पर उदारता उसकी


अपनी परिधि का विस्तार करें!

आत्मा का विकास परमात्मा के समान विस्तृत होने में है। जो सीमित है— संकीर्ण है, वह क्षुद्र है। जिसने अपनी परिधि बढ़ा ली, वही महान है। हम क्षुद्र न रहे, महान बनें। असंतोष सीमित अधिकार से दूर नहीं होता। थोड़ा मिल जाए तो अधिक पाने की इच्छा रहती है। सुरसा के मुख की तरह तृष्णा अधिक पाने के लिए मुँह फाड़ती चली जाती है। आग में घी डालने से वह बुझती कहाँ है? अधिक ही बढ़ती है। तृप्ति तब मिलेगी जब इस संसार में जो कुछ है, सब पा लिया जाए। वह हँसी नहीं, कल्पना नहीं। समग्र को पा सकना स्वल्प पाने की अपेक्षा सरल है।

मान्यता को विस्तृत कीजिए— यह सारा विश्व मेरा है। नीला विशाल आकाश मेरा। हीरे-मोतियों की तरह— झाड़-फानूसों की तरह जगमगाते हुए सितारे मेरे, सातों समुद्र मेरी संपदा, हिमालय मेरा, गंगा मेरी, पवन देवता मेरे, बादल मेरी संपत्ति। इस मान्यता में कोई बाधा नहीं, किसी की रोक नहीं। समुद्र में तैरिऐ, गंगा में नहाइए, पर्वत पर चढ़िए, पवन का आनंद लूटिए, प्रकृति की सुषमा देखकर उल्लसित हूजिए। कोई बंधन नहीं, कोई प्रतिरोध नहीं। सभी मनुष्य मेरे, सभी प्राणी मेरे, की परिधि इतनी विस्तृत करनी चाहिए कि समस्त चेतन जगत उसमें समा जाए। अपनी सीमित पीड़ा से कराहेंगे, तो कष्ट और दुःख होगा , पर जब मानवता की व्यथा को अपनी व्यथा मान लेंगे और लोक-पीड़ा की कसक अपने भीतर अनुभव करेंगे तो मनुष्य नहीं, ऋषि, देवता और भगवान जैसी अपनी अंतःस्थिति हो जाएगी। अपना कष्ट दूर करने को जैसा प्रयत्न किया जाता है, वैसी ही तत्परता विश्व- व्यवस्था के निवारण में जुट पड़ेगी। इस चेष्टा में लगे हुए व्यक्ति को ही तो महामानव और देवदूत कहते हैं। इश्वर का अनुग्रह—  सिद्धियों का अनुदान ऐसी ही उदात्त आत्माओं के चरणों में लोटता है।


शिक्षाप्रद कहानी

हुगली के सरकारी वकील स्वर्गीय शशिभूषण बंधोपाध्याय एक दिन जून के महीने में दोपहर की कड़कती लू में किराए की गाड़ी में बैठकर एक प्रतिष्ठित व्यक्ति के यहाँ  आवयश्क कार्यवश पहुँचे। यथोचित सत्कार के बाद उस व्यक्ति ने कहा—"इस भयंकर गर्मी में आपने स्वयं आने का कष्ट क्यों किया ? किसी नौकर के हाथों कागजात भेज दिए होते। इतना सुनकर शशिभूषण जी कुछ गंभीर होकर बोले—" पहले मेरा विचार नौकर ही को भेजने का था। किंतु तपती लू और प्रचंड गर्मी को देखकर मेरे मन ने गवाही नहीं दी कि बेचारे को पैदल भेजूँ। आखिर कुछ भी हो उसमें भी तो मेरी जैसी आत्मा है।" इसीलिए गाड़ी में बैठकर मैं स्वयं चला आया।


अपनी परिधि का विस्तार करें!

आत्मा का विकास परमात्मा के समान विस्तृत होने में है। जो सीमित है— संकीर्ण है, वह क्षुद्र है। जिसने अपनी परिधि बढ़ा ली, वही महान है। हम क्षुद्र न रहे, महान बनें। असंतोष सीमित अधिकार से दूर नहीं होता। थोड़ा मिल जाए तो अधिक पाने की इच्छा रहती है। सुरसा के मुख की तरह तृष्णा अधिक पाने के लिए मुँह फाड़ती चली जाती है। आग में घी डालने से वह बुझती कहाँ है? अधिक ही बढ़ती है। तृप्ति तब मिलेगी जब इस संसार में जो कुछ है, सब पा लिया जाए। वह हँसी नहीं, कल्पना नहीं। समग्र को पा सकना स्वल्प पाने की अपेक्षा सरल है।

मान्यता को विस्तृत कीजिए— यह सारा विश्व मेरा है। नीला विशाल आकाश मेरा। हीरे-मोतियों की तरह— झाड़-फानूसों की तरह जगमगाते हुए सितारे मेरे, सातों समुद्र मेरी संपदा, हिमालय मेरा, गंगा मेरी, पवन देवता मेरे, बादल मेरी संपत्ति। इस मान्यता में कोई बाधा नहीं, किसी की रोक नहीं। समुद्र में तैरिऐ, गंगा में नहाइए, पर्वत पर चढ़िए, पवन का आनंद लूटिए, प्रकृति की सुषमा देखकर उल्लसित हूजिए। कोई बंधन नहीं, कोई प्रतिरोध नहीं। सभी मनुष्य मेरे, सभी प्राणी मेरे, की परिधि इतनी विस्तृत करनी चाहिए कि समस्त चेतन जगत उसमें समा जाए। अपनी सीमित पीड़ा से कराहेंगे, तो कष्ट और दुःख होगा , पर जब मानवता की व्यथा को अपनी व्यथा मान लेंगे और लोक-पीड़ा की कसक अपने भीतर अनुभव करेंगे तो मनुष्य नहीं, ऋषि, देवता और भगवान जैसी अपनी अंतःस्थिति हो जाएगी। अपना कष्ट दूर करने को जैसा प्रयत्न किया जाता है, वैसी ही तत्परता विश्व- व्यवस्था के निवारण में जुट पड़ेगी। इस चेष्टा में लगे हुए व्यक्ति को ही तो महामानव और देवदूत कहते हैं। इश्वर का अनुग्रह—  सिद्धियों का अनुदान ऐसी ही उदात्त आत्माओं के चरणों में लोटता है।


साहित्यकार स्रष्टा ही नहीं, द्रष्टा भी

न्यूयार्क के पास एक छोटा-सा कस्बा। एक प्रौढ़ आयु के व्यक्ति अपने कुछ सहयोगियों के साथ स्वच्छता अभियान में जुटे थे। इतने में एक मोटर रुकी। कुछ व्यक्ति उतरे और उनके पास तक आ पहुँचे। उनके हाव- भाव देखकर लग रहा था, जैसे उन्हें यह सब देखकर आश्चर्य हो रहा हो।

उनमें से एक ने कहा— “आप यहाँ”?

“जी हाँ”!— संक्षिप्त-सा उत्तर था।

“आपके लिए अतिप्रसन्नतादायक समाचार है।"—  उनमें से कुछ ने उत्साहातिरेक से कहा। ‘क्या?’  “आपको नोबेल पुरस्कार दिया जाने वाला है”। “अच्छा!”— कहकर वह पुनः अपने काम में जुट गए।

इतनी बड़ी सफलता का समाचार सुनकर इस तरह का व्यवहार, किसी को इसकी आशा न थी। एक ने हिम्मत जुटाई— “ हम आपका कुछ समय चाहते हैं”?

इस पर काम में जुटे व्यक्ति ने एक सहयोगी की तरफ इशारा करते हुए कहा— "ये आप सबको स्थान बता देंगे, शाम तक रुकें, तब आराम से बातें होंगी”।

शाम हुई, उसने अपने स्वच्छता कार्य को विराम दिया। हाथ-पैर साफ करके नपे-तुले कदमों से चलता हुआ वहाँ जा पहुँचा जहाँ प्रातः आए व्यक्ति ठहरे थे।

सामान्य शिष्टाचार के बाद आगंतुक सज्जनों ने जिज्ञासा की— “पुरस्कार आपको साहित्य-क्षेत्र में मिला और आप जुटे थे, सेवाकार्य में।”

तनिक-सा मुस्कराते हुए उसने कहा— “साहित्य और सेवा दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। सेवा करने से भाव-संवेदनाएँ परिपक्व होती हैं और साहित्य के माध्यम से शब्दों में उभरती हैं। दूसरी तरह से देखें तो चिंतन और कर्म दोनों एकदूसरे के पूरक हैं। एक उत्कृष्ट होगा— दूसरा प्रखर बनेगा”। “आपको कहाँ से लिखने की प्रेरणा मिली?''— "प्रेरणा ?” इतना कहकर मानो वह अतीत के गहरे सागर में डूब गए। सागर के कुछ मोती उनकी आँखों में थे। कुछ क्षण बाद उनके मुख से बोल फूटे— “हिरोशिमा की विनाश लीलाओं का हृदयविदारक विवरण पढ़कर मेरा साहित्यकार जगा। लगा, क्या यही है आधुनिक यथार्थवादी संस्कृति; जिसके बीच उलझकर मनुष्य ने अपनी पहचान खो दी। सृजन का देवता होते हुए वह विध्वंस का शैतान बनता जा रहा है। मानवी बुद्धि को शैतान के चंगुल से छुड़ाने के लिए मैंने साहित्य के माध्यम से प्रयास शुरू किया।" — कहने वाले के साथ मानो सुनने वाले भी गहरे भावों में डूब गए।

थोड़ी देर के बाद एक ने पूछा— “क्या यह संभव है"?

