जो कि सुरक्षित रहा” वे अपनी जान बचाने के लिए हमेशा अपने अन्तःकरण में अवतरित होने वाली प्रेरणा को ही श्रेय देते थे। इसे उनने “इनर वाँइस”- अन्तः की पुकार नाम किया था जो कि पूर्वाभास, दैवी प्रेरणा, अदृश्य सहायता किसी भी नाम से पुकारी जा सकती है। लार्ड डफरिन को भी इसी प्रकार अपने मृत्यु की पूर्व सूचना एक भयंकर आकार प्रकार के व्यक्ति को देख कर मिली थी। यह बहुचर्चित घटना जिसमें वे लिफ्ट दुर्घटना में मरने से बच गए थे, अदृश्य सहायता व पूर्वाभास का एक विलक्षण उदाहरण है।

टीपू सुल्तान को अपने समय के सफलतम शासकों में माना जाता रहा है। 18 वीं सदी का यह योद्धा अन्ततः जब श्रीरंगपटट्म में वीरता के साथ संघर्ष करता हुआ सन् 1799 में युद्ध में मारा गया तो उसके पास से एक डायरी प्राप्त हुई उससे यह स्पष्ट हुआ कि टीपू को अपनी रणनीति के संबंध में पूर्वाभास होता था। कभी स्वप्न में, कभी अनायास बैठे-बैठे यह अन्तःप्रेरणा होती थी कि अब यह कदम उठाना चाहिए। वैसा ही होता था व साथ जुड़े पराक्रम के कारण वह अजेय बना रहा अपने साथ संभावित विश्वासघात व मृत्यु की संभावना भी उसने अपनी डायरी में लिखदी थी।

अपनी पुस्तक “फोर नॉलेज” में एच.एफ. सल्तमर्श ने लिखा है चेतना के विभिन्न धरातलों पर समय के विभिन्न आयामों का व्यक्ति सत्ता को उद्घाटन होता रहता हैं यही भविष्यदर्शन का मूलभूत आधार है। वे लिखते हैं कि समय उड़ता है व अचेतन अवस्था में किसी को भी भूतकाल की घटनाओं का (रिट्रोकाग्नीशन) तथा भविष्य काल की घटनाओं का (प्रिकाग्नीशन) पूर्वानुमान हो सकता हैं। स्नायुशास्त्रियों ने मस्तिष्क के दायें गोलार्ध को समय के आयाम से जुड़ा माना है व कहा है कि जिस किसी में जन्म अथवा साधना पुरुषार्थ से यह विकसित-जाग्रत अवस्था में बना-रहता है उसमें भविष्य दर्शन की क्षमता आ जाती है क्योंकि वह “टाइम एवं स्पेस” आयाम परिभ्रमण करने लगता है।

यहाँ प्रिडीचशन (भविष्यवाणी) एवं प्रिमाँनीशन प्रिकाँग्नीशन (पूर्वाभास) में अन्तर समझ लेना जरूरी है। भविष्यवाणी बहुधा सुनिश्चित होती है। यह या तो ज्योतिर्विज्ञान की गणना, हाथ की रेखाओं, चेहरे आदि को देखकर की जाती है या किसी दैवी प्रेरणावश अथवा साधना पुरुषार्थ से अर्जित ऋद्धि-सिद्धियों के आधार पर की जाती है।

पूर्वाभास सहज अन्तःप्रेरणा या अंतःस्फुरणा के आधार पर किसी को भी कभी भी सोते-जागते एकाकी या पूरे समूह को हो सकता है।

“प्रोफेसी” शब्द प्रोफेट से बना है जिसका अर्थ है-किसी उच्चस्तरीय दैवी सत्ता द्वारा, जो त्रिकालश है - दिव्यदर्शी है, भविष्य के सम्बन्ध में कथन। ये सदैव एक व्यापक समूह को प्रभावित करने वाले पूर्व कथन होते हैं। कभी-कभी “युग विशेष” अथवा पूरे विश्व समुदाय तक को प्रभावित करने वाले। पूर्वाभास एक व्यक्ति पर भी लागू हो सकता है तथा कुछ समूहों पर भी। यह चेतावनी के रूप में भी हो सकता है पर बहुधा स्पष्ट नहीं होता।

एक तथ्य बिलकुल सत्य है कि मनुष्य के अन्दर भविष्य को जानने की विलक्षण सामर्थ्य विद्यमान है। वह भविष्य को वाँछित दिशा में मोड़ भी सकता हैं आने वाला समय उज्ज्वल होगा, सुखद संभावनाएँ लेकर आएगा। यह यदि आज कहा जा रहा है तो उसका सशक्त आधार है- अन्तःस्फुरणा एवं यह विश्वास कि मानव चिरंतर की दिशा धारा अगले दिनों बदलेगी जो समय के प्रवाह को उलट कर रख देगी। ऐसा पहले भी हुआ है और आने वाले बारह वर्ष इसी तरह उथल-पुथल भरे होंगे, यह एक व्यक्ति का अंतःकरण ही नहीं, दैवी चेतना का प्रचण्ड प्रवाह भी अपनी हलचलों से बता रहा है।


छोटे मिल जुल कर बड़ा काम कर सकते है (kahani)

कार्तिक अमावस्या को घनघोर अंधेरी रात थी। प्रकाश की आवश्यकता कहीं से भी पूरी नहीं हो रही थी। सूर्य थक कर सो गया था। चन्द्रमा को छुट्टी के दिन काम करने में उत्साह न था।

कोई हल निकलते न दीख कर छोटे दीपकों ने निश्चय किया कि हमीं सारी रात जलेंगे और प्रकाश की आवश्यकता पूरी करेंगे।

दीपावली हर वर्ष उसी घटना का स्मरण दिलाने आती है। कहती है छोटे मिल जुल कर बड़ा काम कर सकते है।

आद्य शंकराचार्य की माता अपने मेधावी बालक को सुसंपन्न ग्रहस्थ बनाना चाहती थी। पर बालक के मनोभाव कुछ दूसरे ही थे। वे संन्यास लेकर धर्म प्रचार में प्रवृत्त होना चाहते थे। माँ बेटे के बीच इसी प्रसंग को लेकर खींच -तान चलती रहित थी। दोनों के बीच भारी मत भेद था।

माता के दबाव का हल एक विचित्र रीति से निकला। शंकराचार्य नदी में स्नान कर रहे थे। माता किनारे पर बैठी थी। यकायक बच्चे की चीख निकली। मगर ने पैर पकड़ लिया और वह पानी में घसीटे लिये जा रहा था।

माता असहाय थी कुछ कर नहीं पा रही थी। उसने अपने उपास्य शिव को पुकारा। बचाने की प्रार्थना की, साथ ही मनौती मनाई कि बच्चा मगर से छूट जाये तो उसे परमार्थ के लिए ही अर्पित कर देंगी।

वैसा ही हुआ जैसा कि चाहा गया था। मगर की पकड़ से शंकराचार्य छूट गये। सोलह वर्ष की आयु में ही उनने आवश्यक विद्या प्राप्त कर ली। संन्यास लेकर धर्म प्रचार के लिए विस्तृत परिभ्रमण पर निकले। उनके द्वारा धर्म और संस्कृति की महती सेवा सम्पन्न हुई जो गृहस्थ की अनेकानेक समस्याओं को सुलझाते हुए संभव न थी।


आत्मिक प्रगति के त्रिविध आधार

भगवत् आराधना के लिए जप और ध्यान का उपचार सर्वविदित, सर्वमान्य एवं सार्वभौम है। अन्य उपासनायें भी विभिन्न सम्प्रदायों में अपने- अपने ढंग से प्रचलित हैं। पर उसमें शब्द और भाव का नियोजन निश्चित रूप से होता है। इन उपचारों के बिना देवता के साथ चेतना को जोड़ सकना प्रायः बन नहीं पाता। उन थोड़े मनीषियों की बात अलग है जो पूजा उपचार के बिना भी अपने कर्मों में आदर्शों की भगवद्बुद्धि को सुस्पष्ट रख साधना का प्रयोजन अपनी विशेष शैली में उपलब्ध कर लेते हैं। इसका अर्थ यह नहीं है कि आत्मिक प्रगति में उपासना के बिना भी काम चल सकता है। यह राजमार्ग है कोई पुल पर चलने की अपेक्षा नहीं तैरकर गन्तव्य तक जा पहुँचे तो उसे कीर्तिमान भले ही कहा जाय पर वह सर्वसाधारण के लिए सुलभ नहीं है।

उपासना का पहला चरण दूसरे चरण जीवन साधना का आधार बनता है। सार्थकता उसी उपासना की है जो आत्म परिष्कार की प्रेरणा दे सके। संयम साधना के रूप में तपश्चर्या इसी हेतु की जाती है। इन्द्रिय-संयम अर्थ-संयम-समय संयम, विचार-संयम यह उपासना की सार्थकता के चार प्रतिफल हैं। आत्मशोधन के लिए इन्हें अपनाना ही पड़ता है। जीवन साधना इन्हीं के सहारे बन पड़ती है। उस उपासना को निष्फल ही मानना चाहिए जो जीवन के मौलिक स्वरूप में सभ्य आचरण एवं आत्मिक पक्ष को सुसंस्कारिता से सम्पन्न न करे। उस बीज की क्या महिमा जो उर्वर भूमि में भी अंकुर उत्पन्न न करे। उपासना बीज है और उसका अंकुर संयम। तपश्चर्या भी यही है। उपासना और साधना का खाद पानी पाकर मनुष्य क्षुद्र से महान बनता हैं छोटा अंकुर विशाल वृक्ष का रूप धारण करता है। शक्तियों से आत्मसत्ता का भण्डार भरता है।

इस शक्ति संचार के भण्डार का आखिर उपयोग क्या हो? इसके लिए अध्यात्म अभ्युदय का तीसरा पक्ष “आराधना” के नाम से जाना जाता रहा है। आराधना परमार्थ परायणता को कहते हैं। तृष्णा के क्षेत्र तो व्यक्तिगत स्वार्थपरता तक सीमित हैं, किन्तु परमार्थ का क्षेत्र उतना ही बड़ा है जितना कि ईश्वर का विश्व विस्तार। परमार्थ में जन्म जन्मान्तरों तक लगे रहा जा सकता है। ऋषि चेतना ने भी स्वर्ग, मुक्ति, वैभव आदि की उपलब्धियों को स्वीकार करने से इन्कार करते हुए यही कामना व्यक्त की है कि प्राणियों की सेवा में ही उसे सदा सर्वदा जुटे रहने का अवसर मिले। यही है वह विधा जिसके सहारे आत्म सन्तोष लोक-सम्मान और दैवी अनुग्रह के तीनों लाभ हाथों हाथ मिलते रहते हैं। तीनों लोकों का वैभव प्राप्त करने से भी अधिक इस आनन्द का रसास्वादन अधिक बढ़ा चढ़ा माना गया है। उपासना जीवन साधना के लिए अग्रसर करती है और सुसंस्कारों से साधा गया जीवन अपनी उपयोगिता आराधना में-लोकसेवा में निरत रहना अनुभव करता है। यही वह त्रिवेणी है जिसे तीर्थराज की संज्ञा दी गई है। ईश्वर आराधना का अर्थ है दिव्यता के साथ अपनी संवेदनाओं को घनीभूत कर लेना। जीवन के विचार क्षेत्र में भ्रष्ट चिन्तन और दुष्ट आचरण को बहिष्कृत कर देना। अपनी कौशल और साधना को पुण्य परमार्थ में उत्सर्ग करते रहना। यही है क्रमशः उपासना, साधना और आराधना के तीन वर्ग। इनसे आत्मा सत्ता के स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीर तीनों ही कृतकृत्य होते हैं। आध्यात्म तत्वज्ञान और योग साधना के विधि विधान का यह परम प्रयोजन है। प्रचलित समस्त कर्मकाण्ड इन्हीं तीन प्रयोजनों के इर्द गिर्द परिभ्रमण करते हैं। उस कर्मकाण्ड की कोई उपयोगिता नहीं, जो जीवनक्रम को प्रभावित न करे, मात्र पूजा-उपचारों की लकीर तो पीटे, पर व्यक्तित्व के किसी क्षेत्र को प्रभावित न करें।

इस मान्यता को बाल बुद्धि ही कहा जा सकता है कि ईश्वर को छुटपुट उपहार देकर या शब्दों का वाक्जाल बनाकर खुशामद के सहारे प्रसन्न किया जा सकता है। उतने भर से मनोकामनाओं की खाई पाटने वाला वरदान प्राप्त किया जा सकता है हो सकता है कि यह सस्ती रीति-नीति बालकों को कुछ प्रलोभन देकर स्कूल पढ़ने जाने के लिए प्रोत्साहित करने जैसे प्रयास के रूप में मानली गयी हो। मन्दिरों में प्रसाद बाँटकर उस लालच से लोगों को पूजा के समय आने और सदुपदेशों से लाभ उठाने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। यह न कुछ देकर बहुत कुछ पाने की कल्पना लाटरी खुलने का सपना दीखने जैसा है। सामान्य लाभों में सफलताओं को प्राप्त करने के लिए जब इतना समय, श्रम, कौशल और साधन लगाने की आवश्यकता पड़ती है तो फिर असामान्य मनोकामनायें तुर्त फुर्त पूरी कराने के लिए मात्र कुछ देर का पूजा पाठ, चमत्कार दिखा देना ऐसी बाल कल्पनायें वयस्कों और समझदारों को शोभा नहीं देती।

आत्मबल सबसे बड़ा बल है। उसके धनी हनुमान, अर्जुन, ईसा, बुद्ध, गाँधी, शंकराचार्य जैसे महान कार्य सम्पादित करते देखे गये है। जिन्हें बुद्धिमान पराक्रमी साधन सम्पन्न व्यक्ति भी नहीं कर पाते वे कार्य आत्मबल के सहारे सम्भव हो जाते हैं। चाणक्य ने चन्द्रगुप्त को, समर्थ ने शिवा को अपने अनुदानों के सहारे कितना सुसम्पन्न बनाया था यह सर्वविदित है। ऐसी इसी संसार की महानतम विभूति को प्राप्त करने के लिए जादूगरों जैसा छू मन्तर करके कौतुक-कौतूहल जैसा कुछ पाया नहीं जा सकता। उसके लिए धीर-गंभीर प्रयत्न करने की आवश्यकता है- आत्मशोधन की आवश्यकता हैं। विषों को शोधकर चिकित्सक अमृतोपम औषधियां बनाते हैं। मनुष्य प्रत्यक्षतः कितना ही दुर्बल अभावग्रस्त क्यों न हो? आत्मपरिष्कार की प्रक्रिया अपनाकर ऐसी प्रतिभा अर्जित कर सकता है जिसके सहारे आत्मकल्याण और विश्व-कल्याण की दोनों आवश्यकतायें साथ-साथ सध सके।

उपासना साधना और आराधना यह तीन प्रयोग प्रकरण है जिनके सहारे ईश्वर प्रदत्त प्रसुप्त दिव्य क्षमताओं को जगाया और अपने समर्थ शक्तिवान बनाया जा सकता है। हर क्षेत्र में प्रगति के लिए प्रबल पुरुषार्थ करने पड़ते हैं। शरीर को बलवान पहलवान बनाने के लिए कितनों को कितने दिन कितनी तत्परता व कठोर व्यायाम करने पड़ते हैं यह किसी से छिपा नहीं। धनी बनने के लिए कृषि व्यवसाय कल शिल्प आदि का आश्रय लेने वाले कितने लम्बे समय तक कितनी तत्परता के साथ कितना कठोर श्रम करते है वह किसी से छिपा नहीं। उच्च शिक्षा प्राप्त करके उच्च अधिकारी बनने की आकाँक्षा रखने वाले प्रायः चौथाई जीवन जितना समय और इतना धन खर्च करते हैं जिसके ब्याज से ही जिन्दगी भर बैठे गुजारा होता रह सकता था।

फिर भी जिन्हें शिक्षा की वह परिणति विदित है जिसके सहारे आत्मगौरव के अतिरिक्त अगले जन्म के लिए विकसित मानस लेकर अगले जन्म तक से लाभ उठाते रहने का अवसर मिलता है, कितना अधिक महत्वपूर्ण है? महान उपलब्धियों के लिए उच्चस्तरीय प्रयत्न करने पड़ते हैं। आत्म परिष्कार ऐसा ही बढ़ा−चढ़ा-लाभ है, जिसके सहारे भौतिक सफलताओं से लेकर आत्मिक अभ्युदय की ऋद्धि−सिद्धियों का लाभ मिलता है। यह कितना बड़ा काम है, इसका मूल्यांकन करने में किसी को भी भूल नहीं करनी चाहिए।

आत्मिक प्रगति का अर्थ है-आत्मपरिष्कार, सत्प्रवृत्ति संवर्धन और पुण्य परमार्थ संचय कर सकने की प्रचण्ड क्षमता। इसके लिए उपासना, साधना, आराधना के अवलम्बनों को ध्यानपूर्वक अपनाया ही जाना चाहिए।


Quotation

ईश्वर की अनुकम्पा सिर्फ उन पर बरती है, जो उसकी दुनिया में शान्ति पैदा करते है। न कि उन पर जो बड़बड़ाते तो बहुत हैं, किन्तु काम कलह के बीज बोने का करते है।


प्रकाश रश्मियों की विज्ञान सम्मत ध्यान प्रक्रिया

मनुष्य को शारीरिक, मानसिक एवं आत्मिक दृष्टि से सुविकसित-समुन्नत बनाने में - दीर्घायुष्य प्रदान करने में रंगीन प्रकाश की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। विज्ञान जगत में उपचार की इस विधि व्यवस्था को फोटो क्रोमोथेरेपी, कलर ब्रीदिंग, कलर मेडिटेशन आदि नामों से जाना जाता है। वर्णों के आधार पर चिकित्सा की यह पद्धति भारत में प्राचीन काल से ही प्रचलित रही है। योग-साधनाओं में तो सूर्योपासना एवं रंगोपचार की अनेक विधाओं का उपयोग साधक की मनःस्थिति को दृष्टिगत रख समर्थ मार्गदर्शकों द्वारा किया जाता रहा है। भारतीय दर्शन के प्रवक्ताओं द्वारा ध्यान साधना में भिन्न-भिन्न रंग संवेदनाओं का प्रयोग प्रमुख विधा के रूप में किया जाता रहा है। यह प्रभाव उथली संवेदनात्मक प्रतिक्रिया तक सीमित न रहकर आध्यात्मिक विकास में अतीन्द्रिय क्षमताओं के उन्नयन में उत्प्रेरक की भूमिका निभाने लगता है। उचित वर्ण का चुनाव कर उनसे लाभ उठा सकना हर किसी के लिए संभव है।

विभिन्न रंगों की सहज उपलब्धता प्रातःकालीन स्वर्णिम आभा लिए उदय होते सूर्य से होती है। अध्यात्म साधनाओं में सविता देवता की भौतिक उपासना सूर्य सेवन और आध्यात्मिक उपासना तेजस का ध्यान करते हुए की जाती है। भारतीय तत्वदर्शियों ने सविता को सहस्र किरणों वाला माना है और उनकी प्रधान एवं सुपरिचित किरणों को ‘सात रश्मि’ कहा है। वायु पुराण में उल्लेख है कि सूर्य की सहस्र रश्मियाँ हैं उनमें से सात प्रधान हैं। ऋग्वेद 10/139/1 में, कौशीतकि ब्राह्मण, शतपथ ब्राह्मण आदि ग्रन्थों में भी सात रंग की रश्मियों का वर्णन है। उनके नाम - (1) सुषुम्णा (2) हरिकेशः (3) विश्वकर्मा (4) संपहंसु (5) अर्वावसु (6) विश्वश्रवः और (7) स्वराट्- गिनाये गये हैं। उन नामों में उन विशेषताओं का एवं शक्तियों का संकेत है जो भौतिक जगत में प्रगति का और आत्मिक जगत में ब्रह्मतेज का पथ प्रशस्त करती हैं। सात रंगों के रूप में हम उनका प्रत्यक्ष परिचय चर्म चक्षुओं से भी प्राप्त करते हैं। त्रिपार्श्व (प्रिज्म) से गुजारने पर इन्हें क्रमशः कढ्ढक्चत्रंघह्रक्र अर्थात् बैंगनी, नीला, आसमानी, हरा, पीला, नारंगी और लाल रूप में देखा जाता है। आध्यात्मिक क्षेत्र में यही सप्तरश्मियाँ सप्तज्ञान भूमिकाओं- शुभेच्छा, विचारणा, तनुमानसा, सत्वापत्ति, असंशक्ति, पदार्थाभावनी और तुर्यगा की द्योतक मानी जाती हैं। इन्हें सप्त साधन के रूप में अर्थात् शोधन, दृढ़ता, स्थैर्य, लाघव, प्रत्यक्ष एवं निर्लिप्तता के अर्थ के भी साथ प्रयुक्त किया जाता है।

सूर्य की सात रंग की किरणें जब मनुष्य के व्यक्तित्व में समाहित होती हैं, तो वे कुछ विभूतियों, विशिष्टताओं के रूप में परिलक्षित होती हैं। ये हैं- साहस, पराक्रम, संयम, संतुलन, एकाग्रता, प्रफुल्लता एवं उत्साह। यही हैं वे विशेषताएँ जिनके आधार पर साधारण सामान्य स्तर का मनुष्य भी प्रतिभावान एवं सफल सम्पन्न बनता हैं इन गुणों की न्यूनता ही मानव को पिछड़ेपन से ग्रस्त रखती है। प्रकाश रंगों का भावप्रवण ध्यान न केवल उन कमियों को दूर करता है वरन साधक को सद्गुण सम्पन्न बनाता और अतीन्द्रिय शक्तियों को उभारता है। चेतना के उच्च आयामों की ओर आरोहण करने में इससे काफी सहायता मिलती है।

भाव संवेदनाओं को उभारने में इनसे महत्वपूर्ण सफलता मिलती है। मानसिक विकास एवं मन के शिथिलीकरण में रंगों की ध्यान-धारणा का प्रयोग प्राचीनकाल से ही चला आ रहा है। योगाभ्यास की षट्चक्र वेधन प्रक्रिया में विभिन्न रंगों का ही ध्यान किया जाता है। आधुनिक काल के पाश्चात्य मनोचिकित्सकों-विशेषज्ञों ने भी मनोरोगों के निवारण में रंगों के ध्यान से आशातीत सफलता पाई है। व्यक्तित्व विकास में मानसिक एकाग्रता आवश्यक है। इसके लिए उन्होंने प्रकृति के अनुरूप रंगों के ध्यान को उपयुक्त माना है।

प्रख्यात रंग चिकित्सा विज्ञानी एस.जी.जे. ओसिली ने अपनी पुस्तक- ‘‘कलर मेडिटेशन” में बताया है कि ध्यान के साथ रंगों का घनिष्ट सम्बन्ध है। मन भावना और रंग परस्पर गुँथे हुए हैं। उन्होंने प्रकाश के सात रंगों को सूक्ष्म शरीर स्थित सात चक्रों, एवं स्थूल शरीर की अंतःस्रावी ग्रंथियों के साथ संबंधित बताया है। श्वेत रंग को उन्होंने दिव्य प्रकाश का स्वरूप माना है जिसका केन्द्र सहस्रार चक्र और उससे जुड़ी पीनियल ग्रंथि है। श्वेत प्रकाश का ध्यान करने से ज्ञान केन्द्रों का अनावरण होता है। आज्ञाचक्र एवं उससे संबन्धित पिट्यूटरी ग्रन्थि पीले रंग का ध्यान करने से प्रभावित उत्तेजित होती है। विशुद्धि चक्र एवं थायराइड ग्लैण्ड नीले रंग से, अनाहत चक्र तथा उससे जुड़ी अंतःस्रावी ग्रन्थि थाइमस हरे रंग की प्रकाश रश्मियों से सक्रिय बनती एवं जाग्रत होती है। मणिपुर चक्र का सम्बन्ध एड्रीनल ग्रन्थियों से होता है। यही वह केन्द्र है जो सूर्य की विविध प्रकाश ऊर्जा तरंगों का अवशोषण करता है और समस्त शरीर को वितरित करता है। अन्यान्य चक्रों को उनके अनुरूप रंग प्रकम्पनों पूर्ति यहीं से होती है। इससे जहाँ शरीर की जीवनी शक्ति मिलती है वहीं चक्रों-कमलों से सम्बन्धित एवं नियंत्रित अंगों में रंगों का सही अनुपात बना रहता है। इस चक्र प्रभावित करने सक्रिय बनाने के लिए नारंगी रंग का ध्यान किया जा सकता है।

मनीषीगणों के अनुसार षट्चक्र प्राण ऊर्जा के केन्द्र माने गये हैं। उनसे प्रस्फुटित होने वाली ऊर्जा तरंगों से ही जीवन की समस्त गतिविधियाँ संचालित नियंत्रित एवं अभिप्रेरित होती है। तमसाछन्न होने के कारण इन शक्तियों का ज्ञान एवं सदुपयोग मनुष्य नहीं कर पाता और दीन-हीन स्थिति में पड़ा जीवन ऊर्जा का अपव्यय करता रहता हैं। इन शक्ति केन्द्रों के अपने विशिष्ट रंग, प्रभाव और सामर्थ्य होते हैं जिन्हें रंग विशेष के ध्यान द्वारा जाग्रत किया और उभारा जा सकता है। विशिष्ट रंग प्रकंपनों को आकर्षित कर अपने आभा मण्डल को -प्राण ऊर्जा को सशक्त, आकर्षक एवं सुखदायी बना सकना सभी के लिए सहज संभव है।

योग साधनाओं, उपासनात्मक-क्रिया- कृत्यों-कर्मकाण्ड के विविध विधि-विधानों में भिन्न-भिन्न रंगों का निर्धारण है। तंत्र साधना में प्रायः लाल वर्ण को इसलिए महत्वपूर्ण माना गया है, क्योंकि उसमें इष्टदेव को बल और आक्रोशपूर्वक वशवर्ती करना होता है। यह विचार यदि ठण्डे पड़ जायँ और साधक को बीच में ही साधना छोड़नी पड़े, तो न सिर्फ उसके अब तक के समय - श्रम बर्बाद होंगे, वरन प्राण - संकट भी उठ खड़े होंगे। इसीलिए ऐसी साधनाओं में लाल रंग के प्रयोग से निकलने वाली लाल प्रकाश तरंगें साधक की भावनाओं को वैसी ही उग्र बनाये रखने में मदद करती हैं, ताकि साधना निरुत्साह के कारण न टूटे। इसी प्रकार पूजा उपासना और सात्विक साधनाओं में प्रायः पीले अथवा श्वेत रंग का प्रयोग किया जाता है, जो साधक की सात्विक विचारधारा को उस काल में उद्दीप्त करते रहता है।

थियोसोफिकल सोसाइटी की संस्थापिका मैडम एच.पी. ब्लैकेट्स्की ने अपनी कृति “प्रेक्टिकल आकल्ट्ज्म” में बताया है कि रंगों का मानव जीवन से घनिष्ट संबंध है। रंग विशेष के वातावरण में ध्यान करने पर मन की एकाग्रता सधती और ध्यान जनित आनन्ददायी अनुभूतियों का लाभ भी साधक को मिलता है। आधुनिक रंग चिकित्सा विशेषज्ञों ने इस संदर्भ में गहन अध्ययन एवं अनुसंधान किये है और पाया है कि मानवी चेतना रंगों से बहुत अधिक प्रभावित होती है। उनके अनुसार नारंगी रंग ध्यान करने अथवा उस वातावरण में रहने से मानसिक क्षमता बढ़ती है। इच्छाशक्ति-संकल्पबल को सुदृढ़ बनाने में इस रंग की महती भूमिका होती है। बौद्धिक एवं भावनात्मक विकास के लिए इसे उपयुक्त पाया गया है। हरे रंग का ध्यान भी मानसिक प्रफुल्लता तथा शान्ति प्रदान करता है। स्वार्थ, ईर्ष्या, द्वेष आदि भावनाओं को कम करने, उनका परिमार्जन परिष्कार करके परमार्थ की पवित्र कर्मों के सम्पादन की मैत्री की भावना उत्पन्न करने में हरा रंग बहुत सहायक होता है। सूक्ष्म शरीर के विकास में प्रधान भूमिका इसी की होती है। नीला रंग शीतल-सुखद माना गया है। मानसिक उत्तेजनाओं को समाप्त कर शान्ति प्रदान करने में इससे महत्वपूर्ण सहायता मिलती है। आत्मिक विकास के लिए प्रयुक्त होने वाले ध्यान साधना में इसी रंग को प्रमुखता दी जाती है। इसे श्रद्धा, भक्ति एवं सत्याचरण की भावना को प्रेरित- उद्वेलित करने वाला माना गया है।

मूर्धन्य रंग चिकित्सा विज्ञानी मेरी एंडरसन के अनुसार लाल रंग अग्नि तत्व का द्योतक है। इसकी गणना रक्त एवं स्नायुओं को उत्तेजना प्रदान करने वाले तत्वों में की जाती है। इसकी अधिकता भौतिक शरीर के लिए अस्वास्थ्य कर होती है। अनेक भावनात्मक असंतुलनों को लाल रंग के अनुपात में संतुलन बिठाकर अथवा इसका ध्यान कर संतुलित किया जाता है। पीला रंग ज्ञान का, प्रतिभा का, तर्कबुद्धि का प्रतीक माना जाता है। शरीर में इसका सही अनुपात व्यक्तित्व विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इस रंग का सेवन करने या ध्यान करने से निराशा, अवसाद, उदासी चिन्ता, विषाद, आदि मानसिक विकास दूर होते है। आसमानी, गहरा नीला एवं बैंगनी रंग ठंडे प्रकृति के होने के कारण मानसिक प्रसन्नता प्रदान करते हैं। इनमें आसमानी रंग का ध्यान अंतर्ज्ञान का अंतःप्रज्ञा का बोध कराता है। उच्चस्तरीय अतीन्द्रिय सामर्थ्य एवं मानसिक क्षमताओं को जाग्रत करने में इस रंग से काफी सहायता मिलती है।

बैंगनी रंग सबसे अच्छा एवं शान्तिदायक रंग माना गया है। इसके प्रकम्पन मानसिक रूप से विक्षिप्त उन्मादी व्यक्ति को भी स्वस्थ बना देते हैं। मानसिक परिष्कार एवं आत्मोन्नति में सहायक होने के कारण इसे आध्यात्मिक रंग के नाम से सम्बोधित किया जाता है। रंग चिकित्सा विशेषज्ञों का कहना है कि बैंगनी रंग के प्रकाश में ध्यान करने से मन की एकाग्रता सधती है साथ ही साधक ध्यान की गहराइयों में पहुँच जाता है। प्रसुप्त अंतःशक्तियों को जाग्रत करने तथा अन्तरात्मा तक पहुँचने में इस रंग के ध्यान से बहुत सहायता मिलती है। मैजेन्टा कलर भावनात्मक स्थिरता प्रदान करता है। लाल और बैंगनी रंगों के सम्मिश्रण से मैजेन्टा रंग बनता है। टरक्वाइज अर्थात् फीरोजी रंग का निर्माण पीले और हरे रंग के सम्मिश्रण से होता है। इस रंग का ध्यान मानसिक चंचलता-उग्रता को दूर करता है। मन की एकाग्रता एवं भावना की प्रगाढ़ता जितनी अधिक होगी, प्रतिफल भी उसी अनुपात में सामने आयेगा।

प्रकाश, ताप, विद्युत और चुम्बकीय शक्ति का आधार एवं केन्द्र विभिन्न रंगों वाली सूर्य प्रभा ही है। वेदों-उपनिषदों से इसे जीवनी शक्ति ‘प्राण’ के नाम से सम्बोधित किया गया है जिसकी पुष्टि अब विज्ञानवेत्ता भी करने लगे हैं। ख्यातिलब्ध वैज्ञानिक मनीषी सर ओलिवर लाज ने अपनी कृति -”लाइफ एण्ड मैटर” में कहा है सूर्य की रंगीन किरणों में प्राण तत्व के सम्वर्धन की अद्भुत क्षमता हैं इनका अवशोषण अवधारण मनुष्य की शारीरिक मानसिक चेतना के विकास में सहायक सिद्ध होता है।

रंगों का मूल स्रोत सूर्य प्रभा है। शास्त्रकारों ने इसे ही - “रश्मीनाँ प्राणाना रसानाँ च स्वीकरणात् सूर्यः” कहा है अर्थात् प्रकाश रश्मियाँ ही समस्त प्राणियों की प्राण शक्ति - जीवनी शक्ति है। यही रश्मियाँ अपने अमृत रस से मनुष्य सहित सभी जीवधारियों को जीवन प्रदान करती है। सप्तव्याहृतियां अर्थात् गायत्री त्रिष्टुप, जगती, अनुष्टुप, बृहती, पंक्ति और उष्णिक- यह सभी सविता देवता की सात रंगों वाली किरणों से उत्पन्न हुई हैं। चेतना के सात आयामों, ज्ञान-विज्ञान की सात भूमिकाओं की अधिष्ठाता सप्तव्याहृतियां इन्हीं रंग रश्मियों के अवयव हैं। प्राचीन ऋषि मुनि इन्हीं का पान करके व्याहृतियों तथा वेदमंत्रों का साक्षत्कार करते थे। याज्ञवल्क्य सहित सप्तऋषियों एवं समस्त मनीषियों ने इन्हीं का अमृत पान कर ज्ञान-विज्ञान के उच्चतम सोपानों पर आरोहण किया था। आज भी वह उपचार पद्धति सबके लिए खुली पड़ी है। अपनी मनः स्थिति, प्रकृति और सामर्थ्य के अनुरूप वर्णों का रंग-रश्मियों का चुनाव कर उनके प्रकम्पनों से लाभान्वित हो सकना सबके लिए सहज- सुलभ है। रंग ध्यान की प्रक्रिया निरापद भी है।


शाश्वत-सनातनः आँतरिक सौंदर्य

मगधराज बिम्बसार के लिये आज का दिन बड़े हर्ष और गौरव का दिन है। भगवान् बुद्ध लोक यश को निस्सार बताते हैं वे चाहते हैं ऊँच-नीच छोटे-बड़े का भेद संसार में न रहे, जीव मात्र परस्पर समता, ममता और शुचिता का जीवन यापन करते हुए सुख पूर्वक रहें, वे छोटे बनकर रहना पसन्द करते हैं इसीलिए राजकीय अतिथि भवन में ठहरने की अपेक्षा उन्होंने बेलवन को विश्राम-स्थल चुना है तथापि अतिथि वे सम्राट बिम्बसार के ही हैं।

एक सामान्य परिचारिका से लेकर मगध नरेश तक की, आज की सज-धज राज्याभिषेक पर्व को फीका कर रही थी। समस्त स्वागत साज तैयार हैं किन्तु मगध साम्राज्ञी क्षेमा अब तक अन्यमनस्क हैं। अन्तःपुर के स्वाध्याय कक्ष में वे आचार्य धर्मपाल का जीवन-दर्शन पढ़ रही हैं। सागल नरेश भगवान् बुद्ध के परम निष्ठावान शिष्य थे उन्हीं की राज-कन्या क्षेमा के अन्तःकरण में तथागत के प्रति उपेक्षा का यह भाव खटकने वाला तो था ही। स्वयं नरेश उपस्थित हुये और पूछा - प्रियतमे! समस्त राज-प्रासाद तथागत की अगवानी के लिये तैयार है किन्तु आपने अभी तक अपने परिधान भी बदले नहीं। राज-कुल अतिथि की यह अवमानना अच्छी नहीं, उठो! और स्वागत हेतु शीघ्र तैयार हो जाओ।

करवट के साथ पुस्तक का प्रस्तुत पृष्ठ बदलते हुए साम्राज्ञी बोलीं-महाराज! जिस व्यक्ति के लिए संसार निस्सार हो, सौंदर्य निस्सार हो उस व्यक्ति के सम्मुख जाकर संसारी जीव क्या करे? वहाँ जाऊँगी तो उनका प्रवचन यही तो होगा - यह संसार भ्रम है, साँसारिक सुख मिथ्या है और मिथ्या है सौंदर्य जिनके आधार पर ही हम अपने जीवन को सजाते संवारते और सुख की कल्पना करते हैं?

