जो धर्म और विज्ञान में विरोध बताता है वह या तो विज्ञान से अपरिचित है या धर्म से अनजान।
न रगड़ के बिना रत्न चमकते है और न कठिनाइयों का सामना किये बिना मनुष्य महान बनता है।
वातावरण में काफी उमस थी। बंगाल प्रान्त वैसे भी अपनी गर्मी के लिए प्रसिद्ध है। उस पर जेल, जिसका निर्माण ही तकलीफों में लगातार बढ़ोत्तरी करते जाने के लिए होता हैं। आसनसोल जेल की एक छोटी-सी कोठरी में मत जी उन दिनों अपने साथियों के साथ थे। मित्र-गण गर्मी की अकुलाहट कम करने के लिए विभिन्न चर्चाओं में मशगूल थे। कभी राजनीति की बातें होती, कभी व्यक्तिगत जीवन पर। बीच बीच में गर्मी को भी कोस लिया जाता।
सीखने की अद्भुत लगन
वह इन सबसे बेखबर हो एक कोने में बैठे तसले पर कंकड़ के सहारे कुछ लिख रहे थे। पास में ‘लीडर’ का एक पुराना अंक पड़ा था, जिसे कभी-कभी उलट-पुलट लेते। चर्चा में से उकताकर मित्रों में से एक का ध्यान उनकी ओर गया-”अरे! मत्त जी क्या करने में जुटे हैं।” “कुछ आड़ी-तिरछी रेखाएँ खींच रहे होंगे।” “देखो तो तनिक।” दूसरे का स्वर था। कथन के साथ ही एक सज्जन उठकर गए। पास पहुंचकर कंधा हिलाते हुए पूछा-”तसले पर क्या लिख रहे हैं। भाई!”
अंग्रेजी सीखने की कोशिश में लगा हूँ। चिर-परिचित मुसकान के साथ जवाब था।
अँग्रेजी! सुनकर सभी को आश्चर्य हुआ। यहाँ पर भला क्या तुक है, सीखने की। न तो कोई मास्टर है और न अनिवार्य पुस्तकें। स्याही कलम कागज कुछ भी तो नहीं है। तसले और कंकड़ के सहारे कहीं भाषा ज्ञान होता है। उनमें से एक ने पूरा लेक्चर झाड़ दिया।
“लगता है 1936 में ही लन्दन जाने वाले हैं।” एक ने व्यंग किया “शायद शेक्सपियर, मिल्टन बनने का इरादा हो।” दूसरे ने समर्थन दिया। जितने मुँह उतनी बातें। ठीक भी है प्रगति पथ पर बढ़ रहे कदमों के सहायक तो विरले महामानव होते हैं। बहुसंख्यक तो ऐसे ही हैं, जो निराशा जगाएँ। पर लगनशीलों के लिए तो अवरोध भी गन्तव्य का सोपान बनते हैं।
न न आप लोग ऐसी बातें मत कीजिए। अब तक की चर्चा में सर्वथा विरत रहे एक अन्य बन्दी ने अपनी बात कही। वह पहले भी कई जेलों में राजबन्दी के रूप में रह चुका था।
सब का ध्यान उसकी ओर मुड़ गया। वह कह रहा था-’उन दिनों मैं बिनोवा जी के साथ तेलंगाना की एक जेल में था। एक दिन सुबह-सुबह सब ने सुना विनोबा जी बड़े जोर-जोर से वर्णमाला के अक्षर रट रहे हैं। कभी-कभी दो अक्षरों को मिलाकर पढ़ने का प्रयास भी चलता। स्लेट पर खड़िया के सहारे कुछ लिखते भी थे। जिसने सुना वही हँसा, बहुतों को आश्चर्य भी हुआ। किसी की समझ में नहीं आ रहा था, आखिर विनोबा को यह क्यों सूझी। बाद में पूछने पर पता चला कि वह तमिल सीख रहे हैं। “उन्होंने सीखने सीख ली तमिल।” सुनने वालों में से किसी ने अपना आश्चर्य प्रकट किया। तमिल ही क्यों इस तरह विश्व की तेईस भाषाएँ सीखी हैं। अभी तुम लोग इस तरह की बातें करते हो-देख लेना एक दिन यह व्यक्ति भी विश्व के गिने-चुने विद्वानों में अग्रणी होगा।
विनोबा जी का सादृश्य उपस्थित हो जाने पर सभी की बोलती बन्द हो गई। उन्हें अपनी भूल समझ में आ रही थी। अब उनको तसला, कंकड़, लीडर की पुरानी प्रति उपेक्षणीय न लगकर लगन निष्ठा के प्रतीक लगने लगे थे। “माफ करना भाई! हम तुम्हारी सीखने के प्रति अद्भुत निष्ठा को पहचान न सके थे।” व्यंग करने वाले ने क्षमा-याचना के स्वर में कहा।
अरे, नहीं-नहीं। उनके एक ठहाके ने वातावरण को पुनः सामान्य कर दिया। सीखने के प्रति अपनी इसी अनोखी निष्ठा के कारण उस समय के मत जी को कालान्तर में सभी ने वेदमूर्ति (मूर्तमान ज्ञान) के रूप में जाना।
पढ़ना तो बहुत जानते है, पर यह कोई विरला ही जानता है कि क्या और क्यों पढ़ना चाहिए।
मेरा क्या परिचय पूछ रहे, रचयिता, रक्षक, पोषक हूँ।मैं शून्य किंतु फिर भी विराट, मैं आदि ऋचा उद्घोषक हूँ॥1॥
मैं एक किंतु संकल्प किया, तो एकोऽहम् बहुस्याम हुआ।मैंने विस्तार किया-अपना, ब्रह्मांड उसी का नाम हुआ॥
ये चाँद और सूरज, मेरी आँखों में उगने वाले हैं॥है एक आँख में स्नेह, और दूजी में प्रखर उजाले हैं।
मनचाही सृष्टि, रचाने की क्षमता वाला, मैं कौशिक हूँ।मेरा क्या परिचय पूछ रहे, रचयिता, रक्षक, पोषक हूँ॥2॥
जिसमें मणि मुक्ता छिपे हुए, वह सागर की गहराई हूँ।जिसकी करुणा सुरसरि बनती, उस हिमनद की ऊँचाई हूँ॥
मेरा संगीत छिड़ा करता, कल-कल करते इन झरनों में।मैं सौरभ बिखराता रहता, इन इन रंग बिरंगे सुमनों में॥
यह प्रकृति छटा मेरी ही है, इतना सुँदर मनमोहक हूँ।मेरा क्या परिचय पूछ रहे, रचयिता, रक्षक, पोषक हूँ॥3॥
मेरे चिंतन की धारा से, ऋषियों का प्रादुर्भाव हुआ।मैंने जब ऋचा उचारी तो, सुर संस्कृति का फैलाव हुआ॥
मैं याज्ञवल्क्य, मैं ही वशिष्ठ, मैं परशुराम भागीरथ हूँ।जो कभी अधूरा रहा नहीं मैं ऐसा प्रबल मनोरथ हूँ॥
प्रण पूरा करने महाकाल हूँ, कालचक्र अवरोधक हूँ।मेरा क्या परिचय पूछ रहे, रचयिता, रक्षक, पोषक हूँ॥4॥
जनहित में विष पीने वाली, विषपाई मेरी क्षमता है।जनपीड़ा से विगलित होती, ऐसी करुणा है, ममता है॥
मैंने साधारण वानर को, बजरंग बनाकर खड़ा किया।मेरी गीता ने अर्जुन को, अन्याय मिटाने अड़ा दिया॥
विकृतियों से लोहा लेने, सुर संस्कृति का संयोजक हूँ।मेरा क्या परिचय पूछ रहे, रचयिता, रक्षक, पोषक हूँ॥5॥
मैंने संकल्प किया है फिर, भू पर ही स्वर्ग बसाऊँ।इस ही धरती के मानव को शोधूँगा, देव बनाऊँगा।
इस ही मैं उज्ज्वल भविष्य, इसका साक्षी यह दिनकर है।मेरे संग सविता के साधक, गायत्री वाला परिकर है॥
मैं युगद्रष्टा हूँ, युग परिवर्तन उद्घोषक हूँ।मेरा क्या परिचय पूछ रहे, रचयिता, रक्षक, पोषक हूँ॥6॥
हे तपःपूत, वेदमूर्ति, हे ज्ञानदूत! हम अकिंचन, जिन्हें आपने हाथ में कलम थमा कर लिखना सिखाया, इस योग्य नहीं है कि हिमालय से भी विराट आपके उस व्यक्तित्व पर प्रकाश डाल सकें जो आपने अस्सी वर्ष के जीवन के रूप में स्थूल काया से जीकर इस धरित्री को धन्य बना दिया। हे युगदृष्टा, युगप्रवर्तक! जिन लाखों परिजनों को आपने छाती से माँ की तरह चिपटाकर आजीवन अपने पास रखा, उन्हें आश्वासन तो दे गए कि उनको दिव्य संरक्षण अपने सूक्ष्म अस्तित्व से देते रहेंगे किन्तु यह कैसे भूल गए कि हाड़ माँस के ये पुतले अभी शक्तिहीन हैं, इनके कन्धे अभी निर्बल हैं, ये कैसे आपके कर्तव्य को शब्दकृति दे सकेंगे। महाकाल की सत्ता के पक्षधर हे हमारे प्रिय गुरुदेव! यह श्रद्धांजलि अंक आपके ही श्रीचरणों में समर्पित है। यदि इसमें कुछ श्रेष्ठ है तो वह आपका ही है, हे युग ऋषि! यदि कहीं कोई कमी है, कुछ त्रुटियाँ हैं तो वह हम अज्ञानी बालकों की नादानी वश हुई मान, क्षमा दान दे।
-आपके ही
हम सब ब्रह्मवर्चस शान्तिकुँजवासी शिष्यगण
“सुधा बीज बोने से पहिले, कालकूट पीना होगा। पहिन मौत का मुकुट, विश्व हित, मानव को जीना होगा॥
ये भी अखण्ड ज्योति पत्रिका के चालीसवें दशक में आज से पचास वर्ष पूर्व प्रथम पृष्ठ पर छपने वाली प्रारंभिक पंक्तियाँ। इन पंक्तियों को अपने मुख पृष्ठ पर देने वाले, स्वयं विश्वव्यापी दुष्प्रवृत्तियों का हलाहल पीकर मृतकों को भी जिला कर उठ खड़ा कर देने वाली अमृत संजीवनी का करोड़ों को रसास्वादन कराने वाले युगपुरुष पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य ने स्थूल काया की गतिविधियों को समेटते हुए गायत्री जयन्ती के दिन (2 जून 1990 ) ही अपनी चेतना की माँ गायत्री में समाहित कर अपने दृश्य जीवन पर पटाक्षेप कर दिया।
जिस व्यक्ति ने अपनी बहुमुखी लेखनी, बुद्धि सम्मत प्रतिपादनयुक्त वाणी, ऋषिप्रणीत कर्त्तृत्व तथा स्नेह वर्षा द्वारा आधी शताब्दी से अधिक समय तक अगणित व्यक्तियों के हृदय पर राज किया जो “रसौ वै सः” की मूर्तिमान था वह अपनी पार्थिव काया को छोड़ते हुए इस प्रकार इतनी शीघ्र अपनी चेतना को महत्चेतना से एकाकार कर लेगा, इस तथ्य पर अब तक किसी को विश्वास नहीं होता कि वह हमारे बीच नहीं रहा। क्या महाकाल के अग्रदूत महाप्राण व्यक्ति किसी शरीरधारी के रोके रुके हैं? वे तो धरित्री के कल्याण हेतु इस ग्रह कह यात्रा करने एक विशिष्ट समय पर आते हैं एवं अपनी इस अनवरत यात्रा में अगणित को रखा-सहचर बना उनसे अपौरुषेय पुरुषार्थ संपन्न करा के सतयुगी संभावनाएँ साकार करते हुए आगे की ओर चल देते हैं।
अवतार शब्द का जिस प्रयोजन से प्रयोग होता है उससे भावार्थ निकलता है-महाचेतना का अवतरण। निष्कलंक प्रज्ञावतार के रूप में अपनी दुर्बुद्धि से अपने ही महाविनाश में जुटी मानव जाति को सद्बुद्धि की ओर मोड़ देने का काम जिस महाशक्ति ने करने का संकल्प लेकर आज से अस्सी वर्ष पूर्व जन्म लिया, उसके व्यक्तित्व पर लेखनी उठाना एक प्रकार का दुस्साहस है। संभवतः उस बहुमुखी विराट प्राणवान महापुरुष के साथ यह समुचित न्याय भी नहीं कर पायेगी पर उसी शक्ति ने यदि यह शक्ति, सम्बल व प्रेरणा दी हो एवं लिखने का निर्देश भी दिया हो तो एक अकिंचन प्रयास अपनी ओर से किया तो एक अकिंचन प्रयास अपनी ओर से किया तो जा ही सकता है। यदि यह प्रकाश अनेकों व्यक्तियों में अध्यात्मपरायण, ब्रह्मवर्चस प्रधान जीवन जीने की उमंगें जगा दे, उन्हें देवमानव बन लोकहितार्थाय जीवन जीने की प्रेरणा देने का शुभारंभ कर दे तो उनके चरणों की प्रेरणा देने का शुभारंभ कर दे तो उनके चरणों में चढ़ाई जा रही यह श्रद्धाँजलि कुछ अंशों में सार्थक मानी जा सकेगी।
जीवन जीने को तो यों अनेकों जीते हैं। नाम भी कमाते हैं पर यश व कीर्ति उनकी ही अमर होती है जो पिछड़ों को बढ़ाने, गिरों को उठाने पीड़ितों का कष्ट मिटाने हेतु तिल तिल कर अपना जीवन होत्र कर देते हैं, अपना सर्वस्व समर्पित कर देते हैं या जीवनयज्ञ एवं समाजयज्ञ के माध्यम से विश्व वसुधा के लिए इतना कुछ कर जाते हैं जिसे कभी भुलाया न जा सकें। स्वयं को ऊंचा उठाना आत्मबल विकसित कर मुक्ति का पथ प्रशस्त करना तो सरल है पर विश्व मानवता के लिए उस द्वार को खोल देना अत्यन्त कठिन हैं। ऐसे व्यक्ति न समाधि की इच्छा करते हैं न स्वर्ग की, न मोक्ष की। वे तो महात्मा बुद्ध की तरह यही उद्घोष करते रहते हैं कि जब तक एक भी व्यक्ति इस वसुधा पर बंधनों से जकड़ा है, मैं अपनी मुक्ति नहीं चाहूँगा। ऐसे देवमानवों को ही पैगम्बर देवदूत, अवतार की संज्ञा दी जाती है एवं वे कई सहस्राब्दियों में विरले, कभी एक बार जन्म लेते हैं, स्वयं को व युग को धन्य बना देते हैं। “आत्मवत् सर्वभूतेषु’ जीवन जीने वाले ये महापुरुष दिखने में तो साधारण व्यक्तियों के रूप में ही होते हैं परन्तु उनके जीवन का हर क्षण विश्व मानव के उत्थान हेतु समर्पित होता है, इसीलिए वे हर पल का सदुपयोग करते हुए “काल” को भी अपनी पाटी से बाँध कर स्वयं “महाकाल” रूप धारण कर युगसृजन के श्रेयाधिकारी बनते हैं व अपने साथ चलने वालों को निहाल कर जाते है। ऐसे ही महाप्राज्ञ युगपुरुष थे-हमारे गुरुदेव।
उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम पाँच दशकों एवं बीसवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध के कुछ दशकों का इतिहास देखें तो जानकारी मिलती है कि विश्वभर में व्यापक परिवर्तन लाने वाले व्यक्ति इसी अवधि में जन्मे हैं। विश्ववंद्य महात्मा गाँधी, साम्यवाद को कार्य रूप देने वाले ब्लादीमिर लेनिन, स्वामी रामकृष्ण परमहंस, मौन तपस्वी महर्षि रमण, योगीराज अरविन्द, स्वामी विवेकानन्द, भगिनी निवेदिता, महाप्राज्ञ वैज्ञानिक आइन्स्टीन, संत विनोबा, विशाल संगठन के जन्मदाता हेडगेवार, द्वितीय विश्व युद्ध की विभीषिका से जूझने वाले सर विंस्टन चर्चिल, विश्व शांति के प्रतिष्ठाता रवीन्द्रनाथ टैगोर, शरतचन्द्र चटर्जी, चिकित्सा विज्ञान में नई क्राँति लाने वाले एलेक्जेंडर फ्लेमिंग, लौह पुरुष सरदार पटेल व पं. नेहरू, भारत के वैज्ञानिक द्वय जगदीश चन्द्र बसु एवं सी.वी. रमन, हुतात्मा चन्द्रशेखर आजाद एवं भगतसिंह, अमर शहीद सुभाष चन्द्र बोस, दार्शनिक काण्ट एवं मैक्समूलर तथा विज्ञान के क्षेत्र में उड़ान द्वारा नई क्राँति लाने वाले राइट बन्धु सभी इसी अवधि में जन्मे, यही उन का कार्य काल रहा। यह सूची तो अत्यन्त संक्षिप्त है व इंगित मात्र करती है महाकाल की उस रीति-नीति को जिसके अंतर्गत अगणित चेतना सम्पन्न व्यक्ति एक साथ एक शताब्दी में किस प्रकार स्थान स्थान पर अवतरित होते हैं। किन्तु यहाँ इस प्रसंग को पर अवतरित होते हैं। किन्तु यहाँ इस प्रसंग को लाना इसलिए आवश्यक समझा गया कि इन्हीं कुछ वर्षों में स्वामी रामकृष्ण परमहंस के ब्रह्मलीन होने के चौबीस वर्ष बाद आगरा जनपद के आंवलखेड़ा गाँव में एक समृद्ध ब्राह्मण परिवार में एक युगपुरुष जन्मा। बाल्यकाल जिसका साधारण रहा किन्तु क्रमशः अपनी बहुमुखी क्रिया पद्धति व प्राप्त सुसंस्कारिता अदृश्य सत्ता के मार्गदर्शन तथा विकसित आत्मबल के सहारे सन् 1940 तक लाखों व्यक्तियों के मन मस्तिष्क पर छा गया। नाम था उसका श्रीराम वह एक सद्गृहस्थ के रूप में दृश्य रूप में तो एक साधारण जीवन जीता चला गया, किन्तु कालाँतर में 1958 में एक अलौकिक विराट स्तर का सहस्रकुंडीय महायज्ञ मथुरा में आयोजित कर एक विशाल संगठन का सिरमौर बन गया।
इस युग पुरुष की महायात्रा का यह एक महत्वपूर्ण पड़ाव था। धर्म तंत्र के विस्तृत बिखरे ढाँचे को सुव्यवस्थित कर उसे लोकमानस के परिष्कार के लिए नियोजित कर देने के पुरुषार्थ को एक योद्धा ही मूर्त रूप दे सकता था। समस्त प्रतिकूलताओं के बीच अपनी देखनी, वाणी व ममत्व की त्रिवेणी बहाते हुए सारे कचरे को, दुष्प्रवृत्तियों के समुच्चय को महासागर में बहाते हुए देवमानवों के एक समुदाय को उनने गठित कर दिया जिसने “गायत्री परिवार’8 का नाम ग्रहण किया एवं कालान्तर में “युग निर्माण योजना” को जन्म दिया। यह एक महत्वपूर्ण स्थापना थी क्योंकि वे इस विशाल परिवार के अभिभावक थे, कुलपति थे, संस्थापक-संरक्षक सब कुछ थे। अगणित व्यक्ति अपने समय, ज्ञान, उपार्जन, विभूतियों की श्रद्धाँजलियाँ उनके चरणों में चढ़ाते हुए उनके अंग अवयव, सखा-सहचर बनते चले गए। अपनी चौबीस वर्ष की चौबीस लक्ष की महापुरश्चरण साधना के समापन पर जो पूर्णाहुति का प्रसाद माँ गायत्री ने उन्हें प्रदान निश्छल प्यार, निष्काम समर्पण।
विराट जनमेदिनी का प्रवाह जब उस पुण्यतोया भागीरथी में समाहित हुआ तो स्वतः एक पवित्र ब्रह्म सरोवर में बदलते हुए महासागर बनता चला गया। संगठन तो राजनीतिक भी होते है, सामाजिक भी, जातीय भी तथा शोषकों के भी। किन्तु धर्म की रक्षा एवं संस्थापना संघशक्ति के जागरण से किस प्रकार हो सकती है, इसका प्रत्यक्ष प्रमाण गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा जी ने दिया जिनने केंद्रीय प्रवाह से गोमुख-गंगोत्री से जुड़ने की जनसामान्य के लिए एक ही शर्त रखी अपने आप पर नियंत्रण, सादगी भरा जीवन तथा लोक मंगल के लिए सत्प्रवृत्ति संवर्धन के लिए अपनी आजीविका एवं समय सम्पदा का एक अंश समर्पित करना जो उनके विचारों से जुड़ा वह बदलता चला गया। स्वयं गुरुदेव परोक्ष रूप से उसकी चेतना का मार्गदर्शन करने लगे एवं उसने समर्पण के बदले में दिव्य अनुभूतियों का रसास्वादन अपने जीवन में किया।
पूरे गायत्री परिवार के लाखों सदस्यों के प्रथम नाम से लेकर पारिवारिक जानकारी विस्तार से होना तथा मिलने पर तुरन्त याद कर सारी चर्चा कर अपना स्नेह उस पर उड़ेल देना, एक चमत्कारी व्यक्तित्व सम्पन्न महापुरुष के ही बस का था। उनका मण्डल हँसता-मुसकराता खिल-खिलाता चेहरा बरबस हर किसी को उनका अपना अन्तरंग बना लेता था। संभवतः यही कारण कि बहुमुखी जीवन जीने वाले इस युगपुरुष ने विरासत में सबसे बहुमूल्य निधि अपने प्रति, अपने कार्यों के प्रति समर्पित कार्यकर्ताओं की मणि मुक्तकों में पिरोई माला के रूप में छोड़ी है जो मात्र महाकाल के गले का ही श्रृंगार बनने योग्य है जिसका मुकाबला करोड़ों-अरबों की धनराशि से नहीं किया जा सकता जो एक अति बहुमूल्य थाती है जिसे वंदनीया माता जी के माध्यम से वैसा ही स्नेह-दुलार मिलते रहने का आश्वासन वे दे गये हैं।
पूज्य गुरुदेव के अस्सी वर्ष के जीवन के प्रत्येक पल का यदि लेखा जोखा लिया जाय तो ग्रंथों का एक विशाल पर्वत खड़ा किया जा सकता है। लेखनी व कागज उनके व्यक्तित्व एवं कर्त्तृत्व को अपनी सीमा में बाँध नहीं सकते क्योंकि ऐसे बहुमुखी व्यक्तित्व के धनी युगपुरुष को, जिसे निष्कलंक प्रज्ञावतार की गिनती में ही गिना जा सकता है कोई साधारण व्यक्ति लिपिबद्ध नहीं कर सकता। प्रस्तुत श्रद्धाँजलि ग्रन्थ स्मारक स्वरूप प्रस्तुत अखण्ड ज्योति संयुक्तांक में यह प्रयास किया गया है कि पूज्य गुरुदेव के जीवन के हर पक्ष की झाँकी, जन-जन को जो उनसे उनके जीवनकाल में जड़े अथवा विचारों के मनन के माध्यम से उनका परिचय पा सके अथवा प्रसुप्त सुसंस्कारिता के बीजाँकुर जिनमें विद्यमान हैं व भविष्य में जिनकी उस विराट नवयुग अभियान में जुड़ने की संभावना है, सभी को परिलक्षित हो। यदि इस प्रयास, में कुछ सफलता मिल सकी जिसमें कोई सन्देह नहीं है, तो यही गुरुसत्ता के प्रति सच्ची श्रद्धाँजलि होगी।
सन् 1966 में एक कार्यक्रम में गुरुदेव प्रवास पर थे। कार्यक्रम के आयोजकों ने उन्हें अपने घर ठहराया। उनके आने की खबर सुन कर आस पास के बहुत लोग आ जुटे थे। इसी सिलसिले में पड़ोस की एक नव विवाहिता लड़की आयी। वेश विन्यास की तड़क भड़क के अतिरिक्त उसने ढेरों गहने-जेवर पहन रखे थे। पर परिवार की बातें, व्यक्तिगत कष्ट कठिनाई पूछने के बाद स्नेह भरे स्वर में बोले, अरे, तूने इतने गहने क्यों लाद रखे हैं। लड़की तो मौन रही पर पास खड़ी एक प्रौढ़ महिला बोल पड़ी गहने पहनने से लड़कियों का सौंदर्य बढ़ जाता हैं।
सुनकर वह हँसते हुए तनिक आश्चर्य से बोले अच्छा! पर भाई मैं तो उसी को सुन्दर कहता हूँ जो सुन्दर काम करता है। फिर थोड़ा गम्भीर होकर बोले-गहने नारी जाति की हथकड़ी बेड़ियाँ है। इस तरह अपने को भ्रमित रखने के कारण कितना त्रास सहा है उसने। कहते कहते उनके हृदय की कोमलता सजीव हो उठी। नारी के प्रति उनकी हम जीवन्त सम्वेदना में उपस्थित जनों को ईश्वरचन्द्र विद्यासागर के कर्तृत्व का सादृश्य अनुभव हुआ।
संसार भव-बंधन नहीं और न ही माया जाल है। वह सृष्टा की सर्वोत्तम कलाकृति है उसमें सत् चित् और आनन्द भरा पड़ा है।
अपनी राह आप बनाएँ, ताकि सफलता के लक्ष्य तक पहुँचें।
सन् 1988 की सर्दियाँ शुरू हो चुकी थीं। नवम्बर महीने का प्रसंग हैं। वह अपनी कमरे मैं बिस्तर पर लेटे हुए दर्शन सम्बन्धी किसी दुरूह तथ्य का खुलासा कर रहे थे। सुन रहे शिष्य ने कौतूहल वश पूछा। “गुरुजी! आप मरेंगे तो नहीं सदा हमारे बीच रहेंगे न। मूर्खता पर हँसते हुए बोले “मेरा मरना कैसा? मैं शाश्वत हूँ बेटा। फिर तनिक रुक कर कुर्ते का एक सिरा उठाकर कहने लगे जहाँ तक इस शरीर की बात है एक झटके में इस कुर्ते की तरह उतार कर फेंक दूँगा।
“फिर तो आप हमसे दूर चले जायेंगे। उसने फिर जिज्ञासा व्यक्त की। “न मुझे कहीं नहीं जाना है मैं इसी शान्ति कुँज में रहूँगा। पहले से भी अधिक सबसे निकट। बस मेरी चेतना की अनुभूति के लिए तनिक संवेदनशीलता बढ़ाने की जरूरत है।” आज जबकि उन्होंने अपना शरीर कुर्ते की तरह उतार कर फेंक दिया है। याद आते हैं शिष्य समुदाय को उनके शब्द “मैं शाश्वत मैं पहले से अधिक सघन हो संव्याप्त हैं।
आसरा तकते रहने से तो निराशा ही हाथ लगती है।
तुम हँसोगे तो दुनिया साथ देगी, किन्तु यदि रोने लगे तो देखोगे कि उस वजन को अकेले ही उठाना पड़ रहा है।
“सुना है कि आत्मज्ञानी सुखी रहते हैं और चैन की नींद सोते हैं। अपने लिए ऐसा आत्मज्ञान अभी तक दुर्लभ ही बना हुआ है। ऐसा आत्मज्ञान कभी मिल भी सकेगा या नहीं, इसमें पूरा सन्देह है। जब तक व्यथा वेदना का अस्तित्व इस जगती में बना रहे, जब तक प्राणियों को क्लेश और कष्ट की आग में जलना पड़े, तब तक हमें भी चैन से बैठने की इच्छा न हो, जब भी प्रार्थना का समय आया भगवान से यही निवेदन किया हमें चैन नहीं वह करुणा चाहिए जो पीड़ितों की व्यथा को अपनी व्यथा समझने की अनुभूति करा सके, हमें समृद्धि नहीं, वह शक्ति चाहिए जो आँखों के आँसू पोंछ सकने की अपनी सार्थकता सिद्ध कर सके। बस इतना ही अनुदान वरदान भगवान से माँगा और लगा कि द्रौपदी को वस्त्र देकर उसकी लज्जा को बचाने वाले भगवान हमें करुणा की अनन्त संवेदनाओं से ओत−प्रोत करते चले जा रहे हैं।”
“हमारी कितनी ही रातें सिसकते बीती हैं-कितनी बार हम बालकों की तरह बिलख बिलख कर फूट-फूट कर रोये हैं, इसे कोई कहाँ जानता हैं? लोग हमें संत विद्वान, सिद्ध, ज्ञानी मानते हैं, कोई हमें लेखक, वक्ता, नेता समझते हैं, पर किसी ने हमारा अंतःकरण खोलकर पढ़ा समझा है? कोई उसे देख सका होता उसे मानवीय व्यथा वेदना की अनुभूतियों से, करुण कराह से हाहाकार करती एक उद्विग्न आत्मा भर इस हड्डियों के ढाँचे में बैठी बिलखती दिखाई पड़ती। कहाँ तथाकथित आत्मज्ञान की निश्चिन्तता-निर्द्वंद्वता और कहाँ हमारी करुण कराहों से भरी अन्तरात्मा। दोनों में कोई ताल मेल नहीं। सो जब कभी सोचा यही सोचा कि अभी वह जान जो निश्चिन्तता एकाग्रता समाधि सुख दिला सके हमसे बहुत दूर है। न उसकी चाह हैं।
प्रस्तुत पंक्तियां पूज्य गुरुदेव की लेखनी से फरवरी 1971 में “अपनों से अपनी बात “ स्तम्भ के अंतर्गत उनकी अन्तर्वेदना के रूप में प्रस्फुटित हुई थीं। इनमें झाँकी देखी जा सकती है, एक सिद्ध पुरुष के अन्दर बैठे संवेदना से भरे पूरे एक संत की जिसे दूसरों की पीड़ा अपनी नजर आती है। जिसका हृदय नवनीत समान है, एक ऐसे व्यक्ति की जो अपनी मुक्ति, समाधि आत्मिक प्रगति की सर्वोच्च कक्षा में पहुँच जाने की कोई आतुरता नहीं दर्शाता वरन् परहितार्थाय जीवन जीता हुआ दूसरों की मुक्ति की कामना सर्वप्रथम करता है। ऐसे एक फक्कड़ फकीर का, अवतारी महापुरुष का भूतकाल में और स्मरण आता है जिसका छोटा सा नाम था “कबीर”। वह अपनी सीधी सादी भाषा में कहता है।
सुखिया सब संसार है, खाये अरु सोवे। दुखिया दास कबीर है, जागे अरु रोवे॥
कितनी समानता है दोनों के जीवन दर्शन में? दोनों ही सिद्धि के सर्वोच्च स्तर तक पहुंचने की क्षमता रखते हैं पर बालक जैसी सरलता और एक परिपक्व मस्तिष्क वाले बूढ़े जैसी महानता का युग्म धारे हुए करुणा की प्रतिमूर्ति मात्र जान पड़ते हैं।
पूज्य गुरुदेव की जीवन साधना का महत्वपूर्ण अंग था “आत्मवत् सर्वभूतेषु, मातृवत् परदारेषु” एवं “परद्रव्येषु लोष्ठवत्” तो काया की परिधि तो वे कभी की लाँघ चुके थे पर अपने समान सबको देखना समानुभूति करना एवं दूसरों के अंतःकरण से अपने को इस गहराई जोड़ लेना कि लाखों परिजन उसे अपना परमप्रिय सखा, पिता, अभिभावक मानने लगे साधना की सर्वोपरि सिद्धि है।
दुनिया के सारे वैभव, कौशल और समर्थता को एक पलड़े पर रखा जाय एवं सरस भाव संवेदनाओं को तुला के दूसरे पलड़े पर तो दूसरा अधिक वजनदार सिद्ध होगा। उसी में शक्ति है दूसरों का हृदय जीतने की उसी के बल पर व्यक्ति आत्मसत्ता को क्रमशः ऊँचा उठाते हुए उच्चतम सोपानों को प्राप्त करता चला जाता है। वही है जिसके अंतराल में जागने पर साधारण मनुष्य देवमानव महामानव बन अगणित व्यक्तियों की श्रद्धा का केन्द्र बन जाता है। पूज्य गुरुदेव ने दुनिया की तीनों शक्तियों को परे रख महत्व दिया भावासिक्त अंतःकरण को। उनके “आत्मवत् सर्वभूतेषु” के आत्मविस्तार ने सर्वत्र अपना ही आपा बिखरा दिखलाया तो वह मात्र दृष्टि दर्शन न रह गया वरन् दूसरों की व्यथा-वेदनाएँ भी उनकी अपनी बन गई और वे इतनी अधिक चुभन-कसक पैदा करती रहीं कि उन पर मरहम लगाने के अतिरिक्त और कुछ सूझा नहीं फिर पुण्य परमार्थ की अलग से कौन चिन्ता करता? मीरा की तरह से उनका अंतःकरण पुकारता रहता-”ए री! मैं तो प्रेम दीवानी मेरा दरद न जाने कोय”। उनका दर्द था पीड़ित मानव जाति, शोषित प्राणी समुदाय को कैसे कष्ट से, व्यथा से, पतन से, मुक्ति दिलाई जाय ताकि औरों के लिए एक ऐसा मार्ग प्रशस्त हो जिस पर चलकर लोक सेवा की जा सके।
इस संबंध में एक प्रसंग यहाँ पर उनके बाल्यकाल से संबंधित देना अप्रासंगिक न होगा। वे जब मात्र बाहर वर्ष के थे तब की उनके ग्राम आँवलखेड़ा की यह घटना है। वे एक समृद्ध ब्राह्मण परिवार में जन्मे थे। पिता कुल पुरोहित थे। आस पास की सभी जमींदारियों में बड़ा सम्मान था तथा जब भी कभी भागवत पारायण होता उनके पिता पं. रूपकिशोर जी को ही बुलाया जाता। गाँव के बीच एक किलेनुमा हवेली में उनका निवास था। पर बालक श्रीराम का मन वहाँ घुटता रहता। वह निकल जाता अपने साथियों के साथ-दुखियों, बीमारों की तलाश में। गाँव में कभी हाट बाजार लगता तो उनके स्वयं सेवकों की टोली सबको पानी पिलाती। सबको प्राथमिक सहायता से लेकर पशु चिकित्सा के पैम्फलेट्स हाथों से बाँटते। सब ढेरों आशीर्वाद देते। ऐसे ही दिनों में एक दिन उन्हें जानकारी मिली कि उनके घर की हरिजन महिला छपको तीन चार दिनों से किसी कारण से आ नहीं रही। वे उसे प्यार से अम्मा कह कर बुलाते थे। निकल पड़े व पहुँच गए हरिजनों के टोले में। गाँव के सभी ब्राह्मणों, ठाकुरों ने टोका-रोका व कहा कि “घर जाकर पढ़ाई करो-भंगियों में तुम्हारा कोई काम नहीं है। कहीं छू लिया तो प्रायश्चित और करना पड़ेगा।
वे भला रुकने वाले थे। गंदी नालियों से गुजरते हुए वे पहुँच गए उस अम्मा के घर व देखकर हैरान रह गए कि उसकी हथेली में बड़ा घाव है व बिना दवा कराए उच्च ताप में वह बिस्तर में पड़ी है। पहले ढेरों उलाहने दिए और फिर का कि अभी मलहम पट्टी का सामान लेकर आता हूँ। शोषित समुदाय की उस वृद्ध ने श्रीराम को रोकते हुए कहा कि वह खुद ही पाँच मील दूर अस्पताल जाकर मलहम करा लेगी पर वे तो घर से सामान लेकर ही लौटे। खूब मन लगाकर कीड़ों से सने गैग्रीन में बदल रहे घाव को धोया और लाल दवा लगा कर मलहम पट्टी कर दी फिर कहा कि जड़ी बूटियों का काढ़ा और बना जाता हूँ ताप उतर जाएगा। वह डबडबाए नेत्रों से उन्हें आशीर्वाद देती रही। किन्तु आगे का मार्ग और भी दुष्कर था। घर पहुँचे तो गंगाजल का घड़ा लिए घर वाले खड़े थे ताकि स्नान करा के पवित्र किया जा सके व फिर प्रताड़ित कर आगे के लिए सावधान किया जा सके। बालक श्रीराम का कहना था कि ‘तुम लाख रोको मैं जाऊँगा जरूर। तब तक, जब तक कि उस बुढ़िया के घाव ठीक ठीक नहीं हो जाते। अतः गंगा जल की व्यवस्था और कर लेना क्योंकि रोज ही मुझे पवित्र करना पड़ेगा”। डाँट पड़ी तथा भोजन भी नहीं दिया गया। किन्तु बालक कच्ची मिट्टी का नहीं बना था।
वह पुनः अगले दिन गया व फिर पाँच दिन तक जब तक कि उस वृद्ध के घाव सूखकर वह चलने योग्य नहीं हो गई। इस बीच उसे घर के बाहर एक कोठरी में रहना पड़ा सभी बुजुर्गों की डाँट भरीपूरी मात्रा में सुननी पड़ी रोज गंगाजल से नहाना पड़ा जाने के मार्ग बदलने पड़े पर दूसरे की पीड़ा मिटाने का जो संकल्प लिया था वह पूरा हो कर ही रहा। संभवतः स्वयं महाकाल ने उस वृद्ध हरिजन महिला के मुँह से उसे ढेरों आशीर्वाद दिए कहा कि आगे चलकर वह एक बहुत बड़ा महात्मा बनेगा, ढेरों व्यक्तियों के हृदय का सम्राट बनेगा। हुआ भी यही। बीसवें दशक की उस वृद्ध माँ की आत्मा जहाँ आत्मा जहाँ भी होगी उस छोटे बालक रूपी वामन की इस अवतार लीला को देख रही होगी व सोचती होगी कि वह कितनी बड़भागी थी कि स्वयं निष्कलंक प्रज्ञावतार का प्रतिनिधि उसकी सेवा हेतु आया।
घटना छोटी है किन्तु एक बालक के अंदर विद्यमान प्रसुप्त सुसंस्कारिता की एक झलक देती है कि “आत्मवत् सर्वभूतेषु “ के बीजांकुर तो उन्हीं दिनों फूट चुके थे। उन्हीं के गाँव का एक पटवारी था-नाम था लाला हुब्बलाल। उसका आतंक ऐसा था कि जब तक सामने वाले को निचोड़ न लेता था, छोड़ता नहीं था। उसके कोप ने कई खाती पीती गृहस्थियों को धूलि में मिला दिया। बालक श्रीराम उन दिनों गाँव का मदरसा पास करके आगरा आए थे। पूरे जनपद में दौरा करने वाली एक सेवा समिति बना चुके थे जो अपाहिजों, अनाश्रितों को कम्बल, रजाइयाँ बाँटती थी। घूमते हुए एक दिन वे अपने गाँव भी पहुँच सूची बनाई। देखा तो सबसे पहला नाम उस लाला हुब्बलाल का था जो कुछ वर्ष पहले आस पास के क्षेत्र का बेताज बादशाह था किन्तु अब फालिज का शिकार हो, चिथड़ों में लिपटा भिनभिनाती मक्खियों के बीच गंदगी से सना टूटी चारपाई पर पड़ा था। दिन भर रोता था व कहता था-लोगो! देखो पाप का परिणाम देखो मुझे भगवान ने कैसा दण्ड दिया है।”
गुरुदेव युवा श्रीराम जब कंबल आदि लेकर पहुँचे तो वे लिपट कर रो पड़ें। कहने लगे लल्लू। यह क्या हुआ? भगवान मुझे कब तक सजा देगा”। गुरुदेव ने उन्हें दिलासा दी ढाढ़स बँधाया व अपनी समिति के सदस्यों सहित सभी ने उनकी खूब सेवा की। जो आदमी पास नहीं फटकते थे, उन्हें प्रेरणा दी कि “पाप से घृणा करो, पापी से नहीं”
लालाजी ने अंतिम प्रयाण तो किया पर अंत तक सब पूज्य गुरुदेव की प्रेरणा से उनकी सेवा करते रहे। यह है युगदृष्टा का, अवतार सत्ता का ममत्व से अभिपूरित समष्टि से जुड़ी महाप्राण की सत्ता का स्वरूप। ऐसे महामानवों का न कोई दुश्मन होता है, न कोई बैरी। सब उनके अपने होते हैं। अपनी जीवन यात्रा में अगणित ईर्ष्यालु व्यक्तियों ने उनके विरुद्ध दुरभिसंधियां रची होगी, न जाने क्या क्या कहा होगा पर उनने प्रत्युत्तर में कुछ नहीं कहा। स्नेह स्नेह, यही तो है ईश्वरीय सत्ता का वह अंतरंग रूप जो संतों को आत्मिक प्रगति एवं लौकिक समृद्धि के शीर्ष शिखर पर पहुँचा देता है। दुलार बाँटने व पीड़ा-पतन निवारण में जुटे रहने का जो मार्गदर्शन हमें वह दे गये हैं वह अन्यान्य उपदेशों से भी अधिक मूल्यवान व वरेण्य है।
हिमालयवासी गुरुसत्ता के मार्गदर्शन पर उन्हें बार-बार हिमालय जाना पड़ा एवं 1971 में तो अपने विशाल परिवार से प्रकारान्तर से स्थाई विदाई लेकर ही अपना कार्य क्षेत्र बदल का वे मथुरा से हरिद्वार आ गए थे। ये सारे कदम उनने अपने कोमल अन्तःकरण पर कितना कड़ा अंकुश लगाकर उठायें होंगे, इसकी कोई कल्पना कर सकता है? जिस मनुष्य तनधारी अवतारी सत्ता ने 33 वर्ष तक अपनी कार्यस्थली यमुना किनारे अवस्थित दुर्वासा ऋषि की तपस्थली गायत्री तपोभूमि को चुना, वह यदि इस दृढ़ संकल्प पर अड़ी रहें कि अब उसे वहाँ जाना ही नहीं है इसे कठोर व्यक्ति भी संभवतः अपने संकल्प से डिग जाता व एक बार अपने लगाये पौधे के विशाल वृक्ष रूपी कलेवर को गायत्री तपोभूमि एवं गुरुदेव मथुरा-आगरा बाईपास मार्ग से शक्तिपीठों की यात्रा के दौरान चार बार गुजरे पर परिजनों के आग्रह के बावजूद पुनः तपोभूमि नहीं गये। जब कार्यभार अपने उत्तराधिकारियों को सौंप दिया व वे उसे सुचारु रूप से चला रहें है तो फिर जाने का प्रश्न कहाँ उठ खड़ा होता है? फिर जाना ऐसे व्यक्ति के लिए कोई अर्थ नहीं रखता जो अपने दिव्य चक्षुओं से सब कुछ देख रहा हो।
अन्धड़ का झोंका खोखले पेड़ों को उखाड़ता है किन्तु पर्वत से टकरा कर अपना वेग ही खो बैठता है।
व्यसन के निकट जाओ तो ललचाते हैं। अपनाओ तो जकड़ लेते है फिर नागपाश बनते है, और फिर प्राण ले कर ही छोड़ते है।
तत्वज्ञानी की वाणी कामधेनु है। वह श्रोताओं को प्रगति प्रदान समस्याओं को सुलझाती है शत्रुता को मित्रता में बदलती है।
शाम का समय था वे शान्ति कुँज के अपने कमरे में बैठे व्यवस्था आदि कार्यों के संदर्भ में गोष्ठी रहे थे। इसी बीच बरसात के कारण लाइट चली गई। कुछ शाम अधिक हो जाने के कारण और कुछ घने बादलों के कारण कमरे में घना अँधेरा हो गया। बैठे हुए लोगों में से कुछ प्रकाश के लिए लैम्प आदि की व्यवस्था के लिए उठने ही वाले थे कि तनिक तीखी आवाज में वह स्वयं उठते हुए बोले थे कि तनिक बैठे रहो! उठना नहीं। तुम्हें क्या पता कौन सी चीज कहाँ रखी है। मैं अपनी हर चीज यथा स्थान रखता हूँ। कहते हुए उन्होंने लैम्प जलाया और एक मन्द प्रकाश में वार्तालाप पुनः शुरू हो गया। कहाँ चेतना की उच्चतम भूमि पर निवास? और कहाँ इन छोटी चीजों की ऐसी सुव्यवस्था? इन दोनों बातों का विरल एकीकरण उन्हीं के जीवन में सघन था।
ईस्ट अफ्रीका जाने के लिए वह पानी के जहाज से यात्रा कर रहे थे। उद्देश्य तक ही था सभ्यता के अहं में ग्रस्त लोगों द्वारा तिरस्कृत अपमानित समुदाय की गले लगाना। वहाँ भारतीय सभ्यता और संस्कृति के बीज छिड़कना। समुद्री यात्रा अनभ्यासी के लिए कम कष्टकर नहीं होती। पर उनका लेखन चिन्तन तथा अन्य दैनिक क्रम यथावत थे। इसी बीच पता चला कि उनके गन्तव्य स्थान के कुछ व्यक्ति साथ चल रहे है। बस मन की सीखने की वृत्ति ने प्रोत्साहित किया क्यों न पहुँचने के पहले वहाँ की भाषा सीख ली जाय।
उमंग उत्साह में बदली उत्साह कार्य में। सीखना शुरू हो गया। ठीक 1 दिन में उन्होंने स्वाहिली नाम से जानी जाने वाली भाषा पर अधिकार प्राप्त कर लिया। सिखाने वाले स्वयं दंग थे। यों प्रसिद्ध प्राध्यविद् सर विलियम जोन्स ने भी कलकत्ता के पण्डितों से संस्कृत सीखी थी। पर यहाँ गति की तीव्रता से अद्भुत थी। सीखने की वृत्ति के इसी वरदान के बल पर उन्होंने वहाँ पहुँच कर सारे वार्तालाप उन्हीं की भाषा में कर सबको चकित कर दिया।
यह सब एक ऐसे व्यक्ति के लिए ही संभव है जो अतिमानवी सत्ता का रूप हो। एक और तो इतना स्नेह, इतना प्यार कि अन्तःकरण मक्खन की डली समान नजर आता है व एक और इतनी निर्मोहिता-स्वयं का कड़ा दिल होना कि उद्धव के उलाहना सुनने पर ब्रज की गोपियों द्वारा श्रीकृष्ण के बुलावा भेजने पर इनकार कर न आने की तरह अपनी क्रियास्थली उसी ब्रज से मोह की डोरी एक झटके से तोड़ देना। क्या यह साधारण मानव के बस की बात है? संभवतः नहीं।
जून 1971 में जब गुरुदेव ने मथुरा से विदाई ली तब जो अभिव्यक्ति उनकी रही, वह आज पुनः स्मरण किये जाने योग्य है क्योंकि वे आत्मीय जनों को, जिन्हें अंग-अवयव कहते थे, कदापि अपनी पार्थिव काया के ऊर्ध्वारोहण पर शोक न कर निर्लिप्त भाव से कर्त्तव्य में जुटा रहने को कह गये हैं। पहले तो शरीर मथुरा से हरिद्वार होता हुआ हिमालय गया था व संभावना पूरी थी कि पुनः दर्शन होंगे। पर अब? अब तो उस शरीर का महाप्रयाण हो चुका। लाख मन को समझा लें कि वे सूक्ष्म रूप से हमारे मध्य विद्यमान है, पर मन का मोह तो मोह ही है। स्वयं वे कठोर-हृदय रहे होते व परिजनों से इतनी आत्मीयता न जोड़ी होती तो संभवतः मन को कठोर भी किया जा सकता था। किंतु जिसने इतनी स्नेहवर्षा की हो कि सामने वाले को अपने स्पर्श मात्र से, वाणी के वचनों मात्र से अंदर से हिला कर रखा दिया हो उसकी पार्थिव देह के महाप्रयाण पर क्या यह हृदय इतना कठोर हो जाय कि उनकी उन मधुर स्मृतियों को ही भुला बैठें। संभवतः हमारे स्थान पर पूज्य गुरुदेव भी रहें होते तो उनका अन्तःकरण भी ऐसा ही पर किया क्या जाय? याद आती हैं उन्हीं की लिखी पंक्तियां विदाई के दिनों की सन् 1971 की तथा साथ ही इस वर्ष महाप्रयाण से पूर्व एक माह से सतत् उनकी अभिव्यक्ति की, जिसमें उनका निर्देश था कि “पार्थिव काया से मोह न करना। हमें तो गायत्री जयन्ती को जाना ही है। तुम सबको हमारा काम आगे बढ़ाना है।” पूज्य गुरुदेव ऐसी ही परिस्थितियों में अप्रैल 1971 की अखण्ड-ज्योति में भाव भरे अन्तः करण से कहते हैं ”अपनी कमजोरी को हम छिपाते नहीं। हमारा अन्तःकरण अति भावुक ओर मोह ममता से भरा पड़ा है। जहाँ तनिक सा स्नेह मिलता है, मिठास को तलाश करने वाली चींटी की तरह रेंगकर वहीं जा पहुँचता है। स्नेह, सद्भाव की, प्रेम और ममता की मधुरिमा हमें इतनी अधिक भाती है कि शहद में पर सनी मक्खी की तरह उस स्थिति को छोड़ने की रत्ती भर भी इच्छा नहीं होती। जिन लक्ष लक्ष परिजनों का स्नेह, सद्भाव हमें मिला है, जी लेकर हजार शरीर धारण कर हजार कल्प तक लेते रहें। प्रेमी के लिए मिलन का आनन्द बड़ा सुखद होता है पर बिछुड़ने का दर्द उसे मर्माहत करके ही रख देता है। वही जान सकता है कि प्रियजनों के बिछुड़ने की घड़ी कितनी मर्मान्तक और हतप्रभ कर देने वाली होती है। लगता है कोई उसका कलेजा ही चीर कर निकाल लिये जाता है”।
“भगवान ने न जाने हमें क्यों स्नेहसिक्त अन्तःकरण देकर भेजा जिसके कारण हमें जहाँ प्रिय पात्रों के मिलन की थोड़ी सी हर्षोल्लास भरी घड़ियाँ उपलब्ध होती हैं वहाँ उससे अधिक वियोग-बिछुड़न के बारम्बार निकलने वाले आँसू बहाने पड़ते हैं। इन दिनों हमारी भी मनोभूमि इसी दयनीय स्थिति में पहुँच गयी है। मिशन के भविष्य की बात एक ओर उठाकर भी रख दें तो भी प्रियजनों से बिछोह वह भी सदा के लिए हमें कष्टकर बन शूल रूप में चुभ रहा है।”
परिजन इन पंक्तियों पर ध्यान दें। कितना निश्छल स्नेहसिक्त अन्तःकरण था उस सत्ता का कि उसने जिन से नाता जोड़ा, उन्हें वह अंत तक याद करता रहा। 60 वर्ष का जन संपर्क व लोकमंगल के लिए शरीरयज्ञ जिसने किया वह यदि इतनी वेदना के साथ तब जाने की बात कहता था तो 1990 में महाप्रयाण के समय उसके भीतर कितनी पीड़ा रही होगी, कितनी मर्मान्तक वेदना उसे टीस रही होगी, इसकी कल्पना भर की जा सकती है। किंतु महापुरुषों की लीला अपरंपार हैं। पूज्यवर श्रीकृष्ण की तरह ही नीति पुरुष थे। यदि वे लोकमंगल के लिए तिल-तिल कर अपनी आहुति देकर जाते समय तक परिजनों की याद भी करते हैं वे उज्ज्वल भविष्य का निर्माण करने के निमित्त अपनी मुक्ति की बात परे रख एक सौ दस वर्ष तक और सूक्ष्म-कारण शरीर रूप में हमारे बीच विद्यमान रहने की बात कह गये हैं, तो उस पर विश्वास कर हमें भी अपने को उसी स्तर की दृढ़ता को विकसित करना होगा। शक्ति तो हमारे मध्य उपस्थिति का संकेत सतत् दे रही है। मोह से परे उठकर हमें लोकमंगल का, विद्या विस्तार की लक्ष्यपूर्ति का उनका स्वप्न साकार करना है, यह याद रहा तो आँसू रुकेंगे, अवश्य रुकेंगे।
किस्मत के सम्पादक का पत्र 14-16 वर्ष के बालक श्रीराम के पास आया था। इतने छोटे बच्चे के नाम किसी सम्पादक का पत्र देखकर गाँव का एक युवक उत्सुकतावश पास आ गया। चिट्ठी खोलने पर पता चला कि इसका सम्बन्ध उनकी हाल में ही छपी एक कविता से है। सम्पादक ने संवेदनशील हो लिखा था, तुम्हारी कविता किसी बच्चे के हाथ की लिखी नहीं लगती। निश्चित रूप से तुम में संवेदनाओं का स्रोत है, जो आगे चलकर निर्झर महान बनेगा और गुरुदेव पढ़कर दंग रह गये।
बदलते समय के साथ इस टिप्पणी की सार्थकता हर्बर्ट स्पेन्सर की उस टिप्पणी की तरह सबने परखी जो उन्होंने बालक विवेकानन्द के उस लेख पर लिखी थी, शीघ्र ही विश्व तुम्हें एक विचारक के रूप में जानेगा। संवेदनाओं के इस निर्झर ने कितने सूखते-मुरझाते जीवनों को हरा भरा किया? यह गणना क्या आकलन शक्ति के बूते की बात है?
पीढ़ियों को सुसंस्कृत बनाना है तो बनाना है तो महिलाओं को सुयोग्य बनाओ।
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राजहंस दूध पीते है, जल छोड़ देते हैं। मोती चुगते हैं, कीड़े नहीं खाते। ऐसी व्रतशीलता निभाकर कोई भी श्रेष्ठ बन सकता है।
शैशवकाल से ही परम पूज्य गुरुदेव के उस साधक स्वरूप के बीजांकुर प्रस्फुटित होते दीखते हैं जिनके कारण उन्हें दिव्य मार्गदर्शक सत्ता को आमंत्रण देने योग्य समर्थता प्राप्त हुई, पात्रता अर्जित कर ली गई। इस वर्ष की आयु से ही यह ऊहापोह मन में चलता रहा है कि “साधना से सिद्धि’ का सिद्धान्त सही है या गलत। इसका परीक्षण उनने स्वयं पर किया। सारे सुयोग वैसे ही बनते चले गये एवं संकल्प को प्रयास रूप में परिणत होने का योग भी मिल गया।
गुरुदेव के पिताश्री संस्कृत के उद्भट विद्वान थे एवं महामना मालवीय जी के सहपाठी थे, घनिष्ठ मित्र भी। यज्ञोपवीत संस्कार कराते समय उनने कई उपदेश दिए जो उन्हें सतत् याद रहे। वे उन्हें चिन्तन के लिए उद्वेलित करते रहे। उनने कहा था-”गायत्री ब्राह्मण की कामधेनु है। वह अभीष्ट फल प्रदान करे इसके लिए श्रद्धा, प्रज्ञा और निष्ठा का अवलम्बन लेना जरूरी है”। बात याद तो हो गई पर दो बातें समझ में नहीं आई। एक यह कि- “ब्राह्मण बनने के लिए क्या करना होगा” क्योंकि बताया यह गया था कि गायत्री ब्राह्मण परिवार में ही जन्मे थे, फिर वे तो ब्राह्मण परिवार में ही जन्मे थे, फिर वे तो ब्राह्मणोचित नित्यकर्म भी पिता द्वारा दिये गये प्रशिक्षणानुसार बचपन से ही सीखते व करते आ रहे थे। ऐसी दशा में पुनः ब्राह्मणोचित नित्यकर्म भी पिता द्वारा दिये गये प्रशिक्षणानुसार बचपन से ही सीखते व करते आ रहे थे। ऐसी दशा में पुनः ब्राह्मण बनने का प्रश्न कहाँ उठता है?
दूसरा प्रश्न दिमाग में उठा कि “श्रद्धा, प्रज्ञा, निष्ठा का अवलम्बन लेना जरूरी है” इसका क्या तात्पर्य हुआ? बनारस से आगरा लौटते हुए रेल में जितना भी अक्सर मिला वे अपने पिता जी से इन्हीं दो बातों के संबंध में कुरेद-कुरेद कर पूछते रहे। उनने बाल जिज्ञासा का समाधान इस प्रकार किया। जिसे दस वर्ष की बालबुद्धि भी भली प्रकार समझ सके!जो नहीं समझ में आया उसे उनने दुबारा पूछा। उनने बताया जो वे चाहते थे।
संस्कृत के प्रकांड विद्वान व सरस अन्तःकरण वाले पिता ने बालक की हर शंका का समाधान कर साधना के प्रति न केवल रुचि जगा दी अपितु गायत्री का मर्म समझाते हुए यज्ञोपवीत संस्कार की सार्थकता को उनके रोम-रोम में पिरो दिया। गायत्री ही जिनका आगे चल कर इष्ट बनी एवं करोड़ों व्यक्तियों से जिनने गायत्री साधना करवा ली, ऐसे श्री राम के पिता ने सच्चे मार्गदर्शक की वह भरी भूमिका निभाई जो गुरु के साक्षात्कार से पहले संपन्न होनी ही थी।
पूज्य गुरुदेव के पिताजी ने कहा कि गायत्री कामधेनु है, इसका तात्पर्य यह है कि वह मनुष्य की समस्त मंत्रों का बीज है, प्रमुख है, वेदमाता हैं। सभी देवताओं, ऋषिगणों, ब्राह्मणों और उपासना परायण महापुरुषों ने इसी का अवलम्बन लिया है। यज्ञोपवीत उसी की दिव्य प्रेरणाओं का सार संक्षेप प्रतीक रूप में पहनाया जाता है ताकि साक्षात गायत्री माता कंधे पर, छाती पर, कलेजे पर, पीठ पर हर समय विराजमान होने के कारण उस तत्व ज्ञान को समझाती रहें जिससे वे फलित होती हैं और साधक अपनी पात्रता बढ़ाता हुआ सच्चे अर्थों में ब्राह्मण बनता है।
सच्चे अर्थों में और झूठे अर्थों में ब्राह्मण होने की बात गुरुदेव को पिताजी द्वारा इस प्रकार समझाई गई कि वंश परम्परा से ब्राह्मण कुल में जन्म लेने से तो वंशानुक्रम प्रभाव होता है, किन्तु श्रद्धा, प्रज्ञा, और निष्ठा की मनोभूमि बन जाने से किसी भी वंश में जन्मा हुआ व्यक्ति ब्राह्मण बन सकता है। इसके अभाव में वंश परम्परा मात्र मिट्टी के खिलौने जैसी रह जाती है।
यहाँ यह बताना प्रासंगिक होगा कि मथुरा पहुँचने पर जब पूज्य गुरुदेव ने सन् 1949 में सद्ज्ञान पुष्पमाला के अंतर्गत पुस्तकें प्रकाशित कीं तो 6 आना सीरीज में एक पुस्तक थी-”गायत्री ब्राह्मण की कामधेनु है”। पुस्तक तो लोगों ने बाद में पढ़ी शीर्षक पर अधिक आपत्ति उठायी कि क्या केवल ब्राह्मण ही गायत्री जप सकते हैं व मात्र उन्हीं को वह फलित हो सकती है? गुरुदेव ने अज्ञानग्रस्त पाठक समुदाय का गहराई से अध्ययन कर अगले संस्करण में ब्राह्मणत्व की व्याख्या पुनः नये सिरे से की व गायत्री के लिए वंश, कुल, लिंग, गोत्र, वर्ण कुछ भी बाधक नहीं बनता, यह बात विस्तार से समझाते हुए पुस्तक का नाम ही बदल दिया-”गायत्री ही कामधेनु है’ यह परिवर्तन का तत्कालीन समाज में संव्याप्त मूढ़ मान्यताओं व अज्ञान को देखते हुए उचित ही था क्योंकि फिर इस पुस्तक को ढेरों व्यक्तियों ने पढ़ा व इसके सात से भी आधिक संस्करण प्रकाशित हुए। प्रत्यक्ष कामधेनु से सिद्धियाँ प्राप्त होने की जिज्ञासा हर व्यक्ति के मन में होती हैं। इसी मनोविज्ञान के जादू ने लोगों को सम्मोहित किया व पुस्तक खूब बिकी। यह प्रसंग बिल्कुल अलग है कि उनमें से कितने सही अर्थों में ब्राह्मणत्व को प्राप्त कर गुरुदेव द्वारा गायत्री के तत्वदर्शन को आत्मसात कर पाए?
पूज्य गुरुदेव के पिताजी ने आगे और विस्तार से समझाते हुए बनारस से वापसी के मार्ग में बताया कि गायत्री को त्रिपदा-तीन चरणों वाली कहा गया है। इसी कारण उसमें तीन व्याहृतियां भी लगीं। त्रिपदा के कई अर्थ हो सकते हैं पर जो अर्थ अध्यात्म तत्वदर्शन में सही माना जाता है, उसका अभिप्राय यहीं है कि जीवन में श्रद्धा, प्रज्ञा, निष्ठा को बड़ी गहराई से उतारा जाय। पं. रूपकिशोर जो ने अपने जिज्ञासु पुत्र को मालवीय जी द्वारा बताये संकेतों-सूत्रों,को बड़े हृदयग्राही ढंग से समझाया। पूरी रेल यात्रा में इसी प्रसंग पर चर्चा होती रही। उनने कहा-” श्रद्धा “का अर्थ है परिपूर्ण विश्वास। ऐसा विश्वास जिसमें शंका-कुशल तर्क-वितर्क आदि की कोई गुंजाइश न हो। “प्रज्ञा”का अर्थ है-स्वविवेक हो सके। किसी से पूछने की कोई गुँजाइश ही न रहे। अपना आपा इतना संतुष्ट हो जाय कि मान्यता को यथार्थता के रूप में देखा जा सके। “निष्ठा”अर्थात् नियमित क्रिया, इतनी सुनिश्चित क्रिया कि उसे सर्वोपरि महत्व की माना जा सके। जिस प्रकार प्रातःकाल उठते ही कुछ खाने-पीने की इच्छा होती है, उससे भी अधिक व्याकुलता निर्धारित उपासनात्मक क्रिया-कृत्यों को करने के लिए उठे और खाया पिया तब जाय जबकि शारीरिक नित्यकर्म करने की तरह मन की मलीनता को स्वच्छ करने की तरह मन की भूख बुझाने के लिए संकल्पित साधना कृत्य पूरा कर लिया जाय”।
बालक श्रीराम पिता की मर्मस्पर्शी विवेचना को सुनते रहे कि “मनुष्य के तीन शरीर होते हैं। कारण शरीर, सूक्ष्म शरीर व स्थूल शरीर।
कारण शरीर भावनाओं का उद्गम है। यह भाव शरीर भी कहलाता है। भावना से ही पाषाण देवता बनते हैं। मीरा के गिरधर गोपाल, रामकृष्ण की काली इसीलिए चमत्कार दिखा सके कि उनके साथ साधक की श्रद्धा भावना अत्यन्त घनिष्ठतापूर्वक जुड़ी हुई थी। अध्यात्म में सारा चमत्कार श्रद्धा को है। इसीलिए महामना मालवीय जी ने कारण शरीर को बलिष्ठ बनाने का निर्देश दिया।
“प्रज्ञा सूक्ष्म शरीर में रहती है। प्रज्ञा अर्थात् हर बात में गहराई से प्रवेश कर समूची तर्क शक्ति का प्रयोग कर किसी निर्णय पर पहुँच जाना। जब विश्वास जम जाय, किसी अन्य के बहकाने-फुसलाने का कोई प्रभाव न पड़े तो समझना चाहिए कि “ऋतम्भरा प्रज्ञा”जाग पड़ी। इसके कारण विश्वास शिथिल नहीं होता व मान्यताएं नहीं डगमगाती”।
स्थूल शरीर में निष्ठा का विकास अर्थात् कार्य की नियमितता, सुव्यवस्था। शरीर का प्रत्येक अवयव इतना अभ्यस्त हो जाय कि काम को सुचारु रूप से किये बिना चैन न मिले। बिगुल बजते ही सैनिकों के ड्यूटी पर आ उपस्थित होने की तरह तत्परता हो। जिस कार्य कार्य में अनन्य निष्ठा होती है। उसमें मन न लगने, समय न मिलने जैसी बहानेबाजी की गुंजाइश नहीं रहती”।
आत्मिक प्रगति के लिए जिन तीन तत्वों का समावेश जीवन में करना पड़ता है उन्हें बड़े विस्तार से समझने पर बालक श्रीराम की जिज्ञासा अध्यात्म तत्वज्ञान के संबंध में और भी बढ़ने लगेगी। उनके पिता ने कहा कि गायत्री कामधेनु तो है ओर अमृतोपम दूध भी देती है पर उसे चारा, दाना-पानी की व्यवस्था भी चाहिए अन्यथा भूखी-प्यासी गाय से दोहनी भरकर दूध प्राप्त करने की आकांक्षा अपूर्ण ही बनी रहेगी।
स्वयं पूज्य गुरुदेव अपनी लेखनी से अपनी इस यात्रा के प्रसंग जो लिख गए हैं, उनकी ही लिपि में नीचे प्रस्तुत हैं।
“महामना मालवीय जी के सूत्रों की पिताजी ने जो व्याख्या की, वह मस्तिष्क से लेकर अन्तःकरण के कोने-कोने में समा गई। बार इस संदर्भ में और भी जिज्ञासाएँ उठती रहीं और उनका भीतर से ही समाधान होता रहा”। कितना सारगर्भित विवेचन अध्यात्म का उन्हें बाल्यकाल में ही प्राप्त हो गया था। संभवतः यज्ञोपवीत संस्कार के साथ द्विजत्व जो प्राप्त होता है, वह अन्तर्ज्ञान के रूप में पिताश्री की वाणी के माध्यम से उन्हें प्राप्त हुआ व फिर दो वर्ष बाद पिताश्री के स्वर्गवास के बद उनकी बराबर परीक्षा लेता रहा। अन्ततः पंद्रह वर्ष की आयु में उनकी पथप्रदर्शक गुरुसत्ता ढूँढ़ती हुई उनके पास पहुँच ही गई।
जो पराक्रम नहीं कर पाते, वे उपदेश देने का धंधा पकड़ते हैं।
स्वर्ग और नर्क अपने घर में ही देखना चाहो तो मुसकान में स्वर्ग उतरना और विग्रह के साथ जुड़ा हुआ नरक कभी भी प्रत्यक्ष देख लें।
वक्ता वह नहीं जो धड़ल्ले के साथ बहुत शब्द बोलता चला जाता है, वरन् वह है-जो अनुभव और विश्वास के साथ बोलता हैं।
विषधर सर्प आड़े समय पर केंचुए की भाँति बिलों में दुबके नहीं पड़े रहते। जिनके पास तनिक भी साहस, शौर्य, संघर्ष की शक्ति है, वह विषम समय पर प्रकट हुए बिना नहीं रहता। फिर जो इससे भरे-पूरे हैं, उनका कहना ही क्या? पूज्य गुरुदेव के साथ कुछ ऐसा ही था। राष्ट्र पिता के आह्वान पर देश भर में नमक सत्याग्रह प्रारंभ हुआ। आगरा जिले में एक स्थान पर 17-18 वर्ष के तरुण श्रीराम भी अपने साथियों के साथ नमक बनाने में जुटे थे। प्रशासन का प्रतिरोध तो होना ही था। पुलिस की लाठियों के आतंक के मारे भगदड़ मच गई। इस हड़बड़ी में वह नमक के कुंड में गिर गए। नमकीन घोल शरीर स्वास्थ्य के लिए कितना हानिकारक होता है, यह जानकारों से छुपा नहीं। पर वह दम साधे पड़े रहे। सारा तूफान शान्त हो जाने पर हँसते हुए कुंड के बाहर निकल आये। लोग उनके इस तरह निकलने पर भौंचक्के थे। किसी ने कहा-अमुक तकलीफ होगी, कोई कहता वह कष्ट तो होकर ही रहेगा पर कहीं कुछ नहीं वह नहा’-धोकर पूर्ववत् हँस रहे थे शौर्य और जिजीविषा का यह अद्भुत मिलन जिसने भी देखा उसी ने दाँतों तले अंगुली दबा ली।
अपराह्न के करीब साढ़े तीन बजे होंगे। वह अपने कमरे में बैठे सेविंग कर रहें थे, साथ ही घर से लौटकर आए एक कार्यकर्ता से बात-चीत भी। सेविंग करने के उपरान्त जैसे ही उनने सामान रखा कि कार्यकर्ता उस और लपका। उन्होंने तुरंत टोका-”उसका जवाब था। “हाँ-हाँ! तू तो मेरे बदले मुँह भी धो आएगा। कहते हुए उन्होंने स्वयं सामान उठाया और निकट तौलिए से अपना मुँह पोंछते हुए बोले- “हारी-बीमारी अथवा किसी दूसरे से सेवा लेना अपराध जैसा हैं”। सेवा न लेने की वृत्ति के इस उत्कट स्वरूप को कार्यकर्ता मौन हो निहार रहा था।
जीवन के प्रारंभिक दिनों में ही जिसे साधना का पोषक आहार उपलब्ध हो जाय तथा सुसंस्कारिता के बीज पूर्व से ही विद्यमान हों, उसका भावी जीवन क्रम कैसा होगा, इसकी पूर्व कल्पना की जा सकती है। पूज्य गुरुदेव की बहुमुखी जीवन साधना के चमत्कारी प्रसंगों का प्राकट्य अन्यान्य महापुरुषों की तरह शैशवकाल से ही होने लगा था। ऐसे महापुरुष की जीवनी को, विभिन्न संस्करणों को लिपिबद्ध करना कितना पुष्कर कार्य हो सकता है, इसकी कल्पना सामान्य पाठक नहीं कर सकते। संभव है कुछ अविज्ञात घटनाक्रम ऐसे उनके शैशवकाल से संबंधित इस स्मारक अंक से छूट जाएँ जिनकी फलश्रुतियाँ आगे चल कर देखने को मिली तो इसे संकलनकर्ताओं का-संपादकों का प्रमाद माना जाए।
शरीर के अवतरण की दृष्टि से देखा जाय तो पूज्य गुरुदेव का जन्म आश्विन कृष्ण 13 संवत् 1968 में आगरा जिले के आंवलखेड़ा ग्राम में हुआ। यह यमुना पार, आगरा-जलेसर मार्ग पर 12 मील दूर अवस्थित है। आज तो यहाँ पूज्य गुरुदेव की माताजी की स्मृति में स्थापित लड़कों का इण्टर कॉलेज एवं पूज्यवर द्वारा अपनी जन्म भूमि में स्थापित लड़कियों का इण्टर कॉलेज, एक चिकित्सालय तथा शक्ति पीठ स्थापित हो जाने से अच्छी-खासी कस्बे स्तर की जनसंख्या है। पर कभी यह छोटा सा गाँव मात्र था। जिस घर में वे जन्मे वह एक सम्पन्न घर था। 2000 बीघा जमीन थी,किसी बात की कमी नहीं थी। संभवतः उनके पिता पंडित रूपकिशोर शर्मा एवं माता दानकुँवरि जी स्वयंभू मनु-शतरूपा की तरह तप साधना कर साक्षात भगवान को अपने घर जन्म लेने के लिए विवश कर दिया था। तप की अवधि में एक ही प्रार्थना रही होगी कि वे एक ऐसी सुसन्तति को जन्म दें जो अपने सत्कार्यों से विश्व वसुधा को धन्य कर दे। यही हुआ भी।
उनकी प्राथमिक स्तर तक की तथा संस्कृत व अंग्रेजी की शिक्षा घर रह कर ही एक उच्च संस्कारवान आत्मा पण्डित रूपराम जी के माध्यम से पूरी हो गई। मास्टरजी उन्हें नैसर्गिक परिकर में ले जाते व वहाँ व्यावहारिक अनौपचारिक शिक्षा का महत्व समझाते। प्रतिभा के धनी वे इतने थे कि वजीफे के साथ प्राइमरी बोर्ड की परीक्षा आगरा मण्डल से उत्तीर्ण की किन्तु इसके बाद स्वयं ही इस बाबू बनाने बाली शिक्षा पर विराम लगा दिया। जब समय मिलता अपने कुछ सखाओं को बैठकर गायत्री व अध्यात्म साधना की चर्चा करते।
जितना कुछ पढ़ा था, उससे विद्या ऋण चुकाने के लिए उनने दलित,शोषित से लेकर हर उस बालक को जिसे विद्यार्जन का अवसर नहीं मिल पाया था, अक्षर ज्ञान कराते थे ताकि इसके बाद वे व्यावहारिक जीवन की साधना सीखकर स्वयं को गढ़ सके। विद्या विस्तार का उनका यह क्रम स्वयं के लिए भी, औरों को वितरित करने के रूप में भी आजीवन चलता रहा।
गायत्री संबंधी दिया गया पण्डित मदन मोहन मालवीय का मूल मंत्र तथा पिता द्वारा की गयी व्याख्या हमेशा याद बनी रही। इसे उनने गाँठ बाँध कर रख लिया। जब भी अवसर मिलता, घर से निकल भागते व किसी वृक्ष के नीचे गायत्री जप तक, कि घर वाले ढूँढ़ न लें। क्रमबद्ध अनुष्ठान न भले ही पंद्रह वर्ष की आयु में हिमालयवासी अपने गुरु रूपी परोक्ष सत्ता से मार्गदर्शन के बाद आरंभ हुए हों, उनने अपने ब्राह्मणत्व को वेदमाता गायत्री की नियमित उपासना के माध्यम से उपनयन संस्कार के बाद ही जगाना आरंभ कर दिया।
दस वर्ष की ही आयु में एक दिन हुड़क उठी व वे घर से पैदल उत्तर की ओर चल पड़े। गंतव्य था हिमालय। बालक को यह भी पता नहीं कि वह कितना दूर है पर ऐसा लगा जैसा हिमालय में विद्यमान दिव्य चेतना, ऋषिसत्ता उन्हें बुला रही है, कुछ सन्देश देना चाह रही है। घर वालों ने ढूँढ़-खोज की तो घर से सात-आठ मील देर के एक रेलवे स्टेशन पर मिले जहाँ बरेली जाने वाली रेल की प्रतीक्षा वे कर रहे थे। पकड़े जाने पर भागने का कारण पूछा गया तो इतना ही कहा-”हम तो हिमालय जा रहे थे। वही हमारा घर है। हवेली में रहकर क्या करेगी”। बड़ी कठिनाई से समझा-बुझाकर लाया गया। यज्ञोपवीत संस्कार उसी घटना के बाद दिव्यात्मा द्वारा सम्पन्न कराया गया ताकि योगी आत्मा को सही मार्गदर्शन मिले।
यहाँ संकेत मिलते हैं एक ऐसी प्राणवान सत्ता के जो शुरू से ही हिमालय जाने के ललक मन में लगाये हुए थी, लौ प्रदीप्त किये हुए थी। परमहंस योगानन्द जी भी तो इसी तरह बाल्यकाल में अपने घर से भाग खड़े हुए थे व हरिद्वार से पकड़ कर लाये गये थे। महामानवों के जीवन की यही कुछ प्रारंभिक झलकियाँ उनके भविष्य की संभावनाओं की ओर पूर्व संकेत कर देती हैं। संभवतः कुछ परिवारीजनों ने घटना को महत्वहीन मान बालक को प्रताड़ित भी किया होगा पर किसे मालूम था कि इसी महाप्राण को ढूँढ़ने स्वयं ऋषिसत्ता उनके समक्ष कुछ ही वर्षों बाद आएगी व चार बार हिमालय अपने पास बुलाएगी। इस उम्र में बालकों की रुचि सामान्यतः मेला, खेल-कूद, मिठाई आदि में रहती है, किन्तु यह बालक तो किसी ओर मिट्टी का बना था। स्वयं उपासना तो करता ही, अपने साथियों को भी अमराई के कुँजों में ले जाकर अध्यात्म तत्वज्ञान के गूढ़ उपदेश व्यावहारिक रूप में ग्रामीण भाषा में समझाता। संभवतः वह अध्यात्म क्षेत्र का लोक शिक्षक बनने की तैयारी अभी से कर रहा था। एक सज्जन जो उनसे आयु में एक वर्ष बड़े हैं, अभी भी जीवित हैं व अपने रोचक संस्मरण बालक श्रीराम की अध्यात्म क्षेत्र में प्रगति के सुनाते हैं। उन संस्मरणों को इसी अंक में अन्यत्र स्थान दिया गया है।
बाल्यकाल से ही गुरुदेव तीन देवता, तीन संरक्षकों की छाया स्वयं पर अनुभूत करते रहे। माता के रूप में पण्डित प्रवर श्री मालवीय जी ने उन्हें गायत्री माता-कामधेनु का पयपान करते रहने का मार्गदर्शन दिया था। यह वे जीवन भर करते रहे व उसी माता की गोद में गायत्री जयंती के दिन ही महाप्रयाण कर गए। इसी दिन स्वर्ग लोक से भगवन् सत्ता का अवतरण हुआ था तथा इसी दिन ब्रह्माजी की वाणी ज्ञान गंगा गायत्री के रूप में प्रकट हुई थी। तरणतारिणी अंतरंग को पवित्र बनाने वाली व सद्बुद्धि-सद्भावनाओं को जगाने वाली गायत्री का अवतरण दिवस इसी दिन मनाया जाता है।
हिमालय को वे अपना पिता मानते थे तथा पारस की उपमा देते थे, जिसका स्पर्श करके वे उतना ही ऊँचा उठे जितना विराट दिव्यशीलता से अभिपूरित देवात्मा हिमालय है एवं जिसकी शरण में वे मार्गदर्शन हेतु बार-बार जाते रहे। माता, पिता के अतिरिक्त तीसरी सत्ता थी गुरुसत्ता की, उस अदृश्य सिद्ध पुरुष की जिसका दर्शन मात्र वे ही कर पाये थे, जिसने स्वयं उनकी पूजा की कोठरी में आकर उन्हें दैवी चेतना से साक्षात्कार करा अपने पिछले जन्मों के इतिहास की झाँकी दिखाई थी। इस जीवन संबंधी भावी क्रिया-कलापों का मार्गदर्शन किया था तथा जीवन भर परोक्ष रूप से उनका मार्गदर्शन किया व अब उन्हीं के साथ वे एकाकार हो गये हैं। उन्हें वे “मार्गदर्शक” भी कहते थे, मौज में आने पर “मास्टर भी।
तीनों की उपमा पूज्य गुरुदेव अमृत, पारस कल्पवृक्ष के रूप में दिया करते थे। पूज्यवर अखण्ड-ज्योति (जनवरी 1972) में वंदनीया माता जी के माध्यम से कहते हैं कि गायत्री मंत्र अमृत है जिसे पीकर हमारी सत्ता अजर-अमर, देवतुल्य हो गई। हिमालय वह पारस है जिसने हमें मानव से देवमानव, अवतारी पुरुष बना दिया, दूसरों को लोहे से स्वर्ण में परिणत करने की सिद्धि प्रदान कर दी। इस हिमाच्छादित धवल ऊँचाई को पाकर ही हम दूसरों की जलन को, तपन को मिटाने योग्य सिद्धि अर्जित कर पाए। कल्पवृक्ष हैं-उनके मार्गदर्शक जिनने स्वयं तो कई शतकों का जीवन जिया है, स्वयं अजर अमर है, देव तुल्य हो गई। हिमालय वह पारस है जिसने हमें मानव से देवमानव, अवतार पुरुष बना दिया, दूसरों को लोहे से स्वर्ण में परिणत करने की सिद्धि प्रदान कर दी। इस हिमाच्छादित धवल ऊँचाई को पारकर ही हम दूसरों की जलन को, तपन को मिटाने योग्य सिद्धि अर्जित कर पाए। कल्पवृक्ष हैं-उनके मार्गदर्शक जिनने स्वयं तो कई शतकों का जीवन जिया है, स्वयं अजर-अमर हैं, दुर्गम हिमालय में सूक्ष्म ऋषिसत्ता के रूप में विद्यमान हैं, पर जिनने अपने सुपात्र को चुनकर अपनी छाया में बैठकर साधना शक्ति द्वारा बीसवीं व इक्कीसवीं शताब्दी में सारे महत्वपूर्ण परिवर्तन का सरंजाम जुटा कर, धरित्री का कायाकल्प करने का आश्वासन दिया। उनकी सारी आध्यात्मिक मनोकामनाएँ पूरी कीं तथा जो कुछ भी गुरुदेव ने “मास्टर” से माँगा वह कल्पवृक्ष के माध्यम से मिलता चला गया। उपरोक्त तीनों दिव्य सत्ताओं का त्रिवेणी संगम उनके जीवन के प्रारंभिक कुछ वर्षों में ही फलीभूत होता दिखाई पड़ता है।
कहते हैं कि गुरु को खोजने निकलना पड़ता है व विरलों को ही सद्गुरु हाथ लगते हैं। यों तो सब कुछ हड़प लेने वाले, मूंड़ लेने वाले वेशधारी अधिकाँश को मिल जाते हैं जो अध्यात्म के नाम पर बट्टा और लगाते हैं। सच्चा पथप्रदर्शक तो जन्म-जन्मान्तरों में किसी विरले को ही हाथ लगता है। शिष्य सुपात्र होने के कारण उसे ढूँढ़ने नहीं जाता, स्वयं गुरु आकर उपस्थित हो जाता है और अपने शिष्य के नेत्रों में अज्ञान के अंधकार से निकलने वाली शलाका डालकर उसे दिव्य प्रकाश दिखाता है, उसके हाथ में दीपक थमा देता है। संत कबीर दास ने कहा है-
पाछे लागा जाइ था लोक वेद के साथ। आगे ते गुरु मिल्या दीपक दीया हाथ॥
पूज्य गुरुदेव के जीवन प्रसंग पर उपरोक्त दोहा बिल्कुल सही बैठता है जिन्हें प्रकाश दिखाने, मार्गदर्शन देने स्वयं गुरुसत्ता परोक्ष चेतना के रूप में उनके पास आई। यह सौभाग्य सूर्योदय उनके आध्यात्मिक जन्मदिवस वसंतपर्व के दिन हुआ जहाँ से वे जीवन की शुरुआत होती मानते आये हैं। शारीरिक आयु पंद्रह वर्ष पूराकर सोलहवें में पदार्पण किये 2-3 माह ही हुए थे कि प्रातः की उपासना में वसंत पंचमी के दिन बालक श्रीराम के उपासना ग्रह में एक दिव्य प्रकाश का अवतरण हुआ जो बाहर से घनीभूत होता हुआ उसके शरीर, मन, अन्तःकरण में समा गया और उसे साधारण बालक से अवतारी महापुरुष बना कर निहाल कर गया। इसे आत्मबोध कहा जाय या परोक्ष सत्ता द्वारा शक्तिपात स्तर का अनुग्रह., जो भी कुछ यह था, उनके जीवन का एक महत्वपूर्ण था।
जो पाप का पश्चाताप करता है वह साधु है और जो पाप पर अभिमान करता है वह शैतान है।
देश को स्वाधीनता मिल जाने के बाद, स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने वाले सैनिकों को पुरस्कृत, सम्मानित करने की बारी आयी। एक-एक करके सभी को पेन्शन, पदक, यात्रा भत्ता आदि सुविधाओं की व्यवस्था होने लगी। पू. गुरुदेव के पास भी एक अधिकारी पेन्शन आदि का प्रस्ताव लेकर आए। उनने कड़ाई से मना कर दिया। बाद में आज से ढाई वर्ष पूर्व शासन के उच्चाधिकारियों ने आकर स्वीकार करने का अत्यधिक आग्रह किया तो गुरुदेव बोले-”राष्ट्र के सम्मान चिह्न के रूप में मैं पदक तो रखे लेता हूँ पर किन्हीं सुविधाओं का उपयोग नहीं करूंगा। पेन्शन को आप राष्ट्रीय सुरक्षा निधि को देदें।” अधिकारी निस्पृहता के इस प्रतीक को कुछ देर ताकता रहा, फिर उनका निर्देश पालन कर वापस चला गया।
निस्पृहता को उन्होंने अपनी सबसे बड़ी पूँजी माना। वह कहा करते-”ईश्वर विश्वास की सबसे बड़ी कसौटी है निस्पृहता। जो ईश्वर विश्वासी है वह उतना ही निस्पृह होगा।”
जो सचमुच प्रेम करता है उसका हृदय धरती पर साक्षात स्वर्ग है। ईश्वर बसता है क्योंकि ईश्वर प्रेम है।
तब वह टूण्डला जेल में राजनीतिक बंदी के तौर पर थे। अवस्था कम होने के कारण जेलर ने उन्हें प्रौढ़ व्यक्तियों के साथ रखने के बजाय-किशोरों बालकों के साथ रख दिया था। इनमें से प्रायः सभी अपराधी श्रेणी के थे। वह अपने प्रेम भरे बर्ताव से उनमें बुराइयों के प्रति वितृष्णा, अच्छाइयों के प्रति अनुराग जगाने की कोशिश में लगे रहते। उद्दण्ड, आवारा कहे जाने वाले ये लड़के भी उनके अपनत्व से प्रभावित हो उनके आज्ञाकारी बनने लगे थे।
ऐसे ही एक दिन उनका शिक्षण चल रहा था। इतने में जेलर अपने साथी के साथ आया और ओट में खड़ा सुनता रहा। दानों चकित थे। मित्र ने आश्चर्यपूर्ण स्वर में जेलर से पूछा-”अरे, यह सुकरात है क्या? जेल में भी ज्ञान सिखा रहा है।” “न भी है तो आगे चल कर बन ही जायेगा,” जेलर का जवाब था। उस दिन वह इतना प्रभावित हुआ कि उन्हें बच्चों का शिक्षक नियुक्त कर दिया। यह थी उनके लोक शिक्षण की नींव। जिस पर आगे चलकर लोकशिक्षण का एक व्यापक तंत्र खड़ा हुआ।
देवत्व की रक्षा करने से बढ़कर और कोई धर्म नहीं और देवत्व अपनाने से बढ़कर और कोई कर्त्तव्य नहीं।
कैसे दें? हम तुम्हें विदाई। क्योंकि तुम्हारी प्राण चेतना ही, प्राणों के बीच समाई॥1॥
विदा कर दिया तुम्हें अगर, तो क्या अस्तित्व हमारा होगा। बिना प्राण के इस काया में, क्या व्यक्तित्व हमारा होगा॥ महाप्राण! तुममें ही अब तक, इन प्राणों ने है गति पाई। कैसे दें? हम तुम्हें विदाई॥2॥
जन मंगल-पथ पर उछालने, तुम्हें उछलते रहे प्राण में। युग-पीड़ा मन में उभारने, तुम्हीं मचलते रहे प्राण में॥ करुणानिधि! तुमने करुणा कर, संवेदन की सुधा पिलाई। कैसे दें? हम तुम्हें विदाई॥3॥
तुम ही साँसों के तारों पर, प्रतिक्षण ही डोल रहे हो। और हमारी हर धड़कन में, जब तुम ही तो बोल रहे हो॥ कैसे कहें, विछोह हुआ है, बने हुए हो जब परछाई। कैसे दें? हम तुम्हें विदाई॥4॥
हम भी साथ नहीं छोड़ेंगे, यह आश्वासन देते है हम। कमर बाँधकर खड़े रहेंगे, खड़ा, जहाँ भी कर दोगे तुम॥ लक्ष्य तुम्हारी तक पहुंचेंगे, हमने कसम तुम्हारी खाई। कैसे दें? हम तुम्हें विदाई॥5॥
साथ आपके खड़े रहेंगे, नई सदी का स्वागत करने। और दीपसा जले रहेंगे, जन पथ पर छाया तम हरने। वह मशाल अब सदा जलेगी, जिसको तुमने हमें थमाई। कैसे दें? हम तुम्हें विदाई॥6॥
पार्थिव को तो विदा कर दिया, इस सीने पर पत्थर रखकर। लेकिन तुम्हें सहेज लिया है, अपने इन प्राणों में भर कर॥ तुम तो महाकाल, हो जिसने, कालचक्र की चाल चलाई। कैसे दें? हम तुम्हें विदाई॥7॥
अधूरे ज्ञान का अहंकार अपेक्षाकृत अधिक खतरनाक है।
छोटा न मत करो! नया आकाश तुम्हें दूँगा। नभ को भी छू सको, वही विश्वास तुम्हें दूँगा॥1॥
बहुत रो लिये, रोने-धोने की बातें छोड़ो रो-रो कर, मत अपनी, रत्नों सी आँखें फोड़ो
मुस्कानों से भरा हुआ मधुमास तुम्हें दूंगा छोटा मन मत करो। नया आकाश तुम्हें दूँगा
पतन, पराभव की दुनिया, अब मत स्वीकार करो। दीन-हीन जीवन जीने से, अब इन्कार करो॥
गौरव से जी सको, वही उल्लास तुम्हें दूँगा। छोटा मन मत करो! नया आकाश तुम्हें दूँगा॥3॥
कुछ करने के योग्य नहीं हो, छोड़ो इस भ्रम को असफलता ही मिली अभी तक, तोड़ो इस क्रम को
चरण सफलता चूम रही, आभास तुम्हें दूँगा छोटा मन मत करो। नया आकाश तुम्हें दूँगा
भूल रहे हो तुम, ऋषियों की परम्पराएँ हो। सिद्धि साधना से, पाने वाली क्षमताएँ हो॥
घबराओ मत! वही, अमर इतिहास तुम्हें दूँगा। छोटा मन मत करो! नवा आकाश तुम्हें दूँगा॥5॥
जब सुषुप्त-देवत्व तुम्हारा, तुम में जागेगा स्वर्ग, धरा पर आने, की अनुमतियाँ माँगेगा
आशीषों के आँचल में आवास तुम्हें दूँगा छोटा मन मत करो! नया आकाश तुम्हें दूँगा॥6॥
प्रज्ञा-पुत्रों! तुम प्रज्ञा-युग, के आराधक हो। और लोक मंगल के, शिव-संकल्पी साधक हो॥
तुम मेरे हो, जो है, मेरे पास तुम्हें दूँगा। छोटा मन मत करो! नया आकाश तुम्हें दूँगा॥7॥
दुनिया से जितना लिया है कम से कम उतना दे जाने की बात तो सोचा करें।
दैवी सत्ता का प्राकट्य जब किसी महामानव के जीवन में होता है तो सोने में सुगन्धि का काम करता है। परोक्ष मार्गदर्शक सूक्ष्म शरीरधारी ढूँढ़ते भी उन्हें ही हैं, जिनके माध्यम से उन्हें मानव मात्र के कल्याण हेतु सारा ढाँचा विनिर्मित करना होता है। समष्टिगत चेतना का अवतरण जिस स्थूल तनधारी में होता है, फिर वह सामान्य न रह कर असामान्य अवतारी पुरुष हो जाता है। क्रिया कलाप तो उसके चर्मचक्षुओं से सामान्य ही जान पड़ते हैं किन्तु वह जो कुछ कर्तृत्व करता चला जाता है, वही उस युग की नीति का आधार बन जाता है। युग परिवर्तन ऐसी ही आत्मबल आत्माओं के बलबूते बन पड़ता है।
पूज्य गुरुदेव के बाल्यकाल में ही पन्द्रह वर्ष की आयु के बाद आए वसंतपर्व के ब्रह्ममुहूर्त में पूजा की कोठरी में एक प्रकाश पुँज प्रकट हुआ। उस दिव्य प्रकाश से सारी कोठरी जगमगा उठी। प्रकाश के मध्य एक योगी का सूक्ष्म छाया शरीर उभरा। इस प्रकाश के प्रकटीकरण की प्रक्रिया का आत्मबोध अंतःस्फुरणा, गुरुदर्शन, आत्म साक्षात्कार कुछ भी नाम जा सकता है, पर उस दिन प्रकट वह प्रकाश ही उनका मास्टर, मार्गदर्शक उनकी परोक्ष सत्ता बन गया। इसकी भौतिक रूप से व्याख्या की जाय तो इसे दुर्गम हिमालय से प्रकटी उस चिनगारी से भी जोड़ा जा सकता है जहाँ ऋषिसत्तायें सूक्ष्म शरीर में निवास करती हैं। हिमालय से विराट व्यक्तित्व वाले पूज्य गुरुदेव ने अपने आध्यात्मिक पिता के रूप में स्वयं हिमालय के उस क्षेत्र की जो उत्तराखंड क्षेत्र में स्थित है, हिमालय का हृदय कहा जाता है। यह परोक्ष चेतना पन्द्रहवें वर्ष पूरा होने के तीन माह बाद ही बसंत पर्व के दिन युवा श्रीराम के पूजा गृह में प्रकट हुई, स्थूल शरीर एक ऐसे कृशकाय सिद्धपुरुष के रूप में है जो अनादिकाल से एकाकी, मग्न, मौन, निराहार रहकर अपनी तप ऊर्जा द्वारा अपने को अधिकाधिक प्रचण्ड प्रखर बनाते चले आ रहे हैं। एक दिगंबर देहधारी हिमराशि के मध्य खड़ी दुर्बल काया-यह तो स्थूल रूप में उपलब्ध उनका एक मात्र चित्र है जो अपनी पहली हिमालय यात्रा के समय उनके आग्रह पर स्वयं पूज्य गुरुदेव को प्रकट रूप में उनने प्रदान किया यही चित्र गायत्री परिवार में दृश्य प्रतीक के रूप में उपलब्ध है। नाम है-स्वामी सर्वेश्वरानन्द किन्तु इससे भी अधिक महत्वपूर्ण है उनका सूक्ष्म अस्तित्व जिसमें वे गति, काल, दिशा से परे सतत् परिभ्रमण प्राणधारी आत्माओं को मार्गदर्शन देते दिखाई देते हैं। वे ही अपने सूक्ष्म रूप में दिव्य प्रकाश के रूप में उनके समक्ष आए एवं उनके कौतूहल को समाप्त करते हुए बोले-”हमारे तुम्हारे जन्म जन्मान्तरों के संबंध हैं। तुम्हारे पिछले जन्म एक से एक बढ़ कर रहे हैं किन्तु प्रस्तुत जीवन और भी विलक्षण है। इस जन्म में समस्त अवतारी सत्ताओं के समतुल्य पुरुषार्थ करना है, भारतीय संस्कृति के नवोन्मेष हेतु एक विशाल संगठन देवमानवों का खड़ा करना है तथा इसके लिए प्रचण्ड तप पुरुषार्थ करना है”।
पूज्य गुरुदेव के बाल्यकाल में ही पन्द्रह वर्ष की आयु के बाद आए वसंतपर्व के ब्रह्ममुहूर्त में पूजा की कोठरी में एक प्रकाश पुँज प्रकट हुआ। उस दिव्य प्रकाश से सारी कोठरी जगमगा उठी। प्रकाश के मध्य एक योगी का सूक्ष्म छाया शरीर उभरा। इस प्रकाश के प्रकटीकरण की प्रक्रिया का आत्मबोध अंतःस्फुरणा, गुरुदर्शन, आत्म साक्षात्कार कुछ भी नाम जा सकता है, पर उस दिन प्रकट वह प्रकाश ही उनका मास्टर, मार्गदर्शक उनकी परोक्षसत्ता बन गया। इसकी भौतिक रूप से व्याख्या की जाय तो इसे दुर्गम हिमालय से प्रकटी उस चिनगारी से भी जोड़ा जा सकता है जहाँ ऋषिसत्ता सूक्ष्म शरीर में निवास करती हैं। हिमालय से विराट व्यक्तित्व वाले पूज्य गुरुदेव ने अपने आध्यात्मिक पिता के रूप में स्वयं हिमालय के उस क्षेत्र की जो उत्तराखंड क्षेत्र में स्थित है, हिमालय का हृदय कहा जाता है। यह परोक्ष चेतना पन्द्रहवें वर्ष पूरा होने के तीन माह बाद ही बसंत पर्व के दिन युवा श्रीराम के पूजा गृह में प्रकट हुई, स्थूल शरीर एक ऐसे कृशकाय सिद्धपुरुष के रूप में है जो अनादिकाल से एकाकी, मग्न, मौन, निराहार रहकर अपनी तप ऊर्जा द्वारा अपने को अधिकाधिक प्रचण्ड प्रखर बनाते चले आ रहे हैं। एक दिगंबर देहधारी हिमराशि के मध्य खड़ी दुर्बल काया-यह तो स्थूल रूप में उपलब्ध उनका एक मात्र चित्र है जो अपनी पहली हिमालय यात्रा के समय उनके आग्रह पर स्वयं पूज्य गुरुदेव को प्रकट रूप में उनने प्रदान किया यही चित्र गायत्री परिवार में दृश्य प्रतीक के रूप में उपलब्ध है। नाम है-स्वामी सर्वेश्वरानन्द किन्तु इससे भी अधिक महत्वपूर्ण है उनका सूक्ष्म अस्तित्व जिसमें वे गति, काल, दिशा से परे सतत् परिभ्रमण प्राणधारी आत्माओं को मार्गदर्शन देते दिखाई देते हैं। वे ही अपने सूक्ष्म रूप में दिव्य प्रकाश के रूप में उनके समक्ष आए एवं उनके कौतूहल को समाप्त करते हुए बोले-”हमारे तुम्हारे जन्म जन्मान्तरों के संबंध हैं। तुम्हारे पिछले जन्म एक से एक बढ़ कर रहे हैं किन्तु प्रस्तुत जीवन और भी विलक्षण है। इस जन्म में समस्त अवतारी सत्ताओं के समतुल्य पुरुषार्थ करना है, भारतीय संस्कृति के नवोन्मेष हेतु एक विशाल संगठन देवमानवों का खड़ा करना है तथा इसके लिए प्रचण्ड तप पुरुष करना है”।
उनके इस असमंजस को, चिन्तन चेतना को उस सूक्ष्म शरीरधारी सत्ता ने पढ़ लिया व कहा कि “देवात्माएँ हैं, उनकी अच्छी तरह जाँच-पड़ताल करती हैं। शक्ति सम्पन्न महामानव अकारण अपनी सामर्थ्य किसी निरर्थक व्यक्ति के निमित्त नहीं गँवाते। सूक्ष्म शरीरधारी होने के नाते जो काम हम नहीं कर सकते वह स्थूल शरीर के माध्यम से तुम से कराएँगे। समय की विषमताओं को मिटाने के लिए तुम्हारा प्रयोग करेंगे। देखते में तो यों तुम्हारा दृश्य जीवन साधारण व्यक्ति के समान होगा पर कर्तृत्व सभी असाधारण होंगे। तुम से सीमित आयु में हम कई सौ वर्ष का कार्य करा लेंगे व समय आने पर तुम्हें वापस बुला लेंगे ताकि हमारी ही तरह युगसंधि वेला में प्रचण्ड पुरुषार्थ सम्पन्न कर प्रत्यक्ष शरीरधारी देवमानवों को नवयुग की पृष्ठभूमि बनाने हेतु पर्याप्त शक्ति मिले। दृश्य कर्तृत्व जो तुम्हें करना है उसके लिए पर्याप्त आत्मबल, ब्रह्मवर्चस चाहिए जो तप द्वारा ही संभव हो सकता है।
अपनी गुरुसत्ता व अपने बीच वार्तालाप के इस प्रसंग को पूज्य गुरुदेव ने स्वयं अपने निकटतम कार्यकर्ताओं से वार्तालाप के दौरान सुनाया था। जो समयानुसार प्रकाशित होना था, उसे वे समय समय पर बताते रहे। लिपिबद्ध यह अभिव्यक्ति उन्हीं की अनुभूति है। कई प्रसंग ऐसे हैं जो प्रकाशित नहीं हुए क्योंकि उन पर विराम लगा दिया गया था। अब उनके निर्देशानुसार ही उनका अनावरण किया जा रहा है। स्वयं पूज्य गुरुदेव कहते थे कि हमने मात्र जिज्ञासुओं के समाधान हेतु रामकृष्ण परमहंस, समर्थ रामदास, कबीर के रूप में संपन्न कर्तृत्व का अपनी कलम से उल्लेख किया है पर कोई उनसे स्थूल संगति न जोड़ने लगे। मात्र इन्हीं तीन बंधनों में बाँधने न लगे इन अलंकारिक विवेचनों से तात्पर्य यही है कि जो भी पहले कर्त्तृत्व बन पड़ा इन प्रकट व अप्रकट रूप से कई अवतारी सत्ताओं के द्वारा बन पड़े कार्यों के समकक्ष था व आगे जो किया जाना या इससे भी कई गुना था। “आगे जब भी हमारा मूल्याँकन किया जाएगा तो लोग समझेंगे कि हमने कितने महापुरुषों के रूप में जीवन इस अस्सी वर्ष की आयु में ही जिया है। इतना कुछ करके पहले से ही रख दिया है, सब कुछ अपनी परोक्ष सत्ता के मार्गदर्शन में कि वर्षों शोधकर्ता उसका मूल्याँकन करके स्वयं को बड़भागी मानते रहेंगे।
पूज्य गुरुदेव की इस सूक्ष्म मार्गदर्शक सत्ता के संबंध में जो हिमालयवासी है, विवरण कई ग्रन्थों में मिलते हैं। इस्लाम धर्म का एक ग्रन्थ है-”तजकर रसुल गोशिया” जो हिजरी सन् 1289 में दिल्ली के प्रसिद्ध गौस अलीशाह के परिशिष्ट श्री गुलहसन ने लिखा है। यह पुस्तक आज भी श्री दीपसिंह हिम्मतसिंह राज लौटा पो. आँकलाव गुजरात में उपलब्ध है। इस पुस्तक के पृष्ठ क्रमाँक 48 पर दादागुरु रूपी सूक्ष्म शरीर सत्ता का स्पष्ट उल्लेख है कि 150 वर्ष पूर्व श्री गुलहसन साह की मुलाकात स्वामी श्री श्रवणनाथ के माध्यम से हरिद्वार में श्री सर्वेश्वरानन्द जी से हुई थी। वे इच्छानुसार जब चाहते अपना वयोवृद्ध शरीर छोड़ कर 12 वर्ष के बालक बन जाते थे। उनके अनेकानेक दृश्य चमत्कारों का वर्णन श्री शाह ने किया है।
