चिन्तन की दृष्टि से हम प्रौढ़ बनें!

लोग आयु की दृष्टि से तो बड़े तो जाते हैं, पर चिन्तन की दृष्टि से बालक जैसे अविकसित ही बने रहते हैं। पड़ोसियों का ढर्रा अपनाकर गतिविधियाँ बनती हैं और यह यथार्थता, दूरदर्शिता तथा उपयोगिता की परख करना अनावश्यक मान लिया जाता है। यह अपरिपक्वता ही मानव जीवन की आन्तरिक प्रगति में सबसे बड़ी बाधा है।

बुद्धिमत्ता का अर्थ है-सुलझे हुए विचार, स्पष्ट दृष्टिकोण और उत्तरदायित्व समझने एवं निबाहने है जिसे उपलब्ध करने पर व्यक्तित्व प्रतिभाशाली बनता है और बड़ी सफलताएँ प्राप्त कर सकने की सम्भावना सुनिश्चित होती है। ओछे मनुष्य वे नहीं जो वजन लम्बाई या आयु की दृष्टि से छोटे हैं। जिनकी विचारणा तथा आकाँक्षा उथली और बचकानी हैं, जो गये-गुजरे लोगों की तरह सोचते और घटिया आकाँक्षाएँ पूरी करने के लिए ओछे हथकंडे अपनाते हैं, उन्हें कोई चतुर भले ही कहले, पर वस्तुतः वे व्यक्तित्व की दृष्टि से बौने, अपंग, लोगों की श्रेणी में ही मान जा सकेंगे।


चेतन सत्ता का अवतरण- व्यक्तित्व में परिवर्तन

दैवी चेतना के बारे में कहा जाता है कि वह जब जिसमें उतरती है, उसके जीवन को बदल कर रख देती है, उसे प्रसन्नता प्रफुल्लता से भर कर प्रत्यक्ष स्वर्ग का आनन्द लाभ देती है। स्वभाव और आचरण में ऐसा परिवर्तन ला देती है, मानो मनुष्य शरीर में वह कोई देव पुरुष हो।

विश्व विख्यात कवि राबर्ट लुई स्टीवेंसन के बारे में मान्यता है कि जीवन के उत्तरार्ध में उनमें ऐसी ही चेतना का अवतरण हुआ था। इससे पूर्व वह एक ऐसे व्यक्तित्व थे, जिनके जीवन में ईर्ष्या, द्वेष, घृणा अविश्वास के अतिरिक्त और कुछ था ही नहीं। यही उनकी वैयक्तिक सम्पत्ति थी। जो कोई उनसे मिलने आता, उन्हें भी इसके अतिरिक्त और कुछ प्राप्त न होता। आत्मीयता दिखाना और मधुर बोलना तो जैसे उनने सीखा ही नहीं था। उनके इस व्यवहार से पड़ोसी, परिचित, मित्र ही नहीं सगे-संबंधी भी कन्नी काटने लगे थे, जिससे उनका जीवन एक तरह से नीरस, उबाऊ व एकाकी बन गया था। मन की स्थिति का शरीर पर भी प्रभाव पड़ा। शरीर-स्वास्थ्य बिगड़ने लगा। इस क्रम में एक समय ऐसा आया, जब वे क्षय रोगी-से दिखाई पड़ने लगे, वजन भी कम हो गया व भूख भी गायब हो गई। पड़ोसी उनके विषय में अटकलें लगाते हुए कहते- स्टीवेंसन अब मुश्किल से कुछ महीनों का मेहमान है पता नहीं कब क्या हो जाय?

स्टीवेंसन अपनी इस स्थिति से भली−भांति परिचित थे। स्वयं को परिवर्तित करना चाहते थे, पर कर नहीं पा रहे थे और निराशा हताशा की स्थिति में जीवन गुजार रहे थे। जब उनकी यह दशा एक मनोवैज्ञानिक चिकित्सक मित्र ने देखी, तो सलाह दी कि आप कहीं अन्यत्र चले जायें और नये सिरे से नई जिन्दगी की शुरुआत करें। ईश्वर आप की सहायता अवश्य करेंगे, पर एक बात का स्मरण रखें “परम सत्ता केवल उन्हीं की सहायता करती है, जो अपनी सहायता आप करते हैं।” स्टीवेंसन को सुझाव जंच गया वह वहाँ से दूर और निताँत अपरिचित समोआ द्वीप में चले गये।

प्रथम दिन और प्रथम अभ्यास उनने वहाँ प्रेम का किया। जो कोई मिलता उसके लिए हाथ नमस्कार के लिए उठ जाता। कोई घर आ गया तो बिना चाय पिये जा नहीं सकता, भले ही वह मजदूर ही क्यों न हो। छोटे बच्चे रात बेचैनी में काटते। सबेरा होते ही उनका द्वार खटखटाते और बाहर से ही पूछते-यार लुई! तुम अब तक सोये पड़े हो। हम सब कब से तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहे हैं। बाहर आओ, देखो न कितने लोग आ गये हैं। स्टीवेंसन अँगड़ाई लेते बाहर आते और बच्चों से ऐसे घुल मिल जाते कि उन्हें पता भी नहीं चलता कि और भी स्त्री, पुरुष, वृद्ध वहाँ आ पहुँचे हैं। लुई उन सब को शिक्षाप्रद कहानियाँ, और महापुरुषों की जीवनियाँ सुनाते। उसका प्रभाव यह होता कि दिन भर वहाँ भीड़ जुटी रहती। स्टीवेंसन उन्हीं में व्यस्त प्रेम बाँटते रहते और अपनी कमियाँ- बुराइयों को निकालने का संकल्प दृढ़ करते। इस मध्य उनके स्वास्थ्य में आश्चर्यजनक परिवर्तन आया। अब जो कोई उन्हें देखता, वह यही कहता कि यह स्वयं स्टीवेंसन नहीं उनके शरीर में किसी प्रत्यक्ष दैवी सत्ता का प्राकट्य है। स्वयं लुई का भी ऐसा ही विचार था। वे कहते जब मैं कोई कार्य आरंभ करता हूँ तो ऐसा लगता है, मानो कोई मेरी सहायता कर रहा हो। जब में किसी विषय पर सोचना आरंभ करता हूँ तो उसमें गहराई तक उतरता चला जाता हूँ। ऐसा प्रतीत होता है जैसे कोई मेरे मस्तिष्क में तत्संबंधी विषय की क्रमबद्ध जानकारी भरता जा रहा है। वे इस बात को स्वीकार करते थे कि ज्ञान और व्यवहार में इस प्रकार की कोई विशेषता उनमें पहले नहीं थी। पता नहीं यहाँ आने के थोड़े दिन पश्चात् यह क्यों होने लगा।

वस्तुतः यह दैवी सत्ता का चमत्कार है। यह सत्य है कि जब दैवी चेतना का किसी में अवतरण होता है, तो उसके व्यक्तित्व का सर्वांगपूर्ण कायाकल्प कर देती है।


प्रार्थना जीवन का अविच्छिन्न अंग बने।

मानव जीवन में आने वाली समस्याओं का निराकरण विघ्न, बाधाओं का शमन करने के लिए बताए जाने वाले अनेकानेक उपायों में पूर्वार्त्य दर्शन में प्रार्थना को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। विश्व में फैले मानव समाज के हर भाग में किसी न किसी रूप में इस प्रक्रिया का प्रचलन पाया जाता है। रोजमर्रा के जीवन में अनेकों उदाहरण मिलते हैं जिससे प्रार्थना द्वारा होने वाली उत्क्रान्ति को जाना समझा जा सकता है।

इतने पर भी मानवीय विकास के चरण बुद्धिवाद के शिखर तक पहुँच जाने के कारण सहज बोध का स्थान संशय ने ले लिया है। यहाँ तक कि रेने देकार्ते के शब्दों में “मैं स्वयं पर भी सन्देह करता हूँ” की स्थिति आ पहुँची है। ऐसी दशा में प्रार्थना अथवा दैवी चेतना के आह्वान जैसी प्रक्रिया पर अविश्वास होने लगे, संशय का पाश इसके प्रभावों को बाँध ले, यह स्वाभाविक ही है।

क्या प्रार्थना सिर्फ धर्म का अनिवार्य अंग भर है अथवा इसमें कुछ मनोवैज्ञानिक आधार भी हैं। यदि इसमें मनोवैज्ञानिक तथ्य निहित हैं, तो उनका मानसिक चेतना पर क्या परिणाम होता है? आदि अनेकों प्रश्न हैं। आधुनिक मनोविज्ञान के गतिशील समाधान प्रस्तुत किया है।

मनोविद एरिक फ्राम का अपनी कृति “एनाटॉमी आफ ह्यूमन डिस्ट्रक्टिवनेस” में मानना है कि मानवीय समस्याओं की जड़ अनिश्चितता- असुरक्षा के रूप में उसके मन में समाई हुई है। परेशानियों का स्वरूप कोई भी हो उपजती इसी से है। यदि किसी तरह मन में निश्चय व सुरक्षा के प्रति विश्वास जगाया जा सके तो बहुत सारी परेशानियों को यों ही दूर किया जा सकता है।

विश्वास के बिना प्रार्थना सम्भव नहीं। किन्तु यहाँ पर यह मूढ़ता-अंधता का घोतक न होकर स्पष्टतया वैज्ञानिक एवं तर्क सम्मत है। इशप्रोग्राफ ने अपने ग्रन्थ “डेथ एण्ड रिबर्थ आफ साइकोलॉजी” में स्पष्ट किया है कि वैश्व चेतना के अनेकानेक स्तर हैं। निष्क्रिय निश्चेतन से लेकर सर्वत्र व्याप्त शुद्धतम चेतन। हमारी अन्तरतम चेतना इसी शुद्धतम स्तर से जुड़ी है। अपनी बहिर्मुखी प्रकृति के कारण हम इसके लाभों से वंचित हैं। अन्तर्मुखी हो वैश्व चेतना के इस स्वरूप पर विश्वास हमें सभी प्रकार की संशयग्रस्तता से मुक्त करता है।

संशयग्रस्तता से मुक्त चित्त से ही सच्चा आह्वान संभव है। इसे अभीप्सा भी कह सकते हैं। ऐसी अभीप्सा जो अनिमिष, अविराम, अविच्छिन्न हो।

किन्तु मात्र इस तरह की अभीप्सा से समष्टि चेतना की शक्ति तब तक हमें अनुप्राणित नहीं कर सकती जब तक हम खुद को क्षुद्रता संकीर्णता से मुक्त न कर सकें। इसी के लिए त्याग की आवश्यकता है। मन की सारी संकीर्ण वृत्तियों का त्याग इन सब का ऐसा परित्याग कि जिससे रिक्त मन में वास्तविक ज्ञानपोषक विचारों को निर्बंध स्थान मिले। प्राण प्रकृति की सारी वासना, कामना, लालसा, वेदना, आवेग, स्वार्थपरता, अहंकारिता, लोलुपता, क्षुब्धता ईर्ष्या आदि सभी वे तत्व जो समष्टि चेतना के शुद्धतम स्वरूप का विरोध करते हैं-सभी का त्याग। बहुधा लोग प्रार्थना के इस चरण को पूरा किये बिना प्रक्रिया की सफलता चाहते हैं। किन्तु प्रायः असफलता हाथ लगती है। श्रीअरविन्द इसका समाधान सुझाते हुए कहते हैं कि भागवत प्रसाद शक्ति केवल प्रकाश और सत्य की ही स्थितियों में कार्य करती है। असत्य और संकीर्ण मनोवृत्तियाँ उन पर जो अवस्थाएँ लाद देना चाहती हैं उन अवस्थाओं में उनका कार्य नहीं होता। कारण संकीर्ण मनोवृत्तियाँ जो कुछ चाहती हैं वह यदि उन्हें मंजूर हो जाय तो वह अपने व्रत से च्युत हो जायँ।

इस तरह के त्याग के बिना भी कभी कभी लौकिक सफलताएँ पाते देखा जाता है। माताजी इस स्थिति का स्पष्टीकरण करते हुए “मातृवाणी” खण्ड 4 में कहती हैं कि “इस स्थिति में मिलने वाली सहायताएँ दैवी चेतना की न होकर आसुरी शक्तियों की होती हैं। ऐसी ही सहायताएँ हिटलर, रासपुटिन आदि को प्राप्त हुई थीं। ये शक्तियाँ सहायता तो देती हैं किन्तु शीघ्र ही सहायता प्राप्त करने वाले को विनष्ट कर डालती हैं।

चतुर्थ चरण है ईश्वरीय चेतना से सामंजस्य स्थापना का प्रयत्न। प्रार्थना यहीं पर अपनी पूर्णता प्राप्त करती है। इस चरण का उद्देश्य है-हमारे चिन्तन की पद्धति में परिवर्तन ला देना। ईश्वरी चेतना तो सर्वदा और संपूर्णतः मंगलमय है। फिर हम मंगलमय से दूर क्यों? सिर्फ इसलिए कि हम अपने विचार जगत में शुभ के स्रोत और मंगल के निधान ईश्वर से सामंजस्य स्थापित नहीं कर पाते।

विचार दो प्रकार के होते हैं पोषक और विरोधी। मैं प्रतिभावान हूँ कर्मठता अंग-अंग में समायी है। ऐसे विचार पोषक विचार हैं। पोषक विचार वे हैं जो हमारी आन्तरिक शक्तियों को जगाएँ, हमारी कार्य शक्ति का पोषण करें, निज के और लोक के हित का पोषण करें। हमारी और हमारे साथ पड़ोसियों की सब प्रकार की उन्नति में जो विचार सहायता करते हैं, वे विचार पोषक हैं। जो इस प्रकार के पोषण के वि....घातक हैं उन्हें विरोधी विचार कहते हैं। यह कार्य कैसे पूरा होगा? सामने बाधा ही बाधा खड़ी हैं। मैं ही ऐसा अभागा हूँ, जिसे कोई सहायता नहीं करता। ऐसे विचार वि....घातक विचार हैं।

विचारों के अनुरूप ही मानसिक चेतना का स्वरूप गठित होता तथा जीवन क्रम का नियोजन बन पड़ता है। इन्हीं के अनुरूप ईश्वरीय चेतना से सम्बन्ध का स्थापन अथवा विच्छेद होता है। पोषक विचार और पोषक शब्द हमारे शुभ की भूमिका हैं। वे आने वाले प्रभात की सुनहली रश्मियाँ हैं विधेयात्मक विचारों से जीवन एवं जगत में हमारे लिए शुभ विचारों का अवतरण निश्चित हो जाता है। इसके विपरीत विरोधी विचार शुभ की भूमिका को नष्ट करते हैं। इनका प्रवाह हमें अन्धकार की ओर ले जाता है। इनका जमघट हमारे जीवन में क्या भीतर क्या बाहर हर और दुःख का जमघट लगा देता है। इस प्रवाह से मानसिक चेतना पूर्णतया क्षुब्ध और अशान्त हो जाती है। ऐसी स्थिति में आन्तरिक शक्तियों की अभिव्यक्ति की सारी सम्भावनाएँ समाप्त प्रायः हो जाती हैं।

विरोधी विचार “निर्वाण” हैं तो पोषक विचार “निर्माण” हैं। ईश्वर मंगलमय है “शिवत्व” से परिपूर्ण है। वह हमारे लिए मंगल का विधान करते हैं। हमारे पोषक विचार प्रार्थनाएँ ईश्वरीय चेतना से सामंजस्य का स्थापन करते हैं। परम चेतना के प्रवाह का पथ प्रशस्त कर देते हैं। पर ज्यों ही विरोधी विचार आते हैं, ईश्वर के मंगलमय विधान के अभिव्यक्त होने में बाधा उपस्थित करते हैं। वे राह में काँटे बिखेर देते हैं। अतएव चतुर्थ चरण की पूर्ति का तात्पर्य है पोषक विचारों का अविरल प्रवाह बना रहे।

इन चारों चरणों से युक्त प्रार्थना हमारे अपने जीवन क्रम को आमूल-चूल रूप से परिवर्तन करने वाली होती है। जब अवरोधों, परेशानियों, समस्याओं की जड़ ही समाप्त हो गई, तो जीवन प्रवाह का उन्नत एवं उच्चस्तरीय आयामों में पहुँचना स्वाभाविक ही है। यह परिवर्तन स्वयं के जीवन में घटे इसके लिए जरूरी है कि प्रार्थना को जीवन का अविच्छिन्न अंग बनाया जाय।


नवयुग विवेक पर अवलम्बित होगा

इतिहास के पृष्ठ उलटने पर लगता है कि विगत कुछ सहस्राब्दियों में ही इतना कुछ हेर-फेर हो गया है, जिसे आश्चर्यजनक और अप्रत्याशित ही कहा जा सकता है।

अब से दो हजार वर्ष पहले संसार भर की मनुष्य आबादी 30 करोड़ के लगभग थी। चारों और सघन वन फैले हुए थे। कृषि थोड़ी ही भूमि पर होती थी। गृहउद्योगों से ही जरूरत की चीजें बन जाती थी। कल-कारखानों की बात भी नहीं सूझी थी। युद्ध या तो होते ही नहीं थे या फिर तीर-कमान, गुदा-मुगदर के सहारे कुछ लोग ही हार-जीत का फैसला कर लेते थे। निर्वाह भर के साधनों में संतोष रहता था। महत्वाकाँक्षाएँ न उभरती थी और न उनके लिए किसी को धरती आसमान के कुलावे लगाने पड़ते थे। जागरूक प्रहरियों की तरह साधु-ब्राह्मण सर्वत्र परिभ्रमण करते रहते थे। जहाँ भी तनिक टूट-फूट देखी, वहीं मरम्मत कर देते थे। ऐसा था सौजन्य और सहयोग का जमाना-कुछ ही सहस्राब्दियों पहले। सतयुग उसी को कहा जाता था। शासन और समाज की व्यवस्था स्थानीय पंचायतें ही कर लेती।

आफत तब से आई जब से सैनिकों के गिरोह जमा करके लूट-पाट पर उतारू राजा सामंतों के गढ़ बनने लगे। एक और आतंक उत्पन्न करने वाले साधनों के अम्बार जुट गये और दूसरी ओर प्रतिरोध कर सकने के साधन भी अस्तव्यस्त कर दिये। मध्ययुग का सामन्तवादी अन्धकार युग यही है। सामर्थ्य, अहंकार और स्वेच्छाचार का संयोग जहाँ भी जुटने लगेगा, वहाँ अनर्थ के अतिरिक्त और कुछ हो भी क्या सकता है?

ढलता हुआ सूरज नीचे ही उतरता आता है। मनुष्य की आकुल-व्याकुल स्वेच्छाचारिता इस कदर बढ़ी कि उसने उफनती बाढ़ की तरह सुरक्षा के साधनों को बहा कर कहीं से-कहीं पहुँचा दिया। आज की तुलना पुरातन काल से करते हैं, तो लगता है मानो सब कुछ उलट गया। परिस्थितियाँ कहीं-से कहीं पहुँच गई। ऐसी दशा में वैयक्तिक आचरण और सामाजिक ढाँचे में अर्थ प्रचलन का ढाँचा आमूल-चूल परिवर्तित होना चाहिए था, पर वह संभव न हो सका। यातायात के साधन सीमित रहने से एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचना भी कठिन हो गया, इसलिए क्षेत्रीय हेर-फेर ही संभव भी थे। विश्व-व्यवस्था बनाये रखने के लिए कभी-कभी अश्वमेध, राजसूर्य, और बाजपेय यज्ञ ही मुद्दतों बाद होते थे, पर उनका प्रभाव भी क्षेत्रीय बन कर रह जाता था और स्वल्पकालीन भी। ऐसी दशा में मध्यकालीन प्रगति मात्र समर्थ लोगों की ही सहचरी बनी और सर्वसाधारण को पतन-प्रतिगामिता की परिस्थितियों से ही पाला पड़ता रहा। पटरी से उतरी गाड़ी अभी तक इसी प्रकार खिंचती-घिसटती चली आ रही है।

पिछली दो शताब्दियों में परिस्थितियों ने और भी लम्बी कुलाचें भरीं। भौतिक विज्ञान और मान्यताओं से जुड़े हुए दर्शन ने लम्बी छलाँगें लगायीं। उसका परिणाम आज सामने हैं। कारखानों और वाहनों ने वायुमण्डल और अन्तरिक्ष को प्रदूषण से भर दिया है। युद्ध आयुधों ने मनुष्य को मौत के गले का चबेना बना कर रख दिया है। अर्थतंत्र ने ऐसी बाजीगरी दिखाई कि समय और श्रम के बदले धन मिलने का पुरातन सिद्धान्त एक प्रकार से विस्मृति के गर्त में गिर गया। आदमी आदमी का सहयोगी नहीं रहा वरन् एक दूसरे को लूट खाने का कुचक्र ही चलता दीख पड़ता है।

सुविधा साधनों की कमी नहीं। चिन्तन भी विकसित हो रहा है, पर सौजन्य के अभाव में हर किसी को चिन्ता, आशंका, अविश्वास एवं असंतोष का मानस लेकर निरन्तर उद्विग्न रहना पड़ रहा है। सुरक्षा और संभावना के संबंध में हर किसी को अनिश्चितता की स्थिति में रहना पड़ रहा है। मनोविकारों की अभिवृद्धि ने जनसाधारण को दुर्बल, रुग्ण, सनकी एवं अर्धविक्षिप्त स्तर का बना कर रख दिया है। अपराधों की संख्या और विचित्रताओं की इतनी अभिवृद्धि हो रही है, मानो बढ़ी हुई चतुरता ने इसी विपन्नता के साथ गठ-बन्धन कर लिया हो। आश्चर्य ही कहना चाहिए कि विकास की डींगें हाँकते हुए भी हम निरन्तर पतन के गर्त में गिरते चले जा रहे हैं।

गिरना सहज है, उठना कठिन। पिछली कुछ शताब्दियों और सहस्राब्दियों में मानवी नियति को उलट कर रख दिया है। अब उसे फिर से उलट कर सीधा करना पड़ रहा है, पर इतनी बड़ी कठिनाई सामने होते हुए भी विश्वास इसी बात का है कि विभीषिकाओं की अति होने पर नियन्ता की प्रबल प्रेरणा उठ खड़ी होती है और विनाश की अन्तिम संभावना सामने आने से पूर्व ही बदलने की प्रक्रिया पूरी कर देती है। इस आड़े समय में भी बड़ा प्रयोजन पूरा होने जा रहा है। इक्कीसवीं सदी में उज्ज्वल भविष्य की संभावना निराधार नहीं है। उसके पीछे इतने तथ्य विद्यमान हैं कि चरितार्थ न होने पर महाप्रलय ही एकमात्र विकल्प रह जाता है, जो न तो होना ही चाहिए और न होगा ही।

सहस्राब्दियों-शताब्दियों की गलतियाँ अगली एक शताब्दी में परिवर्तित करनी है। इसके लिए इतने बड़े परिवर्तन प्रस्तुत होंगे, जिन्हें कायाकल्प के समतुल्य ही समझा जा सकता है। सड़े-गले लोहे को भट्ठी में तप कर गलना और फिर नये साँचे में ढलना पड़ता है। निकटवर्ती परिवर्तन का भी यही आधार होगा।

सही-गलत की कसौटी का ऐसे समय से प्रामाणिक होना आवश्यक है। कम्पास सही नहीं तो रात के अन्धेरे में जलयान को सही दिशा में ले चलना कठिन है। युग परिवर्तन की वेला में

लगभग नये सिरे से नई प्रक्रियाएँ अपनानी पड़ेगी। उस कसौटी का नाम होगा-”विवेक” जिसमें आत्मीयता न्यायनिष्ठा, और दूरदर्शिता का समग्र समन्वय होगा। ऐसा विवेक ही नये युग की नई रूपरेखा विनिर्मित करने में अवलम्बन बन सकेगा।

परम्पराओं का मोह छोड़ने के लिए विकट संघर्ष भी करना पड़ेगा। विवेक की आधारशिला इसी नींव के खण्डहरों पर रखी जा सकेगी। व्यक्तिगत दृष्टिकोण परिवर्तित करने से लेकर समाजगत प्रचलनों का अभिनव निर्माण करने के लिए यह दुराग्रह छोड़ना पड़ेगा कि अब तक हम क्या सोचते और मानते-करते चले जा रहे हैं।

यही दुराग्रह यदि सभी लोग अपनाये रहें, तो विग्रह के असंख्यों कारण आये दिन सामने आते रहेंगे। तर्क उन सभी बातों का समर्थन करता है, जिनकी कि मनुष्य इच्छा करता है। रुझान को उचित सिद्ध करने के लिए ही अब तक मनुष्य की बुद्धि का उपयोग होता रहा है। अगले दिनों वह रुक जायेगा, ऐसी आशा नहीं की जा सकती। पूर्वाग्रहों पर निर्भर रह कर हम समता और एकता का लक्ष्य कभी भी प्राप्त नहीं कर सकेंगे।

ऐसी दशा में नवनिर्माण की बात सोचने वाले प्रत्येक व्यक्ति को यह मान्यता बनानी होगी कि विश्व व्यवस्था को न्याय-निष्ठ और विवेक सम्मत बनाने के लिए हमें ऐसे सिद्धान्त अपनाने होंगे, जो समय की आवश्यकता और विवेकशीलता के समन्वय से निर्धारित होते हों जिनके पीछे किसी भी पूर्व मान्यता का दबाव अनिवार्य स्तर का न हो। निश्चय ही अगला युग विवेकयुग होगा। कोई चाहे तो इसे प्रज्ञायुग भी कह सकता है।


प्रतिकूलताएँ निखारती हैं, व्यक्तित्व को

महापुरुषों का जीवन चरित्र पढ़ने पर ऐसा लगता है, जैसे वह कठिनाइयों का जीता-जागता इतिहास हो। दूसरे शब्दों में किसी महान लक्ष्य के लिए इनसे जूझते रहना ही महापुरुष होना है। इन विषमताओं से लड़े बिना शायद ही कोई अपने लक्ष्य को पाता है। मनीषियों का कथन है कि जिस उद्देश्य का मार्ग संघर्षों के बीच से नहीं गुजरता, उसकी महानता संदिग्ध है।

यह तो नहीं है कि संसार के सभी महापुरुष असुविधाओं में पले हों। किन्तु यह अवश्य है कि उन्होंने स्वेच्छा से कठोर जीवन का वरण करके ही अपने उद्देश्य को प्राप्त किया। बुद्ध महावीर पैदा तो राजकुल में हुए थे पर उन्होंने स्वतः काँटों से भरी कठिन राह को स्वीकार कर मानवता की प्रगति का मार्ग प्रशस्त किया।

आधुनिक काल में भी महापुरुषों का जीवन कष्टों से भरा पड़ा है। बैरिस्टर गाँधी जीवन भर कष्टकारक परिस्थितियों से जूझते रहने के कारण ही महात्मा गाँधी बन सके और जन-जन के हृदय में आसीन हो पाए।

भारत माता की बेड़ियों को काटने वाले वीरों में अग्रणी योगिराज श्री अरविन्द का जीवन भी विषमताओं और संघर्षों से भरा है। किंग्स कालेज, कैम्ब्रिज के विद्यार्थी अरविन्द को कभी कभी मात्र चाय पर गुजारा करके भूखे पेट रह जाना पड़ता था। इन कष्टों का अन्त अलीपुर जेल की यातनाओं से भी नहीं हुआ। पाण्डिचेरी के तपस्यामय जीवन में भी उन्होंने अपने शिष्यों के साथ दसियों दिन बिना खाए पिए काटे। उनके जीवन की कठोरताओं तथा संघर्षों का मर्मस्पर्शी चित्रण डा. के. आर. श्रीनिवास अंयगर, नीरोदवरन, ए. बी. पुराणी ने अपनी कृतियों में विशद रूप से किया है।

विश्ववन्द्य स्वामी विवेकानन्द के जीवन में भी मुसीबतें कम नहीं आई। बचपन में राजसी सुविधाओं में पले नरेन्द्र को पिता की मृत्यु के बाद एक-एक रोटी तक के लिए तरसना पड़ा। संन्यास लेने के बाद भी इन मुसीबतों का अन्त नहीं हुआ। प्रव्रज्या काल में उन्हें कई-कई दिन भूखे रहना पड़ा, साथ ही अनेक लोगों ने तरह-तरह के विघ्न उपस्थित किए। अमेरिका इंग्लैण्ड आदि देशों में धर्म प्रचार के लिए जाने पर इन कष्टों का सिलसिला सौगुना अधिक बढ़ गया। उनके जीवन की संघर्ष मय परिस्थितियों का हृदयस्पर्शी चित्रण संकरी प्रसाद बसु, प्रो. शैलेन्द्र नाथ धर, तथा मेरी लुईस बर्क ने अपनी शोधपूर्ण कृतियों में किया है।

वस्तुतः बात यह है कि मुसीबतों के बीच से गुजरे बिना मनुष्य के व्यक्तित्व में पूर्णतया निखार नहीं आता और न सुविधाओं के बीच पाए लक्ष्य में सन्तोष होता है। संघर्षमय परिस्थितियाँ एक ऐसी खराद की तरह हैं जो मनुष्य के व्यक्तित्व को तराश कर हीरे की तरह चमका देती हैं। कष्टकारक परिस्थितियों से संघर्ष करने पर एक बहुमूल्य सम्पत्ति विकसित होती है जिसका नाम है आत्मबल। इसे पाने पर ही सन्तोष का परम सुख मिलता है। इन संघर्षों से जीवन में एक ऐसी तेजी आती है, जिससे जिन्दगी की राह के काँटे, झाड़-झंखाड़ सहज ही दूर हो जाते हैं।

कष्ट कठिनाइयाँ अन्तःकरण के कषाय- कल्मषों को गलाने के लिए भट्ठी की तरह हैं। अपने व्यक्तित्व को इसमें झोंककर ही उसे अधिकाधिक निखारा जा सकता है। सोना तप कर ही निखरता है। तपने से उसकी कान्ति और शुद्धता सौगुनी बढ़ जाती है। अपने देश में प्राचीन काल से भी राजा-महाराजाओं से लेकर ऋषि-मुनि सभी अपने को पूर्णावस्था तक पहुँचाने के लिए जीवन का एक भाग कठोर साधना तपश्चर्या में लगाते थे। भारत के हर गृहस्थ का यह अनिवार्य कर्त्तव्य रहा है कि वह जीवन के अन्तिम चरण में सभी सुख सुविधाओं को त्याग कर, कठोर जीवन क्रम को अपनाकर लोक कल्याण और आत्मकल्याण में अपने को नियोजित करे। सुख-सुविधाओं के बीच रहते मनुष्य में जो ढीला-पोलापन आ जाता था उसमें निखार कठोर जीवनचर्या से पुनः आ जाता था।

जीवन को कर्मठ बनाने के लिए कठिनाइयाँ जिस तरह आवश्यक हैं, उसी तरह इनकी उपयोगिता-चरित्र निर्माण के लिए भी है। शराब और विलासिता में डूबे रहने वाले मुँशीराम ने जिस समय से कठोर जीवन व्यतीत करने का संकल्प लिया, उसी समय से वह स्वामी श्रद्धानन्द बन कर जन-जन के श्रद्धाभाजन बन गए। राष्ट्र के लिए उनका समर्पित जीवन सबके लिए चिरस्मरणीय रहेगा। सुविधाएँ मनुष्य को आलसी निकम्मा बनाती हैं। यही कारण है कि- उत्तराधिकार में सुख-सुविधाओं की बहुलता को पाने वाले प्रायः विलासी और निठल्ले ही निकलते हैं।

कष्टों से जूझने, परिस्थितियों से टकराने और असुविधाओं को चुनौती देने वाले फौलादी व्यक्ति को फिजूल चीजों के लिए अवकाश ही नहीं रहता। वह तो मोर्चे पर डटे रहने वाले सिपाही की तरह संघर्षशील रहकर जीवन के प्रगति पथ पर आगे बढ़ता रहता है।

जिस व्यक्ति ने जीवन में स्वयं कष्टों को अनुभव किया है, वही दूसरों के दुःख दर्द को भली प्रकार समझ सकता है। अन्यथा ऐसों को तो काशिराज की महारानी करुणावती की तरह दूसरों की झोंपड़ी जलाकर आनन्द ही मिलता है। मुसीबतों को अनुभव करने वालों में सौहार्द संवेदना, जैसे दैवी गुण आ जाते हैं। वह दूसरों को सताना दुख देना कभी नहीं पसन्द करता है। उसका अहंकार गल जाता है। इसकी जगह उसमें विनम्रता प्रेम, क्षमा के भाव भर जाते हैं। संघर्षमयी परिस्थितियों की कृपा से मनुष्य में इस प्रकार के दैवी गुण विकसित होते हैं और वह मनुष्य से देवत्व के प्रगति मार्ग पर तीव्रता से बढ़ने लगता है।

विषम परिस्थितियाँ मनुष्य के लिए वरदान रूप ही होती हैं। पर इन वरदानों का लाभ वही उठा सकता है जिसमें इनको सँभालने की शक्ति हो। पुरुषार्थी और साहसी व्यक्ति ही इनको फलीभूत करके अनेक विभूतियाँ पाता है। जबकि आलसी, कायर, अकर्मण्य इनकी चपेट में आकर जीवन के सुखों से हाथ धो बैठता है। विषमताओं का मूल्य गहरा है। इन पर विजय पाने वाला ही इनसे बहुत कुछ पाता है और हार बैठने वाले को हाथ का भी गँवाना पड़ता है।

कष्ट के समय को जो लोग विवेक, धैर्य, पुरुषार्थ की कसौटी समझ कर परीक्षा देते हैं, वे जीवन के वास्तविक सुख शान्ति से लाभान्वित होते हैं। सही माने में सुखों का सूर्य दुःखों के बादलों के पीछे छिपा रहता है। जो बादलों की गर्जन-तर्जन से भय किये बिना इन्हें पार करता है। उसी को इसकी प्राप्ति होती है।

इसके अलावा दुःख कष्ट का सबसे बड़ा लाभ यह है कि इनके आने पर परमात्मा का सच्चे हृदय से स्मरण हो पाता है। इसी कारण पाण्डवों की माता कुन्ती ने भगवान श्रीकृष्ण से दुःखों का वरदान माँगा था। कष्टों की तीव्रता व्यक्ति में ईश्वर की अनुभूति पैदाकर उसके पास पहुँचा देती है।

कठिनाइयों को जो दुःख देने वाला मानकर पलायन करता है, उसे वे दुःख रूप में ही पीछे लग जाती है। जो साहसी बुद्धिमान इन्हें सुख मूलक मान इनका स्वागत करता है उसे देवदूतों की तरह वरदान देने वाली होती है।


साधना से सिद्धि का शाश्वत सिद्धांत!

