तपस्वी का वैराग्य!

सत्य की प्राप्ति-तपस्वी ही कर सकता है। शारीरिक और मानसिक प्रलोभनों से बचने में जिस तितिक्षा और कष्ट-सहिष्णुता की-धैर्य और संयम की आवश्यकता पड़ती है, उसे जुटा लेने का नाम ही तप है। अकारण शरीर के सताने का नाम ही तप नहीं है। सताना तो किसी का भी बुरा है फिर शरीर को व्यथित और संतप्त करने से ही क्या हित साधन हो सकता है? तपस्या वह है जिसमें सत्यमय जीवन लक्ष्य निर्धारित करने के कारण सीमित उपार्जन से निर्वाह करने की स्थिति में गरीबी अथवा मितव्ययिता अपनानी पड़ती है। इसे प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार और शिरोधार्य करने का नाम तप साधना ही है।

सत्य रूप नारायण को प्राप्त करने का मूल्य है वैराग्य। वैराग्य का अर्थ घर परिवार को छोड़, विचित्र वेश बनाना या भिक्षाटन करना नहीं है वरन् यह है कि जिस राग-द्वेष की धूप छाँह में सारा जगत हँसता, रोता, अशान्त और उद्विग्न रहता है, उस विडम्बना से बचते हुए महान लक्ष्य की ओर अनवरत गति से चलते जाना। सत्यनिष्ठ व्यक्ति इस असत्य मग्न संसार को एक विचित्र प्राणी लगता हैं। उसे भी अज्ञान के अन्धकार में भटकती दुनिया दयनीय लगती है। दोनों का मेल नहीं बैठता। यह विसंगति कहीं कटुता उत्पन्न करती है, वहीं तिरस्कार उलीचती है, कहीं अवरोध उत्पन्न करती है, कहीं त्रास देती इसे उपेक्षापूर्वक देखना वैराग्य है और इस पर भी जो त्रास सहने पड़ें उन्हें सन्तोषपूर्वक सहने का नाम पता है।

वैराग्य और तप की डंडों के सहारे विवेकवान व्यक्ति अपनी साधना की नाव खेते हैं और सत्य के परम लक्ष्य तक जा पहुंचते हैं। युग परिवर्तन यही व्यक्ति कर पाते हैं।


हँसती-मुस्कराती-आकृति-प्रकृति

बन्द कली में फल का अस्तित्व तो होता है। पर वह मुंदी संकुची सिकुड़ी होने के कारण एक गोली सी बनी पत्तियों की छाया में मुँह छिपाये बैठी रहती है। उसका प्रभाव स्वरूप तब निखर कर आता है जब वह खिलती है और अपने आकार का विस्तार करती हैं। तभी उससे फूल की संज्ञा और प्रशंसा मिलती है। तितली भौंरों से लेकर भावुक जनों तक सभी उसके इर्द गिर्द मँडराते हैं।

मनुष्य के होठों के बीच दबी हुई सम्पदा उदासी की मनःस्थिति में दबी बँधी और छिपी रहती है। किन्तु जब भीतर से उल्लास उभरता है। व्यक्तित्व की गरिमा का दृश्यमान अरुणोदय होता है तो मुख अनायास ही पड़ता हैं और बंद दाँत मोती के दोनों की तरह दीख पड़ते हैं।

सूर्य की ऊर्जा का उदय होते ही तालाबों में कमल खिल जाते हैं। सूर्यमुखी के जिधर तिधर सीधे हुए फूल प्रभात को नमन करने के लिए अपनी दिशा वहीं कर लेते हैं यही बात मनुष्य के संबंध में भी है। संतुष्ट प्रसन्न और आशान्वित व्यक्ति की विशिष्टता अपनी वाणी में बोलती हैं यह अभिव्यक्ति अपनी साँकेतिक होती है। शब्दावली का समावेश न होने पर भी वह स्थिति को प्रकट कर देती है।

होठों को मनहूसों की तरह बन्द रखना ऐसा है जैसा किसी जीवित मनुष्य को मुर्दे का कफन उढ़ा देना। उसे किसी सुन्दर गुलदस्ते की बोरी में बँद कर देने के समान है।

भावना रहित व्यक्ति ही डरे सहमे और सकुचे रहते हैं। अपना मन न खोल सकने वाले आत्महीनता की ग्रन्थि से ग्रसित व्यक्ति मौन साधे बैठे रहते हैं। अन्यथा हलके मन वालों की पहचान यह है कि अपना मन जिस सीमा तक खोल सकना संभव है उस सीमा तक खोलें। मन की बात कहें और उस प्रोत्साहन पर दूसरों को भी यह अवसर दें कि वे भी मन की बात कह सकें। इतना ही नहीं अपनी प्रसन्न संतुष्ट आशान्वित मनोवृत्ति का परिचय प्रकट होने दें। इससे मनुष्य का गौरव बढ़ता है और उस बात का परिचय मिलता है कि भीतर खोखलापन नहीं है। वरन् कुछ ऐसा भी है जिसे मधुर, सरस, उज्ज्वल और आकर्षक कहा जा सकें।

कहते हैं कि जब मनुष्य हँसता है तो मोती उगते और फूल झड़ते हैं। इस प्रसाद को पाने के लिए हर कोई लालायित रहता है। हँसते हुए मनुष्य को देख कर देखने वाले को भी हँसना आता है। ठीक उसी प्रकार जैसे कि रोते को देख कर रोना आता है और क्रोधी की समीपता में क्रोध का आवेश चढ़ आता है। यह बिना पूँजी का उपहार है जिसे किसी को भी कितनी ही दे तक कितनी ही बड़ी मात्रा में दिया जा सकता है।

यह सोचना व्यर्थ है कि अपने दाँत प्रकृति ने कैसे ही क्यों न बनाये हों पर जब वे खिलते हैं तो सहज सौंदर्य से भर जाते हैं।

मुस्कराने की आदत मानसिक स्वास्थ्य को कायम रखने और दूसरों को वही उपहार बाँटने की दृष्टि से नितान्त सस्ता और बहुमूल्य उपक्रम है। यदि स्वभावतः ऐसी प्रकृति न मिली हो, वातावरण ने यदि इस सद्गुण को विकसित होने का अवसर न मिलने दिया हो तो फिर अपने प्रयत्न से एक उपयोगी व्यायाम या योगाभ्यास की तरह इसे आरंभ करना चाहिए।


अंतः करण के परिमार्जन से दिव्य शक्तियों का उद्भव!

आत्मोत्कर्ष के लिए साधना क्षेत्र में उतरना ही एक मात्र उपाय है। अन्तःक्षेत्र का परिशोधन परिमार्जन करना पड़ता है। मलीनताएँ सम्मिश्रित किये रहने पर उसका मूल्याँकन ठीक नहीं हो पाता। जमीन से धातुएँ जब निकलती हैं तो उन सब के साथ मिट्टी मिली होती है। आग की प्रचंड भट्ठी में डालकर उसे तपाना- पिघलाना पड़ता है। इससे मिट्टी वाला अशुद्ध अंश जलकर पृथक् होता है और शुद्ध धातु अपने असली रूप में सामने आती है।

सौर मण्डल के ग्रह, उपग्रह जिस क्रम और जिस गति से अपनी धुरी और कक्षा में घूमते हैं, उसी प्रकार परमाणु भी नाभिक की परिक्रमा करते और धुरी पर घूमते हैं। परमाणु के इर्द-गिर्द घूमने वाले इलेक्ट्रान, प्रोटान, न्यूट्रान की भी वही रीति-नीति होती है, जो सौर मण्डल के ग्रह-उपग्रहों की। इनकी गतिविधियों और परमाणुओं के क्रिया-कलापों में नगण्य सा ही अन्तर पाया जाता है इसी तथ्य पर समस्त ब्रह्मांड का गति चक्र चलता है। ईश्वर को ब्रह्मांड माना जाय, तो व्यक्तित्व को एक सौर मंडल माना जा सकता है। सौर मण्डल का एक इकाई माना जय तो परमाणुओं को उनका अंशधर मानना पड़ेगा। इसका तात्पर्य यह हुआ कि मनुष्य के अन्तराल में विद्यमान शक्तियों की न्यूनता नहीं। प्रश्न केवल इतना भर है कि उन्हें प्रसुप्त स्थिति में पड़े रहने दिया जाय या जाग्रत, सशक्त-सक्रिय बनाया जाय।

इसका एक ही उपाय है कि जो अवांछनियताएं उभरी हुई है, इन्हें दबाया जाय और जो श्रेष्ठता के साथ विद्यमान हैं, उनमें नव जीवन का संचार किया जाय। यह कार्य साधना माध्यम से ही हो सकता है।

साधना के दो पक्ष है। एक तप दूसरा योग। तप का अर्थ है तपाना। किसी वस्तु को तपाने से जो उसमें अनावश्यक तत्व हैं वे हट जाते हैं और शुद्ध स्थिति की सुदृढ़ता उत्पन्न होती है। मिट्टी के बने पात्रों को गरम करने से वे सुदृढ़ और टिकाऊ हो जाते है। ईंटें पकने के उपरान्त पत्थर का काम करती हैं। धातुएँ पकाने से अपने शुद्ध स्वरूप में निखर आती हैं। धूप में कपड़े सुखाने से उनकी सीलन और बदबू उड़ जाती है। पानी का तपाने से ऐसी सशक्त भाप बनती हैं, जो रेलगाड़ी जैसे भारी-भरकम वाहन को खींचे खींचे फिरे। रस भस्में अग्नि संस्कार प्रक्रिया से बनती हैं। शरीर का तापमान जब तक सही रहता है तभी तक जीवन है। घटने से दुर्बलता और बढ़ने से उत्तेजना ऐसी सवार होती है, जो प्राण घातक तक बन सकें।

योग का अर्थ है जोड़ना। जोड़ना किसको, किससे? इसका उत्तर एक ही है आत्मा को परमात्मा से। टंकी के साथ नल का तारतम्य जुड़ा रहता है।, तो नल की टोंटी से तब तक पानी निकलता रहेगा, जब तक कि टंकी पूरी तरह खाली नहीं हो जाती। बिजली घर के साथ जेनरेटर ट्रांसफारमर जुड़ते हैं और फिर उनके कनेक्शन जहाँ कहीं तक जाते हैं, वहाँ करेण्ट बराबर चलता रहता है। हिमालय के साथ जुड़ी हुई नदियों का प्रवाह तब तक चलता रहता है जब तक कि हिम भण्डार पूरी तरह गल कर समाप्त नहीं हो जाता। यही स्थिति आत्मा की भी है। सम्बन्ध मजबूती से जुड़ जाय तो दोनों की एकता में कोई अन्तर नहीं रह जाता। परमात्मा के गुण आत्मा में प्रकट होने लगते हैं।

तप में तितिक्षा द्वारा अपने को तपाना और दुर्गुणों को जलाना पड़ता है। इसमें दोष, दुर्गुणों कुसंस्कारों को जलाकर व्यक्तित्व में सन्निहित श्रेष्ठ के तत्वों को उजागर करना पड़ता हैं। शुद्ध स्थिति में पहुँचने पर वस्तु का मूल्य अनायास ही अत्यधिक बढ़ जाता है, कोयले का शुद्ध स्वरूप हीरा है। भाप से उड़ाना हुआ पानी डिस्टिल्य उपयोग किया जाता है। मनुष्य की उत्कृष्टता दुर्गुणों के छिद्रों से होकर बह जाती है। यदि उन्हें रोक दिया जाय, तपाकर मजबूत टाँके लगे बर्तन जैसा बना दिया जाय, तो फिर प्रवाह की निरर्थकता का खतरा नहीं रहता।

योग में जब परमात्म सत्ता के साथ आत्म सत्ता की घनिष्टता होती है तो द्वैत मिटकर अद्वैत बन जाता है। परमात्मा की सभी विशेषताएँ आत्मा में अवतरित होने लगती हैं। नाला जब नदी में मिल जाता है, तो उसका गंदा जल भी गंगा जल के सदृश्य पवित्र माना जाने लगता है। आग में जब ईंधन पड़ता है, तो दोनों की घनिष्टता एक रूप में प्रकट होती है। ईंधन भी आग की तरह जलने लगता है और कुछ क्षण पहले जो लकड़ी सा नगण्य था वही अग्नि के गुणों से भर जाता है और उसे कोई छूने का साहस नहीं करता बेल में निजी गुण जमीन पर फैलने का है, पर जब वह पेड़ से लिपट जाती है, तो उतनी ही ऊपर उठ जाती है, जितना लम्बा कि पेड़ होता है। बाँसुरी जब अपने को पोला कर देती है, अपनी निजी अहंता का परित्याग कर देती है तो बसी के रूप में विकसित हो जाती है और वादक द्वारा छेड़े गये मधुर स्वर उसमें से निनादित होते हैं। व्यक्ति काया की दृष्टि से ही जीवधारी रहता है, पर गुण, कर्म, स्वभाव से वह ईश्वरवत हो जाता है।

तपस्वी को अपनी अवाँछनीय आदतों से संघर्ष करना होता है और उन्हें परास्त करना पड़ता है संकीर्ण स्वार्थता, विलासिता, मोहग्रस्तता, लोभ, लिप्सा, .... जैसे अनेक कुसंस्कार ऐसे हैं, जिनका उन्मूलन न किया जाय तो अन्तराल की स्थिति झाड़ झंखाड़ उगे बीहड़ जैसी हो सकती हैं और उस स्थान पर उपयोगी कृषि करना, उद्यान उगाना संभव नहीं हो पाता। कपड़ा पहले धोया जाता है जब उस पर रंग चढ़ता है। तप को कपड़ा धोना समझना चाहिए और योग का परमात्मा के रंग में अपने को रंगना।

जिस प्रकार दोनों पहिये सही होने पर गाड़ सही रीति से चल पड़ती है, आन्तरिक दिव्य क्षमताओं को विकसित करने के लिए इन्हीं दो क्रिया-कलापों को खाद पानी की तरह प्रयुक्त करना पड़ता है। आत्मशोधन एवं आत्म परिष्कार की दिव्यशक्तियों की सिद्धियों-ऋद्धियों को अपने भीतर से उभारने का एक मात्र उपाय है।

जो छद्म प्रयोजनों से ताँत्रिक जैसे आधारों का अवलम्बन करके कोई चमत्कारी विशेषताएँ उत्पन्न कर लेते हैं, बाजीगरी स्तर की होती हैं। न तो उनमें वास्तविकता होती है और न टिकाऊपन। उनका उपयोग मात्र लोगों को प्रभावित करने, भ्रम में डालने भर के लिए किया जा सकता है। वे चकाचौंध उत्पन्न करके किसी की आँखों को चौंधिया सकती हैं। ऐसा तो सम्मोहन विधा हिप्नोटिज्म से भी हो सकता है कि सांप बिच्छू, शेर, ईश्वर देवता आदि के दर्शन करा दिये जाँय। यह दिवा स्वप्न हैं जो समय की कसौटी पर खरे नहीं उतरते। जिसको देवता अनुग्रह पूर्वक दर्शन दें उन्हें अपनी दिव्य विभूतियाँ प्रदान करके उच्चस्तरीय भूमिका में क्यों नहीं पहुँचा देंगे? यदि ऐसा कोई परिवर्तन अपने में दृष्टिगोचर नहीं हुआ है, चिन्तन, चरित्र और व्यवहार में निकृष्टता ही छाई रही है तो समझना चाहिए कि स्थिति पूर्ववत् गई-गुजरी ही बनी हुई है। लोगों को भ्रम में डालने के लिए अपने प्रभाव और प्रताप के झूठे किस्से भी गढ़े जा सकते हैं। बाजीगरों को भाँति किन्हीं को भ्रम में डालने वाला कौतुक चमत्कार भी दिखाया जा सकता है। किन्तु यह निश्चित है कि व्यक्तित्व को परिमार्जित किये बिना कोई सिद्ध पुरुष नहीं बन सकता।


भविष्य इस प्रकार का उभरेगा

समतल भूमि पर मध्यम चाल से चलता हुआ मनुष्य मंजिल पार करने में आवश्यक समय तो लगा लेता है पर यात्रा बिना थकान वाली और सुरक्षित रहती है। यदि वह नीचे खाई खन्दक में गिरने पर उतारू हो, मिनटों में लुढ़कता लुढ़कता सैंकड़ों गज गहरे खड्ड की गहराई में पहुँच सकता है। मध्यम चाल स्वाभाविक है और बेतहाशा दौड़ अस्वाभाविक। ऐसी गति अपनाने वालों की थोड़ी ही देर में साँस फूलने लगती है और थक कर चूर हो जाते हैं। समय चक्र के संबंध में भी यही बात है, उसे क्रमबद्ध रूप से पार करना ही हितकर हैं।

पिछली कुछ शताब्दियों में प्रगति के नाम पर हर क्षेत्र में भारी छलांगें लगाई गई हैं। आरंभ में उस आधार पर बड़ी सफलता का भले ही अनुमान लगाया गया हो पर समय बीतते बीतते परिणाम सामने आ गये और अतिवाद अपनाने की प्रतिक्रिया सामने आ उपस्थित होने लगी।

जब बारूद का आविष्कार नहीं हुआ था तब थोड़े युद्ध होते रहते थे और उनका फैसला भी जल्दी ही हो जाता था। बारूद का परिष्कृत स्वरूप डाइनामाइट जब युद्ध प्रयोजनों में प्रयुक्त होने लगा तो द्वितीय विश्व युद्ध और तृतीय विश्वयुद्ध की विभीषिका ने विकराल रूप धारण कर लिया। असीम धन जन की हानि हुई। भीमकाय कारखानों का उत्पादन खपाने के लिए उपनिवेशवाद, साम्राज्यवाद के विस्तार का सिलसिला चल पड़ा और संसार भर में तनाव का, पिछड़ेपन का, अनाचार का बोलबाला दीख पड़ने लगा। वायु, जल, भूमि, आकाश, पाताल ऐसे प्रदूषण से भरने लगे जो अनंतः प्राणी समुदाय के लिए प्राणनाशक ही हो सकता था। ऊर्जा का अविराम उपयोग तापमान बढ़ाता जा रहा हैं उसके आधार पर हिमखंड पिघल पड़ने समुद्र में बाढ़ आने, हिमयुग लौट पड़ने, आकाश का “ओजोन” रक्षा कवच फट जाने जैसे अनेकों संकट अपनी पूर्व-सूचना देने लगे। यह समस्त कुचक्र तथा कथित प्रगतिशीलता की धुरी से बँधे हैं। इनका विस्तार पिछली कुछ ही शताब्दियों में हुआ है, कारण कि वैज्ञानिक आविष्कारों और उनके मनमाने उपयोग की धमा-चौकड़ी इसी बीच मची है।

समय के पर्यवेक्षकों से लेकर सामान्य बुद्धिवाले तक को यह अनुभव होता है कि तथाकथित प्रगति का उद्धत उपयोग नशा पीने की तरह अवाँछनीयता अपनाने में हुआ है। फलतः शारीरिक अस्वस्थता, मानसिक उद्विग्नता, आर्थिक अभावग्रस्तता, पारिवारिक अन्यमनस्कता और सामाजिक क्षेत्र में उद्दण्डता की बेहतर अभिवृद्धि हो चली है। फलतः जिस ओर भी नजर उठाकर देखा जाता है वर्तमान और भविष्य विपत्तियों से घिरा हुआ ही दीखता है। लगता है कि यही स्थिति देर तक चलती रही तो महाविनाश ही हाथ रह जायेगा।

स्मरण रखने योग्य यह तथ्य है कि इस सुन्दर सृष्टि का नियन्ता कोई असाधारण दूरदर्शी है वह मनुष्य को एक सीमा तक उद्दंडता अपनाने की भी छूट देता है ताकि उसके दुष्परिणामों को देखते हुए अपनी समझ से आवश्यक सुधार परिवर्तन कर सके, पर जब सभी मर्यादायें तोड़ फेंकी जाती हैं तो सुधारने के लिए वही शक्ति हस्तक्षेप करती हैं जिसने असंतुलन को संतुलन में बदलने के लिए शपथपूर्वक वचन दिया हुआ है।

अगले दिनों यही होने जा रहा है। निकट भविष्य में एक ऐसा तूफान आ रहा है जो अनौचित्य के स्थान पर औचित्य की स्थापना कर सके। उलटों का उलट कर सीधा कर सकें।

यह भूल सुधार की बेला है। से प्रायश्चित्त के लिए पड़ने वाला दबाव भी कह सकते हैं, अपनायी गयी अवांछनीयता को छोड़ने के लिए बाधित करने वाला प्रतिकार भी।

प्रस्तुत विकृतियों में से प्रत्येक को पतन की दिशा छोड़कर उत्थान का मार्ग अपनाना होगा। ध्वंस के निमित्त लगी हुई शक्ति का सृजन के लिए नये सिरे से निर्धारण करना होगा। इस परिवर्तन की व्यापक प्रक्रिया को समय का परिवर्तन या युग परिवर्तन कहा जा सकता है। त्रेता में रामराज्य के रूप में सतयुग की वापसी संभव हुई थी। द्वापर में अवांछनीय बिखराव को समेट कर सुव्यवस्थित विशाल भारत की संरचना हुई थी और सुख-शान्ति का समय फिर वापस लौटा था। इन दिनों भी प्रायः उसी की पुनरावृत्ति होने जा रही है। सूर्य सदा अस्त की नहीं रहता। डरावनी और असुविधाओं से भरी रात अनन्त नहीं है, उसका समापन होकर ही रहता हैं प्रभात का अरुणोदय भी अपने समय पर उगकर रहता है। इन दिनों इसी स्तर की संधिवेला है ऊषाकाल की लालिमा को उभरते और ऊँची उठने का आभास नहीं क्षणों में पूर्वांचल को शायमान करते देखा जा सकता है।

परिवर्तन की बेला में सर्वप्रथम आबादी घटाने की आवश्यकता पड़ेगी। अन्यथा प्रगति प्रयास कितने ही बड़-चढ़े क्यों न हों वे आवश्यकता कि तुलना में क्रम ही पड़ते जायेंगे। पारस्परिक प्रतिस्पर्धा में वे आपस में ही लड़ मर कर महाविनाश के गर्त में गिरेंगे। तरीके जो भी अपनाये जाँय आबादी को नियंत्रित किये बिना कोई गति नहीं। समस्याओं का कहीं समाधान नहीं। ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ, संयम बचाव आदि जिससे जो बन पड़े उसे यह सीखना और सिखाया जाना चाहिए कि शान्ति और प्रगति का समय-वास लाने के लिए प्रजनन को जिस प्रकार भी बन पड़े निरुत्साहित किया जाना चाहिए।

अगले दिनों भीमकाय कारखाने छोटे कुटी उद्योगों का रूप अपना कर गाँव कस्बों में बिखर जायेंगे। तभी प्रदूषण रुकेगा और तभी हर हाथ को काम और हर पेट को रोटी मिलने का सुयोग बनेगा।

हर किसी औसत नागरिक स्तर का निर्वाह स्वीकार करना पड़ेगा। अन्यथा विलास, दर्प, अपव्यय, प्रदर्शन की अहंकारिता के लिए नीति और अनीति से बहुत जोड़ने, जमा करने और खर्चने की हविस में जिन्दगियाँ खप जायेंगी। सादा जीवन उच्च विचार का सिद्धान्त व्यवहार में उतरने पर ही यह संभव होगा कि ऊँचे टीले नीचे झुकें और नीचे खाई खन्दकों को भर कर समतल का सृजन करें। कृषि उद्यान और हरे मैदान और नगर, उद्योग आदि ऐसी ही भूमि की तो अपेक्षा करते हैं। अमीरों और गरीबों की बीच की दीवार टूटते टूटते वे विसंगतियाँ भी मिटेंगी जिनके कारण जाति वंश के लिंग भेद के मनुष्य-मनुष्य के बीच भारी असमानता दीख पड़ रही है।

आधी आबादी नारी के रूप में मुद्दतों से क्रीत-दासी की तरह बँधुआ मजदूरों जैसा परावलम्बी जीवन जीती रही हैं। अगले दिनों वह पूर्व मानवाधिकार सम्पन्न स्तर को उपलब्ध कर सकेगी। इसका शुभारंभ तो सूर्योदय के देश जापान से हो ही चुका है। एशिया, चीन, इजराइल, बुल्गारिया आदि में उसे पहले से ही अधिकार प्राप्त है। यदि यह हो गया तो कमाऊ हाथ दूने हो जायेंगे और किसी को किसी पर लदने और किसी को किसी का भार वहन करने की आवश्यकता न पड़ेगी सभी एकता की स्थिति में रहते हुए स्नेह सहयोग का रसास्वादन कर सकेंगे। प्रगति भी देखते देखते दूनी हो चलेगी।

भाषा, क्षेत्र, सम्प्रदाय, प्रचलन की विभिन्नता ने सार्वभौम एकता में भारी व्यवधान खड़ा कर रखा है। अगले दिनों सभी विश्व नागरिक होंगे। विश्व मानव के रूप में विकसित हुए सार्वभौम सभ्यता की छत्र छाया में ही मनुष्य हिल मिल कर रह सकेंगे। मिल बाँट कर खाते हुए हँसती हँसाती जिन्दगी जी सकेंगे।

युग की आवश्यकता के अनुरूप नागरिक और वातावरण विनिर्मित करने वाली शिक्षा एवं साहित्य का नये सिरे से निर्माण होगा। उसमें प्रभावित हुए बिना मनुष्य समाज का एक भी सदस्य बाकी न रहेगा। विद्यालयों के समकक्ष ही पुस्तकालयों का भी महत्व होगा। अध्यापकों की तरह साहित्य सृजेता भी जन मानस को उच्च स्तरीय बनाने में समान योगदान देंगे।

प्रत्येक क्रिया-कलाप में सहकारिता आधारभूत व्यवस्था बनेगी। परिवार स्तर की निर्वाह पद्धति हर कहीं अपनाई जायगी। उद्योग मनोरंजन, उपभोग, विनिमय आदि में सहकारिता को अधिकाधिक स्थान दिया जायेगा। कोई अपने को एकाकी अनुभव न करेगा, ‘हम सब के-सब हमारे’ का मंत्र हर किसी के मन मानस में गूँजता रहेगा। इसी आधार पर वर्तमान का अनावरण तथा भविष्य का निर्धारण ढल कर रहेगा।

शासन को लोक जीवन में कम से कम हस्तक्षेप की आवश्यकता पड़ेगी। उसका वजन पंचायती और स्वेच्छा सेवी संस्थाएँ सहकारी समितियाँ पूरा कर देगी। अवाँछनीय तत्वों का नियंत्रण और प्रगति का संतुलित मार्ग दर्शन ही उसका प्रमुख कार्य रह जायेगा। चुनाव की पद्धति अति सरल और बिना खर्च वाली होगी। मौलिक अधिकारों के नाम पर किसी को असामाजिक कार्य करने की छूट न मिलेगी। दुर्बलों का न्याय मिलना कठिन न होगा। क्योंकि यथार्थता जाँचने की जिम्मेदारी पूरी तरह शासन संस्था वहन करेगी अनुशासन को सर्वत्र मान्यता मिलने से भ्रष्टाचार की गुंजाइश न अफसर के लिए रहेगी न जन साधारण के लिए।

वैज्ञानिक, डॉक्टर, इंजीनियर, आर्चीटेक्ट, मनीषी, साहित्यकार, कलाकार जैसी प्रतिभाएँ सार्वजनिक सम्पत्ति बन कर रहेंगी। वे अपनी विशेष योग्यता का विशेष मूल्य माँगने का दुस्साहस न करेंगी, कारण कि उन्हें अधिक समर्थ सुयोग्य बनाने में वर्तमान समाज एवं चिरकालीन संचित ज्ञान-सम्पदा का भी तो भरपूर लाभ मिलेगा। अकेला रह कर तो कोई व्यक्ति वन मानुष य नर वानर से अधिक कुछ बन ही नहीं सकता। जिसे अधिक मिला है उसे लोक सेवा का अधिक श्रेय लेकर ही संतोष करना चाहिए।

व्यक्ति को समाज का एक अविच्छिन्न घटक बन कर रहना होगा। मर्यादाओं का पालन और सवर्जनाओं का अनुशासन शिरोधार्य करना होगा। उच्छृंखलता बरतने का न कोई प्रयास करेगा और न समुदाय उसे वैसा करने देना सहन करेगा। अपना सुख बाँटना और दूसरों का दुख बँटाना। सही रहना और सही रहने देना इसी में जियो और जीने दो का सिद्धान्त पलता हैं मानवी गरिमा को अक्षुण्ण बनाये रखने में ही मनुष्य का गौरव, सम्मान एवं स्तर बनता है। यह मान्यता अगले दिनों हर किसी को सच्चे मन से अपनानी होगी।

इन सिद्धान्तों का कहाँ किस प्रकार कौन कैसे क्रियान्वयन करेगा? यह परिस्थितियों पर निर्भर रहेगा समस्त संसार में उच्च सिद्धान्त तो एक तरह अपनाये जा सकते हैं, पर उनके क्रियान्वयन में समयानुसार ही निर्धारण हो सकता है। इसलिए क्रिया कलापों की अपनी अपनी स्थिति के अनुरूप ही व्यवस्था बन सकती है। यह सुनिश्चित है कि भविष्य निश्चय ही उज्ज्वल एवं सुखद संभावनाओं से भरा पूरा होगा।


Quotation

सफलता जिस ताले में बन्द रहती है वह दो चाबियों से खुलता है एक परिश्रम और दूसरा सत् प्रयास। कोई भी ताला यदि बिना चाबी के खोला गया तो आगे उपयोगी नहीं रहेगा। इसी प्रकार यदि परिश्रम और प्रयास का माद्दा अपने अन्दर पैदा नहीं किया तो कोई भी थोपी सफलता टिक न सकेगी।

एक मनोवैज्ञानिक रिच्टर ने अपने लेख “काँकर स्ट्रेन्थ” यानी “शक्ति को जीतो” में लिखा है कि जीवन में किये गये सत्कार्य ही स्वर्ग की घंटी बजाते है। दरवाजा आवश्यक खुलेगा।


सौंदर्य का सच्चा मापदण्ड

कुटिलता विजातीय द्रव्य है। उसे आत्मा सहज ही आत्मसात् नहीं करती। किसी प्रकार देह भीतर पहुँचाई जाय तो उसे वमन विरेचन आदि उपायों द्वारा निकाल बाहर करने की चेष्टा करती है।

मनुष्य स्वभाव सज्जनोचित, सौम्य, स्नेहिल एवं उदार बनाया गया है। उसमें मधुरता और मृदुलता की मात्रा अधिक है। यही है उसकी विशिष्ट मानसिक सम्पदा जिसे प्राप्त कर लेने पर मनुष्य अपने मित्र सहयोगी बढ़ाता है। सद्व्यवहार का द्वार खोलता है और उत्साह पूर्वक जीवन बिताता है।

जिसके स्वभाव में कुटिलता, धूर्तता, अनाचार एवं उद्दण्डता का समावेश जितनी अधिक मात्रा में है वह उतनी ही मात्रा में विक्षुब्ध रहेगा और उसका प्रदर्शन शरीर के अंग अवयवों पर उभरता हुआ दीख पड़ेगा। इन विकृतियों से लदा हुआ कोई श्वेत वर्ण व्यक्ति नखशिख से आकर्षक होते हुए भी गंभीरता पूर्वक देखने से स्पष्ट ही कुरूप दीख पड़ेगा।

सुन्दरता की मोटी पहचान है-किसी की त्वचा सफेद होना। मांसपेशियों में मजबूती रहना, आँखें बड़ती, दाँत साफ होना, नखशिख सुन्दर होना। आरंभिक दर्शन और परिचय में किसी के रूप की सुन्दरता इतने ही लक्षणों से समझ ली जानी हैं पर यह भौंड़ी पहचान है। किसी क्षेत्र के लोगों की बनावट एक प्रकार की होती है दूसरे क्षेत्र वालों की दूसरी तरह की। चमड़ी या बनावट देश कर सुन्दरता-असुन्दरता का आकलन नहीं किया जा सकता कई काले दुबले भी इतने सुन्दर होते हैं कि उन्हें हर घड़ी देखते रहने को ही मन करता है और कई मोटी दृष्टि से सुन्दर लगने पर भी ऐसा लगता है जिनके पास बैठने, उनसे बात करने को भी मन नहीं करता। वरन् उलटे डर लगता है और मन कतर है कि जितनी जल्दी संपर्क टूटे उतना ही अच्छा है।

इस विसंगति का एक ही कारण है कि मनुष्य की मानसिकता भी उसके अवयवों पर विशेषतया चेहरे पर उभर आते है और वह दर्शक के अन्तराल तक अपना प्रभाव छोड़ती है।

चेहरा ऐसा विशेष अंग है जिस पर मानसिकता बहुत अंशों तक छाई रहती है। जिसमें सहज सौजन्य है जो चरित्र निष्ठा के प्रति आस्थावान हैं। जिनके मन में शुभेच्छा और सद्भावना का उभार है, उनके यह गुण चेहरे के विभिन्न अंगों द्वारा सहज छलकते हैं। उनके चिंतन में मुसकराहट में एक दिव्य कोमलता उभरी रहती है। वाणी में आत्मीयता की इतनी मिठास रहती है जिस पर गायकों का आलाप निछावर किया जा सके। इच्छा होती है, इस सौजन्य के प्रति श्रद्धा समर्पित करने की। इसके विपरीत जिनके भीतर कुटिलता भरी रहती है वे ठगों और बहुरूपियों की तरह बाहर से भले ही सब्जबाग दिखाते रहें पर भीतर जो ठगने की शोषण और विश्वासघात करने की कुटिलता भरी रहती है वह छिपाने पर भी छिपती नहीं। आँखें मनुष्य के अन्तराल का दर्पण है। उन्हें बारीकी से देखा जाय तो यह पता चल सकता है कि असलियत क्या है?