‘आखिर गृही हो या विरक्त’-बिम्बसार बोले- जाना तो एक न एक दिन सब को ही पड़ेगा इसलिए पारलौकिक लक्ष्य की तैयारी जाने से पूर्व किया जाना ठीक है। यदि इस तरह का ज्ञान और मार्गदर्शन किसी योग्य पथ प्रदर्शक से मिलता है तो इसमें बुरा क्या? इसे तो अपना सौभाग्य मानना चाहिए प्रिये! साम्राज्ञी ने कोई उत्साह प्रदर्शित नहीं किया। इसी बीच तथागत वहाँ आ पहुँचे। समस्त राज-परिवार उनके स्वागत में दौड़ पड़ा। भगवान् बुद्ध ने क्षेमा जब कन्या ही थी तभी सागल में उसे देखा था। इन्होंने क्षेमा की कुशल क्षेम पूछी और साथ ही समझ भी गये कि उसका सौंदर्य अहंकार ही उसे यहाँ आने में बाधक बना है।

इधर वे अन्य सब लोगों से बातचीत कर रहे थे उधर उनके योग प्रभाव से क्षेमा को योग निद्रा आ गई। उसने देखा एक अत्यन्त सौंदर्यवती अप्सरा भगवान् बुद्ध को चंवर डुला रही है। कुछ ही निमिष के स्वप्न में उन्होंने अप्सरा की बाल्यावस्था, यौवन और जरा तीनों अवस्थाऐं देखीं। उसका शिथिल-जर्जर गात पके बाल धँसी आँखें देखते ही क्षेमा का अंतर्मन व्याकुल हो उठा-कहाँ गया उसका यौवन, कहाँ गया वह सौंदर्य जो अंग-अंग से काम-भाव टपका रहा था। नींद टूट गई और उसके साथ ही उनकी मोह निद्रा भी। मनुष्य जीवन कितना निस्सार है मनुष्य अपने आपको कितना सजाता सँवारता है पर अंत में विनाश के अतिरिक्त हाथ कुछ नहीं आता - आज सारी भौतिकता बालू के ढेर की भाँति ढह गई। क्षेमा दूसरे क्षण तथागत के चरणों में पड़ी क्षमा माँग रही थी और पूछ रही थी ‘आत्मोद्धार का मार्ग’?

तथागत मुस्कराये और बोले - बेटी क्षेम! आत्मोद्धार और आत्म-कल्याण का मार्ग मिलेगा अवश्य-तुम अपने बाह्य सौंदर्य को भूलकर भीतरी सौंदर्य की तलाश करो तुम्हारी जिज्ञासा जितनी प्रबल होती जायेगी लक्ष्य उतनी ही तेजी से अपने आप पास आता चला जायेगा।


ऊँचा उठें- आगे बढ़ें!

मानव जीवन का श्रेष्ठतम सदुपयोग मात्र दो ही विषयों में है। एक तो यह कि मानवी गरिमा के अनुरूप अपने गुण-कर्ण-स्वभाव को ढाला जाय संचित कुसंस्कारों का परिमार्जन किया जाय और उनके स्थान पर उन सत्प्रवृत्तियों को उभारने का पूरा पूरा अवसर दिया जाय जो मनुष्य जीवन की सुर दुर्लभ विभूति को सच्चे अर्थों में सार्थक बनाती हैं। यही आत्म सुधार सच्चे अध्यात्म में प्रवेश करना है। योग और तप इसी निमित्त साधे जाते हैं। ज्ञानयोग, कर्मयोग और भक्तियोग का आश्रय इसी निमित्त लिया जाता है। तत्वदर्शन और धर्मशास्त्र की संरचना इसी निमित्त हुई है।

साधना, स्वाध्याय, संयम और सेवा की चार विधायें अपना कर आत्मोत्कर्ष का महान प्रयोजन पूरा किया जाता है। पशु कलेवर छूट गया, यह एक उत्साहवर्धक सफलता है पर बात इतने से ही बनती नहीं। मानव गरिमा को प्रकट प्रकाशित करने के लिए भाव भरे प्रयत्न होने चाहिए। समझदारी ईमानदारी, जिम्मेदारी और सदुद्देश्यों के लिए बहादुरी बरते जाने की प्रक्रिया अभ्यास में उतारनी चाहिए। यदि इतना न बन पड़ा तो समझना चाहिए कि विडम्बना ही सिर पर लद कर रह गई। भीतर पशु प्रवृत्तियाँ भरी पड़ी हैं। चिन्तन, चरित्र और व्यवहार पर पशुता ही जड़ जमाये बैठी है। तृष्णा, वासना और अहंता ही इष्ट देवियाँ बनकर रह गईं तो सोचना चाहिए कि वस्तुतः पशुता का ही बोलबाला रहा। मुखौटा पहन कर, पोशाक अलंकार धारण करके अभिनेता अपनी वास्तविकता छिपाते और कुछ के स्थान पर कुछ दिखाने में सफल हो जाते हैं। यही स्थिति उनकी भी है जिनके चिन्तन अधोगामी हैं, चरित्र पर स्वार्थपरता छाई हुई है और व्यवहार में जिनने निकृष्टता धारण करके सेवा धर्म अपनाने की भावना ही त्याग दी है। जिनसे लिप्सा, वैभव और अहंकार प्रदर्शन करने वाली महत्वाकाँक्षाओं के अतिरिक्त और कुछ बन ही नहीं पड़ता। मनुष्य कलेवर मिला है तो अंतरंग भी उसी स्तर का होना चाहिए। यदि पैर से सिर तक पशुता ही छाई रहे तो अच्छा यह था कि भीतर और बाहर एक जैसा दिखाने के लिए पशुओं जैसा मुखौटा और आच्छादन ओढ़ कर रहा जाता। अपना नाम नर पशुओं की श्रेणी में लिखाया होता साथ ही यह आशा भी रखी गई होती अपनी वर्तमान स्थिति और संभावना भी इसी स्तर की बन कर रहेगी।

मनुष्य बानर की संतान होने की बात डार्विन कहते रहे हैं। आदर्श रहित व्यक्ति को नर बानर, नर पामर, बन मनुष्य आदि की संज्ञा दी जाती रही है। आदिम कालीन मनुष्य तक का स्तर ऐसा ही बताया गया है। अभी भी कुछ वन जातियाँ लुक छिप कर किन्हीं सघन क्षेत्रों में जानवरों जैसा जीवनयापन करती देखी जाती हैं। इन सब के अनगढ़पन पर आश्चर्य प्रकट किया जाता है, उपहासास्पद माना जाता है और दुर्भाग्यग्रस्त माना जाता है। लगभग ऐसा ही स्तर उन लोगों का भी है जो कहे तो शिक्षित जाते हैं। रहते तो सभ्य जनों की तरह हैं। साधन सुविधाओं की भी कमी नहीं। पर उन्हें कभी इस बात का ध्यान नहीं आता कि मनुष्य जन्म जैसा उच्च पद लदे हैं उन्हें भी समझा और पाला जाय। इस संदर्भ में उपेक्षा करने के उपरान्त मनुष्य का स्तर और भी अधिक गया गुजरा बन जाता है क्योंकि साधन न होने के कारण अन्य जीवधारी पेट प्रजनन तक सीमित रहने के लिए विवश हैं पर मनुष्य तो हर दृष्टि से समर्थ और सुविकसित है। इतने पर भी यदि वह अपने मूल लक्ष्य से भटक कर भूल-भुलैयों में मारा मारा फिरता है तो इसमें दोष अन्य का नहीं वरन् अपना निज का ही है। यह ऐसा बड़ा खोट है कि जिसके बदले उसे अनन्त काल तक असाधारण तप प्रायश्चित ही करना पड़े।

जिन वस्तुओं के साथ इन दिनों असाधारण मोह जोड़ रखा है, जिन्हें अपना मान लिया गया हैं, वे वस्तुतः इस विशाल संसार की ही घटक हैं, पहले से भी थीं और भी रहेंगी। अपने को तो एकाकी ही आना पड़ा है और एकाकी ही जाना पड़ेगा। वस्तुओं की उपलब्धियों में एक ही बुद्धिमत्ता है कि उनका श्रेष्ठतम सदुपयोग कर लिया जाय। किसी के भी साथ इतनी आसवित नहीं जोड़नी चाहिए कि किसी कारण वश उनसे बिछुड़ना पड़े तो दिल टूट जाय, कलेजा बैठ जाय। समझना चाहिए कि हर पदार्थ और हर प्राणी भगवान की सम्पदा हैं। हमें तो उनके साथ सद्व्यवहार की ही जिम्मेदारी सौंपी गई है। इसे पूरा करते रहते तक ही अपने को साधना है। न किसी वस्तु पर अधिकार जमाना जाना चाहिए और न किसी वस्तु पर। यही अनासक्त योग हैं। इसी को शान दृष्टि कहते हैं। लाभदर्शी इसी प्रकार सोचते और जल में रुपसावत रह कर संसार में अपना निर्वाहक्रम जारी रखते हैं। जब तक व्यक्तियों और वस्तुओं को अपनेपन की सघन मान्यता के साथ जकड़ कर रखा जायगा तब तक वे भारभूत रहेंगे और उनके कारण अकर्म करने की आशंका बनी रहेगी पर जब उन्हें भगवान की धरोहर माना जायगा तब न तो अधिकार जमाने की इच्छा उठेगी और न उनके साथ अत्यधिक लगाव बढ़ाने पर, क्षण क्षण में राग द्वेष उमड़ने पर मन को अशान्त ही रहना पड़ेगा।

मनुष्य जीवन की निजी आवश्यकताओं को व्रन्ध ने न्यूनतम रखा है और तुलनात्मक दृष्टि से उसे उपार्जन की क्षमता अत्यधिक मात्रा में दी है। अन्य जीवनों को उपार्जनक्षमता और कम और आवश्यकतायें अधिक दी हैं। उपार्जन क्षमता अधिक होते हुए भी देखा यह जाता है कि मनुष्य की तृष्णा का कोई अंत नहीं है। इस आधार पर तो एक व्यक्ति के लिए सारी दुनिया का वैभव कम पढ़ता है कहते हैं कि हिरण्याक्ष ने समूची पृथ्वी ही चुरा कर अपने भण्डार में रख ली थी। रावण सिकन्दर तक अन्त तक अपने को अभावग्रस्त ही मानते रहे। हविस को पूरा करने में उनने अनाचार अत्याचार बरतने में भी कोई कमी न रखी। इतने पर भी यह संभव न हुआ कि जो बटोर सके उस पर संतोष कर पाते।

भगवान ने मनुष्य की आवश्यकताऐं कम और उपार्जन क्षमताएँ अधिक इस कारण रखी हैं कि वह निर्वाह से कुछ ही समय में निश्चित हो सके और शेष सारा समय उस प्रयोजन के लिए खर्च कर सके जिसके लिए उसे यह महान अवसर उपलब्ध हुआ है। वह उद्देश्य एक ही है कि आत्मिक दृष्टि से स्वयं ऊँचा उठना और दूसरों को उठाना। स्वयं व्यक्तित्ववान बनना और दूसरों को बनाना। सम्पत्तिवान तो चोर, डाकू, ठग, उचक्के, अनाचारी भी बन सकते हैं। पर व्यक्तित्व की दृष्टि से वे गए गुजरे ही रहते हैं। अपनी दृष्टि से अपने को गिरा हुआ पाते हैं। दूसरे भी उन्हें वैसा ही अनुभव करते हैं। वस्तुस्थिति सात पदों के पीछे छिपाने पर भी प्रकट होकर रहती है। हींग की गन्ध पोटली में बाँध लेने पर भी रुकती नहीं। सज्जनता एवं नम्रता तो आचरण में बिना बहु प्रयारित हुए भी रह सकती हैं, पर दुष्टता की दुर्गन्ध दूर दूर तक अपनी उपस्थिति का परिचय देती है और समूचे वातावरण को प्रभावित करती है। संकीर्णतावादी स्वार्थपरायण व्यक्ति सदैव उपेक्षित तिरस्कृत रहते हैं। उनका कोई सच्चा मित्र नहीं बनता। न किसी से सराहना करते, समर्थन जताते और सहयोग करते बन पड़ता है। ऐसे व्यक्ति एकाकी स्तर के ही बन कर रह जाते हैं। न कोई उनका बनता है न वे किसी के काम आते हैं।

जो आदर्शों के निर्वाह के लिए संयम निभाने उदारता बरतने के लिए साहस न कर सके, उसके लिए यह संभव ही नहीं है कि वह व्यक्तित्ववान बने, चरित्रकम रहे। स्वार्थ श्रद्धास्पद बने और दूसरों के मानव में आदर्शवादी श्रद्धा संवेदना कर संचार कर सके।

संसार में प्रवृत्ति, समृद्धि और संसार शान्ति का सुनिश्चित आधार एक ही है - चरित्रनिष्कर, व्यक्तित्व की उत्कृष्टता। उसके अभाव में किसी के लिए भी यह संभव नहीं होता कि सामग्री गरिमा के अनुरूप अपने व्यक्तित्व को ऊर्जा और आभा सम्पन्न बना सके। इसलिए जीवन के सदुपयोग का एक ही मार्ग रह जाता है कि निर्वाह प्रयोजन के लिए उतना ही समय श्रम कौशल चलायें जितना कि जीवित रहने के लिए आवश्यक है। शेष सारी बचत तो सत्प्रयोजनों के लिए ही लगनी चाहिए। अपना चिन्ता, प्रमाण और व्यवहार इस स्तर का रहें जिससे अपने और दूसरों के लिए सत्प्रवृत्तियाँ को अपनाने और बढ़ाने की प्रेरणा मिलती रहे। उठने और उठाने का उपक्रम निर्माण गति से चलता रहे, अग्रगामिता अपनायी जाती रहे।


सर्वसुलभ, सर्वोपयोगी ध्यान-धारणा

मनुष्य अनेक कल्पनाएं करता है। कई आदर्शों को अपनाने की बात सोचता है। कई निर्णयों को आवश्यक मानकर उनके निमित्त पुरुषार्थ का प्रयास भी करता है। पर देखा गया है उच्चस्तरीय प्रयोजनों का उत्साह थोड़े से ही समय में ठंडा पड़ जाता है। जो उमंगें उठी थीं वे उड़ने वाले बुलबुलों की तरह समाप्त हो जाती हैं। उच्चस्तरीय प्रयोजन के लिए उठने वाला उत्साह प्रायः शिथिल होते होते समाप्त हो जाता है। पर अवाँछनीय दिशा में उठाए गए कदम सहज विस्मृत नहीं होते, वे अपनी जगह दृढ़ता-पूर्वक जमे रहते हैं। नशेबाजी की लत एक बार लग जाने पर फिर उससे पीछा नहीं छूटता। तलब उठती है तो बेचैन कर देती है। मस्तिष्क उसी प्रिय पदार्थ को पाने के लिए ताने बाने बुनता रहता है। चैन तब लेता है जब अभीष्ट को हस्तगत कर लिया जाता है।

किन्तु उत्कृष्ट स्तर के निर्धारणों में यह प्रक्रिया कम ही चलती है। पानी ढलान की ओर सहज ही बहता है। वस्तुएँ ऊपर से नीचे की ओर गिरती हैं। यह कार्य तो धरती की गुरुत्वाकर्षण शक्ति ही कर लेती है। पर किसी वस्तु को ऊँचा उछालना हो तो उसके लिए अतिरिक्त शक्ति लगानी पड़ती है। आदर्शों का परिपालन ऐसा ही उच्चस्तरीय प्रयास है। जिसके लिए विशेष रूप से प्रेरणाप्रद प्रयत्न करने पड़ते हैं।

ऐसे प्रयत्नों में ‘ध्यान’ का बहुत महत्व है। वह विस्मरण - जन्म कठिनाइयों की रोकथाम करता है। विस्मरण यों उपयोगी भी है। उसके कारण विछोह जैसे आघात क्रमशः हलके होते जाते हैं। लोग पिछली बातों को भूलकर नई जानकारियों को स्मृति पटल पर अंकित करते जाते हैं। यदि ऐसा न होता तो स्लेट पर एक ही हिसाब सदा लिखा रहता। पुराने को मिटाकर ही उस स्थान पर नया अंकन किया जाता है। यही लोकाचार है।

आदर्शों के क्षेत्र में प्रवेश करने पर महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि मन संसार के मेले में भ्रमित होकर मूल अवलम्बन को विस्मृत कर देता है। नए नए आकर्षक जाल जंजालों फँस जाता है। ऐसी दशा में यही उपयुक्त है कि आदर्शों के परिपालन में कर्तव्यों के निर्वाह की बात को प्रमुखता दी जाय और उनका बार-बार स्मरण करते रहकर विस्मृति जैसा कुयोग न बनने दिया जाय।

द्वेष-दुर्गुणों को भुला दिया जाय। इसका ताक कुछ तुक है। किन्तु जिन आधारों पर जीवन का उत्कर्ष-अभ्युदय अवलम्बित है। उन्हें ते प्रयत्नपूर्वक स्मृति पटल पर अंकित किया जाता रहना चाहिए। इसका सरल उपाय यह है कि उसे दिन चर्या का अविच्छिन्न अंग बना लिया जाय। जो काम नित्य किए जाते हैं, उनकी आदत पड़ जाती है और फिर समय पर उन्हें पूरा करने की एक बेचैनी उठती है। शौच, स्नान, भोजन-शयन आदि की स्मृति नियत समय पर अनायास ही उठती है और जब तक वह कार्य पूरा न हो जाय तब तक शान्ति नहीं मिलती। ठीक इसी आधार पर आत्म-चिन्तन को भी दिनचर्या का अविच्छिन्न अंग बनाना चाहिए। इसी को ईश्वर स्मरण पूजा पाठ, दैनिक उपासना, संध्यावन्दन आदि नामों से जाना जाता है।

वस्तुतः ईश्वर को किसी खुशामद या रिश्वत की रत्ती भर भी आवश्यकता नहीं है। उस पर इन बातों का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। अनुशासन में रहना, मर्यादाओं का अपनाना, वर्जनाओं से बचना यही ईश्वर-साधना है। सादगी, सज्जनता, संयम, सेवा, के प्रयासों को जीवन व्यवहार के साथ जोड़कर ईश्वर उपासना का प्रयोजन भली प्रकार पूरा हो जाता है। सृष्टि में इतने जीवधारी हैं पर कोई पूजा पाठ नहीं करता। इन दिनों आधी आबादी नास्तिक वर्ग की है। उन्हें न ईश्वर की मान्यता के प्रति विश्वास है और न पूजा पाठ से सम्बन्ध। फिर भी ईश्वर उन सब का भरण पोषण और अनुदान सहयोग करता रहता है। इससे स्पष्ट है कि ईश्वर को प्रसन्न करने के लिए नहीं वरन् अपने आत्मशोध की प्रक्रिया पूरी करने के लिए उपासना करनी होती है। उसकी यथार्थता इसी में है कि आदर्शों के परिपालन तथा कर्तव्यों के निर्वाह में कहीं चूक न होने पाए। इसका ध्यान उपयुक्त समय पर किया जाय। उसमें चूक न होने दी जाय। जब हर दिन कमरे में बुहारी लगती है। नहाने, कपड़े धोने, रसोई बनाने आदि का क्रम बिना नागा किया जाता है तो फिर आत्म परिशोधन की बात को क्यों भूला जाय? ईश्वर को हमारी पूजा की आवश्यकता भले ही न हो, पर हमारे लिए उस का प्रयास नित्य-नियमित रूप से करना चाहिए। यह हमारी व्यक्तिगत आवश्यकता है, जिसके बिना आत्मोत्कर्ष के मार्ग में भारी व्यवधान आ खड़ा होता है।

उपासनात्मक अनेकों क्रिया-कलापों में ध्यान--धारणा ऐसी है, जिसे उपेक्षित नहीं किया जाना चाहिए। ध्यान भी कई प्रकार के हैं। उनमें से अधिकाँश में ईश्वर की छवि की कल्पना की जाती है, साथ ही उसके सान्निध्य भी अपेक्षा भी। इस सही प्रक्रिया के साथ इतना और जोड़ना चाहिए कि परमात्मा और आत्मा के विच्छिन्न सम्बन्ध को स्मरण रखा जाय। उसे सर्वव्यापी व न्यायकारी माना जाय। मानव जीवन प्रदान करने की अनुकम्पा और उसके साथ जुड़ी हुई जिम्मेदारी को एक क्षण के लिए भुलाया न जाय। स्मरण के लिए यह तारतम्य भी जुड़ा रखा जाय कि जो आत्मिक प्रगति के लिए आवश्यक है, उसका निर्वाह बिना प्रयास के किया जाता रहे। यह सब ठीक तरह हो रहा है या नहीं? इसके लिए चिन्तन-मनन किया जाता रहे। वस्तुतः आत्म सुधार और आत्म परिष्कार की प्रक्रिया जिस आधार पर पूरी होती है, वही सच्चा “भजन” एवं सच्चा “ध्यान” है।

जीवन के स्वरूप, उद्देश्य एवं सदुपयोग का ताल मेल अपनी विधारणाओं एवं गतिविधियों के साथ ठीक प्रकार बैठ रहा है या नहीं, इसका ध्यान हर घड़ी रखना चाहिए। जहाँ चूक हो रही हो उसे सँभालने, सुधारने की चेष्टा सतर्कतापूर्वक की जानी चाहिए। ऐसा न हो कि इस संदर्भ में उपेक्षा चलती रहे और चिन्तन में भ्रष्टता का, चरित्र में दुष्टता का अनुपात बढ़ता जा रहा हो। जो सब करते हैं, उसी का अनुकरण किया जा रहा है। अधिकाँश व्यक्ति प्रमाद में समय गुजारते हैं और अकरणीय कृत्य करने के अभ्यस्त होते हैं। उनमें अपनी पहचान अलग रहनी चाहिए। नर पशुओं के झुण्ड में उन्हीं का एक सदस्य बनकर रहा गया तो यह मानवी गरिमा का संरक्षण कहाँ हुआ? अपना स्तर घटिया तो नहीं बनता जा रहा है, इसी जाँच पड़ताल हर घड़ी ध्यान पूर्वक होती रहनी चाहिए।

ध्यान की एक प्रक्रिया एकाग्रता साधना के लिए की जाने वाली कसरत की तरह भी है। चंचल मन को वानर जैसी उछल कूद करते रहने, अपनी शक्ति गँवाने की छूट नहीं मिलनी चाहिए। असंयम के जीवन के किसी भी पक्ष पर हावी नहीं होने देना चाहिए। इन्द्रिय संयम, अर्थ संयम, समय संयम और विचार संयम की घेरा बन्दी करते रहने से शक्तियों का अपव्यय रुकता है, एकाग्रता सधती है और मन को ज्ञान-साधना, कर्म-साधना एवं भाव साधनाओं की उच्चस्तरीय क्रिया-पद्धति में नियोजित किया जा सकता है। किसी देव प्रतिमा या महामानव के चित्त जमाकर उसके साथ तन्मय होने की भाव साधना भी ध्यान कहलाती है। ऐसा आए दिन कई-कई बार करते रहने से मनोनिग्रह की सिद्धि मिलती है। निग्रहित मन वाला लक्ष्य के साथ तन्मयता अपना कर बड़ी-बड़ी सफलताएँ प्राप्त करता है।

एक ध्यान, शक्ति संयम का है। इसके लिए उदीयमान स्वर्णिम सूर्य को ध्यान का माध्यम बनाया जाना चाहिए। आँखें बन्द करके भावना करनी चाहिए कि प्रभातकालीन उदीयमान सूर्य की किरणें अपने शरीर पर पड़ रही हैं। शरीर को बल मस्तिष्क को ज्ञान और हृदय को भाव संवेदनाओं से भर रही है। नाभि चक्र को स्थूल शरीर का, हृदय को सूक्ष्म का, मस्तिष्क मध्य-ब्रह्मरंध्र के कारण शरीर का केन्द्र बिन्दु माना गया है। इन तीनों में सूक्ष्म स्तर की तीन ग्रंथियाँ हैं, जिन्हें कमल भी कहते हैं। सूर्य के उदय होने पर कमल खिलते हैं और सुगंध तथा शोभा से समूचे क्षेत्र की भर देते हैं। यह ध्यान प्रातःकाल ही किया जाना चाहिए। तीनों कमल चक्रों को विविध विधि शरीर के केन्द्र बिन्दुओं को विकसित होने की भावना करनी चाहिए। यह साधना प्रक्रिया तीनों शरीरों के विकसित करती है, उन्हें ओजस् तेजस् एवं वर्चस से सराबोर करती हैं।

ध्यान की अनेकानेक विधियाँ हैं और उनके विभिन्न स्तर के प्रयोजन भी हैं। उनमें से उपरोक्त कुछ ऐसे हैं, जिन्हें सर्व सुलभ और सर्वोपयोगी कह जा सकता है।


स्वप्न संकेतों से प्रेरणा लें

स्वप्नों के सम्बन्ध में अनेकों मान्यताएं हैं। प्रायः लोगों की धारणा है कि सोते समय जीवात्मा शरीर से बाहर निकल कर कहीं अन्यत्र चली जाती है और वहाँ के चित्र - विचित्र दृश्य देखती रहती है। निद्रा भंग होने के अवसर पर पुनः काया में प्रवेश कर जाती है। कुछ लोग इसे अदृश्य आत्माओं का संकेत मानते हैं तो कुछ स्वप्नों में भविष्य के संकेत, चेतावनी, जानकारी देने वाले सूत्रों की खोज करते हैं। इस प्रकार अनेकों मान्यताएँ, किम्वदंतियां, भ्रान्तियाँ जन सामान्य में प्रचलित हैं। हर कोई स्वप्नों के रहस्यवाद को जानना-समझना चाहता है कि आखिर वे है क्या? मूर्धन्य मनोविज्ञानवेत्ताओं ने इस संदर्भ में गहन शोध प्रयास किये हैं और बहुत कुछ उन्हें सफलता भी मिली है। उन्होंने चेतन मन के अतिरिक्त अचेतन मन को भी इसके लिए उत्तरदायी माना है।

मनोविज्ञानवेत्ताओं के अनुसार स्वप्न दो प्रकार के होते हैं--पहला सक्रिय- दूसरा निष्क्रिय। सक्रिय स्वप्न वे हैं जिनमें व्यक्ति स्वयं को किसी कार्य में संलग्न देखता है। दूसरे में व्यक्ति दर्शक की तरह घटनाओं का अवलोकन करता रहता है। स्वयं कोई हिस्सा नहीं लेता। इस स्थिति में मनुष्य को कभी-कभी नये विचार, नई प्रेरणाएँ, नये संकेत मिल जाते हैं। स्वयं के अथवा व्यक्ति विशेष-समूह आदि से सम्बन्धित भविष्य की जानकारियाँ भी कभी-कभी मन के पर्दे पर कौंध जाती हैं। पर अधिकाँश सपने निरर्थक ही होते हैं। इनमें कोई विशेष ऊर्जा तो नहीं व्यय होती किन्तु अचेतन मन तनावों से मुक्ति अवश्य पा लेता है। ऐसी इच्छाएँ, आकाँक्षाएँ - भावनाएँ जो चेतन मन पर सवारी गांठें रहती हैं, परन्तु किन्हीं कारणों से उनकी पूर्ति नहीं हो पाती, अचेतन मन की गहरी पर्तों में चली जाती हैं। स्वप्न काल में यही विभिन्न रूप धारण कर प्रकट होती और मन को सन्तुष्टि प्रदान करती हैं।