उपासना शरीर है-साधन प्राण। उपासना चिनगारी है-साधना ईंधन। उपासना संकल्प है-साधना साहस। उपासना ज्ञान है-साधना- कर्म। उपासना उपकरण है-साधना कौशल। उपासना बाण है-साधना धनुष। एक के बिना दूसरे को प्रखर और फलित होने का अवसर नहीं मिलता।

उपासना थोड़े श्रम और थोड़े समय में सम्पन्न हो जाती है, किन्तु साधना के लिए चिन्तन और चरित्र के क्षेत्र में घुसी हुई दुष्प्रवृत्तियों से जूझने और हटाने का एक काम ही नहीं करना पड़ता, उनके स्थान पर सत्प्रवृत्तियों का जगाने का उससे भी अधिक कष्टसाध्य कार्य भी करना पड़ता है। इस उन्मूलन और आरोपण के दुहरे प्रयोजन को पूरा करना प्रायः वैसा ही है जैसा भगवान परशुराम के फरसा और फावड़ा चलाने के दुहरे पराक्रम का का परिचय देना। उन्होंने झंखाड़ काटे और उद्यान लगाये थे। इसी पराक्रम का परिचय हर साधक को अपने जीवन क्षेत्र में देना पड़ता है। इससे कम में काम चलता नहीं और इससे अधिक और कुछ करने की आवश्यकता नहीं।

सिद्धियाँ सुनिश्चित हैं। वे साधकों के लिये सुरक्षित हैं। अनादिकाल से लेकर अब तक के सभी सच्चे साधकों द्वारा सिद्धियाँ पाने की सचाई का पर्यवेक्षण करने पर इसी निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ा है कि उपासनाओं का विधान और प्रकार भिन्न-भिन्न रहने पर भी सभी साधकों को अपने चिंतन को उदात्त और चरित्र को उदार बनाना पड़ा है। व्यक्तित्व के परिष्कार और उदार लोक मंगल को अपनी प्रधान आकाँक्षा मानकर चलने वाले और इसके लिये प्रबल पुरुषार्थ करने वाले ही अपनी पात्रता उस स्तर तक पहुँचा सके हैं, जिस पर अंतरिक्ष से अनायास ही दिव्य अनुदान बरसते हैं।

ऊँचे पर्वत-शिखरों पर बर्फ जमती है, खाई-खड्डों में नहीं। वर्षा का जल नदी सरोवरों में भरता है, टीलों पर जमा होने का उपक्रम बनता ही नहीं। मंत्र सिद्धि के लिये योगी जैसी मनोभूमि और तपस्वी जैसी कार्यपद्धति अपनानी होती है। दुष्ट चिन्तन और भ्रष्ट चरित्र का भारी लदान लाद कर आत्मिक प्रगति की लम्बी छलाँग लगा सकना कठिन है। कौतूहल करना और जादू दिखाना ही अभीष्ट हो तो मूर्खों को बहकाने वाले धूर्तों की सर्वत्र भरमार पाई जा सकती है। ‘छुट पुट’ पूजा विधानों में लम्बे चौड़े चमत्कार बताने वालों की कमी नहीं। सस्ती लूट के लालची वहाँ भीड़ लगाये भी रहते हैं। जब तक संसार में सस्ते मोल में बहुत पाने की लिप्सा जीवित रहेगी तब तक यह गोरख-धंधा भी चलता रहेगा। जो इन दिनों अध्यात्म क्षेत्र पर कुहासे की भाँति बेतरह छाया हुआ है इस स्थिति में केवल विडम्बना ही पलती-पनपती रह सकेगी। कोई ठोस उपलब्धि किसी के हाथ लगेगी नहीं फलतः अध्यात्म का क्षेत्र अप्रामाणिक और उपहासास्पद बनता चला जायगा।

इस दुखद दलदल में से आस्तिकता को उबारने की आवश्यकता है। यह तथ्य उजागर किया जाना चाहिए कि तत्वज्ञान और साधना विधान का समन्वय ही उन सत्परिणामों को प्रस्तुत कर सकने में समर्थ हो सकता है, जिसमें अंतरंग को स्वर्ग मुक्ति का आनन्द और बहिरंग को ऋद्धि-सिद्धि का वैभव उपलब्ध होता है। बहुमूल्य उपलब्धियाँ प्राप्त करने के लिए उसका उचित मूल्य समझने और जुटाने का प्रयत्न करना ही होगा।

सस्ते शॉटकट का कोई तरीका न इस लोक में है न परलोक में। सस्तेपन की तलाश अनैतिक है। उचित से कम मूल्य में प्राप्त की गई वस्तुयें चोरी की समझी जाती हैं और पता चलने पर पुलिस खरीददार को खींच कर दण्डित कर सकती है। जुआ इसलिए अपराध माना गया है कि उसमें कम देकर अधिक पाने की दुरभि-संधि को प्रश्रय मिलता है। अध्यात्म तत्वज्ञान का सुनियोजित विज्ञान किन्हें समुचित उपहार प्रदान करता है? इसे सिद्ध पुरुषों के द्वारा अपनाये ऋषि जीवन को देखकर भली प्रकार जाना जा सकता है। संत भक्तों को जो दैवी अनुदान प्राप्त होते रहे हैं। उसमें उनकी औपचारिक भावुकता को स्वल्प परिणाम में ही श्रेय दिया जा सकता है। सफलता का मूल आधार तो उनका प्रखर व्यक्तित्व और परमार्थ परायण क्रियाकलाप ही रहा है। लोभ और मोह की कीचड़ में ऐड़ी से चोटी तक डूबे हुए यदि उन ऋषि कल्प लाभों को छुट-पुट टंट-घंटों के सहारे प्राप्त करने का मनोरथ रचते हैं तो उसे विज्ञजनों की दृष्टि में अनधिकार चेष्टा ही कहा जायेगा। ऐसे प्रयास कदाचित ही कभी सफल होते हैं। अनैतिक उपार्जन में किसी को किसी प्रकार सफलता मिल सके तो भी उसके परिणाम कालान्तर में कष्टकारक ही सिद्ध होते हैं।

आत्मशक्ति का उपार्जन व्यक्ति के लिये भी श्रेयस्कर है और समाज के लिये भी मंगलमय है। सच्ची सम्पदा, आत्म शक्ति ही है। शरीर शक्ति, बुद्धि शक्ति, धन शक्ति, संघ शक्ति के प्रतिफल सीमित हैं, साथ ही क्षणिक भी। चिरस्थाई व्यापक और प्रचण्ड परिणाम आत्मशक्ति के ही हैं। इसलिये उसका उपार्जन चरम पुरुषार्थ कहा जाता है। छोटे व्यक्ति छोटी वस्तु ढूँढ़ते हैं, बड़े बड़ी। छोटों की दृष्टि तात्कालिक लाभ पर केन्द्रित रहती है। बड़े दूर की सोचते हैं। आत्म विकास का यही लक्षण है कि उद्देश्य ऊँचा रखा जाय। इस दृष्टि से आत्मशक्ति का उपार्जन और उसका परमार्थ प्रयोजनों में उपयोग करना ही सर्वोत्तम बुद्धिमत्ता कही जा सकती है। विभूतियों का उपार्जन ही सच्चा वैभव है।

इन प्रयोजनों की पूर्ति के लिये उपासना के क्षेत्र में गायत्री की महत्ता अनुपम-अद्भुत और अद्वितीय है। उसके महात्म्य से शास्त्रों का पन्ना पन्ना भरा पड़ा है। ऋषियों ने अपने अनुभव से उसकी महिमा को ऐसा बताया है जिसकी तुलना में अन्य सभी उपार्जन हलके बैठते हैं। जिन ने इस कल्पवृक्ष के नीचे आश्रय लिया है जिनने इस कामधेनु का दूध पिया है उन सभी ने अपना अनुभव यही बतलाया है कि इस अवलम्बन को पकड़ने से बढ़कर श्रेय-सौभाग्य का और कोई आधार नहीं हो सकता।

इतने पर भी एक बात दर्पण की तरह स्पष्ट है कि उपासना का साधना के साथ अविच्छिन्न सम्बन्ध है। साधना के बिना उपासना का कोई चमत्कार दृष्टिगोचर नहीं हो सकता। इसलिये अनुष्ठान उपचार का महत्व स्वीकार करते हुये भी इस आवश्यकता को भी समझा जाना चाहिए कि आत्मिक प्रगति के लिये उपासनात्मक, उपचारों से भी अधिक महत्व साधक के चिन्तन और चरित्र में उत्कृष्टता का समावेश होने का है। साधना इसी को कहते हैं। जो साधक है, उसकी उपासना फलवती हुए बिना रह नहीं सकती। इसके विपरीत जिनके जीवनक्रम में निकृष्टता और दुष्टता भरी पड़ी है, जिन्हें छल छद्म ही रुचते हैं, जिन्हें लोभ मोह से आगे की कोई बात सूझती ही नहीं, जिनके लिये वासना और तृष्णा ही सब कुछ हैं-इन्हीं प्रयोजनों के लिए अपना श्रम, समय और मनोयोग लगाये रहते हैं, इन्हीं के लिए पूजा-पाठ का ढोंग रचते हैं ऐसे व्यक्ति निष्प्राण उपासना का प्रतिफल भी निराशा के रूप में ही पाते हैं। साधना से सिद्धि का सिद्धान्त समझने वाले जानते हैं कि आस्तिकता की सफलता के साथ आध्यात्मिकता और धार्मिकता का समावेश होने की शर्त भी जुड़ी हुई है।


सूक्ष्म जगत में विद्यमान आसुरी सत्ता का प्रवाह!

....उक्ति है-”चोर-चोर मौसेरे भाई।” .... सत्य है कि समानधर्मी व्यक्तियों .... अपनी बिरादरी वालों की ओर ही .... चुम्बक सदा अपनी स्वजातियों .... अपनी ओर आकर्षित कर पाता .... धातुओं में भी जितनी सरलता से समान .... वाली परस्पर मिलन-संयोग कर पाती हैं, .... सुगमता से विपरीत प्रकृति वाली नहीं, इसी का प्रतिपादन उपरोक्त उक्ति में है। .... सत्य आज के माहौल में अधिक देखा .... और महसूस किया जा .... है। विवेकानन्द ने एक स्थान पर .... किया है कि स्थूल जगत की तरह एक .... जगत भी है और उससे हम उसी प्रकार .... रूप से संबद्ध हैं, जिस प्रकार भौतिक .... से। वे कहते हैं कि हमारे इर्द-गिर्द हर वक्त अनेकों सत्ताएँ मँडराती रहती हैं, पर हमारा संपर्क सिर्फ उन्हीं सत्ताओं से हो पाता है, जिनकी आवृत्ति से हमारी चिन्तन-चेतना की आवृत्ति मेल खाती है। आज सर्वत्र आपाधापी और विनाशकारी वातावरण दिखाई पड़ता है। अधिसंख्यक लोग अनैतिक कृत्यों में रुचि लेते दिखाई पड़ते हैं। इसका प्रमुख कारण यह है कि चिन्तन की प्रतिकूलता एवं निषेधात्मकता के कारण सूक्ष्म जगत की आसुरी शक्तियां उन पर सवार होतीं और विनाशकारी कुचक्र रचने की प्रेरणा भरती हैं। इतिहास साक्षी है कि जिन व्यक्तियों ने मनुष्य और समाज के लिए क्रूरतम कार्य किये, उन पर सदा असुर सत्ताएँ ही छाई और अहितकर कार्य कराती रही एवं अन्ततः उनके अन्त का भी निमित्त कारण बनी।

द्वितीय विश्वयुद्ध के खलनायक हिटलर के बारे में कहा जाता है कि एक असुर आत्मा सतत् उसके संपर्क में बनी रहती थी और उसे क्रूर कर्म करने के लिए सदा बाधित करती रहती थी। इस तथ्य का उल्लेख “दि आँकल्ट राइख” नामक पुस्तक में विस्तार पूर्वक किया गया है।

अरविंद आश्रम की “श्री माँ” ने भी अपने गु.... अनुभव के आधार पर लिखा है कि हिटलर के आस-पास सदा .... .... सत्ता विद्यमान रहती थी, जो प्रकट होकर नृशंस कार्यों में उसकी सहायता और प्रेरणा दिया करती थी।

इस दानवी सत्ता के संपर्क में हिटलर सर्वप्रथम 1916 में आया, जब वह एक सामान्य सैनिक के रूप में प्रथम विश्व युद्ध में हिस्सा ले रहा था। एक रात जब वह मोर्चे पर था, तो उसे झपकी सी आ गई और उसने एक स्वप्न, देखा, कि एक अग्नि का गोला उसकी ओर बढ़ा आ रहा है और अब तब उस पर गिरने ही वाला है कि एक दैत्याकार व्यक्ति ने उसका हाथ पकड़ कर उसे अपनी और खींच कर बचा लिया। आतंकित हिटलर नींद से जागा ही था कि एक तोप का गोला उसके कन्धे को चूमता हुआ निकल गया और वह बाल-बाल बच गया। भय की स्थिति में वह खंदक को छोड़ दानवी प्रेरणा के आधार पर कठपुतले की तरह आगे बढ़ गया। अभी वह कुछ ही कदम आगे बढ़ा था कि एक अन्य गोला सनसनाता आया और वहीं गिरा, जहाँ वह पहले था। उसके सभी साथी विस्मार हो गये। अकेला हिटलर बचा रहा। इस घटना के बाद से उसका मनोबल बढ़ता गया और उसी के साथ उसकी नादिरशाही भी बढ़ती ही गई, जिसका चरमोत्कर्ष एक ऐसे व्यक्तित्व के रूप में सामने आया, जिसने अपनी पैशाचिकता से मानवी इतिहास को कलंकित कर दिया पर वह स्वयं भी उस दानवी सत्ता के चंगुल से नहीं बच सका। कहा जाता है कि उस सत्ता ने अन्ततः उसे इतना पागल बना दिया था कि उसने अन्य अनेकों के साथ द्वितीय विश्व युद्ध के समापन के साथ ही अपना अन्त भी कर डाला। इस सारी घटना का उल्लेख हार्थन बुक्स न्यूयार्क से प्रकाशित पुस्तक “दि अण्डरस्टैण्डिंग ऑफ ड्रीम्स एण्ड देयर इन्फ्लूएन्सेज आँन दि हिस्ट्री ऑफ मैन” में विस्तारपूर्वक किया गया है।

नेपोलियन के बारे में भी ऐसी ही मान्यता है कि उसके आस-पास सदा एक असुर सत्ता मँडराती रहती थी। आस्ट्रिया के साथ युद्ध में एक दिन जब वह मोर्चे की ओर बढ़ रहा था, तो गाड़ी में ही उसे नींद आ गई। उसने एक स्वप्न देखा, जिसमें उसके अदृश्य सहायक ने बताया कि जिस स्थान पर अभी है, वह पूरी तरह से बारूदी सुरंग से घिरा हुआ है और जल्द ही फटने वाला है। नींद खुली तो स्वप्न के तथ्य की जाँच की। सचमुच ही वहाँ सुरंगें बिछी हुई थी। उसने तुरन्त उस स्थान को छोड़ दिया। कुछ ही देर पश्चात् एक जोरदार धमाके से वह सारा क्षेत्र प्रकम्पित हो उठा। नेपोलियन की जान तो बच गई पर उस दिन से सदैव वह अशरीरी सत्ता छाया की तरह उसके साथ रहने लगी उसके क्रूर कर्मों का कारण बनी और अन्त में उसकी मृत्यु का भी श्रेय उसी को मिला। उत्तरार्ध जीवन में उसने नेपोलियन की मौत की घोषणा भी कर दी थी और सचमुच उन्हीं परिस्थितियों में वह मरा पाया गया।

जब क्रूरता का भूत किसी पर सवार होता है तो वह उसे कुछ भी कर गुजरने की प्रेरणा देता रहता है, पर अन्त में उस क्रूर प्रवाह का शिकार हुए बिना वह भी नहीं रह पाता। नादिरशाह के मामले में भी ऐसा ही हुआ। अन्ततः उसकी हत्या कर दी गई।

14 वीं सदी में नीरो नौ वर्ष तक रोम पर शासन करता रहा। इस मध्य उसने भी खूब रक्तपात मचाया। अपनी माता और पत्नी का सिर कटवा डाला। जिन लोगों से मतभेद होता, उन्हें अपने सामने ही मौत के मुँह में धकेल देता। एक बार सनक चढ़ी, तो पूरा शहर ही जलवा कर राख कर दिया और जलते शहर का दृश्य एक पहाड़ी पर बैठ कर स्वयं देखता रहा एवं उस सर्वनाश का आनन्द लेता रहा। स्वयं भी वह मित्र के विश्वासघात से मरा।

असुरता कितनी नृशंस हो सकती है, आये दिन उसके उदाहरण हमें देखने को मिलते रहते हैं। इतिहास का पन्ना तो इससे भरा पड़ा है यह बर्बरता सामूहिक रूप से बड़े पैमाने पर और मात्र सनक की पूर्ति के लिए भी की जाती रही है। छुट-पुट लड़ाई-झगड़ों से लेकर विश्व युद्धों तक में जितनी भी क्रूरताएँ हुई और विनाश लीलाएँ रची गई-इन सबके मूल में असुरता ही प्रधान रही है। इस असुरता के भी मूल में उस सूक्ष्म प्रवाह को ही जिम्मेदार ठहराया जाता रहा है, जो अपने अनुकूल माध्यमों पर सवार होता और यंत्रमानव की तरह उनसे कुछ से कुछ करवाता रहता है।

अब इस तथ्य की वैज्ञानिक पुष्टि भी हो गई है कि हम जो कुछ सोचते-विचारते हैं, वह समाप्त नहीं हो जाता, वरन् मस्तिष्क के चारों ओर एक विशेष क्षेत्र-आइडियोस्फियर में इकट्ठा होता रहता है। जो जैसा भला-बुरा चिन्तन करता है उसकी ओर आइडियोस्फियर की तदनुरूप चिन्तन धारा स्वतंत्र सत्ता का रूप धारण कर आकर्षित होती और उन्हें सन्मार्ग-कुमार्ग पर ले चलने की प्रेरणा भरती है। क्रूर कृत्यों में संलग्न व्यक्तियों का चिन्तन चूँकि अन्याय और अनाचारपूर्ण होता है, अतः उनका संपर्क सदा ऐसे ही सूक्ष्म असुर प्रवाह से बना रहता है। इनसे उन्हें तब तक मुक्ति नहीं मिल पाती जब तक वे अपनी चिन्तन-चेतना को परिष्कृत - परिवर्तित नहीं कर लेते।


Quotation

छिपकर किया गय अपराध भी जीवन भर हृदय में काँटे की तरह चुभता रहता है।


प्रसन्नता का चुम्बकत्व

मनुष्य का जीवन अनुपम है। उसे स्रष्टा की सर्वोत्तम कलाकृति कहा गया है। उसमें इतना कौशल भरा पड़ा है जिसकी अन्य किसी से तुलना नहीं। उसे इतने साधन उपलब्ध हैं मानो प्रकृति ने माता की तरह सारा स्नेह उसी पर निछावर कर दिया है।

प्रश्न एक ही है कि जिसे वह मिला है वह कितना मूर्ख या बुद्धिमान है। मूर्ख इस अर्थ में कि अपनी बहुमूल्य क्षमताओं को कूड़े कचरे की तरह बिखेर दे। बुद्धिमान इस अर्थ में कि जो मिला है उसका राई रत्ती भी सदुपयोग की परिधि से बाहर न जाने दे।

जीवन को प्रगतिशील और प्रसन्नता से भरा पूरा रखने के कुछ मोटे नियम हैं। इतने मोटे और सर्वविदित कि उन्हें सीखने जानने के लिए किसी विद्यालय में प्रवेश पाने, कोई धर्मशास्त्र पढ़ने या किसी सद्गुरु के तलाशने की आवश्यकता नहीं है। इन नियमों को दुर्मतिजन्य दुर्गति से ग्रसित लोगों को देखकर, प्रसन्न और सफल लोगों के बीच पाये जाने वाले अन्तर को सहज ही समझा जा सकता है।

प्रसन्नता एक मानसिक गुण है जो थोड़े दिनों अभ्यास करने एवं आदत में समाविष्ट करने पर सहज ही एक सामान्य आदत के रूप में विकसित हो सकती है। दर्पण के सम्मुख खड़े होकर अपने मुसकाते हुए खीजते हुए और खिन्न निराश चेहरे को देखकर सहज समझा जा सकता है कि उनके बीच कितना अन्तर है।

कुरूपता या सुन्दरता चेहरे की बनावट पर निर्भर नहीं है। कोई कुरूप भी प्रसन्न स्थिति में खिले हुए फूल जैसा सुन्दर लग सकता है और कोई सुन्दर भी उदास, निराश स्थिति में ऐसा लग सकता है मानों किसी मरणासन्न को लकड़ी के ढाँचे में कसकर खड़ा कर दिया गया है।

मुसकान एक आकर्षण है जिसमें चुम्बक की तरह दूसरे का स्नेह, समर्थन और सहयोग आकर्षित कर लेने की क्षमता है। मुसकान इस बात की प्रतीक है कि व्यक्ति अंतरंग क्षेत्र में सद्गुणों का भण्डार भरें पड़ा है। ऐसे व्यक्ति की आंखें चमकती हैं और दीखते हुए दाँत उन विशेषताओं की साक्षी देते हैं जो किसी का जीवन प्रगतिशील एवं सफल होने की भविष्यवाणी करते हैं।

“दि पावर आफ पोजीटिव थिंकिंग” के लेखक विद्वान नार्मन बीसेन्ट पाँल ने कुछ छोटे किन्तु सुनहरी सूत्र बताये हैं जिन्हें अपनाकर कोई भी अपने को महत्वपूर्ण व्यक्ति बना सकता है। वे कहते हैं-”बड़ी महत्वाकाँक्षायें मत गढ़िये। ललक और लिप्सा में इतने व्यग्र मत रहिए कि बहुत कुछ पाने की लालसा में चैन ही न पड़े। सादा जीवन जिएँ। प्रगति के लिए परिश्रम करें। व्यस्त रहें। किन्तु आवेश और अशान्ति से दूर रहें। संकीर्ण नहीं उदार बनें। जीवन से प्रेम करें और सहचरों से भी, ताकि लौटकर वह प्रेम तुम्हें प्रफुल्लता में आच्छादित कर दे।”

अरस्तु कहते थे कि “प्रसन्नता और कुछ नहीं जीवन-कला का ही दूसरा नाम है। जो व्यक्ति अपने को व्यवस्थित रख सकता है और दूसरों के साथ सद्व्यवहार बरतने के सिद्धान्त जानता है वह सदा मुसकराता पाया जायेगा”।

डाक्टर मार्टिन गैमर्ट ने अपनी पुस्तक ‘दि एनाटॉमी आफ दी मिनैस’ में लिखा है कि “प्रसन्नता आसमान से नहीं टपकती, वह भले इनसान के अन्तराल में उगती है। कुचक्री और षड्यन्त्रकारी इस दैवी उपलब्धि से सदा वंचित ही रहेंगे।”

हम अपने उद्देश्य और क्रियाकलापों में शालीनता का समावेश रखें। निठल्ले न बैठें अनगढ़ व्यक्तियों को मित्र न बनायें और न उनका प्रभाव ग्रहण करें। पिछड़ों का सहारा देना एक बात है और अपने को उन्हीं के जैसा बना लेना दूसरी। दुर्गुणों को अपना लेने पर हम अपनी शान्ति, तुष्टि और प्रसन्नता को एक साथ गँवा देते हैं यह संसार नाटक नहीं है जिसमें मुखौटे बाँधकर और पोशाकें पहनकर महान बना जा सके। हमारा व्यक्तित्व ऐसा होना चाहिए जो सभी कसौटियों पर कसे जाने पर भी खरासिद्ध हो दूसरों की श्रद्धा उछलकर अपने चेहरे पर प्रफुल्लता के रूप में दर्शाती है।

ओछे विचार और हेय काम मनुष्य को भीतर ही भीतर कचोटते और खोखला करते रहते हैं। जिन्हें सफल जीवन जीना और प्रगतिशील बनना है उन्हें यह गाँठ बाँध लेना होगा कि सज्जनता और प्रसन्नता सहोदर बहिनों की तरह हैं, उन्हें एक साथ हँसते खेलते देखा जा सकता है।

जीवन को खिलाड़ी की तरह जिएँ उसी दृष्टिकोण को अपनाकर काम करें। इससे बहुत काम करने पर भी न आप पर वजन पड़ेगा न थकान आयेगी। ऐसे व्यक्ति हारने और जीतने के अभ्यस्त होते हैं और दोनों ही स्थितियों में संतुलन बनाये रहते हैं। संतुलन खोकर जीतना भी बुरा, हारना तो बुरा है ही। अपनी क्षमता से अधिक अपने हाथ में लिए हुए कामों को भारी न मानें। यदि आप उन्हें तन्मयता से करेंगे तो जीतने की ही अधिक संभावना है। जिसे अत्यधिक भारी समझें उसे आरंभ में ही तोल लें। अनावश्यक वजन से न लद मरें। जितना अपने बस में हो उतना ही हाथ में लें और जो लें उसे विश्वासपूर्वक परिपूर्ण तत्परता के साथ करें। इस प्रकार आप प्रायः सफल ही होकर रहेंगे और अपनी प्रसन्नता बनाये रहेंगे।

असफल होने पर भी खिन्न होने की आवश्यकता नहीं है। इससे तो आप भावी सफलता को भी खतरे में डाल देंगे। दुनिया मुसकराते हुए आदमी को मनस्वी, साहसी और पराक्रमी मानती है। जबकि मुँह फुलाये रहने वाले, कठिनाइयों का रोना रोने वाले के सम्बन्ध में बेसमझ अथवा कर्महीन होने की धारणा बनाते हैं। अपने आप को बदनाम करें या सफल श्रेयाधिकारी का यश लूटें यह बहुत कुछ इस बात पर निर्भर है कि आप अपने चेहरे को कैसा बनाये रहने के आदी हो चुके हैं।

जो उपलब्ध है, उसका सदुपयोग कीजिए। भवितव्यता के सपने न देखिए। असफलताओं में अपनी भूल का निरीक्षण करें। दूसरों पर दोष थोपने की अपेक्षा यह अच्छा है कि जहाँ इस बार अपने से चूक हुई है उसकी भविष्य में पुनरावृत्ति न होने दें। जो गुजर चुका उससे शिक्षा ग्रहण करें पर हर्ष या शोक से अपने आपको उद्विग्न न करें।

सामाजिक बनिए। सबके साथ हिलमिल कर रहने और मिल बाँट कर खाने की आदत बहुत अच्छी है। जो एकाकी रहते हैं, दूसरों से डरते या कतराते हैं उसे स्वार्थी या डरपोक समझा जाता है। अच्छा यही है कि स्वयं प्रसन्न रहा जाय और उस दैवी सम्पदा को अधिकाधिक लोगों में वितरित किया जाय। यह मान लिया जाना चाहिए कि प्रसन्नता एक ऐसा चुम्बक है जो सज्जनों, विधेयात्मक चिन्तन वालों को अपनी और खींचता रहता है।


मिठास का आनन्द (kahani)

एक व्यक्ति रूखी रोटी खा रहा था। साथ ही मिर्च खाने जैसे सीकारे भी ले रहा था।

साथी ने कहा-रूखी रोटी में कहीं चिरपराहट होती है जो मिर्च जैसे सीकारे लेते हो। उसने कहा कल्पना की मिर्च से मन बहला रहा हूँ।

साथी ने कहा यदि कल्पना ही करनी है तो चाशनी की कर और मिठास का आनन्द ले। कडुआ मुँह क्यों करता है?


सृजन प्रयोजनों के निमित्त परोक्ष-जगत का योगदान

संसार के जितने भी महान आन्दोलन या महाक्रान्तियाँ हुई हैं, उनको जन्म देने वाली प्रेरणा की निर्झरिणी का उद्गम केन्द्र एक अविज्ञात दैवी चेतन सत्ता ही परोक्ष रूप से रही है। अन्यथा उनके आरंभिक स्वरूप को देखते हुए कोई यह अनुमान नहीं लगा सकता था कि कभी वे इतनी सुविस्तृत बनेंगी और संसार की इतनी सेवा करेंगी। दैवी चेतना ने जहाँ उन महाक्रान्तियों को किसी परिष्कृत व्यक्तित्व के माध्यम से उसे विकसित किया, वहीं इतनी व्यवस्था और भी बनाई कि उस उत्पादन को अग्रगामी बनाने के लिए सहयोगियों की श्रृंखला बढ़ती चली जाय। एक विशेष बात यह है कि उस समय एक जैसे ही विचार असंख्यों के मन में उठते हैं और उन सबकी मिली-जुली शक्ति से सृजन स्तर के कार्य इतने अधिक और इतने सफल होने लगते हैं कि दर्शकों को इसका अवलोकन करके आश्चर्यचकित रह जाना पड़ता है।

विश्व इतिहास में कितनी ही ऐसी महाक्रान्तियाँ हुई हैं, जो चिरकाल तक स्मरण की जाती रहेंगी और लोक मानस को महत्वपूर्ण तथ्यों से अवगत कराती रहेंगी। वस्तुतः महान घटनाओं के पीछे दैवी प्रेरणा ही प्रमुख रूप से कार्यरत देखी जाती है जिनमें व्यापकता के साथ-साथ प्रवाह परिवर्तन भी जुड़ा होता है। ऐसी घटनाओं में चाहे पौराणिक काल का समुद्र मंथन, वृत्रासुर, गंगावतरण, हिरण्याक्ष के बन्धनों से पृथ्वी की मुक्ति, परशुराम द्वारा कुपथगामियों का ब्रेन-वाशिंग आदि हों अथवा इतिहास काल के कुछ शक्तिशाली परिवर्तन जैसे रामायण प्रसंग, महाभारत आयोजन और बुद्ध का धर्म चक्र प्रवर्तन आदि। यह सभी महाक्रान्तियाँ ऐसी थीं जिनने कालचक्र के परिवर्तन में महान भूमिका निभाई। असुरों के विनाश के उपरान्त रामराज्य के साथ सतयुग की वापसी संभव हुई। महाभारत के उपरान्त भारत की महान भारत बनाने का लक्ष्य पूरा हुआ। बुद्ध के धर्म चक्र प्रवर्तन से उठी चिनगारी ने अगणित क्षेत्रों के अगणित प्रसंगों की ऊर्जा और आभा से भर दिया। पिछले दिनों प्रजातंत्र और साम्यवाद की सशक्त नई विचारणा इस प्रकार उभरी जिसने लगभग समूची विश्व वसुधा को आन्दोलित करके रख दिया। ये महाक्रान्तियाँ सिद्ध करती हैं कि दैवी प्रवाह प्रेरणा जब भी सक्रिय होती है, मनीषा उस चेतन ऊर्जा से अनुप्राणित हो उठती है और वह कार्य कर दिखाती है जिसकी कभी कल्पना तक न की थी अथवा उसे असंभव माना जाता था।

अपने समय का महापरिवर्तन “युगान्तर” के नाम से जाना जा सकता है। युग परिवर्तन की प्रस्तुत प्रक्रिया का एक ज्वलन्त पक्ष तब देखने में आया, जब प्रायः दो हजार वर्षों से चले आ रहे आक्रमणों अनाचारों से छुटकारा मिला। दैवीचेतना से उद्भूत महाक्रान्ति ने अपना स्वरूप प्रकट किया और भारत ने लम्बे समय से चली आ रही राजनीतिक पराधीनता का जुआ देखते-देखते उतार फेंका। प्रचण्ड दावानल इतने तक ही नहीं रुका। संसार भर में प्रायः राजतंत्र का सफाया हो गया। जो अमीर, रजवाड़े और जमींदार छत्रप बने हुए थे, वे न जाने किस हवा के झोंके के साथ टूटी पतंग की तरह उड़ गये। अफ्रीका महाद्वीप के अधिकाँश देश साधारण से प्रयत्नों के सहारे स्वतंत्र हो गये। इसके अतिरिक्त छोटे-छोटे द्वीपों तक ने राजनीतिक स्वतंत्रता प्राप्त कर ली। दास प्रथा जैसे इतने पुराने सामाजिक कुप्रचलनों को इतनी तेजी से उखाड़ना संभव हुआ, मानो किसी बड़े तूफान ने सब कुछ उलट-पलट कर रख दिया हो।

अग्रगामियों को सदैव दैवी प्रवाह प्रेरणा में बहते देखा जाता है। दैवी चेतना पग-पग पर उनका मार्गदर्शन करती और आवश्यक सरंजाम जुटाती चलती है। कितनों के अचेतन को झकझोरती और अग्रिम मोर्चे पर ला खड़ा करती है।

दास प्रथा के उन्मूलन में अब्राहम लिंकन और हैरियट स्टो के नाम मूर्धन्यों में लिये जाते हैं। इस कुप्रचलन को समाप्त कराने में अदृश्य चेतन सत्ता की परोक्ष भूमिका कार्यरत थी। सर ओलिवर लॉज ने भी अपनी पुस्तक “सरवाइवल आफ मैन” में इस तथ्य को स्वीकार किया है कि अमेरिकी राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन को अपने अधिकाँश कार्यों की प्रेरणा अदृश्य चेतन सत्ता के माध्यम से मिला करती थी।

फ्राँस की राज्यक्रान्ति की सफल संचालिका ‘जोन आफ आर्क’ एक मामूली से किसान के घर जन्मी थी। जब वह अपने पिता के घर थी तभी एक दिन आसमान से एक फरिश्ता उतरा और उसके कान में कह गया कि “अपने को पहचान समय की पुकार सुन और स्वतंत्रता की मशाल जला।” यह प्रेरणा इतनी जीवन्त और सशक्त थी कि जोन ने इन बातों को गाँठ बाँध लिया उसी समय से फ्राँस को स्वतंत्र कराने के लिए उत्साह के साथ काम करने लगी इतिहास साक्षी है कि उसने कितनी वीरता के साथ स्वतंत्रता संग्राम लड़ा और अपने प्राणों की बाजी लगाकर सफलता प्राप्त की। साथ ही अपने आप को अमर कर गयी।

पिछले दिनों ऐसी अनेकों घटनाएँ घटी हैं जिसमें लोक मंगल के लिए जुट पड़ने के लिए व्यक्तिगत अथवा सामूहिक रूप से लोगों को दैवी प्रेरणाएं उभरी अथवा सूक्ष्म संकेत मिले। एक घटना बैनजुएला की है।

दक्षिण अमेरिका का यह देश तब एक स्पेनी उपनिवेश था। उसकी प्रजा में स्वतंत्रता के लिए कुँरामुसाहट तो थी, पर तीखे आन्दोलन के लिए कोई आगे न बढ़ रहा था। असंगठित प्रजा बेचारी करती क्या?