“अवश्य।”—  उसका दृढ़ स्वर था। “साहित्यकार द्रष्टा ही नहीं स्रष्टा भी है, जो समाज की मानसिकता को नए संस्कार देकर उन्नत बनाता है। समाज के वैचारिक नेतृत्व की जिम्मेदारी उसी पर है। वह समाज का प्रहरी है।”

“तो क्या आप अकेले उस कलंक को धो सकेंगे, जो साहित्यकारों पर लगा है”। "मैं ही क्याें और भी बहुत से आएँगे और वर्त्तमान की समस्त निषेधात्मक और ध्वंसकारी प्रवृत्तियों के बावजूद भी शीघ्र ही मानव जाति अंततः आत्मा की शक्ति के बल पर विजयी होगी। न केवल जीवित रहेगी, वरन पुनः समर्थ और सशक्त बनेगी।”

“नोबेल पुरस्कार की धनराशि का क्या होगा”? कोई कुछ और कहे कि उनका जवाब था —"समाज का धन समाज के कामों में लगेगा”।

पत्रकारों की टोली श्रद्धानत थी और इन सबके श्रद्धाभाजन थे—'सांलबेंलो', जो निरंतर चिंतन व कर्मपीड़ित मानवता की मरहम-पट्टी करते रहे।"


देवत्व का विकास ही अंतिम समाधान!

क्रौंच पक्षी को आहत-विलाप करते देखकर वाल्मीकि की करुणा जिस क्षण उभरी उसी समय वे आदिकवि के रूप में परिणत हो गए। ऋषियों के अस्थि-पंजरों की पर्वतमाला देखकर राम की करुणा मर्माहत हो गई और उनसे भुजा उठाकर यह प्रण करते ही बन पड़ा कि “निशिचर हीन करौं मही”। बाढ़, भूकंप ,दुर्भिक्ष, महामारी जैसे आपत्तिकाल में जब असंख्यों को देखा जाता है, तो निष्ठुर भले ही मूकदर्शक बने रहें, सहृदयों को तो अपनी सामर्थ्य भर सहायता के लिए दौड़ना ही पड़ता है। इसके बिना उनकी अंतरात्मा आत्मप्रताड़ना से व्याकुल हो उठती है। दुर्घटनाग्रस्तों को चीखते-चिल्लाते देखकर भावनाशीलों को तो अपना काम हर्ज करके भी सहायता के लिए दौड़ना पड़ता है। यहाँ उन निष्ठुरों की चर्चा नहीं हो रही है, जो कुत्तों, कौओं और शृगालों की तरह अर्धमृतकों का मांस स्वादपूर्वक चखते और मोद मनाते हैं। निष्ठुरों को भी नर-पिशाच कह सकते हैं, उनका मनुष्य-समुदाय में भी अभाव नहीं है।

विकास की अंतिम सीढ़ी भाव-संवेदना को मर्माहत कर देने वाली करुणा के विस्तार में ही है। इसी को आंतरिक उत्कृष्टता भी कहते हैं। संवेदना उभरने पर ही सेवा-साधना बन पड़ती है। धर्म-धारणा का निर्वाह भी इससे कम में नहीं होता। तपश्चर्या और योग-साधना का लक्ष्य भी यही है कि किसी प्रकार संवेदनाशून्य निष्ठुरता के महादैत्य से बच निकलना संभव हो सके और उस देवत्व का साक्षात्कार हो सके, जो जरूरतमंदों को दिए बिना रह ही नहीं सकता। देना ही जिनकी प्रकृति और नियति है। उन्हीं को इस धरती का देवता कहा जाता है। देवमानव के रूप में उन्हीं का अनुकरण और अभिनंदन करते विवेकवान भक्तजन देखे जाते हैं।

देने की प्रकृति वाली आत्माओं का जहाँ संगठन— समंवय होता रहता हैा उसी क्षेत्र को स्वर्ग के नाम से संबोधित किया जाने लगता है। इस प्रकार का लोक या स्थान कहीं न होने की बात को तर्क और तथ्य की दृष्टि से भले ही अस्वीकार कर दिया जाए, पर इस प्रतिपादन को कोई चुनौती नहीं दे सकता कि सहृदय, सेवाभावी, उदारचेता न केवल स्वयं देवमानव होते हैं; वरन अपने कार्यक्षेत्र को भी ऐसा कुछ बनाए बिना नहीं रहते, जिसे स्वर्गोपम अथवा सतयुग का सामयिक संस्करण कहा जा सके।

अपने समय को अभूतपूर्व प्रगतिशीलता का युग कहा और गर्वोक्तियों के साथ बखाना जाता है। इस अर्थ में बात सही भी है कि जितने सुविधा-साधन इन दिनों उपलब्ध हैं, उतने इससे पहले कभी भी हस्तगत नहीं हो सके। विज्ञान के विकास से जलयान, वायुयान, रेल, मोटर जैसे द्रुतगामी वाहन, तार, रेडियो, फिल्म, दूरदर्शन जैसे संचार-साधन इससे पूर्व कभी कल्पना में भी नहीं आए थे। कल-कारखानों का पर्वताकार उत्पादन, सर्जरी, अंग-प्रत्यारोपण जैसी सुविधाएँ भूतकाल में कहाँ थीं? कहा जा सकता है कि विज्ञान ने पौराणिक विश्वकर्मा को कहीं अधिक पीछे छोड़ दिया है ।

बुद्धिवाद की प्रगति भी कम नहीं हुई है। तर्क, तथ्य, प्रमाण इस कदर विकसित हुए हैं कि पुरातन—  एकाकी धर्मशास्त्र, वर्त्तमान अर्थशास्त्र, राजनीतिशास्त्र, तर्कशास्त्र, समाजशास्त्र, मनोविज्ञानशास्त्र जैसी अनेकानेक कलेवरों में असाधारण रूप से बढ़ा और भविष्य में और भी अधिक खोज लेने का दावा कर रहा है। शोध-संस्थानों की, प्रयोगशालाओं की उपलब्धियाँ घोषणा कर रही हैं कि निकट भविष्य में, मनुष्य इतना अधिक ज्ञान-विज्ञान खोज लेगा कि पुरातनकाल की समस्त उपलब्धियों को उसके सामने, बौना-बचकाना ठहराया जा सके।

इतने पर भी एक प्रश्न सर्वथा अनसुलझा ही रह जाता है कि यह तथाकथित प्रगति अपने साथ दुर्गति के असंख्यों बवंडर, क्यों और कैसे घसीटती-बटोरती चली जा रही है ? प्रदूषण, युद्धोन्माद , खाद्य-संकट, अपराधों की भरमार समस्त तटबंध तोड़ती चली आ रही है। अस्वस्थता, दुर्बलता, कलह-विग्रह, छल-प्रपंच जैसी विडंबनाएँ व्यवहार तथा चिंतन को धुआँधार विकृतियाें से भरती क्यों चली आ रही है ? निकट भविष्य के संबंध में मूर्धन्य विचारक यह भविष्यवाणी क्यों कर रहे हैं  कि स्थिति यही रही, रेल इसी पटरी पर चलती रही, तो विपन्नता बढ़ते-बढ़ते महाप्रलय जैसी स्थिति में पहुँच जा सकता है? वे कहते हैं, कि हवा और पानी में विषाक्तता इस तेजी से बढ़ रही है कि उसे धीमी गति से सर्वभक्षी आत्महत्या का नाम दिया जा सकता है। बढ़ता हुआ तापमान यदि ध्रुवों की बर्फ पिघला दे और समुद्र में भयानक बाढ़ ला दे, तो उससे थल निवासियों के लिए डूब मरने का संकट उत्पन्न कर सकता है। वनों का कटान , रेगिस्तान का द्रुतगामी विस्तार, भूमि की उर्वरता का ह्रास, खनिजों के बेतरह दोहन से उत्पन्न हुआ धरित्री असंतुलन, मौसमों में आश्चर्यजनक परिवर्तन, तेजाबी मेघवर्षण, अणु-विकिरण, बढ़ती हुई जनसंख्या के अनुरूप जीवन-साधन न बढ़ पाने का संकट; जैसे अनेकानेक प्रश्न ऐसे हैं, जिनमें किसी पर भी विचार किया जाए तो प्रतीत होता है कि तथाकथित प्रगति ही उन समस्त विग्रहों के लिए पूरी तरह उत्तरदाई है। वह प्रगति किस काम की, जिसमें एक रुपया कमाने के बदले सौ का घाटा उठाना पड़े। उन बढ़े हुए सुविधा-साधनों का आखिर होगा क्या, जो मनुष्य को प्रसन्नता प्रदान करने के स्थान पर उसके अस्तित्व को ही मिटा डालने के लिए नंगी तलवार तानकर सामने आ खड़े हों?

आश्चर्य इस बात का है कि आखिर यह सब हो क्यों एवं कैसे रहा है ? इसे कौन करा रहा है ? आखिर वह चौकड़ी कैसे चूक गई थी, जो बहुत कुछ पाने का सरंजाम जुटाकर अलादीन का नया चिराग जलाने चली थी और कुछ ही दूर चलकर पैर पसार गई। पहुँचना तो उसे प्रकृति-विजय के लक्ष्य तक था, पर यह हुआ क्या कि तीनों लोक तीन डगों में नाप लेने की दावेदारी करारी मोच लगने पर सिहरकर बीच रास्ते में ही पसर गई। उसे इस असमंजस की स्थिति में रहना पड़ रहा है कि 'आगे कुँआँ पीछे खाई' की स्थिति आ खड़ी होने पर आखिर चला किस तरह जाए। साँप-छछूँदर की इस स्थिति से कैसे उबरा जाए, जिसमें न निगलते बन रहा है और न उगलते। असमंजस की स्थिति लंबे समय तक टिकती नहीं है। मनुष्य की बुद्धि इतनी कमजोर नहीं है कि वह उत्पन्न संकटों का कारण न ढूँढ़ सके और शांतचित्त होने पर उनके समाधान न ढूँढ़ सके।

फूटे घड़े में पानी भरने पर वह देर तक ठहरता नहीं है। चलनी में दूध दुहने पर दुधारू गाय पालने वाला भी खिन्न-विपन्न रहता है।

ऐसी ही कुछ भूल मनुष्य से भी बन पड़ी है, जिसके कारण अत्यंत परिश्रमपूर्वक जुटाई गई उपलब्धियों को हस्तगत करने पर भी लेने के देने पड़ रहे हैं। इसी को कहते हैं— “सिर मुड़ाते ही ओले पड़ना।”

