एक प्रौढ़ बंगाली दुःखी स्वर में अपनी पत्नी से कह रहे थे— "कल क्या होगा?” "किस चीज का?"
“भोजन का" "नहीं मिलेगा तो पानी पीकर गुजर कर लेंगे"— पत्नी ने कहा। यह बंगाली थे— ठाकुरदास, जो दो रुपए माहवार की नौकरीकर उसी से अपने परिवार का गुजारा चलाते।
पहले उन्हें कलकत्ता की गलियों और सड़कों पर भटकना पड़ा। भोजन का प्रबंध कभी दोनों वक्त, कभी एक वक्त हो जाता। ऐसे भी कई अवसर आए, जबकि घर में किसी के मुँह में एक रोटी तो दूर, एक दाना भी नहीं पहुँच पाया। माँ व्यथित, पिता परेशान और पुत्र का अनिश्चित भविष्य।
कलकत्ते से वह मेदिनीपुर कस्बे में आ गए। वहाँ ठाकुर दास को दो रुपए महीने की नौकरी लगी। कुछ नहीं से कुछ की तो राहत थी। इसी राहत में बरसों बीत गए। एक दिन रात के समय बेटे ने अपनी माँ के पैर दबाते हुए कहा— "माँ मेरी इच्छा है कि मैं पढ़-लिखकर बहुत बड़ा विद्वान बनूँ और तुम्हारी खूब सेवा करूँ।"
“कैसी सेवा करेगा?” — बेटा पढ़ने लगा था, इसलिए कुछ मन बहलाते हुए प्रोत्साहन के स्वरों में माँ ने पूछा।
"माँ! तुमने बड़ी तकलीफ में दिन गुजारे हैं। मैं तुम्हें अच्छा खाना खिलाऊँगा और बढ़िया कपड़े लाऊँगा।" हाँ..! बेटे को जैसी कुछ याद आया— "तुम्हारे लिए गहने भी बनवाऊँगा।"
“हाँ बेटा! तू जरूर सेवा करेगा मेरी”— माँ बोली। "अच्छा बता! तूने चंडी पाठ पढ़ा है? तुझे 'स्त्रियः समस्ताः सकला जगत्सु' वाला श्लोक याद है।"
“हाँ माँ!"— बालक ने कहा। "तो यही समझ, सारी मातृ जाति ही तकलीफ भुगत रही है"— माँ के स्वरों में पीड़ा थी।
"एक बात करना रे तू, पढ़-लिखकर पंडित मत बनना।"
“तो फिर न पढ़ूँ?" “नहीं! पढ़ तो खूब, पर शास्त्रार्थ में न उलझकर तू सेवा करना, सारी नारी जाति की तकलीफें दूर करना। पढ़कर निष्ठुर मत बनना, संवेदना जिंदा रखना”— माँ के स्वरों की पीड़ा भाँपकर बेटे की आँखें भर आईं।
बेटे ने भावाभिभूत होकर माँ के चरणों में मस्तक रख दिया। तभी से उसे धुन सवार हो गई कि माँ की तकलीफ सारी नारी जाति की तकलीफ है, इसे दूर करने के लिए कुछ भी करना पड़े, वह करेगा। खूब पढ़ा-लिखा और विद्वान बन गया तथा कई-एक महत्त्वपूर्ण पदों पर नियुक्त होकर काम भी किया, जिनसे वेतन में अच्छी खासी रकम मिलती थी; पर उसे अपनी माँ की बातों का सदैव ध्यान रहा। पांडित्य के झूँठे अभिमान से दूर रहकर वह स्त्री शिक्षा, विधवा विवाह, जैसे अनेकों माध्यमों से नारी उत्कर्ष के लिए प्रयत्न करते रहे।
नारी जाति की तकलीफ को अपनी माँ की तकलीफ समझने वाले महामानव थे— ईश्वर चंद्र विद्यासागर, जो मजाक में कहा करते— 'मैं शिक्षा का नहीं, विद्या का सागर हूँ' और श्रुति वचन के अनुसार— 'नास्ति विद्या समं चक्षु'। जिसके पास विद्या की आँखें हैं, उसे ही मानवता की पीड़ा, समस्याएँ दिखेंगी और दूर करने में जुटेगा। जिसे ये नहीं दिख रही, इसका मतलब उसके पास विद्या की आँखें नहीं हैं। उनके इस कथन से हम स्वयं की स्थिति पहिचानें। यदि आँख वाले हैं तो समय को पहचान कर सक्रिय हों।"
दादू तब संत नहीं, दुकानदारी का काम करते थे। पानी बरस रहा था। अवसर पाकर वे हिसाब-किताब लिखने में व्यस्त हो गए।
उनके गुरु आए। शिष्य व्यस्त था और अलग से बैठने की जगह न थी, सो बाहर मूसलाधार बारिश में खड़े भीगते रहे।
दादू का ध्यान हटा तो उन्हें गुरुदेव को इस प्रकार खड़े देखकर बड़ी लज्जा आई और ध्यान न दे सकने के लिए क्षमा माँगते हुए उन्हें ऊपर लाए।
गुरुदेव ने हँसते हुए कहा— "बेटा! मैं तो थोड़ी ही देर तक इंतजार करता रहा; पर भगवान तो आरंभ से ही प्रतीक्षा कर रहा है कि कब दादू मेरी ओर ध्यान दे और अंदर बुलाए।”
वे वचन उनके हृदय में बैठ गए और दुकानदारी छोड़कर संत जीवन अपना लिया।
समुद्र-मंथन से अमृत भी निकला था और विष-वारुणी भी। देवताओं ने अमृत की उपयोगिता समझी और उसे आग्रहपूर्वक पिया। सृष्टि को महाविनाश से बचाने के लिए विष तो महाशिव ने कंठ में धारण कर लिया, पर दैत्यों को मदिरा का स्वाद सुहाया और उनने उसे छककर पिया। उन्माद चढ़ना ही था, सो वे खुमारी का दौर आने पर भ्रष्ट चिंतन और आचरण में निरत हो गए। प्रतिफल जो होना था, वही हुआ। देवता स्वर्गीय वातावरण का आनंद लेते रहे और दैत्यों ने अपना ही नहीं, अपनी पकड़ में आने वालों, संपर्क-साधने वालों का अहित-ही-अहित किया। स्वयं भर्त्सना के भाजन बनते और दुर्गति के गर्त में गिरते रहे। इतना ही नहीं, जो भी संपर्क में आया, उसे पतन के गर्त में गिराया। अमृत को अपना प्रतिफल मिला था और अपेय पीने वाले भी दुर्गति से न बच सके। छूत लगने की बात प्रसिद्ध है। देवत्व भी बढ़ा; पर उसकी गति मंद रही।
वारुणी का उन्माद जितने बड़े क्षेत्र में, जितना प्रभाव छोड़ता है; उसे भी सभी जानते हैं। बहुमत दैत्यों का रहा और तत्त्वदर्शियों को उस प्रतिक्रिया को देखते हुए कहना पड़ा— “पीत्वा मोहमयी मदिरा उन्मत्त भूत्वा जगत।” जगत शब्द से उनका अभिप्राय बहुसंख्य लोगों से रहा है। माचिस की तीली देखते-देखते बड़े क्षेत्र को भस्मीभूत कर देती है, जबकि पानी का छिड़काव उपयोगी होते हुए भी धीमी गति से अपना प्रभाव छोड़ता है। अमृत का प्रभाव-क्षेत्र घटता-सिकुड़ता गया; पर मदिराजन्य उन्माद ने तो सर्वत्र कुहराम ही मचा दिया। वह प्रक्रिया दावानल की तरह बढ़ती और बढ़ती गई।
मनुष्यों पर आज एक उन्माद बुरी तरह छाया दीखता है। वे वासना, तृष्णा और अहंता की ललक बुझाने के लिए बेतरह आकुल-व्याकुल दिखते हैं। जो कुछ सोचते और करते हैं, वह उन्हीं प्रयोजनों के लिए होता है। कुछ समेटते-बटोरते भी हैं। इस प्रकार स्वाभाविक रूप से उस वर्ग की अभिवृद्धि असाधारण रूप से होती है।
लगता है, समुद्र-मंथनकाल से लेकर अब तक दैत्य परंपरा ही उगती, बढ़ती और फैलती चली आई है। उसकी गति में विराम भी लगा नहीं है। वासना, तृष्णा और अहंता का उन्माद जन-जन पर चढ़ा दिखता है। उसकी खुमारी इतनी गहरी है कि 'और-और' ,'अधिक-अधिक' की रट उभरती ही आती है। कितनी ही पी लेने पर तृप्ति का अनुभव होता ही नहीं। विद्रूपता बढ़ती ही जाती है। लगता है, यह उन्माद समूची मनुष्य जाति को न घेर ले और असुरता का सर्वव्यापी साम्राज्य कहीं समूची मनुष्य जाति को अपने शिकंजे में न कस ले।
इस दावानल के विस्तार को हमें मूकदर्शक की तरह बैठे हुए देखते नहीं रहना चाहिए। अग्निकांड के अवसर पर जो निष्ठुरता अपनाए रहता है, अपने पानी के घड़े में से एक बूँद भी उसके समाधान के लिए खर्चने में कृपणता बरतता है, बुझाने की दौड़-धूप के लिए पसीने की एक बूँद भी नहीं बहाना चाहता, उसे भी भर्त्सना का भाजन बनना पड़ता है, भले ही अग्निकांड प्रस्तुत करने में उसका कोई हाथ न रहा हो। दुर्घटनाग्रस्त घायल को सड़क पर पड़ा देखकर, जो मुँह बिचकाकर आगे बढ़ जाता है, उसे आत्मा, परमात्मा और लोक-चेतना की दृष्टि में अपराधी बनना पड़ता है, भले ही उस दुर्घटना में उसका कोई हाथ न रहा हो।
मनुष्य प्राणी-जगत में सामान्य नहीं, वरन असामान्य है। उसकी शारीरिक-मानसिक संरचना अपने ढंग की अनोखी है, उसे विशिष्ट और वरिष्ठ बनाया गया है। साथ ही, एक अतिरिक्त उत्तरदायित्व सौंपा गया है कि वह ईश्वरीय उद्यान की, इस सुगढ़ संसार की, न केवल रखवाली करे; वरन उसे खाद-पानी देने और बढ़ाने, संभालने में भी समुचित तत्परता और सतर्कता निबाहे। इस ओर से मुँह मोड़ लेने पर वह अपराधियों की श्रेणी में गिना जाता है। दायित्वों की उपेक्षा हेय प्राणियों के लिए क्षम्य हो सकती है, पर सेनापति जैसे उच्चपदासीन के लिए तो इतना प्रमाद भी अक्षम्य हो जाता है एवं उसे कोर्ट मार्शल के कटघरे में मृत्युदंड पाने के लिए खड़ा होना पड़ता है।
दैत्य-परंपरा इसलिए बढ़ती चली गई है कि उसकी रोक-थाम करने के लिए देव परिवार आगे नहीं आया। उसने अनर्थ को होते अपनी आँखों से देखा और जब रोक-थाम की गुहार सर्वत्र उठ रही थी, तो उसने यह कहकर मुँह मोड़ लिया कि वह अपनी स्वर्गमुक्ति के लिए किन्हीं पूजा-पाठों में लगा रहता है। उसने मोह-माया के साथ-साथ कर्त्तव्यपालन से भी निवृत्ति ले ली है।
सेना मोर्चे पर अड़ी रहे, तो कोई कमजोर शत्रु भी देश पर हमला कर सकता है और उस पर अधिकार जमा लेता है। खरपतवारों को उखाड़ा न जाए तो बहुमूल्य फसलें भी उन्हीं झाड़-झंखाड़ों में दबकर रह जाएँगी। मच्छर-मक्खियों की रोक-थाम न की जाए तो उनकी अभिवृद्धि, अपने प्रभाव-क्षेत्र में मलेरिया जैसे कितने ही रोगों से वहाँ के निवासियों को ग्रसित कर लेगी। मल-मूत्र की गंदगी को हटाने का प्रयत्न न किया जाए तो उस लापरवाही को बरतने वाले हैजे जैसे बीमारियों से ग्रसित होकर रहेंगे, साथ ही उस उदासीनता के अपराध से लोक-भर्त्सना और आत्मप्रताड़ना के भाजन भी बनेंगे।
जनमानस पर असुरता का उन्माद बुरी तरह चढ़ रहा है। पैसा बटोरने, मजाक उड़ाने और बड़प्पन जताने की खुमारी महामारी की तरह फैल रही है। यद्यपि इन तीनों का एक से एक बढ़ा-चढ़ा अनर्थ है। शांति और प्रगति का वातावरण इन्हीं तीनों के कारण बुरी तरह बरबाद हो रहा है। नशेबाजों की मंडली विस्तार पकड़ गई और दिन-दिन अपना परिवार बढ़ाती चली जा रही है। यह हो रहा है, सो तो है ही; पर उन देवमानवों को क्या हुआ? जो अपने को प्रहरी होने का दावा करते रहे, अवांछनीयता को निरस्त करने की जिम्मेदारियाँ उठाने की घोषणा करते रहे हैं?
जिन्होंने घोषणा कर रखी है कि “वयं राष्ट्रे जागृयामः पुरोहिताः।” हम पुरोहित राष्ट्र को जाग्रत और जीवंत बनाए रखेंगे, वे ही यदि अपनी प्रतिभा को भुला बैठें, चुनौती सामने आने पर हथियार डाल दें और असमर्थतासूचक मिमियाने के स्वर में विवशता प्रदर्शित करने लगें तो विचारशीलता मात्र असुरता के बढ़ने पर ही आक्रोश व्यक्त नहीं करेगी, वरन प्रहरियों को भी अपराधी ठहराएगी, जो कर्त्तव्यपालन में समर्थ होते हुए भी असमर्थता का लबादा ओढ़ मैदान छोड़कर भाग खड़े होने की कायरता दिखाते हैं।
छोटे बच्चों के कपड़े किशोरों के लिए फिट नहीं बैठते और किशोरों के लिए सिलवाए गए कपड़ों से प्रौढ़ों का काम नहीं चलता। आयु वृद्धि के साथ-साथ परिवर्तन आवश्यक हो जाता है। भोजन ताजा बनाने से ही काम चलता है। विद्यार्थी जैसे-जैसे कक्षा चढ़ते जाते हैं, वैसे ही उन्हें अगले पाठ्यक्रम की पुस्तकें खरीदनी पड़ती हैं। सर्दी और गर्मी के कपड़े अलग तरह के होते हैं। परिवर्तन होते चलने के साथ तदनुकूल व्यवस्था बनाते रहना भी एक प्रकार से अनिवार्य है।
समय सदा एक जैसा नहीं रहता। वह बदलता एवं आगे बढ़ता जाता है, तो उसके अनुसार नए नियम-निर्धारण भी करने पड़ते हैं। आदिमकाल में मनुष्य बिना वस्त्रों के ही रहता था। मध्यकाल में धोती और दुपट्टा दो ही, बिना सिले वस्त्र काम आने लगे थे। प्रारंभ में अनगढ़ औजारों, हथियारों से ही काम चल जाता था। मध्यकाल में भी धनुष-बाण और ढाल-तलवार ही युद्ध के प्रमुख उपकरण थे; पर इन दिनों वे दोनों ही एक प्रकार से बेकार हो गए, अब आग्नेयास्त्रों के बिना काम चल ही नहीं सकता। समय के साथ परिस्थितियाँ बदलती हैं और फिर उनके समाधान भी ढूँढ़ने पड़ते हैं।
प्राचीनकाल के वर्णाश्रम पर आधारित प्रायः सभी विभाजन बदल गए। अब उसका स्थान नई व्यवस्था ने ले लिया है। दो सौ वर्ष पुराने समय में काम आने वाली पोशाकों का अब कहीं-कहीं प्रदर्शनियों के रूप में ही अस्तित्व दीख पड़ता है। जब साइकिलें चली थीं, तब अगला पहिया बहुत बड़ा और पिछला बहुत छोटा होता था। अब उनका दर्शन किन्हीं पुरातन प्रदर्शनियों में ही दीख पड़ता है। कुदाली से जमीन खोदकर खेती करना किसी समय कृषि का प्रमुख आधार रहा होगा; पर अब तो सुधरे हुए हल ही काम आते हैं। उन्हें जानवरों या मशीनों द्वारा चलाया जाता है। लकड़ियाँ घिसकर आग पैदा करने की प्रथा मध्यकाल में थी पर; अब तो माचिस का प्रचलन हो जाने पर कोई भी उस कष्टसाध्य प्रक्रिया को अपनाने के लिए तैयार न होगा।
विकास क्रम में ऐसे बदलाव अनायास ही प्रस्तुत कर दिए गए हैं। इस परिवर्तन क्रम को रोका नहीं जा सकता। जो पुरानी प्रथाओं पर ही अड़ा रहेगा, उसे न केवल घाटा-ही-घाटा उठाना पड़ेगा; वरन उपहासास्पद भी बनना पड़ेगा।
मान्यताएँ, विचारणाएँ, निर्धारण और क्रियाकलाप आदि भी समय के परिवर्तन से प्रभावित हुए बिना रहते नहीं। उनकी सर्वथा उपेक्षा नहीं की जा सकती। धर्मशास्त्र भी समय की मर्यादाओं में बँधे रहे हैं और उनमें प्रस्तुत बदलाव के आधार पर परिवर्तन होते रहे हैं। स्मृतियाँ और सूत्रग्रंथ भी भिन्न-भिन्न ऋषियों ने अपने-अपने समय के अनुसार नए सिरे से लिखने की आवश्यकता समझी और वह सुधार ही जन-जीवन में मान्यता प्राप्त करता रहा। इसका कारण उन निर्माताओं में परस्पर विवाद या विग्रह होना नहीं है; वरन यह है कि बदलती परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए धर्म-प्रचलन के स्वरूप में भी भारी हेर-फेर किया गया।
प्राचीनकाल में जमीन में गड्ढा खोदकर गुफाएँ विनिर्मित कर ली जाती थीं। बाद में कुटिया बनाना अधिक सरल और सुविधाजनक लगा। इसके बाद अब तो भूमि संबंधी कठिनाई को देखते हुए कई-कई मंजिले मकान बनने लगे हैं और उनमें ईंट-चूने से भी आगे बढ़कर सीमेंट और लोहे के सहारे भवन निर्माण का प्रयोग निरंतर बढ़ता जा रहा है। लकड़ी और गोबर से ईंधन की आवश्यकता पूरी करने की प्रथा पिछले दिनों रही है, पर उनका पर्याप्त मात्रा में न मिलना, इस प्रयास को तेजी से कार्यांवित कर रहा है कि गोबर गैस या खनिज गैस से काम लिया जाए। जहाँ इफरात है, वहाँ बिजली से भी ईंधन का काम लिया जा रहा है। खनिज तेल भी किसी प्रकार उस आवश्यकता की पूर्ति कर रहे हैं। अब तो सूर्य की धूप भी ईंधन की जगह प्रयुक्त होने लगी है। इन परिवर्तनों में आवश्यकता के अनुरूप आविष्कार होते चलने की उक्ति ही सार्थक सिद्ध होती है।
समय पीछे नहीं लौटता, वह निरंतर आगे ही बढ़ता है। उसके साथ ही मान्यताओं में, प्रचलनों में भी परिवर्तन होता चलता है। ऐसा आग्रह कोई कदाचित ही करता हो कि जो पहले दिनों माना या किया जाता रहा है, वही पत्थर की तरह सदा-सर्वदा जारी रहना चाहिए? ऐसे दुराग्रही तो शायद बिजली का प्रयोग करने और नल का पानी पीने से भी ऐतराज कर सकते हैं? उन्हें शायद गुफा बनाकर रहने का भी आग्रह हो, क्योंकि पूर्व-पुरुषों ने निवास के लिए उसी प्रक्रिया को सरल समझा था?
कभी मिट्टी के खपरों पर लेखन का काम लिया जाता था। बाद में चमड़े, भोजपत्र, ताड़पत्र आदि पर लेखन कार्य चलने लगा। कुछ दिनों हाथ का बना कागज भी चला; पर अब तो सर्वत्र मिलों का बना कागज ही काम में आता है। हाथ से ग्रंथों की नकल करने का उपक्रम लंबे समय तक चलता रहा है; पर अब तो छपाई की सरल और सस्ती सुविधाएँ छोड़ने के लिए कोई तैयार नहीं। तब रेल-मोटर आदि की आवश्यकता न थी; पर अब तो उनके बिना परिवहन और यातायात का काम नहीं चलता। डाक से पत्र-व्यवहार करने की अपेक्षा घोड़ों पर लंबी दूरी पर संदेश भेजने की प्रथा अब एक प्रकार से समाप्त ही हो गई है।
परिवर्तन के साथ जुड़े हुए नए आयाम विकसित करने की आवश्यकता अब इतनी अनिवार्य हो गई है, कि उसे अपनाने से कदाचित ही कोई इनकार करता हो? घड़ी का उपयोग करने से अब कदाचित ही कहीं एतराज किया जाता हो? समय हर किसी को बाधित करता है कि युगधर्म पहचाना जाए और उसे अपनाने में आना-कानी न की जाए। सनातन धर्म, नीतिनिष्ठा एवं समाजनिष्ठा के संबंध में शाश्वत हो सकता है; पर रीति-रिवाजों, क्रियाकलापों, उपकरणों आदि प्रचलित नियम-अनुशासन के संबंध में पुरातन कि दुहाई देकर, दुराग्रह अपनाने से कुछ काम चलता नहीं। ऐसे हठवादी-दुराग्रही पुरातन परिपाटी के भक्त तो कहे जा सकते हैं, पर अपने अतिरिक्त और किसी को इसके लिए सहमत नहीं कर सकते कि लकीर के फकीर बने रहने में ही धर्म का पालन सन्निहित है, जो पुरातनकाल में चलता रहा है, उसमें हेर-फेर करने की बात किसी को सोचनी ही नहीं चाहिए, ऐसा करने को अधर्म कहा जाएगा और उसे करने वाले पर पाप चढ़ेगा।
किसी भी भली-बुरी प्रथा को अपनी और पूर्वजों की प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाकर, उस पर अड़ा और डटा तो रहा जा सकता है; पर उसमें बुद्धिमानी का समावेश तनिक भी नहीं है। मनुष्य प्रगतिशील रहा है और रहेगा। वह सृष्टि के आदि से लेकर अनेक परिवर्तनों के बीच से गुजरता हुआ आज की स्थिति तक पहुँचा है। यह क्रम आगे भी चलता ही रहने वाला है। पुरातन के लिए हठवादी बने रहना किसी भी प्रकार, किसी के लिए भी हितकारी नहीं हो सकता। युगधर्म का निर्धारण और परिपालन ही प्रगतिशीलता का प्रधानचिह्न है। युगधर्म को अपनाकर ही मनुष्य आगे बढ़ा है और आगे भी उसके लिए तैयार रहेगा। समय का यह ऐसा तकाजा है, जिससे इनकार नहीं किया जा सकता।
अमेरिका के एक बड़े राजनेता ने अपने बचपन का एक संस्मरण लिखा है—‘लुहार की दुकान के सामने से गुजर रहा था। उसका दूसरा साथी कहीं चला गया था। अकेला ही धौंकनी-धौंकता और लोहा पीटता। मुझे अजीब लगा, सो दुकान के सामने ठिठक गया।'
लुहार ने अपनी कारिस्तानी दिखाई, उसने छूटते ही किसी बड़े खानदान से संबंधित और अपनी कक्षा का मेधावी छात्र बताया, साथ ही भविष्य में कोई बड़ा आदमी बनने की संभावना भी व्यक्त की। उसके इस कथन से मेरे मन में उसके प्रति सद्भावना जागी। उसने कहा— "यदि और भी कुछ सुनना और देखना चाहो तो मेरे पास बैठो और इस कला की जानकारी प्राप्त करो, जिसने मुझे मालदार बना दिया है।"
बालक प्रभावित हुआ। दुकान पर जा बैठा। उसने धौंकनी थमा दी और कहा देखो इसको चलाना कितना मजेदार काम है। मैं उसकी बातों में आ गया और देर तक उसी में जुटा रहा। जब भी उठने का मन करता तभी वह फिर अपनी चिकनी-चुपड़ी बातों में फँसा लेता। इस प्रकार दोपहर हो गई। हाथ भी दुखने लगे। निदान मैं उठकर चल ही पड़ा।
स्कूल पहुँचा तो कई क्लासों में गैरहाजिरी लग ही गई थी। उस दिन परीक्षा भी थी। मास्टर ने बुरी तरह पीटा और फेल कर दिया। धौंकनी-धौंकने से उत्पन्न बाँहों का दर्द पिटाई से और भी अधिक बढ़ गया। बुखार आया और चारपाई पर पड़ा पछताता रहा।
इसके बाद मैंने जीवन भर याद रखा कि चापलूसी में फँसना कितनी बड़ी मूर्खता है। अब किसी चापलूस को पास नहीं फटकने देता और झूठी प्रशंसा करने वालों से सदा दूर रहता हूँ। तभी वर्तमान पद तक पहुँचने में सफल हो सका।
जेठ की तपती दुपहरी, उस पर क्षेत्र में छाया दुर्भिक्ष। गाँव के बाहर रास्ते में एक वृद्ध और एक किशोर मूर्छित हो पड़े थे। उनके कुम्हलाएँ चेहरे, धूल भरे पाँव देखकर यह पता लगता था कि वे जरूर काफी दूर से आ रहे होंगे। अशक्ततावश थककर गिर पड़े, मूर्छित हो गए; पर क्यों आई अशक्तता? क्यों गिरे? किसे परवाह थी? लोग आते, मुँह घुमाकर निकल जाते जैसे जीवित इंसान न होकर मशीनी पुतले हों। वे भले अपने को जीवित कहते रहे; पर उनके भीतर की मनुष्यता तो मूर्छित थी, अन्यथा भला इस तरह कैसे निकल जाते?
एक-एक करके न जाने कितने निकले। एक यह भी था; पर उनमें से नहीं, वह रुका, गौर से देखा; छाती की धड़कन, नाड़ी की गति वह बता रही थी कि वे जीवित हैं। एक-एक करके दोनों को पास खड़े छायादार वृक्ष के नीचे लाया, अपने लोटे से चेहरों पर जल छिड़का और अंगोछे से हवा करने लगा। एक मिनट, दो मिनट, पाँच मिनट बाद उन दोनों ने आँखें खोलीं। थोड़ी देर बाद उनके मुँह से वाणी निकली— अ-आप देवदूत हैं, मैं मर गया हूँ?” “नहीं! न आप मरे हैं और न मैं देवदूत हूँ। सिर्फ इंसान! इससे अधिक कुछ नहीं।”
अब तक वे होश में आ चुके थे। पूछने पर बताया— "हम दोनों बाप-बेटे सात-आठ मील दूर गाँव के रहने वाले हैं। काम की तलाश में निकले थे, घर में अन्न का दाना नहीं, हम दोनों के पेट में भी तीन दिन से एक दाना नहीं गया और इसकी माँ......; कहते-कहते बूढ़े की आँखें भर आईं, शून्य की ओर ताकने लगा।” “क्या हुआ उसको?”— युवक ने पूछा। "क्या बीमारी थी?" बीमारी थी— 'भूख'। भोजन का अभाव, काम का दबाव और चिंता इन्हीं यमदूतों ने उसे खा लिया।
पेट की क्षुधा, इसके निवारण के बगैर न तो कोई उपदेश अच्छा लगता है, न कोई ज्ञान सुहाता है। भगवान बुद्ध ने भी पहले रोटी, फिर उपदेश, सिफारिश की थी। युवक जैसे-तैसे दोनों को अपने घर ले आया। पत्नी से बोला— "देखो भक्त आए हैं।" खाट पर शिथिल पड़े बूढ़े ने कहा— "भक्त कहाँ हैं, भाई! हम तो भूखे हैं, सिर्फ भूखे?" "अरे! हर कोई भक्त होता है। कोई इसे जानकर तदनुरूप आचरण करता है, कोई न जानने और मानने के कारण हैरान, परेशान फिरता है।"
इस बीच पत्नी सारी स्थिति भाँप चुकी थी। भोजन तैयार था। अतिथियों के साथ पति को भी परोसा। क्षुधापूर्ति ने वृद्ध और किशोर की सारी पीड़ा हर ली थी। युवक ने अपने घर से उन्हें कुछ अनाज दिया। दिन भर विश्राम के बाद वे दोनों शाम को चले गए।
चले तो गए, पर कुछ छोड़ गए— एक पीड़ा, तड़प, कसक। वह सोचता रहा— "ऐसे न जाने कितने होंगे। न जाने कितनों की पत्नियाँ भूख के मारे मरती होंगी? कितनों को बेहोशी आती होगी? कौन करेगा इनकी मदद? वे जो स्वयं बेहोश हैं। "धन के नशे में, ताकत के गर्व में, अहंकार के गुस्से में?" "नहीं-नहीं! एक बेहोश दूसरे बेहोश की कैसे मदद कर सकता है? पर हम तो क्या, हम भी बेहोश हैं।" "नहीं तो", के विचार के साथ उसने सिर झटक दिया। आँखें फाड़कर अपने चारों ओर देखा।
पत्नी पास खड़ी उसका यह विचित्र व्यवहार देखे जा रही थी। उसने पूछा— "क्यों जी! बात क्या है?" प्रश्न के उत्तर में युवक ने प्रश्न किया— "क्या तुम बेहोश हो?" "नहीं।" "फिर क्या मैं बेहोश हूँ?" "नहीं।" "पर आपको हो क्या गया है?"— "कुछ नहीं, बेहोशी टूट रही है।"
“बेहोशी?” “हाँ? बेहोशी ही! अब तक बेहोश न होता तो मनुष्य की पीड़ा क्यों न अनुभव होती? इतने भूखों के रहते मैं कैसे चैन से खाता रहा? अरे! खाते-खाते उल्टी क्यों नहीं हो गई? इतने पीड़ितों के रहते दर्द से छाती क्यों नहीं फटी? सिर्फ इसलिए कि बेहोश थे?” “ठीक कहते हो”— पत्नी ने धीरे से कहा। "तो अब? कल से भंडारा चलाने का विचार है। भूखों को बटोरकर लाऊँगा, उन्हें खिलाने के बाद खाऊँगा।"
"विचार नहीं संकल्प कहो"— पत्नी का स्वर उत्साहपूर्ण था।
"संकल्प की पूर्णता के लिए कुछ और करना पड़ेगा; “बोलो! क्या सहमत हो?”
“पवित्र संकल्प की पूर्ति के लिए कुछ करने के लिए सहमत होने की बात करते हो? अरे! सब कुछ करने के लिए सहमत हूँ।”
सचमुच पति का स्वर उल्लासपूर्ण था। "तो हम जिम्मेदारी नहीं बढ़ाएँगे, बच्चे पैदा करने के मोह में नहीं पड़ेंगे। और? और क्या? आज की अपेक्षा कहीं अधिक किफायतशार बनेंगे, प्रभु-भक्ति के सिवा और कुछ न चाहेंगे।"
तभी तो पूरा हो सकेगा अपना संकल्प। संकल्प की शुरुआत का यह दिन था, माघशुक्ल द्वितीया संवत् 1871। उस दिन से पति खेतों में काम करता। पत्नी चक्की पीसती, आगंतुकों को बनाकर खिलाती। पति-पत्नी शाम होने पर बैठते, कथा-संकीर्तन के माध्यम से बताते, "मानव पीड़ा के निवारण में अपना सब कुछ होम देना भक्ति है।" कथनी-करनी की एकता ने अनेकों के जीवन बदले।
वर्षों यह क्रम अनवरत चलता रहा। एक दिन वृद्ध साधु आया। पत्नी पति की परमार्थपरायणता से इतना खुश हुआ कि आशीर्वाद में अपना झोली-झंडा देकर चलता बना। अब तक युवक भी वृद्ध हो गया था और इसकी पत्नी भी। उन्होंने झोली की स्थापना अपने आश्रम में की। मानो यह इस बात की प्रतीक हो कि जब इन पति-पत्नी ने अपना सर्वस्व जनसेवा में लगा दिया, तब झोली इतना उगलती है कि कमी का नामोनिशान नहीं। बोओ और काटो के शाश्वत सिद्धांत की प्रतीक बनी झोली। इसे चमत्कारी माना जाने लगा व झोली दे जाने वाले को भगवान। जो हो, उस स्थान की व झोली की पूजा होने लगी। वस्तुतः सिद्धांत चमत्कारी है और इस पूजा का तात्पर्य है— 'तदनुरूप आचरण।'
गुजरात के वीरपुर गाँव के ये भक्त दंपत्ति थे, जलाराम बापा और वीर बाई। जिनका कर्त्तृत्व हम सभी को आज भी झकझोरता है “बेहोशी छोड़ो होश में आओ”। होश में आ चुके हो तो सक्रिय बनो, सेवा करो। यदि इसमें जुट सके सारी कसौटियों पर अपने को खरा साबित कर सके, तो अकिंचन होने पर भी अनेकों कष्टों को दूर कर सकने में समर्थ हो सकेंगे। एक छटांक पीतल जब गलकर टोंटी में ढलती, नल से जुड़ती है, तो हजारों की प्यास बुझाती है। स्वयं भी ऐसे ही बनें। इसी बनने का नाम भक्ति है।
एक दिन नारद ने भगवान से पूछा— “माया कैसी है?” भगवान मुस्करा दिए और बोले— “किसी दिन प्रत्यक्ष दिखा देंगे।"
अवसर मिलने पर भगवान नारद को साथ लेकर मृत्युलोक को चल दिए। रास्ते में एक लंबा रेगिस्तान पड़ा। भगवान ने कहा— “नारद! बहुत जोर की प्यास लगी है। कहीं से थोड़ा पानी लाओ।”
नारद कमंडल लेकर चल दिए। थोड़ा आगे चलने पर नींद आ गई और एक खजूर के झुरमुट में सो गए। पानी लाने की याद ही न रही।
सोते ही एक मीठा सपना देखा, किसी वनवासी के दरवाजे पर पहुँचे हैं। द्वार खटखटाया तो एक सुंदर युवती निकली। नारद को सुहावनी लगी, सो घर में चले गए और इधर-उधर की वार्त्ता में निमग्न हो गए। नारद ने अपना परिचय दिया और भील कन्या से विवाह का प्रस्ताव किया। उसका परिवार सहमत हो गया और तुरंत साज-सामान इकट्ठा करके विवाह कर दिया। नारद सुंदर पत्नी के साथ बड़े आनंदपूर्वक दिन बिताने लगे। कुछ ही दिनों में क्रमशः उनके तीन पुत्र भी हो गए।
एक दिन भयंकर वर्षा हुई झोंपड़ी के पास बहने वाली नदी में बाढ़ आ गई। नारद अपने परिवार को लेकर बचने के लिए भागे। पीठ और कंधे पर लदे हुए तीनों बच्चे उस भयंकर बाढ़ में बह गए। यहाँ तक कि पत्नी का हाथ पकड़ने पर भी वह रुक न सकी और उसी बाढ़ में बह गई, जिसमें उसके बच्चे बह गए थे।
नारद किनारे पर निकल तो आए; पर सारा परिवार गँवा बैठने पर फूट-फूटकर रोने लगे। सोने और सपने में एक घंटा बीत चुका था। उनके मुख से रुदन की आवाज अब भी निकल रही थी, पर झुरमुट में औंधे मुँह ही उनींदे पड़े हुए थे।
भगवान सब समझ रहे थे। वे नारद को ढूँढ़ते हुए खजूर के झुरमुट में पहुँचे, उन्हें सोते से जगाया। आँसू पोंछे और रुदन रुकवाया। नारद हड़बड़ाकर बैठ गए।
भगवान ने पूछा—‘‘हमारे लिए पानी लाने गए थे, सो क्या हुआ?” नारद ने सपने में परिवार बसने और बाढ़ में बहने के दृश्य में समय चला जाने के कारण क्षमा माँगी।
भगवान ने कहा— ‘‘देखा नारद! यही माया है।”
विराट विश्व-ब्रह्मांड में संव्याप्त दिव्य चेतनसत्ता को विराट ब्रह्म कहते हैं। वही सर्वव्यापी न्यायकर्त्ता, सत्-चित-आनंद आदि विशेषताओं से जाना जाता है। मनुष्यसहित समस्त जीवधारियों में उसी का एक छोटा-सा अंश काम करता है, इतने पर भी मानव में इसका स्तर ऊँचा भी है और अधिक भी। असंतुलन को संतुलन में, ध्वंस को सृजन में परिवर्तित कर सकने में मानवी पुरुषार्थ एक सीमा तक ही सफल हो पाता है। परिस्थितियाँ बेकाबू हो जाने पर जब समूची मानव सभ्यता का दम घुटने लगता है, सर्वत्र त्राहि-त्राहि मच जाती है, विनाशकारी विभीषिकाएँ ही घटाटोप-सी छाई दीखती हैं, ऐसे निविड़ अंधकार में अतिरिक्त से कहीं बिजली-सी कौंधती और समस्त बिगाड़ को सँभाल लेती है। दैवी सत्ता मनुष्य को मार्गदर्शन एवं अपेक्षित सहायता प्रदान करने को सदैव तत्पर रहती है।
इस संदर्भ में अमेरिका के सुप्रसिद्ध दार्शनिक कोर्लिस लेमोन्ट ने अपनी कृति “द इल्यूजन ऑफ इम्मौर्टलिटी” में ‘कैन गॉड सेव द सिचुएशन’ नामक शीर्षक से विस्तारपूर्वक लिखा है। उनका कहना है कि मनुष्य सृष्टि में असंतुलन पैदा कर सकता है और बीसवीं शताब्दी में उसने किया भी है; पर उसके सुधार की बात अब उसे सूझ रही हो, ऐसी आशा बँधती दिखती नहीं। पिछले दिनों अणु-आयुधों के निर्माण से लेकर वातावरण बिगाड़ने तक, प्रकृति को रुष्ट करने से लेकर स्वयं चिंतन-चेतना में, क्रियाकलापों में विकृतियों की भरमार का कार्य तो उसने पूरे कर लिए, परंतु प्रतिफल जब अकालमृत्यु के रूप में सामने आया तो, किंकर्त्तव्यविमूढ़ हो अदृश्य सत्ता की ओर ताकने लगा है। उनके अनुसार प्रस्तुत समय की विषम परिस्थितियों को अनुकूल बनाने में मात्र परमात्म सत्ता ही सहायक सिद्ध हो सकती है। मनुष्य की शक्ति, क्षमता और प्रतिभा एक सीमित दायरे में थोड़ा-बहुत अपना चमत्कार प्रस्तुत कर सकती है, किंतु विस्तृत भूमंडल की परिस्थितियों का नियंत्रण करना तो दूर, उनकी सूक्ष्मता को समझना भी मुश्किल है। फिर समूचे ब्रह्मांड की स्थिति को समझना तो उसकी शक्ति से सर्वथा परे है।
ब्रिटेन के विख्यात खगोल भौतिकी विशेषज्ञ सर जेम्स जीन्स ने अपनी पुस्तक ‘द वर्ल्ड अराउन्ड अस’ में इसी तरह के उद्गार प्रकट करते हुए कहा है कि “संकट की जिन घड़ियों से हम गुजर रहे हैं, उसमें सुधार-परिवर्तन कर सकना मात्र अदृश्य सत्ता के द्वारा ही संभव है। हममें से हर कोई जब अपनी, अपने परिवार-परिकर की समस्याओं को समझने, सँभालने में विफल रह रहा हो, तो सूर्य के चारों ओर चक्कर लगाने वाले पृथ्वी सहित अगणित ग्रहगोलकों को नियंत्रित कर सकना तो दूर, उनकी पूर्ण जानकारी भी नहीं रख सकता। मनुष्य की शक्ति-सामर्थ्य इसका अनुमान नहीं लगा सकती। संसार की भली-बुरी परिस्थितियों को जान सकना, उनमें सुधार, परिवर्तन कर सकने की क्षमता उसी अदृश्य समर्थसत्ता में है, जिसे ‘डिवाइन माइंड' के नाम से पुकारा गया है। अब हमें उसी का आश्रय लेना होगा और तदनुरूप प्रयत्नशील होने के लिए अपनी मानसिक चेतना को अत्यधिक पवित्र, प्रखर एवं परिष्कृत बनाना होगा। आसन्न संकटों को तभी टाला और सुख-शांति का वातावरण विनिर्मित किया जा सकता है।”
अमेरिकी वैज्ञानिक डॉ. रॉबर्ट एच. स्कूलर का कथन है कि संसार की बढ़ती हुई समस्याओं और विभीषिकाओं के दुष्परिणामों को देखकर, आज का अधिसंख्य बुद्धिजीवी और वैज्ञानिक समुदाय ईश्वरीय सत्ता की महत्ता और जीवन में उसकी भागीदारी की अनिवार्यता में गंभीरतापूर्वक आस्था प्रकट करने लगा है। अब यह धारणा प्रबल होती जा रही है कि दैवी सहायता के बिना, न तो बिगाड़ को सुधारा जाना संभव है और न मानवी सभ्यता को संरक्षित रखा जाना ही। ईश्वर की स्वसंचालित प्रक्रिया ही समस्त विग्रहों को समाप्त करने में समर्थ है, उनके अनुसार सूक्ष्मजगत में ऐसा वातावरण विनिर्मित हो चुका है, जिससे सुखद संभावनाओं की सुनिश्चितता पर विश्वास किया जा सकता है। डॉ. स्कूलर की दैवी सत्ता पर प्रगाढ़ आस्था है और उनने कास्मिक पॉवर के अनुशासन के अनुरूप आचरण करने के लिए एक सघन जन-अभियान भी चला रखा है। 'ऑवर ऑफ पॉवर' नामक सुनिश्चित कार्यक्रम के द्वारा लोगों को प्रार्थना और ध्यान जैसे ईश्वर उपासनात्मक अभ्यासों के द्वारा जीवनशैली को नया रूप प्रदान करने, धार्मिक वातावरण बनाने में वे उत्साहपूर्वक लगे हैं। उनका कहना है कि आसन्न संकटों का निवारण तो दैवी चेतना के द्वारा ही संपन्न होगा, परंतु माध्यम तो मनुष्य ही रहेगा। उसकी सूक्ष्मप्रेरणाएँ वही ग्रहण कर सकते हैं, जिनकी आत्मचेतना जाग्रत एवं परिष्कृत स्तर की होंगी।
ईसाइयों के धर्मग्रंथ बाइबिल के मैथ्यू 21-22 प्रकरण में कहा गया है कि दैवी सत्ता में आस्था रखने से जीवन के समस्त विग्रहों का समापन होता और स्नेह-सद्भाव का, सुख-शांति का वातावरण विनिर्मित होता है। धरती पर स्वर्गीय परिस्थितियों का निर्माण तभी संभव होता है। इसी तथ्य का प्रतिपादन करते हुए इंग्लैण्ड के ख्यातिलब्ध दार्शनिक एवं गुह्यविज्ञानी डॉ. पाल ब्रण्टन ने अपनी पुस्तक “द स्प्रिचुअल क्राइसिस ऑफ मैन” में कहा है कि विगत कुछ वर्षों से विश्व के मूर्धन्य वैज्ञानिकों का ध्यान ‘एन्थ्रोपोमार्फिक गॉड’ की ओर केंद्रित होता जा रहा है, जिसकी अदृश्य शक्ति अनंत एवं सर्वसमर्थ है। संसार के समस्त मनुष्यों की सम्मिलित शक्ति भी उसके समक्ष नगण्य है। उनने इसे ‘डिवाइन पॉवर’ नाम से संबोधित किया है तथा विश्व-व्यवस्था को सुव्यवस्थित रूप से नियंत्रित एवं संचालित करने वाली उसकी विधिक व्यवस्था को ‘डिवाइन लॉ’ की संज्ञा दी है।
मनुष्य जब सब ओर से अपनी असमर्थता प्रकट करने लगता है, परिस्थितियाँ उसके सामर्थ्य से बाहर हो जाती हैं तब दिव्य चेतना अपने दिव्य कानून के अनुसार विनाश के गर्त में लुढ़कती जा रही मानव सभ्यता को उबारती, उसका मार्गदर्शन करती है। वस्तुतः हमारी आंतरिक पुकार जितनी अधिक तीव्र होगी, परम चेतना का उदार, अनुदान भी शीघ्र बरसने लगेगा।
‘यदा-यदा हि धर्मस्य’ वाले गीताकार के कथन का समर्थन करते हुए, एल्गरमैन ब्लैकवुड ने अपनी पुस्तक “द ब्राइट मैसेंजर” में स्पष्ट किया है कि परम सत्ता को अनौचित्य का निराकरण और औचित्य का अभिवर्द्धन ही अभीष्ट है। मानव समाज में दुष्प्रवृत्तियाँ जब अपनी चरम सीमा का उल्लंघन कर जाती हैं तब उनके निवारणार्थ दैवी चेतना का मानव स्वरूप में अवतरण होता है और सत्प्रवृत्ति-संवर्द्धन की पुण्य-प्रक्रिया को विकसित, विस्तारित करने में वह सफल होती है। अब वही समय फिर से आ गया है, जिसमें स्रष्टा अपनी श्रेष्ठतम कृति धरित्री और उस पर निवास करने वाले मानव समुदाय को विनष्ट होने से बचाने के लिए कृत संकल्प है।
अवतार चेतना जब कभी इस धरती पर आती है तो प्रचंड तूफानी प्रवाह के रूप में वह जन-जन के मन-मस्तिष्क को झकझोरती और सन्मार्ग अपनाने तथा अनौचित्य को त्यागने के लिए बाध्य कर देती है। दिव्य चेतना किस प्रकार सृष्टि के असंतुलन को नियंत्रित करती संतुलन बिठाती है, इस व्याख्या-विवेचना से भूतकालीन इतिहास के पन्ने पटे पड़े हैं। सतयुग से लेकर आधुनिक युग तक राम, कृष्ण से लेकर बुद्ध एवं ईसा तक के पौराणिक आख्यान इसके साक्षी हैं। शंकराचार्य, रामकृष्ण, अरविंद, महर्षि रमण, विवेकानंद एवं गाँधी जैसे महामानवों की कथा-गाथाएँ बताती हैं कि वे अवतार चेतना से अनुप्राणित थे और उनके माध्यम से वह चेतना विश्व के नवनिर्माण की प्रक्रिया में संलग्न रही। वही परम सत्ता यदि फिर से मानवी चिंतन चेतना को पतनोन्मुख एवं विध्वंसक गतिविधियों से विमुखकर विधेयात्मक एवं रचनात्मक दिशा में मोड़-मरोड़कर रख दे और नवसृजन की सुखद प्रक्रिया चल पड़े तो इसमें किसी को आश्चर्य नहीं मानना चाहिए।
रामकृष्ण परमहंस के मिलने से पूर्व विवेकानंद महर्षि देवेंद्रनाथ से मिलने गए। देवेंद्रनाथ बड़े ज्ञानी-मर्मज्ञ पंडित थे। आधी रात गंगा में, बजरे में ध्यानमग्न महर्षि का दरवाजा खोला और विवेकानंद ने पूछा— "मैं आप से पूछने आया हूँ— क्या ईश्वर है?" मुझे स्वयं के अनुभव इस संबंध में बताएँ। मैं हाँ या ना से उत्तर चाहता हूँ।" महर्षि बोले— "बैठो! मैं तुम्हें शास्त्रों के अनुसार समझाता हूँ।" विवेकानंद बोले— "शास्त्र तो मैं भी पढ़ लूँगा। मैं तो आप की स्वयं की अनुभूति, स्वयं की शोध, स्वयं का निष्कर्ष सुनने आया हूँ। यदि स्वयं का कोई अनुभव आपके पास नहीं है तो मैं जाता हूँ।" और देवेंद्रनाथ जो इतने वर्षों से साधना करते आ रहे थे; हाँ न कर सके और विवेकानंद को लौटने से न रोक सके; किंतु विवेकानंद जब रामकृष्ण के पास गए और यही प्रश्न उनसे किया। उन्होंने आँखें खोलीं तो विवेकानंद की कँप-कँपी बँध गई। रामकृष्ण बोले— “ईश्वर है या नहीं, यह छोड़ो तुम्हें जानना है तो बोलो और अभी जानना है तो हाँ करो या ना करो; है या नहीं, ये सवाल बेकार है। विवेकानंद लिखते हैं कि उनकी हिम्मत ही न पड़ी कि फिर उलटकर उनसे पूछा जाए; क्योंकि वे वेद, उपनिषद्, शास्त्र, बुद्ध, कृष्ण की किसी की भी गवाही बीच में लाए ही नहीं। वे तो इस बात पर तुल गए कि जैसा मैंने अनुभव किया है वैसा तू भी कर, अभी कर, इसी क्षण कर। कहा जाता है कि काली का साक्षात्कार विवेकानंद को रामकृष्ण देव ने कराया था।
सम्राट अशोक राजदरबार में बैठे एक भिक्षु से बात कर रहे थे। बातों के बीच राजकुमार महेंद्र आ पहुँचे। भिक्षु की निस्पृह दृष्टि और गहन-गंभीर वाणी ने उनको अत्यधिक प्रभावित किया। जिज्ञासावश आखिर पूछ ही लिया।
“पिता जी! आपका परिचय?” “बेटा! यह है— महास्थविर योग्गालि पुत्तत्तिस। जनमानस को परिष्कृत करने, उसे जीवन विद्या सिखाने के लिए इन्होंने समूचा जीवन संघ को समर्पित कर दिया है।" "संघ क्या होता है, देव?" महेंद्र ने फिर प्रश्न किया।
"तात! जो लोग लौकिक आकर्षणों और एैषणाओं का त्यागकर लोकहित में परिव्रज्या का व्रत लेते हैं, उनके समूह का नाम संघ है।"— इस बार उत्तर दिया महास्थविर ने।
“मैं भी इस समूह में आना चाहता हूँ। क्या मुझे भी परिव्रज्या मिलेगी?"— महेंद्र ने बड़े उत्साह के साथ कहा। "नहीं बेटा! अभी लोकोपभोग के योग्य हो तुम। खूब खाओ-पियो और मौज करो।" महात्यागी अशोक को भी पुत्रमोह तो था ही। उसने मना कर दिया; परंतु पुत्र ने अपने पिता से भी एक कदम आगे बढ़कर यह मोह तोड़ दिया।
राजपुत्र बोले— “सांसारिक सुखों की निस्सारता और सद्ज्ञान-प्रसार के महत्त्व को समझकर कौन बुद्धिमान श्रेष्ठ को ठुकराना और निकृष्ट को अपनाना चाहेगा?”