उन्हीं दिनों फ्राँस को नेपोलियन के नेतृत्व में आजादी मिली थी। बैनेजुएला के केरामश नगर के “बेलियर” नामक एक युवक ने भी उस विजयोत्सव को देखा था। उसे दैवी प्रेरणा मिली कि वह भी आजादी की मशाल जलाये और अपने देश को विदेशियों से मुक्त कराये। इससे प्रेरित होकर उसने रोम की एक पहाड़ी पर खड़े होकर एकाकी प्रतिज्ञा की कि वह अपने देश को आजाद कराके रहेगा। वह कैसे इस कार्य को करे, यह ताना-बाना बुन ही रहा था। तभी उसे अपने पुराने साथी फ्राँसिस्को मिराण्डा की याद आयी, जिसने कुछ दिन पहले आजादी की लड़ाई लड़ी थी, किन्तु असफल रहने के कारण इंग्लैण्ड में निर्वासित जीवन जी रहा था।

बोलियर ने मिराण्डा को इंग्लैण्ड से गुपचुप बुला लिया। दोनों ने मिलकर जन संपर्क साधा और एक दिन देश के स्वतन्त्रता की घोषणा कर दी। छापामार लड़ाई चलती रही। इसी बीच एक युद्ध में बोलियर और मिराण्डा घायल हो गये और एक छोटे से द्वीप में अपना इलाज कराने लगे। इन दोनों की बाद में वहीं मृत्यु हो गई किन्तु युद्ध जारी रहा और अन्ततः स्पेनी शासन के पैर उखड़ गये और बेनुजुएला स्वतंत्र राष्ट्र बन गया। आजादी की लड़ाई का यह तूफान बेनजुएला तक सीमित न रहकर पूरे दक्षिण अमेरिका में फैल गया और देखते-देखते सभी राज्य स्पेनी शासन से मुक्ति पाकर स्वतंत्र जनतंत्र बन कर अपनी पसन्दगी का शासन चलाने लगे।

उपरोक्त उदाहरण यह प्रमाणित करते हैं कि समय-समय पर दैवी चेतना प्रचण्ड प्रेरणा प्रवाह बनकर स्वयं अथवा प्रतिभावानों के माध्यम से जन मानस को प्रेरित-आन्दोलित करती, आवश्यक साधन जुटाती और धराधाम पर अभीष्ट परिवर्तन ला खड़ा करती है। इक्कीसवीं सदी की उज्ज्वल संभावना को साकार बनाने में उसी परम सत्ता की परोक्ष भूमिका को सक्रिय देखा जा सकता है।


मनस्विता की प्रचण्ड शक्ति

पार्सल का पैकेट ही दृष्टिगोचर होता है। इसके भीतर क्या है, यह पता लगाने के लिए उसके भीतर के भाग को खोलना और देखना होता है। शरीर एक प्रकार से पार्सल का पैकिंग है, उसकी चमड़ी के रंग और नख–शिख की बनावट मात्र की परिचय बाहरी देखभाल से मिल सकता है। इसके भीतर क्या है? इसका पता ऊपरी देखभाल से नहीं लग सकता। हो सकता है उसके भीतर बहुमूल्य रत्न बन्द हों और यह भी हो सकता है कि चमकीले लिफाफे के भीतर किसी मसखरे ने उसमें ऐसे ही कुछ कूड़ा कबाड़ भर दिया हो।

मनुष्य का वास्तविक मूल्याँकन उसके मन मस्तिष्क की जाँच पड़ताल कर लेने से होता है। हो सकता है कि कोई विषकन्या नख शिख से सुसज्जित होकर प्राण हरण के लिए बैठी हो। यह भी हो सकता है कि अष्टावक्र जैसे किसी अपंग के कलेवर में ज्ञान का भण्डार भरा पड़ा हो। चाणक्य काले कुरूप थे तो भी उनकी मेधा शक्ति ने छिन्न-भिन्न भारत को चक्रवर्ती विशाल भारत में बदल दिया था। कीमत अन्तराल की होती है। बाहरी कलेवर तो दिखावा मात्र होता है, कई बार तो छलावा भी।

चेतन की कई परतें हैं। उनमें मन बुद्धि, चित्त, अहंकार का प्रमुख रूप से प्राधान्य होता है। मनोविज्ञान की भाषा में इनका विवेचन चेतन, अचेतन, अवचेतन, सुपर चेतन आदि के रूप में किया जाता है। वस्तुतः यही वह खजाना है जिसमें एक से एक बहुमूल्य रत्नों का भण्डार भरा पूरा रहता है। उसमें देवत्व के दर्शन होते हैं पर कभी कभी ऐसा भी होता देखा गया कि इस देव सिंहासन पर कोई दुर्दान्त दस्यु अपना कुचक्र डाले और इस प्रकार अपनी शक्ति का प्रदर्शन करे मानो विनाश के देवता के रूप में उसका अवतार हुआ हो। रावन, कुँभकरण, दुर्योधन, जरासंध, वृत्रासुर, महिषासुर, भस्मासुर आदि के रूप में ऐसों की ही रोमाँचकारी चर्चा होती रहती है। यह विकृति का विवेचन है। वस्तुतः अन्तराल देवलोक है। स्वर्ग मुक्ति से लेकर ऋद्धि सिद्धियों के खजाने इसी में भरे रहते हैं। आत्मा के रूप में परमात्मा का निवास भी इसी मानस मन्दिर में निरन्तर विराजमान रहता है। ऋषि, मनीषी, तपस्वी, सन्त, सुधारक, शहीद जैसे महामानव इसी क्षेत्र की उत्पत्ति हैं।

मोटे शब्दों में इस चेतना केन्द्र को मानस या मानस कहते हैं। यही वह निकटतम लोक है जिसमें स्वर्ग और नरक थोड़े से फासले पर ही विद्यमान है, तभी तक वह जीवित है अन्यथा प्राण के निकलते ही अच्छा खासा शरीर कुछ ही क्षणों में सड़गल कर अपनी सत्ता समेटने की तैयारी कर लेता है।

काम करता तो शरीर दिखाई पड़ता है पर वस्तुतः वह जड़ होने के कारण निष्क्रिय होता है। साइकिल को सवार की इच्छानुसार अपनी गति और दिशा निर्धारित करनी पड़ती है। उसी प्रकार दृश्यमान कायिक हलचलें मन के संकेतों का अनुसरण करती हैं। दोषारोपण या गुणगान शरीर के रूप में गाये जाने वाले का होता है पर वास्तविकता दूसरी है। कठपुतली की समस्त हरकतें परदे के पीछे छिपे बैठे बाजीगर की होती है। उसी प्रकार मनका सूत्र संचालक दृश्यमान अनेकों बुरी भली हरकतें करता रहता है।

यह व्यक्ति का मन ही है, जिसमें विचारों का उद्गम उमड़ता रहता है और वह ऐसा विचित्र रूप धारण करता है कि आश्चर्य से चकित रह जाना पड़ता है। इसकी विचित्रतायें देखते ही बनती हैं। यदि पतन की दिशा में मुड़ चले तो उसकी स्थिति-पशु, पामर और पिशाच से भी बदतर हो जाती है। यदि वह ऊँची उठ चले तो इसी हाड़ माँस के पुतले की ऐसी उच्चस्तरीय स्थिति बन जाती है कि उस पर देव समुदाय को भी निछावर किया जा सके। विचार संस्थान काम न दे तो व्यक्ति मूर्ख, सनकी, विक्षिप्त, बेतुका, गया गुजरा जैसा बनकर रह जाता है, भले ही उसके अंग अवयव अपनी जगह पर सही और सुशोभित ही क्यों न हों।

मस्तिष्क सही रहने पर कितने ही विद्वानों ने रोग–शय्या पर पड़े पड़े असाध्य कष्ट सहते सहते महत्वपूर्ण ग्रन्थों की संरचना की है। उनके नेतृत्व में जितने महत्वपूर्ण काम चलते रहे हैं उन्हें कितने ही विद्वान एक साथ मिलकर नहीं चला सकते थे। संसार में ऐसे अगणित प्रतिभा के धनी हुए है, जिनने घोर अभावों के बीच किसी प्रकार दिन गुजारते हुए भी प्रगति पथ पर अनवरत गति से कदम बढ़ाये और ऐसे काम कर दिखाये जो सुसम्पन्नों की कल्पना में भी नहीं आ सकते थे। प्रगति और अवगति की दोनों दिशाएँ मानसिक स्तर की उत्कृष्टता पर निर्भर रहती हैं।

रेल की पटरियों के मोड़ इंजन और डिब्बों को किसी भी दिशा में घसीट ले जाते हैं। इंजन तो मात्र दौड़ता भर है, डिब्बे तो मात्र अनुगमन भर करते हैं वस्तुतः दिशा निर्धारण उस माध्यम से होता है जहाँ से कि पटरियों को जोड़ने और खोलने का उपक्रम सम्पन्न किया जाता है। इसी अन्तर के कारण एक रेल-पूर्व को तो दूसरी दक्षिण को चल पड़ती है और उन दोनों के बीच कुछ ही समय में असाधारण दूरी का अन्तर बन जाता है। पहाड़ की चोटी पर होने वाली वर्षा का पानी जिस ओर को ढलानों पर बह चलता है उसकी धारा भी उसी दिशा वाले समुद्र में जा मिलती है। आरंभ एक जगह से होने पर उसका अन्त उस प्रकार का होता है जिसे असाधारण ही कहा जा सकता है। यह मार्ग परिवर्तन कहाँ से होता है। इसका उत्तर एक ही हो सकता है कि मन के रुझान से।

समझा यह जाता है कि वातावरण से, संगति से, शिक्षा से मनुष्य का मन बदल जाता है और वह सुसंस्कृत बनने की ओर अग्रसर होने लगता है पर यह बात आँशिक रूप से तभी सच निकलती है जब मन ढीलापोला हो और गीली मिट्टी की तरह किस भी ढाँचे में ढलते समय आना-कानी न करे पर जब निजी उत्कण्ठा प्रबल होती है तो वह सारे आवरणों को तोड़ मरोड़ कर रख देती है और वही करा लेती है जिसके लिए प्रबल उत्कण्ठा जड़ जमाये बैठी होती है। रावण पुलस्त्य ऋषि का नाती था। उसकी वंश परंपरा में सभी सज्जन होते आये थे पर रावण की अपनी इच्छा शक्ति इतनी प्रबल निकली कि उसने वंश परम्परा की वातावरण की, शिक्षा दीक्षा की कुछ भी परवाह न की और उस दिशा में चल पड़ा जिसके सम्बन्ध में कोई आशा अपेक्षा नहीं की जा सकती थी। यहाँ मनोबल की प्रबलता सर्वोपरि सिद्ध होती है। इसके विपरीत कितने ही ऐसे व्यक्ति भी हुए हैं जिनके न पूर्वजों का कोई इतिहास था और न वे स्वयं किसी समुन्नत वातावरण में पले फिर भी मन की एक उमंग ने उन्हें कुछ से कुछ बना दिया। आंबपाली, अंगुलिमाल की जिन्दगी हेय स्तर की बीती जब उनने करवट बदली तो कायाकल्प जैसा परिवर्तन उपस्थित हो गया। वे सन्त ही नहीं बने, वरन् ऐसी स्थिति में पहुँच गये जहाँ से वे अनेकों को सन्मार्ग की ओर घसीट कर ले जाने में सफल होते रहे। कबीर, रैदास आदि की परिस्थितियाँ ऐसी नहीं थीं, जिसके कारण उन्हें उच्चकोटि के सन्त और समाज सुधारक बनने का अवसर मिलता। उनकी निजी मानसिक प्रचंडता अपने आप में एक ऐसी शक्ति है जो अपने अनुकूल वातावरण बना लेती और सहयोग जुटा लेती है तथा प्रतिकूलताओं से जूझकर उन्हें अनुकूलता में बदल लेती है।


सुगंधों से मन को प्रफुल्लित करें, प्रसुप्त को जगायें

सुगंध का प्रभाव सर्वविदित हैं सुगंधित वातावरण में उठने-बैठने, खाने-पीने की सभी की इच्छा होती है, जबकि दुर्गन्ध से लोग दूर भागते हैं। मन्दिरों और उपासना-गृहों में भक्त देर तक बैठे रहकर साधना-आराधना इसलिए करते रह पाते हैं कि वे खुशबूदार और उत्फुल्लतादायक स्थान होते हैं। प्रकृति का सान्निध्य आनन्ददायक माना जाता है, क्योंकि वहाँ का वातावरण वृक्ष-वनस्पतियों और फूलों के सुवास से ओत-प्रोत रहता है। यह खुशबू के प्रभाव-परिणाम हैं, पर यह सिर्फ मन तक ही सीमित होता है, ऐसी बात नहीं है। शरीर पर भी इसका असर स्पष्ट दिखाई पड़ता है। इसकी इसी सामर्थ्य को देखते हुए अब चिकित्सा विज्ञान की एक अभिनव शाखा (गंध चिकित्सा) के रूप में इसे विकसित किया जा रहा है।

प्रख्यात अँग्रेज तंत्रिका विज्ञान वाई, जेड. यंग के अनुसार गंध ही एक मात्र ऐसी तन्मात्रा है, जिसे ग्रहण तो मस्तिष्क के कोश करते हैं, पर उसका प्रभाव-परिणाम स्वास और रक्त के माध्यम से सम्पूर्ण शरीर को मिलता है। इसी सिद्धान्त पर यह चिकित्सा पद्धति आधारित है। आधुनिक गंध चिकित्सा की जननी फ्राँस की मारग्युवेराइट मौरी मानी जाती है। इस क्षेत्र में दीर्घकालीन अध्ययन अनुसंधान के उपरान्त उन्होंने एक पुस्तक लिखी है-” दि सीक्रेट ऑफ लाइफ एण्ड यूथ” इस पुस्तक में वे लिखती हैं कि गंध चिकित्सा के माध्यम से स्वास्थ्य और यौवन को उसी प्रकार सुरक्षित रखा जा सकता है, जिस प्रकार अन्य कारगर चिकित्सा पद्धतियों द्वारा संभव होता है। वे कहती हैं कि विशेष कर ढलती आयु के साथ जब माँसपेशियों की ऊतकें कड़ी पड़ने लगती हैं और त्वचा में झुर्रियाँ आने लगती हैं, वैसी अवस्था को टालने में यह उपचार प्रक्रिया विशेष रूप से सफल साबित हुई है। उनके अनुसार ऐसा इसलिए संभव हो पाता है, क्योंकि इसमें कड़े ऊतकों में लोच उत्पन्न करने और त्वचा कोशाओं के पुनरुत्पादन की अद्भुत सामर्थ्य है। “एनसाइक्लोपीडिया ऑफ अल्टरनेटिव मेडिसिन एण्ड सेल्प हेल्प” में कहा गया है कि सुगंधित सत्व न सिर्फ शरीर को प्रभावित करते हैं, वरन् स्वभाव और भावनाओं को भी प्रभावित करने की सामर्थ्य रखते हैं। इस क्षेत्र के विशेषज्ञों का कहना है कि उक्त चिकित्सा से न सिर्फ त्वचा संबंधी शिकायतों को दूर किया जा सकता है, अपितु अनेकानेक प्रकार के शारीरिक मानसिक रोगों का इलाज भी संभव है।

अब इस क्षेत्र में ऐसे विशिष्ट कार्ड भी विकसित कर लिए गये हैं, जो रोगियों के संपर्क में आकर उनकी गंध को अपने में धारण कर लेते हैं। तत्पश्चात् इन कांडों को सूँघ कर विशेषज्ञ रोग का निदान करते हैं। इस विद्या के विकास से अब रोगियों को दूरस्थ डॉक्टरों के पास जाने का कष्ट नहीं उठाना पड़ता और घर बैठे उनका इलाज हो जाता है। पश्चिम के कई देशों में इस प्रक्रिया से सफलतापूर्वक उपचार किया जा रहा है। इससे जिन बीमारियों का निदान और उपचार अब तक संभव हुआ है, वे हैं-टाइफाइड, टी.बी., मधुमेह, स्कर्वी, डिप्थीरिया, गुर्दे, यकृत व फेफड़े संबंधी रोग।

इस दिशा में कार्यरत अमेरिकी आयुर्विज्ञान अनुसंधान संस्थान की ग्रन्थि और हारमोन विशेषज्ञ श्रीमती बिनीप्रेड कटलर अपने गहन अनुसंधान के बाद इस निष्कर्ष पर पहुँची हैं कि पुरुष शरीर से निकलने वाली गंध का नारी शरीर का अनुकूल व उत्तम प्रभाव पड़ता है। ज्ञातव्य है कि मनुष्यों में इसका आधार भी “फेरोमोन” नाम रसायन ही है। इस तथ्य के प्रकाश में आते ही पश्चिमी देशों की सौंदर्य- प्रसाधन निर्मात्री कम्पनियों ने अब ऐसे क्रीम, पाउडर व इत्रों का निर्माण आरंभ किया है, जिनमें पुरुषों की खुशबू समाविष्ट होती है इन कंपनियों का दावा है कि इनके प्रयोग से महिलाएँ वही लाभ ले सकेंगी, जो पुरुषों के प्रत्यक्ष सान्निध्य में रहकर लिया जा सकता है।

अब यह तथ्य भी सुस्पष्ट हो चुका है कि शल्यक्रिया की वास्तविक सफलता के पीछे गंध-विज्ञान की महती भूमिका है। क्लोरोफार्म, हैलोथेन, ईथर जैसे रसायनों की गंध मस्तिष्क कोशाओं को तुरंत प्रभावित कर शरीर को अचेतावस्था में ले जाती हैं। इसी के बाद रोगग्रस्त अंग-अवयवों की चीरफाड़ संभव हो पाती है। यदि इस विज्ञान का विकास न हुआ होता, तो आज शल्यक्रिया की सफलता संदिग्ध ही बनी रहती।

कनाडा के तंत्रिका तंत्र विशेषज्ञ डा. पेनफील्ड का कहना है कि मानवी मस्तिष्क में घ्राण केन्द्र और स्मृति केंद्र का बड़ा घनिष्ट संबंध है। वे कहते हैं कि सिर्फ घ्राणशक्ति के माध्यम से मस्तिष्क की गहरी परत में दबी-छुपी, भूली-बिसरी स्मृतियों को उखाड़ा उभारा जा सकता है। इसी प्रकार गंध और स्वाद केन्द्रों का भी निकट का संबंध है। उनके अनुसार जिस प्रकार श्रवण तंत्र की खराबी वाले लोग स्थायी रूप से गूँगे होते हैं, उसी प्रकार जिनकी गन्ध ग्रहण की सामर्थ्य चली जाती है, उनकी स्वादेन्द्रियाँ भी प्रभावित होती हैं। सामान्यतः गंध, स्वाद की तुलना में 10 हजार गुणी अधिक संवेदनशील होती है, पर जब इससे संबंधित अवयव में स्थायी अथवा अस्थायी रूप से खराबी आती है, तब हमें स्वाद में परिवर्तन का आभास होता है सर्दी-जुकाम एवं बुखार की स्थिति में जब हमारा घ्राण तंत्र प्रभावित होता है, तो अन्तर अधिक स्पष्ट हो जाता है।

अपनी पुस्तक “ग्लैण्ड रेग्युलेटिंग पर्सनालिटी” में येल विश्वविद्यालय के तंत्रिका शास्त्री गोर्डन शैपर्ड घ्राण चिकित्सा की प्रक्रिया समझाते हुए कहते हैं कि विभिन्न प्रकार की खुशबूओं के अणु इतने हल्के होते हैं कि वे हवा में इधर-उधर उड़ते-फिरते रहते हैं। इनमें से जब कोई अणु हमारी नाक के संपर्क में आता है, तो घ्राण प्रक्रिया के दौरान ज्ञान तन्तुओं के माध्यम से यह मस्तिष्क की सबसे भीतरी परत (रेप्टीलियन ब्रेन) में स्थित घ्राण केन्द्र में पहुँचता है। यह परत अपनी ऊपरी मस्तिष्कीय परत (लिम्बिक सिस्टम) से स्नायु तंतुओं के माध्यम से परस्पर अन्योन्याश्रित रूप से संबद्ध होती है, जिससे सुगन्धियों का प्रभाव परिणाम सिर्फ घ्राण केन्द्र तक ही सीमित होकर नहीं रहता, वरन् अपनी ऊपरी परत (लिम्बिकलोब) को भी कुछ हद तक प्रभावित करता है। इस परत में स्थित लिम्बिक सिस्टम का नियंत्रण मस्तिष्क के उस क्षेत्र पर होता है, जहाँ अंतःस्रावी तंत्र को संचालित नियंत्रित करने वाला मास्टर स्विच (हाइपोथैलमस) होता है। इस प्रकार सुगंधि गन्ध केन्द्र के साथ-साथ शरीर की समस्त हारमोन ग्रन्थियों को भी प्रभावित-उत्तेजित करने में समर्थ हो जाती है।

संभव है, सुगंधियों के लाभों को देखते हुए ही भारतीय संस्कृति में अग्निहोत्र, यज्ञ विधान और पूजा उपचारों में वातावरण को सुगंधित बनाये रखने का सामान्य प्रचलन चलाया गया हो, ताकि मुख्य उपचार के साथ-साथ खुशबूओं के संपर्क में रहकर गंध-चिकित्सा का लाभ भी अनायास लिया जा सके। गंध चिकित्सा, एरोमा थेरेपी पूर्णतः विज्ञान सम्मत है, यह अब प्रमाणित हो चुका है। यह भी तथ्य सम्मत है कि अप्राकृतिक, संश्लेषित सुगंध से बचना भी उतना ही जरूरी है जितना कि दुर्गन्ध या प्रदूषित वायु से। हितकारी, मन को आह्लादित, प्रफुल्लित करने वाली सुगंधों से लाभ उठाकर मस्तिष्क के प्रसुप्त केन्द्रों को निश्चित ही जाग्रत किया जा सकता है।


प्रतिभा एवं संकल्पशक्ति का उभार

प्रतिभावान होने का अर्थ है-विनम्र, साहसी एवं संकल्पवान बनना। इसके अभाव में मनुष्य महानता के उच्च सोपानों को प्राप्त नहीं कर सकता। सेंट आइन्स्टाइन का कहना है कि यदि आप प्रगति करना चाहते हैं, प्रतिभाशालियों की श्रेणी में अपने को खड़ा देखना चाहते हैं तो सर्वप्रथम जीवन व्यवहार में नम्रता को प्रमुखता देनी होगी। भव्य भवन को खड़ा करने के लिए पहले उसकी नींव को सुदृढ़ किया जाता है। भवन जितना ऊँचा बनाना है, उसकी नींव उतनी ही गहरी खोदनी होगी। यही बात जीन के अन्यान्य सद्गुणों के विकास के संबंध में भी लागू होती है। जीवन का सौंदर्य तभी निखरता है जब साहस और संकल्पबल के आधार पर विकास के मार्ग पर आने वाले अवरोधों से जूझते हुए चला जाय। ऐसे व्यक्तित्ववान, दृढ़संकल्पी ही समाज का कुछ हित साधन कर पाए हैं।

संसार में जितने भी प्रतिभाशाली महापुरुष हुए हैं, अत्यंत निर्धनता की स्थिति में भी वे पीड़ा और पतन निवारण के अपने कार्य से च्युत नहीं हुए। यद्यपि धन का लालच, पद का प्रलोभन भी एवं उच्चवर्ग के दबाव उन पर कम नहीं थे। फिर भी वे जीवन भर उसका साहसपूर्वक सामान करते रहे और प्रेम, सम्मान तथा चरित्र से प्रेरित होकर कार्य करते रहे। सुकरात ने अपने विचार छोड़ देने की अपेक्षा विषपान करना अधिक अच्छा समझा, वेस्टइंडीज में काम करने वाले पादरी ‘लेस केसस’ को निर्धन इंडियंस के दुख दर्दों को दूर करने से पीछे कोई नहीं हटा सका ब्रूसेल्स के महान कलाकार ‘विंर्ट्ज’ को कोई नहीं खरीद सका।

इसी तरह अंग्रेज शासक चार्ल्स द्वितीय के सांसदों में मार्वल एक ऐसा प्रतिभाशाली सदस्य था जिससे निरंकुश शासक को अपनी सत्ता छिन जाने का सतत् भय बना रहता था। जनता उसके विरुद्ध थी और उसका नेतृत्व मार्वल के हाथों में सुरक्षित था। राजा न सभी प्रमुख व्यक्तियों को कितनी काँचन का प्रलोभन देकर अपने पक्ष में कर लिया फिर भी मार्वल को वह अपनी .... में नहीं ले सका। चार्ल्स के लाखों प्रयत्न भी उसे उसके कर्तव्य पथ से डि.... नहीं सके। उसका कोषाध्यक्ष .... .... एक लाख पौण्ड लेकर साँसद के पास पहुँचा तो उसने यह कहते हुए वापस कर दिया कि “मैं यहाँ उन लोगों की सेवा करने आया हूँ जिन्होंने मुझे चुन कर भेजा है। अपनी स्वार्थपूर्ति के लिए राजा और किसी मंत्री को चुन लें, मैं उनमें से नहीं हूँ”। मार्वल की सादगी और चरित्र निष्ठा आज भी लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनी हुई है। उसकी समाधि पर अंकित ये शब्द आज भी कितने सार्थक हैं-”अच्छे लोग उससे प्यार करते थे, बुरे लोग उससे डरते थे, कुछ लोग उसका अनुकरण करते थे परन्तु उसकी बराबरी करने वाला कोई न था।”

दूसरी शताब्दी में इटली का एक सैनिक वेसुवियस में अन्य साथी सिपाहियों के साथ अपनी ड्यूटी पर तैनात था। सहसा उस क्षेत्र में भयंकर आग लग गई। इस दृश्य से भयभीत उसके सारे साथी-सहयोगी अपने प्राण बचाकर भाग खड़े हुए। किन्तु अकेला वह उस दावानल से जूझने लगा। अग्नि प्रकोप को शाँत करने में वह तब तक लगा रहा जब तक कि स्वयं उसका काय कलेवर भस्मीभूत नहीं बन गया। नेपल्स के संग्रहालय में उस प्रतिभाशाली वीर सैनिक के अस्त्र-शस्त्र एवं लोहे के टोप आज भी संरक्षित हैं। यह संकल्प शक्ति से उपजी कर्तव्यनिष्ठा का चमत्कार है।

लन्दन के प्रख्यात विद्वान सैमुएल स्माइल ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “ड्यूटी” में लिखा है कि प्रतिभा परिवर्धन में संकल्प शक्ति की प्रखरता महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। ऊँचे उद्देश्यों सत्कर्मों से प्रेरित संकल्पशक्ति अन्यान्यों को भी प्रेरणा और प्रोत्साहन देती है। संकल्प बल का धनी व्यक्तित्व अपने सद्विचारों की छाप दूसरों पर छोड़ता है और उनको अपने मार्ग पर घसीट ले जाता है। ऐसे दृढ़ संकल्प शक्ति वाले मनुष्य जिस भी समाज या राष्ट्र में होते हैं, उसे अभिनव शक्ति प्रदान करते और उनमें नवजीवन का प्राण फूँकते हैं।

संकल्प शक्ति की दिशा धारा-भली या बुरी कोई भी हो सकती है। इसका गहरा सम्बन्ध मनुष्य की चरित्र निष्ठा से जुड़ा हुआ है। यदि चरित्र निर्माण की दिशा गलत हो तो दृढ़ संकल्पशक्ति विनाशकारी भी हो सकती है। तब वह निष्ठुर व्यक्तियों की आततायी बनाकर उसे प्रेत-पिशाच स्तर का भी बना सकती है। उसे युद्ध विनाश या अत्याचार के लिए उभार सकती है। हिटलर, नैपोलियन, सिकन्दर आदि इसके प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। उनमें संकल्प बल की कमी नहीं थी। प्रतिभा भी उनमें थी पर उसकी दिशाधारा सही नहीं थी। परिणाम स्वरूप उनके विनष्ट होने में देर नहीं लगी।

तृतीय श्रेणी के उन लोगों की संख्या इस संसार में सर्वाधिक है जिनकी संकल्पशक्ति या तो कमजोर होती है अथवा होती ही नहीं। ऐसे लोगों में भले या बुरे कामों के प्रति दृढ़ता का पूर्णतया अभाव होता है। वे प्रायः दब्बू किस्म के होते हैं और जिस तिस के हाथों बिकते और कठपुतली की तरह नाचते हुए दिन काटते रहते हैं। हवा के प्रवाह के अनुरूप तिनके-पत्तों की तरह उड़कर कहीं से कहीं जा गिरते हैं। उन पर कोई भी अपना प्रभाव जमा सकता है। नदी के प्रबल प्रवाह को उलटी दिशा में चीर कर मछली की तरह एकाकी आगे बढ़ सकना मात्र संकल्पबल के धनी प्रतिभावानों से ही बन पड़ता है।

सैमुएल स्माइल का कहना है कि यदि मनुष्य को प्रतिभावान बनना है तो उसे संकल्प बल एवं चरित्र निष्ठा-दोनों को ही सुदृढ़ बनाना होगा। अन्यथा इसके बिना सच्चाई निर्बल रहेगी, नैतिकता भटक जायेगी और हम किन्हीं अयोग्य एवं धूर्त व्यक्तियों के हाथों की कठपुतली बन जायेंगे। ऐसी स्थिति में समाज का-राष्ट्र का निर्माण तो दूर रहा, अपने व्यक्तित्व का विकास भी हम नहीं कर सकते। उनके अनुसार मात्र बौद्धिक विकास से चरित्र की दृढ़ता नहीं आती हैं ऐसे लोग केवल बहस कर सकते हैं, जबकि दृढ़ संकल्प वाले ठोस कार्य कर दिखाते हैं। इस संबंध में मूर्धन्य मानस विज्ञानी श्री लाँक का कहना है कि युवावस्था ही वह उपयुक्त अवसर है जिसमें व्यक्ति अपने संकल्प बल को प्रखर बना सकता है। चरित्र को गढ़ सकता है। यही वह आयु है, जब मस्तिष्क में नये विचार और अच्छे संस्कार जड़ जमा सकते हैं। इस वय में लापरवाही बरतने वालों को आजीवन पछताना पड़ेगा।

