परिष्कृत दृष्टिकोण ही स्वर्ग है

धन वैभव से शारीरिक सुख-साधन मिल सकते हैं। विलास सामग्री कुछ क्षण इन्द्रियों में गुदगुदी पैदा कर सकती है, पर उनसे आन्तरिक एवं आत्मिक उल्लास मिलने में कोई सहायता नहीं मिलती। धूप-छाँव की तरह क्षण-क्षण में आते रहने वाले सुख-दुख शरीर और जीवन के धर्म हैं। इनसे छुटकारा नहीं मिल सकता। जिनने अपनी प्रसन्नता इन बाह्य आधारों पर निर्भर कर रखी है, उन्हें असंतोष एवं असफलता की ही अनुभव होता रहेगा। वे अपने को सदा दुखी ही अनुभव करेंगे।

सच्चा एवं चिरस्थाई सुख आत्मिक सम्पदा बढ़ाने के साथ बढ़ता है। गुण, कर्म, स्वभाव में जितनी उत्कृष्टता आती है, उतना ही अन्तःकरण निर्मल बनता है। इस निर्मलता के द्वारा परिष्कृत दृष्टिकोण हर व्यक्ति, हर घटना एवं हर पदार्थ के बारे में रचनात्मक ढंग से सोचता और उज्ज्वल पहलू देखता है। इस दृष्टिकोण की प्रेरणा से जो भी क्रिया पद्धति बनती है, उसमें सत्य, धर्म एवं सेवा का ही समावेश होता है।

वस्तुतः परिष्कृत दृष्टिकोण का नाम ही स्वर्ग है। स्वर्ग किसी स्थान विशेष का नाम नहीं, वह तो मनुष्य के सोचने, देखने और करने की उत्कृष्टता मिश्रित प्रक्रिया मात्र है। जो केवल ऊँचा ही सोचता और अच्छा ही करता है, उसे हर घड़ी स्वर्ग का आनन्द मिलेगा। उसके सुख का कभी अन्त नहीं।


प्यार-प्यार में अन्तर

प्यार मनुष्य की उच्चस्तरीय मनःस्थिति है। उसके बिना आनंद और उल्लास की अनुभूति नहीं हो सकती। इसके बिना व्यक्ति नीरस, निरानंद मनःस्थिति में बना रहता है। निरानंद और स्नेह सद्भाव रहित मनुष्य को एक प्रकार का जड़ पदार्थ माना जा सकता है जो जीवितों की तरह हलचलें भर कर सकने में समर्थ है। आनंद का रसास्वादन वह कर ही नहीं पाता।

प्रेम का क्षेत्र जितना विस्तृत होगा, मनुष्य उतना ही अधिक पुलकित प्रफुल्लित रह सकेगा। उसका दायरा जितना छोटा होगा उसकी प्रसन्नता भी हलकी एवं उथली होगी। निकृष्ट योनियों वाले प्राणी इसी विभूति से वंचित रहते हैं। इसलिए उनकी मानसिकता में उत्कृष्टता और प्रफुल्लता का अस्तित्व नहीं पाया जाता। मात्र उदरपूर्ति के निमित्त ही वे अपना अधिकाँश समय लगा देते हैं। यदाकदा प्रजनन अथवा झगड़ने के उभार भी उनमें उठते देखे जाते हैं। इसी हेय स्थिति में वे अपनी जीवन अवधि गुजार देते हैं।

मनुष्य में जहाँ शरीर संरचना मानसिक विलक्षणता और भाव संवेदनाओं की अनेकानेक विशेषताएँ पाई जाती हैं वहाँ सर्वोच्च स्तर की एक और विभूति उसे उपलब्ध हैं-प्रेम-भावना का रसास्वादन। इसे कोई कितना है घटा या बढ़ा सकता है। परिधि के अनुरूप ही उसकी सफलता प्रफुल्लता घटती-बढ़ती रहती है।

क्षुद्र स्तर के मनुष्य मात्र अपने शरीर को प्यार करते हैं। इन्द्रिय स्वाद ही उनके लिए सब कुछ होता है। इसी प्रयोजन तक वे सोचने और करने तक सीमित रहते हैं। वासना, तृष्णा और अहंता के निकृष्ट स्तर तक ही उनकी आकांक्षा, अभीप्सा केन्द्रित रहती है। इसी दायरे में कल्पनाएँ, इच्छाएँ उठती हैं और जो कुछ करते बन पड़ता है वह उन्हीं प्रयोजनों के लिए होता है।

स्नेह रहित व्यक्ति का अपनापन विलास और अहंकार की पूर्ति से आगे तनिक भी नहीं बढ़ पाता। यहाँ तक कि छोटे बच्चों तक के लिए उनके सहयोग उत्थान, कल्याण तक का कोई भाव नहीं रहता। उनसे भी उनके संबंध मात्र क्षुद्र स्वार्थों की पूर्ति तक के लिए होते हैं। उसमें कमी पड़ने पर उनके लिए अपने भी विराने हो जाते हैं। कामुकता के प्रति असाधारण लगाव होने पर वे पत्नी के स्वास्थ्य और बच्चों के भविष्य और अपने आर्थिक दायित्व तक को भुला देते हैं। उनके लिए इन्द्रिय लिप्सा ही सब कुछ होती है।

शरीर को ऐसे क्षुद्र लोग प्यार करते हैं यह भी नहीं कहा जा सकता। अन्यथा स्वाद के लिए अभक्ष्य खाने उन्माद के लिए इन्द्रिय आवश्यकता में वे अपना शारीरिक स्वास्थ्य और मानसिक संतुलन क्यों बर्बाद करते रहते हैं? दुर्बलता, रुग्णता, अकालमृत्यु के ग्रास क्यों बनते हैं? इसलिए यह कहना ही उचित होगा कि नीरसता के रहते, मनुष्य कम से कम अपने शरीर को तो प्यार करता होता। आत्मा का प्यार इससे आगे की बात है। गुण, कर्म, स्वभाव की उत्कृष्टता से ही मनुष्य महान बनता है और संतोष सम्मान जैसे रसास्वादन कर पाता है। जो आत्मा को प्यार नहीं करता वह मात्र नरक के दायरे में ही परिभ्रमण करता रहता है।

सच्चे प्यार का अर्थ है उत्थान के निमित्त सहयोग। इसमें अपने लोगों की तुलना में प्रियपात्र के उत्कर्ष को प्रधानता देनी पड़ती है, पर यह सब बन तभी पड़ेगा जब अपने स्वार्थ पर अंकुश लगाया जाय, उसे गौण माना जाय। इसके अभाव में वह प्यार न रहकर छद्म मात्र बनकर रह जाता है। ठगों का व्यवसाय चापलूसी पर आधारित है। वे अपने शिकार को सज्जन व्यवहार से फुसलाते और प्रलोभनों के आकर्षण दिखाकर अपना स्वार्थ साधते और भोले भावुकों को बहेलियों की तरह जाल में फँसाते और जो भी हाथ लगे, उसका अपहरण करते रहते हैं। नाम कोई चाहे तो इसे भी प्यार का दे सकता है, पर सच्चाई देखने पर थोड़े ही प्रयत्न से पता चल जाता है कि यह प्यार था या जाल-जंजाल में फँसाकर सर्वनाश करने का कुचक्र। हम प्यार तो हर किसी से करें, पर उसके पीछे अपहरण की विडम्बना न हो इसका सतर्कतापूर्वक ध्यान भी रखें।


आइए! चेतना के विज्ञान पर शोध करें।

अध्यात्म और विज्ञान में सामंजस्य और सहयोग का तालमेल बिठाने में इन दिनों विज्ञ समुदाय द्वारा समुद्र मंथन जैसा प्रयास चल रहा है। सर्वत्र यही सोचा जा रहा है कि दोनों महाशक्तियों का समन्वय किया जाय। इनके मध्य जो खाई खुद गई है, उसे पाटने के लिए प्रयत्न किया जाय इतने पर भी दोनों को पृथक् शक्तियाँ मानने वालों के सामने यह स्पष्ट नहीं है कि उनके प्रतिपादन का उद्देश्य और स्वरूप क्या है?

यथार्थतः विज्ञान और अध्यात्म के समन्वय की माँग करने वाले यह भूल जाते हैं कि जीवन सत्ता ही तब प्रकट होती है, जब चेतना और पदार्थ का समन्वय होता है। जड़ और चेतन का मिलन ही हलचलों का केन्द्र है। काया का दृश्यमान पक्ष जड़ तत्वों से विनिर्मित प्रत्यक्ष भौतिक विज्ञान का चमत्कार है तो उसमें सन्निहित अदृश्य चेतन सत्ता अध्यात्म है। दोनों का मिलन ही जीवन की स्थिरता का चिन्ह है। दोनों के मध्य सामंजस्य की परम्परा अनादिकाल से चली आ रही है, जब स्रष्टा ने ‘एकोऽहम् बहुस्यामि’ की इच्छा की तो चेतन-अचेतन के दो प्रवाह फूट पड़े। दोनों एक दूसरे से सर्वथा पृथक् रह कर अपना अस्तित्व नहीं बनाये रख सकते। पदार्थ के बिना चेतना पंगु है, तो चेतना की प्रखरता के बिना पदार्थ अन्धे के समान। अन्धे और पंगु की जोड़ी मिलकर ही नहीं पार करने की योजना बना सकते हैं और पार पाने में सफल होते हैं।

गहराई में प्रवेश करने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि दोनों में टकराव तब उत्पन्न हुआ, जब विज्ञान को फिजिक्स से एवं सुविधा-साधन जुटाने वाली मशीनों, कल कारखानों से सम्बन्धित मानने तक मानवी बुद्धि सीमित हो गयी, जब कि इसका तात्त्विक अर्थ कुछ और है। विज्ञान कहते हैं प्रगतिशीलता को-वैज्ञानिक दृष्टिकोण को। हम जो भी सोचें जो भी करे उसमें वैज्ञानिकता का समावेश हो, वह तर्क, तथ्य एवं प्रमाणयुक्त हो, इसी में हमारे चिंतन कथन और कर्तव्य की प्रामाणिकता है। विज्ञान मात्र प्रकृति से सम्बन्धित सूक्ष्म जगत का रहस्योद्घाटन करने और उससे लाभान्वित होने तक सीमित न होकर जीवन से, प्राणि शरीरों से भी सम्बन्धित है। चेतना उसी से लिपटी एवं सघनतापूर्वक गुँथी हुई सक्रिय है। उसकी शक्ति अदृश्य होते हुए भी इतनी प्रचण्ड है कि अनगढ़ पदार्थ जगत को सुनियोजित कर स्वर्गोपम सुखद परिस्थितियाँ पैदा कर दे। इसे ही अध्यात्म कहते हैं। भौतिक साधन एवं चेतना के अदृश्य पक्ष को मिला देने पर जीवन में समन्वय स्थापित होता और प्रगति का आधार खड़ा होता है।

पदार्थ सत्ता की सूक्ष्म जानकारी विज्ञानियों के हाथ लगती है, तो चेतन सत्ता वाले सूक्ष्म अध्यात्म जगत के सम्बन्ध में अधिक ज्ञान मनीषीगण प्राप्त करते और उससे लाभान्वित होते हैं। वैज्ञानिक मनीषी प्रोफेसर ए. ई. वाइल्डर स्मिथ के अनुसार प्रकृति विज्ञानी जिस तर्क बुद्धि या कल्पना शक्ति के सहारे पदार्थ जगत के अध्ययन और अनुसंधान में निरत रहते हैं, यदि उनसे यह पूछा जाय कि इस सब का जन्मदाता कौन है? उनके स्वयं के जीवन के पीछे विचार या शब्द, बुद्धि या कल्पनाएँ कौन प्रस्फुटित कर रहा है अनुसंधान की प्रेरणा कौन उभार रहा है? तो इसका उत्तर देने में वे असमर्थता अनुभव करते हैं। कारण स्पष्ट है कि वह उनकी खोजी संभावनाओं से बाहर है। इसे यों भी कहा जा सकता है कि इस ओर उनका ध्यान ही आकृष्ट नहीं हुआ। इतना ही नहीं जिस गुरुत्वाकर्षण शक्ति की वे बात करते और कहते हैं कि उस बल के सहारे पृथ्वी समेत सभी ग्रह-नक्षत्र अधर में लटके रहकर नियत कक्षा में नियत गति से परिभ्रमणशील हैं, वस्तुतः उनके मध्य चेतन तत्व ही सक्रिय भूमिका निभा रहा है। वैज्ञानिक बुद्धि न तो इस तरह के निर्माण कर सकती है ओर न उन्हें व्यवस्थित क्रम, गति प्रदान कर सकती एवं सम्पदाओं से भरा पूरा बना सकती है। यह कार्य परम चेतना का है। पदार्थों का सूक्ष्म से सूक्ष्म परमाणुओं-उप परमाणुओं, उनके व्यवहार एवं ऊर्जा उत्सर्जन की प्रक्रिया का सूक्ष्म अध्ययन करने पर यही तथ्य सामने आता है कि सूक्ष्म से सूक्ष्म कण के पीछे नया क्रम, नया नियम कार्यरत है, जिसे किसी अदृश्य चेतना की इच्छाशक्ति से संचालित माना जा सकता है। अध्यात्मवेत्ताओं ने इसे ‘यूनिवर्सल फोर्स’ या ब्रह्माण्डव्यापी चेतना माना और कहा है कि सृष्टि में सर्वत्र उसकी इच्छाशक्ति ही कार्यरत है।

मानव जीवन के दो पक्ष हैं। पहला पदार्थ परक साधन सामग्री, जिसे विज्ञान कहते हैं। इसका सम्बन्ध बुद्धि से है जो यह निर्णय करती है कि लोक व्यवहार कैसा हो। दूसरा पक्ष अध्यात्म कहलाता है, जिसका सम्बन्ध चिन्तन, भाव संवेदना एवं प्रज्ञा से है। यह सभी चेतना की उच्चस्तरीय परतें हैं, जो यह निरूपण करती हैं कि ऊर्ध्वगामिता का अनुगमन किस प्रकार किया जाय। पाश्चात्य मनोविज्ञानी सी.जी. जुग भी इस तथ्य की पुष्टि करते हुए कहते हैं कि मानवी चेतना के चार कार्य हैं तर्क बुद्धि, अनुभव, भाव संवेदना और अन्तः प्रज्ञा। यह सभी एक से बढ़कर एक उच्चस्तरीय विभूतियाँ हैं। विज्ञानी इनमें से मात्र तर्क बुद्धि तक सीमित रहकर अधूरे सत्य की खोज में संलग्न हैं। समग्रता की उपलब्धि सम्पूर्ण पक्षों को अपनाने पर ही संभव हो सकती है।

विख्यात भौतिकी विद् जीन ई. चेरोन के अनुसार हम चेतना और पदार्थ को अलग मानते और उनमें से किसी एक की खोज में निमग्न हो जाते हैं। विज्ञानी पदार्थ जगत में अपने को सीमाबद्ध कर लेते हैं, तो अध्यात्मवेत्ता चेतना के निरीक्षण-परीक्षण में लगे रहते हैं, जबकि वस्तुस्थिति यह है कि चेतना और पदार्थ इतनी अधिक जटिलता से परस्पर गुँथे हुए हैं कि उनमें से किसी एक की महत्ता को कम नहीं किया जा सकता। यद्यपि चेतना की महिमा और गरिमा सर्वोपरि है। इसके अनुसार जिसे हम मैटर या “मास” कहते हैं, वह चेतना का ही एक भाग है और इसका निर्माण उसी की इच्छा शक्ति के आधार पर हुआ है। जिस तरह पॉजेटिव और निगेटिव तारों के मिलने पर उनमें विद्युत प्रवाहित होती है और बल्ब जलने से लेकर भारी मशीनों का संचालन तक होने लगता है। यही तथ्य चेतना और पदार्थ के सम्मिलन से उद्भूत जीवन पर भी लागू होता है। इलेक्ट्रान और पाजिट्रान नाम ऋणात्मक एवं धनात्मक कणों के सम्मिलन से जिस तरह ‘फर्स्ट मैटर’ का निर्माण होता है, उसी तरह जीवन का प्रादुर्भाव जड़-चेतन से समन्वित दो सूक्ष्म इकाइयों के सम्मिलन से भ्रूण-कमल के रूप में आरम्भ होता और अन्ततः 5.6 फुट लम्बे काय-कलेवर वाला मनुष्य बन जाता है। इस निर्माण के पीछे प्राणी विशेषज्ञ जिस जेनेटिक कोड की बात करते और कहते हैं कि सूक्ष्म परमाणुओं से निर्मित इकाइयाँ ‘जीन’ इसके लिए उत्तरदायी हैं, वस्तुतः मैटर के अन्दर समाहित चेतना ही वहाँ कार्यरत रहती और अपने अनुकूल उपयुक्त परमाणुओं की काट छाँट करती तथा विकास क्रम का निर्धारण करती हैं।

विचारशीलता, भावना, इच्छा एवं सक्रियता चेतना के प्रमुख गुण हैं। चेतना सत्ता के साथ छोड़ते ही मृत शरीर को ठिकाने लगाने की प्रक्रिया आरंभ हो जाती है और सारा कलेवर पंचभूतों में बिखर जाता है। विश्वविख्यात वैज्ञानिक आइन्स्टीन को पदार्थ जगत के अनुसंधान के चरमोत्कर्ष पर पहुँचने के पश्चात् यह अनुभूति हो गई थी कि समूचा विश्व-ब्रह्माण्ड चेतना का खेल है। कार्बोनिक, अकार्बनिक जड़ पदार्थों से लेकर जीवन जगत तक में उसकी सक्रिय हलचलें ही क्रीड़ा कल्लोल कर रही हैं। मनुष्य में इसकी सघनता अधिक है। इस तथ्य की प्रामाणिकता सिद्ध करने के लिए उनने अपने वसीयतनामा में लिखा था कि मरणोपरान्त मेरे शरीर का तो संस्कार कर दिया जाय परन्तु सिर वैज्ञानिकों को परीक्षण के लिए दे दिया जाय, ताकि यह जाना जा सके कि मस्तिष्क में कोई विशिष्टता या क्षमता मरने के बाद भी विद्यमान है क्या? जो मस्तिष्क जीवन पर्यन्त प्रकृति पदार्थों में सन्निहित रहस्यमय शक्तियों की खोज करने में निमग्न रहा, क्या वह ज्ञान चेतना अब भी उसके स्नायु कोषों में सुरक्षित है? जैसा सबको विदित है कोई विलक्षणता उस जड़ पिण्ड-लिबलिबे ग्रे व ह्वाइट मैटर से बने पदार्थ में नहीं पाई गई। चेतना की शक्ति का संचार होने पर ही मस्तिष्क विभूति सम्पन्न बनता है, यह तथ्य प्रतिपादित करना ही आइंस्टीन का लक्ष्य था।

पदार्थ जगत पर चेतना का आधिपत्य है। चेतना स्वामी है तो मैटर दास। समस्त जीवों, पदार्थों, विभिन्न क्षेत्रों, दिशाओं और परिस्थितियों में चैतन्य शक्ति ही उनके स्तरों के अनुरूप अविरल गति से गतिमान है। यह सृष्टि परमचेतना का मात्र एक कौतुक भी नहीं है, वरन् उसमें समग्र सत्य दर्शन का लक्ष्य सन्निहित है। तभी तो आइन्स्टीन ने कहा था कि “ईश्वर पासा नहीं खेलता। उसके द्वारा सृजित एकल परमाणु से लेकर ग्रहगोलकों एवं उसके निवासी मनुष्यों तक सभी सुनियोजित ढंग से विनिर्मित हैं।” सत्यम्, शिवम्, सुंदरम् का दिग्दर्शन कराना उसका परम लक्ष्य है उस उपलब्धि की दिशा में अग्रसर होना ही हमारे जीवन का उद्देश्य होना चाहिए।


स्थूल से परे सूक्ष्म की सामर्थ्य

मनुष्य मात्र पंचभौतिक शरीर ही नहीं है, वरन् उसकी एक प्रचण्ड सामर्थ्य युक्त सूक्ष्म सत्ता भी होती है जिसे सूक्ष्म शरीर कहते हैं, आत्मा का वाहन भी। इसी पर सवार होकर आत्मा लोक-परलोक की यात्राएँ करता तथा मरणोत्तर जीवन के पश्चात् पुराने कलेवर को छोड़कर नये कलेवर में प्रवेश करता है। तपस्वी एवं सिद्ध योगीजन अपने इसी शरीर से स्वल्प समय में दूरवर्ती दुर्गम क्षेत्रों की यात्राएँ करते एवं जरूरतमंदों की सहायता करते देखे-सुने जाते हैं। सूक्ष्म शरीर से अन्य शरीरों में प्रवेश करने की कथा-गाथाओं का भी उल्लेख मिलता है। जिन कार्यों को मनुष्य स्थूल काया से सम्पादित नहीं कर पाता, वह दिव्य दर्शन, दूरश्रवण, दूर सम्प्रेषण, दूरगामी जैसे कठिन कार्य सूक्ष्म शरीर को विकसित कर लेने पर सहज संभव हो जाते हैं।

भारत का प्राचीन इतिहास आध्यात्मिक उपलब्धियों से भरापूरा है। इसे आध्यात्मिक उपलब्धियों की श्रृंखला कहें तो आध्यात्मिक साहित्य और दर्शन को तत्त्वदर्शी ऋषि-मनीषियों योगी और सन्तों का इतिहास कहना पड़ेगा। आध्यात्मिक जगत की ऐसी कितनी ही घटनाएँ हैं जो इस तथ्य पर प्रकाश डालती हैं कि स्थूल शरीर से परे जीवात्मा का वाहन ‘सूक्ष्म शरीर-जिसे ‘एस्ट्रल बॉडी, एटलर बॉडी’ के नाम से भी जाना जाता है, विलक्षण क्षमता सम्पन्न एक सुनिश्चित सत्ता है। इसे अदृश्य प्रवृत्तियों और शक्तियों का केन्द्र भी कहा जाता है। इसको विकसित कर लेने पर लोक-लोकान्तरों की यात्राएँ की जा सकती हैं। अपनी सूक्ष्म सत्ता को दूसरों की काया में प्रवेश कराकर उनसे मनचाही दिशा में कार्य कराया जा सकता है। इस संदर्भ में आद्यशंकराचार्य की वह घटना प्रसिद्ध है जिसमें महान विद्वान मण्डन मिश्र के पराजित होने पर उनकी पत्नी विदुषी भारती ने मोर्चा सँभाला था और उनके गूढ़ प्रश्नों के उत्तर देने के लिए शंकराचार्य को एक मृत राजा के शरीर में परकाया प्रवेश करना पड़ा था। तत्पश्चात् अपने शरीर में वापस आकर उन्होंने भारती के प्रश्नों का उत्तर दिया और उन्हें परास्त किया। परकाया प्रवेश की यह घटना पिण्ड की सामर्थ्य के उस चेतन पक्ष का परिचय देती है जिसे रहस्यमय विभूतियों से सम्पन्न माना जाता है।

इतिहास में इस घटना की तरह ही पाटलिपुत्र के सम्राट महापद्मनन्द और चाणक्य की कथा भी प्रख्यात है। लोग जानते हैं कि महापद्मनन्द का शरीर एक था, पर उस शरीर से यात्राएँ दो आत्माओं ने की थीं। एक स्वयं महापद्मनन्द ने तो दूसरे तत्कालीन विद्वान आचार्य उपवर्ष के प्रसिद्ध योगी शिष्य-इन्द्रदत्त ने।

नाथ सम्प्रदाय के आदिगुरु महायोगी मत्स्येन्द्रनाथ के विषय में कहा जाता है कि सूक्ष्मशरीर से वे अपनी इच्छानुसार आवागमन विभिन्न लोकों में करते थे। उन्हें परकाया प्रवेश की सिद्धि प्राप्त थी। एक बार अपने शिष्य गोरखनाथ को स्थूल शरीर की सुरक्षा का भार सौंपकर मृत राजा के शरीर की सुरक्षा का भार सौंपकर मृत राजा के शरीर में उन्होंने सूक्ष्मशरीर से प्रवेश किया था। गोरखनाथ स्वयं एक महान योगी थे और अध्यात्म जगत की विभूतियों से सम्पन्न थे। महाभारत के “शान्तिपर्व” में वर्णन है कि सुलभा नामक विदुषी अपने योगबल की शक्ति से राजा जनक के शरीर में प्रविष्ट कर विद्वानों से शास्त्रार्थ करने लगी थी। उन दिनों राजा जनक का व्यवहार भी स्वाभाविक न था। ‘अनुशासन पर्व’ में ही कथा आती है कि एक बार इन्द्र किसी कारणवश ऋषि देवशर्मा से कुपित हो गये। उन्होंने क्रोधवश ऋषि की पत्नी से बदला लेने का निश्चय किया। देवशर्मा का शिष्य-विपुल योग-साधनाओं में निष्णात् और सिद्ध था। उसे योग दृष्टि से यह मालूम हो गया कि मायावी इन्द्र गुरुपत्नी से बदला लेने वाले हैं। विपुल ने सूक्ष्म शरीर से गुरुपत्नी के शरीर में उपस्थित होकर इन्द्र के हाथों से उन्हें बचाया।

पतंजलि योगदर्शन में सूक्ष्मशरीर से आकाश-गमन करने, एक ही समय में अनेकों शरीर धारण करने, अदृश्य होने, परकाया प्रवेश करने जैसी अनेकों योग विभूतियों का वर्णन है जो प्रकारान्तर से जीवात्मा की अकूत सामर्थ्य और काया से परे उसकी स्वतंत्र सत्ता का प्रतिपादन करती है। सत्, रज, तम से बने संसार और पंचभौतिक काया से जुड़े आकर्षणों से अत्याधिक लिप्त होने के कारण अपनी मूल सत्ता, जो समस्त शारीरिक एवं मानसिक हलचलों का केन्द्र है, का बोध नहीं हो पाता। बाह्यकर्षणों के आवरणों को चीरकर निकल सकना संभव हो सके तो प्रतीत होगा कि अपनी ही आत्म सत्ता में ऋद्धि-सिद्धियों को ऐसा विलक्षण भण्डार छिपा पड़ा है जिसे जानकर समष्टि चेतन सत्ता से संबंध जोड़ सकना तथा विभूति सम्पन्न-सामर्थ्यवान बन सकना संभव है। शास्त्र में इसी तथ्य का प्रतिपादन करते हुए ऋषि कहते हैं-योगी को अदृश्य जगत् दृश्यवत् दीखता है। उसे दूरदर्शन, दूरश्रवण की विभूतियाँ उपलब्धियाँ होती हैं। ध्यान मात्र से योगी भूत, भविष्य, वर्तमान तथा प्राणियों के मनोगत भाव जान लेता है।”

अदृश्य जगत को जान लेना-उसमें सूक्ष्मशरीर द्वारा प्रवेश कर सकना संभव है। विज्ञानवेत्ता भी अब इस तथ्य को स्वीकारने लगे हैं और सूक्ष्मशरीर की विशिष्ट क्षमता को उद्घाटित करने निरत हुए हैं। अनुसंधानकर्ताओं ने स्थूल काया से सूक्ष्मशरीर के बाहर निकलने की प्रक्रिया को -’ऐक्सोमेटिक स्टेट’ तथा ‘आउट ऑफ बॉडी एक्सपीरियेन्स’ (ओ. बी. ई.) अर्थात्-शरीर से बाहर अतीन्द्रिय अनुभव आदि नामों से संबोधित किया है। पाश्चात्य योग साधकों में से डॉ. माल्थ कारिंगटन, हैवर्टलमान, लिण्डार्स, डुरावेल मुलडोन, ओलीवर लॉज, डॉ. मेस्मर, डेविडनील, पाल ब्रण्टन आदि के अनुभवों और प्रयोगों में सूक्ष्मशरीर की प्रामाणिकता सिद्ध करने वाले अनेक प्रमाण उपस्थित किये गये हैं। जे. मुलडोन अपने स्थूल शरीर से सूक्ष्मशरीर को पृथक् करने के कितने ही प्रदर्शन कर चुके थे। उनने इन सबकी चर्चा अपनी पुस्तक-द प्रोजेक्शन ऑफ एस्ट्रल बॉडी” में विस्तारपूर्वक की है।

फ्राँस के प्रख्यात कथाकार गुई दि मोपाँसा ने अपने संस्मरण में लिखा है कि जब कभी वह लिखने बैठते तो उनके सम्मुख एक सूक्ष्म शरीरधारी पुरुष बैठा मिलता। वह उनसे आग्रहपूर्वक वही लिखाता जो उसकी इच्छा होती। लेखन समाप्त होती ही वह अदृश्य हो जाता। कहानी पढ़ने पर प्रतीत होता कि किसी उच्चस्तरीय साहित्यकार की आत्मा ने उसमें अपने प्राण उड़ेल दिये हैं। इसी तरह के एक संस्मरण का उल्लेख करते हुए अंग्रेजी के ख्याति प्राप्त कवि बायरन ने अपने समकालीन कवि शैली के सूक्ष्मशरीर से यात्राएँ करने का वर्णन किया है। एक ही समय में उनके दो भिन्न स्थानों में उपस्थिति रहने की सामर्थ्य का वर्णन करते हुए वे लिखते हैं कि जब एक बार वह किसी जंगल से गुजर रहे थे तो उनकी भेंट शैली से हो गई और वार्तालाप करने से पूर्व ही अदृश्य हो गये। खोजबीन करने पर माया गया कि उस वक्त शैली कहीं दूसरी जगह अपने मित्रों से बातचीत करने में मशगूल थे।

पुराणों में उल्लेख है कि प्राचीन काल के योगी तपस्वी ऋषिकल्प आत्माएँ न केवल सूक्ष्मशरीर से आवागमन करने में समर्थ थी वरन् इच्छानुसार रूप धारण करने और जब चाहे अदृश्य होने और पुनः प्रकट हो जाने की विभूतियों से भी सम्पन्न थीं। बीसवीं सदी में भी इस तरह के कितने ही उदाहरण विद्यमान हैं जो मान में अन्तर्निहित प्रचण्ड सूक्ष्म शक्ति-सामर्थ्य को प्रकट करते हैं। ब्राजील निवासी राजास केमिलो नामक एक ईसाई साधकर का उदाहरण कुछ इसी प्रकार का है। केमिलो की ईश्वर पर दृढ़ आस्था थी और उसने अपने जीवन को बहुत ही पवित्र एवं प्रखर बना लिया था। फलतः अन्तर्निहित शक्तियाँ विकसित हो गई थीं। इच्छानुसार वह अदृश्य या प्रकट हो सकता था। उसकी इस विलक्षण क्षमता की पुष्टि जाँचकर्ता वैज्ञानिकों एवं पत्रकारों ने भी की थी।

इसी तरह अलबानिया के काउण्ट एडुवर्डो नामक व्यक्ति को सूक्ष्म शरीर से यात्रा करने, अदृश्य होने आदि की सामर्थ्य प्राप्त थी। मंगोलिया के बौद्ध भिक्षु थ्याँग ने भी कठिन अभ्यास के द्वारा इस तरह की क्षमताएँ विकसित कर ली थीं। सब के सामने वह अचानक प्रकट हो जाता और फिर अदृश्य होकर सबको अचंभे में डाल देता। इस तरह के कितने ही प्रदर्शन उसने मूर्धन्य वैज्ञानिकों, विद्वानों एवं पत्रकारों के समक्ष प्रस्तुत किये थे। आस्ट्रेलिया के सुप्रसिद्ध पत्रकार डेविड नील ने जब थ्याँग से उसकी विलक्षणता का कारण पूछा तो उत्तर मिला-सूक्ष्म शरीर से यात्रा करना, अदृश्य होना आदि साधक की अपनी इच्छा शक्ति पर निर्भर करता है। अपनी समस्त मानसिक एवं आध्यात्मिक शक्तियों को केन्द्रित करके कोई भी व्यक्ति इस तरह की क्षमताएँ विकसित कर सकता है।” योगी एवं तपस्वी स्तर के भारतीय साधकों की एक महान परम्परा रही है जो इस तथ्य को उद्घाटित करती है कि मानव जीवन सृष्टा का वह अनुपम उपहार है जिसका यदि सदुपयोग बन पड़े तो हर मनुष्य दिव्य विभूतियों का स्वामी बन सकता है। पवित्रता एवं प्रखरता द्वारा पात्रता अर्जित कर हर साधक योगसाधना के माध्यम से भौतिक सफलताएँ एवं अध्यात्म जगत की विभूतियाँ हस्तगत कर सकता है।


कूड़े के ढेर से जन्मा एक महामानव

कूड़े के ढेर को उसने कुछ उलटा-पलटा डोबारिका शहर के इस होटल के पीछे पड़ी इस जगह में होटल वाले अपनी बची जूठन, रोटियों के टुकड़े डाल जाते थे। उसके सिवा यहाँ की छान-बीन करने कुछ कुत्तों के अलावा और काई नहीं आता था। शायद किसी को आने की जरूरत भी नहीं थी। उसने आँखें ऊपर की ओर उठाई। सूर्य डूब रहा था। थोड़ी देर के लिए एक बादल ने आकर उसे ढक लिया फिर वह हट गया, ठीक सामने क्षितिज के किनारे सूर्य निकल आया और खाली पड़ी जमीन को ज्योति से भर दिया। कूड़े के ढेर में अकस्मात् सुवर्ण बरस पड़ा। इसके बाद सूर्य अस्त हो गया। उसने एक नजर अपनी ओर डाली। शरीर पर फटे चीथड़ों के अलावा और क्या था?

शरीर को भेदती हुई उसकी नजर और गहरे चली गई। वर्तमान के परे का अतीत झलकने लगा। 14 मार्च 1848 में रूस के निजनी नोवा स्थान में उसने पहली बार अपनी आँखें खोली थीं। गरीबी और विवशता यही उसकी मित्र बनी। क्या कुछ नहीं देखा उसने तब से आज तक। दोनों मामाओं की मार खा कर पिता को मरते देखा था। मनुष्य की दया माया का इस तरह दिवाला निकलते देख कितना रोया था वह। याद में उसकी आँखों से आँसू ढुलक पड़े। नाना की क्रूर स्वार्थी प्रवृत्ति के शिकार उसके रँगाई कारखाने के श्रमिकों को कोल्हू के बैल की तरह काम करते और आधे पेट भूखे सोते भी उसने देखा था। मानव का दर्द दिल की गहराइयों से अनुभव करता आया था वह। एक दिन वह भी आया जब कृपण-निष्ठुर नाना ने बूढ़ी नानी के साथ उसे निकाल दिया था। माँ पहले ही पता नहीं कहाँ चली गई थी। तब वह करीब आठ साल का होगा।

तब से अब, अतीत से अतल सागर से उबरते हुए मुस्कराया। मुसकान में पीड़ा और कर्मठता का अजीब सा मिश्रण छलछला रहा था। क्या कुछ उसने नहीं सहा-अपमान तिरस्कार, फटकार, मार। कूड़े का यह ढेर उसका बहुत दिनों का साथी था। यहीं से फटे कागजों को उठाकर, तुड़े-मुड़े सड़-गल रहे अक्षरों को जोड़कर उसने पढ़ना सीखा था। यही उसकी पाठशाला थी। पढ़ने का शौक इतना उभरा कि जब कभी किसी के पास अच्छी पुस्तक का पता चलता, उसके पास पहुँच जाता। उसकी मजदूरी करता, बदले में एक-आध दिन के लिए किताब माँगकर पढ़ लेता। देने वाले हँसते, तिरस्कार भरे स्वर में कहते क्या करेगा पढ़कर यह सब तू! बदले में वह चुप्पी साध लेता। इसी चुप्पी के पीछे कितना कुछ छुपा है किसी को क्या पता?

उसके हाथ तेजी से कूड़े के ढेर को उलटने-पलटने लगे। शाम का धुँधलका बढ़ता जा रहा था। निशा के सागर की बलवती लहरें-घहराती बलखाती जैसे समूची धरती सारे आसमान को एक साथ अपने आगोश में ले लेना चाहती हो। बाहर की तरह उसके भीतर भी कुछ घटित हो रहा था। यादें घुमड़-घुमड़ कर मन पर छा जातीं कुछ ढूँढ़ते हुए हाथों की गति मन्द पड़ने लगती। अब तो नानी को भी मरे बहुत दिन हो गये। रात्रि को रेलवे स्टेशन में चौकीदारी करता। दिन भर अपनी कोठरी में कुछ पढ़ता लिखता रहता। उसका निवास जिसे कोठरी की अपेक्षा कालकोठरी कहना अधिक सही होगा। बदबू और सीलन भरी जगह और वस्त्र उनकी तो चर्चा भी बेकार। जब पहनने के लिए कपड़े नहीं जुट रहे तो ओढ़ने-बिछाने के लिए कहाँ से आए।

कचरे के ढेर में कुछ निकालते हुए बुदबुदाया-चलो कुछ तो मिला। सामने कोई आ रहा था। “कौन?” उसने सारी शक्ति को आँखों में केन्द्रीभूत करते हुए-घने होते जा रहे धुँधलके को भेदने की चेष्टा की। आने वाला धीरे-धीरे बढ़ रहा था। स्पष्ट न दीख पड़ने पर भी छाया जैसी हिलडुल रही एक आकृति बढ़ती हुई नजर आ रही थी। प्रश्न अभी यथावत् था। नजरें अभी भी उठी थीं। हाथों की हरकत शान्त थी। इतने में आने वाला पास आ चुका था। दोनों ने एक दूसरे को पहचाना। उल्लास की रेखाएँ चेहरों पर चमकी और अँधेरे में विलीन हो गई। आने वाले ने स्नेहपूर्वक कहा-भले आदमी अपने शरीर का ख्याल करो। रात भर जागकर चौकीदारी दिन भर किताबों में सिर खपाना। न ढंग से खाना, न ठीक से सोना। इस तरह कब तक चलेगा।” यह था उसका मित्र ग्रेगरी।

बातों-बातों में आने वाले की नजर उसके हाथ की ओर गई। उसमें रोटी का टुकड़ा थमा था। “तो क्या आ.....ज.....भी”। बोलने वाला हकला गया।

दरअसल क्या...? उसने कुछ छिपाने की कोशिश करते हुए कहना चाहा। दरअसल क्या? “सारी तनख्वाह किताबों में झोंक दी होगी। भूख लगी तो कूड़े के ढेर से रोटी बीनने आ गए।”

“मुझे समझने की कोशिश करो, ग्रेगरी! मेरी एक ही साध है कि मैं मानव का दर्द साहित्य के माध्यम से मानव को समझा सकूँ। जब तक यह नहीं कर लेता...।”

“तुम्हारी इस साध को मैं पागलपन कहता हूँ। कौन सुनेगा तुम्हारी। नक्काल खाने में तूती की आवाज नहीं गूंजा करती। सिर टकराने से कहीं दीवारें भी टूटी हैं?”