वस्तुतः ऐसे सन्तों की आयु का कोई अनुमान नहीं लगाया जा सकता वे चमत्कारों को देखने की ललक में आतुर सामान्य व्यक्तियों की भीड़ देख स्वयं ही सूक्ष्म शरीरधारी हो दुर्गम हिमालय प्रस्थान कर जाते हैं। मात्र समष्टिगत हित हेतु अपने सुपात्रों का चयन करने भूलोक पर आवागमन करते रहते हैं। भूख प्यास आदि लौकिक बंधनों से वे मुक्त होते हैं।
पायलट बाबा रचित ग्रन्थ “हिमालय कह रहा है” (1982) में पृष्ठ 145, 236, 571, 572, 589 पृष्ठों पर विस्तार से योगीराज श्री सर्वेश्वरानन्द जी का उल्लेख आया है। स्वयं पूज्य गुरुदेव अपनी गुरुसत्ता के दृश्य रूप के संबंध में कभी कुछ न लिखा, न कहा। अपने हर कार्य को उनके मार्गदर्शन में सम्पन्न वे मानते थे। अपने हर कार्य का उपलब्धि का श्रेय सदैव परोक्ष सत्ता को देते थे। यह विनम्रता भी हो सकती है व महामानव के रूप में उनकी श्रेय स्वयं न लेने की नीति भी। किन्तु इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि जिस प्रकाशपुँज ने उनसे उनके जीवन के पन्द्रहवें बसंत में साक्षात्कार किया था, वह निश्चित ही उनकी गुरुसत्ता थी जो उनकी ही तलाश में थी व उस पावन दिन उनसे एकाकार हो उन्हें विलक्षण अवतारी सत्ता बना गई।
एक गायत्री परिजन की अनुभूति के माध्यम से थोड़ा स्पष्टीकरण ऊपर व्यक्त किये गये कथन का करना चाहेंगे। स्वयं गुरुदेव कहते थे कि हमारी मार्गदर्शक सत्ता सदैव हमारे साथ रहती है व हमारे आगे पायलट की तरह चलती रहती है व हमारे आगे पायलट की तरह चलती रहती है। उसी सत्ता को, जिसे हम सभी दादागुरु कहकर पुकारते हैं, देखने की जिज्ञासा गुजरात के नवसारी के श्री मगन भाई गाँधी न की। गुरुदेव ने कहा कि “मुझे देखकर मेरे ही अंदर उनकी अनुभूति कर लें। किन्तु वे जिद पर अड़े रहे। अंततः पूज्य गुरुदेव ने उत्तरकाशी में अमुक स्थान पर अमुक दिन अमुक रूप में उनके अन्न क्षेत्र में दिखाई देने की बात बताई व कहा कि इसके बाद गहराई में मत जाना। वे मन्तव्य समझ नहीं पाए उत्तरकाशी मैं बताए गये दिन वे प्रतीक्षा करते रहे। जैसी शक्ल बतायी गयी थी, उसी शक्ल के धवल केशधारी बाबा प्रकट हुए, सफेद वस्त्रों में थे, शिक्षा ली व गंगा किनारे नीचे तेजी से उतर गए। मगन भाई ने पीछा किया। उन्हें आश्चर्य हो रहा था कि इतनी तीव्रगति से चलकर वे किधर निकल गए। वे एक कंदरा के समझ खड़े चारों ओर दृष्टि दौड़ाने लगे तभी झाड़ी के पीछे से कुछ आवाज आई। पहुंचे तो देखा वे ही श्वेत केशधारी बाबा बैठे हैं। किन्तु यह क्या। जैसे ही उनने अपना स्मित मुख मण्डल मगन भाई की ओर किया वे देखकर आश्चर्य चकित रह गए कि ये तो अपने गुरुदेव स्वयं हैं पं. श्रीराम शर्मा आचार्य, जिनसे वे कोठरी में 5 दिन पूर्व मुलाकात कर सारा अता पता नोट करके लाए थे। गुरुदेव ने कहा “अब आगे से अविश्वास न करना, नहीं संत बाबाओं के पीछे भागना। इतना कहकर वे अन्तर्ध्यान हो गए।
सारी यात्रा छोड़ कर मगन भाई वापस हरिद्वार लौटे, बार-बार गुरुदेव के चरणों पर गिरकर क्षमा माँगी व कहा कि मुझ नादान को सजा दीजिए क्योंकि उसने गुरुसत्ता पर अविश्वास किया। गुरुदेव ने प्यार से समझा भर दिया समाधान हो गया।
यहाँ प्रकाश पुँज के प्रकटीकरण के बात के प्रसंग को वही छोड़ उपरोक्त विवरण इसलिए देना पड़ा कि परिजनों में चमत्कार संबंधी कई किम्वदन्तियाँ प्रचलित हैं। उन्हें विराम देने के लिए इतना ही लिखना पर्याप्त है कि गुरुसत्ता व उनकी मार्गदर्शक सत्ता का साक्षात्कार उनके आध्यात्मिक विवाह के रूप में सम्पन्न हुआ व दूध-पानी की तरह गुरु-शिष्य की सत्ता मिलकर एक हो गयी दोनों एक रूप हो गए।
जो आलसी है सो दरिद्र हो कर रहेगा। जो प्रमादी है सो सुयोग को गँवा देगा। नासमझ हर मण्डी में गाँठ कटाता है।
अद्भुत होता है दो महान आत्माओं का मिलन। इन क्षणों में जो न निहार पाएँ। फिर भी उतना ही क्या काम है जितना ये देख पाते हैं। गुरुदेव से लगभग 25 उम्र में बड़े महात्मा आनन्द स्वामी शान्ति कुँज पधारे थे। एक तो संन्यासी दूसरे आयु में जेष्ठ, तीसरे सघन आत्मीय। शिष्टता की प्रतिमूर्ति गुरुजी उन्हें माला पहिनाने के लिए बढ़े, माला उनके हाथ में भी थी। कौन किसे पहिनाए? प्रेम भरी नोक झोंक शुरू हो गई। गुरुदेव ने हँसते हुए अपने पक्ष में अनेकों तर्क दिए। बड़े हैं, संन्यासी हैं, पूज्यनीय हैं, कितनी ही बातें कहीं।
छोटे कद के सुडौल शरीर वाले महात्मा जी ने सभी तर्कों के जवाब में एक बात कही यह मेरी श्रद्धा का प्रश्न है, आप किसी से अपने को छुपा ले पर मेरे से नहीं छुपा सकते। फिर हँसते हुए बोले-मुझे! झुको कद में छोटे होने के कारण माला पहनाने में उनको परेशानी हो रही थी। आखिर गुरुदेव को उनके प्रेमवश झुकना ही पड़ा उन्होंने हँसते हुए माला गले में डाल दी। बड़ी देर दोनों की बालवत् निश्छल हँसी वातावरण को पवित्र करती रहीं “मुनि रघुबीर परस्पर नहीं” गोस्वामी जी की इस उक्ति को चरितार्थ होते जिसने भी देखा धन्य हो उठा।
पुण्य असंगठित रहता है। इसलिए समर्थ होते हुए भी वह असमर्थता का त्रास सहता एक जुट हो कर आक्रमण करता है इसलिए वह असमर्थ होते हुए भी बाजी मार ले जाता है।
संपादकीय विभाग के तीन महत्वपूर्ण व्यक्तियों के इस्तीफा दे देने के कारण सौनिक पत्र के बन्द होने की नौबत आ पहुँची। इस संकट से निबटने की जिम्मेदारी पालीवाल जी ने उन दिनों मत्त जी के नाम से परिचित गुरुदेव को सौंपी। वह स्वयं उन दिनों जेल में थे। श्रमनिष्ठा की कठोर परीक्षा थी। संपादन प्रूफ रीडिंग करने के साथ कम्पोजिंग, छपाई वितरण की व्यवस्था सभी कुछ देखना पड़ता। बीस से लेकर तेईस घण्टे तक काम करना पड़ता। प्रेस के काम के साथ लोगों की घरेलू कामों में सहायता भी कर देते। जो देखता वही दांतों तले उँगली दबा लेता। पूछे जाने पर वह एक ही बात कहते “व्यक्ति की शक्तियाँ अपार है, पर इनकी अभिव्यक्ति का माध्यम है श्रम। जो जितना अधिक श्रम करता है, उसमें ये उतना ही अधिक प्रकट होती है। प्रत्यक्ष को प्रमाण क्या। लगभग एक साल में संकट का स्थाई हल निकला। बीच उनकी कर्मठता से सहकर्मी उसी तरह चमत्कृत रह गए जैसे हालैण्ड वासी प्रसिद्ध दार्शनिक स्विनोजा के श्रम से हुए थे। जो सारे दिन ताला बनाता चमकाता रात को तंग कोठरी में टिमटिमाते दीपक के प्रकाश में अध्ययन लेखन करता। तभी तो वह सारे जीवन यही समझते रहे कि श्रम महामानव बनाने वाला कीमिया हैं।
प्रभुता के पीछे सब दौड़ते है, प्रभु का पल्ला कोई नहीं पकड़ता।
यदि प्रभु को अपनाया जा सके तो प्रभुता चेरी ही कर रहे।
महान मार्गदर्शक का सर्वप्रथम अनुग्रह जो पहले दिन मिला, उसने पूज्य गुरुदेव से सम्पूर्ण समर्पण माँगा, भावी जीवन मानव मात्र के हित हेतु जीने के लिए माँगा। उनके मास्टर ने उन्हें सच्चे अर्थों में नग्न, निर्वस्त्र कर दिया। अपना कहने जैसा उनके पास कोई पदार्थ तो क्या, शरीर, मन, भावना, कामना कुछ नहीं बचा। एक अवधूत स्थिति में लाकर उन्हें छोड़े दिया गया।
पहला आदेश था चौबीस लक्ष के चौबीस गायत्री महापुरश्चरण अगले दिनों सम्पन्न करना। उनने कहा “चाहे कितनी भी प्रतिकूलताएँ आएँ, तुम्हें लक्ष्य अवश्य पूरा करना है। इस बीच कुछ समय स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभानी पड़ सकती है, पर नियम भंग मत होने देना। जो भी समयक्षेप उधर हो उसकी पूर्ति कड़ी तपस्या करके बाद में कर लेना है ताकि इसकी पूर्ति पर तुमसे महत्वपूर्ण कार्य संपन्न कराये जा सकें। इस बीच चार बार हिमालय बुलाने की बात उनने कहीं। कभी एक वर्ष के लिए कभी कम अवधि के लिए।” हिमालय बुलाया जाना इसलिए जरूरी था कि वह सिद्ध आत्माओं की साधनास्थली है। हव ऐसा पारस है जिसका स्पर्श मात्र कर व्यक्ति तपे कुन्दन की तरह निखर जाता है।
स्थूल हिमालय तो हिमाच्छादित पहाड़ भर है जो पाकिस्तान से लेकर वर्मा की सीमा तक फैला है पर उनके गुरुदेव का आशय उस हिमालय से था जो उसका हृदय माना जाता है, उत्तराखण्ड का वह क्षेत्र जो दुर्गम है तथा यमुनोत्री ग्लेशियर से लेकर नन्दादेवी तक जिसका विस्तार है। यहीं वे ऋषि सत्ताएँ निवास करती हैं जिनका आध्यात्मिक प्रकाश अभी भी भारतीय संस्कृति के मूल्यों को जिन्दा रखे हुए है। कभी पं. मदनमोहन मालवीय जी ने बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय की स्थापना हेतु भूमिपूजन हेतु यहीं से स्वामी कृष्णश्रम जी को बुलाया था। परमहंस योगानन्द जी की पुस्तक “आटोबायोग्राफी ऑफ योगी” में लाहिड़ी महाशय के गुरु महावतार बाबा का जो उल्लेख किया गया है, वे भी यही सूक्ष्म शरीर धर कर रहते थे। थियोसोफी की संस्थापिका मैडम ब्लैवटस्की के अनुसार अदृश्य सिद्ध पुरुषों की पार्लियामेंट इसी दुर्गम क्षेत्र में है, जिसे अध्यात्म चेतना का ध्रुव केन्द्र “माना गया है यहीं सभी सूक्ष्म शरीर धारी ऋषि सत्ताएँ निवास करती है तथा यही देवताओं की क्रीड़ा स्थली भी है। पृथ्वी पर कभी स्वर्ग रहा होगा तो वह यहीं रहा होगा, ऐसे पूज्य गुरुदेव की अपनी बार-बार की हिमालय यात्रा के बाद मान्यता रही।
हिमालय निर्देश समय समय पर सूक्ष्म प्रेरणा के रूप में किये जाने की बात कह कर उस परोक्षसत्ता ने तीसरा निर्देश दिया कि जन्म जन्मान्तरों से पुण्य संग्रह करती जा रही देवसत्ताओं की पक्षधर जागृतात्माओं को संगठित कर एक माला में पिरोया जाना है। वे ही नवयुग निर्माण सतयुग की वापसी में प्रमुख भूमिका निबाहेंगी। इस के लिए उनने पूजा गृह में जल रहीं दीपक ज्योति को लक्ष्य कर “अखण्ड ज्योति” नाम से समय आने पर विचारक्राँति का सरंजाम पूरा करने वाली एक पत्रिका आरम्भ करने की बात कही व कहा कि उस दीपक को अब सतत् जलाते रहना। इसके प्रकाश से तुम्हें प्रेरणा मिलती रहेगी एवं समष्टिगत प्रवाह से वे तभी विचार प्राप्त होते रहेंगे जिनके माध्यम से अगले दिनों अध्यात्म तंत्र का परिष्कार नवयुग का सूत्रपात होना है। “अखण्ड दीपक ही समय-समय पर पर परोक्ष जगत से आने वाले दैवी मार्गदर्शन को तुम तक पहुँचायेगा, अतः जहाँ भी रखो, इसे अपने पास पूजा गृह में रखना। इसका दर्शन मात्र लोगों का कल्याण कर देगा।
चौथा मार्गदर्शन था चौबीस लक्ष के चौबीस महापुरश्चरणों की समाप्ति पर एक विशाल सहस्रकुंडीय महायज्ञ आयोजित करना ताकि दैवी सत्ता की अंशधारी आत्माएँ एक स्थान पर एकत्र हो सकें। इन्हीं में से गायत्री परिवार रूपी संगठन का बीजाँकुर उभरने व कालान्तर में वृक्ष का रूप लेने की बात वे बता गए। यह भी कह गए कि समय-समय पर वे बताते रहेंगे कि उन्हें कौन-सा कदम उठाना है? कब कहाँ स्थान परिवर्तन करना है, क्या कार्यक्रम कहाँ से आरंभ करना है। वे तो मात्र एक समर्पित शिष्य की तरह अपना कर्तव्य निबाहते रहें, शक्ति उन्हें सतत् उनके द्वारा प्राप्त होती रहेगी।
दिव्य प्रकाश धारी सत्ता ने निर्देश दिया कि जो आत्मबल का उपार्जन अगले दिनों होगा उसका नियोजन प्रतिकूलताओं से जूझने नवसृजन का आधार खड़ा करने तथा देवताओं की, ऋषियों की प्राणशक्ति का अंश लेकर जन्मी जागृतात्माओं का एक परिवार खड़ा करने के निमित्त करना है। उनका मूक निर्देश था कि “प्रस्तुत वेला परिवर्तन की है। इसमें अगणित अभावों की एक साथ पूर्ति करनी है, साथ ही एक साथ चढ़ दौड़ी अनेकानेक विपत्तियों से जूझना है। इस के लिए व्यापक स्तर पर ऋषि सत्ताओं द्वारा जो मोर्चे बन्दी पहले की जाती रही है उसकी झलक झाँकी भी तुम्हें दिखायेंगे तथा तुम्हें किस प्रकार यह सब करना है, यह भी सतत् बताते रहेंगे। आगे उन्होंने बताया कि “हम लोगों की तरह तुम्हें भी सूक्ष्म शरीर के माध्यम से अति महत्वपूर्ण कार्य करने होंगे। इसके लिए पूर्वाभ्यास हिमालय यात्रा द्वारा सम्पन्न होगा।”भौतिक दृष्टि से देखा जाय तो 15 वर्ष के किशोर को गुरुसत्ता द्वारा ऊपर दिये गये निर्देशों को घाटे का सौदा माना जाता। जो खेलने-खाने शौक मजे की उम्र है, उसमें प्रतिबन्ध किस बालक को अच्छे लगते है, उसमें प्रतिबन्ध किस बालक को अच्छे लगते है, किन्तु यही तो अन्तर होता है अवतारी सत्ताधारी महापुरुष एवं सामान्य नर तन धारी भौतिक ऐषणाओं में डूबे मनुष्य में। जो अपनी प्रसुप्त सुसंस्कारिता को जगाकर अपनी पात्रता विकसित कर लेता है स्वयं भगवान उसे ढूँढ़ने जा पहुँचते है। घुन लगा बीज तो कभी अंकुरित हो नहीं पाता, उलटे आसुरी माया के प्रपंचों में उलझकर ऐसा व्यक्ति शिश्नोदर परायण जीवन जीता स्वयं दुखी होता, दूसरों को त्रास देता जीवन यूँ ही गंवा देता है।
गुरुदेव को उनके पिता ने गायत्री रूपी कामधेनु का पयपान महामना मालवीय जी के माध्यम से करा के जो सबसे बड़ी शक्ति दी थी, वह थी ‘आत्मबल इसी को एक प्रकार से ब्रह्मवर्चस् भी कहा जा सकता है। जिसका आत्मबल विकसित हो गया उसकी आँतरिक प्रौढ़ता विकसित हो गया उसकी आँतरिक प्रौढ़ता विकसित हो जाती है, गुण-कर्म-स्वभाव का सर्वांगपूर्ण परिष्कार हो उसमें अनेक उत्कृष्टताएँ जड़ जाती हैं। इस तत्व के विकसित होते ही अनायास ही अंतःकरण से ऐसी अलौकिकताएँ फूट पड़ती है जिन्हें ऋद्धि सिद्धियों के नाम से संबोधित किया जाता रहता है।
संभवतः गुरुदेव के सूक्ष्म शरीरधारी मार्गदर्शक ने यही उचित समझा कि अपने सुयोग्य शिष्य से उसके उपासना गृह में साक्षात्कार कर उसके अंदर छिपे महामानव का, अवतारी सत्ता का उसे परिचय करा दिया जाय ताकि भविष्य में जो किया जाना है, उसके माध्यम से संपन्न होना है उसका पूरा खाका उसके दिमाग में बैठ सके। समस्त मानव जाति का व विश्व का कल्याण उन्हें जिस प्रयोजन में दिखा उसे पूरा करने प्रकाश पुँज के रूप में आए व तप साधना का आदर्श ही नहीं, अटूट विश्वास और प्रचण्ड साहस, पर्याप्त मनोबल देकर चले गए। दिव्य सत्ताओं का प्यार अनुदान भी विचित्र होता है। संभवतः यही शक्तिपात प्रक्रिया भी है।
शक्तिपात के संबंध में लोगों के मन में तरह तरह की भ्रान्तियाँ हैं। गुरु सिर पर हाथ रखता है व बिजली के प्रवाह की तरह से पूरे शरीर में करेण्ट दौड़ जाता है, गुरु की सारी शक्ति शिष्य में आ जाती है। यही कपोल कल्पित मान्यता जन सामान्य की है। कोई कहता है कि गुरु कुण्डलिनी जगाकर शिष्य को सारी शक्ति दे जाते है। उदाहरण के लिए वे रामकृष्ण-विवेकानन्द, नित्यानन्द मुक्तानन्द इत्यादि के प्रसंगों का हवाला भी देते हैं।
पर सबसे बड़ी बात जो साधारण जन समझ नहीं पाते, वह है अंतरंग की पवित्रता एवं पात्रता का विकास। मैले कपड़े पर नहीं रंग चढ़ता है? पात्र उल्टा रखा हो तो पानी उसमें कैसे भरे? खिड़कियाँ बन्द हों तो सूर्य किरणों ताप व पवन का अंदर प्रवेश कैसे हो? शिष्य जब अपना शिष्यत्व सार्थक कर देता है व गुरु यह समझ लेता है कि जो कुछ भी अनुदान दिया जा रहा है उसका दुरुपयोग नहीं होगा, समष्टि के हित हेतु ही प्रयोग होगा तो शक्ति संचार अवश्य होता हैं। किन्तु इस प्रक्रिया को इतना सुगम नहीं समझ लिया जाना चाहिए कि हम भी लाइन में लग जायें। गुरु का सिर का सिर पर हाथ भी स्पर्श स्पर्श हो गया तो निहाल हो जायेंगे।
हजारों वर्षों में कहीं एक गुरु ऐसा आता है जो शक्ति देने की पात्रता रखता है व ऐसा शिष्य पैदा होता है जो उसे संगृहीत कर उसे सुनियोजित दिशा दे सके। यदि शक्तिपात इतना सरल होता तो इतने धर्माधीशों, महामण्डलेश्वरों के रहते धर्मतंत्र इतना अशक्त मूढ़मान्यता ग्रस्त रहा होता? शक्ति संचार जब भी होता है शिष्य मुक्ति के लिए नहीं उसे कीर्ति के शिखर पर पहुँचाने के लिए नहीं अपितु उसके माध्यम से लोकहित का कर्तृत्व कराये जाने के लिए। विवेकानन्द को शक्ति बिजली के झटके के रूप में मिली कि नहीं, यह या तो स्वयं रामकृष्ण परमहंस बता सकते है या स्वामी विवेकानन्द। दोनों ने ऐसा नहीं कहा। हाँ विवेकानन्द को वास्तविक आत्मबोध, स्वयं की गरिमा का साक्षात्कार अवश्य रामकृष्ण ने करा दिया व कहा कि परोक्ष सत्ता सूक्ष्म जगत से सदैव तेरे साथ रहेंगी। वे ही तेरे से सब कार्य सिद्ध करायेंगी। विश्वधर्म सम्मेलन में संभवतः उसी सत्ता ने गेरुआ वस्त्रधारी एक रात्रि पहले रेलवे वैगन में ठिठुरकर सो रहे अकिंचन से ऐसी सारगर्भित वक्तृता करा ली कि विश्वभर में उनका डंका बज गया।
बसंत पंचमी के उस ब्रह्म मुहूर्त में गुरुदेव ने अपना तप, आत्मबल शिष्य पर उड़ेलकर उसकी चेतना को झकझोर दिया, आत्मबोध कराया एवं शिष्य ने अपना आपा, अस्तित्व ही उन्हें समर्पित कर दिया। समर्पण में स्वयं की इच्छा कैसी? जो मार्गदर्शक की इच्छा वही अपनी इच्छा। तर्क की वहाँ कोई गुँजाइश ही नहीं। कठपुतली तो बाजीगर के इशारे पर नाचती है। पोली बंशी कृष्ण के मुँह से लगी वही अलापती चली गयी जो तान छोड़ी गई। यह समर्पण ही गुरुदेव की वह सारी शक्ति सामर्थ्य दे गया जिसकी परिणति आज इतने बड़े युगान्तरकारी मिशन संगठन व विश्व व्यापी समुदाय के रूप में दिखाई देती है धन्य है वह गुरु हैं ऐसा शिष्य।
किसी भी बाह्य हलचल से बेखबर पूज्य गुरुदेव पलंग पर बैठे घुटनों पर पैड रखे लिख रहे थे। आस-पास कुछ पुस्तकें बिखरी पड़ी थी, जिन्हें कभी किसी विशेष संदर्भ की जरूरत पड़ने पर देख लेते।
अचानक उनने कलम रखी, जीभ को होठों पर फिराया। शायद प्यास अनुभव कर रहे थे। हाथ यंत्रचालित की भाँति मेज के कोने पर पहुँचा। कोने पर रखा गिलास उठा और अधरों पर जा लगा। जिह्वा ने स्वाद चखा कुछ विचित्र-सा था। मन जब तक चिन्तन की गहराइयों से उबरता, तब क्या सचमुच पानी नहीं है फिर क्या है यह? इतनी देर में मन प्रकृतिस्थ हो चुका था। गिलास को ध्यान से देखा-विश्वास हुआ यह पानी नहीं है। पर क्या है, यह नहीं सूझ रहा था। स्वाद अपरिचित जो था।
इशारे से घर के एक बालक को बुलाया पूछा-”आज पानी किसने रखा।” खोज खबर सुन माताजी स्वयं आयीं, पूरी बात स्पष्ट हुई, यह मौसमी का रस था, जो एक स्नेही शरीर शास्त्री की सलाह पर इसलिए रखा गया, ताकि अत्यधिक श्रम करने के कारण उनके शरीर स्वास्थ्य पर कोई विपरीत असर न पड़ें।
“ मौसमी का रस?” वह सकते में आ गए। कहने के ढंग से पास खड़े हुए अन्य स्वजनों के भी कान चौकन्ने हुए। बिना कुछ बोले नाली के नजदीक गए, मुंह में उंगली डाल कर उलटी की। गिलास के पानी से मुख साफ किया। स्वजनों को सम्बोधित करते हुए बोले’-”आग लगे ऐसी जिन्दगी को सम्बोधित करते हुए बोले-आग लगे ऐसी जिन्दगी में। सब कुछ त्याग कर आए कार्यकर्ताओं के बच्चों के लिए मैं दूध का इन्तजाम न कर सकूँ और स्वयं मौसमी का जूस पीऊँ। धिक्कार है ऐसे जीवन पर संवेदनशीलता उन समेत सभी की आँखों से आँसू बन कर बरस पड़ी।
सत्य अकेला नहीं प्रेम और न्याय को भी साथ लेकर चलता है। इसी प्रकार असत्य के साथ पतन और विग्रह के सहचरों की जोड़ी चलती है।
सभ्यता चरित्र का वह स्वरूप है जो मनुष्य कर्तव्य का मार्ग दर्शाती है।
सत्य में हजार हाथियों के समान बल होता है इसलिए अन्तिम विजय उसी की होती है, चाहे संघर्ष कितना ही लंबा क्यों न चले।
सहस्र कुण्डीय यज्ञ के समय की बात है। मथुरा के ही एक (पण्डा) समुदाय की अड़ंगेबाजियाँ विरोध जारी था। इसे प्रायः हर दिन किसी न किसी बदले रूप में प्रस्तुत होना अनिवार्य था। एक दिन गुरूजी वंदनीया माता जी के साथ रिक्शे पर जा रहे थे। इसी समय इन्हीं विरोध करने वालों में से एक व्यक्ति ने छपा हुआ एक पर्चा माता जी के हाथों में थमा दिया। उन्होंने भड़काने वाली विरोधी बातों से लिखे इस पत्रक को बिना पढ़े ही फाड़ दिया।
उनका इस तरह पर्चा फाड़ना देखकर वह बोले-”अरे! आपने यह क्या किया? आपको मालूम नहीं उसमें क्या था?” हाँ बकवास थी” वंदनीया माताजी का उत्तर था। पर इससे क्या। माना कि उसमें बेकार बातें थी पर इस तरह तो देने वाले का अपमान हो गया। विरोधियों एवं सतत् अपमान की ही सोचने वालों के भी सम्मान का इतना ख्याल! माताजी उनका चेहरा देखने लगी।
तपोभूमि मथुरा में उस रोज सत्र की समाप्ति पर गुरुदेव का विदाई प्रवचन हो रहा था। सभी शान्तचित्त एकाग्र मन हो उनकी अमृत वाणी का पान कर रहे थे। भाव विह्वल स्वर में वह कह रहे थे “अब तुम लोग जाओगे यह तपोभूमि मुझे काटेगी। वह मुझसे पूछेगी तुम जिनके लिए आते थे वह कहाँ हैं? मैं क्या जवाब दूँगा।” शब्दों की मार्मिकता पर सभी फफक कर रो पड़े। उनकी भी आंखों से आँसू झर रहे थे। जिस किसी तरह अपने भाव को थामते हुए बोले” यह आंसुओं की धारा ही अपने संगठन को सींचेगी। उसे हरा-भरा बनाएगी। उनकी हर विदाई ऐसी ही करुण होती थी।
आज उनके न रहने पर लाखों नेत्रों से आंसुओं का सागर उमड़ पड़ा है। भले ही वह सूक्ष्म में हो, अनुभूतियाँ भी पूर्व की अपेक्षा गहन ही पर जिन आंखों ने उनकी एक झलक भी पायी है। वे क्या रोए बिना मानेगी। रोने दो नेत्रों को झरने दो प्रेमाश्रुओं की धारा जिससे सींच कर संगठन की हरियाली बढ़े। पर ध्यान रहे कर्मरत हाथ शिथिल न पड़ने पाएँ। ऊपर से हमें देख रहा है वह प्रेम का अगाध सागर। उसका सिर्फ एक ही नाम है-”रसौ वै सः”|
भावों के उद्रेक को कुछ क्षण पश्चात स्वयं शान्त करते हुए बोले-नानक के जीवन की एक घटना सुनाता हूँ। सुनो-एक बार नानक देव किसी गाँव गए। इलाके के जमींदार ने उनके लिए पूरे रईसी स्वागत का सरंजाम जुटाया।
भोजन में दूध-घी अनेकों प्रकार के व्यंजन सभी कुछ थी। नानक गए, जाकर देखा और माफी माँग कर उलटे पैरों लौटे चले। साथ चल रहे मरदाना को यह सब विचित्र लगा। उसने टोका-विचित्र है, गुरुजी आप, यहाँ तो पेट में चूहे कुश्ती लड़ रहे हैं और आपने भोजन ही छोड़ दिया।
चुप रहने का इशारा कर, वह एक लोहार के यहाँ जा पहुँचे। बाजरे की सूखी रोटी नमक के साथ खाई, ठण्डा पानी पिया। मरदाना ने भी मरे मन से खाया। रह रह कर उसके मन में छोड़े गए व्यंजनों की खुशबू, लज्जतदार स्वाद कौंध उठता। पर करता भी क्या बेचारा, गुरु जो न कराए, सो थोड़ा। भोजन कर चुकने के बाद शिष्य की पीठ थपथपाते हुए नानक बोले-हम लोग लोक सेवा के अग्नि व्रत में दीक्षित है, यह याद रखो लोक सेवी की एक सर्वमान्य कसौटी है, उसके जीवन का निर्वाह सामान्य नागरिक जैसा हो। ऐसा न होने पर वह लोक जीवन से कोसों दूर हो जाएगा। इस प्रकार की दूरी रहने पर कहीं लोक सेवा बन पड़ेगी?
मरदाना अपना सिर थपथपाते हुए बोला-”कुछ-कुछ समझ रहा हूँ गुरुजी-मेरी अक्ल जरा मोटी है। गुरुजी की कहानी ने गम्भीर हो रहे माहौल को हल्का कर दिया। वह भी तनिक मुसकाए फिर पूर्ववत् गम्भीर हो बोले-यदि मैं ऐसी चीजों का उपयोग करने लगूँ तो लोकसेवी की सिद्धान्तनिष्ठा चकनाचूर हो जाएगी।” कहने के ढंग से सभी ने ऐसा महसूस किया कि जैसे सिख सम्प्रदाय के प्रवर्तक के रूप में बोल रहे हों। निःसन्देह अपनी इसी सिद्धान्तनिष्ठा के बल पर उन्होंने लोकसेवियों का वसुंधराव्यापी संगठन तैयार किया। लाखों हृदयों में आदर्श बन प्रतिष्ठित हुए।
उपलब्धियां इस संसार में भरी पड़ी है, पर उन्हें प्राप्त करने के लिए ज्ञान, चरित्र एवं साहस चाहिए।
आग का स्वभाव हैं गर्मी देना और रोशनी पैदा करना। जो वस्तु उसके निकट आती है वह परिस्थिति के अनुरूप संपर्क के कारण जलने लगती है। आग बुझ जाय तो ईंधन कितना ही क्यों न हो, ज्वलन जैसा उपक्रम दिख नहीं पड़ता। लकड़ी गीलेपन समेत जलायी जाय तो उसमें से धुँधला धुंआ भर निकलता रहेगा, आग नहीं लगेगी, न ही ईंधन जलते अंगारे की तरह प्रदीप्त हो सकेगा।
आग यदि डायनामाइट के संपर्क में आये तो पहाड़ की चट्टानों को क्षण मात्र में उड़ा देती है। मुर्दा जब आग के संपर्क में आता है तो चारों ओर की परिधि विषैले धुएं से भर जाती है। इसके विपरीत यदि चन्दन या कपूर का अग्नि से स्पर्श कराया जाय तो मन को अच्छी लगने वाली सुगंधि उठती है। आग के अपने गुण हैं, ईंधन के अपने। पर पदार्थों और परिस्थितियों के अनुरूप उस ज्वलनशीलता में, सुगंधि व रोशनी, ध्वनि जैसी प्रतिक्रिया में असाधारण स्तर का अन्तर पाया जाता है।
परब्रह्म की परोक्ष सत्ता को आग एवं व्यक्तिगत चेतना को ईंधन स्तर का माना जा सकता है। दोनों का संपर्क जब अनुकूल परिस्थितियों में होता है तो चेतना प्रखर परिमार्जित होने लगती है एवं व्यक्ति का स्तर सामान्य से उठकर असामान्य देवमानव स्तर का हो जाता है। यों ऊँचा उठने की अभीप्सा व प्रगति के स्फुल्लिंग सभी में न्यूनाधिक मात्रा में विद्यमान होते है पर इसकी विशेष मात्रा योगी, तपस्वी गणों में अपनी पूर्वजन्मों की अर्जित सुसंस्कारिता के बल-बूते पायी जाती हैं। थोड़ा सा भी अतिरिक्त प्रयास करने पर दोनों के बीच व्यष्टि व समष्टि, प्रत्यक्ष व परोक्ष, भक्त व भगवान के बीच घनिष्ठता भी उत्पन्न हो जाती है तथा परस्पर आदान-प्रदान का क्रम भी चल पड़ता है।
जैसे मनुष्यों की अपनी-अपनी इच्छाएँ होती हैं, परब्रह्म सत्ता की भी समय-समय पर अपनी इच्छाएँ, आकाँक्षाएँ एवं योजनाएं उभरती हैं। सृष्टि का संतुलन बनाये रखना ही उसका प्रधान लक्ष्य होता है। समष्टिगत विराट सत्ता का कोई आकार तो हो ही नहीं सकता, अंग अवयव भी नहीं होते, उपकरणों से भी वह सिद्ध नहीं हो सकती अतः दृश्यमान क्रिया-प्रक्रिया बनाने के लिए उसे भी मनुष्य शरीर का आश्रय लेना पड़ता है। इस विशाल विश्व में मात्र मनुष्य शरीर ही एक ऐसा है जो देवी चेतना के अनुरूप शरीर ही एक ऐसा है जो दैवी चेतना के अनुरूप कोई क्रिया-प्रक्रिया कर सकने में समर्थ है। मात्र मानवी काया व चेतना ही स्थूल व सूक्ष्म जगत का संचालन करने वाली परब्रह्म सत्ता की किसी इच्छा या अपेक्षा में योगदान दे सकती है, उसकी इच्छानुसार कुछ निर्माण या परिवर्तन कर सकने में समर्थ हो सकती है।
इस स्तर के मनुष्य जिन्हें दैवी सत्ता चुनती है देवात्मा कहलाते हैं। इनमें मानवी संरचना का समावेश तो होता ही है। इसके-अतिरिक्त परब्रह्म की आशा अपेक्षा एवं योजना के अनुरूप आवश्यक प्रयोजन पूरा करने में भी वे समर्थ होते हैं इनमें भी उच्चकोटि के विलक्षण क्षमता सम्पन्न मनुष्यों को देवमानव, दिव्य मानव, सिद्धपुरुष, अवतार, देवदूत, पैगम्बर नामों से पुकारा जाता है। परोक्ष जगत में सक्रिय दैवी सत्ताएँ ईश्वरीय इच्छाओं की पूर्ति के लिए ऐसे ही देवमानवों के शरीर व मानस का प्रयोग करती है व उनके माध्यम से युग परिवर्तन का प्राकट्य कर विश्व वसुधा को धन्य कर देती हैं।
उपरोक्त प्रसंग जिस संदर्भ में चल रहा है, उसे परिजन भली-भाँति समझ रहे होंगे। परोक्ष जगत से उभरी प्रेरणा पूज्य गुरुदेव की मार्गदर्शक सत्ता के रूप में प्रकट हुई व उसने संस्कारवान देवात्मा के रूप में उचित शरीर व मन, उदात्त अंतःकरण वाले शिष्य का चयन कर लिया ताकि बीसवीं सदी का उत्तरार्द्ध व इक्कीसवीं सदी का पूर्वार्द्ध नवसृजन की आधारभूत पृष्ठभूमि बना सकें। परमसत्ता ने अपने सामयिक अभीष्ट प्रयोजन सदैव इसी प्रकार पूरे किये है। जब मानव की सृष्टि नहीं हुई थीं तब यह कार्य मत्स्य, कच्छप आदि अवतारों ने किया, फिर बाद में विकास क्रम की पूर्णता प्राप्त होने पर श्रीराम, कृष्ण, बुद्ध जैसे व्यक्तियों द्वारा ही अवतार प्रकरण पूरे किए हैं। अवतारों की तरह ही ऋषिसत्तायें भी यही प्रयोजन पूरा करती हैं। पृथ्वी पर सतयुगी वातावरण, सृष्टि संतुलन स्थापित करने के अनेकानेक महत्वपूर्ण, सृष्टि संतुलन स्थापित करने के अनेकानेक महत्वपूर्ण प्रयोजन ऋषि स्तर के समर्थ व्यक्तियों द्वारा सम्पन्न होते रहे है।
समय-समय पर दैवी चेतना आत्मिक प्रगति के पथ पर चलने के जिज्ञासुओं को विश्वहितार्थाय जीवन जीने हेतु प्रेरणा देने के लिए, उनसे कुछ महत्वपूर्ण कार्य कराने के लिए ऋषियों को, श्रेष्ठ व्यक्तियों को मार्गदर्शक या माध्यम बनाकर अपना कार्य करती रही है। गुरु-शिष्य परम्परा के ऐसे ढेरों उदाहरण है जिनमें गुरु ने शिष्य की तलाश की क्योंकि वह सुपात्र था तथा उसे समुचित आध्यात्मिक सम्बल व पूँजी देकर उससे वह कार्य करा लिया। शिष्य तो निमित्त मात्र होता है किंतु चूँकि मार्गदर्शक सत्ता के समर्पित मन वाले पुरुषार्थी की नरतनधारी के रूप में आवश्यकता पड़ती ही है, उसका चयन भी उच्चस्तरीय निर्धारण के बाद ही होता है एवं फिर वह कठपुतली की तरह वह सब कुछ करता चला जाता है जो पर्दे के पीछे से बाजीगर की अंगुलियाँ कराती है। जब शिष्य प्रामाणिकता की कसौटी पर खरा उतरने लगता है तो उसी आधार पर क्रमशः उसे अधिकाधिक बड़े अनुदान मिलते चले जाते हैं। वरदान जिसे भी मिले है, दैवी अनुग्रह जिसे भी प्राप्त हुआ है, तप करने, अपनी पात्रता सिद्ध करने के उपरान्त ही मिले हैं।
सामान्यतया लोगों की दृष्टि बड़ी संकीर्ण होती है। जब भी वे किसी को लौकिक दृष्टि से घाटे में जाते व कड़ी तपश्चर्या में नियोजित होते देखते हैं तो परिवारी जनों से लेकर शुभचिन्तकों व अन्यान्य व्यक्तियों को पहली दृष्टि में यह एक सनक, समय की बरबादी, मूर्खता ही जान पड़ती है। पर इसमें इनका क्या दोष? बाद की संभावनाओं का आभास उन्हें कहाँ हो पाता है जो वे सामने उठाये जो रहे कदम को सराहें।
नारदजी ने ध्रुव, प्रहलाद, बाल्मीकि, पार्वती, सावित्री और सुकन्या को ऐसा ही उपदेश दिया था जो तत्काल उनके परिवार वालों को, हितैषियों को नहीं सुहाया, पर जो सत्परामर्श मिला उसने इन सभी को धन्य बना दिया। ब्रह्मर्षि विश्वामित्र द्वारा भी अपने शिष्य हरिश्चन्द्र को परीक्षा जब ली गयी तो उनके हर क्रिया−कलाप की किसने स्तुति की होगी। सत्य की कसौटी पर खरा उतरने के लिए नरमेध स्तर का जीवन यज्ञ रचाना पड़ सकता है, यह उन्हें ज्ञान था व यही उनने किया।
गुरु गोविन्द सिंह के पंचप्यारों को पहले तो बलिदान हेतु अग्रगमन का साहस दिखाना ही पड़ा, बाद में ही श्रेय-सम्मान के भागीदार बन गए।
ठाकुर रामकृष्ण अपने शिष्य नरेन को ढूँढ़ने उनके घर तक गये थे व बार-बार उससे यही कहा था कि “दुनिया भर को विद्या का पाठ पढ़ाने का जो काम मैं तुझे सौंपना चाहता हूँ वह छोड़कर, मेरी अवहेलना करके क्यों लौकिक शिक्षा के प्रपंचों में फँसा है।” बार-बार का बुलावा नरेन के अंतःकरण को हिला गया व न जाने कौन सी शक्ति उसे ठाकुर के पास, परमहंस के पास ले जाती रही व अंततः उसे विवेकानन्द बना कर छोड़ा। नरेन के घर वालों को परमहंस की राय भला अच्छी लगी थी? हर दृष्टि से घाटा ही घाटा था।
योगीराज अरविन्द को प्रत्यक्षतः किन-किन ने प्रेरणा दी, यह उनकी जीवन लीला से जुड़ा प्रसंग है पर परोक्ष सत्ता का, दिव्यचेतना का अवतरण निश्चित ही उनके अंतःकरण में हुआ व आई. सी .एस. उत्तीर्ण, आजादी का दीवाना नेशनल कॉलेज का प्राध्यापक, बड़ौदा स्टेट का दीवान वह व्यक्ति सब कुछ छोड़कर फक्कड़ बनकर सूक्ष्म वातावरण को प्रचण्ड तप ऊर्जा द्वारा गर्म करने के लिए वेदपुरी (महर्षि अगस्त्य की तपस्थली-पांडिचेरी) जा बसा एवं नूतन सृष्टि की ही संरचना कर डाली। समर्थ गुरु रामदास ने सह्याद्रि की पर्वत श्रृंखलाओं में लुका–छिपी की युद्ध-लीला रचने वाले, अनीति के पक्षधर आक्रांताओं से जूझने वाले शिवा के प्रसुप्त संस्कारों को पहचाना व उसके पास जा पहुँचे। अपनी भवानी तलवार उसे सौंपी व उसके माध्यम से एक सुरक्षित धर्मरक्षक समाज की संस्थापना की। यह सुनिश्चित तथ्य है कि गुरुसत्ता ही अपने योग्य शिष्य को ढूंढ़ने निकलती है व उसे श्रेयाधिकारी बना देती है।
भर्तृहरि ने तो अपने भांजे गोपीचन्द को ही बैरागी बना दिया था और मदालसा ने गुरु की तरह ही अपने बच्चों में वाँछित संस्कार डालकर उन्हें तत्वज्ञानी ऋषि बनाया। जब पति ने आपत्ति प्रकट की कि एक बालक तो कम से कम राज्य चलाने योग्य बने तो उसने एक को राजा बनने योग्य गुणों से विभूषित कर दिया। बुद्ध का अनुग्रह जब अम्बपाली पर, अशोक पर, राहुल पर, आनन्द पर बरसा तो उनको ऐश्वर्य की अभिवृद्धि तो दूर, भिक्षुक बनना तक स्वीकार कर जीवन जीना शानदार लगा। दिव्य सत्ताओं का अनुग्रह इसी स्तर का होता है।
थ्वव के चूड़ामणि में एक सूत्र आता है
दुर्लभ त्रयमेतत् देवानुग्रह हैतुकम्। मनुष्यत्वं मुमुक्षत्वं महापुरुष संश्रयः॥
अर्थात्-मनुष्य जीवन पाने के बाद तीन बातें दैवी अनुग्रह की प्रगति हेतु बड़ी दुर्लभता से प्राप्त होती हैं-मनुष्यत्व-मानवी गरिमा के अनुरूप जीवन जीने की योग्यता, मुमुक्षत्व-उच्च जीवन जीने की अभीप्सा एवं तीसरा महापुरुष संश्रयः अर्थात् महापुरुषों का सान्निध्य, उनका संरक्षण। प्रथम दो गुण अपने शिष्य में पाकर गुरुसत्ता धन्य हो गई एवं शिष्य श्रीराम पर अपना सारा अनुग्रह उड़ेलकर चली गई। उन्हीं श्रीराम ने इस युग के निष्कलंक अवतार ने अपने परोक्ष मार्गदर्शक द्वारा दी गई विभूति को असंख्यों शिष्यों में बाँटकर उन्हें निहाल कर दिया। अपने अस्सी वर्ष के जीवन में जितना उनने वितरित कर दिया, अपना आपा तक उड़ेल दिया है कि उस अनुदान को, कर्ज के एक शताँश को भी चुकाया जा सका तो हम सबका उनके समय में आना सार्थक हो जाएगा।
प्रशंसकों पर ही प्रसन्न न हो। महत्व उन्हें भी दे जो सही आलोचना कर सकते है।
बड़प्पन शालीनता से मिलता है। पद और प्रतिष्ठा तो उसे चमकाते भर हैं।
स्थूल शरीर बनाम सूक्ष्म शरीर
जब तक स्थूल शरीर है, तभी तक झंझट हैं। सूक्ष्म शरीर में चले जाने पर तो वे आवश्यकताएँ समाप्त हो जाती है जो स्थूल शरीर के साथ जुड़ी हैं। सर्दी-गर्मी से बचाव, क्षुधा-पिपासा का निवारण, निद्रा और थकान का दबाव यह सब झंझट उस स्थिति में नहीं रहते हैं। पैरों से चलकर मनुष्य थोड़ी दूर जा सकता है किन्तु सूक्ष्म शरीर के लिए एक दिन में सैकड़ों योजन की यात्रा संभव है। एक साथ,एक मुख से पराशक्ति द्वारा सहस्रों व्यक्तियों के अंतःकरणों तक अपना संदेश पहुँचाया जा सकता है। दूसरों की इतनी सहायता सूक्ष्म शरीरधारी कर सकते हैं, जो स्थूल शरीर रहते संभव नहीं। इसीलिए सिद्ध पुरुष सूक्ष्म शरीर द्वारा काम करते हैं। उनकी साधनाएं भी स्थूल शरीर वालों की अपेक्षा भिन्न हैं।
(अखण्ड-ज्योति)
(अप्रैल 85, पृष्ठ 10)
बात गायों पर चल रही थी। गौ ग्रास एक अंक हाथ में लिए पूज्य गुरुदेव विचार कर रहे थे कि कौन से वे उपाय हैं जिनके आधार पर इस नस्ल की रक्षा बढ़ोत्तरी की जा सके। ढूंढ़-खोज आर्थिक आधार पर थी। चर्चा के दौरान पास बैठा एक वाचाल शिष्य बोल उठा-”गुरुजी गायों पर तो बहुतों ने सोचा है। लेकिन ओर एक ऐसा प्राणी है गधा। उस पर दिन-रात बोझा लादा जाता है और शाम को बिना कुछ चारा डाले ही छोड़ दिया जाता है। और गधे के मालिक ही उन पर अत्याचार करे यह बात तो सही नहीं। जिनका उससे प्रत्यक्ष संबंध नहीं है, वे भी पीछे नहीं रहते। किसी को मूर्ख बनाने की कोशिश होती है तो उसका नाम लिया जाता है।”
वह बोले-”तू ठीक कहता है। एक आदमी के लिए सब कुछ संभव नहीं। मैं गायों को संभालता हूँ, तू गधे को संभाल। बना डाल एक गर्दभ सेवा संघ। वैसे चिन्ता न कर मैं तेरे बारे में बहुत सोचता हूँ।” साथ ही सभी की खिलखिलाहट कमरे में बिखर गई। वह भी हँसते हुए बोले-”जितनी ऊर्जा भोजन से मिलती है, उतनी ही हँसी से।” सचमुच सत्पुरुष अपने ऐसे ही सौम्य हास्य से नई स्फूर्ति प्राप्त कर दूने वेग से काम में जुटा करते हैं।
प्रेम में मनुष्य सब कुछ दे कर भी यही सोचता है कि अभी कम दिया।
परब्रह्म की अवतार सत्ता का कार्य क्षेत्र अदृश्य जगत है। युग संतुलन तत्कालीन समुदाय को संभालने सुधारने, अनीतिकारक तत्वों को मिटाने का कार्य वह उनसे कराती है, जिनमें दैवी तत्वों का चिरसंचित बाहुल्य पाया जाता है।
जब जब जिस प्रकार की समस्याएं उत्पन्न हुई है तब असंतुलन को सही करने के लिए सूक्ष्म जगत से एक दिव्य चेतना का प्राकट्य हुआ है। अपने कौशल एवं पराक्रम से डगमगाती नाव को संभालने, विकराल भंवर प्रवाहों से उसे बचा ले जाने का लीला उपक्रम ही अवतारों का चरित्र रहा है।
सृष्टि के प्रारंभ में जब इस धरित्री पर जल ही जल था और प्राणिजगत में जलचर ही प्रधान थे तब छाई हुई अव्यवस्था को मत्स्यावतार ने संभाला था। ब्रह्मा के कमण्डलु में प्रकट हुआ एक छोटा सा मत्स्य बीज विस्तृत होते होते महामत्स्य का रूप धारण कर ब्रह्मा को सृष्टि विस्तार की प्रेरणा दे गया। तद्नुसार ही ब्रह्मा जी ने सृष्टि संरचना की व देवमानवों से सृष्टि को भर दिया।
जब जल और थल दोनों पर छोटे प्राणियों की हलचलें बढ़ीं तो तदनुरूप क्षमता रखने वाली कच्छप काया ही उस समय का संतुलन सकी। समुद्र मंथन प्रकृति दोहन का महापुरुषार्थ उन्हीं के नेतृत्व में आरम्भ हुआ। इससे निकली अगणित विभूतियों-पदार्थों ने सृष्टि विकास में अभूतपूर्व भूमिका सम्पन्न की।
हिरण्याक्ष रूपी संकीर्ण स्वार्थ परायण दैत्य द्वारा जल में समुद्र में छिपी सम्पदा को ढूँढ़ निकालने तथा आसुरी सत्ता का दमन करने का कार्य वाराह रूप ही कर सकता था। वही किया गया तथा प्रयोजन पूरा हुआ।
जब भी असुरत्व उद्धत उच्छृंखलता को पार कर जाता है तो ऐसे अवसरों पर शालीनता से काम नहीं ही चलता। तब नरसिंहों की आवश्यकता पड़ती है और उन्हीं का पराक्रम अग्रणी रहता है भगवान ने आदिम परिस्थितियाँ देखीं और नर और सिंह का समन्वय आवश्यक समझ दुष्टता के दमन, सज्जनता के संरक्षण द्वारा अपना आश्वासन पूर्ण किया।
जब संकीर्णता, संचय और उपभोग की पशु-प्रवृत्ति को उदारता में बदलने की आवश्यकता पड़ी तो उस वृत्ति को मिटाने वामन भगवान के नेतृत्व में छोटे, बौने, पिछड़े लोगों की ही आवाज बुलन्द हुई और बलि जैसे सम्पन्न व्यक्ति को विश्व हितार्थाय उदार वितरण के लिए स्वेच्छा सेे सहमत किया गया। यही वामन अवतार था।
इनके बाद के परशुराम, राम, कृष्ण व युद्ध के सभी अवतारों को लक्ष्य एक ही था-बढ़ते हुए अनाचार का, आसुरी आक्रामकता का प्रतिरोध और सदाचार का, सदाशयता का समर्थन, पोषण। परशुराम ने सामन्तवादी आधिपत्य को शस्त्र बल से निरस्त किया। क्षत्रियों का सिर काटने से तात्पर्य था, शक्ति के उन्मादी, अहंकारी छत्राधिपतियों के अहंकार का उन्मूलन। इस तरह परशु से वह कार्य सम्पन्न हुआ जो और कोई मानवी सत्ता नहीं कर सकती थी। राम ने मर्यादाओं की संस्थापना पर जोर दिया तथा धरती को निशिचर हीन कर डाला ताकि कोई वर्जनाओं की सीमा न लाँघ सके। कृष्ण नीति पुरुष थे। उनने मनुष्य में घर कर बैठी छद्म वृत्ति से विनिर्मित परिस्थितियों का शमन करने हेतु “विषस्य विषमौषधम्” का “शठे शाठ्यम” की नीति का उपाय अपनाया तथा कूटनीतिक दूरदर्शिता दिखाते हुए काँटे से काँटा निकालने के लिए टेढ़ी चाल चलकर लक्ष्य तक पहुँचने की प्रतिक्रिया संपन्न की। यह अपने युग का विलक्षण अवतार था।
जिन दिनों धर्म तंत्र में विकृतियों का समावेश हो गया, मद्य, माँस आदि के रूप में अनाचार धर्म की आड़ लेकर लोक व्यवस्था को अस्त व्यस्त करने लगा तथा धर्माडम्बरों ने जन सामान्य को दुखी कर डाला तब महात्मा बुद्ध ने सही धर्म की संस्थापना का, सज्जनों के संगठन का तथा विवेक को सर्वोपरि स्थान देने का प्रवाह जन जन में फैलाया। धम्मं शरणं गच्छामि, संघं शरणं गच्छामि, बुद्धं शरणं गच्छामि का शंखनाद ही बुद्ध का लीला संदोह है। उनके आह्वान पर छोटी सुप्रिया से लेकर अम्बपाली, आनन्द राहुल, अशोक अगणित व्यक्ति आगे आए। लाखों धर्म प्रचारक प्रव्रज्या पर निकले, संघाराम स्थापित हुए और विचार क्रांति का आलोक विश्व के कोने कोने में पहुँचा।
आज की परिस्थितियाँ तब की परिस्थितियों से भिन्न हैं। बदलती हुई परिस्थितियों में भगवान को भी आधार बदलने पड़े हैं। विश्व विकास की क्रम व्यवस्था के अनुरूप ही अवतार का स्तर एवं कार्यक्षेत्र भी विस्तृत होता चला जाता है। साधन एवं कर्म प्रधान विश्व में तो शस्त्र व साधनों के सहारे काम चल गया। आज तो चारों ओर बुद्धि तत्व की प्रधानता है। सम्पन्नता, समर्थता और कुशलता का दुर्बुद्धि जन्य दुरुपयोग ही चारों ओर दिखाई देता है। विज्ञान के विकास ने दुनिया को बहुत छोटा व विश्व मानव को एक दूसरे के समीप ला दिया है, गतिशीलता अत्यधिक बढ़ी है। ऐसी दशा में भगवान का अवतार युगान्तरीय चेतना के रूप में ही हो सकती हैं, इतनी व्यापक कि जनता न के मन को बदल सके, अन्तःकरण में सद्भावनाएं जगा सकें। तभी अनास्था से मोर्चा ले पाना संभव होगा।
बुद्ध के बुद्धिवाद का मूलभूत ढाँचा विचार क्रांति का था। पूर्वार्द्ध में धर्म चक्र प्रवर्तन हुआ था। धर्मधारणा सम्पन्न लाखों मानवों ने बुद्ध का अभियान भारत ही नहीं, भारत की सीमाओं के पार भी धर्म तंत्र के परिष्कार का आलोक फैलाया। बुद्ध का कार्य पूरा नहीं हुआ उत्तरार्ध अभी बाकी है। प्रज्ञावतार वही कार्य संपन्न कर रहा है। बुद्धि प्रधान तर्क प्रधान युग में समस्याएं भी चिन्तन प्रधान होती हैं। मान्यताओं, विचारणाओं के प्रवाह में ही सारा समाज बहता है। ऐसे समय में अवतार प्रक्रिया लोकमानस की अवांछनीयता, अनैतिकता एवं मूढ़ मान्यता को मिटाने वाली विचारक्राँति के रूप में ही इस युग की समस्याओं का समाधान कर सतयुग की वापसी कर सकती है।
परम पूज्य गुरुदेव का प्राकट्य जिस काल को हुआ उसमें सर्वाधिक आवश्यकता थी विचारों की अवाँछनीयता हटा कर सद्बुद्धि की स्थापना करना। इसी कारण इस युग का महाभारत चेतना क्षेत्र में लड़ा गया एवं गायत्री महामंत्र की प्रेरणा द्वारा सद्भाव सम्पन्न आस्थाओं के निर्माण एवं अभिवर्धन का प्रयोजन पूरा किया गया। व्यक्ति के चरित्र, चिंतन व समाज का विधान, प्रचलन क्या हो, इसका सुनिश्चित निर्धारण इस महामंत्र के विराट विस्तार द्वारा सम्पन्न हुआ है। देवसंस्कृति की जन्मदात्री, देवमाता, वेदमाता अब उनके महाप्रयाण के बाद विश्वमाता का रूप धारण करने जा रही है, इसे अगले दिनों ही देखा जा सकेगा। सुसंस्कृत समुन्नत विश्व का निर्माण इसी चिन्तन धारा की पृष्ठभूमि पर होने जा रहा है।
गायत्री जयन्ती के दिन, जिस दिन प्रजापिता ब्रह्मा के मुख से गायत्री मंत्र की ऋचाओं का उच्चारण हो मंत्र वेदों के रूप में लिपिबद्ध हुए, ही पूज्य गुरुदेव का महाप्रयाण हुआ। जिस नर तनधारी अवतारी सत्ता ने जन जन को ऋतम्भरा प्रज्ञा के चिन्तन से अनुप्राणित कर दिया, उसके लिए इससे श्रेष्ठ दिवस और क्या हो सकता था कि वह सूक्ष्मीकृत घनीभूत होने के लिए सीधा तरणतारिणी माँ गायत्री की गोद में ही जाए।
पूज्य गुरुदेव ने ऋतम्भरा प्रज्ञा अर्थात् विवेक और श्रद्धा के समुचित समावेश से जन जन के मन को परिचित कराया एवं क्षुद्रता से महानता के स्तर पर पहुँचाया। विवेक वह प्रतिपादन है जिसमें तर्क, तथ्य और दूरदर्शिता का समुचित समावेश हो। श्रद्धा उस गहन आस्था का नाम है जो उत्कृष्ट आदर्शवादिता से प्यार करना सिखाती है। विवेक जहाँ बुद्धि का उत्कृष्टतम स्तर है, श्रद्धा वहाँ अन्तःकरण की श्रेष्ठतम उपलब्धि है।
सूक्ष्मजगत में बहने वाली प्रचण्ड शक्तिधाराओं का प्रवाह ऊपर से ही शान्त व सामान्य दिखाई देता है। भीतर वह ज्वालामुखी जैसी विस्फोटक होता है तो उलटे को उलट कर, अवाँछनीयता को निरस्त कर सब कुछ बदल कर रख देता है। सूक्ष्मजगत में गतिशील इसी अगम्य विलक्षणता को अवतार कहते हैं। अवतार का प्रधान कार्य है अपने लीलाकाल में देवदूतों में, देवअंशधारी महामानवों में उच्चस्तरीय उमंगें भर देना। तत्वदर्शी इन्हीं अदृश्य हलचलों को जागृतात्माओं में हिलोरें भरती देखते हैं तो कहते हैं कि अवतार का यह प्रचण्ड आवेश असंतुलन को संतुलन में बदल कर ही रहेगा। इन दिनों भी यही हो रहा है।
पूज्य गुरुदेव ने अपनी सूक्ष्मसत्ता के मार्गदर्शन में निष्कलंक प्रज्ञावतार की भूमिका निबाही एवं एक ऐसा प्रचण्ड विचार प्रवाह विनिर्मित किया कि श्रद्धा और विवेक का संगम युगान्तरीय चेतना, युगशक्ति के रूप में उनके जीवन काल में ही प्रकट होकर के रहा। प्रस्तुत अवतार विचार प्रवाह के रूप में आया था इसलिए उसे स्थूल काया तक सीमित न मान, यह समझा जाय कि वह सत्ता सूक्ष्मीकृत, घनीभूत होकर पूरे विश्व में संव्याप्त हो गयी है व बिगड़ों की बुद्धि को ठिकाने लगाने तथा बुद्धि वालों को विवेक श्रद्धा के अवलम्बन को स्वीकारने हेतु विवश कर रही है, झकझोर रही है। जागृतात्माओं का बढ़ता परिकर व विस्तार लेती चिंतन चेतना इसका प्रमाण है। यही तो है निष्कलंक प्रज्ञावतार जिसे दशमावतार कहा गया है।
नारी के बिना पुरुष की बाल्यावस्था असहाय है। युवावस्था आनन्द रहित और वृद्धावस्था साँत्वना शून्य।
मान का संकल्प और शरीर का पराक्रम यदि किसी काम में पूरी तरह लगा दिया जाए तो सफलता मिल कर रहेगी।
आवश्यकता और विलास में अन्तर अनगढ़ मनुष्य नहीं कर सकता। यह देवदूत का काम है। देवदूत विवेक को कहते है।
गुरुदेव के छोटे सुपुत्र की शादी होने वाली थी। उन दिनों वह अपने घीया-मण्डी वाले मकान में थे। रिश्तेदारों सगे संबंधियों की जमा भीड़ में प्रायः सभी का मत था- कि मकान की साज सज्जा शादी विवाह के घर के अनुरूप हो। इस तरह लगता नहीं कि यहाँ किसी की शादी होने वाली है। एक सज्जन जो उनके थोड़ा मुँह लगे थे पीछे ही पड़ गये।
सब का आग्रह देख उन्होंने पास खड़े एक स्वयं सेवक को बुलाया और कहा बिजली वाले को थोड़ी झालर आदि लगा जाने को बोल आओ और देखा ध्यान रखना पैसा कम से कम खर्च हो। स्वयं सेवक जब लौटकर आया तो पूछा-कितने पैसे की बात हुई? उसके मुख से पचास रुपये की बात सुनकर चकित होते हुए बोले पचास। दूसरे दिन सुबह ही उसे फिर बुलाया और कहा सुनी बिजली वाले को जाकर मना कर आना। कारण पूछने पर बोले मैं इतने रुपये की बर्बादी कैसे सहन कर सकता हूँ, वह तो मैंने सभी के आग्रहवश कह दिया था। अब स्वयं सेवक के चकित होने की बारी थी।
अपने निजी जीवन में मितव्ययिता का कठोरतापूर्वक पालन तो महापुरुषों का दैवी सद्गुण है। बिजली वाले की मना कर दिया गया सिद्धान्त के आचरण के साथ मिलकर शादी वाले इस घर को अतुलित सज्जा प्रदान की।
शांतिकुंज आश्रम के शुरू के दिनों की बात है, उन दिनों आर्य समाज के प्रसिद्ध संत महात्मा आनन्द स्वामी सरस्वती जी जीवित थे। हरिद्वार आने पर वह शाँतिकुँज अवश्य पधारते। गुरुदेव को यदि उनके आने की खबर मिलती तो प्रेम भरे आग्रह के साथ बुलाने से न चूकते। व्यास आश्रम में उनके ठहरने की बात सुनकर गुरुजी ने एक कार्यकर्ता को उन्हें बुलाने के लिए भेजा।
जैसे ही वह उक्त आश्रम के दरवाजे पर पहुँचा। उनके कानों में कुछ शब्द पड़े। महात्मा आनंद स्वामी पास बैठे लोगों से चर्चा कर रहे थे-देश, व्यक्ति और समाज के कल्याण का दिन-रात अखण्ड ध्यान करने वाला कोई है तो एक आचार्य श्रीराम शर्मा। इतना कहकर वह एक क्षण ठहरे, फिर कहने लगे मैं निश्चय पूर्वक कह सकता हूँ कि इस क्षण भी वह देश, व्यक्ति, समाज के उत्थान की चर्चा कर रहे होंगे।
तब तक पास आ खड़े हुए कार्यकर्ता को देखकर ठहाका लगाते हुए बोले-”अरे तुम आ गए, मैं आचार्य जी की ही चर्चा कर रहा था।” कार्यकर्ता इस संत के उद्गार सुन गदगद था।
पूज्य गुरुदेव शांतिकुंज के लिए जमीन तलाश रहे थे। 1968 के दिन थे उन्हीं दिनों पास की प्रायः सभी जमीनों को देखते कुछ परखते एक स्थान पर आ कर ठहर गए। पास में कुछ और भी लोग खड़े थे, जो देखे गए भूखंडों की अनुमानित कीमतें, विविध दृष्टिकोणों से उनकी विशेषताएं बता रहे थे। पता नहीं इस बात चीत ने उनके कानों में प्रवेश किया या नहीं। वह यथावत खड़े जैसे अविज्ञात की किन्हीं रहस्यमयी तरंगों को पकड़ रहे हों। मुखमंडल में किसी तरह की प्रतिक्रिया का कोई चिह्न नहीं उभरा। अचानक उन्होंने अपनी धोती समेटी और सामने खड़े भूखण्ड का एक चक्कर लगाया। एक सन्तोष की रेखा झलकी मानो खोज पूरी हुई।
“मुझे यह जमीन खरीदनी है, बात चलाओ।”
“यह?” एक शब्द के उच्चारण के साथ सभी के चेहरे पर आश्चर्य घनीभूत हो उठा। सामान्य तौर पर यह उचित भी था। घुटनों से भी गहरा दलदल, छाती तक बड़ी घास, यातायात की असुविधा। ऐसी जगह को खरीदने की सोचना कम से कम बुद्धिमत्ता की दृष्टि से तो कतई ठीक नहीं।
हाँ, यही। उनका जवाब था जो शायद बुद्धि की सीमाओं से अछूते किसी क्षेत्र से उभरा था। पर यहाँ की दलदली भूमि में न तो मकान बन सकेंगे। फिर कीमतें भी ज्यादा है। प्रायः सभी ने अपनी अक्ल की सीमाओं को छूते हुए अपने अपने तर्क प्रस्तुत किये।
इन दिनों उनके मन में अध्यात्म की एक जीती जागती प्रयोगशाला बनाने की योजना उतरी थी। एक ऐसी प्रयोगशाला जहाँ मानव की आंतरिक संरचना में फेर बदल किया जा सके, उसकी अंतःशक्तियों को जगाया निखारा जा सके। समाज के लिए लोकसेवियों को गढ़ना नवयुग को मूर्त करना भी महत्वपूर्ण उद्देश्य थे। ये सभी कल्पनाएं जहाँ से मूर्त हो सकें ऐसी कार्यशाला हर स्थान पर तो नहीं बन सकती। पर सहयोगियों के अपने तर्क थे। कुछ वैसी ही स्थिति आ पड़ी जैसी श्री अरविन्द के सामने चन्द्रनगर से पाण्डिचेरी प्रस्थान करते समय आयी थी। उनके समक्ष भी सहयोगियों के सुझाव थे तप करने के लिए वहीं क्यों? फ्रांस शासित दूरस्थ प्रदेश, यात्रा की कठिनाइयाँ, स्वजनों का विछोह। एकान्त वास तो कहीं किया जा सकता है फिर स्थान विशेष का आग्रह किसलिए। श्री अरविन्द का जवाब था-भगवान गुरु का आदेश। तुम लोग बाद में देखोगे, समझोगे। इस कथन के सम्मुख सभी तर्क मौन हो गये। बाद में रहस्य उद्घाटित हुआ कि पाण्डिचेरी दुर्धर्ष तपस्वी महर्षि अगस्त्य की तपस्थली थी। अध्यात्म की अकूत सम्पदाओं को स्वयं में संजोये स्थान था यह। इन प्रचण्ड संस्कारों वाली भूमि के अलावा अतिमानस की प्रयोगशाला और कहाँ स्थापित होती?
इस बार भी जवाब यही था गुरु का आदेश है। दिव्यसत्ता ने इसी स्थान के बारे में निर्देशित किया है। तुम लोग बाद में देखोगे समझोगे। सभी तर्क शिथिल हो गए। आर्थिक हानि असुविधाओं का रोना धोना बेकार रहा।
सब कुछ निश्चय हो जाने पर एक दिन पूज्य गुरुदेव ने धीरे से कहा-जानते हो यह स्थान ब्रह्मर्षि विश्वामित्र की तपस्थली रही है। गंगा की सप्त धाराओं में एक कभी इसी स्थान को सींचती रही है।
सुनने वाले भौंचक्के थे। प्रखर से भी प्रखर बुद्धि महायोगी के सम्मुख कितनी बौनी हो जाती है, आज स्पष्ट था। कोई क्या बोलता?
वह कह रहे थे देवदारु को रेगिस्तान में नहीं उगाया जा सकता। शुष्क स्थानों पर उगने वाली कटीली झाड़ियाँ, वहाँ के पशु पक्षी हिमाद्रि में अपना अस्तित्व गंवा बैठेंगे। संसार की प्रत्येक वस्तु प्राण, जीवन को अपना पूर्ण विकास करने के लिए एक निश्चित वातावरण चाहिए। आध्यात्मिकता भी इसकी अपेक्षा करती है।
अपेक्षा पूरी हुईं। गंगा की गोद, हिमालय के पद प्रान्त में स्थित विश्वामित्र की तपस्थली ऋषि युग्म की दीर्घ तपश्चर्या, नित्य यज्ञ, लक्षाधिक साधकों के साधनात्मक पुरुषार्थ से तीर्थ, महातीर्थ और अब युगान्तर चेतना के गोमुख के रूप में परिवर्तित हो गई। शांतिकुंज नाम से जाना जाने वाला यह दिव्य क्षेत्र सहस्राधिक वर्षों तक मानवता को नवीन प्राण देता रहेगा।
आदमी यदि लालच और व्यामोह से ऊंचा उठ जाए तो आसमान का स्वर्ग उसके पैरों तले आ सकता है।
‘गुरु-रूप’ की तुम्हारे, अब कल्पना करेंगे। लेकिन पिता! तुम्हें हम कैसे भुला सकेंगे॥1॥
गुरु-रूप में दिया जो, वह ज्ञान याद तो है। जो भी सृजन किया, वह हर ग्रन्थ साथ तो है॥
उस ज्ञान का सहारा, हमको प्रकाश देगा। गुरुवर! सृजन तुम्हारा, उत्साह, आस देगा॥
कहकर ‘पिता’ मगर हम, किसको बुला सकेंगे। बोलो पिता! तुम्हें हम कैसे भुला सकेंगे॥2॥
देता जिसे पिता ही, वह प्यार अब कहाँ है। कंधे कहाँ पिता के, आधार वह कहाँ है॥
वे हाथ अब कहाँ हैं, जो थपथपा दिये थे। वे नयन अब कहाँ, जो ममता मधुर लिये थे॥
अब कौन पितृ ममता, को छलछला सकेंगे। बोलो पिता! तुम्हें हम कैसे भुला सकेंगे॥3॥
‘परिवार’ बनाया था, क्या छोड़ चले जाने। क्या प्यार बढ़ाया था, दिल तोड़ चले जाने॥
हम सीख ही रहे थे, उंगली पकड़ के चलना। बाहें पकड़ तुम्हारी, सत्पथ पर पैर धरना॥
अब कौन थाम बाहें, हमको चला सकेंगे। बोलो पिता! तुम्हें हम कैसे भुला सकेंगे॥4॥
बोलो! जहाँ कहीं हो, विश्वास तो हमें दो। निर्मम नहीं हुये हो, आभास तो हमें दो॥
छाया बने रहोगे, हम पर पिता सदा ही। वात्सल्य भावना से, होंगी नहीं जुदाई॥
हम इस तरह दिलासा, दिल को दिला सकेंगे। बोलो पिता! तुम्हें हम कैसे भुला सकेंगे॥5॥
कोई न कह यह पाये, हम हैं बिना पिता के। हों हौसले हमारे, इतने बुलंद बाँके॥
बन भव्य भावनाएं, मन में विहार करना। हम भटकने न पायें, हरक्षण विचार करना॥
है साथ में पिता, यह जग को बता सकेंगे। बोलो पिता! तुम्हें हम कैसे भुला सकेंगे॥6॥
झगड़ने वाले दुश्मनों से उतरा डरने की आवश्यकता नहीं, जितना मित्र बन कर घात करने वालों से।
नैमिषारण्य में सूत शौनक वार्ता चल रही थी। समस्त अवतारों की कथा लीला संदोह सुनने के उपरान्त ज्ञान की अन्यतम जिज्ञासा वाले शौनक मुनियों ने महर्षि लोमहर्षक के सुपुत्र श्री सूत जी से प्रश्न किया-भगवन्। द्वापर तक की व तदुपरांत बुद्धावतार की कथा पूरी हो चुकी। अब कृपया यह बताइये कि कलियुग जब पराकाष्ठा पर होगा तो भगवान का जन्म किस रूप में होगा। उस समय ऐसी कौन सी दुरात्माएं होंगी जिन्हें मारने के लिए भगवान अवतार लेंगे। वह कथा भी हमें विस्तार से सुनाएं।
श्री सूत जी बोले-हे मुनीश्वरो-ब्रह्माजी ने अपनी पीठ से घोर मलीन पातक को उत्पन्न किया, जिसका नाम रखा गया अधर्म। अधर्म जब बड़ा हुआ तब उसका मिथ्या से विवाह कर दिया गया। दोनों के संयोग से महाक्रोधी पुत्र दम्भ तथा माया नाम की कन्या जन्मी। फिर दम्भ व माया के संयोग से लोभ नामक पुत्र और विकृति नामक कन्या हुई। दोनों ने क्रोध को जन्म दिया। क्रोध से हिंसा व दोनों के संयोग से काली देह वाले महाभयंकर कलि का जन्म हुआ। काकोदर कराल, चंचल, भयानक, दुर्गन्धयुक्त शरीर, द्यूत, मद्य, स्वर्ण और वेश्या में निवास करने वाले इस कलि की बहिन व संतानों के रूप में दुरुक्ति, भयानक, मृत्यु निरथ, यातना का जन्म हुआ जिसके हजारों अधर्मी पुत्र-पुत्री आधि-व्याधि, बुढ़ापा, दुख शोक,पतन,भोग-विलास आदि में निवास कर यज्ञ, तप,दान, स्वाध्याय, उपासना आदि का नाश करने लगे।
(कल्कि पुराण 1 से 22 श्लोक) उपरोक्त वर्णन पाठकों के मनोरंजन मात्र के लिए नहीं दिया गया। श्रुतियाँ देशकाल से परे होती हैं अतः उनमें वह सब भी दिया होता है जो भविष्य में संभावित है। कलियुग जिससे इस दिनों हम गुजर रहे हैं अपनी प्रौढ़ता के समापन काल पर है वह ऐसे मैं उस अवतार की प्रतीक्षा सबको है जो अविवेक दुर्बुद्धि, निष्ठुरता, अधर्म का नाश का धर्म की, सत्प्रवृत्तियाँ की स्थापना करेगा।
कल्कि अवतार की भाव भूमिका पर प्रकाश डालते हुए श्री सूत जी आगे लिखते हैं कि “देवता धरती को आगे करके ब्रह्माजी के पास गए और उन्हीं से भूमण्डल पर हो रहे अत्याचारों कष्टों का वर्णन करवाया। ब्रह्माजी सब को लेकर विष्णुलोक गए। विष्णु जी ने सब कुछ सुनकर आश्वासन दिया कि हम तुम्हारे कष्ट दूर करने के लिए अवतार लेने आ रहे हैं। फिर देवताओं से कहा कि “तुम मेरी सहायतार्थ पृथ्वी पर जाकर जागृतात्माओं व प्रज्ञा परिजनों के रूप में जन्म लो।”
उपयुक्त कथानक अधर्म पृथ्वी पर बुरी तरह संव्याप्त हो गया तब विधि व्यवस्था (ब्रह्मा) ने एक सर्वांगपूर्ण मानवीय सामर्थ्यों से सम्पन्न सत्ता का प्राकट्य किया जिसने संघ शक्ति का सहारा लेकर दुर्बुद्धि से मोर्चा लिया एवं सतयुग की स्थापना की।
कल्किपुराण में उल्लेख आता है कि-”भगवान कल्कि सम्भल ग्राम में विष्णु यश शर्मा के घर जन्म लेंगे, सावित्री उपासक होंगे। महेन्द्र पर्वत के निवासी भगवान परशुराम उनके गुरु होंगे? मथुरा का राज्य सूर्य केतु को सौंपकर वे हरिद्वार में पत्नी सहित निवास करेंगे, बौद्धों से संग्राम कर उन्हें पराजित कर संसार में धर्म की संस्थापना का काम पूरा करेंगे। सच्चे ब्राह्मणत्व की प्रतिष्ठा वे करेंगे तथा निष्कलंक कहलायेंगे।”
कुविचारों का समूलोच्छेदन करने वाली यह शक्ति एक श्रद्धा पर आधारित विचार प्रधान संस्थान के रूप में जन्मेगी और सारे विश्व में विचारक्रांति उत्पन्न कर देगी
उपरोक्त अलंकारिक विवेचना व घोषणाओं से स्पष्ट होता है कि “यदा यदा हि धर्मस्य”-की अपनी प्रतिज्ञा निबाहने को संकल्पित भगवत् सत्ता का
अवतरण काल यही है जिससे हम गुजर रहे हैं। वस्तुतः वह अवतार लेकर स्थूल काया से वह सब कुछ कर चुका जो एक अवतारधारी सत्ता को करना था,अब वह सूक्ष्म रूप में संव्याप्त हो देव अंशधारी सत्ताओं को प्रेरित अनुप्राणित कर अपनी लक्ष्य सिद्धि की ओर बढ़ रहा है।
भीष्म पितामह महाभारत में कहते हैं “कृष्णावतार का स्वरूप व उद्देश्य मैं तुम्हें समझा चुका अब कलियुग के बारे में बताता हूँ। कलियुग के अन्त में जब धर्म की शिथिलता आने लगेगी, पाखण्ड बढ़ जाएगा तब धर्म की वृद्धि और सच्चे ब्रह्मत्व की प्रतिष्ठा के लिए भगवान पुनः अवतार लेंगे!वे भगवान के समान यश वाले “विष्णु यशा” होंगे। भगवान के अनेक देवतागण भी अपनी शक्तियों सहित पृथ्वी पर उनके सहायक बनकर आते हैं, ऐसा पुराणों ने गाया है”।
आज की परिस्थितियां ठीक अवतार के प्रादुर्भाव के अनुरूप हैं। जब सदाचरण का कोई महत्व न रह जाए, संसार की सभी धार्मिक व्यवस्थाएं अस्त व्यस्त हो जाएं, तब मानना चाहिए कि अब कलियुग पूरी तरह प्रौढ़ हो गया और इस प्रौढ़ हुए कलिकाल में ही कीचड़ में कमल की भाँति निष्कलंक अवतार के प्रकट होने की संभावना मानना चाहिए। अवतार आते रहे हैं, आयें हैं और आते रहेंगे। उनकी पहचान संसार न करे तो वह अपनी पहचान स्वयं ही अपने कर्तव्यों, कर्मों की प्रचण्डता द्वारा अन्यान्यों को करता है। वह अपने पीछे निर्धारणाएं, व्यवस्थाएं बनाकर जागृतात्माओं को उस काम को पूरा करने के लिए छोड़ जाता है। बहुधा अवतार के जाने के बाद ही उसका मूल्याँकन होता है।
शास्त्रकारों की, श्रुति रचने वालों की शैली यद्यपि अलंकारिक होती है तो भी वह थोड़ा सा बुद्धि पर जोर डालने पर समझ में आ जाती है। कल्कि पुराण का कहना है कि वह सत्ता मनुष्य काया में होते हुए भी वंश कुल, गोत्र, कर्म, विचार भाव, व्यवसाय, स्वभाव आदि से पूर्ण निष्कलुष होगा। पाप, लोभ, मोह उसे स्पर्श भी न कर पायेंगे, असत्य व अधर्म उसके पास भी न आ पायेंगे। वह पूर्ण ज्ञानी, पूर्ण सन्त व बालकों के समान निर्मल अन्तःकरण स्वभाव वाला होगा। यह सारी बातें पूज्य गुरुदेव के जीवन क्रम से संगति खाती हैं, यद्यपि वे जीवन भर अवतार की बात का खण्डन ही करते रहे।
ग्रन्थ में उसके एक गाँव में जन्म लेने, उसके पिता के यशस्वी (विष्णु यशा) होने, माता सुन्दर बुद्धि वाली (सुमति) होने की बात कही। ज्ञान गंगा से वह अपने चित्त को निर्मल कर सावित्री साधना में प्रवीण पारंगत बनेगा, यह बात भी कही गयी है। उपनयन संस्कार के बाद, ब्रह्म संस्कार, गायत्री उपासना व वेदाध्ययन करने का प्रसंग भी आया है। पुराण के पैंतीसवें श्लोक से चालीसवें श्लोक तक कल्कि द्वारा पिता से वेद, सावित्री ब्राह्मणत्व, यज्ञोपवीत, गायत्री ब्रह्म विद्या आदि की व्याख्या पूछी गयी है। सच्चा ब्राह्मणत्व क्या होता है व उसकी उपासना कैसे की जाती है? यह समझाया
ब्राह्मण बालक को गुरुकुल अध्ययन के लिए तत्पर होते समय भगवान परशुराम को (परोक्ष सूक्ष्म सत्ता धारी मार्गदर्शक) दर्शन होता है। वे दर्शन ही नहीं देते, आत्मज्ञान की साधना के लिए अपने साथ हिमालय ले जाते हैं। समस्त वेदों का ज्ञान प्राप्त कर वे शिवजी की भस्म रूपी ज्ञान गंगा तथा परशु (विचारों की तीक्ष्णता रूपी अस्त्र) लेकर संसार के उद्धार के लिए चल देते हैं।
कल्कि लौटकर अपने ईश्वरीय ऐश्वर्य को प्रकट करते हैं एवं सारे देश में यज्ञ, दान, तपस्या और व्रत करने वाले ब्राह्मण क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र भगवान के कृपा पात्र बनते हैं। ये सभी सहायक भारतवर्ष के प्रत्येक प्रान्त से, सभी धर्म सम्प्रदायों से व विश्व भर से आते हैं व युग निर्माण की प्रक्रिया के प्रभाव से सब की बुद्धि सात्विक, ईशपरायण बनती चली जाती है। भगवान कल्कि राजसूय व अश्वमेध रचकर यज्ञ भावना का विस्तार करते हैं तथा सभी सहायकों, शुद्ध अन्तःकरण वालों को आत्मस्वरूप बताते हुए मृत्यु के बाद उन्हें स्वयं में एकाकार करने का आश्वासन दे देते हैं। वे लौकिक नहीं, आध्यात्मिक इच्छाओं की पूर्ति की ही कामना करने वाला एक समाज अपने सूक्ष्म चिन्तन से विनिर्मित कर देते हैं। स्त्रियों को वे नव जागरण की प्रेरणा देते हैं वह उनसे नेतृत्व कराते हैं। “कीकटपुर” अर्थात् संकीर्ण स्वार्थी मनोवृत्ति में निवास करने वाले बौद्ध अर्थात् तार्किक, घमण्डी, शिक्षित किन्तु स्वार्थपरायण बुद्धि वाले व्यक्तियों से वे युद्ध करते हैं। आस्था संकट से जूझते हुए वे ज्ञान रूपी परशु से उनका सिर काटते हैं अर्थात् विचार क्रांति द्वारा उनके विचारों को बदलकर उन्हें समर्पण अपनाने, क्षुद्र बुद्धि छोड़ सबके हित की बात सोचने के लिए बाध्य कर देते हैं।
अध्यात्म तत्व ज्ञान का वे ऐसा वैज्ञानिक विवेचन प्रस्तुत करते हैं कि हर नास्तिक (बौद्ध) उन्हें पढ़ता हुआ बदलता चला जाता है। विचारों को विचारों द्वारा काटकर वे एक प्रकार का ज्ञान यज्ञ रच देते हैं। घर-घर फैले भौतिकवाद से जूझकर धर्म तंत्र का परिष्कार इस प्रकार उनके माध्यम से सम्पन्न होता है। पाठकगण उपरोक्त विवेचन पर ध्यान दें कि यही रीति नीति पूज्य गुरुदेव की जीवन भर रही है। उनने क्राँतिकारी जीवन जिया है, परम्पराओं से मोर्चा लिया है एवं अध्यात्म तत्वज्ञान की स्थापना करने के लिए विज्ञान एवं अध्यात्म का समन्वय किया। प्रचुर परिमाण में साहित्य रचकर ज्ञान यज्ञ के माध्यम से उनने लाखों व्यक्तियों के विचार बदले हैं, उन्हें संकीर्ण स्वार्थान्धता से भरे जीवन से मोड़कर औदार्य भरी हंसती-हंसती, खिलती-खिलती जिन्दगी जीन सिखाया है।
गुरुदेव की ज्ञानयज्ञ, बाजपेय यज्ञ की श्रृंखला लम्बे समय तक चली। सहस्रकुंडीय महायज्ञ के माध्यम से अश्वमेध यज्ञ उनने पहले मथुरा में व फिर 1971 में पूरे भारत भर में पाँच स्थानों पर रचा। मथुरा की व्यवस्था सूर्यकेतु (उचित पात्रता वाले आत्मीय परिजन) को सौंपकर वे सपत्नीक उग्र तपश्चर्या हेतु हरिद्वार में गंगातट पर सप्त सरोवर क्षेत्र में आ गए (गंगा तीरे हरीद्वारे निवासं संकल्पयत)
हिमालय में अपने गुरु के दर्शन व तपश्चर्या करके आने के उपरान्त वे हरिद्वार में ऋषियों के अंशों से उत्पन्न आत्माओं से मिले व उनसे प्राण प्रत्यावर्तन जीवन शोधन साधना करा के अपने कार्य को उनके माध्यम से आगे बढ़ाने का संकल्प दिलाते हैं। वे एक विशाल परिवार की, जो मात्र सत्प्रवृत्तियों की स्थापना को कृतसंकल्प है, संरचना कर अपना कार्यभार अपनी धर्मपत्नी को सौंपकर स्वयं सूक्ष्म शरीर से गतिशील व सर्वव्यापी बनने महाप्रयाण कर जाते हैं।
अवतारों का स्वरूप एक विचार प्रवाह के समान होता है। मानवी काया में अवतार के दर्शन करने
वालों को यह देखना चाहिए कि क्या किसी एक महाप्राज्ञ की विचार चेतना से अनुप्राणित हो श्रेष्ठ सज्जनों के समुदाय को उत्तम चरित्र एवं उदात्त प्रयास के विकास विस्तार हेतु गतिशील देखा जा सका? यदि ऐसा कुछ दिखाई पड़े तो इसे अवतार की प्रेरणा ही मानना चाहिए। पूज्य गुरुदेव का कहना था कि यदि इस समय सब अवतार को खोजने लगें जो अगणित श्रेयाधिकारी खड़े हो जायेंगे।
वे कहते थे कि जब भी समाज में संत, सुधारक और शहीद बढ़ने लगें, समझना चाहिए कि इसका सूत्र संचालन परोक्ष रूप से अवतारी सत्ता ही कर रही है। सन्त वे जो सज्जनता से भरा, ब्राह्मणोचित जीवन जीकर प्रकाश स्तंभ का काम करते हैं। निराश व्यक्तियों में प्राण फूँकते हैं। संत हर प्रतिकूलता का हंसकर सामना कर आदर्शों का परिपालन करते हैं। इससे ऊंची श्रेणी सुधारक की है। सुधारक को न केवल अपना आपा सुधारना पड़ता है दूसरों को बदलने के लिए प्राणशक्ति का उपार्जन करना पड़ता है। उनका चरित्र ऊंचा, साहस अधिक प्रखर व पुरुषार्थ अधिक प्रबल होता है। वे एक हाथ में शास्त्र व दूसरों में शस्त्र लेकर चलते हैं। विचारक्रांति की मशाल यही जलाते हैं।
“संत, सुधारक के बाद तीसरा चरण है शहीद। शहीद वे जो ‘स्व’ का ‘पर’ के लिए सब कुछ समर्पित कर दें। यही समर्पण है, शरणागति है। स्वजनों का परामर्श न मानकर वे अवतार चेतना की प्रेरणा से सारा कार्य करते हैं। मानसिक शहादत ही सच्ची शहादत है। जिसमें परमार्थी महत्त्वाकांक्षाएं ही प्रधान हो जाती हैं एवं संकीर्ण स्वार्थपरता का अन्त हो जाता है”। (अखण्ड ज्योति पृष्ठ 7 से 9 अगस्त 1971)
पूज्य गुरुदेव की अवतार चेतना की परिभाषा के अनुरूप निराकार प्रज्ञावतार के प्रवाह को इन दिनों चारों और संव्याप्त देखा जा सकता है। इतना सब कुछ सम्पन्न कर दिखाने वाला वह युगपुरुष जब आज हमारे बीच नहीं है, सूक्ष्मीकृत घनीभूत हो परोक्ष जगत में क्रियाशील है, हम देहधारी उनके अनुचर अब तो उनका सही मूल्याँकन कर सकते हैं। “सुदृढ़ संगठन का स्वामी, स्वयं अपनी संहिताएं निश्चित करने वाला नीति पुरुष, वैज्ञानिक, मनीषी, आस्था संकट को मिटाकर भाव चेतना को जगाने वाला सत्पुरुष ही इस युग का कल्कि अवतार होगा”, “यह निर्धारण सन 1939 में उत्तराखण्ड के महात्माओं की एक बैठक में निश्चित हो”,काल गणना व कल्कि अवतार “ नामक पुस्तक रूप में प्रकाशित हुआ था। उसमें लिखा है “उसके मस्तिष्क की दो भौंहों के बीच चन्द्रमा होगा। विशुद्ध भारतीय वेशभूषा, पहनेगा, स्वभाव से बालकों जैसा निर्मल, योद्धाओं जैसा साहसी तथा वेदों-शास्त्रों का प्रकाण्ड पण्डित होगा। 24 अक्षर का उसके जीवन में बड़ा महत्व होगा। चौबीस अक्षर वाले मंत्र का जाप कर वह 24 वर्ष तक तप करेगा तथा वही चौबीसवाँ अवतार होगा। सारे विश्व पर उसका प्रभाव छा जायेगा”।
अवतारों को प्रायः जीवनकाल में पहचाना नहीं जाता। राम पर भी लाँछन लगे व कृष्ण को भी किसी ने नहीं बख्शा। हम सब को इस पर गर्व होना चाहिए कि हमारे बीच एक देवसत्ता आई व अपनी लीला दिखाकर चली गई। चलेंगे सब अब उसी की नीति पर। कहीं हम प्रमादग्रस्त न हो जायें व लोग यही न कहने
लगें कि अवतार सत्ता आई व उनके साथ रहने वाले ही उन्हें न पहचान पाये। कर्तृत्व व यशोगाथा हमारे सामने है। करना सिर्फ यह है कि उनके विचारों का विस्तार विश्व के कोने-कोने तक, हम सब उनसे जुड़ने वाले व भविष्य में उन्हें पहचानने वाले, करके दिखायें।
एक कार्यक्रम के सिलसिले में गुरुदेव को एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाना था। पहले स्थान के कार्यकर्ता उनके जाने की व्यवस्था बनाने में जुटे थे। किसी का मत था एयरकंडीशंड कोच का टिकट ले लिया जाये यात्रा आराम से कट जाएगी। कुछ लोग फर्स्ट क्लास की वकालत कर रहे थे। उनके अनुसार इस तरह जाने से न केवल यात्रा आरामदायक रहेगी, बल्कि खुली हवा का लाभ मिलेगा।
चल रही इस चर्चा के कुछ शब्द गुरुदेव के कानों में पड़े उन्होंने इन सबको पास बुलाकर कहा मुझे पैसिन्जर ट्रेन में साधारण डिब्बे का टिकट खरीद कर ला दो। रिजर्वेशन की भी जरूरत नहीं। पैसे भी बचेंगे और मैं आराम से अपना लेखन भी कर लूँगा। उन दिनों उनकी चलती ट्रेन में लिखने की आदत थीं। यद्यपि एनीबेसेण्ट भी इस तरह लिखा करती थी, पर उनका अपना निजी सैलून होता था। एकाग्रता और मितव्ययिता का ऐसा अद्भुत मिलन शायद पहली बार हो रहा था। गाँधी के इस अनुयायी को यही सादगी शोभा भी देती थी।
विज्ञान बाहर की प्रगति है एवं ज्ञान अन्तः की अनुभूति।
जिससे हम कुछ नहीं सीख सकते ऐसा संसार में कोई नहीं।
उत्तर प्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल डॉ एम. चन्नारेड्डी अब आँध्रप्रदेश के मुख्य मंत्री शान्तिकुंज आये हुए थे। यह शुरू के दिनों की बात है। तब वे न केवल सभी को पर्याप्त समय देते थे। बल्कि कभी कभी अतिथियों को स्वयं आश्रम की सारी गतिविधियों का परिचय देते। इस बार भी कुछ ऐसा ही हुआ।
आश्रम घूमने के बाद भाव विमुग्ध हो माननीय राज्यपाल ने स्टेज से अपने उद्गार व्यक्त करते हुए कहा-”यहाँ मैंने अपनी कल्पना से भिन्न देखा, अतएव जो सोच कर आया हूँ, उससे भिन्न बोलूँगा। मैं यहाँ से उस शक्ति को प्रस्फुटित होते देख रहा हूँ, जो गाँधी के सपनों को साकार कर सकती है।” कुछ रुक कर वह भावुक होते हुए बोले-”मैं देख रहा हूँ कि यह कार्य गंगा से लेकर गोदावरी, कृष्णा, कावेरी तक फैसला चला जा रहा है? कभी दक्षिण ने भारत को आचार्य शंकर दिया था, जिन्होंने ठेठ हिमालय तक आकर भारत की साँस्कृतिक एकता स्थापित की। अब इस बार इसे आचार्य श्रीराम शर्मा कर रहे हैं।”
उपस्थित समुदाय यह सुनकर गदगद हो गया।
हारता वह है जो हिम्मत गंवा बैठता है।
दुनिया की निन्दा स्तुति की परवाह मत करो। हृदय टटोलो और उसी की आवाज सुनो।
सोलह से बीस जून 1991 की तिथियों में विदाई सम्मेलन आयोजन चल रहा था। प्रायः हजारों लोग आए हुए थे। उस दिन ग्यारह से एक बजे रात्रि तक तेज बारिश होती रही। किसी को कुछ परेशानी तो नहीं हुई पर पंडाल अवश्य भीग कर गिर गया। सुबह विदाई प्रवचन था। सबसे मुलाकात भी करनी थी। यह सब कैसे सम्भव हो?
सुनकर उन्होंने एक स्वयं सेवक को बुलाकर कहा-तुम सभी से जाकर कह दो कि सब अपने-अपने स्थान पर अपना काम करते रहें। मैं स्वयं आकर मिलूँगा। आप!इस तरह स्वयं सेवक पूरी बात कहता कि वह बोले, क्यों? मैं बहुत बड़ा आदमी हूँ और वह सचमुच स्नेह शीलता हृदय से सबसे मिले। लगा जैसे अयोध्यावासियों से विदा लेते हुए राम सबसे मिल रहे हों। ऐसी निरभिमानता और प्रेम भरा हृदय और कहाँ मिलेगा? अभी भी ऐसा लग रहा है,जैसे वह कह रहे हों “मैं स्वयं आकर सबसे मिलूँगा। “मिलेंगे वह अवश्य मिलेंगे। “
बहुमुखी व्यक्तित्व के, भंडार थे तुम। और सबका, श्रेष्ठतम श्रृंगार थे तुम॥ 1॥
और जो थे, थाह तक पाते नहीं हैं। क्या नहीं थे, यह समझ पाते नहीं हैं॥
आपका जिस क्षेत्र में भी, आगमन था। झाँकता उस क्षेत्र में ही बाँकपन था॥
व्यक्ति क्या थे, शक्ति का आगार थे तुम। बहु मुखी व्यक्तित्व के, भंडार थे तुम॥ 2॥
जब चलाई ‘लेखनी’, अद्भुत चलाई। व्यास! तुम ने गणपति बन कर उठाई॥
बेलने में वेद चारों ही मुखर थे। वाक्य क्या ये ऋचाओं जैसे प्रखर थे॥
ज्ञान के विज्ञान के आधार थे तुम। बहुमुखी व्यक्तित्व के भंडार थे तुम॥3॥
“साधना” करने तुले, तो की अनूठी। फिर अछूती साधना, कोई न छूटी॥
और गायत्री-उपासक, जग बनाया। भेद कोई भी, कभी आड़े न आया॥
मुक्ति का, सबके लिये ही द्वार थे तुम। बहु मुखी व्यक्तित्व के भंडार थे तुम॥4॥
“संगठन” ऐसे, किया परिवार निर्मित। जो न था कुल, जाति, धर्म, समाज सीमित॥
सृष्टि कर डाली, वसुधैव कुटुम्बकम् की। तोड़ दी दीवार, सारे भेद भ्रम की॥
भेद भावों से परे थे, प्यार थे तुम। बहु मुखी व्यक्तित्व, के भंडार थे तुम॥5॥
‘शिल्प’ करने जब, अनूठी साधना की। स्वर्ग से कम की, नहीं कुछ कल्पना की॥
अनूठे शिल्पी। तराशा मानवों को। गढ़, दिया तुमने सुगढ़, युग साधकों को।
देव परिकर को लिये, अवतार थे तुम। बहु मुखी व्यक्तित्व के, भंडार थे तुम॥6॥
ऐसे ईश्वर को खोज निकालें। जो चरित्र बन कर साथ साथ रह सके।
हुए प्रकंपित स्वर, नयनों में विकल वेदना छाती। महाप्राण से अब प्राणों की, दूरी हमें रुलाती॥ क्षुद्र अकिंचन हम दीपों ने, ज्योति तुम्हीं से पाई। हारे थके हुए नयनों में, तुमने आस जगाई। टूटी मनवीणा की अनुपम, सरगम पुनः सजाई। दिशाहीन जब भटक रहे थे, राह नई दिखलाई॥
अनुपम अनुदानों की गाथा, नहीं भुलायी जाती। विष में डूबी मानवता को, सुधापान करवाया। दुख दर्दों से बिलख रहे, उनमें मधुहास जगाया। प्यासी जगती ने तुम से ही, स्नेह स्रोत है पाया। अखिल विश्व को धर्म और संस्कृति का पाठ पढ़ाया॥
हर पल जले जगत के हित में, बनकर दीपक बाती। आज हमारी बारी है, हम भी विश्वास दिलावें। आदर्शों के लिए हृदय में, तड़पन व्यथा जगावें। बन प्रामाणिक और क्रियारत, अविरल कदम बढ़ाएं। बच हुआ जो काम प्राण देकर भी उसे बनाएं॥
सींचे खून पसीने से, अभिनव अंकुर की थाती। भागीरथी ज्ञान की गंगा, से जग को सरसाने। क्रांति विचारों में लाने को, बुने आज ताने बाने। समता ममता और एकता, के हम गायें तराने। नन्दन बन के पुष्प बनें इस वसुधा को महकाने॥
राह नवल निर्माणों की, हमको आवाज लगाती। महाप्राण से अब प्राणों, की, दूरी हमें रुलाती॥
घास खेत में चरी जाती है और जुगाली छाया में बैठ कर। अनुभव संसार से एकत्रित करें और उसे पचाने के लिए एकान्त में मनन करें।
ओ सविता देवता! संदेशा, मेरा तुम ले जाना। जहाँ कहीं हों गुरुवर, उन तक सुनो इसे पहुँचाना॥
कष्ट दिया तुमको कि तुम्हारी, ही सब जगह पहुँच है। सब लोकों के अधिपति हो, यह बात शास्त्र सम्मत है॥
हम लाखों बच्चों के हित तुम, इतना कष्ट उठाना॥ कहना-”चले गये तुम, पर विश्वास सुदृढ़ यह रखना।
बचा कार्य हम पूर्ण करेंगे, अब न पड़ेगा कहना॥ रहो कहीं, पर शक्ति सतत् बढ़ने की देते जाना॥
आँसू भी आये थे, पर उनको कर यत्न सुखाया। त्यागी देहासक्ति, और उपदेशों को दुहराया॥
बन सिद्धान्त बसे हो हम सबमें, न इसे बिसराना॥ लक्ष्यपूर्ति में ही सान्निध्य, तुम्हारा हम पायेंगे।
सिसकेगा तो हृदय मगर, यह कहकर समझायेंगे॥ वह विराट् प्राणी तो साथ है, अतः न मन घबराना॥
तुम केवल मानव कब थे, प्रभु! तुम तो थे अवतारी। युग परिवर्तन हित दी, “युग निर्माण योजना” प्यारी॥
इसमें मिला सही जीवन, जीने का विशद खजाना॥ वे हैं गायत्री सुत, सत्यलोक में मिल जायेंगे।
सुन कर यह संदेश शाँति, आत्मा की वे पायेंगे॥ लिया बहुत उनसे हम सबने, अब है फर्ज निभाना॥
फूटे नगाड़े की आवाज में क्या रस? चरित्रहीन के उपदेश में क्या दम?
