क्षुद्रता अपनाने से हानि ही हानि!

अपने पन को छोटा करते-करते क्षुद्रता इतनी बढ़ जाती है कि मात्र विलास तक ही मनुष्य की सत्ता सीमाबद्ध होकर रह जाती है। इतने भर के लिए वह अपने पेट को, इन्द्रियों को स्वास्थ्य तथा दीर्घजीवन तक को तोड़कर रख देता है। क्षुद्रताग्रस्त विचारों की भरमार से मस्तिष्क श्मशान की तरह मनोविकारों की चिंता में जलता रहता है। आनन्द और उल्लास के भाव भरे सुमन जिस उद्यान में खिले रह सकते हैं और सम्बद्ध वातावरण को सुरम्य बनाये रह सकते हैं, उस नन्दनवन में पतझड़ की स्थिति उत्पन्न करने में क्षुद्रता का हिमपात ही प्रधान कारण होता है।

क्षुद्रता न पत्नी को विकसित होने देती है, न बच्चों को सुसंस्कृत बनने देती है। वयोवृद्धों को सम्मान देने में और उनका दुलार पाने में न तो वस्तुएँ कम पड़ती हैं, न अवकाश की ही कमी रहती है। ओछेपन और उपेक्षा भरे बरताव के कारण ही छोटों और बड़ों के बीच खाई बनी रहती है। वयस्कों में पारस्परिक सद्भाव और सहयोग न बन पाता है, न बढ़ पाता है। परिवार की इस विपन्न स्थिति में क्षुद्रता का बढ़ा हुआ स्वरूप ही प्रधान कारण पाया जाता है।

हर व्यक्ति अपने संपर्क क्षेत्र में सम्मान और विश्वास का पात्र बनकर भावभरा सहयोग प्राप्त कर सकता है। उदारमना लोगों के लिए यह सारा संसार उदार है। सज्जनता की प्रतिक्रिया सज्जनोचित सहायता के रूप में वापस लौट आती है। सहृदय व्यक्ति सेवा की नीति अपनाकर जो खोते हैं, उससे अनेक गुना प्राप्त कर लेते हैं। क्षुद्रता देखने भर में लाभदायक प्रतीत होती है और उससे स्वार्थ सधता लगता है, पर वस्तुतः उसकी हानि अपार है। उसे अपनाकर मनुष्य न केवल छोटा और बौना रह जाता है वरन् हानि, विपत्ति तथा प्रताड़ना का भी भाजन बनता है।


जब जाग उठी अंतः की संवेदना

सड़क पर एक अन्धा बड़े कारुणिक स्वर गीत गा रहा था। बीच-बीच में “अन्धे को रोटी दे” की टेर भी लगा देता। मधुर कण्ठ से निकली आवाज लोगों का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट कर लेती पर अधिकाँश लोग उपेक्षाभाव से इन पंक्तियों को अनसुनी करते चले जाते।

जिस स्थान पर वह अंधा भिखारी बैठा भीख माँग रहा था, उसी स्थान पर एक कार आकर रुकी। कार में बैठे थे विश्व प्रसिद्ध संगीतकार ‘सिग्रफिड जोनसन’ जो स्वयं भी अंधे थे। जब ड्राइवर जब कुछ देर में लौटकर आया तो जोनसन ने पूछा-”क्या इस देश में सभी अन्धे व्यक्ति भीख माँग कर आजीविका चलाते हैं?”

“जी हाँ, लगभग ऐसा ही है”-ड्राइवर का संक्षिप्त सा उत्तर था और उसने गाड़ी स्टार्ट कर दी। परन्तु इस संक्षिप्त से उत्तर ने उनकी विचार श्रृंखला को गाड़ी से भी तेज गति दी। वे सोचने लगे-”क्या यह मानवता की गरिमा के अनुरूप है कि कोई अपंग या नेत्रहीन आदमी और उसके लिए भी अपने माननीय गौरव की हत्या करनी पड़े। अर्हित है वह समाज जो अपने अपंग असमर्थ सदस्यों के लिए कोई सम्मानित जीविका की व्यवस्था न कर सके।”

समाज में अंधे अपंगों के प्रति दया नहीं, सहानुभूति के भाव जगें और उन लोगों में आत्मविश्वास पैदा हो। इसके लिए सिग्रफिड जोनसन ने कुछ करने का निश्चय किया। वे स्वयं भी जन्म से अन्धे थे, पर जिस परिवेश में रहकर उनका आत्मदीप पूर्ण तेज से प्रज्वलित ही रहा।

हर व्यक्ति में हर तरह की क्षमताएँ नहीं होती। किन्तु प्रत्येक में अपनी ऐसी कुछ मौलिक विशेषताएँ होती हैं कि यदि उसे उभार जा सके, जगाया जा सके, तो विशिष्टता का सम्पादन सहज हो जाता है। जोनसन की विशेषता थी सुरीला कण्ठ। किसी ने उन्हें संगीत साधना की प्रेरणा दी। साधना ने उनके कण्ठ का सुरीलापन और भी निखारा। उन्होंने वाद्ययन्त्र बजाने से लेकर संगीत के उतार चढ़ाव सीखने के लिए दिन राज परिश्रम किया। परिश्रम से प्रतिभा परिष्कृत हुई और परिष्कृति ने उन्हें सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ाई। सिग्रफिड की गणना अमेरिका के चोटी के संगीतकारों में होने लगी। उनकी ख्याति देश-काल की सीमाओं को लाँघकर फैल गई। देश-विदेश में उन्हें कार्यक्रम मिलने लगे और वह अपना कला का प्रदर्शन करने के लिए विभिन्न देशों की यात्राएँ सम्पन्न करने लगे।

इन्हीं यात्राओं के अंतर्गत वे एक बार भारत आए। यहाँ पर जब उन्होंने देखा कि यहाँ अन्धों को तथा दूसरे अपंगों को बुरी स्थिति में रहना पड़ता है, तो उनकी करुणा उमड़ पड़ी। उन्होंने निश्चय किया कि वे भारत में एक ऐसा आश्रम स्थापित करेंगे कि अन्धे व्यक्ति उसमें रहकर सम्मानपूर्वक आजीविका कमा सके।

इसके लिए उन्होंने देश व्यापी संगीत कार्यक्रमों की एक श्रृंखला बनाई और भारत के कौने-कौने में जाकर अपनी स्वर माधुरी से जनमत को विभोर किया। इन कार्यक्रमों में श्रोता टूट पड़ते। कार्यक्रम सुनने के लिए जो टिकट बेचे जाते, उससे होने वाली आय को विशुद्ध रूप से उन्होंने अंधाश्रमों की व्यवस्था के लिए सुरक्षित रखा। इस प्रकार छः वर्ष तक जगह-जगह कार्यक्रम दिए और इसी बीच दक्षिण भारत के ऐलम जिले के तिरुपट्टर गाँव में एक विशाल आश्रम की योजना को मूर्तरूप देने की कोशिश करते रहे। जिस समय अपने देश रवाना हुए तब उन्होंने लगभग दो लाख रुपया आश्रम को और दिया। उनका यह प्रयास आज भी सैकड़ों अंधों के ससम्मानित जीविका उपार्जन के रूप में देखा जा सकता है।


भूल को सुधारने का ठीक यही समय!

समय की गति आमतौर से धीमी पवन की तरह मंद गति से चलती है। पर कभी-कभी आवेश की स्थिति में वह आँधी तूफान, चक्रवात की तरह अतिशय तीव्र होती हुई भी देखी गयी है। उस तीव्रता में न जाने कितना कितना उलट−पुलट हो जाता है। नदियों के प्रवाह की सामान्य गति रहने पर उन्हें तैर कर पार किया जा सकता है, पर जब वे उफान पर होती हैं तो भयंकर भँवर पड़ते हैं और वे नावों जहाजों को अपने कुचक्र में फँसाकर डुबा देते है। आदमी साधारणतया एक घंटे में चार मील की चाल से चलता है पर वायुयान जैसे वाहन मिल जाने पर घंटे में छः सौ मील की दूरी पार कर लेता है। आवेश में साधारण स्थिति का मनुष्य भी कई गुनी तेजी अपना लेता है और आश्चर्यजनक दौड़ लगाता है। इसी को यदि चाहे तो समय की चाल चलना बढ़ना भी कह सकते हैं। औसत क्रम से बीज को पेड़ बनने में समय लगता है पर यदि गहराई तक खोदकर अन्यत्र गड्ढे में लगा दिया जाय तो दूसरे ही दिन नये स्थान पर नया पेड़ इस प्रकार खड़ा हो जाता है, मानो वह कई वर्ष पुराना हो। इसे भी समय की चाल में गिना जा सकता है।

पिछले दो सहस्राब्दियों ने इतनी गति पकड़ी है जितनी कि लाखों वर्षों में नहीं बन पड़ी थी। विज्ञान के आविष्कारों को देखकर लगता है किसी बाजीगर ने अपना भानुमती का पिटारा खोलकर उसमें भरी सारी करामातों को कुछ ही क्षणों में सर्वत्र बिखेर दिया हो। आदिमकाल से लेकर लाखों वर्षों में मनुष्य जो कुछ हस्तगत कर सका था उसकी तुलना में इन दो शताब्दियों में उसने कम नहीं अधिक ही कर दिखाया है। ज्ञान के इतने क्षेत्रों में इतनी शाखाएँ अभी अभी विकसित हुई हैं जिन्हें देखकर लगता है कि जानकारियों के क्षेत्र में मनुष्य ने सारे संसार को, प्रकृति के रहस्यों को और दर्शन के गूढ़ तथ्यों को कुछ ही दिनों में अविज्ञात से ज्ञात बना दिया है।

पारसी, यहूदी, बौद्ध, ईसाई और मुस्लिम धर्मों ने अपना विस्तार इतनी तेजी से किया है जितना कि पुरानी धार्मिकता लाखों वर्षों में यत्किंचित ही प्रगति कर सकी हो। बारूद का आविष्कार होने पर युद्धों का धरातल ही बदल गया। अब बिजली, रोशनी, गर्मी, ठंडक कुछ भी देने में समर्थ है। वह पंखा झलाती है। रेडियो के माध्यम से धरती के एक कोने का संवाद दूसरे कोने तक पहुँचाने में कुछ ही सेकेंड लगते है। उसे कुओं से पानी खींचते और भारी भरकम कारखाने चलाते हुए देखा जाता है। पूर्वकाल में इसकी किसी को कल्पना तक न थी।

रीति-रिवाजों में परम्पराओं में असाधारण परिवर्तन हुआ है। पुरातन वेशभूषा का स्थान पश्चिमी फैशन ने ले लिया है। राजतन्त्र की जड़े उखड़ गयीं और उसे स्थान पर प्रजातन्त्र आ खड़ा हुआ। सामंत, जमींदार, साहूकारों की कभी तूती बोलती थी, पर वे अब ऐतिहासिक प्राणी मात्र बनकर रह गये है। पर्दाप्रथा अब अपना अस्तित्व समेटती जाती है। जाति-पाति, ऊँच नीच, नर और नारी के बीच चलने वाले अन्तर अब अपनी आखिरी साँस गिन रहा है। साम्यवादी विचारधारा ने संसार के दो तिहाई लोगों को अपनी चपेट में ले लिया है। अणु आविष्कार ने प्रकृति की महत्वपूर्ण शक्ति को हस्तगत कर लिया है। ग्रह उपग्रहों पर मनुष्य को भेजकर राकेट महत्वपूर्ण जानकारियाँ संग्रह करने में लगे है। रोबोट मनुष्य की प्रतिद्वन्द्विता कर रहे है। कम्प्यूटरों ने मानवी मस्तिष्क के अधिकाँश कार्य अपनी मुट्ठी में ले लिये है। परिवार नियोजन, शल्य चिकित्सा आदि के क्षेत्र में न जाने स्थिति कहाँ जा पहुँची है और भी न जाने कहाँ क्या-क्या हो रहा है जिन्हें देखकर हतप्रभ रह जाते है। प्राणियों की संकर प्रजातियों, वनस्पतियों के वर्णसंकर, स्वरूपों को देखकर लगता है कि पदार्थ की भाँति मनुष्य प्राणिजगत का भी भाग्य-विधाता बनकर रहेगा। यह सब काम इतनी तेजी से हुए हैं, जिन्हें देखते हुए लगता है कि अपना समय अत्यन्त द्रुतगामिता की चाल अपना रहा है।

जाने अनजाने ज्ञान को मनुष्य आमतौर से भूलता नहीं। द्रुतगामिता जब अपनी नियति बन गयी है। वाहनों की दौड़ को देखते हुए इसका सहज अनुभव लगाया जा सकता है। तथ्यों को देखते हुए निष्कर्ष पर पहुँचना किसी के लिए भी कठिन नहीं होना चाहिए कि अगले समय में भी ऐसा ही कुछ चलता रहेगा जो पिछले प्रचलन के स्थान पर नवीनता को स्थानापन्न करते हुए अपनी गतिशीलता को धीमी न पड़ने दें वरन् उसे और भी अधिक आगे बढ़ा दें।

घड़ी का पेण्डुलम एक सीमा तक ही आगे बढ़ता है। प्रकृति के नियम इसके बाद उसे वापस लौटने के लिए बाधित कर देते हैं। बचपन में मनुष्य की लम्बाई तेजी से बढ़ती है, पर वह कुछ ही समय पर ठहर जाती है और वह बढ़ोत्तरी समाप्त हो जाती है। कई बार तो ऐसा भी होता है कि दूध का जला छाछ को भी फूँक कर पीता है। आग, साँप, बिजली आदि से क्या दुर्घटनाएं हो सकती है, इसे जान लेने के बाद फिर कोई उस गलती को नहीं दुहराता। ठोकर खाकर भी आदमी बहुत कुछ सीखता है।

पिछले दिनों की द्रुतगामिता ने अनेकों उपलब्धियाँ भी अर्जित की है। साथ ही ऐसी भूलें भी कम नहीं हुई हैं जिनके कारण सदा सर्वदा पछताना पड़ेगा और उन्हें सुधारने के लिए उससे अधिक प्रयत्न करना पड़ेगा जितना कि अत्याधिक पाने की दौड़ में समेटने बटोरने में अत्युत्साह दिखाया गया है। कारखानों द्वारा अत्यधिक उत्पादन करने की दौड़ में चिमनियों से निकलने वाला प्रदूषण इतना अधिक संचित हो गया है कि दम घुटने की बारी आ गयी है। कारखानों और शहरों का बेशुमार कचरा पड़ते रहने से नदियों का जल विषैला, अपेय होता जा रहा है। ऊर्जा के अधिक प्रयोग से वातावरण इतना गरम हो जाता है जिसे देखते हुए ध्रुवों की बर्फ पिघल जाने और समुद्रों में बाढ़ आने की विभीषिका दिल दहलाने लगती है। आकाश की ओजोन परत फटने पर पृथ्वी पर ब्रह्माण्डीय किरणें बेधड़क बरस सकती है और धरती के पदार्थों को चना-चबाने की तरह भूनकर रख सकती है। अणु शक्ति का प्रयोग परीक्षण तेजी से चल रहा है, पर यह सूझ नहीं पड़ता कि इन भट्टियों से निकली खतरनाक राख को कहाँ रखकर विकिरण से प्राण छुड़ाये जा सकेंगे।

जनसंख्या खेल-खेल में बढ़ती जा रही है पर उसके लिए निर्वाह के साधन जुटाना दूभर हो रहा है। वह विज्ञान का अभिशाप है जिसके कारण मनुष्य की जीवनीशक्ति बेतरह क्षीण होती जा रही है और वह अशक्त अपंग स्तर का बनकर रहने लगा है। कमजोरी और बीमारी सहज स्वभाव में सम्मिलित हो गयी है। शरीर में काम करने की और मस्तिष्क में सोचने की दूरदर्शिता दिन-दिन क्षीण होती जाती है लगता है कि कुछ समय उपरान्त मनुष्य अपनी मौलिक क्षमताएँ गँवाकर परावलम्बी स्तर का जीवन यापन करने लगेगा।

वैज्ञानिक दुरुपयोग से भी बढ़कर एक अनर्थ यह हुआ है कि मनुष्य ने अपनी मस्तिष्क गरिमा शालीनता से बुरी तरह मुँह मोड़ना आरंभ कर दिया है। मर्यादाओं के पालन और वर्जनाओं को मानने में आस्था घटती जाती है। चिन्तन, चरित्र और व्यवहार में घुसता जा रहा प्रदूषण इतना भयावह है कि उनके कारण उत्पन्न होने वाली विकृतियों और समस्याओं का कोई अन्त ही नहीं है। पारस्परिक विश्वास उठता जा रहा है। मित्र द्वारा अपनाये गये शत्रुवत् व्यवहार की भरमार को देखते हुए प्रतीत होता है कि स्नेह सौजन्य, सहयोग का उदार व्यवहार कहीं कथा-कहानियों की तरह पोथी-पत्राओं में पढ़ी जाने वाली विडम्बनाओं की तरह मन बहलाने की चीजें बनकर तो नहीं रह रही है। इस दूसरे के प्रति बरते गये दुर्व्यवहार को देखते हुए आशंका होती है कि मैत्री पूरी तरह खतरे से भरी हुई है। दूसरी एक आफत यह भी है कि नितान्त एकाकी बनकर रहना भी तो कम असुविधाओं से भरा हुआ नहीं है। बेमौत मरना निश्चित ही कठिन है, पर आदर्शों से सर्वथा विहीन होकर जी सकना भी तो कम दुष्कर नहीं है। अर्धमृतक की तरह जी सकना भी शान्तिपूर्वक कहाँ बन पड़ता है?

आदर्शों का आच्छादन टूट जाने से सब और से विभीषिकाएँ ही टिड्डी दल की तरह दौड़ पड़ी है। अशान्त, अविश्वास और आशंकाग्रस्त मनुष्य सोते आक्रमण पल-पल पर होता रहता है। इस बेचैनी की हालत में स्थिति ऐसी नहीं रह जाती कि अपने समग्र चिन्तन, अपनी रीति-नीति, दिशाधारा के संबंध में कोई सुनिश्चित निर्णय किया जा सके। अनिश्चय की स्थिति में नीरसता और निष्ठुरता की मनोभूमि बनती है, जो मरघट में रहने वाले प्रेत-पिशाचों की तरह डराने और व्यथित कर देने के लिए बाधित करती है।

औसत मनुष्य की ऐसी ही विपन्न परिस्थिति है, जिसमें जीना और मरना दोनों ही कठिन हो रहा है। आलस्य, प्रमाद, उपेक्षा, अनुशासन की अवमानना, नीरसता, निरुद्देश्य जीवनयापन का सम्मिलित माहौल ऐसा बनता जा रहा है, जिसमें किसी प्रकार घुटन भरा जीवन ही जिया जा सकता है। गम गलत करने के लिए नशेबाजी, आवारागर्दी जैसे दुर्व्यसन अपनाने पड़ते है। उपलब्धियों का दुरुपयोग न केवल पदार्थों का अपहरण कर वरन् गुण, कर्म, स्वभाव जैसी प्रवृत्तियाँ भी सीधी राह छोड़कर उलटे कदम पीछे की ओर ही लौट आती है। मानवी स्तर का पराक्रम और पशु-पिशाच स्तर की अवधारणा ही व्यवहार में उतरती जाती है। एक दूसरे को ठगने के लिए सज्जनता का लिबास तो बहुत लोग ओढ़ते हैं पर जिनकी कथनी और करनी मानवी मर्यादाओं के अनुरूप हो ऐसे कहीं कोई .... ही दीख पड़ते है।

इन परिस्थितियों में वैयक्तिक और सामाजिक जीवन कैसा गया गुजरा हो गया है, इसका अनुमान लगाने की आवश्यकता नहीं है। अपने चारों ओर बिखरे वातावरण में यही सब आसानी से छाया हुआ देखा जा सकता है।

मनःस्थिति में विषाक्तता भर जाने पर परिस्थितियाँ विभीषिकाओं से भरी पूरी होना नितान्त स्वाभाविक है। अपराधों और छद्मों की बाढ़ इसी कारण आती है। विषैले तालाब में मछली किस प्रकार जियें? घुटन भरे वातावरण में मनुष्य किस प्रकार शान्तिपूर्वक जिये?

पदार्थ विज्ञान और प्रत्यक्षवादी बुद्धिवाद ने एक हाथ से जो कुछ दिया है उसे दूसरे हाथ से दुष्प्रवृत्ति ने बढ़कर छीन भी तो लिया है। ऐसी दशा में अपनी स्थिति पर सोचने वाले मनुष्य यही निष्कर्ष निकालते हैं कि उनने प्रगति के नाम पर अनीति को ही अपनाया। बुद्धिमानी के अहंकार में उसने झाड़ झंखाड़ भरी भूल भुलैया का विस्तार ही अपनाया है। ऐसी स्थिति में चैन कहाँ? शान्ति कैसी?

गिनती गिनना भूल जाने पर फिर दुबारा से उसे गिनना पड़ता है। रास्ता भटक जाने पर फिर वापस लौटना पड़ता है। इसके बिना और कोई चारा नहीं। जिस तेजी से हम आगे बढ़े हैं उसी तेजी से वापस भी लौटना पड़ेगा। जो परिस्थितियाँ आज सामने हैं उसे सुधारने के लिए उतनी ही तेजी अपनानी पड़ेगी। भूल को सुधारने का ठीक यही समय है, अन्यथा जिस अवाँछनीयता को पिछले दिनों अपनाया गया था, उसी पर और भी आगे चलते रहा गया तो स्थिति ऐसी आ .... कि प्रायश्चित बन पड़ना .... होगा।


चित की चंचलता (kahani)

चार मित्र मिलकर एक गुरु के पास ध्यान सीखने पहुँचे। गुरु ने कहा-”ध्यान तो दूर की बात है। अभी साँझ हो गई है, सूरज ढल चुका है, तुम एक घड़ी यहाँ चुपचाप शान्त होकर बैठे जाओ। मैं तुमसे बाद में बात करूंगा।” गुरु आंखें बन्द करके अपने ध्यान में लीन हो गया। वे चारों बड़ी मुसीबत में फँस गये। कुछ करने को कहा होता तो भी ठीक था। चुप बैठे रहना तो बड़ा कठिन लग रहा था। उनमें से एक का धैर्य टूटा तो खुसफुसाया। “रात पड़ गई अभी तक दीपक नहीं जला।” दूसरे ने कहा-”क्या करता है? मौन के लिए कहा है।” तीसरे ने कहा-”बड़े नासमझ हो मौन तोड़ दिया।” चौथा बोला-”मुझे छोड़कर तुम में से कोई भी मौन नहीं है” एक क्षण भी चुप रहना बहुत मुश्किल बात है। मन की भटकन यदि दूर नहीं होती, चित की चंचलता यदि नहीं हटती तब तक ध्यान लगना बहुत कठिन बात है।


यदि आसक्ति छूट जाय तो?

छत्रपति शिवाजी अपने गुरु की मस्ती, उमंग और आनन्द को देखकर सोचने लगे- इस सब का कारण क्या है? उत्तर में मन में आया-”अरे! उनके पास कोई जिम्मेदारी दायित्व नहीं है इसी कारण मस्त रहते होंगे।” बस चिन्तन की धारा इसी दिशा में चल पड़ी क्यों ने राज्य, शासन, युद्ध तथा अन्याय परेशान करने वाले दायित्व से छुटकारा पा लिया जाय?

मन इन्हीं विचारों में चक्कर काट रहा था कि एक दिन समर्थ गुरु रामदास आ पहुँचे। शिवाजी का उल्लास उन्हें देखकर अनेकों गुना बढ़ गया अवसर पाकर छत्रपति ने उनसे निवेदन किया! “गुरुदेव! मैं राज्य के इन झंझटों से उकता गया हूँ। इसलिए सोच रहा हूँ कि मैं भी अब संन्यास ग्रहण कर लूँ।”

“संन्यास ले लो”-गुरुदेव ने बहुत ही सहज भाव से कहा-”इससे अच्छी ओर क्या बात हो सकती है”?

शिवाजी पुलकित हो उठे। वे तो सोच रहे थे कि पता नहीं इसके लिए गुरुदेव अनुमति देंगे या नहीं? शायद उन्हें बहुत मनाना पड़ेगा। लेकिन बात आसानी से बन गई। उन्होंने कहा-”तो फिर आप अपनी दृष्टि में का कोई ऐसा व्यक्ति बताइए जिसे राज काज सौंपकर में आत्मकल्याण की साधना करूं और आपके सान्निध्य में रह सकूँ।”

गुरुदेव ने कहा-”मुझे राज्य दे दे और चला जा निश्चित होकर वन में। मैं चलाऊँगा राज का काम काज।” और शिवाजी ने हाथ में जल लेकर राज्यदान का संकल्प कर लिया। उसी वेश में जाने को उद्यत हुए। वहाँ से निकलने और भविष्य के प्रबन्ध के लिए उन्होंने कुछ मुद्राएँ साथ लेना चाहीं। परन्तु समर्थ ने यह कहकर मुद्राएँ ले जाने से मना कर दिया कि “अब तो तुम राज्य का दान कर चुके हो। राज कोष पर तुम्हारा कोई अधिकार नहीं रहा।”

शिवाजी उसी स्थिति में बाहर चल दिए।

जब शिवाजी चलने लगे तो स्वामी जी ने रोक कर पूछा-”सुनो! तुम जा तो रहे हो परन्तु भविष्य में निर्वाह की व्यवस्था क्या होगी?”

“जो भी हो जाए” शिवाजी बोले।

“फिर भी? कुछ तो सोचा होगा?”

“सोचा क्या? कहीं मेहनत मजदूरी तो मिलेगी। किसी की नौकरी कर ही अपना गुजारा चला लूँगा।” विरक्त स्वर में शिवाजी बोले।

अच्छा तो नौकरी ही करनी है। मैं समझता हूँ कि तुम्हारे लिए मैं बढ़िया नौकरी की व्यवस्था कर सकता हूँ।

“बड़ी कृपा होगी” शिवाजी का उत्तर था।

तुम यह राज्य तो मुझे दे चुके हो। अब मैं जिसे चाहूँ, उसे इसकी देख रेख और व्यवस्था के लिए नियुक्त कर सकता हूँ। अब मुझे किसी योग्य व्यक्ति की तलाश भी करनी पड़ेगी सो सोचता हूँ कि तुम ही इसके लिए सबसे ज्यादा योग्य हो सकते हो। इस भाव से राज्य का संचालन दायित्व संभालना कि तुम केवल सेवक मात्र हो। “यह राज्य मेरा है।” शिवा स्तंभित रह गए।

बस उसी क्षण से मराठों के झण्डे का रंग भगवा हो गया। शिवाजी भी जब हर स्थिति में मस्त रहने लगे। एक बार युद्ध क्षेत्र में शिवाजी प्रसन्न भाव से दास बोध पढ़ रहे थे। उन्हें इस प्रकार प्रसन्न देखकर मोरोपन्त ने पूछा-”आप इस विकट स्थिति में इस प्रकार मस्त कैसे है।” शिवाजी का जवाब था-”सारी प्रसन्नता आसक्ति की आड़ में छुपी है। यदि आसक्ति को उखाड़ फेंका जाय तो समूची सृष्टि को भगवान का उद्यान तथा अपने को एक सेवक समझ लिया जाय तो फिर कोई परेशानी नहीं है। उन्होंने ऐसा किया भी। हम सबके लिए भी यही रास्ता खुला है।”


दैवी चेतना का प्रभावी प्रचण्ड प्रवाह

मनुष्य मूलतः देव पुत्र है। उसे विकसित करने एवं सभ्यता की पराकाष्ठा पर पहुँचाने में देव शक्तियों का प्रमुख हाथ रहा है। प्रत्यक्ष में देखने पर मानवी पुरुषार्थ भले ही दीख पड़े, पर परोक्ष में महान कार्यों, संकटकालीन विषम परिस्थितियों में ब्राह्मी चेतना की उदार अनुदान सहायता ही कार्यरत रहती है। प्रत्यक्षवाद को प्रमुख मानने वाले वैज्ञानिकों एवं बुद्धिवादियों ने भी अब ऐसी कितनी ही घटनाओं का संकलन और विश्लेषण ब्रह्माण्ड की कोई एक नियामक सत्ता अवश्य है। उसकी सूक्ष्म सन्देशवाहक शक्ति धाराएँ समय-समय पर शरीरधारी मनुष्यों से संपर्क साधती, उन्हें पूर्वाभास करातीं, चेतावनी देती और संकट के समय मनोबल बढ़ाने वाला उत्कृष्ट चिन्तन उभारती है।

दार्शनिक सुकरात

के संबंध में विख्यात है कि उनके साथ एक दिव्य आत्मा रहती थी जिसे वे “डेमन” कहते थे। वह उन्हें हर महत्वपूर्ण विषय पर परामर्श दिया करती थी, जिन्हें वे अक्षरशः स्वीकारते थे। उनने स्वयं तो अपनी जीवनी नहीं लिख, पर प्लेटों, जेनोफेन प्लुटार्क जैसे प्रसिद्ध दार्शनिकों के ग्रन्थों से सुकरात की जीवनगाथा मिलते हैं। ऐसे कितने ही घटनाक्रमों का उनने उल्लेख किया है जिसमें वह देवी शक्ति उन्हें खतरों से अवगत कराती और पग-पग पर सहायता देती रहती थी।

जब विद्रोह फैलाने के अपराध में अदालत से सुकरात को मृत्युदण्ड मिला और उनको जेल से छुड़ा ले जाने के लिए पर्याप्त साधन जुटा लिए गये थे, तब “डेमन” ने उनसे कहा-”यह मृत्यु तुम्हारे लिए श्रेयस्कर है। इससे इनकार मत करो।” सुकरात को अपील नहीं करने दी और वे विष का प्याला खुशी-खुशी पी गये।

दैवी शक्तियाँ अनेक बार मनुष्यों को चेतावनी, सत्परामर्श देती भविष्यवाणी बताती तथा उन्हें अपने अदृश्य रूप का प्रत्यक्ष दर्शन भी कराती है। उनके बताये संकेतों पर चलकर कितने ही धर्म प्रेमी लाभ भी उठाते है। ऐसी ही एक घटना फ्रांस के अपर ऐल्सेक प्रान्त के ट्रोइस ऐपिस नगर की है। जहाँ एक धार्मिक व्यक्ति की हत्या कर दी गई थी। 3 मई 1491 को डैटर स्कोर नामक एक लुहार वहाँ से गुजरा तो उसे आकाश से उतरती हुई एक दिव्य शक्ति के दर्शन हुए। नारी स्वरूप उस शक्ति के एक हाथ में श्वेत हिमवर्तिका तथा दूसरे में हरीतिमा की प्रतीक अनाज की तीन बालियाँ थी। उसका कहना था कि यदि अपराधों की गति ऐसी ही रही तो लोगों को प्राकृतिक प्रकोपों का शिकार बनना पड़ेगा। दुर्भिक्ष से लेकर अनेकानेक बीमारियाँ फैलेंगी। ट्रौइस ऐपिस में ऐसा ही हुआ और लोगों को भारी मुसीबतों का सामना करना पड़ा। तब से उस स्थल को धर्म स्थल के रूप में माना जाने लगा।

ग्रीक-पर्शियन युद्ध के कारणों का गंभीरतापूर्वक अध्ययन करने वाले सुप्रसिद्ध इतिहासकारों का कहना है कि एथेना प्रोनाइया के मन्दिर में एक बार देवी आवाज गूँजी, जिसमें अनाचार के विरुद्ध मुहिम शुरू करने का स्पष्ट आदेश था। सन् 1491 में बवेरिया के हैरोल्ड बैक गाँव में भी एक ऐसी ही आयोजन हो रहा था, जिसमें काफी संख्या में लोग उपस्थित थे। कार्यक्रम के मध्य में अचानक एक श्वेत वस्त्रधारी प्रतिमा लोगों के सक्षम प्रकट हुई। उसने परावाणी में जो कुछ कहा, उसकी प्रेरणा लोगों ने स्पष्ट अनुभव की। इसके बाद मूर्ति अन्तर्ध्यान हो गई। धर्म प्राण लोगों ने अनुभव किया कि मानो मूर्ति कह रही हो कि शासनतंत्र पर धर्मतंत्र का अंकुश होना चाहिए। तभी राज्य में सुव्यवस्था और शान्ति बनी रह सकती है। ज्ञातव्य है, तब वहाँ चारों ओर अव्यवस्था और अराजकता का बोलबाला था। अशान्ति और कलह के दमघोट वातावरण से सभी संत्रस्त थे और शान्ति की तलाश में मृगतृष्णा की तरह भटक रहे थे।

दैवी चेतना की सूक्ष्म प्रवाह प्रेरणा का जब कभी अवतरण होता है तो वह इतनी प्रचण्ड होती है कि मनुष्य का विशाल समुदाय भी उसके प्रभाव में आये बिना नहीं रहता। पुर्तगाल के एक गाँव में सन् 1417 में एक ऐसी घटना घटी। 13 मई से लेकर 13 अक्टूबर 1417 तक हर महीने की 13 तारीख को “डिवाइन मदर आफ रोजरी” के रूप में दिव्य संदेश के साथ अवतरित हुए स्थानीय लोगों ने देखा। चर्चा फैलने पर 13 अक्टूबर को इस अभूतपूर्व दृश्य को देखने के लिए हजारों व्यक्ति एकत्र हो गये। उपस्थित लोगों का कहना था कि इस बीच वहाँ का सूक्ष्म वातावरण कुछ ऐसा बना, जो लोगों की धर्म-भावना को झकझोर रहा था। लोगों ने अपने भीतर उत्कृष्ट विचारणाएँ और विलक्षण परिवर्तन अनुभव किये। “फातिमा उद्यान” के रूप में यह घटना अभी भी अविस्मरणीय बनी हुई है।

इजराइल तब गुलामी की जंजीरों में जकड़ा था। स्वाधीनता प्राप्ति के लिए अथक प्रयास करने के बावजूद भी जब वहाँ के निवासियों को मुक्ति के कोई आसार नजर नहीं आये, तो उन्होंने धार्मिक कृत्यों का सहारा लिया और धर्मानुष्ठानों की एक लम्बी श्रृंखला चलाई। इसी मध्य उन्हें “माउण्ट सिनाई”से एक दिन एक दिव्य संदेश मिला, जिसमें कहा गया कि-”तुम्हारी खुशियाँ वापस लौटेगी और तुम जल्दी स्वतंत्र हो जाओगे।” इस ईश्वरी सूचना के मिलते ही लोगों की उद्विग्नता शान्त हो गई और सभी ने सोलोमन के नेतृत्व में इजराइल ने स्वतंत्रता प्राप्त की, यह एक इतिहास प्रसिद्ध घटना है।

चौदहवीं शताब्दी में इटली में राजनीतिक कमजोरियों के कारण अराजकता का विष पूरे देश में फैलता चला गया। पास-पड़ौस क राष्ट्र भी इटली वासियों की इस कमजोरी का लाभ उठाने की कोशिश करने लगे। इन्हीं परिस्थितियों में सन् 1364 में इटली के एक छोटे से गाँव “साइना” में कैथलीन नाम एक 14 वर्षीय किशोरी के कर्ण कुहरों में दिव्य वाणी सुनाई दी। उसमें देवी चेतना का यही संदेश था कि-”तुम लोगों में धार्मिक चेतना फैलाओ तभी देश इस दल-दल से निकल सकता है।” पहले तो कैथलीन ने इसे अपने कानों का भ्रम माना, पर जब वह घटना उसके दैनन्दिन जीवन का अंग बन गई तो उसने उन्हें अपने जीवन का आदर्श और आधार बना लिया। तदनुरूप कार्यक्रम आरंभ कर लोगों का चिन्तन-तंत्र और जीवनक्रम बदलने का अभियान आरंभ किया, जिसमें उसे काफी सहायता मिली तथा देश की स्थिति में उत्तरोत्तर सुधार होता चला गया।

स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में विवेकानन्द और अरविन्द को ब्राह्मी चेतना से दिव्य एवं सूक्ष्म संकेत नियमित रूप से मिलते रहते थे। दैवी शक्तियाँ इनसे सतत् संपर्क बनाये हुए थीं और भावी कार्यक्रमों की रूपरेखा तथा उनसे सम्बन्धित निर्देश दिया करती थी। इन्हीं संकेतों के आधार पर वे अपनी योजनाएँ बनाते और क्रियान्वित करते थे। अलीपुर जेल में मिले दैवी चेतना के संकेतों के आधार पर ही अरविन्द स्वाधीनता-संग्राम के सक्रिय जीवन से संन्यास लेकर पाण्डिचेरी की एकान्त साधना में निरत हुए।

परिवर्तन चाहे व्यष्टिगत को अथवा समष्टिगत सदैव सत्प्रयोजनों के निमित्त होते हैं। दैवीसत्ताओं की इनमें प्रमुख भूमिका होती है। वे जन मानस को झकझोरती, चिन्तन की उत्कृष्टता को उभारती और वह सब करने को बाध्य कर देती हैं जो मानवी गरिमा को अक्षुण्ण बनाये रखने के लिए नियामक सत्ता को अभीष्ट है।


हारीबाजी पलट गयी (kahani)

स्काटलैण्ड के युद्ध में जो सिपाही झंडा लिये खड़ा था, वह अपने स्थान पर डटा रहा, परन्तु अन्य सिपाही वापस हट गए, कप्तान ने वापस लौटने सिपाहियों से जोर से चिल्लाकर कहा कि झंडा तो लेते आओ। परन्तु जो सिपाही झंडा लिये खड़ा था, उसने यह पुकार लगाई कि “झंडे की रक्षा के लिए सब सिपाहियों को यहाँ ले आओ।” इसी साहसपूर्ण वचन से सभी सिपाही आगे बढ़ गये और विजयी हुए। हारीबाजी पलट गयी।


कहीं मनुष्य यंत्र मानव न बन जाय!