अभी तक की उपलब्धि पर संतोष व्यक्त करते हुए मनीषी चिंतक दिव्य द्रष्टा कहते हैं कि अगले दिनों मनुष्य की समझदारी, सतर्कता और सूझबूझ जागेगी। भाव-संवेदनाओं से भरे-पूरे व्यक्ति आने वाली सदी में उस रीति-नीति पर चलेंगे, जिनके आधार पर संपदाओं का सदुपयोग— सुनियोजन करते बन पड़ेगा। तब आसन्न विभीषिकाओं, विपन्नताओं और विडंबनाओं पर क्षुब्ध न होना पड़ेगा। वह समय शीघ्र ही आ रहा है।


शिक्षाप्रद कहानी

गाय सूखा भूसा अनमने मन से खाती। रुचिकर न लगने से वह प्रायः भूखी रहती।

चतुर मालिक ने एक तरकीब निकाली। उसने हरे रंग की एक प्लास्टिक की पट्टी उसकी आँखों पर लपेट दी। गाय को सब कुछ हरा दिखने लगा। भूसे को वह घास समझने लगी और रुचिपूर्वक खाने लगी। दृष्टिकोण विकृत हो जाने पर सामान्यजन भी हेय को भी श्रेय समझने और अपनाने लगते हैं।


हजार तालों की एक चाबी

मनःस्थिति के अनुरूप परिस्थितियाँ उत्पन्न होती, तदनुरूप सुख या दुःख सामने आते हैं। विचार ही कर्म के उत्पादक हैं और उन्हीं के आधार पर भले-बुरे परिणाम सामने आते रहते हैं। विचारों को यदि संयमित और परिष्कृत बनाया जा सके तो समझना चाहिए कि उज्ज्वल भविष्य की संभावनाएँ निश्चित रूप से बन गईं।

पराचेतना और जीवसत्ता के मध्य चलने वाले प्रवाह का माध्यम विचार ही है। उसे असुरता के साथ भी जोड़ा जा सकता है और देवत्व के साथ घुल-मिलकर तदनुरूप वर्त्तमान एवं भविष्य का निर्माण-निर्धारण भी बन पड़ता है। चूंकि विचारों का स्तर इच्छानुरूप बन पड़ना मनुष्य की अपनी इच्छा और चेष्टा पर निर्भर है। इसलिए उसे अपने भाग्य का निर्माता आप होने वाली बात को सर्वत्र मान्यता मिली है।

हेय विचारों से बुरी आदतें विकसित होती हैं। बुरे स्तर की इच्छा-आकांक्षाएँ उभरती हैं, तदनुरूप मनुष्य कर्म करने लगता है। आज के कर्म ही कल के भाग्य बनकर सामने आते हैं। इस तथ्य से अवगत दूरदर्शी अपने विचारों पर कड़ा नियंत्रण करते हैं, उन्हें सुधारते-परिष्कृत करते और मानवी गरिमा के साथ जुड़े हुए आदर्शों के अनुरूप बनाते हैं; किंतु जो इस केंद्रबिंदु पर चौकड़ी चूक जाते हैं और वासना, तृष्णा, अहमन्यता एवं पतन-पराभव का स्तर अपना लेते हैं, उनकी विचारणा ही उन्हें नारकीय परिस्थितियों में धकेल देती है। असंतोष, आक्रोश, अनिष्ट, विग्रह जैसी आशंकाओं से खिन्न-विपन्न बनाए रहती है। उतावली और लिप्सा से मतिभ्रम अपनाकर तात्कालिक लाभ को सब कुछ समझते हुए संलग्न तो अनाचार में भी हुआ जा सकता है, पर उनके दुष्परिणामों से बच सकना किसी भी प्रकार संभव नहीं होता। उदात्त दृष्टिकोण और शालीनतायुक्त चरित्र-व्यवहार अपनाकर ही लोग महापुरुषों जैसी उत्कृष्टता प्राप्त करते हैं, ऊँचे उठते और साथियों को प्रोत्साहन-समर्थन देकर ऊँचा उठाते हैं। श्रेय और सम्मान उन पर बरसता है। आत्मसंतोष का असाधारण लाभ मिलता है, सो अलग है।

इन दिनों की उलझनों को तत्त्वदृष्टि से देखा जाए तो उनका सब के मूल में एक ही आधारभूत कारण  दिख पड़ता है— 'विचार-विपर्यय', अर्थात आस्था-संकट, चिंतन क्षेत्र में अवांछनीयता का घुस पड़ना। यदि इस एक ही तथ्य पर पहुँचा जा सके और विचार-परिष्कार को समस्त समस्याओं का एक हल माना जा सके, तो बात इतने भर से बन जाती है। इस एक ही चाबी से उलझनों के अगणित ताले सरलतापूर्वक खुल सकते हैं।

लोक-शिक्षण और जनमानस के परिष्कार को हाथ में लिया जाए और हर किसी को यह हृदयंगम कराया जाए कि मानवी गरिमा के अनुरूप ही विचारणा को मान्यता मिलनी चाहिए। जो अनुपयुक्त एवं अवांछनीय है, उसकी जड़ विचार-क्षेत्र में जमने ही न दी जाए तो फिर वे विषवृक्ष उग ही नहीं सकते, जो शारीरिक मानसिक, आर्थिक, पारिवारिक, सामाजिक, राजनीतिक-क्षेत्र में भयंकर विग्रहों और अनर्थों के रूप में मानवी सुख-शांति को चुनौती देते दीख पड़ते हैं। जनमानस का परिष्कार यदि चरम लक्ष्य की तरह अपनाया जा सके तो उस विचार-क्रांति की परिणति ऐसी सुखद हो सकती है, जिसका परिणाम इसी धरती पर स्वर्ग के अवतरण जैसा देखा जा सके।


मेरा सभी कुछ औरों से अलग है

दरवाजे पर खट-खट की आवाज हुई। कमरे में कुर्सी पर बैठे, मेज पर कागज-कलम से लिख रहे, युवक धीरज से इन्हें रखकर उठे और शालीनता से दरवाजा खोला। देखा— कुछ नवयुवक बाहर खड़े थे।

कमरे में घुसते ही ये सभी भौंचक्के से रह गए। इसका कारण था—  घर की हालत। कोने में चटाई, उस पर रखा एक कंबल, यही था उनका बिस्तर, अरगनी पर टँगे दो-तीन कपड़े, यही थी उनकी वस्त्र-संपदा और पुस्तकें, इनसे तो यही कमरा क्यों बगल का कमरा भी भरा था। वह न जाने कितनी भाषाओं को पढ़ते होंगे। फारसी, जर्मन, रशियन, अंग्रेजी, ग्रीक, लैटिन, फ्रेंच, इटैलियन, बंँगला, संस्कृत, हिब्रू आदि भाषाओं की ढेर की ढेर पुस्तकें जमा थीं। बड़ौदा की कड़ाके की सर्दी में ऊनी कपड़ों से रहित, पर विविध भाषाओं की पुस्तकों से भरा घर देखकर आश्चर्य होना स्वाभाविक था।

“सर! सुना है आप कॉलेज छोड़ रहे हैं। ” “ठीक सुना हैं।”—  उनके प्राचार्य का उत्तर था। “फिर हमें कौन पढ़ाएगा? ”

“कोई नया व्यक्ति।”—  सपाट और ठंडा-सा उत्तर था। “ एक बात पूछें ?”—एक छात्र ने हिचकिचाते हुए कहा। पूछो!"— "प्रेमभरा उत्तर था।  “ क्या यहाँ वेतन कुछ कम है?”

“ओह! नहीं, मेरे बच्चे।  नयी जगह में मिलने वाला वेतन यहाँ के वेतन का दशांश होगा। यहाँ अभी 710 मिलता है, वहाँ मिलेगा सिर्फ 70 रु.।” सुनकर सभी एक बारगी अवाक् रह गए ।

एक महानुभाव अंदर आए, उन्होंने प्राचार्य महोदय के कान में कुछ कहा। उन्होंने दूर रखी मेज पर रुपयों की प्लेट की ओर इशारा किया। आगंतुक सज्जन मेज के पास गए, उसमें से दो हजार रुपए उठाए और जैसे आए थे, वैसे ही चले गए। नवयुवक छात्रों को यह और अजीब लगा, जो आदमी अपने ऊपर एक कौड़ी भी अधिक खर्च नहीं करता, वही हजारों रुपया इस तरह दे देता है, जैसे कुछ हुआ ही न हो।

“सर! ये कौन थे, इतने रुपए क्यों ले गए ?”— उनमें से कुछ ने पूछा। जिज्ञासा स्वाभाविक थी।

“ये थे राष्ट्र को समर्पित एक व्यक्ति और राष्ट्र के लिए ही धन ले गए। इस संबंध में अधिक कुछ न पूछना।”

“आपका सभी कुछ आश्चर्यपूर्ण है।”— एक ने भयमिश्रित श्रद्धा से कहा ।

तुम्हारी बातें मैं समझ रहा हूँ,  पर मेरा जीवन कुछ आश्चर्यपूर्ण नहीं। हाँ ! औरों से कुछ भिन्न जरूर है।  कारण कि मुझे दृढ़विश्वास है कि भगवान ने जो गुण, प्रतिभा, जो उच्च शिक्षा और विद्या, जो धन दिया है, सब भगवान का है। इसके अल्पतम अंश में अपना काम चलाकर बाकी सब भगवान, अर्थात समाज को वापस कर देना उचित है।

छात्र भी भावविहल हो उठे। एक के भरे गले से मुश्किल से, आवाज निकली— "सर ! हम लोग आपका विदाई-समारोह करना चाहते थे, आपकी अनुमति लेने ही आए थे।"

नहीं ! मुझे यों ही जाने दो, तुम नहीं जानते— महान कार्य में लगे व्यक्ति के लिए राई भर सम्मान भी पहाड़ के बराबर अवरोध उत्पन्न करता है। फिर मेरी नीति है परदे के पीछे काम करना। तुम लोग मुझे चुपचाप जाने दो”।