सोलह वर्ष के किशोर के इस उत्तर ने महास्थविर सहित अशोक और माता देवी को हतप्रभ कर दिया। महास्थविर बोले— “राजन! लगता है महेंद्र के अंतराल में तथागत की प्रेरणा उतरी है। शायद यही आगे चलकर ईश्वरीय वाणी का प्रसार करेगा।”
अपने विचार का समर्थन पाकर महेंद्र एक बार पुनः उत्साह के साथ बोला— “देव! यदि आपकी आज्ञा हो तो मैं आज परिव्रज्या ग्रहण कर लूँ। प्रव्रजित होने पर मेरा और आपका दोनों का ही कल्याण है।”
“ठीक है बेटा! महाभिक्षु जैसा परामर्श दें।" और महाभिक्षु ने निर्णय दिया, परिव्रजित होने के लिए किसी भी व्यक्ति को बीस वर्ष से कम नहीं होना चाहिए। तब तक घर में ही रहकर आत्मनिर्माण का आदेश हुआ।"
वय की बीसवीं-इक्कीसवीं संधिवेला में महास्थविर ने राजपुत्र महेंद्र को प्रव्रज्या दी। साथ में महेंद्र की कनिष्ठ बहिन भी लोक-कल्याण के लिए व्रतशील हुई। दोनों भाई-बहिन स्थान-स्थान पर जीने की निर्माणपद्धति सिखाते। नारियों में कर्त्तव्यबोध, आत्माभिमान जाग्रत करने की जिम्मेदारी संघमित्रा ने उठाई। महेंद्र पुरुषों में कुरीतियों, अनीतियों को उखाड़ फेंकने के लिए साहस जगाने लगे। इस कार्य को करते हुए उन्होंने तैंतीस वर्ष का जीवन पार कर लिया। तो एक दिन महास्थविर ने दोनों भाई-बहिन को आमंत्रित कर कहा— "इस समय सिंहल (लंका) वासी अपनी सृजनात्मक क्षमताओं को भूलते जा रहे हैं। उन्हें जीवन के प्रति अविश्वास हो गया है। उन्हें सचेत करने के लिए उनमें प्राण फूँकने के लिए तुम दोनों को ही जाना होगा।"
सद्ज्ञान के प्रचार-प्रसार की जहाँ भी आवश्यकता हो, लोकसेवा के लिए व्रतनिष्ठजन सदैव तैयार रहते हैं। महेंद्र और संघमित्रा ने तुरंत सहमति दी। जलमार्ग की बाधाओं तथा सिंहल नरेश की नीतियों से उन्हें अवगत करा दिया गया।
महाभिक्षु की तथा उपस्थित स्थविरों की वंदना कर दोनों सिंहल अभियान पर चल दिए। उनके पिता ने सांस्कृतिक दिग्विजय का जो स्वप्न देखा था, उसी दिशा में महेंद्र के चरण बढ़े थे। अशोक को इस अवसर पर आमंत्रित किया गया। पुत्र को उत्साहपूर्वक जाते देख अशोक के नेत्र सजल हो उठे। पिता के चरणों में प्रणामकर भाई-बहिन नाव पर जा बैठे।
तब समुद्री यात्रा दुष्कर थी। थोड़ी ही दूरी पर तूफान आ गया, नाव उलट गई; पर जिन कदमों ने पीछे मुड़ना सीखा न हो उसे बाधाएँ क्या कर सकती हैं? उन्होंने सोचा जिस अभियान के लिए वह चले हैं, उसे छोड़कर लौट जाना मानवोचित नहीं है। लाख बाधाएँ क्यों न आए, शूरवीर ‘कार्यं वा साधयामि, शरीरं वा पातयामि' सिद्धांत का अनुसरण करते हैं। नाविक तो तैरकर वापस आ गया; परंतु संघमित्रा और महेंद्र सिंहल की दिशा में बढ़ने लगे। सुयोग से कुछ ही दूरी पर उन्हें उलटी हुई नाव मिल गई, जिसको लेकर उन्होंने अपनी यात्रा पूरी कर ली।
लंका की भूमि पर चरण रखते ही दोनों भाई-बहिन भगवान बुद्ध द्वारा प्रदत्त कार्यसिद्धि की ओर बढ़े। नगर तक पहुँचने के पूर्व वनों में होकर गुजरना पड़ता था। राह में देखा कि एक हिरण पड़ा तड़प रहा है। उसके गर्दन में घुसे तीर को जैसे ही निकाला उसकी जीवन-लीला समाप्त हो गई। तभी वह शिकारी आ पहुँचा जिसके बाण का निशाना वह मृग था। महेंद्र ने देखते ही कहा— "धर्मसम्राट! तिष्य के शासन में आप लोग इतनी निर्दयतापूर्वक प्राणियों का वध करते हैं, वह भी खिलवाड़ के लिए।”
शिकारी जो राजोचित वेश में था। महाभिक्षु महेंद्र के चरणों में गिर पड़ा। अपना परिचय देते हुए कहा—"भंते! मुझसे भूल हो गई। मैं ही सम्राट तिष्य हूँ, जो मात्र विनोद के लिए इन निरापराध पशुओं को मारता रहता हूँ।”
सम्राट तिष्य के इस कथन पर भिक्षु महेंद्र बुदबुदाए— "ठीक ही कहा था महास्थविर ने, यहाँ के निवासी क्रूर और नृशंस होते जा रहे हैं। इनकी सोई संवेदनाओं को जगाना होगा।"
सम्राट तिष्य ने दोनों का आदर-सत्कार किया और राजमहल में ले आए। दूसरे दिन महेंद्र ने तिष्य को जीवनमार्ग की शिक्षा दी और चलने को उद्यत हुए। सम्राट ने कहा— “आप यहीं निवास कीजिए। राज्य के नागरिकों तक आपका संदेश यहीं से पहुँचा दिया जाएगा।”
जनमानस के सफल जानकार परिव्राजक महेंद्र को तिष्य के इस कथन में वहाँ के विहार और धर्म-प्रचारकों की रीति-नीति दिखाई दी। उन्होंने बौद्ध विहारों को देखने की इच्छा व्यक्त की। आशंका सच निकली। सांसारिक मनुष्यों से अधिक विषय, वासना और भोगों में लिप्त धर्म का नेतृत्त्व उस तंत्र के मूल प्रयोजन को कहाँ से पूरा कर सकेगा? संघ का गठन तो इस उद्देश्य से हुआ था कि व्यवस्थित रूप से लोगों को सन्मार्ग की ओर प्रेरित किया जाए, परंतु लोकश्रद्धा का अनुचित लाभ उठाकर भिक्षु धर्मजीवी हो गए हैं। सेवा का मार्ग उपभोग का माध्यम बन जाए तो गड़बड़ी होना स्वाभाविक है।
राजभवन में निवास को अस्वीकृतकर स्थविर महेंद्र ने तप-साधना का मार्ग अपनाया। दोनों तपस्वीगण लोक-मानस के कल्मषों को धोने में निरत हो गए। उन्होंने पहला काम किया व्यक्तियों को ढालने का; भटके परिव्राजकों में कर्त्तव्यबोध जगाने का। श्रद्धास्पद होकर भी श्रद्धातत्त्व के मूल कारणों की उपेक्षा भर्त्सना के योग्य है। यह कहकर उन्होंने परिव्राजकों को उनका समाज के प्रति दायित्व समझाया।
परिव्राजकों की दशा में सुधार करने के बाद वह घूम-घूमकर लोक-जीवन को दिशा देने में संलग्न हुए। धर्मतंत्र का परिष्कार धार्मिक समाज की पहली आवश्यकता है। जब तक यह क्षेत्र विकृत पड़ा रहेगा, जनमानस में आदर्शनिष्ठा नहीं जाग सकती। साठ वर्ष तक कार्यरत रहने वाले इस तपस्वी ने चैत्य पर्वत पर अंतिम वर्षावास किया, इस वर्षावास में उन्होंने शरीर छोड़ दिया। भाई के आदर्शों को अपनाने वाली बहिन ने सभी को आश्वस्त किया। 'स्वयं को समझो, कर्त्तव्य को पहचानो' का संदेश देती हुई वह भी कुछ समय के पश्चात शरीर से परे हो गई।
यों सम्राट अशोक के पाँच पुत्र थे। सभी क्रमशः एक-एक करके राजसिंहासन पर बैठे। इतिहास उनके लिए श्रद्धारहित होकर चार-चार लाइने लिखता है, उनके नाम भी किसी को नहीं विदित हैं; जबकि राज्यपद के अधिकारी होते हुए उसे छोड़ देने वाले राजपुत्र महेंद्र इतिहास में अमर हो गए हैं। वस्तुतः अधिकार या पद नहीं, मनुष्य को महान बनाता है— उसका त्यागमय जीवन और उज्ज्वल चरित्र। ऐसे ही त्यागी और चरित्रवान युवक को परिव्राजक परंपरा पुनः आमंत्रित कर रही है।
अवंतिका के माघ कवि उन दिनों जैसे-तैसे गुजर चला रहे थे, कि उनका परिचित एक व्यक्ति अचानक आ पहुँचा और कन्या-विवाह के लिए घर में कुछ भी न होने की बात कहकर कुछ याचना करने लगा।
माघ ने सब ओर दृष्टि दौड़ाई; पर घर में देने योग्य कुछ न था। उनकी दृष्टि सोती हुई पत्नी के हाथ पर गई। उसके दोनों हाथों में एक-एक सोने की चूड़ी थी। माघ दबे पाँव गए और धीरे से एक चूड़ी उतारकर याचक को देने लगे।
पत्नी उनींदी थी। वह प्रसंग को आधा-अधूरा सुन रही थी। वह उठ बैठी और दूसरे हाथ की चूड़ी भी उतारकर देती हुई बोली— "एक चूड़ी के दाम से बेचारे का काम कैसे चल सकेगा।"
दाता और याचक दोनों की ही, इस महानता ने आँखें छलछला दीं।
महत्त्वपूर्ण अवसरों पर स्वजनों-संबंधियों को ही बुलाया जाता है और उनसे अभिनव परिस्थितियों में सहकार करने की आशा की जाती है। जन्म-मरण जैसी घटनाओं में स्वजन-संबंधी ही प्रमुख रूप से दौड़े आते हैं। विवाह-शादियों के अवसर पर भी उन्हीं की उपस्थिति आवश्यक समझी जाती है। दुर्घटना घटित हो जाने पर भी वही परिकर दौड़ा-दौड़ा आता है। बीमारी, मुसीबत में भी उन्हीं से कुछ आशा-अपेक्षा की जाती है। साथ ही यह भी होता है कि उपहार बाँटते समय भी उन्हीं का प्रमुख रूप से ध्यान रखा जाता है। जीवन भर की कमाई भी उत्तराधिकार में कुटुंबियों, परिजनों के लिए ही प्रसन्नतापूर्वक छोड़ी जाती है, किंतु पड़ोसी-मुहल्ले वाले जान-पहचान होने पर भी प्रायः उदासीनता ही धारण किए रहते हैं। लोकाचार के रूप में ही उथली भाव-संवेदना का दिखावा करते हैं। अपने-परायों के बीच यह अंतर कहीं भी देखा-पाया जा सकता है।
भगवान के भी कुछ स्वजन-संबंधी होते हैं और कुछ मात्र परिचित ही। इन परिचितों में से कुछ तो कौतुकी, मसखरे जैसे होते हैं। कुछ चापलूसों, चाटुकारों को आगे-पीछे फिरते तो देखा जाता है; पर उनकी नीयत केवल यही होती है कि किसी प्रकार दाँव चले, हाथ लगे और प्रशंसा के पुल बाँधने के बदले जो भी हाथ लगे, उसे झपटकर चंपत बना जाए। इस स्तर के लोग प्रदर्शन तो स्वजनों से भी बढ़कर करते हैं, पर परीक्षा का समय आते ही प्रकट हो जाता है कि इन प्रपंचियों का दिखावा मात्र ठगने, बहकाने और फुसलाने भर का था। प्रसंग जब सहयोग देने और सहायता करने का आता है, तो पल्ला झाड़कर अलग हो जाते हैं। मात्र उपहार बँटने और कुछ अपने हाथ लगने की फिराक में ही अपने छद्म द्वारा कुछ का कुछ जताते रहते हैं। सर्वथा पराए होने पर भी अपनेपन की कसमें खाते हैं, पर झूठे और सच्चे का अंतर प्रायः समझदारों द्वारा पहचान ही लिया जाता है। अंतर्यामी परमात्मा को वंचना और विडंबना के जंजाल में फँसा लेना, उन बहेलियों के लिए भी सरल नहीं होता, जो चिड़ियों और मछलियों को आरंभिक चारा दिखाने की प्रवंचना में फँसा, उनका कचूमर निकाल देते हैं।
लोगों को भयंकर और भारी भ्रम इस बात का है कि भगवान वह मुर्गी है, जो सोने का अंडा रोज देती और दबाव बनाने वाले की दरिद्रता दूर करती रहती है। उससे माँगने और पाने के अतिरिक्त तथाकथित भक्तजनों की और कोई मनोकामना होती ही नहीं। इसे पूरी करने के लिए वे अधिक-से-अधिक इतना ही कर सकते हैं कि प्रशंसा के बाँधने वाले स्तवन करें, नामजप की माला और ऐसे ही कुछ अन्य चोंचले-ढकोसले खड़े करे, जिससे बे-अकल भगवान से उसकी झोली खाली कर ली जाए। धूर्त और मूर्खों के बीच प्रायः इसकी शतरंज खेली जाती रहती है। उसका कुछ परिणाम भी होता है क्या? इस संबंध में कुछ निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता है। कभी-कभी अंधे के हाथ बटेर भी अनायास ही लग जाती देखी गई है।
किंतु भगवान को इतना ओछा समझना उपहासास्पद है। राई-रत्ती जैसे पूजा-पत्रों कें, छिट-पुट उपहार और प्रशंसा के गीत गाने, नाचने जैसे मनुहारकृत्य क्या वस्तुतः भगवान का अनुग्रह, वरदान प्राप्त कर सकने में समर्थ हैं? इसका अनुमान एक निरीक्षण-परीक्षण से लगाया जा सकता है कि मंदिरों के लाखों पुजारी और भजनानंदियो भजन की विशालकाय जमाते किस स्तर का गुजारा कर रही हैं, इसे बारीकी से देखा, परखा और जाना जाए। जो प्रायः पूरा समय इस तथाकथित भक्ति-भावना में गुजार देते हैं, उनका व्यक्तित्व तक यदि प्रखर, प्रतिभावान समर्थ और सेवाभावी सहृदय स्तर का न बन सका, तो यह कैसे विश्वास किया जाए कि दस-बीस मिनट उस विडंबना की चिह्नपूजा करने वाले अपनी आकाश-पाताल जैसी मनोकामनाओं को पूरी करा लेने में सफल हो जाएँगे।
देखना उन महामानवों की ओर है, जिननें भले ही पूजा-पाठ कम किया हो, पर अपनी जीवनचर्या में अध्यात्म तत्त्वज्ञान को सही रूप में समाविष्ट किया और आत्मसंतोष के परलोक एवं सम्मान के इहलोक में पूरी तरह सफल सिद्ध हुए। ऐसे लोगों के चिंतन, चरित्र, व्यवहार में पूरी तरह भगवान ओत-प्रोत रहा और उन्हें अपने सान्निध्य का, उपयोगी आदान-प्रदान का प्रत्यक्ष आभास कराता रहा। ऋषियों, तपस्वियों, मनीषियों, महामानवों, लोकसेवियों, उदात्त, संयमशीलता के साधकों को ही सच्चे अर्थों में भक्त माना जा सकता है और उन्हें इस अवलंबन के सहारे पूरी तरह कृत-कृत्य हुए देखा जा सकता है।
धुलाई के बाद ही रँगाई का उपक्रम बन पड़ता है। गलाई के बाद ही ढलाई संभव होती है। आदर्शवाद के क्रियांवयन का आँवा ही उस ऊर्जा से ओत-प्रोत होता है, जिसमें तपकर ईंटों से लेकर मिट्टी के बर्तनों तक की मजबूती तथा उपयोगिता देखते बन पड़ती है। नदियों में उतना ही पानी भरा और बहता रहता है, जितनी कि उनकी गहराई होती है। व्यक्तित्त्ववान हुए बिना कोई आदमी भक्त कहलाने का अधिकारी नहीं बन सकता। यह उदारचेता, आदर्शवादी और दृढ़ प्रतिज्ञ लोगों के द्वारा ही बन पड़ने वाला तपस्वियों जैसा पुरुषार्थ है, जिसे देने वाले की भावना हृदयंगम करते हुए भगवान के द्वार पर पहुँचने और प्रवेश पाने का अवसर मिलता है।
यों भगवान का दरबार सुपर मार्केट की तरह मनचाही वस्तुएँ उचित मूल्य देकर खरीदने के लिए हर किसी के लिए हर समय खुला रहता है, पर किसी समय विशेष के साथ जुड़े हुए सुयोग को अपने ढंग का अनुपम सौभाग्य कहा जा सकता है। प्रतिस्पर्धाएँ कभी-कभी ही होती हैं और उनमें जीतने वालों को तभी लाभ मिलता है, जब निर्धारित समय पर वे समुचित तैयारी के साथ उसमें सम्मिलित होते हैं। अफसरों का चुनाव करने के लिए कभी-कभी ही बोर्ड बैठता है। छात्रवृत्ति पाने की प्रतिस्पर्धाएँ भी समय विशेष पर ही होती हैं। उस स्तर के सुयोग हर कभी नहीं बने रहते। ऐसा सुयोग इन्हीं दिनों है कि ईश्वर की इच्छा, आवश्यकता और माँग के अनुरूप भक्तजन अपने को प्रस्तुत और समर्पित करें और बदले में ऐसा उपहार पाएँ, जो सहस्राब्दियों बाद कभी आता है और साहस दिखाने वालों को अजर-अमर कर जाता है।
यह युग-परिवर्तन की वेला है। स्रष्टा को अपना अभीष्ट प्रयोजन पूरा करना है। नवयुग अवतरण की प्रतिज्ञा से वचनबद्ध सत्ता इक्कीसवीं सदी में उज्ज्वल भविष्य की संरचना करने जा रही है। इससे पूर्व का प्रस्तुत समय युगसंधि के नाम से जाना जाता है। इन दिनों दैवी प्रयोजन में सहयोग कर सकने वालों की आवश्यकता पड़ रही है। कारण कि भगवान निराकार होने के कारण प्रायः मनुष्य शरीरधारियों से अपने प्रयोजन पूरे कराते हैं। जो उसके लिए कटिबद्ध रहते हैं, वे हनुमान और अर्जुन की तरह धन्य बन जाते हैं। समय निकल जाने पर उसके लिए बहुत पीछे जगने वालों को उस लाभ से वंचित ही रहना पड़ता है। स्वतंत्रता सेनानी उच्च पद और उपहार उपलब्ध कर सके। अब समय निकलने पर कोई जेल जाने का प्रस्ताव करे, तो वह लाभ नहीं मिल सकता, जो समय पर जग पड़ने वाले पा सके। ईश्वर को जो देना था, वह मनुष्य जन्म के रूप में दे चुका, अब उसी का सदुपयोग करके अभीष्ट साधन और वैभव उपलब्ध करना ही सीधा मार्ग है। इस उपलब्धि के बाद अनेकानेक मनोवांछाओं को पूरा करने के लिए गिड़गिड़ाना अपनी ही दीनता और हीनता का परिचय देना है। इससे आगे तो जो पाया था, उसका ब्याज समेत ऋण चुकाना ही शेष रह जाता है। यही धर्म है, यही कर्म और यही औचित्य।
अब आगे दिशाधारा मोड़ने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं। भक्तमंडली, स्वर्गमुक्ति और ऋद्धि-सिद्धि की दुनिया में उड़ानें भरती है। पूजा भर से मनोवांछाएँ पूरी कराने वाले सनकियों की अपनी दुनिया है। लोक-मानस— परिष्कार, चरित्रनिष्ठा और समाज की अभिनव संरचना पर किसी का ध्यान नहीं। होना यह चाहिए कि भावना, श्रम-साधनों का उपयोग ऐसे केंद्रबिंदु पर एकत्र किया जाए, जिससे समाजसेवियों की संख्या और सत्प्रवृत्ति-संवर्द्धन-प्रक्रिया को प्राचीनकाल की तरह अब फिर नया श्रेय-सम्मान मिल सके। यही है धर्म-धारणा और ईश्वरीय प्रेरणा की अभिनव दिशाधारा।
पर्वतारोहियों के दल का एक सदस्य लड़खड़ाया। उसने सामने वाली ऊँची चोटियों को देखकर कहा— “इतनी ऊँचाई तक चढ़ सकना, मेरे लिए संभव नहीं।”
साथियों ने उसे नीचे देखने को कहा— "गहरी खाई नीचे की ओर थी। जमीन तो बहुत पीछे काफी निचाई पर निकल गई थी।" पुनर्विचार करके वह आगे बढ़ने को तैयार हो गया कि जब इतना चढ़ लिया गया तो आगे भी चढ़ते रहना क्यों कठिन होना चाहिए।
अस्पताल की शैया पर लेटी वह कुछ पढ़ रही थी। पढ़ते-पढ़ते अचानक उसकी आँखें चमक उठीं, चेहरा खिल उठा। मुख से अस्फुट स्वर निकले— "एकदम सही।" पास बैठी माँ ने पूछा— “क्या है बेटी?” “माँ! इसमें एक आश्चर्यजनक वाक्य लिखा है।”
“क्या?”
“अभी भी तुममें ऐसा कुछ है, जिसको पोषण देकर न केवल तुम स्वयं प्रसन्न रह सकती हो; वरन औरों को भी प्रसन्नता बाँट सकती हो।”
"जरूर होगा”— माँ का निराश स्वर था। पास खड़ी दूसरी महिला ने व्यंग्यात्मक स्वर में कहा— "कल्पना की उड़ान भले उड़ लो, नहीं तो अब क्या बचा है? टूटी हुई टाँगें, टूटी हुई रीढ़।" यही न बात सही थी, उसकी टाँगें बेकार हो चुकी थीं, रीढ़ की हड्डी भी जख्मी थी। “तो क्या यही सब कुछ है।” "नहीं-नहीं!" "शरीर सब कुछ नहीं हो सकता; इसकी संचालक संज्ञा इसकी अपेक्षा कहीं अधिक सामर्थ्यवान है।”— मन ने कायरतापूर्ण विचारों को झटक दिया।
अस्पताल से छुट्टी मिली। घर पहुँचने पर कोई संवेदना व्यक्त कर रहा था। कुछ अपंग हालत पर अफसोस प्रकट कर रहे थे। इन सभी के स्वरों में कहीं आशा-उत्साह नजर नहीं आ रहा है।
"तो क्या?" तभी उसे इंजील की बात याद आई— “उनकी बातों पर ध्यान मत दो, जो स्वयं के अंदर विद्यमान ईश्वर के राज्य की अवहेलना कर रहे हैं। सामर्थ्य का स्रोत अंदर है।”
विश्वास की दृढ़ता से उसे अनुभव होने लगा था कि सचमुच अभी ऐसा कुछ है, जिसके आधार पर प्रसन्न रह सकती है, यह है मनोबल।
पर दूसरों के किस काम आ सकेगी? इसी सोच में दिन बीत रहे थे कि एक दिन दूरदर्शन प्रासारिका के स्थान की रिक्ति का समाचार मिला। आवेदन किया, बुलावा आया। चयनकर्त्ता भी उसे देखकर चकित थे। "क्या कर सकेगी यह लड़की?" किंतु उसकी आवाज की मधुरता और आत्मबल की दृढ़ता के सामने उनको घुटने टेकने पड़े।
अब उसका उद्देश्य था, जन-जन में जीवन के प्रति खोए विश्वास को जगाना। पहली बार जब उसने टेलीविजन के सामने अपनी जीवन कहानी बताई तो लोग अभिभूत हो उठे; रो पड़े।
क्या इस हालत में भी जीवन के प्रति इतना अटूट विश्वास बरकरार रह सकता है? हाँ! अवश्य; पर विश्वास, मनोबल, उत्साह, आत्मविश्वास सभी कुछ तभी संभव हो सकता है, जब आप सद्विचारों को अपना आत्मीय माने। वह सबसे कहती— "मेरा अपना निजी अनुभव है, जब अपने आत्मीय सघन हितैषी कहे जाने वाले व्यक्ति साथ छोड़ देते हैं, निराशाजनक बातें करने लगते हैं। उस समय भी एक आत्मीय रह जाता है, वह है— सद्विचारों का प्राणपुंज, जो नवचेतना प्रदान करता और मनोबल को वज्रवत बनाए रखता है। प्रत्यक्ष को प्रमाण क्या?"
सभी ने न केवल उसकी बात मानी, बल्कि उसे अपने जीवन की प्रखर-प्रेरणा के रूप में स्वीकार किया।
दीप से दीप जलते हैं। विश्वास से विश्वास जगता है। मनोबल से मनोबल पनपता है। अनेकों में जीवन के प्रति खोया विश्वास वापस लाने वाली, मनोबल उमगाने वाली, प्रकाश फैलाने वाली यह नवयुवती है— जर्मन दूरदर्शन की उद्घोषिका कु. पेट्राक्रान्स। जो स्वयं अपंग, विकलांग होते हुए भी सद्विचारों को अपना आत्मीय बनाकर स्वयं प्रसन्न बनी, औरों में उसने प्रसन्नता बिखेरी। सैकड़ों पत्रों द्वारा जनसमूह इनके कार्यक्रमों के लिए लालायित रहता है, ताकि कुछ और सीख सकें। वह इतनी लोकप्रिय है कि एक दिन भी कार्यक्रम में न दिखाई पड़े तो पत्रों का अंबार जर्मन टीवी केंद्र पर लग जाता है। इसे कहते हैं— मनोबलजन्य वह आत्मीयता, जो लोगों को अपना बनाकर व्यक्ति को लोक-सम्मान का जन-अभिनंदन का पात्र बना देती है।
अस्पताल की शैया पर लेटी वह कुछ पढ़ रही थी। पढ़ते-पढ़ते अचानक उसकी आँखें चमक उठीं, चेहरा खिल उठा। मुख से अस्फुट स्वर निकले— "एकदम सही।" पास बैठी माँ ने पूछा— “क्या है बेटी?” “माँ! इसमें एक आश्चर्यजनक वाक्य लिखा है।”
“क्या?”
“अभी भी तुममें ऐसा कुछ है, जिसको पोषण देकर न केवल तुम स्वयं प्रसन्न रह सकती हो; वरन औरों को भी प्रसन्नता बाँट सकती हो।”
"जरूर होगा”— माँ का निराश स्वर था। पास खड़ी दूसरी महिला ने व्यंग्यात्मक स्वर में कहा— "कल्पना की उड़ान भले उड़ लो, नहीं तो अब क्या बचा है? टूटी हुई टाँगें, टूटी हुई रीढ़।" यही न बात सही थी, उसकी टाँगें बेकार हो चुकी थीं, रीढ़ की हड्डी भी जख्मी थी। “तो क्या यही सब कुछ है।” "नहीं-नहीं!" "शरीर सब कुछ नहीं हो सकता; इसकी संचालक संज्ञा इसकी अपेक्षा कहीं अधिक सामर्थ्यवान है।”— मन ने कायरतापूर्ण विचारों को झटक दिया।
अस्पताल से छुट्टी मिली। घर पहुँचने पर कोई संवेदना व्यक्त कर रहा था। कुछ अपंग हालत पर अफसोस प्रकट कर रहे थे। इन सभी के स्वरों में कहीं आशा-उत्साह नजर नहीं आ रहा है।
"तो क्या?" तभी उसे इंजील की बात याद आई— “उनकी बातों पर ध्यान मत दो, जो स्वयं के अंदर विद्यमान ईश्वर के राज्य की अवहेलना कर रहे हैं। सामर्थ्य का स्रोत अंदर है।”
विश्वास की दृढ़ता से उसे अनुभव होने लगा था कि सचमुच अभी ऐसा कुछ है, जिसके आधार पर प्रसन्न रह सकती है, यह है मनोबल।
पर दूसरों के किस काम आ सकेगी? इसी सोच में दिन बीत रहे थे कि एक दिन दूरदर्शन प्रासारिका के स्थान की रिक्ति का समाचार मिला। आवेदन किया, बुलावा आया। चयनकर्त्ता भी उसे देखकर चकित थे। "क्या कर सकेगी यह लड़की?" किंतु उसकी आवाज की मधुरता और आत्मबल की दृढ़ता के सामने उनको घुटने टेकने पड़े।
अब उसका उद्देश्य था, जन-जन में जीवन के प्रति खोए विश्वास को जगाना। पहली बार जब उसने टेलीविजन के सामने अपनी जीवन कहानी बताई तो लोग अभिभूत हो उठे; रो पड़े।
क्या इस हालत में भी जीवन के प्रति इतना अटूट विश्वास बरकरार रह सकता है? हाँ! अवश्य; पर विश्वास, मनोबल, उत्साह, आत्मविश्वास सभी कुछ तभी संभव हो सकता है, जब आप सद्विचारों को अपना आत्मीय माने। वह सबसे कहती— "मेरा अपना निजी अनुभव है, जब अपने आत्मीय सघन हितैषी कहे जाने वाले व्यक्ति साथ छोड़ देते हैं, निराशाजनक बातें करने लगते हैं। उस समय भी एक आत्मीय रह जाता है, वह है— सद्विचारों का प्राणपुंज, जो नवचेतना प्रदान करता और मनोबल को वज्रवत बनाए रखता है। प्रत्यक्ष को प्रमाण क्या?"
सभी ने न केवल उसकी बात मानी, बल्कि उसे अपने जीवन की प्रखर-प्रेरणा के रूप में स्वीकार किया।
दीप से दीप जलते हैं। विश्वास से विश्वास जगता है। मनोबल से मनोबल पनपता है। अनेकों में जीवन के प्रति खोया विश्वास वापस लाने वाली, मनोबल उमगाने वाली, प्रकाश फैलाने वाली यह नवयुवती है— जर्मन दूरदर्शन की उद्घोषिका कु. पेट्राक्रान्स। जो स्वयं अपंग, विकलांग होते हुए भी सद्विचारों को अपना आत्मीय बनाकर स्वयं प्रसन्न बनी, औरों में उसने प्रसन्नता बिखेरी। सैकड़ों पत्रों द्वारा जनसमूह इनके कार्यक्रमों के लिए लालायित रहता है, ताकि कुछ और सीख सकें। वह इतनी लोकप्रिय है कि एक दिन भी कार्यक्रम में न दिखाई पड़े तो पत्रों का अंबार जर्मन टीवी केंद्र पर लग जाता है। इसे कहते हैं— मनोबलजन्य वह आत्मीयता, जो लोगों को अपना बनाकर व्यक्ति को लोक-सम्मान का जन-अभिनंदन का पात्र बना देती है।
यूनान के राजदूत ने भारत सम्राट के गुरु, राष्ट्रनीति के संचालक चाणक्य की विद्वता, कूटनीतिज्ञता तथा सादगी की बात सुनी तो उनसे भेंट करने चल पड़ा। चाणक्य की कुटिया गंगा के किनारे थी। वह राजदूत तलाश करता हुआ गंगातट पर पहुँचा, उसने देखा— एक बलिष्ठ व्यक्ति गंगा में नहा रहा है। थोड़ी ही देर बाद वह निकला। उसने पानी का घड़ा उठाया, अपने कंधे पर रखा और चल दिया।
राजदूत ने कहा—“क्यों भाई! मुझे आचार्य चाणक्य के निवास स्थान का पता बताओगे?”
उसने घास-फूस से निर्मित कुटी की ओर हाथ से संकेत कर दिया।
राजदूत को बड़ा आश्चर्य हुआ कि मैंने भारत के प्रधानमंत्री का निवास पूछा था और इसने कुटिया की ओर इशारा कर दिया। भला प्रधानमंत्री कुटिया में क्यों रहने लगा? विश्वास नहीं हुआ; काफी देर खड़ा रहा; सोचा; कोई दूसरा निकले तो पूछूँ।
इसी बीच एक अन्य व्यक्ति गुजरा। उससे उसने वही प्रश्न दुहराया।
श्रद्धासिक्त भरे स्वर में उसने कहा— "सामने जो कुटिया दिख रही है, आचार्य उसी में रहते हैं।"
“चलो देख लेते हैं", सोचकर उसके कदम कुटिया की ओर मुड़ गए।
पहुँचकर देखा— कुटिया का द्वार खुला है। एक कोने में थोड़े से बरतन रखे हैं। एक किनारे पर जल का वही घड़ा, जो गंगा से कुछ देर पहले लाया गया है। एक चटाई और मोटे-मोटे ग्रंथों का संग्रह।
इसके सबके बीच कुछ और था। वह था— एक साँवला व्यक्ति, जो टिमटिमाते दीपक के प्रकाश में कुछ लिख रहा था।
“मैं प्रधानमंत्री चाणक्य से मिलना चाहता हूँ”— राजदूत ने कहा।
आवाज ने ध्यान भंग किया। लिख रहे व्यक्ति ने लेखनी रखी; जल रहे दीपक से दूसरा दीपक जलाया, पहला बुझा दिया। इस कार्य को करते उसके मुख से शालीन वाणी निकली— “स्वागत है अतिथि आपका। मुझे ही चाणक्य कहते हैं।”
राजदूत के नेत्र आश्चर्य से खुले रह गए। इस व्यक्ति से तो अभी-अभी स्नान के बाद भेट हो चुकी थी। लंबी-सी चोटी, साधारण-सी धोती पहने लेखन में मग्न किसी देश का प्रधानमंत्री भी हो सकता है? स्वावलंबन का यह अनोखा जीवन कि पानी तक स्वयं भर कर लाता है। जी हुजूरी करने वाले नौकरों-चाकरों का नामोनिशान नहीं। फर्नीचर-अलमारियों का सर्वथा अभाव। वह खड़ा देखता रह गया। फिर भी कुछ पूछना बाकी था।
सो उसने कहा— "एक बात पूछना चाहता हूँ।" "कहिए! दीपक जलाने-बुझाने का क्या रहस्य है?" “रहस्य कुछ नहीं।” आचार्य ने मुसकराते हुए कहा— “पहले वाले में राजकोष का तेल था, दूसरे वाले में मेरी आय का।”
“आप की आय का स्रोत क्या है?" “पुस्तकों के लेखन और अध्यापन से गुजारे भर का ले लेता हूँ। छात्र जो देते हैं उसमें से आवश्यक अंश लेकर बाकी गरीब छात्रों के लिए खर्च कर देता हूँ।”
“ओह! तो गुजारे के लिए भी राजकोष पर निर्भरता नहीं।” “और कोई जिज्ञासा है?”