स्वप्न अस्त-व्यस्त, अस्थिर क्यों दिखाई देते हैं? इसकी विसंगति के पीछे भी कारण हैं। अचेतन मनःक्षेत्र में भूतकाल की एवं अनेकानेक जन्मों की भूली बिसरी, प्रिय, अप्रिय, सार्थक निरर्थक विस्मृतियाँ दबी पड़ी रहती हैं। इनमें जो भी हाथ लग जाती है वह स्मृति पटल पर अंकित हो जाती है। उसे ही अचेतन देख लेता है। अचेतन की कुछ अपनी इच्छाएँ भी होती हैं, जिन्हें अनेक जन्मों की संग्रही संस्कार पूँजी भी कहा जा सकता है। उनमें से अधिकाँश अतृप्त पड़ी रहती हैं। तृप्ति तो थोड़े ही प्रसंगों में मिल पाती है। परिस्थितियाँ हर इच्छा की पूर्ति के उपयुक्त कहाँ होती हैं? ऐसी दशा में अतृप्ततम मन कल्पनाएँ ही करता रहता है। वही घटनाएँ रात्रि स्वप्नों का आधार बन जाया करती हैं। जैसे ही चेतन मन की पकड़ ढीली पड़ती है कि अचेतन में दबी कल्पनाएँ उभरने लगती हैं और स्वप्नों के रूप में दिखाई देने लगती हैं।

मनःशास्त्रियों ने अचेतन मन की क्षमता को असीम बताया है। उनका कहना है कि चेतन मन और बुद्धि संस्थान उसके आगे नगण्य तुच्छ हैं। मस्तिष्क विज्ञानी भी इस बात की पुष्टि करते हैं कि मन 88 प्रतिशत भाग अचेतन है और 12 प्रतिशत चेतन। चेतन मस्तिष्क भी पूर्ण चैतन्यता के साथ क्रियाशील कहाँ रहता है? सामान्य व्यक्ति अपने अधिकाँश क्रिया-कलाप अर्धचेतन अवस्था में करते हैं। ऐसी दशा में अचेतन की क्रियाओं का ज्ञान कैसे संभव हो सकता है? हमें इसकी जानकारी भले ही न रहे पर अचेतन अपने कर्तव्यों से विमुख नहीं होता। वह स्वप्न संकेतों द्वारा अपनी जानकारी सम्प्रेषित करता रहता है। इस सम्बन्ध में वह उदार है। अनुभवी चिकित्सा विज्ञानियों का मत है कि सामान्यतः छोटे-मोटे रोगों की सूचना एक दो दिन पहले ही रोगी को सपने में मिल जाती है। अधिक गंभीर रोगों--जैसे-मिरगी, यक्ष्मा, पक्षाघात आदि के पूर्वाभास दो से तीन माह पूर्व स्वप्न संकेतों से मिल जाते हैं। पर प्रायः लोग इन चेतावनियों की उपेक्षा कर देते हैं।

सिगमंड फ्रायड जैसे पाश्चात्य मनोविज्ञानी स्वप्नों को भले ही अवचेतन मस्तिष्क काल्पनिक उड़ानें बताते रहे हों। पर कुछ सपने ऐसे होते हैं जिनमें किन्हीं लोगों के भविष्य में घटित होने वाली अनेक घटनाओं के पूर्व संदेश इतने सच्चे निकलते हैं मानो वह सब कुछ अदृश्य जगत में कहीं पहले ही सृजित हो चुके हों। वैज्ञानिकों के पास तो अभी इसका कोई उत्तर नहीं है परन्तु भारतीय आर्षग्रन्थों जैसे-अथर्ववेद, देवज्ञ कल्पदुम, सुश्रुत संहिता, अग्नि पुराण आदि में इसका सुविस्तृत उल्लेख है। उसके अनुसार अचेतन का सम्बन्ध विराट चेतना से रहता है। अतः घटित-अघटित घटनाओं का विवरण शीशे पर पड़ने वाले दृश्यों की तरह उस पर अंकित होता रहता है और यदाकदा उसके संकेत सपनों के माध्यम से मिलते रहते हैं। उपनिषदों के अनुसार मन जिस भी क्षण आत्मा से संबंध स्थापित कर लेता है, उसे भूत, भविष्य, वर्तमान की काल, सीमा और स्थान की मर्यादा से बाहर की घटनाएँ एवं वस्तुएँ दीखने लगती हैं। स्वप्न संकेत उसी का एक छोटा उदाहरण है।

विख्यात वैज्ञानिक फ्रैंक एडवर्ड ने अपनी कृति-”स्टे्रंज वर्ल्ड” में ऐसी अनेकों रोचक घटनाओं का वर्णन किया है जो भविष्य दर्शन सम्बन्धी सार्थक स्वप्नों की पुष्टि करती हैं। इनमें से एक घटना ब्रिटिश जनरल स्टाफ के अध्यक्ष एवं नार्थ डाउन आयरलैण्ड के साँसद सर हैनरी विल्सन से सम्बन्धित है। लन्दन की एक संभ्रांत महिला लेडी लंडनबरी ने एक रात टैक्सी में प्रवेश कर रहें हैं। पिछली सीट पर बैठे वह जैसे ही उसके आवास पर पहुँचते हैं वैसे ही कुछ हमलावरों ने उन पर गोली चला दी और वे लहूलुहान हो गये। सपना इतना भयानक था जिसे देखकर लंडनबरी चीख उठीं। चिल्लाहट सुनकर परिवार के लोग निकट जा पहुँचे और घटनाक्रम सुनकर उस पर हँसने लगे। इस घटना को सुनने वाले अन्यान्य व्यक्तियों ने भी उसे अंधविश्वास कहकर टाल दिया। किन्तु दसवें दिन जब वही घटना उक्त सैनिक अफसर के साथ ज्यों की त्यों घटित हुई तो सभी अवाक् रह गये।

कभी-कभी ऐसे भी अवसर देखने को मिलते हैं कि स्वप्न व्यक्ति के लिए बड़े ही लाभकारी सिद्ध होते हैं। घटना अप्रैल 1956 की है। ओहिओ के जूलियस डिटमैन के मालंगोदाम के पास ‘क्लक्लैण्ड पार्केमेटिक कारपोरेशन’ पश्चात् डिटमैन ने एक स्वप्न देखा कि निगम द्वारा निर्मित पार्किंग गेरेज अचानक ही ढह गया है और उसके मलवे से डिटमैन का स्टोर पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया। डिटमैन का स्टोर पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया। डिटमैन ने स्वप्न संकेतों को समझकर बीमा कम्पनी से एक लाख बीस हजार डालर की पाँलिसी 6 अप्रैल 1956 शुक्रवार को करा ली। दूसरे ही दिन शनिवार को प्रातः 7 बजे पार्किंग इमारत धंसकने लगी और डिटमैन के स्टोर के ऊपर आ गिरी जिससे वह विनष्ट हो गया। बीमा कम्पनी ने उसकी सुरक्षित धनराशि का भुगतान किया भी साथ ही उसकी इस दूरदर्शन की क्षमता पर आश्चर्य व्यक्त किया।

एक अन्य घटना में शेफफील्ड, इंग्लैंड की श्रीमती बिनी विलिन्कसन एक दिन दोपहर को झपकी सी ले ही रहीं थी कि स्वप्न उसके मानस पटल पर मँडराने लगे। उसे अपने घर के सामने वाले दरवाजे पर भारी धमाके जैसी आवाज सुनाई दी। जैसे ही उसने दरवाजा खोला कि क्रोधातुर एक महिला खड़ी मिली जिसे उसने पहले कभी नहीं देखा था। उस अजनबी महिला ने विलिन्कसन को बताया कि तुम्हारा पत एक तख्ते से गिर कर बुरी तरह घायल हो चुका है और तुम्हारी सेवा-सहायता की प्रतीक्षा कर रहा है। विलिन्कसन बिस्तर से उठी और स्वप्न की घटना से भयभीत होकर अपने पति गोर्डन विलिन्कसन को फोन करने लगी तो प्रत्युत्तर में यही सुनने को मिला कि उनका पति एक तख्ते से गिरकर बुरी तरह घायल हो गया था काफी उपाय-उपचार करने के बावजूद भी प्राण नहीं बच सके।

इसी तरह की एक घटना मई 1937 की है। ईस्ट औरेंज, न्यूजर्सी की श्रीमती अर्नेस्ट टाप ने स्वप्न देखा कि उसके पति को किसी हत्यारे ने चाकू मार कर घायल कर दिया है। प्रातः जगकर उसने यह वृतान्त अपने पति को ही कह सुनाया।

लेकिन पति ने उस पर कोई ध्यान नहीं दिया। उपेक्षा-उपहास और करने लगा। 16 मई 1938 को जब अर्नेस्ट टाप जलयान से यात्रा पर निकला तो ठीक वैसा ही सब कुछ उसके साथ घटित हुआ जैसा कि उसकी पत्नी ने बताया था।

अमेरिका में लोग बीच की श्रीमती बालिक ने 21 जनवरी 1963 को एक बड़ा ही वीभत्स स्वप्न देखा कि उसके पति का वायुयान सैन-फ्राँसिस्को इंटरनेशनल एयर पोर्ट पर टकरा कर क्षतिग्रस्त हो गया है। इसकी सूचना श्रीमती बालिक ने लोग बीच इन्डिपेन्डेन्ट प्रेस को दी। 4 फरवरी 1963 को प्रेस को पता चला कि उसके पति के साथ ठीक वैसा ही घटित हुआ है जैसा कि पत्नी ने स्वप्न में देखा था। प्रेस ने उस घटना को समाचार पत्र के मुख पृष्ठ पर “मेट्स प्लेन क्रैश सीन इन वाइव्स ड्रीम” नाम से प्रकाशित किया। लोग बीच की सभी समाचार एजेन्सियों ने स्वप्न के इस अलौकिक रहस्य काक सर्वसम्मति से स्वीकृत किया और छापा भी।

सर ओलिवरलॉज ने अपनी पुस्तक “सरवाइबल आफ मैन” में इस तथ्य को स्वीकार किया है कि अचेतन मन के माध्यम से हम स्वप्नावस्था में अलौकिक और भविष्य में होने वाली घटनाओं को देखते और जान लेते हैं। उन्होंने लिखा है कि अमेरिका के राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन को अपने अधिकांश कार्यों की प्रेरणा सपनों के माध्यम से मिला करती थी। जिस समय दास प्रथा के उन्मूलन का उनका आन्दोलन तीव्र हो रहा था और उन पर उसे बंद कर देने का चारों ओर से दबाव डाला जा रहा था। उन्हें बार-बार एक ही स्वप्न दिखाई देता जिसमें उन्हें यही सन्देश मिलता कि अपने दास प्रथा उन्मूलन के निश्चय को वे न बदलें। यह कुप्रथा अवश्य समाप्त होकर रहेगी। इसकी पुष्टि लेखक राबर्ट जेम्स लीज ने भी अपनी कृति में की है।

एक अन्य स्वप्न में लिंकन ने अपने भावी राष्ट्रपति चुने जाने का भी पूर्वाभ्यास पा लिया था। इतना ही नहीं अपना हत्या किये जाने के दृश्य भी उन्हें दिख गये थे। परमहंस परिव्राजकोपनिषद् में इस प्रकार के स्वप्नों को “तेजस स्वप्न” कहा गया है जिसमें भविष्य के संकेत छिपे रहते हैं। लन्दन स्थित इंडिया हाउस की लाइब्रेरी में टीपू सुलतान की एक डायरी सुरक्षित है जिसमें अंग्रेजों को बुरी तरह परास्त करने वाले इस महान योद्धा के विचार और स्वप्न संकलित हैं। इन्हीं स्वप्न संकेतों के आधार पर उनकी योजनायें बनती और क्रियान्वित होती थीं। इसमें उन्हें सफलता भी मिलती रही।

उपरोक्त घटनाएँ बताती हैं कि स्वप्न मानव जीवन की एक महत्वपूर्ण अवस्था है। यदि मन शुद्ध, सात्विक, निर्मल और परिष्कृत हो ता सूक्ष्म जगत के स्पन्दनों को पकड़ने में वह उतना ही सक्षम होगा। इसके लिए जहाँ तक संभव हो, चेतन मन को वासनाओं, तृष्णाओं और अनावश्यक कुकल्पनाओं से बचाया जाना चाहिए। जिससे अतृप्त आकाँक्षाऐं अचेतन में जाकर डेरा न डाल सकें। चिन्तन, मनन, विचार-व्यवहार में सरलता उत्कृष्टता का समावेश होने पर जीवन भी परिष्कृत बनेगा साथ ही मन भी अनगढ़ और कुसंस्कारी न रह सकेगा। अध्यात्म उपचारों का अवलम्बन इसमें सर्वोत्तम परिणाम प्रस्तुत करता है। फिर सार्थक स्वप्न भी अधिक मात्रा में देखे जा सकेंगे। वैसे भी जब भी ऐसे संकेत मिलें उनसे प्रेरणा लें व जीवन की रीति-नीति में उन प्रेरणाओं को समाविष्ट कर उनसे लाभ उठाने का प्रयास करें।


दृष्टिकोण का अन्तर मात्र (kahani)

कुछ लोग स्वल्प साधनों में संतोष पूर्वक जीते और कुछ के पास पर्याप्त साधन होते हुए भी अभाव की शिकायत करते। दोनों ही प्रकार के लोग उस सत्संग में आया करते। किसकी बात यही है यह सिद्ध करने के लिए प्रवक्ता विद्वान ने आया गिलास पानी से भरा और उसे दर्शकों को दिखाया।

कुछ लोग कहते थे आधा भरा है। कुछ लोग कहते आधा खाली है।

विद्वान ने समझाया कि जो अभावों को देखता है ओर भरे पूरे सम्पन्नों से अपनी तुलना करता है उसे अपनी स्थिति अभावग्रस्तों जैसी दिखती है। पर जो उपलब्ध साधनों से भी संतोष कर लेत और मितव्ययतापूर्वक काम चला लेते हैं उन्हें अपनी स्थिति भरे पूरे जैसी लगती है। यह दृष्टिकोण का अन्तर मात्र है।


प्रचलनों को तर्क की कसौटी पर कसें!

सम्पूर्ण विश्व में पाँच हजार से भी अधिक भाषाएँ और बोलियां है। इनमें से 845 तो केवल भारत में बोली जाती हैं। जब विश्व इतना बड़ा है और बालियाँ एवं भाषाएँ इतनी हैं, तो स्वाभाविक है कि प्रथा-परम्पराएँ भी असंख्यों होगी जरा एक दृष्टि इन विविध परम्पराओं पर भी डालें पुर्तगाल के टिमोर द्वीपवासी आदिवासी महिलाओं में अपने कानों को खाँचे के रूप में काट लेने की प्रथा है। इस प्रकार कटे हुए वे कान सुन्दर मानते हैं।

कहीं मोटापा और फील-पाँव को खराब माना जाता है और उससे बचने के लिए तरह तरह के उपाय-उपचार किये जाते हैं, पर अफ्रीका की मुरुण्डी जनजाति में मोटी टाँग बावी लड़कियाँ सुन्दर एवं सौभाग्यशाली मानी जाती है।

थल प्रदेश में निवास करना सुविधाजनक और आरामदेह माना जाता हैं, इसलिए लोग प्रायः भूतल पर ही घर-मकान बनाते हैं, किन्तु मिश्र में आदिवासियों का एक विशेष समुदाय है, जो जल पर रहना ही पसंद करता है। वहाँ जमीन की कमी है, ऐसी बात नहीं है, पर वे जो आनन्द जल पर निवास कर ले पाते हैं, उस आनन्द से जमीन पर वंचित हो जाते हैं ऐसा उनका मत है। वहाँ एक विशाल झील है। वे उसी झील पर बाँस के सहारे जल सतह के ऊपर झोंपड़ी बनाते और रहते हैं। खेती के लिए वे पुआल और मिट्टी से बनी तैरती सतह का इस्तेमाल करते हैं। उस समुदाय में जब कोई बच्चा पैदा होता है, तो वे शिशु के दानों और दो तुम्बी बाँध कर उसे जल में तैरने के लिए छोड़ देते हैं। बच्चा खो न जाये, इसलिए उसे गले में एक छोटी घण्टी बाँध दी जाती है।

भारतीय मान्यता के अनुसार मृत शरीर का दाह-संस्कार कर देने पर शरीर के प्रति आत्मा की आसक्ति समाप्त हो जाती है और उसे शान्ति मिलती है। किन्तु अफ्रीका के सियरा लियोन जनजाति में अवधारणा ठीक इसके विपरीत है। उनका विश्वास है, कि मृत व्यक्ति की हड्डियों को विभिन्न अंग-अवयवों में बाँध कर नृत्य करने से मृतात्मा प्रसन्न होती है और अपना आशीर्वाद-वरदान प्रदान करती है।

पेड़-पौधे चूँकि मूक-योनि के होते हैं, अतः वे अपनी आयु का परिचय अपने “एनुवल रिंग” द्वारा देते हैं। आयु-प्रदर्शन की लगभग ऐसी ही प्रथा दक्षिण भारत की बन्दों जनजातियों में प्रचलित है। वहाँ लड़कियों की आयु बताने के लिए प्रति माह एक नया ‘वलय’ उनके गले में पहना दिया जाता है यह क्रम तब तक चलता रहता है, जब तक कि उसका विवाह न हो जाय। कभी कभी यह इतना बड़ा हो जाता है कि गर्दन सुराहीदार वस्तुतः नजर आती है। अलग-अलग प्रदेशों में सुन्दरता का अलग-अलग मापदण्ड है, मगर विश्व के प्राय’ हर हिस्से में आकर्षण बढ़ाने के लिए महिलाएँ सौंदर्य-प्रसाधनों का ही इस्तेमाल करती हैं। विचित्र बात यह है कि आस्ट्रेलिया की जनजाति महिलाओं में सुन्दर बनने और दीखने का अलग ही ढंग है वहाँ की महिलाएँ स्वयं को आकर्षक बनाने के लिए अपने होठों में सलाई घुसा लेती है।

मान्यता है कि स्थूल शरीर द्वारा ही भौतिक वस्तुओं का भोग कर सकना संभव है। सूक्ष्म शरीर को इनकी आवश्यकता नहीं पड़ती। प्राचीन मिश्रियों का विश्वास था कि मरने के बाद भी व्यक्ति को भोग-सामग्री की आवश्यकता पड़ती है। इसी कारण वे मृत व्यक्ति के साथ भोज्य पदार्थ, धन-दौलत, नौकर-चाकर सब कुछ दफना देते थे, ताकि मृतात्मा को किसी प्रकार की तकलीफ न हो।

जो भी शाश्वत सत्य है, वह तो अपनी जगह अक्षुण्य बना रहता है, किन्तु प्रथा-परंपराएं- प्रचलन सतत् बदलते रहते हैं। इसलिए कभी भी किन्हीं परम्पराओं को जो कभी किसी कारण अपनाई गई, समझदार व्यक्तियों द्वारा विवेक की कसौटी पर कस कर नकार दिया जाता हैं यह तथ्य अध्यात्म विधा में घुसी हर अवांछनियता, मूढ मान्यता पर लागू होता है।


विचारों में निहित प्रचण्ड सामर्थ्य

मनुष्य का जीवन उसके विचारों का प्रतिबिम्ब है। व्यक्तित्व विकास एवं भाग्य निर्माण में इन्हीं की महती भूमिका होती है। सफलता- असफलता, उन्नति-अवनति, सुख-दुःख, शान्ति-अशान्ति आदि सभी मनुष्य के अपने विचारों पर निर्भर करते हैं। किसी भी व्यक्ति के विचार जानकर उसके जीवन के स्वरूप को सहज ही मालूम किया जा सकता है। मनुष्य को कायर-वीर, स्वस्थ-अस्वस्थ, प्रसन्न-अप्रसन्न कुछ भी बनाने में उसके विचारों का महत्वपूर्ण हाथ होता है। स्पष्ट है कि विचारों के अनुरूप ही मानव जीवन का निर्धारण होता है। अच्छे विचार उसे उन्नत बनायेंगे तो उनकी निकृष्टता उसे गर्त में धकेलेगी।

विचार चेतना क्षेत्र की एक विशिष्ट सम्पदा है। इसी के आधार पर मनुष्य जीवन का उपयोग करता, योजनायें बनाता और उन्हें पूरी करता है। विचारशील व्यक्ति सामर्थ्यवान माने जाते हैं। इसके विपरीत विचारहीनों की गणना नर पशुओं में की जाती है। विचारक्षमता को बढ़ाने के लिए स्वाध्याय, चिन्तन, मनन, सत्परामर्श आदि उपाय काम में लाये जाते हैं। यह उपाय साधन जिन्हें उपलब्ध नहीं होते वे कूपमण्डूक बने रहते हैं। वे जीवन का भार ढोने के अतिरिक्त और कुछ कर नहीं पाते। इसीलिए जहाँ चेतना की शक्ति पर विचार किया जाता है वहाँ प्रकारान्तर से उसे विचार शक्ति का विशेष सुनियोजन किया जाना कहा जाता है। विचारशील ही महत्वपूर्ण योजनाएँ बनाते, महत्वपूर्ण कार्य करते और सफल महापुरुष कहलाते हैं।

विचारों को कभी चिन्तन क्षेत्र में घुमड़ते रहने और मस्तिष्क को कुछ काम देने वाली एक विशेषताभर समझा जाता था, परन्तु अब इसे भी विद्युत के समतुल्य ही प्रभावोत्पादक शक्ति माना जाने लगा है। यह न केवल शारीरिक हलचलों को जन्म देती है वरन् व्यक्ति, पदार्थ एवं वातावरण पर भी अपना प्रभाव डालती है और उन्हें बदलने तक में अपनी आश्चर्यजनक भूमिका सम्पन्न करती है। विचारों के विद्युत प्रवाह दूरस्थ व्यक्ति को उसी प्रकार प्रभावित करते हैं जैसा कि चाहा जाता है। जब मानव विचार एक मस्तिष्क से दूसरे मस्तिष्क तक भेजे जाते हैं तो उसे “टेलीपैथी” या “विचार संप्रेषण” कहते हैं विश्व के अनेक वैज्ञानिक एवं परामनो-वैज्ञानिक इस क्षेत्र में अनुसंधानरत हैं।

प्रख्यात मनो विज्ञानी डा. अप्टान सिन्कलेयर ने अपनी पुस्तक “मेण्टल रेडिया” में बताया है कि मानवी मस्तिष्क में यदि उत्कृष्ट स्तर के विचार विद्यमान रहें तो वह उनका प्रसारण करता रह सकता है और अनेकों मस्तिष्कों को अपने जैसा सोचने वाला बना सकता है। विचारशीलता व्यक्तियों की एक और श्रेष्ठता होती है कि संसार में जो श्रेष्ठ विचार कहीं भी किसी के पास भी विद्यमान हैं उन्हें आकर्षित कर वह अपने ज्ञान भण्डार को विस्तृत कर लेते हैं। परामनोविज्ञानी जैम्बिस मोनार्ड का भी कहना है कि “आइडियोस्फियर” अर्थात् विचारों के प्रभामण्डल में सभी प्रकार के विचार प्रवाह निरन्तर गतिमान हैं। उनमें से अपने अनुकूल विचार तरंगों को आकर्षित किया और तदनुरूप लाभान्वित हुआ जा सकता है। साथ ही दूसरों तक प्रवाहित करके उन्हें अपनी इच्छानुरूप मोड़ा मरोड़ा जा सकता है। वस्तुतः अपनी प्रबल चुम्बकत्व शक्ति के कारण ही विचार शक्ति सहायक साधनों को अपने अनुरूप वातावरण में से घसीट लाती है। इस विश्व ब्रह्माण्ड में सब कुछ विद्यमान है। मनुष्य चाहे जिसका चुनाव कर सकता है और तदनुरूप उस ढाँचे में ढलकर अपना विकास या विनाश कर सकता है।

“साइकोलॉजी आफ रिलीजन” नाम अपनी प्रसिद्ध पुस्तक में मनोविज्ञानवेत्ता डा. यूथेस ने लिखा है कि मनुष्य की विचारणा जिस भी प्रयोजन में लग जाती है उसी से उसका तादात्म्य स्थापित हो जाता हैं। उसके मनःसंस्थान एवं अन्यान्य अवयव भी तद्नुरूप ही कार्य करने लगते है। इसी तरह की मान्यता मनःशास्त्री डा. हेनरी लिडनहर की हैं। उन्होंने अपनी पुस्तक-”प्रैक्टिस आफ नेचुरल थेरैप्यूटिक्स” में कहा है। कि विचारों का स्वास्थ्य पर गहन प्रभाव पड़ता है। महापुरुषों अथवा महान् सद्गुणों के साथ एकात्मता स्थापित करने से मनुष्य की अनेकानेक शारीरिक मानसिक व्यथायें दूर हो जाती हैं। व्यक्तित्व को प्रभावोत्पादक बनाने में उत्कृष्ट विचारों की महान भूमिका होती है। विचार शक्ति ही कर्म को प्रेरणा देती है।

विचारों की छाया आचरण में प्रवेश किये बिना उभरे बिन रह नहीं सकती। निषेधात्मक चिंतन बाला व्यक्ति जहाँ जाता है, वहीं प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से तिरस्कार का भाजन बनता है। उसके मिलन की किसी को प्रसन्नता नहीं होती और चल जाने से न दुःख लगता है न अघात लगता है। उसकी निज के जीवन की समस्यायें ही इतनी उलझ जाती हैं, जिन्हें सुलझाते नहीं बनता और ऐसे ही परेशानियों में डूबता-उतराता हैं। जिनसे मन मिलता है उनके सामने आपनी विपन्नता का रोना रोने के अतिरिक्त और कुछ भी नहीं बन पड़ता है। मानवी विचार चेतना के विपरीत प्रवाहों का ही यह परिणाम है कि आज पर्याप्त सुख सुविधा, समृद्धि, ऐश्वर्य, वैज्ञानिक साधनों से युक्त जीवन बिताकर भी वह अधिक अशान्ति, दुःख व उद्विग्नता सये परेशान हैं। अँग्रेजी के प्रसिद्ध विद्वान लेखक डा. रिवपट आने प्रत्येक जन्म दिन पर काले और भड़े कपड़े पहनकर शोक मनाया करते थे। वह कहते थे-”अच्छा होता यह जीवन मुझे न मिलता, मैं दुनिया में न आता”। इसके ठीक विपरीत अन्धे कवि मिल्टन कहा करते थे-”भगवान का शुक्रिया है जिसने मुझे जीवन का अमूल्य वरदान दिया”। नेपोलियन बोनापार्ट ने अपने अन्तिम दिनों में कहा था- “अफसोस है-मैंने जीवन का एक सप्ताह भी सुख शान्तिपूर्वक नहीं बिताया”। जबकि उसे समृद्धि ऐश्वर्य, सम्पत्ति यश आदि की कोई कमी नहीं रही। सिकन्दर महान भी अपने अन्तिम जीवन में पश्चाताप करता हुआ ही मरा। जीवन में सुख शाँति, प्रसन्नता अथवा दुःख, क्लेश अशाँति, पश्चाताप आदि का आधार मनुष्य के अपने विचार हैं-अन्य कोई नहीं। साधन सम्पन्न जीवन में भी व्यक्ति गलत विचारों के कारण दुखी रहेगा और उत्कृष्ट विचारों से अभावग्रस्त जीवन में भी सुख-शान्ति, प्रसन्नता अनुभव करेगा।

संसार एक दर्पण है। इस पर हमारे विचारों की जैसी छाया पड़ेगी वैसा ही प्रतिबिम्ब दिखाई देगा। इसके आधार पर ही सुखमय अथवा दुःखमय सृष्टि का सृजन होता हैं संसार के समस्त विचारकों ने एक स्वर से उसकी शक्ति और असाधारण महत्ता को स्वीकार किया है। स्वामी रामतीर्थ ने कहा था- “मनुष्य के जैसे विचार होते हैं वैसा ही उसका जीवन बनता है।” स्वामी विवेकानन्द के अनुसार-”स्वर्ग और नरक कहीं अन्यत्र नहीं इनका निवास हमारे चिन्तनचेतना में ही है।” भगवान बुद्ध ने अपने शिष्यों को उपदेश देते हुए कहा था- ‘‘भिक्षुओं! वर्तमान में हम जो कुछ हैं अपने विचारों के ही कारण हैं और भविष्य में जो कुछ भी बनेंगे वह इसी के कारण।”

शेक्सपियर ने लिखा है-”कोई वस्तु अच्छी या बुरी नहीं है। अच्छाई और बुराई को आधार हमारे विचार ही हैं।” ईसा ने कहा था-”मनुष्य के जैसे विचार होते हैं वैसा ही वह बन जाता है प्रसिद्ध अमेरिकी लेखक डेलकार्नेगी ने अपने अनुभवों पर आधारित तथ्य प्रकट करते हुए लिखा हैं। कि-”जीवन में मैंने सबसे महत्वपूर्ण कोई बात सीखी है तो वह है विचारों की अपूर्व शक्ति और महत्ता। विचारों की शक्ति सर्वोच्च तथा अपार है।”

संक्षेप में जीवन की विभिन्न गतिविधियों का संचालन करने में हमारे विचारों का ही प्रमुख हाथ रहता है। यद्यपि देखने में वह मस्तिष्क को बिना पर वाली रंगीली उड़ान भर मालूम होते हैं। मस्तिष्क को बिना पैसे का सिनेमा भर दिखाते रहते हैं। किन्तु यदि उन्हें उद्देश्यपूर्ण दिशा में ही प्रवाहित रहने की आदत डाली जाय तो वह दृष्टिकोण को परिष्कृत कर सकते हैं। जीवन जीने की संजीवनी विद्या जैसी कला में प्रवीण कर सकते हैं। व्यक्तित्व को इस स्तर का उभार सकते हैं जिसे देवोपम कहा जा सकें, जिसके साथ चिरस्थायी सुख शान्ति जुड़ी रहें।


समर्पण का आनन्द और उसकी अनुभूति

भक्तियोग में पूर्णता ‘शरणगति’ को दी गयी हैं योगो में इसे समर्पण योग गिना जाता हैं वेदान्त में इसे अद्वैत कहा गया है। अद्वैत अर्थात् दो को मिलाकर एक कर देना। इसका स्वरूप भी यही बनता है कि या तो ‘तू’ को ‘मैं’ में परिवर्तित कर लिया जाय या फिर ‘मैं’ को तू बना लिया जाय अद्वैत अर्थात् दो का न रहना। इसे दूसरे शब्दों में एकात्म भाव भी कहा जा सकता है।

मिश्रण से एक नई वस्तु बनती है। नीला और पीला रंग मिलकर हरा बन जाता है। रात्रि ओर दिन का मिलन संध्याकाल कहलाता है, जिसमें दोनों अवधियों का सम्मिश्रण रहता है। नमक और मिर्च मिलकर एक तीसरे प्रकार का चटनी जैसा स्वाद बनाते हैं। शरणगति या समर्पण के सम्बन्ध में भी यही बात है।