छात्रों ने आज्ञा शिरोधार्य की और एक-एक करके निकल गए। 710 रु. की नौकरी छोड़कर 70 रुपये माह में नेशनल कॉलेज कलकत्ता में प्राचार्य का पद स्वीकारकर राष्ट्रसेवी व्यक्तियों का गठन करने वाले महामानव थे—  श्री अरविन्द घोष और आए हुए छात्रों के अगुआ थे— कन्हैया लाल माणिक लाल मुंशी। उक्त प्राचार्य और उनके इस छात्र को सेवाओं को समूचा देश जानता है।


दिव्य अनुकंपा का मखौल तो न हो

दैवी विशेष अनुकंपा के रूप में मनुष्य को दो असाधारण विभूतियाँ उपलब्ध हुई हैं— एक अन्य प्राणियों की तुलना में अद्भुत कही जा सकने योग्य शारीरिक संरचना, दूसरी अलौकिक चिंतन-चेतना वाली बुद्धिमत्ता। इन दोनों को तिरस्कृत—  उपेक्षित पड़ा रहने दिया जाए, तो कचरा भर बनकर रह जाती हैं और कूड़े के ढेर में बुहार फेंकी जाती हैं, पर यदि उनका अभिवर्द्धन और सुनियोजन बन पड़े, तो इतने भर से उत्पन्न हुए चमत्कारों को ऋद्धि-सिद्धि जैसे नामों से जाना जा सकता है। लोगों के असंख्यों एक-से-एक बढ़कर प्रगति-प्रयोजन साक्षीरूप में प्रस्तुत किए जा सकते हैं।

पिछड़ेपन की दुर्गति सहते हुए तिरस्कृत और अभावग्रस्त वे लोग रह जाते हैं, जो इन उपलब्धियों की ओर ध्यान नहीं देते, उन्हें ऐसे ही अनगढ़ स्थिति में पड़े रहने देते हैं। उपेक्षापूर्वक किसी कोने में पड़ा रहने पर तो तेज धार वाले चाकू को भी जंग खा जाती है। अन्यमनस्क, आलसी, बुद्धि रहते हुए भी उसे प्रखर बनाने और लाभ उठाने की स्थिति तक नहीं पहुँच पाते। इसी प्रकार जिनने पुरुषार्थ प्रयोग का अभ्यास नहीं किया है, उनको पेट भरने के भी लाले पड़े रहते हैं।

भगवान ने दो असाधारण उपहार देकर अपनी उदारता में कहीं कोई कसर नहीं रखी। इतने पर भी इस संबंध में मनुष्य की समझदारी पर विश्वास करते हुए यह छूट भी दी है कि अनुदान का वह चाहे जैसा भला-बुरा उपयोग करे। कर्तृत्व की दृष्टि से स्वतंत्रता प्रदान करते हुए भी नियंता ने उसकी परिणति उत्पन्न करने का काम अपने हाथ में रखा है। कोई स्वेच्छापूर्वक विषपान भी बेरोक-टोक के कर सकता है, पर उसके परिणाम— मरण से नहीं बच सकता। कोई चाहे तो आग से झुलसने का दुस्साहस भी कर सकता है, पर उसके कारण जलने-झुलसने की प्रतिक्रिया से नहीं बच सकता। यदि इतना भी अंकुश न रखा गया होता, तो उपलब्धियों को मटियामेट ही नहीं, ऐसे कामों में भी प्रयुक्त किया जाता, जिसके दुष्परिणाम अपने साथ अपने लिए ही नहीं, संपर्क में आने वाले अन्यान्य अनेकों का भी अहित करते कर्मफल की सुनिश्चित विधा को मानवीकृत्यों के साथ जुड़े रखने पर ही मनुष्य को यह अवसर दिया गया है कि वह अनर्थ और उत्कर्ष में से किसी एक को स्वेच्छापूर्वक अपना ले।

देखा जाता है कि वस्तुस्थिति की सही समीक्षा कर सकने वाले, दूरगामी भटकावों को ध्यान में रखकर अपनी रीति-नीति एवं दिशाधारा का निर्धारण कर सकने वाले ही सदुपयोग की बात सोच पाते हैं। उन्हीं के लिए उर्ध्वगमन— अभ्युदय का तारतम्य बिठा सकना संभव होता है, अन्यथा पतन के गर्त्त में खिसक पड़ने के लिए तो पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति भी सहायता हेतु हर घड़ी तैयार रहती है। फल पेड़ से टूटने पर सीधा जमीन पर ही गिरता है। पानी ढलान की ओर ही बहता है। मनुष्य भी अपनी बिरादरी के अन्यान्य पशुओं की तरह पेट-प्रजनन की परिधि में ही सीमाबद्ध होकर रह जाता है। पेट की भूख बुझाने के लिए आहार जुटाने भर में अधिकांश समय बिता देता है। परिवार बटोरता-बढ़ाता है, तो वह अतिरिक्त उत्पादन भी कंधे पर लाद लेता है। कंगारू को पेट के ऊपर जमी हुई थैली में जने हूुए बच्चों की एक पूरी कंपनी हर घड़ी लादे फिरना पड़ता है।

उसे प्रकृति का कौतुक-कौतूहल ही समझा जाना चाहिए कि बैठे-बैठाए प्राणी पर वह यदा-कदा कामुकता का बुखार चढ़ा देती है। उसी उन्माद से प्रेरित होकर यौनाचार की राई-रत्ती जैसी बिडंबना के फेर में पड़कर प्रजनन कृत्य में जुट जाता है। ऐसे उत्तदायित्वों में बँधता है, जिसकी जंजीरें उसे जीवनभर कसे रहती हैं। मदारी के बंदर जैसे कौतुक करते रहने में जिंदगी गुजार देने के लिए यह कौतुक ही प्रधान बंधन बनता है, जिसे यौनाचार नाम से जाना जाता है। प्रकृति यह कठिन कार्य प्राणियों पर इसलिए लादती है कि उसकी वंशवृद्धि जैसी खिलवाड़ यथावत् चलती रहे। मरण की विधा निश्चित कर देने के बाद उसके लिए भी यह मजबूरी ही थी, कि नया उत्पादन जारी रखे, अन्यथा बूढ़ों के मरते रहने पर नए उत्पन्न न होने की दशा में यहाँ सुनसान ही बढ़ता जाता।

भूख रोज लगती है, जबकि कामुक उन्माद एक विशेष मानसिकता उभार लेने पर ही पनपती है। इस उन्माद के रहते हुए भी विभुक्षा और कामेच्छा का प्रयोजन एक ही है कि मनुष्य जाल-जंजाल में फँसा हुआ वैसा ही कौतुक-कौतूहल करता रहे जैसे कि पिंजड़े में फँसा हुआ चूहा असाधारण रूप से उछल-कूद करता रहता है। बुभुक्षा का बढ़ा हुआ रूप लोभ, लिप्सा और वासना के फलस्वरूप लदी हुई ललक को तृष्णा कहते हैं। देखा जाता है कि इन्हीं दो प्रयोजनों में भगवान की वे दोनों ही महती अनुकंपाएँ खप जाती हैं, जो उसे अन्य प्राणियों की तुलना में अतिरिक्त अनुग्रह के रूप में मिली थी।

नशा पीने पर कभी-कभी मनुष्य आपे से बाहर हो जाता है और ऐसे कृत्य करने लगता है, जिसे बोल-चाल की भाषा में 'पगलाना' कहते हैं। उन्मादी ऐसे ही विलक्षण वचन बोलते, आचरण करते देखे गए हैं। इस पगलाने का नाम है— अहंकार का प्रदर्शन। अपने को औरों की तुलना में अधिक संपन्न, अधिक सुंदर, अधिक प्रतिभावान, सौभाग्यशाली सिद्ध करने के लिए अपने मुँह शेखी बघारने से लेकर दूसरों के मुँह प्रशंसा सुनने जैसे उद्धत आचरण करने के लिए भी कई लोग कई बार इतने आकुल-व्याकुल हो जाते हैं कि उनके लिए घरफूँक तमाशा देखना ही एकमात्र समाधान सूझ पड़ता है। ठाट-बाट रचने वाले और उस मद में ढेरों, समय, साधन और वैभव खपा देने वाले अपने को कुछ भी कहें या समझें, पर वस्तुतः हैं वे विदूषक जैसे आचरण में निरत पगलाए हुए।

क्या दैवी अवलंबन— अनुकंपा का उपयोग यही है, जिसे आम आदमी लिप्सा, लालसा, अहंता के निमित्त खर्चता रहता है ? क्या इससे अच्छा उपयोग और कुछ संभव नहीं हो सकता था ? यह प्रश्न आज के मानव को देखकर रह-रहकर मन में कौंध उठता है।

विश्व-व्यवस्था की संचालक सत्ता की अदालत में अगले दिनों यह अभियोग प्रस्तुत किया जा सकता है कि या तो वह मनुष्य के अधिकार-अनुदान में अभिवृद्धि करके उसके साथ पक्षपात करता, या फिर अन्य जीवों को निरर्थक—  उपेक्षित समझकर उन्हें ऐसे ही गई-गुजरी स्थिति में पड़ा रहने देता। दोनों ही परिस्थितियों में यह अत्याचार नहीं तो कम-से-कम अन्याय तो कहा ही जाएगा।

बड़ों पर छोटा आक्षेप भी चर्चा का विषय बनता है और उस पर रोष असंतोष प्रकट किया जाता है। ईश्वर को सबसे बड़ा सृष्टि का सृजेता, व्यवस्थापक एवं नियामक अधिपति माना जाता है। कम-से-कम मनुष्य को तो यह शोभा नहीं देता कि अपनी कमजोरियों, त्रुटियों को परे रख वह उस सत्ता पर लांछन लगाए, जिसने उसे बनाया, विविधत-विशिष्टताओं से सुशोभित किया है। भगवान पर लांछन की नहीं, नए भगवान की नहीं, नए इंसान को बनाने की आवश्यकता है जो अगले दिनों ही पूरी होने वाली है। इक्कीसवीं सदी देव मानवों की नई पीढ़ी लेकर आने वाली है, जो तर्क पर नहीं, श्रद्धा-सद्भावना की आधारशिला पर विनिर्मित होगी।