तप के बल पर आ जाते हैं, बड़े बड़े भूचाल। सूरज को भी हतप्रभ कर देता, तपसी का भाल॥1॥
जब सूरज तपता है, जलनिधि भी जलंधर बन जाता। सूरज के तप से, हिमनद का भी तो हिम गल जाता॥
सोना तपता है, तो काया भी कुंदन हो जाती। दूध तपा करता जब, ऊपर स्वयं मलाई आती॥
तप संभव कर देता सब कुछ, तप में बड़ा कमाल। तप के बल पर आ जाते हैं, बड़े बड़े भूचाल॥
आप तपे हैं इतना, तप के ही पर्याय हुये हैं। अरे तपस्वी! तपने भी आ, तेरे चरण छुए हैं।
केवल तन मन नहीं तपाये, जीवन प्राण तपाये। तेरे तप ने दधीचि से भी, आगे कदम बढ़ाये॥
तप की गाथाएं बौनी हैं, इतना हुआ विशाल। तप के बल पर आ जाते हैं, बड़े बड़े भूचाल॥
तेरा तप फिर कैसे, अपना रंग नहीं लायेगा। अब तेरा संकल्प कौन सा, पूर्ण न हो पायेगा॥
तेरे संकल्पों ने तपसी! हम को शिल्प किया है। तूने हमको अपने दुर्लभ तप का अंश दिया है॥
यह कैसे भूलेंगे, तूने हम को किया निहाल। तप के बल पर आ जाते हैं, बड़े बड़े भूचाल॥
हम मलाई बन कर तैरेंगे, जग की जलन मिटाने। और मनुजों के घावों को, शीतलता पहुँचाने॥
तेरे हैं, इसका परिचय, हम देंगे आचरणों से। जैसे सूरज का परिचय, मिलता उसकी किरणों से।
देते रहना हमें तपस्वी! गरिमा भरी उछाल। तप के बल पर आ जाते हैं, बड़े बड़े भूचाल॥
हम उज्ज्वल भविष्य, के आने तक चलते जायेंगे। और हमारे प्राणों के दीपक, जलते जायेंगे॥
नई सदी के अभिनन्दन में, आगे खड़े दिखेंगे। दुष्प्रवृत्तियों के उन्मूलन में, हम अड़े दिखेंगे॥
पहिनायेंगे महाकाल को, इन मुँडों की माल। तप के बल पर आ जाते हैं, बड़े बड़े भूचाल॥
साबुन से कपड़े धोए जाते हैं, कीचड़ से नहीं। दूसरों को सुधारने से पहले अपने को सुधारो।
प्रस्तुत समय के बारे में सभी विद्वान, ज्योतिर्विद्, अतीन्द्रिय द्रष्टा एकमत हैं कि यह युगसन्धि की बेला है। विषमताएं अपनी चरमसीमा पर पहुँच गयी हैं। चारों और काम, क्रोध लोभ व मोह का ही साम्राज्य छाया दिखाई देता है। ऐसे ही समय में धर्म की रक्षा और अधर्म का विध्वंस करने के लिए भगवान द्वारा अवतार लिये जाने की शास्त्रीय मान्यता हैं क्योंकि भगवत् सत्ता अपनी प्रेरणा पुरुषार्थ द्वारा असंतुलन को संतुलन में बदलने के लिए वचनबद्ध है। “तदाऽऽत्मनं सृजाम्यहम्” जैसे गीता के वचनों के माध्यम से दिया गया उनका आश्वासन ऐसे अवसरों पर ही प्रत्यक्ष होता रहा है।
ज्योतिर्विज्ञान के अनुसार प्रस्तुत समय कलियुग के अंत तथा सतयुग के आरम्भ का है। कालगणना जो समस्त पूर्वाग्रहों को परे रख कर की गई है, बताती है कि यह हमारे इतिहास के पाँचवे कल्प का संक्रमण काल है। महतकल्प, हिरण्यगर्भ कल्प, ब्रह्मकल्प, पद्मकल्प बीत चुके। वाराहकल्प 13700 विक्रम पूर्व से आरंभ होकर अब तक चल रहा है। वैवस्वत मन्वन्तर (सप्तम) भी चल रहा है। भारत के प्रख्यात ज्योतिर्विदों ने सन् 1964 में एक सम्मेलन आयोजित कर एक महत्वपूर्ण घोषणा की थी कि नौ अवतारों के बाद कल्कि अवतार का प्राकट्य हो चुका है एवं इस समय उसे “बौद्धों” अर्थात् बुद्धिजीवियों के दुष्प्रभाव को निरस्त करने तथा श्रद्धा सद्भावना का नवयुग लाने में व्यस्त होना चाहिए। वे पाश्चात्य ज्योतिर्विदों की इस बात से सहमत नहीं थे कि उसका अवतरण इस सदी के अंत में होगा। उन सभी ने विश्व की कुण्डली बनाकर यह प्रमाणित किया कि निष्कलंक प्रज्ञावतार का अवतरण भारत भूमि में हो चुका है वह इस समय उसे सक्रिय होना चाहिए। उनके अनुसार 1990 से 2010 के बीच उसका प्रभाव सूक्ष्म रूप से अति तीव्र वेग से फैलने व सारे विश्व को अपने प्रभाव क्षेत्र में लेने की सम्भावना बतायी गयी है।
इस संदर्भ में सभी ज्योतिर्विद् बरार के विद्वान ज्योतिषी ज्योतिर्भूषण श्री गोपीनाथ जी द्वारा 5 सितम्बर 1926 को बनाई गई विश्व कुण्डली को प्रामाणिक मानते है।
इस कुण्डली के अनुसार लग्न तुला उच्च के शनि से युक्त थी, पराक्रम के स्थान पर उच्च का केतु सुख के स्थान में गुरु, सप्तम में स्वगृही मंगल, नवें में उच्च का राहु, कर्म स्थान में स्वगृही चन्द्र और शुक्र के साथ उसकी युति थी। ये सभी विज्ञान और नये धर्म की प्रतिष्ठा के सूचक है। लाभ भाव में बुद्ध और स्वगृही सूर्य का युक्तीकरण भारतवर्ष के धन और ऐश्वर्य की वृद्धि के सूचक है। यह लग्न भगवान कृष्ण, भगवान राम के जन्म के लग्न की याद दिलाती है और यह बोध होता है कि संसार में फिर से धर्म की स्थापना करने वाली शक्ति व अवतार का प्राकट्य हो गया होना चाहिए, भले ही लोग उसे बाद में समझ पायें। (“देवदूत आया हम पहचान न सके”पुस्तक सके पृष्ठ-19-20)
वस्तुतः गड़बड़ी वहाँ आती है, जब अर्थ का अनर्थ कर कालगणनादि के द्वारा आर्य ग्रन्थों में उद्धृत प्रसंगों को भी उलट-पलट दिया जाता है।
वस्तुतः गड़बड़ी वहाँ आती है, जब अर्थ का अनर्थ कर कालगणनादि के द्वारा आर्य ग्रन्थों में उद्धृत प्रसंगों को भी उलट-पलट दिया जाता है।
ब्राह्मस्यतु क्षपादस्य यत्प्रमाणं समारुतः। एकैकशो युगानान्तु क्रमशस्त्रत्रिर्बधितः॥ चत्वार्याहु सहस्त्राणि वर्षाणाँतु क्रतं युग। तस्यतावत शती संध्या संध्याशशच तथाविधः॥ इतेयेरेषु ससंध्येषु ससंध्याशेषु चत्रिपु। एकोयायेन वर्तन्ते सहस्राणि शतानिच॥
(मनु 1/67-69)
अर्थात् ब्रह्मा जी के अहोरात्र में सृष्टि के पैदा होने और नाश होने में जो युग माने गये हैं, वे इस प्रकार हैं-चार हजार वर्ष और उतने ही शत अर्थात् चार सौ वर्ष की पूर्व संध्या और इतने ही वर्षों की उत्तर संध्या। इस प्रकार कुल 4800 वर्षों का सतयुग, तीन हजार वर्षों का त्रेतायुग, दो हजार वर्षों का द्वापर तथा बारह सौ वर्ष का कलियुग हुआ।
इसके बाद श्रीमद्भागवत् के स्कन्द 12, अध्याय 2 के 34 वें श्लोक को देखा जाय।
दिव्याब्दाना सहस्रान्ते चतुर्थेतु पुनः कृतम्। भविष्यति यदानृणा मन आत्मप्रकाशकम्॥
अर्थात् चार हजार दिव्य वर्षों के अन्त में अर्थात् चार हजार दिव्य वर्षों में कलियुग बीता, फिर सतयुग आयेगा जो मनुष्यों के मन और आत्मा में प्रकाश भर देगा।
यहाँ दिव्य शब्द ध्यान देने योग्य है भूल से पण्डितों ने इससे अर्थ देवता ले लिया एवं 360 से गुणा करके (देवताओं का एक दिन बराबर एक मानुषी वर्ष)432000 बना दिया और इतने वर्ष की कलियुग की अवधि लिख दी। ऋग्वेद 2/164/46 के अनुसार जो दिवि में प्रकट होता है जो अग्निरूपी सूर्य है, वही दिव्य है। दिविद्यु को कहते हैं ओर द्युदिन का नाम है। अतः सूर्य के दिन के हिसाब से पुनः गणना करने पर सतयुग 1200 वर्षों का, त्रेता 2400 का, द्वापर 3600 का तथा कलियुग 4800 वर्षों का है। 4000 वर्ष भागवत के श्लोकानुसार कलियुग के व संधिकाल के 800 इस प्रकार 4800 वर्ष हुए जो अब समाप्त होने को आ रहे हैं।
महाभारत बन पर्व अध्याय 190 श्लोक 88 से 19 2024 का समय कयामत का है। कयामत से तात्पर्य है कि फिर कोई पापी नहीं रहेगा। मक्का के हमीदिया पुस्तकालय में “अल्कश्फ वल्कात्मफी मार्फत” पुस्तक रखी हुई है। उसमें लिखा है कि “कयामत तब आयेगी जब फूट, कलह और व्यभिचार बढ़ जाएंगे। तब एक महापुरुष आएगा। वह आध्यात्मिक शक्ति से पूर्ण होगा एवं अपनी आत्मशक्ति के प्रभाव से सारे आग्नेयास्त्रों को बेकार कर देगा। वह संसार को स्वर्ग बना देगा और बूढ़ों को जवान बना देगा।” इसी प्रकार का विवरण “इमामे आखिकज्जमा” ग्रन्थ में भी मिलता है। मदीना को प्रसिद्ध पुस्तक “मकसूम बुखारी” के अनुसार हिजरी सन् की चौदहवीं शताब्दी की दूसरी तिहाई में कयामत आएगी और हजरत मेंहदी प्रकट हो जाएंगे। वे सब धर्मों के मसीहा होंगे।
वस्तुतः अवतार की काल गणना प्रसंग ऐसा टेढ़ा व विवादास्पद है कि उस पर ढेरों वाद प्रतिवाद प्रस्तुत किये जा सकते हैं, पर वस्तुतः जो हलचलें परोक्ष जगत में सक्रिय रहती हैं व जो क्रिया कलाप मानवी कर्तृत्व के रूप में, किस प्रकार, कहाँ क्रियाशील है।
अवतारों का भी क्रमिक विकास हुआ है। इनकी कलाएं क्रमशः बढ़ती चली गई हैं। कच्छ मच्छ एक एक कला के अवतार थे। वाराह और वामन दो दो के। नृसिंह और परशुराम तीन तीन के माने जाते हैं। राम बारह के, कृष्ण सोलह के तथा बुद्ध बीस कला के अवतार माने गये हैं। निष्कलंक के बारे में यह कहा गया है कि वे चौबीस कला के अवतार हैं। यह क्रमिक विकास है। सृष्टिक्रम में अवतारों की यह श्रृंखला अनवरत चलती चली आ रही है एवं संपूर्ण चौसठ कला को पहुँचने तक चलती ही रहेगी।
प्रज्ञावतार का व युगसंधि का प्रसंग यहाँ विस्तार से इसलिए दिया जा रहा है कि परिजन इस अवतारी विचार प्रवाह को पहचान सकें जो उनके जीवन काल में उनके समक्ष उपस्थित रहा, वे उससे जुड़े भी व आगे भी जुड़े रहेंगे। अवतार को जानने, पहचानने के बाद देवमानवों को आत्मबोध कराना कठिन नहीं है कि वे क्या हैं?
भूतकाल के अवतारों में प्रारंभिक कार्यक्षेत्र भौतिक परिस्थितियों से जूझना, अनाचारियों से लड़ना तथा श्रेष्ठता की स्थापना तक सीमित रहा है। प्रज्ञावतार से सबसे अधिक समीप है बुद्धावतार जिसमें बुद्धि की शरण में जाने का, लोकमानस को सत् प्रेरणा देने का प्रचण्ड अभियान चला। प्रज्ञावतार का कार्यक्षेत्र अधिक व्यापक व क्लिष्ट प्रकार का है। उसे सामयिक समस्याओं एवं व्यक्तिगत उद्दण्डताओं से जूझना ही नहीं वरन् लोकमानस में ऐसे आदर्शों का बीजारोपण, अभिवर्धन, परिपोषण व क्रियान्वयन करना है जो सतयुग जैसी भावना और रामराज्य जैसी व्यवस्था के लिए आवश्यक अंतःप्रेरणा एवं विस्तार को देखते हुए प्रज्ञावतार की कलाएं चौबीस होना स्वाभाविक है।
पुरुषसूक्त में भगवान के स्वरूप का दिग्दर्शन कराते हुए उसे “सहस्र शीर्ष पुरुषः सहस्राक्षः सहस्र पाद” हजार सिर वाला, हजार हाथ पैर वाला बताया गया है। अर्थात् ब्रह्म तो एक ही है पर विशेष अवसरों पर वह अपने विशेष साधनों, उपकरणों द्वारा अभीष्ट प्रयोजन की पूर्ति करता है। सृष्टि संचालन ही नहीं, युगपरिवर्तन जैसे विशिष्ट अवसरों पर हजारों जीवनमुक्त उच्चस्तरीय आत्माएं उसकी सहचर बनकर महाकाल का प्रयोजन पूरा करती हैं।
भगवान एक अवश्य हैं पर जब वे कुछ विशेष प्रयोजन पूर्ण करते हैं तब एकाकी नहीं रहते वरन् सहस्र रश्मियों वाले अंशुमाली की तरह प्रकट होते हैं। युगपरिवर्तन जैसे प्रयोजनों में तो उनका सहस्र शीर्षारूप निश्चित ही स्पष्ट हो उठता है। महाकाल को विशेष अवसरों पर ऐसा महारास रचना पड़ता है जिसमें उत्कृष्ट आदर्श के लिए सहस्रों महामानव कार्यरत दिखाई पड़ें।
इन दिनों यही सब हो रहा है। एक प्रबुद्ध विचार प्रवाह उस कमल पुष्प से उद्भूत हुआ जिसे सहस्र दल कमल कहते हैं। ब्रह्माजी की उत्पत्ति कमल पुष्प से ही है। यह मस्तिष्क मध्य ब्रह्मरंध्र में अवस्थित है। अध्यात्मबल यहीं केन्द्रित रहने के कारण ईश्वर की उत्पत्ति एवं स्थिति का केन्द्र बिन्दु उसे ही माना गया है। प्रचण्ड विचारों का चक्रवात यहीं से उद्भूत हुआ। एक अवतारी महामानव के मस्तिष्क के माध्यम से उन विचारों ने चेतना क्षेत्र में बढ़ती असुरता के निवारण का तथा आध्यात्मिक पूँजी सम्पन्न प्रबुद्ध आत्माओं को जगाने का काम किया। दशम निष्कलंक अवतार इन्हीं सबकी संघशक्ति का प्रतीक है।
महाकाल का, अवतारी प्रक्रिया का प्रबुद्ध आत्माओं में अवतरण स्वाति बूँद की तरह होता है जिससे साधारण दिखने वाली सीपी को भी अपने गर्भ से महान मोती उगाने का सौभाग्य मिलता है। इस अनुग्रह से सामान्य व्यक्तित्व भी देखते देखते महान हो जाता है।
संधि काल की विषम वेला, भारत व विश्व के महान गौरव व वर्चस्व को पुनः अपने स्थान पर प्रतिष्ठापित करने वाली आत्माओं का अवतरण तथा प्रचण्ड विचारशक्ति प्रवाह के रूप में महाकाल का स्वयं का नरतन देह धारण करके आगमन इसी शताब्दी में हुआ है जिसके लिए मानवता कब से तरसती प्यासी बैठी थी। भगवान बुद्ध के बाद पिछले 2000 वर्षों में महापुरुषों का उत्पादन प्रायः रुक सा गया था। अब पिछली एक शताब्दी में खण्ड अवतारों के रूप में तीन का प्राकट्य हो चुका, चौथे अंतिम का जो सतयुग की वापसी का संदेश लेकर आ रहा है, प्राकट्य सूक्ष्म व कारण शरीर की सक्रियता के रूप में आगामी दस वर्षों में सक्रिय होता देखा जा सकेगा। उसकी पूर्व भूमिका पहले ही बन चुकी है।
खण्ड अवतारों में प्रथम थे श्रीकृष्ण परमहंस, दूसरे योगीराज अरविन्द। तीसरा अवतरण शान्तिकुँज की युगान्तरीय चेतना, युगनिर्माण आन्दोलन के रूप में विगत चालीस वर्षों से सक्रिय है, अब चौथा विश्वव्यापी होगा, सूक्ष्म विचार प्रवाह के रूप में होगा तथा विचार परिवर्तन द्वारा वह पूरे विश्व का काया कल्प कर देगा। ये चारों मिलकर पूर्णावतार का निर्माण करेंगे।
इन चारों ही खण्ड अवतारों का प्रभाव रहा है कि भारतभूमि ने प्रखर चेतना सम्पन्न महामानव जितने इस अवधि में उत्पन्न किये हैं। उतने चिरकाल में उत्पन्न नहीं किये। ठाकुर श्री रामकृष्ण द्वारा भक्तियोग की तथा श्री अरविन्द द्वारा ज्ञान योग की भूमिका सम्पन्न हुई। दोनों देवदूतों ने वातावरण को गर्मी प्रदान की तथा तपश्चर्या द्वारा ऐसा वातावरण उत्पन्न किया जिससे बंकिमचन्द्र महामना मालवीयजी, गोपाल कृष्ण गोखले,जस्टिस रानाडे, दादा नौरोजी, केशवचन्द्र सेन, तांत्या टोपे, लक्ष्मीबाई, स्वामी विवेकानन्द, भी शारदा, भगिनी निवेदिता,महात्मा गाँधी, नेहरू,पटेल मौलाना आजाद, चितरंजनदास, राजेन्द्र बाबू, एनीबेसेंट, सरोजिनी नायडू, शचीन्द्र सान्याल, चन्द्रशेखर आजाद, रासबिहारी बोस, भगतसिंह, दुर्गा देवी, पांडिचेरी की श्री माँ, नीरोटवरण जैसी अनेकानेक विभूतियाँ जन्मी तथा असाधारण पुरुषार्थ सम्पन्न कर गयीं। रामकृष्ण व माँ शारदा का तथा योगीराज अरविंद एवं महाकाली के प्रखर प्रज्ञा-सजल श्रद्धा के युग्म के रूप में देखी जा सकती है।
यहाँ ध्यान रखा जाना चाहिए कि कोई भी व्यक्ति जन्म से ही देवदूत नहीं होता। महाकाल और महाकाली उसे किसी विशेष अवसर पर अपना वाहन बनाते हैं और देहधारी के माध्यम से वे सूक्ष्मताएं अपना काम करती चलती जाती हैं। अदृश्य शक्ति परोक्ष सत्ता किसी दृश्य माध्यम से ही अपने क्रिया-कलापों को सम्पन्न करती है। तब सामान्य मनुष्य भी असामान्य पुरुषार्थ दिखाते दीख पड़ते हैं। जिस प्रकार गंगावतरण के समय भगवती सुरसरि ने शिवजी की जटाओं को वाहन चुना था, समय-समय पर कितने ही नर-नारी इन जटाओं का प्रयोजन पूर्ण करते हैं।
वर्तमान काल में सन् 1911 में पूज्य गुरुदेव के रूप में एक देवदूत का अवतरण हुआ। महाकाल की सत्ता ने उसे अपना माध्यम बनाया एवं उसने 60 वर्ष की आयु पहुँचने तक युग निर्माण योजना का एक विशाल संगठन खड़ा करके रख दिया जिसमें कितनी ही सुसंस्कारिता सम्पन्न जागृतात्माएं हैं। समय आने पर उन्हें झकझोरने के लिए हमारी गुरुसत्ता ने जो निष्कलंक प्रज्ञावतार के रूप में जन्मी थी, स्थूल काया से महाप्रयाण किया। महाप्रयाण के पूर्व भी स्वयं को पाँच में बाँटकर सूक्ष्मीकरण कर बहुमुखी आत्मविस्तार कर डाला। अब वही सत्ता परोक्ष जगत से खण्डावतारों का बचा शेष कार्य सम्पन्न करने सूक्ष्म शरीर से सक्रिय हो गई है। हमें निश्चय करना है कि हम दुष्ट दुष्प्रवृत्तियों की मरणासन्न कौरवी सेना में सम्मिलित हों अथवा धर्मराज की धर्म संस्थापक सेना में।
खण्डावतार की, निष्कलंक प्रज्ञावतार की भूमिका वह महामानव कैसे सम्पन्न करेगा जिसे हम साधारण मनुष्य के रूप में देखते थे व अब जिसकी स्थूल देह भी अग्नि को समर्पित कर दी गई, उनके लिए पूज्य गुरुदेव की जन्म कुण्डली व उसका फलादेश प्रस्तुत है जो सन् 1983 में एक प्रज्ञाचक्षु ज्योतिर्विज्ञानी ने किया, जिसकी गणित ज्योतिष में महारत हासिल है तथा अभी भी प्रमाण देने के लिए विद्यमान है।
आप दुनिया में सबसे महान् पुरुष है। पर एक ही दुर्गुण उसे ढके हुए है,
वह दुर्गुण है- सद्गुणों को व्यवहार में न लाना।
वीरों का मन न वज्र से टूटता है और न प्रलोभन की कीचड़ से फिसलता है।
जिसका अहंकार जितना बढ़ा-चढ़ा है। वह वस्तुतः उतना ही छोटा और अनाड़ी है।
जीवन रूपी परिधि के केन्द्र हैं विचार। केन्द्र की तनिक सी हलचल समूची परिधि को प्रभावित करती है और जब परिधि को पूर्णतया बदल डालना अनिवार्य लगने लगा हो, तब जरूरी है केन्द्र में व्यापक फेर बदल की जाय। इसी आधार पर विचार क्राँति का प्रवर्तन करने वाले पू. गुरुदेव ने अपने वार्तालाप में इसी वर्ष जनवरी के प्रथम सप्ताह में सामने बैठे हुए कार्यकर्ताओं को इसकी समर्थता बताते हुए कहा था-”तुम लोग विचार क्राँति को मजाक मत समझना। मेरी विचार क्राँति के बीज जिस दिन फूटेंगे, धमाका कर देंगे।” अगले दिनों इसी धमाके और उससे होने वाले व्यापक परिवर्तन का समूचा विश्व साक्षी होने जा रहा है।
रात्रि को जल्दी सोना व प्रातः डेढ़ बजे से उठकर अपनी दिनचर्या प्रारंभ कर देना उनकी एक नियत दिनचर्या थी। जब आंवलखेड़ा व मथुरा में थे तो गुरुदेव अपने साथ बच्चों को पास बुलाकर तारों में से एक एक की पहचान करवाते। उन सभी ग्रहों गोलकों, नक्षत्रों के बारे में विस्तार से समझाते। बालसुलभ जिज्ञासाओं का वर्णन करते हुए बताते कि-”इन नक्षत्रों व पृथ्वी की स्थिति में क्या अन्तर है। चन्द्रमा कैसे बढ़ते बढ़ते पूर्णिमा का चन्द्रमा व घटते घटते अमावस्या बना देता है, गुरुत्वाकर्षण शक्ति क्या है वह किस आधार पर सितारों से टंकी यह चादर ऊपर लगी हुई, हमारे ऊपर नहीं गिरती? बिजली पहले चमकती है कि गरजती है?” जिन सौभाग्यशालियों को यह अवसर मिला है, वे बताते हैं कि विज्ञान की विशद जानकारियों, जो उनने अध्ययन से बढ़ाई थीं, से उन्हें किस तरह लाभान्वित कर उनकी रुचि विज्ञान की ओर मोड़ दी गयी। अंतरिक्ष विज्ञान की उन्हें उतनी ही विस्तृत जानकारी थी, जितनी कि उस विषय के विशेषज्ञ को हो सकती है।
साधना का निवास स्थान है-ईश्वर विश्वास। इसके अभाव में साधना टिक नहीं सकती। जो अनेकानेक साधनाओं का पथ-प्रदर्शक हो उसके पास तो ईश्वर अपनी चरम और परम स्थिति में होना चाहिए। था भी ऐसा। मथुरा के दिनों का प्रसंग है, तब विख्यात उद्योगपति जुगलकिशोर बिड़ला अक्सर आया करते थे। एक दिन आने पर उन्होंने कहा “आचार्य जी!मैं आपकी कुछ आर्थिक सहायता करना चाहता हूँ। “मिशन तब अपनी शैशव अवस्था से गुजर रहा था, अर्थ की आवश्यकता तो थी ही। वह हंसते हुए बोले-”बिड़ला जी! कहाँ से आता है धन आपके पास “भगवान देता है। “ उनका जबाब था। “अच्छा! तब भगवान से हमारी सीधी जान-पहचान है, वहीं से हम भी ले लेंगे। “ हंसते हुए कही गई इस बात ने उनका जीवन दर्शन स्पष्ट कर दिया। प्रत्यक्ष रूप से जनता जनार्दन के दस-दस पैसों का अंशदान और परोक्ष रूप से ईश्वरीय शक्तियाँ उनकी सहायक बनी। पूंजीपतियों पर निर्भरता उन्हें कभी स्वीकार न थी।
पं. कन्हैया लाल दुबे ज्योतिषी भक्त गरीब दास महादेव द्वारा अध्ययन प्रस्तुत किया गया जिसे श्री पुरुषोत्तम राव गरुड़ ने लिपिबद्ध किया दिना पूज्यवर का जन्मागम -
जन्म दिनाँक 20-9-1911 दिन गुरुवार समय प्रातः 8 से 1 के मध्य आश्विन 13 सम्वत् 1968, जन्म सामान्य स्थिति में। बचपन साधारण रहा, 24 से 32 के मध्य द्वितीय विवाह। 42 की अवस्था में चमत्कारिक व्यक्तित्व का परिचय प्रारम्भ 14 वर्ष के आसपास महान पुरुषों का सत्संग एवं दर्शन। 7 वर्ष की अवस्था से ही महिमावान बालक के रूप में माने जाने लगें।
साक्षात् भगवान के अवतार रूप। ईश्वर अंश आशीर्वाद दैवी शक्ति सम्पन्न होने का योग इस जातक को है। जिस कार्य को पूर्ण करने का प्रयास किया जा रहा है वह पूर्णतया सफल होकर रहेगा। अंशावतारी महत्पुरुष, जन्म लग्न का स्वामी चन्द्र, शुक्र और बुद्ध से युक्त है। इस कारण महान पुरुष-यह जातक होना चाहिए। तंत्र, मंत्र, जंत्र का विशेषज्ञ, शुक्र की उद्भूत शक्ति इन्हें प्राप्त है।
विश्व गुरु योग
विश्व योगी योग
विश्व सम्राट योग
अभी 72 वर्ष के आसपास की अवस्था होनी चाहिए। 80 वर्ष की आयु में विश्व, पूज्य महान तपस्वी के रूप में विख्यात आयु के बंधन से मुक्त। स्वेच्छा जीवी महापुरुष हैं। ऐसे ग्रह योग वाले जातक अमर योग के धनी होते हैं सप्तम शनि अपने चौथे घर को पूर्ण दृष्टि से देखता है। अतएव इनके विरोधी नहीं रहेंगे। सभी मित्र हो जावेंगे। नास्तिक से नास्तिक मन वाला व्यक्ति भी प्रभावित हो जावेगा।
ये विश्व पिता कहे जावेंगे। विश्व सत्ता इनके कदमों के नीचे पड़ी रहेगी इनकी सामान्य मृत्यु नहीं हो सकती। विचारों का संदेश प्रदान कर ये ब्रह्मलीन हो जावेंगे। स्वेच्छा से ईश्वर लीन होंगे। वर्तमान में इनकी अर्द्धांगिनी (माताजी) के चरणारविन्द में इतनी शक्ति है कि किसी स्त्री के खोटे ग्रहों की शाँति उनके चरण स्पर्श से एवं चरणामृत पान से हो जावेगी। यहाँ तक कि चरणामृत से खोटे ग्रहों के कारण लगने वाला वैधव्य योग भी कट जावेगा। आप साक्षात देवी हैं। अमर योग के धनी हैं। प्रथम पत्नी का मारकेश था। दूसरी पत्नी अमर योग वाली है। ब्रह्म के विधान से दो पत्नी योग बना।
इस जातक के पास संजीवनी शक्ति है। व्यक्ति को जीवित करने की ताकत इन्हें प्राप्त है। ये किसी भी व्यक्ति का कायाकल्प कर सकते हैं। शरीर के रोग को दूर कर सकते हैं। अंधे को नेत्र ज्योति। बहरे को श्रवण शक्ति दे सकते हैं। ब्रह्मा, विष्णु महेश की समस्त शक्तियाँ इनके शरीर में विद्यमान हैं। इनके कार्य इन्हें त्रैलोक्य में अमर करने के लिए पर्याप्त हैं। इनके चरण धूलि से हीरा भी छोटा है। शुक्र, बुध, चन्द्र और तुला के गुरु, के कारण यह सब है।
सन्तान पक्ष दो लड़के दो लड़कियाँ। सभी योग्य होंगे। एक लड़का त्यागी होगा कर्मनिष्ठ भाग्यशाली स्वभाव से खरे विद्यावान कर्मण्य सभी सन्तान होंगी। धनेश मंगल अष्टम है। संस्थागत सम्पत्ति होगी और बहुत बड़ी होगी। वर्तमान समय में सिंह राशि पर छाया होने से 21.9.82 तक साढ़ेसाती शनि का प्रभाव रहेगा। 23 जुलाई 1982 तक मंगल शनि से युक्त है। इस कारण मन में मलीनता के भाव उठ सकते हैं। ग्रह भाव का प्रभाव भी योगी पुरुष पर केवल छाया डालकर कट जाता है। उदर विकार 17 वर्ष से 27 वर्ष तक रहा होगा किन्तु खान-पान समय के प्रभाव से ठीक हो गया। सूर्य 12 वें में होने के कारण आँखों में कमजोरी चश्मे का प्रयोग किया जावेगा।
कर्मकांडी विवेकी योग बल एवं तपोबल सम्पन्न होने के कारण यह जातक स्वस्थ हैं अन्यथा रोग ग्रस्त हो जाता। चन्द्रमा, बुद्ध शुक्र गुरु ये चारों ग्रह इस जातक के लिए वरदान स्वरूप हैं। इनका प्रभाव इन्हें देवाँशी पुरुष बना देता है। नवम्बर 1982 आकस्मिक धन लाभ, पराक्रम श्रेष्ठ, प्रवास एवं स्थान, वृद्धि, मित्र समागम योग बनाता है विशेष सम्मान प्राप्त योग है।
सन् 1983 वर्ष आनंददायी, अर्थ लाभकारी स्थान वृद्धि सूचक मान सम्मान प्रतिष्ठा वृद्धिकारक वैभव सम्पन्न योग बनाता है।
सन् 1984 अत्यन्त श्रेष्ठ वर्ष सन् 1988 से 1996 के बीच सारे संसार में शत प्रतिशत कार्य सम्पन्न हो जावेगा।
सारे संसार के लोग इनके अनुयायी होने लग जावेंगे। सारे संसार में इनके नाम का डंका बज जावेगा। विश्व योगी विश्व पिता विश्व सम्राट के रूप में पूज्य हो जावेंगे।
ईश्वर तुल्य साक्षात ईश्वर। सन् 1991-1992 से किसी फलादेश का पता नहीं चलता। अज्ञात वास योग प्रारंभ हो सकता है। अदृश्य होकर भी विश्व को प्रकाशित करते रहेंगे। आत्म चेतना को ब्रह्म चेतना में अपनी स्वेच्छा से लीन करने का सामर्थ्य प्रदर्शित करके शाँत ज्योति स्वरूप रहेंगे।
अपराधी की अन्तरात्मा उसे कचोटती रहती है। यह बन्दीगृह से कम कष्टदायक प्रताड़ना नहीं है।
अविश्वासी होना बुरा है पर अन्ध विश्वासी होना उससे भी बुरा।
अन्तः करण की जाग्रत शक्तियाँ न केवल व्यक्ति वस्तु बल्कि मशीनों को भी प्रभावित करने में समर्थ हैं। योग शास्त्रों का यह प्रतिपादन जिसे अब परामनोवैज्ञानिक भी स्वीकारने लगे हैं-सन् 81 की उस ग्रीष्मकालीन संध्या को प्रत्यक्ष हो गया। बगल में वन्दनीया माताजी भी बैठी थीं। एक कार्यकर्ता की काफी दिनों से इच्छा थी कि ऐसी किसी गोष्ठी को टेप किया जाय, अभी हाल में ही उसने नया टेपरिकार्डर भी लिया था। सी उसने नया कैसेट, नये सेल लगाकर भली प्रकार जाँच लिया और उनके ठीक सामने टेपरिकार्डर चालू कर बैठ गया। गुरुदेव ने मुसकरा कर एक बार उसकी ओर कनखियों से देखा और बात शुरू कर दी। गोष्ठी समाप्त होने के बाद उसने नीचे आकर टेप शुरू कर बातें सुननी चाहीं। पर उसमें साँय-सायं की आवाज के सिवा और कुछ न था। सोचा शायद कुछ मशीन में खराबी आ गई हो, इसलिए दुबारा जाँच की, पर वह तो पूर्ववत् ठीक था। तब कहीं जाकर उसे उनकी मुसकान का गूढ़ार्थ स्पष्ट हुआ। उनकी इच्छा के बगैर बातें टेप होती भी तो कैसे। उसे रिकार्ड न हो पाने का दुख था साथ ही योग की इस विभूति को साक्षात करने की खुशी भी।
अणोरणीयान्-महतो महीयान्-इन दोनों का एकीकरण परमेश्वर के अतिरिक्त यदि और कहीं होता है तो उनकी विभूति रूप महापुरुषों में। भारी भरकम व्यक्तित्व व वृहदाकार कर्तव्य के साथ सरलता और सादगी यहीं आकर एक जुट होती है। इसका साक्षात्कार उनके डबरा प्रवास के दौरान हुआ। एक कार्यक्रम के सिलसिले में वह यहाँ आने वाले थे। स्टेशन पर उन्हें लेने के लिए आस पास कई मिल मालिक, गणमान्य व्यक्ति अपनी कारों, मोटरसाइकिलों के साथ उपस्थित थे। स्वागतार्थियों की इस भीड़ में सिर्फ एक व्यक्ति उन्हें पहचानता था। नियत समय रेलगाड़ी आकर रुकी। इन सभी ने एयरकण्डीशंड, फर्स्ट क्लास के सारे डिब्बे खोज डाले कहीं गुरुजी नहीं। आर्ष साहित्य का भाष्य करने वाला, इतना बड़ा लेखक, मनीषी, एक बड़े अभियान का संचालक के रूप में उन्होंने कुछ ऊंचे ठाठ की कल्पना कर रखी थी।
गाड़ी तो चली गई। इसी बीच इन सबने देखा कि उन्हें पहचानने वाला वह व्यक्ति एक ऐसे आदमी के चरणों पर झुका है- जिसके एक हाथ में लोहे की छोटी पेटी है, कन्धे पर बिस्तर का पुलिंदा है। पहले उन्होंने सोचा कि हो न हो, इसका कोई रिश्तेदार आ गया हो। निकट पहुँचने पर पता चला-”यही गुरुजी हैं।” गुरुजी और ये सपने दाँतों तले अंगुली दबा ली। यह उनके अणोरणीयान् रूप का साक्षात्कार था। कार्यक्रम मैं उनके दूसरे स्वरूप को लोगों ने देखा। सरलता और महानता के संगम रूप सबल तीर्थ को देख सभी कृतकृत्य थे।
मैंने जीवन त्याग, तितीक्षा, तप में सतत् गलाया। तब जीवन के ‘ब्रह्मकमल’ को, पूरी तरह खिलाया॥1॥
ब्रह्मकमल में ‘ब्रह्मतेज’ का, जादू बोल रहा है। और ब्राह्मणोचित जीवन की, महिमा खोल रहा है॥ ब्रह्मकमल की हर पंखुरि में, ब्राह्मण का परिचय है। ब्रह्म और ब्राह्मण का, युग-युग से अटूट परिणय है॥ मैंने खिलकर, ब्रह्मबीज का है अंबार लगाया। मैंने जीवन त्याग, तितीक्षा, तप में सतत् गलाया॥2॥
पड़े न रह जायें, मेरे में ‘ब्रह्मबीज’ बिन बोये। मैंने इन्हें कलेजे में रख, हैं जीवन भर ढ़ोये॥ मेरे हो तो, मेरे इन बीजों को तुम बो देना। कुछ तो मेरा भार घटाने को, तुम भी ढो देना॥ कहीं न ऐसा हो, पछताऊं क्यों कर कमल खिलाया। मैंने जीवन त्याग, तितीक्षा, तप में सतत् गलाया॥3॥
ब्रह्मबीज बोये जाते, धरती तप से तपती पर। और ब्राह्मणोचित जीवन की, उपजाऊ धरती पर॥ भोगवाद के चक्कर में फंस, ब्राह्मणवंश घटा है। त्याग, तितीक्षा, संयम, तप से ही संबंध कटा है॥ भटक गया है स्वयं ब्राह्मण, जग को भी भटकाया। मैंने जीवन त्याग, तितीक्षा, तप में सतत् गलाया॥4॥
आवश्यक है, ब्रह्मबीज की, फसल उगाई जाये। और ब्राह्मण वृत्ति, देश में, पुनः जगाई जाये॥ मार्गदर्शकों के अभाव में, सब ही भटक रहे हैं। मानव की बहुमुखी प्रगति के, पहिये अटक रहे हैं॥ इसी वेदना से मेरा मन, द्रवित हुआ, अकुलाया। मैंने जीवन त्याग, तितीक्षा, तप में सतत् गलाया॥5॥
उठो! राष्ट्र के ‘पुरोहित’ जागो! सोया राष्ट्र जगाओ। ब्रह्मकमल की ब्रह्मबीज की गरिमा को दर्शाओ॥ ब्रह्मतेज से चमक उठे फिर, भारत देश हमारा। और विश्व को ‘आत्मज्ञान’ का फिर से मिले उजाला॥ मेरे ब्रह्मकमल ने खिलकर, यह उद्घोष लगाया। मैंने जीवन त्याग, तितीक्षा, तप में सतत् गलाया॥6॥
आशावाद आस्तिकता है और निराशा नास्तिकता।
आशावादी केवल ईश्वर से डरता है।
मुझे नहीं आता है, कोरे स्वप्न सजाना, मैं अपने मन की, देखी साकार करूंगा।
माना यह, हर एक कल्पना सत्य न होती, हर अभिलाषा, पूरी हो पाती ही कब हैं? सभी ओर अवरोध खड़े हैं, भाँति भाँति के, हर पगडंडी मंजिल तक, जाती ही कब है? लेकिन मुझे न आता, आधे में रुक जाना, निकल पड़ा हूँ तो बाधायें पार करूंगा॥
ऋतुएं भी बदलेंगी, अपने अपने क्रम से, कभी मेघ गरजेंगे, सरिता इतरायेगी। धूप कभी अपना शरीर, ही झुलसायेगी, लौट पुनः दिन, वासन्ती वेला भी आयेगी, मैंने कब सीखा है, पीड़ा से डर जाना, अभिसंघातों से, जीवन श्रृंगार करूंगा॥
मेरा रहा असंभव से आकर्षण गहरा, चाँद सितारों पर, मेरा मन ललचाता है। जाने क्यों घनघोर तिमिर की छाया में भी, मुझको आशा दीप, दूर से दिख जाता है। मुझे नहीं आता, अंधियारे से घबराना, मैं प्रकाश की खातिर पूरी रात चलूँगा॥
सम्पत्ति बहुतों के पास होती है, पर उसका उपयोग बहुत कम लोग जानते हैं।
पूज्य गुरुदेव की मार्गदर्शक सत्ता के हिमप्रदेश में निवास करने एवं वहाँ से उनका मार्गदर्शन करने सूक्ष्म शरीर से उनकी पूजा स्थली में प्रकट होने का प्रसंग पढ़कर पाठकों को हिमालय के संबंध में कुछ उत्कण्ठाएं-जिज्ञासाएं हो सकती हैं। मोटी दृष्टि तो यही कहती है कि गिलगिट की पाकिस्तान रूस से लगी हिमाच्छादित चोटियों से लेकर अरुणाचल व बर्मा तक तथा, गढ़वाल की पहाड़ियों से लेकर तिब्बत के पठार तक छाया सारा ही प्रदेश हिमालय है। तो वे हिमालय में किस क्षेत्र से आए?हिमालय में ऐसी क्या विशेषता है?
भूगोल वेत्ताओं भू, गर्भवेत्ताओं, पर्यावरणविदों की दृष्टि में हिमालय आल्पस पर्वत की तरह ही मात्र हरीतिमा व बर्फ से ढकी एक पर्वत श्रृंखला हो सकती है जिसमें के-2 एवं गौरीशंकर नामक विश्व की दो सर्वोच्च चोटियाँ भी हैं किन्तु अध्यात्मवेत्ताओं की दृष्टि में वह देवी चेतन सत्ता की, परोक्ष संचालन तंत्र की निवास स्थली है। भारतीय संस्कृति आर्य संस्कृति के विकास की दृष्टि से हिमालय का प्रागैतिहासिक काल से ही बड़ा महत्वपूर्ण स्थान रहा है। हिमालय को धरती का स्वर्ग कहा गया है, जो कि गलत नहीं है। भौतिक और आत्मिक दोनों ही प्रगति की उच्चस्तरीय विभूतियों से भरी पूरी होने के कारण यह भूमि “स्वर्गादपि गरीयसी” कहलाती रही है। गरीयसी न मानें तो वह स्वर्ग तो है ही। क्योंकि जलधारा वाली भागीरथी ही नहीं, देवलोक की ज्ञानगंगा का अवतरण एवं प्रवाह भी इसी क्षेत्र से ही आरंभ होता रहा है। विशेष रूप से उत्तराखण्ड जिसे देवात्मा हिमालय का हृदय कहा जाता है, दुर्गम हिमालय नाम से जाना जाता है, विशिष्ट ऋषिसत्ताओं की तपस्थली है एवं अध्यात्म चेतना का ध्रुव केन्द्र है।
श्रीमद्भागवत में (स्कन्द, बारह, अध्याय 2) हिमालय के इस क्षेत्र में सिद्ध पुरुषों का निवास बताया गया है जो सारे विश्व के कल्याण की कामना हेतु सतत् तप करते रहते हैं एवं सूक्ष्म शरीरधारी होते हैं। ऐसा ही कुछ कथन ‘थियोसोफी” की संस्थापिका मैडम ब्लैवटस्की का है जो इसे सिद्धों की पार्लियामेंट मानती हैं। परमहंस योगानन्द जी की “आटोबायोग्राफी ऑफ योगी” एवं स्वामी राम की “लिविंग विद हिमालयन मास्टर्स” में ऐसे अनेक प्रसंगों के उल्लेख हैं जिनमें हिमालय के सिद्ध योगियों के विलक्षण कर्तव्यों का विवरण है। पाल ब्रण्टन ने एक पुस्तक लिखी हैं “इन सर्च ऑफ सीक्रेट इण्डिया” इसमें उनने भी अन्यान्य शोधकर्ताओं की तरह समर्थ सिद्ध पुरुषों का यहाँ अस्तित्व माना है।
यदि इसे देवलोक माना जाता रहा हो तो भी कोई अत्युक्ति नहीं है। इतिहासकारों के अनुसार आर्यों का राजा इन्द्र था व उनके पुरोहित थे बृहस्पति। हिमालय का उत्तराखण्ड क्षेत्र इनकी राजधानी था। अन्याय देवता भी इसी क्षेत्र में निवास करते थे। तब हिमालय ऊंचा तो था, परन्तु इतना ऊंचा नहीं कि उसमें ठण्डक असह्य हो, वृक्ष वनस्पति न होते हों फिर उस समय के व्यक्तियों की जीवनी शक्ति भी अधिक बढ़ी चढ़ी थी। इन दिनों गंगोत्री-गोमुख का जैसा क्षेत्र है, लगभग वैसा ही उस क्षेत्र की स्थिति थी, जिसे देवलोक कहते हैं।
पाण्डवों ने अंत समय में स्वर्गारोहण जहाँ किया, वह पर्वत श्रृंखला स्वर्गारोहिणी नाम से अभी भी बद्रीनाथ केदारनाथ के मध्य विद्यमान है। वसोधरा पठार के पास ही व्यास गुफा है जहाँ महाभारत व अन्यान्य पुराण लिखे गए।
पाण्डवों ने अंत समय में स्वर्गारोहण जहाँ किया, वह पर्वत श्रृंखला स्वर्गारोहिणी नाम से अभी भी बद्रीनाथ केदारनाथ के मध्य विद्यमान है। वसोधरा पठार के पास ही व्यास गुफा है जहाँ महाभारत व अन्यान्य पुराण लिखे गए।
इस क्षेत्र के देवताओं की क्रीड़ा स्थली होने से तात्पर्य यह है कि ब्रह्मपरायण जीवन जीने वाले देवमानव कभी यहाँ रहकर वैज्ञानिक एवं दार्शनिक शोधों में निरत रहते थे। अपनी काया को ही प्रयोगशाला बनाते हुए वे सतत् इस दिव्य वातावरण में साधना करते तथा उन निष्कर्षों के आधार पर उन ग्रन्थों का निर्माण करते थे, जिनसे जनसामान्य का मार्गदर्शन होता था। इस क्षेत्र के निवासी मूर्धन्य स्तर के थे। तत्वदर्शन उनका प्रिय विषय था। यदि कहीं इसी कारण इस क्षेत्र को स्वर्ग और निवासियों को देवता कहा गया हो तो वह अत्युक्तिपूर्ण है भी नहीं। दिव्यदर्शियों का कथन है कि ब्रह्मांड की सघन अध्यात्मचेतना का धरती पर विशिष्ट अवतरण इस क्षेत्र की भू चुम्बकीय व आध्यात्मिक विशेषताओं के कारण इसी क्षेत्र में होता है। जो मान्यता उत्तरी ध्रुव, दक्षिणी ध्रुव को भौतिक क्षेत्र में मिली है, वही अध्यात्म क्षेत्र में हिमालय के हृदय को मिली है। इसीलिए यदि ब्रह्मांड में कहीं बुद्धिमान प्राणी रहते होंगे, तो उनके साथ भी देवमानवों की घनिष्ठता रही हो, आदान प्रदान का क्रम चलता रहता हो, तो यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है। महत्वपूर्ण विद्याओं, कलाओं विभूतियों का भण्डार वहाँ होने की बात समझ में भी आती है।
नारदजी विष्णु जी से महत्वपूर्ण विचार विमर्श करने स्वर्ग लोक संभवतः इसी मार्ग से जाया करते होंगे। पौराणिक आख्यानों के अनुसार दशरथ को इन्द्र द्वारा सहायता के लिए बुलाना, अर्जुन, का इन्द्र लोक जाना दधीचि का देवगणों को अस्थिदान, सुकन्या के आह्वान पर अश्विनी कुमारों द्वारा च्यवन ऋषि को नेत्रदृष्टि ही नहीं देना अपितु कायाकल्प कर देना आदि अनेक घटनाक्रम ऐसे हैं जो यह प्रमाणित करते हैं कि स्वर्ग कहीं भूमि पर ही होना चाहिए व वहाँ के देवमानवों का अंतरंग स्तर कहीं अधिक ऊंचा होना चाहिए।
हिमालय को देवमानवों व ऋषिसत्ता ने अपना कार्य क्षेत्र बनाया हो तो इसके कई कारण थे। एक तो यह कि अधिक ऊंचाई होने के कारण अनगढ़ों, असुरों, नरपशु स्तर के व्यक्तियों का वहाँ तक पहुँचना व व्यवधान पहुँचाना सरल नहीं था। इसीलिए देवासुर संग्राम आये दिन न होने की सुविधा देवताओं को प्राप्त थी। दूसरी यह कि उस क्षेत्र में इतनी अधिक गुफाएं, कन्दराएं, झीलें प्रपात व गुप्त स्थान हैं जिनमें तापमान भी सहन करने योग्य होता है व उनमें निवास करते हुए तत्वज्ञान और विज्ञान की शोधें एकान्त में एकाग्रतापूर्वक कर पाना संभव होता था। यहाँ रहकर शाँत चित्त से धर्म तंत्र की विविध उपलब्धियों से समस्त विश्व को लाभान्वित बनाने की योजनाएं बनाना साधन जुटाना सरल था। तपस्वी ऋषिगण एक प्रकार से अध्यात्म विज्ञान के शोधकर्ता एवं विभूति उत्पादक कहे जा सकते हैं। पातंजलि, चरक, आर्यभट्ट की प्रयोगशालाएं यहीं थीं एवं कणाद ने अणु विज्ञान की शोध यहीं की थी। ऐसी वैज्ञानिक प्रयोगशालाएं यहाँ थीं जिनमें शरीर यंत्र और मनःतन्त्र के भीतर छिपे शक्तिशाली रहस्यों का अधिकाधिक अनावरण सम्भव होता था। शास्त्रों का सृजन, योगाभ्यास की उपलब्धियाँ, अध्यात्म दर्शन का विकास, स्वास्थ्य, शिक्षा, चिकित्साशास्त्र रसायन, शिल्पकला आदि की भौतिक एवं आध्यात्मिक
हिमालय को देवमानवों व ऋषिसत्ता ने अपना कार्य क्षेत्र बनाया हो तो इसके कई कारण थे। एक तो यह कि अधिक ऊंचाई होने के कारण अनगढ़ों, असुरों, नरपशु स्तर के व्यक्तियों का वहाँ तक पहुँचना व व्यवधान पहुँचाना सरल नहीं था। इसीलिए देवासुर संग्राम आये दिन न होने की सुविधा देवताओं को प्राप्त थी। दूसरी यह कि उस क्षेत्र में इतनी अधिक गुफाएं, कन्दराएं, झीलें प्रपात व गुप्त स्थान हैं जिनमें तापमान भी सहन करने योग्य होता है व उनमें निवास करते हुए तत्वज्ञान और विज्ञान की शोधें एकान्त में एकाग्रतापूर्वक कर पाना संभव होता था। यहाँ रहकर शाँत चित्त से धर्म तंत्र की विविध उपलब्धियों से समस्त विश्व को लाभान्वित बनाने की योजनाएं बनाना साधन जुटाना सरल था। तपस्वी ऋषिगण एक प्रकार से अध्यात्म विज्ञान के शोधकर्ता एवं विभूति उत्पादक कहे जा सकते हैं। पातंजलि, चरक, आर्यभट्ट की प्रयोगशालाएं यहीं थीं एवं कणाद ने अणु विज्ञान की शोध यहीं की थी। ऐसी वैज्ञानिक प्रयोगशालाएं यहाँ थीं जिनमें शरीर यंत्र और मनःतन्त्र के भीतर छिपे शक्तिशाली रहस्यों का अधिकाधिक अनावरण सम्भव होता था। शास्त्रों का सृजन, योगाभ्यास की उपलब्धियाँ, अध्यात्म दर्शन का विकास, स्वास्थ्य, शिक्षा, चिकित्साशास्त्र रसायन, शिल्पकला आदि की भौतिक एवं आध्यात्मिक
तीसरे यह कि उस क्षेत्र में संजीवनी बूटी रुदन्ती, ब्रह्मकमल जैसी अमृतोपम जड़ी बूटियाँ मिलती थीं। सोमरस यहीं उपलब्ध था जिसे पाकर देवमानव अजर अमर बने रहते थे। बहुमूल्य धातुओं स्वर्णादि को खदानें भी यहीं थीं व अभी भी उनका बाहुल्य इधर बताया जाता है। वस्तुतः वातावरण में इतने अलौकिक तत्व इस स्थान विशेष में हैं कि इसे धरती के स्वर्ग की उपमा गलत नहीं दी गयी।
जहाँ ऋद्धि सिद्धियों को अध्यात्म चेतना से अनुप्राणित हो सरलतापूर्वक अर्जित किया जा सकता हो, वहाँ देवता ही नहीं, देवमानव, सिद्धपुरुषों का समुदाय भी आकर निवास करता हो, तो इसे आश्चर्य नहीं मानना चाहिए।
हिमालय के इस स्वर्ग केन्द्र की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह थी कि यहाँ स्थूल शरीर को सूक्ष्म शरीर में विकसित कर उसे इच्छानुसार लम्बी अवधि तक जीवित बनाये रखना संभव था। सूक्ष्म और कारण शरीर को समर्थ बनाने के उपरान्त स्थूल शरीर के न रहने पर भी मनुष्य का अस्तित्व सदियों तक बना रहता है। भूख प्यास निद्रा जैसी दैनन्दिन आवश्यकताओं को तब पूरा नहीं करना पड़ता। सूक्ष्म शरीर भले ही दिखाई न पड़े तो भी अधिक सामर्थ्यवान बना रहता है व उसे महान उद्देश्यों के निमित्त नियोजित करना संभव हो पाता है।
अभी भी सूक्ष्म शरीर धारी ऋषिगण हिमालय के इसी हृदय की कन्दराओं, शिखरों दिव्य भूमियों पर विद्यमान हैं। जिन्हें अपना परिचय देना होता है या अदृश्य सहायता करनी होती है वे इच्छानुसार अपना शरीर प्रकट भी कर देते हैं। इसी सिद्धि के बल पर हिमालय के सिद्धपुरुष हिमयुग से भी पूर्व की संचित अपनी भाव तथा ज्ञान सम्पदा को यथावत बनाये हुए हैं। सतत् तप में लीन होने के कारण वे अपेक्षाकृत अधिक समर्थ हो गये हैं। इन्हीं सूक्ष्म शरीरधारी ऋषियों से साक्षात्कार हिमालय यात्रा के दौरान परोक्षसत्ता ने पूज्य गुरुदेव से कराया था। इनका एक ही काम है पिछड़ों को बढ़ाना, गिरों को उठाना व उस के लिए कठोर तप करना। अध्यात्म मार्ग के जिज्ञासुओं को यह अभिभावक की तरह संरक्षण व सुविधा प्रदान करते हैं।
अपने गुरु से हिमालय की पावन भूमि पर सशरीर प्रथम साक्षात्कार का प्रसंग अप्रैल 1985 की अखण्ड ज्योति में लिखते हुए पूज्य गुरुदेव वर्णन करते है “तपोवन का पठार चौरस है। फिर पहाड़ियों की ऊंची श्रृंखला है। इसके बाद नन्दन वन आता है। हमें यही बुलाया गया था। समय पर पहुँच गए। देखा तो गुरुदेव खड़े थे। प्रसन्नता का ठिकाना न रहा हमारी का भी और उनका भी। वे पहली बार हमारे घर आए थे और अब हम उनके यहाँ आए थे। यह सिलसिला जीवन भर चलता रहे तो ही इस बंधे सूत्र की सार्थकता है”। “. . . बात चीत का सिलसिला थोड़े समय में ही पूरा हो गया। अध्यात्म शक्ति प्राप्त करने के लिए प्रचण्ड मनोबल सम्पादित करना, प्रतिकूलताओं को दबोचकर अनुकूलता में ढाल लेना, मौत से भी न डरना, ऋषिकल्प आत्माओं के लिए तो यह स्थिति नितान्त आवश्यक है। तुम्हें ऐसी
परिस्थितियों के बीच अपने जीवन का बहुत समय गुजारना है। “
“उस समय की बात समाप्त हो गयी . . वहीं बहते निर्झर में स्नान किया, संध्या वन्दन भी। जीवन में पहली बार ब्रह्मकमल और देवकन्द रेखा। योगनिद्रा ला देने वाली सुगन्ध देने वाला ब्रह्मकमल, हफ्तों तक क्षुधा तृप्ति कर देने वाला देवकन्द। गुरुदेव के यही दो प्रत्यक्ष उपहार थे। इसके बाद तपोवन पर दृष्टि दौड़ाई। पूरे पठार पर मखमली फूलदार गलीचा सा बिछा था। “
उपरोक्त वर्णन सिद्ध पुरुषों की मार्गदर्शन शैली व हिमालय के सौंदर्य का परिचायक है। यों हिमालय के प्रकृतिगत सौंदर्य का वर्णन पूज्य गुरुदेव ने अपनी 1961 की तीसरी हिमालय यात्रा में “ सुनसान के सहचर “ प्रसंग में विस्तार से किया है, जिसके अंश परिजन ‘आगे उनकी लेखनी से जुड़े प्रसंगों में पढ़ेंगे ‘पर यहाँ उनके अपने गुरु से प्रथम साक्षात्कार का प्रसंग यही विचार कर उद्धृत किया कि जिन्हें इस सौंदर्य के रसास्वादन का हिमालय के प्रसंग में लाभ न मिल पाया हो वे भी वंचित न रहें।
आगे ऋषि सत्ता से साक्षात्कार प्रसंग में वे लिखते हैं-” रात्रि को गुरुदेव आए। उनके पैर जमीन से ऊपर उठे हुए चल रहे थे। आज यह जाना कि सिद्धियों में ऊपर हवा में उड़ने की अन्तरिक्ष में चलने की आवश्यकता क्यों पड़ती है। मैं भी अधर ही अधर गुरुदेव के पीछे उनकी पूँछ की तरह सटा हुआ चल रहा था। आज की यात्रा का उद्देश्य पुरातन ऋषियों की तपस्थलियों का दिग्दर्शन कराना था। स्थूल शरीर सभी ने त्याग दिये थे पर सूक्ष्म शरीर सभी के बने हुए थे। ‘
..”वे सभी ध्यान मुद्रा में थे। मुझे एक एक का नाम बताया और सूक्ष्म शरीर का दर्शन कराया गया। यही है सम्पदा ‘विशिष्टता और विभूति सम्पदा ‘इस क्षेत्र की।”
यह प्रसंग विस्तार से परिजन “हमारी वसीयत और विरासत” पुस्तक में पढ़ सकते हैं। अदृश्य शरीर धारी ऋषियों की पावनस्थली से परिचय कराने के उद्देश्य से इसे यहाँ दिया गया। वस्तुतः पृथ्वी का आध्यात्मिक ध्रुव केन्द्र हिमालय है, यह ऋषिसत्ता की विशिष्ट छावनी है। सूक्ष्म शरीरधारी देवात्मा सिद्धपुरुष प्रायः इसी क्षेत्र में रहते हैं। यह उच्चस्तरीय आत्माओं का एक प्रकार से प्रशिक्षण विद्यालय रहा है। सिद्धपुरुष सुयोग्य पात्रों को सिद्धियाँ अपने विभूति भण्डार से यहीं से देते रहते हैं। यही है हिमालय का वास्तविक स्वरूप जिसे जनसाधारण सामान्यतया समझ नहीं पाते। भगवान ने गीता में अकारण नहीं कहा है कि “स्थावराणां हिमालय”। हिमालय देखने में पाषाण खण्ड प्रतीत होता है। पर तात्विक दृष्टि से पर्यवेक्षण करने पर वह एक प्रत्यक्ष देवता है। जीवन उसके कण कण में है। आत्मसाधना की दृष्टि से इस क्षेत्र का सर्वोपरि महत्व प्राचीनकाल की तरह तभी भी बना हुआ है और संभवतः सदा बना ही रहेगा।
संसार का सबसे बड़ा दिवालिया वह है, जिसने उत्साह खो दिया।
धर्म में से दुराग्रह और पाखण्ड को निकाल दो। वह अकेला ही संसार को स्वर्ग बनाने में समर्थ है।
धर्म को संकीर्णता के बाड़े में न बंद करें। उसे व्यवहार में उतरने दें, ताकि आपका और समाज का भला कर सके।
प्रशंसा के भूखे यह जताते फिरते है कि वे योग्यता की दृष्टि से खोखले है।
पश्चिम के एक ख्यातिनामा विचारक डॉ. मार्टिना एक जगह कहते हैं छोटी छोटी बातें मिलकर पूर्णता बन जाती हैं और पूर्णता कोई छोटी बात नहीं हैं। गुरुदेव के जीवन की हर छोटी बात में उनकी पूर्णता की झाँकी झलकती हुई दिखाई देती है। मथुरा के दिनों की बात हैं वह कार्यक्रम के सिलसिले में लम्बे प्रवास पर थे। साथ चल रहे स्वयं सेवक की उनके साथ यह पहली यात्रा थी। एक स्थान पर रुकना हुआ। रात्रि में सोने के पहले उसे हिदायत देते हुए बोले “देखो! यहाँ रात तीन बजे मत जग कर बैठ जाना। तुम्हारे इस तरह जगने से घर वालों को तकलीफ होगी। अपनी खाट पर बैठकर ही भगवान का नाम ले लेना। सुबह चाय पीने हो तो आहिस्ते से स्टोव जलाकर पी लेना।” ऐसी तमाम नगण्य सी लगने वाली बातों के बारे में समझाकर उसे सोने की इजाजत दी।
सोने के लिए लेटे हुए स्वयं सेवक को अभी इन छोटी बातों में उसकी पूर्णता की झलक मिल रही थी।
यथार्थ शिक्षण वाणी से नहीं जीवन से होता है। उपदेश नहीं कर्तृत्व इसे बल प्रदान करता है। उन्हीं के ये शब्द उनके समूचे जीवन में रमे थे। उस दिन किसी कार्यक्रम के सिलसिले में वह रेलगाड़ी में जा रहे थे। गन्तव्य स्टेशन आने पर उतरना हुआ। पास में बिस्तरबन्द बैग आदि सामान था। साथ में आए कार्यकर्ता ने कुली। कुली॥ की आवाज लगाई। निकट में कुल न दिखने पर थोड़ी दूर पर उसे खोजने निकल गया। लौट कर आने पर सामने के दृश्य ने उसके होशोहवास गुम कर दिए। हुआ यह कि गुरुदेव उसका व अपना सामान सिर पर व कन्धे पर लाद कर चल दिए थे। बेचारा कुली का साथ छोड़कर तेज कदमों से उनके पास पहुँचा। प्रार्थना की कि वह सामान उसे दे दें। इस पर वह बोले-”न भाई मैं ठहरा गरीब ब्राह्मण और तू बड़ा आदमी।” सुनकर कार्यकर्ता और शर्मिंदा हो गया। जैसे तैसे उन्होंने उसका सामान तो दिया पर अपना यथावत लादे चलते रहे।,
कार्यकर्ता लोकसेवी ब्राह्मण की मर्यादा का यथार्थ शिक्षण पा रहा था।
एक दिन एक उच्च पदस्थ अधिकारी अपने एक मित्र के साथ पधारे। तपोभूमि के एक कमरे में उनके मुलाकात की व्यवस्था हुई। दोनों के अनेक बार न न करने पर भी गुरुदेव ने उन्हें आग्रहपूर्वक कुर्सी पर बिठाया। कोई सुप्रसिद्ध सन्त इस तरह उन्हें सम्मान देगा इसकी उन्हें कल्पना नहीं थी। लगभग आधा घण्टे बात चीत का क्रम चला। तत्पश्चात् वे दोनों बाहर आये। अपनी मोटर पर बैठते हुए अधिकारी महोदय अपने मित्र से कह रहे थे-”वन्डरफुल पर्सन। एवरीवन्स आनर इज सेफ इन हिज हैण्ड्स” “आश्चर्यजनक व्यक्ति, प्रत्येक व्यक्ति का सम्मान उनके हाथों में सुरक्षित है।” पास खड़े इसे सुन रहे एक कार्यकर्ता ने जब यह टिप्पणी उन्हें सुनायी तो हंसते हुए कहने लगे शिष्टाचार व प्रशंसा में अद्भुत शक्ति है। इस शक्ति का सदुपयोग कर तुम सारी दुनिया के हृदय के सम्राट बन सकते हो।
सूक्ष्म शरीर धारी देवात्मा ने प्रकाशपुँज ने पंद्रह वर्ष की आयु में ही पूज्य गुरुदेव को पूर्व जन्मों के दृश्य दिखाकर यह जतला दिया था कि पिछले अनेक जन्मों में वे साधना के कठिन मार्ग पर चलते हुए तप साधना और लोक सेवा की एक लम्बी मंजिल पार कर चुके हैं। इस जन्मे में प्रचण्ड तप आरंभ करना था उसका स्वरूप उनने बता दिया। वह था चौबीस लक्ष के चौबीस गायत्री महापुरश्चरण सम्पन्न करना और उन दिनों जौ की रोटी तथा छाछ (मट्ठा) अथवा उस न्यूनतम पर निर्वाह करना जो तप तितिक्षा की श्रेणी में आता है। समर्थता सम्पादन के लिए यह प्रचण्ड तपोबल अर्जित करना जरूरी था यह उन तीन कार्यों में से एक था जो सूक्ष्म ऋषि सत्ताओं से साक्षात्कार के बाद प्रथम हिमालय यात्रा के अवसर पर पूज्य गुरुदेव को बताये गये थे। अन्य दो कार्य थे अपना अध्ययन जारी रख लेखनी की साधना द्वारा युग संजीवनी जन जन तक पहुँचाना, विचारक्राँति का सरंजाम जुटाना तथा तीसरा कार्यक्रम था स्वतंत्रता संग्राम में एक सिपाही की तरह प्रत्यक्ष एवं पृष्ठभूमि में रहकर लड़ते रहना। प्रस्तुत पंक्तियों में उनके जीवन के प्रबलतम पुरुषार्थ गायत्री उपासना की चर्चा की जा रही है जिससे उनने पर्याप्त तप पूँजी कमाई और जी भर कर लुटाई।
मार्गदर्शक सत्ता का कथन था कि “आद्यशक्ति गायत्री के चौबीस लक्ष के चौबीस महापुरश्चरण तुम्हें सुनिश्चित रूप से इस तरह पूरे करने हैं कि दैनिक जप न्यूनाधिक करने पर कम से कम सत्रह और अधिक से अधिक चौबीस वर्ष में पूरे हो जायें”। इस निर्देश का कारण यह था कि बीच में स्वतन्त्रता संग्राम में सेनानी की भूमिका निभाने के नाते कुछ व्यक्तिक्रम साधना सम्पादन में आ सकता था। उसका पूर्वानुमान कर उनने लक्ष्य निर्धारित कर दिया व यह भी बता दिया कि बिना इस तप शक्ति की पूँजी के वे वह कार्य नहीं कर पाएंगे जिसकी कि उनके गुरु ने उनसे आकांक्षा रखी है। बड़े काम उपयुक्त समर्थता के बल पर ही पूरे होते हैं। पूज्य गुरुदेव की लिपि में आदिकाल वह निर्देश यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है।
“सुगन्ध और प्रकाश लुप्त हो गया वह देवसत्ता सामान्य मनुष्य के के रूप में सामने बैठी थी। वह वस्तुतः उनका सूक्ष्म शरीर था बोले “तुझ से बड़े काम कराने हैं और उसके उपयुक्त समर्थता प्रदान करनी है। इसके लिए आद्य शक्ति गायत्री के 24 लक्ष के 24 पुरश्चरण पूरे करने हैं। यह दैनिक जप न्यूनाधिक करने पर कम से कम 17 अधिक से अधिक 24 वर्ष में पूरे होने चाहिए”।
पूज्यवर की 1926 में अपने प्रकाशपुँज से भेंट वार्ता के बाद वर्षों का मूल्यांकन करें तो हम पाते हैं कि 1926, 27,28 में तो उनने अनुष्ठानक्रम पूरी तरह चलाया। 1928 के उत्तरार्ध से 1936 के उत्तरार्ध तक वे स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के रूप में सक्रिय रहे। फिर बापू का निर्देश मिलने पर लेखनी की साधना, पूजा उपासना का नियमित क्रम 1937 से आरंभ कर 1951 तक यथावत चलाया एवं पूर्णाहुति तक उनने सारे व्रत अनुशासन उसी प्रकार निबाहे जैसा कि उनके गुरु ने उन्हें बताया था। इस बीच 1951 में वे एक बार हिमालय यात्रा पर गए जो कुछ माह की थी व पुनः बाद में 1961 में एक वर्ष के लिए दुर्गम हिमालय उनने प्रवास किया। सब कुछ अपने मार्गदर्शक के बताये निर्देशों के अनुरूप।
उत्सुकता सबके मन में रहती है कि यह तप साधना उनने किस प्रकार कब संपन्न की होगी? अलौकिक पुरुषों के अविज्ञात साधनाक्रम के विषय में यह जिज्ञासाएं उठना स्वाभाविक हैं। इस संबंध में स्वयं पूज्य गुरुदेव अपनी पुस्तक “सुनसान के सहचर” में लिखते हैं कि “हमारी 24 लक्ष महापुरश्चरण की साधना गायत्री उपासना को इतना महत्व नहीं दिया जाना चाहिए जितना कि मानसिक परिष्कार और भावनात्मक उत्कृष्टता के अभिवर्धन के प्रयत्नों को। यह माना जाना चाहिए कि यदि विचारणा और कार्य पद्धति को परिष्कृत न किया गया होता तो उपासना के कर्मकाण्ड उसी तरह निरर्थक चले जाते जिस तरह कि अनेक पूजा पत्र तक सीमित मन्त्र तन्त्रों का ताना बाना बुनते रहने वालों को नितान्त खाली हाथ रहना पड़ता है। हमारी जीवन साधना को यदि सफल माना जाय और उसमें दिखने वाली अलौकिकता को खोजा जाय तो उसका प्रधान कारण हमारी अन्तरंग और बहिरंग स्थिति के परिष्कार को ही माना जाय। पूजा उपासना को गौण माना जाय। आत्मकथा के एक अंश को लिखते का दुस्साहस करते हुए, हम एक ही तथ्य का प्रतिपादन करेंगे कि हमारा सारा मनोयोग और पुरुषार्थ आत्मशोधन में लगा है। उपासना जो बन पड़ी है उसे भी हमने भाव परिष्कार के प्रयत्नों के साथ पूरी तरह जोड़ रखा है।” (पृष्ठ 135 प्रथम संस्करण, सन् 1965)
उपरोक्त प्रसंग जिस सरलता, निश्छलता व गंभीरता के साथ उनने लिखा है उसे उनने अपने शिष्यों को भी सदैव उसी स्तर पर जीवन में उतारने का सन्देश दिया। शिष्यगण सदा ही कर्मकाण्ड जप अनुष्ठान की बारीकियाँ, गिनती आदि के बारे में पूछा करते तो उनका स्पष्ट उत्तर जिस प्रकार का होता था उसकी बानगी नीचे दिये जा रहे तीन पत्रों के नमूनों से ली जा सकती है जो उन्हीं की लिपि में यथा रूप दिये जा रहे हैं।
ड़ड़ड़ड़
(1)”तुम्हारी अनुष्ठान श्रृंखला के विवरणों से बड़ी प्रसन्नता हुई। तप ही ब्राह्मण की सच्ची सम्पत्ति है। ईश्वर के निकट पहुँचने के इन साधनों को अपनाकर मनुष्य कुछ खोता नहीं, पाता ही है। शर्त इतनी ही है कि उपासना कर्मकाण्ड प्रधान, भावविहीन न हो। भावना का परिष्कार ही वस्तुतः आत्मबल का अभिवर्धन करता है। कर्मकाण्ड उसका बाह्य उपकरण मात्र है।”
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(2)
हमारे आत्म स्वरूप, 17-8-50
आपका पत्र मिला। पढ़कर प्रसन्नता हुई। बहुत अधिक थका देने वाला जप आपके लिए उपयुक्त नहीं। गृहत्यागी लोगों के सामने अन्य कार्यक्रम नहीं होते, इसलिए वे इस प्रकार की कठोर तपश्चर्या कर सकते हैं। आप इतना ही करें जितना आसानी से हो सके। जप संख्या बढ़ाने की अपेक्षा अपनी भावना में वृद्धि करें।
शार्टकट की तलाश करने वाले एवं स्वल्प काल में ही स्वल्प श्रम से अपरिमित लाभ उठाने की अधीरता दिखाने वालों को गुरुदेव सदा ही कहा करते थे कि अध्यात्म एक नकद धर्म है जिसे मात्र आत्मशोधन की तपश्चर्या से ही प्राप्त किया जा सकता है। वस्तुतः विडम्बना और भ्रम जंजाल से भरे हुए आज के तथाकथित अध्यात्म की निरर्थकता ने जनमानस में जो अश्रद्धा और अविश्वास का माहौल बना दिया था उसके निवारण के लिए ऐसे ही आत्मबल संपन्न व्यक्ति द्वारा अपने आपको प्रयोगशाला बनाकर सिद्ध बनने का रहस्योद्घाटन जरूरी था। यही कार्य पूज्य गुरुदेव ने आजीवन किया। जादू की तरह तुर्त फुर्त चमत्कार दिखा सकें, ऐसे कर्मकाण्डों की तलाश में भटकने वालों को गुरुदेव यह बताना चाहते थे कि सिद्धियों और विभूतियों का,गरिमा और महिमा का राजमार्ग आत्मशोधन और आत्मनिर्माण की चाल से चलकर ही पूरा होता है। अध्यात्म एक क्रमबद्ध विज्ञान है, जिसका सहारा लेकर कोई भी व्यक्ति प्रत्यक्ष लाभ उठा सकता है।
पू. गुरुदेव गायत्री महामंत्र के माध्यम से ऋतम्भरा प्रज्ञा और ब्रह्मवर्चस् की साधना करते थे। इन दोनों ही तत्वों को वे अपने आत्मदेवता में समाविष्ट मानते थे। उनका मन था कि जिसने अन्तःकरण को तपोवन बना लिया व वहाँ एकनिष्ठ होकर ब्रह्म चेतना से तादात्म्य स्थापित करने का प्रयास किया, वही सच्चा साधक है।
पूज्य गुरुदेव ही साधना पद्धति को जितना समीप से, गहराई से वंदनीया माता जी ने देखा व समझा था उतना अवसर शायद ही किसी को मिला हो। वंदनीया माता जी कहा करती हैं कि गुरुदेव ने जितना कड़ा तप किया है, उतने ही दिव्य अनुदान उन्हें मिले हैं। वस्तुतः उनका सारा जीवन तपोमय रहा हैं सब कुछ साधन व कमा सकने की असीम संभावनाएं होते हुए भी जो अपनी भौतिक महत्त्वाकांक्षाओं पर कड़ा नियंत्रण लगा ले, वह सही अर्थों में जीवन संग्राम में प्रतिकूलताओं से लड़ रहा, एक जुझारू योद्धा है जिसे मात्र औरों के हित की समाज के उत्थान की ही एक मात्र आध्यात्मिक महत्त्वाकांक्षा है।
चौबीस महापुरश्चरणों के बारे में लोगों को छात्र इतनी जानकारी है कि प्रतिदिन छह से आठ घण्टा बैठकर वे 40 से 10 मालाएं गायत्री का जप प्रतिदिन करते रहे। परम सात्विक जौ की रोटी तथा छाछ पर निर्वाह करते रहे एवं अनुष्ठान काल में प्रयुक्त बंधनों-प्रतिबंधों का कठोरता से पालन करते रहे। गौ माता के गोबर में जो तिल जौ निकलता है उसे निथारकर स्वच्छ कर उससे जितना अन्न मिल जाता है उससे शरीर यात्रा चल जाती थी। तीन वर्ष तो वे नैमिषारण्य रहे जहाँ के व्यक्ति अभी भी बताते हैं कि श्रद्धालुओं द्वारा सरोवर में डाले गए चावलों को वे कपड़े की आड़ लगाकर एकत्र कर लेते थे व उतने को ही पकाकर बिना किसी मिर्च मसाले के उदरस्थ कर नित्य 5 घण्टे जल में खड़े रहकर जप किया करते थे। यह तो वह पक्ष है जो अभी तक अविज्ञात है, दृश्य है प्रत्यक्ष है पर उन दिनों प्रसिद्धि से दूर रहने के कारण वे उसे संपन्न कर सकें। चालीस वर्ष तक की आयु जो युवावस्था का चरमोत्कर्ष मानी जाती है, उनने कड़ी तप साधना में नियोजित कर दी। इस अवधि में कितनी ही बार में नियोजित कर दी। इस अवधि में कितनी ही बार निराहार रहना पड़ा, मात्र मट्ठे पर ही जीकर अपनी काया का अनिवार्य किन्तु सीमित पोषण वे करते रहे। वस्तुतः यह तो उनकी स्थूल व दृश्य साधना थी। मोटे तौर से जितना देखा जा सके, उतना ही तो समझा जा सकता है। पर वस्तुतः साधना उस क्रिया कलाप तक ही सीमित नहीं थी।
काया के कर्मकाण्डात्मक क्रिया–कलापों से बहुत आगे बढ़कर वह तो मन और प्राण की सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर की परिधि में प्रवेश कर गई थी। अपनी पाँचों इन्द्रियों और पाँचों मन संस्थान का परिष्कार करने हेतु उनने अथक परिश्रम किया था व यह देखा था कि दसों देवताओं को विनाश के मार्ग पर एक इंच भी न गिरने दिया जाय वरन् उन्हें पवित्रता और प्रखरता के पथ पर ही अग्रसर रखा जाय। इस प्रकार अंतः को परिमार्जित कर वे पंचकोशों को जगाने में सफल हो गए, जिन्हें अनेकों अद्भुत ऋद्धि-सिद्धियों का केन्द्र माना जाता है। वस्तुतः अगणित व्यक्ति जिन्हें साधना संबंधी मार्गदर्शन देकर उनने कहीं से कहीं पहुँचा दिया तथा जिन्हें अपने तप का एक अंश देकर विभूति संपन्न बना दिया अथवा कष्ट निवारण में उनकी मदद की, इसके प्रत्यक्ष प्रमाण हैं कि वे एक ऐसे सिद्ध स्तर के साधक थे जो सतत् कमाने व पूँजी को दिल खोल कर सुपात्रों में बाँटने में ही विश्वास रखते थे। स्वयं के लिए अथवा आत्मीयों के लिए अपने निज के तपोबल का, अर्जित सम्पदा का उनने कभी उपयोग नहीं किया। वे लिखते हैं कि हमने अपने लिए व आत्मीय निकटस्थ परिजनों के लिए दवा दारु का ही प्रयोग किया हैं। वस्तुतः किसी दुखी की वेदना बाँटनी पड़ी तो सबने मिलकर बाँटी है। इतना जरूर किया कि किसी के कष्ट को मृत्यु स्तर से कम कर छोटी-मोटी दुर्घटना के रूप में टाल दिया गया। अखण्ड ज्योति के इस अंक में अन्यत्र ऐसे कई महत्वपूर्ण घटना प्रसंगों का विवरण दिया गया है जिन पर उनके जीवन काल में उनकी इच्छानुसार पर्दा ही पड़ा रहा।
पूज्य गुरुदेव यह मानते थे कि तर्क और विवेक का अंश भी अपनी चेतना का अविच्छिन्न अंग रहा है। अपने गुरु के निर्देश पर उनने गायत्री पर गहरा अनुसंधान करने की ठान ठानी और सोचा कि इस प्रयोग के समुचित सत्परिणाम होंगे तो इसके लिए अन्यान्यों को भी साहस एवं विश्वास के साथ अपनाया गया ताकि उनका निज का मन इस बात के लिए न कचोटें कि आधे अधूरे प्रयोग करने के कारण असफलता हाथ लगी। जो वैद्य रस-भस्म बनाते हैं और बेचते हैं पर उनका विधान अधूरा रहने देते हैं वे रोगी की भी हानि करते हैं और स्वयं भी अपयश के भागी बनते हैं।
इसलिए उनने एक ही निश्चय लिया कि जो करना वह पूरी रीति-नीति से परिपूर्ण आस्था के साथ किया जाय।
साधारणतया साधक अपने साधना के स्वरूपों को गोपनीय ही रहने देते हैं किन्तु गुरुदेव का जीवन तो एक खुली किताब है। उनने जो भी किया उसे लेखनी के माध्यम से जन-जन तक पहुँचा दिया। जिसे उचित समझा वाणी से समझाया व जिसे और अधिक पात्र समझा उसके रोम में वह ज्ञान समाविष्ट कर दिया। 1950 से 1961 के बीच की उनकी अखण्ड ज्योति पत्रिका गायत्री विज्ञान, गायत्री रहस्य, गायत्री के अनुभव, गायत्रीतंत्र एवं गायत्री योग नामक पाँच 200-200 पृष्ठ के ग्रंथ तथा तीन भागों में छपा गायत्री महाविज्ञान इसकी साक्षी देते हैं। बाद में विज्ञान समस्त प्रतिपादनों के साथ जोड़ कर अपनी सुबोध शैली में उनने 1977 में चार विशेषाँक अखण्ड ज्योति के प्रकाशित किये (मार्च से जून 1977) जिसमें उनने साधना विधान का निचोड़ लिखकर रख दिया। इन सबके बावजूद भी जो स्थूल में सब कुछ खोज रहा हो इसे क्या कहा जाय?
जिसने शिष्टता और नम्रता नहीं सीखी उसका बहुत सीखना भी व्यर्थ रहा।
कोयले की खदान में से हीरा ढूँढ़ निकाले। पुरातन बहुत विस्तृत है, उसमें से वही खोजें जो सही और सामयिक है।
जीवन को क्षण भंगुर कहा जाता है, इसका तात्पर्य यह है कि उसका एक क्षण भी बर्बाद न किया जाय।
महान कार्य शक्ति के सहारे नहीं, दूरदर्शिता के बल पर सम्पन्न होते हैं।
आलोचनाएं जहाँ सामान्य व्यक्ति को हैरान, परेशान और उद्विग्न करके रख देती हैं, वहीं महापुरुष इनसे खासा मनोरंजन कर अपना गूढ़ार्थ प्रकट कर देते हैं। एक दिन बाहर से आए एक कार्यकर्ता ने थोड़ा दुःखी मन से कहा-”गुरु जी! कुछ लोग कहते हैं कि आप ब्राह्मण न होकर बढ़ई हैं।” अखबार को मेज पर रखते हुए बोले “अच्छा! पर मैं उतना ऊंचा असल में मैं तो भंगी और धोबी हूँ।”
कार्यकर्ता को चकित होते देखकर वह जोर से हंसने लगे। हंसी थमने पर बोले “देखो मेरा काम है संस्कृति की सफाई और धुलाई। अब हुआ न भंगी और धोबी।” सुनने वाला उनके इस सरल निष्कपट भाव को देख हतप्रभ था।
पारस पत्थर की तरह होते हैं, सन्त, जिनके संसर्ग में आकर अनगढ़ सुगढ़ बने बिना नहीं रह सकते। घटना सन् 1983 की है। पू. गुरुदेव दो-तीन कार्यकर्ताओं के साथ कार में बैठकर आंवलखेड़ा जा रहे थे। उद्देश्य था, शक्ति पीठ के लिए जमीन देखना। रास्ते में एक सज्जन बोले-”गुरुदेव! जब वहाँ शक्ति पीठ बन जाये तो एक ब्राह्मण नियुक्त कर दीजिएगा। इससे मन्दिर का संचालन उचित रीति से होता रहेगा।” सुनकर वह उसकी ओर मुखातिब होकर बोले” यदि बर्फ के पास बैठ कर ठण्डक न लगे तो बर्फ कैसी? आग के पास बैठ कर ठण्डक न लगे तो बर्फ कैसी? आग के पास बैठ कर गर्मी न लगे तो वह आग कैसी? हमारे पास बैठकर भी यदि कोई ब्राह्मण न बन सका तो हम ब्राह्मण किस बात के।”
आत्मविश्वास से परिपूरित’ उनके ये वचन सुनकर सुनने वाले मौन होने के सिवा क्या करते आगे चलकर सभी को उनके कथन की सार्थकता अनुभूत हुई। सचमुच उनके संसर्ग ने अनेकों ब्राह्मण उपजाए।
सामान्यतया साधना क्षेत्र में बाह्योपचारों की नकल होती देखी जाती है एवं जो भी बहिरंग उपचार कोई साधक करता दिखता है, एक समुदाय उसके पीछे चल पड़ता है। उन प्रतीकों के पीछे छिपी भावनाओं को, आत्मशोधन व जीवनसाधना के अनुशासनों को न समझा जाता है, न निर्वाह किया जाता है, फिर वे फलित हों कैसे?
पूज्य गुरुदेव को उनके मार्गदर्शक ने कहा कि-”तुम्हें अखण्ड घृतदीप हमारे अपने संबन्धों के रूप में स्थापित करना है ताकि कोई किसी को भूलने न पाए। हम जिस प्रकाश पुँज के रूप में आए थे, उसकी स्मृति सतत् बनी रहे।” पूज्य गुरुदेव ने अपने इष्ट का मार्गदर्शन सर माथे रखा तथा उसका निर्वाह करते चले गए।
जब 1941, 1951 व 1960 में पूज्य गुरुदेव हिमांचल यात्रा पर गए तब भी यह अनुशासन भली प्रकार पाला गया। वंदनीया माता जी अक्टूबर 1951 की अखण्ड ज्योति पत्रिका में लिखती हैं कि-अब अखण्ड ज्योति को संभालने का गुरुतम दायित्व मुझ पर आ गया है। सम्पादिका के रूप में यह उनका पहला अंक था क्योंकि इस बार पूज्य गुरुदेव का हिमांचल प्रवास एक वर्ष से अधिक था। जो तीन प्रमुख काम गुरुदेव वंदनीया माताजी को सौंप गए थे, उनमें पहला था-”अखण्ड घृतदीप को दस वर्ष और प्रज्ज्वलित रखा जाय। पहले यह अखण्ड दीपक मात्र 24 पुरश्चरणों के लिए था पर अब कार्य पूरा हो जाने पर भी उसका विसर्जन नहीं होना चाहिए। जिस प्रकार चालीस दिन में एक गायत्री अनुष्ठान (सवालक्ष का) पूर्ण हो जाता है, इसी प्रकार चालीस वर्ष तक जलते रहने पर अखण्ड घृतदीप भी “सिद्ध ज्योति” बन जाता है। जब तीस वर्ष यह दीपक जल चुका एवं सारे परिवार ने क्रमशः चौबीस घण्टे जागरण रखकर उसे जलाये रखा तो अब दस वर्ष के लिए ही इस अधूरा क्यों छोड़ा जाय?” (अखण्ड ज्योति अक्टूबर 1959 पृष्ठ 6,7,8)। चूँकि अभी 1971 के बाद के निर्धारणों का रहस्योद्घाटन पूज्यवर ने हिमालय यात्रा से लौटने के बाद तक के लिए सुरक्षित रखा था, स्थान परिवर्तन पर हरिद्वार में पुनः इसी ज्योति को अखण्ड जलाये रखने के प्रसंग की चर्चा यहाँ नहीं की थी। जो हो पूज्यवर के निर्देशों का वंदनीया माताजी ने अक्षरशः पालन किया। उसी के प्रकाश में वे अपनी गुरुसत्ता पूज्य गुरुदेव एवं परोक्ष सत्ता का दर्शन कर पूरा परिवार चलाती रहीं संपादन करती रहीं एवं सारे दायित्व वे निभाये जो उन्हें एक संस्था के संचालक के नाते करना था।
दूसरे निर्देश था कि इस दीपक के सम्मुख अब अखण्ड जप का आयोजन किया जाय और दस वर्षों में 24 लक्ष के 24 और अनुष्ठान कराने का उपक्रम बनाया जाय। तीसरा निर्देश था कि अखण्ड दीप और अखण्ड जप जहाँ रहें वहीं के संस्कार लेकर ही “अखण्ड-ज्योति “पत्रिका प्रकाशित हो।
अखण्ड अग्नियों व दीपकों का असाधारण आध्यात्मिक महत्व होता है। इस लेख में जहाँ से शुरुआत की गई थी, इसी प्रसंग को आगे बढ़ाने हैं कि जन सामान्य अनुकरण की प्रवृत्ति अपनाते हुए सारी सिद्धि का स्रोत एक दृश्य उपचार को मानते हुए अखण्ड दीपक या अग्नि प्रज्ज्वलित तो कर देते हैं पर उसका निर्वाह नहीं कर पाते। दीपक तभी सिद्ध हो पाता है जब तप साधना का पोषण सुपात्र साधन द्वारा किया जा रही हो। यह कोई छोटा-मोटा काम नहीं है कि किसी और से करा लिया जाय। जप-अनुष्ठान भी स्वयं करना पड़ता है, तप-तितीक्षा भी स्वयं करनी पड़ती है तथा आत्मशोधन को अनिवार्य अंग मानते हुए उसे सतत् निभाना पड़ता है। यही कार्य पूज्य गुरुदेव व वंदनीया माता जी ने किया तथा आज भी वह अखण्ड दीपक जो 64 वर्षों से जल रहा है, शांतिकुंज में स्थापित है। समस्त प्रेरणाओं व सिद्धियों का वह स्रोत है। उसके सामने अभी भी अखण्ड जप चलता है। उसके सान्निध्य में एक करोड़ गायत्री जप चलता है। उसके सान्निध्य में एक करोड़ गायत्री जप नित्य सम्पन्न होता है व नौ कुण्डीय यज्ञशाला में नित्य गायत्री यज्ञ में आहुतियाँ दी जाती है। इसी से यहाँ के प्रसुप्त बीजाँकुर फलित-पल्लवित हुए है। पूज्य गुरुदेव ने इसी के प्रकाश में सतत् लेखनी की साधना तथा अपनी उपासना सम्पन्न की। प्रस्तुत पंक्तियाँ भी उसी अखण्ड दीपक के प्रकाश में परोक्ष प्रेरणा से लिखी जा रही है। इसमें किसी का व्यक्तिगत पुरुषार्थ नहीं है, दिव्य धना का तपोबल जो पूज्य गुरुदेव रूपी ब्रह्मवर्चस् सम्पन्न महामानव के रूप में सिद्ध हुआ ही इसके मूल में कार्य कर रहा है वह आगे भी करता रहेगा।
यहाँ यह सब विस्तार से इसलिए लिखा गया है कि जो परिजन उस अखण्ड दीपक के दर्शन यहाँ आकर करते है, उसके मूलभूत तत्वदर्शन व परोक्ष सिद्धि के स्वरूप में भी समझें। अनुकरण में वे अपने यहाँ दीप जला लें तो फिर उसे “सिद्ध ज्योति” जैसा बनाने का पुरुषार्थ भी करें। यदि यह न बन पड़े जो कि असंभव ही है क्योंकि दीप जलाने के साथ जो तप साधना जुड़ी है, वह भी स्वयं की, वह कर पाना हरेक के लिए शक्य नहीं है, तो उस अखण्ड दीप व अखण्ड-ज्योति से लाभ उठायें जो क्रमशः प्रत्यक्ष अग्नि व लेखनी रूपी संजीवनी के रूप में उनके समक्ष प्रस्तुत है। तीर्थों का जो महत्व होता है, उससे कहीं अधिक महत्व ऐसी सिद्ध ज्योति का है जिसमें तिल-तिल कर एक साधक ने अपना जीवन होम किया व न केवल अपनी कुण्डलिनी जाग्रत की विश्वात्मा की कुण्डलिनी जगाने हेतु सूक्ष्मीकृत-घनीभूत हो जो अभी भी परोक्ष जगत में सक्रिय है।
बहुधा शांतिकुंज पत्र आते हैं व मथुरा भी आते थे कि हमारे निमित्त इतनी संख्या का इतना जप करा दें, हम बदले में इतनी राशि भेज देंगे। लिखने वाले यह नहीं जानते कि जप-अनुष्ठान किराये पर संभव नहीं होते। यह तो पण्डे-पुजारियों का, धर्माडम्बर रचने वालों का खोला धंधा है, जिसका गुरुदेव ने जीवनभर उपहास किया, खंडन किया। जप-तप स्वयं किया जाता है, हाँ! अनुष्ठान में कोई व्यवधान न आने पाए, कोई बाधक तत्व बीच में क्रम न तोड़ दे, इसका नियमित संरक्षण शांतिकुंज की ऋषिसत्ता करती रहेगी यह आश्वासन उनने सतत् दिया। यह आश्वासन अभी भी है वह आगे भी रहेगा कि कोई भी साधक स्वयं जप अपने यहाँ अथवा जहाँ कहीं करता है तो उसका संरक्षण-विपत्तियों का निवारण यहाँ की अलौकिक दिव्यसत्ता सदैव करती रहेगी। मूलभूत प्रसंग जो समझने का है, वह यह कि अपनी पवित्रता बढ़ाने पर, कषाय कल्मषों के परिशोधन पर अधिक ध्यान दिया जाय तथा भावनात्मक परिष्कार को अधिक बाह्योपचारों को कम महत्व दिया जाय। जप करते समय यदि मन गिनती में ही लगा रहा तो यह ईश्वर से सौदेबाजी हो गई। भगवान के यहाँ गायत्री माता के यहाँ ऐसा रजिस्टर नहीं है जिसमें जप की गिनती लिखी जाती हो। वहाँ तो सद्भावनाओं का, संवेदनाओं का, परिष्कृत उच्चस्तरीय आकाँक्षाओं का मूल्याँकन होता है वह कभी भी कोई सिद्धि पाएगा तो उसी बलबूते, यह प्रतिपादन पूज्य गुरुदेव जीवन भर करते रहे।
गुरुदेव के सिद्ध पक्ष पर चूँकि अब अनावरण का निर्देश मिल चुका है प्रस्तुत पंक्तियों को लिखने का किया जा रहा है व आगे भी इस अंक में स्थान-स्थान पर उनका उद्धरण है। गुरुदेव के निकट संपर्क में रहने वाले इस तथ्य को भली भाँति जानते थे कि वे एक शरीर में रहते हुए भी पाँच शरीरों जितना कार्य वे करते थे। भिन्न-भिन्न प्रकार के पाँच कार्यों का सम्पादन एक साथ कैसे होता था, यह रहस्यमय प्रसंग होता है और निकटवर्ती जानते है कि उनने अस्सी वर्ष की आयु में आठ सौ वर्षों का जीवन जिया है। पाँच काम पाँच शरीर से कैसे होते थे, इसका थोड़ा खुलासा करें। पहला तो, छः घंटे प्रतिदिन गायत्री माँ की उपासना जो आठ घण्टे शारीरिक श्रम व सात घण्टे मानसिक श्रम (चिन्तन, मनन, स्वाध्याय, लेखनी की साधना) के अतिरिक्त थी। यह सोचा जा सकता है कि 24 घंटे में 21 घंटे जब इसमें चले गए तो वे सोते कब थे। यही तो अलौकिक सिद्धि है जो किसी भी नाम से पुकारी जा सकती है पर उनके निकटवर्ती जानते हैं कि प्रातः 1 बजे से उठकर जो उनने कार्य आरंभ किया है तो उसे बिना विराम दिये सतत् रात्रि 10 बजे तक सम्पन्न किया है। यह संभव है तपोबल से अर्जित सामर्थ्य के सहारे।
दूसरा काम था एक हजार से अधिक परिजनों के पत्रों को जो नित्य आते थे, खोलना, पढ़ना व उन्हें 24 घंटे के भीतर ही जवाब देना। वह भी इतना सटीक, आत्मीयता भरा कि सामने वालों को यह लगता था कि जो भी कुछ वह पूछना, जानना, मार्गदर्शन पाना चाहता था वह उसे मिल गया, पिता की आत्मीयता मिल गयी, स्नेह की पूर्ति हो गई। हरिद्वार आने पर भी यह काम उनने सतत् किया पर सहायकों के माध्यम से वंदनीया माताजी का मार्गदर्शन 1972 के बाद साधकों को पहुँचने लगा। पत्रों का वर्गीकरण स्वयं गुरुदेव करते थे, क्या जवाब, किसको, किस प्रकार दिया जाना है, यह निर्धारण भी स्वयं करते थे। यह एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी वे वंदनीया माताजी व उनके सहायकों को सौंप गये है। परोक्ष मार्गदर्शन तो उनका है ही। उनके संगठन का मूलभूत आधार तो वे पत्र ही है जो उनने अगणित व्यक्तियों को लिखे, स्नेह के आधार पर जिन्हें उनने अपना बना लिया।
तीसरा काम जो एक काया से रहते हुए उनने किया वह था लेखन। अपने वजन की तौल से दुगुना वे लिखकर चले गए हैं। नियमित रूप से 3 घण्टे पढ़ना व 4 घण्टे पत्रिका व किताबों के लिए लिखना। खाना छूट गया हो पर उनने कभी लिखने की नागा नहीं की। सतत् स्वाध्याय द्वारा जो पढ़ा, दैवी सत्ता ने जो परोक्ष ज्ञान उन्हें दिया उसे वे बहुमूल्य विचारों के रूप में, सशक्त संजीवनी के रूप में लिपिबद्ध करते गये। एक बात और ध्यान रखने योग्य है कि पढ़ने के बाद कभी संदर्भ ग्रन्थ सामने नहीं रखते थे। इतनी विलक्षण स्मृति थी। लगभग ढाई हजार पुस्तकों के रूप में, अनूदित भाष्यों के रूप में स्वरचित प्रज्ञापुराण के रूप में इतना कुछ वे दे गए है वह आने वाले दस वर्षों के लिए इतना कुछ लिख कर दे गये है कि अखण्ड ज्योति सतत् प्रकाशित होती रहेगी; सदा ज्वलन्त देदीप्यमान बनी रहेगी। भले ही लेखनी किसी की भी हो विचार उन्हीं की प्रेरणा से आयेंगे। गीता विश्व कोष के रूप में विशाल महाग्रन्थ की रूप-रेखा वे बना गए है, वह भी अगले दिनों उनका सूक्ष्म व कारण शरीर लिखवाएगा तथा 14 खण्ड प्रज्ञा पुराण के भी।
चौथा काम था व्यक्तिगत संपर्क, शिक्षण एवं मार्गदर्शन-परामर्श। विश्राम कभी कुछ क्षणों का योगनिद्रा द्वारा किया हो तो ठीक है, नहीं तो अगणित व्यक्तियों से अपने अंतिम वर्षों के सूक्ष्मीकरण साधना के दिनों को छोड़कर नित्य वे मिलते ही रहे, उनमें प्राण फूँकते रहे, उनका मनोबल बढ़ाते रहे वह दैनन्दिन जीवन संबंधी मार्गदर्शन, साधना संबंधी मार्गदर्शन तथा परिस्थितियों के अनुकूल कैसे मनःस्थिति बदली जाय यह वह बड़े ममत्व व लगन के साथ बताते थे। कार्यकर्ताओं के हृदय के सम्राट उन्हें कहा जाय तो अत्युक्ति न होगी।
पांचवां कार्य था मिशन की गतिविधियों के लिए सतत् बाहर घूमते रहना व प्रचार कार्य को गति देना। प्रारंभ के कुछ वर्ष गाँधीजी के साबरमती आश्रम व कवीन्द्र रवीन्द्र के शाँतिनिकेतन में रहे। अड्यार भी वे गये तथा एनीबेसेंट की बनारस की लाइब्रेरी भी उनने पढ़ डाली। इसके अतिरिक्त जहाँ-जहाँ कार्यकर्ता सुदूर क्षेत्र में रहते थे, मिशन के विस्तार हेतु उनके पास जाने का क्रम बनाया। रास्ते में यात्रा में लिखते भी थे उपासना क्रम भी चालू रखते थे। 1971 की विदाई से 15 दिन पहले तक वे सतत् घूमते रहे थे व एक-एक दिन में 3-4 स्थानों के कार्यक्रम उनने निपटाये। न केवल सम्पन्न किया, वरन् जो मिलने आया उससे इतना समीप से मिले कि उसे लगा मुझसे अधिक उनका कोई और समीप नहीं है। 1980-81-82 में शक्तिपीठों के शिलान्यास व फिर प्राण प्रतिष्ठा हेतु निकले तो एक दिन में पाँच कार्यक्रम सम्पन्न कराते चले गये।
किसी भी कसौटी पर परख लिया जाय, कोई संगति दिनों व क्षणों की बैठती नहीं कि कैसे यह कार्य सम्पन्न किया जाता होगा। पर महाकाल की शक्ति तो ऐसी ही प्रचण्ड होती है। एक ही बार में वे पाँच जगह कैसे सक्रिय बने रहते थे, यह बात उनके कार्यकाल में उनके निकटवर्ती कार्यकर्ताओं ने कई बार पूछी। पर निर्देश न होने से, समाधान वही दे दिया गया जो ऊपर पाँच शरीरों से किये जाने वाले काम के रूप में दिया गया है। पर यदि परिजन वास्तव में सिद्ध पुरुष की सिद्धि सुनना, जानना चाहते हैं तो एक घटना सुन लें। मध्य प्रदेश (पश्चिम) के दौरे पर एक कार्यकर्ता उनके पीछे पड़ा कि गुरुदेव आप पाँच स्थान पर कैसे रहते है? उसकी जिद को पूरा करने व अपनी लीला दिखाने के लिए उनने उससे उसी समय बिलासपुर का एक टेलीफोन नंबर दिया व कहा कि कॉल मिलाकर पूछो कि वहाँ क्या चल रहा है? जवाब मिला गुरुदेव का पूर्व से कार्यक्रम था। वे प्रवचन देकर आये हैं व उनके यहाँ भोजन कर रहे हैं। फोन उन सज्जन के हाथ से नीचे गिर गया व उनने साष्टाँग दण्डवत् कर पूज्यवर से कहा-”अब कभी शंका नहीं करूंगा प्रभु।”
क्या कहेंगे आप इसे? क्या यह भी मैस्मरेज्म या हिप्नोटिज्म है। सिद्ध पुरुषों की लीलाएँ निराली होती हैं। वे सशरीर थे, तब न जाने क्या रहस्यमय रच गए हैं, सूक्ष्म शरीर से तो परिजनों को अभी और अधिक अनुभूतियाँ होंगी।
वैभव को कमाओ तो पर रोक कर न रखो। वह तुम से भी अधिक किसी अन्य के लिये आवश्यक हो सकता है।
दूसरों की सुँदरता पर न रीझें। अपने अन्तराल में झाँकें और देखें कि सौंदर्य का भण्डार भरा पड़ा लें
जब तक हम ईश्वर की बताई राह पर चलते है वह हमारी सहायता करता है। जब कुमार्ग पर चलते है तो मुसीबतों में फँसा कर झिड़क देता है।
अपना सुधार करो तो संपर्क में आने वाले दूसरे भी सुधर जाएँगे, जो अपने को नहीं सुधार सका उसका दूसरों के प्रति धर्मोपदेशक का अधिकार नहीं बनता।
सन 1968 के अक्टूबर माह का प्रसंग है। इंदौर के क्रिश्चियन कॉलेज में दर्शन विभाग द्वारा सम्पन्न हो रहे समारोह में गुरुदेव को वक्तृता देनी थी। सभा में महाविद्यालय के प्राध्यापक छात्र, नगर के गणमान्य सदस्य सभी उपस्थित थे। ठीक समय पर वह भी एक-दो स्थानीय कार्यकर्ताओं के साथ पहुँचे। उनकी सीधी-सादी वेशभूषा, चेहरे की सरलता देखकर महाविद्यालय के प्राचार्य विश्वास न कर सके कि वह विषय के अधिकारी विद्वान हो सकते है। अतएव पास आकर बोले-” आप कम समय में अपनी बात कह लीजिएगा। विषय से इधर-उधर भटक जाने में परेशानी होगी।”
उन्हें उचित आश्वासन देकर गुरुदेव ने पूर्वी-पश्चिमी दर्शन में समन्वय की स्थापना करते हुए जीवन मूल्यों के परिप्रेक्ष्य में अपनी मौलिक व्याख्या आरंभ की। व्यवहारिक जीवन से कोसों दूर होती जा रही दार्शनिकता पर कटाक्ष करते हुए कहा-”जो विचार या सिद्धांत मनुष्य के सर्वांगीण विकास में सहायक हों उन्हीं के चिंतन-प्रतिपादन क्रियान्वयन में दर्शन की सार्थकता है।” व्याख्या की समाप्ति पर प्राध्यापकों समेत प्राचार्य महोदय के हाथ जुड़े थे। प्राचार्य महोदय भावपूर्ण स्वर में बोले-”मैं आपको समझ नहीं सका था। डॉ. राधाकृष्णन को सुनने के बाद मुझे सभी फीके लगते थे। पर आज आपको सुनकर लगा कोई उसे भी एक कदम आगे है, जो न केवल दर्शन की सार्थकता समझा सकता है बल्कि स्वयं के जीवन में दर्शन को सार्थक कर रहा है।”
युग निर्माण विद्यालय का प्रथम सत्र समाप्ति पर था। इसी समय एक संस्कृत प्रेमी सज्जन जो काफी प्रतिष्ठित थे गुरुदेव से मिलने पधारे। उन्होंने उनको साथ लेकर तपोभूमि की विविध गतिविधियों की जानकारी कराई। इसी क्रम में विद्यालय की बारी आयी। स्वावलंबन सम्बन्धी शिक्षा, जीवन परिशोधन प्रयोगों के साथ विद्यार्थियों का लोक सेवियों के रूप में गठन सारा कुछ स्पष्ट किया। वह सज्जन इसे सुना-अनसुना कर, बार-बार एक ही बात कहते जा रहे थे-”यहाँ सब कुछ संस्कृत में क्यों नहीं पढ़ाया जाता? आप सारा जोर संस्कृत पर क्यों नहीं देते।” काफी कुछ सुन लेने के बाद उन्होंने जवाब दिया-”मेरा सारा जोर संस्कृत की जगह संस्कृति पर है। मैं यहाँ संस्कृत की जगह संस्कृति का शिक्षण देता हूँ।”
तनिक तेज स्वर में कहे गये इन वाक्यों ने आगंतुकों को स्तब्ध कर दिया। कुछ सोचते हुए उनने कहा-”आप ठीक कह रहे है। आपके इस प्रयास की महत्ता स्वामी श्रद्धानन्द के प्रयासों से कम नहीं।”
उस दिन वह घीयामंडी के अखण्ड-ज्योति कार्यालय में बैठे मिशन की भावी रूप-रेखा पर चिन्तन कर रहे थे। पता नहीं क्या सोचकर बड़ी सरलता से पास बैठे एक स्वयं सेवक से पूछा-”क्यों जी तुम्हीं कुछ बताओ, मिशन को विस्तार कैसे दिया जा सकता है?” स्वयं सेवक ने थोड़ा सोचते हुए कहा-”यदि शिक्षक और चिकित्सक इस काम में सहयोग करने लगें तो प्रगति दूनी हो जायेगी। क्योंकि इन्हीं दोनों वर्गों से समाज उपकृत रहता है। उपकार करने वाले की बात मानने में किसी को संकोच कहाँ?”