"नहीं! आपकी जीवन-प्रणाली ने मेरी सारी जिज्ञासाएँ शमन कर दीं, आचार्य! मैं धन्य हुआ।"
जब वह अपने देश लौटा तो लिखा— “भारत में राष्ट्रनिर्माण का रहस्य मिला। राष्ट्रनिर्माता वही बन सकता है, सादगी और संयम जिसके जीवन के अविभाज्य अंग हों। जो भी देश और समाज, जब कभी उन्नति करेगा, ऐसे ही निर्माताओं के बल पर करेगा। अतीत का गौरव पुनः स्थापित हो, इसके लिए ऐसे ही राष्ट्रनिर्माता के रूप में स्वयं को गढ़ना होगा।”
लेनिन पर विरोधियों ने आक्रमण करके घायल कर दिया। उन्हें अस्पताल में भर्ती रहना पड़ा।
उन्हीं दिनों पास में एक रेलवे लाइन बन रही थी। लेनिन चुपचाप अस्पताल से निकल जाते और श्रमिकों के साथ रहकर उनका हाथ बँटाते। 'संघर्षपरायण' योद्धा कभी विश्राम नहीं करते।
पदार्थ-संपदा की उपयोगिता और महत्ता कितनी ही बढ़ी-चढ़ी क्यों न हो, पर यदि उसका दुरुपयोग चल पड़े तो अमृत भी विष बनकर रहता है। कलम बनाने के काम आने वाला चाकू किसी के प्राण हरण का निमित्त कारण भी बन सकता है। समर्थता, संपन्नता और चतुरता के नाम से जानी जाने वाली बलिष्ठता, संपदा और शिक्षा के संबंध में भी यही बात है। उनके सत्परिणाम तभी देखे जा सकते हैं, जब सदुपयोग का प्रयोग कर सकने वाली सद्बुद्धि को अहम भूमिका निबाहने का अवसर मिले। यहाँ इतना और भी समझ लेना चाहिए कि नीतिनिष्ठा और समाजनिष्ठा का अवलंबन अपनाए रहने वाली सद्बुद्धि की सत्ता, अपने आप में स्वतंत्र नहीं है। उसमें भाव-संवेदनाओं का पवन-प्रवाह ही भले-बुरे लगने वाले ज्वार-भाटे लाता रहा है।
मस्तिष्क आमतौर से सभी के सही होते हैं। पागलों और सनकियों की संख्या तो सीमित ही होती है। फिर अच्छे-खराब मस्तिष्क आदर्शवादी उत्कृष्टता क्यों नहीं अपनाते? उन्हें अनर्थ ही क्यों सूझता रहता है? उनके निर्णय, निर्धारण ऐसे क्यों कर बन पड़ते हैं? जिनके कारण सुविधा, प्रसन्नता और प्रगति जैसा कुछ बन पड़ना तो दूर, उलटे संकटों, विपन्नताओं, विभीषिकाओं का ही सृजन होता रहा है। इस तथ्य का पता लगाने के लिए हमें भाव-संवेदनाओं की गहराई में उतरना होगा और इसी तथ्य को समझना होगा कि उसमें श्रद्धा-संवेदना की शीतल, सरसता भरी रहने पर भी सदाशयता का वातावरण बना रहता है। यदि उसमें शुष्कता, निष्ठुरता का माहौल बन जाए तो समझना चाहिए, अब इस क्षेत्र पर आश्रित रहने वाले प्राणियों में से किसी के भी बच सकने की संभावना का समापन हो गया है। मानसिकता तो उस चेरी की तरह है, जो अंतः श्रद्धारूपी रानी की सेवा में हर घड़ी-खड़ी रहती है और हुक्म बजाने में आना-कानी नहीं करती।
स्वेच्छाचारी, बुद्धिमत्ता की दृष्टि में उन आदर्शों का कोई मूल्य नहीं, जो धर्मधारणा, सेवा-साधना उभारती, संयम अपनाने के लिए बाधित करती और क्षमताओं को पुण्य-परमार्थ के साथ नियोजित करती है। वह न केवल निरुत्साहित करती है, वरन प्रत्यक्ष घाटा पड़ने की बात कहकर उसके विपरीत विद्रोह भी खड़ा करती है। इसी मानसिकता को दूसरे शब्दों में कुटिलता, नास्तिकता, शालीनता को पूरी तरह समाप्त कर देने में समर्थ उपल वृद्धि के समतुल्य भी समझा जा सकता है। स्पष्ट है कि देवमानवों में से प्रत्येक को अपनी सुविधाओं, मनचली इच्छाओं पर अंकुश लगाना पड़ा है और उस बचत को उत्कृष्टताओं के समुच्चय समझे जाने वाले भगवान के चरणों पर अर्पित करना पड़ा है। लोक-मंगल के लिए, आत्मपरिष्कार के लिए अपनी क्षमता का कण-कण समर्पित करना पड़ा है। इसी मूल्य को चुकाने पर किसी को दैवी अनुग्रह और उसके आधार पर विकसित होने वाला उच्चस्तरीय व्यक्तित्व उपलब्ध होता है। महानता इसी स्थिति को कहते हैं। इसी वरिष्ठता को चरितार्थ करने वाले देवमानव या देवदूत कहलाते हैं।
तात्त्विक दृष्टि से यह प्रगतिशीलता, कुटिलता की पक्षधर बुद्धिवादी मानसिकता को तनिक भी नहीं सुहाती। इसमें उसे प्रत्यक्षतः घाटा-ही-घाटा दीखता है। अपना और दूसरों का जो कुछ भी उपलब्ध हो, उस सबको हड़प जाना या बिखेर देना ही उस भौतिक दृष्टि का एकमात्र निर्धारण है, जो जनमानस पर प्रमुखतापूर्वक छाई हुई है। संकीर्ण स्वार्थपरता, अभीष्ट उपयोग कि ललक उभरती है। उसी की प्रेरणा से वह निष्ठुरता पनपती है, जो मात्र हड़पने की ही शिक्षा देती है, जिसके लिए भले ही किसी स्तर का अनाचार बरतना पड़े। निष्ठुरता इस स्थिति की देन है।
दोष न तो विज्ञान का है, न बुद्धिवाद का। बढ़ी-चढ़ी उपलब्धियों को भी वर्तमान अनर्थ के लिए दोषी नहीं ठहराया जा सकता, क्योंकि यदि उपार्जन, अभिवर्द्धन का उपयोग सत्प्रयोजनों के लिए बन पड़ा होता तो उस बढ़ोत्तरी के आधार पर अपनी दुनिया को स्वर्गलोक से बढ़कर सिद्ध होने की चुनौती दी होती; पर उस दुर्बुद्धि को क्या कहा जाए जो पूतना, ताड़का, सुरसा की तरह मात्र अनर्थ संपादन पर ही उतारू है।
प्रदूषण, विकिरण, युद्धोन्माद, दरिद्रता, पिछड़ापन, अपराधों का आधार ढूँढ़ने पर एक ही निष्कर्ष निकलता है कि उपलब्धियों को दानवी स्वार्थपरता के लिए नियोजित किए जाने पर ही यह संकट उत्पन्न हुए हैं। शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को चौपट करने में असंयम और दुर्व्यसन ही प्रधान कारण हैं। मनुष्यों के मध्य चलने वाले छल, छद्म, प्रपंच एवं विश्वासघात के पीछे भी यही मानसिकता काम करती है। इनमें जिस अवांछनीयता का आभास मिलता है; वस्तुतः वे सब विकृत मानसिकता की ही देन है।
यदि विकसित बुद्धिवाद का, विज्ञान का, वैभव का, कौशल का उपयोग सदाशयता के आधार पर बन पड़ा होता तो खाई-खंदकों के स्थान पर समुद्र के मध्य प्रकाश-स्तंभ बनकर खड़ी रहने वाली मीनार बनकर खड़ी हो गई होती। कुछ वरिष्ठ समर्थ कहलाने वाले लोग यदि उपलब्धियों को अपने लिए प्रयुक्त न कर रहे होते तो उस जंजाल से छूटी हुई प्रगति जन-जन के सुख-सौभाग्य में अनेक गुनी बढ़ोतरी कर रही होती। हँसता-हँसाता, खिलता-खिलाता जीवन जी सकने की सुविधा हर किसी को मिल गई होती; पर उस विडंबना को क्या कहा जाए, जिसमें विकसित मानवी कौशल ने उन दुरभिसंधियों के साथ तालमेल बिठा लिया जो गिरों को गिराने और समर्थों को सर्वसंपन्न बनाने के लिए बेहतर उतारू हों।
विकृतियाँ दीखती भर ऊपर हैं; पर उनकी जड़ अंतराल की कुसंस्कारिता के साथ जुड़ी रहती हैं। यदि उस क्षेत्र को सुधारा, संभाला, उभारा जा सके तो समझना चाहिए कि चिंतन, चरित्र और व्यवहार बदला और साथ ही उच्चस्तरीय परिवर्तन भी सुनिश्चित हो गया।
भगवान असंख्य ऋद्धि-सिद्धियों के भंडार हैं। उनमें संकटों के निवारण और अवांछनीयताओं के निराकरण की भी समग्र शक्ति है। वह मनुष्य के साथ संबंध घनिष्ठ करने के लिए भी उसी प्रकार लालायित रहते हैं, जैसे माता अपने बालक को गोदी में उठाने, छाती से लगाने के लिए लालायित रहती है। मनुष्य ही है, जो वासना, तृष्णा के खिलौने से खेलता भर रहता है और दुलार की ओर से मुँह मोड़े रहता है, जिसे पाकर वह सच्चे अर्थों में कृत-कृत्य हो सकता था, उसे समीप तक बुलाने और उस विभूतिवान का अतिरिक्त उत्तराधिकार पाने के लिए यह आवश्यक है कि उसके बैठने के लिए साफ-सुथरा स्थान पहले से ही निर्धारित कर लिया जाए। यह स्थान अपना अंतःकरण ही हो सकता है।
दिव्य सत्ताओं का द्विधा मिलन एक तीसरी दिव्य संवेदना कहलाती है, जो नए सिरे से, नए उल्लास के साथ उभरती है। यही उसकी यथार्थता वाली पहचान है, अन्यथा मान्यता तो प्रतिमाओं में भी आरोपित की जा सकती है। तस्वीर देखकर भी प्रियजन का स्मरण किया जा सकता है, पर वास्तविक मिलन इतना उल्लास भरा होता है कि उसकी अनुभूति अमृत निर्झरणी उभरने जैसी होती है। इसका अवगाहन करते ही मनुष्य कायाकल्प जैसी देवोपम स्थिति में जा पहुँचता हैं, उसमें हर किसी में अपना आपा हिलोरें लेता दीख पड़ता है और समग्र लोक-चेतना अपने भीतर घनीभूत हो जाती है। ऐसी स्थिति में परमार्थ ही सच्चा स्वार्थ बन जाता है। यही है— मानव में देवत्व का उदय एवं धरती पर स्वर्ग का अवतरण।
एक व्यक्ति नदी के किनारे पहुँचा, आत्महत्या करने। पास ही संत की कुटिया थी। संत सब देख रहे थे। वह कूदने ही वाला था कि संत ने आवाज लगाई— “ठहर”। उसने कहा— "रोको मत! मुझे मरना ही है। जिंदगी बेकार है। यहाँ कुछ भी नहीं है। परमात्मा भी मुझसे रूठ गया है, सबको निहाल कर दिया है, मेरे पास कुछ भी नहीं है।" संत ने कहा— "आज रात ठहर जा। चाहे तो कल मर जाना।” संत की बात मानकर वह रात भर ठहर गया। प्रातः संत उस व्यक्ति को लेकर राजमहल पहुँचे। सारा वृत्तांत सुनाया, फिर उसे आकर कान में बताया कि "राजा साहब को तुम्हारी आँखों की जरूरत है। एक लाख रुपया दे रहे हैं, एक आँख का। दोनों दे दोगे तो दो लाख देने को तैयार हैं।" उसने कहा— "मैं आँखें बेच दूँ, फिर देखूँगा काहे से।" संत फिर राजा के पास गया। थोड़ी देर में लौटकर आया और बोला— “यदि कान भी देते हो तो चार लाख रुपया देने को तैयार हैं और नाक देनी हो तो पाँच लाख।" उसने कहा— “क्या मतलब”, “मैं आँख, कान, नाक बेच दूँ? उसने कहा— “सम्राट हाथ-पैर तक भी खरीदने को तैयार है। तू चाहे तो सबका सौदा तय कर ले, दस लाख देंगे।" अब तो वह चकराया कि मात्र शरीर की इतनी कीमत। संत ने कहा— "तूने कभी अकल पसारकर सोचा कि सुरदुर्लभ तन जो तुझे मिला, क्या इस प्रकार बे-अकली से बुरी तरह नष्ट करने के लिए मिला था। लाखों-करोड़ों लोग तुझसे भी गई-बीती स्थिति में होंगे।" मनुष्य की समझ में आ गया, मानव जीवन का महत्त्व। उसने आत्महत्या का इरादा छोड़ा व पुरुषार्थ में जुट पड़ा।
ब्रह्ममुहूर्त्त को साधना का काल माना गया है। घटती-मिटती-हटती तमिस्रा और तेजी से दौड़ते आ रहे नवप्रभात के क्षणों में अर्जित की गई ओजस्विता और प्रखरता की सिद्धियाँ, नए दिन के नए प्रभात का आनंद सौ गुना बढ़ा देती है। जब ब्रह्मवेला की व्यापकता युगों के दायरे में फैल गई हों। उस समय, जबकि बुद्धिवाद की घटती निशा और भाव-संवेदनाओं का प्रभात अपने मिलन बिंदु पर आ पहुँचे हों, जीवन-साधना में सक्रियता और तन्मयता अधिक हो जाती है।
प्रत्येक साधना का एक ही परिणाम है— सिद्धि। जीवन-साधना भी इसका अपवाद नहीं है। सिद्धियाँ यह बताती हैं कि साधना सही क्रम में और ठीक दिशा में गतिमान है। यदि इन्हें साधना की प्रामाणिकता का मानदंड माना गया हो तो आश्चर्य क्या? जीवन-साधना के मानदंडों के रूप में हमने चित्र-विचित्र ख्याल बना रखें हैं। ख्यालों के अनुरूप ख्वाब देखे जाते हैं, सपने संजोए जाते हैं। सिद्धियाँ क्या हैं? इस प्रश्न के बारे में अधिकांश के जवाब होंगे— पानी पर चलना, आग पर दौड़ना, आकाश में उड़ना और न जाने कितनी ऐसी अनेकों विलक्षण बातें सुनने को मिलेंगी।
यदि यही प्रश्न लेकर हम ऋषिप्रणीत शास्त्रों के पास जाएँ तो प्राप्त होने वाला उत्तर साफ यह कर देता है कि सिद्धियाँ व्यक्तित्व विकास की सफल प्रक्रिया के चिह्न हैं। ये क्या हैं? और कितने हैं? के उत्तर में महर्षि कपिल अपने सांख्य दर्शन के तीसरे अध्याय के 44 वें सूत्र में कहते हैं— “ऊहादिभिः सिद्धिरष्टधा।" इन आठों का और खुलासा करने पर मालूम होता है, पहली सिद्धि है— 'ऊह' अर्थात युक्तिपूर्ण चुनाव की योग्यता। जिसे भले और बुरे में भले को चुनकर भलाई की राह पर चलना आ गया, समझना चाहिए कि उसे यह पहली सिद्धि मिल गई।
दूसरी है— 'शब्द'। इसका अभिप्राय प्रज्ञा-पुरुष के उन संकेतों से है जो सन्मार्ग पर चलने को प्रेरित करते हैं। तीसरी है— 'स्वाध्याय'। इसका तात्पर्य उन पुस्तकों का अध्ययन है जो अपने को समझने में सहायक हो, जिसकी मदद से स्वयं के चिंतन, चरित्र व व्यवहार को सुधारा जा सके। चौथी का नाम है— सुहृत प्राप्ति अथवा 'सत्संग'; ऐसे लोगों का संग, जो हमें समय की पहचान कराएँ, हमारे मनोबल को मजबूत बनाएँ, जिससे जीवन-साधना अविराम चलती रहे। पाँचवीं सिद्धि है— 'दान' अर्थात अपने समय का कुछ भाग स्वयं के अनुभवों को दूसरों को बताने व उन्हें सन्मार्ग की ओर मोड़ने में लगाना। अपने प्रयत्नों से स्वाध्याय और सत्संग की प्रक्रिया को वह तेजी देना, जिससे दूर अनेकों व्यक्ति जीवन-साधना को अपना सकें; स्वयं के व्यक्तित्व को परिपक्व बना सकें।
महर्षि इन पाँचों को प्राथमिक सिद्धियाँ मानते हैं। जिस किसी को ये पाँच सिद्धियाँ मिल जाती हैं, उसे अगली तीन प्राप्त होती हैं, जिन्हें वह चरम और परम बताते हैं। इन तीनों में पहली है— 'भौतिक दुख विघात'। जो जीवन जीने की कला में निष्णात हो गया। जिसे कम में गुजारा करना, मेल-प्रेम से रहना आ गया हो, उसे किस बात का दुःख। दूसरी है— 'दैविक दुःख विघात'। इसका संबंध चिंतन की चमक से है। साफ-सुथरा चिंतन, सुधरी सोच, उन्नत कल्पनाएँ हर किसी को कहीं भी प्रमुदित बनाए रख सकती है। अंतिम सिद्धि वहाँ है, जिसे प्राप्त होने पर मनुष्य सिद्ध बनता है। इसका नाम है— अध्यात्मिक दुखहान। ऐसी स्थिति में जागृत भाव-चेतना समूचे व्यक्ति को अपने प्लावन से ओत-प्रोत कर देती है। व्यक्ति संवेदनशील, सक्रिय और प्रामाणिक बन जाता है।
सांख्यकार कपिल स्वयं इन्हीं सिद्धियों को अर्जितकर श्रेष्ठ-सिद्ध बने थे। उन्हें सर्वोत्तम सिद्ध करार करते हुए गीताकार कहते हैं— “सिद्धानां कपिलो मुनिः।" श्री रामकृष्ण इसका तात्पर्य बताते हुए कहते हैं— "जो जितना नरम हो, जिसकी भावश्रद्धा जितनी अधिक जाग्रत हो, वह उतना ही बड़ा सिद्ध।" कुछ भी हो इसका एक ही अर्थ है— "परिपक्व व्यक्तित्व का स्वामी होना, जो जीवन की चरम परिणति है।"
मनोविद अभय कुमार मजूमदार अपने अध्ययन 'द सांख्य कनसेप्शन ऑफ पर्सनालिटी ' में उपरोक्त तथ्य को प्रामाणिक ठहराते हैं। उनके अनुसार आज के मानव की सारी परेशानियों की जड़ है— उसका दिग्भ्रांत हो जाना। इसका एक ही कारण है— उसका उलझा और बँटा-बिखरा व्यक्तित्व। यदि इसे सांख्यकार के अनुरूप गढ़ लिया जाए, सँवारने-सुधारने में तत्परता बरती जाए तो न केवल एक की; वरन समूची मानव जाति की परेशानियों का निदान तेजी से होता दिखाई पड़ने लगेगा।
सुविख्यात मनीषी प्रो. पीथम. ए. सोरोकिन ने अपने ग्रंथ 'द वेज एण्ड पॉवर्स ऑफ लव एण्ड रिकन्सट्रक्शन ऑफ ह्यूमैनिटी' में 'व्यक्तित्ववान कैसे करेंगे मानवता की नूतन संरचना'? विषय को अच्छी तरह समझाने का सफल प्रयास किया है। उन्होंने मानवी व्यक्तित्व को तीन श्रेणियों में बाँटा है— सब ह्यूमन, ह्यूमन एवं सुपर ह्यूमन। पहले प्रकार के उपमानव, जिनकी प्रकृति निष्ठुर है, समस्याओं को पनपाते और बढ़ाते हैं। दूसरे तरह के मानवीय व्यक्तित्व वालों के अंदर संवेदना तो होती है; पर साहस नहीं होता। इसके अभाव में वे समस्याओं से दुःखी, परेशान भर रहते हैं। उसके निदान के लिए आगे कदम बढ़ाने की हिम्मत नहीं जुटा पाते।
तीसरे अतिमानवीय व्यक्तित्व वाले संवेदनाओं और साहस दोनों के धनी होते हैं। इनके अंदर की बेचैनी साहस से मिलकर कुछ कर गुजरने को विवश करती है। यथार्थ में यही व्यक्तित्व की परिपक्वता का स्तर है। सोरोकिन के अनुसार ऐसों के भीतर मानवमात्र के लिए प्रेम उफनता है। इन्हीं के द्वारा नूतन मानवता की संरचना संपन्न होती है।
इस संरचना को संपन्न करने की घड़ी अब आ पहुँची है। आवश्यकता है कि अग्रदूत जीवन-साधना में प्रवृत्त हों, आठों सिद्धियाँ अर्जित करें। भावी समय व्यक्तित्ववानों का होगा। वही अपनी सार्थकता साबित कर सकेंगे जो प्रामाणिकता की कसौटी पर खरे सिद्ध हुए हैं। बीतते और आते युगों की ब्रह्मबेला के क्षण यों ही बर्बाद करने के लिए नहीं हैं। स्वयं को गढ़ें, अंतराल की भावश्रद्धा को जाग्रत— विकसित करें। दूसरों को वैसा कर सकने में सहायक सिद्ध हों, जो इन दिनों न कर सके, उन्हें सारी उम्र हाथ मलकर पछताना पड़ेगा।
किसान के घोड़े की ख्याति चारों ओर फैल गई। ऐसा घोड़ा तो राजा के अस्तबल में भी नहीं था। लोग मुँहमाँगा मोल तक देने को तैयार थे; किंतु किसान किसी कीमत पर घोड़ा बेचने को तैयार न होता। उसे घोड़े से जान से भी अधिक प्रेम था। एक रात घोड़ा अस्तबल से अचानक गायब हो गया। बात आग की तरह सारे गाँव में फैल गई। लोग सांत्वना देने किसान के पास आने लगे। किसान ने कहा— "तो इसमें कौन सी नई बात हो गई, सिर्फ घोड़ा ही तो नहीं है अस्तबल में। इसमें दुःख की क्या बात है।" बुरा हुआ कि भला हुआ, यह तो ईश्वर ही जानता है। हम तो घटना को देख सकते है। उचित-अनुचित को तो ईश्वर ही जानता है। लोग औपचारिकता पूरी करके चले गए। कुछ दिन के उपरांत किसान का घोड़ा वापस लौट आया और इतना ही नहीं, अपने साथ दस घोड़े और जंगल से ले आया। अब की बार लोग इकट्ठे हुए और किसान के भाग्य की सराहना करने लगे। मुफ्त में कुछ मिल जाए तो भाग्य को सराहने का प्रचलन समाज में न जाने कब से है; किंतु किसान ने अब की बार भी वही बात दुहराई कि इसमें कौन सी नई बात है। हम कर भी क्या सकते हैं। जो कुछ हो रहा है, वह सब ईश्वर की मर्जी से हो रहा है। गाँव के लोगों ने पहली बात पर अपनी भूल स्वीकार की। किसान के भाग्य की सराहना करते हुए लोग लौट गए।
किंतु कुछ दिन के उपरांत एक और दुर्घटना घट गई कि किसान का इकलौता बेटा नए घोड़े पर सवारी करते हुए गिर गया और उसके पैर की हड्डी टूट गई। अब की बार लोग फिर इकट्ठे हुए। किसान से बोले— "यह तो ईश्वर ने बहुत बुरा किया।"
किसान बोला— "इसमें बुरा-भला क्या है? यह हम कैसे कह सकते हैं, हम तो वर्तमान के अतिरिक्त कुछ नहीं जानते।" कुछ दिन के उपरांत राज्य में लड़ाई छिड़ गई। सारे गाँव के नवयुवक सेना में बुला लिए गए। किसान के बेटे के पैर में चोट के कारण वही बच गया। अब लोग पुनः प्रशंसा करने लगे, तो किसान का वही एक उत्तर था कि भले-बुरे के अनुमान की कल्पना भर है। अच्छा किसमें है, बुरा किसमें है। यह विधाता से अधिक कोई नहीं जानता। जीवन के रहस्यों की अनंत शृंखला है, जो अज्ञात है— अनजान है, इसीलिए सुख-दुःख, लाभ-हानि, जीवन-मरण की चिंता किए बिना, सत्कर्मों में निरत रहने कि लिए कहा गया है।
एक प्रौढ़वय के व्यक्ति ने बड़ी मेज के दूसरी ओर बैठे प्रबंध समिति के सदस्यों में से एक को टाइप किया हुआ फुलस्केप कागज थमा दिया। कागज को पढ़ते ही उसके हाथ काँप उठे, लगा कि कागज की जगह साँप पकड़ा दिया हो। उसने धीरे से दूसरे को दिया। एक-एक करके सभी ने पढ़ा। सभी अवाक और सन्न थे।
गले से मुश्किल से थूक गटकते हुए एक ने पूछा— "यह क्या है?"
"इस्तीफा आपने पढ़ लिया होगा।" "पर क्यों? क्या हम लोगों के व्यवहार से कोई नाराजगी हुई? किसी अन्य से कोई अपराध बन पड़ा?"
"नहीं! आप सभी के मृदुल व्यवहार का मैं बहुत कृतज्ञ हूँ, सहयोगी-सहकर्मियों से भी सम्मान ही मिला है।" "फिर क्यों? जबकि लोग नौकरियों के लिए दर-बदर भटक रहे हैं, आप एक जाने-माने पोस्ट ग्रेजुएट कॉलेज के प्रिंसिपल पद को ठुकरा रहे हैं, क्या कोई इससे अच्छी जगह मिल रही है।"
“शायद", सुनने वालों के मनों का उफान शांत होने लगा। अधिक धनवाली जगह पाने पर कम धनवाली जगह को छोड़ देना ही ठीक है। सोच-विचार चल ही रहा था, कि एक ने पूछा— "कौन से पद स्वीकार कर रहे हैं?" “लोकसेवी का पद जो सभी पदों से श्रेष्ठ है।”
सुनकर सभी जैसे आसमान से नीचे जमीन पर धम से गिर पड़े।
सभी के आश्चर्य को भाँपकर उसने कहना शुरू किया— ऐसे समय में जबकि देश और समाज का भाग्य नए कागज, नई कलम और स्याही से लिखा जा रहा है। इस विलक्षण समय में जो चूक जाए, उससे बड़ा अभागा भला दूसरा कौन है? युगपुरुष मानवीय पीड़ा से बिलख रहा है। रो-रोकर अपनी झोली सबके सामने फैला रहा है। दर-दर भटकते हुए चिल्ला रहा है। "ओ धनवालो! मुझे भी अपने धन का थोड़ा हिस्सा दो, अरे मनुष्यो! अपने अमूल्य समय का थोड़ा हिस्सा हमें भी दो। धन और समय, साधन और प्राण मिलकर ही साध्य की प्राप्ति कराएँगे।“ "ओह!"— सुनने वाले चकित थे; पर एक ने हिचकिचाते-सकुचाते हुए कहा— संकोच भापकर उसने कहा— "कहिए-कहिए?" "धन का थोड़ा हिस्सा, समय का कुछ भाग तो आप नौकरी करते हुए भी दे सकते हैं।"
"आह! आपने उसकी पीड़ा पहचानी नहीं। जो हरिश्चंद्र का नाटक देखकर राष्ट्र के लिए बिक गया। स्वयं को बेचा, परिवार को बेचा, छटपटाहट, अकुलाहट, बेचैनी को आपने पहचाना नहीं। काश! कर सके होते। मैंने अभी तक की कमाई और स्वयं अपने को उसके चरणों में अर्पित करने की शपथ ली है। अब से मेरी सामर्थ्य का कण-कण, समय का क्षण-क्षण, समाज के लिए उस महामानव के इशारे के अनुरूप खर्च होगा? क्या यह कोरी भावुकता नहीं है?"
"भावुकता विवेकहीनता की निशानी है, स्वार्थों के लिए मन में उठी बेचैनी का नाम भावुकता है। यह तो मनुष्यता की कसौटी है। जिस पर मैं अपने को खरा साबित कर रहा हूँ। जो न कर सका, समझना चाहिए वह मनुष्य नहीं। मानवीय भावनाओं से शून्य चलता-फिरता पुतला भर है।"
सुनकर सभी अभिभूत थे। "हम सभी क्षमा चाहते हैं वास्वानी जी। आपका यह त्याग हम सभी के लिए गर्व की बात है। आज से हम लोग भी अपने धन और समय को यथाशक्ति समाज के लिए लगाएँगे।"
समाज के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर करने वाले ये महामानव थे— थापरदास लीलाराम वास्वानी। जो अपनी सेवापरायणता, कर्मठता के कारण बाद में साधु वास्वनी के नाम से जाने गए। इनका जन्म सिंध प्रांत के हैदराबाद जिले में 24 नवंबर 1879 ई. को हुआ। गरीबी पितृविछोह के बाद भी उन्होंने एम. ए. (दर्शन) में सर्वोच्च स्थान हासिल किया। बाद में लाहौर कॉलेज में प्रोफेसर और प्रिंसिपल हुए।
उन दिनों देश में आमूलचूल परिवर्तन के लिए गाँधी संव्याप्त बवंडर और तूफान का संचालन कर रहे थे। सारे देश के युवक, प्रौढ़, महिलाओं को रह-रहकर झकझोर रहे थे।"अरे नींद छोड़ो! उठ खड़े हो! समय तुम्हारे लिए रुकने वाला नहीं हैं। जो समय को पहचानते है, साथ चलते हैं, वे ही श्रेष्ठ हैं। इस पुकार ने वास्वानी को हिलाकर रख दिया। उनके सामने दुख-दैन्य की पीड़ा से कराहते, भारत का चित्र घूम गया। उनके भीतर बैठे आत्मदेवता ने उनको धिक्कारना शुरू किया। "अरे! तुम शिक्षक हो? मानवीय भावनाओं का गला घोटने वाले! किस आधार पर तुम अपने को शिक्षक कहते हो? शिक्षक, वह भी दर्शन का, चैन की नींद सोए, इससे बड़ी विडंबना और क्या होगी।"
"नहीं! अब अधिक नहीं"— वह चीख पड़े। पश्चाताप के आँसू बह निकले, अंतरात्मा बिलख उठी और वह कह उठे 'अब लौं नसानी अब न सैहों'। इसी का परिणाम था— इस्तीफा, समाज को अपना सर्वस्व अर्पित करने का संकल्प।
फिर क्या करें? गाँधी ने सुझाया तुम नए समाज के लिए नए आदमी गढ़ो। उन्होंने मीरा शिक्षण संस्था की स्थापना की। इस संस्था की शाखाएँ सारे सिंध प्रांत में फैल गई। विभाजन के बाद वह बंबई आ गए। बाद में पूना में मीरा शिक्षण संस्था का काम शुरू किया। क्या काम? काम एक ही था— आदमी गढ़ना। अपनी निजी जिंदगी के छोटे-छोटे कामों को भी वह इतनी तन्मयता और प्रभावशाली ढंग से करते कि देखने वाले अभिभूत हुए बिना न रहते। आचरण की मुखरता दूर-दूर तक फैले, इसके लिए उन्होंने लेखनी और वाणी का सहारा लिया। “मीरा” नाम की एक पत्रिका निकाली जो अपने समय में बड़ी लोकप्रिय हुई।
एक बार किसी ने उनसे पूछा— "आप बार-बार आदमी गढ़ने की बात करते हैं, कैसे गढ़े जाएँ आदमी?"
प्रश्न के उत्तर में उन्होंने प्रश्न किया— "तुमने रबड़ की मुहर देखी है?" “हाँ!" “कैसे बनती है”?
"रबड़ को गर्माकर उसके ऊपर वाँछित अक्षर काटे जाते हैं?" "फिर?"