लार्ड शाफ्टबरी का कहना है कि अस्तव्यस्त एवं मूर्खतापूर्ण कार्य बुद्धि की कमी के कारण नहीं वरन् संकल्प शक्ति की कमी से होते हैं। चरित्र का गठन एवं परोपकार पूर्ण कार्य मस्तिष्कीय बौद्धिकता से नहीं, हृदय की विशालता से सम्बन्ध रखते हैं। विद्वानों ने वैज्ञानिकों ने भले ही महान सिद्धान्त खोजे या आविष्कार किये होंगे पर महान कार्यों की प्रेरणा दे पाने में वे कम ही समर्थ हुए। मानवता का उद्धार कम-पढ़े लिखे महामानवों द्वारा ही सम्पन्न हुआ है। प्रतिभा का वास्तविक उन्नयन बौद्धिक विकास से न होकर आन्तरिक विकास से सम्बन्धित है। अन्तः प्रेरणा इसका प्रमुख स्रोत है। सेंट एनसेल्म के अनुसार “अपनी बौद्धिक प्रतिभा पर अधिक विश्वास करने वालों की अपेक्षा ईश्वर उन लोगों के अधिक निकट है जो उस पर विश्वास करते और उसके विश्व उद्यान को समुन्नत बनाने में निरत रहते हैं।


राग-रागनियां आँदोलित करती है शरीर व मन को

संगीत में शरीर और मन को उत्तेजित- आन्दोलित करने तथा उसे स्वस्थता और शक्ति प्रदान करने वाले तत्वों का बाहुल्य है। प्राचीन भारतीय आचार्यों ने इसी कारण संगीतशास्त्र के विकास में अधिक रुचि दिखाई थी। भारतीय संगीत उस समय विकास की किन ऊँचाइयों को छू चुका था, इस अनुमान उसकी विभिन्न राग-रागिनियों की अद्भुत सामर्थ्य को देखकर लगाया जा सकता है।

इनके निर्माण के पीछे मात्र मनोरंजन प्रदान करना जैसा स्थूल दृष्टिकोण नहीं था, वरन् इसके द्वारा मानवी अन्तराल में सन्निहित सूक्ष्म भावनाओं और विशिष्टताओं को उभारना, हृदयतंत्र को झंकृत करना ही प्रधान लक्ष्य था। विविध मनोदशाओं की घोतक राग-रागनियां मनुष्य में रसानुभूति का संचार तो करती ही हैं, अनेकानेक शारीरिक-मानसिक-व्याधियों से भी छुटकारा दिलाती हैं संगीत ध्वनि विज्ञान की एक शाखा है जिसमें भिन्न-भिन्न राग-रागिनियों के माध्यम से मानवी चिन्तन और व्यवहार तथा वातावरण को प्रभावित किया जाता है संगीत में अनेकों राग-रागनियां हैं, पर वे सभी सात स्वरों से ही बने होते हैं। किन्हीं-किन्हीं में मात्र पाँच स्वरों का प्रयोग होता है। वाद्य यंत्रों के साथ रागों में स्वरों और आलापों में परिवर्तन के आधार पर उत्पन्न प्रकंपन शरीर और मन को अलग-अलग प्रकार से प्रभावित करते हैं।

संगीत शास्त्रों में कितनी ही राग- रागिनियों का वर्णन है और उन सबके पृथक्- पृथक् प्रभाव बताये गये हैं। ‘संगीत मकरंद’ के संगीताध्याय के चतुर्थ पाद के सूत्र 80-83 में देवर्षि नारद ने कहा है कि सम्पूर्ण रागों के गायन से आयु, धर्म, यश, बुद्धि, धन-धान्य आदि की अभिवृद्धि होती है। संतानें सद्गुणी बनती हैं। इसी ग्रंथ में बताया गया है कि ‘षाडव’ रागों के गायन-वादन से शोक-संताप दूर होते हैं और रूप लावण्य बढ़ता है। ‘पूर्ण’ राग के गायन से आयुष्य और बुद्धि की अभिवृद्धि बतायी गई है। जबकि ‘औडव” से शारीरिक-मानसिक व्याधियों का शमन होता है। ‘मालकौष’ सद्भावना उत्पन्न करता है, तो जैजैवन्ती, राग से प्राण ऊर्जा का अभिवर्धन होता है। इसी प्रकार कई राग ऐसे हैं जिनके शरीर और मन पर तीव्र स्तर के प्रभाव पड़ते हैं। ‘दीपक’ राग गर्मी उत्पन्न करता है तो ‘कालिंगड़ा राग’ गाने-बजाने से गायक एवं श्रोताओं के दिल की धड़कने बढ़ने लगती हैं। इस तरह “पीलू राग” के प्रभाव से कई व्यक्तियों को रोने की तीव्र इच्छा होने लगती है और कइयों की आंखों से आँसू भी बहने लगते हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि संगीत की विभिन्न राग-रागनियां इन्फ्रा और अल्ट्रासोनिक स्तर की ध्वनियाँ हैं जो अपने में समाहित तीव्रता, मधुरता और कर्कशता के कारण अलग-अलग प्रकार के परिणाम प्रस्तुत करती हैं। इस संदर्भ में वैज्ञानिकों ने विविध प्रयोग परीक्षण भी किये हैं। वैज्ञानिक द्वय चार्ल्स कील एवं आँगेलिकी ने विभिन्न स्वर माधुर्य वाले संगीत के प्रभाव को मानसिक रोगियों पर जाँचा परखा है। रोगियों को दो वर्गों में बाँटकर उन्होंने एक समूह को विदेशी संगीत जैसे-पाप म्यूजिक सुनाया और दूसरे समूह को भारतीय संगीत के राग आदि। इस प्रयोग में उत्साह वर्धक और प्रफुल्लता दायक राग चुने गये थे। परिणामतः उनने पाया कि भावोत्पादक भारतीय संगीत के प्रभाव से 80 प्रतिशत मनोरोगी स्वस्थ हो गये, जबकि विदेशी संगीत का असर ठीक उसके विपरीत रहा है। इस तरह के कई प्रयोग-परीक्षणों का विवरण उनने अपनी पुस्तक ‘द म्यूजिकल मीनिंग’ में प्रकाशित भी किया है। “म्यूजिक थैरेपी” नामक पुस्तक में मूर्धन्य चिकित्सा विज्ञानी जूलियट एल्विन ने अपना अनुसंधान निष्कर्ष प्रस्तुत करते हुए बताया है कि संगीत हमारे मन मस्तिष्क, संवेगों एवं शरीर पर अच्छा प्रभाव डालती है।

संगीत से कठोर मन भी द्रवित हो जाता है। इसका एक प्रत्यक्ष उदाहरण त्रावणकोर के स्वातितिरु नालु राजा के प्रसिद्ध दरबारी संगीतकार वडिवेलु के जीवन का है। घटना उन दिनों की है जब राजा ने किसी कारणवश नाराज होकर उन्हें अपने राज्य से निष्कासित कर दिया था। वह अपना सामान और एक पुराना वायलिन लिए जंगल से गुजर रहे थे, तभी कुछ डाकुओं ने उन्हें आ घेरा। उनका सारा सामान छीन लिया और साथ में वाद्ययंत्र भी। वडिवेलु उच्चकोटि के वायलिनवादक थे। उन्हें अपने इस पुराने वाद्ययंत्र से बहुत प्यार था, अतः किसी प्रकार अनुनय-विनय कर उसे लेने में वे सफल हो गये और वहीं बैठ कर बजाने लगे। उससे निनादित स्वर लहरी का लुटेरों पर ऐसा आश्चर्यजनक प्रभाव हुआ कि उनने न केवल सारा सामान लौटा दिया, वरन् उन्हें पुरस्कृत भी किया और सुरक्षित स्थान तक पहुँचा दिया।

संगीत में अपनी एक विशिष्ट शक्ति है जिसे अब विज्ञानवेत्ता भी स्वीकारते हैं। इसकी इस क्षमता का उल्लेख करते हुए अमेरिका के सुप्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक आस्टिन एम. डे लारियर्स ने “व्हाट इज थैरेपी इन म्यूजिक थैरेपी” में कहा है कि संगीत अपनी विशिष्ट और सूक्ष्म आन्तरिक संरचना के माध्यम से उन महत्वपूर्ण तत्वों को उपस्थित करता है, जिन्हें मानसोपचार के लिए किसी भी आधुनिक चिकित्सा पद्धति में आवश्यक माना जाता है।

इसमें भावनाओं को उद्दीप्त करने की अद्भुत क्षमता है। इससे उत्पन्न शरीर के विभिन्न कायिकीय परिवर्तनों-जैसे रक्तचाप, नाड़ी गति, श्वसनदर, मस्कुलर एनर्जी आदि को वैज्ञानिक उपकरणों की सहायता से मापा जा सकता है। कुछ ध्वनियाँ मनुष्य एवं अन्य जीव−जंतुओं के लिए सत्परिणामदायक होती हैं, तो कुछ इसके विपरीत। इस आधार पर संगीत के प्रभाव परिणाम भी दोनों प्रकार के होते हैं। विभिन्न रोगों पर अलग-अलग रागों की प्रभाव प्रतिक्रिया भी अलग-अलग होती है। इस संबंध में अमेरिका के प्रख्यात शरीर विज्ञान डा. कीथ वैलेस ने अपने सहयोगियों के साथ गहन खोजें की हैं और पाया है कि रुग्ण व्यक्ति विभिन्न रागों के प्रति अपनी अलग-अलग प्रतिक्रियाएँ व्यक्त करता है। यह भी देखा गया है कि यदि वह व्यक्ति संगीत के प्रति संवेदनशील नहीं हुआ तो रोग के ठीक होने की संभावना भी न्यून ही रहती है।

यूरोप और अमेरिका के चिकित्सा विज्ञानी संगीत द्वारा रोगोपचार में अब गहरी अभिरुचि दिखा रहे हैं। मधुर स्वर लहरियों को कैसेटों में बंद करके व्यक्तिगत या सामूहिक रूप से रोगियों को सुनाया जाता है। पूर्वी जर्मनी के डा. जोहोंस, अमेरिका के डा. पोडोलास्की तथा डा. दर्चिसन ने इस क्षेत्र में काफी ख्याति अर्जित की है। चीन के शंघाई कन्जरवेटरी आफ म्यूजिक के चिकित्सकों ने “इलेक्ट्रो म्यूजिक थैरेपी” नामक एक प्रभावशाली उपचार पद्धति विकसित की है जिसमें भिन्न-भिन्न बीमारियों के लिए पृथक्-पृथक् संगीत ध्वनियाँ प्रयुक्त की जाती हैं।

इस क्षेत्र में विकास की अनन्त संभावनाएँ हैं। इतिहास में बैजूबावरा, तानसेन, बाजबहादुर जैसी अनगिनत हस्तियों के नाम देखने को मिलते हैं जिनने जड़ व चेतन दोनों ही जगत को संगीत से प्रभावित कर इस कला को शिखर तक पहुँचा दिया था। आज इस पर विज्ञान सम्मत शोध की आवश्यकता है। आँसीलोस्कोप, हारमोनी एनालायजर, डेसीबल मीटर, वायोफीड बैक एवं पाँलीग्राफ का संयुक्त प्रयोगकर ध्वनि तरंगों का स्वरूप व उनके प्रभाव को जाँचा मापा जा सकता है। इन प्रयोगों का एक छोटा सा संस्करण ब्रह्मवर्चस शान्तिकुँज में भी देखा जा सकता है।


आनंद का उद्गम-आत्मभाव

प्रिय पदार्थों एवं प्राणियों को हर कोई अपने समीप देखना चाहता है। साथ ही अप्रियों से छुटकारा भी। प्रियता, प्रेम-भावना सभी को सुहाती लुभाती है। हर किसी को प्रिय पात्रों से घिरा रह कर प्रसन्नता प्राप्त करना चाहिए। घृणा अप्रियों से ही होती है। वे ही अखरते हैं। अपना बालक प्रिय लगता है, इसलिए उसके कुरूप, मूर्ख अथवा दुर्गुणी होने पर भी उसके साथ प्रीति रहती है। प्रीति के साथ प्रसन्नता जुड़ी हुई हैं। इस उपलब्धि के लिए हर कोई तरसता रहता है। उसके निकटवर्ती बनने के लिए प्रयत्न भी करता है।

उपनिषदकारों ने प्रेम को परमात्मा कहा है। महा प्रभु ईसा भी यही कहा करते थे। भक्तियोग में इसी को प्रभु मिलन का रस कहा है। सामान्य जीवन में भी यही बात है। मनुष्य प्रियजनों के साथ कठिन परिस्थितियों में भी रह लेता है। दुःख भी सह लेता। दुर्दिन भी गुजार लेता हे। कठिनाई तब पड़ती है जब अप्रिय अनिच्छित समुदाय के साथ की परिस्थितियों में रहना पड़े। इस संसार में आत्मा प्रेम की प्यासी रहती है। उसी को ढूँढ़ती है। यदि उस उपलब्धि का सुयोग हस्तगत करती है तो कृत कृत्य होकर रहती है।

वस्तुओं में व्यक्तियों में न कोई प्रिय है न अप्रिय है। मेले ठेलों में अनेकानेक वस्तुएँ प्रदर्शनार्थ सजधज कर रखी होती है पर उन पर उड़ती नजर डाल कर दर्शक आगे बढ़ जाते हैं। इसी प्रकार पर्व, समारोहों पर नर नारियों की भारी भीड़ रहती है। इनमें अनेकों सुन्दर भी होते हैं, अनेकों असुन्दर भी। पर उनसे निजी लगाव न होने से उस समूह के प्रति कोई लगाव नहीं होता है। वह भीड़ मात्र लगती है। उसे धकेल कर आगे बढ़ चलने को मन करता है। सड़कों, मुसाफिरखानों में सभा सम्मेलनों में अगणित नर मुँड दीखते हैं पर उन्हें देखने पर कौतूहल भर ही अनुभूति होती है। न कुछ आकर्षण होता है न उत्साह।

प्रियता का समावेश तब होता है जब साथ में आत्मीयता जुड़ती है। अपने मित्र परिजनों में गुण ही भरे दीखते हैं। उनके साथ रहने खर्च करने एवं सहयोग देने का जी करता है। यदि उन्हीं के साथ कुछ दिन बार शत्रुता हो जाय अथवा उपेक्षा बरतने की स्थिति आ जाय तो फिर समीप रहने पर भी वे दूरवर्ती लगने लगते हैं। शकल सूरत वही रहने पर भी सुहाते तक नहीं। उनका स्मरण आना, समीप रहना तो बन ही नहीं पड़ता। बच निकलने का ही विचार रहता है इस परिवर्तन का विश्लेषण करने पर यही तथ्य उभर कर आता है कि यहाँ न कोई प्रिय है न अप्रिय न सुन्दर है न कुरूप न सज्जन है न दुर्जन न उपयोगी है न अनुपयोगी। जिसके साथ अपनी आत्मीयता जुड़ जाती है वही सुहाने लगता है। उसमें गुण ही गुण भरे दीखते हैं।

अँधेरे में टार्च का प्रकाश फेंकने पर जितने दायरे में रोशनी पड़ती है उतनी ही जगह प्रकाशवान हो उठती है। उस परिधि में जो कुछ है सभी स्पष्ट हो जाता है। साफ दीखने लगता है। आत्मीयता एक टार्च है, उसका प्रकाश जिन वस्तुओं, प्राणियों या व्यक्तियों पर पड़ता है वे ही सुहावने लगते हैं। शेष सब तो कूड़ा, कचरा भर प्रतीत होता है। जब तक घर, वाहन, वस्त्र अपना था तब तक उसकी पूरी साज सँभाल रखी जाती है, पर जब वह बिक जाता है, दूसरे के कब्जे में चला जाता है तो फिर उसके टूटने फूटने पर से कोई चिन्ता नहीं होती। कुछ दिन पूर्व जो जब तक अपना रहा तब तक उसकी उपस्थिति सुहाती रही और साज सँभाल होती रही। पर जब परायेपन का भाव आया तो फिर उपेक्षा ही शेष रह जाती है। वह कहाँ, किस स्थिति में है इस की चिन्ता नहीं रहती। पड़ोसी के घर मृत्यु होने पर सहानुभूति का लोकाचार भर निबाहा जाता है, पर जब अपने घर में किसी प्रियजन की मृत्यु होती है तो शोक से चिन्त विह्वल हो उठता है। धैर्य बँधता ही नहीं। उस विछोह का कष्ट शूल की तरह चुभता रहता है। पड़ोसी से भी मिलना जुलना होता रहता था, पर आत्मीयता के अभाव में उसका मरना तक कौतूहल मात्र बन कर रह गया। जब अपने की मृत्यु हुई तब पता चला कि वियोग का घाव कितना गहरा होता है। मनुष्य सभी एक जैसे। मरण का दृश्य और अंत्येष्टि का स्वरूप भी एक जैसा। फिर एक में उपेक्षा और दूसरे में गहरी व्यथा होने का कारण तलाश करने पर वस्तु स्थिति स्पष्ट हो जाती है कि जिसके साथ जितनी गहरी आत्मीयता होती है, उसके साथ उतनी ही गहरी मिलन की प्रसन्नता एवं वियोग की व्यथा जुड़ी होती है। अपनी वस्तुओं के टूटने खोने पर उद्विग्नता होती है। पालतू कुत्ते, बिल्ली, तोते तक के मरने पर वेदना होती है। यहाँ वस्तु या प्राणी के प्रति ममता का होना न होना ही प्रसन्नता एवं व्यथा का आधार भूत कारण सिद्ध होता है। वस्तुएँ तो आती जाती ही रहती हैं। प्राणी तो मरते जन्मते ही रहते हैं। उनके संबंध में विचार करने की फुरसत किसे? हर किसी को अपनी पड़ी है। जिसे अपना माना जाता है उसी में आकर्षण दीख पड़ता है। उसी में सद्गुण भरे प्रतीत होते हैं। उसी को साथ रखने या साथ रहने में आनंद मिलता है।

तथ्य इस प्रकार उभर कर आते हैं कि अपनापन आरोपित होने से ही कोई प्रिय लगने लगता है। यदि वह भाव बदल जाय तो कल जो प्राणप्रिय था वह आज उपेक्षा का पात्र बन जाता है। शत्रुता बन जाने पर तो उसकी गंध भी नहीं सुहाती। ऐसी दशा में किसी वस्तु या व्यक्ति को स्थायी रूप से सुन्दर या प्रिय पात्र नहीं कहा जा सकता है। आत्मभाव का ही चमत्कार है कि वह जिस किसी के साथ ही जुड़ता है उसी में बड़ी सुन्दरता दीख पड़ती है उसी में प्रिय पात्र होने के सभी लक्षण अनुभव होने लगते हैं। इसका निष्कर्ष यह भी निकलता है कि जिस किसी को भी प्रियवत् देखना है उसके साथ आत्मीयता जोड़ ली जाय। उसकी निकटता आनंद विभोर कर देने वाली बन जायगी।

विचारणीय यह है कि जिसके साथ संयोगवश आत्मीयता जुड़ गई है उसी को स्वाभाविक या पर्याप्त मान कर बैठ रहा जाय या आनंददायक परिधि का और भी अधिक विस्तार किया जाय। यदि ससीम को असीम बनाने का मन हो बूँद से मन न भरता हो और निर्झर में कलोल करने के लिए मन चलता हो तो वह भी नितान्त सरल है। करना इतना भर पड़ता है कि आत्मीयता को संकीर्ण क्षेत्र से उबार कर उसे अधिक व्यापक क्षेत्र तक पसारा जाय। शरीर, कुटुम्ब या उपलब्ध वैभव से आगे बढ़ कर अपनेपन के अंचल में सुविस्तृत क्षेत्र को समेटा जाय। इस विस्तार से घर की छोटी मान्यता समूचे मुहल्ले, गाँव प्रान्त, देश की फैल पड़ती है। सवेरे का सूर्य पेड़ों, टीलों के ऊपरी भाग पर चमकता है। पर जब वह मध्याह्नकाल तक पहुँचता है तो उसका प्रकाश सुविस्तृत भूमि पर फैल पड़ता है। व्यक्ति की आत्मीयता के सम्बन्ध में भी यही कहा जा सकता है। उसे सीमित परिधि में संकुचित भी रखा जा सकता है पर यदि इच्छा हो तो उस आलोक से सुविस्तृत क्षेत्र को आलोकित किया जा सकता है। विरानी समझी जाने वाली वस्तुओं को अपना माना और उनकी समीपता से भरपूर आनंद उठाया जा सकता है।

मान्यता के विस्तार में कहीं कोई अवरोध नहीं। अधिकार जमाने की चेष्टा की जाय तो विग्रह खड़ा हो सकता है। पर मानवता तो अपने मन की बात है उसे किसी पर भी कितने ही बड़े क्षेत्र पर भी आच्छादित किया जा सकता है।

सूर्य, चंद्र, तारक बादल, वन, पर्वत, नदी, निर्झर, धरती, समुद्र, पवन आदि को अपना माना जाय तो इस मानवता को चुनौती कौन देगा? दृष्टिगोचर होने वाले पुरुषों को पिता, भाई, भतीजे की और नारियों को माता, भगिनी, पुत्री की दृष्टि से देखते रहा जाय तो इस पर रोक लगाने का साहस कोई नहीं कर सकता। स्वामी राम तीर्थ अपने को राम बादशाह मानते थे। समस्त विश्व को अपनी प्रजा कहते थे। उनके कथन पर किसी ने कानूनी कार्यवाही नहीं की। झंझट तब खड़ा होता है जब किसी पर एकाधिकार जमाया जाता है। एक ही नारी किसी की पत्नी, किसी की माता, किसी की बहिन, किसी की पुत्री, किसी की भतीजी, किसी की भांजी आदि हो सकती है। उस पर सभी अपना अपना सीमित अधिकार मानते हैं, पर इनमें से कोई भी यह दावा नहीं करता कि उसके अतिरिक्त और किसी का किसी प्रकार का कोई रिश्ता वास्ता नहीं है। इसी प्रकार अपनी मान्यताओं को कितने ही विस्तृत क्षेत्र पर भली प्रकार आरोपित कर सकते हैं। शर्त एक ही है कि उस पर एकाधिकार न जतायें दूसरों के अधिकार को अस्वीकार न करें।

वस्तुतः इस संसार की किसी भी वस्तु पर किसी का पूरा अधिकार नहीं। यहाँ तक कि अपने शरीर पर भी नहीं। उसके भीतर भी अनेक जीवाणु विषाणु पलते रहते हैं। भूमि जिस पर अपना कब्जा जमाये हुए थे वह भी सृष्टि के आदि से लेकर अब तक लाखों करोड़ों के कब्जे में रह चुकी है। पवन साझे का सागर है। जितना खा पहिन लेते हैं उतना ही अपना है। शेष तो तिजोरियों में कोठी संदूकों में बन्द रहता है। उस पर समूचे परिवार का उत्तराधिकारियों का हक जुड़ा रहता है। ऐसी दशा में अपना पूरा अधिकार किस पर है, यह सोचने पर अकेली आत्मा ही अपनी रह जाती है।

अधिकार न जमाया जाय। इतनी सतर्कता बरतने पर आत्मीयता का कितना ही गहरा आरोपण किसी पर भी किया जा सकता है। आवश्यक नहीं कि दूसरे भी हमारी मान्यता के अनुरूप ही प्रत्युत्तर दें। एक पक्षीय प्यार बिना किसी कठिनाई के पलता रह सकता है। देव प्रतिमाओं के प्रति भक्तजन एक पक्षीय श्रद्धा का ही आरोपण करते हैं। देवता उसका कोई प्रत्युत्तर नहीं देते। उसकी पाषाण या धातु से बनी प्रतिमा बदले में भी किसी प्रकार की भाव संवेदना या हलचल प्रकट नहीं करती है। इसी प्रकार बिना प्रत्युत्तर प्रतिक्रिया की अपेक्षा किये हम हर वस्तु पर सुव्यवस्था और हर व्यक्ति पर सद्भावना का आरोपण करते रह सकते हैं।

गेंद जिस कोण में जितने जोर से जमीन पर मारी जाती है वह उसी वेग से उसी कोण में फेंकने वालों के पास वापस लौट आती है गुम्बजों में बोली हुई आवाज की प्रतिध्वनि गूँजती है। दर्पण में ज्यों का त्यों प्रतिबिम्ब दीखता है। छाया की आकृति वस्तु जैसी ही होती है। हमारी आत्मीयता आरोपित वस्तु से टकरा कर शब्दबेधी बाण की तरह अपने पास ही वापस लौट आती है। आत्मभाव का आरोपण अपनी प्रतिक्रिया इस रूप में प्रकट करता है, मानो सारा संसार ही बदले में आत्मीयता हमारे ऊपर उड़ेल रहा हो।

आनन्द की उपलब्धि केवल एक ही स्थान से होती है वह है आत्मभाव। उसे इच्छानुसार किसी पर भी कितनी ही सघनता के साथ आरोपित किया जा सकता है। यदि यह विश्वास रखा जा सकता है कि अपनी मान्यता विश्व ब्रह्मांड में टकरा कर अपने ही पास वापस लौट आयेगी। आत्मीयता ही प्रसन्नता, प्रफुल्लता और पुलकन है। उसका अभीष्ट मात्रा में निरन्तर उपलब्ध करते रहना पूर्णतया अपने हाथ की बात है। शर्त इतनी ही है कि अपना आरोपण सच्चा, निस्वार्थ और गहरा है।


विरोध नहीं समभाव के विषय में सोचें!

श्रुति का वचन है कि “सर्व वै खिल्विदं ब्रह्म” अर्थात् यह सब विराट ब्रह्माण्ड ब्रह्म ही है। विराट ब्रह्म की परिकल्पना में इस विश्व को ही ईश्वर का दृश्य स्वरूप माना गया है। अर्जुन, कौशल्या, काकभुशुण्डि आदि ने ईश्वर दर्शन का आग्रह किया तो उन्हें विराट विश्व की झाँकी करके ही सन्तोष करना पड़ा। निराकार का अपना निजी स्वरूप कोई हो ही नहीं सकता। कलेवर समेत ही उसकी झाँकी होने की अपेक्षा की जाती है। यह कलेवर और कुछ नहीं प्रकृतिपरक ही हो सकता है, भले ही वह प्रत्यक्ष हो अथवा परोक्ष दृश्य हो या अदृश्य। वह वस्तु रूप भी हो सकता है और कल्पना शक्ति के आधार पर स्व-विनिर्मित भी।

ईश्वर सान्निध्य की चर्चा का जहाँ प्रसंग आता है उसे अन्तराल में, हृदय देश में, अन्तःगुहा में अवस्थित ही बताया जाता है। चेतना का अणु पक्ष आत्मसत्ता में है और विभु पक्ष ब्रह्माण्डीय चेतना में। दोनों एक ही तत्व के बने हैं। चिनगारी और आग, बूँद और जलाशय, घटाकाश और महाकाश में मात्र आकार भिन्नता है। सत्ता एक ही है। ब्रह्म सान्निध्य का लक्ष्य प्राप्त करने के लिए आत्म परिष्कार ही एक मात्र उपाय माना गया है। इसी के निमित्त उपासना, साधना और आराधना का त्रिविध प्रयास करना पड़ता है। योग और तप का बहुमुखी आधार इसी निमित्त जाना और किया जाता है। मैले दर्पण में अपनी छवि दिखाई नहीं पड़ती। मैले पानी में सूर्य का प्रतिबिम्ब नहीं चमकता। इसी प्रकार दुश्चिन्तन और कुकर्मों से सड़े गले जीवन से अन्तःकरण ऐसा दूषित हो जाता है कि उसमें ईश्वर सत्ता विद्यमान होते हुए भी आभास मिल नहीं पाता। इस अवरोध को दूर करने के आत्म शोधन के ही प्रयास करे पड़ते हैं। अपूर्णता से उबर कर पूर्णता प्राप्त करने का यही एक मात्र मार्ग है। अध्यात्म तत्व दर्शन में इसी का प्रतिपादन है। साधनापरक समस्त कर्मकाण्ड इसी की पूर्ति के लिए विनिर्मित किये गये हैं। जो जिस अनुपात से आत्मशोधन करता जाता है उसके भव बन्धन उसी मात्रा में कटते हैं। ब्रह्म सान्निध्य का रसास्वादन करने का अवसर उसे उसी अनुपात में मिलता चला जाता है। जीव का प्रयास ब्रह्म सान्निध्य के लालच के मृग की नाभि में कस्तूरी भरी होने पर भी उसे अन्यत्र ढूँढ़ते फिरने की तरह शास्त्रों में बताया गया है।

तात्विक प्रतिपादन और अनुभवों का निर्धारण जीव और ब्रह्म की एकता का समर्थन है। इसे जड़ चेतन का समन्वय भी कह सकते हैं।

इतना होते हुए भी यह देखा जाता है कि दोनों सत्ताओं में पृथकता ही नहीं प्रतिकूलता भी है। ईश्वर के गुण जीव में नहीं पाये जाते और जीव स्तर की गतिविधियाँ अपनाने के लिए ईश्वर की विवशता भी समझी जा सकती है। जो व्यापक है वह एक केन्द्र पर सिकुड़ कर केन्द्रित कैसे हो सके? यदि होने का प्रयास भी करे तो सृष्टि में वह अन्यत्र कैसे उपस्थित हो सकेगा? शून्य को पूरा कौन करेगा?

पुरातन प्रतिपादनों और निर्धारणों को समझ सकने के उपरान्त वस्तुस्थिति सहज समझी जा सकती है। फिर भी इन दिनों दोनों के पृथक् होने की कठिनाई का जो वर्णन किया जाता है। पृथकता के कारण होने वाली हानियों का जो वर्णन किया जाता है एवं अध्यात्म और विज्ञान के समन्वय पर जो जोर दिया जाता है, उन प्रतिपादन कर्ताओं के मन्तव्यों को समझना चाहिए। शब्दों के भ्रम जंजाल में कई बार वह बात स्पष्ट नहीं हो पाती कि जो कुछ कहा जा रहा था, चाहा जा रहा था उसके पीछे वास्तविक उद्देश्य क्या था और किस कठिनाई का क्या समाधान खोजा जा रहा था? इन दिनों चल रही चर्चा के सम्बन्ध में ऐसा ही शब्द जंजाल बाधक हो रहा है। उस उलझन की वास्तविकता गहराई में उतर कर समझना होगा ताकि जो तथ्य विचारशीलों को उद्विग्न करते हैं, उन्हें समझा और उनका समाधान खोजा जा सके।

विज्ञान पक्ष की मान्यता है कि जो प्रत्यक्ष है, उतना ही सत्य है। इसमें जो तुरन्त लाभ दिख सके, अपनी सत्ता का परिचय दे सके, वही मान्य है। चूँकि ईश्वर, धर्म और तत्वदर्शन के प्रतिपादन प्रत्यक्ष नहीं हैं इसलिए उन्हें मान्यता क्यों दी जाय?

अध्यात्म का कथन है शास्त्रों, आप्तवचनों में ही पूर्ण सत्य समाहित है। उन्हें, झुठलाना ऋषियों और शास्त्रों का अपमान है। विज्ञान की खोजें नित नई सामने आती हैं। पिछले कथनों को झुठलाती चलती हैं ऐसे अपरिपक्व प्रतिपादनों की बात क्यों सुनी जाय?