“जबकि मेरा पूरा विश्वास है कि यदि श्रम और समय का नियोजन हो सके। उसमें पूरा मनोयोग जुट सके, मनोबल बरकरार रहे तो सभी कुछ सम्भव है।” उसने मित्र की आँखों में झाँका” जानते हो सिर्फ बोझ होता है मनोयोग के बिना। मनोयोग लगे पर श्रम न हो तो व्यावहारिक जगत में कुछ नहीं बन पड़ता और यदि समय का सही नियोजन न हो तो दोनों इधर-उधर भटकते रहते हैं। जैसे ही तीनों मिले कि सभी कुछ सम्भव दिखने लगता है।”

“फिर क्यों लौट आती हैं, तुम्हारी रचनाएँ।”

“शायद मेरे में अभी कुछ कमी होगी।” कुछ सोचता हुआ बोला-जो दो-चार बार हारने पर ही हार मान बैठे-वह भी कोई इंसान है।” वाणी आत्मविश्वास से सनी थी।

हाँ-हाँ जो तुम्हारी तरह बार-बार सिर टकराता रहे, वही इंसान है, बाकी तो सब.....।” आगे के शब्द गले में फँस गए।

“कुछ भी कहो, जब तक मैं मानव को कर्तव्य बोध नहीं करा लेता रुक नहीं सकता, अवरोध मुझे झुका नहीं सकते।”

“मत रुकना! मत झुकना! चौकीदारी करने चलना है कि नहीं।” उसे जैसे कुछ याद आया। एक साथ चार कदम अँधेरे के सागर को चीरते बढ़ने लगे। दोनों मौन थे पर सतही ढंग से भीतर कुछ घट रहा था किन्तु एक जैसा नहीं सर्वथा अलग-अलग कारण मनोभूमि की भिन्नता थी। एक परिस्थितियों के अनुरूप ढल पाने, हर कदम पर समझौता कर बैठने को ही जीवन मानता था। आदर्श और सिद्धान्त उसके लिए बेवकूफी थे। दूसरे के लिए यही सब कुछ थे। इन्हीं के द्वारा उसे परिस्थितियों को मोड़ना था। इनमें से कौन श्रेष्ठ था, इसका मूल्याँकन समय के सिवा और कौन करे?

रेलवे स्टेशन पर टिमटिमाती बत्तियों को देखकर दोनों चौंके। चौंकने के साथ ही दोनों के मुख पर से दो शब्द निकले-आ गया। पहुँचते ही अख़बार बेचने वाले की आवाज कान में पड़ी-वह कुछ कह रहा था। आवाज को अनसुना करते हुए उसने एक अख़बार लिया। यह काकेशस का विशेषांक था। पेज पलटते ही उछल पड़ा वह। मुख मण्डल पर सैकड़ों आश्चर्य एक साथ तैर गए। वह जैसे प्रसन्नता के सागर में समाने लगा हो।

भावों का यह परिवर्तन मित्र से छुपा न रह सका। कंधा हिलाते हुए उसने पूछा-क्या हुआ अलेक्सी”! आज मेरा जन्म हुआ है ग्रेगरी।”

“जन्म....”। “हाँ! साहित्यकार के रूप में और जन्मदाता है कूड़े का ढेर। जिसने मेरा पोषण किया। उसी के बल पर आज।” कहते हुए उसने अख़बार ग्रेगरी के सामने कर दिया। बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था-भाकार चन्दा। इस कहानी का लेखक था वह स्वयं।

अरे तुम गोर्की कब से बन गए। मित्र के चेहरे पर भी प्रसन्नता छलक पड़ी।

“गोर्की अर्थात्-तेज-मैं तेजी से समाज की विवशताओं के बन्धन काटना चाहता हूँ न इसलिए गोर्की बना”। दोनों किन्हीं सुखद अनुभूतियों में खोने लगे। यह गोर्की और कोई नहीं विश्व के सर्वश्रेष्ठ रूसी साहित्यकार मैक्सिसगोर्की ही थे, जिनके साहित्य ने रूस की क्रान्ति को दिशा दी। समाज की विवशता से उबारा। आज हर मानव उन्हीं की तरह अपने श्रम, समय, मनोयोग का नियोजन हो रही महाक्रान्ति के लिए कर सके, तो भावी युग मानव जाति का अभिनन्दन किए बिना न रहे।


ईश्वर का अस्तित्व एवं अनुभूति

भगवान को निराकार चेतन सत्ता कहा गया है, इसीलिए उसी सर्वव्यापकता है, कण-कण में उसकी विद्यमानता बतायी गई है। कोई सत्ता इतनी निकट हो और हमें उसका आभास तक न मिले, ऐसा हो नहीं सकता। किसी न किसी रूप में तो उसकी उपस्थिति का एहसास हमें मिलना ही चाहिए, पर ऐसा प्रायः नहीं होता। तो क्या उसकी सत्ता से इनकार कर दिया जाय अथवा किसी स्थान विशेष में उसकी उपस्थिति मान ली जाय? पर यह भी उचित नहीं होगा, क्योंकि प्राचीन ऋषियों ने भी सर्वव्यापकता के सिद्धान्त का ही समर्थन किया है।

भिन्न-भिन्न दर्शनों ने अपने-अपने प्रकार से इसकी व्याख्या की है। किसी ने स्याद्वाद (संदेहवाद्) का सिद्धान्त दिया, तो किसी ने शून्यवाद का, जबकि नीत्से जैसे दार्शनिकों ने तो “भगवान मर गया” यहाँ तक कह डाला। इतनी महान और महत्वपूर्ण सत्ता के संबंध में इतनी मतभिन्नता? आखिर क्यों? यदि वस्तुतः वह घट-घटवासी है, तो जनसामान्य को उसकी अनुभूति क्यों नहीं होती?

इसका उत्तर मूर्धन्य मनीषी रॉल्फवाल्डो ट्राइन अपनी पुस्तक “इन ट्यून विद दि इनफाइनाइट” में देते हैं। पुस्तक के “दि सुप्रीम फैक्ट ऑफ दि ह्यूमन लाइफ” अध्याय में एक कहानी का उल्लेख करते हुए लिखते हैं कि उनके एक मित्र का कमल फूलों से सुशोभित एक तालाब था। उसके आस-पास प्राकृतिक घाटी की सुन्दरता व्याप्त थी। तालाब में पानी पास के एक पहाड़ी झरने से आता था। गर्मियों के दिनों इसकी सुषमा और भी अद्भुत हो जाती थी। खिले हुए रंग-बिरंगे कमल फूलों से तालाब भरा रहता था। तालाब के किनारों पर भी तरह-तरह के फूल सुशोभित होते रहते। ऐसे में भिन्न-भिन्न प्रकार के पशु-पक्षियों के झुण्डों की उपस्थिति वहाँ के वातावरण को और भी नैसर्गिक बना देती। यही कारण है कि वहाँ पर्यटकों की भीड़ सदा बनी रहती। बच्चे, बूढ़े, युवक हर प्रकार के लोग हमेशा वहाँ आते-जाते दिखाई पड़ते, तालाब में पानी आने-जाने के लिए एक सुन्दर मार्ग और उसमें एक द्वार बना हुआ था, जो सदा पूरी तरह खुला रहता था, जिसके कारण पानी बह-बह कर आस-पास के क्षेत्र को भी हरा-भरा बनाये रखता था।

कुछ वर्षों के उपरान्त किसी आवश्यक कार्य से मित्र को एक साल के लिए कहीं बाहर जाना पड़ा। वह अपने स्थान पर देख-भाल के लिए एक निरीक्षक नियुक्त कर गया। निरीक्षक बड़ा ही संकीर्ण और स्वार्थी प्रकृति का व्यक्ति था। जिस वस्तु और व्यक्ति से उसका कुछ स्वार्थ सिद्ध होता, लाभ मिलता, उससे ही वह अपना संबंध रखता, शेष की उपेक्षा कर देता। उसने आती ही तालाब में आने वाले पानी का मार्ग बन्द कर दिया और उसे निजी क्षेत्र घोषित कर लोगों का आना-जाना रोक दिया। पानी बन्द हो जाने से कुछ ही दिनों में वहाँ की सुन्दरता कुरूपता में बदल गई। पक्षियों का कलरव, पशुओं का निर्भय विचरण, मन को मोहने वाली फूलों की मादकता और सुगंधित वातावरण सब कुछ नष्ट हो गया।

श्री वाल्डो कहते हैं कि इतना बड़ा परिवर्तन मात्र एक कारण-स्रोत से तालाब का संबंध विच्छेद हो जाने के कारण हुआ। मनुष्य जीवन से इस घटना की संगति बिठाते हुए वे कहते हैं कि मनुष्य इस अनन्त चेतना के सागर का एक अंग है। उसी से वह उत्पन्न हुआ है, पर यहाँ के अधिसंख्यक लोग उस संकीर्ण और स्वार्थी निरीक्षक की भाँति आचरण करते हैं और स्वतः ही उस परम चेतना से संपर्क का अपना द्वार बन्द कर लेते हैं, फलतः न सिर्फ उस शक्ति और सत्ता का अनुभव नहीं कर पाते, वरन् उसका मार्गदर्शन पाने और लाभ उठाने से भी वंचित रह जाते हैं।

रिचार्ड मोरिस बक अपनी पुस्तक “कॉस्मिक काँन्शसनेस” में इसी बात को दूसरे ढंग से समझाते हैं। वे कहते हैं कि मनुष्य मूलतः शुद्ध पवित्र अन्तःकरणयुक्त होता है, पर सर्वत्र प्रदूषित वातावरण होने और उसी में पलने-बढ़ने के कारण धीरे-धीरे वह उससे प्रभावित होकर अपवित्र बन जाता है, जबकि उसे कीचड़ में कमल की भाँति अप्रभावित रहना चाहिए। वे कहते हैं कि कमल कीचड़ में खिलकर भी उसकी सड़न और दुर्गन्ध से सर्वथा मुक्त होता है और अपनी मादकता बिखेरता रहता है। उसका यही आकर्षण उसके पा मधुमक्खियों को भी खींच बुलाता है और भृंगों एवं मनुष्यों को भी। यदि उसमें रंगों का सौंदर्य न हो और सदा बदबू ही बिखेरता रहे, तो मनुष्य तो क्या पशु-पक्षी भी उसके निकट न फटकें। रिचार्ड मोरिस का कहना है कि मनुष्य की तरह भगवान भी आकर्षणों के पीछे भागते हैं, अन्तर एक ही है-मनुष्य आमतौर से बुरे आकर्षणों की ओर उन्मुख होता है और जो अच्छा एवं कल्याणकारी है, उससे परहेज करता है, किन्तु ईश्वर ऐसा नहीं करते, उनका पलायन सदा अच्छे आकर्षणों की ओर होता है। वह उन्हीं व्यक्तियों की ओर आकर्षित होते हैं, जो अपने सद्गुण और सद्व्यवहार से आस-पास के वातावरण को एवं सत्कार्यों द्वारा समाज के वातावरण को चन्दन की तरह सुवासित करते रहते हैं। प्रकारान्तर से यही वह मानदण्ड है, जिसके आधार पर परमसत्ता की न सिर्फ अनुभूति होती है, वरन् मार्गदर्शन भी मिलता है।

आज तो विरोधाभास दिखाई पड़ता है या अनीश्वरवादियों के शब्दों में कहें, तो ऐसी किसी सत्ता की जो शून्यता या अनुपस्थिति प्रतिभासित होती हैं, उसका एक प्रमुख कारण मनुष्य की मलिनता है। दैनिक जीवन में हम देखते भी हैं कि बालक माता का कितना ही प्रिय क्यों न हो, वह तब तक उसे अपनी गोद में नहीं उठाती, जब तक पूरी तरह आश्वस्त नहीं हो जाती कि वह साफ-सुथरा है, मलमूत्र में सना नहीं है। फिर सर्वथा शुद्ध-पवित्र ईश्वरीय सत्ता का सान्निध्य-लाभ हम अपने अपरिष्कृत और अपवित्र स्वरूप से कैसे कर सकते हैं? किन्तु ईश्वर की अनुभूति प्राप्त करने की दिशा में मनुष्य का आत्म-परिष्कार ही सब कुछ नहीं होता। इसे लक्ष्य की दिशा में आधा रास्ता तय करना ही कहा जा सकता है। यह तो व्यक्तिगत जीवन की एक श्रेष्ठ उपलब्धि मात्र है। मनुष्य सामाजिक प्राणी भी है, वह समाज में रहता है, इसीलिए उसके कुछ सामाजिक दायित्व भी होते हैं, जिसे उसे अनिवार्य रूप से पूरा करना पड़ता है। इसे प्रयोजन का उत्तरार्ध कहा जा सकता है। इस प्रकार व्यक्तिगत जीवन में चिन्तन और व्यवहार में उदात्तता और सामाजिक जीवन में सेवा-सहकार की अनिवार्यता-यह दोनों मिल कर ही सम्पूर्ण उद्देश्य की पूर्ति कर पाते हैं। चिन्तन यदि पवित्र हो और व्यवहार भी शालीन हो, किन्तु सामाजिक जीवन में निष्क्रियता बनी रहे, तो भी व्यक्ति आत्मोन्नति के क्षेत्र में-ईश्वर-साक्षात्कार के संदर्भ में वह लाभ नहीं उठा सकेगा, जो सेवा-सहकार का दूसरा और महत्वपूर्ण पक्ष साथ-साथ क्रियान्वित होने से हो सकता था। कोई मूर्तिकार मूर्ति बहुत सुन्दर, सजीव और आकर्षक बनाता हो, उसे देखते ही दर्शकों को किसी जीवन्त नारी का भ्रम हो जाता हो, पर इतने से ही तो प्रतिमा बोलने नहीं लग जाती। इतना सब होने के बावजूद भी उसमें एक कमी रह जाती है-प्राण की और यही कमी उसके लिए सबसे बड़ी कमी साबित होती है। यही बात उस साधक पर भी लागू होती है, जो ईश्वर-दर्शन की आकांक्षा तो रखता है, इसके लिए आत्म-परिष्कार की आवश्यक साधना भी करता है, पर लोक-आराधना के अभाव में वह अंकुरित बीज पौधा बनने से पूर्व ही सूख जाता है।


सुविधा पाने में क्या न्याय (Kahani)

परचुरे शास्त्री को कुष्ठ रोग हो गया वे गाँधी जी की कुटिया के पास रहते थे।

किसी ने दवा बताई कि काला साँप हाँडी में बंद करके जलाया जाय। उसकी भस्म शहद के साथ खाई जाय तो कुष्ठ रोग दूर हो जाएगा।

शास्त्री जी ने कहा इससे तो अच्छा है कि मुझे ही किसी संदूक में बंद करके जला दिया जाय। दूसरे का प्राण हरण करके अपने लिए सुविधा पाने में क्या न्याय है?


उनके शरीर से शोले फूटते हैं

न्यूयार्क के एक दोनों आँखों से अन्धे एन्थोनी एलिबर्टी नामक व्यक्ति को अपने अंधत्व पर कोई दुख नहीं है क्योंकि वह आँखों का काम कानों के सहारे चलाता है। वह नित्य लाँग आइलैण्ड से वाँक्स तक भारी भीड़ भाड़ वाला रास्ता इस होशियारी से पार करता है कि कोई उसके अन्धे होने का अनुमान नहीं लगा सकता। कोई साथी तो क्या लाठी का सहारा तक वह अपनी दैनिक यात्रा में नहीं लाता।

एंथोनी कुश्ती लड़ने, गोला फेंकने, छलाँग लगाने जैसे काम कर लेता है, साथ ही लोहा मशीन पर पुर्जे भी खरादता है। साइकिल चलाता है, पियानो बजाता है और अच्छी आमदनी करके परिवार का गुजारा करता है। इन कामों में उसे अभी तक किसी चोट या दुर्घटना का शिकार नहीं होना पड़ा। दृष्टि क्षमता न होने की बात डॉक्टरों द्वारा अनेक बार जाँची जा चुकी है। पत्रकारों को वह बताता है कि कोई भी अन्धा व्यक्ति अपनी दिव्य दृष्टि को अभ्यास द्वारा विकसित कर सकता है। मात्र मनोबल की प्रचण्डता इसके लिए चाहिए।

जापान के टोक्यो नगर की बारह वर्षीय बालिका सयूरी तनाका ने भी इसी तरह अतीन्द्रिय क्षमता विकसित कर ली है और वह आँखों का काम नासिका के अग्रभाग से लेती है। सामान्य आँखों पर मोटी पट्टी बाँध देने पर भी वह पुस्तकों को उसी तरह पढ़ लेती है जैसे कि नेत्रों से। वह न केवल टेलीविजन पर चल रहे कार्यक्रमों को देख लेती और अक्षरशः वर्णन कर देती है, वरन् उसने इस क्षमता को इतना अधिक विकसित कर लिया है जिसके द्वारा सामान्य नेत्रों से सम्पन्न होने वाले सभी कार्यों को करने में वह सक्षम बन गई है। तृतीय नेत्रों की तरह ही उसकी नासा दृष्टि से कुछ भी छिपा नहीं रहता। दो वर्ष की छोटी उम्र से ही वह अनुसंधान कर्ताओं के लिए खोज का विषय बनी हुई है। विशेषज्ञों ने उसकी इस विलक्षणता को कितनी ही बार जाँचा-परखा है और पाया है कि नाशाग्र को ढक देने पर तनाका छटपटाहट सा महसूस करती है। वे मात्र इतना ही जान पाये हैं कि यह सामर्थ्य मानसिक चेतना के एक जगह पर केन्द्रीभूत होने के कारण उद्भूत हुई है। यह संभावना हर किसी में विद्यमान है।

चीन के लेनज्होन शहर के निकट रहने वाले वेल रुओयाँग नामक एक किशोर की आँखें एक्सरे की तरह पारदर्शी हैं। दीवालों के उस पार क्या हो रहा है व पृथ्वी के गर्भ में कहाँ क्या छिपा हुआ है? उसकी आँखें उन्हें स्पष्ट देख लेती हैं। मानवी काया की भीतरी संरचना, उस में उत्पन्न विकार ट्यूमर आदि की स्पष्ट जानकारी उसकी सूक्ष्म दृष्टि एक्सरे की तरह रोगी के सामने उजागर कर देती है। बैल ने अपने कानों को भी पारदर्शी एवं अति संवेदनशील बना लिया है और उनसे पढ़ने का काम लेता है। परीक्षणकर्ता वैज्ञानिकों एवं मूर्धन्य पत्रकारों ने इस तथ्य की पुष्टि की है कि उसकी यह प्रतिभा जन्मजात है जिसको अभ्यास द्वारा विकसित करके उसने इस स्तर तक पहुँचा दिया है कि लोग उसे दिव्य द्रष्टा की संज्ञा देने लगे हैं।

कितने ही लोग जन्मजात विलक्षणता लिए होते हैं, पर कई बार ऐसा भी होता है कि किन्हीं-किन्हीं व्यक्तियों में किसी दुर्घटना के कारण भी ऐसी दिव्य क्षमताएँ उभर आती हैं। पिछले दिनों सोवियत संघ के यूक्रेन प्रान्त की एक खान में कार्यरत 36 वर्षीय महिला जुलिया वोरोवियव के साथ कुछ ऐसा ही घटित हुआ। उच्च धारा वाले बिजली के तार से छू जाने के कारण उसे 6 महीने अस्पताल में भर्ती रहना पड़ा। इसी मध्य एक दिन उसने अनुभव किया कि उसकी आँखें एक्सरे की भाँति किसी भी वस्तु या व्यक्ति के आरपार एवं उसके भीतर झाँक सकती हैं। सूर्य की अति सूक्ष्म अल्ट्रावायलेट किरणों तक को वह देख लेती है। धरती के गर्भ में छिपी खनिज सम्पदा, जल स्रोत, विवर आदि कुछ भी उसकी आँख से बच नहीं पाते और अपना रहस्य उगल देते हैं। मौसम-परिवर्तन एवं तूफानों के आगमन की पूर्व जानकारी उसे बहुत पहले ही हो जाती है। डोनेटुक अस्पताल के चिकित्सा विज्ञानी जुलिया की इस अतीन्द्रिय क्षमता के माध्यम से उन जटिल रोगों का पता लगाते हैं जिन्हें वे स्वयं महँगे वैज्ञानिकों उपकरणों से भी ज्ञात नहीं कर पाते। जब कि वह जटिल से जटिल रोगों की जानकारी 5 से 10 सेकेण्ड के अन्दर प्राप्त कर लेती है।

इटली के प्रसिद्ध पर्यटक स्थल फामिया में रहने वाले 11वीं कक्षा के छात्र बेनेदेत्तो सुपीनों की आँखों से चिनगारियों का फव्वारा छूटता है। जब कभी वह किसी वस्तु पर देर तक नजरें टिका देता है, उसमें आग लग जाती है। अब न तो वह नेत्रों पर जोर देकर पुस्तकें पढ़ सकता है और न ही कुछ लिख सकता है। परिवार के सदस्यों की तरफ भी वह एक टक नहीं देख सकता, अन्यथा किसी के चेहरे पर नजर टिकी कि वह झुलसने लगता है। परीक्षणकर्ता वैज्ञानिकों ने इसे प्राणशक्ति का चमत्कार बताया है, जो किन्हीं कारणों से बेनेदेत्तो में जाग्रत हो गई हैं, पर उसके सुनियोजन की कला ज्ञात न होने से वह मात्र तमाशा दिखाने या हानि पहुँचाने जैसे कौतूहल ही प्रस्तुत कर सकती है।

इसी तरह रूस के यूक्रेन का शशा नामक एक किशोर छात्र जिस किसी वस्तु का स्पर्श कर लेता है, वह जलने लगती है। अब तक वह अपने तन ढकने के वस्त्रों से लेकर घर की प्रायः सभी वस्तुओं को भस्मसात् कर चुका है। अपनी इस विलक्षण शक्ति के कारण उसे कितनी ही बार स्थान परिवर्तन के लिए रिश्तेदारों के यहाँ भेजा गया, किन्तु वहाँ से भी इस प्रक्रिया के कारण उसे भागना पड़ा। शशा की असाधारण क्षमता का अध्ययन कर रहे सुप्रसिद्ध चिकित्सा विशेषज्ञ डॉ. वाल्दीमिर कोरचिन्कोव का कहना है कि उसकी पूरी काया डायनेमो की भाँति विद्युतीय आवेश से भरी रहती है और जब तक उसमें उफान सा उठता है और संपर्क में आने वाली वस्तु में आग लग जाती है। इसी तरह का निष्कर्ष यूक्रेनियन एकेडमी ऑफ साइन्सिस के प्रमुख रसायन विज्ञानी डॉ. ए नातोली पोपोव का हैं। उनने इसे प्राणाग्नि का एक स्थान पर अधिक परिणाम में संचय बताया है और माना है कि मनुष्य का शरीर भी सूर्य की तरह ही एक आग का गोला है। इस छोटे से पिण्ड में अगणित शक्तियाँ समाहित हैं जिनमें से प्राण एक है। यह सारा खेल उसी का है।

मैनचेस्टर की श्रीमती पालिन शा नामक एक अधेड़ महिला चलते फिरते जीवंत बिजली घर के रूप में प्रसिद्ध है। जिस किसी वस्तु को वह स्पर्श कर लेती है, धमाके की आवाज के साथ उसमें से शॉर्टसर्किट की तरह चिनगारी निकलने लगती है। हाथ मिलाने वाले झटके खा कर दूर जा गिरते हैं। जाँचकर्ता वैज्ञानिकों ने पाया है कि पालिन के शरीर से दो हजार बोल्ट तक का विद्युतीय प्रवाह निकलता है। इससे बचने के लिए डॉक्टरों ने उसे विद्युत रोधी दस्ताने पहनने और दिन में कई बार नहाने की सलाह दी है। अपने बायें टखने में वह सदा एक अर्थ वायर बाँधे रखती है जिससे शरीर में उत्पन्न होने वाली अतिरिक्त विद्युतीय तरंगें धरती में समा जायें।

पालिन शा पहले एक कंप्यूटर कंपनी में र्क्क के पद पर कार्यरत थी, पर कुछ दिनों पश्चात् उसके अन्दर कुछ ऐसा परिवर्तन हुआ कि उसकी उपस्थिति मात्र से कम्प्यूटरों ने सही ढंग से काम करना ही बंद कर दिया। फलतः राशियाँ और परिणाम गलत निकलने लगे। उसका स्थानान्तरण अन्य जगह कर देने पर मालिक को दूसरी तरह की परेशानियाँ सुनने को मिलने लगी कि जो भी उसके संपर्क में आता है, विद्युतीय झटके का शिकार बन जाता है। अंततः उसे नौकरी छोड़नी पड़ी। अपनी विद्युतीय क्षमता का परिचय सबसे पहले उसे तब मिला, जब एक दिन मछलियों से भरे एक्वैरियन्म को छूने मात्र से उसके काय विद्युतीय न्यू प्रवाह को प्रवाह सह ने पाने कारण वे सबकी सब मछलियाँ छटपटा कर मर गईं।

उपरोक्त घटनाएँ महर्षि वशिष्ठ के उस कथन की पुष्टि करती हैं जिसमें कहा गया है कि मानवी काया से श्रेष्ठ और अद्भुत संरचना इस सृष्टि में और कोई दूसरी नहीं है। समस्त ऋद्धि-सिद्धियों के भाण्डागार इसी देह में प्रसुप्त अवस्था में भरे पड़ा हैं। आवश्यकता मात्र उन्हें पहचानने, जाग्रत और विकसित करने तथा सदुपयोग में लाने भर की है। आन्तरिक विभूतियाँ कितनी बहुमूल्य हैं, इसे अनुभव से ही जाना जा सकता है।

उपरोक्त वृत्तांत चाहे वे अतीन्द्रिय क्षमता के जागरण के हों अथवा प्राण शक्ति के एक स्थान पर केन्द्रीकरण से चमत्कारी परिणति दिखाने वाले, एक ही तथ्य प्रमाणित करते हैं कि ऋद्धि-सिद्धियों का समुच्चय मनुष्य में अंदर प्रसुप्त पड़ा है। यदि प्रयास पूर्वक उन्हें जगाया उभारा जा सके तो अपनी सामान्य क्षमताओं के अतिरिक्त इस सामर्थ्यों से वही लाभ लिया जा सकता है जो प्राचीनकाल में ऋषिगण अपनी काया रूपी प्रयोगशाला में तपश्चर्या द्वारा प्रत्यक्ष कर दिखाते थे। भौतिक उपलब्धियों की तुलना में आत्मिक विभूतियाँ निश्चित ही बहुमूल्य हैं, इस तथ्य पर किसी प्रकार विवाद नहीं है।


दैवी प्रेरणा बनाम अंतःस्फुरणा

भगवद् शक्ति के क्रियान्वित होने का एकमात्र माध्यम मनुष्य शरीर ही है। वह निराकार सत्ता कुछ भी उदात्त कार्य इसका प्रयोग कर पूरा करा सकती है। समय-समय पर होने वाली महत्वपूर्ण वैज्ञानिक शोधों एवं खोजों के पीछे यह रहस्य छुपा हुआ है। परम पिता और मनुष्य उसके श्रेष्ठ व ज्येष्ठ राजकुमार होने के नाते वह सत्ता सदा उसे उच्चस्तरीय प्रेरणाएँ दिया करती हैं अथवा कोई ऐसा कार्य करवा लेती हैं, जिसे मनुष्य संयोग समझ बैठता है, पर वही संयोग जब बाद में महत्वपूर्ण खोज बन जाता है, तो उसे आश्चर्य होता है कि आखिर ऐसा क्यों हुआ? ऐसी बात नहीं है कि कोई एक आविष्कार में ऐसी घटना घट गई हो। आदिम काल में आग से लेकर वर्तमान के आग्नेयास्त्रों तक के अनुसंधानों का इतिहास ऐसी ही स्फुरणाओं अथवा भूलवश घटी घटनाओं से भरा पड़ा है, जो बाद में महत्वपूर्ण आविष्कार साबित हुई। यह बात दूसरी है कि मनुष्य इसे अपनी स्वयं की उपलब्धि मान बैठता है, पर सच पूछा जाय तो इसके पीछे उसी परम सत्ता की इच्छा-आकांक्षा काम करती रहती है।

वोल्गाना विश्वविद्यालय, इटली के प्राध्यापक लुइगी गेल्वीनि एक दिन आनी प्रयोगशाला में जीवन-जन्तुओं की नाडियों एवं माँसपेशियों में विद्युत प्रवाह के प्रभाव का अध्ययन कर रहे थे। उन्होंने मेंढक को काटने के लिए स्टील का औजार प्रयुक्त किया। उसी समय उनके सहायक ने उसी कमरे में स्थिर विद्युत मशीन से विद्युत प्रवाह उत्पन्न किया, जिससे एक विद्युतीय चक्र बन गया और अचानक मेढक की माँसपेशियों एवं नाडियों में ऐसी फड़कन अनायास हुई मानों कोई जोर लगाया गया हो। मरे हुए मेढक में इस परिवर्तन ने विद्युत धारा के सम्बन्ध में एक रास्ता खोल दिया, तो आगे चलकर चिकित्सा क्षेत्र में महत्वपूर्ण सिद्ध हुआ।

सन् 1837 के पहले फोटो लेने की मशीन का निर्माण नहीं हुआ था। इसके पूर्व मात्र हाथों के प्रयोग से ही चित्र बनाये जाते थे। प्रायोगिक फोटोग्राफ के सम्बन्ध में खोज करने का श्रेय लुईस डेगुइर को जाता है, किन्तु सही अर्थों में यह खोज उनकी भी नहीं थी, वरन् यह तो अनायास ही हो गया था। डेगुइर प्राकृतिक दृश्यों को बनाने वाले चित्रकार थे। अतः सहायता के लिए अँधेरा एवं धुँधला फोटो लेने वाला कैमरा प्रयुक्त किया करते थे। वे फोटोग्राफिक प्लेट में सिल्वर का आवरण लगाते थे एवं संवेदनशील बनाने के लिए आयोडीन प्रयुक्त करते थे। परन्तु उससे जो चित्र मिलते थे, वह अस्पष्ट एवं धुँधले होते थे। एक दिन एक प्लेट जिसमें चित्र खिंच चुका था, एक पात्र में पड़े रसायन में धोने लगे और उस प्लेट का पुनः उपयोग किया दूसरे दिन उन्हें अत्यन्त प्रसन्नता हुई, क्योंकि जो चित्र प्राप्त हुआ वह बहुत ही स्पष्ट एवं साफ दिखाई दे रहा था, किन्तु परेशानी तब हुई कि कैसे पता लगाया जाय कि एक या अनेक रसायनों के संपर्क से यह परिवर्तन हुआ। इसके लिए कई दिनों तक प्रयोग-परीक्षण चलता रहा, पर उन्हें निराशा ही हाथ लगी क्योंकि जो सूत्र मिला वह आधा-अधूरा ही था। उनकी निगाह प्रयोग के दौरान बिखरी पड़ी चमकती हुई बूँदों पर पड़ी। इसका जब उन्होंने अध्ययन किया, वे जोर से चिल्ला पड़े-मैंने प्रकाश को पकड़ लिया, मैंने उसकी उड़ान को पकड़ लिया। भविष्य में सूर्य को भी कैमरे में कैद होना पड़ेगा यह विजय वस्तुतः डेगुइर की नहीं, अपितु कोई शक्ति उनसे भूलें कराकर यह प्रयोग सफल करवाना चाहती थी।

सन् 1939 के पहले रबर का उपयोगी स्वरूप प्रकट नहीं हुआ था, वह रबर जो इस समय दैनिक जीवन क्रम में महत्वपूर्ण स्थान रखता है। इसकी खोज भी अचानक घटने वाली घटना के ही फलस्वरूप हुई। रबर का प्रारंभिक रूप उपयोग रहित था। गरम अवस्था में चिपकने वाला एवं ठंडा होने पर कड़ा, जो निरुपयोगी था। अमेरिका के चार्ल्स गुडइयर रबर को उपयोगी कर रहे थे, कि नीचे गरम स्टोव में कुछ सल्फर एवं रबर गिर पड़ा। रबर गल गया, तब सल्फर से जब प्रतिक्रिया हुई, तो रबर का वह उपयोगी स्वरूप सामने आया, जो वर्तमान में प्रयुक्त होती है। यह घटना यदि नहीं घटी होती, तो शायद आज हम रबर से संचित ही बने रहन, पर कदाचित सत्ता को मनुष्य की यह पिछड़ी स्थिति स्वीकार नहीं थी, इसी कारण उसने उक्त घटना द्वारा उसे एवं प्लास्टिक युग कहा जाय, तो कोई अत्युक्ति नहीं होगी।

मरने के बाद कुछ समय तो जीव जन्तुओं का हृदय क्यों धड़कता रहता है, इस सम्बन्ध में ग्रेट ब्रिटेन के डॉ. रिजर विभिन्न प्रकार के परीक्षणों में निरत थे। नमक की कुछ मात्रा मेढ़क के रक्त में मिलाने पर मरने के बाद भी हृदय धड़कता रहा, किन्तु यह बहुत कम समय के लिए था। एक दिन डॉ. रिंजर यह देखकर हैरान हुए कि नल के पास कई घंटे पहले मृत पड़े मेढ़क का हृदय अब भी धड़क रहा है। वे आश्चर्यचकित थे कि आखिर यह कैसे संभव हुआ? इसका कैसे पता लगाया जाय, इसका उत्तर भी जल्दी ही मिल गया। प्रयोगशाला में काम करने वाले सहायक लड़के ने बताया कि उसने “रिंजर सोल्यूशन” के बदल नल के जल का प्रयोग किया। किन्तु सौभाग्य से उस दिन नल के जल में सही अनुपात में पोटैशियम एवं सोडियम की मात्रा मिली हुई थी, जो आगे चलकर “रिंजर सोल्यूशन” कहलाया, जिसका उपयोग चिकित्सा एवं जैविक परीक्षणों में अति महत्वपूर्ण है। उस दिन वह लड़का स्वतः प्रेरणा से नल का पानी प्रयुक्त न करता, तो इसकी खोज नहीं हुई होती। ऐसा लगा, मानों कोई चेतन सत्ता ने मनुष्य को हारते देखकर खोज के लिए अनुकूल परिस्थिति बनाई हो।

फ्राँस के हेनरी बाक्वारल, रोण्टजन की एक्स-रे की खोज के बाद से यह समझने लगे थे कि सूर्य किरण ही एक्स किरणों के रूप में बदलती है। इसी सिद्धान्त की पुष्टि करने के लिए एक प्रयोग के दौरान उन्होंने फोटोग्राफिक प्लेट को काले पेपर से ढँक दिया। उसके बाद उसके पास स्वतः दीप्तिमान पदार्थ, सौभाग्य से यूरेनियम को रखा और सोचा कि इससे निःसृत किरणों का प्रभाव प्लेट पर पड़ेगा। इतना मालूम था कि यह सूर्य किरणों के निकलने पर चमकती है, किन्तु सूर्य कई दिनों तक उदित नहीं हुआ, मौसम खराब होने के कारण। अतः प्रतीक्षा करने के लिए एक दराज में बन्द कर दिया। बाद में जब बाक्वारेल ने इसे साफ किया तो पता चला, यह तो प्रभावित हुआ है। तब उन्होंने सिद्धान्त प्रतिपादित किया कि कुछ ऐसे तत्व हैं, जिनसे प्रकाश की अनुपस्थिति में भी कुछ किरणें निकलती हैं। उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि यूरेनियम के अन्दर मौजूद किसी अज्ञात तत्व से यह रेडियेशन निकल रहा है। इस तरह आगे की खोज के लिए उन्होंने एक नया रास्ता बनाया। इसी सूत्र के आधार पर 1999 में मैडम क्यूरी ने रेडियम की खोज की, परन्तु क्या होता यदि बाक्वारेल के प्रयोग के दिनों सूर्य निकल जाता? तब शायद यह महत्वपूर्ण अनुसंधान संभव न होता।

सर अलेक्जेण्डर फ्लेमिंग रोगों के निमित्त कारण बैक्टीरिया पर कुछ शोध कर रहे थे। 1922 के एक दिन उन्हें जुकाम हो गया। अचानक उड़ आयी बैक्टीरिया का कुछ अंश उछलकर उनके नाक एवं मुँह में गिर गया। फ्लेमिंग दुखी हुए कि मेहनत बेकार गई। किन्तु तब वे आश्चर्य में पड़ गये जब इससे उनका जुकाम ठीक हो गया। इसी के आधार पर वे आगे प्रयोग-परीक्षण करते गये और अन्ततः एक ऐसी खोज की जिससे प्राणरक्षक पेन्सिलीन दवा बनायी जा सकी। वह घोल जिससे दवा बनी थी, फफूँद से बना था व गलती से ही बन गया था। किंतु एक महत्वपूर्ण आविष्कार उसी से संभव हुआ।

न्यूटन का तीसरा नियम एवं गुरुत्वाकर्षण का सिद्धान्त फल को पेड़ से टपकते देखकर होना, फैराडे द्वारा विद्युत की खोज चुम्बक के चारों ओर लिपटे कुण्डलीय तार के कारण होना, पक्षियों को देखकर वायुयान की कल्पना चित्र बनना, उबलती हुई केतली को देखकर स्टीम इंजन का, इसके द्वारा आविष्कार, माता के डाँटने पर कि शाम को पौधों को न सताओ, इसके द्वारा पेड़-पौधों में चेतना होने की जगदीश चन्द्र बसु द्वारा खोज, यह सब तथ्य यह स्पष्ट करते हैं कि जहाँ मानवी बुद्धि असफल होकर हताश-निराश सिद्ध होने लगती हैं, वहीं परमसत्ता स्फुरणा के रूप में, दुर्घटना, संयोग अथवा भूल या सामान्य घटना के माध्यम से व्यक्ति का मार्गदर्शन करती है। यह बात और है कि व्यक्ति उसे मान ही लेता है, पर इनके पीछे वस्तुतः उसी समर्थ सत्ता का हाथ होता है, जिसने यह सृष्टि बनायी है। इन दिनों यदि हम अपने अन्तराल को तनिक-सा पवित्र बना लें, तो जीवन-यापन के संदर्भ में ऐसी ढेरों सत्प्रेरणाएँ अनायास प्राप्त कर सकते हैं, जो हमारे जीवनक्रम को सरल-सहज बना दें, क्योंकि आज हम महाकाल की सक्रिय गतिविधियों के महत्वपूर्ण सन्धिकाल से गुजर रहे हैं। विश्व घटनाक्रमों पर दृष्टि डाल कर इसका स्पष्ट आभास प्राप्त किया जा सकता है।


“मैं व्यक्ति नहीं विचार हूँ!”