"फिर क्या?" "उसमें स्याही लगाकर कहीं भी चिपकाओ, वही इबारत उभर आती है।"
"बस तो जान लो, यही है आदमी गढ़ने का तरीका।" एक-एक करके मानवी सद्गुणों को अपने चिंतन, चरित्र, व्यवहार में उभारना पड़ेगा। ये यों ही नहीं उभरेंगे। कष्ट सहना होगा। तितिक्षा सहनी होगी, इसी का दूसरा नाम तप है। जब स्वयं सारे सद्गुण अच्छी तरह खूबसूरत ढंग से उभर आए तो दूसरे के पास जाओ। इस अवसर पर स्याही का काम करेगा— स्नेह-आत्मीयता, इसके बिना कुछ संभव नहीं। स्नेह की स्याही जितनी अच्छी होगी, सद्गुणों की इबारत उतनी साफ होगी। दूसरों में अल्प प्रयास से वही सद्गुण साफ-साफ उभरेंगे यही है— आदमी गढ़ने का तरीका।
सुनने वाले की शंका का समाधान हुआ। वह जीवन भर अपने इन्हीं प्रयासों में लगे रहे। अपने समय में उन्होंने राष्ट्र को अनेकों लोकसेवी दिए। गाँधी जी मजाक में कहा करते— "वास्वानी जी हमारी लिए रुपया छापने की मशीन हैं। सचमुच वह मशीन थे, जो सौ फीसदी खरे आदमी निकालते।" 16 जनवरी 1966 में अपने इस काम को अधूरा छोड़कर वे चले गए; पर इस आशा के साथ कि उनकी जिम्मेदारी को सभी भारतवासी निभाएँगे। समाज की सामयिक आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए अपना सर्वस्व होम देंगे।
परमात्मा ने चींटी से लेकर हाथी तक की सृष्टि-रचना कर डाली। तब तक सृष्टि में न कोई उत्पात मचा, न झंझट खड़ा हुआ। न ईश्वर से कोई माँगता, न कोई शिकायतें करता; किंतु जब वह मनुष्य की रचना कर चुका तो परमात्मा उस दिन से बड़ा परेशान, बड़ा हैरान रहने लगा। नित नए उपद्रव दंगे-फसाद, शिकायत, फरियादों का ताँता लग गया। सब काम रोककर शिकायतें निपटाते ही दिन बीतता।
एक दिन परमात्मा ने देवताओं की बैठक बुलाई और कहा कि हमसे जीवन में पहली बार इतनी बड़ी भूल हुई है, जितनी कभी नहीं हुई थी। अनेकों जीवों की रचना की, तब तक हम बड़े चैन से थे; किंतु जब से मनुष्य की रचना की है, पूरी मुसीबत खड़ी हो गई। नित्य ही दरवाजे पर माँगने वालों और फरियाद करने वालों की भीड़ जमा रहने लगी है। अब कोई उपाय भी नहीं सूझता कि क्या किया जाए? कोई ऐसी जगह बताओ जहाँ मैं छिपकर बैठ जाऊँ।
एक देवता ने सुझाव दिया— "भगवान! क्षीर सागर में छिपना ठीक रहेगा।" भगवान बोले— "वहाँ तो मनुष्य मुझे आसानी से ढूँढ़ लेगा।" दूसरे ने कहा— "हिमालय पर्वत ठीक रहेगा।" तीसरे ने कहा— "चंद्रमा में छिप जाए; प्रभु!" भगवान ने कहा— "इसकी अकल इतनी पैनी है कि आकाश-पाताल में कहीं भी पहुँच सकता है।" तब देवर्षि नारद आगे आए और बोले— "भगवन्! बहुत गोपनीय स्थान समझ में आया है; किंतु कानोंकान किसी को खबर न होने दें।" और उनने भगवान के कान में कहा— “प्रभु! मनुष्य के दिल में छिपकर बैठ जाइए। इसकी आँखें बाहर देखती हैं। वह चारों ओर खोजता फिरेगा अपने अंदर वह आपको कभी खोजेगा ही नहीं।” कहते हैं, जब से भगवान मनुष्य के हृदय में छिपकर बैठे हैं, जो इस रहस्य को जानता है, वहीं उन्हें खोज पाता है।
भगवान ने अपने बाद चेतना का दूसरा स्तर मनुष्य को ही बनाया है। उसकी ज्ञानेंद्रिय और कर्मेंद्रिय इतनी समर्थ हैं कि उसे देखते हुए सृष्टि का सर्वसमर्थ प्राणी कहा जाना उचित ही है। यह उसके काय-कलेवर की विशेषता है। सचेतन अदृश्य सत्ता की अतींद्रिय क्षमताओं का यदि लेखा-जोखा लिया जाए तो प्रतीत होगा कि न केवल भौतिक जगत पर; वरन अदृश्य क्षेत्र के रूप में जाने जाने वाले सूक्ष्मजगत पर भी उसका वर्चस्व स्थापित है। दृश्य और अदृश्य दोनों ही लोकों पर उसका अधिकार होने से मानवी सत्ता को सुरदुर्लभ भी कहा गया है। किसी ने सच ही कहा है— “मनुष्य भटका हुआ देवता है।” उसका अंतराल समुन्नत देवलोक है, जिसमें दैवी शक्तियों का तत्त्वतः समग्र निवास है, पर दृश्य जगत के झाड़-झंखाड़ में, जाल-जंजाल में अपनी चौकड़ी भूल जाने के कारण ठोकरें खाता, काँटों की चुभन सहता जहाँ-तहाँ भटकता है। हँसने के स्थान पर रुदन का अभिनय करता दीख पड़ता है।
गड़बड़ी वहाँ से प्रारंभ होती है, जहाँ वह अपने वास्तविक स्वरूप को भूलकर अपने को कलेवर मात्र समझता है। वाहन को अधिपति मान बैठता है और गोबर भरी मशक में अपने को समाया भर मानता है। दर्पण में छवि तो अपनी ही दीखती है, पर उसे समझा प्रतिबिंबमात्र ही जाना चाहिए। होता तो कोई छाया पुरुष भी है। वह असली मनुष्य का स्थान ग्रहण नहीं कर सकता। गुंबज में आवाज तो अपनी ही गूँजती है, पर उसे वक्ता का कथन प्रतिपादन कहना भूल है। शरीर कुछ तो है, पर सब कुछ नहीं। उसकी इच्छा, आवश्यकता को भी पूरा किया जाना चाहिए, पर मात्र उसी के लिए सब कुछ निछावर कर देना भूल है। अच्छा होता सवार और घोड़े का संबंध भी समझ लिया गया होता। आदमी घोड़े पर सवारी करे, यह तो समझ में आता है; पर उस स्थिति को क्या कहा जाए, जिसमें घोड़ा सवार की पीठ पर लद ले और उससे वह कौतुक कराने लगे, जो देखने या सुनने वाले तक को अजीब मालूम पड़ता है। इतने पर भर की वास्तविकता यही है। भेड़ों के झुंडों में पले सिंह ने अपने को भेड़ मान लिया था। यह कथा सुनी तो बहुतों ने है, पर यह अनुभव कोई बिरला ही करता है कि यह उपहासास्पद कथा, उक्ति सीधी अपने ही ऊपर लागू होती है।
परमाणु मोटी दृष्टि से धूलि का एक अत्यंत ही छोटा, अदृश्य स्तर का, प्रकृति का अत्यंत सूक्ष्मघटक मात्र मालूम पड़ता है। इतने पर भी वस्तुस्थिति यह है कि उसमें एक समूचे ग्रहपिंड जितनी शक्ति भरी पड़ी है। अणु विस्फोट के समय उसकी अधिकांश शक्ति आकाश में बिखर जाती है। जो अनुभव में आती है, प्रभाव दिखाती है। वह समूची विस्फोटजन्य शक्ति का लाखवाँ भाग भर होता है। यदि एक कण की समूची शक्ति को बिखरने से रोककर उसे केंद्रीभूत कर लिया जाए, तो उतने भर से समूचे धरातल पर खर्च होने वाली ऊर्जा, जितनी विद्युत का परिचय प्राप्त किया जा सकता है। मनुष्य असंख्य परमाणुओं, जीवाणुओं, रसायनों, विद्युत आवेगों का भंडार है। इस प्रायः साढ़े पाँच फुट ऊँचे 60 किलोग्राम भारी औसत के काय-कलेवर में संभवतः उतने ही गोलक हो सकते हैं, जितने कि इस समूचे ब्रह्मांड में ग्रहतारक एवं निहारिका, मेघमंडल बिखरे हुए हैं। इस समूची शक्ति का अनुमान लगाया और आकलन किया जाए, तो एक औसत मनुष्य प्रायः उतना ही हो सकता है, जितना कि यह समूचा ब्रह्मांड प्रकृति-संपदा से भरा पड़ा है।
ब्रह्मांड को “महतो महीयान्” कहा गया है और पिंड को 'अणोरणीयान्’। यदि आकार की न्यूनाधिकता पर ध्यान न दिया जाए, तो मानवी सत्ता भी परमात्म सत्ता के समतुल्य जा पहुँचती है। भगवान को जितने भी प्रमुख अवतार लेने पड़े हैं, वे सभी मनुष्य आकृति में ही अवतरित हुए हैं। स्वर्गोपम देवता अपनी जगह विराजमान हो सकते हैं, पर धरती के देवताओं की भी कमी नहीं रही। महामानवों के रूप में अपने अस्तित्व का परिचय समय-समय पर मिलता रहा। वे देवस्वरूप में सृजन और दैत्य के रूप में ध्वंस के ऐसे अनेक कृत्य दिखाते रहे हैं, जिसकी विशालता और विध्वंसकता ध्यान देते ही दाँतों तले उँगली दबानी पड़ती है। क्षुद्रता का प्रतिनिधित्व करते हुए उन्हें इसी कारण देखा जाता है कि अपनी शक्ति का उपयोग करना तो दूर, आकलन करते तक नहीं बन पड़ता। यदि मनुष्य “आत्मबोध” प्राप्त कर ले और समझ ले कि मैं कौन हूँ? क्या हूँ? और क्या कर सकता हूँ? तो समझना चाहिए कि उसे क्षुद्रता से उबरने का मार्ग मिल गया।
यह संसार जड़ पदार्थों वाला है। उसमें भले-बुरे जैसा कहीं कुछ नहीं है। जड़ पदार्थों का अपना स्वरूप भर है। उनमें सुख और दुःख की अनुभूति तो मनुष्य की खुद की गढ़ी हुई है। पाप, पुण्य पदार्थ तो कैसे करेंगे? उनका सदुपयोग-दुरुपयोग ही स्वेच्छापूर्वक अनुभूतियाँ या परिस्थितियाँ गढ़ता रहा है। इंजन कितना ही समर्थ या कीमती क्यों न हो, उसे चलाने की क्षमता तो सजीव मनुष्य में ही होती है। रेलगाड़ी अपने बलबूते किसी निर्दिष्ट लक्ष्य पर नहीं पहुँच सकती। अधिक से अधिक कोई दुर्घटना करने का निमित्त भर बन सकती है। संसार का वातावरण पदार्थों से विनिर्मित होने के कारण अपने बलबूते कुछ भला-बुरा नहीं कर सकता। सचेतन सत्ता का प्रत्यक्ष प्रतिनिधित्व करने वाला मनुष्य ही हर परिस्थिति के लिए पूरी तरह उत्तरदाई है।
तथ्यों को समझते हुए, हमें जैसा भी कुछ भला-बुरा भविष्य विनिर्मित करना हो, उसी के अनुरूप जनमानस विनिर्मित करना चाहिए। सतयुग और कलियुग में लोगों के शरीर निर्वाह एवं पदार्थ-परिकर में कोई बड़ा अंतर नहीं होता था, फिर भी जो जमीन-आसमान जैसा, स्वर्ग-नरक जैसा अंतर दीख पड़ता है, उसका सृजनकर्त्ता मनुष्य के अतिरिक्त भी कोई हो ही नहीं सकता। वह न केवल अपने भाग्य का निर्माता आप है, वरन उसी का सामूहिक चिंतन, क्रियाकलाप-प्रवाह वैसा ही कुछ बनाकर खड़ा कर देता है, जैसा कि सोचा या कहा गया था। हमें मुरझाए पत्ते सींचने की योजना नहीं बनानी चाहिए; वरन जड़ तक खाद-पानी पहुँचाने का प्रयत्न करना चाहिए।
पूछा जाता है कि उज्ज्वल भविष्य की संरचना के लिए क्या करना होगा? यदि प्रश्न का सही उतर अपेक्षित हो तो वह एक ही हो सकता कि 'दृष्टिकोण का परिवर्तन', जिसके आधार पर गतिविधियाँ बनती-बिगड़ती और बदलती हैं। परिस्थितियों के आधार पर ही उत्थान-पतन का अनुमान लगाया जाता है। वे स्वयं न तो प्रतिकूल हो सकती हैं और न अनुकूल। मनुष्य ही उन्हें इच्छानुसार घोड़े की लगाम की तरह मोड़ता-घुमाता रहता है। वह उन्हें दौड़ा भी सकता है और खड़ा रहने के लिए भी बाधित कर सकता है।
मोटी बुद्धि दृश्यों, पदार्थों, घटनाओं को ही सब कुछ मानती है। चिंतन, दृष्टिकोण, उत्साह, साहस जैसी अदृश्य प्रवृत्तियों के संबंध में हर किसी के लिए यह अनुमान लगाना कठिन होता है कि पर्दे के पीछे काम करने वाली मदारी की उँगलियाँ ही समूचे प्रह्सन की निमित्तमात्र है। तमाशे का सूत्रधार तो मानसिकता का बाजीगर ही होता है। समस्याओं का वास्तविक हल उसी के हाथ है। बंदी-कठपुतलियों के साथ माथा-पच्ची करना कुछ अर्थ नहीं रखता, फिर भी बच्चे को चाभी के खिलौनों की हलचलें ही प्रभावित करती हैं। उन्हें यह कहाँ पता होता है कि खोखले के भीतर जमे हुए पुर्जे ही यह चित्र-विचित्र हलचल करते हैं। यदि यह मतिभ्रम निकल जाए, वस्तुस्थिति का आभास होने लगे तो समझना चाहिए कि प्रगति का पथ-प्रशस्त हो गया।
‘द सक्सैज प्रिंसिपल’ पुस्तक के लेखक डेव जोन्सन का कहना है कि प्रकृति का एक शाश्वत नियम है कि शारीरिक श्रम-व्यायाम न करने पर मांसपेशियाँ सूखती और मनुष्य को रुग्ण बनाकर समय से पूर्व ही मृत्यु का शिकार बना देती हैं। मस्तिष्क के ऊपर भी यही मान्यता पूर्णतः लागू होती है। प्रसुप्त मानसिक क्षमताओं, योग्यता और प्रतिभा को न जगाया जा सके तो व्यक्ति को विक्षिप्तता, खीज, निराशा के अतिरिक्त और कुछ हाथ न लगेगा। जिन लोगों ने अपनी प्रसुप्त प्रतिभा को प्रबल पुरुषार्थ के सहारे जगाया है, उनके मस्तिष्क में नवीन एवं सृजनात्मक विचार आते चले गए हैं। यह सब कुछ दैवी सत्ता के प्रति आस्थावान होने की ही परिणति भर है। कोलम्बस ने संसार को नया विचार देने से पूर्व दैवी मान्यताओं से परिपूर्ण धर्मग्रंथ बाइबिल— ईक्षीआह 40:42 का अध्ययन किया और "पृथ्वी गोल है", के प्रभाव को प्रस्तुत कर दिखाया। उनके मतानुसार धर्मग्रंथों को बार-बार पढ़ने, चिंतन-मनन करने, तदनुरूप प्रयासरत बने रहने से प्रसुप्त मानसिक क्षमताओं का विकास होता और जीवन सब प्रकार से सफल सिद्ध होता है।
स्नायु रोग के तेज आघात से उनके दोनों हाथ खराब हो गए। जिसने सुना, वही पीड़ा से कराह उठा। हरेक के मुँह से निकल पड़ा— "अरे! अब क्या होगा? जो हमेशा दूसरों की सेवा के लिए तत्पर रहा करता हो, उसे अब स्वयं के भोजन के लिए दूसरों का सहारा तकना पड़ेगा।" मित्रों ने पूछा— “अब क्या होगा आपकी सेवा का?" “क्यों? वह तो चलती रहेगी”— उनका जबाब था।
“कैसे?" सुनने वाले आश्चर्यचकित थे।
“अरे भाई! हाथ ही तो खराब और बेकार हुए हैं। अभी मेरे पास भावनाओं से लबालब हृदय सक्रिय-सतेज मस्तिष्क और सुदृढ़ पैर हैं।"
"भला इनसे कैसे करोगे सेवा!" "ओह! शायद आप नहीं जानते, आज मनुष्य को दूसरों की शारीरिक सहायता की उतनी जरूरत नहीं पड़ती, जितनी मानसिक सहायता की। शारीरिक सेवा तो सिर्फ बीमारों को चाहिए। ऐसे कितने हैं? बहुत थोड़े। अधिकांश जनसंख्या, जो शरीर से स्वस्थ रहते हुए मानसिक रूप से बेतरह परेशान है। उसकी सहायता तो विचारों से ही हो सकना संभव है।"
सुनने वालों को उनकी बात कितनी समझ में आई, पता नहीं; पर उनकी पदयात्रा शुरू हो गई। घर-घर, दरवाजे-दरवाजे पहुँचने लगे। हरेक से मिलते, बड़े प्रेम से उसके घर का हाल-चाल पूछते, उनकी हैरानी-परेशानी मालूम करते और उपयुक्त समाधान सुझाते।
कभी-कभी उनके इस तरह पूछने पर लोगों को अत्यधिक विस्मय होता, जिसके स्वयं हाथ नहीं है वह हमारी तकलीफें पूछ रहा है। कभी-कदार इसे प्रकट भी कर देते। सुनकर वह कहते— “मेरे तो हाथ रोग से बरबाद हो गए; पर ऐसे न जाने कितने हैं जो सब कुछ सही सलामत रहते हुए भटक रहे हैं, उन्हें राह नहीं सूझ रही, क्या करें? कैसे करें? मेरा काम उन्हीं भटकों को राह दिखाना है। उन्हें जीवन का मर्म सुझाना है। यह बात उनके गले उतारनी है कि अभावों का रोना मत रो, अभी भी तुम्हारे पास ऐसा कुछ है, जिसका उपयोगकर स्वयं निहाल हो सकते हो, औरों को निहाल कर सकते हो।”
कर्नाटक के मेलुकीटे नामक स्थान में जन्मे, इस अलौकिक लोकसेवी ने अपने समूचे प्रांत की तीन बार पदयात्रा की। लोग उन्हें संत-समर्थ मानने लगे। उनके बारे में यह बात फैल गई कि वह तमाम तरह की समस्याओं को हँसते-मुस्कराते सुलझा देते हैं। किसी ने पूछा— "कौन से तप द्वारा आपको यह शक्ति मिली?" "सत्साहित्य के अध्ययन से।" "यही मेरा वह तप है, जिसके द्वारा स्वयं शक्ति पाता और औरों को बाँटता हूँ।"
उनकी ख्याति को सुनकर तमिलनाडु निवासियों ने अपने यहाँ आने का आग्रह किया। 'सारा भारत मेरा घर' नीति के मानने वाले, वे वहाँ भी पहुँच गए। थोड़े ही प्रयास से तमिल भाषा सीखकर तमिलनाडु से अपनी पदयात्रा शुरू कर दी।
उनका समूचा जीवन मुखर होकर प्रेरणा देने लगा। वाणी के द्वारा इसे वह मर्मस्पर्शी व सौ गुना अधिक प्रभावशाली बनाने लगे। एक बार तंजौवूर जिले के एक गाँव में सभा हो रही थी। उन्होंने कहा— "यदि हम सब एकदूसरे के दुःख-दर्द में हिस्सा बँटाना सीख जाएँ तो परेशानियों का हौआ खुद ही गायब हो जाए।" गाँव में विद्यालय की समस्या थी। इसके निदान के लिए धन इकट्ठा करने की बात आई। सभा में स्तब्धता छा गई। थोड़ी देर बाद एक अंधा भिखारी तानपूरे को ठीक करते उठा। मंच के पास आया और गाँठ खोलकर पैसे गिनने लगा। कुल एक रुपये के पैसे उसके पास निकले। सबके सब उसने दान में दे दिए। कई दिन की बची हुई कमाई का सारा भाग समर्पित करने वाले भिखारी को देखकर औरों की थैलियाँ खुली, समस्या सुलझ गई।
चलते-फिरते समस्याओं का निदान प्रस्तुत करने वाले इस व्यक्ति से विनोबा जी अपनी भूदान यात्रा के समय मिले। नाटे कद के दोनों हाथों से रहित इस व्यक्ति को देखकर उन्होंने कहा— "वह वामन नहीं, विराट हैं जिन्होंने अपने पैरों पूरे दो प्रांतों को नाप लिया।" विनोबा ने उन्हें चलते-फिरते विश्वविद्यालय का नाम दिया, जो हरेक का दरवाजा खटखटाकर उन्हें जीवन विद्या की सीख देता है। सीख देने वाले ये व्यक्ति थे— पेनुगोडे, जो अपने नाटे कद के कारण जन-जन में कुट्टी जी के नाम से विख्यात हुए। सचमुच वे चलते-फिरते विश्वविद्यालय थे।
“नहीं इतना बहुत अधिक है”— व्यवस्थापक की मेज के दूसरी ओर बैठे व्यक्ति ने कहा। कहने वाले की वाणी में जितनी अधिक सरलता थी, सुनने वाले के चेहरे पर उससे कहीं अधिक आश्चर्य के भाव थे।
प्रौढ़ आयु के व्यवस्थापक ने सामने बैठे नवयुवक को एक बार सिर से पैर तक घूरा। साधारण मोटे सूत का कुर्ता, ऐसी ही धोती, पैरों में टायर की सस्ती चप्पलें। कहीं से भी धनी नहीं दिखता, फिर क्यों मन में एक-पर-एक भाव आ-जा रहे थे?
एक बार पुनः सामने रखी मार्कशीटों प्रमाण पत्रों को उलटा-पलटा। शुरू से लेकर आखिर तक प्रथम श्रेणी के अंक। योग्यता भी कम नहीं— एम. ए. एल. टी. फिर बात क्या है?
मन की ऊहापोह ने पूछने पर विवश किया— “आप निर्धारित वेतन से कम क्यों लेना चाहते हैं?" जवाब मिला— "भाई मुझे दो धोतियाँ, दो कुर्ते तथा सामान्य भोजन की जरूरत है। मैंने खूब जोड़-घटाकर देख लिया है, सब मिलाकर 30 रुपए में मेरा काम चल जाता है। इससे अधिक क्या करूँगा।"
“30 रुपये, अर्थात दिए जा रहे वेतन से आठवें भाग से भी कम जो भी हो।”
“पर पूरा क्यों नहीं लेते हैं”— पूछने वाले ने फिर कुरेदा। "देखिए! अधिक रुपए का मतलब है— अधिक विलासिता। विलासिता न हो तो उसे संग्रह कह लीजिए, कृपणता कह लीजिए। मतलब एक ही है— घनीभूत संकीर्णता और निष्ठुरता।" सुनने वाला दंग था। "अधिक धन को अच्छे कामों में भी लगाया जा सकता है" व्यवस्थापक ने एक बार फिर कहा।— "निर्वाह भी प्रधानाचार्य के स्तर के अनुरूप होना चाहिए।"
"इन दो विरोधी बातों की कोई संगत नहीं। धन को अच्छे काम में लगाने की बात ठीक है; पर एक से अधिक तनख्वाह लेने का मतलब है, दूसरों के मन में लालच पैदा करना। उन्हें भागने के लिए विवश करना, इसलिए जिम्मेदार आदमी की तनख्वाह कम होना ही ठीक है। रही बात प्रधानाचार्य के स्तर की, तो उसका निर्वाह स्तर नहीं, बल्कि जीवन स्तर अन्य सभी की तुलना में अधिक होना चाहिए। जीवन स्तर के ऊँचे होने का मतलब— व्यक्तित्व को अधिकाधिक सद्गुणों से युक्त होना। इस संबंध में मैं प्रयत्नशील हूँ।”
व्यवस्थापक सुनकर हतप्रभ रह गए। एक साधारण तबके का आदमी, जिसका बचपन माँ-बाप के बिना बीता। शुरू से अब तक कष्ट झेलता चला आ रहा है। ऐसी स्थिति में इतनी निस्पृह और उन्नत मानसिकता। उन्होंने रुककर कहा— “एक बात पूँछू।" "पूछिए?" "गरीबी में रहते हुए ऐसी त्यागवृत्ति मन में कैसे पनपी"? वे बोले— “मन में भावश्रद्धा उमग पड़े तो गरीब जुलाहे कबीर खुद भूखे रहकर जैसे-तैसे कइयों भूखों का पेट भर सकते हैं और यदि अंदर निष्ठुरता भरी पड़ी हो तो एक धनकुबेर भी अपने आश्रितों-नौकरों को भूखों मरने पर विवश कर सकता है। संवेदना उपजे तो सादगी आए बिना रह ही नहीं सकती।”
ये प्रधानाचार्य थे— श्री दीनदयाल उपाध्याय। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के एक समर्पित कार्यकर्त्ता, जिन्हें पाकर समाज-देश ही नहीं मानवता धन्य हो गई।
स्वामी सत्यदेव परिव्राजक ने अपनी अमेरिका यात्रा का एक संस्मरण इस प्रकार लिखा है।
“मेरा जूता एक जगह से फट गया था। मोची लड़के से उसकी मरम्मत के लिए कहा”। उसने जवाब दिया— “अभी तो मेरे हाथ में पिछला काम है। मैं आपका काम कर नहीं सकूँगा। हाँ! इतना हो सकता है कि आप मेरे औजार ले-लें और स्वयं ही यहाँ बैठकर मरम्मत कर लें।”
सुनकर मैं स्तब्ध रह गया। मोची युवक भाँप गया। बोला— "आप हिन्दुस्तान से आए मालूम पड़ते हैं। जहाँ काम को छोटे और बड़े रूप में विभाजित किया जाता है। मैं एम. ए. का छात्र हूँ। अपना खर्च स्वयं इस व्यवसाय के माध्यम से चलाता हूँ और पढ़ाई मजे से चला लेता हूँ।
आप स्वयं जूते की मरम्मत कर लें। यह बहुत सरल काम है। साथ ही अपने देशवासियों को लौटने पर बताएँ कि अमरीकी नागरिक किस प्रकार श्रम का सम्मान करते हुए खुशहाल रहते हैं।
प्रस्तुत जनसमुदाय में से अधिकांश की मान्यताओं, आकांक्षाओं, आदतों एवं प्रवृत्तियों में अवांछनीयता का असाधारण समन्वय हो चला है। उनकी योग्यता एवं क्षमता ऐसे प्रयोजनों में नियोजित रह रही है, जिसके कारण दुष्प्रवृत्तियों को ही बल मिले। उस समस्या से निपटा या निपटाया जाना है जो व्यवसाय, क्रियाकलाप, वैयक्तिक या सामूहिक रूप में छोटे या बड़े आकारों में बन पड़ रहे हैं, उनके प्रभाव-परिणाम भी अंततः अहितकर ही सिद्ध होते जा रहे हैं। जिनके दुष्परिणाम अभी पूरी तरह सामने नहीं आए हैं, वे अवसर की प्रतीक्षा में हैं और अनुरूप अवसर पाते ही और भी भयावह अनर्थ कर गुजरने की तैयारी में हैं। इस विषमवेला में दो मोर्चों पर दोनों हाथों से आगे-पीछे की दोनों दिशाओं में जूझना आवश्यक हो गया है। असमंजस एक ही बात का है कि बिल्ली के गले में घंटी कौन बाँधे? दृश्यमान जनसाधारण में जब अपनी व्यक्तिगत आवश्यकताओं को जुटाना, समस्याओं का हल खोजना और विपत्तियों से उबरना तक संभव नहीं हो पा रहा है, तो यह आशा किन से, किस आधार पर की जाए कि वे इस आड़े समय में, दिव्य प्रयोजनों में, सहायता कर सकने में कुछ कहने लायक योगदान दे सकेंगे। ऐसी प्रतिभाएँ यदि जुट नहीं सकीं तो यही मानना पड़ेगा कि उज्ज्वल भविष्य की संभावना भले ही निश्चित हो; पर उसका आगमन-अवतरण काफी दूर है। उस अवसर की प्रतीक्षा में इतना समय लग सकता है कि अनर्थ हो चुके और निराशा आ घेरे।
समय की इस महती माँग को पूरा करने के लिए परोक्ष सत्ता ने इन दिनों कई महत्त्वपूर्ण कदम उठाए हैं, जिनमें पहला है— अदृश्य वातावरण में भरे भौतिक एवं चेतनात्मक प्रदूषणों से निपटना। इसके लिए अध्यात्म स्तर का एक अतीव व्यापक युगसंधि पुरश्चरण आरंभ किया गया है। इसके आरंभिक दिनों में तो कुछ लाख ही भागीदार बने हैं, पर विश्वास किया गया है कि इस सामूहिक साधना में अगले ही दिनों करोड़ों सम्मिलित होंगे। एक ही प्रयोजन के लिए— एक ही सूत्र में संबद्ध होकर, एक ही दिन में एकरूपता वाली साधना चलती है तो उसके बिखराव वाली अस्त-व्यस्तता की तुलना में अनेक गुना सत्परिणाम हस्तगत होता है। देवताओं की बिखरी शक्तियों को एक केंद्र पर केंद्रित करके, कभी प्रजापति ने ऐसी समर्थ महाकाली का सृजन किया था, जो देखते-देखते उद्दंड असुरता को धराशाई बनाने और देवसत्ता को उनकी गरिमा यथावत लौटाने में समर्थ हुई थी। प्रस्तुत युगसंधि पुरश्चरण को उसी स्तर का एक सामयिक प्रयोग समझा जा सकता है। यह साधना शान्तिकुञ्ज की इमारत तक सीमित नहीं है, वरन उसका एक बड़ा भाग उन भागीदारों द्वारा संपन्न हो रहा है, जो अपने-अपने स्थानों पर रहकर भी उस प्रयोग को निर्धारित अनुशासन के साथ संपन्न कर रहे हैं। अदृश्य वातावरण में, सूक्ष्मजगत में छाई हुई प्रतिकूलता को अनुकूलता में बदल सकने में इस दिव्य साधना की अभूतपूर्व भूमिका प्रस्तुत होने की संभावना है। जहाँ भौतिक पुरुषार्थ अपर्याप्त पड़ता है, वहाँ दैवी सहायता का अवतरण ऐसे ही प्रयोगों द्वारा संपन्न होता है। तप-साधना की अपनी महती शक्ति ऐसे ही महान प्रयोजनों के लिए संपन्न की जाती रही है।
समय की दूसरी माँग है— ऐसी प्रतिभाओं का निर्माण, प्रशिक्षण और सृजन-क्षेत्र में उतारने का उपक्रम। इस सामुदायिक दिव्यशक्ति संकलन के बिना इतनी बोझिल गाड़ी किस प्रकार आगे बढ़ सकेगी, जिस पर कि मनुष्य जाति के भविष्य का भला-बुरा निर्धारण पूरी तरह लदा हुआ है? खींचने वाले इंजन, उठाने वाली क्रेनें, उछालने वाले राॅकेट उन दिनों विशेष रूप से आवश्यक होते हैं, जब गिरे को उठाने की आवश्यकता अनिवार्य बनकर अड़ जाती है। महाकाल का यह दूसरा संकल्प है कि युगसंधि की शेष अवधि में एक लाख सृजनशिल्पियों की प्रतिभाशाली संगठन-शक्ति को पंक्तिबद्ध खड़ी करके, सुनियोजित क्रियाकलापों में जुटाया जाए। विचारक्रांति उसका प्रथम पड़ाव है। ऑपरेशन के बाद भी चिकित्सकों के लिए बहुत कुछ करना शेष रह जाता है। विचारक्रांति एक निषेधात्मक पक्ष है। उसका दूसरा पक्ष सत्प्रवृत्तियों का संवर्द्धन भी तो है। आग बुझा देना ही काफी नहीं। उजड़े हुए गाँव को फिर सुसंपन्न बनाना, उससे भी बड़ा काम है। दुष्प्रवृत्तियों के परिपोषण में पिछले दिनों असीम साधन लगे और विशालकाय तंत्र खड़े किए गए हैं। इन्हें निरस्त करना ही पर्याप्त न होगा; वरन आवश्यकता यह भी पड़ेगी कि श्रेष्ठता के पक्षधर, न केवल आचरण अपनाए जाएँ, वरन तदनुरूप विशाल सरंजाम जुटाए जाएँ, जो विनाश में प्रयुक्त होने वाले साधनों-उपकरणों की अपेक्षा कहीं अधिक विशाल या समर्थ हों।
युगसंधि की बेला में इक्कीसवीं सदी के गंगावतरण हेतु भागीरथी साधना में निरत शान्तिकुञ्ज की एक तीसरी प्रतिज्ञा और है कि निर्धारित अवधि में वह एक लाख वरिष्ठों के एक करोड़ तक के सहयोगी बनाकर रहेगी। दस वर्ष में इतनी प्रगति हो चुकना असंभव नहीं है। पचास लाख का वर्तमान परिवार यदि वर्तमान जनसंख्या अभिवृद्धि की गति अपना सके तो उसका चार गुना हो जाना किसी भी प्रकार असंभव नहीं माना जा सकता। खरगोश-चूहे तो इतनी अवधि में सौ गुने से भी अधिक हो सकते हैं। हमें यह आशा करनी चाहिए कि एक से पाँच, पाँच से पच्चीस बनने के जिस सिद्धांत का इन दिनों परिवार के हर क्षेत्र में कार्यान्वयन किया जा रहा है, उसकी गति यह पूरा वेग न पकड़ सके तो भी प्रज्ञा परिजनों को सन् 2000 तक एक करोड़ तो हो ही जाना चाहिए।
प्रश्न एक ही रह जाता है कि ऐसे प्रतिभाशाली देवमानव कहाँ से आएँ? उन्हें कहाँ पाएँ? उत्तर कस्तूरी मृग की तरह अपने भीतर ही ढूँढ़ना पड़ता है। उच्चस्तरीय क्रियाकलाप सदा अपने से, अपनों से ही आरंभ किए जाते रहे हैं। इस प्रसंग में भी वही होना है। शान्तिकुञ्ज परिवार पिछले दिनों पच्चीस लाख की गणना की परिधि छूता रहा है। अगले दिनों उसका कई गुना विस्तार होना संभाव्य है। इस सुविस्तृत समुदाय में से एक लाख प्रतिभाओं को खोज निकालना अथवा उन्हें नए सिरे से ढालना, गढ़ना, खरादना इतना बड़ा संकल्प नहीं है, जिसे असंभव माना या समझा जा सके। पिछले दिनों की प्रगति पर दृष्टिपात करने से यह विश्वास सहज ही सुदृढ़ हो जाता है कि अगले दिनों के निर्धारण असफल रहें, इसका कोई कारण नहीं। पिछले ही दिनों हर राजपूत परिवार से एक सैनिक, प्रत्येक ब्राह्मण परिवार से एक संत, प्रत्येक सिख परिवार से एक समर्पित निकलता रहा है तो वर्तमान परिजनों की तुलना में अगले ही दिनों कई गुने बढ़ जाने वाले परिवार से एक लाख सृजनशिल्पी और उनके एक करोड़ सहयोगी निकल न सकेंगे, ऐसी आशंका करने का कोई कारण नहीं।
इन पंक्तियों में सचेतन सत्ता वाले व्यक्तियों के उभरने को ही प्रमुख मानकर चला गया है। इनको जिन प्रयोजनों में लगना है, जिन साधनों का प्रयोग करना है, उसके संबंध में कोई संकेत नहीं दिया गया है। कारण कि भौतिक प्रयोजनों के लिए ही भौतिक साधन जुटाने को अनिवार्य माना और तारतम्य बिठाना पड़ता है; पर चेतना का चुंबकत्व तो स्वयं इतना प्रचंड है कि साधन, सहयोग के लिए अनुकूल अवसर तक स्वयं अविचल चल सके। महाकाल की शक्ति चेतन-सत्ता का समुच्चय जुट जाने पर स्वयं ही साधनों को भी बटोर लेती है। युगसंधि का मध्यांतर परोक्ष जगत से यही संदेश लेकर आया है व सारी दिशाओं, गगन को निनादित-गुंजित कर रहा है।
एक शिष्य वर्षों गुरु आश्रम में रहा। एक दिन उसने देखा कि उसका गुरु पानी पर चला आ रहा है। यह देखकर वह बहुत चकित हुआ। जब गुरु पास में आए तो वह पैरों पर गिरकर बोला कि आप तो बड़े चमत्कारी हैं। यह रहस्य आपने अब तक क्यों छिपाए रखा। कृपया मुझे यह सूत्र बताइए कि पानी पर किस प्रकार चला जाता है, अन्यथा मैं आपके पैर नहीं छोड़ूँगा। गुरु ने कहा— “उसमें कोई रहस्य नहीं है। बस भरोसा करने की बात है। श्रद्धा चाहिए। श्रद्धा हो तो सब कुछ संभव है।” गुरु ने कहा— “नाम स्मरण काफी है।” वह शिष्य नाम रटने लगा। अनेकों बार नाम-जप करने के उपरांत उसने पानी पर चलने की बात सोची और जैसे ही पानी में उतरा कि डुबकी खा गया। मुँह में पानी भर गया। बड़ी मुश्किल से बाहर आया। बाहर आकर बड़ा क्रोधित हुआ। गुरु के पास जाकर बोला— “आपने बहुत धोखा दिया। मैंने कितने ही बार आपका नाम जपा, फिर भी डुबकी खा गया। यों मैं तैरना भी जानता हूँ। मगर मैंने सोचा कि बहुत जप लिया नाम, अब तो पूरी हो गई होगी श्रद्धा वाली शर्त और जैसे पानी पर उतरा, डुबकी खा गया। सब कपड़े खराब हो गए। कुछ बात जँची नहीं।” गुरु ने कहा— "कितनी बार नाम जप किया।" शिष्य ने कहा— "अनगिनत बार जप किया। किनारे पर खड़े-खड़े भी किया। पानी पर उतरते समय भी और डूबते-डूबते भी करता रहा।” गुरु ने कहा— "बस डूबने का यही कारण है। श्रद्धा होती तो बस एक बार ही का नाम-जप पर्याप्त था। बस एक बार राम-राम कह दिया, वही काफी था।” सच्ची श्रद्धा गिनती नहीं, इष्ट के साथ विसर्जन माँगती है।
एक विशाल कारखाने के मुख्य द्वार पर शानदार मोटर रुकी। उसमें से एक सज्जन उतरे। उनके कीमती वेश-विन्यास और हाथों की उँगलियों में चमकती हीरे की अँगूठियों को देखकर कोई भी समझ सकता था कि वह काफी रईस व्यक्ति है। उतरकर नपे-तुले कदमों से चलकर दरबान के पास आए। बोले— "मुझे फैक्टरी के प्रोप्राइटर से मिलना है।"
आशय समझकर उसने एक व्यक्ति को इशारे से बुलाया, कहा— "इन साहब को मालिक से मिलवा दो।" वह उन्हें लेकर विभिन्न इमारतों और गलियारों से गुजरता हुआ एक काफी बड़े हाॅल के पास पहुँचा, जहाँ से मशीनों के चलने की आवाज आ रही थी। वह दरवाजा खोलने वाला ही था कि आगंतुक ने पूछा— "क्या यही प्रोप्राइटर का ऑफिस है?" "जी नहीं।"
"तो ऑफिस की ओर चलो।"
“पर वह इस समय ऑफिस में नहीं मिलेंगे।" सुनने वाले ने सोचा— हो सकता है, कामगारों का काम देखने के लिए राउंड पर निकलते हों। दोनों अंदर घुसे। देखा— कुछ मिस्त्री लोग किसी पुर्जे को लेकर व्यस्त हैं। एक व्यक्ति उन्हें समझा रहा है, स्वयं करके मार्गदर्शन दे रहा है। "चलो, लौट चलो! मैंने शुरू में ही कहा था कि वह दफ्तर में मिलेंगे।"
“नहीं! लौटने की आवश्यकता नहीं है”। क्यों? "वह ये है"— मार्गदर्शन दे रहे व्यक्ति की ओर इशारा करते हुए कहा।
"क..क.. क्या?"— उसने भौंचक्के होकर हकलाते हुए कहा। ऐसा लगा जैसे उसने दुनिया के सारे आश्चर्य एक साथ देख लिए हों। उसने कल्पना भी नहीं की थी कि हाइड लैण्ड पार्क के पास खूबसूरत जगह में दो सौ एकड़ जमीन में फैले मोटर कारखाने, जिसमें पाँच सौ विभाग है। हजारों कर्मचारी काम करते हैं,— का मालिक इस तरह मिलेगा। इनके अनुसार तो उन्हें बेशकीमती कपड़ों, आभूषणों से लदे और आलीशान दफ्तर में जी हुजूरी करने वाले नौकरों की फौज से घिरे होना चाहिए; पर यहाँ तो सभी कुछ उलटा था। वह साधारण कपड़ों में श्रम में जुटे थे।
इसी सोच-विचार में कुछ क्षण बीते थे कि मार्गदर्शन कर रहे सज्जन ने सिर उठाया और बोले— "कहिए।" इस बीच एक मिस्त्री ने कुर्सी ला रखी और सम्मानपूर्वक बैठने का इशारा किया। आगंतुक सज्जन हिचकिचाते हुए बैठ गए। अभी भी उनकी भावमुद्रा देखकर लग रहा था कि वह आश्चर्य के समुद्र में गोते लगा रहे हैं। उन्हें उबारते हुए साधारण से लगने वाले व्यक्ति ने पूछा— “कैसे आना हुआ”?
जबाब में प्रश्न उभरा— “क्षमा कीजिए! मुझे आपको इस अवस्था में देखकर आश्चर्य हो रहा है। क्या आप मेरी जिज्ञासा को शांत करने की कृपा करेंगे?”