सद्वाक्य

सफलता की पहली शर्त है—  पूरी तन्मयता, धैर्य और साहस के साथ प्रस्तुत कार्य में जुट जाया जाए। दूसरी शर्त है— उस कार्य के उपयुक्त अपनी योग्यता, साधन-सामग्री एवं सुयोग्य व्यक्तियों की सहायता बढ़ाने के लिए निरंतर प्रयत्नशील रहा जाए।


यह सुयोग व्यर्थ न जाने पाए

समर्थ शक्तियों का परिवर्तन-प्रत्यावर्तन सक्रांतिकाल कहलाता है। राज्य पलटते हैं, तो भारी उथल-पुथल मचती है। दिन और रात्रि का मिलना-बिछुड़ना संध्याकाल कहलाता है। उन घड़ियों की अनेक दृष्टियों से अपनी महत्ता है। संध्याकाल को आत्मिक और बौद्धिक दृष्टि से असामान्य ही माना जाता है। शताब्दियों का परिवर्तन भी प्रकारांतर से युग-परिवर्तन जैसी संभावनाओं से भरा-पूरा होता हैं। प्रसवकाल में पीड़ा और प्रसन्नता का कैसा अद्भुत संयोग रहता है, इसे सभी जानते हैं। देवासुर संग्राम की अपने समय में आश्चर्यचकित करने वाली प्रतिक्रिया होती रही है। उन दिनों महाकाल को अवतार लेकर समस्या का समाधान करना पड़ा था। अवतार धारण करने की समर्थ सत्ता को ऐसे ही अवसरों पर आवश्यकता पड़ी है।

लंका को परास्त करने और रामराज्य के रूप में सतयुग की वापसी संभव करने के लिए जो मध्यांतर था, उसमें जिनको भी प्रमुख भूमिका निभानी पड़ी, वे अजर-अमर हो गए। हनुमान की अपनी औकात क्या थी? इसे देखना हो तो सुग्रीव के सेवक के रूप में ऋष्यमूक पर्वत पर रहने के दिनों की परिस्थितियों का आकलन किया जा सकता है, साथ ही यह भी दखा जा सकता है कि रामकाज में निरत होने पर उन्हें समुद्र छलाँगने, लंका जलाने, पर्वत उखाड़े जाने जैसी कितनी दिव्य विभूतियाँ हस्तगत हो गई थीं। हनुमान ही नहीं, केवट, शबरी, गिलहरी जैसे नगण्य स्तर वाले भी इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में लिखे जाने योग्य बन गए थे। द्रौपदी के चीरहरण के समय पर असहाय से बने अर्जुन द्वारा किसी महान शक्ति का प्रयोजन पूरा करने के लिए कटिबद्ध होने पर महाभारत विजेता की गौरव-गरिमा उपलब्ध हुई थी। उनके सारथी बनने में कृष्ण ने अपने को धन्य माना था।

संधिबेला की महत्ता, प्रेरणा एवं आवश्यकता को जिनने भी समझा, उन्हें दैनिक सुख-सुविधा में से कटौती करनी पड़ी। प्रतिकूलताओं से भी टकराना पड़ा, पर इसके फलस्वरूप उनने जो पाया उसे अविस्मरणीय ही कहा जा सकता है। बुद्ध, गांधी, लेनिन, दयानंद आदि क्रांतिकारियों की सूझ-बूझ ने ठीक काम दिया। साहस प्रदर्शन के लिए उपयुक्त समय चुना। समय पर बोई गई फसल ठीक प्रकार उगी और उसने उन पराक्रमों को ही नहीं, अपने समय के वातावरण को भी प्रेरणाप्रद बनाकर रख दिया।

प्रस्तुत समय युगसंधि का है। भ्रांतियों और विकृतियों से भरी बीसवीं सदी विदा हो रही है और उसके स्थान पर उज्ज्वल भविष्य से भरी पूरी इक्कीसवीं सदी का आगमन हो रहा है। मध्यांतर के यह थोड़े से वर्ष हैं; जिनमें कि हम सब जी और रह रहे हैं। विशेष समय सामान्य जीवधारियों की तरह पेट-प्रजनन के लिए खपा देने भर के लिए नहीं होते। उनमें दूरदर्शी विवेकशीलों को युगधर्म को स्वीकारने और समय की चुनौती को स्वीकारने के लिए साहस जुटाना होता है। इसमें कुछ घाटा जैसा तो प्रतीत होता है, पर वह वस्तुतः थोड़ा-सा बीज बोकर सैकड़ों गुना काटने जैसा दूरदर्शितापूर्ण ही होता है।

भगवान अभीष्ट परिवर्तन के लिए समुचित योजना बना चुके हैं। साधन भी जुटा चुके हैं। पर वे उस क्रिया-प्रक्रिया को संपन्न करने का श्रेय ऐसे लोगों को देना चाहते हैं, जो आदर्शों के प्रति निष्ठावान होने की प्रतिभा एवं प्रामाणिकता का परिचय दे सकें। बदलें में क्या मिल सकेगा, इसे सामान्य से ऊँचा उठकर असामान्य बने महामानवों की जीवनगाथाओं का स्मरण करते हुए सहज ही समझा जा सकता है। समय को पहचानना और अवसर को न चूकना ही जाग्रतों-जीवितों के लिए अभीष्ट है। इस सुयोग को हाथ से न जाने देने में ही बुद्धिमत्ता है।


आदर्शवादी बिक नहीं सकता!

दरवाजे पर खट-खट की आवाज हुई और अंदर कमरे में नीचे फर्श पर दरी बिछाकर बैठे चौकी पर कागज रखकर लिख रहे गुप्त जी ने छोटे लड़के को आवाज देते हुए कहा— ”देखना बेटा ! कौन आए हैं?”

छोटे लड़के ने अपने पिता की आवाज सुन दरवाजा खोला और एक सज्जन अंदर प्रविष्ट हुए। गुप्त जी उन्हें देखकर तुरंत खड़े हो गए, “बहुत दिनों बाद दिखाई दिए हो मित्र ! कहाँ हो आजकल, क्या कर रहे हो?"

आगंतुक सज्जन जो उनके पुराने मित्र थे, उनके इन प्रश्नों के उत्तर तो दे ही रहे थे, पर साथ घर की स्थिति को भी बारीकी से देख रहे थे। सोचा तो यह था कि 'भारत मित्र’ जैसे प्रतिष्ठित अख़बार के संपादक से मिलने जा रहा हूँ। घर में ठाट-बाट और रौनक नहीं होगी, तो कम-से-कम मध्यमवर्गीय परिवार जैसी स्थिति तो होगी ही। पर यहाँ चारों ओर फटेहाली दिखाई पड़ रही थी। ‘भारत मित्र’ हिन्दी दैनिक के संपादक श्री बालमुकुंद गुप्त की कमीज, जो बहुत ही हलके और सस्ते कपड़े की सिली हुई थी, पीछे दीवार पर खूँटी पर टँगी हुई थी। गुप्त जी बहुत मोटी निब वाली सस्ते दामों वाली कलम से लिख रहे थे।

आगंतुक सज्जन इन सब वस्तुओं को, घर के वातावरण को, बड़ी बारीक नजर से देख रहे थे। इधर-उधर की बातें चल रही थीं । सज्जन अपना मंतव्य कहने ही जा रहे थे कि गुप्त जी का ज्येष्ठ पुत्र कमरे में आया और उसने बाजार से खरीदकर लाई हुई दो कमीजें अपने पिता के सामने रखीं।

गुप्त जी ने उससे पूछा—“कमीज तो अच्छी है। कितने की है, बेटा!“ "चार रुपये की।”,

“चार रुपए की ?”— गुप्त जी ने बड़े ही विस्मय और आपत्तिजनक स्वर में कहा। “इतनी महंँगी क्यों खरीदी ? इतने में तो घर के सभी सदस्यों के लिए कपड़े बन सकते हैं।"

आगंतुक सज्जन ने कहा— “बच्चे ही तो हैं, गुप्त जी ! यदि ये अभी अपनी पसंद का खा-पी और पहन नहीं सकेंगे तो कब खाएँगे और पहनेंगे।”

“लेकिन यह तो सरासर फिजूलखरची है। हमारे परिवार की आर्थिक स्थिति इस योग्य नहीं हैं कि हम इतने महँगे कपड़े पहन सकें”— गुप्त जी ने कहा।  “रही खाने-पीने की उम्र वाली बात, तो उन्हें मितव्ययिता अभी नहीं सिखाएँगे तो कब सिखाएँगे।”

अर्थाभाव वाली कठिनाई तो मैं दूर किए देता हूँ। मैं इसीलिए आपके पास आया हूँ। यह कहते हुए आगंतुक मित्र ने पाँच हजार रुपए उनकी चौकी पर रख दिए ।

यह देखकर गुप्त जी ऐसे चौंके, जैसे सैकड़ों साँप-बिच्छू उनके शरीर पर रेंग गए हों। गुप्त जी ने विस्मय-विस्फारित नेत्रों से मित्र महोदय की ओर देखते हुए कहा— "क्या मतलब ?"