आग और ईधन के सम्मिश्रण से लपटें उठने लगती है। वह न तो पूर्णतया ईधन वर्ग में आती है और न उसे विशुद्ध अग्नितत्त्व ही कहा जा सकता है। नर मादा के संयोग से बालक उत्पन्न होता है। वह दोनों के संयुक्त प्रयास का प्रतिफल होता है। न उसमें माता की सभी विशेषताएं होती हैं और न पिता की वैसे दोनों के गुणों का बहुत हद तक उसमें बाहुल्य पाया जाता है।

मुक्ति के चार रूप हैं। सालोक्प, सामीप्य, सारुप्य, और अन्तिम सायुज्य। सायुज्य में जीव और ब्रह्म की एकता हो जाती हैं। फिर भी किसी का पूर्णतया समापन नहीं होता। समाप्त हो जाय तो फिर उस मिलन के आनन्द की अनुभूति कोन करे? यदि उसकी समाप्ति हो चले तो ब्रह्म अपने को भारी भले ही अनुभव करे पर जीव का तो आत्यन्तिक समापन हो जायगा। यह स्थिति किसी को भी अभीष्ट नहीं। सुख यौवन उत्कर्ष की चाह तो रहती है, पर किसी को भी यह स्वीकार्य नहीं कि उसकी अपनी अनुभूति रहे ही नहीं। इसलिए भक्तजन “सायुज्य” मुक्ति की कल्पना कदाचित ही करते हैं। उन्हें “सालोक्य”-भगवान के लोक में रहने की “सामीप्य” -उनके समीप हरने की “सारुप्य” -उनके समान रूप कलेवर पाने की अभिलाषा ही रहती है, ताकि वे अपनी विकसित स्थिति का आनन्द उपलब्ध कर सकें।

समर्पण को ही मुक्ति की पूर्व स्थिति मानी गयी है। अपने आपको दूसरे के हाि में सौंप देने का भी अपना आनन्द हैं। विशेषतया तब जब किसी महान शक्ति के हाथों में अपने को सौंपा गया हो। इसकी प्रतिक्रिया तत्काल यह देखने को मिलती है दूसरा पक्ष भी अपने को उसी प्रकार सौंप देता है और दोनों के सम्मिश्रण में एक अति आनन्ददायक स्थिति बनती है। विवाह से पूर्व पति-पत्नी का अस्तित्व सर्वथा पृथक होता है। दोनों एक दूसरे से परिचित तक नहीं होते। ऐसी दशा में स्वार्थों का समन्वय तो बन ही कैसे पड़े? जब विवाह बंधन में वे दोनों बँध जाते हैं तो “एक प्राण दो शरीर” जैसा अनुभव करने लगते हैं। दोनों का एक दूसरे के शरीर, मन तथा वैभव पर अधिकार हो जाता है। जो चाहता है वह साथी को भी इच्छानुरूप चला लेता है। एकाकी मन की तुलना में यह स्थिति दोनों के लिए ही अधिक आनन्द और साहस प्रदान करती है। एक और एक मिलकर जड़ पदार्थ तो दो होते है पर जीव तो सर्वतोभावेन समर्थ और असाधारण शक्ति उत्पन्न करता है और एक-एक मिलकर ग्यारह बनने का गणित तो प्रत्यक्ष रूप से सार्थक हुआ सिद्ध करता है।

दूध में पानी मिला देने पर पानी का स्वरूप और भाव बढ़ जाता है। भक्त के संबंध में भी यही कहा जा सकता हैं। वह घटिया होने पर भी बढ़िया की संगति में अपनी गरिमा से अनेक गुनी अभिवृद्धि कर लेता है। लोहा पारस को छूकर सोना बनता है, भले ही वह स्वयं पारस न बन पाये पर लोहे की स्थिति से तो बहुत अधिक ऊँचा उठकर स्वर्ण कहलाने का अधिकारी बनता है।

सैन्यबल अनुशासन पर निर्भर है। सेनापति की आज्ञा ही उस समुदाय के सभी सदस्यों को मान्य होती है। वे उसमें न तो मीनमेख निकालते हैं। और न अपने निजी स्वार्थ को हानि पहुँचाने की बात सोचते है। सेनाध्यक्ष का आदेश ही उनके लिए सब कुछ होता है। भर्ती होते समय उन्हें यही प्रथम पाठ पढ़ाया जाता है कि अधिष्ठाता के अनुशासन का प्राणपण से पालन करना हैं। इससे किसी के नागरिक या मौलिक अधिकारों का हनन नहीं होता। यह प्रश्न तब उठता है जब सेनापति का अपना कोई निजी स्वार्थ काम करता हो। यदि ऐसा नहीं है तो फिर अनुशासन ही वह प्रधान शक्ति रह जाती है, जिसके आधार पर सेना को चमत्कारी सफलताएँ प्राप्त करने का अवसर मिलता है। यदि आरम्भ में ही स्वार्थों की रस्साकसी बनी रहे तो उसके साथ किसी आदर्श को नहीं जोड़ा जा सकता। तब तो वह मात्र व्यवसाय भर ही बनकर रह जायेगा। उसे वेश्यावृत्ति के नाम से भी जाना जा सकेगा। ऐसी दशा में कोई व्यावसायिक सौदेबाजी भी सम्भव हो सकती है। शरणगति या समर्पण जैसे उच्चकोटि के शब्दों का प्रयोग उस सहचरत्व में खोजा नहीं जा सकता है।

समर्पण का तात्पर्य है-अनुशासन पालना। यह छोटे पक्ष को स्वीकार करना होता है, क्योंकि उसकी योग्यता, इच्छा, स्थिति सभी कुछ वरिष्ठ की तुलना में घटिया होती हैं। अध्यापकों का आदेश छात्रों को मानना पड़ता है। यदि कहीं छात्र ही अध्यापक को अपनी मर्जी पर चलाये तो समझना चाहिए कि अध्यापक और छात्र दोनों का ही बंठाधार हुआ। अफसर का कहना मातहत मानते हैं यदि मातहत ही अफसर पर हुक्म चलाने लगें तो सारी व्यवस्था ही गड़बड़ा जायेगी।

उच्च पदासीन होने के लिए योग्यता की परीक्षा होती है और प्रतिस्पर्धा में उतर कर अपनी वरिष्ठता सिद्ध करनी पड़ती है। इसी आधार पर चुनाव होते हैं। इससे बचकर कोई चुनाव कर्त्ता की खुशामद के सहारे ही अपना काम बनाने के लिए चले तो उसे वांछनीय ही माना जायेगा और बदले में भर्त्सना ही मिलेगी। ईश्वर की शरणगति का यह आधार नहीं हो सकता कि कामनाओं की पूर्ति के लिए गिड़-गिड़ाया जाय और पात्रता न होते हुए भी बढ़ चढ़ कर उपहार वरदान पाने के लिए नाक रबड़ी जाय। इसे पूजा की, भक्ति की, भावना की श्रेणी में नहीं गिना जा सकता।

शरणगति-समर्पण तभी वास्तविक माना जा सकता है। जब अपने तन, मन, धन को नियन्ता की मर्जी पर चलने के लिए छोड़ दिया जाय। यहाँ यह बात भी स्मरणीय है कि भगवद् इच्छा सदा उच्चस्तरीय ही होते हैं। जब भी अन्तराल में ऐसा उत्साह उभरे तो उसे ईश्वर की मर्जी समझना चाहिए। किन्तु यदि निकृष्टता का खुमार चढ़ा हो तो समझना चाहिए कि यह शैतान की करतूत है। कई व्यक्ति अपने भीतर उठने वाले अनौचित्य को भी ईश्वर की इच्छा मान कर कुकृत्य करने पर उतारू हो जाते है। उन्हें समझना चाहिए कि निकृष्टता ही ईश्वर आदर्श बनकर धोखा दे रही और कुकृत्य कराकर पतन के मार्ग में धकेलने की विडंबना रच रही है।

शरणगति से तात्पर्य है निःस्वार्थ होना। उच्चस्तरीय आदर्श को अपने चिन्तन, चरित्र और व्यवहार में ओतप्रोत कर लेना। इससे कम में ईश्वरीयसत्ता का आत्मसत्ता में समावेश बन ही नहीं पड़ता।

संकीर्ण स्वार्थपरता कई बार ईश्वरेच्छा का अवतरण ओढ़कर मनुष्य पर आवेश की तरह चढ़ती और कुकृत्य कराती है। इस भ्रान्ति से सदा हर किसी को बचना चाहिए। ईश्वरेच्छा होने की एक ही कसौटी है कि अपने आपको अधिकाधिक सद्भावनाओं से ओतप्रोत किया जाय और बुद्धि को ऐसा निर्णय करने दिया जाय, जिससे सत्प्रवृत्तियों का संवर्धन होता हो, सत्कर्म बन पड़ता हो ओर नीति-मर्यादा एवं शालीनता का परिपालन होता हो। भगवद् समीपता का मार्ग सर्वतोमुखी सदाशयता है। समर्पण करने वालों का यही इष्ट हो लक्ष्य होता है।


Quotation

सरलता शान्ति का प्रथम चरण है और उदारता अन्तिम।


विपन्नता के बीच एकान्त साधना

एकान्त यों अकेलेपन को कहा जाता है, जहाँ दूसरों का आवागमन न हो। कोलाहल कानों में न पहुँचें, आवागमन की उछल फुदक जहाँ विक्षेप उत्पन्न न करें, वहाँ एकान्त समझा जाता है, पर वास्तविकता ऐसी है नहीं। चित्त को बढ़ाने वाली समस्याएँ, जहाँ विक्षेप उत्पन्न करें, उस मनः स्थिति एवं परिस्थिति को भी एकान्त की संज्ञा दी जाय तो कुछ अत्युक्ति न होगी। लगाव ही दूसरों के साथ अपने संपर्क जोड़ता है। जिनके साथ परिचय, सम्बन्ध, सहयोग, विरोध न हो, वे अपने स्थान पर बने रहें, अपनी हलचलें करते रहें तो भी उस स्थिति को एकान्त कहा जा सकता है। भीड़-भाड़ और मेले ठेले में अनेकों का आवागमन रहता है पर वह दृश्य मनोरंजन के अतिरिक्त ऐसा कुछ नहीं होता, जो मन को अपने साथ बाँधे या विक्षेप उत्पन्न करे। ऐसी दशा में उस रिक्तता के कारण एकान्त जैसी स्थिति बन जाती है। विघ्न तब पड़ता है। जब हलचलों में, व्यक्तियों तथा वस्तुओं में रस आने लगे या उनके कारण विक्षेप उत्पन्न हो।

इस दृष्टि से कारागार को भी एकान्त की स्थिति कहा जाता है। यो वहाँ भी अनेक कर्मचारी या बन्दी अपना अपना कम करते रहते हैं। पक्षी उड़ते-चहकते हरते हैं पर उनके साथ सीधा लगाव न होने के कारण मनःस्थिति एकान्त जैसी ही बनी रहती है। उस स्थिति में रहते चिन्तन-मनन में भी बाधा नहीं पड़ती और आत्म विश्लेषण, अन्तःकरण निरीक्षण में भी कोई बाधा नहीं पड़ती। परिस्थिति जन्य एकान्त वह है जहाँ सर्वथा एकाकी रहना पड़ें। मनःस्थिति जन्य एकान्त वह है। जिसमें व्यक्तियों के इर्द-’गिर्द रहते हुए भी उनसे लगाव हटा लिया जाय या हट जाय।

एकान्त में भजन भी ठीक बनता है और मनन-चिन्तन भी। स्वाध्याय और लेख भी इन परिस्थितियों में ठीक तरह संभव हो जाता है। यों सर्वथा एकान्त तो समाधि स्थिति में ही भले बन पड़े अन्यथा शारीरिक आवश्यकताएँ और मानसिक स्मृतियाँ भी किसी न किसी प्रकार के विक्षेप उत्पन्न करती रहतीं है, वैज्ञानिक शोध एवं आध्यात्मिक अवगाहन जैसे कार्यों में विक्षेप डालती है। सरल यही है कि प्रत्यक्ष और स्मृति जन्य लगाव अन्यत्र बिखरने न दिया जाय। इतने से भी वह काम चल जाता है जो एकान्त माँगता हैं। स्वाध्याय एवं साहित्य सृजन भी वैज्ञानिक शेष अथवा अनुसंधान स्तर के ही काम है। इसके लिए मन को अनिवार्य रूप से साधना पड़ता है।

उदाहरण के लिए उन मनस्वी लोगों की महान कृतियों को लिया जा सकता है जो उन्होंने जेलखानों में ही लिखीं और वैसी सुन्दर बन पड़ी जैसी सुविधा साधनों से घिरे रहने पर कदाचित ही बन पड़ती है।

लोकमान्य तिलक ने अपना महान गीत रहस्य ग्रन्थ माँडले जेल में ही लिखा था। वहाँ उन्हें अनेकों असुविधाएँ थीं। नौकर ऐसा दिया गया जो उनकी भाषा नहीं समझता था और न तिलक ही उसकी भाषा समझते थे। गूंगे-बहरे की तरह इशारों से काम चलाते थे। गीता रहस्य में अनेक ग्रन्थों के संदर्भ बार-बार लेने पड़ते थे, पर उनकी निजी पुस्तकों में से भी उन्हें चार ही एक बार में मिलती थीं। लिखने के लिए कागज सीमित दिये जाते थे और कलम के स्थान पर पेन्सिल। उसी से बारीक अक्षर लिखकर किसी प्रकार काम चलाया और नियमित दिनचर्या एवं मानसिक संतुलन के सहारे वह कार्य पूरा किया।

विनोबा की प्रसिद्ध पुस्तक गीत प्रवचन धूलिया जेल में ही लिखी गई थी। विद्वान कुमारप्पा का प्रसिद्ध ग्रन्थ “इकोनोमिक्स आफ परमानेन्स” जेल जीवन में ही लिखा गया था। गाँधी जी ने “मंगल प्रभात” और “आश्रमवासियों से “पुस्तकें जेल जीवन में ही लिखी थीं। यों उनको ध्यान बँटाने के लिए कई साथी भी वहाँ रह रहे थे, पर गाँधी जी ने अपने को इतना नियमित और संयमित कर लिया कि प्रार्थना की तरह इस लेखन प्रक्रिया में भी कोई बाधा नहीं पड़ी।

इस दिखा में पं0 जवाहर लाल नेहरू ने भी असाधारण कार्य किया। उनने नैनी जेल में “विश्व इतिहास की झलक”, “डिस्कवरी ऑफ इण्डिया” लिखनी शुरू कीं, जो देहरादून जेल में जाकर समाप्त हुई। “पिता के पत्र -पुत्री के नाम” जिनने पढ़े हैं वे जानते हैं कि उनमें अस्त व्यस्तता या ऐसी विसंगति कहीं नहीं है जो ऐसे वातावरण में स्वभावतः होनी चाहिए।

बहादुर शाह जफर जानते थे कि जेल जीवन के उपरान्त मरण ही उनके लिए एक मात्र विकल्प है तो भी उनने उन दिनों की भावभरी कविताएँ लिखने में अपना समय बिताया।

पं0 द्वारिका प्रसाद मिश्र ने जेल में ही अपना “कृश्णायन” काव्य पूरा किया। सुब्रह्मण्य भारती, माखन लाल चतुर्वेदी, बालकृष्ण शर्मा, ‘नवीन’, भारती प्रसाद मिश्र आदि की जेल जीवन में लिखी कृतियाँ ऐसी ही हैं।

सेठ गोविन्द दास का उपन्यास “इन्दुमती” जेल में ही लिखा गया। श्री जैनेन्द्र कुमार जैन ने भी बहुत कुछ जेल में लिखा। क्रान्तिकारियों में से श्री यशपाल और मन्मथ नाथ गुप्त की कृतियाँ जेल जीवन की कठिनाइयों के बीच भी असाधारण ही बन पड़ी हैं। गुरुमुख सिंह “मुसाफिर” की जेल जीवन में लिखी गई कहानियाँ पाठनीय हैं।

राजगोपालार्य और एम0एन॰ राय, बाबू राजेन्द्र कुमार की डायरियाँ बतातीं है कि जेल जीवन में भी मानसिक संतुलन कितना सही और सुव्यवस्थित रखा जा सकता है। बाबू सम्पूर्णानन्द की “दर्शन और जीवन”, चिद् विलास”, “आर्यों का आदि देश” “वेद मंत्रों के प्रकाश में” आदि पुस्तकें जेल जीवन में ही लिखी गयी। जयप्रकाश नारायण, राममनोहर लोहिया, मौलाना आजाद, रामवृक्ष बेनीपुरी, वीरेन्द्र कुमार घोष, कमलापति त्रिपाठी, सज्जद जहीर, प्रिंसिपल छबीलदास आदि की कृतियाँ भी अविस्मरणीय हैं। इस संदर्भ में गाँधी की आरोग्य की कुँजी, बालपोथी, गीताबोध, गीता प्रवेशिका, अनासक्ति योग को भी नहीं भुलाया जा सकता। यह भारत के हिन्दी भाषी लेखकों का ही कुछ उल्लेख हैं। दक्षिण भारत के विद्वान भी इस दिशा में पीछे नहीं रहे हैं।

साम्यवादी साहित्य में विश्व के बहुत कम सौभाग्यशाली लेखक ऐसे हैं जिनने लेख की तरह किसी सुव्यवस्थित कमरे में बैठकर इस विषय की पुस्तकें लिखी हों। वे जेल के सीखचों, तथा गुप्तवास के ऐसे दिनों में लिखी गई है। जिन दिनों कि उनके ठहरने, सोने और खाने का भी कोई प्रबंध नहीं था।

हिमालय में एकान्त साधना करने वाले अध्यात्म विज्ञानी भी उस अवधि में महत्वपूर्ण अनुसंधान करते रहें है। मध्यकालीन सन्तों को सदा प्रचार-प्रव्रज्या में ही संलग्न रहना पड़ता था। उन्होंने अपने गीत और भजन उसी भाग-दौड़ की स्थिति में रचे हैं।

एकान्त सन्तुलन बनाता है या बिगाड़ता है? इस प्रश्न के उत्तर में इतना ही कहा जा सता है कि परिस्थितियाँ मनुष्य को सभी अस्त व्यस्त करती हैं, जब वह आत्म-संतुलन स्थिर न रखे अथवा अनेक लोगों से घिरा हुआ हो। समस्याओं में उलझा हुआ व्यक्ति भी अपने को एकाग्र किये रह सकता है और उस व्यस्त एकाग्रता के बीच भी महत्वपूर्ण कार्य कर सकता है।


कुमार जीव (kahani)

बिहार प्रान्त में उत्पन्न हुए कुमार जीव असाधारण प्रतिभावान थे। वह पहले नालन्दा विश्व विद्यालय गये। पीछे तक्षशिला ले गये। वहाँ पढ़ते पढ़ाते रहें।

उनने निश्चय किया कि ईश्वर प्रवृत्त इस विशेष प्रतिभा का प्रयोग धर्म प्रचार में करना चाहिए। उन्होंने संन्यास ले लिया। चीनी भाषा पढ़ी और चीन देश में धर्म प्रचार के लिए चले गये। वहाँ उन्होंने समूचे देश में बौद्ध धर्म का प्रचार किया। जीवनभर वहीं रहें।


जपयोग की साधना एवं उसका महात्म्य

जपयोग अचेतन मन को जागृत करने की एक वैज्ञानिक विधि हैं सद्गुणों के समुच्चय ईश्वर से अपनी अन्तरात्मा को जोड़ने का यह एक अत्यन्त महत्वपूर्ण साधन है। इसमें परमात्मा के इष्ट के नाम-रूप स्मरण के साथ ही उसके गुण कर्मों की भावभरी स्मृति उपासक के मानस पटल पर अंतःकरण पर सत् छाई रहती है। इससे न केवल साधक का नोबेल दृढ़ होता है, आस्था परिपक्व होती है, वरन् विचारों में विवेकशीलता आती है। बुद्धि निर्मल व पवित्र बनती है तथा आत्मा में ईश्वर का प्रकाश अवतरित होता है। उससे मनुष्य अनेक प्रकार की ऋद्धि-सिद्धियों का स्वामी बन जाता है। शास्त्रकारों ने इसकी महत्ता का प्रतिपादन करते हुए कहा है कि समस्त मानव जाति के लिए जपयोग एक ऐसा विधान है कि जिसमें मनुष्य प्रेरणा ग्रहण कर बन्धन मुक्त हो व्यक्तिगत जीवन में शान्ति एवं सामाजिक जीवन में श्रेय सम्मान का अधिकारी बनने का सौभाग्य पा सकता हैं।

विश्व के समस्त धर्मो में जप को समुचित स्थान दिया गया है और इसे मनुष्य को उसका चरम उद्देश्य प्राप्त कराने वाला अमोघ अस्त्र कहा गया है। सम्प्रदाय विशेष के मन जो भी हों, जप की आवश्यकता सर्वत्र बताई गई है। हिन्दू धम्र के आध्यात्मिक कर्मकाण्ड का तो यह मेरुदण्ड है। बौद्ध एवं जैन मतावलम्बियों ने भी इसे अपनाया है। उनके साधना विधान में इस पर बल दिया गया है। सूफी मत एवं कैथोलिक मत वाले इसे प्राचीन काल से अपनाये हुए हैं। योगियों ने क्रियायोग में इसे स्वाध्याय का एक अंग माना है।

जप यौगिक अभ्यास के अंतर्गत आता है। जिसका अर्थ होता है-”किसी पवित्र मंत्र की पुनरावृत्ति करते रहना।” जप धातु का दूसरा अर्थ है- “जप व्यक्तायाँ वाचि” अर्थात् स्पष्ट बोलना। अतः मंत्र के बार बार उच्चारण को ही जप कहते है। यह अभ्यास कर्ता को उसके अंतिम उद्देश्य पर पहुँचने के योग्य बनाता है। इसकी व्याख्या करते हुए रामकृष्ण परमहंस ने कहा है “एकान्त में बैठकर मन ही मन भगवान का नाम लेना ही जप है”। इस प्रकार नाम स्मरण से अंतःकरण की शुद्धि होती हैं और उससे कषाय कल्मषों के बन्धन शिथिल पड़ते हैं। पापवृत्तियाँ छिन्न-भिन्न होती हैं।

भगवान कृष्ण ने इसे सब यज्ञों में श्रेष्ठ कहा है और अपनी विभूति बताया है। गीता के दसवें अध्याय में 25 वें श्लोक में कहा गया है- “यज्ञानाँ जपयज्ञोऽस्मि” अर्थात् यज्ञों में में जप यज्ञ हूँ। इसका नियत संख्या में नियमित रूप से गायत्री अथवा अन्य किसी इष्ट मंत्र का भाव प्रवण जप अभीष्ट लक्ष्य की पूर्ति करता है। संत तुलसीदास के शब्दों में विश्वासपूर्वक भगवद् नाम स्मरण से कठिन से कठिन संकटों पर भी विजय प्राप्त की जा सकती है। इसका आश्रय लेने पर दसों दिशाओं में साधक या उपासक पर कल्याण की मंगलमयी अमृत वर्षा होती हैं वे कहते है। “नाम जपत मंगल दिशि दस हूँ।” प्रमाण प्रस्तुत करते हुए उनने कहा है कि उलटा -सीधा जैसे भी बन पड़े भगवान के नाम का स्मरण करते रहना चाहिए। वाल्मीकि को राम नाम का सीधा उच्चारण कहाँ आता था। फिर भी- “उलटा नाम जपत जग जाना। वाल्मीकि भए ब्रह्म समाना।” समस्त ऋषि मुनियों, संत-महात्माओं ने मंत्र जप के माध्यम से ही महानता को वरण किया है, आत्म साक्षात्कार किया है।

भगवत् स्मरण उपासना का प्रधान अंग है। नाम के आधार पर ही किसी सत्ता का बोध और स्मरण हमें होता है। ईश्वर को स्मृति पटल पर बिठाने के लिए प्रतिष्ठापित करने के लिए उसके नाम का सहारा लेना पड़ता है। शरीर पर नित्य मैल चढ़ता है और उसे साफ करने के लिए रोज नहाना पड़ता है। इसी तरह मन पर भी नित्य वातावरण में उड़ती फिरने वाली दुष्प्रवृत्तियों की छाप पड़ती है। उस मलीनता को धोने के लिए नित्य ही उपासना करनी पड़ती हैं यह कार्य जप से आसानी से पूर्ण हो जाता है। स्मरण से आह्वान, आह्वान से स्थापन और स्थापना से उपलब्धि का क्रम चल पड़ता शास्त्र समस्त ही नहीं विज्ञान सम्मत भी हैं।

चेतना को प्रशिक्षित करने के लिए मनोविज्ञान शास्त्र में चार आधार और स्तर बताये गये हैं। इनमें प्रथम है- ‘लर्निंग’। इस भूमिका में पुनरावृत्ति का आश्रम लिया जाता है। शिक्षण की दूसरी परत हैं- ‘रिटेन्शन’ अर्थात् प्रस्तुत जानकारी को स्वभाव का अंग बना लेना। तीसरी भूमिका है- ‘रीतकाल’ अर्थात् भूतकाल की किन्हीं विस्मृत स्थितियों को कुरेद बीन कर फिर से सजीव कर लेना। चौथी भूमिका है- रीकाम्बीशन’ अर्थात् मान्यता प्रदान कर देना। निष्ठा -आस्था एवं विश्वास में परिणत कर देना। जप साधना में इन्हीं सब प्रयोजनों को पूरा करना पड़ता हैं व्यष्टि सत्ता को समष्टि सत्ता से जोड़ने के लिए मन को बार-बार स्मरण दिलाया जाता है क्योंकि वही आत्मा और परमात्मा की मध्यवर्ती कड़ी है। जप द्वारा अनभ्यस्त मन को सही रास्ते पर लाया जाता है और उसे प्रशिक्षित करके ईश्वरीय चेतना को मानस पटल पर जमाया जाता है ताकि उपयोगी प्रकाश की अंतःकरण में स्थापना हो सके। कुएँ की जगत पर लगे पत्थर पर रस्सी की रगड़ बहुत समय तक करते हरने से उसमें निशान बन जाते है। फिर कोई कारण नहीं कि भगवत् नाम को बहुत समय तक दुहराते रहने का गहराई तक जप सकना संभव न हों।

जप के लिए भारतीय धम्र में सर्वविदित और सर्वोपरि मंत्र गायत्री मंत्र का प्रतिपादन है। उसे गुरु मंत्र कहा गया है। अन्तःचेतना को प्रभावित और परिष्कृत करने में उसका जप बहुत ही सहायक सिद्ध होता है। वेदमाता उसे इसीलिए कहा गया है कि वेदों में सन्निहित ज्ञान-विज्ञान का सारा वैभव बीज रूप इन थोड़े से अक्षरों में ही सन्निहित है।

जप का भौतिक महत्व भी है। विज्ञान के आधार पर भी उसकी उपयोगिता समझाई जा सकती है। शरीर और मन में अनेकानेक दिव्य क्षमताएँ चक्रों, ग्रन्थियों, उपत्यिकाओं के रूप में विद्यमान हैं, उनमें ऐसी सामर्थ्य सन्निहित हैं, जिन्हें जगाया जा सकें तो व्यक्ति को अतीन्द्रिय एवं अलौकिक विशेषतायें प्राप्त हो सकती हैं साधना का परिणाम सिद्धि है। वह सिद्धियाँ भौतिक प्रतिभा और आत्मिक दिव्यता के रूप में जिन साधना आधारों के सहारे विकसित होती है, उनमें जप को प्रथम स्थान दिया गया है। योग, दर्शन में स्पष्ट कहा है- कि मंत्र जप से सिद्धियाँ मिलती हैं। ईश्वर साक्षात्कार का मार्ग खुलता है। वह अभ्यास बहुत काल तक लगातार विधि व्यवस्था से ठीक ठीक किया जाने पर दृढ़ अवस्था वाला होता है। जप साधना का आश्रय लेने वाला साधक धीरे धीरे इतना ऊँचा उठ जाता है कि वह इसी साधना से समाधि तक पहुँच जाता है। सुप्रसिद्ध मनीषी सर जान वुडरफ ने भी अपने ग्रन्थ “गारलैण्ड आफ लेटर्स” में लिखा है कि मंत्र या शब्दों की विशेष रचना में गुप्त दिव्य शक्तियों का पुँज बना देती है।

जप साधना यदि भावना और श्रद्धापूर्वक की जाय तो उससे उत्पन्न होने वाली तरंगें अनय को निरस्त कर मनुष्य को श्रेय पथ पर अग्रसर करती हैं। श्रद्धा-विश्वास एवं इच्छाशक्ति के साथ जप द्वार मंत्रों में सन्निहित दिव्य शक्तियों को जगाया एवं आत्मसत्ता का स्तर ऊँचा उठाया जा सकता है।


संस्कार (kahani)

एक महिला किसी विद्वान के पास यह पूछने पहुँची कि वह अपने बच्चे को कब से पाठशाला भेजना आरंभ करें? बच्चे की आयु उसे पाँच वर्ष बताई।

विद्वान ने कहा-तब आपने छः वर्ष की देरी करदी। उसे उसी दिन से पढ़ाना था जिस दिन कि वह गर्भ में आया था। बालक अपने संस्कार गर्भावस्था से ही ढालना आरंभ कर देता है।


तर्क की कसौटी पर एक नास्तिकवादी दर्शन

मानव जाति की प्रगति का इतिहास यदि एक शब्द में कहना हो, तो उसे आपस का “सहयोग” कह सकते हैं। आदमी के रहने-सहने का ढंग, जिन्दगी जीने की व्यवस्थित रीति-नीति उसकी इसी मनोवृत्ति की उपज है। यही वह तथ्य है, जिस पर उन्नति की सारी संभावनाएं टिकी हुई है। यों यह कहते सुना जाता है कि बुद्धिमत्ता के सहारे प्रगति की राह पर बढ़ा गया हैं पर सही बात यही है कि सहयोग के आधार पर एक दूसरे के साथ घनिष्टता स्थापित करते हुए परस्पर आदान-प्रदान का क्रम चला और उससे मानसिक विकास के दरवाजे खुले।

इस चीज का नजर अन्दाज करके कुछ लोगों ने जिन्दगी जीने के तरीके को दूसरी तरह से सोचा है। पिछले दिनों हुई इस सोच को उपयोगितावाद का नाम दिया गया है। नीति शास्त्रियों ने इसे स्थूल सुखवाद भी कहा है। जे.एस.मिल ने इसकी व्याख्या करते हुए लिखा है “संसार में सभी सुख की तलाश में हैं। जीवन का ध्येय यही हैं इस कारण स्वाभाविक है कि इसे तलाशा जाय। उनके अनुसार आदमी की चाहते सुख है और वस्तुएँ हैं इसका माध्यम। इसी कारण वस्तुओं को इकट्ठा करने की कोशिश की जाती है। मिल ने अपने इस सिद्धान्त में आचरण की महत्ता पर कोई ध्यान नहीं दिया हैं।

मनोवद्िएरिक फ्राफम अपनी किताब “एनाटॉमी आफ हा्मन-डिस्ट्रक्टिवनेस” में इसे मनोवैज्ञानिक क्रान्ति बतलाते है, हजारों साल के किए कराए पर पानी फरे देना। इससे तो साधन सामग्रियों को अतहाशा इकट्ठे करने के चक्कर में आदमी पशु जैसा हो जाएगा।

बोलना-सोचना, पढ़ना-लिखना खेती पशुपालन तथा समाज व्यवस्था आदि उन्नति के आरम्भिक चरणों को सहयोग-सद्भाव की उपलब्धियाँ हैं।