"अवश्य! इतनी बड़ी मिलकियत के बाद आप अभी भी इस कदर सादगी से रहते और श्रम करते हैं।" "हाँ! क्योंकि ये दोनों न होते तो इतनी बड़ी मिलकियत न होती।”
“पर अब तो इसकी जरूरत नहीं है" "नहीं! ऐसा नहीं। इमारत बनाने के पहले नींव को मजबूत किया जाता है; पर बन जाने के बाद इसकी आवश्यकता और बढ़ जाती है। उस समय यदि नींव को उखाड़ फेंका जाए तो भवन की सारी भव्यता मिट्टी का ढेर हो जाएगी।”
“सो तो है, पर आपके इस तरह मजदूरों के साथ काम करने और साधारण ढंग से रहने पर ये आपकी बात क्यों मानेंगे? मालिक और नौकर में एक फासला तो होना ही चाहिए।”
“आपका गलत ख्याल है; श्रीमान जी!। इनके साथ काम करने से मुझे इनका प्यार मिलता है। इन सबको भी कार्य करने में उत्साह रहता है। साधारण कपड़े, सादगी का व्यवहार इन्हें यह बताता है कि मालिक हमीं में से एक है। परिणामस्वरूप हम सबके बीच पारिवारिक रिश्ते हैं। मुझे भी इनकी जरूरतों का पता चलता है और उन्हें पूरा करता रहता हूँ। इनका भी सारी चीजों के साथ अपनत्त्व जुड़ा है, फिर तोड़-फोड़, हड़ताल की गुँजाइश कहाँ? इन सबके आत्मीयता भरे प्यार से मैं भी स्वयं को धन्य महसूस करता हूँ।”
“पर आपको तकलीफ तो होती होगी।” “तकलीफ नहीं, प्रसन्नता कहिए। कार्य करने से शरीर मजबूत और मस्तिष्क सदैव जागरूक बना रहता है। सादगी इस सक्रियता की गति को अनेकों गुना बढ़ा देती है। अन्यथा, विलासिता-अकर्मण्यता से वशीभूत होकर, अब तक बिस्तर में पड़े, जिंदगी के दिन पूरे कर रहा होता।”
आगंतुक सज्जन को बात समझ में आ चुकी थी। अब मुख्य मुद्दे पर आते हुए मोटर कंपनी के मालिक ने पूछा—“अरे! आप ने अभी तक यह नहीं बताया कि आप किस मकसद से आए थे?" "मैं स्वयं भी व्यापारी हूँ; पर इन दिनों कुछ परेशानी में हूँ। कर्मचारियों के साथ झगड़े, अनेकों समस्याएँ। देखना यह चाहता था कि आप सफलतापूर्वक अपना कारोबार कैसे चला रहे हैं। बस आपकी सफलता का रहस्य जानना चाहता था। तो यदि मेरी बात पर विश्वास कर सको तो किसी भी क्षेत्र में सफल होने का रहस्य है— सादगी और श्रम। दोनों एकदूसरे के पूरक हैं। एक के बिना दूसरे का अस्तित्व नहीं। श्रमशील यदि विलासी हो जाए तो पसीने की कमाई को यों ही कूड़े में डाल देगा और साधारण जिंदगी जीने वाला निठल्ला हो जाए तो उसके पल्ले सादगी नहीं, गरीबी पड़ेगी और वह फटे हाल बना रहेगा। सफलतारूपी सूर्य का प्रकाश है— सादगी और इसकी ऊर्जा-उष्मा है— श्रम।" कथन की समाप्ति पर उसकी और देखा।
उसने सिर हिलाते हुए कहा— "सारी बात समझ में आ गई। श्रमिक समस्या का हल भी समझ में आ गया और जहाँ तक विश्वास की बात है, विशालकाय फोर्ड कंपनी के मालिक— हेनरी फोर्ड के अनुभवजन्य कथन पर विश्वास न करूँगा तो किस पर करूँगा। सचमुच इसी के बलबूते आपने गरीबी से उद्योगपति बनने की यात्रा संपन्न की है। इतना ही नहीं, दूसरों का दुःख-दर्द समझने, दूर करने वाले सच्चे इंसान के रूप में स्वयं को गढ़ सके हैं।”
सादगी और श्रम के रूप में जीवन के इन अनमोल रत्नों को पा, वह चलता बना और हेनरी फोर्ड पुनः अपने काम में व्यस्त हो गए।
वर्ष 1970 की एक घटना को अमेरिकावासी कभी भी भुला नहीं सकते। अपोलो-13 नाम का राॅकेट अग्निकांड से ग्रसित हो चुका था, जिसमें बैठे सभी अंतरिक्ष यात्रियों की जान जोखिम में पड़ गई। पृथ्वी से 2 लाख पाँच हजार मील की ऊँचाई पर जो कुछ घटित हो रहा था। इसकी सूचना ‘ग्राउण्ड कन्ट्रोल तकनीकी’ के माध्यम से प्राप्त की जा सकी। देश के लगभग सभी नागरिकों ने जब इस दुःखद समाचार को रेडियो और टेलीविजन पर सुना तो आकुल-व्याकुल हो उठे। एसी विपन्न एवं विषम परिस्थितियों में मानवी प्रयास तो सफल होते नहीं दिखते, ईश्वरीय सत्ता ही इस आसन्न संकट को टाल सकती है। ऐसा सोच-समझकर करोड़ों लोगों ने ईश्वर से प्रार्थना करना आरंभ कर दिया। फलतः जेम्स ए लौबेल, फैड डब्लू हैस और जॉन एल. स्वीजर्ट जैसे अंतरिक्ष अभियानी राॅकेट से निकलकर प्रशांत महासागर की ओर बढ़े और एक मालवाहक जलयान पर आ टिके, जहाँ से उन्हें हैलिकाप्टर की सहायता से बाहर लाया जा सका। उपस्थित जनसमुदाय ने देखा कि तीनों ही साहसी युवक ईश्वर-प्रार्थना की मुद्रा में थे। उनके हाथ जुड़े और सिर नीचे को झुका था। ‘टाइम’ पत्रिका के मुख पृष्ठ पर उनका चित्र इसी स्थिति में देखने को मिला। उनने अपनी सुरक्षित यात्रा का एकमात्र कारण दैवी सहायता को ही बताया। अमेरिका के राष्ट्रपति ने ईश्वरीय अनुकंपा के उपलक्ष में एक विशेष प्रार्थना-सभा बुलाई और दैवी सत्ता के प्रति आस्थावान होने के लिए इस घटना का हवाला देकर सभी राष्ट्रवासियों को प्रेरित भी किया।
ह्यूस्टन अंतरिक्ष केंद्र के विशेषज्ञों का कहना है कि तीनों ही यात्रियों ने अपने साहस को नहीं खोया और बिना किसी कृत्रिम इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की सहायता लिए ईश्वर स्मरण करते हुए रॉकेट की खिड़कियों से पैराशूट लेकर कूद पड़े और अपने को पृथ्वी तक पहुँचाने में सफल हो सके। सच ही है; मानवी पुरुषार्थ का पूरक दैवी अवलंबन है।
विज्ञान और दर्शन विश्व-ब्रह्मांड की दो सर्वश्रेष्ठ शक्तियाँ है। समर्थता की दृष्टि से स्रष्टा के पश्चात इन्हीं का नंबर आता है। यही दोनों शक्तियाँ अपनी-अपनी क्षमता के अनुसार मानव समुदाय को अपने-अपने ढंग से परिचालित कर रही हैं। इसमें भी प्रकृति मूलक प्रत्यक्ष ज्ञान पर आधारित विज्ञान, परोक्ष ज्ञान एवं अनुभवों पर टिके हुए दर्शन पर आज हावी हो गया है। जो चीज प्रत्यक्ष फलदाई हो, आकर्षणों, संपन्नताओं से परिपूर्ण हो, मानवी अभिरुचि का उस ओर झुक जाना स्वाभाविक है।
इस तथ्य को अधिक स्पष्ट करते हुए विख्यात रसायनवेत्ता डॉ. इनो वोल्यूइस कहते हैं कि जीव विज्ञान, गणित, भौतिकी, रासायनिकी, इंजीनियरिंग टेक्नोलॉजी आदि की बहुमुखी उपलब्धियों से आज का मानव जितना समृद्ध है, उतना पहले कभी नहीं हुआ। परंतु समृद्धि एवं समर्थता की अंधी दौड़ में जिस महत्त्वपूर्ण पक्ष की अवहेलना हुई, वह है स्वयं के जीवन लक्ष्य को समझना और उसे प्राप्त करना तथा अपने रचयिता की इच्छा-आकांक्षाओं की पूर्ति करना। इस उपेक्षा का ही परिणाम है कि हमारी प्रगति एकांगी रह गई और वैज्ञानिक निर्माण का विवेक समस्त सदुपयोग नहीं बन पड़ा।
मनीषीगणों के अनुसार— विज्ञान मात्र प्राकृतिक नियमों, उसके रहस्यों के उद्घाटन तक सीमित नहीं है। उसका विस्तार क्षेत्र व्यापक एवं बहु आयामी है। प्रयोगशालाओं में प्रयोग-परीक्षणों, उत्पादन, सुविधा-संवर्द्धन तक सीमाबद्ध न होकर, वह प्रकृति के साथ उसके निर्माता के संबंध में जानने की ओर भी इंगित करता है। यह विज्ञान का उच्चस्तरीय एवं उज्ज्वल पक्ष है, जो वैज्ञानिक को स्वयं अपने अंतराल के प्रविष्ट करने और उस उपलब्धि के साथ भौतिक उपलब्धियों का तालमेल बिठाने की कला सिखाता है। इसे दर्शन या अध्यात्म भी कह सकते हैं। इस कला से अनभिज्ञ होने के कारण विज्ञान की अपूर्व शक्ति हाथ लग जाने पर भी हम आज न केवल सुख-शांति से वंचित रह गए, वरन तद्जन्य विध्वंसकारी अणु-आयुधों के निर्माण से स्वयं का सर्वनाश करने पर भी तुल गए हैं।
न्यूटन, प्रीस्टले, डॉल्टन एवं मेन्डेलीफ से लेकर रदरफोर्ड, चाडविक, हाइजेनबर्ग, प्लाक एवं आइन्स्टीन तक विज्ञान-जगत के कीर्तिस्तंभों की अपनी कथा-गाथा है तो सुकरात, प्लेटो और अरस्तू से लेकर आधुनिक दार्शनिकों, अध्यात्मवेत्ताओं की अपनी। यह दोनों वर्ग यह दर्शाते हैं कि आरंभ से ही मनुष्य दो जगतों, दो शक्तियों के मध्य बँटा रहा। इससे जहाँ एक वर्ग पदार्थ-जगत को ही सब कुछ मान बैठा और की उधेड़ बुन में लग गया, वही दूसरा वर्ग अध्यात्म दर्शन की रहस्यमयी दुनिया में विचरण करता रहा। विभाजन की यही रेखा 17वीं शताब्दी के पश्चात और भी अधिक गहरी होती गई। 20वीं सदी आते-आते विज्ञान इतना अधिक उन्नत हो गया कि आध्यात्मिक मूल्यों में से अधिकांश को हम भूल गए और अब वह समय भी आ धमका जब यह कहा जाने लगा कि जो चीज वैज्ञानिक तरीके से तर्क-तथ्य के आधार पर, प्रयोगशालाओं में परीक्षणों के आधार पर सिद्ध हो सके, उसके मानने में कोई औचित्य दिखाई नहीं देता। बुद्धवादियों को यह तर्क अच्छा भी लगा और उनने यह कहना आरंभ कर दिया कि जिनका विश्वास दर्शन में, दैववाद में है, उन्हें छूट है कि वे उन पर विश्वास करें, उसे मानें परंतु वे अपनी मान्यताओं से सहमत होने के लिए दूसरों को बाध्य नहीं कर सकते हैं। यही वह पाश्चात्य हवा है, जिसमें आज का मानव श्वास ले रहा है।
वस्तुतः मनुष्य ने विज्ञान को इसलिए इतनी जल्दी स्वीकार कर लिया कि वह स्वयं पदार्थ-जगत के बहुत समीप है और इस संसार में उसी की भरमार है। मनुष्य की ज्ञानेंद्रियाँ बहिर्मुखी हैं और विज्ञान उन्हीं की देन है। वह विज्ञान जो कभी मानव मन की खोज थी, आज उसने मस्तिष्कों को अपने ढंग से आकार प्रदान किया है। प्रकृति और उसके रहस्य ही अनुसंधान के विषय बन गए हैं, जो शक्ति कामधेनु की तरह प्रत्यक्ष रूप से सभी साधन-सुविधाएँ जुटा रही हो, उससे भला कौन मुँह मोड़े? विपन्नता की स्थिति कौन स्वीकारे? ऐसी स्थिति में हमारा अधिकांश समय, श्रम एवं चिंतन उसे प्राप्त करने और उपलब्धि की सुरक्षा करने में खप जाता है। उस की अभिवृद्धि एवं उपभोग में ही हम उलझे रहते हैं। एक ही दिशा में चिंतन-चेतना के बहते रहने पर हम अपना मूल्यांकन, उपलब्धियों के आधार पर करने लगे हैं। इस हालत में न तो चेतनसत्ता के प्रति चिंतन-मनन का समय मिलता है और न आदर्शों के प्रति अभिरुचि जाग्रत होती है।
इस संदर्भ में प्रख्यात वैज्ञानिक एवं दार्शनिक जॉनडेवी का कहना है कि पूर्ण सत्य तक पहुँचने का मार्ग एक ही है और वह है— दर्शन का, अध्यात्म का। यह वह उच्चस्तरीय विज्ञान है, जिसमें किसी बाह्य यंत्र-उपकरण की आवश्यकता नहीं पड़ती। इसमें खोज का विषय है— अंतश्चेतना, कार्यक्षेत्र स्वयं का अंतराल तथा उद्देश्य उसमें सन्निहित प्रतिभा, प्रखरता एवं क्षमता का, ऋद्धि-सिद्धियों का उत्पादन, अभिवर्द्धन, उन्नयन है। गुण, कर्म स्वभाव की उत्कृष्टता, चिंतन, चरित्र, व्यवहार की श्रेष्ठता उसकी कसौटियाँ हैं। इस परीक्षण पर खरा उतरने पर चेतनसत्ता जो तथ्य उसके समक्ष उजागर करती है, वह आधुनिक वैज्ञानिक शक्ति से कई गुने अधिक सुस्पष्ट, सशक्त एवं उपयोगी होते हैं। उनके अनुसार विज्ञान के बढ़ते चरण को सुविधा-संवर्द्धन तक ही सीमित न रहने देकर यदि उसी प्रक्रिया को अगले कदम के रूप में जीवन तथ्यों के उद्घाटन की ओर मोड़ा जा सके तो जो बुद्धि, भौतिक शक्ति के अन्वेषण में लगी हुई है, वही परम सत्य का उद्घाटन करने में भी समर्थ हो सकती है। तब बहुसंख्यक उच्चस्तरीय व्यक्तित्वों के उदाहरण सामने होने पर सामान्यजनों का मन भी उस ओर आकर्षित होगा। रुझान बढ़ने पर प्रगति की दिशाधारा तदनुरूप बन पड़ेगी।
सुविख्यात वैज्ञानिक जेम्स जीन्स के अनुसार, हम जिस रहस्यमय विश्व-ब्रह्मांड में रह रहे हैं, वह और कुछ नहीं विचारों और भावनाओं की दुनिया है। उसकी अभिवृद्धि ही अभीष्ट है। वैज्ञानिक प्रगति को अवरुद्ध किए बिना हम उसी अन्वेषक बुद्धि के सहारे सत्य का द्वार खोल सकते हैं और उस ज्ञान-संपदा से विश्व संस्कृति को नया स्वरूप प्रदान कर, संपूर्ण मानव जाति को उच्च मानसिक धरातल पर साथ-साथ चलने को विवश कर सकते हैं।
मूर्धन्य वैज्ञानिक आर्थर कोएस्लर ने अपनी कृति 'द रूट्स ऑफ को इन्सीडेन्स' में बताया है कि इस शताब्दी के महान भौतिकविदों— आइन्स्टीन और प्लॉक से लेकर स्रोडिन्गर, हाइजेन बर्ग एवं ब्रोगली तक अपने जीवन के उत्तरार्द्ध में इसी निष्कर्ष पर पहुँचे थे कि चेतना प्रमुख है तथा पदार्थ-जगत उसकी उत्पत्ति शोरिंगटन, एक्लीस जैसे प्रख्यात स्नायु विज्ञानी एवं जूलियनहक्सले, एडिंगटन जैसे प्रमुख विज्ञान वेत्ताओं ने एक मत से स्वीकारा है कि इस संसार में जो कुछ दृष्टिगोचर हो रहा है, वह चेतना का खेल है। अलेक्सिस कैरेल के शब्दों में विज्ञान को अब अपनी अगली यात्रा इसी की खोज से आरंभ करनी होगी, तभी नई सृष्टि की, नवीन समाज की भव्य संरचना विनिर्मित हो सकेगी। इसके लिए वर्तमान चिंतन-पद्धति को बदलने तथा पाश्चात्य वैज्ञानिक विचारधारा में, प्राच्य दार्शनिक चिंतन में, वैज्ञानिक विचारधारा को समाविष्ट किए जाने की आवश्यकता पड़ेगी और तब विज्ञान और दर्शन दोनों महाशक्तियों का समन्वय जीवन की पूर्णता की उपलब्धि सरलतापूर्वक करा सकेगा। भविष्य के इक्कीसवीं सदी के विज्ञान का यही स्वरूप होगा।
एक तांत्रिक ऐसी विद्या सीखकर आया कि उस अनुष्ठान की पूर्णाहुति रात्रि को बारह बजे हो। मंत्र पूरा होते ही उबलते पानी में मक्का के दाने डाले जाएँ तो वे सभी मोती बन जाएँ।
तांत्रिक अपने काम में लग गया। पत्नी को पास बिठा लिया और सावधान कर दिया कि वह जैसे ही पूर्णाहुति सूचक हुंकार भरे, वैसे ही खौलती हाँडी में मक्का डाल दे। विधान चल पड़ा।
पत्नी स्वभाव की आलसिन भी थी और अविश्वासी भी। उसने उपेक्षापूर्वक सुना; पर आज्ञापालन में भलाई देखी, सो चूल्हे में आग जलाकर पानी चढ़ा दिया। मक्का का कटोरा भी पास था। रात बीतते उन्हें नींद आने लगी, सो पैर सिकोड़कर वहीं सो गई।
पूर्णाहुति की हुंकार तांत्रिक ने कई बार की, पर पत्नी तो सोई हुई थी। वह उठा, जगाया और पानी में मक्का डालीं; पर कुछ हुआ नहीं। समय निकल चुका था। अविश्वास और आलस्य ने सारा प्रयास व्यर्थ कर दिया।
दूसरे दिन पड़ोस की बुढ़िया एक कटोरा भरकर मोती लेकर तांत्रिक के पास आई। उन्हें सौंप दिए और कहा— "आपकी बात मैं दीवार के छेद में से सुन रही थी। चूल्हे पर पानी उबालती रही और हुंकार की प्रतीक्षा करती रही। आपका संकेत सुनकर मैंने तत्काल पानी में मक्का डाल दी। उसी से बने यह मोती है।"
जागरूकता और तत्परता, सफलता की अनन्य सहायिका हैं।
बदलते समय के अनुरूप अपने को बदल डालना ही उचित है। अपने को बदलने का मतलब पोशाक, रूप-सज्जा अथवा निवास बदलना नहीं है, बल्कि है— अपने व्यवहार का परिवर्तन, अर्थात उन क्रियाकलापों में आमूलचूल फेर-बदल करना, जिनका संबंध औरों से है।
आज के समय में सबसे बड़ी और सबसे भयावह समस्या एक ही है— मानवी व्यवहार का गड़बड़ा जाना। अंतःसंवेदना के मूर्छाग्रस्त हो जाने के कारण उसे औचित्य नहीं सूझ रहा। बुद्धि, नित नए समाधान खोजती है; पर किस लिए? सिर्फ इस हेतु कि स्वार्थ बरकरार रहे, साधन-सुविधाओं के लिए की जा रही नोच-खसोट, छीना-झपटी बनी रहे? अपने बौद्धिक होने के अहंकार और बढ़ती निष्ठुरता के कारण वह ऐसा कुछ कर रहा है, जिसे देखकर प्राचीनकाल के दैत्यों के दिल दहल जाएँ। जीवित बछड़ों का पेट फाड़कर तरल द्रव निकालने, हँसते-खेलते खूबसूरत खरगोशों को दबोचकर चीर-फाड़ देने जैसे नृशंस कृत्य सिर्फ इसलिए किए जाते हैं कि अधिक-से-अधिक फैशन का सामान बने और सुंदर दिख सकें। धन कमाने, वैभव जुटाने की सनक, यहाँ तक है कि किसी के घर-आँगन की खुशहाली नन्हें-मुन्ने बालकों को पकड़कर, उनके एक-एक अंग निकालने, बेचने का धंधा भी शुरू हो गया है। इनकी चीख-चिल्लाहट, तड़फड़ाहट के बीच वह इसलिए खुश होता है कि कमाई हो गई। यह सब और किसी का नहीं, उस मनुष्य का व्यवहार है, जिसे अपने बुद्धिमान और सभ्य होने का गर्व है।
प्रख्यात विचारक पाल टिलिच ने एक स्थान पर कहा है कि, "मनुष्य अपनी पहचान खो बैठा है। बौद्धिकता के बल पर अनेकों तरह की खोज-बीन करने वाला मानव कितना ही अभियान क्यों न करे; पर संवेदनाओं के क्षेत्र में वह पाषाणयुगीन मनुष्य से भी कोसों पीछे है।" श्री टिलिच अपने इस कथन के उपरांत आगे कहते हैं कि, "आज की स्थिति को प्रगति कहा जाए या पिछड़ापन? इसका जवाब हमें अपने अंदर ढूँढ़ना होगा।"
निःसंदेह व्यवहारसंबंधी दोषों, दुर्बलताओं, कमियों का एकमात्र कारण है— निष्ठुरता। ये गड़बड़ियाँ तब और अधिक त्वरित गति से बढ़ने लगती हैं, जब बुद्धि-खाद-पानी बनकर इसे पोषण देने लगे। डॉ. राधाकृष्णन 'द कन्सेप्ट ऑफ मैन' में इसी तथ्य को और अधिक उजागर करते हैं। उनके अनुसार, "विश्व के इतिहास से साफ जाहिर होता है कि जब कभी, जहाँ कहीं भी समाज टूटा-बिखरा है, उसका एक ही कारण है— मानव की व्यक्तिगत और समूहगत निष्ठुरता।"
अभी तक दिए गए समाधानों में रोग के कारण को न हटाकर सिर्फ रोग के चिह्नों को मिटाया गया है, इसीलिए सिर्फ एक या दो दशाब्दी अथवा शताब्दी बाद हर समाधान एक नई समस्या बन गया है। राजतंत्र को उलटकर प्रजातंत्र, साम्यवाद को उलटकर समाजवाद की स्थापना, यही है— "विश्व का इतिहास" पर क्या मनुष्य इस उलट-फेर में सुखी हो सका? नहीं! क्योंकि उसने अपने व्यवहार का प्रेरकतत्त्व नहीं बदला। निष्ठुरता के स्थान पर अंतःसंवेदना की स्थापना नहीं की।
यह स्थापना होते ही स्वयं का व्यवहार बदल जाएगा, गड़बड़ियाँ और दुर्बलताएँ स्वयमेव मुँह छुपाकर भाग जाएगी। कार्लयुंग अपनी किताब 'मार्डन मैन इन सर्च ऑफ सोल' में इसी तथ्य पर बल देते हैं। उनके अनुसार— "मनुष्य को अपनी आत्मा, जो मानवीय संवेदनाओं के रूप में है, को जगाना होगा। इस जागरण के बाद ही उसके व्यवहार में चिरस्थाई सुधार संभव हो सकेगा। सारी उलट-फेर अपने आप हो जाएगी। स्वार्थ उलटकर परमार्थ, बुद्धि को विवेक, ध्वंस को सृजन, क्रूरता को दयालुता में बदलते देर न लगेगी।"
कैसे होगा यह चमत्कार? इस संबंध में एक ऐतिहासिक घटना है। विजयनगरसम्राट, कृष्णदेव राय ने अपने गुरु संत कनकदास से पूछा— "महाराज! भगवान गज को बचाने स्वयं क्यों दौड़े? दौड़े भी थे तो सवारी क्यों नहीं ली?" संत दूसरे दिन समझाने का वायदा कर चले गए। दूसरे दिन उन्होंने नवजात राजकुमार को ठीक वैसी प्रतिमा बनवाई। गोद में खिलाते हुए राजमहल के तालाब के पास आए, राजा भी पास ही थे। उस कृत्रिम प्रतिमा को उन्होंने धीरे से तालाब में डाल दिया। नकली राजकुमार के गिरते ही राजा कूद पड़ा, बहुत देर बाद जब वह निकला तो राजकुमार की प्रतिमा उसके हाथ में थी। अपनी बेवकूफी पर कुछ खिन्न भी था। संत ने कहा— "उत्तर मिला सम्राट? अंतःसंवेदना का जागरण इसी कदर बेचैनी उत्पन्न करता और व्यवहार को बदलने के लिए बाध्य करता है। फिर भगवान तो संवेदनाओं के घनीभूत रूप हैं।"
अगले दिनों यही चमत्कार घटित होने वाला है। वर्तमान की स्थिति से इसी के बल पर उबरा जा सकेगा। ईशोपनिषद् कहता है— 'हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्या विहितं मुखं सत्य', अर्थात मानवीय आत्मा अंतःसंवेदना का मुख बौद्धिकता-निष्ठुरता के चमकीले चका-चौंध वाले बर्तन से ढका है। इसी कारण मनुष्य कटीली झाड़ियों में उलझकर रह गया है। निष्ठुरता हटते, बौद्धिक चका-चौंध के उलटते ही अंतःसंवेदनाओं का निर्मल आलोक फैलेगा।
उज्ज्वल भविष्य की समस्त संभावनाओं का आधार यही है। अगले दिनों किसी को उन्मादी, मनोमलीन, उद्विग्न-विक्षिप्त दशा में रहना स्वीकार न होगा। जाॅन रसेल का 'द टास्क ऑफ रेशनलिज्म इन रिट्रोस्पैक्ट एण्ड प्रोस्पेक्ट' में कहना है कि प्रत्येक व्यवहारविज्ञानी ईसा, फ्रांसिस, संतपाल, गाँधी, बुद्ध व्यवहार को ललचाई नजरों से देखता है। हिटलर, मुसोलिनी जैसों को व्यवहार के कलंक के रूप में देखता है; पर उसे नहीं मालूम कि व्यवहार के कलंक को कैसे धोया जाए और उसकी ऊँचाइयों को कैसे पाया जाए? समाधान एक ही है— भाव-चेतना का जागरण। इसे आत्मजागरण कहें या उच्चतर जीवन के प्रति अभीप्सा। व्यवहार को सुधारने, बदलने, सँवारने का उपाय यही एक है। फ्रांस के कुख्यात डाकू फैकुइस डी विलेन इसी के बल पर अपने को परिवर्तितकर मर्मस्पर्शी साहित्य के सृजेता बन सके।
परिवर्तन न केवल संभव है, बल्कि होकर रहेगा। इन दिनों नियंता कुम्हार की तरह अपने कालचक्र तेजी से घुमा रहा है। उद्देश्य एक ही है— नए युग के अनुरूप नए मनुष्य गढ़ना। आज के मानव समूह के अंदर से ही वे नररत्न तैयार किए जाने हैं, जो भावी युग के आभूषण होंगे। समय आने पर भारी-भरकम काम भी अल्प प्रयासों से हो जाते हैं। आँधी आने पर तिनका भी मीलों उड़ जाता है। समय को पहचानें; स्वयं को बदलने के लिए उठ खड़े हों। स्वार्थी का लबादा उतार फेंकते ही साफ अनुभव हो सकेगा कि हम मिमियाने, घिघियाने, दरबदर ठोकरें खाने वाले मेमने नहीं, विश्वहित में कुछ कर गुजरने वाले सिंह हैं।
कराह रही मानवता के घावों पर मरहम लगाने के लिए जब अंदर बेचैनी, छटपटाहट अनुभव होने लगे तो समझना चाहिए— राजकुमार सिद्धार्थ के भीतर से लोक-वरेण्य भगवान तथागत जन्म लेने वाले हैं। बैरिस्टर गाँधी के अंदर से विश्वबंधु महात्मा उभरने वाला है। कहाँ से उभरेगा-जन्मेगा यह सब? सिर्फ हमारे अंतराल से। महानता-दिव्यता तो उभरने, जन्मने के लिए आतुर है, आकुल-व्याकुल है ही। तैयारी तो हमें अपनी करनी है, परिवर्तन तो होकर रहेगा।
मनुष्य की याचना में सूझ-बूझ और दूरदर्शिता का दृष्टिकोण समाविष्ट रहने से ही देवाराधन के सत्परिणाम सामने आते हैं। देवताओं का काम ही देने का होता है, पर मनुष्य की अनभिज्ञता जैसी पात्रता को देखते हुए उनकी अनुकंपा व्यर्थ— निरर्थक ही साबित होगी। इस संदर्भ में एक जर्मनी पौराणिक गाथा बहुप्रचलित है। कई वर्ष पूर्व जर्मन राष्ट्र में फसल ठीक तरह से उग न पाने के कारण लोगों को खाद्य-संकट का सामना करना पड़ा। ग्रामीण जनता ने एकजुट होकर, ईश्वर से प्रार्थना की कि, एक वर्ष के लिए हमें उपयुक्त धूप और पानी मिले तो खाद्यान्न की समस्या का हल हो सके। ईश्वर ने यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया और मनोवांछित फल भी प्रदान किया; पर अनुदान माँगने के साथ अविवेक की दुष्परिणति को नहीं टाला जा सकता। फसल काटने के समय किसानों ने देखा कि न तो अनाज के पौधे ही पूरी तरह विकसित हो पाए हैं और न बालियों में दाना ही पड़ा है। फलदार पेड़ों पर पत्ते तो आए हैं, पर फल नहीं लग रहे हैं। निराश-हताश जनता ने परमात्मा से पूछा— "ऐसा क्यों हुआ?" आकाशवाणी हुई कि तुमने वर्षा और धूप के साथ तीव्र गति से चलने वाली उत्तरी हवा के झोंकों को माँगने के संबंध में असावधानी और अज्ञानता ही बरती, जिसके रहते परागण (पौलिनेशन) की प्रक्रिया किसी तरह संभव नहीं हो सकती थी। भगवान भक्त की पात्रता, प्रतिभा के अनुरूप ही अनुग्रह बिखेरता और जीवन को सफल-सार्थक बनाने में सहायक सिद्ध होता है। मात्र श्रम ही पर्याप्त नहीं।
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मनोविज्ञानी विन्सैंट पाॅल ने अपनी पुस्तक 'ए गाइड टू कौन्फीडेन्ट लिविंग' में फ्लोरिडा की एक महिला की चर्चा करते हुए बताया कि वह एक असाध्य रोग से बुरी तरह पीड़ित थी। चिकित्सकों द्वारा निराशापूर्ण जवाब सुना तो डेटोना बीच जो प्राकृतिक सौंदर्य के लिए प्रसिद्ध है, में जाकर सूर्य देवता की नियमित प्रार्थना करने लगी। महिला को अपने शरीर-तंत्र की समस्त अव्यवस्थित गतिविधियों के संकेत मिलने लगे और वह उन्हें सुनियोजित पूर्णस्वास्थ लाभ कर सकी।
एक बौद्ध भिक्षु चिंतामग्न बैठे थे। आस-पास घेरे बैठे कुछ लोगों में से एक ने पूछा— "भगवन! आप इतना अन्यमनस्क क्यों हैं?"
"मैंने भारत में भगवान तथागत के कुछ दुर्लभ उपदेश मूल पाली भाषा में प्राप्त किए थे।"
"तो खो गए?"— पूछने वाले ने चिंता का अनुमान लगाया।
"नहीं! वे मेरे पास हैं और मैंने उन सबको यहाँ की जापानी भाषा में अनूदित भी कर लिया।" "यह प्रसन्नता की बात है, फिर चिंता क्यों?"
"चिंता प्रकाशन की है, जो बिना धन-संग्रह के संभव नहीं।"
"यह कार्य तो यहाँ के धनपतियों को प्रभावितकर सहज ही किया जा सकता है।"
"फिर आप ही कुछ सुझाएँ","क्यों न हम सब मजदूरी करें?"
"मजदूरी और भिक्षु यह कैसे संभव होगा?" सभी के चेहरों पर आश्चर्य के भाव थे।
"साधन भी कार्य की गरिमा के अनुरूप होना चाहिए। श्रमशीलों के बीच में अपनी प्रामाणिकता साबित करने का यही माध्यम है। प्रामाणिक हुए बिना लोकसेवा संभव नहीं।"
भिक्षुओं ने मजदूरी करना शुरू किया। लोग आते और पूछते— "ऐसी क्या जरूरत आ पड़ी? आने वालों को उद्देश्य से, तथागत के उपदेशों से अनुप्राणित किया जाता है।" सुनने वालों ने सहायता का क्रम शुरू किया।
यह क्रम चल ही रहा था कि तब तक जापान के एक इलाके में दुर्भिक्ष पड़ा। भिक्षु का मन बेचैन हो उठा। उसने पीड़ितों की आँखों में सेवा की प्यास देखी। संग्रहित धन को अकालपीड़ितों की सहायता में लगा देने का निश्चय किया।
शिष्यों ने एक बार पुनः विरोध प्रकट किया। “इतने परिश्रम से इकट्ठे धन को यों ही खर्च कर देना?”
विरोध को शांत करते हुए भिक्षु का उत्तर था— "स्वयं को भूलो मत। हमारा धन, विभूति एक ही है— अंतःसंवेदनाएँ। जब तक यह हैं, हम कंगाल नहीं हो सकते। यह न रही तो हम सभी निष्प्राण हो जाएँगे। हमारा उद्देश्य जनसेवा है, धनोपार्जन नहीं।"
"पर पुस्तक प्रकाशन?"
"जन जीवित रहा तो पुस्तक भी छपेगी।" भूखों को भोजन देने, वस्त्रहीनों को कपड़े बाँटने में सारी राशि समाप्त हो गई।
दूसरे वर्ष पुनः वर्षा हुई। क्षेत्र से अकाल के बादल छटे। भिक्षु पुनः धन-संग्रह में लग गए। इस बार अपेक्षाकृत कम समय में अधिक धन-संग्रह हुआ। भिक्षु को संतोष था। इस कारण नहीं कि धन जल्दी इकट्ठा हो गया, बल्कि इस कारण कि वह प्रामाणिक साबित हो गया। अब कहीं अधिक उत्तम रीति से वह अपना काम कर सकेगा।
लेकिन इस बार दूसरे क्षेत्र में अतिवृष्टि हुई। नदियों में बाढ़ आ गई। सारे इलाके की फसल को बड़ी क्षति हुई। इस बार श्री महाभिक्षु ने सारा धन बाढ़ पीड़ितों की सहायतार्थ लगा दिया।
इस बार कुछ शिष्य तो हताश होने लगे थे; पर भिक्षु ने उसी उत्साह के साथ धन-संग्रह करना शुरू किया। अबकी बार अपेक्षाकृत और कम समय लगा। संयोग से इस बार कोई प्राकृतिक प्रकोप नहीं हुआ। फलस्वरूप पुस्तक प्रकाशित हो गई।
इस अनुवाद को अनेकों ने पढ़ा और महाभिक्षु के प्रयत्नों की सराहना की। मुखपृष्ठ पर संस्करण के सामने लिखा था— 'तीसरा संस्करण'। लोगों ने पूछा— "यह तो पहली बार छपी है, इसके पूर्व के दो संस्करण कब और कहाँ प्रकाशित हुए?"
"पहले दो संस्करण उन्हीं लोगों को दिखाई देंगे, जिनके पास सेवा और संवेदना की दो आँखें हैं।"— महाभिक्षु भोग्गालि पुत्तस का उत्तर था। उनने अपने जीवन में इन्हीं आँखों से देखा और अंत तक सक्रिय रहे।
भावी समय की नूतन सामाजिक संरचना को गढ़ने और तदनुरूप ढलने में तत्पर व्यक्ति आज की सामयिक आवश्यकता है। इस अनिवार्य माँग को पूरा करने का दायित्व शिक्षण-तंत्र पर है। इसी की जिम्मेदारी है कि वह समाज की वर्तमान और भविष्य की जरूरतों के अनुरूप व्यक्तियों के अंदर से व्यक्तित्व को उभारे ताकि वह आज के और आने वाले समय में आदर्शवादी उपयोगिता की कसौटी पर खरा सिद्ध हो सके। प्रचलित शिक्षण-व्यवस्था की छानबीन करने पर हर किसी को यह सहज बोध हो जाएगा कि इस संबंध में यह असफल प्रायः है। इसकी दशा उस निठल्ले कारखाने-सी है, जिस पर कच्चे लोहे से उत्तम कोटि की मशीनें बनाने की जिम्मेदारी है; पर निकम्मेपन के कारण अधिकांश लोहा पड़ा जंग खाता, सड़ता रहता है। जो मशीनें बनकर निकलती हैं, वह उपयोगी और कारगर सिद्ध नहीं हो पा रहीं। यह स्थिति एकदेशीय नहीं, सार्वभौमिक है।
अमेरिकन मनीषी इवान इलिच ने अपनी कृति 'डिस्कूलिंग सोसायटी' में स्थिति का खुलासा करने की कोशिश की है। उनके अनुसार संस्थाओं के दड़बे में बंद शिक्षण-प्रक्रिया अपनी परिणति भौतिकवादी प्रदूषण, सामाजिक ध्रुवीकरण, मनोवैज्ञानिक और भावनाशून्यता के रूप में कर रही है। इन सबके प्रधानतया दो कारण हैं— पहला, इसे एक खास आयु के वर्ग की सीमा में समेट देना। दूसरा, अन्य व्यापारों की भाँति शिक्षण का व्यापारीकरण कर देना। इसी का प्रतिफल है कि शिक्षा जन-जन तक, द्वार-द्वार तक नहीं पहुँच पा रही। व्यापारीकरण के कारण लोक-शिक्षण की परंपरा निर्जीव प्रायः हो गई है। दिमाग को कंप्यूटर मानकर उसमें जानकारियाँ तो घुसेड़ी जा रही है; पर मानवीय व्यवहार गढ़ पाने में असमर्थता है। परिणाम आज की सामाजिक दशा है। जहाँ अपने को शिक्षित कहने वाला व्यक्ति स्वयं के ज्ञानवान और विद्वान होने का दावा तो करता है, पर ज्ञान इतना भी नहीं है कि स्वयं में क्या है? स्वयं के प्रति और समाज के प्रति क्या दायित्व है, उन्हें किस कौशल व तत्परता से पूरा किया जाए? शिक्षा देने वाले और शिक्षा लेने वाले दोनों की एक-सी दशा है।
कारगर उपचार एक ही है— लोक-शिक्षण का एक नया तंत्र विकसित करना। जहाँ शिक्षा कैदमुक्त हो, सार्वभौमिक हो और श्री इलिच के शब्दों में कहें तो व्यक्तित्वों के गढ़ने की टकसाल हो। ऐसी टकसाल जहाँ से ढले सिक्के आज और कल सोलह आने खरे साबित हों। इसी कारण वह ढालने वाले प्रशिक्षक में दो गुणों की अनिवार्यता बताते हैं। उन्हीं के भावों में, प्रशिक्षक कुम्हार की तरह, प्रशिक्षक वैद्य की तरह। कबीर ने भी गुरु को कुम्हार संबोधन दिया है। ऐसा कुम्हार जो मिट्टी के लौंदे को समय के अनुरूप समाजहित में क्षेत्र की समस्याओं के निदान हेतु भिन्न-भिन्न रूप देने में तत्पर रहता है। उसे पकाता, मजबूती प्रदान करता है और जनहित में समर्पित करता है। श्री रामकृष्ण गुरु को वैद्य के अनुरूप होने पर बल देते हैं। ऐसा वैद्य जो मानव, व्यक्ति और समूह की आंतरिक और बाह्य संरचना व क्रियाविधियों में निष्णात हो। बिगड़े को सँवारने, बिखरे को समेटने, नवजीवन संचार करने में माहिर हो।
आज की स्थिति में इस तंत्र को विकसित करने की तकनीकें प्रयोगवादी भारत के प्राचीन सफल प्रयोगों से सीखनी होगी। अतीत के झरोखों से झाँकने पर साफ दिखाई देता है कि शिक्षण का यह तंत्र कुछ ऐसा ही विकसित रहा है। प्रागैतिहासिककाल में चतुर्दिक् फैले महर्षि अगस्त्य की वेदपुरी, भारद्वाज की प्रयागस्थित प्रशिक्षणशाला, महर्षि विश्वामित्र का सिद्धाश्रम आदि ने समय की माँगों को पूरा किया। वेदपुरी में महर्षि अगस्त्य के प्रशिक्षण की प्रखरता की सराहना करते हुए आदिकवि बाल्मीकि कहते हैं— "अनीतिकारी आसुरी शक्तियाँ उस दिशा से भय खाती थीं।" राक्षसों को अगस्त्य की दिशा से इतना खौफ था कि उधर पैर रखने का साहस नहीं करते थे। दस हजार छात्रों वाली भारद्वाज की प्रशिक्षणशाला जन को जाग्रत और कर्त्तव्यनिष्ठा के लिए सचेत करने वाले प्रहरी तैयार करती रहती। सिद्धाश्रम को केंद्र बनाकर, उपयुक्त पात्रों को प्रशिक्षितकर विश्वामित्र ने अनीतियों के विरुद्ध व्यूह-रचना की। रामराज्य की सतयुगी परिस्थितियाँ इन्हीं प्रशिक्षणशालाओं की उर्वरता और प्रशिक्षकों के चमत्कारी व्यक्तित्व गढ़ने में महारथ का परिणाम था। इन तीनों के यहाँ स्वयं जाकर श्रीराम ने सतयुग के विस्तार की तकनीकें और सहायता प्राप्त की।
बीच के समय में भारत को सोने की चिड़िया— स्वर्णभूमि कहलाने का सौभाग्य ऐसे ही विश्वविद्यालयों ने प्रदान किया था। गांधारस्थित तक्षशिला, राजगिरि के समीप नालंदा, भागलपुरस्थित विक्रमशिला, काठियावाड़ के वल्लभी विश्वविद्यालयों ने अपने समय में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। चाणक्य की दुर्धर्ष प्रखरता तक्षशिला से उपजी थी। यही के स्नातक उनके प्रथम सहयोगी थे। जिनके सम्मिलित प्रयासों से जनजाग्रति की लहर फैली और विशाल भारत की अभिनव समाज-संरचना अपना पूर्ण सौंदर्य प्रकट कर सकी। विचारक्रांति के अग्रदूत कुमारिल भट्ट नालंदा में गढ़े गए, जिनकी रखी मजबूत नींव पर शंकराचार्य ने सांस्कृतिक क्रांति की भव्यता विनिर्मित की। चोल सम्राट देवपाल के समय विक्रमशिला से गढ़े गए परिव्राजकों ने भारत ही क्यों, सुदूर बर्मा, मलाया आदि जगहों पर जा, जीवन विद्या का प्रसार किया। पाँचवीं से आठवीं सदी तक वल्लभी के स्नातकों ने काठियावाड़ ही क्यों, समूचे भारत की जनचेतना को जीवंत और सचेत रखा। यहाँ के प्रशिक्षक व्यक्तित्वों को ढालने में इतने माहिर थे कि अन्य देशों के लोग भी यहाँ दाखिले के लिए तरसते थे।
यहीं क्यों उज्जयिनी, कांचीपुरम, अमरावती, औदंतपुरी आदि स्थानों में ऐसी ही कार्यशालाएँ थी, जहाँ से साधारण व्यक्ति असाधारण प्रखर बनकर निकलते थे। वह स्वयं के साथ देश-समाज के लिए उपयोगिता की कसौटी पर खरे सिद्ध होते। नेशनल कॉलेज की स्थापना के पीछे श्री अरविंद का यही उद्देश्य था और बहुत कुछ पूरा भी हुआ। बंगाल की भूमि ने ऐसी ही प्रशिक्षण संस्थाओं के बल पर नररत्नों की झड़ी लगा दी। काशी विद्यापीठ की भूमिका भी कुछ ऐसी ही थी। बाबू सम्पूर्णानंद, आचार्य जुगलकिशोर, लालबहादुर शास्त्री, राजाराम शास्त्री, भगवान दास यहीं तराशे और निखारे गए थे। यहीं के उत्पादकों ने राजा महेंद्र प्रताप का प्रेम महाविद्यालय, प्रयाग विद्यापीठ आदि स्थानों पर जाकर अपने जैसे अनेकों बनाए।
वर्तमान के क्षण सन्निकट उज्ज्वल भविष्य के लिए अतीत के इतिहास के इन प्रभावकारी प्रयोगों को दुहराने के लिए बेतरह आकुल है। कम समय में भावी समय को आदर्शवादी परिस्थितियों, व्यक्तित्वों के गढ़ने-तराशने की भारी जिम्मेदारी आ पड़ने से यह व्याकुलता निरंतर त्वरित गति से बढ़ती जा रही है। ब्रिटिश मनीषी अरनाल्ड टायनबी ने एक स्थान पर संकेत किया था कि; "मानवता एक महान संस्कृति को अपने गर्भ में धारण कर चुकी है, जिसके प्रकट होने पर समूचा विश्व स्वर्गराज्य के रूप में बदल जाएगा।" प्रकट होने के क्षण आ पहुँचे हैं। उन क्षणों की महत्ता बताते हुए श्री अरविंद ने इसे देवमुहूर्त्त घोषित किया है। वह कहते हैं— "वह समय निकट है, जब सत्य दुनिया पर शासन करेगा। उसके लिए हम स्वयं को तैयार करें।"
यह तैयारी ही प्रशिक्षण है, जिसके द्वारा संस्कृत व्यक्तियों का वह समूह तैयार किया जा सके जो नवयुग की संस्कृति के अनुरूप अपने को सिद्ध कर सके। श्री इलिच ऐसे व्यक्ति को कहते हैं— 'डपिमेथियन' अर्थात वह जो अपने अंदर के प्रकाश को प्रकट करने के लिए उतारू है, प्रकट कर रहा है। सारा जनसमूह एक साथ, एक जगह प्रशिक्षित हो सके, यह संभव नहीं। नीति यही रहेगी कि यदि पहाड़ ईसा के पास न पहुँचे तो ईसा पहाड़ के पास पहुँचेगा, अर्थात घर-घर पहुँचकर मनुष्य को उसके गढ़ने, निखारने में सहायता पहुँचानी होगी। इसे सहायता पहुँचाने वाले प्रशिक्षकों को विशेष वर्ग को गढ़ने के लिए वेदपुरी, सिद्धाश्रम, वल्लभी, तक्षशिला की भूमिका गायत्री तीर्थस्थित आरण्यक निभा रहा है। गढ़ने का उत्कृष्ट कौशल चाणक्य और कुमारिलभट्ट की वह नई पीढ़ी तैयार करेगी जो वर्तमान और भविष्य की जरूरतों को पूरा कर सके। प्रशिक्षित दूसरों को प्रशिक्षण दें। क्रम की निरंतरता एक चिरस्थाई और मजबूत शिक्षण-तंत्र की रचना करेगी जहाँ से विश्वहित, समाजहित के साथ व्यक्ति की क्षेत्रविशेष की उलझनें सुलझेंगी। प्रतियोगिता और संघर्ष को त्यागकर, सारी बहानेबाज़ी भुलाकर नूतन सृजित शिक्षण-तंत्र स्वयं को जोड़े प्रशिक्षकों का महत्त्वपूर्ण दायित्व निभाने को तैयार हो। नूतन इतिहास के सृजन का यह कार्य युगों तक भुलाया न जा सकेगा।
भावी समय की नूतन सामाजिक संरचना को गढ़ने और तदनुरूप ढलने में तत्पर व्यक्ति आज की सामयिक आवश्यकता है। इस अनिवार्य माँग को पूरा करने का दायित्व शिक्षण-तंत्र पर है। इसी की जिम्मेदारी है कि वह समाज की वर्तमान और भविष्य की जरूरतों के अनुरूप व्यक्तियों के अंदर से व्यक्तित्व को उभारे ताकि वह आज के और आने वाले समय में आदर्शवादी उपयोगिता की कसौटी पर खरा सिद्ध हो सके। प्रचलित शिक्षण-व्यवस्था की छानबीन करने पर हर किसी को यह सहज बोध हो जाएगा कि इस संबंध में यह असफल प्रायः है। इसकी दशा उस निठल्ले कारखाने-सी है, जिस पर कच्चे लोहे से उत्तम कोटि की मशीनें बनाने की जिम्मेदारी है; पर निकम्मेपन के कारण अधिकांश लोहा पड़ा जंग खाता, सड़ता रहता है। जो मशीनें बनकर निकलती हैं, वह उपयोगी और कारगर सिद्ध नहीं हो पा रहीं। यह स्थिति एकदेशीय नहीं, सार्वभौमिक है।
अमेरिकन मनीषी इवान इलिच ने अपनी कृति 'डिस्कूलिंग सोसायटी' में स्थिति का खुलासा करने की कोशिश की है। उनके अनुसार संस्थाओं के दड़बे में बंद शिक्षण-प्रक्रिया अपनी परिणति भौतिकवादी प्रदूषण, सामाजिक ध्रुवीकरण, मनोवैज्ञानिक और भावनाशून्यता के रूप में कर रही है। इन सबके प्रधानतया दो कारण हैं— पहला, इसे एक खास आयु के वर्ग की सीमा में समेट देना। दूसरा, अन्य व्यापारों की भाँति शिक्षण का व्यापारीकरण कर देना। इसी का प्रतिफल है कि शिक्षा जन-जन तक, द्वार-द्वार तक नहीं पहुँच पा रही। व्यापारीकरण के कारण लोक-शिक्षण की परंपरा निर्जीव प्रायः हो गई है। दिमाग को कंप्यूटर मानकर उसमें जानकारियाँ तो घुसेड़ी जा रही है; पर मानवीय व्यवहार गढ़ पाने में असमर्थता है। परिणाम आज की सामाजिक दशा है। जहाँ अपने को शिक्षित कहने वाला व्यक्ति स्वयं के ज्ञानवान और विद्वान होने का दावा तो करता है, पर ज्ञान इतना भी नहीं है कि स्वयं में क्या है? स्वयं के प्रति और समाज के प्रति क्या दायित्व है, उन्हें किस कौशल व तत्परता से पूरा किया जाए? शिक्षा देने वाले और शिक्षा लेने वाले दोनों की एक-सी दशा है।
कारगर उपचार एक ही है— लोक-शिक्षण का एक नया तंत्र विकसित करना। जहाँ शिक्षा कैदमुक्त हो, सार्वभौमिक हो और श्री इलिच के शब्दों में कहें तो व्यक्तित्वों के गढ़ने की टकसाल हो। ऐसी टकसाल जहाँ से ढले सिक्के आज और कल सोलह आने खरे साबित हों। इसी कारण वह ढालने वाले प्रशिक्षक में दो गुणों की अनिवार्यता बताते हैं। उन्हीं के भावों में, प्रशिक्षक कुम्हार की तरह, प्रशिक्षक वैद्य की तरह। कबीर ने भी गुरु को कुम्हार संबोधन दिया है। ऐसा कुम्हार जो मिट्टी के लौंदे को समय के अनुरूप समाजहित में क्षेत्र की समस्याओं के निदान हेतु भिन्न-भिन्न रूप देने में तत्पर रहता है। उसे पकाता, मजबूती प्रदान करता है और जनहित में समर्पित करता है। श्री रामकृष्ण गुरु को वैद्य के अनुरूप होने पर बल देते हैं। ऐसा वैद्य जो मानव, व्यक्ति और समूह की आंतरिक और बाह्य संरचना व क्रियाविधियों में निष्णात हो। बिगड़े को सँवारने, बिखरे को समेटने, नवजीवन संचार करने में माहिर हो।
आज की स्थिति में इस तंत्र को विकसित करने की तकनीकें प्रयोगवादी भारत के प्राचीन सफल प्रयोगों से सीखनी होगी। अतीत के झरोखों से झाँकने पर साफ दिखाई देता है कि शिक्षण का यह तंत्र कुछ ऐसा ही विकसित रहा है। प्रागैतिहासिककाल में चतुर्दिक् फैले महर्षि अगस्त्य की वेदपुरी, भारद्वाज की प्रयागस्थित प्रशिक्षणशाला, महर्षि विश्वामित्र का सिद्धाश्रम आदि ने समय की माँगों को पूरा किया। वेदपुरी में महर्षि अगस्त्य के प्रशिक्षण की प्रखरता की सराहना करते हुए आदिकवि बाल्मीकि कहते हैं— "अनीतिकारी आसुरी शक्तियाँ उस दिशा से भय खाती थीं।" राक्षसों को अगस्त्य की दिशा से इतना खौफ था कि उधर पैर रखने का साहस नहीं करते थे। दस हजार छात्रों वाली भारद्वाज की प्रशिक्षणशाला जन को जाग्रत और कर्त्तव्यनिष्ठा के लिए सचेत करने वाले प्रहरी तैयार करती रहती। सिद्धाश्रम को केंद्र बनाकर, उपयुक्त पात्रों को प्रशिक्षितकर विश्वामित्र ने अनीतियों के विरुद्ध व्यूह-रचना की। रामराज्य की सतयुगी परिस्थितियाँ इन्हीं प्रशिक्षणशालाओं की उर्वरता और प्रशिक्षकों के चमत्कारी व्यक्तित्व गढ़ने में महारथ का परिणाम था। इन तीनों के यहाँ स्वयं जाकर श्रीराम ने सतयुग के विस्तार की तकनीकें और सहायता प्राप्त की।
बीच के समय में भारत को सोने की चिड़िया— स्वर्णभूमि कहलाने का सौभाग्य ऐसे ही विश्वविद्यालयों ने प्रदान किया था। गांधारस्थित तक्षशिला, राजगिरि के समीप नालंदा, भागलपुरस्थित विक्रमशिला, काठियावाड़ के वल्लभी विश्वविद्यालयों ने अपने समय में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। चाणक्य की दुर्धर्ष प्रखरता तक्षशिला से उपजी थी। यही के स्नातक उनके प्रथम सहयोगी थे। जिनके सम्मिलित प्रयासों से जनजाग्रति की लहर फैली और विशाल भारत की अभिनव समाज-संरचना अपना पूर्ण सौंदर्य प्रकट कर सकी। विचारक्रांति के अग्रदूत कुमारिल भट्ट नालंदा में गढ़े गए, जिनकी रखी मजबूत नींव पर शंकराचार्य ने सांस्कृतिक क्रांति की भव्यता विनिर्मित की। चोल सम्राट देवपाल के समय विक्रमशिला से गढ़े गए परिव्राजकों ने भारत ही क्यों, सुदूर बर्मा, मलाया आदि जगहों पर जा, जीवन विद्या का प्रसार किया। पाँचवीं से आठवीं सदी तक वल्लभी के स्नातकों ने काठियावाड़ ही क्यों, समूचे भारत की जनचेतना को जीवंत और सचेत रखा। यहाँ के प्रशिक्षक व्यक्तित्वों को ढालने में इतने माहिर थे कि अन्य देशों के लोग भी यहाँ दाखिले के लिए तरसते थे।
यहीं क्यों उज्जयिनी, कांचीपुरम, अमरावती, औदंतपुरी आदि स्थानों में ऐसी ही कार्यशालाएँ थी, जहाँ से साधारण व्यक्ति असाधारण प्रखर बनकर निकलते थे। वह स्वयं के साथ देश-समाज के लिए उपयोगिता की कसौटी पर खरे सिद्ध होते। नेशनल कॉलेज की स्थापना के पीछे श्री अरविंद का यही उद्देश्य था और बहुत कुछ पूरा भी हुआ। बंगाल की भूमि ने ऐसी ही प्रशिक्षण संस्थाओं के बल पर नररत्नों की झड़ी लगा दी। काशी विद्यापीठ की भूमिका भी कुछ ऐसी ही थी। बाबू सम्पूर्णानंद, आचार्य जुगलकिशोर, लालबहादुर शास्त्री, राजाराम शास्त्री, भगवान दास यहीं तराशे और निखारे गए थे। यहीं के उत्पादकों ने राजा महेंद्र प्रताप का प्रेम महाविद्यालय, प्रयाग विद्यापीठ आदि स्थानों पर जाकर अपने जैसे अनेकों बनाए।
वर्तमान के क्षण सन्निकट उज्ज्वल भविष्य के लिए अतीत के इतिहास के इन प्रभावकारी प्रयोगों को दुहराने के लिए बेतरह आकुल है। कम समय में भावी समय को आदर्शवादी परिस्थितियों, व्यक्तित्वों के गढ़ने-तराशने की भारी जिम्मेदारी आ पड़ने से यह व्याकुलता निरंतर त्वरित गति से बढ़ती जा रही है। ब्रिटिश मनीषी अरनाल्ड टायनबी ने एक स्थान पर संकेत किया था कि; "मानवता एक महान संस्कृति को अपने गर्भ में धारण कर चुकी है, जिसके प्रकट होने पर समूचा विश्व स्वर्गराज्य के रूप में बदल जाएगा।" प्रकट होने के क्षण आ पहुँचे हैं। उन क्षणों की महत्ता बताते हुए श्री अरविंद ने इसे देवमुहूर्त्त घोषित किया है। वह कहते हैं— "वह समय निकट है, जब सत्य दुनिया पर शासन करेगा। उसके लिए हम स्वयं को तैयार करें।"
यह तैयारी ही प्रशिक्षण है, जिसके द्वारा संस्कृत व्यक्तियों का वह समूह तैयार किया जा सके जो नवयुग की संस्कृति के अनुरूप अपने को सिद्ध कर सके। श्री इलिच ऐसे व्यक्ति को कहते हैं— 'डपिमेथियन' अर्थात वह जो अपने अंदर के प्रकाश को प्रकट करने के लिए उतारू है, प्रकट कर रहा है। सारा जनसमूह एक साथ, एक जगह प्रशिक्षित हो सके, यह संभव नहीं। नीति यही रहेगी कि यदि पहाड़ ईसा के पास न पहुँचे तो ईसा पहाड़ के पास पहुँचेगा, अर्थात घर-घर पहुँचकर मनुष्य को उसके गढ़ने, निखारने में सहायता पहुँचानी होगी। इसे सहायता पहुँचाने वाले प्रशिक्षकों को विशेष वर्ग को गढ़ने के लिए वेदपुरी, सिद्धाश्रम, वल्लभी, तक्षशिला की भूमिका गायत्री तीर्थस्थित आरण्यक निभा रहा है। गढ़ने का उत्कृष्ट कौशल चाणक्य और कुमारिलभट्ट की वह नई पीढ़ी तैयार करेगी जो वर्तमान और भविष्य की जरूरतों को पूरा कर सके। प्रशिक्षित दूसरों को प्रशिक्षण दें। क्रम की निरंतरता एक चिरस्थाई और मजबूत शिक्षण-तंत्र की रचना करेगी जहाँ से विश्वहित, समाजहित के साथ व्यक्ति की क्षेत्रविशेष की उलझनें सुलझेंगी। प्रतियोगिता और संघर्ष को त्यागकर, सारी बहानेबाज़ी भुलाकर नूतन सृजित शिक्षण-तंत्र स्वयं को जोड़े प्रशिक्षकों का महत्त्वपूर्ण दायित्व निभाने को तैयार हो। नूतन इतिहास के सृजन का यह कार्य युगों तक भुलाया न जा सकेगा।
भविष्य में आपको ऊँचे, अच्छे और लाभदायक काम मिले, इसके लिए यह आवश्यक है कि आज हाथ के नीचे आए कामों को अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाकर करें और छोटा होते हुए भी उसे इस तरह संपन्न करें कि वह स्वयं प्रशंसा योग्य बने और करने वाले को प्रतिष्ठा प्रदान करे।
गाँव के पंचायत-घर में काफी भीड़ थी। एक नजर देखने से लगता था जैसे समूचा गाँव उस व्यक्ति के इर्द-गिर्द जमा हो गया हो। इस जनसमुदाय से घिरे उस व्यक्ति के चेहरे पर विश्वास की आभा एक अनोखी दृढ़ता उसके असाधारण व्यक्तित्व के स्वामी होने की गवाही दे रही थी।
उसके कंठ से स्वर उभरा— "बात क्या है? आप लोग इतने आतंकित क्यों हैं?"