“जानते हो! शिक्षण और चिकित्सा किसके काम हैं?” कुछ रुककर स्वयं बोले-ब्राह्मण के। एकमात्र ब्राह्मण ही समाज को ज्ञान दे सकता है, उसे सारी व्याधियों से मुक्त कर सकता है। बाकी अन्य तो इसके नाम पर व्यवसाय करते हैं। उनकी वाणी से ऐसा लगा जैसे भगवान मनु ब्राह्मणों का कर्तव्य निर्धारण कर रहे हों। ब्राह्मणत्व सम्पन्न व्यक्ति ही इस कार्य को आगे बढ़ाएँगे। शान्त भाव से कहकर वह चुप हो गए।
“तप के धनी ज्ञान के सागर, चिन्तन के उद्गाता”-इन शब्दों में हम उस विराट व्यक्तित्व का वर्णन करते हैं जो हमारे बीच अस्सी वर्षों तक सक्रिय रह अपना अस्तित्व बनाये रहा व फिर अनेकों को रोता-बिलखता हुआ छोड़ गया। वस्तुतः यह मूल्याँकन किया जाय कि अगणित मनोव्यथा पीड़ितों, अभावग्रस्तों, शोषितों की उस करुण हृदय सम्पन्न महामानव ने कितनी सेवा की, किस सीमा तक उनके दुख में दुख बंटाया व किस तरह उन्हें पतन से उत्थान की राह दिखाई तो एक गौरव की अनुभूति होती है कि हम सौभाग्यशाली हैं जो उसके जीवनकाल में उसके साथ रहे।
गुरुदेव की उदार-सहकार वृत्ति हर क्षेत्र में बढ़ी चढ़ी रूप में देखी जा सकती है। उपासना के क्षेत्र में प्रवेश किया तो नवनीत रूपी हृदय वाला यह सन्त पिघल कर अगणित व्यक्तियों को अपनी तप साधना के अनुदान बाँटता चला गया। उसके गुरु ने उनसे कहा, “सौ हाथों से कमाना, हजार हाथों से लुटाना। जितना तुम समाज रूपी खेत में बोओगे कई गुना तुम्हें वापस मिलेगा, उसे काटना व वितरित कर देना।” ऐसे औघड़दानी को साक्षात् रुद्र न कहा जाय तो क्या कहें? नवनीत और हिमखण्ड जब गलते और पिघलते रहते हैं तथा अपने तप अनुदान सहज वितरित करते रहते हैं।
सामान्य गृहस्थों जैसा रहन सहन व वेशभूषा देखकर उन्हें एक अति सामान्य व्यक्ति समझा जाता था। न वे तिलकधारी महामण्डलेश्वर थे, न छत्रधारी महन्त। जीवन भर एक ऐसा जीवन जिया जिसे पर्वतराज हिमालय की ऊँचाई जैसा माना जाता है। ऐसा जीवन जीने वाले की महानता को कूता जाना सामान्यतः साधारण बुद्धि वाले के लिए शक्य नहीं है। बच्चों जैसी निश्छल पवित्रता तथा बादलों जैसी उदारता उनके मुख्य गुण था, वह था माता के स्तर की ममता। जो भी उनके संपर्क में आया, उनका होता चला गया। हर व्यक्ति जो पहली बार आता यही समझता कि हम से अधिक गुरुजी का और कोई निकटवर्ती नहीं।
प्रत्यक्ष सिद्धियों की चर्चा करने वालों को यह समझा पाना मुश्किल है कि उनकी अगणित सिद्धियों विभूतियों में एक यह भी थी कि वे जिसे चाहते, अपना बना लेते थे, अपनी विकसित संवेदनशीलता, सहज औदार्य की वृत्ति के कारण। इसे जन्मजात संस्कार भी कह सकते हैं एवं चौबीस लक्ष महापुरश्चरणों की सिद्धि भी। पवन के विषय में हर कोई समझता है कि यह हमारे ही ऊपर हवा फेंक रहा है। सूर्य के विषय में सब यही मानते हैं कि उन्हीं के घर रोशनी, गर्मी बिखेरने वह आता है पर समझा जा सकता है कि पवन और सूर्य दोनों ही इतने विशाल और महान हैं कि एक नहीं, असंख्यों को उनकी सहायता का लाभ समान रूप से मिलता रहता है! करुणा-ममता से भरा स्नेहसिक्त अन्तःकरण सब पर अपनी आत्मीयता बरसाता रहता है यहाँ तक कि हिंस्र पशुओं पर भी। क्योंकि वह समष्टिगत विश्वात्मा का प्रतिनिधि होने के नाते मात्र कर-स्नेह लुटाना जानता है। महर्षि रमण के पास जीव जन्तु मनुष्य सभी एक समान विचरते रहते थे। उनकी दृष्टिमात्र से जीवजन्तु अपनी हिंस्रवृत्ति छोड़ देते थे। यह चमत्कार उस विशाल अन्तःकरण का है जो आत्मीयता से सराबोर है
जो भी पूज्य गुरुदेव के पास आया वे उसे जीभर अनुदान देते रहे। कभी निराश नहीं लौटाया कुछ गिने चुने अमिट प्रारब्धग्रस्तों को छोड़कर प्रायः उन सभी को उनने भरपूर सहायता की जो तनिक से सहयोग अथवा अनुदान पाने की इच्छा से उनके पास आया। सदैव यह कहा कि हमारे पास कुछ नहीं, हम अपनी माँ से माँगेंगे व जो भी मदद संभव होगी, करेंगे। यह उनकी सबसे बड़ी महानता थी।
हिमालय निवासी त्रिकालदर्शी परमसिद्ध महात्मा विशुद्धानन्द जी महाराज ने उनके विषय में दिसम्बर 1957 की अखण्ड ज्योति में लिखते हुए अपने उद्गार इस तरह व्यक्त किए है
“आचार्य जी कच्ची मिट्टी के नहीं बने हैं। उनकी नस-नाड़ियाँ फौलाद की हैं। विगत तीस वर्षों में उनने अपने को घनघोर तपस्याओं में तपा-तपा कर अष्टधातु का बना लिया है। जिन कमजोरियों पर शत्रु हमला करता है उन्हें उनने पहले ही ठोक-पीटकर काफी मजबूत बना लिया है। गिराने वाली वस्तुओं में तृष्णा, कंचन, कामिनी, वासना प्रधान हैं। अपनी जीवन भर की कमाई पूर्वजों की छोड़ी सम्पत्ति का एक-एक पैसा उनने मिशन के लिए अर्पण कर दिया है। उनकी धर्म-पत्नी माता भगवती देवी ने अपने शरीर के आभूषणों की एक एक कील माता के चरणों में अर्पण करके एक सतयुगी उदाहरण प्रस्तुत किया है। जौ की रोटी व नमक छाछ को अपना प्रधान भोजन और तन ढकने भर के लिए खादी के टुकड़े पहनने का व्रत लेकर धन लोभ को एक प्रकार से इन दोनों ने अपने से हजारों कोस दूर कर दिया है।”आगे स्वामी जी लिखते हैं कि ‘गृहस्थ को तपोवन बनाते हुए दोनों परस्पर एक दूसरे को माता-पिता जैसी दृष्टि से ही देखते हैं। यह उनकी जीवन साधना है। हिमालय जैसी उदार हृदय और मानसरोवर जैसी निर्मल इन आत्माओं में वह विष बीज निश्चित रूप से नहीं है जो इतने बड़े अनुष्ठानों के संयोजकों को झुका सके। आचार्य जी असंख्यों को पार कराने वाले अनुभवी मल्लाह हैं। वे महान पैदा हुए हैं, महानता के साथ जी रहे हैं और उनका अन्त भी महान ही होगा”।
कितना सही कथन था इस दिव्य द्रष्टा का जिसने उन्हें सहस्रकुंडीय महायज्ञ का आशीर्वाद देते हुए ही अच्छी तरह पढ़ लिया था। उनकी गायत्री साधना का यह चमत्कार था कि एक स्वर से सारे भारत के महात्मागण उन्हें गायत्री विद्या व उसकी साधना पद्धति का एक अनुभवी निष्णात विद्वान मानते थे। ब्रह्मलीन श्री देवरहा बाबा से विगत महाकुँभ पर्व पर इलाहाबाद में मिशन से जुड़े एक उच्चाधिकारी ने पूज्य गुरुदेव के विषय में पूछा कि आपकी उनके संबंध में क्या मान्यता है? तो देवरहा बाबा ने पूर्व की ओर मुख करके कहा कि “साक्षात् सविता का जो रूप है, ब्रह्मतेज सम्पन्न उस अवतारी सत्ता को मेरा नमन है। वे माँ गायत्री के सिद्ध साधक है व युगपरिवर्तन उन्हीं के बताये पद चिह्नों पर चल कर होगा।” युग निर्माण योजना से प्रत्यक्ष उनके क्या संबंध है, यह पूछने पर दीर्घ-जीवी उस महापुरुष ने कहा कि “सभी देवसत्ताएं धरती पर सतयुग लाने को जन्मी है। जो काम आचार्य जी ने प्रत्यक्ष रूप से अपनी स्थूल काया द्वारा किया है, उससे अधिक वे अन्यान्य ऋषि सत्ताओं के साथ जिनमें मैं भी शामिल हूँ सूक्ष्म रूप में काया के महाप्रयाण के बाद, सम्पन्न करेंगे। दुर्गम हिमालय से हम सबका सामूहिक तपोबल वह प्रचंड ऊर्जा उत्पन्न करेगा कि भारत को विश्व संस्कृति में सर्वोच्च स्थान दिलाकर ही रहेगा।” यहाँ यह स्मरणीय है कि विगत जून माह में ही दोनों ही महाशक्तियों ने अपनी काया का परित्याग कर सूक्ष्म शरीर में प्रवेश किया। यह रहस्यमय प्रसंग मात्र संयोग नहीं है, नियन्ता की योजना का एक अंग है।
गायत्री उपासना उनने जिस लगन व एक निष्ठा भाव से की, अगणित व्यक्तियों से करा ली उसने उन्हें युग का विश्वामित्र बना दिया। उनने व्यक्ति व्यक्ति को यह बोध करा दिया कि जीवन शोधन को स्वास्थ्य और कर्मकाण्डों को श्रृंगार मानकर चलना चाहिए। दोनों उनने तब प्रतिपादित किया जब लोगों में यह भ्रान्ति बड़ी गहराई तक जड़ जमाए बैठी थी कि ब्राह्मणत्व अर्जित करने के लिए भीतर से उत्कृष्ट व बाहर से आदर्शवादी जीवन जीने की कोई आवश्यकता नहीं है। जीवन कैसा भी जिया जाय बस स्थूल कर्मकाण्ड येन केन प्रकारेण पूरा होना चाहिए। इस भ्रान्ति का उन्मूलन एक प्रकार की विचार क्रांति थी।
गायत्री यों एक ऐसा मंत्र माना जाता है जिसका जब अनुष्ठान करने पर संकटों के निवारण और सुख सुविधाओं का संवर्धन होता है। पर यह एक अधूरी जानकारी है। गायत्री को महाप्रज्ञा कहते है। महाप्रज्ञा अर्थात् चिन्तन की वह शैली जो मनुष्य जैसे बुद्धिमान प्राणी को भटकावों एवं जंजालों की विपन्नता से छुड़ा सके।
पूज्य गुरुदेव कहते थे कि “गायत्री के चौबीस अक्षरों में सन्निहित अर्थ सूत्रों का विचार किया जाय तो उन्हें संसार का सबसे छोटा किन्तु समग्र प्रकाश प्रेरणाओं से भरा पूरा महामंत्र कह सकते है। गायत्री के अंतिम चरण में भगवान से सद्बुद्धि की याचना की गई है। वह मात्र याचना ही नहीं है वरन् गायत्री का मंत्रोच्चारण उसी स्तर की क्षमताओं वे प्रेरणाओं से भरा हुआ है। जिसने भाव भरे अंतःकरण से इस कामधेनु का पयपान किया, वह सद्बुद्धि सद्भावना का वरदान पाकर निहाल हो गया।” सही अर्थों में सामान्य व्यक्तियों को महामानव बनाने की क्षमता गायत्री मंत्र में है। यह पूज्य गुरुदेव ने अपने जीवन को एक प्रयोगशाला बनाकर तथा अन्यान्यों से साधना कराके उनकी आत्मिक प्रगति का पथ प्रशस्त कर प्रमाणित कर दिया। अन्यान्य देवताओं की अनुकम्पा पाने हेतु भटकने वालों के लिए उनका एक ही संदेश था कि एक ही मंत्र ऐसा है जो संसार भर के सभी मंत्रों की बराबरी करता है, वह है गायत्री मंत्र। सभी अवतारों ने इसकी उपासना की तथा महामानवों, ऋषिसत्ताओं ने भी। फिर जगह जगह कुआँ खोदते रहने की विडंबना क्यों रची जाय? आज के बुद्धिवादी युग में महाप्रज्ञा के तत्वदर्शन के विस्तार की और अधिक आवश्यकता है। वह सही अर्थों में नवयुग ला सकता है और लाकर रहेगा।
पूज्य गुरुदेव ने गायत्री साधना के समग्र रूप का प्रस्तुतीकरण गायत्री महाविज्ञान के तीन खण्ड रचकर किया जो कि एक प्रकार से विश्वकोष माने जा सकते है। उस में उनने लिखा है कि मंत्राराधना के अतिरिक्त एक निष्ठावान साधक को अपनी जीवनचर्या में उपासना, साधना और आराधना का समन्वय करना चाहिए।
त्रिपदा गायत्री के तीन चरणों में इन्हीं तीन विशिष्टताओं को मनोभूमि में ओत−प्रोत कर लेने की आवश्यकता बताई गई है।
उपासना-कारण शरीर अंतःकरण से संबंधित है। साधना चिन्तन से-सूक्ष्म शरीर से और आराधना समाज सेवा के लिए किये गये उदार सहकार भरे कृत्यों से-स्थूल शरीर से। पूज्य गुरुदेव ने अपने तीनों शरीरों से पूरी निष्ठा के साथ गायत्री साधना स्वयं सम्पन्न की व माँ गायत्री के वरदपुत्र बन गए। असंख्यों की सहायता करने वाला ब्रह्मवर्चस् इससे कम में संग्रहित हो भी तो नहीं सकता था। अपने व्यक्तित्व को उर्वर क्षेत्र की तरह विकसित करने में यदि इतनी सतर्कता न बरती होती तो संभवतः उनके चौबीस वर्षों के चौबीस गायत्री महापुरश्चरण तथा सामान्य समय के जप-तप उतने प्रभावी न हो सके होते जितने कि देखे और पाये गये।
साठ वर्ष की आयु में देश के एक मूर्धन्य नेता ने तपोभूमि में भेंट करने पर उनसे अकेले में पूछा कि “आपके द्वारा अनेकों को जो असाधारण लाभ मिले है, उसका विवरण मुझे मालूम है। जरा उस सिद्धि का रहस्य हमें भी बता दीजिए। उत्तर दिया गया कि “गायत्री उपासना के प्रतिफल तो अभी किसी विशेष कार्य के लिए तिजोरी में बंद कर रखे है। यह तो हमारी काया के इस पृथ्वी से ऊर्ध्वारोहण के बाद ही रहस्य खुलेगा। आपने जो कुछ जाना और सुना है, वह सब तो जीवन में उतारे गये ब्राह्मणत्व का प्रतिफल हैं। ब्राह्मणत्व अपने आपमें एक तपश्चर्या है। अभी तक तो उसी का लाभ उठाया और दिया है व आगे भी यही प्रतिफल उससे मिलता रहेगा।
कहीं किसी प्रकार का घमण्ड नहीं कहीं कोई गायत्री के सिद्ध उपासक होने का गुरूर नहीं-सब कुछ सीधा सादा स्पष्टवादी-यह है उनके जीवन का वह पक्ष जो साधारण दृष्टि देख नहीं पाती, मात्र, स्थूल काया को ही सब कुछ मान बैठती है।
परमेश्वर का पहला अनुग्रह मनुष्य जन्म है और दूसरा भावना की दृष्टि से मनुष्य बनना।
जीवन में दो ही व्यक्ति असफल होते है, जो सोचते है, पर करते नहीं। दूसरे वे जो करते तो है, पर सोचते नहीं।
जीवन एक संग्राम है। इसमें वही विजयी होता है, जो हर परिस्थिति का सामना करने के लिए सीना तान कर खड़ा होता है।
मोक्ष अकेले हथियाने की वस्तु नहीं है।” “मोक्ष हम सब को,” यही वाक्य शुद्ध है। सब के मोक्ष का प्रयत्न करने में अपना मोक्ष भी सम्मिलित है।
प्रखरता की सर्वमान्य परिभाषा है आदर्शों से समझौता न करना। उनके जीवन पटल पर प्रखरता इसी रूप में प्रकाशित रही। उस रोज एक कार्यकर्ता कलकत्ता निवासी किसी सेठ की उनके पास लेकर पहुँचे। परिचय दिया, सेठ जी समाज सेवा के कार्य में कुछ दान करना चाहते है। सेठ जी ने अपनी बात शुरू की देखिए स्वामी जी। मैं दान तो बहुत करूंगा। पर मेरी एक शर्त है कि उस धन से कमरे बनें और उनमें से हर कमरे में मेरे परिवारजनों के नाम खुदवायें, सुनकर वह थोड़ा चकित हो कार्यकर्ता को झिड़कते हुए बोले “अरे ये तो कब्रिस्तान बनाना चाहते हैं। इन्हें तुमने मिशन का स्वरूप और मेरे उद्देश्य नहीं समझाए क्या? जाओ ले जाओ मुझे इनका एक पैसा नहीं चाहिए।” सेठ जी यह सब सुनकर सन्न रह गये। उन्हें अन्य जगहों और इनमें फर्क साफ नजर आने लगा था। अपनी इसी प्रखरता की दुधारी तलवार से वह आजीवन आदर्शों के अवरोधों को काटते रहे।
महामानव संवेदनाओं के घनीभूत रूप होते है। सम्वेदनाएं उनका स्पर्श पा सजीव होती है ओर वे संवेदनाओं का स्पर्श पा द्रवित होते है। सन् 84 में उन पर हुए एक हमले ने परिजनों के दिलों को झकझोर दिया। आने-जाने वालों का ताँता लगा था। इन्हीं में एक फटे हाल प्रौढ़वय की महिला भी आई। कमरे में अन्दर आते ही रोने लगी। सांत्वना देने पर बड़ी मुश्किल से अपनी सिसकियों को थामती हुई बोली “गुरुजी आपके लिये दवा लाई हूँ” फिर बताने लगी मेरे गाँव में एक साइकिल वाला डॉक्टर आता है। मैंने उससे पूछा-मेरे गुरुजी को चोट लगी है सो उसने एक ट्यूब और पट्टियाँ दे दी।” कहते हुए उसने अपने झोले से एक फ्यूरासिन का छोटा पैक और कुछ बैण्डेज निकाले। उन्होंने उसे अपने हाथ में लेकर पास में खड़े कार्यकर्ता को निर्देश दिया “आज इसी से मेरी पट्टी करना” और उसे बड़े प्रेम से समझा बुझाकर रवाना किया। शाम को उसी के सामान से पट्टी करवाई गई। इस तरह उनसे सघन रूप से जुड़ी थी जनभावनाएँ।
एक महिला उसी डिब्बे में बैठी थी जिसमें पूज्य गुरुदेव बैठे अजमेर जा रहे थे। अजमेर में एक महायज्ञ था। वे अकेले एक लोहे का बक्सा व बेडिंग लिये हुए थे। कहीं से भी महात्मा जी, गुरु जी नजर नहीं आते थे। वह महिला सतत् रो रही थी। उनने बार-बार उससे पूछा तो इतना ही बोली-’गत माह ही पति का देहान्त हुआ है। संतान है नहीं। सुना है मथुरा से कोई गुरुजी आ रहे हैं। अजमेर इसी या में उनका दर्शन करने जा रही हूँ ताकि मन की शान्ति मिले या मौत ही मिले।” गुरुजी मुस्कराते हुए उसे हर स्टेशन पर पानी भी देते रहे व समझाते रहे कि गुरुजी से हमारी पहचान है मिला देंगे।
अजमेर स्टेशन आया। वह महिला यह देखकर स्तब्ध थी कि जो सज्जन उसे पानी पिलाकर कष्ट पूछ रहे थे, वे ही गुरुजी थे। चरणों में गिर पड़ी। उसके रहने की व्यवस्था का निर्देश देकर गुरुदेव यज्ञ स्थल पहुँच गए। अगले दिन वे वहाँ के एक प्रमुख कार्यकर्ता मोहनलाल जी से बोले-”एक अनाथ बालक लेकर आओ, वे दो दिन तक घूमते रहे। फिर एक महिला चिकित्सक श्रीमती सक्सेना से मिले। उनने दो दिन पूर्व ही एक आपरेशन किया था जिसमें माँ पहले ही प्रसव वेदना में मर चुकी थी बच्चा जीवित था। परिवार वाले उस बच्चे के पिता की नई शादी के लिए नवजात शिशु से छुटकारा पाना चाहते थे। महिला चिकित्सक ने वह बच्चा मोहनलाल जी को दिया। गुरुदेव के समक्ष बच्चा लाया गया। वह महिला जाति के विषय में थोड़ा शंकित दिखी। उनने सारे शरीर पर हाथ फेर कर कहा कि “इसे ब्राह्मण बना दिया है। अब इसे अपना बेटा मानकर पालो। यह मेरा भी बेटा है।”
वही बिलासपुर (म.प्र.) में जूनियर इंजीनियर है, अपनी माँ की खूब सेवा कर रहा है। गुरुदेव की कृपा को वे अपना पुनर्जीवन मानती है। कहती है कि “निराशा के सागर में उबार कर नयी जिन्दगी दी, बेटा दिया व मैं निहाल हो गयी।” ऐसे अनगिनत व्यक्तियों को उनने नया जीवन दिया, मनोबल बढ़ा कर जीवन जीने की दिशा ही।
धन्य-धन्य आदर्श तुम्हारा, आत्मा का श्रृंगार किया। आत्म-शुद्धि के महायज्ञ में तन-मन जीवन वाद दिया॥
दिव्य “अखण्ड-ज्योति” दी तुमने, घर-घर फैला उजियारा। “युग-निर्माण” लक्ष्य जीवन का, सत्संकल्प तुम्हें प्यारा॥
परम शाँति, संतोष कोश से, तुमने मानव मन जीता। तप बल के रावण से छीनी, परम पुनीता सत् सीता॥
श्रीराम ने श्रीराम का, मृदु सपना साकार किया। धर्म-कर्म के महायज्ञ में, अपना सब कुछ वार दिया॥1॥
जीवित साँसों के मंत्रों का, तुमने जादू खिलाया। सूने मन-मंदिर में सहसा, सुख का सागर लहराया॥
जन गण मन के नव जीवन तुम, जन-जन की जीवित भाषा। धर्म-प्राण तुम तपोनिष्ठ तुम, जीवन दर्शन परिभाषा॥
योग साधना के उन्नायक, वेद पुराणों के ज्ञाता। सदाचार समता के पोषक, राष्ट्र धर्म के निर्माता॥
भूली भटकी मानवता को, सविता का आधार दिया। यज्ञ-ज्योति घर-घर फैलाई, मानव का उपहार किया॥2॥
आँधी पानी तूफानों से, लड़ना तुमने सिखलाया। पशुता के आँगन में तुमने, महायज्ञ ध्वज फहराया॥
ऐसी कठिन साधना तुमने, अपने जीवन में साधी। असुरों की दुर्धर्ष शाहियाँ, अपनी मुट्ठी में बाँधी॥
प्राण प्रतिष्ठा, जीवन निष्ठा, सीखी सत पथ राही से। लिखा दिव्य जीवन पृष्ठों को, सदाचार की स्याही से॥
तुमने गीता कर्म योग को, जीवन में साकार किया। अपने प्राणों की ऊष्मा से, नव जीवन संचार किया॥3॥
धुंआ उगलता आसमान है, घुटन भरी है साँसों में। जीवन की बीहड़ घाटी में, आग लगी विश्वासों में॥
तुम्हें साधना, हमें सातना, कैसा खेल विधाता का। किस दर्पण में कहाँ निहारें, प्रियदर्शी मुख त्राता का॥
मन अधीर कुण्ठित है वाणी, याद तुम्हारी कलपाती। लेते नाम विदा का गुरुवर, जन-जन की फटती छाती॥
जीवन यज्ञ अभी है बाकी, असमय में मुँह मोड़ चलें। आकर प्राण कंठ में अटके, राम अयोध्या छोड़ चले।
आकर प्राण कंठ में अटके, राम अयोध्या छोड़ चले॥4॥
चिन्तन बहुतों ने सिखाया हैं, पर ऐसे बहुत कम मिले। जो चिन्तन को जीवन में उतारना सिखा पाते।
सामने पार्थिव न, पर आदर्श की प्रतिमा खड़ी है। आप तो थे ही बड़े, यह और भी उससे बड़ी है॥1॥
पार्थिक से आपने, अपनत्व का अमृत पिलाया। और जब भटक, पकड़ कर हाथ, सत्पथ पर चलाया॥ आपके आदर्श, उससे अधिक संबल दे रहे है। इस तरह से आप, हर क्षण साथ में ही रह रहे है॥ आपसे गहरे जुड़े हम, सूक्ष्म उसकी ही कड़ी है। आज तो थे ही बड़े यह और भी उससे बड़ी है॥2॥
पार्थिव से थी, वही आदर्श से अनुरक्ति देना। उस विरह को भुलाने को, ओर दूनी शक्ति देना॥ समर्पित जीवन जिये हम, आपके आदर्श के प्रति। आपको पीड़ा न पहुंचाएं, हमारी कोई भी कृति॥ आप “बिछुड़ेंगे नहीं” इस वचन पर आँखें गड़ी है। सामने पार्थिव पर आदर्श की प्रतिमा खड़ी है॥3॥
आप तब भी व्यक्ति कब थे, शक्ति की प्रतिमूर्ति ही थे। पार्थिव द्वारा हमारी लालसा की पूर्ति ही थे॥ चाह रहती थी हृदय में, पार्थिव तक दौड़ने की। और अपनी वेदना की, अश्रु धारा छोड़ने की॥ विश्वव्यापी शक्ति का सामीप्य, अब तो हर घड़ी है। आप तो थे ही बड़े, यह और भी उससे बड़ी है॥4॥
प्राणपण से लोकमंगल पंथ, पर हम चल पड़ेंगे। ओ प्रकाश स्तम्भ! तम से आखिरी दम तक लड़ेंगे॥ साँस का हर सुमन, श्रद्धांजलि लिए शिव पर चढ़ेगा। कारवाँ अब तक आपके, आदर्श को लेकर बढ़ेगा॥ क्यों न हम आहुति बनेंगे, जब जरूरत ही पड़ी है। सामने पार्थिव न, पर आदर्श की प्रतिमा खड़ी है॥5॥
नये युग की आरती के थाल के दीपक बनेंगे। और हम ‘उज्ज्वल-भविष्य’ के प्रखर उद्घोषक बनेंगे॥ हम जगायेंगे सतत्, सोया हुआ देवत्व अपना। पूर्ण होगा, आपका स्वर्ग अवतरण का सुगढ़ सपना॥ प्राण, मन में आपकी ही प्रेरणा की धुन चढ़ी है। आप तो थे ही बड़े, यह और भी उससे बड़ी है॥6॥
यदि मनुष्य धर्म की उपस्थिति में इतने दुष्ट है, तो उसकी अनुपस्थिति में क्या दशा होगी?
अपनी प्रचण्ड तपश्चर्या एवं गायत्री महाशक्ति की सुनियोजित उपासना कर वर्चस् की सिद्धि करने वाले पूज्य गुरुदेव ने सदैव डंके की चोट पर यह कहा कि जो भी उनके द्वारा निर्देशित साधना उपक्रम को जीवन में अपनाएगा, वह सुनिश्चित ही प्रतिफल पाएगा। अखण्ड ज्योति जूना 1966 में “अखण्ड ज्योति के परिजन इतना तो करें ही” प्रसंग में वे लिखते है कि “हमने गायत्री उपासना तथा पूजा पद्धति लोगों को सिखाई है और साथ ही यह भी कहा है कि इनका पूरा लाभ उन्हीं को मिलेगा जो अपने व्यक्तित्व को पवित्र एवं उत्कृष्ट बनाने की साधना भी साथ ही करेगा।” आगे वे लिखते है कि “हमने प्रत्येक सहचर को शास्त्रों एवं ऋषियों का यही संदेश सुनाया है कि वे भी विश्व मानव की सेवा को हमारी ही तरह जीवन का वैसा ही अंग बनाएं जैसा कि धन उपार्जन तथा शरीर यात्रा के नित्यकर्म हेतु हम प्रयत्नशील रहते है। यही सच्चा अध्यात्म है।
उपासना को सेवा साधना से जोड़ने का उनका तरीका स्वयं में निराला था एवं अध्यात्म को सही प्रगतिशील दिशा देने वाला भी। लाखों व्यक्तियों को इस प्रकार उनने अपनी ही मुक्ति, वैराग्य, समाधि वाले चिन्तन से विरत कर लोकसेवी बना दिया। यह एक क्रान्तिकारी स्तर का विचारक ही कर सकता था। धर्म के संबंध में जो भ्राँतियाँ संव्याप्त हैं एवं जनोपदेशक जो भी कुछ कहकर उन्हें पोषण देते रहे है, उनसे जूझना व योद्धा की तरह संघर्षरत रह बिना विचलित हुए लक्ष्य सिद्धि तक पहुंच जाना उनके व्यक्तित्व के एक अनूठे पक्ष को प्रस्तुत करता है।
पिछले दिनों लिखे ‘सावित्री महाविज्ञान’ (अभी प्रकाशित) ग्रन्थ में उनने जो लिखा है, वह पूरे मानव समुदाय को एक चुनौती हैं। उसे उन्हीं की लिपि में यहाँ प्रस्तुत कर रहे है।
ड़ड़ड़ड़
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“गायत्री उपासना का प्रयोजन प्रमुखता सद्बुद्धि का अवतरण है। वह ऋतम्भरा या महाप्रज्ञा कही जाती हैं उसका यही लाभ प्रमुख है। इस संदर्भ में हम जितना कुछ उपलब्ध कर सके है, वह गर्व करने योग्य तो नहीं, पर संतोषजनक अवश्य है। नवनिर्माण हमारे इस जीवन का प्रमुख उद्देश्य है। सज्जनों में ही सद्बुद्धि का अवतरण होता है। अपने संपर्क क्षेत्र में जितने भी लोग मिल सके, उनको इस मार्ग पर चलाया घसीटा और धकेला भी है। उसका परिणाम भी लहलहाती फसल के रूप में दीखने लगा है और यह विश्वास बन गया है कि वर्तमान 24 लाख उपासक यदि अपने को बीज बनाकर बोने लगे तो हमारी ही तरह वे भी नई फसल उगाने लगेंगे और युगसन्धि के आगामी वर्षों में यह विस्तार क्रम इतना व्यापक हो जाएगा कि सुसंस्कारी प्रकृति के लोगों में कदाचित ही कुछ प्रतिशत ऐसे बचें जो आद्यशक्ति-युग शक्ति की गायत्री की तत्व चेतना से अनुप्राणित न हुए हों। अपने सहचरों अनुचरों से हमें वैसा विश्वास भी है। यदि उनमें से कुछ शिथिल पड़ते दीखेंगे तो उन्हें झकझोरने की स्थिति में हमारी अदृश्य सत्ता यह शरीर उठ जाने के उपरान्त भी सक्षम रहेगी।”
कितना सुनिश्चित आश्वासन है व यह इलहाम भी कि संभव है शरीर के महाप्रयाण के बाद लोग प्रमादग्रस्त हो जायें तो सूक्ष्म व कारण शरीर के माध्यम से उन्हें सतत् सक्रिय बनाते रहने का संकल्प भी वे प्रकट करते हैं।
अलौकिक दैवी सत्ताएं अवतारी महापुरुष इसी तरह अपना जीवन जीती अगणित व्यक्तियों के लिए प्रेरणा स्रोत बनकर अपना धरती पर अवतरण सार्थक कर जाती है। गुरुदेव कहा करते थे कि पाने लायक जो कुछ भी इस संसार में है, उसे आत्मदेव को जगाकर सहज ही पाया जा सकता है। उनका मत था कि पाँच ज्ञानेन्द्रियों की शक्ति को समझना और उनका सदुपयोग कर सकना ऐसा प्रयोग है जिसके द्वारा अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय, आनन्दमय कोशों को जगाया जा सकता है और उनके सहारे समर्थ सिद्ध पुरुषों जैसा लाभ उठाया जा सकता है। वे यह भी कहते थे कि मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार और प्राण की पंचधा सूक्ष्म काया स्थूल शरीर से असंख्य गुनी सामर्थ्यवान है। (अखण्ड ज्योति, नवम्बर 1971, पृष्ठ 84)
गायत्री की व्याख्या प्राणों की रक्षा करने वाली महाशक्ति (गयं (प्राणों) का जो त्राण करे वह “गायत्री”) के रूप में भी की जाती है। पूज्य गुरुदेव ने पंचकोशों की तो सिद्धि अर्जित की ही प्राणशक्ति को प्रबल बनाकर संकल्प को अडिग बनाकर स्वयं को अजर, अमर मृत्युंजय बन लिया। इन्द्रियों से वे परिचारिकाओं जैसा काम लेते रहे, कभी उच्छृंखल नहीं होने दिया। स्वादेन्द्रिय की पवित्रता हेतु जौ व छाछ का सेवन तथा वाक् पवित्रता अर्जित करने हेतु सत्य का प्रयोग जीवन भर किया। निष्पाप व निर्मल जिह्वा पर साक्षात् सरस्वती विराजमान रहती थी यही कारण था कि उनके आशीर्वाद कभी निष्फल नहीं गए, न कभी परामर्श टाले गये। जिससे बात की उसे अपना बना लिया। जो कुछ भी सारगर्भित प्रवचनों में कहा लोगों के अन्तःकरण में उतरता चला गया।
यही बात घ्राणेन्द्रियों, चक्षुन्द्रियों, कर्णेन्द्रियों तथा काम बीज रूपी त्वक् इन्द्रिय के संबंध में समझी जा सकती है। सर्वत्र उनने सद्भावना व श्रेष्ठता की ही गंध सूँघी आँखों से श्रेय ही देखा, कानों से दिव्य प्रयोजन के बच नहीं सुने-कटु कर्कश वचनों को भुला दिया तथा ब्रह्मचर्य की साधना द्वारा ऊर्ध्वरेता बन अपनी कुण्डलिनी शक्ति को जाग्रत किया। यह पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ जिस व्यक्ति के मातृवत् श्रद्धा के साथ सिद्ध कर लीं, उसके पास कोई कमी रह कैसे सकती है? पंचदेवों को भी उनने इन्द्रियों की तरह संभाला। मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार व प्राण सभी देवों की आराधना कर उन्हें परिष्कृत की ओर ही नियोजित किया।
गायत्री के पाँच मुख पंचकोश कहलाते है। यही सावित्री का स्वरूप है। दस भुजाओं का का अलंकारिक विवरण आता है वे पाँच ज्ञानेन्द्रियों एवं पाँच मनस तत्व से संबंधित देवता ही हे जो मिल कर महाशक्ति की दस भुजाएं बनाते है। इस प्रकार पूज्य गुरुदेव ने पंचकोशों की सिद्धि व दस देवताओं को आत्मसात कर स्वयं को गायत्रीमय बना लिया था। गायत्रीमय स्वयं को ही नहीं अपितु अगणित व्यक्तियों को इस दिशा में मोड़ा व सद्बुद्धि की अवधारणा द्वारा देवत्व का अभिसंचार किया। यही तो है नूतन सृष्टि का सृजन।
यहाँ एक पक्ष विचारणीय है कि क्या उनकी जगह और कोई व्यक्ति होता तो वह मूढ़ मान्यताओं से ग्रसित इस देश में जहाँ ऊँच नीच, जाति पाँति, लिंगभेद जैसी कितनी ही बुराइयाँ संव्याप्त है, इस स्तर का मोर्चा चलाता? सबसे गायत्री उपासना भी करवा लेता तथा यज्ञ में बैठकर आहुतियां भी डलवा लेता? संभव नहीं। अछूत व स्त्री कैसे गायत्री का प्रयोग कर सकते है, यह भ्रान्ति जिस राष्ट्र में रोम रोम में संव्याप्त हो, वहाँ यह क्राँतिकारी कदम सारे खतरे मोल लेते हुए उठाना, एक अवतारी सत्ता का ही काम हो सकता था। संभवतः इसी काम के लिए, आमूलचूल परिवर्तन के लिए, तथा कथित बुद्धिवादियों व अनास्था बढ़ाने वाले कर्मकाण्डियों से मोर्चा लेने हेतु यह कालजयी जन्मा था। आजीवन वे आचार से, अविवेकपूर्ण प्रचलनों से, दुर्बुद्धि भरे कुतर्की प्रतिपादनों से मोर्चा लेते रहे, न जाने कितने घाव व चोटें खायीं पर राणा साँगा की तरह मोर्चे पर डटे रहे, यह शक्ति उन्हें कहाँ से मिली? संदेह नहीं कि माँ गायत्री ही स्वयं अपने पुत्र का संरक्षण कर रही थी व अंततः उसने गायत्री जयंती के पावन दिन अपने पुत्र को गोद में लेकर स्थूल शरीर के बंधन से मुक्त कर और सूक्ष्म, सघन, वायुभूत बनाकर अपना विश्वमाता वाला स्वरूप उजागर कर दिया कि सारे विश्व की कुण्डलिनी को जगाने व नवयुग लाने हेतु अब उस सिद्ध पुरुष का पुरुषार्थ नियोजित होना है। जीवन वृत्तांत के इन प्रसंगों, लिपिबद्ध उनके विचारों व साधना की सिद्धि के अलौकिक घटनाक्रमों से भी बढ़कर किसी की क्या कोई और प्रमाण चाहिए?
नासमझ रिवाज के समर्थन में तर्क करते है। बुद्धिमान तर्क संगत को रिवाज बनाने का प्रयत्न करते है।
यश अपयश मरण के उपरान्त भी सुगंध दुर्गंध की तरह चिरकाल तक बना रहता है। वस्तुतः यही मनुष्य का बहुमूल्य उपार्जन है।
उपयोगी साहित्य पढ़ने से अधिक चिरस्थायी और उपयोगी दूसरा मनोरंजन कोई है नहीं।
स्वामी विवेकानन्द के जीवन की शोधकर्ता मेरीलुई सवर्क ने लिखा है “व्याख्यान देते समय उनके शरीर से एक तरह की तरंगें निकलती थी। फिर क्या मजाल कोई उनसे बंधे बिना न रहे।” फूल बाग कानपुर में, उनकी वक्तृता समारोह के दौरान इस तथ्य को सत्यापित होते बहुतों ने देखा। उस दिन लगभग 15 हजार की उपस्थिति थी। भारत सरकार के तत्कालीन गृहमंत्री आने वाले थे। उनकी देर के कारण काफी कुछ लोग इधर-उधर चले गये। खैर मंत्री महोदय आए संक्षेप में उन्होंने अपनी बात पूरी की। पं. गुरुदेव ने माइक संभालते हुए स्पष्ट घोषणा की “जो मंत्री जी को सुनने आए हो सो चले जाएं जिन्हें मुझे सुनना हो वे बैठे रहे।” घोषणा का परिणाम यह हुआ कि बाहर गये लोग भी लौट आए। उपस्थिति ज्यों की त्यों हो गई। एक घने सन्नाटे को चीरती उनकी वाणी ठीक डेढ़ घंटे तक गूँजती रही। रात्रि के साढ़े बारह बजे मंत्र मुग्ध जनसमुदाय का सम्मोहन टूटा। लोग प्रवचन की चर्चा करते हुए अपने घरों की ओर गए। ऐसा था उनका सम्मोहक व्यक्तित्व जिसका स्थायित्व एक व्यापक संगठन के रूप में सभी के सामने है।
काका कालेलकर गाँधी जी के लिए मजाक में कहा करते थे अपना सब कुछ लुटा देने वाले महापुरुष यदि कहीं कंजूस होते हैं तो अपने मय को लुटाने करने में। इसके छोटे से अंश को भी यह बेकार नहीं गंवा सकते। काका का यह मजाक गुरुदेव के जीवन में भी सोलह आने सच था। यों उनका सुबह का समय लेखन के लिए था पर इस बीच वह अनेकों मुलाकातियों की न केवल दुःख तकलीफ सुनते बल्कि समाधान जुटा देते। एक दिन एक व्यक्ति उनके पास आया। आने के बाद उसने शाखाओं के झगड़े कार्यक्रम की परेशानियां कहना शुरू की।
उसके कथन के बीच में ही पैनी नजर ताकते हुए वह बोले बेटा तू अपनी बात कह तेरा घर परिवार कैसा है। जवाब में उसने गृह कलह, बच्चों की पढ़ाई, पत्नी के स्वास्थ्य अपनी नौकरी संबंधी अनेकों समस्याएं कह सुनाई। यथार्थ में वह कहना भी यही चाहता था। सब कुछ सुनकर वह बोले अब देख तूने असली मुद्दे की बात कही ना पहले बेकार में मेरा और अपना समय खराब कर रहा था। जा तेरा ध्यान रखेंगे। वह व्यक्ति चला गया। समय की इतनी कीमत उसे आज पता चली।
बाल्यकाल व युवावस्था के दिनों में कोई धूनी रमाकर घंटों जप करता बैठा रहे तो ऐसा जीवन असामान्य ही कहा जायेगा। हमारे देश में ऐसी असामान्यताओं की या तो जमकर पूजा की जाती है या खुलकर उपहास उड़ाया जाता है। पूज्य गुरुदेव जिस मिट्टी के बने थे, उसमें उनने अपने कठोर तप की बाहर वाले को खबर तक नहीं लगने दी व एक सेवाभावी विनम्र, औरों के प्रति सदाशयी पण्डित जी के पुत्र के रूप में शीघ्र ही अपने गाँव व आस-पा के इलाके में प्रख्यात हो गये। आँवलखेड़ा में बिताये उनके तीरे दशक के उत्तरार्ध व चौथे के पूर्वार्ध के दिन बहुरंगी गतिविधियों से भरे पड़े है। जो कुछ जानकारी समकालीन व्यक्तियों से मिली है वह यहाँ प्रस्तुत की जा रही हैं इस अवधि में वे आँवलखेड़ा आगरा व आस-पास के गाँवों में सक्रिय रहे। सन 1936 तक स्वतंत्रता संग्राम के सेनानी के नाते बड़ी समर्पित क्रान्तिकारी भूमिका निभाते रहे।
ग्रामीण किसानों की उन दिनों स्थिति बड़ी दयनीय थी। सिंचाई के धनों व कीटनाशक दवाओं के अभाव में खेतों की पैदावार बहुत ही कम होती थी। पूज्य गुरुदेव ने अपने ग्रामीण अनुभव व अध्ययन के आधार पर अनेक फसलों को उगाने, रखरखाव, अधिक उपज लेने का महत्व दर्शाने वाली एक पैसा मूल्य की सोलह पुस्तकें प्रकाशित की। फसली बुखार, पशुओं को रोग से कैसे बचायें? इन सब पुस्तकों को वे नगण्य से मूल्य पर हाट-बाजार में जाकर बाँटा करते। यह बात अलग है कि घर से कोई मदद न मिलने के कारण उनने अपनी प्रथम पत्नी श्रीमती सरस्वती देवी की सोने की हँसली ही गिरवी रखकर यह काम किया।
खड़ी हिन्दी में से सब किताबें लिखी जाती तो शायद जनता प्रभावित नहीं होती। देहाती ब्रजभाषा में उनने जातिभेद, मृतकभोज, खर्चीली शादी, पण्डावाद एवं अन्यान्य अंधविश्वासों पर पाँच पुस्तकें बड़ी व्यंग्यात्मक शैली में लिखी जो बड़ी लोकप्रिय हुई। एक पुस्तक “बेटा की तेरहवीं” में वे लिखते है कि पंडित जी दही-बूरा कुल्हड़ पर कुल्हड़ पिये जा रहे है व कंगाल हो गये घरवालों को उलाहना सुना रहे है-”चौं पोहे के खाजे में मोह मार रह्यौ ऐ।” समाज की मूढ़ मान्यताओं के प्रति क्रान्तिकारी अभियान उनका तब से ही आरम्भ हो चुका था।
इसी अवधि में उनने देशभक्ति की ओजपूर्ण कविताएं लिखी। ये सभी कानपुर के “विद्यार्थी” (संपादक गणेश शंकर विद्यार्थी ) कलकत्ता के “विश्वमित्र” तथा आगरा के दैनिक “सैनिक” में प्रकाशित होती रही। किस्मत, मस्ताना जैसी प्रसिद्ध पत्रिकाओं में भी वे कविताएं भेजते रहे। दुर्भाग्यवश इन कविताओं का संकलन अब उपलब्ध नहीं है, नहीं तो पाठकों को उनके शोर लेखक स्वरूप की जानकारी मिलती। 1940 की “अखण्ड ज्योति” प्रकाशित करने से पूर्व तो वे “सैनिक’ पत्र में ही मत्त जी नाम से कार्य भी करते रहे थे तथा स्वतंत्रता संग्राम के लिए क्रान्तिकारी स्तर का संघर्ष भी करते रहे। मत्त नाम उनका पड़ने के दो कारण बताये जाते हैं एक तो वे देशभक्ति के लिए उन्मत्त थे जिसमें अंग्रेजों के कुशासन से देश को मुक्त कराने के लिए प्राणपण से लगना उन्हें पसंद था। दूसरे एक घटना जिसकी चर्चा आगे की गई है, में पुलिस पिटाई से इतना बेहोश होकर कीचड़ में रात्रि भर पड़े रहे थे कि अगले दिन लोग यह सोचकर ढूंढ़ने निकले कि शायद अब मर-मरा गये होंगे। देखा तो बेहोश थे, दाँत में झण्डा अभी भी था। उनकी यह लगन, चाहे मर जाएं देखकर मतुआ या मत्त नाम उनका सन् 1928-29 में ही पड़ गया था।
आर्थिक दृष्टि से कड़की के दिन थे। क्योंकि इनके स्वतंत्रता सेनानी होने के नाते कई बार पुलिस छापा मार चुकी थी। कुर्की भी हो चुकी थी। डर के मारे कोई फसल भी नहीं उठा रहा था। डर के मारे कोई फसल भी नहीं उठा रहा था। वे घर वालों को समझाते कि थोड़े दिन कष्ट सहना है, फिर सब ठीक हो जायेगा पर सब वस्तुतः उनकी इस देशनिष्ठा से परेशान थे। इन्हीं दिनों के जीवन का एक विचित्र प्रसंग है। इन्हीं दिनों के जीवन का एक विचित्र प्रसंग हैं जिनसे उनकी गौ माता के प्रति भक्ति व परदुःखकातरता की अनुभूति होती है। “सिया राम मय सब जग जानी” वाले नवनीत अंतःकरण वाले युवा श्रीराम ने देखा कि गाँव के कुछ मुसलमान कसाई दो गायों को जो अभी भी पर्याप्त दूध दे सकती थीं, मात्र लंगड़ी थीं, काटने के लिए ले जा रहे थे। पूछा कि उनने कितने में खरीदी हैं। पता चला 25 रुपये में खरीदी हैं। क्या किया जाय? कहाँ से आयें ये पैसे? तुरंत गाँव के साहूकार गुलजारी के पास जाकर 35 रुपये उधार लिए। बैलगाड़ी किराये पर ली, घास के दो बड़े-बड़े. गट्ठर खरीदे व गायों को उठवाकर बैलगाड़ी पर दोनों गायों को रखवाया। दोनों बैलों के साथ स्वयं भी लगे व सुबह के चले रात देर तक हाथरस पहुंच कर वहां की गौशाला में गायों को पहुँचा दिया। अगले दिन बैलगाड़ी प्रातः तक लौटकर लौटा दी, किराया चुकाया व एक हफ्ते में सूद सहित कर्जा भी। अपना सब कुछ लगाकर भी जिसने दो गायों को बचाया, उसके भविष्य को संभवतः सूक्ष्मजगत से देखने वाले देवतागण ही समझते थे। तत्कालीन नरतनधारी व्यक्तियों ने तो इसका कोई मूल्याँकन किया ही नहीं।
वे जानते थे जब तक देश की आधी जनशक्ति नारी को ऊँचा नहीं उठाया गया, देश प्रगति नहीं कर सकता। इसके लिए नारी जागृति अभियान का शुभारंभ उनने अपने घर से ही कर दिया था। अपनी माताजी को अक्षरज्ञान का महत्व बताया, सुलेख कैसे लिखा जाय यह समझाया, धीरे-धीरे वह अच्छा लिखने लगीं। दूसरे नंबर पर उनने अपनी धर्मपत्नी अर्धांगिनी को साक्षर बनाने का जिम्मा लिया। उनने भी बड़े प्रतिरोध के बाद लिखना सीखना चालू किया व क्रमशः दो-तीन बार तख्ती लिख-लिख कर बताने लगीं। वे इन सबका महत्व दोनों को बराबर समझाते। माँ को बताते कि आप रामायण पढ़ सकेंगी, पत्नी को बताते कि घर से चिट्ठी आयेगी या वे लिखेंगे तो किससे पढ़वायेंगी? बात छोटी सी है पर तीस के दशक में एक किशोर नारी साक्षरता की दिशा में इस सीमा तक सोच रहा था व जग का सुधार अपने से ही करने का बीड़ा भी उठा चुका था। बाद में उनने घर में एक प्रौढ़ पाठशाला आरंभ कर दी जिसमें हिंदू, मुस्लिम दोनों ही धर्म की महिलाएं आती व अक्षरज्ञान तथा फिर लोक व्यवहार का ज्ञान सीखती। बाद में मथुरा पहुंचने पर “स्त्रियों का गायत्री अधिकार” पुस्तक लिखने तक उनने नारी जागरण की पूरे भारत में धूम मचा दी।
एक बार गाँव के साहूकार जी के घर में आग लग गई व पूरे घर में फैल गई। लोग बाल्टी भरके पानी तो डालने लगें पर किसी को उनकी युवा बहू की चिन्ता नहीं थी जो अंदर फँसी बैठी थी। छप्पर से एक नसेनी लटक कर आँगन में जाती थी। मत्त जी ने आव देखा न ताव, चढ़कर तुरंत आँगन में पहुँचे व जब तक छप्पर नीचे गिरे, उसे लेकर बाहर आ गये व प्राथमिक चिकित्सा दी। जब तक साहूकार जी धन्यवाद देते, वे रवाना हो चुके थे। ऐसी थी उनकी सेवा-साधना।
आँवलखेड़ा की ही एक और घटना नारी मुक्ति से जुड़ी है। उस गाँव की एक ब्राह्मण विधवा युवती किसी मुसलमान से गर्भवती हो गई। माँ-बाप पूरे गाँव में निंदाभाजक बन गये। उसे घर से बाहर न निकलने देते थे। कोई गर्भपात सलाह देता था तो कोई युवती को जहर देने की। पूज्य गुरुदेव ने साहस किया व उसके घरवालों से बात की कि इसका पुनर्विवाह कराने की जिम्मेदारी मैं लेता हूँ। जो इसे विवाह करेगा, वह इसके बच्चे की भी देख-रेख करेगा। वे उसे मथुरा आर्य समाज ले गये जहाँ की चौक शाखा के बाद में प्रधान बने तथा उचित वर ढूँढ़ कर उसका विवाह एक विधुर से करा दिया। उसने बड़ी उदारतापूर्वक उसकी संतान को अपने पास रखा। इन दिनों अभी भी वह
महिला कानपुर के एक मोहल्ले में अपने जीवन का उत्तरार्ध बिता रही है व हर पल धन्यवाद देती है उस देवदूत को जिसने उसे कुरीतियों की बेड़ी से मुक्त कराया। “एक गर्भवती विधवा का पुनर्विवाह?” क्या कोई सोच सकता था, उन दिनों जबकि जातिवाद और आड़े आ रही थी, साम्प्रदायिकता भी। समाज सुधारक श्रीराम की लगन देखकर सब दंग तो रह गए, पर किसी ने कल्पना न की होगी कि यह व्यक्ति आदर्श विवाहों की धूम आने वाले वर्षों में पूरे भारत में मचा देगा, पतितों-शोषितों का उद्धार एक मसीहा ही कर सकता है व ईसा जैसी ही करुणा-आत्मवत् सर्वभूतेषु की भावनाएं उनमें कूट-कूट कर भरी थीं।
अगस्त 1930 का एक प्रसंग है। उनकी हवेली के फाटक की सफाई तथा ताऊजी की घोड़ी पर खरहरा करने को एक सफाई कर्मचारी आता था-गिरवर। सहज भाव से उसने कहा-”श्रीराम जी, हमें भी अपने यहाँ सत्यनारायण भगवान की कथा करानी है, पर हम अछूतों के यहाँ कोई कैसे आएगा?”उसकी करुण वाणी पूज्यवर को स्पर्श कर गई। वे बोले-”कल तुम सब नहा-धोकर तैयार रहना। हम तुम्हारे घर आयेंगे।” उसे विश्वास नहीं हुआ, पर वे पहुँच गए पोथी, हवन कुण्ड, सामग्री, शंख, झालर व सजावट का सामान लेकर पूरे टोले के हरिजन एकत्र हो गये थे। पहले हवन हुआ, फिर सत्यनारायण कथा तथा फिर शंखनाद फिर प्रसाद बाँटा गया। शंखनाद सुनकर गाँव के ब्राह्मण व ठाकुर लट्ठ लेकर हरिजनों के टोले की ओर दौड़ पड़े पर तब तक श्रीराम जी सारा सामान समेट कर बाजरे के खेतों में होते हुए भाग चुके थे। बाद घर में अच्छी-खासी डाँट पड़ी। विनम्रतापूर्वक सब सुनकर उनने कह दिया कि उनने तो मात्र हवन किया व कथा पढ़ी, ब्राह्मण का कार्य किया। इसमें गलत क्या है? कोई आखिर समझ कैसे पाता कि एक अवतारी, क्राँतिकारी समाज सुधारक अगले दिनों सारी जाति, वर्ण लिंग के व्यक्तियों को एकत्र कर विचार क्रांति के बीज बो रहा है, उसका यह भूमिका का एक अध्याय भर है।
वस्तुतः छोटे-छोटे बाल्यकाल के घटनाक्रम ही महामानवों की प्रौढ़ावस्था की नींव के पत्थर बनते हैं। उस समय भले ही उन्हें समझा न जा रहा हो, पर समयानुसार कालान्तर में जब बीज परिपक्व होकर उर्वर भूमि पाकर अंकुरित, पुष्पित पल्लवित होते हैं तब तक उस वृक्ष को देखकर सभी हर्षोन्मत हो उठते हैं। विराट व्यक्तित्वों के साथ काल्पनिक गलत कथानक जोड़ने वालों की कोई कमी नहीं है पर जो वास्तविक घटनाएँ होती हैं, स्मरणीय बन जाती हैं जब यह गौरवपूर्ण इतिहास सारी मानवजाति के समक्ष आता है तब सब कहते हैं कि हमें तो पहले ही लगता था कि वे ऐसा कुछ बनेंगे। मूल्याँकन वस्तुतः समय पर व जीवित रहते नहीं हो पाता, बाद में इनकी महत्ता समझ में आती है।
नारी धरती की देवी है उसे कामिनी, रमणी बनाकर सर्पिणी स्तर तक न घसीट ले जाओ।
वैदिक साहित्य में विश्वजित यज्ञ की बड़ी महिमा बखान की है। पर कठिन होने के कारण उस समय भी इसे काम ही लोग कर पाते थे। कठिन इसलिये था, क्योंकि इसमें सर्वजनहिताय सर्वजनसुखाय अपना सर्वस्व अर्पण करना पड़ता था। महाराज रघु ने इसे सविधि किया था। नचिकेता के पिता तो सिर्फ चिह्न पूजा कर रहे थे बालक के टोकने पर उस पर नाराज हो बैठे।
जो विधा तुम्हें अहंकार, आलस्य और अनीति की ओर धकेले उसे प्राप्त करने की अपेक्षा अशिक्षित रहना अच्छा।
सफलताओं का ढिंढोरा पीटना ईर्ष्यालुओं को न्यौत बुलाना है। प्रसिद्ध होने की चाह झाड़ियों में भटकाती ओर भेड़ियों की माँद तक पहुँचाती है।
यज्ञमय जीवन जीने के महान संदेशवाहक भला इस वेद विश्रुत यज्ञ से कैसे चूकते। युग निर्माण योजना की स्थापना के अवसर पर उन्होंने वंदनीया माताजी के सारे जेवर, धन संस्था को दे दिया। बाद के दिनों में अपने हिस्से की पैतृक संपत्ति स्वयं द्वारा संस्थापित इण्टर कॉलेज को दे दी। जहाँ कहीं जो कुछ भी उनका निजी कहा जा सकता था, सब कुछ सर्वहित में अर्पण करके कलिकाल में विश्वजित यज्ञ की महिमा को पुनर्जीवित कर गए। अंतिम समय में उनके पास अपना कहने को दो रुपये का डॉटपेन व एक चश्मा भर था।
अखण्ड ज्योति पत्रिका का सम्पादन परोक्ष रूप से उनने प्रारंभ से अंत तक किया था किंतु 1971 के याद यह दायित्व दूसरों के कन्धों पर डालकर अपनी लेखनी अंत तक चालू रखी। जब पत्रिका सहयोगियों के सम्पादन द्वारा प्रकाशित होती थी तो प्रारंभ के कुछ वर्षों में तो वे उसे डिस्पेच होने से पहले देखते, किंतु 1982 के बाद वे भेज देने का निर्देश देकर उसकी समीक्षा छपकर आने के बाद करते थे। कभी कोई गूढ़ वैज्ञानिक विवेचना वाला लेख प्रकाशित होता तो वे बड़े प्यार से उस कार्यकर्ता को पास में बिठाकर समझाते कि-यदि तुम स्वयं अपने बच्चे को यह बात समझा रहे होते तो क्या इतनी क्लिष्ट भाषा में लिखते? लिखते समय ध्यान रखा करो कि एक छठी-सातवीं कक्षा का विज्ञान का छात्र तुम्हारा पाठक है व तुम उसे संबोधित कर रहे हो। फिर ऐसी विशद वैज्ञानिक क्लिष्टता से भरा विवेचन तुम्हारी लेखनी से नहीं लिखते बनेगा।” वे एक शिल्पी थे, जिनने अनेकों को कलम पकड़कर लिखना सिखाया, उन्हीं से युग साहित्य भी लिखवा लिया व उन्हें सम्पादन का श्रेय भी दिया।
मत्त-प्रलाप
अंधकार कुछ सूझ न पड़ता, होता है हिमपात। जग की सारी शक्ति लगाए बैठीं तेरी घात॥
इंद्र-ब्रज गिरता है ऊपर, लेता सिंधु उफान। मेरु उड़े जाते है, ऐसा आता है तूफान॥
नष्ट-भ्रष्ट करने आते है, प्रलय मेघ घनघोर। पर तेरा तो पथ निश्चित है, बढ़ता जा उस ओर॥
देख-देख, इन बाधाओं को, पथिक! न घबरा जाना! सब कुछ करना सहन, किंतु मत पीछे पैर हटाना!!
-श्रीराम ‘मत्त’
किसान
छाती तोड़ महान परिश्रम, तेरे का परिणाम। झपट, हड़पता रहता है, यह क्रूर विश्व अविराम॥
तू भूखा, नंगा रोगी रहता, व्याकुल बेचैन। पर वह ‘ही-ही’ हँसता है, लखि तेरे गीले नैन॥
तेरा करुणा पूर्ण दुखों से, जाता हृदय पसीज। पर वह झुँझलाता है, उलटा तुझ पर बरबस खीझ॥
इस पूँजीमय निर्दय जग का, देख कुटिल व्यवहार। ज्वालामुखी! न फट जना। मिट जायेगा संसार॥
ओ, हिमगिरि से क्षमाशील, उपकारी सदय किसान! देव! शान्त रखना अपना दुखपूरित हृदय महान॥
-श्रीराम ‘मत्त’
मत्त-प्रलाप
चीर भूमि का पेट, किया श्रम से गेहूँ उत्पन्न कहाँ चला जाता है, मेरा कष्ट उपार्जित अन्न?
मैं, मेरे पशु, सुत, जन, दारा, करते हैं उपवास। कौन हड़प जाता है, मेरी रोटी, मेरे ग्रास?
लकड़ी, अन्न, तेल, घी, सब्जी, दाल, रुई, गुड़, राव। पैदा करता, फिर भी रहता, इनका मुझे अभाव!!
यह क्या? जादू? गोरखधंधा? भूल भुलैया जाल! श्रम-जीवी भूखा; बैठा ठाला मालामाल!!
एक-एक के बाद अहो कितनी, अनन्त आपत्ति! गिरा-गिरा कर लात लगाती जगाती कोई शक्ति?
-श्रीराम ‘मत्त’
मत्त-प्रलाप
माता! व्यथित हुई कैसे? जल आँखों में भर आया। हैं! रोती है। कैसा संकट, जननी तुझ पर आया॥
किधर गया? वह नारकीय नर, जिसने तुझे सताया। इतनी हिम्मत? किसने की? था कौन? कहाँ से आया??
कर तेरा अपमान, इसी जगती पर है, जीवित है? बता कोन है? इन्द्र? वज्र? रवि? वायु? सिंधु? पर्वत है??
कोई भी हो, तोरा दुश्मन, निश्चय मिट जावेगा। त्रिंस कोटि हुँकारों से, नभ मण्डल फट जावेगा॥
-श्रीराम ‘मत्त’
परिवर्तन युग
(पं. श्रीराम ‘मत्त’)
मलय-मरुत हो बंद, बवंडर के प्रचण्ड झोंके आवें। शाँत हिमालय फटे, शिलायें उड़े, चूर हों टकरावें॥
चलता रहे प्रतप्त ग्रीष्म, सागर सूखे ‘खल-बल’ खौले। वज्रपात हो, भूमि कम्प हो, सर्वनाश हौले, हौले॥
फट जावे भूतल का पर्दा, उसमें विश्व समा जावे। लड़ें दिशाएँ, उलटें, रवि, शशि, शून्य, शून्य ही रह जावे॥
परिवर्तन युग आवे, बहरे सुनें, आँख अंधे खोले। सोने वाले उठें! सिपाही जागें! सावधान हो लें॥
जवाहर के प्रति
देख दुर्दशा माता की, जल आँखों में भर आया। सिंहासन पर लात मार कर, भिक्षा-पात्र उठाया॥
छोड़ राज प्रासाद पिता का, घर-घर अलख जगाया। समझाया “स्वाधीन बनो” जो तेरे पथ पर आया॥
ओ, इस युग के बुद्ध-तपस्वी, मौन, साधनाकारी। ‘बंधन से निर्वाण’ सिखाती, वाणी वीर तुम्हारी॥
हुई एक से एक बड़ी तेरी अनुपम कुर्बानी। आज और क्या देने आया ओ दधीचि से दानी॥
-श्रीराम ‘मत्त’
पूज्य गुरुदेव ने अवतारों की परिभाषा तीन प्रकार से की है संत, सुधारक, शहीद। तीनों ही परिभाषाएं अपने में अनूठी है। एक विचित्र समन्वय यह है कि इस निष्कलंक प्रज्ञावतार में इन तीनों ही स्वरूपों का सम्मिश्रण समुचित अनुपात में मिलता। “संत हृदय नवनीत समाना” उक्ति उनके जीवन में सार्थक होती है जब हम उनके बाल्यकाल व बाद के संस्मरण, इतना बड़ा गायत्री परिवार व उसके अभिभावक के रूप में अपनी अनुभूतियाँ लुटाते उन्हें पाते है। सुधारक तो वे जन्मजात थे ही। इसकी चिनगारी तो आँवलखेड़ा में ही दिखाई देती है जब वे छुआछूत का भेदभाव दूर करने से लेकर, मेहतरानी की सेवा व उनके टोले में पूजा पाठ करने तक का उपक्रम आरंभ कर देते है।
शहीद अर्थात् लगन, निष्ठा कि देश, समाज, धर्म, कर्तव्य के प्रति अपनी कुरबानी तक दे देने की ललक। उनके मार्गदर्शक ने उन्हें अपने महाअनुष्ठान में परिस्थितियों के अनुरूप समझौता कर वर्षों में कटौती कर लेने का संकेत कर दिया था। अतः वे उनके आदेश का पालन करते हुए स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े। यह युगधर्म था। हजारों स्वयं सेवकों में एक न भी जाता तो किसी का कोई क्या बिगाड़ लेता। किंतु प्रेरणा औरों को भी तो देनी थी। अतः सत्याग्रही बनने का संकल्प पूरा करने के विचार को अमली स्वरूप दिया व वे घर से भाग खड़े हुए।
जिन परिस्थितियों में वे भागे वे संभवतः औरों के साथ रही होती तो न कर पाते। वे अपनी विधवा माँ के इकलौते बेटे थे। शादी हो चुकी थी। माँ चाहती थी वे भी पुरोहिताई करें व कुछ पिता की संपत्ति में अभिवृद्धि करें। ऐसे में “काँग्रेस” रूपी मौत के कुएं में कूदना आत्मघाती कदम ही था। सभी को भय था कि वे कहीं भाग न जायें अतः घर पर ताले डाल दिये गये। वे घर से पानी भरा लोटा लेकर शौच के बहाने निकले एवं घर से 17 किलोमीटर दूर आगरा पहले उल्टी दिशा में चल कर, फिर घूमकर लौटकर लगभग 12 घंटे पैदल चलकर स्वयं सेवक भर्ती कैम्प में पहुँचे। वहाँ वे अपने मित्र जगन प्रसाद जी रावत, ठाकुर ऊधमसिंह तथा ठाकुर गंगासिंह दहू से मिले। चारों तरफ जन संपर्क का माहौल बनाया एवं सभाओं में गर्म उत्तेजक भाषण देकर नये स्वयं सेवकों की भर्ती चालू कर दी।
मार्च-अप्रैल 1931 में वीर भगत सिंह को फाँसी लगते ही देश वातावरण आक्रोश से भर उठा। “सरफरोशी की तमन्ना” वाले देश भक्तों की भीड़ से जेल भर गयी। उनमें से एक हमारे पूज्य गुरुदेव भी थे जिन्हें सब श्रीराम ‘मत्त’ के नाम से जानते थे। कुछ दिन जल का यातनाएं सहकर बाहर निकले। आंवलखेड़ा के थाना अहारान के अंतर्गत एक कस्बा था “ जारखी”।सरकार वहाँ से जुलूस निकालने पर प्रतिबन्ध लगा रखा था। तिरंगा झंडा लेकर सरकार को चुनौती देकर निकलना एक दुस्साहसी का ही काम हो सकता था। जुलूस निकला। वँदेमातरम् के नारे गँज उठे। पुलिस ने डण्डों से पिटाई चालू की। झण्डा मत्तजी के हाथों में था। बेहोश होकर वे कीचड़ में गिर गये व पुलिस पीटती चली गई। प्रातः दाँतभिची स्थिति में उनके मित्रों ने उन्हें कीचड़ के जोहड़ से निकाला। डॉक्टरों ने जब औजारों से मुँह खोला तो तिरंगे झण्डे का टुकड़ा जो डण्डे की मार से हाथ से छूट गया था व उनने मुँह से दाँतों में भींच रखा था, फँसा पाया। यह स्थिति देखकर उनकी आजादी के प्रति यह लगन व उमंगें देखकर सब आश्चर्यचकित रह गये मत्तजी नाम तब और प्रख्यात हो गया।
सत्याग्रह आँदोलन के अंतर्गत टेलीफोन के तार काटने से लेकर पुलिस थानों पर छापे मार हमले बोलने तक का कार्य उनने व उनके युवा मित्रों ने किया। अपने छह-आठ वर्ष के इस जीवन काल में गुरुदेव का “योद्धा” वाला वह रूप उभर कर आता है जिसको हम परिमार्जित प्रौढ़रूप में बाद में पण्डों से संघर्ष करते हुए सहस्रकुंडीय यज्ञ में तथा पूरे समाज में संव्याप्त अनीति से मोर्चा लेते हुए युगनिर्माण के सूत्रधार के रूप में देखते हैं। अगणित चोटें खाई हैं इस आजादी के सिपाही ने जो बिना नाम व यश की आकाँक्षा के लड़ा व एक स्वयं सेवक मात्र रहना जिसने पसन्द किया।
अपने जीवनकाल के इस अध्याय पर पूज्य गुरुदेव अपनी आत्मकथा में जो लिखते हैं, वह उनकी लिपि में ही प्रस्तुत है-
ड़ड़ड़ड़
(अनुवाद) “देश के लिए क्या किया? कितने कष्ट सहे? सौंपे गये कार्यों को कितनी खूबसूरती से निबाहा इसकी चर्चा करना यहां सर्वथा अप्रासंगिक है। उसे जानने की आवश्यकता प्रतीत होती हो तो वे उत्तर प्रदेश सरकार के सूचना विभाग द्वारा प्रकाशित आगरा संभाग के स्वतंत्रता सेनानी पुस्तक पढ़ लें उसमें ढेरों महत्वपूर्ण कार्यों के साथ हमारे नाम का उल्लेख अनेक बार हुआ है। पर यहाँ तो केवल यह देखना है कि हमारे हित में-मार्गदर्शक ने किस हित को ध्यान में रखा?”
इस आत्म विवेचना में कितना भोलापन है व यश न लेने की, आत्मस्तुति न करने की एक ऐसी वृत्ति का दर्शन होता है जो आज कही दिखाई नहीं देती। उन दिनों दो दिन जेल काटने वाले भी आज मंत्री पद की शोभा बढ़ा रहे है, देश की भूखी जनता दाने-दाने को तरसती रहे, स्वयं अपने कोठे भरे जा रहे है पर निस्पृह लोकसेवी उन दिनों भी थे, इसकी साक्षी हैं पूज्य गुरुदेव जिनने अपनी इस आठ वर्ष की तपस्या का प्रतिदान न सुविधाओं के रूप में लिया, न पद-वैभव के रूप में। ताम्रपत्र लिया तो वह भी आज से दो वर्ष पूर्व जब शासन की ओर से एक मंत्री महोदय ने स्वयं निवास स्थान पर आग्रहपूर्वक समर्पित किया। पेंशन उनने शासन के हरिजन फण्ड या प्रधानमंत्री राहत कोष में प्रतिमाह जमा कर दिये जाने का अनुरोध किया जो कृतज्ञतापूर्वक शासन ने स्वीकार कर लिया। उनके मार्गदर्शक बहादुरी का जो इम्तहान ले रहे थे उसमें वे पूरी कसौटी पर खरे उतर रहे थे।
गुरुदेव बताते थे कि इस अवधि में जेल में व जेल से बाहर अनेक प्रकृति के लोगों से मिलना हुआ। इनसे बहुत कुछ सीखने को मिला। जेल में ही लोहे के तसले की पीठ को कागज, कंकड़ को फाउन्टेन पेन व “लीडर” की एक पुरानी प्रति को पाठ्य पुस्तक बनाकर साथियों से पूछते-पूछते अंग्रेजी सीख ली। उत्तर भारत की प्रायः सभी भाषाओं का अभ्यास जेल में रहते-रहते होता रहा। कई बार जिम्मेदारी के पद सौंपने के आग्रह हुए पर सदा स्वयं सेवक ही बने रहने का अनुरोध किया। कभी किसी पद की चाह नहीं की। केसकर साहब जो बाद में प्रसारण मंत्री बने को एक स्वयं सेवक की आवश्यकता थी। पालीवाल जी ने
मत्त जी से एक ढूंढ़ कर देने को कहा। उनने स्वयं को प्रस्तुत किया व उनकी व्यक्तिगत देखभाल से लेकर आने वालों से मिलने तक, छापा मारने वाली पुलिस से उन्हें बचा कर पीछे के दरवाजे से रवाना करने व स्वयं को छद्म वेश में रख गिरफ्तारी से बचने के सारे नाटक उनने किये।
काँग्रेस उन दिनों गैरकानूनी थी। कलकत्ता में 1933 में एक बड़ा अधिवेशन होने जा रहा था। देशभर से सत्याग्रही कलकत्ता रवाना होने लगे। सरकार ने बंगाल की सीमा में प्रवेश करने के लिए बड़ी संख्या में हर जिले की सी.डी.लगा रखी थी। बर्दवान स्टेशन पर हर डिब्बे की तलाशी लेकर गिरफ्तारियां की गयीं। आगरा से चला आखिरी जत्था श्री रावत जी, गोपाल नारायण, व श्रीराम मत्त का था। तीनों ने कई रेलें बदलीं पर अन्ततः आसनसोल स्टेशन पर आगरा के ही सब इंस्पेक्टर ने पहचान कर उतार लिया व उसी जेल में बन्द कर दिया जहाँ अन्य व्यक्तियों का आगमन थोड़ी देर में होना था। ये थे महामना मदन मोहन मालवीय, स्व. जवाहर लाल नेहरू की माता स्वरूप रानी, गाँधीजी के बड़े पुत्र देवीदास गाँधी, रफी अहमद किदवई, शोभालाल गुप्त, कन्हैयालाल खादीवाला, गोपीनाथ श्रीवास्तव इत्यादि। मालवीय जी व माता स्वरूप रानी सबके साथ बच्चों जैसा व्यवहार करते। जो कुछ मिलता-मिल बाँट कर खाते। शाम को सत्याग्रहियों को कबड्डी खिलाई जाती व फिर उपदेश-परामर्श का क्रम चल पड़ता था।
एक दिन मालवीय जी ने कहा-”यदि कांग्रेस को लोकप्रिय बनाना है तो हर घर से एक मुट्ठी अनाज या एक पैसा संग्रह करना चाहिए ताकि जनता यह समझे कि काँग्रेस हमारी है।” औरों के गले यह परामर्श उतारा कि नहीं किन्तु बालक श्रीराम मत को यह सूत्र समझ में आ गया एवं युग निर्माण योजना से लेकर गायत्री परिवार खड़ा करने तक इसी सूत्र को लोक व्यवहार में उतारा गया। परिणति स्वरूप मिली अपार जन श्रद्धा व प्रत्येक की घनिष्ठ आत्मीयता। करोड़ों की पूँजी से बने इस संगठन की प्रत्येक गतिविधि के मूल में यह अंशदान की मूल वृत्ति जिन्दा है व इसी ने करोड़ों भारतीयों का इसे एक संगठन बना दिया है।
आसनसोल जेल का प्रसंग चल रहा था। वहाँ से सरकार ने सभी को छोड़ दिया व सभी कलकत्ता पहुँचे। अन्य लोग तो मंच की तरफ बढ़ गये, पूज्य गुरुदेव उत्तर प्रदेश के ग्रामीण परिकर से आये सत्याग्रहियों के जत्थे में मिल गये, सबकी कुशल पूछी व उन्हीं के साथ लौट आए। आने के बाद पुनः”सैनिक” प्रेस में कम्पोजिंग, प्रूफ रीडिंग सम्पादन का काम सँभाल लिया। कई बार प्रेस पर छापा पड़ता क्योंकि श्रीकृष्ण दत्त जी पालीवाल इसके मालिक थे व सभी सेनानी उन्हीं के पास रह रहे थे। ऐसे में नियमित रूप से संयत भाषा में सेंसर से बचाते हुए पत्र निकालने का काम एक कुशल स्तर का सम्पादक हुए पत्र निकालने का काम एक कुशल स्तर का सम्पादक कर सकता था जिसे पूज्यवर ने बखूबी किया।
इन्हीं दिनों एक क्राँतिकारी काम उनने और किया। गाँधी इर्विन समझौते के अंतर्गत एक विषय लगान बन्दी का भी था। आगरा सबसे बड़ा जिला संयुक्त प्रान्त का था। लगान बन्दी संबंधी आँकड़े पन्त जी ने नैनीताल से मंगवाये। पूज्य गुरुदेव ने अकेले गाँवों में घूम-घूम कर किसानों के नाम, रकबा लगान की रकम आदि की पूरी छान-बीन कर सारे आँकड़े तैयार किये। इतनी विस्तृत, प्रामाणिक जानकारी पंत जी के पास पहुँची तब उन्हें यह मालूम हुआ कि यह काम श्रीराम मत्त नामक एक देहाती स्वयं सेवक का है जो उनके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा। इन्हीं आँकड़ों के आधार पर पूरे प्राँत के उन सभी देशभक्त किसानों या गाँवों का लगान माफ कर दिया गया जिनने लगान बन्दी का ऐलान किया था। स्वयं महात्मा गाँधी ने इस कार्य की प्रशंसा करते हुए कार्यकर्ताओं से कहा था कि-”कांग्रेस को कार्यकर्ता चाहिए तो इस स्तर का।” गुरुदेव के जीवनवृत्त का यह 1936 तक का प्रसंग बड़े उतार-चढ़ावों व संघर्ष भरे घटनाक्रमों से भरा है। इसका वास्तविक मूल्याँकन जब होगा तब लोग जानेंगे कि एक सर्वोच्च स्तर का धर्मोपदेशक महर्षि अरविंद की तरह ऐसा क्राँतिकारी जीवन जीता रहा व हमें इसकी जानकारी भी नहीं थी।
कभी-कभी जीवित भी मृतकों से बुरे सिद्ध होते हैं या कभी-कभी मृतक भी जीवितों से श्रेष्ठ गिने जाते हैं।
मुसकान स्नेह सौजन्य की भाषा है। खीझ अपने रोष, असंतोष और अशक्ति की अभिव्यक्ति।
जाति जन्म से नहीं कर्म से बनती है। जो ब्रह्म परायण है, वह ब्राह्मण। जो अनीति के विरुद्ध लड़ता है सो क्षत्रिय। जो आदान-प्रदान की व्यवस्था बनाता है वह वैश्य। जो श्रम रत है सो शूद्र।
मन की अनदेखी परतों में होने वाली हलचल को खुली किताब की तरह पढ़ लेना योगियों की प्रखर चेतना के ही बूते की बात है। उनमें प्रायः इसकी झलक मिलती रहती थी। बात सन 60 के दिनों की है। ग्वालियर से एक कार्यकर्ता घीया-मण्डी, मथुरा पधारे। आते ही उन्होंने निचली मंजिल के दफ्तर में सौ रुपये का अंशदान दिया, बाद में गुरु जी से मिले। कुशल वार्ता के बाद ही गुरुदेव ने उनसे भोजन के लिए आग्रह किया। भोजन का समय भी था, वह स्वयं भी खाना-खाने बैठ रहे थे।
आगन्तुक कार्यकर्ता बैठ तो गये, पर उनके मन में उथल-पुथल हो रही थी कि सौ रुपयों की रसीद तो मिली नहीं, पता नहीं गुरुदेव को मेरे इन रुपयों का पता चलेगा कि नहीं। मन में उठ रहे उनके भाव के साथ ही अपनी चर्चा रोककर वह बोल उठे-”पहले नीचे से जाकर सौ रुपये की रसीद ले आओ फिर हम दोनों आराम से भोजन करेंगे।” सुनने वाले को काटो तो खून नहीं, इस अनजानी बात को वह कैसे जान गए? झेंपते हुए वह उठा और रसीद ले आया। मन में थोड़ी ग्लानि के साथ यह विश्वास दृढ़ हो रहा था कि किसी के भी मन की गहराइयों में छिपी बातें उनके लिए स्पष्ट है।
शक्तिपीठों के उद्घाटन के समय पूज्य गुरुदेव एक परिजन के घर पहुँचे। घर में प्रवेश करते ही उन्हें सीधे उस विशाल कक्ष की ओर ले जाया गया जहाँ सभी संभ्रान्त व्यक्तियों को बिठाया जाता था। इसकी भव्यता व रौनक, सजावट देखते ही वे पलट पड़े। सहज, सरल भाव से उस परिजन से कहा-”बेटे! यहाँ मैं प्रवचन करने नहीं आया हूँ न आवभगत करवाने। मैं तो अपने बच्चों मिलने आया हूँ। क्या तुम्हारे यहाँ कोई खुली जगह नहीं है बैठने की।” इतना कहकर वे पास सटी एक छत की ओर चल दिये वहाँ कुछ लोहे के टूटे पाइप व एक पुराना तखत पड़ा था। उनने उसे बिछाने की चेष्टा की, इसी बीच हतप्रभ परिजन वे उनके परिवार के सदस्यों ने उसे बिछाकर उस पर दरी बिछा दी। एक व्यक्ति ने कूड़ा कोने में कर दिया। वहीं बैठ कर उनने सबकी कुशल-क्षेम पूछी व अपनी आत्मीयता के स्पर्श से सबको निहाल कर दिया। इसी सादगी व सरलता के कारण ही तो वे लाखोँ व्यक्तियों के हृदय के सम्राट बने।
सन् 1938-39 के दिन भारत और विश्व के इतिहास के लिए भारी उथल-पुथल के थे। भारत में स्वतंत्रता संग्राम जोरों पर था। महाकाल कुछ ही वर्षों में आजादी के साथ एक नये सूर्योदय के समीप राष्ट्र के लिए जा रहा था। उधर परोक्ष जगत में एक विश्वयुद्ध की पृष्ठभूमि रची जा रही थी। हिटलर का उदय हो चुका था व उसका अधिनायकवाद अपनी जकड़ में पोलैंड व फ्राँस को ले चुका था। भविष्य में क्या होगा? ये संभावनाएं दिव्यदर्शी आत्माओं को ही दृष्टिगोचर होती थी। साधारण व्यक्ति भविष्य का पूर्वानुमान कब कर पाते है?