दर्शनीय आवेश एक सम्मोहन है जो चातुर्य जंजाल में फँसाकर ठग सकता है किन्तु सामने वाले के अंदर ऐसा प्रेम और विश्वास उत्पन्न नहीं कर सकता जिससे मित्रता और घनिष्टता न केवल उत्पन्न होती है, निभती है वरन् अपनी उत्कृष्टता के कारण अनेकों का उच्चस्तरीय मार्गदर्शन भी करती है।


यह कुचक्र देर तक टिकेगा नहीं

विगत शताब्दियों में विज्ञान और बुद्धिवान ने असाधारण प्रगति की है। इनके सहारे बहुमुखी प्रगति की आशा की जानी चाहिए थी और सत्गुणी वातावरण फिर से वापस लौटना चाहिए था, पर दुर्भाग्य से वह आशा पूरी नहीं हुई, वरन् उलटे ही दृश्य दृष्टिगोचर हो रहे हैं। असमानताएँ बढ़ी हैं। द्वेष-दुर्भाव में बढ़ोत्तरी हुई है। स्वार्थपरता अधिकाधिक सघन होती गई है। करुणा और शालीनता के स्त्रोत मानी सूखने ही लगे हैं। हर कोई अधिकारों के लिये अपनी माँग बढ़ाने में निरत है, कर्तव्यों की ओर से उपेक्षा की प्रवृत्ति की बढ़ रही है। चिन्तन, चरित्र और व्यवहार की दृष्टि से स्थिति दिन-दिन पतन पराभव की ओर गिरते जाने का परिणाम यह हुआ है कि चेतनात्मक वातावरण का हर क्षेत्र प्रदूषण से भर गय है। वायु, जल, मिट्टी, आकाश आदि में बढ़ते जा रहे प्रदूषण इसके अतिरिक्त हैं। आशंका और अविश्वास बढ़ते-बढ़ते आगामी संभावित महायुद्ध की तैयारियों में जुट गये हैं। वैज्ञानिक आयुधों के ऐसे आविर्भाव हुए हैं, जो यदि चल पड़े तो इस सुन्दर दुनिया का और उसकी प्राणि सम्पदा का अस्तित्व भी शेष रहने देंगे या नहीं, इसमें सन्देह है। साधारण क्रम से भी विषाक्तता जिस तेजी से बढ़ रही है उसे देखते हुये लगता है कि कहीं दुनिया धीमी आत्महत्या की ओर नहीं बढ़ रही बढ़ती हुई नशेबाजी और अन्धाधुन्ध जनसंख्या वृद्धि ऐसे दो उदाहरण हैं जो प्रगति और शान्ति की संभावनाओं को धूमिल करके दुख देते हैं। गरीब-अमीर के, नर और नारी के, जाति-पाँति के, अशिक्षित-शिक्षित के, बढ़ते हुये अन्तर भी निराशाजनक संभावनाओं के घटाटोप समेट कर ही सामने खड़े कर देते हैं। असंतोष, आशंका, उद्विग्नता और असहयोग की बढ़ती हुई मानसिकता हर किसी को तनावग्रस्त किये हुये है।

अवाँछनीय वातावरण से न शरीर स्वस्थ रहता है न मन सन्तुलित। देखा जाता है कि अधिकाधिक शरीर दुर्बलता और अस्वस्थता से ग्रस्त हैं। जिन्हें पूर्णस्वस्थ कहा जा सके, उनके दर्शन दुर्लभ हो रहे हैं। ईर्ष्या, द्वेष से जलती हुई मानसिकता ने घर-घर में श्मशान जैसे वीभत्स दृश्य उपस्थित कर दिए हैं। सहयोग तो स्वार्थ भर के लिए शेष रह गया है। उस आत्मीयता की अभिवृद्धि हो ही नहीं रही है, जिसके कारण एक और एक मिलकर ग्यारह बनने की उक्ति सार्थक होती है।

पिछली दो-तीन शताब्दियों में प्रगति के नाम पर जो कुछ सुविधा साधन बन पड़े हैं, उन्हें मोटी दृष्टि से देखने पर प्रतीत होता है कि धरती पर देवताओं न नया स्वर्ग लोक बसा लिया है। पाँच सौ वर्ष पुराने व्यक्ति कहीं जीवित हों और पुराने जमाने तथा आज के युग की वह आज तुलना करें, तो उसे इस प्रगतिशीलता पर आश्चर्य चकित होकर रहना पड़ेगा। किन्तु ऊपर की सुसज्जा वाली परत उघाड़ते ही जो अनुभव होता है, उसे नरक से भी गया गुजरा कहा जा सकता है। दृष्ट चिन्तन ने आचरण को भ्रष्ट करके रख दिया है। शालीनता का स्थान निष्ठुरता ने ग्रहण कर लिया हैं वासना, तृष्णा और अहंता की कभी न पूरी होने वाली खाई, को पाटने में लोग अहर्निश इस प्रकार लगे हैं, मानों कुबेर के साधन और इन्द्र के वैभव से उन्हें कम नहीं, अधिक ही चाहिए। इस व्यामोह के कुचक्र से मनुष्य इतने गहरे दलदल में धँसता ही चला गया है कि उबरने की बात सोचना तक संभव नहीं बन पड़ रहा है, फिर छुटकारा मिले भी तो कैसे?

बाहर से बन-इन कर निकलने की विडम्बना में भीतर ही भीतर मनुष्य कितना खोखला हो गया है, इसे देखकर आश्चर्य होता है। परिणाम सामने हैं समृद्धि भले ही बढ़ी हो, पर मनुष्य भीतर से इतना खोखला होता चला गया है मानों धुन समुदाय ने किसी खम्भे को पूरी तरह जराजीर्ण करके रख दिया हो और वह अब-तक धराशायी होने की बाट जोह रहा है।

वैभव का बाहुल्य और उद्विग्नता का विस्फोट साथ-साथ कैसे बैठे रह सकते हैं? यह लगता तो आश्चर्यजनक है, पर विश्लेषण इसी यथार्थता के निष्कर्ष पर पहुँचता है परिस्थितियों पर और भी अधिक ऊहापोह करने पर पता चलता है कि हम सब किसी महाअशुभ के महागर्त में गिरने जा रहे है। वैभव का दुरुपयोग प्रयोक्ता के लिए ही नहीं, सर्व साधारण के लिए भी विपत्ति लाता है। कला समृद्धि चतुरता, सम्पदा आदि के सभी पक्ष यदि नीतिमत्ता की राह छोड़ दें तो फिर ईश्वर ही मालिक है।

मनःस्थिति के गड़बड़ा जाने पर परिस्थितियों की विपन्नता स्वाभाविक है। जिधर से भी पर्दा उठाया जाता है, उधर ही चमकीले खोखले की आड़ में एक विषैला सर्प बैठा दीखता है। प्रगतिशीलता ने मनुष्य को जिस स्तर का बना दिया है, उसे देखते हुए लगता है कि वर्जनाओं का उदरस्थ करने से पूर्व निकटवर्तियों और समीपस्थों का भक्षण कर जाने की नीति अब अपवाद नहीं रही वरन् उसने सार्वजनिक प्रचलन की मान्यता प्राप्त कर ली है। इस बीच मानवी गरिमा की सत्ता को ढूँढ़ निकालना सुनिश्चित हो रहा है। जहाँ दीखता भी है वहाँ उपजने वाली आशा भीतरी छझ को देखकर निराशा में बदल जाती हैं।

दुरुपयोग से तो अमृत भी विष बन जाता है। उसने वर्तमान प्रगति के पक्षधर दर्शन, कौशल, स्वभाव, रुझान, प्रयास आदि को सहचर बना लिया है। ऐसी दिशा में अनर्थ का ही पोषण हुआ है। विकृत मानसिकता ने मो विपन्न परिस्थितियों को ही जन्म दिया हैं और विषधरों का एक अच्छा खासा समुदाय फन फैलाये हुए दसों दिशाओं में कोलाहल मचाता दिखता है। लगता है कि सब चलता रहा तो आदिमकाल से अबतक संचित की गयी मानवी संस्कृति और प्रगति का अन्त होकर रहेगा।

स्थिति से सभी विचारशील निश्चिन्त हो उसके हल खोजते भी हैं और सुझाते भी हैं, पर कार्यान्वयन का अवसर आते ही उसके लिए साहस का अन्त हो गया प्रतीत होता है। अभ्यस्त विचार ही स्वभाव में सम्मिलित हो कर एक से एक बड़े कौतूहल और कुकृत्य कर दिखते हैं। जो इस कुचक्र से बच रहे हो उनकी गणना अपवाद रूप में उंगलियों पर करनी पड़ेगी।

साधारण बुद्धि वैभव की चमकदार पिटारी में बैठे विनाश के महाविषधर का अभाव न पा सकें, यह संभव है। किन्तु उस मदारी को तो वास्तविकता का ज्ञान होना ही चाहिए, जिसके इशारे पर यह सब भला-बुरा विस्तार होता रहता है। स्रष्टा ने मनुष्य एवं इस धरती को अपनी सर्वोत्तम कलाकृति के रूप में बनाया है। मनुष्य की संरचना प्रायः उन्हीं तत्वों से की है जिसके द्वारा कि उसका अपना अस्तित्व विनिर्मित हुआ है। नियन्ता की इच्छा यही रही है कि बड़े अरमानों के साथ बनाई गई उसकी इस कलाकृति का विकास हो। वह न इस धरित्री का अन्त चाहता है और न उसे यह सुहाता है कि मनुष्य आत्म हत्या के मार्ग पर चलकर अपना विनाश अपने आप करले। इसलिए उसने इस आड़े वक्त में डूबती नाव को बचाने के लिए कुशल मल्लाह जैसा पराक्रम कर दिखाने का निश्चय किया है। “हारे को हरि नाम” ही एक मात्र सम्बल रह जाता है। गज और द्रौपदी जैसे अनेक उदाहरण भी इसके प्रमाण हैं। बालकों को कारण बनाने का कौतूहल अभिभावक एक सीमा तक ही देखते हैं। जब वे माचिस का खेल खेलने पर उतारू होते हैं तो उनकी इस हरकत को रोक भी दिया जाता है।


प्रत्यक्ष पराक्रमों के मूल में सक्रिय दैवी प्रेरणा

दैवी चेतना निर्गुण निराकार होने से स्वयं कार्य तो नहीं कर पाती, पर अपने पार्षदों को माध्यम बना कर वह ऐसे सभी कार्य करा लेती है, जिनमें ज्ञानेन्द्रियों, कर्मेंद्रियों की आवश्यकता पड़ती हो। ‘पार्षद’ का अर्थ है-समीपवर्ती। जो ईश्वरीय सत्ता की दिव्य विभूतियों को अपने में जिस मात्रा में ग्रहण-धारण कर लेते हैं, उन्हें भगवत् सत्ता का उतना ही निकटवर्ती अथवा कृपा मात्र माना जाता है। ऐसे ही लोगों को संसार संतुलन सही बनाये रखने वाले कार्य करने का आदेश-निर्देश उस निराकार सत्ता की ओर से मिलता है, जिन्हें वे पूरा कर भी दिखाते हैं। इस प्रक्रिया में दैवी शक्ति का सहयोग उन्हें मिलता रहता हैं आभास ऐसा होता है, जैसे उसने स्वयं के पराक्रम से यह सब कुछ कर दिखाया है, पर वास्तविकता यह है कि इसमें बाजीगर और कठपुतली वाला खेल ही क्रियान्वित होता है। व्यक्ति माध्यम तो बनता है, पर शक्ति अदृश्य सत्ता की ही काम करती हैं

मनुष्य की शक्ति बहुत सीमित है। उसका शरीर व बुद्धिबल भी नगण्य जितना है। साधन-सहयोग भी वह एक हद तक ही एकत्र कर सकता है। आकाँक्षाओं और संकल्पों की पूर्ति परिस्थितियों पर निर्भर। यदि संकट खड़े करने वाला विपरीत प्रवाह चल पड़े तो बने काम भी बिगड़ने लगते हैं। इसके विपरीत यदि परिस्थितियाँ अनुकूल होकर साथ देने लगें, तो ऐसा भी हो सकता है, जिसमें सरसों को पहाड़ बनने का अवसर मिले एवं “मूक होहि वाचाल” और “पंगु चढहिं गिरिवर गहन” की रामायण उक्ति प्रत्यक्ष होती और लोगों को अचम्भित करती दिखाई पड़े।

भारत एवं विश्व के इतिहास में ऐसे कई मौके उपस्थित हुए हैं, जिनमें इस प्रकार के अद्भुत आश्चर्य होते दिखाई पड़े हैं। यदि कहीं इस प्रकार के चमत्कार दीख पड़े, तो उनमें अदृश्य दैवी चेतना का ही हाथ समझा जा सकता है, भले ही प्रत्यक्ष रूप में श्रेयाधिकारी कोई व्यक्ति क्यों न बने।

थियोसोफिकल सोसाइटी के संचालकों ने भी इस तथ्य को स्वीकारते हुए यह प्रतिपादन विवेचन विस्तार पूर्व किया है कि हिमालय का हृदय समझे जाने वाले उत्तराखण्ड के देवात्मा क्षेत्र में सिद्ध संतों के सभा-सम्मेलन चलते हरते हैं। उनके निर्णय सदा अदृश्य सहायकों के माध्यम से क्रियान्वित होते हैं। इससे सामान्य जनों को जाने-अनजाने ऐसी सहायताएँ मिलती रहती हैं, जिन्हें वे स्वयं के पराक्रम से सम्पूर्ण जीवन में भी उपलब्ध नहीं कर सकते थे।

अदृश्य वातावरण में उपयोगी प्रवाह उत्पन्न करने एवं उसे झकझोरने के क्रम में महर्षि अरविंद का नाम लिया जा सकता है। स्वाधीनता संग्राम के दिनों में सूक्ष्म वातावरण को गर्म करने में उनने जो असाधारण भूमिका निभायी थी, उसे सूक्ष्मद्रष्टा जानते हैं। उन दिनों भारत ने ऐसे कितने ही प्रबल पुरुषार्थी उत्पन्न किये, जैसे उदाहरण इतिहास के दूसरे कालों में देखने को नहीं मिलते हैं। स्वतंत्रता प्राप्ति का प्रत्यक्ष श्रेय यों तो इस दौरान जूझने वाले सेनानियों और मार्गदर्शी नेताओं को ही जाता है, पर दिव्य दृष्टा महापुरुष यह समझ सकते हैं कि इसमें परोक्ष भूमिका महर्षि जैसे योगियों एवं महाकाल के परिवर्तनकारी दिव्य प्रवाह की ही रही थी।

सन्त कबीर का अवतरण तत्कालीन समाज में संव्याप्त मूढ़–मान्यताओं और अन्ध परम्पराओं का खण्डन करने एवं विभिन्न सम्प्रदायों के बीच पारस्परिक सद्भाव बढ़ाने के निमित्त हुआ था। उन्होंने अपने जीवन काल में कितने ही लोगों को ऊँचा उठाया व आगे बढ़ाया। वे मुसलमानों से जितना सद्भाव रखते थे, उससे किसी भी प्रकार कम महत्व हिन्दुओं एवं अन्य धर्मावलंबियों को नहीं देते थे। सभी के लिए उनके दिल में एक जैसा प्यार था। यह बात कट्टर मुसलमानों को बुरी लगी। वे नहीं चाहते थे कि इस्लाम वंश में पैदा होकर कबीर हिंदू धर्म का प्रचार करें। उनमें से कुछ लोगों ने इसकी शिकायत तत्कालीन मुस्लिम बादशाह सिकन्दर लोदी से की। बादशाह ने कबीर को मृत्युदण्ड सुनाया। उन्हें लोहे की बेड़ी में कस कर बहती गंगा में फेंक दिया गया। कबीर डूबे, पर मरे नहीं। चमत्कार यह हुआ कि अन्दर जाते ही लोहे के बन्धन स्वतः टूट गये। वे बहते-बहते किनारे आ लगे। जब यह अद्भुत घटना बादशाह तक पहुँची तो वे अचम्भे में पड़ गये, बाद में क्षमा माँगी तथा धार्मिक एकता संबंधी प्रचार करने की छूट दे दी। प्रस्तुत घटना में कबीर की जीवन-रक्षा अदृश्य सत्ता ने ही की थी, यही माना जाएगा।

विवेकानन्द ने अपने अनुभवों का उल्लेख करते हुए एक स्थान पर लिखा है कि-”अमेरिका में धर्म सभा एवं अन्य धार्मिक सम्मेलनों में जब मैं बोलने के लिए खड़ा होता था, तो आरंभ में चिन्ता रहती थी कि क्या कुछ कह सकूँगा, पर जैसे ही बोलना आरंभ करता था, तो ऐसा लगता था, मानो कोई दिव्य सत्ता जिव्हा पर सवार होकर बोलने के लिए प्रेरित कर रही हैं तब मैं तन्द्रा की स्थिति में ऐसी ज्ञान की बातें करने लगता था, जिसकी जानकारी स्वयं मुझे भी नहीं होती थी। तब ऐसा प्रतीत होता था कि जीभ तो हमारी है, पर वाणी किसी और की।”

यह एक सुविदित तथ्य है कि उच्च उद्देश्यों के निमित्त तपस्वियों एवं देव सत्ताओं की कृपा-वर्षा अनुदान-वरदान के रूप में सदा होती रहती है। गाँधी के प्रखर व्यक्तित्व के पीछे दैवी अनुकम्पा ही थी। महामना मालवीय, हिन्दू विश्व विद्यालय की, हीरालाल शास्त्री वनस्थली बालिका विद्यालय की, श्रद्धानन्द गुरुकुल काँगड़ी की स्थापना जैसे महत् कार्य मात्र अपने पराक्रम के बलबूते नहीं, दैवी अनुदानों के सहारे ही पूरा कर सके। सुग्रीव, विभीषण नरसी मेहता सुदामा आदि को उच्च स्थिति प्राप्त कराने में भगवत्सत्ता ही सहायक रही। भागीरथ द्वारा गंगा अवतरण एवं परशुराम द्वारा अनीति उन्मूलन में शिव जी का भारी योगदान था। हनुमान-जामवन्त आदि को इतिहास में अविस्मरणीय बनाने वाले भगवान राम ही थे। कुमारजीव, संघमित्रा, महेन्द्र आदि को बुद्ध ने वह सामर्थ्य प्रदान की थी, जिसके बल पर ही वे क्रमशः चीन एवं श्रीलंका में धर्मप्रचार में अग्रणी भूमिका निभा सके। समर्थ का प्रत्यक्ष और परोक्ष आशीर्वाद यदि शिवाजी को न मिला होता, तो वे वह सब कुछ न कर पाते, जो कर गुजरे। उनकी भवानी तलवार के विषय में कहा जाता है कि यह उन्हें देवी की और से गुरु माध्यम से प्राप्त हुई थी। गुजरात के जलाराम बापा का अक्षय अन्न भण्डार भगवान के ही अनुदान-आशीर्वाद का प्रतिफल था।

अरविंद आश्रम की श्री माँ ने अपने जीवन चरित्र में इस बात का उल्लेख किया है कि जब वह छोटी सी बालिका थीं, तभी से बराबर उन्हें ऐसा प्रतीत होता था, कि उनके पीछे कोई अतिमानवी शक्ति है, जो जब तब उनके शरीर में प्रवेश कर उनमें अलौकिक कार्य करा जाती है। उनने लिखा है कि उसी दिव्य सत्ता ने उन्हें भारत आकर श्री अरविंद से संपर्क करने और शेष जीवन समाजोत्थान के कार्य में लगा देने का निर्देश किया था।

इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि महान व्यक्ति के महान कार्य मात्र. व्यक्तिगत पुरुषार्थ के बलबूते संभव नहीं होते, श्रेय, प्रदान करने वाली दैवी अनुकम्पा ही इनकी पृष्ठभूमि में का करती है। पात्रता विकसित करके ही कोई भी सहज ही इन अनुदानों में लाभान्वित हो सकता हैं।


न कोई बुरा है न पापी!

जैकस कई शराब घर चलाता था। उसके शराब खानों से जहाँ रईस अमीरों के घर शराब बेची जाती थी वहीं गरीब मजदूरों को भी शराब बेची जाती थी। अमीर उमराव तो उसके यहाँ से कोई ज्यादा मात्रा में शराब मँगाते नहीं थे उसके शराब घरों में अधिक ग्राहक गरीब ओर मजदूर पेशा ही आते थे। अपने ग्राहकों को फँसाने के लिए वह बड़ी ही चालाकी से काम लेता था पहले तो अपने आदमियों को उनके पास दोस्ती करने के लिए भेज देता था जो उनसे दोस्ती गाँठ कर उनमें शराब की लत लगवा देते थे और जैकस के नियमित ग्राहक बना देते थे शराबियों के पास कोई पूँजी तो जुट नहीं पाती। अगर होती भी है तो वह धीरे-धीरे खत्म हो जाती है। फिर अगर वह आदत किसी गरीब आदमी को लगे तो उसके परिवार का अमन चैन भी जाता रहता है। वह अपने परिवार की जरूरतों की उपेक्षाकर शराब पीता रहता। जेकस ऐसे लोगों को उस समय उधार देता था फिर बड़ी बेरहमी से अपना पैसा वसूल करता था। इसलिए लोग जैकस की अनाचारी ओर दुष्ट व्यक्ति के रूप में जानने लगे थे। इस धंधे के अतिरिक्त सम्राट ने उस पर टैक्स वसूली का काम भी छोड़ दिया था। जिस समय वह टैक्स वसूली के लिए निकलता था उस समय तो उसका रूप ही बदल जाया करता था। हाथ में हण्टर व कोड़े लिए जेकस जब भी टैक्स वसूली करने निकलता तो लोग डर के मारे घरों में जा छुपते। जिन पर बकाया टैक्स निकलता था-न दे पाने पर वह उन्हें कोड़ों से पिटवाता और बुरी बुरी यातनाएँ देता।

एक बार उस गाँव में ईसा का आगमन हुआ। लोगों ने बताया कि जेकस बहुत दुराचारी व्यक्ति है और वह ईसा के आने से बहुत क्रुद्ध है। क्योंकि ईसा लोगों को नेक व शराफत की जिन्दगी जीने का उपदेश देते थे। उनके उपदेशों का लोगों पर प्रभाव भी होता था। कईयों ने उनसे प्रभावित होकर शराब, नशा, और कुमार्ग छोड़ा था। जेकस के नाराज होने की बात जब ईसा को पता लगी तो उन्होंने कहा “मैं जेकस के घर जाऊँगा और कल उसी का आतिथ्य ग्रहण करूंगा।”

जेकस को जैसे ही इस बात का पता चला तो उसने जंगल की ओर जाने का कार्यक्रम बना लिया वह ईसा से मिलना नहीं चाहता था, क्योंकि उसने उनके चुम्बकीय व्यक्तित्व के बारे में तरह-तरह की कहानियाँ सुन रखी थीं। जब ईसा उसके घर पहुँचे तो उन्हें पता चला कि वह तो जंगल में चला गया है। वे भी कहाँ मानने वाले थे उसे खोजते हुए वहाँ पहुँचे जहाँ जेकस था। उसने जब उनको देखा तो बड़ा हैरान हुआ और हैरानी का तब तो और ठिकाना नहीं था जब ईसा ने कहा “जेकस मैं आज तुम्हारा अतिथि बनने के लिए आया हूँ।” ऐसा कह उसे हृदय से लिपटा लिया। पेड़ों की आड़ में चुपके खड़े शिष्य यह सब सुन रहे थे। उन्होंने सोच रखा था कि अब शायद उपदेश शुरू हो। अब सत्संकल्पों के लिए दबाव डाला जाय। किन्तु वहाँ ऐसा तो कुछ भी नहीं था। दोनों ही मौन और भाव भरे नेत्रों से एक दूसरे की ओर देख रहें थे। अन्त में जेकस ने चुप्पी तोड़ी। वह बोला “प्रभो मैं आपके सामने नत मस्तक हूँ आज से आपके सामने संकल्प लेता हूँ कि न तो स्वयं कुमार्ग पर चलूँगा और न दूसरे को प्रेरित करूंगा साथ ही अब तक की अपनी सारी कमाई दरिद्र नारायण की सेवा में अर्पित करूंगा, तथा जिनसे मैंने अनुचित धन प्राप्त किया है उन्हें चौगुना वापस करने का वचन देता हूँ” ऐसा कह ईसा के चरणों में मस्तक झुकाया और उठकर चलता बना।

पेड़ों की आड़ में खड़े शिष्य यह सब क्रियाकलाप देख रहे थे। उन्हें जेकस का व्यवहार देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ। वे आड़ से निकल ईसा के सामने आए और भौचक्के स्वर में बोले “प्रभु! आपने तो उपदेश भी नहीं दिया फिर यह चमत्कार कैसे घटित हुआ? इतने खतरनाक आदमी को आपने कैसे वश में कर लिया?”

“प्रभावी व्यक्तित्व होता है उपदेश नहीं- मेरे बच्चे! ईसा का स्वर उभरा। बुराइयाँ छोड़ने का संकल्प दिलाने का यथार्थ अधिकार उन्हीं को है जो मन, वाणी अन्तःकरण में पूर्णतया मुक्त हो चुके हैं। तुम में अवश्य ही बुराइयाँ शेष होंगी तभी जेकस ने संकल्प नहीं ग्रहण किया। वस्तुतः कोई व्यक्ति बुरा नहीं होता और न खतरनाक। उससे कुछ भूलें होती हैं जिनका परिमार्जन निश्चित रूप से सम्भव हैं।”


राजा जनक विदेह क्यों कहलाए?

गुरु ने शिष्य से कहा “तुझे अब व्यावहारिक ज्ञान की दीक्षा के लिए राजा जनक के पास जाना होगा। राजा जनक राज काज करते हुए राज महलों में रहकर भी सद्ज्ञान को प्राप्त हो गये हैं उन्हें विदेह कहा जाता है” शिष्य बड़ी उलझन में पड़ गया कि ख्याति लब्ध गुरु के पास वर्षों रहा, घेर तप किया किन्तु फिर भी ज्ञान प्राप्त न हो सका। भला राज महलों में किस तरह ज्ञान मिलेगा। किन्तु गुरु आज्ञा शिरोधार्य कर शिष्य राजा जनक के राज दरबार में पहुँचा। देख राजा जनक के राज दरबार में पहुँचा। देखा राजा जनक काज में व्यस्त है। राजमहलों में सुख सुविधा की प्रचुर सामग्री सुलभ है। नाच, गान, रास रंग में पूरा राज दरबार डूबा है वह बड़ा हैरान हुआ कि इस विलासी राजा से क्या ज्ञान मिलने वाला है। किन्तु फिर भी राजा को अपने आने का मन्तव्य कह सुनाया।

राजा जनक न कहा कि “आज तो वह राज महलों को घूम कर देखलें। कल सत्संग और ज्ञान की बात करेंगे और एक दीपक हाथ में थमाकर कहा कि देखना यह दीपक बुझ न जाय अन्यथा महल के रास्ते विकट है। भूल भुलैयों में भटकने का डर है”। शिष्य ने पूरा महल घूमा तो किन्तु मन में डर बैठा ही रहा कि यदि दीपक बुझ गया तो रास्ते से भटक सकता है। अतः महल भली प्रकार न देख सका। पूरा ध्यान दीपक सम्हालने में ही लगा रहा।

सोने को सुन्दर, सुकोमल विस्तर पलंगों की व्यवस्था तो थी किन्तु शयन कक्ष में पलंग के ठीक ऊपर नंगी तलवार पतले धागे से लटकती देखकर शिष्य रात भर न सो सका। रत भर सोचता रहा कि गुरु ने किस मुसीबत में फँसा दिया। यहाँ क्या ज्ञान मिलेगा? जान बच जाय यह क्या कम है। प्रातः शिष्य राजा जनक के पास जाकर बोला “महाराज अब क्या आज्ञा हैं। राजा ने पूछा- “रात को नींद कैसी आई पहले यह तो बताइए” उसने कहा “बिस्तर पलंग आदि की व्यवस्था बहुत अच्छी थीं, किन्तु सिर पर नंगी तलवार लटकती देखकर रात भर नहीं सो सका। इससे तो अच्छी नींद हमें हमारे झोपड़ों में ही आती थी।” अब सम्राट ने कहा ठीक है। आओ भोजन करलें। सुस्वाद भोजनों का थाल परोसकर शिष्य के सामने रक्खा और कहा भोजन करें। किन्तु एक संदेश आपके गुरु का आया है कि शिष्य को सत्संग में ज्ञान प्राप्त होना ही चाहिए। यदि न हो तो फिर सूली लगवा दें।” यह समाचार सुनकर शिष्य स्वादिष्ट भोजन का स्वाद भूल गया अब तो उसको सूली सामने नजर आने लगी। बड़े बेमन से भोजन किया और उठकर चल दिया और हाथ जोड़ कर राजा से प्रार्थना की महाराज अब नहीं करना सत्संग। प्राण बच जाँय यही बहुत है।

राजा जनक ने कहा “सत्संग तो हो चुका, तुम इतना भी नहीं समझ सके”। शिष्य ने कहा वह कैसे? राजा ने कहा- “जैसे तुम रात दीपक लेकर महल में घूमें किन्तु दीपक बुझने के भय से महल का सुख न भोग सके। इस प्रकार मुझे हर समय यह ध्यान बना रहता है कि यह जीवन का दीपक बुझने ही वाला है अतः मैं रास रंग में रमता नहीं मात्र दृष्टा बना रहता हूँ। राज काज करता अवश्य हूँ किन्तु लिप्त नहीं होता।”

“रात को नंगी तलवार लटकती देखकर तुम सो नहीं सके। इसी प्रकार मुझे प्रतिपल मृत्यु का ध्यान रहता है। मृत्यु कभी भी घट सकती है अतः मैं रास रंग में कभी डूबता नहीं। सुस्वाद भोजन में तुम्हें जिस तरह सूली का संदेश सुनकर स्वाद नहीं आया। इसी प्रकार संसार में सब कुछ चल रहा है, घट रहा किन्तु मुझे भी उस शाश्वत अन्तिम सन्देश का प्रतिपल स्मरण रहता है। अतः माया, ममता, लोभ और आकर्षणों में मैं कभी लिप्त नहीं होता। मैं महल में अवश्य हूँ किन्तु महल मुझ में नहीं। ज्ञानी का यही परम लक्षण है कि वह संसार में अवश्य है किन्तु संसार रंचमात्र भी उसमें नहीं है। वह कर्म करते हुए भी लिप्त नहीं होता”। शिष्य उसी क्षण परम ज्ञान का प्राप्त हो गया। विदेह से वह सही अर्थों में तत्वदर्शन की दीक्षा ले चुका था।


प्रतिभाएँ यह तथ्य समझें-समझायें

मौलिक या आरंभिक रूप में हर वस्तु कच्ची या अनगढ़ ही होती हैं। इसे प्रयत्न पूर्वक सुन्दर-समुन्नत बनाना पड़ता है। खदान में से लोहा या सोना मिट्टी मिले हुए सामान्य स्थिति में मिलता हैं। उन्हें धधकती भट्ठी में गला कर शुद्ध स्थिति में पहुँचाया जाता है। इस गली हुई धातु में से जो उपकरण बनाने होते हैं, उनकी तदनुरूप साँचे में डाल कर ढलाई की जाती है, तभी औजारों या आभूषणों के रूप में उनकी उपयोगिता सिद्ध हो पाती है। इस प्रक्रिया में से गुजरे बिना उनका मूल्याँकन हो ही नहीं पाता। मिट्टी को गीली करके उससे जो बनाया जाय, वह कच्चा ही होता है। कुम्हार चाक पर घुमा कर उसको शक्ल तो दे सकता है, पर वह निर्माण कच्चा ही रहता है। ठोकर लगने पर टूट जाता है। पानी पड़ने पर गल जाता है। उसे यदि चिरस्थाई एवं सुदृढ़ बनाना हो, तो आवे की आग में पकाये बिना और कोई चारा नहीं। पकने वाले को इसमें असुविधा हो सकती है, पर उससे बच निकलने का और कोई विकल्प है नहीं। परिष्कृतता प्राप्त करने के लिए तपाने तपने के अतिरिक्त और किसी तरह समर्थता विनिर्मित होती नहीं।

तप का महात्म्य आचार्यजनों और आप्तजनों द्वारा विस्तारपूर्वक बताया गया है। तपस्वी ऋद्धि-सिद्धियाँ प्राप्त करते हैं, स्वर्ग और मुक्ति जैसी समुन्नत स्थिति में पहुँचते हैं। ऋषिकल्प मनस्वियों का सुसंस्कृत इतिहास इसी आधार पर विनिर्मित हुआ। वे उत्पन्न तो सामान्यजनों जैसी परिस्थितियों में ही हुए पर अपनी तप-साधना द्वारा धरती पर रह कर भी स्वर्ग लोक में निवास काने वाले देवमानवों जैसे बन गये, दिव्य सम्पदाओं, विभूतियों और शक्तियों के अधिष्ठाता बने। कह जाता है कि तप के बल पर ही ब्रह्मा, विष्णु महेश अपने सुविस्तृत दायित्व वहन करते रहने में समर्थ होते हैं। तपस्वी भगीरथ ने गंगा को धरती पर उतार कर दिखाने का श्रेय पाया था। दधीचि की अस्थियाँ इन्द्रवज्र जैसी शक्तिवान तभी सिद्ध हुई जब वे दीर्घकालीन तप-साधना कर चुके। तपस्विनी पार्वती ने शिव को वरण कर सकने जैसे कठिन कार्य में तभी सफलता पायी, जब वे कठोर तप की परीक्षा उत्तीर्ण कर चुकीं। ध्रुव, प्रहलाद की तपश्चर्या प्रसिद्ध है। सप्तऋषियों को वरिष्ठता इसी आधार पर मिली भी। अपने समय में भी महर्षि अरविंद, रमण, पौहारी बाबा आदि की साधनाओं द्वारा उत्पन्न हुए प्रतिफल का गंभीरता पूर्वक मूल्यांकन किया जाता है।