"हम सभी डाकुओं से परेशान हैं। हम ही क्यों; समूचे बारदोली क्षेत्र की यही दशा है। सच कहा जाए तो हम लोक-चक्की के दो पाटों में पिस रहे हैं। एक पाट है— डाकू तो दूसरा है— पुलिस। डाकू लूट रहे हैं और पुलिस उन्हें पकड़ने में असफल है।"
उन दिनों वहाँ डाकुओं का आतंक कुछ ज्यादा ही था। दिन छिपते ही सब लोग अपने-अपने घरों में जा घुसते थे। बाहर एक बच्चा भी नजर नहीं आता था। डाकू संख्या में थोड़े होने पर भी पचासों ग्रामों के हजारों ग्रामवासियों का दिल दहला रहे थे।
अंग्रेज सरकार ने उन गाँवों की सुरक्षा के लिए पुलिस के दल-के-दल नियुक्त कर रखे थे, जिनका खर्च ग्रामवासियों को देना पड़ता था, जबकि ये डाकुओं को पकड़ने में नितांत असमर्थ होते थे। उन्हें सिर्फ अपने से मतलब था। डाकुओं से मुकाबला करना-भिड़ना भला उन्हें क्यों प्रिय होता?
बेचारे ग्रामवासियों ने इसी दोहरी मार से त्रस्त होकर उनका स्मरण किया था। वह आए और सारी बातें सुन रहे थे। उनके मन में न तो डाकुओं का डर था और न पुलिस की नाराजी की परेशानी।
"यह बात है? इस कारण आप सब डरे-सहमे हैं?" पूरी बात समझकर सिर हिलाते हुए उन्होंने अपना वाक्य पूरा किया।
गाँव वाले आशा की नजरों से उनकी ओर देख रहे थे। सबकी ओर एक नजर घुमाते हुए उन्होंने फिर बात शुरू की— "देखिए! बुराइयाँ भी अच्छाइयों के आधार पर खड़ी होती और इन्हीं से अपना पोषण प्राप्त करती हैं और कुछ नहीं, ये परजीवी की तरह हैं जो अपने आधार का खून चूसकर बढ़ता, फिर उसे समाप्त प्राप्त कर देता है। होना तो यह चाहिए कि बीमारी बढ़े, उसके पहले परजीवी बुराई नष्ट हो; पर ऐसा होता कहाँ है?"
"खैर हम तो यह देखें कि बुरे डाकू अपनी बुराइयों के लिए कहाँ से शक्ति प्राप्त करते हैं?"
"तो क्या दुर्दांत डाकुओं के भीतर भी कोई अच्छाई है?" सभी के स्वरों में आश्चर्य था।
"निश्चित ये हैं— संगठन, साहस, सावधानी और मनोबल। यही उनके शक्तिस्रोत हैं।"— उनने जिज्ञासा शांत की।
"अब हम सब क्या करें?"
"आप लोग इन्हीं गुणों को विकसित करें। तभी वह शक्ति अर्जित कर सकेंगे, जिसके बल पर इन डाकुओं को पछाड़ा जा सके।"
"किस तरह करें?"
इसके जवाब में उन्होंने गाँव के मुखिया से पूछा— "आप यह बताइए कि इस गाँव में कितने लोग रहते हैं?"
“सात सौ”
“इनमें से कितने हट्टे-कट्टे आदमी हैं; जवान और अधेड़।"
“कोई दो सौ”
"और डाकू कितने आते हैं डाका डालने?"
"यही कोई दस-पंद्रह, अधिक-से-अधिक पच्चीस मैं समझता हूँ।" हर घर में एक लाठी तो होगी, कुछ और हथियार भी होंगे। कई लोग इन्हें चलाना भी जानते होंगे। इस लिहाज से गाँववासियों की ताकत डकैतों से पाँच गुनी है, फिर अपने गाँव के रास्ते हमारे जाने-पहचाने हैं, डाकू तो यह भी नहीं जानते। हममें और उनमें अंतर यही है कि वे संगठित हैं, सावधान हैं, साहस के धनी हैं और हम ऐसे नहीं हैं, इसलिए उनका मुकाबला नहीं कर पाते। यद्यपि उनकी बुराइयाँ शीघ्र ही इन गुणों को नष्ट कर देंगी; पर अच्छा यही है इन गुणों को विकसितकर मुकाबले के लिए तत्पर हों। बात समझ में आ चुकी थी। गाँव में, उस गाँव और आसपास के सभी गाँवों में स्वस्थसमर्थ पुरुषों को लेकर व्यूह-रचना की गई। महिलाओं ने घर की जिम्मेदारी सँभाली। देखते-देखते डाकुओं का आतंक समाप्त हो गया।
आतंक की समाप्ति पर वह फिर आए और कहा— "जिन सद्गुणों के बल पर हमने बुराइयों को पछाड़ा है, उन्हें जीवित रखें और उनकी शक्ति का उचित नियोजन करें।" ग्रामवासी अपने गाँव के हित में सफाई, स्वास्थ्य, व्यायाम आदि अनेकों काम करने लगे। इन्हीं दिनों गाँधी जी ने सत्याग्रह शुरू किया। संगठित और बुराइयों के प्रति व्यूह-रचना में कुशल बारदोली क्षेत्र की जनशक्ति ने अनोखा चमत्कार दिखाया। देखने वालों की आँखें चकरा गईं। पत्रकारों ने लिखा— गाँधी का एक चेला एक साथ विस्मार्क और मेंजिनी बना घूम रहा है, किसकी ताकत है जो उसे हरा सके? यह गाँधी के शिष्य थे— बल्लभ भाई पटेल। जिन्हें वहाँ की जनता ने प्यार से सरदार का संबोधन दिया। बारदोली निवासियों का संबोधन पूरे देश का संबोधन बन गया।
बुराइयों के प्रति व्यूह-रचना संगठित प्रतिकार आज की सामयिक आवश्यकता है। धार्मिक क्रियाओं के नाम पर मूढ़मान्यताएँ, परंपराओं के नाम पर कुरीतियाँ तभी तक हैं जब तक हम उन्हें गले का हार समझकर लिपटाए हैं। जिस क्षण से असलियत पहचानी, उन्हें विषदंश करने वाला साँप समझा, उतार फेंकने के लिए सामूहिक प्रयास शुरू किए कि समूचा समाज स्वस्थ होता दिखाई पड़ेगा; पर इस युगांतरकारी कार्य के लिए शक्ति का स्रोत संगठन, साहस, सावधानी और मनोबल में है। ये महती शक्तियाँ हैं, जिसके आधार पर नवयुग का सृजन बन पड़ेगा।
कलकत्ता के हाईकोर्ट के जज स्वर्गीय श्री गुरुदास बनर्जी वायसराय के साथ कानपुर से कलकत्ता के लिए यात्रा कर रहे थे। कलकत्ता विश्वविद्यालय कमीशन संबंधी किसी आवश्यक चर्चा के लिए वायसराय ने उन्हें अपने ही डिब्बे में बुला लिया। बातचीत के मध्य भोजन का समय हुआ तो वायसराय ने उनसे भोजन पाने का अनुरोध किया। बनर्जी साहब ने उत्तर दिया— "मैं रेल में कुछ नहीं खाता। थोड़ा-सा गंगाजल रखे हुए हूँ, वही पी लेता हूँ।"
वायसराय को विश्वास नहीं हुआ। इतना प्रगतिशील व्यक्ति भी धार्मिक मान्यताओं का इतना कट्टरता के साथ पालन कर सकता है। उन्होंने कहा— "तो फिर लड़के को ही भोजन ग्रहण करने के लिए कहिए।" पर बच्चे ने भी इंकार करते हुए कहा— "मेरे पास घर की बनी थोड़ी-सी मिठाई है, उसका नाश्ता कर लिया है, अन्य कोई वस्तु ग्रहण न करूँगा।"
वायसराय आश्चर्यचकित रह गए। उन्होंने कहा— "आप लोग उपवास कर रहे है, मैं ही भोजन कैसे ग्रहण करूँ?" वायसराय की आज्ञा से इलाहाबाद में गाड़ी रोक दी गई। वहाँ बनर्जी ने अपने पुत्रसहित त्रिवेणी स्नान किया तो फिर गाड़ी आगे बढ़ी। लौटने पर वायसराय को धन्यवाद देते हुए कहा— "कुछ खा-पी लेने से किसी की जाति जाती हो, इस संबंध में मेरा कोई तर्क नहीं, पर इन नियमों के पालन से आत्मसंयम और अनुशासन की शिक्षा मिलती है। हमारे धर्म और संस्कृति में जो ऐसी बातें है, उनको मैंने इसीलिए हृदय से स्वीकार किया है।
1942 की एक सर्दीली सुबह रंगून के एक विशाल प्रांगण में हजारों लोग जमा थे, इन सबके बीच एक ऊँचे मंच पर खड़े थे— नेता जी सुभाष चंद्र बोस। उन्होंने बोलना शुरू किया— "मित्रो! बड़े काम बड़ा त्याग चाहते हैं। समय हमेशा एक-सा नहीं रहता। यों व्यक्ति की जिंदगी में कुछ ऐसे महत्त्वपूर्ण क्षण आते हैं, जो सारी जीवन की धारा में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन कर दें; पर युगों में एक आध बार कभी-कभी ऐसी विलक्षण घड़ियाँ आती हैं, जो एक नहीं, दो नहीं, पाँच-दस नहीं; वरन समूची मानव जाति के भाग्य विधान में चमत्कारी उलट-फेर कर दें। इस उलट-फेर के लिए वांछित है, आप सबका समय और धन।"
उन्होंने एक नजर उपस्थित जनसमूह की ओर डाली, फिर वाणी को गति दी— "यों ही फालतू गपशप, ताश-चौपड़ में बरबाद होने वाले समय को समाज तुमसे माँग रहा है। पान-तंबाकू, चाय-सिगरेट में फूँकने-बहाने वाले धन के लिए राष्ट्रदेवता झोली पसार रहा है। क्या तुम उसे भीख दोगे? बलि के दरवाजे पर स्वयं विराट पुरुष वामन होकर आया है? कौन उसकी झोली भरकर महादानियों में अपना नाम लिखाएगा? कौन इतिहास सृजेता बनेगा?"
सुनने वालों के समक्ष उन्होंने अपने गले से एक साधारण माला उतारी। उसे हिलाते हुए कहा— "यह मेरा हृदयहार है, मेरे सीने में उमड़ने वाली पीड़ा का सहभागी। कौन इसे अपनाएगा; पर मुफ्त नहीं, कीमत चुकानी होगी— समय और धन की कीमत।"
सुनने वालों ने बोलियाँ लगानी शुरू की। पहली बोली पढ़ी एक लाख, दूसरी बोली आई दो लाख फिर बोली बढ़ी तीन-चार पाँच-सात से होती हुई नौ लाख तक बढ़ती चली गई। बोली में अब ठहराव था।
इस दृश्य को देखकर ऐसा लगता था कि सीता की खोज ने समुद्र किनारे बैठी वानर सेना के सदस्य दस-बीस पचास-सत्तर नब्बे योजन समुद्र लाँघने की बात कर रहे हैं; पर समुद्र तो सौ योजन था, कौन लाँघेगा? एक ठहराव आ गया।
खुसफुसाहट चलती रही। एक साधारण-सा युवक भीड़ को लाँघकर नेता जी के सामने आ पहुँचा, उसने बोली लगाई— “मेरा सब कुछ।”
नेता जी मंच के नीचे कूद पड़े, उसके गले में माला पहनाई और सीने से चिपटा लिया। दोनों की आँखों में आँसुओं का अविरल प्रवाह था।
खुसफुसाहट के अस्फुट स्वरों को भाँपकर नेता जी ने कहा— "इस युवक के पास नौ लाख नहीं है, यही कहना चाहते हैं? तो जान लीजिए धन की अपेक्षा समय कीमती है। धन और कुछ नहीं, समय का ठोस भौतिक रूप है। इसने सब कुछ देकर मेरी माला नहीं, स्वयं मुझको खरीद लिया है।"
नेता जी के स्वरों से लग रहा था, जैसे हनुमान से राम कह रहे हों। 'सुनु कपि तेहि उरिन मैं नाहीं'। "मेरी पीड़ा में सहायक युवक क्या नाम है तुम्हारा?" "मोहन सिंह।"
“मोहन सिंह”— उन्होंने दुहराया? "जाओ, गाँव-गाँव घूमो, हरेक से कहो; परिवर्तन के पर्व का समय तुम्हें पुकार रहा है। उन्हें मेरी पीड़ा का एक घूँट पिलाओ, स्वतंत्रता का मर्म सुझाओ, जागृति का शंख फूँक सकोगे, युवक?"
फिर अपने से बोले— “तुम अवश्य कर सकोगे।” सभा विसर्जित हो गई।
वर्षों बाद समय ने फिर पुकारा है। राम अपने हनुमान को, नेताजी मोहन सिंह को, गाँधी अपने जवाहर, पटेल, विनोबा को बेतरह ढूँढ़ रहे हैं। अर्जुन का सारथी फिर अपने प्रिय सखा का रथ हाँकने के लिए आतुर है। कहाँ है ये सब भक्त, जिन्हें भगवान ढूँढ़ रहा है? ये और नहीं, हमारे अंतर में छुपे बैठे हैं; और कोई नहीं, हम स्वयं हैं। अपने को पहचानें, कर्त्तव्य को पूरे करने के लिए महाकाल की झोली भरने के लिए पैर बढ़ाएँ।
बाँट दो अमृत उन्हें, भय मौत का जो सह रहे हैं। दो उन्हें वाणी कहानी आँख से जो कह रहे हैं॥
है बड़ी उलझन अँधेरों से बढ़ी आसक्ति सबकी। आस भी रवि उगने की, पा चुकी नैराश्य कब की॥
ध्रुव बनो उन के लिये, पथ भ्रान्ति का जो गह रहे हैं। चपल मन की अज्ञता बहका रही है आदमी को।
और दिखता है न कोई जो हरे ऐसी कमी को॥ दो किनारा उन सभी को धार में जो बह रहे हैं॥
चक्र चिंता का बढ़ा औ जिंदगी दूभर हुई है। गहनता मस्तिष्क की छल, एषणाओं में छुई है॥
शान्ति मन की दो उन्हें इस ताप में जो दह रहे हैं॥ बात है अच्छी भवन ऊँचे बनायें नयी पीढ़ी।
पर न यह भूले शुरू होती कहाँ से प्रथम सीढ़ी॥ उन्हें भी गारा मिले बरसात में जो ढह रहे हैं॥
-माया वर्मा
अग्रदूतों से
बाँट दो अमृत उन्हें, भय मौत का जो सह रहे हैं।
दो उन्हें वाणी कहानी आँख से जो कह रहे हैं॥
है बड़ी उलझन, अँधेरों से बढ़ी आसक्ति सबकी।
आस भी रवि उगने की, पा चुकी नैराश्य कब की॥
ध्रुव बनो उन के लिए, पथ भ्रांति का जो गह रहे हैं॥
चपल मन की अज्ञता बहका रही है आदमी को।
और दिखता है न कोई जो हरे ऐसी कमी को॥
दो किनारा उन सभी को धार में जो बह रहे हैं॥
चक्र चिंता का बढ़ा और जिंदगी दूभर हुई है।
गहनता मस्तिष्क की छल, एषणाओं में छुई है॥
शांति मन की दो उन्हें इस ताप में जो दह रहे हैं॥
बात है अच्छी, भवन ऊँचे बनाए नई पीढ़ी।
पर न यह भूलें, शुरू होती कहाँ से प्रथम सीढ़ी॥
उन्हें भी गारा मिले बरसात में जो ढह रहे हैं॥
— माया वर्मा
संक्रांति वेला
हाथ पर यूँ हाथ धरकर तुम न बैठो,
सोच लो, अब यह समय संक्रांति का है।
कुछ-न-कुछ कर गुजरने को आ गई है,
दो सहस्राब्दियों की यह संधिबेला,
ठहर पाएगा नहीं तूफान में अब,
नींद आँखों में भरे कोई अकेला,
बस यही संकेत है मिलकर चलो तुम,
अब समय क्षण भर नहीं विश्रांति का है।
सोच लो, अब यह समय संक्रांति का है।
हर तरफ अब दृश्य ऐसा है, समय की
धार में बिगड़ा हुआ हर संतुलन है,
सब ढलानों पर फिसलते जा रहे हैं,
इस तरह निश्चित पराभव है पतन का,
सावधानी से तुम्हें हर पग बढ़ाना,
यह समय हर ओर घोर अशांति का है।
सोच लो, अब यह समय संक्रांति का है।
आत्मबल लेकर अगर तुम बढ़ सकोगे,
लक्ष्य पर ही दृष्टि यदि केंद्रित रहेगी,
तो समझ लो इस भयंकर धार में भी
नाव मनचाही दिशा में ही बढ़ेगी,
साथ हो संकल्प का संबल अविचलित,
यह समय बिलकुल न अब दिग्भ्रांति का है।
सोच लो, अब यह समय संक्रांति का है।
बस तुम्हारी इस समन्वित शक्ति से ही,
स्वर्ग का फिर अवतरण होगा धरा पर,
अनुप्राणित नवसृजन की चेतना से,
प्रीति का वातावरण होगा धरा पर,
फिर समझ लो, जो यहाँ आना समय है,
वह बहुत पावन सुनिश्चित शांति का है।
सोच लो, अब यह समय संक्रांति का है।
— शचींद्र भटनागर
अग्रदूतों से
बाँट दो अमृत उन्हें, भय मौत का जो सह रहे हैं।
दो उन्हें वाणी कहानी आँख से जो कह रहे हैं॥
है बड़ी उलझन, अँधेरों से बढ़ी आसक्ति सबकी।
आस भी रवि उगने की, पा चुकी नैराश्य कब की॥
ध्रुव बनो उन के लिए, पथ भ्रांति का जो गह रहे हैं॥
चपल मन की अज्ञता बहका रही है आदमी को।
और दिखता है न कोई जो हरे ऐसी कमी को॥
दो किनारा उन सभी को धार में जो बह रहे हैं॥
चक्र चिंता का बढ़ा और जिंदगी दूभर हुई है।
गहनता मस्तिष्क की छल, एषणाओं में छुई है॥
शांति मन की दो उन्हें इस ताप में जो दह रहे हैं॥
बात है अच्छी, भवन ऊँचे बनाए नई पीढ़ी।
पर न यह भूलें, शुरू होती कहाँ से प्रथम सीढ़ी॥
उन्हें भी गारा मिले बरसात में जो ढह रहे हैं॥
— माया वर्मा
संक्रांति वेला
हाथ पर यूँ हाथ धरकर तुम न बैठो,
सोच लो, अब यह समय संक्रांति का है।
कुछ-न-कुछ कर गुजरने को आ गई है,
दो सहस्राब्दियों की यह संधिबेला,
ठहर पाएगा नहीं तूफान में अब,
नींद आँखों में भरे कोई अकेला,
बस यही संकेत है मिलकर चलो तुम,
अब समय क्षण भर नहीं विश्रांति का है।
सोच लो, अब यह समय संक्रांति का है।
हर तरफ अब दृश्य ऐसा है, समय की
धार में बिगड़ा हुआ हर संतुलन है,
सब ढलानों पर फिसलते जा रहे हैं,
इस तरह निश्चित पराभव है पतन का,
सावधानी से तुम्हें हर पग बढ़ाना,
यह समय हर ओर घोर अशांति का है।
सोच लो, अब यह समय संक्रांति का है।
आत्मबल लेकर अगर तुम बढ़ सकोगे,
लक्ष्य पर ही दृष्टि यदि केंद्रित रहेगी,
तो समझ लो इस भयंकर धार में भी
नाव मनचाही दिशा में ही बढ़ेगी,
साथ हो संकल्प का संबल अविचलित,
यह समय बिलकुल न अब दिग्भ्रांति का है।
सोच लो, अब यह समय संक्रांति का है।
बस तुम्हारी इस समन्वित शक्ति से ही,
स्वर्ग का फिर अवतरण होगा धरा पर,
अनुप्राणित नवसृजन की चेतना से,
प्रीति का वातावरण होगा धरा पर,
फिर समझ लो, जो यहाँ आना समय है,
वह बहुत पावन सुनिश्चित शांति का है।
सोच लो, अब यह समय संक्रांति का है।
— शचींद्र भटनागर
बाँट दो अमृत उन्हें, भय मौत का जो सह रहे हैं। दो उन्हें वाणी कहानी आँख से जो कह रहे हैं॥
है बड़ी उलझन अँधेरों से बढ़ी आसक्ति सबकी। आस भी रवि उगने की, पा चुकी नैराश्य कब की॥
ध्रुव बनो उन के लिये, पथ भ्रान्ति का जो गह रहे हैं। चपल मन की अज्ञता बहका रही है आदमी को।
और दिखता है न कोई जो हरे ऐसी कमी को॥ दो किनारा उन सभी को धार में जो बह रहे हैं॥
चक्र चिंता का बढ़ा औ जिंदगी दूभर हुई है। गहनता मस्तिष्क की छल, एषणाओं में छुई है॥
शान्ति मन की दो उन्हें इस ताप में जो दह रहे हैं॥ बात है अच्छी भवन ऊँचे बनायें नयी पीढ़ी।
पर न यह भूले शुरू होती कहाँ से प्रथम सीढ़ी॥ उन्हें भी गारा मिले बरसात में जो ढह रहे हैं॥
-माया वर्मा
मनीषी कहते हैं कि; "मानवी स्वभाव की सबसे बड़ी दुर्बलता यह है कि किसी भी शांतिपूर्ण मान्यता को वह अपने जीवन का अविच्छिन्न अंग मानकर चलता और तदनुरूप ही अपने क्रियाकलापों का निर्धारण करता है।" डॉ. रॉबर्ट एन्थोनी ऐसे भ्रममूलक विश्वासों को 'मिस्टेकेन सर्टनिटीज' के नाम से संबोधित करते हैं, जिनके रहते संसार को बदलना तो दूर आत्मसुधार भी कठिन है।
इन भ्रांतियों से छुटकारा पाने का एक ही उपाय है कि यथार्थतावादी दृष्टिकोण विकसित किया जाए। श्री एंथोनी ने यथार्थवादी चिंतन को जीवनचर्या के साथ जोड़ने के लिए नौ सूत्र ऐसे सुझाए हैं, जिनके समाविष्ट होने पर भ्रांतियाँ मिटती और प्रसुप्त प्रतिभा निखरती हैं। ये नौ सूत्र इस प्रकार है—
1- जीवन में अनौचित्यपूर्ण मान्यताओं को हटाकर औचित्य की विवेकशीलता को ही अपनाया जाए।
2- कल्पनाओं, मूल्यों, विश्वासों, आदर्शों, मान्यताओं और उद्देश्यों के निर्धारण में दूरदर्शिता का समावेश रहे।
3- अपनी आवश्यकताओं, आकांक्षाओं और अभिप्रेरणाओं की वास्तविकता को ध्यान में रखते हुए पुनर्गठन की प्रक्रिया को लागू किया जाए।
4- अपनी अंतःचेतना की सामर्थ्य पर विश्वास किया जाए।
5- अपने दोष-दुर्गुणों की कड़ी समीक्षा करते हुए उन्हें निकाल फेंका जाए और उनकी जगह सद्गुणों की संपदा को बढ़ाते रहें।
6- दूसरे लोगों के साथ स्नेह, सद्भाव और सहयोग-सहकार की भावनाओं को विकसित करें।
7- पक्षपातरहित चिंतन की स्वतः प्रक्रिया को न दबाया जाए। उचित-अनुचित का निर्णय ले सकने वाली प्रतिभा का विकास तभी होता है।
8- अपने समय का निर्धारण इस प्रकार किया जाए, जिससे आत्मसुधार और लोक-कल्याण के दोनों प्रयोजन पूरे होते हैं। निरर्थक बातों में समय न गँवाकर उच्च उद्देश्यों के लिए ही उसका नियोजन किया जाए।
9- अपने मन-मस्तिष्क में ऐसे सद्विचार उत्पन्न किए जाएँ कि संसार की गतिविधियाँ अपने साथ ही बदलती चली जा रही हैं और निकट भविष्य में सर्वत्र अच्छाइयाँ-ही-अच्छाइयाँ दृष्टिगोचर होने लगेंगी।
/akhandjyoti/edition/1990/February/49
काँच को हथौड़े से तोड़ा जाए तो वह छर-छर होकर बिखर तो सकता है; पर सही जगह से इच्छित स्तर के टुकड़ों में विभाजित न हो सकेगा। चट्टानों में छेद करना हो, तो सिर्फ हीरे की नोक वाला बरमा ही काम आता है। पहाड़ में सुरंगें निकालने के लिए डायनामाइट की जरूरत पड़ती है। कुदालों से खोदते-तोड़ते रहने पर तो सफलता संदिग्ध ही बनी रहेगी।
वर्त्तमान में संव्याप्त असंख्यों अवांछनीयताओं से जूझने में प्रचलित उपाय पर्याप्त नहीं हैं। दरिद्रता को सभी संकटों की एकमात्र जड़ बताने से तो बात नहीं बनती। समाधान तो तब हो, जब सर्वसाधारण को मनचाही संपदाओं से सराबोर कर देने का कोई सीधा मार्ग बन सके। यह तो संभव नहीं दिखता। इसी प्रकार यह भी दुष्कर प्रतीत होता है कि उच्च शिक्षित, चतुर कहलाने वाला व्यक्ति अपनी विशिष्टताओं का दुरुपयोग न करेगा और उपार्जित योग्यता का लाभ सर्वसाधारण तक पहुँचा सकेगा। प्रपंचों से भरीपूरी गतिविधियाँ अपनाकर जनसाधारण के लिए अनेको कठिनाइयाँ खड़ी न करेगा। संपदा के द्वारा मिलने वाली सुविधाओं से कोई इनकार नहीं कर सकता, पर यह विश्वास कर सकना कठिन है कि जो पाया गया, उसका सदुपयोग ही बन पड़ेगा। उसके कारण दुर्व्यसनों का, आतंकवादी अनाचार का जमघट तो नहीं लग जाएगा?
वर्त्तमान कठिनाइयों के निराकरण हेतु आमतौर से संपदा, सत्ता और प्रतिभा के सहारे ही निराकरण की आशा की जाती है, इन्हीं तीनों का मुँह जोहा जाता है। इतने पर भी इनके द्वारा जो पिछले दिनों बन पड़ा है, उसका लेखा-जोखा लेने पर निराशा ही हाथ लगती है। प्रतीत होता है कि जब भी, जहाँ भी वे अतिरिक्त मात्रा में संचित होती हैं, वहीं एक प्रकार का उन्माद उत्पन्न कर देती हैं। उस अधपगलाई मनोदशा के लोग सुविधा-संवर्द्धन के नाम पर उद्धत आचरण करने पर उतारू हो जाते हैं और मनमानी करने लगते हैं। अपने-अपनों के लाभ के लिए उनकी उपलब्धियाँ खपती रहती हैं। प्रदर्शन के रूप में ही यदा-कदा उनका उपयोग ऐसे कार्यों में लग पाता है, जिससे सत्प्रवृत्ति-संवर्द्धन में कदाचित कुछ योगदान मिल सके।
सच तो यह है कि समर्थता का जखीरा हाथ लगने पर तथाकथित बलिष्ठों ने घटाटोप की तरह छाए हुए संकट और विग्रह खड़े किए हैं। प्रदूषण उगलने वाले कारखाने संपन्न लोगों ने ही लगाए हैं। उन्हीं ने बेरोजगारी और बेकारी का अनुपात बढ़ाया है। आतंक, आक्रमण और अनाचार में संलग्न बलिष्ठ लोग ही होते हैं। युद्धोन्माद उत्पन्न करना खर्चीले माध्यमों के सहारे उन्हीं के द्वारा बन पड़ता है। प्रतिभा के धनी कहे जाने वाले वैज्ञानिकों ने ही मृत्यु-किरणों जैसे आविष्कार किए हैं। कामुकता को धरती से आसमान तक उछाल देने में तथाकथित कलाकारों की ही संरचनाएँ काम करती हैं। अनास्थाओं को जन्म देने का श्रेय, बुद्धिवादी कहे जाने वालों के ही पल्ले बंधा है। नशेबाजी को घर-घर तक पहुँचाने में चतुरता के धनी लोग ही अपने स्वेच्छाचार का परिचय दे रहे हैं। इस प्रकार आकलन करने पर प्रतीत होता है कि मूर्धन्यों, बलिष्ठों, संपन्न और प्रतिभाशालियों की छोटी-सी चौकड़ी ने अनर्थ थोड़े समय में खड़े किए हैं।
यहाँ साधनसंपन्नता की निंदा नहीं की जा रही है और न दुर्बलता के सिर पर शालीनता का सेहरा बाँधा जा रहा है। कहा इतना भर जा रहा है कि पिछड़ेपन को हटाने-मिटाने का एकमात्र यही उपाय नहीं है।
इस तथ्य को हजार बार समझा और लाख बार समझाया जाना चाहिए कि मनःस्थिति ही परिस्थितियों की जन्मदात्री है, इसलिए यदि परिस्थितियों की विपन्नता को सचमुच ही सुधारना हो, तो जनसमुदाय की मनःस्थिति में दूरदर्शी विवेकशीलता को उगाया, उभारा और गहराई तक समाविष्ट किया जाए। यहाँ यह बात भी ध्यान रखने की है कि मनःक्षेत्र एवं बुद्धि संस्थान भी स्वतंत्र नहीं हैं, उन्हें भावनाओं, आकांक्षाओं, मान्यताओं के आधार पर अपनी दिशाधारा विनिर्मित करनी होती है। उनका आदर्शवादी उत्कृष्ट स्वरूप अंतःकरण में भाव-संवेदना बनकर रहता है। यही है वह सूत्र, जिसके परिष्कृत होने पर कोई व्यक्ति ऋषिकल्प, देवमानव बन सकता है। यह एक ही तत्त्व इतना समर्थ है कि अन्यान्य असमर्थताएँ बने रहने पर भी मात्र अकेली विभूति के सहारे न केवल अपना, वरन समूचे संसार की शालीनता का पक्षधर कायाकल्प किया जा सकता है। इक्कीसवीं सदी के साथ जुड़े उज्ज्वल भविष्य का यदि कोई सुनिश्चित आधार है, तो वह एक ही है कि जन-जन की भाव-संवेदनाओं को उत्कृष्ट, आदर्श, उदत्त बनाया जाए। इस सदाशयता की अभिवृद्धि इस स्तर तक होनी चाहिए कि सब अपने और अपने को सबका मानने की आस्था उभरती और परिपक्व होती रहे।
संपदा संसार में इस अनुपात में ही विनिर्मित हुई है कि उसे मिल-बाँटकर खाने की नीति अपनाकर सभी औसत नागरिक स्तर का जीवन जी सके। साथ ही बढ़े हुए पुरुषार्थ के आधार पर जो कुछ अतिरिक्त अर्जन कर सकें, उसे पिछड़े हुओं को बढ़ाने, गिरते हुओं को उठाने एवं समुन्नतों को सत्प्रवृत्तियों के संवर्द्धन हेतु प्रोत्साहित कर सकें।
अनावश्यक संपन्नता की ललक ही बेकाबू होने पर उन अनर्थकारी संरचनाओं में प्रवृत्त होती है, जिनके कारण अनेकानेक रंग-रूप वाले अनाचारों को व्यापक, विस्तृत और प्रचंड होते हुए देखा जा रहा है। लिप्साओं में किसी प्रकार कटौती करते बन पड़े तो ही वह जुझारूपन उभर सकता है, जो अवांछनीयताओं से गुँथे और पटकनी देकर परास्त कर सके। जिन अभावों से लोग संत्रस्त दीखते हैं, उनसे निपटने की प्रतिभा उनमें उभारी जाए, ताकि वे अपने पैरों खड़े होकर, दौड़कर स्पर्धा जीतते देखे जा सकें। आर्थिक अनुदान देने की मनाही नहीं है और न यह कहा जा रहा है कि गिरों को उठाने में सहयोग देने में कोताही बरती जानी चाहिए। मात्र इतना भर सुझाया जा रहा है कि मनुष्य अपने आप में समग्र और समर्थ है। यदि उसका आत्मविश्वास एवं पुरुषार्थ जगाया जा सके, तो इतना कुछ बन सकता है, जिसके रहते याचना का तो प्रश्न ही नहीं उठता, इतना बचा रहता है जिसे अभावों और अव्यवस्थाओं की पूर्ति के लिए पर्याप्त मात्रा में लगाया जा सके।
इक्कीसवीं सदी भाव-संवेदनाओं के उभरने-उभारने की अवधि है। हमें इस उपेक्षित क्षेत्र को ही हरा-भरा बनाने में निष्ठावान माली की भूमिका निभानी चाहिए। यह विश्व-उद्यान इसी आधार पर हरा-भरा, फला-फूला एवं सुषमासंपन्न बना सकेगा। आश्चर्य नहीं कि वह स्वर्गलोक वाले नंदनवन की समता कर सके।
मनीषी कहते हैं कि; "मानवी स्वभाव की सबसे बड़ी दुर्बलता यह है कि किसी भी शांतिपूर्ण मान्यता को वह अपने जीवन का अविच्छिन्न अंग मानकर चलता और तदनुरूप ही अपने क्रियाकलापों का निर्धारण करता है।" डॉ. रॉबर्ट एन्थोनी ऐसे भ्रममूलक विश्वासों को 'मिस्टेकेन सर्टनिटीज' के नाम से संबोधित करते हैं, जिनके रहते संसार को बदलना तो दूर आत्मसुधार भी कठिन है।
इन भ्रांतियों से छुटकारा पाने का एक ही उपाय है कि यथार्थतावादी दृष्टिकोण विकसित किया जाए। श्री एंथोनी ने यथार्थवादी चिंतन को जीवनचर्या के साथ जोड़ने के लिए नौ सूत्र ऐसे सुझाए हैं, जिनके समाविष्ट होने पर भ्रांतियाँ मिटती और प्रसुप्त प्रतिभा निखरती हैं। ये नौ सूत्र इस प्रकार है—
1- जीवन में अनौचित्यपूर्ण मान्यताओं को हटाकर औचित्य की विवेकशीलता को ही अपनाया जाए।
2- कल्पनाओं, मूल्यों, विश्वासों, आदर्शों, मान्यताओं और उद्देश्यों के निर्धारण में दूरदर्शिता का समावेश रहे।
3- अपनी आवश्यकताओं, आकांक्षाओं और अभिप्रेरणाओं की वास्तविकता को ध्यान में रखते हुए पुनर्गठन की प्रक्रिया को लागू किया जाए।
4- अपनी अंतःचेतना की सामर्थ्य पर विश्वास किया जाए।
5- अपने दोष-दुर्गुणों की कड़ी समीक्षा करते हुए उन्हें निकाल फेंका जाए और उनकी जगह सद्गुणों की संपदा को बढ़ाते रहें।
6- दूसरे लोगों के साथ स्नेह, सद्भाव और सहयोग-सहकार की भावनाओं को विकसित करें।
7- पक्षपातरहित चिंतन की स्वतः प्रक्रिया को न दबाया जाए। उचित-अनुचित का निर्णय ले सकने वाली प्रतिभा का विकास तभी होता है।
8- अपने समय का निर्धारण इस प्रकार किया जाए, जिससे आत्मसुधार और लोक-कल्याण के दोनों प्रयोजन पूरे होते हैं। निरर्थक बातों में समय न गँवाकर उच्च उद्देश्यों के लिए ही उसका नियोजन किया जाए।
9- अपने मन-मस्तिष्क में ऐसे सद्विचार उत्पन्न किए जाएँ कि संसार की गतिविधियाँ अपने साथ ही बदलती चली जा रही हैं और निकट भविष्य में सर्वत्र अच्छाइयाँ-ही-अच्छाइयाँ दृष्टिगोचर होने लगेंगी।
/akhandjyoti/edition/1990/February/49
लाहौर के एक मकान के कमरे में एक नवयुवक बैठा सूखी रोटियाँ चबा रहा था। उसकी कद, काठी और चेहरे के हाव-भाव से कोई भी सहज अंदाजा लगा सकता था कि वह बलिष्ठ और चरित्रवान है।
उसे घेरे बैठे अन्य नवयुवक साथियों में से एक ने कहा— “क्यों जिद करते हैं, पंडित जी?” “यह जिद नहीं किफायतशारी है।”
“तो अब सूखी रोटियाँ चबाने का आपने नया नामकरण भी कर लिया?”