मित्र ने कहा— “यह तो आपको मालूम ही है कि यहाँ की फौजदारी अदालत में दो धनिकों के बीच मुकदमा चल रहा है। दोनों पक्षों के सनसनीपूर्ण विवरणों द्वारा अपने पत्र में उनका आप समर्थन करें तो उन्हें लाभ हो सकता हैं। इसी के लिए मैं उनकी ओर से यह भेंट आपके पास लाया हूँ।"

गुप्त जी ने धीरे, पर गंभीर स्वरों में कहा— “मित्र ! तुम गलत समझे हो। अगर अर्थोपार्जन मेरा ध्येय रहा होता तो आप जो अभी चारों ओर घूर-घूरकर देख रहे थे और मेरी गरीबी पर आश्चर्य कर रहे थे, वह न होता। गरीबी मेरी शान है। मैंने स्वेच्छया इसका वरण किया है। कारण कि मैं भारत के आम नागरिक से एक होकर जीना चाहता हूँ। उसके दुःख-दर्द के समझने, अनुभव करने की ललक है। यही अनुभव मेरे साहित्य को प्राण देते हैं, दूसरे शब्दों में कहा जाए तो गरीबी मेरा प्राण बन चुकी है। आप मेरा प्राण हरण करने आए हैं, वह भी अन्याय की खातिर, कदापि संभव नहीं।" गरीबी की गरिमा का गान सुनकर मित्र अपना रुपया उठा चलते बने और गुप्त जी पुनः लेख में व्यस्त हो गए।


नवयुग की वरिष्ठतम शक्ति-संपदा: भाव-संवेदना

गिरने-गिराने की, मिटने-मिटाने की ध्वंसात्मक योजनाओं में अनेकों मनचले साथ देने— सहायता करने के लिए सहज समुद्यत हो जाते हैं। होली जलाने के कौतूहल हेतु छोटे बच्चों से लेकर किशोर-युवकों तक का एक बड़ा समूह लकड़ियाँ बीनते देखा जाता है। जब उस ढेर में आग लगती है, तो तालियाँ बजाने और हुल्लड़ मचाने वालों की भी कमी नहीं रहती। कठिनाई तब पड़ती है, जब छप्पर छाने की आवश्यकता पड़ती है। बुलाने पर भी पड़ोसी तक आना-कानी और बहानेबाजी करते देखे गए हैं। तब काम अपने बलबूते ही आरंभ करना पड़ता है। कवि टैगोर ने लोक-प्रचलन का आँकलन करते हुए यह ठीक ही कहा था कि यदि सत्प्रयोजन की दिशा में कुछ करना-सँजोना हो, तो 'एकला चलो रे' की नीति अपनानी और तदनुरूप सहायता जुटानी चाहिए। साथियों का मुँह नहीं ताकना चाहिए।

सृजनात्मक साहस जब व्यापक परिप्रेक्षण में किया जाना हो तो अपने को अग्रगामी बनाने वाले मनस्वियों को आशा और विश्वास की तेल-बाती वाला ऐसा दीपक जलाए रहना चाहिए, जिसके माध्यम से प्रकाश की किरणें अपना काम करती एवं चमत्कार दिखाती हैं।

निविड़ अंधकार से निपटने के लिए जब माचिस की एक तीली अपने को जलाने का साहस सँजोकर प्रकट होती है, तो दीपक उस तीली के बुझने से पहले ही अपने को ज्योतिर्मय कर लेते हैं। इतना ही नहीं, दिवाली जैसे विशेष पर्वों पर प्रज्वलित दीपकों की विशालकाय वाहिनी तक स्थान-स्थान पर जगमगाती दृष्टिगोचर होती है। अकेले चल पड़ने वालों का उपहास और विरोध आरंभ से ही होता है, पर जब स्पष्ट हो जाता है कि उच्चस्तरीय लक्ष्य की दिशा में कोई चल ही पड़ा, तो उसके साथी-सहयोगी भी क्रमशः मिलते और बढ़ते चले जाते हैं। दुष्टता में ही नहीं, सदाशयता में भी अपेक्षाकृत अधिक सशक्त चुंबकत्व होता है, जो अपने जैसे अनेकों को जहाँ-तहाँ से खींच-बुला सके और विशालकाय खदान का रूप धारण कर सके।

सर्वविदित है कि सशक्त अनाचारियों के गिरोह में उसी स्तर के लोग जुड़ते चले जाते हैं। चोर, उचक्के, लबार-लफंगे, दुराचारी-व्यभिचारी, नशेबाज, धोखेबाज मिल-जुलकर अपने-अपने सशक्त गिरोह बना लेते हैं, फिर कोई कारण नहीं कि सृजन-संकल्प के धनी प्रामाणिक और प्रतिभावानों को अंत तक एकाकी ही बना रहना पड़े। भागीरथ की सहायता के लिए, गंगा को स्वर्ग से नीचे उतरने के लिए, आना-कानी करने वाली सुरसरि की पीठ पर विष्णु ने कसकर लात जमाई थी। धरती पर उतरते समय जब भयंकर गर्त्त बन जाने की आशंका उत्पन्न हुई, तो शिवजी बिना बुलाए ही नियत स्थान पर जा पहुँचे और अपनी जटाएँ बिखेरकर समस्या के समाधान में असाधारण सहायता पहुँचाई। ऐसा ही द्रौपदी के चीरहरण, ग्राह के मुख से गज को निकालने वाली शक्ति जैसे प्रसंगों में हुआ। आसन्न व्यवधानों से नवसृजन में संलग्न व्यक्तियों की कोई सहायता न करे, यह हो ही नहीं सकता। जब हनुमान, अंगद, नल-नील जैसे रीछ-वानर मिलकर राम को जिताने का श्रेय ले सकते हैं, तो कोई कारण नहीं कि नवसृजन के कार्यक्षेत्र में जुझारू मूड में लड़ने वालों की सहायता के लिए अदृश्य सत्ता, दृश्य घटनाक्रमों के रूप में सहायता करने के लिए दौड़ती चली न आए।

विपन्नताएँ इन दिनों सुरसा जैसा मुँह बनाए खड़ी दिखती हैं। आतंक रावण स्तर का है। प्रचलनों के चक्रवात, भँवर, अंधड़, तूफान अपनी विनाश क्षमता का नग्न प्रदर्शन करने में कोई कसर रहने नहीं दे रहे हैं। सघन अंधकार में हाथों को हाथ नहीं सूझता। वासना, तृष्णा और अहंता का उन्माद महामारी की तरह जन-जन को भ्रमित और संत्रस्त कर रहा हैं। नीति को पीछे धकेलकर, अनीति ने उसके स्थान पर कब्जा जमा लिया है। यह विपन्नता दो-पाँच पर नहीं, संसारव्यापी समूचे जनसमुदाय पर अपने-अपने आकार-प्रकार में बुरी तरह आच्छादित हो रही हैं। तब 600 करोड़ मनुष्यों की ब्रेन वाशिंग कैसे बन पड़े ? अनौचित्य से भरे-पूरे प्रचलनों की दिशाधारा उलट देने का सुयोग किस प्रकार मिले ? जब अपना छोटा-सा घर-परिवार सँभाल नहीं पाते, तो नया इंसान बनाने, नया संसार बसाने और नया भगवान बुलाने जैसे असंभव दीख पड़ने वाली सृजन-प्रक्रिया को विजयश्री वरण करने की सफलता कैसे मिले ?

निःसंदेह कठिनाई बड़ी है और उसे पार करना भी दुरूह है, पर हमें उस परम सत्ता के सहयोग पर विश्वास करना चाहिए, जो इस समूची सृष्टि को उगाने, उभारने, बदलने जैसे क्रियाकलापों को ही अपना मनोविनोद मानता और उसी में निरंतर निरत रहता है। मनुष्य के लिए छोटे काम भी कठिन हो सकते हैं, पर भगवान की छत्रछाया में रहते ऐसा कोई भी काम बन नहीं पड़ता, जिसे असंभव कहा जा सके। जो इतने बड़े संसार की संरचना कर सकता है, उसके लिए युग-परिवर्तन की प्रक्रिया क्यों कठिन होनी चाहिए? विषम वेलाओं में अपनी विशेष भूमिका निभाने के लिए तो 'सम्भवामि युगे युगे' के संबंध में वह वचनबद्ध भी हैं। यह तो उसका आए दिन का क्रीड़ा-कल्लोल है।

युग-परिवर्तन में दृश्यमान भूमिका तो प्रामाणिक प्रतिभाओं की ही रहेगी, पर उसके पीछे अदृश्य सत्ता का असाधारण योगदान रहेगा। कठपुतलियों के दृश्यमान अभिनय के पीछे भी तो बाजीगर की उँगलियों से बँधे हुए तार ही प्रधान भूमिका निभाते हैं। सर्वव्यापी सत्ता निराकार है। पर घटनाक्रम तो दृश्यमान शरीरों द्वारा ही बन पड़ते हैं। देवदूतों में ऐसा ही उभयपक्षीय समन्वय होता है। शरीर तो मनुष्यों के ही काम करते हैं, पर उन श्रेयाधिकारियों का पथप्रदर्शन, अनुदानों का अभिवर्द्धन उसी महानसत्ता द्वारा होता है, जिसे 'अणोरणीयान् महतो महीयान्' कहकर आधा-अधूरा परिचय दिया जाता है।

जिस महान प्रयोजन में इन दिनों परमेश्वर की महती भूमिका संपन्न होने जा रही है, उसका श्रेय तो उन जागरूकों, आदर्शवादियों, प्रतिभासंपन्नों को ही मिलेगा, जिनने अपने व्यक्तित्व को परम सत्ता के साथ जुड़ सकने जैसी स्थिति को विनिर्मित कर लिया है। इसी आवश्यकता की पूर्ति को कोई चाहे तो युग-साधना भी कह सकता है।

समर्थता, कुशलता और संपन्नता जैसी महाशक्तियों से ऊपर उठकर एक चौथी शक्ति है—  भाव-संवेदना । इसी का प्रमाण-परिचय श्रद्धा, प्रज्ञा, निष्ठा के रूप में मिलता है । इन्हीं को तृप्ति, तुष्टि और शांति के रूप में अपनी उपस्थिति का प्रमाण-परिचय देते देखा गया है। यही दैवी अनुदान जब मनुष्य की स्वच्छ अंतरात्मा पर उतरता है, तो उसे निहाल बनाकर रख देता है। मात्र आदर्शवादी भाव-संवेदना ही है, जो जब अंतःकरण के साथ जुड़ती है, तो उसे देवदूत स्तर का बना देती है। उसकी समर्थता इस स्तर की होती है कि वह भौतिक आकर्षणों, प्रलोभनों एवं दबावों से स्वयं को बचा लेने की पूरी क्षमता रखता है। साथ ही ऊँचा उठाने, आगे बढ़ाने में भी उसका योगदान सामान्य नहीं, असामान्य स्तर का होता है। जब कभी भी मनुष्य के अंतराल में श्रद्धा-संवेदना उभरती है, तो वह आदर्शवादी उत्कृष्टता के अतिरिक्त और कुछ माँगना चाहती नहीं। इस एक के आधार पर ही उसमें अनेकानेक दैवी तत्त्व भरते चले जाते हैं। महामानव इसी प्रकार उभरते व संधिकाल में विशिष्ट भूमिका निबाहते देखे जाते हैं।