पानी को गरम करने से वह भाप बनता है और बादलों के रूप में बरसता है। वाष्पीकृत जल ही स्टीम इंजन चलाता है, प्रेशर कुकर के रूप में अपनी उपयोगिता दिखाता है। चिकित्सा के काम आने वाली बहुमूल्य रसायनें तभी बनती हैं, जब उनके अनेक अग्नि संस्कार होते हैं। तपाने, पकाने पर ही अनपढ़ खाद्य स्वादिष्ट व्यंजनों के रूप में परिणत होता है। सूर्य की ऊर्जा तप से उपजी हैं। प्राणियों और वनस्पतियों में प्राण संचार करने में समर्थ होती है घोर शीत के रहते तो जीवन का किसी रूप में उदय संभव नहीं हो पाता। सौर मण्डल के दूरवर्ती ग्रह-उपग्रह इसी कारण निर्जीव हैं कि उन तक सूर्यताप अभीष्ट मात्रा में पहुँच नहीं पाता।

मनुष्य जीवन पर तो यह बात शत प्रतिशत घटित होनी है कि तप-साधना अपना कर ही प्रगतिशीलता और वरिष्ठता का लाभ उपलब्ध होता है। शरीर का स्वाभाविक तापमान घटने पर .... आ दबोचती है। और मृत्यु आ धमकती हैं। ताप आवश्यक हैं। विषाणु उसी के प्रभाव से मरते हैं। धूप पाकर ही उद्यान में फूल खिलने और फलने लगते है।

उच्च उद्देश्यों के लिए किया गया पराक्रम या कष्ट सहज ही तप है। इसका प्रतिफल प्रत्येक महान प्रयोजन में नियोजित हुआ देखा जाता है। आलसी-प्रमादी किसी प्रकार मौत के दिन पूरे करते हैं, जबकि साहस के धनी पुरुषार्थ परायण अपनी प्रचण्ड लगन और पुरुषार्थ के आधार पर तेजी से आगे बढ़ते और तूफान की तरह ऊँचे उठते हैं।

प्रतिभा परिष्कार की उपयोगिता- आवश्यकता समझने वालों को इसके लिए सहमत किया जाना चाहिए कि वे किसी प्रकार ढर्रे का जीवन जीकर दिन गुजारते रहने की सरल प्रक्रिया अपनाये रहने तक संतुष्ट न रहेंगे, वरन् आदर्शों के परिपालन में तत्परता बरतने और कटिबद्ध होने के लिए अपनी संकल्प शक्ति का समग्र प्रयोग करेंगे।

संसार के इतिहास पर दृष्टिपात करने पर एक ही तथ्य उभर कर सामने आता है। कि जिनने आदर्शवाद की दिशा धारा अपनाने के लिए कठोरतापूर्वक आत्मानुशासन करता, जो अवांछनियताओं से डट कर जूझे, जिनने नवसृजन के लिए प्राणपण से प्रयत्न किये वे ही ऐसा श्रेय अर्जित कर सके जिसे अभिनन्दनीय या अनुकरणीय कहा जा सकें। महामानव बनने की बात इससे कम में बनती नहीं। जो इसके लिए कटिबद्ध प्रयत्नरत हैं, उसे और कुछ करने की आवश्यकता नहीं। तपश्चर्या का एक स्वरूप एकान्त साधना और कष्ट साध्य तितिक्षा का भी है, पर वह हर किसी के लिए अनिवार्य नहीं। सदुद्देश्यों के लिए प्रचंड पुरुषार्थ भी एक प्रकार का सर्वसुलभ तप है। उसे अपनाकर असंख्य लोक सेवी अपना और संसार का भला करने और हर दृष्टि से धन्य बनने में समर्थ हुए हैं। गान्धी विनोबा, विवेकानन्द, दयानन्द जैसों की तपश्चर्या सेवा संदर्भ से ही जुड़ी रही उनने अपने को इतना परिष्कृत किया कि उनका व्यक्तित्व दूसरों पर गहरी छाप छोड़ सके और अपनाये हुए कठिनाइयों से भरे मार्ग पर अनेकों को चला सकने में सफल हो सके। इसके अतिरिक्त उन्होंने लोक मंगल के लिए इतना सृजनात्मक प्रयास पुरुषार्थ किया कि उसका प्रभाव बहुमुखी अभ्युदय के रूप में सर्व साधारण के सामने प्रस्तुत हुआ।

आपत्ति काल में एकान्त साधना से भी बढ़कर सेवा साधना का महत्व बन जाता है। अग्निकाण्ड, भूकम्प, बाढ़ दुर्भिक्ष, महामारी आदि की विपत्तियों से जन समुदाय को बचाने के लिए जो भावना पूर्वक जुटते और उदार सेवा साधना का परिचय देते हैं, उन्हें आत्म संतोष भी मिलता है और लोक सम्मान भी। साथ ही दैवी अनुग्रह का प्रत्यक्ष रसास्वादन करने का अक्सर भी हाथों हाथ उपलब्ध होता है। तप साधना का भी अन्तिम लक्ष्य यही है। ऋषि ने देवदूत के प्रश्न का उत्तर देते हुए अपनी आन्तरिक आकाँक्षा इतने भर में व्यक्त कर दी कि उन्हें स्वर्ग नहीं चाहिए, न राज्य चाहिए न मुक्ति। मात्र इतनी इच्छा है कि दुख-दैन्य से घिरे हुए प्राणियों की व्यथा निवारण के कुछ काम आ सकूँ। वस्तुतः ऐसे ही देवात्मा बिना कन्दराओं के खोजे, जनसाधारण के बीच रहते हुए अपनी उदारता का परिचय देते हुए उसी पद को प्राप्त करते हैं जो तपस्वियों के लिए निश्चित है, निर्धारित है।

आत्म-परिष्कार और लोक-परिष्कार की संयुक्त साधना ऐसी है, जिस अपना कर काम काजी व्यक्ति भी सामान्य जनों जैसा गृहस्थ जीवन व्यतीत करते हुए भी अपने साथ अनेकानेकों की प्रतिभा परिष्कार कर सकने में सफल, समर्थ हो सकता है। यह युग संधि का आपत्ति काल है। इसमें अवांछनियताओं से जूझना आपत्ति धर्म है। साथ ही वातावरण को सुधार-परिष्कार की ऊर्जा से भर देना भी महत्वपूर्ण कार्य हैं। इन दिनों इस प्रक्रिया को प्रतिभा परिष्कार के लिए अपनाया जाना चाहिए।

भाव संवेदनाओं से भरा-पूरा भक्तियोग

मनुष्य में शारीरिक संरचना और बुद्धिकौशल भी बढ़ा चढ़ा है पर उसकी सर्वोपरि विशेषता जो अन्यान्य जीवों के पास नहीं है, मात्र उसकी ही विभूति है-भाव संवेदना। अपना सुख बाँट देने और दूसरों का दुख बटा लेने की प्रवृत्ति। सघन सहकारिता ओर उदार सेवा साधना मात्र उसी के हिस्से में आई है इसी कारण उसे ईश्वर का युवराज कहा जाता है। सृष्टि का मुकुटमणि भी।

बलिष्ठता और कुशलता की दृष्टि से अन्य जीव भी अपने-अपने स्तर की विशेषताएँ धारण किये हुए हैं। ह्वेल और हाथी जैसे विशालकाय, चीते जैसे धावक, गेंडे जैसे सुदृढ़, क्या और मकड़ी जैसे शिल्पी, कुत्ते जैसे घ्राण विकसित एवं अनेक स्तर की अतीन्द्रिय क्षमताओं से सम्पन्न अनेक प्राणी पाये जाते हैं। मनुष्य उनसे पीछे है। न व आकाश में पक्षियों की तरह उड़ सकता है और न पानी की गहराई में मछली की तरह निर्बाध रूप से रह सकता है। साँप जैसे बिना हाथ पैरों के सरपट दौड़ लगाना भी उसके वश में नहीं हैं। उतने पर भी उसने सहकारिता के आधार पर न केवल परिवार की, समाज की, शासन की व्यवस्था की है, वरन् विज्ञान, व्यवसाय, उत्पादन, कला कौशल के अनेक क्षेत्र भी विकसित किये हैं। यह सब तभी संभव हो सका, जब उसमें आत्मीयता की सद्भावना उभरी और उसी के सहारे सहकार, अनुदान का बहुविधि उत्कर्ष बन पड़ा। आदर्शों की स्थापना, उदात्त लोक मंगल के निमित्त बढ़ी चढ़ी योजना बनाने में भी उसकी भाव संवेदना ही सहायक हुई है।

वैयक्तिक जीवन में यदि किसी को आनन्द भरी उमंगों से अनुप्राणित देखा जाय तो समझना चाहिए कि उसके अन्तःकरण में भाव तरंगों की निर्झरिणी उमँगी है। इसी के कारण उल्लास का उद्भव होता है। और व्यक्ति उन कामों को करने के लिए उद्यत होता है जिन्हें मानवी गरिमा के अनुरूप कहा जाता है, जिनमें उत्कृष्ट आदर्शवादिता का असाधारण समावेश पाया जाता है।

दरबारी, चापलूस, चमचे, ठग, व्यभिचारी अक्सर मीठी बातें करते और व्यवहार में उदार, शिष्ट, मधुरता दिखाई देखे जाते है। अपराध क्षमा करने के लिए भी कई लोग मतलब निकालने वालों की ही तरह दीनता दर्शाते और हितैषी बनने का स्वाँग रचते देखे गये हैं। पर यह सब उनका छद्म, पाखंड भर होता हैं काम निकलते ही निगाह फेर लेते और तोता चश्मी का प्रत्यक्ष उदाहरण बनते देखे गये हैं। वास्तविक भाव संवेदना इससे अलग चीज है। इसके मूल में आत्मीयता का व्यापक विस्तार रहता है जो उदार आदर्शवादियों के साथ जुड़ा होता है। आत्मा सीमित होती है। वह जब व्यापक, विस्तृत क्षेत्र में अपनत्व को फैलाती है तो परमात्मा बन जाती है। परमात्मा के लिए सभी अपने हैं। वह व्यापक भी है और सर्व हितैषी भी। उसके अनुदान हर किसी पर बिना किसी बदले की आकाँक्षा के बरसते हैं। शरीर धारी व्यक्ति भी इसी परमात्म सत्ता को अपने अन्तराल में धारण करके उतना ही उदार और महान बन सकता है। पर यह संभव तभी है जब प्यार की उत्कृष्टता एवं असीमितता हो। प्यार में सेवा सहायता का सद्भाव इसलिए उमड़ता रहता है कि उसमें आत्मीयता का गहरा पुट लगता है अपनी हित कामना में अधिकाधिक ध्यान स्वार्थ सिद्धि पर रहता है। इस तथ्य को जब सुविस्तृत किया जाता है तो वह परमार्थ बन जाता हैं। चिंतन और प्रयत्न स्वार्थ सिद्धि के निमित्त होता है वह आत्म विस्तार की स्थिति में अन्यान्यों के लिए भी करना पड़ता है।

अपनत्व ही प्यार है। इसमें लोकाचार का निर्वाह या शिष्टाचार का प्रदर्शन आवश्यक नहीं। मनुहार करने या उपहार देने की भी आवश्यकता नहीं पड़ती। प्रदर्शन करने या आकर्षित करने के लिए जाल भी नहीं बिछाना पड़ता यह सब तो परायों को चुंगल में फँसाने के लिए करना पड़ता है। भय, आतंक, उत्पीड़न के आधार पर जिस प्रकार दुर्दान्तों को वशवर्ती किया जाता है उसी का दूसरा तरीका प्रेम प्रदर्शन भी है। उसमें भोले भावुक सहज फँस जाते हैं। चिड़ीमार, मछलीमार, सपेरे, इसी आधार पर शिकार पकड़ते हैं। भगवान को वशवर्ती बनाने और उनसे तरह-तरह की मनोकामनाएँ पूरी कराने के लिए पूजा परक कर्म–काण्डों का-स्तवन कीर्तन का आडम्बर रचा जाता है। पर यथार्थता के अभाव में वह पोल वाला ढोल दबाव की परीक्षा में कसौटी पर खरा नहीं उतर पाता। काठ की हाँडी बार-बार कहाँ चढ़ती है? कलई देर तक कहाँ टिकती है। मुखौटे देर तक लोगों को भ्रम में नहीं रख पाते। वस्तु स्थिति खुलकर रहती हैं।

अपनों के साथ अपनी वस्तुओं के साथ स्वाभाविक लगाव होना है। उन्हें सुरक्षित, समुन्नत, सुव्यवस्थित रखने के लिए सहज उत्कंठा रहती है। यहाँ सब तभी बन पड़ता है, जब आत्म भाव को विस्तृत करके उसकी लपेट में दूसरों को भी जकड़ लिया जाय। ऐसी दशा में सभी अपने लगते है, साथ ही प्यारे भी। उनका साज संभाल में मन रहता है। सुन्दर, सुविकसित, सुसज्जित, सुसंस्कृत बनाने के लिए भी जो करता है, वह भावना इतनी गहरी और प्रबल होती है कि बिना सेवा सहयोग किये काम चलता ही नहीं।

प्रिय पात्र के सान्निध्य में रस बरसता है। उसमें दोष नहीं गुण ही दीखते हैं। बिछुड़ने को जी नहीं करता। मन में उमंगें उठती है। कि सब कुछ उसी पर निछावर कर दें। भक्त और भगवान का विलय समर्पण इसी रूप में सुना समझा जाता है। किन्तु कठिनाई यह है कि परब्रह्म सर्वव्यापी होने से शक्याँ नियम रूप हैं। उसकी समीपता वैसी नहीं मिल सकती, जिस प्रकार कि मनुष्य अपने प्रियजनों के साथ गुँथते हैं। यह तो शरीरधारियों के साथ ही बन पड़ना संभव है। आत्मा परमात्मा का अंश होने के कारण प्रेयसी की तरह प्रेम से लबालब-सराबोर है। उसका अपना आपा जिस पर भी प्रतिबिंबित होता है, वही परम प्रिय लगने लगता है। पर जब यह आत्मीयता सीमित लोगों तक थोड़े पदार्थों तक परिसीमित होती है तो अन्य सभी वस्तुएँ उपेक्षित हो जाती हैं और नीरस लगने लगती हैं सदा सर्वदा आनंद उभरता रहें, इसका एक ही आधार है कि हर किसी को आत्म-स्वरूप माना जाय।

इसी मनःस्थिति को चरितार्थ करने के लिए लोकसेवा का व्रत लेना पड़ता है। वह लोक सेवा भी इच्छुकों की इच्छा पूर्ति के लिए नहीं वरन् उसे पवित्र, परिष्कृत प्रखर बनाने के लिए निश्चयपूर्वक नियोजित रहती है। यही है लोक मंगल की साधना। इसी को सत्प्रवृत्ति संवर्धन या जन मानस का परिष्कार कहते हैं। सेवा धर्म का यही केन्द्र बिन्दु हैं।

यथा अवसर विपत्ति ग्रस्तों की सहायता करना, संकटों से उबारना प्रगति में सहयोग करना भी उदारता का चिन्ह हैं और सराहनीय भी। पर न तो हर कोई इतना कर सकने में समर्थ होता है। और न विपत्तिग्रस्त ही हर समय, हर जगह हाथ पसारे खड़े होते हैं। इसलिए धन साध्य, दान शीलता यदा-कदा ही जब कभी बन पड़ती है किन्तु आत्म परिष्कार और सत्प्रवृत्ति संवर्धन की प्रक्रिया ऐसी है जिसे घर बाहर अपनों परायों से निरन्तर सम्बद्ध किया जा सकता है। जिनसे आत्मीयता का सुविस्तृत करने और उसे उत्कृष्टता के साथ जोड़ने का रहस्य समझ लिया समझाना चाहिए कि उसने भाव संवेदनाओं से भरा पूरा भक्तियोग सिद्ध कर लिया।


अनीति का साम्राज्य देर तक नहीं टिकता

परमब्रह्म निराकार है। उसकी शक्तियाँ अनन्त हैं। उसके व्यवस्था तंत्र में जहाँ पात्रता के अनुरूप अनुदान-वरदान मिलने, विभूतियाँ उपलब्ध होने, अनायास सहयोग मिलने का विधान है, वहीं यह भी सही है कि दुष्ट-दुराचारियों आततायियों को उनके कुकृत्यों के लिए भयंकर दण्ड व्यवस्था भी है। दूसरों के विनाश का तानाबाना बुनने वाले स्वयं बच नहीं पाते, प्रत्युत अधिक हानि ही हिस्से में आती हैं। इसका एक उदाहरण उस समय देखने को मिला जब एक वैज्ञानिक स्वयमेव तोप के गोले के साथ निकल कर अपनी पत्नी से टकराकर चकना चूर हो गया।

पश्चिमी योरोप के केलगाल प्राँत में सन् 1257 ई. में पाँस्थुमस नामक एक बागी सेनापति ने अपनी सैनिक टुकड़ी के माध्यम से भारी लुट पात मचायी। लुटेरे सैनिक स्वयं मालामाल हो गये और अपने सेनापति को रोम का राजा घोषित कर दिया। पर ‘पाँस्थुमस’ की दुर्गति होने में भी अधिक दिन नहीं लगे। सैनिकों की अपनी मनमानी चल ही रही थी। इसी बीच एक बार उनने जर्मनी के एक नगर भेज को लूटने की अनुमति माँगी। अनुमति न मिलने पर उनने सेनापति पाँस्थुमस को गोली से उड़ा दिया और स्वच्छंद होकर लूटपाट करते रहें। इनमें से अधिकाँश की मृत्यु भी द्वारका के यादवों की तरह आपसी लड़ाई में हुई। दैवी सत्ता अनीति के साम्राज्य को अधिक दिनों तक चलने नहीं देती।

उन दिनों रूस में साम्यवादी क्रान्ति चल रही थी। हर क्षेत्र में जागीरदारों, सामन्तों की शामत आयी हुई थी। सेंटपीटर्सवर्ग भी इससे अछूता नहीं बचा। तब वहाँ काउण्ट इवान नामक जागीरदार अपनी पत्नी अन्ना, दो बच्चे एवं एक बूढ़े नौकर के साथ जागीरदारी संभालता था। देखने में जमींदार दम्पत्ति तो बड़े भोले-भाले दिखते थे, पर थे बड़े क्रूर। उनने सैकड़ों व्यक्तियों को अपने क्रूरकृत्य का शिकार बनाया। जब करेलिया-सेंटपीटर्सवर्ग के लोगों में क्रांतिकारी चेतना उभरी तो उनने इवान के विरुद्ध आवाज उठानी शुरू की। भयभीत इवान घर छोड़कर भाग खड़ा हुआ और नेवा नदी के तटीय प्राँत में एक खाली पड़ी झोंपड़ी में शरण ली। इवान का बूढ़ा नौकर भोजन की तलाश में बाहर गया हुआ था। जब लौटा तो अपने मालिक और मालकिन को झोंपड़ी में अचेत पड़ा देखा और पास ही खड़ी थी एक भयंकर काली साया। उसने गरज कर कहा “मल्लाह तुम्हें डरने की आवश्यकता नहीं, किन्तु तुम्हारा स्वामी अब बच नहीं सकता। उसने सैंकड़ों निरपराधों की जानें ली हैं। उसके पाप का घड़ा अब भर चुका है। “इतना कह कर साया ओझल हो गई। एकाएक झोंपड़ी की दीवार गिरने से दोनों की नींद खुल गई तो देखा कि उन पर सील मछलियों ने आक्रमण कर दिया है। जान बचाने की लालख् में सभी नदी की तरफ भागे और किनारे पर बँधी नौका पर सवार होकर नहीं पार करने लगे। बीच धारा में अचानक न जाने आसमान में से कहाँ से लाल रंग की लोमड़ियाँ आ झपटीं। डर के मारे अन्ना नदी में कूद पड़ी और सील मछलियों ने उसका काम तमाम कर दिया। अभी नाव कुछ दूर ही आगे बढ़ी थी कि इवान के साथ भी इसी घटना की पुनरावृत्ति हुई और वह भी नदी में कूद कर अन्ना की गति को प्राप्त हुआ बूढ़ा मल्लाह और दोनों बच्चे बचे रहें जिन्हें उसने पाल पोस कर बड़ा भी किया।

यह सुनिश्चित है कि मनुष्य जैसा बोता है, वैसा ही काटता है। पर ब्रह्म की निराकार सत्ता के यहाँ कर्मों के लिए दण्ड की व्यवस्था है व उससे कोई बच नहीं सकता।


संत विरुवल्लुवर के अमृतवचन

अधर्म द्वारा एकत्र की हुई सम्पत्ति की अपेक्षा तो सदाचारी पुरुष की दरिद्रता कहीं अच्छी हैं।

जिन कामों में असफलता अवश्यम्भावी है, उसे संभव कर दिखना और बाधा विघ्नों से न डर कर अपने कर्तव्य पर अड़ते रहना प्रतिभाशालियों के लिये ये दो मुख्य पथप्रदर्शक सिद्धान्त हैं।

लोगों को रुलाकर जो सम्पत्ति इकट्ठी की जाती है, वह क्रन्दन ध्वनि के साथ ही विदा हो जाती है, मगर जो धर्म द्वारा संचित की जाती है, वह बीच में ही क्षीण हो जाने पर भी अन्त में खूब फलती फलती है।

धोखा देकर दगाबाजी के साथ धन जमा करना बस ऐसा ही है, जैसा कि मिट्टी के बने हुए कच्चे घड़े में पानी भर कर रखना।

अपना मन पवित्र रखो धर्म का समस्त सार बस इसी उपदेश में समाया हुआ है। दूसरी बातें और कुछ नहीं केवल शब्दाडम्बर मात्र हैं।

यह मत सोचो कि मैं धीरे, धीरे धर्म मार्ग का अवलम्बन लूँगा। बल्कि अभी बिना देर लगाये ही नेक काम करना शुरू कर दो।

जिस घर में स्नेह और प्रेम का निवास हे, जिसमें धर्म का साम्राज्य है, वह सम्पूर्णता सन्तुष्ट रहता है, उसके अब उद्देश्य सफल होते हैं।

गृहस्थ जो दूसरे लोगों को कर्तव्यपालन में सहायता देता है और स्वयं भी धार्मिक जीवन व्यतीत करता है, ऋषियों से भी अधिक पवित्र हैं।

सत्पुरुषों की वाणी ही वास्तव में सुस्निग्ध होती है, क्योंकि वह दयार्द्र कोमल और बनावट से रहित होती है।

औदार्य मन दान से भी बढ़कर सुन्दर गुण वाणी की मधुरता, दृष्टि की स्निग्धता तथा हृदय की स्नेहार्द्रता में है।

जो मनुष्य सदा ऐसी वाणी बोलता है कि जो सबक हृदयों को आह्लादित करदे, उसके पास दुःखों की अभिवृद्धि करने वाली दरिद्रता कभी न आयेगी।

भ्रमता और और स्नेहार्द्र वक्तृता केवल यही मनुष्य के आभूषण है और कोई नहीं।

यदि तुम्हारे विचार शुद्ध और पवित्र हैं, और तुम्हारी वाणी में सहृदयता है, तो तुम्हारी पाप वृत्ति का स्वयमेव क्षम हो जायगा।

सेवा भाव को प्रदर्शित करने वाला और शत्रु को भी मित्र बनाने वाला नम्र वचन ही है।

मीठे शब्दों के रहते हुए भी जो मनुष्य कड़ुवे शब्दों का प्रयोग करता है, वह मानों पक्के फल को छोड़कर कच्चा फल खाना पसन्द करता है

उपकार को भूल जाना नीचता है, लेकिन यदि कोई भलाई के बदले बुराई करे तो उसको तत्काल भुला देना शराफत की निशानी है।

आवश्यकता पड़ने पर जो सहायता की जाती है, वह देखने में छोटी अवश्य प्रतीत हो किन्तु वह ज्यादा वजनदार है।

जब तुम्हारा मन नेकी को छोड़कर बदी की ओर चलायमान होने लगे, तो समझ लो तुम्हारा सर्वनाश निकट है।

अगर तुम्हारे एक शब्द से भी किसी को पीड़ा पहुँचती है तो तुम अपनी सब नेकी नष्ट हुई समझो।

वेद भी अगर विस्मृत हो तो फिर याद कर लिये जा सकते हैं, मगर सदाचार से यदि एक बार भी मनुष्य नीचे गिर गया तो सदा के लिए अपने स्थान से भ्रष्ट हो जाता है

लक्ष्मी ईर्ष्या करने वाले के पास नहीं रह सकती। वह उसको बड़ी बहन दरिद्रता के हवाले कर चली जायेगी।


मानवी गरिमा के साथ जुड़ी दिव्य संवेदना,

जिन पदार्थों को निर्जीव या जड़ कहा जाता है उनमें भी हरकतें, हलचलें होती है। यह समूचा विश्व परमाणुओं से बना है। उनके नाभिक एवं इर्द गिर्द परिभ्रमण करने वाले घटक निरन्तर भ्रमणशील रहते हैं। इन्हीं इकाइयों का चित्र विचित्र समीकरण विभिन्न पदार्थों के रूप में परिलक्षित होता है। इनका स्वरूप भी स्थाई नहीं रहता वह बनता, बढ़ता परिपक्व एवं वयोवृद्ध होकर मरता बदलता रहता है। समस्त पदार्थों की यही गति नियति हैं।

ताप, प्रकाश एवं ध्वनितरंगें समूचे ब्रह्माण्ड में गतिशील हो रही है। अणु परमाणु उन्हीं के परिस्थितिजन्य संगठन हैं निर्मित पदार्थ स्थित तो दिखाई देते है, पर उनका निर्माण एवं परिवर्तन करने वाली तरंगीय एवं आणविक इकाइयाँ द्वुत वेग से गतिशील रहती हैं। इसलिए आंखों से जो कुछ स्थिर दीखता है तत्वतः यह सभी गतिशील एवं परिवर्तन रत है। क्रिया उन सब के साथ सघन रूप से जुड़ी हुई है।

स्रष्टा का एक भाग जड़ है। दूसरा सचेतन। सचेतन में जीव धारणा का समुदाय आता है। उनके शरीर में विचारणा काम करती है। वे पेट प्रजनन की व्यवस्था जुटाने के लिए सोचते हैं और साधन जुटाते रहते हैं। ऋतु प्रभाव एवं अन्य कठिनाइयों से बचने निपटने के लिए आत्मरक्षा हेतु संघर्ष भी करते हैं। उनकी विचारणा इसी छोटी सीमा तक सीमित है। मनुष्य अन्य प्राणियों की तुलना में अधिक विकसित है। अतएव उसका स्वार्थ चिन्तन भी विकसित है। उसे सरलता चाहिए और सुन्दरता, सम्पन्नता प्रशंसा भी अतएव उसका विचार क्षेत्र विस्तृत हो जाता हैं वह लोभ, मोह और अहंता के परिपोषण का भी प्रयास करता है। इसलिए उसके सोचने का कार्य क्षेत्र भी विस्तृत हो जाता है। उसकी व्यवस्था बुद्धि अनेक प्रकार के नीच-ऊँच सोचती है, मोड़ मरोड़ों से होकर गुजरती हैं। इसलिए उसे विचारशील ही नहीं बुद्धिमान भी माना जाता हैं।

उपरोक्त दोनों उपक्रम स्थूल एवं सूक्ष्म की परिधि में आते हैं। हलचलें एवं विचारणाएँ इन्हीं वर्गों में गिनी जाती हैं। इन्हीं का आधार अपनाकर जड़ चेतन की विविध गतिविधियाँ चल रही हैं। इससे आगे का उत्कृष्ट क्षेत्र भावनाओं का है-दिव्य भावनाओं का। जिसमें रागद्वेष नहीं वरन् ऐसी संवेदनाओं की गणना होती है जो दया, करुणा सेवा, पुण्य, परमार्थ, संयम, साहस जैसी सद्भावनाओं के साथ जुड़ती हैं। यह मानवी संवेदनाएं हैं जो स्वकीय सुख सुविधाओं पर अंकुश लगाती और दूसरों के प्रति उदार-आत्मीय भाव जगाती और दूसरों के प्रति उदार-आत्मीय भाव जगाती हैं। इसी संवेदना को आत्मीयता, उदारता एवं पुण्य प्रक्रिया के रूप में विकसित किया जाता है। यह मनुष्यता के साथ जुड़ी हुई दिव्य संवेदना है। इसका बाहुल्य तो नर देवों में भी होता है। माता और सन्तान के प्रति आरम्भिक दिनों में उभरता वात्सल्य अन्य प्राणियों में भी प्राणियों में भी यत्किंचित मात्रा में पाया जाता है। पालतू पशु भी मनुष्यों के साथ बहुत हद तक प्यार दुलार करते देख गये हैं।

तथाकथित देवताओं की मूल प्रकृति भी यही है। वे दयालु होते हैं जहाँ आवश्यकता समझते है, बादलों की तरह अनुदान वरदान बरसाते हैं। ऋषि मुनि, योगी, तपस्वी,भक्त, मनीषी अपनी साधनाओं को इसी निमित्त नियोजित करते हैं कि उनका लगाव क्रियाशीलता और कल्पना की प्रतिक्रिया से यथा सम्भव वितर होता चले। स्वार्थ की सीमा से उछलकर परमार्थ संवेदनाओं में वे प्रवेश कर सकें।

भक्ति भावना जब कभी भी, जहाँ कहीं भी उभरती है तो उसका प्रवाह सेवा सहायता के लिए मचलता है। पुण्य परमार्थ को चरितार्थ किये बिना चैन नहीं पड़ता। इसी मनःस्थिति को भक्ति या आत्मीयता कहते है। प्रेमप्रति भी यही हैं निराकार भगवान की भावानुभूति इसी रूप में होती है। देवताओं की रीति रीति भी यही हैं। सूर्य, चन्द्र पवन, बादल आदि को निरन्तर परमार्थ मैं संलग्न देखा जाता है। कारण शरीर भाव शरीर के क्षेत्र में प्रवेश करने उसे उभारने, उजागर करने में भी इसी परिपाटी को अपनाना पड़ता है। पति पत्नी परस्पर समर्पण योग की साधना करते हैं। माता का अजस्र वात्सल्य भी सन्तान पर इसी हेतु बरसता है। तत्वज्ञानी जब जीवन और महिमा पर विचार करते हैं तो उन्हें इसी में सार प्रतीत होता है कि द्वैत को अद्वैत में परिणत किया जाय। कामनाओं की भावनाओं में उलट दिया जाय मनुष्यों में उत्कृष्टता जिन्हें अर्पित की जाती है, वे पुरोहित और परिव्राजक अनने के पुण्य प्रयास में लगे होते हैं।

ब्रह्म परायणों में से जो गृहस्थ रहते थे वे पुरोहित का काम करते थे और जिन्हें विरक्त रहना बन पड़ता था वे परिव्राजकों की तरह परिभ्रमण करते आलोक वितरण का कार्य करते और जन मानस के परिष्कार में संलग्न रहते थे। औसत नागरिक की तरह निर्वाह करना, लोभ मोह के बंधन शिथिल रखना जिस किसी से बन पड़ता है समझना चाहिए कि उसने कारण शरीर को सशक्त बनाने की प्रक्रिया में उत्साहवर्धक सफलता प्राप्त की है।

कारण शरीर को देव शरीर भी कहते हैं। कारण कि पाँचों प्रसिद्ध देवताओं की दिव्य शक्तियों का उसमें समावेश रहता है। परमेश्वर को परम पुरुष कहा है और पाँच देव तत्वों का अधिष्ठाता कहा है। परमात्मा की उपासना का तात्पर्य है श्रद्धा, निष्ठा, प्रज्ञा की त्रिधा-सद्भावनाओं का संगम। इस समागम को जिसने अन्तरात्मा में धारण कर लिया समझना चाहिए कि उसने ब्राह्मी स्थिति उपलब्ध करली।

स्वर्ग-मुक्ति और ऋद्धि-सिद्धि का भण्डार परब्रह्म को माना जाता है। उसका अवतरण जब कभी जहाँ कहीं हुआ है उस स्थान को अन्तःकरण के उच्च स्तर एवं कारण शरीर के आधार बिन्दु के रूप में पाया गया हैं।

उपनिषदों में ईश्वर की परिभाषा “ रसो वै सः” रूप में की गई है। ईसा भी प्रेम परमेश्वर कहते थे। समस्त सत्प्रवृत्तियों एवं सद्भावनाओं का उद्गम केन्द्र कारण शरीर ही हैं उसी को परिष्कृत करने के लिए भक्ति भाव की साधना की जाती हैं।

उच्चस्तरीय प्रेम भक्ति में द्वैत को अद्वैत बनना बड़ता है। इस स्थिति को समर्पण योग भी कहते है। समर्पण में छोटी इकाइयों को बड़ी सत्ता में अपने को होमना, सौंपना पड़ता है। नाली नदी में मिलती है, नदी नाले में नहीं। आत्मा को अपनी संकीर्णता परमात्मा परमात्मा की महानता में विलीन करनी पड़ती है। निजी इच्छा, आकाँक्षाओं का परित्याग परमात्मा के अनुशासन में विलय करना होता है। ऐसी दशा में भक्त को दानी बनना पड़ता है, याचक नहीं। कामनापूर्ति के लिए परमात्मा को अपने सेवक की तरह आदेश देने की धृष्टता का दुस्साहस नहीं अपनाना होता। इसमें तो महान की महानता को ही आँच आती है। भक्त की भावना का स्तर गया गुजरा होकर याचक जैसा बन जाता है। यह अनुचित है, मानवी गरिमा के अयोग्य है। परमात्म की महानता छूने के लिए भक्त साधक को अपना अन्तःकरण उतना ही विशाल एवं उत्कृष्ट बनाना पड़ता है। स्वार्थ को परमार्थ में परिणत करना पड़ता हैं।


Quotation

स्पेन की एक कहावत है कि भगवान ने मनुष्य से कहा-”मैं तुम्हें सब कुछ दे सकता हूँ पर शर्त यह कि तुम्हें उसकी कीमत चुकानी होगी। हर प्रतिभावान व्यक्ति गुणों की कीमत पर ही सम्मान जनसहयोग खरीदता हैं।