सुप्रसिद्ध चीनी दार्शनिक चाँग होचाँग एक बार देश-भ्रमण के लिए निकले। प्रजा की भलाई के लिए सामाजिक अध्ययन और उपयुक्त वातावरण की शोध इस भ्रमण का मुख्य उद्देश्य था।

घूमते-घूमते चाँग ताईवान पहुँचे। एक युवक माली कुँए स जल निकाल रहा था। बाल्टी बालटी पानी निकालने और फिर से ढोकर हर पौधे तक पहुँचाने में उसे बहुत अधिक श्रम करना पड़ रहा था। माली की देह पसीने से तर हो रही थी। तो काफी काम बाकी पड़ा था। काफी देर तक सोचते रहे। कोई ऐसा उपाय नहीं है क्या? जिससे माली का परिश्रम कम किया जा सके।

विचार न करें तो सैकड़ों वर्षों की कड़ी गली अनुपयोगी चीजें सगे सम्बन्धी की तरह चिपक रहतीं और कष्ट देती हैं। पर विचार की एक छोटी सी चिनगारी की उन्नतियों के राजमहल खड़े कर सकती है। चाँग ने सोचा यदि लकड़ियों की एक घिरी बनाकर उसमें रस्सी लपेट कर खड़े-खड़े ही खींचने का प्रबन्ध हो जाए और यहीं से प्रत्येक वृक्ष तक के लिए नाली खोद ली जाए तो माली का यथेष्ट श्रम बच सकता है। इतने ही श्रम में वहां पहले से अधिक काम कर सकता है।

माली ने इस योजना का लाभ समझा और उसे मान लिया। ढेकलीनुमा व्यवस्था हो गई माली वहीं खड़ा-खड़ा पानी निकाल कर पौधे सींचने लगा।

समय तो बचा पर माली ने देखा कि उसके चलने फिरने लचकने-झुकने के कई व्यायाम अब नहीं रहे। इसलिए शरीर के कुछ अंग शिथिल रहने लगे है तो भी उसे इस बात का सन्तोष था कि तब से कुछ अधिक काम हो जाने से शरीर का हर अंग कुछ न कुछ तो क्रियाशील हो ही जाता है। इसलिए स्वास्थ्य में गिरावट की कोई विशेष चिन्ता नहीं हुई है।

चाँग आगे बढ़ गया। बहुत देर तक घूम चुकने के बाद वह फिर उसी रास्ते से वापस लौटे तो उनके मस्तिष्क में एक और बात याद आई कि यदि कुयें में भाप से चलने वाली मशीन डाल दी जाए तो परिश्रम भी बिलकुल कम हो जाय और पौधों को पानी भी खूब मिलने लगे। माली ने वह प्रस्ताव भी स्वीकार कर लिया। भाप का इंजन लग गया, माली को चैन हो गया।

काफी दिन बीतने के बाद एक दिन चाँग की इच्छा उस बाग को देखने की हुई। उसने सोचा था बगीचा अब लहलहा रहा होगा। पर वहाँ जाकर देखा तो स्तब्ध रह गया। पूछने पर पता चला माली बीमार रहता है इसलिए समय बेसमय पानी मिल पाता है। इसी से पेड़ पौधे मुरझा रहे हैं।

चाँग माली को देखने उसके घर गए। सचमुच उसे बीमार पाया। उसके हाथ सूख गए थे, टाँगे कमजोर हो गई थी, पेट दो रोटी से ज्यादा पचा नहीं सकता था। माली का मुँह पीला पड़ गया था।

चाँग ने हँस कर पूछा-”कहो भाई! अभी भी अधिक परिश्रम करना पड़ता है क्या? तो कोई और तरकीब सोचें।” पास खड़ी मालिन ने हाथ जोड़कर कहा-”श्रीमान् जी तरकीब लड़ाने की अपेक्षा आप इन्हें ऐसी सीख दीजिए कि पहले की तरह फिर से अपने हाथ से ही काम करने लगें। मशीन का आराम ही इनकी बीमारी का कारण है।” चाँग अपने एकाँगी चिन्तन पर बहुत ही पछताये। उन्होंने सोचा-”मनुष्य यांत्रिक और बिना परिश्रम के जीवन के आकर्षण में न पड़ता तो वह न तो अस्वस्थ होता न तो रोगी।” उनने माली से अपनी स्त्री की ही राय मान लेने की सीख दी वहाँ से वापस चलें आए। माली अपनी पूर्व जीवन पद्धति में आकर पुनः स्वस्थ हो गया।


क्या है आपकी उम्र?

जन्मतिथि को आधार मानकर व्यक्ति की शारीरिक आयु की गणना की जा सकती है। लेकिन मनुष्य की मानसिक आयु क्या है इस संबंध में इन गणितीय मापदण्डों को नहीं अपनाया जा सकता है। वृद्ध होने का अनुमान भी इसी आधार पर लगाया जाता है जब कि मन में निराशा निष्क्रियता और बूढ़ा होने की मान्यता घर करने लगे तो समय से पूर्व ही बुढ़ापा आ धमक सकता है। आशा उत्साह के साथ जीवन बिताने और स्वउपार्जित ऊर्जा को लोकोपयोगी बनाने वाले व्यक्ति भले ही शारीरिक उम्र से छोटे पड़ते हों पर अपनी मानसिक आयु को अधिक बढ़ा चढ़ा कर सिद्ध कर दिखाते हैं।

प्रायः देखा गया है कि मनुष्य अपनी आयु के संबंध में सदैव अनभिज्ञ और उद्विग्न सा ही बन रहता है। बचपन में युवावस्था का स्वप्न देखता है तो वृद्धावस्था आने पर अपने युवाकाल की कल्पनाओं में ही खोया रहता है। कहने का तात्पर्य व्यक्ति को अपनी सही-सार्थक आयु का भाव तक नहीं होता। दिसम्बर 1984 की स्पूतनिक पत्रिका में मनोविज्ञानी अलेक्जेन्डर क्रोनिक का एक निबंध “हाऊ ओल्ड आर यू” नाम से प्रकाशित हुआ है। इस लेख में उनका मत है कि मानसिक शक्तियों के बलबूते कितनी उपलब्धियाँ हस्तगत की जा चुकी हैं और आगे भी कितनी करने की संभावना है, इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए ही आयु का सही समुचित मूल्याँकन संभव है। निकट भविष्य में भी यही रीति-नीति कार्यान्वित करनी पड़ती है। इस अवस्था में मनुष्य की शारीरिक आयु भले ही कम क्यों ने दिखती रहे, पर उसकी मानसिक आयु अधिक बढ़ी चढ़ी मानी जायेगी। क्रोनिक का कहना है कि लोगों को अपनी मानसिक उम्र का उचित ज्ञान प्राप्त हो सके तो उसकी प्रतिभा को सुविकसित होने में बल मिलेगा जिसे “साइकोलॉजिकल रिजुविनेशन” अर्थात् “मनोवैज्ञानिक कायाकल्प” के नाम से जाना पड़ता है। शरीर की दृष्टि से किसी भी अवस्था में कोई क्यों न बना रहे, पर उसकी मानसिक प्रतिभा अवश्य प्रखर और परिष्कृत होती जायेगी।

स्मरण रहे मनुष्य के मनोभावों का कायिक संरचना पर विशेष प्रभाव पड़ता है। लोगों के मन में यदि यह बद्धमूल विश्वास जम जाता है कि एक समय विशेष के उपरान्त वे जीवित न रह पायेंगे तो वैसे ही आसार नजर आने लगते है। जन साधारण की यह धारण है कि 60 वर्ष से ऊपर की आयु में प्रवेश पाकर योग्यता, क्षमता और प्रतिभा का ह्रास ही होता चला जाता है। जीवन के किसी क्षेत्र में न तो कार्य करने की कोई अभिरुचि रह जाती और न सेवा सहयोग का उपक्रम ही बिठा पाता है। मन में वृद्धावस्था के विचार बीज पनपने और बुढ़ापे की खेती के रूप में प्रकट होने लगते हैं।

शरीर को ही एक मात्र जीवन मान बैठने वाले ने केवल मानसिक उपलब्धियों से अनभिज्ञ बने रहते है वरन् कायिक क्षमताओं का उपयोग भी भली-भाँति नहीं कर पाते और समाज और राष्ट्र के लिए हर तरह से भारभूत ही सिद्ध होते हैं।

विज्ञजनों का कहना है कि बचपन तो अबोध अवस्था है और जवानी बोध अवस्था लेकिन वृद्धावस्था एक परिपक्व-बोध अवस्था का नाम है। यहाँ पर बोध का अभिप्रायः अन्तःबोध से होता है। यानी मनुष्य अपनी मानसिक चेतना को इतना सजीव और सक्रिय बना लेता है कि शरीर की बढ़ती हुई उम्र भी उसके क्रिया-कौशल में किसी भी प्रकार का अवरोध उत्पन्न नहीं कर सकती।

यदि इतना मर्म समझ में आ जाए तो जीवन का हर क्षण बहुमूल्य नजर आएगा, कभी भी शारीरिक या मानसिक बुढ़ापा शरीर पर भारभूत होकर नहीं लदेगा। सारा जीवन स्फूर्ति व मस्ती से भरा होगा।


सब धर्मों में एक ही है, उस परम सत्ता का स्वरूप!

ईश्वर एक है, पर भिन्न-भिन्न धर्मो में उसकी व्याख्या-विवेचना विभिन्न प्रकार से की गई है। कहीं उसे सातवें आसमान में बताया गया है, तो कहीं उसकी अवस्थिति की कल्पना कण-कण में की गई है, कहीं उसे “रसो वै सः” अर्थात् आनन्द से अभिपूरित सत्ता कहा गया है। गहराई से विचारने पर सभी का सार-निष्कर्ष लगभग एक जैसा प्रतीत होता है।

इस्लाम धर्म में ईश्वर को अल्लाह के नाम से जाना जाता है। वही कयामत यानी महाप्रलय का मालिक हे। कुरान में लिखा है वही अव्वल है, वही आखिर है, वही प्रकट है और वही गुप्त है और वही सब चीजों का जानने वाला है। अल्लाह का इल्म अर्थात् ज्ञान सम्पूर्ण जगत में समाया हुआ है। कुरान में ‘रब्ब’ शब्द भी देखने को मिलता है, जिसका अर्थ ही ‘महान’ होता है। सफाहत शिलालेखों में अल्लाह का स्त्रीलिंग ‘अल्लात’ भी देखने को मिला है। ‘लाह’ शब्द का अर्थ सूर्य के प्रकाश के सदृश्य चमक का बोध कराता है। एक बार मुहम्मद पैगम्बर ने परमात्मा को अर-रहमान कहकर पुकारा तो लोगों ने बड़े ही संदेहास्पद ढंग से पूछा-”जब ईश्वर को एक नाम से पुकारना है तब फिर दूसरे नाम का क्या महत्व रह जाता है?” मुहम्मद साहब ने इसका उत्तर बड़ी बुद्धिमत्ता के साथ दिया और बताया कि ईश्वर की कई प्रकार की श्रेष्ठ पदवियाँ है। कुरान की आयत (7ः179) इसी तथ्य की पुष्टि करती है। जो अल्लात-अल्लाह यानी स्त्री-पुरुष जैसा लिंग भेद करते हैं उनसे सदैव दूर ही रहना चाहिए। नाम कोई भी रहे, वे तौकीफी यानी कुरान-सम्मत होना चाहिए। कुरान (6ः12.59) में उसे सर्वज्ञानवान सर्वशक्तिवान और सृष्टि के कण-कण में विराजमान बताया और कहा है। “वह तो गुप्त रूप से की गई फुसफुसाहट को भी आसनी से सुन-समझने में सक्षम है। उसकी इच्छा के बिना तो संसार की कोई गतिविधि सम्पन्न नहीं हो सकती। ईश्वर के अनेक नामों में अलवद्द (प्रेम करने वाला) अल्-तव्वाव (कृपा दृष्टि रखने वाला) अल्-रदूक (दयावान), अल् हादी (मार्ग दर्शक) अल्मोमिन (संरक्षक) अल्-मुहैमिन (आश्रयदाता) अलसलाम (शांतिदाता) आदि को प्रमुख रूप से लिया जाता है, जिन्हें देखकर इतना ही कहा जाता है कि भगवान श्रेष्ठताओं का, सद्गुणों का समुच्चय मात्र है।”

यहूदी धर्म ईश्वर को ‘यहोवा’ के नाम से जाना जाता है। हजरत मूसा इस धर्म के सूत्र-संचालक माने जाते है। यहूदियों का दृढ़ विश्वास है कि उनका मसीहा फिर से इस धरती पर अवतरित होगा और धार्मिक वातावरण विनिर्मित करेगा। ओल्ड टेस्टामेंट (साम 82.6) में लिखा है कि यहोवा के अतिरिक्त और भी बहुत सारे देवी-देवता हैं, पर उन सब की उत्पत्ति ईश्वर से ही हुई है। मनुष्य उसकी सर्वप्रिय संतान है। होसिया, 11.3,4,8 में इसी तथ्य की पुष्टि की गई है। इस धर्म ग्रन्थ के उत्पत्ति अध्याय में एडम और ईव नामक दो पुरुष स्त्री थे उनने ईश्वरीय निर्देशों का उल्लंघन करते हुए ईडन गार्डन से फल तोड़ कर खा लिया तभी से संसार में जन्म और मृत्यु का चक्र चला आ रहा है। यहूदी धर्म में मसीहा का बड़ा महात्म्य है। उसी को यूनानी भाषा में ‘प्रोफेट’ के नाम से जाना जाता है। ‘प्रो’. का अर्थ पक्ष में और फीटेस का अभिप्राय बोलना अर्थात् प्राणियों के कल्याण की बात सोचने और बोलने वाला ही परमात्मतत्व है। मनुष्य और परमात्मा के मध्य की कड़ी ही “प्रोफेट” है। एक्सोडस 12.50 में ईश्वरीय अनुग्रह की ही चर्चा की गई है। यहूदियों का मूल धर्मग्रंथ ‘तोरा’ है। ‘तालमुड’- को विधि-व्यवस्था की पुस्तक समझा जाता है। एक श्रुति है तो दूसरी स्मृति। इनके अतिरिक्त तीसरा धर्मग्रंथ ‘मिद्राशिम’ है, जिसमें नीतिमत्ता की कथाओं का ही उल्लेख है। ईश्वरीय प्रेरणाओं से ओत-प्रोत इन धर्म ग्रन्थों को लोग पवित्रता का प्रतीक समझ कर तदनुरूप आचरण भी करते देखे गये है।

कुँग-फुत्सु जिन्हें अँग्रेजी में कन्फ्यूशियम के नाम से जाना जाता है चीन के सर्वप्रथम धर्म गुरु कहे जाते है। उनने ईश्वरीय सत्ता का स्थान मानवी अन्तराल को ही बताया है। इसलिए वे प्रायः यही काल करते थे कि “अपना सुधार संसार की सबसे बड़ी सेवा है। अनीति एवं अनाचार बरतने ले राजा महाराजाओं से उनने यही बात कहीं। उनने नैतिक एवं धार्मिक जीवन को ही ईश्वर का स्वरूप माना है “जेन, चुन-त्सु.लि.ते. और वेन नैतिकता के पाँच सूत्र हैं, जिन्हें जीवनचर्या में समाविष्ट करने का अभिप्राय ही ईश्वरीय अनुग्रह को प्राप्त करने का होता है। सहृदयता शालीनता, सदाचरण, शक्ति और शान्तिपूर्ण ढंग से ही उस परमतत्व का अनुभव किया जा सकता है। उनके मतानुसार मनुष्य की भौतिक सत्ता से परे कोई अदृश्य एवं आध्यात्मिक चेतना अवश्य है जो इसका नियमन एवं नियंत्रण करती है।

ताओ धर्म के संस्थापक श्री लाओत्से के अनुसार “मनुष्य ताओ का स्वरूप नहीं बता सकता है, उसका कोई नाम नहीं है। जो उसे अपनी भाषा में जानने का प्रयत्न करते हैं वे उससे सदा दूर ही बने रहेंगे। वह परमशक्ति शब्द और व्याख्या से परे है। “उसका” आदि और अंत नहीं है। सबकी उत्पत्ति उससे होती है, “उसकी” उत्पत्ति किसी से नहीं होती वह जन्म-मरण से मुक्त है।”

जापान का शिंतों धर्म बौद्ध और कन्फ्यूशियस धर्म से बहुत पहले का है। यह सूर्य-उपासक धर्म है। प्राकृतिक जीवन के प्रति अगाध प्रेम होने के कारण ही उनने अपने इष्ट देव का चयन किया है। सूर्य की देवी को ही वे देवाधिदेव कह कर पुकारते और उसकी उपासना कर उपक्रम बिठाते हे। उनकी मान्यताओं के अनुसार देवी की सेवा-सहायता के लिए पाँच देवता सदैव तत्पर बने रहते है।

आदिवासियों में भी ईश्वर विश्वास कम नहीं है। भारत के आदिवासी संताल सूर्य को सिनकान्दू कह कर पुकारते और ईश्वर के सदृश सम्मानास्पद समझ कर पूजा-उपासना की विधि व्यवस्था का उपक्रम बिठाते हैं। कुछ लोग ऐसे भी हैं, जिनका कोई धार्मिक संगठन तो नहीं बना है, पर ईश्वरीय सत्ता के अस्तित्व के संबंध में वे पूर्णतः सहमत है। आस्ट्रेलिया के आदिवासी लोगों का कहना है कि ईश्वर बहुत समय पूर्व धरती पर रह चुका है और बाद में अपने स्थान पर चला गया। वहीं बैठ कर भूलोक के निवासियों के कर्मों का निरीक्षण करता और तदनुरूप प्रतिफल प्रदान करने की योजना भी क्रियान्वित करता रहता है। ‘अतनाम’ नाम ईश्वर का ही है। बेबीलोनिया के लोग पहले तो प्रकृति पूजा लोग पहले तो प्रकृति पूजा को ही महत्व देते रहे, पर शनैःशनैः उनकी धार्मिक मान्यताएँ परिवर्तित होती चलीं गयी। वर्तमान में वे परमात्मा सत्ता को त्रिमूर्ति का प्रतीक यानी स्वर्ग, पृथ्वी और नरक के रूप में समझ कर ही चलते और अपने क्रिया-कलापों का निर्धारण करते है। असीरियन लोगों का ईश्वर ‘असुर’ के नाम से प्रख्यात है। उनके मतानुसार “जीवन का आधार भौतिक तत्व नहीं, वरन् इससे परे कोई सत्ता है। वह अविनाशी है।”

हमें ईश्वर को उसके आकार प्रकार अथवा अवस्थिति के आधार पर विभक्त नहीं करना चाहिए, वरन् उसके अनुशासन और विधि-व्यवस्था को प्रमुखता देनी चाहिए। इस दृष्टि से विचार करने पर विभिन्न धर्मों में ईश्वर का स्वरूप समान प्रतीत होता है।


Quotation

प्रातःकाल की प्रार्थना कुँजी है, जो सदाशयता के द्वार खोलती है। सायंकाल की प्रार्थना चटखनी के समान है जो चोरों को घात नहीं लगाने देती।


दो प्रचण्ड शक्तियों का समन्वय

विज्ञान को शक्तिपुँज कहा जा सकता है, पर वह जड़ पदार्थों से विनिर्मित होने के कारण विवेक शून्य स्तर का है। स्वच्छन्दता मिलन पर वह ऐसा भी कर बैठ सकता है, जिससे भारी हानि उठानी पड़ और पछताते हुए शिर धुनना पड़े। चूल्हे की चिनगारी को उचटने का अवसर मिल जाय तो वह अपने घर का छप्पर ही नहीं जलायेगी वरन् पास पड़ोस को चपेट में लेते हुए पूरे गाँव को भस्मसात करके रहेगी। इसलिए आग को सतर्कतापूर्वक ढक कर रखा जाता है।

समर्थता अच्छी बात है पर उसके साथ सदुपयोग करने और सुरक्षा बनाए रखने की शर्त अनिवार्य रूप से जुड़ी हुई है, अन्यथा खतरा ही खतरा मँडराता रहेगा। धन दौलत को जहाँ तहाँ पड़ी रहने देने पर चोर डाकुओं का आक्रमण हुए बिना नहीं रह सकता। अस्त्र शस्त्रों को लूट ले जाने की घात में भी लुटेरे रहते है इसलिए उनकी सुरक्षा की व्यवस्था की जाती है। बिक्री पर लाइसेन्स रहता है। मादक पदार्थों के सेवन की भी खुली छूट नहीं रहती। कारण कि ये सब असाधारण शक्तिशाली होते हैं और बारूद के भड़क उठने पर उत्पन्न होने वाले विनाश की तरह संकट खड़े करते हैं।

भौतिक विज्ञान और उनके सशक्त उत्पादनों का लाभ तभी है जब उनके ऊपर दूरदर्शी प्रयोक्ता का समुचित अंकुश-नियंत्रण हो। अन्यथा असुरक्षित छोड़ देने पर लाभ के स्थान पर हानि सहने का संकट ही सहन करना होगा। भूल यहीं हुई है और हो रही है। समर्थ होने के अहंकार ने अपने आप को सर्वत्र स्वतन्त्र मान लिया है। उसके ऊपर नियन्त्रण की भी आवश्यकता है, यह किसी ने अनुभव नहीं किया। फलस्वरूप स्वच्छन्दता इस कदर बढ़ गयी कि विज्ञान ने पदार्थ सम्पदा की उधेड़-बुन करते रहने तक सीमित न रहकर तत्वदर्शन को भी अपने ढाँचे में ढालना आरंभ कर दिया।

दर्शन के क्षेत्र में विज्ञान का हस्तक्षेप बढ़ने का प्रतिफल लगभग नास्तिकता जैसा हुआ है। प्राणी को जब पदार्थ मात्र मान लिया गया तो उस पर भी जड़ नियम लागू करने की बात सोचना स्वाभाविक है। ऐसी दशा में चेतना की स्वतन्त्र सत्ता नहीं रहती तो उस पर उन कर्तव्यों और दायित्वों का आरोपण कैसे किया जाय जो भाव संवेदना, उदारता, परमार्थ परायणता, सेवा, सद्भावना, शालीनता, संयम जैसी दिव्य विभूतियों से सम्बन्धित हैं यदि इन्हें अनावश्यक ठहरा दिया जाय तो मानवी मर्यादाओं का पालन और वर्जनाओं का अनुशासन मानने की कोई आवश्यकता ही नहीं रह जाती। ऐसी दशा में समाजनिष्ठ और परस्पर आदान प्रदान पर निर्भर मानवी सत्ता की चारित्रिक उत्कृष्टता को मान्यता मिलना कठिन हो जायगा।

सम्प्रति संव्याप्त विपत्तियों, समस्याओं, विडम्बनाओं और अनिष्ट आशंकाओं के मूल में एक ही कारण है मनुष्य के स्तर में निकृष्टता का समावेश। उसकी कृतियाँ संसार में स्वर्ग भी उतार सकती है और देखते देखते नरक का माहौल भी बन सकती हैं। यदि संसार को सुखी समुन्नत बनाना है तो प्रधानतया एक ही उपाय अपनाना होगा- उसे सुसंस्कृत बनाना, शालीनता अपनाने के लिए भावना स्तर पर तैयार करना। यह कैसे बन पड़े? इसके उत्तर में एक ही बात कही जा सकती है कि उसके दृष्टिकोण में उत्कृष्ट आदर्शवादिता का समावेश कर सकने वाले तत्वदर्शन को अपनाने के लिए उसके अन्तराल को सहमत किया जाय। अन्तराल की गहराई में अनाचार का पक्षधर अविवेक पहले से ही जड़ जमाये बैठा होता है। उखाड़ना इसी क्षेत्र में जमी हुई जड़ों को है। परिवर्तन उस दृष्टिकोण का किया जाना है, जिसका स्थायित्व आस्थाओं और भावनाओं से सम्बन्धित है।

यह हेर फेर जीवन दर्शन आस्थाओं के अभ्यास और स्वभाव पर प्रचलन के प्रभाव पर निर्भर है। इसके लिए अध्यात्मक पर मान्यताओं, आस्थाओं और आदतों को स्वभाव में सम्मिलित करना होगा। यही है व्यक्तित्व के स्तर का मूलभूत आधार। इसी को परिष्कृत करने के लिए अध्यात्म का समग्र ताना बाना बुना गया है। इस भाव संवेदना में जिस आधार पर उत्कृष्टता का मानवी गरिमा के अनुरूप किया जा सके, उसी आस्था नियोजन के आधार पर व्यक्ति के गुण कर्म और स्वभाव का निर्माण होता है। यही है वह मेरुदण्ड जिसके सही सीधा होने पर कोई सीधा खड़ा होने और तनकर चलने में समर्थ हो सकता है।

इस तथ्य को इतिहास और वर्तमान के जन स्तर पर दृष्टिपात करके भली प्रकार जाना जा सकता है कि ऊँचे दृष्टिकोण एवं अच्छे स्वभाव के कारण ही लोग सर्वसाधारण की दृष्टि में अपने को प्रामाणिक एवं विश्वास सिद्ध कर पाते है। ऊँचा उठने, आगे बढ़ने और सफलताएँ अर्जित करने का यही मार्ग है। इसी विशिष्टता के आधार पर कोई महामानव स्तर के अपना और अन्यान्यों का कल्याण कर सकने वाले परमार्थ स्तर के कार्य कर पाता है। इस प्रकार अध्यात्मक का अवलम्बन प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से हर किसी के लिए लाभदायक ही सिद्ध होता है। नीति निष्ठा अपनाये रहने पर आत्मसंतोष का, हलके फुलके प्रसन्न चित्त बने रहने का लाभ मिलता है। उसी में वह शक्ति होती है कि अपने अनुकरण से संपर्क क्षेत्र वालों को अधिक श्रेष्ठ समुन्नत बना सकने में समर्थ हो सके। संसार के हर क्षेत्र की चिरस्थायी और दूरगामी सत्परिणाम उत्पन्न कर सकने वाली मनःस्थिति और परिस्थिति हाथ लगती है। दूसरों को सुधारना समझाना भी ऐसे ही लोगों के लिए संभव है उसी का परामर्श विश्वस्त समझा जाता है जो अपनी कथनी और करनी को एक कर चुका हो। व्यक्तित्व को इस स्तर का बना सकना मात्र उन्हीं क लिए संभव हो सकता है, जिन ने मानवी गरिमा के साथ जुड़े हुए नीतिनिष्ठ, सामाजिक एवं आदर्शनिष्ठ तत्वज्ञान को चिन्तन और चरित्र में गहराई तक स्थापित किया है। इस प्रकार आस्था संस्थान को उत्कृष्ट बना लेना हर किसी के लिए हर प्रकार लाभदायक सिद्ध होता है। समझा जाना चाहिए कि अध्यात्म तत्वदर्शन से संबंधित अनेकानेक प्रतिपादन, अनुभव एवं कर्मकाण्ड इसी उद्देश्य को लेकर बनाये गये हैं जो लोक और परलोक को प्रत्यक्ष और परोक्ष हर कसौटी पर बहूमूल्य सिद्ध करने में समर्थ होते है। जिस आस्था संकट ने अनेकानेक समस्याओं, उलझनों, विपत्तियों, विडंबनाओं और आशंकाओं को जन्म दिया है उन्हें निरस्त करने का वास्तविक उपाय यही है कि लोकमानस को आदर्शवादी निष्ठाओं से अनुप्राणित किया जाय। हर किसी का हर प्रकार कल्याण इसी अवलम्बन को अपनाने में है।

विज्ञान ने सत्य की शोध को लक्ष्य बनाया है। जब भी भूल मालूम हुई है उसे सुधारा है। जो हस्तगत हुआ है उसे आत्यंतिक सत्य न मानकर आगे भी खोज चलते रहने की उपयोगिता को स्वीकार किया है। इन्हीं मान्यताओं के आधार पर उसने इतनी प्रगति की है और भविष्य में भी और भी अधिक कर गुजरने की संभावना है। यही तथ्य यदि अध्यात्म क्षेत्र में अपनाया गया होता और सत्य के अधिक निकट पहुँचने के लिए आग्रह रहित मानस बनाकर रखा गया तो क्रमशः निखार आता चलता और अध्यात्म में भी वह विश्वास मिला होता तो विज्ञान की उपलब्धि है।

अध्यात्म और विज्ञान के समन्वय का तात्पर्य यह है कि मनुष्य को भौतिक और आत्मिक प्रगति का संतुलन बिठाने, मिल-जुलकर काम करने के लिए सहमत किया जाय। वैसे ही प्रचलनों को जन्म दिया जाय। सत्य की शोध के लिए दोनों में समान रूप से उत्साह रहे संभव सत्प्रगति के मार्ग में किन्हीं भी पूर्वाग्रहों को बाधक न बनने दिया जाय। इसी में सबका सब प्रकार कल्याण है।


Quotation

सफलता का रहस्य है लक्ष्य को सोच विचार कर निर्धारित करना और फिर उस पर संकल्प और साहस के साथ चल पड़ना।


त्रिविध आधारों को अपनायें, प्रतिभाशाली बनें!

