हम में से कोई सचमुच ही बुद्धिमान है क्या?

सराहनीय बुद्धिमत्ता वह है, जो दूरदर्शी विवेकशील की पक्षधर हो। जिसके साथ मानवी गरिमा के अनुरूप मर्यादाओं का परिपालन और वर्जनाओं के संदर्भ में अनुशासन का परिपालन और जुड़ा हुआ हो। जो इन कसौटियों पर खरी न उतरे, उस दक्षता को धूर्तता का ही नाम दिया जा सकता हैं। इस दृष्टि से तो सियारों और लोमड़ियों को भी चिरकाल से ख्याति प्राप्त है। यदि वस्तुतः मनुष्य बुद्धिमान है तो उसे क्रिया की प्रतिक्रिया से परिचित होना चाहिए। नीति और अनीति के बीच अन्तर करना चाहिए और क्रिया की प्रतिक्रिया पर विश्वास करना चाहिए। वस्तुस्थिति समझने और उपलब्धियों का सदुपयोग कर सकने में भी उसे समर्थ होना चाहिए।

आश्चर्य इस बात का है कि बुद्धिमत्ता का विपुल वैभव उपलब्ध होने पर भी मनुष्य अपने हित-अनहित का सही मार्ग ढूँढ़ नहीं पाता, सीधी चाल चलने तक में आये दिन चूक करता रहता है। अपनी बहुमूल्य समझदारी को, क्षमता और दक्षता को उन कार्यों में खर्च करता देखा जाता हैं, जो भ्रान्तिवश लाभ जैसे प्रतीत होते हैं, पर वस्तुतः हानिकारक ही सिद्ध होते हैं।

खजांची की तिजोरी में भरी धन राशि इसलिए नहीं रखी रहती कि वह उसे अपनी निजी सम्पदा समझे और मनचाहे जैसे खर्च करे। सरकारी अफसरों को बड़े अधिकार और सशक्त साधन प्रदान किये जाते हैं। पर उनका प्रयोग सौंपे गये उत्तरदायित्वों की पूर्ति में ही हो सकता है। कोई उन्हें अपनी बपौती समझकर स्वार्थ सिद्धि के लिए मनचाहे ढंग से प्रयोग करने लगे, तो पदच्युत होगा और अनाचार के लिए दंड का भाजन भी बनेगा। सेनाध्यक्ष के तत्त्वावधान में विपुल शक्ति भण्डार केन्द्रित रहता है, पर वह है मात्र राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ही। निजी लाभ कि लिए उस व्यक्ति का उपयोग कर लेने वालों को कोर्टमार्शल उसे मृत्युदण्ड देकर उचित नसीहत देता है।

जो सुविधाएँ अन्य प्राणियों को उपलब्ध नहीं हैं, उसे मात्र मनुष्य को ही उपलब्ध कराने में स्रष्टा का पक्षपात एवं अन्याय प्रतीत होता है। पर वास्तविकता ऐसी है नहीं। यह सर्वोपरि कलाकृति जिन हाथों में सौंपी गई हैं, उनसे यह भी अपेक्षा रखी गई है कि वे उसे मात्र विश्व उद्यान को सुरम्य बनाने के लिए ही प्रयुक्त करें। अन्य प्राणियों के लिए निर्वाह ही इतना भारी पड़ता है कि उसे जुटाने में ही उन्हें अपनी समूची क्षमता खपानी पड़ती है, किन्तु मनुष्य के लिए मुट्ठी भर आटे की इतनी स्वल्प आवश्यकता हैं, जो कुछ ही समय के रम से भली-भाँति पूरी हो सकती है। इसके बाद जो कुछ समय, श्रम कौशल एवं साधन बचता हैं, वह मात्र इस प्रयोजन के लिए है कि उसका सदुपयोग करके आत्मपरिष्कार का स्वार्थ और लोकमंगल का परमार्थ, दुहरे लाभ के रूप में अर्जित कर लिया जाय।

सही राह पर सही रीति से चल पड़ने को ही दैवी परीक्षा में उत्तीर्ण हुआ समझा जाता है और उसे नर-वानरों की पंक्ति से उठाकर महामानवों में, ऋषि मनीषियों में और देवदूतों में गिना जाने लगता है। इस स्थिति में जो अनुभूतियाँ होती रहती हैं, उन्हीं को स्वर्ग-मुक्ति के नाम से संबोधित किया गया है। जीवन को उत्कृष्ट आदर्शवादिता के साथ जोड़ लेने पर वह स्थिति बन जाती है, जिसमें कुशल मल्लाह की तरह स्वयं पार उतरने और अनेकों को अपनी नाव में बिठाकर पार करने का श्रेय सुनिश्चित रूप से मिल सके। यही तो जीवन लक्ष्य है, जिसे प्राप्त करने वाले ऋद्धि-सिद्धियों के अधिष्ठाता और लाभ भरी कृतार्थता अर्जित करने में सफल होते है यह तथ्य समझाते समझाते रहने पर भी अपनी दुराग्रही हेय गतिविधियों को ही अपनाये रहना ऐसा हैं, जिसे अत्यन्त कष्टकर प्रताड़ना के साथ वहन करना पड़ता हैं।

आप्तजनों ने सच ही कहा है कि मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप है। उसकी एक मुट्ठी में स्वर्ग और दूसरी में नरक सँजोया हुआ है। उत्थान और पतन में से किसी का भी चयन कर लेना उसकी अपनी मर्जी की बात है। खेद इस बात का है कि हित को अनहित और अनहित को हित समझकर वह किया जाने लगता है, जिसे उलटी दिशा में उलटे पैरों चलने का बीनापन ही कहा जा सकता है।

बुद्धिमत्ता यथार्थता समझने और दूरदर्शी विवेकशीलता से जुड़ी हुई होनी चाहिए। जहाँ वह वस्तुतः होगी, वहाँ सद्विचारों को अपनाये जाना सदाचार पर आरूढ़ होने और सद्व्यवहार के रूप में सेवा साधना के पथ पर अग्रसर होने का प्रमाण मिलना चाहिए। धर्म-धारणा का एक ही प्रमाण-परिचय है कि मनुष्य स्वयं को अपने प्रति कठोर और दूसरों के प्रति उदार बनाये, अपने को तपाये गलाए और देव मानवों के अनुरूप दृष्टिकोण और क्रिया-कलाप का उपक्रम बनाए। यदि वैसा कुछ न बन पड़े, तो समझना चाहिए कि लोभ मोह के भवबंधनों की हथकड़ी-बेड़ी जानबूझकर पहन ली गई हैं।

परमेश्वर का वरिष्ठ राजकुमार अपने पिता के आदर्शों अनुशासनों का निर्वाह करते हुए दीख पड़ना चाहिए। उसे सूर्य चन्द्र की तरह असंख्यों को प्रकाश प्रेरणा देते रहने में सतत् संलग्न रहना चाहिए। उसकी आभा और ऊर्जा से सत्प्रवृत्तियों को अग्रगामी बनाने में योगदान मिलना चाहिए। इसी भावना, मान्यता, विचारणा और क्रिया पद्धति अपनाने में उसका आत्मगौरव है। उसकी ओर से मुँह मोड़ने पर तो यही कहा जायेगा कि सिंहशावक ने भेड़ों के झुण्ड को अपना सदस्य मान लिया है और उन्हीं की तरह मिमियाना सीख लिया है। जब आत्म स्वरूप का बोध हो और दिशाधारा में कायाकल्प जैसा परिवर्तन प्रस्तुत हो, तभी समझना चाहिए कि मनुष्य को बुद्धिमान समझे जाने की बात अपने सही स्वरूप में उभर रही हैं।


भगवान से सफाई किस बात की माँगें?

ईश्वर संबंधी वर्तमान मान्यताओं एवं उपासना से जुड़ी भ्रान्तियों से घिरे आज के समाज को देखकर मन में कई प्रश्न उठते हैं कि क्या वास्तव में ईश्वर ऐसा ही है? यदि वह पुजारियों को निहाल करने की मान्यता का प्रतिवाद नहीं करता, विदूषकों-चारणों-बहुरूपियों को-कर्तव्य पालन में उपेक्षा बरतने वालों को प्रश्रय देता है तो उस पर न्यायनिष्ठ ईश सन्तानों को पक्षपात का महाभियोग उसी तरह लगाना चाहिए जैसा कि कभी कभी राष्ट्रपति-प्रधानमंत्रियों पर लगाने की चर्चा होती रही हैं।

इन दिनों यह मान्यता पनपकर प्रौढ़ होती चली गयी है कि जो भजन के नाम पर अपना सारा समय आलस्य-प्रमाद में गुजार देते हैं और जनता से अपना शानदार निर्वाह के लिए चन्दा वसूल कर डकार तक नहीं लेते, अपने को भगवान का मध्यवर्ती एजेण्ट बताते हैं, उन्हें ही ईश्वरभक्त कहा जाना चाहिए। मन में एक प्रश्न उठता हैं कि जो ईश्वर अन्तर्यामी हैं, वह भावसंवेदनाओं आकांक्षाओं, उद्देश्यों, आदर्शों को देख परख कर ही किसी के भले-बुरे भक्त-अभक्त होने का निर्णय क्यों नहीं कर लेता? जो ईश्वर इलहाम कर सकता है, धर्मधारणा के नियम उपनियम बना सकता है, ऋषियों को प्रेरणा दे सकता है, मनीषियों को अशुभ निवारण हेतु उत्तेजित कर सकता है, वह अपने ऊपर लगने वाले इन आक्षेपों का निराकरण करने के लिए कोई कदम क्यों नहीं उठाता? यह क्यों नहीं स्पष्ट करता कि उसकी सरकार में सत्ता के दलालों के लिए कोई स्थान नहीं हैं?

जब वह सर्वज्ञ है, सभी भाषाओं का विद्वान है तो फिर कोई व्यक्ति अपनी मातृभाषा में ही क्यों नहीं अपने मन की बात कह सकता। क्यों उसे बाइबिल के लिए सहस्राब्दी पुरानी अँग्रेजी तथा आर्षग्रन्थों के लिए जटिल व दुरूह भाषा ही सुहाती हैं? अपने शिष्टाचार-सम्मान हेतु वह भावनात्मक आदान प्रदान के स्थान पर झंझट भरे कर्मकाण्डों का आश्रय क्यों लेता हैं?

भजन और कर्म में से किसे प्रमुखता दी जाय? इस सीधे किन्तु इन दिनों अति जटिल बने हुए प्रचलन में गहरी जड़ जमाए बैठे, एक प्रकार की ग्रन्थि बने हुए मन्तव्य पर कोई दो टूक निर्णय क्यों नहीं किया जाता? इस मौन साधना से, मूकदर्शक बने रहने से लोगों की यह सहज मान्यता बनती हैं कि ‘मौन को अर्धस्वीकृति’ क्यों न मान लिया जाय, और ईश्वर को क्यों न उसका समर्थन मान लिया जाय? बड़ों की बड़ी बातें छोटों की समझ में नहीं आतीं, कहकर उत्कट जिज्ञासा बालों को भी चुप तो किया जा सकता हैं, पर इस भ्रम-संदेह की आग को भीतर-ही-भीतर सुलगने से नहीं रोका जा सकता है कि जो समय, श्रम-साधना द्वारा सत्प्रवृत्ति संवर्द्धन में लग सकता था उसे भजन परक विडम्बनाओं में इस हद तक क्यों सहन किया जाता है कि प्रायः साठ लाख पूरे समय के पेशेवर और न्यूनाधिक मात्रा में उसी के लिए ढेरों समय लगाने वाले कोटि-कोटि व्यक्ति नाम रटन को ही ईश्वर की प्रसन्नता प्राप्ति का एक मात्र साधन मान लें। बहाना मिल जाने पर प्रायः पूरा ही समय उसी प्रयोजन में गुजारते रहें?

हर मनुष्य जब अपनी व्यक्तिगत इच्छाओं और आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए जब अपने ही श्रम साधना में निर्वाह के आवश्यक साधन जुटा लेता है तो फिर कुछ लोग इस प्रकार का दावा क्यों करते रहे कि उन्हें भजन समर्थक होने के कारण यह छूट मिल गई है कि वे जनता को इसी एक कारण को सब कुछ बतायें और अपने लिए मुफ्त में खर्चीले साधन जुटाये? यदि इस प्रवाह की दिशा बदली जा सकी होती तो लाखों करोड़ों परमार्थ प्रेमी सृजन प्रयोजनों में लग सकते थे और अपने खाली समय का ऐसा सुनियोजित उपक्रम अपना सकते थे कि उतने भर से दोष दुर्गुणों में, अभाव, अनाचार में भारी कटौती हो सकी होती और ऐसे आधार खड़े हो सकते थे कि संव्याप्त अवांछनीयता के स्थान पर नवजीवन संचार के लिए बहुत कुछ बन पड़ा होता।

ईश्वर की पूजा प्रार्थना के बदले मनोकामनाएँ पूरा कर देने की मान्यता अब इतनी प्रबल हो गई हैं कि अधिकांश उपासना केन्द्र अब इसी एक बिन्दु पर केन्द्रित होकर रह गये हैं। यह प्रवाह प्रचलन दिन-दिन अधिक तेजी से चलने वाले तूफान की तरह बढ़ रहा है। मनोकामना पूरी करने का दावा करने वाले देवी देवताओं, जंतर-मंतर ओर तथाकथित सिद्धपुरुषों की, दाढ़ीवाले भगवाधारियों की ऐसी बाढ़ आई है कि जल-थल उसी में डूब गए प्रतीत होते हैं। वरदान आशीर्वाद पाने का प्रमुख माध्यम उसी प्रतिपादन को माना जाने लगा हैं। फलतः उसी निमित्त धनशक्ति, समयशक्ति और भावचेतना का नियोजन होते रहना स्वाभाविक सा बन गया हैं। स्थिति की तूफानी बाढ़ को देखते हुए हर विचारशील का शंका शंकित मन यह जानना चाहता है कि आखिर वस्तुस्थिति का निर्णय निर्धारण क्यों नहीं हो पा रहा?

वस्तुतः उपरोक्त सारे प्रश्नों का समाधान एवं महाभियोग लगाने की आतुरता का प्रत्युत्तर तब मिलने लगता है जब मनःस्थिति को थोड़ा सा मोड़ देकर विचार किया जाय। मनोकामना की पूर्ति वाला ईश्वर तो मनुष्य ने ही गढ़ा है न, किसी और ने तो नहीं, फिर वह उसी अपनी कृति पर आरोप कैसे लगा सकता है? परमेश्वर परब्रह्म, परमात्मा जिन्हें अचिन्त्य, अगोचर अगम्य कहा गया है, तो वे हैं जिनने इस सृष्टि के कण-कण की, वृक्ष वनस्पतियों की, जन-जन की काया व मन की ग्रह-नक्षत्रों की अनुशासन रूपी सीमेन्ट से संरचना की है। यह परब्रह्म वह है जिसने सारी सृष्टि को सृजा है। उसी का स्पन्दन जड़-चेतन के कण-कण में सतत् होता रहता है। यह स्पष्टीकरण ईश्वर तो करने से रहा कि “मुझ से संबंधी मान्यताओं के भ्रमजंजालों में फँसे हे मनुष्यों! कम से कम विचार करके तो देखो कि सही मायने में मेरी सत्ता कौन सी है, क्या है?” यह तो हमें ही अपनी दूरदर्शी विवेकशील को जगाकर, औचित्य की स्थापना कर अपने ही हृदय में झाँककर तलाशना होगा कि सच्चा भगवान कौन सा हैं?

यदि निराकार परब्रह्म को समझने में हमें, हमारी बुद्धि को कुछ कठिनाई आती हो तो हमें वेदान्त के कुछ सूत्रों ‘सोऽहम्’ अयमात्मा ब्रह्म’ सच्चिदानंदोऽहम् तत्त्वमसि, ‘जीवोब्रह्मव नापरः’ का चिन्तन-मनन कर लेना चाहिए एवं अपनी जिज्ञासा का समाधान करते हुए भ्रमजंजालों की मृग-मरीचिका से उबर आना चाहिए।


इब्राहिम खवास (Kahani)

सूफी सन्त इब्राहिम खवास घने जंगल से होकर अपने शिष्य के साथ चले जा रहे थे। घने जंगल में खूँखार जानवरों का साम्राज्य था। सन्त की संध्या का समय हुआ तो नदी में हाथ पैर धोकर वे एक पेड़ के नीचे ध्यान लगाकर बैठ गये। पास में शिष्य भी बैठ गया। तभी शिष्य ने देखा कि सामने से एक शेर उन्हीं ओर आ रहा है। डर के मारे शिष्य की सिट्टी पिट्टी गुम हो गई और घबरा कर वह एक पेड़ पर चढ़ गया। शेर आया। सन्त के चारों ओर चक्कर लगाया। उनका शरीर सूँघा और कुछ ही क्षणों में ऐसे चला गया जैसे सन्त के दर्शन करने आया हो। शिष्या पेड़ पर बैठा यह सब देख रहा था।

कुछ देर के बाद संत का ध्यान पूरा हुआ। वे चल पड़े। शिष्य भी पेड़ से उतरकर उनके पीछे हो लिया। चलते-चलते सहसा मच्छर ने सन्त को काट लिया तो उनके मुँह से आह निकल पड़ी। शिष्य ने विस्मय से पूछा। गुरुदेव जब शेर आया और आपके सारे शरीर को सूँघ कर चला गया। तब तो आप बिल्कुल नहीं घबराये और एक छोटे से मच्छर के काटने पर आप आह भर रहे हैं।

सन्त एक क्षण मौन रहे। फिर बोले “तुझे शायद पता नहीं उस समय मेरे साथ परमात्मा था। भला परमात्मा के सान्निध्य में डर किस बात का था। किन्तु इस समय तू हैं। बस इस लिए ही मेरी आह निकल गई।”


नवयुग का आगमन सुनिश्चित

दस वर्ष उम्र की छोटी सी लड़की आँगन में खेलकूद में मग्न थी और माँ अपने घरेलू काम-काज में उलझी हुई थी। अचानक वह लड़की दौड़ती चीखती, माँ-माँ पुकारती माँ के पास चली आई और कहने लगी “माँ देखो मेरी पीठ पर चाकू से निर्ममतापूर्वक प्रहार करने के निशान हैं और माँ! घर के पिछवाड़े में स्थित झाड़ी में जमीन के अन्दर हूँ।”

माँ चौक पड़ी कि बेटी को हो क्या गया। किन्तु वह लड़की लगातार कराहती जा रही थी। व उसके शरीर पर नील के निशान भी थे। बाद में जब झाड़ी में ढूँढ़ा गया तो एक व्यक्ति की लाश मिली। पुलिस के द्वारा खोजने पर दो हत्यारों का पता चला। लोगों को आश्चर्य हुआ आखिर इस लड़की को यह सब बातें कैसे मालूम हुई। यह लड़की और कोई नहीं बल्कि अमेरिका की भूतपूर्व चित्रपट नायिका एवं वर्तमान में भविष्य दर्शी के रूप में राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त केब्रिना किन्केडा ही है। उसने अमेरिका के महत्वपूर्ण व्यक्तियों फरेह फैकेट, क्लाइन्ट वाकर एवं लिण्डाडे जॉर्ज के बारे में जो कुछ वह अक्षरशः सत्य घटित होता गया। उसने २१ हत्यारों को खोजने एवं उनके बारे में सत्यता का पता लगाने में पुलिस अधिकारियों की भी कई अवसरों पर मदद की और ४२ गुमशुदा लोगों को भी ढूँढ़ निकाला। यह तो केब्रिना के अतीन्द्रिय ज्ञान का छोटा सा पक्ष हुआ। राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय धार्मिक एवं नैतिक मूल्यों के बदलाव से सम्बन्धित जिन घटनाओं के सम्बन्ध में उसने जैसा बताया था, वे सभी उसी रूप में अपने समय पर घटित होती गयीं।

जब उसने बसन्त ११७४ में राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन के सितम्बर से पहले व्हाइट हाउस से निकलने की बात कही, तो लोगों ने उसकी हँसी उड़ाई और कपोल कल्पना मात्र समझा, क्योंकि परिस्थितियाँ रिचार्ड निक्सन के पक्ष में थी। किन्तु ७ अगस्त को जब निक्सन ने टेलीविजन पर अपना त्यागपत्र सम्बन्धी अभिभाषण देना। प्रारम्भ किया तो लोग किन्केडा को सत्य समझने लगे।

उन्होंने राष्ट्रपति फोर्डस् के बारे में कहा था कि उन पर एक प्राणघातक हमला होगा, किन्तु वे सुरक्षित बच जायेंगे। पेपर में छपी उपरोक्त घटना को लोगों ने जब १९७५ में पढ़ा तभी किन्केडा पर विश्वास हो सका।

१७ नवम्बर १९७४ को उसने एक अख़बार के संवाददाता को बताया कि “केरोलिन केनेडी आतंकवादी घटना में मारे जायेगी उनके साथ रहने वाली उनकी पुत्री बच जायेगी।” लगभग ११ महीने बाद २३ अक्टूबर १९७५ को बमकाण्ड में उनकी मृत्यु हुई और केब्रिना की भविष्यवाणी सत्य सिद्ध हुई।

उपरोक्त घटनाक्रमों के बारे में केब्रिना कहतीं थी कि “जब मैं सो जाती हूँ तो मुझे भविष्य घटित हो रहे दृश्य दिखाई पड़ने लगते हैं और मैं अनुभव करती हूँ कि ये सभी दृश्य स्वयमेव ही आ रहे हैं।” उन्होंने १९७२ से २००० के बीच हो रहे क्राँतिकारी परिवर्तनों को भी स्पष्ट किया है जिसका उल्लेख डेविड वाले किन्सी एवं इरबिंग वेल्स ने “द् पीपुल्स एव मेनेक” में विस्तारपूर्वक किया है। उनके अनुसार

(१) सारा विश्व आर्थिक दृष्टि से एक राष्ट्र कहलायेगा और मुद्रा विनिमय के लिए विश्व मुद्रा की व्यवस्था होगी। सभी देशों में इसी को माना जायेगा।

(२) मनोविज्ञान का उपयोग गुप्तचर विभाग में व्यापक स्तर पर होगा एवं अतीन्द्रिय क्षमता सम्पन्न व्यक्तियों के कारण उसको प्रामाणिकता भी मिलती रहेगी। न्यायालय में इनकी बातें मानी जाएँगी।

(३) प्रमुख ईंधन के रूप में सूर्य से निकलने वाली रोशनी का प्रयोग किया जायगा। यही ऊर्जा का स्रोत बनेगा।

(४) जातिगत संघर्षों में लोग बुरी तरह जुटे रहेंगे किन्तु इस सदी के अन्तिम पाँच वर्ष पूर्व सभी धर्मों जातियों एवं सम्प्रदायों का एकीकरण हो जायगा।

(५) कैन्सर के बारे में यह सूचना मिलेगी कि वह एक वायरस से उत्पन्न होता है, उसके निदान के लिए प्रतिरोधी क्षमता खोजी जायेगी और कैंसर का पूर्णतः निदान संभव हो जायगा।

(६) यू. एफ. ओ. (उड़नतश्तरी) से संपर्क सध जायेगा, जो पृथ्वीवासियों के लिए सुखद परिस्थितियाँ विनिर्मित करने का संकेत होगा। इसके द्वारा १२ नये ग्रह खोजे जायेंगे, जहाँ मानव जीवन का अस्तित्व संभव होगा और परस्पर सूचनाओं के आदान प्रदान का क्रम चल निकलेगा।

(७) भयावह भूकम्पों से विनाश तो होगा ही, किन्तु विकास की सुखद संभावना भी प्रगट होगी। पैसिफिक सागर में नये द्वीप उभर कर आयेंगे, जिसमें मनुष्य जाति का अधिकांश भाग जीवनयापन करने लगेगा।

(८) वारमूडा ट्रैंगल (जिसमें यान अदृश्य हो जाते हैं) के बारे में यह स्पष्ट पता चलेगा कि यह उड़न तश्तरी के क्रिया–कलापों का केन्द्र है, जहाँ से अदृश्य के क्रिया–कलापों का केन्द्र है, जहाँ से अदृश्य लोकों से सम्बन्ध स्थापित किया जा सकेगा एवं धरतीवासियों को अनुदान मिलेगा।

(९) आँख-गुर्दे की तरह हाथ-पैर भी प्रत्यारोपित किये जा सकेंगे, जिसके द्वारा अपंग, अपाहिज लोगों को नया जीवन मिलेगा।

(१०) मस्तिष्क से उत्पन्न हुए लकवा जैसे रोगों का स्थायी निदान संभव हो जायेगा।

(११) धूम्रपान के विषैले प्रभाव के कारण कोई भी व्यक्ति धूम्रपान की ओर कदम नहीं बढ़ायेगा, बल्कि आत्मानुशासन से ऐसे उद्योग स्वयमेव ही बन्द हो जाएँगे।

(१२) जनसंख्या न बढ़ाने के लिए हर व्यक्ति जिम्मेदारी अनुभव करेगा और यह अंतर्राष्ट्रीय कानून में सम्मिलित किया जायेगा, किन्तु इसकी आवश्यकता ही नहीं पड़ेगी, क्योंकि हर व्यक्ति का झुकाव संयम की ओर होगा।

यह तो उनकी विज्ञान के विकास मानव स्वास्थ्य एवं अर्थव्यवस्था संबंधी भविष्यवाणियाँ थीं, किन्तु उनने आने वाले समय के बारे में भी बहुत कुछ कहा है। इस संबंध में केब्रिना का मत विश्व के मूर्धन्य भविष्य वक्ताओं की ही तरह है। वे भी इसे स्वीकारती है कि वर्तमान समय समस्त विश्व के लिए भारी उथल-पुथल का है। इस क्रम में एक समय ऐसा आयेगा जब यह प्रतीत होने लगेगा कि सर्वनाश को टालना और मानवी अस्तित्व को सुरक्षित बचा पाना कदापि संभव नहीं, तभी एक ऐसी अभिनव विचार-चेतना जन्म लेगी, जो भँवर में फँसी नाव को सुरक्षित किनारे ले आयेगी। इसके बाद का मानवी इतिहास हर क्षेत्र में पिछले दिनों की तुलना में अनुपम और अभूतपूर्व होगा जिसे युगों युगों तक लोग याद करते रहेंगे।

उनकी इस भविष्यवाणी की संगति प्रज्ञा अभियान की गतिविधियों से हूबहू बैठती चली जा रही हैं। इसे पूरा करने में भगवत्सत्ता भी अपने ढंग का प्रयास कर रही है। हमें भी उस प्रयास में सहभागी बनने के लिए अपनी सक्रियता का परिचय देना चाहिए।


तृष्णा की बाल्टी (Kahani)

बुद्ध को प्यास लगी तो गाँव में कुएँ के समीप ठहर गये। बुद्ध ने देखा कि एक व्यक्ति कुएँ में बाल्टी डालता है। बाल्टी भर जाती है ऊपर खींचता है। इतने में सारा पानी बाएँ में ही बिखर जाता है। बाल्टी में अनेकों छेद थे। पानी बिखरना स्वाभाविक था। किन्तु वह मूढ़ व्यक्ति बार बार प्रयास करता व असफल रहता।

युद्ध बहुत देर तक खड़े-खड़े यह तमाशा देखते रहे। पास में उनका शिष्य आनन्द भी खड़ा था और देख रहा था। युद्ध ने आनन्द से कहा-देखो आनन्द। इस व्यक्ति के पास तृष्णा की बाल्टी है। यह कभी भर नहीं सकती। सारा जीवन यह भरने का प्रयास करेगा। किन्तु बर्तन रीता ही रहेगा। वह स्वयं की प्यास नहीं मिटा सकता। इससे हमें पानी की आशा नहीं करनी चाहिए।

जो जीवन भर अपव्यय के छिद्रों से गँवाता, चुकाता रहता हैं, वह स्वयं तो क्या, सत्य करेगा, औरों को दे सकने की स्थिति में भी क्या आ पाएगा?


बड़ा विलक्षण-अद्भुत हैं, मानवी मन

यदा-कदा व्यक्ति को ऐसी सत्प्रेरणाएँ मिल जाती हैं, जिनसे उसका कोई बड़ा नुकसान टल जाता है, प्रियजन अथवा स्वयं उसकी आत्मरक्षा हो जाती हैं। इसे वह बड़ा चमत्कार मानने लगता है और तरह-तरह की संज्ञा-संबोधन इसे देने लगता है। कभी भगवान की अहेतुकी कृपा मान बैठता है, पर इस बात को भुला देता हैं कि जिसे वह अचम्भा मान बैठा है, वस्तुतः इसमें वैसा कुछ है नहीं। परिष्कृत अन्तःकरण ही वह कारण है जिसकी उपलब्धि बन पहने पर ऐसी घटनाएँ घटने लगती हैं, जो सामान्य स्थिति में कभी-कभी ही दिखाई पड़ती हैं, किन्तु तनिक उच्च भाव-भूमि की उपलब्धि हो जाने पर यह घटनाएँ सामान्य जीवनक्रम का अभिन्न अंग बन जाती है और फिर व्यक्ति अनवरत रूप से ऐसी सूक्ष्म तरंगों से संबंध स्थापित बनाये रह सकता हैं।

आये दिन ऐसी घटनाएँ घटित होती ही रहती हैं। एक घटना साउथगेट, कैलीफोर्निया की है। वहाँ के एक सज्जन समाजसेवी श्री आर. एल. बेनडिक्ट अपनी एक सहयोगिनी श्रीमती एम. बी. जीन के साथ फिलाडेल्फिया के लिए अपनी कार में यात्रा कर रहे थे। कुछ खराबी के कारण एक स्थान पर कार खड़ी करनी पड़ी। कार पार्किंग के लिए वहाँ विशाल क्षेत्र था। श्रीमती जीन कार खड़ी कर रही थी तभी अचानक श्री बेनेडिक्ट के अन्तःकरण में एक प्रवाह आया और वह स्वाभाविक रूप से कहने लगे कृपया यहाँ गाड़ी खड़ी न करें, कुछ अनर्थ हो जायेगा।” जीन उस पर विश्वास करती थी उन्होंने स्थान बदल दिया। सभी उतर कर आवश्यक जब वे लोग वापस लौटे, तो दृश्य देखकर आश्चर्य का ठिकाना न रहा। जिस स्थान पर कार खड़ी करने के लिए मना किया गया था, उस स्थान पर खड़ी दूसरी कार बिल्डिंग गिरने से चकनाचूर हो गई। सभी बाल-बाल बच गये। यह दैवी प्रेरणा का ही मार्गदर्शन था।

दूसरी घटना का उल्लेख करते हुए श्री आर. एल. बेनडिक्ट यात्रा कर रहे थे और एक ऊँचे सदस्यगण यात्रा कर रहे थे और एक ऊँचे पहाड़ी एवं घनघोर जंगल से गुजर रहे थे। मेरा छोटा लड़का कार चला रहा था। अनायास ही मैं अनुभव करने लगा कि कुछ दुर्घटना होने वाली है मैं जोरों से चिल्लाया “मिक्। तुरन्त गति कर करो, ऐसा न करने पर कोई बड़ी दुर्घटना होने वाली है, इसके कारणों की व्याख्या करने के लिए समय नहीं हैं।” “तुरन्त की मिक् ने आज्ञा का पालन किया और गति कम की। दूसरे मोड़ पर तीस फीट सामने हिरणों का झुण्ड गुजर रहा था। यदि गति कम नहीं की जाती तो सुनिश्चित रूप से दुर्घटना घटती। ब्रेक लगाने पर कुछ इंच की दूरी पर अपनी गाड़ी रुक गई और बड़ी दुर्घटना टल गई।” ऐसे ही अनेकों विधेयात्मक निर्देश प्रत्येक मनुष्य को कोई महत्वपूर्ण कार्य करने से पहले प्राप्त होते हैं, किन्तु जो अपने स्वच्छ अन्तःकरण के पट को खोले रहते हैं, ऐसे निश्छल हृदयों को इसका लाभ मिलता रहता है, कषाय कल्मष एवं लोभ मोह, अहंकार जैसी वृत्तियाँ स्फुरणा के उन रास्तों को बन्द कर देती है, जहाँ से दिशा निर्देश का प्रवाह फूटता है।

मनुष्य के मस्तिष्क क्षेत्र में इतनी क्षमता है कि वह अपने मित्र, परिजन, सम्बन्धी अथवा वैचारिक साम्यता वाले लोगों तक अपनी सूक्ष्म संवेदना का अंश भेज सकता है, जिससे उन्हें मार्गदर्शन मिले एवं गलत कदम न उठाकर परिस्थितियों से लड़ने की शक्ति प्राप्त करें। इसी आधार पर ऋषि मनीषी अपने परिकर में जुड़े लोगों को वैचारिक दबाव देकर सन्मार्ग की ओर प्रेरित करते थे। यही हे विचार सम्प्रेषण पूर्वाभास, अब पूर्णतः विज्ञान सम्मत माना जाता है। एरलिंगटन टेक्सेस की श्रीमती बी. एन. केन्योन अपने जीवन में घटी घटनाओं से इसकी पुष्टि करती है। वे लिखती है मेरे पति वैचारिक तनाव से गुजर रहे थे। उन्हें महत्वपूर्ण कार्य के लिए बैंक से लोन लेना पड़ा, जिसको समय पर पूरा करने के लिए उनके बड़े भाई ने आश्वासन दिया किन्तु समय पर पूरा न होने के कारण बैंक मैनेजर दबाव देने लगे। परिस्थिति इतनी बिगड़ गई कि मेरे पति को कुछ सूझ ही नहीं पड़ता था। वे रात्रि में देर तक काम करते रहे और फिर कमरे से बाहर चले गये, किन्तु उनका यह व्यवहार मुझे विचित्र नहीं लगा, क्योंकि वे प्रायः ऐसा किया करते थे। रात्रि में टहलने के लिए पास के पार्क में चले जाया करते थे किन्तु उस रात जब पुत्र सो गया, मुझे ऐसा लगने लगा कि कुछ अनर्थ होने वाला है। मैं उठ बैठी और जोर से कहने लगी “टोवी कृपया ऐसा मत करो।” अचानक उठने वाले ये भाव अत्यन्त गहराते चले गये और अपना विचार प्रवाह उन तक पहुँचाने की मनःस्थिति बनाकर कहने लगी” टोवी! जल्दी घर आओ हमें इस तरह छोड़कर न जाओ। अपने बच्चों के बारे में सोचो ऐसा मत करो। मुझे आपकी आवश्यकता है, जल्दी आओ। मैं ऐसा अनुभव करने लगी कि उन्हें बुला रही हूँ। इतने मैं दरवाजा खुला और उनके आते ही में बोल दरवाजा खुला और उनके आते ही में बोल पड़ी। कृपया वादा कीजिए ऐसा कभी नहीं करने के लिए सोचेंगे। उन्हें आश्चर्य हुआ पूछा “तुम कैसे जानती हो, तुम्हें कैसे मालूम कि यहाँ से दूर मैं क्या योजना बना रहा था।” “मैंने उनसे कहा कि मैं नहीं जानती कि मुझे कैसे भान हुआ पर, कुछ अनिष्ट होने वाला है। इसकी स्पष्ट अनुभूति हो रही थी।” उन्होंने बताया कि उनके टेबल की दराज में पिस्तौल थी और वे योजना बना रहे थे कि इससे आत्मा हत्या की जाय, किन्तु अचानक एक तीव्र प्रवाह आया और ऐसा लगा मानों कोई उन्हें खींच रहा है इस तीव्रता से कि रुकते ही नहीं बना और वे घर की ओर चल पड़े।”

इन घटनाओं से सुस्पष्ट है कि मनुष्य चाहे तो दूसरों तक अपना विचार प्रवाह सम्प्रेषित कर उसे आवश्यक मार्गदर्शन दे सकता है एवं स्वयं मौका पड़ने पर इस तरह की विचार तरंगें ग्रहण कर सकता हैं। यह क्षमता हर व्यक्ति में सन्निहित हैं, पर भाव संस्थान अनगढ़ होने के कारण यदा-कदा ही संयोग अथवा भाग्यवश अपनी इस क्षमता का व्यक्ति लाभ उठा पाता है। यदि वह अपनी भावनाओं को तनिक उच्चस्तरीय बना ले, तो फिर अनायास ही उसे इस प्रकार के सूक्ष्म मार्गदर्शन एवं प्रेरणाएँ मिलते रह सकते हैं, जिससे आड़े समय में वह इससे लाभ उठा सके। इतना बन पड़ने पर वह न सिर्फ दूरस्थ व्यक्ति से ही संपर्क साधने में समर्थ हो सकेगा, वरन् आस-पास उमड़ते घुमड़ते उन समस्त श्रेष्ठ विचार प्रवाह के अतिरिक्त ब्राह्मीचेतना से भी तादात्म्य स्थापित करने में सफल हो सकेगा, जो उसके आत्मिक विकास में सहायक हो सके।


धन का समाज के लिए सदुपयोग (Kahani)

प्रसिद्ध धनपति रॉकफेलर इंग्लैण्ड आए तो एयर पोर्ट पर सस्ते होटल की तलाश की। लोगों ने कहा “ऐसा पुराना कोट पहने हुए है। क्या आपको नहीं लगता कि लोग कंजूस कहेंगे?”