इन्हीं सीढ़ियों पर चढ़ते हुए मनुष्य ने आगे बढ़ने और ऊँचा उठने की राह पायी है। यह सब किसी एक के प्रयास का फल नहीं हैं। इसमें बहुत समय लगा है। एक के अनुभव को दूसरे ने लाभ उठाया है। एक की उपलब्धियाँ दूसरों ने सीखी हैं जो मार्ग मिला है, उस पर एक दूसरे को साथ लेते हुए कदम बढ़ाया है।

मिल तथा इसके अनुयायियों ने अपने पक्ष में जो तर्क प्रस्तुत किए हैं, वे प्रकृति के नियम न होकर अपवाद है। बड़ा पेड़ अपने पास वाले पौधों की खुराक खुद-हड़प लेता है। बड़ी मछली छोटी मछली को खा जाती है। हिंसक जानवर छोटे-छोटे निरीह पशुओं को खा जाते है। ये उदाहरण प्रकृति की समूची व्यवस्था को भुला कर दिये गये है। परिस्थिति विज्ञान के विद्वान यह बताते हैं कि प्रकृति का हर घटक एक दूसरे के साथ सहयोग का व्यवहार करता हैं प्राणी और वनस्पतियाँ एक दूसरे के साथ मिलकर ही जीवन की गाड़ी चला रहे हैं। एक कार्बन डाइ आक्साइड छोड़ता है दूसरा उसे पचाकर बदल में जाती आक्सीजन देता है। प्रकृति में लगातार चलने वाले नाइट्रोजन-चक्र, जल-चक्र आदि इसी आधार पर समूची व्यवस्था बनाए हुए हैं।

उपयोगितावाद के अनुभव यदि मनचाही इच्छाओं को पूरा करने को ठीक मान लिया जाय, तो समूची समाज व्यवस्था ढह जाएगी। यदि हर मनुष्य सुख-साधनों की छीना झपटी को सही समझने लगे, तो होने वाले परिणाम की कल्पना भी खतरनाक लगेगी। भारतीय तत्वचिन्तक भी सुख की बात कहते हैं। पर प्राच्य दर्शन में मिल की तरह सुख साधनों को अधिकाधिक इकट्ठा करने, उनके लिए छीना-झपटी करने जैसा भाव नहीं हैं इसमें एक समूह का सुख न कहकर सबके सुख की बात कही है। “सर्वे भवन्तु सुखिनः” की कामना की है, जो समता व सद्भाव का घोतक है।

मनुष्य समझदार और श्रेष्ठ प्राणी माना जाता है। इसका कारण उसकी सहयोगपरक सत्प्रवृत्ति ही है। इसी आधार पर परिवार बसाए। उसमें सरसता और उदारता का समावेश हुआ। इससे कुटुम्ब के हर छोटे-बड़े सदस्य को लाभ मिला। यही प्रवृत्ति आगे सामाजिकता के रूप में विकसित हुई। समाज व्यवस्था की संरचना परिवार पद्धति की आचारसंहिता के आधार पर ही बन सकी है। अर्थ तन्त्र का पूरा ढाँचा सहकारिता पर टिका है। वस्तुओं का उत्पादन, और विनिमय वितरण क्रम ही वर्तमान अर्थ व्यवस्था तक बढ़ता आया है। शिल्प, चिकित्सा, शिक्षा, कला कौशल और विज्ञान के लम्बे चरण एकाएक नहीं नहीं उठे। अमुक आविष्कार का श्रेय अमुक व्यक्ति को मिला यह अलग बात हैं पर वस्तुतः सफल खोज की पृष्ठभूमि बहुत पहले से ही बनने लगी थी। उसमें अनेकों का चिन्तन और प्रयास जुड़ते हुए वह आधार बन सका था, जिसके सहारे उसे अन्तिम रूप में उद्घोषित किया गया। धर्म अध्यात्म जैसी उच्चस्तरीय भावनात्मक चेतनाएँ किसी एक आदमी का काम नहीं है। इनके क्रमिक विकास में अनेक पीढ़ियों के हजारों साल लगे है। यह उन सबके परस्पर सहयोग का ही परिणाम हैं।

जबकि मिल का सिद्धान्त उपरोक्त चिन्तन से विपरीत है। इसके अलावा भी इसमें दो प्रधान दोष है। पहला मनुष्य मनुष्य के बीच बलगाव की दीवार खड़ी करना। क्योंकि हर मनुष्य जब सुविधा साधनों को इकट्ठा करने के लिए जुट पड़ेगा, तो इन्हें कहीं से छीन-झपट कर ही जुटाया जा सकेगा। छीनने वाला शोषक होगा, जिसका छीना गया है, वह शोषित। इन दोनों के बीच की खाई धीरे-धीरे बढ़ती जाएगी। एक स्थिति में इसे पाटने के लिए प्रयास होंगे फिर वे चाहें हिंसात्मक ही क्यों न हों? रूप में हुई बोल्शेविक क्रान्ति इसका जीता-जागता उदाहरण है। इसका दूसरा दोष है सारे भावनात्मक सम्बन्धों का समाप्त कर देना। युवक अपने बूढ़े बाप की क्यों सेवा करेंगे? क्योंकि इसमें दवा से लेकर शारीरिक सेवा करने, पैसा खर्च करने की झंझट उठानी पड़ती है। मिल के अनुसार इससे कोई फायदा तो है नहीं। यही स्थिति छोटे बच्चों की परवरिश करने वाले माँ-बाप की है।

सचमुच, उपयोगितावाद की नीति से समता और सद्भाव खतम हो जाते हैं। विक्टोरिया विश्वविद्यालय के प्राध्यापक लायड गियरिंग ने अपने अध्ययन “फेथ्स न्यू एज” में इसे अच्छी तरह समझाया है। उनके अनुसार आज की सामाजिक समस्याओं का कारण यही है।हर आदमी चालाकी धोखाधड़ी, किसी भी तरह से अपने भोग सुख की पूर्ति चाहता है। फिर भला अस्तव्यस्तता और बरबादी क्यों न हो?

श्री गियरिंग का अपनी पुस्तक में मत है कि इस समस्याओं के निवारण के लिए समाज को एक बड़ा परिवार मान कर चलना होगा। पारस्परिक घनिष्टता से समता व सद्भाव उपज सकते हैं। बात भी सही हैं-अपनी ढपली अपना राग अलापने से काम नहीं चलेगा। यदि हर बाजा अपना अलग-अलग स्वर निकाले तो उससे कानों को बुरा लगने वाला शोरगुल उत्पन्न होगा। यह भला किसे अच्छा लगेगा?

स्थिति को सुधरने सँवारने के लिए हमें अपने में सहयोग व सद्भाव का विकास करना चाहिए। इसी के आधार पर दूसरों का हृदय जीतना और उन्हें अपना घनिष्ट सहयोगी बना सकना सम्भव हो सकेगा। अपनी प्रकृति एकम् ही दूसरों पर भली-बुरी छाप छोड़ती है। उस प्रतिक्रिया से प्रेरित होकर लोगों का व्यवहार अच्छा या बुरा बनता है। अपना स्तर जिस तरह का होगा, उसी के अनुरूप लोग संपर्क में आएँगे- घनिष्ट बनेंगे। अपने विकास की बात सोचते हुए हमें यह ध्यान में रखना चाहिए कि अभीष्ट सहयोग का संचय कर सकने योग्य विशेषताएँ अपने में संजोयें। इस तरह व्यापक स्तर का प्रयास सामाजिक जीवन में पुनः सहयोग की सद्भाव की प्रतिष्ठा कर सकेगा ओर अनास्था की असुरता से संघर्ष किया जा सकना संभव होगा।


Quotation

जुगनू जब बैठा रहेगा तो उसकी पूँछ चमकेगी नहीं। उसकी चमक तो चलने के साथ ही दृष्टिगोचर होती है। मनुष्य का व्यक्तित्व उसके द्वारा किए जाने वाले कठोर परिश्रम के साथ ही चमकता है।


वह परमसत्ता एक ही है

साधना विधान में देव-उपासना का महत्वपूर्ण स्थान हैं अध्यात्म शासकों में जहाँ आत्म चिन्तन, ब्रह्मध्यान, मनोनिग्रह, विवेक, वैराग्य आदि का विस्तृत विवेचन हुआ हैं वहाँ अनेक देवताओं की उपासना के भी विधि-विधानों एवं महत्वों की चर्चा हुई है। कई उपनिषद् देवताओं के नाम पर ही हैं। उसमें प्रतिपादित देवता के गुण, धर्म एवं उपासना के प्रतिफल विस्तारपूर्वक बताये गये है। उच्च मनोभूमि के साधक वेदान्त की अद्वैत साधना में संलग्न रहें एवं उससे कुछ नीची श्रेणी के साधक देव-उपासना द्वारा अभीष्ट काम्य-प्रयोजनों की भी पूर्ति करते रहें। क्रमशः आगे अध्यात्म मार्ग पर चलते हुए ब्रह्म प्राप्ति के परम श्रेयस्कर लक्ष्य की ओर अभिमुख हो जायँ, ऐसा अभिमत ऋषियों का रहा है।

वस्तुतः देव उपासना परमात्मा के एक रूप विशेष की ही पूजा है। उसके विभिन्न गुणों शक्तियों का प्रतिनिधित्व देवगण करते हैं अन्यथा तो इस सृष्टि का उत्पादक, पोषक, संहारक, कर्ता-हर्ता एक परमात्मा ही है। उसे ही अनेक नामों से पुकारते हैं।

सृष्टि में अनेकों प्रक्रियायें चलती हैं। उनकी संचालक शक्तियाँ भी अनेक हैं। यद्यपि वे सभी परब्रह्म की ही शक्तियाँ हैं, पर उनकी गतिविधियों की पृथकता के अनुरूप उनके नामकरण अलग-अलग किये गये हैं। सूर्य एक ही है पर उसकी अनेक किरणें अपने गुण धर्म की पृथकता के कारण अल्ट्रावायलेट, इन्फ्रारेड एक्सरेज आदि अनेक नामों से पुकारी जाती हैं। मनुष्य शरीर एक ही है पर उसके विभिन्न अंगों का उपयोग और स्वरूप भिन्न भिन्न होने के कारण उन अंगों के नाम भी भिन्न-भिन्न हैं। शरीर को जो कार्य करना होता है। वह अपने तदनुकूल अंग से ही उसे पूरा करता है।

ईश्वर के विराट् स्वरूप के अंग-प्रत्यंगों को, उसकी क्रियाकलापों को देवता नाम से पुकारते है। यह देवता अपने-अपने कार्य क्षेत्र में उसी प्रकार संलग्न रहते हैं जिस प्रकार किसी सरकार के अनेक मंत्री एवं अफसर अपने-अपने विभाग को संभालते हुए राजतंत्र का संचालन करते हैं।

देवताओं की सत्ता पृथक से दृष्टिगोचर होते हुए भी वे वस्तुतः एक ही विराट् ब्रह्म के अवयव मात्र हैं। उनका स्वतंत्र अस्तित्व भासता तो है पर है नहीं। लहरें और बबूले जल के ही अंग हैं। विविध देवताओं के जहाँ भिन्न-भिन्न स्वरूप और गुण-धम्र शास्त्रकारों ने वर्णन किये हैं वहाँ यह भी स्पष्ट कर दिया है कि वे सब वस्तुतः एक ही परमात्मा के अंग-प्रत्यंग मात्र है। ऋग्वेद (6/3/22/46) में कहा गया हैं- “एकं सद् प्रा बहुथा वदन्ति” अर्थात् उस एक ही परमात्मा को विद्वान लोग अनेक नामों से वर्णन करते हैं। एक सन्त बहुधा कल्पयन्ति” अर्थात् उस एक की ही अनेक रूपों में कल्पना की गई है। विष्णुपुराण 1/2/66/ के अनुसार-”यह एक ही भगवान सृष्टि का उत्पादन, पालन और संहार करता हैं उसी के ब्रह्मा, विष्णु महेश नाम हैं। बृहन्नारदीय पुराण (1/2/5) में भी कहा गया है- “उस अनादि-अजर परमात्मा को कोई शिव कोई विष्णु कोई ब्रह्मा कहते हैं। यजुर्वेद (32/1) के अनुसार यह परमात्मा ही अग्नि, सूर्य, वायु, चन्द्रमा, शुक्र,ब्रह्म और वरुण हैं।” ऐतरेय उपनिषद् (1/1/1) में “आत्मा के इदमेक एवाग्र आसीत्”- ‘यह आत्मा एक ही था’ का प्रतिपादन हुआ है तो छान्दोग्य 6/21 में कहा गया है कि- ‘वह एक ही है, दो नहीं-”एकमेवा”द्वितीयम्” या “एको विश्वस्य भुवनस्य राजा”।

शिव पुराण के अनुसार ‘वह एक ही महाशक्ति है। उसी से यह सारा विश्व आच्छादित हैं “एक एवं तदा रुद्रो न द्वितीयों अस्ति कश्चन” अर्थात् तब सृष्टि के आदि में अकेला रुद्र ही था और कोई नहीं। इसी में आगे 2/1/1/27 में कहा है- सृष्टि के उत्पादन, पालन तथा संहार के गुणों के कारण मेरे ही ब्रह्मा, विष्णु शिव यह तीन भेद हुए हैं। वस्तुतः मेरा स्वरूप सदा भेद रहित है।” शिवपुराण में ही वर्णन है कि जो ब्रह्मा है, वही हरि है, जा हरि हैं वे ही महेश्वर हैं। जो काली हैं, वही कृष्ण हैं। जो कृष्ण हैं वही काली हैं। देव और देवी को लक्ष्य करके कभी मन में भेद भाव उत्पन्न होने देना उचित नहीं है। देवता के चाहे जितने नाम और रूप हों, सभी एक हैं। यह जगत् शिव शक्तिमय है।”

विभिन्न देवताओं की अलग-अलग उपासना का तात्पर्य परमात्मा की उस शक्ति से सम्बन्ध स्थापिताकरण है जो साधक के अभीष्ट प्रयोजन से सम्बन्धित है। जैसे समस्त प्रजा एक ही राजा के राज्य में रहती है तो भी उसे अलग-अलग प्रयोजनों के लिए अलग-अलग विभागों के कर्मचारियों के पास जाना पड़ता है। देव उपासना का भी यही प्रयोजन है। साधक अपनी आवश्यकता और आकाँक्षा के अनुरूप उनमें से समय-समय पर इन देवताओं का अंचल पकड़ता है और छोड़ता रहता है।

किस देवता की आराधना किस प्रयोजन के लिए किस प्रकार करनी चाहिए, इसका वर्णन साधना शास्त्रों में विस्तारपूर्वक किया गया है। श्रीमद्भागवत 2/3/29 में कहा गया है- ब्रह्मतेज की इच्छा वाले को ब्रह्मा की, इन्द्रियभोगों के लिए इन्द्र की, सन्तान के लिए प्रजापति की, सौभाग्य के लिए दुर्गा की, तेज के लिए अग्नि की, धन के लिए वस्तुओं की, वीर्य के लिए रुद्र की एवं अन्न के लिए आदित्यों की, राज्य के लिए विश्वेदेवता की, लोक-प्रियता के लिए साध्यगण की, दीर्घायु के लिए अश्विनी कुमारों की, पुष्टि के लिए वसुन्धरा की, प्रतिष्ठा के लिए अन्तरा देवता की आराधना करनी चाहिए। यश के लिए यज्ञ की, विद्या के लिए शंकर की, दाम्पत्य के लिए गौरी की, रक्षा के लिए यज्ञों की, भोगों के लिए चन्द्रमा आदि देवताओं की उपासना करने से अभीष्ट की पूर्ति होती हैं। परन्तु जिसे कोई इच्छा न हो अथवा मोक्ष का आकाँक्षी साधक परमात्मा की उपासना करें।

धर्म शास्त्रों में यह देव शक्तियाँ विभिन्न आकृतियाँ, आयुध, वाहन आदि का भी स्वरूप दिखाया गया है पर वस्तुतः इन सबका आधार ध्यान योग का विज्ञान है। किस प्रकार से ध्यान करने पर कौन सी देव शक्ति को साधक अपनी धारणा में अवतरित कर सकता है, इस गूढ़ रहस्य को बहुत कम ही लोग जानते हैं। इस सूक्ष्म विज्ञान के ज्ञाता बहुत खोज करने पर ही प्राप्त हो सकते हैं। इसीलिए गुरु के रूप में मार्गदर्शक ढूंढ़कर उनके माध्यम से ही उपासना- क्रम चलाने का निर्देश शास्त्रकार देते हैं।

देव उपासना में जहाँ विधि विधान और कर्मकाण्डों का महत्व है वहाँ श्रद्धा और विश्वास की सुदृढ़ भावना का होना भी आवश्यक है। उथली श्रद्धा के साथ केवल कौतुक, कौतूहल समझकर, मन्त्र या देवता की परीक्षा के लिए कुछ आधी अधूरी साधना कर लेने से वमुचित परिणाम प्राप्त नहीं हो सकता। उसके लिए गहरी श्रद्धा और पूर्ण विश्वास का होना अपरिहार्य है। इस श्रद्धा विश्वास को ही “अमृत” कहते हैं। इसी को पीकर देवता तृप्त होते और प्रसन्न होते हैं। परमसत्ता को इसी कारण “रसौ वै सः” कहकर संबोधित किया गया है व कहा गया है कि उसके प्रति समर्पण होने पर आदर्शों के समुच्चय को देव प्रतीक मानते पर जिस आनन्द की अनुभूति होती है, वह वर्णनातीत है उन्हें शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता। मार्ग को भी चुना हो, लक्ष्य स्पष्ट एवं श्रेष्ठ होने चाहिए। इस प्रकार की गयी उपासना व उसके प्रति किया गया समर्पण साधक के जीवन व कायाकल्प कर देता है।


परमार्थ भी विचारना चाहिए (kahani)

एक अन्धा व्यक्ति रोज रात्रि के पहले प्रहर में दीपक जला कर सड़क के किनारे बैठता। किसी राहगीर ने पूछा, सूरदास! इससे तुम्हें क्या लाभ? तुम्हें तो दीखता तक नहीं। अन्धे ने कहा दीपक मैं दूसरे राहगीरों की सुविधा के लिए जलाता हूँ ताकि वे अँधेरे में ठोकर खाने से बचें। हर काम में स्वार्थ की ही दृष्टि नहीं रहनी चाहिए। परमार्थ भी विचारना चाहिए।


आत्मिकी का स्वरूप और प्रयोजन

इस विश्व ब्रह्माण्ड में दो शक्ति सत्ताएँ आच्छादित हैं एक जड़ दूसरी चेतन। इन्हीं को प्रकृति और पुरुष भी कहते है, स्थूल और सूक्ष्म भी। इन दोनों का पृथक पृथक अस्तित्व और महत्व है पर सुयोग तभी बनता है जब वे एक दूसरे की सहायक बनकर संयुक्त शक्ति के रूप में विकसित होतीं और अपने चमत्कार दिखाती हैं।

उदाहरण के लिए शरीर को ही लिया जाय। काया पंचतत्वों द्वारा विनिर्मित है। अंग अवयवों में रक्त-माँस, तन्तु-झिल्ली, अस्थि- मज्जा इत्यादि का मिलन एकीकरण हैं इसलिए उनसे इच्छानुरूप काम कराया जा सकता है शरीर तंत्र की प्रकृति का करामात ही इसे कह कसते है। इतने पर भी वह अपूर्ण है उसके भीतर एक चेतन काम करती है उसी का अचेतन भाग श्वास-प्रश्वास, निमेष-उन्मेष, आकुँचन-प्रकुँचन, सुषुप्ति-जागृत आदि की व्यवस्था बनाती रहती हैं उसकी का दूसरा पक्ष है- सचेतन। जो सोचता, निर्णय करता और इच्छानुसार कार्य करने का आदेश देकर अनेकानेक क्रिया कृत्य सम्पन्न कराता है।

जब तक जड़ चेतन का संयोग है तभी तक प्राणी जीवति रहता है। दोनों के विलग हो जाने पर मृत्यु हो जाती है। भरा हुआ शरीर देखने में यथावत रखने पर भी सर्वथा निर्जीव हो जाता हैं। तेजी से सड़ने-गलने लगता है ताकि उसके घटक पृथक-पृथक होकर अपनी मूल स्थिति में जा पहुँचें निर्जीव शरीर बेकार है। शरीर रहित आत्मा अपना अस्तित्व भले ही बनाये रहती हो पर उसका प्रकट परिचय देने तक की स्थिति में नहीं रहता। मरणोपरान्त अदृश्य प्राण चेतना किस रूप में रहती है? पुनर्जन्म से पूर्व उसे किस स्थिति में कहाँ रहना पड़ता है। इसका केवल अनुमान ही लगाया जाता रहता हैं।

अभिप्राय इतना भर है कि जड़ और चेतन का समन्वय ही कोई सार्थक स्थिति का निर्माण करता हैं। अन्यथा इस विशाल में बिखरा पड़ा पदार्थ तत्व भी अपनी अस्तव्यस्तता और कुरूपता का ही परिचय देता हैं धरती पर ठोस रूप में-जलाशयों में द्रव रूप में और आकाश में वाष्पीभूत स्थिति में पदार्थ सत्ता बेतुके रूप में बिखरी पड़ी रहती है। थल प्रदेश जिसके साथ मनुष्य का संपर्क नहीं सधा है, वहीं खड्डे टीले जैसा ही कुछ अनगढ़ देखा पाया जाता है। वृक्ष वनस्पति वहाँ हैं तो उनकी क्रमबद्धता कहीं दृष्टिगोचर नहीं होती। जलाशयों में समुद्र सबसे बड़ा है, पर वह इतना गहरा और खारी है कि उसका प्रयोग सर्वसाधारण के लिए किसी निमित्त कर सकना सींव नहीं आकाश में यों हवा का ही परिचय मिलता है, पर उन गैसों में भी विद्युत, विद्युतचुंबकीय, लेसर, एक्सरे जैसी सूर्य द्वारा उत्पादित किरणों की भरमार है। इनका स्वतंत्र कोई विशेष उपयोग नहीं। कभी कभी उस क्षेत्र में भी आँधी तूफान जैसे उद्दण्ड प्रकरण भी उभरते रहते हैं। मेघ-मालाएँ घुमड़ने और बिजली चमकने जैसे दृश्य कौतूहलवर्धक दृश्य तो सामने आते हैं पर उनकी शक्ति सामर्थ्य का ऐसा उपयोग नहीं बनता जिसे सराहा और उपयोगी कहा जा सकें। कहीं अतिवृष्टि कहीं अनावृष्टि। यहाँ तक कि समुद्रों से उठे बादल समुद्र पर ही बरस कर अपने बेतुकेपन का परिचय देते हैं। थल, जल और नभ के क्षेत्र में यदि चेतना का हस्तक्षेप न हुआ होता तो यहाँ अभी भी लगभग वैसा ही दीख पड़ता, जैसा अनादि काल में किसी प्रकार विनिर्मित हुआ था।

कहने का तात्पर्य यह है कि जड़ और चेतन का संयोग ही सब प्रकार अभीष्ट है। जीवन यात्रा के सुसंचालन तक में चेतना को पर्दा की और पदार्थ को चेतना की आवश्यकता पड़ती है तभी वे सुन्दर, सुव्यवस्थित और उपयोगी होने का प्रमाण-परिचय दे पाते हैं। भूमि को समतल बनाकर घास किस्म की वनस्पतियों को अन्न के रूप में खाद्य का प्रमुख आधार बना देता मनुष्य का ही कौशल है, यहाँ तक कि तापमान को चिनगारी से ले कर ज्वाला में बदल लेने का श्रेय भी मनुष्य को है। यद्यपि अग्नि एवं बिजली का अस्तित्व अनादि काल से सृष्टि परिकर में विद्यमान था पर उसका उद्घाटन तो मनुष्य ने ही किया है और उन सबका विविध प्रयोजनों के लिए उपयोग कर सकने का कौशल उसी के पुरुषार्थ ने संभव कर दिखाया है।

ऊपर कुछ प्रारंभिक प्रत्यक्षीकरणों और उत्पादनों की चर्चा है जिनमें यह बताया उद्देश्य है कि प्रकृति के ठोस द्रव्य और व्याप्त कलेवरों में शक्ति सामर्थ्य कितनी ही क्यों न हो पर उनका लाभ लेना मानवी चेतना के कौशल पर ही निर्भर रहा है। आरंभिक काल से लेकर अब तक प्रकृति की शक्तियों का रहस्योद्घाटन, सुनियोजन और महत्वपूर्ण उपयोग बन पड़ना संभव बनाने वाली कुशलता का मना ही विज्ञान है। इस चमत्कारी उपलब्धि को जड़ -चेतन का समन्वय ही कह सकते हैं। इसी के बल पर वह प्रगति संभव हुई है जिसके आधार पर इस धरातल पर सर्वत्र सुख साधनों के अम्बार खड़े हो गये हैं। उनके सहारे मनुष्य अपने को सर्वश्रेष्ठ, शक्ति सम्पन्न एवं धरातल का अधिष्ठाता बनने का दावा करते देखा जाता है। वह दावा किसी सीमा तक सही भी है। वन्य पशुओं और मनुष्य की तुलनात्मक समीक्षा करने पर सहज ही जाना जा सकता है कि पदार्थ को सुनियोजित करने की क्षमता-जिसे विज्ञान कहते हैं, कितना सशक्त-समर्थ और कितने सुविधाओं से भरा पूरा है। पदार्थ की अपनी स्वतंत्र सत्ता है। इसी प्रकार चेतना के भी स्त्रोत - उद्गम और कार्य क्षेत्र पृथक हैं। इस पृथकता के रहते हुए भी संसार इतना सुन्दर और इतना श्रेय उस विज्ञान रूपी विधा को ही दिया जा सकता है जिसे पदार्थ से लाभान्वित होने की कुशलता भी कहा जा सकता है। सामान्य प्राणियों की तुलना में मनुष्य सुखी समृद्धि है, यह तभी बन पड़ा जब विज्ञान के रहस्यों को उद्घाटित कर उससे लाभ उठाने की प्रक्रिया को अधिकाधिक सफलतापूर्वक सम्पन्न करना संभव हुआ।

इस मोटी जानकारी के उपरान्त एक और भी बड़ी विचारणीय रह जाती है कि पदार्थ का उपयोग जानना ही पर्याप्त नहीं, उसका सदुपयोग भी समझा जाना चाहिए। वह विभाजन रेखा मात्र पदार्थ तक ही सीमित नहीं है वरन् स्वयं चेतना के अपने आपे पर भी लागू होती हैं। इन दोनों महाशक्तियों का यदि सदुपयोग न बन पड़े तो फिर दूसरा पक्ष दुरुपयोग ही रह जाता है। विज्ञान को, शक्ति और साधन उत्पन्न करने का श्रेय तो है पर वह स्वयं इस स्थिति में नहीं है कि सदुपयोग और दुरुपयोग का अन्तर कर सकें। देखा गया है कि तात्कालिक लाभ की संकीर्णता प्रायः नहीं के बराबर होती है। इसलिए प्रलोभनों, आकर्षण, लिप्साओं की प्रबलता उपलब्ध शक्तियों का दुरुपयोग करने के लिए ही घसीट ले जाती है। जाल में फँसने वाली चिड़िया, मछली का उदाहरण इस संदर्भ में प्रायः दिया जाता रहता हैं। इसे विज्ञान वैभव को अनर्थ के लिए नियोजित करना भी कह सकते हैं। पतन तात्कालिन लाभ की आतुरता के साथ जुड़ हुआ है। आमतौर से यही किया और अपनाया जाता हैं। फलस्वरूप व्यक्ति अपने सुदूर भविष्य को अन्धकारमय बनाता है। त्रास सहता है और आत्म प्रताड़ना के साथ साथ लोक भर्त्सना का भाजन बनता है। इसकी रोकथाम समाज, शासन द्वारा तो यत्किंचित ही बन पड़ती है। उसे सहज भ्रम में डाला या लुभाया जा सकता है। मात्र एक ही रोकथाम का उपाय है दूरदर्शिता पर आधारित विवेकशीलता, मानव गरिमा के साथ जुड़ी हुई उत्कृष्टता। इसी को तत्वदर्शन की भाषा में अध्यात्म कहा गया है।

पर्दा से भी अधिक शक्तिवान है चेतना। उसी का कौशल और चमत्कार है कि पदार्थ को अनगढ़ से सुगढ़ स्थिति तक पहुँचाने में सफलता प्राप्त हुई है। फिर भी एक आश्चर्य और भी शेष रह जाता है कि विज्ञान की जन्मदात्री होने पर भी यह चेतना अपने आपके सम्बन्ध में भी कम दिग्भ्रांत नहीं रहती। अपने को भी अपना मकड़जाल बुनकर फँसाने और असाधारण सन्त्रास सहते रहने के लिए बाधित होती रहती है। यह और भी जटिल स्थिति है। दूसरों के संबंध में समीक्षा करना सरल पड़ता है। दूसरों के रूप का भला बुरा वर्णन किया जा सकता है, पर आत्म समीक्षा कैसे बन पड़? अपने प्रति पक्षपात भी रहता है और सर्वोत्तम होने का आग्रह भी। ऐसी दशा में दृष्टिकोण गड़बड़ाता है एवं कुकल्पनायें उठती हैं। अपने को सही सिद्ध करने वाले अनेकानेक तर्क साथ देते हैं। बुद्धि का निर्णय कभी तद्नुरूप ही होता है। जैसा कि सामान्यतया मानस बन गया है।

ऐसी दशा में यह कठिनाई भी सामने आती है कि अपना दृष्टिकोण उत्कृष्ट आदर्शवादिता के ढाँचे में कैसे ढले? व्यवहार में ऐसी शालीनता का समावेश कैसे हो? जिस मानवी गरिमा के उपयुक्त कहा जा सके? जिसके आधार पर चरित्र और व्यवहार ऐसा बन सकें, जिससे उपलब्ध साधनों का सदुपयोग बन पड़े? दूसरों के साथ सज्जनता स्तर का शिष्टाचार निभ सके?

यह ध्यान में रखने योग्य बात एक है कि लोग आदर्शों की बात का मौखिक समर्थन तो अपने बड़प्पन बघारने के लिए करते रहते हैं। वैसे धर्मोपदेश सुनकर उनके प्रति समर्थन भी व्यक्त कर देते हैं पर मानते और करते वही रहते हैं जो पहले से ही मजबूती के साथ अपनी मान्यताओं में समाविष्ट कर रखा है। आत्म सुधार के क्षेत्र में यही भारी संकट है। उपदेश, परामर्श शास्त्र उल्लेख आप्त वचन जब कान, मस्तिष्क तक टकरा कर ही बाहर निकल जायँ और उसका प्रीव अन्तराल की गहराइयों तक न पहुँचे तो चेतना का परिष्कार किस आधार पर बन पड़?