अँग्रेजी के विख्यात लेखक अलेक्जेन्डर हैमिल्टन छोटी आयु में ही लेख कहानियाँ और कविताएँ लिखने लगे थे। उनके सम्बन्ध में यह माना जाता था कि ईश्वर की उन पर विशेष कृपा है। इसीलिए तो वह बचपन से ही मेधावी और अद्वितीय प्रतिभाशाली है। परन्तु अलेक्जेन्डर हैमिल्टन की स्वयं अपने बारे में धारणा लोगों की धारणा से भिन्न थी। उनका विश्वास था कि उनकी प्रतिभा के विकसित होने का कारण उनके द्वारा किया गया श्रम है। अपने प्रतिभाशाली होने का राज बताते हुए हैमिल्टन अपने शिष्यों से कहा करते थे “लोग समझते है कि मेरी सफलता का रहस्य कोई अनूठा चमत्कार है। पर मैं जानता हूँ कि यह सब मेरी श्रमशीलता और मनोयोग का परिणाम है।”

लेखन हो या कोई क्षेत्र प्रत्येक कार्य में सफलता प्राप्त करने के लिए अभ्यास और अभ्यास की निरन्तर आवश्यकता है। अन्तःशक्तियाँ तो प्रत्येक के अन्तराल में छुपी है। बीज बोने, अंकुरित होने और फसल बोने की प्रतीक्षा न की जाय न ही इसके लिए कोई परिश्रम किया जाय तो बीज यों ही सड़ गल जाएगा। उसी प्रकार अन्तर्निहित प्रतिभा को पहचानते हुए उसे अंकुरित करने के लिए प्रयास न किए जायँ और पल्लवित पुष्पित होने तक धैर्य न रखा जाय तो सड़ने गलने वाले बीज की तरह प्रतिभा भी सड़ गल जाती है।

संसार में जितने भी महान विचारक और सफल व्यक्ति हुए है। उनकी सफलता का रहस्य उनके अध्यवसाय में ही निहित रहा है। जिन लेखकों विचारकों की रचनाओं को सर आँखों पर लिया जाता है और समझा जाता है कि मानवता उनसे उपकृत हुई है, उन्होंने अपनी रचनाओं को निखारने के लिए बार-बार अभ्यास किया है। बार-बार लिखा, बार-बार काटा और फिर लिखा। प्लेटों ने अपनी ख्याति प्राप्त पुस्तक “रिपब्लिक” के पहले वाक्य को नौ तरीके से लिखा था तब कहीं जाकर वे उस वाक्य को अन्तिम रूप दे सके। अँग्रेजी कवि पोप एक छंद को पूरा करने के लिए उसे कई बार लिखते थे। चाकलोट ब्रोटे कई बार एक वाक्य को अलग-अलग ढंग से लिखते थे और तब उसे अंतिम रूप देते थे “डिक्लाइन एण्ड फाल” नामक पुस्तक के प्रसिद्ध लेखक और विचारक गिवन ने इस पुस्तक का पहला अभ्यास तीन बार लिख था और पूरी पुस्तक 25 वर्ष तक मेहनत करने के बाद पूरी कर सके थे। कार्लमार्क्स ने अपना सारा जीवन लगा कर “दास कैपिटल” पुस्तक लिखी जिसमें प्रतिपादित समाज व्यवस्था को संसार के 14 बड़े राष्ट्रों ने अपना रखा था।

इन सब व्यक्तियों के कार्यों की गरिमा सिर्फ इसी कारण सिद्ध नहीं हुई कि वे श्रमशील थे। श्रम-शीलता तथ्य एक महान पहलू है। इसके अन्य पहलू भी हैं-धैर्य एवं मनोयोग। इन तीनों को मिश्रित किए बगैर सफलता महानता का होना क्षमतावान् बनना असंभवप्राय है। यों श्रम तो अनेकों लोग करते हैं। इसमें किसान मजदूर सभी शामिल हैं। परन्तु सभी श्रमशील होते हुए प्रतिभावान क्यों नहीं हो जाते? इसका एक ही कारण है कि उनके श्रम के साथ धैर्य व मनोयोग नहीं जुड़ा है। श्री रामकृष्ण इस संदर्भ में अपने गाँव के किसान की कहानी सुनाया करते थे। उस किसान ने कुआँ खोदने का प्रयास किया। 7-8 फीट खोदता और पानी न मिलने पर जगह बदल देता। इस तरह उसने लगभग 10 जगह प्रयास किया, कुल मिलाकर 70-80 फीट गहरा खोद डाला। पर धैर्य और मनोयोग के अभाव में श्रम निष्फल ही हुआ। श्रमशीलता की परिणति हताशा में हुई।

इस तरह अनेकों हताशा संसार में मिल जायेंगे। तो श्रम तो करते हैं, पर धैर्य मनोयोग से रिश्ता नहीं रखते। सही कहा जाय तो ऐसे लोगों में श्रम के प्रति निष्ठा नहीं है। मनोयोग के अभाव में कार्य को भारभूत समझते हैं। मन में हमेशा यही भाव रहता है कब इससे छुट्टी मिले। कार्य को जब इन लादे गए भार की तरह उतार फेंकना चाहते हैं। यही कारण है कि एक बार भी असफल होने पर उनका मनोबल लड़खड़ा जाता है।

इस तरह की मनोवृत्ति आज-कल के छात्रों में खूब घर कर रही है। पढ़ाई का सीधा सम्बन्ध नौकरी से मान लिए जाने के कारण मन का अधिकाँश भाग उसी में लगा रहता है। तरह तरह की कल्पनाएँ गढ़ा करता है। इस मनोवृत्ति को पहचानने के कारण रस्किन ने एक नया शब्द गढ़ा है “समग्र श्रम”। उसके अनुसार इस तरह के श्रम में धैर्य और मनोयोग भी शामिल है। इसी से जीवन निखरता है। प्रसिद्ध विचारक स्माइल्स ने लिखा है-”मनुष्य ने जो भी कुछ विशेष उपलब्धियाँ अर्जित की हैं उसका मूल आधार यही है। मनुष्य में जो कुछ भी महान है-इसी का परिणाम है। मनुष्य की सभ्यता इसी की देन है।”

रस्किन ने श्रम की समग्रता को जो सिद्धाँत दिया, उसमें चमत्कारी परिणाम प्रस्तुत करने की क्षमता है। कोई भी व्यक्ति किसी भी स्थिति में क्यों ने काम कर रहा हो, वह किसान हो या कारीगर अथवा मजदूर, विद्यार्थी, व्यापारी, कोई भी क्यों नप हो, जैसे ही श्रम ‘धैर्य’ मनोयोग के मिश्रित स्वरूप को अपनाता है। उसमें कार्य के प्रति एक नया उत्साह जागता है। अन्दर से कर्त्तव्य के प्रति समर्पण की भावना जागती है। फिर पहले की बेचैनी भाग जाती है। क्योंकि इसका कारण ही मनोयोग का अभाव था। इतना ही नहीं कार्य की बारीकियाँ समझ में आने लगती है। गुत्थियाँ सुलझने लगती है। मौलिक सूझ बूझ जाग जाती है।

इसी के सहारे मजदूर कारीगर बनते देखे जाते है और कारीगर विशेषज्ञ। माइकेल फैराडे प्रसिद्ध वैज्ञानिक हैम्फ्री डेवी के यहाँ मजदूर के रूप में भर्ती हुआ था। उसका काम था प्रयोगशाला की सफाई करना। सफाई तो दूसरे भी करते थे पर उनका श्रम रोजी रोटी का साधना भर था। उनका मन इसे भारभूत समझता। जैसे ही छुट्टी मिलती गदगद हो जाते। किंतु माइकेल तो काम के समय में भी प्रसन्न रहता। उत्साह के साथ सूझ बूझ जगी। श्रम की समग्रता के बल पर मजदूर माइकेल डायनुमों और इलेक्ट्रोलिसिस के सिद्धांत के आविष्कर्ता मूर्धन्य वैज्ञानिक माइकेल फैराडे बन गया। यही बात मत्स्य नारमन ने उसे अपनी प्रयोगशाला में स्पेसीमेन की बोतलों की सफाई के लिए खड़ा रखा था। सफाई तो करता साथ जन्तुओं की रचना व क्रिया की बारीकियों को देखता। एक दिन उसने अपनी इस रुचि से नारमन साहब को चकित कर दिया। समग्र श्रम का चमत्कारी परिणाम मजदूर गुन्थर को एक ख्याति लब्ध मत्स्य विज्ञानी बनाने वाला हुआ।

समग्रता के अभाव में श्रम के अन्याय पक्ष भी अधूरे रह जाते है। धैर्य तो आलसियों के भी होता है। अपनी दीर्घ सूत्रता को वे धैर्य के विकास होने से रहा, उलटे जड़ता ही आती है।

किसी भी तरक का एकाँगी क्रम जीवन की क्षमताओं को भली प्रकार नहीं उभार पाता आधा अधूरा पन बना रहता है। यह अधकचरी और भौंड़ी स्थिति न रहे, इसके लिए शारीरिक श्रम मानसिक एकाग्रता और इन दोनों की अंतःक्रिया के परिणाम धैर्य बना रहे। इन तीन का सम्मिश्रण आयुर्वेदिक औषधि त्रिफला की तरह बल्कि उससे भी कहीं बढ़कर है।

इसे अनपायें और स्वीकारें। इसके परिणाम स्वरूप जीवन एक नए रूप में ढलेगा। इस कायाकल्प की प्रक्रिया से पुराने मल, विक्षेप आवरण आलस्य, प्रमाद जड़ता सबसे उसी तरह विमुक्त होते बन सकेगा जैसे कि सांप अपनी केंचुली छोड़ देते है। निखरी हुई प्रतिभा अपनूतन सौंदर्य को पा सकेगी। स्वयं भी कृतकृत्य होंगे, औरों को प्रोत्साहन मिलेगा।


Quotation

मनुष्य के तीन सौभाग्य है। एक मनुष्य जन्म। दूसरा मानवी गरिमा का अवलम्बन। तीसरा महामानवों के साथ घनिष्टता।


परोक्ष जगत से उतरते दिव्य संकेत

दैवी चेतना न किसी से पक्षपात करती है, न किसी को दीन-हीन अथवा संकटपूर्ण स्थिति में रहने देना चाहती है। कई बार इस माध्यम से कई लोगों को महत्वपूर्ण सूचनाएँ मिलती हैं, जबकि अनेक लोग इस संपर्क से सर्वथा वंचित बने रहते है। ऐसे प्रकरणों में दैवी सत्ता की कृपा कुछ व्यक्ति विशेषों पर ही क्यों होती है? इसके मूल में पात्रता को ही प्रधान कारण मानना चाहिए।

अमेरिका के चार्ल्स फिल्मोर एक सात्विक व सन्त प्रकृति के व्यक्ति थे। वे अपना कुछ समय नित्य ही ध्यान-साधना में लगाया करते थे। अपने उत्तरार्ध जीवन में उन्होंने जिस ‘सोसायटी ऑफ सायलेण्ड यूनिटी’ नामक संस्था की स्थापना की थी, उसकी अभिप्रेरणा उन्हें दैवी सत्ता द्वारा ही प्राप्त हुई थी। बाद में इस संस्थान ने अमेरिका एवं विश्व के अनेक देशों में अध्यात्म का संदेश पहुँचाने एवं लोगों को एक उत्कृष्टा के मार्ग पर ले चलने का एक अभियान शुरू किया, जिसके परिणाम काफी उत्साहवर्धक रहे। अभी भी यह संस्था पूरी तरह सक्रिय है।

भगवान बुद्ध को राजपाट छोड़कर संन्यासी बन जाने और बाद में बुद्धत्व प्राप्त कर समस्त विश्व को सत्य, अहिंसा, प्रेम, सदाचार के अध्यात्म पर पर ले चलने की प्रेरणा भी दैवी चेतना ने ही दी थी। एक दिन उन्हें ऐसी अनुभूति हुई जैसे कोई कह रहा हो कि सामान्य मनुष्य जन्म लेता है, और पेट प्रजनन की सामान्य प्रक्रिया से गुजरते हुए भरण को प्राप्त होता है। तुम्हारा जन्म जीवन को इस प्रकार गुजारा देने के लिए नहीं हुआ। तुम्हें असाधारण कार्य करना है। इसके लिए स्वयं को तैयार करो। जीवन सम्पदा का सदुपयोग और संसार का मार्ग दर्शन करने के लिए जुट पड़ो। इस दिव्य संदेश के बाद से ही उनके मन में वैराग्य उदय हुआ और राज्य पाट छोड़ कर वे तप करने चल पड़े। बाइबिल के बारे में कहा जाता है कि रेविलेशन के सारे संदेश और भविष्यवाणियां मानवी हृदय में ‘इलहाम’ के रूप में उतरे है। ग्रहणकर्त्ता के बाद में उन्हें पुस्तकाकार का रूप दिया। ऐसा ही मान्यता ज्ञान-विज्ञान के अगाध भण्डार वेदों के बारे में है।

अचेतन मन के माध्यम से दैवी संकेतों का मिलना एक महत्वपूर्ण तथ्य है। अब से 600 वर्ष ईसा पूर्व बेबीलोन के राजा ने बूचाउ को इसी के माध्यम से यह संदेश मिला था कि उसका शीघ्र ही पतन होने जा रहा है।

मेडिया के राजा अस्ट्यागेस पूर्वाभास हुआ था कि उनकी लड़की राजकुमारी मैण्डेना का विवाह एक अन्तर्जातीय लड़के से हो गया है। उससे जो पुत्र पैदा हुआ उसने राजा को पदच्युत कर राज्य छीन लिया। वह इस पूर्वाभास से इतना घबराया कि राजकुमारी की शादी से सामान्य सीधे-साधे पारसी युवक से करदी, ताकि राज्य और राजा को उससे किसी प्रकार की हानि की संभावना न रहे, पर होनी को नहीं टाला जा सका। उनसे जो पुत्र हुआ, उसने न सिर्फ अस्ट्योगेस को ही पराजित किया, वरन् दूर-दूर तक अपने राज्य का विस्तार किया और साइरस महान कहलाया।

मिश्र के राजकुमार तुल्मेस को एक बार एक दिव्य संदेश प्राप्त हुआ कि तुम्हें छोटे राज्य का न रहने दूँगा। बड़े क्षेत्र का शासक बनाऊँगा। ऐसा ही हुआ। बड़े क्षेत्र का शासक बनाऊँगा। ऐसा ही हुआ। राजगद्दी पर बैठते ही परिस्थितियाँ उसके अनुरूप बनने लगीं और सचमुच कुछ ही वर्षों में वह एक बड़े साम्राज्य का शासक बन गया। दैवी प्रेरणा सदैव पवित्र अंतःकरण में अवतरित होती है व भविष्य की झाँकी दिखा जाती है।


जिजीविषा की अजेय चमत्कारी सामर्थ्य

यह किसने किया? कम से कम यह मनुष्य के द्वारा तो संभव नहीं। सामान्य आदमी ऐसे आश्चर्यजनक वाक्य कहते सुने जाते है। किंतु मनोबल के धनी इन आश्चर्यचकित कहने वाले कामों को करते देखे जा सकते हैं। ये उद्गार पश्चिम जर्मनी के एक युक कुर्त एंजील पर पूरी तरह सही उतरते हैं, जिसका सारा जीवन ही ऐसे कारनामों से भरा पड़ा है।

एंजील का बचपन से शौक था दुस्साहस भरे काम करना। दुस्साहस ऐसा नहीं कि किसी को पीड़ा पहुँचाए या किसी को डरा धमका कर अपना वर्चस्व बनाए। बल्कि ऐसा दुस्साहस जिसकी सामान्य स्थिति में मनुष्य कल्पना भी न कर सके। ऐसे रोमाँचक कारनामों में उसे लड़ते वायुयानों से पैराशूट बाँधकर छलाँग लगाना सर्वाधिक प्रिय था और एक बार पैराट्रपिंग पुरस्कार भी जीत चुका था। तेज गति से उड़ते विमानों पर से छलाँग लगा कर उसने कई बार लोगों को रोमाँचित किया।

घटना उस समय की है जब कुर्त एंजील ने पहली बार रोमाँचक प्रदर्शन किया था। इससे पहले वह अभ्यास ही करता रहा था उसकी अभ्यास पारंगतता तथा प्रत्युत्पन्न मति को देखकर अधिकारियों ने एंजील का छाताधारी दल के नेतृत्व का अवसर प्रदान किया।

जिस वायुयान में वह उसके दल के अन्य सदस्य सवार थे, उस वायुयान ने पहले ओवहैजन के इर्द-गिर्द वाले क्षेत्र में उड़ा भरी। फिर एकदम ऊँचाई पकड़ना आरम्भ किया करीब 1500 फीट की ऊँचाई पर विमान पहुँच गया। इतनी ऊँचाई पहुँच विमान के पिछले हिस्से से कितने ही पैराशूटधारी कूद पड़े।

वह कूद तो गया पर पैराशूट नहीं खुल सका। उसमें कहीं कोई गड़बड़ी आ गई थी और बजाए खुलने के पैराशूट रस्सियों सहित उसके घटना तथा बदन के इर्द-गिर्द लिफ्ट गया था। कुर्त ने लुढ़कते हुए उन रस्सियों को काट डाला। प्राणों पर प्रत्यक्ष संकट था।

लेकिन जैसे-जैसे वह रस्सियाँ काटता जा रहा था, वैसे-वैसे रस्सियाँ उसके शरीर पर लिपटती जा रही है। वह नब्बे किलोमीटर प्रति घण्टे की गति से जमीन पर गिरता जा रहा था, पर इतने पर भी उसने होशोहवास नहीं खोए थे। पैराशूट से बुरी तरह लिपटे हुए वह जमीन पर गिरा। इस बुरी तरह गिरा कि वह अपने ही भार से पीठ के बल लगभग दो फूट की गहराई में जमीन में धँस गया था। फिर भी उसके होशोहवास कायम थे। एक तीखी जलन शरीर में महसूस होती जा रही थी, और उसे बेसुध किए दे रही थी जैसे शरीर का सारा खून निचुड़कर पीठ में इकट्ठा होता जा रहा है। उसने हिलना चाहा पर हिल न सका। आँखों में बचपन स अब तक की कितनी ही स्मृतियाँ तैर गई। कुर्त के मन में संकल्प उठा। अभी मुझे अपने देश के लिए परिवार के लिए जिन्दा रहना है। मैं जीवित रहूँगा और ठीक होने परा इससे भी अधिक ऊँचाई से छलाँग लगाऊँगा।

इन संकल्पों के साथ ही उस पर न जाने कब बेहोशी आ गई। होश आया तो वह अस्पताल में था। कहीं दूर से आती डाक्टर की आवाज उसके कानों में पड़ी “एक फेफड़ा फट गया है पसलियाँ टूट गई हैं, रीढ़ की हड्डी बुरी तरह क्षति ग्रस्त हो गई है, दाहिना गुर्दा पिस चुका है। अब इसे किसी भी तरह बचाया नहीं जा सकता।

लेकिन आश्चर्य कि इस घटना के नौ सप्ताह बाद ही कुर्त एंजील उस अस्पताल से स्वस्थ होकर निकला। उसका जवाब था ‘मुझे पूर्ण विश्वास था कि मैं बचूँगा। भला मैं अपना काम पूरा किए बिना मर कैसे सकता हूँ, स्वस्थ होने के बाद उसने छलाँग लगाई और सिद्ध कर दिया कि मनोबल से मौत भी डरती है।


अन्तरंग त्राटक की महान महत्ता

मस्तिष्क से लगी हुई दो आँखें वस्तुओं को देखने पहचानने तथा पढ़ने लिखने आदि के कामों में आती है। इनमें से एक न रहे तो दूसरी उसका काम चला देती है। इतना तो सभी जानते हैं पर यह रहस्य किसी-किसी को ही विदित है कि एक तीसरी आँख भी होती है जो उन तथ्यों को, दृश्यों को देखती है जिन्हें बाहर के चर्मचक्षु नहीं देख पाते। जो तीनों का सहारा लेते है वे दूरदर्शी या दिव्यदर्शी कहलाते है। प्रत्यक्ष आँखें मात्र सामने का ही, थोड़ी दूर तक ही देख पाती है। पीठ पीछे का या बहुत दूर तक का उनकों नहीं दीखता। बुढ़ापे में नेत्र ज्योति घट जाती है। चश्मे की जरूरत पड़ती है। मोतियाबिन्द आ घिरने पर आपरेशन कराना पड़ता है। इससे इनकी स्वल्प शक्ति होने का पता चलता है। वे तत्काल का जो सौंदर्य, सम्मान आदि हैं, उसी को देखती हैं पर यह नहीं जान पातीं कि इनके नजदीक जाने का क्या परिणाम हो सकता है। आग और सर्प देखने में कितने चमकीले चिकने लगते है। उन्हें पकड़ने का अबोधों का मन करता है पर तीसरी विवेक की आँख भी है। वह अपने अनुभव या दूसरों के परामर्श से यह समझ पाती है कि इस लालच में नहीं पड़ना चाहिए, अन्यथा परिणाम बहुत भयंकर हो सकता है। असली हीरे की तुलना में नकली हीरा और भी अधिक चमकदार होता है। दोनों में से कौन कितने मूल्य का हो सकता है, उसे जिस विशेष ज्ञान के आधार पर जाना जाता है उसे तृतीय नेत्र कह सकते हैं।

दूरगामी परिणामों का विचार न कर पाने के कारण ही लोग तात्कालिक लाभ को देखकर अन्ध हो जाते हैं और जब उनके दुष्परिणाम सामने आते है .... है। इसी प्रकार .... हानि देखकर लोग विद्या पढ़ने खेत .... व्यवसाय करने आदि से हाथ खींच लेते है और तब पछताते हैं जब उन्हीं कार्यों के लिए साहस करने वाले लाभ उठाते और भण्डार भरते है।

यह तीसरी आँख मिली तो सब को है पर है गुप्त। इस प्रयत्नपूर्वक जगाना पड़ता है। मस्तिष्क का दूरदर्शी या सूक्ष्मदर्शी होना इसी प्रयत्नशीलता पर निर्भर है। दूर तक देखने के लिए टेलिस्कोप की आवश्यकता पड़ती है। जीवाणु जैसी बारीक वस्तुएँ देखने के लिए माइक्रोस्कोप जैसे यंत्रों की आवश्यकता पड़ती है। यह दोनों ही हमारे पास विद्यमान है, पर काम न लिए जाने पर मैली–कुचैली होकर ठीक काम देने योग्य नहीं रहती। तीसरे नेत्र के सम्बन्ध में भी यही कहा जा सकता है। शिव और शक्ति के चित्रों में तीन नेत्र होते है। इन में शाप वरदान देने की शक्ति बताई जाती है। ऐसा तो कोई तपस्वी या आध्यात्मिक सम्पदा के धनी ही कर सकते है, पर इस दूरदर्शन का लाभ कोई साधारण स्थिति का व्यक्ति भी कर सकता है। अपने को बरबादी से बचा सकता है ओर वह लाभ उठा सकता है जिसे मन्दमति नहीं उठा पाते।

जो कार्य आज दिनों किया जा रहा है उसका अगले दिनों क्या परिणाम होगा? यदि निष्कर्ष ठीक तरह निकाला जा सके तो कोई भी व्यक्ति दुष्कर्मों में हाथ न डाले और ऐसी रीति-नीति अपनाये जिसके सहारे उज्ज्वल भविष्य का बनना सुनिश्चित है। लोग तात्कालिक स्वाद, सौंदर्य या लाभ भर को देखते हैं और मछली, चिड़ियों की तरह जाल में जा फँसते है। चासनी पर टूट पड़ने वाली मक्खी की तरह पर फँसा कर बे-मौत मरते है। इन्हें अदूरदर्शी ही कहा जा सकता है। जो इस जाली जंजाल से भरे संसार में फूँक-फूँक कर कदम नहीं रखते है वे इसी प्रकार फँसते है और बहुमूल्य जीवन सम्पदा को बाजी में हार जाते हैं।

अध्यात्म प्रकरणों में त्राटक प्रयोगों की चर्चा है। उसके प्रातःकालीन स्वर्णिम सूर्य, दीपक या किसी चमकदार निशान पर मैस्मरेजम स्तर के अभ्यास करते हैं और आँखों की बेधक दृष्टि बढ़ाते है। चमकदार दृश्य को लगातार देखने और उसके साथ इच्छाशक्ति का समावेश करने से वह क्षमता प्राप्त हो जाती है कि किसी भी मनस्वी को योग निद्रा में सुला सके। उसके मस्तिष्क पर अधिकार कर सके। यह एक प्रकार का जादू चमत्कार है जिसके सहारे अपनी विशेषता सिद्ध की जा सकती है।

सामान्य लोग इसी स्तर के प्रयोग करते रहते हैं किन्तु जिन्हें अध्यात्मवाद में आस्था है, वे वाह्य त्राटक का प्रयोग अति आरम्भिक अवस्था में ही करते है। दीपक आदि का सहारा वे .... समय लेकर यह क्षमता प्राप्त कर लेते है कि यह बहिरंग दृश्यों का अन्तरंग क्षेत्र में दिव्य दृष्टि से देख सकें।

इसके अभ्यास में यह करना होता है कि कोई खिला फूल आँख भरके देखा जाय और फिर ठीक वैसी ही कल्पना आँख खोल कर यह देखा जाय कि प्रत्यक्ष और कल्पना में कितना अन्तर रहा है। किसी बेलबूटे खिलौने आदि के सहारे भी यह अभ्यास किया जा सकता है कि बहिरंग दृश्यों का यथावत स्वरूप कल्पना चित्र के रूप में सही प्रकार जमा या नहीं। आरंभ में इसमें कुछ अन्तर रहता है पर थोड़े ही दिनों में ऐसी स्थिति बन जाती है कि बाह्य वस्तुओं और घटनाओं का यथार्थ स्वरूप मात्र कल्पना के आधार पर जाना जा सके। कितने ही अन्धे लोगों में आँशिक रूप से यह शक्ति विकसित हो जाती है और वे उस अदृश्य दृष्टि के सहारे दिन भर अपना काम बिना भूलचूक किये करते है। अन्धों की लिपि आरंभ में कठिन लगती है पर वे पीछे इसकी इतनी अच्छी तरह अभ्यस्त हो जाते है कि उस लिपि में लिखी हुई किसी भी भाषा की पुस्तकें धड़ल्ले से पढ़ सकें।

यह तृतीय नेत्र की शक्ति है। इसे साँसारिक .... प्रयुक्त किया जा सकता है और .... समझना चाहिए कि हम कार्यों का दूरगामी परिणाम समझ सकने में एक प्रकार से अन्ध के समतुल्य है। न हम जीवन का स्वरूप समझ पाते है, न लक्ष्य, न दायित्व .... में टकराते रहते हैं और सुर दुर्लभ मनुष्य जीवन को जो सांसें मिली हैं उनको ऐसे निरर्थक कामों में खर्च कर डालते हैं जो आकर्षक तो है किन्तु उनकी परिणित में निरर्थकता या दुर्दशा ही हाथ लगती है। यदि तीसरे नेत्र ने, विवेक बुद्धि ने, साथ दिया होता तो हस्तगत अवसर को किस प्रकार उपयोग में लाया जाय इसकी उच्चकोटि की योजना बन सी होती और परिस्थितियों सामान्य या गई गुजरी होते हुए भी उच्च लक्ष्य का अवलम्बन किए रहने पर कहीं से कहीं पहुँचे होते। कुछ से कुछ बन गये होते।

अन्तरंग त्राटक योग में अपनी गरिमा, अपनी क्षमता को समझना होता है और भावी जीवन को किन प्रयोजनों में प्रयुक्त करें, इसके कई कल्पना चित्र बनाते हुए यह देखना पड़ता है कि किन में क्या क्या जोखिम और क्या क्या सुयोग है? आन्तरिक सूझ-बूझ यदि सही हो तो सर्वोत्तम का ही चुनाव करती है ओर उसी मार्ग पर चलते हुए सफलता तक पहुँचने का योजनाबद्ध कार्यक्रम बनाती है। यही है आन्तरिक त्राटक की महान .... और सराहनीय सफलता।


दैवी कृपा का प्रवाह (kahani)

कालविन कैम्पबेल स्काटलैण्ड के हाईलेण्डर की 13 नं. की कम्पनी के ऑफिसर थे। उन्होंने बेलकछावा की लड़ाई में ऐसे समय, जब बाजी उलटी जा रही थी, सिपाहियों से जोर देकर कहा “कि जो सिपाही जहाँ खड़े हों वहीं मर जायँ।” इस साहसपूर्ण वचन न ऐसा जादू किया मानो कोई अदृश्य सत्ता एक साहसिक प्रवाह बन कर सभी सैनिकों को आन्दोलित कर रही हो। इतना वचन सुनते ही प्रत्येक सिपाही ने उत्तर दिया “सरकालविन हमस ब यहीं मरेंगे, यही मरेंगे।”

सभी सैनिक मुट्ठी भर होते हुए भी दैवी कृपा एवं आन्तरिक शक्ति से ऐसे लड़े कि हारी बाजी उलट गई। साहस करने वालों के साथ दैवी कृपा का प्रवाह अपने आप जुड़ जाता है।


महाक्रान्ति सुनिश्चित एवं अतिनिकट

मंत्री मण्डल जब तक राज काज ठीक चलाता रहता है, तब तक ढर्रा यथावत चलता रहता है। पर जब अव्यवस्था या अराजकता फैलती है तो फिर राष्ट्रपति शासन लागू होता है और अयोग्य शासकों को पदच्युत करके सत्ता का केन्द्रीकरण कर लिया जाता है। इन दिनों समष्टि स्तर पर ऐसा ही कुछ होने जा रहा है। तथाकथित प्रगतिशील ने मनुष्य को इतना उद्धत और अहंकारी बना दिया है कि वह अपने निर्धारण पर पुनर्विचार करने तक को तैयार नहीं है।

स्रष्टा की एक सुनिश्चित प्रक्रिया है कि जब जब औचित्य व नीतिमत्ता का पराभव और अनौचित्य का विस्तार होगा तब-तब प्रबल प्रतिक्रिया के रूप में सत्ता स्वयं अवतरित होकर रहेगी और तब तक अपने प्रयास जारी रखेगी जब तक कि सन्तुलन की धुरी अपना उचित स्थान ग्रहण न करले। इस वचन बद्धता पर विश्वास किया जाना चाहिए। अनौचित्य चिरस्थाई नहीं हो सकता उसे घड़ी के पेण्डुलम की तरह एक सीमा तक आगे बढ़ने के बाद वापस लौटना पड़ता है। यह उपक्रम न चले तो संसार का निर्धारित क्रम ही गड़बड़ा जाय। बिना पेण्डुलम की घड़ी का चक्र कैसे घूमे?

मनुष्य इन दिनों की परिस्थितियों से चिंतित न हो तो बात नहीं है। वह कुछ करने के लिए उपाय भी सोचता है, प्रचलनों का प्रतिगामी प्रवाह .... है कि सुधार परिष्कार का प्रयास कुछ जम ही नहीं पाता। बालू का महल प्रचण्ड अंधड़ के प्रवाह में यथा स्थान टिके रहना तो दूर उड़कर कहीं से कहीं चला जाता है और जहाँ दीवार खड़ी की गई थी वहाँ उनके लकीर जैसे निशान भी दीख पड़ते। अब तक के सुधार प्रयास वैसे ठोस परिणाम प्रस्तुत नहीं कर सके हैं, जैसा कि आशा अपेक्षा की गई थी। ऐसी दशा में सर्वसाधारण के मन में निराश उत्पन्न होना स्वाभाविक है। जो जीतता है उसी का समर्थन करने के लिए दुर्बल मन लुढ़क जाता है। पानी के तेज प्रवाह को चीरते हुए उलटी दिशा में साहसपूर्वक छितराते हुए आगे बढ़ते जाना किन्हीं सशक्त मगरमच्छों से ही बन पड़ता है। प्रवाह से प्रतिकूल दिशा में कोई बिरले ही चल पाते हैं

ऐसी विकट घड़ियों में निराशा के अंधकार को चीरते हुए भारत काल का ब्रह्म मुहूर्त उदय होता है। उसके पीछे पीछे अरुणोदय की ध्वजा फहराते हुए उषाकाल चला जाता है। जब प्रतिकूलता झीनी पड़ती है तो अनर्थ भी अपने कदम पीछे हटा लेता है और उसे चुनौती देने के लिए अकेला मुर्गा भी मैदान में खड़े होकर गर्दन ऊँची उठाकर तनकर बाँग लगाता देखा जाता है। कहाँ व्यापक क्षेत्र में फैला हुआ सफल अंधकार और कहाँ अकेला निहत्था मुर्गा, फिर उसके साहस के पीछे प्रभात के आगमन की सुनिश्चित संभावना ही काम करती है। यह विश्वास उसके मनोबल को सैकड़ों गुना आगे बढ़ा देता है और तीखी बांगें लगा कर सारे संपर्क क्षेत्र में नव जागरण का कुहराम मचा देता है। इन दिनों भी यही हो रहा है।

भ्रष्ट चिन्तन और दुष्ट आचरण के विरुद्ध एक प्रचण्ड विचारक्रान्ति का अवतरण हो रहा है। ऐसा अवतरण जिसने कि किसी समय धरती की प्यास बुझाने के लिए गंगा को स्वर्ग का आनन्द छोड़कर धरती पर बहने और खेत खेत को खींचने के लिए बाधित किया था। ऐसा अवतरण जिसमें के अरुणोदय होते ही अंधकार के विशाल साम्राज्य को देखते-देखते तिरोहित होना पड़ता है।

असुरता के शक्तिशाली साम्राज्य पृथ्वी के अधिकाँश भाग को शिकंजे में कसे हुए थे। पर उसे कुचल देने के लिए जब मनुष्यों तक ने इनकार कर दिया तो रीछ बानरों की मण्डली अपनी अदक्षता से परिचित होते हुए भी मैदान में कूदी और उसने वह कर दिखाया जिस पर सहज विश्वास भी नहीं होता। समुद्र छलाँगना, पर्वत उठाना, लंका जलाना एक बन्दर के लिए संभव हो सकता है? इस गुत्थी को बुद्धि न समझ सकती है, न समझा सकती है। इस गुत्थी के समाधान में वह विश्वास ही काम दे सकता है, जिसका प्रतिपादन है कि अनाचार को एक सीमा से आगे नहीं बढ़ने दिया जा सकता।

पराजितों की शक्ति भी समवेत होकर कभी कभी अपनी समर्थता का अद्भुत परिचय देती है। हारे हुए देवताओं की शक्ति सामर्थ्य को संगठित करके प्रजापति ने देवी दुर्गा की रचना की थी और उसके अदृश्य हाथों ने दृश्यमान महाबलशाली मधुकैटभ, महिषासुर, शुँभ, निशुँभ जैसे दुर्दान्त दैत्यों को धरती में मिला दिया था। मनुष्य की हड्डियों से बना बज्र वृत्रासुर जैसे त्रैलोक्य विजयी को चकनाचूर कर सकता है। इस पर बुद्धि भले ही विश्वास न करे, पर श्रद्धा को स्वीकार करना पड़ता है कि सत्य और न्याय साथ हों तो सावित्री जैसी महिला काल का रास्ता भी रोक सकती है और उसके शिकंजे से अपने पति को छुड़ा कर जिन्दा कर सकती है। इतना तो भीष्म ने भी मौत से कह दिया था कि बिना उत्तरायण आए मैं। तुम्हारे साथ नहीं चल सकता। मरजी हो तो निर्धारित मुहूर्त पर आ जाना तब तुझे तुम्हारे साथ चलने में आपत्ति न होगी।

सत्य के अपराजित होने पर जिन्हें विश्वास है वे काल से भी मोर्चा लेते रह सकते हैं और यथार्थता को विजयी बनाने के लिए बुद्ध, गाँधी की तरह अन्तिम साँस पूरी होने तक लड़ते रह सकते है। श्रद्धा और विश्वास की शक्ति अजेय जो है।

इन दिनों जिधर नजर डाल कर देखते हैं अनर्थ का ही बोलबाला दिखता है। पाप की विजय दुदुंभि बज रही है। कुम्भकरण का झलता हुआ मुँह असंख्यों को चबाने की तरह चकता दीखता है। पृथ्वी को चूरा ले जाने वाले हिरण्याक्षों की कमी नहीं। इतने पर भी कोई अदृश्य शक्ति कहती है कि उसकी नियत मर्यादाओं का उल्लंघन देर तक नहीं चल सकेगा आसमान पर कीचड़ उछालने वालों को कुकृत्य उनके चेहरे को ही कालिमा से लपेट देगा।