पूज्य गुरुदेव उन दिनों “सैनिक” समाचार पत्र से अवकाश लेकर अपनी तप साधना में लीन थे। वे इस बीच स्वतंत्रता संग्राम में अपनी भूमिका निभाने के बाद बापू से यह निर्देश ले आए थे कि उन्हें योगीराज अरविंद एवं रमण महर्षि की तरह आध्यात्मिक शक्ति के सहारे परतंत्रता से मुक्ति पा रहे भारत व युद्ध की पीड़ा से भुगत रहे विश्व को प्रचण्ड सामर्थ्य परोक्ष जगत से प्रदान करनी है। यह उनकी मार्गदर्शक सत्ता का निर्देशन भी था। उन दिनों जिनने पूज्य गुरुदेव को लेखनी द्वारा संघर्ष कर एक मासिक आध्यात्मिक पत्रिका निकालने की स्थिति में देखा था, वे एक सामान्य व्यक्ति का संघर्ष मात्र ही समझ पाए थे। वस्तुतः पूज्य गुरुदेव युग परिवर्तन के लिए पृष्ठभूमि तैयार करने के लिए अपनी लेखनी द्वारा लोकशिक्षण का,जन-जन का आत्मबल बढ़ाने का, उन्हें तपोनिष्ठ बनाने का शिक्षण आरम्भ करना चाहते थे। “सैनिक” मूलतः एक समाचार पत्र था। उससे वे वह कार्य नहीं कर सकते थे, जो अध्यात्म मंच से संभव था, वह भी तप में लीन एक अवतारी सत्ता द्वारा जिसका अवतरण ही इसलिए हुआ था कि विचारों में संव्याप्त भ्राँतियों का उन्मूलन के।वह एक नये अभियान का प्रज्ञा अभियान का सूत्रपात करना चाहते थे। उन्हें लेखनी के माध्यम से आने वाले युग के लिए संस्कारवान आत्माओं का आह्वान करना था। इसके लिए अपनी व्यवस्था,चाहे वह शुरुआत में छोटी ही हो, बनाना बहुत जरूरी था।
“सैनिक” पत्र छोड़ने के बाद डेढ़ वर्ष का समय उनने स्वाध्याय व अपनी भावी तैयारी हेतु गहन मन्थन में लगाया। इसके लिए उनने कलकत्ता, पटना, वाराणसी, दिल्ली, पूना, मद्रास की विभिन्न लायब्रेरीज छान मारी। अध्यात्म तत्वज्ञान से लेकर समाज के नव निर्माण संबंधी आवश्यक संदर्भ और विवरण संकलित कर उन्हें सिलसिलेवार जमाया। इसके बाद शुरुआत दो हजार संस्कारवान आत्माओं से की। इन व्यक्तियों से उनका संपर्क या तो प्रत्यक्ष हो चुका था या वे परोक्ष रूप से उनकी रुचि को जानते थे। अपनी दृष्टि से उनने उन्हें परखा कि उनकी मनोभूमि आत्मनिर्माण, आत्मविकास एवं तदुपरान्त युग परिवर्तन के संस्कारों के बीज बोने योग्य है या नहीं। इन सभी को उनने अपने हाथ से पत्र लिखे, प्रत्येक को उसके स्वरूप और स्तर के अनुसार अलग-अलग।
कोई कल्पना कर सकता है कि एक अकेला व्यक्ति पत्राचार, स्वाध्याय, लेखन-प्रकाशन की व्यवस्था, कागज का प्रबंध, पत्रिका के लिए रजिस्ट्रेशन की अनुमति आदि की भागदौड़ कैसे कर सकता है। पर यह सब उनने अकेले उस अवधि में किया जब ब्रिटिश प्रशासन का दमन चक्र अपने चरम पर था एवं सभी सामग्री युद्ध के कारण आसानी से नहीं मिल पा रही थी। उस पर भी संकल्प यह कि हम बिना किसी से साधन माँगे, किसी प्रकार की वित्तीय सहायता लिए पत्रिका प्रकाशित करेंगे। जिन्हें पत्रिका या समाचार पत्र निकालने का कटु अनुभव है वे जानते हैं कि प्रतिकूल परिस्थितियों में सब कुछ कर पाना एकाकी व्यक्ति के वश की बात नहीं। पर पूज्य गुरुदेव के संकल्प के साथ गुरु का बल जुड़ा था, महाकाल का आश्वासन साथ में था कि वे किसी से भी बिना किसी सहायता माँगे विचारक्राँति का माहौल तैयार करेंगे। उनने सब कुछ दाँव पर लगा दिया। कुछ धनपति वित्तीय समूहों ने उनके शुभ संकल्प को सुनकर धनराशि देने की बात कही तो उनने अस्वीकार कर दी। यह उनके ब्राह्मणत्व को एक चुनौती थी कि क्या वे अपने आत्मबल से कुछ कर सकते हैं? यदि हाँ, तो वे शुरुआत कर दिखाएँ।
उन दिनों घर वालों से लेकर, मित्रों-परामर्शदाताओं ने उन्हें यही राय दी कि वे स्वतन्त्र पत्रिका निकालने के स्थान पर, अच्छा हो जनरुचि की पुस्तकें लिखें अथवा वापस गाँव जाकर अपने पिता के कथा-पठन पाठन के काम को सँभाल लें। सभी को इस काम में घाटा ही घाटा नजर आ रहा था। पर महाकाल के वरद् पुत्र के लिए तो यह अभियान एक कर्म साधना की शुरुआत थी। उन्हें किसी का परामर्श क्या प्रभावित करता। वे तो महाकाल की आकाँक्षा का प्रतिनिधित्व करने के साथ-साथ लोक संग्रह के लिए भी कर्म कर रहे थे। उनका हर कार्य दिव्य सत्ता की स्फुरणा के साथ था। कर्तृत्व के माध्यम से जो शिक्षण करना था, उसे उन्हें अपने जीवन में भी तो उतारना था। पुरुषार्थ असंभव स्तर का ही सही, कर डालने का निर्णय कर अन्ततः उनने पत्रिका का नामकरण कर उसकी शुरुआत वसंतपंचमी 1940 (संवत् 1996) से विधिवत् कर दी।
नाम चुनने के लिए कोई ऊहापोह नहीं करनी पड़ी। जो अखण्ड-ज्योति उनने पंद्रह वर्ष की आयु में प्रदीप्त की थी, जिसके प्रकाश में उन्हें सूक्ष्म शरीरधारी सत्ता के दर्शन हुए थे, उसी प्रकाशपुँज को लक्ष्य रख उनने पत्रिका का नाम “अखण्ड -ज्योति” रख दिया। यही तो उनकी प्रेरणा का मूल स्रोत था।
जिस प्रकाश में गायत्री महापुरश्चरण साधना अब तक चली थी, व अगले दिनों और प्रचंड रूप में चलनी थी, वही इस पत्रिका का नाम बनकर आया व सभी परिजनों को इसका इतिहास बताते हुए उनने दो हजार पते जो छाँटे थे, उन्हें नमूने की एक-एक प्रति भेज दी कि यदि आपको पसंद आये तो आप अन्य पाँच व्यक्तियों को भी इसे पढ़ायें। वे भी ग्राहक बनना चाहें तो जब सुविधा हो तब चन्दा भेज दें। मूल्य था प्रत्येक पत्रिका का नौ पैसा, वार्षिक डेढ़ रुपया।
पत्रिका के मुख्य पृष्ठ पर भगवान कृष्ण सुदर्शन हाथ में लिए युद्ध क्षेत्र में खड़े हैं, यह चित्र था मानो यह परिजनों को आश्वासन था कि आने वाली प्रतिकूलताओं की घड़ी में भी वे महाकाल के संरक्षण में है, इसलिए निश्चिन्त रहें। पत्रिका-में विभिन्न लेखकों के लेख थे एवं अध्यात्म विधा पर सारगर्भित विवेचना थी। यह थी नवयुग के मत्स्यावतार की शुरुआत जो बाद में अनेक सोपानों को पार करती हुई इस स्थिति में पहुँची जैसी कि आज हैं एक साधक की लेखनी के अनुष्ठान का यह प्रथम पुष्प था।
बच्चों के प्रति पूज्यवर को बड़ा स्नेह था। अपनी बाल सुलभ सरलता के कारण वे बच्चों के साथ घुल-मिलकर एक हो जाते थे। कहानी, वह भी बच्चों की, काव्यात्मक भाषा में सुनाना एक कला है। वे इस कला के महारथी थे। रेल का आना, इंजन का चलना, कुत्ते का भौंकना, बंदर की खों खों, ढोल की ढमढम, क्रोध, आस्य प्रेम रस की अभिव्यक्ति इस प्रकार करते कि बच्चों की जिज्ञासा आगे का प्रसंग जानने के लिए सहज बढ़ जाती। सोद्देश्य बताते हुए कथा के एक मोड़ पर रुक कर पूछते-”बेटा, यदि ऐसा होता तू क्या करता” एवं फिर बच्चे का जवाब सुनकर कथा को आगे बढ़ा देते। कहानी में ध्वन्यात्मक शब्द यथा-”खट, खट, खट, शेर सपट्ट-इस तरह नाम हुआ खट्टू” जोड़ते हुए उसे ऐसी रोचक बना देते कि सब एकटक, स्तब्ध हो सुनते ही रहते। अपने अंतरंग क्षणों में कार्यकर्ताओं से भी इसी शैली में बात कर गंभीर विषयों को भी सरस बना देना उनके प्रतिपाद का अनूठापन था।
माली की तरह जियो जिसके प्रयास की चर्चा खिलते पुष्प हवा में फैलायें।
आवेश में एक बार आदमी कुछ भी कर सकता है, किंतु निरंतर छोटे-बड़े कामों में आदर्शों का समावेश रखे रहना मात्र सिद्धान्तवादियों का काम है।
बड़े-बड़े कार्य मात्र संकल्प बल के सहारे संभव हो पाते है। अखण्ड ज्योति का प्रथम पुष्प प्रकाशित करने का दुस्साहस करने के साथ उनने सबको पत्र लिखने के अलावा एक और काम किया था, सबके पते अपने हाथ से लिखे व डाकघर तक भी उन्हें पहुँचाया। प्रथम अंक में यह भी लिखा है कि “अगला अंक हम निश्चित तिथि पर ही छपाकर तैयार रख लेंगे और रजिस्ट्रेशन नंबर आए पत्रिका भेजने में तिगुना पोस्टेज लगेगा इसलिए अगले अंक के लिए पूरी फरवरी प्रतीक्षा करनी चाहिए। यदि फिर भी नंबर न आया तो 27 फरवरी को तिगुना पोस्टेज लगाकर भी “ज्योति” अवश्य भेज देंगे।” (पृष्ठ 3 जनवरी 1940)
पाठकगण कल्पना कर सकते है कि जिसने पत्नी के गहने व अपना सब कुछ बेचकर किराये पर छपाने की कहीं किसी तरह व्यवस्था की हो, वह हर पत्रिका पर तिगुना पोस्टेज भी देने को तैयार है पर पाठकों को “ज्योति” के प्रकाश से वंचित नहीं रखना चाहता न ही वह सरकारी तंत्र से कोई समझौता ही करना चाहता है। यह संकल्प किसी साधारण मानव का नहीं हो सकता। संकल्प, केवल संकल्प वह भी एकाकी संकल्प।
पूज्य गुरुदेव ने उन्हीं दिनों अपने स्वाध्याय के आधार पर अपनी पहली पुस्तक लिखी थी “मैं क्या हूँ।” यह पुस्तक अखण्ड ज्योति कार्यालय फ्रीगंज आगरा से उसी वर्ष प्रकाशित हुई थी। इस प्रथम चिन्तन नवनीत में उनके वही विचार उभर कर आये है जिन्हें वे व्यवहार के माध्यम से सबके समक्ष प्रकट कर रहे थे। वह था अपनी प्रसुप्त संकल्प शक्ति का जागरण और आत्मदेव की आराधना, जीवन देवता की साधना के बल पर प्रचण्ड पुरुषार्थ कर दिखाना। इस पुस्तक की कुछ पंक्तियाँ देखने योग्य हैं-
“साधारण और स्वाभाविक योग का सारा रहस्य उसमें छिपा है कि आदमी आत्मस्वरूप को जानें, अपने गौरव को पहचानें, अपने अधिकार की तलाश करें और अपने पिता की अतुलित संपत्ति पर अपना हक पेश करें। यह राजमार्ग है, सीधा-सच्चा और बिना जोखिम का। यह मोटी बात हर किसी की समझ में आ जानी चाहिए कि अपनी शक्ति और औजारों की कार्यक्षमता की जानकारी और अज्ञानता, किसी भी कार्य की सफलता असफलता के लिए अत्यन्त आवश्यक है।”
अपना यही संदेश तरह तरह से भिन्न भिन्न अवसरों पर अखण्ड ज्योति व पुस्तकों के माध्यम से दोहराते हुए वे मनुष्य को ईश्वर का अंश-अविनाशी राजकुमार आत्मा परमवैभवशाली परमात्मा की विभूतिवान संतान कहकर संबोधित करते रहे।
अपनी इस पुस्तक “मैं क्या हूँ” के अंश उनने अखण्ड ज्योति पत्रिका के प्रथम वर्ष के अंकों पर स्थान स्थान पर दिए हैं। इन लेखों में उनने संकल्पशक्ति को मनोबल भी कहा है। उससे आगे प्राणबल और आत्मबल की विवेचना की है। प्राणशक्ति को वे दूसरे मनुष्यों का कायाकल्प कर देने वाली और वातावरण को बदलने में समर्थ बताते है तो आत्मबल को पारस से भी ज्यादा क्षमतावान सिद्ध करते हैं। जो लोग पूज्य गुरुदेव के संपर्क में आए हैं, वे भली भाँति जानते हैं कि उनने समय समय पर तीनों ही सामर्थ्यों का उपयोग कर मनुष्य में छिपे देवत्व को जगाने की, प्रसुप्त को उभारने की चेष्टा की। अखण्ड ज्योति का शुभारंभ उनकी इन विभिन्न शक्ति रूपों का आरंभिक परिचय ही था।
“मैं क्या हूँ” सद्ज्ञान ग्रन्थ माला का आरंभिक पुष्प था। बाद में इस श्रृंखला में कई पुस्तकें जुड़ती चली गयीं यथा-ईश्वर कौन है, कहीं है, कैसा है? आगे बढ़ने की तैयारी, मरने के बाद हमारा क्या होता है? आन्तरिक उल्लास का विकास, सफलता के तीन साधन, योग के नाम पर मायाचार, बिना औषधि के कायाकल्प इत्यादि। ये सभी पुस्तकें तब की 6 आना सीरीज के नाम से प्रख्यात हुई व जहाँ पहुँची, चमत्कार दिखाती चली गयी।इन पुस्तकों के अंश समय समय पर अखण्ड ज्योति में छपते थे। अखण्ड ज्योति के प्रथम पृष्ठ से अंत तक सारी सामग्री पूज्य गुरुदेव की लिखी होती थी पर लोकरुचि को देखते हुए वे लेखकों के कल्पित नाम भी दे दिया करते थे। कभी कभी ये नाम वास्तविक भी होते पर उस व्यक्ति की पूर्वानुमति से वह अपने ही चिन्तन को अखण्ड ज्योति के प्रथम कुछ वर्षों में विभिन्न लेखकों के नाम देते रहे। जब बाद में पत्रिका ने अपनी जड़ें गहराई से जमा लीं तो उनने नाम देने का क्रम बन्द कर दिया। पर यह सिलसिला पंद्रह वर्ष तक चला। कई बार अन्य सहयोगियों, अपने अनुयाइयों को श्रेय देने के लिए उनने उनके नाम दिए।
लेखों को पढ़ने के बाद लगता है, मानों पाठकों को निजी तौर पर संबोधित करते हुए ये लिखे गये है। एक नमूना अगस्त 1940 की पत्रिका से उद्धृत है-”हमारा विश्वास है कि अखण्ड ज्योति के पाठक कुछ न कुछ भजन पूजा, साधना, अनुष्ठान करते होंगे। वे जैसा भी कुछ अपने विश्वास के कारण करते हों करें। परंतु एक साधना को करने के लिए हम उन्हें अनुरोधपूर्वक प्रेरित करेंगे कि वह दिन-रात में से कोई भी पंद्रह मिनट का समय निकालें और एकान्त में शान्तिपूर्वक सोचें कि वे क्या हैं? वे सोचें कि क्या वे उस कर्तव्य को पूरा कर रहे हैं जो मनुष्य होने के नाते उन्हें सौंपा गया था। मन से कहिए कि वह निर्भीक सत्यवक्ता की तरह आपके अवगुण साफ साफ बताए।” यह शैली ऐसी लगती है जैसे किसी को व्यक्तिगत पत्र लिखा जा रहा हो। हर पाठक इन्हें पढ़ने के बाद ऐसा अकुलाता था कि उनके संपर्क में आने के बाद निरन्तर संपर्क बनाये रखने को उत्सुक रहता था। इस लेखनी का चमत्कार कहें या उनकी प्राणशक्ति का। पर परिजन जरूरी चिट्ठी की तरह अपनी प्रिय अखण्ड ज्योति की प्रतीक्षा हर माह करते थे।
प्रारंभ के तेरह अंक गुरुदेव ने आगरा से प्रकाशित कर अपनी सत्ता के संकेतों पर श्रीकृष्ण की जन्मभूमि मथुरा को अपना निवास स्थान बनाया। प्रकाशन की सारी व्यवस्थाएँ नये सिरे से बनाई पर पत्रिका की छपाई व डिस्पेच में एक दिन की भी नागा नहीं होने दी। प्रारंभ के कुछ अंकों में आत्मविकास शारीरिक, मानसिक स्वास्थ्य संबंधी विज्ञापन भी दिए परंतु बाद में उनने पाठकों को लिखा कि “धार्मिक और आध्यात्मिक सामग्री प्रस्तुत करने वाली पत्रिका में विज्ञापनों का कोई औचित्य नहीं। कोई इतर विषय इसमें शोभा नहीं देता। अतः हम घाटा उठाकर भी पत्रिका बराबर भेजते रहेंगे व अधिक से अधिक ठोस लेखन सामग्री भी।”
दुष्टों की उपेक्षा करना सज्जनों की राह पर काँटे बिखेरने के समान है।
धर्म की जय तभी होती है जब उसके पीछे शक्ति है। दुर्बल तो धर्म के साथ अपना भी उपहास कराते और हारते है।
जनता के असंख्यों दिलों की धड़कनें जिसके अपने दिल में स्पन्दित हो सकें वही तो करेगा लोकजीवन का पथ प्रदर्शन। उस दिन गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति अपने एक दो सहयोगियों के साथ आये हुए थे। मौसम अपनी पूरी उष्णता पर था। सीढ़ियाँ चढ़कर जैसे ही कुलपति महोदय पहुँचे-देखा गुरुदेव टहल रहें है। पंखा भी बंद है।
उनका अभिवादन करते हुए गुरुदेव ने पंखा चालू कर दिया। बैठने के बाद वार्ता शुरू हुई। बात-चीत के बीच में उन्होंने इधर-उधर देखते हुए कहा “यहाँ तो कूलर तक नहीं-आपकी एयरकंडीशनर तो लगवा ही लेना चाहिए। सारे दिन पढ़ने लिखने गम्भीर काम करने में कितनी परेशानी होती होगी?” सुनकर उनने गम्भीर स्वर में कहा “जिस दिन सारे भारत को ए.सी. दे सकूँगा, उस दिन मैं भी लगवा लूँगा। अभी तो इस पंखे का उपयोग भी आने-जाने वालों के लिए ही होता है।” वार्ता समाप्ति के पश्चात जैसे ही वे लोग नीचे उतरने के लिए मुड़े गुरुदेव ने स्वयं उठकर पंखा बंद कर दिया। उतरने वाले उनके हृदय की संवेदनशीलता में भारतीय जनजीवन के स्पंदन अनुभव कर रहे थे।
यह प्रामाणिकता ही उस अखण्ड-ज्योति का प्राण हैं जो आज तक अगणित व्यक्तियों में प्राण संचार करती आयी है। गुरुदेव “स्नेह से सनी एक सोने की लौ” अपने पास रखते थे जिसे ज्योति के रूप में अपने प्रियजनों तक हर माह एक पाती की तरह पहुँचा देते थे। इसी ने उन सभी को उनका अपना बनाया।
“अखण्ड ज्योति के प्रथम अंक को देख कर कई पाठकों ने शिकायत के पत्र भेजे है कि उसमें सम्मोहन, तंत्र, संतानोत्पत्ति और योग आदि क्रियाओं का बहुत थोड़ा बयान है। अपने इन स्नेही बंधुओं से हमें एक प्रार्थना करनी है कि जल्दी न करें। धीर-धीरे और थोड़ा-थोड़ा ही वे ग्रहण करके मनन करते जाएँ और उसे अभ्यास में लाते जाएं। एक साथ उच्च कक्षा की चर्चा आरंभ कर देना अनुचित और निष्फल होगा”।
अखण्ड ज्योति के फरवरी 1940 अंक में तीसरे पृष्ठ पर यह पंक्तियाँ छपी है। माह भर पहले प्रकाशित अखण्ड ज्योति के प्रवेशांक में सम्मोहन विद्या, निद्रा विज्ञान, स्वरयोग, शारीरिक लक्षणों से मनुष्य की पहचान जैसे चार विषयों पर लेख प्रकाशित हुए थे, इन्हीं की प्रतिक्रिया ऊपर व्यक्त की गयी थी।
आज के परिजन जो पिछले चार दशक से पूज्य गुरुदेव के संपर्क में आने के बाद उनके प्रगतिशील विचारों को पढ़ते आ रहे है, उनको ये पंक्तियां असमंजस में डाल सकती है। उन्हें लग सकता है कि जिन विषयों एवं मान्यताओं को स्वयं पूज्य गुरुदेव ने अंधविश्वास व मूढ़तायुक्त कहा है, वे इस पत्रिका के आरंभ में मैस्मरेज्म, हिप्नोटिज्म, शकुनशास्त्र संतानोत्पत्ति आदि के रूप में छपे व पाठकों को गुरुदेव ने आश्वासन दिया कि वे क्रमशः इन विषयों को छूते व उन तक सारगर्भित रूप में पहुँचाते रहेंगे, क्या पूज्य गुरुदेव प्रचलित अंधविश्वासों का समर्थन कर रहे थे? यह दुविधा किसी भी विचारक्रांति के पथिक पाठक के मन में आ सकती है।
वस्तुतः यह उनका वह रूप था जिसमें उनने पाठक मनोविज्ञान को पढ़ने का प्रयास किया था। देखा कि आत्मज्ञान की घुट्टी कड़वी है व इसे सुगर कोटेड गोली के रूप में देना है तो जिज्ञासा को जिन्दा बनाये रख कर धीरे धीरे इन सभी विषयों के प्रति आकर्षण को प्रगतिशील मोड़ देना होगा। यही विचार परिवर्तन है, ब्रेनवाशिंग है एवं यह बड़ी धीमी प्रक्रिया होती है।
उनने आश्वासन ही नहीं दिया पुस्तकें भी छह आना सीरीज में इन ऑकल्ट विषयों पर लिखीं जिन के शीर्षक पाठकों को देखकर आश्चर्य हो सकता है। सम्मोहन विद्या, जीव जन्तुओं की मूक भाषा, आकृति देखकर मनुष्यों की पहचान, परकाया प्रवेश, वशीकरण की सच्ची सिद्धि, मनचाही सन्तान, भोग में योग, हस्तरेखा विज्ञान इत्यादि। यह नामावली अपूर्ण है। लगभग साठ पृष्ठों की इन विभिन्न पुस्तकों में इन विद्याओं का जो स्पष्टीकरण अध्यात्म तत्वज्ञान को आधार बनाकर किया गया है, वह लेखन शैली का अध्ययन करने वाले किसी भी हिन्दी प्रेमी के लिए शोध का विषय हो सकता है।
यह कल्पना तक नहीं की जा सकती कि वशीकरण मनचाही सन्तान, सम्मोहन जैसे विषयों को आध्यात्मिक, मनोवैज्ञानिक, शरीर रक्षा परक जामा पहनाया गया होगा। परन्तु शीर्षक को आकर्षक देखकर पुस्तक को एक बार आदि से अन्त तक पढ़ने वाला पाठक अपने चिन्तन को आमूलचूल परिष्कृत करके उठता है। इस जाल में कई विचार शील, तथाकथित प्रगतिशील पाठक भी आ गए एवं सभी पूज्य गुरुदेव की पत्रिका के पाठक बनते चले गए क्योंकि उन्हें कभी कल्पना भी नहीं थी कि एक दिग्भ्रान्त करने वाले विषय पर तत्वदर्शन की सारगर्भित पुस्तक भी लिखी जा सकती है। इन पुस्तकों के ढेरों संस्करण छपे व हाथों हाथ बिक गए। “मैं क्या हूँ” जैसे आत्मोपनिषद् से शुरुआत करने वाले मनीषी को भी पाठक रुचि को देखते हुए उन दिनों झुनझुना बाँटकर ललचाने वाली विधि का उपयोग करना पड़ा था।
लेकिन वे अपने संकल्प से कभी भी डिगे नहीं। उनने इन विषयों का प्रतिपादन या पुष्टि न अपनी पत्रिका में की, न ही इन पुस्तकों में। 1940 की ही एक अखण्ड ज्योति में वे लिखते हैं कि “इस पत्र में तंत्र शास्त्र, मैस्मरेज्म, प्रेतवाद, मनोविज्ञान आदि की चर्चा करने में कुछ विलक्षणता और अटपटापन देख कर किसी को न तो भ्रम में पड़ना चाहिए, नहीं आश्चर्य करना चाहिए। यह सब मनोविज्ञान और अध्यात्म विद्या द्वारा सामयिक रोगों की चिकित्सा विधि मात्र है। यह रोते हुए बच्चों को खिलौने देना है।”
भली भाँति समझा जा सकता है कि इन प्रतिपादनों द्वारा वे क्या कर रहे थे। धीरे धीरे क्रमिक गति से वे इन विषयों पर छाये भ्रान्तियों के कुहासे को मिटा रहे थे। सही राह पर लाने के लिए श्रद्धासिक्त मनोभूमि वाले व्यक्तियों को वेदांत दर्शन का एक झटका देने की बजाय यह मनोवैज्ञानिक चिकित्सा वाली तकनीक ज्यादा सही थी। यदि वे उन दिनों अध्यात्म के सही किन्तु अप्रचलित स्वरूप को लोगों के समक्ष सीधे रखते तो शायद वे निराश हो कर पढ़ना बन्द कर देते किन्तु जिस विषय को उनने रहस्य रोमाँच के घेरे में बन्द कर रखा था, उसका स्पष्टीकरण जब उन्हें मिलता चला गया तो वे क्रमशः उनके होते चले गए।
एक दो पुस्तकों से समझ में आ जाएगा कि वह शैली स्वयं में निराली भी थी कि नहीं। “मनचाही सन्तान” में वे मनोनिग्रह, कुदृष्टि पर नियंत्रण तथा इंद्रिय संयम का ही प्रभाव बताते है कि मनचाही सन्तान उत्पन्न नहीं की जाती, उस में सुसंस्कारों का प्रवेश कर उसे सुयोग्य बनाया जा सकता है। गृहस्थ को एक तपोवन बताते हुए वे सन्तानोत्पादन के इच्छुकों को भी तप का ड़ड़ड़ड़ समझाते है।
सम्मोहन विद्या” एवं “आकृति देखकर मनुष्य की पहचान” जैसी पुस्तकें आज की जनसंपर्क कला व लोक व्यवहार विद्या के विशेषज्ञों के लिए दिशा निर्देशन का काम दे सकती है। दूसरों को कैसे पढ़ा जाय व कैसे उन्हें अपने सद्विचारों तथा सही प्रभा मण्डल द्वारा अपना बनाया जाय, यही व्याख्या इन में है। क्या अब भी कोई शीर्षक देखकर किसी प्रकार का दोषारोपण लेखनी शिल्प के इस कलाकार पर महामनीषी पर करेंगे? संभवतः नहीं। प्रस्तुत पुस्तकों को इसीलिए नये सिरे से प्रकाशित कर परिजनों के समक्ष श्रद्धाँजलि समारोह के समय प्रस्तुत किया जा रहा है ताकि वे 1940 उद्भूत चिन्तन का अब भी लाभ उठा सकें।
तुलसी मीठे वचन ते सुख उपजत चहुं ओर। वशीकरण एक मंत्र है, तज दे वचन कठोर॥ तुलसीदास जी की इन पंक्तियों की ही व्याख्या
वशीकरण पुस्तक में की हो, तो पढ़ने के बाद ही व्यक्ति को लगेगा कि वशीकरण तो उसकी मीठी वाणी व सद्व्यवहार में ही निहित है। सभी पुस्तकें इसी प्रकार की हैं व इन सबने क्राँतिकारी चिन्तन का नवनीत भावुक जनमानस के समक्ष रखा। उन दिनों रहस्य विद्या का जाल पूरे भारत व विश्व मानस पर छाया था। उसका रहस्योद्घाटन कर उनने सारे भ्रम जंजालों का नीर क्षीर विवेक से अलग अलग कर दिया।
बात सन् 1960 के आस पास की है। एक वरिष्ठ राजनेता गायत्री तपोभूमि पधारे। गुरुदेव ने बड़े ही आत्मीयतापूर्ण ढंग से मिशन की विभिन्न गतिविधियों से उन्हें अवगत कराया। देश व्यापी संगठन का स्वरूप तपोभूमि द्वारा संचालित क्रिया–कलापों ने उन्हें सुखद आश्चर्य से भर दिया। प्रसन्न होते हुए बोले “आचार्य जी यह सब आपकी तप साधना से प्राप्त दिव्य शक्तियों का चमत्कार है। अन्यथा मनुष्य कितना भी प्रतिभाशाली क्यों न हो इतना सब नहीं कर सकता।”
गुरुदेव हंसते हुए बोले-तप साधना नहीं ब्राह्मणत्व का चमत्कार कहिए। तप साधना तो अभी तिजोरी में बन्द है। “ब्राह्मणत्व? ब्राह्मण तो अनेकों है” शायद यह मन्तव्य समझ नहीं पाये थे। उनका जवाब था “ब्राह्मण वह है जो समाज से न्यूनतम लेकर समाज को अधिकतम दे। इसके बिना भी कभी कोई ब्राह्मण हुआ है। राजनेता चकित होते हुए बोले “ओह ब्रह्मर्षि वशिष्ठ के ब्राह्मणत्व के चमत्कार तो मैं रामायण आदि ग्रंथों में पढ़ा करता था आज प्रत्यक्ष देख लिया।”
अखण्ड ज्योति पत्रिका में प्रारंभिक वर्ष में अन्दर के टाइटिल पृष्ठ पर दो पंक्तियाँ निकलती थी जिनका हवाला इस विशेषाँक के प्रारंभ में दिया गया था
सुधा बीज बोने से पहिले, कालकूट पीना होगा। पहिन मौत का मुकुट, विश्वहित मानव को जीना होगा।
ये पंक्तियाँ नहीं, सूत्र संचालक की संकल्पशक्ति की परिचायक सूक्ति है जो बताती है कि वे किस लक्ष्य को लेकर लेखन क्षेत्र में कूदे थे। श्रद्धासिक्त भाव क्षेत्र में अमृत बीज बोने के लिए वे आए थे किन्तु इसके लिए अनिवार्य सावधानियाँ भी बताते है कि शिव की तरह गरल विषपान (गूढ़ मान्यताओं, अंधविश्वासों प्रतिगामी विचारधाराओं का) उन्हें व उनके पाठक गणों को करना होगा। विश्व हितार्थाय जीने के लिए सिर पर मौत का मुकुट पहन कर, खतरा उठा कर भी चलना होगा। यह अध्यात्म क्षेत्र में उतरने वालों के लिए एक चेतावनी भी थी व दुस्साहसी साधकों को आमंत्रण भी। गुरुदेव कहते थे-”मिट्टी का है देह-दीप जलना मेरा इतिहास है “यह उनकी ही लिखी उन दिनों की कविताओं की एक पंक्ति है। कितना प्रचण्ड आत्मबल सम्पन्न रहा होगा, यह व्यक्ति जो प्रचलनों के विपरीत चलने का साहस स्वयं ही नहीं कर रहा था, अपनी नाव पर औरों को भी बैठने का आमंत्रण सतत् दे रहा था।
अगले ही वर्ष जब वे आगरा से मथुरा चले आए तो कागज के अभाव में हाथ से बने कागज व हैण्डप्रेस से स्वयं छाप कर पत्रिका जन जन तक पहुँचानी आरंभ की साथ ही अपनी वे प्रथम पंक्तियाँ इस प्रकार कर दी-
“सन्देश नहीं मैं स्वर्ग लोक का लाई। इस भूतल को ही स्वर्ग बनाने आई॥”
अखण्ड ज्योति के आह्वान को इस रूप में बदलने का क्या मर्म हो सकता है, यह गहन विश्लेषण का विषय है पर इसमें कोई सन्देह नहीं कि देवत्व से अभिपूरित विचार जो इस पत्रिका द्वारा जन-जन तक पहुँचते थे, वे धरती पर स्वर्ग जैसी परिस्थिति का ही निर्माण कर रहे थे। पाठकों को न केवल आन्तरिक उल्लास की अनुभूति होती थी वरन् वे औरों से चर्चा कर उसका विस्तार ही करते थे। संभवतः पहले निमंत्रण को बड़ा चुनौती भरा मानकर विश्व युद्ध की विभीषिका का इल समीप आते देख उनने पहले ही इसकी भविष्यवाणी कर दी थी कि नवयुग का आगमन सन्निकट है जिसमें सब की मनःस्थिति बदली हुई होगी व परिस्थितियाँ भी स्वयं तब बदल जायेगी। आगे वर्षों तक यही आह्वान पत्रिका पर आता रहा।
प्रगति यात्रा चल रही थी। क्रमशः परिजनों का समुदाय एकत्र होता जा रहा था। फरवरी 1947 के अंक में उनने लिखा कि साधु बाबाओं, ताँत्रिकों, मांत्रिकों और चमत्कारी फकीरों की पोल खोलने का समय अब समीप आ गया है। नोट दूने करने वाले, ताम्बे से सोना बनाने वाले, मन की बात जान कर आशीर्वाद देकर माला ड़ड़ड़ड़ कर देने वाले धूर्त आज भी अपना उल्लू सीधा करते देखे जाते है। लोग उन के हाथों लुट कर शर्म के कारण या उनके चंगुल में फँसे रहने के कारण सही बात नहीं बताते। इन सबकी पोल खोलते हुए इस विशेषाँक में उनने सबको सतर्क किया था कि यह अध्यात्म नहीं है। इस प्रवृत्ति से सतर्क रहें व औरों को भी सावधान करें।
अपनी पत्रिका में उनने लिखा कि “पूरे भारत वर्ष की यात्रा करने के बाद खरे खोटे का अन्तर हमारी समझ में आ गया है। उचित यही है कि धूर्त लोग जिन हथकण्डों को अपनाते है, उनका रहस्योद्घाटन सार्वजनिक रूप से कर दिया जाय ताकि सर्वसाधारण ठगी के इस जंजाल से बचे। एक दो व्यक्तियों को बताने से तो वे संभवतः इसकी आड़ में धन्धा कर सकते थे, पर सार्वजनिक रूप से बताने पर ऐसा नहीं होगा।” इन्हीं दिनों योग के नाम पर मायाचार नामक पुस्तक उनने प्रकाशित की। सद्ज्ञान ग्रन्थ माला के इस सड़सठवें पुष्प के 1947 में प्रकाशित होने के साथ ही जादूगरी का छल” “जीवन की गूढ़ गुत्थियों पर ताँत्रिक प्रकाश” “वैज्ञानिक अध्यात्मवाद” “गायत्री की दिव्य सिद्धियाँ” “श्री समृद्धि-शक्ति के अनुदान” “गायत्री ही कामधेनु है” जैसी पुस्तकें भी प्रकाशित हुई। स्पष्ट था कि सिद्धि चमत्कारों को लेकर आमतौर पर लोगों के मन मस्तिष्क में बैठी दुर्बलता को मिटाने व उसके स्थान पर अध्यात्म के सशक्त पक्ष को उभारने में लगे थे। गायत्री का तत्वज्ञान लिखने के पहले उनने उस कूड़े की सफाई की जो मन मस्तिष्क में संव्याप्त था।
अध्यात्म दर्शन पर आधारित इस पत्रिका में मात्र आत्मा परमात्मा, परलोक पुनर्जन्म का ही विवेचन नहीं था अपितु उनने शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवार निर्माण मनोविज्ञान, राजनीति, समाज शास्त्र सभी को अध्यात्म के घेरे में लेकर उसकी ऐसी सटीक व्याख्या प्रस्तुत करना आरंभ कर दी थी कि वह सुग्राह्य शैली सहज ही सबके गले उतरती चली गई। वर्ष में एक पूरा अंक मनोविज्ञान को समर्पित रहता था जिसमें मनोवैज्ञानिक विधियों द्वारा व्यक्तित्व विकास के रहस्य समझाए गए थे। स्वास्थ्य विशेषाँक में आहार विहार के संयम से लेकर रोगों का घरेलू उपचार, जीवनीशक्ति संवर्धन सब शामिल था। शिक्षा और परिवार निर्माण के भी गहराई तक प्रवेश कर अध्यात्म की परिधि में समझाया गया। जिन दिनों “वैज्ञानिक अध्यात्मवाद” शब्द लेखकों की लेखनी के नीचे आया भी नहीं था, उन दिनों वे योग साधना के वैज्ञानिक पक्ष को उद्घाटित करते हुए 64 पृष्ठ की एक किताब सन 1946 में ही प्रकाशित कर चुके थे। आज तो परिजन उसका बड़ा परिवर्धित स्वरूप पढ़ते व पाते हैं किन्तु उस जमाने के हिसाब से वह प्रस्तुतीकरण अनूठा था।
अपने अंग अवयव बने परिजनों को परिमार्जित करने के उनके प्रयास क्रमशः उत्तरोत्तर सघन होते चले गए। अध्यात्म साधना के प्राथमिक पाठों में आत्मशुद्धि व पात्रता संवर्धन की महत्ता समझाने के बाद उनने भारतीय धर्म और संस्कृति के प्रतीकों का मर्म समझाना आरम्भ किया। इस क्रम में शिखा और सूत्र की उपयोगिता, उन्हें धारण करने का विनम्र अनुरोध, उनका वैज्ञानिक आधार, गंगा-गौ गायत्री-गुरु गीता का महत्व स्वास्तिक, तुलसी, प्रतिमा, देवालय, तीर्थ, पर्व-संस्कार आदि सभी पक्षों पर महत्वपूर्ण विवेचन करते हुए शिक्षण संस्कार की प्रक्रिया चलाई।
अपनी इस पत्राचार साधना में वे क्रमशः आगे के पाठ, नया परामर्श पहले बताई गई दिशा धारा से आगे का निर्देशन ऐसे करते चले गए जैसे वे स्वयं सामने बैठ कर समझा रहे हों। पत्रकारिता की इस पत्राचार विद्या को अनूठा, अभूतपूर्व ही कहा जाएगा क्योंकि यह साधना जैसे गूढ़ तत्व पर आधारित थी।
दस वर्ष बाद ही पूज्य गुरुदेव ने “गायत्री चर्चा” शीर्षक से एक अलग स्तम्भ शुरू कर दिया था, जिसमें सामान्य गायत्री उपासना, संध्यावन्दन के उपचार, गायत्री जप की विधि, भावनाओं के परिष्कार परिमार्जन को प्राथमिकता जैसे विषयों से शुरुआत की। क्रमशः उच्चस्तर की ओर प्रेरित करते हुए गुरुदेव ने गायत्री के पाँच मुखों की प्रेरणा स्वरूप पाँच कोषों की साधना, तीन शरीरों के परिष्कार-उन्नयन की साधना, सावित्री तथा कुण्डलिनी साधना और आत्मा-परमात्मा के मेल-मिलन की साधना की विभिन्न दिशाओं में परिजनों को अग्रसर कर दिया। अब यह आश्चर्य का ही विषय है कि एक ही पत्रिका में सभी परिजनों को उनकी मनःस्थिति, प्रकृति, रुचि के अनुरूप साधना की सामग्री भी मिली और प्रेरणा थी। जो जिस पथ पर अग्रसर हो गया, उसे वही मार्ग प्रकाशित होता दिखाई देने लगा। सामान्य सी शैली में सामान्य ढंग से कोई बात कहकर हजारों भिन्न प्रकृति के व्यक्तियों का समाधान करने की क्षमता अलौकिक और दिव्य ही कहीं जाएगी।
“गायत्री चर्चा” के पन्नों पर प्रेरणा देते हुए उनने गायत्री महाशक्ति का जो तत्वज्ञान अपनी पत्रिका के पृष्ठों पर दिया था, उसे क्रमबद्ध कर उनने “गायत्री महाविज्ञान” पाठकों के समक्ष रखा। इसके पहले पाँच खण्ड लिखे गए फिर इसे परिवर्धित कर तीन खण्डों में प्रकाशित किया गया। गायत्री महाविद्या के ऊपर एक प्रामाणिक ग्रन्थ विश्वकोष यदि आज विश्व में कहीं है तो इस महाविज्ञान के रूप में विद्यमान है। इसके पूज्य गुरुदेव के महाप्रयाण तक 21 संस्करण निकल चुके थे एवं अंग्रेजी अनुवाद के भी, जो पिछले वर्ष ही छपा था, दो संस्करण पाठकों तक पहुँच चुके है। यह एक अमूल्य निधि के रूप पाठक समुदाय में पहुँचा क्योंकि अब तक आद्यशक्ति के सिद्धान्त एवं व्यवहार, साधना एवं तत्वज्ञान का समन्वित रूप कही देखने को नहीं मिला था।
महाविज्ञान के सृजन के साथ साथ ही पचासवें दशक के अंत में गुरुदेव संगठन पक्ष की नींव रखना प्रारंभ कर चुके थे। अतः उनने सामूहिक साधना पर विशेष ध्यान देने की चर्चा अपने विशेष स्तम्भ में करना आरंभ कर दी थी। अब तक उनकी स्वयं की कोई प्रशिक्षण स्थली भी मथुरा में नहीं थी, जिसमें वे आगन्तुक जिज्ञासुओं को ठहराते एवं संगठन की महत्ता समझाते, उनकी शंकाओं का समाधान करते अथवा परामर्श द्वारा प्रेरणा देते। जो भी परिजन आते वे घीयामण्डी मथुरा वाले घर में ही मिलने आते थे। स्थान छोटा था पर हर व्यक्ति उनका आतिथ्य पाकर जाता। न्यूनतम में अपना निर्वाह कर वे औरों का आतिथ्य कैसे कर पाते होंगे एवं साथ ही अपनी साधना का क्रम भी निर्बाध गति से चला कर पत्र परामर्श एवं सम्पादन कार्य भी करते रहे यह एक रहस्यमय प्रसंग है। जो भी उनके पास आया, वह उनके पास आया वह उनके एवं वन्दनीय माताजी के भाव भरे सत्कार एवं सत्परामर्श में निहाल हो कर उनका हो कर गया। अब वे आगन्तुकों की बढ़ती संख्या देखकर एक ऐसा सुसंस्कारित स्थान ढूँढ़ रहे थे जहाँ वे अपने लम्बे महापुरश्चरण की पूर्णाहुति कर सकें, साथ ही सुनियोजित सामूहिक साधना व शिक्षण क्रम भी चला सकें। यहीं से गायत्री तपोभूमि का शुभारम्भ माना जाना चाहिए। यह एक सहज संयोग नहीं है कि जिस वर्ष गायत्री महाविज्ञान खण्डों में प्रकाशित हुआ, उस वर्ष देश को स्वतंत्रता मिली एवं जब गणतंत्र बनने के बाद प्रथम अखिल भारतीय चुनाव प्रक्रिया की ओर बढ़ा तपोभूमि की स्थापना हुई।
शरीर को देखकर मनुष्य होना पहचाना जाता है और भावना देख कर उसका दैत्य या देवता होना।
तुम्हें दया और सेवा करने के लिए भेजा गया है। सताने और छीनने के लिए नहीं।
सभ्य समाज में जाते समय पहनने की सबसे बढ़िया पोशाक है-खुशी और मुसकान है।
खूड़ सीकर की एक घटना है। पूज्य गुरुदेव यज्ञ में वहाँ गये थे। शोभा यात्रा वहाँ से निकलनी थी जहाँ से वे गाँव में प्रवेश करने वाले थे स्व.वैद्य पं. रामगोपाल जी जोशी ने उनका स्वागत किया। देखा तो भाव लिए साठ से अधिक कुष्ठ रोगियों की एक पंक्ति भी खड़ी थी। पूज्यवर तुरन्त उनके पास पहुँचे, सबको स्पर्श कर आशीर्वाद दिया एवं फिर कहा कि “मैं आपकी तो कोई सेवा नहीं कर सकता क्योंकि यह अनिवार्य प्रारब्ध है जो आपको भुगतना पड़ रहा है। किन्तु एक आशीर्वाद व आश्वासन आपको देता हूँ कि आप लोगों के बाद आपकी संतानों को यह रोग नहीं होगा।” रोगी निहाल होकर उनके चरणों में गिर पड़े।
आज तीस वर्ष से भी अधिक हो गये है। उन कुष्ठ रोगियों के परिवारजनों में से किसी को भी रोग नहीं है। पूरी पंचायत क्षेत्र से उन रोगियों की मृत्यु के बाद कुष्ठ उन्मूलन हो गया है। ऐसा फलदायी प्रत्यक्ष आशीर्वचन स्वयं परमसत्ता ही दे सकती है।
संस्मरणों के माध्यम से अध्यात्म तत्व ज्ञान का गूढ़ विवेचन कर श्रोताओं के गले उतार देना एक बहुत बड़ी उपलब्धि है जो साधक स्तर का वक्ता ही अर्जित कर सकता है। यह सिद्धि पूज्य गुरुदेव को प्राप्त थी। उनके प्रवचनों को मूल आधार ही प्रेरक मार्मिक रुला देने वाले संस्मरण होते थे। जापान के गाँधी कागाबा, पिसनहारी हजारी किसान, जलाराम बापा, नरसी मेहता, मीरा, चैतन्य, महात्मा गाँधी इत्यादि के प्रसंगों में एक प्रसंग पर ही पूरा विवेचन कर श्रोताओं को उद्वेलित कर पूरे डेढ़ घण्टे तक बिठाये रहना उन्हीं का कौशल था। देव कन्याओं को वक्तृता का शिक्षण देते समय दहेज-बहू पर अत्याचार-खर्चीली शादी जैसे विषयों का सोदाहरण ऐसा मार्मिक चित्रण उनने हृदयंगम कराया कि जहाँ जहाँ उनके प्रवचन हुए श्रोताओं को उस उद्बोधन ने हिलाकर रख दिया। यही कथा शैली “रामचरित मानस की प्रगतिशील प्रेरणा” “गीता कथा” “बाल निर्माण की कहानियाँ” एवं “प्रज्ञापुराण” में प्रधानता पाकर जन-जन में लोक प्रिय बन गई।
साधना की सफलता का मूल तो साधक की अटूट निष्ठा एवं आत्मशोधन है किन्तु ऐ अक्ष जो बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, वह है सुसंस्कारिता साधना स्थली में साधना करने की सुविधा उपलब्ध होना। जहाँ यह उपलब्ध हो जाती है वहाँ थोड़े ही पुरुषार्थ से दिव्यदर्शी साधक अपना लक्ष्य सिद्धि कर लेते है। वातावरण की अपनी महत्ता है। देवात्मा हिमालय की हिमाच्छादित चोटियों के मध्य गंगा किनारे की गई उपासना का अपना प्रतिफल है तथा श्रेष्ठ संस्कारों से अनुप्राणित भूमि में साधना का अपना। महर्षि रमण ने अपनी एकान्त साधना के लिए शैव साधकों की तपस्थली अरुणाचलम् को चुना क्योंकि वहाँ वे सारे संस्कार विद्यमान थे जहाँ वे न्यूनतम पुरुषार्थ से अपनी सिद्धियों को जगा कसते थे। योगीराज अरविन्द ने भी वेद पुरी को ही अपनी तपःस्थली बनाया जो महर्षि अगस्त की तपोभूमि थी। रावण महाबली था पर तप शक्ति से डरता था। उसके निर्देश थे कि उसके असुर उत्तर में कहीं भी जाएँ पर वेदपुरी जहाँ आज पांडिचेरी स्थित है से कोसों दूर रहें क्योंकि उस स्थान के प्रभामण्डल का प्रभाव असुरत्व के लिए विनाशकारी था। गोविन्द पाद जो आद्य शंकराचार्य के गुरु थे, ने अमरकण्टक को अपनी साधना स्थली बनाया, वहीं पर आचार्य शंकर को चारों धामों की यात्रा करने का उपदेश दिया व शक्ति प्रदान की। यह महत्ता भूमि के संस्कारों की है।
पूज्य गुरुदेव ने अपनी जीवन यात्रा के साधना काल रूपी पूर्वार्द्ध की पूर्णाहुति के लिए एवं भावी गतिविधियों को क्रिया रूप देने के लिए जिस स्थान का चयन किया, वह महर्षि दुर्वासा की तपःस्थली था। यह स्थान यमुना किनारे मथुरा से वृन्दावन जाने वाले मार्ग पर स्थित था। वे अखण्ड ज्योति के जनवरी 1942 अंक में लिखते है कि “मथुरा में गायत्री तीर्थ बनने की योजना किसी व्यक्ति के संकल्प से नहीं वरन् माता की प्रेरणा से बनी है। ब्रह्मविद्या के गंभीर अन्वेषण एवं विशद विस्तार के लिए एक केन्द्रीय स्थान जरूरी था। कितने ही सूक्ष्म एवं रहस्यमय कारणों से वह स्थान मथुरा चुना गया व अब वहाँ गायत्री माता का मन्दिर व तपोभूमि बननी है। यही स्थान बाद में गायत्री तपोभूमि नाम से प्रख्यात हुआ।
भूमिका चयन करने के बाद उससे भी कठिन कार्य निर्माण का है। धर्मधारणा भारत में अभी भी जिन्दा है पर उन दिनों जब चारों और मूढ़ मान्यताएँ घर किये हुए बैठी थीं, गायत्री के संबंध में भ्रान्तियाँ संव्याप्त थी, यह काम भगीरथ के गंगावतरण के समान दुष्कर था। पूज्य गुरुदेव ने सबसे पहले गायत्री चर्चा स्तम्भ के माध्यम से सब पाठकों की मनोभूमि बनाई एवं गायत्री तीर्थ बनाने की आवश्यकता बताते हुए अंतः की सदाशयता जगाई। यों यह कार्य इस युग अंतः की सदाशयता जगाई। यों यह कार्य इस युग का ब्रह्मर्षि, यह विश्वामित्र, अकेला भी कर सकता था पर जनता के अंश अंश सहयोग द्वारा उनका अपनत्व संस्था से जोड़ते हुए ही वह कार्य होना है, यही उनका लक्ष्य था। साथ ही सहयोग देने वाले हर व्यक्ति को उनने गायत्री उपासक कहा तथा प्रत्येक से हाथ से मंत्र लेखन व नियमित अनुष्ठान करने को कहा। उनके स्वयं के चौबीस लक्ष के चौबीस महापुरश्चरणों की समाप्ति का समय आ रहा था। गायत्री जयन्ती 1943 में उसकी औपचारिक पूर्णाहुति होनी थी। उस दिन तक उनने तपोभूमि पर मन्दिर के निर्माण तथा गायत्री माता की मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा कर डालने का निश्चय कर लिया व इस पुनीत कार्य में सभी साधकों से सहयोग माँगा। उसके लिए नवम्बर माह 1949 के अंक में गायत्री तपोभूमि का संभावित रूप क्या होगा, इसका एक चित्र छापा व उसके नीचे एक पंक्ति दी, “देखें किन्हें पुण्य मिलता है इस पवित्र तीर्थ को बनाने का” आश्चर्य होता है यह देखकर कि तपोभूमि वैसी ही बनी जैसा कि इसका प्रारूप बनाया गया था।
ज्येष्ठ सुदी 10 गायत्री जयन्ती 1942 तक उनने हस्त लिखित गायत्री मंत्र चौबीस लक्ष की संख्या में गायत्री तपोभूमि पहुँचाये जाने की अपनी इच्छा व्यक्त प्रत्येक व्यक्ति से 2400 मंत्र लिखकर भेजने को कहा। इस प्रकार एक हजार चुने हुए साधकों द्वारा इस लक्ष्य पूर्ति के लिए तिथि निर्धारित कर दी व उस दिन तक उन्हें हस्त लिखित गायत्री मंत्र प्राप्त हो गए। पर मन्दिर अभी था कहाँ? अभी तो निर्माण भी होना था।
अपने पाठकों को श्रेय देने के लिए उनके नगण्य से अनुदान को भी अखण्ड ज्योति में छापा व जिन जिन ने नैष्ठिक उपासना की, उनके चित्र जुलाई अंक में छापे। जिनमें सावित्री देवी, शिवशंकर जी मिश्र बाला शंकर जी भट्ट, नन्दकिशोर उपाध्याय, पुरुषोत्तम साखरे तथा शालिग्राम जी दुबे कुछ नाम है। वस्तुतः जुलाई 1942 का अंक ही गायत्री साधना की अनुभूतियों पर आधारित अंक था। इस तथा आगे के अंकों की “गायत्री चर्चा” प्रसंग में उनने स्थान स्थान पर गायत्री उपासना का महत्व तथा फैलायी जा रही भ्रान्तियों के निवारण हेतु शास्त्र सम्मत तर्क सम्मत समाधान दिए। दिसम्बर 1942 की अखण्ड ज्योति में उनने घोषणा कर दी कि ज्येष्ठ सुदी सं. 2010 गायत्री जयन्ती (सन 1943) को कई महान कार्यों की पूर्णाहुति होगी उसमें प्रथम थी सहस्राँशु गायत्री ब्रह्मयज्ञ की पूर्णाहुति। 124 करोड़ गायत्री महामन्त्रों का जप, 124 लाख आहुतियों का हवन, 124 हजार उपवास तीनों ही पूरे होने को आ रहे थे वे सभी गायत्री जयन्ती तक पूरे हो जाने की संभावना उनने व्यक्त की थी। दूसरा था सवा करोड़ हस्तलिखित मंत्रों के संकल्प की पूर्ति व उसकी भी पूर्णाहुति। तीसरा था स्वयं के 24-24 लक्ष के 24 पुरश्चरणों की पूर्णाहुति। चौथा था गायत्री मन्दिर में गायत्री माता की मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा। ऋषिकल्प सात्विकता का इस आयोजन में पूरा ध्यान रखे जाने का उनने आश्वासन दिया व स्वयं बैसाख सुदी 14 से ज्येष्ठ सुदी 10 तक चौबीस दिन मात्र गंगाजल पीकर निराहार उपवास रखने की घोषणा की।
यह प्राण प्रतिष्ठा पर्व कितना महत्वपूर्ण था, इसको भली भाँति समझा जा सकता था जब हम देखते है कि इसके लिए पूर्व से पूज्य गुरुदेव ने क्या क्या तैयारियाँ की।
(1) भारत वर्ष के सभी प्रमुख तीर्थों (चौबीस सौ) का जल एवं सभी सिद्ध पीठों (इक्यावन) की रज एकत्रित कर सभी तीर्थों व सिद्ध पीठों को गायत्री तीर्थों में प्रतिनिधित्व देने की घोषणा व छह माह में यह कार्य पूरा भी कर लिया। बारह महाशक्ति का चरणोदक भी स्थान स्थान से मंगाया गया।
(2) सात सौ वर्षों से जल रही एक महान सिद्ध पुरुष की धूनी की अग्नि की स्थापना करने की बात कही गयी।
(2) सात सौ वर्षों से जल रही एक महान सिद्ध पुरुष की धूनी की अग्नि की स्थापना करने की बात कही गयी।
(4) सवा करोड़ मंत्र लेखन भी प्रस्तावित गायत्री तीर्थ में उसी दिन स्थापित किये जाने की घोषणा की गयी।
इस आयोजन में बहुत बड़ी भीड़ को नहीं मात्र 124 उन गायत्री उपासकों को बुलाया गया, जिनने संतोषजनक ढंग से समस्त विधि विधानों को पूरा कर गायत्री उपासना संपन्न की थी। साथ ही ज्ञानवृद्ध, आयुवृद्ध, लोकसेवी, पुण्यात्मा सत्पुरुषों के पते भी माँगे गये ताकि उनसे इस पुण्य आयोजन हेतु आशीर्वाद लिया जा सके। कितना कुछ सुनियोजित व शालीनता, सुव्यवस्था से भरा पूरा आयोजन, जिसमें स्वयं को सिद्ध न बताकर सबके आशीर्वाद माँगे ताकि भूमि के संस्कारों को जगाकर एक सिद्धपीठ विनिर्मित की जा सके।
सब कुछ इसी प्रकार चला एवं चौबीस दिन का जल उपवास पूज्य गुरुदेव ने निर्विघ्न पूरा किया। जो साधक ब्रह्म यज्ञ में आए थे, उन्हें मात्र दुग्ध दिया जाता व लकड़ी की खड़ाऊँ पर चलने, यथा संभव सारी तप तितिक्षाओं का निर्वाह करने को कहा गया। गायत्री जयन्ती के दिन वाराणसी से पधारे तीन संतों ने ब्रह्मयज्ञ की शुरुआत की। अरणिमंथन द्वारा अग्नि प्रज्ज्वलन का प्रयास किया गया पर तीन चार बार करने पर भी असफलता हाथ लगी। पूज्य गुरुदेव अधूरे बने गायत्री मन्दिर के फर्श पर बैठे सारी लीला देख रहे थे। उनने जटापाठ धनपाठ सामगान के लिए उपयुक्त निर्देश दिए तथा अरणि मंथन हेतु आई काष्ठ को अपने हाथ से स्पर्श कर गायत्री मंत्र का जप कर वापस किया। एक सहयोगी को बुला कर कहा कि नारियल की मूँज लाओ। उसके आने पर उसमें भी मंत्रोच्चारण द्वारा प्राण फूँके तथा पुनः अरणि मंथन किये जाने का निर्देश दिया। जैसे ही काष्ठों का घर्षण हुआ, मूँज को स्पर्श करा दिया तथा तुरन्त अग्नि प्रज्ज्वलित हो उठी इसी यज्ञ कुण्ड में धूनी की स्थापित कर दी गयी। यज्ञ पूर्ण हुआ एवं संध्या सभी के साथ संतरे का रस लेकर पूज्य गुरुदेव ने अपना उपवास तोड़ा। एक महायज्ञ, जो सन् 1923 में इस महापुरुष ने आरंभ किया था, की पूर्णाहुति इस पावन दिन हुई। घोषणा की गई कि आगामी पाँच वर्षों में एक शतकुण्डी यज्ञ, एक नरमेध यज्ञ एवं एक सहस्रकुंडीय महायज्ञ अंत में संपन्न होगा जिसमें विराट स्तर पर गायत्री साधक भाग लेंगे।
पूर्णाहुति के दिन ही उनने शाम को एक और विलक्षण घोषणा की कि अभी तक उनने किसी को गुरु के नाते दीक्षा नहीं दी है। अभी तक सत्य धर्म की दीक्षा ही वे देते आये है। अब वे अगले दिन प्रातः अपने जीवन की पहली गुरुदीक्षा देंगे। जो लेना चाहें वे उस दिन उपवास रखें। स्वयं वे भी निराहार रहेंगे तथा अपने समक्ष साधकों को बिठाकर यज्ञाग्नि की साक्षी में दीक्षा देंगे। दीक्षा का यह प्रारंभिक दिन था व इसके बाद अनवरत क्रम चल पड़ा। यही दिन दीक्षा के लिए क्यों चुना, यह एक साधक द्वारा पूछे जाने पर उनने कहा कि 24 लक्ष के चौबीस महापुरश्चरणों की पूर्णाहुति व चौबीस दिन के जल उपवास की समाप्ति पर उनमें अब पर्याप्त आत्मबल का संचय हो चुका है तथा अब
वे अपनी परोक्षसत्ता के संकेत पर अन्यों को अपने मार्ग पर चलने की विधिवत आध्यात्मिक प्रेरणा दे सकते है। ब्रह्मवर्चस् सम्पन्न गुरुदेव ने पूर्णाहुति के अगले दिन वाले गुरुवार से दीक्षा देना आरंभ किया व उनके माध्यम से स्थूल सूक्ष्म रूप में ज्ञान दीक्षा, प्राणदीक्षा, संकल्प दीक्षा लगभग पाँच करोड़ से अधिक व्यक्ति उनके महानिर्वाण तक ले चुके थे। सिद्ध साधक का सिद्ध तीर्थ बनाने का यह प्रथम सोपान पूर्ण हो चुका था। अब विशाल गायत्री परिवार बनाने की, संगठन को सुव्यवस्थित करने की सुविस्तृत स्तर पर तैयारी करनी थी, जिस निमित्त ने गायत्री तपोभूमि के निर्माण के बाद प्राणपण से जुट गए।
दुराग्रह पूर्वक गलत राह पर चलते जाने की अपेक्षा भूल प्रतीत होने पर लौट पड़ना ही बुद्धिमानी है।
चिन्ता और चित में इतना ही अन्तर है कि एक अदृश्य है और दूसरी प्रत्यक्ष।
किसी ने पूछा-जानवरों में सबसे बुरा कौन है? ज्ञानी ने उत्तर दिया-पालतुओं में चापलूस और जंगलियों में चुगलखोर।
सन 1943 में पूज्य गुरुदेव ने एक पुस्तक लिखी “मित्रभाव बढ़ाने की कला”। यह सद्ज्ञान ग्रन्थ माला का तेईसवाँ पुष्प था। पुस्तक के नाम की ही तरह उनके उन दिनों अनेक मित्र थे। कुछ गाँव के साथी जो उन्हें मत्त जी कहते थे, घर जब मनचाहा, चले आते थे, कुछ कांग्रेस के कार्यकर्ता मित्र, कुछ आर्य समाज के धर्मोपदेशक मित्र कुछ पण्डित कुछ मुसलमान तो कुछ ईसाई मित्र। सभी से उनका परस्पर स्नेहभाव व सम्मान देने के गुण ही ने उन्हें सबका प्रिय पात्र बनाया। वैसे प्रसंग चलने पर वे कहा करते थे-”मेरे ढ़ाई मित्र है।” ये कौन हैं? कौन से दो हैं व शेष आधे में कौन कौन हैं, यह पूछने पर सदैव मुस्करा देते।
अखण्ड ज्योति कार्यालय में तब पैर से चलने वाली ट्रेडिल मशीन लगी थी। बूढ़े नसरुमियाँ एवं लतीफ नाम का एक युवा लड़का मिलकर इसे चलाते थे व सतत् काम करते हुए अखण्ड ज्योति की छपाई करते थे। उनका अपना खर्च भी इसी से चल रहा था। इसी बीच 1947 का भारत-पाक विभाजन का दौर आया। सभी नगर उसकी चपेट में आ चुके थे। नसरु व लतीफ के न आने के कारण मशीन बंद हो गयी थी। पूज्य गुरुदेव स्वयं लतीफ के घर पहुँचे व उसके पूरे परिवार को अपने संरक्षण में अपने घर ले आयें। नसरुमियाँ कही और जा चुके थे। बाद में उन्माद थमने पर उनने लतीफ के पूरे परिवार की उसकी इच्छानुसार पाकिस्तान जाने की व्यवस्था भी कर दी। साम्प्रदायिक सौहार्द्र का यह अद्भुत उदाहरण था।
1984 में वही लतीफ कराची से वीसा लेकर भारत आया व वंदनीया माताजी व गुरुदेव से मिल कर गया। 1947 से अब तक सतत् एक अखण्ड ज्योति 3876, कौरंगी कालोनी कराची लतीफ मियाँ के पते पर जाती है।
जितने भी बड़े-बड़े कार्य इस जगती पर सम्पन्न हुए है, वे संघशक्ति के बल पर ही हुए है। ऋषि रक्त के संचय से सीता का जन्म हुआ था जो रावण के विनाश का कारण बनी तथा देवताओं की अंशधर सत्ता महाकाली के रूप में जन्म लेकर शुम्भ निशुम्भ, मधुकैटभ इत्यादि दैत्यों का संहार कर पायी। राम को रीछ वानरों का सहयोग लेना पड़ा तो कृष्ण को ग्वाल-बालों का, अर्जुन-सुदामा जैसे सखाओं का। बुद्ध का धर्मचक्र प्रवर्तन संधारामों में से निकले भिक्षुओं भिक्षुणिओं के बल पर ही संभव हो सका। गाँधी ने भी सत्याग्रहियों की सेना एकत्र न की होती तो परतंत्रता की बेड़ियों से मुक्ति न मिलती।
महाकाल की अग्रदूत जब भी जन्म लेते है, आत्मबल सम्पन्न होते है। स्वयं सब कुछ करने की सामर्थ्य भी रखते है, किंतु स्रष्टा का खेल बिल्कुल निराला है। वह चाहता है श्रेय अगणित नरतनधारी देवात्माओं को मिले जो अवतारी सत्ता के साथ जन्म लेती है। पूज्य गुरुदेव रूपी महाकाल की सत्ता जब जन्मी और उनका साक्षात्कार अपनी परोक्ष मार्गदर्शक सत्ता से हुआ तो उन्हें अपना उद्देश्य समझ में आ गया था कि उन्हें एक विशाल संगठन खड़ा करना है जिसके माध्यम से वे विचारक्राँति को, जनमानस के परिष्कार को सम्पन्न कर दिखायें। इसके लिए चरण-चरण में मार्गदर्शन उनकी दुर्गम हिमालयवासी सत्ता करती रही। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के नाते अपनी भूमिका निभाकर, “सैनिक” समाचार पत्र के सम्पादन से मुक्ति लेकर जब “अखण्ड ज्योति” पत्रिका के रूप में अपने विचारों के विस्तार द्वारा उनने अपनी छूटी हुई तप साधना को अगले चरण पर पहुँचाया तो उनका लक्ष्य था आत्मशक्ति का संवर्धन तथा तप से उद्भूत लेखनी द्वारा तत्कालीन समाज का बहुमुखी मार्गदर्शन। लेखनी दो तरह से चली एक प्यार व ममत्व भरा व्यक्तिगत परामर्श, प्रत्येक व्यक्ति को पत्र द्वारा स्वयं की लेखनी से। दूसरे लेखों के रूप में-जिनमें व्यक्ति, परिवार समाज से जुड़ी समस्याओं का आध्यात्मिक परिप्रेक्ष्य में समाधान समाहित रहता था। 1953 की गायत्री जयन्ती पर जब उनने गायत्री तपोभूमि की स्थापना कर अपनी पहली गुरुदीक्षा दी तो एक अध्याय का पटाक्षेप हो गया था-वह था चौबीस लक्ष के चौबीस महापुरश्चरणों की साधना जिसकी पूर्णाहुति उस दिन की गयी तथा दूसरा अध्याय आरंभ हो गया था वह था गायत्री परिवार के रूप में एक सुव्यवस्थित संगठन की स्थापना। मणिमुक्तकों को ढूंढ़कर एकत्र कर उनमें प्राणशक्ति भरने का सुनियोजित कार्य यदि गायत्री जयन्ती सन 1953 से आरंभ हुआ माने तो कोई अत्युक्ति नहीं होगी। क्योंकि इसके पूर्व तो वे पृष्ठभूमि तैयार कर रहे थे, वातावरण गर्म कर रहे थे तथा हर परिजन को आने वाले समय के लिए अपनी तैयारी कैसे की जाय, यह मार्गदर्शन दे रहे थे। “गायत्री चर्चा” स्तम्भ द्वारा उनने गायत्री के तत्वज्ञान को व्यावहारिक जामा पहनाकर उसे इतना जन सुलभ बना दिया कि हर व्यक्ति जो उनके संपर्क में आया, वह गायत्री साधना न्यूनाधिक किसी ने किसी रूप में करने लगा।
गायत्री महायज्ञ अभी बड़े रूप में संपन्न होने थे। यज्ञ की प्रेरणा-”संगतिकरण” अर्थात् परमार्थ प्रयोजनार्थ श्रेष्ठ व्यक्तियों का संघबद्ध होना उन्हें भली भाँति याद था। अतः उनने शतकुण्डी महायज्ञ व सहस्रकुंडीय महायज्ञों के रूप में बाजपेय, अश्वमेध, राजसूय यज्ञ परम्परा का पुनर्जीवन कर एक विशाल संगठन की स्थापना करने का संकल्प इसी दिन लिया।
पूज्य गुरुदेव अगस्त 1953 की अखण्ड ज्योति की “गायत्री चर्चा” स्तम्भ में लिखते है कि गायत्री तपोभूमि की स्थापना माँ भगवती की इच्छा और प्रेरणा से ही हुई है। इसका मुख्य कार्य होगा। भारतीय संस्कृति धर्म और आत्मविज्ञान की आधारशिला गायत्री का जन-जन तक विस्तार। तपोभूमि भारतवर्ष के तपस्वियों, गायत्री उपासकों का एक ऐसा केन्द्रीय संगठन बिन्दु है जहाँ उनका पारस्परिक संगठन व सहयोग स्थापित होगा। जन-साधारण में गायत्री साधना का विस्तार करने की जो योजना है उससे राष्ट्र में एक तपोमयी भूमिका का सूक्ष्म वायुमण्डल बनेगा और उस वातावरण में अनेक मनोरम पुष्प प्रस्फुटित होंगे।” (पृष्ठ 21 अगस्त 1953 अखण्ड ज्योति) पहली बार वे इसी अंक में लिखते है कि “अब सभी गायत्री उपासकों को जो हमसे जुड़े हैं अपना दैनिक उपासना क्रम चालू रख रविवार के दिन साप्ताहिक कार्यक्रम रखना व सामूहिक हवन करना चाहिए।”
संभवतः गायत्री परिवार की विधिवत स्थापना का यह शुभारंभ था। समय दान का आवाहन भी पहली बार इसी अंक में इसी स्तंभ में किया गया था। उन दिनों “अपनों से अपनी बात” स्तंभ आरंभ नहीं हुआ था। “गायत्री चर्चा” स्तंभ के अंतर्गत ही वे अपनी बात कह लिया करते थे। अनेक व्यक्तियों को सन्मार्ग पर लगाने का पुण्यफल एकान्त साधना से कहीं अधिक बताते हुए वे गायत्री मात के निमित्त श्रम व समय सब से माँगते है वे सेवा के लिए समर्पित कार्यकर्ताओं का आह्वान भी पहली बार इसी के माध्यम से करते है। क्रमशः इन्हीं प्रसंगों को आगे बढ़ाते हुए 1954 की जून में पहला, पंद्रह दिन का जीवन विद्या सत्र आयोजित हुआ जिसमें संजीवनी विद्या पर, जीवन जीने की कला पर व्याख्यानों का क्रम चला। संभवतः यह बौद्धिक स्तर का पहला समागम था।
इसके पश्चात जो दूसरा महत्वपूर्ण कदम पूज्य गुरुदेव द्वारा उठाया गया, वह था संगठन निर्माण हेतु पंद्रह माह का एक अनुष्ठान का शुभारम्भ जिसकी पूर्णाहुति 108 कुण्डी महायज्ञ के यज्ञ के रूप में अप्रैल 1956 में विद्या का अधिकाधिक प्रचार के इस अनुष्ठान में गायत्री विद्या का अधिकाधिक प्रचार जन जन तक करने के लिए सबसे कहा गया व बसंत पंचमी 1955 को उनने घोषणा की कि वे 108 कुण्डी महायज्ञ में नरमेध यज्ञ करेंगे। घोषणा चौंकाने वाली थी क्योंकि उससे तो पौराणिक आशय नर बलि का ही निकलता था। पूज्यवर ने अखण्ड ज्योति के अंकों में इसका स्पष्टीकरण किया कि नरमेध का अर्थ है विशिष्ट व्यक्तियों द्वारा किसी उद्देश्य विशेष के लिए उच्चस्तरीय ड़ड़ड़ड़। अपना जीवन समाज को समर्पित करना तथा मन बुद्धि प्राण, जीवन, इच्छा, आकाँक्षा आदि की परमार्थ के लिए यज्ञ भगवान को आहुतियाँ दिया जाना। इस विशाल यज्ञ से जुड़ी नरमेध प्रक्रिया द्वारा उनने ऋषि रक्त में छिपे त्याग तत्व का आह्वान किया तथा परिजनों पाठकों की आत्माओं को झकझोरा।
अखण्ड ज्योति पढ़ने वाले पाठक निरन्तर प्रकाश प्रेरणा पा रहे थे वे गायत्री की सद्बुद्धि विस्तार की प्रेरणाओं को जन जन तक फैला रहे थे। इसी वर्ष 1955 में पूज्य गुरुदेव ने मथुरा में भादों से महामृत्युंजय यज्ञ, विष्णुयज्ञ, शतचण्डीयज्ञ, नवग्रहयज्ञ तथा चारों वेदों के यज्ञों के आयोजन किए व जो मथुरा न आ सके उनसे अपने यहाँ एक छोटा सा यज्ञ प्रति सप्ताह कर लेने का निवेदन किया। साथ ही नित्य नियमित जप करते रहने व मंत्र लेखन का अनुरोध भी। ऊपर वर्णित यज्ञ चैत्र माह 1953 (संवत् 2013) तक चलने थे। इनके समापन पर ही विशाल 108 महाकुण्डी यज्ञ व नरमेध यज्ञ का आयोजन किया गया। नरमेध प्रक्रिया देखने हजारों व्यक्ति आ जुटे। जिनने समाज के लिए कार्य करने का संकल्प लिया था उसके हाथ अलग-अलग रंग की रेशम की डोरियों से खंभों से बाँधे गये। उन्हें कलावा पहनाकर उन पर अक्षत पुष्प वर्षा कर यज्ञ समाप्ति पर उन्हें समाज को समर्पित कर बंधनमुक्त कर दिया गया।
इस यज्ञ में, जो बीस अप्रैल से 24 अप्रैल 1956 तक चला कई विशिष्ट अतिथियों व बीस हजार से अधिक व्यक्तियों ने भाग लिया। लोकसभा के सभापति अनन्तशयनम आयंगर ने इसका उद्घाटन किया। यह पूज्य गुरुदेव द्वारा तपोबल से जनशक्ति जुटाने के लिए किया गया। संगतिकरण था, एक ऐसा महायज्ञ था जिसकी परिणति पूरे भारत में स्थान स्थान पर यज्ञायोजनों के रूप में होनी थी। अपने इस कार्यक्रम के अंतिम दिन गुरुदेव ने घोषणा की कि भारत में वे 108 स्थानों पर गायत्री महायज्ञ छोटे बड़े रूप में पूरे आगामी दो वर्षों में सम्पन्न करेंगे। वस्तुतः इनकी संख्या 108 न रहकर 1008 से भी अधिक हो गई एवं ये पाँच व नौ कुण्डी से 108 यज्ञ स्तर के हुए। पहली बार अखिल भारतीय गायत्री परिवार का सदस्यता का पत्र सितम्बर 1953 की अखण्ड ज्योति में छापा गया व बाकायदा अधिकृत शाखाएँ स्थापित कर दी गई। यह प्रगतिक्रम बताता है कि कितने सुनियोजित ढंग से संगठन का सूत्रपात पूज्यवर द्वारा किया गया।
दिसम्बर 1953 में पूज्य गुरुदेव ने एक वर्ष तक 24 लक्ष गायत्री महामंत्र का महापुरश्चरण सामूहिक स्तर पर किये जाने की आवश्यकता पर बल दिया तथा इसे “आध्यात्मिक वरुणास्त्र” कहा जो 1957 में संभावित प्रकृति प्रकोपों, अन्तर्ग्रही प्रभावों तथा युद्धोन्माद की संभावनाओं से मानव मात्र को बचाने के लिए किया जाना था। जून 1947 में पहला अखिल भारतीय गायत्री परिवार सम्मेलन 7 से 12 जून की तारीखों में बुलाया गया एवं गायत्री उपासक, शाखा कार्यवाहक या मंत्री तथा व्रतधारी अक्रिय कार्यकर्ता ये तीन श्रेणियाँ अपने परिजनों की करके प्रत्येक को जिम्मेदारियाँ बाँट दी। इस सम्मेलन में संगठन का महत्व सबको समझाया गया, विभिन्न प्रांतों की गोष्ठियाँ की गयीं तथा किस प्रकार गायत्री व यज्ञ भावना का जन-जन तक विस्तार किया जाना है, यह बताया गया।
1957 की दिसम्बर अखण्ड ज्योति में पूज्य गुरुदेव द्वारा बताया गया कि 14 सितम्बर 1958 से गुरु वे नेपच्यून की युति आरंभ हो रही है। ऐसे में पाँच वर्ष भयंकर आपदाओं से भरे हो सकते है। इसके लिए गायत्री परिवार के संभावित एक लाख सदस्यों द्वारा ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान 1958 में किया जाना चाहिए। वह इसकी महापूर्णाहुति स्वरूप 1008 कुण्डों का एक विशाल महायज्ञ कार्तिक सुदी 12 से 15 (23 नवम्बर से 23 नवम्बर) 1958 की तिथियों में मथुरा में तपोभूमि में करने की विधिवत् घोषणा कर दी गयी। यह यज्ञ 101 यज्ञशालाओं में 1 लाख होताओं द्वारा संपन्न होना था। इस विराट आयोजन द्वारा एक लाख गायत्री उपासकों की श्रद्धा शक्ति का केन्द्रीकरण कर पूज्य गुरुदेव ने इस विशाल संगठन को उस महायात्रा पर ला खड़ा कर दिया जिसे अगले दिनों करोड़ों व्यक्तियों को अपनी चपेट में लेना था। यह उस मिशन का प्रगति की दिशा में अभूतपूर्व मोड़ था।
“यह सब अदृश्य सत्ता का खेल था। इस आयोजन में सूक्ष्म शरीर से वे ऋषि भी उपस्थित हुए थे, जिनके दर्शन हमने प्रथम हिमालय यात्रा में किए थे। सभी सूक्ष्म एवं कारण शरीरधारी थे। इन सब कार्यों के पीछे जो शक्ति काम करती रही उसके संबंध में किसी को कोई तथ्य विदित नहीं। लोग इसे हमारी करामात कहते रहे, किंतु भगवान साक्षी है कि हम जड़ भरत की तरह, मात्र दर्शक की तरह यह सारा खेल देखते रहे। जो शक्ति व्यवस्था बना रही थी, उसके संबंध में कदाचित ही किसी को कुछ आभास हुआ हो।”
दीर्घ जीवन वर्षों के आधार पर नहीं उसमें ड़ड़ड़ड़ पड़े महत्वपूर्ण कार्यों के आधार पर आँका जाना चाहिए।
सार्थकता उसी शिक्षा की है जो छात्र को विनम्र सुव्यवस्थित और आदर्शवादी बना सके।
सम्मान की पूँजी देने पर मिलती, बाँटने पर बढ़ती और बटोरने पर समाप्त हो जाती है। उनका सहज स्वभाव सम्मान बाँटने का था। एक दिन एक उच्च प्रशासनिक अधिकारी का अपने परिवार के साथ आना हुआ। ऊपर के कमरे में पहुँचने पर गुरुदेव ने आग्रहपूर्वक उन सको कुर्सियों पर बैठने का आग्रह किया। पहले तो वे चौके फिर न नुकुर की पर बाद में स्नेहिल आग्रह के वश में हो बैठना पड़ा। घर-परिवार, व्यक्तिगत व कार्यालय के जीवन संबंधी तमाम बातों की थोड़ी देर तक चर्चा होती रही। अधिकारी महोदय उनकी इन बातों से चकित होते रहे। नीचे उतरने पर वह अपनी पत्नी से कह रहे थे- “भाई! विचित्र सन्त है यह।” “क्यों क्या विचित्रता है इनमें?” पत्नी ने पूछा। “अन्य सन्त महात्माओं के पास जाकर उन्हें सम्मान देना पड़ता है। यहाँ उल्टे यह स्वयं सम्मान देने है।” उनका उत्तर था। ने केवल उन सज्जन ने, अनेकों ने उनके सान्निध्य में ऐसी अनुभूति पायी।
ईश्वरीय प्रयोजन के लिए आये महापुरुष भावपुँज होते है। जहाँ-कहीं भी भावनाशीलता जीवित है, उनके आगमन पर उद्वेलित, आकर्षित हुए बिना नहीं रहती। शक्तिपीठों को निर्माण लगभग शुरू हो चुका था। जन सहयोग उमड़ रहा था। इन्हीं दिनों एक बुढ़िया उनके पास आई और अपने दोनों चाँदी के कड़े उतार कर उनके पास रख दिये-बोलो-”सुना है आप शक्तिपीठ बना रहे हैं, मेरा भी इतना दान स्वीकार कर लीजिये।” पूछने पर उसने बताया कि दस बीस रुपये की साग-भाजी खरीद कर बेच लेती है। यही उसकी आजीविका है। सम्पत्ति के नाम पर यही चाँदी के कड़े है सो दे रही है। विवरण सुनकर वह भाव विह्वल हो उठे उन कड़ों को स्पर्श करते हुए बोले-”माताजी आपका दान सबसे बड़ा है। इतना बड़ा दान भला आपके सिवा और कौन देगा? उसकी प्रशंसा में अनेकों वाक्य कहे। वृद्धा अश्रु भरे नयनों से उनकी ओर ताक रही थी। निश्चित ही उनकी दृष्टि में कार्य की अपेक्षा भाव के परिणाम का कहीं अधिक महत्व था।
प्रस्तुत पंक्तियाँ अप्रैल 1984 को अखण्ड ज्योति के जीवन वृत्त विशेषाँक में पूज्य गुरुदेव द्वारा लिखी यहाँ उद्धृत है। यह प्रसंग सहस्रकुंडीय यज्ञायोजन का चल रहा है जो वस्तुतः राजसूय बाजपेय स्तर का एक विशाल आयोजन था। कई रहस्यमयी विशेषताओं से भरा पूरा यह सारा कार्य क्रम रहा। आमंत्रित तो मात्र एक लाख नैष्ठिक उपासक थे किंतु आ गए थे इससे सात-आठ गुने अधिक। दस मील के घेरे में ये सब ठहरे। किसने आवास व्यवस्था की व किसने भोजन की? सब पहेलियाँ है पर कही भी कोई अव्यवस्था नहीं थी। राशि जो सहयोग हेतु जुटी थी वह मात्र टेंट खड़ा कर लेने जितनी थी। शेष व्यवस्था किस महाशक्ति ने सँभाल ली, इसे पूज्य गुरुदेव अदृश्य मार्गदर्शक सत्ता का खेल विनम्रतापूर्वक मानते है पर यदि इसे उनकी संगठन क्षमता का चमत्कार भी कहा जाय तो कुछ अत्युक्तिपूर्ण न होगा। इस विशाल आयोजन में उनने अपने आत्मबल के सहारे सब कुछ जुए पर लगा दिया। बदले में एक लाख से अधिक निष्ठावान परिजनों का एक संगठन देखते-देखते खड़ा हो गया। इस दिव्य वातावरण में अन्तः प्रेरणा ने उन्हीं परिजनों को यह दायित्व भी सौंपा कि प्रत्येक व्यक्ति न्यूनतम एक हजार विचारशील व्यक्तियों को अपने समीपवर्ती क्षेत्र में से ढूँढ़कर अपना सहयोगी बनाए।
वस्तुतः युग निर्माण योजना के विचार क्रान्ति अभियान एवं धर्मतंत्र से लोकशिक्षण की भूमिका इस आयोजन से पूरी तरह बन गई। जिन जिन व्यक्तियों ने इसमें भाग लिया उन्हें विभिन्न काम सौंपे गए जिनसे संगठन सशक्त बना-
कार्यकर्ताओं के जन्मदिवसोत्सव मनाने की परम्परा चलाना एवं पारिवारिक यज्ञ एवं सत्संग के रूप में न्यूनतम साप्ताहिक आयोजन। इनका बड़ी संख्या में प्रचलन हुआ।
(2) विधिवत् स्नान-ध्यान नियम पूजन न कर पाने वालों के लिए गायत्री मंत्र लेखन का क्रम चला। 2400 मंत्र लिख कर लोग कापियाँ गायत्री तपोभूमि में जमा करने लगे। इससे आँदोलन बच्चों बड़ों सभी के माध्यम से घर-घर तक पहुंच गया।
(3) एक करोड़ गायत्री चालीसा छापी गयीं व जो पाठ कर सकें उनमें वितरण करने के लिए एक रुपये की सौ की दर से महायज्ञ के प्रसाद के रूप में इन्हें बाँटा गया।
(4) विचारक्राँति को घर घर पहुँचाने के लिए तथा पढ़ाने, वापस लेने की योजना के अंतर्गत झोला पुस्तकालयों का क्रम चला। ज्ञानरथ लोहे की धकेल गाड़ी के रूप में बने जिनके माध्यम से युगसाहित्य, के प्रसार में और भी तीव्रता आई। जन जन तक प्रचार के लिए पूज्य गुरुदेव ने छोटी छोटी विज्ञप्तियों व विभिन्न विषयों पर पच्चीस पैसा सीरीज के सत्तर ट्रैक्ट लिखे। यह साहित्य झोला पुस्तकालयों व ज्ञान रथों द्वारा घर घर पहुंचा।
(5) इसी अभियान के अंतर्गत सद्वाक्यों के स्टीकर पोस्टर छपे जो घरों में कमरों में सर्वत्र लगे दिखाई देने लगे। दीवारों पर आदर्श वाक्य लेखन का आँदोलन हर शाखाओं द्वारा चलाया गया जिसमें युगपरिवर्तन के लिए जिस विचारधारा की आवश्यकता थी उसे सुन्दर अक्षरों से गाँव गाँव की दीवारों पर लिखाया गया।
(6) साइकिलों पर धर्मप्रचार की पद यात्रा हेतु चार चार के जत्थे निकले। रास्ते में मिलने वालों को गीत सुनाने और रात्रि को प्रज्ञा सत्संग के माध्यम से रामचरित मानस की प्रगतिशील प्रेरणा, गीता कथा, बाल्मीकि रामायण तथा प्रज्ञा पुराण कथा का आयोजन चल पड़ा।
(7) इसी महायज्ञ में स्थान स्थान पर इसी स्तर के महायज्ञ विशुद्ध रूप से वनौषधियों द्वारा आयोजित होने की योजना बनी, जिनमें स्वयं पूज्य गुरुदेव कई स्थानों पर गए। इन यज्ञों में सम्मिलित होने वालों में से प्रत्येक से यह कहा गया कि वे अपनी वैयक्तिक दुष्प्रवृत्तियों और सामाजिक कुरीतियों में से एक को संकल्पपूर्वक छोड़ें और न्यूनतम एक सत्प्रवृत्ति बढ़ाने का व्रत लें। उपस्थित लोगों में से अधिकांश ने ऐसा किया। कुरीतियों में से विशेषतया जातिगत ऊँच-नीच, धूमधाम और दहेज को विवाहों में से हटाना भिक्षा व्यवसाय, मृतक भोज जैसी कुप्रचलन एवं स्वार्थ प्रेरित अनैतिकताओं को हटाने पर विशेष जोर दिया गया।
(8) गायत्री तपोभूमि में आने वाले कार्यकर्ताओं को शिक्षण दिया गया कि वे न्यूनतम एक घण्टा समय और दस पैसा नित्य अपने क्षेत्र से सत्प्रवृत्ति संवर्धन के लिए लगाते रहने का व्रत लें। अधिक सक्षम लोगों ने एक दिन की आय भी इस पुण्य प्रयोजन हेतु दी।
(9) वानप्रस्थ परम्परा को पुनर्जीवित किया गया एवं अनेकों रिटायर्ड व्यक्तियों को समीपवर्ती क्षेत्र में सेवा कार्य करने के लिए तत्पर होने को कहा गया। इस प्रकार हजारों अनुभवी व्यक्ति सेवा कार्यों में जुट गए।
(10) वृक्षारोपण, स्वच्छता अभियान, सामूहिक श्रमदान, शिक्षा संवर्धन, नशा निवारण, पर्दा प्रथा निवारण, चल पुस्तकालयों की स्थापना जैसे रचनात्मक कार्यों को स्थान स्थान पर आरंभ कर उनका मार्गदर्शन क्रम आरंभ कर दिया गया।
(11) युग निर्माण योजना का एक शत सूत्रीय कार्यक्रम बनाया गया तथा 1064 में एक घोषणापत्र (मेनीफेस्टो) बनाकर उसे जनसाधारण में वितरित कर दिया गया। इसे नाम दिया गया “हमारा युग निर्माण सत्संकल्प”। लाखों व्यक्ति इसमें दी गई आचार संहिता के अनुरूप चलने लगे। इससे संगठन की जड़ें मजबूत हुई।
(12) कार्यकर्ताओं के किशोर बालकों की विशेष शिक्षा के लिए एक वर्षीय पाठ्यक्रम निरन्तर चलाने का क्रम 1964 से आरंभ किया गया जिसमें वे गृह उद्योगों के माध्यम से आजीविका उपार्जन व समाज सेवा की शिक्षा सीखने लगें। ऐसे एक सौ छात्रों की भर्ती का छात्रावास एवं प्रशिक्षण का प्रबंध किया गया।
(13) गायत्री तपोभूमि मूलतः उपासना कार्यों के लिए बनी थी। 1971 तक तो नौ दिवसीय सत्रों के माध्यम से पूज्य गुरुदेव यह क्रम बराबर चलाते रहे, फिर प्रचार प्रकाशन तंत्र के तेजी से बढ़ने से उनके वहाँ से शाँतिकुँज आ जाने के बाद नई भूमि खरीद कर वहाँ प्रज्ञा नगर बसाया गया तथा बढ़े कार्यक्रमों के अनुरूप नई इमारतें बना दी गई रोटरी आँफसेट मशीनें खरीदी गई। इस प्रकार गायत्री तत्वज्ञान से आरंभ हुआ लोकशिक्षण युगपरिवर्तनकारी साहित्य रचने वाली बहुमुखी कार्यपद्धति के रूप में विकसित हो सब दिशाओं में फैल गया। गुजराती मराठी, उड़िया, अँग्रेजी आदि भाषाओं में साहित्य का अनुवाद होकर पत्रिका कई रूपों में प्रकाशित होने लगी।
(14) चूंकि पूज्य गुरुदेव को ऋषि परम्परा के बीजारोपण व नई गतिविधियों को कार्य रूप देने हेतु मथुरा छोड़कर हरिद्वार आना था, उनकी विदाई के पूर्व जिम्मेदारी वितरण के निमित्त मथुरा के सहस्रकुंडीय यज्ञ स्तर के पाँच महायज्ञ विभिन्न स्थानों पर हुए। बिहार में टाटानगर, उत्तर प्रदेश में बहराइच, राजस्थान में भीलवाड़ा, मध्य प्रदेश में महासमुन्द तथा गुजरात में पोरबन्दर स्थानों पर ये कार्यक्रम बड़े उत्साहपूर्वक सम्पन्न हुए। पूज्य गुरुदेव एवं माताजी दोनों इन कार्यक्रमों में गए एवं पूरे भारत में एक नये उत्साह का उभार आया व निर्धारित कार्यक्रमों में असाधारण अभिवृद्धि हुई।
संक्षेप में यही है सहस्रकुंडीय महायज्ञरूपी समुद्र मंथन की 14 रत्नों के रूप में उपलब्धियाँ जो आने वाले चौदह वर्षों में एक विशाल संगठन के रूप में परिणति गायत्री परिवार को हस्तगत हुई एवं नवयुग के एक ऐसे मत्स्यावतार का जन्म हुआ जो बढ़ते बढ़ते आज 1990 में उस स्थित में आ पहुँचा है जिसे एक सुनियोजित अनुशासित समाजसेवी संगठन के रूप में लाखों देवमानवों द्वारा सम्पन्न होता देखा जा सकता है।
जो अखण्ड ज्योति एकाकी एक व्यक्ति द्वारा आंवलखेड़ा से मथुरा एवं फिर वहाँ से शांतिकुंज तक प्रज्ज्वलित रखी गई थी, उसका विराट रूप उस दावानल के रूप में देखा जा सकता है जो विचारक्रान्ति से मिले हुए गायत्री उपासना कार्यक्रम के रूप में दावानल की तरह व्यापक क्षेत्र में फैलती और गजब की ऊर्जा उत्पन्न करती चली गयी।
जो गुरुदेव को एक सिद्ध पुरुष, महामानव के रूप में जानते हैं वे उनका एक दूसरा रूप संभवतः न देख पाए हों एक विशाल जन-समुदाय से आत्मीयता के आधार पर घनिष्ठ जन-संपर्क कर उन्हें लोक-सेवा के क्षेत्र में मोड़ देने वाला एक करामाती बाजीगर। यह एक सत्य है कि उनने गायत्री व यज्ञ को जन-जन तक पहुँचा दिया परंतु बिखरे हुए मणि मुक्तकों को एक माला में पिरोकर आपस में गूँथकर उन्हें समाज देवता के चरणों में अर्पित कर देना एक अवतारी शक्ति का ही काम हो सकता था व इस कार्य को ऊपर से साधारण नजर आते, इस महाब्राह्मण ने सर्वोदय स्तर का कार्य करने वाले लोकनायक ने ऐसे अमली जामा पहनाये कि देखने वाले दंग रह गए।
यह एक संयोग नहीं, अकाट्य सत्य है कि जिन व्यक्तियों से पूज्य गुरुदेव ने सहस्रकुंडीय महायज्ञ में भागीदारी करवा ली तथा बाद में अपने क्षेत्रीय दौरों से लेकर व्यक्तिगत जनसंपर्क तक जिन-जिन से वे मिले, उन्हीं में से अगणित
उनका दायित्व संभालने आगे आए व आज स्थायी कार्यकर्ता व समयदानी कर्मठ परिजनों के रूप में सक्रिय है। जिन स्थानों पर इस महायज्ञ में शाखा संगठन स्थापित होने के संकल्प लिये गए, वहीं बीस वर्ष बाद शक्तिपीठ बने। क्या इसे एक सुनियोजित संगठन के सुयोग्य सूत्रधार की महालीला नहीं कहेंगे?
ईश्वर विश्वास का फलितार्थ है-आत्मविश्वास और सदाशयता के सत्परिणामों पर भरोसा।
प्रसन्नता वसंत की तरह है जिसके आगमन पर हृदय की कलियाँ खिले फूल की तरह हँस पड़ती है।
अश्लील चिन्तन और लोलुप दृष्टिकोण मानसिक व्यभिचार है।
पूज्य गुरुदेव न केवल अंग्रेजी समझते थे, पढ़ लेते थे बल्कि बिल्कुल शुद्ध उच्चारण भी उसका कर लेते थे। तपोभूमि आने वालों में कई विदेशी हुआ करते थे। कनाडा, रशिया, जर्मनी से आयें व्यक्तियों से इस तरह बातचीत करते कि उनकी जिज्ञासा का समाधान हो जाता। शांतिकुंज आने पर भी यह सिलसिला ऊपर आकर बताया कि “मेक्सिको से एक स्पेनिश विद्वान आए है। उनकी पत्नी अंग्रेजी जानती है पर हिन्दी नहीं। मैं दुभाषिये का काम कर दूँगा। वे गायत्री मंत्र पर आपसे चर्चा करना चाहते हैं।” हँसकर वे बोले “अच्छा। बुला ला। “ऊपर आने पर जैसे ही बातचीत का क्रम आरंभ हुआ। उन सज्जन ने अपनी स्पेनिश में कुछ कहा। जब तक उनकी पत्नी अंग्रेजी अनुवाद करतीं व बीच में टपके वे कार्यकर्ता महोदय हिंदी अनुवाद तब तक पूज्य गुरुदेव उसका अँग्रेजी में जवाब भी दे चुके थे। आधे घण्टे तक यह प्रसंग चलता रहा। सब अवाक् थे। समझने में आया मनीषी भाषाओं के धरातल से भी ऊँचे होते हैं व कभी भी अपनी महानता अपने मुँह से कहते नहीं।
जिसे जनता पर विश्वास हो जनता उसके ऊपर विश्वास करे। इन विश्वासों का मिलन जिसके दिल की गहराइयों में हो वही तो सच्चा लोकनायक है। यह तथ्य ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान के उद्घाटन दिवस पर मूर्त हो उठा। इस अवसर पर उत्तर प्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल जी. डी. तपासे आए हुए थे। अनेकों गणमान्य व्यक्तियों की उपस्थिति में गुरुदेव किसी संदर्भ में बोले “हम सरकार से पैसों की अपेक्षा नहीं करते। सरकार के पास अपने ही बहुत काम है, जो धन के अभाव में अधूरे पड़े है।”
समारोह की समाप्ति पर महामहिम राज्यपाल महोदय कुछ मजाक के स्वर में बोले “आचार्य जी! सरकार से आपको पैसा चाहिए नहीं, धनपतियों से आप माँगते नहीं। फिर आपका स्रोत क्या है?” मजाक का जवाब मजाक में देते हुए उन्होंने कहा “मैंने एक जिन्न सिद्ध कर रखा है। बड़ा करामाती जिन्न है। मेरे कार्यक्रमों को तो वही पूरा करता है।” सुनकर राज्यपाल आश्चर्य से उनकी और देखने लगे-वह भी हँसते हुए बोले “चलो आप तो अपने है-बताए देता हूँ उसका नाम, मेरा जिन्न है- भारत की जनता।”
जनता पर उनके अखण्ड विश्वास को देख महामहिम राज्यपाल के मुख से निकला आचार्य जी! आप सच्चे लोकनायक है।
ज्येष्ठ सुदी 10 संवत् 2018 (गायत्री जयन्ती 1961) को चारों वेदों के साथ उपनिषदों के तीन खण्ड गायत्री तपोभूमि मथुरा से पूज्य गुरुदेव द्वारा सम्पादित हो पहली बार प्रकाशित हुए। उपनिषदों के ज्ञानखण्ड, साधनाखण्ड एवं ब्रह्मविद्या खण्डों में कुल 108 उपनिषद् थे जिनकी हिन्दी में सरल टीका पहली बार जनसमुदाय के समक्ष प्रस्तुत की गयी थी। इसकी भूमिका में पूज्य गुरुदेव लिखते है कि “उपनिषदों को जीवन का सर्वांगपूर्ण दर्शन ही कहना चाहिए। उनमें जीवन को शान्ति और आनन्द के साथ जीने तथा प्रगतिपथ पर निरन्तर आगे बढ़ते जाने की विद्या का भली भाँति विवेचन हुआ है। लौकिक और पारलौकिक, बाह्य और आन्तरिक, व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन के दोनों ही पक्ष जिसके आधार पर समुन्नत हों, वह महत्वपूर्ण ज्ञान उनमें भरा हुआ है। इनकी एक एक पंक्ति में अमृत भरा प्रतीत होता है। इस शाश्वत ज्ञान के समुद्र में जितना गहरा उतरा जाय, उतना ही अधिकाधिक आनन्द उपलब्ध होता चलता है।”
इस भूमिका व समग्र आर्ष साहित्य को जब तत्कालीन राष्ट्रपति सर्वपल्ली डॉ. राधाकृष्णन को भेंट किया गया तो उनने कहा कि “यदि यह ज्ञान नवनीत मुझे कुछ वर्ष पूर्व मिल गया होता तो संभवतः मैं राजनीति में प्रवेश न कर आचार्य श्री के चरणों में बैठा अध्यात्म दर्शन का शिक्षण ले रहा होता”। यह तथ्य सर्वविदित है कि स्वयं श्री राधाकृष्णन ने भारतीय व पाश्चात्य दर्शन पर अनेकानेक टीकाएँ लिखी है जो कि विश्व भर में पाठ्य पुस्तकों के रूप में पढ़ाई जाती है।
पूज्य गुरुदेव के सम्पादन कार्य में सहयोगी एक प्रमुख कार्यकर्ता को अड्यार (मद्रास) में एक अधिवेशन को 1981 में संबोधित करने का व मद्रास विश्व विद्यालय के प्रोफेसर्स से बात चीत का मौका मिला तो वह यह जानकर हतप्रभ रह गया कि मात्र आचार्य जी का आर्ष वाङ्मय पढ़ने के लिए वहाँ के संस्कृत दर्शन व मनोविज्ञान विभाग के प्राध्यापकों ने हिन्दी बोली व इतनी सुन्दर टीका उन्हें कहीं देखने को नहीं मिली।
आर्ष ड़ड़ड़ड़ का पुनरुद्धार वस्तुतः पूज्य गुरुदेव की पूरे समाज को एक महत्वपूर्ण देन है, जिसका सही मूल्यांकन अभी किया जाना है। मध्यकाल के अंधकार युग में भारतीय समाज को जो सबसे बड़ी क्षति हुई थी वह थी उसके विद्या वैभव का लोप। आततायियों ने उन दिनों जगह जगह आग लगा कर सुरक्षित ग्रन्थों से भरे पुस्तकालय राख कर दिये। विद्या और ज्ञान की प्राचीन परम्परा के वाहक विद्वानों और मनीषियों को ढूंढ़-ढूँढ़ कर मौत के घाट उतारा गया। फिर भी उन दिनों ऐसे मनस्वी व साहसी भी थे जिनने प्राणों की बाजी लगाई और उन ग्रंथों को लेकर जंगलों में भाग गए, गिरि कन्दराओं में ड़ड़ड़ड़ स्थिति में रहकर उनने इस विरासत की सुरक्षा की व अवसर आने पर इस विद्या के पठन पाठन का सिलसिला पुनः शुरू किया। लेकिन यह क्रम सीमित ही रहा।
अधिकाँश ग्रन्थ जिनका उल्लेख हम आज उपलब्ध प्राचीन साहित्य में पढ़ते है, अपना अस्तित्व खो चुके है। आर्ष साहित्य भी विलोप का ग्रास होते होते बचा क्योंकि कुछ समर्पित देव संस्कृति के अनुरागियों ने इसे प्राणों से भी ज्यादा प्रिय मानकर बचाने की चेष्टा की। फिर भी यह कुछ स्थानों तक ही सीमित रहा। जन-जन तक न पहुंच पाया।
वाराणसी, प्रयाग, हरिद्वार, नदिया, अवन्तिका, द्वारिका, नासिक, पुणे, रामेश्वरम् पुरी, काँची, अयोध्या, मथुरा जैसे कुछ गिने चुने स्थान ही थे जहाँ कतिपय ब्राह्मण परिवार और प्राचीन वाङ्मय को सर्वोपरि महत्व देने वाले लोग आर्ष साहित्य को जानते और उसका अध्ययन करते थे। ब्रिटिश काल आया व प्राच्य साहित्य के प्रति रुचि वाले मैक्समूलर, मैकडाँनल, पालडासन, विलसन आदि मनीषियों ने इस साहित्य की ढूँढ़ खोज की लेकिन उससे भारतीय जनसाधारण को कुछ अधिक न मिल पाया।
पाश्चात्य विद्वानों को वेदों का सायण भाष्य ही उपलब्ध हो पाया था। महीधर, उब्बरष् रावण आदि के भाष्यों की उन्हें भनक भी नहीं थी। उन्नीसवीं सदी में स्वामी दयानन्द वे वेदों पर भाष्य लिखना शुरू किया। वे ऋग्वेद के छह मण्डलों का ही भाष्य कर निर्वाण को प्राप्त हो गए। उनके शिष्यों ने अन्यान्य ग्रन्थों का भाष्य चालू किया पर उन पर सदैव यही आरोप लगता रहा कि अपने विचारों व पूर्वाग्रहों को उनने आर्ष साहित्य पर जबरदस्ती थोपा है। मूर्तिपूजा को न मानने वाले आर्यसमाजियों ने जहाँ कहीं प्रतीक पूजा का उल्लेख आया, बिना उसका तात्विक विश्लेषण किए उसे काट ही दिया। वेदों में अवतार वाद का उल्लेख नहीं है तो आर्य समाज के विद्वानों ने राम, कृष्ण, आदि अवतारी सत्ताओं को भी साधारण मानव की भाँति निरूपित किया। साकार ध्यान, योग, भक्ति, तीर्थ, मन्दिर, सगुण उपासना आदि पर उनका दृष्टिकोण स्थूलवादी ही रहा।
एक तो वैदिक वाङ्मय बिल्कुल विलुप्त एवं जो भी सामने आया उसके प्रस्तुतीकरण को ले कर भी विवाद! महायोगी अरविंद, कुमार स्वामी और श्रीपाद दामोदर सातवलेकर ने भी आर्ष वाङ्मय के भाष्य किए लेकिन इनमें से किसी का भी भाष्य समग्र नहीं है। जिन जिनको अपनी इस पुरातन धरोहर से अवगत होने ज्ञानगंगा का अवगाहन करने की आकाँक्षा उठती थी उन्हें मन मार कर रह जाना पड़ता था।
पूज्य गुरुदेव ने स्वतंत्रता आन्दोलन के बाद से ही वैदिक साहित्य, आर्ष वाङ्मय को अपने मूल रूप में सरल हिन्दी टीका सहित प्रस्तुत करने की भूमिका मन में बनाली थी। उनकी मार्गदर्शक सत्ता द्वारा उन्हें सौंपे गए अनेक भागीरथी कार्यों में से एक आर्ष साहित्य को जन सुलभ कराना भी था। अध्ययन और सामग्री संकलन का कार्य इसी कारण उनने 1936-37 से ही आरंभ कर दिया था, जब वे आगरा में थे।
चारों वेदों के संहिता पाठ समग्र रूप में कहीं भी एक स्थान पर उपलब्ध नहीं थे। सार्वदेशिक आर्यसभा, वैदिक पुस्तकालय, काशी विद्वत्परिषद और वैदिक शोध संस्थान होशियारपुर जैसे कतिपय प्रकाशकों ने उन्हें अंश अंश में प्रकाशित किया था। संपूर्ण पाठ प्राप्त करने के लिए गुरुदेव ने काशी नदिया, पूना, नासिक की यात्रा की व अलग अलग मण्डल, अध्याय, सूक्त, मंत्र जैसा भी जहाँ से मिला लिया एवं क्रमबद्ध किया। यही कठिनाई उपनिषदों के संकलन में आई। मोटे तौर पर आठ नौ उपनिषद् ही प्रसिद्ध हैं, वही आसानी से मिलते है लेकिन पूज्य गुरुदेव को एक सौ आठ उपनिषदों के मूल पाठ जुटाने थे। प्रयत्नपूर्वक यह भी संकलित कर क्रमबद्ध किये गए। आर्ष साहित्य में वेद व उपनिषद् के अलावा, छहों दर्शन, अठारह पुराण बीस स्मृतियाँ, चौबीस गीताएँ, आरण्यक, ब्राह्मण, निरुक्त, व्याकरण आदि भी आते है। ये सभी आसानी से मूल रूप में उपलब्ध नहीं थे। पुराणों का कार्य सबसे अधिक दुरूह था। लगभग साठ पुराणों के नाम मिलते है। पुराण, उपपुराण और औपपुराणों का वर्गीकरण इन्हीं में से किया गया था। कुछ विद्वान जिन्हें प्रमुख पुराण मानते है, दूसरे उन्हें उपपुराण व कुछ उन्हें औपपुराण कहते है। पूज्यवर ने काशी के विद्वानों से संपर्क कर अठारह पुराणों की नामावली तय की। यद्यपि उन सब में परस्पर मत भेद था पर अन्तिम सम्मति उनकी ही उपयोगी और महत्वपूर्ण सिद्ध हुई।
संपूर्ण वाङ्मय जुटा लेने के बाद प्रत्येक ग्रन्थ पर भाष्य लिखने के लिए उन्हें एकान्त की आवश्यकता थी। पत्रिका और पुस्तकों का लेखन सम्पादन साधकों जिज्ञासुओं से संपर्क व दिशा निर्देशन, संगठन के संचालन आदि सभी कार्य अपने में महत्वपूर्ण थे। इन सबका सुनियोजन कर उपयुक्त व्यक्तियों को कार्यभार सौंप, वंदनीया माताजी को अखण्ड ज्योति के सम्पादन की गुरुतर जिम्मेदारी संभलवाई एवं एक वर्ष के लिए तप करने गंगोत्री गोमुख के दुर्गम हिमालय वाले क्षेत्र में चले गए। साथ में सारे आर्ष वाङ्मय का मूल संकलन भी ले गए ताकि तप से उद्भूत आत्मबल के प्रकाश में बाद में उत्तरकाशी में रहकर सारा भाष्य व टीका का कार्य सम्पन्न कर सके। “सुनसान के सहचर” पुस्तक यदि उनके हिमालय प्रवास के चिन्तन का नवनीत है तो समग्र आर्ष वाङ्मय उसके तुरन्त बाद उत्तरकाशी में मात्र छह माह की अवधि के उस पुरुषार्थ का सार है जो उनने लेखनी के माध्यम से एक मनीषी, ऋषि तत्वदर्शी की भूमिका निभाकर संपन्न किया।
सारे भाष्य को उनने क्रमबद्ध कर मथुरा भेजते रहने का क्रम चालू रखा। वह कम्पोज होता रहा किन्तु छपाई तभी हुई जब पूज्य गुरुदेव ने स्वयं आकर सारी अशुद्धियों को ठीक कर स्वयं प्रूफ पढ़कर प्रेस में दिया। यही सर्व शुद्ध भाष्य प्रथम संस्करण के रूप में दिया। यही सर्व शुद्ध भाष्य प्रथम संस्करण के रूप में गायत्री जयन्ती 1961 प्रकाशित हुआ। सर्व प्रथम वेद व उपनिषद् छपे, बाद में पुराण आदि अन्य ग्रन्थ। पुराणों ने थोड़ा समय जरूर लिया क्योंकि इन्हीं में मध्यकाल के टीकाकारों द्वारा अपना उल्लू सीधा करने के लिए जोड़े गए अनावश्यक अंश ज्यादा थे। इन अंशों को पहचानना व पूर्वापर संगति बिठाकर उन्हें संपादित करना एक दुष्कर कार्य था। किन्तु पूज्य गुरुदेव की अठारह से बीस घंटे नित्य काम करने की शैली ने इस कार्य को आसान कर दिया व समग्र आर्ष साहित्य पाँच वर्ष में छपकर जन सामान्य के सामने आ गया। बाद में अन्यान्य प्रकाशकों के पास संस्करणों के छपते रहने व प्रूफ रीडिंग में प्रमाद होने से अशुद्धियाँ बढ़ती गयी।
मूल ग्रन्थों का प्रथम संस्करण जिनके पास उपलब्ध है, उसे प्राप्त कर देखा जा सकता है कि आर्ष साहित्य के नाम पर पूज्य गुरुदेव के सम्पादित पाठ और अनुवाद ही आज आसानी से उपलब्ध है आर्ष साहित्य को जिसने जन सुलभ बना दिया, ऐसे युग पुरुष को हर संस्कृति प्रेमी नमन करने हेतु सहज श्रद्धावश प्रेरित हो जाता है। यदि मूल शुद्ध भाष्य जिसकी छपाई स्वयं पूज्य गुरुदेव की देख रेख में हुई पुनः उपलब्ध कराया जा सके तो यह शिष्य समुदाय की सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
विद्या वह जो नम्रता सिखाए। उचित अनुचित का विश्लेषण करे और नीति मार्ग पर चलने का साहस प्रदान करे।
ईश्वर को कल्पवृक्ष कहा गया है पर कुछ पाने के लिए निकट जाना और छाया में बैठना पड़ता है।
ईश्वर की सृष्टि को श्रेष्ठ सुन्दर और समुन्नत बनाना ही उसकी आराधना है।
घीया मण्डी वाले वर्तमान “अखण्ड ज्योति संस्थान” में जनवरी 1944 में आने से पूर्व पूज्य गुरुदेव दो तीन मकान बदल चुके थे सभी मकान छोटे थे। परिवार में पाँच सदस्य थे माँ को मिलाकर और आने वालों की कमी नहीं थी। मकान की तलाश जारी थी। एक दिन उनके ढाई मित्रों में से एक ने बताया कि घीयामण्डी पर एक मकान सड़क पर है। टूटा-फूटा तो है। पर उसमें तीन जीने है 14 कमरे है व दो दालान है। किराया भी मात्र 14 रुपये महीना! मुँह में पानी आ गया ऐसा मकान तो मिलना चाहिए। पर उसके अभी तक खाली रहने का कारण भी बता दिया गया। कहा कि भुतहा मकान है। रात को रोज “छम छम’ आवाज होती है। आचार्य श्री ने हँसते हुए पूछा कि “बस छम छम मात्र से इतना लोग डर गए। हम नृत्य व संगीत दोनों का आनंद लेंगे पर रहेंगे वहीं।”
जनवरी 1944 बसंत पंचमी पर आर्यसमाजी पद्धति से हवन दालान में किया गया। सड़क पर बोर्ड लगा दिया गया अखण्ड ज्योति कार्यालय’ उस हवन के बाद न वहाँ भूत प्रेत नजर आए न वह आवाज ही सुनाई दी। पूरे मकान में प्रेस प्रकाशन व आवास की व्यवस्था हो गयी। भूत महाकाल के अग्रदूत को डरा भी कैसे सकते थे। जो अतीत को भूत मानता हो एवं वर्तमान में कर्मयोगी रह उज्ज्वल भविष्य का निर्माता हो वह भूत से भला क्या डरेगा?