महासागर के शान्त वक्षस्थल पर भयानक झंझावात उठने के पहले एक घोर निस्तब्धता छा जाती है। उस समय वायुमण्डल उत्तेजित हो उठता है। और सारा वातावरण एक आशंका से शून्य सा हो जाता है। आकाश के वक्ष पर ज्वालामुखी के फटने के पहले एक घोर दबी हुई अशान्ति फैल जाती है, उसका नीला रंग धूमिल हो जाता है और एक भय से सारा आकाश-मण्डल वायु से रिक्त हो जाता है।

कारागार के इस कक्ष में कुछ ऐसी ही शून्यता-रिक्तता छाई हुई थीं। उनके पास बैठे इन सबकी दशा तो और बदतर थी। अन्दर के उद्वेलन के बावजूद इन्हें अनुभव हो रहा था जैसे अंगों में लहू की भाग दौड़ साँसों की घुसपैठ सभी कुछ थमने को है। निराशा, भय, आशंका रिक्तता के इस माहौल में सिर्फ एक वही प्रसन्न लग रहे थे। पता नहीं कौन सी ऐसी अमर मूरि थी उनके पास।

“तब फिर आप नहीं ही चलेंगे।” पास बैठे सत्ताईस -अट्ठाइस साल के युवक ने पूछा? भावों के अतिरेक से उसका गला रुंधा था। काफी देर से समीप बैठा आँखें नीचे किये पैर के अँगूठे से फर्श खुरच रहा था। उसे सूझ नहीं रहा था क्या करे वह।

न्यायालय से उन्हें मृत्युदण्ड घोषित किए जाने के बाद इन सबने उनको कारागार से छुड़ाने की योजना बनाई थी। सब कुछ ठीक हो गया था पर किया क्या जाय वह स्वयं मना कर रहे थे। जेल कर्मचारियों की भी गुप-चुप सहमति थी। सभी को पता था, न्यायाधीशों ने विद्वेषियों के दबाव में आकर फैसला सुनाया था। उनके रहने से कितनों का ही कल्याण हो रहा था। उनके रहने से कितनों का ही कल्याण हो रहा था। कितने ही भटकन से उबरें थे। पर.....उसने उनके चेहरे की ओर देखा। सत्तर वर्ष से अधिक अवस्था हो जाने के बाद भी झुर्रियाँ और मलिनता के निशान न थे। प्रफुल्लता भरी ताजगी थिरक रही थी।

“अरे! मृत्यु मेरी और उदासी तुम सबके चेहरों पर,” हँसते हुए उनने उसका कंधा थपथपाया। फिर गम्भीर हो बोले-कभी-कभी ऐसे क्षण आते हैं जब किसी की मृत्यु का मोल जीवन से अनेकों गुना अधिक हो जाता है। जिस समय स्थूल शरीर सूक्ष्मतम शक्तियों के क्रिया−कलाप में अवरोध बनने लगे। ऐसी दशा में ठीक यही है कि इस खोल को उतार दिया जाय। सभी दम साधे सुन रहे थे। कौन क्या बोल? बोले भी तो क्या?

“पर आपके रहने से अनेकों का भला.....।” एक अन्य ने निवेदन करना चाहा। उसकी वाणी में हिचकिचाहट के साथ अनुनय का पुट था।

“फीडो! लगता है तुम लोग मुझे पहचान नहीं पाए। इन सबकी आँखों में झाँकते हुए बोल-मैंने कितनी बार समझाया कि मैं व्यक्ति नहीं हूँ।”

इस कथन को सुन पास आ रहे एक जेल कर्मचारी के पाँव ठिठक गए। वह बताने आ रहा था निकलने का सभी सुयोग बन चुका है। किन्तु मैं व्यक्ति नहीं हूँ” सुनकर अवाक् रह गया। सोचने लगा-कैसा विलक्षण है यह आदमी जो कह रहा था कि मैं आदमी नहीं, व्यक्ति नहीं।

“तो महाशय आप क्या हैं।” उसकी जिज्ञासा होठों से निकले बगैर रह न सकी।

“मैं विचार हूँ मित्र!” चेहरे पर गम्भीरता और आँखों में एक अनोखी चमक खेल रही थी। कुछ रुक कर बोले-जहर पीस लिया गया।”

यहाँ तो......।”

“नहीं! तुम जहर पीसो।”

सुनने के साथ उसके पैर द्वार की ओर मुड़. गए। वह पुनः अपने शिष्यों को समझाने लगे-तुम सबके दुःखी निराश होने का कारण यही है कि तुम लोग मुझे व्यक्ति के रूप में पहचानते आए हो। आज जबकि इसके खो जाने का, बिछुड़ने को समय आ गया सब के सब विकल हो। पर मैं व्यक्ति था ही कब? यदि मेरे द्वारा किसी का भला हुआ भी है तो सिर्फ विचारों के कारण।

“विचारों की शक्ति आपसे भी ज्यादा!” गुरु से बिछुड़ने के दुःख ने उसके मन में अजीब सी सनसनाहट भर दी थी। समझना चाहकर समझ नहीं पा रहा था।

“हाँ इनकी अपार शक्ति है प्लेटो।” उनका सर्वाधिक प्रिय शिष्य था। विनम्र और मितभाषी। सारी उम्र उन्होंने जो ज्ञान की मशाल जलाई, अब उसे प्रज्ज्वलित रखने का दायित्व उसी का था, अन्यों को तो सिर्फ सहायक भर होना था। विचार कर्म के प्रेरक हैं। वह अच्छे कर्मों में लग जाएँ तो अच्छे और बुरे मार्ग में प्रवृत्त हो डडडड तो बुरे परिणाम प्राप्त होते हैं। सच मानों आदमी किसी अकेली कोठरी में बन्द विचार करे और ऐसा ही करते हुए मर जाए विचार कुछ समय बाद कोठरी दीवारों को भेद कर बाहर निकल पड़ेंगे और अनेकों को प्रभावित किए बिना न रहेंगे। वात्सल्य के अनुपात में सने ये शब्द सुनने वालों के दिलों में समाए बिना न रह सके।

शिष्यों को अपने गुरु की व्यथा मालूम थी। उन्हें ज्ञात था कि उनकी मुसकान के आवरण में कितनी तड़पन छुपी है। सारी उम्र उन्होंने जीवनों को सँवारा है और अब जबकि वह स्वयं महाप्रयाण की ओर गतिमान हैं। वामन विराट होने की दिशा में पाँव बढ़ा रहे हैं, उनके कार्य का गुरुतर दायित्व शिष्य परिकर को ही तो वहन करना पड़ेगा।

“देख नहीं रहे लोक जीवन का प्रवाह।” उनकी वाणी अन्तराल की गहराइयों से उभरी।” करो-शरीर क्या है? मलमूत्र से भरा और हाड़-माँस से बना घिनौना किंतु चलता-फिरता पुतला। जीव क्या है? आपाधापी में निरत, दूसरों को नोंच खाने की कुटिलता में संलग्न चेतना स्फुल्लिंग। जीवन क्या है? एक लदा हुआ भार जिसे कष्ट और खीज़ के साथ ज्यों-त्यों वहन करना पड़ता है। पेट और प्रजनन इसका लक्ष्य बन गया है, लिप्सा और लोलुपता की खाज-खुजाते रहना, इसका प्रिय प्रसंग।”

कितनी सटीक विवेचना है-आज के सामाजिक और वैयक्तिक जीवन की। उन सबके मन अपने गुरु से एकाकार हो रहे थे।

जन समुदाय को इस विडम्बना से उबारने के लिए उसके विचारों में क्राँतिकारी परिवर्तन करना होगा। इस परिवर्तन के बाद ही वह समझ सकेगा कि शरीर-भगवान का मन्दिर है। व्यक्तित्व आस्था है और मनुष्य श्रद्धा। चेष्टाएँ-आकांक्षाओं की प्रतिध्वनि हैं। इन सबके समायोजन का ही उपाय है कि विचार बदलें तुम लोग मेरे विचारों के संवाहक बनो।

बात -चीत का क्रम चल रहा था, इतने में जेल का अधीक्षक स्वयं विष के घोल से भरा प्याला लेकर आ गया। उसकी स्वयं की आँखें डबडबाई हुई थी। उसे देखकर अन्यों की आँखें भर आई। पर सभी विवश थे।

उन्होंने मुसकराते हुए प्याले को हाथ में लिया और बोले। इसमें निहित द्रव अज्ञान की बूँदें का संघटन है। मैं विष नहीं अज्ञान पीने को तत्पर हुआ हूँ। मेरे सशरीर न रहने पर तुम सबकी जिम्मेदारी अब की अपेक्षा असंख्यों गुना बढ़ जाएगी। विश्वास रखो- विचारों के रूप में प्रेरक शक्ति के रूप में तुम सब प्रतिपल मुझे अनुभव कर सकोगे। पहले मैं एक शरीर के रूप में कार्य करता था और आज से तुम सभी के माध्यम से अनेकों शरीरों द्वारा कार्य करूँगा। अद्भुत होगा ज्ञान और कर्म शक्ति का यह समन्वय। चमत्कारी परिणाम देखकर चौंक उठेगा संसार।”

प्याला अधरों से जा लगा। सिसकियाँ फूट पड़ी। एक-एक घूँट के बढ़ते क्रम के अनुसार बढ़ता जा रहा था। उनके मुख पर प्रसन्नता और आँखों में दीप्ति यकायक बढ़ी और फिर मन्द पड़ने लगी। उनके आखिरी शब्द थे चिन्तित मत हो, घबड़ाओ नहीं तुम सभी विचारों के रूप में, ज्ञान के रूप में और मार्गदर्शक के रूप में हर पल-हर क्षण महसूस करोगे। ध्यान रखना कर्म शक्ति मन्द न पड़े।

स्वयं को व्यक्ति नहीं विचार कहने वाले यह महामानव थे-यूनानी दर्शन के पितामह-सुकरात जिनके द्वारा जलाई गई ज्ञान की मशाल को उनके शिष्यों ने निज का प्राणपण कर जलाए रखा। अब हम सबकी बारी आ पहुँची है-युग सुकरात” के विचारों को जन-जन तक पहुँचाने की।


विधाता के साथ समस्वरता

अपनी समूची गति से सक्रिय विश्व जीवन का यह अरणि मन्थन अकारण नहीं है। इसकी हलचलों से राजतंत्र, समाजतंत्र, धर्मतंत्र सहित विश्व व्यवस्था का हर छोटा-बड़ा घटक उद्वेलित है। मनुष्य समुदाय का हर वर्ग इसे आश्चर्य से आँखें फाड़े देख रहा है। जहाँ कहीं जो कुछ घट रहा है आश्चर्यजनक है। सिर्फ जीवन की बाह्य भूमि घटनाओं की बारिश से भीग रहीं हो, ऐसा नहीं है अंतर्मन में भी उथल-पुथल व्यापक है। उन विवेकशीलों ने इसे सूक्ष्मता और गहराई से समझना शुरू किया है, जिन्हें विश्वास हो चुका है कि यह अरणि मन्थन समूचे जीवन की संरचना में फेर-बदल कर डालने के लिए किया जा रहा नियन्ता का तप है, जिसका ताप महसूस करने के लिए सभी को बाध्य होना पड़ रहा है। यह उष्णता जाग्रत मन का मन्थन करें यह स्वाभाविक है, सोचेंगे जीवन्त ही। जिन्होंने अपने शरीर और मन पर निष्क्रियता के ताले डाल रखे हैं। उनका कहना ही क्या? नव सृजन के विधाता के तप का प्रत्येक स्पन्दन एक आह्वान है प्रत्येक हलचल एक सन्देश, जिसकी हर गूँज में स्वर समाविष्ट है- आगे आने और साथ निभाने के।

तप में साथ निभाने की बात मन के पर्दे पर सवालों की अनेकों आड़ी-तिरछी रेखाएँ खींच जाती है। भूखे रहने, एक पाँव के बल खड़े होने जैसे तरह-तरह के कल्पना चित्र मन के सामने नाचने लगते हैं। यही तो ताप का लोक प्रचलित रूप है। तो क्या सृजेता को आज-कल कुछ ऐसा ही उलटा-पुल्टा करना पड़ रहा है। यदि ऐसा है तो उसमें भागीदारी एक संशय भरा सवाल उपजा कर हतोत्साह की खाई में फेंक देती है। पर असलियत भिन्न है-प्रचलन हमेशा सही नहीं होते। यथार्थता के रत्न जिस गहराई में रहते हैं वह लोक प्रचलनों के उबलेपन में कहाँ?

इसका महत्वपूर्ण कारण-यह भी है कि प्रचलन प्रायः साधारण मनोभूमि के लोगों में पनपते हैं और इस मनोभूमि के लोगों के दो वर्ग हैं। एक परपीड़क-जिसे दूसरों को पीड़ा देना सुखकर लगता है। दूसरा स्वपीड़क- जिसे अपने को सताने में मजा आता है। परपीड़कों के वर्ग में आने वाले ज्ञात रूप से अज्ञात रूप से उस ओर सरकते रहते हैं-जहाँ वह दूसरों को पीड़ा दे सकें। शिक्षण, प्रशासन सुधार के नाम पर सदा ही किसी न किसी को सताने के अवसर की खोज बनी रहती है।

स्वपीड़क उत्पीड़न के वे सारे प्रयोग एक-एक करके अपने ऊपर कर डालते हैं। ईश्वर के नाम पर, प्रार्थना के नाम पर ऐसों की संख्या कम नहीं है जो कील-काँटों की शैया पर लेटते हैं, महीनों-महीनों भूखे रहते हैं। ऐसे लोग भी हैं जो लगातार जगते रहने की कोशिश में लगे रहते हैं, ये सालों खड़े रहे और कोई मुद्रा नहीं अपनाई। उनकी टाँगे करीब-करीब मुर्दा हो चुकी। एक हाथ उठाए जो जी रहे हैं-एक हाथ मृत हो रहा है। हड्डियों का ढाँचा हो गए इस हाथ में खून संचरित नहीं है। प्रकारान्तर से यह एक प्रकार की हिंसा है। “वैरायटीज ऑफ रिलीजस एक्सपीरियेन्सेज” के लेखक विलियम जेम्स ने अपनी इस रचना में ऐसे तथाकथित तपस्वियों के जीवन का गहरा सर्वेक्षण किया है। विवेचन करते हुए उसने प्रश्न उठाया है-क्या यह तप है? आनन्द के स्रोत परमेश्वर की ओर जाने के लिए क्या यही मार्ग है?

जेम्स को उसके सवालों का जवाब मिला या नहीं-यह तो नहीं मालूम। पर सहस्राधिक वर्षों से गीता अपने सत्रहवें अध्याय के पाँचवें-छठवें श्लोकों के माध्यम से इस तरह का जीवन जीने वालों को दम्भ अहंकार का लबादा लपेटे अविवेकी असुर कहती आयी है। उसके अनुसार ये सभी मनोव्याधि से पीड़ित हैं। आज के मनोविज्ञान के संदर्भ में परखें तो चर्चा उचित है। जे. बैरोन अपने चिंतकोश “साइकोलॉजिकल प्रिंसिपल” में इसे “सैडिज्म” कहते है। इसके मुताबिक़ हिटलर, स्तालिन, माओत्से को इलाज तुँग इन सबके साथ ऐसे अनेक तपस्वियों को इलाज की जरूरत है। ऐसा इलाज जो इन्हें समझदारी सिखा सके-जो बता सके कि जीवन उत्पीड़न नहीं संवेदना है और तप इसकी चरमावस्था की प्राप्ति है।

उत्पीड़न कोई मार्ग नहीं-यह तो आक्रमण है चाहे अपने ऊपर हो या दूसरों पर। आक्रामकता कभी तप नहीं बन सकती। दूसरों के शरीर को उत्पीड़ित करने व शरीर को सताने में क्या भेद? शरीर है दूसरों का, स्वयं का शरीर से जरा ज्यादा नजदीक है। बस इसीलिए यह जल्दी हिंसा का शिकार बन सकता है। न जाने कितने वर्षों से मानवता इसे झूठे लोक प्रचलन को ढो रही है कि यह ईश्वर के साथ चलने-उससे भागीदारी निभाने का रास्ता है।

भगवान तो संवेदनाओं का घनीभूत पुँज है। वह संवेदना को हरण करने की बात क्यों सुझाने लगा बल्कि इसके उसने मनुष्य को संवेदनाएँ दी हैं। संवेदनशीलता की अनुभूतियों को स्वयं के साथ औरों को लाभ देने के लिए प्रदत्त किया है। पीड़ा पहुँचाने से तो इनका हरण हो जाता है। फिर यह हरण विलासिता द्वारा हो या काँटों के बिस्तर पर लेट कर। आज का मनोविज्ञान विलासिता अतिशय भोग को भी उत्पीड़न का एक प्रकार मानता है। क्योंकि भोग की क्रमिक वृद्धि शनैः शनैः इन्द्रियों को, मन की चेतना को संवेदना शून्य बनाती जाती है। मानव मन की सूक्ष्मताओं के पारखी ए हानेगग का “ कांप्लेक्स फ्री पर्सनैलिटी” में कहना है कि व्यक्तित्व की किसी न किसी ग्रन्थि के कारण व्यक्ति भोगों में डूबता है, नशेबाज बनता है अथवा स्वयं को सताने लगता है। परिणाम में आती है- मर्दानगी-चेतनाशून्यता

संवेदनशून्य शरीर और मन भला कैसे अनुभव करेंगे उस आशीष को जो उसके अस्तित्व का करेंगे उस आशीष को जो उसके अस्तित्व का विद्याता उस पर लगातार बरसाए जा रहा है। हर पल घट रही अनुग्रह वर्षा की इस अनुभूति को विलास और उत्पीड़न से मृतप्राय जीवन कहाँ अनुभव कर सकते हैं? ईश्वर के साथ समस्वरता बिठाने के लिए हमें कहीं अधिक संवेदनशील होने की जरूरत है। क्योंकि यह व्यक्तित्व की आँख है, अनन्त की ओर खुलने वाला झरोखा है। जब स्वयं का अस्तित्व इससे ओत-प्रोत होता है तो हवा का हल्का झोंका भी गहरे स्पर्श की अनुभूति कराता है। साधारण पत्थर नदी की लहरें-समूची प्रकृति एक संदेश देती दिखाई पड़ती है। जीवन शून्यता की दशा में कोई इसे कैसे अनुभव करेगा?

वास्तविकता यही है-जिसने अपने में जितनी संवेदनशीलता जगाई वह उतना ही अधिक तपस्वी हुआ। यही तपस्या-जीवन के विधाता के साथ समस्वरता है। इसी कारण गीता के महोपदेष्टा योगेश्वर कृष्ण ने गीता के सत्रहवें अध्याय में तप के प्रकरण को स्पष्ट करते हुए उन तकनीकों को गिनाया है, जिनसे अस्तित्व की जागरूकता बढ़े। उनके अनुसार शरीर का तप है-सेवा सरलता और श्रम। वाणी का तप है-सत्य-प्रिय और हितकारक वचन और मन का तप है-प्रसन्नता सौम्यता तथा विचारशीलता।

यही वह तकनीकें हैं-जिनसे जीवन की पुरानी पड़ गई गाँठों को खोला जा सकता है और तपश्चर्या है ही ग्रन्थि मुक्त सहज-सरल जीवन जीने की मनोवैज्ञानिक प्रणाली। क्योंकि जीवन जितना जटिल होता जाएगा, संवेदना उतनी खोती जाएगी। उत्पीड़क और विलासी दोनों अपने जीवन को संवेदना शून्य बना अनेकानेक ग्रन्थियों से कुरूप बना देते हैं। निष्ठुर तो जटिलता का मूर्तिमान् रूप ही है। जबकि सरल जीवन का मतलब होता है, बिना उलझाव का जीवन। सहज जीवन गहरी समझ का जीवन होता है।

होता यह है कि तप के नाम पर लोग सहजता और सरलता गँवा बैठते हैं। करने लगते हैं अनुकरण बन्दर के बच्चों जैसी नकल। महावीर नग्न रहते थे-हमें भी नग्न रहना चाहिए। बुद्ध 7 दिन पेड़ के नीचे बिना हिले-डुले बैठे रह, हम सत्तर दिन बैठे रहेंगे। आखिर बुद्ध और महावीर से बड़ा जो बनना है। अहं के पोषण का यह प्रयास हमें जड़ता के अंधेरे में ले पटकता है। महावीर की नग्नता के पीछे अनुभव की गहरी समझ थी। उनकी वह अनुभूति थी कि दिशाएँ ही वस्त्र हैं। उनके पंचभूतों के शरीर ने प्रकृति के पंचमहाभूतों से एकत्व बिठा लिया था। बुद्ध की लम्बी बैठक का कारण, ध्यान मग्नता थी। मन का शरीर भाव से ऊपर उठ कर निस्पन्द हो जाना था। जबकि हमारे जीवन में आती है-सिर्फ नकल। लाओत्से कहता था-” नकल से उत्पन्न जड़ता मृत्यु है।”

आज खोज इस बात की करनी है कि अपने व्यक्तित्व की किस ग्रन्थि के कारण हम मुख्य धारा से अलग-थलग पड़ गए। थोड़ा सा आत्मनिरीक्षण, विवेचन सब स्पष्ट कर देगा, हमारे व्यक्तित्व की जटिल ग्रन्थियों के अधिष्ठाता से समस्वरता सामंजस्य की अनुभूति करने लगेंगे। तपश्चर्या की इसी भागीदारी को आज भगवान के साथ हमें निभाना है।


गायत्री का ब्रह्मवर्चस्

गायत्री उपासना का उच्चस्तरीय सोपान ‘ब्रह्मवर्चस्’ कहलाता है। इसमें दो शब्द हैं- ब्रह्म+वर्चस्। ब्रह्म अर्थात्- ब्रह्म विद्या, ब्रह्मज्ञान। वर्चस् अर्थात्-तेजस् ब्रह्मतेज। अतः ब्रह्मवर्चस् के दो पक्ष हुए-तेजस् ब्रह्मतेज। अतः ब्रह्मवर्चस् के दो पक्ष हुए-प्रथम ब्रह्मविद्या अर्थात्-दृष्टिकोण का, क्रिया−कलाप का परिष्कार एवं भावनात्मक कायाकल्प। दूसरा वर्चस् अर्थात्-प्रसुप्त अन्तः शक्तियों का जागरण, ओजस् का संवर्द्धन। इस प्रकार ब्रह्मवर्चस् उस समग्र अध्यात्म, तत्त्वज्ञान एवं आत्मिक प्रखरता दोनों का समुचित सुसंतुलित समावेश है।

गाड़ी की पूर्णता दो पहियों के मिलने से है। एक के रहने से वह अधूरी रहती है। एक हाथ, एक पैर से किसी प्रकार काम चल तो सकता है, किन्तु उसमें सहज गतिमयता, प्रखरता और परिपूर्णता नहीं आ पाती। चिन्तन तथा क्रिया दोनों का समन्वय ही समग्र अध्यात्म साधना है। चिन्तन की उत्कृष्टता ब्रह्मविद्या या अध्यात्म-तत्त्वज्ञान का ज्ञान पक्ष है। ज्ञान एवं कर्म का समन्वय ही ब्रह्मवर्चस् है परिपोषण तथा उन्मूलन दोनों ही तथ्य इसमें समाविष्ट हैं।

ईश्वर का अवतार दो प्रयोजनों के लिए होता है-धर्म की स्थापना और अधर्म का नाश। पुण्य से प्रेम तथा पाप से घृणा की उभयपक्षीय प्रवृत्तियों को सन्तुलन बनाये रहने की प्रेरणा को ब्रह्मवर्चस् कह सकते हैं। सदाशयता के संवर्धन में उदारता और सहकारिता की नितान्त आवश्यकता है। किन्तु दुष्टता के प्रति यही नीति नहीं अपनाई जा सकती, अन्यथा सर्प को पालने, दूध पिलाने, आततायी को सहयोग देने या सहन करने के अतिवादी और भयपरक उदारता के अनर्थकारी दुष्परिणाम उत्पन्न होंगे। सज्जनता एवं सत्प्रवृत्तियों के प्रति उदार सहयोग तथा आन्तरिक दोष-दुर्गुणों एवं समाजगत अनाचारों का प्रतिकार-दोनों ही आवश्यक हैं। असुरता और पाशविकता के तत्व अपने भीतर और इस संसार में कम नहीं। उनसे जूझने के लिए मात्र सदाशयता और सज्जनता अपर्याप्त है। उनके प्रति मन्यु-सिद्धान्तनिष्ठ आक्रोश का उभरना स्वयं के प्रति कठोर होना आवश्यक हैं।

रावण द्वारा मारे गये ऋषियों के अस्थिपंजरों के पहाड़ जैसे विशाल ढेर देखकर भगवान राम ने ‘मन्यु’ की ही अभिव्यक्ति की थी और भुजा उठाकर प्रण किया था-निशिचर हीन करौं महि।” इसी प्रकार दुर्योधन पक्ष की दुर्नीति एवं दुराग्रह के दलन के लिए भगवान कृष्ण को महाभारत रचाना पड़ा था और सुदर्शन चक्र भी घुमाना पड़ा था। तेजस्विता तथा उदारता परस्पर सम्बद्ध रहनी चाहिए। पवित्रता एवं प्रखरता दोनों ही समन्वित रहें, यही उचित है। ब्रह्मवर्चस् इसी समन्वयात्मक रीति-नीति को जीवन में उतारने की प्रशिक्षण प्रक्रिया को कहते हैं। इसे आगम एवं निगम, वैदिक एवं तांत्रिक पक्षों का समन्वय कहा समझा जाना चाहिए।

मानवीय चेतना में दैवी एवं आसुरी-दोनों ही तत्व कार्यरत रहते हैं। दैवी अंश को उत्कृष्टता, सद्भावना और सज्जनता का खाद-पानी देकर बढ़ाया जाता है। आसुरी अंश का उन्मूलन करने की आवश्यकता पड़ती है। माली पौधों को सींचता है तो साथ ही अनावश्यक कुरूप टहनियों की काट छाँट भी सफाई भी करता है। किसान उपयोगी पशुओं को पालता है, साथ ही हानि पहुँचाने वाले जंगली जानवरों के भगाता भी है। अपने भीतर एवं अपने समाज के भीतर सत्प्रवृत्तियों, सद्भावनाओं का अभिवर्धन जितना आवश्यक है दुष्प्रवृत्तियों का उन्मूलन प्रायश्चित एवं इच्छापूर्ति भी उतनी ही आवश्यक है। भक्ति एवं प्रायश्चित दोनों ही उपासना के अंग हैं। श्रेष्ठता को प्रोत्साहन और निकृष्टता पर बंधन दोनों ही आवश्यक हैं।

द्रोणाचार्य के कन्धे पर धनुष, पीछे तरकश, और हाथों में वे देखकर किसी ने प्रश्न किया। ‘आचार्य प्रवर! बाण और वेद एक साथ क्यों? द्रोणाचार्य ने उत्तर-अग्रतः चतुरो वेदाः पृष्ठतः सशरं धनु। इंद ब्रह्मं इदं क्षात्रं शास्त्रादापि शरदपि।” अर्थात् धर्म है तो धनुष-बाण क्षात्र-धर्म शास्त्र एवं शस्त्र दोनों ही ने द्वारा सदाचरण का पथ प्रशस्त किया जाता है।” विद्या और बल, ज्ञान और भक्ति दोनों ही महत्वपूर्ण एवं आवश्यक हैं। यही प्राचीन आर्ष परम्परा रही है। श्रीराम को महर्षि विश्वामित्र ने दोनों ही प्रकार का शिक्षण दिया था। श्रीकृष्ण को भी संदीपनि के आश्रम में उभयपक्षीय शिक्षा प्रदान की गई थी। प्राचीन गुरुकुल परम्परा में यह प्रशिक्षण क्रम समन्वय सर्वत्र विद्यमान था। अध्यात्म क्षेत्र में वही परम्परा भक्ति और कर्म का समन्वय करने वाले तत्त्वज्ञान के रूप में है। अर्जुन और हनुमान दोनों ही उत्कृष्ट भक्त थे, साथ ही दोनों को सदा सक्रिय जीवन जीना पड़ा दोनों को ही भगवान द्वारा निरन्तर कर्म की प्रेरणा एवं शिक्षा दी गयी। आत्मोत्कर्ष और लोक-कल्याण की यही समन्वित व्यवस्था भारतीय अध्यात्म की आर्ष परम्परा है। ब्रह्मवर्चस् उसी परम्परा को गतिशील बनाने वाली प्रक्रिया है।

एकांगी दृष्टिकोण अपूर्ण ही नहीं, हानिकर भी होता है। जिन दिनों भारत में उदारता को सीमाबद्ध किया गया और अहिंसा के अतिवाद में पराक्रम को अनावश्यक ठहराया गया, उन दिनों तेजस्विता-प्रखरता की उपेक्षा होती चली गई और मध्य एशिया से आये मुट्ठी भर आक्रान्ता इस विशाल देश को पराधीन बनाने में सफल होते चले गये। इसी प्रकार तेजस्विता का अभ्यास होने पर भी उसके साथ में विवेक का मार्गदर्शन न होने पर एक समय आक्रान्ताओं की कुटिल चालों के सामने असंगठित तेजस्वी योद्धा हारते चले गये। भक्ति एवं कर्म, भावना एवं तेजस्विता दोनों को समन्वित रखने वाला तत्त्वज्ञान ही भारतीय अध्यात्म विद्या का समग्र आधार रहा है। उसके स्थान पर एकांगी चिन्तन अपनाने की भूल जब की गई है तो दुर्गति का सामना करना पड़ा है जबकि दोनों के समन्वय से सफलता और प्रगति का द्वार प्रशस्त होता है। गाँधी जी के सत्याग्रह में सत्य और अहिंसा का जितना समावेश था, अनीति के निर्भीक प्रतिकार का उतना ही प्रखर संकल्प एवं साहस भी था। यह समन्वय ही ब्रह्मवर्चस् की साधना-प्रक्रिया का पथ है।

ब्रह्मज्ञान एवं ब्रह्मतेज-दोनों के समन्वय से ब्रह्मवर्चस्-साधना सम्पन्न होती है। महान ऋषियों द्वारा प्रतिपादित समग्र अध्यात्म यही है। प्रज्ञा और पराक्रम का यही युग्म ब्रह्मवर्चस् की लक्ष्य-प्राप्ति में समर्थ बनाता है। अध्यात्म परम्परा में इन्हें ही ब्रह्मविद्या एवं तपश्चर्या कहा गया है। पौराणिक कथाओं में ब्रह्मा जी की दो पत्नियाँ बताई गई हैं एक गायत्री, दूसरी सावित्री। गायत्री को ब्रह्मविद्या पक्ष की और सावित्री को तपश्चर्या पक्ष की माना जाता है। तपश्चर्या किस की? ब्रह्माग्नि की स्फुरणा उद्भव की। आँतरिक अग्नि-चेतन ऊर्जा ही ब्रह्माग्नि है-प्राणाग्नि है। गायत्री या ब्रह्मविद्या से शान्ति का-मोक्ष का द्वार खुलता है तो सावित्री से सर्वतोमुखी समर्थता प्रखरता की उपलब्धि होती है। दोनों ही परस्पर अविच्छिन्न जुड़े है। सुसंस्कार और सत्सामर्थ्य दोनों ही परस्पर अन्योऽन्याश्रित कहे जा सकते हैं। इन दोनों का सम्मिलन ही प्रगति का पाथेय बनता है। प्रज्ञा की उदारता, पवित्रता, उत्कृष्टता से मिलने वाली उपलब्धियों को गायत्री-उपासना से प्राप्त अमृत, पारस और कल्पवृक्ष कहते हैं। प्रखरता, पराक्रम और पुरुषार्थ की उपलब्धियाँ ब्रह्मास्त्र, ब्रह्मदण्ड और ब्रह्मपाश के रूप में सामने आती हैं। गायत्री और सावित्री के रूप में साधना विज्ञान की भाषा में इसे योग और तप का समन्वय कहा जाता है। योग से आत्मा के देवात्मा, परमात्मा स्तर तक विकसित होने का अवसर प्राप्त होता हैं तप से शक्ति उत्पन्न होती है। सशक्तता ही प्रगति, समृद्धि और विभूति के विविध सत्परिणाम उत्पन्न करती है। साधना से मिलने वाली सिद्धियाँ शक्ति -सम्पादन का ही परिणाम हैं। योग एवं तप दोनों की समन्वित साधना, प्रक्रिया ब्रह्मवर्चस् का आधार है।

योग और तप पवित्रता तथा प्रखरता, आस्था और क्रिया, ज्ञान एवं तेज-दोनों पक्षों की समन्वित साधना ही गायत्री की समग्र साधना है। उच्चस्तरीय सत्परिणाम इसी से मिलते हैं। ब्रह्मज्ञान और ब्रह्मतेज दोनों के समन्वय द्वारा ही सर्वांगपूर्ण साधना संभव हो पाती अभीष्ट दोनों हैं-तत्त्वज्ञान भी तथा तेजस्विता भी। एक के बिना दूसरा अपूर्ण है। यह गायत्री साधना विधान की विशेषता है कि इसमें दोनों ही प्रतिफलों की प्राप्ति होती है तथा व्यक्ति ओजस्, तेजस, वर्चस् को समुच्चय बनता है। अथर्व वेद के मंत्र “स्तुता मया वरदा वेदमाता प्रचोदयन्ताम्.......” में जिस सर्वाधिक महत्वपूर्ण उपलब्धि की बात कही गयी है, वह ब्रह्मवर्चस् ही है। साथ ही यह भी कहा गया है कि यही ब्रह्मलोक ले जाने वाला, बंधनों से मुक्ति दिलाने वाला एक मात्र मार्ग है। हम सब गायत्री के ब्रह्मवर्चस् की साधना कर आत्मबल संपन्न बनें।


उज्ज्वल भविष्य सम्बन्धी पूर्वानुमान भी संभव

26 जुलाई 1973 को अमेरिकी वायु सेना के मुख्यालय में फोन घनघना उठा, जिसमें से आवाज आई-मैं जेन्डोलिन मार्क्स बोल रही हूँ। कृपया लाकहर्स्ट झील के ऊपर किये जा रहे हवाई प्रदर्शन को रोक दीजिए क्योंकि तीन दिन के भीतर बहुत बड़ी दुर्घटना देख रही हूँ। यह कल्पना नहीं है, अपितु यथार्थ है। कृपया शीघ्र निर्णय लीजिए।” उक्त फोन मिलने पर वायुसेना के मुख्य लोगों को आश्चर्य हुआ कि आखिर हमारी गुप्त बातें इन्हें कैसे मालूम हुई ऊहापोह और सूचना देने वाली महिला की खोजबीन में दो दिन बीत गए। उड़ान जारी रहा।

किन्तु फोन आने के 48 घण्टे के बाद दो नीले, युद्धक जैट विमान आपस में टकराकर झील में डूब गये। तो पूर्व सूचना देने वाली लड़की मार्क्स को लोग पुनः ढूँढ़ने लग गये। आगे चलकर यह लड़की वायुसेना में सम्मिलित हो गई और हर माह घटने वाली सभी महत्वपूर्ण घटनाओं को पहले ही स्पष्ट करने लग गई। इनकी अधिकाँश भविष्यवाणियों सच निकलती गई जो समय-समय पर प्रकाशित होती रही।

जेन्डोलीन मार्क्स अद्भुत शक्ति सम्पन्न थी। बाल्यावस्था में अपने निकट घटने वाली छोटी-बड़ी घटनाओं को जब पहले ही बता देती, तो लोगों को आश्चर्य होता था। स्कूल में पढ़ने जाती, तो बच्चे घेर लेते और पूछते-बताओ आज मास्टर जी क्या पढ़ाएँगे एवं मार किसको खानी पड़ेगी और विशेष बात यह कि जिसका नाम वह बताती उसी छात्र को मार खानी पड़ती। अनेक प्रमुख घटनाओं को तो चित्र बना कर बता देती थी एवं स्थान भी। उनका कहना था कि अतीन्द्रिय क्षमता एवं स्वप्न के द्वारा भी भविष्य में होने वाली घटनाओं को देख लेती हूँ, किन्तु इस अद्भुत क्षमता का मैंने कभी दुरुपयोग नहीं किया और न ही भविष्य में कभी करूंगी। दुर्घटनाओं को पहले से जानकर उनसे बचने के लिये लोगों को सावधान करना ही अब तक का मेरा लक्ष्य रहा है और आगे भी यही रहेगा।

फरवरी 1974 में उसने कहा था कि 1 मार्च से 3 मार्च का समय अमेरिकी वायुयान के लिए महाविपत्ति का समय है। इस अवधि में बाद में अनेक घटनाएँ घटीं।

“द पीपुल्स एलमनेक” में डैविड वेलिकनिस्की एवं इरविंग वेलेज ने जेन्डोलीन मार्क्स के भविष्य कथन का उल्लेख करते हुए 1970 से 2009 से 21 वर्ष की अवधि को उज्ज्वल भविष्य की तैयारी के वर्ष कहा है। उनके अनुसार इसमें ऐसी सफलताएँ मिलेंगी, जिससे मनुष्य जाति की प्रगति का मार्ग प्रशस्त हो जायेगा। जेन्डोलीन मार्क्स लिखती हैं-

बीसवीं सदी के अन्त तक अधिकाँश लोग स्वयमेव ही परिवार नियोजन के उपक्रम को अपनायेंगे, जिसमें यांत्रिक विधि-व्यवस्था का कोई स्थान नहीं होगा, अपितु हर व्यक्ति यह अनुभव करेगा कि बहुप्रजनन से अनेकानेक संकट उपजते हैं एवं मात्र पति-पत्नी की युगल जोड़ी के लिए ही नहीं, वरन् समूचे समाज के लिए हानिकारक सिद्ध होते हैं अतएव वैवाहिक जीवन में संयम की नीति अपनायेंगे। पति-पत्नी परस्पर मित्रवत व्यवहार करेंगे एवं एक-दूसरे को भावनात्मक एवं वैचारिक दृष्टि से डइाने का प्रयास करेंगे। प्रजनन की ओर से विमुख होने से नारियों की प्राणशक्ति में बढ़ोत्तरी होगी, जिससे महिलाएँ भी वे सभी कार्य सम्पन्न कर सकेंगी, जिसे अब तक पुरुष ही सम्पन्न किया करते थे शौर्य, पराक्रम एवं जीवट के क्षेत्र में वह पुरुषों के बराबर सिद्ध होंगी। इस प्रकार से परिवार नियोजन “न्यूडायमेन्सन” नये आयाम में प्रवेश करेगा और हर धर्म के व्यक्ति इस नई आत्मानुशासन वाली विधा का परिपालन करेंगे। इसी में उन्हें अपनी, परिवार एवं समाज की भलाई दिखाई देगी।

1980 की दशाब्दी चिकित्सा के क्षेत्र में नई उपलब्धि अर्जित करने की अवधि है एवं नब्बे का दशक आरंभ होते ही विज्ञान रोगों के कारणों को ढूँढ़ने के लिए निरन्तर सूक्ष्म से सूक्ष्मतम अवस्थाओं में प्रवेश करता चला जायेगा और इस सदी के अन्त में विज्ञान यह सिद्ध कर देगा कि रोगों का कारण बाहरी वायरस, कीटाणु, अथवा बैक्टीरिया नहीं है, अपितु व्यक्ति अपने ही असंयम से अपनी प्राणशक्ति की क्षीण कर डालता है, फलतः अनेकानेक आधि व्याधियों का शिकार होता चला जाता है। खान-पान रहन-सहन सोचने-विचारने में अतिशय का अतिवाद समय रहने से ही रोग उत्पन्न होते हैं। अतः इनका समाधान वही निकलेगा, जो प्राच्य देशों के पूर्वकालीन दर्शन व चिकित्सा ग्रन्थों में विद्यमान है। सन 2000 तक की अवधि में इस प्रकार की अनेकों उपलब्धियाँ मानवता के समक्ष आएँगी।

प्रसंग यूटोपिया या एक व्यक्ति के भविष्य उद्घाटन का नहीं है। जब क्रिया−कलाप उस दिशा में चल पड़ें तो परिणति भी वही होकर रहती है। उज्ज्वल भविष्य की ओर महायात्रा के संकेत अभी से दिखने लगे हैं। विश्वास किया जाना चाहिए कि आने वाला एक दशक एक महत्वपूर्ण भूमिका समग्र मानव समुदाय के लिए निभाने जा रहा है।


जब संवेदना का अंकुर पल्लवित हुआ......