इस संदर्भ में एक ही आधार कारगर हो सका है और वह है आत्म समीक्षा निष्पक्ष भाव से कर सकने की क्षमता। आत्म सुधार और आत्म आपे का सुधार परिष्कार उस आत्मबल के पक्षधर तत्वदर्शन के माध्यम से ही हो सकता है, जिसे पुरातन भाषा में अध्यात्म’ कहते हैं। विज्ञान वैभव का सदुपयोग और आत्म चेतना का परिष्कार ये दोनों ही प्रयोजन जिस आधार पर सिद्ध हो सकें, उसे एक शब्द में अध्यात्म कहा जा सकता है, उच्चस्तरीय तत्वदर्शन भी।

लोक व्यवहार में अध्यात्म और विज्ञान की दो पृथक धारायें बन गई हैं। दोनों ने अपने-अपने दुर्ग अलग-अलग खड़े कर लिए हैं। भ्रान्तियाँ दोनों पर ही अपने अपने ढंग की सवार है। वे जिस भी स्थिति में है अपने को पूर्ण मान कर चल रहे हैं। जिस प्रकार बँटे हुए आदिम स्तर के कबीले एक दूसरे के प्रति सहयोग और सहानुभूति रखने की आवश्यकता नहीं समझते, उसी प्रकार दोनों वर्ग के सत्ताधारी यह सोच बनाकर चले हैं कि वे अपने आप में पूर्ण हैं।

वैज्ञानिक क्षेत्रों में आध्यात्म को अन्धविश्वास, कल्पनाओं की उड़ान और प्रतिगामियों का बौद्धिक षड़यन्त्र कहना शुरू कर दिया गया है। धर्म को अफीम की गोली और तत्वदर्शन को भ्रांतियों की पिटारी ठहराना शुरू कर दिया गया है। इस द्वन्द्व में मनुष्य जाति को असीम क्षति उठानी पड़ रही हैं गाड़ी को खींचने वाले दो बैल यदि परस्पर सींग मारने पर उतर आयें तो यात्रा हो नहीं सकेगी। वे बैल भी आहत होकर उस उद्देश्य को चोट पहुँचायेंगे जिसके लिए दोनों गाड़ी में जुते और एक दिशा में चल कर एक लक्ष्य पूरा करने के लिए नियोजित हुए थे। अब समय आ गया है कि दोनों पक्ष एक दूसरे की उपयोगिता व समन्वय की आवश्यकता समझते हुए चिन्तन के अवरुद्ध द्वार खोले। मानव जाति का भविष्य इसी समन्वय पर टिका हुआ है।

वैज्ञानिक क्षेत्रों में आध्यात्म को अन्धविश्वास, कल्पनाओं की उड़ान और प्रतिगामियों का बौद्धिक षड़यन्त्र कहना शुरू कर दिया गया है। धर्म को अफीम की गोली और तत्वदर्शन को भ्रांतियों की पिटारी ठहराना शुरू कर दिया गया है। इस द्वन्द्व में मनुष्य जाति को असीम क्षति उठानी पड़ रही हैं गाड़ी को खींचने वाले दो बैल यदि परस्पर सींग मारने पर उतर आयें तो यात्रा हो नहीं सकेगी। वे बैल भी आहत होकर उस उद्देश्य को चोट पहुंचायेंगे जिसके लिए दोनों गाड़ी में जुते और एक दिशा में चल कर एक लक्ष्य पूरा करने के लिए नियोजित हुए थे। अब समय आ गया है कि दोनों पक्ष एक दूसरे की उपयोगिता व समन्वय की आवश्यकता समझते हुए चिन्तन के अवरुद्ध द्वार खोले। मानव जाति का भविष्य इसी समन्वय पर टिका हुआ है।


सच्चा कर्मयोग (kahani)

विवेकानंद से उनके शिष्य संक्षेप में गीता का सार बताने के लिए कहा करते थे। वे समय आने पर बताने ही नहीं दिखने का भी वचन देकर बात को टालते रहे।

एक दिन वे सभी शिष्यों को लेकर खेल के उस मैदान में गये जहाँ कितने ही खिलाड़ी तन्मयतापूर्वक खेल रहे थे। पर हार जीत का कोई बड़ा मलाल इनमें से किसी को भी न था। हारने वाला भी मुख पर मलीनता न आने देता और दूने उत्साह के साथ खेलता?

विवेकानंद ने कहा देखा आपने इन लोगों को। जीवन का खेल भी यदि इसी भावना से खेला जाय तो उसे गीता में कहा गया कर्मयोग समझा जाना चाहिए।


देवत्व का विकास एवं योग सिद्धि

परमसत्ता से संपर्क-सान्निध्य स्थापित करने की एक विशेष प्रक्रिया होती हैं। चूँकि इसका काम दो सत्ताओं को परस्पर जोड़ना है, इसलिए इसका नाम”योग’ और इस प्रक्रिया को पूरा कर सकने वाली क्षमता का ‘योगशक्ति’ रखा गया। इसकी अनेकानेक शाखाएँ हैं, पर हर पल का लक्ष्य एक ही है- चिन्तन चेतना को परिष्कृत कर विचार बुद्धि को सुस्थिर रखना और आत्मसत्ता को परमात्म सत्ता से एकाकार करना।

‘योग’ शब्द का अर्थ-क्षेत्र अत्यन्त व्यापक हैं जिस ‘योग’ का जो विशेष अि उद्देश्य होता है, उसका संकेत करने वाला शब्द आगे जोड़ दिया जाता है। जैसे भक्तियोग का अर्थ है-ब्रह्मसत्ता से भक्तिभाव से जुड़े रहने की जीवन पद्धति। ज्ञानयोग का अर्थ है-ज्ञान साधना द्वारा सर्वव्यापी सत्ता की अखण्ड अनुभूति। मंत्रयोग अर्थात् मंत्र जप द्वारा आत्म चेतना क ब्रह्म चेतना से समरसता प्राप्त करने का प्रयास। कर्मयोग को प्रखर कर्मनिष्ठ एक जीवन साधना कहा गया है। हठयोग यानी पूर्ण स्वस्थता के लिए की जाने वाली विशिष्ट शारीरिक मानसिक क्रियाओं का साग्रह अभ्यास।

भगवद् गीता में योग और योगी के स्वरूप का जहाँ कहीं भी उल्लेख हुआ है, वहाँ योग के ऐसे ही लक्षणों का संकेत-निर्देश हुआ है, जो आत्मचेतना को ब्रह्मचेतना से जोड़ने पर आनन्द- उल्लास सक्रियता-स्फूर्ति, कर्मनिष्ठा- चरित्रनिष्ठ के रूप में प्रत्यक्ष देखे जाते हैं। साधक के व्यक्तित्व में चिन्ह हैं इसी तथ्य को गीता में भिन्न-भिन्न ढंग से प्रतिपादित किया गया है, यथा-’समत्वं योग उच्चयते’, अर्थात् समत्व बुद्धि सुसंतुलित मनः स्थिति ही योग है। योग संन्यस्त कर्माणम्,’ अर्थात् संन्स्त भाव से निर्लिप्त एवं उत्साहपूर्ण रहकर काम करना योग है “ईक्षते योग युक्तात्मा सर्वत्र सम दर्शनम् बुद्धि से सर्वत्र परमात्मा को देखने वाले व्यक्ति योग युक्त होते हैं ‘योगः कर्मसु कौशलम्’-कर्म-कौशल या उत्कृष्ट कर्मनिष्ठा ही योग है। ‘योगिनः कर्म कुर्वन्ति संग त्यक्तत्वात्मशुद्धये’-योगी वह है, जो आत्मशुद्धि के लिए मोहासक्ति छोड़ कर कर्म करता है। ‘नैव किंचित्करोमीति युक्तो मन्येत तत्ववित्’-तत्ववेत्ता जानता है कि आत्मसत्ता स्वयं स्थूल कर्म नहीं करती, कर्म तो इन्द्रियादिक द्वारा आत्मचेतना की उपस्थिति में सम्पन्न हो रहे हैं अतः उनमें सफलता विफलता से असन्तुलित हो उठने जैसी कोई बात नहीं। ‘योगयुक्तों विशुद्धात्मा’ -योगयुक्त व्यक्ति की आत्मसत्ता विशुद्ध प्रखर हो जाती है। ‘समाधवचला बुद्धिस्तदा योगमवाप्स्यसि’-समाधि स्थिति की तरह स्थिर, अविचल बुद्धि होने पर ही योगस्थिति प्राप्त होती हैं।

इस प्रकार स्पष्ट है कि अंतरंग चेतना का परिष्कार ही समस्त योग-साधनाओं का वास्तविक अभीष्ट है और इस परिष्कार में निरन्तर प्रवृत्त रहने की क्षमता ही योगशक्ति है। योग शक्ति का यह स्वरूप स्पष्ट हो जाने पर यह परिणाम भी उतना ही स्पष्ट हो जाने पर यह परिणाम भी उतना ही स्पष्ट हो जाता है कि योगशक्ति व्यक्तित्व का विकास करती है, उसकी संकीर्णताओं को नष्ट कर उसे प्रखर-परिष्कृत बना देती है।

यही देवत्व-शक्ति के विकास की अवस्था है। यह शक्ति आत्मपरिष्कार के साथ आती और व्यक्तित्व की प्रखरता के साथ बढ़ती जाती है। यह परिष्कृति ही योगशक्ति हैं कुण्डलिनी जागरण और ऊर्ध्वारोहण इसी का दूसरा नाम हैं इसके उपरान्त क्रियाशीलता, स्फूर्ति, उत्फुल्लता तथा आनन्द का अजस्र स्रोत फुट पड़ता है। आत्मसत्ता अधिकाधिक विशुद्ध, प्रखर, विस्तृत, विराट् होती चली जाती है, जिसकी चरम परिणति ब्रह्मसत्ता से पूर्ण तादात्म्य के रूप में सामने आती हैं यही मोक्ष-मिलन, विलय-विसर्जन है-क्षुद्र सत्ता और महतसत्ता का महायोग है।


रागों से होगी अब रोगों की चिकित्सा

संगीत व गायन को मात्र मनोरंजन की विधा माना जाना त्रुटिपूर्ण है। इसका उपयोग पिछले दिनों स्वास्थ्य संवर्धन के क्षेत्र में हुआ है व इस चिकित्सा से कई व्यक्तियों को व्याधियों से मुक्ति भी मिली हैं इन दिनों जो शोध कार्य चल रहा है, उससे यह स्पष्ट हो गय है कि संगीत का शरीर व मन पर असाधारण प्रभाव पड़ता है व सही निदान कर उपयुक्त स्वर लहरियों का व्यक्तियों के लिए चयन कर उन्हें मनोविकारों- विभिन्न शारीरिक रागों से मुक्ति भी दिलायी जा सकती है।

इंग्लैण्ड के चिकित्सा शास्त्री डाँ. एडवीना मीड और कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के शरीर शास्त्री एडवर्ड पोडीलास्की ने लम्बे समय तक शरीर व मन पर संगीत के प्रभावों का अध्ययन कर अपना शोध निष्कर्ष प्रस्तुत करते हुए कहा है कि संगीत की शक्ति से स्नायु संस्थान में एक विशेष प्रकार की हलचलें उत्पन्न होती है, जो चिन्तन और भावना क्षेत्र की विकृतियों को दूर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। उनके अनुसार संगीत के स्वरों से शरीर मन को संचालित करने वाली अंतःस्रावी ग्रन्थियों को भी प्रभावित उत्तेजित किया जा सकता है। यह कह कर उन्होंने प्रकारान्तर से संगीतशास्त्र की रोग निवारक क्षमता का ही समर्थन किया है, जिसमें शरीर-मन की विभिन्न अवस्थाओं को प्रभावित करने के लिए विभिन्न राग रागिनियों को का निर्धारण है। पश्चिम जर्मनी के डाँ. डोनाल्ड ड्रोह एवं पूना विश्व विद्यालय के डाँ. तम्हाने का मत है कि एड्रिनोलिन के कारण उत्पन्न होने वाले विकारों को संगीत द्वारा उसके स्राव को सामान्य संतुलित बना कर सही किया जा सकता है। उन्होंने बच्चों पर इसका प्रयोग कर उत्साह वर्धक परिणाम प्राप्त किया। चार्ल्स कील एवं आँगेलिकी नाम वैज्ञानिकों द्वारा भी ऐसे ही परिणाम प्राप्त किये गये, जिसका उल्लेख सन् 1966 में “म्युजिकल मीनिंग ए प्रिलीमिनरी रिपोर्ट” नाम से अयेडी की पत्रिका “जनरल आफ इण्टनोम्यूजिकोलाँजी” में किया गया है। डाँ. हर्बर्ट स्पेंसर ने भी रोग और रोगियों पर संगीत उपचार के कुछ प्रयोग-परीक्षण किये थे। उन्होंने अपने प्रयोग में पाया कि द्रुतगति व तीव्र स्वर में बजती धुनों के प्रयोग से निम्न रक्तचाप वाले रोगियों तथा हल्के स्वर में बजती धुनों से उच्च रक्तचाप वाले मरीजों को लाी पहुँचता है।

संगीत से मात्र शारीरिक मानसिक रोगों को ही ठीक किया जा सकता है, ऐसी बात नहीं है। यह भावनाओं को भी परिवर्तित परिष्कृत एवं उद्वेलित करने की सामर्थ्य रखता है। त्रावणकोर के प्रसिद्ध संगीतकार वडिवेल्लु के जीवन की वह घटना प्रसिद्ध है, जिसमें उनने अपने संगीत के माध्यम से डाकुओं के कठोर हृदय को भी विगलित कर दिया था।

संगीत की इसी शक्ति का समर्थन डाँ. लुई वैरमोन ने अपनी पुस्तक “दि ग्लैण्ड रेग्युलेटिंग पर्सनालिटी” में किया है। स्वर विज्ञान का विवेचन करते हुए अपनी उक्त पुस्तक में उन्होंने कण्ठ नहीं से संबंधित ग्रन्थि का उल्लेख किया है और कहा है कि थायराइड ग्रन्थि न केवल रक्तचाप व चाप का नियंत्रण करती है, वरन् प्रेम और सहानुभूति बढ़ाने एवं असामान्य व विकृत स्थिति में ईर्ष्या द्वेष उभारने में भी अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। उनने अपनी पुस्तक में आगे लिखा है कि सामान्य परिणाम में रक्तचाप बनाये रखने के लिए आवश्यक है कि थायराइड से निकलने वाला रसस्राव थायरोक्सिन का अनुपात सही हो। उसका संतुलन बिगड़ने से न केवल रक्त की ऊष्मा और गति में गड़बड़ी उत्पन्न होती है, वरन् तरह तरह की भावनाओं संबंधी विकृतियों का भी मनुष्य शिकार बन जाता है। संगीत के माध्यम से इसके इसी रसस्राव को नियंत्रित कर व्यक्ति को भावनात्मक दृष्टि से उदात्त बनाया जाता है। संभव है संगीत से मस्तिष्क के एण्डार्फिन्स व एन्केफिलिन्स आदि रसस्राव भी प्रभावित होते हों जो भाग संस्थान से जुड़े होते है।

रूसी वैज्ञानिक और संगीतज्ञ डाँ. नेर्लिएल ने भी इसी प्रकार का मन्तव्य प्रकट करते हुए कहा है कि संगीत न सिर्फ रक्तचाप को प्रभावित करता हैं, वरन् इससे व्यक्ति की भावनाएँ भी बदली जा सकती हैं।

किन्तु संगीत के रूप में वर्तमान चिकित्सा पद्धति की गति अभी उतनी गहरी नहीं हो पायी है, जिसकी प्राचीनकाल में कमी थी। तब भिन्न-भिन्न आधि-व्याधियों का निर्धारण था। उदाहरण के लिए मानसिक अस्थिरता एवं क्रोध शमन् के लिए मल्हार, सौरत एवं जैजैवन्ती रागों की व्यवस्था थी। श्वास संबंधी तकलीफ, खाँसी, दमा, तपेदिक आदि में राग भैरव, रक्त अशुद्धि की स्थिति की स्थिति में राग अस्तावरी तथा मेदा, यकृत, प्लीहा वृद्धि में राग हिंडोल का प्रावधान था, पर रोगोपचार के क्षेत्र में आज विभिन्न प्रकार की पद्धतियों के प्रचलन से अब इनका प्रयोग लगभग लुप्तप्राय हो चला है। सत्य तो यह है कि संगीत की इस विद्या को आज लोग शंकित दृष्टि से देखते हैं। प्राचीन भारतीय शास्त्रों में वर्णित इसकी विलक्षण शक्ति की सच्चाई जानने के लिए विज्ञान का आश्रय लिया जाता तो वह शंका तो मिटती।

प्राचीन भारतीय संगीत शास्त्रियों ने आयुर्वेदिक सिद्धांत के आधार पर कठनाद की भी तीन प्रकृति-कफ, वात, पित्त निर्धारित की हैं। उनके अनुसार कफ प्रधान कंठ से उत्पन्न नाद स्वर अथवा शब्द गंभीरता लिये, स्थिर व मधुर होता हैं। इस प्रकार के कंठ से तरंगित स्वर को “काहुल” या “कफज” कहा गया है। पित्त प्रकृति युक्त कंठ तीव्र नाद पैदा करता है। वह कर्कश व कर्णकटु होता है। ऐसे नाद को संगीत शास्त्र की भाषा में “नाटर” की संज्ञा दी गई है।, जबकि बात की अधिकता होने पर इस प्रकार के कंठ से उद्भूत स्वर माधुर्य रहित व उच्च होते है। ऐसे कंठ वाले गायक चाह कर भी अपने स्वर को स्थिर नहीं रख पाते, फलतः गायन बेसुरा हो जाता है। ऐसे स्वर को बोंबर” नाम दिया गया है। इसी प्रकार बात-कफ वात-पित्त और कफ-पित्त प्रधान कंठ अथवा स्वर भी होते हैं।

आयुर्वेदशास्त्र में जिस प्रकार वात, पित्त, कफ की त्रिधातुओं को गति, चेतन और र्मदता के लिए जिम्मेदार माना गया है, वैसे ही संगीत के आचार्यों ने इनके आधार पर स्वरों की तारता, तीव्रता और मधुरता के तीन भेदों का निर्धारण किया है। तारता (पिच) बात गुण का घोतक है। तीव्रता (लाउडनेस) पित्त गुण को इंगित करती है और मधुरता (टोनस क्वालिटी) कफ-गुण का संकेत करती है। आयुर्वेद के अनुसार पिण्ड से ब्रह्मांड तक के सारे प्राणी-पदार्थ इन्हीं तीन गुणों का विभिन्न अनुपात में सम्मिश्रण लिये होते है। काया में इनकी साम्यावस्था या विषमता से जो अवस्था उत्पन्न होती है, उसका प्रभाव हृदय नाड़ियों और स्नायु तंतुओं से लेकर समस्त अंक अवयवों पर पड़ता है, जिसके झंकार को स्वर कहते हैं। धातु-भेद के आधार पर इन स्वरों के प्रभाव-परिणाम भी श्रोताओं पर भिन्न प्रकार के होते है। इसी को ध्यान में रखते हुए रोगग्रस्त स्थिति में शरीर में इन तीन गुणों में से जिसकी कमी-अथवा अधिकता होती है, संगीत के माध्यम से उसे साम्य बनाया जाता है।

डाँ.वि.वि. गारे ने अपने लेख “संगीत और आयुर्वेद” (संगीत पत्रिका फरवरी 1962) में लिखा है कि यदि शरीर और मन पर सुस्ती छा जाय, आलस्य आ जाये एवं आवाज मन्द आने लगे, पंचम स्वर की आलापिनी, मंदती, रोहिणी, सम्बा स्वरों का कंठ पर वर्यस्व हो, तो ऐसे व्यक्ति को (कफ प्रकृति की मंदता) स्वस्थ बनाने के लिए रौद्री, क्रोषी, वजिका श्रृतियाँ ऋषभ स्वर शब्द को या ऋषभवादी स्वर वाले राग को सुनाया जाना चाहिए। इसी प्रकार पित और बात प्रकृति वाले व्यक्ति को साम्वावस्था में लाने के लिए कफ प्रकृति स्वर अर्थात् श्रंगार रस के राग खमाज, तिलंग, देस आदि सुनाने चाहिए।

शास्त्रों में संगीत की महत्ता का वर्णन अनेक स्थानों पर किया गया है। पराशर ऋषि ने इसके महात्म्य का उल्लेख करते हुए कहा है -

न नादेन बिना ज्ञानं न वादेन बिना शिवः नाद रुपं पर ज्योतिर्नदरुपी स्वयं हरिः॥ अर्थात् नाद के बिना ज्ञानं नहीं होता।

नादन के बिना शिव नहीं होता। परम ज्योति नाद .... ही है। स्वयं विष्णु नाद रूप है।” नारद रचित “संगीत मकरंद” में भी संगीत का गुणगान करते हुए कहा गय है कि आयु धर्म, यश,बुद्धि धन, धान्य, संतान की अभिवृद्धि यह सब रागों के .... द्वारा सींव है।

ऐसी बात नहीं कि संगीत की यह विधा प्राचीन समय में पुस्तकीय ज्ञान के रूप में ही सीमित होकर रह गई थी। अपितु इसका सफल प्रयोग भी होता रहा था। इसके अनेक उदाहरण देखने को मिलते है। कहा जाता है कि प्रसिद्ध संगीतज्ञ बैजूबावरा ने जग पूरिया सुनाकर राजा राजसिंह की अनिद्रा की बीमारी दूर की थी। ऐसी ही शक्ति पं. पलुस्कर और डागरबन्ध के गायन वादन में बतायाी जाती थी। अब तो क्रमशः यह पीढ़ी भी लुप्त होती जा रही है। फिर भी कुछ धराने ऐसे हैं। जहाँ इन रागों को जिन्दास रखा गया है। इटली के शासन सुसोलिनी की निद्रा संबंधी बीमारी भी, कहा जाता है कि एक भारतीय संगीतकार ने ही संगी के माध्यम से दूर की थी।

अब जैसे-जैसे विज्ञान इसकी गहराई में उतरता जा रहा है। उसे संगीत की अपरिमित शक्ति और क्षमता का ज्ञान विदित होता जा रहा है। आज “औरोटोन” जैसे कई ऐसे विशेष वाद्य यंत्र उपकरण विकसित कर लिये गये हैं, जिसमें भिन्न-भिन्न राग सुना कर स्वस्थ करने की व्यवस्था है। इसे देखते हुए आने वाले समय में संगीत को यदि वैकल्पिक चिकित्सा पद्धति के रूप में विकसित किया गया, तो इसमें आश्चर्य जैसे कोई बात नहीं होनी चाहिए। इसके लिए प्रयोग परीक्षण का एक व्यापक तंत्र बनाना होगा। हमारे पास संगीत रूपी पंजी का अभाव नहीं है। उसे विभिन्न आधुनिक यंत्रों की कसौटी पर कसे जाने भर की आवश्यकता है।

विभिन्न नादों रागों-रागिनियों को सुनाने के पूर्व शरीर व मन से जुड़े रसायनों की क्या स्थिति थी व बाद में क्या हो गयी? विभिन्न नादों रागों-रागिनियों को सुनाने के पूर्व शरीर व मन से जुड़ें रसायनों की क्या स्थिति थी व बाद में क्या हो गयी? यदि यह तुलनात्मक अध्ययन संभव हो गया तो कोई संगीत शक्ति की वैज्ञानिकता पर उँगली उठा सकेगा। ब्रह्मचर्य शोध संस्थान ने इस दिशा में प्रारंभिक कदम उठाये हैं। ऐसे ही प्रयास, संभव है कहीं और भी चल रहे हों। उन्हें समन्वित किया जा सके तो इस चिकित्सा पद्धति को पुनः प्रतिष्ठापित किया जा सकता है।


गैरीबाल्डी की सादगी (kahani)

गैरीबाल्डी ने अपने देश का स्वतन्त्रता संग्राम जिस कुशलता और बहादुरी से लड़ा उसकी धंर्धा उन दिनों दूर देशों तक फैली हुई थी और उन्हें बहुत कुछ माना जाता था और बहुत बड़ा भी।

एक देश के सेनापति सैन्य संचालन सम्बन्धी कुछ महत्वपूर्ण परामर्श करने उनके पास पहुँचे। इन दिनों वे एक बहुत ही मामूली डेरे में रहते थे। साज-सज्जा के सामान का अभाव था। उसी सादगी के वातावरण में सारगर्भित वार्तालाप होता रहा।

अंत में सेनापति को एक गोपनीय नक्शा दिखाकर स्थानीय परिस्थितियों के सम्बन्ध में पूछताछ करनी थी। पर कठिनाई यह थी कि लालटेन का कोई प्रबन्ध नहीं था। अस्तु नक्शे को देखना दिखाना संभव ही न हो सका।

गैरीबाल्डी जैसे विश्व विख्यात व्यक्ति को इतनी सादगी, गरीबी और अभावग्रस्त स्थिति में देखकर सेनापति को आश्चर्य मिश्रित दुःख हुआ।

दूसरे दिन में प्रकाश होने पर नक्शे के सम्बन्ध में परामर्श करने के लिए सेनापति आये तो उन्होंने बड़ी नम्रता और सम्मान के साथ पाँच हजार पौंड भेंट किये और कहा-अपनी आवश्यकताएँ पूरी करने के लिए मेरी यह नगण्य सी भेंट स्वीकार करने का अनुग्रह करें।

गैरीबाल्डी ने मुसकराते हुए कहा-वस्तुतः मुझे कभी उन चीजों की आवश्यकता ही अनुभव नहीं हुई जिन्हें आप अभाव समझते है। इस पैसे की मुझे तनिक भी आवश्यकता नहीं है।

सेनापति का अत्यधिक आग्रह देखा और अस्वीकार करने पर उन्हें खिन्न पाया तो फैसला यहाँ समाप्त किया गया कि सेनापति पाँच पौण्ड वजन की मोम बत्तियाँ दे जाँय ताकि भविष्य में रात्रि के समय कोई परामर्श करने आवे तो उसके लिए सुविधा हो सके।


आत्मबल सर्वोपरि

दायें बाएँ अलग-अलग चारों और पुस्तकें रखी हुई थीं। विश्व कवि रविंद्रनाथ टैगोर अपने अध्ययन कक्ष में बैठे तन्मयता से साहित्य सृजन कर रहे थे। वे अपने काम में इतने तल्लीन थे कि कमरे के बाहर और कमरे के भीतर क्या हो रहा है? इसका तनिक भी ध्यान नहीं था। चुपके से एक व्यक्ति ने उनके कक्ष में प्रवेश किया, रविंद्रबाबू को इसका भी पता नहीं चला।

उस व्यक्ति के चेहरे से भयावह हिंस्र भाव टपक रहा था। डराबने नैगे, चेहरे पर तनाव, हाथ में लपलपाता सा लम्बा छुरा। वह चुपके से रविंद्रबाबू के सामने आ कर खड़ा हो गय और एक एक शब्द को चबा-चबा कर बोलने के से ढंग से कहा, “आने प्रभु का स्मरण कर लो। मैं तुम्हारी हत्या करने आया हूँ।”

विश्व कवि की साम्यता ये शब्द सुन कर टूटी ओर उन्होंने उस व्यक्ति की और दृष्टि उठा कर देखा, “तुम मेरी हत्या करने आये हो? रविंद्र बाबू ने पूछा।

देखते नहीं मेरे हाथ में यह छुरा है। आज मैं तुम्हारी इहलीला समाप्त करने आया हूँ, उस व्यक्ति ने अपने हाथ में छुरा नचाते हुए कहा।

वह व्यक्ति रविंद्रबाबू के किसी विरोधी द्वारा उकसाने और लालच देने पर विश्व की इस महान विभूति का अन्त करने के लिए आया था ताकि सूरज अस्त हो जाए और जुगनुओं को चमकने का अवसर मिले।

रविंद्रबाबू ने उस की ओर देखा, जैसे पुस्तक का कोई पन्ना देख रहें हों। न मन में भय न मृत्यु का डर। बहुत ही मधुर स्वर में उन्होंने कहा, तो ठीक है। परन्तु तुम जरा जल्दी अ गये। मुझे यह कविता पूरी कर लेने दो। तब तक आराम से बैठों।

‘मूर्ख-नहीं मैं’, यह गुर्राया, तब तक तुम्हारे सेवक इस बीच यहाँ एकाम चक्कर लगायेंगे ही और तुम अपनी रक्षा के लिए कोई उपाय कर लोगे।

हँसे रविंद्रबाबू! उनकी हँसी भी शाँत और निश्चल थी। फिर रुक कर उन्होंने कहा, ‘गलत समझे हो मित्र। इस समय सभी लोग सो चुके, आधी रात्रि बीतने जा रही है। जरा अनुमान तो लगाओ इस आधी रत में कौन मेरे पास आएगा।

फिर उन्होंने कहा, तुम्हें मेरी हत्या के लिए भेजा गया है। मैं नहीं चाहता कि तुम असुल होकर लौटो और मुझे मृत्यु का भी कोई भय नहीं है। परन्तु कठिनाई यह है कि इस समय मेरी यह रचना अधूरी पड़ी हुई है। इस समय तुम साक्षातकाल बने हुए हो। तु से इतना ही निवेदन करता हूँ कि थोड़ी देर प्रतीक्षा करों और रचना पूरी हो जाने दो।

विश्व कवि उसी प्रकार आकर्षित और वाणी में कहते जा रहे थे परंतु वह व्यक्ति समझ रहा था कि शायद रविंद्रबाबू मृत्यु से डर रहें है। इसलिए वह कड़क कर बोला, ‘मेरे पास समय नहीं है अपनी और इसी क्षण मुझे अपना काम करना है। अतः अपनी कलम नीचे रख दो और मरने के लिए तैयार हो जाओ,।

रवीन्द्र बाबू अब भी शाँत और संयत थे। हत्या के उद्देश्य से आये आगन्तुक को इस प्रकार समझा रहे थे, जैसे कोई हठी बच्चे को समझा रहा हो और कोई जब बार-बार समझाने पर भी नहीं समझता है तो उसे जिस तरह डपट दिया जाता है। उसी प्रकार रविंद्रबाबू ने उसे डप्टा, “चुप चाप बैठ जाओ। मुझे अपना काम करने दो’’।

धक्क रह गया हत्या के उद्देश्य से आया गुण्डा रविंद्रबाबू इतना कह कर चुप चाप अपने काम में लग गए। उनके इन शब्दों और मृत्यु की ओर से भी लापरवाही बेखबर रहते हुए अपने काम को प्राथमिकता देने वाले मनोबल ने हत्यारे को परास्त कर दिया।

यह कुछ ही क्षणों तक वहाँ ठहर सका था। बोला, ‘क्षमा कीजिए गुरुदेव! मैं आज एक जघन्य अपराध से बच गया। कहीं हाथ उठ जाता तो एक देव पुरुष से भारत ही नहीं समूचा विश्व शून्य हो जाता’ और वह जिस तरह आया था, उसी तरह चला गया।


क्रिया की प्रतिक्रिया का सुनिश्चित सिद्धान्त

भारतीय दर्शन में कर्मफल की सुनिश्चित पर बहुत जोर दिया गय है। यह एक ऐसी सच्चाई है, जिसे इच्छा या अनिच्छा से सभी को स्वीकार करना ही पड़ता है। भूतकाल के आधार पर वर्तमान बनता है एवं वर्तमान के अनुरूप भविष्य। किशोरावस्था में कमाई हुई विद्या एवं स्वास्थ्य सम्पदा, जवानी में सम्पन्नता एवं बलिष्ठता के रूप में सामने आती है। क्रिया की प्रतिक्रिया एक सुनिश्चित तथ्य हैं। कर्म क परिपाक भी वस्तुतः इसी प्रकार देर सवेर में मिलता अवश्य है। जो जीवन को अनन्त अविरल प्रवाह मानते हैं, वे जानते हैं कि जो शुभ-अशुभ कर्म किये जा रहे हैं, उनके परिणाम कालान्तर में अवश्य प्राप्त होंगे। वस्तुतः इस जीवन के कर्म ही स्वर्ग-नगर जैसी परिस्थितियों के तद्नुरूप पुनर्जन्म में सद्गति-दुर्गति मिलने या मरणोत्तर योनि में सुख-दुःख के कारण बनते हैं।