व्यक्तित्व परिष्कार में मंत्र शक्ति का योगदान

सृष्टि का कारण भूत तत्व “ओंकार”शब्द को बताया गया है। सूक्ष्म जगत में नाद-ब्रह्म के रूप में इसी की प्रधानता है, जब कि दृश्य जगत के क्रिया-कलाप स्थूल शब्द पर आधारित हैं। ‘ओऽम्’ वह कर्णातीत ध्वनि हैं, जिसे सूना नहीं जा सकता है, परन्तु अनुभव किया जा सकता है। आध्यात्म शास्त्रों में इसे ब्रह्म वाचक बताया गया है। नादानुसंधान में साधक इसी एक में. का आश्रम लेते हैं। यही प्रकृति-पुरुष का आदि समागम भी है और उसी उपक्रम में निरन्तर चलते रहने से सृष्टि क्रम चलता रहता है। गायत्री महामंत्र का बीज भी यही है। ‘ॐ’ से तीन व्याहृतियां उत्पन्न हुई। प्रत्येक से तीन-तीन शब्द प्रस्फुटित हुए जैसे कि बीच से अंकुर, पौधा और पत्तों फूल फलों से विकसित हुआ वृक्ष दृष्टिगोचर होता है। गायत्री को वृक्ष और “ॐ” को उसका बीच कहा जा सकता है। गायत्री के 24 अक्षरों के मंत्रोच्चारण से काय कलेवर के अन्तराल में विद्यमान 24 शक्ति केन्द्रों का जागरण होता है और उस आधार पर अनेक ऋद्धि-सिद्धियों का विभूतियों का वैभव हस्तगत होता हैं। यही समूचा लाभ प्रकारान्तर से अकेले “ओंकार’ मंत्र के जप से भी हस्तगत हो सकता है।

मंत्रोच्चार की नियमित प्रक्रिया दुहरी प्रतिक्रिया उत्पन्न करती है। एक अभ्याँतरिक दूसरी वाह्य। इससे उत्पन्न इन्फ्रासोनिक स्तर का ध्वनि प्रवाह जहाँ शरीर में स्थित सूक्ष्म चक्रों में शक्ति संचार करता है वहीं दूसरी ओर इन ध्वनि प्रकंपनों से वातावरण में एक विशेष प्रकार का स्पंदन उत्पन्न होता है। एक संदर्भ में भौतिक वैज्ञानिकों ने भी गहन खोजें की है। और प्राचीन मंत्र विद्या की सत्यता को सही सिद्ध कर दिखाया हैं।

मंत्र विज्ञान पर अनुसंधानरत वैज्ञानिकों ने पाया है कि मंत्रोच्चारण के पश्चात् उसकी आवृत्तियों से उठने वाली ध्वनि तरंगें पृथ्वी के आयन मंडल को घेरे विशाल भू चुम्बकीय प्रवाह शूमेन्स रेजोनेन्स से टकराती और परावर्तित होकर सम्पूर्ण पृथ्वी के वायुमंडल में छा जाती हैं। इन्फ्रासोनिक स्तर की यह मंत्र ध्वनियाँ जीव-जन्तुओं पेड़ पादपों सभी पर समान रूप से प्रभाव डालती हैं। प्रयोग परीक्षणों के दौरान पाया गया है कि सामूहिक अनुष्ठानों में समवेत स्वर में बोले गये मंत्र शूमेन्स रेजोनेन्स के अंतर्गत वैसी ही गति उत्पन्न करते हैं, जो ध्यानावस्था की गहराई में पहुँचने वाले साधक के मस्तिष्क के ‘अल्फा स्टेट’ की होती है। शातव्य है कि 7 से 13 चक्र प्रति सेकेंड की दर से निकलने वाली अल्फाब्रेन वेव्स का व्यक्ति के शरीर और मन पर अनुकूल एवं उत्साह-वर्धक प्रभाव पड़ता है। इससे उसे प्रसन्नता-प्रफुल्लता एवं तनाव शैथिल्य का अनुभव होता है और अधिक गहराई में प्रवेश करने पर समाधि सुख जैसा लाभ हस्तगत होता है। भूचुम्बकीय प्रवाह से टकराने के बाद मंत्र की यह अल्फा तरंगें समस्त बायोस्फियर में संचारित होकर अपनी प्रकृति के अनुरूप प्रभाव-परिमाण उत्पन्न करती हैं। ज्यूरिच की सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक डा. हैन्स जैनी ने मंत्र विज्ञान की क्षमता को ....खने के लिए “टोनोस्कोप”नामक एवं विशेष यंत्र बनाया है। उसमें जब कुछ बोला जाता है अथवा किसी प्रकार की ध्वनि छोड़ी जाती है, जो वह पर्दे पर आकृति के रूप में उभर आती है। एक प्रयोग में उन्होंने पाया कि जब इस उपकरण में “ओंकार” मंत्र का उच्चारण किया जाता है तो पर्दे पर इसका एक विशिष्ट रेखागणितीय रूप प्रकट होता है, जबकि बलवान के दूसरे शब्दों के साथ इस प्रकार की कोई नियमित और व्यवस्थित आकृति नहीं उभरती। इस बात पर वे आश्चर्य व्यक्त करते हुए कहती हैं। कि पूर्वार्त्त देशों के मनीषी ऋषियों खोजे की थीं। उनका कहना है कि विज्ञान में शब्दों का गुँथन एक विशिष्ट क्रम से होता है, अतः ‘टोनोस्कोप’ में उनका आकार भी नियमित प्रकट होता है।

जैनी का उक्त प्रयोग मंत्र विज्ञान के उस रहस्य को उद्घाटित करता है जिसमें कहा गया है कि प्रत्येक मंत्र में अदृश्य शक्तियाँ एवं इच्छाशक्ति की प्रखरता के साथ जप करने पर प्रकट होती है विख्यात थियोसोफिस्ट लेटवीटर, एनी वेसेन्ट, मैडम ब्लैक्टस् की आदि मनीषियों ने भी अपनी-अपनी रचनाओं में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया है कि ‘मंत्र’ वर्णों के साधारण संग्रह से पूर्णतः भिन्न एवं शक्ति जागरण के स्त्रोत हैं। इस सम्बन्ध में सर जॉन वुडरफ ने अपने प्रसिद्ध ग्रंथ “गारलैण्ड आफ लेटर्स” में लिखा है कि मंत्रों की विशिष्ट संरचना के मूल में गुह्य अर्थ एवं शक्ति होती है जो अभ्यास कर्ता को दिव्यशक्तियों का पुँज बना देती है।

अध्यात्म साधनाओं में नादयोग के रूप में मंत्रों में सन्निहित पराध्वनियों का उपयोग आत्मिक विकास के लिए प्रयुक्त करने की व्यवस्था है, पर विज्ञान ने इनका उपयोग विभिन्न प्रकार के शारीरिक मानसिक रोगों के उपचार में प्रयुक्त करने की विधा विकसित की है।

“न्यू इंग्लैण्ड जनरल आफ मेडिसिन” पत्रिका में प्रकाशित “योग फार ड्रग एब्यूज” नामक लेख के अंतर्गत डा. एचत्र बेन्सन ने मन्त्र जप और ध्यान से नशेबाजी जैसी बुरी आदतें छुड़ाने सम्बन्धी प्रयोगों का उल्लेख किया हैं। उनके अनुसार 29 से 37 वर्ष की अवस्था वाले 20 व्यक्तियों को कई माह तक नियमित रूप से मंत्र जप कराया गया। उनमें से 91 व्यक्ति, स्मेक, एल.एस.डी. हेरोइन जैसी तीव्र नशीली औषधियों का सेवन करते थे, मन्त्र जप और ध्यान के निरन्तर अभ्यास से उनकी लतें छूट गईं। इसके बाद उन्हें इनकी आवश्यकता भी महसूस नहीं हुई। इन सभी व्यक्तियों में उन नशीली औषधियों का प्रयोग पूर्णतया बन्दकर दिया जिनके बिना पहले उन्हें चैन नहीं पड़ता था।

श्रद्धाभावयुक्त शुद्ध लयबद्ध मंत्रोच्चार करने एवं उसे बार-बार दुहराते रहने से उसकी आवृत्तियों से उठने वाली अतिसूक्ष्म ध्वनि तरंगों का एक गति तंत्र बन जाता है जो अभ्यासकर्ता के शरीर तंत्र विचार तंत्र एवं भावना तंत्र को प्रभावित-रूपांतरित करता है। वैज्ञानिक खोजों और प्रयोगों ने भी यह सिद्ध कर दिया है कि ‘ॐ’ के क्रमबद्ध एवं लयबद्ध बार-बार सम्यक उच्चारण से मस्तिष्कीय विकारों का शमन होता है। स्नायु स्वस्थ और सशक्त बनते हैं। रक्तचाप संतुलित होता है। मंत्रों का उच्चारण जितनी बार किया जाता है, हृदय की सक्रियता सशक्तता बढ़ती जाती है और रक्ताभिसरण में तीव्रता आ जाती है। इससे रक्त शुद्ध होने की प्रक्रिया भी बढ़ जाती है और हृदय धमनियों को आराम मिलता हैं। इससे जहाँ जीवनीशक्ति प्रखर बनती है। वहीं ओजस्-तेजस् की भी अभिवृद्धि होती है।

भारतीय अध्यात्म प्रयोजनों में विभिन्न प्रकार के तंत्र मंत्रों का अनुष्ठान पुरातनकाल से ही प्रचलित रहा है। मंत्रशक्ति से आत्मसत्ता का परमात्म सत्ता से घनिष्ट सम्बन्ध जोड़ने और व्यक्तित्व निर्माण की प्रक्रियाएँ पूर्ण की जाती रही हैं। अब वैज्ञानिक खोजों और प्रयोगों ने भी उसकी असंदिग्ध प्रभावशीलता पर मुहर लगा दी है। लंदन में ‘यूटा कालेज आफ मेडिसिन’ तथा न्यूयार्क में ‘येशीवा विद्यालय’ के अलबर्ट आइन्स्टीन कालेज ऑफ मेडीसिन’ में मंत्र ध्वनियों द्वारा शारीरिक मानसिक रोगों के उपचार के निमित्त लगातार अनुसंधान प्रयोग किये जा रहें है। एक ऐसा ही अभिनव प्रयोग शान्तिकुँज के ब्रह्मवर्चस अनुसंधान केन्द्र में मंत्र शक्ति पर चल रहा है और उसके उत्साहवर्धक सत्यपरिणाम भी सामने आये हैं।


आ रहा है अध्यात्म प्रधान युग।

मनुष्य कैसा था? क्या बन गया? और क्या बनने जा रहा है? इन प्रश्नों का उत्तर पाने के लिए चिरकाल से ऊहापोह चल रही है। स्वर्ग से आदम हव्वा धरती पर धकेल दिए गए और उन्होंने यहाँ आकर जो सन्तानें उत्पन्न की वे मनुष्य बन गई। ब्रह्मा ने सृष्टि उत्पन्न की और उसी समय श्रेष्ठ प्राणी के रूप में मनुष्य को सृजा। इन आख्यानों से मानवी बुद्धि सन्तुष्ट नहीं होती। खोज बीन करने वाला वैज्ञानिक मन इस संदर्भ में तर्क व प्रमाणों को आधार मान कर खोजें करता रहा है।

मानवीय विकास के कालक्रम के अनुरूप उसकी सभ्यता का स्वरूप देखने पर स्पष्ट होता है कि प्रारम्भिक स्तर में मानव शरीर की दृष्टि से तो विशालकाय था पर कल्पना व विचारणा की दृष्टि से मन्द था। इस समय प्रधानता भी शरीर बल की थी। परिवर्धित प्राण सुपुष्ट शरीर ही विकसित होने की पहचान थी। पी.बिर मैन “मोर आँन ह्यूमन इवाल्यूशन” में कहते हैं। कि इस काल में शारीरिक वीरता ही सर्वश्रेष्ठ गुण था। आवश्यकता भी इसी की थी। मनुष्य को शरीर बल के सहारे ही सिंह व्याघ्र तथा अन्य इन्हीं जैसे हिंसक प्राणियों से लड़ना। एम. स्टैनफार्ड ने “लिग्विस्टिक एन एना लिटिकल अप्रोच” में वरच्यू शब्द की उत्पत्ति “विर” से बताई है जो संस्कृत के वीर शब्द से बना है। इसके विश्लेषण में उनका कहना है सभ्यता के उदय काल में वीरता का स्थान सर्वोपरि था। शरीरबल की ही प्रधानता हैं। प्रतिभा पुरुषार्थ का यही अकेला क्षेत्र था।

इसके बाद मानसिक संकल्पा व भावना का उदय हुआ। प्रकृति का सिद्धान्त है जिस तत्व की उपयोगिता समझी जाएगी आवश्यकता अनुभव की जाएगी और प्रयोग में लाई जाएगी वह बढ़ेगी और प्रयोग में लाई जाएगी वह बढ़ेगी, मजबूत होगी। मनुष्य के सम्बन्ध में यही हुआ। मनुष्य के सम्बन्ध में यही हुआ। शारीरिक बल को गौण चिन्तन को श्रेष्ठ माना जाने लगा। भावनाएँ उदय हुई। परिवार व्यवस्था पनपी, समाज सुसंगठित हुआ। इसी समय प्रथम काव्य मुखरित हुआ वेदों की ऋचाएँ गूंजी। यह था धरती का प्रथम सतयुग, अथवा यों कहें भावनामय युग। आत्मीयता इसी युग में पहले पहल पनपी। समाज को सुव्यवस्थित रखने के लिए शासन व्यवस्था सृजी गई। कर्तव्य कर्म की मीमाँसाएँ हुई। स्मृतियाँ प्रकाश में आयीं।

के.एन.राघवन ने “इण्डियन कल्चर एजेंस” में इसी मत का प्रतिपादन किया है। मन का विकास होने पर शरीर कहीं चला गया हो ऐसा नहीं, उसका अस्तित्व बरकरार रहा पर आवश्यकतानुरूप। एक चीज अवश्य घटित हुई शरीर को मन का अनुगामी बनना पड़ा पहले जहाँ शारीरिक शक्तियों का ही गुणगान होता था अब मानसिक शक्तियों का वर्चस्व स्वीकारा गया। सुव्यवस्था आत्मीयता व भावना से ओत-प्रोत वातावरण की दृष्टि से उस सतयुग को अभी भी सराहा जाता है।

इस विकास के आयाम में एक नया आयाम आया-बौद्धिक विकास का इस काल में तरह तरह के अन्वेषण हुए। सभ्यता ने नया रूप लिया। काव्य के स्थान पर विज्ञान प्रकाश में आया। भावना के स्थान पर बुद्धि का वर्चस्व हुआ। पुरानी मान्यताएँ टूटीं, नए आधार गढ़े गए। ऐसा लगने लगा कि पुराना सतयुग ढह गया। कुछ ने इसे घोर अनर्थ कहा अब क्या होगा? बुद्धि अपने रंग बिरंगे रूपों में सामने आयी। भावना-मय युग की मान्यताएँ एक-एक करके अस्वीकृत होने लगीं यही है वह काल जिसे हम वर्तमान कह सकते हैं और जिसमें हम जी रहे हैं।

आज की स्थिति भले हमें कष्ट प्रद लगे, दयनीय प्रतीत हो। पर वास्तविकता कुछ और है जिन्हें पहले के दिव्यदर्शी ऋषियों ने जिन्होंने मानवीय चेतना के आयामों को जाना था उल्लेख किया है। भगवान कृष्ण गीता में स्पष्ट करते है “मनसस्तु परा बुद्धे” अर्थात् मनके बाद बुद्धि। तो यह समय भी अपने विकास का अनिवार्य चरण है, इसे आना ही था। किन्तु यह अन्तिम नहीं है। यह तो केवल बीच की एक कड़ी भर है।

अब प्रश्न यह बचता है कि क्या बनने जा रहा है मनुष्य? इसका उत्तर बहुत आसान है। गीता की भाषा में कहे-बुद्धे परवस्तु सः अर्थात् बौद्धिक सभ्यता के बाद आध्यात्मिक सभ्यता। यह आध्यात्मिक सभ्यता शब्द बिलकुल नवीन है। पिछले सतयुग में अथवा वर्तमान तक व्यक्ति आध्यात्मिक हुआ करते थे। सभ्यता अध्यात्मिक हुई हो, ऐसा कभी सुना नहीं गया और सुना नहीं जा सकता था। शारीरिक प्राणिक युग में कोई अध्यात्म का नाम क नहीं जानता था। भावनामय युग अथवा सतयुग में व्यक्ति आध्यात्मिक हुए। व्यक्ति को आध्यात्मिक बनाने के लिए तरह तरह की प्रणालियाँ खोजी गई। जिनका अवलम्बन करके व्यक्ति आध्यात्मिक हो सकता था। पर पूरा समाज आध्यात्मिक हो यह अभी तक के मानव के लिए नयी बात है पर है सत्य।

श्री अरविंद “लाइफ डिवाइन” में भावी युग अथवा अध्यात्म युग का वर्णन करते हुए कहते हैं। कि यह सतयुग पिछले से मिला होगा। इन्हीं मनुष्यों में से एक जीवन प्रजाति जन्म लेगी। एक ऐसी प्रजाति जो अभी से पूर्णतया भिन्न होगी। यह भिन्नता शक्ल सूरत की दृष्टि से नहीं अपितु आचार व्यवहार सामाजिक संरचना की दृष्टि से होगी। फिर मनुष्य की बुद्धि, मन व शरीर का क्या होगा? इस प्रश्न के उत्तर में वह कहते हैं कि ऐसा नहीं होगा कि मनुष्य इन सबसे विहीन हो पिछले युगों में भी ऐ नहीं हुआ।

मन का विकास होने पर शरीर लुप्त नहीं हुआ। वरन् उसे भनक, अनुगामी बनना पड़ा। बुद्धि के विकास पर मानव शरीर लुप्त नहीं हुए। पर उनकी क्रिया विधि में व्यापक फेर बदल हुई। इस स्थिति में बरबस बुद्धि आज्ञाकारिता स्वीकारनी पड़ी। मन व शरीर दोनों बुद्धि के सेवक हो गए। अब बारी बुद्धि के सेवक बनने की है। उसे आत्मा का सेवक बनना होगा। मन व शरीर भी इसी का अनुगमन करेंगे। दूसरे शब्दों में इसे यह भी कह सकते हैं कि समूची मानवी सत्ता आत्मा की अनुगामिनी बनेगी। यह स्थिति किसी अकेले व्यक्ति की नहीं वरन् पूरे समाज की होगी।

डाँ. राधाकृष्णन “आइडियालिस्टिक व्यू आफ लाइफ” में कहते हैं कि “अध्यात्म के सम्बन्ध में लोगों की मान्यताएँ भ्रमात्मक हैं। वस्तुतः अध्यात्म कोई अजूबा न होकर एक जीवन दृष्टि है। जिसके अनुसार जीवन जीने का अर्थ है सबमें अपनत्व। भावी युग में मानवीय जीवन का व्यवहार केन्द्र बिन्दु यही रहेगा। सहयोग-सहकार, प्रेम-स्नेह सहृदयता के रूप में मानसिक गुण बुद्धि के गुणों में विवेक, परिष्कृत विचारणा,परख चिन्तनशीलता किसी व्यक्ति तक सीमित न रह कर समूचे समाज सारी सभ्यता को आप्लावित कर लेंगे। उन्हीं को स्वाभाविक मानकर जीना पड़ेगा। यद्यपि प्रवाह से कोई बचेगा नहीं। किन्तु बच निकलने की कोशिश वाले उसी तरह पिछड़ गया। भावी युग के मनुष्य की तुलना में अजा का अनगढ़ मानव कुछ इसी प्रकार का होगा।

इस आध्यात्मिक सभ्यता का प्रसव काल पूरा होने को है। अच्छा यही है कि हम भी भावी युग के अनुरूप गुणों को अपने में तेती से विकसित करें ताकि हमें पिछड़ना व चिरकाल के लिए पछताना न पड़े।


ज्योति अवतरण की उच्चस्तरीय साधना

आध्यात्म साधना विधानों में प्रकाश का महत्वपूर्ण स्थान है। इसको माध्यम बनाकर आन्तरिक प्रकाश को जाग्रत किया जाता है। जिस प्रकार नव ग्रहों और उपग्रहों का केन्द्र सूर्य है। पृथ्वी का केन्द्र ध्रुव प्रदेश हैं। परमाणु का शक्ति केन्द्र ध्रुव प्रदेश है। परमाणु का शक्ति केन्द्र उसका मध्यवर्ती केन्द्र-’न्यूक्लियस’ कहलाता है। उसी प्रकार मस्तिष्क मानवी चेतना का केन्द्र है और उसका मध्य बिन्दु आशा चक्र कहलाता है। उसे जीवन दुर्ग का प्रवेश द्वार कह सकते हैं। प्रकाश ज्योति की त्राटक साधना से इसका उन्मीलन संभव होता है।

योगशास्त्रों में आज्ञा चक्र को दिव्य नेत्र एवं पौराणिक अलंकारिक चिरण किया गया है। इसे ही ‘दिव्य दृष्टि’ का केन्द्र माना जाता है। महाभारत के सारे दृश्य संजय ने इसी माध्यम से देखे और धृतराष्ट्र का सुनाये थे। कृष्ण के विराट स्वरूप को अर्जुन ने एवं राम के स्वरूप को कौशल्या ने इसी प्रकार दृष्टि से देखा था। इसकी शक्ति कितनी विशिष्ट होती है, इसका पुरातन विवरण शंकर जी द्वारा कामदेव को जला दिये जाने के रूप में मिलता है प्रकाश पुँज की ध्यान-धारणा इसे ‘लेसर स्तर’ की बना देती है। इस ऊर्जा पुँज के सहारे ऐसा कुछ भी किया जा सकता है जिससे दिव्य दर्शन के अतिरिक्त शाप-वरदान का उद्देश्य भी पूरा हो सके। शक्तिपात में सम्मोहन में उस नेत्र शक्ति का ही प्रयोग किया जाता है जो पहले से ही तृतीय नेत्र के भंडार में भर ली गई होती है। इस शक्ति से उत्पन्न हुई दिव्य दृष्टि अनेकों का अनेक प्रकार से भला भी कर सकती हैं।

तृतीय नेत्र का स्थान दोनों भृकुटियों के मध्य में है। इसकी दिव्य क्षमता को जाग्रत करने की साधना साधारणतया त्राटक के आधार पर की जाती है। प्रत्यक्ष प्रकाशमान वस्तु को देखकर उसका स्वरूप नेत्रों में बन्द करके चिन्तन करते रहने की विधा को त्राटक साधना कहा गया है। इससे चर्म चक्षुओं में आत्म तेज का आविर्भाव होता है और दृष्टिकोण के परिमार्जन का क्रम चल पड़ता है। योगाभ्यास परक साधना क्रम में इससे मनकी एकाग्रता सधती है और अभ्यास क्रम में बढ़ते हरने पर वह अतंतः समाधि स्थिति तक साधक को पहुँचा देती है।

त्राटक-विधियाँ अनेक प्रकार की हैं। मैस्मरेज्म के अभ्यासी सफेद कागज पर काला गोला बनाते हैं। उसके मध्य में श्वेत बिन्दु रहने देते हैं। इस पर नेत्र दृष्टि और मानसिक एकाग्रता को केन्द्रित किया जाता है। अष्टधातु के बने तश्तरीनुमा पतरे के मध्य में ताँबे की कील लगाकर उस मध्य बिन्दु को एकाग्र भाव से देखते रहने का भी वैसा ही लाभ बताया जाता है। पर सम्मोहन का लक्ष्य एकाग्रता सम्पादन तथा बेधक दृष्टि प्राप्ति के भौतिक प्रयोजन तक ही सीमित है। इसलिए इस अभ्यास से वह लाभ नहीं मिल पाता जो त्राटक के बताये गये हैं।

भारतीय योगशास्त्रों के अनुसार त्राटक के अभ्यास में चमकते प्रकाश को उपयुक्त माना गया है। सूर्य, चन्द्रमा, तारे अथवा दीपक के प्रकाश साधनों को काम में लाने का विधान है। बाह्य एवं प्रत्यक्ष त्राटक के लिए दीपक, मोमबत्ती, बल्ब आदि की आवश्यकता पड़ती है। जबकि अन्तः त्राटक में इन उपकरणों की आवश्यकता नहीं पड़ती। उसमें प्रकाश ज्योति का मानसिक एवं भावनात्मक ध्यान करने से ही काम चल जाता है।

अंतःत्राटक प्रकाश ज्योति पर ही किया जाता है। उसके आरंभिक चरण में कुछ क्षण तक बाह्य त्राटक कर फिर उसी का ध्यान करते हैं। प्रातः कालीन उदीयमान सूर्य जब तक स्वर्णिम रहे, तब तक कुछ-कुछ सेकेंड के लिए उसका प्रत्यक्ष आँखों से दर्शन और फिर नेत्र बन्द करके उसका ध्यान करने से अंतःलोक की भूमिका बन जाती है। यही कार्य पूर्णिमा का चन्द्रमा देखने और आँखें बन्द करने से भी हो सकता है उस समय अन्य तारकों की ओर ध्यान न जाये। शुक्र, गुरु जैसा किसी प्रकाशवान तारे का इस प्रयोजन के लिए प्रयुक्त किया जा सकता है।

अन्तःत्राटक प्रारंभ करते हुए कुछ समय ध्येय प्रकाश की स्थिति वहीं रखनी पड़ती है, जहाँ उसे देखा गया था। प्रभात कालीन स्वर्णिम सविता को सुदूर पूर्व में उगते हुए जहाँ देखा गया, आरंभिक दिनों उसे वहीं सूक्ष्म दृष्टि से देखना होता है और भावना की जाती है कि प्रकाश पुँज की ज्योति किरणें अन्तरिक्ष में होकर उतरती हैं और अपनी उत्कृष्टता को स्थूल शरीर में बल, सूक्ष्म शरीर में ज्ञान एवं कारण शरीर में भाव बन कर प्रवेश करती हैं। परिणामतः शरीर संयमी, सक्रिय स्वच्छ बनता है, मन में उसी प्रकार की किरणों संतुलन विवेक शालीनता, सद्ज्ञान बनकर बरसती हैं। कारण शरीर में अन्तःकरण में सद्भावना और श्रद्धाभक्ति के रूप में वे प्रकाश किरणें अवतरित होती हैं। इस प्रकार समूचा व्यक्तित्व दिव्य ज्योति से जगमग हो उठता हैं।

बाह्य–त्राटक के लिए खुली आँखों से अभ्यास करना होता है। पर अन्तः त्राटक के लिए ध्यान मुद्रा है। भगवान बुद्ध के चित्रों में प्रायः यही स्थिति चित्रित की जाती है। इस स्थिति प्रकाश पुँज की अवधारणा और अधिक प्रगाढ़ भाव से की जाती है। बिजली के बल्ब का मध्यवर्ती फिलामेण्ट जिस प्रकार चमकता है और उसकी रोशनी बल्ब के भीतर भाग में भरी हुई गैस में प्रतिविम्बित होती है, उससे बल्ब का पूरा गोला चमकने लगता है और उसका प्रकाश बाहर भी फैलता है। ठीक यही भावना अन्तःत्राटक का यह प्रथम चरण है। बाहर से भीतर की ओर ज्योति का प्रवेश करने की प्रक्रिया प्रथम भूमाक कहलाती है। क्रमिक विकास में इसी प्रक्रिया के विस्तार की सुविधा रहती है। यह स्थिति अधिक परिपक्व-परिपुष्ट हो चलने पर प्रकाश की स्थापना भीतर की जाती है और उस आत्म ज्योति की-ब्रह्म ज्योति की आँच भीतर से निकलकर बाहर की ओर फैलती अनुभव होती है। बल्ब फिलामेण्ट भीतर तो ज्योतिर्मय होता ही है अपनी आभा से संपर्क क्षेत्र को भी प्रकाशवान बना देता है। आँतरिक ज्योति के प्रकटीकरण में भी ऐसी ही स्थिति बनती है। अन्तःत्राटक का साध आत्मसत्ता को प्रकाश से परिपूर्ण तो देखता ही है, साथ ही अपने प्रभाव क्षेत्र में भी आलोक बिखेरता है।

अन्तः त्राटक उच्च भूमिका में प्रकाश ज्योति को आज्ञा चक्र केन्द्र में स्थापित करते है। इससे भी आगे यह आभा हृदय केन्द्र में ले जाई जाती है। इस उच्च भूमिका में श्रद्धा प्राण रहती है और ध्येय ज्योति की सविता की चेतना द्युति के रूप में अनुभव किया जाता है। शास्त्रों में इसे ही- “हृत्पुण्डरीक मध्यस्थाँ प्रातः सूर्य सम प्रभाम्” अर्थात् हृदय कमल के मध्य में प्रातःकालीन सूर्य की प्रभा सदृश निर्दिष्ट कर वर्णन किया गया है। यही हृदय रूपी कमल में उल्लासित सविता की ज्योति है। अध्यात्म साधकों द्वारा बाह्य एवं अंतः त्राटक की साधना इसी परम ज्योति के दर्शन कर जीवन लक्ष्य प्राप्त करने के लिए की जाती है। साधक और सविता को एक बना देने का लक्ष्य अन्तःत्राटक द्वारा ही पूर्ण होता है। दिव्य दृष्टि इसी से खुलती और ज्योतिर्मय बनती है। प्रतिभा उन्नयन का आधार भी यही हे।


अध्यात्म यथार्थवादी है, विज्ञान सम्मत भी

चेतन पक्ष को सुनियोजित सुसंस्कृत बनाने की विधा आध्यात्म नाम से जानी जाती है। इसमें वह अनुशासन भी जुड़ा हुआ हैं जिसे संयम या आत्मानुशासन नाम से जाना जाता है। यह न बनने पर जो शेष रह जाता है। उसे आडम्बर या कलेवर ही कह सकते है। रामलीला आयोजन में बड़े आकार के रावण कुम्भकरण आदि खड़े किये जाते हैं। उनमें कौतूहल भर होता है। अधिक से अधिक उन दैत्यों के सम्बन्ध में कुछ जानकारी मिलती है। पर यह नहीं होता कि वे पुतले अपने कलेवर के अनुरूप कुछ कृत्य पराक्रम पुरुषार्थ करके दिखा सकें। यही बात अध्यात्म के सम्बन्ध में भी है। आम तौर से लोग उसके कलेवर भर का वर्णन करने में रुचि लेते है। उसकी मर्यादाओं को जीवन में उतारने का प्रयत्न नहीं करते। फलतः जो कुछ बचा रहता हैं उसे कलेवर की विडम्बना भर कहा जा सकता है।

तथ्य और तत्व का समावेश न होने पर यह स्थिति बन ही नहीं पड़ती जिसमें विज्ञान के समतुल्य या उससे भी अधिक महत्वपूर्ण सिद्ध कर सकने की स्थिति बन सके। एक और सजीव हाथी खड़ा हो और दूसरी ओर वैसा ही कागज का पुतला बना कर खड़ा कर दिया हो तो यह आशा नहीं की जा सकती कि तुलना करने पर दोनों की सामर्थ्य समान सिद्ध हो सकेगी। दोनों को समान महत्व या मूल्य मिल सकेगा। दोनों से समान काम लिया जा सकेगा। नकली को अधिक वरिष्ठ या प्रमुख सिद्ध करने का तो अवसर ही कहाँ आता है?

जब जड़ पदार्थों से लाभान्वित होने की शरीरों को स्वस्थ रखने की, व्यापार व्यवसाय की कोई विधि व्यवस्था हो सकती है तो चेतना को सही और सुसंस्कृत बनाए रखने का भी सुनिश्चित अनुशासन रहेगा ही। शरीर की पृष्ठ भूमि में प्राण काम करता है। प्राण के दुर्बल हो जाने या विलग हो जाने पर शरीर महत्वहीन बन जाता है। इससे प्रकट है कि चेतना की-प्राण सत्ता की-विचारणा की अपनी समर्थता और उपयोगिता है। जैसे तैसे जहाँ तहाँ उसे पड़ा नहीं रहने दिया जा सकता है। अनगढ़ बनी रहने पर तो वह जंग खाई हुई घड़ी की तरह समय बताने की अपनी क्षमता से वंचित ही बनी रहेगी। इस दुर्गति से चेतना क्षेत्र को बचाए रहने के लिए अध्यात्म विज्ञान का सुनियोजन हुआ। पदार्थ विज्ञानियों की तरह ऋषिकल्प तपस्वियों ने अपने मानस को प्रयोगशाला बनाकर उन तथ्यों को ढूँढ़ निकाला जिन्हें अपनाकर नर बानर स्तर क एक सामान्य प्राणी किस प्रकार ऋद्धि सिद्धियों के स्वामी, विश्व वसुन्धरा के अधिष्ठाता बन सके। किस प्रकार उसने अपनी प्रसुप्त शक्तियों को खोजा और उन्हें जागृत करके देव मानव का पद पाया।

पदार्थ द्वारा मिल सकने वाले लाभों से सभी परिचित हैं। बलिष्ठ शरीर की उपयोगिता भी निरन्तर सिद्ध होती रहती है। सम्पत्ति के आधार पर इच्छित सुविधा साधन खरीदे जा सकते हैं। यह प्रत्यक्ष उपलब्धियों का महात्म्य हुआ। इससे कहीं अधिक बढ़े चढ़े लाभ विभूतियों के हैं। गुण कर्म की उत्कृष्टता को ही दार्शनिक भाषा में अध्यात्म कहा जाता है उसके आधार पर जो मिल सकता है उसकी जानकारी संसार में सृजन प्रयोजनों में सफल हुए महामानवों की जीवन गाथाओं का पर्यवेक्षण करते हुए सहज ही जानी जा सकती है।

अध्यात्म नेताओं का मत है कि इस विज्ञान के अनुसार आचरण करने पर अदृश्य चेतना के भावना, मान्यता, आस्था, प्रज्ञा, श्रद्धा पक्षों को उच्चस्तरीय बनाया जाता है। वे परिस्थिति होने पर इच्छा, आकाँक्षा, प्रेरणा के रूप में बुद्धिक्षेत्र को देवोपम बनाती है। देवोपम से तात्पर्य है- उत्कृष्टता सम्पन्न आदर्शवादी चिन्तन और चरित्र। व्यक्तित्व का परिष्कार भी इसी को कहते है॥ प्रतिभा परिवर्धन भी इसी को कहते है। प्रतिभा परिवर्धन भी इसी के साथ जुड़ा रहता है। इन विशेषताओं से सम्पन्न होने पर व्यक्ति उस स्तर का बन जाता है जिस श्रद्धेय, सम्माननीय, प्रामाणिक अनुकरणीय, अभिनन्दनीय कहा जा सकें।

अध्यात्म की वास्तविकता का स्वरूप एवं उपक्रम समझ लेने के उपरान्त यह स्पष्ट हो जाता है कि चेतना को मनश्चेतना के साथ जोड़ने की यह प्रक्रिया आत्मसंयम, अनुशासन, मर्यादापालन की तपश्चर्या से आरंभ होती है। और उत्कृष्ट आदर्शवादिता से भरे पूरे चरित्र व्यवहार से अपना प्रमाण परिचय पग पग पर देती है। परिष्कृत आत्मा ही परमात्म का है। वेदान्त दर्शन में ‘अयमात्मा ब्रह्म’ ‘प्रज्ञानं ब्रह्म’ ‘तत्वमसि’ ‘सोहम्’ ‘शिवोऽहम्’ जैसे सूत्रों द्वारा वास्तविकता का स्पष्ट करना किया गया है।

इस स्तर के अध्यात्म का विज्ञान भी कैसे विरोध करने का साहस जुटा पाएगा? विज्ञान का उद्देश्य सत्य की खोज, अविज्ञात का अनुसंधान और प्रगति के साधन जुटाना है। यदि यही कुछ अध्यात्म के द्वारा चेतना क्षेत्र में सम्पन्न किया जाता हो तो विग्रह क्यों उठेगा? दोनों अपने अपने क्षेत्र में काम करते हुए भी एक दूसरे के पूरक समझे जाने लगेंगे हवा आकाश में परिभ्रमण करती है और आहार दृश्यमान खाद्य-पदार्थों से विनिर्मित होता है। इतने पर भी दोनों की भूमिका जीवन निर्वाह में समान स्तर की होती है। यदि लक्ष्य एक रहें तो उन्हें विरोधी क्यों माना जाएगा। उपलब्धियों का सदुपयोग और जो आगे की संभावनाएँ हैं उनका अनुसंधान यह कार्य यह दोनों महाशक्तियाँ अपने अपने ढंग से सम्पन्न करती रहें तो उनके बीच विग्रह कहाँ रहा?