वह फटी-फटी आँखों से देखे जा रही थी। सूखते-चटकते तालाब तड़पते, विकल होते, प्राण छोड़ते जानवर और मनुष्य क्या कहा जाय उनके बारे में सब कुछ तो प्रत्यक्ष दीख रहा था। हाय! पेट का वह धधकता ज्वालमाल! सभी तो दिन-रात उसी आग में पतंगों की तरह जले भुने जा रहे हैं। क्षुधा तृषा से पीड़ित कृषक मजदूर इस दुष्काल में कौन सुनता है इनकी। सिवा उस धरती के जिसकी छाती अपनी सन्तानों के दुख से सूख-चटख कर विदीर्ण हो रही थी। जो कभी सभी का पेट भरते थे आज वे स्वयं ही.......। आगे कुछ सोच न सही वह... दोनों हाथों सिर थाम कर बैठ गई।

आज वर्षों बाद उसका इधर आना हुआ। सुना था दुष्काल है, चारों ओर आती स्वर उठ रहे हैं। अनुभव इसलिए नहीं हुआ क्योंकि उसके पिता स्वयं बड़े श्रेष्ठी थे। उनके निजी आगार में अनाज की विशाल राशि थी, जल दूर की नदी से बहँगियो में आता था। उसी के घर क्यों आस-पास के सभी घरों में यही स्थिति थी। वैभव की इतराहठ-विलास की उन्मादी गूँज में अकाल पीड़ितों के कारुणिक स्वर भला कैसे घुसे। एक ओर कुत्ते भी पेट भर दूध छकते थे दूसरी ओर इंसान पानी के लिए तड़प रहा था। क्या कहा जाये इसे?

वह कौन सी चीज है जिसने हम लोगों की मनुष्यता, हमारी मान-मर्यादा भूख का अन्न-त्याग का जल सभी कुछ छीन लिया। कहा जाता है कसाई खाने में कटे बैल का माँस, बैल ही ढोकर ले जाते हैं। पर बैल तो बेचारे बेजबान, विवश हैं। लेकिन मनुष्य वह तो अकलमन्द है, क्या हो गया है उसे जो अपने जाति भाइयों की लाशें ढो रहा है उनके घरों में आग लगाकर जिन्दा जला रहा है। वह सोचते-सोचते लौट पड़ी। ऐसे दुष्काल में श्रेष्ठियों के समूह की यह निर्दयता नहीं....नहीं, वह पिता से कहेगी, भीख माँगेगी हाथ पसारेगी, कुछ भी हो अकाल से लड़ेंगी उसे पराजित करके रहेगी। बढ़ते कदम उसे हवेली तक ले आए। पता तो तब चला जब पिता ने म्लान मुख बेटी की परेशानी का कारण जानना चाहा।

सारी बात सुनकर पिता ने उसास भरी। बेरुखे स्वर में कहा-हम कर भी क्या सकते हैं-बेटी-सब का अपना भाग्य है। इस तरह यदि हम लोग अन्न-धन लुटाने लगे तो चल चुका व्यापार। अब उस ओर न जाना।” चलो स्नान आदि करके भोजन करो। पुत्री से सिर पर हाथ फेरते हुए उन्होंने अपनी बात पूरी की।

“भोजन! न, न, एक कौर भी नहीं, एक दाना भी नहीं। आप को दया नहीं आती पिताजी, अनेकों भूख से तड़पते हुओं को जान गँवाते देश कर। किसी दिन अपने कृषि प्रधान देश के गाँव ही प्राण थे, आज वे ध्वंसोन्मुख हैं। जानते हैं क्यों?” वह आक्रोश से उबल पड़ी। “सिर्फ इसलिए कि आप जैसे लोग सदाशयता को भूलकर शोषण में जुट गए। इसके सिवा क्या सम्बन्ध है आप लोगों का किसानों से। जो लोग इस देश के मुख का अन्न जुटाते आ रहे हैं, वे ही आज निरन्तर, निरक्षर, निरुपाय होकर मृत्यु पथ में तेजी से बढ़ते जा रहे हैं। क्यों अब कुछ बोलते क्यों नहीं?

वृद्ध पिता ने मुँह फेरकर ज्यों ही देखा, त्यों ही उसके दोनों होंठ थर-थर काँपने लगे। वह बोली “मनुष्य होकर मनुष्यता की कोई बात न हो यह कैसे हो सकता है, पिताश्री!” कह कर उसने दाँतों से भींचकर अपने होठों का काँपना रोक लिया, लेकिन आँखों के कोनों से झर-झर करके आँसू बह निकले।

अब वह प्रतिवाद न कर सके। ऐसा लगा मानो उनकी सुरमा अंजित आँखों की दीप्ति कुछ धीमी पड़ गई हो। बड़ी मुश्किल से कंठ से स्वर फूटा मेरा सब कुछ तेरा, तू कुछ भी कर।

एक घर-दो घर-दस घर-प्रायः सभी धनिकों के यहाँ नंगे पाँवों वह भागती फिरी। उसके द्वारा किए गए कारुणिक चित्रण ने अनेकों के दिलों में संवेदना के बीज बो दिए। आगार खुल गए। अस्त्र-वस्त्रों की बाढ़ लग गई। उसने सब कुछ समर्पित किया तथागत के उन्हीं चरणों में जिनके पास बैठकर एक दिन उसने अकाल की कहानी सुनी थी। दुष्काल पीड़ित क्षेत्र को देखने की प्रेरणा की थी।

आज समूचा भिक्षु संघ इस अनोखी बाला के सम्मुख नतमस्तक था। हतप्रभ था उसके करतब के सामने। एक छोटी से दुबली पतली लड़की अकाल के दानव को इस तरह पराजित कर सकेगी कौन सोच सकता था भला? सचमुच अकाल पराजित हो तो गया सभी तो उसका गुणगान कर रहे थे।

भिक्षुओं के आश्चर्य को भंग करते हुए तथागत का स्वर गुँजा-भाव संवेदना की शक्ति असीम है पुत्रों! जिसका जीवन सुप्रिया की तरह इन उदात्त भावों का घनीभूत पुँज बन गया हो उसके लिए कुछ भी असम्भव नहीं है।”


ध्यान सार्थक कब बनता है?

योगाभ्यास में ध्यान प्रक्रिया की प्रमुखता है। लययोग, राजयोग, हठयोग, नादयोग, बिन्दुयोग आदि अनेकों योग हैं। उनकी संख्या 84 बतायी जाती है। इन सबकी जो क्रियाएँ कर्मकाण्ड निर्धारित हैं, वे तभी सफलता तक पहुँचते हैं जब उनके मनोयोग का गहरा पुट लगा हुआ हो। उपेक्षापूर्वक, अन्यमनस्क भाव से उन कृत्यों की लकीर पीटते रहा गया या उनमें गहरी श्रद्धा विश्वास न हो और रसानुभूति उत्पन्न करने की स्थिति न बन पड़े तो समझना चाहिए कि प्रयास में कदाचित ही कुछ आँशिक सफलता मिल सके।

चक्रबेधन, कुण्डलिनी जागरण आदि में जिस स्थान पर जो स्थिति बतायी गयी है उसे करना पड़ता है। दिवा स्वप्नों के व्याख्याकार कहते हैं कि भूत-प्रेत जैसी कल्पनाएँ विश्वास का गहरा पुट लग जाने पर ठीक वैसी ही बन जाती हैं जैसी कि मान्यता रखी गई थी। न केवल उनका स्वरूप वैसा दिखता है वरन् त्रास या उल्लास भी वैसा ही मिलता है। भूत-प्रेतों के सम्बन्ध में जैसी अशुभ कल्पना की जाती है, ठीक देवी-देवताओं के सम्बन्ध में भी वैसी ही होती है। एक काला पक्ष है एक उज्ज्वल। देवी-देवता या भूत-प्रेत होते हैं या नहीं उनके सम्बन्ध में यथार्थता का तो अभी सर्वसम्मत समाधान नहीं हो सका पर इतना निश्चित रूप से सच है कि मान्यताओं के आधार से व्यक्ति वैसा ही अनुभव करता है और डरावने तथा लुभावने ऐसे साक्षात्कार करता है जो श्रद्धा के अनुरूप प्रतिफल दे सके।

इस विज्ञान को “साइकोमेट्री” के आधार पर मान्यता मिली है। क्रिश्चियन साइंस में प्रार्थना द्वारा रोग निवारण का प्रयोग चलता हे और उसकी सफलता भी वैसी ही देखी गयी है। मस्तिष्क विज्ञान के आधार पर कितनी ही क्षमताओं, विशेषताओं के कतिपय केन्द्र निर्धारित किये गये हैं। वहाँ तक किसी बाह्य सामर्थ्य का प्रभाव पहुँचने के लिए “इलेक्ट्रोड्स” काम में लाये जाने लगे हैं। पर साथ ही यह भी देखा गया है कि वैसा ही प्रतिफल विश्वासपूर्वक किये गये ध्यान का भी होता है। “स्वसम्मोहन” ऑटोसजेशन या हिप्नोटिज्म का आधार ही संकल्पबल या इच्छा शक्ति का प्रयोग है। इनका उपयोग चमत्कारी प्रतिफल प्रस्तुत करता देखा गया है। संगीत माध्यम के साथ विश्वास का संयोग हो जाने पर कितने ही शारीरिक और मानसिक रोगों पर प्रभाव पड़ता देखा गया है। उन केन्द्रों या अंग अवयवों को विकसित एवं क्रियाशील भी किया जा सकता है। इनका प्रयोग विज्ञान जगत में अब गंभीरतापूर्वक हो रहा है और पाया गया है कि औषधि चिकित्सा या शल्य चिकित्सा की तरह इन प्रयोगों का भी समुचित प्रभाव होता है। जापान के डॉक्टर हिरोशी मोटोयामा ने अपने योगों से सिद्ध किया है कि विश्वास उपचार भी अन्य चिकित्सा पद्धतियों से कम फलप्रद नहीं है। इस आधार पर निष्क्रियता को सक्रियता में बदला जा सकता है और संचित विकृतियों को निकाल बाहर किया जा सकता है।

व्यक्तित्व के उत्थान-पतन में अपने सम्बन्ध में बनायी गयी मान्यता ही फलित होती है। योग वशिष्ठ का यह कथन सर्वथा सत्य है कि जो अपने सम्बन्ध में जैसी धारणा बनाता है वह क्रमशः उसी ढाँचे में ढलता जाता है। इस मान्यता के आधार पर ही लोग ऊँचे उठते और नीचे गिरते हैं। सामान्यतया मनुष्य भी अन्य जीवों की तरह एक प्राणी है पर वह जब अपने सम्बन्ध में श्रेष्ठ सामान्य या निकृष्ट होने की मान्यता बना लेता है तो वह मान्यता ही उसमें उसी स्तर की विशेषताएँ पैदा कर देती हैं और वह उसी दिशा में बढ़ते-बढ़ते अन्ततः पूरी तरह वैसा ही बन जाता है।

ईश्वर या देवताओं के सम्बन्ध में इन मान्यताओं को भी सृजन का श्रेय प्राप्त है। अन्यथा एक ही ईश्वर के इतने चित्र-विचित्र प्रकारों की आकृतियाँ कैसे हो सकती हैं? इन मान्यताओं में यथार्थता रही होती तो हर धर्म और देश में उसी प्रकार की समान अनुभूति होती। दार्शनिकों के इस कथन में बहुत कुछ सत्य है कि मनुष्य को ईश्वर ने गढ़ा है तो यह भी झूठ नहीं है कि ईश्वर सम्बन्धी मान्यताओं का सृजनकर्ता मनुष्य ही है। जिस प्रकार भक्तजनों का सृजनकर्ता मनुष्य ही है। जिस प्रकार भक्तजनों की मान्यता है ईश्वर अपने को उसी रूप और स्वभाव का बना लेता है। यहाँ प्रधानता ईश्वर की नहीं भक्त की ही ठहरती है।

भावना अर्थात् ध्यान। परिपक्व मान्यता और परिपुष्ट ध्यान में कोई अन्तर नहीं है। प्रधान किसे कहा जाय, गौण किसे? यह प्रश्न उतना ही उलझा हुआ है जितना कि बीज से वृक्ष हुआ या वृक्ष से बीज? पहले स्त्री उत्पन्न हुई या पुरुष? वस्तुतः ये अन्योऽन्याश्रित हैं। मकान, सड़क, पुल आदि की तरह पहले व्यक्तित्व या देवी-देवता कल्पना क्षेत्र में उत्पन्न होते हैं पीछे वे आकृति और प्रकृति के रूप में प्रत्यक्ष परिचय देने लगते हैं।

ध्यान ही योजना है। योजना ही ध्यान। उन्हें प्रतिपादन और निर्धारण की तरह अन्योऽन्याश्रित भी कह सकते हैं। वस्तुतः ध्यान का उपयोग अप्रत्यक्ष जगत की संरचना में उतना सार्थक नहीं होता जितना कि प्रत्यक्ष जीवन को योजनाबद्ध बनाने में। अच्छा हो अपने जीवन यापन की अब से लेकर अन्त समय तक की एक सार्थक कल्पना करें और उसे किस प्रकार व्यतीत करें इसकी रूपरेखा बनाएँ। जीवन प्रत्यक्ष देवता है उसका उच्चतम अनुग्रह किस प्रकार की साधना द्वारा प्राप्त किया जा सकता है, इसकी रूप-रेखा बनाने में दिशाधारा विनिर्मित करने में ध्यान योग का उपयोग कर सकें तो वह प्रयास अधिक सार्थक और अधिक प्रत्यक्ष हो सकता है।

लोग जिन्दगी को किसी प्रकार जीते और मौत के दिन पूरे करते हैं। न उसका कोई उद्देश्य निर्धारित कर पाते हैं और न कार्यक्रम। बिना लगाम के घोड़े की तरह अनियन्त्रित मन की तरह जीवन भी जिधर-तिधर बहता और ज्यों-त्यों करके बीतता है। इसकी परिणति प्रत्यक्ष है। खीजते-खिजाते डरते-डराते श्मशान में रहने वाले भूत-पलीतों की तरह नीरस और निरर्थक जीवन जीना। यह कल्पना शक्ति के अभाव का कारण है। लाटरी खुलने पर मिलने वाली राशि को ऐसे ही लोग एकाध वर्ष के भीतर बर्बाद कर देते हैं। फण्ड, बोनस में जिन्हें लम्बी रकमें मिलती हैं उनके पास भी वह राशि अधिक समय नहीं ठहरती। कारण एक ही है कि उस उपलब्ध धन को व्यय करने का कोई सारगर्भित कार्यक्रम नहीं बन पाता। यही बात जीवन सम्पदा के सम्बन्ध में भी है। वह जिस-तिस प्रकार खर्च होता और समय काटता रहता है।

अच्छा होता हमारा ध्यान जीवन का महत्व समझने और उसे किसी उच्च उद्देश्य के लिए नियोजित करने में लगता और उसके सदुपयोग की कोई कारगर योजना बन पाती। सोचा जाता कि बुढ़ापे की कठिनाइयों का समय रहते बचाव कर लिया जाय और मौत के उपरान्त जिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। उनसे निपटने के लिए ऐसा प्रबन्ध कर लिया जाय जिससे समय निकल जाने पर पश्चाताप न करना पड़े।

निज का जीवनयापन करने और भविष्य का भला-बुरा निर्धारण करने की बात जिस तरह अपने हाथ में है। उसी प्रकार यह भी अपना ही दायित्व है कि पत्नी को भी ऐसी स्थिति में रखा जाय कि वह अच्छा साथी मिलने के लिए भाग्य को सराहती रहे और कृतज्ञता व्यक्त करती रहे। बच्चों का दायित्व इससे भी अधिक बढ़कर है। उन्हें बुला कर दुर्गति में फँसा देने की अपेक्षा यह कहीं अच्छा था कि उन्हें बुलाया ही न जाता।

ध्यान उस विश्व चेतना का भी रखना है जिससे प्रत्येक घटक का असीम अहसान अपने ऊपर लदा हुआ है। व्यक्ति एकाकी स्थिति में तो असहाय अनाथ है। उसे इस विश्व की असंख्य इकाइयाँ मिल कर जीवित रह सकने की स्थिति बनाती हैं। उनके प्रति भी अपना कुछ कर्तव्य है क्या? जीवन किसी प्रयोजन विशेष के लिए मिला है क्या? ध्यान रखने योग्य यह सब बातें भी हैं। इन्हें भुला देने पर मात्र पूजापाठपरक ध्यान अधूरा एवं खिलवाड़ भर रह जाता है।


अहिंसा के नूतन आयाम

अहिंसा को धर्म धारणा में प्रमुख स्थान दिया गया है। किसी प्राणी को कष्ट न पहुँचाना साधारणतया अहिंसा का प्रकट अर्थ समझा जाता है। पर बात इतने भर से नहीं बनती। अहिंसा शब्द निषेधात्मक है। उसका विधेयात्मक पक्ष प्रेम, दया, करुणा, सेवा, सहिष्णुता के रूप में उदित होता है। इस हेतु कुछ करना पड़ता है, करने से ही पुण्य बन पड़ता है। न करने पर भावना मात्र से एक कल्पना ही कन पर छायी रह जाती हे। उसे यदि चरितार्थ होने पर अवसर न मिले तो भाव संवेदना में औचित्य का समावेश रहते हुए भी उसका कोई प्रत्यक्ष प्रतिफल प्रस्तुत न हो सकेगा।

स्थूल अहिंसा का पालन तो पेड़, पर्वत भी करते हैं वे किसी को कष्ट नहीं पहुँचाते। यह उनकी जड़ताजन्य विवशता है। ऐसी दशा में उन्हें अहिंसक होने का श्रेय नहीं मिल सकता। प्रकृति के सभी पदार्थ ऐसे हैं जो अपनी जगह पर स्थिर रहते अपने निर्धारित चक्र पर भ्रमण भर करते रहते हैं। उनमें यह भावन नहीं रहती तो सचेतन में पाई जाती हे। ऐसी दशा में वे जान-बूझ कर हिंसा नहीं करते। उनसे टकरा कर कोई अपना पैर तोड़ ले तो उनकी मर्जी।

कृमि कीटकों पर भी अहिंसा का आदेश लागू नहीं होता। उनमें से अधिकाँश माँसाहारी प्रकृति के होते हैं। अपने से छोटों को मारते खाते रहते हैं। इनकी प्रकृति को नहीं बदला जा सकता और न उनमें यह भाव जगाया जा सकता है कि अपने लाभ के लिए दूसरों को हानि न पहुँचाएँ। लाभ-हानि तक का उन्हें विचार नहीं होता और न उन्हें यह सूझ पड़ता है कि उनकी किस क्रिया से किसी को क्या कष्ट होगा? छिपकली, मकड़ी आदि घरेलू कीड़े अपने से छोटों को मारते खाते रहते हैं। बड़ी मछली भी छोटी को खाती देखी गई हे। बिल्ली, व्याघ्र, मगरमच्छ, सर्प, बाज़ जैसे प्राणी भी माँसाहारी होते हैं। भूख लगने पर अपनी प्रकृति के अनुरूप वे शिकार पकड़ते उदरस्थ करते रहते हैं। उन तक अहिंसा का संदेश पहुँचना या पहुँचाया जाना कठिन है।

मनुष्य भावनाशील है विवेकवान भी। उसे उचित अनुचित का बोध आरंभ से ही मिला है। सहकारी प्राणी होने के नाते उसके लिए नीति नियम भी यही है कि दूसरों के साथ वैसा व्यवहार करे जैसा दूसरों से अपने लिए चाहता है। क्रिया की प्रतिक्रिया होती है। सज्जनता बरतने वाले बदले में वैसा ही सद्व्यवहार अन्यों द्वारा अपने साथ होते देखते हैं। दुष्टता की प्रतिक्रिया भी आक्रोश प्रतिशोध में होती है। इसलिए अपने को त्रास न सहना पड़े इसका एक ही सही तरीका है कि दूसरों के साथ दुर्व्यवहार न किया जाय, अन्यथा प्रतिक्रिया एक नहीं तो दूसरे तरीके से होगी और अपना किया कृत्य शब्दबेधी बाण की तरह उसी तरकस में लौट आयेगा, जहाँ से निकाल कर कि उसे फेंका गया था दूरदर्शी विवेकशीलता का यही तकाजा है कि दूसरों के साथ सद्व्यवहार करने में ही अपना लाभ समझा जाय और वैसा ही आचरण करने के लिए मानस बनाया जाय। अहिंसा इस दृष्टि से आत्मरक्षा की ढाल सिद्ध होती है। दूसरों के प्रति उदार रह कर प्रकारान्तर से अन्यों को अपने साथ सद्व्यवहार करने के लिए आमंत्रित किया जाता है। हिंसा पर उतारू होकर उसकी प्रतिक्रिया से बचा नहीं जा सकता। जिसे सताया गया है वह दुर्बल एवं प्रतिशोध में असमर्थ हो सकता है। किन्तु दूसरी शक्तियाँ तो संसार में मौजूद हैं वे उस अनाचार का बदला लिए बिना नहीं छोड़ेगी। इसलिए जिन्हें चैन से रहना अभीष्ट है, उन्हें दूसरों को भी चैन से रहने देना चाहिए।

अहिंसा का सृजनात्मक पक्ष है-आत्मीयता अपनों के साथ दया करुणा, का सद्भाव और ममता का व्यवहार ही बन पड़ता है। माता-पिता अपने बच्चों के प्रति अनवरत स्नेह लुटाते हैं और उनके साथ सेवा-सहायता का व्यवहार सहज स्वाभाविक करते रहते हैं। यह सब उनसे स्वाभाविक रूप से बन पड़ता है। एहसान जताने पुण्य करने जैसा कोई भाव उनके मन में नहीं उठता यही भावना संकीर्णता की परिधि से आगे निकलकर जब विराट के साथ संबन्ध जोड़ती है तो सभी अपने बन जाते हैं। जो अपना है वह स्नेह सद्भाव सहृदयता का पात्र बन ही जाता है। आत्मीयता का ही एक पक्ष दया और करुणा है। यह भी विकसित मानस में सहज स्वभाव चल पड़ता है। सहायता का बदला सहायता के रूप में मिलते देख कर का प्रत्युत्तर प्रेम में पाकर प्रसन्नता का ठिकाना नहीं रहता। इस प्रकार अहिंसा का प्रतिफल हाथों-हाथ मिलता है। यह नकद धर्म है। जिसके आधार पर-जिओ और जीने दो, बढ़ो और बढ़ने दो” का सिद्धान्त सहज ही चरितार्थ होता चला जाता है।

अहिंसा में विक्षेप उचित कष्ट से नहीं होता। इसलिए अहिंसा में कष्ट नहीं औचित्य मुख्य है। डॉक्टर अस्पतालों में ढेरों रोगियों की शल्य क्रिया करता रहता है कितनों को ही सुई चुभोता हे। मोटी दृष्टि से यह हिंसा हुई, पर वस्तुतः ऐसा है नहीं। उद्देश्य रोगी के पति दया भाव होने के कारण ऊँचा ही रहा। ऐसी दशा में तात्कालिक पीड़ा का कोई महत्व नहीं रहा। देखा यही गया है कि रोगी का हित किसमें है। हित कामना को देखते हुए कष्ट पहुँचाने की भी गुँजाइश है। न्यायाधीश अभियुक्त को फाँसी की सजा देता है। इससे समाज व्यवस्था का संरक्षण होता है। यदि उस अपराधी को क्षमा कर दिया गया होता तो खुल कर न जाने कितनों की हत्या करता कितनी अव्यवस्था फैलता। इस तथ्य को ध्यान में रखकर यदि न्यायाधीश ने मृत्युदण्ड दिया और अपराधी को कष्ट हुआ तो इसके लिए क्या किया जा सकता है। अहिंसा को रूढ़ि मानकर न्याय और विवेक को झुठलाया तो नहीं जा सकता।

अहिंसा में विवेक को भी जुड़ा रखना पड़ता है। आत्म रक्षा के लिए हिंसा भी अपनाई जा सकती है। घर पर डाकू आक्रमण करे तो उनका सामना करना ही पड़ेगा, भले ही उनमें से कोई आक्रान्ता, मारा ही क्यों न जाय? घर में पलने वाले साँप बिच्छुओं पर कब तक दया करते रहा जाएगा। चूल्हें की आग जलाते समय, यात्रा में चलते समय धूप में कपड़े सुखाते समय कुछ जीव मर सकते हैं। इनकी रक्षा किया जा सकना असंभव है।

हिंसा वहाँ से आरंभ होती है जहाँ दूसरों को पराया समझकर अपनी संकीर्ण स्वार्थ की सिद्धि के लिए अनीतिपूर्वक दूसरों को कष्ट पहुँचाया जाय जिससे निर्दोषों को उत्पीड़न सहना पड़े जिसके साथ अनीति का आधार जुड़ा हुआ हो।

हिंसा शारीरिक आघात तक सीमित नहीं है, उसका मानसिक आघात भी एक पक्ष हे। अपमान, तिरस्कार, दुर्व्यवहार भी हिंसा का ही एक रूप है, जिसके मन को, सम्मान को आघात लगे उसे भी हिंसा ही कहा जाएगा .. किसी को गलत परामर्श देकर कुमार्ग पर चलने के लिए सहमत कर लेने से तत्काल न सही परिणाम सामने आने पर तो कष्ट उठाना ही पड़ता है। इस प्रकार का जिसने कुचक्र रचा उसे भी हिंसक ही कहा जाएगा।

हिंसा का तात्पर्य है अन्यायपूर्वक उत्पीड़न। मात्र शारीरिक या मानसिक कष्ट पहुँचाना हिंसा नहीं है। कुकर्मियों और कुमार्गगामियों को जब समझाने बुझाने से सही राह पर लाना सम्भव नहीं रहता, जब दुरात्माओं का अहंकार, दुराग्रह और आतंक चिर सीमा तक पहुँच जाता है तो वे दया क्षमा को कर्ता की दुर्बलता मानते हैं और इस प्रकार के सौम्य व्यवहार को अपनी जीत मानकर अनीति पर और भी अधिक वेग के साथ उतरते हैं। ऐसी दशा में प्रताड़ना के अतिरिक्त और कोई मार्ग नहीं रह जाता। शठता को शठता की भाषा ही समझ में आती है। उन्हें सुधारने के लिए जो विवेकपूर्ण हिंसा प्रयुक्त की जाती है उसे अहिंसा ही कहना चाहिए।


साहस और धैर्य का फल (Kahani)

एक ब्राह्मण जंगल में जा रहा था कि सहसा सामने से आते बाध से उसका मुकाबला हो गया। मौत सामने थी। पर ऐसे समय में उसने साहस नहीं खोया और सूझबूझ से काम लिया।

बाघ जब समीप आ गया तो ब्राह्मण ने दोनों हाथ उठाये और जोर-जोर से मंत्र बोलने लगा। ऐसा अद्भुत अवसर बाघ को कभी पहले देखने को नहीं मिला था। उसने आश्चर्य से पूछा यह क्या कर रहे है और क्या कह रहे हैं?

ब्राह्मण ने कहा “मैं आपके वंश का कुल पुरोहित हूँ। आपके पूर्वज भी हमारे पूर्वजों के यजमान रहते आये है। आपके मिलने से बड़ी प्रसन्नता हुई। हाथ उठाकर, मंत्र पढ़कर आशीर्वाद दे रहा हूँ। अब आपका कर्तव्य है कि पुरोहित को दक्षिणा दें”।

बाघ ने कहा “आपका कथन सत्य हो सकता है। पर मेरे पास दक्षिणा देने को तो कुछ नहीं है, क्या दूँ”?

ब्राह्मण ने कहा-मेरे साथ चलिए, निवास स्थान देख लीजिए। प्रतिदिन आकर मुझे प्रणाम कर जाया कीजिए साथ ही यह भी ध्यान रखिए कि उस अवसर पर आप किसी से भी छेड़खानी नहीं करेंगे-’। बाघ दोनों शर्तें स्वीकार करके दक्षिणा के ऋण से उऋण हुआ।

ब्राह्मण के घर नित्य सिंह आने लगा। पालतू होने जैसा व्यवहार करने लगा। किसी को उसने काटा नहीं इसे लोगों ने ब्राह्मण की सिद्धि समझा, उसकी पूजा होने लगी और दक्षिणा भी बढ़-चढ़ कर मिलने लगी। यह था साहस और धैर्य का फल ।


उत्कृष्टता का सृजन

अंधकार कितना ही सघन और व्यापक क्यों न हो, उस भय भरी स्थिति को अपनी सीमा से दूर कर सकने में जलता दीपक भी सफल हो जाता है। जलते दीपक ही अन्य अनेकों बुझे हुओं को नये सिरे से जलाने में समर्थ हो जाते हैं।

दुराचारी, अपराधी, नशेबाज, दुर्व्यसनी अपने स्तर के अनेकों अन्य साथी-सहयोगी एकत्रित कर लेते हैं, अपने द्वार अपनाई गई दुष्प्रवृत्तियों का अभ्यस्त बना लेने में सफल हो जाते हैं। महामारी के रोगाणु एक बड़े क्षेत्र को अपनी चपेट में ले लेते हैं, फिर कोई कारण नहीं कि युग सृजेताओं का परिकर उत्पादित, प्रशिक्षित एवं कार्यरत न बनाया जा सके। अवांछनीयता को विस्तृत और सफल होने का अवसर इसलिए मिल जाता है कि उनके सूत्र-संचालकों की कथनी और करनी में एकता होती है, भले ही वह बुराई ही क्यों न हो। परंतु जहाँ भी मान्यता और सक्रियता का समन्वय होता है वहाँ समर्थता उत्पन्न होगी और साथी-सहयोगी को निकट आने के लिए अनायास ही आकर्षित करेगी। बिजली के दोनों तार मिल कर करेंट उत्पन्न करते हैं। दोनों पहियों का सहारा मिलने पर गाड़ी आगे चलती है।

पिछले दिनों नीति, धर्म, सदाचार, कर्तव्य पालन, पुण्य-परमार्थ की चर्चा तो बहुत होती रही, पर जो अपनी कथनी को करनी में, निजी जीवन में समाविष्ट कर सके हों, ऐसे प्रवक्ता मार्गदर्शक आगे नहीं आ सके, इसलिए उनके सुधार प्रयास एकांगी रह गये। श्रेष्ठता का सुखद वातावरण बनाने के लिए प्रचार कार्य करते तो अनेकों देखे गये, पर ऐसी प्रतिभाओं का अभाव ही रहा, जो अपने उच्चस्तरीय कर्तव्य के आधार पर अन्यान्यों को प्रभावित करते, साथी-सहयोगी बनाते। बुझे हुए दीपक दूसरों को जलाने में समर्थ कहाँ होते हैं?

प्राचीन सतयुगी वातावरण में जन साधारण की भूमिका को सशक्त बताया जाता रहा है, पर उसका मार्गदर्शन उन महामानवों ने किया है, जिनने अपनी कथनी और करनी को एक रखते हुए आदर्शवादिता का प्रत्यक्ष प्रमाण सामने रखा और अपने चुम्बकत्व से अनेक साथी-सहयोगियों को आकर्षित करके प्रभावोत्पादक वातावरण का समर्थ उत्पादन किया।

हनुमान-जामवन्त के नेतृत्व में रीछ-वानरों की निहत्थी सेना इतना साहस प्रदर्शित कर सकी थी, कि असुरता दमन, और धर्म-राज्य की संस्थापना वाले दोनों ही कार्य भली प्रकार पूरे हो सके। बुद्ध और गाँधी को असाधारण त्याग और पुरुषार्थ करने वाले सहयोगियों-अनुचरों की कमी नहीं रही। इस प्रक्रिया को युग सृजेताओं की समर्थ मंडली बनने में भी कार्यान्वित होते हुए देखा जा सकता है। उपयुक्त नेतृत्व में सामान्य मनोबल वाले भी प्रबल पुरुषार्थ करते और असाधारण सफलता प्राप्त करते देखे जाते हैं। कुटिलता और कायरता भरा नेतृत्व बड़े प्रयोजन सिद्ध कर सकेगा, इसकी आशा नहीं ही करनी चाहिए।

इन दिनों विलासिता और अहमन्यता की पूर्ति ही महत्त्वाकाँक्षा बन कर रह गई है और उसी हेय प्रयोजन में अधिकाँश लोगों को निरत देखा जाता है। स्वर्गीय वातावरण वाले सतयुग को विनिर्मित करने की चर्चा करते हुए यह भी मानना पड़ता है कि चरित्रवान और परमार्थ के, साहस के धनी नेतृत्व की जिन दिनों कमी नहीं थी, उन दिनों अब से भी कम सुविधा रहते हुए ऐसे असंख्यों सृजन शिल्पियों का उत्पादन किया गया, जिनके साहसी प्रयत्नों ने वैसी परिस्थितियाँ गढ़ी, जिनका स्मरण इन दिनों पुरातन देवयुग के रूप में होता है।

उज्ज्वल भविष्य की संभावनाओं से भरी इक्कीसवीं सदी की चर्चा करते हुए हमें इन तथ्यों को ध्यान में रखना होगा कि असंख्य विपन्नताओं से भरी हुई वर्तमान परिस्थिति कुटिल और अनाचारी व्यक्तित्वों एवं कर्तव्यों के कारण ही विनिर्मित हुई है। इन्हें बदलना हो, तो लोकचिंतन की उत्कृष्ट बनाने की महत्वपूर्ण मुहिम संभालनी होगी।


व्यावहारिक अध्यात्म का मर्म

महाराज रविशंकर के पास कहीं से सवा सौ मन अनाज आया था। उनके पास सम्पन्न व्यक्ति प्रायः इस उद्देश्य से कुछ भिजवाते थे कि उसे निर्धनों में बँटवा दिया जाय और जिनके पास खाने -पीने पहनने ओढ़ने के पर्याप्त साधन नहीं है उनकी कुछ सेवा सहायता हो सके। महाराज रविशंकर ने हमेशा की भाँति वह अनाज बाँटने का प्रबन्ध किया और गरीबों की बस्ती में गए। उस बस्ती में खेल रही थी एक बालिका। महाराज ने उसे देखकर कहा जा बिटिया तू भी कोई बर्तन ले आ और अपने हिस्से का अनाज ले ले।

लड़की ने कहा मेरी माँ मजदूरी से आती होगी। पैसे उसी के पास हैं जब वह आएगी तब हम अनाज ले लेंगे।

लड़की समझती थी कि महाराज अनाज खरीदने के लिए कह रहे हैं। परन्तु जब उसे बताया गया कि यह अनाज बेचा नहीं जा रहा, बल्कि मुफ्त में बाँटा जा रहा है तो उसने लेने से इनकार कर दिया। उन्होंने इसका कारण पूछा तो वह बोली स्वामी जी! मेरी माँ ने मुझे सिखाया है कि मुफ्त में किसी से कुछ न लेना चाहिए देने वाला भले ही भगवान क्यों न हो।

“अच्छा।” छोटी सी बालिका के मुख से यह बात सुनकर वह आश्चर्य चकित रह गए। उन्होंने निश्चय किया कि जो माँ अपने बच्चों को इतने अच्छे संस्कार दे सकती है, उसका चरित्र साधारण न होगा। उससे मिलना चाहिए। उनने बालिका से कहा क्या तुम मुझे अपनी माँ से मिलवा सकती हो।”

“ठीक है! आप अपने काम से निबट जाइए तब तक मेरी माँ भी आती ही होगी “ और वह लड़की खेलने में व्यस्त हो गयी तथा महाराज अपने काम में। जब उनके काम का अन्तिम चरण चल रहा था तभी वह लड़की आयी और उनको अपनी माँ से मिलवाने ले गई। रविशंकर जी ने देखा उस लड़की की माँ साधारण कपड़े पहने एक प्रौढ़ आयु की स्त्री थी।उस स्त्री ने उठकर उनका अभिवादन किया। उनने उसे देखकर पूछा “ देवि! तुमने अपनी लड़की को कोई वस्तु मुफ्त में न लेने की सीख दी है”?

इसमें कौन बड़ी बात है” महाराज! जब भगवान ने हाथ पैर दिए हैं तो फिर मेहनत करके अपना पेट पालना चाहिए। इसमें सिखाने या समझाने जैसी कौन बात है?”

उन्होंने उस महिला से गृहव्यवस्था और निर्वाह कैसे चलता है? आदि बातें पूछीं तो उसने बताया कि “वह युवावस्था में विधवा हो गई थी, तभी से जंगल में से लकड़ियाँ काट कर लाती और उन्हें बेचकर अपना गुजारा करती”। महाराज से न रहा गया उन्होंने पूछा “ क्या तुम्हारे पति की कोई जमीन जायदाद नहीं थी?”