कर्मफल मिलने की सुनिश्चित एक अटल सत्य है। इसे झुठलाया नहीं जा सकता। इसका अनुमान इसीसे लगाया जा सकता है कि कर्म’ शब्द ऋग्वेद में 40 बार से अधिक प्रयुक्त हुआ हैं। इसका अर्थ कहीं कहीं पराक्रम या वीरोचित कार्यों से है तो कहीं-कही पर यह धार्मिक कृत्यों के लिए प्रयुक्त हुआ है। इसके अनुसार देवता मनुष्य के सत्कर्मों को ही स्वीकार करते हैं। सत्कर्म करने वालों के लिए ऋग्वेद (10/16/4) में अग्नि देव से प्रार्थना की गई है कि वह मृत व्यक्ति को उन लोगों के लोक में ले जायें जिन्होंने अच्छे कर्म किये हैं। ऐसे लोगों के लिए देवों से अमरत्व प्रदान करने के लिए प्रार्थना की गई है जो सतत् सत्कर्मों में निरत रहते हैं। वस्तुतः सत्कर्म ही है जो मनुष्य को ऊपर उठाता-अमरत्व प्रदान करता है। सत्कार्यों एवं दुष्कृत्यों में से जिनका पलड़ा भारी होता है, वे ही मनुष्य के भावी जीवन में अपने प्रतिफल स्वर्ग या नरक के रूप में प्रकट करते हैं। शतपथ ब्राह्मण (10/4/4/9-10) में स्पष्टोकित् है कि-’जो व्यक्ति इसे जानते हैं अर्थात् पवित्र कर्म करते हैं, वे पुनः मृत्यु के उपरान्त मानव जीवन पाते है। और इस जीवन में अमरत्व प्राप्त करते हैं किन्तु जो पवित्र कर्मों का सम्पादन नहीं करते वे मरने के बाद फिर से जीवन प्राप्त करने पर नाना विधि दुःख-कष्टों को भोगते और बार-बार जन्मते मरने रहते हैं।

मनुष्य अपने भाग्य का निर्माण स्वयं करता है। अपने कर्मों एवं आचरणों से ही वह अपने भविष्य को गढ़ता है। इसे स्पष्ट करते हुए बृहदारण्यक उपनिषद् में (4/4/5/7) कहा गय है-’मनुष्य की जैसी इच्छा होती है, वैसे ही उसके विचार बनते हैं। विचारों के अनुसार ही उसके कर्म होते हैं और कर्मों के अनुरूप ही वह प्रतिफल पाता है।” इस प्रकार यह एक सुनिश्चित तथ्य है कि मनुष्य जैसा सोचता और करता है, वह वैसा ही बन जाता है। छान्दोग्य उपनिषद् (3/14/1) में कहा गया है-मनुष्य का निर्माण उसके अपने विचारों के अनुसार ही होता है। क्षुद्रता या महानता का वरण मनुष्य अपनी विचार सम्पदा के आधार पर ही करता है। विचारों में अपार शक्ति है। यही वह सामर्थ्य है, जो व्यक्ति को निम्न परिस्थितियों से विकास की उच्चतम अवस्था में पहुँचाने में, नर से नारायण बनाने में समर्थ है। देवी भागवत (9/28/17/20) के अनुसार “जीव अपने शुभ कर्मों की सहायता से इन्द्र का पद प्राप्त कर सकता है वह ईश्वर भक्त बन सकता है और आवागमन के चक्कर से मुक्त हो सकता है, समस्त सिद्धियाँ प्राप्त करता हुआ अमरत्व की स्थिति तक पहुँच सकता हैं वह देवता, राजा, शिव आदि जो कुछ भी चाहे वही बन सकता है।” इस प्रकार विचार को बीज और कर्म को वृक्ष कहा जा सकता है। जैसे विचार होते हैं, वैसे ही प्रयास चल पड़ते हैं, तद्नुरूप भली-बुरी परिस्थितियाँ सामने आ खड़ी होती है।

तत्वज्ञानी जानते हैं कि जो भी दुःख या सुख के दृश्य हमारे सामने आ रहे हैं, उस प्रत्येक प्रतिबिम्ब के पीछे उसका कारण विद्यमान है। बिना कारण के कार्य संभव नहीं है। ईश्वर किसी का पक्षपात नहीं करता और नहीं किसी का विरोध करता हैं। न्याय और निष्पक्षता की रक्षा उसके लिए प्रधान है। कर्मफल की मर्यादा का उल्लंघन करके वह न तो किसी को क्षमा प्रदान करता है ओर न किसी के भक्त-अभक्त होने के नाम पर राग द्वेष की नीति अपनाता हैं सर्वतंत्र स्वतंत्र होते हुए भी उसने जो नियम व्यवस्था बनाये हैं, उसमें सर्व प्रथम अपने को बाँधा है, जहाँ विश्व ब्रह्माण्ड का कण-कण किसी विधान से बँधा है। उसी प्रकार ईश्वर भी मर्यादा पुरुषोत्तम है। मर्यादायें टूटने न पायें, उन्हें तोड़ने का कोई दुस्साहस न करें इसलिए उसने अपने को भी प्रतिबंधित किया है। देवी भागवत (4/2/7) में उल्लेख है-”ब्रह्मादि सभी इस नियम के वश में हैं इसी संसार का सुव्यवस्थित संचालन हो रहा हैं मनुष्य को सुख, शान्ति और शक्ति की प्राप्ति तभी सम्भव है जब वह नैतिक नियमों और ईश्वरीय मर्यादाओं का पालन करे।

“बुक आफ मेडिटेशन्स” नामक अपनी कृति में प्रसिद्ध अँग्रेज दार्शनिक जेम्स एलन ने ‘कर्म सिद्धान्त’ की विशर्छ व्याख्या की है। उनके अनुसार यह समग्र विश्व ब्रह्माण्ड न्याय व्यवस्था पर टिका हुआ है। और यही न्याय मानव जीवन और आचार का नियमन करता है। आज विश्व में विद्यमान जीवन की विभिन्न दशाएँ मानव आचार पर प्रतिक्रियाशील इसी नियम का परिणाम हैं। विवेकशील प्राणी होने के कारण सोचने, विचारने और कर्म करने की उसे पूर्ण स्वतंत्रता मिली हुई है, परन्तु उससे उत्पन्न परिणामों पर उसका कोई अधिकार नहीं है। इसका निर्णय नियामक सत्ता के हाथ में है क्रम करने का सम्पूर्ण अधिकार मनुष्य को है किन्तु कार्य के निष्पादन के साथ ही उसका अधिकार समाप्त हो जाता है। कार्य के परिणामों को न तो बदला जा सकता है और न ही उनका अंत किया अथवा उनसे बचा जा सकता है। यह एक अटल नियम है कि बुरे विचार और कार्य क्लेश की दुःख की परिस्थितियाँ उत्पन्न करते हैं जब कि सद्विचार और सत्कर्म सुखकारक अवस्थाओं का निर्माण करते हैं।

वस्तुतः यह संसार कर्मफल व्यवस्था के आधार पर चल रहा है। जो जैसा बोता है, वह वैसा काटता हैं। क्रिया की प्रतिक्रिया होती है। कर्म करलें और उसके फल से बचे रहें, यह नहीं हो सकता। नीला थोथा खा लेने पर उल्टी हुए बिना नहीं रहती। कच्चा पारा पेट में जाने पर वह शरीर से फूट कर अवश्य निकलेगा अथवा अपने विषाक्त प्रभाव से शारीरिक स्वास्थ्य को गड़बड़ायेगा ठीक इसी प्रकार कर्म भी अपने प्रतिफल निश्चित रूप से उत्पन्न करते हैं। यदि ऐसा न होता तो इस सृष्टि में घोर अन्धेरा छाया हुआ दीखता, तब कोई कुछ भी कर गुजरता और प्रतिफल की चिन्ता न करता। इसका प्रतिपादन करते हुए महाभारत (वन/207) में स्पष्ट कहा गया है-”मनुष्य जो कुछ शुभ या अशुभ कार्य करता है उसका फल उसे अवश्य भोगना पड़ता है। इसमें संशय नहीं। मार्कण्डेय पुराण, (कर्मफल), शिवपुराण, हरिवंश पुराण, (उग्रसेन अभि0 25) ब्रह्मपुराण, बाल्मीकि रामायण उपनिषदों एवं उनकी टीकाओं, वेदांत सूत्रों तथा भगवद् गीता आदि धर्म ग्रंथों में इस संदर्भ में सुस्पष्ट वर्णन मिलता है कि अपने किये हुए पाप अथवा पुण्य के फल मनुष्यों को अवश्य भोगने पड़ते हैं। इन्हें भोगे बिना कोई रास्ता नहीं, मुक्ति नहीं।

प्राच्य दर्शनविदों के अतिरिक्त कुछ पाश्चात्य विचारकों ने भी कर्मफल की सुनिश्चित विधि व्यवस्था में अपनी आस्था व्यक्त की है। प्लेटों इसमें सबसे अग्रणी हैं। प्रख्यात मनीषी पॉल ब्रण्घ्टन ने भी अपनी पुस्तक “हिडेन टीचिंग्स बियोन्ड योगा” में लिख है कि “कर्म नितान्त वैज्ञानिक नियम है। उनका कथन है कि दूसरे के प्रति हम जो कुछ करते हैं वह किसी न किसी समय किसी न किसी प्रकार हमें अवश्य लौटा दिया जाता है। अपने किये कर्मों का बदला हमें अवश्य मिलता है। जो हम देते है बदले में हमें वही मिलता है। सुप्रसिद्ध विद्वान डिक्सन ने अपनी कृति “रिलीजन एण्ड इम्मैरैलिटी” में कहा है-’वास्तव में यह संतोषप्रद भावना है कि हमारी वर्तमान समर्थताएँ हमारे पिछले जीवन के कार्यों द्वारा निर्धारित होती हैं और हमारी वर्तमान कर्म पुनः हमारे भावी जीवन चरित्र को निर्धारित करते है। “दी स्केल्स आफ कर्माज” नामक अपनी पुस्तक में मूर्धन्य मनीषी ओवेन रटर ने भी कर्मफल सिद्धान्त को स्वीकार किया है।

कर्मफल सिद्धान्त को अधिक स्पष्ट करते हुए भारतीय ऋषिगणों ने कर्म को तीन भागों में बाँटा है-संचित, क्रियमाण और प्रारब्ध। वह कर्म जो अभी फल नहीं दे रहे हैं बिना फलित हुए इकट्ठे हो जाते हैं, उनको संचित कर्म कहते हैं। कालान्तर में वे अपना फल प्रस्तुत करने के लिए फिक्स डिपॉजिट की तरह सुरक्षित रखे हुए हैं। पर समस्त संचित कर्म भी एक जैसे नहीं होते, न ही उनका फल एक मुश्त समय में मिलता हैं। विभिन्न प्रकार फल एक मुश्त समय में मिलता हैं। विभिन्न प्रकार के संचित कर्मों के पकने की अवधि अलग-अलग हो सकती है। इसी प्रकार जो कर्म वर्तमान में किये जाते हैं, वे क्रियमाण कहलाते हैं। संचित कर्मों में से जिनका विपाक हो जाता है अर्थात् जो पककर फल देने लगते हैं उनको प्रारब्ध कहते हैं जन्म के साथ अनायास भली बुरी परिस्थितियाँ लिए अथवा जीवन में अकस्मात उपलब्धियाँ लिए वे ही प्रकट होते हैं।

कर्मों की श्रृंखला इस प्रकार बनती है- क्रियमाण कर्म का अन्त संचित में हो जाता है और संचित में जो कर्म फल देने लगते है, उनको प्रारब्ध कहते हैं। इनमें से मनुष्य का अधिकार क्रियमाण कर्मों पर है। शेष दो उसकी ही उपलब्धियाँ हैं जिन पर उसका कोई अधिकार नहीं। इसे अधिक स्पष्ट करते हुए आद्य शंकराचार्य के अनन्य शिष्य पद्यपाद ने अपने ग्रंथ-”विज्ञान दीपिका” के श्लोक 5 एवं 7 में कहा है कि संचित कर्म की तुलना घर में रखे अन्नों स, क्रियमाणया संचीयमान कर्म की तुलना खेत में खड़े अन्नों से और प्रारब्ध कर्म की तुलना पेट में पड़े अन्नों से की जा सकती है। पेट में पड़ा भोजन पच जाता है, पर उसमें कुछ समय लगता है। संचित एवं क्रियमाण कर्म का नाश सम्यक ज्ञान से होता है किन्तु प्रारब्ध का नाश उसके फलों को भोगने के बाद ही समाप्त होता हैं उनके अनुसार कर्म विभिन्न प्रकार के होते हैं। और विभिन्न प्रकार के प्रतिफल उपस्थित करते हैं। सात्विक कर्मों से स्वर्ग, राजसिक कृत्यों से पृथ्वी या अन्तरिक्ष तथा तामसिक कर्मों से यातनाओं के स्थल प्राप्त होते है॥ वासनाओं का क्षय, कर्म तथा पुनर्जन्म की समर्पित का प्रमुख आधार उन्होंने तत्वज्ञान को बताया है। जो विवेक एवं वैराग्य द्वारा उपलब्ध होता है।

कर्मफल की सुनिश्चितता का तथ्य ऐसा है, जिसे अकाट्य ही समझना चाहिए। किये हुए भले-बुरे कर्म अपने परिणाम सुख-दुःख के रूप में प्रस्तुत करते रहते है। दुःखों से बचना हो तो दुष्कर्मों से पिण्ड छुड़ाना चाहिए। सुख पाने की अभिलाषा हो तो सत्कर्म बढ़ाने चाहिए। ईश्वर को नियामक तंत्र को प्रसन्न और रुष्ट करना सत्यकर्मी एवं दुष्कर्मों के आधार पर ही बन पड़ता है। यदि कर्म के सिद्धान्त का दर्शन समझा जा सकें तो मानव समुदाय में संव्याप्त ईर्ष्या, द्वेष व बुराईयों का अंत सुनिश्चित है। इस प्रकार जहाँ कर्मफल की मान्यता व्यक्तिगत चारित्रिक निर्माण के लिए जरूरी है वहाँ समाज व्यवस्था के लिए भी वह आवश्यक है। इसे दार्शनिक, धार्मिक और आध्यात्मिक स्तर पर जन साधारण को हृदयंगम कराया जाय तो इस निष्कर्ष पर पहुँचा जा सकता है कि भले बुरे कर्मों का आनंददायक एवं दुःखदायी प्रतिफल निश्चित रूप से मिलेगा, भले ही उसमें कुछ विलम्ब क्यों न हो जाय? पुनर्जन्म की मान्यता को कर्मफल सिद्धान्त के साथ इसीलिए जोड़ा गया है। मरणोत्तर जीवन के उपरान्त भी इस क्रम चक्र से छुटकारा नहीं मिलता और वहाँ भी वह क्रम चक्र से छुटकारा नहीं मिलता और वहाँ भी वह स्वर्ग-नरक की प्रतिक्रिया उत्पन्न करता हैं।

तुरन्त फल पाने में मनुष्य चतुरता के सहारे भी बच सकता है, पर अन्तःकरण में उनके जो रेखाँकन होते हैं वे ही कुछ समय उपरान्त फलित होने लगते हैं। बीज को वृक्ष बनने में जिस प्रकार थोड़ा समय लग जाता है उसी प्रकार कर्मफल की सुनिश्चितता पर आस्तिक जन सहज ही विश्वास कर सकते है।


ब्रह्मचर्य की सही परिभाषा

काम शक्ति का परिष्कार एवं ऊर्ध्वारोहण न केवल शारीरिक बलिष्ठता की दृष्टि से जरूरी, वरन् मानसिक प्रखरता के लिए भी अनिवार्य है। सृजनात्मकता एवं समस्त सफलताओं का मूलाधार भी यही हैं इसका आरीं इन्द्रिय संयम से होता है। किन्तु समापन ब्रह्म में एकाकार होकर होने के रूप में होता है। ब्रह्मचर्य की संयम-साधना दमन का नहीं, परिष्कार एवं ऊर्ध्वीकरण का मार्ग है। इसका सुंदरतम स्वरूप आदर्शों एवं सिद्धान्तों के प्रति प्रगाढ़ निष्ठा के रूप में दिखाई पड़ता है। इस तथ्य से अवगत होने पर जीवनी शक्ति का क्षरण रुकता है।

ब्रह्मचर्य का महत्व न समझने वाले व्यक्ति काम शक्ति का दुरुपयोग भोग लिप्सा-यौन लिप्सा में करते हैं। फलतः इसके दिव्य अनुदानों का लाभ, जो श्रेष्ठ विचारों- उदात्तभाव-संवेदनाओं के रूप में मिलता हैं, उसे नहीं उठा पाते। अद्भुत सृजनशक्ति आधार क्षणिक इन्द्रिय सुखों के आवेश में नष्ट होकर मनुष्य की प्रगति को रोक देता है। इससे वह अपने पूर्व संचित तथा अब की उपार्जित क्षमताओं को भी गँवा बैठता है, साथ ही दुरुपयोग का दुष्परिणाम भी भुगतता है। कामुक लोगों यौन स्वेच्छाचारियों को एड्स क्षय जैसे प्राणघातक बीमारियों से ग्रसित होकर बेमौत मरते देखा जाता है शारीरिक काम सेवन से धातु क्षय की हानि तो होती है, उससे भी बड़ी हानि मानसिक व्यभिचार से होती है, उससे भी बड़ी हानि मानसिक व्यभिचार में होती है। उसमें ओजस् ही नहीं मनस् भी क्षीण होता है और व्यक्ति संकल्प, साहस और मनोबल भी गँवा बैठता है। ऐसे व्यक्ति हर दृष्टि से खोखले हो जाते हैं।

अध्यात्मवेत्ता ऋषि-मनीषियों का युगों- युगों से यह शिक्षण रहा है कि मनुष्य यदि इस अदूरदर्शी क्षरण को रोक सके तो उस बचत से इतना बड़ा भंडार जमा हो सकता है जिसके बलबूते विपुल विभूतियों का अधिपति बन सकें। अथर्ववेद की ऋचा 1/5/19 में कहा है-कि ब्रह्मचर्य द्वारा मृत्यु पर भी विजय प्राप्त की जा सकती है। इस प्रतिपादन में तथ्य यह है कि उसे बहुत समय के लिए टाला जा सकता हैं हनुमान, भीष्म, शंकराचार्य, स्वामी दयानंद, विवेकानंद आदि इसी के उदाहरण है।

यह एक तथ्य है कि ऋषियों और मनीषियों में से अधिकाँश संयमी ब्रह्मचारी रहें है, परिणाम स्वरूप उनकी क्षमता, प्रतिभा, प्रखरता एवं भाव संवेदनाएं भी बढ़ी चढ़ी रही हैं। रामकृष्ण परमहंस एवं जापान के गाँधी का गावा के ऐसे उदाहरण है। दो सांडों के टकराव को रोकने के लिए दयानन्द सरस्वती ने उन दोनों के सींग पकड़ कर मरोड़ और धकेल कर दूर पटक दिये थे। अपनी संयम शक्ति के बल पर ही उन्होंने एक राजा की बग्घी रोक कर दिखाई थी। शिवाजी को उनकी संयम साधना एवं पात्रता क आधार पर ही भवानी तलवार हस्तगत हुई थी। आद्य शंकराचार्य, विवेकानन्द, समर्थ गुरुरामदास, विनोबा आदि महापुरुषों की प्रतिभाओं का मूल स्त्रोत उनकी संयम शक्ति थी। निश्चय ही ब्रह्मचर्य की शक्ति महान है। घेरण्ड संहिता में शिव का वचन है- “बिन्दु को सिद्ध कर लेने पर इस धरती काी कोई सिद्धि ऐसी नहीं जो प्राप्त न हो सकें।”

ब्रह्मचर्य का पूर्ण परिपालन कैसे निभे? क्या अविवाहित रहना ही ब्रह्मचर्य है? आदि प्रश्नों की गहराई में उतरने पर स्पष्ट होता है कि इसकी गहराई में उतरने पर स्पष्ट होता है कि इसकी प्रधान भूमिका मानसिक है। अन्यथा कितने ही विवाहित लोग पूर्ण संयमी रहते और दीर्घ जीवन क आनंद उठाते है। इसके विपरीत तथा कथित अविवाहित ब्रह्मचारी, साधु-संन्यासी खोखले, निस्तेज दीखते और नाना प्रकार की आधि व्याधियों से घिरे असंयम दम तोड़ते देखे जाते हैं। वस्तुतः वीर्य रक्षा का लाभ उन्हें ही मिल पाता है जो अश्लील -चिन्तक-कामुक-आचरण से अपने मन-मस्तिष्क का बचाये रखते हैं। मन, वचन, कर्म से इन्द्रिय-निग्रह ही “ब्रह्मचर्य” है।


भावाभिव्यक्ति का अनुदान सभी को प्रदत्त

भाषा भगवान ने सब जीवधारियों को नहीं दी है, पर भाव सबको दिये है। सुख, दुःख, भय आशंका, प्रसन्नता, आशा जैसे भले बुरे अवसर परिस्थितिवश सभी के समाने आते रहते है। इसमें मनुष्य ही नहीं पशु पक्षी भी सम्मिलित है। अपनी भाव-संवेदनाओं को वे शारीरिक हलचल अथवा विभिन्न संकेतों के आधार पर प्रकट करते है। जीव-जन्तुओं की सामर्थ्य को परखा तथा उनकी साँकेतिक भाषा को समझा जा सकें तो उनके प्रशिक्षण में इससे काफी सहायता मिल सकती हैं।

भावाभिव्यक्ति एवं बातचीत की कला में मनुष्य विशेष रूप से दक्ष है। भाषा उसे विरासत के रूप में अपने पूर्वजों से मिली है। बच्चे को भाषा ज्ञान विशेष रूप से नहीं कराना पड़ता। परिवार के लोगों के संपर्क से ही वह सीख लेता है। हिन्दी भाषी परिवारों के बालक हिन्दी, अँग्रेजी भाषी परिवारों के बच्चे अँग्रेजी तथा अन्य भाषी परिवारों के बच्चे पैतृक भाषा सहज ही सीख लेते है। यदि जन्म दाता गूँगे-बहरे हो तथा बालक को समाज का संपर्क न मिले तो वह बोलना भी नहीं सीख सकेगा। देखा जाता है कि जो बच्चे सुन नहीं पाते वे बोल भी नहीं पाते और अंततः गूँगे हो जाते हैं। भाषा की जानकारी उन तक नहीं पहुँच पाती। संकेतों के आधार पर ऐसे बालक किसी तरह अपना काम चलाते हैं।

मानवेत्तर प्राणियों के पास भी भाषा की कोई विरासत नहीं है, पर वे वार्तालाप गूँगे व्यक्तियों की तरह साँकेतिक आधारों पर करते है। द्रष्टा ने उन्हें ऐसी क्षमता प्रदान की है जिनके आधार पर वे विभिन्न प्रकार की सूचनाएँ देने के लिए विभिन्न तरह की ध्वनियाँ उत्पन्न करते है। चिड़िया खतरे की सूचना देने के लिए एक तरह की तथा प्रसन्नता अभिव्यक्ति में दूसरे तरह की आवाज करती हैं। कुत्ते के भौंकने में वार्तालाप छिपा होता है। जिसका प्रत्युत्तर कुत्ते उसी भाषा में देते है। वाद्य की अपनी विशिष्ट भाषा होती हैं। बन्दर अपनी इच्छा को ध्वनियों में एवं अभिव्यक्तियों से दर्शाते है। चिंपेंजी मुस्कराकर, टिड्डे अपने संगीत द्वारा तथा कीट-पतंगे अपने रंगों के माध्यम से भावाभिव्यक्ति करते हैं। पक्षियों में तोता, मैना आदि को प्रशिक्षित करने पर तो उन्हें मानवी भाषा को भी दोहराते नकल उतारते देखा जाता है। कोयल की कूक जहाँ अपनी जाति वालों को बुलावा देती है। वहीं एक विशेष आवाज में चेतावनी भी देती है।

जिन्हें जीभ मिली ही नहीं, उनकी बात दूसरी है। वे अपना मन मसोस कर रह जाते हैं। अथवा अपने समूचे शरीर की छटपटाहट से अपनी पीड़ा का परिचय देते हैं। उदाहरण के लिए मछलियाँ प्रसन्न होने पर क्रीड़ा कल्लोल करने लगती है। जब उन्हें पानी से निकाल कर जाल में एकत्र किया जाता है तो उनकी छटपटाहट प्रत्येक भावनाशील क हृदय हिला देती है। मछलियाँ गंध के माध्यम से भी अपनी संवाद संप्रेषण प्रक्रिया पूरी करती हैं।

पशु पक्षियों को जीभ मिली है। वे उसके माध्यम से अपने भाव प्रकट करते रहते है। उनके साथी-सहयोगी उस शब्दावली के माध्यम से यह अनुमान लगा लेते हैं कि उन पर क्या बीत रही है और अपनी अनुभूतियों को साथियों पर कोई कैसे प्रकट करना चाहता है? यद्यपि अभी तक ऐसा नियमित शब्दकोष नहीं नहीं बना है कि किस प्राणी को अपने मनोभाव दूसरों पर प्रकट करने के लिए किस शब्दावली का प्रयोग करना पड़ता है।

जर्मनी के म्यूनिख विश्वविद्यालय के मूर्धन्य प्राणिशास्त्री डाँ. लारेन्स ने हंसो पर गहन अध्ययन किया और पा है कि उनमें विवाह आदि का सामाजिक स्वरूप होता है तथा स्नेह भरा दाम्पत्य जीवन और साथी के मर जाने या बिछुड़ने पर वे मानवीय विरह-व्यथा, संवेदनाएँ व्यक्त करते हैं तथा ब्रह्मचर्ययुक्त जीवन व्यतीत करते है। हंस एवं अधिकाँश अन्य प्राणी विभिन्न प्रकार की ध्वनियों के द्वारा अपने भावों को अभिव्यक्त करते हैं। वैज्ञानिक भाषा में इसे रिलीजर मैकेनिज्म कहते हैं हंसो में लम्बी गर्दन के कारण उसे विभिन्न प्रकार से मरोड़ने की सैकड़ों मुद्रायें पायी जाती हैं जो कि उनकी भाषा के संकेत है। डाँ. लारेन्स के इन अध्ययनों से मानव व्यवहार विज्ञान को नये आयाम मिले हैं।

वे कहते हैं कि टूटी-फूटी जैसी भी उनकी भाषा है, इसके आधार पर वे अपनी जाति वालों के साथ तो विचार विनिमय करते ही हैं, उनकी इस भाषा को और भी अधिक विकसित किया जा सकता है। इस विकास के आधार पर मनुष्य के साथ अन्य प्राणियों के विचार विनिमय का द्वार भी खुल सकता है।

“चिम्पेंजी इंटेलीजेन्स एण्ड इट्स वोकल एक्सप्रेशन” नामक पुस्तक में लोक द्वैय श्री ईयर्कस और श्रीमती लर्नेड ने चिम्पेंजी बन्दरों की लगभग 30 ध्वनियों को संगृहीत और विश्लेषित करके एक प्रकार से उनका भाषा विज्ञान ही रच दिया है। इसी प्रकार प्राणि विशेषज्ञ हरमन फ्रेबुर्ग ने अपनी पुस्तक “एडवेंचर ऑफ अफ्रीका” में ऐसे अनेकों संस्मरण लिखे हैं जिसमें गोरिल्ला और मनुष्य के बची बात-चीत, भावों का आदान प्रदान ओर सहयोग संघर्ष का परिचय मिलता है उनके अनुसार बन्दरों की भाव भंगिमा, उनकी मनःस्थिति को अच्छी तरह प्रकट करती है। यदि गंभीरता से उनके चेहरे पर दृष्टि जमाई जाय तो सहज ही पता चल जायगा कि वह इस समय किस मूड में है। उसके डराने प्रसन्न होने, क्रोध करने, स्वयं डरने, थक जाने, दुःख व्यक्त करने, साथियों को बुलाने आदि के स्वर ही नहीं, भाव भी होते है। जिन्हें आसानी से पहचाना जा सकता है।

भावना अन्तःकरण की भाषा है। वह प्रकट हुए बिना नहीं रहती। कोई प्राणी घुटन में आबद्ध नहीं रहना चाहता। अपने व्यक्तित्व का परिचय देने और भावों को प्रकट करने की इच्छा उन सभी प्राणियों में होती है जिन्हें जिव्हा मिली है। भले ही वह मनुष्य की तरह क्रमबद्ध रूप से वार्तालाप न कर सकें किन्तु अपने भावों को तो किसी न किसी रूप से प्रकट कर ही देते है। उदाहरण के लिए मनुष्य की तरह प्रकृति के परिन्दों में भी न केवल उन्नत श्रेणी के वरन् विलक्षण अभिव्यक्ति ओर भंगिमाओं भरे नृत्य की परम्परा पाई जाती है। मोर इस कला में बादशाह माना जाता है। ध्रुव प्रदेश में पाये जाने वाले पेंगुइन पक्षियों के विवाह नृत्य का ‘एक्शनसाँग’ देखने ही बनता है। भाव प्रदर्शन में ये प्राणी मनुष्यों को भी पीछे छोड़ देते हैं।

बाज, गोह, बिल्ली, साँप, आदि किसी आक्रामक जानवर की निकटता अनुभव करते ही पली इकट्ठा होकर चहचहाने लगते हैं। इसके कई उद्देश्य होते हे। एक तो सब साथियों को एक होकर संगठित होकर दूसरों के साथ मिलकर शोर मचाने चाहिए जिससे शत्रु यह न समझ कि वे एकाकी हैं, इसलिए हमला किया जा सकता है। दूसरा यह कि सभी पर्वती क्षेत्र में उस समुदाय की कोई और बिरादरी हो तो वह भी सचेत हो जाय। बचने का उपाय कर ले।

प्रसन्नता के अवसर पर भौंरे, कोकिला, मोर आदि अपनी विशेष वाणी बोलते हैं। उन शब्दों का मानवी भाषा में रूपांतरण तो नहीं किया जा सकता पर इतना आसानी से जाना जा सकता है कि यह पक्षी अपनी वर्तमान परिस्थितियों से प्रसन्न हैं।

हर प्राणी की भाव भंगिमा मनुष्य से मिलती जुलती हैं शब्द न पहचाने जा सकें तो आकृति, भाव भँगिमा देखकर यह अनुमान लगाया जा सकता है कि कौन प्राणी अपनी क्या भाव संवेदना व्यक्त करना या विचार विनिमय करना चाहता है। यदि इसे समझा और उन्हें सिखाया जाय तो वे न केवल मनुष्य के साथ हिल मिल सकते हैं वरन् एक जाति का दूसरी जाति वाले अन्य जीवों के साथ व्यवहार संपर्क और अधिक बढ़ाया जा सकता है। हम सब समष्टि के घटक है। यह सहयोगी आदान प्रदान हमें परस्पर निकट तो लायेगा ही, यह भी प्रमाणित करेगा कि सभी जीवों में परमसत्ता समान रूप से विद्यमान है। जीवों के साथ एकता का सन्देश यदि मानव मानव में ही संव्याप्त हो सके तो मानवी गरिमा को चार चाँद लग जायेंगे।


मानवता का भविष्य निश्चित ही उज्ज्वल है!