बीसवीं सदी के अन्तिम दिनों तक अनाचार को जीतते देखा जाता रहा है। हारा जुआरी दूने जोश से दाँव लगाता है। मरते समय चींटी को पंख उग आते हैं। मरने वाले पतंगे दीपक की लौ बुझाने के लिए कूदते हैं, पर अपनी जान गवाँ बैठने के अतिरिक्त और कुछ नहीं कर पाते। कौरवों की विशालकाय सैना पाण्डवों के छोटे से समुदाय के सामने देर तक खड़ी नहीं रह सकी थी। आग की चिनगारी को जब विचरने का मौका आता है तो विशाल क्षेत्र में फैली वन सम्पदा को दावानल बन कर कुछ ही समय में भस्मसात करके रख देती है, जब तूफान आते और घटाटोप बरसते हैं तो धरती पर दूर-दूर तक फैले तिनके, कचरे को न जाने कहाँ से उड़ाकर कहाँ पहुँचा देते हैं कि ढूंढ़ने पर उनका पता नहीं चलता।

समय चक्र परिवर्तनशील है। वह एक जैसी ही स्थिति में कभी रहता नहीं। बच्चा किशोर बनता है। किशोर से जवान, जवान से प्रौढ़, प्रौढ़ से जराजीर्ण बनता और मरने के बाद नया जन्म धारण कर लेता है। यह भ्रमणशील गतिचक्र कभी किसी के बूते रुका नहीं है। इन दिनों भी किसी को ऐसा मन छोटा नहीं करना चाहिए कि प्रस्तुत विपन्नताएँ, विभीषिकाएँ, अवांछनियताएं, दुष्प्रवृत्तियाँ आगे भी इसी प्रकार जड़ जमाए बैठी रहेगी। उनका बदलना निश्चित है। इस निश्चय में इतना और जोड़ लेना चाहिए कि महाक्रान्ति का समय अति निकट है। इक्कीसवीं सदी अण्डे का छिलका तोड़ कर बाहर निकलने का प्रबल पुरुषार्थ कर रही है। उसे मनोरम चूजे की तरह उछलता फुदकता हम सब निश्चित रूप से देख सकेंगे। शाँतिकुँज के प्रयास इन दिनों इसी दिशा में गतिशील है।


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महामानव प्रायः अपने जीवनकाल में नहीं पहचाने जाते। चले जाने पर ही उनकी गरिमा जानी जाती है। वह गरिमा भी अनन्त काल तक रहती है और असंख्यों का हित साधन करती है।


छोटी छोटी बातों की जीवन में महत्ता

बहुधा हम अपने जीवन में बहुत सी बातों की इसलिए उपेक्षा कर देते हैं कि उन्हें लगता है वे बहुत छोटी बातें है। इनसे भला व्यक्ति, परिवार और समाज पर क्या असर पड़ता है? उदाहरण के लिए किसी केला खाकर सड़क पर छिलका फैंक दिया किसी ने टोक दिया तो उत्तर मिलेगा इससे कौन सा प्रलय हो जायेगा। इधर-उधर थूकते फिरने, लाइन तोड़कर पहले टिकट लेने के लिए आगे बढ़ने, यातायात के नियमों को तोड़कर सड़क पर घूमने जैसी बातों को लोग महत्व नहीं देते क्योंकि उनकी दृष्टि में ये बहुत साधारण और छोटी-छोटी बातें है।

लेकिन इन छोटी-छोटी बातों को छोटी होने के कारण उपेक्षित नहीं किया जाना चाहिए। एक छोटे से परमाणु की आँतरिक संरचना में हुआ जार सा परिवर्तन विध्वंसकारी परिणाम प्रस्तुत कर देता है। विष का जरा सा अंश जीवन संकट खड़ा कर देता है। एक छोटी सी ब्लेड प्राणान्त की स्थिति ला देती हे। एक छोटा से घाव नासूर बनकर शरीर को गलाने लगता है। छोटी सी खरोंच टिटनेस जैसा प्राणघाती रोग उत्पन्न कर देती है। ये तो सामान्य जीवन की बातें हुई। सामाजिक जीवन में छोटी-छोटी बातों के कितने परिणा में होते हैं-इसके अनेकों उदाहरण यत्र तत्र बिखरे पड़े हैं।

ग्यारहवीं शती में मुडेना और बोलोना राज्य में हुए युद्ध में हजारों व्यक्ति मारे गये। यह युद्ध कोई बीस वर्षों तक चला। युद्ध एक छोटी से बात के कारण छिड़ा थािक मुडेना के कुछ सैनिक बोलोना राज्य के एक सार्वजनिक कुएं से कोई बर्तन उठा कर ले गये थे।

छोटी-छोटी लापरवाहियों के बहुत बड़े दुष्परिणाम होते है। कुछ वर्षों पूर्व .... की पोस्ट नामक पत्रिका में एक लेख छपा था जिसका साराँश इस प्रकार है-नगर की एक प्रसिद्ध फर्म में विलियम डेकन-लेखा कर्मचारी ने जब एक दिन .... हिसाब किताब पूरा किया वह बड़ा परेशान हुआ। उसके हिसाब में नौ सौ डालर की कमी पड़ रही थी। वह बार-बार जोड़ता, हिसाब लगता और हिसाब था कि .... ही नहीं रहा था। संस्था के प्रबन्धक इस पर कर्मचारी की बड़ी भर्त्सना की। .... पहले ही हिसाब न मिलने के कारण बहुत ज्यादा परेशान था। मालिक की डाँट पड़ने पर और उखड़ गया। यह देखकर प्रबन्धक भी हिसाब जोड़ने लग गया। परन्तु समस्या का कोई समाधान नहीं निकला। दो आदमी जाँच के लिए लगाए गए। वे एक रकम को चक कर रहे थे। अभी वे थोड़ा ही आगे बढ़ पाए थे कि एक रकम पर आकर रुक गये। उन्होंने गलती को पकड़ लिया। एक स्थान पर एक हजार डालर होना चाहिए था जबकि वहाँ उन्नीस सौ डालर बन गए थे। ध्यान से निरीक्षण करने पर पता चला कि कैश बुक के पृष्ठों में एक मक्खी मर गई थी और एक हजार की संख्या में सैकड़ों वाले शून्य पर उसकी टाँग इस प्रकार चिपक गई थी कि वह शून्य के स्थान पर नौ बन गया था।

जनरल ग्रांट जिन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध में मित्र राष्ट्रों की ओर से लड़कर महत्वपूर्ण भूमिका निबाही, एक छोटे से अवसर का उपयोग कर ही सफल हुए। उन्होंने लिखा है-युवावस्था में मैं एक बार पड़ोस की मार्केट में अपनी माँ के लिए मक्खन लेने गया। रास्ते में मैंने सुना कि सेना के कुछ स्थान रिक्त हुए हैं। मैंने उसके लिए आवेदन कर दिया। इस तरह मेरे लिए सैनिक शिक्षण प्राप्त करने का अवसर मिल गया, जो युद्ध के समय मुझे सेना के लिए बहुत उपयोगी सिद्ध कर सका। जिस अवसर ने जनरल ग्राण्ट को इतने उच्च स्तर तक पहुँचाया वह एक साधारण सी घटना के कारण ही मिला था। जनरल ग्राण्ट ने इस सम्बन्ध में लिखा है-यदि उसकी माँ उन्हें मक्खन लेने नहीं भेजती तो वे जनरल तथा प्रधान नहीं बन पाते।

जीवन में छोटी-छोटी बातों का महत्व दर्शाते हुए प्रसिद्ध विचारक बर्टेंड रसेल ने लिखा है- आदमी की परख बड़ी-बड़ी बातों से उतनी नहीं होती जितनी कि छोटी बातों से। ये ही आगे चलकर बड़ी हो जाती है। छोटा सा छेद बड़े से बड़े जहाज को डुबो देता है। छोटी सी फुँसी बड़े से बड़े पहलवान को मार सकती है। अतः छोटी बातों की उपेक्षा न कीजिए। वे बड़ी से बड़ी बातों से भी बड़ी है।

गेहूँ के एक दाने से सारे विश्व का भरण पोषण करने की बात पढ़ने सुनने में भले ही कोतुकपूर्ण लगे और अतिवश्वसनी लगे पर गणितीय आकलन से सही .... होती है। गणना की गई है कि एक दाने से एक वर्ष में पचास दाने होते है। उन पचास दानों को अगले वर्ष बोया जाए तो उससे अगले वर्ष उनके ढाई हजार दाने हो जायेंगे। फिर उन सब दानों को बोया जाए तो उससे अगले वर्ष 75 हजार दाने हो जायेंगे। यही क्रम बारह वर्ष तक चलता रहे तो तेरहवें वर्ष 21, 41, 40, 62, 50,00,00,000 (21 शंख, 41, पदम, 40, नील, 62 खरब, 50 अरब) दाने हो जाते हैं। गेहूँ के इतने दानों का भार लाखों टन होता है। जिससे सारे विश्व को खिलाया जा सकता है। कल्पना कीजिए, यह एक दाने का कमाल है इसी प्रकार एक कथा प्रचलित है कि विजय नगर के राजा कृष्णदेव राय ने अपने यहाँ एक नौकर रखा। नौकर के कहने पर तनख्वाह तय हुई एक पैसा प्रतिमाह। साथ ही साथ शर्त भी थी। वेतन प्रतिमास गुणानुपात में बढ़ाया जाए। राजा को शर्त आसान लगी। उसी क्रम से वेतन बढ़ने लगा। दूसरे माह दो पैसे, तीसरे माह 1 आना, चौथे माह 2 आने, पांचवें माह 4 आने, छठे माह आठ आने, सातवें माह एक रुपया और अन्त में 1 लाख 31 हजार 17 रुपये प्रति मास पाने वाला हो गया। तब राजा की समझ में आया कि जिस शर्त को उसने बहुत छोटी और आसान सा समझा था वह कितनी बड़ी थी।

इन कहानियों को मनोरंजन के लिए गढ़ा गया भी मान लिया जाए तो भी यह तथ्य अपने स्थान पर सही है। छोटी-छोटी और साधारण लगने वाली बातें बहुत बड़ी तथा असाधारण होती है। जिस सूर्य से पृथ्वी सहित अन्य कई ग्रहों को प्रकाश मिलता है उसका व्यास आठ लाख छियासी हजार मील है। इस पर भी यदि हम दूर के किसी नक्षत्र से जहाँ से यह एक तारे के बराबर दिखाई देता हो-टेलिस्कोप से देखें। उस टेलिस्कोप के लैन्स के आगे एक पतला सा रेशमी धागा आ जाय तो हमें सूर्य एकदम दिखाई नहीं देगा। 8 लाख 86 हजार मील व्यास वाला सूर्य एक रेशमी धागे की ओट में आ जायेगा। एक छोटी सी असावधानी कैसा विध्वंस प्रस्तुत कर देती है, इसका उदाहरण मिसीसिपी बाँध के टूटने की घटना से मिलता है। इस नदी के स्तर से लगभग 15 फीट नीचे अर्लियन्स नगर बसा हुआ है। सन् 1883 ई. उस बाँध में एक छोटी सी दरार देखी गई।

अधिकारियों ने उसे देखकर भी अनदेखा कर दिया। इतना मजबूत बाँध और दो, तीन फुट लम्बी बाल बराबर इस दरार से क्या अनर्थ हो जायेगा। इस लापरवाही के परिणाम स्वरूप चौड़ी होते-होते वह दरार इतनी बड़ी हो गई कि उससे निकली विपुल जल राशि से आर्लियेन्स नगर ही डूब गया।

अधिकारियों ने उसे देखकर भी अनदेखा कर दिया। इतना मजबूत बाँध और दो, तीन फुट लम्बी बाल बराबर इस दरार से क्या अनर्थ हो जायेगा। इस लापरवाही के परिणाम स्वरूप चौड़ी होते-होते वह दरार इतनी बड़ी हो गई कि उससे निकली विपुल जल राशि से आर्लियेन्स नगर ही डूब गया।


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अपने को ऐसे वेदांती न बनाओ जो अपने को ब्रह्म बताते है और सड़े कूड़े की तरह जीते है।


आनन्द और उल्लास का अजस्र निर्झर

मनुष्य का कारण शरीर-भाव संस्थान कहलाता हे। यह वह खदान है जिसमें प्रत्यक्ष और परोक्ष आनन्द से स्त्रोत उमगते रहते हैं। भावनाओं में सर्वप्रमुख है-आत्मीयता। इसका प्रकाश जिस व्यक्ति या वस्तुतः के ऊपर जितनी साधना के साथ सम्बद्ध किया जाता है, वह उतना ही प्रिय लगने लगता है, प्रिय ही नहीं अपना भी। यह आत्मीयता का चमत्कार है। वस्तुतः सभी वस्तुएँ चलती बदलती रहती हैं, साथ ही निर्जीव भी हैं। ऐसी दशा में वे अपनी विशेषताओं के कारण प्रिय लगें-लगती रहें, यह संभव नहीं। उनका स्वभाव, स्तर, रुझा एवं व्यवहार बदलता रहता है। विवाह के दिनों में पत्नी जितनी मनोरम लगती है, उतनी तब नहीं जब वह रुग्ण, दुर्बल या वयोवृद्ध हो जाती है। विग्रह या तलाक हो जाने पर तो उसकी चर्चा भी नहीं सुहाती। यह भावात्मक परिवर्तन क्यों होता है? उसमें प्रिय पदार्थों या प्रिय जनों में परिवर्तन आना ही कारण नहीं हे। अपनी आत्मीयता की घनिष्टता की, रुझान की कमीवेशी भी इसका कारण होती है।

किसी पदार्थ या प्राणी का प्रिय, अप्रिय, नीरस, सरस लगना इस बता के ऊपर निर्भर करता है कि हम उसे कितना चाहते हैं। किस हद तक अपना समझते हैं। उद्गम अपना अन्तराल है। वस्तुओं की उपयोगिता, अनुपयोगिता भी इसी कसौटी पर कसी जाती हे। जिन्हें पराया समझा जाता है उनके प्रति उपेक्षा भाव ही रहता है। अपनी अँगूठी खो जाने पर दुःख होता है किन्तु पड़ोस में रहने वाले जौहरी की दुकान से सारे रत्न-आभूषण चोरी चले जाने पर दुख नहीं, लोकाचार जैसा कौतूहल मात्र होता है। यद्यपि अँगूठी की तुलना में वे रत्नाभूषण अधिक सुन्दर भी थे और अधिक कीमती भी। पर उनके साथ आत्मीयता जुड़ी न होने से कोई हर्ष-विषाद नहीं होता।

कोई कितना प्रिय या अप्रिय लगता है? इसका आधार उसकी विशेषताएँ नहीं, वरन् यह है कि अपनी आत्मीयता की भावना उसके साथ किस कदर जुड़ी, चिपकी एवं घनीभूत हुई है। इस तथ्य को समझ लेने के उपरान्त प्रिय वस्तुओं या व्यक्तियों की तलाश नहीं करनी पड़ती। वे अपने आप में कुछ भी नहीं है। हमी अपने आरोपण के अनुरूप उन्हें वैसा बनाते है जैसा कि वे प्रतीत होते हैं। पदार्थ अपने आप में जड़ पदार्थों का ढेला ढकोसला मात्र है। इसी कारण वेदान्त तत्व-दर्शन में संसार को माया मिथ्या कहा गया है स्वप्न बताया गया है, और रज्जू-सर्प का उदाहरण देकर अपनी मान्यता को ही सब कुछ कहा गया है।

जीवित व्यक्ति भी संबंधों के अनुसार किसी का पुत्र, किसी का पिता, किस का मित्र, किसी का शत्रु होता हे। कोई उसे व्यापारी, पहलवान, चिकित्सक, विद्वान, सज्जन आदि के रूप में देखता है, तो किसी की मान्यता उसे संबंध में ठीक उलटी या उपेक्षा भरी होती है। ऐसी दशा में यह निर्णय करना कठिन है कि सामने वाला वस्तुतः क्या है? उसमें अनेक विशेषताएँ भी हैं और अनेक त्रुटियाँ भी। जिस पक्ष को उघाड़ा जाय, उजागर किया जाय वही भासने लगता है। जिसके संबंध में जितनी अनभिज्ञता है वह उतना ही गया गुजरा प्रतीत होता है। अनाड़ी के लिए हीरे और काँच के टुकड़े में कोई अन्तर नहीं। हीरा स्वयं क्या है? इसका मूल्याँकन किसी वैज्ञानिक द्वारा कराया जाय तो वह उसे पका हुआ कोयला भर सिद्ध करेगा। जौहरी का मूल्यांकन सर्वथा दूसरा है।

नेत्र चले जाने पर संसार के समस्त दृश्यों का लोप हो जाता है। श्रवण शक्ति न रहे तो समस्त विश्व में नीरवता भर शेष रह जायेगी। मस्तिष्क विकृत हो जाने पर हर किसी को विक्षिप्तों जैसे आचरण करते पाया जायगा। अपनी मृत्यु हो जाने पर सभी प्रसार-प्रस्तर की समाप्ति समझी जा सकती है। अपनी सत्ता एवं मान्यता ही सब कुछ है अपने इष्ट के प्रति श्रद्धा, विश्वास सँजोया जाता है, किन्तु दूसरे की विपरीत मान्यता को असत्य कहा और उपहार उड़ाया जाता है। यहाँ यह निर्णय करना कठिन है कि वास्तविकता किस पक्ष के साथ हैं यह भी हो सकता है कि दोनों ही पक्ष रँगीली कल्पनाओं की उड़ानें उड़ रहे हों।

प्रश्न भाव संवेदनाओं के आधार पर आनन्द का रसास्वादन करने का है। इस संदर्भ में वस्तुओं या व्यक्तियों को टटोलना व्यर्थ है, वे सभी दर्पण की तरह हैं जिनमें हम अपनी ही छवि देखते हैं। गुम्बज में अपनी ही प्रतिध्वनि गूँजती है। प्रकाश में होकर गुजरते हुए अपनी ही प्रतिच्छाया साथ चलती है। यदि अन्तःकरण नीरस हो तो हर कहीं नीरसता ही भरी दिखाई देती है। स्वार्थी के लिए समस्त संसार स्वार्थ परायण है। अविश्वासी यह तक सिद्ध नहीं कर सकते कि हमारा वास्तविक पिता कौन है? माता का कथन ही इस निमित्त प्रामाणिक मानकर चलना पड़ता है। पर उसमें भी संदेह या अविश्वास करने की पूरी-पूरी गुँजाइश है। दृश्य-जगत पदार्थ विज्ञान की दृष्टि में अणु-परमाणुओं का जखीरा भर है, किन्तु भावुक भक्त उसे पर ब्रह्म का विराट स्वरूप होने का पूरा और पक्का विश्वास करते हैं।

पदार्थों में, प्राणियों में, सुन्दरता, सरसता ढूंढ़ना व्यर्थ है। अपना आत्मभाव ही उनके साथ लिपटकर प्रिय लगने की स्थिति विनिर्मित करता है। इस अपनेपन को यदि संकीर्णता के सीमा बन्धनों में बाँधा जाय तो आत्मीयता का प्रकाश विशाल क्षेत्र को आच्छादित करेगा और सर्वत्र अनुकूलता, सुन्दरता बिखरी पड़ी दीखेगी। परिवार को, शरीर को ही अपना न मानकर यदि प्राणि समुदाय पर, प्रकृति विस्तार पर, उसे बखेरा जाये तो दृष्टिकोण बदलते ही बहिरंग क्षेत्र में आनन्द भरा हुआ प्रतीत होगा। सब कुछ परमप्रिय, परम सुंदर लगेगा। प्रकृति की विशालता को यदि सुन्दरता की दृष्टि से देखा जाय तो हरे भरे खेत, सघन-जंगल, ऊँचे पर्वत, दौ बादल, भरे-पूरे जलाशय अतीव सुन्दर लगेंगे कुदकते-चहकते पशु पक्षी सजीव खिलौनों की .... क्रीड़ा कल्लोल करते हुए मन को विमोहित करेंगे समूची सृष्टि अपनी है, यह मान्यता अपनाने तनिक भी अवास्तविकता नहीं है। संसार के .... हम और हमारे साथ संसार का अविच्छिन्न संबंध है। उसमें आत्मीयता का पुट और भी गह लगा दिया जाये तो यह समूचा-जगत विशालकाय कलाकृति की तरह मनोरम दृष्टिगोचर होगा और उसे निरखते-निरखते उल्लास का ठिकाना न रहेगा।

दूसरों से अनुकूलता प्राप्त करने की कामना लेकर जिस तिस से अनुग्रह करने की याचना करना व्यर्थ है। इस मृगतृष्णा में भटकते रहने पर थकान और खीज ही हाथ लगेगी। क्यों न हम विशाल विश्व पर आत्मभाव की वर्षा करें और बदले में इसे बसन्ती फूलों से खिला मुसकराता देखें।

सुन्दर, सुयोग्य और अनुवर्ती अनुचर ढूँढ़ना व्यर्थ है। आत्मभाव की उदात्त-मान्यता अपनाकर सभी नये सिरे से दृष्टिपात करें और बदले हुए संसार का सुहावना चित्र आनन्द विभोर होकर देखें। दूसरों को अपने अनुकूल बनाना कठिन है। पर अपने को ऐसा बनाया जा सकता है कि सह-सौजन्य प्रदान करते हुए सन्तोष और आनन्द से अपना अन्तःकरण भर ले। विराट विश्व को श्रद्धा संवेदना से देखते हुए हर घड़ी विश्व ब्रह्माण्ड में परब्रह्म की झाँकी करते रहने का अमृतोपम रसास्वादन किया जा सकता है।

सुन्दर, सुयोग्य और अनुवर्ती अनुचर ढूँढ़ना व्यर्थ है। आत्मभाव की उदात्त-मान्यता अपनाकर सभी नये सिरे से दृष्टिपात करें और बदले हुए संसार का सुहावना चित्र आनन्द विभोर होकर देखें। दूसरों को अपने अनुकूल बनाना कठिन है। पर अपने को ऐसा बनाया जा सकता है कि सह-सौजन्य प्रदान करते हुए सन्तोष और आनन्द से अपना अन्तःकरण भर ले। विराट विश्व को श्रद्धा संवेदना से देखते हुए हर घड़ी विश्व ब्रह्माण्ड में परब्रह्म की झाँकी करते रहने का अमृतोपम रसास्वादन किया जा सकता है।


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जीवन का आनंद अन्तरात्मा का संगीत सुनने में समाया हुआ है।


अतीन्द्रिय क्षमता कोरी करामात नहीं

पूर्वाभास, भविष्यकथन, दूरदर्शन, दूरश्रवण, परोक्षज्ञान जैसी घटनाएँ अब भूत, पलीत, देवी देवताओं की करामात अथवा संयोग न मानकर पूर्णतः विज्ञान सम्मत मानी जाने लगी हैं। सामान्यतः ज्ञानेन्द्रियों की सहायता से ही ज्ञान प्राप्त होता है, किन्तु मनोवैज्ञानिकों की शोध के अनुसार एक छटी इन्द्रिय भी है जो ऐसी जानकारियाँ देने में समर्थ है जिसे मन, बुद्धि से परे कहा जाता है। चेतना की गहन पतों की खोज-बीन से अब इस रहस्य पर से पर्दा उठा है कि अतीन्द्रिय सामर्थ्य बाह्य उपार्जन नहीं, वरन् आन्तरिक उद्भव है। अभी तक हमें मानवीय सत्ता के थोड़े से ही अंश और शक्तियों की जानकारी है इससे भी अनन्तगुनी सम्भावनाएँ सत्ता के गहन अन्तराल में छिपी पड़ी है। धरती की ऊपरी पर्त में भले ही घास-पात उगाने की क्षमता हो किन्तु गहराई में खोदने पर बहुमूल्य खनिज सम्पदा उपलब्ध होती है, ठीक इसी प्रकार शारीरिक श्रम और मानसिक शक्ति से आगे की गहराई में उतरने पर उस क्षमता का अस्तित्व सामने आता है जिसे अतीन्द्रिय क्षमता अथवा दैवी शक्ति के नाम से पुकारा जाता है।

पाश्चात्य मनोवैज्ञानिक अतीन्द्रिय क्षमताओं की गहरी खोज में लगे है। उन्होंने परोक्ष दर्शन, भविष्यगत ज्ञान, भूतकालिक ज्ञान, और विचार सम्प्रेषण पर अनुसंधान भी किया है साथ ही अनेकों ऐसे प्रमाण जुटाने का प्रयास किया है जिनके आधार पर कहा जा सकता है कि भारतीय योग शास्त्रों में ऋद्धियों, सिद्धियों का जो वर्णन मिलता है वह मिथ्या नहीं वरन् सत्य है।

अतीन्द्रिय क्षमता की भौतिक अभिव्यक्ति का सर्वप्रथम वैज्ञानिक परीक्षण फ्राँस के प्रसिद्ध वैज्ञानिक काउट एगेनर डी गेस्परिन ने किया था। उन्होंने अन्य वैज्ञानिकों को साथ लेकर एक प्रयोग किया और देखा कि कुछ वस्तुओं को बिना स्पर्श किये एक स्थान से दूसरे स्थान पर हटाने की क्षमता रखते है। बिना स्पर्श किये हटाने वाली शक्ति को उसी प्रकार उन्होंने मापा जैसे भौतिक विज्ञानी गुरुत्वाकर्षण शक्ति को नापते है। अभी तक किसी वस्तु का गुरुत्वाकर्षण नियमों के विरुद्ध अधर में झूलना या ऊपर उठना उस शक्ति के नियमों के प्रतिकूल माना जाता रहा है, किन्तु देखा गया है कि यह कार्य मानव अपनी प्रचण्ड आत्म शक्ति के बल पर सम्भव कर दिखा सकता है।

इसी प्रकार “जनरल ऑफ साइंस” पत्रिका में प्रोफेसर विलियम क्रुक्स के अनुसंधान की रिपोर्ट का विवरण मिलता है। जिसमें उन्होंने डेनियल होम की अतीन्द्रिय क्षमता के बारे में प्रकाश डाला है। डेनियल बड़ी सरलता से बिना स्पर्श किये किसी वस्तु को एक स्थान से दूसरे स्थान पर स्थानांतरित कर देता था। बिना स्पर्श किये वाद्य यंत्रों को बजा कर बता देता था। आगे क्रुक्स लिखते हैं कि वह भार तौलने की मशीन के एक बोर्ड के सिरे को छू भर देता था कि मशीन कम या ज्यादा भार बताने लगती। आत्मशक्ति द्वारा जड़ पदार्थ को प्रभावित करने वाला, वैज्ञानिक को आश्चर्य चकित करने वाला यह एक अनूठा प्रयोग था।

वस्तुतः अतीन्द्रिय क्षमता सूक्ष्म शरीर का मस्तिष्क चेतना का विषय है। मस्तिष्क ब्रह्मांडीय चेतना से संपर्क बना सकने और उस क्षेत्र की जानकारियाँ प्राप्त कर सकने में समर्थ है। अविकसित स्थिति में उसे ज्ञान प्राप्त करने के लिए इन्द्रियों जैसे सामान्य उपकरणों पर निर्भर रहना पड़ता है। इससे उस सीमित जानकारी के आधार पर अल्पज्ञ बन कर रहना पड़ता है। किन्तु जब मस्तिष्क चेतना का अपेक्षाकृत विकास हो जाता है, तब फिर बिना इन्द्रियों के सहारे दूरवर्ती घटनाओं तथा अविज्ञात के रहस्यों पर से पर्दा उठने लगता है। अन्तरिक्ष के अंतराल में अनन्त छिपी घटनाओं, सम्पदाओं, विभूतियों, शक्तियों, ऋद्धियाँ, सिद्धियों की जानकारी मिलने लगती है।


न सोचो अकेली किरण क्या करेगी?

भूख से तड़पता एक बालक केन्या की सड़कों पर घूम रहा था। उसकी आँखों में छलकते हुए आँसू व्यथा-पीड़ा की कथा कह रहे थे। कहीं से एक बूढ़ा पादरी गुजरा। ज्यों ही उसकी दृष्टि बालक के चेहरे पर पड़ी-विचारा उभरा कि यदि इस कोमल फूल को सँजोया न गया तो इसे असमय मुरझाना पड़ेगा। उसके ममत्व भरे हाथों की सार-सँभाल से वह बढ़ा और प्रखर बुद्धिमता व लगनशीलता के बल पर उसकी गणना सुयोग्यों में होने लगी।

लोग उनके व्यक्तित्व की विशेषताओं को सराहते। उनकी बुद्धिमत्ता और विचारशीलता से प्रभावित होते। अच्छी नौकरियों के प्रस्ताव भी आए, परन्तु उसके अन्तर में तो अपना दुःख भरा बचपन तैर रहा था। ऐसा ही तड़पता बचपन उन्हें बाहर भी दिखा। यही क्यों-डूबती-उतरती जिन्दगियाँ दिखाई पड़ी। मनुष्यों के साथ पशुओं का सा व्यवहार होता देख उसका हृदय रा पड़ा। अँग्रेज और अफ्रीकियों से सिर्फ रंग-रूप भर का अन्तर दिखाई देता है। इसी के कारण उनकी सामाजिक और आर्थिक स्थिति में आसमान-पाताल का अन्तर है। एक घृणा का पा. है-दूसरा सम्मान का। एक का काम पिटना-दूसरे का पीटना। मनुष्य अपने जैसे ही मनुष्य के साथ पशु से गया गुजरा व्यवहार करे, इससे बड़ी और क्या विडंबना हो सकती है?

जिस समाज में हम उत्पन्न हुए हैं, जिस जाति का हममें खून बह रहा है। उस समाज और जाति के प्रति हमारे कुछ कर्तव्य हैं। क्या इन्हें झुठलाया जा सकता है? वह भी मात्र सुविधा सम्पन्न जीवन जीने के लिए। नहीं कदापि नहीं। अन्तराल की इसी कसक ने, मानसिक पीड़ा को हरने की छटपटाहट ने एक अनूठे व्यक्तित्व को जन्म दिया। इस व्यक्तित्व को स्वामी जोमो के न्याता के नाम से समूचे विश्व में जाना गया।

सर्वप्रथम पढ़े-लिखे और शिक्षित व्यक्तियों को यह तथ्य अवगत कराना आवश्यक था। सो उन्होंने सन् 1928 में किकयू भाषा का पहला पत्र निकाला। इस पत्र के सम्पादक, प्रकाशक, मुद्रक सभी कुछ वही थे। पत्र का उद्देश्य था-स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए जन-जागरण। विचार इतने सशक्त और विश्लेषण थे कि अंग्रेज नागरिक भी उसे नियमित पढ़ने लगे।

सन् 1929 में वे लन्दन गये। वहाँ के सूत्र संचालकों को औचित्य को समझाने का प्रयत्न किया पर धन, मद, अहंकार से बंद हुए कानों में मानवीय संवेदना कहाँ प्रवेश करती है? फिर भी प्रयास तो करना ही था। सन् 1938 में उन्होंने ‘फेसिंग माउण्ट केन्या’ नामक पुस्तक लिखी। विचार और संवेदना दोनों ही दृष्टियों से ग्रन्थ उत्तम था। इस पुस्तक की भूमिका सुप्रसिद्ध मानव विज्ञानी प्रो मैलिनोस्की ने लिखी। इसका प्रचार व्यापक हुआ। विभिन्न देशों के शासन प्रमुखों व निवासियों तक उद्देश्यों के औचित्य को समझाने का यह प्रयास काफी कारगर हुआ।

दूसरों में सहानुभूति तो जगी, परन्तु स्वयं पीड़ितों में जाग्रति नहीं आई। इस महत कार्य को पूरा करने के लिए विभिन्न सृजनात्मक कार्यक्रमों के माध्यम से जनक्षेत्र में उतरे। कर्तव्यों और अधिकारों के प्रति सचेष्टता करने के लिए घर-घर गए। प्रत्येक को समझाने की कोशिश की, तुम मनुष्य हो मनुष्य की तरह से रहो। मानवी जीवन की रीति-नीति से अवगत कराया। उनके सहयोगी भी उभरे। अवरोध भी आए। 9 वर्षों का कारावास, तरह-तरह के दण्ड दिए गए। पर जाग्रत मनःचेतना भला अवांछनियताओं को कहाँ स्वीकार करती है। हुआ भी यही। 12 दिसम्बर 1963 को राष्ट्र ने पीड़को उठाकर फेंक दिया। इतना ही नहीं सामाजिक स्थिति बदली। पहले पशु समझे जाने वाले मानव शरीरधारी मनुष्य समझे गए। सारी उलटी स्थिति उलटकर सीधी हो गई। यह एक व्यक्ति के अन्तर में उठी कसक का परिणाम था।


उच्चस्तरीय रहस्यमय प्राणतत्व

प्राणवायु और प्राणतत्व का अन्तर हमें भली-भाँति समझ लेना चाहिए। प्राणवायु हवा में मिली हुई आक्सीजन गैस कहलाती है। यह ज्वलनशील है। शरीर का तापमान इसी के आधार पर स्थिर रहता है। हर मशीन को चलाने के लिए ऊर्जा ही काम देती हे। यह मुँह और नाक के माध्यम से छोड़ी या ग्रहण की जा सकती है।

प्राणतत्व सूक्ष्म चेतना है। उसमें क्रिया, व्यवस्था, विचारणा एवं भावना का समावेश हैं .... इसी के रहने से जीवित रहते है। प्राण निकल जाएँ तो मृत्यु निश्चित है, फिर आक्सीजन ....श्रित वायु फेफड़ों में पम्प की जाती रहे तो भी .... लौटना संभव नहीं। आक्सीजन पदार्थ जबकि प्राण पदार्थ के साथ जुड़ी हुई ....