अन्ध विश्वास फैलाने का आरोप दार्शनिक प्रतिपादनों पर लगता हैं। कारण कि उनका आधार पर जो कुछ कहा जाता है वह सर्वमान्य नहीं होता। मात्र एक वर्ग के लोग ही उसे यथार्थ मानते हैं। अपने को सच्चा और दूसरों को झूठा भी ठहराते हैं। कलह यहीं से आरम्भ होता है। जो बात प्रत्यक्ष प्रमाणित न की जा सके उसे अपनी श्रद्धा के अनुरूप मान्यता देने में तो कोई भी स्वतन्त्र है। पर उन्हें दबाव व प्रलोभन के आधार पर दूसरों पर थोपना अनुचित है। इसी अनौचित्य का विरोध प्रायः विज्ञान वर्ग द्वारा अध्यात्म पर होता रहता है। मरणोत्तर जीवन,सम्प्रदाय विशेष पर ईश्वर की अनुकम्पा या नाराजी जैसे प्रतिपादन से सत्य की शोध में बाधा पड़ती है। प्रत्यक्षवाद का हिमायती बुद्धिवादी वर्ग इसी आधार पर अध्यात्म को अन्ध विश्वासों र अवलम्बित कहता और उसे असामान्य ठहराता है। इस प्रश्न पर सम्प्रदायवादी दार्शनिकों को भी नरम होना चाहिए। साथ ह अनुसन्धान के क्षेत्र में उतर कर यह देखना चाहिये कि उनके प्रतिपादन नीतिशास्त्र और समाज सुनियोजन में किस सीमा तक सहायक सिद्ध होते हैं? सर्व साधारण को उन मान्यताओं के सहारे किन सुव्यवस्थाओं की उपलब्धि होती है? तर्क, तथ्य, प्रमाण, उदाहरण के आधार पर यदि अध्यात्म मान्यतायें सही सिद्ध की जा सकें तो वे प्रत्यक्षवाद की कसौटी पर भी खरी सिद्ध होंगी और उनका मान बौद्धिक तथा वैज्ञानिक प्रत्यक्षवाद की कसौटी पर भी खरा सिद्ध होता चलेगा फिर किसी को किसी पर आरोप लगाने की आक्षेप थोपने की गुँजाइश न रहेगी।

जो अपनी प्रमाणिकता एवं उपयोगिता सिद्ध कर पाता है, उसी में लोक मान्यता मिलती है। इस संदर्भ में अध्यात्म को स्वयं आत्म निरीक्षण परीक्षण करना चाहिए और जो खरा है वह वाला सिद्धान्त अपनाकर ऐसा कवच पहन लेना चाहिए कि जिस पर बुद्धिवाद का, प्रत्यक्षवाद का अतिक्रमण आघात न पहुँचा सकें।


आस्तिकता की सही परिभाषा!

आस्तिकता हृदय की सहज वृत्ति है। किन्तु इसका तात्पर्य किसी एक देशीय वस्तु स्थिति व्यक्ति के साथ एकात्म नहीं है। इसकी एक ही कसौटी है “सुहृदं सर्व भूतानाम्”। जो इस कसौटी पर खरा नहीं उतरता उसे आस्तिक मानना मनवाना एक प्रवंचना भर है। ये उद्गार हैं देशबंधु चितरंजन दास के। जो स्वयं को इसी कसौटी पर जाँचा परखा करते थे।

कल्याण के आदि सम्पादक श्री हनुमान प्रसाद पौद्दाद को उन्हें निकट से देखने परखने का अवसर मिला। अपने एक संस्मरण में कहते हैं कि अगाध विद्वता के साथ करुणा और अपरिग्रह का भण्डार उनमें भरा हुआ था। उनके जीवन का एक मात्र लक्ष्य दीन विद्यार्थी, धनाभाव से चिकित्सा कराने में असमर्थ रोगी, मृत पिता का शवदाह करने में अशक्त निर्धन कंकाल शेष क्षुधार्त, आदि विविध रूपों में अभाव ग्रस्त मानवता को तृप्त करना था। पोद्दार जी को यह देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ कि सुबह से शाम तक जितना कमाते वह सब सूर्य की किरणों के साथ विलीन हो जाता। दो हाथों से धन संग्रह करते और उसे हजार हाथों तक पहुँचा देते थे।

एक बार की बात है डुमराँव राज्य का मुकदमा जीतने पर उन्हें एक दिन में एक लाख रुपये से अधिक मेहनताने में मिला। घर पहुँचते-पहुँचते सारा धन देश और समाज की विविध आवश्यकताओं में नियोजित हो गया। गाँधीजी ने उनकी यह बात सुन रखी थी। जब वह उनसे मिलने उनके घर गए उस समय पोद्धार जी भी मौजूद थे। गाँधीजी ने दास बाबा से पूछा-सूना है आपकी रुपए में पन्द्रह आने कमाई लोग ठग ले जाते हैं।

देश बन्धु ने उत्तर दिया बापू। मैं आस्तिक हूँ। मेरा भगवान, उदास, दुःखी पीड़ित रोगी पड़ता रहे और मैं शौक-मौज में धन उड़ाऊँ यह मेरे से सम्भव नहीं। विभिन्न रूपों में जीवन जीने वाले भगवान को नैवेद्य लगाकर उसका उच्छिष्ट ग्रहण करना ही मुझे प्रिय है।

पास बैठे हुए एक मित्र बोले लेकन फिर भी आपत्ति विपत्ति के लिए कुछ रखे बगैर इस तरह खुले हाथों सेवा कार्यों में लगाना बुद्धिमानी तो नहीं कही जा सकती। देश बन्धु कुछ रोष भरे स्वर में बोले -जो मेरे भगवान की सो में अड़ंगा लगाए, रोड़े अटकाए ऐसी बुद्धि को मैं तिलाँजलि देता हूँ। ऐसे बुद्धिमान बनने से मैं बेवकूफ भला।

परमात्मा अनेक रूपों में विपत्ति में पड़ा तड़पता रहें और उसकी सेवा करने के स्थान पर मैं भावी विपत्ति की आशंका से परेशान होऊँ और धन के ढेर लगाऊँ यहां मेरे से सम्भव नहीं। भगवान ने मुझे हाथ पाँव मस्तिष्क क्षमताएँ दी हैं। वर्तमान में मैं इसका भरपूर उपयोग देने वाले के लिए कर लेना चाहता हूँ।भविष्य क्या होगा अच्छा या बुरा इसके बारे में व्यर्थ अभी सोच सोच कर परेशान क्यों होऊँ?

आस्तिकता मुझे विरासत में मिली है। इसे मैं किसी कीमत में खोना नहीं चाहता। मेरे लिए इसका सीधा-साधा तात्पर्य है अपनी शारीरिक, मानसिक, आर्थिक, शक्ति का एक-एक कण भगवान की सेवा में लगे। फिर सभी कुछ भगवान का ही तो है। मैं तो भगवान की चीन भगवान को अर्पित करता हूँ। इसमें किसी पर मेरा अहसान तो नहीं। यदि ऐसा न करूं तो नास्तिक ओर बेईमान समझा जाऊँ। आस्तिकता की यह नई परिभाषा सुनकर गाँधीजी भाव–विभोर हो गए और मित्र मण्डली आश्चर्य चकित।


मधु संचय

आत्मावलोकन


मधु-संचय (Kavita)

अपना दर्द हुआ छोटा जब दिखी और की पीर बड़ी। शक्ति जगी तूफाँ से लड़ने की जब देखी प्रलय खड़ी॥

इंसा है, पहली ठोकर पर गिरता है घबराता है। लेकिन यह भी सच है तभी देखकर चलना आता है॥

पर मानव है वही कि व्यवधानों से जिसकी शक्ति लड़ी॥ खुद की प्यास लखी तो सोचा, है मुझ पर अन्याय बड़ा।

पर मुड़ कर पीछे देखा तो, था भूखा भी व्यक्ति खड़ा।। अपने तो दो ही आँसू थे, उसे देख लग गयी झड़ी॥

जो है नहीं उसे पाने का हम मन से उद्योग करें। पर जो मिला हुआ है उसका भी पूरा उपभोग करें॥

है संतोष-शांति पाने की, जीवनदायी मार कड़ी॥ अपना दर्द हुआ, छोटा जब दिखी और की पीर बड़ी।

शक्ति जगी तूफां से लड़ने की जब देखी प्रलय खड़ी॥

-माया वर्मा

साधना-सामर्थ्य


अनुपम उपहार (kavita)

साधना का अनुपम उपहार, सृष्टि का यह सौंदर्य अपार॥ अनवरत चली किसी की साध, जब कहीं हुआ सृष्टि का सृजन।

साधना का क्रम चला अबाध, तभी पा सका सूर्य, शशि गगन। बन सकी तभी व्यवस्थित सृष्टि, साथ-रत रहा सृष्टि करतार॥

साथ से वृक्ष बना है बीज, साथ से हुआ व्यष्टि निर्माण। साथ से बड़ी बनी, ना चीज, मनुज में प्रकटे हैं भगवान॥

साथ से देव-सृष्टि का सृजन, और संभव पालन, संहार॥ आज युग परिवर्तन के लिये, चलो! साधना करें।

स्वार्थ के लिये अभी तक जिये, चलो, सर्वार्थ- साधना करें॥ धरा पर स्वर्ग-अवतरण हेतु साधना ही सक्षम आधार॥

-मंगल विजय

व्यक्ति परिमार्जन


वस्तु विकृ न हो पात्र (kavita)

वस्तु विकृ न हो पात्र में, इसलिये है जरूरी बहुत पात्र का मार्जन। दिव्य-अनुदान को साधने के लिये, मित्र! अनिवार्य है व्यक्ति-परिमार्जन॥

वस्तु को क्यों प्रभावित करेगी नहीं, पात्र में जो समाई हुई गंदगी। श्रेष्ठ-अनुदान भी वह कलंकित करे, जी रहा जो पतन, पाप की जिन्दगी॥

हर जगह पात्र का मूल्य होता रखे! इसलिए पात्रता का करें हम वरण। वस्तु विकृत न हो पात्र में इसलिये है जरूरी बहुत पात्र का मार्जन।2॥

व्यक्ति के पात्र में लोभ की, मोह की गंदगी कंठ तक यह यदि समाई हुई। क्रूर छाया कलुष-कल्मषों की अगर व्यक्ति के अन्रंग बीच छाई हुई॥

फिर अनुग्रह किसी संत का क्यों करे, विष भरे पात्र का क्या करे रस-झिरन। दिव्य-अनुदान को साधने के लिये, मित्र! अनिवार्य है व्यक्ति-परिमार्जन॥3॥

दिव्य-अनुदान की वाँछा है अगर, तो चलो मित्र! विकसित करें पात्रता। स्वाति-नक्षत्र का लाभ देने हमें, चाहिये सीपसी रिक्तता, आर्द्रता॥

स्वातिवत् संत फिर कर सकेंगे सहज व्यक्ति की सीप में मोतियों का सृजन। वस्तु विकृ न हो पात्र में, इसलिये है जरूरी बहुत पात्र का मार्जन॥

-मंगल विजय


विचारों में निहित रचनात्मक शक्ति

विचार स्वयं में एक सामर्थ्य है। ये अपनी निर्धारित रीति-नीति से स्वयं के लिए तथा दूसरों के लिए परिणाम-प्रतिक्रिया उत्पन्न करते हैं। प्राण शक्ति के चुम्बकीय और अधिक हो जाती है। यद्यपि प्रत्येक व्यक्ति में मौलिक रूप से यह सामर्थ्य विद्यमान होती है। किन्तु इतने पर भी इने-गिने लोग ही ऐसे होते हैं जिन्होंने इसका सही व सन्तुलित उपयोग करने की कला का मर्म जाना हो।

दार्शनिकों ने विचारों क्षमता पर विशद चिन्तन किया है। आचार्य शंकर का इस सदी में मानना है, कि प्रत्येक व्यक्ति का अपना मानसिक जगत होता है। इसे विचारों एवं कल्पनाओं का संसार कह सकते हैं। यद्यपि विचार की प्रक्रिया में बुद्धि की प्रधानता होती हैं। पर व्यापक अर्धो में दोनों ही मानसिक चेतना के अंतर्गत आते है।

बौद्ध मत के अनुसार भी प्रत्येक मनुष्य अपने ही जगत में रहता एवं विचरण करता है उसका यह संसार दूसरे मनुष्य के संसार से भिन्न होता है। इन विभिन्न जगतों में एक प्रकार का सामंजस्य होने पर ही ये एक दूसरे में अन्त; प्रविष्ट हो सकते हैं। इसी स्थिति में व्यक्ति एक दूसरे के संपर्क में आता है इसी तरह पारस्परिक विचारों को समझा जा सकता है।

आधुनिक मनोवैज्ञानिकों ने भी उपयुक्त दार्शनिक चिन्तन को अपनी प्रयोगात्मक कसौटी पर खरा सिद्ध किया है। उनके अनुसार जब कोई बात किसी समूह में कही जाती है तो प्रत्येक व्यक्ति उसे बलग ढंग से समझाता है। वक्ता ने अपने कथन को जिस भाव से कहा है, इसे ठीक उसी तरह ग्रहण नहीं किया जाता इसके स्थान पर ऐसी चीज को ग्रहण किया जाता है जो उसके मन में पहले से भरी हो।

वस्तुतः मन विचारों को गढ़ने एवं आकार देने का कारण है। यह ज्ञान का कारण नहीं है। इसके द्वारा प्रत्येक क्षण इन आकरों की रचना की जाती है। विचार आकारमय होते है।

मनःशास्त्री पोफैन बरगर ने अपनी रचना “प्रिन्सिपल्स आफ अप्लाइड साइकोलॉजी” में इन विचारमय आकारों को विवेचित किया हैं। उनका अपने इस अध्ययन में मानना है कि इनका अस्तित्व विचारमय आकारों को जगत में भेज देता है, तो ये अपने अस्तित्व के प्रयोजन को पूर्ण करने के लिए जगत में विचरण करने लगते हैं।

ड्यूक विश्वविद्यालय के प्राध्यापक डा. जे.बी. राइन के अनुसार परामनोविज्ञान में विचार संचरण प्रणाल का आधार यही है। विचारों का गठन हमारे द्वारा किसी व्यक्ति या विषय वस्तु पर चिन्तन करने पर होता है। यह सृजित विचार एक आकार धारण करके उसे खोजने के लिए निकल जाता है। यदि इस विचार के पीछे कोई संकल्प नियोजित है, तो मानसिक क्षेत्र से निकला यह विचारमय आकार अपने को चरितार्थ करने की चेष्टा करता है।

मनो अध्येता राबर्टो असागिओली का अपनी कृति “साइको-सिन्थेसिस” में मानना है कि “जब इन विचारमय आकारों का फल प्राप्त होता है तब हम उस विषय की इच्छा या परवाह छोड़ चुके होते है। इस तरह की अव्यवस्थित विचार प्रणाली को वैचारिक परिपक्वता में एक कमी के रूप में जाना जा सकता है।

इस कमी को श्री एच.ए.रुगल ने “द-साइकोलॉजी ऑफ एफिसिएन्सी” में भली प्रकार स्पष्ट किया है। उनका मानना है कि कुछ लोगों की रचना शक्ति अत्यन्त सशक्त होती हैं। यही कारण है कि उनकी मनोरचनाएँ सदा कार्यान्वित होती है। पर अधिकाँश व्यक्तियाँ की मनोमय व प्राणमय सत्ता सधी हुई नहीं होती है। इस कारण वे कभी एक चीज पर विचार करते हैं-कभी उसकी विरोधी चीज पर। अतएव उनकी ये विरोधी रचनाएँ तथा उनके परिणाम एक दूसरे से टकराते और भिड़ते रहते हैं। श्री रुगल इस संदर्भ में एक तथ्य और उद्घाटित करते है कि निषेधात्मक विचारों की रचना करके भी हम स्वयं विरोधी परिणामों को आमन्त्रित करते हैं।

उनका मत हैं कि उपर्युक्त तथ्य को विस्मृत कर देने की ही परिणति है कि बहुसंख्य व्यक्ति अपनी दुर्व्यवस्था पर आश्चर्य चकित होते हैं। उन्हें अपने जीवन में इतनी अधिक अव्यवस्था और असामंजस्य का कारण ही नहीं समझ में आता। वे इस तथ्य को अनुभूत नहीं कर पाते कि उनकी परिस्थितियों की विषमता स्वयं के विचारों एवं इच्छाओं की ही उपज हैं। बेमेल और विरोधी जान पड़ने वाली यह स्थितियाँ व्यक्ति के जीवन को असह्य प्रायः बना देती हैं।

परामनोविज्ञान का यह अध्ययन अत्यन्त महत्वपूर्ण है किन्तु इसकी समग्र महत्ता तभी है, जब जीवन में इसके सदुपयोग के रहस्य को जाना जाय। श्री अरविन्द अपने योग विषयक पत्रों में इसे स्पष्ट करते हुए कहते है। कि साधारणतया मनुष्य अपने विचारों की प्रभावोत्पादकता जाने बिना इनका बेतुका सृजन करते रहते हैं। उनको इसका तनिक भी पता नहीं है कि उनकी विचार रचनाएँ किस प्रकार गति एवं क्रिया करती हैं। इस प्रकार की अज्ञानमय विश्रृंखल अवस्था में गढ़े हुए विचार परस्पर टकराते रहते है। इनकी टकराहट मानसिक श्रम, भार व थकान के रूप में अनुभूत होती है।

आत्म विश्लेषण व आत्म-परीक्षण की विधि द्वारा स्वयं के विचारों का अध्ययन किया जा सकता है। तत्पश्चात् संकल्पपूर्वक अनवरत उन पर नियंत्रण द्वारा उनको गढ़ा जा सकता है। आत्मानुशासन द्वारा इनके गठन तथा संकल्प द्वारा प्राण शक्ति का नियोजन विचारमय आकार को पूर्ण शक्ति और सफलता प्रदान कराता हैं।

श्री अरविन्द के द्वारा उपदिष्ट उपरोक्त प्रणाली को मनोवेत्ता “थाँट प्रासेस” क नाम से बताते हैं। शास्त्रों में इसे ही ‘निदिध्यासन’ कहकर बताया गया हैं विभिन्न चिन्तक और विज्ञानवेत्ता देर तक एक ही विषय वस्तु पर विचार करते रहने की रुचि एवं आदत उत्पन्न करते है। फलतः वे समुद्र में गहरे उतरने वाले गोताखोरों की भाँति बहुत से मणि-मुक्तक खोजने में सफल हो जाते हैं। किनारों पर टहलने वाले दर्शकों को तो सीप और घोंघे जैसी चीजें ही हाथ लगती है।

आन्तरिक अभिरुचि को इस ओर मोड़ देने से सहजतापूर्वक निषेधात कुविचारों से छुटकारा पाया जा सकता है। इस तरह छुटकारा पा जाने वाले लोग गहने व आदर्शोन्मुख होते हैं। उथले लोगों की वैचारिकता हवा में उड़ते तिनके की भाँति है। ये हवा के रुख को देखकर अपनी गतिविधियाँ परिवर्तित कर देते हैं। जबकि विचार साधना के धीन आदर्शपूर्ण लक्ष्य पर चट्टान की तरह अटल रहते है।

विचारों की यह साधना अपने आप में सम्पूर्ण व समग्र है। आचार्य शंकर अपनी रचना “अपरोक्षानुभूति” में इसका महत्व बताते हैं कि जिस प्रकार प्रकाश के बिना कभी पदार्थ का भान नहीं होता उसी प्रकार बिना विचार साधन के जीवन जीने की कला का बोध सम्भव नहीं।

निःसन्देह इसका महत्व हमारे बहुआयामी जीवन के प्रत्येक आयाम में है। इसको हृदयंगम कर ही मन व प्राण को आत्मानुशासन द्वारा संचालित कर विचारों के सुगठन तथा उनके सदुपयोग का मार्ग अपनाया जा सकता है। इस तरह सफल और समुन्नत जीवन की मंगलमयी उपलब्धियाँ पचुर परिणाम में प्राप्त की जा सकती है।


Quotation

चिन्ता नहीं विचार करें। सारे दिन चिन्ता के बाद भी कुछ हाथ न लगेगा-पर जब कभी भी समस्या का समाधान हाथ लगा है, वह ठीक सोचने और करने से ही लगा है।


सूझबूझ ने खोला समृद्धि का द्वार!

इंग्लैण्ड का जान फौस्टर नामक युवक लिवरपूल् का रहने वाला था। बेरोजगार होने के कारण बहुत तंगी में दिन काट रहा था। एक दिन वह विचारमग्न बैठा इस उधेड़बुन में पड़ा था कि इस आर्थिक तंगी की स्थिति से कैसे निपटा जाय? क्या युक्ति अपनायी जाय, जिससे दुर्भाग्य के यह दिन दूर हों? वह यह सब सोच रहा था और हाथ में पत्नी की हेयरपिन लिए निरुद्देश्य मोड़-मरोड़ रहा था। पत्नी आयी, तो वही पिन बालों में लगा कर एक पार्टी में चली गई। वहाँ उसने थोड़ी देर डांस भी किया। पार्टी समाप्त हुई तो पति पत्नी दोनों वापस घर लौट आये। पत्नी ने थोड़ी देर बाद जब अपना सिर टटोला तो उसकी आश्चर्य की सीमा न रही, जब उसने देखा कि उस टेढ़ी पिन को छोड़ कर अन्य सारी पिनें गिर कर कहीं खो गई थीं। यह बाज जब उसने पति को बतायी, ता वह खुशी से उछल पड़ा। उसे गरीबी से पिण्ड छुड़ाने का उत्तम उपाय मिल गया था। इससे पूर्व जो पिनें बनती थीं। वह सीधी होती थीं। फलतः बालों से फिसल कर तुरंत गिर पड़ती थीं। इसे बनाने वाली कम्पनी को भी लम्बे समय से कोई ऐसी नई डिजाइन की पिन की तलाश थी, जो झटके के बावजूद वालों में फँसी रह सकें, गिरे नहीं। यह उपयुक्त अवसर देख आर्मस्ट्राँग ने अपनी इस पिन को पेटेण्ट करा लिया, जिसे बाद में कम्पनी ने 40 लाख पौण्ड की विशाल राशि देकर खरीद लिया और इस प्रकार उसकी तंगी सदा-सदा के लिए समाप्त हो गई।

इसे मानवी सूझबूझ कहें, अंदर से उठने वाली प्रेरणा अथवा केवल संयोग। किन्तु बहुधा ऐसा होता देखा गया है कि महत्वपूर्ण खोजें इसी आधार पर हुई और ऐसा करने वाले देखते धनवान बन गए।

कभी-कभी एकाकी उलझन भरी परिस्थिति में व्यक्ति में ऐसी सूझ उत्पन्न कर देती है, जो अनजाने ही उसके लिए भाग्योदय साबित होती है। यही स्थिति जेम्स मिचनर नामक एक अमरीकी नागरिक के साथ गुजरी। द्वितीय विश्व युद्ध में संयुक्त राज्य अमेरिका में वह एक नौसैनिक अधिकारी था। एक बार सुरक्षा की दृष्टि से वह प्रशान्त महासागर में अपनी मोटरबोट में घूम रहा था। तभी उस क्षेत्र में उसे एक छोटा द्वीप दिखाई पड़ा। उसकी इच्छा उस द्वीप को देखने की हुई और इसी उद्देश्य से वह वहाँ पहुँचा, किन्तु अन्ततः भटक गया और लम्बे समय तक वहाँ से बाहर न आ सका। वह टापू बिलकुल निर्जन था। उसकी फौजी जिन्दगी की व्यस्तता और श्रमशीलता समय के खालीपन में आड़े आ रही थी। बहुत सोच−विचार कर उसने एक निश्चय किया कि क्यों न कुछ लिखा जाय। अपने सैन्य जीवन में उसने जो कुछ देखा, सुना और अनुभव किया था, उसे कहानियों के कथानक के रूप में अपनी मोटरबोट में मौजूद पोर्टेबल टाइपराइटर में उतारना आरंभ कर दिया। बाद में यही उसकी प्रथम पुस्तिका “टेल्स ऑफ दि साउथ पैसेफिक” के नाम से प्रख्यात हुई। अपनी पाण्डुलिपि लेकर वह वापस बाहर आने व अपने शहर पहुँचने में सफल हुआ। अपनी इस कृति पर उसे पत्रकारिता का सर्वोच्च पुलिट्जर पुरस्कार मिला इसके बाद उसकी लेखन प्रतिभा विकसित होती गयी व वह सम्पन्न बन गया।

प्रतिभा के बीजाँकुर चाहें जिस रूप में विकसित हों, व्यक्ति को निहाल कर देते हैं। यदि भौतिक प्रगति व समृद्धि ही अभीष्ट हो तो वह भी निश्चित ही मिलकर रहती है।


नींव का पत्थर बनूँ मैं!

बात सन् 1937 की हैं। खादी ग्रामोद्योग संघ के अनुभवी लोकसेवी कार्यकर्ता री कृष्णदास जाजू को महात्मा गाँधी ने किसी महत्वपूर्ण विषय पर वार्ता करने के लिए सेवा ग्राम बुलाया। जाजू जी सगये कि खादी ग्रामोद्योग या अनय किसी रचनात्मक कार्यक्रम के सम्बन्ध में कुछ आवश्यक विचार विमर्श या निर्देश देने होंगे बापू को। किन्तु बात दूसरी ही थी।

मध्य प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री डा.खरे ने कांग्रेस हाई कमान से बिना पूछ अँग्रेज गवर्नर की सलाह से अपने मंत्री मण्डल में परिवर्तन कर लिया था। उनकी यह सूझ-बूझ उन सहित कांग्रेस की प्रतिष्ठा को धक्का पहुंचने वाली थी। अतः उन्हें अपनी भूल स्वीकार करते हुए मुख्यमंत्री पद से त्याग पत्र देना पड़ा। सरदार पटेल उनके स्थान पर जाजू जी को मुख्य मंत्री बनाना चाहते थे। पर वे जानते थे कि वह इस पचड़े में पड़ना स्वीकार नहीं करेंगे। अतः उन्होंने गाँधी जी से उन्हें इसके लिए तैयार करने को कहा।

बापू के मुख से मध्य प्रदेश का मुख्य मंत्री बनने के आग्रह की यह अनपेक्षित बात सुनकर वे हतप्रभ हो गए। गाँधीजी की आशा के विपरीत उन्होंने अपनी असमर्थता जाहिर की, साथ ही बोले बापू जी मैं तो कांग्रेस का सदस्य तक नहीं हूँ फिर यह कैसे सम्भव है कि मैं किसी प्रदेश की विधान सभा का नेता बन जाऊँ और वरिष्ठ सदस्य देखते रह जायँ।

गाँधी जी ने उन्हें विश्वास दिलाया कि कोई वरिष्ठ सदस्य आपत्ति नहीं करेगा। किन्तु श्री कृष्ण्दास जाजू नींव के पत्थर बनना चाहते थे, प्रसाद के कगूरों पर लगने वाले सबकी आंखों को बरबस दिखने वाले पत्थर नहीं। वे बोले “आप और कोई आदेश दें मैं सहर्ष स्वीकार करूंगा पर मुझे इस पद प्रतिष्ठा के दलदल में मत डालिए।”

इतने पर भी गाँधीजी का आग्रह बना रहा। वे राजनेता बनकर रचनात्मक कार्य छोड़ना नहीं चाहते थे। किन्तु इतने बड़े आदमी के आग्रह को उनके मुँह के समाने ठुकराने की धृष्टता भी नहीं कर सकते थे। अतः उनको इस सम्बन्ध में विचार करने की बात कहकर वे वहाँ से लौट आए। कुछ दिनों के बाद उन्होंने सेवाग्राम को एक मार्मिक पत्र प्रेषित किया। जिसमें लिखा “मैं कार्यकर्ता बनना चाहता हूँ नेता नहीं। इसके लिए मुझमें वैसी योग्यता का भी अभाव हैं। मुझे अपने आपको रचनात्मक कार्य में खपाना कहीं अधिक पसन्द है अपेक्षाकृत प्रशासन का भार ग्रहण करने के।”

इसी तरह उनके सामने राज्यपाल बनने का प्रस्ताव भी रखा गया। अनेकों अन्य पद सम्मान के अवसर आये। किन्तु इन सबको ढोने की जगह उन्हें एक विनम्र स्वयं सेवक का स्तर कही अधिक महत्वपूर्ण लगा।

वह कहा करते थे किसी राष्ट्र, समाज, संस्था का जीवन, प्रगति इस बात पर निर्भर करती है कि उसके पास निष्ठावान, निस्पृह स्वयं सेवक कितने हैं। व्यवस्थापकों प्रशासकों की बदौलत न संस्थाएँ जीवित रहती हैं और सार जीवन इसी आदर्श को निभाया और किसी बड़े पदधारी की अपेक्षा अधिक ठोस कार्य किया। आज भी समाज ऐसे लोगों का आह्वान कर रहा है जो उसकी नींव में अपना जीवन खपाते हुए उसके भवन को स्थायित्व प्रदान कर सकें।


मनः स्थिति को सुव्यवस्थित बनायें!