तब उस महिला ने कहा” थी तो महाराज! कोई तीस बीघा जमीन और एक जोड़ी बैल थे। मैंने सोचा यह तो इस बेटी के पिता की सम्पत्ति है। उस पर मेरा क्या अधिकार। मैंने उसे प्राप्त करने या बढ़ाने में कोई योगदान तो दिया था नहीं। इधर मैं कई दिनों से देख रही थी कि इस गाँव की माँ बहिनें पानी लाने के लिए गाँव से बाहर करीब तीन -मील जाती हैं। आस -पास कोई कुआं नहीं था, रेगिस्तानी इलाका होने के कारण बहुत गहरे खोदने पर पानी निकलता है, इसलिए कोई कुआं खोदता भी न था। अतः मैंने अपने सारे खेत और बैलों की जोड़ी गाँव के ही एक सेठ की सहायता से बेच दिये। जो कुछ मिला उससे गाँव में एक कुआं बनवा दिया। जमीन काफी थी बेचने पर पैसा भी अच्छा मिला इसलिए कुआं बन जाने के बाद भी कुछ पैसा बचा तो उससे पशुओं की पास प्यास बुझाने के लिए एक हौदी बनवा दी। अब गाँव वालों को गर्मियों में भी पानी का अभाव नहीं रहता।”

उस विधवा के उत्सर्ग और त्याग की कथा सुनकर रविशंकर महाराज बहुत प्रभावित हुए। उन्होंने कहा धन्य हो देवि! तुम इस समूचे गाँव की माँ हो। धन से न सही मन से तो तुम इतनी धनवान् हो कि तुम्हारी सम्पन्नता को कोई लखपति तो क्या करोड़पति भी नहीं पहुँच सकता। तभी तो तुम्हारी लड़की को देखकर मैंने समझ लिया कि वह किसी साधारण माँ की बेटी नहीं है।

महाराज! शर्मिंदा मत कीजिए कहकर माँ ने उनके चरणों में अपना सिर रख दिया।

हैं कहीं ऐसी आदर्शवादी माँ, जिसे दूसरों का दर्द अपना लगता हो, सारे समुदाय की सेवा में जिसे आनन्द आता हो तथा स्वाभिमानी कोई भी चीज मुफ्त में नहीं लेता, यह अपने बच्चों को जिसने सिखाया हो? यही तो है सच्चा अध्यात्म जिसका अवलम्बन व्यक्ति को महापुरुषों की श्रेणी में ला खड़ा कर देता है। ऐसे सिद्धान्तों का अवलम्बन करने वालों को ही भारतीय संस्कृति में “ भूसुर “ पृथ्वी वासी देवता कहकर पुकारा जाता रहा है। आवश्यकता आज ऐसे ही ब्रह्म बीजों की है।


हमारा चिरपुरातन गौरव एवं बहुमूल्य थाती

हमारी प्राचीन साँस्कृतिक धरोहर इतनी समृद्ध थी कि उसने एक समय समस्त विश्व को अपने रंग में रंग लिया था। इसका पता विभिन्न देशों की संस्कृतियों, वास्तुकलाओं, एवं पुरातत्व अवशेषों के अध्ययन से सहज ही मिल जाता है। अमरीका भी भारतीय संस्कृति से अछूता नहीं था, इसकी जानकारी इतिहासकारों की विभिन्न रचनाओं से मिलती हैं।

कुछ पाश्चात्य विद्वानों के अनुसार दुनिया के किसी भी भाग से अमेरिका निवासी एशिया आदि से नहीं गये, वरन् उन्होंने स्वयं अपना विकास किया है, किन्तु वर्तमान में भौगोलिक भूगर्भीय पुरातत्व और प्राणिशास्त्र सम्बन्धी खोज इन तर्कों का खंडन करती है। “हाँम्सवर्थ हिस्ट्री ऑफ द वर्ल्ड” नामक संकलन में लिखा है कि ‘उत्तरी अटलाँटिक समुद्र हमेशा से जलमय नहीं था। वहाँ की भूमि पुरातन विश्व से मिली थी और अमेरिका में मनुष्य ने पुरानी दुनिया से ही प्रवेश किया। कोलम्बिया इक्वेडर, पेरु बोलेविया चिली आदि में जो प्रमाण बिखरे पड़े हैं, उससे चलता है कि किसी समय वहाँ की स्थिति सुविकसित देशों जैसी थी। किन्तु यह सभ्यता कहाँ से पहुँची इसका उत्तर उनके धार्मिक विश्वासों उनके चेहरे की बनावट उनके कुशलशिल्प और निर्माणों उनके पूर्वकालिक गमनागमनों से ही मिल जाता है।

अमेरिका की “जॉन होपकिन्स” नामक पत्रिका तथा हाम्सवर्थ हिस्टी ऑफ दि वर्ल्ड एवं उन पर समीक्षा लिखने वाले भारतीय विद्वान श्री उमेशचन्द्र ने अनेक प्रमाण यह सिद्ध करने के लिए प्रस्तुत किये हैं कि प्राचीन भारत और प्राचीन अमेरिका में घनिष्ठ सम्बन्ध था। व्यापारी और धर्मोपदेशक लम्बी जल यात्राएँ करके आते जाते थे। इन्द्र गणेश, अग्नि शिव, सूर्य एवं अन्य देवी-देवता भारत की तरह वहाँ भी पूजे थे। उक्त इतिहासकार बताते हैं कि उस समय अमेरिका एक प्रकार से भारतवर्ष का साँस्कृतिक उपनिवेश था। मैक्सिको में साथ मनाया जाता है, जिसमें राम लीला की झाँकियाँ निकाली जाती हैं भारत की तरह स्मृति रूप में समाधि, स्तूप एवं स्मारक वहाँ भी बनते थे, जिन्हें “टिकल” कहा जाता था। भी बनते थे, जिन्हें “टिकल” कहा जाता था। इसके अतिरिक्त उनके यहाँ वैवस्वत मनु की जलप्लावन की कथा अब भी प्रख्यात है तथा जनश्रुति का एक अंग है।

मेक्सिको के प्राचीन मन्दिर ‘कोपन’ की दीवारों पर हाथी पर सवार की महावत के भित्ति चित्र’ निकल’ में मुण्डधारी शिव की प्रतिमा अनन्त वासुकि, तक्षक सर्प देवताओं की प्रतिमाएँ आदि भारतीय चित्रकला और मूर्तिकला की अमिट छाप हैं। ‘क्वीरिग्वा’ में मिली मिट्टी की प्राचीन प्रतिमाओं में भारतीय शिल्प देखा जा सकता है। टोलो (मैक्सिको) में विशालकाय पाषाण स्तम्भों पर भारतीय देवताओं की प्रतिमाएँ बड़े कलात्मक ढंग से खुदी हुई हैं। कोयून हाण्डुराँस-मध्य अमेरिका ) में दैत्य की मूर्ति भी उसी आकृति में है, जिस प्रकार असुरों का हमारे यहाँ वर्णन पाया जाता है। ‘कपूरगों’ (ग्वालेभाटा) में उपलब्ध शिला प्रतिमाओं में स्पष्टतः भारतीय शिल्प छलकता देखा जा सकता है। जिस प्रकार अनेक स्तम्भों वाले मन्दिर भारत में जहाँ-तहाँ दिख पड़ते हैं, उसी प्रकार ‘यूक्टास’ के ध्वंसावशेष’ थाइजेण्ड कालम्स’ (हजार स्तम्भों ) को देखा जा सकता है। बिना चूने-गारे की सहायता से केवल पत्थरों से बने भवन भारत की विशिष्ट वास्तु कला है। ऐसा ही एक तक्षशिला जैसा ध्वस्त खण्डहर चाको (द अमेरिका) में विद्यमान है। सन् 1927 में तिआहुआन’ (पेरु द अमेरिका ) में पुरातत्व विभाग ने जो खुदाई कराई है, उसमें एक ऐसा शिव त्रिशूल मिला है, जिसकी ऊँचाई 750 फीट है। इसी में 20 टन भारी और 24 फीट लंबा एक शिवलिंग भी है, जिस पर ग्रह नक्षत्रों की अन्तरिक्षीय स्थितियाँ अंकित हैं। एक ही पत्थर से तराशा हुआ 10 टन भारी सूर्य मन्दिर, तीन कतारों में उपलब्ध 47 प्रतिमाएँ भी उस काल की भारतीय कला एवं संस्कृति की साक्षी देती है।

भारत के प्राचीनतम साहित्य में अमेरिका का उल्लेख भी है। ऐतरेय ब्राह्मण के इन्द्र महाभिषेक में अपाच्यों के राजाओं का वर्णन है और कहा गया है कि ये पश्चिम दिशा में है। भूगोल के अनुसार भी मैक्सिको राष्ट्र में अपाच्य नामक मूल निवासी अब तक रहते हैं। महाभारत में लिखा है कि उद्दालक मुनि पाताल में ही निवास करते थे। हाम्स हिस्ट्री ऑफ दि वर्ल्ड’ में लिखा है कि पाताल अमेरिका को ही कहा जाता था। बलि नामक राजा भी पाताल देश में निवास करता था। पाताल देश में राजा बलि की राजधानी दक्षिण अमेरिका में अभी भी बोलीविया नाम से प्रसिद्ध है। अर्जुन की उलूपी नामक एक पत्नी भी इसी मूल की थी और वेदव्यास भी वहाँ कई बार गये थे। इसका उल्लेख स्वामी दयानन्द सरस्वती ने सत्यार्थ प्रकाश में भी किया है। भारतीय पौराणिक उल्लेखों और मेक्सिको में प्रचलित “किजक्स” गाथाओं में आश्चर्यजनक साम्य है। विष्णु पुराण में पाताल लोक का और भी अधिक विस्तारपूर्वक वर्णन है और वह अमेरिका की प्राचीन स्थिति पर वैसा ही प्रकाश डालता है जैसा कि पुरातत्त्ववेत्ता बताते हैं’।

विद्वान लेखक चेसली बैटी “अमेरिका बिफोर कोलम्बस” में लिखते हैं कि मेक्सिको नाम माया+कसको पड़ा है, जिसका अर्थ वहाँ के प्राचीन आदिवासियों की भाषा में ‘मय’ का अनुयायी ‘ है। लैली मिचेल द्वारा लिखित ‘काँक्वेस्ट ऑफ दि माया’ ग्रन्थ में मेक्सिको में उपलब्ध ऐसे अनेक प्रमाणों का वर्णन है, जिनसे पुरातन भारत और मैक्सिको की साँस्कृतिक घनिष्ठता सहज ही सिद्ध होती है। बाल्मीकि रामायण में भी “मय” सभ्यता के अनुयायी भारतीयों की चर्चा लगभग उन्हीं शब्दों में की गई हैं।

भारतीयता के प्रभाव की साक्षी देने वाला दक्षिणी अमरीकी राष्ट्र है पेरु। ‘पेरु’ का शब्दार्थ संस्कृत में ‘सूर्य का देश, ‘सूर्य पुत्रों का देश है।’ वस्तुतः “पेरु” नाम रखा ही गया इस कारण कि जब भारत में सूर्य अस्त हो जाता था तब वहाँ दिन का समय होता था। पूर्व में भारत व पश्चिम में पेरु एक दूसरे से इतनी दूर होने के बावजूद साँस्कृतिक रूप से एक दूसरे से अविच्छिन्न रूप से विश्व को भारत के अजस्र अनुदान” में पूरे विश्व में भारतीय संस्कृति के प्रसार-विस्तार का विशद एवं गूढ़ विवेचन किया गया है।

वस्तुतः भारतीय साँस्कृतिक गौरव एक अमूल्य थाती है। समय आ रहा है कि यही आलोक पुनः समस्त विश्व में संव्याप्त हो जा रहा है। कभी जिसे ब्रह्मवर्त कहा जाता था वह ब्रह्मनिष्ठ आत्माओं के समुच्चय से भरा पूरा सारा विश्व ही था। पूर्वात्य आध्यात्मिक स्थापनाएँ अगले दस वर्षों में विश्व के कोने कोने में भिन्न भाषाओं में जब पहुँचेगी तो इसे सही अर्थों में सतयुग की आपसी के रूप में देखा जा सकेगा।


भूल (Kahani)

एक मूर्तिकार मूर्तियाँ बनाता और उन्हें बेचकर गुजारा करता। उसकी एक मूर्ति प्रायः एक रुपये में बिकती।

लड़का बड़ा हुआ तो मूर्तिकार ने उसी धन्धे में उसको भी लगाया। वह कुशाग्र बुद्धि था जल्दी ही अच्छी मूर्तियाँ बनाने लगा और वे बाप की अपेक्षा दूने दाम में अर्थात् दो रुपये में बिकने लगीं।

इतने पर भी बाप ने अपना नित्यकर्म जारी रखा। वह लड़के की मूर्तियों को बहुत बारीकी से देखता और उनमें जो नुक्स होता उसे सुधारने की सलाह देता।

लड़के के अहंकार को चोट लगी उसकी मूर्तियाँ दूने दामों में बिकने लगी थीं। तब भी प्रशंसा मिलने के स्थान पर उसके कार्य में बाप द्वारा ही निकाली जाती थी। उसने अपने दुःख मानने की बात बाप प्रकट कर दी

बाप को भारी दुःख हुआ। उसने कहा बेटे तेरी भावी प्रगति अब रुक गई। दो रुपये से अधिक मूल्य की वस्तु न बना सकेगा। यह भूल मुझ से बचपन में हुई थी और एक रुपये को प्रतिमा बनाने के बाद अधिक प्रगति न कर सका। वहीं भूल तुम अब कर रहे हो।

लड़के ने अपनी भूल समझी और समीक्षा को न केवल बाप से वरन् दूसरों से भी कहने लगा। गलतियाँ मालूम करना और उन्हें सुधारना यही तो अनवरत प्रगति का मार्ग है।


युग के विश्वमित्र द्वारा राम-लक्ष्मण की माँग

सभी बैठे हुए थे कि शोर मचा-जत्था आ गया! पश्चिम में गर्द उड़ती हुई नजर आ रही थी, मानों पृथ्वी उन यात्रियों के स्वागत में अपने नररत्नों की वर्षा कर रही हो। गाँव के स्त्री पुरुष सब काम छोड़-छोड़ कर उनका अभिवादन करने दौड़ पड़े। क्षण में तिरंगी पताका हवा में फहराती दिखाई दी।

जरा देर में यात्रियों का दल साफ नजर आने लगा। दो-दो आदमियों की कतारें थीं। हर एक की देह पर खद्दर का कुर्ता था, सिर पर गाँधी टोपी, बगल में लटकता हुआ थैला, दोनों हाथ खाली जैसे नए जमाने का आलिंगन करने के लिए तैयार हों। उनके मर्दाने गले से एक तराना निकल रहा था, गर्म, गहरा, दिलों में स्फूर्ति डालने वाला। जिसे सुनकर सभी के भाव उमगने लगे। गाँव वालों ने कई कदम आगे बढ़कर उनका स्वागत किया। उनके सिरों पर धूल जमीं थी होंठ सूखे हुए चेहरे संवलाए पर आँखों में नव समाज की भव्यता प्रदीप्त थी।

आने के साथ उन सब ने अपने पटुके से धूल साफ की हाथ पैर धोया तनिक विश्राम करने के साथ ही गाँव के चौधरी को निवेदन किया “हम लोग अपने मार्गदर्शक की कुछ बातें आप को बताना चाहते हैं। सुनने की कृपा करेंगे।” चौधरी सहर्ष तैयार हो गया। शाम के उसके दरवाजे पर मशालें जलने लगीं। गाँव के अनेकों आदमी जाम हो गए। महिलाएँ छतों पर खड़े होकर कहना प्रारम्भ किया।

“भाइयों। आप सब ने हम लोगों का आदर सत्कार किया व हम में से किसी व्यक्ति का सत्कार न होकर बदलते समाज का सत्कार है। मैंने पूरब और पश्चिम के बहुत से देशों को देखा है और तजुरबे से कहता हूँ कि आप में जो सरलता जो ईमानदारी जो श्रम और धर्म बुद्धि वह कहीं और नहीं। इन दैवी गुणों के बावजूद आप लोगों को विवशता और घुटन की जो त्रासदी सहनी पड़ती है उसका एक ही कारण है भटकाव।”

सुनने वाले अचकचा कर सोचने लगे भटकाव कैसा? भटका हुआ कौन? वह कह रहे थे “आपके श्रम सीकरों की रत्नराशि को दहेज का डाकू लूट ले जाता है, मृतक भोज के गिद्ध नोंच ले जाते हैं, जो कुछ बचता है वह मुकदमेबाजी की आग में स्वाहा हो जाता है।” सही तो कह रहे हैं। अनेकों होंठ बुदबुदाए। कहने वाले की वाणी गतिमान थी सब कुछ लुटने गँवाने के बाद भी चैन नहीं। कन्याओं के आँसू पोंछने में हमारे हाथ असमर्थ हैं, जिन्दगी में चैन हम नहीं ला पा रहे हैं, जानते हैं क्यों? “क्यों?” अनेकों ने इस एक शब्द को दुहराया।

“सिर्फ इसलिए कि हम धर्म को भूल गए हैं”। धर्म को भूल गए हैं, भला यह कैसे? धर्म तो हमारा प्राण है।” नहीं भाई यह बात सच नहीं है।” न चाहते हुए आखिरी शब्द किसी के कण्ठ से जोर से निकल गए।”तनिक फिर से परखिए जिसे आपने धर्म कहकर छाती से चिपटा रखा है, वह धर्म है अथवा कुरीतियाँ, कुप्रचलन अथवा आड़ी टेड़ी प्रथाएँ। धर्म के तीन रूप हैं पहला यह कि व्यक्ति अपनी आन्तरिक शक्तियों को अधिकाधिक उभारे प्रतिभावान क्षमतावान् बने। दूसरा यह कि परिवार सृजन की प्रयोगशाला बने। तीसरा यह कि व्यक्ति एवं परिवार की क्षमताओं का अधिकतम लाभ समाज को मिले। इनमें से कौन सा रूप है आपके पास।”

सुनकर सभी मौन थे। कहें भी क्या? वह कहे जा रहे थे “लुट रहें हैं, बरबाद हो रहे हैं, सर्वनाश हो रहा है, वह भी स्वयं अपने हाथों से।” आवाज दर्द भरी हो उठी। व्यक्तित्व की अपनी वाणी है जो जीभ या कलम का इस्तेमाल किए बिना लोगों के अन्तराल को छूती है।

एक आवाज आयी “हम किस लायक हैं?” “यही तो आपका भ्रम है। आप के कन्धों इतना बड़ा राज टिका हुआ है। आप बड़ी-बड़ी फौजों, बड़े-बड़े अफसरों के मालिक हैं नायक कह रहे थे “समझिये अपनी शक्ति को टटोलिए अपने को, आ मिलिए सृजन के इस तूफान में, जो समाज की सारी दुर्गन्ध को उड़ा फेंकने के लिए उतारू है। अब सोचिए कि आप हमारी कुछ मदद करेंगे? मर्दों की तरह निकल कर अपनों को इस घुटन से बचाएँगे या कायरों की तरह बैठे हुए तकदीर को कोसते रहेंगे? युग के विश्वमित्र ने हर गाँव हर घर से राम-लक्ष्मण माँगे हैं जो ताड़का मारीच सुबाहु जैसी आसुरी शक्तियों को पराजित कर भावी युग का नेतृत्व सँभाल सकें”।

सभा में सन्नाटा छा गया। सभी कुछ जैसे निस्पन्द निष्प्राण। सिर्फ सामने खड़ा पीपल का पेड़ कभी-कभी अपने पत्ते खड़का कर अपने सप्राण होने की खबर देता। नायक का थमा हुआ कण्ठ स्वर फिर कभी न आढ़। अगर इस वक्त चूके तो शायद हमेशा हाथ मलें। हमें ऐसे वीरों की जरूरत है जिनके दिलों में सब कुछ नया गढ़ डालने की उमंग हो। जो ईश्वर पर अटल विश्वास रख कर मानव हित के लिए सभी कुछ झेल सकें।”

कोई आगे नहीं बढ़ा। सन्नाटे ने सभी को डुबा दिया। सब के सिर झुके थे। यदि किसी का मस्तक उठा था सिर्फ उसका। अपनी लठिया पकड़े सबके पीछे आशीर्वाद बनी खड़ी थी। उसकी आँखें डबडबाई हुई थीं, मुख से गौरव की ऐसी झलक आ रही थी, मानों वह कोई महारानी हो, सारा गाँव उसका है ये सभी युवक अपने बालक है। नायक की वाणी से वह अपने अन्दर में अद्भुत शक्ति विकास और उत्थान का अनुभव कर रही थी। उसने एक नजर सब पर घुमाई पर सभी मुर्दों की तरह निश्चेष्ट थे। कहीं कोई हलचल न देखकर इशारे से दो तरुणों को अपने पास बुलाया। लाठियों को एक ओर फेंक कर अपने दोनों हाथों से युवकों का हाथ पकड़ा और तनिक डगमगाते हुए मंच की ओर चल दी।

उपस्थित जनसमुदाय ने तो तब ध्यान दिया जब उसके मुख से निकला “नायक जी! सँभालिए मेरे राम-लक्ष्मण-देश के लिए-समाज के लिए, मैं इन्हें सौंपती हूँ। आपके विश्वामित्र को उन्हें मेरा प्रणाम कहना।” सुनकर नायक भी विह्वल हो उठा उसने लपककर बुढ़िया के चरणों में सिर रखा। वृद्धा ने काँपते हाथों से उसे उठाया नायक को अपने सिर पर टपक पड़े गर्म जल की बूँदों का अहसास हो रहा था। यह और कुछ नहीं वृद्धा के अश्रुधारा थी।

गाँव का चौधरी हतप्रभ हो बोला “यह क्या करती हो काकी। इनकी तो बारात जाने वाली थी। अब”

बात काटते हुए वृद्धा बोली “बीते को बिसार दो चौधरी। अब राष्ट्र से इनका विवाह होगा। समाज की आपत्तियों को देखकर भी ऐश-मौज की सोचना मनुष्य का काम नहीं है।” कहकर वह चुप हो गई।

नायक ने तरुणों का हाथ पकड़ा झोले से मालाएँ निकाल कर उन्हें पहनाई। एक माला बुढ़िया माँ के गले में डाली। जबाब में उसने लड़कों को चेतावनी दी “मेरे दूध की लाज रखना, मेरे बच्चों।”

सुनकर नायक बोल पड़ा तुम्हारा दूध अमर रहेगा माँ। युग के विश्वामित्र के लिए राम-लक्ष्मण माँगने वाले यह नायक थे महावीर त्यागी। गाँधी जी के अनन्य सहयोगी। बीतते वर्षों के बाद भी पुकार मन्द नहीं पड़ी है। युग के विश्वामित्र ने अपनी सृजन सेना के लिए सेनानी माँगे हैं। भावी युग के कर्णधार यही होंगे। अपने को टटोले हृदय में उमंग रही भावनाओं के बीच हम अपने मध्य भी राम-लक्ष्मण का गौरव चमकता पाएँगे। हर बढ़ते कदम के साथ वैसी ही प्रतिभा-क्षमता का विकास होता चला जाएगा।


उतार-चढ़ाव कम हुआ (Kahani)

गाँधी जी की जीवनचर्या बड़ी नियमित तथा सन्तुलित थी। एक बार वे आगा खाँ महल में ठहरे हुए थे। उस दिन श्रम कुछ अधिक करना पड़ा, व्यस्तता भी असाधारण रही। इसलिए सुबह कुछ देर से आँख खुली।

इस भूल पर बापू को बहुत ग्लानि हुई। क्षोभ से हृदय मथने लगा। मन किसी प्रकार हलका ही नहीं हो पा रहा था। बापू ने प्रायश्चित करने की बात सोची। उस दिन उन्होंने भोजन नहीं किया, तब कहीं जाकर मन कर उतार-चढ़ाव कम हुआ और अन्तर्द्वन्द्व मिटा। महापुरुषों के जीवन की ये छोटी बातें ही उनकी महानता का परिचय देती हैं।


अध्यात्म भगोड़ों का नहीं शूरवीरों का क्षेत्र

वैयक्तिक जीवन में आत्म परिष्कार, पारिवारिक जीवन में सहयोगियों का पोषण-संवर्द्धन सामाजिक जीवन में सत्प्रवृत्तियों का समर्थन जैसे उत्तरदायित्व हर किसी के सामने मौजूद हैं। उनका निर्वाह भली प्रकार किया जाना चाहिए। इन तीनों ही मोर्चों पर कर्म कौशल का शौर्य-साहस का विवेक सन्तुलन का परिचय दिया जाना चाहिए। इन से मन हटा लेना और तथाकथित धर्म या अध्यात्म के कोतर में जा छिपना और कल्पना लोक में विचरण करके मन को समझाना, ऐसा प्रयत्न है जिससे किसी उद्देश्य की पूर्ति नहीं होती।

भाग खड़े होने से समस्याएँ और भी अधिक विकराल होती हैं और पहले जितना उपद्रव चल रहा था, उस में और भी अधिक वृद्धि हो जाती है। मन जिस समाधान को खोजने चला था वह भी भटकाव भरी पगडंडियों में कहाँ मिलता है? उपेक्षा, उदासीनता कर रीति-नीति से चैन मिलने की कल्पना जिनने भी की है, उन्हें प्रयोग के उपरान्त निराशा ही हाथ लगी है।

प्रायः कायरता से उत्पन्न पलायनवाद की चपेट में बहुत से लोग धर्म का-अध्यात्म का आवरण ओढ़ते और व्यावहारिक जीवन से जुड़ी हुई समस्याओं से मुँह मोड़ते देखे जाते हैं। अपने कर्तव्यों और आश्रितों से उदासीन हो जाने वालों के लिए उदासी से उत्पन्न शिथिलता भी भारी पड़ती है। ऐसे ही धर्मात्मा सर्वत्र उपहासास्पद बनते हैं। इसी तरह भगोड़ों में से कितने ही एकान्त में भजन करने और आरंभ में ही एकान्त ढूँढ़ते और पहले ही दिन समाधि लगाने की बात सोचते हैं। उनकी बालबुद्धि इस तथ्य से अनभिज्ञ बनी रहती है कि अध्यात्म साधना एक वैज्ञानिक अन्वेषण एवं अभ्यास प्रकरण है। उसमें अन्तर्मुखी होकर सूक्ष्म अतिसूक्ष्म सत्ता के गहरे समुद्र में डुबकी लगाने और वहाँ से बहुमूल्य रत्न-राशि ढूँढ़ लाने के लिए कुशल पनडुब्बी का सा-दुस्साहस भरा महत्वपूर्ण कदम उठाया जाता है और वही भी बन तब पड़ता है जब पहल मन को भली प्रकार निग्रहित कर लिया जाय।

यह समय साध्य और अभ्यास साध्य प्रक्रिया है। इसके लिए उनकी पूर्व तैयारी तो होती नहीं। जो उत्साह होता है वह भी श्रद्धा जन्य नहीं, जीवन संग्राम की भयंकरता से डर कर कहीं जा छिपने की पलायनवादी मनोवृत्ति से उत्पन्न हुआ होता है। उसमें न श्रद्धा होती है और न गहराई। फलतः मन वहाँ भी नहीं लगता। वापिस लौटने में उपहास होने की झिझक से एक नया असमंजस और खड़ा हो जाता है।

श्रम करने पर ही उपलब्धियाँ हस्तगत होती हैं। धर्म क्षेत्र में प्रवेश करने पर व्यक्तित्व में तद्विषयक प्रखरता उत्पन्न न हो तो सहज ही उसे निरर्थक ठहराया जाने लगेगा। दर्शकों और पर्यवेक्षकों में सहज ही उसकी बुरी प्रतिक्रिया होगी। धर्मात्माओं की अपरिपक्वता का दोष धर्म पर धार्मिकता पर मढ़ा जायेगा। देखा यही जाता है धर्म-चर्चा करने वाले लोग अपने स्वजन सम्बन्धियों से उदास होते जाते हैं। जिम्मेदारियों से हाथ खींच कर उन्हें और भी अधिक विकृत करते अपने आप के लिए भारभूत बने हैं। जहाँ रहते हैं वहाँ भी नीरसता का वातावरण उत्पन्न करते हैं। जिस समुदाय के बीच रहा जाए, जिन लोगों के साथ घनिष्ठतापूर्वक निर्वाह किया जाय, उन्हें पारस्परिक स्नेह, सहयोग, विनोद, उल्लास-उत्साह लाभ मिलना चाहिए। इसके बिना सह निर्वाह के साथ जुड़े हुए कर्तव्य की अवहेलना ही होती है। जो माँ स्वयं उदास रहती है और अपने बच्चे तथा पति पर, परिवार पर उदासी थोपे रहती है वह प्रकारान्तर से उन पर अत्याचार ही करती है भले ही वह निर्दोष दुखी ही क्यों न हो? यह बात उपेक्षा बरतने वाले हर नर-नारी बाल-वृद्ध रुचि घटा लेना, उनके प्रति अपने कर्तव्यों में शिथिलता बरतना हर दृष्टि से अनुचित है। भले ही इस के लिए धार्मिकता की आड़ क्यों न ली गई हो? धर्म-धारणा का निर्वाह करने के लिए नीरस और उत्तरदायित्व विहीन जीवन क्रम अपनाना आवश्यक नहीं है। उसे सरसता और सक्रियता के साथ अपेक्षाकृत और भी अच्छी तरह निभाया जा सकता है।

ऐसी पलायनवादी धार्मिकता पर करारे व्यंग करते हुए सुप्रसिद्ध दार्शनिक मनोविज्ञानविद् विन्सेन्टपील ने अपने ग्रंथ में लिखा है “कमजोर मनःस्थिति के लोग जीवन संग्राम की स्वाभाविक कठिनाइयों को तिल का ताड़ बनाते हैं और भयभीत होकर मुँह छिपाने का कोई आसरा तकते हैं। कोई धर्म रूपी अफीम का पल्ला पकड़ते हैं तो कोई किसी नशे का आश्रय लेते हैं, पर इससे उन्हें मिलता कुछ नहीं। ऐसे सभी आसरे परिस्थिति में सुधार नहीं बिगाड़ ही उत्पन्न करते हैं।” धर्म को अफीम की गोली कह कर अनास्थावादी लोगों ने उसे खूब बदनाम किया है और कहा है कि इस जंजाल में फँसने वाले लोग काहिल और गैर जिम्मेदारी से लद जाते हैं। यह बदनामी किसी भी भले बुरे इरादे से क्यों न की जाती हो, इसमें इतना तथ्य तो है ही कि धार्मिकता उद्देश्यहीनता से जुड़ कर उदासीनता के साथ जब पर्यायवाचक बनती दिखाई पड़ती है तो उस परिणाम को देखते हुए इस प्रकार के निष्कर्ष निकालने वालों को अधिक दोष नहीं दिया जा सकता।

मनीषीगणों ने कहा है धार्मिकता, आध्यात्मिकता, औषधियाँ पूजा-अर्चा कथा-कीर्तन आदि सभी साधन यदि सुनियोजित रूप में प्रयुक्त किये जायें तो ही इनके सहारे प्रगति होती है और प्रसन्नता मिलती है। किन्तु इन पर इतना आश्रित न बना जाय कि कठोर कर्तव्यों की उपेक्षा ही होने लगे। औषधियों पर आश्रित रहने से नहीं स्वास्थ्य रक्षा के ठोस प्रयत्नों से काम चलता है। मनोरंजन के अवसर ढूँढ़ने से नहीं आन्तरिक उल्लास से प्रसन्नता स्थिर रहती है। इसी तरह धर्म के कल्पना लोक में विचरण करने से नहीं, जीवन संग्राम में कर्म का गाण्डीव उठाने से समाधान मिलता है। कर्म निष्ठा का स्थान यदि पलायनवादी धार्मिकता ग्रहण करने लगे तो उसमें अनर्थ की ही संभावना बनी रहती है।

धर्म का वास्तविक तात्पर्य है-मानवी चेतना में ऐसी सत्प्रवृत्तियों का समावेश जो सदाचरण और कर्तव्य पालन के रूप में समावेश में वातावरण को उल्लासपूर्ण बनाने में समर्थ हो। सहिष्णुता, दया, प्रेम, विवेक, उदारता, संयम, सेवा जैसे गुणों में सच्ची धर्म निष्ठा का परिचय मिलता है। कर्तव्य परायणता को धर्मात्मा कहा जा सकता है, किन्तु आज वे इन सब की उपेक्षा करके मात्र पूजा-पाठ के ढकोसले में निरत रहना ही धर्म-धर्म परायणता का चिन्ह बन गया है। धर्म के प्रति अनास्था इसी विकृति के कारण उत्पन्न हुई है। धर्म के कारण लोग पिछड़ेपन के शिकार नहीं हुए हैं, वरन् पिछड़े एवं पलायनवादी लोगों ने धर्म का आडम्बर ओढ़ कर उसकी उपयोगिता में सन्देह उत्पन्न कर दिया है।

नींद की गोली खाने से नशा पीने से, भाग्यवाद का आश्रय लेने भाग खड़े होने, उदासीनता धारण कर लेने से उलझनें सुलझती नहीं और न पलायनवादी धार्मिकता से किसी को समाधान मिलता है। तथ्यों को समझा जाना चाहिए और समस्याओं का समाधान ढूँढ़ा जाना चाहिए। वह एक तरह हम हल चाहते हैं वही एक मात्र उपाय हो, ऐसी बात नहीं है। खोजने पर ऐसे अनेकों आधार मिल सकते हैं जिससे प्रस्तुत कठिनाइयों से आसानी से निपटना या बचना संभव हो सके। निराशा कायरता और भीरुता में लिया गया धर्मावलम्बन किसी के कुछ काम नहीं आ सकता। धर्म तो कर्तव्य परायणता का पर्यायवाचक है। धर्मनिष्ठा और कर्मनिष्ठा समान अर्थबोधक हैं। दूरदर्शी दृष्टिकोण अपनाकर अपनी और अपने सम्पर्क क्षेत्र की समस्याओं का समाधान करने की क्षमता का विकास ही सच्ची धार्मिकता है। इसी विशेषता के कारण धर्मतत्त्व को मानव जीवन में सम्मान और उच्चस्थान मिला है। इस मौलिकता से विरत होकर तो वह अनुपयोगी बन जाता है।

धर्म और ईश्वर के प्रति आस्था होने का तात्पर्य है जीवन की गरिमा और उसकी श्रेष्ठता पर सुदृढ़ विश्वास। इस आस्तिकता के सहारे ही ईश्वर विश्वास विकसित किया और सत्कर्मों में उसकी सहायता मिलने का भरोसा रखा जा सकता है। आस्तिकता के माध्यम से आत्म गौरव और आत्म विश्वास विकसित किया और सत्कर्मों में उसकी सहायता मिलने का भरोसा रखा जा सकता है। आस्तिकता के माध्यम से आत्म गौरव और आस्तिकता के माध्यम से आत्म गौरव और आत्म विश्वास बढ़ाते हुए आत्मावलम्बन की दिशा में आगे बढ़ा और आत्म निर्भर रहा जा सकता है। धार्मिकता का तत्त्वज्ञान हमें कर्तव्य परायण बने रहने और जीवन संग्राम के हर मोर्चे पर आदर्शों की लड़ाई लड़ने का शौर्य साहस प्रदान करता है। क्या यह उपलब्धियाँ जीवन को सार्थक बनाने के लिए पर्याप्त नहीं हैं? धर्म और अध्यात्म को पलायनवाद का पर्याय क्यों बनाया जाय, जब कि उसमें सज्जनता, शालीनता एवं प्रखरता प्रदान करने वाली विभूतियाँ आदि से अन्त तक भरी पूरी हैं। यह मानकर चलना चाहिए कि अगले दिनों अनेक क्षेत्रों की सफाई अवांछनीयताओं की निष्कासन प्रक्रिया की तरह धर्म-अध्यात्म के क्षेत्र में श्री महाकाल बुहारी लगाएगा व मात्र वे ही अपना अस्तित्व बनाये रख सकेंगे जिनका आधार आदर्शवादी कर्मनिष्ठा, ब्रह्मपरायण चिंतन व जीवन है।


साहित्य दिव्यजीवन का मानचित्र

एक क्षण के लिए पलकें झपकी, दृष्टि पुनः सामने बह रही नदी की जल धारा से एकाकार होने की कोशिश में लग गई। फ्लोरेंस के शहरी जीवन से थोड़ा हटकर इस टेकरी पर खड़े वृक्षों के घने झुरमुट के बीच बनी झोंपड़ी में वह विगत कई वर्षों से रह रहे थे? सोच क्या थे मन की पोथी को उलटने-पुलटने का प्रयास?

इस उलट पुलट में जब से होश सँभाला था, तब से लेकर अब तक की यादें, जीवन की घटनाएँ एक-एक करके मुखर हो उठीं। जन्मते ही उन्हें वह परिस्थितियाँ प्राप्त हुई जिनके मिलने पर मनुष्य को सौभाग्यशाली समझने की परिपाटी है। किन्तु परिपाटियाँ तो अक्सर भ्रमों से सन होती हैं। सौभाग्य और दुर्भाग्य सुख और दुःख, शान्ति और अशान्ति, कहाँ है यह सब? अन्दर या बाहर! उनके अधरों से टपक पड़ी मुसकान को बह रही सरिता ने लहरों के आँचल में थाम लिया।

वैभव शान-शौकत राब दाब ऐशो-आराम के किले में रहने वाले स्वजनों को उन्होंने अतृप्ति के धधकते ज्वालानल में जलते अनुभव किया था। ओह! शायद विलासिता के पाश उन्माद में मानव अपनी मानवता दौड़ गई। मानस पटल पर दृश्य साकार हो उठा। शराब के टकराते जामों की झनकार में दासों की देह पर बरस रहे कोड़ों की विलय होती चीत्कार। आखिर उस दिन वह बेचारा प्राण छोड़ ही बैठा।

अमीरी और गरीबी सुख और दुख के प्रचलित पर्याय। न न वह होठों ही होठों में बुदबुदा उठे। उफ! कितना भ्रम है। सारा खेल तो मन का है। मन की सुगढ़ता सुख है और इसी की अनगढ़ता दुःख जैसे वह अपने आप से कहने लगे मन की समस्याएँ मन के समाधान। लोक मन के अनगढ़ होने के कारण ही तो कितना भौंड़ा, कुरूप, बेडौल होता जा रहा है लो जीवन।

इसी को भव्य और दिव्य बनाने के लिए ही तो.....। हवा के एक तेज झोंके के साथ चिन्तन श्रृंखला को झटका लगा। अन्तर में झाँकने की कोशिश कर रही दृष्टि फिर से बाहर लौट आई। प्रहरी की भाँति सीधे तने खड़े पेड़ कभी-कभी हिलडुल कर अपनी गोद में तारों को लहरों की प्यार भरी झपकियाँ देकर सुलाने का यत्न कर रही थी। रात्रि के गतिमान चरण अपनी सघनता की ओर बढ़ रहे थे।

वह उठा, नपे-तुले कदमों से अपनी झोंपड़ी की ओर चलने लगा। कितनी खट्टी मीठी स्मृतियों की साक्षी बनी है यह। जब उसने लोक सेवा के लिए, जन मन को जीवन बोध कराने के लिए, वैभव के किले से अपने पैर बाहर निकाले सुवर्ण की अर्गलाएँ तोड़ी तब सभी तो विरोधी थे हर कोई उसे मूर्ख, कहता था। अभी ही कौन से कम हैं? सोचते-सोचते पैर को ठोकर लगी झुक कर नीचे की ओर देखा एक पत्थर का टुकड़ा था। सँभल कर दोनों हाथों से उठा एक ओर फेंक दिया। पैर फिर बढ़ने लगे। दिव्य जीवन की राह में भी तो इसी तरह अवरोध है। इन अवरोधों से कैसे बचा जाय संभल कर कैसे बढ़ें जीवनोद्देश्य की ओर-इसी के लिए तो उसने नक्शा तैयार किया हैं। आज ही तो उसकी समाप्ति हुई है। भले उसका स्वरूप काव्य हो पर यथार्थ में वह दिव्य जीवन का नक्शा है।

झोंपड़ी आ चुकी थी। आहिस्ते से द्वार खोला। दीपक की पतली लौ अन्दर के तम से एकाकी जूझ रही थी। भले वह दुर्बल हो, कमजोर हो किन्तु उसकी लगन निष्ठा के सामने चारों ओर पसरा हुआ अंधेरा हारने को मजबूर हो रहा था। आँखों की पुतलियाँ इधर से उधर हुई पैनी दृष्टि ने कुछ भाँपने की कोशिश की। शायद कोई आया है सामान की बेतरतीबी से ऐसा कुछ लग रहा था। अभी वह कुछ और सोचते कि पीछे से किसी ने वार करने का प्रयास किया। दीपक के प्रकाश में उसकी हिलती-डुलती छाया दिखी। उन्होंने झुक कर वार बचाया और पीछे मुड़ कर उसके हाथ पकड़ लिए।

यह सब एक क्षण में बिजली की तेजी से हुआ। वार करने वाला हतप्रभ था। हाथ का गँडासा छीन कर उसे रोशनी में लाते हुए पूछा “तुम कौन हो भाई। मैंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है, जो मुझे मारने की कोशिश कर रहे थे। मुझे मार डालने से तुम्हें मिलेगा भी क्या? कंद माल भत्ता तो मेरे पास है नहीं।”

सुनने वाला मौन ही टुकुर टुकुर उनकी ओर देखे जा रहा था। शायद उसका प्रयत्न उनका चेहरा पढ़ने का हो अथवा यह सोच रहा हो कि अब क्या होगा मेरा!