औरों का आतिथ्य कर उन्हें अपनी आत्मीयता से सराबोर कर देना पूज्य गुरुदेव के जीवन की एक प्रमुख विशेषता रही है। जो भी जाता, उसे 1943 तक पहली वाली माताजी एवं उसके बाद सजल श्रद्धा की साकार मूर्ति वंदनीया माताजी स्नेहपूर्वक भोजन कराती। स्वयं वे पास बैठकर परिजन की समस्याएँ पूछकर उसे आश्वस्त कर उसका मानसिक उपचार भी करते रहते। 1954 तक तो तपोभूमि की व रहने की व्यवस्था भी नहीं हो पायी थी। घीया मण्डी वाले घर में ही उपलब्ध स्थान में वे परिजनों के सोने के लिए भी स्थान निकाल लेते। यही आत्मीयता-सघन सहृदयता उनकी एक मात्र पूँजी थी जिसके बल पर वे प्रज्ञा परिवार के एक एक सदस्य को चुन चुन कर एक माला में गूँथते रहे व विशाल गायत्री परिवार को जन्म दिया। यह एक रहस्य ही रहेगा कि दो सौ रुपये में वंदनीया माताजी कैसे घर का खर्च भी चला लेती थी एवं आतिथ्य भी पूरा कर लेती थी। एक ब्राह्मण का जीवन जीकर न्यूनतम में यह सब भी संभव है, यह ऋषि युग्म ने साकार कर दिखाया। आज शाँतिकुँज में भी वन्दनीया माताजी किसी को बिना भोजन कराये नहीं जाने देती। आतिथ्य परम्परा आजीवन चली व वह सूत्र संचालक के निर्धारणों का एक अंग बन गई।
महाकुम्भ 1977 का प्रसंग है प्रयाग में काँची कामकोटि पीठ के शंकराचार्य स्वामी जयेन्द्र सरस्वती ने पूज्य गुरुदेव के विषय में अपने उद्गार व्यक्त करते हुए कहा था, “आचार्य जी ने गायत्री को जन-जन तक पहुँचाने के लिए भागीरथी प्रयत्न किया है। उनका एकाँकी पुरुषार्थ सारे संत समाज की सम्मिलित शक्ति के स्तर का है। “शंकराचार्य की इस सम्मति पर वहाँ उपस्थित संतजन विस्मित हुए क्योंकि अब तक तो चारों मठों के शंकराचार्य गुरुदेव की आलोचना ही करते आए है। वह भी मात्र इसलिए कि उनकी राय में गायत्री मंत्र की दीक्षा द्विजों को ही दी जानी चाहिए। अन्य वर्ण लोगों को यह अधिकार दिए जाने पर वे सभी बड़ा कट्टरपंथी रुख रखते आये है।
स्त्रियों के गायत्री अधिकार के विषय में भी अन्य संत-महात्मा-महामण्डलेश्वर एक तरफ हैं एवं पूज्य गुरुदेव एक तरफ। पूज्यवर की प्रारम्भ से ही यह मान्यता रही कि गायत्री व यज्ञ भारतीय संस्कृति के मानव मात्र को दो दिव्य अनुदान-वरदान है। किसी को भी जाति व लिंग, वर्ण का भेद किए गायत्री को जपने व यज्ञ कार्य करने का पूरा अधिकार है। अपने विरोध में क्या कहा जा रहा है, इसकी उनने जीवन भर परवाह नहीं की। जब काँची के शंकराचार्य की उपरोक्त अभिव्यक्त व पं श्रीराम शर्मा आचार्य की प्रशंसा कुम्भ में पधारे पण्डितगणों ने सुनी तो सुनने वालों को चौंकना स्वाभाविक था। पूछने वालों ने प्रश्न किया-” आचार्य जी ने क्या शास्त्रों की अवहेलना कर जिस तिस को गायत्री दीक्षा नहीं दी? क्या यह उचित है? “ इस पर संत श्री का कहना था कि “शास्त्र विधि शास्त्र के अनुशीलन से निर्धारित होती है, शास्त्र को शस्. बना लेने से नहीं। आचार्य जी ने जो भी किया, वह शास्त्र सम्मत ही था”,
बात अपनी जगह बिल्कुल सही थी। जिन लोगों ने गायत्री और यज्ञ को जन सुलभ बनाने के लिए गुरुदेव को पानी पी पीकर कोसा, वे शास्त्रों का उपयोग हथियार बनाकर ही कर रहे थे। अन्यथा पाँचवे दशक में ही गायत्री महाविज्ञान, गायत्री ही कामधेनु है, स्त्रियों का गायत्री अधिकार आदि पुस्तकों में शास्त्रीय उद्धरणों एवं प्रमाणों से यह सिद्ध कर दिया गया था कि गायत्री और यज्ञ सबके लिए है। इसके लिए किसी भी संस्तुति की गुरुदेव ने कभी अपेक्षा नहीं की, न ही अपनी प्रगति यात्रा में इन व्यवधानों से कभी रुके।
यह बात सही है कि द्विजों को ही गायत्री का अधिकार है। लेकिन द्विज कौन से? शास्त्रीय प्रमाणों से पूज्य गुरुदेव ने समझाया कि द्विज वह जिसका दूसरा जन्म हुआ हो। जन्म से तो सभी शूद्र होते हैं, द्विजत्व तो अर्जित किया जाता है। एक जन्म माता-पिता द्वारा होता है। यह काया का जन्म है। दूसरा जन्म आत्मिक है और यह गायत्री और यज्ञ रूपी सद्ज्ञान व सत्कर्म के समन्वय से सम्भव होता हैं गायत्री माता है व यज्ञ पिता। यह भारतीय संस्कृति का निर्धारण है। जिसने इस दोनों की सन्निथि में आत्मिक प्रगति की स्फुरणा होती और दिशा मिलती अनुभव की, वह द्विज है। यही शास्त्रोक्त व तथ्य सम्मत प्रतिपादन है। इन प्रतिपादनों से प्रतिगामियों व विरोध के लिए विरोध करने वालों, स्वार्थ पर जिनकी चोट पड़ती हों, उन्हें क्या लेना-देना। ऐसे लोगों ने तरह तरह की अफवाहें व प्रत्यक्ष विघ्न भी उत्पन्न किया लेकिन?
गुरुदेव इन अवरोधों से बिना प्रभावित हुए कभी रुके नहीं, चलते रहे।
गायत्री तपोभूमि की स्थापना के बाद पहली बार जब उनने दीक्षा देना आरम्भ किया, वे दीक्षार्थियों से कुछ व्रत-नियमों का पालन करने के लिए कहने लगे। नियमित गायत्री जप, सात्विक रहन सहन, अभक्ष्य भक्षण त्याग के मूल में जो उद्देश्य था, वह यही कि दीक्षा लेने वाला आचार शुद्धि, आत्मशोधन के महत्व को समझ कर अपने को दिनों दिन परिष्कृत करता चले। जो भी इन नियमों का पालन करने को तत्पर दीखता, वह चाहे जिस जाति या लिंग का हो, उसे वे बेरोक-टोक दीक्षा देते। दीक्षा की यह प्रक्रिया जब गति पकड़ती गई तो लाखों लोगों गायत्री मंत्र की प्रेरणा को, सद्बुद्धि को अपने अंदर धारण कर लिया और ब्रह्मलोक से अवतरित हंस कामधेनु का पयपान कर भौतिक एवं आध्यात्मिक दोनों ही क्षेत्रों में प्रगति का लाभ लेने लगे। ऐसे व्यक्तियों जिनने प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से गुरुदेव से मंत्र दीक्षा ग्रहण की व इन दिनों गायत्री मंत्र की प्रेरणाओं को अपने जीवन में उतार कर जीवन जी रहे है, संख्या लगभग पाँच करोड़ से अधिक है। कितनी बड़ी सेवा मानव समुदाय की वे अपने जीवित रहते कर गए व अब सौ गुना अधिक व्यक्तियों को सद्बुद्धि की प्रेरणा देने का संकल्प लेकर गए हैं, वह पूरी होने पर निश्चित ही नव युग की संभावनाओं को साकार देखा जा सकेगा, इसके कोई सन्देह नहीं है।
उनने समाज की जो सेवा की, उनका मूल्याँकन लोग प्रशस्ति से नहीं, ऐसे ब्राह्मणत्व सम्पन्न व्यक्तियों के उद्गारों से किया जाना चाहिए जिनने स्वयं वैसा जीवन जिया है। काँची के शंकराचार्य की चर्चा ऊपर हो चुकी। आर्य समाज के प्रधान रहे महात्मा आनन्द स्वामी गुरुदेव को अत्यधिक स्नेह भी करते थे एवं सम्मान भी। वे जब गायत्री की प्रतिभा की प्रतिष्ठा करने वाले ऐ आर्य समाजी पूज्य गुरुदेव के संस्थान गायत्री तपोभूमि के पधारे तो उनने उपस्थित जनसमुदाय को खरी-खोटी सुनाते हुए गायत्री को सार्वभौम बनाने के उनके प्रयासों की भूरि-भूरि सराहना की थी। अपने ही प्रमुख व सम्माननीय महात्मा के उद्गार संभवतः उपस्थित कट्टर पंथियों को कड़ुए लगे होंगे पर उनमें वास्तविकता थी क्योंकि वे दुष्टा की नजरों में जो महामानव का मूल्याँकन होता है, उसी की अभिव्यक्ति कर रहे थे। बाद में अपने महानिर्वाण से कुछ वर्ष पूर्व जब महात्मा आनन्द स्वामी हरिद्वार पधारे तो स्वयं गायत्री माँ की मूर्ति को नमन कर अपने प्रतीक पूजा की। एकपक्षीय व्याख्या करने वालों को चुनौती दे डाली। उनने उपस्थित सभी श्रोताओं को बताया कि सृष्टि का नवसृजन जिस सत्ता ने किया है, उसी ने गायत्री परिवार व युग निर्माण योजना के सूत्रधार के रूप में जन्म लिया है। पूज्य गुरुदेव ने बड़ी विनम्रतापूर्वक मंच से कहा कि वे महाकाल के प्रतिनिधि मात्र है, किन्तु उपस्थित श्रोता मुग्ध थे, यह जानकर कि वे कैसी सत्ता के सान्निध्य में है।
यज्ञों के लिए यजन कर्ताओं की कभी जाति-पाँति नहीं, पूछी गयी। जहाँ भी आयोजन होता वहाँ निर्धारण के समय ही निर्देश दे दिये जाते कि यज्ञ में सम्मिलित होने वाले पहले कुछ साधनात्मक उपचार कर लें। गायत्री का लघु अनुष्ठान, चौबीस हजार मंत्रों का जाप नौ दिन तक संयम नियम से रहना। यदि लघु अनुष्ठान संभव न हो तो गायत्री चालीसा का चौबीस सौ पाठ। इतना भी न हो सके तो मंत्र लेखन ही पर्याप्त है। पंचाक्षरी ॐ भूर्भुवः स्वः का जप भी जो कर ले उसे भी वे यज्ञ की पात्रता दे देते थे। मात्र वनौषधियों से होने वाले इन यज्ञों में पहले दिन कलश यात्रा इसी तथ्य की घोषणा करती थी कि सभी स्त्री पुरुषों को यज्ञ में सम्मिलित होने का अधिकार है। ब्राह्मण व्यक्ति अपने कर्मों से बनता है, जन्म से नहीं होता।
यह एक क्रान्तिकारी आँदोलन था, संभवतः पिछले सभी समाज सुधारकों से भी अधिक प्रचण्ड स्तर का क्रान्तिकारी, युगान्तरकारी।
मथुरा का 107 कुण्डी महायज्ञ जब 1956 में सम्पन्न होने जा रहा था तब मथुरा के कई पण्डों ब्राह्मणों ने विरोध किया। उनने सभी तरह की तरकीबों से विघ्न पहुँचाने का प्रयास कर लिया। जब इनका एक प्रतिनिधि मण्डल पूज्य गुरुदेव से मिलने आया तो उनने उनका सम्मानपूर्वक स्वागत कर बिठाया, प्रत्येक को दुशाला, दक्षिणा दी व उनकी बात को बिना किसी प्रतिरोध के सुना। उनके इस व्यवहार से ही अपनी बात कहकर जाने वाले उन्हीं ब्राह्मणों में से कुछ कभी बिगाड़ नहीं पाया व इसके बाद अभूतपूर्व स्तर का 1007 कुण्डी महायज्ञ भी उनने सम्पन्न किया व लाखों ने उसमें भाग लिया। यह एक योद्धा, युग परिवर्तन को कृत संकल्प व्यक्ति का ही कर्तृत्व हो सकता था कि उसने यज्ञ जैसे पुनीत कार्य को जनसुलभ, सब के लिए बना दिया। अध्यात्म में गतिशील साम्यवाद लाने का श्रेय किसी को जाता है तो पूज्य गुरुदेव को।
मथुरा से बाहर सुदूर क्षेत्रों में भी उनका कम विरोध नहीं हुआ। कई व्यक्ति भ्रान्तियाँ फैला देते कि जहाँ आचार्य जी यज्ञ करने जा रहे हैं, वहाँ अनिष्ट ही अनिष्ट होने वाला है क्योंकि गायत्री मंत्र कीलित है। इसे कोई सिद्ध ब्राह्मण ही जप सकता है। ऐसे विघ्नों को कोई प्रभाव जनसमुदाय पर नहीं पड़ा क्योंकि वे उनका साहित्य पढ़कर पहले ही अपने अज्ञान के स्थान पर सद्ज्ञान की प्रतिष्ठापना कर चुके थे। कुछ व्यक्ति जो सभा में विघ्न फैलाने या शास्त्रार्थ करने की धमकी से आते उन्हें वे पहले सुनने को कहते व अपने प्रवचन में ही कुछ ऐसा कह देते कि न केवल उस का समाधान हो जाता, उनका आध्यात्मिक कायाकल्प भी हो चुका होता था। वे कहते कि “गायत्री तो वेदमाता है, जगज्जननी है, ज्ञान स्रोत है, मातृ स्वरूप है, सद्बुद्धि की अधिष्ठात्री देवी है। वह कैसे अपनी संतान का अहित कर सकती है। वह कुपित भी नहीं होती व अपना आँचल पकड़ने वाले को कभी मझधार में भी नहीं छोड़ती।” लाखों व्यक्ति उन्हें सुनकर उनके होते चले गये।
अब तो परम्परावादी आचार्य, महामण्डलेश्वर तक गुरुदेव के गायत्री व यज्ञ की दिशा में किये गये कार्य की महत्ता को स्वीकारते व सराहते हैं। इस संदर्भ में स्वामी करपात्री जी की सम्मति उल्लेखनीय है। वे बड़े कट्टर पंथी माने जाते है पर अपनी मान्यताओं के प्रति हठी इन्हीं करपात्री जी ने 1974 में हरिद्वार में कुम्भ में कहा था कि “श्रीराम शर्मा आचार्य जी ने गायत्री को सब की बना दिया। मेरी अपनी दृष्टि में यह बात मैं आज भी मानता व कहता हूँ कि यह ठीक नहीं है। लेकिन इतना तो मानना ही पड़ेगा कि गायत्री सबकी होने के बाद लुप्त होने से बच गयी। यदि इसे ब्राह्मणों के भरोसे छोड़ दिया जाता तो कौन इसे याद रखता?”
स्वामी अखण्डानन्द जी जो करपात्री जी के गुरु भाई थे, ने दिल्ली के लक्ष्मीनारायण मन्दिर में अक्टूबर 1978 में चली प्रवचन माला में कहा था कि “जो गायत्री का गंगाजल की तरह सेवन करना चाहते हों, वे आचार्य जी का मार्ग अपनाएँ। वह आसान है और निरापद भी। आचार्य जी ने तो यज्ञ को भी देवदर्शन की तरह सुलभ कर दिया।”
क्या इसके बाद भी किन्हीं और की सम्मति आवश्यक है?
धूर्तों की चापलूसी से विचारशीलों की फटकार अच्छी।
संसार में तीन सम्मान सबसे बड़े है सन्त, सुधारक और शहीद।
धरती पर विशेष प्रयोजन हेतु आए महापुरुष उदारता की प्रतिमूर्ति होने के बावजूद कहीं कठोर भी होते है, और उनकी इस कठोरता का केन्द्र बनता है अपना और अपनों का जीवन। आश्चर्यजनक किन्तु सत्य की सीमा में आने वाली यह बात उनके अपने एक निकटतम शिष्य की बीमारी के दौरान स्पष्ट हुई। उस समय इस कार्यकर्ता का गंभीर आप्रेशन हुआ था। सहृदय, वेदना, असुविधाओं को जखीरा तो जुटाना ही थे।
कुछ के मन में आया गुरुदेव तो अपनी तप शक्ति से अनेकों संकट टाल सकते है। फिर इस संकट को क्यों नहीं टाल रहे? जबकि संकट उनके नितान्त अपने पर है। एक दिन इधर-उधर से उठी इस बात का समाधान देते हुए उससे बोले क्यों भाई तुम तो ऐसा नहीं सोचते। फिर समझाते हुए कहा-हमारी आत्मीयता के लिए कष्ट तो उठाना ही पड़ेगा। न जाने कितनों की तकलीफें मुझे लेनी पड़ती है। इन्हें मैं और मेरे अपने ही तो उठाएँगे। अपने प्रति ही नहीं, अपनों के प्रति भी कठोरता। यह कठोरता ही तो उनकी अमूल्य आत्मीयता का मूल्य है। तथ्य स्पष्ट हो चुका था।
नाविक की तरह जियो जिसके द्वारा पार उतारे जाने की बात कृतज्ञतापूर्वक स्मरण की जाए।
चमत्कार का तात्पर्य बाजीगरी नहीं, बल्कि लोकहित में कुछ ऐसा कर गुजरना है जो अनुपयोग असाधारण हो। उत्तर प्रदेश के तत्कालीन राज्यपाल डॉ. एम. चन्नारेड्डी ने अपने दूसरी बार आगमन पर इन्हीं अर्थों में उन्हें चमत्कारी कहा। राज्यपाल महोदय भावुक हो अपने भाषण में कहने लगे “देश के स्वतन्त्रता के बाद लोक जीवन की मानसिकता ऐसी बदली कि स्वयं राष्ट्र पिता को हताश हो कहना पड़ा अब मेरी कौन सुनेगा? सत्ता शासन के मद में भरे अँग्रेजों को सुनाने वाला अपनों को न सुना पाया। ऐसे में गाँव का साधारण ब्राह्मण कहता है कि मैं सुनने योग्य सुनाऊँगा करने योग्य कराऊँगा। कहता ही नहीं करके दिखा रहा हूँ। इसे मैं सबसे बड़ा चमत्कार न मानूँ तो क्या मानूँ। न कुछ से कुछ, कुछ से बहुत कुछ की इनकी यात्रा आश्चर्य नहीं तो क्या है?” महामहिम राज्यपाल के इन शब्दों ने सुनने वालों के मन में चमत्कार की सही परिभाषा लिख दी पर सही माने में चमत्कार तो अब दिखाई देंगे। बहुत कुछ से सब कुछ की यात्रा जो अभी शुरू हुई है।
मैं आस्तिकता और कर्तव्यपरायणता को मानव जीवन का धर्म कर्तव्य मानता हूँ”- यही थीं प्रथम पंक्तियाँ उस अधिकृत सत्संकल्प की, घोषणा पत्र की जिसे युग निर्माण योजना का प्रारम्भिक उद्घोष कहा जा सकता है। मार्च 1962 की अखण्ड-ज्योति में पहली बार पूज्य गुरुदेव ने इस सत्संकल्प एवं शुभ अवसरों पर इसे सामूहिक रूप से पढ़ा जाय। सभी परिजनों, पंजीकृत शाखाओं को एवं ज्ञान मंदिर चलाने वाले परिजनों को उद्बोधन करते हुए सितम्बर 1962 के अंक में लिखा गया कि यह वह विचार बीज है जिसके आधार पर युग निर्माण की संभावनाएँ सुनिश्चित होंगी।
युग परिवर्तन की बात एक क्रान्तिकारी स्तर का विचारक ही कह सकता है। वही सोच सकता है कि सड़ी गली मान्यताओं से घिरा यह समाज तभी बदल सकता है जब व्यक्ति अपने आपको आमूलचूल बदले। परिस्थितियों को बदलने की बात तो सब कहते है पर मनःस्थिति को बदल कर, विचार करने की शक्ति द्वारा अपने श्रेष्ठ संकल्पों को जाग्रत कर यदि व्यक्ति स्वयं को बदल ले तो यह सारा समाज बदल जाय। यह एक दार्शनिक एवं मनोविज्ञान का मनीषी विद्वान ही सोच सकता है कि “युग” को बदलने जैसे असंभव दीखने वाले कार्य को तभी व्यावहारिक रूप दिया जा सकता है जब उसकी एक इकाई समाज व उसकी भी एक इकाई परिवार तथा अन्ततः व्यक्ति का सर्वांगपूर्ण परिष्कार हो। मनुष्य बदलना है तो जमाना भी बदलने लगता है। दृष्टिकोण में परिवर्तन आते ही वातावरण बदला हुआ दिखाई पड़ने लगता है। “एक-एक व्यक्ति का निर्माण होता चला तो युग निर्माण हुआ दृष्टिगोचर होगा,” यह एक अवतार स्तर की सत्ता ही कह सकती है जिसे भविष्य भी दिखाई पड़ना है एवं वर्तमान को बदलने का सारा ताना-बाना भी जो परोक्ष जगत के साथ ही बुनती चलती है।
कोई यह भी कह सकता है कि “युग निर्माण”-”युग परिवर्तन” बड़े-बड़े शब्द है, लच्छेदार अभिव्यंजनायें है एवं कैसे यह सब सम्भव है। जब विषमताएँ, अलगाववाद, मूढ़ मान्यताएँ ही चारों ओर संव्याप्त हो। क्या यह एक यूटोपिया नहीं है कि व्यक्ति समाज ही नहीं, एक पूरे युग को, “एरा” को बदलने की बात कह रहा है। परन्तु इन सबके मूल में उस सत्साहस एवं प्रचण्ड मनोबल, इच्छाशक्ति को देखा जाना चाहिए जो स्रष्टा के “एकोऽहं बहुस्यामि” संकल्प स्तर की है तथा “धर्म संस्थापनार्थाय संभवामि युगे-युगे" के रूप में मानव मात्र को दिये गये आश्वासन के रूप में विद्यमान है। यह महामानव का संकल्प है एवं उसी की परिणिति है कि उसी विषमता भरे समुदाय में आज जो परिवर्तन की बात सोची जा रही है, सभी विचारक जिसके बारे में अपना मतैक्य प्रकट करते दिखाई देते हैं, उसके मूल में व्यक्ति निर्माण ही है।
इतना बड़ा समुदाय जो प्रज्ञापरिवार, गायत्री परिवार के रूप में अखण्ड-ज्योति, युगशक्ति गायत्री के पाठकों के परिकर के रूप में दिखाई देता है उसने इस सत्संकल्प की संजीवनी द्वारा ही स्वयं को उस स्तर तक पहुँचाया है, जहाँ वे आते हैं।
पूज्य गुरुदेव लिखते हैं कि “युग परिवर्तन के लिए जिस अवतार की आवश्यकता है वह पहले आकाँक्षा रूप में ही अवतरित होगा। इसी अवतार का सूक्ष्म स्वरूप यह युग निर्माण सत्संकल्प है। “यह कथन एक निश्छल निर्मल अन्तःकरण वाले उस महामानव का है जो जीवन भर इसी निमित्त तपा तथा कुन्दन की तरह उस अग्नि में तप कर सोना बना। उसके विचार ही आज सूक्ष्मजगत में छाए सारे परिवर्तन का सरंजाम बनाते दिखाई देते हैं। कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी यदि यह कहा जाय कि स्वयं निष्कलंक प्रज्ञावतार के संकल्प के रूप में यह घोषणा पत्र प्रकट हुआ एवं स्रष्टा का संकल्प कभी अधूरा रहता है?
अपने इस सत्संकल्प में पहला स्थान पूज्य गुरुदेव ने आस्तिकता को दिया जो व्यक्ति को सन्मार्ग पर चलाती है, उसे भगवत्सत्ता के अनुशासन में रहना सिखाती है। आस्तिकता भी ऐसी जो व्यक्ति को पलायनवादी न बनाए बल्कि कर्मयोगी कर्तव्यपरायण बनाए। भगवान के प्रति सच्चा समर्पण सक्रिय समर्पण है, यही सूत्र समझाते हुए वे कहते है कि यदि आस्तिकता कभी जीवन में फलित होगी जो व्यक्ति कर्तव्यपालन को सबसे पहले महत्व देगा। कर्तव्य शरीर के प्रति तो यह है कि उसे भगवान का मंदिर समझा जाय व आत्मसंयम व नियमितता के माध्यम से उसे स्वस्थ, निरोग, सशक्त बनाये रखा जाय। मन को स्वच्छ रखना, कलुष रहित, निष्पाप बनाये रखना उतना ही जरूरी है जितना व्यक्ति शारीरिक स्वास्थ्य का ध्यान रखता है। यदि मानसिक स्वास्थ्य अक्षुण्ण बना रहा तो जीवनीशक्ति भी सही बनी रहेगी। मनोविकार व दुर्भावनाएँ सतायेंगी नहीं तथा आधि-व्याधि समीप भी नहीं आयेंगी। मनन व चिंतन, स्वास्थ्य व सत्संग से रोक कर सही दिशा दिखाती हैं व सदैव आत्मनिर्माण, आत्मविकास की प्रेरणा देती रहती है। सद्विचारों के लिए श्रेष्ठ साहित्य ही वरेण्य होना चाहिए व सतत् स्वाध्यायरत रह, श्रेष्ठ व्यक्तियों के समूह में रह कर व्यक्तियों को सही चिन्तन की शैली का अभ्यास करना चाहिए, यह सत्संकल्प का प्रथम पाठ है एवं सही कहा जाय तो यही मर्म है। यदि इतनी व्यवस्था भी कोई जीवन में कर ले तो वह बदल जाए, साथ ही अनेकों को बदल दे।
आगे वे लिखते हैं कि सामुदायिकता की भावना जब तक विकसित नहीं होगी, हर व्यक्ति अपने हित के बजाय सब का हित पहले नहीं सोचेगा तब तक चारों ओर संकीर्ण स्वार्थपरता का ही साम्राज्य होगा। आध्यात्मिक साम्यवाद का मूलमंत्र यही है जो पूज्य गुरुदेव बताते हैं-”सबसे हित में अपना हित है।”यही एकता -समता का, सामाजिक, न्याय का मूल आधार स्तम्भ है। “मैं नहीं, हम सब” की बात सोची जाय तथा “वर्ण” और “लिंग” का अनुपयुक्त भेद-भाव समाप्त किया जाय। आज जब चारों ओर साम्राज्यवाद, अधिनायकवाद ढह चुका है व वर्ण भेद के खिलाफ संघर्ष जारी है, यह कथन तब कितना समयानुकूल था, यह भलीभाँति समझा जा सकता है।
आत्मसुधार की प्रेरणा देने के लिए कुछ गुणों को जीवन में उतारने की बात संकल्प में आगे कहते है-”नागरिकता, नैतिकता, मानवता, सच्चरित्रता, शिष्टता, उदारता जैसे सद्गुणों को सच्ची सम्पत्ति समझ कर मैं उन्हें अपने जीवन में बढ़ाया चलूँगा।” “सच्ची सम्पत्ति” शब्द गौर करने योग्य है। सम्पदा तो भौतिक जगत में कई रूपों में बिखरी पड़ी है पर सच्ची सम्पत्ति वह है जो व्यक्ति को नर मानव से देवमानव बना दें। ये गुण जो ऊपर बताये गये हैं, जीवन में उतारे जायें तो व्यक्ति महामानव बनकर ही रहेगा। साधना, स्वाध्याय,
संयम व सेवा इन चारों सूत्रों में जो वे आगे लिखते है सारा अध्यात्म दर्शन समाया हुआ है। आत्मशोधन व फिर सद्विचारों का आरोपण अपने ऊपर कठोर नियंत्रण एवं सत्प्रवृत्ति संवर्धन हेतु सेवा-साधना या समाज देवता की आराधना जो करता चले वह आत्मकल्याण का पथ तो प्रशस्त करेगा, औरों की मुक्ति का निमित्त भी बन सहज ही श्रेय पाता चलेगा।
वस्तुतः सत्संकल्प का एक-एक अक्षर क्रांति का बीज है। किसी एक को भी जीवन में उतार लिया जाय तो व्यक्ति को स्वयं को आत्मिक प्रगति ही नहीं भौतिक प्रगति का द्वार भी खुला मिलेगा। न केवल वह बदलेगा, उसके आस-पास का परिकर भी बदल जायेगा।
बुद्धावतार के उत्तरार्ध रूप में जन्मे प्रज्ञावतार के प्रतीक पूज्यवर ने आगे सूत्र दिया है कि “परम्पराओं की तुलना में विवेक को महत्व दिया जायगा तथा अनीति के प्राप्त सफलता की अपेक्षा नीति पर चलते हम असफलता ही शिरोधार्य होगी।” विवेक परम्पराओं के समक्ष यदि जाग्रत रहे तो समाज में भेड़ों के अंधानुकरण की लहर देखी जाती है वह समाप्त हो जाय। दुष्प्रवृत्तियाँ कुरीतियाँ, मूढ़ मान्यताएँ विवेक की उपेक्षा करने से ही पनपती है। विवेक रूपी नेत्र के जाग्रत होते ही इनके मिटने में देर नहीं लगती। आज समाज में व्यक्ति अनीति का “शार्टकट” वाला रास्ता अपना कर अदूरदर्शितापूर्ण ढंग से सफलता दिखाई देता है। यदि नीति का स्थायी महत्व समझा जाय तो व्यक्ति नीति की राह पर चलना, ईमानदारी से जीवन बिताना श्रेयस्कर मानेगा। मनुष्य के मूल्याँकन की कसौटी भी फिर वह नीति तथा विधि रहेगी, जिसके आधार पर सफलता प्राप्त की गयी।
स्वार्थ नहीं, परमार्थ को प्रधानता देते हुए सत्प्रवृत्ति का एक अंश लगाने की प्रेरणा देते हुए पुरुषार्थ का एक अंश लगाने की प्रेरणा देत हुए पूज्यवर कहते हैं कि यही सच्चा धर्म है, युगधर्म है। ब्राह्मण वही है जो सौ हाथ से कमाए, हजार हाथों से दान करें। ऐसा ब्राह्मणत्व अर्जित करने की वे सबको प्रेरणा देते है।
“आत्मनः प्रतिकूलानि परेषाँ न समाचरेत्” यह सूक्त पढ़ा तो कइयों ने होगा पर जीवन में इसे उतारना जो संभव कर लेता है वह सबकी निगाह में चढ़ जाता है। यदि हम दूसरों से अच्छे व्यवहार की अपेक्षा रखते हैं तो हमें भी उनसे वैसा ही व्यवहार करना चाहिए। जनसंपर्क के, व्यवहार, कौशल के, दूसरों को अपना बनाने के, संजीवनी विद्या के, जीवन जीने की कला के सारे सूत्र इस एक ही वाक्य में समा जाते है। कि-”मैं दूसरों के साथ वह व्यवहार न करूंगा जो मुझे अपने लिए पसंद नहीं।”
ईमानदारी और परिश्रम की कमाई ही पचती है। इससे उलटे व्यवहार वाली तो बीमारी बनकर, कोढ़ बनकर इसी जन्म में व्यक्ति को त्रास देती व क्रिया की प्रतिक्रिया का कर्मफल वाला सिद्धान्त समझाती है। अनीति की राह पकड़ कर अधिक कमाने वाले वित्तेषणाग्रस्त व्यक्ति शोषण करते है, नर-पिशाच की पदवी पाते हैं व लोक भर्त्सना के भाजक होते है। जो अपना उपार्जन श्रम की स्वेद बूँदें बहाकर ईमानदारी से करता है, वह स्वभावतः सेवा परायण, उदारमना तथा सज्जन होगा। अध्यात्मवादी को यही जीवन नीति अपनानी चाहिए भले ही प्रत्यक्ष घाटा दिखाई देता हो।
अगला सूत्र है नारी जाति के प्रति माता, बहिन और पुत्री की दृष्टि रखेंगे, कुदृष्टि से ही कामुकता पनपती व अन्यान्य विकार जन्म लेते है। विश्व शांति का एक प्रमुख आधार बताते हुए पूज्य गुरुदेव लिखते है कि विश्व की आधी जनशक्ति नारी है।
यदि उसके प्रति पूज्य व पवित्र दृष्टि रखी जाने लगे, उस पर शोषण, अत्याचार स्वतः बन्द हो जायेगी व दोनों मिलकर एक स्वस्थ व श्रेष्ठ समाज की रचना करेंगे। दाम्पत्य जीवन तो जिया जाय पर संतानोत्पादन को एक कर्तव्य मात्र मानते हुए कुदृष्टि प्रधान कामुक जीवन न जिया जाय। नारी की महत्ता अग्नि के समाज बताते हुए वे कहते है कि इसे ऊष्मा माना जाय, जीवन का स्रोत मना जाय। नारी की भावनाओं को यथोचित सम्मान देकर उसे भी ऊँचा उठने का पूरा अवसर दिया जाय। रमणी की नहीं, भोग्या की नहीं अपितु माता की, भगिनी की दृष्टि रखी जाय तो ही व्यक्ति निर्माण, परिवार निर्माण संभव है।
अंत में पूज्य गुरुदेव लिखते है कि मनुष्य भाग्य निर्माता है, अपने भविष्य का निर्धारण वह स्वयं करता है। इस असाधारण सामर्थ्य का अधिपति होने के कारण यह उद्घोष करने में उसे कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि यदि वह उत्कृष्ट बनेगा व दूसरों को श्रेष्ठ बनाने का प्रयास करेगा तो युग अवश्य बदलेगा। “तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु” के आध्यात्मिक मनोविज्ञान के सिद्धान्त के अनुसार कितना शुभ व श्रेष्ठ यह संकल्प है कि युग अवश्य बदलेगा क्योंकि मैं वह नहीं रहूँगा जो आज हूँ। मैं आज से भी श्रेष्ठ व उत्कृष्ट अपने को बनाता रहूँगा व पारस से छूकर लोहे से सोना बना जाने की तरह औरों को भी वैसा बनाता चलूँगा। यदि ऐसा हुआ तो युग अवश्य बदलेगा क्योंकि फिर समाज में श्रेष्ठ व्यक्तियों का, सद्भावना को महत्व देने वाले नर रत्नोँ का, संवेदना से भरे-पूरे देवमानवों का बाहुल्य होगा। पुरुषार्थ ही प्रधान है भाग्य नहीं, यह मान्यता इस घोषणा में कूट-कूट कर भरी हुई है कि “मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप है।” ऐसे व्यक्ति जो पुरुषार्थ द्वारा अपने भविष्य को श्रेष्ठ व उत्तम बनाते है सुगंधित चन्दन के वृक्षों के समाज अपनी सुरभि चारों ओर बिखेरते हैं, युग प्रवर्तक कहलाते है व मल्लाह बनकर अपनी नाव स्वयं खेते, औरों को पार लगाते है। जब ऐसे व्यक्ति हों तो युग क्योँ नहीं बदलेगा? अवश्य बदलेगा।
एक युग पुरुष द्वारा लिखा गया यह सत्संकल्प (घोषणा पत्र) स्वयं में एक दस्तावेज है, युग निर्माण के लम्बे सफर में एक कीर्ति स्तम्भ है। बाद में मार्च 1971 में इसी को एक संशोधित प्रगतिशील रूप दिया गया जिसमें मूल बातें तो वही थीं, जिनका विवेचन ऊपर किया गया, कुछ पक्षों को इसलिए जोड़ा गया कि वे समय के अनुकूल अब उपयुक्त भी थीं। इसमें समझदारी बहादुरी व जिम्मेदारी को भी ईमानदारी के साथ जोड़ दिया गया। राष्ट्रीय एकता व अखण्डता की बात नये सिरे से दुहराई गई तथा अंत में अपना विश्वास पूरी मजबूती से इस संकल्प पर प्रकट करते हुए लिखा कि- “हम बदलेंगे युग बदलेगा, हम सुधरेंगे-युग सुधरेगा।”
महाकाल जब यह कह रहा हो तब उसकी अंशधर आत्माएँ ऐसा क्यों नहीं करेंगी। युग परिवर्तन का शुभारंभ हो चुका हैं, नवयुग निश्चित ही आना है, यह विश्वास यदि हम बनाये रखें स्वयं को बदलते हुए ऊँचा उठाने की दिशा में बढ़ते चलें तो पूज्य गुरुदेव का “इक्कीसवीं सदी, उज्ज्वल भविष्य” उद्घोष निश्चित की साकार होकर रहेगा।
प्रसन्नता अन्तःकरण की परिष्कृतता का चिह्न है। खिन्नता बिगड़े बच्चों के मचलने जैसी आदत।
दुष्टों का वैभव पढ़ते देखकर ललचाओ मत। वे गुब्बारे की तरह फूलते और बबूले की तरह फूटते रहते है।
अनीति सहन करते रहने की अपेक्षा उससे लड़ते हुए मर जाना अच्छा।
प्रकृति से पूज्य गुरुदेव को अगाध प्रेम था। हिमालय की आत्मा तो उनके कण-कण में समाई हुई थी। “सुनसान के सहचर” पुस्तक उसी आत्मभाव की अभिव्यक्ति है। शांतिकुंज में उनके कक्ष व लगी हुई छत से गढ़वाल हिमालय,शिवालिक पर्वत की श्रृंखलायें सामने ही दिखाई देती है। शीतऋतु में हिमाच्छादित चोटियाँ भी साफ दृष्टिगोचर होती हैं तथा वर्षा ऋतु में तो यहाँ का सौंदर्य देखते ही बनता है। अपने साथ कार्य करने वाले सहयोगी कार्यकर्ताओं व वंदनीया माता जी को भी वे मेघमालाओं से घिरे पर्वत शिखर, उनकी गोद में खेल रही माँ गंगा व हिमशिखरों को दिखा-दिखा कर अपने आनन्द की अभिव्यक्ति करते। संभवतः शांतिकुंज निर्माण का मूल कारण उस भूमि का सुसंस्कारित रहना हो किन्तु एक प्रमुख कारण प्रकृति का साहचर्य भी हो सकता है। दूर उत्तर दिशा व पूर्व में आज भी मात्र हरे-भरे वृक्ष हैं,पर्वत श्रृंखलाएँ है, व प्राकृतिक सौंदर्य अपनी छटा बिखेरे हुए है। यदि सब देखने वे सतत् बाहर आते व इनका अवलोकन कर समष्टि से अपना तादात्म्य स्थापित करते थे।
उन दिनों गुरुदेव नित्य प्रवचन देने नीचे जाते थे। “ शांतिकुंज नाम उस आश्रम का इसलिए था कि स्थान-स्थान पर कुँज थे, लता मण्डप थे, जड़ी बूटियाँ लगी थी। सभी की साज-सज्जा, कटाई-छँटाई कुछ ज्यादा ही निर्ममता से कर ऊपर से दिखाने भर के लिए बेलों को बाँध दिया है ताकि वे बिखरें नहीं पर उसके इस प्रकार बाँधने व नीचे से कट जाने से ऊपर की शाखाएँ व पत्तियाँ सूख गई है। लौटकर उनने व्यवस्था में जुड़े लोगों को बुलाया व उसका उदाहरण देते हुए आक्रोश में बोले-”तुम समझते हो इन निरीह पौधों में प्राण नहीं होते। कैसा हो यदि तुम्हारे हाथ-पाँव बांधकर कोई ऐसा तुम्हें खड़ा कर दे। “ ऐसा लगा प्रकृति से तादात्म्य स्थापित करने वाला यह महामानव वह दृश्य देखकर अंदर से तिल-मिला गया है। उस दिन सबने एक तथ्य समझा कि प्रकृति मात्र में वही परमसत्ता विद्यमान है व महापुरुषों की करुणा सहज ही ऐसे में उभर आती है जब उसके किसी भी अंग के साथ खिलवाड़ किया जाता है।
उन दिनों वह कार्यक्रम के सिलसिले में बाहर थे। आयोजन में उनके प्रवचन को कुछ ही देर रह गई थी कि खबर आई कि एक कार्यकर्ता मथुरा से अभी आए हैं और आपसे तुरन्त मिलना चाहते है। सुनकर आगन्तुक कार्यकर्ता को बुलाने का आदेश दिया। कार्यकर्ता ने पास पहुँचने पर बताया कि पू. ताई जी (पू. गुरुदेव की माता जी) की दशा बहुत चिन्ताजनक है, तुरन्त चलना होगा। सुनकर वह बोले- “तुम चलो, उनके शरीर छोड़ देने पर उचित व्यवस्था जुटाना, मैं कार्यक्रम के समाप्त हो जाने पर आ जाऊँगा।
समाचार आयोजकों ने भी सुना-उन्होंने भी प्रार्थना की आपको चले जाना चाहिए आयोजन बाद में हो जायगा।” सुनकर वह बोले- “सवाल आयोजन का नहीं है, सवाल मेरे कर्तव्य का है। इतने लोग जो मुझसे कुछ पाने आए हैं, खाली हाथ लौटेंगे। यह मैं देख नहीं सकता। मानवमात्र के हृदय में भगवान का निवास होता है। ऐसे भगवान की पूजा छोड़कर मैं नहीं जा सकता।” तत्पश्चात् उन्होंने स्वस्थ चित्त हो प्रवचन किया। कार्यक्रम भली प्रकार समाप्त हुआ। कहना न होगा कि उनके पहुँचने के काफी पहले ताई जी संसार छोड़ चुकी थीं। पहुँचने पर सारा उत्तर कार्य निपटाया। महामानव मोह से परे होते हैं उन्हें निर्मम नहीं, कर्तव्य मानवता का पुजारी मानना चाहिए। महानता मालवीय जी एवं बालकृष्ण गंगाधर तिलक के साथ भी ऐसा ही हुआ था।
जब शुष्क मरुस्थल तपते हैं, बहती है मेरी निर्झरिणी। आँधी तूफान मचलते हैं, तब चलती है मेरी तरनी।
मुझको हर मौसम सावन है, हर परिवर्तन भाया रहता। आँखों में हरियाली बनकर, मेरा साजन छाया रहता।
“युग बीत गए चलते-चलते॥”
ये पंक्तियाँ पूज्य गुरुदेव की अखण्ड-ज्योति पत्रिका से उद्धृत की गयी हैं जो सन् 1953 में प्रकाशित हुई थी। लेखनी का जादूगर, शब्दों का शिल्पी, नाचते-उछलते हृदयों को झकझोरते वाक्यों की रचना करने वाला, क्या उक्ति दें इस महामानव को! समझ में नहीं आता। सरकस में देखा जाता है कि सधे हुए जानवर रिंग मास्टर के इशारे पर सारे करतब दिखाते हैं। मदारी जब जानवरों को साध लेता है तो उनसे मन चाहे करिश्मे-नाच आदि दिखा देता है। हिप्नोटिज्म के विशेषज्ञ जिसे सम्मोहित करते हैं, उससे जो कहते हैं वह करता है।
लगता है पूज्य गुरुदेव की लेखनी में वह जादू था कि वे जो चाहते थे, जैसा चाहते थे अक्षरों का गुंथन वैसा ही कर दिया करते थे। अक्षर उनके इशारे पर नाचते थे व लेखनी चिन्तन-चेतना के साथ जुड़कर माँ सरस्वती के इस वरद पुत्र के हाथ से स्पर्श होकर स्वयं को धन्य मानती थी। पूज्य गुरुदेव को सिद्ध पुरुष, अवतारी महामानव, उदात्त अंतःकरण वाला एक विशाल परिवार का अभिभावक, एक विराट संगठन का सृजन करने वाला, गायत्री व यज्ञ को जन-जन के मन-मन में स्थापित कराने वाले से लेकर एक वैज्ञानिक मनीषी, ऋषि सब कुछ माना जाता है किन्तु एक कुशल लेखनी का शिल्पी, हिन्दी साहित्य के इतिहास में एक अनूठी विधा रचने वाला अभूतपूर्व साहित्यकार वाला पक्ष ऐसा था, जो स्वयं हिन्दी जगत उनके जीवित रहते नहीं जान पाया। जब भी उनके साहित्यकार पक्ष पर शोध कार्य होगा तो यह प्रकाश में आएगा कि साहित्य की एक विलक्षण विधा का ही इस व्यक्ति के माध्यम से जन्म हो गया। हिन्दी की गरिमा गाने वाले तथाकथित बुद्धिजीवी संभवतः तब इस विराट व्यक्तित्व के प्रचुर परिमाण में लिखे गए साहित्य का मूल्याँकन करेंगे व पश्चाताप करेंगे कि उनके जीवित रहते उन पर यह कार्य क्यों नहीं सम्पन्न हो सका।
परिमाण की दृष्टि से पूज्य गुरुदेव ने बहुमुखी विषयों पर इतना कुछ लिखकर रख दिया है कि उसका विवेचन-प्रस्तुतीकरण इस लेख क्या, किसी ग्रन्थ में भी सम्भव नहीं। एक साक्षी के रूप में उनके साहित्यकार पक्ष को, शब्दों को गूँथने वाले कलाकार के रूप में दृश्यमान पक्ष को प्रस्तुत करने के लिए एक ही पुस्तक का हवाला देना काफी होगा-”सुनसान के सहचर”।
प्रस्तुत पुस्तक जैसा कि परिजन जानते हैं पूज्य गुरुदेव द्वारा अपने 1960-61 के अज्ञातवास में लिखी गयी लेख माला “साधक की डायरी के पृष्ठ”, “कोई एक” के संस्मरण तथा “सुनसान के सहचर” के रूप में अखण्ड-ज्योति के सन् 1960 व 61 के अंकों में प्रकाशित हुई थीं। इसमें उन्होंने प्रकृति व हिमालय को जितना समीप से देखा व उसका अध्ययन कर अपनी अभिव्यक्ति शब्दों के रूप में की है वह अत्यन्त भावभरी व बार-बार पढ़ने योग्य है। हरीतिमा व पहाड़, उस पर भी हिमालय से उन्हें अत्यधिक लगाव था। पूज्य गुरुदेव की मार्गदर्शक सत्ता ने उन्हें बार-बार वहीं बुलाया भी। अपनी शेष तीन बार की यात्रा में तो उन्होंने वह कार्य किया जो उन्हें सौंपा गया था-कठोर तप, सूक्ष्म मार्गदर्शक ऋषिसत्ताओं का साक्षात्कार तथा शक्ति एवं भविष्य की अपनी योजनाओं का ताना-बाना भी इन्हीं यात्राओं के दौरान उन्होंने बुना। किंतु जो संस्मरण उन्होंने अपनी कृति “सुनसान के सहचर” में लिखे हैं, वे स्वयं में अनूठे हैं। प्रकृति का यह विलक्षण स्वरूप भी हो सकता है, उससे कण-कण से महत्वपूर्ण शिक्षण इस तरह भी लिया जा सकता है, यह इस पुस्तक को पढ़ने के बाद समझ में आता है।
सैलानियों के, पर्यटन करने वालों के अनेकानेक संस्मरण छपते रहते हैं किंतु इस विलक्षण सैलानी ने जो कठोर तपस्वी भी था जिस गहराई से उस परमात्मसत्ता का अध्ययन किया है जो प्रकृति के रूप में हमारे चारों ओर संव्याप्त है व हमारी प्राणरक्षक सत्ता भी है, यह देखते ही बनती है। इसकी अनुभूतियाँ मन में उठतीं भावभरी हिलोरें जिस तरह शब्दों का आकार पाकर कागज पर उतरती चली गई, वह एक साधारण लेखक का नहीं, सैलानी का नहीं, प्रकृति प्रेमी का नहीं वरन् एक ऐसे महापुरुष का चमत्कार है जिसे मानो सरस्वती सिद्ध हो, जो प्रकृति और पुरुष के एकाकार होकर अद्वैत होने के रूप में अपना अस्तित्व परम सत्ता में ही विलय कर चुका हो तथा जो सपेरे की बीन पर साँप को लहराने की तरह अपनी भाव-संवेदनाओं से शब्द-व्यंजनाओं को नचाता हो, थिरकाता हो।
अपनी गंगोत्री-गोमुख यात्रा के दौरान पूज्य गुरुदेव ने दुर्गम हिमालय की यात्रा भी की थी। एकाकी व्यक्ति क्या प्रकृति के सान्निध्य का आनन्द ले सकता है? उत्तर है-हाँ। जब हम “सुनसान के सहचर” के पृष्ठ पलटते हैं तो लगता है जीव जगत, वनस्पति समुदाय, यह विराट अंतरिक्ष व मानव समुदाय सभी एक दूसरे के सहयोगी हैं। मानव के साथ मानव न भी हो तो सुनसान में भी वह प्रकृति का आनन्द वैसा ही लेता रह सकता हे, वैसा ही नहीं और भी अधिक अच्छी तरह, जब वह सूक्ष्म दृष्टि विकसित कर प्राकृतिक सौंदर्य में अर्थ ढूँढ़ने की कोशिश करता है।
यह गोमुख की यात्रा तब की गई थी जब गाड़ियाँ सीधी ऋषिकेश से आगे नहीं चलती थीं। ऋषिकेश से देवप्रयाग का मार्ग भी सन् 1961 में बना है। इसके बाद चट्टियों पर मुकाम करते-करते पैदल माह-डेढ़ माह में यात्री गंगोत्री तक पहुँचता था। वे लिखते हैं- “सँकरी पगडण्डी पर चलते हुए पहली बार मौत का भय हुआ। एक पैर भी इधर-उधर हो जाय तो नीचे गरजती गंगा के गर्भ में जल समाधि लेने में कुछ देर न थी। जरा बच कर चलें तो सैकड़ों फुट ऊँचा पर्वत सीधा तना खड़ा था, एक इंच भी अपनी जगह से हटने को तैयार न था। जीवन और मृत्यु के बीच डेढ़ फुट का अंतर था” . . . . “सोचता हूँ वह यात्रा तो पूरी हो गई पर यदि हम सदा मृत्यु को निकट देखते रहें तो व्यर्थ की बातों पर मन दौड़ाने वाली मृगतृष्णाओं से बच सकते हैं। जीवनकाल की यात्रा भी सँकरी पगडण्डी पर चलने के समान है, जिसमें हर कदम साध-साध कर रखना जरूरी है।”
प्रसंग छोटा सा है पर निष्कर्ष कितना महत्वपूर्ण वह भी मृत्यु के दर्शन से जोड़ता हुआ। आगे वे लिखते हैं कि “सुक्की चट्टी पर जहाँ ठहरे, वहाँ सामने ही बर्फ से ढ़की पर्वत की चोटी दिखाई दे रही थी। बर्फ पूरी तरह पिघलने से पहले ही पानी के साथ मिलकर बहने लगती थी। इसलिए झरना ऐसा लगता था मानो फेनदार दूध ही ऊपर से बहता चला आ रहा हो। शोभायमान दृश्य को देख-देख कर ही आँखें ठण्डी हो रही थीं।” क्या कोई प्रकृति प्रेमी इससे अधिक सुन्दर ढंग से व्याख्या कर सकता है एक प्रपात की! दो बच्चे वहीं बैठे थे जो यात्रियों के थे। उनकी बहस गुरुदेव ने सुनी कि बच्ची कह रही थी कि यह पहाड़ चाँदी का है। दूसरे का कहना था कि नहीं इतनी चाँदी कोई खुली नहीं छोड़ सकता। पूज्यवर ने उनका समाधान किया व अपनी मनोरंजक शैली में समझाया कि पहाड़ पर बर्फ जमती है। इसके बाद वे आत्मविश्लेषण करके कहते हैं कि “क्या बड़े हो जाने पर भी आदमी समझदार हो पाता है? जैसे ये दोनों बच्चे बर्फ जैसी मामूली चीज को चाँदी समझ रहे थे उसी प्रकार चाँदी-ताँबे के टुकड़ों को, इन्द्रिय छेदों पर मचलने वाली खुजली को, नगण्य अहंकार को, तुच्छ शरीर को बड़ी आयु का मनुष्य न जाने कितना अधिक महत्व दे डालता है और जीवन लक्ष्य को भुलाकर भविष्य को अंधकारमय बना डालता है।”
कितना सुन्दर तात्विक पर्यवेक्षण है आज के मनुष्य का जिसे साँसारिक सुखों में ही रस आता है। सुनसान में बैठा एक चिन्तक, मनीषी चिन्तन भी कर रहा है तो मानवी स्वभाव का व कैसे उसके संकीर्ण स्वार्थपरता को ऊर्ध्वगामी मोड़ दिया जाय, इस बात का। आगे वे पीली मक्खियों द्वारा काटे जाने पर लिखते हैं कि “वे तो नन्हे-नन्हे डंक मार कर आधा मील पीछा करके वापस लौट गई पर मनुष्य की अधिकार लिप्सा, स्वार्थपरता और अहंकार से उद्धत होकर किये जाने वाले आक्रमणों की भयंकरता जब सोचता हूँ तो बेचारी पीली मक्खियों को बुरा-भला कहने में जीभ सकुचाने लगती है।”
ठण्डे पहाड़ों में गरम पानी के सोतों व उनसे मिलने वाली ताजगी को लक्ष्य करके पूज्य गुरुदेव लिखते हैं कि “ठण्डे स्नान से खिन्न व्यक्तियों को गरम जल से स्नान कराने की सुविधा और आवश्यकता का ध्यान रखते हुए संभव है पर्वत ने अपने भीतरी बची बहुत थोड़ी सी गर्मी को बाहर निकाल कर रख दिया हो। पर्वत सोचता होगा जब सारा ही ठण्डा हो चला तो इस थोड़ी सी गर्मी को ही बचाकर क्या करूंगा? इसे भी क्यों न जरूरतमंदों को दे डालूँ।” कितना अद्भुत विश्लेषण है गंधक के इन उष्ण सोतों की ठण्डे हिम से ढके पहाड़ों में उपस्थिति का? इसे वे आत्मदानी पर्वत कहते हैं मानव मात्र को प्रेरणा देते हुए कहते हैं कि जो भी शक्ति अपने पास हो उसे जनहित में लगाकर इन तप्त कुण्डों का सा आदर्श उपस्थित करें।
मार्ग में आगे चलकर एक पहाड़ मिलता है जिसके नरम पत्थरों से पानी धीरे-धीरे बूँद की तरह टपक रहा था। काई लगी होने से जैसे रोने से आँख में कीचड़ आ जाती है ऐसी कुछ कल्पना पूज्य गुरुदेव के मन ने की व वे यही सोचकर अपनी लेखनी चला बैठे। “पर्वतराज! तुम इतनी वन श्री से लदे हो, तुम्हें किस बात की चिन्ता! तुम्हें रुलाई क्यों आती है?” उनकी कल्पना के प्रश्न का पर्वत उत्तर देता है “मेरे दिल का दर्द तुम्हें क्या मालूम। मैं बड़ा हूँ, ऊँचा हूँ, वन श्री से लदा हूँ पर निष्क्रिय हूँ। यह जीवन भी कोई जीवन हैं और लोग संसार की सेवा में अपने पुरुषार्थ का परिचय देकर अपना नाम इतिहास में अमर कर रहे हैं। पर एक मैं हूँ, जो अपना वैभव अपने तक ही समेटे बैठा हूँ। इस आत्मग्लानि से ही मुझे रुलाई आती ही।” लेखक की, चिन्तक की, मनीषी की कल्पनाशक्ति दौड़ी भी तो कहाँ तक व शब्दों ने जो अभिव्यक्ति दी, वह भी ऐसी अनूठी!
गोमुख के मार्ग पर हिम पर्वत से ऊपर गिर रही जलधारा, जो नीचे प्रकृति द्वारा निर्मित शिवलिंगों पर गिर रही थी, एवं इधर-उधर छिटक रही थी, को देखकर वे उसे प्रकृति का रुद्राभिषेक कहकर उस नयनाभिराम दृश्य को अपलक देखते ही रहते हैं। फिर लिखते हैं-”सौंदर्य आत्मा की प्यास है पर वह कृत्रिमता की कीचड़ में उपलब्ध होना कहाँ संभव है? इन, वन-पर्वतों के चित्र बनाकर लोग अपने घरों में टाँगते हैं और उसी से संतोष कर लेते हैं पर प्रकृति की गोदी में जो सौंदर्य का निर्झर बह रहा है उसकी ओर कोई आँख उठाकर भी नहीं देखता . . . जी करता है इस अनन्य सौंदर्य राशि में अपने आपको खो क्यों न दिया जाय?”
प्रकृति में सौंदर्य का दर्शन करने वाला एक कोतन हृदय वाला कवि भी ऐसा मार्मिक चित्रण नहीं कर सकता, जो इस महाकाल की अंशधर सत्ता ने यहाँ किया है।
मील का पत्थर एक सुनिश्चित दूरी बताता है कि कितनी पार कर ली व कितनी शेष है। क्या यह जड़ पाषाण भी प्रेरणा स्रोत बन सकता है? कल्पना करने वाले लेखनी के धनी मनीषी के लिए कुछ कठिन नहीं। वे लिखते हैं कि-”मील का पत्थर अपने आप में तुच्छ है पर एक निश्चित व नियत कर्तव्य को लेकर यथा स्थान जम गया है। हटने की सोचता तक नहीं। . . . जब यह जरा सा पत्थर का टुकड़ा मार्गदर्शन कर सकता है तो क्या सेवाभावी मनुष्य को इसलिए चुप बैठना चाहिए कि उसकी विद्या कम है, बुद्धि कम है, सामर्थ्य कम है, योग्यता कम है? . . . हममें से कितने ही ऐसे हैं जो जनसेवा कर सकते हैं पर उपयुक्त क्षेत्र में आत्मविश्वास संजोकर अड़ जाने की निष्ठा हो तभी तो हमारी उपयोगिता को सार्थक होने का अवसर मिले।”
सेवा साधना को ही सब कुछ मानने वाले पूज्य गुरुदेव ने प्रेरणापुँज के रूप में मील के पत्थर को भी एक मान्यता प्रदान कर अपनी कल्पना को ऐसा रूप दिया कि पढ़ने वालों को सहज ही लगने लगे कि क्या वास्तव में हम कहीं उपयोगी नहीं हो सकते?
आगे वे लिखते हैं कि-”बड़ी आशा के साथ लिए हुए जूतों काट खाया। जिन पैरों पर बहुत भरोसा था उनने भी दाँत दिखा दिए, पर वे पैसे की लाठी इतनी काम आई की कृतज्ञता से इसका गुणानुवाद गाते रहने को जी चाहता है। अपनों ने साथ नहीं दिया पर पराई लगने वाली लाठी ने वफादारी दिखाई। चेहरा यही सोचकर प्रसन्नता से खिल गया।”
कहाँ तक वर्णन किया जाय, लेखनी की इस अनूठी विधा का जिसके माध्यम से छोटे-छोटे जड़ माध्यमों से भी वे प्रेरणा प्रसंग निकाल लेते हैं, जीवन दर्शन पर उड़ती हुई एक दृष्टि डाल लेते हैं एवं उन सभी प्रसंगों पर प्रकाश डालने लगते हैं जिन्हें सामान्यतः हम सभी उपेक्षा में डाले रहते हैं। मनुष्य की जीवन जीने की शैली क्या होनी चाहिए, इसकी प्रेरणा “सुनसान के सहचर” पुस्तक के ये छोटे-छोटे प्रसंग देते हैं। प्रकृति का सौंदर्य, तत्वदर्शन की गहन मीमांसा, लोकव्यवहार, सही व विधेयात्मक चिन्तन, एकाकी चलते हुए भी कभी भयभीत न हो प्रकृति से अपना साहचर्य जोड़ते रहना, यही सब शिक्षण शब्दों के माध्यम से इस खूबी से इस मनीषी ने गूँथा है कि बार-बार कलम को चूमने का मन करता है।
लेखन की यह विधा स्वयं में निराली है व आने वालों वर्षों में अगणित लेखनी के विद्यार्थियों को, साहित्यकारों को प्रेरणा देती रहेगी कि कल्पना के लिए मूड बनाना जरूरी नहीं, कहीं से भी प्रेरणा लेते हुए लोकशिक्षण पर दृष्टि रखकर ऐसा कुछ लिखा जा सकता है जिसे पढ़कर मार्गदर्शन मिले, चिन्तन प्रक्रिया को नूतन प्राण मिले।
जो अपने लिए नहीं औरों के लिए जीते हैं वे जीवनमुक्त हैं।
जो शत्रु के प्रति भी मित्रता का व्यवहार करता है उसका कोई शत्रु नहीं रह पाता।
महात्मा गाँधी ने स्वतंत्रता आँदोलन के लिए आरम्भ किये गये अनेकानेक कार्यक्रमों के साथ एक प्रौढ़ शिक्षा का कार्यक्रम भी चलाया था। देशभर में उन दिनों स्थान-स्थान पर ये पाठशालाएं चल पड़ी थीं और कहीं स्थायित्व रहा कि नहीं, जानकारी नहीं किंतु पूज्य गुरुदेव ने न केवल उसे अपने घर से आरम्भ कर दिया, इस योजना को अपनी शतसूत्री युग निर्माण योजना में स्थान दिया तथा प्रज्ञा संस्थानों में बालसंस्कारशालायें व प्रौढ़ पाठशालाएँ चलवायीं। जब वे मात्र बाईस वर्ष के थे, अपने घर में अपनी माँ व उनकी उम्र की अन्य महिलाओं, जिनमें मुस्लिम भी थीं, को अक्षरज्ञान व हिंदी, उर्दू, संस्कृत की जानकारी देने लगे थे। उनके गाँव में यह चर्चा का विषय था कि पण्डित जी के घर स्कूल चलता है जिसमें श्रीराम मत्त जी बड़े-बूढ़ों को पढ़ाते हैं। हिंदू, मुस्लिम सद्भाव बनाये रख साक्षरता का समान भाव से शिक्षण उनकी विद्या विस्तार की भावी योजना का ही एक अंग था।
इतनी लम्बी जीवन यात्रा में पूज्य गुरुदेव की न जाने कितनों से मित्रता हुई व स्वाभाविक है कि अध्यात्म क्षेत्र में मिली लोकप्रियता व कीर्ति को देखते हुए कुछ विरोधी भी बने। जब चौक आर्य समाज मथुरा के प्रधान से त्यागपत्र देकर वे गायत्री तत्वज्ञान प्रतिपादन करते हुए मंदिर की स्थापना करने के लिए उद्यत हुए तो स्वाभाविक था कि आर्यसमाजी उनका विरोध करें। गुरुकुल काँगड़ी हरिद्वार के तत्कालीन कुलपति रामनाथ वेदालंकार उनसे मिलने आए व कहा कि -”आपने आर्य समाज को क्यों छोड़ दिया? सभी आपके मूर्तिपूजा पक्ष की आलोचना करते हैं।” गुरुदेव ने कहा कि-”आर्य समाज मेरे रोम-रोम में बसा है। मैंने तो सनातन धर्म एवं आर्य समाज का समन्वय कर स्वामी दयानन्द जी के काम को आगे ही बढ़ाया है। जबकि उधर आर्य समाज परस्पर विवादों, अंतः संघर्षों से घिरा हुआ है। हिंदू धर्म को आज समन्वित स्वरूप की आवश्यकता है। इस भूख को आप मुझे मिले जन-सहयोग को देखकर समझ सकते हैं।” वे निरुत्तर थे।
वस्तुतः एक ब्रह्मास्त्र उनके पास था-”उपेक्षा” लड़कर विवाद कर अपनी बात का प्रतिपादन करने की अपेक्षा जो आलोचना करता है, उसकी उपेक्षा करने पर वह स्वतः समाप्त हो जाता या पुनः उनका अपना बन जाता।
सर्वाधिक दुष्कर काम यदि कोई है तो स्वयंसेवक बनना। कारण कि इस साधना में अपने अहं को पूर्णतया गला डालना जो अनिवार्य है। इस अनिवार्यता को उन जैसे कोई विरले ही निभा पाते हैं। आगरा में काँग्रेसी कार्यकर्ताओं का बृहद् सम्मेलन था। स्वर्गीय बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ आए हुए थे। सम्मेलन में कार्यक्रम की समाप्ति पर श्री कृष्णदत्त पालीवाल जी ने ‘नवीन’ जी को सभी का परिचय देना शुरू किया। एक के बाद अनेक लोगों का परिचय देते हुए तरुण श्रीराम की बारी आयी। उनके सामने रुककर तनिक गौरवपूर्ण स्वर में पालीवाल जी ने कहा- यह है हमारे यहाँ के स्वयं सेवक श्रीराम मत्त। “बाकी सब” नवीन जी ने पूछा। “वे कार्यकर्ता है।” उनका जवाब था। स्वयंसेवक शब्द में छुपे पदार्थ और गरिमा को समय प्रौढ़ वय के नवीन जी तरुण श्रीराम के चरणों में झुक पड़े। उनके द्वारा किया गया यह सम्मान अहं विसर्जन करने वाले साधक का सम्मान था।
आहार-विहार का असंयम ही नहीं-चिन्तन का असंतुलन भी रुग्णता और अकाल मृत्यु का कारण बनता है।
गोमुख तक की यात्रा अब बड़ी सरल एवं सुगम हो गयी है। यात्रा के महीनों में हजारों व्यक्ति वहाँ तक होकर आते हैं। मात्र एक पहाड़ से निकलते उद्गम को देखने नहीं, पूज्य गुरुदेव ने अपनी हिमालय यात्रा जिस उद्देश्य से की थी, उसका अपनी लेखनी से ऐसा भाव भरा चित्रण अपनी निम्न लिखित इन पंक्तियों में किया है, जो सुनसान के सहचर, पुस्तक में उन दिनों छपी थीं, कि बार बार जाने व उस नयनाभिराम दृश्य का अवलोकन कर पुण्यतोया भागीरथी में कई डुबकियाँ लगाने की मन में हूक सी उठने लगती है।
“आज माता गंगा के मूल उद्गम को देखने की चिर अभिलाषा पूरी हुई। गंगोत्री तक पहुँचने में जितना कठिन मार्ग मिला था, उससे कहीं अधिक दुर्गम यह गंगोत्री से गोमुख तक का अठारह मील का टुकड़ा है। गंगोत्री तक के रास्ते में तो जब टूट-फूट होती है, तो सरकारी सड़क विभाग के कर्मचारी ठीक करते रहते हैं, पर उपेक्षित मार्ग को जिसमें बहुत कम लोग ही कभी-कभी जाते हैं कौन सुधारे। पर्वतीय मार्गों को हर साल बिगड़ना ही ठहरा। यदि एक दो वर्ष उनकी उपेक्षा रहे तो वे काफी जटिल हो जाते हैं। कई जगह तो रास्ते ऐसे टूट गये थे, कि वहाँ से गुजरना जीवन के साथ जुआ खेलने के समान था। एक पैर फिसलने की देर थी कि जीवन का अन्त ही समझना चाहिए।
जिस हिमस्तूप(ग्लेशियर) से गंगा की छोटी सी धारा निकलती है, वह नीले रंग की है। गंगा माता का यह उद्गम हिमाच्छादित गिरिश्रृंगों से बहुत ही शोभनीय प्रतीत होता है। धारा का दर्शन एक साधारण से झरने के रूप में होता है। वह है तो पतली सी ही, पर वेग बहुत है। कहते हैं कि यह धारा कैलाश से-शिवजी की जटाओं से आती है। कैलाश से गंगोत्री तक का सैकड़ों मील का रास्ता गंगा भीतर ही भीतर पार करती है और उसे करोड़ों टन ग्लेशियर का दबाव सहन करना पड़ता है। इसी से धारा इतनी तीव्र निकलती है। जो हो भावुक हृदय के लिए यह धारा ऐसी ही लगती है, मानों माता की छाती से दूध की धारा निकलती है, उसे पान करके इसी में निमग्न हो जाने की ऐसी ही हूक उठती है, जैसे गंगा-लहरी के रचयिता जगन्नाथ मिश्र के मन में उठी थी और स्वरचित गंगा-लहरी का एक-एक श्लोक का गान करते हुए एक-एक कदम उठाते गंगा और अन्तिम श्लोक गति हुए भावावेश में माता गंगा की गोद में ही विलीन हो गये। वे कहते हैं कि स्वामी रामतीर्थ भी ऐसे ही भावावेश में माता की गोद में कूद पड़े थे और जल-समाधि ले गये थे।
अपनी हूक मैंने पान और स्नान से ही शान्त की। रास्ते भर उमंगें और भावनाएँ भी गंगा जल की भाँति हिलोरें लेती रहीं। अनेक विचार आते और जाते रहे। इस समय एक महत्वपूर्ण विचार मन में आया, उसे लिपिबद्ध करने का लोभ संवरण न कर सका, इसलिए उसे लिख ही रहा हूँ।
सोचता हूँ कि यहाँ गोमुख में गंगा एक नन्हीं-सी पतली धारा मात्र है। रास्ते में हजारों झरने, नाले, नदी उससे मिलते गये हैं। उनमें से कई तो इस गंगा की मूल धारा से कइयों गुने अधिक बड़े हैं। उन सब के संयोग से ही गंगा इतनी बड़ी और चौड़ी हुई है, जितनी हरिद्वार, कानपुर प्रयाग आदि में दिखाई पड़ती है। उन में से बड़ी-बड़ी नहरें निकाली गई हैं। गोमुख के उद्गम का पानी तो उनमें से एक नहर कि लिए भी पर्याप्त नहीं हो सकता। यदि कोई नहर-नाले रास्ते में उसे न मिले तो संभवतः सौ-पचास मील की मिट्टी ही उसे सोख ले और आगे बढ़ने का अवसर ही न रहे। गंगा महान है- अवश्य ही महान है, क्योंकि वह नदी-नाले को अपने स्नेह बन्धन से बाँध सकने में समर्थ हुई। उसने अपनी उदारता का अंचल फैलाया और छोटे-छोटे झरनों-नालों का भी अपने बाहुपाश से आबद्ध करके छाती से चिपटाती चली गई। उसने गुण-दोषों की परवाह किये बिना सभी को अपने उदर-अंचल में स्थान दिया। जिसके अन्तर में आत्मीयता की स्नेह-सौजन्य की अगाध मात्रा भरी पड़ी है, उस जल राशि की कमी कैसे पड़ सकती है। दीपक जब स्वयं जलता है, तो पतंगे भी उस पर जलने को तैयार हो जाते हैं। गंगा जब परमार्थ के उद्देश्य से संसार में शीतलता फैलाने निकली है, तो क्यों न नदी-नाले भी उसकी आत्मा में अपनी आत्मा की आहुति देंगे? गाँधी, बुद्धि, ईसा की गंगाओं में कितनी आत्माएँ आज अपने को आत्मसात् करा चुकी हैं, यह सभी को स्पष्ट दृष्टिगोचर हो रहा है।
गंगा की सतह सबसे नीची है, इसलिए नदी-नालों का गिर सकना संभव हुआ। यदि उसने अपने को नीचा न बनाया होता, सबसे ऊपर उठ कर चलती, अपना स्तर ऊँचा रखती तो फिर नदी-नाले तुच्छ होते हुए भी उसके अहंकार को सहन न करते, उससे ईर्ष्या करते और अपना मुख दूसरी ओर मोड़ लेते। नदी-नालों की उदारता है सही-उनका त्याग प्रशंसनीय है सही, पर उन्हें उस उदारता और त्याग को चरितार्थ करने का अवसर गंगा ने अपने को नम्र बनाकर, नीचे स्तर पर रखकर ही दिया है। अन्य अनेकों महत्तायें गंगा कह हैं, पर यह एक महत्ता ही उसकी इतनी बड़ी है कि जितना भी अभिवादन किया जाय कम है।
नदी-नालों ने झरने-स्रोतों ने भी अपना अलग अस्तित्व कायम न रखने की, अपनी व्यक्तिगत महत्त्वाकांक्षाओं और कीर्ति स्थापित करने की लालसा को दमन करने की जो दूरदर्शिता की है, वह भी सर्वथा अभिनन्दनीय है। उन्होंने अपने को खोकर गंगा की क्षमता, महत्ता, और कीर्ति बढ़ाई। सामूहिकता का, एकत्रीकरण का, मिलजुल कर काम करने का महत्व समझा, इस के लिए उनकी जितनी प्रशंसा की जाय कम है। संगठन में ही शक्ति है, यह उन्होंने वाणी से नहीं, मन से नहीं प्रत्यक्ष क्रिया से कर दिखाया। कर्मवीरता इसे ही कहते हैं। आत्म त्याग के इस अनुपम आदर्श में जितनी महानता है, उतनी ही दूरदर्शिता भी है। यदि वे अपना अलग अस्तित्व बनाये रहने पर अड़े रहते, सोचते जो मेरी क्षमता है, उसका यश मुझे ही मिलना चाहिए और गंगा में मिलने से इन्कार कर देते, अवश्य ही उनका अपना अस्तित्व भी अलग रहता और नाम भी। पर वह होता इतना छोटा कि उसे उपेक्षणीय और नगण्य ही माना जाता उस दशा में उस जल को गंगा जल कोई नहीं कहता और उसका चरणामृत सिर पर चढ़ाने को कोई लालायित न रहता।
गोमुख पर आज जिस पुनीत जल धारा में माता गंगा का दर्शन मज्जन मैंने किया, वह तो उद्गम मात्र था। पुरी गंगा तो सहस्रों नदी-नालों के संगठन से सामूहिकता का कार्यक्रम लेकर चलने पर बनी है। गंगा सागर ने उसी का स्वागत किया है। सारी दुनिया उसी को पूजती है। गोमुख की तलाश में तो मुझ जैसे चन्द आदमी ही पहुँच पाते हैं।
गंगा और नदी-नालों के सम्मिश्रण का महान परिणाम यदि सर्वसाधारण की, नेता और अनुयायियों की समझ में आ जाये लोग सामूहिकता के, सामाजिकता के महत्व को हृदयंगम कर सकें, तो एक ऐसी ही पवित्र पापनाशिनी, लोकतारिणी संघशक्ति का प्रादुर्भाव हो सकता है, जैसा गंगा का हुआ है।
मुकुट बनकर इतराने वाले फूल की क्या प्रशंसा। सराहो उन शूलों का जो कली की लाज बचाने के लिए कमर कसे रहते हैं।
पूज्य गुरुदेव लेखन से पूर्व चिन्तन नियमित किया करते थे एवं सहयोगी कार्यकर्ताओं को बिठाकर उनके दिमाग की अच्छी कसरत करवा के उनसे संदर्भ ढूंढ़ने को कहते। इधर संदर्भों की तलाश होती, उधर इतनी चर्चा के बाद प्रातः उनकी लेखनी चल पड़ती। आश्चर्य यह होता था कि इन लेखों में बहुधा वही नाम, संदर्भ हुआ करते थे जो परिजन, शोधकार्य में सहयोगी उस समय पढ़ रहे या नोट्स ले रहे होते थे। संभवतः यह भी योग की एक सिद्धि है, जिसमें व्यक्ति विचारों को समष्टिगत प्रवाह बनाकर पढ़ लेता है व उसे युग प्रवाह का अंग बना देता है। ऐसा कई बार देखने में आया कि किसी नये विषय पर किसी कार्यकर्ता ने पुस्तक पढ़ी तो अगले दिन पूज्य गुरुदेव का लेख उसी विषय पर नकल हेतु पहुँच गया। प्रवाह वही है, शक्ति उन्हीं की है। लेखनी भले ही किसी या किन्हीं के हाथों में हो।
कोई कभी अकेले घनघोर वन में भटक जाए, साथ में कोई भी न हो व तरह-तरह की झींगुरों की आवाजें, पेड़ों को स्पर्श करती पवन की सीटी बजाती ध्वनि सुनाई देने लगे तो सामान्य मनुष्य सहज ही भयभीत हो सकता है। उस समय लगता है कोई तो मनुष्य साथ होता। निर्जन एकाकीपन काटने को दौड़ता है व तुरन्त भाग निकलने की इच्छा होने लगती है। किन्तु महामानवों की, प्रकृति से सामीप्य स्थापित कर महत्चेतना से एकाकार होने की प्रवृत्ति उन्हें सुनसान में भी सहचर ढूँढ़ कर ला देती है।
पूज्य गुरुदेव की लेखनी से जो विशाल साहित्य सृजा गया, उसमें “सुनसान के सहचर’ पुस्तक वस्तुतः एक मील का पत्थर हैँ। पिछले दो लेखों में उनके हिमालय यात्रा संबंधी अनुभव व गोमुख गंगा से प्रेरणा व लोकमानस का शिक्षण प्रसंग दिया गया है। जहाँ उनके उस पहलू को उजागर किया जा रहा है। जो उन्हें साहित्य जगत की बिखरी हिमाच्छादित चोटियों में सबसे ऊँची एवरेस्ट की चोटी पार बैठा देता हैं कल्पना की सृजनात्मक शक्ति कितनी प्रचण्ड हो सकती हैं व लेखनी से रचा ऐसा साहित्य कितना लालित्यपूर्ण हो सकता है, इसे परिजन इन प्रसंगों में देख सकते है।
पूज्य गुरुदेव एक वर्ष से अधिक समय तक गोमुख व नन्दनवन के बीच एक झोंपड़ी में रहे जो सुनसान संग्राम में एक माह काल कोठरी में भी रहना पड़ा था, पर यहाँ तो चौबीस घण्टे झोंपड़ी थी, जंगल का अंधकार था, घोर शीत था तथा एकाकीपन था। उसी एकाकीपन में वे सोचते हैं- “क्या वास्तव में सूनापन इतना भयभीत करने वाला है? विवेक ने मन की दौड़ को पहिचान कर कहा- यदि सूनापन ऐसा ही अनुपयुक्त होता तो ऋषि और मुनि, साधक और सिद्ध विचारक और वैज्ञानिक उसे क्यों खोजते? समाधि सुख और आत्मदर्शन के लिए उसकी तलाश क्यों होती’? आगे वे लिखते हैं कि “निष्ठा ने कहा-एकान्त साधना की आत्म प्रेरणा असत् नहीं हो सकती, जो शक्ति इस मार्ग पर खींच कर लाई है, वह गलत मार्गदर्शन नहीं कर सकती। भावना ने कहा-जीव अकेला आता है, अकेला जाता है। सूर्य अकेला चलता है, चन्द्रमा अकेला उदय होता है। इसमें उन्हें कुछ कष्ट है।
“विचारों को विचारों से काटा व अब मस्तिष्क एकान्त की उपयोगिता, आवश्यकता और महत्ता पर विचार करने लगा।”
उस समय के इस चिन्तन ने ही संभवतः इस ऋषि को आगे चक्कर सूक्ष्मीकरण साधना तथा उसके बाद के महाप्रयाण तक के वर्ष एकाकी बिताने की प्रेरणा एवं शक्ति दी होगी। सन् 1974 से 1990 तक वे एक ही कोठरी में रहे, उसी में तप में लीन रहे व वहीं से प्रचण्ड शक्ति में चक्रवात सारे विश्व में उत्पन्न कर सके। एकान्त सेवन को किस सीमा तक रचनात्मक बनाया जा सकता है व इसके लिए किस श्रेणी का चिन्तन होना चाहिए यह मार्गदर्शन पूज्य गुरुदेव लेखनी से ही नहीं, अपना जीवन जीकर सब को दे गए हैं।
प्रकृति प्रेमी पूज्य गुरुदेव रात्रि को अपनी झोपड़ी से बाहर आकर प्रकृति का लीला जगत देखने लगे व मानों जड़ समझी जाने वाली वस्तुओं से वार्तालाप ही करने लगे। वे लिखते है-”गंगा की लहरों में चन्द्रमा के अनेकों प्रतिबिम्ब चमक रहे थे। दृश्य बड़ा सुहावना था। कुटिया से निकल कर गंगा तट के एक बड़े शिलाखण्ड पर जा बैठा और निर्निमेष होकर उस सुन्दर दृश्य को देखने लगा......... लगा कि वह जलधारा कमल पुष्प सी सुन्दर एक देवकन्या के रूप में परिणत हो गयी है। वह बोली-हे नर तनधारी आत्मा! तू अपने को इस निर्जन वन में अकेला मत मान। दृष्टि पसार कर देख। चारों ओर तू ही बिखरा पड़ा है। मनुष्य तक अपने को सीमित मत मान। इस विशाल सृष्टि में मनुष्य का भी एक स्थान है, पर वही सब कुछ नहीं है। अन्य जड़ चेतन माने जाने वाले जीव भी विश्वात्मा के वैसे ही प्रिय पुत्र हैं जैसा मनुष्य। तू उन्हें अपना सहोदर, अपना सहचर क्यों नहीं मानता? पशु पक्षी, कीट पतंग, वृक्ष वनस्पति सभी में आत्मा है, भावना है। यदि तू इन अचेतन समझे जाने वाले चेतनों की आत्मा से अपनी आत्मा को मिला सके तो एक पथिक! तू अपनी खण्ड आत्मा को समग्र आत्मा के रूप में देख सकेगा। .... वह बोले जा रही थी... मनुष्य अभागे। अपने अनुदानों का उपभोग कहाँ कर सका? दृष्टि के अन्य जीवों में चेतना की मात्रा भले ही न्यून हो पर भावना को उनकी भावना के साथ मिलाकर तो देख। अकेलापन कहाँ है सभी ही तो तेरे सहचर है। सभी ही तो तेरे बन्धु बान्धव है?