रॉकफेलर ने कहा-लोग क्या कहेंगे इससे कभी फर्क नहीं पड़ता। सस्ते होटल में मेरे जैसे व्यक्ति के ठहरने से मेरा तो लाभ होगा कि किन्तु होटल की साख बढ़ेगी कि वहाँ रॉकफेलर ठहरा और पुराना कोट देखकर लोग मेरी सादगी ही प्रशंसा ही करेंगे।”

गरीब जब सस्ते होटल में ठहरता हैं तो अपमानित हो सकता हैं। किन्तु धनी व्यक्ति के ठहरने से उलटे लोग उस की सादगी की प्रशंसा करते हैं क्योंकि उसने अपनी आवश्यक अपव्यय की वृत्ति रोक कर धन बचाया, समाज में एक दुष्प्रवृत्ति पनपने पर रोकथाम लगायी तथा धन का समाज के लिए सदुपयोग का मार्ग प्रशस्त किया।


साधु वे, जो समय को धन्य कर दें

उसका मन ध्यान की निमग्नता से उबरा ही था कि सामने नदी में स्नान करने वालों की आवाजें कानों में पड़ीं। उनमें से कोई कह रहा था नहीं रहे अब साधु, समाप्त हो गई साधुता।

इन वाक्यों ने अन्तर भावों में डूब उतरा रहे उसके मन को खींच कर बाहर कर दिया। वह उठा, उलट कर द्वार खोल कर बाहर आया। देखा दो नवयुवक बात करते चले जा रहे है। पहले ही बात पर दूसरा बोला क्या कहते हो दादा इतने लाखों साधु जो हैं। इन्हें साधु कहेंगे? पहले ही वाणी रोष पूर्ण थी। फिर क्या कहेंगे?

काहिलों का समुदाय, बहुसंख्यक ऐसे हैं। जो इक्के दुक्के तपस्वी साधक हैं, वे भी करुणाविहीन पूँजीपतियों का तरह साधना की पूँजी बटोरने में जुटें हैं। इन्हें कुछ भी कहो भैया पर इनमें से कोई साधु नहीं हैं। साधु भला बिलखती मानवता को देख कर निष्क्रिय कैसे रह सकता है। गीता में भगवान भी कहते हैं “न निरग्निचाक्रिय” आग छोड़ने से कर्मठता को त्यागने से भला कोई साधु होता है। युवक कुछ क्षण रुका बराबर चल रहे अपने भाई की ओर देखा। फिर बोला एक साधु थे आचार्य शंकर जिन्होंने समूचे भारत में साँस्कृतिक क्रान्ति कर दी। लाखों मस्तिष्कों में उलट फेर कर दी। हजारों हजार की जीवन शैली बदल दी। हिमालय से सागर तक अपनी प्राण सरिता के माध्यम से बहा दिया विद्या का प्रवाह। कहीं रुकें नहीं कहीं टिके नहीं। नंगे पाँव भागते रहे। घूम-घूम कर बाँटते रहे जीवन बोध, और उन्हीं के अनुयायी कहने वाले ये हृदय के उमड़ रहे भावों ने गला रुद्ध कर दिया। एक ने दूसरे की ओर देखा।

गला साफ करके बोलना शुरू किया। ये छत्र चंवर धारण करते हैं। सिंहासन पर बैठते हैं। स्वयं को धर्म की जागीर के मालिक होने की मुनादी करते हैं। आज आचार्य शंकर की जन्मभूमि की छाती उनकी याद में फट रही हैं। हिमालय उनके बिछोह में अपने को गला रहा है। सागर गरज-गरज कर हरेक से पूछ रहा है, कहाँ खो दिया तूने उस साधु को, कहाँ गंवा डाली साधुता। पर कोई तो नहीं दिख रहा जो गर्व से कह सके कि हम साधु हैं सही अर्थों में आचार्य शंकर के अनुयायी, जो दे सकें कुचली, रौंदी, मसली जा रही मानवता को नया जीवन। हम जैसे अनेकों का कल्याण कर सकें।

ठीक कहते हो दादा-दूसरे ने कहा।

वह भी इन्हीं के पीछे दबे पैरों जा रहा था। सुनाई पड़ रही थी इनकी आवाजें। झकझोर रही थीं उसको। वह भी तो अपने आप को साधु कहता था। कावेरी तट पर बने इस उटज में योगाभ्यास और शास्त्रचर्चा की निमग्नता में उसे वर्षों बीत गये। पर वेश के अतिरिक्त क्या उसमें साधुता की पहचान बाकी है?

प्रश्न अंतर्मन को खरोंचने लगा कुरेदने लगा। उसके पास स्वस्थ शरीर है प्रखर प्रतिभा है निर्मल प्रज्ञा है। किन्तु किस की दी हुई? ईश्वर की दी हुई मन के किसी कोने से जवाब उभरा।

फिर क्या अधिकार है उसे इन सबको काले धन के रूप में जमा रखने का। प्रश्न उसे मथते रहे। आज कावेरी का शीतल प्रवाह भी उसे शीतलता न दे सका। ध्यान की गम्भीरता मन की हलचलों को विराम न दे सकी। पोथियों के फड़फड़ाते पन्ने उसे एक-एक करके चिढ़ाते रहे। समूचा समाज उससे साधुता माँग रहा है। इसका जन-जन याद दिला रहा प्रव्रज्या के उस व्रत को जिसके तहत उसे घूम-घूम कर ज्ञान देना हैं। सामाजिक साँस्कृतिक जीवन का कायाकल्प करना है।

शाम को वह उटज में न बैठ सके। जाग्रत साधुता पुनः याद आयी संकल्प भला बैठने कैसे देता? निकले उन युवकों का पता लगाने हेतु। पता चला कि वे पास के ही गाँव के हैं। रात्रि होते ही पहुँच गए उनके द्वार पर अन्दर से आवाज आई- कौन?

एक साधु! स्वर शान्त और दृढ़ था।

साधु! आश्चर्य चकित हों दोनों भाई निकल पड़े। हाँ साधु जिसे अपनी साधुता वापस मिल गई हैं। जिसको अपना संकल्प पुनः याद आ गया है। जिसको मालूम हो गया कि उसका स्थान राष्ट्र के प्रत्येक घर का द्वार है। जिसका कार्य-वैचारिक क्रान्ति का प्रवर्तन है।

उसके स्वरों की गम्भीरता, चेहरे का तेजोवलय बता रहा था कि वह सिर्फ वेश से ही साधु नहीं हैं वरन् अन्तर चेतना भी साधुता से अनुप्राणित है युवकों ने प्रणाम किया कुछ संकोच के स्वर में बोले आज्ञा दें।

तुम दोनों को अपना प्रातःकाल का वार्तालाप याद है। माथे पर बल डालते हुए दोनों ने कहा-हाँ तो मैंने पहला कदम बढ़ाया हैं, दूसरा कदम तुम्हें बढ़ाना हैं। बढ़ा सकोगे?

अवश्य स्वरों में वज्रवत संकल्प गूँज रहा था। क्या करना होगा, लोकजीवन को गढ़ने सँवारने हेतु स्वयं के जीवन का अर्पण।

युवकों ने स्वीकार किया। रात्रि भर कार्य की रूप रेख बनती रही। अगले दिनों से प्रारम्भ हो गया छोटे-छोटे मण्डलों को गठित करके लोक जीवन की धरती पर भाव गंगा को उतार लाने की तपश्चर्या। अनेकों भगीरथों ने कमर कस ली भावों की जाह्नवी उतर कर रहेगी। न जाने कितनी अनुसुइया व्रतशील हो गई कि सद्विचारों की पयस्विनी को प्रवाहित करके दम लेना है। यह सब था साधु में साधुता के जागरण का परिणाम।

परिवर्तन का चक्र घूमा पहले धीरे फिर तेज और तेज यहाँ तक कि इतना तेज कि सब कुछ बदला हुआ नजर आने लगा। इस चक्र की धुरी थे वह साधु जिनकी तप शक्ति ने इसे गति दी। और उनके पहले सहयोगी थे हरिहर राय और बुक्काराय नाम के युवक। जिनको उन्होंने प्राण शक्ति दे दक्षिण के उस अंचल में संचालित क्रान्ति का नायक बनाया। महान कार्य में जुटने वाले को विधाता पुरस्कृत किये बिना नहीं रहता। ये ही दोनों अपने गुरु की आज्ञा शिरोधार्य कर विजय नगर साम्राज्य के सम्राट हुए। जहाँ की उन्नत सामाजिक स्थिति का विवेचन करते हुए उस समय भारत आए एक फारसी यात्री ने लिखा है “सम्पूर्ण विश्व में यहाँ जैसी सामाजिक स्थिति न देखी है और न सुनी है। चोरी, व्यभिचार, अत्याचार जहाँ जनकोश में न मिलकर शब्दकोश में मिलते हैं। सचमुच यह धरती का स्वर्ग हैं और इस स्वर्ग के अवतरणकर्त्ता उन युवकों के गुरु थे

स्वामी विधारण्य। जिनकी जाग्रत साधुता ने समूचे दक्षिण अंचल की मृतप्राय सामाजिक साँस्कृतिक काया में प्राण संचार किया। उसे स्वस्थ और सुपुष्ट बनाया।

सन् १३७७ में श्रृंगेरी आकर विद्या विस्तार के कार्य को गति देते रहे। सद्विचारों की फसल लहलहाए इस हेतु अनेकों ग्रन्थों का सृजन भी किया। उनकी प्रत्येक श्वास, रक्त का प्रत्येक बिन्दु शरीर का प्रत्येक कोश अन्तिम क्षण तक समाज को निखारता सँवारता रहा।

आज का वर्तमान कल के सुनहरे भविष्य सृजन हेतु साधु माँग रहा हैं। वेश हो या न हो पर अन्तर में साधुता अवश्य हों।


Quotation

वास्तविकता बहुत देर तक छिपाए नहीं रक्खी जा सकती। व्यक्तित्व में इतने अधिक छिद्र होते हैं कि उनमें होकर गंध दूसरों तक पहुँच ही जाती हैं। इसलिए कमजोरियाँ पर गन्दगी पर आवरण न डालकर उनके निष्कासन के स्वच्छता के प्रयासों में निरत रहना चाहिए।


निश्छल पुकार में हैं, अकूत शक्ति का भण्डार

प्रार्थना की सृजनात्मक क्षमता अभूतपूर्व है। यह अन्तरात्मा की वह सच्ची पुकार है जो परमात्मा को अभीष्ट प्रयोजन की पूर्ति के लिए अपने अनुदान-वरदान बरसाने के लिए विवश कर देती है। भक्त की भावभरी करुण पुकार सुनकर भगवान चुपचाप बैठा रहे, ऐसी संभावना नहीं दीख पड़ती। अध्यात्मवेत्ताओं ने प्रार्थना को आत्मा की खुराक बताया है और कहा है इस माध्यम से मनुष्य अपने को विराट ब्रह्म से सघनतापूर्वक जोड़ लेता है और उत्कृष्टता की दिशा में निरन्तर विकास करता जाता है। इसकी अद्भुत सामर्थ्य को देखते हुए ही टेनीसन ने कहा था कि “संसार में प्रार्थना ही एक ऐसी शक्ति है जिसके द्वारा कठिन से कठिन संकटों को टाला और प्रकृति के नियमों को मोड़ा-मरोड़ा जा सकता है।

डॉ. रॉबर्ट एन्थोनी ने अपनी पुस्तक “द अल्टीमेट सीक्रेट्स ऑफ सेल्फ कान्फीडेन्स” में कहा है कि मनुष्य के अन्तराल में प्रसुप्त पड़ी शक्ति-सामर्थ्य अद्भुत एवं अपरिमित है जिसे सुविकसित करने एवं लोकोपयोगी बनाने के लिए प्रार्थना एवं ध्यान साधना का अवलम्बन ही एक मात्र सर्वोत्तम मार्ग हैं। शारीरिक, मानसिक एवं आत्मिक ऊर्जा के उन्नयन में इसका महत्वपूर्ण योगदान माना जाता हैं। इसकी परिणति सदैव विधेयात्मक दिशा में देखने को मिलती हैं। आरोग्य की प्राप्ति उत्साह की अभिवृद्धि तथा सफलता का मार्ग तो इससे प्रशस्त होता ही है, आन्तरिक विकास का मार्ग भी खुलता है। उनकी मान्यता हैं कि अनभिज्ञता के कारण जीवन के महत्वपूर्ण अवसर यों ही व्यर्थ निकल जाते हैं और मानव विशिष्ट उपलब्धियों से वंचित रह जाता है। यह भी पता नहीं चल पाता कि वह कहाँ से किस लिए आया और कहाँ जा रहा है। जब कि ब्रह्माण्डव्यापी दैवी चेतना निरन्तर आगाह करती रहती है। उन्होंने इसे “इन्टेलीजेंट फोर्स” के नाम से सम्बोधित करते हुए कहा है कि इसी के निर्देशन के अनुरूप समस्त ग्रह-नक्षत्र जीव-जन्तु वृक्ष-वनस्पति तक दिव्य व्यवस्था के अंतर्गत सतत् क्रियाशील रहकर अपनी सृजनात्मक एवं उपयोगी क्षमता का परिचय देते हैं। हममें से प्रत्येक व्यक्ति भी यदि उस दैवी-चेतना के अनुशासन का परिपालन को आसानी से प्राप्त किया जा सकता है। परमात्मा चेतना से जुड़ने और उसकी इच्छा-आकांक्षाओं को जानने समझने और तद्नुरूप आचरण करने के लिए उनने प्रार्थना का मार्ग सुझाया है।

सच्चे मन से की गई ईश्वर-प्रार्थना से बड़े से बड़े संकटों को निरस्त किया और जीवन को सुखद बनाया जा सकता है। इस संदर्भ में अमेरिका के विख्यात मनोविज्ञानी नॉर्मन विन्सेण्ट पील ने गहन खोजें की हैं और उपलब्ध प्रमाणों को “ट्रेजरी ऑफ करेज एण्ड कान्फीडेन्स" में प्रकाशित किया है। उसके अनुसार चीन की श्रीमती चिआँग काईशेक कई तरह की समस्याओं से घिरे होने पर बड़ा ही कष्टमय जीवन व्यतीत कर रही थीं। विषमता की इन कठिन परिस्थितियों में उन्हें भगवत् प्रार्थना सम्बन्धी एक पुस्तक कहीं से हाथ लग गई। पढ़ने के पश्चात् उनकी ईश्वर में आस्था जगी और संकट निवारण के लिए प्रार्थना करने लगीं और उससे जीवन का दैनिक उपक्रम बना लिया। कुछ ही दिनों में संकट के बादल छट गये और जीवन सुख-शान्तिमय व्यतीत होने लगा। ईश्वरीय सत्ता में उनकी आस्था इतनी प्रगाढ़ हो गई थी कि प्रतिदिन दो घण्टे का समय इसी उपक्रम के लिए सुरक्षित रखा।

मनोविज्ञानी पील के अनुसार प्रार्थना या ध्यान साधना को चिन्हपूजा भर नहीं कहा जा सकता। वह मानव चेतना से निस्सृत होने वाली वह जीवन्त ऊर्जा है जो हर व्यक्ति में समान रूप से विद्यमान रहती हैं और उच्च उद्देश्यों आदर्शों के साथ जुड़ जाने पर प्रभावकारी सत्परिणाम प्रस्तुत करती हैं। इसके प्रतिफल शारीरिक दृढ़ता, मनोगत उत्साह तथा नैतिक बल के रूप में सामने आते हैं, अध्यात्मवेत्ताओं ने इस शारीरिक ओजस, मानसिक तेजस् और आत्मिक वर्चस्व के नाम से पुकारा है और कहा है कि प्राणऊर्जा के सुविकसित एवं सशक्त होने पर ही यह उपलब्धियाँ हस्तगत होती हैं। रेडियम की भाँति प्रकाशन इस ऊर्जा को जिधर भी नियोजित किया जाता है वहीं सफलता प्रकट हो कर रहती हैं। परमचेतना से गुँथने पर मनुष्य उसके जैसा ही समर्थ बन जाता हैं।

स्मरण रखने योग्य तथ्य यह है कि प्रार्थना याचना नहीं हैं। उसका ढिंढोरा भी नहीं पीटा जाता है। सौम्य एवं शान्त भाव से निश्छल अन्तःकरण से की गई पुकार ही प्रार्थना है और यही हितकारी भी सिद्ध होती हैं। रणभेरियाँ की ध्वनियाँ अंकुरित बीजों की मंद आवाज से कहीं अधिक तीव्र तो होती हैं, पर परिणाम ठीक उलटा ही निकलता है। एक ही दिशा ध्वंसात्मक है तो दूसरे की नवजीवन प्रदान करने की इस संबंध में धर्मग्रंथ “ओल्ड हैबू” में सोडोम नामक पुरोहित की कहानी प्रसिद्ध है। प्रार्थना के बल पर यह न केवल शारीरिक, मानसिक रूप से पूर्ण स्वस्थ हो गया था, वरन् आत्मिक विभूतियाँ भी अर्जित कर ली थीं। उसके अनुसार प्राणऊर्जा के उन्नयन के लिए इससे बढ़कर उपाय-उपचार दूसरा कोई नहीं हो सकता।

प्रार्थना की प्रचंड शक्ति से कैंसर जैसी प्राण-घातक बीमारियों से रोग मुक्ति की चमत्कारिक घटनाओं के कितने ही उदाहरण सामने आये हैं। पिछले दिनों ‘साइंस डायजेस्ट’ नामक प्रसिद्ध पत्रिका में ‘यूमन हू सेड नो टू कैंसर” नामक शीर्षक से डॉ. विलियम एनोलेन का लेख प्रकाशित हुआ था। ब्रिटेन की ५२ वर्षीय महिला श्रीमती एलेन थाँयर कैंसर रो से पीड़ित थीं। विलियम एनोलेन ने स्वयं उसकी चिकित्सा की थी, परन्तु घटने के स्थान पर मर्ज बढ़ता ही गया। चिकित्सकों ने नियति के आगे हार मान ली और उसे उसके भाग्य पर मरने के लिये छोड़ दिया। एलेन की ईश्वर में गहरी आस्था, थी, अतः वह निराश नहीं हुई आरोग्य लाभ के लिए परमात्मा से प्रार्थना करने में निरत हो गई। कुछ दिनों में ही वह आत्मशक्ति के प्रभाव से सर्वथा रोगमुक्त हो गई।

इसी तरह की एक घटना ग्लासगों शहर के जान केनाली फगान नामक व्यक्ति के जीवन से संबंधित है। सन् १९६५ में वह एक सामान्य गोदी मजदूर था, तभी आँतों के कैंसर का शिकार हो गया। रोग इतना अधिक विकसित हो गया था कि रॉयल इन्फरमेरी अस्पताल के डॉ. आर्चीबाल्ड मैकडोनाल्ड, डॉ. जीन मैकडोनाल्ड, सर्जन डेविडमिलन जैसे प्रसिद्ध चिकित्सकों द्वारा क्षतिग्रस्त भाग को आपरेशन द्वारा बाहर निकालना पड़ा। कुछ समय के लिए अस्थायी राहत भी मिली, किन्तु कुछ ही हफ्तों पश्चात् दोबारा कैंसर का जहर पूरी आँख में फैल गया और उसे खून की उल्टियाँ होने लगीं। मरणासन्न स्थिति में देखकर डॉक्टरों के पास उसे क्लाइडबैंक स्थित रोगियों के सेवागृह में मरने के लिए भेज देने के अतिरिक्त कोई दूसरा उपाय शेष न था। श्रीमती मेरी फगान को यही सलाह भी दी गयी। उसने ऐसा न कर पति को घर पर रखना ही उचित समझा और सेवा-सुश्रूषा करने लगी। यह प्रतिदिन १६ वीं शताब्दी के प्रख्यात संत ओजिलनी के गिरिजाघर में जाती और ईश्वर से वही प्रार्थना करती कि उसके पति का स्वास्थ्य सुधर जाये और वह जल्दी अपने काम पर लौट जाये। परमात्मा पर उसकी दृढ़ आस्था को देखकर अब तो परिवार के सदस्य निमंत्रण सभी उस प्रार्थना में सम्मिलित होने लगे। नित्य प्रति का यह क्रम बन गया।

एक दिन पत्नी ने तन्द्रावस्था में एक आवाज सुनी “मेरी मुझे भूख लगी है। यह जानी-पहचानी आवाज थी जिसे उसने महीनों से नहीं सुना था। वह उठ बैठी और पति की ओर देखा तो पाया कि वह स्वस्थ हो चुका था। आवाज उसी की थी। उसकी प्रार्थना भगवान ने सुन ली थी। प्रस्तुत घटनाक्रम का विस्तृत विवरण डेसहिकी और गुसस्मिथ ने अपनी पुस्तक “द मिरैकल” में प्रकाशित किया है।

प्रार्थना अनसुनी न रहे, इसके लिए आवश्यक है कि उसमें आत्मा की कसक हो। इसी स्थिति में प्रार्थना सामर्थ्यवान बन पाती हैं और भगवान को न सिर्फ उसकी पुकार सुनने वरन् भक्त तक खींच बुलाने में भी समर्थ हो पाती हैं।


VigyapanSuchana

विशेष लेख माला-१

इक्कीसवीं सदी में हमें क्या करना होगा?


इस बार का बसन्त पर्व एवं उसकी उपलब्धियाँ

लम्बी मंजिल लगातार चल कर पार नहीं की जाती। बीच में सुस्ताने के लिए विराम भी देना पड़ता है। रेलगाड़ी जंक्शन पर खड़ी होती हैं। पुराने मुसाफिर और असबाब उतारे जाते हैं। नये चढ़ाये जाते हैं। ईंधन भरने और सफाई करने की थी आवश्यकता पड़ती हैं। आर्थिक वर्ष पर पुराना हिसाब-किताब जाँचा जाता है और नया बजट बनता हैं। भ्रूण माता के गर्भ में रहकर अंग प्रत्यंगों को इस योग्य बना लेता है कि शेष जीवन उससे बाद काम में लगाया जा सके। किसान हर साल नई फसल बोने और काटने का क्रम जारी रखता हैं। यह सब कृत्य लगातार नहीं होते, बीच में विराम के क्रम भी चलते रहते हैं। फौजियों की टुकड़ी भी कूच के समय में बीच-बीच में सुस्ताती हैं।

ब्रह्मकमल की एक फुलवारी अस्सी वर्ष तक हर साल एक नया पुष्प खिलाने की तरह अपनी मंजिल का एक विराम निर्धारण पूरा कर चुकी। अब नयी योजना के अनुरूप नयी शक्ति संग्रह करके नया प्रयास आरम्भ किया जाना है। यह विराम प्रत्यावर्तन लगभग किया जाना है। यह विराम प्रत्यावर्तन लगभग वैसा ही है जैसे वयोवृद्ध शरीर को त्याग कर नये शिशु का नया जन्म लिया जाता है और नये नाम से सम्बोधन किया जाता है। नवसृजन की सन्धिवेला में भी लगभग ऐसा ही हो रहा है। विराम की अवधि अस्सी वर्ष रहे तो इसमें कुछ अनहोनी नहीं मानी जानी चाहिए। नवसृजन अभियान तथा उसके लिए नियमित रूप से काम करने वाले व्यक्ति के सम्बन्ध में भी ऐसा ही सोचा जा सकता है।

सभी को तो नहीं पर साथ में जुड़े हुए लोगों को इसका पूर्व संकेत विदित था। इसलिए उन्हें भूतकाल के आश्चर्य जनक रहस्यों और भविष्य के अभूतपूर्व निर्धारणों के सम्बन्ध में अधिक कुछ जानने की उत्सुकता एवं जिज्ञासा उभरी। समय रहते उनने प्रत्यक्ष पूछताछ करने की आतुरता प्रदर्शित की। सन् ९० का वसन्त आने से पूर्व कई महीने पूर्व आत्मीयजनों के हरिद्वार आने पर ताँता लग गया। आगमन का उद्देश्य वह लाभ उठाने का था जो किसी बड़े व्यवसायी के कारोबार में भागीदार बन जाने वालों को सहज ही मिलने लगता है। अनुसंधान-अन्वेषण भी एक कारण ही रहा है। रहस्यों का पता लगाने का सहज कौतूहल भी इस उत्साह का निमित्त कारण हो सकता है। जो हो पिछले छः महीने इसी ऊहापोह में बीते हैं। इस बीच इतने प्रज्ञापुत्रों का आगमन हुआ जितना कि इस आश्रम के निर्माण से लेकर अब तक के पूर्व वर्षों में कभी भी नहीं हुआ। बहुसंख्य परिजनों के आगमन से भी अधिक महत्वपूर्ण बात यह रही कि जिज्ञासुओं ने आग्रहपूर्वक वह सब उगलवा लिया जो रहस्यमय समझा जाता और लुक-छिप कर लिया जाता रहा हैं। महत्वपूर्ण स्थानान्तरों के अवसर पर सहज सौम्यता इसके लिए बाधित भी तो करती ही हैं कि चलते समय तो गोपनीयता का, आश्चर्य-असमंजस का समाधान कर ही दिया जाय। सो कुशलक्षेम सहज आतिथ्य के अतिरिक्त ऐसा भी बहुत कुछ पूछा बताया गया जिनका तनिक दूर रहने वालों को अनुभव भी नहीं हैं। जो आ नहीं सके उन्हें भी उस रहस्यमयी चर्चाओं की जानकारी प्राप्त करने से वंचित न रहना पड़े, यह विचार करते हुए आवश्यक रहस्यों का इन व्यक्तियों में लिपिबद्ध कर देना उचित समझा गया ताकि उपयोगी जानकारी से वे लोग भी वंचित न रहें जो अब तक न सही अगले दिनों संपर्क में आयेगी और अतीत के संबंध में उपयोगी जानकारी प्राप्त करने के लिए उत्सुक होंगे। कारण कि इस रहस्योद्घाटन में उनका भी तो ऐसा लाभ सन्निहित है जो सफल लोगों के महामानवों के सहचरों को सहज मिलता रहता है।

अनुमान सभी को वह था कि इस तंत्र की प्रायः सभी महत्वपूर्ण गतिविधियों का प्रथम दिन वसंत पंचमी हैं। सो उस मुहूर्त को विशेष महत्व देने वाले आगन्तुकों की संख्या निश्चय ही पहले दिनों की अपेक्षा निश्चित रूप से अधिक रहेगी। हुआ भी ठीक ऐसा ही। मिशन के साथ जुड़े हुए परिजन इस वसन्त पर्व पर इतनी अधिक संख्या में आये जितने कि विगत दस वर्षों में कुल मिलाकर भी नहीं आये थे।

आश्रम की परिधि और आगन्तुकों के लिए साधनों की तुलनात्मक दृष्टि से कमी होने के कारण शान्तिकुञ्ज के आश्रमवासी इस आपत्तिकालीन समस्या से निपटने में जुट गये। भूमि न मिल सकी तो जितना स्थान पास में था उसे बहुमंजिला और सघन बनाया गया। लगभग सारा काम श्रमदान से हुआ और जितनों के लिए जगह थी उससे प्रायः ढाई-तीन गुना के लिए जगह बना दी गई। भोजन व्यवस्था के लिए बड़े आधुनिक यंत्र-उपकरण नये सिरे से लगाये गये और ऊपरी मंजिल पर बने भोजनालय से नीचे खाद्य पदार्थ लाने के लिए एक गुड्स लिफ्ट को फिट किया गया। बिछाने के लिए फर्शों का अतिरिक्त प्रबंध किया गया। फिर भी असुविधा रहने की आशंका थी पर काम किसी प्रकार चल गया, जैसे कि ईश्वर पर आश्रित लोगों का चल जाया करता है। इस बार का बसन्त पर्व न केवल आयोजन की दृष्टि से वरन् स्वजनों के साथ आत्मीयता भरे परामर्श देने की दृष्टि से भी अनुपम रहा। लोगों ने इतना कुछ ऐसा कुछ पाया जिसकी आशा या संभावना कदाचित थोड़ों को ही रही होगी।

सुनना अधिक कहना कम, करना-अधिक बताना कम, सिखाना कम-सीखना अधिक जिनकी जीवन शैली रही हो, वे इतने गंभीर प्रसंगों को इतनी सरलतापूर्वक बता देंगे इस स्थिति का प्रावधान पाकर आगन्तुकों में से अधिकांश को भारी संतोष हुआ। प्रश्नों की-जिज्ञासाओं की झड़ी लगी रही। इतनों को एक व्यक्ति इतना कुछ प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से बता सकता हैं, यह प्रसंग भी अपने आप में अद्भुत रहा।

अधिकांश जिज्ञासुओं ने एक जिज्ञासा प्रधान रूप से प्रकट की एक साधन रहित एकाकी व्यक्ति सीमित समय में इतने भारी और इतने व्यापक काम कर सकता है, इसका रहस्य बचा है? पूछने वालों को उन सर्व विदित बातों का तो पता ही था जो कानों से सुनी और आँखों से देखी गई हैं।

मूल प्रश्न था युगचेतना उभारने वाला इतना साहित्य कैसे सृजा गया? उसका अनेक भाषाओं में अनुवाद और प्रकाशन प्रसार कैसे सम्पन्न हुआ? इतना बड़ा परिवार कैसे संगठित हो गया, जिसमें पाँच लाख पंजीकृत और इससे पाँच गुना अधिक सामयिक स्तर पर सम्मिलित उच्चस्तरीय व्यक्तियों का समुदाय किस प्रकार जुड़ता चला गया और साथ चलता रहा? एक व्यक्ति के तत्त्वावधान में २४०० आश्रम-देवालय कैसे बन सके? शान्तिकुञ्ज, ब्रह्मवर्चस् गायत्री तीर्थधाम जैसे बहुमुखी सेवा कार्य में संलग्न संरचनाओं की इतनी सुव्यवस्था कैसे बन सकी? सुधारात्मक और सृजनात्मक आन्दोलन की देश व्यापी विश्व-व्यापी व्यवस्था कैसे बन गई? “रोता आये हँसता जाये” वाला उपक्रम अनवरत रूप से कैसे चलता रहा? आदि-आदि ऐसे विदित अगणित क्रिया-कलाप इन अस्सी वर्षों में घटित हुए हैं जिनकी इतने सुचारु रूप से चलने की सूत्र संचालक जैसे एक नगण्य एवं साधारण से व्यक्तित्व से आशा की नहीं जा सकती कर भी वे कैसे सम्पन्न होते चले गए?

जड़ी बूटी चिकित्सा पर आधारित आयुर्वेद की नयी सिरे से शोध कैसे बन पड़ी व मनोरोगों के निवारण और मनोबल के संवर्द्धन की ब्रह्मवर्चस प्रक्रिया कैसे चलती रही? सात पत्रिकाओं का सम्पादन एकाकी प्रयास से कैसे चल पड़ा? लाखों शिक्षार्थी हर वर्ष प्रशिक्षण पाने से किस प्रकार लाभान्वित होते रहे? सृजनात्मक आन्दोलनों को इतनी गति कैसे मिल सकी जितनी कि अनेकानेक संगठन और समुदाय भी नहीं उपलब्ध कर सके?

उपरोक्त प्रत्यक्षदर्शी कृत्यों को जिनने अंकुरित, पल्लवित और फलित होते देखा है, उनका समाधान एक ही उत्तर से हुआ कि सर्वशक्तिमान सत्ता की इच्छा और प्रेरणा के अनुरूप अपने व्यक्तित्व, कर्तृत्व, मानस और श्रम को समर्पित कर सकने वालों के लिए ऐसा कुछ बन पड़ना तनिक भी कठिन नहीं हैं। एक छोटी सी चिनगारी के ईंधन के अम्बार से मिल जाने पर प्रचण्ड अग्निकाण्ड बन सकता है। पारस को छूकर लोहे का सोना बनने वाली उक्ति प्रसिद्ध है। फिर भगवान के साथ रहने सर्वतोभावेन जुड़ने वालों की स्थिति वैसी क्यों नहीं हो सकती, जैसी कि बिजली के विशाल उत्पादन केन्द्र के साथ जुड़ जाने पर छोटे मोटे यंत्र उपकरण सहज ही चलते रहते हैं। बताया जाता रहा है कि यह सब कुछ मात्र कठपुतली के खेल की तरह होता रहा। श्रेय लकड़ी के खिलौने को नहीं, बाजीगर की उस कलाकारिता को मिलना चाहिए जो पर्दे के पीछे रह कर उँगलियों में बँधे तारों के सहारे अद्भुत हलचल करते चलने लायक बनाता और नचाता रहता हैं।

कुछ का समाधान तो हो गया, पर हजारों जिज्ञासु सन्देह ही प्रकट करते रहे और पूछते रहे कि जब लाखों की संख्याओं में गिने जो सकने वाले भगवद् भक्त गई गुजरी उपहासास्पद अवांछनीयताओं के बीच ही जीवन व्यतीत करते हैं। तब एक व्यक्ति ने ऐसा क्या किया जिसमें भगवान के अनुदान नरसी मेहता के हुण्डी बरसने तथा हनुमान अर्जुन जैसे किन्हीं बिरलों को भगवत् सखा होने के रूप में मिलें। संदेह सही भी था, पर जो उत्तर दिया गया वह भी कम समाधान कारक नहीं था। पात्रता के अनुरूप उपलब्धियों का हस्तगत होना एक ऐसी वास्तविकता का हस्तगत होना एक ऐसी वास्तविकता है जिसे हर कहीं चरितार्थ होते देखा जा सकता हैं। खोटे सिक्के ही सर्वत्र ठुकराये जाते हैं। खरे सोने की कीमत तो कहीं भी उठाई जा सकती हैं। भगवान से जो अपना स्वार्थ साधना चाहता है। उस प्रपंची पाखण्डी को सदैव भगवान को उलाहना देने और निरंकुश कहते रहने की शिकायत रहती है। जिसने अपना सब कुछ पति के सामने सौंप दिया उस पत्नी को अपने पति की समूची सम्पत्ति सहायता और सद्भावना मिलकर रहती है।

स्रष्टा की एक ही अपेक्षा है कि सुरदुर्लभ मानव तन तथा जीवन पाने वाला प्राणी उपलब्ध विभूतियों के सहारे स्रष्टा के विश्व उद्यान को हरा भरा रखने के लिए वफादार माली की भूमिका निबाहें तो कोई कारण नहीं कि उसे आत्म संतोष, सभी का सम्मान, श्रेय यश तथा स्वामी का समुचित अनुग्रह अनुदान प्राप्त न हो। इस तथ्य की परीक्षा करनी हो तो संसार में जन्मे अब तक के महामानवों की जीवनचर्या को साक्षी देने के लिए आमंत्रित किया जा सकता है। पुण्य और परमार्थ को उस बीज की तरह विकसित होते देखा जा सकता हैं जो आरंभ में राई के बराबर होता है पर कुछ ही समय में विशालकाय बरगद वृक्ष की तरह उत्कर्ष के उच्च शिखर तक जा पहुँचता है। ईश्वर का अजस्र अनुदान प्राप्त करने का एक ही तरीका है और रहेगा कि स्वार्थ को परमार्थ में बदल दिया गया। धर्मधारणा और सेवा साधना को जीवनचर्या का अविच्छिन्न अंग बनाया जाय। भिखारी बनकर नहीं, उदारचेता दानवीर बनकर भगवान के दरवाजे पर पहुँचा जाय और अनुदान का प्रतिदान असंख्यों गुनी मात्रा में वापस लौटाया जाय।

“साधना से सिद्धि” प्राप्त होने के रहस्य का उद्घाटन करने के इच्छुकों में से प्रत्येक को यही जताया और बताया गया है कि सत्प्रवृत्तियों के धन हेतु अपने को प्रखर, प्रामाणिक और साहसी, उदारचेता बनाया जाय तो उतने भर से अनेकानेक कर्मकाण्डों की आवश्यकता पूरी हो जाती हैं और बदले में वह मिल जाता हैं जो सच्चे भगवद् भक्तों को मिलना चाहिए। साधना अपने आपको संयमी और सुसंस्कृत बनाने की की जाती हैं। इसके लिए स्रष्टा की एकमात्र इच्छा को पूरा करना पड़ता हैं कि संयमशील उदारचेता स्तर का परमार्थ परायण जीवन जिया जाय। साधु ब्राह्मण, सन्त, सुधारक और शहीद इसी स्तर के होते रहे हैं। उनकी साधारण सी पूजा उपासना भी तिल से ताड़ और राई से पर्वत बनती देखी जा सकती हैं, ईश्वर समर्पित मनुष्य ही देव-मानव कहलाते हैं और उन्हीं में वे सिद्धियाँ विभूतियाँ प्रकट होती हैं जिनके बारे में एक व्यक्ति के माध्यम से बन पड़े अनेकानेक महान कार्यों की चर्चा एवं पूछताछ की जाती हैं।


ग्वाले जैसी गिनती (kahani)

गाँव के नुक्कड़ पर बैठकर एक ग्वाला नित्य आती जाती गायों का हिसाब रखता। प्रातः इतनी गायें जंगल गई। सायं इतनी लौटी। बुद्ध ने पूछा “तुम्हारी इनमें से कितनी हैं?” उसने कहा-मेरी एक भी नहीं, यह तो गाँव की है। मैं तो बैठकर गिनती कर लेता हूँ।

बुद्ध ने आनन्द से कहा-ऐसे आदमी कितने ही रूपों में मुझे मिलते रहते हैं, जो हिसाब रखते हैं कि अमुक मिलते रहते हैं, जो हिसाब रखते हैं कि अमुक शास्त्र में क्या लिखा है, अमुक पुस्तक में क्या कहा गया है? अमुक ने यह लिखा है? किन्तु जीवन में, आचरण में उनने सिद्धान्तों को अपनाते किसी को नहीं देखा। बहुसंख्य व्यक्ति इस ग्वाले जैसी गिनती में सारा जीवन गँवा देते हैं।”


विशेष लेख माला-२ - माथा पच्ची निरर्थक नहीं गई

इस बार का वसंत पर्व एक प्रकार का ब्रह्म यज्ञ रहा। शान्तिकुञ्ज की भूमि पर उन दिनों यही समुद्र मंथन होता रहा और जिज्ञासाओं को यह पता चल सका कि मनुष्य का निजी पुरुषार्थ नगण्य है। उसकी इच्छा-आकांक्षा वासना, तृष्णा और अहंता से आगे नहीं बढ़ती। उसी छोटे दायरे में वह कूप-मंडूक एवं गूलर के भुनगे की तरह अपनी बहुमूल्य जीवन सम्पदा को विसर्जित कर देता हैं। पूजा पत्री, छिटपुट पूजा पाठ तक तनिक से उपहार मनुहार तक सीमित रहकर वह स्वयं संतुष्ट रहता एवं उसे ईश्वर उपासना मानकर मन बहलाता, पास पड़ोस वालों को बहकाता रहता हैं। ऐसी दशा में प्रवंचना की विडम्बना उन्हें मात्र निराशा ही प्रदान करती हैं जो अपने को भक्तजनों की श्रेणी में गिन लेते हैं।

शक्ति के स्रोत ईश्वर के साथ जुड़कर मनुष्य भी हिमालय से निकलने वाली गंगा की तरह अपने और संसार का भला करने में समर्थ होता हैं। जिन सफलताओं के संबंध में चर्चा होती रहीं, वे मात्र सर्वविदित सुपरिचित एवं दृश्यमान हैं। इस श्रृंखला में अभी और कुछ कहीं अधिक जानने योग्य शेष रह जाता है जिसको आँखें से नहीं देखा गया, कानों से नहीं सुना गया, वरन् उसे समयानुसार फिर कभी पूछे और बताये जाने के लिये सुरक्षित रख लिया गया है। संक्षेप में व्यक्ति विशेष के द्वारा बन पड़े चमत्कारी कहे जाने वाले कार्यों के संबंध में उतना ही पूछना बताया जाना सीमित रहा कि शक्ति स्रोत से जुड़ने के लिये अपनी क्षुद्रता को महापुरुष के चरणों पर समर्पित करने और उनकी महानता को मान्यताओं भावनाओं, संवेदनाओं आकांक्षाओं एवं क्रिया–कलापों में कस लेने का सघन साहस यदि सच्चे अर्थों में किया जा सके तो अपने को ईश्वर के हाथों सौंपे जाने के बदलें में उसके अनुदान और सिद्धि सम्पदा को सहज खरीद पाना संभव है। मात्र पूजा पाठ की राई-रत्ती चिन्ह पूजा अभीष्ट प्रयोजन की पूर्ति नहीं कर सकती। यही समझा-समझाया जा सकता है, साधना से सिद्धि का रहस्य और मार्ग सदा से यही समझा-समझाया जाता रहा है।

वसन्त पर्व के महासत्संग ने अनजाने में भक्ति के साथ शक्ति के जुड़े होने का रहस्य समझाया है, जिसकी शाब्दिक जानकारी तो थी पर न कभी श्रद्धा जगती थी और न विश्वास परिपक्व होता था। मात्र जानकारी भर को पर्याप्त समझते थे, क्रिया रूप में कुछ परमार्थ जैसा कुछ करने के लिये साहस नहीं जुटा पाते थे। उनने इस बार तथ्य को गंभीरतापूर्वक समझा। साथ ही यह भी अनुभव किया कि शरीरबल, बुद्धिबल मनोबल धनबल आदि क्षमताओं और सामर्थ्यों का कितना ही बाहुल्य क्यों न हो, आत्मबल की तुलना में उन सब की सम्मिलित क्षमता भी नगण्य हैं। शान्तिकुञ्ज परिकर द्वारा अब तक जो घटित हुआ है, उसके मूल में तप ही एक मात्र वास्तविकता है और यदि कोई ऐसा ही ओजस्वी तेजस्वी, वर्चस्वी, तपस्वी बनना चाहता है तो ऋद्धियों और सिद्धियों को प्राप्त करने के लिये कस्तूरी के मृग की तरह भटकने की क्या आवश्यकता हैं? मात्र पूजा के सहारे दैवी अनुकम्पा के रूप में मिलने वाले अनुदानों की जो अपेक्षा करते हैं, उन्हें मृग तृष्णा में भटकने पर खीज़, थकान और निराशा के अतिरिक्त और कुछ हाथ नहीं लगता।

बीज अपने बल बूते वृक्ष नहीं बन जाता। उसे खाद पानी भी चाहिए। व्यक्तित्व की प्रामाणिकता और व्यवहार में उच्चस्तरीय उदारता की समावेश ही वह आधार है जिसके बलबूते किसी को भी साधारण परिस्थितियों में रहते हुए भी असाधारण स्तर का देवमानव बनने का अवसर मिल सकता है

वसन्त पर्व के दिन इस संदर्भ में चलता रहा शंका समाधान निरर्थक नहीं गया। रहस्योद्घाटन की जानकारी प्राप्त करके जिज्ञासा की तुष्टि भर नहीं हुई, वरन् सहस्रों ने निश्चयपूर्वक संकल्प लिया कि वे अगले दिनों राजमार्ग पर चलेंगे। शेष जीवन को सच्चे अर्थों में सार्थक बनायेंगे। ईश्वर की आशा अपेक्षा पूरी करेंगे और बदले में उसे सच्चे साथी सहचर की भूमिका निबाहते हुए निहाल कर देने के लिये बाधित करेंगे।


विशेष लेख माला-३ - तपने और तपाने की आवश्यकता क्यों पड़ी?