सर्वविदित है कि चुम्बकत्व अदृश्य क्षेत्र में हित होने वाली क्षमता है जो सजातीय तत्वों अपनी ओर खींचती है। शरीरगत शक्ति चुम्बकत्व के रूप में दूसरे शरीरधारियों आकर्षित करती है। नर, नारी के बीच ऐसा आकर्षण है। सौंदर्य में भी इसी विशेषता बढ़ी-चढ़ी मात्रा होती हे। सत्संग और कुसंग ....ही प्रतिभा दूसरों का अपनी ओर आकर्षित .... है प्रभावित और अनुकरण के लिए बाधित ....।

कई चिकित्सक प्राणबल से आधि-व्याधियों का ++++ कर सकते हे। मैस्मोरिजम, हिप्नोटिज्म उपचारों में इसी का प्रभाव काम करता है। आकर्षण एक दूसरे के बीच घनिष्टता एवं करता है। तेजोवलय के रूप में इसे देखा और शरीरगत विद्युतशक्ति मापक यंत्रों से इसकी क्षमता को तौला भी जा सकता है। इसका प्रयोग शारीरिक बलिष्ठता, सुन्दरता, निरोगता एवं दीर्घजीवन के रूप में किया जाता है।

प्राणः की दूसरी परत वह है जिससे सूक्ष्म शरीर प्रभावित होता है। सूक्ष्म शरीर अर्थात् चिन्तन, विवेचन एवं सूझ-बूझ का संस्थान। इस क्षेत्र में प्राण प्रक्रिया की विशिष्टता में मनुष्य बुद्धिमान, विवेकशील एवं सूझ-बूझ, प्रभाव-प्रतिभा का धनी बनता है। मनीषियों की गणना ऐसे ही प्रावधानों में की जाती है। वे विचारणा का वातावरण बनाते एवं सुधारते है। अनन्त आकाश में फैली हुई ज्ञान सम्पदा को इच्छानुसार बटोर बुलाते है।

प्राणी की तीसरी परत भावना स्तर की है। इसे कारण शरीर में सन्निहित कहते है। इसका केन्द्र हृदय से कुछ हट कर है। इसी का हृदय गुफा कहते हे। जिसमें परब्रह्म का दर्शन दिव्य ज्योति के रूप में होता है।

इस निखिल अन्तरिक्ष में ग्रह, नक्षत्रों की तरह दिवंगत आत्माएँ भी सूक्ष्म शरीर से प्रेत-पितर के रूप में भ्रमण करतीं तथा समाधि स्थिति में सोई रहती है। समुद्र में उठने वाली लहरों की तरह इसी में देवदानव भी रहते हैं। ज्वार अर्थात् देव और भाटा अर्थात्-दैत्य। यह मनुष्यों की ओर संबंध साधने के लिए आकर्षित होते हैं और इन्हें हृदयगत प्राणचेतना के चुम्बकत्व से खींच कर बुलाया जा सकता है। इसी तृतीय शरीर अन्तराल का चुम्बकत्व तप, योग की साधना द्वारा अधिक शक्ति सम्पन्न किया जाता है।

कारण शरीर भावनाओं का केन्द्र है। वासना, तृष्णा और अहंता का खेल तो शरीर और मन ही मिलजुल कर खेलते रहते है। पर दिव्य भावना, जिन्हें श्रद्धा, निष्ठा, प्रज्ञा, दया, करुणा, उदारता, आत्मीयता, आस्था आदि के रूप में जाना जाता है, हृदय क्षेत्र की, कारण शरीर की देने है। इनका गंगावतरण उच्च लोक के दिव्य अन्तःकरण में होता है। संत, सुधारक, शहीद, लोकसेवी, पुण्यात्मा, परमार्थी इसी क्षेत्र में दिव्य सम्पदाएँ भर जाने पर कोई भी बन सकता है अन्यथा व्यवसायिक बुद्धि तो सदा संकीर्ण और स्वार्थपरता से ही प्रभावित होती है और लोभ, मोह और दर्प की अधिकाधिक उपलब्धि के प्रयासों में लगी रहती है।

स्थूल शरीर का काया को प्रभावित करने वाला और सूक्ष्म शरीर का मन को प्रभावित करने वाला प्राण दिनचर्या में अभ्यास का उपयोग करने से करतलगत होता जाता हे। इसके लिए प्राणाकर्षण जैसी सामान्य ध्यान-धारणाएँ काम दे जाती है और व्यक्ति आधि-व्याधि से छुटकारा पाने जैसा लाभ उठा सकता है। प्राणायाम की मोटी परिधि यही है। गहरी साँस लेने के साथ संकल्प शक्ति का चुम्बकत्व काम दे जाता है।

किन्तु उच्चस्तरीय स्वःलोक की विभूतियों को आकर्षित करने के लिए कुछ बड़े पराक्रम करने पड़ते है क्योंकि उसकी उपलब्धियाँ भी मूल्यवान हैं। उत्कृष्ट, आदर्शवादी त्याग-बलिदान, परोपकार सेवा साधना की भावनाएँ जगाने के लिए दिव्य लोक से खींच बुलाने के लिए शारीरिक और मानसिक संयम साधने पड़ते हे। संयमों को ही तप-तितिक्षा कहते है। ऊपर गिरते झरने की धार जहाँ गिरती है वहाँ गड्ढा बन जाता है। बिजली उत्पादन क्षेत्र जैसे संयत्र भी उसी वेग के साथ जुड़ते है। संयमी जिन्हें तपस्वी भी कहते है अपनी संकल्प शक्ति इतनी प्रचण्ड बना सकते है कि देवताओं की सम्पत्ति दिव्य श्रद्धा को हस्तगत करके वे महामानव, ऋषि, देवात्मा एवं अवतार बन सकें।

इसी क्षेत्र में निवास करने वाली दैत्यसत्ता भी पराक्रमी असुर प्राप्त कर लेते है। रावण, कुम्भकरण, हिरण्यकश्यप, वृत्रासुर, महिषासुर, भस्मासुर आदि ने प्रचण्ड भौतिक पराक्रम इसी क्षेत्र की दैत्यधारा से जुड़कर कमाया था।

मनुष्य के काय कलेवर में जो क्षमताएँ होती है वह सर्वविदित है। बलिष्ठ, बुद्धिमान, प्रतिभावान, समृद्धिवान, यशस्वी इन्हीं शक्तियों के आधार पर बना जाता है जो शरीर और मन में रहती है। उन्हें हस्तगत करने के लिए संकल्पशक्ति से काम चल जाता है। उसे प्राणायाम की साधारण या मध्यवर्ती आकर्षणशक्ति के सहारे उपलब्ध कर सकने भर से बात बन जाती है। मनस्वी अपने बल-बूते साँसारिक समृद्धियाँ एवं सफलताएँ प्राप्त कर सकते हैं। संकल्पवान मनस्वी बनने के लिए व्यवहार कौशल के अतिरिक्त प्राणायाम स्तर की विशिष्ट साधनाओं के सहारे भी प्रयास करना पड़ता है।

अतीन्द्रिय क्षमताओं का बोध तो आज्ञाचक्र भ्रूमध्य भाग में होता है पर इसकी जड़ कारण शरीर की हृदय गुफा में रहती है। इसके लिए प्राणायाम भी उच्चस्तरीय करने पड़ते है। इसमें सर्वसुलभ सोहम् साधना है। उससे आत्मिक स्तर की विशिष्टताएं उत्पन्नं होती हैं। व्यक्ति भावनाशील एवं उदात्त बनता है।

यदि अतीन्द्रिय स्तर की प्रचण्ड क्षमताएँ चाहिए तो मूलाधार अवस्थित कुण्डलिनी प्राणाग्नि को प्रज्ज्वलित करना होता है और उसकी ज्वाला-माल मेरुदण्ड से सुषुम्ना मार्ग में मस्तिष्क के मध्यवर्ती ब्रह्मरंध्र तक पहुँचाना होता हे। अतीन्द्रिय क्षमताओं में दूरदर्शन, दूरश्रवण, विचार-संचालन, प्राण-प्रहार, परकाया प्रवेश जैसी सिद्धियों की गणना होती है। इन बड़े कार्यों के लिए डाइनामाइट स्तर की प्रचण्ड ऊर्जा चाहिए।

उसे कुण्डलिनी जागरण पंचकोश अनावरण- षट्चक्र वेधन स्तर की साधनाओं द्वारा करना होता है। किन्तु इस सभी साधनों के लिए मूलभूत उपकरण की आवश्यकता होती है वह प्राणशक्ति की प्रचण्डता ही है। कठोर चट्टानें काटने के लिए हीरे की आरी अथवा वर्मा चाहिए। यह कार्य प्राणशक्ति की विशिष्ट क्षमता द्वारा ही सम्पन्न किये जा सकते हैं। ऐसे प्राणायामों को गुप्त रखा जाने वाले सुपात्र को बताये जाने की ही परम्परा है। इसी स्तर के लोग ही उन अभ्यासों में सफल भी हो सकते है।


परमात्मा की खोज (kahani)

अरस्तु से किसी ने पूछा कि तुमने विवाह क्यों नहीं किया? तो अरस्तु ने कहा। “दो पत्नियाँ एक साथ रखना कठिन पड़ेगा।” पूछने वाला हैरान हुआ। क्या आपकी पहले भी कोई पत्नी है? अरस्तु ने कहा- “हाँ जिस दिन से परमात्मा की खोज में लगे हैं उस दिन से सारी शक्ति तो उसमें चुक जाती है। अब दूसरी पत्नी रखना मुश्किल है।


आवेशों को हावी न होने दें!

वजनदार भारी भरकम वे व्यक्ति माने जाते हैं जिनमें बाहर के प्रभावों को समझ-बूझ कर उचित मात्रा में ग्रहण करने की क्षमता होती है। जो दूर की बात सोचते और भावी परिणामों को देखकर कदम उठाते हैं। उथले-ओछे उन्हें कहते है जो तत्काल भावुक हो बैठते है। ऐसे लोगों से वस्तु स्थिति समझते बन नहीं पड़ती। उतावली उन्हें जो कुछ सुझा देती है उसे न केवल ध्रुव सत्य की तरह मान बैठने के लिए कदम उठा लेते है। भले ही उसका परिणाम थोड़े ही दिन उपरान्त इस रूप में सामने आये कि पछताने के अतिरिक्त और कुछ शेष न रहे।

प्रेम प्रसंगों में अक्सर ऐसी ही उतावली उभरती रहती है। नई उम्र के लड़के-लड़कियाँ अनुभवहीनता के कारण यह नहीं समझ पाते कि जिसके साथ संबंध सूत्र बनाया जा रहा है वह कहीं नाटक तो नहीं कर रहा है। भावुकता भड़काकर उसे निकट लाने और अनुचित लाभ उठाने की फिराक में तो नहीं है। इनकी मनः स्थिति और परिस्थिति इस प्रसंग को उभार सकने के उपरान्त उसे भविष्य में भी निबाहते रहने की है या नहीं। भावुकता का उभार मात्र एक पक्षीय चिन्तन तक सीमित कर देता है। चिन्तन को उन्माद स्तर तक पहुँचा देता है और जमीन रहते हुए आकाश जैसी कल्पनाएं करने के लिए विवश कर देता है। सही निष्कर्ष पर पहुँचने के लिए प्रिय कल्पना को ही सब कुछ नहीं मान लिया जाना चाहिए वरन् देखना यह भी चाहिए कि ऐसी संभावनाएं तो सामने नहीं आ रही जो वर्तमान मान्यता के सर्वथा विपरीत है। संभव और असंभव, उचित और अनुचित की उभयपक्षीय विवेचना करने के उपरान्त ही किसी निष्कर्ष पर पहुँचा जा सकता है। इस संदर्भ में प्रायः अतिभावुक व्यक्ति असफल ही रहते है। बिना विचारे कुछ भी कदम उठा लेने के लिए उत्तेजित करने वाली एकाँगी भावुकता प्रायः पछताने वाले प्रसंग ही उपस्थिति करती है। ठगे जाने की, विश्वासघात की प्रायः ऐसे ही लोग शिकायत करते पाये जाते है। पुरुषों की अपेक्षा महिलाएँ प्रायः इस प्रकार के जाल-जंजाल में अधिक फँसती देखी जाती है।

ठगों का व्यवसाय ही यह है कि वे तर्क न सकने वाले सहज विश्वसनीयों को कम समय में सुगमता पूर्वक बहुत धन कमा लेने सब्जबाग दिखाते है और जाल में फँस जाने वालों की उलटे उस्तरे से हजामत बनाते हैं। यह ठगे जाने वाले लोग यह विचार नहीं कर पाते कि कमाई इतनी सरल रही होती तो कहने वाला पहले ही करोड़पति बन गया होता। दूसरों को क्यों ऐसे रहस्य बताता फिरता। उधार माँगने वाले भी अपनी ईमानदारी और आवश्यकता का इस प्रकार वर्णन करते हैं कि सहज स्वभाव वाले को देते ही बने रहे। सहज विश्वासी भावुकता वश आये दिन ऐसे ही घाटे उठाते रहते हैं। अपनी जाँच-पड़ताल कर सकने में असमर्थ रहने की कमी को नहीं देखते। दोष बहेलियों को और मछलीमारों को देते हैं, जो सदा जाल बिछाते और अदूरदर्शियों को फँसा कर ही अपना गुजारा करते हैं।

यह सब मंदमति के ठंडे बस्ते में पड़ने वाले आवेश हैं। इनकी एक बिरादरी और भी है जो तनिक सी प्रतिकूलता आते ही आग-बबूला बना देती है और इतना होश नहीं रहने देती कि जो उन्माद अपनाया जा रहा है उसका परिणाम अगले ही क्षणों में क्या होकर रहेगा?

उठती उम्र के किशोर लड़के स्वाभिमान कही हल्की सी झलक झाँकी उठते ही उसे उद्धत अहंकार में बदल लेते हैं और उन के अनुकूल परिस्थिति न बन पड़ने पर ऐसे कदम उठा लेते हैं जिससे न केवल उन्हें वरन् अभिभावकों समेत पूरे परिवार को त्रास सहना पड़ता है। घर छोड़ कर भाग खड़े होने वाले अनुभवहीनता के रहते न जाने कहाँ-कहाँ धक्के खाते और कितने-कितने अपमान सहते है। फिर बरबस लौटने में नाक कटती देखकर जहाँ-तहाँ दिन गुजारते हैं। अपने को, अपनों को वे लंब समय तक कष्ट देकर तब कहीं होश में आते हैं और नासमझी पर पछताते हैं।

इन दिनों किशोर लड़कों के घर छोड़कर भाग जाने के समाचार आये दिन हर क्षेत्र में मिलते रहते हैं। इनमें कुछ ऐसे भी होते हैं जो आवेश की चरम स्थिति में आत्मघात तक कर बैठते है। कारण तलाश करने पर बात इतनी छोटी से होती है कि किसी गलती पर घर वालों से मामूली डाँट-डपट की। उनने उसी को अपना भारी अपमान माना। यह भूल गये कि अपने बड़े हितैषियों को यह अधिकार भी है कि वे नरम ही नहीं गरम शब्दों में भी भूल सुधारने के लिए कुछ कह सकते हैं। भूल समझने की तो स्थिति ही नहीं होती। अपमान, आवेश के उन्माद में कुछ ऐसा करने का मन करता है जिससे समझाने वालों से प्रतिशोध किया जाय। भले ही इसमें उन्हें स्वयं कितने ही कष्ट उठाने, बदनामी सहने और लोगों की आँखों में उतरने का जोखिम उठाना पड़े।

नव बंधुओं के संबंध में भी कितनी ही घटनाएँ ऐसी ही घटित होती रहती है। जिनमें कई बार तो ससुराल वालों द्वारा त्रास दिये जाने की घटनाएँ भी होती है। पर ऐसे प्रसंगों की भी कमी नहीं होती जिसमें साधारण कहना सुनना भी बहुत बढ़ा-चढ़ा कर माना गया और घर छोड़ देने से लेकर आत्म-हत्या कर बैठने जैसा रोमाँचकारी कदम उठा लिया गया। इस आवेश में इतना तक ध्यान नहीं रहता कि उनके छोटे बच्चों का पीछे क्या होगा?

पारस्परिक मनोमालिन्य के, मतभेद के अवसर भी साथियों के बीच आते है। उन्हें प्रतिष्ठा का प्रश्न न बना कर आपसी विचार विनिमय से या किसी मध्यस्थ के माध्यम से हल किया जा सकता था। बड़ी हानि होने की संभावना हल किया जा सकता था। बड़ी हानि होने की सम्भावना को देखते हुए छोटी हानि उठा लेने का भी मन बना लिया जा सकता था, पर वैसा अवसर बन नहीं पड़ता। बात का बतंगड़ हो जाता है और नाराजी दुश्मनी में बदल जाती हैं। आक्रामक रवैया अपनाने पर प्रत्याक्रमण का सिलसिला चल पड़ता है। बहुधा उसका जीवन भर अन्त नहीं होता। इस कुचक्र में बहुधा दोनों पक्षों को इतनी अधिक हानि उठानी पड़ती है कि उसी तुलना में प्रथम मन मुटाव को दर गुजर कर देना कहीं अधिक सस्ता पड़ता। हत्या और आत्महत्या के मूल कारण की तलाश करने पर विदित होता है कि आरंभिक मूल कारण इतना बड़ा नहीं था जिस पर चरम सीमा का आक्रोश उभारा जाता और इतना बड़ा कदम उठाया जाता जिससे दोनों ही पक्ष एक प्रकार से तबाह हो जाने की स्थिति तक जा पहुँचते।

असहिष्णुता या एकाकी रहने से अधिक सुविधा सोचने पर कई सम्मिलित परिवार बिखर जाते है। एक ही कुटिलता, दूसरों को भी ऐसा ही करने के लिए विवश करती है। फलतः संयुक्त कारोबार संयुक्त सम्मान विघटित होकर अस्त व्यस्त हो जाता है। बुहारी से अलग-अलग हुई सीकें किस प्रकार कूड़े के ढेर से जा गिरती है, यह सभी ने देखा है। फिर भी जब किसी पर स्वार्थ परता, कुटिलता सवार होती है तो यह पता नहीं चलता कि क्या किया जाना था और क्या कर डाला गया। दुष्परिणाम का अनुमान तब होता है जब समय गुजर गया होता है और पछताने के अतिरिक्त और कुछ शेष नहीं बचा सकता।

विग्रहों में से आधे ऐसे होते है जिनके पीछे कोई ठोस कारण नहीं थे। मात्र गलतफहमी से ही कुछ का कुछ समझ लिया गया और तिल का ताड़ बन गया। यदि शान्त चित्त से वस्तुस्थिति को समझा गया होता तो पता चलता कि गाँठ छोटी सी थी और उसे आरंभ में ही आसानी से सुलझाया जा सकता था।

अदूरदर्शी, अविवेक, उथली, भावुकता से मिल कर प्रायः अवाँछनीय दुष्परिणाम ही उत्पन्न करता है। यदि मन को उत्तेजना के वशीभूत न होने दिया जाय और तथ्यों के गहराई तक पहुँचाने का प्रयत्न किया जाय तो प्रतीत होगा कि “ठहरा और देखा’ की बात ही ऐसे प्रसंगों में बुद्धिमत्ता पूर्ण सिद्ध होते है।


अनन्त संभावनाओं का स्त्रोत- मानवी मन

आकृति में छोटा किन्तु प्रकृति में विराट मानवी मस्तिष्क का विश्लेषण करने पर पैसा ही आश्चर्यजनक प्रतीत होता है जैसा कि ब्रह्मांड की रहस्यमयी क्षमताओं पर दृष्टिपात करते समय यह विराट का वैभव। इसकी संरचना बड़ी अलौकिक एवं अद्भुत है। मस्तिष्क ब्रह्माण्डीय चेतना का-परमात्मा का प्रतीक है। शरीर पदार्थ विज्ञान है तो मस्तिष्क ब्रह्म विज्ञान। स्वभावतः गरिमा चेतन सत्ता की ही मानी जायगी क्योंकि शरीर की प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष गतिविधियों पर उसका नियंत्रण है। इतना ही नहीं मस्तिष्क जिस व्यापक चेतना केन्द्र के साथ आदान-प्रदान स्थापित करने में समर्थ है उसे देखते हुए यही कहा जा सकता है कि परमात्मा और आत्मा के बीच विद्यमान एकात्मा की तरह मानवी मस्तिष्क भी विश्व चेतना (कास्मिक माइन्ड) के साथ अविच्छिन्न रूप से जुड़ा रहने के कारण उतना ही सशक्त समझा जाता है।

मस्तिष्कीय क्षमताओं में स्मरण शक्ति का बहुत बड़ा योगदान है। जो आज पढ़ता-सुनता है और कल भूल जाता है, उसे अशिक्षित एवं अनगढ़ स्थिति में ही रहना पड़ेगा। स्मरण-शक्ति की आवश्यकता एवं उपयोगिता को समझते हुए शिकागो यूनीवर्सिटी में कार्यरत मनोरोग विशेषज्ञ डा. रोबोर्ट रोज ने एक ऐसे मस्तिष्क में सूचनाओं के भण्डारण की जटिल प्रक्रिया और खोई स्मृतियों को पुनः प्राप्त कर सकने की क्षमता का अध्ययन .... से किया जा सकता है। इन्हें न्यूरोट्रांसमीटरों के नाम से जाना जाता है। डा. राज का कहना है कि इस रसायन की आकृति और प्रकृति अन्यान्यों की तुलना में भिन्न स्तर की होती है।

न्यूरोट्रांसमीटरों की तुलना रेडियो तरंगों से की गई है लेकिन इन्हें क्रियाशील बनाने की क्षमता न्यूरोमोडूलेटर हारमोन में पायी जाती है जो डायल की भाँति लयबद्ध तरीके से ट्यूनिंग की जिम्मेदारी निभाता है। इसी को दूसरे शब्दों में एड्रीनोकोर्टीकोट्रापिक हारमोन अर्थात् एसीटीएच नाम से जाना जाता है। जिसका उद्गम स्त्रोत पीयूष ग्रन्थि है। श्रमशीलता के परिणाम स्वरूप यह रक्त प्रवाह में घुलकर ऐड्रीनल हारमोन के निर्माण में पिल पड़ता है जिससे स्मरण शक्ति में अप्रत्याशित अभिवृद्धि हो उठती है।

मनःसंस्थान का गहनता से पर्यवेक्षण करने के उपरान्त पता चला है कि तथ्यों को भविष्य में याद रखने की आवश्यकता समझी तथा उनमें गहरी अभिरुचि उत्पन्न की जानी चाहिए। स्मरण और विस्मरण की लाभ हानियाँ पर भी समान रूप से विचार किया जाय तो अनेकानेक तथ्यों की परत मस्तिष्क में जमायी जा सकती है।

आये दिन घटित होने वाली अद्भुत अलौकिक और आश्चर्यजनक घटनाएँ वैज्ञानिकों, चिकित्सकों और अन्वेषकों के लिए चुनौती और गुत्थी बनकर आ खड़ी होती है तो वैज्ञानिक नियमानुसार उन्हें नहीं समझा जा सकता। वर्ष 1978 में इंग्लैंड के मेडीकल रॉयल कालेज में एक व्यक्ति की मृत्यु के प्रसंग को लेकर संगोष्ठी आयोजित की गई। मृतक का परीक्षण किया गया तो उसके हृदय की धड़कने पुनः धड़कने लगीं। तब से यह सिद्ध हो चुका है कि हृदय की गति, श्वसन प्रक्रिया तथा शरीर की सम्पूर्ण गतिविधियों का नियंत्रण एवं नियमन मस्तिष्क से ही होता है और मस्तिष्कीय कोशिकाओं की मृत्यु के उपरान्त ही व्यक्ति को मृत घोषित किया जा सकता है। असीम क्षमताओं से भरा पूरा मानवी मस्तिष्क इतना सशक्त और समर्थ है कि इसका पूरी तरह उपयोग करने पर अनेकानेक तरह की महत्वपूर्ण सफलताएँ हस्तगत की जा सकती है। मनः संस्थान को जाग्रत एवं सक्षम बनाने के लिए निरन्तर प्रयत्नशील रहना ही व्यक्ति की विवेकशीलता है।


एक और अंगुलिमाल

सन् 1863 की सर्दीली सुबह। पेरिस का एक कुख्यात अपराधी अपने स्वजन सम्बन्धियों से अन्तिम बार मिल रहा था। पेरिस के न्यायालय ने उसे निष्कासन का दण्ड दिया था और तीन दिन के भीतर अपनी तैयारियाँ पूर्ण कर पेरिस छोड़ने का फैसला सुनाया था। उस अपराधी का नाम था फ्रैच्कुइस डी विलीन। फ्रेन्कुइस की गणना फ्रांस के कुख्यात अपराधियों में की जाती थी। ऐसा नहीं था कि वह पैदायशी अपराधी था। बचपन में तो उसकी गणना-मेधावी छात्रों में की जाती थी। छात्र और अध्यापक सभी उसकी प्रतिभा का लोहा मानते थे। किन्तु दुर्योग से वह अपने विद्यार्थी जीवन में ही ऐसी कुसंगति में फँस गया कि उसकी रुचि अपराध की ओर खिंच गई। जिस प्रतिभा ने उसे विद्यार्थी जीवन में विश्वविद्यालय का गौरव बनाया था, वही जब भटक गई तो फ्रैन्कुइस बन गया, अपराधियों का गुरु।

सुशिक्षित फ्रैन्कुइस ने अपने अपराधी जीवन का आरम्भ जेब कटी से किया फिर वह चोर बना। वह पेरिस की गन्दी बस्ती में रात भर वैश्यालयों में पड़ा रहता। जब उसे पैसों की जरूरत पड़ती वह किसी को भी धर दबोचता और अपने आतंक से डराकर उसके पास जो कुछ भी होता छीन लेता। जेब कटी और चोरी के बाद डाके डालने की आदतें भी पड़ी। उसे डाके डालने में इतना आनन्द आता कि वह अपने शिकार के साथ बुरी तरह मारपीट भी करता।

फ्रैन्कुइस के इन क्रिया-कृत्यों से पुलिस ने उसका नाम काली सूची के शिखर पर दर्ज कर दिया पुलिस उसे गिरफ्तार करने के लिए बार-बार फंदा कसती पर फ्रैन्कुइस हर बार उस फन्दे को तोड़ देता। लोगों को हमेशा एक दहशत सी बनी रहती। लेकिन भला कोई कब तक बच सकता है। एक बार वह पुलिस की गिरफ्त में ऐसा आया कि उसकी सारी चालें बेकार हो गई। न्यायालय ने उसे प्राणदण्ड दिया। उसके सारे हौंसले पस्त हो गए, मनोबल चकनाचूर हो गया।

उन दिनों पेरिस निवासियों पर पादरी ग्यूलैमी का अच्छा प्रभाव था। ग्यूलैमी के व्यक्तित्व और आचरण द्वारा लोगों को नैतिकता और मानवता के मार्ग पर आरूढ़ होने की प्रेरणा मिलती थी। वे सोचने लगे कि यदि उसे एक बार सुधरने का मौका दिया जाय तो शायद वह अपना जीवन बदल दे। इसलिए उन्होंने फ्रांस सरकार से उसके लिए क्षमा याचना की। सरकार ने उसे क्षमा तो नहीं किया परन्तु उसका प्राणदण्ड निर्वासन में जरूर बदल गया।

ग्यूलैमी उससे मिले। अपने प्रेम से लबालब भरे हृदय को उस पर उड़ेला। आत्मीयता भरे स्वरों में उसे बोध कराया कि मूलतः तुम अपराधी नहीं हो। तुम्हारे अब तक के कर्म कुछ भूलें भर है। तुम्हारे चाहने पर उनका पूरी तरह परिमार्जन सम्भव है। यह परिमार्जन होते हुए तुम्हारा व्यक्तित्व निखर आएगा। तुम्हारे भीतर का देवता जग जाएगा। यह देवता और कोई नहीं तुम स्वयं हो।

ग्लूमैली के प्रेम ने उसके अंतस् के मर्म स्थल को छू लिया। भीतर सोए देवता ने अंगड़ाई ली इतिहास ने अपनी पुनरावृत्ति की। एक नया अंगुलिमाल भिक्षु बना। फ्रैन्कुइस के ढाँचे में बदलने लगा। अपनी कविताओं में पीड़ा, पश्चाताप अपने अतीत से घृणा और पिछले जीवन के कारण स्वयं के लिए तिरस्कार की भावनाओं को इतने सशक्त ढंग से व्यक्त किया कि फ्रैन्कुइस डी विलान फ्रांस का श्रेष्ठ कवि और उच्चकोटि का साहित्यकार बन गया। मनुष्य में परिवर्तन असम्भव नहीं है। सिर्फ आवश्यकता उससे अन्तर की दैवी भाव सम्वेदनाएँ छूने और उभारने की है।


भावी पीढ़ी चरित्रवानों की होगी

चरित्र इस शब्द में मनुष्य का समूचा व्यक्तित्व समाया हुआ है। सामान्य अर्थों में चरित्रवान उन्हीं को कहा जाता है जिनकी व्यक्तिगत जीवन में कर्तव्य परायणता, सत्यनिष्ठा, पारिवारिक जीवन में सद्भाव, स्नेह, सामाजिक जीवन में शिष्टता, नागरिकता आदि आदर्शों के प्रति निष्ठा है। इन्हें दृढ़ता के साथ पालन करते हैं। दूसरे शब्दों में इन्हीं को व्यक्तित्ववान भी कहा जाता है। किसी भी देश, समाज अथवा समुदाय का भाग्य इन्हीं पर टिका रहता है। ऐसे चरित्रवान नहीं सतयुगी परिस्थितियों को पनपाते विकसित करते तथा समाज का कायाकल्प करने में सक्षम होते है।

प्रथम विश्वयुद्ध में मित्र राष्ट्रों ने जापान को तहस नहस कर दिया था। दूसरे महायुद्ध में उसे कम क्षति नहीं उठाती पड़ी। इस सबके बाद कुछ ही गया। विजेता राष्ट्र विजय का उपहार लेकर भी युद्ध में हुई क्षति की भरपाई नहीं कर पाए थे कि पराजित जापान ने हर के बावजूद अपने जहाँ अर्थतंत्र की रीढ़ को पुनः .... कर लिया। कारण एक ही था, वहाँ के निवासियों का राष्ट्र-भक्ति सम्पन्न उन्नत चरित्र।

देश व समाज के प्रति प्रेम चरित्र का अनिवार्य अंग है। जहाँ यह तत्व जितना अधिक होगा वहाँ सुव्यवस्था, शान्ति व समुन्नति के आधार उतने ही मजबूती का कारण वे व्यक्ति हैं जो जनहित के लिए कुछ भी उत्सर्ग करने के लिए तैयार हो जाते है। स्पान पत्रिका में एक विवरण छपा था-एक बार अमेरिका में किन्हीं रोगों के उपचार का प्रयोग करने के लिए जीवित मनुष्यों के शरीर की चीर-फाड़ आवश्यक अनुभव की गई। वैज्ञानिक जीवित मनुष्य की देह पर कुछ प्रयोग करना चाहते थे, अतः समाचार पत्रों में विज्ञापन दिए गए। जनहित की भावना से प्रेरित होकर सैकड़ों व्यक्तियों ने स्वयं को प्रस्तुत किया। परिणाम स्वरूप कई असाध्य रोगों की चिकित्सा के उपाय ढूंढ़े जा सके।

चरित्रवान व्यक्ति के लिए खुद का स्वार्थ नहीं दूसरों का, समाज का हित प्रधान रहता है। इसको पूरा करने के लिए अपने स्वार्थ का ही नहीं अस्तित्व तक परित्याग कर देते है। पेरिस में हुई राज्य क्रान्ति के समय की घटना है। तब क्रान्तिकारी दमन चक्र से पीसे और जेलों में ठूँसे जा चुके थे। यहाँ तक कि विपक्षी सैनिकों ने कैदखानों में घुसकर इन्हें शाक-भाजी की तरह काटना शुरू कर दिया। इन सैनिकों ने एक बन्दी को पहचाना, जिसका नाम था आँवी सिफार्ड ने अनुरोध किया कि यदि तुम लोग मेरे बदले उस तरुण महिला को जाने दो, जो गर्भवती है तो मुझे मर कर भी प्रसन्नता होगी। माना कि हम लोगों ने नियम भंग किया है पर गर्भ में पल रहे मासूम को तो निर्दोषिता का पुरस्कार मिलना चाहिए। पादरी की करुणा व दयार्द्रता ने आँवी सिफार्ड नाम को इतिहास में अमर कर दिया।

आदर्शों के प्रति निष्ठा सामाजिक हितों के लिए उत्सर्ग की उमंग व्यक्तित्व को इतना तेजस्वी बना देती है कि लोक श्रद्धा अनायास ही उसके प्रति उमड़ने लगती है। जब समाज या राष्ट्र पर संकट के बादल घिर आते है तो जन समुदाय ऐसे ही चरित्रवान, साहसी लोगों से मार्गदर्शन की अपेक्षा करता है। उन्हें ही नेतृत्व सौंपता है। रोमन साम्राज्य जब संकट में फँसा तो शासन सभा के सदस्यों ने एक ऐसे व्यक्ति को सूत्र संचालन सौंपा जो सक्रिय राजनीति से संन्यास लेकर सामान्य जीवन व्यतीत कर रहा था। नाम था सिनसिनेट्स। वह अपने तेजस्वी व्यक्तित्व और आदर्श चरित्र के बल पर एक बार पहले भी राजप्रमुख के रूप में वर्षों तक राष्ट्र का नेतृत्व करता था। जब संकट की घड़ियाँ आई, एक बार फिर सभासद उसके पास पहुँचे। उस समय वह खेत पर काम कर रहा था। वहाँ से आकर संकट की घड़ियों में फँसे देश को चर्चिल की तरह उबारा। जनता ने उनके प्रति जो विश्वास व्यक्त किया था, उसे कायम रखा। संकट के दौर के समाप्त हो जाने पर पुनः उत्तराधिकारियों को बागडोर थमा शान्ति के साथ जीवन व्यतीत करने लगा।

सब जानते है कि लगभग दो सौ वर्ष पहले अमेरिका ने वाशिंगटन के नेतृत्व में स्वतंत्रता प्राप्त की थी। कुछ समय तक शासन सँभालने के बाद वह राजनीति से विरत होकर सामान्य जीवन व्यतीत करने लगे। इसी समय अमेरिका और फ्राँस में युद्ध छिड़ा। इस विषम वेला में लोगों ने एक बार फिर वाशिंगटन को याद किया। अपने कार्यकाल में उन्होंने कर्तव्य निष्ठा, सूझबूझ और चारित्रिक गुणों की ऐसी धाक जमा ली थी क तत्कालीन प्रेसीडेन्ट मि. एडम्स ने उन्हें देश की बागडोर सम्भालने को कहा। एक प्रमुख नेता ने अपने अनुरोध भरे पत्र में लिखा “अमेरिका की सारी जनता आप पर विश्वास करती है। यूरोप में एक भी राज्य सिंहासन ऐसा नहीं है जो आपके चरित्र बल के सामने टिक सके।”