मानसिक अस्तव्यस्तता की स्थिति तनाव कहलाती है। इसी के चिन्ह सिर में दर्द, चक्कर आना, जी घबराना, अनिद्रा बेचैनी, उत्तेजना आदि के रूप में दिखाई देते हैं। निद्रा, शाँति और विश्राम के लिए मानसिक शिथिलता जरूरी है। पर जब मानसिक स्थिति तनाव ग्रस्त हो तो थकान मिटाने वाली नींद कैसे आए? काम के दबाव से उत्पन्न तनाव तो विश्राम से दूर किया जा सकता है, पर चिन्ताओं से उत्पन्न होने वाला तनाव विश्राम की स्थिति उत्पन्न होने नहीं देता। फलस्वरूप स्थिति लगातार बिगड़ती जाती ह॥

मनोवैज्ञानिकों के अध्ययन के अनुसार बड़े शहरों के निवासी देहात में रहने वालों की अपेक्षा कहीं अधिक इससे ग्रसित पाए जाते हैं।इसके कारण के बारे में उनका मानना हैं, गाँवों का जीवन सीधा और सरल है-जबकि शहरों काजीवन मशनी बन कर रह गया है। जीवन शैली का यह भेद बहुत महत्वपूर्ण है। एक को साधारण कपड़े और साधारण भोजन में सन्तोष है, तो दूसरा अधिक से अधिक घमक-दमक बटोरना चाहता है। कामनाओं की बाढ़ में मन चिन्ताओं और विक्षोभों में डूबा रहे यह स्वाभाविक है। सितार के तारों को अधिक कड़ा करते जायँ तो वे टूट जाँएगें। इसी प्रकार मनःस्थिति यदि अव्यवस्थित व तनाव पूर्ण रहे तो उसकी प्रतिक्रिया समूचे जीवन को तोड़-मरोड़ कर रख देती है।

मनोवैज्ञानिक आर.एस. लाजरस ने अपनी रचना “साइकोलाजिक स्टे्रस एण्ड द कोपिग प्रोसेस” में इसका प्रमुख कारण खुद की मनःस्थिति एवं सामाजिक वातावरण के पारस्परिक सम्बन्धों में होने वाले उतार-चढ़ाव को बताया है। यह उतार-चढ़ाव मुख्य रूप से दो तथ्यों पर टिक है। पहला व्यक्ति की समा से माँग, दूसरा माँग के प्रति उसकी स्वयं की मानसिकता। अधिकाँश लोग समाज से असीमित माँगे रखते हैं, जबकि समाज के देने की क्षमता सीमित है। ऐसी दशा में स्वाभाविक है कि मनःस्थिति अस्तव्यस्त हो चले।

इच्छाओं की बाढ़ को रोक कर परिस्थितियों से ताल मेल बिठाना हमें सीखना होगा। लोगों का साथ निभाने की कला हमें आनी चाहिए। आदमी मिट्टी के खिलौने नहीं हैं जो चाहे जब चाहे जहाँ हटाए बदले जा सकें। कुछ लोग ऐसे होते है। जिनके साथ हमें इच्छा या अनिच्छा से रहना ही पड़ेगा। पड़ोस में जो लोग बसे हैं उनके घर को नहीं उखाड़ फेंका जा सकता? और न ही अपने खेत खलिहान को छोड़कर किसी दूर देश में घोंसला बनाया जा सकता है। पड़ोसी जैसे भी हैं, आखिर रहना तो उन्हीं के साथ पड़ेगा। जरूरी नहीं वे समझाने-बुझाने से हमारी मन मर्जी के अनुसार चलने लगें। यही बात कुटुम्बियों परिवारीजनों के सम्बन्ध में भी है। बूढ़े माँ-बाप, जवान भाई भावज, सयाने, लड़के, धर्म-पत्नी इन सबकी आदतें अपनी मर्जी के अनुरूप हों, यह कोई जरूरी नहीं। जिस तरह हर आदमी की शक्ल में अन्तर होता है, उसी प्रकार उसका व्यक्तित्व भी न जाने कितनी अच्छी खराब विशेषताओं से जुड़ा रहता है। कुछ इनमें से बदलती रहती हैं। अच्छे बुरे बन जाते हैं, और बुरे अच्छे। अरुचि की स्थिति पैदा होते ही उन्हें हटा दिया जाय, खुद हट जाँय या अपनी मर्जी का सुधार कर लिया जाय। ये तीनों बातें कठिन हैं। सरल यही है कि हमें जिन लोगों के साथ रहना पड़े उनके साथ इस तरह गुजर बसर करें, तालमेल बिठाये कि आये दिन का टकराव पैदा हुए बिना समय गुजरता रहें और यथा सम्भव सहयोग की सम्भावनाएँ बढ़ती रहें।

घुटन को हार की तरह छाती से चिपटाए रहना ठीक नहीं। एक बात सामने आयी उस पर विचार किया और सिनेमा की फिल्म की तरह दिमाग के पर्दे से हटा दिया। जब हम फेफड़े में साँस को रोके नहीं रख सकते। तो किसी विक्षोभ को ही मन में जमाकर, दबाकर क्यों बैठें रहें! नई साँस लेने के लिए जरूरी है कि पुरानी साँस बाहर निकले। भविष्य का निर्माण करने वाले विचारों को आमन्त्रित करने के लिए जरूरी है, जो बीत चुका उसकी कष्टदायी यादों को विस्मरण के गड्ढे में धकेल कर छुटकारा, पाएँ। खाली बैठे रहने पर न जाने कितनी इच्छाएँ कामनाएँ, ऊट-पटाँग विचार मन में उमड़ा करते हैं। इनमें पिण्ड छुड़ाने का सरल तरीका यह भी है कि ठाली पन दूर किया जाय। बहुत से काम ऐसे हैं। जो मानसिक गड़बड़ी में भी किए जा सकते हैं। झाडू लगाना, कपड़े धोना, जैसे काम अभ्यस्त हाथ करते रह सकते हैं। तैरना, खेलना, किसी काम से दूसरी जगह चले जाना जैसे छोटे परिवर्तन उत्तेजित मनःस्थिति को हलकी कर सकते हैं।

दूसरों से बहुत ज्यादा अपेक्षा न करना भी एक कारगर, उपाय है। सामान्यतया देखा यह जाता है कि बाप-बेटे से बहुत अधिक आशाएँ रखता है। उसके द्वारा हवाई किले बनाए जाने के सपने देखे जाते हैं। इसी प्रकार तमाम तरह की अपेक्षाएँ पड़ोसियों, कुटुम्बियों, रिश्ते-नातेदारों से की जाती हैं। ये सभी पूरी होने से तो रहीं। न पूरी होने की स्थिति में मन को विक्षुब्ध होना पड़ता है।

इस विक्षुब्धता जन्य तनाव से बचने के लिए जरूरी है कि अपनी अपेक्षाओं, को कम से कम रखा जय। अपनी मांगों को सिकोड़ा जाय। इसके लिए मन को प्रशिक्षित करना होगा। मन तो छोटे बच्चे की तरह है। जिस किसी चीन को पाने के लिए दौड़ पड़ता है। न पाने पर रोता मचलता है। यह रोने मचलने की स्थिति ही तो तनाव है। वह न रोए मचले, इसके लिए तरह-तरह के उदाहरण उसके सामने रखने होंगे। दुनिया के ख्याति प्राप्त रसायनज्ञ डाँ. प्रफुल्ल चन्द्र राय अपने वेतन के छोटे से हिस्से से अपना काम चला लेते थे, शेष धन गरीब विद्यार्थियों, सेवाभावी, संस्थाओं में नियोजित करते थे। माँगें कम रखने का मतलब है-इस स्थिति स्थाई रूप छुटकारा पाना।

यही बात परिवेश-परिस्थितियों के सम्बन्ध में है। बात घर परिवार अड़ोस-पड़ोस की हो या दफ्तर कार्यालय की। जब भी कोई ऐसी समस्या उठे तो शान्त मनःस्थिति रख कर विचार करने का प्रयास करना चाहिए। एक हाथ ताली नहीं बजती। गलती दोनों ओर से होती है। इसमें अपनी गलती कहाँ है-उसे ढूँढ़ कर दूर करने की कोशिश की जाय। प्रायः होता यह है कि छोटी सी बात को बड़ा बना दिया जाता है। तिल का ताड़ बनाने वाली इस आदत की वजह से न जाने कितने लोग मन का विक्षोभ भुगतते रहते हैं। थोड़ी समझदारी बरत लेने-संगति बिठाकर चलने में किसी तरह की तनाव जन्य स्थिति का न आना स्वाभाविक है।

काम की चिन्ताओं का बोझ दफ्तर या कार्य स्थल पर ही रहने देना ठीक है। हर समय इसे बेवजह ढोने से कोई भलाई नहीं। क्योंकि इस तरह काम को तो पूरा किया नहीं जा सकता। सिर्फ उधेड़बुन के कारण तनाव हाथ लगता है। जिस समय काम करें, पूरे मनोयोग से करें। प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाकर करें सके बाद तो उसे उसी जगह छोड़ कर हँसी-खुशी की हलकी -फुलकी जिन्दगी जीना ही अच्छा है। धीरे धीरे किन्तु लगातार इस तथ्य पर अमल करने से ऐसी स्थिति आने नहीं पाती।

मानसिक स्तर व जीवन क्रम को ऐसा सँजोया जाय, इस प्रकार सुसंयत किया जाय कि आयेदिन की तनाव जन्य परेशानियों का सामना ही न करना पड़े। चिन्तन और जीवन शैली में ठीक तरह से सामंजस्य बिठा कर चलने और हँसने हँसाने की आदतों को अपना कर तनाव से एवं तद्जन्य व्यथाओं से सहज ही छुटकारा पाया जा सकता है।


परोक्ष से उठता क्रूरता का उन्माद

परीक्षा जगत में कई बार ज्वार भाटे की तरह महत्वपूर्ण उतार-चढ़ाव आते हैं, जिसका स्थूल प्रभाव प्रत्यक्ष जगत में उथल-पुथल, विनाश, नरसंहार, ठगी, अपराध आदि के रूप में सामने आता है। इन कृत्यों में संलग्न व्यक्ति स्वयं तो कोई लाभ उठा नहीं पाते है। जिन क्षेत्रों में उनका प्रभाव होता है। वहाँ सर्वग्राही विभीषिका का दृश्य उपस्थिति किये रहकर विनाशलीला अवश्य रचते रहते हैं। इसे आसुरी प्रवाह-प्रचलन कहा जा सकता है। इससे सूक्ष्म असुर सत्ताएँ विनाशकारी कुचक्र रचतीं और जिस-तिस के सिर चढ़ कर अपने मनोरथ पूरे करने का प्रयास करती हैं।

गुह्य विज्ञान के निष्णातों के अनुसार इस नदीं के दो महायुद्धों की पीछे मुख्य भूमिका दानवी सत्ताओं काी ही रही थी। प्रथम विश्वयुद्ध का सूत्रपात आस्ट्रिया एवं हंगरी की दुहरी शासन सत्ता का एक मात्र उत्तराधिकारी आर्कड्यूक फर्डिनेग्ड एवं उसके राजकर्मियों की रहस्यमय मौत के कारण हुआ। कहा जाता है कि आर्कड्यूक के साथ सदा एक सूक्ष्म असुर रहता था। इस बात का भी उल्लेख मिलता है कि जिस “केसल्स ऑफ मिराभर’ नामक महल में वह रहता था वहाँ, एवं उसकी कार तक में साथ-साथ वह सफर करता था। एक दिन कार में इसी सत्ता रहस्यमय ढंग से उसकी हत्या कर दी। इसके उपरान्त इटली ने आस्ट्रिया पर कब्जा कर लिया और यहीं से युद्ध की शुरुआत हुई, जिसमें लाखों की जाने गई और कितनी ही सम्पत्ति नष्ट हो गई।

तैमूर लंग के बारे में यह प्रसिद्ध है कि वह जिस प्रकार स्वयं लंगड़ा और काना था, वैसा ही दूसरों को भी बनाने में उसे मजा आता था। बलख गछ्दी पर बैठते ही उसने लोभहर्षक आतंक मचाना आरंभ कर दिया शत्रुओं के रक्त और हड्डियों का गारा बना कर उसने कितनी ही मीनारें चिनवायी। दिल्ली लूटी और वहां खून की नदियाँ बहा दीं। इस प्रकार न जाने उसने कितने नगर उजाड़ दिये फसलों और बस्तियों में आग लगा दी। रोते और बिलखते लोगों की आवाजों उसे बहुत प्रिय थीं। प्रायः इसीलिए वह इस प्रकार की विनाशलीलाएँ रचना और आनन्दित होता था। उसे स्वयं कोढ़ हुआ व उसी नियति को वही प्राप्त हुआ जैसे उसने कृत्य किये।

बारहवीं सदी का मंगोल शासक चंगेज खाँ तो नृशंसता का पर्याय बन गया था। वह जहाँ भी जाता, उसका पहला काम कत्लेआम मचाना होता। लूटी गई सम्पदा से उसे जितना आनन्द मिलता उससे कई गुनी अधिक खुशी उसे नर-नारियों को भाले भौंकने और सिर काटने में होती थी। रूस के एक नगर में तो उसने ऐसी प्रलयलीला मचायी, कि वह वीरान हो गया। लाशों की सड़न से जब वहाँ बीमारी फैली, तो उसे स्वयं भी वहाँ से जान बचा कर भागना पड़ा।

चंगेज खाँ का बेटा हलाकू खाँ तो बाप को पीछे छोड़ गया। वह उससे भी खूँखार निकला ईरान पर चढ़ाई करके वहाँ के लोगों को गाजर-मूली की तरह काट डाला और रक्त से वहाँ की धरती को रंग दिया।

लिपजिंग (जर्मनी) के सेशन कोर्ट में सन् 1620 में बनेडिक्ट कार्पजे नामक एक न्यायाधीश था। क्रूरता में वह ड्रैक्युला का सहोदर जान पड़ता था। उसने अपने 46 वर्षीय कार्यकाल में कुल 52 हजार स्त्री-पुरुषों को फाँसी के फँदे पर चढ़ाया। वह इतना कठोर था कि छोटे से छोटे अपराध तक के लिए फाँसी की सजा सुना देता। औसतन पाँच व्यक्ति प्रतिदिन उसके इस अन्याय का शिकार होते थे। प्रायः वह कहा करता था कि जानवरों द्वारा फाँसी प्राप्त व्यक्तियों की लाश खाये जाने का दृश्य देखन में उसे एक अजीब आनन्द की अनुभूति होती थी, अतः ऐसे मौके पर वह अवश्य उपस्थित रहता था।

इन सभी उदाहरणों में सि एक बात की समानता वह है इन क्रूरकर्मियों की मौत। उपरोक्त सभी आततायियों की मृत्यु लगभग वैसी ही, उन्हीं परिस्थितियों में हुई, जिनमें वे दूसरों को मारना पसंद करते थे। इससे एक बात अवश्य सिद्ध होती है कि सूक्ष्म जगत की दानवी शक्तियाँ को वाहन बना कर उत्पात मचाती है, अन्त में स्वयं उन्हें भी नहीं छोड़ती। परोक्ष जगत की अनुशासित व्यवस्था का शिकंजा आसुरी सत्ता के प्रति कसता ही जाता है जब वे अपनी सीमा को लाँघ जाती है।


निंदा से विचलित क्यों हों?

प्रसिद्ध विचारक हरिभाऊ उपाध्याय के एक मित्र थे जो गाँधी जी के कटु आलोचक थे। यों गाँधी जी के आलोचकों की कमी नहीं थीं, लेकिन ऐसे आलोचक कम ही रहे जो उनके संपर्क में आने के बाद भी उनकी आलोचना निन्दा करते रहे हों। कारण कि जब भी कभी उनके सामने निन्दा-आलोचना का प्रसंग उठता तो वे प्रत्येक आलोचना का इस प्रकार उत्तर देते कि सामने वाले का हृदय उनके मानवीय गुणों के सम्मुख नतमस्तक हुए बिना नहीं रहता था।

उपाध्याय जी के उन मित्र को गाँधी जी की अहिंसा बड़ी आपत्तिजनक लगती थी। और वह जब भी अवसर मिलता गाँधी जी पर आक्षेप किये बिना नहीं रहते थे। एक बार उन्होंने बड़े उत्साह के साथ कहा कि यदि आप महात्मा जी से मेरभ् मुलाकात करा दें तो देश का भला होगा। क्योंकि मेरा मन महात्मा जी को खूब खरी खोटी सुनाने का है। ताकि वह अपनी रीति नीति बदलें और उनकी अहिंसा से देश को जो नुकसान होना बन्द हो जाय।

एक दिन सामना होने पर उपाध्याय जी को गाँधी जी से यह कहता ही पड़ा “बापू! यह हमारे आर्य समाजी मित्र हैं, बड़े दबंग और आपके कटु आलोचक। कई बार आपसे मिलने के लिए कह चुके हैं। “गाँधी जी ने हँसते हुए कहा- “हाँ-हाँ जरूर इनकी बातें तो जरूर सुनूँगा।” वे महाशय डिब्बे के अन्दर पहुँचे और खड़े खड़े ही गाँधी जी को अण्ट-शण्ट कहने लगे। बापू उनकी बातें सुनते हुए बोले कृपया बैठ जायँ। इससे आपको सुनाने में सुविधा होगी और मुझे सुनने में भी।

तभी गार्ड ने सीटी दी और गाड़ी ने प्लेट काम छोड़ दिया। उन महाशय को इसका कोई ख्याल नहीं रहा और वह अपनी आलोचना जारी ही रखे रहे। पता तो तब चला जब गाड़ी ने गति पकड़ ली और पता चलते ही उपाध्याय जी के मित्र के चेहरे पर घबराहट आ गई। मनोविज्ञान के पारखी गाँधी जी ने उनकी घबराहट का कारण जान लिया और कहा-”आप चिन्ता न कीजिए। आपकी बहुत सी बातों से मेरा भला हो रहा है और जो मुझे जंच रही हैं उन्हें ग्रहण कर रहा हूँ।” इतने में टिकट चेकर ने टिकट माँगा।

तत्काल गाँधी जी कह उठे। “यह मेरे साथ हैं। अभी अजमेर से सवार हुए हैं जल्दी के कारण टिकट नहीं बन सका। इसलिए इनका टिकट बना दीजिए” और गाँधी जी ने उनका टिकट बनवाया। टिकट बना कर टी.टी.ई. जैसे ही आगे बढ़ा गाँधी जी ने नितान्त सहज भाव से कहा-आप अपनी बात जारी रखिए।

लेकिन अब आलोचक महोदय से कुछ कहते नहीं बन रहा था। वह तो गाँधी जी के कारण अपनी फजीहत होने से बच जाने के कारण यह सोच रहे थे कैसा विचित्र है यह व्यक्ति जो अपने आलोचक के प्रति भी मैत्री का भाव रखता है। उसे एक भी अक्षर नहीं याद आ रहा था, जबकि उसकी किसी कटूक्ति पर उसे हाँ या अच्छा से अधिक कुछ सुनने को मिला हो। बापू ने उसके असमंजस को भाँप कर जवाब देते हुए कहा- प्रत्येक में दोष भी रहते हैं और गुण भी। मेरी भी यही स्थिति है। पर वास्तविक मनुष्य वही है जो अपने दोषों को खोज उनके निवारण का सच्चे हृदय से प्रयत्न कर रहा हो। अन्यथा उसे मनुष्य तो नहीं कहा जा सकता। आपने दोषों को खोजने में मेरी मदद की अतएव आपसे बड़ा मित्र और कौन होगा?


चिंता की चिता में जलते मन व उनका उपचार

पिछले कुछ सालों से मनोरोग बेतरह बढ़े हैं। इनकी बढ़ोत्तरी शारीरिक रोगों से भी अधिक है। जिस तरह पूरी तरह शारीरिक रूप से स्वस्थ कहें जा सकने वाले कम मिलेंगे। उसी भाँति पूरी तरह मानसिक रूप से ठीक व्यक्तियों की संख्या कम ही है। मन के ठीक न होने की स्थिति मनोरोग है। इसका मतलब हैं मन में गड़बड़ी और टूट-फूट।

क्रेंब्रिज विश्वविद्यालय के मनोरोग विशेषज्ञ डाँ. डेविड जान इग्लेबी ने अपनी पुस्तक “क्रिटिकल साइकियाट्री” में अमेरिका में मनो रोगियों की स्थिति को बताया है। उनके अनुसार एक ही वर्ष (1973) में बीस लाख हुआ। स्थित कम नहीं हुई। इसकी व्यापकता का अनुमान मानसिक चिकित्सा तन्त्र के बड़े आकार के आधार पर किया जा सकता है वहीं के “नेशनल इन्स्टीट्यूट आफ मेण्टल हेल्थ” ने इसका विस्तृत ब्योरा दिया है। इसके अनुसार पाँच लाख अट्ठानबे हजार नौ सौ तिरानवे सरकारी व एक लाख पैंसठ हजार गैर सरकारी अस्पतालों में काम करने वाले डाक्टरों की संख्या क्रमशः पाँच लाख पैंसठ हजार छह सौ छियानवे और दो लाख चौदह हजार दो सौ चौसठ है।

इतनी बड़ी संख्या और व्यवस्था को आइंस्टीन कालेज ऑफ मेडिसिन साइकियाट्री के प्रोफेसर डा. जोल कावेल, अमेरिकन मानसिक स्वास्वास्थ्य उद्योग का नाम देते हैं। उनका इस विषय में कहना है कि इस व्यवसाय में लगे लोग तो धनवान हो गए। पर रोगियों की संख्या की घटने की जगह बढ़ती जा रही है। इसका एक मात्र कारण है-समस्या पर ठीक से विचार न करना।

सामान्य बुद्धि के लोग परिस्थितियों को ही सब कुछ मान लेते हैं। यह भूल जाते है कि मानने की शक्ति कितनी अद्भुत है। मामूली सी बात असह्य संकट के रूप में दिखना और सचमुच ही किसी बड़ी विपत्ति का आक्रमण मामूली विपरीतता भर लगना अपने चिन्तन की ही दो दिशाएँ हैं। पहली में पड़कर व्यक्ति अपना सन्तुलन गँवा बैठता है। झाड़ी का भूत बन जाना-रस्सी का साँप दिखाई देना, जैसी भ्रम की प्रतिक्रिया प्रत्यक्ष हो जाती है। जबकि दूसरी के अनुरूप चिन्तन को सही रख सकना सम्भव हो सकता है। परिस्थितियों के साथ चिन्तन की सही संगति न बिठा सकने के कारण ही इतनी बड़ी संख्या में लोग मानसिक बीमारी से जकड़ते जा रहे हैं।

मानसिक बीमारियों से ग्रसित जिन्दगी का सहज आनन्द छिन जाता है। ऐसी स्थिति में वह सनकी, वहमी, शेखचिल्ली, उद्विग्न, असन्तुष्ट, आशंकाग्रस्त चिन्तित, निराश, भयभीत, उदासीन होता चला जाता है। उसका जीवन अपने लिए ही भार बन जाता है। उसके मन में ऐसे चक्रवात उठते रहते है, जो सोचने की स्वस्थ शैली को बुरी तरह तोड़-मरोड़ कर रख देते है। टूटी हुई मनःस्थिति में तथ्य को समझाना सम्भव नहीं रहता। कुछ के बदले कुछ समझना, कुछ करने की जगह कुछ करने लगना ऐसी ही विपत्ति हैं।

ऐसे मनुष्य अत्यधिक हताश रहते हैं। कभी एक तरह की गड़बड़ी करते हैं, कभी दूसरे तरह की। इन हरकतों को प्रेरणा देने वाली मनोवृत्ति को “एजीटेटेड डिप्रेसिव साइकोसिस’ कहा जाता है। न्यूरोटिक डिप्रेशन अथवा साइकोटिक डिप्रेशन एक अन्य स्थिति है। इसमें निराशा छायी रहती है, चित्त उदास रहता है। कुछ नया सोचने करने को जी नहीं चाहता। चुप चाप बैठे या पड़े रहना इनको पसन्द होता है मेनिकडिप्रेशन और एण्डोजेनिक डिप्रेशन की स्थिति में उतार-चढ़ाव आते है। कभी उत्तेजना कभी निष्क्रियता। कुछ दिन या कुछ समय वे सक्रिय दिखते हैं, किन्तु फिर ऐसा कुछ हो जाता है। कि जो किया था, उसे जहाँ का तहाँ छोड़कर फिर ठप हो जाते हैं।

अपने काम में लगातार गलती देखता और उसे सनक की तरह बार-बार दुहराना ‘आब्सेसिग कम्पलसिव न्यूरोसिस’ कहलाता है। बार-बार दाढ़ी बनाना और सोचना अभी भी बाल ठीक तरह नहीं साफ हुए। बार-बार झाडू लगाना और अनुभव करना गन्दगी अभी भी मौजूद है। बार-बार कपड़े, बर्तन आदि धोना घंटों नहाना और यह सोचते रहना कि काम पूरा नहीं हुआ, इसी रोग का लक्षण है। ऐसे में रोगी की स्थिति बड़ी उपहासास्पद हो जाती है।

यह तो कुछ सामान्य रोगों की बात हुई। इसके अलावा जटिल रोगों की बड़ी सूची है। सरकारी मानसिक अस्पतालों में प्रायः पागल ही पहुँचते है। गहरी उदासी, मानसिक तनाव, आदि रोगों से पीड़ित इक्के-दुक्के ही जाते हैं। इसके हल्के स्तर की विक्षिप्तता न तो उपचार के लायक समझी जाती है और न ही उसकी हानि का लेखा जोखा किया जाता है। तलाश किया जाय तो जनसंख्या में से आधे आदमी विक्षिप्तता के नजदीक की स्थिति ही में पाए जाएँगे। कितने ही शारीरिक समझे जाने वाले रोग भी मानसिक होते हैं। डाक्टर उन्हें अपनी जाँच-पड़ताल के आधार पर निरोग बताते हैं पर बीमार का कष्ट ऐसा होता है, जिससे वह गलता-घुलता चला जाता है।

अमेरिकन मनोरोग विशेषज्ञ जोल-कावेल के अनुसार मानसिक चिकित्सक इन रोगों का सामयिक निदान तो कर सकते हैं, पर स्थाई निदान के लिए व्यक्ति को स्वयं जागरूक होना होगा। होता यह है कि डाक्टर कुछ दवाइयों अथवा किन्हीं तकनीकों के आधार पर कारण को अवचेतन में दबा देते हैं, पर जैसे ही परिस्थितियों से उद्दीपन मिलता है, व्यक्ति फिर रोगी बीमार हो जाता है।

मानसिक रोग विशेषज्ञ एरिक फ्राँम का “मैन फार हिमसेल्फ” में मानना है कि इन रोगों की जड़े चिन्तन में समायी हैं। इसी को सँवारना होगा। अभी हम सोचते हैं कि किसे कब-कब क्या क्या दुर्व्यवहार हमारे साथ किया? अब तक कितनी बार असफलताएँ मिलीं कितनी हानियाँ उठानी पड़ी? सामान्यतया हमारी सोच इसी सबका लेखा जोखा करती रहती है। इसकी जगह यह सोचना चाहिए कि अपने पास जो भी है, पर्याप्त है। समय-समय पर जिनसे सहयोग सहायता मिली है, उस पर विचार करना चाहिए। इसके साथ ही यह अनुभव करना चाहिए कि हमारे पास शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक क्षमता काफी मात्रा में है। इनका सुनियोजन सभी परेशानियों को दूर कर सकता हैं।

विक्टोर पेकेलिस “रियलाइज योर पोटोन्शियल” नामक पुस्तक में एक उपाय बतलाते हैं- वह है किसी रचनात्मक लक्ष्य का निर्धारण। उनके अनुसार इसे व्यापक और आदर्श होना चाहिए। इस तरह का उद्देश्य निर्धारित करने से मानसिक टूटन खत्म होती हैं। विखरता मन धीरे-धीरे सिमट जाता है। यही नहीं उसे सामूहिक मन से अतिरिक्त ऊर्जा शक्ति भी मिलती है।

उन्होंने टालस्टाय टैगोर आदि महापुरुषों का उदाहरण देते हुए समझाया है कि इस प्रकार के लोगों ने अपने मन को ऐसे ही आदर्श में तन्मय कर दिया था। परिणाम स्वरूप उनका चिन्तन संवारा। साथ ही मनोरोगी होने की जगह स्वस्थ और सबल हुआ। विक्टोर का मानना है कि मन को आदर्श में न तन्मय करने से चिन्तन को एक जगह रोक पाना कठिन है। सही दिशा-धारा न होने से विकृतियों का घुसना स्वाभाविक है। इन्हीं का परिणाम मनोरोग है। अतएव इनसे बचने के लिए उपरोक्त तरीका ही अच्छा है। इसको अपना कर मन को स्वस्थ व शक्ति सम्पन्न बनाया जा सकता है।


प्रसन्नता- एक सुलझी हुई मनःस्थिति

आनन्द जीवन का लक्ष्य माना, समझा और कहा जाता है। पर यह स्मरण ही नहीं आता कि वस्तुतः यह शब्द किस भाव संवेदना के लिए प्रयुक्त किया जाता है और किया जाना चाहिए?

यदि आनन्द को प्रसन्नता के अर्थ में लिया जाय तो हर खुशी को इसी श्रेणी में गिना जायेगा। भले ही वह कितने ही बुरे उपायों से, बुरे उद्देश्य की पूर्ति के लिए, क्यों न की गई हो। चटोरे लोग स्वादों को चखने में मजा लेते हैं। कामुक प्रकृति के लोगों पर यौनाचार का भूत ही सवार रहता है। उस संदर्भ में उन्हें जब जितना अवसर मिला जाता है तब उन्हें उसी अनुपात से प्रसन्नता हाथ लग जाती हैं। शिकारियों को बधिकता में प्रसन्न होते देखा गया है। यहाँ तक कि चोर, उचक्के, ठग, प्रपंची का जब दांव लग जाता है तो शेखी बघारते और मूंछें ऐंठते देखे गये हैं। शोषकों की प्रकृति ही ऐसी बन जाती है कि उन्हें पर पीड़न में ही अपने दर्प की पूर्ति होती दिखाई देती है।

दृष्टिकोण में यदि सौंदर्य का पुट हो तो दृश्यमान पदार्थों और प्राणियों में से जो भी सुरुचि कर प्रतीत होते हैं, उन्हें देखने भर से प्रसन्नता होती है। उमड़ती मेघ–मालाएँ रात के समय हँसते तारागण, उड़ते पक्षियों की शोभाएँ, जलाशयों में उठती लहरें अनायास ही मन की कली खिलाती हैं चहकते पक्षी मन बहलाते हैं। खिलते फूल आँखों में रस भर जाते है। जमीन पर बिछी मखमली फर्श जैसी घास कितनी सुहावनी लगती है। हरे भरे खेत, हिलोरें लेते तालाब, शीतल हवा के झोंके संपर्क मात्र से प्रसन्नता प्रदान करते हैं। यह सब मिलाकर आनन्द से सराबोर झरने की तरह झरते हुए सहज पुलकन उत्पन्न करते हैं। सज्जनों के द्वारा किये गये सत्कर्म जब चर्चा का विषय बनकर कानों तक पहुँचते हैं तब तो लगता है मानों संसार में सर्वत्र सुखद ही सुखद भरा है। यह बिना मोल मिलने वाला आनन्द है। जिन्हें अपने चिन्तन में सदाशयता का समावेश किये रहना बन पड़ता है वे अपनी उपलब्धियों से ही नहीं आसपास के वातावरण से भी पर्याप्त मात्रा में आनन्द उपलब्ध कर लेत हे। इस प्रयोजन में प्रकृति की संरचना उसका स्वाभाविक रूप से समुचित सहयोग करती है। आनन्द से उत्पन्न हुआ व्यक्ति अपने निजी चुम्बकत्व के अनुरूप वातावरण स्वयमेव एकत्रित कर लेता है।

दुष्टता की अपनी एक विलक्षण प्रकृति है। वह जिधर भी घूमती है अपने ही अनुरूप देखती है। जिस रंग का चश्मा आँख पर पहना जाता है। उसी रंग से रंगी हुई सब वस्तुएँ दीखती हैं। स्वर्ग की तरह नरक भी एक दृष्टिकोण ही है। सज्जनों को सज्जनता का बाहुल्य इस संसार में दीख पड़ता है पर दुर्जनों को तो कहीं भी दुर्जनता के अतिरिक्त और दीखता सूझता ही नहीं। अपने अनुरूप वहाँ न भी हो तो कल्पना करके वैसा ही कुछ गढ़ लेते हैं। भूत पलीत प्रायः मन की आशंकाओं और कुशंकाओं के सहारे ही गढ़े होते है। उनकी वास्तविक उपस्थिति न होने पर भी झाड़ी ही वैसी आकृति बना लेती है और इस कदर डराती है। कि भयभीत मनुष्य को उससे जान बचाना ही कठिन पड़ जाय। रस्सी का साँप बन जाने की उक्ति प्रसिद्ध हैं आशंका और अविश्वास का मानस होने पर साधारण व्यक्ति ही शत्रु जैसे प्रतीत होते हैं और लगता है कि उनकी साधारण सी चेष्टाएँ भी उनके लिए कुछ षड्यंत्र जैसा गढ़ रही है।

अपने स्तर के लोग सभी आसानी से ढूंढ़ लेते हैं। उनके साथ घनिष्टता जोड़ते और अपने स्वभाव का गिरोह बना लेते हैं। जुआरी नशेबाज, व्यभिचारी, प्रकृति के लोग अपनी प्रकृति के सहचर कहीं से भी तलाश लेते है। न होने पर सामान्य लोगों पर अपनी आदतों का शिकार बनाकर देखते देखते मंडली खड़ी कर लेते हैं। जल कुँभी की बेल किसी जलाशय के निकट छोटे रूप उगती है फिर इतनी तेजी से बढ़ती है कि कुछ ही समय में उस समूचे जलाशय पर कब्जा जमा लेती है। मक्खी, मच्छर भी अपनी बिरादरी तेजी से बढ़ाते हैं और अल्प संख्या में होते हुए भी तेजी से बढ़ते हुए निकटवर्ती क्षेत्र पर आधिपत्य जमा लेते हैं। एक जैसी भूमि में विभिन्न प्रकाश के बीच पड़ने पर वे अपने अपने सजातियों की ही उत्पत्ति करते है।भूमि वही रहती है। खाद पानी भी एक जैसा मिलता है किन्तु पौधों की आकृति एवं प्रकृति वैसी ही देखी जाती है। जैसा कि बीज था। परिस्थितियाँ लोगों के सामने अलग-अलग प्रकार की आती हैं पर वस्तुतः वे मनःस्थिति का ही उत्पादन होती हैं। एक जैसे वातावरण में जन्मे और पले लोग चित्र विचित्र शैली के जीवनयापन करते और विभिन्न प्रकार की दिशा द्वारा अपनाते हुए कहीं से कहीं जा पहुँचते हैं। सगे भाइयों तक में अन्तर पाया जाता है। यह विभेद उनकी प्रकृति के अनुरूप आदतों से प्रेरित होकर विकसित होते है।

परिस्थितियां प्रतिकूल होने पर आवश्यक नहीं कि उन्हें दुर्भाग्य का ही अनुभव किया जाय। इसके विपरीत यह भी हो सकता है कि उन्हें अपने पुरुषार्थ के लिए चुनौती समझ कर अधिक हिम्मत और अधिक सूझबूझ से काम लिया जाय। सर्दी की ऋतु कड़ाके की ऐसी ठंड लेकर आ सकती है जिसके प्रभाव से कष्ट सहने और बीमार पड़ने की स्थिति दबोच ले। पर यदि सूझ बूझ से काम लिया जाय तो खिड़कियाँ बन्द करने गरम कपड़ों का प्रबंध करने जैसे उपायों से उसे मजेदार भी बनाया जा सकता है। तपाने वाली गर्मी के जूते और छाते का उपयोग करके उस दबाव को हलका किया जा सकता है। विरोधियों का आतंक भले ही कितना ही बड़ा क्यों न हो अपनी सच्चाई उजागर करने और भयभीत न होकर मुकाबला करने के लिए उठ जाने पर संकट का अधिकाँश भाग टल जाता है। अधिक रोगी भर्ती होने पर डाक्टर घबराते नहीं वरन् दूने उत्साह से दूना परिश्रम करते हुए अनेकों की जानें बचाते और स्वयं क्षेत्र प्राप्त करते है। इसी प्रकार अन्य प्रतिकूलताएँ सामने आने पर जो अपने धैर्य, साहस और प्रयास का अनुपात बढ़ा देते हैं वे उस संकट को पार ही नहीं कर लेते वरन् सर्व साधारण की दृष्टि में अपनी गरिमा में चार चाँद लगा देते हैं।