विरोध के मुख्य तथ्य यही हैं। विरोध चल पड़ने पर कटु प्रहार एवं दोषारोपण के अनेकों प्रसंग आते हैं और परस्पर गाली गलौज की भाषा का प्रयोग होने लगता है। मन्तव्यों को मिथ्या ही नहीं निहित स्वार्थों से प्रेरित तक कहा जाने लगता है। आस्तिक-नास्तिक स्तर का यही मल्लयुद्ध खून खराबे तक पहुँचता रहा है।

विज्ञान के सम्बन्ध में अध्यात्म पक्ष द्वारा कहा जाता है कि उसके द्वारा प्रकृति का असाधारण दोहन किये जाने पर भविष्य के लिए कुछ न बचेगा। प्रदूषण फैलने की विषाक्तता प्राणघातक होगी। लोग काहिल बनेंगे। इसके कारण समस्त सत्ता सम्पदा सिमट कर कुछ ही हाथों में सीमित हो जायगी। नीति मर्यादाओं का कोई मूल्य न रहेगा आदि।

इसी प्रकार विज्ञान ने अध्यात्म को अन्ध विज्ञान बताया है। धर्म को अफीम की गोली कहा है। आधार रहित कल्पनाओं की उड़ानें बताया है। ईश्वर यदि नियामक है तो वही कर्म अपनी विशेषताओं के कारण प्रकृति क्यों नहीं कर सकती? अध्यात्म परावलम्बन है। पराक्रम साहस को काटता और व्यक्ति को दीन दुर्बल बनाता है।

दोनों पक्ष अपने अपने समर्थन से बहुत कुछ कहते रहे हैं। दूसरों पर लाँछन लगाने में काई कसर नहीं रहने देते रहे हैं। किसी ने भी यह नहीं सोचा कि दूसरे पक्ष के प्रतिपादनों और आक्षेपों में क्या कुछ सचाई भी है? भ्रान्तियों के निराकरण और उपयोगी प्रतिपादनों को ग्रहण करने की यदि मनोभूमि रही होती तो जो खाई लगातार बढ़ती चली आई है वह घटती। एक दूसरे के परिश्रम को सराहता और जो ग्रहणयोग्य होता अपनाता। जहाँ सहमति नहीं बन पड़ रही हो उसे सुलझाने के लिए कभी उचित अवसर आने की प्रतीक्षा करता, तो ऐसी स्थिति न बन पड़ती जैसी आज है।

वस्तुतः दोनों ही पक्ष असाधारण शक्ति सम्पन्न हैं। उनके प्रतिपादनों में इतनी सचाई एवं उपयोगिता भी है जिसे जन-साधारण को बताते हुए औचित्य अपनाने की पृष्ठभूमि तैयार की जा सके। विग्रह से शत्रुता उपजती है। आग्रह प्रतिष्ठा का प्रश्न बनता है और अहंकार इस प्रकार आड़े आता है कि तथ्यों के निरीक्षण-परीक्षण की गुंजाइश तक नहीं रहती वरन् विरोध में मजा आता है। दूसरे पक्ष को नीचा दिखाने की प्रवृत्ति बढ़ती है।

इस तनावपूर्ण स्थिति में एक तीसरा पक्ष उभरा है जिसे विवाद से उत्पन्न दिग्भ्रम ही कहा जा सकता है। सेनायें परस्पर विरोधी युद्ध की साज सज्जा इसी मनःस्थिति में बनाती हैं। सभी जानते हैं कि उपयोगी पक्षों का विग्रह सर्व साधारण के लिए, संसार के लिए हानिकारक की सिद्ध होता है। देवासुर संग्राम लम्बे समय तक चलता रहा, पर उससे किसको क्या मिला? दोनों ने ही हानि उठाई। इस स्थिति में किसी को भी शान्ति से रहने एवं प्रगति करने का अवसर न मिला।

अन्ततः दूरदर्शी बुद्धिमत्ता उभरी। सहयोग की बात सोची गई। समुद्र मंथन की योजना बनी। लड़ झगड़ में खर्च होने वाली शक्ति सृजन प्रयोजन में लगी। इस माहौल में निराश बैठ हुए कच्छप भगवान, वासुकी महासर्प, मन्दराचल पर्वत पर उस प्रयास में सहयोग के लिए कटिबद्ध हो गये। मंथन में चौदह रत्न निकले। उनके माध्यम से उन दोनों पक्षों को नहीं सर्वसाधारण को भी अनेक प्रकार से लाभान्वित होने का अवसर मिला।

उसी घटना क्रम का स्मरण करते हुए विचारशील वर्ग द्वारा सोचा जा रहा है कि संसार की इन दोनों सर्वोपरि कही जा सकने योग्य शक्तियों को सामंजस्य और सहयोग का तालमेल बिठाने की स्थिति में लाया जाय। अध्यात्म और विज्ञान का समन्वय किया जाय। यह आवाज हर दिशा में उठ रही है। विश्व के मूर्धन्य विचारकों का यही अभिमत है कि इनके मध्य जो खाई खुद गई है उसे पाटने के लिए प्रबल प्रयत्न किया जाय।

वास्तविकता यह है कि दोनों के बीच सामंजस्य की परम्परा अनादि काल से चली आ रही है। वे एक दूसरे के विरोधी नहीं पूरक हैं। एक के सर्वथा पृथक् रह कर दूसरा अपना अस्तित्व तक बनाये नहीं रह सकता। पदार्थ के बिना चेतना पंगु है और चेतना की प्रखरता के बिना पदार्थ अंधे के समतुल्य। अंधे पंगे परस्पर मिल कर नदी पार करने की योजना बना सकते हैं और पार जाने में सफल हो सकते हैं। यही स्थिति उपरोक्त विचार के सम्बन्ध में भी है। पृथक् रह कर तो वे अभीष्ट लाभ उठाने से वंचित ही रहेंगे और असहयोग एवं विग्रह जन्य घाटा ही उठाते रहेंगे। अब समय आ गया है कि विरोध को मैत्री में परिणत किया जाय।

अध्यात्म और विज्ञान दोनों का एक ही लक्ष्य है-सत्य की खोज। यह तभी बन पड़ता है जब मस्तिष्क खुला रखा जाय। पिछली मान्यताओं में यदि नये तथ्य सामने आने पर परिवर्तन करने की आवश्यकता पड़े तो उसके लिए तैयार रहा जाय। शोध प्रक्रिया इसी प्रकार सम्पन्न होती है।

अब तक दोनों पक्षों ने बहुत कुछ जाना है। पर जो जानने के लिए शेष है वह उससे भी कहीं अधिक है, जो अब तक हस्तगत हो चुका। विज्ञान अपेक्षाकृत अधिक अच्छी तरह समझता और अपनाता है। तभी तो पुराने शोध निष्कर्षों से संतुष्ट न रहकर आगे की बात जानने, अधिक गहराई में उतरने और यदि पिछले में सुधार संशोधन करना पड़े तो उसके लिए तैयार रहता है। उपलब्धियों को पूर्ण मानने की उसकी प्रवृत्ति है ही नहीं। इसी का परिणाम है कि नित नये आविष्कार प्रकट होते चलते हैं और उनके द्वारा अधिक क्षमतायें प्राप्त करते चलने के अवसर मिलते रहते हैं। यदि पूर्णता का आग्रह किया गया होता तो उसका परिणाम निश्चित रूप से यही होता कि अग्रगमन की संभावनायें समाप्त हो जातीं। अधिक नया जानने और अधिक महत्वपूर्ण प्राप्त करने का चलता हुआ उपक्रम अवरुद्ध होकर रह जाता।

विज्ञान ने सिद्धान्तों की सचाई के सम्बंध में आस्था उत्पन्न की है और उसका समुचित लाभ भी उठाया है। धर्म को भी प्रामाणिकता के लिए एकता का एकात्मकता का सिद्धान्त अपनाना होगा तभी विग्रह और भ्रम फैलाने के लाँछन से मुक्ति मिल सकेगी। सभी एक न हो सकते हों कम से कम सहिष्णुता, समन्वय, समभाव तो अपनाना ही चाहिए। भले ही निजी अभिरुचि के अनुरूप कोई किसी भी प्रकार का प्रयोग-उपयोग अपनाता रहे। विज्ञान सार्वभौम, सर्वजनीन और सर्वोपयोगी है। अध्यात्म को भी इसी स्तर का बनकर अपनी महत्ता प्रतिपादित करनी चाहिए।


Quotation

प्रत्येक मनुष्य दो प्रकार की शिक्षा प्राप्त करता है। एक वह जो उसे दूसरों से मिलती है। उससे भी महत्तर वह दूसरी शिक्षा है जो अपने अनुभव से वह अपने आप प्राप्त करता है।

-गिबन


स्फूर्ति व मस्ती पाने की सही विधि!

आन्तरिक क्षेत्र की दो कामनायें प्रमुख हैं। एक स्फूर्ति दूसरे मस्ती। उन्हें पाने के लिए हर किसी में लालसा बनी रहती है। जिस प्रकार शरीर को अपनी शारीरिक और मानसिक भूखे बुझाने के लिए प्रयत्न करने के लिए जी करता है, मन चलता है उसी प्रकार आत्मा भी अपने स्वाभाविक गुण स्फूर्ति और मस्ती के अवसर प्राप्त करने के लिए लालायित रहती है। भले ही व्यावहारिक जीवन में वैसे अवसर न मिले और अन्तरात्मा को उस अभाव के कारण उदास असन्तुष्ट रहना पड़े। आलस्य और प्रमाद से बचकर सामने प्रस्तुत कर्त्तव्य कर्मों को ईश्वर की पूजा मान कर उनमें तत्परता एवं तन्मयता के साथ लगने पर स्फूर्ति की स्थिति सदा बनी रह सकती है। ऐसा लगता रहता है कि किसी महत्वपूर्ण कार्य में लगने और उसमें सफलता मिलने जैसा उत्साह मिल रहा। यदि दिनचर्या को पुण्य परमार्थ में, सेवा साधना में नियोजित रखा जा सके तो उसके बदले उत्साह में अनायास ही स्फूर्ति बनी रह सकती है। आलस्य प्रमाद का बोझिल अभिशाप सिर से उतरते ही बहते प्रवाह में तैरने वाली लकड़ी की तरह अपने आप को प्रगतिशीलता के पथ पर चलने की अनुभूति होती है।

इन सद्गुणों की मात्रा बढ़ने पर स्फूर्ति ही मस्ती के रूप में विकसित होने लगती है। स्फूर्ति शारीरिक समझी जाती है पर उसके पीछे भी मानसिक प्रसन्नता छिपी रहती है। मात्र शारीरिक स्फूर्ति तो खिलाड़ियों को खेल के मैदान में भी मिल जाती है पर जब वह सफलता के समीप पहुँचने पर बढ़े हुए उत्साह के रूप में विकसित होती है तो उसमें मन उछलने लगता है और गतिशीलता के साथ घुली हुई प्रसन्नता की भी अभिवृद्धि होती है। स्फूर्ति का विकसित स्वरूप यही है।

मस्ती तब आती है जब मनुष्य भ्रम जंजाल से निकलकर श्रेय पथ पर सुनिश्चित संकल्पों के साथ आगे बढ़ता है। सदाशीलता की तुलना सोमरस से की जाती रही है उसे “अमृत” नाम भी दिया जाता है। विवेक की आँख खुलने पर अपना स्वरूप, लक्ष्य और कर्तव्य स्पष्ट रूप से परिलक्षित होने लगता है। शंका कुशंकाओं से निवृत्त होने पर जब भ्रान्तियों से छुटकारा पाकर जीवन मुक्ति जैसी स्थिति मिलती है तो विचारणा ही नहीं क्रियाशीलता भी सत्प्रयोजनों में निरत रहने लगती है। इच्छा के अनुरूप अवसर मिलने पर जो गहरी प्रसन्नता मिलती है पुलकन और सिहरन उठती है उसे मस्ती कहते हैं। मस्ती यों असाधारण लाभ, यश एवं वासनात्मक तृप्ति के अवसर मिलने पर भी आती है पर वह टिकती नहीं। समय क्रम के अनुसार स्थिति में निरन्तर परिवर्तन होता रहता है। ऐसी दशा में शरीरगत सफलताओं के मिलने पर जो मस्ती आती है वह भी निवृत्ति के अगले ही क्षणों में समाप्त हो जाती है। सुखद स्मृतियों की घटनायें जब आँखों के आगे से गुजरती हैं और उन के फिर से पा सकने का अवसर चला गया होता है तो कसक भरा पश्चाताप ही शेष रह जाता है किन्तु आत्मिक मस्ती का भी कभी अन्त नहीं होता। वह सुनिश्चित संकल्पों के साथ आदर्शवाद की ऐसी दिशा में बढ़ती है जिसमें अनन्त काल तक प्रगति ही प्रगति है। जब तक सदाशयता की दिशा में भाव उमड़ते रहेंगे और प्रयत्न चलते रहेंगे तब तक मस्ती में कभी कमी नहीं पड़ने वाली है। निर्धारण अपना है, संकल्प अपना है, प्रयास अपना है इसलिए मस्ती का आनन्द भी अपना है। न उसके घटने की आशंका है और न व्यवधान पड़ने की। यही है जीवन का आनन्द जो शरीर क्षेत्र में स्फूर्ति के रूप में और मनःक्षेत्र में मस्ती के रूप में सतत् अनुभव किया जा सकता है। उस सरसता का निरन्तर रसास्वादन किया जा सकता है। जीवन को कृतकृत्य हुआ प्रत्यक्ष अनुभव किया जा सकता है असल की नकल बनाने में मनुष्य बहुत चतुर है। मिट्टी के हाथी, घोड़े, शेर, रीछ जैसी अनुकृतियाँ बनाने में उसे देर नहीं लगती। रेल मोटर भी वह रद्दी टीन को तोड़ मरोड़ कर तनिक सा रंग लगने भर से बना, कर तैयार कर लेता है। बच्चे के खिलौनों में एक से एक बढ़ी चढ़ी चीजों के नमूने होते हैं। चिड़िया से लेकर मछली तितली इत्यादि संभवतः उसने मनो-विनोद के लिए ही बनाये। मस्ती पाना ही उसका मूल प्रयोजन था। लगता है किसी मन चले ने इसी नकल प्रयोजन के लिए नशेबाजी क तरीका खोज निकाला होगा। नशों में तात्कालिक रूप से ऐसी ही क्षणिक अनुभूति करा देने की विशेषता होती है। हल्के सस्ते नशे उस प्रयोजन को थोड़ी मात्रा में पूरा करते हैं और जो उनमें महंगे गहरे हैं वे बढ़ चढ़ कर अपना कौतुक कौतूहल दिखाते हैं। उन सब से किसी न किसी मात्रा में फुर्ती और मस्ती का अनुभव होता है। इसी लालच में लोग नशेबाजी के शिकार बनते हैं और फिर उस कुचक्र में मछली के जाल में फँसने की तरह इस तरह जकड़ जाते हैं कि आरम्भिक कौतुक अन्ततः जानलेवा बनता है, मछली और चिड़ियाँ आरम्भ में देखने वाले चारे को ही बड़ा लाभ समझती हैं पर कुछ ही देर में उनको यथार्थता विदित हो जाती है। जब प्राणों पर आ बनती है तब पछताने से भी कुछ काम नहीं चलता।

आरम्भिक प्रलोभन को देख कर ही लोग पाप कर्मों में प्रवृत्त होते हैं। इसमें उन्हें पहला हाथ छोड़ते ही नफा प्रतीत होता है पर वस्तुस्थिति प्रकट होते ही उस ओर कदम बढ़ाने वाले का विश्वास चला जाता है। अपयश फैलता है। सहयोग, स्नेह और सम्मान मिलना समाप्त हो जाता है तब प्रतीत होता है कि आरंभिक उतावली में जो लाभ कमाया गया था वह बहुत महँगा पड़ा। नशेबाजी के सम्बन्ध में भी यही घटना घटित होती है।

बाल बुद्धि की अदूरदर्शिता और समझदारी की दूरदर्शिता का अन्तर समझा जाना चाहिए और जिनका मानसिक विकास उस स्तर का हो चुका है उन्हें समझ बूझ कर ही कदम उठाने चाहिए। छोटे बच्चे साँप को, बिच्छू को, आग को खिलौना समझ कर पकड़ सकते हैं कील, सिक्का या दूसरी चीज लुभावनी देखकर उसे निगल सकते हैं। उन्हें इस बात का ज्ञान नहीं होता कि इस नासमझी का परिणाम उन्हें जान गँवाने जैसा भी भुगतना पड़ता है। चूहेदानी में लगी रोटी का टुकड़ा देखकर वे नादान जीव भी आतुर होकर पिंजड़े में दौड़ पड़ते हैं और अन्ततः उसका दुष्परिणाम ही भोगते हैं। नशेबाजी भी जान बूझ कर बुलाई गई प्राणघातक बीमारी है जो आदत में सम्मिलित हो जाती है पर पीछे उससे पीछा छुड़ाना कदाचित ही किसी साहसी से संभव हो पाता है।

नशे जीवनी शक्ति को चूसते हैं। आयु को घटाते हैं। दुर्बलता और रुग्णता का अभ्यस्त को शिकार बनाते हैं। सर्वेक्षण से जाना गया है कि नशे मनुष्य की आधी आयु का हरण का लेते हैं और व्यक्ति की शारीरिक मानसिक क्षमता को बुरी तरह बरबाद करते हैं। आर्थिक दृष्टि से, सामाजिक सम्मान की दृष्टि से भी वह बुरी तरह पिछड़ जाता है।

नशेबाजी की बुराइयों को समझते हुए भी उसकी ओर प्रवृत्ति का भावनात्मक कारण है-फुरती और मस्ती की अभिलाषा। इसकी पूर्ति उचित रीति से ही की जानी चाहिए। चूँकि आकाँक्षा आध्यात्मिक है, उसकी पूर्ति भी उसी क्षेत्र में हो सकती है। नशे के सहारे नहीं। जीवन में उन तत्वों का समावेश किया जाना चाहिए जिसके आधार पर कि स्थायी आनन्द मिले और प्रगति की संभावना बढ़े।


विकास के साथ साथ विनाश से जूझना भी आवश्यक

नव परिवर्तन के पुण्य परमार्थ में हर किसी को अपने-अपने स्तर पर सम्मिलित होना होगा। नियति के इस निर्धारण के विपरीत चलने के लिए हर किसी को अपना हठ छोड़ना पड़ेगा। प्रभात बेला में हर वनस्पति और प्राणी को अपने क्रियाकलाप में नया उत्साह सम्मिलित करना होता ही है। यहाँ तक कि निशाचर समुदाय को भी अपनी गतिविधियाँ रोक कर विश्राम के लिए बाधित होना पड़ता है।

पिछले दिनों दुश्चिन्तन का बोल बाला रहा है और उसी के प्रभाव से अनाचारों में बाढ़ आने से समूचा वातावरण प्रभावित हुआ है। इसकी रोकथाम आवश्यक है। अन्यथा नव सृजन के बीजाँकुर ऐसे ही बिना विकसित हुए अनुपयुक्त वातावरण के बीच नष्ट हो जायेंगे।

कपड़ा रंगने से पूर्व अच्छी तरह धोया जाता है। अन्यथा मैले कुचैले कपड़े पर कीमती रंग चढ़ाना भी बेकार हो जाता है। किसी को सभ्य बनाने से पूर्व उसके साथ जुड़े हुए असभ्यता के लक्षणों को समाप्त करना होता है। स्वच्छता पहली आवश्यकता है और सज्जा दूसरी। उर्वर भूमि में ही फसल उगती है, इसलिए कुशल किसान बीज बोने से पहले जमीन के कंकड़ पत्थर बीन कर समतल बना लेते हैं। कारखाना लगाने वाले चौकीदारों की व्यवस्था करते हैं, अन्यथा जो कमाया जा सका, वह चोर उचक्कों की जेब में ही चला जायगा। किसी को पहलवानी सिखाने से पूर्व उसे आयेदिन घेरे रहने वाले रोगों से छुटकारा दिलाने का प्रबंध करना पड़ता है।

हानि पहुँचाने में अवांछनियताएं ही अग्रणी रहती हैं। घुन लगने पर अच्छे खासे शहतीर पोले हो जाते हैं। शरीर में विषाणु प्रवेश पालें तो कुछ ही दिनों में भला चंगा शरीर रोग ग्रस्त होकर मृत्यु के मुँह में जा पहुँचे। किसी घड़े में पानी भरना हो तो पहले यह देखना पड़ता है कि इसके पैंदे में कहीं कोई छेद नहीं है। दोष दुर्गुणों को पहचानना और उन्हें बुहार कर बाहर करना पहला काम है। विकास के अन्यान्य कार्य इसके बाद ही बन पड़ते हैं।

कुटेवें बड़ी हठीली होती हैं। वे जिसका पल्ला पकड़ लेती हैं आसानी से पीछा नहीं छोड़तीं। नशेबाजी का आरंभ तो ऐसे ही हँसी दिल्लगी के बीच हो जाता है। देखते देखते उसका चस्का लग जाता है। पर आदत पक्की हो जाने पर उसे छुड़ा पाना मुश्किल होता है। कई बार तो शरीर, मस्तिष्क, सभ्यता, परिवार से लेकर अर्थ व्यवस्था तक खतरे में पड़ जाती है। आलसी, प्रमादी, ऐसे ही सुस्ती, मस्ती या आवारागर्दी में समय गुजारते रहते हैं। उस दुर्गुण से ग्रस्त हो जाने पर स्थिति अर्धमृतक या मूर्छित जैसी हो जाती है। समय पर कोई काम करते नहीं बन पड़ता। सुयोग्य होते हुए भी निठल्ले निकम्मों में उनकी गणना होती है। सदा घाटा ही उठाते रहते हैं और गई गुजरी स्थिति से ऊपर उठ ही नहीं पाते। चोर, उचक्के, आलसी, क्रोधी, उतावले, व्यक्ति अपना विश्वास खो बैठते हैं और सम्मान भी। उन्हें पास बिठाने या बात करने तक का किसी का मन नहीं होता।

विश्वामित्र के परामर्श से भगवान राम ने त्रेता से सतयुग वापस लौटाने वाले राम राज्य की विशद योजना बनाई थी, जिस पर असंख्यों का चिरकाल तक कल्याण होते रहना निर्भर हो। पर किया क्या जाय? असुरों का आतंक उस समूची परिधि का अहित किये हुए था सृजन का कोई काम उन परिस्थितियों में बन पड़ना संभव ही नहीं था। सोच विचार के बाद यह निष्कर्ष निकला कि पहले असुरों से निबट लिया जाय, यही हुआ भी। असुर वर्ग को ठिकाने लगा देने के उपरान्त ही यह संभव हुआ कि सतयुगी रामराज्य की आधार शिला रखी जाय और वह किया जाय जो मूलतः अभीष्ट था।

कृष्ण की योजना बिखरे और अस्त व्यस्त भारत को सुव्यवस्थित, विशाल भारत में परिवर्तित करने की थी पर उसे कार्यान्वित करने में बाधक सामन्तों की भरमार थी। वे उपयोगी योजना को अपने स्वार्थ के विपरीत मानते थे और पग पग पर रोड़े अटकाते थे। इसलिए उपाय एक ही शेष रह गया कि मार्ग के रोड़ों को साफ करके तब राजमार्ग बनाया जाय। महाभारत युद्ध इसी प्रयोजन की पूर्ति के लिए योजित हुआ। परीक्षित और जन्मेजय ने कृष्ण की उस इच्छापूर्ति को तदुपरान्त ही सम्पन्न किया।

भगवान के अवतारों की गणना चौबीस या दस बताई जाती है। इन सभी के क्रियाकलापों पर दृष्टि डालने से प्रतीत होता है कि उनने अपने समय के अनाचारों से निबटने का काम पहले हाथ में लिया। उसकी पूर्ति हो जाने के उपरान्त ही धर्म स्थापना के वे कार्य बन पड़े जिनके लिए उनके अवतरण का प्रमुख उद्देश्य था। देश के विकास-कार्यों में जितनी जनशक्ति, धन शक्ति और बुद्धि लगानी पड़ती है उससे कहीं अधिक सुरक्षा व्यय की व्यवस्था करनी पड़ती है। अन्यथा बोई हुई फसल को वन जन्तु ही चरकर साफ कर दें। आक्रमणकारी, अनाचारी इस दुनिया में कम नहीं। उनकी दाल गलने लगे तो समझना चाहिए कि किसी सत्कर्म का शुभारम्भ तक न हो सकेगा। उस राष्ट्र की सुरक्षा खतरे में ही समझनी चाहिए, जिसके पड़ोसी यह समझें कि अनाचार का प्रतिकार करने की व्यवस्था वहाँ कमजोर है।

उसे दबाने और उपेक्षा करने से दूसरों की दृष्टि में कमजोरी ही आँकी जाती है। भले ही अपने मन को बहकाने के लिए उसे दया, क्षमा आदि का आवरण ही क्यों न उठाना पड़ रहा हो? सज्जनों की दृष्टि में ही सज्जनता का मूल्य हो सकता है। वे ही उनका प्रभाव मानते हैं और सुधारने, हृदय बदलने जैसी प्रतिक्रिया व्यक्त कर पाते हैं। अन्यथा आमतौर पर उसे कायरता और दुर्बलता को, उदारता के आवरण में छिपा कर रखा गय छद्मभर ही मानते हैं।

अब से दो ढाई हजार वर्ष पूर्व भारत में कई धर्माचार्यों ने अहिंसावाद का घनघोर प्रचार किया था और उस दर्शन को अतिवाद की सीमा तक पहुँचाया था। कहने सुनने में यह सचमुच ही उदारता की पक्षधर आदर्शवादिता ही समझी जाती थी, पर उसका प्रभाव इच्छा से विपरीत ही निकला। मध्य एशिया के डाकुओं के कानों तक यह भनक पहुँची तो उन्होंने डाकुओं के छोटे छोटे गिरोह बना लिये और आक्रमण पर आक्रमण का सिलसिला चला दिया, सैन्य बल की उपेक्षा होने लगी। संघर्ष को व्यर्थ माना गया। इसका परिणाम यह हुआ कि देश पर इतने अधिक आक्रमण हुए कि लम्बे समय तक लूट, पाट, अपहरण और दासता का शिकार बन कर देश को बहुत कुछ गँवाना पड़ा। पुराना शौर्य, साहस पराक्रम और दुष्टता से जूझने का संघर्षशील मानस यदि बना रहा होता तो कदाचित आक्रमणकारियों की हिम्मत ही न पड़ती।

अनाचार तभी बढ़ता है, जब उसके प्रतिरोध का वातावरण ढीला पड़ जाता है। आवश्यक नहीं कि अनौचित्य की रोकथाम के लिए शस्त्रों का प्रयोग ही एकमात्र विकल्प हो और भी कितने ही ऐसे उपाय हैं, जो उद्दंडता पर कहर ढा सकते हैं। बाढ़ के बढ़ते पानी को रोकने के लिए लोग मिल जुल कर इतनी मिट्टी जमा करते हैं जिससे उफान का जोश छटे और बढ़ता हुआ प्रवाह आगे बढ़ने से रुके। अग्निकाण्ड हो जाने पर आवश्यक नहीं कि उसके लिए धनुष बाण ही सम्हाली जाय। मिलजुल कर पानी या धूल डालने भर से अग्निकाण्ड पर काबू पाया जा सकता है। डाकुओं का खतरा सामने होने पर गाँव के लोग संगठित चौकीदारी की मजबूत व्यवस्था बनाले तो भी स्थिति ऐसी बन जाती है कि डाकुओं को खाली हाथ वापस लौटना पड़े। देखा गया है कि अनाचार उसी क्षेत्र में उन्हीं लोगों पर होता है जिनके बारे में कमजोरी या कायरता की मान्यता बन जाती है। इसकी शक्ति बनाये रहने के लिए शक्ति का प्रदर्शन आवश्यक माना जाता है भले ही उसके प्रयोग का अवसर कभी न आये।

कहते हैं कि एक विषधर सर्प ने नारद से दया पालने की दीक्षा ली। उसने काटना बन्द कर दिया। जंगल के लड़कों ने समझ लिया कि साँप बूढ़ा या अपंग हो गया है। उनकी बन आई। जब भी अवसर मिलता उस साँप से छेड़ खानी करने जा पहुँचते। चोटें लगते रहने से साँप का बुरा हाल हो गया। दूसरे वर्ष नारद जी उधर से फिर निकले। थोड़े रुककर अपने शिष्य साँप से कुशल समाचार पूछे। उसने एक वर्ष में हुई दुर्गति का हाल बताया और अपने शरीर की चोटें बताई। नारदजी ने अपने उपदेश में सुधार किया कि उद्दंडों को काटा भले ही न जाय, पर उनकी हरकतें देखने पर फन फैलाकर फुफकार तो लगानी ही चाहिए। सर्प ने अपनी नीति में आवश्यक सुधार कर लिया फलतः उसे दुर्गति से छुटकारा मिल गया जो गत वर्ष उसे आये दिन हैरान करती रही थी।

अगले दिनों हमें सुधार, विकास एवं उत्कर्ष की दिशा में बढ़ना है। इस प्रयोजन के लिए निष्ठावान रहते हुए भी देखना यह भी होगा कि इस मार्ग पर चलना आरंभ करने से पहले उस मार्ग को ऊबड़ खाबड़, पथरीली तथा खाई खड्डों भरा बना न रहने देकर समतल बना लिया जाय। ऐसा करने से न केवल प्रारंभिक यात्रियों को आसानी होगी, वरन् बाद में उसी मार्ग पर आने वालों को भी रास्ता साफ मिलेगा और आसानी से मंजिल पार कर सकेंगे। इसीलिए विचारशील लोग रास्ते की मरम्मत करना, उन पर उगे झाड़ झंखाड़ों को हटाना आवश्यक समझते हैं और उसकी कटाई छँटाई को भी पुण्य कार्य मानते हैं। किसान और माली यही करते रहते हैं। उन्हें पौधों में खाद पानी देने की जितनी चिन्ता रहती है उतनी ही खरपतवार उखाड़ने तथा वन्य पशुओं से रखवाली की व्यवस्था भी बनानी पड़ती है। यदि उनका कार्य एकाँगी हो तो वे मात्र खाद पानी भर की व्यवस्था करें। गड़बड़ियों को न रोकें तो कितना ही परिश्रम करने पर भी अच्छी फसल घन न ला सकेंगे।

इक्कीसवीं सदी में जिस उज्ज्वल भविष्य की मान्यता परिपक्व की जा रही है, उसका शुभारंभ करते हुए सर्वप्रथम यह देखना होगा कि सत्प्रयोजनों के पनपने का माहौल बन गया या नहीं?

सज्जनता का प्रचार करना आवश्यक है। पर उतना ही अभीष्ट यह भी है कि दुर्जनता के कारण होने वाले दुष्परिणामों को भी ध्यान में रखा जाय। यदि उन्मूलन का ध्यान न रखकर मात्र संवर्धन का ही ध्यान रखा गया तो संसार भर में कुछ ही काल के भीतर मक्खी, मच्छर, खटमल, जूँ जैसे कृमि कीटकों से लेकर सर्प, बिच्छू बर्र, जैसे विषैले जंतुओं की तेजी से होने वाली अभिवृद्धि संसार को इस योग्य बना देगी कि उसमें रहना कठिन हो जायेगा। यदि दुष्ट दुराचारियों को छूट मिले उनके काम में कोई अवरोध उत्पन्न न करे तो देखते देखते वही स्थिति बन जायगी जिसमें किसी के लिए भी चैन से दिन गुजारना संभव न होगा। विरोध, अवरोध की शंका न रहने पर छोटे चोर उचक्के भी दिनोंदिन प्रोत्साहित, सर्व समर्थ होते जायेंगे और ऐसी स्थिति उत्पन्न कर देंगे कि भले मानसों का जीना भी दूभर हो जायगा। दानवों की शक्ति अधिक होती है, इस तथ्य को देवासुर संग्राम की कथाओं में अनेक बार सिद्ध किया जा चुका है, इसीलिए देवपूजन के बाद दैत्य समुदाय से बचाव का उपाय करना भी आवश्यक माना गया है। युग संधि महापुरश्चरण उसी कड़ी का एक अंग है।


रोगोपचार की एक ही कुँजी

मनुष्य जाति के करोड़ों मनुष्य इस धरती पर रहते हैं पर किसी से किसी की शकल पूरी तरह नहीं मिलती। गड़रिया बड़ी भेड़ों के झुण्ड में से दूसरे में जा मिलने वाली को देखते ही पहचान लेता है। क्योंकि उनकी शकल सूरत में कुछ न कुछ अन्तर होता है। पेड़ों पर सभी पत्ते फल फूल एक जैसे लगते हैं पर बारीकी से देखने पर उनमें से हर एक की विशेषता अलग अलग दीख पड़ती है। आसानी से उन्हें पहचाना जा सकता है। अँगूठे के निशान तक किसी के किसी से नहीं मिलते यह हर वस्तु की विशेषता ईश्वर की अपनी कलाकृति है किन्तु इतने पर भी वे एक सम्बन्ध सूत्र से जुड़े हुए हैं। बहुत अंशों में एक दूसरे पर निर्भर भी हैं।

शरीरगत अवयवों के सम्बन्ध में भी यही बात है। उनकी बनावट में अन्तर है फिर भी उनकी पारस्परिक निर्भरता अक्षुण्ण रूप से जुड़ी रहती है। जड़, तना, टहनी, पत्ते और फल फूल अपनी अपनी आकृति प्रकृति में भिन्नता रखते हैं तो भी वे आपस में जुड़े रहते हैं। इनके टुकड़े कर देने पर भी एक का भी अस्तित्व शेष न रहेगा।

शरीर अनेक अवयवों में बँटा हुआ होते हुए स्थिरता और व्यवस्था की दृष्टि से एक सूत्र में पिरोया हुआ है। उसके घटकों की आकृति अलग अलग है। पर उनके बीच असंबद्धता नहीं है। यह विशेषता रोग विशेष की स्थिति में देखी जा सकती है। रोग पृथक् पृथक् अंगों में प्रकट होते हैं और उनके लक्षण निदान में भी अन्तर पाया जाता है। किन्तु शारीरिक अंग अवयव न केवल मिल-जुलकर काम करते हैं वरन् बहुत अंशों में परस्पर मिलजुल कर रहते भी हैं। सुविधाओं को बाँटते और असुविधाओं को बँटाते हैं। इस प्रकार बढ़े हुए भार को भी घटाते हैं, संतुलन बिठाते हैं। देखने में अनेक रोगों के लक्षण और स्थान भिन्न भिन्न होते हैं पर वस्तुतः उनका मूल कारण एक ही है। जड़ में कीड़ा लग जाने पर पेड़ का पूरा ढाँचा लड़खड़ाने लगता है तब कोई भी डाली सूख सकती है कोई भी उनमें से मुरझा सकती है।

उपचार संबंधी प्रचलन यह है कि जहाँ पीड़ा हो दर्द, सूजन ताप आदि की अधिकता हो उसी स्थान की मरम्मत की जाय। इससे तात्कालिक लाभ भर होता है। एक जगह जमा हुआ कचरा आगे धकेल देने पर किसी और जगह रुकावट बनकर खड़ा हो जाता है और वहाँ अपने तरह के उपद्रव या अवरोध खड़े करने लगता है। एक रोग अच्छा होने की खुशी मिल नहीं पाती कि दूसरी जगह दूसरे तरह से रोग खड़ा हो जाता है। यदि उनकी गति मंद है तो सहन किया और उपेक्षा में डाला जा सकता है पर जब उसका प्रभाव तीव्रता धारण कर लेता है और चिकित्सा करानी होती है।

बढ़ते जाने वाले रोगों में इन दिनों हृदय रोग अपने प्रौढ़ यौवन पर है। उसकी चपेट में अधिकाँश लोग आते हैं और इस तरह मरते हैं कि दर्शकों और संबंधियों में से हर एक को आश्चर्य होता है। हृदय की धड़कन का बढ़ना बीमारी का चिन्ह है। यह समूचे शरीर को लड़खड़ा देती है। आक्रान्त व्यक्ति को लगता है कि अचानक मौत सामने आ खड़ी हुई और उसने अपने पंजों में निरीह पक्षी की तरह दबा लिया। यदि बीमारी टली नहीं तो फिर उसे प्राण हरण में देर नहीं लगती। रोगी बहुत देर छटपटा भी नहीं पाता। उपचार का उपाय सोचते और करते इतना समय गुजर जाता है, कि उतनी ही देर में मृत्यु का शिकंजा कस जाय फिर उपाय क्या हो? कैसे इस विभीषिका से बचा जाय?