शान्तिकुञ्ज के सूत्र संचालक के जीवन में घटित घटनाओं में से कुछ की जानकारी और प्रयत्नों की प्रतिक्रिया का तारतम्य समझ लेने के उपरान्त अनेकानेक आगन्तुकों ने अपनी जानकारी के आधार पर कई बातें पूछीं कि “अगले दिनों आप एकान्त वास की साधना करेंगे और कठोर तपश्चर्या में रित् रहने का संकल्प साधेंगे। ऐसा क्यों? जब धर्म धारण और सेवा साधना से ही ईश्वर भक्ति का प्रयोजन बहुत अंशों में पूरा हो जाता है तो एकान्त तपश्चर्या की अति-आपका जनसंपर्क, कार्यक्रमों का नियोजन, मार्गदर्शन एवं सेवा-सहयोग की अन्यान्य क्रिया-प्रक्रियाएँ जो इन दिनों चलती हैं, वे भी न बन पड़ेंगी? आपको कष्टसाध्य उपक्रम अपनाकर अनेक असुविधाओं से भरी जीवनचर्या बितानी पड़ेगी और संपर्क में आने वाले जो निरन्तर लाभ उठाते रहते हैं, उनसे उन्हें वंचित रहना पड़ेगा?”

प्रश्न समझदारी का था। वैसी ही जिज्ञासा अन्य अनेकों के मन में उठ रही थी। वियोग जन्य व्यथा उन्हें भी कष्ट दे रही थी। सो उपस्थितजनों में से प्रत्येक व्यक्ति इसका कारण और समाधान जानने के लिए उत्सुक था।

प्रश्न अधिक गंभीर और उलझन भरा था। सो उस संबंध में चर्चा के अवसर पर मात्र उन्हें ही सम्मिलित रखा गया जिन्हें अध्यात्म विधा को पृष्ठभूमि के साथ पहले से भी गहराई स्तर तक समझने का अवसर मिलता रहा है।

कहा गया है कि अब तक जो सेवा और साधना चलती रही है उसका प्रभाव स्थल जगत तक पदार्थ जगत तक मार्ग दर्शन और सीमित अनुदान दे सकने जितनी क्षमता अर्जित कर सकता है। पर अगले समय असाधारण रूप से विकट हैं उसके लिए इतनी सीमित क्षमता पर्याप्त न होगी। विशिष्ट स्तर की प्रचंडता उत्पन्न करने के लिए उच्चस्तरीय तपश्चर्या से कम में काम नहीं चलता। भगीरथ, दधीचि, ध्रुव, सप्तऋषि स्तर की उस तपश्चर्या की आवश्यकता पड़ती है जो प्रत्यक्ष शरीर में अधिक बढ़ी-चढ़ी क्षमता उत्पन्न करने तक सीमित न रहे, वरन् सूक्ष्म शरीर, कारण शरीर की गहराई में प्रवेश करके उच्चस्तरीय प्राणचेतना का ऐसा भंडार संचय कर सके जो विषय परिस्थितियों से लोहा ले सके और-असाधारण दिव्य उत्पादन में अपनी सामर्थ्य का परिचय दे सके। सूक्ष्म जगत में संव्याप्त विकृतियों को भी बुहार सके।

इन दिनों विकृतियों और विपन्नताओं के घटाटोप छाये हुए हैं। आकाश प्रदूषण से भर गया है। जलवायु में विषाक्तता की मात्रा इतनी बढ़ गई है कि इससे प्रकृति ने विद्रोह खड़ा कर दिया है। विविध प्रकार के प्रदूषण अपने अपने क्षेत्र में ऐसे संकट खड़े कर रहे हैं जो विदित व्यावहारिक उपाय उपचारों से नियंत्रण में नहीं आ रहे हैं। दुर्भिक्ष, युद्धोन्माद, राजनीतिक विग्रह, अपराधों की बाढ़, विचार विकृति का तूफानी प्रवाह मिल जुलकर ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न कर रहे हैं, जिससे अपनी धरती पर जीवधारियों का निर्वाह कठिन हो जाय, शारीरिक-मानसिक रोगों की अभिवृद्धि नियन्त्रण से बाहर हो जाय एवं शालीनता का व्यवहार और प्रचलन ढूँढ़ पाना दुर्लभ हो जाय।

प्रस्तुत अवांछनीयता को हटाने घटाने के लिए असाधारण प्रवाह विनिर्मित करना आवश्यक होगा। देवत्व को पराजित होने से बचाने के लिए उसी दिव्यशक्ति का अवतरण होना चाहिए, जो महाकाली की तरह दैत्यसत्ता से लोहा ले सके, उसे परास्त कर सके। मनुष्य को ऐसा-वरदान मिले इसके लिए प्रचण्ड तप के अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं। तप शक्ति से ही देवसत्ता का अवतरण संभव होता रह सकता हैं। ऋषि तपस्वियों द्वारा अनेक बार का परिचित उपचार इन दिनों भी अपनाये जाने की आवश्यकता पड़ गई हैं। सो उसे पूरा करने के लिए ऐसे दुस्साहसपूर्ण कदम उठाये जा रहे हैं।

नवयुग का अवतरण अपने समय की “सतयुग की वापसी” है। इसलिए जितना मानवी पुरुषार्थ आवश्यक है उससे अधिक दैवी सहयोग चाहिए।

सत्प्रयोजनों में आसुरी शक्तियाँ सदा आक्रमण करती और विघ्न उपस्थित करती हैं। विश्वामित्र के यज्ञ को असफल करने में निरत सुबाहु, मारीच, ताड़का आदि के उपद्रवों का सामना करने के लिये राम लक्ष्मण की सहायता आमंत्रित की गयी थी। कालनेमि, अहिरावण, और सुरसा हनुमान को असफल करने जा रहे थे। इन सबका सामना दिव्यशक्ति के माध्यम से ही संभव हो सका। अगले दिनों भी ऐसी ही प्रचण्ड सामर्थ्य उपार्जित की जानी है।

भस्मासुर, वृत्तासुर, महिषासुर, अघासुर आदि ने दैवी प्रयोजनों में कितने विघ्न उत्पन्न किये थे, यह सर्व विदित हैं। इस बार सतयुग की वापसी वाली प्रस्तुत दैवी योजना पर भी ऐसे ही आसुरी संकट आते और अपनी भरपूर सामर्थ्य लगाते रहेंगे। उनका सामना भी समान स्तर की दैवी शक्ति से ही किया जा सकता हैं।

परिजनों में से अनेकों अवगत हैं कि शान्तिकुञ्ज की युग निर्माण योजना को कितने दुरात्माओं ने समय-समय पर अपनी छोटी सामर्थ्य के अनुरूप चिकोटी काटने और डंक मारने में कमी नहीं रहने दी। वे आक्रमण तो आसानी से रद्द और निरस्त कर दिये गये, पर भारत के भीतर, पड़ोस में तथा विश्व के हर कोने में जो आतंकवादी-आक्रामकता छाई हुई हैं वह न जाने कब, क्या अड़ंगा खड़ा कर दें, इसे कोई नहीं जानता। ऐसी दशा में विश्व शान्ति की सुरक्षा करने के लिए ऐसी सतर्कता और शक्ति चाहिए जैसी कि वन्य पशुओं की भरमार वाले एक छोटे से खेल की सुरक्षा के लिए रखवाले के सारे परिवार को जुटा रहना पड़ता हैं। भले ही हम आक्रमणकारी न हों, पर आक्रान्ताओं से आत्मरक्षा करने के लिए कुछ तो करना ही होगा। यह एक बड़ी व्यापक और भयंकर समस्या हैं जिससे निपटने के लिए उस स्तर की तैयारी हर हालत में अपेक्षित हैं, जैसी कि शान्तिकुञ्ज के सूत्रधार एकांतिक प्रचण्ड तपश्चर्या द्वारा समर्थ आत्मशक्ति का संग्रह कर रहे हैं।

संकटों की कोई कमी नहीं। उनसे कोई क्षेत्र बचा नहीं है। तोप बन्दूक के धमाके हुए बिना भी ऐसी परिस्थिति बनी रह सकती है जो आतंक आशंका, विपत्ति और अराजकता जैसी अवांछनीयता बनाये रहे। युद्ध आग्नेय ही नहीं होते। शीत युद्धों की अनेकों किस्में भी ऐसी हैं जो विप्लवी परिस्थितियाँ बनाये रह सकती हैं और अपनी परिधि में उन्मादी अशान्ति खड़ी किये रह सकती हैं। हर विपत्ति को पुलिस, शासन, कचहरी और जेल जैसे प्रताड़ना माध्यमों से ही काबू में नहीं किया जा सकता। शान्ति की परिस्थितियाँ बनाये रहने के लिए भी बड़ी क्षमता हाथ में रहनी चाहिए। प्रस्तुत तपश्चर्या को ऐसी ही शक्ति साधना समझा जा सकता है। अवांछनीयताओं, अनाचारों, आपदाओं, मूढ़ मान्यताओं, कुरीतियों, अनीतियों और विडम्बनाओं से जूझने के लिये भी कारगर हथियार चाहिए। सीधे साधे तरीके से तो नशेबाजी, दहेज वाली बरबादी भरी शादियों तक से छुटकारा नहीं पाया जा सका तो और भी अनौचित्य की जो विषम विडम्बनाएँ घटाटोप की तरह गहरा रही हैं, उनको लेख-लेक्चर जैसे दुर्बल साधनों से कैसे निरस्त किया जा सकेगा?

बुद्ध और गाँधी ने मात्र उपदेश ही नहीं दिये थे, ऐसे संघर्ष भी खड़े किये थे जो व्यापक अनाचार को निरस्त कर सके। दयानंद, विवेकानंद, गुरु गोविन्द सिंह जैसों को भी इसी वर्ग में गिन सकते हैं। उनकी सफलता के अनय कारण भी जुड़ें हुए रहे होंगे, पर आत्मशक्ति की बहुलता का विद्यमान आधार भी उस संदर्भ में नकारा नहीं जा सकता। आज की अवांछनीयताओं को भी अपने निराकरण के लिए ऐसी ही आत्मशक्ति अपेक्षित है। समुद्र सोखने वाले अगस्त्य मुनि को, और विचारतंत्र को उलटने वाले परशुराम के कुल्हाड़े को भी विस्मृत नहीं किया जा सकता।

अगले दिनों अनेक खाई खंदकों को पाटना आवश्यक होगा। साथ ही टीलों को भी झुकने के लिए विवश करना होगा, समतल भूमि तभी बन सकेगी और उसी पर कोई भव्य निर्माण संभव हो सकेगा। खेत उगाने और उद्यान लगाने के लिए भी तो समतल भूमि चाहिए। ऐसे प्रसंगों में प्रायः बुलडोजर प्रयुक्त करने पड़ते हैं। रेगिस्तानों को हरे भरे बनाने के लिए समतल करके नहरों का-जल स्रोतों का प्रबंध करना पड़ता हैं। ऐसी ही एक व्यवस्था आत्मशक्ति की उपलब्धि भी है। गंगा लाने का श्रेय भगीरथ को है और मन्दाकिनी को अवतरित करने में महातपस्विनी अनुसुइया का पुरुषार्थ काम आया था पाताल गंगा अर्जुन के धनुषबाण से प्रादुर्भूत हुई थी और उसी से भीष्म की प्यास बुझी थी।

तपते सूर्य की किरणों से समुद्रों से भाप के अम्बार उठते हैं। बादलों का जन्म उसी से होता हैं। वर्षा ऋतु ही हरीतिमा और खाद्य-सम्पदा का उत्पादन करती हैं। यह तप की ही गरिमा है। उज्ज्वल भविष्य के निर्माण हेतु प्रचुर साधन सामग्री की आवश्यकता पड़ेगी। उसका उत्पादन मात्र यंत्र उपकरणों से ही नहीं होगा। अपेक्षित तप शक्ति ही है, जो हिमालय पिघला सके तो हाहाकारी प्यास को अपने बलबूते शान्त कर सके। ऐसे ही अनेक कारण है जो उस तपश्चर्या के साथ जुड़े हुए हैं, जो शान्तिकुञ्ज के सूत्र-संचालक द्वारा इसी बसंत पर्व से कठोर अनुबंधों के साथ आरंभ की गयी है।


विशेष लेख माला-४ - हम बिछुड़ने के लिये नहीं जुड़े है

ध्वंस के सरंजाम तो माचिस की एक तीली आग की छोटी चिनगारी भी कर सकती हैं। पर निर्माण एक झोंपड़े का करना हो तो भी ढेरों साधन सामग्री और श्रमशीलों की कुशल तत्परता चाहिए। बिगड़ बहुत चुका। मनुष्य खोखला, उन्मादी और इस स्तर तक अनाचारी हो गया है कि उसे नर पशु तक नहीं कहा जा सकता मरघट में प्रेत-पिशाच कोलाहल करते रहते हैं। डरना और डराना ही उनका प्रधान कार्य होता है। मनुष्यों में से एक बड़ी संख्या आज ऐसे ही लोगों की दीख पड़ती हैं।

भ्रष्ट चिन्तन ही दुष्ट आचरणों का निमित्त कारण है। उस आधार पर विनिर्मित वातावरण ही उन अनेकानेक विभीषिकाओं, विपत्तियों, कठिनाइयों और अभावों अवरोधों का प्रमुख कारण है। इस कठिनाई को साधनों के सहारे दूर नहीं किया जा सकता। अनुदानों से अभाव दूर नहीं हो सकता। कहने भर से नासमझों को उलटी चाल अपनाने से कहाँ विरत किया जा सकता हैं। इसके लिये ऐसे प्रतिभावान व्यक्तित्व चाहिए जिनने अपने को ऊँचा उठा लिया हो और दूसरों को पतन पराभव से उबारने लायक बल कौशल उपलब्ध कर लिया हो। ऐसे ही लोग देवमानव कहलाते है और उनके कार्य क्षेत्र में उतरने पर वे साधन विनिर्मित होते चले जाते हैं, जिन्हें अभ्युदय के नाम से जाना जा सके।

इन दिनों पतन और पराभव की विपन्नता को बढ़ाने में निरत हेयजनों की बहुलता, प्रबलता होने का आकलन गलत नहीं हैं। फिर भी यह नहीं समझा जा सकता है कि मानवी गरिमा को उबारने सुरक्षित रख सकने वाले देवमानवों का सर्वथा अभाव हो गया है। वे हैं, रहे हैं और रहेंगे। अन्यथा यह धरती रसातल को चली जायेगी। भावी नवसृजन के लिए ऐसे ही उत्कृष्टता के पक्ष धर आदर्शवादियों की आवश्यकता पड़ेगी। उन्हीं के प्रयत्न-पुरुषार्थ से पुण्य परमार्थ से समय को बदला और वातावरण को श्रेष्ठता से युक्त बनाया जा सकेगा। उन्हीं को तलाशना, संगठित, सुगठित एवं सुशिक्षित किया जाना अपने समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। इस दिशा में अपने प्रयत्नों ने अपने ढंग का कीर्तिमान स्थापित किया है। युगशिल्पियों का एक बड़ा समुदाय मिशन की पत्रिकाओं के साथ सम्बद्ध करके इस स्तर का विनिर्मित किया है जो स्वयं उठ सकने की सफलता प्राप्त करने के उपरान्त दूसरों को सहारा देने उबारने, उभारने, में समर्थ हो सके। जिनके लिए गिरों को उठाने और उठों को उछालना एक स्वाभाविक विषय बन गया है। इन्हीं को नवयुग के अग्रदूत नवसृजन के कर्णधार भी कहा जाता रहा है।

पाँच लाख को पच्चीस लाख बनाने-इसी गुणन प्रक्रिया को निरन्तर जारी रखने और कार्तिक अमावस्या की रात्रि को सघन तमिस्रा से उबारकर जगमगाती दीपावली बनने की चर्चा होती और योजना बनती रहती है। नवसृजन के आधार, उपकरण औजार या साधन यही वह समुदाय हैं, जिसे शान्तिकुञ्ज के महागरुड़ ने अण्डे बच्चों की तरह अपने डैनों के नीचे छिपा रखा है। उनको समर्थ एवं परिपुष्ट बनाने के प्रक्रिया इसी तन्त्र के अंतर्गत चल रही है। कहना न होगा इस प्रयोजन के लिए नवयुग के अर्ध्वय ने अपने जीवन के अस्सी पुष्प सुनियोजित गुलदस्ते के रूप में समर्पित किए हैं और देव मानवों की एक ऐसी समर्थ मण्डली विनिर्मित की है जो नवयुग के अवतरण में ब्रह्ममुहूर्त की तरह अपना परिचय दे सकें, भोर का उद्घोष करने वाले कुक्कुटों की भूमिका निभा सकें। शान्तिकुञ्ज में इन दिनों यही सृजन कार्य होना है। उसके संपर्क में आए प्रभाव क्षेत्र में ऐसी ही बहुमुखी गतिविधियों का सूत्र संचालन होना है। हर वसन्तपर्व इसी की स्मृति ताजा कराता है। इस बार उसका वह नया स्वरूप निखरा है जिसे नया पौधा कहा जा सकता हैं। जहाँ से अब तक बन पड़े प्रयासों की तुलना में कहीं अधिक महत्वपूर्ण निश्चय निर्धारण होने जा रहे हैं।

विगत बसन्त पर्व पर ऐसे ही परिजनों को सूक्ष्म संकेतों से आमंत्रित किया गया अथवा वे अपनी निजी उमंगों से विवश होकर उस आयोजन में सम्मिलित होने के लिए चल पड़े, इसी का संक्षिप्त विवरण इन पंक्तियों में यत्किंचित् प्रस्तुत किया जा रहा है।

जो नहीं आ सके उनका आवश्यक निजी परिश्रम एवं स्तर जानने के लिये एक पत्र भेजा गया है ताकि उस जानकारी के आधार पर यदि घनिष्ठता में कोई कमी रह गई हो तो पूरी हो सके। आदान-प्रदान का सिलसिला इस रूप में चल सके, जिसमें सबके लिए एक प्रकार से श्रेय साधना ही सन्निहित है।

प्रत्यक्ष पधारने या अपने व्यक्तित्व के स्तर को लिपिबद्ध व्यवस्थित भेजने वाले दोनों ही वर्गों की संख्या में वर्तमान उत्कृष्टता सम्पन्न लोगों की सज्जनता है जिस पर गर्व भी किया जाता है और नवसृजन के उज्ज्वल भविष्य का आधार स्तम्भ भी माना जा सकता हैं।

इन दोनों ही वर्गों के साथ लेखनी या वाणी के माध्यम से प्रयत्न या परोक्ष सम्बन्ध बने रहे हैं और उस आधार पर युगचेतना का प्रकाश अधिकाधिक विशिष्ट विस्तृत, सार्थक एवं सफल होता रहा है।

विगत वसन्त से कुलपति के एकान्त साधना में चले जाने, अन्तः चेतना के विशेष प्रयोजन के लिए नियोजित कर देने पर एक असमंजस यह खड़ा होता है कि इतने बड़े और इतने समर्थ समुदाय के साथ जो घनिष्ठता पनपती और प्रगति की प्रक्रिया चलती रही है उसमें विक्षेप, गतिरोध लगेगा, व्यवधान पड़ेगा। पारस्परिक जोड़ने वाला स्नेह, बन्धन टूट जाने पर वह उपक्रम कैसे बनेगा, जिससे पतंगे की तरह उज्ज्वल भविष्य के आकाश पर छाया और अपनी सक्रियता का परिचय देते रहा जा सके?

इस सम्बन्ध में सभी परिजनों को उपलब्ध माध्यमों से यह सूचित किया गया है कि कोई यह न समझे कि दीप बुझ गया और प्रगति का क्रम रुक गया। दृश्य शरीर रूपी गोबर की मशक चर्मचक्षुओं से दिखे या न दिखे, विशेष प्रयोजनों के लिये नियुक्त किया गया प्रहरी अगली शताब्दी तक पूरी जागरूकता के साथ अपनी जिम्मेदारी बहन करता रहेगा।

पक्षी सुदूर अन्तरिक्ष में इतनी दूर उड़ जाते हैं कि खुली आँखों से दीख नहीं पड़ते फिर भी वे अपने घोंसले का दुधमुँहे बच्चों का पूरा ध्यान रखते हैं। बच्चे भी समय पर उनके द्वारा खुराक मिलने की प्रतीक्षा करते रहते हैं। गाय अपने बछड़े सहित जंगल में चरने चली जाती है। संयोगवश कभी दोनों बिछुड़ भी जाते हैं, फिर भी एक दूसरे को ढूँढ़ने और पुकारने में कमी नहीं रहने देते। वर्तमान पत्रिका पाठकों का अपने परिवार का परिकर अगले दिनों बढ़ तो सकता है पर घटेगा नहीं। मिशन की पत्रिकाओं के रूप में प्रकाश चेतना हर महीने अपने पाठक परिजनों के यहाँ अप्रत्यक्ष रूप से जा पहुँचती है। हर दिन के एक लेख को एक प्रवचन समझा जाय तो यह मान्यता उचित है कि परिजनों और अभिभावकों के बीच दैनिक मिलन सत्संग संभव हैं। इसलिये परिजन एक महीने में ढाई रुपये का व्यक्तिगत अनुदान पत्रिका के चन्दे के रूप में प्रदान करते हैं इस प्रकार प्रत्यक्ष न सही परोक्ष मिलन एवं नियमित आदान प्रदान का क्रम चलता रहता हैं। इसी माध्यम से विचारों का ही नहीं, प्राणचेतना का शक्ति प्रत्यावर्तन भी बन पड़ता हैं।

अब इस संदर्भ में आगे भी यही प्रक्रिया चलेगी सभी परिजनों के परिचय, जन्मतिथि, फोटोग्राफ संग्रह कर लिये गए हैं। इस आधार पर शान्तिकुञ्ज से जन्मदिन के अवसर पर एक प्रेरणापूर्ण सन्देश एवं अनुदान पहुँचा करेगा। मिलन की आँशिक पूर्ति इस प्रकार हो जाया करेगी। शान्तिकुञ्ज परिवार में संचालक अपना सूक्ष्म शरीर-अदृश्य अस्तित्व बनाए रहेंगे। आने वाले रहने वाले अनुभव करेंगे कि उनसे अदृश्य किन्तु समर्थ प्राण प्रत्यावर्तन और मिलन आदान-प्रदान भी हो रहा है। इस प्रक्रिया का लाभ अनवरत रूप से जारी रहेगा।

युगसन्धि पुरश्चरण के अंतर्गत सभी साधकों को अपने-अपने यहाँ कुछ साधना करते रहने के लिए कहा गया है, वह तो चलेगी ही। साथ ही एक अनुबन्ध यह भी जोड़ा गया है यदि संभव हो तो वर्ष में कभी भी पाँच दिन के लिए शान्तिकुञ्ज आकर एक सत्र सम्पन्न कर लें और लगभग वही लाभ प्राप्त कर लें तो बैटरी को बिजली के साथ जुड़कर नये सिरे से चार्ज होने एवं धीमी पड़ी शक्ति को नये सिरे से फिर अर्जित करने के रूप में मिलता हैं।

कहने, सुनने, करने, कराने की प्रक्रिया चलती रहने के सम्बन्ध में इस वसंत पर्व पर उपस्थित परिजनों के ऊपर से उतरे आदेश के अनुसार यह कहा गया था कि “हममें से कोई किसी से अगले दिनों बिछुड़ न सके। जो प्रमाद और उपेक्षा बरतेगा उसे शान्तिकुञ्ज की संचालक शक्ति झकझोरेगी, उसके कान उमेठेगी और बाधित करती रहेगी। हर व्यक्ति सक्रिय होकर ही चैन से बैठ सकेगा”। कहा भले ही अलंकारिक भाषा में गया हो पर इसे एक सच्चाई मानकर चलना चाहिए कि ऐसे सशक्त सूत्र मजबूती के साथ परस्पर बाँधे गए हैं जो बिछुड़ने की स्थिति आने नहीं देंगे, भले ही हम लोगों में से किसी का दृश्यमान शरीर रहे या न रहे।


Quotation

रूस के ख्यातिलब्ध मनीषी गुर जिएफ के कथनानुसार मनुष्य की आन्तरिक गुलामी का पहला कारण उसकी अज्ञानता ही हैं। आत्म-ज्ञान के बिना इस अज्ञानरूपी अंधकार को मिटाया नहीं जा सकता। अपनी मूलसत्ता चेतना को समझे बिना वह गुलामों जैसा जीवन ही व्यतीत करता रहता हैं। चिरपुरातन धर्मग्रन्थों के अध्ययन और चिंतन मनन के पश्चात् वे इसी निष्कर्ष पर पहुँच पाये है कि व्यक्ति की कषाय-कल्मषों से मुक्ति अपने भीतर की प्रसुप्त चेतना को जगाने के उपरान्त ही संभव है।


ईश्वर निराकार है (Kahani)

केशव चन्द्र रामकृष्ण परमहंस के बड़े तार्किक शिष्य माने जाते हैं। रामकृष्ण जितने सीधे थे, केशव चन्द्र उतने ही तेज और अव्वल नम्बर के तार्किक। वे राम कृष्ण से भी तर्क करते रहते और अधिकांश समय यही सिद्ध करने की कोशिश करते कि “कहाँ है ईश्वर? किसने देखा है?” एक दिन तर्क इतनी जोरों से चल पड़ा कि शिष्यों की भीड़ इकट्ठी हो गई।

राम कृष्ण की प्रत्येक बात को केशव चन्द्र काट देते थे। किन्तु देखते ही देखते बात उलटी हो गई। केशव चन्द्र बिल्कुल नास्तिकों जैसे वक्तव्य देने लगे।

राम कृष्ण उठे और नाचने लगे। किन्तु केशव चन्द्र को बेचैनी होने लगी कि अब क्या करें? यदि राम कृष्ण प्रतिवाद करें तो वादविवाद आगे बढ़े। किन्तु वे तो हार कर केशव चन्द्र की बातें सुनकर नाचने लगते। धीरे-धीरे केशव चन्द्र के सभी तर्क चुक गये। अब केशव चन्द्र ने रामकृष्ण से पूछा कि “तो फिर! आप भी मानते हैं और मेरी बातों से सहमत हैं कि “ईश्वर नहीं है।”

राम कृष्ण ने कहा कि तुम्हें न देखा होता तो शायद मान भी लेता किन्तु तुम्हारी जैसी विलक्षण प्रतिभा जब पैदा होती है तो बिना ईश्वर के कैसे होगी? तुम्हें देखकर तो प्रमाण और पक्का हो गया कि ईश्वर जरूर है। ईश्वर निराकार है। वह तो प्रतिभा ज्ञान प्रज्ञा के रूप में ही हो सकता है।”

कहते हैं, केशव चन्द्र उस दिन तो भीड़ में से उठ कर चले गये। किन्तु फिर लौटे तो पक्के आस्तिक होकर और रामकृष्ण के ही होकर रहे।


विशेष लेख माला-५ - अध्यात्म अविश्वस्त सिद्ध हुआ तो?

साधना शक्ति की की जाती हैं। शक्ति, समृद्धि या शक्ति के रूप में प्रकट होती है। सम्पत्ति, सिद्धि और सफलता का चिन्ह परस्पर पर्यायवाचक है। किसने किस स्तर की साधना की इसका पता उसकी परिणति को देखकर ही जाना समझा जाता है।

शरीर बल की साधना करने पर बलिष्ठता सुन्दरता आदि विभूतियों की प्राप्ति होती है। उसी के सहारे अभीष्ट उपलब्धियों के लिए पुरुषार्थ करते बन पड़ता है। आक्रमण किया या उसे निरस्त किया जा सकता हैं। रुपये पास में हों तो बाज़ार में मिलने वाली हर वस्तु उससे खरीदी जा सकती है। सुविधा साधनों का अभीष्ट मात्रा में संचय करते बन पड़ता है। अहंता का प्रदर्शन, चाटुकारों का समर्थन आदि की उपलब्धियों धन बल के सहारे होती हैं। बुद्धिबल के धनी उच्च पदाधिकारी बनते हैं। वकील, डॉक्टर इंजीनियर, नेतृत्व संयोजन संचालन कर सकने की गौरव, पाई-कमाई जा सकती हैं। दार्शनिक, वैज्ञानिक, निर्णायक होने के लिए अभीष्ट मात्रा में बुद्धिबल का संचय आवश्यक है।

युद्ध में शस्त्र संचालन, साहस, रणनीति का कौशल काय आता है। कलाकारिता की साधना करने वाले, साहित्यकार, कवि, संगीतज्ञ, चित्रकार, मूर्तिकार, अभिनेता आदि बनते हैं। इसी प्रकार संसार में अनेकानेक शक्तियों के अपने-अपने चमत्कार देखे जा सकते हैं। अशक्तों को अभाव तिरस्कार, दौर्बल्य पराजय आदि का ही भाजन बनना पड़ता है। वे जैसे तैसे काम चलाते और परावलम्बन पर आश्रित रहते हैं। इसलिए बहुमुखी शक्तियों में से किसी न किसी की साधना के लिए मनुष्य को प्रयत्नशील होना पड़ता है। जो इसकी उपेक्षा करते हैं उन्हें आलसी-प्रमादी कहा, गया-गुजरा माना और अभागेपन का आरोपण किया जाता है।

शक्तियों में सर्वोपरि स्तर की क्षमता आत्मबल है। उसे अलौकिक, असाधारण माना जाता है। इस स्तर के प्रयासों को परम पुरुषार्थ गिना जाता है। उनकी ललक उच्चस्तरीय होती है। वे आत्मबल सम्पादित करने के लिए उन्मुख तत्पर होते हैं। इसकी कीमत तपश्चर्या के रूप में चुकानी पड़ती हैं और वे इसे प्रसन्नतापूर्वक चुकाते हैं। उपार्जन के लिए पूँजी तो जुटानी ही पड़ती है। शक्तिवानों में से प्रत्येक को यही करना पड़ा है। अन्यथा शेख चिल्ली जैसी बेसिर पैर की कल्पना-जल्पना करते रहने के अतिरिक्त और कुछ नहीं आता। छल छद्म की बाजीगरी द्वारा कुछ को कुछ बताकर नासमझों को बहका देना दूसरी बात हैं।

ऋषियों को आत्मबल सम्पादन की साधना के लिए अभीष्ट तपश्चर्या के लिए साहस जुटाते रहना पड़ा है। योगी-तपस्वी अपने कार्यक्रम इसी आधार पर विनिर्मित करते हैं। बदले में उन्हें जो कुछ मिलता है वह भी उत्कृष्टता की दिशाधारा का अवलम्बन के कारण हस्तगत भी ऐसा ही होता है। असाधारण अद्भुत, अलौकिक कहा जा सके। इस बल के धनी होते ही इस स्तर के हैं कि वे अपने को महामानव, धरती के देवता कह सकें। उन्हीं को ऋद्धि-सिद्धियों के अधिष्ठाता स्तर का अभ्युदय कर सकने की स्थिति में पाया जाता हैं। अपने को अभ्युदय के चरम शिखर तक वे पहुँचाते हैं। अलौकिक स्तर की विभूतियों से सम्पन्न होते हैं। अपनी नाव पर बिठाकर अनेकों को भयंकर प्रवाह वाली नदी से उबारते उतारते और पार करते हैं। वातावरण को प्रवाह को बदल देता भी ऐसों से ही बन पड़ता है। दैवी अनुकम्पा एवं सहायता भी ऐसे ही लोग विपुल मात्रा से हस्तगत करते हैं। उनमें दूसरों को प्रभावित करने वाली शाप वरदान देने की क्षमता होती हैं। स्वर्ग की मुक्ति के नाम से दिव्य आनन्दों की जो चर्चा होती रहती हैं उन्हें उपलब्ध कर सकना भी आत्मबल के अधिष्ठाताओं से बन पड़ता है। इन सनातन मान्यताओं को कोई भी कभी भी यथार्थता की कड़ी कसौटी पर कस सकता है। आग पर तपाये, कसौटी पर कसे सोने की तरह खरा पा सकता हैं।