सोने का खरा होना कसौटी पर कसे जाने और आग में तपने पर ही सिद्ध होता है। इसके बिना उसकी प्रमाणिकता पर कहाँ कोई विश्वास करता है। मानने को तो किसान भी अभागा कहा जा सकता है जो पूरे साल भर कड़ी मेहनत करता और ऋतु प्रतिकूलताओं से जूझता है। पर जब उस प्रयास के फल स्वरूप कोठे भरा अनाज घर आता है तो सभी की बाछें खिल उठती है। और समझा जाता है कि कठोर परिश्रम में निरत होना और कठिनाइयों से जूझना उस समय कैसा ही क्यों न लगे पर अनंतः संतोष और आनन्द का निमित्त कारण ही होता है। आनन्द क्या है? उसके उत्तर में वैभव, विलास और शोभा श्रृंगार के साथ ही उसे नहीं जोड़ा जाना चाहिए क्योंकि उनके कारण शक्तियों का क्षरण ही होता है। प्रसन्नता एक मनः स्थिति है जिसे उपयोगी कार्य करते हुए शौर्य पराक्रम के साथ जोड़ा जा सकता है। कर्त्तव्य पालन का आनन्द ही वास्तविक है। उसके रहते प्रतिकूलताएँ भी अनुकूलताओं जैसा संतोष प्रदान करती है।


प्रकृति प्रेरणा का भयावह व्यतिरेक

मौत तो क्या बुढ़ापा भी नहीं टाला जा सकता पर इन दोनों का समय हम अपेक्षाकृत आगे धकेल सकते है। दीपक में पतली बत्ती डालें निर्वात स्थान पर रखें तो वह देर तक जलता रहेगा पर यदि बत्ती मोटी कर दी जाय, दीपक टूटा होने से तेल बहने की गुंजाइश रहे, रखे स्थान पर हवा के तेज झोंके आते रहें तो उसके असमय में ही बुझ जाने की आशंका है। जीवन भी एक ऐसी सम्पदा ह जो कुछ अपवादों को छोड़कर शेष सभी को समान रूप से मिली है। निर्धारित आयुष्य को हम चाहें तो पूरी अवधि तक बिना किसी कठिनाई के भोग सकते है।

सृष्टि के सभी प्राणी युवा होने की आयु से पाँच गुनी अधिक आयु तक जीते हैं। इस नियम को हम अपने परिचित पशु पक्षियों पर पूर्णरूपेण लागू होते देख सकते हैं। मनुष्य 25 वर्ष में युवा होता है। तद्नुसार वह 125 वर्ष तक जीवित रह सकता है। रूस के उजेविकस्तान क्षेत्र के लोग आमतौर से सौ वर्ष से अधिक जीते है॥ कितने ही तो 150 या उससे भी अधिक जीते देख गये हैं। इसके लिए उन्हें कुछ विशेष प्रयत्न नहीं करना पड़ता। मात्र इतना ही करते है कि प्रकृति के सामान्य नियमों का सरल मन से पालन करते रहते है। बस इतने भर से ही वे उस दीर्घायुष्य के लाभ को प्राप्त कर लेते हैं।

भारत गरम देश है तो भी यहाँ के जलवायु में साधारण आयु 100 वर्ष मानी गई है। आशीर्वाद मंत्र में सौ वर्ष जीने की सक्षम रहने की शुभ कामना व्यक्त की गई है। इसमें कुछ भी अत्युक्ति नहीं है। संसार के विभिन्न क्षेत्रों में अभी भी व्यक्ति ऐसे पाये जाते है। जिनकी आयु सौ वर्ष य उससे ऊपर है। इसके लिए उन्हें कोई जादुई आहार नहीं अपनाना पड़ा न कोई टॉनिक भस्म रसायन आदि का आश्रय लेना पड़ा। यह सब सहज स्वाभाविक रीति से ही होता रहा। प्रकृति की मर्यादाओं का उल्लंघन न करना यह एक ही पाया ऐसा है जिस अपना कर कोई भी व्यक्ति दुर्बलता रुग्णता से बचा रह सकता ह। और दीर्घजीवन का अधिकारी बन सकता हैं।

इस संदर्भ में सादगी सरलता नियमितता व्यवस्था आदि ऐसे गुण हैं जो जीवन को न केवल लम्बा बनाते हैं वरन् उसे स्वस्थ और सुखी भी रखते हैं। आहार और विहार की नियमितता बरती जाय तो क्षमताओं का अपव्यय न हो जिसके कारण जीवनी शक्ति का भण्डार चुकता है और साथ ही अशक्तता का दौर बुढ़ापे जैसी व्याधियों समेत असमय में ही आधमकता हैं।

चिड़ियाँ संख्या होते ही अपने घोसलों में लौट जाती हैं। सबेरा होने पर बसेरे से बाहर निकलती है। वन्य पशु भी ऐसा ही करते हैं। जिनकी संरचना भिन्न प्रकार से हुई है वही निशाचर पशु पक्षी, दिन में विश्राम करते और रात में आहार खोजने के लिए निकलते है। इस प्रकार आधा समय विश्राम के लिए और आधा समय श्रम करने के लिए मिल जाता हैं सभी प्राणी ऋतुओं के प्रभाव से यथा संभव बचते तो हैं पर साथ ही उनके संपर्क में भी रहता है। ऋतुएँ शरीर पर अपना प्रभाव छोड़ती हैं और वह उपयोगी भी होता है। सूर्य के संपर्क से सभी जीवनीशक्ति प्राप्त करते हैं। मनुष्य है जा अपनी जीवन चर्या में प्रकृति विरोधी व्यतिरेक करता रहता है। रात का बहुत देर तक जगता है। तेज प्रकाश के दबाव में आँखों पर मस्तिष्क तंत्र अनावश्यक दबाव डालता रहता है सीलन भरे अँधेरे वाले ऐसे मकानों में रहता है। दिन में सूर्य किरणों और साफ हवा का आवागमन नहीं होता। कपड़ों से लदे रहने पर ऋतुओं का प्रभाव भी शरीरगत सुदृढ़ता को सहज क्रम में नहीं बनने देता।

इन्द्रियों के माध्यम से जीवनी शक्ति का क्षरण होता है। इसमें अतिवाद बरतने भर से भण्डार समय से पहले ही चुक जाता है। आँखों पर, मस्तिष्क पर अतिशय दबाव और हाथ पैरों को समुचित श्रम करने का अवसर न मिलना ऐसा व्यतिरेक है जिसके कारण या तो अवयव बहुत जल्दी घिस जाते हैं और फिर निकम्मे पड़े रह कर जंग खाये जैसे निकम्मे हो जाते है। दोनों ही विपन्नताऐं ऐसी हैं जो स्वस्थता को चोट पहुँचाती हैं और जीवन की लम्बी अवधि पर खेदजनक कुठाराघात करती हैं। प्रकृति पुत्र अन्य सभी जीवधारी भोजन की तलाश में, विनोद-मनोरंजन के लिए दिनभर भागते दौड़ते रहते हैं। इसमें उन्हें समुचित श्रम करने का गहरी साँस लेने का और खुली धूप हवा में रहने का स्वच्छ जलाशयों में पानी पीने का अवसर मिलता है। यही है वह प्रकृति अनुसरण जिसके कारण उन्हें रोगों के चंगुल में नहीं फँसना पड़ता। दुर्घटनाओं को छोड़कर अकारण मृत्यु का शिकार नहीं बनना पड़ता।

प्राणि वर्ग में नर मादाओं के समूह साथ साथ मिल जुलकर रहते हैं। सामान्य समय में न उनमें कामुक चिन्तन चलता है न अश्लील छेड़-छाड़ की विडम्बना की पनपती है। गर्भाधान का उपयुक्त अवसर आने पर मादा की ओर से प्रणय निवेदन होता है। नर एक प्रयोग में ही उस आवश्यकता को पूरी कर देता है। फिर जब तक वैसी स्थिति न बने, दोनों पक्षों में से कोई भी यौनाचार का विचार नहीं करता। इस मर्यादा पालन के कारण ओजस् यथावत बना रहता है और उनकी दृढ़ता को अक्षुण्ण बनाये रखता है। उसके विपरीत मनुष्य किशोरावस्था की कच्ची उम्र से ही कामुकता के गर्त में गिरना आरंभ करता है और वृद्धावस्था तक उस कुचेष्टा को किसी न किसी रूप में अपनाये रहता है। फल यही होता है कि शरीरगत ओजस् तेजस् और आत्मिक क्षेत्र का वर्चस् निरन्तर घटता जाता है। ऊपर का कलेवर तो किसी प्रकार दर्शनीय बना रहता है पर भीतर वह जीवन नहीं रहता, जो रोग-कीटाणुओं के विरुद्ध लड़ सके। भीतर की गंदगी को बाहर निकालने की भूमिका को समुचित रीति से सम्पन्न करता रह सके। अंदर की गंदगी और बाहर की आक्रामकता, अभावग्रस्तता मिलकर व्यक्ति को खोखला बना देते हैं। जिन्हें संयम अपनाने की विवेकशीलता नहीं है वे अपने पैरों आप कुल्हाड़ी मारते हैं और असंयम की वेदी पर आत्महत्या जैसी दुर्घटना के शिकार बनते हैं। जिन्हें ब्रह्मचर्य का अन्यान्य इंद्रियों के संयम-सदुपयोग का ज्ञान नहीं, समझना चाहिए कि उन्हें जीवित रहने का, निरोगतापूर्वक दीर्घायु रहने का महत्व ही मालूम नहीं है।

प्राणि वर्ग में नर मादाओं के समूह साथ साथ मिल जुलकर रहते हैं। सामान्य समय में न उनमें कामुक चिन्तन चलता है न अश्लील छेड़-छाड़ की विडम्बना की पनपती है। गर्भाधान का उपयुक्त अवसर आने पर मादा की ओर से प्रणय निवेदन होता है। नर एक प्रयोग में ही उस आवश्यकता को पूरी कर देता है। फिर जब तक वैसी स्थिति न बने, दोनों पक्षों में से कोई भी यौनाचार का विचार नहीं करता। इस मर्यादा पालन के कारण ओजस् यथावत बना रहता है और उनकी दृढ़ता को अक्षुण्ण बनाये रखता है। उसके विपरीत मनुष्य किशोरावस्था की कच्ची उम्र से ही कामुकता के गर्त में गिरना आरंभ करता है और वृद्धावस्था तक उस कुचेष्टा को किसी न किसी रूप में अपनाये रहता है। फल यही होता है कि शरीरगत ओजस् तेजस् और आत्मिक क्षेत्र का वर्चस् निरन्तर घटता जाता है। ऊपर का कलेवर तो किसी प्रकार दर्शनीय बना रहता है पर भीतर वह जीवन नहीं रहता, जो रोग-कीटाणुओं के विरुद्ध लड़ सके। भीतर की गंदगी को बाहर निकालने की भूमिका को समुचित रीति से सम्पन्न करता रह सके। अंदर की गंदगी और बाहर की आक्रामकता, अभावग्रस्तता मिलकर व्यक्ति को खोखला बना देते हैं। जिन्हें संयम अपनाने की विवेकशीलता नहीं है वे अपने पैरों आप कुल्हाड़ी मारते हैं और असंयम की वेदी पर आत्महत्या जैसी दुर्घटना के शिकार बनते हैं। जिन्हें ब्रह्मचर्य का अन्यान्य इंद्रियों के संयम-सदुपयोग का ज्ञान नहीं, समझना चाहिए कि उन्हें जीवित रहने का, निरोगतापूर्वक दीर्घायु रहने का महत्व ही मालूम नहीं है।


Quotation

पाठकों की सूचनार्थ यह जानकारी प्रेषित की जाती है कि “हमारी वसीयत और विरासत” पुस्तक का अंग्रेजी अनुवाद रुंघ खढ्ढरुरु ्नहृष्ठ॥श्वक्रढ्ढञ्ज्नत्रश्व नाम से तथा गायत्री महाविज्ञान के तीनों खण्डों का सम्मिलित अँग्रेजी अनुवाद ञ्ज॥श्व त्रक्रश्व्नञ्ज स्ष्टढ्ढश्वहृष्टश्व ह्रस्न त्र्नंघ्नञ्जक्रढ्ढ .नाम से गायत्री तपोभूमि मथुरा द्वारा विगत श्रावणी पर्व पर प्रकाशित कर दिया गया है। दोनों का मूल्य क्रमशः 1 रु. तथा 10 रु. है। पत्र व्यवहार गायत्री तपोभूमि मथुरा से करें।


चिन्तन की अनगढ़ता ही दरिद्रता है!

जीवन चेतना का भी नाम है। शरीर अच्छा भला होते हुए भी यदि किसी कारण उसकी प्राण ज्योति बुझ जाय तो समझना चाहिए कि मृत्यु की घड़ी आ गई और जो शरीर कुछ क्षण पहले अपना काम ठीक प्रकार कर रहा था उसकी सभी हलचलों का समापन हो गया। इससे प्रतीत होता है कि प्राण में मनुष्य का परिचय उसके शरीर की स्थिति के अनुरूप समझा और बताया जाता है। पर उसकी वास्तविक क्षमता चेतन तत्व पर निर्भर है। यह तत्व बहुधा अचेतन के रूप में अवयवों का अनवरत संचालन करता रहा है और विराट सत्ता के साथ जुड़ जाने पर अतीन्द्रिय दिव्य क्षमताओं का भी परिचय देने लगता है पर साधारणतया उसकी विधि व्यवस्था विचार शक्ति के रूप में ही काम करती देखी जाती है। यों विचार नए-नए आते और उठते रहते हैं पर जिनका निरन्तर अभ्यास चलता रहता है वे भी अभ्यास सा स्वभाव बन जाते हैं। व्यक्तित्व के रूप में अपना परिचय देने लगते हैं।

शरीर में यों रक्त संचार प्रधान प्रतीत होता है पर बारीकी से पर्यवेक्षण किया जाय तो पता चलेगा कि जीवन सत्ता के हर पक्ष को विचार ही प्रभावित करते हैं। यहाँ तक कि रक्त संचार प्रश्वास, चयापचय, निमेष-उन्मेष आकुँचन-प्रकुँचन आदि में भी मन का ही एक अवचेतन नाम से जाना जाने वाला पक्ष काम करता रहता हैं।

नाम रूप से किसी का परिचय प्राप्त करना एक बात है, पर किसी की विशेषताओं को जानना हो तो उसके गुण कर्म स्वभाव को योग्यता विशेषता को जानना होगा। व्यक्तित्व इसी को कहा समझा जाता है। यह और कुछ नहीं विचारों क अभ्यस्त पक्ष का ही एक नाम है। कौन व्यक्ति क्या है? इसका वास्तविक परिचय जानना हो तो उसके अभ्यस्त विचारों का ही परिचय प्राप्त करना पड़ेगा। कारण कि उन्हीं के कारण शारीरिक और मानसिक गतिविधियों का प्रत्यक्ष संचालन होता है। प्रसन्नता, उदासी, नाराजी, निराशा आदि मानसिक परिस्थितियाँ ही हैं। जिनके कारण शरीर की आकृति प्रकृति में तत्काल अन्तर पड़ता दीखता है। शरीर जड़ पदार्थों का बना होने के कारण वह चेतना के अभाव में स्वेच्छापूर्वक कुछ भी कर सकने में समर्थ नहीं होता। उसे जैसी जैसी मानसिक प्रेरणाएँ मिलती रहती हैं तद्नुरूप ही उसके क्रिया कलाप का संचालन होने लगता है। मन चलने का आदेश देता है तो पैर चलने लगते हैं। खुजली का अनुभव हो तो उंगलियां बनाये स्थान को खुजलाने लगती हैं। मल मूत्र त्यागने की, भूख प्यास की अनुभूति सर्व प्रथम मस्तिष्क में ही होती है। इसके उपरान्त अन्य अवयव तद्नुसार सरंजाम जुटाने लगते हैं। नींद मस्तिष्क को ही आती हैं और देखते देखते पैर पसर जाता है। क्रोध आवेश की मनःस्थिति में उत्तेजित मस्तिष्क होने के कारण भूख प्यास और नींद भूख सब कुछ गायब हो जाते हैं और उत्तेजना से अनुप्राणित शरीर असाधारण और अस्वाभाविक गतिविधियां अपना बैठता है। चेतना एक दर्पण है। जिसका बारीकी से निहारने पर पता चलता है कि मनुष्य की अन्तरंग मनः स्थिति क्या हैं?

जीवन क्या है? विचारों की परिपक्वता से विनिर्मित एक स्वभाव समुच्चय। इसी कारण मनुष्य मनुष्य की शारीरिक संरचना में यत्किंचित अंतर रहते है। उसके वास्तविक मूल्याँकन में जमीन आसमान जैसा अन्तर पाया जाता है। शिष्ट अशिष्ट की भाव भँगिमाएँ उनकी वास्तविक स्थिति का अधिकाँश परिचय बिना पूछे बताये ही दे देती है। गुण, कर्म, स्वभाव का परिचय भी हाव भाव में हलचलों और क्रिया कलापों के सहारे बिना पूछ ताछ किए भी बहुत कुछ अंशों में मिल जाता हैं। वस्तुतः विचार ही मनुष्य जीवन के हर पक्ष पर छाए रहते हैं। अनुमान तो अन्य प्राणियों की मनःस्थिति का भी उनकी चेष्टाओं को देखकर लगता रहता हैं। मनुष्य तो विचार प्रधान जीवधारी है। उसकी समूची सत्ता और महत्ता विचारों से ही अनुप्राणित होती है। इसलिए संपर्क में आने वालों के सम्बन्ध में हम एक मोटा अनुमान सहज ही लगा लेते हैं। शरीर और मन पारस्परिक एक दूसरे के साथ विच्छिन्न रूप में जुड़े हुए पाये जाते हैं।

मनुष्य का मूल्याँकन उसकी आदतों के अनुरूप होता है। विचार ही शरीर पर विशेषतया मुख्य मण्डल पर छाए रहते हैं। उन्हीं की प्रेरणा से ज्ञात और विज्ञात चेष्टाएँ एन पड़ती हैं, जो किसी के स्तर एवं चरित्र का अधिकाँश परिचय देती रहती हैं।

इन तथ्यों पर जितना अधिक विचार किया जाय उतना ही स्पष्ट यह निष्कर्ष निकलता है कि मनुष्य और कुछ नहीं मात्र कुछ विचारों के संकेतों पर नाचने वाली कठपुतली मात्र है। जो अभ्यास में आते रहने के कारण परिपक्व हो जाते हैं और आदतों के रूप में अपना परिचय देने लगते हैं।

यह भी किसी हद तक है कि अभ्यस्त गतिविधियों के कारण विचारों का एक प्रवाह बन जाता है। पर यह और अधिक सही है कि विचारों की निजी क्षमता होती हैं और वह प्रयोग में आते रहने के कारण जीवन के अनेक पक्षों को प्रभावित करती है। यही कारण है कि किन्हीं आदतों को बदलने के लिए तदनुसार विचारों के परिवर्तन करना पड़ता है। उन्हें न बदला जा सकें तो क्रियाएँ अपने अभ्यस्त आचरण से विरत होने के लिए सहज तैयार नहीं होतीं। नशेबाजी का उदाहरण प्रत्यक्ष हैं। जिन्हें उस प्रकार की आदतें पड़ जाती है वे तक तक छूटती नहीं जब तक कि प्रतिपक्षी विचारों की सशक्तता समुचित दबाव न देने लगे। यही बात अभिनव आदतों के संबंध में भी है।

तथ्य और निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि जीवनक्रम में आवश्यक हेर-फेर करने के लिए तद्नुसार विचारों का गठन और परिपाक करना होता है। इसके बाद ही अभीष्ट परिवर्तन की बात बनती है। विचार जहाँ के तहाँ बने रहें तो चाहते हुए भी व्यक्ति अपने में कोई महत्वपूर्ण परिवर्तन कर सकने में समर्थ नहीं हो पाता।

इन दिनों बहू संख्यक लोगों की मान्यताएँ आस्थाएँ विचारणाएँ इच्छाएँ और गतिविधियाँ ऐसी हैं जिन्हें दूरदर्शी विवेकशीलता की कसौटी पर सही नहीं माना जा सकता। तात्कालिन लाभ की कल्पना में आकुल व्याकुल होकर लोग कुछ भी कराने को तैयार हो जाते हैं। इन्हें इतनी फुरसत नहीं होती कि क्रिया की प्रतिक्रिया का अनुमान लगा सकें और यह सोच सकें कि आज की उतावली कल कितने बड़े दुष्परिणाम उपस्थित कर सकती है। ऐसा उत्कट आभास न होने पर गाड़ी ढर्रे पर चलती रहती है। भली बुरी आदतें अपने स्थान पर जमी रहती है और मनुष्य व्यामोह ग्रस्तों की तरह वैसा ही करता रहता है जैसा कि दूरदर्शी विवेक शीलता के रहते वैसा करना अनुचित एवं हानिकर माना जाता है।

मनुष्य स्वभाव से अनुकरण प्रिय है। इर्द गिर्द के लोगों को जैसा करते देखता है उसी की नकल बनाने लगता है। उचित अनुचित का विवेक करने के लिए तो विकसित विवेकशीलता चाहिए। उसका प्रायः अभाव रहता है। जैसा कुछ अधिकाँश लोगों को करते देखा जाता है, उसी को सही मानने और अनुकरण करने का मन बन जाता है। दुर्व्यसन प्रायः इसी कारण छूत की बीमारी की तरह फैलते हैं। क्योंकि उन्हें अधिकाँश लोग अपनाते दीखते हैं। अस्तु विचारों के सुनियोजन पर सावधानी पूर्वक ध्यान दिया जाना चाहिए।

चिन्तन को सुगढ़ बनाने के लिए सतत् प्रयासरत रहना चाहिए।


स्वस्थ मनोरंजन मनुष्य की एक नैसर्गिक आवश्यकता!

मन को विश्राम देने की कला का नाम मनोरंजन है। इसी को आह्लाद खुशी अथवा हल्कापन लाने वाली विद्या भी कहा जाता है। शरीर को आराम देने के साथ मन के आराम की भी जरूरत हैं। विश्राम काल में शरीर को ढीला छोड़ना पड़ता है, और मनोरंजन के समय मन ढीला हो जाता है। यद्यपि बिना मनोरंजन के भी मन की थकान मिटाना संभव है। पर वह उच्च स्तरीय योग साधनाओं में लगे लोगों के लिए ही सम्भव है। जन सामान्य के लिए थके मन को राहत दिलाने का काम मनोरंजन के द्वारा ही बन पड़ता है। इसी कारण थक जाने के बाद लोग सिनेमा-टी.वी. देखने, गीत संगीत सुनने, कहानी, चुटकुले पढ़ने में खाली समय लगाकर मन को बहलाते हैं।

इस थकान मिटाने की जरूरत सभी को है। चौबीस घण्टे काम में जुटे रहने की सामर्थ्य साधारणतया किसी को नहीं होती। परिस्थिति विशेष में जब कभी भले ही सामान्य से अधिक काम किया जा सके। किन्तु इस ढर्रे को रोज अपनाने की चेष्टा करने पर रोग, अतिशयता, दुर्बलता का बिना बुलाए आधमकता गैर वाजिब नहीं है। अतएव जरूरी है शक्ति के अनुसार काम करने के बाद थकान को मिटाया जाय।

विश्राम के समय शरीर तो अपनी खर्च की हुई ताकत को पुनः अर्जित कर लेता है। पर इसके साथ मन की सक्रियता भी जुड़ी रहती है। मानसिक शक्तियों का खर्च होना भी स्वाभाविक है। मन तो सोते समय भी निष्क्रिय नहीं रहता। दिन भर जिन क्रिया कलापों में व्यस्त रहा गया है। रात को सोते समय इसकी क्रियाशीलता उसी धारा में बनी रहती है। यदि ऐसा न हो तो भी मन न जाने कितनी इच्छाएँ, संकल्प, विकल्प सँजोने में जुटा रहता है। क्योंकि सोते समय शरीर को तो विश्रामावस्था में छोड़ देते हैं, पर मन को भुला दिया जाता है, वह बेचारा उस समय भी काम में जुटा रहता है। इसे आराम मिले यह फिर से अपनी क्षमता का अर्जन कर सके, इसके लिए मनोरंजन निहायत जरूरी हैं।

पर यह प्रक्रिया मन से जुड़ी रहने के कारण केवल उथले स्तर तक सीमित नहीं है। इसका प्रभाव बहुत गहरा है। व्यक्तित्व की अनेक परतें इससे अछूती नहीं रहतीं। यही कारण है कि मनोवैज्ञानिकों ने इसकी शुद्धता और स्वस्थता अनिवार्य बताई है। स्वस्थ मनोरंजन जहाँ व्यक्ति को नई ताजगी देता, जीवन में रस घोलता और मनोभूमि में नूतन शक्ति का संचार करता है वही इसका अशुद्ध और अपरिष्कृत रूप उसे नीरस, कुण्ठित और पथभ्रष्ट बनाता है। जिस तरह स्वस्थ शरीर वाले व्यक्ति अनुपयुक्त आहार का क्रम अपना कर अपने शरीर स्वास्थ्य को चौपट कर लेते हैं, उसी तरह स्वस्थ मानसिकता का विनष्टीकरण अस्वस्थ मनोरंजन द्वारा सम्पन्न होता है। इसका अवलंबन मनुष्य को कुमार्गगामी और दुर्व्यसनी बना देता है। जहाँ स्वस्थ भाव में इससे व्यक्ति को आगे बढ़ने की प्रतिकूलताओं से डटकर लोहा लेने की, कठिनाइयों से संघर्ष करने की प्रेरणा मिलती है।

यह भी सही है, कि दुनिया के महापुरुषों से सामान्य जनों तक जिनकी प्रवृत्तियाँ विचार और कार्यक्षेत्र अलग-अलग रहते हैं और कोई भी चीज एक दूसरे से नहीं मिलती, इसके प्रति समान रूप से सजग रहते हैं। सभी व्यक्तियों में हास्य विनोद और आमोद-प्रमोद की प्रवृत्ति समान रूप से विद्यमान रहती है।

इसकी आवश्यकता और महत्ता इतनी है कि इसे जीवन का अभिन्न अंग कहा जाना कोई अतिशयोक्ति न होगी। पर इसे दुर्भाग्य ही कहा जायेगा कि उसके स्तर की ओर हमारा कोई ध्यान नहीं रहता। गरीबी अशिक्षा संकीर्णता अथवा कुछ अन्य जो भी कारण हों, अधिकाँश लोग इसकी जरूरत तो महसूस करते हैं, पर इसके महत्व और प्रभाव को नहीं समझते। अथवा यह कहा जाय कि उसे हेय स्तर का बनाए रखने में ही मन के किसी कोने को प्रसन्नता मिलती हैं।

एटकिन्सन ने अपने उपरोक्त ग्रन्थ में इसके अच्छे और बुरे स्तर के बारे में स्पष्ट धारणा व्यक्त की है। उनके अनुसार जो पशु प्रवृत्तियाँ भड़काये, दोष-दुर्गुणों को उभारे वह हेय तथा जो मानवीय गुणों के प्रति आस्था जाग्रत करे वह उत्कृष्ट। इस माप दण्ड के आधार पर सभी उपलब्ध मनोरंजन साधनों का विश्लेषण किया जा सकता है।

आजकल उपयोग में लाए जा रहे साधनों में फिल्म व साहित्य की प्रमुखता है। किन्तु खेद है, इस कसौटी पर कसने में निराशा ही हाथ लगती है। फिल्में देखकर पशु प्रवृत्तियों के शिकार हुए लोगों की कितनी ही घटनाएँ नित्य प्रकाश में आती हैं। गीत संगीत के नाम पर अधिकतर फिल्मी गानों का ही उपयोग किया जाता है। प्रचलित साहित्य की भी यही हालत है। मानवीय गुणों के प्रति आस्था जाग्रत करने वाले उपन्यास, कहानियाँ, कविताएँ कम ही दिखाई पड़ती हैं और सस्ती रोमाँटिक पुस्तकों की बाढ़ दिखाई देती है।

लोग इनका उपयोग इस कारण करते हैं कि उन्हें मनोरंजन की आवश्यकता खुराक मिलती रहे। परन्तु प्रभाव की बारीक बातों का चयन करने की क्षमता जनसाधारण में नहीं होती। यह एक मनोवैज्ञानिक तथ्य है कि व्यस्तता की अपेक्षा खली समय में मन बड़ी गहराई से प्रभावित होता है। हम जब निश्चित मुद्रा में अवकाश के समय कोई बात सुनते हैं तो देर तक वह स्मरण में बनी रहती है और बड़ी जल्दी में कहीं जा रहे हो तो कोई बात सुनकर भी वह जल्दी भूल जाती है। व्यस्त लोगों को अपने आस-पास क्या हो रहा है? इस बात का भी ध्यान नहीं रहता।

अमेरिकन मनोवैज्ञानिक जे.ए..फ्लेमिंग ने “द स्टडी आफ ह्यूमन साइक” में मनोरंजन की प्रक्रिया की तुलना सम्मोहन से की है। उनके अनुसार सामान्यता मनोरंजन हम उसी समय करते हैं जब हमारा मन खाली हो। उधेड़ बुन में फँसा मन प्रायः मनोरंजन नहीं पसंद करता। सम्मोहन भी खाली मन में डाले गए कुछ संकेत ही हैं। विशेष उपचारों एवं तकनीकों के कारण भले ही उसकी शक्ति में कुछ बढ़ोत्तरी हो जाती हो, लेकिन मूल में एक ही तथ्य है- खाली मन में डाले गए संकेत और निर्देश। मनोरंजन के प्रभावशाली होने की भी यही रीति-नीति है। वह तथ्य को प्रेरणाएँ बनाकर प्रस्तुत करता हैं।

इसका प्रभाव संस्कारों के रूप में भी पड़ता है। यदि वे तत्काल कोई प्रभाव नहीं भी दर्शाते तो कालांतर में जब संस्कार दृढ़ हो जाते हैं, तब अपना घातक असर पैदा करते हैं। अतः मनोरंजन को केवल थकान मिटाने का साधन ही नहीं बल्कि मन को प्रभावित करने वाली एक कला के रूप में देखा जाना चाहिए और जो चीज कुरुचि जगाए, विकृतियाँ बढ़ाए, उनसे दूर रहना चाहिए।

एक परिष्कृत एवं स्वस्थ रूप वह भी है, जो मन के साथ-साथ शरीर को भी लाभ पहुँचाए। इस दृष्टि से खेल-कूद कबड्डी आदि क्रीड़ा अभ्यासों को भी शामिल किया जा सकता है। इसका इतना ही मतलब है कि मन के खिंचे हुए तार थोड़े ढीले करें और जीवन वीणा को इस योग्य रहने दें कि पुनः जब उसका साज बजाना हो तो, वह पहले की भाँति सक्रिय सतेज और सुमधुर हो। हमें मनोरंजन के महत्व और स्तर को समझ कर उसे अस्वास्थ्यकर और हानिप्रद ढंग से प्रयोग में नहीं लेना चाहिए।


नारी अबला नहीं, शक्तिशाली है

सामाजिक नव निर्माण के क्षेत्र में महिलाओं की भूमिका के प्रश्न को विवादास्पद माना जाता रहा है। अभी भी स्थिति अनिर्णीत ही हैं। लोगों का मत है कि फ्लोरेंस नाइटिंगेल, जोन आफ आर्क का सामाजिक क्षेत्र में नेतृत्व सिर्फ इसलिए सफल रहा क्योंकि उनके देश की सामाजिक संरचना इसके अनुकूल थी। जबकि भारत की सामाजिक स्थिति पर्याप्त भिन्न है। यहाँ पर पश्चिमी उदाहरणों को प्रामाणिक नहीं ठहराया जा सकता।

कुछ अंशों में बात सही भी है प्रत्येक देश की अपनी सामाजिक स्थिति होती है। अनेक बातों में स्वाभाविक भिन्नता भी। ऐसी दशा में जो प्रक्रिया एक स्थान पर सम्भव है दूसरे स्थान पर असम्भव भी हो सकती है। किन्तु अपने देश में सामाजिक नवगठन के क्षेत्र में महिलाओं का योगदान मात्र पश्चिम का अंधानुकरण भर नहीं है अपितु सुदूर अतीत से इसकी अपनी गौरवमयी परम्परा रही हैं।

यह मान्यता पूर्णतया भ्रमात्मक है कि स्त्रियाँ सामाजिक जीवन में पुरुषों के बराबर सफलता प्राप्त करने में अक्षम है। पुरुषों और महिलाओं में शारीरिक संरचना एवं क्रियाविधि सम्बन्धी कुछ अन्तर हो सकता है। पर मानसिक प्रखरता अन्तर हो सकता है। पर मानसिक प्रखरता बौद्धिक तेजस्विता के क्षेत्र में वे न केवल समान हैं अपितु एक कदम आगे भी। इतिहास में कई ऐसे उदाहरण मिलते हैं जबकि ज्ञान विद्वत्ता शौर्य और सेवा के क्षेत्रों में से कई में जिन्हें केवल पुरुषों के वश में समझा जाता रहा है, उनमें महिलाओं ने पुरुषों से भी अधिक सफलता प्राप्त की। प्राचीनकाल में घोषा गोधा, शाश्वती, सूर्या, सावित्री, अनुसुइया आदि कई विदुषियाँ थी ज्ञान तत्वविधा के साथ बल और शौर्य में पुरुषों से शानी रखती थीं। दशरथ की पत्नी कैकई ने तो एक बार हारते हुए दशरथ को युद्ध क्षेत्र में अपने रण कौशल से विजय भी दिलाई थी। यही कारण है कि प्राचीन नीतिकारों ने राज सिंहासन का आधा भाग महारानी के लिए अनिवार्य घोषित किया था। उसे राजा के बदाबर न्याय और प्रशासन का अधिकार भी मिला हुआ था।