कल्पना पटल पर उतरी वह देवकन्या एक ऋषि के माध्यम से क्या कुछ कह गयी, इसे भली भाँति समझा जा सकता है। “सिया राम मय सब जग जानी” तथा “हर प्राणी में रूप तुम्हारा, पंकज सा मुसकाता” की भावना हो तो भगवान प्रत्यक्ष प्रकृति के अंग अंग में दृष्टिगोचर होने लगता है, यह तत्वदर्शन की साधना सुनसान का सहचर अपनी झोंपड़ी से कुछ दूर गंगा की जलधारा के पास बैठकर कह रहा था। वे लिखते हैं-”अगणित चन्द्रबिम्ब मुझ से कहने लगे-तुम तो यहाँ साधना करने आए हो न। इस प्रियतम के प्रेम में तल्लीन गंगा की धारा को नहीं देखते! गंगा तट पर निवास करना है तो गंगा की प्रेम साधना भी सीखो”।
कितना कुछ सार नवनीत भरा पड़ा है ऊपर की इन पंक्तियों में। सूनेपन में भी प्रकृति का सौंदर्य योग साधना का दर्शन तत्वज्ञान सिखा रहा है।
उस झोंपड़ी में बैठकर पूज्य गुरुदेव ने झींगुर के मधुरगान को भी मानवी भाषा में ही समझा “उसने गाया-हम असीम क्यों न बनें? असीमता में मुक्ति का तत्व भरा है। स्वार्थ से बाहर निकल, जीव तू असीम हो आत्मा का विस्तार कर। सर्वत्र आनन्द ही आनन्द बिखरा पड़ा है, उसे अनुभव कर और अमर हो जा”।
आगे वे लिखते है-” इकतारे पर जैसे वीतराग ज्ञानियों की मण्डली मिलजुल कर कोई निर्वाण पद गा रही हो, वैसे ही सभी झींगुर मिलकर अपना गान निर्विघ्न गा रहे थे। स्वान्तःसुखाय उन का यह प्रयास चल रहा था। मैं भी उसी में विभोर हो गया।”........”अब निर्जन वन में कहीं एकाकीपन नहीं दिखाई देता। कुटिया से बाहर निकल कर देखा-विशाल वृक्ष पिता और पितामह जैसे व कषाय वल्कलधारी भोजपत्र ऐसे लग रहे थे मानों गेरुआ वस्त्र पहने कोई तपस्वी महात्मा खड़ा हो”.......”नवयौवन का भार जिससे संभालने में न आ रहा हो, ऐसी इतराती हुई पर्वतीय नदी बगल में ही बह रही थी। उसकी चंचलता और उच्छृंखलता, दर्प देखते ही बनता था।....वयोवृद्ध राज पुरुषों और लोक नायकों की तरह पर्वत शिखर दूर दूर तक ऐसे बैठे थे। मानों किसी गंभीर समस्या को सुलझाने में दत्तचित्त होकर संलग्न हों।”
पूज्य गुरुदेव ने नन्दनवन पठार पर प्रातःकाल की स्वर्णिम धूप में एक पीले फूल से भी चर्चा की व यह शिक्षण लिया कि जीवन कैसे जिया जाता है। रात्रि होने पर उनने शिला की आत्मा से बातचीत की जिस पर आकर वे साधना हेतु बैठे थे वह बोली-”साधक! क्या तुझे आत्मा में रस नहीं आता जो सिद्धि व मुक्ति की बात सोचता है। भगवान के दर्शन से क्या भक्ति भावना में कम रस है? मिलन से क्या विरह कम गुदगुदा है। मैं। तिल तिल अपने को घिस रही हूँ। इस प्रकार प्रेमी के प्रति आत्मदान का आनन्द अधिक से अधिक देने का रस ले रही हूँ। तभी तिल तिल पर अपने इष्ट के लिए घिसना सीखा।”
उपरोक्त वार्तालाप कल्पना के क्षितिज पर पूज्य गुरुदेव के सूक्ष्म एवं विराट रूप को पुनः हमारे समक्ष प्रत्यक्ष प्रकट करके दिखाता है व यह सिखावन देता है कि पूज्यवर की लेखनी से निकली प्राणचेतना और सूक्ष्म व विराट घनीभूत हो निखिल विश्व में संव्याप्त है। हम उससे एकाकार होने की दिशा में एक कदम तो बढ़ा कर देखें।
घमंडी के लिए कहीं कोई ईश्वर नहीं। ईर्ष्यालु का कोई पड़ोसी नहीं और क्रोधी का कोई मित्र नहीं।
अच्छी से अच्छी उम्मीदें करो, किन्तु बुरी से बुरी परिस्थितियों के लिए तैयार रहो।
“केवल नारी नहीं, सुनो हम साथी हैं, भगिनी माँ है नहीं वासना का साधना है, हम ममता है, गरिमा हैं। आँचल में जीवनधारा है, कर में आतुर राखी है। मस्तक पर सिन्दूर बिन्दू, अनुराग त्याग की सीमा है। गृहिणी, सहधर्मचारिणी, कुल दीपक की बाती हैं।
प्रस्तुत कविता की पंक्तियाँ ली गयी हैं अखण्ड-ज्योति अप्रैल 1963 के अंक से व यह बताती है कि सूत्र संचालक ने कितनी अंतः पीड़ा के साथ इन्हें अपनी पत्रिका में प्रकाशित किया होगा। वस्तुतः “नारी जागरण अभियान” स्वयं में एक ऐसा आंदोलन है जिसका शुभारंभ कर, गति देकर लाखों आंदोलन है जिसका शुभारंभ कर, गति देकर लाखों महिलाओं में प्रगति की उमंग भर देने का जो पुरुषार्थ सूत्र संचालक पूज्य युगनिर्माताओं की श्रेणी में बिठा देता है। आधी जनशक्ति के दमन, शोषण, उत्पीड़न पर वस्तुतः पिछले दो हजार वर्षों में कहा तो बहुत गया पर उसे जनांदोलन का रूप छुट-पुट स्तर पर ही दिया गया। सड़े-गले मूढ़ मान्यताओं से भरे इस समाज को जब तक जमकर झकझोर नहीं जाता, तब तक बदलने की बात तो दूर उनमें गतिशील भी नहीं आती।
पूज्य गुरुदेव ने “अखण्ड-ज्योति के शुभारंभ के साथ ही अपनी लेखनी यदि “मैं क्या हूँ” जैसे जटिल, आत्मोपनिषद् प्रधान विषय पर चलाई थी तथा परलोक लीला एवं सम्मोहन विद्या के झुनझुने कौतुकी लोगों के लिए बजाए थे तो दाम्पत्य जीवन की निर्मलता एवं गृहस्थ को तपोवन समान बना कर जीना चाहिए। इन विषयों पर विशद विवेचन भी किया था। उद्देश्य एक ही था-पुरुष अपने घर में बैठी अपनी पत्नी को यथोचित सम्मान देना सीखें, नारी शक्ति की महत्ता को पहचानें व उन्हें भी आगे बढ़ने के उपयुक्त अवसर प्रदान करने के लिए मात्र बच्चे जनने की मशीन न बनकर उन्हें बराबर का साझीदार बनाएँ। यह संयोग नहीं है कि उन्हीं दिनों शरतचन्द्र जगत में इन्हीं विषयों पर लिखी जा रही थीं। रवीन्द्रनाथ टैगोर की नारी की व्यथा-वेदना पर मार्मिक कथाएँ उन दिनों खूब पढ़ी जा रही थीं। मिशन के सूत्र संचालक पूज्यवर ने शुरुआत कुदृष्टि के शोधन से की। यदि नर अपने कामुक चिन्तन को बदल लेता है तो नारी पर अनावश्यक दबाव, शोषण स्वतः ही बन्द हो जाता है। सुखी गृहस्थ कैसे बना जाय, इसके लिए भी उनने दाम्पत्य जीवन की पवित्रता पर जोर दिया।
क्रमशः गायत्री व यज्ञ का प्रतिपादन करते-करते उनने नारी पाठकों को याद दिलाया कि वे अपनी गरिमा को पहचानें। जून सन् 1959 की अखण्ड-ज्योति में वे लिखते हैं कि वैदिककाल में ऋषिकाएँ ही समाज की विभिन्न गतिविधियों का संचालन करती थीं। सभी ब्रह्मवादिनी थी। तथा कइयों ने मंत्रों की रचना तक की है। वेदाध्ययन, ब्रह्मोपासना, यज्ञ, शिक्षण आदि।
गृहस्थ संचालन के अतिरिक्त उनके द्वारा सम्पादित कार्य थे। बृहदारण्यक का उदाहरण देते हुए उनने लिखा कि-”जिस प्रकार पुरुष ब्रह्मचारी रह कर तप, स्वाध्याय, योग आदि द्वारा ब्रह्म को प्राप्त करते हैं वैसे ही स्त्रियाँ ब्रह्मचारिणी रह कर आत्मनिर्माण एवं परमार्थ का संपादन करती हैं।” अथर्ववेद का उल्लेख हैं कि “ब्रह्मचर्येण कन्या युवानं विन्दते पतिम” (अथर्व 11/6/18) अर्थात् कन्या ब्रह्मचर्य का अनुष्ठान करती हुई उसके द्वारा उपयुक्त पति को प्राप्त करती है।
संभवतः पूज्य गुरुदेव पहले ऐसे धर्म-क्षेत्र में प्रवक्ता रहे हैं जिनने आध्यात्मिक पुरुषार्थों से लेकर भौतिक जगत के, समाज क्षेत्र के विभिन्न कार्यों में पुरुष व स्त्री दोनों को समान अवसर दिये जाने की वकालत उस जमाने में की, जबकि ऐसा समाजशास्त्री भी खुलकर नहीं कह पा रहे थे। गायत्री तपोभूमि की स्थापना के बाद जब वहाँ 108 एवं 1008 कुण्डी गायत्री महायज्ञ सम्पन्न हुए तो वंदनीया माताजी एवं पूज्य गुरुदेव दोनों की उनके संचालन, व्यवस्था में समान जिम्मेदारी थी। सभी आमंत्रित एवं यज्ञ में भाग लेने की पूरी स्वतंत्रता दी गयी एवं वहीं से उस अभियान की शुरुआत हुई जिसे उनने नारी जाग्रति या महिला जागरण अभियान नाम दिया। मार्च 1958 में गुरुदेव अपनी पत्रिका में लिखते हैं कि “नारी जाति के बौद्धिक व भावनात्मक उत्कर्ष की भारी महत्व को समझते हुए यह विचार उठता है कि हमारी धर्मपत्नी की शक्ति, योग्यता व भावना का उपयोग क्यों न इस कार्य में किया जाय।” उन दिनों वंदनीया माताजी की इच्छा कन्याओं के लिए गुरुदेव व माताजी दोनों कई कन्या गुरुकुलों का निरीक्षण करके आए थे। संभवतः उन दिनों परिजनों की कन्या को घर से बाहर भेजने की हिचक को देखते हुए वे इस चिन्तन को कार्य का स्वरूप नहीं दे पायी पर बाद में शाँतिकुँज आने पर सुनियोजित ढंग से इस कार्य को चला सकीं।
महायज्ञ के बाद अगले वर्ष ही 1959 की गायत्री जयंती पर उनने पहली महती जिम्मेदारी वंदनीय माताजी के कंधों पर डाली। वह भी अखण्ड-ज्योति के संपादन की। 2 वर्ष तक अपनी हिमालय यात्रा एवं आर्ष ग्रन्थों के भाष्य हेतु बाहर रहने के कारण वे परोक्ष मार्गदर्शन वंदनीया माताजी का करते रहे किन्तु सारा प्रत्यक्ष दायित्व वंदनीया माताजी ने बड़ी कुशलतापूर्वक सँभाला। यहीं से उन्हें दस वर्ष बाद सौंपे जाने वाले अति महत्वपूर्ण कार्य की नींव पड़ चुकी थी।
अपनी विदाई से एक वर्ष पूर्व उनने “आध्यात्मिक धारावाहिक चलाने वाली एक लेखमाला प्रकाशित की। इसमें मूल प्रतिपादन यह था कि “प्रजनन प्रक्रिया के मूल में छिपी पवित्रता को पहचाना जाना चाहिए। नर और नारी दोनों मिलकर एक व्यवस्थित शक्ति का रूप धारण करते हैं। जब तक यह मिलन न हो, चेतना व गति उत्पन्न ही न होगी। काम बीज का दुरुपयोग न कर उसका परिष्कार किया जाना चाहिए। नर-नारी का निर्मल सामीप्य ही आध्यात्मिक काम विज्ञान है।” यह एक क्राँतिकारी प्रतिपादन था जिसके माध्यम से नर की शक्ति का स्रोत नारी को बताया गया था व मर्यादित यौन संबंधों का निर्वाह करते हुए किस प्रकार दोनों प्रगति पथ पर बढ़ सकते हैं, इसका मार्गदर्शन किया गया था।
वंदनीया माता जी को मातृत्व की उदात्त गरिमा से भरा-पूरा बताते हुए मई 1971 की अखण्ड-ज्योति में उनने लिखा कि “जून के बाद माताजी शाँतिकुँज हरिद्वार रहेंगी। अखण्ड घृतदीप उनके साथ चला जायेगा। वे भी 24 लक्ष के 24 महापुरश्चरण संपन्न करेंगी।” गुरुदेव 30 जून 1971 को हिमालय चले गए एवं सारा कार्य भार वंदनीया माता जी ने सँभाला। यह पूज्य गुरुदेव के स्थूल से सूक्ष्म की ओर जाने का प्रथम चरण था। उनने प्रत्यक्ष से अपना स्वरूप काफी पीछे कर वंदनीया माता जी के माध्यम से मिशन का मार्गदर्शन-संचालन आरम्भ कर दिया था। एक वर्ष की अवधि जब तक गुरुदेव अपनी मार्गदर्शक सत्ता के पास रहे माता जी के पास बारह कन्याएं आ गई जो 12-13 वर्ष की सुसंस्कारी विभूतियाँ थी। इनने अखण्ड दीप के पास अखण्ड महापुरश्चरण वंदनीया माताजी के मार्गदर्शन में आरंभ कर दिया जो चार वर्ष में समाप्त हो गया। इन्हीं कन्याओं की संख्या बढ़ी व इनको प्रशिक्षिका बनाकर शांतिकुंज के नारी जागरण सत्र चलाये गये तो 3-3 माह के थे।
इन नारी जागरण सत्रों की विशेषता यह थी कि इनमें गुरुकुल स्तर की शिक्षा कि साथ-साथ परिवार निर्माण व लोकसेवी बनने का समग्र शिक्षण दिया जाता था। आठवें दर्जे से अधिक पढ़ी वयस्क कन्याओं व महिलाओं को प्रवेश दिया गया। स्वास्थ्य-संरक्षण, शिशु पालन, घर की स्वच्छता, परिवार, कुरीतियों से संघर्ष, सामान्य संगीत शिक्षा, लाठी व्यायाम, स्काउटिंग, संस्कार कर्मकाण्ड तथा स्वावलम्बन की शिक्षा इनमें दी जाती थी। युग नेतृत्व तथा समूह संचालन भी उन्हें यहाँ सिखाया गया। प्रवेश संख्या बढ़ती गई, शाँतिकुँज का भी विस्तार होता गया एवं जुलाई 1975 में “महिला जाग्रति अभियान” नाम से एक स्वतंत्र पत्रिका प्रकाशित होना आरंभ हो गई। इस पत्रिका में ऊपर बताये गये विषयों का विवेचन व मार्गदर्शन समाहित था। आरंभिक वर्ष से ही इसकी पाठक संख्या बीस हजार पहुँच गई जो बताती है कि ऐसे साहित्य की कितनी आवश्यकता उस समय थी। इस पत्रिका में चुनौती थी-
जब तक नारी के नयनों से बहता है जल खारा।
तब तक नवयुग का न पूर्ण होगा मृदुस्वप्न तुम्हारा॥
पूरी पत्रिका सारे परिकर को संबोधित थी व इसके लेखों ने न केवल परिवार के मुखिया को, बच्चों को व अन्यान्य सदस्यों को भी जीवन जीने की नयी दिशा दी पाँच वर्ष बाद इस पत्रिका को युग निर्माण पत्रिका से समन्वित कर इन विषयों का विवेचन इसमें किया जाने लगा।
सबसे महत्वपूर्ण व चौका देने वाली घोषणा पूज्यवर ने अक्टूबर 75 में की, जब उनने देवकन्याओं के जत्थे क्षेत्रों में नारी सम्मेलन हेतु भेजे जाने का निर्णय व नवंबर में उन्हें रवाना कर दिया गया। वंदनीया माता जी के संरक्षण में प्रारंभ में पलीं व पूज्य गुरुदेव द्वारा प्रशिक्षित इन तपस्विनी देवताओं के जहाँ-जहाँ ओजपूर्ण व्याख्यान हुए एक नया क्राँति का तूफान आया। सभी ओर महिला नेतृत्व की, युगपरिवर्तन की दुदुंभी बजती चली गई। यह दृश्य देखने योग्य था कि जिस सभा को बड़-बड़ वक्ता नहीं सँभाल पाते उसे गेरुआ वस्त्रों इन देवकन्याओं ने न केवल बाँध रखा बल्कि उनके चिन्तन को भली-भाँति झकझोरा। यह क्रम नवम्बर 1975 से 1979 तक निर्बाध गति से चलता रहा, फिर शक्तिपीठों के निर्माण की घोषणा कर गुरुदेव ने क्षेत्रीय कार्यक्रमों को नई दिशा प्रदान की। देवकन्याओं के प्रशिक्षण के साथ त्रैमासिक महिला शिक्षण शांतिकुंज में सतत् चलता रहा व उसका परिवर्धित स्वरूप अब युगशिल्पी शिक्षण के रूप में चलता है जिसमें स्वावलम्बन, संगीत, कर्मकाण्ड एवं संभाषण कला का बहुमुखी शिक्षण दिया जाता है।
इन्हीं प्रशिक्षण कन्याओं-महिलाओं ने क्षेत्र का नेतृत्व सँभाला एवं लगभग पच्चीस हजार महिला संगठन पूरे देश में गठित किए। यह कहना अतिश्योक्ति न होगी कि क्षेत्र की सक्रियता, कार्य कर्ताओं की तत्परता, स्फूर्ति के मूल में इन महिलाओं का ही सबसे बड़ा हाथ है।
पूज्य गुरुदेव संभवतः पहले युगपुरुष हैं जिनने “इक्कीसवीं सदी-नारी सदी” की घोषणा की है। उनकी घोषणा है अब नारी का वर्चस्व प्रमुख होगा तथा वही नवसृजन के निमित्त प्रमुख भूमिका निभाएंगी। उनके महाप्रयाण के निमित्त प्रमुख भूमिका निभायेंगी। उनके महाप्रयाण के बाद माँ शारदामणि की तरह वंदनीया माताजी द्वारा संगठन का समग्र सूत्र संचालन कुशलतापूर्वक संभाल लिए जाने से यह भविष्यवाणी साकार होती दीखती है। नारी जाग्रति के लिए इस महामनीषी द्वारा संपन्न पुरुषार्थ युगों-युगों तक याद किया जाता रहेगा।
कायर पग-पग पर आत्म प्रताड़ना की मार से मरते है जबकि साहसी को केवल एक बार ही मरना पड़ता है।
सतयुग आयेगा, पृथ्वी का भार हलका होगा
मिष्ठान्न का नामोच्चारण करने भर से न मुँह मीठा होता है और न पेट भरता है। ईश्वर की रट लगाने और धर्म की दुहाई देने से भी हाथ कुछ नहीं आता।
प्रत्येक युग में दूसरा युग वर्तता है, यह प्रकृति का नियम है। सतयुग में भी कलियुग का प्रभाव था, इसी प्रकार अब कलियुग में भी सतयुग का प्रभाव परिलक्षित होने लगा है। सृष्टि की वर्तमान व्यवस्था ऐसी हो गई है कि यदि अब सतयुग न आवे तो यह सृष्टि अधिक समय तक स्थिर ही नहीं रह सकती है। यह नष्ट हो सकती है। ऐसा भगवान को दृष्ट नहीं है। इसीलिए इस कालचक्र को कायम रखने के लिए भगवान को बीच में सतयुग रूपी टेका (आधार) लगाकर इसे स्थिर रखना आवश्यक है।
-एक भारतीय योगी
(अखण्ड-ज्योति, जुलाई 1959 पृष्ठ 25)
इस विश्व-वाटिका में एक से एक बढ़ कर सुगंधित और सुन्दर फूल खिलते रहते है। काँटे तो यहाँ मात्र अपने भ्रम जंजालों और दुष्कर्मों के ही है।
हीरे की परख जौहरी ही कर सकता है। इसी तरह ऋषि की परख वहीं करे जो स्वयं ऋषि हो। इस कथन की सार्थकता विनोबा जी के ग्वालियर मुरार कार्यक्रम के अवसर पर अनुभव हुई। उनके निवास स्थान पर ग्वालियर के एक कार्यकर्ता पू. गुरुदेव के वेद भाष्य लेकर भेंट करने गए। यह वेद भाष्य का प्रथम प्रकाशन था। शाम के यही कोई चार बज रहे होंगे। विनोबा जी ठहरे ठेठ सत्यवादी वेदों को उलटते पलटते हुए बोले “अभी मैं तुम्हारी इस भेंट के बारे में कुछ नहीं कह सकता हूँ। कल सुबह आना।
दूसरे दिन प्रातः पहुँचने पर वह वेद वापस करने लगे। लेते हुए कार्यकर्ता थोड़ा मलीन मन था, कुछ आश्चर्यचकित भी। उसके आश्चर्य को तोड़ते हुए बोले-”मेरे शाम के कार्यक्रम में आना वही पर मैं यह भेंट स्वीकार करूंगा। ऐसी अमूल्य भेंट व्यक्तिगत नहीं सार्वजनिक स्तर पर स्वीकारी जानी चाहिए। कार्यकर्ता शाम के कार्यक्रम में पहुँचा-वेदों के महान पण्डित विनोबा जी ने उसे मंच पर बुलाया। वेद भगवान को प्रणाम करते हुए उन्होंने घोषणा की कल रात मैंने इस वेद भाष्य को भली-भाँति देखा है। ऐसा सुन्दर भाष्य कोई वैदिक ऋषि ही कर सकता है अन्य में भला ऐसी सामर्थ्य कहाँ? विनोबा जी पूरी भरी सभा में काफी देर तक वेद भाष्य की प्रशंसा में बोलते रहे। कार्यकर्ता एक ऋषि से दूसरे ऋषि के स्वरूप को सुनकर मुग्ध हो रहा था।
पूज्य गुरुदेव के जीवन के अस्सी वर्ष का हर दिन, हर पल एक महत्वपूर्ण निर्धारण से जुड़ा हुआ है। जिनने उन्हें समीप से देखा व उनकी रीति-नीति का अध्ययन किया है, वे भली-भाँति जानते हैं कि वे अपने लिए एक सुनियोजित रूप रेखा निर्धारित करके आए। प्रत्येक वसंत पर्व उनका आध्यात्मिक जन्मदिन रहा है व वर्ष भर के महत्वपूर्ण निर्णय उसी दिन लिए जाते रहे हैं। ज्ञान पर्व के रूप में गायत्री जयंती एवं संकल्प-कर्म अनुशासन पर्व के रूप में गुरुपूर्णिमा पर्व मनाये जाते है। हर दस वर्ष के अन्तराल से वे न्यूनाधिक समय के लिए 1941, 1951, 1960-61 व 1971 में हिमालय अज्ञातवास के लिए गये व अपने मार्गदर्शक का महत्वपूर्ण दिशा निर्देशन लेकर लौटे।
सन् 1961 के अज्ञातवास से लौटने के बाद उनका सुनिश्चित निर्धारण था कि दस वर्ष बाद वे वर्तमान कार्यस्थली मथुरा को छोड़कर हिमालय चले जायेंगे। बाद का निर्धारण उनके गुरुदेव करेंगे। एक लेख सन् 1962 की अखण्ड-ज्योति में प्रकाशित हुआ था-”हमारे भावी सवा नौ वर्षों का कार्यक्रम।”उनने तब तक घोषणा नहीं की थी कि अपने आयुष्य का 60 वर्ष पूरा होते ही वे मथुरा से प्रयाण कर हमेशा के लिए हिमालय की गोद में जा बैठेंगे किंतु अपनी सीमा रेखा का तभी निर्धारण कर लिया था। एक पत्र जो उनने उन दिनों एक परिजन को लिखा था, विशेष रूप से ध्यान देने योग्य है। उस पत्र को यहाँ यथा रूप प्रकाशित किया जा रहा हैं
ड़ड़ड़ड़
हमारे आत्मस्वरूप, 29-9-62 पत्र मिला। फार्म भी। युग निर्माण संबंधी आवश्यक परिपत्र अगले सप्ताह भेजेंगे।
आपका मारकेश हमारे यहाँ रहते सफल नहीं होगा। हम अभी 8॥। वर्ष इधर हैं। तब तक आप पूर्ण निश्चिंत रहें।
नवरात्रि में आपका साधनाक्रम चल रहा होगा। सब स्वजनों को हमारा आशीर्वाद और माताजी का स्नेह कहें।
श्रीराम शर्मा आचार्य
इस पत्र से यह स्पष्ट है कि अपने परिजन का संरक्षण उनने जून 1971 तक अपने मथुरा रहने तक करने का आश्वासन दिया था। वह पूरा भी किया। पर सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अपनी प्रत्यक्ष से परोक्ष में जाने की स्पष्ट घोषणा लिखित में उनने लगभग नौ वर्ष पहले ही कर दी। यह एक द्रष्टा, जो भविष्य के गर्भ में झाँक सकता है, का ही कार्य हो सकता है।
विदाई के पहले अपनी अन्तर्व्यथा को उनने किसी से नहीं छिपाया। जनवरी 69 से चालू हुई उनकी
लेखनी जून 1971 तक बराबर परिजनों को रुलाती रही, उद्वेलित करती रही। चार-चार दिन के मिलन सत्र जून 70 से जून 71 तक सतत् चलाये गये। इसमें गुरुदेव को अपनी मन की बात कहने का मौका मिला। 2000 व्यक्ति प्रति सत्र इस प्रकार एक वर्ष तक आये, इस प्रकार लगभग दो लाख व्यक्ति उनसे वर्ष का काम निपटाना है।” शीर्षक से “अपनों से अपनी बात” स्तंभ के अंतर्गत उनने लिखा कि उन्हें अगले दिनों क्या-क्या कार्य प्रत्यक्ष रूप से करने हैं, परिजनों को क्या जिम्मेदारियाँ सँभालनी हैं तथा वे अपनी आगामी उग्र तपश्चर्या क्यों करने जा रहे हैं।
अप्रैल 1971 में संपादकीय स्तंभ में वे लिखते हैं-”पीछे जो किया जा चुका, हमें उससे हजार लाख गुना काम अभी और करना है। उच्च आत्माओं को मोहनिद्रा से जगाकर ईश्वरीय इच्छा की पूर्ति के लिए लोकमंगल के क्रिया-कलापों में नियोजित करना है”......”विदाई का वियोग हमारी भावुक दुर्बलता हो सकती है या स्नेहसिक्त अंतःकरण की स्वाभाविक प्रक्रिया। जो भी हो हम उसे इन दिनों लुप्त करने का यथासंभव प्रयास कर रहे हैं। मन की मचलन का समाधान कर रहे हैं। गत एक वर्ष से देशव्यापी दौरे करके परिजनों से भेंट करने की अपनी आन्तरिक इच्छा को एक हद तक पूरा किया है। अब विदाई सम्मेलन बुलाकर एक बार अन्तिम बार जी भर कर अपने परिवार को फिर देखेंगे।”
उपरोक्त पंक्तियाँ संभवतः परिजनों को भावी संभावनाएँ बताने व उनकी अंतिम परीक्षा लेने के लिए लिखी गयी थीं विदाई सम्मेलन 16 जून 1971 से 20 जून 1971 तक गायत्री तपोभूमि मथुरा में संपन्न हुआ। सहस्रकुंडीय महायज्ञ से भी बड़ा यह समागम था व लाखों व्यक्तियों ने अश्रुपूरित नेत्रों से उन्हें विदाई दी। वे तथा वंदनीया माताजी एवं उनका अखण्ड दीपक शाँतिकुँज आ गए, जो अभी बनकर मात्र रहने योग्य स्थिति में ही था। नौ दिन तक वे घनिष्ठ कार्यकर्ताओं एवं वंदनीया माताजी को महत्वपूर्ण निर्देश देते रहे एवं दसवें दिन रात्रि 2 बजे उठकर बिना किसी को बताए अपने गन्तव्य पर चले गये।
“अखण्ड-ज्योति” निरन्तर जलती रही व पूज्य गुरुदेव की चिन्तन चेतना सभी पाठकों का दैनन्दिन जीवन में मार्गदर्शन करती रही। जनवरी 1972 में बंगला देश के मुक्ति युद्ध के समापन के बाद अल्प अवधि के लिए पूज्य गुरुदेव शाँतिकुँज अचानक आए एवं माताजी को प्रत्यक्ष मार्गदर्शन देकर फिर चले गए। जून 1972 में अपनी गुरु सत्ता के मार्गदर्शन पर सप्तऋषियों की तपस्थली में रह कर ऋषि परम्परा का बीजारोपण कर देवमानवों को विनिर्मित करने हेतु अपना प्रचण्ड तपोबल संचित कर वापस लौट आए। अपनी आत्मकथा में अपनी ही लेखनी से उनने इस एक वर्ष की अवधि में गुरु सत्ता द्वारा क्या निर्देश दिए गए, इनका खुलासा स्वयं किया है।
तीर्थ के रूप में विकसित करना होगा, और उन प्रवृत्तियों का आरंभ करना होगा, जिन्हें पूर्व काल में ऋषि करते रहे हैं। वह परम्पराएँ लुप्त प्रायः हो जाने से उन्हें अब पुनर्जीवन प्रदान करने की आवश्यकता होगी। संक्षेप में यही था सार-संदेश।”
मूल कार्य यह था कि शाँतिकुँज, जो ब्रह्मर्षि विश्वामित्र की तपस्थली रही है, में ऋषियों द्वारा संचालित समस्त गतिविधियों को चलाया जाय। इसके लिए उनने महत्वपूर्ण परामर्श व प्राण-प्रत्यावर्तन सत्र सबसे पहले आयोजित किए। वस्तुतः गुरुदेव अपने तप की एक प्रखर चिनगारी सुसंस्कारी आत्माओं को देकर उन्हें ज्योतिर्मय बनाना चाहते थे ताकि नवसृजन के लिए एक महत्वपूर्ण जिम्मेदारी वे निभा सके। ग्रहण करने की जिनमें पात्रता हो, ऐसे ही व्यक्तियों को स्वीकृति दी गयी। स्थान सिद्धपीठ था ही, उर्वर अंतःकरण में प्राण अनुदान का खाद-पानी देकर उस बीज को अंकुरित, पल्लवित करना था जो असंख्यों परिजनों में से कुछ सौ में विद्यमान पाया गया। यह एक महज संयोग नहीं है कि इन दिनों जो कार्यकर्ताओं की एक सशक्त टीम पूज्य गुरुदेव के बाद गुरुतर दायित्वों को सँभाल रही है एवं वंदनीया माताजी के मार्गदर्शन में उन सब निर्धारणों को क्रिया रूप दे रही है जो पूज्य गुरुदेव अदृश्य जगत से सौंप रहे हैं, वह प्राण-प्रत्यावर्तन सत्रों की अग्नि परीक्षा से गुजर चुकी है। अगस्त 1972 की अखण्ड-ज्योति में उनने लिखा है कि “प्रत्यावर्तन तप की पूँजी का वितरण है। जिन भाग्यवानों को इसका थोड़ा सा भी अंश मिल सका, वे निश्चित रूप से उसके लिए अपने भाग्य की सराहना जन्म-जन्मान्तरों तक करते रहेंगे।
पूज्य गुरुदेव की लिपि में अंश ड़ड़ड़ड़
अनुवाद “क्या करना होगा? इसके उत्तर में इतना ही कहा गया कि हरिद्वार आश्रम को गायत्री
प्रत्यावर्तन सत्र फरवरी 1973 से आरंभ किये गये एवं फरवरी 1974 तक चले। ये विशुद्धतः साधना सत्र थे। विभिन्न मुद्राओं, त्राटक योग, सोऽहम्, नादयोग, आत्मब्रह्म की दर्पण साधना तथा तत्व बोध की साधना इनमें कराई गई पंद्रह मिनट पूज्य गुरुदेव एकान्त में परामर्श भी देते थे। सीमित संख्या में प्राणवान साधकों को यह अनुदान दिया गया। ऐसे प्रखर साधना सत्र फिर आगे कभी नहीं हुए। इस बीच तीन-तीन माह के वानप्रस्थ सत्र, भी चले, अध्यापकों के तीन लेखन सत्र भी मई-जून 1974 में संपन्न हुए तथा साथ-साथ रामायण सत्र एवं महिला जागरण सत्र भी चलते रहे। प्राण प्रत्यावर्तन सत्र को फरवरी 74 से बन्द कर नौ दिवसीय जीवन साधना सत्र में बदल दिया गया। यही साधनाक्रम फिर आगे कल्प साधना तथा चान्द्रायण सत्रों आदि के रूप में चलता रहा।
स्थान कम पड़ने से गायत्रीनगर की नई जमीन खरीदी गई एवं उसमें देवमानवों को बसने के लिए आमंत्रित किया गया। नगर का निर्माण एवं जड़ी-बूटी उद्यान लगाना प्रारंभ उद्यान लगाना प्रारंभ कर दिया गया। 1976 से 1980 तक का समय ब्रह्मवर्चस् की स्थापना होने का समय है। सभी ऋषियों की गतिविधियों के अनुरूप यहाँ उनसे संबंधित गतिविधियाँ भी प्रारंभ कर दी गयीं। भगीरथ परम्परा में ज्ञानगंगा का विस्तार चरक परम्परा में दुर्लभ वनौषधियों का आरोपण व उन पर प्रयोग परीक्षण, व्यास परम्परा में युग साहित्य के साथ-साथ चार खण्डों में प्रज्ञापुराण का सृजन, नारद परम्परा में संगीत के माध्यम से जन-जन की भावनाओं को तरंगित करने का शिक्षण समर्थ गुरु रामदास व आद्य शंकराचार्य परम्परा में पाँच केन्द्रीय संस्थानों के अतिरिक्त चौबीस सौ प्रज्ञा संस्थानों की स्थापना, पतंजलि परम्परा में प्राण-प्रत्यावर्तन एवं प्रज्ञायोग की साधना द्वार योगदर्शन को व्यावहारिक रूप प्रदान करना, विश्वामित्र परम्परा में सिद्धपीठ की स्थापना कर संजीवनी विद्या का शिक्षण व नवयुग के पृष्ठ भूमि का निर्माण, पिप्पलाद परम्परा में संस्कारी आहार के माध्यम से कल्प साधना, सूत शौनिक परम्परा में रामचरित मानव की प्रगतिशील प्रेरणा व गीता कथा तथा प्रज्ञापुराण कथा द्वारा समागमों का आयोजन व लोक शिक्षण ये कुछ महत्वपूर्ण स्थापनाएँ ऐसी थी जिनसे गायत्री तीर्थ को संस्कारित किया गया।
वैशेषिक-कणाद परम्परा में अध्यात्म-विज्ञान के समन्वय के अनुसंधान हेतु ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान की स्थापना जून 1979 में की गई जो कि अपने समय का एक भागीरथी पुरुषार्थ है।
आज के गायत्रीनगर रूपी समग्र गायत्री तीर्थ को देखकर लगता नहीं कि यह स्थापना मानवी प्रयासों से इतने कम समय में हुई होगी। सन् 1961 से 1990 के पूज्य गुरुदेव की प्रगति यात्रा का नियोजित स्थापनाएँ थीं जो समय के साथ क्रिया रूप लेती गई। यही होती है युग विश्वामित्रों की कार्य शैली।
राष्ट्र देव की पूजा करना ही सच्ची देवपूजा है। इसके लिए स्नेह, सेवा, संगठन, सहयोग और संघर्ष के पंचोपचार अर्पण करने पड़ते है। पुजारी को सत्यनिष्ठ और साहसी बनना पड़ता है।
हर मनुष्य अपने स्तर की दुनिया अपने हाथों आप रचता है।
मनुष्य उस धातु का बना है जिसकी संकल्प भरी साहसिकता के आगे कभी भी कोई अवरोध टिक नहीं सका है और न कभी टिक ही सकेगा।
भाव नगर के एक सज्जन ने मथुरा यात्रा के दौरान उनका नाम सुना। वे उनसे मिलने आये। 1940-49 का समय था। अखण्ड-ज्योति हाथ के कागज से छपने के बाद कुछ ही दिन पूर्व अखबारी कागज पर छपने की स्थिति में आई थी। आर्थिक संकट यथावत था।
उन सज्जन से उनने उनकी सारी समस्याएँ सुनीं। फिर साथ विश्राम घाट तक बात करते चले गए। यमुना किनारे बैठकर आत्मीयतापूर्वक उनके कंधे पर हाथ रखते हुए उन्हें आश्वासन दिया कि वे उनके दुःख कष्ट में हमेशा साथ रहेंगे। भावविभोर उस व्यक्ति ने श्रद्धापूर्वक इक्यावन रुपये उनको भेंट किए व इजाजत माँगी। उनने कहा कुछ देर और कष्ट करना पड़ेगा क्योंकि श्रद्धाँजलि की रसीद तो लेनी ही पड़ेगी। साथ लेकर लौटे व कपड़ों की मण्डी जा पहुँचे। इक्यावन रुपये में चार सौ रुई की बण्डियाँ खरीदीं। कुछ उनके सिर पर रखीं, कुछ अपने व रास्ते में सड़क पर ठण्ड में ठिठुर रहे निराश्रितों को बाँटते चले गये। श्रद्धाँजलि की पावती इस रूप में मिलती देख वे सज्जन स्तब्ध थे। बोले कुछ नहीं। चरणों में सिर नवाकर चले गये। पहला अंशदान पाँच हजार रुपयों का तपोभूमि निर्माण के निमित्त उन्हीं ने भेजा था। यह थी उनकी अपनत्व की सम्मोहन शक्ति जिसने अनगिनत विभिन्न वर्ग के व्यक्तियों को उनकी प्रामाणिकता के आधार पर उनसे स्नेह सूत्रों में बाँध दिया।
स्वयं सेवक वह, जो सेवा में स्वयं को तिल-तिल गला सकें। अपने को इस कसौटी पर सोलह आना खरा साबित किया गुरुदेव ने। घटना स्वतंत्रता संग्राम से पूर्व की है। डॉ. केसकर जो बाद में भारत सरकार में सूचना प्रसारण मंत्री हुए। उन दिनों काँग्रेस के दिग्गजों में गिने जाते थे। उन्होंने पालीवाल जी से अपनी सेवा सहायता के लिए एक स्वयं सेवक की मांग कीं। उन्होंने अपने विश्वस्त स्वयं सेवक 98, 19 वर्ष के तरुण श्रीराम की नियुक्ति कर दी। वह प्रसन्नतापूर्वक उनकी सेवा में लग गये। खाना बनाने, कपड़े धोने, साफ-सफाई जैसे अनेकों काम करने पड़ते। साथ ही अपनी साधना स्वाध्याय प्रेस का काम तो था ही। इन सबके बावजूद न कोई उनकी शिकवा शिकायत थी और न असुविधाओं का रोना। उनकी इस अद्भुत जीवन शैली-अपूर्व कर्मठता ने केसकर जी को दंग कर दिया। सहस्र कुण्डीय महायज्ञ में वही केसकर जी जब तीस वर्ष बाद आए तो उन्होंने सभी के सामने उनके चरण स्पर्श किए।
तीर्थों के विषय में हर व्यक्ति की मान्यता भिन्न-भिन्न प्रकार की है। कोई इन्हें पर्यटन स्थली मानता है, कोई इनकी दर्शन झाँकी से मिलने वाले कौतुक को ही सब कुछ समझता है, कोई इन्हें इनकी पृष्ठ भूमि से जोड़ कर सुसंस्कारित स्थान मानते हैं जहाँ महामानवों ऋषियों ने या देव मानवों ने अपने श्रेष्ठ कृत्यों द्वारा कुछ महत्त्वपूर्ण स्थापनाएँ समय समय पर कीं। गायत्री तीर्थ में ऋषि परंपराओं का बीजारोपण करते समय पूज्य गुरुदेव ने इन सब पक्षों का ध्यान रखते हुए ही उसकी उपमा एक नर्सरी, एक टकसाल, एक ऐसे कारखाने से दी थी जहाँ से महामानव रूप पौध समाज के कोने कोने में भेजी जानी थी, वे सिक्के ढलने थे जिन्हें हर कसौटी पर खरा उतरना था।
भव्य निर्माण, मठ, मन्दिर तो अनेकों बने हुए हैं व बनते रहते है। किन्तु उनकी सार्थकता तभी है, जब उनमें काम करने वाले प्राणवान हो, किसी श्रेष्ठ उद्देश्य के साथ जुड़े हों। यह चिन्तन तपस्वी, मनस्वी ऋषि प्रवर के मन को सदैव मथता रहा कि समाज में जो सत्प्रवृत्तियाँ फैलानी हैं, दुष्प्रवृत्तियों के बाहुल्य से मोर्चा लेना है, उसके लिए जिस स्तर के व्यक्तियों की आवश्यकता पड़ेगी उन्हें उन्हें उपयुक्त वातावरण में श्रेष्ठ स्तर का शिक्षण भी देना पड़ेगा। उनकी सुसंस्कारिता तभी अंकुरित, पल्लवित होगी जब उन्हें उर्वर भूमि में सभी अनुकूल परिस्थितियाँ मिलें।
अखण्ड ज्योति परिवार की स्थापना एक साधारण मनोरंजन करने वाली पत्रिका के सदस्यों का परिकर बनाने के लिए नहीं की गयी थी अपितु इसके संपर्क में आने वाली हर संस्कारवान आत्मा को सत्परामर्श व स्वाध्याय हेतु श्रेष्ठतम पाठ्य सामग्री प्रदान की गयी थी। जो साहित्य विगत पचास वर्षों में पूज्य गुरुदेव ने लिखा वह युग साहित्य कहलाया जिसमें सामयिक समस्याओं का समाधान व उलझनों का हल परिस्थितियों के अनुरूप किया गया था। जब उनने इसी अखण्ड ज्योति के पृष्ठों पर (अप्रैल अखण्ड ज्योति 1980, पृष्ठ 33 से 56) प्रेरणाप्रद वातावरण में देवस्तर की ढलाई हेतु बसने वाले देव परिवार का अंग बनने के लिए जागृतात्माओं को निवास आमंत्रण भेजा, तब यही परिकल्पना उनके मन में रही कि गायत्री नगर को गुरुकुल, आरण्यक स्तर का बनाया जाय, जहाँ रहकर अखण्ड ज्योति युग निर्माण योजना एवं युग शक्ति गायत्री के पाठक-गुरुदेव के सभी मानस पुत्र तीर्थ कल्प का भी लाभ ले सकें तथा अपनी प्रतिभा का परिष्कार कर उन महामानवों की पूर्ति कर सकें जिनके अभाव से ही समाज में सारी समस्याएँ पनपी हैं।
पूज्य गुरुदेव इस अंक में इसी स्तम्भ में लिखते है कि “धर्म और अध्यात्म के चमकीले बोर्ड वाले स्टालों की सजधज समाज में कम नहीं है। कलेवर की दृष्टि से धर्माडम्बर किसी अन्य से पीछे नहीं। इतने पर भी प्रभावी वातावरण का अभाव अभी भी जहाँ का तहाँ है। सुविधा सम्पन्न धर्म स्थान देखे जाते हैं पर उच्चस्तरीय आत्माओं का निवास न होने के कारण वहाँ भी ऐसा कुछ नहीं दीखता जिसमें अनगढ़ों को भी ढलने का बदलने का अवसर मिले।। इस अभाव के रहते उस ऊर्जा की कमी खटकती ही रहेगी जिससे धान पकते और अण्डों से चूजे निकलते हैं।
ऊपर जो वर्णन पूज्य गुरुदेव द्वारा किया गया है वह कितना वास्तविकता से भरा है इसका सहज अध्ययन तीर्थ स्थानों पर जा कर किया जा सकता है। पूज्य गुरुदेव का अध्यात्म प्रगतिशील कर्मयोग परक अध्यात्म रहा है जिसमें व्यक्ति मात्र बाबाजी न बनकर बैठे अपितु विश्व उद्यान को सींचने, समुन्नत बनाते में अपनी और से कोई कसर न छोड़े। इस अध्यात्म को जिन्दा कौन करे?मात्र प्रखर प्रतिभा सम्पन्न सुसंस्कारित व्यक्ति ही ऐसा कर सकते हैं व ऐसे देवमानवों के निर्माण हेतु एक गलाई-ढलाई के लिए उपयुक्त स्थान चाहिए था। जहाँ वे जैसा चाह रहे थे वैसा निर्माण कर सकें। भवनों का निर्माण। ऐसे व्यक्ति जो युग नेतृत्व कर सकें, मल्लाह की भूमिका निभा सकें, दूसरों का मार्गदर्शन कर सकें।
वातावरण कैसे श्रेष्ठ बनाया गया इस के लिए वे लिखते हैं कि जहाँ सहज ही श्रेष्ठता के अनुगमन उमगने लगे उत्कृष्टता के उदाहरणों का जहाँ बाहुल्य हो, वहीं देव वातावरण है व जहाँ ऐसा प्रभाव होगा वहाँ के संपर्क में आने वाले व्यक्ति देवों जैसा उत्कृष्ट स्तर का दृष्टिकोण अपनाते देखे जाएंगे। वातावरण को श्रेष्ठता से अनुप्राणित करने के लिए ही गायत्री तीर्थ को तप की ऊर्जा से संस्कारित कर यहाँ देवी संरक्षण उपलब्ध कराया गया तथा ऋषि परम्पराओं की स्थापना कर उन प्रचलनों को आरंभ किया गया जो सतयुग की वापसी में सहायक सदा से रहे हैं
गायत्री नगर को युगशिल्पियों का प्रशिक्षण संस्थान बनाया गया-बौद्ध विहारों और संधारामें जैसा। मात्रा बसने के लिए, समय गुजारने के लिए धर्मशाला नहीं बनायी गयी, अपितु साँचे की भूमिका निभा सकने वाले प्राणवानों को जो स्वयं “डाई” बन सकें व दूसरों को भी अपने जैसा बना सकें, प्यूपील्स टीचर (शिक्षकों के भी अध्यापक)की भूमिका निभा सकें, ऐसी प्रतिभाओं को रहने हेतु आमंत्रित किया गया। ऐसे प्राणवान आत्मनिर्माण और लोककल्याण की दुहरी साधना साथ कर सकें, इसलिए उन्हें परमार्थ कार्य में नियोजित होने को आमंत्रित किया गया।
इसके लिए पूज्य गुरुदेव ने शर्त रखी कि जो अपनी भौतिक महत्वाकाँक्षाओं को नियंत्रित कर ब्राह्मणोचित निर्वाह में तपोमय जीवन जी सकें तथा परमार्थ हेतु अपना 12 से 18 घण्टे का श्रम समाज के नवनिर्माण हेतु लगा सकें वे ही आएँ। कहना न होगा कि जो भी आए उन्हें पूरी कसौटी पर कसकर प्रशिक्षण प्रक्रिया से गुजारने के बाद रहने का अवसर दिया अपने पद सम्मान, वैभव को लात मार कर यहाँ का सीधा सरल, जीवन स्वीकार किया। पूज्य गुरुदेव के निर्देशों के अनुरूप स्वयं।के जीवन को, अपने परिवार को ढाला एवं देखते देखते उच्चशिक्षित, प्रतिभावान अढ़ाई सौ व्यक्तियों का एक देव परिवार यहाँ बस गया।
पूज्य गुरुदेव ने आध्यात्मिक साम्यवाद की परिकल्पना को कण-कण में संचरित किया है। यहाँ वरिष्ठता की एक ही कसौटी है विनम्रता, स्वयं पर अंकुश व कर्मनिष्ठ जीवनचर्या। अभी इनकी संख्या बढ़ेगी, और भी नये देवमानव परिवार आयेंगे तथा तीर्थ क्षेत्र का विस्तार होगा। पर करोड़ों व्यक्तियों की दृष्टि केन्द्रित होगी आरण्यकवासी इन कार्यकर्ताओं पर। इसमें कोई संदेह नहीं कि पूज्य गुरुदेव द्वारा जिये गये जीवन, उनके द्वारा निर्धारित आदर्शों को ही जीवन में उतार कर वे अपना लोकसेवा के क्षेत्र में पदार्पण सार्थक कर सकते हैं। जो इनका निर्वाह नहीं कर पायेगा, महाकाल उनके स्थानापन्नों की व्यवस्था भी कर लेगा किन्तु भगवान का यह कार्य रुकेगा नहीं, सतत् बढ़ता ही रहेगा।
प्रतिकूलताओं से डरो नहीं। उनसे धैर्य और साहस के साथ निपटो। याद रहे कठिनाइयाँ ही आदमी को निखारती हैं।
बुद्धि वैभव चमत्कारी तो है पर हृदय की विशालता से बढ़कर उसकी गरिमा है नहीं।
विदुर की पत्नी योगेश्वर कृष्ण को केले के छिलके खिलाती रही और वह आनन्द मग्न हो खाते रहे। आखिर उन्हें पदार्थ नहीं भाव जो प्रिय था। ऐसी घटी। वे अपने सहायक कार्यकर्ता के साथ एक घर में पहुँचे।घर में अकेली महिला थी। गुरुजी आए हैं सुनते ही भाव विह्वल हो उठी।क्या खिलाऊँ? क्या स्वागत करूं? कुछ सूझ नहीं रहा था दौड़ी दौड़ी गई दो गिलास दूध भरा पर जल्दी के मारे उसमें शक्कर की जगह एक एक मुट्ठी पिसा नमक डाल गई।
दूध मिलने पर गुरुदेव तो बड़े प्रेम से उसे पीने लगे। पीते हुए कभी दूध की प्रशंसा करते कभी उसकी जीवन शैली की। इधर साथ के कार्यकर्ता को उबकाइयाँ आ रही थी। इशारा करने के बावजूद वह कह ही बैठे तब तक गुरुजी अपनी दूध समाप्त कर चुके थे। महिला के दुखी होने पर बोले”बेटी इसके में नमक होगा मेरे में तो शकर थी।” थोड़ी देर तक उसे समझाते बुझाते रहे। बाहर निकलने पर कार्यकर्ता को प्रेम भरी डांट पिलाई बोले तुम्हें किसी की भावनाओं का ख्याल नहीं। कार्यकर्ता अवाक् हो “भावना ही जनार्दन”। इस उक्ति को साकार होते देख रहा था।
यह एक संयोग मात्र नहीं है जिस वर्ष ब्रह्मवर्चस के रूप में चौबीस गायत्री प्रतिमाओं से सज्जित केन्द्रीय शक्ति-पीठ का उद्घाटन शोध ग्रन्थालय जुड़े थे, ठीक इस वर्ष गुरुदेव के चिन्तन क्षेत्र में एक नया चक्रवात घूम रहा था। वह था केन्द्र में प्रशिक्षित किये जा रहे समयदानी परिव्राजकों के माध्यम से पूरे भारत में फैले सत्प्रवृत्ति संवर्धन के कार्य का, धर्मतंत्र से लोकशिक्षण रूपी महत्वपूर्ण कार्यक्रम का सुनियोजित विकेंद्रीकरण। इस के लिए बसंत पंचमी, उनके अध्यात्मिक जन्म दिवस पर एक महत्वपूर्ण संदेश आया-वह था नवचेतना के निर्झर केंद्रों के रूप में प्रज्ञा संस्थापना का। यह वर्ष था सन् 1979 का व युग निर्माण योजना को प्रारंभ हुए पच्चीस वर्ष हो चुके थे अतः उसका यह रजत जयन्ती वर्ष था। मात्र प्रतिपादन ही नहीं, अंतराल में सद्भावों को जगाने के लिए एक विशाल ज्ञानयज्ञ की आवश्यकता को समझते हुए गुरुदेव द्वारा पहले चौबीस एवं फिर आवश्यकता को देखते हुए चौबीस सौ स्थानों पर प्रज्ञा संस्थान, शक्ति पीठ या गायत्री तीर्थ स्थापित करने का निश्चय का लिया गया
पूज्यवर चाहते थे कि गायत्री का तत्वज्ञान जन-जन तक पहुँचे। इसी उद्देश्य से ‘युग शक्ति गायत्री पत्रिका का प्रकाशन भी कुछ वर्ष पूर्व आरंभ कर सद्बुद्धि विस्तार की प्रक्रिया आरंभ हो गई थी। यही निष्कलंक प्रज्ञावतार का संकल्प भी रहा है। ऋतम्भरा प्रज्ञा को ही उनने दूसरे शब्दों में ब्रह्मविद्या कहा जिसके अवधारण मात्र से आस्था संकट के मिटने की संभावनाएं बतायी गयीं। उनने आद्यशक्ति गायत्री की सामयिक भूमिका को युगशक्ति के संघशक्ति के अवतरण के रूप में प्रतिपादित किया जो लाखों करोड़ों बदले हुए अन्तःकरणों के रूप में अपना विराट रूप दिखाने जा रही थी। युगशक्ति के विस्तार हेतु आरम्भ किया गया प्रव्रज्या अभियान गति पकड़ चुका था, स्थान स्थान से परिजन आकर इस परम्परा में दीक्षित हो रहें थे, अब समय आ गया था कि प्रज्ञावतार का आलोक उनके माध्यम से भारत भूमि के कोने तक पहुंचे।
गायत्री तीर्थ अथवा शक्तिपीठ इसी उद्देश्य को पूरा करने वाले मूल रूप में जन-जाग्रति के केन्द्र बनने जा रहे थे। ठीक उसी तरह जैसे कि कभी आद्य शंकराचार्य ने चार स्थानों पर चार धामों की स्थापना कर विराट भारत को एक सूत्र में आबद्ध करने का प्रयास किया था एवं समर्थ रामदास ने स्थान स्थान पर हनुमान मन्दिर के रूप में जाग्रति केन्द्र व्यायामशालाएँ प्रतीक रूप में स्थापित की थीं। निर्माण कहाँ कहाँ हो व किस रूप में हो, यह जिज्ञासा शान्त करते हुए उनने लिखा कि “हमारी कभी यह इच्छा नहीं रही कि विशाल मन्दिरों की संख्या अनावश्यक रूप से बढ़ाई जाय। स्थापनाएँ जहाँ हों वहाँ वे गायत्री तीर्थ के रूप में विनिर्मित हों, जहाँ देव प्रतिष्ठा से लेकर धर्मधारणा को सुस्थिर एवं प्रगतिशील बनाने की रचनात्मक गतिविधियाँ चलें यदि यह पहले से स्थापित देवालयों में भी चल पड़े तो इसे नयी स्थापना-नवजागरण मानना चाहिए।”
इस प्रकार एक क्रान्तिकारी प्रतिपादन सामने आया कि जहाँ साधन हों, पुरुषार्थ हों, उमंगें हों वहाँ नूतन निर्माण किया जाय जो केन्द्रीय निर्धारणों के अनुरूप हो तथा जहाँ पुराने देवालयों का जीर्णोद्धार संभव हो, वहाँ मन्दिर का स्वरूप दे दिया जाय। वैसे प्रथम चरण में चौबीस स्थानों का निर्धारण किया गया था किन्तु लक्ष्य चौबीस से बढ़ा कर चौबीस सौ कर दिया गया व पहले दस वर्ष में उत्तर भारत के हिन्दी भाषी प्रान्तों व उनसे जुड़े प्रांतों में निर्माण की बात सोची गयी। दक्षिण भारत व शेष भारत को 90 के दशक के बाद अन्यान्य भाषाओं में साहित्य के अनुवाद व प्रकाशन के बाद स्पर्श करने की बात सोची गयी।
मत्स्यावतार की तरह से शक्तिपीठ संकल्प ने विस्तार लिया। पहले जिन परिजनों ने आ कर निर्माण के संकल्प लिए उन्हें स्थापना हेतु प्रतीक रूप में पहली राशि केन्द्र की ओर से गुरुदेव माताजी के हाथों से दी गयी ताकि बीजारोपण प्राणवान हो। प्रत्येक शक्तिपीठ के निर्माण का इतिहास अनेकानेक चमत्कारी प्रसंगों से जुड़ा हुआ है। जो व्यक्ति कभी अपने लिए एक कमरे के निर्माण के लिए भी सोच नहीं सकते थे, उनने इतने विशाल निर्माण एकाकी अथवा संघशक्ति के बलबूते कर दिखाए। मूल स्रोत था वह प्रेरक बल जो पूज्य गुरुदेव की वाणी एवं लेखनी से प्रकट हो कर अर्धमृतकों निष्क्रियों में भी प्राण फूँक कर उन्हें खड़ा कर रहा था।
प्रत्येक तीर्थ को, शक्तिपीठ को एक या अधिक ब्रह्मवर्चस् की शक्ति-धाराओं का प्रतिनिधित्व करने वाली गायत्री प्रतिमाओं की स्थापना हेतु कहा गया तथा सत्साहित्य का एक प्रचार केन्द्र व सत्संग हेतु एक एक कक्ष विनिर्मित करने के लिए प्रेरित किया गया जहाँ व्यवस्था बन पड़े वहाँ परिव्राजकों के लिए एक निवास भी बनाने को कहा गया। परिव्राजकों को स्थायी महन्त बनने के लिए नहीं बल्कि गायत्री यज्ञ का प्रचार विस्तार इस पूरे क्षेत्र में कर एक विनम्र लोकसेवी के रूप में सबका श्रद्धाभाजन बनने की प्रेरणा दी गयी। इन्हें तीन माह से लेकर एक वर्ष तक एक स्थान पर रहकर फिर बुद्ध के प्रचारकों की तरह आगे बढ़ कर नया कार्यक्षेत्र सँभालने की प्रेरणा दी गयी। केन्द्रीय शिक्षण तंत्र भी इसी स्तर का बनाया गया।
धर्म चेतना के इस पुनर्जीवन के इस देव प्रयास ने गहरी जड़े पकड़ीं व स्थान स्थान पर छोटे बड़े प्रज्ञा केन्द्र प्रज्ञा संस्थान, प्रज्ञा मण्डल तथा छोटे स्वाध्याय मण्डल स्थापित होते चले गए। पहले जिन्हें गायत्री परिवार की शाखाएं कहा जाता था व जिनने 1958 के सहस्रकुंडीय महायज्ञ से साधना स्वर्ण जयन्ती समारोह तक महत्वपूर्ण भूमिकाएँ निभाई थी, उन्हीं को प्रकारान्तर से इन्हें स्थापित करने का श्रेय मिला। कुछ ऐसे नये प्राणवान व्यक्ति भी उभर कर आए जिन्हें आगे चलकर महत्वपूर्ण भूमिका निभानी थी।
उनने शक्ति पीठ संचालकों को निर्माण हेतु बधाई, धन्यवाद व आशीर्वाद भी दिया स्वयं वहाँ जा कर कइयों का शिलान्यास व उद्घाटन भी किया। 1981-82 में यही क्रम चला। साथ ही वे सबको सचेत भी करते चले गए कि निर्माण तब तक प्राणहीन है जब तक वहाँ क्रिया−कलाप नहीं चलते। वे लोक भर्त्सना व निन्दा के पात्र बनेंगे यदि वे सफेद हाथी मात्र बनकर रह गए। उनने कहा कि हमने ब्रह्म विद्यालय की स्थापना की है, मन्दिरों की नहीं। नियुक्त परिव्राजक इसके उपाध्याय हैं, अध्यापक हैं। समय समय पर वे यह इशारा करते रहे कि 1980-1990 के बीच हम स्थूल रूप से तो तंत्र का विकेन्द्रीकरण कर भवनों की, कार्यालयों की, संगठन शाखाओं की स्थापना कर जायेंगे पर इनमें प्राण सतत् फूँकते रहेंगे व सन् 2000 के आते आते मात्र सक्रिय, श्रद्धावान, संवेदनाशील युग नेतृत्व कर सकने में सक्षम प्रतिभाशाली ही इन स्थापनाओं से जुड़े रहेंगे। धनाध्यक्ष एवं जड़ निर्माण से चिपके रहने वाले लोकेषणाग्रस्त व्यक्ति हमारे संगठन का अंग नहीं बन सकते। सूक्ष्म व कारण शरीर से हम 1990 के बाद वह काम करेंगे जो स्थूल शरीर से नहीं कर पाए। संकेत स्पष्ट था व अभी भी सब के लिए एक चेतावनी है कि जन-जन से संचित धनराशि से विनिर्मित ज्ञान विस्तार को समर्पित प्रज्ञाकेंद्र यदि सक्रिय न रहे, गतिविधियों का विस्तार न कर सके तो परोक्ष जगत से महाकाल की शक्ति सब को झकझोर कर नये तंत्र को आगे ला खड़ा करेगी व उनसे सारा कार्य करा लेगी।
गतिविधियां क्या-क्या चलें, इस का संकेत वे “अपनों से अपनी बात” स्तम्भ के अंतर्गत अखण्ड ज्योति व युग शक्ति गायत्री युग निर्माण योजना में तथा प्रज्ञा अभियान पाक्षिक पत्रों में सतत् करते रहें। प्रतिमाओं के दर्शन के माध्यम से आगंतुकों को ऋतम्भरा प्रज्ञा का दर्शन समझाना, जिज्ञासुओं की गायत्री यज्ञ अध्यात्म संबंधी जिज्ञासाओं की गायत्री यज्ञ अध्यात्म संबंधी जिज्ञासाओं का समाधान करना, नियमित साधना-उपासना का क्रम शक्ति पीठों में चलाना, युग संगीत के माध्यम से जन चेतना को झकझोरना का विस्तार करना, रामायण गीता प्रज्ञापुराण की कथा द्वारा प्रगतिशील अध्यात्म का प्रतिपादन करना, अपने मण्डल की तीर्थ यात्रा-धर्म प्रचार की पदयात्रा-साइकिल यात्रा सतत् चलाना, जन-जन को युग साहित्य के संजीवनी से परिचित कराना, इस के लिए चल पुस्तकालयों की व्यवस्था करना, स्वाध्याय मण्डलों की स्थापना व उनका संचालन बाल संस्कार शालाओं तथा प्रौढ़ पुरुषों व महिलाओं की साक्षरता हेतु नियमित कक्षाएँ चलाना, वृक्षारोपण द्वारा हरीतिमा विस्तार करना तथा नशा निवारण आँदोलन चलाना-थे अनेकों कार्यों में से कुछ थे जिन पर पूज्यवर सतत् जोर देते रहे।
दृश्य-श्रव्य साधनों, स्लाइड प्रोजेक्टर व टेपरिकार्डर तथा झोल पुस्तकालय, ज्ञानरथ के माध्यम से ये सभी गतिविधियाँ परिव्राजक प्रशिक्षण प्राप्त युग शिल्पियों द्वारा जोर पकड़ने लगी। एक स्वस्थ प्रतिस्पर्धा परिजनों में चल पड़ी कि किस का केन्द्र सत्प्रवृत्ति संवर्धन के क्षेत्र में आगे रहता है। इसी बीच राष्ट्रीय अखण्डता-एकता के निमित्त विशाल महायज्ञों का संदेश पूज्यवर ने परिजनों तक पहुँचाया व 1986-1987 में विशाल राष्ट्रीय एकता सम्मेलनों की धूम मच गई। साँप्रदायिक सद्भाव हेतु आयोजित इन कार्यक्रमों में यज्ञों से जुड़ी दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन प्रतिज्ञाओं के अलावा राष्ट्रीय अखण्डता हेतु सभी धर्म-संप्रदायों की विभूतियों से एक जुट होकर धर्मधारणा के विस्तार का आह्वान किया गया था। इनका प्रतिफल यह निकला कि लाखों नये व्यक्ति इस युग के ब्रह्मर्षि की सार्वभौम विचार धारा से जुड़ गए। लगभग एक हजार स्थानों पर ऐसे बड़े-बड़े यज्ञ व सम्मेलन दो वर्ष की अवधि में सम्पन्न हो गए।
मिशन के विस्तार को देखते हुए वसंत पर्व 1988 पर उनने एक नया निर्धारण किया कि अब यज्ञ कुण्डों के स्थान पर ज्ञान के प्रतीक दीप प्रज्ज्वलित किये जायें व ऐसे दीपयज्ञ स्थान-स्थान पर हों। जन्म दिवसोत्सव से लेकर हर शुभ कार्य का शुभारंभ व महासम्मेलन का स्वरूप दीपयज्ञमय बना दिया गया। इन दीपयज्ञों में पदार्थों की आहुति नाममात्र की होने से वे सर्व सुलभ बन गए व लोककल्याण की प्रखर भावना एवं विचारणा साथ जुड़ जाने से सूक्ष्मजगत को व्यापक स्तर पर प्रभावित करते चले गए।
नीति पुरुष वे होते हैं जो स्वयं जो निर्धारण महाकाल के निर्देश पर करते हैं, वह लोक प्रचलन बन जाता है। पूज्य गुरुदेव के कर्त्तृत्व के बहुमुखी पक्षों में एक संगठन को विशाल रूप देने वाला वह पक्ष भी है जो ऊपर दिया गया। इस सब के मूल में जो संकल्प शक्ति काम करती रही है वह मानव स्तर की नहीं, अवतारी स्तर के महापुरुष की थी, यह कार्य के परिमाण को देख कर सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है।
गवान समुद्र की तरह एक है। देवताओं और नाम रूपों की भिन्नता शत्र उसमें उठने वाली तरंगों की तरह हैं।
नीचा गिराने के लिए निरंतर गतिशील पक्षी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति ही पर्याप्त है। ऊँचा उठना हो तो बलिष्ठ पंखों और साधनों का अवलंबन आवश्यक है।
स्वावलम्बन विद्यालय जो मथुरा व हरिद्वार में स्थापित है, देखकर सभी अनौपचारिक उपार्जन प्रधान इस शिक्षा का प्रारूप देखकर प्रशंसा करते हैं। पूज्य गुरुदेव के निर्धारणों के अनुसार बने ये दो केन्द्र तो पिछले दो दशकों के बने हैं किन्तु अपनी किशोरावस्था में ही अपने गाँव आँवलखेड़ा में उनने अपने इस विचार को कार्य रूप दे दिया था। “शिल्पकला केन्द्र” नाम से अपने घर के सामने की जमीन पर उनने सोलह-सत्रह वर्ष की आयु में ही सात करघों से खद्दर बुनने का कार्य चालू कर दिया था। सूत कातने के लिए गाँव की महिलाओं में बाँट दिया जाता। श्रम के बदले में उन्हें राशि भी दी जाती थी। नारी उत्थान के लिए उनकी यह शुरुआत वाला कार्यक्रम था जिसे बाद में सुनियोजित रूप दिया गया। कुछ अशिक्षित बेरोजगार युवकों से उनने करघों पर बुनाई हेतु आने को कहा व बदले में राशि देकर मेहनत की कमाई पर जीना सिखाया। ‘बुनताधर’ नाम से गाँव में प्रसिद्ध इस केन्द्र के जन्मस्थली के सामने अवशेष विद्यमान हैं।
विनोबा ने “गीता प्रवचन” में तुलाधर वैश्य की कथा जिसमें बच्चे बूढ़े सबके साथ तुला जैसा व्यवहार किये जाने बाल काटने वाले नाई के जीवन के साधनामय बनने पर दूषित विचारों की भी वैसी ही कटाई, किसान की तरह खरपतवार अपने जीवन में से निकाल बाहर कर अनगढ़ता से सुगढ़ता की साधना करना ऐसे जीवन्त उदाहरण दिए है। पूज्य गुरुदेव की संभाषण व व्याख्यान की शैली भी यही थी। जीवन से जुड़े छोटे छोटे उदाहरणों के द्वारा कैसे व्यक्ति साधारण से असाधारण बनता है, यह उनने अनेकों तरह से समझाया है। कोयले से हीरा बनने से लेकर अनगढ़ पत्थर की मूर्ति की तरह तराशा जाना एवं बेल के वृक्ष से लिपट कर ऊँचा उठ जाने की तरह समर्पित का उत्कृष्टता की ऊँचाई को पा लेना यही उनकी मर्मस्पर्शी उद्बोधन शैली थी। आश्चर्य इस बात का है कि बोलते समय ऐसी सुबोध शैली जो सीधी अंदर तक उतरती चली जाए व लिखते समय ऐसी संस्कृतनिष्ठ व उक्तियों-मुहावरों से भरी हुई कि हिन्दी के विद्वान भी उससे शिक्षण लें। यह बहुमुखी स्वरूप साधारण मानव का नहीं हो सकता।
अपनी चौथी हिमालय यात्रा से लौट कर आने के बाद शांतिकुंज में रहकर अपनी 1972 से 1981 तक की दो पंचवर्षीय योजनाओं की घोषणा पूज्य गुरुदेव ने की। इन योजनाओं में पहले पाँच प्रमुख कार्यों निज की तप साधना द्वारा युग निर्माण आँदोलन का परोक्ष सूत्र संचालन, प्राण प्रत्यावर्तन के सघन अनुदान, नारी जागरण का अभिनव सूत्रपात, वैज्ञानिक अध्यात्मवाद की स्थापना का भागीरथी प्रयास तथा प्रवासी भारतीयों में देव संस्कृति का विस्तार में से चार की चर्चा तो हो चुकी। पाँचवाँ प्रसंग विदेश में बसे प्रवासियों व नागरिकों को देव संस्कृति के महत्वपूर्ण निर्धारणों से अनुप्राणित कर उन्हें उस केन्द्रीय धुरी से जोड़ना था जो प्राण संचार करती रह सके। इस के लिए दिसम्बर 1972 से स्वयं पूज्य गुरुदेव ने अढ़ाई माह की अफ्रीका के पूर्वी भाग की यात्रा की। यह यात्रा कई उद्देश्यों से जरूरी थी।
युग निर्माण की चर्चा करते समय वे सदा कहते थे कि मिशन का कार्य क्षेत्र सारा विश्व है व अवधि तब तक की है जब तक कि वह युग, यह समय, यह एरा नहीं बदल जाता। शुरुआत उन लोगों से करना उनने अनिवार्य समझा जो भारत के राजदूत बनकर पीढ़ियों से वहीं जा बसे थे इनमें प्रधानता गुजरात प्रान्त से जाने वालों की, किन्तु राजस्थान, पंजाब व अन्यान्य स्थानों से रोजगार हेतु बाहर गए परिजनों की संख्या भी कम नहीं है। इनमें से कई पूज्य गुरुदेव से अखण्ड ज्योति के माध्यम से जुड़े हुए थे। इन से पत्र व्यवहार व मार्गदर्शन का क्रम चल ही रहा था। ये व्यक्ति न केवल अफ्रीका के तंज़ानिया, केन्या, मोमबासा, जाम्बिया, जिंबाबे, काँगो यूगांडा, साउथ अफ्रीका, मलावी जैसे देशों में बसे हुए हैं, बल्कि यूरोप के इंग्लैण्ड, नार्वे, डेनमार्क, हालैण्ड जर्मनी तथा कनाडा, सूरीनाम, फिजी, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैण्ड, मलेशिया एवं अमेरिका आदि राष्ट्रों में भी बहुतायत से विद्यमान हैं। इन सभी से मिलना तो इतनी कम अवधि में संभव नहीं था किन्तु उस विधा की तो शुरुआत करनी ही थी जिसके माध्यम से परिजनों को आवश्यक प्रेरणा, प्रकाश एवं दिशा निर्देश दिया जा सकें। अन्यान्य धर्मों के अनुयाइयों तथा विज्ञानवेत्ताओं से मिलना भी उनका उद्देश्य था ताकि वसुधैव कुटुम्बकम् के लक्ष्य तक पहुँचने के लिए स्थूल शरीर से जो जाना जा सकना संभव है वह इस यात्रा से जान लिया जाय।
सोचा जा सकता है मात्र अफ्रीका के कुछ देशों की यात्रा द्वारा तो वह प्रयोजन पूरा नहीं होता जिसकी चर्चा ऊपर की गयी है। यहाँ यह नहीं भूलना चाहिए कि उनकी यात्रा अन्यान्य धर्म गुरुओं के समान नहीं थी जो सुख उपभोग की तलाश में धन बटोरने की ललक में, धर्म के नाम पर योग साधना के नाम पर संव्याप्त आस्था वाली मानसिकता का दोहन करने अधिकाँश समय वहीं बने रहते हैं। चोगा भले ही उनने बाबा जी का पहन रखा हो, किन्तु आचरण में पाश्चात्य भोग विलास की ही प्रधानता रहती है। पूज्य गुरुदेव ने जीवन भर एक ब्राह्मण की जिन्दगी जी है वह सफेद खादी की धोती व एक कुर्ते से ही जीवन भर काम चलाया है। विमान यात्रा का खर्च सुनकर उनने समुद्र से यात्रा कर अधिक दिन प्रवास व बिताना पसंद किया ताकि अनावश्यक भार परिजनों पर न पड़े वह जहाज पर व्यतीत समय को वे स्वाध्याय, साधना में लगा सकें। आज की परिस्थितियों में यह भले ही अव्यावहारिक प्रतीत होता हो किन्तु मिशन का सूत्र संचालक जिन आदर्शों पर जीवन भर चला था, उनके माध्यम से ही अपनी रीति नीति का निर्धारण कर रहा था। यदि इसे एक आदर्श शुरुआत कहें तो उचित होगा क्योंकि वे आने वाले दिनों में प्रज्ञा परिजनों प्रवासियों तथा विश्वभर के नागरिकों में घूम घूम कर प्रचार करने वाले विवेकानन्दों, रामतीर्थों, कुमारजीवों, महेन्द्रों व संघमित्राओं के लिए एक उदाहरण सामने रखना चाहते थे। यह यात्रा एक बीजारोपण मात्र थी इसलिए सूत्र संचालक ने 80 वर्ष के जीवन के अढ़ाई माह इस कार्य के लिए निर्धारित कर दिए किन्तु यह कार्य बाद में भी सतत् चलना ही था।
वे अपने ममत्व भरे मार्गदर्शन से अनेकों परिजनों को अपना बनाकर लौटे वह लौटते हुए उनने कल्पना कर ली कि देव संस्कृति के मूल स्वरूप से जब तक प्रत्येक भारतवासी को, प्रवासी नागरिकों को एवं विश्व वसुधा पर बसने वाले हर व्यक्ति को अवगत नहीं कराया जाता तब तक वे अज्ञान के अंधकार में ही भटकते रहेंगे। भोगवादी जीवन ही जहाँ सब कुछ है, नास्तिकतावादी तत्वदर्शन जहाँ हावी होता जा रहा हो, वहाँ भारतीय संस्कृति की आस्थावादी मान्यताओं का पहुँचना जरूरी है यहीं से शुभारंभ हुआ वह अभियान जो एक शोधग्रन्थ के रूप में 1975 में “समस्त विश्व को भारत के अजस्र अनुदान” के नाम से साकार हो कर गायत्री तपोभूमि से प्रकाशित हुआ। इस ग्रन्थ से इस महामनीषी का युग द्रष्टा व विचारक वाला वह स्वरूप परिलक्षित होता है जिसमें मानव मात्र के उत्थान के लिए पीड़ा दिखाई देती है व सभी को दयनीय स्थिति से उबारने हेतु किये जा सकने वाले प्रयासों की प्रेरणा के दर्शन होते हैं। भारतीय संस्कृति चिरकाल से विश्वमानव की सेवा करती रही है व उन्हीं आदर्शों को आधार बनाकर पुनः वह कार्य संपन्न करती रह सकती हैं, इसका प्रत्यक्ष मार्गदर्शन इस देवदूत द्वारा इसमें किया गया है।
अब तक न जाने कितने भारत माँ के सपूत पिछली दो सदियों ने भारत से बाहर जा कर बस गए, पर उनकी खोज खबर किसी ने नहीं ली, न उनको सुनियोजित दिशा देने का प्रयास किया। बुद्धि की दृष्टि से कुशल एवं भावनाओं की दृष्टि से संपन्न इन प्रवासियों का अधिकांश धर्म गुरुओं ने दोहन ही किया, उन्हें उनके मूल स्वरूप का बोध कराके मार्गदर्शन नहीं दिया। विवेकानन्द एवं रामतीर्थ के बाद गिने चुने व्यक्ति ही ऐसे पहुँच पाये जो वहाँ के विलास प्रधान, भोगवादी स्वरूप से अप्रभावित रह अपनी संस्कृति के रंग में विदेशियों को रंग सके। प्रस्तुत ग्रन्थ इन महामानवों के पुरुषार्थ के बाद किया गया एक ऐसा लेखनी का तप कहा जा सकता है जिसका उद्देश्य था देवमानवों के अंदर से उनका ब्राह्मणत्व जगाया जाय, उन्हें उनकी गरिमा का बोध कराके उन महान परम्पराओं से परिचित कराया जाय जो समस्त संसार का कभी भला करती थीं व आगे भी करती रहेंगी।
अपनी पुस्तक की भूमिका में उनने लिखा कि “भारतीय कभी नर पशु नहीं रहे। वे क्षुद्र स्वार्थों के लिए न तो कभी जिये हैं और न मरे खपे हैं। जन्मघुट्टी में ही उनको मानवीय कर्तव्यों को अपनाने की और उसके लिए बढ़ चढ़ कर त्याग बलिदान करने की शिक्षा पिलाई जाती है। वे पेट और परिवार की नहीं, आदर्शों की रक्षा करने एवं समस्त संसार से पीड़ा एवं पतन को निरस्त करने के लिए अपने चिन्तन और कर्तव्यों को नियोजित रखते थे। इस देवोपम रीति नीति को अपनाकर वे आत्मिक विभूतियों से और भौतिक समृद्धि से भरे पूरे बन सके, साथ ही अपना तथा समस्त संसार का भला कर सके। यही है हमारी साँस्कृतिक पुण्य परम्परा पूर्वजों की विरासत और गौरव गरिमा की आधार शिला, जिसके माध्यम से हमें पूरे भावावेश और प्रचण्ड पुरुषार्थ के साथ अपनी नवोदित सत्ता की प्राण प्रतिष्ठा करनी है।
प्रस्तुत पंक्तियाँ एक प्रकार का शंखनाद है जिसके माध्यम से युग निर्माण योजना के अंतर्गत संसार भर को मानवीय संस्कृति का सन्देश सुनाने तथा वैसी ही गतिविधियाँ अग्रसर करने की प्रेरणा दी गयी। इस पुस्तक में विश्व के कोने कोने में संव्याप्त भारतीय सभ्यता, विभिन्न भारतीय संस्कृति के अवशेष चिह्नों की जानकारी तथा अमेरिका यूरोप से लेकर रूस, जापान, कोरिया, दक्षिण पूर्व एशिया से सम्पन्न महान कर्तृत्व की बड़े विस्तार से व्याख्या की गयी है। इस शोध ग्रन्थ में अंत में प्रवासी भारतीयों की वर्तमान स्थिति, विदेशों में भारतीयता प्रेमी संगठनों की जानकारी तथा भारतीय तत्वज्ञान को विश्वव्यापी कैसे बनाया जाय, यह मार्गदर्शन है। इस ग्रन्थ ने प्रबुद्ध वर्ग में न केवल अच्छी खास ख्याति प्राप्त की, सभी अखण्ड ज्योति पाठकों को अपने गौरवमय अतीत की झाँकी भी करा दी। यही पुस्तक प्रवासी परिजनों के लिए भावी मार्गदर्शन का आधार भी बनी। अब इसे हिन्दी व अंग्रेजी में पुनः प्रकाशित किया।
मात्र हिन्दी व गुजराती तक सीमित रहने से मिशन का कार्य क्षेत्र फैल नहीं सकता था। अतः इस पुस्तक के प्रकाशन के दो वर्ष बाद एक योजना बनी जिसमें पत्रिका अथवा पुस्तकें इंग्लिश, तमिल, तेलुगु, बंगाली, गुरुमुखी जैसी पाँच भाषाओं में प्रकाशित किये जाने की योजना बनी। युग शक्ति गायत्री के नाम से ये गुजराती मराठी व उड़िया में पहले ही प्रकाशित हो रही थी। साथ ही प्रवासी भारतीयों के लिए साँस्कृतिक चेतना, गायत्री एवं यज्ञ तथा योग के वैज्ञानिक स्वरूप का परिचय देने वाली तीन छोटी पुस्तिकाएं हिन्दी अंग्रेजी व गुजराती में 1971-80 में प्रकाशित हुई। गायत्री महाविज्ञान के समन्वित तीनों खण्ड तथा पूज्य गुरुदेव की आत्मकथा जो 1958 में लिखी हुई, का अंग्रेजी अनुवाद भी पुस्तक आकार में प्रकाशित हुआ। इन सभी में उपासना, साधना, आराधना से लेकर लोक सेवा संबंधी विशद मार्गदर्शन भी है।
पत्र व्यवहार द्वारा समय समय पर प्रवासी भारतीयों व उनके संपर्क में आने वाले वहाँ के नागरिकों को मार्गदर्शन देते रहने का एक क्रम चल पड़ा व अब कार्यकर्ताओं के समूह सुनियोजित ढंग से प्रशिक्षण हेतु यहाँ बुलाने तथा यहां से दो या तीन लोकसेवी, निस्पृह परिव्राजक स्तर के उच्चशिक्षित कार्यकर्ता सतत् भेजे जाते रहने की योजना पूज्य गुरुदेव अपने सामने बनाकर गए हैं।
पूज्य गुरुदेव का संकल्प है कि युगसन्धि के शेष दस वर्षों में उनका संदेश विश्व के जन जन तक पहुंचे इस के लिए विश्व की अन्यान्य भाषाओं में साहित्य का अनुवाद होते रहने की प्रेरणा वे सूक्ष्म शरीर से प्रतिभाशालियों को देते रहेंगे। फ्रेंच व रशियन में यह कार्य आरंभ हो चुका है। विश्व में
ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान के सत्र चल रहे थे विज्ञान, दर्शन विद्या के कई विशेषज्ञों ने जो मिशन के कार्यकर्ता भी थे, उसमें भाग लिया था। सूत्र समापन पर पूज्य गुरुदेव का अन्तिम प्रवचन हुआ जिसमें समस्त संकल्पनाओं पर प्रकाश डाला तथा इस पुनीत कार्य हेतु समर्पित कार्यकर्ताओं का आह्वान किया गया था। अगले ही दिन सत्र में आए एक रसायन शास्त्र के पोस्ट ग्रेजुएट ऊपर गुरुदेव से आज्ञा लेने जा पहुँचे। बोले कि “यहीं रहकर काम करना चाहता हूँ।” बार बार अपनी योग्यता की रट लगा रहे थे। गुरुदेव ने सारी बात सुनकर एक ही बात पूछी। “तुम क्या काम करोगे ब्रह्मवर्चस् में?” उत्तर आया- “मैं तो उपकरणों पर काम करूंगा। निदेशक महोदय के साथ काम कर उनको सहयोग दूँगा”। गुरुदेव ने पूछा “कभी झाडू लगानी पड़े। प्रयोगशाला की सफाई करनी पड़े। पखाने की धुलाई करनी पड़े तो कर सकोगे?” उत्तर आया यह काम तो कोई भी नौकर कर लेगा। मैं तो वैज्ञानिक हूँ।” कड़े शब्दों में गुरुदेव बोल उठे जो “स्वयं सेवक बन सके, वही मेरा प्रिय परिजन बन सकता है। जाओ तुम नौकरी करो। तुम्हारे अन्दर लोकसेवा के संस्कार जाग जाएं तब आना”। यह थी इनकी मूल्याँकन की कसौटी।
बड़ी विनम्रता से गुरुदेव स्वीकार करते हैं कि सुव्यवस्था एवं आश्रम दिनचर्या का शिक्षण जो उन्हें बापू के साबरमती आश्रम में प्राप्त हुआ, वह वे जीवन भर नहीं भूलते व यही उपदेश आजीवन सभी को देते रहेंगे कि व्यवस्था बुद्धि के विकास द्वारा छोटी छोटी बातों से शिक्षण लेते हुए ही व्यक्ति प्रगतिपथ पर बढ़ सकता है। वे साबरमती आश्रम में थे। 1935-36 की बात हैं प्रातः दातौन तोड़ी तो जार बड़ी टूट गई। फिर दातौन कर उसे जब वे नाली में फेंकने जा रहे थे, मीराबेन ने देख लिया। तुरन्त हाथ पकड़कर समझाया कि “तुमने दो व्यक्तियों के बराबर दातौन की डाली तोड़ कर एक का हम छीना, दूसरे उसे कचरे में फेंक कर बर्बाद भी कर रहे हो। इसे अच्छी तरह धोकर सूखने डाल दो। सूख जाने पर जलावन के काम आएगी।”
छोटी सी बात किन्तु इसने उन्हें मथकर रख दिया। बाद में जब भी आश्रम में व्यवस्था की बात चलती तो इसका हवाला देते व कहते कि इन्हीं सूत्रों से सुव्यवस्था निभ सकती है। जन जन के पैसों से बना यह आश्रम तभी अस्तित्व बनाए रखेगा जब तुम अपनी सूक्ष्म व्यवस्था बुद्धि ऐसी ही विकसित कर लोगे।
प्रायश्चित के तीन चरण है सच्चे मन से पश्चाताप, भविष्य में वैसा न करने की प्रतिज्ञा और जितनी हानि पहुँचाई गई है उसकी क्षति पूर्ति।
प्रशंसा एक प्रकार की अफीम है। जिसकी खुमारी में मनुष्य यह भूल जाता है कि अभी और भी कुछ करना शेष है।
भक्त जिसे भगवान कहते हैं। योगी जिसे ब्रह्म और वेदांती आत्मा वह एक ही तत्व है। कहने भर के लिए पृथक् शब्दों का प्रयोग होता है।
प्रेम का अमृत पिला जो, सींचता था स्नेह जल से। आज वो ही स्रोत सूखा देख, मन मुरझा रहा है॥ तड़पते दिल, रो रही हर आँख, उर है छलछलाया। ज्योति हो शाश्वत भले ही, किंतु तुम तो छा रहा है॥1॥
होश आया तो मनुजता, छटपटाती रो रही थी। संस्कृति अध्यात्म की गरिमा, युगों से सो रही थी॥ वेदना थी पा रही पीड़ा, जगत के ताप से। जर्जरित छाती घुटन, दुःख शोक के अभिशाप से॥
तड़प जागी मोम से दिल में, भ्रमित जग के लिए। विश्व माली का बगीचा, सूखता क्यों जा रहा है॥2॥
लोक हित में दीप बनकर, फिर अहर्निश वह जला। लहलहाने विश्व उपवन, बीज बन कर खुद गला॥ सघन तम की चोर छाती, फिर अखण्ड ज्योति जली। और युग निर्माण करने, योजना नूतन चली॥
रात दिन, हर पल घड़ी हर, साधना करता रहा है। कह उठ जग क्रान्ति करने, फिर मसीहा आ रहा है॥3॥
प्यास पाई प्यार हृदय की यादें, मातृवत् उर से लगाया। घाव यदि देखा हृदय में, हाथ से मरहम लगाया॥ थाम अंगुली फिर तुम्हीं ने, तो हमें चलना सिखाया। लड़खड़ाते पैर तो कंधे पकड़, तुमने उठाया॥
काल ने ऐसे निकटतम से, हमें बिछुड़ा दिया है। सोच कर ही डूबता दिल, सामने वह आ रहा है॥4॥
अब समय, अनुदान की कीमत चलो हम भी चुकाएं। राह जो तुमने दिखाई, दृढ़ चरण उस पर बढ़ाएं॥ दे रहे हम आज श्रद्धा, रूप में सक्रिय समर्पण। अब तुम्हारे लक्ष्य में ही, है सदा ये प्राण अर्पण॥
ज्योति जो तुमने जलाई, वह नहीं हरगिज बुझेगी। जा हर परिजन यही, सौगंध पावन खा रहा है॥5॥
मनुष्य और कुछ नहीं, मात्र भटका हुआ देवता है।
आँख से झरता नहीं जल, हृदय में धन छा रहे हैं बरसना है मना फिर भी, अतल में गहरा रहे है॥
रह गया कुछ-जो नहीं तब, सामने हम कह सके थे। आज उसको प्राण जाने क्यों, स्वतः दुहरा रहे है॥
ज्वार ही आये हृदय में, धैर्य का भाटा न बैठा। प्राण फिर भी स्मृति का, मंथन किये ही जा रहे है॥
इस सफर में लक्ष्य तक तुम, साथ हो प्रेरक हमारे। बस इसी विश्वास पर पग, थक नहीं ये पा रहे है॥
है हमारे हृदय घायल, दे रहे आश्वस्ति फिर भी। कर रहे हम काम, पीड़ा को सयत्न दबा रहे है॥
खोलकर साँकल नये युग की, चले तुम गये गुरुवर। बैठने रहने के काबिल, हम उसे करवा रहे है॥
थे सामने तो लखकर, खिलता था कमल मन में। लेकिन सुदूर जाकर, मधु गंध बन गये हो॥
सुख, दुख सभी क्षणों में, संवेदना पिलाई। ठोकर अदृश्य भी तुम, मधु छंद बन गये हो॥
थे मने तो मन यह, दर्शन ही चाहता था। प्रभु! किन्तु दूर जाकर, उरस्पंद बन गये हो॥
दस लाख साथियों के, मन-प्राण में बसे हो। कुछ महारास जैसे, नंद नंद बन गये हो॥
“सत” का सबक पढ़ाया, “चित” में हुए समाहित। रख सूक्ष्म रूप गुरु! “आनन्द” बन गये हो॥
ईश्वर से मिलने निवेदन करने का सबसे निकटवर्ती स्थान अपना अन्तःकरण ही है।
अध्यात्म और विज्ञान का समन्वय कर दोनों के शाश्वत स्वरूप का सरल, सुबोध प्रस्तुतीकरण एवं वैज्ञानिक गवेषणाओं आधुनिकतम यंत्रों के माध्यम से प्रमाणीकरण एक ऐसा युग पुरुषार्थ है, जिसके सम्पादन पर पूज्य गुरुदेव को इस युग का सब से बड़ा मनीषी वैज्ञानिक, दार्शनिक सिद्ध किया जा सकता है। वे स्वयं एक जीती जागती प्रयोगशाला के रूप में चुनौती भरा जीवन जीते रहे। अध्यात्म साधनाएँ पूर्णतः विज्ञान सम्मत है; यह उनने अपने जीवन के माध्यम से प्रमाणित किया। ब्रह्मवर्चस् सम्पन्न आचार्य श्री के अनेकानेक कर्तव्यों में, उनकी 80 वर्ष की जिन्दगी की महत्वपूर्ण उपलब्धियों से जड़े हीरक मालाओं के हार में एक हीरा और जुड़ता है- वैज्ञानिक अध्यात्मवाद की परिकल्पना, उस दिशा में आवश्यक दार्शनिक शोध कर युग साहित्य का प्रस्तुतीकरण तथा एक अत्याधुनिक प्रयोगशाला एवं दुर्लभ ग्रन्थों से सज्जित “ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान” की स्थापना।
इसकी शुरुआत काफी पहले से हो चुकी मानी जानी चाहिए। पूज्य गुरुदेव ने अपने प्रथम “अखण्ड ज्योति” अंकों के साथ सन् 1940 के दशक में ही अध्यात्म मान्यताओं के वैज्ञानिक प्रस्तुतीकरण कार्य आरम्भ कर दिया था। “मैं क्या हूँ” जैसे गूढ़ दार्शनिक विषय पर मनोविज्ञान को आधार बनाकर उनने प्रतिपादित किया था कि व्यक्ति जैसा चाहे, स्वयं को बना सकता है। इस के लिए उसे “ऑटोसजेशन” की तकनीक का आश्रय लेना होगा जो कि मूलतः ध्यानयोग है। बाद में उनने 1947 में दो विशेषांक “वैज्ञानिक अध्यात्मवाद” पर ही प्रकाशित किए, साथ ही एक पुस्तक भी सद्ज्ञान ग्रन्थमाला की इसी विषय पर प्रकाशित की। यह वर्ष था जब भारतवर्ष परतंत्रता के बन्धनों से मुक्त होने जा रहा था। धर्म और अध्यात्म भी मूढ़मान्यताओं, अंधविश्वासों, सड़ी गली परम्पराओं के आवरण में जकड़े किसी देवदूत के द्वारा अपनी मुक्ति चाहते थे ताकि वे नवीन समाज की संरचना का आधार खड़ा कर सकें। उन्हें इस पाश से मुक्त कर विज्ञान का कलेवर प्रदान करने का श्रेय पूज्य गुरुदेव को ही जाता है।
उन दिनों आस्तिकता, तत्वदर्शन, साधना, संयम जैसे विषयों को वैज्ञानिक ढंग से समझाते, हुए उनने उपासना विधियों की उपयोगिता को सुबोध शैली में समझाया। पहली बार जनसाधारण के सम्मुख ऐसा प्रतिपादन आया, जिससे वे प्रेरणा ले सकें कि अध्यात्म मात्र शास्त्र वचन ही नहीं हैं, पूर्णतः उसका पूरा आधार विज्ञान सम्मत भी है। बाद की अखण्ड ज्योति के अंकों में वे शब्द शक्ति की महत्ता, गायत्री के चौबीस अक्षरों का वैज्ञानिक विवेचन, यज्ञ विज्ञान के महत्वपूर्ण पक्षों तथा कुण्डलिनी महाशक्ति के विज्ञान सम्मत आधार पर लिखते रहे। यह क्रम 1967-68 तक चला।
यह समय आते आते उन्हें ऐसा लगा कि अब प्रबुद्ध वर्ग में अखण्ड ज्योति की गहरी पैठ हो चुकी है व प्रबुद्ध पाठक उनके प्रतिपादनों को पसंद कर रहा है। उनने अनुभव किया कि यदि वे इस प्रतिपादन से भरी पूरी और सामग्री अखण्ड ज्योति के पृष्ठों पर देते रहे तो वह वर्ग, जो अध्यात्म साधनाएँ, धर्म-धारणा, कर्मकाण्ड, प्रतीक उपासना आदि नामों से ही कतराता रहा है अथवा मन में उनके संबंध में भ्रान्तियाँ पाले हुए है, भी उनकी बात समझकर इस आलोक का विस्तार कर सकेगा।
इस कार्य के लिए वे श्रेय उन्हीं को देना चाहते थे, उन्हें ही निमित्त बनाना चाहते थे जो विज्ञान की विधाओं से जुड़े थे। अखंड ज्योति पाठक वर्ग में विज्ञान पढ़ने पढ़ाने वाले अध्यापकों की कमी नहीं थी। उनके ही संपर्क में चिकित्सक, इंजीनियर, भौतिकी आदि के ऐसे विशेषज्ञ विद्वान भी थे जिनका चिन्तन प्रत्यक्षवाद, बुद्धिवाद प्रधान था। कहना न होगा कि यही चिन्तन आस्था व श्रद्धा की काट अपने अस्त्रों से करता आ रहा है। पूज्य गुरुदेव ने उन्हीं अस्त्रों को प्रयोग अपने उद्देश्य की पूर्ति हेतु किया।
अपनी निराली शैली में उनने दो सौ चुने हुए विज्ञान की विभिन्न विधाओं से जुड़े व्यक्तियों को बसंत पर्व 1968 पर पत्र लिखें कि वे उनके माध्यम से अखण्ड ज्योति के लिए मानव मात्र के कल्याण के लिए आ चुके इस उत्तरार्ध में भी विज्ञान विषय का अध्ययन करना चाहते हैं। उन सभी रसायनशास्त्र, जैविकी, मनोविज्ञान, भूगोल, अंतरिक्ष विज्ञान, आणविक भौतिकी, वैद्युतिकी, भूगर्भशास्त्र, नृतत्वविज्ञान, समाजशास्त्र जैसे विषयों पर विशद विवेचना करने वाले नोट्स मंगाए गये थे। विषय का खुलासा उनने अखण्ड ज्योति में प्रकाशित अपने उद्बोधन में कर दिया था कि “विज्ञान और बुद्धिवाद की मान्यताओं ने मानवीय आदर्शवादिता को गहरा आघात पहुँचाया है और साँस्कृतिक मूल्यों के विनाश का गहरा संकट आ खड़ा हुआ है। जड़ परमाणुओं से चेतना जन्म लेती हैं, मानवीय अस्तित्व एक संयोग मात्र है, आत्मा का स्वतंत्र कोई अस्तित्व नहीं- शरीर के साथ ही जीवन समाप्त हो जाता है, कर्मफल की दण्ड व्यवस्था नाम की किसी चीज का अस्तित्व है नहीं, प्रकृति प्रेरणा का अनुसरण ही जीव का स्वाभाविक धर्म है, कामवृत्ति की तृप्ति आवश्यक है, उसे रोकने से कांप्लेक्सेस पैदा होते हैं व माँसाहार विज्ञान सम्मत है, किसी की पीड़ा का कोई महत्व नहीं- इन प्रतिपादनों ने मनुष्य को बंदर से विकसित हुआ एक नर पशु मात्र बना दिया है। नैतिक और सामाजिक उच्छृंखलताओं का कारण यही आस्था संकट है। इससे जूझने के लिए विज्ञान के अस्त्रों का ही प्रयोग करना होगा। नोट्स इसी आधार पर मंगाये गये थे। प्रत्येक विषय की विशद गूढ़ सामग्री से भरे फुलस्केप पन्नों पर लिखे नोट्स मथुरा आने लगे। लगभग बीस हजार से अधिक पन्ने विभिन्न विषयों पर एकत्रित हो गए।
यह एक अनसुलझी गुत्थी है कि कब कैसे उन सभी नोट्स का अध्ययन किया गया होगा क्योंकि कुछ ही माह बाद सभी ने देखा कि अखण्ड ज्योति की प्रतिपादन शैली धारदार तर्कों द्वारा आस्तिकता के तत्वदर्शन की काट करने वाले पक्षों पर एक दूसरा ही विवेचन प्रस्तुत करने लगी थी। सभी आधार विज्ञान सम्मत थे व लगने लगा था कि अभी तक सोचा जा रहा ढर्रा गलत था। 1969 में प्रकाशित कुछ लेखों के शीर्षक दृष्टव्य हैं लोकोत्तर जीवन विज्ञान-भूत भी, धर्मरहित विज्ञान हमारा विनाश करके छोड़ेगा, बिन्दु में समाया सिन्धु नास्तिक दर्शन पर वैज्ञानिक आक्रमण, आत्मा के अस्तित्व का प्रमाण-भूत, परलोक और पृथ्वी-कितने दूर कितने पास, जीवकोषों के मन और मानसोपचार, अन्तरिक्ष के सूक्ष्म शक्ति प्रवाह इत्यादि।
पूज्य गुरुदेव की लेखनी से उद्भूत इन सरस प्रतिपादनों को पढ़कर वैज्ञानिक वर्ग को, बुद्धिजीवी वर्ग को लगा कि अध्यात्म तो प्रगतिशील है, विज्ञान सम्मत है। अभी तक की उनकी सारी मान्यताएँ धराशायी हो रही थीं। इस बीच गुरुदेव के दौरे जहाँ जहाँ हुए वहाँ मेडिकल कॉलेज, पी.जी. कॉलेज, ऑडिटोरियमों में उनने प्रत्येक स्थान पर बुद्धि जीवियों को संबोधित कर उनको इस आँदोलन में सम्मिलित होने का आह्वान किया। एक नया वर्ग देखते देखते जुड़ता चला गया व पूज्य गुरुदेव की शान्तिकुँज में आरम्भ की गयी सत्र श्रृंखला में बड़ी संख्या में दर्शन एवं विज्ञान विषय की विभूतियाँ सम्मिलित होकर स्वयं को धन्य मानने लगी। परलोक, पुनर्जन्म, कर्मफल अतीन्द्रिय सामर्थ्य, सिद्धियाँ, साधना उपचार, कुण्डलिनी अष्टचक्र, अंतरंग में विद्यमान विराट संभावनाएं मंदिर-मूर्ति-शिखा सूत्र-तिलक-संख्या-पूजा अग्निहोत्र जन-व्रत आदि का वैज्ञानिक प्रस्तुतीकरण हजारों ऐसे व्यक्तियों को खींचकर प्रज्ञापरिवार में सम्मिलित कर रहा था जो पहले इन नामों से बिदकते थे।
“वैज्ञानिक अध्यात्मवाद” की इस नई चिन्तन धारा ने 70 से 90 के दो दशकों में पूरे भारत व विश्व में एक व्यापक उथल पुथल मचाई एवं शोध का एक नया आयाम ही खोल दिया। साधना का वैज्ञानिक स्वरूप प्रस्तुत कर पूज्य गुरुदेव ने अनेकों बुद्धिजीवियों को प्राण प्रत्यावर्तन जीवन साधना, साधना स्वर्ण जयन्ती, कुण्डलिनी जागरण, उच्चस्तरीय गायत्री साधना सत्रों में सम्मिलित कर उनका आत्मबल बढ़ाया व इस योग्य बनाया कि वे आस्था संकट से मोर्चा ले सके॥ इस लिए सभी प्रतिपादनों का सारगर्भित पहला संकलन 1978-79 में 42 पुस्तकों के एक सेट के रूप में तथा दूसरा संकलन 1984-85 में 25 पुस्तकों के एक सेट के रूप में प्रकाशित हुआ।
सबसे महत्वपूर्ण स्थापना 1978-79 में हुई जब उनने कणाद ऋषि की तपःस्थली में भागीरथी के तट पर ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान की स्थापना की। शांतिकुंज से लगभग आधा किलोमीटर दूरी पर विनिर्मित यह संस्थान स्वयं में अनूठा है। यहाँ बौद्धिक अनुसंधान व वैज्ञानिक प्रयोग परीक्षण का क्रम जून 79 से आरंभ हुआ। नवयुग के अनुरूप तत्वदर्शन के निर्माण हेतु युग मनीषी का आह्वान किया गया एवं दुर्लभ ग्रन्थों से भरा एक ग्रंथालय विनिर्मित हुआ जिसमें विज्ञान व अध्यात्म के समन्वयात्मक प्रतिपादनों पर खण्डन व मण्डन करने वाले दोनों ही पक्षों की विभिन्न विषयों की पुस्तकों एवं पत्रिकाओं अनुसंधान निष्कर्षों तथा शोध ग्रन्थों का विश्वभर से संकलन किया गया। उद्देश्य एक ही था विज्ञान की सहायता से श्रेष्ठता के समर्थन एवं भविष्य निर्माण के लिए सुदृढ़ आधार खड़े करना। युग परिवर्तन के नये आयाम तलाश करने के लिए भविष्य विज्ञान, सर्वधर्म समभाव एवं देव संस्कृति पर शोधकार्य भी इसी के साथ हाथों में लिए गये। अपने ही परिवार में से उच्च शिक्षित पदार्थ विज्ञान, चिकित्साशास्त्र एवं अन्यान्य विधाओं में निष्णात ऐसे नररत्न निकल कर आ गए जिनने स्थायी रूप से यहीं रहकर अथवा कुछ समय नियमित रूप से इस कार्य के लिए देते रहने का संकल्प लिया। दार्शनिक शोध का क्रम चल पड़ा एवं दिसम्बर 1979 व जनवरी 1980 में आयोजित तीन सत्रों में बुद्धिजीवी वर्ग चिन्तन को पूज्य गुरुदेव ने भलीभाँति मथा।
प्रत्यक्ष प्रमाणों की प्रस्तुति प्रयोगशाला की आवश्यकता और थी जहाँ यह प्रतिपादित किया जा सके कि अध्यात्म उपचारों को अपनाने से काया की जीवनीशक्ति बढ़ती है, मनोबल व आत्मबल में वृद्धि होती है। तनाव का शमन होता है। एवं रोगों के होने की संभावनाएं समाप्त हो जाती है। चिकित्सा वान, मनोविज्ञान एवं पदार्थ विज्ञान को सम्मिलित एक ऐसी प्रयोगशाला 1984 तक बनकर खड़ी हो गई जिसमें कल्प साधकों, युगशिल्पी साधकों तथा आहार नियमन, जप-अनुष्ठान, वर्णों का अध्यापन, नादयोग, त्राटक आदि सम्पादित करने वाले व्यक्तियों पर प्रयोग परीक्षण आरंभ हो गए। गायत्री मंत्र की शब्द शक्ति एवं यज्ञ के रूप में पदार्थ की कारण शक्ति की शोध इस संस्थान की निराली विशेषता है। अन्यान्य विषयों पर तो अनुसंधान अब विश्व की कुछ प्रयोगशालाओं में आरंभ भी हो चुके है किन्तु मंत्रशक्ति की प्रभावोत्पादकता, ध्वनि वान का विश्लेषणात्मक अध्ययन एवं यज्ञ की भौतिकीय व रासायनिक आधार पर विशद विवेचना संभवतः इसी संस्थान की विज्ञान जगत को देन है।
गैस लिक्विड क्रोमेटोग्राफी, फ्रैक्शनल डिसटिलेशन एवं साल्वेन्ट एक्सट्रैक्शन के माध्यम से यहाँ वनौषधियों की गुणवत्ता की प्रमाणित की जाती है। व यह भी बताया जाता है कि उनका सूक्ष्मीकृत रूप में चूर्ण, क्वाथ-फाण्ट या वाष्पीभूत अग्निहोत्र धूम्र के रूप में प्रयोग समग्र स्वास्थ्य के लिए लाभकारी (होलिस्टिक हीलिंग) है। मंत्रों के उच्चारण व श्रवण का शरीर के अंग-प्रत्यंगों पर क्या प्रभाव पड़ता है तथा विभिन्न वर्णों (स्पेक्ट्रम के सात रंग) व प्रकाश ज्योति का ध्यान किस तरह से शरीर की विद्युत को प्रभावित कर उसे सुनियोजित करता है, इसे मल्टीचैनेल पॉलीग्राफ, बायोफीडबैक, इलेक्ट्रोएन के फेलोग्राफी, इलेक्ट्रोकार्डियोग्राफी, तथा साइकोमेट्री के उपकरणों से देखा-परखा जाता है। रक्त के श्वेतकण व विभिन्न हारमोन्स, एन्जाइम्स, जीवनीशक्ति बढ़ाने वाले द्रव्यों तथा फेफड़ों की रक्त शोधन प्रक्रिया को प्राणायाम, आसन, मुद्राएं बन्ध ध्यान तथा आहार संयम कैसे प्रभावित करते है, इसके लिए यहाँ स्पेक्ट्रोफोटोमीटर, इलेक्ट्रोफोरेसिस ऑटोएनालाईजर, स्पायरोमेट्री आदि के प्रयोग परीक्षण होते है। सारे यंत्रों का विश्लेषण कम्प्यूटर्स द्वारा किया जाता है।
अभी तक संपन्न शोधकार्य एवं पूज्य गुरुदेव द्वारा निर्देशित भावी शोध संकल्पनाओं को शीघ्र ही पुस्तकाकार एवं बुलेटिन के रूप में प्रकाशित करने की योजना है ताकि जन जन तक यह जानकारी पहुँच सके कि अध्यात्म साधनाओं का अवलम्बन घाटे का सौदा नहीं व जो लाभ होता है वह पूर्णतः वान सम्मत है, प्रत्यक्षवाद की कसौटी पर प्रमाणित किया जा सकता है। देवसंस्कृति के निर्धारण मात्र कपोल कल्पना नहीं है वरन् तथ्यों पर आधारित है, यह देखकर नयी पीढ़ी, बुद्धिवादी समुदाय को भी आश्वासन मिलेगा कि एक ऐसा संस्थान है जो मात्र इसी कार्य को समर्पित है।
पूज्य गुरुदेव ने सतयुग कालीन ऋषि श्रेष्ठों की तरह से जो वैज्ञानिक भी हुआ करते थे समय समय पर 1984 तक स्वयं ब्रह्मवर्चस जा जाकर व तत्पश्चात शोधकर्ताओं का मार्गदर्शन कर एक ऐसा सुदृढ़ आधार खड़ा कर दिया है कि दार्शनिक विवेचनाओं एवं वैज्ञानिक आँकड़ों के माध्यम से वह सारा प्रतिपादन अब प्रस्तुत करना संभव है जो नव युग की आधार शिला रखेगा। विज्ञान व अध्यात्म का समन्वय एक समुद्र मंथन के समान इस युग में संपन्न हुआ पुरुषार्थ कहा जा सकता है। समुद्र मंथन से निकले चौदह रत्नों की तरह इस शोध-अनुसंधान से उद्भूत निष्कर्ष आने वाले समय में जन-जन का मार्गदर्शन करेंगे, जीवन जीने की शैली दिखायेंगे तथा उज्ज्वल भविष्य का पथ प्रशस्त करेंगे।
पूज्य गुरुदेव स्वयं को कलम का सिपाही एक विनम्र लोकसेवी तथा ऋतम्भरा प्रज्ञा के आराधक कहते रहे। यह सब तो उनके जीवन का अंग है।
किन्तु इन सबसे भी कुछ अधिक व सशक्त रूप में स्वयं “वर्चस” सम्पन्न एक ऐसे “ब्रह्मर्षि” का जीवन उनने जिया जिसे एक अन्वेषक तत्वदर्शी या वैज्ञानिक मनीषी द्वारा जिया माना जाना चाहिए। ब्रह्मवर्चस् उस तत्वदर्शन की शोध का उत्तरार्ध है जो उनने स्वयं चौबीस लक्ष के चौबीस गायत्री महापुरश्चरण कर अपनी काया में जीवन के प्रारंभिक काल में आरंभ की थी। दृश्य रूप में तो उत्तरार्ध का पटाक्षेप हो गया है, प्राणों का महाप्राण में विसर्जन हो चुका है किन्तु उनकी परोक्ष सामर्थ्य शीघ्र ही शोध निर्धारणों को विश्वमानस के समक्ष प्रतिष्ठित करेगी।
अध्यात्म का उद्देश्य तत्वज्ञान की विवेचना करना भर नहीं, जीवन परिष्कार का व्यावहारिक मार्गदर्शन करना भी है।
सुसंस्कृत परिवार उन निर्झरों जैसे हैं जो अपनी शोभा और सरसता से प्रसन्नता का वातावरण बनाते और हरीतिमा उगाते हैं।
नम्रता अर्थात् उच्चस्तरीय समर्थता। इसमें तनने की क्षमता, जीतने की कला और पराक्रम की पराकाष्ठा सन्निहित है।
लोग रोते हुए जन्मते, शिकायतें करते हुए जीते है और पाप की गठरी लाद कर कलपते हुए मरते है।
स्वामी विवेकानन्द कहा करते थे कि छटाँक भर के दिमाग से कहीं रामकृष्ण की अवधारणा हो सकती है? स्वामीजी का कथन गुरुदेव पर भी सौ फीसदी खरा उतरता है। बात 7 दिसम्बर 1989 की है। गुरुदेव अपने ऊपर के आँगन में टहलने हुए पास बैठे एक शिष्य को मनोविज्ञान के कुछ सिद्धान्त स्पष्ट कर रहे थे। यही कोई साढ़े-तीन चार का समय होगा। सिद्धान्तों को भली प्रकार स्पष्ट करते हुए बोले “जानता हे! आजकल शांतिकुंज क्या बन गया हैं?”
सुनकर शिष्य कुछ अचकचा गया उसे हाल में हुए नए निर्माण के बारे में मालूम था। विश्वामित्र की तपस्थली के बारे में भी जानता था। अपनी जानकारियों को उसने कह सुनाया। सुनकर उसके बचकाने पन पर हँसते हुए बोल “अरे यह सब नहीं लड़के! आजकल शांतिकुंज बन गया है- महाकाल का घोंसला।” सुनने वाले की समझ को परखते हुए वह थोड़ा खुलासा करते हुए बोल “धरती पर चल रही महाकाल की विभिन्न गतिविधियों का हेड ऑफिस अब यहीं है।”
सुनने वाले को चकित देख वह हँसने लगे। उसने भी घोंसले के निवासी को प्रणाम किया और चलता बना। उसके दिमाग में गोस्वामी जी की एक चौपाई गूँज रही थी “सो जानइ जेहि देहु जनाई”।
विवेक चूड़ामणि में आचार्य शंकर ने परम सिद्ध को आनन्द का पिटारा कहा है। आनन्द का पिटारा होने का मतलब है बच्चों जैसा निश्छल हंसता-हंसता विनोदी जीवन। जिन्हें भी उनके निकट आने का सौभाग्य मिला उनके हंसी के फव्वारों से नहाए बिना न रहे होंगे। ऐसे ही एक दिन गुरुदेव तपोभूमि में दो कार्यकर्ताओं के साथ बैठे हुए। इनमें से एक कार्यकर्ता को लम्बी दाढ़ी बढ़े हुए बाल रखने का शौक था। तिलक लगाने, पीत वस्त्र धारण करने पर उनकी शोभा किसी महन्त से कम न होती थी। वार्तालाप का क्रम चल ही रहा था कि एक व्यक्ति ने अन्दर प्रवेश किया। इन तीनों के पास पहुँचकर बोला मुझे गुरुजी से मिलना है।
गुरुजी हंसते हुए बोले-पहचान लो गुरुजी को इन्हीं तीन में कोई गुरुजी है। आगन्तुक थोड़ी देर तक इधर-उधर देखता रहा। फिर लम्बी दाढ़ी वाले कार्यकर्ता के चरणों में माथा रख दिया। बेचारे कार्यकर्ता भौंचक्के हो समझाने लगे कि गुरु जी मैं नहीं वह रहे इधर वह सारे तमाशे को देख हंसते हुए कह रहे थे “बहकावे में आकर गुरु के चरणोँ को मत छोड़ देना यही गुरु जी हैं।” आसपास कुछ और लोग आ गए। बड़ी देर तक वातावरण में ठहाके गूँजते रहे। काफी देर बार आने वाले को असली गुरु जी का पता चला वह भी उनकी बालवत् हंसी देख मुग्ध हो गया।
शब्द सक्रिय होते है और निष्क्रिय भी इनकी सक्रियता के लिए वाक्य व्यंजना व्याकरण कौशल नहीं, चाहिए बोलने वाले के व्यक्तित्व की प्राण ऊर्जा। जिसके बिना सभी कुछ निष्क्रिय है! प्रारम्भ से ही गुरुदेव की वाणी ऐसी प्राण ऊर्जा से सनी होती थी। उन दिनों काँग्रेस का आन्दोलन मन्दा पड़ते देख अधिकाँश कार्यकर्ता यहां तक कि वरिष्ठ कहे जाने वाले काँग्रेसी अपना काम धंधा जमाने लगे थे। भू.पू. प्रान्तीय मन्त्री जगन प्रसाद जी रावत ने भी पुस्तकों, मुहर्रिर, एवं स्थान की व्यवस्था करके अपनी वकालत प्रायः शुरू कर दी थी।
एक दिन जब वह ताँगे पर कचहरी जा रहे थे। रास्ते में नवयुवक न्ीराम ने एक क्षण के लिये ताँगा रुकवाया और बोले रावत जी! ऐसे में आप भी वकालत करने लगेंगे तो हम स्वयं सेवकों का क्या होगा? कांग्रेस कहाँ जायेगी? देश के प्रति उनके प्राणों की आकुलता ने सुनने वाले के अन्तःकरण को झकझोर दिया। ठेठ ब्रजभाषा में कहे गये शब्दों ने निर्णय परिवर्तित करा दिया। वकालत का निर्णय परे रख वे पुनः राष्ट्र सेवा में कूद पड़े आगे चलकर सरकार में मंत्री बने। ऐसे थे उनके सक्रिय शब्द। जिनके प्रभाव ने एक दो नहीं लाखों व्यक्तियों के जीवन बदले।
युग का अर्थ होता हैं। एक काल अवधि, एक एरा एक “जमाना”। जिस जमाने की जो विशेषताएं प्रमुखताएँ होती हैं, उन्हें युग के साथ जोड़कर उस काल अवधि को सम्बोधित करते हैं। जैसे ऋषियुग यंत्रयुग, ज्ञानयुग। जब भी युग परिवर्तन की बात कही जाती हैं। तो उसमें उस कालावधि की चपेट में आने वाले पूरे समष्टिगत तंत्र को बदलने से आशय होता हैं। पूज्य गुरुदेव ने जब युग निर्माण की बात कहीं तो यह तो कहा कि यह व्यक्ति निर्माण से होगा, किन्तु उसका पूर्वार्द्ध भी बता दिया युग परिवर्तन अर्थात् इस काल खंड से जुड़े हर व्यक्ति के सोचने के ढर्रे में, रीति-नीति तथा महत्त्वाकांक्षाओं में आमूलचूल परिवर्तन।
यह परिवर्तन कैसे हों? यह एक सर्वाधिक जटिल प्रसंग हैं क्योंकि यह निर्माण से भी दुरूह, समय साध्य एवं कष्टसाध्य प्रक्रिया हैं। विश्वभर में समय समय पर द्रष्टा, मनीषी, भविष्य द्रष्टा जन्मे हैं व उनने तत्कालीन समय को देखते हुए अपनी अंतर्दृष्टि के आधार पर भविष्य के विषय में जो भी कुछ कहा हैं, वह निराश ही करने वाला है। लगता है कि मानव के कृत्यों के कारण महाविनाश की, महाप्रलय की घड़ी निकट आ पहुँची। व्यक्ति संकीर्ण स्वार्थपरता से बाहर नहीं निकल पर रहा, समाज मूढ़ मान्यता से ग्रस्त हैं तथा राष्ट्र युद्धोन्माद में चूर हैं। ऐसी स्थिति को देखते हुए पर्यवेक्षक कहते हैं कि यदि मनुष्य ने अपनी चाल नहीं बदली तो अमर्यादित प्रजनन से लेकर मनोविकार, आवेशग्रस्तता एवं शहरीकरण, औद्योगीकरण से लेकर प्रदूषण, अंतर्ग्रही विक्षोभ, प्रकृति प्रकोप एवं युद्ध ही इस धरित्री को देखते देखते नष्ट कर डालेंगे।
उनका यह मूल्यांकन संव्याप्त परिस्थिति को देखते हुए गलत भी नहीं कहा जा सकता। चारों और अविश्वास, विद्वेष, अलगाववाद पारस्परिक विग्रह सम्प्रदायवाद एवं सत्ता की भोग लिप्सा ही छाई दिखाई देती हैं। दो विश्वयुद्ध एवं 240 छिटपुट युद्ध इसी सदी में हो चुके किन्तु मनुष्य को लड़े बिना चैन ही नहीं मिलता, ऐसा लगता है अब जीवाणु युद्ध, रासायनिक युद्ध कल्पना मात्र तक सीमित नहीं रहे-विभिन्न युद्धों में एक दशक में ही उनका निर्ममतापूर्वक प्रयोग हो चुका हैं। सभी का प्रतिफल एक ही नजर आता हैं, मनुष्य जाति की सामूहिक आत्महत्या की तैयारी।
ऐसी विपरीत व दुर्धर्ष परिस्थितियों में भी कोई एक महामनीषी सबका मनोबल बढ़ाते हुए मूल समस्या को ठीक कर मानव जाति को सही राह पर ले जाने की तथा उज्ज्वल भविष्य लाने की बातें करता हैं तो आश्चर्य तो होता हैं। वह बातें ही नहीं करता एक पूर्व चित्राँकन छोटा संस्करण भी अपने सामने विनिर्मित करता चला जाता हैं, ऐसी सुदृढ़ नींव विनिर्मित करता चला जाता हैं, तो इस दुस्साहस पर विश्वास करने को भी मन करता हैं।
पूज्य गुरुदेव की ही हस्तलिपि में अभी तक अप्रकाशित एक लेख से उनका भविष्य कथन उद्धृत हैं।
ड़ड़ड़ड़
ड़ड़ड़ड़
हम अकेले हैं जो अन्य सभी के कथनों का सम्मान करते हुए इतना भर कहते हैं “उन परिस्थितियों को देखते हुए जिस महाविनाश की संभावना व्यक्त की गई हैं, वह निराधार नहीं हैं। फिर भी इतना निश्चित हैं कि वृत्तासुर, महिषासुर, जैसे दुर्दान्त दैत्य जब निरस्त हो चुके हैं, तो कोई कारण नहीं कि सशक्त क्षमता के रहते वर्तमान विनाश संकट को परास्त न किया जा सके और उसके सर्वथा प्रतिकूल सृजन की नई परिस्थितियाँ न बन सकें। लंका दमन के उपरान्त अविलम्ब धर्म राज्य का सतयुगी वातावरण आ गया था। उसकी पुनरावृत्ति फिर न हो सके, ऐसा कोई कारण नहीं।
यह संकल्प एक ऐसी सत्ता का हैं जो यह मान रही हैं कि परिस्थितियों में बिगाड़ मनुष्य बहुत कर चुका, किन्तु अब सुधार की बारी हैं। हर युग में सतयुग आता रहा हैं तो अब कलियुग, जो अपनी अन्तिम सांसें गिन रहा हैं, क्यों नहीं सतयुग की वापसी के साथ ही पलायन कर युग परिवर्तन को सुनिश्चित करेगा? वस्तुतः यह विधेयात्मक चिन्तन ही इस प्रज्ञापुँज का, ऋषि सत्ताओं की पक्षधर, महाकाल की सत्ता का सर्वाधिक सबल सशक्त पक्ष हैं जिसने लाखोँ प्रज्ञा परिजनों में नये प्राण फूँक कर उन्हें पुनर्जीवित कर दिया। अपनी उलटी चाल बदल कर नये सिरे से सतयुगी ब्राह्मण परम्परा वाली जिन्दगी जीने लगना एक प्रकार से नये जीवन समान ही तो कहा जायगा।
पूज्य गुरुदेव ने जब अखंड ज्योति प्रकाशित की तब द्वितीय विश्व युद्ध चल रहा था। सुदर्शन चक्रधारी श्री कृष्ण उसके मुखपृष्ठ पर आश्वासन देते विराजमान थे। शीघ्र ही भारत को आजादी मिलने जा रही थी। उसके बाद संभावित भारत व्यापी अराजक परिस्थितियों को दृष्टिगत रख साधना अनुष्ठान की महत्ता एवं ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान रूपी गायत्री महापुरश्चरण की आवश्यकता को पत्रिका में प्रतिपादित किया जाने लगा था। इसके बाद सहस्रकुंडीय महायज्ञ 1958 में संपन्न हुआ। व सभी परिजनों को एक सूत्र में आबद्ध कर गायत्री परिवार रूपी संगठन बनाया। इस संगठन के माध्यम से अष्टग्रही योग, भारत-चीन युद्ध (968) भारत-पाक युद्ध (1965) बंगला मुक्ति संघर्ष (1971) आपातकाल (1976) तक गायत्री की उच्चस्तरीय, पंचकोशी तथा, स्वर्ण जयन्ती साधना द्वारा अभयदान देते हुए वे अपनी भूमिका को स्पष्ट करते चले जा रहे थे। उनकी तप साधना भी इसी क्रम से प्रचंड होती होती गयी व उसकी स्थूल परिणति सूक्ष्मीकरण साधना के रूप में 1984 में जाकर हुई इस बीच”महाकाल” और युग प्रत्यावर्तन प्रक्रिया”‘ (1971) नामक एक पुस्तक एवं अखंड ज्योति की लेखमाला (1967) के माध्यम से वे महाकाल के रौद्र रूप व परिजनों को भावी देवासुर संग्राम में अपनी भूमिका समझने व बदलने का संकेत सतत् देते आ रहे थे।
1980 में युगसन्धि का बीजारोपण किया गया तथा युगसन्धि के बीस वर्ष व नवयुग के आगमन की
बेला सन् 2000 के बाद की निर्धारित की गयी। इसी के साथ प्रज्ञा पुरश्चरण का क्रम आरंभ कर दिया गया वह सामूहिक धर्मानुष्ठानों की महत्ता बताते हुए 1983 से 1988 तक एक सुनियोजित क्रम इसका चला। इस बीच शान्तिकुँज में आर्य भट्ट परम्परा के अंतर्गत स्थापित वेधशाला में शोध कार्य चल रहा था। गणना के पूरा होते ही उस स्थान को संस्कारित पावन भूमि मानकर यंत्रों को हटा कर वहाँ बड़े शेड बना दिये गए जहाँ विधिवत् युगसंधि महापुरश्चरण बसंतपंचमी 1989 से आरम्भ कर या गया जो लाखोँ प्रज्ञा परिजनों द्वारा नित्य नियमित रूप से केंद्र एवं पूरे विश्व में एक साथ संपन्न किया जाता है। चूँकि सामूहिक सत्प्रयासों के परिणाम स्वयं पूज्य गुरुदेव ने अपने जीवन में क्रियान्वित एक वैज्ञानिक की तरह प्रस्तुत किये है, इसलिए यह विश्वास सुनिश्चित होता लगता है कि यदि उनके निर्देशों ही के अनुरूप मानव जाति चली तो भविष्य निश्चित उज्ज्वल है।
युग निर्माण के अपने प्रयासों का एक सुनिश्चित प्रारूप पूज्य गुरुदेव ने 1962 में प्रसारित अपने घोषणा पत्र में, युगनिर्माण सत्संकल्प में विश्वमानस के समक्ष रख दिया था। इस मैनिफेस्टो का प्रत्येक सूत्र मानव, परिवार, समाज एवं राष्ट्र को आमूलचूल बदलने की आधार शिला के रूप में रखा गया है। एकता, समता की सर्वांगपूर्ण रूपरेखा वसुधैव कुटुंबकम् की समग्र परिकल्पना इसमें की गयी है।
इसके बाद महाकाल रौद्र रूप में ताण्डव नृत्य करने की मुद्रा में अखण्ड ज्योति के पृष्ठों पर (1967) से आने लगे व उन्हीं दिनों युग प्रत्यावर्तन प्रक्रिया का स्वरूप अखण्ड ज्योति के पृष्ठों पर उनने स्पष्ट किया। वे लिखते है-”महाप्रलय का अन्तिम ताण्डव नृत्य तब होता है, जब पंचतत्वों से बनी प्रकृति जराजीर्ण हो जाती है। तत्व बूढ़े होने के कारण अपना काम ठीक तरह समयानुसार नहीं कर पाते। ऋतुएं समय पर नहीं आती और उत्पादन, पोषण विनाश की क्रम व्यवस्था में व्यवधान उत्पन्न हो जाता है। ऐसी स्थिति में महाकाल का अन्तिम ताण्डव नृत्य इस ब्रह्माण्ड को चूर्ण विचूर्ण कर छितरा बिखरा देने वाली महाज्वालाएं प्रचण्ड करता है और नयी सृष्टि के सृजन की भूमिका सम्पादित करने के लिए महाकाली फिर अपने प्रसव प्रजनन की तैयारी में लग जाती है,” किन्तु साथ ही आगे वे लिखते है-”त्रिपुरारी महाकाल ने अतीत में भी त्रिविध माया मरीचिका को अपने त्रिशूल से तोड़ फोड़ कर विदीर्ण किया था, अब वे फिर उसी की पुनरावृत्ति करने वाले है। धर्म जीतने वाला है अधर्म हारने वाला है। लोभ, व्यामोह और अहंकार के कालपाशों से मानवता को पुनः मुक्ति मिलने वाली है। संहार की आग में तपा हुआ मनुष्य अगले ही दिनों पश्चाताप, संयम और नम्रता का पाठ पढ़कर सज्जनोचित प्रवृत्तियाँ अपनाने वाला है। वह शुभ दिन शीघ्र लाने वाले त्रिपुरारी-महाकाल आपकी जय हो! विजय हो!