इस संदर्भ में भी इन दिनों एक भारी असमंजस भरी विपन्नता देखी जाती है। आत्मसाधना का अवलम्बन करने का दावा असंख्यों को करते देखा जाता है। पर उनमें वे विभूतियाँ नहीं देखी जातीं जो इस दिशा में सफल पुरुषार्थियों में देखी जानी चाहिए। असफलता के लक्षण न दीख पड़ने पर विडम्बना का ही आरोप लगेगा। वह धनाध्यक्ष कैसा?, जो रोटी कपड़े जैसी सामान्य आवश्यकता न जुटा सके। वह पहलवान कैसा? जो सौ कदम की दौड़ न लगा सके। वह विद्वान कैसा? जो चिट्ठी पत्री तक पढ़ने लिखने में असमर्थता प्रकट करे। वह कलाकार कैसा? जो एकाग्र रहने तक ही क्षमता प्रदर्शित न कर सके। इसी प्रकार आत्मसाधना में अपने को संलग्न करने वालों के लिए क्या कहा जाए जो न तो अपना निजी व्यक्तित्व परिष्कृत कर सके जो न सामयिक विपत्तियों के समाधान में कोई योगदान दे सके। जिनमें दूसरों को प्रभावित, परिवर्तित करने की सामर्थ्य, कुछ कहने लायक सफलता प्राप्त कर सकने की क्षमता न हो। जिनमें समय की माँग, प्रवाह के परिवर्तन और पतन को अभ्युदय में परिवर्तित कर सकने की क्षमता न हो। इन अभावों को देखते हुए सन्देह होता है कि या तो आत्मबल की, आत्मसाधना की जो महत्ता बताई, महिमा गाई जाती रही है, वह अत्युक्ति या अलंकारिक है। अथवा जो आत्मसाधना के करने के दावेदार हैं, वे भ्रमग्रस्त हैं। छल-प्रपंच का आश्रय लेते है अथवा वास्तविकता को न समझ पाने के कारण अंड-जडं करते, अस्त-व्यस्त रहते और दिग्भ्रान्त होने पर भी बड़े लक्ष्य प्राप्त करने की आशा करते हैं।

किसी समय आत्मशक्ति से सम्पन्न अनेकों व्यक्तित्व थे। उनने अपनी अर्जित क्षमता के सहारे ऐसे कार्य कर दिखावे जो साधारणजनों की दृष्टि में अलौकिक कहे जा सके। विश्वमित्र, अगस्त्य, परशुराम, नारद, दधीचि जैसे तपस्वियों के नाम याद आते ही वे घटनाएँ भी आँखों के सामने गुजरने लगती हैं जिनमें उनने अपने समय में असाधारण पुरुषार्थ प्रकट करते हुए सिद्ध पुरुषों जैसे स्तर के प्रमाण परिचय दिये गये थे।

आज साधु-संतों की जनसंख्या प्रायः ६० लाख के लगभग है। तंत्र मंत्र की कला में अपने को प्रवीण-पारंगत करने वालों की संख्या भी हजारों में हैं। देवी देवताओं की पूजा पत्री में निरन्तर निरत रहने वाले पुजारी वर्ग के लोगों की गणना भी लाखों में की जा सकती है क्योंकि प्रस्तुत देवताओं में से हर मन्दिर पीछे कम से कम एक पुजारी की नियुक्ति तो आँकी ही जा सकती हैं। व्यक्तिगत पूजा-पाठ में घंटों समय लगाने वाले भक्तजनों को गिना जाय तो वे भी करोड़ों न सही लाखों तो होंगे ही। पंडित पुरोहित अपने को देवताओं का एजेण्ट बना कर प्रचुर परिमाण में दान दक्षिणा बटोरते रहे हैं। इस समूचे परिकर को एकत्रित करके गिना जाय तो उनकी संख्या मात्र अपने देश में ही लाखों करोड़ों हो सकती हैं। प्रस्तुत तथ्य को नकारा भी नहीं जा सकता और साथ ही यह विश्वास भी नहीं किया जा सकता कि उनकी स्थिति वैसी ही हैं जैसी कि कहीं सुनी और बताई जाती हैं। सामयिक समस्याएँ इतनी हैं कि समर्थ अध्यात्म के सहारे उन्हें इतने सारे लोग एकाकी न सही तो मिलजुल कर तो कर ही सकते हैं। किन्तु देखा इसके ठीक विपरीत जाता हैं। एक ओर तथाकथित अध्यात्मवादियों की संख्या बरसाती उद्भिजों की तरह बढ़ती जा रही हैं। उनके द्वारा नियोजित कर्मकाण्डों का भी अत्यन्त खर्चीला और आडम्बरभरा प्रदर्शन इतना बढ़ रहा है जिसे आसमान छूने स्तर का कहा जा सके। इस विषय के पक्षधर देवताओं, आश्रमों, मठों की, साहित्य की भी तूफानी गति से अभिवृद्धि हो रही हैं।

यह उलझन किसी प्रकार सुलझाने में नहीं आती कि आत्मशक्ति की प्रखरता जिस प्रकार गाई बताई जाती है वह किस प्रकार विश्वस्त हो सकती हैं जबकि हर क्षेत्र में संकटों, विग्रहों, अभावों और अनाचारों के अम्बार लगे हुए हैं और उन्हें निरस्त करने में निरन्तर बढ़ते हुए अध्यात्म विस्तार का दबाव कुछ ऐसा नहीं कर पा रहा है जिससे परिस्थितियाँ सुधरे, अवांछनीयताओं की बाढ़ रुके हो तो इतना भी नहीं रहा हैं कि उपरोक्त लाखों करोड़ों वेशधारियों की संख्या लोकहित की दृष्टि से कुछ न कर सके तो कम से कम अपने आपको तो आदर्श व्यक्तित्व के रूप में प्रस्तुत करे। जिनके चिन्तन चरित्र और व्यवहार, प्रयास को देखते हुए यह मान्यता बने कि अपने देश में उच्चस्तरीय व्यक्तित्व से सम्पन्न ऐसे लाखों करोड़ों मौजूद हैं जो अपनी उपस्थिति से जनसाधारण की जनजागरण में बढ़ती जा रही अश्रद्धा से तो निपट सकें। कम से कम इतना तो सिद्ध कर सकें कि अध्यात्म के दावेदार निजी जीवन में तो इतने प्रखर और प्रामाणिक होते ही हैं उनकी साक्षी में आत्म विधा की गरिमा को तो विश्वस्त समझा जा सके।

लगता है कहीं बहुत बड़ी गड़बड़ हो गई हैं। कुछ को कुछ समझ लिया गया है। मात्र कलेवर को सब कुछ समझा गया है और यह आवश्यकता-अनुभव नहीं की गई है कि उपासक को प्राणवान भी होना चाहिए। पूजा कृत्यों के साथ आध्यात्मवादी की जीवनचर्या भी उच्चस्तरीय होनी चाहिए। उसके व्यक्तित्व में प्रामाणिकता एवं उत्कृष्टता का भी गहरा पुट होना चाहिए।

मात्र बहिरंग कलेवर का गठन कर लेना पर्याप्त नहीं होता। मिट्टी के खिलौने जैसी गाय से बच्चे का मन तो बहला सकता है, पर उससे दूध देने और बछड़े जनते रहने की आशा नहीं की जा सकती। काठ से बड़े हाथी की आकृति तो बन सकती हैं, पर उन पर सवारी करके लम्बी मंजिल पूरी करने की आशा नहीं की जा सकती। खोटे सिक्के देखने में असली जैसे लगते तो हैं, पर दुकानदार के हाथ तक पहुँचने पहुँचने उपहासास्पद बनने लगते हैं। नकली तो आखिर नकली ही रहेगा। उससे मन बहलाया जा सकता है पर वह प्रयोजन पूरा नहीं कराया जा सकता जो असली के माध्यम से सम्पन्न हो सकता हैं।

चकली आध्यात्म के खिलौने से एक बड़ी भारी हानि यह हो सकती है कि अध्यात्मिकता और आस्तिकता के तत्त्वज्ञान को ही लोग अविश्वस्त और अप्रामाणिक मानने लगें। उसे छद्म समझने और इस प्रपंच से दूर रहने की बात सोचने लगें। यदि ऐसा हुआ तो आप्त वचनों को, संसार के उच्चस्तरीय प्रतिपादनों को भारी क्षति पहुँचेगी और उस नास्तिकता का बोलबाला होने लगेगा जिसकी आड़ में अनैतिकता, असामाजिकता, अराजकता, अवांछनीयता, का बोलबाला होने लगे। उत्कृष्टता आदर्शवादिता को अनावश्यक समझा जाने लगे। अंकुश भी महावत का रहने पर उन्मत्त हाथी किसी भी दिशा में चल सकता है और कुछ भी अनर्थ कर सकता हैं। आत्मिक तत्व के साथ जुड़े हुए उत्कृष्टता के, मर्यादाओं के, पुण्य-परमार्थों के विचार यदि बाँध तोड़ कर उच्छृंखलता की दिशा में चल पड़ें तो मनुष्य-मनुष्य नहीं रह जायगा, उसे प्रेत पिशाचों जैसे उद्दंड कोलाहल खड़े करते चारों ओर देखा जायगा।

इसे दुर्भाग्य ही कहना चाहिए कि इन दिनों कड़वी गिलोय का कड़ुवा नीम पर चढ़ने का सम्मिलित कुयोग बन रहा है। एक तो भौतिक विज्ञान ने नियन्ता बन रहा है। एक तो भौतिक विज्ञान कुयोग बन रहा है। एक तो भौतिक विज्ञान ने नियन्ता की मान्यता से इंकार करके विशुद्ध भौतिकवादी मान्यताओं को जन्म दिया हैं। आत्मा परमात्मा को अमान्य ठहराकर प्रकारान्तर से उस नीति निष्ठा की उपयोगिता से इंकार कर दिया है जो अब तक किसी रूप में मानवी गरिमा और मर्यादा से किसी सीमा तक मनुष्य को सराबोर बनाये हुए थी। पथ-भ्रष्ट हुए विज्ञान ने अनेक आविष्कारकों की तरह उस नास्तिकता का भी बीज बो दिया जो नीतिनिष्ठा को भी साथ ही अमान्य ठहराता हैं। इस प्रतिपादन से प्रभावित होने से भविष्य में लोग क्या रीति-नीति अपनाने लगेंगे, इस विचारणा से भी भयंकर भविष्य की ही आशंका उभरती हैं।

इसी के साथ-साथ यह दार्शनिक संकट भी उभरता दीखता हैं जो अध्यात्म आधारों के सहारे बड़े महत्वपूर्ण प्रयोजन सिद्ध होते रहने की आशा दिलाता रहा हैं। उच्चस्तरीय सिद्धियों और साधना द्वारा व्यक्तित्व के देवोपम बनने की मान्यता पर विश्वास कराता रहा हैं।

वर्तमान परिस्थितियाँ सन्निपात जैसी बन गई हैं। मनुष्य में विकसित पशुता द्वारा पतन के गर्त में गिरने का प्रोत्साहन, विज्ञान द्वारा नास्तिकता का पोषण तथा आत्मिक क्षेत्र में बढ़ रही विडम्बनाओं की भरमार जनमानस को इतना भ्रमित कर रही हैं कि उनका जनमानस को इतना भ्रमित कर रही हैं कि उनका प्रतिफल विनाशकारी रूप धारण करके ही सामने आ सकता है। वही हो भी रहा है।


Quotation

जब पानी का दबाव अधिक होता हैं तो झरने व नदियाँ तीव्रगति से बहते हैं। उनकी लहरे उछलती, हिलोरें लेती, कल-कल निनाद करती चलती हैं। पानी का दबाव न हो तो न केवल जल धारा मन्द होती हैं, वरन् निर्जीव दिखाई देती हैं। यही अंतर हैं आदर्शवादी महामानवों व सामान्य व्यक्तियों में।


विशेष लेख माला-६ - प्रगति के त्रिविधि अवलम्बन

यह सुनिश्चित तथ्य है कि मनःस्थिति ही परिस्थितियों की जन्मदात्री है। मान्यताएँ और भावनाएँ ही व्यक्तित्व का गठन करती हैं और मनुष्य को उसी स्तर का बना देती हैं। विचार बीज और कार्य उसके द्वारा उत्पादित पौध। व्यक्ति का नीतिवान, समाजनिष्ठ, कर्तव्यपरायण, धर्मात्मा एवं परमार्थी बन सकना तभी संभव है, जब उसके अन्तःकरण में उत्कृष्ट आदर्शवादिता ने गहरी जड़े जमा ली हों। भ्रष्ट चिन्तन तो दुष्ट आचरणों को ही जन्म देगा और उस विषवृद्धि के समर्थ होने पर परिस्थितियाँ अनर्थकारी स्तर की ही बन कर रहेंगी।

इन दिनों विज्ञान और बुद्धिवाद की अभिवृद्धि ने सुविधा-साधनों के अम्बार खड़े कर दिये हैं। पूर्वजों की तुलना में भौतिक दृष्टि से हम कहीं सुविधा सम्पन्न हैं। सम्पदा की उपलब्धि को यदि प्रगति कहा जाय, तो मानना पड़ेगा कि पूर्वजों की तुलना में हम कहीं आगे हैं, पर वस्तुतः ऐसा है नहीं। जनसाधारण का शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य बुरी तरह गड़बड़ा रहा है। दुर्बलता और रुग्णता दिन-दिन तूफानी गति से बढ़ती जा रही है। अस्पताल, डॉक्टर और औषधि आविष्कारों ने हमें स्वस्थ और समर्थ बनाने में कोई सहायता नहीं की हैं, कारण कि आहार-विहार में बढ़ा हुआ असंयम स्वस्थ जीवन के मूलभूत आधार को ही नष्ट किये दे रहा है। पैसा बढ़ा हैं, पर उसके साथ ही दुर्व्यसनों और प्रदर्शनों के निमित्त होने वाले अपव्यय की इतनी वृद्धि है कि हर कोई अपने को अभावग्रस्त अनुभव करता है। कामचोरी, हरामखोरी को प्रश्रय मिलते रहने पर किसी भी क्षेत्र में वास्तविक एवं अभीष्ट रहने पर किसी भी क्षेत्र में वास्तविक एवं अभीष्ट प्रगति को नहीं सकती। गुण, कर्म, स्वभाव में घुसे हुए दुर्गुण आये दिन ऐसे संकट खड़े करते रहेंगे, जिसका समाधान करने में भौतिक उपचार एवं अनुदान कुछ काम न आ सकें। बढ़ते हुए अविश्वास, असहयोग अनाचार के पीछे चरित्रभ्रष्टता ही मूल कारण है। क्रोध और अनाचार से अनाचार बढ़ता है। यह विपन्नता आज संसार के समूचे जलाशय पर जल कुम्भी-काई की तरह छायी दीखती है और जलाशय से मिलने वाले लाभों का अन्त हो रहा हैं। पथभ्रष्ट को किस प्रकार कँटीली झाड़ियों से संत्रस्त होना पड़ता है, इसे हममें से प्रत्येक को सर्वत्र घटित होते देखा जा सकता हैं।

प्रदूषण, विकिरण, पर्यावरण, अपराध, छल आदि के जो संकट व्यापक रूप से गहरा रहे हैं, उनकी परिणति की कल्पना और चिन्ताजनक हैं। बढ़ती हुई जनसंख्या के लिए आवश्यक साधन जुटा सकना कठिन प्रतीत होता हैं। अवांछनीयता और वातावरण में संव्याप्त विपन्नता कैसे पनपी? इसका उत्तर वस्तुओं की कमी होने की बात कहने से नहीं मिल सकता। मानना यही पड़ेगा कि विचार क्षेत्र में बढ़ती हुई उद्दण्डता, आपाधापी का प्रदूषण ही उन समस्याओं के लिए उत्तरदायी है, जो अप्रसन्नता और अव्यवस्था का निमित्त कारण बनी हुई हैं।

अवशेष संक्षेप में यही निष्कर्ष निकलता है कि नीतिनिष्ठा और समाजनिष्ठा के आदर्शों की अवहेलना करने पर ही समूचा मनुष्य समुदाय उस विपत्ति में फँसा है, जिससे निकलना और उबरना असंभव नहीं तो कम से कम सहज तो प्रतीत नहीं होता है। आशा की किरण एक ही हैं-लोकमानस का परिष्कार, आदर्शों का परिपालन, विचारों का परिशोधन, चरित्र और प्रयासों में आदर्शों का सम्पुट लगाया जाना। उसके बिना प्रस्तुत असंख्यों समस्याओं में से एक का भी सीधा समाधान मिलना नहीं हैं।

इसी महान प्रयोजन की पूर्ति अध्यात्म तत्त्वज्ञान से होती हैं। भावनाओं और मान्यताओं का उदात्तीकरण इसी आधार पर संभव हैं। प्रस्तुत विश्व समस्याओं का निराकरण भी यही हैं। व्यक्तियों को भ्रान्तियों एवं अवांछनीयता से मुक्त करके ही उन्हें मौज से रहने, और रहने देने की स्थिति में आया जा सकता है। हँसती-हँसाती जिन्दगी मिल बाँट कर खाने की प्रवृत्ति, झपटने-हड़पने की अपेक्षा सेवा सहायता में रुचि लेने की रीति-रीति ही मनुष्य को सच्चे अर्थों में मनुष्य बना सकती है और उन सारी विपत्तियों से एक बारगी छुटकारा दिला सकती हैं जिनके कारण कि महाविनाश की आशंका पनप रही हैं।

उपरोक्त उद्देश्यों की पूर्ति के लिए प्रचलित भाषा में जिसे विचार क्रान्ति कहा जाता है और पुरातन सोच के अनुसार जन मानस का परिष्कार कहा जा सकता है, इस मर्यादा को अन्तःकरण ही गहराई तक पहुँचाने में मात्र अध्यात्म तत्त्वदर्शन ही समर्थ हो सकता हैं। इस प्रकार समर्थ एवं प्रखर अध्यात्म से ही यह आशा की जा सकती हैं कि व्यक्ति और समाज के सामने प्रस्तुत असंख्यों विपन्नताओं-विभीषिकाओं का समाधान वह कर सकेगा।

इसके अतिरिक्त वह शक्ति भी जीवन्त अध्यात्म में ही है जो सर्वतोमुखी समर्थता और प्रगतिशीलता से जन साधारण को लाभान्वित कर सके। अध्यात्म की चर्चा सिद्धियों के संबंध में भी होती रहती है और कहा जाता रहा है कि सतयुग की वापसी जैसा सुखद वातावरण यदि उससे विनिर्मित करना हो तो मनुष्य को समझना और समझाना पड़ेगा कि जिस प्रकार शरीरबल, धनबल, बुद्धिबल, कौशल बल आदि के सम्पादन कर प्रयत्न किया जा रहा है, उससे बढ़ कर आत्मबल का उपार्जन-अभिवर्धन होना चाहिए। उज्ज्वल भविष्य की संरचना इसी आधार पर हो सकेगी। इक्कीसवीं सदी में जिन सुखद भवितव्यताओं की अपेक्षा की जा रही है, उसके लिए दैवी शक्ति के रूप में अध्यात्म का सर्वतोमुखी संवर्द्धन होना चाहिए। आज की सबसे बड़ी आवश्यकता एवं दूरदर्शिता यही हैं। कठिनाई यह है कि परिस्थितियों को देखते हुए अध्यात्म के संबंध में उसकी प्रामाणिकता संदिग्ध हो चली है। भौतिक विज्ञान और प्रच्छन्न अध्यात्म ने मिलजुल कर ऐसा वातावरण बनाया है। जिससे श्रद्धा डगमगाती है और आत्मसाधना का कोई सर्वसाधारण की प्रवृत्ति को मोड़ना अतिशय कठिन हो रहा है।

वास्तविकता और अवास्तविकता के बीच बने रहस्य उद्घाटित करने के लिए परोक्ष-दैवी नियोजन ने सर्वसाधारण के सामने एक सुयोग प्रस्तुत किया है। शान्तिकुञ्ज की भूतकालीन गतिविधियों में यदि कुछ आनन्ददायक और उत्साहवर्धक है, तो उसका श्रेय आत्मशक्ति को ही जाता है। भले ही प्रयोक्ता कोई भी व्यक्ति क्यों न रहा हो? भूतकाल में सभी का उल्लेख हो चुका। इन दिनों जो तैयारी चल रही है उसे भी इसी स्तर का समझा जा सकता है कि कोई सर्वशक्तिमान नियोजन कार्यान्वित होने जा रहा है। अगले दिनों जो होने जा रहा है, जो नियोजन बन रहा है, उसे भी इस भाषा में कहा जा सकता है मानों कोई सत्ता असंभव को संभव करने जा रही हो।

युगपरिवर्तन के भूत कालीन, आज के और भावी प्रयत्नों को जोड़कर देखा जाय तो इसे आत्मशक्ति से समाज संरचना के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता है। इतने पर भी पूर्व असमंजस जहाँ का तहाँ अड़ा रह जाता है कि बात यदि ऐसी है तो इतने बड़े समुदाय द्वारा अपनाई जा रही प्रक्रिया अपने द्वारा किसी महत्वपूर्ण संरचना का परिचय क्यों नहीं दे रही हैं?

यह साधारण असमंजस नहीं हैं। इसके निराकरण के ऐसे समाधान कारक प्रमाण चाहिए जो अविश्वास को विश्वास में बदल सके। साथ ही यह रहस्योद्घाटन भी कर सके कि सशक्त और सही अध्यात्म का स्वरूप क्या हो सकता है जो अपनी प्रखरता का परिचय दे सके और साथ ही इस तथ्य से भी सर्वसाधारण को अवगत कराया जाना चाहिए कि वे अभाव क्या हैं, जिनकी उपेक्षा के कारण पूजा पत्री और कथा-वार्ता मात्र विडम्बना बनकर रह गई और दिग्भ्रान्त लोगों को किस कारण से असफलताएँ हस्तगत हुई, जो केवल उनको असमर्थ और उपहासास्पद बनाती रहीं, लोक श्रद्धा, डगमगाती रहीं विचारशीलों को उस उत्साह से वंचित भी करती रहीं कि वे सही दिशा धारा अपना कर अपने को और अपने समूचे समूह को कृतकृत्य बनाते।

इन समस्त साधनों के लिए शान्तिकुञ्ज के संचालकों को निजी जीवन में अपनाये गये उन तथ्यों पर प्रकाश डालना पड़ रहा है जिनसे वह भूतकाल को साक्षी रूप में प्रस्तुत करते हुए, वर्तमान क्रिया–कलापों के औचित्य पर विश्वास करने की मनःस्थिति पैदा कर सकता है। साथ ही भावी योजना के लिए जितनी जनशक्ति और साधनाशक्ति की अपेक्षा होगी उसे सफल सम्पन्न कर सकता है। इससे शक्ति संचय हेतु किये गये पुरुषार्थ और तद्नुरूप दैवी अनुकम्पा के सहयोग की सम्भावना का रहस्य आसानी से समझा जा सकता हैं।

प्रस्तोता ने पूजा अर्चा की उपेक्षा की हो सो बात नहीं। इस दिशा में सघन विश्वासी जो कर सकता है, वह भी उनने दुस्साहस स्तर का पूरा किया है। पर साधना को ही उन प्रयोगों में अपनाया है जिन्हें अध्यात्म का प्राण कहा जा सकता है।

कपड़े को धोने के बाद ही उस पर रंग चढ़ता है। लोहा तो भट्टी में गलने के उपरान्त ही अभीष्ट स्तर के उपकरण ढलने योग्य बनता हैं पात्रता के अनुरूप ही अनुदान मिलते हैं। इन उदाहरणों की चर्चा इस संदर्भ में की जा रही हैं कि अध्यात्मवादी को निजी व्यक्तित्व के परिष्कार को प्राथमिकता देनी चाहिए और उसकी शोभा सज्जा के लिए जप-तप को प्रश्रय देना चाहिए। यही है प्रयोक्ता का अनुभव और प्रतिदान जो साक्षी रूप में इसलिए प्रस्तुत किया जा रहा है कि जिसने इस दिशा में चलने का साहस जुटा लिया है उसे यह भी जानना चाहिए कि समग्र साधना सम्पादन के लिए किन तथ्यों को अविस्मरणीय मानते हुए अपनाने की तैयारी करनी चाहिए।

इन पंक्तियों के लेखक ने अध्यात्म विज्ञान के रहस्यों की प्रेरणा, अनुसंधान, अनुभव के आधार पर यह जाना ओर माना है कि आत्म विज्ञान की त्रिवेणी संगम की तरह तीन दिशा धाराएँ हैं। (१) उपासना (२) साधना (३) आराधना। तीनों के समन्वय से ही एक पूरी बात बनती हैं।

मनुष्य अन्न पानी, और हवा के आधार पर जीता हैं। तीन लोक प्रसिद्ध है। तीन देवता प्रमुख कहे गये हैं। भूत, वर्तमान और भविष्य समय के तीन काल माने जाते हैं। जीव, ईश्वर, और प्रकृति के समन्वय से संसार चल रहा है। इसी प्रकार यह भी माना जाना चाहिए कि (१) उपासना (२) साधना (३) आराधना का समन्वय ही आत्मशक्ति के उपार्जन को सुनिश्चित करता है। इन्हें समान रूप से अपनाया जा सके तो कोई कारण नहीं कि जिन चमत्कारी ऋद्धि-सिद्धियों को अध्यात्म की परिणति माना जाता है, वे अक्षरशः सही सिद्ध न हों। तीनों की संक्षिप्त विवेचना यहाँ प्रस्तुत हैं।

(१) उपासना-निकट बैठना। ईश्वर को सर्वतोभावेन आत्मसमर्पण करना। उसके निर्देश और अनुशासन को इस सघनता के साथ अपनाना मानों आग और ईंधन, नाला और नदी एक हो गये हों। एक ने अपनी इच्छा, अस्तित्व और सत्ता समाप्त कर दी हो और दूसरे में अपने को लय करने में कोई कमी न रखी हो। पूजा पाठ इसी मनःस्थिति को विनिर्मित करने का एक माध्यम है, अपनाया उसे भी जाय किन्तु सद्भावनाओं, सत्प्रवृत्तियों का समन्वय अर्थात् ईश्वर। विराट ब्रह्म विशाल विश्व अर्थात् ईश्वर। इसका कोई नाम रूप नहीं। व्यापक सत्ता निराकार ही हो सकती है। फिर भी कोई उसकी इच्छित कल्पना एवं स्थापना अपने मन से कर सकता है। प्रस्तोता उसका नाम गायत्री मंत्र के शब्दों में और सविता उदीयमान स्वर्णिम सूर्य के रूप में अपनाता रहा है। दूसरे अपनी इच्छानुसार और अन्य नाम रूपों को भी मान्यता में सन्निहित कर सकते हैं।

साम्प्रदायिक प्रचलनों, रीति रिवाजों को भी ईश्वर की वाणी कहते रहे हैं। यह समयानुसार परिवर्तनशील है। इसलिए इन्हें भी सामयिक उपयोगिता की कसौटी पर कसते हुए मान्यताओं के रूप में स्थिर किया जा सकता हैं।

(२) ईश्वर प्राप्ति की पात्रता अर्जित करने का दूसरा अवलम्बन है-साधना-अर्थात् जीवन साधना। सध हुआ संयमी जीवन। मानवी गरिमा के अनुरूप क्रियाएँ, मर्यादाओं का अवलम्बन और वर्जनाओं का निरस्तीकरण, सभ्यता एवं सुसंस्कारिता की अवधारणा। उत्कृष्ट आदर्शवादिता के अनुशासन का अवधारण। संचित कुसंस्कारों का गुण, कर्म स्वभाव से निष्कासन। देव मानव स्तर के गुण, कर्म, स्वभाव का अवलम्बन, अभिवर्धन। सरकस के जानवरों जैसा आत्मशिक्षण, सुरम्य उद्यान स्तर का सुनियोजित जीवनयापन। संस्कारों को यह पवित्र बनाने वाली साधना है। तपश्चर्या की संयम साधना से तुलना इसी कारण की जाती हैं।

(३) आराधना-अर्थात् उदारता। देने में प्रसन्नता। लेने में संकोच। सादा जीवन उच्च विचार। न्यूनतम में निर्वाह। बचत का सर्वतोमुखी सुसंस्कारिता के लिए नियोजन। गिरों को उठाने और उठों को उछालने में अभिरुचि। इसी को पुण्य-परमार्थ कहा जाता है। दान की परम्परा यही है। ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ और ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु' के दोनों सिद्धान्त इसी आधार पर विनिर्मित है। धर्म-धारणा और सेवा साधना का निर्वाह भी आराधना और सेवा साधना का निर्वाह भी आराधना के अंतर्गत आता है। देवत्व की प्रवृत्ति एवं रीति-नीति भी यही हैं।

अध्यात्म तत्त्वज्ञान उपासना, साधना, आराधना के समन्वय पर अवलम्बित है। इन तीनों को जीवनचर्या की हर क्रिया प्रक्रिया के साथ जोड़ना पड़ता है और ध्यान रखना पड़ता है कि इसके विपरीत तो कुछ नहीं बन पड़ रहा है।

आराधना का एक पक्ष है शुभ का संवर्द्धन और दूसरा है अशुभ का उन्मूलन। इन्हें सहयोग और संघर्ष के नाम से जाना जाता है।

बोने और काटने का सिद्धान्त आराधना विज्ञान के अंतर्गत ही आता है। न्यायनिष्ठा एवं औचित्य का नीर-क्षीर विवेक भी आराधना का ही एक भाग है।

पात्रता अर्जित करने के लिए उपासना, साधना और आराधना के त्रिविध प्रयत्न करते रहने की आवश्यकता होती है। इसी आधार पर आत्मिक स्वस्थता बन पड़ती है। पूजन, अर्जन, उपहार, आदि क्रिया-कृत्यों को भी आत्म साधना का अंग माना जाता है पर वह ऐसा ही है जैसा कि स्वस्थ शरीर पर धुले वस्त्र और श्रृंगार साधनों की सुसज्जा। आवश्यकता उसकी भी है पर उसे महत्व इतना ही देना चाहिए जितना कि अपेक्षित है। पूजा कृत्यों को कलेवर और आत्म साधना को यदि प्राण समझा जाय तो भी ठीक है। दोनों के बीच अविच्छिन्न संबंध है। पूर्णता तक पहुँचने के लिए जीवन शोधन की वह तत्व है जिसे शक्ति भावना की जड़ों के सहारे सींचा और आगे बढ़ाया जाता हैं।

इन पंक्तियों के लेखक के द्वारा भूतकाल में जो सफलताएँ पाई गई हैं। वर्तमान में जो योजनाएँ बनाई गई हैं और भविष्य के लिए जो तैयारियाँ की गई हैं, उनकी सफलताओं का रहस्य इस एक ही केन्द्र पर केन्द्रित समझा जा सकता हैं कि उसने आत्म परिष्कार के उपरोक्त तीनों आधारों का समग्र निष्ठा के साथ अपनाया है। इस संदर्भ में अन्य सफलता प्राप्ति के इच्छुकों को भी इसी समग्रता का अनुकरण करना चाहिए।


Quotation

मेले ठेलों में लकड़ी के घोड़ों पर बैठ कर चक्कर खाने वाले यदि समझ बैठे कि मंजिल तय कर ली तो यह उनकी भूल है। क्योंकि चक्कर खाकर घोड़े जहाँ के तहाँ बने रहते हैं। बैठने वालों को चक्कर भी आते हैं और गिर पड़ते हैं। किन्तु रहते वही है, पहुँचते कहीं नहीं। इसी प्रकार बचपन से बुढ़ापे तक की मंजिल लगती तो ऐसी है जैसे कितनी दूर का कितने समय का फासला तय कर लिया गया है। किन्तु पहुँचते कहीं नहीं। उसी उधेड़बुन में जन्मते, पलते बड़े होकर मर जाते हैं। भ्रम यह बना रहता है कि हम बहुत आगे बढ़ गये है। अधिकांश यही भ्रम पाले जीते देखे जाते हैं।


विशेष लेख माला-७ - समय सम्पदा का श्रेष्ठतम सदुपयोग

लेने और देने दोनों का ही अपने-अपने स्थान पर अपना-अपना महत्व है। इस सुविस्तृत प्रसंग पर गंभीरतापूर्वक विचार करते हुए “दान” के सम्बन्ध में भी वैसा ही विचार करना पड़ता है। दान देते समय प्रसन्नता एवं गर्व-गौरव की अनुभूति होती है। लेने वाले से कृतज्ञ, सहयोगी, प्रशंसक बनने की अपेक्षा रहती हैं। देखने-सुनने वाले उदार व्यक्तित्व की झाँकी करते और समय-समय पर प्रशंसा भरी चर्चा करते हैं। विश्वस्त मानते और परोक्ष रूप से सहायक बनते हैं। इसके अतिरिक्त पापों के प्रतिफल से छुटकारा, पुण्यों की अभिवृद्धि, स्वर्ग और मुक्ति के प्रति-अमुक देवता की अनुकम्पा जैसी कितनी ही उपलब्धियों की आशा की जाती है जो खर्ची हुई राशि की तुलना में कहीं अधिक लाभ मिलने का आश्वासन दिखाती हैं। इतने पर भी इस संदर्भ में फूँक-फूँककर कदम उठाने की आवश्यकता समझी जाती हैं।

संकटग्रस्तों, अभावग्रस्तों की सहायता करने में धन का सदुपयोग ही है। सुविधा-संवर्द्धन के लिए कई लोग धर्मशालाएँ सदावर्त आदि ऐसा भी विनियोग करते हैं, जिनका लाभ सत्पात्रों को कम और कुपात्रों को अधिक मिलता है। मुफ्त औषधि वितरण की व्यवस्था को सराहा तो जाता है, तीर्थयात्रा पर-प्रीतिभोजों पर किये जाने वाले खर्च भी वास्तविक हित-साधन कितना कर पाते हैं-इसके लिए उपयोग की प्रक्रिया पर भी ध्यान देना-होगा लाखों-करोड़ों की संख्या में भिखारियों की संख्या बढ़ाने वालों ने गृहस्थों से स्वावलम्बन और आत्मगौरव छीना है। ऐसा कुप्रचलन बढ़ाया है, जिसने आदर्शनिष्ठा को, मानवी गरिमा को गिराने में ही सहायता की है। भिक्षा भी एक व्यवसाय गिना जाने लगने से देश का गौरव बढ़ा नहीं, वरन् गिरा ही हैं। इसलिए विचारशील वर्ग में उसे अनुचित ठहराया गया और हेय कहा गया है। प्रीतिभोजों से बची हुई जूठन मुफ्त में लेते रहने वाले वर्ग भी अब उस परम्परा को छोड़ रहे हैं। पहने हुए कपड़ों की उतरन सस्ते या मुफ्त में मिलने पर भी लेने वाला लजाता है और उस लाभ को संकोचपूर्वक ही ग्रहण करते-करते असमंजस में पड़ता हैं। आपत्तिग्रस्त दुर्घटना में फँसे हुए लोगों के अतिरिक्त अन्य लोग भिक्षास्तर के अनुदानों को अस्वीकार करते हैं। जिन संस्थाओं को दान देने पर इनकम टैक्स की छूट मिलती हैं, उन्हें साझीदार बना कर कई चतुर लोग दानी भी बन जाते हैं और आर्थिक लाभ भी उठा लेते हैं। चन्दाजीवी, धन्धेखोर भी ऐसी ही उलटी-पुलटी विसंगतियाँ बनाते रहते हैं। ऐसी दशा में यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि धन दान करें तो किसी हद तक पुण्य कमाया या पाप घटाया। दहेज का लेन-देन भी कहने की दृष्टि से दान ही बन जाता है।

देवालय और तीर्थ कभी लोकशिक्षण की अतिमहत्त्वपूर्ण आवश्यकता की पूर्ति करते रहे होंगे। कोई समय ऐसा भी रहा होगा, जब लोकमंगल के लिए समर्पित पुरोहित वर्ग आकांक्षीवृत्ति पर अपरिग्रही रीति-नीति अपनाये रहा होगा। तब उन्हें दान-दक्षिणा देने की भी उपयोगिता थी, पर जब वह अधिकार वंश और वेश के आधार पर उनके हिस्से में चला गया, तो उनकी परिणति क्या हुई?, इसकी विवेचना करते किस प्रकार बन पड़े। देवालय कभी धर्म प्रचार केन्द्र थे, पर आज तो उनमें मात्र मनोकामना पूरी कराने के लिए उसी स्तर के देवताओं को बदले में अनेक गुना लाभ देने के लिए मनाया जाता रहता हैं।

यहाँ मात्र इतना कहा जा रहा है कि कृपाओं को ही यदि धन दान दिया जाना हो तो मुट्ठी खोलने से पहले हजार बार यह भी विचार कर लेना चाहिए, कि इसकी परिणति क्या हुई या क्या हो सकती है? गिरों को उठाने और उठों को उछालने जैसी सत्प्रवृत्तियों के संवर्द्धन में सहायक होने वाले दान सदा से सराहनीय एवं श्रेयस्कर रहे हैं। उस पुनीत परम्परा को तो अभी भी और भविष्य में भी जीवन्त बनाये रहने की, रखे जाने की आवश्यकता हैं।

यहाँ इन पंक्तियों में एक नया सोच प्रस्तुत किया जा सकता हैं कि मानवता को लगे घावों को भरने के लिए जिस दान-पुण्य की परमार्थिक आवश्यकता हैं, उसके लिए उपयुक्त माध्यम जन-मानस का परिष्कार होना चाहिए। यह बन पड़ते तो समझना चाहिए कि इस क्षेत्र की उर्वर भूमि में बोया गया प्रत्येक बीज ऐसे प्रतिफलों से लदा रहेगा जिसमें प्रस्तुत संकटों को टालने से लेकर भविष्य में हर क्षेत्र को समृद्धिमय बनाने की क्षमता होगी। विचार परिमार्जन से लेकर सत्प्रवृत्ति संवर्द्धन तक की परिधि में आने वाले पुनीत कार्य ही ऐसे है जिनके लिए स्वयं आधे पेट रह कर भी भाव भरे अनुदान प्रस्तुत करने की उदारता दिखाई जानी चाहिए। व्यक्ति और समाज का सर्वतोमुखी कल्याण उन्हीं भाव-संवेदनाओं के साथ अविच्छिन्न रूप से जुड़ा हुआ हैं।

सर्वोच्च स्तर का ब्रह्मदान है सत्प्रयोजनों के लिए अधिकाधिक मात्रा में समयदान का-नियोजन क्योंकि वह तभी बन पड़ेगा, जब उसके पीछे श्रद्धा, सद्भावना और शालीनता के अभिवर्धन का गहरा पुट हो।