“समझने की कोशिश करो, रणजीत!"— खा रहे युवक ने पूछने वाले को संबोधित करते हुए कहा। “चलिए आप ही समझाइए।”
“दल की वर्त्तमान आर्थिक स्थिति के अनुरूप प्रत्येक सदस्य को दो आने भोजन के लिए मिलते है। एक आने की रोटियाँ और एक आने का गुड़।" "पर मेरा पेट एक आने की रोटियों से नहीं भर सकता। इसी कारण समूचे दो आने की रोटियाँ खरीद, खा रहा हूँ। आई बात समझ में?"
"बिलकुल नहीं।" सुनने वालों ने एक साथ कहा— "दल के पास बहुत पैसा है।”
"पर खाने के लिए नहीं"— बात काटते हुए नवयुवक ने कहा।
“ठीक है! पर आप हमारे प्रमुख हैं, इसलिए आप यदि खाने में कुछ थोड़ा-ज्यादा खर्च कर लें तो कोई एतराज नहीं; पर यहाँ तो मामला ही उलटा है। आप सूखी रोटियाँ चबाते हैं और हम सबको अपेक्षाकृत अच्छा भोजन मिल जाता है। यह नीति कब तक चलेगी?”
"जब तक संगठन को जीवित रखना है।” “अपने प्रति कठोरता, दूसरों के प्रति उदारता।” “संगठन के जिम्मेदार लोग जब तक इस नीति के अनुरूप व्यवहार करते हैं, तभी तक संगठन जीवित रहता है। सामूहिकता तभी बरकरार रह सकेगी जब तक किफायतशारी को अपनाया और महत्त्वाकांक्षाओं को ठुकराया जाता रहेगा।”
“आ गए न आप घूम-फिरकर वहीं? सिद्धांत सूर्य की तरह है जब तक मानवीय जीवन के विभिन्न ग्रह उसके चारों ओर चक्कर लगाते हैं, उसकी प्रेरणा के अनुरूप अपने को संचालित करते हैं, तभी तक इनका अस्तित्व है। सिद्धांत से विलग हुए कि अस्तित्व समाप्त हुआ।”
"बड़प्पन सुविधा-संवर्द्धन का नहीं, सद्गुण-संवर्द्धन का नाम है"— कहने वाले के स्वरों में पीड़ा थी। “जिसने संगठन बनाया है, उसे ही बिखरने का दर्द होता है। खूबसूरत माला के टूटने की सबसे अधिक पीड़ा माली को होती है।"— कहते-कहते गला भर आया।
साथियों ने एक स्वर से क्षमा याचना की— "हमने आपकी किफायतशारी का मखौल उड़ाया, इसके लिए माफी चाहते हैं। आप जो भी दंड दें, स्वीकारने के लिए तैयार हैं।"
“दंड नहीं, अच्छाई का महत्त्व समझो और स्वीकारो। देश को हम सब लोगों से कितनी आशा है। हम क्रांतिकारी माने जाते हैं, एक बड़े परिवर्तन के लिए प्रयत्नशील हैं”
“क्रांतिकारी का मतलब जानते हो?” कुछ चुप रहकर वह बोले— "जो वर्त्तमान में भी भविष्य में होने वाले परिवर्तन के अनुरूप जी रहा हो। जिसकी जिंदगी के छोटे-छोटे क्रियाकलाप को देखकर हर कोई कह सके— अहा! ऐसा होगा स्वर्णिम-भविष्य जिसके लिए वे लोग प्रयासरत हैं।"
"हम सभी प्रतिज्ञा करते हैं, पंडित जी। सच! आपकी शपथ। हम वैसे ही क्रांतिकारी बनेंगे जैसे आप चाहते हैं।" यह पंडित जी थे— हिंदुस्तान रिपब्लिकन आर्मी नामक क्रांतिदल के कमांडर इन चीफ चंद्रशेखर आजाद, जिनके आदर्शवादी जीवन ने अनेकों में प्राण फूँके।
चार चोर एक गाय चुराकर लाए। बंटवारा इस प्रकार हुआ कि चारों बारी-बारी एक-एक दिन उसे अपने घर रखे।
चतुरता में चारों एकदूसरे से बढ़े-चढ़े थे। बारी के दिन गाय का दूध तो निकालते; पर घास यह सोचकर न खिलाते कि पिछले दिन वाले ने इसका पेट भरा ही होगा। अगले दिन वाला भी खिलाएगा ही। एक दिन मैं न खिलाऊँ तो क्या हर्ज है।
यही क्रम कई दिन चला। भूखी गाय का दूध सूखता गया और अंत में उसके प्राण भी निकल गए। अधिकार के लिए आतुर और कर्त्तव्य से बचने वालों को घाटा भी पड़ता है और अपयश भी मिलता है।
मानवी चेतना जल में पड़ी बर्फशिला की भाँति हैं, इसका जितना हिस्सा जागते समय बाहरी क्रियाकलापों के माध्यम से प्रकट होता है, उससे कई गुना अधिक अंदर है। स्वप्नों के माध्यम से हम सभी को इसी अंदर वाले हिस्से की झलक-झाँकी दिखती रही है। यदा-कदा मिलने वाली इस झाँकी से अंतराल के स्वरूप और स्थिति की जानकारियाँ मिलती रहती हैं। स्थिति काई से ढके तालाब की भाँति है। हवा का झोंका आने पर थोड़ी काई हटी और नीचे का पानी प्रकट हुआ। यदि इस छोटी-सी घटना का गहराईपूर्वक निरीक्षण-अध्ययन किया जाए तो नीचे के पानी के बारे में बहुत कुछ जाना जा सकता है।
नींद के झोंकों के बीच मिलने वाली झाँकियों के संबंध में ठीक यही बात हैंं। यदि झाँकियों की सावधानीपूर्वक विवेचना-विश्लेषण की आदत बन पड़े तो आत्मपरिष्कार-आत्मसुधार की दिशा में एक प्रभावी कदम साबित हो सकता है। यह बात सर्वविदित है कि व्यवहार का वृक्ष चिंतन के बीजों से अंकुरित होता, चरित्र के पौधे के रूप में विकसित हो, व्यवहार विटप के रूप में अपना विस्तार करता है। स्वाभाविक है, यह विस्तार बीज के अनुरूप हो। बबूल का बीज तो बड़ा होकर खुद की तथा दूसरों की राह पर काँटे ही बिखेरेगा। उससे यह उम्मीद कैसे की जाए की आम के स्वादिष्ट फल खाने को मिलेंगे। आम के लिए तो भूमि को कुरेदकर बबूल के बीज को निकालने, आम के बीज को गाड़ने जैसी प्रक्रियाओं में संलग्न होना होगा।
मनोभूमि के संदर्भ में भी यही तथ्य लागू होता है। इसे उर्वर बनाने, दुश्चिंतन के बीजों को नष्ट करने, सत्चिंतन को उगाने जैसी प्रक्रिया चल पड़े तो समूचा जीवन बदलता नजर आने लगेगा। स्वप्न की छान-बीन, इस प्रक्रिया में बहुत अधिक सीमा तक सहायक सिद्ध हो सकती है, यदि इनकी बारीकियों को समझा जा सके। आज के मनोवैज्ञानिक ने भी इस बात को स्वीकार किया है। उनके अनुसार नींद में दिखाई देने वाले सपनों के माध्यम से तीन चीजें उजागर होती हैं, वर्तमान चिंतन, गहरे पड़े भले-बुरे संस्कार और मनोभूमि की उर्वर या बंजर स्थिति। यही तीन भिन्न-भिन्न रूपों, झाँकियों के माध्यम से स्वप्नों के झरोखे से प्रकट होते अपनी झलक दिखाते रहते हैं।
मानसशास्त्रियों के अनुसार आंतरिक चेतना की एक और खूबसूरती है— विचारों को आकार का रूप देना। मान लीजिए, किसी व्यक्ति के मन में किसी रोगी की सेवा करने का विचार आया तो वह स्वप्न में अपने को रोगी की सेवा करते हुए देखेगा। विचार ऊपरी सतह पर होते हैं और संस्कार गहराइयों में। यही कारण है कि स्वप्नों में इनका आकारों के रूप में उभरना कहीं अधिक अस्पष्ट, प्रतीकात्मक धुँधला, यहाँ तक कि कभी-कभी बेतुका-सा लगता है।
अंतराल के किसी कोने को देखकर समूचे के बारे में कोई राय नहीं दी जा सकती। यदि एक कोना खराब है तो दूसरा अच्छा भी होगा। कही बुरे संस्कारों के बीज छुपे हैं तो कहीं अच्छों के अवश्य होंगे। इस बारीकी को न समझ पाने के कारण मनोविज्ञान के आचार्य सिग्मण्ड फ्रायड सारे स्वप्नों को दमित वासनाओं का उभरना मान बैठे। वह अपनी किताब 'इन्टरप्रिटेशन ऑफ ड्रीम्स' में कहते हैं कि, "हमारी वे सभी इच्छाएँ अथवा मनोकामनाएँ, जिनकी तृप्ति जगने की हालत में नहीं हो पाती, मन की गहराइयों में चली जाती हैं। सामाजिक मर्यादाओं अथवा साधनों के अभाव के कारण इनकी पूर्ति साधारण ढंग से नहीं हो पाती। फलतः ये नष्ट न होकर गहरे में चली जाती हैं और स्वप्नों के माध्यम से अपना प्रदर्शन करती रहती हैं।"
फ्रायड के इस कथन में सच्चाई तो है, पर थोड़ी। उसी की बेटी अन्ना फ्रायड और शिष्य एडलर ने बात साफ की है। इन दोनों के अनुसार वह मनोरोगियों, अपराधियों की मनोदशा का अध्ययन करते रहने के कारण, मन के गँदले कोने को बार-बार देखने, झाँकने के कारण समूचे मन को गँदला समझने की भूल कर बैठे। कुछ भी हो, भूल तो भूल ही है, इसे सँभालना-सँवारना ही उचित है। एडलर के अनुसार— सपनों के द्वारा चिंतन-चरित्र, कार्य-संचालन के तौर-तरीकों की बारीकियाँ परखी जा सकती है। उदाहरण के लिए दो परीक्षार्थियों के स्वप्न को लें। एक देखता है कि मैं पहाड़ की चोटी पर खड़ा हूँ और दूसरा कि मैं लड़ाई लड़ रहा हूँ। इसका मतलब है कि पहला आत्मविश्वासी है। दूसरे के मन में अपने प्रति विश्वास की कमी है और वह परीक्षा का लड़ाई जैसा दृष्टिकोण रखता है। कमी को परख लेने पर वह और अधिक पढ़ाई करके आत्मविश्वास को मजबूत बना सकता है।
बात न केवल आत्मविश्वास की है; वरन अन्यान्य सद्गुणों की भी। यदि कोई लगातार हिंसक घटनाओं, मारपीट, दुर्व्यवहार के स्वप्न देखता है तो इसका मतलब उसमें करुणा-संवेदना, सहायता की कमी है। इस स्थिति में यदि वह सद्विचारों पर लगातार चिंतन करके इन गुणों पर आस्था जमाए और व्यवहार के माध्यम से इनको सक्रिय करे तो धीरे-धीरे ये अपने जीवन का अविभाज्य अंग हो जाएँगे। सद्गुणों की जितनी अधिक सघनता होती है, सद्विचारों के द्वारा मन जितना अधिक प्रकाशित होता है, सपने उतनी ही अधिक गहराई की कहानी सुनाते हैं। 'मेमोरीज, ड्रीम्स, रिफलेक्शन्स' के लेखक मानव मन के आचार्य कार्लजुंग ने इसे स्वीकारते हुए अपने निजी अनुभव से प्रामाणिक ठहराया है। उनका इसी किताब में कहना है कि, "सन् 1944 में एक दिन मैंने सपना देखा कि एक पहाड़ी सड़क में टहल रहा हूँ। पास में मंदिर है। इसके एक के बाद एक दरवाजे खोलने के बाद मंदिर में घुसा। देखा, विभिन्न तरह के फूलों से घिरा एक योगी गंभीर ध्यान में बैठा है। चारों ओर खुशबू उड़ रही है। योगी के चेहरे की ओर देखा तो पाया कि यह और कोई नहीं, मैं स्वयं हूँ। अरे! यह क्या? और नींद खुल गई।"
इसका विवेचनकर उन्होंने बताया— "कई दरवाजे अपनी ही चेतना की कई परतें थीं। योगी के रूप में था— उनका आत्मदेव, जो विभिन्न गुणों के फूलों से घिरा था, खुशबू और कुछ नहीं— इन्हीं गुणों की सुवास थी। बाहर भटकने वाला था, उनका अहंकार। इस सपने के बाद ही उन्होंने अपनी शोध में आत्मा और अहम् का ब्यौरा दिया। इतना ही नहीं, उन्होंने सेवा-साधना-सत्चिंतन के माध्यम से आत्मसत्ता को व्यवहारव्यापी बनाने का क्रम शुरू किया।"
हम स्वयं के सपनों की छान-बीन इसी ढंग से करें। इन्हें देखने के बाद ढूँढ़-खोज करें कि किस क्षेत्र में कौन-सी कमी है। खराबी को ढूँढ़ने के बाद सुधार संभव है। सुधार के लिए सद्गुण का अभावपूर्ति के लिए सद्विचारों का सहारा लें। गहराई से चिंतन करने से गुण के प्रति आस्था जगेगी, दोषों से विरक्ति होगी। इतना ही नहीं, पूर्ण मनोयोग से उसे क्रिया-व्यवहार में उतारें। चेतना की गहरी परतों में दुर्गुणों की खरपतवार उखाड़ने, सत्प्रवृत्तियों की फसल रोपने का यही तरीका है।
महर्षि अरविंद की सहयोगिनी श्री माँ का 'मातृवाणी खंड 2' में यही कहना है। उनके अनुसार— आत्मनिरीक्षण के लिए स्वप्नों से अधिक सरल, रोचक और गहरा तरीका कोई दूसरा नहीं। इस दशा में व्यक्तित्त्व की किताब के पन्ने नींद के झोंकों से उलटते रहते हैं। इन्हें पढ़कर गड़बड़ियों का सुधार सहज संभव है। आचार्य शंकर ने इसी कारण निद्रा को भी साधना की श्रेणी में गिना है। उन्होंने सपनों को झूठा न ठहराकर प्रतिभासित सत्य की श्रेणी में रखा है। स्वप्नों में गहरे आत्मनिरीक्षण और जागरण में आत्मसुधार का क्रम चल पड़े तो व्यक्तित्व का काया पलट होते देर नहीं लगेगी।
जब गीतांजलि लिखी जा चुकी और रवींद्रनाथ ठाकुर को नोबुल पुरस्कार मिल चुका और सारी दुनिया में उनकी ख्याति के समाचार फैल गए तो उनके पड़ोसी एक बूढ़े ने रवींद्रनाथ से पूछा कि, "रवींद्र! क्या तुमने वास्तव में परमात्मा को जान लिया है? जैसा कि गीतांजलि में तुमने ईश्वर की प्रशंसा में गीत गाए हैं।” रविंद्रनाथ लिखते हैं कि, "प्रश्न सुनकर मैं चौंक पड़ा कि ऐसा तो मैंने सोचा तक नहीं था कि मुझे कभी कोई ऐसा प्रश्न पूछ लेगा तो मैं क्या उत्तर दूँगा? वे कितनी ही रातों सोए नहीं और लिखते हैं कि दुबारा वह बूढ़ा प्रश्न न पूछ ले, इसलिए उन्होंने उस गली का रास्ता ही बदल दिया। किंतु प्रश्न का उत्तर खोजे बिना रवींद्रनाथ को भी चैन नहीं था। नदीतट, सागरतट, वन-बीहड़ में घूमते उत्तर खोजते।
वर्षा के दिन थे, आषाढ़ का महीना, तालाब, पोखर, नदी, डबरे भरे-पूरे थे। प्रातःकालीन सूर्य की किरणें समुद्र पर बिखरीं। प्रतिबिंब डबरे, पोखर, नदी, तालाब, समुद्र में, सब में दिखाई दे रहा था। सब में सूरज झलकता था; किंतु सूरज न डबरे के जल से गँदला था, न समुद्र के जल से खारा। बस रवींद्र को परमात्मा समझ आ गया। वह सर्वशक्तिमान सत्ता, पापी, पुण्यात्मा, आकाश-पाताल के प्रत्येक जीव में विद्यमान है। वह न कभी अशुद्ध होती है, न समाप्त होती है। वे आगे लिखते हैं कि, "उस दिन के बाद मुझे बूढ़े को देखकर कभी डर नहीं लगा और उसकी सद्प्रेरणा से मुझे परमात्मा को समझने का मौका मिल गया, जो गीतांजलि लिखते समय नहीं मिल सका था।"
नासिक के पास पंचवटी में एक तरुण बैठा ध्यान कर रहा था। आज पंद्रह वर्षों से उसका एक ही क्रम था। प्रातः-सायं गोदावरी में स्नान, दिन भर स्वाध्याय, जप-तप, रात्रि के कुछ घंटों को नींद के लिए छोड़कर ध्यान। क्रम की निरंतरता अनवरत चल रही थी। उन्हीं दिनों सिक्खों के दसवें गुरू गोविंद सिंह जनजागरण के लिए देश भर की यात्रा के लिए निकले थे। पंचवटी पहुँचने पर उन्होंने इस तरुण तपस्वी का साधनाक्रम देखा। आस-पास के लोगों से पता लगाया। जिज्ञासा और बढ़ी। रात्रि के ध्यान से उठकर जब वह प्रातः नदी स्नान की ओर जा रहे थे, गुरु साथ हो लिए।
पूछा— “आप का शुभ नाम?”
“अब माधवदास”
“अब का तात्पर्य?”
"एकांत साधना के पहले लक्ष्मण देव था।” छोटे प्रश्न का छोटा उत्तर। ऐसा, जैसे अंतर्मुख तपस्वी कुछ अधिक बताने के लिए उत्सुक न हो। गुरु ने कुरेदा— "अपने बारे में कुछ अधिक बताने की कृपा करेंगे?"
उसने गुरु के सिर से पाँव तक एक नजर डाली। प्रखर तेजोमूर्ति का अनुरोध वह अस्वीकार न कर सका। उसने बताना शुरू किया।
“मैं कश्मीर के डोगरा राजपूत परिवार में जन्मा हूँ। पिता का नाम रामदेव था। उन्होंने मुझे शस्त्र और शास्त्र दोनों में निष्णात किया। एक दिन जब मैं शिकार खेल रहा था, तीर गर्भवती हरिणी को लगा। उसके नीचे गिरते ही गर्भ से दो मृग शावक छिटक गए और कुछ ही समय बाद तीनों कलपते-तड़पते मर गए। हृदयविदारक इस दृश्य ने मुझे इतना व्यथित किया कि मैं यहाँ तप के लिए चला आया। उस समय मेरी आयु सोलह वर्ष की थी और... आज कुछ सोचते हुए रुककर उसने, 31 वर्ष।” “तो इस तप-साधना का लक्ष्य क्या है? युवक!” "मान-अपमान में समान रहना, उद्वेगों को शांत करना" और... कहते-कहते वह रुक गया।
"बताओ-बताओ!" गुरु ने प्रोत्साहित किया। "मुक्ति-निर्वाण का परम लाभ पाना।"
“अच्छा! तो यह है, आपकी साधना?” गुरु ने उसकी ओर इस तरह से देखा, मानो वह कोई बहुत छोटी चीज के लिए यत्न कर रहा हो। अभी तक उसे प्रशंसा करने वाले मिले थे; पर गुरु की आँखों में प्रशंसा का कोई भाव न था, उल्टे उनमें उद्धारक की करुणा थी।
"अच्छा! सच बताना, अभी तक तुम मान-अपमान में समान रहकर उद्वेगों को शांत कर सके?"
युवक कुछ क्षण मौन रहा मानो अपने अंदर निहार रहा हो। मौन के बाद बोला— "नहीं!" "और शायद इस तरह जल्दी कर भी न सको”— उन्होंने धीरे से कहा।
"क्या?" कहकर वह अवाक् रह गया। लगा उसके पैरों से जमीन खिसक गई हो। एक साथ हजारों साँप-बिच्छू शरीर पर रेंग गए हों।
कुछ क्षणों तक दोनों मौन रहे। “क्यों?”— तपस्वी ने पूछा। "वत्स"— गुरु का स्वर करुणा विगलित था। “जहाँ तुम्हें कोई सम्मान देने वाला नहीं, अपमानित-तिरस्कृत करने वाला नहीं, उद्वेगों के अवसरों को पास फटकने का मौका नहीं, वहाँ समत्व कैसा?” "तो क्या अब तक की तपश्चर्या व्यर्थ गई?" “नहीं! उससे तुम निष्पाप हुए; पर अधिक समय इसी में जुटे रहना हठ होगा। समय को पहचानने की कोशिश करो।"
कुछ क्षण वह युवक की आँखों में देखते रहे, फिर प्यार भरे स्वर में बोले— “तुम मुक्ति चाहते हो न? यदि मैं उसे इसी जीवन में उपलब्ध करा दूँ?”
“सच!" जैसे उसे सारी दुनिया का वैभव एक साथ मिल गया हो। अस्फुट स्वरों में बुदबुदाया— “जीवनमुक्ति।”
“हाँ।”— गुरु का स्वर था। “पर कीमत चुकानी होगी।” "मैं बड़ी-से-बड़ी कीमत चुकाने को तैयार हूँ।" “तो उठो और जुट पड़ो जनक्रांति का शंख फूँकने में। अपने तपे-तपाए जीवन और सधे-सधाए मन के द्वारा घर-घर जाकर बताओ— मनुष्य कब, कैसा होता है? मनुष्य देवता कैसे बनता है? मेरे बेटे! जनसमुदाय अनुकरण का आदी है। उसकी प्रवृत्तियों को सत् की ओर मोड़ने के लिए तुम्हारे जैसे खरे शिक्षक चाहिए। बोलो, क्या तैयार हो? मनु की संतानें अज्ञान के अंधकार में पड़ी कीड़े-मकोड़ों की तरह बिलबिला रही हैं। उनके उद्धार के लिए विद्या का आलोक चाहिए, जो पुस्तकों से नहीं, तपे-तपाए, ढले-ढलाए जीवन से ही संभव है। चुप क्यों हो? कुछ तो बोलो! क्या नीलकंठ बन मानवीय जीवन में भरती जा रही विषाक्तता के शमन के लिए तैयार हो?”— कहते-कहते गुरु का गला भर्रा गया, आँखों की कोरों से आँसू ढुलक पड़े।
"तैयार हूँ गुरुदेव!"— कहकर वह साष्टांग पैरों पर गिर पड़ा।
गुरु ने उठाकर छाती से लगाया। दोनों बेसुध हो रोते रहे। बड़ी देर बाद एकदूसरे से अलग हुए। दोनों की आँखों में अभी भी आँसू थे, पर ये दुःख के नहीं प्रसन्नता के थे। गुरु को प्रसन्नता थी कि मानवता के प्रति उसके हृदय की मर्मांतक पीड़ा को पीने वाला शिष्य मिला। शिष्य को प्रसन्नता थी कि उसके जीवन को सही राह दिखाने वाला गुरु मिला।
घटना का पटाक्षेप हुआ। उस दिन से लक्ष्मण राव गया, माधवदास गया, रह गया सिर्फ गुरु का बंदा, जिसमें स्वार्थ-संकीर्णता का कण भी न था, 'सर्वजन सुखाय, सर्वजन हिताय' काम करने की लगन। यही था उसका वैराग्य। इन्हीं अर्थों में वह बंदा वैरागी था।
वह जब तक जीवित रहे, अपने जीवन की ज्योति से औरों की ज्योति जलाते रहे। बिना किसी मान-सम्मान, पद-प्रतिष्ठा की कामना से गुरु का काम करते रहे। क्या काम? लोक-शिक्षण। वाणी से नहीं आचरण से। वह साँचे बने, अनेकों ढाँचे तैयार किए। अपने परिचय में सिर्फ इतना कहते और कुछ नहीं, सिर्फ गुरु का बंदा हूँ और गुरु के काम में जीवनमुक्ति का आनंद अनुभव कर रहा हूँ। जून 1716 तक उनका शरीर क्रियाशील रहा। आज शरीर के न रहने पर भी उनकी आत्मा चीख-चीख पुकार रही है। गुरु के बंदों। कहाँ हो? मनु की संतानों की पीड़ा तुम से कैसे देखी जाती है? इनके लिए वापस सतयुग लौटा लाने के लिए तुम्हारा पराक्रम क्यों नहीं जाग रहा? क्या ये पुकारें हमें सुनाई पड़ रही हैं? यदि हाँ, तो फिर गुरु के बंदे बने और कर्त्तव्य कर्म को पहचानकर जुट पड़े।
सामान्यतः लोग इतना भर जानते है कि 'कणाद' एक ऋषि थे, जो खेतों में से अन्न के दाने बीनकर अपना पेट भर लेते थे; किंतु बात इससे भी अधिक महत्त्व की है कि कणाद नाम क्यों विख्यात हुआ। कणाद को कणभुज या कणभक्ष भी कहते हैं। वास्तविकता यह है कि कणाद बड़े विचारक थे। उन्होंने संसार के पदार्थों के बारे में नवीनतम दृष्टि से सोचा था और अंत में वे इस नतीजे पर पहुँचे थे कि संसार के पदार्थ छोटे-छोटे कणों से बने है, जिन्हें अणु-परमाणु नाम से भी जाना जाता है। कहा जाता है कि कणाद से पूर्व इस तरह पदार्थ की रचना, कण और अणु के बारे में किसी ने गहराई से विचार नहीं किया था।
ऐसा भी कहा जाता है कि कणाद, ईश्वर तथा वेदों के संबंध में प्रचलित मत से सहमत नहीं थे। अतः तत्कालीन विचारक और विद्वान उनसे नाराज ही रहते थे, इसलिए वे उनकी खिल्ली उड़ाते रहते कि वह सारी सृष्टि में कण-कण ही देखता रहता है, खाता भी कण ही होगा। इस तरह भी वे कणाद नाम से जाने गए।
कणाद ने अपने विचारों को नपे-तुले शब्दों में सूत्ररूप से लिख डाला। कणाद की यह पुस्तक 'कणाद सूत्र या 'वैशेषिक सूत्र' के नाम से विख्यात है। कणाद के विचारों को वैशेषिक दर्शन भी कहते हैं। कणाद ने छः प्रकार के पदार्थों की कल्पना की और इनमें द्रव्य को प्रमुख माना, फिर उन्होंने द्रव्य को पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश आदि आठ भागों में बाँटा और इनके गुण निर्धारित किए। जैसे जल का गुण उन्होंने रस बताया। आकाश का शब्द। आज भी हम जानते हैं कि वायुरहित आकाश में शब्द सुनाई नहीं देता। सूर्य की किरणें जब कमरे में दिखाई पड़ती हैं, उनमें धूल कण दिखाई देते है उन्हें कणाद ने त्रसरेणु नाम दिया है। इन कणों को विभाजित किया जा सकता है और अणु-परमाणुओं में विभक्त किया जा सकता है। कणाद का कहना था कि परमाणु पदार्थ का सबसे छोटा कण है। ये अदृश्य हैं, अविभाज्य हैं, अनादि-अक्षय हैं। कणाद से दो सौ वर्ष पूर्व यूनान में भी एक विचारक हुआ है— 'देमो क्रेतिमस'। उसने भी ऐसे ही विचार प्रकट किए थे कि समस्त वस्तुएँ अ-तोमन (एटम) से बनी हैं। तब उसका भी विरोध हुआ था; किंतु कणाद और देमो क्रेतिमस ही सही निकले।
‘नारी जाग्रति अभियान’ में उन प्रयासों की गणना की जाती है, जिनका उद्देश्य महिलाओं की दशा में सुधार लाना, उन्हें ऊँचा उठाना, उनकी सामाजिक स्थिति सँवारना है। पश्चिम में इस तरह के प्रयत्नों का आरंभ 18 वीं सदी में हुआ और पूर्व विशेषतया भारत में यह प्रक्रिया 19 वीं सदी के पूर्वार्द्ध से शुरू हुई। भले ही ये प्रयास छुट-पुट हुए हों; पर समूची एक सदी बीत जाने पर भी महिला जाग्रति का कोई स्पष्ट स्वरूप सामाजिक-सांस्कृतिक पटल पर उभर कर नहीं आ सका है।
इस संबंध में आवश्यकता इस बात की है कि विशेषतया भारत में महिलाओं की गई-गुजरी स्थिति के कारण क्या हैं? ये कैसे उपजे? और इनके निवारण की रणनीति क्या हो आदि प्रश्नों पर गंभीरता से विचार किया जाए, तभी महिला जाग्रति का स्वरूप व उद्देश्य स्पष्ट हो सकता है।
सामाजिक संरचना का विश्लेषणात्मक अध्ययन करने पर यह स्पष्ट होता है कि कतिपय प्रबुद्ध नारियों को छोड़कर अधिकांश की स्थिति किसी-न-किसी तरह बंधक-सी है। इसके मूलतः दो कारण हैं— अनिश्चितता और असुरक्षा। अनिश्चितता का संबंध आर्थिक क्षेत्र से है। आज की स्थिति में इस क्षेत्र में प्रधानतया पुरुषों के वर्चस्व हैं और अर्थशक्ति युगशक्ति के रूप में पूजी जा रही है। परिणामस्वरूप पुरुष वर्ग सरलता से उन पर शासन करने में सक्षम हो जाता है। उन्हें भी अनिश्चितता निवारण हेतु बरबस शासित होना पड़ता है। असुरक्षा के पीछे साहस को दबा दिए जाने का भाव है। उनके मनों में सदियों से यह भाव भर गया कि तुम अक्षम हो, दुर्बल हो, यहाँ तक कि अबला ही कहा जाने लगा। कहा जाता है— लगातार सौ बार कहा गया झूठ भी सत्य प्रतीत होने लगता है। स्थिति ऐसी ही हुई, इस समूचे वर्ग ने अपने को अबला मान भी लिया। इस मान्यता के कारण सुरक्षा की दृष्टि से उन्हें पुरुषों का आश्रय आवश्यक हो गया। एक युग में तो यह नीति ही बन गई कि बचपन में उनकी रक्षा पिता, युवावस्था में पति और वृद्धावस्था में पुत्र करें। नारी प्रत्येक स्थिति में रक्षणीय है। जैसे-जैसे उक्त दोनों कारणों की जड़ें गहरी होती चली गईं, महिलाओं की स्थिति बँधुआ— आश्रित की-सी हो गई। यहाँ तक कि उसकी स्वतंत्र स्थिति ही न रह गई। पति, पिता, पुत्र से ही उसका परिचय होने लगा।
यदि मानवी सभ्यता के आदिकाल की ओर लौट चलें, उस समय की सामाजिक स्थिति पर नजरें घुमाएँ, जबकि सामाजिक संरचना हो रही थी। तब यह साफ हो जाता है कि कारण क्यों उपजे, कैसे पनपे और किस तरह आज की स्थिति में बबूल के बगीचे की तरह मानवीय सभ्यता की राह में कंटक बिखराने वाले हुए। नृतत्वशास्त्री ई. बौरग्यूग्नन अपने अध्ययन 'साइकोलॉजिकल अन्थ्रोपोलॉजी' में बताते हैं कि प्रारंभ में नर और नारी दोनों ही वैचारिक, बौद्धिक, मानसिक क्षमताओं कि दृष्टि से समान थे। एच. कोचेटेवा का पैलियो एनोटॉमी में कहना है कि, "उनकी पारस्परिक शारीरिक क्षमताएँ भी समान थीं। दोनों ही शिकार खेलने, झोपड़ी बनाने आदि अनेकों कार्यों में बराबर की भागीदारी रखते थे। छोटे-बड़े जैसा कोई भाव ही न था।"
ए. मारशाक ने 'रूट्स ऑफ सिविलेजेशन' में सामाजिक संरचना के प्रारंभिक स्वरूप को स्पष्ट किया है। जैसे-जैसे यह संरचना जटिल हुई, परिवार संस्था बनी और परिपक्व हुई। ऐसी स्थिति में उस समय के विचारकों ने पुरुषों और महिलाओं की मानसिक स्थिति और गहराइयों का अध्ययन गुणों और मौलिकता को आधार मानकर करना शुरू किया। पुरुषों में वीरता, कर्मठता और नारियों में करुणा, ममत्व जैसे गुणों की प्रधानता पाई गई। सामाजिक संरचना का ताना-बाना बुनते समय आवश्यकता हुई कि श्रम व कार्य का विभाजन किया जाए।
इस विभाजन में यह ध्यान रखा गया कि प्रत्येक के मौलिक गुणों के अनुरूप उसे काम मिले। इससे दो लाभ सोचे गए, प्रथम तो व्यक्ति की अपनी मौलिक क्षमता अपनी चरम स्थिति प्राप्त करे, दूसरे— समाज को उसका अधिकाधिक लाभ मिले। इसी प्रक्रिया के अंतर्गत नारी को पारिवारिक दायित्व सँभालने का अवसर मिला, क्योंकि शिशुपालन, प्रशिक्षण, पारिवारिक संगठन में ममता आदि की विशेष आवश्यकता थी। पुरुष को यह जिम्मेदारी मिली कि वह परिवार के लिए सुविधा जुटाने, सुरक्षा करने का भार वहन करे।
उस समय छोटे-बड़े की भावना न थी। समाज मातृप्रधान था। वैदिककाल तक यही बात थी। नारी के दो स्वरूप थे— एक सद्योवधू, दूसरा ब्रह्मवादिनी। सद्योवधू की जिम्मेदारी थी कि वह परिवार को सुदृढ़ बनाए, समाज को सुयोग्य संस्कारवान संतति दे। ब्रह्मवादिनी का दायित्व था कि वह नारियों की जाग्रति बनाए रखे। उन्हें कर्त्तव्य मार्ग पर आरूढ़ रहने के लिए प्रोत्साहित करती रहे। इसी संदर्भ में महाभारत में एक सुलभा नाम की संन्यासिनी का जिक्र आता है जो घूम-घूमकर अपने इस दायित्व को निभाती थी। मातृप्रधान समाज होने के कारण संतान का परिचय प्रायः माँ के नाम के साथ जोड़कर दिया जाता था। इतरा के पुत्र होने के कारण ऐतरेय नाम हुआ, जो बाद में उपनिषद्कार हुए। जाबाला के पुत्र होने के कारण सत्यकाम, सत्यकाम जाबाल के रूप में प्रचलित हुए।
परिवर्तित मूल्यों के अनुरूप समाज का स्वरूप भी बदला। लगातार आक्रमणों में भागीदारी, परिवार व समाज को सुरक्षा प्रदान करते रहने के कारण पुरुषों का गौरव बढ़ता गया। धीरे-धीरे स्थिति यह आई कि सुविधा और सुरक्षा जुटाते रहने के कारण पुरुषों ने अपने वर्चस्व को मान्यता दी। नारी ने इस पर अपनी स्वीकृति जाहिर की। लगातार किसी कार्य व भाव के करने व स्वीकारने से मन की संरचना उसी के अनुरूप ढलने लगती है। शरीर भी वैसा ही हो जाता है।
हुआ भी यही। कोमलता स्त्रियों का भूषण हो गई, भीरुता को शृंगार माना जाने लगा। मध्ययुगीन अंधकार के छापों ने इसे और बढ़ावा दिया। विकृत होती परंपराएँ आज रूढ़ियाँ बन चुकी हैं। इन्हें तब तक नहीं तोड़ा जा सकता जब तक नारी पुनः असुरक्षा व अनिश्चितता को परे न झटक दे, अर्थात उसका साहस उभरे और आर्थिक क्षेत्र में समानता सिद्ध करे।
नारी जागरण की क्रियापद्धति यही होनी चाहिए। इसके लिए इन्हीं दोनों मोर्चों पर लड़ना होगा; किंतु इनमें से आर्थिक क्षेत्र को प्राथमिकता देनी होगी, क्योंकि यह सामान्य सूत्र है कि परावलंबी कभी साहसी नहीं हो सकता। साहस के बिना असुरक्षा का भाव मिटने से रहा। आर्थिक क्षेत्र में प्रगति के लिए आवश्यक नहीं कि नौकरी ही की जाए। गृह-उद्योग चलाने उसमें निष्ठापूर्वक अपने को नियोजित करने में सफलता असंदिग्ध हो जाएगी।
गृह-उद्योग, कुटीर-उद्योग की परंपरा यदि नारी समुदाय के बीच चल पड़े तो यह उत्पादक श्रम की प्रक्रिया स्वाभिमान जगाए बिना न रहेगी। आज की स्थिति मशीनों और मिलों, फैक्ट्रियों के युग में ये बातें हास्यास्पद लग सकती है। हो सकता है, यह भी सोचा जाए कि नारी जागरण से इसका संबंध क्या है? किंतु यह सोच उन्हीं की होगी जो मानव मन की संरचना से अपरिचित है। नमक आंदोलन, दांडी मार्च, और चरखा इन सबका स्वराज्य से दूर-दराज तक का कोई संबंध न था; किंतु इनमें से प्रत्येक ने जो जनक्रांति फैलाई उससे शायद ही कोई अपरिचित हो।
ऐसा ही एक प्रयास गृह-उद्योगों का है। भले उससे दो तीन रुपए रोज का ही काम क्यों न हो, किंतु जब खाली समय यों ही बिताने वाली महिलाएँ इसमें जुटेंगी तो न केवल उनकी श्रमशीलता बढ़ेगी, बल्कि महत्त्व भी जगेगा। उन्हें यह स्पष्ट अनुभव होगा कि हम भी कुछ कर सकती हैं। यह उभरा हुआ साहस, शिक्षा व उत्कृष्ट विचारों से मिलकर असुरक्षा के भाव को भी दूर फेंक देगा।
किंतु इस संबंध में महत्त्वपूर्ण काम है— महिलाओं में इसके प्रति रुचि जगाना। यह कोई कम कठिन काम नहीं है। सदियों से एक ही भाव में रहते हुए उनके मन में यह जम गया है कि यह सब काम हमारे लिए नहीं है। पालतू तोते पिंजरा खोल देने पर भी नहीं उड़ते। इधर-उधर घूम-टहलकर फिर वापस आ जाते है। इनकी मुक्ति के लिए इतना काफी नहीं है कि पिंजड़े का दरवाजा खोल दिया जाए। कार्य तब सधेगा जब उन्हें उड़ना सिखाया जाए।
इंडोनेशिया में इस तरह के कार्य में अग्रणी की भूमिका निभाई ‘रेडन एडजंग कार्तिनी’ ने। उन दिनों इंडोनेशिया में नारी जाति की स्थिति अत्यंत दयनीय थी। उनका न कोई अधिकार था, न सम्मान। घर में उन्हें दासियों की भाँति रखा जाता। प्रतिष्ठित परिवार में जन्म लेने पर कार्तिनी बचपन से ही नारी की इस दयनीय दशा के प्रति दुःखी रहा करती। इसका एक कारण यह भी था कि उन्हें बारह वर्ष की अल्पायु में सिर्फ इसीलिए स्कूल छोड़ना पड़ा, क्योंकि वह नारी जाति सदस्या थी। बड़ी होने पर रेडन अपनी दो बहिनों के साथ नारी जागरण में जुट गई। लेखनी, वाणी व कर्मठता तीनों ही विधाएँ उन्होंने अपनाईं। नारी प्रगति के लिए लेख लिखकर समाज के कर्णधारों, बुद्धिजीवियों का ध्यान इसके प्रति आकर्षित करना। घर-घर जाकर महिलाओं में शिल्प, गृह उद्योग के माध्यम से आर्थिक स्वावलंबन हेतु रुचि जगाना। इस संबंध में उन्होंने बहुत कुछ सफलता भी पाई। इसी कारण 21 अप्रैल को उनका जन्मदिन नारी विकास के मील के पत्थर के रूप में इंडोनेशिया में बड़ी घूम-धाम तथा सम्मान के साथ मनाया जाता है।