औद्योगीकरण का कुकुरमुत्ता ऐसे नष्ट होगा

इसे बीसवीं सदी की एक विडंंबना ही कहा जाना चाहिए कि उद्योगों के फलने-फूलने में जनरुचि का बहुत बड़ा हाथ रहा है। यह प्रोत्साहन इसलिए मिला कि अधिक साफ-सुथरी अधिक आकर्षक, पॉलिश्ड वस्तुएँ हाथ की बनी वस्तुओं की तुलना में अधिक रास आने लगी हैं। वे कुछ सस्ती भी पड़ती हैं एवं प्रचुर मात्रा में आसानी से उनके विक्रेता उन्हें हस्तगत करा देते हैं।

शासनसत्ता एवं धनाधीशों ने बड़े उद्योगों को देश की प्रगति और जनता को सस्ती व अधिक सुविधा-साधन देने का आश्वासन देकर इस तेजी से गत कुछ दशकों में बढ़ाया हैं कि चारों ओर उन्हीं की भरमार दिखाई देती हैं। उन्हें स्थान व मुद्रा उपलब्ध कराने में टैक्स की अधिक प्राप्ति के प्रलोभन के कारण और भी बढ़ावा मिला। मशीनें बनाने वालों को अपने लिए काम का एक नया क्षेत्र मिला। किसानों ने अधिक राशि के बदले बहुमूल्य अन्न पैदा करने वाली अपनी जमीनें बेच दीं; फलतः जहाँ-तहाँ कुकुरमुत्तों की तरह उद्योग खड़े होते चले गए एवं भारत जैसे कृषि प्रधान देश में एक असमंजस व विरोधाभास वाली स्थिति उत्पन्न करते चले गए। आटोमेशन (स्वचालन पद्धति) ने नई-नई जटिल मशीनों का निर्माण किया। जिसमें प्रारंभ में लागत अधिक लगने पर भी अत्यधिक लाभांश मिलने की पूरी संभावना थी; किंतु रोजगार के अवसर उतने ही कम होते चले गए। कम श्रमिक, कम लेबर, यूनियन समस्या, अधिक उत्पाद अधिक लाभ, इन नीति ने ऐसा जोर पकड़ा है कि क्रमशः टेक्नालॉजी, सुपर टेक्नालॉजी में बदलती गई एवं आज की विद्रूपताभरी स्थिति खड़ी हो गई, जिसमें अगणित श्रमिक एंव शिक्षित बेरोजगारों की भीड़ खड़ी दिखाई देती हैं।

कुटीर उद्योगों के साथ सुविधा-सामग्री का अभाव, हर जगह उनका उपलब्ध न होना, अधिक श्रम की माँग जैसे पक्ष जुड़े होने से यह स्वाभाविक ही था कि क्रमशः हस्तउद्योग गिरते चले जाएँ एवं उनके स्थान पर कस्बा स्तर तक भी उत्पादन प्रधान बड़े उद्योग लग जाएँ। इसे हीन भावना एवं श्रम की अवमानना का समन्वय ही कहना चाहिए कि विदेशी आयात की हुई वस्तुएँ या बड़ी मिलों से निकली सामग्रियाँ अधिक आकर्षक लगने लगती हैं एवं उपभोक्ता के संबंध में यह मान्यता दर्शकों की बनती हैं कि वह कदरदान है, कृपण या निर्धन नहीं। ऐसी मनःस्थिति में स्वाभाविक है कि सोफियानी वस्तुओं की खरीद ही होगी, वह भी अनावश्यक, चाहे वे देशी हो या विदेशी।

यह बात सभी मनीषियों, अर्थविशेषज्ञों, समाजविज्ञानियों ने कही है कि यदि समाज को ढहने से बचाना है, तो ग्रामों को व कुटीर उद्योगों को फिर जिंदा करना होगा। मशीनीकरण, शहरीकरण के साथ निष्ठुरत-शुष्कता का समंवय यह बताता है कि आने वाले समय में जैसे-जैसे शहर फूलेंगे, उनका विस्तार होगा। समस्याएँ और बढ़ेंगी तथा अंततः उन विभीषिकाओं को आमंत्रित करेंगी; जिनसे पश्चिम जगत को न केवल परेशान होना पड़ रहा है; अपितु महाविनाश की तलवार ऊपर लटकती देख सतत भयाक्रांत होकर जीना पड़ रहा है।

डॉ. इ. एफ. शुमाकर (1910-1977) जिन्हें गांधीवादी अर्थशास्त्र का एक प्रमुख प्रवक्ता माना जाता रहा है, अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “स्माल इज ब्यूटीफुल” में लिखते है कि “हमें भोगवादी प्रौद्योगिकी का मुकाबला करने के लिए मानवमुखी प्रौद्योगिकी का विकास करना होगा, जो मनुष्य के हाथों और दिमाग को बेकार बनाने के बजाए उन्हें पहले की अपेक्षा अधिक उत्पादन बनाने में सहायक हो। वे कहते हैं कि— ''बड़े पैमाने के उत्पादन की प्रौद्योगिकी हिंसक पर्यावरण को नुकसान पहुँचाने वाली, संसाधनों के समाप्त होते चले जाने की दृष्टि से आत्मघातक और मनुष्य को नाकारा बना देने वाली है। इसके विपरीत बहुत से लोगों द्वारा छोटे पैमाने पर उत्पादन की प्रौद्योगिकी अच्छी-से-अच्छी, आधुनिकतम जानकारी अनुभव का उपयोग करते हुए विकेंद्रीकरण में सहायक होती है, पर्यावरण से छेड़खानी नहीं करती, दुर्लभ संसाधनों के प्रयोग में संवेदनशील होती है तथा मनुष्य को मशीन का दास नहीं बनाती, उनकी सेवा करती है। इसे 'मध्यवर्त्ती प्रौद्योगिकी' भी कहा जा सकता है, जो आने वाले समय में मानव समाज के विकास का प्रमुख आधार बनेगी।”

श्री शुमाकर का उपरोक्त कथन दूरदर्शितापूर्ण है एवं आज जब हम इक्कीसवीं सदी की कगार पर खड़े हैं, यह और भी सही  प्रतीत होता है। जब शहरों में, गंदी बस्तियों में हैजा फैलता है, तो सब वहाँ से भागने लगते हैं। कहीं अग्निकांड हो जाए तो भले ही सब कुछ जीवन भर का संजोया उपार्जन नष्ट हो जाए, पहले जान बचाने की पड़ती है एवं भागने की प्रवृत्ति चल पड़ती है। भूकंप आने के पूर्व जानवरों को पूर्वाभास होने लगता हैं, एवं वे उस स्थान से पहले ही भाग जाते हैं। अगले दिनों यही होने जा रहा हैं। औद्योगीकरण ने शहरों को फैलाया, विस्तार दिया, श्रमिकों की फौज खड़ी कर दी, आवास की सारी व्यवस्था छिन्न- भिन्न कर गंदी बस्तियों में रहने के लिए उन्हीं को विवश किया। जो गाँवों से काम के लिए भागकर शहर आए थे, अब प्रकृति ऐसी व्यवस्था कर रही है कि शहरों की बुराइयाँ ही शहरवासियों को वहाँ से भगाएँ, ताकि वे प्रकृति के साहचर्य में शरण ले सकें। आदमी विलासी न बनकर उद्यमपारायण हो, भले ही हाथ से छोटी-मोटी खेती करे या एक या दो हार्स पॉवर की मशीनों से न्यूनतम प्रदूषण पैदा करने वाला उत्पादक उद्योग वह शहरों से दूर रहकर संपादित करें।

यह पूर्वभास सहज ही उन सबको हो रहा है, जो दैवी सत्ता से परोक्ष रूप से जुड़े हैं, चिंतक-मनीषी वर्ग के हैं, दिव्य दृष्टिसंपन्न हैं, कि व्यक्ति अब शहर से पलायनकर उद्योग-प्रदूषण से भरे माहौल से भागकर प्रकृति की शरण में आएगा, खोदी खाई को पाटेगा तथा पुनः ग्रामीण परिकर की समस्वरता को स्थापितकर सारे आवास-प्रौद्योगिकी तंत्र का विकेंद्रीकरण करेगा।

यह तो नहीं मान लेना चाहिए कि यह सब अनायास रातों-रात ही हो जाएगा; क्योंकि जिन धनाध्यक्षों के हाथ में औद्योगीकरण है, वे अपना लाभ छोड़कर छोटे उद्योगों में अपनी पूंजी लगाकर अधिक श्रमिकों को, अधिक काम एकाएक दे देंगे, मलाई छोड़कर छाछ पर संतोष करने के लिए तैयार हो जाएँगे, यह भी तो तर्क संगत नहीं लगता। परंतु विश्वास क्रिया की प्रतिक्रिया वाले सिद्धांत पर किया जाना चाहिए। औद्योगीकृत नगरों के रहन-सहन ने जो-जो भी आदतें जनसाधारण को दी हैं, वे उनके पलायन का कारण बनेंगी। नशाखोरी उनमें चरम सीमा पर हैं। स्मैक, हिरोइन, चरस, तंबाकू से लेकर देशी शराब में ही मजूरों-रहवासियों का सारा उपार्जन व स्वास्थ्य नष्ट होता चला जा रहा है। यही आदतें उनके परिवारजनों को भी लग चुकी हैं। परिणाम आर्थिक कंगाली एवं अस्वास्थ्यकर परिस्थितियों के रूप में सामने है। ऐसे लोगों को शहरों की सुविधा का प्रलोभन छोड़कर दूर जाना ही होगा। मध्य वर्ग व उच्च वर्ग के लोगों में भी अब ये आदतें तेजी से प्रविष्ट होती जा रही हैं। अंततः बसेरा उन्हें भी बाहर खोजना होगा।