“बताते क्यों नहीं? मुझे अपना मित्र समझो। कुछ परेशानी समस्या हो तो निःसंकोच कहो।” वाणी में मधुरता थी, प्यार छलक रहा था।

व्यवहार की इस मधुरता ने उस में आत्म ग्लानि भर दी। स्वपरिताप से आँखों से आँसू ढुलक पड़े। सिसकते हुए बोला “आप से मेरा कोई बैर नहीं। मुझे तो फ्लोरेंस की साहित्यिक सभा के अध्यक्ष ने भेजा था। उसके आदेश के मुताबिक़ आपको मार कर कोई एक किताब चुरानी थी जिसे आपने लिखा है”। “ओर”! सुनकर उन्होंने गहरी श्वास ली। “यही है पाण्डित्य, यही है विद्वता जिसका एक ही काम बचा है कि अपने अहंकार के पत्थरों से लोकहित को कैसे कुचले। विद्वता विभूति है जब वह अपने को जनहिताय समर्पित करें और दुर्भाग्य है तब जबकि इस में आड़े आए।”

“तुम जानते हो वह किताब कैसी है”।

“न”

“अच्छा, तुम्हें उसका एक अंश सुनाता हूँ। सुनकर निर्णय करना”। कहकर कपड़े में लिपटी एक हस्तलिखित पोथी उठाई। उसके कुछ पन्ने पलट कर दीपक के प्रकाश में पढ़ना शुरू किया। लोक भाषा का माधुर्य हृदय की गहराइयों से निकला काव्य रचनाकार की वाणी से झरने लगा।

‘सुनने वाला निस्तब्ध था। “इतनी अच्छी बातें। रोजमर्रा के जीवन से लेकर अध्यात्मिक ऊँचाइयों तक का इतना मर्मस्पर्शी मार्गदर्शन। ऐसी कृति को नष्ट करने चला था वह” अन्तरात्मा धिक्कार उठी। अनजाने में कितना बड़ा अपराध हो जाता सोचकर वह सिहर उठा।

काव्य पाठ चलता रहा। भावों के मोती झरते रहे साथ ही कितनी देर तक यह क्रम चला। बन्द होने के साथ ही एक अन्य व्यक्ति के अन्दर प्रवेश किया।

“अरे तुम कब आए”। रचनाकार ने बड़ी तत्परता के साथ उसे गले से लगा लिया।

मैंने सुना था कि तुमने लैटिन को छोड़कर लोक भाषा में कोई काव्य लिखा है, पर उसमें इतना अकल्पनीय सौंदर्य होगा, इतना सार्थक जीवन बोध होगा, ऐसी कल्पना नहीं थी”।

“तो तुम भी सुन रहे थे”। अपने बाल मित्र की ओर आश्चर्य से देखा।

“हाँ बाहर खड़े होकर” ‘पर इतनी रात को कैसे?’

लैटिन के पण्डितों ने साहित्यकारों ने आज की रात तुम्हें समाप्त करने की योजना बनाई थी। उन मूर्खों को क्या पता साहित्य का मर्म -’। कहते हुए आगन्तुक ने मुँह बिचकाया।”

कुछ ही क्षणों के वार्तालाप में सारी बात स्पष्ट हो गई। “सच कहते हो मित्र! यथार्थ में साहित्य दिव्य जीवन का मानचित्र है। जो कलात्मक ढंग से सीधे-सच्चे सुखप्रद जीवन की राहें सुझाता है। इसकी सार्थकता तभी है जब सभी समझें। ऐसा होने के लिए आवश्यक है कि यह सहज, सरल सुबोध और भावों से ओत प्रोत है, ताकि सरलता से ग्राह्य हो। यही मैंने किया है” बात पूरी करते हुए एक बारगी दोनों की ओर देखा।

“तुम पूर्णतया सफल हो। अपने अहंकार का ढोल बजाने वाले ये पण्डित क्या समझेंगे इन चीजों को।”

“इस लोक भाषा को क्या नाम दोगे”?

इटली की है इसलिए इतालवी’

‘ठीक बिल्कुल ठीक।’

“कल से हम दोनों गाँव-गाँव पहुँच कर औरों को लेकर तुम्हारा यह मानचित्र समझाएँगे, डिवाइन कॉमेडी गाएँगे।”

वह किन्हीं भावों में डूबने लगे। डिवाइन कॉमेडी के रूप में दिव्य जीवन का मानचित्र बनाने वाले रचनाकार थे दाँते। जिन्हें न केवल इटैलियन के जनक के रूप में समूचा इटली 22 मई को याद करता है। 700 वर्ष बीत जाने पर आज भी लगभग उनकी लिखी एक लाख प्रतियों को प्रति वर्ष लोग खरीदते हैं।

भारतीयता के परिवेश में युग साहित्य के रूप में ऐसे ही मानचित्रों का सृजन हुआ है, जिसके सहारे हमारे अपने कदम सही राह पर बढ़ सके। गहराई से पहचानें इन नक्शों को और गति दें अपने रुके पावों को।


कौन करेगा भावी युग का नेतृत्व?

उज्ज्वल भविष्य के चित्रांकन में निरत विश्व-मनीषा ने अनेकों मोहक चित्र प्रस्तुत किए हैं। आध्यात्मिक, साँस्कृतिक, सामाजिक, राजनैतिक पहलुओं के अनुरूप प्रत्येक का अपना सौंदर्य है। अन्तर्दृष्टि के बल पर प्रकाश युगीन सामाजिक संरचना, व्यवस्था प्रणालियों आदि का जीवन्त चित्रण कर रही कल्पना की तूलिका यकायक ठहराव सा अनुभव कर रही है। कैसे होंगे वे व्यक्ति जिनके ऊपर भावी समाज के नेतृत्व का भार होगा? सही माने में संरचना व्यवस्था-प्रणालियाँ तो कलेवर मात्र हैं। प्राण तो ये ही व्यक्ति हैं जिनके रहते तक कायकलेवर अपना सौंदर्य बरकरार रखता हैं। इनके जर्जरित होते ही अच्छी से अच्छी संरचना अपना अस्तित्व गंवा बैठती है।

मानवीय इतिहास की पोथी को उलट-पुलट कर देखें तो यह तथ्य कहीं अधिक मुखर हो अपना स्पष्टीकरण देता है। कबीले यूथों के सामुदायिक निवास से राजतन्त्र, लोकतन्त्र, साम्यवादी समाजवाद के उत्थान और अवसान की गहराइयों में यही स्वर गूँजते हैं। यथार्थ में कोई भी प्रणाली या विधि व्यवस्था उतनी खराब नहीं होती, जितनी कि हम सब समझ बैठते हैं। यदि राजतन्त्र का नेतृत्व करने वाले विक्रमादित्य और चन्द्रगुप्त सदृश व्यक्ति हों, जिन्होंने अपने समूचे जीवन का उद्देश्य एक मात्र जन कल्याण मान रखा हो। तो शायद राजतन्त्र अभी भी अपनी सामयिकता सिद्ध कर सके। इसी प्रकार लोकतन्त्र की बागडोर जनहित में आधी धोती पहनने वाले गाँधी के हाथ में हो तो राम राज्य अभी भी अपनी अभिव्यक्ति किए बिना न रुके। यही बात अन्य प्रणालियों के बारे में सत्य है। हो सकता है, यह सवाल किसी के मन को परेशान करने लगे कि यदि व्यक्ति की इतनी महत्ता है, कर्णधार इतने अधिक उपादेय हैं तब फिर यह प्रणालियों में उलट-फेर क्यों? क्या नयी प्रणालियों का जन्म देने वालों की अकल गड़बड़ थी? इन प्रश्नों के जवाब में यही कहा जा सकता है कि व्यवस्था की अपनी उपादेयता है। इनकी संरचना में फेर बदल करने वाले भी असंदिग्ध रूप से बुद्धिमान थे। इतने पर भी नेतृत्व करने वाले व्यक्तियों का महत्व कम नहीं हो जाता। बदलते समय के अनुरूप व्यवस्था की संरचना में फेर बदल सिर्फ इसलिए करनी पड़ती है, ताकि इसकी सहायता से मानव महासागर में खोये उपेक्षित पड़े सुयोग्य प्रतिभाशाली, चरित्रवान नर रत्नों को उभारा जा सके। इन्हें अपना नेतृत्व सौंपकर तत्कालीन समाज चैन की साँस ले सकें। कोई भी प्रणाली जब अपना यह दायित्व निभा सकने में अक्षम होने लगती है नीतिज्ञ उसे बदल डालने के लिए नई स्थानापन्न विधा की ढूँढ़-खोज में लग जाते हैं।

प्रकारान्तर से यह ढूँढ़ खोज नेतृत्व सँभाल सकने योग्य व्यक्तियों की होती है। उसका स्वरूप और प्रक्रिया भले ही कुछ और कैसी हो। स्वाभाविक है इसे जाने की लालसा बहुतों में जगे। हर कोई यह जानना चाहे कि वह कौन सी योग्यता है जो मनुष्य को इसके योग्य बनाती है। विशेषकर जिनका सम्पादन करके हम में से कोई भावी समाज की नौका का कर्णधार बन सकने योग्य बन सके।

सही भी है, संसार के सभी महत्वपूर्ण कार्यों के लिए एक विशेष योग्यता और शक्ति की आवश्यकता होती है। अनेक व्यक्ति कुछ महत्वपूर्ण करने की आकांक्षा तो करते हैं, पर उनको करने के लिए जिस क्षमता एवं शक्ति की जरूरत होती है उसे सम्पादित नहीं करते फलस्वरूप उन्हें सफलता से वंचित ही रहना पड़ता है। जिनने भी कोई बड़ा पुरुषार्थ किया है, बड़ी विजय प्राप्त की है। उनने तात्कालिक परिस्थितियों से ही सब कुछ प्राप्त नहीं किया। अपितु उनकी पूर्व तैयारी ही उस सफलता का कारण रही है।

मैन मॉरल सोसाइटी के कृतिकार ब्रिटिश विद्वान जे.सी. फ्ल्यूगेल सदाशयता सद्व्यवहार, संघटन शक्ति चरित्रनिष्ठा और सामाजिक हितों के लिए समर्पित बुद्धि को नेतृत्व की योग्यता बताते हैं। उनके अनुसार मॉरल अर्थात् चरित्र ही वह प्राण स्रोत है जो व्यक्ति और समाज दोनों को ऊर्जस्विता प्रदान करता है। विद्वान्तकार लैम्प्रैरण्ट की दृष्टि से सोचें तो अगले दिनों जो समाज का स्वरूप बनेगा उसके मुताबिक़ नेतृत्व की योग्यता के लिए महज चरित्र निष्ठा काफी नहीं ‘बल्कि चाहिए तप-शक्ति लैम्प्रैरण्ट की सोच के अनुसार मानव समाज कुछ विशिष्ट मनोवैज्ञानिक अवस्थाओं से होता हुआ प्रगति करता है। जिन्हें क्रमशः प्रतीकात्मक आदर्श प्रधान परम्परा प्रधान व्यक्ति तथा भाव प्रधान नाम दिये हैं। उनके अनुसार भाव-प्रधान नाम दिये हैं। उनके अनुसार भाव-प्रधान समाज के नेतृत्व हेतु पूर्ण व्यक्ति चाहिए। पूर्ण व्यक्ति का तात्पर्य है जिसका व्यक्तित्व तप से साँचे में ढला हो।

इतिहासविद् राधाकुमुद मुखर्जी की रचना “मैन एण्ड थॉट इन एशिएण्ट इण्डिया” के अनुसार पूर्वकाल में लाखों वर्षों तक सतयुग की सुख-शान्ति भरी परिस्थितियाँ इस संसार में रही हैं। इसका कारण एक ही रहा है कि उस समय के लोक नायक मार्ग दर्शक आत्मशक्ति से सम्पन्न रहे और केवल वाणी से नहीं अपनी आन्तरिक महानता की किरणें फेंक कर लोक-मानस को प्रभावित करते रहे। मस्तिष्क की वाणी मस्तिष्क तक पहुँचती है और आत्मा की आत्मा तक। कोई सुशिक्षित व्यक्ति अपनी ज्ञान शक्ति का लाभ सुनने वालों की जानकारी बढ़ाने के लिए दे सकता है। पर अन्तःकरण में जमी हुई आस्था में हेर-फेर करने का कार्य ज्ञान से नहीं तप शक्ति से सम्पन्न होना सम्भव हो सकता है। प्राचीन काल के लोक नायक ऋषि मुनि इस तथ्य को भली-भाँति जानते थे। इसीलिए वे दूसरों को उपदेश देने उनकी वाह्य सेवा करने में जितना समय खर्च करते थे। उतना ही प्रयत्न वर्स्य के जीवन को सँवारने, तप के साँचे में ढालने निमित्त करते थे। तप से ही वह ऊर्जा मिलती है जिसकी प्रेरणा से किसी के मन पर जमे बुराइयों के आकर्षक कुसंस्कारों को हटाकर अच्छाइयों के कष्ट साध्य मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी जा सके।

प्राचीन इतिहास की ही भाँति पिछले दो हजार वर्षों में भी इसी आधार पर जन मानस का सुधार एवं परिष्कार सम्भव होता रहा है। भगवान बुद्ध के मन में अपने तथा संसार के दुःखों के निवारण की लालसा जगी। इसके लिए उन्होंने पच्चीस वर्ष की आयु से मोह बन्धनों को तोड़ बीस वर्ष तक लगातार आत्मनिर्माण की साधना की। पैंतालीस वर्ष की आयु में उनका व्यक्तित्व लोक नायक के रूप में उभरा। भगवान महावीर ने अपनी आयु का तीन चौथाई भाग तप में और एक चौथाई जन नेतृत्व में लगाया। इन दोनों महापुरुषों ने उपदेशों की बौछार उतनी नहीं की जितने आज के सामान्य उपदेशक कर लेते हैं। तब भी उनका प्रभाव पड़ा और आज भी संसार की एक चौथाई जनता उनके मार्गदर्शन पर आस्था रखती है।

समस्त विवादों से परे तप की एक ही सार्वभौमिक परिभाषा है स्वयं के जीवन की समस्त खोटों को निकाल फेंकना। साथ ही आध्यात्म के उन प्रयोगों को दैनन्दिन जीवन में समावेश करना जो व्यक्तित्व की अन्तःशक्तियों को जगाते हैं। आदि गुरु शंकराचार्य ने बीस वर्षों की ऐसी ही तपश्चर्या के बल बूते अपने समय के मार्गदर्शन का दायित्व सँभाला। गुरु गोविन्द सिंह ने लोकमत नामक स्थान में जो तप-प्राण बटोरा उसी को बिखेर कर स्वयं को युग निर्माता के रूप में प्रतिष्ठित कर सकें। छत्रपति शिवाजी का व्यक्तित्व गढ़ने वाले डडडड रामदास ने तप कौशल से स्वयं को साँचा बना डाला था। संभवतः 1924 के कुम्भ में स्वामी दयानन्द को हरिद्वार प्रवास के दौरान कोरी वाणी फीकी मालूम पड़ी। इस न्यूनता को पूर्णता के लिए उन्होंने कठोर तप को ही साधना बनाया।

श्री रामकृष्ण परमहंस ने पचास वर्ष की आयु में विशुद्ध तीस वर्ष तप साधना में लगाए। योगी अरविन्द घोष, महर्षि रमण, स्वामी रामतीर्थ की तपश्चर्या प्रसिद्ध है। वैष्णव आचार्यों में से रामानुज मध्व, निम्बार्क आदि ने जितना ज्ञान संचय किया उतनी ही तप साधना की।

संसार के अन्य महापुरुष जिनने लोगों को उच्च भूमिका की ओर बढ़ाया निश्चित रूप से तपस्वी थे। महात्मा ईसा के जीवन में 36 वर्ष तपश्चर्या में लगे। पैगम्बर मुहम्मद ने पच्चीसवें वर्ष में साधना की और कदम बढ़ाया और चालीस साल तक उसी में लगे रहे। यहूदी धर्म के यहोवा और पारसी धर्म के देवदूत जरथुस्त्र की दीर्घकालीन तप साधनाएँ प्रसिद्ध हैं।

मानवीय जीवन क्रम में आदि काल से लेकर अब तक एक ही तथ्य समय-समय पर स्पष्ट होता रहा है कि अध्यात्म साधनाओं द्वारा स्वयं के जीवन को उत्कृष्टतम बनाने वाली आत्माएँ ही लोक जीवन को सच्चा नेतृत्व दे सकने में समर्थ हो सकती हैं। नए समाज में ओछे हल्के वाचाल व्यक्तियों का कोई स्थान न होगा। फिर नेतृत्व जैसे महान कार्य के लिए इन जैसों के बारे में सोचना ही ठीक नहीं। यह महान कार्य महान आत्माएँ ही कर सकेंगी और महान आत्माओं के अनेक गुणों में प्रमुख एक तपश्चर्या भी है जिसकी उपेक्षा नहीं की जा सकती। महाकाल आज ऐसे ही तपस्वियों की प्रतीक्षा कर रहा है।


उच्चस्तरीय सान्निध्य की परिणति

गर्ग संहिता के सूत्र 62/9 में कहा गया है ‘गंगा पाप का, चन्द्रमा ताप का और कल्पवृक्ष दीनता के अभिशाप का अपहरण करता है, किन्तु महामानवों की संगति, उनका सान्निध्य पाप, ताप और दैन्य तीनों का नाश कर देते हैं। महापुरुष संपर्क में आने वालों की बुद्धि की जड़ता, मन की मलिनता को दूर कर उसे परिष्कृत स्तर का बनाते, वाणी में सत्य का संचार करते और सम्मान में अभिवृद्धि करते हैं। कोई भी व्यक्ति या वस्तु महान का आश्रय पाकर उत्कर्ष को प्राप्त हुए बिना नहीं रहती। सत्संगति का प्रतिफल भी यही है।

उच्चस्तरीय मस्तिष्क कमजोर बालों को किस प्रकार इच्छित दिशा में घसीट ले जाते हैं, इस संदर्भ में मनोवेत्ताओं एवं भौतिक विज्ञानियों ने अपने-अपने ढंग से अनुसंधान किये हैं। दोनों क्षेत्रों के निष्कर्ष लगभग समान हैं। इनके अनुसार कमजोर एवं अपरिष्कृत मन-मस्तिष्क वाले मनुष्यों को यदि परिष्कृत व्यक्तित्वों का सतत् सान्निध्य मिलता रहे, तो उन्हें जैसा चाहें सोचने, मान्यता बनाने और गतिविधियाँ अपनाने के लिए विवश किया जा सकता है। उदाहरण स्वरूप परिष्कृत व्यक्तित्व एवं शुद्ध सात्विक मनःस्थिति का प्रचण्ड प्रभाव देखना हो तो वह विवेकानन्द, महात्मा गाँधी, अब्राहम लिंकन मार्टिन लूथर किंग आदि महापुरुषों के रूप में देखा जा सकता है जिन्होंने अकेले ही अपने समाज तथा संसार में महत्वपूर्ण क्रान्तिकारी परिवर्तन प्रस्तुत किये।

वस्तुतः परिष्कृत मन की शक्ति अणुशक्ति से किसी भी प्रकार कम नहीं है, वरन् उससे अधिक ही समर्थ और प्रचण्ड है। इस स्तर के व्यक्तित्वों के संपर्क में आने वाले भी तदनुरूप बनते और और ढलते चले जाते हैं। इतिहास पुराणों में वर्णित हृदय परिवर्तन एवं जनमानस के परिष्कार की घटनाएँ इसी मनःशक्ति के सृजन उपयोगों के उदाहरण हैं। इस तथ्य को भारतीय तत्त्वदर्शियों ने बहुत पहले जान लिया था कि परिष्कृत चेतना ही अनगढ़ स्वभावों में सुधार परिवर्तन कर सकने में सक्षम हो सकती है। विज्ञानवेत्ता भी अब इस तथ्य का समर्थन करने लगे हैं। प्राणिशास्त्री चिस्टन एवं मनोविज्ञानी वेलोस्कोव जैसे मूर्धन्य अनुसंधान कर्ताओं का कहना है कि मानसिक विकास की बहुत कुछ संभावना इस बात पर निर्भर है कि अविकसित मस्तिष्क वालों का सतत् सान्निध्य मिलता रहे। मनुष्य का बौद्धिक एवं भावनात्मक विकास बहुत कुछ उच्चस्तरीय संगति पर निर्भर करता है। समीपता के कारण उनके सोचने का ढंग और भावनाएँ बहुत कुछ वैसी ही बनने लगती हैं, जैसे कि प्रभावशाली व्यक्तित्वों का निज का होता है।

प्राचीनकाल से लेकर अर्वाचीन काल तक के ऋषि मनीषियों एवं अध्यात्मवेत्ताओं ने इस तरह के कितने ही प्रयोग किये और सफलता प्राप्त करने में कृत कार्य हो चुके हैं। बुद्ध की समीपता पाने वालों में से कितने ही उन्हीं की तरह महानता अर्जित कर सके, यह कोई छुपा तथ्य नहीं है। अपने समय में अकेले बुद्ध की प्रचण्ड विचार धारा ने लगभग ढाई लाख व्यक्तियों को अपनी विलासी एवं भौतिकवादी महत्त्वाकाँक्षी गतिविधियाँ छोड़कर उस कष्ट कर प्रयोजन में सहभागी बनने के लिए विवश कर दिया था, जो बुद्ध को अभीष्ट था। भगवान राम ने रीछ वानरों को ऐसे कार्य में जुट जाने के लिए संलग्न कर दिया जो उन दिनों असंभव माना जाता था कृष्ण ने महाभारत की भूमि रची और उसके लिए मनोभूमियाँ उत्तेजित की उनके समीप आने वाले ग्वाल-बाल तक अपने व्यक्तित्व को उच्चस्तरीय बना सकें।

ईसा मसीह, मुहम्मद साहब, जरथुस्त्र आदि धार्मिक क्षेत्र के मनस्वी ही थे, जिन्होंने लोगों को अभीष्ट पथ पर चलने के लिए विवश किया। उपदेशक लोग आकर्षक प्रवचन देते रहते हैं, पर उनकी कला की प्रशंसा करने वाले भी उनके उपदेशों पर चलने को तैयार नहीं होते। इसमें उनके प्रतिपाद्य विषय का दोष नहीं, उस मनोबल की कमी ही कारणभूत तत्व है, जिसके बिना सुनने वालों के मस्तिष्क में हलचल उत्पन्न किया जा सकना संभव न हो सका। नारद जैसे मनस्वी ही अपने स्वल्प परामर्श से लोगों की जीवनधारा बदल सकते हैं। बाल्मीकि, ध्रुव, प्रह्लाद, सुकन्या आदि कितने ही आदर्शवादी उन्हीं की प्रेरणा भरी प्रकाश किरण पाकर आगे बढ़े थे।

सत्संग उसी स्तर के महामानवों का किया जाना चाहिए, जिनकी उत्कृष्टता से सुसम्पन्न व्यक्तित्व का तेजस् दूसरे अल्प तेजस् व्यक्तियों में प्रवेश करके उन्हें देखते-देखते समर्थ बनाकर रख दे। दीपक से दीपक जलने का, पारस-स्पर्श से लोहा सोना होने का कौवे का कोयल और बगुले का हंस बन जाने के उदाहरण सर्वविदित हैं जो इसी संदर्भ की पुष्टि करते हैं, कि मनुष्य का मन और दृष्टिकोण उच्चस्तरीय सान्निध्य से ही परिष्कृत होता है।


वसुधैव कुटुम्बकम् की ओर बढ़ते चरण

धर्म और संस्कृति दोनों ही सार्वभौम और सर्वजनीन है। शारीरिक संरचना की तरह मानवी अन्तःकरण की मूलसत्ता भी एक ही प्रकार कह है। भौतिक प्रवृत्तियाँ भी लगभग एक सी हैं। अतः एकता व्यापक और शाश्वत हैं पृथकता सामयिक है और क्षणिक। हम सब एक ही परमपिता की संतानें हैं। एक ही धरती पर पैदा हुए हैं। एक ही आकाश के नीचे रहते हैं। एक ही सूर्य से गर्मी पाते हैं और बादलों के अनुदान से एक ही तरह गुजारा करते हैं, फिर कृत्रिम विभेद से बहुत दिनों तक बहुत दूरी तक किस प्रकार बँधे रह सकते हैं। औचित्य को आधार मानकर परस्पर आदान-प्रदान का द्वारा जितना खोलकर रखा जायेगा उतना ही स्वच्छ हवा और रोशनी का लाभ मिलेगा। खिड़कियाँ बन्द रखकर हम अपनी विशेषताओं को न तो सुरक्षित रख सकते हैं और न स्वच्छ हवा और खुली धूप से मिलने वाले लाभों से लाभान्वित हो सकते हैं। संकीर्णता अपनाकर पाया कम और खोया अधिक जाता है।

अब राष्ट्रवाद के दिन लदते जा रहे हैं। देश भक्ति के जोश को अब उतना नहीं उभारा जाता जिसमें अपने ही क्षेत्र या वर्ग को सर्वोच्च ठहराया जाय अथवा विश्व विजय करके सर्वत्र अपना ही झण्डा फहराने का उन्माद उठ खड़ा हो। ऐसी पक्षपाती और आवेशग्रस्त देश भक्ति अब विचारशील वर्ग में नापसंद की जाती है और विश्व नागरिकता की वसुधैव कुटुम्बकम् की बात को महत्व दिया जाता है। विश्व एकता के सिद्धान्त को मान्यता मिली है और राष्ट्र संघ बना है। इस दिशा में अभी तक प्रगति के चरण धीमे रहे हैं किन्तु अब अपेक्षा यही की जानी चाहिए कि अगले ही दिनों व्यापक समस्याओं के समाधान के लिए समूचा विश्व एकता के सूत्र में आबद्ध होगा। एक राष्ट्र एक भाषा, एक संस्कृति एक धर्म अपनाकर ही उज्ज्वल भविष्य की विश्व शान्ति की स्थापना हो सकेगी। यह तथ्य मानवी विवेक ने स्वीकार कर लिया है और विभेद उभारने वाले, कट्टरता के कटघरे में मनुष्य की बुद्धि को कैद रखने वाले तत्वों को अब सामान्य ठहराया जा रहा है। धर्म और संस्कृति के क्षेत्र में भी ऐसी ही व्यापक एकता उत्पन्न करने वाला वातावरण विनिर्मित हो रहा है।

नैतिक और आध्यात्मिक मूल्यों की स्थापना के लिए ऐसे एकतावादी विवेक को जागृत करने की अब आवश्यकता है जिसमें अपने ही पक्ष को सर्वोपरि ठहराये जाने का आग्रह न हो। अपने पराये का भेद भाव न करके औचित्य, न्याय, तथ्य और विवेक को ही जब मान्यता दी जायेगी तो फिर उपयोगिता स्वीकार करने की मनःस्थिति बन जायेगी। तब जो कुछ भी तथ्य तर्क सम्मत होगा वह स्वीकार कर लिया जायेगा।

मनुष्य के अपने रहन-सहन एवं सोचने विचारने के तरीके अलग-अलग हैं जिसे सभ्यता के नाम से भी जाना जाता है। अपने नाम, रूप, धन, परिवार क्षेत्र आदि की तरह ही भाषा एवं धर्म भी लोगों को प्रिय लगता है। यह प्रियता बहुधा कट्टरता का रूप धारण कर लेती या पक्षपात के रूप में बदल जाती है और अपने को श्रेष्ठ तथा दूसरों को निकृष्ट ठहराने लगती है। पूर्वाग्रह और पक्षपात का गहरा पुट रहने से प्रायः यही भ्रम बना रहता है कि मानों सत्य अपने ही हिस्से में आया है और सभी गलत सोचने और झूठ बोलते हैं। अपना धर्म श्रेष्ठ दूसरे का निकृष्ट, अपनी जाति ऊँची दूसरे की नीची, अपनी मान्यता सच-सूदरे की झूठ ऐसा दुराग्रह यदि आरंभ से ही हो तो फिर सत्य-असत्य का निर्णय हो ही नहीं सकता। एकता के लिए न्याय और औचित्य की रक्षा के लिए आवश्यक है कि तथ्यों को ढूँढ़ने के लिए खुला मस्तिष्क रखा जाय और अपने पराये का भेद भाव न रख कर विवेक और तर्क का सहारा लेने की नीति अपनाई जाय। सत्य को प्राप्त करने का लक्ष्य इस नीति को अपनाने से ही पूरा हो सकता है।

मूर्धन्य मनीषियों, भविष्य दर्शियों का कहना है कि अगले दिनों मानवी विवेक और अधिक विकसित होगा और समूचे विश्व को एकता के सूत्र में आबद्ध करेगा। अध्यात्म पक्ष की इस संदर्भ में महती भूमिका होगी। शास्त्र उल्लेख और आप्त वचनों को ही तब पूर्ण न मानकर नये अनुसंधानों के लिए उसका द्वारा खुला रखा जायेगा ताकि उसकी प्रखरता, प्रामाणिकता और उपयोगिता को कसौटियों पर कसने के उपरान्त ही उसे सार्वभौम मान्यता मिले। विवेक दृष्टि जाग्रत होते ही धर्म-सम्प्रदाय संबंधी परस्पर विरोधी असंख्य मान्यताओं के संबंध में यह सोच उभरेगा कि सच्चाई तो एक ही हो सकती है, फिर समग्रता को समझते हुए असहमतियों को शिथिल करते हुए किसी एक निश्चय पर क्यों न पहुँचा जाय?

इतना बन पड़ने पर सम्प्रदायों की भिन्नता एकता में विकसित होकर लोक कल्याण में भली प्रकार समर्थ हो सकेगी। विग्रहों में भिन्नताओं में जो शक्ति खर्च होती है, उसका उपयोग सदुद्देश्यों के लिए बन पड़ना संभव होगा यह सब अगले दस वर्षों में होने जा रहा है।


क्षमतावान् नहीं, प्रतिभावान

वह आगन्तुकों से लिपट कर रो पड़े। अन्तर की संवेदना आँसू बन कर झरने लगी। यों वह शान्त और अपने में खोए से रहने वाले व्यक्ति थे। हाँ बच्चों से जरूर हँसते, मिलते, बोलते, खेलते थे। कहा करते थे इन सीधे, सरल, निश्छल बालकों के बीच उन्हें जितनी शान्ति अनुभव होती हे उतनी और कहीं नहीं। शायद इसी शोक ने, न शोक नहीं चिरन्तन आवश्यकता, हाँ। इसी के कारण विगत कुछ वर्षों से एक छोटे से स्कूल में बच्चों को पढ़ाने लगे थे। अन्यथा क्या कुछ नहीं था उनके पास विश्व विश्रुत वैज्ञानिक होने का लोक सम्मान। जिस राष्ट्र जिस देश में जाएँ वहीं देखने-मिलने वालों की भीड़ उमड़ पड़े। मोटर, कोठी, नौकर चाकर सभी कुछ तो था उनके पास।

पर सभी कुछ तो छोड़ दिया उनने। जब छोड़ा तो मिलने-जुलने वालों ने सनकी-पागल कहा-सामने नहीं तो चोरी-छुपे साथी वैज्ञानिकों ने कहा कि वह अपनी प्रतिभा के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। किन्तु वह इन विविध तर्कों से उलझनें कब सुलझी हैं। तर्क अर्थात् उलझाव से और अधिक उलझाव की ओर। सत्य हृदय को सम्पदा हे, भावों की पेटी में छुपी। बुद्धि तरह-तरह के प्रश्न-प्रतिप्रश्न खड़े कर महत्त्वाकाँक्षाओं के लुभावने आकर्षण दिखाकर सत्य से विरत करती हे। होश तो तब आए जब उसे ध्यान आए कि वह मनुष्य हे। कितना दुर्लभ हे यह ख्याल वह-वैज्ञानिक हे, डॉक्टर हे, प्रोफेसर हे, व्यापारी हे, राजनेता हे, प्रशासनिक अधिकारी हे, विद्वान हे, बुद्धिमान हे, कवि, लेखक क्या कुछ नहीं हे, नहीं हे तो सिर्फ मनुष्य।

वह भी मनुष्य को छोड़ इन्हीं में से एक था। उसी के एक आविष्कार ने द्वितीय विश्वयुद्ध में...... उफ......। आगन्तुक भी जापानी ही थे। जापान में ही तो ..... साकार हो उठा अतीत कल्पना के नेत्रों के सामने। एक-एक करके उभरने लगे दृश्य। एक तेज विस्फोट अनेकों सूर्य एक साथ प्रकाशित हो उठे। भीषण गर्मी, छटपटाते मनुष्य, पशु-पक्षी कुछ भी तो नहीं बचा। ध्वंस ही ध्वंस खिले चमन उजड़ गए। और उजाड़ने वाला सम्मानित हुआ, प्रशंसित हुआ। किसने किया यह सब .....एक बेअकल ने। किन्तु उसकी मंशा तो यह नहीं थी। उसने आविष्कार तो इसलिए किया था कि परमाणु ऊर्जा से जगमगा उठेंगे नगर-ग्राम लोक जीवन की आवश्यकताएँ पूरी होगी। किन्तु जीवन और जीवन की आवश्यकताओं में प्रथम कौन? हाँ यहीं तो उससे गलती हुई और तब से वह अपनी भूल का प्रायश्चित कर रहा था।

आप कुछ अस्वस्थ लग रहे है मित्र। आने वालों में से एक ने धीरे से कहा। अस्वस्थ नहीं में पूर्ण स्वस्थ हूँ। स्वस्थ होने का मतलब आखिर रोग मुक्त होना ही तो नहीं हुआ करता। स्वस्थ माने स्वस्थ अर्थात् अपनी पूरी चेतना में, पूरी प्रवक्ता में, पूरी स्फूर्ति में व्यक्ति का होना कहकर वह हलके से मुस्करा दिये।

आने वाले भाव विह्वल थे। ऐसा स्वागत, ऐसी अपूर्व आत्मीयता उन्हें जीवन में पहली बार मिली थी। वह अपने इन नवागन्तुक मित्रों को जो जापानी वैज्ञानिकों के प्रतिनिधि मण्डल के रूप में आए थे, विद्यालय घुमाना शुरू किया। उन्हें भी आश्चर्य था विश्व का सर्वोच्च वैज्ञानिक प्रयोगशाला से संन्यास ने इस छोटे से विद्यालय में क्यों अपने को अटकाए हे। क्या इसकी प्रतिभा का दुरुपयोग नहीं हो रहा। जो प्रतिभा.....