वस्तुतः हृदय शरीर यात्रा का महत्वपूर्ण कार्य संचालन करता है वह कोमल भी इतना है कि तनिक से आघातों को सहन करना उसके लिए कठिन पड़ता है। पर यह अचानक नहीं होता, जैसा कि लगता है। रक्तचाप, मधुमेह, अनिद्रा आदि अनेक व्यथाएँ पूर्व सूचना देने आती रहती हैं उनकी चेतावनियों पर ध्यान देते हुए यदि शरीर को प्राकृतिक रीति नीति अपनाने के लिए सहमत किया जा सके तो समझना चाहिए कि हृदय रोग समेत अनेक रोगों से छुटकारा पाने का सुनिश्चित मार्ग मिल गया।


मृत्यु का विस्मरण एक असाधारण प्रमाद

बैंक से कर्ज जमानत पर मिलता है और उसे समयानुसार ब्याज समेत वापस लौटाना पड़ता है। मिली हुई राशि धरोहर है। उसे ठीक तरह लौटा देने और जितने दिन वह पास में रहे उससे कुछ उत्पादन कर के पूँजी बना लेना ही बुद्धिमत्ता है ताकि बार बार कर्ज लेने का झंझट न रहे। अपनी ही पूँजी में गुजारा होता रहे।

मूर्खता यह कि जिस तिस प्रकार तिकड़म भिड़ा कर बैंक से कर्ज तो प्राप्त कर लिया जाय पर उसे वापस चुकाना भी है यह स्मरण ही न रहे। जो पाया उसे शौक मौज में, दुर्व्यसनों में उड़ाया। ऐसे लोग कर्जे की राशि को जेब में आते समय तो बड़े प्रसन्न होते हैं और समझते हैं कि भाग्य खुला। मुट्ठी गरम होते ही उद्देश्य की याद नहीं रहती कि यह किस प्रयोजन का वचन देकर, किन की जमानतें दिला कर यह सम्पदा हस्तगत की गई थी। उस काम को भी करना है यह भुला दिया जाता है और उस से रंग रेलियाँ मनाई जाती हैं। फलतः कुछ ही समय से पूँजी निबट जाती है।

मनुष्य जीवन ऐसी ही एक धरोहर है-बैंक से लिया हुआ कर्ज। यह हर किसी को नहीं मिलता। प्राप्त वे ही कर पाते हैं जो देने वाले तन्त्र को यह दुहरा विश्वास दिला देते हैं कि उस का सदुपयोग करके अपना उद्यम खड़ा कर लिया जाएगा और साथ ही एक मुश्त अथवा किश्तों में अमानत को लौटाते रहा जायगा। उपलब्धि के उद्देश्य को भुला देने वाले अपनी पिछली सम्पदा को भी गँवा बैठते हैं और नए न चुकाने पर मिलने वाली प्रताड़ना को सहन करते हैं।

मनुष्य जीवन विशुद्ध धरोहर है, जिसे अभिभावकों, गुरुजनों की जमानत पर इस लिए दिया गया है कि इस धरोहर का दुरुपयोग नहीं होने दिया जाएगा और वापसी का प्रबन्ध ठीक समय पर बन पड़े इस के लिए नियन्त्रण रखा जायगा। किन्तु जमानतदार भी जब दुरुपयोग को टुकुर-टुकुर देखते रहते हैं इतना ही नहीं उलटे मौज मजा करने की, उसे उड़ा देने की सलाह देते हैं तो फिर समझना चाहिए कि दुर्भाग्य भरी दुर्घटना होने जा रही है। वापसी का विस्मरण इतना बड़ा प्रमाद है कि उसका प्रतिफल चिरकाल तक जन्म जन्मान्तरों तक भुगतना पड़ता है।

जीवन का दुर्भाग्य भरा दुरुपयोग तब होता है जब मृत्यु को भुला दिया जाय। भगवान का स्मरण आवश्यक माना जाता है। उसके कितने ही लाभ गिनाये जाते हैं पर उससे भी आवश्यक यह है कि मृत्यु को हर घड़ी स्मरण रखा जाय। समझा जाय कि यह एक अग्नि परीक्षा का अवसर है। उसे बरबाद नहीं ही करना है अन्यथा उस विस्मरण का समय गुजर जाने पर इतना पश्चात्ताप होता है, इतना प्रायश्चित लदता है जिसकी याद करने भर से जी दहल जाय।

जीवन की घड़ियाँ देखते देखते निकलती हैं। पेट प्रजनन के दो शरीरगत कार्य ऐसे हैं जिनमें व्यस्त रहते हुए यह पता ही नहीं चलता कि 360 दिन वाले कितने वर्ष एक एक करके गुजर गए। बचपन, किशोरावस्था, तरुणाई, प्रौढ़ता के उपरान्त वृद्धावस्था आ धमकती है। यह मृत्यु का पूर्व स्वरूप है। वैभव तथा अधिकार सब तरुण उत्तराधिकारियों द्वारा इच्छा या अनिच्छा रहते छीन लिए जाते हैं। अपने शरीर का ठीक प्रकार संचालन अपने बलबूते नहीं हो पाता। इसके निमित्त भी दूसरों का आसरा तकना पड़ता है। शैशव में जिस प्रकार बड़ों के अनुग्रह से शरीर यात्रा चलती थी उसी प्रकार बुढ़ापे में छोटों की अनुकम्पा पर आश्रित रहना पड़ता है। देने वाले एहसान जताते हैं और लेने वाले को सिर नीचा रखना पड़ता है, प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से गिड़गिड़ाते रहना भी।

बचपन और बुढ़ापा दोनों ही अपंगावस्था से हैं। किशोर आयु में जोश तो बहुत रहता है पर होश नहीं। मात्र तरुणाई और प्रौढ़ता ही ऐसी अवधि है जिसमें दूरदर्शिता सजग सक्षम रखी जा सकती है। शेष आयुष्य तो खिलवाड़ में ही चली जाती है। रहा बचा समय यार दोस्त, लोभ, मोह, अहंकार प्रदर्शन खा जाते हैं। महत्वाकाँक्षाओं की ललक इतनी बढ़ी चढ़ी रहती है कि मात्र यही सूझता है कि बड़प्पन जितना अधिक बटोरा जा सके बटोर लिया जाय। दर्प-अहंकार प्रदर्शन जितना भी सँजोया जा सके उसे सँजो कर लोगों की आँखों में चकाचौंध उत्पन्न किया जाय, किन्तु वास्तविकता यह है कि हर व्यक्ति अपनी निज की समस्याओं में उलझा है कि उसे किसी दूसरे के सौंदर्य, बल, वैभव, उत्थान पतन से किसी प्रकार का सरोकार नहीं है, न रस, न गंभीरता। अधिक शोर मचाने पर विवशता की स्थिति में आँख उठा कर देख लेने और उस हुड़दंग पर मुस्करा भरा देना पर्याप्त समझा जाता है। इस से अधिक किसी को किसी के सम्बन्ध में ध्यान देने, प्रभावित होने, यश गाने की फुरसत ही नहीं मितली। जब कि इसी वहम में लोग निरर्थक उछल कूद करते हुए अपनी बहुमूल्य जीवन सम्पदा को चिथड़े बना कर बेकार करते और फेंकते रहते हैं।

जीवन में वास्तविक ज्ञान प्रदान करने का समय वह है जिसमें जीवात्मा शरीर को त्याग कर ईश्वर के दरबार में पेश होने के लिए प्रयाण करती है। कमाया हुआ वैभव और यश शरीर के साथ जुड़ा था। जब शरीर ही धूल चाटने वाला है तो फिर उसके साथ जुड़े हुए वैभव को साथ क्या चलना? खाली हाथ विदाई लेते समय रहस्यमयी परतें खुलती हैं। प्रतीत होता है कि लोभ की ललक ने जितनी अभिरुचि कमाने में उत्पन्न की वह आवेश बन कर छाई रही और निरन्तर अनीति ही बन पड़ती रही। सम्पदा निष्ठुरता धारण किए बिना अधिक मात्रा में कमाई ही नहीं जा सकती। उसके लिए छल-प्रपंच और अपराधों के अस्त्र शस्त्र सँजोने पड़ते हैं। इसके अतिरिक्त दूसरा मोह जाल है जो भ्रम होते हुए भी वास्तविकता जैसा प्रतीत होता है। स्वजन, परिजन, सम्बन्धी, कुटुम्बी, परिचित-अपरिचित समुदाय के साथ मोह जुड़ जाता है। उसके वशीभूत होकर अपने पराये का भेदभाव उपजता है। अपनों को प्रसन्न रखने के लिए उनकी मर्जी पर चलना पड़ता है। मर्जी की कोई सीमा नहीं। वह क्रमशः बढ़ती ही रहती है।

और व्यक्ति उसकी प्रसन्नता के लिए अपनी शान्ति, सद्गति और जिम्मेदारी प्रायः पूरी तरह खो बैठता है। इतने पर भी इन्हें छोड़ कर रोते रुलाते अन्त समय अकेले ही चलना पड़ता है जन्म लेते समय तो शरीर तब भी साथ था पर मरण की बेला में वह भी साथ छोड़ देता है और आत्मा को अकेले ही जाना पड़ता है।

और व्यक्ति उसकी प्रसन्नता के लिए अपनी शान्ति, सद्गति और जिम्मेदारी प्रायः पूरी तरह खो बैठता है। इतने पर भी इन्हें छोड़ कर रोते रुलाते अन्त समय अकेले ही चलना पड़ता है जन्म लेते समय तो शरीर तब भी साथ था पर मरण की बेला में वह भी साथ छोड़ देता है और आत्मा को अकेले ही जाना पड़ता है।


Quotation

अशुभ भविष्य की चिन्ता में उद्विग्न न रहो। साहसपूर्वक प्रगति का सरंजाम जुटाओ और प्रसन्न रहो।


सविता का अनुदान प्राणशक्ति के रूप में

सामान्य प्राणी अपने जीवनक्रम को शरीरगत ऊर्जा और प्रकृति प्रदत्त तापमान से सामान्यतया चला लेते हैं। उन्हें अतिरिक्त ऊर्जा की आवश्यकता नहीं पड़ती। परन्तु विकसित मनुष्य पर यह बात लागू नहीं होती। स्तर बढ़ने के साथ-साथ साधनों की आवश्यकता बढ़ती हैं सर्व विदित है कि असामान्य उत्पादन के लिए असामान्य ऊर्जा की आवश्यकता होती है। ऊर्जा ही शक्ति है। शक्ति से ही पराक्रम संभव होता है। शरीर हो अथवा उपकरण, उसकी गतिशीलता शक्ति पर ही निर्भर है। यह शक्ति प्रकारान्तर से ऊर्जा की ही विविध रूपों में परिलक्षित होने वाली परिणति भर होती है, जिसका उद्गम स्थल सूर्य है।

दिव्यदर्शी मनीषियों ने भूतकाल से ही सूर्य शक्ति का उपयोग मनुष्य की सर्वतोमुखी प्रगति के लिए कई उपाय-उपचारों के सहारे किया है। सूर्य चिकित्सा अपने आप में एक विज्ञान है। शरीर को रुग्ण करने वाले विषाणुओं का नाश नित्य प्रति के व्यवहार में तो धूप सेकने के सहारे होता ही है। विशेष रोगों की चिकित्सा भी रवि रश्मियों की ऊर्जा को विशिष्ट क्रम से ग्रहण करने से सहज संभव हो सकती है। सूर्योपस्थान, सूर्य नमस्कार, सूर्य साधना जैसे अनेकों अध्यात्म उपचार ऐसे हैं जो मानवी चेतना की विभिन्न आवश्यकताओं को, आत्मोत्कर्ष के विभिन्न आयामों को पूरा कर सकते हैं।

गायत्री महामंत्र की गरिमा सर्व विदित है। उसके चमत्कारी लाभों से सभी परिचित हैं। उसके अक्षरों का अर्थ तो ऋतम्भरा प्रज्ञा का सद्भावना एवं सद् विचारणा से संबंधित है। पर उसकी साधना से जिस चमत्कारी शक्ति सम्पदा की उपलब्धि होती है, उसका उद्गम केन्द्र-’सविता’ देवता है। गायत्री का अधिपति-’सविता’ है। उसी के विशिष्ट साधना विधानों की सहायता से दिव्य शक्तियों को आकर्षित किया जाता है और साधक को सर्व समर्थ बनने का अवसर मिलता है।

धरातल की प्राकृतिक हलचलें अधिकतर सूर्य के अनुदान पर ही अवलम्बित हैं। पृथ्वी की अपनी विशिष्टताएँ एवं सम्पदायें परोक्ष रूप से सूर्य की ही देन हैं। अन्तरिक्षीय अनुदानों के रूप में उसे जो कुछ प्राप्त होता है, उसमें सूर्य का भाग ही प्रमुख होता है। ऐसी दशा में वह मानवी आवश्यकताओं की बढ़ोत्तरी का समाधान कर सकने में भी समर्थ हो सकता है, यह बात सहज ही समझ में आने योग्य भी है।

उदाहरण के लिए सविता की स्वर्णिम आभा नित्य प्रति जो हम तक, पहुँचती हैं उसमें असंख्यों जीवनदायी दुर्लभ तत्व घुले होते हैं। मिस्र के काहिरा यूनिवर्सिटी के सुप्रसिद्ध भौतिकविद् नाफीद यूसुफ ने गहन अनुसंधान के पश्चात् निष्कर्ष निकाला है कि अरुणोदय काल में सुदूर क्षितिज से आती सूर्य किरणों में एक लाख खरब टन सोना बिखरा विद्यमान होता है। इतनी भारी मात्रा से लदी हुई इन रश्मियों को हम अपने शरीर पर प्रतिदिन झेलते रहते हैं। सूर्योदय के समय खुले बदन पर यदि कुछ समय के लिए प्रतिदिन इन्हें पड़ने दिया जाय तो स्वास्थ्य संवर्धन में यह अभूतपूर्व सत्परिणाम प्रस्तुत करती हैं।

इतना ही नहीं सूर्य जीवनी शक्ति, प्राण का केन्द्र है। अध्यात्मवेत्ता ऋषि-मनीषियों ने सविता को प्राण पुंज और बुद्धि चेतना को प्रेरणा दे सकने योग्य बताया है और “प्राणः प्रजानाँ उदयति एवं सूर्यः” कह कर प्रार्थना की है। उनके अनुसार इसके बिना पृथ्वी पर जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती है। उससे निःसृत प्रकाश, ताप और प्राण ऊर्जा जीवन निर्वाह और सृष्टि व्यवस्था दोनों के लिए आवश्यक हैं। वैज्ञानिकों का भी कहना है कि सूर्य की सत्ता ही जीवन सम्पदा का रूप धरती है। रोग निवारण एवं स्वास्थ्य संवर्धन में निरंतर काम आने वाली ‘जीवनी शक्ति’ शरीर का अपना उपार्जन नहीं वरन् सूर्य का दिया हुआ अनुदान ही है। यही वनस्पतियों का प्राण एवं प्राणियों की जीवनी शक्ति का केन्द्र है। सूर्य प्रकाश के अभाव में चारों ओर जीवन प्रवाह मंद हो जाता है। इसी कारण गर्मी व सर्दी में जन्मने वाले तथा उष्ण एवं शीत प्रधान देशों में रहने वाले व्यक्तियों की प्रकृति, रुचि और मान्यताओं में अंतर देखा जाता है। वातावरण की भिन्नता के पीछे पृथ्वी के विभिन्न स्थानों के साथ होने वाला सूर्य संयोग ही मुख्य है।

अग्नि का अस्तित्व तो पहले भी था, पर मनुष्य ने उसे काफी समय बाद पहचाना। कालान्तर में विकसित होती विधियों से विशिष्ट प्रक्रिया द्वारा इस शक्ति से लाभ उठाना संभव होता गया। सूर्य की गर्मी अपनी प्राकृतिक सम्पदा तो सबको समान रूप से बाँटती रहती है, पर उसका सर्वाधिक लाभ जानकार लोग ही उठा पाते हैं। उसमें सन्निहित, प्राणशक्ति को अध्यात्मवेत्ता ही जानते हैं और उसके संपर्क सान्निध्य से अभीष्ट लक्ष्य को प्राप्त करते हैं। जिस तरह भौतिक जगत में आज के वैज्ञानिक विभिन्न कार्यों के सम्पादन के लिए ऊर्जा का एक मात्र सशक्त एवं स्थायी विकल्प सूर्य ऊर्जा को ही मान रहे हैं और उसके दोहन के लिए विविध विधि सरंजाम खड़े कर रहे हैं। ठीक उसी तरह शारीरिक, मानसिक रोगों के निवारण और स्वस्थ दीर्घायुष्य जीवन से लेकर अध्यात्मोपचार तक की प्रक्रिया में सविता की प्राणशक्ति का तारतम्य बिठाया जा सकता है। यह सबके लिए सहज साध्य है। इसके लिए किसी वैज्ञानिक उपकरण की आवश्यकता नहीं पड़ती। अपना मन और अन्तःकरण ही इसके लिए फोटोवोल्टिक बैटरी और स्टोर हाउस का काम करते हैं। ध्यान-धारणा के सहारे आदित्य मंडल के प्राण भण्डार को आकर्षित किया और अपने को उससे परिपूरित किया जाता है। वैदिक ऋचाएँ इसी तथ्य का प्रतिपादन करती हैं कि सूर्य शक्ति को महत्व भौतिक और आध्यात्मिक दोनों ही दृष्टि से दिया जाना चाहिए।

पाश्चात्य जगत के ख्याति लब्ध खगोलज्ञ सर जॉन हर्शल की भी मान्यता है कि सविता के ‘एब्सेकंडिटो’ नामक क्षेत्र में प्राण शक्ति का विशाल स्रोत भरा पड़ा है। विश्व ब्रह्माण्ड की आपूर्ति इसी से होती है। उनके अनुसार शरीर में जिस तरह हृदय कार्यरत रहता है, लगभग वैसा ही काम सूर्य का है। इसकी लय भी उसी तरह गतिशील रहती है। ‘वाइटल फ्लूइड’ अर्थात् जीवनतत्व का संचरण उसी से होता है। यौगिक अभ्यासों-साधना उपचारों के माध्यम से साधक उसी प्राण शक्ति को आकर्षित करके अपने को शारीरिक, मानसिक और आत्मिक दृष्टि से सशक्त एवं प्रखर बनाते हैं।

भौतिक जगत पर सौर ऊर्जा का अजस्र अनुदान बरसता है और आत्मिक क्षेत्र पर उसका अभिवर्षण प्राण के रूप में होता है। प्राण को सविता का अनुदान माना गया है। प्राण प्रधान होने से ही जीवधारियों को प्राणी कहा गया है। जो जितना प्राणवान है उतना ही समर्थ, विकसित एवं समुन्नत है। मनुष्य को दूरदर्शिता, साहसिकता, श्रमशीलता एवं सद्भावना के रूप में जो विशिष्टताएँ उपलब्ध हुई हैं वे प्रकारांतर से प्राणशक्ति के अनुदान हैं। साधनों की दृष्टि से ऊर्जा की और उत्कृष्टता की दृष्टि से मनुष्य को प्राणशक्ति की प्रचुरता अभीष्ट है। इसके लिए सूर्यताप और सविता अनुग्रह का उभय पक्षीय अनुदान आवश्यक है। इसके लिए पूर्णतया सूर्य साधना पर ही निर्भर रहना होगा। अच्छा हो उस प्रयास पर पूरी तरह ध्यान केन्द्रित किया जाय और शारीरिक बलिष्ठता, मानसिक पवित्रता-प्रखरता एवं आत्मिक प्रचंडता जैसी उपलब्धियों के लिए योजनाबद्ध साहसिक कदम उठाया जाय।


विशेषताओं में हम से कहीं आगे हैं अन्यान्य प्राणी

विकास क्रम में मनुष्य सबसे आगे माना जाता है। माता के गर्भ में प्रवेश करते समय उसका भार एवं विस्तार जितना होता है उसी को अस्तित्व का प्रथम परिचय कह सकते हैं। इस समय उसकी जो स्थिति होती है उसकी तुलना में प्रौढ़ावस्था तक पहुँचते-पहुँचते वह प्रायः अपनी वृद्धि एक अरब गुनी बढ़ा लेता है। इस विकासक्रम को देखकर उसकी प्रगतिशील क्षमता पर आश्चर्य होता है पर यह नहीं मानना चाहिए कि अन्य प्राणी सर्वथा पिछड़ी स्थिति में ही पड़े रहते हैं और अपनी प्रगति नहीं करते है। अपने आरंभ काल में प्राणियों की जो स्थिति थी उसकी तुलना में सभी ने आशाजनक उन्नति की है और इस समय वे इतने आगे बढ़ गये हैं कि उसे देखकर आश्चर्य चकित होना पड़ता है। इसमें ईश्वर की निष्पक्ष न्यायकारिता का ही पग-पग पर दर्शन होता है।

विकास एवं रचनाक्रम में वरिष्ठ कहा जाने वाला मनुष्य अपनी विशिष्टता प्रतिभा, बुद्धि वैभव पर इतराता भले ही हो पर सृष्टि के अन्यान्य प्राणियों की तुलना में कई अर्थों में वह पीछे रह जाता है। अकशेरुकीय प्राणियों में काकरोच को ही लें तो प्रकृति ने उसकी शारीरिक संरचना को इतना मजबूत बनाया है कि आदमी की तुलना में-वह सौगुना अधिक विकिरण सहन कर सकता है। मानवी काया पर गुरुत्वाकर्षण के 18 जी के बराबर दबाव पड़ने से हड्डियाँ टूटने-चरमराने लगती हैं, किन्तु तिलचट्टा है कि जिस पर 126 जी. का दबाव चार घंटे तक निरन्तर पड़ते रहने पर भी वह जीवित रहता और अपना सामान्य किया कलाप करता रहता है।

वैज्ञानिकों ने अनुसंधानों के आधार पर यह पता लगाया है कि भीमकाय शरीर वाले सरीसृप- डाइनासौर, जो करोड़ों वर्ष पूर्व कभी इस धरती पर छाये हुए थे किन्तु किन्हीं परिस्थितियों वश अब विलुप्त हो चुके हैं, काकरोच भी उन्हीं का समकालीन प्राणी है। डाइनासौर जिन प्रतिकूल परिस्थितियों को नहीं झेल सके और अपना अस्तित्व गँवा बैठे उसी वातावरण में काकरोच जीवित बने रहे। ईश्वर प्रदत्त मजबूत सुरक्षा कवच से ढका शरीर एवं परिस्थितियों से तालमेल बिठा सकने की अद्भुत कुशलता ने ही इसे सुरक्षित रखा है।

विभिन्न-प्रयोग-परीक्षणों के आधार पर वैज्ञानिकों ने पाया है कि काकरोच पाँच महीने तक बिना पानी के मात्र सूखे भोजन पर रह सकता है। दो महीने केवल जल पर तथा एक माह तक बिना जल और भोजन के रखे जाने पर उनके शरीर पर कोई दुष्प्रभाव दृष्टिगोचर नहीं होता। इसके अंडे ने निकले हुए नवजात बच्चे भी आठ दिन तक बिना भोजन के रह सकते हैं। इन्हीं क्षमताओं से सम्पन्न होने के कारण आज स्पेस रिसर्च में इस जीव को विशिष्ट प्रकार के कैप्सूलनुमा उपकरणों में पर्याप्त हवा मात्र भर कर ‘स्पेस’ में भेजा जाता है। उसके स्नायुविक एवं पेशीय प्रतिक्रियाओं की जानकारी प्राप्त करने के लिए इलेक्ट्रोड लगा दिये जाते हैं।

प्राणिशास्त्रियों का कहना है कि चमगादड़ तब क्रियाशील होते हैं जब उनका रक्त गरम होता है। प्रसुप्त अवस्था में यह ठंडा हो जाता है। सक्रिय अवस्था में उसके हृदय की धड़कन 180 प्रति मिनट और श्वास-प्रश्वास की गति 8 प्रति सेकेंड होती है। सो जाने पर हृदय की धड़कन 3 प्रतिमिनट और साँस की गति 8 प्रति मिनट अर्थात् 60 गुना कम हो जाती है। यही कारण है कि प्रयोगशाला में प्रयोग परीक्षण के लिए चमगादड़ों को रेफ्रिजरेटर में रखा जाता है जिससे वे तुरंत जड़ समाधि में पहुँच जाते हैं। इससे न उन्हें खुराक देने की आवश्यकता होती है और न देखभाल ही करनी पड़ती है। जीवित रहने के लिए जिस ऊर्जा की आवश्यकता होती है, शरीर के अन्दर एकत्रित चरबी से उसकी पूर्ति होती रहती है। कई महीने तक वे इस स्थिति में बने रह सकते हैं। सामान्य मनुष्य के लिए यह संभव नहीं। समाधि की अवस्था तक कोई विरले ही पहुँच पाते हैं।

सामान्यतः जीवधारियों में उनके कद के अनुसार उनकी आयु हुआ करती है। उदाहरणार्थ चूहे की आयु एक वर्ष, कुत्ते की 12 वर्ष और घोड़े की 17 वर्ष होती है। चमगादड़ का कद चूहे जितना ही होता है जिसके हिसाब से उसकी आयु एक वर्ष होनी चाहिए, परन्तु वह 20 वर्ष या उससे अधिक समय तक जीवित रहता है। विख्यात प्राणिविद् जेम्स पोलिंग के अनुसार यह कहा जा सकता है कि नियम के अनुसार वे असामान्य आयु वाले होते हैं। मनुष्य के भारी भरकम डील डौल वाली काया से इसकी तुलना करें तो वह इसके सामने नगण्य ठहरेगा।

इसी तरह हम जो भोजन ग्रहण करते हैं उनमें प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, वसा जैसे पोषक तत्वों की बहुलता रहती है। सन्तुलित आहार न मिलने पर जीवनी शक्ति क्षीण होती है। परन्तु चमगादड़ जीवन पर्यन्त विशेषकर एक ही तत्व चरबी वाले कीड़ों को खाता रहता है फिर भी न तो उसकी जीवनीशक्ति कमजोर पड़ती है और न स्वास्थ्य लड़-खड़ाता है।

पिट्सवर्ग यूनिवर्सिटी के प्रख्यात जीव विज्ञानी डा. फिलिप क्रुट्ज्स ने चमगादड़ों का गहन अध्ययन करने के पश्चात् पाया है कि यही एक ऐस प्राणी है जिसकी रक्तवाही धमनियों पर आयु वृद्धि का कोई प्रभाव नहीं पड़ता चाहे वह एक वर्ष का हो अथवा 20 वर्ष का। डा. क्रुद्ज्स के अनुसार मनुष्यों में सामान्यतया आयु-वृद्धि के साथ-साथ रक्त नलिकाओं की दीवाल मोटी होती जाती है तथा उनके आकुंचन प्रकुंचन की क्षमता कम हो जाती है, पर चमगादड़ों में ऐसा नहीं होता। यह किन विशिष्टताओं के कारण होता है, वैज्ञानिकों के लिए अनुसंधान का विषय बना हुआ है।

वैज्ञानिकों ने चमगादड़ को ‘अनुपम प्राणी’ की संज्ञा दी है। वस्तुतः यह नाम उन्हें उनकी विशेषताओं के कारण ही मिला है। हाईस्पीड फोटोग्राफ द्वारा यह देखा गया है कि जब उसे खाने के लिए बहुत अधिक मात्रा में कीड़े-मकोड़े मिल जाते हैं तो वह अपने पंखों को थैलीनुमा आकार दे देता है और उसी में उन्हें एकत्र कर लेता है तथा आवश्यकता पड़ने पर उड़ते समय भी खाता रहता है। ध्रुव प्रदेशों को छोड़ कर सर्वत्र पाया जाने वाला यह विलक्षण जीव खदानों, गुफाओं खण्डहरों, वृक्षों आदि में निवास करता है किन्तु अभी तक यह एक रहस्य ही बना हुआ है कि जाड़े की ऋतु में करोड़ों की संख्या में ये कहाँ गायब हो जाते हैं।

सृष्टि के आरंभ में जीवन अमीबा जैसे छोटे प्राणियों के रूप में प्रकट हुआ था। उसमें जन्मजात रूप से विद्यमान प्रकृति की महत्वाकाँक्षा ने आगे बढ़ने और साधन उपलब्ध करने का पुरुषार्थ उत्पन्न किया। जो चाहता है सो करता है-जो करता है सो पाता है, का सिद्धान्त अपनाकर विभिन्न समुदायों के प्राणी वर्तमान स्तर तक पहुँचे हैं। भविष्य में उनकी महत्वाकाँक्षा ही उपयुक्त दिशाधारा का निर्धारण करेगी और उसी प्रेरणा के अनुपात से वे क्रमशः आगे बढ़ते चलेंगे। परन्तु मनुष्य की स्थिति कुछ दूसरी ही है। वह पूर्वजों की तुलना में आगे बढ़ने की अपेक्षा अवनति की ओर अग्रसर होता जा रहा है। वह इन प्राणियों से ही कुछ शिक्षा ले तो आगे बढ़ने का मार्ग दर्शन लेता रह सकता है।


चेतना को अन्तर्मुखी बनाऐं

व्यक्तित्व गठन का तात्पर्य है अपने समूचे जीवन क्रम को संवारना। यह तभी सम्भव है जब जिन्दगी के प्रत्येक हिस्से को ध्यान से देखा जाय। कहाँ पर कौन कमी है-इस पर गौर किया जाय। तभी इन कमियों को दूर कर पाना सम्भव बन पड़ेगा।

सामान्यतः हमें अपने दोष दिखाई नहीं पड़ते। हमें अपने चिन्तन के सामने मार्क्स गाँधी फीके लगते हैं। स्वयं की चरित्र निष्ठा विवेकानन्द दयानन्द से बढ़कर आँकी जाती है। व्यावहारिक क्रिया कलापों के सामने राम मोहन राय, ईश्वरचन्द्र विद्यासागर बौने लगते हैं। अपने में कहीं कोई दोष दिखाई नहीं पड़ता। भूले भटके कोई कोई कमियाँ दिखाने का प्रयास भी करे तो उसे ईर्ष्यालु या शत्रु की संज्ञा प्रदान की जाती है। परिणाम यह होता है कि हमारा समूचा व्यक्तित्व भौंड़ा बन कर रह जाता है।

अपने दोष देखने की जगह दूसरों की कमियाँ देखने में रस मिलता है। अच्छी से अच्छी चीज में कोई न कोई कमी खटकती है। यहाँ तक कि परमात्मा में दोष निकाल लिया जाता है। अपने शक्ति व समय की खपत इसी में होती रहती है।

पर छिद्रान्वेषण की प्रवृत्ति संसार में कहीं सुन्दरता नहीं देखने देती। महापुरुषों, समाज-सेवियों, लोकनायकों आदि के दर्शन कराकर, उनकी महानता की चर्चा करने पर चित्त खिन्न हो जाता है। यही नहीं मौका पाकर उनके दोष गिनाने शुरू कर देते हैं। उन्हें भी अहंकारी, स्वार्थी आदि अवगुणों से ग्रसित कहकर दोषी सिद्ध कर दिया जाता है।

सृष्टि में गुण हैं और दोष भी। हर स्थान, हर पदार्थ, हर व्यक्ति में किसी न किसी मात्रा में ये दोनों रहते हैं। सही कहा जाय तो दोनों की ही अपने-अपने स्थान पर उपयोगिता भी है। जो एक स्थान पर गुण है वही दूसरे स्थान पर दोष हो सकता है। संसार में दुग्ध, फल, मेवा जैसी पोषक चीजें हैं तो ज़हर जैसी मारक भी। प्रत्यक्ष में पोषक वस्तुएँ गुणवान लगती हैं ज़हर जैसी चीजों में दोष ही दोष दिखाई पड़ते हैं। किन्तु वास्तविकता इससे अलग है। अधिक खा लेने पर पोषक मारक में बदल जाती है और सँखिया आदि जहरीली चीजों को औषधि के रूप में प्रयुक्त कर किसी की जान भी बचाई जा सकती है। पर यह काम तभी सम्भव है जब उपयोग करने वाला उनको विवेक सम्मत ढंग से प्रयोग में लाए।