न केवल प्राचीन काल में बल्कि मध्ययुग में भी लक्ष्मी बाई, दुर्गावती, अहिल्या बाई आदि कई महिलाएँ हुई हैं जिन्होंने पुरुषों के कार्य क्षेत्र में घुसकर उन्हें पीछे छोड़ दिया था, कहा जा सकता है तब परिस्थितियाँ कुछ और थीं। अब विगत दिनों की अंधकार बेला ने महिलाओं की शक्ति को कुँठित कर दिया है और उनकी क्षमता और शक्ति को जंग लग गयी हो तो यह भी निराधार ही सिद्ध होता हैं स्वतंत्रता संग्राम के समय जन चेतना जाग्रत करने में कस्तूरबा, सरोजनी नायडू कमलानेहरू, राजकुमारी अमृतकौर, विजय लक्ष्मी पंडित कमला देवी, चट्टोपाध्याय, भीकाजी, कामा, अवंतिका बाई गोखले, आदि अनेकों महिलाओं ने जो कार्य किया उसे किसी भी रूप में पुरुषों द्वारा चलाए गए अभियानों से कम नहीं कहा जा सकता। ये तो हुई विशिष्ट महिलाओं की बात साधारण स्त्रियों ने भी स्वतंत्रता आन्दोलन के उन मोर्चों को फतह कर दिया जिन्हें पुरुषों ने अपने वश से बाहर का जान कर छोड़ दिया था। विदेशी और वस्तुओं के बहिष्कार का जब आह्वान किया गया तो सत्याग्रह का एक बड़ा रूप सामने आया पिकेटिंग। पिकेटिंग में उन दुकानों पर जिन पर कि विदेशी वस्तुएँ बेची जाती थीं धरना दिया जाता था। पुरुषों को प्रारम्भ में इस कार्य में सफलता नहीं मिली तब आगे आयीं महिलाएँ और उन्होंने तब तक धरना दिए जाने की दृढ़ता दिखाई जब तक कि दुकानें बन्द न हो गई।

भारत की विभूतियों में अग्रगण्य सरोजनीनायडू ने उच्चशिक्षा प्राप्त करने के बाद भी समाज और संस्कृति के प्रति अपने दायित्व को निभाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। न केवल राजनैतिक स्वतन्त्रता के लिए वरन् मनुष्य को दास बनाने उसे अपने अधिकारों से वंचित करने के प्रत्येक कारण के विरुद्ध लड़े गए धर्म युद्ध में योद्धा की भूमिका निबाही। अफ्रीका में प्रवासी भारतीयों के हितों की रक्षा, असहयोग सत्याग्रह, नारी उत्कर्ष समाज सुधार, बाल सुधार, साक्षरता, शिक्षाप्रसार, आदि कई उनकी समाज सेवा साधना के अंग रहें। श्रीमती शचीरानी गुर्दू के अनुसार वे सफल कवियित्री पटु राजनीतिज्ञ, कुशलता, सजग कार्य कर्त्री और साथ ही साथ सफल गृहणी भी थीं। सन् 25 में काँग्रेस के कानपुर अधिवेशन की अध्यक्षता करते हुए उन्होंने यह सिंह गर्जना की कि देश व समाज के नवसृजन काल में कायरता सबसे अक्षम्य अपराध और निराशा सबसे बड़ा भयानक पाप हैं।

एक प्रख्यात लेखक ने जागरूक भारतीय महिलाओं के सम्बन्ध में लिखा हैं। भारतीय राष्ट्रीयता स्वीकार करने वाली एनीबेसेन्ट भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस की अध्यक्ष बनीं। यही पद बाद में सरोजिनी नायडू ने सुशोभित किया। श्रीमती नायडू एवं श्रीमती हीराटाटा ने महिलाओं के मताधिकार का प्रश्न लेकर आन्दोलन भी चलाया। कमला देवी चट्टोपाध्याय प्रथम महिला थीं जो चुनाव में खड़ी हुई। स्वतन्त्रता आन्दोलन का संचालन करने वाली वीरांगनाओं में श्रीमती भीकाजी कामा, विजय लक्ष्मी पण्डित मृदला साराभाई लक्ष्मी मेंनन अरुणा असफअली, दुर्गाबाई देशमुख कमला नेहरू, मणिबेन, पटेल सुशीला नैयर, पद्मजा नायडू अनुसुइया बाई काले आदि नामों की एक लम्बी सूची है जो भारतीय समाज में महिलाओं के गौरव को प्रकट करती है।

यह आरोप स्वतः ही आधारहीन सिद्ध हो जाता है कि महिलाएँ पुरुषों की तुलना में उन्नीस ठहरती हैं। जब कि सचाई यह है कि वे कई मामलों में इक्कीस भी सिद्ध होती हैं। यदि आज कुछ क्षेत्रों में वे पुरुषों से पिछड़ी दशा में हैं तो इसका कारण यह नहीं है कि उनमें कोई न्यूनता है। सही कारण है कि उन्होंने अपने पराक्रम अंतःशक्तियों को विस्तृत कर रखा है। महिलाएँ अबला नहीं हैं। आचार्य विनोबा भावे ने तो महिला की एक नवीन और सटीक व्याख्या कर डाली है कि अगला शब्द बहुत बाद का हैं। उससे पूर्व हमारे यहाँ महिला शब्द व्यवहृत होता रहा है जिसका अर्थ है, महान शक्तिशाली। वस्तुतः नारी अबला नहीं महान शक्तिशाली है और समाज के विकास के नेतृत्व को अपनी प्रखरबुद्धि के सहारे संभाल सकती है।

कहा जाता है कि समय की हवा में तिनका भी तूफान बन जाता है। आज वही समय है ऐसे में शक्ति स्वरूपा नारी प्रचण्ड शक्ति बनकर उभर सके तो कोई आश्चर्य नहीं। माता जी और श्री अरविन्द ने इक्कीसवीं शती को स्पष्ट शब्दों में वदर्स सेंचुरी अथवा “मातृ-शती” कहा है। उनका आगे कहना है कि इस शताब्दी में शासन सुव्यवस्था की जिम्मेदारी नारी के हाथ में होगी पुरुष उसका सहायक भर होगा। एक प्राचीन कहावत का जिक्र करते हुए वह कहते हैं कि जिस देश, समाज, संपत्ति पर नारी का शासन होता है वह समृद्ध रहती है। महर्षि अरविन्द के शब्दों में कालचक्र पूर्ण वेग से गतिमान है। भवितव्यता नारियों पर अपने अनुदानों की वर्षा करने पर उतारू है। ऐसे में उन्हें विचारों और दृष्टिकोण के विस्तार एवं भावनात्मक परिष्कार के क्षेत्र में बहुत आगे बढ़ना होगा ताकि वे आगामी दिनों में सार्वजनिक कार्यों की व्यवस्था को संभालकर समाज का नेतृत्वकर सकें।


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अपना स्वभाव कछुए का सा बनाएँ। जरासे स्पर्श के डर से उचकने वाला मेंढक सा नहीं। खतरा कठिनाई सा असफलता एक व्यक्ति को परेशान कर देती है तो मनस्वी को और अधिक सफल बनाती है।


अपनों से अपनी बात

घरेलू व्यक्तिगत विशेष अवसरों पर मित्र परिवारी सम्बन्धी सभी एकत्रित होते है ताकि उस विशिष्ट घटना की प्रतिक्रियाओं से परिचित होने के अतिरिक्त आवश्यक योगदान भी दे सकें। प्रसवकाल में जहाँ सुसमाचार मिलने की सम्भावना रहती है वहाँ असह्य कष्ट से लेकर जोखिम तक का खतरा रहता है। सगे संबंधी इस सूचना को पाकर इर्द−गिर्द ही रहते हैं ताकि किसी प्रकार की आवश्यकता पड़ने पर अपना कोई रोल निभा सकें।

विवाह समय में भी ऐसी ही उपस्थिति आवश्यक समझी जाती हैं कि परिवार से जुड़े नये सदस्य बढ़ने और उस आगमन के साथ नई परिस्थितियाँ बनने सम्बन्ध में अपनी उपस्थिति का प्रभाव सभी संबंधित लोगों पर छोड़ सकें। मित्र की प्रसन्नता में भागीदार बन सकें। मृत्यु बीमारी या दुर्घटना का समाचार सुनकर भी स्वजन दौड़ आते हैं। लोकाचार निर्वाह के लिए ही नहीं, इसलिए भी कि उस संकट की घड़ी में उनको किसी प्रकार की सहायता अपेक्षित हो तो उसे भावना पूर्वक कर सकें। बिखरे हुए कुटुम्बी अक्सर किसी बड़े त्यौहार पर एकत्रित हो लेते हैं, ताकि दूर दूर रहने के कारण जो आत्मीयता घट जाती है उसे साल में एकबार तो तरोताजा करके अपेक्षा वृत्ति विकसित न होने दी जाय।

प्रज्ञा परिवार के इस दिशा में बड़े कदम मथुरा में सहस्र कुण्डीय गायत्री महायज्ञ के साथ सम्पन्न हुए। उन दिनों परिवार में जितने प्रमुख सदस्य थे वे लगभग सभी उस अवसर पर एकत्रित हुए। उद्देश्य था देव संस्कृति को उपेक्षित स्थिति से उबारना और उसमें पुनर्जीवन जैसी प्राण चेतना उत्पन्न करना। पाँच दिन के आयोजन में अत्यन्त महत्त्वपूर्ण और दूरगामी परिणाम उत्पन्न करने वाले निर्णय हुए। साथ ही एक सुनियोजित संगठन भी बनाया गया। युग निर्माण परिवार नाम दिया गया। उपस्थित लोगों में जो अतीव कर्मठ ढूँढ़े गये उन्हें उस संगठन को संयोजक बना दिया गया। उन्होंने जाते ही अपने क्षेत्र में प्राणपण से काम करना शुरू किया। बाद में हजारों सम्मेलन, समारोह ऐसे स्थानों पर हुए। सहस्रों ही प्रज्ञापीठों के भवन बने और ऐसे रचनात्मक और सुधारात्मक आन्दोलन आरंभ हुए जिनकी प्रगति देखते हुए संसार भर में तहलका मच गया। इस प्रयास को अपने ढंग के अद्भुत पराक्रम और अभूतपूर्व अभियान की संज्ञा दी जाने लगी। वही एक बार लगा हुआ जोरदार धक्का अब तक काम देता आया है और स्थिति यहाँ तक पहुँच गई है कि “इक्कीसवीं सदी उज्ज्वल भविष्य” नाम से जाने जाने वाले संसार भर को झकझोर कर रख देने वाले आन्दोलन का सुनियोजित उद्गम केन्द्र शांतिकुंज बन गया है। उसे गंगोत्री, जमुनोत्री, अमरकंटक, मानसरोवर स्तर का देव सरिताओं का उद्गम स्वीकारा जा रहा है। ऐसी ही उसकी छवि भी बन रही हैं।

इक्कीसवीं सदी के आगमन में अभी 11 वर्ष से कुछ ही अधिक समय बाकी है इस अवधि का संधिपर्व माना गया है। संध्याकाल, ग्रहणकाल, ऋतु परिवर्तन आदि ऐसे ही मध्यान्तर होते हैं जिनमें अपने अपने ढंग की विशेषताएँ देखी जाती हैं। सन् 89 आरंभ होकर सन् 2000 तक चलने वाले इन बारह वर्षों में प्राणवानों के निमित्त महाकाल की एक विशेष चुनौती माना गया है। और कहा गया है कि वे निजी कारोबार में व्यामोह में संभव कटौती करें और युग धर्म के परिपालन में ऐसा उच्चस्तरीय दायित्व निबाहें जिनमें उद्भूत तप ऊर्जा से नवयुग की ज्ञानगंगा के सतयुगी गंगावतरण की घटना की फिर से पुनरावृत्ति देखी जा सकें। यह युगसाधना मूलतः भाव, ज्ञान और कर्म के अदृश्य तथ्यों पर निर्धारित हैं पर सर्व साधारण को दृश्यमान परिचय प्राप्त हो सके, इसके लिए बाहर वर्षीय प्रत्यक्ष पुरश्चरण की आवश्यकता पड़ी। उपयुक्त वातावरण बनाने, इसे अपनाने और प्रवाह में बहने की इससे आशा की गई है। सन् 89 के आरंभ से ही युगसंधि पुरश्चरण शान्तिकुँज हरिद्वार में विधिवत् आरंभ हो गया है। प्रज्ञा संस्थानों और प्रज्ञा मण्डलों में उसकी छोटी अनुकृतियाँ साप्ताहिक सत्संगों के रूप में हो रही हैं। दीपयज्ञ के विशालकाय समारोह इसी संदर्भ में हो रहे हैं और भी अनेक गतिविधियों का उद्घाटन, शुभारंभ विस्तृतीकरण अपने ढंग से हो रहा है, जिनका प्रत्यक्ष परिचय परिजनों को समय-समय पर मिलता रहेगा। प्रस्तुत गुरुपूर्णिमा से तो बड़ा प्रत्यक्ष कार्य इतना ही किया गया है कि हरिद्वार के वर्तमान में आश्रम के ही 50 कमरे नये बनाने का कार्य आरंभ हो गया है ताकि इस युग समारोह के भागीदारों को यहाँ आने पर किसी प्रकार ठहरा तो सकें।

राम वनवास, पाण्डवों का वनवास नल-दमयंती का बन निवास प्रायः बारह बारह वर्ष का ही था। बारह वर्ष का एक युग भी माना जाता हैं। हर बारह वर्ष में इस संसार में अत्यन्त महत्वपूर्ण परिवर्तन भी होते रहते हैं। जिन्हें सूक्ष्मदर्शी प्रज्ञावान अधिक स्पष्टता से देख सकते हैं। अखण्ड ज्योति परिजनों में से प्रत्येक से यह अपेक्षा की गई है कि इस परिवर्तन पर्व में वे मात्र मौन दर्शक न रहेंगे। भीम, अर्जुन, अंगद, हनुमान जैसे पराक्रम न सही तो वे शबरी, गिलहरी, गिद्ध जैसी हलकी-फुलकी भूमिका तो अवश्य निभा सकेंगे। समय का अपना महत्व होता है। जो गुजर जाने पर फिर हाथ नहीं आता। सत्याग्रह संग्राम में जो आड़े दिन के लिए सम्मिलित हुए वे स्वतंत्रता सैनिक कहलाये, गौरवान्वित हुए और अनेक सुविधा उपहारों से अपने को कृतकृत्य कर सके। समझा जाना चाहिए कि युगसंधि के बारह वर्ष इतने बड़े आन्दोलन की भूमिका है जिसे युगान्तरीय अभियान के रूप में चिरकाल तक स्मरण किया जा सकेगा।

प्रस्तुत महापुरश्चरण का एक पक्ष है सूक्ष्म वातावरण को सृजनात्मक प्राण ख्तना से भर देना। दूसरा है इस महा अभियान में सम्मिलित होने वालों की प्रत्यक्ष प्रतिभा का परिवर्धन करना, प्रतिभा हो तो प्राण चेतना और उसी के आधार पर मनुष्य की जीवट, दूरदर्शिता, साहसिकता, क्षमता, दक्षता जैसी अनेकानेक विशेषताएँ उभरती हैं। उन्हीं के बल पर लोग लौकिक जीवन में सम्पन्नता और आन्तरिक जीवन की महानता अर्जित करने में सफल होते हैं। धन तो धूप-छाँव की तरह आँख मिचौनी खेलता रहता है, किन्तु यदि प्रतिभा का स्तर परिष्कृत जैसा बन जाय तो उसकी लाभ श्रृंखला पीढ़ी दर पीढ़ी चलती रहती है। अपने और दूसरों के लिए आगे बढ़ने, ऊँचा उठने का पथ प्रशस्त करती रहती है। सम्पत्ति से भी अधिक आत्मिक महानता का परिचय देने वाली विभूतिमत्ता का प्रतिफल अनेक गुना स्थायी भी है और महान भी।

युगसंधि काल में साधना परक तपश्चर्या की साधना में जहाँ व्यक्ति की स्थिति के अनुरूप उपासना का विधान है, वहाँ हर भागीदार को न्यूनतम दो घंटे समयदान के रूप में अपने क्षेत्र में अनुदान प्रस्तुत करते रहने का भी विधान हैं यह पुण्य और परमार्थ का समन्वय ऐसा है जिसके फलस्वरूप भागीदारों की प्रतिभा का परिष्कार वातावरण में सृजन चेतना के समावेश और नव निर्माण में पुरुषार्थपरक योगदान के तीनों पक्ष जुड़े हुए हैं और त्रिवेणी संगम की समता करते हैं। अभियान की भागीदारी को एक शब्द में उदीयमान सौभाग्य कह सकते हैं।

यों इस उदीयमान प्रकाशपुँज से आलोकित तो विश्व का कोना-कोना होगा, पर उस सूत्र संचालन में भागीदारी प्रमुखता और प्राथमिकता रहेगी। कहावत है कि शालीनता और उदारता का प्रारंभ अपने घर से करना चाहिए। अपने निजी शरीर के उपरान्त मनुष्य क सबसे अधिक प्रभाव अपने परिवार पर ही होता है। कारण कि उप परिवार के लोग अनेक आदान-प्रदानों के सहारे असाधारण रूप से गुथे रहते हैं। शान्तिकुँज ने मानवी सभ्यता के पुनरुत्थान का कार्य अपने हाथों आन्दोलन के रूप में शुरू किया है। यों उसके सहभागी तो करोड़ों बन गये हैं और बनेंगे, पर शुभारंभ श्री गणेश के समय तो घर-परिवार के लोग ही पुकारे जाते हैं। उनके सहयोग पर उत्साह भी बढ़ता है और उपेक्षा बरतने पर निराशा भी होती है।

संदेशों और दायित्वों की एक निराली श्रृंखला है। उसकी कड़ियाँ समयानुसार खुलती ओर दृष्टिगोचर होती रहेंगी। इसमें से प्रथम चरण यह है कि अखण्ड ज्योति के सभी सदस्य एक बार समय निकाल कर नौ दिन के लिए शांतिकुंज एक सत्र में सम्मिलित होने की तैयारी करें। एक पुरश्चरण इस देव भूमि पर कर लेने से जो महानता उनके भीतर दबी पड़ी है, वह निखरेगी। महाकाल की वाणी सुन सकने लायक अपने बंद कपाट खुलेंगे। डायनुमों के संपर्क से अचानक बुझी बैटरी फिर सक्रिय हो जाती है। साधना सत्रों का यही प्रधान उद्देश्य हैं।

युगसंधि महापुरश्चरण की वातावरण को संशोधित करने वाली आध्यात्मिक प्रक्रिया अगले दिनों तेजी से चलेगी और उसके एक करोड़ भागीदार बनेंगे। सन् 2001 में इस महासाधना के युग की पूर्णाहुति होगी। इन ग्यारह वर्षों में एक लाख प्राणवान कार्यकर्ता कार्य क्षेत्र में उतार दिये जायेंगे दस वर्ष जीवित रहने के अवकाश शायद हमें न मिले। क्योंकि अन्य अत्यन्त प्रचण्ड चोर्ये इतने विशालकाय हैं जिन्हें सूक्ष्म शरीर की शक्ति से ही तोड़ा जा सकता है। इस विवशता में हमारा स्थूल शरीर अदृश्य हो सकता है, फिर भी अपने वर्तमान दायित्वों को हम शान्तिकुँज में अप्रत्यक्ष रूप से विद्यमान रहते हुए भी उससे अधिक अच्छी तरह चलाते रहेंगे, जितना कि प्रत्यक्ष शरीर द्वारा कर पाते हैं। हमारी लेखनी बराबर चलती रहेगी, भले ही उसका रेखाँकन किन्हीं अन्य हाथों से होता दिखायी पड़े। एक लाख कार्यकर्ताओं का परिपूर्ण प्रशिक्षण और एक करोड़ का सहयोगी समुदाय जुटाने में विशालकाय भौतिक साधन जुटाने पड़ेंगे। इतने अधिक कि जिनका आज तो साधारणजनों के लिए कल्पना कर सकना कठिन पड़ेगा। इतने पर भी यह सुनिश्चित समझा जाना चाहिए कि निर्धारित योजना उसी तरह चलती रहेगी, जैसे कोई शरीरधारी, प्रबल पुरुषार्थी कर सकता है। दैवी शक्ति की निर्धारित योजना को पूरा करने के एिल मुफ्त का श्रेय लेना किसी को क्यों कुछ भारी पड़ेगा?

अन्य भी योजना के अति महत्वपूर्ण पृष्ठ है। जो समयानुसार खुलते और सामने आते रहेंगे। आज तो इनता समझ लेना ही पर्याप्त है कि इक्कीसवीं सदी इस विश्व की सबसे बड़ी सबसे व्यापक और सबसे आश्चर्यजनक उथल-पुथलों से भरी क्रान्ति है। उसके परिवर्तनों और घटनाक्रमों का अंकन तो इतिहास के पृष्ठों पर रहेगा ही, बड़ी बात यह है कि इसी अवधि में इतने महामानव दूध में से मलाई की तरह उछल कर ऊपर आयेंगे जिन्हें देखते हुए श्रेय साधकों द्वारा भागीरथ जैसे गंगावतरण का नाम दिया जा सके। बगीचा लगाने वाले की तीन पीढ़ियाँ मोद मनाती हैं स्वतंत्रता सैनिक इन दिनों भी गौरवान्वित हो रहें हैं। यह सृजन कार्य से जुड़े श्रेय का ही कमाल हैं।

ऐसा ही कुछ अपने लिए प्राप्त कर सकना संभव हो सके, उसकी पृष्ठभूमि समझने के लिए, युगसंधि पुरश्चरण में भाग लेने के लिए अखण्ड ज्योति के प्रत्येक परिजन का आह्वान किया जाना है। अच्छा हो उसके लिए बहुत दिन तक योजना बनाने में समय गँवाया न जाय और आगामी एक वर्ष में इस प्रक्रिया को पूरा कर लिया जाय।


परिजनों को एक जुट होने का आह्वान - युगसंधि के उषाकाल में शान्तिकुँज के चार संकल्प

इक्कीसवीं सदी के गंगावतरण की पूर्व तैयारी महाकाल ने समय रहते आरंभ कर दी है। अरुणोदय से पूर्व ऊषाकाल अपनी अरुणिमा दिग्-दिगन्त में बिखेर ने लगता है। युगसंधि के इन ग्यारह वर्षों में भी पूर्व सूचना देने वाले मुर्गे जोरों से बाँग लगाने लगे हैं। सोते को करवट बदलते और करवट बदलने वालों को जम्हाई लेते हुए उठ खड़े होने के दृश्य सब ओर अनायास ही दीखने लगे हैं। मनुष्य की शक्ति असाधारण है। देवताओं की क्षमता पर संदेह व्यक्त किया जा सकता है, पर मनुष्य तो स्रष्टा की कलाकारिता का सर्वोत्तम प्रतीक जो ठहरा। वह बिगाड़ करने में भी पीछे नहीं रहा। पर अब जल्दी उसने प्रवाह बदला है तो सृजन की संभावनाएँ भी दीख पड़ने लगी हैं। जब भी मनुष्य अपनी कर्मठता को उजागर करने पर उतारू हुआ तभी उसने कमाल करके दिखा दिया है।

मिश्र के पिरामिड साक्षी है कि सूडान में पत्थर का नामों निशान न होने पर भी उसने सुदूर क्षेत्रों में बिखरे पत्थर चूने, बजरी को समेट कर भव्य चट्टो बनालीं और इस रेगिस्तानी इलाके में ऐसी अद्भुत पिरामिड श्रृंखला खड़ी कर दी कि अब तक के वैज्ञानिक इस रहस्य का पूरी तरह पता नहीं लगा सके हैं कि ऐसी विकट परिस्थितियों में यह सब किन लोगों द्वारा किन साधनों द्वारा सृजा गया होगा।

चीन की योजनों लम्बी दीवार बना लेने की मनुष्य में जब ठानी तो उस अजूबे को बनाकर खड़ा कर दिया। इतना ही नहीं, उत्तर से साइबेरिया की हवाएँ जब उस क्षेत्र को बुरी तरह गड़बड़ाये दे रही थीं। तो वहाँ के निवासियों ने ऊँचे वृक्षों की हजारों मील लम्बी, 5 मील चौड़ी एक हरित दीवार और खड़ी करके प्रकृति की चुनौती का मुँह मोड़ दिया। हालैंड की घटना का जिन्हें स्मरण हैं, वे जानते है कि उफनते समुद्र को पीछे धकेल कर उसने सैकड़ों मील लम्बा तथा चौड़ा इलाका कैसे छीन लिया औंस उस भूमि पर कितने सुन्दर नगर और कारखाने सिर उठाये खड़े हैं।

मध्यपूर्व की कम्बोडिया की सीमा से लगी हुई अंगकोरवाट श्रृंखला विश्व विख्यात है। इक्कीस इक्कीस मंजिल ऊंचे ये देवालय आज भग्नावशेष स्थिति में है, पर मनुष्य की श्रमशीलता, बुद्धिमता और संकल्पशक्ति की साक्षी अभी भी दे रहें हैं और चिरकाल तक देते रहेंगे। स्वेज और पनामा की नहरें यही बताती हैं कि प्रकृति के अवरोध कितने ही बड़े क्यों न हों मनुष्य की प्रचण्ड संकल्पशक्ति उनका मुँह मोड़कर रख देने में समर्थ है।

पिछली शताब्दियों से आरंभ हुई और अब तक चली आ रही एक से एक बढ़कर अवांछनियताओं की विजय दुदुंभि बजती रही हैं पर जब सृजन के भव्य भवन खड़ करने का निश्चय कर लिया है तो उनकी पूर्ति के मार्ग में अड़ने वाली वे बाधाएँ भी हटकर रहेंगी, जो सुखद संभावनाओं की चरितार्थ करने में व्यवधान बनतीं।

उदाहरणार्थ इक्कीसवीं सदी के नारीशक्ति प्रधान होने की संभावना का शुभारंभ देखने ही योग्य है। शासनतन्त्र से कोसा दूर रखी गयी पिछड़ी समझी जाने वाली नारी अब तीस प्रतिशत जनता का कानूनी प्रतिनिधित्व प्राप्त करने जा रही हैं यही बात युग निर्माण योजना ने आज से पचास वर्ष पूर्व “नर और नारी एक सामान” तथा “जातिवंश सब एक समान” नारे के रूप कही थी। इसका संकेत था कि नारी हर क्षेत्र में अपने अधिकार और दायित्व नर के कंधे से कंधे मिलाकर काम करती हुई दिखाई देगी। इसी उदाहरण को जापान की राजनीति में नारी प्रगति तथा वर्मा में तानाशाही शासन के खिलाफ उभरने वाली नारी नेतृत्व के प्रस्तुत करके दिखा दिया है।

युग परिवर्तन की महाक्रान्ति के असंख्यों विभाग-उपविभाग है। उन सभी में नव जीवन का संचार होता हुआ देखा जा सकता है। लगता है कोई महान जादूगर अपने चमत्कारों की पिटारी खोलकर सर्व साधारण को यह अवगत कराने जा रहा है कि दैत्य की दानवी दमनकारी शक्ति क्यों न हो विश्वकर्मा की सृजन सामर्थ्य उससे कहीं अधिक बड़ी चढ़ी है। परिस्थितियों का कायाकल्प करने के लिए सामर्थ्य पुँजों, महामनीषियों और सृजन के कलाकारों ने अपने अपने पुरुषार्थ तेज कर दिये है। लगता है कि समाज के कायाकल्प को कोई भी भवितव्यता टाल नहीं सकेगी।

तथ्य की संभावना को साकार करने में लगे अनेक प्रयोगों से एक छोटा उदाहरण अपने प्रयासों का भी है। उसे देख कर यह जाना जा सकता है कि हवा का रुख किधर है। पूर्व दिशा से उठने वाली एक छोटी बदली भी हर किसी को यह अश्वासन देती है कि घनघोर वर्षा होने की अब ओर प्रतीक्षा न करनी पड़ेगी।

शान्तिकुँज ने इसी वर्ष अपने चार कार्यक्रम विचार क्रान्ति के संदर्भ में घोषित किये है। एक यह कि अपने परिकर के प्रायः चौथाई करोड़ लोगों को व सृजन के लिए प्रशिक्षण प्राप्त करने का, बैटरी चार्ज करने स्तर का कार्यक्रम आरम्भ किया गया है। नौ दिन ओर एक माह के निरन्तर चलने वाले सत्रों में भावनाशील परिजनों को आमंत्रित किया गया है। उनकी ठहरने भोजन शिक्षण आदि की व्यवस्था में किसी को असमंजस हो तो सबको यह समझ लेना चाहिए कि जब जनमानस का परिष्कार सत्प्रवृत्ति संवर्धन किसी को आवश्यक तो नहीं, अनिवार्य भी प्रतीत होता है तो महाकाल इसे भी कहीं न कहीं से पूरी करता चलेगा। वह अपनी महान पर परम्परा से मुँह मोड़ने वाला नहीं है।

युगसंधि के दिनों में ही शाँतिकुँज का दूसरा संकल्प है एक लाख सृजन शिल्पी कार्य क्षेत्र में उतारना। इसे साधु ब्राह्मण परम्परा का समय के अनुरूप पुनर्जीवन कह सकते है। सिखों राजपूतों, ब्राह्मणों, में यह परम्परा रही है कि परिवार का एक सदस्य उच्च उद्देश्यों की पूर्ति के लिए भी समर्पित किया करते थे। आज वह पुनर्जीवन कठिन इसलिए प्रतीत होता है कि हर व्यक्ति के पास पैसा और प्रजनन के अतिरिक्त कोई उद्देश्य है ही नहीं इस ऊसर भूमि जैसे बियाबान में नन्दनवन जैसे उद्यानों को उगाना ओर परिपुष्ट कर सकना किस प्रकार संभव हो सकेगा? फिर जो युग प्रहरी निकल कर आगे आयेंगे, उनके भोजन व्यय की व्यवस्था कैसे जुटेगी? प्रश्न टेढ़ा है। इस समस्या का प्रत्यक्ष समाधान देने वाला अन्तराल के विश्वास कक्ष में बैठा हुआ कोई कहता है कि बलिदानियों को युद्ध क्षेत्र में तो मरना पड़ा है। पर भूखे रहने के कारण कभी भी प्राण त्याग नहीं करना पड़ा। यदि एक लाख युगशिल्पी कार्य क्षेत्र में उतरने ही है। तो फिर उनके साथ ही उनके निर्वाह की व्यवस्था भी जुड़ी होगी।

तीसरा संकल्प युगसंधि की इस छोटी अवधि में नालन्दा, तक्षशिला, श्रावस्ती आदि के अनुकरण का है, जिसके अनुसार घर घर अलाव जगाने वाले युगशिल्पी अभिनव प्रवर्तन का संदेश लेकर पहुँचाने के लिए जाने वाले है। नालन्दा विश्वविद्यालय से प्रशिक्षित श्रावक-परिव्राजक मध्यपूर्व, इंडोचनी, श्रीलंका, चीन, कोरिया कम्बोदिया आदि क्षेत्रों में बुद्ध के धर्मचक्र प्रवर्तन का आलोक वितरण करने के लिए गये थे और वे हजार वर्ष तक जमे। तक्षशिला विश्वविद्यालय ने भी यही कमाल कर दिखाया था। ये सभी यात्राएँ, दलदलों पर्वतों, हिमप्रदेशों, रेगिस्तानों में हुई थी। फिर भी विश्व परिक्रमा रुकी नहीं। उसी हाथी का अनुकरण करने की मेंढक ने ठानी है। एक लाख साइकिल सवारों की पद यात्राएँ निकालने की बात विनोबा की पदयात्रा की तरह सोची गयी है, व यह अवश्य पूरी होगी।

चौथा संकल्प नारी जागरण का है। घूँघट, पर्दे में कैद अशिक्षित, रूढ़िग्रस्त नारी में उस चेतना का संचार कैसे किया जाय, यह कार्य कोई कम जोखिम भरा नहीं है। पर गुत्थियाँ अनसुलझी तो भी नहीं रहने दी जा सकती। आधी जनशक्ति अपंग तो नहीं छोड़ी जा सकती।

क्या ये चार संकल्प पूरा होने से युग−परिवर्तन जैसा महान प्रयोजन पूरा हो जाएगा। समझा जाना चाहिए कि संसार में प्रतिभाएँ एक से एक बढ़कर भरी पड़ी है। वे समय की पुकार सुने बिना रहेगी नहीं। मंदिरों में बजने वाले घड़ियाल, मस्जिदों में गूँजने वाली अजान जो न सुन सकें उन्हें मुर्गों के झुण्ड भी कुहराम मचाकर नींद हराम करने से चूकने वाले नहीं है। मनस्वी, तेजस्वी, वर्चस्वी वर्ग भी अगले दिनों आगे आएगा और स्रष्टा द्वारा निर्धारित संभावना को पूरा करने में एक से एक बढ़कर कीर्तिमान स्थापित करेगा।

जब स्वल्प साधनों वाले शाँतिकुँज ने यह कमाल कर दिखाने का निश्चय किया है तो अगले दिनों अखाड़े में उतरने वाले महामल्लों का तो कहना ही क्या, जो अपनी उठा पटक से दर्शकों तक को चकित करके रहेंगे।


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विचार मानसिक कारखाना है और उससे संबंधित सारी सच्चाइयाँ उस कारखाने में उपयोग आने वाला कच्चा माल। जो सभ्यता हम आज देख रहें है वह किसी के दिमाग की कभी उपज रही होगी जिसे क्रियान्वित किया गया। अच्छा विचारों को पनपने दें और आचरण क बल प्रदान करें।

*समाप्त*