आगे कुछ कोई सोचता इसके पूर्व उन्होंने एक छोटे से उपवन की और इशारा करते हुए कहा-आइए उधर बैठेंगे। सभी वहाँ पहुँच कर एक गोल घेरे में बैठ गए। लहराते पुष्पों, उड़ती तितलियों के बीच हरी घास पर बैठते ही एक अपूर्व ताजगी आ गई। “यदि मैं आपसे आपके व्यक्तिगत जीवन के बारे में पूछूँ” प्रश्नकर्ता का स्वर शालीन था। “प्रसन्नता होगी-” कह कर वह जिज्ञासा की प्रतीक्षा करने लगे। “शायद आप का मतलब इस बाल विद्यालय में किए जा रहे अध्यापक कार्य से है।” “हाँ।” “प्रतिभा के बारे में बहुत भ्रम फैल गया है मित्र”। उन्होंने एक हल्की मुसकान के साथ अपनी बात शुरू की।” प्रतिभावान वह नहीं है जिसने कोई बड़ा पद हथिया लिया हो, जिसकी शारीरिक और बौद्धिक क्षमताएँ बढ़ी-चढ़ी हों। इसके साथ एक शर्त और यह भी जुड़ी है कि उसकी दिशा क्या है। दिशा विहीनता की स्थिति में व्यक्ति क्षमतावान् तो हो सकता है, किन्तु प्रतिभावान नहीं। अन्तर उतना ही है जितना वेग और गति में, एक दिशाहीन है दूसरा दिशायुक्त। उन्होंने भौतिक विज्ञान की भाषा में समझाया। सामर्थ्य दोनों में है, क्रियाशील भी दोनों हैं पर एक को अपने गन्तव्य का कोई पता ठिकाना नहीं, दूसरा प्रतिपल अपने गन्तव्य की ओर बढ़ रहा है।” “अरे! यह तो बहुत बड़ा अन्तर है”। बोलने वाले के स्वरों में आश्चर्य था।

“बस यही दशा आज जीवन की है। आज की स्थिति में यह उस जहाज की तरह है जिसका नेव्हीगेटर बेहोश है, बस चला जा रहा है, बता सकते हैं उसका परिणाम! जरूर कहीं न कहीं अनेकों को नष्ट कर स्वयं नष्ट हो जाएगा”। सुनने वालों में से एक का जवाब था। “ठीक कहते हैं।” उन्होंने चिन्तक की मुद्रा में कहा। हर मनुष्य सोचता है। पर क्या करना है? परिणति क्या होगी? इसके गुणों-दोषों पर विचार करने की उस फुरसत नहीं होती और परिणाम होता है, क्षमताओं का उन्मत्त नर्तन जिसमें वेग तो होता है पर दिशा नहीं। पिछले विश्वयुद्ध में यही तो हुआ, हिटलर ही क्यों-पूरी जमात की क्षमताएँ उन्मादी होकर थिरक रहीं थीं। राजनेता वैज्ञानिक सभी तो शामिल थे। उनमें से अनेकों के बारे में दुनिया प्रतिभाशाली होने का भ्रम पाले हुए है”। उनका संकेत अपनी ओर था।” तो फिर प्रतिभा”......एक अन्य की जिज्ञासा उभरी। अर्थात् वह क्षमता जिसकी दिशा सृजन की ओर हो। जिसके हर बढ़ते कदम का स्वागत मानवीय मुस्कान करे। छटपटाहट विफलता आह्लाद में बदल जाए। क्षमताएँ सभी के पास हैं, मात्रा का थोड़ा बहुत भेद भले हो। इनके वेग को सृजन की ओर बढ़ती गति में बदलकर हर कोई प्रतिभाशाली बन सकता है। किन्तु स्वयं आपकी प्रतिभा का उपयोग.......”? प्रश्नकर्ता अपने मूल विषय पर आ गया।” वह तो मैं मानवीय जीवन की प्रथम आवश्यकता की पूर्ति में कर रहा हूँ। प्रथम आवश्यकता? हाँ प्रथम आवश्यकता, जो टी. वी., टेलीफोन नहीं, स्वादिष्ट व्यंजन, सुख के सरंजाम नहीं, हैलिकाप्टर राकेटलाँचर, अणु, परमाणु आयुध भी नहीं मित्रों वह है जीवन कैसे जिया जाय, इस बात की जानकारी। समूची जिन्दगी कैसे अनेकों सद्गुणों की सुरभि बिखेरने वाला मुसकराता गुलदस्ता कैसे बने, इस बात का पता। इसके बिना सभी कुछ बन्दर के हाथ में उस्तरे जैसा है, जिसका उपयोग वह सिवा अपनी और दूसरों की नाक काटने के और कुछ नहीं करेगा। अच्छा हो बन्दर पहले नाई बने फिर उस्तरा पकड़े।” आप तो दार्शनिकों की सी बातें करते हैं”- सुनने वालों ने उल्लास भरे स्वरों में कहा। ”दार्शनिक तो नहीं, अभी तक के अनुभवों ने सोचना सिखा दिया है और अभी तक के अनुभवों के आधार पर प्रतिभा का जो स्वरूप समझ में आया है वह है प्रकाश की ओर गतिमान जीवन। उसी के अनुरूप इन बच्चों को प्रतिभाशाली बना रहा हूँ। उन्हें मनुष्य होने का शिक्षण दे रहा हूँ।”

“अर्थात् आप बन्दरों को नाई बना रहे हैं,” कहने वाले का संकेत पेड़ों पर उछल-कूद कर रहे विद्यालय के बालकों की ओर था। ठीक कह रहे हैं ताकि वे अपने उस्तरे की सहायता से मनुष्यता के चेहरे का सौंदर्य निखार सकें और वह “तमसो मा ज्योतिर्गमय” की पुकार लगाती हुई प्रकाश के युग में पहुँच सके। प्रतिभा की यथार्थता समझाने और स्वयं का जीवन तदनुरूप गढ़ने वाले यह विश्व विश्रुत वैज्ञानिक थे ‘अलबर्ट आइन्स्टीन जिनके द्वारा लिखे गए ऑटो बायोग्राफिकल नोट्स आ भी हम सबको प्रतिभावान बनने का तत्त्वदर्शन सुझाते हैं।


युग धर्म के निर्वाह में ही समझदारी

उत्सव आयोजनों, निर्माणों, दुर्घटनाओं प्रकृति प्रकोपों जैसे अवसरों पर संबंधित व्यक्ति ही नहीं, अन्य भावनाशील भी उन कार्यों में सहयोगी बनने के लिए अनायास ही दौड़ पड़ते है। इसके लिए निमंत्रण देने, बुलाने के लिए नहीं जाना पड़ता। दर्शकों तक की क्रियाशीलता उभर पड़ती हे और वे अपने योग्य काम तलाश कर स्वयं ही कुछ न कुछ करने लगते हैं। मेलों में जब सर्वत्र हलचलें दीख पड़ती है तो वहाँ जा पहुँचने वाले भी चुपचाप बैठे नहीं रहते वरन् कहाँ क्या हो रहा हे यह देखने के लिए चल तो पड़ते ही है। अरुणोदय, प्रभात बेला में भी सर्वत्र हलचलें दीख पड़ती है। पक्षी चहचहाने पुष्प खिलने और प्राणी समुदाय उदीयमान ऊर्जा से अनुप्राणित होकर अपने-अपने स्तर की क्रियाशीलता का परिचय देने लगते है। मदारी, सपेरे और बाजीगर जब कुछ कौतुक दिखाने लगते है तब भी बच्चों से लेकर बूढ़ों तक के ठट्ठ जमा हो जाते हैं और जरूरी काम छोड़कर भी उस अभिनव क्रिया−कलाप में रस लेने लगते हैं।

युग परिवर्तन की बेला भी ऐसी ही हे जिसमें बहुमुखी परिवर्तन दृष्टिगोचर होंगे। बीन बजने पर सर्प लहराने लगते है। मेघ गर्जन पर मोरों का नाचना आरम्भ हो जाता हे। बसंत उभरा देखकर तितलियाँ, भौंरों से लेकर कोयलों तक की चित्र-विचित्र हलचलें दीख पड़ती है। लगता है उनको भाव-संवेदनाएँ अवसर के अनुकूल उत्तेजित करती और कुछ न कुछ करने के लिए जुटा देती है। युद्ध के नगाड़े बजाने पर सैनिकों की भुजाएँ फड़कती है। सावन आते ही गीत-मलहारों की धूम मच जाती हे। भोर का प्रकाश आरंभ होते ही सभी की नींद खुल जाती है और नित्य कर्म से निबटकर ताजगी अनुभव करने और निर्धारित क्रिया–कलापों में जुटते सभी को देखा जाता है। जुलूस को आरंभ करने में ही कुछ जुगाड़ बिठाना पड़ता हे पीछे तो रास्ता चलते लोग साथ हो लेते है और प्रमुखों की तरह ही प्रदर्शन करने और नारे लगाने लगते है। नदी के प्रवाह में कूड़ा-करकट भी बहता हे। अन्धड़ के साथ तिनके-पते भी घोड़े की चाल दौड़ने लगते है।

युग सृजन बड़ा काम हे। इसमें जीर्ण-शीर्ण खण्डहरों को उखाड़ा और उनके स्थान पर भव्य भवन खड़ा किया जाना हे। दिवाली पर घर का कूड़ा-कचरा तो बुहारा ही जाता हे साथ ही पुताई रंगाई के अतिरिक्त सजावट के लिए भी मन हुलसता हे। युगसंधि को ऐसी ही हलचलों से भरा पूरा मानना चाहिए। प्रस्तुत दस वर्षों के उपरान्त नये दृश्यों, विधानों और क्रिया–कलापों का सिलसिला चल पड़ेगा। मुर्दों के साथ श्मशान तक भी भीड़ जाती है और बारात के आगमन पर दूल्हा को देखने के लिए भी लोग काम छोड़कर बारात पर टकटकी लगाते हैं। प्रस्तुत परिवर्तन अभूतपूर्व ही होने जा रहा हैं। इसमें आश्चर्य का गहरा पुट रहेगा। जीवित लोगों में से इस प्रकार की महान क्रान्ति कदाचित ही किसी को देखने को मिली होगी। स्थानीय और क्षेत्रीय घटनाएँ आश्चर्यजनक होती भी रहती हैं। पर जिनका प्रभाव विश्व के कोने-कोने पर पड़े और प्राणियों के चिन्तन, क्रिया–कलापों में असाधारण अन्तर आये ऐसी कुछ कल्पना तो की जा सकती है पर उतनी व्यापक उथल-पुथल का घटनाक्रम तो असंभव जैसा ही लगता है। आज जबकि हर दिशा में अवांछनीयता का बोलबाला है इस बात पर कौन भरोसा करेगा कि वह परिवर्तन आँखों को देखने को मिलेगा जिसके असंख्यों स्वप्न तो सँजोये पर कुछ बन न पहने के कारण निराश होकर ही चले आये।

अब की बार बात दूसरी है। इस भवितव्यता के पीछे सृष्टा की योजना, चेतना और प्रेरणा जो काम कर रही है। उसका संकेत पाकर तो “मूक होंहि वाचाल -पंभु चढ़हिं गिरिवर गहन” वाली उक्ति चरितार्थ होने लगती है। बीज को वृक्ष और भ्रूण को समर्थ जीवधारी बना देने वाले कौतुकी के लिए क्या कुछ असंभव हो सकता है। जो रात को दिन में बदल सकता है उसके लिए युग परिवर्तन क्यों कुछ कठिन होना चाहिए। भूतकाल में भी ऐसे परिवर्तन होते रहने की गाथाएँ और साक्षियाँ देखने सुनने को मिलती रहती हैं।

बसन्त की बेला फूल ही नहीं खिलाती, प्राणियों में ऐसा आन्तरिक उल्लास भी उभारती है जो उन्हें प्रजनन-कृत्य में संलग्न होने को विवश करता है। आन्तरिक उमंगें जब उठती हैं तब ऐसा नियोजित और घटित होने लगता है जिसे देखने वाले आश्चर्यचकित हुए बिना नहीं रहते। इन दिनों भी ऐसा ही कुछ दीख पड़े तो उसे अप्रत्याशित नहीं मानने चाहिए।

भूमिपूजन, शिलान्यास, शुभारंभ तो आदर्शनिष्ठ व लोकसेवी अपने ढंग से अपनी छोटी हैसियत के अनुरूप छोटे स्तर पर कर रहे हैं। पर वह महान प्रक्रिया इतने छोटे परिकर तक ही सीमाबद्ध होकर नहीं रहने वाली है। चिनगारी, दावानल बनते देखी जाने वाली है। बुद्ध के धर्म चक्र प्रवर्तन एवं गाँधी के सत्याग्रह का आरंभ छोटा और क्रमिक विस्तार कितना हुआ था, इसे हम सभी जानते हैं। ईसा ने शरीर त्यागने के उपरान्त भी करोड़ों को अनुयायी बना लेने की भूमिका निभाई। साम्यवाद, प्रजातंत्र के जन्मदाता भी मात्र आरंभिक प्रतिपादन ही कर सके थे। उन मान्यताओं का विस्तार तो उनने किया जिनने उन्हें अन्तर की गहराई में प्रतिष्ठित कर लिया था।

युग सृजन की प्रारंभिक भूमिका विचारशील वर्ग को दीप्तिमान करती है। प्रतिभाएँ ही अग्रिम पंक्ति में खड़ी होती हैं। साहस और पराक्रम के आधार पर ऐसे आदर्श उपस्थित करती हैं। जिनका अनुगमन करने में अनेकों के पैर सहज ही आगे बढ़ने लगें। प्रथम चरण विचार क्रान्ति है। जो चल रहा है उसमें से अधिकाँश सड़ा-गला है। इसे बुहारना हटाना तो पड़ेगा ही, साथ ही उसे प्रस्तुत-उपस्थित भी करना होगा, जिसकी समय को अनिवार्य आवश्यकता है। इसके लिए लेखनी, वाणी, कला जैसे अनेकों विचारों के प्रभावित करने वाले तब के अग्रिम मोर्चा सँभालेंगे। लोगों को सोचने के लिए बाधित करेंगे कि जो अपना लिया गया है वह न तो उचित है और न श्रेयस्कर। इसके स्थान पर वही प्रतिष्ठित किया जाना चाहिए जो यथार्थता, उपयोगिता, दूरदर्शिता और आदर्शवादिता के साथ जुड़ा हुआ है।

अवांछनीय प्रचलनों की आदतों को छोड़े बिना कोई गति नहीं। नशेबाजी चाहे कितनी ही पुरानी क्यों न हो उसे छोड़े बिना कोई गति नहीं हैं आलस्य और प्रसाद का उपभोग भले ही चिरकाल से स्वभाव में सम्मिलित रहता चला आया हो पर जब प्रगति की आवश्यकता अनुभव हो तो उन्हें छोड़ना ही पड़ेगा। लोगों में लालच-संग्रह की, बड़प्पन-प्रदर्शन के लिए आतुर अहंकार की प्रवृत्तियाँ स्वभाव का अंग बनकर रह रही हैं। थोड़े लोगों के कुटुम्ब का स्वार्थ साध नहीं समस्त विश्व के हित अधिक बटोरने और उसका अपव्यय दुरुपयोग करके बिखेरते रहने की आदतें स्वभाव में घुस पड़ी है। इन्हें हटाये बिना किसी को सच्चे अर्थों में मनुष्य कहला सकने का अवसर मिलता ही नहीं। मर्यादाओं का पालन और वर्जनाओं का संयम रखकर ही कोई इस योग्य बन सकता है कि विश्व वसुधा की सेवा साधना में समर्थ हो सके। औसत नागरिक स्तर के निर्वाह में संतोष करने के उपरान्त ही ऐसा कुछ बन पड़ता है जिसे युग देवता के चरणों में समर्पित किया जा सके और वातावरण को नन्दन वन जैसा सुरभित बनाया जा सके।

जिनके पास अतिरिक्त सामर्थ्य है उनके ऊपर अतिरिक्त जिम्मेदारियाँ भी आती हैं और उनका उपयोग युग परिवर्तन जैसे महान प्रयोजनों में बन पड़ने की आशा अपेक्षा तो की ही जाती है। जिनके पास भाव संवेदना का कोई कहने लायक अंश विद्यमान होगा वे अपनी विचार शक्ति का भरपूर उपयोग दिग्भ्रान्तों को सही रास्ते पर लगाने के लिये करेगा। वह कैसा ज्ञानी अपने बुद्धि कौशल का उपयोग मात्र धन सम्पदा एकत्रित करने में ही लगता रहे। इसके लिए अनुचित मार्ग तक अपनाये और दूसरों को भी अपने भटकावे में सहयोगी बनाये। मनीषियों का प्रथम वर्ग है जिसे लोक चेतना की उत्कृष्टता की दिशा में उछालने के लिए प्राणपण से प्रयत्न करना चाहिए। विचार क्रान्ति का अधिक दायित्व उन्हीं के कंधों पर है। युग साहित्य का सृजन, मार्गदर्शन, विचार विनिमय जैसे कृत्य आदि अपना उदाहरण प्रस्तुत करते हुए किये जा सकें तो उसका प्रतिफल उच्चस्तरीय हुए बिना रह ही नहीं सकता। प्रज्ञा पुत्रों का प्रथम और प्रमुख यही कार्य है कि वे नवयुग के अनुरूप दृष्टिकोण, भावसंवेदना और साहस उत्पन्न करने में कमी न रखें। तद्नुरूप वातावरण बनाने में प्राणपण से जुट पड़ें।

जिनके पास पैसा है वे उसे विलास के लिए संग्रह के लिए उत्तराधिकारियों के लिए और ठाटबाट के लिए खर्च न करे। वरन् उन पुण्य-प्रयोजनों के लिये लगायें जो गिरों को उठाने और उठों को उछालने में अपनी सार्थकता सिद्ध करें।

जो जा रहा है उसकी पूँछ पकड़ने से कुछ लाभ नहीं। जो आ रहा है और स्थिर रहने वाला है उसी की आरती उतारना दूरदर्शिता है। पिछले दिनों आसुरी सभ्यता का बोलबाला रहा है। उसी ने तथाकथित समर्थों को बुरी तरह भ्रमाया और नचाया है। इस कुचक्र से उन्होंने लाभ भी उठाया है भले ही उसने उन्हें तथा सहभागियों को सड़ा गला कर बर्बाद कर दिया हो। यह ग्रहण काल जैसे अनर्थ अब बिदा होने जा रहा है। उसका साथ समय रहते छोड़ देने में भलाई है। भलाई इसमें भी है कि जिस शालीनता के प्रतिष्ठित होने का समय आ रहा है उसके अनुरूप अपनी रीति-नीति को परिवर्तित कर लिया जाय। इस परिवर्तित में प्रतिभाओं को अग्रणी बनना चाहिए। प्रचलन से विरत होकर यदि प्रगतिशीलता अपनाने में कुछ घाटा दीखता हो तो उसको वरण नहीं करनी चाहिए। समय के अनुरूप बदलने में जो उत्साह का परिचय देते है उनका अग्रगमन हर दृष्टि से हर किसी के लिये श्रेयस्कर ही सिद्ध होता है। भोर होने से पहले बाँग लगाने वाला मुर्गा अकिंचन पक्षी होते हुए भी सर्वत्र चर्चा का विषय रहता है और अपनी दूरदर्शिता के कारण सराहा भी जाता है।

इन दिनों पाश्चात्य भौतिकवाद हर किसी के सिर पर चढ़ा है। विज्ञान क्षेत्र में उसने जो उपलब्धियाँ हस्तगत की है उसी के सहारे उसकी साख जम गई है और समर्थों के अनुकरण की परम्परा बन गई है। यह इन्द्रधनुषी आकर्षण है तो बहुत, पर नियति के साथ जुड़ा हुआ न होने से उनमें स्थायित्व नहीं है। कुकुरमुत्ते बरसात के दिनों उग तो सड़े कचरे में भी जाते है पर उनकी छायादार विशालता का लाभ किसी ने नहीं उठाया। समझा जाना चाहिए कि इन दिनों जिस प्रपंच का बोलबाला ह। वह बरसाती नदी की तरह अपना उफान देर तक बनाये न रह सकेगा। ऐसे नाले कुछ ही दिनों में तली तक पहुँच कर सुख जाते है। अवांछनीयता और कुप्रचलनों की तूती देर तक नहीं बोलती रह सकती।

सात्विकता और शालीनता में ही स्थिरता रही है। देव पक्ष ही स्थिर रहता और पूजनीय बनता है। भूत पलीत तो थोड़े समय उपद्रव खड़ा करते और सदा के लिए समाप्त हो जाते है। प्रपंचों में ओत-प्रोत चतुरता गुब्बारे की तरह कुछ ही समय तक फूली हुई और आकाश में उड़ती हुई दीख सकती है पर वह स्वरूप स्थिर कहाँ रह सकता है। पानी के बबूले की उछल-कूद कुछ ही क्षण रहती है। टिकाऊपन तो हिम प्रदेश से झरने वालों झरनों में ही होता है। वे स्वयं शोभायमान लगते और असंख्यों की प्यास बुझाने की क्षमता धारण किये रहते हैं। समझना चाहिए कि देव स्तर की शालीनता को अपनाने, तदनुरूप ढलने और ढालने में ही कल्याण है। विचारवानों को समय रहते अपनी गतिविधियों में ऐसा परिवर्तित कर लेना चाहिए जिसमें लाभान्वित रहने और रखने के उभयपक्षीय प्रयोजन सिद्ध होते रहें। उपलब्ध क्षमताओं को नव सृजन के पुण्य प्रयोजन के लिए नियोजित करना ही अपने समय की सबसे बड़ी बुद्धिमानी है। चूक जाने पर तो पश्चाताप ही हाथ रहेगा और घाटा उठाने का परिताप भी भुगतान पड़ेगा।


अपनी मर्जी की बात (Kahani)

चीन का एक सेनापति एक सन्त के पास स्वर्ग नरक की व्याख्या पूछने आया। सन्त ने मौखिक उत्तर से काम न बनता देख तो उसे प्रत्यक्ष दिखाने का उपाय सोचा।

सन्त ने सेनापति से पूछा-आप कौन है”? उत्तर मिला “सेनापति”। इस पर सन्त हँस पड़े और बोले -”लगते तो भिखारी से हो?” इस पर सेनापति को क्रोध आ गया और वह म्यान तलवार खींचने लगा। सन्त ने कहा -”यह तो लकड़ी की सी मालूम पड़ती है। तुम्हारी कलाइयाँ में इतना बल भी है जो मेरी गरदन काट सको।”

इस पर सेनापति आपे से बाहर हो गया और गाली देते हुए उन्हें मारने दौड़ा। सन्त इस बार फिर सौम्य हँसी हँसे और बोले-देखा यही नरक है, जिसमें तुम फँस गये।”

सेनापति ने विचार किया तो उसे लज्जा आई और सन्त से क्षमा माँगने लगा अब उसको शान्ति थी। सन्त से क्षमा माँगने लगा अब उसको शान्ति थी। सन्त ने बताया-देखा यही स्वर्ग है। क्रोध में नरक और शान्ति में स्वर्ग है। इसमें से किसी एक को चुन लेना हर मनुष्य की अपनी मर्जी की बात है।”


मधुसंचय


विसर्जन-विलय


विसर्जन-विलय (Kavita)

आप क्या मिल गए भ्रम परे हो गए, विश्व तक दृष्टि के दायरे हो गए।

हम स्वयं के सुरों पर बहुत मुग्ध थे, किन्तु अब वे सभी बेसुरे हो गए।

हम जिन्हें शक्तिशाली समझते रहे, अब निरर्थक वही आसरे हो गए।

यूँ उतारे परत - पद - परत आवरण, भाव- चिन्तन हमारे खेर हो गए।

आपने इस तरह कर दिया रिक्त मन, रीत कर हम भरे के भरे हो गए।

लोभ-लिप्सा स्वयं लुप्त होने लगी, द्वेष-दानव सभी अधमरे हो गए।

आपकी स्नेह-बौछार पाकर सुखद, शुष्क अंकुर सभी फिर हरे हो गए।

आपकी जो कृपा-दृष्टि हमको मिली, देख लो हम अरे क्या से क्या हो गए।

आपने इस तरह पंक्ति पहली पढ़ी, हम सभी गीत के अन्तरे हो गए।

-शचीन्द्र भटनागर


“तपस्वी को समर्पण”


तपस्वी को समर्पण (Kavita)

जीवन करें समर्पित उनको। जिनने तपा लिया जीवन को॥

क्योंकि तपस्वी कम होते हैं। पर पीड़ा से नम होते हैं॥

पीड़ा सहकर भी बिन कारण। परपीड़ा का करें निवारण॥

कहते विषपायी-शिव जिनको। जिनने तपा लिया जीवन को।।

जब उनका संबल मिलता है। जनसेवा का बल मिलता है॥

जीवन धन्य बना देते हैं। श्रेय अनन्य दिला देते हैं॥

कहते व्यक्ति-सृजेता इनको। जिनने तपा लिया जीवन को।।

तप उनका सूरज बन जाता। जन मानस का तम कट जाता॥

लोभ-मोह के बन्धन कटते। घृणा-द्वेष के बादल छटते॥

निर्मल कर देते वे मन को। जिनने तपा लिया जीवन को।।

वे सुषुप्त - देवत्व जगाते। मनुज-धरा को स्वर्ग बनाते॥

वसुधा फिर कुटुम्ब हो जाती। जन मन में करुणा छलकती

स्रष्टा करें और फिर जिनको। जिनने तपा लिया जीवन को।।

-मंगल विजय


कुरीतियों की बेड़ी जिन्हें जकड़ न सकी

लगा जैसे कानों में पिघला शीशा उड़ेल दिया गया हो। वह तो स्वयं में शोकाकुल थी। व्यथा हड्डियों तक को बेधे जा रही थी। ऊपर से यह...जले पर नमक-मिर्च का चूर्ण, पके फोड़े पर अंगारे का स्पर्श। संवाद पहुँचाने वाला चला गया था। उसकी पदचापों की ध्वनि क्रमशः दूर होती गई। उसकी गलती भी क्या है? करे भी क्या? हरकारा जो ठहरा....बेचारा......। इस सब के पीछे तो उनका हाथ है जो अपने हैं। जिन्हें उसने इन्हीं हाथों से कभी आश्रय दिया था, अनेकानेक दुरावस्थाओं से रक्षा की थी। अब यही...।

उसने डबडबाई आँखों से पास खड़ी सहेली की ओर देखा। संग्रामों की भयानकता जिसके रणचण्डी स्वरूप को देख थरथरा उठती थी। वनराज की दिल दहला देने वाली दहाड़ को शान्त करने के लिए जिसका एक बाण ही पर्याप्त था वही अब...। महल की दीवारें सहम गई। भगवान के बनाये इस संसार को, मनुष्य ने जाने कितनी छोटी-बड़ी दीवारें तैयार करके सैकड़ों- हजारों कारागारों में बदल डाला है। उन दोनों ने महल की खिड़की से बाहर झाँकने की कोशिश की। बाहर तो जैसे रुद्र का ताण्डव ही मचा हुआ था। बिजली की चमक, मूसलाधार वर्षा, वज्रपात और हवा के झोंके प्रबल हो उठे थे। हर झोंके पर ऐसा लगता जैसे हजारों काले नाग एक साथ फुफकार उठे हों। ओह! सचमुच काल रात्रि बन गई है, आज की निशा। बौछार से उन दोनों के चेहरे भग गए, फानूस की लौ काँप उठी। सभी चीजें उलट-पलट गई।

“तो क्या....तो क्या?” सखी ने खिड़की बन्द करते हुए उनसे पूछना चाहा। कितनी विवशता की अर्गलाओं में जकड़ी है नारी। जन साधारण से लेकर महारानी तक हरेक को कुरीतियों के वृश्चिक दंश उत्पीड़ित किए बिना नहीं चूकते। यह भी कुरीति ही तो है। कुरीति नहीं तो और क्या? मृतक शरीर के साथ जीवित कुसुम कोमल सी देह, सौंदर्य का पुँज आग की लपटों में.....। भयवश आँखें मीच लीं।

कुछ पूछ रही थी, रामचेरी...? सखी के चेहरे पर हो रहे भावान्तर को पढ़ते हुए उनने पूछा। कैसा संयोग दोनों लगभग एक साथ जन्मी। खेल-कूद पढ़ाई-लिखाई यहाँ तक विवाह भी लगभग एक ही समय। संक्षेप में कहें तो जन्म से लेकर आज तक निभता आ रहा है यह सहचरत्व। अनेकों अवसरों पर उन्होंने अपना कष्ट भूल कर उसके आँसुओं को पोंछा है। “क्या आप... आप भी औरों की तरह सती....?” आगे कुछ कह न सकी। वाणी रुद्ध हो गई।

“नहीं! मुझे जीना है। स्वयं के लिए नहीं महाराज के सदुद्देश्यों के लिए। और मेरे विचार से पति के अधूरे कार्य को पूरा करने के लिए अपने को तिल-तिल गलाना ही सच्च सतीत्व है। जल मरना-पलायन भीरुता के अतिरिक्त और क्या है?” उनकी आँखों में चमक और चेहरे पर शौर्य की झलक उभर उठी। कुछ ठहर कर उन्होंने पास खड़ी रामचेरी की ओर देखते हुए कहा- “कैसा विचित्र है अपना देश भी? एक ओर ऊँचे दार्शनिक और बौद्धिक सिद्धान्तों की चर्चा, दूसरी ओर मूढ़ताओं, अन्धविश्वासों, कुरीतियों, चित्र-विचित्र परम्पराओं का अम्बार।”

“आपकी बात सौ फीसदी सच है महारानी। उनके इस कथन को सुन उसके चेहरे पर उल्लास की रेखाएँ उभर आयी थी। अपने यहाँ के स्त्री हो या पुरुष, बालक हो अथवा बूढ़े सबकी अन्धविश्वासों पर जितनी अधिक आस्था है, उतनी शायद भगवान पर भी नहीं। कहते हुए उसने दृष्टि इधर-उधर घुमाई। हवा का शोर थमने लगा था, पर बूँदा-बाँदी अभी भी थी। बाहर के गलियारे में कुछ पदचाप सुनाई दे रहे थे। आवाजें क्रमशः निकट आती गई। द्वार पर आहट हुई। रामचेरी ने उठकर द्वार खोला। एक-एक करके तीन व्यक्तियों ने प्रवेश किया। महारानी ने पहिचाना चन्द्रसिंह उनका देवर, अधारसिंह राज्य का प्रधानमंत्री और मोहनदास राज्य का सेनापति।

“भाभी रानी जी, भगवान और भाग्य पर काबू किसका है।” चन्द्रसिंह ने धीरे से बात शुरू की। मैंने संवाद भेजा था। अपने घराने में सती का चलन चला आया है फिर जैसा आप उचित समझे।” “मैं सती नहीं होऊँगी, चन्द्र!” उन्होंने तनिक रूखे स्वर में कहा! “तुम इस समय की व्यवस्था देखा।”

पर कुल की रीति....। “रीति या कुरीति?” वाणी में तनिक व्यंग था। भारतीय दर्शन, नीतिशास्त्र, आचारशास्त्र, आस्तिकता, कर्मफल, पुण्यपरमार्थ कितनी ही अच्छी चीजें हैं अपने धर्म में। पर इन्हें तो हमने तिरस्कृत कर रखा है, मानने अपनाने की सोचते भी नहीं। सिर्फ एक कुरीतियाँ ही बची हैं, जिन्हें चिपकाए रहने में ही हमने अपनी शान मान रखी है। आपका क्या विचार है दीवान जी, रावराजा........। उन्होंने सामने बड़े दोनों अधिकारियों की ओर दृष्टि फिराई।

“राज्य और प्रशासन की दृष्टि से आपका निर्णय सम सामयिक है।” चन्द्रसिंह की बोलती बन्द हो गई।

शवदाह की तैयारी हुई। बड़ी धूमधाम और पूरी परिपाटी के साथ सब सम्पन्न हुआ। शुद्धि और तेरहवीं के बाद राजकाज की बात चली। यों वीरनारायण का तिलक तो एक वर्ष बाद होना था। अधारसिंह और मान पण्डित ने देखा कि राज्य की नाव भँवर में है। ऐसे में पतवार कौन सँभाले। इस कारण वीरनारायण का राजतिलक तुरन्त सम्पन्न हुआ। पर वह तो छोटा है, व्यवस्था कौन देखेगा?

काम-काज किस तरह से चल पाएगा। इसकी चर्चा हुई। बात-चीत के क्रम में उन्होंने फिर स्पष्ट किया- “मैं पर्दा-वर्दा बिल्कुल नहीं करूंगी, हाथी की सवारी के समय झरप नहीं डालूँगी, दरबार में मुँह खोलकर बैठूँगी, जब आवश्यकता होगी पुरुषों का वेश धारण करूंगी।”

चन्द्रसिंह बौखला गया। उसने रोष भरे स्वर में प्रतिवाद किया......भाभी रानी लगता है आपने तो कुल की सारी रीतियों को एक-एक करके नष्ट करने की शपथ उठा रखी है। आपके इस तरह के रहन-सहन से हमारे वंश को लाँछन लगेगा।

“फिर भूल गए चन्द्र, रीतियों को नष्ट करने की शपथ नहीं-कुरीतियों का सत्यानाश करने की। उन्होंने हलकी मुसकान के साथ कहा- “मेरा जन्म ही कुरीतियों को नष्ट करने के लिए हुआ है। बचपन में प्रचलित कथाओं के विरुद्ध पढ़ाई की। शास्त्र स्मृतियों का ज्ञान प्राप्त किया। अस्त्र संचालन, सैन्य संगठन व नियंत्रण आदि में कुशलता प्राप्त की। विवाह का समय आने पर “उपजातियाँ टूटू” इस आदर्श के अनुसार चन्देल होकर भी राजगोंड वंश में जन्मे महाराज से शादी हुई। महाराज के न रहने पर सती प्रथा को तोड़ा और अब पर्दा प्रथा, आगे न जाने कितनी और ...........उनकी मुसकराहट चन्द्रसिंह के कलेजे में आग भड़काती जा रही थी। पर वह कर भी क्या सकता था, महारानी अपने कुशल प्रशासन, जनहित के कार्यों शौर्य और अद्भुत सैन्य प्रवीणता के कारण समस्त जन समुदाय के दिलों में देवी बनकर प्रतिष्ठित हो चुकी थी।

सुनो चन्द्र! जहाँ तक लाँछन का प्रश्न है, यह क्रूर कर्मी के कारण और जनसमूह को सताने के कारण लगता है। पर्दा न करने से नहीं लगता लाँछन।

“मुझसे नहीं सहा जाएगा”। मैं महाराज संग्रामशाह का बेटा हूँ। “सहना पड़ेगा कुमार।” राज पुरोहित मान पण्डित ने उसे डपटते हुए कहा- “परिवार में समाज में इन कुरीतियों के प्रवेश के कारण ही हम भीतर ही भीतर खोखले हो गए और उनका प्रायश्चित खून के आँसुओं से करना पड़ा है। देख नहीं रहे आक्रमणों की श्रृंखला! कितने लज्जाप्रद अपमानों, रोमांचकारी अत्याचारों से हताहत होना पड़ा है देश को। इसका कारण शौर्य का अभाव नहीं। कुरीतिजन्य आन्तरिक दुर्बलता ही रही है।”

सब सहमे हुए सुन रहे थे राजपुरोहित का वक्तव्य। वह कह रहे थे-किसमें है वह योग्यता जो महारानी का स्थान ले सके। वह अनोखी प्रतिभा, अपरिमित प्रतिभा, असह्य शौर्य कहाँ है? इस सबको तुम पर्दे की कारा में कैद करना चाहते हो? नहीं यह न होगा। किसी को मेरी बात अमान्य हो तो कहे? राज दरबार में सन्नाटा छा गया। कोई कुछ बोल न सका-सभी को आचार्य के कथन में बधार्धता की झलक दीख रही थी। “तो दरबार सहमत है।” “हाँ! हमें महारानी का नेतृत्व स्वीकार है।” शत सहस्र कण्ठस्वर एक साथ गूँज उठे। कुरीतियों को तोड़ने के लिए जन्मी यह अद्भुत नारी थी- “महारानी दुर्गावती”, जिनके शौर्य के किस्से आज भी गोंडवाना मात्र में नहीं, अपितु समूचे भारत में गाए जाते हैं।


शतायु जीवन का मर्म

लम्बी आयु जीने का रहस्य क्या है? क्या आज भी प्राचीन काल की तरह शताधिक वर्ष तक स्वस्थ और निरोगी जीवन जिया जा सकता है? अक्सर आये दिन इस प्रकार के प्रश्न अनेकों के मन में पानी के बबूले की तरह उठते और मिटते रहते हैं। ऐसे लोगों से एक ही बात कही जा सकती है कि यदि संयम पूर्ण जीवन जिया जाय, तो कोई कारण नहीं कि आज भी व्यक्ति प्राचीन काल की तरह शतायु को प्राप्त न कर सके। यह संभावना तब और भी प्रबल और परिपुष्ट को जाती है, जब आज भी विश्व के कई देशों के कई क्षेत्रों में ऐसे लोग देखे जाते हैं। रूस के अजर बेजान और कजाकिस्तान प्रान्त ऐसे ही हैं, जहाँ एक नहीं अधिकाँश निवासी सौ वर्ष की उम्र तक जीते हैं। अब एक ऐसे ही गाँव का पता अमेरिका में चला है, जहाँ की अधिकाँश आबादी सौ वर्ष की आयु तक जीती है।

मिग्यूएल कार्पियो इसी छोटे से किन्तु प्रसिद्ध गाँव विलकेबम्बा के निवासी हैं। जिसका संबंध बाह्य दुनिया से मात्र पगडंडियों से है। न कोई आमोद-प्रमोद के साधन, न ही आवागमन की विशेष सुविधा। 1979 की जनगणना से पता चला कि उस गाँव में 891 लोग हैं। इनमें 19 व्यक्ति शताब्दी पार कर चुके हैं एवं लगभग इनमें से 1/5 प्रतिशत लोग 65 से अधिक उम्र के हैं। सबसे अधिक उम्र तक जीने वाले 142 वर्षीय जोस डेविड की मृत्यु 1973 में हुई। उन्हीं के मित्र कार्पियो वहाँ के पुराने निवासी हैं।

कार्पियो स्वयं सौ वर्ष पूरे करने वाले माता-पिता के पुत्र हैं। यह आश्चर्य की बात नहीं कि वे अपने इस लम्बे जीवन काल में कभी भी डॉक्टर के पास नहीं गए। “डॉक्टर किसे कहते हैं, हमें यह नहीं मालूम। हम न तो इन्फ्लुएञ्जा, उच्च रक्तचाप, हृदय रोग एवं कैन्सर से परिचित हैं न किसी मानसिक परेशानी से।” पूछने पर वे बड़े सहज भाव से उत्तर देते। वहाँ के निवासियों का जीवन क्रम प्राचीन काल के ऋषि मुनियों जैसा है। छोटे-छोटे झोंपड़े में वे निवास करते हैं, जहाँ न तो सुविधा साधन हैं न विद्युत व्यवस्था। भोगवादी सभ्यता को चुनौती देते हुए यह छोटा सा गाँव स्पष्ट करता है कि अक्षुण्ण स्वास्थ्य का लाभ भोग-विलास के साधनों के बीच रहने से नहीं मिलता, अपितु इसके लिए औसत नागरिक स्तर का निर्वाह पर्याप्त है। चिकित्सा सुविधा वहाँ अभी भी अनुपलब्ध है।

विशेषज्ञों का कहना है कि लम्बी आयु का संबंध वहाँ के वातावरण से भी हो सकता है, जहाँ की जलवायु में प्रदूषण नहीं हो। पास में बहने वाली नदी स्वच्छ जल लेकर आती है। मौसम वहाँ का हमेशा एक लेकर आती है। मौसम वहाँ का हमेशा एक समान बना रहता है, न ज्यादा ठंड, न गरम। तापक्रम 40 डिग्री फारेनहाइट बना रहता है। इसे स्वीकार करते हुए कार्पियो कहते हैं कि- “प्रधान कारण यह नहीं है। प्रमुखता तो उस रहन-सहन को मिलनी चाहिए, जिसमें किसी भी क्षेत्र में किसी भी प्रकार का प्रमाद अथवा असंयम नहीं बरता जाता।”

46 वर्षीय पत्रकार एवं विलकेबम्बा में जन्म लेने वाले जार्च विवेन्कों का कहना है कि लम्बी आयु का रहस्य चिन्ता रहित जीवनक्रम है। हम सभी जल्दी सोते एवं जल्दी उठते हैं, दिन भर सक्रियता बनी रहती है। न कहीं कोई कठिनाई, न चिन्ता, न तनाव और न ही कोई उद्विग्नता। हृदय रोग संबंधी संगठन के अध्यक्ष जीम वाकर के अनुसार इस गाँव के लोग सदा तनाव रहित जीवन जीते हैं। इसीलिए हृदय संबंधी किसी भी रोग से सर्वथा मुक्त हैं। खान-पान में भी सात्विकता का समावेश-एक प्रमुख कार हो सकता है।

कार्पियो एवं वहाँ के निवासियों ने स्वीकार किया है कि लम्बी आयु प्राप्त करने में खान-पान का महत्वपूर्ण स्थान है। कार्पियो एवं वहाँ के अन्य निवासी शुद्ध शाकाहारी भोजन लेते हैं, जिनमें फल, सब्जी, पत्ते एवं शक्कर के स्थान पर गुड़ का सेवन प्रमुख होता है। तले भुने एवं मसालेदार व्यंजनों का तो प्रचलन यहाँ है ही नहीं। प्रकृति के अनुकूल आहार-विहार ने ही उन्हें लम्बी आयु प्रदान की है। कठोर श्रम करने एवं भूख लगने पर खाने की नीति को वहाँ के निवासी अपने जीवनक्रम में सम्मिलित किये हुए हैं।

लम्बी आयु जीने की आकांक्षा रखने वालों को सुझाव देते हुए कार्पियो कहते हैं- “जिन्हें लम्बी आयु जीना है, तो औसत नागरिक स्तर का जीवनक्रम अपनाये एवं भौतिकता की आकर्षक लगने वाली मृगतृष्णा से दूर रहें, सामर्थ्य भर श्रम करें, सात्विक भोजन ग्रहण करें तथा मानसिक उद्विग्नता, चिन्ता, भय, क्लेश आदि से सर्वथा मुक्त रहें।”


साधक का सात्विक आहार-विहार

आध्यात्मिक साधना के दिनों में उपासना परक जो नियम-उपनियम बनाये बताये गये हैं, वे तो श्रद्धापूर्वक समग्र अनुशासन के साथ पूरे करने ही चाहिए, पर साथ ही एक बात यह भी भूलनी नहीं चाहिए कि उन दिनों आहार-विहार की सात्विकता का अनुबंध भी ठीक तरह पालन करना चाहिए। अस्त-व्यस्त जीवनचर्या अपनाते हुए पूजा-उपासना के कुछ नियम पालन कर लेने भर से साधना समग्र रूप से सफल नहीं हो सकती। जिस प्रकार पूजा काल में शरीर को शुद्ध करना आवश्यक है, धुले कपड़े ही पहनने चाहिए, उसी प्रकार यह भी आवश्यक है कि आहार-विहार की पवित्रता में, व्यतिरेक न होने दिया जाय।

उक्ति प्रसिद्ध है कि “जैसा खाये अन्न, वैसा बने मन।” मन भी शरीर का ही एक भाग है। मस्तिष्क को ही ग्यारहवीं इन्द्रिय माना गया है। आहार से ही शरीर के दृश्यमान और अदृश्य अवयव विनिर्मित होते हैं। आहार में मात्र दृश्य शरीर को ही परिपुष्ट करने की क्षमता नहीं, वरन् उससे सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर भी प्रभावित होते हैं। मन का प्रवाह भी उसी दिशा में बहने लगता है। मद्य-माँस जैसे अभक्ष्य उदरस्थ करने पर उनका तामसिक प्रभाव अन्तःचेतना पर भी पड़े बिना नहीं रहता। शरीर से कोई व्यक्ति मोटा-तगड़ा या बलिष्ठ बन जाय, तो भी यह आशा नहीं करनी चाहिए कि उसका मानसिक स्तर भी सात्विक बना रहेगा, आत्मबल बढ़ेगा और अन्तःकरण में सात्विक भावनाएँ उठेंगी। आहार का स्थूल प्रभाव अंग-अवयवों पर पड़ता है, पर उसकी सूक्ष्म शक्ति मनुष्य के अन्तराल तक जा पहुँचती है और अपना समुचित प्रभाव छोड़ती है। इसलिए साधना के दिनों में उपवास का नियम है। फलाहार दूध, छाछ पर रहकर साधक अपना साधनाक्रम पूरा करते हैं। इतना न बन पड़े, तो रोटी-पूड़ी आदि न खाकर दलिया खिचड़ी जैसे अमृताशय आधे समय खाकर काम चलाना पड़ता है। कम से कम भोजन किया जाय और दूसरे समय उपवास रखा जाय। इससे पेट को विश्राम मिलने से स्वास्थ्य लाभ भी होता है और मनःक्षेत्र में सात्विकता बनी रहने से साधना की सफलता निश्चय रहती है।

आहार के बाद जीवन निर्वाह का दूसरा चरण है विहार। विहार अर्थ, रहन-सहन इसे इन्द्रिय संयम भी कह सकते हैं। इन्द्रियों में कामेन्द्रियों को अधिक प्रबल माना जाता है। साधना काल में ब्रह्मचर्य पालन का प्रचलन है। शारीरिक काम सेवन की तरह ही कामुक चिन्तन का भी मानसिक पवित्रता पर बुरा असर पड़ता है। उन दिनों नर-नारी के बीच माता, भगिनी, पुत्री जैसे पवित्र संबंधों की ही कल्पना करनी चाहिए। ऐसा साहित्य नहीं पढ़ना चाहिए, ऐसे खेल तमाशे नहीं देखने चाहिए, जो मन में कामुकता के विचार भड़काते हों।

चटोरेपन में सम्मिलित हैं मसाले मिठाई पकवान साधनाकाल में विशेष रूप से निषेध है। सात्विक जीवन जीना हो और आत्मबल बढ़ाना हो, तो आहार ही नहीं, विहार में भी सात्विकता का अधिकाधिक समावेश करना चाहिए।

अन्य इन्द्रियाँ भी विचारों को प्रभावित करती हैं, मन पर अपना प्रभाव छोड़ती हैं। इसलिए इनसे अश्लील बातें, निन्दा, चुगली, छल, कुटिलता जैसे मानसिक अनाचारों को न तो जीभ द्वारा प्रस्तुत होने देना चाहिए और न उन्हें सुनना ही चाहिए। जहाँ ऐसे प्रसंग चल रहे हों, वहाँ से उठ कर अन्यत्र ही चले जाना उचित है। आँखों से अश्लील आचरण के संबंध में उत्तेजना प्रदान करने वाले दृश्यों से अपने को बचाना चाहिए। अवांछनीय प्रसंगों से स्वयं को दूर ही रखना चाहिए।

अनाचारी चिन्तन और क्रिया−कलाप में निरत रहने वाले व्यक्ति जब भी इकट्ठे होते हैं, अपने स्तर का वातावरण बनाते हैं। जब तक उनको कड़े विरोध द्वारा निरस्त न किया जाय, विरोध करके दूर न किया जाये, तब तक अवांछनीय प्रसंग अपना गहरा प्रभाव छोड़ने से रुकते नहीं। शरीर से भले ही अपना बचाव कर लिया जय पर जो लो वैसा अपना संपर्क किसी प्रकार साधना भी उन लोगों के लिए हानिकर सिद्ध होता है, जो सात्विकता बनाये रहना चाहते और साधनारत होकर आत्मकल्याण का प्रयोजन साधने के इच्छुक हैं।


विद्या विस्तार-आज की सर्वोपरि सेवा साधना

प्रतिभा परिष्कार मानवीय प्रगति और प्रसन्नता का एक मात्र आधार है। संस्कारवान् आत्मायें ही संवेदना अनुभव करतीं और पीड़ित मानवता के लिए अग्रसर होती हैं। इस युग में सब कुछ है पर ऐसी परिष्कृत प्रतिभावान सम्पन्न आत्माओं का सर्वत्र अभाव दिखायी दे रहा है। इस उपार्जन को परम पूज्य गुरुदेव ने अपनी अन्तिम आकांक्षा कहकर अपनी दूसरी पीढ़ी को यह दायित्व सौंपकर महाप्रयाण किया है। यह हमारे लिए एक चुनौती है कि हम उसे किस प्रकार पूरा करें?