संसार में शायद ही ऐसा कोई प्रमाण मिले कि किसी व्यक्ति ने दूषित दृष्टिकोण और परनिन्दा की वृत्ति को पाले रख कर जीवन में कोई सफलता पाई हो। विश्व का इतिहास इस बात की अनेक गवाहियों से भरा पड़ा है कि घोर निन्दा, आलोचना और विरोध होने पर भी जिन सत्पुरुषों ने किसी की निन्दा नहीं की और गुण ग्राहक वृत्ति में विश्वास बनाए रखा, उन्होंने अपने साथ दूसरों का भी कल्याण किया आवश्यकता बाहर के दोषों को न देखकर अपने में निहित कमियों-बुराइयों को निहारने की है। मनोविज्ञान ने इस प्रक्रिया को आत्म निरीक्षण का नाम दिया है। दर्शन की भाषा में यह महत्वपूर्ण विशेषता है जो केवल मानव को मिली है मनुष्य आत्म चेतन है, जब कि पशु सिर्फ चेतन। इसका मतलब है कि आदमी के पास वह सामर्थ्य है, जिसके द्वारा अपने को जान सकता है। स्वयं अपने दोष दुर्गुणों को जानकर उन्हें दूर कर सकता है। जब कि पशु इन्द्रिय संवेदनों द्वारा बाहरी चीजों के बारे में तो जान सकते है पर स्वयं को जानना उनके बस की बात नहीं है।

इस विशिष्ट सामर्थ्य की गरिमा तभी है जब उसको उपयोग कर स्वयं को निहारा जाय। दोष-दुर्गुणों, विकृतियों को देख समझ कर उन्हें उखाड़ फेंका जाय।

मनोवैज्ञानिक जे.एस.लैशले ने अपने शोध निबन्ध “द बिहैविअरिस्टिक इन्टरप्रिटेशन आफ काँशसनेस” में इस आत्म निरीक्षण की प्रक्रिया को दो चरणों में समझा है। पहला अपने व्यावहारिक क्रियाकलापों का अध्ययन। इसको पहले नम्बर पर रखने का कारण यह है कि हमारी दृष्टि स्वाभाविक बहिर्मुखी है। शुरू शुरू में यह सम्भव नहीं कि अन्दर गोता लगाकर कमियाँ टटोली जायँ। यदि नित्य प्रति व्यावहारिक गतिविधियों का बारीकी से अध्ययन किया जाय तो मालूम होगा कि स्वयं द्वारा किए गए क्रियाकलापों में लगभग 30-40 प्रतिशत ऐसे बचकाने हैं जो स्वयं की गरिमा के अनुकूल नहीं हैं।

इनको सम्हालने के लिए स्वयं के चिन्तन को निहारना होगा। यह प्रक्रिया का दूसरा चरण है। कठिन होने के बावजूद इसकी जरूरत है। बिना इसके काम नहीं चलता। व्यवहार के बीज चिन्तन में मौजूद रहते हैं। अपने सोच विचार के तौर-तरीके पर ध्यान देना होगा। जैसे जैसे दृष्टि अन्तर्मुखी होगी पता चलेगा कि हमारा बहुत सारा समय निरुपयोगी चीजों को सोचने में चला जाता है। कभी किसी की बुराई सोचते हैं। कभी बिना मतलब की कल्पनाएँ करते हैं। इनमें कोई तारतम्य नहीं। मानसिक ऊर्जा की यों ही बरबादी होती रहती है। दूसरों की बुराइयाँ उन्हें परेशान करने के तौर-तरीके सोचने की जगह चिन्तन को सुसम्बद्ध करना होगा।

मनःशास्त्री आर. अर्नहेम का “द क्रिएटिव प्राँसेस” में मानना है कि आत्मनिरीक्षण का क्रम तब तक अधूरा है जब तक इसके साथ आत्मसुधार की विधि न जुड़ी हो। इसका मतलब है ईर्ष्या, डाह, द्वेष आदि तमाम दोषों को हटाकर इसमें सत्प्रवृत्तियों की पूरी फसल उगाना। यह काम ठीक किसान जैसा है। वह खेत में बुवाई के पहले से खरपतवार निकालना शुरू करता है और फसल उग जाने के बाद भी अपना यह निराई का कार्यक्रम नहीं छोड़ता। प्रक्रिया के इस पहलू में लगभग ऐसा ही करना होता है। व्यावहारिक जीवनक्रम में दया, करुणा, सेवा, सहृदयता का किस स्तर पर कैसे समावेश हो। इसके लिए चिन्तन के स्तर पर पूरी योजना तैयार करनी होगी। प्रयत्न पूर्वक इन्हें व्यवहार में उतारने के प्रयास करने होंगे।

जैसे-जैसे इनका अभ्यासक्रम शुरू होगा अपने दोष साफ-साफ दिखाई पड़ने लगेंगे। स्थिति बिल्कुल बदल जाएगी। जहाँ पहले दूसरों के दोष दिखाई देते थे और अपने गुण। वहाँ अब दूसरों में गुण दिखाई देने लगेंगे और अपने में दोष।

मन चतुर किसान की तरह इसी में व्यस्त रहेगा कि अपने अवगुण निकाल कर कैसे बाहर करें और दूसरों में जो गुण झलक रहे हैं, उन्हें अपने में किस तरह आरोपित किया जाय। महर्षि दत्तात्रेय ने यही क्रम अपनाया था। उन्होंने जब अपनी दोष दृष्टि त्याग कर श्रेष्ठता ढूँढ़ कर अपने में रोपित करने की वृत्ति जगाई, तो तब उन्हें चील, कुत्ते, मकड़ी, मछली, भृंग जैसे तुच्छ प्राणी भी गुणों के भण्डार दीखने लगे। यही नहीं उन्होंने इन्हें गुरु के स्थान पर सुशोभित किया। उनसे शिक्षा ग्रहण करते गए। हम चाहें, तो चोरों से भी सावधानी, सतर्कता आदि अनेक गुणों को सीख सकते हैं। अपने दोष और दूसरों के गुण तलाशने को यदि हम ठीक-ठीक अपनालें तो न केवल अपना व्यक्तित्व सँवरेगा बल्कि सारी दुनिया हमारे लिए उपकार, सद्भावना का उपहार लिए खड़ी दिखाई देगी। उपयुक्त यही है कि अपनी सारी चेतना को आत्म निरीक्षण व आत्म सुधार की प्रक्रिया में केन्द्रित किया जाय।


भ्रान्तियों से उबरें, प्रगति पथ प्रशस्त करें

मनुष्य में प्रतिभा, क्षमता, योग्यता बीज रूप में पूरी तरह विद्यमान हैं। इन सबके विकास की अनेकानेक सम्भावनाएँ भी समाई हैं। यही कारण है कि मानव समुदाय में से विश्व को चमत्कृत कर देने वाले व्यक्तित्व उपजाते आए हैं। शारीरिक स्तर पर इन क्षमताओं के जागरण से कुशल जिम्नास्टिक, एथिलीट, पहलवान बनते देखे जाते हैं। मानसिक स्तर पर कल्पनाशीलता का जागरण व्यक्तित्व को कालिदास, गेटे, टेनीसन, बड्सवर्थ, आइन्स्टीन, काण्ट, इब्नेसिना, जैसे दर्शनशास्त्री व वैज्ञानिक के रूप में गढ़ने वाला होता है। भावनात्मक स्तर पर जाग्रत प्रतिभा व योग्यता व्यक्ति को महात्मा गाँधी, तिलक, विवेकानन्द, जैसा सन्त, समाज सेवी बनाने वाली होती है।

प्रत्येक में प्रतिभा के इन बीजों के बावजूद कल्पना हीन कुण्ठित बुद्धि, भावनाहीन संकीर्ण स्वार्थरत मनुष्यों की भरमार ही चारों ओर दिखाई देती है। जो मनुष्य अपने विकास की सम्भावनाओं को पहचान कर उन्हें उपयोग में लाकर न केवल स्वयं समर्थ और सशक्त बन सकता था, वरन् दूसरों का आश्रय दाता सिद्ध हो सकता था। आज दुःखी पीड़ित, उदास, निराश, हैरान परेशान की स्थिति में जिस-तिस तरह की जिन्दगी गुजार रहा है, सेवा सहायता की बात तो दूर अपना जीवन ही उससे ढोते नहीं बनता।

आधुनिक मनोवैज्ञानिकों ने मानव की वर्तमान स्थिति का गहराई से अध्ययन करने का प्रयास किया है। उनके अध्ययन का केन्द्र बिन्दु यही रहा है, क्षमता के बीजों के रहते अक्षम रहने का कारण क्या है? मनोविद बी.एम.फाँस ने अपनी कृति “न्यू हाँरिजन्स आफ साइकोलॉजी” में इस कारण को स्पष्ट करने की चेष्टा की है उनका कहना है कि वर्तमान की सारी दुर्बलताओं, परेशानियों का कारण मानवी मन की स्वयं को स्वरूप के बारे में भ्रमात्मक धारणा है अधिकाँशतया लोग या तो आत्महीनता से पीड़ित हैं अथवा उद्धत अहंकार को लादे हुए हैं। आत्महीनता से ग्रसित व्यक्ति अपने को निरा दीन हीन समझता है। उसे हमेशा यही भान होता रहता है कि मेरी उन्नति सम्भव नहीं, जबकि अहंकारी अपने की पूर्णतया विकसित मानता है। दोनों ही दशाओं में विकास की सम्भावनाओं के द्वार बन्द हो जाते हैं।

अमेरिकन मनोवैज्ञानिक डा. मैक्सवेल माल्ट्ज अपने अध्ययन “द मैजिक पावर ऑफ सेल्फ इमेज साइकोलॉजी” में स्पष्ट करते हैं कि खुद के बारे में दृष्टिकोण को सुधारा जा सके तो योग्य सक्षम बन सकना असम्भव नहीं है। इसके लिए न तो कोई छोटा है और न बड़ा। सभी समान रूप से नूतन, रचनात्मक, सृजनशील सफल जीवन की लक्ष्य प्राप्ति के इस प्रयोग में संलग्न हो सकते हैं।

माल्ट्ज अपनी इसी कृति में बताते हैं कि मनोविज्ञान के क्षेत्र में कुछ दशक पूर्व यह माना जाता था कि पॉजेटिव थिंकिंग अथवा पोषक विचारों के द्वारा स्वयं की योग्यताएँ उभारी जा सकती हैं। किन्तु नूतन शोध अध्ययनों से स्पष्ट हुआ है कि यदि अपने बारे में धारणाएँ भ्रामक बनी रहें तो पोषक विचार पूर्व प्रभावी नहीं होते हैं। यदि अपने बारे में हेय और निकृष्ट होने की मान्यता जड़ जमाए बैठी है तो बाह्य परिस्थितियों के बारे में पोषक विचारों को स्थान दे पाना सम्भव नहीं बन पड़ता है।

स्वयं के नवीन व उत्कृष्ट स्वरूप गढ़ने की आवश्यकता पर बल देते हुए प्रेस्काट लेकी ने अपनी रचना “सेल्प कन्सिसटेन्सी एथ्योरी आफ पर्सनालिटी” में तकनीकी को स्पष्ट किया है। उनके अनुसार व्यक्तित्व को ढालने के लिए एक ऐसा साँचा आवश्यक है जो अपने में आदर्शों योग्यताओं एवं क्षमताओं का समुच्चय हो। साथ ही मानव के मूलतः दिव्य होने की मान्यता को सार्वभौमिक स्थान दिया जाय। लेकी के अनुसार इन दोनों आस्थाओं को जगाकर जीवन में आमूल-चूल परिवर्तन सम्भव है। जब खुद के मूलतः दिव्य होने पर विश्वास जमता है तो निकृष्टता, हीनता, विजातीय, समझ में अपने लगती है। इससे जैसे-तैसे पीछा छुड़ाने में ही भलाई सूझती है। इसके साथ ही जब जीवन में आदर्श स्वरूप का ऐसा साँचा सामने होता है जो क्षमताओं एवं आदर्शों का समुच्चय हो तो स्वयं को वैसा ही गठित करने में कोई कठिनाई नहीं होगी।

प्रेस्काँट द्वारा बताए गए उपरोक्त मनोवैज्ञानिक तथ्य की स्थापना भारतीय चिन्तन में स्पष्ट रूप से मिलती है। उपनिषद् साफ शब्दों में मानव मात्र को “अमृतस्य पुत्रा” का सम्बोधन देते हैं, जो मनुष्य को मूलतः दिव्य सिद्ध करता है। इसके साथ ईश्वर सम्बन्धी मान्यता के पीछे उपरोक्त मनोवैज्ञानिक रहस्य झाँकता है। इस मान्यता के द्वारा जीवन को तदनुरूप आदर्शयुक्त सुयोग्य व सक्षम गठित करने का ही भाव है। इस भाव को ठीक-ठीक समझ लेने पर वर्तमान पूरी तरह रूपांतरित होने लगता है।

मनःशास्त्री एनी रो ने साँइटिफिक अमेरिकन के वाल्यूम 87 में प्रकाशित शोध निबन्ध “ए साइकोलाजिस्ट एग्जामिन्स सिक्सटी फोर इमिनेंन्ट पर्सन्स” में उपरोक्त तथ्यों का समर्थन किया है। उनका यह शोध पत्र चौसठ विशिष्ट प्रतिभा शालियों के मनोविश्लेषण की रिपोर्ट है। रो लिखती हैं कि प्रखर प्रतिभावानों के मन, बुद्धि, व्यक्तित्व किसी विशेष तत्व से गठित नहीं होते। जन्म से प्रतिभावान होना अपवाद है, नियम नहीं। सभी प्रतिभाशाली लोगों में विशेष तत्व एक ही है कि वह अपने में निहित सम्भावनाओं को पहचानते हैं और उन्हें विकसित करने का प्रयास करते हैं।

रो के अनुसार अपने को मूलतः दिव्य समझते हुए आवश्यक है स्वयं का सम्यक निरीक्षण किया जाय। इस सम्यक निरीक्षण के द्वारा यह पता चलता है कि किस स्तर पर कौन सी योग्यताएँ निखर सकती हैं। हर व्यक्ति की अपनी मौलिक विशेषताएँ होती हैं। उदाहरण के लिए मार्क ट्वेन की मौलिक विशेषता एक साहित्यकार की थी। इसको न समझ पाने के कारण जब वह व्यवसाय के क्षेत्र में उतरे तो पूरी तरह असफल हुए। बाद में भूल सुधार लेने पर उनकी गणना चोटी के साहित्यकारों में होने लगी। अतएव अपनी मौलिक विशेषता को जाना जाय।

इसके साथ यह भी जरूरी है कि अपनी कमियों व दोषों को पूरी तरह विजातीय माना जाय। ऐसी धारणा इनसे सहज छुटकारा दिला देती है। प्रतिभा सम्वर्धन में एक अन्य अवरोध है, बिना जाँचे परखे खुद को सर्वोत्कृष्ट मान लेना। ऐसी दशा में अहं की इतनी मोटी दीवार खड़ी हो जाती है कि विकास का द्वार ही अवरुद्ध हो जाता है। अतएव जरूरी है कि स्थिति का सही-सही आकलन किया जाय।

स्थिति के आकलन के पश्चात् अगला चरण है प्रयास। प्रयास का तात्पर्य है साँचे के अनुसार अपने को ढालना। आदर्शों के समुच्चय के अनुरूप अपने मूलतः दिव्य जीवन को शनैः शनैः विकसित करना। अपने स्वरूप को मूलतः दिव्य मानने तथा आदर्शों की स्पष्ट धारणा होने पर जीवन में चमत्कारी रूप से परिवर्तन होने लगता है। इस तरह मानवी अन्तराल में समाए कालिदास, गेटे, गाँधी, तिलक, काण्ट, शंकराचार्य एक एक करके प्रकट होने लगते हैं। आवश्यक है कि प्रतिभा सम्वर्धन के इस रहस्य को समझ कर प्रयत्नशील हुआ जाय।


नारी का अद्भुत अन्तराल

सृजन से पूर्व सफाई की आवश्यकता होती है। खेत बोने से पहले उसकी जुताई करनी पड़ती है ताकि काँटे कंकड़ पत्थर खरपतवार उस भूमि में से उखड़ जायँ। इसके बिना न बोये बीज की जड़ें ही नीचे चल सकेगी और न बोये पौधों को खुराक मिल सकेगी।

अपना समाज एक खेत है जिसमें सत्प्रवृत्तियों का खेत बोना और उद्यान लगाना है। इससे पूर्व शोधन कार्य आवश्यक है। राम राज्य की स्थापना से पूर्व लंका दहन करना पड़ा था। महाभारत भी इसीलिए रचा गया था।

प्रज्ञा युग के आगमन से पूर्व अनीति का अनर्थकारी वातावरण सुधारना पड़ेगा। सृजन के स्वप्नों को साकार करने से पूर्व मार्ग के अवरोधों से जूझने की योजना बनानी पड़ेगी। गहरी नींव खोदने के उपरान्त ही अन्य भवनों की आधारशिला रखी जाती है।

अपने समय की प्रचलित बुराइयों में अग्रणी है-’नारी की अवमानना’। उनकी गई गुजरी स्थिति में रहते परिवार संस्था का विकास न हो सकेगा। स्पष्ट है कि समाज और व्यक्ति के मध्यवर्ती परिवार हैं। उसी खदान में से नर रत्न निकलते हैं। परिवारों की कड़ियों से मिलकर समाज की श्रृंखला बनती है। परिवारों की सुसंस्कारिता से ही धरती पर स्वर्ग का अवतरण घर परिवारों के देवालय में ही संभव होता है।

समाज और व्यक्ति के उत्कर्ष की बात तो बार बार कही जाती रही है पर परिवार को कूड़े करकट की तरह उपेक्षा के गर्त में ही पड़ा रखा गया है। उसे खाना बनाने खिलाने की सराय जैसा दर्जा प्राप्त है। ऐसी दशा में उसमें से न नर रत्नों की फसल उग सकती है और न ही हर सदस्य को निरन्तर सुसंस्कारिता अपनाने का नियमित प्रशिक्षण और अभ्यास संभव हो सकता है।

परिवार की अधिष्ठात्री नारी है। उसी को गृह स्वामिनी या गृहिणी कहते हैं। गृहलक्ष्मी भी वही है। पीड़ितों का उत्कर्ष एवं अपकर्ष उसी के आँचल तले होता है। गरीबी के रहते भी उसी की सुव्यवस्था घर को “आनंद निकेतन” बना सकती है। कभी यहाँ नारी को सर्वोपरि सम्मान प्राप्त था। उसके नाम के साथ ‘देवी’ शब्द जुड़ा रहता था। पुरुषों में से देव कोई बिरले ही होते हैं पर नारियों में से अधिकाँश को अभी भी देवी पाया जाता है। वे सरस्वती, लक्ष्मी और दुर्गा के रूप में अदृश्य रहती हैं। पर माता, भगिनी और पुत्री के रूप में उन्हें घर घर में पवित्रता के रूप में प्रतिष्ठित देखा जाता है। मनु का कथन असत्य नहीं है कि जहाँ नारी की पूजा होती है वहाँ देवताओं का निवास रहता है।

धर्म पत्नी के रूप में वह जीवन संगिनी की वैसी ही भूमिका निभाती है, जैसी कि दो पहियों के सहारे गाड़ी चलती है। नाव को सही रास्ते पर ले जाने के लिए दोनों हाथों से डाँड सँभालने पड़ते हैं। मंजिल पार करने में दोनों ही पैरों का समान योगदान रहता है। ताली दोनों हाथों से बजती है। नारी की गरिमा बनाये रहने के लिए उसके सहयोग समर्थन के लिए सभी को कृतज्ञ रहना चाहिए। उसके सम्मान में किसी प्रकार की कमी नहीं आने देनी चाहिए।

नारी का एक गर्हित रूप भी है जिसे रमणी, कामिनी कहते हैं। उसी को सर्पिणी भी कहा गया है। जब हम उसे श्रद्धा भरे उच्च स्तर से कीचड़ में पटक कर ‘भोग्या’ के रूप में कुदृष्टि से देखते हैं तो परकाया तो क्या स्वकाया भी फुसकारने और उसके जैसा बरताव करने लगती है। यही है नारी अवज्ञा और अवमानना, जिसके कारण आज घरों में अस्वस्थता, दरिद्रता और विग्रह की जड़ें जमती हैं। इन विष वृक्षों के फलने फूलने पर घर ही नरक बन जाता है। उसे किसी अन्य लोक में ढूँढ़ने के लिए नहीं जाना पड़ता।

हमें अपनी अनेकानेक अव्यवस्थाओं में से ध्यान तो सभी का रखना चाहिए पर लक्ष्य एक को ही मानना चाहिए। नारी के पुत्री, भागिनी और माता के रूप में चित्र छपे। सीता, सावित्री, सुकन्या जैसी धर्म-पत्नियों के रूप में भी। वे अरुन्धती और अनुसुइया भी तो थी। पर उनके चित्र ढूँढ़े नहीं मिलती, जिस दुकान पर देखें वहाँ रमणी, कामिनी के ऐसे उत्तेजक मुद्रा वाले चित्र मिलेंगे, जिन्हें ध्यानपूर्वक अवलोकन करने वाले की पशु प्रवृत्ति ही भड़के। उच्चकोटि की भावना किसी के मन में हो तो उस भौंड़े प्रदर्शन से कालिख पुत जाय।

देवताओं में से एक भी देवता ऐसा नहीं मिलेगा जो अपनी ‘शक्ति’ को प्राथमिकता न देता हो। लक्ष्मी नारायण उमा-महेश, सीताराम-राधेश्याम, शची-पुरन्दर, आदि के रूप में उनकी स्थापनाएँ हैं। इन सब युग्मों में नारी का नाम प्रथम और नर का द्वितीय है। नारी से ही नर उपजा है। नर से नारी नहीं। इसलिए उन्हें श्रद्धा, प्रज्ञा, निष्ठा आदि के रूप में आध्यात्म क्षेत्र की अधिष्ठात्री कहा गया है।

नारी को इन दिनों रसोईदारिन, चौकीदारिन, सफाई वाली, बच्चे जनने वाली के रूप में विभूषित कर पुरुषों की तुलना में हेय समझा जाता है। वैसा ही व्यवहार उसे मिलता है। फलस्वरूप पिता के यहाँ से जिस प्रकार व्यक्तित्व लेकर आई थी उसे एक दो वर्ष में गँवा देती है। भावुकता की मात्रा जिनमें अधिक होती है, उन्हें अपने प्राण गँवाने या परित्यक्ता बनने का अवसर आ जाता है। अधिकाँश ऐसी हैं जो परिस्थितियों में अपने आपको कुचल लेती हैं और जीवित लाश की तरह जिस तिस प्रकार मौत के दिन पूरे करती रहती हैं या दहेज की बलिवेदी पर चढ़ जाती हैं।

सबसे बड़ा अवरोध है-उपेक्षा। इसे कलह से भी बुरी किस्म का दुर्व्यवहार माना गया है। लड़ाई के पीछे अधिकार का भाव होता है। पर उपेक्षा के पीछे तो तिरस्कार की मान्यता बोलती है। उसके साथ भर्त्सना भी छिपी रहती है। समझा जाता है कि यह बेकार का कूड़ा करकट शिर पर लदा हुआ है। कोई काम कराना हुआ तो नौकर की तरह इशारा कर दिया, अन्यथा हर समय गुम-सुम। न अपनी बात कहना, न दूसरे की सुनना। इस स्थिति को उपेक्षा कहते हैं। देखने में तो यह चुप्पी प्रतीत होती है और लगता है कि शान्तिप्रिय एकान्तप्रिय स्वभाव है, किन्तु वस्तुतः वैसा होता नहीं। अवहेलना बुरी किस्म की भर्त्सना है। लड़ाई बरदाश्त हो सकती है। कटु वचन भी सुने जा सकते हैं, क्योंकि इनके पीछे आपसी संबंध तो जुड़े रहते हैं। वे आज कडुए हैं तो कल सुधारे संभाले भी जा सकते हैं। किन्तु जहाँ उपेक्षा का, अवहेलना का परायेपन का भाव टपकता है, वहाँ भावनाशील नारी के लिए स्थिति असह्य हो जाती है।

पिता का घर छोड़कर नारी एक स्वप्न साथ में लेकर आती है। उसे स्वप्न भी कह सकते हैं और स्वर्ग भी। उसे प्रेम लोक भी कहा जा सकता है। इसी के संबंध में वह विवाह से पूर्व रंग बिरंगे सपने देखती रहती है। घर छोड़ते समय स्वजनों के विछोह और परायों के साथ निभ पाने का भय जहाँ त्रास देता है, वहाँ एक नई मान्यता के ऊपर वह जीवित रहती है कि नई जगह जाकर उसे अलौकिक प्रकार का प्यार, सौजन्य, सम्मान मिलेगा, पर जब वस्तु स्थिति उससे ठीक उलटी दीखती है, उसका हृदय टूट जाता है। आवश्यकता है कि नारी के अन्तराल को समझा जाय, उसे उचित सम्मान दिया जाय।


जागरूकता और साहसिकता

शरीर बल के सहारे वे सभी काम सम्पन्न होते हैं जो श्रम के सहारे पूरे किए जाते हैं। शरीर दुर्बल हो, अशक्ति से घिरा हो तो वे काम भी नहीं बन पड़ते जिनमें थोड़ा सा ही परिश्रम लगता है और किसी भी स्वस्थ व्यक्ति के लिए जो अति सरल होते हैं। दुर्बलता वह अभिशाप है जिसके रहते व्यक्ति जीवित रहते हुए भी मृतकों की गणना में गिना जाता है। उसे नित्य कर्मों तक के लिए दूसरों का आश्रय लेना पड़ता है। बीमारों को उठाने बिठाने में भी दूसरों की ही मदद की आवश्यकता पड़ती है। दूसरों की सहायता न मिले तो वह असहाय की तरह अनुभव करता है और सोचता है कि वह निरर्थक महत्वहीन बन कर रह गया।

शरीर बल से भी अधिक आवश्यक है मनोबल। शरीर का सूत्र संचालन मन ही करता है। काया के अवयव तो अपनी निजी गतिविधियों को गतिशील बनाने में ही लगे रहते हैं। दिल, गुर्दे, फेफड़े, जिगर, मूत्राशय, आमाशय, आँतें अपने निजी उत्तरदायित्व को ही सँभाल पाते हैं। शरीर से बाहर निकल कर कोई अतिरिक्त काम करना उनके बस-बूते की बात नहीं है। हाथ पैर सरीखी कर्मेन्द्रियाँ भी मन के आदेश पर अपने क्रिया कलाप सम्पन्न करती हैं। आँखें तभी देखती हैं जब मन दृश्य में एकाग्र हो अन्यथा घटना क्रम सामने होता रहे और ध्यान कहीं अन्यत्र हो तो देखा न देखे के समान हो जाता है। इसी प्रकार कान आदि के सम्बन्ध में भी है। मन किसी अन्य काम में व्यस्त हो तो शब्दों की ध्वनि कर्ण कुहरों में पहुँच कर भी मस्तिष्क को उसकी सूचना नहीं दे पाती कि किसने कहा और क्या कहा? यही बात अन्य इन्द्रियों के सम्बन्ध में भी है।

मन का शरीरगत कार्य संचालन ही एक मात्र गुण नहीं है। उसके अपने निजी भी कई प्रकार के स्वभाव हैं। यथा चिन्तारत एवं निश्चिन्त रहना। उदास बने रहना या उत्साह युक्त रहना। भयभीत रहना या साहस का प्रदर्शन करना। आलसी-प्रमादी प्रकृति का .... अथवा उत्साह का, साहस का, परिचय देना आदि। इन उपयुक्त-अनुपयुक्त विशेषताओं के कारण शरीर भी तदनुकूल बन जाता है। उसकी आकृति प्रकृति में इन्हीं आधारों के कारण भारी अन्तर उत्पन्न होते देखा गया है शरीर के स्वस्थ होने पर भी यदि मन व्यग्र, अस्तव्यस्त और असावधान हो तो प्रत्यक्षतः स्वस्थ दीख पड़ने पर भी मनुष्य ऐसी गति अपनाये रहता है मानो वह अशिक्षित अनगढ़ हो। उससे पग पग पर भूलें होती हैं। जो भी काम किये जाते हैं वे उपहासास्पद बन कर रह जाते हैं।

शरीर में स्वस्थता होने पर भी किया कुशलता के लिए स्फूर्ति की आवश्यकता होती है। स्फूर्ति के अभाव में दीर्घ सूत्रता छायी रहती है। आलस्य प्रमाद घेरे रहता है। समय का पालन नहीं हो पाता। क्रमबद्धता नहीं रहती। ज्यों त्यों करके काम निबटाने से असामान्य रूप से देरी लग जाती है। क्रिया विधि में तारतम्य न रहने से आगे का काम पीछे और पीछे का आगे होता है। फलतः जो किया गया है वह असंगत रहता है। उसमें कुरूपता पाई जाती है। समय भी उसकी तुलना में कहीं अधिक लगता है जितना कि सामान्य रीति में वह किया जा सकता है। स्फूर्ति के अभाव में कोई हृष्टपुष्ट व्यक्ति प्रतिद्वन्दिता में नहीं जीत सकता। पहलवान जैसी आकृति प्रकृति का व्यक्ति भी कुश्ती नहीं पछाड़ सकता।

मानसिक स्फूर्ति को जागरूकता एवं साहसिकता कहते हैं। जागरूकता का तात्पर्य है कार्य के हर पक्ष पर समुचित ध्यान देना। ध्यान देने के साथ साथ उसके साथ जुड़ी हुई समस्याओं के समाधान करने के लिए समुचित प्रयास भी करना। यह तत्परता न हो तो समझना चाहिए कि कार्य की रूपरेखा मस्तिष्क में स्पष्ट न होगी और उसे समग्ररूप से करते धरते न बन पड़ेगा। आधा अधूरा ध्यान देने से उसका एक पक्ष ही ध्यान में आता है, दूसरे या अन्यान्य पक्षों का स्मरण ही नहीं आता। जो जितना सूझा था, उतना ही करते-धरते बन पड़ता है। एक अंश को पूरा किया जाय, अन्य अंशों की उपेक्षा की जाय तो जितना कुछ बन पड़ा है वह भी शेष रही अपूर्णताओं के कारण आधा-अधूरा, काना कुबड़ा या फूहड़ ही बन कर रह जाता है। इसलिए समग्र जागरूकता को कार्य की सफलता के लिए मन की विशिष्ट आवश्यकता माना गया है। शतरंज के खिलाड़ी अपनी चाल के अतिरिक्त यह भी ध्यान रखते हैं कि प्रतिपक्षी का क्या कदम उठ सकता है। उसकी काट का ध्यान रखने पर ही कोई खिलाड़ी बाजी जीत सकता है। कार्यों की सफलता में मानसिक स्फूर्ति की जागरूकता की ऐसी ही आवश्यकता पड़ती है।

जागरूकता की तरह ही साहसिकता का भी अभीष्ट प्रयोजनों की पूर्ति में समुचित समावेश करना पड़ता है। कई व्यक्ति डरपोक प्रकृति के होते हैं। उन्हें काम के अधूरा रह जाने, बिगड़ जाने, व्यवधान आने पर रुक जाने की चिन्ता बनी रहती है। अपनी शक्ति को घटाकर आँकते हैं। सोचते हैं काम बड़ा है, साधन सीमित हैं और अपना अनुभव एवं पुरुषार्थ भी कम है। ऐसी दशा में इतना भार कैसे उठेगा? एक प्रकार की पश्त हिम्मती मन पर सवार होती है। हिम्मत टूट जाती है। करने की उमंग ही नहीं उठती। जिस पहलवान के मन में हारने का भय समाया हुआ हो वह बाजी जीत नहीं पाता। उसे हराने में वह मानसिक कमजोरी ही प्रधान कारण होती है जिसमें उसने अपने को दुर्बल मान लिया था।

संसार में बड़े बड़े काम हिम्मत के बलबूते सम्पन्न हुए हैं। साहसी बाजी मारता है। पराक्रम की चुनौती सामने खड़ी देखकर उसे अपनी प्रतिष्ठा और गरिमा का स्मरण हो आता है। समूची तत्परता और तन्मयता के साथ वह काम करता है। ऐसी दशा में उसकी सामर्थ्य सामान्य की अपेक्षा कई गुनी बढ़ जाती है और असामान्य हो जाती है।

जिसका आत्म विश्वास बढ़ा चढ़ा है, जिसे अपनी क्षमता और कुशलता पर भरोसा है, वह अनुभव करता है कि उसकी कितनी ही प्रसुप्त शक्तियाँ जाग्रत हो चलीं। कितनी ही नई सूझबूझ उजागर हुई और व्यवधानों की आशंकाओं को निरस्त कर दिया गया। समूचा मन लगा कर काम करने से सफलता की संभावना आशा से कहीं अधिक बढ़ जाती है।