ऐसों की प्रामाणिकता हर किसी के लिए विश्वसनीय होती है। हर कोई उन्हें सम्मान देता है। इन्हीं के लिए लोगों के हृदय श्रद्धा से भरे रहते है। स्वामी विवेकानन्द ने एक स्थान न कहा है कि संसार का इतिहास उन मुट्ठी भर व्यक्तियों का बनाया हुआ है जिनके पास चरित्र बल का उत्कृष्ट भण्डार था। यों कई योद्धा, विजेता हुए हैं। बड़े-बड़े चक्रवर्ती सम्राट हुए है। इतने पर भी इतिहास ने उन्हीं व्यक्तियों को अपने हृदय में स्थान दिया है जिनका व्यक्तित्व समाज के लिए एक प्रकाश स्तम्भ का काम कर सका है।

उन्हीं महापुरुषों का गुणगान किया जाता है जिन्होंने समाज को प्रगतिशील जीवन मूल्य, चरित्र को युग के अनुरूप मान दण्ड दिये हैं। आदर्शों की समयानुकूल परिभाषा खुद के व्यक्तित्व व कर्तृत्व के माध्यम से की है। जो गुण व्यक्ति के समग्र जीवन को आच्छादित करते हैं। जिनके द्वारा उसे जीवन व व्यवहार के सभी क्षेत्रों में प्रामाणिकता हासिल होती है। मानवीय गुणों का वही समुच्चय-चरित्र के तीन शब्दों में संजोया है। इन दिनों समाज में बदनीयती, स्वार्थपरता, बेईमानी चारों और दिखाई देती है। उसका एक मात्र कारण है कि जनमानस में चारित्रिक मूल्यों के प्रति आस्था नहीं है। उनकी अवहेलना की जाने लगी है। यह अवहेलना उपेक्षा ही समाज को विकृत और विवश बनाए हुए है। जब तक हम में से हर एक इसके लिए प्रयास हेतु कटिबद्ध नहीं होता, बात बनने की नहीं।

इस दिशा में शुभारम्भ यहाँ से करना चाहिए कि अगर हर व्यक्ति महापुरुष नहीं बन सकता तो न बने। पर चारित्रिक मूल्यों को अपनी भीतर समाविष्ट तो करे। माना कि हर आदमी हरिश्चंद्र की तरह सच बोलने वाला नहीं बन सकता। किन्तु अकारण बोले जाने वाली झूठ से तो बच सकता है। उदारता, सद्व्यवहार, कर्तव्यनिष्ठा, परदुःख कातरता आदि ऐसे गुण हैं, जिनका अभ्यास छोटे रूप में भी शुरू किया जा सकता है। अभ्यास का क्रम चलता रहा तो चरित्र साधना आगे बढ़ती रहेगी। भावी समय भी उन्हीं का होगा जो इस साधना में जुटे है। हमारी अपनी स्थिति क्या है? टटोलें, कहीं पीछे तो नहीं छूट रहे। नए युग की सुखद ऊषा के साथ हम आंखें खोलें और कदम बढ़ाएँ। ये बढ़ते हु कदम व्यक्तिगत जीवन में सरसता और सामाजिक जीवन में सुव्यवस्था लाने वाले होंगे। कायाकल्प हुआ समाज अपने नए यौवन में साफ दिखाई देने लगेगा।


Quotation

समर्थ वे हैं, जो कार्यरत रहने का साहस अपनाये रहें। सुन्दर वे हैं, जिनने संयम बरता और संकल्प निभाया।


संगीत द्वार काया एवं मन का उपचार

संगीत के बारे में प्रायः जन साधारण की मान्यता है कि यह मन बहलाने अथवा मनोरंजन का साधन है, अथवा भजन, पूजन में कविताएँ, छन्द आदि भगवान के गुणानुवाद की काम की चीज है। वस्तुतः संगीत के और भी उपयोग है। यह मनुष्य की ही नहीं मूक पशु पक्षियों तक की भावनाओं को प्रेरित करने में सक्षम है। मनुष्य समझदार होने के कारण और अधिक लाभान्वित होता है। उसकी कोमल भावनाएँ झंकृत ओर तरंगित होती है। इसमें उसके अन्दर करुणा, रौद्र, वीर, वात्सल्य, ममता, दया, उदारता आदि की प्रसुप्त भावनाएँ उभरती हैं। शारीरिक, मानसिक रोगों के निवारण एवं उत्कृष्टता की दिशा में बढ़ चलने की प्रेरणा प्रवाह उमगाने का अद्भुत समन्वय संगीत की मधुर स्वर लहरियों में भरा पड़ा है। आवश्यकता सदुपयोग कर उससे लाभान्वित होने भर की है।

मन के बोझ को, हताशा, निराशा, उद्विग्नता को कम करने या छुटकारा दिलाने में संगीत सर्वोत्तम साधन है। इस तथ्य से प्रख्यात ग्रीक दार्शनिक प्लेटो भी भली−भांति सुपरिचित थे। वह लोगों के मन की सड़ाँध के विरेचन के लिए संगीत को एक अच्छा माध्यम मानते थे। संगीत की स्वर लहरियों से सुषुप्त एवं निष्क्रिय माँसपेशियों, नस नाड़ियों को जाग्रत एवं उत्तेजित किया जा सकता है। भावनाओं में रची, पची, कटुता को मधुरता में, तनाव को शिथिलता और शान्ति में परिणित करने का संगीत एक सशक्त एवं कारगर उपाय उपचार है। मानसिक रोगों में संगीत उपचार एक सफल माध्यम है।

अनुसंधानकर्ता वैज्ञानिकों ने आलस्य प्रमाद को दूर करने में सरस एवं कोमल रोगों का प्रलाप उपयुक्त पाया है। यदि ये रोग लयबद्ध, शुद्ध और नियत समय पर गाये बजाये जाते है तो इनके लाभ की अधिक सुनिश्चितता और सम्भावना रहती है। पाश्चात्य देशों में कितने ही अस्पतालों में औषधियों के साथ सुमधुर संगीत का प्रयोग किया जाता है। कितने ही डाक्टर विशुद्ध संगीत के सहारे ही इलाज करते हैं। म्यूनिख के डाक्टर लुडविन ने मानसिक रोगियों के लिए विशेषतया किशोर बच्चों के लिए एक अलग से संगीत अस्पताल बनाया है। जिनमें न केवल रोगों की चिकित्सा की जाती है, वरन् ध्वनि विशेष के आधार पर उनकी कुटेवों को भी दूर किया जाता है।

मूर्धन्य मनोरोग चिकित्सक पीटर न्यूमैन और माइके सेनडर्स, ने एक ऐसी मनोरोग चिकित्सालय आरम्भ किया है जहाँ उपचार में संगीत वादन का ही प्रयोग किया जाता है। रूस में भी प्रो. एस.बी. कोदाफ स्नायविक रोगों की चिकित्सा में संगीत का प्रयोग कर रहे हैं। शिकागो में डाँ. बेकर तथा डाँ. वर्ड मैन और बुकलिंग ने आपरेशन के समय संगीत के अच्छे परिणाम देखे है। अमेरिका, फ्राँस, जर्मनी और जापान में अब संगीत चिकित्सा सामान्य हो गई है। उसे न केवल स्वास्थ्य संवर्धन के लिए वरन् शारीरिक और मानसिक दृष्टि से दुर्बल व्यक्तियों के लिए शक्ति संचार के माध्यम के रूप में प्रयोग किया जाने लगा है। जिन रोगियों को असाध्य मानकर समाज में बहिष्कृत, तिरस्कृत और निष्कासित कर दिया जाता है। वास्तव में वे पूर्णरूप से बेकार नहीं हो पाते। प्रायः ऐसे लोग भावनाओं को गहरा आघात अथवा ठेस लगने के कारण अपना सन्तुलन खो बैठते हैं। ऐसे दयनीय रोगियों की भावनाओं को जाग्रत करने की आवश्यकता होती है। संगीत चिकित्सकों ने ऐसे कार्यों में संगीत को एक सफल उपचार के रूप में पाया है।

संगीत लहरियों के माध्यम से प्रसुप्त निष्क्रिय माँस-पेशियों को जगाया व उत्तेजित किया जा सकता ह। दुर्भावनाओं को मिटाकर मधुर रस का अभिसंचार किया जा सकता है। यही कारण है कि तनाव दूर करने एवं मनःचिकित्सा का पूरा समग्र तंत्र स्थापित करने में इसकी महता को अब समझा जा रहा है।


व्यक्ति को माध्यम बनाती है समष्टि सत्ता

विज्ञान जगत में जिन खोजियों और आविष्कारों को श्रेय-सम्मान मिला, उन्हें सौभाग्यशाली कहा जाता है। गहन परिश्रम, मनोयोग और लगन के सत्परिणाम क्या हो सकते है, इसका उदाहरण देने के लिए भी उनके नामों का उत्साहवर्धक ढंग से उल्लेख किया जा सकता है। विषय वस्तुतः की गहराई में उतरने और ढूँढ़-खोज करने की प्रेरणा भी उस चर्चा से कितनों को ही मिलती है, इतने पर भी इस तथ्य को भुला न दिया जाना चाहिए कि उन आविष्कारों के प्रारंभिक रहस्य प्रकृति ही अपना अन्तराल खोल कर प्रकट करती और मूर्धन्यों को बनाती है। हाँ, यह अवश्य है कि इस प्रकार के प्रकटीकरण हर किसी के समक्ष उपस्थित नहीं होते। प्रकृति को भी पात्रता की परख करनी पड़ती है।

आविष्कारों-अनुसंधानों का उल्लेख पुस्तकों में जिस प्रकार वर्णित होता है वह तो बहुत बाद की स्थिति है, पर यदि उनका आरंभ जानना हो, तो यह तलाशना पड़ेगा कि इसके लिए मूर्धन्यों को आवश्यक प्रकाश प्रेरणा कहाँ से, किस प्रकार मिला? मूल में जाने पर यह ज्ञात होगा कि इसके लिए उनके मस्तिष्क में किसी प्रकार की पूर्व योजना या तैयारी नहीं थी। विचार अनायास ही उठे और उसके अनुसार जब क्रिया चल पड़ी, तो नूतन आविष्कार हो गये।

पिछले दिनों के महत्वपूर्ण आविष्कारों का इतिहास देखने से यह तथ्य और स्पष्ट हो जाता है। सन् 1619 की बात है। 23 वर्षीय वैज्ञानिक रेने डेस्कार्टिस मानसिक तनाव से गुजर रहे थे। कारण शोध सम्बन्धी समस्या थी। वे जिस गणित विज्ञान को एकीकृत करने की कल्पना सँजोये हुए थे, उसमें सफल नहीं हो पा रहे थे। गलती कहाँ हो रही थी, इसका पता चल नहीं पा रहा था। उनकी बेचैनी बढ़ती जा रही थी। इसी क्रम में एक दिन ब्राह्म मुहूर्त में एकाएक उन्हें एक नवीन प्रेरणा मिली। इस आधार पर नये सिरे से जब कार्यारंभ किया, तो वे सफल हुए। उनका गणित-विज्ञान संभव हुआ। इस घटना के बाद से उनके जीवन की दिशाधारा ही बदल गई। अधिकाँश समय वे सत्य की खोज में बिताने लगे। उत्तरार्ध जीवन में उनने एक नये दर्शन का विकास किया, जिसका प्रभाव लम्बे समय तक पश्मी विज्ञान जगत में बना रहा।

विज्ञान जगत में मूर्धन्य समझे जाने वाले वैज्ञानिक आइन्स्टीन का भी कहना था कि इस विश्व-ब्रह्मांड में आवश्यक ही कोई दिव्य चेतना काम करती है, जो समय-समय पर मानवी मन में प्रेरणा उभारती और उस दिशा में आवश्यक मार्गदर्शन देती है। इस संबंध में ये एक आप बीती घटना का उल्लेख करते हुए कहते हैं कि एक बार उन्हें एक वैज्ञानिक गोष्ठी में किसी जटिल समीकरण का हल प्रस्तुत करना था। कई दिनों से वे इस सवाल में उलझे हुए थे पर कोई हल निकल नहीं पा रहा था। गोष्ठी से एक दिन पूर्व वे विचार मन स्थिति में बैठे थे और उसी पर चिन्तन कर रहे थे। अचानक उनके मन में विचार उठा कि जिस रीति से वे हल कर रहे हैं, वह वस्तुतः गलत है। उन्हें प्रेरणा के बाद व कागज कलम लेकर बैठ गये और सचमुच उस ढंग से समस्या सुलझ गई।

ब्रिटेन के भौतिकशास्त्री एवं प्रसिद्ध गणितज्ञ एड्रियन डाँब्स ने विभिन्न परीक्षणों एवं अनुसंधानों के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला है कि इस ब्रह्माण्ड में ऐसी सूक्ष्मशक्ति धाराएँ हैं जो उपयुक्त माध्यमों को समय-समय पर महत्वपूर्ण प्रेरणाएँ दिया करती है। उन्होंने इस बात को स्वीकार किया है कि अधिकाँश वैज्ञानिक आविष्कारों के मूल में ऐसी सूक्ष्म सत्ताओं की प्रेरणाएँ ही कारणभूत रही है।


अशान्ति के क्षणों में शान्ति का आह्वान

मस्तिष्क समूचे काय तंत्र का संचालक है। विचारणाओं का उद्गम केन्द्र भी यही है। शाँत और प्रसन्न मन जहाँ प्रगति का अभ्युदय का द्वार खोलता है, वहीं चिंतित, अशान्त और उद्विग्न मस्तिष्क अनेकानेक विपदायें खड़ी करता है। मनोमालिन्य बढ़ाने से लेकर विनाश के पथ पर चल पड़ने तक को विवश करता है। विचार तंत्र के लड़खड़ा जाने पर कभी-कभी गलती नाम मात्र की होने पर या भ्रमवश कुछ का कुछ समझ बैठने पर भी ऐसी उत्तेजना नशे की तरह आ दबोचती है और जब तक शान्त नहीं होती जब तक कि अपने आपको पूरी तरह थका कर निढाल नहीं कर देती है। इतना ही नहीं यदि मस्तिष्क सतत् उत्तेजित एवं तनावग्रस्त बना रहे तो आँतों के अल्सर से लेकर पक्षाघात, हृदयाघात जैसी प्राण संकट की स्थितियाँ भी सम्मुख आ धमकती है। अतः हर विचारशील को उत्तेजना उत्पन्न करने वाली परिस्थितियों से बचना और वास्तविक कारणों को समझते हुए अपना मानसोपचार संकल्प शक्ति के सहारे स्वयं ही करना चाहिए।

उद्विग्न मस्तिष्क का शारीरिक स्वास्थ्य पर बहुत ही घातक प्रभाव पड़ता है। मनोचिकित्सा विज्ञानियों ने भी अब इसकी पुष्टि कर दी है। अतः यदि ऐसी स्थिति का सामना करना पड़े तो विचारों से विचारों को काटना चाहिए। खीज के स्थान पर शान्ति और समस्वरता उत्पन्न करने वाले विचारों को आमंत्रित करना चाहिए जो ध्यान बटा सकें, उत्साह बढ़ा सकें। मस्तिष्क एक कार्यकारी यंत्र के रूप में कार्य करता है। उसमें जो भरा जायगा-परिणति भी तदनुरूप ही परिलक्षित होगी। उसमें उत्पन्न हुई कोई भी योजना प्रभावकारी तभी बनती है जब वह शारीरिक क्रियाओं द्वारा कार्य रूप में परिणत की जावे। सर्वप्रथम किसी वस्तुतः को देखकर मन में विचारों की तरंगें उत्पन्न होती हैं, तदुपरान्त शरीर को क्रिया करने का निर्देश मिलता है। स्नायुतंत्र एवं माँसपेशियाँ सक्रिय हो उठती है। विवेक को जीवंत बनाये रखने और बरतने पर अनुपयुक्तता से बचा जा सकता है। इसके लिए जिन विचारों के कारण आशंका, निराशा, या उद्विग्नता उत्पन्न हुई तो, ठीक उसके प्रतिकूल विचारों को उत्पन्न किया जाय। सोचा जाय कि विपत्ति टल गई या टलने जा रही है। बादल साफ होने पर जिस प्रकार आकाश स्वच्छ होता है, समझना चाहिए कि उसी प्रकार अपने को दबोच हुए खिन्नता- विपन्नता का वातावरण बदल जायगा। सृजनात्मक सुखद उज्ज्वल भविष्य के अनुकूलता से भरे मानस चित्र बनाया अर्थात् “माइण्ड पिक्चरिंग” “इमेजिंग” एक ऐसी कला है जिसका अभ्यास होने पर वास्तविक कठिनाइयों के बीच भी मनुष्य अपना धैर्य-साहस बनाये रह सकता है। वह उपाय ढूँढ़ सकता है जो ऐसी दशा में सहायता कर सकें, सहायक सिद्ध हो सकें।

वस्तुतः मानसिक उद्विग्नता, तनाव आधि−व्याधियां और कुछ नहीं चिन्तन की दिशाधारा गड़बड़ा जाना भर है। कभी-कभी काम की अधिकता तथा चिन्तन के पटरी से उतर जाने से यह विपत्ति आ सवार होती है। प्रतिकूलताएँ तथा अनचाही घटनाएँ भी इसका कारण हो सकती है, किन्तु असन्तोषजनक को सर्वथा रोक सकना किसी के बस की बात नहीं है पर मानसिक लचीलेपन से हम हर परिस्थिति में तनाव मुक्त रह सकते है। इसके लिए मन को प्रशिक्षित करना पड़ता है। शिथिलीकरण मुद्रा का शवासन का अभ्यास ऐसा है जिसे आसानी से सीखा जा सकता है।

सुप्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक विल्फ्रिड नार्थफील्ड ने अपनी कृति-”क्योरिंग नर्वस टेन्शन” में मस्तिष्कीय उद्विग्नता को शान्त करने तनाव रहित बनाने के लिए रिलैक्सेशन अर्थात् शिथिलीकरण पर जोर दिया है। उनका कहना है कि मानवी काया की प्रकृति सदैव अपने सामान्य स्थिति में रहने की है। यही कारण है कि अपने अन्दर होने वाली छोटी-मोटी गड़बड़ियों की मरम्मत वह स्वतः करती रहती है। विश्रान्ति काल का निर्धारण इसीलिए किया गया है जिसमें मनुष्य अपनी खोई हुई शक्ति की पुनर्स्थापना कर ले।

दूसरा कारण है श्वास का आधा अधूरा उथला प्रयोग। प्रायः प्रत्येक व्यक्ति श्वास-प्रश्वास के प्रति लापरवाह होता है और हल्की एवं आधी साँसों से ही काम चलता है। परिणाम स्वरूप न तो फेफड़े सम्पूर्ण क्षमता एवं दक्षता से कार्य कर पाते हैं और नहीं स्नायु मण्डल को प्राणवायु की परिपूर्ण मात्रा मिल पाती है। पर्याप्त आक्सीजन न मिल पाने के कारण उनमें जमी विषाक्तता दूर नहीं हो पाती। ऐसी स्थिति में मस्तिष्क का गड़बड़ा जाना स्वाभाविक है। छोटी से प्रतिकूलता .... उपस्थित होने पर भी वह अशान्त हो उठता हैं न सोचने योग्य चिंतन करते तथा न करने योग्य कदम उठाते हुए प्रायः इन्हीं दशाओं में लोगों को देखा जाता है। मनोवैज्ञानिक इसका निवारण उपचार गहरे एवं नियन्त्रित श्वसन में खोजते है। उनका कहना है कि श्वास लेना और मस्तिष्क का कार्यरत रहना एक दूसरे से जुड़े होते हैं। इनमें से एक को प्रशिक्षणपूर्वक नियंत्रित .... पर दूसरे को सही दिशा में चलने के लिए अभ्यस्त किया जा सकता है।

किन्तु गहरी साँस लेना “डीप ब्रीदिंग” की प्रक्रिया ऐसी है जिसे हर कोई कभी भी कर सकता है। सुबह व्यायाम करते या टहलते समय दफ्तरों में विश्राम के क्षणों में शरीर और मन को शिथिलता कर गहरी साँस खींचने और छोड़ने का अभ्यास ऐसा है जिससे शरीर और मन दोनों ही तरोताजा हो जाते है। इससे न केवल शारीरिक थकान मिटती है वरन् मानसिक स्फूर्ति और सक्रियता का लाभ भी मिलता है।

“हाउ टू रिलैक्स” नामक पुस्तक में मनोविज्ञानी विल्फ्रिड नार्थ फील्ड तनाव शैथिल्य की एक अन्य सरल विधि का वर्णन करते हुए लिखते है कि कुर्सी पर बैठकर अथवा किसी आरामदायक स्थान पर लेटकर धीरे-धीरे साँस खींचें और भावनापूर्वक सम्पूर्ण काया को प्राण ऊर्जा से भरा हुआ अनुभव करें। पैरों के अग्रभाग से लेकर प्रत्येक माँसपेशियों पर प्राण प्रवाह बिखरते हुए मस्तिष्क मध्य तक उसे प्रसारित करना चाहिए और तब प्रत्येक अवयव का ध्यानपूर्वक निरीक्षण करते हुए उसे विश्राम दें ताकि तनावग्रस्त माँसपेशियाँ ढीली पड़ जायँ। पूरे शरीर को इस तरह तनाव रहित करने के उपरान्त उलटे क्रम से नीचे तक पुनः संकल्प पूर्वक खींची गई प्राण ऊर्जा का प्रवाह बहने देने का विश्वास किया गया। इस पूरी प्रक्रिया में एक मिनट का समय लगता है। आरंभ पाँच मिनट से करके इसे 15 मिनट तक क्रमशः पहुँचाया जा सकता हैं इस तरह सम्पूर्ण कायातंत्र विश्राम की स्थिति में पहुँच जायगा।

नियमित रूप से प्रतिदिन उपरोक्त विश्रान्ति व्यायाम करते रहने से आध्यात्मिक मानसिक रूप से स्वस्थ बनने की संकल्पना निश्चित रूप से सफल होती है। मानवी मस्तिष्क एक क्रम चाहता है। उसे आदत अच्छी लगती है, उचित अथवा अनुचित चाहे कोई क्यों न हो?

अपना अस्तित्व और भविष्य ईश्वर के हाथों सुरक्षित मानने की भावना ऐसी है जिसे अपनाये रहने और बढ़ाते चलने में हर कोई निश्चिंतता प्राप्त कर सकता है। उल्लसित रहने के लिए छोटे उपायों का अवलम्बन भी बहुमूल्य औषधियों-उपचारों की तुलना में अधिक सन्तोषप्रद परिणाम उपस्थित कर सकता हे। अमेरिका के मूर्धन्य मनोवेत्ता विलियम जेम्स भी अपनी कृति “द गास्पिल आफ रिलैक्सेशन” में यही बात दुहराते हैं कि मानसिक चिन्ताओं- अशान्तियों से मुक्ति पाने में इससे बड़ी कोई औषधि नहीं कि अपने को नियन्ता के हाथों सौंपकर निश्चिन्त हो जाया जाय।


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विवेकानन्द ने कहा था-न मुझे भक्ति की परवाह है, न मुक्ति की। मैं ऐसा वासन्ती जीवन जीना चाहता हूँ जिससे हर ओर प्रसन्नता और खुशहाली का वातावरण बने।


अदृश्य के गर्भ में छिपी अलौकिकताएँ

कभी-कभी अविज्ञात के अंतराल से ऐसे कौतुकी मायावी दृश्य प्रकट होते हैं, जिनकी कार्य कारण से कोई संगति नहीं बैठती। ऐसे घटना क्रमों की एक लम्बी श्रृंखला है। एक घटना 13 अक्टोबर 1917 की है। पुर्तगाल के कोबिड़ाइरिया नामक स्थान में तीन बच्चों ने पेड़ पर लटकते एक प्रकाश पुँज को देखा, जिसके मध्य देदीप्यमान एक देवी मुस्करा रहीं थी। लड़के डरने लगे तो उस देवी ने कहा “डरो मत मैं स्वर्ग से आई हूँ। तुम लोग इसी समय आया करो तो प्रकाश समेत मेरे दर्शन करते रह सकोगे।”

लड़कों ने बात सब जगह फैला दी। दूसरे दिन उस गाँव के आस-पास के ..... हजार की संख्या में लोग उस स्वर्ग की देवी के दर्शन करने एकत्रित हुए। देवी के दर्शन तो न हुए पर लोगों ने बादलों के बीच चाँदी जैसा चमकता हुआ एक दिव्य प्रकाश का गोला अवश्य देखा। दर्शकों में शिक्षित, अशिक्षित, आस्तिक-नास्तिक, विद्वान, वैज्ञानिक आदि सभी वर्गों के लोग सम्मिलित थे। प्रकाश के उस चमचमाते गोले को देखकर भी आश्चर्य चकित थे। यह देख वे और भी अचंभित हुए कि प्रकाश का गोला स्थिर न रहकर कई घेरे बना बनाकर कलाबाजियाँ खा रहा है। देखते-देखते वह तश्तरीनुमा बन गया और उसके कई प्रकार की आकृतियाँ बनने लगीं। बहुत समय तक उसमें इन्द्र धनुष उभरा रहा और अन्तरिक्ष के एक कोने से लेकर दूसरे कोने तक घेरे रहा।

प्रत्यक्ष दर्शियों में से प्रायः सभी के अंतःकरण में एक ही प्रेरणा उभरी कि प्रथम विश्व युद्ध की समाप्ति पर शान्तिपूर्ण वातावरण विनिर्मित होगा। पुर्तगाल के प्रख्यात दैनिक पत्र मार्से क्यूलों के सम्पादक ने इस घटना का आँखों देखा विवरण छापा और इसे देवी चमत्कार बताते हुए “सूर्य का नृत्य” नाम दिया था।

“हिस्ट्री आफ वन्डरफुल इवेन्ट्स” नाम पुस्तक में इस तरह की कई घटनाओं का विवरण प्रकाशित हुआ है जिन्हें देवी चमत्कार कहा जा सकता है। इसमें से एक घटना अठारहवीं शताब्दी के आरंभिक दिनों की है। तब स्पेन और फ्राँस के बीच घमासान युद्ध चल रहा था। कमाण्डर ली, जोनबाँव के नेतृत्व में स्पेन के पाँच हजार सैनिक तीन टुकड़ियों में बंटकर चल रहे थे। एकाएक लगभग ..... सैनिकों की एक टुकड़ी देखते ही कुछ सेकेंडों के भीतर गायब हो गई। सैनिकों की ढूंढ़ खोज का कार्य कई तक चलता रहा, पर कोई सुराग नहीं मिल सका।

इसी से मिलती जुलती एक ओर घटना सन् .... में प्रशिया में घटी। .... फ्राँसीसी सैनिकों का एक जत्था निकटवर्ती जर्मन चौकी पर हमला करने के लिए बढ़ रहा था। सभी सैनिक अस्त्र-शस्त्रों से लैस थे। अचालक हवा का हल्का बवण्डर आया और देखते ही देखते .... सैनिक हवा में विलुप्त हो गये। बचे हुए पाँच सैनिकों के लिए यह घटना अचम्भित कर देने वाली थी। भयभीत इन सैनिकों ने आस-पास का चप्पा-चप्पा छान मारा पर साथी सैनिकों का कहीं पता नहीं चला। सेना की दूसरी टुकड़ी को जाकर इन पाँचों ने घटना की सूचना दी। महीनों खोजबीन चलती रही, पर उन सैनिकों का, विलुप्त साथियों का कोई चिन्ह तक न मिला।

वियतनाम तब फ्रेंच इण्डोचीन के नाम से जाना जाता था। सन् .... में वहाँ की केन्द्रीय छावनी से .... सशस्त्र फ्रांसीसी सैनिकों सैगोन के लिए भेजे गये। निदिष्ट स्थान जब .... मील दूर रह गया था, तभी सारा जत्था इस प्रकार गायब हो गया मानो वहाँ था ही नहीं। मुद्दतों तक ढूंढ़ खोज चलती रही पर ऐसा एक भी सुराग न मिला जिससे उनके अदृश्य होने का कारण समझा जा सके। न तो वे किसी के द्वारा पकड़े गये, न मरे, न भागे, न कोई अस्त्र-शस्त्र या पद चिन्ह ही ऐसे छोड़े गये, जिनके सारे खोजी लोग किसी संभावना की कल्पना कर सकें।

इसी तरह सन् .... में चीन और जापान के बीच युद्ध चल रहा था। तीन हजार चीनी सैनिकों की एक टुकड़ी नानकिंत नामक स्थान पर पड़ाव डाले पड़ी थी। एक दिन प्रातः अचानक केन्द्र से उनका संचार संपर्क टूट गया। केन्द्रीय सैनिक कमाण्डर ने अविलम्ब उक्त टुकड़ी के सैनिकों की खोज आरंभ कर दी। पड़ाव के स्थान पर सैनिकों के अस्त्र-शस्त्र एवं खाद्य सामग्री तो विद्यमान थे, पर वहाँ न तो किसी प्रकार के युद्ध का चिन्ह मिला, न ही सैनिकों के अवशेष। खोजी कुत्ते उक्त स्थान पर जाकर भौंकते रहे। वे वहाँ से आगे बढ़ने का नाम नहीं लेते थे। दो फलाँग दूरी पर दो सैनिक सुरक्षा पर पर नियुक्त थे, मात्र वे ही बच सके। उत्तरी कनाडा के “अजिकृनी” गाँव की घटना उक्त घटनाओं से भी अधिक आश्चर्यजनक है। सन् .... में प्रकाशित नक्शे में उत्तरी कनाडा के चर्चिल पुलिस स्टेशन से 40 मील दूर बसा यह गाँव तब एस्किमो लोगों की आबादी से भरापूरा था। किन्तु .... के अगस्त मास में एक दिन कुछ ऐसी अनहोनी हुई कि उस पूरे गाँव के मनुष्यों, जानवरों का ही नहीं मलवे तक का अस्तित्व पूरी तरह गायब हो गया। भूमि ऐसी हो गई मानों वहाँ किसी आबादी का अस्तित्व था ही नहीं। इससे भी बढ़कर आश्चर्य की बात एक और थी कि वहाँ के कब्रिस्तान में पूर्व से गड़े एक भी मुर्दे के अवशेष नहीं रह गये। लगता था उन्हें भी उखाड़ कर ले जाया गया। उस सारे प्रान्त को छान डालने पर भी इसका कोई कारण या निशान उपलब्ध नहीं हुआ।

अदृश्य सत्ता जहाँ इस तरह के कौतुक कौतूहल कभी-कभी प्रस्तुत करती रहती है वहीं संकटकालीन परिस्थितियों में लोगों को प्रत्यक्ष या परोक्ष सहायता भी प्रदान करती है। द्वितीय महायुद्ध के समय मोन्स की लड़ाई में ब्रिटिश सेनाओं की बुरी तरह हार हो गई, मात्र 400 सैनिक बचे। वे भी बुरी तरह हौंसला पस्त हो चुके थे। दूसरी और जर्मनों की 90 हजार की संख्या वाली विशाल सेना थी जिसकी कोई समानता न थी। तभी ऐसे आड़े समय में ब्रिटिश सेनाधिकारी ने परमसत्ता से सहायता की याचना की और अपने सभी सैनिकों सहित तन्मय भाव से उसके स्मरण में व्यस्त हो गया। अचानक एक बिजली सी कौंधी और पाँच सौ सैनिकों को एक शुभ्र आभा प्रकट होती दिखाई दी। सबने देखा कि कुछ ही क्षणों में सभी दस हजार जर्मन सैनिक रणभूमि में मरे पड़े थे।

स्मरण रखने योग्य तथ्य यह है कि भगवान के लिए कुछ भी कठिन नहीं हैं। वह कलियुग को सतयुग में बदलता है, त्रेता में धर्म राज्य की स्थापना करता है। रावण, वृत्रासुर, कंस जैसों के मद को चूर्ण-विचूर्ण करता है। सुदामा, विभीषण, सुग्रीव जैसे विपन्नों को सुसम्पन्न बनाता है। हारे हुए देवताओं को महाप्रलय के गर्त में डूबो देता है और सर्वव्यापी जल में से नई सृष्टि रचकर खड़ी कर देता है। वह मानवोचित विचारों को, मानवी वर्चस्व की गरिमा व पुनर्जीवित करने के लिए अन्तःकरणों में भा उथल-पुथल उत्पन्न कर दे तो क्या असम्भव है? जिसके कौशल से निखिल ब्रह्माण्ड ग्रह, तारक अधर में टंगे और घुड़दौड़ ल.... हुए ऐसा क्रम चला रहे हैं, जिसे देखते .... आश्चर्यचकित रह जाना पड़ता है। इक्कीसवीं सदी की उज्ज्वल संभावनाओं को साकार .... दिखाने और सड़ी गली व्यवस्था को गर्त झोंक देने तथा उसके अनुग्रह से नवयुग आगमन सम्पन्न होने को असंभव नहीं मानना चाहिए।


Quotation

महान विचार ही महान परिस्थितियों को उत्पन्न करते हैं और अपनाने वाले को महान बनाते है। संसार की महान घटनाऐं महान विचारों के कारण ही संभव हुई। उन्हीं ने समय को बदला और उपयुक्त वातावरण बनाया है।


विलक्षण, अद्भुत प्रेम का रसायन शास्त्र

न्यूयार्क स्टेट साइकेट्रि इन्स्टीट्यूट के संचालक डाँ. माइकेल आर.लैबोबिट ने “दि केमिस्ट्री आफ लव” पुस्तक में बताया है कि भावनाओं में जड़ पदार्थों को भी चेतन कर देने की शक्ति है और प्रेम समस्त भावनाओं का मूल स्त्रोत है इसलिए यह कहना अत्युक्ति नहीं कि स्नेह-सद्भावनाएँ न केवल चेतन तत्व को ही प्रभावित करती हैं, वरन् जड़वत समझे जाने वाले शरीर की रासायनिक प्रक्रिया पर भी समान रूप से असर डालती हैं।

घृणा और ईर्ष्या के भाव उत्पन्न होने पर शरीर के अंग-अवयवों में एक विशिष्ट प्रकार की प्रक्रिया होने से व्यक्ति में निष्क्रियता, नीरसता और निर्जीवता जैसी स्थिति का आभास होने लगता है। इस अवस्था में व्यक्ति के शरीर से ‘ऐम्फेटेमीन’ नामक एक विशेष प्रकार का रसायन शरीर में स्रवित हो उठता है। यह “एक्फेटेमीन” कहाँ से आता है? इसका उद्गम स्त्रोत किस स्थान पर हो सकता है? एनाटॉमी के आधार पर इसका कोई संतोषजनक उत्तर नहीं दिया जा सकता। शरीर की सूक्ष्म रचना के पहलुओं पर ही विचार करना होगा।