भगवान ने मनुष्य को सृष्टि का सर्वोत्तम प्राणी बनाया है और साथ ही शारीरिक, मानसिक क्षमताओं का अजस्र भण्डार भी विपुल मात्रा में दिया है। इसे अन्य प्राणियों के साथ किया गया अन्याय या मनुष्य के साथ बरता गया भाई भतीजावाद स्तर का पक्षपात नहीं समझा जाना चाहिए। यह सामंतों से उनकी संतान को उत्तराधिकार में मिलने वाला मुफ्त का कोष या भण्डार नहीं है जिसे कुकर्मों और दुर्व्यसनों में भी मनमाने ढंग से खर्च कर डालने की छूट मिली हो। अन्य प्राणियों की तुलना में मनुष्य को, जो कुछ भी अतिरिक्त रूप से मिला है वह एक विशुद्ध धरोहर है। उसे ऐसी अमानत समझा जाना चाहिए जिसे मात्र विश्व वाटिका को अधिक सुरम्य और अधिक सुसंस्कृत बनाने के लिए ही खर्च किया जा सकता है। सरकारी खजाने में बड़ी सम्पदा जमा रहती है, पर उसमें से खजांची किसे कितना दे, यह शासकीय निर्धारणों पर ही निर्भर है। बैंक के कोषाध्याक्षों की तिजोरी में भी प्रचुर सम्पदा रहती है और उस तिजोरी की चाभी-कुँजी नियुक्त खजांची ही सँभालते हैं। इतने पर भी वे उसमें से निजी प्रयोजन के लिए अथवा अनधिकारी कामों के लिए एक पाई भी खर्च नहीं कर सकते। यदि वे लोग उस धन को ले भागें या मनमाना खर्च करने में उड़ा दें तो इसे अनाधिकारपूर्व चेष्टा माना जायगा। अमानत में खयानत करने का मुकदमा चलेगा और जेल ही न जाना पड़ेगा वरन् उस हड़पे हुए धन को घर घूरा बेचकर भी वापस जमा करना पड़ेगा

इस तथ्य को भुला देने वाले ही ईश्वर प्रदत्त बहुमूल्य सम्पदा, जीवनकाल की अवधि का मनमाने ढंग से दुरुपयोग करते हैं और बदले में अपना लोक-परलोक बिगाड़ते हैं। पैसा तो मनुष्य का अपना कमाया हुआ है इसलिए उसमें की जाने वाली धाँधली को तो दरगुजर भी किया जा सकता है, पर समय सम्पदा की बरबादी तो खुली डकैती के सदृश्य है। इसे असाधारण स्तर का अनाचार कहा जा सकता हैं। ईश्वर के प्रति विद्रोह भी, जीवन के साथ की गई खिलवाड़ भी।

मनुष्य की आवश्यकताएँ अत्यन्त स्वल्प हैं। उसकी उपार्जन क्षमता इतनी अधिक है कि कुछ ही घण्टे श्रम साधना से निर्वाह की उचित आवश्यकताएँ पूरी की जा सकती हैं। सात घण्टे सोने में, आठ घण्टे कमाने में, पाँच घण्टे इधर उधर के कामों में खर्च कर लेने पर भी बीस घण्टे से अधिक रोज कुआँ खोदने और रोज पानी पीने वाले को भी खर्चने नहीं चाहिए। चौबीस घण्टे समय में से चार घण्टे हर किसी के पास इसलिए बच जाते हैं कि उन्हें ईश्वर द्वारा निर्धारित प्रयोजनों के लिए लोकमंगल के लिए, सत्प्रवृत्ति संवर्द्धन के लिए लगाया जा सके। पर जो इस अनुशासन को पूरी तरह भूल जाते हैं। सारा समय विलास, संग्रह, मनोरंजन एवं अवांछनीय प्रयोजनों के लिए खर्च है कि वे आत्मा और परमात्मा के साथ विश्वासघात कर रहे हैं। जो कर्तव्यों को अवहेलना में ही निरत हैं। उन्हें ऐसी ऊत सूझ रही है जैसी कि उन्मादियों और आतंकवादी, अनाचारियों को सूझती रहती हैं।

यह आपत्तिकाल जैसा समय है। अग्निकाण्ड, तूफान, भूकम्प, दुर्भिक्ष, महामारी, बाढ़, दुर्घटना जैसे समय में तो हर भावनाशील को अपने निजी आवश्यक कामों को छोड़ कर भी उस विपत्ति में सहायता करने के लिए दौड़ना पड़ता है। उस समय निष्ठुरता धारण करके यदि कोई मूकदर्शक बना रहे और गुलछर्रे उड़ाने में निरत रहे तो वह सर्वत्र धिक्कारा जाएगा जो सुनेगा, देखेगा, वह भी इस निष्ठुरता को धिक्कारे बिना रहेगा नहीं। आत्मा ओर परमात्मा की दृष्टि से भी इस प्रकार की उपेक्षा का बरता जाना अक्षम्य ही समझा जायगा।

लूट, बलात्कार, हत्या, डकैती जैसे अपराध आँखों के सामने होते रहें, पर जो समर्थ होते हुए भी उन अनाचारों की रोकथाम के लिए टस से मस न हो तो उसे भी अपराधियों की श्रेणी में ही गिन लिया जाता हैं।

समय की सम्पदा को जिस भी प्रयोजन के लिए लगाया जाय, उसी स्तर की फल पक कर सामने आती है। लोभ, मोह और अहंकार के लिए, वासना, तृष्णा के लिए बौनी समझ के लोग उसे लगाते हैं, फलस्वरूप शोक-सन्ताप कलह-पतन के पराभव भुगतते हैं। इसी प्रचलन ने व्यक्ति और समाज को ऐसे जंजालों में फँसा दिया है जिनमें विनाश और विग्रह के अतिरिक्त और कुछ मिलता ही नहीं दीख पड़ता। आवश्यकता इस अभ्यास को आदि से अन्त तक बदलने की है। देवमानवों को मात्र पुण्य और परमार्थ ही सुहाता था, अन्तराल की शक्तियों और बहिर्जगत की सम्पदाओं को सत्प्रवृत्ति संवर्द्धन के लिए लगाया जाता था। वे अपनी सामर्थ्य का नियोजन अपने और परायों का कल्याण करने में ही निरत रहते थे। फलतः सर्वत्र सतयुगी वातावरण बिखरा दीखता था और दैवी अनुग्रह अमृत वर्षा की तरह बरसता था। अभ्युदय के सभी द्वार खुल रहते थे और यहाँ के वातावरण को स्वर्गोपम बनाते थे।

पिछली शताब्दी में गिरने और गिराने का मार्ग अपनाया गया उसने नारकीय परिस्थितियाँ उत्पन्न करके रख दी हैं। इस अनाचार से प्रकृति और परमेश्वर दोनों को ही भारी कष्ट हुआ है। उनने कुमार्गगामियों को कड़ी प्रताड़ना देकर सीधे रास्ते पर चलाने का निश्चय किया है। साथ ही जो विनाश हो चुका है, उसे नये सिरे से सुधारने का भी। लंकाध्वंस और धर्मराज की स्थापना की त्रेता वाली दुहरी प्रक्रिया पुनः दुहराई जा रही हैं। इस भवितव्यता में सम्मिलित होकर श्रेयाधिकारी बनने की मानसिकता वाले हनुमान, जामवन्त, नल-नील ढूँढ़े जा रहे हैं। देवताओं को मनुष्य कलेवर धारण करके इस नवसृजन के लिए परमसत्ता द्वारा आमंत्रित किया जा रहा है। जो सहमत हो रहे हैं उनसे एक ही अपेक्षा की जा रही है-महाक्रान्ति के लिए समयदान। इन दिनों यही एक कार्य है-हरिश्चन्द्र भामाशाह स्तर का उदार आचरण। इसे अपनाने वाले लगभग उतने ही बड़े श्रेय के अधिकारी बनेंगे जिसे अब तक मात्र परमेश्वर को ही दिया जाता है। राम की प्रतिष्ठा के लिए जितने देवालय बने हैं, उनसे हनुमान के मन्दिर अधिक ही हैं।

यह चिन्ता करना व्यर्थ है कि अपनी समस्त सम्पदा यदि महाकाल की पुकार सुनकर नवसृजन के लिए लगा दी गई तो हमें घाटा पड़ेगा। वस्तुतः यह नफे का सौदा है। संसार भर के महामानवों का इतिहास इस तथ्य का साक्षी है कि परमार्थी देव-पुरुषों ने जो खपाया उसकी तुलना में पाया कहीं अधिक हैं। मात्र संकीर्णता के वशीभूत होकर ही लोग युगधर्म निबाहने और समय की पुकार सुनने में आना कानी करते हैं, पर जिनने भी इस प्रयोजन के लिए साहस बटोरा है, वे कृतकृत्य होकर रहेंगे ओर लोकहित के निमित्त इतना कुछ कर सकेंगे जिसके लिए उसे अनुकरणीय अभिनंदनीय देवमानव के रूप में अनंतकाल तक स्मरण किया जा सके।

भगवान का द्वार निजी प्रयोजनों के लिए अनेकों खटखटाते पाये जाते हैं। पर अब की बार भगवान ने अपना प्रयोजन पूरा करने के लिए साथी-सहयोगियों को पुकारा है। जो इसके लिए साहस, जुटाएँगे, वे लोक और परलोक की सिद्धियों-विभूतियों से अलंकृत होकर रहेंगे। शान्तिकुञ्ज के संचालकों ने यही सम्पन्न किया और अपने को अति सामान्य होते हुए भी अत्यन्त महान कहलाने का श्रेय पाया है। अपेक्षा जाग्रत आत्माओं से भी इन दिनों ऐसा अनुकरण करने की की जा रही हैं।


विशेष लेख माला- ७ - प्रगति के चार चरण

पुण्य परमार्थ के लिए कौन सा क्षेत्र चुनें? किस दिशा धारा को अपनाएँ, अपने लिए क्या कार्यक्रम भावी जीवन के नियोजन हेतु अपनाएँ? समयदान की श्रद्धाञ्जलि किस देवता के चरणों में अर्पित करें? प्राणवान परिजनों के सामने प्रस्तुत इन समस्त प्रश्नों का उत्तर एक ही है कि जन जीवन में गहराई तक घुसी हुई विकृतियों का उन्मूलन। क्योंकि व्यक्ति और समाज की, स्थानीय। क्योंकि व्यक्ति और समाज की, स्थानीय एवं संसार में संव्याप्त अगणित विपन्नताएँ आस्था संकट के कारण ही उत्पन्न हुई हैं। भ्रष्ट चिन्तन ही दुष्ट आचरणों की जन्मदात्री हैं और उसी के कारण समूचा वातावरण अवांछनीय विपन्नता से भर गया है। यदि प्रचलित मानसिकता को बदला जा सके तो उन अगणित समस्याओं का सहज समाधान निकल सकता हैं जो सर्वत्र हाहाकार मचाए हुए है और सर्वनाश की चुनौती दे रहा है।

लोक मानस का परिष्कार अनुपयुक्त प्रचलनों का परिवर्तन, शालीनता की रीति-नीति को प्रश्रय इस एक ही उद्देश्य को विचारक्रान्ति-महाक्रान्ति-जनमानस का परिष्कार “युग परिवर्तन” आदि नामों से जाना जा सकता हैं। बात एक ही है पर उसे नाम कितने ही अन्य भी दिये जा सकते हैं। धर्मधारणा, सेवा साधना भी यही है।

यों सुविधा संवर्द्धन के लिए बनाये हुए अवलम्बन भी दान-पुण्य की परिधि में आते हैं। निर्धनों को अनुदान और संकट निवारण में आर्थिक स्तर का सहयोग भी परमार्थ की परिधि से बाहर नहीं है। पर इन्हीं दिनों जिस प्रयत्न को प्रमुखता के साथ प्रश्रय मिलना चाहिए, जिसे लोकशिक्षा या जनजागरण कहा जा सकता हैं, वही निकृष्टता की पक्षधर मानसिकता को बदल सकने में समर्थ हो सकती है। इस एक कार्य को सफलतापूर्वक सम्पन्न कर लेने से अन्य परमार्थिक कहे जाने हैं जो अनायास ही अपनी पटरी पर लुढ़कने लगे।

मानसिकता को सुधारने उभारने में लेखनी और वाणी को प्रधान माध्यम माना जाता है। इसी को स्वाध्याय और सत्संग भी कहते हैं। लेखनी स्वाध्याय का सरंजाम जुटाती है और वाणी से कानों के छिद्र में मान्यताओं को प्रवेश कराने के रूप में मस्तिष्क को झकझोरा जाता है। धर्मतंत्र के अंतर्गत इन्हीं दोनों को प्रमुखता दी गई हैं। कथा, प्रवचन, कीर्तन आदि में वाणी काम करती है। पाठ, स्वाध्याय आदि में लेखबद्ध प्रशिक्षण का प्रभुत्व है। पढ़े और बिना पढ़े दोनों ही वर्गों में इन माध्यमों से किसी न किसी रूप में प्रकाश पहुँचाया जा सकता हैं। पढ़े लिखे लोग युग साहित्य को अनपढ़ों को पढ़ कर सुना सकते हैं।

इस संदर्भ में संजीवनी विद्या का, परिवर्तन प्रयोजन का व्यावहारिक प्रशिक्षण भी आता है। इसके लिए पाठ्यक्रम चलाने और साधन प्रयोजनों में व्यक्तित्व को झकझोरने का कार्य भी ऐसा है जिसकी उपेक्षा नहीं की जा सकती हैं।

क्रिया–कलापों में एक कार्य देव मानवों की संयुक्त शक्ति का विकास भी है, जिसे दिव्य-संगठन कहा जा सकता है। इसके लिए जनसमूह को एकत्रित करके, धार्मिक कर्मकाण्डों आदि माध्यम से समुन्नत विचारधारा वाले वर्ग को एकत्रित करने की आवश्यकता पड़ती है। घनिष्ठता, सामूहिकता, संगठन को उद्भूत करने के लिए प्रदर्शन, आयोजनों की भी आवश्यकता रहती हैं।

उपरोक्त निर्धारण प्रतिपादन को वर्गीकृत किया जाय तो उसके चार चरण बन पढ़ते हैं। (१) स्वाध्याय के लिए युग साहित्य का प्रयोग (२) सत्संग के लिए प्रवचन, परामर्श, विचार विनिमय आदि की व्यवस्था (३) प्रशिक्षण एवं साधना के लिए नियोजित किये जाने वाले सत्रों में सम्मिलित होना (४) सामूहिक समारोह, दीपयज्ञ, तीर्थयात्रा, जुलूस, प्रदर्शन आदि प्रयोजनों द्वारा अलख जगाने जनसंपर्क साधने की क्रिया प्रक्रिया को अपनाया जाना। युग परिवर्तन के लिए इन चारों ही माध्यमों को समुचित प्रश्रय मिलना चाहिए।


विशेष लेख माला-८ - युग चेतना का प्रसारण

विचार परिष्कार के लिए युगधर्म का प्रतिपादन और प्रस्तुत भ्रान्तियों विकृतियों के निराकरण में साहित्य का अधिकाधिक प्रचार-प्रसार इस प्रकार का स्वाध्याय उपक्रम अधिकाधिक लोगों तक पहुँच सके, इसके लिए शान्तिकुञ्ज द्वारा उस साहित्य का अभिनव सृजन किया गया है जो युगधर्म की रूप-रेखा सामयिक समस्याओं को ध्यान में रखते हुए दूरदर्शी विवेकशीलता को जागता है।

इस प्रयास को एकाकी स्तर पर करना हो तो उसके लिए झोला पुस्तकालय योजना सर्वसुलभ है। इसके लिए अपने संपर्क क्षेत्र में शिक्षितों के साथ संपर्क बढ़ाया जाय। उनकी अन्तरात्मा को स्पर्श करने वाले युगसाहित्य को एक छोटे झोले में लेकर उन तक पहुँचा जाय। पढ़ने के लिए उन्हें घर बैठे वह साहित्य पहुँचाया, व नियत अवधि में उसे पढ़कर वापस करने के लिए सहमत किया जाय।

अपने देश की गरीबी, अशिक्षा और सत्साहित्य के प्रति अरुचि को देखते हुए यह आशा नहीं की जा सकती कि युग चेतना को प्रोत्साहन देने वाला साहित्य अभीष्ट मात्रा में लिखा, छापा प्रकाशित किया जायगा। विक्रेता भी ऐसे झंझट में क्यों हाथ डालें जिसमें उन्हें तत्काल संतोषजनक लाभ न होता हो। यह एक अवरोध है जिसके कारण नवोदित राष्ट्र को उपयुक्त दिशा निर्देशन प्राप्त करने के लिए अभीष्ट साहित्य उपलब्ध नहीं हो पाता। इसलिए शान्तिकुञ्ज ने उपरोक्त सभी पक्षों को अपने हाथ में लिया है और हर शिक्षित को पढ़ाने और हर अशिक्षित को सुनाने के लिए झोला पुस्तकालय योजना बनाई और स्वयं सेवी समय-दानियों द्वारा समग्र निष्ठापूर्वक चलाई है। इस प्रयास के अंतर्गत लाखों को घर बैठे बिना कुछ खर्च किये नवयुग का संदेश मिल रहा है।

इस प्रयास का कुछ बड़ा रूप है ज्ञानरथ संचालन। युग साहित्य को युग देवता का संदेश-प्रतीत मानते हुए उसे साइकिल के दो पहिये वाली गाड़ी पर सुसज्जित रूप से इस स्तर का बनाया गया है कि बाहर से देखने वालों को एक छोटा देवालय ही प्रतीत हो। इसे खींचते धकेलते हुए परिजन अपने क्षेत्र में शिक्षित नर-नारियों तक झोला पुस्तकालय की भाँति सत्साहित्य देने पढ़ाने और वापस लेने का उपक्रम चलाते हैं। और घर-घर जन-जन तक अपनी पैठ बनाते हैं। आकर्षण भी अधिक रहता है और संपर्क भी अधिक बड़े क्षेत्र में अधिक लोगों तक बनता हैं।

प्रज्ञा केन्द्रों को अचल और ज्ञानरथों को चल प्रज्ञा मन्दिर मानकर इस योजना को चलाया तो बहुत दिनों से सफलतापूर्वक जा रहा था पर अब उसमें कुछ और नये एवं सशक्त उपकरण जोड़ दिये गये हैं जिनके कारण वह प्रज्ञा वाहन जिधर से भी गुजरता है उधर ही अच्छी खासी भीड़ जमा हो जाती है और ऐसी प्रेरणाएँ मनोयोगपूर्वक हृदयंगम की जाती है जिसकी कि इन दिनों नितान्त आवश्यकता है।

नवनिर्मित ज्ञानरथों में मोटर वाली छोटी बैटरी से चलने वाला टेपरिकार्डर और लाउडस्पीकर फिट कर दिया गया है। इस माध्यम से जनसमुदाय की प्राण प्रेरणा झकझोरने वाला युग संगीत सुनने को मिलता है और छोटे-छोटे किन्तु सारगर्भित प्रवचन परामर्श सुनने को मिलते रहते हैं। निर्जीव होते हुए भी ज्ञानरथ सजीव वक्ता और प्राणवान संगीत से अपने रास्ते में मिलने वाले से ऐसा कुछ कहता ओर गाता रहता है जिसकी कि परिवर्तन की पृष्ठभूमि बनाने के लिए महती आवश्यकता हैं।

एक पूरे दिन में बैटरी की बिजली प्रायः खर्च हो जाती है उसे नये सिरे से सशक्त बनाने के लिए इतना भर करना पड़ता है कि घर की बिजली के प्लग के साथ “चार्जर” उपकरण द्वारा उसे जोड़ दिया जाय। सवेरा होने से पहले बैटरी, फिर दूसरे दिन का दायित्व पूरा करने के लिए पूरी तरह तैयार हो जाती है। इस प्रयास में बिजली का खर्च कुछ पैसों का ही बैठता हैं, जिसकी व्यवस्था बनाना इन ज्ञानरथ चलाने वालों में से किसी के लिए कुछ भी कठिन नहीं पड़ता।

पिछले दिनों वाले ज्ञानरथ मात्र साहित्य का लाभ पहुँचाने के लिए झोला पुस्तकालय स्तर की सेवा साधना में निरत रहते थे। पर अब वे अपने छोटे कलेवर में दिन भर प्रवचन और गायन करते रहने पर भी न थकने वाला माध्यम सँजोये रहने लगे हैं। इसलिए उसकी उपयोगिता अनेक गुनी अधिक बढ़ गई हैं। पुराने ज्ञानरथों को चलाने वाले राह में मिलने वालों को अपने प्रयास का वाणी द्वारा परिचय भी देते थे। पर अब उन्हें बिना पढ़ें, गूँगे-बहरे शिक्षित-अशिक्षित लिये-लिये फिरते हैं और दिन भर एक अतिप्रभावोत्पादक चलते-फिरते प्रचार समारोह को गतिशील रखे रहते हैं। पुराने की तुलना में नये ज्ञानरथों की लागत तो कुछ बढ़ गई है, पर वह इतनी नहीं कि औसत नागरिक उसे अपनी सीमित सामर्थ्य में ही जुटा न सके। इस प्रयास में स्वाध्याय और सत्संग के दोनों ही प्रयोजन एक साथ जुड़ जाते हैं।

इसके अतिरिक्त इस क्षेत्र का एक और माध्यम है। दीवारों पर आदर्श वाक्य लिखते रहना। गेरू, काजल, नील, पीली रामरज, मुल्तानी मिट्टी, खड़िया आदि को एक डिब्बे में डालकर बड़ी दवात के रूप में विनिर्मित किया जा सकता है और उसमें से बालों के ब्रुश या बाँस जैसे किसी लकड़ी के उपकरण को कलम बनाकर जहाँ भी खाली दीवार दीख पड़े वहाँ हाथ साथ कर सुन्दर अक्षरों में आदर्शवाक्य लिखे जा सकते हैं। जिन्हें उधर से रास्ता निकलने वाले व्यक्ति नजर डालते ही सामयिक प्रेरणाएँ प्राप्त करते रह सकते हैं। (१) हम सुधरेंगे-युग सुधरेगा, हम बदलेंगे-युग बदलेगा। (२) नर और नारी एक समान, जाति वंश, सब एक समान। (३) इक्कीसवीं सदी उज्ज्वल भविष्य का अवतरण। जैसे दर्जनों आदर्शवाक्य गढ़े गये हैं। उनमें से जहाँ जिनका चयन उपयुक्त दीखता हो, उसे वहाँ लिखा जा सकता हैं इस प्रकार हर दीवार, खण्डहर, टीले, पत्थर को बोलती दीवार बनाया जा सकता है।

इस वर्ग में एक अन्य योजना स्टीकर चिपकाने की आती है। यह भी अनेकों प्रकार के तथा नाम मात्र की लागत से भरे पूरे है। इन्हें किवाड़ों पर, अलमारियों पर, अटैचियों पर, फर्नीचरों पर कहीं भी चिपकाया जा सकता हैं। प्लास्टिक पर बने और पक्की स्याही से अंकित एवं मजबूत गोंद से सटे होने के कारण छोटे बड़े साइज के यह स्टीकर ऐसे है जिन्हें वर्षों के लिए स्थायी रहने की स्थिति में चिपकाया जा सकता है। इनकी कीमत कुछ पैसे मात्र होने से हर किसी को खरीदने और घर सजाने के लिए सहमत किया जा सकता है। मोटरों, ताँगों, रिक्शों आदि पर उन्हें चिपका दिया जाय तो उनमें बैठने वाले भी ऐसा कुछ हृदयंगम करते चलते हैं, जिसे इन दिनों समझना और समझाना ही चाहिए।

इस प्रकार की प्रचार सामग्री के सस्ते-महँगे अनेक प्रकार के उपकरण विनिर्मित किये गये हैं। रूमालों, साड़ियों दुपट्टों पर भी ऐसे ही कुछ प्रेरणाप्रद अंकन सटा देने की भी योजनाएँ बनती और चलती रहती है।

साक्षरता की, प्रौढ़ शिक्षा की व्यवस्था बनाना अपनी जगह आवश्यक है। अशिक्षितों की अन्धों में गणना होती है इसलिए प्रत्येक शिक्षित परिजन को यह कहा गया है कि वह अपने संपर्क क्षेत्र में से अशिक्षित नर-नारियों को, बालकों-वृद्धों को, ठाली और व्यस्तों को तलाश करके उनके साथ संपर्क साधे। उनकी सुविधा का समय खोजें और अपने घर बुलाकर अथवा उनके घर जाकर हर किसी को साक्षर बनाने का प्रयत्न करें। अपने देश का कोई भी नागरिक अशिक्षित न रहें, इसके लिए विद्या विस्तार में हर शिक्षित को “विद्या ऋण” चुकाने के लिए बिना पढ़े को पढ़ाने को एक आवश्यक कर्तव्य की तरह अपनाने के लिए प्रोत्साहित किया जाय।

इसी प्रयास का दूसरा चरण यह है कि साक्षरता के उपरान्त दैवी प्रेरणाएँ पढ़ने का अवसर मिले, जिससे व्यक्तित्व विकास में, लोकमानस के परिष्कार की अभीष्ट प्रगति प्रेरणा का भी समावेश हो सके। युग साहित्य को जन-जन तक पहुँचाने के लिए झोला पुस्तकालय और ज्ञानरथ इसी निमित्त चलाये जा रहे हैं। दीवारों पर आदर्शवाक्य लिखने और प्रेरक स्टीकर स्थान-स्थान पर चिपकाने की योजना भी इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए हैं।


विशेष लेख माला-१० - सत्संग प्रशिक्षण एवं संगठन

विचार विनिमय भी उपयोगी आदान-प्रदान की तरह है। प्रगति के लिए मिलजुल कर कदम बढ़ाने पड़ते हैं। जीवनक्रम को ठीक तरह चलाने के लिए जिस प्रकार अनेक साधन जहाँ-तहाँ से जुटाने पड़ते हैं, उसी प्रकार विचार सम्पादन को बढ़ाने के लिए आवश्यक मणिमुक्तक वहाँ से खोजने पड़ते हैं जहाँ वे पहले से ही मौजूद हैं। हाट-बाज़ार की व्यवस्था भी इसीलिए की जाती है कि जरूरतमंदों को आवश्यक वस्तुएँ एकत्रित एवं उपलब्ध कराने में सुविधा रहे। अनगढ़ विचार तो कूड़े करकट की तरह कहीं भी बिखरे पाये जाते हैं और बिना बुलाये ही घर में घुस आते हैं, पर उपयोगी, आवश्यक और महत्वपूर्ण वस्तुएँ हस्तगत करने के लिए उत्साहपूर्वक प्रयत्न करने पड़ते हैं। ठीक इसी प्रकार हर किसी को सुनियोजित प्रगतिशील विचारों को ढूँढ़ने-बटोरने की आवश्यकता पड़ती है। इसी प्रक्रिया को सम्पन्न करने का नाम है सत्संग।

सर्वविदित है कि संगति का प्रभाव पड़े बिना नहीं रहता। सुगंध और दुर्गंध के समीप बैठ कर इस तथ्य का प्रमाण परिचय सहज ही प्राप्त किया जा सकता है। बच्चे भाषा, आचरण और व्यवहार समीपवर्ती लोगों का अनुकरण करते हुए ही उपलब्ध करते हैं। व्यक्तित्व और दिशा निर्धारण में भी संगति का असाधारण प्रभाव पड़ते देखा जाता है। उत्थान और पतन में इसी प्रक्रिया की बड़ी भूमिका रहती हैं। इसलिए जो अपना या दूसरों का हित चाहते हैं उन्हें जीवन की अन्य आवश्यकताओं को पूरा करने की तरह सत्संग उपलब्ध होते रहने की भी व्यवस्था करनी चाहिए।

हर किसी के संपर्क में कुछ न कुछ लोग होते ही हैं। परिवार के लोग एक साथ रहते और एक दूसरे से न केवल सहयोग प्राप्त करते हैं, वरन् प्रभावित भी होते हैं। इसलिए परिवार के वरिष्ठ व्यक्तियों का कर्तव्य बनता है कि वे कम योग्यता वालों को अधिक सुयोग्य, अधिक सुसंस्कृत बनाये रखने के लिए घर-कुटुम्ब में सत्संग का उपक्रम अनिवार्य रूप से बनाये रहें। विचार विनिमय चलता रहे। शंका-समाधान की गुंजाइश रहे। अनुभवों को सुनने और सुनाने का कार्यक्रम भी अन्य नित्यकर्मों की तरह सुनियोजित ढंग से चलता रहे।

संकोचवश या व्यस्तता के बहाने परिवारों के सदस्यों के विचारों का आदान-प्रदान प्रायः उपेक्षित रहता है। इससे जहाँ ज्ञानवृद्धि में रुकावट पड़ती हैं वहाँ पारस्परिक घनिष्ठता भी बढ़ने से रुक जाती हैं। परिवारों में कोई न कोई सभ्य ऐसा अवश्य रहना चाहिए जिससे एक दूसरे की कमी कठिनाई जानने और उनके समाधान सुझाने का अवसर मिलता रहे। यह कार्य कथा, कहानी, जीवन चरित्र, संस्मरण, घटनाक्रम, समाचार सुनने-सुनाने के माध्यम से भी चल सकता है। साथ में एक उपयोगी मनोरंजन की व्यवस्था भी रह सकती है।

घर में अन्य आवश्यक वस्तुओं की तरह घरेलू पुस्तकालय की भी ऐसी व्यवस्था रहनी चाहिए जिसके माध्यम से सद्विचारों को पढ़ने और सुनने का अवसर मिलता रहे। स्वाध्याय और सत्संग यह दोनों ही मनुष्य की मानसिक एवं भावनात्मक आवश्यकताएँ है। इनकी पूर्ति वैयक्तिक, पारिवारिक एवं सामाजिक क्षेत्रों में अपनी परिस्थितियों के अनुरूप क्रियान्वित करते ही रहना है। इन पंक्तियों में इसे पारिवारिक क्षेत्र में आरंभ करने के लिए इसलिए कहा गया है ताकि उसे सहज सुगमता के साथ सीखा और सिखाया जा सके। उसका प्रत्यक्ष लाभ अपनों को विकसित करने के रूप में उठाया जा सके और सामाजिक क्षेत्र में क्रियान्वित करने के लिए प्रभावी अभ्यास करने में प्रवीणता प्राप्त हो सके। युग अवतरण अभियान को अग्रगामी बनाने के लिए तो यह युक्ति ऐसी हैं जिसे हर हालत में प्राथमिकता देनी पड़ेगी। इस अवलम्बन से ऐसे वक्ता भी प्रशिक्षित हो सकते हैं जो भावी संभावनाओं को साकार करने में अपनी असाधारण उपयोगिता का परिचय दे सकें।

युग निर्माण आन्दोलन का एक अनिवार्य चरण साप्ताहिक सत्संग है। रविवार को आमतौर से छुट्टी रहती है। उस दिन इस हेतु दो-तीन घण्टे का कार्यक्रम बनाया और उसमें अधिकाधिक लोगों को सम्मिलित किया जा सकता है। (१) संक्षिप्त दीपयज्ञ (२) सहगान कीर्तन (३) नवसृजन के संदर्भ में प्रवचन (४) झोला पुस्तकालय उपक्रम का भी इसी में समावेश, यह चार कार्यक्रम एक साथ जोड़ देने से थोड़े से लोगों के बीच भी साप्ताहिक सम्मेलन नियमित रूप से चालू रह सकता है। जहाँ अवसर हो वहाँ घनिष्ठ लोगों का जन्म- दिवसोत्सव मनाने के रूप में इसी प्रक्रिया को उसके घर सम्पन्न किया जा सकता हैं, ताकि उस व्यक्ति विशेष के मित्र संबंधी उसमें विशेष उत्साहपूर्वक सम्मिलित हो सकें और अपनी सत्संग योजना को नये लोगों तक पहुँचाने का अवसर मिल सके।

इन सत्संग आयोजनों का एक विशेष लाभ यह है कि जिन लोगों को इसमें रस आने लगता है, वे बार-बार आपस में मिलते हैं। परिचित होते एवं घनिष्ठ बनते हैं। इस प्रकार विचारशील लोगों का संगठन बनने, बढ़ने और सुदृढ़ होने का सिलसिला भी साथ ही चल पड़ता है। यह बहुत बड़ी बात है कि दैत्य इसलिए सफल होते रहे हैं कि वे संगठित होते हैं। देवताओं की-संत सज्जनों की एक ही सबसे बड़ी कमी है कि वे आत्मकेन्द्रित रहते और संगठन को महत्व नहीं देते। पौराणिक कथा प्रख्यात है कि हारे हुए देवताओं ने जब अपने उद्धार का उपाय प्रजापति से पूछा तो उनने उन्हीं की सामर्थ्य को एकीकृत करके महाकाली का अवतरण किया। उसी ने दैत्यों को हराया और देवताओं को दुर्गति से उबारा। यह कथा अपने लक्ष्य की पूर्ति के लिए सटीक मार्गदर्शन करती है। नवसृजन में रुचि लेने वाले प्रज्ञावानों काम करने हैं, सत्प्रवृत्ति संवर्द्धन और दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन के अनेक निर्धारणों को पूरा करना है, वहाँ उससे भी पहले यह करने की आवश्यकता है कि सृजनशिल्पी परस्पर संगठित हों। इसके लिए साप्ताहिक सत्संग, जन्म दिवसोत्सव जैसे छोटे कार्यक्रम अभीष्ट उद्देश्य की पूर्ति में असाधारण रूप से सहायक हो सकते हैं। इसलिए जहाँ भी प्रकाश की किरणें फूटे, वहाँ उपरोक्त स्वाध्याय और सत्संग के उभयपक्षीय शक्तिशाली चरण उठने ही चाहिए। छोटे-बड़े रूप में इस प्रयोजन के लिए नियमित रूप से उत्साहपूर्वक निरत रहा जाना चाहिए।

सत्संग और संगठन का महत्व एवं वास्तविक उद्देश्य तो छोटे आयोजनों से ही पूरा होता है। पर प्रचार प्रयोजन के लिए जनजागरण के लिए बड़े आयोजन, समारोहों की भी आवश्यकता रहती ही है। राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक संस्थाएँ अवसर अपने बड़े वार्षिकोत्सव सम्पन्न किया करते हैं। इससे एक विचारों को एक स्थान पर बड़ी संख्या में एकत्रित होते देखकर उपस्थितजनों का उत्साह भी बढ़ता है और दर्शकों पर भी मनोवैज्ञानिक दृष्टि से अच्छा प्रभाव पड़ता है। जिस विचार धारा को प्रचारित करना है। जिस विचार धारा को प्रचारित करना है उसे अनेक लोगों तक एक ही समय में पहुँचा देने का यह सफल प्रयोग माना जाता हैं। धार्मिक मेलों का भी प्रचलन इसी दृष्टि से हुआ है। तीर्थों पर पर्व भी इसीलिए मनाये जाते हैं। भारतीय संस्कृति का महत्वपूर्ण अंग माने जाने वाले पर्व-त्यौहार भी सामूहिक रूप से इसीलिए मनाये जाते हैं कि उत्कृष्ट विचारधारा के संपर्क में अनेक लोग एक साथ एकत्रित हों और सामूहिक वातावरण में उत्कृष्ट चिन्तन की गरिमा से एक साथ एक समय में लाभान्वित हों।

युग सृजन संगठनों के लिए यह एक आवश्यक कर्तव्य ठहराया गया है कि वे छोटी विचार गोष्ठियों, साप्ताहिक सत्संगों और बन पड़े तो बड़े आयोजन समारोहों के पर्व-त्यौहारों के अवसर पर अथवा वार्षिकोत्सव के रूप में बड़े आकार-प्रकार बड़ी तैयारी, बड़ी धूमधाम के साथ सम्पन्न करें ताकि अपने साथी-सहयोगियों की बढ़ी-चढ़ी संख्या देखकर लोगों में संगठित होने की ललक उठे और उस विशालता से दर्शक एवं सम्मिलित लोग उत्साह वर्धक प्रेरणा प्राप्त करें। यह सभी छोटे-बड़े कार्यक्रम सत्संग में ही गिने जाते हैं। इनके सहारे देवजनों का पारस्परिक परिचय एवं संगठन बनने का कार्य भी सरलतापूर्वक सम्पन्न होता चला जाता हैं।


विशेष लेख माला-११ - महान लक्ष्य की विकेन्द्रीकरण योजना

उज्ज्वल भविष्य की विश्वव्यापी संरचना के लिए आवश्यक समझा गया है कि संसार भर में रह रहे ६०० करोड़ मनुष्यों में से प्रत्येक को मानवी गरिमा और मर्यादा के अनुरूप चिन्तन, चरित्र और व्यवहार अपनाने के लिए सहमत ही नहीं, बाधित भी किया जाय। दुर्बुद्धिजन्य अनीति अपनाने पर तो समग्र एवं समर्थ उत्कृष्टता की संभावना ही नहीं बनती। व्यापक लोक-मानस का परिष्कार यद्यपि बहुत बड़ा कार्य है, फिर उसे सम्पन्न किये बिना और कोई विकल्प नहीं।

इतना बड़ा काम कैसे किया गया जाय? कौन करे? इस संबंध में उथले विचार करने पर बिल्ली के गले में चूहे द्वारा घंटी बाँधे जाने की बात बनना असंभव ही लगता है, पर जब यह विचार सामने आता है कि एक छोटी नर्सरी में लगाये हुए पौधे जब स्थान-स्थान पर आरोपित किये जाते हैं, तो विशालकाय, अगणित वृक्षों से सजा उद्यान, सघन वन विनिर्मित होता है, तो साहस उभरता है, विश्वास होता है कि अच्छे शुभारंभ का परिणाम यह भी हो सकता है कि विश्व व्यवस्था में असाधारण परिवर्तन असंभव न रह कर संभव होगा।