सम्भव था कि परिजनों को अशुभ परिस्थितियाँ देख कर लगता हो कि समय आखिर बदलेगा कैसे? तो उनने अनेकानेक भविष्य विज्ञानियों, दिव्य दृष्टाओं के भविष्य कथनों के माध्यम से अपनी बात को और स्पष्ट करते हुए “युग परिवर्तन एक सुनिश्चित सम्भावना” व अखंड ज्योति के लेखों के माध्यम से अपनी बात को समझाना आरंभ कर दिया था। जीनडिक्सन, जूलवर्न, नोस्ट्राडेमस, प्रो. हरार, कीरो, मदर श्रिप्टन महर्षि अरविन्द एवं स्वामी विवेकानंद की भारत एवं विश्व का भविष्य संबंधी
शुभ भविष्य वाणियाँ उद्धृत करते हुए उनने लिखा कि “समय को तो बदलना ही है। क्योंकि यह महाकाल की प्रेरणा है ईश्वर की इच्छा है, समय की माँग है। इसे युगधर्म का पाँचजन्य उद्घोष भी कह सकते है। इसमें प्रचण्ड मानवी पुरुषार्थ उभरेगा, पर स्मरण रखा जाय कि इसके पीछे नियन्ता की प्रचण्ड प्रेरणा और सुनिश्चित योजना काम कर ही होगी।”
“प्रज्ञावतार का स्वरूप और क्रिया−कलाप” “ध्वंस के साथ नवसृजन भी” तथा “सुरक्षा साधना का समर्थ ब्रह्मास्त्र” जैसे लेखों द्वारा जहाँ उनने महाकाल द्वारा नवसृजन की सुनिश्चितता का तथ्य प्रतिपादित किया, वहीं “इक्कीसवीं सदी बनाम उज्ज्वल भविष्य” (दो खण्डों) तथा सतयुग की वापसी “प्रज्ञावतार की विस्तार प्रक्रिया” जैसी पुस्तकों द्वारा सबकी जिज्ञासाओं का समाधान करते हुए यह स्पष्ट किया कि जब अन्तराल बदलेगा, भाव संवेदनाएं जागेंगी तो सद्बुद्धि का उदय होगा। यही प्रज्ञावतार की व्यष्टि तंत्र में अवतरित सूक्ष्म प्रेरणा हैं यही सद्बुद्धि व्यक्ति के क्रियाकृत्यों में आमूलचूल परिवर्तन कर उदार सहकारिता पर आधारित समाज बनाएगी।
उनके सभी भविष्य कथनों को मनीषी वर्ग ने बड़ी गंभीरता से पढ़ा है वह विगत एक दशक की परिस्थितियों का मूल्याँकन करते लिखा है कि परिवर्तन बड़ी तेजी से आ रहा है। देखते देखते उपनिवेशवाद पूरी धरती से मिट गया एवं युद्ध पर उतारू दो महाशक्तियों के राष्ट्रनायकों का दिमाग न जाने किस अदृश्य शक्ति ने परस्पर संघर्ष से उल्टी सहकार-सृजन की दिशा में मोड़ दिया। पूर्वी यूरोप के देशों में आई परिवर्तन की लहर ने सारे अधिनायकवादी उखाड़ फेंके। चारों ओर मुक्त प्रजातंत्र हैं कुप्रचलन अनैतिकता को अंगीकार करने वालों के विरुद्ध विश्व भर में लोक निंदा व प्रताड़ना का माहौल बना है। सभी मिलजुल कर रहने व प्रकृति से साहचर्य बिठाकर रहने की रीति नीति अपनाने की दिशा में अग्रसर हुए है। मनुष्य का चिंतन न जाने कौन सी अदृश्य शक्ति इस तेजी से बदल रही है कि परमार्थ के लिए सत्प्रयोजनों के लिए देवमानवों में सहज ही उमंगें उठने लगी है। यदि यह परिवर्तन एक छोटे स्तर पर भी कहीं क्रियारूप लेता दिखाई देता हो तो भविष्य में महाकाल एवं अदृश्य जगत में विद्यमान समर्थ सत्ताओं से और व्यापक स्तर पर सक्रिय होने की आशा की जा सकती है।
एक छोटा सा बीजारोपण शान्तिकुँज एवं प्रज्ञा अभियान के रूप में महाकाल के अग्रदूत द्वारा हो चुका व उसने अपनी सूक्ष्मीकरण साधना द्वारा इस प्रचण्ड गति प्रदान की अब वे सूक्ष्म व कारण शरीर से सक्रिय है व सुरक्षा कवच पूरी मानव जाति के लिए विनिर्मित कर रहे है। यदि उनके बताए निर्देशों को हम जीवन में उतारते चलें तो यह परिवर्तन भावी पाँच वर्षों में ही बड़ी तेजी से भारत से आरंभ होकर विश्वभर में संव्याप्त होता दृष्टिगोचर होगा। जागृतात्माओं को यही तो उस सत्ता का अन्तिम संदेश भी था।
जाति जन्म से नहीं कर्म से बनती हैं। जो ब्रह्म परायण हैं, वह ब्राह्मण,जो अनीति के विरुद्ध लड़ता हैं सो क्षत्रिय। जो आदान प्रदान की व्यवस्था बनाता हैं वह वैश्य। जो श्रमरत हैं सो शूद्र।
परिवार संस्था ही नर रत्नों की खदान बन सकती हैं
बहादुरी का अर्थ है हिम्मत भरी साहसिकता, निर्भीक पुरुषार्थ परायणता।
महायोगियों की संपर्क डोर स्थूल से परे सूक्ष्म और कारण की गहराइयों में उन्हें परस्पर जोड़ती हैं। बाह्य रूप से अपरिचित दिखते हुए वे एक दूसरे से कितना घनिष्ठ होते हैं यह उस समय स्पष्ट हुआ जब एक कार्यकर्ता प्राँत के तत्कालीन पी.डब्लू.डी. मिनिस्टर के साथ देवरहा बाबा के दर्शन हेतु गय। बाबा उन दिनों वृन्दावन में मचान बनाकर रह रहे थे पूज्य गुरुदेव उस समय अपनी मार्गदर्शक सत्ता के बुलावे पर सन् 1971) में हिमालय प्रवास पर गये हुए थे।
कार्यकर्ता जैसे ही मचान के पास पहुँचा देखा दो मंत्री और खड़े हैं। बाबा थोड़ी देर बाद अन्दर से निकले और एक सेवक से उसे बुलाने को कहा। सेवक ने समझा किसी मंत्री को बुलाना हैं। उसके इस तरह भ्रमित होने पर दूसरे सेवक को भेज कर उसे बुलाया। पास पहुँचने पर बड़े प्रेम से आश्वासन देते हुए पूछा आचार्य जी हिमालय गये। उसके हाँ कहने पर समझने लगे उनके काम में पूरी तरह तन मन न्यौछावर करना। तुम अभी नहीं जानते वह कौन हैं समय पर जानोगे। फिर हँसने लगे हँसी थमने पर मुस्कराते हुए बोले उनके काम तो अपने आप होते हैं तुम लोग तो कठपुतलियाँ हो। कार्यकर्ता चकित भाव से महायोगियों की पारस्परिक घनिष्ठता अनुभव करता रहा।
अपनापन जहाँ पर जितना अधिक विस्तार करता है, लोक श्रद्धा वहाँ उतनी ही अधिक पल्लवित होती है। अहमदाबाद शक्ति पीठ के उद्घाटन अवसर पर पूज्य गुरुदेव के स्वयं के ये भाव साकार हो रहे थे जनसमूह उमड़ पड़ा था। आयोजन में क्षेत्र विभिन्न गणमान्य व्यक्तियों के अतिरिक्त गुजरात सरकार के तीन मंत्री भी उपस्थित थे। गुरुदेव ने अपने प्रवचन के दौरान हंसते हुए कहा ‘मेरे पास बहुत पैसा है। कहाँ? यह नहीं बताऊंगा”। फिर विनोद भरे स्वर में बोले “बता दूँगा तो इनकम टैक्स वाले छापा नहीं मारेंगे? कहो तो बता दूँ।” थोड़ा रुक कर कहा “मेरा पैसा है आप लोगों की जेब में है जब चाहता हूँ निकाल लेता हूँ।”
प्रवचन की समाप्ति पर विनोद पूर्ण माहौल में एक मंत्री महोदय हंसते हुए बोल पड़े “आज एक बात समझ में आयी आचार्य जी कहो तो बोलूँ। कहिए-गुरुजी ने मुसकराते हुए कहा। “देश की जनता के प्रशासन का केन्द्र भले दिल्ली हो पर उसके दिलों का केन्द्र आप है मंत्री जी ने कहा हंसी में कही गई यह बात न केवल उनके जीवन काल में प्रत्यक्ष होती रही, बल्कि अब और भविष्य में प्रत्यक्ष होती रहेगी। यह और कुछ नहीं उनके अपनेपन से उपजी लोक श्रद्धा की परिणति।
अगले दिनों जब शांतिकुंज से सम्बंधित नवनिर्माण में योगदान करने वालों का इतिहास लिखा जायेगा, तो हो सकता है कि उस प्रकाशन में मात्र पहली पीढ़ी की ही नहीं, वरन् उन पद चिह्नों पर चलने वाली दूसरी-तीसरी पीढ़ी भी अपने को गौरवान्वित अनुभव करे।
.शान्तिकुँज एक शक्ति केन्द्र के रूप में उभरा है। यह किसी व्यक्ति विशेष की योजना, क्षमता एवं प्रयत्नशीलता भर की प्रतिक्रिया नहीं हैं। इसका सूत्र संचालन वह दैवी सत्ता कर ही है जिसने असंतुलन को संतुलन में बदलने के लिए आदि काल में ही प्रतिज्ञा की थी और अब तक वह आश्वासन ठीक प्रकार निभता चला आया है। शान्तिकुँज-उद्भव में उसी की भावना एवं संरचना अीरती हुई देखी जा सकती है और दृष्टिवानों को आश्वासन दिलाती है कि पूर्व दिशा में उदय हुआ स्वर्णिम सूर्य संसार भर को अगले दिनों प्रकाश प्रदान करेगा। शान्तिकुँज की योजनाओं को निरंतर अग्रगामी एवं सफल-द्रुतगामी सफलताएँ अर्जित करके भी ऐसा ही अनुमान लगाया और विश्वास किया जाता सकता है। समय दान के लिए उभरता उत्साह इसका प्रत्यक्ष साक्षी है।
युग पुरुष ने सौंपी वह पीर। कि जिसने रक्खा उन्हें अधीर।
प्राण से प्यारी ऐसी पीर को, हम भुला न पायेंगे। अरे! क्यों उसे भुलायेंगे॥1॥
उनने जीवन भर ही की, युग-पीड़ा की अनुभूति। वह ही युग की पीर बन गई, उनकी एक विभूति॥
रखेंगे प्राणों बीच संभाल। ताकि संवेदन भरे उछाल॥ दर्द से भरे संस्मरण सुना, किसे हम रुला न पायेंगे। अरे! क्यों उसे भुलायेंगे॥2॥
उस विभूति को हम धारण कर, करे आत्म विस्तार। ताकि हमारा संवेदन पाये, दुखिया-संसार॥
यही संवेदन है आधार। इसी से होगा हृदय उदार॥ इस पूँजी द्वारा, भावों का वैभव पा जायेंगे। अरे! क्यों उसे भुलायेंगे॥3॥
दीनों के हम दुख बंटायें, तो हल्का हो भार। सुख बाँटे हम सबको, सारी दुनिया है परिवार॥
करे सबकी आपस में प्रीति। यही है स्वर्ग-सृजन की रीति॥ ऐसे ही अपनी धरती पर, हम स्वर्ग सजायेंगे। अरे! क्यों इसे भुलायेंगे॥4॥
पर पीड़ा को क्या पहिचाने, जो होगा पाषाण। हम में तो है, महाप्राण के ही लहराते प्राण॥
हरेंगे हम दुखिया की पीर। बंधायेंगे दीनों की धीर॥ इस संवेदन से, दीनों के दुख, दर्द मिटायेंगे। अरे! क्यों इसे भुलायेंगे॥5॥
सिर काटने वाला वीर नहीं। वीरता आदर्श के निमित्त अड़ जाने में है। सिर काटने में तो कसाई भी प्रवीण होता है।
“चलते समय काफिला इतना लम्बा, किन्तु मंजिल तक पहुंचने का समय आने तक साथ में उँगलियों पर गिनने जितने। इसे असफलता कहा जाय? दुर्भाग्य? विधि की विडम्बना? अथवा उस मिट्टी को दोष दिया जाय जिससे यात्रियों की कतार तो गढ़ी थी, पर इतनी अनगढ़ कि उसकी संरचना दो कदम चलते चलते यायावरों की तरह भटकी और मृगतृष्णा की आकुलता में दिग्भ्रान्त हो कहीं से कहीं चली गयी।”
“यह क्षुद्रता कैसी जो अग्रदूतों की भूमिका निभाने में अवरोध बनकर अड़ गई है। समर्थ को असहाय बनाने वाला यह व्यामोह आखिर भवबंधन है? कुसंस्कार है? दुर्विपाक है या मकड़ी का जाला? कुछ ठीक से समझ नहीं आता। यह समय पराक्रम और पौरुष का है, शौर्य और साहस का है। इस विषम वेला में युग के अर्जुनों के हाथों से गाण्डीव क्यों छूटे रहे हैं? सिद्धांतवाद क्या कथा गाथा जैसा कोई विनोद मनोरंजन है, जिसकी यथार्थता परखी जाने का कभी कोई अवसर ही न आये?”.................. “प्रज्ञा परिवार को अन्य संगठनों, आन्दोलनों, सभा-संस्थानों के समतुल्य नहीं मानना चाहिए। वह युग सृजन के निमित्त अग्रगामी मूर्धन्य लोगों का एक ही बात सोचनी चाहिए कि समय की जिस चुनौती ने जाग्रत आत्माओं को कान पकड़ कर झकझोरा है उसे उत्तर में उन्हें दाँत निपोरने हैं या सीना तानना हैं।”
“काफिला लम्बा है। चलना दूर है। पर रास्ते में साथियों को भटकते देखकर दर्द होता है। मंजिल तक पहुँचते क्यों उँगलियों पर गिनने लायक ही कुछ साथी रह जायेंगे, इस आशंका से इन दिनों सीना धड़कता और सिर चकराता रहता है।”
पीड़ित मानवता को समर्पित एक साधक की या अन्तर्वेदना है जो अप्रैल 1972 की अखण्ड ज्योति में “अपनों से अपनी बात” स्तम्भ के अंतर्गत प्रकाशित हुई। यह प्रत्येक परिजन के लिए उनका उलाहना है कि जिन्हें आदर्शवाद को जीवन में उबार कर अग्रगामी भूमिका निभानी है, वे प्रमादग्रस्त क्यों होते जा रहे हैं? जो स्वयं समाज को ऊँचा उठाने के लिए तिल तिल कर जला हो उसकी यह व्यथा स्वाभाविक है व यह अभिव्यक्ति भी कि “क्या काफिला बिछुड़ ही जाएगा”?
उनके इन मर्मस्पर्शी शब्दों ने प्रत्येक परिजन को अंदर तक झकझोरा व चिन्तन के लिए विवश किया कि वे किस निमित्त इस महासत्ता से जुड़े थे? मात्र स्वार्थ लिप्सा की पूर्ति हेतु? अपनी क्षुद्र महत्त्वाकाँक्षाओं के लिए? अथवा कोई विवशता उन्हें दीन-दरिद्र बनाकर खींच कर लाई विवशता उन्हें दीन-दरिद्र बनाकर खींच कर लाई थी? यदि नहीं तो जो कर्तृत्व कुलपति का है, युग चिन्तक का है वह उनके जीवन में क्यों नहीं उतरता? इस उद्बोधन के साथ ही पूज्य गुरुदेव ने “मलाई को तैरकर ऊपर आने का आमंत्रण” भी दिया। यह वह समय था जब वे अपनी शक्ति पीठों की प्राणप्रतिष्ठा का दौरा संपूर्ण कर एक क्षुब्ध मनःस्थिति से लौटे थे।
एक विशाल परिवार में से प्रचलनों से विपरीत चलने वाले, धारा के विपरीत चल पड़ने वाले महामत्स्यों की उन्हें तलाश थी। कैसे उन्हें उनींदी मनःस्थिति से उबारा जाय, यही चिंतन उनके मन में सतत् चल रहा था। वंदनीया माताजी को उनने कार्य क्षेत्र से भी जो पत्र लिखे, उनमें यही बातें थी कि संगठन में से मणि मुक्तक तलाशने हेतु अभी एक पुरुषार्थ और बाकी है ताकि “जीवट का अंश कहीं भी आधिक परिमाण में विद्यमान हो तो वह गरम होने पर मलाई की तरह उछल कर ऊपर आ जाय व दूध पर तैरने लगे”।
प्रस्तुत प्रसंग यहाँ जानबूझ कर परिजनों को आत्मचिन्तन पर विवश होने के लिए उद्धृत किया गया है व यह समीक्षा करने के लिए भी कि इस सम्पादकीय का मूल मन्तव्य क्या था? क्या वे अपनी अभी वक की उपलब्धियों से निराश थे अथवा परिजनों को कसौटी पर सकने के लिए अन्तिम तैयारी के लिए चेतावनी दे रहे थे। यदि मई 1982 के अंक पर दृष्टि डालें जो इसके एक माह बाद प्रकाशित हुआ तो तथ्य समझ में आने लगता है। प्रस्तुत अंक से स्पष्ट होता है कि लाखों जनसमूहों के बीच प्राण फूँकने वाले गुरुदेव एकाएक स्तब्ध कैसे हो गए, शान्तिकुँज की सत्र श्रृंखलाओं में मुखर अपनी वाणी को मौन क्यों कर लिया, इस पर किसी को असमंजस हो तो उसे उनकी नयी जिम्मेदारियाँ समझनी चाहिए जिसमें “उन्हें आपत्ति धर्म को पालने के लिए तवे पर रोटी जलती छोड़कर बच्चे को बिच्छू पकड़ने से रोकने के लिए दौड़ पड़ने वाली माता की तरह नई रीति नीति अपनानी पड़ रही है।”
वस्तुतः वातावरण की बढ़ती विक्षुब्धता व नवसृजन के लिए एक हजार प्राणवानों की खोज उन्हें आकुल-व्याकुल कर रही थी। लाखों व्यक्तियों, जो उनसे जुड़े थे व परिजन जो उनके आसपास विद्यमान थे, को मथकर वे मलाई टटोल रहे थे। इस के लिए तपाने की आवश्यकता थी और पूज्य गुरुदेव के प्रवास कार्यक्रम पर जाते रहने व शांतिकुंज में यथास्थिति प्रवचनों में संबोधित करते रहने से तो बात नहीं बनने वाली थी। देव परिवार तो बसा लिया, सत्रों में भी परिजनों को बुला लिया पर अब एकाकी तप साधना की आवश्यकता उन्हें अनुभव हो रही थी जो वातावरण में प्रचण्ड चक्रवात उत्पन्न कर सके, सोयों का जगा व जाग्रतों को क्रियाशील बना आदर्शोन्मुख कर सके। यहीं से आरंभ होती है पूज्य गुरुदेव की एकाकी तप साधना जिसने एक वर्ष बाद ही सूक्ष्मीकरण साधना का रूप ले लिया। प्रारंभ में जो उलाहना दिया गया वह भी ऋषि चिन्तन से उद्भूत हुआ व परिजनों को भाव भरा उद्बोधन देते हुए उनसे अपनी रीति-नीति को बदलने को जो कहा गया, वह भी उसी मनीषी का चिन्तन नवनीत था। यह उलटी नीति कैसी? जब युग बदलने जैसा भारी दायित्व सिर पर हो तो महाकाल पुचकार एवं दण्ड, दुलार एवं उलाहना देने की, दोनों ही नीति अपनाता है। देव अंशधारी जाग्रतात्माएँ भौतिकतावादी प्रवाह में बह कर कहीं अपने लक्ष्य से भटक न जाएँ लोकेषणा-वित्तेषणा की चपेट में आकर लोक सेवा के पथ से विरत न हो जायें इसके लिए इसी स्तर की फटकार की जरूरत भी सदा से रही है व कृष्ण द्वारा अर्जुन को, राम द्वारा हनुमान को व सुग्रीव को तथा बुद्ध द्वारा आनन्द को लगाई गई लताड़ के रूप में सामने आती रही है। इस
अवतारी सत्ता ने भी वाँछित प्रतिक्रिया उत्पन्न होती देखी स्वयं को जन संपर्क से विरत कर पाँच वीर भद्रों के उत्पादन की, पंचकोशों के जागरण, राष्ट्र की कुण्डलिनी के जगाने की अपने जीवन की अन्तिम साधना में प्रवेश करने की निर्णय ले ही लिया।
उनके इस उलाहने व प्रत्यक्ष रूप से न मिलने का निर्णय लेकर पुनः मात्र दर्शन हेतु अपने दरवाजे खोलने तक की अवधि के बीच न केवल स्थानीय स्तर पर सक्रियता का उफान आया, क्रिया–कलापों में तेजी आई, अगणित नये प्रबुद्ध प्रतिभाशाली व भावनाशील इस मिशन से इसी अवधि में जुड़े। इस लेख के प्रारंभ में दिये गए उलाहने के बाद पूज्य गुरुदेव ने उसी वर्ष जून 82 में परिवार में सत्प्रवृत्ति संवर्धन हेतु परिवार निर्माण विशेषांक, युगमनीषा के आह्वान हेतु अक्टूबर व नवम्बर 1982 का विशेषाँक लिखा, प्रज्ञा अभियान में कंधे से कंधा मिलाकर चल सकने वाले मूर्धन्यों को प्रतिभाओं को आमंत्रित किया तथा कल्प साधना, प्रज्ञायोग तथा दिव्य अनुदान की धारणा के महत्वपूर्ण निर्धारण किए। इस वर्ष जो साधना सत्र चले वे विशिष्ट थे। इन में कायाकल्प, आध्यात्मिक भाव कल्प स्तर की साधना करायी गयी थी व आत्मशोधन की महत्ता प्रतिपादित की गयी थी। मिशन को सात संसदों में ( शोध, अध्यापक, संपर्क, कला, महिला, युवा तथा धर्म संसद ) इसी वर्ष बाँटकर भिन्न-भिन्न विधाओं से जुड़े सक्रिय व्यक्तियों को प्रज्ञा अभियान से संबद्ध होने का आह्वान किया गया।
1983 में स्वाध्याय मंडलों के गठन का महत्वपूर्ण निर्देश उनकी लेखनी से वसंत पर्व के दिन उद्भूत हुआ। प्रकारांतर चल देवालयों व चल प्रज्ञापीठों की स्थापना थी जिसके माध्यम से युग साहित्य का जन-जन तक विस्तार होना था। देखते देखते चौबीस हजार स्वाध्याय मण्डल विनिर्मित हो अपने अपने क्षेत्र में सक्रिय क्रिया–कलापों में नियोजित हो गए। अप्रैल 1983 में अपने एक महत्वपूर्ण सम्पादकीय में उनने लिखा कि “प्रज्ञा परिवार की खानातलाशी इस दृष्टि से ली जा रही है कि इस फटी गुदड़ी में भी कहीं लाल छिपे हो सकते हे। ये हाथ लगे तो काम चले।” पूरे वर्ष वे स्वयं जनसंपर्क से विरत रह समयदान के लिए प्रज्ञापरिजनों को झकझोरते रहे। प्रज्ञा पुरश्चरण को भी तीव्रगति इसी वर्ष दी गयी।
1984 की वसंतपर्व से उनने “ गोदी में चढ़कर खेलने हेतु मचलने- वाले खिलौनों की माँग करने वाले बच्चों को अपनी स्थूल काया का दर्शन देने की बजाय सुपात्रों को सूक्ष्मरूप में आत्मबल का दैवी अनुदान देने “ का निश्चय किया। यह उनके क्रमशः दृश्य पटल से हाथ खींचकर सूक्ष्म, और सूक्ष्म भूमिका में जाने का पूर्व निर्धारित उपक्रम था जिसे विधिवत रूप से चैत्र नवरात्रि 1984 से आरंभ कर दिया गया। उनने मई 1984 के अंक में लिखा कि “ दूरदर्शी योजना बनाने के लिए एकान्तवास व एकाग्र चिन्तन की आवश्यकता पड़ती है। इसे न तो विरक्ति कहना चाहिए, न अशक्ति। वरन् तूफानों से आगे चलने वाला सन्नाटा कहना चाहिए”। इस अवधि की साधना को उनने छाया पुरुष की साधना कहा, जिसमें वे पाँच शरीरों से भिन्न भिन्न कार्य सूक्ष्मजगत में करना चाहते थे। वंदनीया माताजी ने इस सम्पादकीय में लिखा कि “ हम सभी अनुभव करें कि गुरुदेव न थक गये है और न पलायन ही कर रहे है, वरन् वे सूक्ष्मीकरण की जीवनचर्या अपनाकर अपनी वर्तमान क्षमता में अनेक गुनी बढ़त कर रहे है।” यह आश्वासन उन के लिए था जिन्हें अचानक परामर्श-वार्तालाप विचार विनिमय का क्रम समाप्त होने पर खिन्नता अनुभव हो रही थी।
जून 1984 का अंक विशेषाँक के रूप में प्रकाशित हुआ जिसमें उनने अपनी अब तक जीवन यात्रा का दार्शनिक आधार एवं सूक्ष्मीकरण साधना का स्वरूप व उसका महात्म्य बताया था। गायत्री जयन्ती (8 जून) तक यह अंक सबके पास पहुँच गया एवं उन सभी को जो सूत्र संचालक के एकाएक दृश्य पटल से चले जाने से क्षुब्ध व व्यथित थे। जुलाई का अंक भी इसी सामग्री का उत्तरार्ध था। इस में स्पष्टीकरण था कि प्रस्तुत सूक्ष्मीकरण साधना किस निमित्त की जा रही है। उनने लिखा कि “ साधक स्तर का एक स्थूल शरीरधारी विशेष स्थिति में पाँच सूक्ष्म शरीरों द्वारा पाँच गुने काम हाथ में ले सकता है। इनमें से एक शरीर को विशेष रूप से इसीलिए सुरक्षित रखा व नियुक्त किया गया है कि वह हमारे पास आने वाले असमर्थों दुखी जनों, पीड़ितों के आँसू पोंछता, सिर दबाता व मलहम लगाकर दुलार पुचकार सहित गोदी में बिठाता रहे।” शेष शरीर नवनिर्माण का जागृतात्माओं का जगाने का, विभीषिकाओं निरस्त करने का कार्य पूरा करते रहेंगे।’
इसी अंक में वंदनीया माताजी के संबंध में अपने उद्गार व्यक्त करते हुए उनने लिखा है “ माताजी का स्नेह-सहयोग ही नहीं, वात्सल्य भी हमने भरपूर पाया है। वे हमें सन्तानों से अधिक उदारतापूर्वक परिपोषण देती रही हैं। उनके कारण हमें निजी जीवन में भी धर्म धारण पर अडिग रहने और दूसरों को उस दिशा में चला सकने में असाधारण सहायता मिली है। एक शब्द में उन्हें “ सजल श्रद्धा “ कहा जा सकता है। श्रद्धा उनके कण-कण में कूट-कूट कर भरी है। संपर्क में बाने वाले हमारी प्रज्ञा से निष्ठावान नहीं बने है।, वरन् उनकी श्रद्धा के साथ वात्सल्य पाकर निष्ठावान बने है मिशन का अग्रगामी बनाने में किसने कितना योगदान किया, जब इसका लेखा जोखा भगवान के घर लिखा जाएगा तो कदाचित मूर्धन्यों में माताजी का ही नाम अग्रणी होगा।”
उपरोक्त चिन्तन बताता है कि सूक्ष्मीकरण साधना के दौरान वे आने वाले भविष्य का ताना बाना बुन रहे थे। अपने स्थूल शरीर के क्रिया–कलापों को सीमित कर सूक्ष्म से और अधिक व व्यापक क्षेत्र में सक्रिय होने के लिए स्वयं पीछे हट रहे थे व वंदनीया माताजी को इस भूमिका के लिए तैयार कर रहे थे, जो उन्हें उनके महाप्रयाण के बाद निभानी थी। यह सारा सुनियोजित उद्देश्यों के लिए धरती पर आयी हो, समर्पित जीवन जी चुकी हो, काया की क्षमता से सौ गुनी अधिक काम कर चुकी हो एवं निरन्तर उनके बताए सूत्रों पर चलने वालों को मार्गदर्शन देते रहने का आश्वासन देकर नवसृजन की आधारशिला रख रही हो। अवतार रूप पूज्य गुरुदेव का विभिन्न कर्तव्यों में तो प्रकट होता ही है, विविध रूपों में समय समय पर व्यक्त उनके उद्गारों में भी। झलकता है।
वे लिखते है कि “ हमें अपनी प्रवृत्तियां बहुमुखी बना लेने कि लिए कहा गया है। इस के लिए एक तरीका यह है कि स्थूल शरीर को बिल्कुल छोड़ दिया जाय और करना है उसे पूरी तरह एक या अनेक सूक्ष्म शरीरों से संपन्न करते रहा जाय। निर्देशक को जब उचित लगेगा तो इस काया को उसे निपटाने में देर भी न लगेगी। फिर हम सूक्ष्म व कारण शरीर से अधिक कार्य कर सकेंगे।”
जिन व्यक्तियों को 2 जून 1990 के गायत्री जयंती के पावन दिन उनके महाप्रयाण का अवसाद अभी भी हो उनके लिए उपरोक्त पंक्तियाँ यह सूचना देते हुए लिखी गयी है। यह सब उनका पूर्व निर्धारित लीला संदोह मात्र था। मार्गदर्शक ने जब तक सशरीर काम करने को कहा उनने किया पर जब व्यापक स्तर पर सक्रिय होने की बात हुई तो काय पिंजर से मुक्त होने का निर्देश दे दिया। यह सब हुआ शुभ प्रयोजनों के निमित्त ही है, यह समझते हुए उनके कार्य क्षेत्र की यात्रा के बाद व्यक्त उद्गार से लेकर सूक्ष्मीकरण साधना के समापन तक के समय को एक पूर्वाभ्यास मानना चाहिए उस महायात्रा का जो उन्हें 1990 में करनी थी व उनने सशरीर बखूबी उसे दो वर्ष में सम्पन्न भी कर लिया।
ईश्वर की प्रसन्नता एक ही केन्द्र बिंदु पर केन्द्रित है कि किसने उसके विश्व उद्यान को सुन्दर समुन्नत बनाने के लिए कितना योगदान प्रस्तुत किया।
गायत्री अर्थात् सामूहिक विवेकशीलता। इस प्रक्रिया से अनुप्राणित होना ही गायत्री जप है।
चिन्तन, चरित्र एवं व्यवहार में उत्कृष्टता का अभिवर्धन अन्तःकरण में भाव संवेदनाएं जगाने से ही संभव हो सकता है।
अध्यात्म एक नकद धर्म है, जिसे मात्र आत्मशोधन की तपश्चर्या से ही भुनाया जा सकता है।
अभाव ग्रस्त परिस्थितियों व प्रतिकूलताओं के बीच भी बिना विचलित हुए अपनी लक्ष्य सिद्धि कर लेना विरलों का ही काम है। पूज्य गुरुदेव ऐसी ही मिट्टी के बने थे कि उनके लिए असंभव कोई काम नहीं था। पालीवाल जी ने 1936-37 में जब उन्हें समाचार सम्पादन हेतु देश -विदेश के समाचार एकत्रकर “सैनिक”- पत्र में नियमित देते रहने की बात कही तो उनने स्वीकार कर ली। टेलीप्रिण्टर उन दिनों थे नहीं। युद्धकाल समीप था। रेडियो से ताजा गर्म खबरें सतत् आती थीं। वे एक पेंसिल शार्पनर व 5-6 पेंसिलें लेकर रेडियो के पास बैठ कर जिस गति से उद्घोषक समाचार पढ़ता, उसी गति से लिखते चले जाते। जब सारी जानकारी एकत्र हो जाती तो सैनिक दफ्तर के टेलीफोन से आगरा के पुलिस स्टेशनों पर फोन से स्थानीय सारे समाचार एकत्रकर, सम्पादित करते व कम्पोज अपने हाथों से करके प्रूफ पढ़कर रात्रि देर घर लौटते। 6 माह तक नित्य यह क्रम चला। बाद में अन्य सुविधाएँ मिलती चली गई। किन्तु आचार्य श्री तो उस सिद्धान्त का प्रतिपादन करना जानते थे “ मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप है।” कठोर परिश्रम ही उनकी बहुमुखी सफलता का राज है।
जो स्वाध्याय में प्रमाद करता है, वह कभी अच्छा चिन्तक नहीं हो सकता। जीवनभर युगसाहित्य की संजीवनी द्वारा जीवन जीने की कला से लेकर आत्मिक प्रगति के उच्चतम सोपानों का शिक्षण देने वाले आचार्य श्री बचपन से ही अध्ययनशील थे। यदि स्कूली पढ़ाई ही उनका लक्ष्य होता तो पांचवीं से आगे भी अपनी पढ़ाई जारी रखते किन्तु उसके बाद वह कार्य कहाँ होता जो वे कर पाए।
अपनी हिन्दी, उर्दू, संस्कृत के प्राथमिक ज्ञान के आधार पर ही उनने आगरा की हीविटपार्क लायब्रेरी, मथुरा का सुखसंचारक पुस्तकालय, हाथरस की दो प्रसिद्ध लायब्रेरी, पटना की खुदाबख्श लायब्रेरी, जयपुर के मधुसूदन ओझाजी एवं विश्वविद्यालय के परामनोविभाग का ग्रंथालय, वाराणसी की एनीबेसेण्ट लायब्रेरी तथा कलकत्ता की नेशनल लायब्रेरी के सारे ग्रन्थ पढ़ डाले। उज्जैन के “ कल्पवृक्ष “ के सम्पादक श्री दुर्गाशंकर नागर उनके घनिष्ठों में से थे। स्वयं उनकी लायब्रेरी बड़ी विशाल थीं। प्रतिदिन 24 से 30 पृष्ठ प्रति घण्टे पढ़ना उनका प्रिय व्यसन था। पढ़ना भी वही जो अखण्ड ज्योति या पुस्तकों के लिए लिखना है। इस ज्ञान के आधार पर ही वे तीस वर्ष की आयु में “ मैं क्या हूँ “ लिखकर लगभग साढ़े तीन हजार पुस्तकों के लेखक बन सके।
प्राकृतिक चिकित्सा एवं आयुर्वेद इन दो विधाओं से पूज्य गुरुदेव को बड़ा लगाव था। स्वयं उनने गोरखपुर के प्राकृतिक चिकित्सा केन्द्र में 1943 में प्रशिक्षण प्राप्त किया था, एवं आयुर्वेद के सभी ग्रन्थों का अध्ययन कर वैद्यक का उच्चस्तरीय ज्ञान अर्जित कर लिया था। गायत्री तपोभूमि में उनने एक निःशुल्क आयुर्वेदिक चिकित्सालय स्थापना के साथ ही आरंभ कर दिया जो अभी भी चल रहा है। प्राकृतिक चिकित्सा के विशेष सत्र उनने तपोभूमि में भी चलाए व कल्प साधनाएं भी करायी। बाद में शान्तिकुँज में आरण्यक के बन जाने पर चान्द्रायण व्रत एवं कल्पसाधना सत्र चलते रहे। आयुर्वेद के राष्ट्रीय बोर्ड से वे मान्यता प्राप्त वैद्य थे।
आयुर्वेद में भी वनौषधियों से विशेष स्नेह था। यही कारण था कि शान्तिकुँज परिसर में काष्ठ औषधियों का पूरा परिचय देते हुए वनौषधि उद्यान भी उनने लगाया व प्रयोग परीक्षण हेतु एक सुसज्जित शोध संस्थान भी खड़ा किया। शान्तिकुँज फार्मेसी, वनौषधि चूर्ण व प्रज्ञापेय उन्हीं के महत्वपूर्ण निर्धारण है।
सूक्ष्मीकरण की एकाकी तप साधना पूज्य गुरुदेव के जीवनकाल एवं मिशन के इतिहास का एक अतिमहत्त्वपूर्ण मोड़ है। इस अवधि में उनकी तप साधना सूक्ष्म रूप से पाँच वीरभद्रों को क्रियाशील बनाने में लगी रही व लेखनी” अखण्ड-ज्योति” एवं” युगशक्ति-गायत्री” के माध्यम से हर प्रज्ञा परिजन के मन को सतत् मथती रही। इसी दौरान सन 1985 का वर्ष उनकी आयुष्य का पचहत्तरवां वर्ष होने के कारण ही रजत जयन्ती वर्ष मनाया गया एवं इसी वर्ष अप्रैल 1985 में उनने अपने जीवन के महत्वपूर्ण प्रसंगों पर पहली बार प्रकाश डाला। इन्हीं लेखों व सूक्ष्मीकरण साधना के अंतर्गत लिखे गये लेखों का समन्वित रूप उनकी पुस्तक “ हमारी वसीयत और विरासत” के रूप में नवम्बर 1986 में प्रकाशित हुआ।
इस दो वर्ष की अवधि में जिसका समापन बसंत पर्व 1986 पर हुआ, दर्शन झाँकी के कौतुक वाले वर्ग से उनने मुक्ति पा ली एवं अनेकों ऐसे प्राणवान व्यक्ति उनसे जुड़ गये जो उनके मूल स्वरूप को उनकी आत्मकथा को पढ़कर भली भाँति हृदयंगम कर उनके प्रत्यक्ष दर्शन न हो पाने की स्थिति में भी आ जुड़े थे। इनमें से कुछ देव परिवार का अभिन्न अंग बन गये कुछ में सक्रिय हो गये। जिन्हें आदर्शवाद रुच नहीं रहा था, वे स्वयं को तीव्रगति से चल रहे प्रज्ञावतार के प्रवाह में अपने को न जोड़ स्वतः अलग हो गये अथवा थपेड़ों ने उन्हें अलग कर दिया। इस प्रकार 1984 से 1986 की अवधि प्रज्ञा परिवार के लिए एक युगान्तरकारी परिवर्तन का स्वरूप लेकर आयी।
बसंत पर्व 1986 पर अपनी सूक्ष्मसत्ता के निर्देशानुसार उनने तप साधना को साथ जारी रखते हुए परिजनों से सीमित रूप में मिलते रहने का क्रम पुनः बना लिया, जो निर्बाध गति से बसंत पर्व 1990 तक चलता रहा। इन चार वर्षों की अवधि में जो कार्य उनके मार्गदर्शन में सम्पन्न हुआ, वह विगत चालीस वर्षों के बराबर हुआ माना जा सकता है। इसी अवधि में उनने कार्यक्षेत्र से जुड़े कार्यक्रमों को नई गति दी। सात लाख गाँवों व एक लाख कस्बों तक पहुँचने के लिए एक नई कार्यशैली निर्धारित हुई। पूर्णाहुति वर्ष होने के कारण एक हजार 108 कुंडीय गायत्री यज्ञों व इतने ही छोटे 24 कुण्डीय यज्ञों को मनाने का निर्णय 1986 में ही लिया गया। यह तीन वर्ष से चली आ रही देवात्मा शक्ति की कुण्डलिनी जागरण साधना की महापूर्णाहुति थी। लाखों व्यक्ति इस माध्यम से मिशन से जुड़ गये। अगले ही वर्ष समय की आवश्यकता को देखते हुए इन यज्ञों को विस्तार देने के लिए न्यूनतम सामग्री में संपन्न करने के लिए दीपयज्ञों का निर्धारण हुआ जो जन्मदिवसोत्सवों से लेकर एक लक्ष वेदीय दीपयज्ञों का स्वरूप लेता हुआ विस्तार लेता चला गया।
जनवरी 1987 का अखण्ड-ज्योति अंक “कुण्डलिनी जागरण विशेषाँक” था। इसमें व्यष्टिगत और समष्टिगत नवसृजन के निमित्त किये जाने वाले साधना पराक्रम का सचित्र, शास्त्रोक्त एवं विज्ञान सम्मत प्रतिपादन था। एक गूढ़ विषय पर एक सरल सुबोध व्याख्या परिजनों के समक्ष आयी। विश्व वातावरण में संव्याप्त अवाँछनीयताओं के परिशोधन हेतु की गयी इस साधना नाम दिया गया। प्रकारान्तर से इस अंक में पूज्य गुरुदेव द्वारा सम्पन्न सूक्ष्मीकरण साधना एवं अगले दिनों सूक्ष्म एवं कारण शरीर से सम्पन्न होने वाली साधना की विस्तृत रूपरेखा थी।
इक्कीसवीं सदी विशेषाँक जो फरवरी 1987 में प्रकाशित हुआ इस साधना का क्रियापक्ष था व पूज्य गुरुदेव का” इक्कीसवीं सदी उज्ज्वल भविष्य “ उद्घोष यही से प्रकट हुआ। उज्ज्वल भविष्य का मूल आधार उनने अपना संकल्पबल बताया जो उच्चसत्ता की प्रेरणा से महाकाल की चुनौती की तरह अवधारित किया गया। इसी अंक में उनने लिखा कि इस कार्य को सम्पन्न करने के लिए हमने स्थूल शरीर से काम लेना प्रायः बंद कर दिया है। उसके साथ एक हल्का तंतु ही जुड़ा रखा है। जब उसकी भी आवश्यकता न रहेगी तो एक झटके से इसे भी तोड़कर अलग कर देंगे।”
बसंत पर्व 1988 के अखण्ड-ज्योति विशेषाँक में “ ज्योति फिर भी बुझेगी नहीं” शीर्षक से एक लेख में उनने लिखा सोचा जाता है कि गुरुजी 80 वर्ष का आयुष्य पूरा करना चाहते हैं। इस दृष्टि से माता ही भी उतनी आयु का लाभ ले सकेंगी जितनी कि गुरुदेव। इस महाप्रयाण का समय अब बहुत दूर नहीं है। हाथ के नीचे वाले अनिवार्य कामों की जल्दी-जल्दी निपटाने की बात बनते ही चार्ज दूसरों के हाथों चला जायेगा। सन्देह हो सकता है कि उस दशा में वर्तमान प्रगति रुक सकती है ओर व्यवस्था बिगड़ सकती है। ऐसे लोग व्यवस्था में आने वाले चढ़ाव-उतारों के आधार पर अनुमान लगाते हैं। वस्तुतः यह मिशन तंत्र बाजीगर द्वारा संचालित है। वही कोई गड़बड़ी होते देखेगा और तत्परतापूर्वक सुधारेगा। आखिर लाभ हानि भी तो उसी की है। मिशन के भविष्य के संबंध में भी हर किसी को इसी प्रकार सोचना चाहिए और निराशा जैसे अशुभ चिन्तन को पास नहीं फटकने देना चाहिए।”
ऊपर की पंक्तियों से स्पष्ट है कि वे अपने दृश्य कार्यों को एक पूर्व निर्धारित अवधि में समेट रहे थे ताकि वे अपने भावी उत्तरदायित्व को सूक्ष्म शरीर से सम्पन्न करने हेतु सक्षम हो सकें।” शरीर के निष्प्राण के उपरान्त जो चर्मचक्षुओं से हमें देखना चाहेंगे वे इसी अखण्ड ज्योति की जलती लौ में हमें देख सकेंगे एवं यह आश्वासन हम देते हैं कि यह ज्योति कभी बुझेगी नहीं। “ जैसे शब्दों से उनने दुखी परिजनों को आश्वासन भी दे दिया था कि वे स्वयं को संभालें व भावी सुनिश्चितता को समझते हुए सौंपे दायित्वों को पूरा भर करते चलें।
बसंत पर्व 1988 पर प्रकाशित इन पंक्तियों को पढ़कर सभी को लगा कि पूज्य गुरुदेव पुनः दर्शन देना संभवतः बंद कर देंगे, शरीर त्याग की बात तो किसी के मन में भी नहीं थी एवं न ही शब्दों का भावार्थ वे समझ पाए थे। लगभग दस हजार निकटवर्ती परिजनों का एक समूह पुनः शांतिकुंज आ गया। शिवरात्रि पर एकत्रित इस वर्ग के एक विशेष सत्र को मिनी वसंत पर्व की उपमा दी गयी व आश्वस्त किया गया कि अभी गुरुदेव अपना आश्वासन पूरा निभायेंगे। किंतु उन्हें समीप से गहराई से समझने वाले भली भाँति समझ रहे थे। कि प्रत्यक्षतः स्वास्थ्य बहुत अच्छा दीखते हुए भी अब वे जिन्दगी का अन्तिम महत्वपूर्ण अध्याय सम्पन्न कर रहे है। यही कारण है कि सन 1990 की वसंत पंचमी पर जब उनने अंतिम दर्शन व अंतिम वसंत पर्व की बात कही तो सूक्ष्म दृष्टि वालों ने उसका अर्थ तुरन्त समझ लिया। सतयुग की वापसी” नवयुग का मत्स्यावतार एवं नवसृजन के निमित्त महाकाल की तैयारी जैसी पुस्तकों में वे पहले ही संकेत दे चुके थे कि वे अब सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर से सक्रिय होने जा रहें हैं। ये सभी पुस्तकें 1989 के उत्तरार्ध में प्रकाशित हो चुकी थीं। जिनने उन्हें गहराई से पढ़ा वे युग परिवर्तन का मर्म गुरुसत्ता के वास्तविक स्वरूप व उनकी उस निमित्त भावी तैयारी हेतु तत्परता समझ रहे थे।
“नवसृजन के निमित्त महाकाल की तैयारी पुस्तक में वे लिखते हैं अब जीवन का दूसरा अध्याय आरंभ होता है। अब इसमें जो होना है उसे ओर भी अधिक महत्वपूर्ण मूल्यवान माना जा सकता है। स्थूल के अतिरिक्त सूक्ष्म व कारण शरीरों का अस्तित्व अध्यात्म विज्ञानी बताते रहें है। उन्हें स्थूल शरीर की तुलना में असंख्य गुना अधिक शक्तिशाली कहा गया है। उन्हीं का प्रयोग अब एक शताब्दी तक किया जाना है। यह कार्य सन 1990 के बसंत पर्व से आरंभ किया जा रहा है। यहाँ से लेकर सन 2000 तक दस वर्ष युग संधि का समय है। परिजन देखेंगे कि इस अवधि में जो गतिविधियां चलेंगी उसका केन्द्र “ शांतिकुंज हरिद्वार होगा।
यही प्रसंग बसंत पर्व पर महाकाल का सन्देश नाम से प्रकाशित हुआ। जिसमें परिजनों को उनने अस्सी ब्रह्मकमल खिलने व अपने जीवन का प्रथम अध्याय समाप्त होने की बात कही। यही प्रसंग मार्च 1990 अखण्ड-ज्योति के सम्पादकीय एवं अप्रैल 1990 की पत्रिका में दी गयी विशेष लेखमाला “इक्कीसवीं सदी में हमें क्या करना होगा” के अंतर्गत दिये गये “हम बिछुड़ने के लिए नहीं जुड़े हैं” शीर्षक लेख में उनकी लेखनी से प्रकट हुआ। वे लिखते हैं-”दृश्य शरीर रूपी गोबर कि मशक चर्मचक्षुओं से दिखे या न दिखे, विशेष प्रयोजनों के लिए नियुक्त किया गया प्रहरी अगली शताब्दी तक पूरी जागरूकता के साथ अपनी जिम्मेदारी वहन करता रहेगा।” आगे के शब्द उन्हीं की लिपि में यथा रूप प्रस्तुत हैं।
ड़ड़ड़ड़
शान्तिकुँज परिवार में संचालक अपना सूक्ष्म शरीर-अदृश्य अस्तित्व बनाये रहेंगे। आने वाले, रहने वाले अनुभव करेंगे कि उनसे अदृश्य, किंतु समर्थ प्राण प्रत्यावर्तन और मिलन, आदान-प्रदान भी हो रहा है। इस प्रक्रिया का लाभ अनवरत रूप से जारी रहेगा।
कहने, सुनने, करने-कराने की प्रक्रिया चलती रहने के संबन्ध में इस वसंत पर्व पर उपस्थित परिजनों से जब ऊपर से उनके आदेश के अनुसार यह कहा था कि- “हममें से कोई किसी से अगले दिनों बिछुड़ न सके। जो प्रमाद और उपेक्षा बरतेगा, उसे शांतिकुंज की संचालक शक्ति झकझोरती, उनके कान उमेठती और बाधित करती रहेगी। हर व्यक्ति सक्रिय रह कर ही चैन से बैठ सकेगा। कहा भले ही अलंकारिक भाषा में गया हो, पर इसे एक सच्चाई मानकर चलना चाहिए कि ऐसे सशक्त सूत्र मजबूती के साथ परस्पर बाँधे गये हैं, जो बिछुड़ने देने की स्थिति आने नहीं देंगे, भले ही हम लोगों में से किसी का दृश्यमान शरीर रहे या न रहे।”
उपरोक्त आश्वासन में एक चेतावनी भी थी व दिलासा भी। इतना सब स्पष्ट होते हुए भी सहज मोहवश हममें से किसी को भी यह कल्पना न रही होगी कि वे स्थूल शरीर का चोला यों उतार फेकेंगे जैसे दास कबीर अपनी झीनी चदरिया ज्यों की त्यों धर कर रखने की बात कह गये हैं। वसंत पर्व पर, प्रत्यक्ष मिलन क्रम बंद होने से 30 अप्रैल 90 तक जब उनने निकटवर्ती कार्यकर्ताओं की एक विशेष गोष्ठी में ब्रह्मबीज के ब्रह्मकमल में विस्तृत होने एवं उसकी सुवास कोने-कोने तक पहुँचाने के लिए 7, 8 जून को ज्येष्ठ पूर्णिमा के अवसर पर 6 महानगरों में 6 विशाल ब्रह्मयज्ञ, लक्षवेदीय दीपयज्ञ के आयोजन की बात कही तो संभवतः औरों को उनके इस अंतिम अध्याय पर शीघ्र पर्दा गिरने की बात मन में भी नहीं आयी होगी। किंतु वंदनीया माताजी एवं उनके समीपवर्ती सहयोगियों को भली-भाँति समझ में आ रहा था कि वे लक्ष्य निर्धारित कर चुके हैं। उनको वसंत पर्व पर ही बता दिया गया है। उसके बाद वे सूक्ष्म व कारण शरीर को और सक्रिय गायत्री जयंती तक वे क्रमशः अपनी चेतना को समस्त अंगों से सिकोड़ना चालू रखेंगे ताकि इच्छानुसार जब चाहें, शरीर छोड़ दें।
इतना होने पर भी मन में यह आश्वासन था कि “जून की पूर्णिमा के ब्रह्मयज्ञों का निर्धारण उन्हीं का है। तब तक तो उन्हें सशरीर रहना ही है। संभवतः हम सबको पक्का करने के लिए यह बात कही गयी है।” किंतु 8 मई को उनने यह कह कर कि प्रस्तुत पूर्णिमा के कार्यक्रम श्रद्धाँजलि कार्यक्रम होंगे व वे अपना शरीर माँ गायत्री के अवतरण के पुण्य दिन, गायत्री जयन्ती पर उन्हीं की गोद में सिर रखते हुए महाप्रयाण कर जायेंगे, सब कुछ स्पष्ट कर समीपवर्ती परिजनों को शोक विह्वल कर दिया। एकाएक कोई घटनाक्रम घटित होने पर संभवतः कोई बड़ी क्षति हो सकती थी। किंतु वे सुनियोजित ढंग से अपने जीवन वृत्त का समापन करना चाह रहे थे।
महापुरुषों की लीला अपरम्पार होती है। स्थूल दृष्टि उन्हें भले ही समझ न पाए किंतु जो उन्हें समीप से देख चुके हैं, अपने सान्निध्य में जिनको उनने विगत छह-सात वर्षों की पूरी अवधि में रखा, उनको यह लीला समझ में आ रही थी। इस बीच उनने मिशन की भावी रीति-नीति स्पष्टीकरण, कार्यकर्ताओं के दायित्व तथा सूत्र संचालन सत्ता संबंधी महत्वपूर्ण निर्देश देते रहने का क्रम बनाए रखा। उनका कथन था कि व्यक्ति के जाने पर तो संस्था का काम रुक सकता है किंतु शक्ति के जाने पर नहीं। वे स्वयं शक्ति स्वरूप हैं एवं वंदनीया माताजी ही उनकी शक्ति को संग्रहित रख परिजनों को दैनन्दिन जीवन से लेकर स्नेह बाँटने तक मिशन के दृश्य क्रिया–कलापों संबंधी मार्गदर्शन इसके बाद करती रहेंगी। उत्तराधिकारियों के रूप में वे लोकसेवी कार्यकर्ताओं की एक सशक्त टीम छोड़े जा रही हैं जिनसे उनकी अपेक्षा है कि वे उनके जैसा ही ब्राह्मणोचित जीवन जियेंगे, उनके जैसी ही संयमित दिनचर्या अपनाते हुए परमार्थ प्रयोजनों में अपनी सारी ‘शक्ति नियोजित करेंगे। लोकेषणा को कभी पास नहीं फटकने देंगे व परस्पर प्रतिद्वन्द्विता आदर्शवाद के क्षेत्र में करेंगे। कौन कितना विनम्र बना, यही उसकी वरिष्ठता की कसौटी होगी। उनके द्वारा समर्पित भाव से ब्रह्मपरायण जीवन किस प्रकार जिया गया, इसी आधार पर उनका मूल्याँकन प्रत्यक्षतः इन दिनों वंदनीय माताजी एवं परोक्ष रूप से वे सतत् करते रहेंगे व सतत् उनकी चेतना को झकझोर कर वे कार्य कराते रहेंगे जो उनकी गुरुसत्ता ने उनसे कराया।”
उनने बार-बार यही कहा कि-”यह काम भगवान का है, अवतार सत्ता का है अतः; कभी रुक नहीं सकता। सूक्ष्म व कारण शरीर से वे क्रमशः; भारत एवं विश्व भर में सक्रिय होते हुए मूर्धन्यों को झकझोरेंगे एवं युगचेतना के आलोक को आगामी दस वर्षों में ही पूरे भारत व विश्वभर में संव्याप्त कर देंगे। ब्रह्मकमल जब परिपक्व स्थिति में पहुँचकर विभाजित होता हैं तो अनेकों ब्रह्मबीज अपने पीछे छोड़ जाता है। हमारे संपर्क में प्रत्यक्ष रूप से आए पच्चीस लाख कार्यकर्ताओं एवं इनसे भी सौ गुना अधिक वे जो अगले दिनों जुड़ेंगे, हमारा मार्गदर्शन सतत् प्राप्त करते रहेंगे क्योंकि अब हम उनके और अधिक निकट आ गये हैं। प्रत्यक्षतः वंदनीया माताजी, आने वाले कुछ समय के लिए जब तक उनकी गुरुसत्ता उन्हें सक्रिय बनाये रखना चाहती है, सारे क्रिया कलापों का संचालन कर शाँतिकुँज को एक विश्वविद्यालय का रूप देंगी जहाँ नियमित रूप से साधना अनुदान के वितरण, ममत्व भरे मार्गदर्शन एवं कौशल प्रशिक्षण का क्रम चलता रहेगा।”
उनके इन अंतिम दिनों में समीप रहने वाले एक चिकित्सक शिष्य को यह निर्देश नोट तो कराये जाते रहे, साथ ही उसके मन में बार-बार उनके शरीर को लेकर मच रहे अन्तर्द्वन्द्व व ऊहापोह को पढ़ते हुए समाधान भी दिया जाता रहा। उनका कहना था कि-”चेतना को मापने वाली मशीन अभी विज्ञान ने नहीं बनाई, अतः तुम जड़ यंत्रों से शरीर की जाँच पड़ताल कर सब कुछ सामान्य पाकर भी हमें असामान्य पाते हो तो इसमें दोष न यंत्रों का है, न तुम्हारा। स्थूल विज्ञान जिसको अध्यात्म से समन्वित कर हम जीवन भर प्रतिपादन करते रहे, इन यंत्रों से नहीं ड़ सकता कि चेतना का 15 प्रतिशत अंश हम पहले से ही सूक्ष्म व कारण शरीर की तैयारी हेतु रवाना कर चुके हैं, 85 प्रतिशत अंश जो शेष बचा है, इस काया की देख-रेख तब तक करता रहेगा, जब तक अनिवार्य है। यंत्रों अथवा औषधि द्वारा काया से छेड़-छाड़ न किये जाने का हमारा निर्देश है। जब हम शरीर छोड़ें न तो प्राणों को लौटाने की चेष्टा करना, न काया से मोह करना। इस पार्थिव शरीर की अन्त्येष्टि हमारे ही द्वारा विनिर्मित प्रखर प्रज्ञा-सजल श्रद्धा तीर्थ स्मारकों के समक्ष गायत्री तीर्थ के प्राँगण में उपस्थित परिजनों की साक्षी में पावन गायत्री जयन्ती के दिन की जाए। काया को औरों के दर्शन हेतु रोका न जाय क्योंकि इससे परिजन हमारी काया से मोह करने लगेंगे जो कि सब कुछ है, हमारा hकक जो शाश्वत है, को परे रख देंगे। हम चाहेंगे कि लोग हमारी चेतना से जुड़ें, इसी कारण हम अन्त्येष्टि यहीं, इसी शाँतिकुँज में पावन गंगादशहरा गायत्री जयन्ती के दिन ही कराने का आग्रह कर रहे हैं। माताजी को हम शक्ति देंगे कि वे स्वयं पर नियंत्रण रख सकें व मिशन से जुड़े एक बालक को हमारी कमी अनुभव न होने दें।”
छाती पर पत्थर रख कर उस कार्यकर्ता ने इन निर्देशों को सुना, महाकाल की अंश धर सत्ता के स्वरूप को समझा व गुरुसत्ता द्वारा अपने महाप्रयाण के बाद किये जाने वाले कर्तृत्वों को नतमस्तक हो स्वीकार किया। परिजनों को आश्चर्य हो सकता है, किंतु शक्ति कलशों को लक्षवेदीय ब्रह्म यज्ञायोजन स्थलों पर भेजने एवं अपने कर्तृत्व पर एक श्रद्धाँजलि विशेषांक लिखे जाने व उसका प्रारूप कैसा हो, यह जीवन्त मार्गदर्शन उस सत्ता का ही दिया हुआ है। जीवित रहते सशरीर कोई महामानव ही 24 दिन तक सतत् अपने बाद के भावी जीवनक्रम का निर्धारण कर हँसता-मुस्कराता जाने, स्थूल रूप से सदा के लिए विदाई लेने की योजना बना सकता है। उसने यह आश्वासन भी ले लिया कि उनके जाने के बाद शोक या विलाप न कर अपने मनोबल, आत्मबल में वृद्धि का सभी परिजन प्रयास-अभ्यास करेंगे तथा क्रिया–कलापों को इतना बहुमुखी बनाएंगे कि हर परिजन गुरुसत्ता के दृश्यमान शरीर का रोम-रोम, अंग अवयव बनता दिखाई दे। परोक्ष रूप से सभी ने यह आश्वासन उन्हें दिया। 25 मई से गुरुदेव ने भोजन व जल दोनों ही लेना बंद कर दिया। कृत्रिम माध्यम से देने का प्रयास करने पर उनने समझाया कि वे स्वेच्छा से यह सब कर रहे है। अपनी चेतना को सिकोड़कर महाप्रयाण की स्थिति में लाने के लिए अब वे अन्न व जल न लेकर वाँछित दिन महासमाधि लेना चाहेंगे। उनके निर्देशानुसार कोई अतिरिक्त प्रयास फिर नहीं किया गया।
दो जून (गायत्री जयन्ती) की प्रातःकाल का समय था। ब्रह्ममुहूर्त था। वंदनीय माता जी को, परिजनों को क्या कहना है एवं आगे कैसे कार्य करना है, यह सन्देश उनने दिया एवं फिर दोनों ने अंतिम विदाई ली। दोनों को दृश्य शरीर के पृथक होने की अनुभूति हो रही थी किन्तु स्वयं पर वज्र रख वंदनीय माताजी अपने आराध्य का संदेश सुनाने नीचे चली आईं। लगभग सात हजार से अधिक व्यक्तियों ने उस सन्देश को सुना जो वंदनीय माता जी ने करुणासिक्त अंतःकरण से निकली अपनी वाणी से कहा। उनके उद्बोधन के बाद प्रणाम व भोजन का क्रम चल पड़ा। जैसे ही युग संगीत की प्रथम पंक्ति पूज्यवर के कक्ष में पहुँची-”माँ तेरे चरणों में हम शीश झुकाते है” उनके हाथ नमन की मुद्रा में ऊपर उठे एवं हृदय की धड़कन बंद हो गई। कार्डियोस्कोप जो विगत तीन सप्ताह से सतत् हृदय का स्पन्दन बता रहा था, अब यह संकेत दे रहा था कि 2 जून 1990 की प्रातः 8 बजकर 5 मिनट पर इस स्थूल काया से प्राण विसर्जित हो, महाप्राण में विलीन हो चुके है। एक युग का पटाक्षेप हो चुका था।
शोक विह्वल उनके पुत्रों एवं दो निकटस्थ कार्यकर्ताओं ने पहले स्वयं को संभाला एवं फिर युगद्रष्टा की उस नश्वर देह को गंगाजल से स्नान कराके खादी के कोरे वस्त्र पहनाकर उन्हें उसी मुद्रा में लिटा दिया। मौन गायत्री जप तब तक चलता रहा जब तक कि नीचे सभी कार्यकर्ताओं का प्रणाम व भोजन का क्रम समाप्त नहीं हो गया। यह उसी अनुशासन के अंतर्गत था जो नियमित दिनचर्या को प्रभावित न होने देने के रूप में वे स्वयं चाहते थे। प्रणाम समापन के बाद वंदनीय माताजी स्वयं दर्शनार्थ ऊपर आयी। अपने आराध्य देवता का स्थूल शरीर ही उनके समक्ष था। प्राणों का विसर्जन जब हुआ तब उन्हें सूक्ष्म रूप से संदेश भी प्राप्त हो गया था तथा अनुभूति भी हो चुकी थी। उनका शोक सभी को और विह्वल कर सकता था अतः उनने स्वयं पर नियंत्रण रख एवं पार्थिव शरीर को अंतिम प्रणाम हेतु नीचे ले चलने के लिए कहा। कहा जा सकता है कि वे सौभाग्यशाली थे जो उनका अंतिम दर्शन कर सके, किंतु जीवन दर्शन से शिक्षा देने वाला वह अवतारी पुरुष जो कहना था, व अब कराने के लिए उनके और निकट, और समीप पहुँच चुका था।
अंतिम दर्शन का दृश्य सभी के अंतःकरण को विदीर्ण करने वाला था। सभी ने अपनी पुष्पाँजलि समर्पित करने वाला था। सभी ने अपनी पुष्पाँजलि समर्पित की एवं उस वातावरण में भी सबको ये विचित्र अनुभूति होती रही कि वे आश्वासन दे गये है तो ज्योति बुझ कैसे सकती है? हम सभी अपने कर्तव्य द्वारा ज्योति को सतत् जलाये रखेंगे। शाम तक बाहर से आए सभी परिजन एवं स्थानीय, निकटवर्ती स्थानों से आए उनके अनुयायी, उनके संपर्क में आये अधिकारी गण व हरिद्वार के नागरिक दर्शन हेतु आते रहे। शाम को पार्थिव शरीर जो फूलों से सजा था, शांतिकुंज आश्रम में स्थित दो छतरियों प्रखर प्रज्ञा-सजल श्रद्धा के समक्ष ले जाया गया एवं उनके दोनों पुत्रों एवं दौहित्र द्वारा अग्नि को समर्पित कर दिया गया। वंदनीय माता जी सजल श्रद्धा की साकार मूर्ति हैं, पर इस समय वहाँ बैठी सबका मनोबल बढ़ाती रही। जीवन भर जिसने ममत्व की धार बहाई थी, अपना सब कुछ मिटाकर स्नेह-करुणा की जल धारा बहाकर उस सरिता में अगणितों को स्नान करा जिसने उन्हें पवित्र बना दिया था, वह युगऋषि, युगद्रष्टा, महाकाल का वरद पुत्र, अवतारी पुरुष अब वहाँ नहीं था। शेष थी वहाँ विद्यमान भस्म अब एवं ताप जिसमें वह लाखों व्यक्तियों को तपाकर कुन्दन बनने की प्रेरणा दे गया। वह सारा कर्तव्य अपने पीछे छोड़ गया था जिनका अनुगमन कर ब्रह्मकमल के रूप में विकसित हो अपनी सुगंध दिग्दिगंत फैलाने की प्रत्येक को वह प्रेरणा दे गया है। वह जाते-जाते कह गया है-
“कहीं भी तुम रही वंशज मेरे, सन्तान मेरी। मेरी आवाज, मेरा स्वर सदा अनुभव करोगे॥”
अगले दिनों युग संधिकाल में अनगढ़ों का कूड़ा-कचरा झाड़-बुहार कर दूर फेंक दिया जायेगा एवं प्रतिभाशालियों को अस्त्रों-आभूषणों की तरह प्रयुक्त किया जायेगा।
लोग कैसे बनें? कैसे बदलें? इस प्रयोग को सर्वप्रथम अपने ऊपर ही किया जाना चाहिए और बताया जाना चाहिए कि कार्य उतना कठिन नहीं है जितना कि समझ जाता है।
जीवन देवता का सुधरा हुआ स्वरूप ही कल्पवृक्ष है।
शिष्टता सभ्यता की आधारशिला है और अशिष्टता अनगढ़पन की प्रतिक्रिया।
ड़ड़ड़ड़
विशेष ज्ञातव्य
“युगपरिवर्तन की संभावना सुनिश्चित है। सन् 2000 तक युगसंधि की प्रभात वेला चलेगी। इस बीच हरिद्वार और मथुरा के ट्रस्टी टीमों द्वारा समस्त गतिविधियों का सूत्र संचालन होता रहेगा। भावनाशील दूरदर्शी विचारवानों को इस अवधि में नव निर्माण के लिए बढ़-चढ़ कर काम करने चाहिए, अग्रिम पंक्ति में खड़े होने का साहस दिखाना चाहिए। स्वयं तरने और असंख्यों को तारने का हौसला बढ़ाने में अपनी समूची चेतना एवं क्षमता को दाव पर लगाना चाहिए।”
सन् 1945 के सहस्रकुंडीय यज्ञ के पूर्व का प्रसंग है। वे जब हजार कुण्डों को बनाये जाने की योजना बता रहे थे तो उनके एक मित्र ने कहा खर्च की व्यवस्था तो है नहीं व आप कल्पनाएँ ऊंची गढ़ रहे हैं। इससे तो अच्छा होगा आप एक हजार कुल्हड़ मँगा लें व उन्हीं में आहुति देकर इतिश्री कर लें।” व्यंग्य तो था पर उनने सहज मुसकराहट बिखरते हुए कहा मैं ऐसा ही करता पर क्या करूं? मेरे पेट में एक चुहिया हमेशा कूदती फाँदती रहती है। वही तरह तरह की योजनाएँ बनाया करती है। वह मान नहीं रही है। तो यज्ञ तो अब होकर ही रहेगा। कुण्ड भी 1000 बनेंगे व संगठन बनाने के निमित्त व्यक्ति भी एक लाख से अधिक ही आयेंगे। कहीं से भी करूं पर उस चुहिया को तो दाना पानी देना ही होगा। सरलता से दिये गये इस उत्तर को संभवतः वे सज्जन तब नहीं समझ पाये। जब महायज्ञ सम्पन्न हो गया लाखों व्यक्ति भाग लेकर उसमें गये वह सब दृश्य देखकर उनने बाद में आकर अपनी कही बात की क्षमा माँगी तो उनने उन्हें हृदय से लगा लिया। महापुरुषों के महत्वपूर्ण कार्यों को पहले भला कौन समझ पाता है?
वे अज्ञातवास के लिए डेढ़ वर्ष के लिए रवाना हो रहे थे। चलते समय एक घनिष्ठ परिजन का पत्र मिला। उसमें व्यग्रता व आकुलता के भाव थे। लिखा था- हम आपको सारा दुख-कष्ट लिख कर ही हलके हो जाते थे। अब हमारा क्या होगा? पत्र का उत्तर उनने गंगोत्री से ही दिया। नीचे उनकी ही लिपि में प्रस्तुत है।
ड़ड़ड़ड़
गंगोत्री
4-7-60
हमारे आत्मस्वरूप,
हम यहाँ आज सकुशल आ पहुंचे यहाँ का वातावरण बहुत ही मनोरम तथा शाँतिपूर्ण हैं। हम अपने लक्ष्य स्थान तक गुरुपूर्णिमा तक पहुँच जायेंगे।
आपसे एक वर्ष तक मिलन तथा पत्र व्यवहार तो न हो सकेगा, परन्तु फिर भी आपका वैसे ही ध्यान रखेंगे जैसे आकाश में उड़ती हुई चिड़िया अपने अंडे बच्चों का ध्यान रखती हैं। बच्चों को स्नेह।
श्रीराम शर्मा आचार्य
ड़ड़ड़ड़
सविता ध्यान
स्थिर शरीर शान्त मन। स्थिर चित। कमर सीधी, आँखें बंद, हाथ गोदी में। ध्यान मुद्रा। प्रभातकाल। पूर्व दिशा। उदीयमान स्वर्णिम सूर्य सविता। सविता स्वर्णिम सूर्य। स्वर्णिम किरणों का साधक के शरीर में प्रवेश। नस-नस में, रोम-रोम में, कण-कण में स्वर्णिम ऊर्जा का समावेश। उपलब्धि ओजस तेजस, वर्चस की। साहस, शौर्य, पराक्रम की। दूरदर्शी विवेकशीलता से आत्मसत्ता ओत-प्रोत।
व्यक्तित्व प्रखर, समर्थ, प्रतिभावान। प्रतिभा का उपयोग सत्प्रवृत्ति संवर्धन में, दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन में। दो प्रयोजनों की सिद्धि आत्म परिष्कार लोकचेतना का सर्वतोमुखी विकास।
ॐ तमसो मा ज्योतिर्गमय। ॐ असतो मा सद्गमय। ॐ मृत्योर्माऽमृतं गमय।
मैं विष पीने का अभ्यासी, अमृत की चाह नहीं करता।
यह पूज्य गुरुदेव की प्रिय कविता की प्रिय पंक्ति थी। वस्तुतः रुद्र का, महाकाल का जीवन ही तो जिया था उनने। जीवन भर दुष्प्रवृत्तियों अवाँछनीयताओं का हलाहल पीकर जो काया से प्राणों के महाप्रयाण के बाद भी मुक्ति की कामना नहीं, उलटे यह कहता है कि “मेरे उत्तर संस्कार अन्यान्य व्यक्तियों की तरह न किये जाएँ। यह कार्य तो सन 2010 के बाद के बाद की पीढ़ी करेगी। तब तक मुझे मुक्त नहीं होना है। जब तक इस धरती पर अज्ञान, अभाव, अनीति को मिटाकर नवयुग की स्थापना नहीं हो जाती, मैं मुक्ति की कामना कैसे कर सकता हूँ?” पूज्य गुरुदेव के उत्तर संस्कार उनके निर्देशानुसार नहीं किये गये परंतु जिस “प्रखर प्रज्ञा” स्मारक के समक्ष उनकी काया भस्मीभूत हुई, वहाँ उनके अवशेषों से भरे कलश की स्थापना 13 जून को शास्त्रोक्त पद्धति से लगभग तीन हजार व्यक्तियों की उपस्थिति में सम्पन्न कर उनकी प्राण प्रतिष्ठा कर दी गयी है। यह स्थान उन्हीं के निर्देशन में 1982-83 में बनाया गया था। प्रतिदिन सैकड़ों व्यक्ति समाधि स्थल पर पुष्प चढ़ाना चाहते है, अतः “प्रखर प्रज्ञा” पर ही उनके स्थूल शरीर के अवशेष स्थापित कर दिये गये।
पूज्य गुरुदेव का हिमालय सा विराट व्यक्तित्व शान से जी गई जिन्दगी एवं ब्रह्मवर्चस् के अनुरूप तप से अर्जित समस्त उपलब्धियाँ सामने रखकर वंदनीया माताजी के निर्देशानुसार यह निर्णय लिया गया कि अपनी अंतःपीड़ा को सृजनात्मक साकार रूप देने के लिए एवं उन सभी परिजनों, जिनको उनने छाती से चिपटा कर रखा था, स्नेह का पय पान कराया था को भी यह अभिव्यक्ति कर पूज्य गुरुदेव के निर्धारणों के अनुरूप संकल्प लेने का अवसर देने के लिए एक विराट अन्तर्राष्ट्रीय श्रद्धाँजलि समारोह आगामी शरद पूर्णिमा पर 1 से 4 अक्टूबर की अवधि के बीच आयोजित किया जाय। पूरे भारत व विश्व का शिष्य समुदाय इसमें एकत्र हो तथा जिन आदर्शों पर चलकर वे ब्रह्मबीज से ब्रह्मकमल बने, उन्हीं के अनुरूप चलने की वह यज्ञाग्नि की साक्षी में शपथ लें। इसीलिए एक हजार आठ कुण्डीय गायत्री यज्ञ एक से चार अक्टूबर की अवधि में इसी समारोह के साथ सम्पन्न करने का निर्णय लिया गया।
कई परिजनों की इच्छा थी कि पूज्य गुरुदेव की स्मृति स्वरूप कुछ विशेष निर्माण किया जाय। पूज्य गुरुदेव स्वयं जो जीवन जी कर गए एवं अपनी अनगिनत उपलब्धियाँ व रहस्यमय प्रसंग शोध कर्ताओं के लिए छोड़ गए, वे अपने आप में जीती जागती स्मृतियाँ है। वे स्वयं नहीं चाहते थे कि कोई भवन या मूर्ति के रूप में उनको याद किया जाय। ऐसा विराट व्यक्तित्व भला सीमेण्ट चूने के भवन या पत्थर की बनी मूर्ति में कैद हो सकता है? एक बार प्रसंग चलने पर उनने वंदनीया माताजी को बताया था कि “मेरे जाने के बाद मेरी स्मृति में तुम चाहो तो एक सुन्दर उपवन बनवा सकती हो जिसमें प्रकृति का सौंदर्य कूट कूट कर भरा हो। हर जर्रा जर्रा यही कहे कि आचार्य जी समष्टि के घटक थे, हम ही में समाहित हैं। हम में ही उनका दर्शन कर लो। मुझे हिमालय से अपार स्नेह है। वही तो एक ऐसी थाती है जिसे मैं पूर्ण रूप से अपनी, सिर्फ अपनी कह सकता हूँ। उसी के स्पर्श ने मेरे बौने व्यक्तित्व को हिमालय सा विराट बना दिया। कभी मैंने हिमालय की प्रतिमा बनवाई थी जिसे एक हाल में रखवाया था। उसमें उसका दम घुटते देख उसे तोड़ कर बाहर कर दिया। बच्चों को उससे बड़ा कष्ट हुआ। मेरी इच्छा है कि उससे भी विशाल हिमालय का लघु संस्करण सा नजर आने वाली एक प्रतिमा विनिर्मित हो। मेरा निवास उसके कण कण में रहेगा।”
वस्तुतः प्राकृतिक सौंदर्य के वे जन्मजात पुजारी थे। आठ वर्ष की उम्र में हिमालय के आह्वान पर घर से वे भाग निकले थे एवं बाद में हिमालयवासी सत्ता स्वयं उनके घर आकर उन्हें निहाल कर गयी तथा दस-दस वर्ष के अन्तराल पर चार बार हिमालय उसने अपने साथ उन्हें रखा। “सुनसान के सहचर” नामक जिस पुस्तक का उल्लेख पिछले पृष्ठों पर किया गया, उनके द्वारा हिमालय प्रवास के दौरान ही लिखी गयी थी। हिमालय को वे देवात्मा कहा करते थे। वहाँ न केवल चारों धाम हैं जिनके दर्शन के लिए लाखों व्यक्ति प्रतिवर्ष वहाँ जाते है, अपितु वह सिद्ध-साधकों की क्रियास्थली है, देवताओं का क्रीड़ाँगन है एवं देवसंस्कृति की एक महत्वपूर्ण देन इस आर्यावर्त, ब्रह्मवर्त को है। सारे ऋषिगणों जिनकी परम्पराओं का बीजारोपण शाँतिकुँज में किया गया है, ने हिमालय पर तप करके ही सिद्धियाँ प्राप्त की व अपनी आध्यात्मिक ऊर्जा से विश्व मानव को लाभान्वित किया। कभी भगीरथ गंगा को लेकर आये थे तो वह शिवजी के खुले केशों के रूप में स्थित नीलकण्ठ से होते हुए गोमुख से धरती पर प्रकट हुई व भागीरथी के रूप में सुरसरि बनकर भारतभूमि को अभिसिंचित करती चली गयी। इस युग के भगीरथ ने प्रचण्ड तप करके उज्ज्वल भविष्य रूपी नवयुग के गंगावतरण का पुरुषार्थ सम्पन्न कर दिखाया व केन्द्र शांतिकुंज को बनाया। ऐसे वे उनकी यह इच्छा, कि हिमालय सब तो नहीं जा सकते पर उसकी प्रतीक स्थापना तो भव्य रूप में हो सकती है और वह भी तप से संस्कारित इस पावन भूमि पर जहाँ कभी महर्षि विश्वामित्र ने एवं अब इस युग के नूतन सृष्टि सृजेता ने तप किया, उचित ही लगती है।
हिमालय एक प्रकार का ऊर्जा का घनीभूत प्राण केन्द्र है जो अमृत रूप में धरती पर बहता है। पूज्य गुरुदेव जैसे तपःपूरित व्यक्तित्व का यदि प्रतीक कोई हो सकता है तो वह हिमालय ही हो सकता है। यह न केवल प्राकृतिक सौंदर्य की प्रतीक स्थापना है वरन् दुर्गम हिमालयवासी दिव्य शक्तियों के प्रखर प्राण संचार केन्द्र की भी स्थापना है। हिमालय के दुर्गम क्षेत्र में जो गोमुख से उत्तरपूर्व एवं सुमेरु चौखम्बा, स्वर्गारोहिणी अलकनन्दा आदि पर्वत श्रृंगों से भी आगे स्थित है, हर किसी का जाना संभव नहीं। किंतु उस दिव्य केन्द्र की स्थूल स्थापना कर उसमें प्राण संचार तो किया जा सकता है। जो हिमालय न जा सकें, वे भी इसकी ऊर्जा का समुचित लाभ ले सकें, इसीलिए स्मृति उपवन में पूज्य समुचित लाभ ले सकें, इसीलिए स्मृति उपवन में पूज्य गुरुदेव द्वारा व्यक्त इच्छा के अनुसार देवात्मा हिमालय की भव्य प्रतिमा विनिर्मित होने जा रही है।
इसी स्मृति उपवन के लिए शाँतिकुँज से लगी हुई बारह बीघे की जमीन खरीदी गर्द है व इसमें वास्तु पूजन कर भूमि को संस्कारित करने के उद्देश्य से, एक हजार आठ कुण्डों की भव्य यज्ञशाला में लगभग पाँच लाख परिजनों द्वारा गायत्री महायज्ञ 1 से 4 अक्टूबर के बीच आयोजित श्रद्धाँजलि समारोह सम्पन्न होने की योजना बनी है। इस श्रद्धाँजलि समारोह के सम्पन्न होने के बाद ही स्मृति उपवन के निर्माण का कार्य चालू हो जाएगा। इस उपवन में लगभग 74 फीट लम्बी एक विशाल प्राणवान प्रतिमा स्थापित की जायेगी। हिमालय क्षेत्र के हृदय वाले, उत्तराखण्ड स्थित यमुनोत्री ग्लेशियर से लेकर नंदादेवी तक के पर्वत क्षेत्र का मुख्य चोटियाँ घाटियाँ गुहा-उपत्यिकाएँ, सरोवर, प्रपात, नदियाँ प्रमुख तीर्थ, धाम एवं ऋषिगणों की तपःस्थलियों का जीवन्त दिग्दर्शन इस प्रतिमा में संभव होगा। हिमालय दुर्लभ, सुगंधित प्राण संचार करने वाली एवं कायाकल्प जैसा चमत्कार पैदा करने वाली वनौषधियों का उत्पादन स्थली है। संजीवनी बूटी रुदन्ती ब्रह्मकमल, वत्सनाभ, जैसी औषधियाँ यहीं उत्पन्न होती एवं जन जन में प्राण का संचार करती है। इनके स्थानों को न केवल प्रतीक रूप में दर्शाया जाएगा अपितु इन जड़ी-बूटियों को वही जलवायु व मिट्टी प्रदान कर आरोपित कर एक उद्यान भी हिमालय के समीप बनाया जाएगा। लगभग 30 फूलों की घाटियाँ हिमालय क्षेत्र में है जो बद्रीनाथ के समीप हेमकुण्ड के पास गोविन्दघाट से लेकर यमुनोत्री के समीप हर की दून घाटी तथा नन्दनवन तक फैली है। इन सब स्थानों का दर्शन आगन्तुक हिमालय में कर सकेंगे। पूज्य गुरुदेव तथा सतयुगाकालीन एवं बाद के युग के महामानवों, ऋषियों, अवतारों ने जहाँ जहाँ तप किया है, उन स्थानों को भी इसमें दर्शाया जाएगा। हिमालय से वैसी ही गंगा प्रवाहित की जाएगी जैसी वह गोमुख से निकल कर देव प्रयाग में अलकनन्दा भागीरथी संगम पर एक धारा के रूप में प्रवाहित होकर ऋषिकेश-हरिद्वार तक आकर मैदानी सफर आरंभ करती है।
पूरे उपवन में स्थान स्थान पर झीलें होगी। नहरें बनी होंगी जिसमें हिमालय से उतरी गंगा का जल प्रवाहित हो रहा होगा। प्रकृति का पूरा साहचर्य परिजनों को मिल सके, इसके लिए बड़े बड़े वृक्षों के सघन कुँज व लताओं से ढकी प्राकृतिक कुटियायें भी विनिर्मित की जायेंगी जहाँ साधक कुछ समय बैठकर दिव्य सत्ताओं पूज्य गुरुदेव की उपस्थिति का, साहित्य का ध्यान कर सकें। स्थान स्थान पर वनौषधियों एवं नेत्रों को मोहित कर देने वाले पुष्पों से लदे गुल्म होंगे। निर्मल निष्पाप, प्रकृति के सान्निध्य में निवास करने वाले सौम्य प्रकृति के प्राणी व पक्षी यथा खरगोश, हिरण, चीतल, मोर, बतख, तोते, मैना आदि भी विचरण कर रहे होंगे। वस्तुतः आगन्तुक पर्यटकों परिजनों को लगेगा कि वे प्रकृति की समस्वरता, निविड़ एकाकीपन से भरा माहौल उन्हें अंतर्मुखी बनने व आत्म साक्षात्कार करने के लिए विवश करेगा। प्रचण्ड ऊर्जा के स्रोत हिमालय के उस उपवन में उपस्थिति उन्हें दिव्य संरक्षण प्रदान करेगा, उनमें दिव्य भावनाओं का संचार करेगा।
यह सब कुछ वैसा ही होने जा रहा है जैसा कि पूज्य गुरुदेव को प्रिय था। उनकी स्मृति इस गायत्री उपवन एवं देवात्मा हिमालय के रूप में अक्षुण्ण बनी रह आने वाले समय में वर्षा तक उनके कर्त्तृत्व को जीवन में उतारने की प्रेरणा देती रहेगी। उनकी इच्छानुसार एक मनोरम कल्पना को साकार रूप देने की जो चेष्टा की जा रही है इसके मूल में दिव्य सत्ता का संकल्प बल ही है जो वंदनीया माताजी के उद्गारों के रूप में प्रकट हुआ है। उस संकल्प के साथ जुड़ी देवसत्ताओं की अंशधर शिष्य वर्ग की सघन श्रद्धा देखते ही देखते इसका निर्माण करा देगी, इसमें कोई संदेह किसी को नहीं होना चाहिए। प्रतिभाएँ विभूतियाँ स्थान स्थान से आकर इस कार्य में यथाशक्ति अपना सहयोग भिन्न भिन्न रूपों में पहले भी देती रही है, आगे भी देती रहेंगी, यह विश्वास सबके मन में सुदृढ़ है।
1 से 4 अक्टूबर तक आयोजित अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन को संकल्प-श्रद्धाँजलि पर्व नाम दिया गया है। इस अवधि में ऐसा अनुमान है कि प्रायः गगगगग तक यहाँ आ चुके होंगे। इन सबके आवास हेतु 80 एकड़ की जमीन पास में ही आयोजन हेतु ले ली गयी है। इसमें परिजनों के लिए 24 नगर बसाये जायेंगे। सबके भोजन की निःशुल्क व्यवस्था की जा रही है। यह हरिद्वार में आयोजित एक महाकुम्भ होगा अतः प्रशासकीय स्तर पर भी सहयोग माँगा गया है एवं लगभग 5 हजार स्वयंसेवी कार्यकर्ताओं से एक माह पूर्व ही यहाँ पहुंचने का निर्देश दिया गया है। पहली तारीख को विशाल जल कलश यात्रा गायत्री तीर्थ से हर की पौड़ी (ब्रह्मकुंड) तक के लिए रवाना होगी व वहाँ से जल लेकर कलशों की संस्कारित किये जाने वाले यज्ञ स्थल पर स्थापना की जायेगी। प्रतिदिन 1008 कुण्डों में एक लाख परिजनों द्वारा एक साथ एक स्वर से गायत्री मंत्र का उच्चारण कर दो सौ चालीस करोड़ आहुतियाँ नित्य दी जायेंगी। विशुद्ध वनौषधियों द्वारा यह यज्ञ नित्य सम्पन्न होकर चार अक्टूबर (शरद पूर्णिमा) को इसकी पूर्णाहुति होगी। तीन अक्टूबर (चतुर्दशी) के दिन सायंकाल लक्षवेदीय दीपयज्ञ सम्पन्न होगा। प्रवचन पाण्डाल शाँतिकुँज से सामने ही बनाया जा रहा है जिसमें क्लोज सर्किट टेलीविजन द्वारा उपस्थित सभी व्यक्ति पूज्य गुरुदेव का महत्वपूर्ण संदेश एवं वंदनीया माताजी का उद्बोधन नित्य सुन सकेंगे।
इसके साथ साथ पूज्यवर के जीवन वृत्त पर जन्म से लेकर महाप्रयाण तक के महत्वपूर्ण प्रसंगों की एक भव्य प्रदर्शनी शाँतिकुँज में लगाई जा रही है जिसमें आगन्तुकों को दृश्य रूप देख सहज प्रेरणा मिल सके। जीवन दर्शन पर एक आद्योपान्त वीडियो फिल्म भी बनाई जा रही है जो नित्य परिजन टी. वी. के पदों पर देखते रह सकेंगे। पूज्य गुरुदेव का अब तक अप्रकाशित साहित्य एवं पुरानी 1940 से लेकर अब तक की सभी पुस्तकें पुनः प्रकाशित की जा रही हैं ताकि उनके विचार सबको उपलब्ध हो सकें, विभिन्न भाषाओं में अनूदित उनके संस्करण भी उपलब्ध होंगे। पूज्य गुरुदेव की ही आवाज में समय समय पर रिकार्ड किये गये प्रवचनों के वे वीडियो कैसेट भी सबको मिल सकेंगे।
वस्तुतः जो शानदार देवोपम जीवन पूज्य आचार्य जी ने जिया है, उसकी एक किरण भी किसी को प्रभावित अनुप्राणित कर उसे सही सोचने व कुछ करने की दिशा में मोड़ सके तो यही संकल्प समारोह की सफलता होगी। उनकी ही लिखी कविता की एक पंक्ति है- “गीत का स्रष्टा स्वयं मैं, गान लेकर क्या करूंगा।” यह सारा काव्य, सब कुछ उन्हीं का तो है। उनकी तो बस एक ही अपेक्षा रही है कि विद्या विस्तार के निमित्त, सत्प्रवृत्ति संवर्धन के निमित्त कितने ब्रह्मबीज उनकी ही तरह ब्रह्मकमल के रूप में खिलते है।
अन्तराल में रहने वाला परमेश्वर ही वस्तुतः उस क्षमता से सम्पन्न है, जिससे अभीष्ट वरदान पाना और निहाल बन सकना संभव हो सकता है।
गिनती गिनना भूल जाने पर दुबारा नये सिरे से गिनना आरंभ करने में किसी समझदार को संकोच नहीं करना चाहिए।
पाँचवे दशक के प्रारंभिक वर्ष का प्रसंग है पूज्य गुरुदेव नेशनल लायब्रेरी कलकत्ता से पुस्तकों का अवलोकन कर लौट रहे थे। रास्ते में गोरखपुर आरोग्य मंदिर के संचालक श्री मोदी से मिलने की इच्छा हुई। उनसे प्रत्यक्ष भेंट के बाद जब गुरुदेव ने बताया कि वे अपनी “अखण्ड ज्योति” पत्रिका को बिना विज्ञापन के निकालना चाहते है तो मोदी जी ने कहा-”मैं आपकी स्थिति अच्छी तरह देख रहा हूँ। आपके बेडिंग पर लगा पैबन्द व आपके कपड़े बताते है कि आर्थिक स्थिति बहुत सुदृढ़ नहीं है। अपना यह पक्ष सशक्त बनाने के बाद कोई व्रत लेना चाहिए। यदि आप विज्ञापन बन्द कर देंगे तो पत्रिका चलेगी कैसे? या तो पत्रिका बंद कर दीजिये या विज्ञापन के आधार पर ही उसे चलाइये।”
बात व्यावहारिक भी थी व कटु सत्य भी, किंतु गुरुदेव की संकल्प शक्ति अडिग थी। उनने उसके बाद ही चुनौती स्वीकार कर विज्ञापन बंद कर दिये। पत्रिका खूब चली व खूब चली। बाद में मोदी जी सन 1950 में गुरुदेव के पास घीयामण्डी आए। गुरुदेव ने अखण्ड दीपक के पास ले जाकर कहा मेरी “अखण्ड-ज्योति” यह है। इस दिव्य प्रकाश ने ही वह मनोबल प्रदान किया है, जो प्रकाशन का मूल प्राण है।
जीवितों में तो लाखों में पूज्य गुरुदेव ने प्राण फूँके है किंतु कई ऐसे प्रसंग है जो उनसे जुड़े पुराने परिजनों को ही विदित है। मृत घोषित व्यक्ति को जीवन दान दे देना यमराज को चुनौती देने के समान है। किंतु अवतारी सत्ता तो इसमें सक्षम है।
नवसारी के मगन भाई गाँधी गुजरात के कर्मठ कार्यकर्ताओं में से थे। दिल का दौरा पहले भी आ चुका था। दूसरे दौरे ने उन्हें मरणासन्न स्थिति में पहुंचा दिया। गुरुदेव उस समय वहीं से कुछ दूर नवसारी में प्रवचन दे रहे थे। तुरंत समापन कर वे आनंद उनके घर एक कार्यकर्ता की गाड़ी से पहुँचे। चिकित्सकों से पूछा- “क्या स्थिति है?” उत्तर मिला “अभी-अभी हृदय की गति बंद हुई है।” सबको बाहर जाने को कहकर वे हाथ में हाथ लेकर मौन गायत्री जप करते रहे व फिर आधे घण्टे बाद सबको अंदर बुला लिया। फिर बोले “मगन बाई! उठो, नींद से जागों तुम्हें अभी दस वर्ष और मेरा काम करना है। “डॉक्टर खड़े देख रहे थे कि मगन भाई उठकर बैठ गये, आंखें मलते हुए मानो गहरी नींद से जागे हों। गुरुदेव के चरणों में गिर पड़े। सभी परिजन हर्षातिरेक से रो रहे थे। परीक्षित का नवजीवन जो देखा था श्रीकृष्ण के हाथों। इसके बाद एक्सटेंशन की अवधि पूरी कर ठीक दस वर्ष बाद मगन काका परलोक धाम चले गये। ऐसी मृत संजीवनी थी उनके पास।
इसी प्रकार यमुना में एक बार बाढ़ आई हुई थी। पानी खतरे के बिन्दु से ऊपर बह रहा था। असकुण्डा घाट पर पूज्य गुरुदेव खड़े यमुना की उत्तंग लहरों को देख रहे थे कि एकाएक एक छप्पर व उस पर बैठा एक कुत्ता दिखाई दिया। एक नाविक को उनने दस रुपये में नाव में लेकर चलने को राजी किया व एक रोटी का टुकड़ा लेकर उसके पास पहुँच गये। कुत्ता भय वश नाव में नहीं आ रहा था। वे उछलकर छप्पर पर जा चढ़े व उसे गोदी में उठाकर नाव में ले आये। इस प्रकार अपनी जान खतरे में डाल कर भी जीवन रक्षा कर वे प्रसन्नता अनुभव कर रहे थे। ऐसे ही छोटे प्रसंग व्यक्ति को देवमानव, ऋषि भगवान बना देते है।
हम सभी आपके अंग-अवयव यह शपथ लेते हैं व आपको आश्वासन दिलाते हैं कि
(1) हम “युग परिवर्तन” की आपकी योजना को कार्य रूप देने में पूरा चिंतन, श्रम एवं मनोयोग लगाने में कोई कसर न छोड़ेंगे।
(2) हम आपके उत्तराधिकारी तभी कहला सकेंगे जब हम वैसा ही ब्राह्मण जीवन जियेंगे, जो आपने जिया। इस निमित्त संयमी जीवन जीकर, आश्रम की रीति-नीति अपनाकर अपनी क्षमताओं को मात्र लोकमंगल के लिए नियोजित करेंगे।
(3) हमारी परस्पर प्रतिस्पर्धा आदर्शवाद के क्षेत्र में होगी। जो भी श्रेय या कीर्ति मिलेगी वह आपके श्रीचरणों में अर्पित कर स्वयं को एक अदृश्य सत्ता की कठपुतली निमित्त मात्र मानेंगे।
(4) हम इस सूत्र का परिपालन पूरी निष्ठा के साथ करेंगे कि “वरिष्ठता की स्वयंसेवक बनने में गौरव अनुभव करेंगे।
(5) अपनी, अपने साथियों की श्रद्धा व क्षमता को और अधिक बढ़ायेंगे। उसे दिन रात चौगुनी करेंगे।
(6) क्षुद्रता को जीवन में कभी स्थान न देंगे तथा वह साँचा बनने का प्रयास-अभ्यास करेंगे जो नररत्नों की ढलाई हेतु देव परिवार के लिए आपने स्वयं के उदाहरण के रूप में सामने रखा था।
(7) अपनी महत्त्वाकांक्षाओं को उच्चस्तरीय आध्यात्मिक मोड़ देते हुए ब्राह्मणोचित जीवन को श्रेष्ठ मानेंगे एवं उन्हीं आदर्शों को जीवन में स्थान देंगे। यह प्रमाणित करके दिखाएँगे कि आदर्शवाद को जीवन में उतार कर कोई घाटा नहीं उठाता, बल्कि नफे में ही रहता है।
(8) कभी विश्राम की बात मन में न लाकर एक ही चिन्तन रखेंगे कि आपके पदचिह्नों पर चलकर अपने कर्तव्य में पूरी तरह खपकर कितना अधिक योगदान दे सकते हैं? कितना आगे रह सकते हैं?
(9) कभी अनुशासन में व्यतिरेक नहीं आने देंगे। अपने कृत्यों का मूल्याँकन अधिक करने की अहंता को अपने पर कभी सवार नहीं होने देंगे।
(10) सत्प्रवृत्ति संवर्धन एवं दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन द्वारा विचारक्रान्ति की प्रक्रिया को, विद्या विस्तार को ही अपना एक मात्र लक्ष्य मानेंगे व इसकी पूर्ति हेतु पूरी तत्परता से जुटे रहेंगे।
(11) शांतिकुंज ही हमारा घर है, यहाँ के निवासी ही हमारे परिजन हैं यह मानते हुए अपने संकल्प को सदा याद रखेंगे कि यहाँ से कहीं अन्यत्र न जाकर “सतयुग की वापसी” तक हमें इसी प्रयोजन के निमित्त समर्पित भाव से स्वयं को लगाये रखना है। कभी भी अपनी मर्जी, स्वार्थ-प्रेरित इच्छा तंत्र पर नहीं थोपेंगे।
(12) यह काफिला जो आपने आरम्भ किया था, कभी अकेला नहीं रह पायेगा। यह बढ़ता ही जायेगा। प्रगतिपथ पर आपके आदर्शों को सूत्र मानते हुए अग्रसर होता रहेगा। नये, प्राणवान, कर्मठ, ब्रह्मपरायण जीवन वालों को इससे जोड़कर हम उस लक्ष्य की दिशा में चलते रहेंगे, जिसके लिए आप इस धरती पर आये थे।
*समाप्त*