प्रतिभाओं के उपार्जन के लिए एक ही धरातल है-विद्या विस्तार”। विद्या ददाति विनयम्, विनया ददाति पात्रताम्, पात्रता का विकास विद्या से होता है। विद्या अर्थात् शिक्षा और जीवन दर्शन का समन्वय। एकांगी शिक्षा से जीवन की समस्याओं का समाधान नहीं होता। सद्ज्ञान से जीवात्माएँ अपने अन्तःकरण में विराट् विश्वात्मा का बोध करती है। सद्ज्ञान जब सत्कर्म में परिणत होता है, तब सर्वत्र सुख-समृद्धि का सागर लहराता दिखाई देता है। पीड़ा और पतन के वर्तमान दावानल से मनुष्य जाति को उबारने और अनास्था संकट के सर्वनाश से बचाने का एक ही रास्ता है-ज्ञान यज्ञ” मनुष्य की समझदारी का विकास, उसके अज्ञान को मिटाना और लघुता में ही विराट् का बोध कराना। प्राचीनकाल का सामान्य व्यक्ति भी महान मानवीय गरिमा से ओत-प्रोत इसी आधार पर हुआ था कि उस समय सर्वत्र विद्या विस्तार का ही बोलबाला था। ज्ञान में ही लोग जन्मते और ज्ञान में विकसित होकर अन्त में विराट् ज्ञान को ही समर्पित हो जाते थे। स्वर्ग और मुक्ति की संज्ञा भी इसी ब्राह्मी स्थिति को बताया गया है।

इस मिशन के लिए जो पहला और लक्ष्य भी यही है। परम पूज्य गुरुदेव ने सारे जीवन भर ज्ञान की ही आराधना की और जन-जन तक ज्ञानामृत ही बाँटा। यह श्रद्धांजलि वर्ष है। इस वर्ष हमें अपनी सारी शक्ति इस महान प्रयोजन में झोंक देने से ही इस समारोह की सार्थकता है और परम पूज्य गुरुदेव के प्रति श्रद्धांजलि की सच्ची अभिव्यक्ति भी।

अखण्ड ज्योति का व्यापक विस्तार

भगीरथ ने राह बनायी और पतित पावनी गंगा युगों-युगों तक के लिए अमर हो गयी। परम पूज्य गुरुदेव नहीं रहे, पर उनकी वाणी-उनका हृदय, उनका अन्तःकरण तीनों अखण्ड ज्योति में समाहित है। इस गंगोत्री का प्रवाह अनन्तकाल तक प्रवाहित होकर जनमानस का परिष्कार करता रहेगा, इसमें किसी को रत्ती भर भी सन्देह नहीं रहना चाहिए। वह जितना आगे बढ़ेगी, उतनी ही विराट् होती चली जायेगी। अभी उसे हिन्दी के अतिरिक्त मात्र गुजराती, मराठी, उड़ीसा, तेलगू, तमिल बंगला भाषा में ही प्रकाशित किया जा रहा है। अगले दिनों वह न केवल सभी भारतीय भाषाओं में, अपितु विश्व की अन्य समृद्ध भाषाओं में भी प्रकाशित हो, वैसे उपक्रम शाँतिकुँज से जुटाये जा रहें हैं।

मूल प्रकाशन हिन्दी भाषा का ही है। परम पूज्य गुरुदेव इतना लिखकर छोड़ गये हैं, जो हिन्दी में लम्बे समय तक चलता रहेगा। उसके अतिरिक्त सावित्री महाविद्या, यज्ञ विज्ञान तथा गीता दर्शन पर लिखी उनकी सर्वथा अप्रकाशित सामग्री पाठकों तक पहुँचाने की व्यवस्था की जा रही है। उनके जीवन के वह अछूते प्रसंग जो अब तक अविज्ञात रहे हैं, अब अखण्ड ज्योति में परिजनों को नियमित रूप से पढ़ने को मिलते रहेंगे। विश्वास किया जाना चाहिए, अखण्ड-ज्योति विद्या विस्तार का मेरुदण्ड है। कोई भी ऐसा शिक्षित घर नहीं बचना चाहिए, जहाँ अखण्ड-ज्योति पढ़ी और सुनी न जाती हो। युग शक्ति गायत्री आदि अन्य सभी भाषाओं की पत्रिकाओं के लिए भी यही बात है क्योंकि वे अखण्ड-ज्योति का ही रूप हैं।

आत्मीय कुटुम्बियों को ज्ञात होगा, परम पूज्य गुरुदेव की स्मृति में निकाला गया अगस्त सितम्बर अखण्ड ज्योति विशेषांक 240 पेज अर्थात् चार अखण्ड-ज्योति पत्रिकाओं के बराबर का है। 84 पृष्ठ के आफसेट रंगीन चित्र और लगभग उतने ही श्वेत-श्याम चित्रों के ब्लॉक है। उसे निकालने में कागज छपाई, ब्लॉक प्रोसेसिंग आदि में प्रायः पच्चीस लाख रुपयों का बैंकों का कर्ज हो गया है। पत्रिका किसी भी तरह का अनुदान या विज्ञापन नहीं लेती। उधर पिछले एक वर्ष में ही कागज, स्याही, छपाई तथा पोस्टेज में असाधारण वृद्धि के कारण उत्पन्न संकट का सामना करना कठिन हो रहा है। बड़ी संख्या में निकलने वाली पत्रिकाएँ सरकारी छूट और सुविधाओं से भी वंचित कर दी गयी है। अतएव संकट और भी गहरा गया है।

दो ही विकल्प बचे हैं, या तो अखण्ड-ज्योति के पृष्ठ कम किये जायें या फिर चन्दा बढ़ाया जाये। संजीवनी विद्या विस्तार जैसे आज के सर्वाधिक महत्व के विषय पर सामग्री कम करने का औचित्य कोई भी स्वीकार नहीं कर रहा है। इस स्थिति में अखण्ड-ज्योति के वार्षिक चन्दे में न्यूनतम वृद्धि की जा रही है जैसे कि पूर्व में सूचना दी गयी थी, अब उसका चन्दा 35/- वार्षिक होगा, आजीवन सदस्यता शुल्क 500/- रखा गया है। अन्य पत्र-पत्रिकाओं की तुलना में आज भी अखण्ड-ज्योति का चन्दा बिलकुल कम है। किसी भी छोटी से छोटी पत्रिका का भी चन्दा 3.50 प्रति अर्थात् 42/- वार्षिक से कम नहीं हैं, जबकि उनके कलेवर और गेट अप में भी जमीन आसमान का अन्तर है। इन परिस्थितियों को स्वीकार करते हुए अपने कुटुम्बियों से इस सामान्य मूल्य वृद्धि को सहर्ष स्वीकार करने का हार्दिक अनुरोध है। इससे एक सीमा तक ही नुकसान की भरपाई होगी।

यदि पत्रिका के सदस्यों की संख्या न बढ़ाई गई, तो यह आर्थिक दबाव दिनों-दिन बढ़ता रहेगा और बार-बार परिवर्तनों की आशंका बनी रहेगी। अतएव अपने सभी परिजनों से इस वर्ष व्यक्तिगत अभिरुचि लेकर अखण्ड-ज्योति और अन्य पत्रिकाओं की सदस्य संख्या बढ़ाने की अपील की जा रही है। सदस्य बनाने का क्रम चाहे एकाकी पुरुषार्थ के बल पर हो या टोलीबद्ध प्रयत्नों द्वारा रसीद बुकें अखण्ड-ज्योति संस्थान घीयामण्डी मथुरा से अथवा शाँतिकुँज हरिद्वार से मँगा लेनी चाहिए, उससे शुल्क संग्रह में सुविधा रहेगी।

श्रद्धांजलि समारोह के समय सीमित संख्या में छपने के कारण स्मृति अंक सभी परिजनों को नहीं मिल सके थे, उन्हें तैयार करा दिया गया है। 25 रुपये का मनीआर्डर, पोस्ट आर्डर या ड्राफ्ट भेज कर इन्हें शाँतिकुँज हरिद्वार से मँगाया जा सकता है। जिन्हें अधिक संख्या में चाहिए हो वे रेलवे से मँगाए। समीपवर्ती रेलवे स्टेशन का नाम अँग्रेजी के कैपिटल अक्षरों में वेर्स्टन, सदर्न या नार्दन रेलवे जो हो, उसके सहित अंकित करके भेजें। ड्राफ्ट अखण्ड ज्योति संस्थान मथुरा के नाम बनवाकर भेजना चाहिए।

ज्ञान रथ झोला पुस्तकालय

विद्या-विस्तार कार्यक्रम में ज्ञान रथों और झोला पुस्तकालयों की भूमिका को अहं मानते हुए उनके व्यापक विस्तार की तैयारियाँ की गयी है। साहित्य एवं यज्ञोपवीत, हवन सामग्री, पूजा उपकरण अगरबत्ती, स्टीकर्स, चित्र आदि रखने का प्रबंध करना चाहिए। आवश्यकता पड़ने पर साहित्य उधार उपलब्ध कराने का भी प्रबंध किया जायेगा पर ज्ञान यज्ञ अभियान को सशक्त बनाना, अब एक अनिवार्य सत्य बन गया है, उसकी बहुत पहले से ही माँग की जाती रही है। जिन शक्तिपीठों-प्रज्ञा संस्थानों ने अब तक ज्ञान रथ प्रारंभ नहीं किए, उन्हें अविलम्ब अपने मन्दिरनुमा बोलते-गाते ज्ञान रथ तत्काल या तो स्वयं बना लेने चाहिए या फिर शाँतिकुँज से प्राप्त कर लेने चाहिए और यह प्रबंध करना चाहिए कि ज्ञान रथ नियमित रूप से चलें और घर-घर अलख जगाते हुए जन-जन तक प्रज्ञा प्रकाश पहुँचाने को सेवा साधना सम्पन्न करें।

व्यक्तिगत स्तर पर चलने वाले झोला पुस्तकालयों में भी नया साहित्य बढ़ाना आवश्यक है, उनका भी पुनर्गठन किया जाना चाहिए। नये सिरे से जिन लोगों तक यह साहित्य पढ़ाया जाये, उनका पूरा रिकार्ड रखा जाये, ताकि ऐसे भावनाशीलों को शाँतिकुँज में चलने वाली सत्र श्रृंखला में प्राथमिकता दी जा सके। परम पूज्य गुरुदेव की चुनी हुई पुस्तकों के रिप्रिन्ट गायत्री तपोभूमि मथुरा से छप गये हैं उन्हें भी मँगाया जाना चाहिए।

संगीत और वीडियो कैसेट

शक्तिपीठों, शाखाओं और प्रज्ञा मंडलों का वातावरण विनिर्मित करने और जन जीवन को प्रेरक विचार एवं भावनाएँ प्रदान करने की दृष्टि से पूज्य गुरुदेव ने जननायकों को बहुत महत्व दिया था। जिन शक्तिपीठों में प्रातःकाल गीतों के प्रसारण का क्रम चलता है, वहाँ का जन संपर्क भी अनेक गुना अधिक विस्तृत हुआ है और श्रद्धा सम्मान भी बढ़ा है। इन्हें जागृत तीर्थों के रूप में प्रतिष्ठा मिल रही है। यह क्रम सर्वत्र चलना चाहिए। व्यक्तिगत आयोजनों में भी इन गीतों का प्रसारण हो, तो यह अच्छी बात होगी। उसके लिए श्रद्धांजलि समारोह के अवसर पर नये और आकर्षक गीतों के कैसेट तैयार करा लिए गये हैं। इन्हें प्रामाणिक संस्थाओं द्वारा सुयोग्य तकनीकीशियनों द्वारा तैयार कराया गया है। उसने उनका प्रभाव बहुत अधिक बढ़ गया है-ध्यान-धारण ऋषि चिंतन, पूज्य गुरुदेव के महत्वपूर्ण उद्बोधन आदि विषयों पर भी कैसेट उपलब्ध हैं। यह कैसेट शाँतिकुँज से अविलम्ब मँगा लेने चाहिए ताकि नवयुग के स्वागत का आकर्षक क्रम तत्काल प्रारंभ किया जा सके।

श्रद्धांजलि समारोह परम पूज्य गुरुदेव के जीवन दर्शन तथा मिशन के विराट् स्वरूप की जानकारी देने वाले चार वीडियो कैसेट्स भी अब शाँतिकुँज में उपलब्ध हैं 150 रु. प्रति कैसेट की दर से यह वीडियो कैसेट किन्हीं आगन्तुकों के हाथ मँगाए जा सकते हैं, डाक से भेजना किसी भी तरह सम्भव नहीं।

आज का समाज पीड़ा और पतन से कराह रहा है, उस दर्द को इस मिशन के कोटि-कोटि परिजनों ने अनुभव किया है। भाव संवेदना को अब एक दावानल के रूप में फूटना चाहिए, ताकि अवांछनीयता, अपराध वृत्ति और अनैतिकता को जला कर भस्मसात् किया जा सके। खण्डनात्मक प्रयत्नों से नहीं विधेयात्मक प्रयत्नों से। यही आज की सबसे बड़ी सेवा, साधना और राष्ट्र भक्ति है। उसमें हर भावनाशील को सम्पूर्ण हृदय और अन्तः करण से जुट जाने का ठीक यही समय है।


जड़ को नमन (Kahani)

जिस बोध वृक्ष के नीचे भगवान बुद्ध को आत्म ज्ञान हुआ था। उसे प्रणाम करने वे अक्सर जाया करते थे।

शिष्य पूछते कि जड़ को नमन करने से क्या लाभ? उत्तर देते जिनसे भी लाभ अभिव्यक्ति है उनके प्रति कृतज्ञता की अभिव्यक्ति करते रहना मनुष्य की अपनी सज्जनता है। जिसे हर स्थिति में बनाये ही रहना चाहिए।


श्रद्धांजलि वर्ष के नूतन निर्धारण

शाँतिकुँज में अक्टूबर माह के प्रथम सप्ताह में आयोजित संकल्प श्रद्धांजलि समारोह के विराट रूप को जिनने भी देखा व उसे सफल ठहराया, उसके मूल में सबको दो कारण समझ में आए। एक संघशक्ति का एकीकरण एवं दूसरा श्रद्धा से उपजे संकल्प की शक्ति का जागरण। ऋषिरक्त के संचय से कभी दुर्गा रूपी संघशक्ति का अवतरण हुआ था। इस पौराणिक आख्यान की पुनरावृत्ति आदिकाल में होती है। इसी को साकार होते हर जुड़े निष्ठावान् परिजन ने पिछले दिनों देखा।

श्रद्धा का, स्नेह का केन्द्र बिन्दु रहे पूज्य गुरुदेव सात दशक से भी अधिक समय तक सैकड़ों के हृदय पर राज्य करते रहे। उनके प्रति समर्पण भाव ने अन्दर सोए संकल्प बल को जगाया एवं विद्या विस्तार के निमित्त घर-घर अलख जगाने का जिम्मा अपने कंधों पर लेने के लिए प्रेरित किया। गुरुदेव अपनी थाती, निधि के रूप में एक विशाल परिवार छोड़ गए हैं, उसके लिए एक सुनियोजित कार्यक्रम दे गए हैं तथा प्रचण्ड आत्मबल संपन्न वातावरण देवात्मा हिमालय की छापा में गंगा की गोद में गायत्री तीर्थ शाँतिकुँज के रूप में बना गए हैं। जो ऊर्जा इस वातावरण में उनकी कठोर तपश्चर्या के फलस्वरूप विद्यमान है, उसकी अनुभूति हर परिजन ने समय-समय पर की है। इसे उनने इक्कीसवीं सदी गंगोत्री, नवयुग का निर्धारण केन्द्र, महामानवों की सर्वोच्च संसद तथा महाकाल का घोंसला कहा है। किसी को भी इसमें संदेह नहीं होना चाहिए कि उनकी प्रेरणा से जो भी महत्वपूर्ण निर्णय अगले दिनों लिए जाएँगे, वे भावी युग का संविधान रचेंगे।

संकल्प समारोह की उत्साहवर्धक प्रतिक्रियाओं को दृष्टिगत रख इस वर्ष तीन प्रमुख कार्यक्रम सभी परिजनों के लिए महत्वपूर्ण निर्धारण के रूप में दिए गये हैं ताकि हर परिजन अपनी स्थिति के अनुरूप उनमें भागीदार बन कर लाभ उठा सके।

पहला कार्यक्रम है संस्कारित देव मानवों की प्रसुप्त आत्मशक्ति के जागरण हेतु शाँतिकुँज की श्रृंखला का विस्तार एवं पुनर्निर्धारण। अब साधना स्तर की तपश्चर्याएँ बढ़ा दी गयी हैं व शीत ऋतु, बसंत को इसके लिए उपयुक्त समझकर इन्हें सर्वोच्च वरीयता देकर 1990 के अंतिम दो माह व 1991 के पूर्वार्ध में चलाते रहने का निश्चय किया गया है।

दूसरा कार्यक्रम है-महाकाल के साथ उज्ज्वल भविष्य के लिए साझेदारी में जन-जन को जोड़ने हेतु विशाल स्तर के आयोजन-दीपयज्ञ संगोष्ठियों का क्रम क्षेत्र में कर जन शक्ति का प्रबल मंथन करना। वे कार्यक्रम भी जनवरी 1991 से आरंभ किये जा रहे हैं।

तीसरा कार्यक्रम है विद्या-विस्तार प्रक्रिया को नयी गति देकर चल देवालयों आदि के माध्यम से इस कार्यक्रम को प्रभावी बनाना, पूज्यवर की लेखनी के आलोक को राष्ट्र व विश्व के हर कोने में पहुँचाना। इस संबंध में पिछले पृष्ठों पर विस्तार से लिखा जा चुका है।

तीन प्रकार की सत्र शृंखलाएँ शाँतिकुँज में अब चल रही हैं। एक नौ दिन के विशिष्ट साधना-अनुसंधान सत्र, एक मास के युग शिल्पी शिक्षण सत्र तथा तीसरे तीन-तीन के अतिथि सत्र। हैं सभी साधना प्रधान पर उनका स्तर तीनों में भिन्न-भिन्न हैं।

यह सर्व विदित तथ्य है कि अन्दर प्रसुप्त पड़ी सुसंस्कारिता को जब तक तप साधना का खाद-पानी नहीं मिलता, वह अंकुरित पल्लवित नहीं होती। बड़े काम साधना पराक्रम के माध्यम से ही संपन्न होते हैं। पुरातन काल में तो वैसा वातावरण चहुँ ओर था एवं बहिरंग से हटकर अन्तर्मुखी हो आत्मचिन्तन की साधना करने का हर किसी के पास अवसर था। कुण्डलिनी जागरण, षट्चक्र भेदन, निदिध्यासन-धारण ध्यान समाधि स्तर के उपक्रम अब भले ही उस सीमा तक संभव न हों, पूज्य गुरुदेव स्थूल, सूक्ष्म कारण शरीर के जागरण संबंधी ऐसे विशिष्ट साधन निर्धारित कर गए हैं कि उनका आश्रम लेकर निश्चित ही लक्ष्य तक पहुँचा जा सकता है। अखण्ड जप, नियमित यज्ञ, युगसन्धि महापुरश्चरण एवं करोड़ों गायत्री जप की ऊर्जा से अभिपूरित वातावरण इसमें सहायक भूमिका है। मनःस्थिति यदि बदलने को एवं नये प्रचलन को अपनाने को समुद्यत है तो आन्तरिक कायाकल्प सुनिश्चित हो जाता है। इन नौ दिवसीय अनुदान सत्रों में इन्हीं तथ्यों को ध्यान में रखते हुए ही विशिष्ट साधना उपक्रमों का निर्धारण किया गया है।

प्रातःकाल के सविता के स्वर्णिम प्रकाश की ध्यान-धारणा जो पूज्य गुरुदेव के निर्देशों (टेप किए हुए) के अनुसार की जाती रही है को अब और विशिष्ट बनाया गया है। सामूहिक ध्यान साधना हेतु बने कक्ष को चारों ओर से ढँक कर ऐसा बनाया गया है कि ध्यान बँटे नहीं, निर्देशों के अनुरूप उन्मीलित नेत्रों से उस प्रकाश व दृश्य पर केन्द्रित रहे जो मंच पर दिखाई दे रहा है। प्रातःकाल प्राणायाम, बंध के विशिष्ट प्रयोग जोड़े गए हैं तथा त्रिकाल संध्या की तरह प्रातः के अलावा मध्याह्न व संध्या के भी, इस प्रकार तीन ध्यान प्रयोग जोड़े गए हैं। सभी उपक्रम बंध मुद्रा को छोड़कर सामूहिक रूप से सम्पन्न होंगे। स्थूल सूक्ष्म व कारण शरीर के परिष्कार के लिए जड़ी बूटी कल्क अखण्ड दीपक को प्रणाम करते समय दिए जाने की व्यवस्था की गयी है। नौ दिन में यह प्रति तीन दिन में भिन्न-भिन्न प्रकार का साधक के परीक्षण के उपरान्त पाई गई स्थिति के अनुरूप होगा। विशिष्टता स्थूलता वनौषधि की कम व उसकी कारण शक्ति के जाग्रत रूप की अधिक है। नौ कुण्डीय यज्ञशाला में नित्य यज्ञ के समय भी आधिभौतिक आधिदैविक एवं आध्यात्मिक प्रगति के लिए विशिष्ट वनौषधियों युक्त विभिन्न मंत्रों से आहुतियों को देने की व्यवस्था की गयी है॥

ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान में प्रत्येक शिविरार्थी का प्रयोग परीक्षण कर आत्मिक प्रगति का एक चार्ट बनाने की व्यवस्था की गयी है, जिसके अनुरूप परामर्श दिया जा रहा है। प्रायश्चित विधान के अंतर्गत दसस्नान, हेमाद्रि संकल्प, विशिष्ट कर्मकाण्ड, इच्छापूर्ति-संकल्प एवं वंदनीय माताजी के समझ अपनी समस्याओं की भूतकाल की स्थिति की चर्चा भविष्य का निर्धारण करने की विशिष्ट व्यवस्था की गई है। भावी साधना का परामर्श भी इसी आधार पर दिए जाने की व्यवस्था बनाई गई है। नौ दिन तक गंगाजल ही पीने एक समय आहार लेने तथा ऊर्जा पूरित स्थान छोड़कर कहीं और न जाने का विधान रखा गया है ताकि संचित प्राणशक्ति का क्षरण न हो। आत्म देव की साधना तथा नादयोग की साधना भी विशिष्ट रूप किये जाने तथा युगसन्धि पुरश्चरण में भागीदारी हेतु सामूहिक मौन जप आधा घण्टे एक साथ एक ही समय किए जाने का प्रावधान भी रखा गया है। परीक्षण के उपकरण नये बढ़ाये गये हैं, जिनसे साधक यह स्वतः जान सकेंगे कि उनमें आने से पूर्व की स्थिति में क्या परिवर्तन हुआ है। विभिन्न वर्णों तथा शब्द शक्ति का प्रभाव अन्तश्चेतना पर क्या पड़ता है, यह ब्रह्मवर्चस् के उपकरणों द्वारा परिजन जान सकेंगे। ध्यान यही रखना है कि यह परीक्षण सुविधा रोगियों के लिए नहीं मात्र साधना का अवलम्बन ले रहे लोक सेवियों के लिए उपलब्ध है। साधना आरण्यक का स्वरूप ब्रह्मवर्चस् के रूप में बनाया गया है, न कि किसी चिकित्सालय सेनेटोरियम जैसा।

ये साधना सत्र प्रतिमाह 1 से 9, 11 से 19 तथा 21 से 29 तारीखों में चलते रहेंगे। आवेदन के पश्चात् जिन्हें उपयुक्त समझा जाएगा, उन्हीं को स्वीकृति स्वरूप सत्र प्रवेश की एक विशिष्ट पुस्तिका नियमोपनियम संबंधी भेजी जायगी। इस प्रकार परिपक्व मनः स्थिति के साधक ही इसमें आ सकेंगे।

सभी परिजन पूज्य गुरुदेव के जीवनवृत्त, मिशन के क्रिया−कलाप भावी विद्या विस्तार संबंधी निर्धारणों पर लगायी जा रही विराट प्रदर्शनी का अवलोकन भी करते रह सकेंगे। यह अभी-अभी स्थायी रूप में शाँतिकुँज में लगायी गयी है व प्रत्येक के लिए दर्शनीय है।

एक मास के युगशिल्पी सत्र चलेंगे तो पूर्ववत् हर माह एक से 21 तारीखों में ही किन्तु सभी में प्रथम नौ दिन साधना अनुदान शिक्षण अनिवार्य रूप से जुड़ा होगा। इस उनतीस दिन की अवधि में प्रज्ञा संस्थानों, प्रज्ञामंडलों, शक्तिपीठों का संचालन व युगनेतृत्व की विधा का शिक्षण दिया जाएगा। अगले दिनों नेतृत्व धर्मतंत्र से लोक शिक्षण करने वाले लोकसेवियों को ही करना हैं। कैसे स्वयं को मुखर बनाया जाय, अपनी झिझक को मिटाकर अपनी बात कैसे सामने वालों के गले उतारी जाय निज की प्रतिभा का संवर्धन परिष्कार कर किस प्रकार अपनी व्यवस्था बुद्धि का उपयोग करते हुए कार्यरत रहा जाय, यह समग्र शिक्षण लोकसेवियों के इन युगशिल्पी सत्रों में दिया जा रहा है।

सभी प्रज्ञा संस्थानों शक्तिपीठों के ट्रस्टी एवं वरिष्ठ कार्यकर्ताओं को वरीयता देते हुए पहले उन्हीं को बुलाया गया है। यदि वे अपनी व्यस्ततावश, अन्यान्य कार्यों में लगे रहने के लिए उतने लम्बे समय के लिए न आ सकें तो अपने स्थान के परिचित जीवट वाले व्यक्तियों को पूरे माह के लिए भेजें, स्वयं तो नौ दिन के सत्र में आ ही जाएँ। इन, सत्रों में जुड़े कर्मकाण्ड, संगीत की टिप्पणियाँ, गायन-वादन की तथा संस्कारादि को सम्पन्न कराने की भी सुविधा रहेगी। स्वावलम्बन विद्यालय के कुटीर उद्योग स्तर के शिक्षण महिलाओं के लिए तो उपलब्ध रहेंगे ही, पुरुष भी स्वेच्छा से कोई एक उद्योग अपने लिए एक माह की अवधि के लिए चुन सकते हैं। सद्ज्ञान संवर्धन की युग सेवा हेतु प्रचार उपकरणों का उपयोग, उनका तकनीकी शिक्षण भी इन सत्रों में दिया जाएगा। जड़ी बूटी चिकित्सा, हरीतिमा संवर्धन तथा साइकिल द्वारा धर्म प्रचार की पदयात्रा इसी शिक्षण का एक अंग है। नये स्थान पर जाकर तीर्थ स्थापना कर कैसे आलोक विस्तार किया जाय, यह युग शिल्पी शिक्षण प्रक्रिया का प्राण है।

तीन दिन के अतिथि सत्र उनके लिए हैं जो षोडश संस्कारों में से कोई भी संस्कार कराने के लिए अथवा क्षेत्रीय कार्यक्रम संबंधी या व्यक्तिगत चर्चा हेतु विचार विमर्श हेतु केन्द्र आना चाहते हैं। कई परिजन अपने जन्म दिन, विवाह दिवस शाँतिकुँज ही मनाते हैं। वे भी दो-तीन दिन ठहर कर तीर्थ की प्राणऊर्जा से लाभान्वित होना चाहते हैं। इन सभी के लिए प्रातः से मध्याह्न तक आश्रम की निर्धारित दिनचर्या रहेगी। युगसन्धि पुरश्चरण की भागीदारी के बाद वे अपना दैनन्दिन क्रम घूमने आसपास के स्थान आदि देखने का बनाकर डडडड वीडियो फिल्म प्रदर्शन तक लौटकर आ सकते हैं। अपेक्षा उन से सही है कि वे जितने दिन तीर्थ में रहे यहाँ की प्रचण्ड प्राणचेतना से अनुप्राणित होने का प्रयास करें।

स्थानीय सत्र निर्धारणों के अतिरिक्त एक महत्वपूर्ण कदम क्षेत्र के मंथन का उठाया गया है। अभी-अभी सभी परिजन संकल्प श्रद्धांजलि समारोह की ऊर्जा से ओत−प्रोत होकर लौटे हैं। सभी का दृढ़ संकल्प है वे पूज्य गुरुदेव के व्यक्तित्व व कर्तृत्व को घर-घर जन-जन तक पहुँचाये। महाकाल के साथ साझेदारी के लिए जन-जन को प्रेरित करें उन्हें संकल्प सूत्र में बाँधें। अभी -अभी यहाँ से जाने के बाद जो पत्र प्रवाह उमड़ा चला आ रहा है, वह यह बताता है कि कर्मठ परिजन संपर्क गोष्ठी, क्षेत्रीय आयोजन, छोटे बड़े दीपयज्ञों द्वारा लोकमानस के परिष्कार का जन -जन से संपर्क करने का ताना -बाना बुन रहे हैं। सूक्ष्म जगत के परिशोधन एवं राष्ट्र की अशाँत अराजकता भरी स्थिति में एकता अखण्डता की शपथ दिलाकर हर व्यक्ति में सद्बुद्धि का विस्तार करना भी उद्देश्य है। धर्म सम्प्रदाय के नाम पर फैला भेदभाव तभी मिटेगा जब सार्वभौम अध्यात्म मंच द्वारा सबसे एक जुट होने का आवाहन कर उन्हें संकल्प में बाँधा जाय। यही तो युग निर्माण योजना का मूलभूत उद्देश्य है।

इस क्षेत्रीय मंथन क्रम को तीव्रगति देने, क्षेत्रीय परिजनों को कार्यक्रम संचालन में सहयोग देने हेतु कुछ बड़े आयोजन छोटे-बड़े दीपयज्ञों सम्मेलनों के अतिरिक्त अगले माह से किये जा रहें हैं जिनमें वीडियो रथ प्रतिनिधियों सहित भेजे जा रहे हैं। प्रतिदिन प्रातःकाल ध्यान साधना के बाद पाँच कुण्डीय यज्ञशाला में अविवाहित कुमारी कन्याओं द्वारा गायत्री यज्ञ के साथ विभिन्न संस्कार तथा “महाकाल के साथ साझेदारी का विशिष्ट संकल्प सभी उपस्थित परिजनों को कराया जाएगा।

इस विशिष्ट कर्मकाण्ड के बाद सारे दिन देवस्थापन कार्यक्रम संपन्न होगा। इसमें कार्यक्रम वाले कस्बे, गाँव या नगर में न्यूनतम 108 संस्कारवान दम्पत्तियों के घर “प्रखर प्रज्ञा सजल श्रद्धा” गायत्री तीर्थ का अभिमंत्रित चित्र, ब्रह्मकुण्ड हर की पौड़ी के जल व गंगा के तट की रज के साथ स्थापित किये जाने हैं। केन्द्र से गए परिजन इन सभी के घर स्वयं जा कर यह स्थापना कार्यक्रम संपन्न कर इन आत्माओं को इन स्थूल प्रतीकों के माध्यम से केन्द्र रूपी जनरेटर से, ट्रांसफार्मर से जोड़कर इक्कीसवीं सदी के उज्ज्वल भविष्य का प्रवाह तीव्र बनाएँगे। इन प्रतीक स्थापनाओं के साथ बताया जाएगा कि वहाँ नियमित उपासना का तथा गायत्री तीर्थ की परिक्रमा की मानसिक ध्यान-धारणा का क्रम नियमित चलता रहे। साथ ही विशेष रूप से आगामी दस वर्षों में सन्धिकाल की पुरश्चरण साधना भी चलती रहे।

संध्या काल में दीपयज्ञ होगा व व्याख्या सहित उद्बोधन। दीपयज्ञ कितना बड़ा हो, इसका निर्धारण परिजन पत्राचार द्वारा पहले कर लेंगे। प्रथम रात्रि के उद्बोधन के बाद शाँतिकुँज के विराट रूप पर दूसरी रात्रि में पूज्य गुरुदेव के जीवन वृत्त पर तथा तीसरे दिन सत्र श्रृंखला का परिचय मिशन के कार्यकलापों पर वीडियो फिल्में रथों में लगें 100 इंच के पर्दों पर दिखाई जाएँगी। इस प्रकार पहले दिन मध्याह्न पहुँचने वाला रथ चौथे दिन प्रातः ध्यान साधन के उपरान्त अपने गन्तव्य की ओर चल देगा।

साधन साध्य होने के कारण फिलहाल दो वीडियो रथ ही भेजे जा रहे हैं व शेष वाहन पूर्व वर्ष की भाँति जाएँगे। आगे व्यवस्था बन जाने पर सभी प्रान्तों में एक या दो वीडियो रथ भेजे जा सकेंगे। इन कार्यक्रमों से निश्चित ही नूतन नये परिजन मिशन के संपर्क में आयेंगे।

संकल्प श्रद्धांजलि समारोह के पश्चात् वंदनीया माताजी ने 1991 के वर्ष को श्रद्धांजलि वर्ष घोषित किया था। इस वर्ष मिशन का विस्तार जितना भी संभव हो करना है तथा स्वयं सत्रों में भागीदारी कर अपनी देवात्मा शक्ति को जगाकर आत्मबल सम्पन्न बनाना है। परिजन दोनों ही कार्यों के लिए पत्राचार कर केन्द्र से संपर्क बनाए रखें, अपना सुनिश्चित निर्धारण इन्हीं दिनों कर लें।


Quotation

दुनिया छोड़ने से पहले यह जान लेना समझदारी है कि संसार और जीवन दोनों ही एक-से एक बढ़कर आनन्ददायक हैं पर उनका अनुग्रह होता उन्हीं पर है जो उनका गौरव और सदुपयोग समझ सकें।


VigyapanSuchana

विभिन्न भाषाओं में अनुवाद एवं प्रकाशन

इस वर्ष का एक और महत्वपूर्ण संकल्प है, विभिन्न भाषाओं में पूज्य गुरुदेव के साहित्य को अनूदित कर उसे प्रकाशित करना। फिलहाल गुजराती, मराठी, बंगला, उड़िया, तमिल, तेलगू इन छह भाषाओं में साहित्य पत्रिका या पुस्तक रूप में प्रकाशित होता है। उड़िया व गुजराती दोनों ही आत्म निर्भर स्वतंत्र संस्थान अब बन गए है एवं प्रायः सारा ही साहित्य प्रकाशित करने की स्थिति में है। बंगला, मराठी, तेलगू तमिल में तथा आसामी, कन्नड़, मलयाली, गुरुमुखी, उर्दू एवं अँग्रेजी अभी यह तंत्र पूरी तरह विकसित होना है। ये सभी अपने अपने यहाँ एक सम्मेलन अगले दिनों जनवरी, फरवरी माह में कभी भी केन्द्र के परामर्श से कर लें। इस सम्मेलन में उस भाषा से जुड़े सभी परिजनों को बुलाकर एक “बॉडी “ऐसी संगठित की जाय जो केन्द्र से भेजे गए साहित्य के अनुवाद व प्रकाशन की व्यवस्था कर सकें। केन्द्र से प्रतिनिधि भी इन सम्मेलनों में जा सकते हैं। आर्थिक व प्रबन्धकीय प्रकाशन व्यवस्था का ताना बाना बुना जाना मूल कार्य है। स्वरूप प्रारंभ में छोटा रखा जा सकता है। धीरे धीरे बढ़ाते हुए उसे 2 या तीन वर्ष में व्यापक स्तर पर पहुँचाया जा सकता है। बहुभाषी परिजन वाले महानगरों से संपर्क स्थापित कर अनुवादक उपलब्ध करवाने में भी केन्द्र मदद करेगा। पर पहला कदम तो क्षेत्रीय परिजनों को स्वयं ही उठाना पड़ेगा। संबंधित परिजन इस संबंध में पत्रा धार कर लें।

----***----

*समाप्त*