शान्तिकुञ्ज ने जिस दिशा में जो श्रीगणेश शुभारंभ किया है, वह अपने पाँच लाख पंजीकृत और पच्चीस लाख सहयोगी समर्थकों द्वारा आरंभ होता है। इस देव समुदाय में से प्रत्येक को एक से पाँच में विकसित होने के लिए कहा गया है। पाँच से पच्चीस, पच्चीस से एक सौ पच्चीस, एक सौ पच्चीस से छः सौ पच्चीस वाली गुणन प्रक्रिया यदि अनवरत रूप से गतिशील रहे तो मिशन का प्रस्तुत समुदाय भी कुछ बड़ी छलाँगों से समूचे मनुष्य समुदाय तक संसार भर में अपना प्रकाश पहुँचा सकता हैं। इस विश्वास के साथ मजबूत कदम उठाये और समर्थ कार्यक्रम चलाये गये हैं।

मिशन की यह घोषित प्रतिज्ञा सर्वविदित है कि युगसन्धि के इन्हीं दस वर्षों में एक लाख से अधिक संगठन समारोह सम्पन्न करने हैं और अपने बलबूते ही युगसन्धि की पूर्णाहुति में एक करोड़ ऐसे लोग सम्मिलित करने हैं, जो नवसृजन के प्रति निष्ठावान् हो। यह आयोजन यदि अपनी पूर्णाहुति एक ही जगह सम्पन्न होकर रह जाय तो यह सचमुच बहुत कठिन होगा। इसीलिए इसे स्थान-स्थान पर करने की योजना बनी है।

सन् ५८ में गायत्री तपोभूमि, मथुरा में सम्पन्न हुए एक हजार कुंड वाले यज्ञ का जिन्हें स्मरण है, उन्हें विदित है कि उसमें चार लाख याजक और १० लाख दर्शक उपस्थित हुए थे। उनके ठहरने आदि की व्यवस्था दस मील के दायरे की भूमि घेरने पर सम्पन्न हुई थी। इन दिनों सम्बद्ध व्यक्तियों को यह आश्चर्य होता होगा कि इतने बड़े समारोह से संबंधित अनेकानेक जटिल व्यवस्थाएँ किस प्रकार जुटायी जा सकी होंगी, किस प्रकार इतने साधन एकत्रित हो सके होंगे, पर इन आश्चर्यचकित लोगों में से प्रत्येक को यह एक तथ्य स्वीकार करना पड़ा था कि दैवी शक्तियों के मनोरथ सचमुच ही ऐसे होते हैं, जिनमें “असंभव” शब्द का प्रयोग कहीं नहीं हो सकता। आकाश के ग्रह नक्षत्रों को, धरती की वनस्पतियों और प्राणियों जलाशयों की लहरों पर खेलते जल-जीवों को संकल्प मात्र से जो सत्ता सृजन कर सकती है, उसके लिए इतने बड़े आयोजन-समारोह का संयोग बिठा देना क्यों कुछ कठिन होगा। उस समारोह की सफलता देखते ही बनती थी।

उस अनुमान के आधार पर जो मनोबल और संकल्प उभरा है, उसने एक प्रकार से निश्चित ही कर दिया है कि अगले बड़े कदम भी डगमगायेंगे नहीं। एक लाख समारोह संगठन-एक करोड़ भागीदार जिस आयोजन में सम्मिलित हो सकते हैं, वह अपनी गति बढ़ाते हुए वायु रोशनी, गर्मी, वर्षा की भाँति अपना विस्तार संसार भर में भी कर सकता है और नये संसार की नई संरचना का स्वप्न साकार होने में कोई अवरोध बाधक नहीं हो सकता। साधारणजनों से भी असंख्य गुना दृढ़ विश्वास इस संदर्भ में उन्हें है जो शान्तिकुञ्ज जैसी छोटी कुटीर में बैठकर इक्कीसवीं सदी के साथ जुड़े हुए उज्ज्वल भविष्य की सतयुगी वातावरण के अवतरण की आशा सँजोये बैठे हैं।

युग सन्धि महापुरश्चरण की जो क्रिया पद्धति इन दिनों चल रही हे उसमें आवश्यक साधना, उपासना, सृजनात्मक संरचना के साथ साथ वह संकल्प भी क्रियान्वित किये जाने का ताना-बाना बुना जा रहा है जिसमें एक लाख संगठन, समारोह तथा एक करोड़ सृजन शिल्पी सम्मिलित किये जाने की योजना भी समग्र तत्परता के साथ चल रही हैं।

विचार उतरा कि एक स्थान पर इतना बड़ा आयोजन करने पर प्रयोग कुम्भ जैसे अनेकों समारोह एकत्रित करने जैसी व्यवस्था बनानी होगी, साधन जुटाने होंगे और पर्यावरण पर जो प्रदूषण का दबाव पड़ेगा, वह सारी व्यवस्था लड़खड़ा देगा। इतने बड़े मेले में सम्मिलित लोग परस्पर परिचित एवं संगठित भी न हो सकेंगे। घुल-मिल भी न सकेंगे और भविष्य की वैसी रूप घुल-मिल भी न सकेंगे और भविष्य की वैसी रूप रेखा भी न बन पायेगी जैसे कि सन् ५८ के सहस्रकुण्डीय यज्ञ के साथ छः हजार शाखाओं और एक लाख कार्यकर्ताओं का हाथों हाथ गठन बन पड़ा था। व्यवस्था की भी एक सीमा होती है। जहाँ अतिशय की भी एक सीमा होती है। जहाँ अतिशय का अतिवाद हाथ में लिया जाता है वहाँ उपयोगिता घटती और अव्यवस्था फैलती है।

इस कठिनाई पर गंभीरतापूर्वक विचार करने के उपरान्त मार्गदर्शक सत्ता ने सुझाया है कि यह अधिक अच्छा होगा कि एक स्थान पर इतना बड़ा समारोह न करके उसे खण्डों में विभाजित कर दिया जाय और अनेकों केन्द्रों में उनकी शक्ति और सामर्थ्य के अनुरूप महान संकल्प को छोटे-छोटे खण्डों में कार्यान्वित किया जाय। पूर्णाहुति का गगन-चुम्बी कार्यक्रम सीमित आयोजनों में सम्पन्न किया जाता रहे। यह पूर्णाहुति हर साल हो या कई वर्ष बाद एक बड़े समारोह के रूप में कार्यान्वित की जाय, यह केन्द्रों की परिस्थितियों को देखते हुए निश्चय होता रहेगा।

इन दिनों २४०० विनिर्मित प्रज्ञापीठें हैं। जिनमें दर्शनीय और कीमती इमारतें बनी हुई हैं। जहाँ नियमित रूप से निर्धारण गतिविधियों का सूत्र संचालन होता है। इसके अतिरिक्त नवनिर्मित २४ हजार केन्द्रों की व्यवस्था भी की जा रही है। यह सचल स्तर के होंगे। जहाँ ज्ञानरथ चलेंगे जहाँ तीर्थयात्रा के साइकिल जत्थे निकलेंगे, जहाँ साप्ताहिक सत्संगों के निर्धारण क्रियान्वित होंगे। वे भव्य इमारतों के रूप में दृष्टिगोचर भले ही न हों, पर उपयोगिता की दृष्टि से यह चल स्थिति अचल निर्माणों से किसी भी प्रकार कम न होगी। विश्वासपूर्वक प्रयत्न चल रहा है कि न केवल पिछले २४०० प्रज्ञापीठ भी उपयोगिता की दृष्टि से अपने को अधिक शक्तिशाली सिद्ध करें। यह चल अचल केन्द्रों की संख्या पच्चीस हजार से अधिक हो जाती हैं।

योजना यह चल रही है कि एक लाख आयोजनों और एक करोड़ भागीदारों को इन नये पुराने प्रज्ञा केन्द्रों को आबंटित कर दिया जाय। इससे देश के कोने कोने में नवजागरण का आलोक प्रसारित होगा और एक स्थान पर इतना दबाव एकत्रित न होगा जो अव्यवस्था पैदा करे और असाधारण रूप से भारी पड़े। यह विभाजन-आबंटन योजना इन दिनों पूरे उत्साह के साथ क्रियान्वित की जा रही है और केन्द्रों की हर इकाई अपनी भागीदारी निर्धारित करने के लिए पूरी दौड़ धूप कर रही है।

इस विभाजन प्रक्रिया की सरलता को देखते हुए भी आशा की गई है कि एक लाख केन्द्रों और एक करोड़ भागीदार बनाने के पूर्व निर्धारण को नई रीति नीति के आधार पर कई गुनी संख्या में फलित होने का अवसर मिलेगा। इतने सृजनशिल्पी सन् २००० तक विनिर्मित हो जायेंगे। जो इक्कीसवीं सदी के अवतरणों में भागीरथी भूमिका निबाह सके। स्वयं धन्य बन सकें, योजनाकारी श्रद्धा को सन्तुष्ट कर सकें और यह भी दिखा सकें कि दैवी मार्गदर्शन में चलने वाले प्रयास युग परिवर्तन जैसे असाधारण असंभव लगने वाले कार्य को मनुष्यों के सहारे ही साधारण और संभव बना सकते हैं।


विशेष लेख माला-१२ - तीर्थ प्रक्रिया का पुनर्जीवन

भारतीय ही नहीं, विश्व की साँस्कृतिक मान्यताओं में तीर्थयात्रा का अतिशय महत्व है। यरुशलम मक्का, बोधगया सारनाथ आदि तीर्थों की यात्रा उन मतों के अनुयायी दूरवर्ती क्षेत्र तय करके उन केन्द्रों में पहुँचते और अपनी श्रद्धा की सघनता का परिचय देते हैं। भारतीय धर्म में उनकी महिमा और गरिमा का असाधारण प्रतिपादन हुआ है इसलिए असंख्य तीर्थयात्री इस प्रयोजन के लिए असाधारण मात्रा में समय, श्रम और धन का नियोजन करते हैं। इस प्रयास को अनेक सत्परिणाम उत्पन्न करने वाले धर्मानुष्ठानों में गिनते हैं। आद्य शंकराचार्य ने देश के चार कोनों पर चार धाम बनाये थे। इसके उपरान्त हजारों की संख्या में छोटे बड़े तीर्थ विभिन्न स्थानों पर बने। उनके कारण समीपवर्ती क्षेत्र के लोगों को भाव-संवेदनाएँ चरितार्थ करने के अवसर मिले।

इन दिनों विकृतियों ने कोई क्षेत्र अछूता नहीं छोड़ा है। तीर्थ प्रयोजन भी नहीं। तीर्थयात्रा का महत्व एवं पुण्यफल इस तथ्य पर आधारित है कि वह धर्मप्रचार की पद यात्रा का रूप लेकर जन जन के संपर्क साधती और उसका नेतृत्व करने वाले विचारशील जन-जीवन में समझदारी, ईमानदारी, एवं बहादुरी जैसी सत्प्रवृत्तियों को उभारने की महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे। पर आज तो द्रुतगामी वाहनों में सवारी करके बड़े-बड़े नगरों में अवस्थित भव्य देवालयों की दर्शन झाँकी करने, जलाशयों में डुबकी लगाने और पूजा पत्री करने पात्र जैसी लकीर पीट कर लोग अपने कर्तव्य की इतिश्री मान लेते हैं। खीज़, निराशा, निरर्थकता जैसी भावनाएँ लेकर वापस लौटते हैं। धक्का-मुक्की और फैली हुई गंदगी के अतिरिक्त और कोई वस्तु बाद में स्मरण नहीं रहती। यह कैसी तीर्थयात्रा? इतने भर से पुण्यफल कैसे आकाश से बरसेगा और पापों का क्षय होने जैसी मान्यताओं को किस आधार पर प्रश्रय मिलेगा?

भूल सुधारनी पड़ती हैं। भटक जाने पर राह बदलनी पड़ती है। अच्छा हो तीर्थयात्रा संबंधी प्रचलन में हम नये सिरे से विचार और परिवर्तन करें और देखें कि उस परिभ्रमण के साथ कहीं लोकमंगल जुड़ा है या नहीं। धर्मप्रचार की पद यात्रा के पुराने प्रचलन में अब यह अन्तर हो सकता है कि उसे बिनोवा सर्वोदयी पदयात्रा स्तर की उपयोगिता से समन्वित किया जाय। समीपवर्ती क्षेत्र में सत्प्रवृत्तियों की प्राचीन या अर्वाचीन कार्यपद्धति के प्रति निष्ठा जमाने के लिए सुनियोजित क्रिया प्रक्रिया निर्धारित करें।

गाँधी जी जब काँग्रेस के माध्यम से देश सेवा की तैयारी करने लगे तो उन्हें श्री गोखले ने सलाह दी कि वे पहले उस भारत माता की परिस्थितियाँ आँखों से देख ले। इसके लिए एक बाद देश भ्रमण कर लें। गाँधी जी ने वही किया और एक अर्धनंगी महिला की परेशानी आँखों देखकर इतने द्रवित हुए कि स्वयं भी आधी धोती पहनने और आधी ओढ़ने लगे। तभी से वे सच्चे अर्थों में महात्मा जी नाम से प्रख्यात हुए। लोकसेवियों के लिए तीर्थयात्रा इसीलिए आवश्यक है कि वे अपने समाज की वस्तुस्थिति समझें और तदनुसार उपचार के लिए जुटें। संत परिव्राजक इसी प्रयोजन के लिए तीर्थयात्रा को धर्मकृत्य मानते और उसमें निरत होकर लोक-कल्याण की बहुमुखी योजनाओं में निरत होते थे।

आज की स्थिति में यह उपयुक्त लगता है कि जन जागरण की साइकिल यात्राओं पर टोली बना कर निकलें। पदयात्रा के स्थान पर अब साइकिल यात्रा को अपनाने में कोई हर्ज नहीं। अब साइकिल ही सर्वजनीन वाहन बनने जा रही है। ईंधन से चलने वाले वाहन तो उपयुक्त आवश्यकता जुटा न पाने और प्रदूषण फैलाने के कारण एक प्रकार से बेमौत मरने ही जा रहे हैं।

साइकिल यात्राओं की टोली एक प्रवाहक्रम बना कर जन-जागरण के लिए निकलें और जिधर से गुजरें, उधर ही युग-चेतना का प्रकाश वितरण करें। दीवारों पर आदर्श वाक्यलेखन-सहगान कीर्तन और युगधर्म संबंधित स्थानीय आधारों का स्वरूप और समाधान प्रस्तुत करें। इसके लिए देवालयों को केन्द्र बनाने की आवश्यकता नहीं है। अपने देश का हर गाँव एक तीर्थ बन कर रहेगा। इस स्थापना के लिए हमीं लोग कटिबद्ध होकर क्यों न निकल पड़ें।

योजना इस प्रकार बने कि साइकिल टोली प्रचारक अपने यहाँ से शान्तिकुञ्ज को विश्व तीर्थ मान कर उसके लिए प्रयाण करें। जहाँ भी उपयुक्त लगे, विराम करें और अपने ढंग से प्रचार प्रक्रिया क्रियान्वित करें। शान्तिकुञ्ज पहुँच कर दो-चार दिन विश्राम करें, साधना करें एवं प्रेरणा ग्रहण करें।

यों पैदल-यात्रा में अधिक जनसंपर्क होने खर्च कम पड़ने, चाहे जहाँ सुस्ताने आदि की अधिक सुविधाएँ तो हैं, पर समय अधिक लगने तथा श्रम को सहन करने की सुविधा भी तो चाहिए। जिन्हें साइकिल चलाना नहीं आता, ऐसे लोग, विशेषतया महिलाएँ साइकिल की अपेक्षा पैदल चलने अथवा वाहनों का उपयोग करने के लिए विवश होती हैं, पर औसत व्यक्ति के लिए, जिन्हें चलाना आता हो, उन्हें साइकिलों की टोली बना कर निकलना ही सुविधाजनक होता है। साइकिलों की दो तीन-चार की टोली ही पर्याप्त है। इनमें से एक भार वाहक रिक्शा भी होना चाहिए, जिसमें बिस्तर कपड़े, भोजन बनाने के साधन वाद्ययंत्र आदि को सुविधापूर्वक ले जाय जा सके। साइकिलों में लोग कैरियर पर बहुत सीमित सामना ही लाद सकते हैं। रिक्शे को टोली वाले बारी-बारी भी लेकर चल सकते हैं, अथवा यात्रियों में से भी कोई ऐसा हो सकता है, जो रिक्शा चलाने आगे जाकर सूचना देने, भोजन का प्रबन्ध करने में अपनी हेठी अनुभव न करे। छोटा या बड़ा लाउडस्पीकर, टेपरिकार्डर हर हालत में साथ रहना चाहिए। स्लाइड प्रोजेक्टर भी ऐसा ही, सस्ता साधन है जो रंगीन प्रकाशचित्र दिखा कर किसी गली मुहल्ले की भीड़ इकट्ठी कर सकता है और प्रवास के साथ धर्म प्रचार का दुहरा उद्देश्य एक साथ पूरा कर सकता हैं।

यों झोला पुस्तकालय चलाना, ज्ञानरथ धकेलना घरों में स्लाइड प्रोजेक्टर दिखाना, आदर्शवाक्य लेखन, स्टीकर्स लगाना, प्रचार उपकरण पेटी से छोटी-छोटी गोष्ठियाँ नियोजित करना, प्रभात फेरी स्तर का अलख जगाना, साप्ताहिक सत्संग के लिए दौड़-धूप करना यह सब भी प्रकारान्तर से पदयात्रा, तीर्थयात्रा की ही आवश्यकता पूरी करते हैं, पर साइकिल टोलीयात्रा का जो प्रभाव-परिणाम देखने को मिलता है, उसकी बात ही दूसरी हैं।

तीर्थयात्रा के पुण्य से प्रभावित का समावेश की बात सोचने वाले उसमें उपयोगिता का समावेश नहीं कर पाते, तो नर्मदा परिक्रमा गोदावरी परिक्रमा, गंगा परिक्रमा, किसी तीर्थ या क्षेत्र की परिक्रमा कर लेने भर से भी मन को सन्तुष्ट कर लेते हैं। महिलाएँ घरों के भीतर तुलसी के थाँवले तथा घर से बाहर पीपल वट आँवला आदि वृक्षों की परिक्रमा कर लेते हैं और कितनी बार भ्रमण हुए इसकी गणना के लिए सूत का कच्चा धागा निर्धारित केन्द्र के आस-पास लपेटती जाती हैं। इन चिन्ह पूजाओं को देखकर अभी भी यह अनुमान लगाया जा सकता है कि उस महान परम्परा की स्मृति तो किसी न किसी रूप में लोग अपनाये हुए ही हैं।

श्रावण या फागुन के महीनों में गंगाजी की काँवर कंधे पर रखकर लोग ले जाते हैं और समीपवर्ती किसी शिवालय में उस चढ़ाते हैं। काँवर पदयात्रा अभी भी देहाती क्षेत्रों में किया जाना प्रचलित है। जो लोग इस प्रयोजन के लिए निकलते हैं, वे मिल जुलकर धार्मिक गीत ऊँचे स्वर से गाते चलते हैं ताकि जो भी उस गायन को सुने वे कुछ प्रेरणा प्राप्त करें। जुलूसों में भी सहगान कोरस गाये जाते हैं। यह चिन्ह पूजा बताती है कि धर्म प्रचारक ही नहीं, तीर्थयात्रा का उपक्रम किसी न किसी प्रकार हर स्तर के लोग किसी न किसी रूप में क्रियान्वित करने के लिए लालायित रहते हैं।

पापों के प्रायश्चित के लिए एक बहु प्रचलित माध्यम तीर्थयात्रा ही की मान्यता अभी भी है। साधु और ब्राह्मणों के लिए निर्धारित क्रियाकृत्यों में एक तीर्थयात्रा भी है। वे चारों धाम, उत्तराखण्ड यात्रा आदि पर निकलते हैं। अन्यथा इतना तो करते ही है कि समीपवर्ती किसी पर्व पर मेलों में सम्मिलित होकर उस तरह का मन बनाते हैं। कुंभ आदि के बड़े मेलों एवं सोमवती अमावस्या, ग्रहण आदि के अवसर पर समीपवर्ती नदियों-सरोवरों में नहाने जाते हैं। वहाँ अच्छा खासा मेला लग जाता हैं।

प्राचीनकाल के ऋषि-मुनियों की एक प्रशिक्षण पद्धति यह भी थी कि वे अपने शिष्यों की मण्डली साथ लेकर तीर्थयात्रा पर निकलते थे और उपयुक्त स्थानों पर विराम करते हुए अध्ययन-अध्यापन का क्रम चलाते रहते थे। इससे उस ऋषि मण्डली को अनेक क्षेत्रों के साथ संपर्क साधने, अनुभव बटोरने एवं स्वास्थ्य संवर्द्धन के बहुमुखी लाभ मिलते थे। पद यात्रा स्वास्थ्य संवर्द्धन का एक अति सरल और महत्वपूर्ण माध्यम माना गया है। अभी भी छुट्टी के दिनों में छात्रों, किसानों एवं दूसरों लोगों को पर्यटन-परिभ्रमण के लिए विशेष सुविधा मिलती रहती है। इस प्रकार पर्यटन एक उद्योग भी बन गया है, जिसमें अनेक श्रमिकों, व्यापारियों एवं वाहनों आदि को कुछ कमाई कर लेने का अवसर मिलता है। यह सब प्रयोजन प्राचीनकाल की उस तीर्थ परम्परा का ही स्मरण दिलाते हैं। जिससे अनेकों को अनेक प्रकार के प्रत्यक्ष एवं परोक्ष लाभ उठाते रहने का अवसर मिलता था।

इक्कीसवीं सदी की युगान्तरीय चेतना का संदेश सुनाने एवं वातावरण बनाने, उत्साह उभारने के लिए उसी प्राचीन परम्परा को अब नये ढंग से नये कार्यक्रम के साथ प्रयुक्त करने की योजना बनाई गई है। जिसे अपनाकर प्रचारकों और विचारकों ने यहाँ के जन समुदाय एवं वातावरण को उच्चस्तरीय बनाने में असाधारण सफलता अर्जित की, उसे पुनर्जीवित करे उद्देश्य तथा सार्थक बनाने का ठीक यही समय हैं।

साइकिल टोलियों का प्रवास कार्यक्रम अपने चुने हुए क्षेत्र में किया जाय ताकि सर्वथा अजनबी क्षेत्र के साथ संपर्क साधने में, यात्रा सम्बन्धी तथा लोगों का सहयोग पाने के संदर्भ में असाधारण कठिनाई का सामना न करना पड़े। असाधारण निर्धारण में अपेक्षाकृत कम कठिनाइयों का सामना करने से काम चल जाता हैं।

कभी प्रचलन यह भी रहा है कि देवालयों, धर्मशालाओं का निर्माण विशालकाय धर्म प्रचार केन्द्रों के रूप में ही किया जाता था। वहाँ दान-दक्षिणा के रूप में खाद्य-पदार्थों आदि का भी संचय रहता था ताकि प्रचारकों को कम से कम असुविधाओं का सामना करना पड़े। तब धर्म केन्द्र और तीर्थयात्रा प्रयोजन दोनों एक दूसरे के साथ अत्यन्त सघनतापूर्वक जुड़े हुए थे। अब वह समय न जाने कब आवेगा। इसकी प्रतीक्षा करनी पड़ेगी। अब तो सिर्फ चिन्हपूजा की मनोरंजन प्रक्रिया ही सर्वत्र हावी है, परमार्थ किसी को सूझता ही नहीं। देवालयों में मनोकामनापूर्ण करने या सस्ती वाह-वाही लूटने के उद्देश्य से ही धर्म स्थानों का निर्माण होते देखा गया हैं।

इस दिशा में शान्तिकुञ्ज ने २४०० प्रज्ञापीठों की स्थापना उत्तर भारत के अनेकों स्थानों पर पिछले दिनों की थी। किन्तु दुर्भाग्य यही रहा कि पुरानी मान्यताओं को बदल सकने में वैसी सफलता नहीं मिली जैसी मिलनी चाहिए। कलेवर मुख्य रहा और प्राण प्रतिष्ठा के तथ्य को एक प्रकार से उपेक्षित ही रखा गया।

अब नये सिरे से नये ऐसे धर्म-स्थानों को बनाने की आवश्यकता अनुभव की जा रही है जो तीर्थ यात्रा आन्दोलन के साथ सघन रूप से जुड़े हुए रहें। जहाँ धर्म प्रचारकों को ठहरने की, भोजन ही सुविधाएँ उपलब्ध रहें।

अगले दिनों हर गाँव-कस्बों को ऐसे ही धर्म संस्थानों की आवश्यकता बड़ी संख्या में पड़ेगी। भले ही वे आर्थिक असुविधा की स्थिति में, झोपड़ी, खपरैल, टिनशेड, चौपाल, सघन वृक्ष के उद्यान जैसे ही आच्छादनों के सहारे बना लिये जाएँ। अपने तीर्थयात्री अब यह प्रयत्न भी करेंगे कि जहाँ ठहरें, वहाँ किसी न किसी रूप में एक प्रबल प्राण वाले तीर्थ आच्छादनों की स्थापना करें। भले ही उनके कलेवर सस्ते साधनों से बने हुए ही क्यों न हों?

एक प्राचीन परम्परा यह भी थी कि हर घर से एक-एक रोटी संग्रह करके तीर्थयात्रियों की भोजन व्यवस्था जुटा ली जाती थी। किसी पर अधिक भार न पड़ता था। बनाने-पकाने का झंझट भी नहीं रहता था और देने वाला यह अनुभव करता था कि उसने भारतीय धर्म में सर्वोत्तम स्तर के माने जाने वाले कार्य में सहयोग दिया। अब से जहाँ संभव होगा वहाँ शान्तिकुञ्ज की साइकिल यात्राएँ उस परम्परा को पुनर्जीवित करने का प्रयत्न करेंगे। जहाँ संभव न होगा वहाँ मंडली के साथ रहने वाले भारवाहक रिक्तों में वे सभी साधन लदे रहेंगे जो यात्रा अवधि में भोजन वस्त्र, प्रचार उपकरण आदि के रूप में आवश्यक होते हैं।

जहाँ भी प्रज्ञा केन्द्र हैं छोटे बड़े संगठन बन चुके हैं, वहाँ समय समय पर तीर्थ यात्राएँ निकलने का प्रयत्न चलना चाहिए। साइकिल, रिक्शा आदि उपकरण एक बार पूरी तरह संग्रह कर लिए जायँ तो टोलियों में जानें वाले ढपलियों को बजाते हुए नये मार्ग से जाने और लौटने के लिए चुनते हुए प्रबंध ऐसा करें कि तीर्थ प्रक्रिया वर्षा को छोड़ कर अन्य महीनों में बराबर चलती रहे। जहाँ इतना प्रबंध न हो रहा है वहाँ अपनी व अपने पड़ोसी की साइकिल माँग कर वर्ष में एक से दो बार दो टोलियाँ निकाल ही सकते हैं। इसके लिए फरवरी से जून तक का और सितम्बर से दिसम्बर तक का समय भी ऋतु की दृष्टि से अनुकूल रहता है। देश का हर गाँव तीर्थ बने, हर क्षेत्र में जीवंत युगान्तरीय चेतना उभरे, इसके लिए मनीषियों को गाँव-गाँव पहुँचने और जन-जन को ऐसे विचारशील प्रतिभाशाली लोगों के संपर्क कि नवयुग के अवतरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया का सूत्र संचालन बन पड़ा।

जहाँ कोई बड़ी तैयारी नहीं हैं। पूर्व योजना बनाने तथा इस संबंध में अब तक प्रशिक्षण प्राप्त करने का अवसर नहीं मिला है वहाँ एक सरल उपाय यह है अपने यहाँ से हरिद्वार चल पड़ने की योजना बनाई जाय। रास्ते में वाक्य लेखन, दीपयज्ञ, सहगान कीर्तन, प्रवचन, साहित्य विस्तार, स्टीकर लगाने आदि कार्य करते हुए शान्तिकुञ्ज पहुँचा जाय। वहाँ दो चार दिन विश्राम एवं मये प्रशिक्षण का लाभ प्राप्त करते हुए दूसरे रास्ते से घर वापस लौट चला जाय ताकि जाने में अलग और लौटने में अलग गाँवों से संपर्क सधे।

इसके अतिरिक्त यह भी हो सकता है कि अपने इलाके की एक परिधि बना कर उसके हर गाँव के साथ संपर्क बनाने का काम हाथ में लिया जाय और निर्धारित परिक्रमा पूरी की जाय। इमारतों, मन्दिरों-जलाशयों तक तीर्थयात्रा को सीमित न करते हुए उस क्षेत्र को ही एक जीवंत तीर्थ मान लिया जाय और उसकी अभ्यर्थना नव चेतना संचार द्वारा ही जाय।

अगले दिनों जन शक्ति ही समस्त समस्याओं का समाधान करेगी। राजनीति, सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक, पारिवारिक एवं अनीति उन्मूलन, सत्प्रवृत्ति संवर्द्धन जैसे कार्यक्रमों में जो लोग निरत होंगे उन्हीं के हाथ सुदृढ़ और सुनिश्चित नेतृत्व अनायास ही जा पहुँचेगा। सेवा के बदले श्रद्धा उपलब्ध करने वाले ही संसार का नेतृत्व करते और महामानव बनते रहे हैं। वातावरण बदलने में भी उन्हीं को सराहनीय श्रेय मिला है। इस साधना को सम्पन्न करने वाले स्वयं लाभान्वित होंगे और अपने संपर्क क्षेत्र को भी लाभान्वित करेंगे। इसलिए नवयुग के आगमन की पुण्य बेला में तीर्थयात्रा के रूप में युगचेतना का अभिनव संचार किया जा रहा है।

इस संदर्भ में शान्तिकुञ्ज की अपनी योजना है। बड़ी संख्या में यहाँ नई साइकिलें भाषण-वादन प्रचार उपकरण आदि संग्रह कर लिये गये है। शान्तिकुञ्ज के प्रामाणिक और प्रशिक्षित कार्यकर्त्ता अपनी-अपनी टोलियाँ लेकर माँग वाले क्षेत्रों में भेजे जाते रहते हैं। यात्रियों को कहाँ क्या करना चाहिए, इस प्रकार का प्रशिक्षण भी मिल जाता है और सुविधा साधन भी जुट जाते हैं। शान्तिकुञ्ज ने इन्हीं दिनों सन् १७७० में एक हजार साइकिल टोलियों को कार्य क्षेत्र में भेजने का निश्चय किया है। आवश्यकतानुसार यह संख्या लाखों तक पहुँच सकती है और समूचे विश्व को अपना कार्य क्षेत्र बना सकती हैं।


Quotation

भक्त यह नहीं, जो नाम रटता रहता है, वरन् वह है, जो उसकी प्रजा को सुखी और समुन्नत करने के लिए अपनी सुविधाओं की बाजी लगाता है।


विशेष लेख माला-१३ - सृजन शिल्पियों का समर्थ शिक्षण

शिक्षा के नाम पर साक्षरता से लेकर सामान्य काम काज में आने वाली जानकारियों का प्रशिक्षण तो वर्तमान स्कूल, कालेजों में भी होता है। इसलिए उसे ‘उदरपूर्णा’ भी नाम दिया जाता है। उस आधार पर नौकरी से लेकर अन्य अनेक प्रकार के व्यवसायों की योग्यता प्राप्त होती है। उस आधार पर लोग पैसा और प्रशिक्षण भी प्राप्त कर लेते हैं, पर व्यक्तित्व का विकास-परिष्कार जो इस प्रस्तुत शिक्षा परिधि से आगे की बात है, सहज उपलब्ध करने की कोई व्यवस्था कहीं दीख नहीं पड़ी।

प्राचीनकाल में व्यक्तित्व के विकास-परिष्कार को ही “विद्या” कहा जाता था। उसी की महिमा-महत्ता विद्यया मृतमश्नुते’ जैसी सूक्तियों में प्रकट की गई थी। उदरपूर्णा में काम आने वाली शिक्षा तो किसी भी तद्विषयक जानकार व्यक्ति या केन्द्र से उपलब्ध की जा सकती है, किन्तु विद्या की प्राप्ति के लिए प्रशिक्षक को स्तर ही नहीं प्रशिक्षण केन्द्र का वातावरण भी उच्चस्तरीय होना चाहिए। प्रशिक्षण का पाठ्यक्रम भी ऐसा होना चाहिए जो मान्य जानकारियाँ ही उपलब्ध न कराये वरन् अन्तराल के उन मर्मस्थलों को भी विकसित करे, जहाँ व्यक्तित्व उद्भव का मूलस्रोत सन्निहित है।

उस स्तर की विद्या की उपलब्धि जहाँ से होती थी, उन केन्द्रों को गुरुकुल, आरण्यक, आश्रम, तीर्थ, आदि के नाम से जाना जाता था। ऐसा प्रबंध जुटा सकना हर किसी के बस में नहीं होता। उन्हें मूर्धन्य मनीषा के धनी ऋषि स्तर के अध्यापक ही विनिर्मित संचालित करते थे। इसलिए जहाँ तहाँ पाये जाने वाले उन केन्द्रों में स्थानीय, समीपवर्ती लोगों के अतिरिक्त सुदूर क्षेत्री के संसार भर के विद्यार्थी एकत्रित होते थे। उस बड़ी व्यवस्था को विश्वविद्यालय के नाम से जाना जाता था। नालन्दा और तक्षशिला विश्वविद्यालय ऐसी ही भूमिका निभाते थे। बौद्ध विहारों और अन्यान्य समर्थ तीर्थों में भी ऐसी ही व्यवस्था थी। उन्हीं खदानों से बहुमूल्य नर रत्न विनिर्मित होते थे। महामानव ढालने की टकसाल भी उन्हीं को कहा जाता था। इन्हीं केन्द्रों का महान कर्तृत्व था जिसने महामानवों को इतनी बड़ी सेना खड़ी कर दी थी, जिसने संसार व्यापी अनाचार से असाधारण गई। वही पुरुषार्थ कल्पित होकर ऐसा वातावरण विनिर्मित करता है जिसे अब भी सतयुग के रूप में स्मरण किया जाता है।

इन दिनों पुरातन महानता की विधि-व्यवस्था का प्रतिरूप कहीं दिखाई नहीं पड़ता। शिष्यों की कमी नहीं, पर विद्यालयों का महान उद्देश्य पूरा करा सकने वाले केन्द्र कहीं खोजने पर भी नहीं मिलते। कोई तब भी था जब इस महान परम्परा के पुनर्जीवन की महान आवश्यकता समझी गई थी ओर कई महामानवों ने अपने अपने ढंग से ऐसे विद्यालयों का नवनिर्माण करने के लिए अपनी-अपनी क्षमता को अपने ढंग से नियोजित किया था।

महामना बालाजी द्वारा स्थापित हिन्दू विश्वविद्यालय, गुप्त द्वारा स्थापित काशी विद्यापीठ, दोनों अरविंद द्वारा स्थापित कलकत्ते का नेशनल कॉलेज, का गुरुकुल-काँगड़ी राजा महेन्द्र प्रताप का प्रेम महाविद्यालय, टैगोर का शान्ति निकेतन आदि कुछ ही स्थापनाएँ अभीष्ट की पूर्ति के लिए बन पड़ीं। पर यह नहीं कहा जा सकता कि उनमें से कितनी प्रतिभाएँ उन्नति, और वे तंत्र किस सीमा तक उद्देश्य की पूर्ति कर सके। महात्मा गाँधी, योगी अरविन्द, विक्षोभ आदि के अपने निजी संपर्क प्रवास प्रयोजन के लिए चले, और उनके किसी तक परिणाम भी निकले। इनमें गाँधी के सत्याग्रही ओर बुद्ध के परिव्राजक विशेष रूप से सिद्ध हुए जिनने प्रतिभाएँ भी निखारी और ऐसी योजनाएँ भी बनाई जिससे सामाजिक कल्पनाओं के कारगर समाधान भी निकले इसी श्रृंखला में एक अभिनव कड़ी शान्तिकुञ्ज हरिद्वार की जुड़ती है। वहाँ वातावरण, प्रशिक्षण एवं अध्यात्म साधना उपक्रम की तीनों व्यवस्था जुटाते हुए ऐसा प्रबंध किया गया है कि प्राचीन विश्वविद्यालयों की तरह सभी शिक्षार्थियों को बिना अमीर-गरीब के अन्तर के शिक्षा देने में सभी अनिवार्य सुविधाओं को प्राप्त करने का अवसर मिल सके। सभी छात्र निवास, भोजन प्रशिक्षण आदि की निःशुल्क सुविधाएँ प्राप्त करते हैं। अन्यथा मूल्य चुकाने की शर्त रहने पर मात्र अमीरों को ही उपयुक्त विद्या लाभ मिल पाता और निर्धनों को आत्म परिष्कार एवं परमार्थ प्रयोजनों के लिए कुछ कर सकने से सर्वथा वंचित ही रहना पड़ता। उपयुक्त साधनों के अभाव में ऐसे समर्थ विद्यालय हर कहीं स्थापित भी तो नहीं हो सकते थे। एक प्रकार से इसे बहुमुखी एवं समग्र विधारण्यक या मल्टीवर्सिटी कहा जा सकता है।