शरीर विज्ञानी तो बस इतना भर जानते हैं कि मानवी मस्तिष्क में फिनाइल ईथाइल अमील यानी पी.ई.ए. नाम क एक तरल पदार्थ बड़ी ही न्यूनतम मात्रा में मस्तिष्क के अंतर्गत समाविष्ट रहता है, जिसकी रासायनिक संरचना “ब्रेन एम्फेटेमीन” से मिलती जुलती प्रतीत होती है। मनोविकारों से ग्रसित व्यक्ति के मूत्र में इस पी.ई.ए. एवं इम्फेटेमीन की उपस्थिति स्पष्टतः देखी जा सकती है। नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हेल्थ के मनःशास्त्री डाँ. रिचार्ड विट के मतानुसार हिस्ब्टीरौइड डिस्फारिया’ एक ऐसा मनोरोग है, जो व्यक्ति में ईर्ष्या-द्वेष और मनोमालिन्य के फलस्वरूप ही उत्पन्न होता है और रोगी मूत्र परीक्षण में पी.ई.ए की मात्रा भी स्फुट दृष्टिगत होती है। चूहों तथा बन्दरों पर किये गये परीक्षणों से यह तथ्य सामने आया है कि उनमें स्नेह सद्भाव पारस्परिक प्रेम का वातावरण विनिर्मित करने पर ही उक्त प्रकार के रसायनों को दूर कर सकना संभव है। यद्यपि वैज्ञानिक बुद्धि ने व्यक्ति में प्रेम-भाव जागृति के लिए “मोनोमाइन ऑक्सीजन इन हीबीटर्स,” जैसे कृत्रिम उपाय उपचारों की भी ढूंढ़ खोज में काफी उत्सुकता दिखाई है, फिर भी उस स्तर की स्थायी सफलता पाने में अभी असफलता ही हाथ लगी है।

“न्यूयार्क स्टेट साइकिएट्रिक इंस्टीट्यूट आफ डिप्रेशन इवेल्युएशन सर्विस” के विशेषज्ञ तथा सुप्रसिद्ध मनःशास्त्री डोनाल्ड एफ.क्लेन ने ‘हिस्टीरौइड डिस्फोरिया’ नामक रोग की उत्पत्ति का मूल कारण व्यक्ति के मनोभावों में विद्यमान ईर्ष्या और घृणा रूपी राक्षस को ही बताया है और कहा है कि यही शरीर के स्वाभाविक विकास क्रम में गतिरोध उत्पन्न करते और विभिन्न प्रकार की आधि-व्याधियों को न्यौत बुलाते हैं। लगभग ऐसा ही मन्तव्य “माइण्ड एण्ड मैटर” के लेखक तथा मूर्धन्य मनःचिकित्सक जे.ए. मिलीगन का है। उन्होंने यह सिद्ध कर दिखाया कि दाम्पत्य जीवन में स्नेह-सौहार्द्र का अभाव ही “हिस्टेरायड डिस्फोरिया” रोग का मूल कारण है।

चिकित्सक द्वय के अनुसार इस रोग में कदाचित ही कोई औषधि प्रभावी सिद्ध होती हैं उनका कहना है कि इस रोग का उपचार औषधि में नहीं वरन् हर रोगी की भावनात्मक स्थिति में सन्निहित है। उसके अंतर्मन से द्वेष-दुर्भावों को निकाल कर उसकी जगह सद्भावों का समावेश कर इस व्याधि का सफल उपचार किया जा सकना संभव है। आज बहुसंख्य व्यक्ति इसी व्याधि से पीड़ित बेचैन उद्विग्न हैं। उनका उपचार दुखों को बाँटकर प्यार द्वारा किया जा सकता है।


आइए उजले-उजले संकल्प करें

विचारों के नियन्त्रण से बड़ी-बड़ी शक्तियाँ प्राप्त की जा सकती हैं, जो सहज ही लोगों को चमत्कृत कर दें। विचारों का संयमन और एकाग्रता यह दो इतने बड़े जादू हैं कि समूचे जीवन व परिवेश को कायाकल्प करने की शक्ति स्वयं में रखते हैं। संसार में जितने भी शक्ति स्वयं में रखते हैं। संसार में जितने भी विशिष्ट व्यक्ति हुए हैं, उन सबकी सफलता का मूल मंत्र उन्नत विचार शक्ति और दृढ़ संकल्प बल ही है। यों उनके जीवन में भी कष्ट-कठिनाइयाँ कम नहीं आयीं। किन्तु इन शक्तियों के बल पर उन्होंने इन सब अवरोधों को पारकर लक्ष्य को हासिल किया। जन्मजात प्रतिमा लेकर तो बिरले ही व्यक्ति आते हैं।

मनोविद जी, वैल्स अपने अध्ययन “द आर्ट आफ थिंकिंग” मेँ विचारों की इन शक्तियों के अर्जन व उपयोग को एक कला मानते हैं। उनके अनुसार इस कला को सीखने की मौलिक विशेषता यद्यपि हर किसी में होती है। फिर भी बिरले ही इसे सीखते और उपयोग में लाते हैं। सामान्य मन में संकल्प नहीं उभरता। यों ही अन्तर की स्फुरणा एवं बाह्य परिवेश के उद्दीपन अपनी अंतःक्रिया के परिणाम स्वरूप कल्पनाओं को जन्म देते हैं। ये कल्पनायें पनपती व नष्ट होती हैं। मानसिक ऊर्जा यों ही खपती रहती है। बुद्धि के द्वारा इनमें से उपयुक्त को ग्रहण कर उन्हें तराशा और रूप दिया जाता है। ये निखरी हुई कल्पनायें ही विचार हैं। इन विचारों को संयमित कर जब अन्तर के प्राण प्रवाह से जोड़ा जाता है तो इनका एक नया मौलिक रूप उभरता है। उसे ही संकल्प कहते हैं। संकल्प अपनी अभिव्यक्ति क्रियाशीलता में करे बगैर नहीं रहते।

आज के मनोविज्ञानियों की तरह प्राचीन ऋषि-मुनियों की भी इसी महत्ता का पर्याप्त ज्ञान था। बृहदारण्यक उपनिषद् में कहा गया है कि इच्छा प्रधान व्यक्ति जैसा संकल्प करता हैं, वैसा ही कर्म करता है। जैसा कर्म करता है वैसा ही बन जाता है। मनोविद डी.डब्लू. डायलर ने “थिंकिग एण्ड क्रिएटीविटी” में विचारों के अनुरूप स्वभाव व आचार के ढलने की बात कहीं है। उनके अनुसार हमारा चेहरा, क्रियाकलाप, स्वास्थ्य, सफलता, असफलताएं सभी कुछ अपने ही विचारों की प्रतिच्छायायें हैं।

इस निदान के लिए चट्टान सी दृढ़ता चाहिए। जो भीषण जल प्रवाह के सामने तिल–तिलकर टूटती तो है पर अपने स्थान से डिगना नहीं पसन्द करती। संकल्प ऐसे ही दृढ़ अन्तर में उपजते हैं। शेष तो संकल्पों के ना पर कल्पनाओं के झूले में झूलते रहते हैं। महामानवों ने क्या नहीं सहा? आज मर कर भी वे यशः काया से अजर अमर हैं। ऐसे अनेकों लोगों के उदाहरण हमारे सामने हैं। मैक्सिम गोर्की सारे दिन साहित्य सर्जन करते और जब क्षुधा व्याकुल करती तो कूड़े के ढेर से डबल रोटी के टुकड़े ढूंढ़ते थे। ग्राह्म बेल ने जब टेलीफोन का आविष्कार किया था, तब जेब का अन्तिम सिक्का तक उसमें लगा दिया था। भूख की परवाह न कर के अन्वेषण में जुटे रहे। यह है संकल्प की दृढ़ता। ऐसी दृढ़ मनोभूमि वाले ही संकल्प करते और उसे निभाते हैं।

मौलिकता की दृष्टि से देखा जाय तो हम भी गोर्की एवं ग्राह्म से कम नहीं है। जो हाथ पैर और प्रतिभाऐं क्षमताएँ भगवान ने उन्हें दी थी वहीं हमें भी दी हैं। अंतर इतना ही है कि उन्होंने अपने दृढ़ निश्चय को आगे बढ़ने के .....भा को को निरन्तर बनाए रखा। कभी निराशा और कायरता को प्रश्रय नहीं दिया। जबकि हम छोटी-छोटी बाधाओं के सामने भी घुटने टेकते हार मानते, थकते और निराशा से चूर हो, ..... पर हाथ रखकर बैठ जाते हैं।

हम पौरुष कर्मठता पर विश्वास बढ़ र.... चले। यही अन्धकार से प्रकाश की और गमन है। इस और गतिमान होकर ही हम सच्चे अर्थों में मनुष्य कहला सकेंगे।


मन की निर्द्वन्द और निश्चिन्त स्थिति

आत्मिक प्रगति के क्षेत्र में एक ही सबसे बड़ी भूल होती है कि हम अपने आप को भूल जाते हैं और पराये को अपना समझने गलते हैं। ऐसी गलती कभी-कभी भूत पलीतों के आवेश में होती है। जिस पर वह आदेश आता है वह अपने मुँह से कुछ कहता और कुछ बताता है। ऐसी अटपटी बातें कहता, है जो उस व्यक्ति के काम की तनिक भी नहीं होतीं, भूत के काम की भले ही हों। इसी प्रकार ज्वर की तीव्रता में जब मनुष्य बेचैन विकल हो जाता है तब ऐसी बातें कहता है जिसे बकवास ही कहा जा सकता है। क्रोध के आवेश में भी लोग ऐसे ही गाली गलौज देते हैं जिन्हें बज्रमूर्खता की संज्ञा दी जा सकती है। शराब पीकर उन्मादी व्यक्ति ही ऐसे वचन बोलता और ऐसे ही कृत्य करता है।

माया को भी एक प्रकार का उन्माद माना गया है। उसकी छाया जिस पर जितनी गहरी पड़ती है। उसकी छाया जिस पर जितनी गहरी पड़ती है, वह उतना ही असंगत अव्यावहारिक और अवास्तविक बन जाता है। सबसे बड़ी भूल यह होती है कि आत्मा को शरीर और शरीर को आत्मा माने लगता है। फलस्वरूप सारा चिन्तन और क्रिया-कलाप गड़बड़ा जाता है।

शरीर वाहन अथवा उपकरण है। आत्मा स्वामी, ईश्वर का पुत्र या प्रतिनिधि। आत्मा को कुछ महत्वपूर्ण कार्य सौंपे गए हैं और विश्वास दिलाया गया है कि इन प्रयासों को यदि ठीक तरह किया जा सके तो इनके परिणाम स्वरूप अगले दिनों उच्चस्तरीय पदोन्नति होगी। इसके अतिरिक्त शरीर ऐसा दिया गया है जैसा कि किसी और प्राणी के पास नहीं है। यह अनुकम्पा इसलिए की गई है कि जो कार्य उच्च श्रेणी के सौंपे गए हैं उन सब को ठीक प्रकार किया जा सके। शरीर और मस्तिष्क तथा उपलब्ध सुविधा, साधन यदि इस स्तर के न मिले होते तो शायद मनुष्य इतना कुछ कर नहीं पाता जितना कि करना चाहिए। अपना अंश आत्मा के रूप में और अद्भुत संरचना वाले शरीर तथा मस्तिष्क को देकर भगवान ने कम अनुग्रह नहीं किया है।

भूल यह हो जाती है कि शरीर की वासना और मन की तृष्णा इतना बलवती हो उठती है कि उन्हें पूरा करने के लिए पूरा समय, श्रम, मनोयोग खप जाता है। लगता है हम शरीर ही हैं। जो शारीरिक स्वार्थ हैं वे ही हमारे स्वार्थ हैं। शरीर में भूख भौतिक आवश्यकता अन्न, वस्त्र और आच्छादन हैं। मन का प्रवाह जब ज्ञानेन्द्रियों की ओर बहने लगता है तो उनकी स्थिति भी यही होती है कि अनेक तरह के दृश्य, स्वाद, स्पर्श माँगने लगती है। उनकी पूर्ति के लिए व्याकुलता होती है तो उसे वासना कहते हैं। शरीर के ही एक भाग मन की उमंगे लोभ, मोह और अहंकार के रूप में उफनती रहती हैं। जब सब मिलकर इतना बड़ा जाल जंजाल खड़ा जो जाता है कि शरीर और मन की इच्छायें पूरी करने में ही जीवन का समूचा सारतत्त्व खप जाता है।

वह मूल प्रयोजन उपेक्षित विस्मृत ही पड़ा रहता है जिसके लिए असाधारण अनुग्रह के रूप में भगवान ने अपनी सर्वोपरि कलाकृति किसी महान प्रयोजन की पूर्ति के लिए प्रदान की हैं। इतना ही नहीं मद्यप की तरह प्रायः आत्मा की, आत्मा के लक्ष्य और जीवन प्रयोजन की बात ही विस्मृत होती है। धीमी आवाज से वह अपनी सत्ता, महत्ता और आवश्यकता को बताती तो है फिर ऐसा हो जाता है कि उसे ठुकराने, कुचलने, अनसुनी करने की ही खुमारी चढ़ी रहती हैं।

दोनों स्थितियों में जीवन आसमान जैसा अन्तर है। शरीर को ही अपना स्वरूप और उसकी इच्छाओं को ही अपना स्वार्थ मान लेने पर फिर निरंतर यही धुन सवार रहती है कि शरीर को सुखी, सुन्दर, सुसज्जित, प्रख्यात करने के लिए जो कुछ बन पड़े वह सब कुछ कर गुजरा जाये।

शरीर की आवश्यकताऐं तो थोड़े से साधनों से ही पूरी हो जाती हैं। फिर चार मुठ्ठी अनाज, कपड़ा आच्छादन इन सब व्यवस्था बनाने में न बहुत समय की आवश्यकता होती है न श्रम की न साधनों की। छोटे परिवार को भी स्वावलंबी सुसंस्कारी बनाने में अधिक ध्यान नहीं देना पड़ता। चोरी, चालाकी के दंदफन्द सिखाने के लिए अवश्य इस प्रकार के अनेकों दाँव पेच बताने पड़ते हैं, पर सज्जनोचित सादगी का जीवन जीने के लिए परिवार को ढाल लेना भी किसी मनस्वी और आत्मवान के लिए कठिन नहीं पड़ना चाहिए। यह कार्य ऐसे हैं जो ध्यान एवं समय का छोटा भाग लगाते रहने भर से ढर्रे की तरह सारे काम चलते रह सकते हैं। इन सब का इतना दबाव नहीं पड़ता कि आत्मिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए उसका ठीक एक क्रमबद्ध कार्यक्रम तैयार न हो सके।

आत्मिक प्रगति से ईश्वर की इच्छा और अनुकम्पा जुड़ी हुई है। उन कार्यों में मन का अधिक भाग खर्च हो जाता है तो साँसारिक प्रयोजनों के लिए समय ही नहीं बचता। ईश्वर की प्राप्ति का सीधा सा मार्ग है उसके साथ अपनी एकात्मता अनुभव करना, उसके प्रति अपना समग्र समर्पण करना, उसे सत्प्रवृत्तियों का समुच्चय मानना और उन दिव्य विभूतियों को अपने अन्तराल की गहराई में धारण करना ताकि इच्छायें प्रेरणायें उसी स्तर की उभरें। कार्य पद्धति उसी ढाँचे में ढल चले। मनःस्तर इस प्रकार का बनाने के लिए ही पूजा पाठ के जप,तप के कतिपय कर्मकाण्ड करने पड़ते हैं। इन कृत्यों के सहारे एकाग्रता तो नहीं पर एक दिशा अवश्य मिलती है। उससे भी विचारों की दिशाविहीन भगदड़ पर अंकुश अवश्य लगता है। विचारविहीन दिशा वाली मनःस्थिति पर नए संस्कारों का आरोपण सरल पड़ता है। जिन प्रसंगों की ओर ध्यान ही नहीं जाता उनकी और चिन्तन मनन की सुविधा होती है पर इसके लिए मन को फुरसत तो मिलनी चाहिए। लालसा जिज्ञासाओं से उसे छुटकारा तो मिलना चाहिए। यह कार्य ईश्वर का सान्निध्य स्थापित कर लेने के उपरान्त ही बन पड़ता है।

उपासना के उपरान्त साधना का ही नम्बर आता है। साधना का तात्पर्य अपने आपके कुसंस्कारों दोष-दुर्गुणों का परिशोधन परिमार्जन और उसके स्थान पर सज्जनता सदाशयता का संस्थापन। आमतौर से अपने दोष-दुर्गुण सूझ नहीं पड़ते आँखें बाहर की वस्तुऐं ही देख पाती हैं। भीतरी क्षेत्र को देख सकने की उसमें क्षमता नहीं है। यह कार्य विवेक बुद्धि को अन्तर्मुखी होकर करना पड़ता है। आत्मनिरीक्षण, आत्म सुधार, आत्म निर्माण, आत्म विकास इन चार विषयों को कठोर समीक्षण परीक्षण की दृष्टि से अपने आप को हर कसौटी पर परखना चाहिए। जो दोष दीख पड़े उनके निराकरण के लिए और उनके ठीक प्रतिकूल उच्च चिन्तन, आदर्श चरित्र एवं सद्व्यवहार का स्वभाव बना लेने का प्रयत्न करना चाहिए। ऐसा करने से मन की घुड़दौड़ बन्द हो जाती है। विचार विहीन उच्च आध्यात्मिक स्थिति प्राप्त होती है। मन का इस स्थिति में होना उसका वास्तविक परिशोधन है। सर्वथा विचार विहीन मनःस्थिति तो समाधि स्थिति में ही बन पड़ती है। वह समय साध्य और बहुत आगे की बात है।


एक क्षण भी व्यर्थ नहीं खोना (kahani)

जिज्ञासु कबीर के पास पहुँचकर बोला-”ईश्वर पाने का कौन सा मार्ग है?” कबीर चुपचाप बैठे रहे। थोड़ी देर सोचने के बाद खिड़की में से झाँककर देखा और बोले- “सूरज ढलने ही वाला है। साँझ होने के करीब है।” जिज्ञासु उठा कबीर को प्रणाम किया और चला गया। पास बैठे व्यक्ति को यह देखकर बड़ी हैरानी हुई कि उस व्यक्ति ने पूछा क्या और कबीर ने उत्तर किया दिया? असंगत उत्तर सुनकर वह कबीर से पूछ बैठा कि “आपने उस व्यक्ति को इस तरह बहकाकर क्यों टाल दिया।” कबीर बोले “उत्तर सही सटीक था। वह व्यक्ति सन्तुष्ट होकर लौटा है।” तुम्हें विश्वास न हो तो जाकर पूछ लो। वह व्यक्ति जिज्ञासु के पास पहुंचकर बोला- “क्या तुम कबीर के उत्तर से संतुष्ट हो चुके हो।” उसने कहा “हाँ। उन्होंने ठीक ही कहा था।” मेरे जीवन की संध्या आ चुकी है और अब ईश्वर मिलने में कितनी देर है।” मुझे अपनी भूल पर पश्चाताप है कि ईश्वर प्राप्त करने के लिए जो कार्य मुझे चाहिए थे वे नहीं किये और व्यर्थ ही मार्ग पूछने पहुँच गया। बस तब से उन्हीं प्रयत्नों और प्रयासों में जुट गया हूँ। अब मुझे एक क्षण भी व्यर्थ नहीं खोना हैं।


मधु-संचय

महाकाल की आशाऐं


महाकाल की आशाऐं (kavita)

करता है हमसे महाकाल आशाएँ। हम स्वयं जागें, औरों को आज जगाएँ॥

बुझने से पहले अन्तिम कुछ निमिषों में, दीपक की लौ की चमक बहुत बढ़ जाती,

इस सहस्रब्दि की यह अन्तिम वेला है, इसलिये भयंकर अपनी दिखलाती,

ऐसे संकट के समय न धैर्य गंवाएं, बस तभी नष्ट हो पाएँगी जड़ताएँ।

हम आ पहुंचे हैं आज मोड़ पर ऐसे, हर राह हमारी हुई तिमिर से मैली,

सामने कुहासे के पीछे प्राची में, लेकिन हल्की लालिमा व्योम में फैली,

ऐसे में हम सब सत्साहस दिखलाएँ, फिर घना कुहासा चीर, उजाला लाएँ।

- रविंद्र भटनागर

“प्रतिमा की निमंत्रण”


यदि चले नहीं तो (kavita)

‘प्रतिभा’ ही तो युग की आवाजें सुन पाती है। ‘प्रतिभा’ ही तो युग-पीड़ा आवाज लगाती है।1।

उसको स्वयं प्रजापति ने आह्वान सुनाया था॥ ऋषि-दधीचि की प्रतिभा का द्वारा खटकाया था॥

ऋषि-दधीचि की प्रतिभा ने ने आवाज सुनी युग की। ‘प्रतिभा’ बज्र बन गई, तोड़ी रीढ़ वृत्रासुर की॥

‘प्रतिभा’ ही तो जनहिताय, सर्वस्य चढ़ाती है॥ ‘प्रतिभा’ को ही युग-पीड़ा आवाज लगाती है।2।

त्रेता ने भी उसको ही, आवाज लगाई थी। प्राणवान-प्रतिभा, सुनकर के दौड़ी आई थी॥

रामभक्त, हनुमान, उछलकर आगे आये थे। वानर, रीछ, जटायु सभी ने हाथ बँटाये थे॥

‘प्रतिभा’ तो हो कहीं, उभर कर आगे आती है। ‘प्रतिभा’ को ही युग-पीड़ा, आवाज लगाती है।3।

वर्तमान-युग भीषण-विपदाओं को मारा है। ‘प्रतिभाओं’ को युग-पीड़ा ने फिर ललकारा है॥

जो आगे आयेंगे, वे इतिहास बनायेंगे। और मनुज संस्कृति के संरक्षक कहलायेंगे॥

अरे! ध्वंस की दृष्टि, सृजन पर घात लगाती है। ‘प्रतिभा’ को ही युग-पीड़ा इन क्षणों बुलाती है।4।

-मंगल विजय

यदि चले नहीं तो


जीवन-गीत (kavita)

यदि चलें नहीं, तो आगे बढ़ना कैसे हो? आगे बढ़ने का चाव, चरण की गति में है।

पथ में आये व्यवधान, प्रमाण-प्रणाति में हैं॥ पहुँच से प्रथम, ठहराव, पहुँचना कैसे हो?

लक्ष्य की प्राप्ति, सन्तुष्टि, थकान नहीं देती, साँझ से भेंटती किरण, विहान नहीं देती,

तप-तेज न हो, सूर्य का निकलना कैसे हो? पानी-सा पा तारलय, अगर वह चले नहीं।

पथ के चट्टानी विघ्न, दरेरे दले नहीं। बूँद का महासागर से मिलना कैसे हो?

है स्वागतव्य, संघर्ष, कि जो गति देता है। है अवरोधक-औदार्य, प्रगति-रति देता है।

झंझा से सहमें ज्योति, तो जलना कैसे हो? फल-फूल, तरु, ढला, बीच की आकृति में,

देना-गलना ही रहा, सृजन की परिणति में, बीच का न गलना हो, तो फलना कैसे हो?

यदि चलें नहीं तो आगे, बढ़ना कैसे हो?

-लाखनसिंह भदौरिया

जीवन-गीत


फूलों की पावनता (kavita)

फूलों की पावनता भरलें सब अपने प्राण में। विकसित करें पराग तो प्यारी खुशबू उड़े जहान में॥

फूल रखा जाता है ईश्वर पूजा के शुचि थाल में। गूँथा जाता है प्रमाण सा, परिणय की जयमाला में॥

ऐशी सुचिता, प्रामाणिकता हो जीवन के हर गान में॥ जिससे मिलें, उड़ेले प्राणों की ममतामय भावना।

प्यार बाँटना ही बन जाये इस जीवन की साधना॥ आएँ सब, ऐसा जादू हो अपनी मुस्कान में॥

सेवा और त्याग की सीढ़ी से सब ऊपर ही ऊपर चढ़ें। बिना दिये धक्का औरों को, जीवन के पथ पर बढ़े॥

दुख में दुखी न हों अभियान न आने दें सम्मान में॥ यों मानवता के चरणों पर फूल सदृश चढ़ जाएँ हम॥

तज दुर्भाव सद्गुणों की सुँदरता को अपनाएँ हम॥ भर जाएगा मधुर कर्णाप्रेय स्वर जीवन के गान में॥

-माया वर्मा


स्वप्न एक वैज्ञानिक सत्य!

स्वप्न जीवन की एक महत्वपूर्ण अवस्था है जिसके आधार पर परलोक, पुनर्जन्म, वासनाओं की प्रबलता, आत्मा का काल और देश से परे होना आदि अनेक वैज्ञानिक मान्यताओं की सत्यता की जाँच हो सकती है। मन आत्मा की सूक्ष्म ज्ञानेन्द्रिय है। वह आत्मा को उसके भूत और भविष्य की अनेक देखी अनदेखी बातों को भी प्रकट करता है। मन जितना ही पवित्र, परिष्कृत और प्रखर होगा उतने ही स्वप्न में सही और सार्थक दृश्य उभरेंगे। ऐसे दृश्य मनुष्य का कल्याण भी करते हैं और भविष्य की अथवा प्रियजनों की खबरें भी देते रहते हैं।

स्वप्न देखते समय मस्तिष्क का ई.ई.जी लेने से जो तथ्य सामने आयें हैं उसके अनुसार उस समय मस्तिष्कीय अल्फा तरंगें क्रियाशील रहती हैं जो जाग्रत एवं अर्ध जाग्रत दशा में भी चलती है। गहरी निद्राओं में नहीं। इससे सिद्ध होता है कि स्वप्न दश जाग्रति की सर्वथा विरोधी दशा नहीं है। जबकि स्वप्न अचेतन की सक्रियता की अवधि का नाम है। सामान्य जीवन में अधिकांश व्यक्ति जो काम करते हैं, मनोवैज्ञानिक दृष्टि से अर्ध चेतनावस्था में सम्पन्न किये जाते हैं। अनुमानतः घन्टेभर में कोई व्यक्ति एक मिनट के लिए पूर्ण एकाग्रता की स्थिति में रहता है। सोने के स्स्स्स् घन्टे यदि कम कर दिये जायें तो दिनरात में स्स्स्स् घन्टों में स्स्स्स् मिनट ही सही मायनों में मनुष्य चेतन और पूर्ण जागरूक रह पाता है अन्यथा अथ चेतन जैसी स्थिति में ढर्रे के काम करता रहता है। इसीलिए दिनभर की वे ही घटनाएँ दीर्घकाल तक स्मृति पटल पर रहती हैं जिनमें वह पूर्ण सजग व एकाग्र स्थिति में रहा होता है।

वैज्ञानिकों ने सपनों को दो भागों में विभक्त किया है, सक्रिय और निष्क्रिय। पहली श्रेणी में स्वप्नदर्शी कुछ कर सकने की स्थिति में होता है और दूसरी में एक मूकदर्शक की तरह की स्थिति बन जाती है। स्वप्न देखने में व्यक्ति के शरीर की ऊर्जा तो खर्च होती है पर लाभ इसकी तुलना में कहीं अधिक देखने को मिलना है। मानसिक तनाव से मुक्ति तथा प्रातःकाल उठने पर नई स्फूर्ति की अनुभूति सपनों की स्थिति के अनुरूप की जा सकती है। यूनानी दार्शनिक अरस्तु ने तो उसी मनुष्य को उत्तम कोटि का माना है, जिसके सपनों के क्रियाकलाप दूसरे लोगों की जाग्रतावस्था से पूरी तरह संगति खाते हैं।

जन सामान्य की तो यही धारणा है कि स्वप्न क्षण भंगुर और न समझ में आने वाली मनोलीला भर हैं। लेकिन अपने चेतन जीवन को अधिकाधिक उपयोगी बनाने और उसे रचनात्मक एवं विधेयात्मक दिशा में प्रवृत्त होने की शक्ति सामर्थ्य का विकास कर सकना स्वप्नों के माध्यम से अत्याधिक सरल एवं सुगम है। जीवन का लगभग आधा भाग निद्रावस्था अचेतनावस्था तथा दिवास्वप्नावस्था से गुजरते ही व्यतीत होता है। सपने उसी अचेतनावस्था के प्रतीत उद्गार समझे जाते हैं। आधुनिक स्वप्न शास्त्री हैवलाँक एलिस ने “वर्ल्ड आफ ड्रीम्स” में बताया है कि यदि सपनों में जरा भी बेचैनी महसूस होने लगे तो उनसे डरने-घबराने की कोई आवश्यकता नहीं, उन्हें अपने स्वभाव का द्योतक नहीं मान बैठ जाना चाहिए। वातावरण की सूक्ष्म हलचलों के फलस्वरूप भी कभी-कभी ऐसा देखने को मिलता है। स्वप्नों की अपनी भाषा है जिसे उसका निष्णात ही पढ़ समझ सकने में सफल हो सकता है। इनकी व्याख्या बिलकुल अनोखी अपने ढँग की ही होती है। रूस और चैकोस्लोवाकिया में अब इनके वैज्ञानिक परीक्षण भी आरम्भ हुए हैं।

स्वप्न विद्या अध्यात्म विज्ञान का ही एक महत्वपूर्ण अंग है, यदि उसका विकास किया जा सके तो मनुष्य की अतीन्द्रिय चेतना का विकास और विस्तार करके परोक्ष जगत के रहस्यों को आसानी से जाना जा सकता है।


एक-एक पल का असाधारण महत्व

वर्ष की सुव्यवस्थित समय सारिणी बनाना अति कठिन कार्य है। कारण है कि पृथ्वी एक सूर्य परिक्रमा 365 दि, 5 घंटा, 48 मिनट, 48 सेकेंड में पूरी करती है। उसका हमारी घड़ियों से, कलेंडरों से कोई सीधा संबंध नहीं है। पूरे दिनों की बात होती तो यह कठिनाई न पड़ती, जो प्रस्तुत पंचांग कर्त्ताओं को पड़ती है। पृथ्वी अपनी धुरी पर 24 घंटे में घूम जाती है। इसमें मात्र इतना ही व्यतिक्रम पड़ता है कि कभी दिन छोटा होता है तो कभी रात छोटी, पर इसका कोई प्रभाव वर्ष में सम्पन्न होने वाली सूर्य परिक्रमा पर नहीं पड़ता।

वार्षिक कलेंडर को चित्र-विचित्र तरीकों से काट छाँट कर पूरा किया जाता है। बारह महीनों में से किसी को 30 दिन का, किसी को 31 दिन का मानकर उस व्यवधान को पूरा किया जाता है। फिर भी जो कमी रह जाती है। उसे हर चौथे वर्ष फरवरी में एक दिन चढ़ा करके पूरा किया जाता है। बात इतने से भी नहीं बनती तो भारतीय पंचांगों में तिथियों की क्षय वृद्धि, महीनों की क्षय वृद्धि का नया हिसाब जोड़ गाँठकर पूरा किया जाता है।

जो बात पृथ्वी के संबंध में है वही सौर मण्डल के अन्य ग्रहों के संबंध में भी है। वे भी पूरे घंटों में अपनी परिक्रमाएं पूरी नहीं करते इसलिए उनकी सही स्थिति जानने के लिए ऐसी ही कमीवेशी करनी पड़ती है।

पंचाँग और कलेंडर बनाने की कितनी ही .....धियाँ-सारिणियाँ इन दिनों प्रचलित है। पर उन में अन्तर पड़ता और बढ़ता जाता है। इसलिए प्रत्यक्ष को प्रमाण मानने की नीति अपना कर दृश्य गणित का आश्रय लेना पड़ता है। जो भूल-चूक हो जाती है उसे प्रायः पाँच हजार वर्ष बाद नई गणना और नई सारणी बनाकर इस .... बनाया जाता है कि उसे विश्वस्त कहा जा सके।

कलेंडर विधियों में पिछले सौ वर्षों में भारी अन्तर होते आयें हैं कभी दस महीनों का भी वर्ष रहा है। उसे बारह महीनों का तो बहुत बाद में किया गया। दिनों की संख्या तो सप्ताह में सात ही रही, पर उनका आरम्भ कहाँ से किया गया इस विषय में सम्प्रदाय विशेष के द्वारा काफी खींचतान की जाती रही है। मुसलमान शुक्र को, ईसाई रविवार को, हिंदू गुरुवार को, मिश्र के लोग शनिवार को प्रथम दिन मानते हैं।

कोई समय ऐसा भी रहा है, जब 304 दिन का वर्ष माना जाता था और वर्ष मार्च से आरम्भ होता था पर इन मान्यताओं के कारण जो ग्रह मण्डल में अन्तर पड़ता था उसे देखते हुए वर्तमान अंग्रेजी खगोल विद्या को अधिक प्रामाणिक माना जाने लगा है। सीजर (रोम) के जमाने में ज्योतिष का वार्षिक स्वरूप निर्धारण करने में कितनी ही उलट-पुलट और उथल-पुथल होती रहीं है। पर अन्त में दूरदर्शी वैज्ञानिकों ने उन भूलों को सुधार कर ही दम लिया।

किसी साल का कलेंडर बीस वर्ष बाद उलट कर उसी स्थिति में आ जाता है। किसी के पास बीस वर्ष के कलेंडर हों तो वह उन्हीं के सहारे सदा अपनी गाड़ी चलाता रह सकता है।

21 मार्च और 22 सितम्बर को दिन और रात की लम्बाई बराबर होती है। 22 दिसम्बर सबसे छोटा दिन माना जाता है। तारीखें रात के बारह बजे बदलती हैं और दिन का परिवर्तन सूर्योदय से होता है।

समय का सबसे पहले दिन-रात्रि या चार पहर में बाँटा जाता था पर अब उसे 24 घंटों में विभाजित किया गया है। एक घंटे में 60 मिनट और हर मिनट में 60 सेकेंड होते हैं। अब इससे भी छोटे विभागों की गणना कर सकने वाले यंत्र बन गये है।

एक दिन में संसार में बड़ी-बड़ी घटनाएँ हो जाती हैं, पर हमारी दृष्टि और जानकारी सीमित होने से उन बातों का पता नहीं चल पाता। एक दिन में 5440 बच्चे पैदा होते हैं। 4630 आदमी मरते हैं। साढ़े आठ लाख प्याले लोग चाय या काफी पी जाते हैं। 1270 टन तम्बाकू की हर घंटे खपत होती है। डाकखाना एक दिन में प्रायः 22 लाख पत्र और दो लाख तार भेजता है।