मनुष्य स्वभाव की भी अजीब बनावट है। उपलब्ध सुविधाओं, सम्पदाओं और सफलताओं को नगद गिनता है और उन्हें उपेक्षा विस्मृति में डालता रहता है। अभावों, असुविधाओं, असफलताओं और आशंकाओं की खिन्नता सवार रहती है। कम ही लोग अपनी स्थिति में सन्तुष्ट और भविष्य के लिए आशान्वित देखे जाते हैं। अधिकाँश को चिंतायें शिकायतें ही बनी रहती हैं और अगले दिनों किन्हीं अनिष्टों के होने की भयभीत करने वाली कल्पना उठती रहती है। पर्यवेक्षण करने पर चिन्तातुर भयभीत और आशंकित लोग ही अधिक देखे जाते है। उपकारों का समूह याद ही नहीं रहता और छोटे से अपकारों के कारण उत्पन्न हुआ आक्रोश मस्तिष्क पर सवार रहता है।

यों सही चिन्तन अपनाकर इस तरह भी सोचा जा सकता था-कि जब सृजनात्मक सफलताओं के आधार पर मानवी प्रगति का सिलसिला अब तक चलता आया है तो प्रस्तुत कुछेक कठिनाइयों से साहस और विवेक का आश्रय लेकर क्यों सामना न किया जा सकेगा? समस्याओं का सुलझाना, कठिनाइयों को निरस्त करना और अवरोधों को उलटना क्यों संभव न होगा? मनोबल बढ़ने और उज्ज्वल भविष्य के आधार प्रस्तुत कर सकने वाले जब अनेकों तथ्य देखे और ढूंढ़े जा सकते है। तो निराश क्यों हुआ जाय? आशंकित और आतंकित क्यों रहा जाय? निषिद्ध चिन्तन के फेर में साहस और उत्साह क्यों गँवाया जाय? मिलजुल कर सृजन प्रयोजनों के निमित्त क्यों न सोचा जाय? जो उपयुक्त लगे उसे कर गुजरने का योजनाबद्ध उपक्रम क्यों न बनाया जाय? यदि सही स्तर का चिन्तन अपनाने की आदत रही होती तो निराश होकर मनोबल गँवाने और कल्पित उलझनों में सचमुच ही उलझ जाने से क्यों न बच सका गया होता?

इस मनोवैज्ञानिक भूल को इन दिनों बढ़ी-चढ़ी स्थिति में देखा जा सकता है। यों वे सर्वथा काल्पनिक भी नहीं उनके पीछे तथ्य भी हैं, पर ऐसे नहीं जिनके कारण विनाश के अतिरिक्त और कुछ सूझ ही न पड़। प्रदूषण विकिरण युद्धोन्माद अतिवादी औद्योगीकरण, भोगवाद की लिप्सा, जनसंख्या विस्फोट, खनिज का असाधारण दोहन वनसम्पदा का उन्मूलन, प्रकृति असंतुलन जैसे अनेक कारण ऐसे है जिन पर जितनी गहराई से विचार किया जाय उतनी भयभीत करने वाली आशंकायें बढ़ती है। फिर मनुष्य का वैयक्तिक ओर सामूहिक चिन्तन, चरित्र और व्यवहार ऐसा है जिनके कारण अवांछनीयता बढ़ती जाने की सहज संभावना मन में उतरती है। नशेबाजी जैसा दुर्व्यसन किस प्रकार मनुष्य को खोखला कर रहे है, आंखों के सामने है। दांपत्य जीवन की मर्यादाओं का उल्लंघन, व्यभिचार और उसके कारण परिवार संस्था का भावी संतति का पराभव सामने है। आर्थिक क्षेत्र का भ्रष्टाचार अपनी चरम सीमा पर है। पदार्थों में मिलावट दफ्तरों में रिश्वत, वस्तुओं की महँगाई विलासिता जन्य फिजूलखर्ची बढ़ते हुये अपराध यदि एक पंक्ति में रखकर देखे जायें तो उनका समुच्चय इतना बड़ा बन जाता है। कि जनमानस का भयभीत एवं निराश हो जाना स्वाभाविक है। यों सोचने का दूसरा पक्ष भी है कि मनुष्य ने पिछले ही दिनों जब इतनी बड़ी राजनैतिक-क्रान्तियाँ सम्पन्न की है, तो उसी पराक्रम को जिस दिन प्रस्तुत विपन्नता को हटाने में जुटा दिया जायेगा तो अभीष्ट परिवर्तन क्यों सम्पन्न न होगा? राज सिंहासन, सामन्ती गढ़ दासप्रथा आदि की चिर पुरातन अवांछनियतायें देखते-देखते धराशायी हो गई तो वर्तमान विषमताओं से क्यों नहीं जूझा जा सकेगा? पर इस प्रकार का विधेयात्मक चिन्तन करने वाले कितने है? अधिकाँश तो अशुभ चिन्तन में ही निरत देखे जाते है। उन्हें भविष्य अन्धकारमय ही दीखता है।

स्पष्ट है कि बलों में सबसे बड़ा बल मनोबल-आत्मबल है। उसकी तुलना में साधनबल, बुद्धिबल कौशल, साहस आदि की सभी क्षमतायें हल्की पड़ती है। सृजन या सुधार प्रयोजनों के लिए प्रतिभावानों का संगठित मनोबल उभारना आवश्यक है। इतना बन पड़े तो जो अनुपलब्ध है उसे जुटाया जा सकता है। अभावों अवरोधों को रिक्त किया जा सकता है। पर यदि मनोबल टूटने लगे तो समझना चाहिए कि अच्छा खासा व्यक्ति अपंग हो गया। उसके बूते कुछ करते धरते नहीं बन पड़ेगा वरन् दुर्भाग्य और विनाश की बात सोचते सोचते अपने आपके लिए भार बन जायेगा। संपर्क में आने वाले दूसरों को भी अस्तव्यस्त करेगा। इस प्रकार वह स्वयं ही एक विपत्ति बनकर वातावरण में चेतनात्मक प्रदूषण की भरमार करेगा।

पिछले दिनों कई भूले हुई हैं और उनमें से कितनी ही अभी विद्यमान हैं पर उनसे निबटने का तरीका तो एक ही है कि साहस पूर्वक औचित्य का पक्ष लिया जाय। अनौचित्य को बुहार फेंका जाय इसके लिए सर्वप्रथम आवश्यकता इस बत की है कि जन साधारण का मनोबल बढ़ाया जाय उसे सही रीति से सोचने का अभ्यास कराया जाय। उज्ज्वल भविष्य की संभावनाओं से आश्वस्त कराया जाय। यह परिवर्तन बन पड़ने पर समझना चाहिए कि अन्य परिवर्तनों का सिलसिला स्वयं चल पड़ेगा ओर द्रुत गति से नव सृजन की दिशा में आगे बढ़ेगा, अभीष्ट परिवर्तन के सुयोग का सृजन करेगा।

इतिहास के कुछ पृष्ठ खोजने पर ऐसे तथ्य सामने आते है। जिनमें लोकमानस में प्रगति का पक्षधर उल्लास भर देते पर ऐसे कार्य बन पड़े जिन्हें चमत्कार स्तर का कहा जा सकता है। बुद्ध गाँधी दयानन्द, विवेकानन्द आदि लोक चिन्तन को झकझोर कर उल्टे प्रवाह को उलट कर सीधा किया था। नेपोलियन, मार्टिनलूथर, जोन ऑफ आर्क कार्लमार्क्स, लेनिन आदि ने किस प्रकार लोक चेतना को अपने पक्ष में मोड़कर कितनी बड़ी सफलतायें पाई थीं, इसे कौन नहीं जानता?

इन दिनों अपने देश को, विश्व को जहाँ अन्यान्य सृजन प्रयोजनों की आवश्यकता है। वहाँ लोक मानस में आशा जगाने और साहस उभरने की मनोवैज्ञानिक मुहीम भी चलाई जानी चाहिए। जिसमें एक कार्य तो शिकायतों का सिलसिला इस सीमा तक न बढ़ने देने की बात है जो जनता को निराशा के गर्त तक न पहुँचने दे। दूसरी ओर यह भी भरना है कि उज्ज्वल भविष्य की संभावनाओँ की दिशा में इतना उत्साह जगाया जाय कि जीत में भागीदार बनने के लिए हर किसी का मन ललकने लगे। आशा प्रदीप्त हो तो मनुष्य अपनी सामान्य सामर्थ्य की तुलना में चौगुना सौगुना काम कर लेता है। मनुष्य शक्तियों का भण्डार है पर वे प्रसुप्त स्थिति में पड़ी रहती हैं यदि उन्हें आशा, उमंग और उत्साह साहस देकर जगाया जा सके तो उसका व्यक्तित्व और कर्तृत्व ऐसा बन पड़ता है जो असंभव को संभव करके दिखा सके।

भारत को आज ऐसे ही उल्लसित मनोबल की आवश्यकता है। उसे जुटाया जा सके तो निराशा की काली घटाओं को आँधी बन कर हटाया जा सकता है। सृजन के क्षेत्र में जो अनेकानेक कार्य करने को पड़े है, उन्हें यदि बिठाया जा सके तो जापान आदि जिन देशों ने युद्ध देशों ने युद्ध की बर्बादी के बाद सब कुछ संभालने में शक्ति झोंक दी थी और क्षति की खाई को समतल कर लिया था उसी प्रकार भारत का भी कायाकल्प हो सकता है।

इस संदर्भ में शान्तिकुँज ने एक नया नारा दिया है-’ इक्कीसवीं सदी बनाम उज्ज्वल भविष्य। इसका तात्पर्य है कि अगली शताब्दी हर दृष्टि से सुखद संभावनाओं, सफलताओं और प्रगति प्रयोजनों से भरी-पूरी होंगी। इस कथन के पीछे अनेकों तथ्य भी है। विभिन्न क्षेत्रों के मूर्धन्य आकलनकर्ता स्थिति का पर्यवेक्षण करते हुए उनकी प्रतिक्रिया का अनुमान लगाते हुए यह कहते है कि अगली शताब्दी अब की अपेक्षा कहीं अधिक सुखद संभावनाओं से भरी है। आध्यात्मवादी, दिव्यदर्शी भविष्य वक्ताओं का कथन भी यही है। शान्तिकुँज के प्रेरणा स्रोतों ने इस प्रतिपादन को और भी अधिक विश्वास-पूर्वक प्रतिदान, समर्थन दिया है। प्रस्तुत समय का मनोवैज्ञानिक उपचार इस आन्दोलन का पूरा पूरा समर्थन करता है। आवश्यकता उसके निमित्त जुड़ने व श्रेय अर्जित करने भर की है।


सामूहिक धर्मानुष्ठानों की बारह वर्षीय श्रृंखला

असुरता के दमन और सतयुगी रामराज्य के और संस्थापन की संधिवेला में भगवान राम द्वारा दशाश्व-मेध महायज्ञों की एक श्रृंखला बनायी थी। उसमें जहाँ आमन्त्रित विज्ञ समाज को नव निर्माण की योजना में सहभागी बनाना था, वहाँ एक प्रयोजन यह भी था कि उस प्रचंड धर्मानुष्ठान द्वारा अदृश्य आकाश में भरे पिछले दिनों के अनौचित्य का प्रवाह निरस्त किया जाय।

भगवान कृष्ण को अपने अवतरण काल में सर्वत्र छाई हुई अनाचारी आपा-धापी को निरस्त करना था। इसके लिए महाभारत रचा गया। जीतने पर भी एक बात शेष रही कि पिछले दिनों के संव्याप्त अनाचार को अदृश्य वातावरण में से किस प्रकार बुहार फेंका जाय। इसके लिए राजसूर्य यज्ञ रचाया गया। देश-देशान्तरों से आमन्त्रित विज्ञजनों के परामर्श से यह निर्धारण किया गया कि नव सृजन के लिए कौन क्या योगदान दे? सुनियोजित योजनाओं को किस प्रकार कार्यान्वित किया जाय। साथ ही उतना आवश्यक अदृश्य आकाश का परिमार्जन भी समझा गया। उसके निमित्त राजसूर्य यज्ञ की आध्यात्मिक ऊर्जा-उत्पन्न करने वाली प्रक्रिया अपनायी गयी।

सामूहिक शक्ति उत्पन्न करने और उसे दुरितों के निवारण और श्रेयस् के संवर्धन हेतु प्रयुक्त किया जाता रहा है। विश्वामित्र का महान यज्ञ इसी निमित्त था, जिसके लिए राम और लक्ष्मण को रक्षा हेतु कटिबद्ध रहना पड़ा।

सूक्ष्म स्तर के विश्व व्यवस्था से जुड़े हुए धर्मानुष्ठान सदा सामूहिक ही होते रहे है। कितने धर्मानुष्ठान तो निजी स्तर के भौतिक या आध्यात्मिक लाभ के लिए किये जाते है। पर जब उन्हें व्यापक प्रयोजनों के लिए प्रयुक्त करना होता है तो सामूहिक साधना की ही व्यवस्था करनी पड़ती है। कुंभ पर्व जैसे ज्ञान यज्ञ इसी निमित्त आरम्भ किये गये थे कि उस अवसर पर धर्मानुष्ठान चलें और उससे लोक शिक्षण एवं अदृश्य संशोधन के दोनों ही कार्य सम्पन्न होते रहें। पर्व स्नानों के विशेष अवसरों पर तीर्थ समारोहों की परम्परा भी इस प्रयोजन के लिए प्रयुक्त होती रही है। तीर्थों में ऐसा ही धर्मानुष्ठानों का क्रम चलते रहने के कारण उनकी गरिमा समझी जाती रही है। आज तो हर क्षेत्र में विकृतियों का ही साम्राज्य छाया हुआ है, पर भूतकाल में जब अध्यात्म को विज्ञान के समकक्ष प्रामाणिक माना जाता था तब सामूहिक अनुष्ठानों का महान महत्व और प्रभाव सर्वत्र स्वीकारा जाता था। उस हेतु समय-समय पर, स्थान-स्थान पर अभीष्ट आयोजन होते रहते थे।

फैली हुई दुर्गन्ध का शमन सुगंधित द्रव्य जलाकर या धूप आग के सहारे उससे निबटा जाता है। लाठी का जवाब लाठी, घूँसे का जवाब घूँसे के रूप में दिये जाने की मान्यता है। अंधेरे में प्रकाश जलाकर काम चलाया जाता है। यह प्रतिरोध प्रक्रिया है जो सर्वत्र काम में लायी जाती है। विषाणुओं का दमन औषधियों द्वारा करके रोगी को निरोग बनाया जाता है। भारी वजन की वस्तुएँ मिल जुलकर ही उठायी जाती है। सैन्य समुदाय ही अपनी सुसज्जित संगठित शक्ति से शत्रु का मुँह मोड़ सकने में समर्थ होते है। मेले ठेले में कितना उत्साह उमड़ता और मौज मस्ती का माहौल बनता है। यह सामूहिक जनशक्ति की ही सामर्थ्यवान प्रतिक्रिया है। राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक संस्थाएँ अपने अपने वार्षिकोत्सव समारोह करती रहती हैं। उनसे लोक शिक्षण और उत्साह उभारने का प्रत्यक्ष उद्देश्य तो पूरा होता है पर यह नहीं बन पड़ता कि उनके साथ कुछ धर्मानुष्ठान भी सम्मिलित रखे और उन पुण्य प्रयोजन के साथ किसी न किसी रूप में उपस्थित जन समुदाय को भी सम्मिलित करें। यदि ऐसा बन पड़ा होता तो उससे मात्र लोक शिक्षण ही पूरा न होता वरन् अदृश्य वातावरण में भी सत्प्रवाह प्रचलित कर सकने का दुहरा लाभ उपलब्ध होता। प्राचीन काल में तीर्थ स्थलों में ऐसी ही दिव्य साधनाएँ होती रही है और उस पुण्य क्षेत्र में अपनी भागीदारी जोड़ने के लिए तीर्थयात्री यही प्रायोजन लेकर वहाँ पहुँचते है। प्रकृति दर्शन और उच्चस्तरीय सत्संग का लाभ तो उन्हें साथ-साथ मिलता ही रहता था अब वे तीर्थ आयोजन भी धार्मिक मेला भर बनकर रह गये है। स्नान और देवदर्शन भर की दो क्रियायें ही वहाँ पूरी हो पाती है। इसे सुधारा और पुरातन स्तर पर लाया जाना चाहिए। उससे उभयपक्षीय प्रयोजन पूरे होंगे।

सन 57 में मथुरा में सहस्र कुण्डी गायत्री यज्ञ सम्पन्न हुआ था। उसमें प्रायः चार लाख धर्मप्रेमी एकत्रित हुए थे। अदृश्य वातावरण को सदाशयता के पक्ष में प्रभावित एवं प्रवाहित करने के लिए जहाँ समय आध्यात्मिक प्रयोग सम्पन्न हुआ, वहाँ एक प्रत्यक्ष प्रक्रिया भी सम्पन्न हुई-गायत्री परिवार के अभिनव शुभारम्भ की। नैतिक, बौद्धिक और सामाजिक क्रान्ति का शंखनाद उसी अवसर पर हुआ और सर्वत्र सत्प्रवृत्ति उन्मूलन के जाति महत्वपूर्ण कार्यक्रम सुनियोजित रूप से चलने लगा।

इसके उपरान्त गायत्री शक्ति पीठों की स्थापना के साथ क्षेत्रीय गायत्री यज्ञों की श्रृंखला चलती रही इसका अन्तरिक्ष पर कितना प्रभाव पड़ा होगा, इसका प्रत्यक्ष प्रमाण तो प्रस्तुत नहीं किया जा सकता पर यह देखा गया कि लोकशिक्षण के प्रयास ने चमत्कार दिखाया और हजारों व्यक्ति अपने-अपने कार्यक्षेत्र में समयदान, अंशदान नियोजित करते हुए सृजनात्मक एवं सुधारात्मक कार्यक्रम में निरत रहने लगे।

अन्याय छोटे बड़े आध्यात्मिक एवं सामूहिक प्रयासों की चर्चा करना यहाँ अनावश्यक होगा पर इतना कहा जा सकता है कि इन दो वर्षों में दीपयज्ञों की श्रृंखला ने अतीव सस्ता और नितान्त सरल संगठन कार्यक्रम धर्म चेतना वाले जन साधारण को दिया है। उसमें साथ, लाखों लोग जुड़े है और प्रस्तुत धर्म चेतना के सहारे आत्म परिष्कार और नये सृजन प्रयोजनों में लगे भावनाशील लोगों की संख्या एक करोड़ तक जा पहुँची है।

अब उन पिछले चरणों से कही अधिक महत्व का और कहीं अधिक व्यापक चरण है-”युग संधि महा पुरश्चरण का”। यह विगत आश्विन नवरात्रि से आरम्भ हुआ है और सन् 2000 ही चैत्र. नव रात्रि तक चलेगा। इक्कीसवीं सदी के आरम्भ में ही वे लक्षण प्रकट होने की आशा और संभावना है जिनसे यह अनुमान लगाया जा सके कि उज्ज्वल भविष्य के लक्षण ब्रह्ममुहूर्त में प्रकट होने वाले अरुणोदय की तरह परिलक्षित होने लगेंगे।

बीसवीं सदी के अन्तिम बारह वर्ष कई दृष्टियों से कठिनाइयों से भरे माने जाते हैं। इतने पर यह विश्वास करने का कारण है कि असंख्यजनों की प्रसुप्त दिव्य चेतना जागेगी और वह प्रस्तुत व्यवधानों को निरस्त करने से लेकर स्वर्णिम संभावनाओं के अवतरण हेतु अग्रसर होगी और अपने पराक्रम से ऐसा कुछ करे सकेंगी जिससे अवाँछनियता का अन्त और सुख संभावनाओं का अवतरण सम्भव हो सके।

शान्तिकुँज हरिद्वार में अगले 12 वर्षा तक इस साधना का उपक्रम जारी रहेगा। गायत्री जप अनुष्ठान, स्वर्णिम सविता का ध्यान, अग्निहोत्र और उपवास के आधार पर .चलने वाली यह साधना अपने प्रतिष्ठा क्षेत्र की प्रयोगशाला में ऐसे प्रवाह प्रवाहित कर सकेगी जो अदृश्य अन्तरिक्ष और अनुकूलता की दिशा में गति देने से लेकर साधनारत व्यक्तियों को भी परिष्कृत व्यक्तित्व के निर्माण में प्रेरणा दे सके।

केन्द्र तो संकल्पित स्थान पर ही रहेगा पर उसके साथी सहचर आयोजन साप्ताहिक सत्संग के रूप में अनेकानेक स्थानों पर होते रहेंगे। उनकी संख्या आरम्भ में हजारों से लेकर अन्त तक लाखों में पहुँच सकती हैं। बीसवीं सदी के अन्त में इसकी पूर्णाहुति भी होगी जिसे अभूत-पूर्व स्तर का समझा जा सकेगा।

अदृश्य वातावरण को संशोधन एक महत्वपूर्ण कार्य है। युग की परिस्थितियों के अनुरूप पूरा किया जाने वाला एक दायित्व भी। इसके निमित्त किया गया साधना पुरुषार्थ साधकों को अगणि गुना प्रतिफल देगा, यह कल्पना सहज ही की जा सकती हैं।


समाचार डायरी क्या हो रहा हैं, इन दिनों विश्व में?

21 वीं सदी में कैसी होगी संचार व्यवस्था?

पिछले दिनों पी.टी.आय के हवाले से प्रकाशित एक समाचार के अनुसार “ वर्ल्ड फ्यूचर सोसायटी” की एम्पोकिया कन्सास (यू.एस.ए.) में एक सेमीनार में बताया गय कि अगले दिनों मानवीय मस्तिष्क की प्रसुप्त क्षमताओं का इतनी तेजी से विकास होगा की व्यक्ति-व्यक्ति के बीच संपर्क का माध्यम तार नहीं मस्तिष्कीय न्यूरान्स से प्रवाहित होने वाली अल्फा तरंगें होगी। क्रमशः तनाव उद्विग्नता के शमन हेतु अधिक से अधिक पाश्चात्य संस्कृति के लोग प्राच्य आध्यात्म की योग साधनाओं का आश्रय लेकर अपनी मस्तिष्कीय क्षमताओं को और प्रखर बनायेंगे ताक ब्रेन्वेव्स की परस्पर ट्यूनिंग हो सके। यह असंभव कपोल कल्पना प्रतीत होने वाली कार्य शैली इस तेजी से जनसाधारण द्वारा क्रिया रूप में परिणत की जाने लगेगी कि सम्प्रेषण माध्यम विकसित अतीन्द्रिय सामर्थ्य के रूप में बिना के रूप में बिना तारों के जंजाल, सेटेलाइट्स आदि के ऐसा भी होता है इस पर सभी आश्चर्य करने लगेंगे उपस्थित सभी भविष्य विज्ञानियों ने वक्ताओं के मन्तव्यों का अनुमोदन ही किया।

भारत एक उभरती हुई महाशक्ति

- ‘टाइम’ पत्रिका 6 अप्रैल 1989

“टाइम” पत्रिका को विश्वभर में एक प्रामाणिक न्यूमेग्जीन के रूप में मान्यता प्राप्त हैं। शीघ्र ही अपने 100 वर्ष पूरे करने जा रहीं यह पत्रिका अन्तर्राष्ट्रीय घटनाओं का विहंगावलोकन कर एक संतुलित, निष्पक्ष विवेचना प्रस्तुतकर उनके भविष्य पर प्रभावों का भी विश्लेषण करती हैं अभी पिछले दिनों 3 अप्रैल 89 को प्रकाशित इस अंक भारत पर विवेचना के लिए हुए आया हैं व इसने मुख्य शीर्षक दिया हैं - “सुपर इण्डिया, द नेक्सट मिलिट्र पाँवर।”

इस लेख के लेखक एस.एच.मुनरे लिखते है कि “ पिछले कुछ वर्षा में भारतवर्ष इतनी तेजी से एक महाशक्ति के रूप में उभर के आया है कि अब रूस,चीन, अमेरिका, फ्राँस जैसी महाशक्तियाँ इसकी उपेक्षा नहीं कर सकती। सिचाचिन ग्लेशियर पर पाकिस्तान को पीछे धकेलना, श्रींलंकर में प्रवेश कर आतंक से मुक्ति दिलाना मालदीव में हुई क्रांति को निरस्त कर अब्दुलगयूम की सरकार को पुनः प्रतिष्ठित कर देना इस महाशक्ति की इस चेतावनी का द्योतक है कि अब भारत को अविकसित पिछड़ा कहकर उपेक्षित नहीं किया जा सकता। भारत सैन्य शक्ति के आधार पर अब विश्व के चौथे नम्बर पर हैं - क्रमशः सोवियत रूस (50 लाख) चीन (बत्तीस लाख) अमेरिका (29 लाख) ट्रुप्स के बाद भारत है। जिसके पास 14 लाख प्रशिक्षित सुसज्जित सैन्य शक्ति हैं। वे कहते हैं कि प्रमुख यह नहीं की संख्या बल के आधार पर भारत को महाशक्ति माना जाय, बल्कि प्रधानता इस तथ्य को दी जानी चाहिए कक पूरे विश्व में हर 6 व्यक्ति के पीछे एक भारतीय हैं, चिकित्सा-सेना- इंजीनियरिंग -अंतरिक्ष विज्ञान हर क्षेत्र में भारतीय ही भारत में या विदेशों में अपनी कुशाग्र बुद्धि के कारण आगे है तथा अपनी गहरी सांस्कृतिक जड़ों के कारण भारत अभी भी विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है। अपनी आँतरिक समस्याओं से जूझते हुए भी उसने खाद्यान्न उत्पन्न, उपकरणों के निर्यात तथा स्वावलम्बन के क्षेत्र में गत दो दशकों में महत्वपूर्ण प्रगति की है। विश्व शांति के लिए पहल करने वाली यही एक महाशक्ति है जो अन्यान्य शक्तियों में टकराव को रोके हुए है।”

पश्चिम में तो भारत की एक ही छवि है- अंधविश्वासों से, रूढ़ियों से भरा, घिचपिच, समस्याग्रस्त भारत, किन्तु अपनी कव्हरस्टोरी में श्री मुनरो लिखते हैं कि ‘इस भारत के अंदर से एक और महाशक्ति उभर रही है जो क्रमशः समस्याओं से जूझती हुई अपनी आध्यात्मिक विरासत एवं कुशाग्र बुद्धिबल के सहारे यदि अगले दिनों विश्व का नेतृत्व करने वाली शक्ति बन जाय तो किसी का आश्चर्य नहीं करना चाहिए। “इसे दैवी चेतना का -महाकाल का प्रवाह ही कहना चाहिए जो यह युगान्तरकारी परिवर्तन ला रहा है एवं संगठित जनशक्ति के सहारे दो हजार वर्ष की गुलामी से आजाद होने के बाद अब पुनः भारतवर्ष को महाशक्ति का रूप दे रहा है। जो इक्कीसवीं सदी में प्रमुख शक्ति का रूप ले लेगा।

विश्वशांति की ओर अग्रसर

‘द गर्जियन वकली” जो इंग्लैण्ड से प्रकाशित एक मान्यता प्राप्त प्रख्यात समाचार पत्र है, अपने 2 अप्रैल 1989 के अंक में लिख है कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद 4 वर्ष गुजर गये एवं छुटपुट लड़ाइयों के अतिरिक्त विश्वस्तर पर कोई महायुद्ध अभी नहीं हुआ है अपितु विश्व शाँति का माहौल पूरी धरित्री पर तेजी से बढ़ा है। जॉन गुलर की पुस्तक ‘रिट्रीट फ्राँम डँम्स डे” की समीक्षा करते हुए मैक्जार्ज बण्डी लिखते हैं कि ‘रामेन एम्पायर के बाद यह सबसे लम्बी अवधि हैं जब हम विश्वव्यापी तनाव शेथिल्य (देतान्ते) की स्थिति देख रहे है। वे लिखते है कि मानव जाति ने समझ लिया है कि युद्ध ही उनका सबसे बड़ा शत्रु है जो मनुष्य की नस्ल को ही खत्म कर सकता है अतः अब विश्व को शान्ति की ही जरूरत है। अब कोई मुसोलिनी, हिटलर या जापनी एम्पायर जन्म नहीं लेगा। इक्कीसवीं सदी उज्ज्वल संभावनाएँ लेकर आएगी।

तनाव कम होगा, शाँति आएगी á-हुआन जियाँग

-बीजिंग (चीन) में अन्तर्राष्ट्रीय अध्ययन केन्द्र के निदेशक हुआन जियाँग ने पिछले दिनों कहा कि भविष्य में विश्व स्तर पर दीर्घकालिक शाँति व्यात रहने की संभावना है। अब रूस व अमेरिका दोनों महाशक्तियाँ हथियारों के जखीरे के जमाव की चरम सीमा पर पहुँच कर संधि कर चुकी है, रूस ने अपनी मिसाइलों को नष्ट भी किया है तथा आर्थिक मजबूती पर-गरीबी उन्मूलन पर ध्यान देना आरंभ कर दिया है। मौजूद युग सहप्रतिस्पर्धा का युग है। जिसमें प्रत्येक व्यक्ति शाँतिव्यवस्था कायम करने में जुटा हुआ है। सभी अब यह बात समझने लगे हैं कि युद्ध किसी समस्या का हल नहीं है।

अध्यात्म मात्र भारत के कारण जीवित है-

स्वा. आत्मानन्द

रामकृष्ण मिशन रायपुर के स्वामी आत्मानन्दजी ने पिछले दिनों इन्दौर में एक प्रवचन माला में कहा कि भारत के लोगों में रोम रोम में धर्म संव्याप्त है। दुनिया का हर देश आज सच्चे अध्यात्म की तलाश में है। नैतिक मूल्यों में ह्रास के कारण वे शाँति भारतीय अध्यात्म में पाते हैं इसीलिए सभी धर्म की वकालत करने लगे हैं। अगले दिनों भारत ही विश्व का मार्गदर्शक राष्ट्र होगा।

परिवर्तन- प्रकृति की एक नियमित प्रक्रिया

पिछले दिनों अमेरिकन स्पेस शटल से खींचे गये धरती के चित्रों में पूर्व के नक्शों से महत्वपूर्ण अंतर पाया गया। वैज्ञानिकों का कहना था कि 1966 में खींचे गए चित्र को सामने रखकर सेंट्रल अफ्रीका का नक्शा बनाया जाय तो वैज्ञानिक यह देखकर हतप्रभ रह जायेंगे कि जिस चाड झील को 200 ममील लम्बी बताया जाता रहा है, उसकी सतह 95 प्रतिशत घटकर नगण्य रह गयी है एवं यह परिवर्तन मात्र विगत 22 वर्षों में ही हुआ है कभी जिस झील की सतह 26500 वर्ग किलों मीटर थी, 240 वर्ग किलों मीटर तक ही सीमित होकर रह गयी थी। चूँकि दक्षिणपूर्व एशिया के ऊपर सतत् बादल छाये रहते हैं, वे यहाँ का स्पष्ट चित्र नहीं ले सके पर अपने सम्मिलित कम्प्यूटराइज्ड निष्कर्षों के आधार पर उनने पाया कि हिमालय क्रमशः ऊपर खिसक रहा है व भारतीय भू भाग बढ़ रहा है। यू.एन.आई. के हवाले से हवाले से 39 मार्च को प्रकाशित यह समाचार एक तथ्य तक हमें ले जाता है कि परिवर्तन एक सतत् शाश्वत प्रक्रिया है व इसमें हजारों लाखों नहीं कुछ ही वर्ष लगते है। सोचा जा सकता है कि अगले 13 वर्षे में विश्व का न केवल भौगोलिक नक्शा बदलेगा अपितु समग्र स्वरूप में ही व्यापक परिवर्तन देखा जा सकेगा। इसी के युग परिवर्तन प्रक्रिया कहा जाता है।

*समाप्त*