कहा जा चुका हैं कि युग परिवर्तन की प्रक्रिया की पीछे पूँजी, प्रतिभा संगठन आदि कोई प्रत्यक्ष दीख पड़ने वाली प्रतिभा शक्ति काम नहीं कर रही है। इतना बड़ी योजना जिसमें किसी देश और क्षेत्र का सुधार परिवर्तन नहीं, वरन् समूचे विश्व की चेतन और अचेतन स्तर की असंख्यों समस्याएँ जुड़ी हुई हैं, जिनकी जड़ें पाताल तक गहराई में घुसी हुई है कि उन्हें प्रभावित करना, बदलना में घुसी हुई है कि उन्हें प्रभावित करना, बदलना किसी भौतिक शक्ति का काम नहीं है, उसकी योजना और व्यवस्था बनाने में एक मात्रा दैवी शक्ति ही सफल हो सकती है, उसी के द्वारा समूचा नवनिर्माण से संबंधित ताना-बाना बुना जा सकता है। उसी शक्ति ने उद्गम-उद्भव केन्द्र के रूप में शान्तिकुञ्ज का चयन किया है। चम्बल, नर्मदा, गंगा, यमुना जैसी विशाल नदियों के उद्गम छोटे-छोटे हैं, पर आगे बढ़ने पर वे आश्चर्यजनक विस्तार पकड़ गये है। शान्तिकुञ्ज को भी गोमुख की तरह एक छोटा झरना कह सकते हैं, जिसके साथ गौरीकुण्ड या नियाग्राप्रपात जैसी सुविस्तृत संभावनाएँ जुड़ी हुई।

गंगा की गोद, हिमालय की छाया, सप्तऋषियों की तपोभूमि दिव्य वातावरण और अखण्ड दीप प्रज्ज्वलन, नित्य यज्ञ, युगसन्धि महापुरश्चरण की आधारशिला के साथ-साथ वहाँ अनायास ही ऐसा शिक्षण तंत्र बन गया है, जिसे चंदनवन, नन्दनवन की उपमा दी जा सकती है और कहा जा सकता है कि उसमें प्रवेश करने वाला जब लौटता है तो उसकी स्थिति ऐसे कायाकल्प जैसी हो जाती है, जिसकी तुलना वयोवृद्ध च्यवन का अश्विनी कुमारों के अनुग्रह से तरुण हो जाने से की जा सकती हैं।

शान्तिकुञ्ज की अपनी अनेक विशेषताएँ हैं, पर उनमें से प्रमुखता इसे दी जाती हैं कि उसने नालन्दा, तक्षशिला के समकक्ष बनने का प्रयत्न किया है। एक लाख प्रज्ञाकेन्द्र और एक करोड़ सृजनशिल्पी विनिर्मित करने और उन्हें युग देवता के चरणों में भावभरी श्रद्धाञ्जलि के रूप में प्रस्तुत करने का ऐसा संकल्प किया है, जिसके साकार एवं सार्थक होने के संबंध में आशंका नहीं की जा सकती। यहाँ अपने ढंग की ऐसी शिक्षा पद्धति चलती हैं, जिसमें पाठ्यक्रम ही पूरे नहीं कराये जाते, वरन् साधना एवं प्रेरणा के उभयपक्षीय प्रयत्नों से सामान्यों को असामान्य बना देने का प्रयत्न किया जाता है, टकसाल के सिक्कों और सीप के मोतियों की तरह।

युग परिवर्तन की मध्य-संध्या दस वर्षों की है। सन् १९७० से २००० तक इस केन्द्र से साहित्य सृजन, संगठन, एवं प्रचार-प्रसार परिवर्तन से लेकर सृजनशिल्पियों का सृजन इन क्रिया–कलापों में प्रमुख है। आश्रम में स्थान की कमी और सम्मिलित होने वाले भागीदारों की बहुलता को देखते हुए पाँच-पाँच दिने के छोटे-छोटे शिक्षण शिविर चला कर किसी प्रकार समाधान ढूँढ़ा गया है। इतने पर भी यह गुंजाइश रखी गई है कि जिनको अधिक देर टिकाना आवश्यक है उन्हें एक महीने तक के लिए रोक लिया जाय। सीखना और सिखाना वही है जिनसे भागीरथी वरिष्ठता अर्जित की जा सके। हनुमान, अंगद जैसा युगधर्म निबाहा जा सके।

प्रेरणाएँ, परामर्श, विचार-विनिमय के, समाधान के आधार पर उपलब्ध कराई जाती हैं। इसके लिए कोई निर्धारित पाठ्यक्रम नहीं है। व्यक्ति विशेष की आवश्यकता के अनुसार चिन्तन को इतना बदल देने का प्रयत्न किया जाता है कि उस आधार पर सामान्य को असामान्य और व्यक्ति को दिव्य स्तर का बनाया जा सके। यह प्रयोग इतना सफल हुआ है कि मिशन के कार्यकर्ता देश-विदेश के कोने-कोने में छाये देखे जा सकते हैं। यह प्रेरणा पक्ष हुआ।

इसके साथ ही साधना की ऐसी प्रक्रिया थी जुड़ी हुई है जिसे युग साधना या सामयिक तपश्चर्या कहा जा सकता हैं। नित्य गायत्री जप उदित होते सत्ता का स्वर्णिम ध्यान, नित्य यज्ञ अखण्ड-द्वीप का सान्निध्य, दिव्य नाद की अवधारणा, आत्मदेव की साधना सहगान कीर्तन जैसे अनेक प्रयोग ऐसे है जो सम्मिलित रूप से युग साधना की आवश्यकता पूरी करते हैं। तपाकर खरा सोना बनाने में बहुत हद तक सफल होते हैं। सूर्यतापी गंगाजल से बना हुआ हविष्यान्न यहाँ का भोजन रूपी प्रसाद है। आश्रम की परिधि में पाँच दिनों तक उसी प्रकार बिना दौड़-धूप के एकनिष्ठ रहना पड़ता है जैसा कि माता के गर्भ में नियत अवधि तक भ्रूण पकता है। संचित कुसंस्कारों के प्रायश्चित परिमार्जन के रूप में जो कुछ करना पड़ता है उसे सामर्थ्य अनुसार नवसृजन की लोक सेवा में निरत रहने के रूप में जाना जा सकता है।

सोचा यह गया है कि जिस प्रकार कभी हर राजपूत के घर से एक सैनिक, हर ब्राह्मण के घर से एक परिव्राजक, हर लोकसेवी परम्परा के परिवार से एक समर्पित शिष्य निकला करता था, उसी प्रकार अब हर सुसंस्कारी परिवार से एक सृजन शिल्पी निकलने की परम्परा चल पड़े। उसके घरेलू उत्तरदायित्व परिवार के अन्य सदस्य मिलजुल कर पूरा करें। इस निमित्त आश्रम में गृह उद्योगों की भी एक सुनिश्चित शिक्षणशाला है जिसमें वह सिखाया जाता है जिसके आधार पर हर परिवार स्वावलंबनपूर्वक अपना खर्च चला सके और एक व्यक्ति की आर्थिक जिम्मेदारियाँ अपने कन्धों पर वहन कर सके।

मिशन दिन-दिन मत्स्यावतार की तरह अपना कलेवर निरन्तर बढ़ाता चला जाता है। इसलिए संपर्क परिकर के सदस्यों का आश्रम में निरन्तर आते जाते रहना स्वाभाविक है। उनके ठहरने और भोजन का प्रबंध भी असाधारण रूप से अधिकाधिक बढ़ाना पड़ रहा है। इसलिए पिछले दिनों वाले रसोईघर से काम नहीं चला अब उसे आधुनिक यंत्र उपकरणों से इस प्रकार सुसज्जित कर दिया गया है कि हर दिन हजारों का ठहरना और भोजन पाना कठिन न रहे। आश्रम में स्थाई रूप से रहने वाले लगभग पाँच सौ कार्यकर्ता है। मिलजुल कर श्रमदान से उन सब कार्यों को सेवा साधना के आधार पर पूरा कर लेते हैं, जिनके लिए यदि कर्मचारी रखने पड़ते तो उनका व्यय भार असंभव हो जाता। यहाँ की गरिमा तो गिरती ही।

शान्तिकुञ्ज की और भी कई अद्भुत विशेषताएँ हैं। जड़ी बूटी उद्यान और अनुसंधान के सहारे आयुर्वेद का पुनर्जीवन, शोध संस्थान द्वारा मनोविकारों का निष्कासन और प्रतिभा परिवर्धन के अदृश्य स्रोतों का रहस्योद्घाटन यह दोनों ही प्रयोग ऐसे है जिनके सहारे अभीष्ट शारीरिक-मानसिक परिष्कार में असाधारण सहायता मिलती है। यह दोनों तंत्र जैसी सफलता अर्जित कर रहे हैं उसे देखने के लिए देश के कोने-कोने से अगणित मनुष्य इसलिए आते है कि अध्यात्म आधार को लेकर व्यक्ति का सर्वतोमुखी परिष्कार सचमुच बन पड़ सकता है।

इक्कीसवीं सदी उज्ज्वल भविष्य के अनेक पक्षों पर प्रकाश डालने वाला सर्वसुख साहित्य भी इसी आश्रम में छपता रहता है जिसके लिए एक छोटा प्रेस लगा है जिसमें मिलजुल कर ही प्रचार साहित्य छपता रहता है जो श्रमदान की सेवा साधना जड़ जाने के कारण सस्ता भी पड़ता है और प्रचार प्रयोजन में सहायक भी सिद्ध होता हैं।

नित्य का साँस्कृतिक कार्यक्रम, प्रखर प्रवचन, तीर्थ यात्रा योजना का प्रशिक्षण, स्लाइड प्रोजेक्टर ऑडियो टेप, वीडियो स्तर के कैसेट आदि मशीन उपकरणों की एक वैज्ञानिक कक्षा अलग से चलती रहती है जिसमें यांत्रिक प्रचार प्रक्रिया की आवश्यकता पूरी होती रहती है। इन्हें दर्शक देखते और शिक्षार्थी सीखते हैं।

पत्राचार विभाग द्वारा व्यापक संख्या में सृजन शिल्पियों का मार्गदर्शन चलता रहता है। इसके लिए आश्रम में ही एक पोस्ट ऑफिस भी है। आश्रम की प्रचार जीपें निरन्तर देश व्यापी दौरे पर रहती है ताकि छोटे-बड़े आयोजनों और सम्मेलनों की आवश्यकता भी क्रमबद्ध रूप से पूरी होती रहे। यह क्रम वर्ष भर चलता रहता है।


विशेष लेख माला-१४ - सहस्र कुण्डी महायज्ञों का देशव्यापी सरंजाम

शासन व्यवस्था संसार भर पर आच्छादित है, पर उसका क्रम खण्ड-खण्डों में विभाजित होकर लागू होता है। दुनिया एक है पर उसमें देश अनेक है। देश में प्रान्त, प्रान्तों में जिले, जिलों में मंडल बँटते हैं और उनके तदनुसार शासनाध्यक्ष नियुक्त होकर कार्यरत होते हैं। थाने, तहसील, परगने आदि इसी विभाजन के अंतर्गत आते हैं। केन्द्रीय शासन के अंतर्गत विधानसभाएँ, जिलापरिषदें, परिषदों आदि के चुनाव होते हैं। तभी विकेन्द्रीकरण के साथ-साथ केन्द्रीकरण का तारतम्य बैठता है।

धर्मतंत्र अथवा समाज तंत्र का भी इसी प्रकार विभाजन बन पड़ता है। छोटी इकाइयाँ मिलकर एक बड़ी इकाई बनती हैं। यों इन दिनों सम्प्रदायों और मत मतांतरों का भी बोलबाला है और तीर्थों, धर्मकेन्द्रों का विभाजन विघटन स्तर का हो गया है, फिर भी ऐसी अराजकता प्राचीनकाल में नहीं थी और भविष्य में भी न रहेगी। राजतंत्र और धर्मतंत्र दोनों मिलकर एक सुरक्षा, सुव्यवस्था, स्वास्थ्य, शिक्षा, संचार, मुद्रा, अर्थतंत्र आदि का संचालन करेगा, पर मानसिकता, भावना, आचार संहिता, प्रथा प्रक्रिया आदि का दायित्व धर्मतंत्र को सँभालना पड़ेगा। भौतिकता से मनुष्य को लाभान्वित करने का सरंजाम शासन जुटाये और अध्यात्मिकता, नीतिनिष्ठा, समाजनिष्ठा, आदर्श, अनुशासन आदि को करने की जिम्मेदारी धर्मतंत्र के कन्धे पर रहे। इतने पर भी आवश्यक है कि दोनों के बीच एकता भी रहे और दोनों एक दूसरे को परिष्कृत-व्यवस्थित करने में अपनी-अपनी भूमिका निबाहें। समग्रता इसी आधार पर बन पड़ेगा।

शासनतंत्र अपने ढंग से चल रहा है। उसकी उठक-पटक राजनीतिक पार्टियाँ करती रहतीं है। सुधार परिवर्तन होते रहते हैं, पर दुर्भाग्य यही हैं। कि मानसिकता, भावना और आदर्शवादी अनुशासन को सुस्थिर समुन्नत रखने वाला धर्मतंत्र इन दिनों अन्य क्षेत्रों की तुलना में विकृतियों से अधिक भर गया है, जबकि उसके अधिक परिचित, प्रभावी एवं संगठित होने की आवश्यकता थी ताकि शासन क्षेत्र में जो गड़बड़ी चले, उसे संतुलित करने में उसकी प्रभाव क्षमता का परिचय मिल सके। धर्मतंत्र से लोक शिक्षण की प्रक्रिया इसी आधार पर चल पड़ी है। इक्कीसवीं सदी की युगपरिवर्तन योजना के अंतर्गत इसी प्रक्रिया को प्रमुखता दी गई हैं। युगसन्धि के नवनिर्धारणों में इसी प्रसंग को प्रमुखतापूर्वक उभारा गया है। जन-संपर्क के जनजागरण के अनेकानेक कार्यक्रम इसी लक्ष्य को आगे रख कर संचालित किये गये हैं।

यह घोषणा देश के, विश्व के कोने-कोने में सुनी गई है कि सन् ७० से २००० के बीच दस वर्षों में जनजाग्रति का-लोकमानस का परिमार्जन का लक्ष्य पूरा कर एक लाख दीपयज्ञों और एक करोड़ सृजन शिल्पियों की भागीदारी नियोजित किये जाने का इतना बड़ा कार्यक्रम बना है जिसे अभूतपूर्व असाधारण एवं ऐतिहासिक कहा जा सकता है। अपेक्षा की गई है कि इस कार्यक्रम के आधार पर देश भर के कोने-कोने तक युगचेतना का प्रकाश पहुँचाया जायगा। इससे कुछ कदम आगे बढ़ते ही विश्व भर में बिखरे भारतीय मूल के प्रवासियों और इसके बाद अनेक धर्मावलम्बियों, भाषा-भाषियों मान्यताओं वाले लोगों को उनकी अभिरुचि के साथ संगति बिठाते हुए इसी प्रयास को व्यापक बनाया जायगा। प्रस्तुत ६०० करोड़ मनुष्यों को मानवी गरिमा की छत्र छाया में लाने की यही योजना है। शान्तिकुञ्ज से संबंधित सभी परिजन इस विशालकाय योजना के कार्यान्वित करने में इन्हीं दिनों जुट गये हैं। जो बच गये हैं इन्हें आग्रहपूर्वक इस प्रयास में सहभागी बनाने के प्रति योजनाबद्ध आन्दोलन चलाया जा रहा है। परिजनों पाठकों तक ही नहीं, अपरिचितों को भी इस माध्यम से एक जुट करने और प्रगति पथ पर चल पड़ने के लिए आन्दोलित किया जा रहा है। सन् ९० को शुभारंभ वर्ष माना गया है। अगले दस वर्ष इस प्रयोजन को व्यापक और परिपक्व बनाने में लगेंगे। फिर सन् २००० के आगमन के साथ इक्कीसवीं सदी का सूत्रपात हो ही जाएगा।

सन् ९० का निर्धारण यह है कि जहाँ भी प्रज्ञापीठें, प्रज्ञामंडलियाँ, जाग्रत शक्तिपीठें विद्यमान हैं, उन सभी में एक-एक हजार दीपयज्ञों के आयोजन हों। उसमें एक मण्डल के लोगों को आमंत्रित ही नहीं सम्मिलित भी किया जाय। मण्डलों के गठन आवश्यक है। राजनीतिक क्षेत्र वाले भी तो अपने विभाजन इसी प्रकार करते हैं। धर्मतंत्र वालों को भी अपने मंडल संगठित करने चाहिए और उसके आधार पर दीपयज्ञों के समारोह होने चाहिए। उस क्षेत्र की विचारशील जनता को इनमें प्रयासपूर्वक अधिकाधिक संख्या में सम्मिलित किया जाना चाहिए।

हर मंडल में कई-कई हजार वेदी के दीपयज्ञ हों। इसके लिए संपर्क साधने, उद्देश्य एवं महत्व बताने, संभावनाओं पर ध्यान केंद्रित कराया जा सके तो निश्चय ही दो दो, तीन तीन मील के फासले पर उपरोक्त स्तर के आयोजनों की धूम मंच सकती है और उस परिधि के लाखों व्यक्ति नवयुग के, नवजीवन के आधारों को अपनाने के लिए आन्दोलित हो सकते हैं।

कुछ प्रभावशाली प्रतिभाएँ यदि इन आयोजनों को सम्पन्न बनाने के लिए कटिबद्ध हो सकें तो इतने भर से ही उज्ज्वल भविष्य से जुड़े हुए नवयुग आन्दोलनों की तूफानी लहर पैदा हो सकती है। समर्थ प्रतिभाओं को कार्यक्षेत्र में उतारने का संदेश शान्तिकुञ्ज से सभी दिशाओं में देश के कोने-कोने में भेजने की प्रक्रिया सुनिश्चित संभावना के साथ योजनाबद्ध रूप से आरंभ कर दी गई हैं।

उपरोक्त आयोजन न तो अत्यधिक श्रम साध्य हैं और न खर्चीले। इच्छाशक्ति की प्रबलता और व्यवस्थित दौड़-धूप से आयोजन में सम्मिलित होने वालों की अभीष्ट संख्या एकत्रित हो सकती है। प्रचार कार्य के लिए कई सरल मार्ग हैं। साइकिल और रिक्शों के सहारे चलने वाली तीर्थयात्रा योजना, ज्ञानरथों द्वारा गली-मुहल्ले-हाट-बाजारों में संदेश गुँजाया जाना कुछ अर्थ रखता है। उस आमंत्रण पर एक दिन में क्षेत्रीय जनता को सरलतापूर्वक एकत्रित किया जा सकता है। इसी संदर्भ में दो प्रचार प्रयोजन और भी प्रभावी सिद्ध होते हैं। इनमें एक है स्लाइड प्रोजेक्टर। जो घरों में गली-मुहल्लों में प्रकाशचित्र दिखाते हुए अभीष्ट उद्देश्य की जानकारियाँ जन-जन तक पहुँचा सकती हैं दूसरा माध्यम है टेपरिकार्डर पेटिका जिसमें एंप्लीफायर भी है जिसके माध्यम से घरों में अच्छा-खासा संगीत सम्मेलन हो सकता है। सुनने के लिए क्षेत्र के लोग सहज ही पहुँच सकते हैं। साथ ही वे यह जानकारी भी प्राप्त कर सकते हैं कि निकट भविष्य में किस निकट एवं समीपवर्ती गाँव में सहस्रकुण्डीय दीपयज्ञ को सम्मिलित होने के लिए ऐसा दैवी निमंत्रण प्राप्त हो रहा है एवं जिसे किसी को भी अस्वीकृत नहीं करना चाहिए।

संयोजकों को छाया का प्रबंध करने के लिए शामियाना, बैठने के लिए फर्श, घेरा बन्दी के लिए कनात जैसी आवश्यकताएँ पड़ेगी। लाउडस्पीकर का भी प्रबंध करना होगा। प्रवचनमंच तथा पूजावेदी की व्यवस्थित तखत एकत्र करके बनाई जा सकती है। ऐसा भी हो सकता है कि एक क्षेत्र के लिए एक सेट की व्यवस्था कर ली जाय और उसी का प्रयोग फिर समीपवर्ती सैकड़ों कार्यक्रमों में काम आता हरे। बड़ी संख्या में जन उपस्थिति के लिए पीने का पानी और पेशाबघरों का प्रबंध भी करना पड़ता है। सज्जा तथा सुव्यवस्था के लिए अपने ही लोगों में से कुछ को स्वयंसेवक स्तर की जिम्मेदारी संभालने के लिए प्रशिक्षित कर दिया जाय। अगरबत्ती दीपक लोग अपने पैसे से खरीद लें। इनकी दुकानें यज्ञशाला क्षेत्र में भी लगाई जा सकती हैं।

एक दिन का यह आयोजन प्रायः सवेरे से शाम तक चलेगा। इतने लम्बे समय तक सम्मिलित रहने वालों के लिए एक बार का भोजन प्रबंध बन पड़े तो ठीक है। यह मुश्किल तब पड़ेगा जब एक ही जगह पूड़ी सब्जी जैसी खर्चीली व्यवस्था बनाई जाय और पंक्तिबद्ध रूप से सबको बैठा कर खिलाया जाय। यह प्रीतिभोज शैली अपने कार्यक्रमों में अपनाये जाने की तनिक भी आवश्यकता नहीं हैं।

नया निर्धारण यह हैं कि हर घर से एक दो रोटी तथा शाक सब्जी लाने के लिए प्लास्टिक की थैलियाँ बाँट दी जाय और कहा जाय कि इसमें अपनी सामर्थ्यानुसार कुछ बना हुआ भोजन भी आयोजन में आने के समय साथ लेते आवें। रोटी संग्रह करने वाली थैलियों पर छपा रहे स्वेच्छापूर्वक बना-शाकाहारी भोजन’ इस प्रकार का भोजन सब लोग पंक्तिबद्ध होकर प्रीतिभोज की तरह खायें तो उससे जाति-वशं सब एक समान’ के आदर्श की पूर्ति होती है और जातिगत ऊँच-नीच का जो भेद-भाव चल रहा है उससे निवृत्ति मिलती है।

सहभोजन के सम्बन्ध में एक प्रयोग यह भी हो सकता है कि खिचड़ी या दलिया एक जगह बना लिया जाय और उसे पत्तलों में परोस कर खाया जाय।

सहगान कीर्तन से भी एकता के भाव विकसित होते हैं। साथ-साथ गायत्री मंत्र के उच्चारण में भी जहाँ एकता और समता का प्रतिपादन है वहाँ उससे सूक्ष्म जगत का ऐसा परिष्कार भी जुड़ा है जो नवयुग के अवतरण में सहायता करेगा।

इन आयोजनों में सम्मिलित होने वालों को कुछ उपयोगी प्रतिज्ञाएँ भी करनी चाहिए। जैसे हर साक्षर द्वारा दो निरक्षरों को साक्षर बनाया जाय। नशेबाजी छोड़ी और छुड़ाई जाय। प्रगति कार्यक्रमों में सहयोगी बनने के लिए समयदान-अंशदान का पुण्य छोटे-बड़े किसी न किसी रूप में निबाहा जाय।

धर्म के चार-चरण भी व्याख्या करने योग्य हैं और प्रतिज्ञा में सम्मिलित रखने योग्य भी। १-समझदारी २-ईमानदारी ३-जिम्मेदारी ४-बहादुरी पाँच नियम ऐसे हैं जिन्हें अपने प्रभाव क्षेत्र में सुविस्तृत किया जाना चाहिए।

१-श्रमशीलता २-शिष्टता ३-मितव्ययिता ४-सुव्यवस्था ५-सहकारिता व्याख्यानों में इन सद्गुणों को अपनाने की उपस्थितजनों को प्रेरणा दी जानी चाहिए। विवाहों में दहेज-जेवर और धूम धाम का परित्याग करने का व्रत लेना भी ऐसा है जिसे सभी लोगों को संकल्प रूप में निबाहने की प्रतिज्ञा करनी चाहिए।

दीपयज्ञ में उपस्थित जन अपने-अपने प्रभाव क्षेत्र में ऐसे ही छोटे-बड़े आयोजन करने कराने की प्रतिज्ञा ले तो इस प्रक्रिया का व्यापक प्रचार हो सकता है और धर्मधारणा के लिए-सेवा साधना के लिए एक नया वातावरण विनिर्मित हो सकता है।

इस योजना से कुछेक प्रतिगामियों को छोड़कर अन्य किसी की कोई असहमति नहीं हो सकती है। एक दिन का समय निकालना और घर से कुछ खाद्य पदार्थ लेकर चलना भी इतना कुछ वर्णित नहीं है, जिसके लिए कोई यदि समुचित प्रचार किया जाय तो बड़ी संख्या में लोगों को सम्मिलित न किया जा सके। इस प्रकार एकत्रित हुए लोगों का एक परिवार समुदाय गठित होता है जिसकी संयुक्त शक्ति को अवांछनीयताओं से जूझने और एक जुट हो कर कोई उपयोगी कार्य सम्पन्न होने के निमित्त लगाया जा सकता है और उसके दूरगामी सत्परिणाम कुछ ही दिनों में सामने आ सकते हैं।

इस आयोजनों को गठित करने वाले जन साधारण के सम्मुख एक लोकसेवी और सुधारवादी के रूप में सामने आते हैं। छवि बनती है और उस छवि का लाभ व्यक्तिगत और सामूहिक प्रगति के रूप में अनेक आधार लेकर सामने आ सकती है। नेतृत्व के अभिलाषी से इन आयोजनों के सहारे अपनी मनोकामना योग्यतापूर्वक सहज पूरी कर सकते हैं।

समर्थ शाखा संगठनों के लिए कुछ उपकरण खरीदना और अपने तथा अन्धों के क्रिया–कलापों में उपयोग करना व्यय साध्य है। दीपयज्ञों के साथ धार्मिकता और पुण्य-परमार्थ के जुड़े होने के कारण खुशहाल लोगों से इतना पैसा भी आसानी से संग्रह किया जा सकता है जिसके सहारे तीर्थयात्रा ज्ञानरथ, स्लाइड प्रोजेक्टर, टेपरिकार्डर पेटी, बिछावन, आच्छादन आदि को खरीद सकना सरलतापूर्वक बन पड़े। दीपयज्ञों को सुनियोजित ढंग से आयोजित किया जा सके तो युग अवतरण के महान प्रयोजन में उनसे बड़ी सहायता मिल सकती है।


विशेष लेख माला-१५ - महिलाओं की महानता उभरे

इक्कीसवीं सदी को महिला शताब्दी घोषित किया गया है। इसे विश्व की आधी जनता का स्वाधीनता आन्दोलन भी कह सकते हैं और नव जीवन स्तर का पुनरुत्थान भी। नारी के रूप में जीवनयापन कर रही आधी जनसंख्या को भविष्य में भी गई गुजरी स्थिति में पड़ा रहने नहीं दिया जा सकता, अन्यथा अर्धांग पक्षाघात पीड़ित की तरह अपंग स्थिति में रहने वाला समुदाय स्वयं तो पिछड़ी, परावलम्बी स्थिति में रहेगा ही। समर्थ पक्ष के ऊपर भी गले का पत्थर बनकर लटकेगा और प्रगति का मार्ग अवरुद्ध ही बना रहेगा। एक पहिये की गाड़ी किस प्रकार आगे बढ़ सकेगी? भगवान ने नर और नारी को एक सिक्के के दो पहलू के रूप में बनाया है। दोनों की समता तो अभीष्ट है ही साथ ही दोनों को समान रूप से शिक्षित, समर्थ, स्वावलम्बी, कुशल एवं प्रगतिशील भी होना चाहिए। यह हो भी रहा है। संसार भर में एक नयी लहर चल पड़ी है जो हर किसी को मानवीयता से वंचित न रहने के लिए दैवी प्रेरणा की तरह उकसा रही है। तदनुसार वातावरण बना रही है और ऐसे साधन जुटा रह है ताकि भविष्य में दोनों परस्पर पूरक इकाइयों में से कोई भी किसी की तुलना में किसी भी दृष्टि से दीन, दुर्बल होकर न हरे।

सहायकों की आवश्यकता सदा रही है और अब भी है, किन्तु इसके लिए उत्साह और साहस उठने वाले का ही रहे। बच्चा स्वयं उठने और चलने का प्रयत्न न करे तो अभिभावक ही जन्म भर उसे गोदी के लिए कहाँ फिरेंगे? स्वावलम्बन भी भाग्योदय का एक समर्थ पक्ष है।

लम्बे समय से नारी की अगणित क्षमताओं और विशेषताओं का शोषण नर द्वारा होता रहा है। समय आ गया कि अब उस अनाचार का पश्चाताप, प्रायश्चित करने के लिए नये सिरे से नये प्रयत्न किये जायँ और जो अपहरण हुआ है उसकी पूर्ति करने के लिए समय रहते भावनापूर्ण प्रयास किये जायँ अन्यथा अब तक हुई क्षति आगे और भी बढ़ेगी और ऐसा संकट खड़ा करेगी जिससे दोनों पक्षों को अपार हानि सहनी पड़े।

पुरुषों में से प्रत्येक के मन में वह न्याय निष्ठा और उदारता जागनी चाहिए जो गहरे घावों पर मरहम लगाने के रूप में सदाशयता का परिचय दे सके। अनीति को आगे भी चलते रहने के लिए आग्रह करना और उठने की संभावनाओं को निरस्त करना जले पर नमक छिड़कने जैसा पाशविक अनाचार माना जायेगा।

नर और नारी की अनिवार्य समता का वातावरण बनाने के लिए आवश्यक है कि कन्या और पुत्र में, बेटी और वधू में अन्तर करने की कुप्रथा का अब पूरी तरह अन्त कर दिया जाय। दोनों की प्रगति एवं सुविधा का हर प्रसंग में समान व्यवहार, समान सम्मान का प्रचलन अपनाया जाय। शिक्षा, स्वावलम्बन, दक्षता, श्रेय सम्मान दोनों को ही समान रूप से मिलने चाहिए। परिवार का हर सदस्य इसी नीति को अपनाये और भेदभाव की अनीति जहाँ पर भी जितने अंशों में चल रही हो उसे समाप्त करने में अनुदारता न दिखाये।

शिक्षा मनुष्य की आरम्भिक आवश्यकता है। इसे लड़कों की तरह लड़कियों को भी उपलब्ध कराने में कहीं किसी प्रकार का दुहरा मापदण्ड न अपनाया जाय। हर व्यक्ति को आर्थिक दृष्टि से स्वावलम्बी होना चाहिए ताकि कोई किसी पर भार बनकर न रहे, वरन् एक दूसरे की सहायता करते हुए इस महँगाई भरे और आर्थिक संकट भरे, बढ़ती आवश्यकताओं वाले समय में एक दूसरे की सहायता करते हुए समूचे परिवार में खुशहाली ला सकें। देखा गया है कि विधवाएँ एवं परित्यक्ताएँ कई छोटे बच्चे गोदी में होने की स्थिति में ससुराल अथवा पितृगृह से कारगर सहायता न मिलने पर कितनी दुर्गति भुगतती हैं। हर भुक्तभोगी यह जानता है। ऐसी स्थिति में किसी भी लड़की को न पड़ना पड़े। इसी कमजोरी के कारण नारी को हर प्रकार से दबाव भी सहने पड़ रहे हैं क्योंकि वह दूसरों की सहायता कर सकना तो दूर, अपने खर्च के लिए भी दूसरों पर अवलम्बित रहती है। कुटीर उद्योग से लेकर अध्यापन तक का कोई न कोई सारेत उसके हाथ में विवाह से पहले ही थमा देना चाहिए ताकि उसे आर्थिक दृष्टि से सर्वथा पराश्रित न रहना पड़े। पैतृक संपत्ति, परिवार की सम्पन्नता अथवा पति की कमाई जैसे माध्यमों को आड़े समय में उपयोग कर सकने का सुयोग मिलता ही रहेगा, इसका अब कोई विश्वास रह नहीं गया है। शिक्षा-स्वावलम्बन के अतिरिक्त स्वास्थ्य, दक्षता कुशलता, अनुभव आदि के साधन भी नारी के लिए जुटने ही चाहिए। परिस्थितियों के अनुसार हर किसी को यह प्रयत्न करना चाहिए कि कोई महिला परावलम्बन के लिए सर्वथा विवश होकर अशिक्षित अनगढ़ स्तर की रहे, ऐसी विपत्ति में न फँसने पाए। इस के लिए जो उपाय संभव हों वे करने चाहिए।

एक दूसरा वज्रपात है- बाल विवाह। इस उतावली में लड़कियों को सुयोग्य बनाने का अवसर ही नहीं मिलता। मनोबल एवं कौशल विकसित होने की तो गुंजाइश ही नहीं रहती। कच्ची आयु में काम-क्रीड़ा का दबाव सहने से उसका शरीर और मन तो निचुड़ ही जाता है साथ ही बच्चों का पालन कर सकने की दक्षता न रहने पर वे भी अनगढ़ स्तर के रह जाते है। प्रसव पीड़ा में अधिकांश महिलाओं को मौत के मुँह में जाना पड़ता है। भयंकर आपरेशन की व्यथा सहने की तरह वह आपत्ति यदि जल्दी-जल्दी उन पर टूटे तो जबानी में बुढ़ापा जा धमकने, अकाल मृत्यु का ग्रास बनने, आये दिन दुर्बल और बीमार रहने की व्यथा तो उसी कारण उसके गले बँध ही जाती है। इसलिए बाल विवाह लड़कियों का आधा मरण समझकर उस विपत्ति से उन्हें बचाया ही जाना चाहिए। पढ़ने और बढ़ने के लिए उन्हें भी उपयुक्त सुविधा और समय मिलना चाहिए। बाल विवाह इस संभावना में सबसे अधिक बाधक है।

तीसरी विपत्ति है धूमधाम वाली शादियाँ लड़के वालों की ओर से दहेज और लड़की वालों की ओर से जेवर की माँग। यह दोनों ही प्रचलन सर्वथा मूर्खता और अनीतिपूर्ण हैं। इस निमित्त होने वाले खर्च में दोनों परिवार खोखले हो जाते हैं। दहेज को लेकर आये दिन जो झंझट होते हैं, हत्या, आत्महत्या जैसी दुर्घटनाएँ होती हैं। इसलिए शादी को नितान्त सादगी के साथ घरेलू उत्सव की तरह सम्पन्न किया जाना चाहिए। दहेज या जेवर के स्थान पर उस रकम को एकत्रित करके कन्या के नाम फिक्स डिपॉजिट के रूप में जमा कर दिया जाय तो वह निधि बनी रहे और सुदूर भविष्य में किसी आड़े वक्त पर काम आये।

अगले दिनों नारी प्रगति की भारी संभावनाएँ सामने आ रही हैं। उन्हें प्रत्येक महत्वपूर्ण प्रसंग में आरक्षण मिलने जा रहा है। राजनीतिक सामाजिक और आर्थिक क्षेत्र में उनकी प्रगति के लिए सरकारी और गैर सरकारी अनेकानेक उपहार दौड़ते हुए चले आ रहे हैं। सरकार बड़े अनुदान भी दिला रही है। नये अवसर भी अनेकों बन रहे हैं। इन से लाभ उठाने के लिए आवश्यक है कि नारी सुयोग्य और समर्थ हो अन्यथा बिचौलिए ही उस सुविधा को हड़प लेंगे अनेक कुरीतियाँ, मूढमान्यताएँ प्रतिगामिताएँ विषाणुओं की तरह दुर्बल शरीर पर सरलतापूर्वक चढ़ दौड़ती हैं। इन त्रासों से भी उन्हें बचाने के लिए विचारशीलों द्वारा गुण-दोष का अन्तर कर सकने के लिए उन्हें सुयोग्य बनाया जाना चाहिए। इसके लिए उपयुक्त अवसर मिले, यह तभी संभव है जब विवाह की अवधि अधिकाधिक बढ़ाई जाय। भारत के केरल प्रान्त की महिलाओं ने तो लड़ झगड़ कर महिलाओं की विवाह आयु न्यूनतम २५ और लड़के की अट्ठाइस करवा ली है। इसी का सत्परिणाम हे कि वहाँ नारियाँ प्रगति के हर पक्ष का अवसर प्राप्त कर रही हैं और परिवारों को समर्थ बना रही हैं। शिक्षा का स्तर और प्रगति भी वहाँ देश के अन्य भागों की तुलना में कहीं अधिक हैं। ऐसे ही प्रयत्न सर्वत्र होने चाहिए।

विवाह के उपरान्त वर कन्या को कई वर्ष का अवसर ऐसा मिलना चाहिए कि वे एक दूसरे की योग्यता-समर्थता बढ़ाने में योगदान दे सकें। इसके लिए आवश्यक है कि विवाह के बाद कम से कम पाँच वर्ष तक बच्चे उत्पन्न करने के संकट न लादें। यह अवधि ससुराल वालों की ओर से समर्थता प्रदान करने के लिए नियत रहनी चाहिए। अभिभावकों ने इतने दिन उसकी योग्यता वृद्धि में योगदान दिया। विवाह के बाद कम से कम पाँच वर्ष तो ससुराल वालों को भी ऐसा ही अनुदान देना चाहिए। उस अवधि में बच्चे पैदा करने की विपत्ति से नहीं लाद देना चाहिए। बढ़ती हुई जनसंख्या इन दिनों पृथ्वी पर हर प्रकार से एक दुर्घटना की तरह संकटपूर्ण बन रही है। यह तभी टल सकती है जब प्रजनन यदि आवश्यक हो तभी किया जाय और यह अवसर किसी नारी पर तीस वर्ष आयु के लगभग होने पर ही आना चाहिए। देश की विश्व की सुव्यवस्था के लिए भी इस प्रकार का प्रचलन अपनाया ही जाना चाहिए।