साहस एक स्वभाव है जिसमें सामर्थ्य को कई गुना कर दिखाने की शक्ति का समावेश रहता है। कहते हैं नशा पीकर सैनिक आवेश ग्रस्त हो जाते हैं और कट कट कर लड़ते हैं साहस भी एक शक्ति भण्डार है जिसके सहारे व्यक्ति को अपनी योग्यता एवं सामर्थ्य कहीं अधिक प्रतीत होती है। यह मान्यता भ्रम मात्र नहीं होती वरन् समय पर सही सिद्ध होकर रहती है। शरीर बल की तुलना में मनोबल की समर्थता कहीं अधिक बढ़ी चढ़ी होती है। जो उसे बढ़ाते रहते हैं और समय समय पर अभ्यास में उतार कर परिपक्व करते रहते हैं। वे देखते हैं कि वे सामान्य से बढ़कर असामान्य बन गए। जो कर सकने की अपने में सामर्थ्य समझते थे उसकी तुलना में कहीं अधिक सफलता अर्जित कर सके।

डरपोक और असावधान अपनी सामान्य सामर्थ्य का एक बहुत स्वल्प अंश प्रयोग कर पाते हैं और दूसरों की तुलना में पिछड़े रह जाते हैं।


व्यावहारिक जीवन का ध्यान योग

खोई हुई वस्तु को ढूँढ़ने का एक ही तरीका है-ध्यान। जेब में सबेरे चले थे तब पचास रुपये थे। रात को जेब पर हाथ गया तो देखा कि जेब खाली है। चिन्ता हुई और हो हल्ला मचा। किसने रुपये निकाले? किसने चोरी की? उत्तेजित और अशान्त मन किसी पर दोषारोपण करने के अतिरिक्त और कुछ कर ही नहीं सकता।

पर जब चित्त शान्त हुआ तब याद किया कि सबेरे से लेकर किन-किन से भेंट हुई और कब, कहाँ रुपयों की आवश्यकता पड़ी। सबेरे से शाम तक का तारतम्य मिलाया तो याद आया कि मकान मालिक रास्ते में मिला था। उसने किराया माँगा सो जेब में रखे पचास रुपये निकाल कर उसे दे दिये थे। चिन्ता का समाधान हो गया।

छाता लेकर चलना था। देखा तो वह खूँटी पर नहीं था। चिन्ता हुई। सभी से पूछा। बच्चों को डाँटा। पर चिन्ता शाँत होने पर सोचा कि कल कहाँ कहाँ गये थे और कहाँ तक छाता साथ रहा। कहीं छूट तो नहीं गया। याद आया कि दोस्त के घर गये थे वहाँ किवाड़ पर छाता टाँगा था। पीछे चले तो शाम हो गयी। छाते की जरूरत नहीं रही सो याद भी भूल गयी। सम्भवतः वहीं रह गया। दोस्त के यहाँ पहुँचे तो उसने जाते ही कहा-”कल छाता तो यहाँ छोड़ गये थे। जूता और टोपी तो किसी के घर नहीं छोड़ गये। बड़े भुलक्कड़ हैं।” छाता मिल गया और सबेरे घर पर जो समस्या हैरान कर रही थी उसका समाधान हो गया।

इसे कहते हैं अन्तर्मुखी होना। मन की-आँखों की बनावट ऐसी है जिसमें बाहर की वस्तुएँ ही दीखती हैं। बाहर से भी सिकुड़ कर वे सामने ही केन्द्रित रह जाती हैं। जो चीजें सामने नहीं हैं, वह ध्यान में ही नहीं रहतीं। फोड़ा उठता है तो दीखता है। अपच में क्या हानि हो सकती है यह समझ में नहीं आता क्योंकि पेट का भारीपन प्रत्यक्ष नहीं है। सच बात यह है कि प्रत्यक्ष की उत्पत्ति परोक्ष में होती है। जो भीतर है वही उबलकर बाहर आता है और जब उस उफान का स्वरूप सामने आता है तब प्रतीत होता है कि समय से पहले ध्यान देने की बात याद ही नहीं रही। नशेबाजों से लेकर आलसी प्रमादी तक अनगढ़ लोग ऐसी ही भूलें करते रहते हैं ताला खुला छोड़ देने पर जब वस्तुएँ गायब हो जाती हैं तब अफसोस होता है।

होना यह चाहिए कि हम सर्वथा बहिर्मुखी न रहें। प्रत्यक्ष भर को देखने वाले नर पशु कहलाते हैं। परोक्ष को देखने के लिए अन्तर्मुखी होना चाहिए और ज्ञान चक्षुओं में यह भीतर का परोक्ष निरीक्षण-परीक्षण सतत् करना चाहिए। शरीर के भीतर क्या व्यथा है? इसे चिकित्सक बतायें, इससे पूर्व अंग अवयवों की स्थिति पर ध्यान देकर स्वयं अधिक अच्छी तरह जाना जा सकता है और जिस भूल के कारण संकट उत्पन्न होने जा रहा था उसे समय रहते रोका सुधारा जा सकता है। यही बात स्वभाव के बारे में है। अपना स्वभाव क्रोधी, कटुभाषण करने का है, इस बात को दूसरे लोग कहें तो बुरा लगेगा किन्तु वह विद्वेष तो बढ़ता ही रहेगा जो आवेशग्रस्तता के कारण उत्पन्न होता ही रहता है। आये दिन की इस कठिनाई से बचने का एक ही तरीका है कि आत्म निरीक्षण किया जाय और जो बुरी आदत पड़ गयी है उसे छुड़ाया जाय पर यह हो तभी सकता है जब अन्तर्मुखी होना सीखा जाय। ध्यानयोग की साधना अन्तर्मुखी होने से आरम्भ होती है।

अन्तर्मुखी होने के लिए यह आवश्यक है कि मन का फैलाव जो बाहर बिखरा पड़ा है उसे समेटा जाय। यदि दृष्टि बाहर ही घूमती रही तो जलवायु को, खाद्य पदार्थों को, स्वास्थ्य संकट को कारण मानते रहने के अतिरिक्त और कोई बात न सूझेगी। पर जब अन्तर्मुखी हुआ जायगा तब चोर पकड़ा जा सकेगा कि असंयम बरतने के कारण अस्वस्थता है। यदि जलवायु कारण रही होती तो उस क्षेत्र में रहने वाले सभी को बीमार हो जाना चाहिए था। उपचार चिकित्सकों के हाथ नहीं, अपने हाथ है। नई परिस्थितियों के अनुरूप अपना रहन सहन नये ढंग से बदल लिया जाय तो बिगड़ी बात बनने में देर न लगे पर यह सूझ बूझ उत्पन्न तभी होगी, जब आत्म निरीक्षण किया जाय और परिस्थितियों के साथ तालमेल न बिठा पाने के अपने दोष को समझा एवं सुधारा जाय।

अध्यात्म प्रयोजनों में लोग अक्सर बाहरी क्षेत्र में ढूँढ़ खोज करते हैं। ईश्वर का अनुग्रह पाना है, देवताओं से वरदान लेना है, समर्थ गुरु ढूँढ़ना है, किसी साधन सम्पन्न का सहयोग लेना है तो उसी की खुशामद की जाती है और काम नहीं बनता तो उन्हीं की निष्ठुरता बतायी जाती है। अन्तर्मुखी होकर यह नहीं देखा जाता कि इन सब उपलब्धियों के लिए जिस पात्रता की आवश्यकता थी वह अपने भीतर है या नहीं है। यदि नहीं है तो फिर उसे ठीक किया जाय। यदि ईश्वर निष्ठुर होता, देवता स्वार्थी होते तो उनका व्यवहार सभी के साथ वैसा होना चाहिए था। जब दूसरों पर अनुकम्पा होती है तो अपने उच्चस्तर के अनुरूप उन्हें हमारे ऊपर भी कृपा करनी चाहिए थी। यदि उनके व्यवहार में अन्तर है तो देखा जाना चाहिए कि अपने व्यक्तित्व में ही ऐसे दोष दुर्गुण तो नहीं घुसे हुए हैं, जो उन्हें पीछे हटने और असहयोग करने के लिए बाधित करते हों। यह आत्म निरीक्षण तभी हो सकता है जब व्यक्ति अन्तर्मुखी हो।

ऋद्धि सिद्धियाँ किन्हीं देवी देवताओं के पास हैं और वे किसी पूजा पाठ से प्रसन्न होकर उड़ेलते रहते हैं, इस प्रकार का बहिर्मुखी दृष्टिकोण हमें भटकाता ही रहेगा। वास्तविकता से कोसों दूर रखेगा। पर जब अपना दृष्टिकोण बदलकर परिस्थितियों के लिए दूसरों को उत्तरदायी ठहराने की अपेक्षा अपनी कमियों को खोजना और उन्हें पूरा करना आरम्भ किया जायगा तो विकट दीखने वाली समस्या नितान्त सरल हो जायगी।

ध्यान लगने का प्रथम उपाय यह है कि उतने समय के लिए बाहर की वस्तुओं और व्यक्तियों, परिस्थितियों से ध्यान हटाकर हम अपने भीतर केन्द्रित हों और सुधार क्रम की आवश्यकता समझें, व्यवस्था बनायें।

ध्यान लगने का प्रथम उपाय यह है कि उतने समय के लिए बाहर की वस्तुओं और व्यक्तियों, परिस्थितियों से ध्यान हटाकर हम अपने भीतर केन्द्रित हों और सुधार क्रम की आवश्यकता समझें, व्यवस्था बनायें।


Quotation

जो यह चाहता है कि उसका कार्यक्रम दूसरे लोग ही निर्दिष्ट कर दें, वह अपने मन्तव्य को पूरा किये बिना ही मर जायगा।

-लोबेल


परिस्थिति नहीं मनःस्थिति बदलें!

स्रष्टा ने यह सृष्टि चित्र विचित्र प्राणियों और परिस्थितियों के लिए बनायी है। इसमें समता और सुविधा भी कम नहीं, पर भिन्नताओं और प्रतिकूलताओं की भी यहाँ भर मार है। एक ही सुविधा दूसरे की असुविधा बन जाती है। ऐसी दशा में स्रष्टा को इसके लिए कैसे सहमत किया जाय कि किसी को असुविधा न हो और सर्वत्र एकता, समता, सुविधा बनी रहे ऐसा होना संभव नहीं, क्योंकि प्रतिकूलताओं को सहने से मनुष्य में सहनशक्ति विकसित होती है, साथ ही प्रतिकूलताओं से संघर्ष करने की भी। एक तीसरा उपाय भी है कि प्रतिकूलताओं को अनुकूलता में बदलने के लिए अपने चिन्तन और व्यवहार को ही बदल लिया जाय। इन तरीकों में से कोई एक मनुष्य को स्वयं ही अपनाना पड़ता है ताकि प्रतिकूलताएँ बनी रहने पर भी अपना काम किसी प्रकार चलता रहे। मनुष्य की बुद्धिमत्ता इसी में है। यों मिट जाने या मिटा देने की नीति भी अपनायी जा सकती है। पर वह इतनी महंगी है कि सहज गले नहीं उतरती। फिर आक्रोश और प्रतिशोध का एक कुचक्र भी ऐसा बन जाता है जिसका अन्त कभी होगा कि नहीं यह कहा नहीं जा सकता। चम्बल क्षेत्र में डाकुओं की भरमार के पीछे यह आक्रोश, आक्रामक प्रतिरोध, प्रतिशोध का सिलसिला पीढ़ियों से चलता आ रहा है और उसका अन्त कब होगा? यह कहा नहीं जा सकता। यही बात अपनी मर्जी किसी पर थोपने और उससे इच्छित काम करा लेने के सम्बन्ध में है। विवशता में कोई अपनी इच्छा के विरुद्ध झंझट समेटने की दृष्टि से मान भी ले तो यह नहीं कहा जा सकता कि द्वेष का अन्त हो गया और सहयोग का सिलसिला चल पड़ा। कहते हैं कि घायल साँप अवसर पाकर बदला लेता है। हो सकता है कि जिसे दबाया गया है, दबा कर मनमर्जी पर चलने के लिए बाधित किया गया है, वह उस समय मन मार कर बैठ जाय और मौका देखकर अपनी घात चलावें। इससे दबी हुई चिनगारी फिर भड़क उठने का खतरा है।

प्रतिकूलताओं के साथ सामंजस्य बिठा लेने की नीति सरल और सुविधाजनक है। इसमें हेठी अनुभव नहीं करनी चाहिए और न सिद्धान्त से हारने या हार मानने की कोई बात सोचनी चाहिए। इसे दूरदर्शिता और नीति मत्ता ही कहा जायगा।

वर्षाऋतु माली के अनुकूल पड़ती है। कुम्हार के प्रतिकूल। गर्मी में कुम्हार बर्तन बनाता, पकाता और रोटी कमाता है किन्तु माली के पेड़ सूख जाते हैं और उसे सिंचाई के लिए भारी प्रयत्न करना पड़ता है। दिवाचरों और निशाचरों की प्रकृति भिन्न है। जो एक वर्ग को अनुकूल पड़ता है, वही दूसरे को प्रतिकूल। फिर भी जीवधारी किसी प्रकार संगति बिठाते हुए अपना काम चलाते हैं। विद्रोह पर उतरें तो सृष्टि क्रम का बदलना तो कठिन है। स्वयं रुष्ट-क्रुद्ध होकर अपनी हैरानी बढ़ायेंगे।

मनुष्य का वास्ता कितनी ही प्रकृति के लोगों के साथ पड़ता है। इनमें से कुछ तो स्वभाव और संस्कारों से ऐसे होते हैं जिन्हें प्रतिकूल माना जा सके। कुछ ही आदतें आस्थाएँ ऐसी हैं जो सहज नहीं बदली जा सकती हैं। उनके सुधार का बहुत प्रयत्न करने पर भी थोड़ा सा ही प्रतिफल होता है। जो कमी रह जाती है उसे किसी प्रकार सहन करते रहने का ही एक मात्र मार्ग है। पृथक् हो जाने या पृथक् कर देने का दो टूक फैसला भी एक उपाय है। पर उसमें भी समस्या के निराकरण का सूत्र नहीं है। उससे नयी समस्यायें उत्पन्न होती हैं और वे अपेक्षाकृत अधिक भारी पड़ती हैं। अनचाहे निर्णय जब गले बँधते हैं तो उनसे घुटन होती है और उसकी प्रतिक्रिया भीतरी अशान्ति और बाहरी हानि के रूप में एक विभीषिका बन कर सामने आती है।

मन का सही उपयोग यह है कि उसे रेफ्रिजरेटर की तरह हर समय शान्त और शीतल रखा जाय। अशान्त, उद्विग्न और विक्षिप्त न होने दिया जाय। समस्याओं को हलकी फुलकी माना जाय। उन्हें बढ़ा-चढ़ा कर न सोचा जाय। संसार का बड़े से बड़ा व्यवधान ऐसा नहीं है जो समझदार व्यक्ति की शान्ति का अपहरण कर सके। कितने ही बलिदानियों ने मौत का फंदा प्यार से चूमा और छाती खोलकर गोली लगने की प्रतीक्षा की। इन्हें हिम्मत वाले भी कह सकते हैं और भी अच्छा विश्लेषण किया जाय तो उन्हें संतुलित कहा जा सकता है। जब मौत को इतना हल्का करके आँका जा सकता है तो छुट पुट प्रतिकूलताएँ ऐसा नहीं हो सकतीं कि जिनके आगमन से पूर्व ही होश हवास गँवा बैठा जाय। धैर्य और साहस रखकर भावी कठिन संभावनाओं को सुलभ कर सकने वाली समस्या समझा जा सकता है और मस्तिष्क शान्त रखते हुए वह उपाय सोचा जा सकता है कि हल निकल सके जो सदस्य अपरिहार्य अंग हैं उन्हें उपेक्षा पूर्वक नहीं, सम्मान देते हुए एकाँगी प्रेम सद्भाव का निर्वाह किया जा सकता है। स्वामी या सेवक यदि बदले नहीं जा सकते तो उन्हें भी किसी प्रकार सहन करते रहना ही उचित है।

मन की उद्विग्नता ऐसी है जो प्रत्यक्ष रोग न दीखते हुए भी मानसिक, शारीरिक रोगों के रूप में प्रकट होती है। मानसिक रुग्णता शरीर को अस्वस्थ बनाती है। चिन्तन को लड़खड़ाती है। भय से विचारों को भर देती है और भविष्य को इस रूप में दिखाती है मानो वह अंधकार से भर गया हो। उस पर पराजय के घुटन भरे बादल छा गये हों। ऐसी स्थिति देर तक बनी रहने पर मानस तंत्र की कोमलता अस्त व्यस्त हुए बिना नहीं रहती। अशुद्ध चिन्तन उन्माद बनकर उभरता है। पर्यवेक्षकों का कहना है कि शरीर रोगियों की तुलना में मनोरोगी बढ़ रहे हैं। आधी अस्वस्थता तो मानसिक विक्षेपों द्वारा उत्पन्न की हुई होती है और उसका कारण होता है, परिस्थिति के साथ मनःस्थिति का तालमेल न बिठा पाना। यहाँ यह समझ रखने की बात है कि परिस्थितियाँ इच्छानुरूप बना सकने की अपेक्षा यह ही सरल है कि मन को परिस्थितियों की प्रतिकूलता सह सकने योग्य बनाया जाय और सहनशक्ति को बढ़ाया जाय।

यह सोचना सही नहीं है कि यदि प्रतिकूलताएँ बनी रहीं तो संतुलन कैसे रखा जा सकेगा? यहाँ यह समझ लेना चाहिए कि परिस्थितियाँ दूसरों के हाथ हैं। ऐसे हाथों में जिन्हें हम कदाचित ही मोड़ मरोड़ सकें। इसकी अपेक्षा यह कहीं सरल है कि मन को चट्टान की तरह मजबूत बनाये रखा जाय और परिस्थितियों के बारे में सोचा जाय कि वह हवा के झोकों की तरह आने जाने वाली लहरें मात्र हैं। हवा चट्टान को नहीं डिगा सकती फिर प्रतिकूलताओं में से कौन ऐसी हो सकती है जो मनुष्य का धैर्य और साहस तोड़ दे। टूटता मनुष्य भीतर से है। समझता और कहता भर यह है कि उसे परिस्थितियों ने तोड़ा, हैरानियों ने झकझोरा पर इस प्रकार की कथनी से काम कुछ नहीं बनता। समस्या का हल किसी का नहीं होता। उलटा मनुष्य अपना विवेक खो बैठता है। चिन्तन में निषेधात्मक तत्व भर लेता है और आरम्भ में सनकी बनता है। सनकें ही व्यक्तित्व को विखण्डित कर देती हैं और उसे विक्षिप्तता के कटघरे में बन्द कर देती हैं। मस्तिष्क को हम स्वयं ही बिगाड़ते हैं। चाहें तो स्वयं ही बिगड़े को बना सकते हैं। यह अपनी संकल्प शक्ति के ऊपर निर्भर है।


युगसंधि की प्रथम किरण

महत्वपूर्ण परिवर्तनों के समय जो उथल पुथल होती है, उसमें से कुछ घटनाक्रम तो मंदगति से चलते रहते हैं, पर कुछ ऐसे होते हैं, जिनमें परिवर्तन की प्रक्रिया बढ़े-चढ़े रूप में होती है और हर किसी को दीख भी पड़ती है। तपते ग्रीष्म के बाद आने वाली .... वर्षा के बीच इतने प्रकार के परिवर्तन होते हैं, मानो सृष्टि का क्रम ही बदल रहा हो। पतझड़ के बाद आने वाला वसंत भी असाधारण उलट-पुलट का परिचायक होता है। बीज बोने और फसल काटने के दिनों में तैयारी तथा योजना ऐसी होती है, जिसके बीच संगति नहीं बैठती। प्रसव काल की पीड़ा और शिशु जन्म की प्रसन्नता के बीच में ऐसी ही विसंगतियाँ होती हैं। बड़े परिवर्तनों के बीच भी ऐसे ही लक्षण उभरते हैं। लंका दहन के तुरन्त बाद सतयुग की वापसी हेतु जमीन आसमान जैसे परिवर्तनों का उपक्रम चल पड़ा था।

युगसंधि सन् 1989 से आरंभ होकर सन् 2000 तक चलनी है। इन बारह वर्षों की अवधि में तूफानी हेरफेर का सिलसिला चलेगा और इक्कीसवीं सदी के आरंभ से ही स्थिति में संतुलन बनने लगेगा और नवसृजन की दिशा में अपने वातावरण के बड़े सृजनात्मक कदम उठने लगेंगे।

जनवरी सन् 89 से युगसंधि का विधिवत शुभारंभ हुआ। इस वर्ष के वसंत पर्व में उस शुभारंभ का दिव्य शिलान्यास चल पड़ा। अभी प्रथम वर्ष पूरा नहीं हो पाया कि परिवर्तन के स्वरूप दृष्टिगोचर होने लगे हैं, जो आज भले ही साधारण प्रतीत हों, पर कल उन अंकुरों को बड़े पौधों और विकसित वृक्षों के रूप में देखा जा सकेगा।

पिछले नौ महीनों में कुछ ऐसी फसलें बोई-उगाई हैं, वह संख्या में कम होते हुए भी निकट भविष्य में अपने छोटे प्रयास का आश्चर्यजनक विकास-परिणाम उत्पन्न करेंगी। विश्वसत्ता अपने नियोजन की छाप हर कहीं छोड़ती है। राजनीति भी उससे अछूती नहीं बच सकी। उसे भी ऐसे कदम उठाने पड़ते हैं, जिन्हें परिवर्तन की पूर्व भूमिका के रूप में निरूपित किया जाय तो कुछ भी अत्युक्ति नहीं है।

विश्व की आधी जनसंख्या महिलाओं के रूप में है। उसके पददलित, प्रतिबन्धित, अवशोषित, अशिक्षित स्थिति के बारे में बहुत कुछ कहा जाता रहा है। रोष प्रकट करने वाले स्थिति के विरुद्ध अपना तीखा आवेश भी व्यक्त करते रहे हैं। नारी मुक्ति आन्दोलन ने तो एक पक्षीय स्वतंत्रता घोषित करने की बगावत भी आरंभ कर दी। कानूनी और संविधान की धाराएँ सहानुभूति प्रकट करने लगीं। हीरालाल शास्त्री, महर्षि कर्वे, लक्ष्मी देवी जैसी आत्माओं ने छोटे रूप में ऐसे कार्य भी आरंभ कर दिये थे, जिनसे प्रतीत हो कि नारी की स्थिति में बदलाव की सुगबुगाहट तेजी से चल रही है। शारदा एक्ट से लेकर सती प्रथा विरोधी, दहेज विरोधी कानून ही हवा के रुख का परिचय दे रहे थे।

युगसंधि के प्रथम वर्ष में एक बड़ी घोषणा हुई है-नारी को एक तिहाई प्रतिनिधित्व मिलने की। बात भले ही पंचायत चुनावों से आरंभ हुई हो, पर वह यहीं रुकी नहीं रहेगी। कदम और भी बढ़ेगा। शासन सत्ता के अन्यान्य पक्षों में, लोक सभाओं, विधान सभाओं, म्युनिसिपल बोर्डों, अफसरों, अधिकारियों में भी यह शुभारंभ फलित होने लगें, तो उसमें आश्चर्य न मानने का मानस हमें अभी से बना लेना चाहिए। नारी अपनी वरिष्ठता और विशिष्टता अनेक क्षेत्रों में सिद्ध भी कर रही है। शुभारंभ हुआ, शंखनाद सुना गया। अब बड़े समारोह की भव्य झाँकी दीख पड़ने की भी प्रतीक्षा की जानी चाहिए।

राष्ट्र के बहुसंख्य ग्रामीण परिकर में भी असाधारण परिवर्तन की संभावनाएँ नजर आ रही हैं। ग्राम स्वराज्य की जो रूप रेखा बन रही है, उसके हजम होने में देर लग सकती है। बलिष्ठों और दुर्बलों का भेद इस नियोजन को भी सहज सफल न होने देगा। फिर भी नियति निश्चित है। जिस प्रकार देहात की जनता शहरों की ओर पलायन करती और झुग्गी झोपड़ियों में रहती है, उसी प्रकार विज्ञजन गंदगी और दुर्व्यसनों से संत्रस्त शहरी जीवन को छोड़ गाँवों की ओर भागने लगें तो इसमें कुछ आश्चर्य नहीं मानना चाहिए। प्रदूषण जन्म रुग्णता से जिन्हें अपने प्राण बचाने हैं, वे अब शहरों से गाँवों की ओर लौटेंगे और अधिक पैसा तथा अधिक सुविधा के आकर्षण को छोड़कर जीवन और सन्तोष के प्यासे लोग अब स्वेच्छा से देहातों में बसेंगे। इस प्रवाह के उलटने में कुछ समय लग सकता है, पर भवितव्यता निश्चित है। युगसंधि के इस प्रथम वर्ष में ही इसका ब्रह्ममुहूर्त में उदय हो रहा है। मुर्गे की बाँग लग रही है कि शहरों के सघनता वाले अँधेरे के जीवन के अब कुछ ही समय बाकी हैं। उषाकाल आने और अरुणोदय होने में विलंब नहीं हैं

यह वे संभावनाएँ हैं जो अखबारों के, पत्रिकाओं के आये दिन की सुर्खियों में छपती हैं। विनाश भी हारे जुआरी की तरह दूने जोश से बढ़ चढ़ कर दाँव लगा रहा है। मरणासन्न की सांसें जोर-जोर से चल रहीं हैं।

एक ओर जहाँ अनिश्चितता पहले की अपेक्षा इन दिनों और अधिक बत्तीसी दिखा रही है, वहाँ दूसरी ओर एक नई बात भी ठीक इन्हीं दिनों प्रकाश में आ रही है। वह है हर क्षेत्र में शालीनता की पक्षधर प्रतिभाओं का उद्भव और उदय के दिनों से ही प्रतिभा का प्रदर्शन। स्वराज्य आन्दोलन के आरंभिक दिनों में भारतमाता ने विभिन्न प्राँतों और क्षेत्रों में मात्र कुछ प्रतिभाएँ ही ऐसी उद्भूत की थीं जिनमें नल, नील, अंगद, हनुमान, और भीम, अर्जुन जैसी भूमिकाएँ निबाहने की क्षमता थीं। आज सामूहिकता का युग है। अब लाठी के सहारे गोवर्धन उठेगा। रीछ-बानरों की सहायता से समुद्र सेतु बँधेगा। श्रावकों और परिव्राजकों द्वारा धर्म चक्र प्रवर्तन का क्रम चलेगा। निहत्थे सत्याग्रहियों द्वारा दुर्धर्ष सत्ता के विपरीत प्रतिरोध खड़ा किया जायगा। इसी को कहते हैं-प्रतिभाओं का उभार परिष्कार।

यह प्रक्रिया भी अछूती नहीं है। शान्तिकुँज की एक छोटी सी खदान को खोदने वाले असंख्यों हीरा पन्ना निकलते देखेंगे। कभी भगीरथ अकेले ही गंगा को स्वर्ग से धरती पर ले आये थे। अब वह श्रेय किसी एक को तो नहीं मिलेगा, पर एक तूफान उठते, आग उगलते जैसा दृश्य देखा जा सकेगा जो उलटी दिशा में बहने वाली अवाँछनीयता को अपने ही भुजदंडों से उलट कर सीधा करदे।

गंगा गोमुख से निकलती है और जमुना जमुनोत्री से। नर्मदा का अवतरण अमरकंटक के एक छोटे से कुण्ड से होता है। मान सरोवर से ब्रह्मपुत्र निकलती है और पंजाब की ओर जाने वाली पाँच नदियाँ भी वहीं से निकलती हैं। शांतिकुंज ऐसे अनेकों प्रवाहों को प्रवाहित कर रहा है जिनका प्रभाव न केवल भारत को वरन् समूचे विश्व को एक नई दिशा में घसीटता हुआ ले चले।

यह आश्चर्य युगसंधि के प्रथम वर्ष के आरंभ के दिनों का है। अभी नवनिर्माण में बहुत समय बाकी है। युगसंधि के शेष ग्यारह वर्ष भी अभीष्ट प्रयोजन की अति महत्वपूर्ण भूमिका निभाएँगे। उन्हें सुविकसित होने के लिए इक्कीसवीं सदी के सौ वर्ष मिल जायेंगे और इसी अवधि में मनुष्य में देवत्व के उदय और धरती पर स्वर्ग के अवतरण की कल्पना अधिक स्पष्ट, अधिक समर्थ और प्रचंड प्रखरता के साथ जाज्वल्यमान दिखने लगेगी।


इक्कीसवीं सदी की नारी जाग चुकी है!

पिछले दिनों जापान में भूचाल सा आया व देखते-देखते महिलाओं ने पुरुषों के हाथ से राजनीति की बागडोर छीनकर अपने हाथों में लेली। इक्कीसवीं सदी का शंखनाद हुए अभी छह मास से अधिक नहीं हुए हैं, लेकिन परिवर्तन की प्रक्रिया उस राष्ट्र से ही आरंभ हो गयी है जहाँ सूर्य देवता सबसे पहले अपनी हाजिरी देते हैं। पूर्व के जापान देश से आरंभ हुई नारी-जागृति की यह क्रान्ति क्रमशः पूरे विश्व को अपने चपेट में ले लेगी, इसमें किसी को सन्देह नहीं करना चाहिए।

आइए पूरे घटनाक्रम को विस्तार से देखें। जापान विश्व का वह अग्रणी राष्ट्र है, जिसने द्वितीय विश्व युद्ध में पूरी तरह ध्वस्त होने के बाद भी अपनी साँस्कृतिक विरासत, श्रमशीलता, कर्त्तव्यपरायणता तथा नैतिकता के उच्च आदर्शों के बलबूते प्रगति के उच्चतम शिखर को छू लिया। आज सारे विश्व की आर्थिक मण्डियों पर उसका वर्चस्व है। औद्योगीकृत विकसित राष्ट्रों के साथ सदैव एक त्रासदी जुड़ी रहती है-धन लोलुपता, भोगवादी लिप्सा तथा क्रमशः राजनीति में घुसती अनैतिकता। ये बुराइयाँ घुन की तरह पूंजीवादी राष्ट्रों को खा जाती हैं किन्तु जागृत नारी समुदाय ने जापान के साथ ऐसा नहीं होने दिया। जैसे ही उनने ऐसे अंकुर फूटते देखे, तुरन्त जनशक्ति का नेतृत्व अपने हाथ में ले लिया व 1945 के पुनर्जागरण के बाद अब पहली बार यह खतरा सामने आ गया है कि “डायट” (जापानीपार्लियामेन्ट) में संभवतः एक या दो ही पुरुष हों शेष सभी महिलाएँ।

इस वर्ष जो ज्वालामुखी फूटा है उसने नवनिर्वाचित श्री ऊनो की सरकार को हिलाकर रख दिया है। उनकी लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी को पिछले दिनों “टोक्यो मेट्रोपाँलीटन असेम्बली” के चुनाव में मुँह की खानी पड़ी है व 50 में से 49 महिलाओं ने चुनाव क्षेत्र में बाजी मारी है। हर तीन वर्ष में “अपर हाउस” के चुनाव होते हैं। वे होने ही वाले हैं व अब लगता है कि “डायट” की सारी सीटें महिलाएँ ही ले जायेंगी। यदि ऐसा हो जाय तो किसी को आश्चर्य नहीं करना चाहिए क्योंकि इसके पीछे सशक्त कारण है।

प्रथम तो स्वयं को भोग्या बना देने वाले पुरुष समाज से वहाँ की स्त्रियाँ बड़ी रुष्ट हैं। दूसरे वैधानिक दृष्टि से वोटर की संज्ञा की तुलना में 27 लाख ज्यादा है एवं यह संख्या एक भारी उलट फेर कर सकने में पूरी तरह सक्षम है। यही कारण है कि श्रीमती मेनी क्युबोटा एवं श्रीमती डोई के नेतृत्व में 23 जुलाई के राष्ट्रीय चुनावों में सभी सीटों पर महिलाएँ लड़ रही हैं व वैसी ही जीत की वे अपेक्षा रखती हैं जो उनने टोक्यों में हासिल की थी। अधिकाँश महिलाएँ नौकरी शुदा हैं, या उद्योग समूहों का नेतृत्व कर रही हैं।

एक और मजेदार बात यह है कि बहुसंख्य महिलाएँ शादी नहीं करना चाहती क्योंकि वे इसे एक प्रवंचना मात्र मानती हैं। जो शादी शुदा हैं, वे बच्चे पैदा करना नहीं चाहतीं। जापान में अब 65000 से भी अधिक महिला इंजीनियर हैं। पत्रकारिता, चिकित्सा व भौतिकी के क्षेत्र में वे अग्रणी हैं। तीन चौथाई महिलाएँ पार्टटाइम या पूरे समय की नौकरी या व्यापार में निमग्न हैं। कई अमेरिका से प्रशिक्षित हो कर आई हैं। साराँश यह कि जापान में महिला क्रान्ति आ चुकी है व उसने सारे विश्व को एक दिशा भी दिखा दी है।

मुर्गा बाँग देता है व सूरज के आगमन की सूचना देता है। घटनाक्रम भवितव्यता की पूर्व सूचना देता है। इक्कीसवीं सदी नारी प्रधान होगी, इसका उद्घोष जापान से हो चुका है, अब बारी विश्व की शेष नारियों के जागने की है

*समाप्त*