शरीर के भीतरी क्षेत्र में जो गतिविधियाँ चलती रहती हैं, वे इतनी द्रुतगामिनी होती हैं कि आश्चर्य चकित रह जाना पड़ता है। एक मिनट में हृदय द्वारा पूरे शरीर में प्रायः 75 बार रक्त भेजा जाता है। परिश्रम के समय वह गति बढ़कर 200 बार तक पहुँच जाती है। एक बार के रक्त परिभ्रमण में प्रायः 60 हजार मील लम्बाई में रक्तकण ढोये जाते हैं। साँस प्रायः इतनी ही देर में 18 बार चल जाती है।

एक मिनट का साधारणतया कोई मूल्य नहीं होता, पर उतनी ही अवधि में पृथ्वी 1109 मील की यात्रा कर लेती है। सूर्य की गर्मी पृथ्वी में एक मिनट में 37 अरब टन पानी भाप के रूप में ऊपर उड़ाती है पर साथ ही थोड़े समय उपरान्त बादलों के रूप में बरसाकर वापस भी कर देती है।

शरीर आमतौर से बचपन, जवानी, प्रौढ़ता, वृद्धावस्था में ही अपनी आकृति बदलता है। पर सच बात यह है कि उसके 98 प्रतिशत जीव कोष एक वर्ष में मरते और नया जन्म ग्रहण करते रहते हैं। इस प्रकार शरीर हर वर्ष नया बन जाता है।

पूरी जिन्दगी यों ऐसे ही खाते, सोते, बीत जाती है पर जीवन काल में एक औसत मनुष्य 65 हजार मील पैदल चल लेता है। इतना ही नहीं घर गृहस्थी के कामों में लगी हुई महिलाएँ भी अपनी छोटी परिधि में तीन हजार मील वर्ष प्रतिवर्ष अर्थात् पचास साल में 15 लाख मील चल लेती हैं। इसे पूरी पृथ्वी की 6 बार परिक्रमा करने जितना समझा जा सकता है। सत्तर साल जीवित रहने वाला मनुष्य औसतन 330 मन रोटी, 138 मन आलू और 100 मन चीनी खा जाता है। पानी तो वह एक छोटे सरोवर जितना खर्च कर लेता है।

साठ वर्ष जीने वाला मनुष्य 18 वर्ष सोने में, 14 साल काम करने में, 5 साल मटर गश्ती करने में, 4 साल पढ़ने में, 5 साल नित्य कर्मों में और 3 वर्ष बीमारी से कराहने में लगाता है। समय गवाने का अर्थ जीवन गंवाना है। 1 घंटा नित्य बरबाद करने का अर्थ होता है 50 साल की जिन्दगी में से ढाई वर्ष चौपट कर देना। 10 मिनट पुस्तक पढ़ने में लगायें जायें तो साठ वर्ष में वे 154 दिन होते हैं। इतने समय में 1 लाख 22 हजार पृष्ठों, का ज्ञान भण्डार मस्तिष्क में उतारा जा सकता है। कुछ ने करने वालों के लिए तो जिन्दगी इतनी भारी पड़ती है कि काटे से नहीं कटती।

अच्छा हो हम समय का मूल्य एवं महत्व समझें और उसका सदुपयोग करने की तत्परता प्रदर्शित करें। क्षण-क्षण बहूमूल्य है। हर क्षण का यथासंभव पूरा उपयोग मानवी दायित्वों के निर्वाह एवं स्वयं को ऊँचा उठाने के निमित्त करें।


नयी श्रद्धा (kahani)

बुद्ध के पास एक युवक आया। उनके चरणों में सिर झुकाया और आँख उठाकर एक बार देखा पुनः चरणों में झुक गया। बुद्ध ने पूछा किस लिए आये हो? युवक बोला “जिस के लिए आया था वह इच्छा पूर्ण हुई। अब कुछ न पूछना है न कहना है” बुद्ध बोले “क्या घट गया क्या पूर्ण हुआ? यह औरों को भी बता दो।” वहां सत्संग में कोई दस हजार भिक्षुओं की भीड़ थी। किन्तु किसी को कुछ दिखाई नहीं दिया। मात्र इतना ही दिखाई दिया कि युवक आया चरणों में झुका किन्तु क्या घटित हुआ क्या परिवर्तन हो गया यह किसी को कुछ दिखाई नहीं दिया। युवक बोला “मैं बदलने आया था। बदल गया हूँ। मेरी आत्मा में जिस क्रान्ति के लिए चाह भी उसके पूर्ण होने के लिए विश्वास मिल गया है। कोई भरोसा पैदा हो गया है। एक विश्वास के साथ मैं बदल गया हूँ। नयी श्रद्धा ने जन्म ले लिया है। बुद्ध को देखकर मुझे विश्वास हो गया है जो बुद्ध में हो सकता है वह मुझ में भी हो सकता है। बुद्ध मेरा भविष्य है। जो मैं कल हो सकता है। वह बुद्ध आज है। इस भरोसे के साथ चरणों में झुका और वापस उठा, तो मैं दूसरा आदमी हो गया।”


ईश प्रार्थना में निहित चुम्बकीय शक्ति

मनुष्य की शक्ति सामर्थ्य आकूत एवं अपरिमित है, पर है वह प्रसुप्त अवस्था में, अन्तराल की गुहा में दबी हुई। उसे उभारने विकसित करने और लोकोपयोगी बनाने की कल ज्ञात हो सके, तो हर कोई महानता की जीवित प्रतिमूर्ति बन सकता है। शारीरिक, मानसिक एवं आत्मिक ऊर्जा के उन्नयन में, ओजस्, तेजस्, ब्रह्मवर्चस् की अभिवृद्धि में ईश्वर-प्रार्थना, ध्यान साधना के महत्वपूर्ण योगदान की चर्चा अध्यात्म-वेताओं ने की है। प्रार्थना वह प्रचण्ड चुम्बकत्व है, जो दैवी सहायता का अपने समीप खींच बुलाती और अभीष्ट स्तर का परिणाम प्रस्तुत करती है। अमेरिका निवासी चार्ल्स फिल्मोर शारीरिक दृष्टि से अशक्त थे। बचपन में स्केटिंग खेलते समय कूल्हे की हड्डी अपने स्थान से हट गई थी। अनेक तरह की चिकित्सा के बाद भी वह स्वस्थ नहीं हुए और एक पैर से लँगड़े हो गये। इस प्रकार की और भी शारीरिक अशक्तताएं थी। चिकित्सा की असफलता के बाद भी वह निराश नहीं हुए।

उनका विश्वास था कि मानव जीवन किसी महान उद्देश्य के लिए है। अतः उसका रूप अवश्य ही भव्य होना चाहिए। उन्होंने स्वयं अनुभव किया कि मानव जीवन मूलतः असुन्दर नहीं सुन्दर है ओर उसे सदा आनन्द से परिपूर्ण रहना चाहिए। यदि मनुष्य के जीवन में कोई दोष है या कोई कमी है तो वह इस सत्य को सही रूप में नहीं समझते और सत्य का व्यावहारिक जीवन में प्रयोग नहीं करने के कारण है। मनुष्य जीवन में अनेक श्रेष्ठ शक्तियाँ है, योग्यताएँ है, आवश्यकता इन्हें उभारने की है।

इस आस्था के अनुरूप वह प्रतिदिन चार से छः घंटे तक प्रार्थना में बैठते और शरीर के विभिन्न अंगों को आशीर्वाद देते, ईश्वर भावों से परिपूर्ण करते। आरम्भ में तो बड़ी कठिनाई हुई, पर धीरे-धीरे शरीर के विभिन्न केन्द्रों पर उनका अधिकाधिक नियंत्रण होने लगा बढ़ते हुए विश्वास और सतत् होने वाली प्रार्थना से उनका पुराना दर्द समाप्त हो गया, कूल्हा भी रोग मुक्त हो गया और लंगड़ाना दूर हो गया।

फिल्मोर ने स्वस्थ होते ही अपने जीवन का उपयोग संकीर्ण स्वार्थों के लिए नहीं किया। उनका विचार था कि ईश्वर प्रदत्त सामर्थ्य का उपयोग ईश्वरीय कार्यों में ही होना चाहिए। उनको जो नया प्रकाश, नया जीवन, नया विश्वास, नया मार्ग मिला उससे वे अपने पड़ोसियों, परिचितों, अपरिचितों का, दुःखी पीड़ितों का, जो भी रोग से दुःख से अविश्वास से परेशान एवं संत्रस्त थे उन सभी का हित सम्पादन करने लगे। लोक सेवा ही चार्ल्स फिल्मोर तथा उसकी पत्नी मार्टिन फिल्मोर का एक मात्र काय हो गया। अमेरिका में वे प्रार्थना मानव के रूप में विख्यात हुए। उन्होंने “यूनिटी स्कूल ऑफ क्रिश्चिएनिटी” नामक एक संस्था की स्थापना की। जिसके द्वारा कल्याणकारी विचारों का प्रसार एवं सेवाकार्य किये जाते है। कल्याणकारी विचारों का प्रसार यूनिटी, पी विजडम, प्रोग्रेस, गुड विजनेस आदि पत्रिकाओं द्वारा होता है। जिसे संसार के कोने-कोने से लोग मँगाते और पढ़ते है।

फिल्मोर के अनुसार प्रार्थना एक रचनात्मक और सक्रिय चीज है। उनके अनुसार प्रार्थना के लिए बस तीन शर्तें हैं ईश्वर पर विश्वास, सरल प्रार्थना और विधेयात्मक पोषक विचार (पॉजेटिव थिंकिंग)। प्रार्थना का उद्देश्य है-चिन्तन पद्धति में परिवर्तन ला देना। परिवर्तन ईश्वर में नहीं होता है। वह तो सर्वदा शुभ और शिव हैं। फिर हम इससे दूर क्यों? सिर्फ इसलिए कि स्वयं के विचार जगत में शुभ के स्त्रोत और मंगलमय ईश्वर से एकात्मता नहीं है और समूचा जीवन दिव्य हो जाता है। हम भी अपने जीवन में ईश प्रार्थना का अवलम्बन लें।


आइये मानवता के ट्रस्टी बनें

जब स्वराज्य आंदोलन का शंख बजा तो सामान्य ही नहीं विपन्न परिस्थितियों से जूझ कर समृद्धि की ओर बढ़ रहे शास्त्री जी ने भी अपनी जीवन दिशा बदली और महात्मा गाँधी के संपर्क में आये। गान्धी जी शास्त्री जी की सिद्धान्त निष्ठा और आदर्शवादिता, लोकसेवा की भावना से बड़े प्रभावित हुए। एक दिन उन्होंने शास्त्री जी को बुला कर कहा-देखो लाल बहादुर तुम में लोक सेवा की उद्दाम भावना है। परन्तु इस मार्ग पर धन सम्पत्ति ऐसी बाधा है जिसकी चमक में चौंधिया कर आदमी लोक सेवा की बात भूल जाता है और उसे परिग्रह ही परिग्रह सूझता है। इसलिए लोकसेवियों को अपरिग्रह का व्रत लेना चाहिए।

शास्त्री जी ने तत्काल प्रतिज्ञा की कि मैं गृह और सम्पत्ति अर्जित नहीं करूंगा तथा ईश्वर पर दृढ़ विश्वास रखते हुए जीवन बीमा भी नहीं कराऊँगा।

प्रतिज्ञा लेकर तोड़ने वाले तो अनेक हैं परन्तु शास्त्री जी ने यह प्रतिज्ञा जीवन भर निभाई यहाँ तक कि जब वे प्रधान मंत्री बने तब भी उनके पास कोई अपना निजी मकान नहीं था।

जीवन में कई अवसर आए जब परिग्रह उन्हें पथ से विचलित करने का खड़ा हो गया। ऐसा ही एक अवसर सन् 1936 ई. में आया। तब वे इलाहाबाद म्युनिसिप्ल बोर्ड के सदस्य चुने गए थे। इस बोर्ड के सदस्य होने के नाते वे इम्प्रूवमेन्ट ट्रस्ट के सदस्य भी बने। यह ट्रस्ट जमीनों के प्लाट बनाता तथा उन्हें बेचा करता था। एक बार ट्रस्ट ने टैगोर टाउन मौहल्ले में निर्माण कार्य लिए आधा एकड़ के प्लाट बनाए ओर कम मूल्य पर बेचने का सिद्धान्त तय किया।

शास्त्री जी ने उन दिनों कुछ समय के लिए इलाहाबाद से बाहर थे। उनके एक मित्र ने इन प्लाटों में से एक प्लाट शास्त्री जी के लिए तथा एक अपने लिए खरीदना चाहा। परन्तु बोर्ड के नियमों के अनुसार ट्रस्ट का कोई सदस्य ऐसा नहीं कर सकता था। उस दस्य ने कमिश्नर साहब से संपर्क साधकर शास्त्री जी के लिए विशेष छूट माँगी ली साथ ही उनके लिए भी छूट मिल गई। उन्होंने एक-एक प्लाट दोनों के लिए खरी लिए।

कुछ दिनों के बाद शास्त्र जी प्रवास से लौटे। लौटते ही मित्र महोदय ने यह सम्वाद इस आशा से सुनाया कि शास्त्री जी प्रसन्न होंगे। परन्तु शास्त्री जी तो प्रसन्ना होने के स्थान पर मर्माहत हो उठे।

शास्त्री जी को इस प्रकार दुःखी होते देखकर उक्त सदस्य उन्हें शान्त करने का प्रयत्न करने और बताने लगे कि कमिश्नर साहब से इजाजत मिल जाने के बाद प्लाट खरीदने में कोई आपत्ति नहीं है। परन्तु शास्त्री जी को यह कब सहन होने वाला था-आपत्ति हो या न हो। नियमों और सिद्धाँत को तोड़ना सर्वथा अनुचित है और इसके प्रायश्चित के रूप में तुम मेरे प्लाट सहित अपना प्लाट भी ट्रस्ट को वापस कर दो।

इन्होंने प्लाट वापस करा कर ही चैन लिया। उन्हीं दिनों ट्रस्ट की मीटिंग हुई। ट्रस्टियों ने दोनों प्लाट वापस होने की बात ज्ञात थी। इसे सराहनीय आदर्शवादिता की संज्ञा देकर सभी ट्रस्टियों ने शास्त्री जी की भूरि-भूरि प्रशंसा की। शास्त्री जी ने बात को मजाक में टालते हुए कहा-” भाई आप प्लाट वापस करने में कौन–सा आदर्शवाद मानते हैं। मैंने तो बापू को जो वचन दिया था उसे ही पूरा किया है और ट्रस्टी की हैसियत से ट्रस्ट द्वारा बेची जाने वाली वस्तुओं को खरीदना भी कौन–सा अच्छा काम है। सभी ने हृदय से स्वीकार किया कि अपरिग्रह को अन्तस्तल से अपनाए बगैर सही माने में लोक सेवा संभव नहीं।”


प्रकृति में दृश्यमान सहयोग-सहकार भरा सद्भाव

जीव मात्र में व्याप्त परमात्मा सत्ता के दर्शन इन स्थूल नेत्रों से कर सकना संभव नहीं है। उसका साक्षात्कार कने एवं आनन्दानुभूति के लिए अपनी अन्तः चेतना को विकसित करना होगा। चेतना को विकसित करने का आधार जिन के स्वार्थ की संकीर्ण सीमा को तोड़कर समष्टि चेतना तक अपने भाव को व्यापक एवं विस्तीर्ण बनाना है। सबमें एक ही दिव्य सत्ता विराजमान है, अपनी आस्था को यदि इस स्तर तक विकसित कर ले और परस्पर स्नेह-सहयोग को, सद्भाव को व्यापक बनाएँ तो भागवत सत्ता का सामीप्य अनुभव किया जा सकता है।

यह जिन की स्वार्थ परता ही है जिसके कारण व्यक्तिवाद, मोह, आसक्ति आदि दोष पनपते है। जबकि परस्पर सहयोग एवं सहकारिता का भाव अपने तथा समाज के उन्नयन में सहायक है।

संसार इसी सहयोग एवं सहकारिता के सिद्धान्त पर जीवित है। यदि दुनिया के सारे लोग अपनी-अपनी बुद्धि को तिलाँजलि दे परस्पर शोषण एवं असहयोग पर उतर आयें तो समूची सृष्टि का अस्तित्व समाप्त प्रायः हो जायेगा।

समष्टि चेतना से उद्भूत प्रकृति को सूक्ष्मता से देखने पर पाते है कि उसका अन्तर्जीवन कितना सद्भावना एवं सहयोग से परिपूरित है। छोटे-छोटे जीव−जंतु, वृक्ष-वनस्पतियाँ भी किस तरह मैत्री का जीवन यापन कर रहे है। मानवी सभ्यता आज इसी कारण विराजमान है कि भौतिकता की इतनी चकाचौंध बढ़ने पर भी हम परस्पर दया, उदारता, सौहार्द के सम्बन्ध को बनाये रखे हैं।

गाँव के किसान से यदि कोई जिज्ञासा करे कि खेत में कई प्रकार के अनाज को मिलाकर बोने का क्या तात्पर्य है। तो परस्पर सहयोग से ही उन्नति के सूत्र की व्याख्या सामने आ जायेगी। ज्वार एवं अरहर साथ-साथ बोई जाती है। मूँग, उड़द और लोबिया आदि दालें भी ज्वार के साथ बो दी जाती है। ज्वार का पौधा लम्बा और बड़ा होता है, यदि उसमें निज के स्वार्थ को ही सब कुछ मान बैठने की संकीर्ण वृत्ति होती तो मूँग उड़द को बढ़ने न देता। जबकि होता यह है कि यह दालों को ज्वार में बढ़ने और हृष्ट-पुष्ट होने में सहायता मिलती है। ज्वार को नाइट्रोजन की आवश्यकता होती है। यह काम अरहर पूरा करती है। वह वातावरण को खींचकर कुछ अपने लिए रख लेती है शेष ज्वार को दे देती है जिससे वह बढ़ती और अच्छा बीज पैदा कर सकने की शक्ति पाती है। अपने देश का सामाजिक ढर्रा भी इसी दृष्टि से बनाया गया था। लुहार, तेली, मोची सब अपना-अपना काम करते और परस्पर विनमय के द्वार बाँट लेते। इस प्रकार एक दूसरे से स्नेह आत्मीयता का भाव भी बना रहता था।

पान की बेल आम के वृक्ष के सहारे कही अच्छी तरह से बढ़ती है। यदि उसे किसी सघन वृक्ष की छाया न मिले तो उसका जीवन ही संकट ग्रस्त हो जाय। यहाँ बड़ा छोटे के विकास में सहायक ही है। बेचारी अमरबेल जिसमें न तो जड़ है, न ही क्लोरोफिल, इस अभाव ग्रस्त स्थिति में स्वयं सीधे भोजन प्राप्त कर सकने में असमर्थ है। इसके लिए उसे बड़े वृक्षों का संरक्षण मिलता है। जिनके पास प्रचुर धन वैभव है, वे उसे मात्र अपने स्वार्थ में खर्च न कर यदि अल्प विकसितों को भी बाँटते रहें तो यह विषमता पैदा ही न हो। बात आर्थिक विशेषताओं की नहीं विद्या बुद्धि-कला कौशल भी एक जगह केन्द्रित न होना चाहिए। हमारे पास जो भी योग्यता सामर्थ्य है उसे अल्प विकसित लोगों को ऊँचा उठाने बढ़ाने में नियोजित करने में ही उसकी सार्थकता है।

अधिक शक्ति वाले कम शक्ति वालों के विकास में जुट जायें तो ही विकास की समग्रता, उत्कृष्टता संभव है। छोटी पीपल जो एक प्रकार की औषधि है, अपना विकास किसी घने, छायादार वृक्ष के नीचे ही कर सकती है।

अन्धे और लँगड़े की कहानी बहुत प्रसिद्ध है। दोनों ने परस्पर सहयोग को वरीयता दी। अन्धे ने लंगड़े को कन्धे पर बिठाया, लंगड़े ने उसे दिशा निर्देशन दिया और दोनों ने इस प्रकार अपनी यात्रा सम्पन्न की।

यह कहानी मानवी समाज की सद्भावना सहानुभूति का प्रमाण है। यहाँ कोई व्यक्ति पूर्ण नहीं सब अपूर्ण ही हे। चिकित्सक औषधिशास्त्र का महा पण्डित को सकता है, पर कृषि का ज्ञाता नहीं। इंजीनियर कल-पुर्जों की बारीकियाँ समझने में निष्णात् भले ही हो पर व्यापार शास्त्र के कौशल में अबोध बच्चा ही है। अपूर्णताओं वाले इस संसार में यदि सभी बुद्धि प्रधान अपने स्वार्थ के लिए छल कपट-चालाकी का आश्रय लेने लगें तो अशिक्षित पर स्वस्थ बलिष्ठ भी निज के स्वार्थ को पूरा करने के लिए डकैती मार-पीट का सहारा अपनाएगा। क्योंकि उसे न्याय नियंत्रण में रखने वाली बौद्धिक शक्ति प्रायः पंगु जो हो जाती है। जबकि सभी उदारतापूर्वक परस्पर सहयोग एवं आत्मीयता का राजमार्ग अपनालें तो हर कोई अपना सर्वांगपूर्ण विकास कर सकता है।

लेग्यूमिनस पौधों जैसे मटर, सेम आदि की जड़ों में छोटे-छोटे फूले हुए भाग होते है, जिन्हें नोड्यूल्स (ग्रन्थियाँ) कहते है। इन ग्रंथों में एजेटोबैक्टर, नाईट्रोबैक्टर जैसे विशेष तरह के जीवाणु रहते है। ये हवा में उपस्थित नाइट्रोजन को उसके यौगिकों में बदलकर पौधों के उपयोग लायक बना देते हैं, क्योंकि हवा की यह नाइट्रोजन इन पौधों के किसी काम की नहीं और स्वयं भी पौधों की जड़ों स अपना स्वल्प भोजन प्राप्त कर लेते हैं। इस प्रकार परस्पर सहयोग से दोनों अपने-अपने विकास की पूर्णता प्राप्त करते हैं।

इसी तरह का पारस्परिक सहयोग संघ प्रोटोजोआ के जन्तु पैरामीशियम में पाया जाता है। यह जन्तु जब थक जाता है, और बुढ़ापे के घिर आने से जीवनीशक्ति कम पड़ती है, जब दो पैरामीशियम मिलकर एक दूसरे से साईटोप्लाजमा अदल-बदल लेते है। इससे उनमें पुनः नई शक्ति आ जाती है। जबकि हम अपने माँ-बाप-बुजुर्गों को इसलिए तिरस्कृत-अपमानित करते है कि उनमें शक्ति की न्यूनता है और आजीविका की दृष्टि से अक्षम है। यदि नई पीढ़ी उनसे उनके विविध अनुभवों एवं बुद्धि का लाभ उठाकर उन्हें स्वअर्जित ज्ञान जीवन की उपयोगी सामर्थ्य के आवश्यकतानुसार दे सकें, तो दोनों पक्ष कुशलता एवं सक्षमता से रह सकते हैं।

लाईकेन जीवशास्त्र का ऐसा शब्द है जो प्रकृति में सहजीवन को स्पष्ट करता है। देखने में तो लगता है कि कुकुरमुत्ता जिस पेड़ या पत्थर पर उगा है, वही उसका शरण दाता है, पर तथ्य इसके विपरीत ही है। इसके कोमल तने के अन्दर जल शैवाल नाम का कोश समुदाय निवास करता है। वह कुकुरमुत्ते के भीतर न केवल सुरक्षित रहता है।

अपितु क्लोरोफिल विहीन कुकुरमुत्ते को इस उपकार के बदले प्रकृति से जीवन तत्व खींचकर देता है जिससे उसका भी विकास होता रहता है। ऐसा ही संबंध कर्कट (ष्टह्ड्डड्ढ) और सी-एनीमोन में पाया जाता है। कर्कट इन्हें पीठ पर लादे घूमता है। बदले में यह कर्कट की जीवन रक्षा में सहायक होता है। कर्कट जल जीवों का प्रिय भोजन है, किन्तु एनीमोन अपने शरीर से ऐसा विषैला द्रव निकालते हैं जिससे आक्रामक जीव इससे बहुत दूर रहते हैं। यह परस्पर सहकार का चमत्कार है। यह सहयोग एवं सहकार का सद्भाव ही है, जिसके कारण परमात्मा चेतना का विश्व उद्यान हरा-भरा दीखता है। मनुष्य जैसे भावनाशील प्राणी के लिए यही उचित है कि वह अपनी संकीर्ण मनोवृत्तियों से ऊपर उठकर सबके लिए दया-करुणा और आत्मीयतापूर्ण सम्वेदना से ओत-प्रोत हो परमपुरुष के उद्यान को पुष्पित पल्लवित करने में उसका हाथ बंटाएं।


Quotation

जब मनुष्य के भीतर उचित और अनुचित अन्तर्द्वन्द उठ खड़ा हो तो समझना चाहिए कि सुख शान्ति के दिन नजदीक आ गये।


प्रतिभाएँ औरों के लिए जीती हैं।

उपयोगिता अभिवृद्धि ही प्रतिभा है। जो अपनी आन्तरिक शक्तियों को जाग्रत कर स्वयं की उपयोगिता बढ़ाने में संलग्न है वह प्रतिभावान है। उसका सामान्य पक्ष ही सहज संपर्क में आता है। जो महान है वह छिपा रहता है। उसे प्रयत्नपूर्वक ढूँढ़ना पड़ता है। धातु खदानें ढूंढ़नी पड़ती है फिर उपलब्ध पदार्थ का परिशोधन करना होता है, तब उपयोगी वस्तु हाथ लगती है। ढूंढ़ खोज न की जाय तो पैरों तले की जमीन में ही सोने की खदान का अस्तित्व रहने पर भी पता न चलेगा और उसे भूमि पर पीढ़ियों से रहने वाला व्यक्ति दरिद्र ही बना रहेगा। ढूंढ़ने के बाद खुदाई के लिए गहरे उतरने साधन जुटाये और कठोर श्रम करने की आवश्यकता होती है। कच्चे माल को भट्ठियों में डालकर धातु से मिट्टी छुड़ानी पड़ती है। तब कहीं शुद्ध धातु के उपकरण औजार बनते हैं अपने व्यक्तित्व को उपयोगी बनाने के लिए लगभग इसी स्तर के प्रयास करने पड़ते हैं। इसे ही प्रतिभा जागरण कहते हैं।

अपना व्यक्तित्व सामान्यतया उतना ही दीख पड़ता है जितना कि खाने-कमाने के काम आता है, यह उसका बहुत छोटा सा अंश है। इसकी क्षमता इतनी ही है कि उससे जीवन यात्रा की गाड़ी घिसटती चले। धान की तरह उगने और कटने में ही जिन्दगी समाप्त हो जाती है। जिस-तिस तरह से जिन्दगी गुजार लेना मानव जीवन का लक्ष्य नहीं हो सकता। इतना तो कृमि कीटक भी कुशलतापूर्वक कर लेते है। अन्तराल की गहराई में घुसा जाय-परिष्कृत दृष्टिकोण के बरमे से उसे खोदा जाये-तो पता चलेगा कि इसी भूमि में वह सब कुछ विद्यमान है जिसे जीवन सम्पदा का सार तत्व कहा जा सकता है और विश्व वसुधा का सारभूत वैभव।

हम अपनी प्रतिभा जगाएँ उपयोगिता बढ़ाएँ। अपने लिए उपयोगी बनें-साथ ही परमात्मा एवं विश्व की समष्टि आत्मा के लिए भी। अनुपयोगी किसी के लिए भी न रहें। जो अपने लिए उपयोगी होता है। वह दूसरों के लिए अनुपयोगी हो सकता हैं। दूसरों की सेवा सहायता करने के लिए यह आवश्यक है कि हम अपने लिए अपने आप का उपयोगी बनाएँ।

उपयोगिता के घटने और प्रतिभा के सोई पड़ी रहने में सबसे बड़ा कारण अपनी ही बुरी आदतें हैं, जो सोचने और करने के दोनों ही यंत्रों पर अपना आधिपत्य जमाए बैठी हैं इन मलीनताओं को धो डालें, तो अन्तर की पवित्रता स्वतः निखर पड़ेगी। दूसरों का शोषण करके अपना वैभव बढ़ाना-उस मृगतृष्णा की तरह है जो देखने में सच मालूम पड़ते हुए भी नितान्त मिथ्या होती है। भलाई और बुराई का ऐसा वर्गीकरण नहीं हो सकता, जो अपने लिए एक तरह का और दूसरों के लिए दूसरी तरह का परिणाम उत्पन्न करें। आग औरों के लिए गरम और अपने लिए ठण्डी सिद्ध हो, ऐसा हो ही नहीं सकता। दूसरों के लिए अनुपयोगी सिद्ध होने वाला व्यक्ति अपने लिए भी घाटे का निमित्त बनता है। अपने लिए लाभदायक केवल वे ही व्यक्ति सिद्ध होते हैं, जिन्हें दूसरों के लिए लाभदायक अनुभव किया जा सकें प्रतिभाशालियों की गणना में वे ही आते हैं, जिन्होंने देश, समाज के कल्याण में हाथ बँटाया हो। औरों को सुखी बनाए बिना कोई सुखी नहीं हो सकता। पेड़ लगाने पर औरों की तरह अपने को भी उसकी छाया में बैठने का अवसर मिलता है। औरों के लिए कुआँ जलाशय बनाने वाले उससे अपनी प्यास बुझाते है। इसी प्रकार स्वयं को मद्यपान का अभ्यासी बनाकर अपने शरीर, मन और धन की ही बरबादी नहीं होती, संपर्क में आने वाले दूसरे लोग भी उसी बुरी आदत से हानि उठाते है। निन्दा का भाजन तो उन्हीं को होना पड़ता है। संक्षेप में अपनी क्षमताओं को इस स्तर तक परिष्कृत कर लेना कि उससे स्वयं और दूसरे भी लाभान्वित हो सकें-प्रतिभा है। इसका विकास ही युग की माँग है। अतः इस ओर प्रत्येक को ध्यान देना चाहिए।


लोक सेवा के निमित्त संघबद्ध प्रयास

एकाकी प्रयास कुछ ने कुछ परिणाम प्रस्तुत करते ही हैं, पर सरलता एवं अधिक सफलता मिल-जुल कर काम करने में ही रहती है। सहकारिता की, संघ शक्ति के महात्म्य का जिन्हें ज्ञान है, वे जानते हैं कि मानवी प्रगति का समूचा ढाँचा सहकारी प्रयासों के आधार पर ही ठीक बना है। परिवार गठन और सामाजिकता के अधिग्रहण ने ही उसे उस स्तर तक ऊँचा उठने, आगे बढ़ने में समर्थ बनाया है, जिसमें कि वह आज है। अकेलेपन का मानस बनाकर यदि वह अपने क्रियाकलापों को सीमित बनाये रहा होता, जो नर-वानर या वन मानुष की स्थिति से कदाचित ही कुछ ऊँचा उठ सकने में समर्थ हुआ होता।

मधु-मक्खियों ने अपने वर्ग में अधिक श्रेय पाया है कि उनमें मिल-जुल कर काम करने की प्रवृत्ति पायी जाती है। तितलियों में यह प्रवृत्ति न होने से वे अपनी जिन्दगी जीती हैं और अपनी मौत मरती रहती है। झुण्ड बनाकर रहने वाले हाथी अपने समुदाय को सुरक्षित रखते और निश्चिन्ततापूर्वक अपने क्षेत्र में विचरते हैं। कुत्ते इसलिए बदनाम हैं कि अपनी बिरादरी का कोई अन्य मुहल्ले में या पहुँचने पर धरती-आसमान सिर पर उठा लेते हैं। बन्दरों को इसलिए नमन किया जाता है कि वे साथ चलते साथ रहते और आपत्ति के समय आक्रमणकारी पर मिलजुल कर हल्ला बोल देते हैं।

संगठित समुदायों ने सदा प्रगति की है और दुर्गति के भाजन वे बने हैं, जिन्हें विघटन की नीति अपना कर स्वेच्छाचार बरतने में रुचि रही है। अपने देश की लम्बी समय की गुलामी मात्र एक तथ्य का परिचय देती है कि हम परस्पर-जाति-कबीलों के नामपर, जागीरों-ठिकानों के नाम पर एक दूसरे की उपेक्षा करते रहे। इसी कारण मुट्ठी भर आक्रमणकारियों का सामना न कर सके।

कहते है कि अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता। ढाई चावल की खिचड़ी नहीं पक सकती। डेढ़ ईंट से मस्जिद खड़ी नहीं हो सकती। कमजोर तिनकों से मिल कर मोटा मजबूत रस्सा बन जाता है जिससे हाथी को भी बाँधा जा सके। धागे मिलकर कपड़े बनते हैं। छोटी-छोटी ईंट मिलकर भव्य भवन खड़े होते है। अकेले सैनिक का महत्व ही कितना है? पर जब वह सेना का अंग बन जाता है, तो एक बड़ी शक्ति का उदय होता है। सन्त भी अखाड़े आश्रम बना कर रहते है और बड़े काम सम्पन्न करते है। प्रतिभा परिष्कार के इच्छुकों को आत्मशोधन का प्रयत्न तो एकाकी स्तर पर करना चाहिए, पर वहाँ सामूहिकता की नीति ही अपनानी चाहिए। राम ने रीछ वानरों को, बुद्ध ने परिव्राजकों को एक सूत्र में बाँधा और उनकी संयुक्त शक्ति से महान लक्ष्य को प्राप्त किया था। यही इन दिनों भी किया जाना है। युग परिवर्तन का प्रकाश पर्व अब अति निकट है। इक्कीसवीं सदी उज्ज्वल भविष्य के साथ जुड़ी हुई है। इस युगसन्धि के समय में तैयारियाँ भी बहुत करनी हैं और प्रस्तुत तथा निकटवर्ती कठिनाइयों के साथ टक्कर भी जोरदार लेनी है। इसके लिए आवश्यक है कि जिनके भीतर महानता के बीजाँकुर मौजूद हों, वे एक सूत्र में बँध कर योजनाबद्ध रूप से काम करें। यह एक उच्चस्तरीय तप है तथा आपत्ति धर्म भी। इसको निजी कार्यक्रम मानकर यदि नव सृजन की साधना में जुटा जाय, तो प्रतिभा परिष्कार का लाभ मिलना सुनिश्चित है। वह किसी के वरदान-अनुदान मात्र से प्राप्त नहीं हो सकता है। कोई पूजा पाठ भी इस प्रयोजन की पूर्ति नहीं कर सकता। इसके लिए सामयिक साधना यही हो सकती है कि नव सृजन के लिए विनिर्मित कार्यक्रम को अपनी योग्यता स्थिति के अनुरूप चुना और उनमें पूरी तत्परता के साथ जुट जाया जाय।

*समाप्त*