यह सामान्य प्रचलन की विधा हुई। नारी को अवगति से उबार कर प्रगति के पथ पर घसीट ले चलने के लिए महिला वर्ग में से भी कुशल नेतृत्व उभरना चाहिए। देश को स्वतंत्र कराने में नारी नेतृत्व की अग्रणी भूमिका रही है। कितनों ने कितने संकट झेले हैं और कितने विकट संघर्ष किये हैं, इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए नारी वर्ग के भावनाशील पक्ष को आगे बढ़ना चाहिए और ऐसा कुछ करना चाहिए जिससे उनकी योग्यता घर की चहार दीवारी में रसोईदारिन धोबिन, मेहतरानी, धाय नौकरानी की तरह ही गुजारा न देनी पड़े, वरन् कम से कम अपने समुदाय ऊँचा उठाने, विवाह बंधनों से छुड़ाने के लिए वे लग सकें।

इसके लिए वे महिलायें अधिक उपयुक्त हो सकती हैं जो छोटे बच्चों की जिम्मेदारी से मुक्त हो चुकीं। रिटायर्ड स्तर की अध्यापिकाएँ तथा दूसरी कार्यरत महिलाएँ घर का भार दूसरों के कन्धे पर खिसका कर यह कर सकती हैं कि छोटी बड़ी टोलियाँ बनाकर महिला संपर्क आन्दोलन के लिए निकल पड़ें और उनमें कितनी ही सत्प्रवृत्तियों के संवर्द्धन हेतु बढ़-चढ़ कर काम करें। उनके लिये विशाल कार्य क्षेत्र खाली पड़ा है।

ऐसा भी हो सकता है कि कुछ युवतियाँ विवाह के प्रलोभन से बचकर अपनी बहुमूल्य प्रतिभा नारी उत्कर्ष के लिए लगा दें। प्रजनन के कुचक्र में फंस कर उन्हें जितना त्रास सहना पड़ता हैं, उसका बीसवाँ भाग भी यदि साहस जुटा कर नारी उत्कृष्टता के लिए अपने को समर्पित कर सकें तो वह महामानवों वीर, बलिदानियों जैसा साहस होगा। घरेलू जिम्मेदारियों से बची रहने की स्थिति में वे विस्तृत क्षेत्र में बड़ी मात्रा में नारी कल्याण का काम कर सकती हैं। ऐसे साहस जिनने अपनाये ऐसी शूरवीर महिलाओं का किसी अंश में पुराण और बड़े अंश में अपने समय का इतिहास भरा पड़ा है। विवाह को अनिवार्य मानकर नहीं चलना चाहिए। साथी के बिना जिन्दगी कैसे कटेगी? सुरक्षा कैसे मिलेगी। इस प्रकार के आडम्बरों से आदर्शवादी महिलाएँ सहज ही बच निकल सकती हैं। सहेलियों की सघन मित्र भी मिलजुल कर इस आवश्यकता को बहुत अंश में पूरी कर सकती हैं। एक और एक मिलकर ग्यारह बनते हैं के सिद्धांत मात्र नर नारी के समन्वय तक ही सीमित नहीं है। नारी नारी का सहयोग भी इसी तथ्य की भली प्रकार पुष्टि कर सकता है।

अगले दिनों नारी शताब्दी का नवनिर्माण संभव कर सकने में देश के जहाँ पुरुषों का उदार सहयोग अपेक्षित हैं, वहाँ यह भी आवश्यक है कि उस आंदोलन का नेतृत्व सँभालने के लिए मनस्वी महिलाएँ अग्रिम पंक्ति में आयें। आन्दोलन को पुरुषों का सहयोग तो चाहिए ही कि वे नारी को समय, साधन, सहयोग और प्रोत्साहन प्रदान करें। पर साथ ही यह उससे भी अधिक आवश्यक है कि नेतृत्व समर्थ महिलायें भी सँभालें। अपने देश की प्रतिगामिता नर और नारी को मिल कर काम करने की सुविधा नहीं देती। इसलिए आवश्यक है कि महिलाओं की अपनी छोटी बड़ी मंडलियाँ बनें और घर घर में प्रवेश करें। संगठन खड़ा करें। वातावरण बनायें और ऐसे अनेकानेक कार्यक्रमों को चलायें जिससे युग संगठनों के अति महत्वपूर्ण नेतृत्व का श्रेय उन्हें ही हस्तान्तरित हो सके।

पुरुष चाहे तो घरेलू काम काज में महिलाओं को दिन-रात खटाते-रखने की अपेक्षा ऐसा प्रबंध करे कि परिवार के सभी नर नारी साथ मिल जुलकर घर के काम सीमित समय में समेट लिया करें। गरम भोजन खाने की सनक यदि सिर पर से उतारी जा सके तो थोड़ी देर पहले बने भोजन से काम चलाने में कोई हर्ज नहीं है। पुरुष भी इस कार्य में किसी हद तक हाथ बँटा सकते हैं। इस प्रकार गृह कार्यों को मिलजुल कर समेट लेने पर घर की महिलाओं को इतना समय उपलब्ध कराया जा सकता है कि वे अपनी और अपने संपर्क की महिलाओं को प्रशिक्षित, सुयोग्य बनाने के कार्यक्रम में भाग लेने के लिए पर्याप्त समय मिल सके।

महिला सदी का बहुत बड़ा शुभारंभ शान्तिकुञ्ज से ही गतिशील होना है। इसलिए उसके सदस्यों और सदस्याओं को अपनी अपनी स्थिति के अनुसार यह योजना बनानी चाहिए कि महिलाओं की स्थानीय क्रिया प्रक्रिया किस प्रकार चले और उनकी बड़े क्षेत्र को सँभाल सकने वाली युग नेतृत्व की व्यवस्था किस आधार पर बने? इस संदर्भ में मात्र पुरुषों का ही सहयोग पर्याप्त नहीं। समर्थ महिलाओं को भी लालच, दबाव, और संकीर्णता की परिधि से ऊँचा उठकर घर से बाहर निकलने की बड़ी योजना भी बनानी चाहिए ताकि उनकी गणना महान प्रयोजन पूरा करने सकने वाली महान महिलाओं में हो सके।


विशेष लेख माला-१६ - युग प्रतिभाएँ इस तरह आगे आएँ

दीपावली, दशहरा जैसे महापर्व वर्ष में एक बार आते हैं। स्वाति वर्षा साल में एक बार ही होती है। उसका लाभ जिन सीपियों को, केलों को, बाँसों को उठाना होता है, वे उन्हीं दिनों उठा लेते है। बाद में तो बात गई आई हो जाती है। कन्यादान भी एक ही बार होता है। ब्रह्मकमल और संजीवनी बूटी भी वर्ष में एक बार ही फलती है। प्रतियोगिताएँ भी निर्धारित समय पर ही होती है। उत्तीर्ण-अनुत्तीर्ण होने का अवसर उन्हीं दिनों आता है। आये दिन वह अवसर मिलता रहे, ऐसा कहाँ होता है? राजनीतिक चुनाव पाँच वर्ष में एक बार होते हैं। यह अवसर विशेष है, जिन्हें महत्वपूर्ण माना और चूका नहीं जाता।

हर दूरदर्शी को यह अनुभव भी करना चाहिए कि युग परिवर्तन की वर्तमान वेला ऐसी है जिसकी पुनरावृत्ति बार-बार नहीं होगी। गाँधी जी के सत्याग्रह आन्दोलन में जो लोग स्वतंत्रता सेनानी के रूप में सम्मिलित हो गये उन्हें इतने दिन बीत जाने के उपरान्त भी अभी तक समुचित सम्मान, पेन्शन, फ्री पास आदि की सुविधा मिलती है। शासन-सत्ता भी वही लोग प्रायः ४० वर्ष तक चलाते रहे। यदि समय निकल जाने पर अब कोई उत्सुक हो तो भी इस सुयोग को नहीं पा सकता। जो अवसर को पहचानने वाले साहस जुटा सके, वे ही समुचित श्रेय पा सके। अब कोई बन्दर, हनुमान नहीं बन सकता। किसी रीछ को जामवन्त, किसी गिद्ध को जटायु बनने का अवसर नहीं मिल सकता। जब महाभारत ही नहीं होने जा रहा हो तो कोई अर्जुन, भीम किस प्रकार इतिहास के पृष्ठों पर अपना नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित करा सकेगा।

कलेक्टर की नियुक्ति चुनाव आयोग या शासनाध्यक्षों द्वारा होती है। यह अवसर गिने–चुनों को मिलता है सो भी दूसरों के अनुग्रह से। किन्तु शासन तंत्र की तरह ही समर्थ धर्मतंत्र में सेवा क्षेत्र में यह अनोखी सुविधा है कि यदि कोई भावनाशील पुरुषार्थी अपनी उमंग और आदर्शवादी हिम्मत से काम ले तो वह मण्डलाधीश मण्डलेश्वर, मण्डलीक, मण्डलाधिपति आदि बन सकता है और इतना समर्थ बन सकता है कि उसका शासन जन-जन के मन पर रहे और उसकी इच्छा के बिना महत्वपूर्ण हलचलों के क्षेत्र में पता भी न हिले। इसी स्तर के लोगों की इन दिनों सर्वत्र माँग है। उनके उभरने की आशा-अपेक्षा दसों-दिशाएँ कर रही है। युगदेवता ने उन्हीं को पुकारा है। महाकाल उन्हीं को खोजने के लिए टकटकी लगाये ढूँढ़-खोज में निरत हैं।

अभागे तो मनुष्य जीवन जैसी सुर-दुर्लभ सम्पदा को भी कीड़े-मकोड़ों की तरह गँवा देते हैं। अनजानों के लिए हीरे और काँच में कोई अन्तर नहीं। पर जिनके अन्तराल में दिव्य प्रकाश की एक किरण भी उठती हो उनके लिए यह अलभ्य अवसर है। इतना अलभ्य जिसे गँवा देने पर जन्म-जन्मान्तरों तक पछताने के अतिरिक्त और कुछ हाथ लगने वाला नहीं है। आत्मा को, परमात्मा को, विश्वात्मा को ऐसे प्रमादियों के प्रति रोष-आक्रोश ही सदा बना रहेगा। यह सुनिश्चित लॉटरी खुलने जैसा, दबा खजाना हाथ लगने जैसा, स्वयंवर वरण करने जैसा अवसर है। जिन आँखों के अन्धों को पेट प्रजनन के अतिरिक्त इस संसार में और कुछ दीख ही नहीं पड़ता उनके प्रमाद पर कोई लानत ही भेज सकता है।

होना यह चाहिए कि बुद्धिमता के दावेदार विवेकशीलों में से प्रत्येक युगसन्धि के यह दस वर्ष अथवा उससे कुछ कम समय भी युग की पुकार सुनने और उसे पूरा करने में अपनी मानसिकता और साहसिकता को खरी-खोटी सिद्ध करने के लिए कसौटी पर कसे जाने के लिए प्रस्तुत करे। न्यूनतम एक वर्ष लगाने जैसे कुछ छोटे कदम उठा लेने के लिए उत्साह को समेटने सँजोने जैसा साहस तो किसी प्रकार बटोर ही लें। जितना अधिक बन पड़े उतना ही उत्तम।

इन दिनों करने योग्य काम, प्रमुखता देने योग्य एक ही हैं ‘जनमानस का परिष्कार’, ‘विचार परिशोधन ‘मान्यताओं भावनाओं आकांक्षाओं को निकृष्ट प्रयोजन में निरत रहने रहने से उबार कर इस मान्यता से सहमत कर लिया जाय कि यह समय उठने और उठाने और जगने जगाने में, नवसृजन के लिए कटिबद्ध होने और दूसरों को इसी के लिए नियोजित करने के लिए प्राणमय से लगा दिया जाय। व्यक्तित्ववानों ने अपने को बदलना आरंभ किया तो यह निश्चित है कि वह समूचा वातावरण बदल जायेगा जिसमें रहते हुए हर कोई खिन्न विपन्न हो रहा है। जिस घुटन में दम निकल रहा है उसे बदलने के लिए कुछ कहने लायक साहस इन्हीं दिनों जुटाया जा सकता हैं।

अपने कुछ न करने पर भी उज्ज्वल भविष्य की संभावना स्रष्टा के संकल्प निर्धारण के संकेत पर भवितव्यता बनकर साकार होकर रहेगी। पर जो सेवा साहस अपनाकर धन्य हो सकते थे वे ही अपनाई गई कृपणता, निष्ठुरता और कायरता के कारण अपने ऊपर दसों दिशाओं से धिक्कार बरसते रहने की व्यथा सहते रहेंगे।

जो करना है वह सरल भी है सुखद भी और हाथों हाथ श्रेय गौरव उपलब्ध करने वाला भी। उसकी आरंभिक चर्चा पिछले पृष्ठों पर हो चुकी हैं। स्वाध्याय, सत्संग संगठन और उल्लास उभार के कई कार्यक्रमों की चर्चा हो चुकी है। उनमें से कोई एकाकी कुछ न कुछ कार्य भी अपना सकता है। पर यदि संगठन की क्षमता हो, मुखरता और सक्रियता अपनाते बन पड़े तो बड़े क्षेत्र को अपने सेवा प्रयोजन के लिए चुना जा सकता है। दस बीस गाँव का एक मण्डल निर्धारित करके उनमें बसने वालों के साथ सघन संपर्क जोड़ा जा सकता है और उन खेतों को जोतने बोने बाद पानी देने रखवाली करने में एक कर्मठ किसान की तरह निरत रहा जा सकता है। साथ ही हीरे मोतियों जैसी फसल से कोठे भरने की प्रतीक्षा भी की जा सकती है

इसका समर्थ शुभारंभ अपनी निजी की प्रतिभा निखारने से होना चाहिए। जिन्हें अपने से बड़ा या योग्य माना जाता है उन्हीं की बातों पर लोग ध्यान देते हैं। उन्हीं का आदेश-परामर्श मानते हैं। इसलिए जिन्हें किसी प्रकार का नेतृत्व निबाहना हो, उन्हें सर्वसाधारण की अपेक्षा अधिक वरिष्ठ और अति विशिष्ट होना चाहिए। आत्म परिष्कार की कसौटी पर कम कर इतना खरा बना लेना चाहिए कि कम से कम किसी को उँगली उठाने का अवसर न मिले। वाणी की मधुरता, व्यवहार में सभ्यजनों जैसी शिष्टता, वस्त्र-उपकरणों से लेकर साज-सज्जा तक में समुचित स्वच्छता रह सके, ऐसा अभ्यास करना चाहिए। समझदारी, ईमानदारी, जिम्मेदारी और बहादुरी के चार प्रमुख धर्माचरणों से अपने व्यक्तित्व को सँजोया जा सके तो समझना चाहिए कि विशिष्टता और वरिष्ठता से अपने को सम्पन्न बना लिया गया और ऐसी स्थिति प्राप्त कर ली गई जिससे सर्वत्र प्रामाणिकता और प्रतिभा का परिचय मिले और अपनी विश्वसनीयता बढ़े। क्रिया−कलाप में वाणी की मुखरता और शरीरगत ऐसी सक्रियता हो जो चुस्त दुरुस्त होने के लक्षण प्रकट करती रहे। स्वाध्याय एवं सत्संग प्राप्त करते रहने का अवसर अधिकाधिक लोगों को मिलता रह सके ऐसे छोटे बड़े कार्यों में निरत रहने के लिए परिस्थितियों के अनुरूप प्रयत्न करते ही रहना चाहिए।

उत्साह उभारने, और लोक चेतना जगाने की एक नितान्त सरल और अत्यधिक प्रभावशाली प्रक्रिया है-सहस्रवेदी दीपयज्ञों की योजना। यदि चुनाव में खड़े होने वालों की तरह दौड़-धूप की जा सके तो यह आयोजन हर कहीं सरलता और सफलतापूर्वक सम्पन्न हो सकते हैं। एक बार का उबाल, साल छः महीने तो अपनी गर्मी बनाये ही रहता है। इसलिए जिलाधीशों के समतुल्य धर्मतंत्र की जिम्मेदारी उठाने वालों को अपनी सुविधानुसार निकटवर्ती मंडल निर्धारित करना चाहिए और एक वाहन की ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए, जिससे दौड़ धूप का अधिक कार्य सम्पन्न हो सके। सघन जनसंपर्क सध सके और जनजागरण के-नवसृजन के अनेकानेक काम अपने ढर्रे पर अपने बलबूते ढर्रे पर लुढ़कते रहने वाली गति पकड़ सकें।

अपने मंडल के हर गाँव में एक बड़ा दीपयज्ञ आयोजन हर साल होना ही चाहिए ताकि उसके द्वारा उभरे हुए उत्साह से सत्प्रवृत्ति संवर्द्धन और दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन के कितने ही छोटे बड़े काम उपस्थितजनों को प्रभावित करके उनके द्वारा संकल्पपूर्वक किये जाने की प्रक्रिया चल पड़े। व्रतशीलता निभ सके।

अपने समुदाय में ऐसे अनेकों कार्य करने को पड़ें, जिनको गतिशील बनाने में तनिक भी विलम्ब नहीं होना चाहिए। शिक्षा संवर्द्धन इनमें से प्रमुख है। नारी शिक्षा और प्रौढ़ शिक्षा को सृजनशिल्पी विशेष रूप से हाथ में लें, क्योंकि इस ओर उपेक्षा ही बरती जा रही है। गरीबी दूर भगाओ की योजना कुटीर उद्योगों को अपनाये बिना हल हो नहीं सकती। शारीरिक समर्थता और मानसिक साहसिकता के अभिवर्धन के लिए व्यायामशालाओं के आन्दोलन को गतिशील बनाया जाना चाहिए। बाल-विवाह और बहुप्रजनन की बाढ़ को तो दृढ़तापूर्वक रोका ही जाना चाहिए। ‘खर्चीली शादियाँ हमें दरिद्र और बेईमान बनाती हैं’ इस तथ्य को हर किसी को हृदयंगम कराया जाना चाहिए और बिना खर्च तथा बिना धूमधाम की शादियाँ कर यह कुप्रचलन समाप्त होना ही चाहिए। नशेबाजी धीमी आत्म हत्या हैं, यदि यह तथ्य समझा और समझाया ला सके तो बहुमुखी बरबादी पर कारगर अंकुश लग सकता है। वृक्षारोपण की प्रवृत्ति बढ़नी चाहिए। यह गतिविधि हर घर में शाकवाटिका, पुष्पवाटिका के आरोपण के रूप में तो चल ही पड़नी चाहिए। जीवन के हर क्षेत्र में प्रगतिशीलता का समावेश करने के लिए साप्ताहिक सत्संगों को योजनाबद्ध रूप से चलना चाहिए। यदि दैनिक रूप में धार्मिक, सामाजिक आयोजन नहीं चल सकते तो उन्हें कम से कम साप्ताहिक रूप में तो चलना ही चाहिए।

युग अवतरण का योजना केन्द्र यदि नई इमारत के रूप में नहीं बन सकता तो कम से कम इतना तो हो ही सकता है कि किसी बड़ी इमारत वाले से एक कमरा माँग लिया जाय जो संगठन कार्यों के लिए भी प्रयुक्त होता रहे और शेष समय घर-मालिक उसे अपने कार्यों में प्रयुक्त करता रहे।

कुछ उपकरण इस प्रयोजन के लिए अनिवार्य हैं (१) ज्ञानरथ का चल देवालय (२) स्लाइड प्रोजेक्टर (३) सत्संग की प्रचार पेटी जिसमें टेप एंप्लीफायर हों। (४) गाँव-गाँव परिभ्रमण करने के लिए साइकिल टोली, (५) संगीत उपकरण (६) आयोजन के लिए फर्श और आच्छादन (७) दीपयज्ञों में काम आने वाले उपकरण। यह सभी साधन मिलकर दस हजार के भीतर बन सकते हैं। इतने पैसे का प्रबंध सहज ही यज्ञ के समय मिलजुल कर चन्दे के रूप में एकत्रित किया जा सकता है। जिनमें पैसा लिया हैं, उन्हें हिसाब समझा कर यह संतोष कराया जा सकता है कि किसी ने इन कार्यों में किसी प्रकार की हेरा-फेरी नहीं की है। प्रामाणिकता बनाये रखने के लिए इतनी सफाई आवश्यक हैं।

वर्ष में एक बार कर्मठ व्यक्तियों को शान्तिकुञ्ज पाँच दिन का एकछत्र सम्पन्न करने के लिए भेजना चाहिए, ताकि वे उपयुक्त प्रेरणा और प्राण चेतना साथ लेकर वापस लौटें। यह हर साल बैटरी चार्ज करा लेने, बंदूक या मोटर का वार्षिक लाइसेंस लेने के समान आवश्यक समझा जाना चाहिए।

मिशन के साथ किसी भी रूप में जुड़े हर व्यक्ति को नित्य कुछ घण्टे का समयदान नवसृजन के निमित्त लगाने के लिए सहमत करना चाहिए और साथ ही कुछ पैसों का अंशदान भी निकालते रहने के लिए उन्हें प्रोत्साहित करना चाहिए। ताकि उस योगदान के सहारे आत्मनिर्माण, परिवार निर्माण और समाज निर्माण के तीनों ही क्रिया–कलापों में आवश्यक पोषण देते रहने का अवसर मिल सके।

अखण्ड-ज्योति पत्रिका अपने परिवार के हर शिक्षित सदस्य को पढ़नी और अशिक्षित को सुनानी चाहिए। यह अनुष्ठान प्रस्तुत महाअभियान के सूत्र संचालक को नित्य अपने घर बुलाने और उसका एक प्रवचन नित्य सुनने के समान सशक्त प्रेरणाप्रद है। इसके लिए जो खर्च करना पड़ता है वह इतना कम है कि महीन में एक बार हलका जलपान करा देने से अधिक नहीं बैठता।

उपरोक्त सभी काम ऐसे हैं जिन्हें अपनाने पर कोई भी व्यक्ति प्रखर प्रतिभा के रूप में उभर सकता है और अपने को, अपने परिवार, अपने समाज, वातावरण को हर दृष्टि से कृतकृत्य कर सकता हैं।


विशेष लेख माला-१७ - यह सरल है कठिन नहीं

सर्वतोमुखी श्रेय साधना का यह सर्वश्रेष्ठ समय है। इसे चूका नहीं जाना चाहिए। जो उपयुक्त अक्सर पर मुँह मोड़ते और पीठ दिखाते हैं, वे परीक्षा भवन में गायब हो जाने वालों की तरह सदा-सर्वदा पछताते ही रहते हैं। इस भूल को अनेक बार दुहराया जाता रहा है पर जब भगवान ने सुदामा से उसकी तंदुल पोटली माँग कर बदले में टूटे छप्पर वाली सुदामापुरी को सर्वसम्पन्न सृजित द्वारिकापुरी के रूप में बदलने का आमंत्रण भेजा हैं, तब उस स्वर्ण सौभाग्य को स्वीकार करने में आना कानी नहीं ही की जानी चाहिए। पेट और प्रजनन की छोटी-सी परिधि में तो कीड़े-मकोड़े भी अपना समय गुजार लेते हैं, पर जब कल्पवृक्ष के नीचे विश्राम मंच किसी ने बिछाया तो उस पर बैठने भर का निर्वाह करने में आनाकानी क्यों करनी चाहिए?

धन दान तो फालतू पैसे वाले उपेक्षापूर्वक अपना ढिंढोरा पिटवाने के लिए भी खर्च कर देते हैं, पर उच्चस्तरीय लक्ष्य पर चल पड़ना तभी बन पड़ता है जब श्रद्धा, सद्भावना और उत्कृष्टता का उसके साथ समुचित समावेश बन पड़े। परीक्षा की इस घड़ी में यहाँ जाँच खोज हो रही है कि यदि कहीं महानता जीवित होगी तो वह इस नवनिर्माण के पुण्य पर्व पर अपनी जागरूकता और सक्रियता का परिचय दिये बिना न रहेगी। दिनमान का अभिनन्दन करने में मात्र निशाचर ही मुँह छिपाते देखे गये हैं। हमारी गणना उन भगोड़ों में नहीं होनी चाहिए जो मोर्चे पर ऐसे पराक्रम का परिचय देने में अपने को असमर्थ पाते और कायरों की तरह सभी धिक्कार सहते हुए पीछे भाग खड़े होते हैं और उलटे सीधे बहाने खोजते हैं।

गाँधी और बुद्ध के आह्वान पर असंख्यों ने अपने तथाकथित आवश्यक काम छोड़ कर भी उन दिनों के महान अभियान में अपनी कारगर भूमिका निबाही थी और पीढ़ियों तक के लिए यशगाथा सुरक्षित छोड़ गये थे।

लिप्सा, तृष्णा और अहमन्यता के उन्माद पर यदि थोड़ा अंकुश लगाया जा सके तो हर किसी के पास इतना समय श्रम और साधन सहज बच जाता है जिसके बलबूते सराहनीय स्तर पर युग धर्म निबाहते बन पड़े। जो सादा जीवन जी सकेगा वहीं उच्च विचारों की अवधारण में समर्थ हो सकेगा। अच्छा हो वासना विलासिता की जंजीरों को कम से कम इस अवधिकाल में थोड़ा ढीला कर ही लिया जाय। भौतिक महत्त्वाकाँक्षा के लिए आतुर होने पर अंकुश लगाया जाय। कुबेर सा सम्पन्न और इन्द्र सा वैभववान् बनने की लालसा तो संजोई जा सकती है, किन्तु विश्व व्यवस्था का अनुशासन ऐसा है कि इन लुटेरों की भी अमर्यादित अभिलाषाओं में से पूरी यत्किंचित् ही किसी की होती है।

परिवार परिकर का अनावश्यक व्यामोह बढ़ाते चलने की मूर्खता से समय रहते जो सजग हो जाते हैं, ऐसे लोगों के लिए याचनारत भगवान को दरवाजे पर से दुत्कार देने का अकार्य नहीं करना पड़ता। अपरिग्रही साधु ब्राह्मण ही दैवी प्रयोजनों को पूरा कर सकने में समर्थ हुए है। लिप्सा और तृष्णा की समुद्र जैसी खाई को पाट सकना किसी से भी नहीं बन पड़ा। सोने के पहाड़ जमा करने से कोई लाभान्वित नहीं हुआ। विश्व विजयी बनने के लिए सब कुछ कर गुजरने के लिए उद्धत महादैत्यों के लिए असीम मनोकामनाओं को पूरा कर सकना संभव नहीं हुआ, तो सामान्य योग्यता और क्षमता वाले कुछ कहने लायक सुखोपभोग कर सकेंगे इस मान्यता को उपहासास्पद ही बनना पड़ेगा।

जो तृष्णाओं को मर्यादित कर सके, जिनकी परमार्थ भावना गहरी खुमारी से उबर सके, उनमें से किसी के लिए भी इन दिनों की अनिवार्य समयदान योजना को उदारतापूर्वक पूरी करने से वंचित न रहना पड़ेगा। व्यस्तता और अभावग्रस्तता तो मात्र बहाने हैं। अभिरुचि होने पर जब अवांछनीय कार्यों के लिए सारा समय और मनोयोग खपाते रह सकते हैं, तो कोई कारण नहीं कि भावनाशीलों के लिये युगचिन्तन के अनुकूल बनने में कोई ऐसा व्यवधान सामने आये जिसे हटा सकना बन ही न पड़े।


विशेष लेख माला-१८ - शेष जीवन का उत्सर्ग

कृपणता, कायरता, और अभ्यस्त हेय परम्परा मनुष्य को मात्र वासना, तृष्णा के लिए अहंकार प्रदर्शन में यत्किंचित् सफलता प्राप्त करने के लिए बाधित करती हैं। मनुष्य रूप में कृमि-कीटकों की तरह जीने वालों का चारों और फैला हुआ समुदाय भी ऐसा ही अनुकरण, आचरण, अपनाने के लिए प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से समझाता-फुसलाता रहता हैं। भूतकालीन मानव की दूरदर्शिता देखी जाय, कि वह इसी प्रयास में जीवन संपदा गँवा देता है और पापों की पोटली सिर पर लाद कर हाथ मलते प्रभु के दरबार में वापस लौटता है।

यदि कहीं से एक प्रकाश किरण अन्तराल तक पहुँचे, तो मानवी गरिमा का उल्लास उभरे और ऐसा कुछ बन पड़े, जिससे संतोष, सम्मान और प्रभु अनुग्रह का दिव्य अनुदान हाथों हाथ उपलब्ध करते हुए जीवन बीते।

पेट भरने की आवश्यकता प्रभु ने जन्म से पूर्व ही दो दूध के कटोरे भर कर पूरी कर दी हैं और विश्वास दिला दिया कि उसे भूखा-नंगा नहीं मरना पड़ेगा। आश्वासन दाता ईश्वर यदि आँखों से दृष्टिगोचर न होता हो, तो उस प्रतिज्ञा का प्रत्यक्ष निर्वाह शान्तिकुञ्ज भी कर सकता है, क्योंकि वहाँ नवसृजन के लिए भावनाशील और कर्मठ व्यक्तियों की असाधारण आवश्यकता अनुभव की जा रही है।

उपेक्षा उन्हीं की की जाती हैं, जो अपना यौवन पूरी तरह गँवा चुके। कोल्हू के बैल की तरह लोभ मोह के कुचक्र में फँस कर खली की तरह छूँछ बन चुके। जिनमें श्रम साहस जैसा कुछ शेष नहीं रह गया है, आलसी-प्रमादी संसार पर भार बनकर रहते हैं, तो उसे शान्तिकुञ्ज ही अपनी दस-दस पैसे की याचना करके यत्किंचित् जमा की गई राशि को क्यों बरबाद करें? स्वर्ग, मुक्ति, सिद्धि, चमत्कार जैसे निरर्थक प्रलोभन देने का यहाँ कोई तारतम्य है नहीं। यहाँ तो कर्म-चेतना को भगवान के चरणों पर अर्पित करने और आत्मोत्कर्ष का प्रत्यक्ष लाभ प्राप्त करने की ही शिक्षा और प्रेरणा दी जाती है।

जिन्हें प्रभु के अनुपम उपहार मानव जीवन के प्रपंचों के दुर्गन्धित दलदल में फँसे रहने से अरुचि उत्पन्न हो, जिन्हें युगदेवता द्वारा द्वार-द्वार खटखटाये जाने पर सर्वथा निष्ठुर न बने रहने की भाव-चेतना उभरे, उन्हें नये सिरे से सोचना चाहिए कि मसखरी के लिए जिन्दगी निछावर करने की अपेक्षा युगधर्म के निर्वाह हेतु शेष जीवन बिताना चाहिए। जहाँ भी ऐसी मान्यता बल पकड़े, वहाँ यह सोच भी गंभीरतापूर्वक उभरना चाहिए कि शेष जीवन को परमार्थ प्रयोजन के लिए ईश्वर के हाथों सौंप देना ही श्रेयस्कर होगा।

शान्तिकुञ्ज में स्थानीय एवं परिव्राजक स्तर के भी कई काम रहते हैं। इसके अतिरिक्त शाखा-प्रशाखाओं में भी कार्यकर्ताओं की ही माँग रहती हैं। उसके लिए तत्परता प्रकट करते हुए नये युग की नई साधना आरंभ की जा सकती हैं।

कठिनाई तभी पड़ती है, जब कोई व्यक्ति लोकसेवी तो बनता है, पर वितृष्णा से आक्रान्त होकर औसत नागरिक से अधिक खर्च करना चाहता है, काम से जी चुराता है या अहंकार की पूर्ति के लिए आत्मविज्ञापन का प्रपंच रचता है। ऐसे लोग विज्ञ समुदाय में सर्वत्र दुत्कारे जाते हैं, फिर सेवा-साधना के क्षेत्र में ही उनकी क्यों व्यापक उपयोगिता-आवश्यकता रह जायेगी। धर्म-धारणा और सेवा-साधना वस्तुतः योगाभ्यास और तपश्चर्या का ही एक बुद्धिसंगत उपचार है।

घोर संसारी बनकर जीना भी कहाँ सरल हैं? उसमें भी पग-पग पर उपहास, आरोप और संकट भरे रहते हैं। जो कमाया जाता है, उसे मसखरे झपट ले जाते हैं। उस सड़े दलदल में हाथ पैर पीटते रहने की अपेक्षा जिन्हें आदर्शवादी अनुशासन अपनाना श्रेयस्कर लगे, उनके लिए शान्तिकुञ्ज का आह्वान है। जो शान्तिकुञ्ज चल पड़ने की सोचें, अपनी संचित कमाई को भी साथ ले जाने की योजना बनायें, अन्यथा उसे मसखरे हड़प लेंगे और अपना गुजारा भिक्षा के धन पर काटना पड़ेगा। जिनके पास कुछ अर्थसाधन संचित नहीं हैं, उनका तो शान्तिकुञ्ज अपना घर हैं ही।


विशेष लेख माला-१९ - अपने को बदल क्यों न दें?

मकड़ी अपने लिए अपना ताना बाना स्वयं बुनती और उसी में इच्छानुसार फँसी जकड़ी रहती है। बंधन अनुभव होने पर रुका करती हैं, पर जब भी उसकी मान्यता बदलती है तभी जाले को समेट कर गोली की तरह पेट में निगल लेती है और सहज स्वाभाविक स्थिति में निर्द्वन्द्व विचरती है। बाद में वह नये निर्धारण के अनुरूप नया मार्ग अपनाती और नई परिस्थितियाँ पैदा करती है।

मनुष्य भी एक प्रकार की मकड़ी है। वह अपने लिए अपने ढंग का संसार स्वयं विनिर्मित करता हैं। वह गया गुजरा, दुख-दारिद्रय से भरा भी हो सकता है, पर यदि परिवर्तन पर उतारू हो जाय तो पिछड़ी मनःस्थिति के साथ उन परिस्थितियों को भी बदल सकता है जो अवांछनीयताओं से भरी, अनावश्यक एवं विपन्नता विद्रूपता से भरी पूरी दीखती हैं।

जन्म से एक जैसी रुचि और मान्यताएँ लेकर सभी जन्मते हैं। ईश्वर का इतना ही अनुदान बहुत हैं, आगे की संरचना मनुष्य स्वयं ही करता है। वह भला भी हो सकता है और बुरा भी। राहगीर एक दिशा में जाने वाली सड़क पर चलता है, पर जब भिन्न आवश्यकता अनुभव करता है तो चौराहे पर से दूसरी दिशा अपना लेता है। दूसरे रास्ते चलते और दूसरी मंजिल तक पहुँच जाते हैं। यह सब अपने ही निर्णय-निर्धारण और बदलाव का खेल हैं। यों उसकी परिणति चर्मचक्षुओं से बदलती घटनाओं के रूप में दीखती हैं, पर वस्तुतः इस उलट-पुलट के पीछे मनुष्य की मानसिकता ही प्रमुख होती है। आखिर मनुष्य भी तो एक विशेष प्रकार की मकड़ी ही हैं न?

ऐसे उदाहरणों की कमी नहीं जिनमें आरंभ में अपनाये गये निर्धारण को लोगों ने भिन्न दिशा में पूरी तरह बदल दिया है। कुछ उदाहरण ऐसे भी हैं जिसमें बहुतों को कुलबुलाते देखा गया है, पर कितनों ने ही ऐसा भी सहज कर दिखाया है जिसमें उनने अपनी अभ्यास अवांछनीयता में पूरी तरह परिवर्तन कर लिया और कुछ से कुछ बन गये। यही प्रक्रिया कायाकल्प कहलाती है।

विपन्नों को संपन्न बनने में भले ही देर लगती हो पर मानसिकता में अभीष्ट परिवर्तन करके अपना स्तर, क्रिया−कलाप एवं लक्ष्य तो निश्चित रूप से बदला जा सकता है। यह न आश्चर्य है, न चमत्कार। इसे मानसिकता का दिशा परिवर्तन ही कह सकते हैं। रेलगाड़ी पटरी की दिशा बदल जाने पर कहीं से कहीं जा पहुँचती हैं।

महामानवों के सहगामी, महान लक्ष्य के लिए द्रुतगति से हुए अग्रगामी जन्म से ही वैसे न थे। उनने अपने चिन्तन, वातावरण एवं सहयोगियों के प्रभाव से प्रेरित होकर ऐसे परिवर्तन प्रस्तुत किये कि उन्हें कुछ से कुछ बन जाते देखा गया। सूर, तुलसी, अजामिल, अम्बपाली, अंगुलिमाल आदि जन्म से ही वैसे न थे, जैसे कि वे बाद में बन गये। गाँधी और बुद्ध तक आरंभ में अन्य बालकों या किशोरों की तरह ही पले और बढ़े। किन्तु उनकी समर्थता ने जब दिशा बदली तो उस स्थान तक जा पहुँचे जिसकी किसी ने कभी आशा न की थी और न अपेक्षा रखी थी। कुन्ती, मदालसा, सीता शकुन्तला ने अपने महान कर्तृत्व को जिस रूप में प्रस्तुत किया था वैसा कुछ आरंभ से ही दृष्टिगोचर नहीं होता था। विश्वामित्र, भर्तृहरि आदि राजपाट छोड़कर ऋषि स्तर अपनाने के लिए मुड़ गये थे। ऐसे परिवर्तन आश्चर्यजनक तो लगते हैं, पर न कठिन हैं और न असंभव। इसे संकल्प बन का लक्ष्य-परिवर्तन और दिशा-निर्धारण के अतिरिक्त और कुछ नहीं कहा जा सकता।

यह विशेष समय ऐसा है जिसमें जब रात्रि का अंधकार, प्रातःकाल का अरुणोदय जैसे सर्वथा विपरीत परिवर्तन आते रहे हैं तो मूढ़मति जड़ नर-पशुओं को छोड़कर सभी के मन में ऐसी उमंगें उठनी चाहिए कि युग परिवर्तन की महाक्रान्ति में अपनी भी कुछ सराहनीय भूमिका वह निबाहे। यह बन पड़ना सर्वथा संभव है। करना केवल इतना है कि जीवन का लक्ष्य और महत्व समझा जा जाय और अपने चिन्तन तथा समय को उस दिशा में नियोजित किया जाय जिसके लिए कि महाकाल के संकेत निरन्तर उभर रहे हैं।

*समाप्त*