ऐसा ही प्रयास भारत में किया श्रीमती उर्मिला शास्त्री ने। यों इनका जन्म कश्मीर में हुआ। बाद में गाँधी जी के संपर्क में आईं। इसी बीच धर्मेंद्रनाथ शास्त्री से विवाह भी हुआ। उन दिनों पुरुषों के सभा-सम्मेलन तो हुआ करते थे; किंतु महिलाओं के नहीं होते थे। महिलाएँ जग उठी हैं, इसका बोध कराने के लिए 30 जनवरी 1930 को मेरठ में एक विशाल महिला सम्मेलन का आयोजन किया और जिसकी अध्यक्षा के रूप में विचारोत्तेजक भाषण दिया, जिसमें महिलाओं को जगाने का उद्बोधन किया। उन्हें उठ खड़े होने की प्रेरणा दी। सन् 1937 में उन्होंने मेरठ में एक महिला दस्तकारी स्कूल की स्थापना की। आरंभ में इस स्कूल की अध्यापिकाओं एवं प्रबंध खर्च अपनी गाँठ से किया। इस छोटे से स्कूल ने पर्याप्त प्रगति की। आज यह 'उर्मिला महिला दस्तकारी स्कूल' के रूप में उनके कार्य के जीवंत स्मारक के रूप में क्रियाशील है।
अभी तक किए गए ये प्रयास सराहनीय और प्रेरक तो हैं; पर छुट-पुट होने के कारण अधिक व्यापक नहीं हो सके हैं। समय की माँग यह है कि व्यवस्थित, सुनियोजित रूप में महिला जागरण का प्रयास एक आंदोलन-अभियान के रूप में गतिमान हो। इसके लिए बुद्धिजीवी पुरुषों को तो क्रियाशील होना ही पड़ेगा; पर प्रबुद्ध महिलाएँ भी अग्रिम पंक्ति में आए, क्योंकि अनुकरण-अनुसरण मनुष्य की सहज मनोवृत्ति है। कोई भी चीज सैद्धांतिक रूप में समझ में नहीं आती है; पर उसके व्यावहारिक स्वरूप व परिणामों को देखते ही सहज अपनाने का जी करता है। विज्ञान अपनी इसी विशेषता के कारण विजयी हुआ और लोगों के गले उतरा है। जैसे-जैसे इस प्रयास में तेजी आएगी संतोषजनक परिणाम भी दिखाई देंगे। नर और नारी एक समान का सूत्र एक तथ्य बनकर उभरेगा। नारियाँ भी अपनी उस गरिमा व वर्चस्व को पा सकेगी, जिसके आधार पर उन्हें अगले दिनों बड़ी जिम्मेदारियाँ व दायित्व वहन करने हैं। परिस्थितियों व समय की माँग को समझकर जुट पड़ा जाए, यही श्रेयस्कर है।
प्रतिभा युवावस्था में उपजती है। उसे यदि सही दिशा में नियोजित किया जाए तो कम उम्र में महत्त्वपूर्ण सफलता प्राप्त की जा सकती है। संसार के महत्त्वपूर्ण कार्यों में अधिकांश कार्य युवावस्था में ही संपन्न हुए हैं।
बादशाह सिकंदर, आजम यूनान में 20 वर्ष की अवस्था में सिंहासनारूढ़ हुए और उत्तर भारत तक विजय प्राप्त करके 33 वें वर्ष में मर गए। जूलियस सीजर ने आठ सौ नगर, तीन सौ जातियों और तीस लाख मनुष्यों को विजित किया। वह बड़ा शक्तिशाली वक्ता और राजनीतिक संचालक था। उस समय वह नितांत युवक था। 19 वे वर्ष में वाशिंगटन एडज्यूटैण्ट जनरल हो गए और 21 वें वर्ष अंग्रेज सरकार ने उन्हें फ्रांस में राजदूत नियुक्त कर दिया। 22 वें वर्ष में वह कर्नल बना दिए गए। उन्होंने प्रथम संग्राम में ही जयश्री प्राप्त कर डाली। लैफ्टी नामक व्यक्ति फ्रांस में समस्त सेना के संचालन 20 वे वर्ष में नियुक्त हो गए। सोलोमन ने 20 वर्ष की अवस्था में फ्रांस और जर्मनी पर अधिकार प्राप्त कर लिया। डडकेराय स्थान पर अधिकार प्राप्त करने के समय कांडे महोदय केवल 22 वर्ष के थे। इटली देश में पाइसा गिरजा ने लटकते हुए लैम्प के पेण्डुलम से जब गैलीलियो ने आकर्षणशक्ति का सिद्धांत खोज निकाला, उस समय वह 18 वर्ष के थे। पाॅल इंग्लिश पार्लियामेण्ट में 21 वें वर्ष में मेंबर हो गए थे। 22 वर्ष की अवस्था के पूर्व ही ग्लैडस्टन पार्लियामेण्ट में जा पहुँचे थे।
एलिजाबेथ बैरट ब्राउनिंग 12 वर्ष की अवस्था में ही ग्रीक और लेटिन भाषा की विद्वान हो गई थी। डीकिन्स ने तो इन भाषाओं का ज्ञान 11 वें वर्ष में ही प्राप्त कर लिया था। रॉबर्ट ब्राउनिंग बारहवें वर्ष में अच्छी कविता लिखने लग गए थे। कवि काउली ने 14 वें वर्ष में कव्य की अच्छी पुस्तक लिख डाली थी। लार्ड मैकाले 23 वें वर्ष में प्रविष्ट होने के पूर्व एक प्रख्यात लेखक हो गए थे। प्रख्यात कवि पी.बी. शैली युवावस्था भी पूरा न कर सके, इसके पहले ही प्रसिद्ध हो गए। सेना में नेल्सन ने लेफ्टीनेन्ट का पद 29 वें वर्ष के पहले ही प्राप्त कर लिया था। 22 वर्ष की अवस्था में क्लाइव ने भारत वर्ष में अंग्रेजों का अधिकार जमा दिया था। देश-देश, नगर-नगर और गाँव-गाँव में जिन मनुष्यों ने अद्भुत उन्नति और देदीप्यमान जीवन का परिचय दिया, वह बहुधा 18 वर्ष से 30 वर्ष की अवस्था के मध्य में ही दिया है। भगवान राम एवं कृष्ण ने भी इसी उम्र में महत्त्वपूर्ण परिवर्तन किए। वनवास एवं रावण वध के समय वे युवा ही थे। झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई ने युवावस्था में ही अंग्रेजों से डटकर मुकाबला करते हुए वीरगति प्राप्त की। भगत सिंह, वीर सावरकर, चंद्रशेखर आजाद जैसे क्रांतिकारी शहीद भी युवक ही थे। महाराणा प्रताप, शिवाजी, स्वामी दयानंद, स्वामी रामतीर्थ, स्वामी विवेकानंद आदि महामानवों ने आपने महत्त्व का परिचय युवावस्था में ही दे डाला। उपरोक्त उदाहरणों से स्पष्ट होता है कि साहसी एवं प्रतिभाशाली अल्प आयु में ही उन्नति कर जाते हैं।
आयुर्वेद ग्रंथों में वर्णित है कि प्राचीनकाल के ऋषि-मनीषियों का आहार प्रायः कंद-मूल, फल या कच्चा अन्न हुआ करता था। उसे ग्रहण करके वे पूर्ण स्वस्थ, दीर्घजीवी एवं ओजस्वी, तेजस्वी बने रहते थे। ईसाई धर्मग्रंथ बाइबिल में भी इसी तरह उल्लेख मिलता है कि अनाजों को उनके प्राकृतिक रूप में खाकर लोग सौ वर्ष की आयु पा लेते थे। आज भी कच्चा आहार उतना ही उपयोगी हो सकता है, जितना कि पहले कभी था। आहार-विहार में परिवर्तन करके न केवल लंबी अवधि तक शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य को अक्षुण्ण बनाए रखा जा सकता है, वरन जीवंत अनधान्यों, फलों, सब्जियों का उपयोग करके कायाकल्प जैसा नवजीवन प्राप्त किया जा सकता है।
जीवंत आहार की प्रमुख विशिष्टता यह है कि शारीरिक परिपुष्टता एवं मानसिक विकास के लिए जिन आवश्यक पोषक तत्त्वों, एन्जाइमों, विटामिनों आदि की आवश्यकता पड़ती है, वह इसमें प्रचुरता से विद्यमान रहते हैं। आग पर पकाए जाने पर इनमें से अधिकांश पाचक तत्त्व नष्ट हो जाते है। परिणामस्वरूप अच्छी तरह न तो उनका पाचन हो पाता है और न रक्त में विलय ही। कच्चे आहार से स्वस्थ आँतें अपने अंदर स्थित बैक्टीरियल फ्लोरा के साथ उक्त तत्त्वों के माध्यम से लगभग एक हजार एन्जाइमों एवं विभिन्न विटामिनों को प्राप्त कर लेती हैं। प्राकृतिक चिकित्साविज्ञानियों के अनुसार कच्चे आहार की तुलना में पका हुआ भोजन स्वादिष्ट तो होता है, पर उच्च तापमान के कारण उसमें सन्निहित प्रोटीन एवं शर्करा दुष्पाच्य बन जाती है। खनिज लवण, एन्जाइम तथा विटामिन पूर्णतः नष्ट हो जाते हैं तो चिकनाई एवं कार्बोहाइड्रेट अधिक ताप के कारण विघटित होकर विष का काम करने लगते हैं। यही कारण है कि पौष्टिक पकवान लेते रहने पर भी पेट खराब रहता है। उसकी पूर्ति के लिए कृत्रिम विटामिनों, खनिजों का सहारा लेना पड़ता है। कच्चे एवं अंकुरित अनाजों को आहार में सम्मिलित कर लेने पर इस व्यथा से सरलतापूर्वक छुटकारा पाया जा सकता है।
सुप्रसिद्ध चिकित्साविज्ञानी डॉ. राल्फबर्चर ने नैसर्गिक जीवंत आहार एवं अंकुरित अन्नों की उपादेयता पर गंभीर खोजें की हैं और पाया है कि इनमें एक विशिष्ट प्रकार की पोषक क्षमता विद्यमान होती है। उनके अनुसार अंकुरित अन्नों को खाने से हमें छः प्रकार के औषधीय तत्त्व प्राप्त होते हैं, जो रोगकारक विषाणुओं को नष्ट करने के साथ ही जीवनीशक्ति का भी अभिवर्द्धन करते हैं। इसके 92 प्रतिशत तत्त्वों को आँतें अवशोषितकर उसे रक्त, मांस मज्जा आदि के निर्माण योग्य बना देती हैं, जबकि पके हुए आहार का मात्र 35 प्रतिशत भाग ही जीवनीशक्ति बढ़ाने वाली प्रक्रिया में प्रयुक्त हो पाता है। अंकुरित अन्नों एवं हरी सब्जियों में पाए जाने वाले तत्त्व शारीरिक कोशिकाओं एवं तंतुओं के खनिजीय और रासायनिक संतुलन को स्थिरता प्रदान करते है। फलतः असंतुलनजन्य बीमारियों का शमन स्वमेव हो जाता है। इससे न केवल मानसिक तनाव दूर होता हे, वरन कैल्शियम, पोटेशियम, सोडियम, मैग्नीशियम जैसे तत्त्वों की समुचित उपलब्धता के कारण हृदय की कार्यक्षमता भी बढ़ जाती है। उसके स्नायुतंत्र सशक्त एवं सक्रिय बने रहते हैं।
मनुष्य प्रकृतितः शाकाहारी है। पहले वह अपना आहार नैसर्गिक रूप में ही ग्रहण करता था। पकाकर खाना तो उसने सभ्यता के विकास के साथ सीखा है। यही कारण है कि आँतें अब पके हुए आहार की अभ्यस्त बन गई हैं; किंतु इससे पर्याप्त पोषक तत्त्व न मिलने के कारण हममें से अधिकांश को समयपूर्व जरा-जीर्णता के साथ ही अनेकानेक बीमारियों का भी शिकार बनना पड़ रहा है। प्रख्यात आहारविद् हेन्स एण्डरसन के कथनानुसार यदि इस भूल को सुधारकर प्राकृतिक आहार की तरफ लौटा जा सके तो कोई कारण नहीं कि स्वस्थ एवं दीर्घ जीवन का लाभ न उठाया जा सके। अनुसंधानपूर्ण अपनी कृति— 'द न्यू फूड थेरेपी' में उनने कहा है कि, "वैज्ञानिक खोजों एवं परीक्षणों द्वारा अब यह सिद्ध हो गया है कि कच्चे अन्न, फल एवं सब्जियाँ सूर्य किरणों की शक्ति को अवशोषितकर अपने बीजकोषों में अवधारित कर लेती हैं। प्राकृतिक रूप में इन्हें खाने पर उस ऊर्जा-भंडार को हमारी आंत्र कोशिकाएँ पीछे आत्मसात कर लेती हैं और उसे पचाने में भी उन्हें को विशेष श्रम नहीं करना पड़ता।"
हरी शाक-सब्जियों एवं अंकुरित अन्नों के क्लोरोफिलयुक्त रस को ‘ग्रीनब्लड’ के नाम से संबोधित किया गया है, इसमें पोषण प्रदान करने एवं स्वास्थ्यवर्द्धन करने वाले सभी प्रकार के तत्त्वों को समावेश होता है। खून को शुद्ध करके रक्त-कणों की अभिवृद्धि करने में उक्त रस की भूमिका महत्त्वपूर्ण होती है। चिकित्साविज्ञानी डॉ. ब्रिशर इसे 'सूर्यशक्ति केंद्रित’ मानते हैं और कहते हैं कि, "क्लोरोफिल के अणु मानव रक्त में पाए जाने वाले हीमोग्लोबिन कणों से बहुत कुछ समानता रखते हैं। यही कारण है कि इसके सेवन से रक्त-कणों की संख्या में असाधारण रूप से अभिवृद्धि देखी जाती है। हरे रस का नियमित सेवन रक्त अभिसंचरण की प्रक्रिया को संतुलित, हृदयतंत्र को सशक्त बनाता है। श्वसनतंत्र, गर्भाशय एवं आँतों के लिए इसे विशेष लाभकारी पाया गया है। कायिक निर्माण में काम आने वाले अमीनो एसिड की प्रक्रिया को तीव्रता प्रदानकर पुष्टिवर्धन का कार्य भी ग्रीनब्लड से सहज संभव बन पड़ता है। इन्हीं गुणों के कारण इसे एक उत्तम टॉनिक माना गया है।
नोबेल पुरस्कार विजेता विख्यात चिकित्साशास्त्री डॉ. फिशर ने रक्ताल्पता दूर करने में अंकुरित अन्नों के जवारे का सफल प्रयोग किया है। इसके अतिरिक्त आंत्रशोध, त्वचा रोग, पेट में अल्सर, पायरिया जैसे रोगों से ग्रस्त 1200 व्यक्तियों के उपचार में भी इससे उन्हें पर्याप्त सहायता मिली है। उनके अनुसार— अंकुरों के रस में अब तक सौ से अधिक जीवन-रक्षक तत्त्व खोजे जा चुके हैं। परीक्षणोपरांत उनने अंकुरित गेहूँ को पूर्ण आहार बताया है और कहा है कि एक ग्राम अंकुर में जितने अधिक पोषक तत्त्व पाए जाते हैं, उसकी तुलना में 25 गुनी अधिक शाक-सब्जियाँ भी मिलकर उसकी पूर्ति नहीं कर सकतीं। शरीर के अंदर एकत्र दूषित पदार्थों को दूरकर रस-रक्त का परिशोधन-अभिवर्द्धन करने में यह महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
धान्यों के अंकुर पोषक तत्त्वों और औषधीय गुणों से युक्त होने के कारण दुर्बलता दूर करने के साथ-साथ शरीर में रोग-प्रतिरोधी क्षमता का भी विकास करते हैं। इस संदर्भ में अमेरिका की महिला चिकित्साविज्ञानी डॉ. एन. विग्मोर ने गहन अनुसंधान किया है। प्राकृतिक चिकित्सा संबंधी संस्था— 'हिपोक्रेट हेल्थ इंस्टीट्यूट' में वह अपने मरीजों को जवारे के रस से उपचार करती हैं। उनके अनुसार— जीवंत आहार से कितने ही रोगियों को नवजीवन मिला है। इस प्रयोग के लिए उनने गेहूँ को सबसे अधिक उपयोगी पाया है। इसके अंकुरों में कैंसररोधी ‘लेट्राइल' नामक एन्जाइम बहुत अधिक मात्रा में पाया जाता है। डॉ. लेट्राइल के अनुसार— मूलबीज में जितनी मात्रा में लेट्राइल होता है, अंकुरित अन्नों एवं कच्ची सब्जियों में यह सौ गुना अधिक पाया जाता है। इसी तरह सेम के बीजों को अंकुरित कर लेने पर उसमें सन्निहित ‘इन्सुलिन’ कई गुना अधिक बढ़ जाता है। मधुमेह रोगियों के लिए अंकुरित सेम बहुत लाभकारी सिद्ध हुआ है।
आहारविज्ञानियों का कहना है कि, "किसी अन्न-धान्य, दाल आदि के अंकुर अपने आरंभिककाल में विटामिनों के भंडार होते हैं। इनमें विटामिन बी कांप्लेक्स, ‘सी', 'ई', तथा 'एफ' प्रचुर मात्रा में विद्यमान होते हैं। पाँच दिन के अंकुरित गेहूँ एवं जई में सामान्य दोनों की तुलना में पाँच सौ गुना अधिक जीवन सत्वों का बाहुल्य देखा गया है। उसी तरह प्रोटीन की मात्रा एवं विविधता में भी अभिवृद्धि पाई गई है। शुरू के दिनों में इस अंकुर में प्रायः स्टार्च भर होता है, किंतु जैसे-जैसे वे बढ़ते जाते हैं, स्टार्च तुरंत शक्ति प्रदान करने वाले सुगर में बदला जाता है। उनके अनुसार— अंकुरित अन्नों को सदैव कच्चा ही खाना चाहिए। उबालने पर उनके उपयोगी तत्त्व नष्ट हो जाते हैं। क्लोरोफिलयुक्त अंकुरित आहार तैयार करने के लिए उसे कपड़े से ढककर हलके धूप में रखना पड़ता हैं। इससे उनमें हरापन आ जाता है, जिसे सलाद के रूप में अथवा पीसकर घोल के रूप में भी प्रयुक्त किया जा सकता है।
चिकित्साविज्ञानी डॉ. इयार्प थामस का कहना है कि, "अंकुरित अन्न एवं उनके जवारे निश्चित रूप से नवयुग के लिए उपयुक्त आहार— औषधि हैं। रोगनाशक एवं आरोग्य-संवर्द्धन की दुहरी क्षमता से संपन्न इस आहार को उनने सभी आयु वर्ग के व्यक्तियों के लिए उपयुक्त पाया है। अशक्त रोगी भी जीवंत आहार से स्वस्थ हो जाते हैं। इस प्रयोग में ऐसे लोगों को आरंभ में गेहूँ का पानी दिया जाता है, जिसे एक कप गेहूँ के स्वस्थ बीजों को दो कप पानी में 24 घंटे भिगोकर रखने पर तैयार किया जाता है। प्रतिदिन दो-तीन गिलास इस पानी को छानकर देते रहने पर शरीर का वजन भी बढ़ता है, स्फूर्ति भी आती है, जीवनीशक्ति भी बढ़ती है।"
आलसी-प्रमादियों की इसलिए भर्त्सना होती रहती है कि वे नियत समय पर, नियत काम करने में टाल-मटोल और हील-हुज्जत करते रहते हैं। समय चूकने पर पछताना ही शेष रह जाता है। हर काम मनमर्जी के अनुसार कभी भी कुछ कर लेने की बात सोचने वालों के मनोरथ अक्सर निष्फल ही रह जाते है। समय तो अत्यधिक मूल्यवान है ही, उसके संबंध में इस मान्यता से सभी सहमत हैं कि गुजरा समय फिर वापस लौटता नहीं और इस कारण हुई क्षति की पूर्ति उसी रूप में फिर कभी बन नहीं पड़ती।
प्रस्तुत समय बड़ा असाधारण व उथल-पुथल से भरा है। इस बार का सदी परिवर्तन तो स्रष्टा की ऐसी योजनाओं से भरा-पूरा है, जिसे महाक्रांति का युग-परिवर्तन भी कहा जा सकता है। बीसवीं शताब्दी में मनुष्य की अभिनव उपलब्धियों ने उसे उन्माद जैसी परिस्थितियाँ अपनाने के लिए उत्तेजित कर दिया है। सोने का एक अंडा रोज देने वाली मुर्गी का पेट चीरकर एक ही दिन में सारे अंडे निकाल लेने और तुर्त-फुर्त धनाध्यक्ष बन जाने के लालची की तरह आज का विज्ञान और बुद्धिवाद अपनी चतुरता का ऐसा ही परिचय दे रहा है। उसे आत्मघात में लगी आतुर दौड़ या होड़ भी कह सकते हैं।
मनुष्य को समझदारी देकर स्रष्टा निश्चित हो गया था कि उसका वरिष्ठ पुत्र यह सुख, समृद्धि और प्रगति का संतुलन बनाए रहेगा; पर जब सर्वत्र उद्दंडता, उच्छृंखलता का माहौल बना दीखता है तो नियंता को अपने विशेष दायित्व को अपने हाथों लेना पड़ रहा है। प्रत्यक्षवादी बुद्धिवाद ने नीति, न्याय, औचित्य, विवेक और मानवी मूल्यों को तहस-नहस जैसा करके रख दिया है। विलास और वैभव की बढ़ी-चढ़ी ललक अपने आयुध से न नैतिक मूल्यों को जीवित रहने दे रहा है और न सामाजिक परंपराओं का मानवोचित निर्वाह आवश्यक समझा जा रहा है। फलस्वरूप जिधर भी नजर उठाकर देखा जाए, अनाचार और अपराधों का प्रचलन भयंकर बाढ़ की तरह विकराल होता चला जा रहा है। जनसमुदाय दुर्बलता, रुग्णता, उद्विग्नता, चिंता, आशंका और अराजकता जैसी असुरक्षा से घिरता जा रहा है। यह सब कुछ और इसी तरह चलता रहा तो कुछ ही दिन में सर्वनाश की स्थिति उसी प्रकार आ जाएगी जैसे कि बरसाती उद्भिज शीतकाल आने से पूर्व ही अपना अस्तित्व गँवा बैठती है।
अपनी सुगढ़ कला-कृति इस विश्व-वसुधा की ऐसी दुर्गति भरा अंत नियंता को स्वीकार नहीं, इसलिए उसने विकृतियों को निरस्त करने और सुव्यवस्था की पुनः संस्थापना करने का निश्चय कर लिया है, साथ ही उस निर्णय को अध्यादेश की तरह तुर्त-फुर्त लागू कर देने का निश्चय कर लिया है। प्रांतीय सरकारों पर राष्ट्रपति शासन का अंकुश इसी प्रकार चरितार्थ होता है। अराजकता को सुव्यवस्था में बदल लेने का उपक्रम पूराकर दिखाने के लिए इक्कीसवीं सदी का समय पर्याप्त समझा गया है। युगसंधि के वर्तमान दस वर्षों में ऐसी ही धुलाई-रंगाई का, गलाई-ढलाई का उपक्रम चल रहा है।
आमतौर से भक्त, भगवान को अनुग्रह प्रदान करने के लिए पुकारते रहते हैं, पर कई बार ऐसे समय भी आते हैं जब असामान्य स्थितियाँ बन जाने पर बड़ों को भी छोटों की सहायता के लिए पुकारना पड़ता है। अपने-अपने समय पर अपनी-अपनी उपयोगिता घटती-बढ़ती है। कभी नाव पानी पर तो कभी नाव में पानी भरने के दृश्य भी देखे जाते हैं। इन दिनों भगवान ने भक्तों को पुकारा है। सामान्यतया सेना में भर्ती होने के लिए युवकों की एक बड़ी पंक्ति, प्रार्थना पत्र लिए लंबी लाइन में खड़ी दीखती है, पर कभी-कभी विषम परिस्थितियों में युवकों को ढूँढ़-ढूँढ़कर अनिवार्य रूप से सेना में भर्ती होने के लिए बाधित करने वाले कानून लागू किए जाते हैं। शत्रु का आक्रमण होने पर प्रायः जबरिया भर्ती लागू करने में शासन संचालकों को संकोच नहीं होता। इन दिनों भगवान ने भक्तों को पुकारा है और आग्रह-अनुरोध करने के अतिरिक्त यह भी कहा है कि, "जो इस आड़े समय में अपनी भाव-भरी स्वेच्छा-सहयोग प्रदान करेंगे, उन्हें देशभक्ति का प्रमाण-परिचय देने वाला पुरस्कार भी दिया जाएगा, प्रशस्ति पत्र भी, जिसे देखकर उनके स्वजन-संबंधी और अगली पीढ़ी वाले भी गर्व-गौरव का अनुभव करते रह सकें। यह समय ठीक इसी स्तर का है।"
उपयुक्त समय पर, उपयुक्त कृत्य कर-गुजरने की जागरूकता पाई गई या नहीं, यह परख ऐसे ही विषम अवसरों पर होती है। जो उसमें खरे उतरते हैं, वे अपनी वरिष्ठता और विशिष्टता का प्रमाण-परिचय देते हैं, तदनुसार सम्मानित भी होते हैं, किंतु जो क्षुद्र दुर्बलताओं से आक्रांत होकर समय की पुकार को अनसुनी करते हैं, उनका यह सोचना गलत सिद्ध होता है कि झंझटों में न पड़कर चैन के दिन गुजारते रहने में ही भलाई है।
पिछले स्वतंत्रता-संग्राम में जो साहसपूर्वक सम्मिलित हुए, उन्हें स्वतंत्रता सेनानी के नाम से सम्मानित किया गया। पेंशन मिली। मुफ्त के रेलवे पास मिले। उनके संबंधी भी उस प्रसंग की समय पर चर्चा करने में गर्व अनुभव करते हैं। इन्हीं सेनानियों में से अनेक मिनिस्टर स्तर के पदों पर आसीन हैं; पर जिनने उन दिनों कृपणता दिखाई, वे अब पछताते हैं कि अमूल्य अवसर को उपेक्षा में गँवा क्यों दिया? पछताने पर भी वह अवसर थोड़े समय के लिए आया था, अब फिर लौटने वाला नहीं है।
शंकराचार्य, बुद्ध, गाँधी आदि ने साधारण लोगों की तरह उदरपूर्ति तक सीमित रहने वाली नीति अपनाई होती, तो उनमें ऐसी कोई क्या विशेषता मिल पाती? जिनके लिए इतिहास उनका स्तवन करते हुए अभी भी थकता नहीं है। अन्य महामानवों के संबंध में भी यही कहा जा सकता है कि उनने समय की आवश्यकता को समझा और क्षुद्रता के आकर्षणों से विरत हो सकने का साहस न दिखाया होता, तो सामान्य से असामान्य बनने का श्रेय, गौरव उन्हें कहाँ मिल पाता?
युग-परिवर्तनकाल के इस प्रभात-पर्व ने हर किसी जाग्रत आत्मा के लिए निमंत्रण भेजा है कि वे नर वानर की तरह न जिएँ। संकीर्ण स्वार्थपरता की पूर्ति के लिए ही अपनी क्षमता और दक्षता को नियोजित न किए रहें, वरन साहसपूर्वक उस प्रयोजन में भागीदारी सम्मिलित करें, जो इसी संसार को स्वर्गोपम बनाने के लिए युगचेतना के रूप में इन दिनों पूरे वेग के साथ चल रही है।
स्रष्टा की योजना, समय की माँग और औचित्य के परिपोषण का महत्त्व समझते हुए सुग्रीव, विभीषण, नल-नील, जामवंत जैसों ने अपनी क्षमता का श्रेष्ठतम उपयोग युगधर्म के निर्वाह में ही लगाया। कनिष्ठ रीछ-वानरों तक को अपनी अशक्ति के कारण संकोच करने में मन विचलित न हुआ। केवट, शबरी, गिलहरी जैसे स्वल्प सामर्थ्य वालों ने भी उचित समय पर अपनी श्रद्धा और साहसिकता का परिचय देने में आना-कानी नहीं कीं, जोखिम को जानबूझकर वरण किया। मोटी दृष्टि से प्रतीत होता था कि वह घाटे में रहेंगे और खतरा उठाएँगे, पर ऐसा कुछ हुआ नहीं, वरन क्षुद्रता की समझ से सर्वथा विपरीत ऐसा श्रेय पाने का सुयोग बना, जिसके लिए लालायित रहने वालों में से भी कम ही सफल हो पाते हैं।
महान परिवर्तन के साथ जुड़े हुए युगधर्म को समझा जाए। महाकाल के आमंत्रण को अपने सौभाग्य का चिह्न मानकर स्वीकार किया जा सके, तो हम स्वयं अग्रगामियों को मिलने वाले श्रेय का लाभ उठा सकते हैं और दूसरों के लिए अनुकरण कर सकने योग्य साहस भरे चिह्न छोड़ सकते हैं।
बुद्ध से मिलने एक घुमक्कड़ साधु आया। बुद्ध से आकर कहा— “भगवन! मेरे पास न बुद्धि है, न चातुर्य, न शब्द है, न कुशलता; अतः मैं कोई प्रश्न अथवा जिज्ञासा कर सकने की स्थिति में भी नहीं हूँ। यदि मुझे पात्र समझें तो मेरे योग्य जो कुछ भी कह सकें, कह दें।” घड़ी भर के लिए बुद्ध मौन हो गए। संत भी शांत बैठा रहा। कौतूहलवश सभी भिक्षु उन्हें निहारते रहे। अचानक देखा कि साधु की आँखों से आँसुओं की धारा बहने लगी। उसने बुद्ध को साष्टांग प्रणाम किया और धन्यवाद देते हुए बोला— "बड़ी कृपा की भगवन! आज मैं धन्य हो गया” और नाचता-गाता, गुनगुनाता चला गया। हतप्रभ शिष्यमंडली देखती रही। बुद्ध एक शब्द भी नहीं बोले, फिर आखिर क्या घट गया, उस साधु के जीवन में?
आनंद ने बुद्ध के पास जाकर पूछा— "भगवन! कुछ समझ में नहीं आया, न कोई वार्त्तालाप ही हुआ, न कोई प्रश्नोत्तर। फिर क्या घट गया आप दोनों के बीच कि साधु परम संतुष्ट होकर लौट गया। हम वर्षों से आप के पास हैं, फिर भी वैसा कुछ घटित नहीं होता।"
बुद्ध ने मौन तोड़ते हुए कहा— “आनंद! घोड़े चार प्रकार के होते है। एक अड़ियल घोड़ा होता है, जो चाबुक मारने पर भी टस-से-मस नहीं होता, जितना मारो उतना ही हठ पकड़ लेता है। दूसरा ऐसा होता है कि मारो तो चल पड़ता है। तीसरे घोड़े कोड़ा फटकारते ही चल पड़ते हैं। चौथे घोड़ों को कोड़े की छाया ही काफी है। बस यह साधु ऐसी ही आत्मा थी। उसे इशारे भर की ही जरूरत थी और वह मेरे मन ने कही, उसके मन ने ग्रहण कर ली। तुम्हारे मन तो उन जिद्दी घोड़ों की तरह हैं कि कोड़े फटकारते रहने पर अपनी जिद पर अड़े हैं।" बात शिष्यों की समझ में आ गई। समर्पणभाव से गुरु से ग्रहण किया जाए तो बिना बोले, बिना कहे ही सब पाया जा सकता है।
आज के मनुष्य की पीड़ा, भटकन का कारण उसकी अपनी अनगढ़ता है। मानवीय प्रकृति की सूक्ष्मताओं के निष्णात के रूप में श्री रामकृष्ण परमहंस ने तथ्य को उद्घाटित करते हुए कहा है— "अनगढ़ता को दूर करने का उपाय है— विद्या। यह कुम्हार के चाक की तरह है जो अनगढ़ मिट्टी के लौंदे जैसे मनुष्यों को लेकर उन्हें चारित्रिक एवं व्यावहारिक दृष्टि से खूबसूरत, सुडौल और उपयोगी बनाती है।"
ऐसी विद्या स्कूलों में नहीं मिलतीं। वहाँ मिलने वाली तो शिक्षा है, जो तमाम तरह की जानकारियों को ठूँस-ठाँसकर दिमाग को कबाड़खाना बना देती है। उन्हीं के स्वरों में इसे यों भी कहा जा सकता है— "यह नोचने-खसोटने वाली प्रक्रिया है, जिसकी एक ही परिणति है, जैसे-तैसे पेट भरना।" वर्तमान के क्षणों में उनकी यह बात कहीं अधिक व्यापकतर और ठोस सत्य के रूप में दिखाई देती है। मनुष्य ने अपनी इसी नोच-खसोट में जंगलों को तबाह किया, निरीह प्राणियों की निर्मम हत्याएँ कीं। जिस धरती ने उसे माँ की तरह अपनी गोद में आश्रय दिया, दुलराया, पाल-पोसकर बड़ा किया, उसे भी नहीं बख्शा। उद्देश्य एक ही रहा— पेट भरना, अपनी हविश पूरी करना। उदरपूर्णा के रूप में शिक्षा का दायरा इसी के लिए नित नई तकनीकें सुझाने तक सीमित रह गया है।
विद्या के आचार्य के रूप में श्री रामकृष्ण ने इसी कारण इसे अपने जीवन से बहिष्कृत कर दिया। कमारपुकुर से कलकत्ता आने पर उनके बड़े भाई रामकुमार ने उन्हें स्कूल में पढ़ाने की बड़ी कोशिश की। इस पर उन्होंने साफ इंकार करते हुए कहा— "दादा! मैंने अक्षरज्ञान पा लिया है, सत्साहित्य को पढ़ सकता हूँ, अब इस पेट भरने वाली शिक्षा को पढ़कर जिंदगी नहीं बरबाद करूँगा। मैं तो इंसान बनूँगा।" और वह जुट गए विद्या पढ़ने में, अर्थात अपने व्यक्तित्व को सँवारने में।
विनोबा जी उनकी इस बात को सराहते हुए कहते थे— "वह शायद इसीलिए विद्यावान बन गए, क्योंकि विद्यालय नहीं गए।" वह कहते— "आज विद्यालय का अर्थ है— जहाँ विद्या का लय हो जाए।" उन्हीं के शब्दों में परमहंस देव महाज्ञानी थे, वह शिक्षा के फेर में न पड़कर, शुरू से विद्या प्राप्ति में जुट गए। मुझे जरा देर में अक्ल आई, इसी कारण मैंने देर से शिक्षा से अपना पिंड छुड़ा पाया। उनके इस कथन की सार्थकता हम स्वयं के जीवन में तथा अपने चारों ओर निहार सकते हैं।
विद्या में स्वयं की पारंगता हासिल होने पर उन्होंने दक्षिणेश्वर मंदिर को विद्या-विस्तार का केंद्र बनाया। जुट गए इंसानों को गढ़ने में— विवेकानंद, अभेदानंद, ब्रह्मानंद जैसे चमचमाते खरे व्यक्तित्व ढालकर उन्हें जीवन विद्या के विस्तारक के रूप में समाज को समर्पित किया। उनकी नीति थी— साँचे के अनुरूप ढाँचा बनता है एवं व्यक्तित्व ढलते हैं। ब्रह्मानंद के शब्दों में— "ठाकुर हम लोगों से कहा करते। जब तुम सोलह आने बनोगे, तब तुम्हे ये लोग आठ आने अपनाने की सोचेंगे।" उनके ये शब्द आज भी लोक-शिक्षक के लिए कसौटी रूप में हैं।
उन दिनों स्वामी विवेकानंद एल.एल.बी के अंतिम वर्ष में थे। उन्हें लक्ष्य करके आत्मीयतापूर्वक उनने कहा— “क्यों रे नरेन! तू कब तक भटकता रहेगा। वकालत करके झूँठ-मूँठ पैसा कमाने के चक्कर में पड़ा तो तेरे हाथ का छुआ पानी नहीं पीऊँगा।” उनकी बात स्वीकार कर वह पूरी तरह विद्या के क्षेत्र में कूद पड़े। विद्या में निष्णात् हो, चमत्कारी व्यक्तित्व के स्वामी बन जाने पर किसी ने ठाकुर से पूछा— "उनसे क्या कराएँगे”। गले में कैंसर होने के कारण वह बोल नहीं सकते थे। उन्होंने कोयले का टुकड़ा उठाकर जमीन पर लिखा— “नरेन शिक्षा दिबे"— नरेंद्र विद्या का शिक्षण देगा।
विद्या के आचार्यो को गढ़ने वाले इस महामानव की स्तुति में स्वामी विवेकानंद ने कहा है— "आचार्याणां महाचार्यो श्री रामकृष्णाय ते नमः।" निःसंदेह वह आचार्यों के महाचार्य थे। स्वामी जी कहते— "मेरे गुरु ने मुझे विद्या दी है। इसको पाकर में दार्शनिक नहीं हुआ, तत्त्ववेत्ता भी नहीं बना हूँ। संत बनने का दावा नहीं करता, परंतु मैं इंसान हूँ और इंसानों को प्यार करता हूँ।"
विस्तारक आचार्यों को एक बार फिर कहीं अधिक बड़ी संख्या में ढाला जा रहा है। यहाँ गढ़े गए यही युगाचार्य गाँव-गाँव के हर मंदिर को दक्षिणेश्वर में बदलेंगे, जनजाग्रति का केंद्र बनाएँगे। विवेकानंद के शब्दों में जनजाग्रति के इन्हीं केंद्रों से वे प्रकाश पुनः निकलेंगे, जो नवयुग की लालिमा को घर-घर पहुँचाकर असंख्यों का उद्धार करेंगे। अग्रदूतों की गणना में अपना नाम भी जुड़ सके, इसके लिए महाकाल की वाणी को सुनें, समय की महत्ता को पहिचानें और आगे की ओर कदम बढ़ाएँ। जीवन विद्या के आचार्य के रूप में ढलकर परिजन स्वयं का जीवन सार्थक अनुभव कर सकेंगे।
*समाप्त*
समस्या को एक साथ सुलझाने का प्रयास करें, एक-एक को देखें समझें कि उस स्थिति में क्या सर्वश्रेष्ठ मैं कर सकता हूँ या क्या सुधार कर सकता हूँ। हर छोटी सफलता, उत्साह कई गुना बढ़ा देगी।
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झाड़ू से घर बुहारा जाता है और प्राश्चित से पापों कि निवृत्ति होती है।
चूजे जब बहुत छोटे थे तब दाने के लिए आपस में लड़ते थे; पर जब वे बड़े हो गए तो समझ में आया कि उनके जैसे लाखों के लिए इस धरती पर अनाज मौजूद है। समझ आते ही उनने लड़ाई बंद कर दी।
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