साँप चमकीला, आकर्षक दिखाई पड़ता है; किंतु जहरीला होता है। बिच्छू आकर्षक व खिलौनों के समान बच्चों को प्रतीत होता है। किंतु हाथ लगाते ही वह जलनभरा विष अंदर प्रविष्ट कर देता है। शहर के आकर्षण इसी प्रकार के हैं। औद्योगीकरण इसी विषाक्तता; किंतु बाह्य आकार एवं पूँजी-प्रलोभन के कारण शहरों-कस्बों को फैलाता-बढ़ाता व जनशक्ति के साथ संकटों को भी आमंत्रित करता चला जा रहा है। उसे अब अपनी मौत मरना ही होगा, यह इक्कीसवीं सदी की प्रमुखशक्ति-जनशक्ति का कहना है।

अब आदमी के मानस का ऐसा विकास होने जा रहा है कि वह स्वयं को ऐसे आकर्षणों से बचाएगा। बदन टूटना, जम्हाई लेना बुखार आने का पूर्वसंकेत है । अभी से यह संकेत बदलती परिस्थितियाँ दे रही हैं कि बड़े उद्योगों की अभिवृद्धि का क्रम रुकेगा एवं छोटे कुटीर उद्योगों को प्रश्रय मिलेगा। लोग गाँवों में, छोटे कस्बों में सीमित सुविधाओं में रहना अधिक पसंद करेंगे । इन्हें नवयुग की आधारशिला रखने वाले कम्यून भी कह सकते हैं। दैवी प्रेरणा यह कहती है कि यह सब होकर के रहेगा; क्योंकि प्रकृति यही चाहती है। चाहे मानव ऐसा विवश होकर करे तो भी उसे शहरों से गाँवों की ओर, बड़े उद्योगों से लघु उद्योगों की ओर उन्मुख होना ही पड़ेगा, यह ऋषिसत्ता की अंतःस्फुरणा है।


फिर एक ईसा ने सूली को स्वीकारा

गोवा प्रांत का कुनारा गाँव। एक साधु अपनी कुटिया में बैठे स्वाध्याय कर रहे थे। अचानक बाहर से दरवाजा पीटने की आवाजें आईं। पोथी बंदकर वह उठे और धीरज से द्वार खोला। बाहर कुछ स्त्री-पुरुष  छोटे-छोटे बच्चों सहित बदहवास खड़े थे। क्या हो गया तुम्हें ? पूछा ही था  कि उनमें से कुछ ने कहा— "महाराज ! पहले भीतर आने दें, फिर बता सकेंगे।" साधु ने इशारा किया और वे एक-एक करके अंदर आ गए ।

उनमें से एक ने बताना शुरू किया— चारों तरफ गोलियों की बौछार होती हैं। वे पुरुषों को अपमानित करते, मारते और स्त्रियों को अपनी ‘पाशविक हविश का शिकार बनाते हैं।" "वे कौन ?" जवाब मिला— "पुर्तगाली"। घटना के समय सोलहवीं शती में गोमंतक क्षेत्र में उन्हीं का अधिकार था। एक-एक करके हर किसी ने उनकी बर्बरता के किस्से रो-रोकर सुनाए। सुनकर साधु का मन क्षुब्ध हो गया। इतने में रात्रि हो चुकी थी, वे सभी जैसे आए वैसे ही एक-एक करके अँधेरे में लीन होते गए। कहाँ? बस कहीं सुरक्षित स्थान की तलाश में।

पीड़ित तो चले गए, पर पीड़ा छोड़ गए। क्या करें ? कैसे करें ? मन में यह भी आया कि मुझे क्या करना, उन्हें भुगतने दो; किंतु स्वाध्याय के क्षणों में पढ़े जा रहे श्वेताश्वतर उपनिषद के कथन— “तू ही स्त्री है, तू ही पुरुष, तू ही सभी के रूप में प्रकट है।”, ने कायरता के मुँह पर जोरदार थप्पड़ जमाया। मन में विचार दृढ़ हुआ। परमात्मा के लिए ही तो संन्यास लिया है और उपनिषद् के शब्दों में वह तो सभी रूपों में है। उसकी सेवा के लिए एकांत सुख का त्याग करना ही होगा। सर्वहित के लिए व्यक्तिगत सुखों का त्याग ही तो संन्यास है।

दृढ़ धारणा के साथ योजना भी दृढ़ हुई। बुराइयाँ तभी पनपती हैं, जब अच्छाइयाँ अपनी जीवनीशक्ति खो देती हैं। दुर्बल हुई जीवनीशक्ति पर बुराइयों के लगातार प्रहार का नाम अत्याचार हैे। उपाय एक ही है बुराइयों से असहयोग और अच्छाइयों का पोषण। इसके लिए कायरता और क्लीवता से ग्रसित जनमानस में विश्वास का संचार करना होगा। विश्वास अपने प्रति, कर्मठता संघर्ष के प्रति। यदि यह जग सका तो परमेश्वर की कृपा उतरे बिना न रहेगी।

अन्य साधु भी इसमें शामिल हों, इस हेतु उनके पास जाकर अपनी इस योजना से अवगत कराने की सोच उभरी। इसी फेर में वह घूम रहे थे। जंगल में एक स्थान पर कुछ साधु रह रहे थे। उनसे अपनी सारी बातें कहीं। आशा के विपरीत जवाब मिला, क्या इसीलिए संसार छोड़ा है कि फिर उसी भ्रम-जंजाल में पड़ें। संसार नहीं परिवार कहिए— क्रांति का संदेश सुनाने आए साधु ने उनके कथन को सुधारा।

चलिए यही सही, पर यहाँ हम लोग अपनी मुक्ति के लिए यत्न कर रहे हैं, उसमें रोड़ा न अटकाएँ।

“मैं रोड़ा अटकाने नहीं; वरन उस यत्न को और अधिक परिमार्जित करने आया हूँ”।

सभी उसकी ओर आश्चर्य से देखने लगे। उसने कथन जारी रखा—  मुक्ति आलस्य-अकर्मण्यता से, इंद्रियों की दासता से, दैन्य की भावना से, अहंकार से, प्रमाद से, क्लीवता, कायरता से। यदि तुम अपनी और सबकी इस मुक्ति के लिए, अपने सुख और जीवन की बलि नहीं दे सके, तो तुम्हारा संन्यास व्यर्थ है। फिर तो यही कहा जाएगा कि वैराग्य के नाम पर पलायन, तप के नाम पर अहंकार, त्याग के नाम पर जड़ता पनप रही है और इन तीनों के मिश्रित स्वरूप त्रिदोष संन्यास नहीं, सन्निपात को जन्म देंगे। जिससे आत्मा जन्मांतर तक सिसकती रहेगी ।

साधुओं के समझ में उसकी बातें आ रही थीं। उन्होंने पूछा फिर संन्यास क्या है ?

मेरे नहीं, गीता के शब्दों में “काम्यानां कर्मणा संन्यासं कवयो विदुः” अर्थात स्वार्थपरता, क्षुद्र कामनाओं में उलझाने वाले कामों को सर्वहित में छोड़ना संन्यास है। बात समझ आ चुकी थी। संन्यास का मर्म पता चल गया था।

उनके नेतृत्व में सभी साधु अब जन-जन में पीड़ित मानवता में ईश्वरदर्शन करने लगे थे। अस्तु उनका प्रधान कार्य मानवोचित शौर्य-साहस उत्पन्न करने के लिए जनसंपर्क बनाना और जनसाधारण के क्रियाकलापों में निरत रहना बन गया। वे घर-घर जाते, जन-जन से मिलते और यही समझाते कि यदि संगठित रूप से अत्याचार-अनाचार का प्रतिरोध किया जा सके तो शक्तिशाली बर्बरता को भी परास्त किया जा सकता है। व्यक्तियों का संगठन करके ये जगह विचारों के क्रांतिकारी गुण ही तूफान को गति दे रहे थे। जनता में एक नवीन साहस पैदा होने लगा था।

पुर्तगाल के अत्याचारी यह जानने को बेचैन थे कि जो आतंकित जनता मुँह खोलने का साहस नहीं जुटा पाती थी। उसमें प्राण फूँकने वाला कौन है ? वे एकदूसरे को कहते— अरे मुर्दे भी जिंदा होने लगे। बहुत खोज-बीन करने के बाद उन्हें पता चल सका कि सद्विचारों के तूफान में दुष्प्रवृत्तियों की दुर्गंध उखाड़ फेंकने वाले और कोई नहीं संत गौरीनाथ हैं। जिन्होंने साधुओं और सामान्यजन को साथ ले जन-जन में नवजीवन का संचार किया है।

आखिर एक दिन अनाचारियों के समूह ने उन्हें पकड़ ही लिया। हंटरों से पीटा, भूखा-प्यासा रख गंदे और फटे कपड़े पहनाए, जूतों की माला गले में डाली और उनसे जनजाग्रति के कार्य से विरत होने को कहा। इस पर उनका जवाब था—“ न मुझे लोभ अपने पथ से डिगा सकते और न अत्याचारों में मुझे विचलित करने की सामर्थ्य है। क्रूरता के पुतलों ने मृत्युदंड दिया। जिसे उन्होंने यह कहते हुए स्वीकारा—  भाइयो ! हम खुशी-खुशी मृत्यु को स्वीकार रहे हैं, ताकि आप सभी जीवित रहें। सर्वस्व त्याग कर रहे हैं, ताकि आप सब स्वाधीन और गौरवमय जीवन बिता सकें। इसे देखकर-सुनकर सहृदय ईसाइयों ने कहा—  "प्रेम व सदाचार जीवित रह सकें, इसके लिए, आज फिर एक ईसा ने सूली को स्वीकारा। विचारशीलों के मुख से निकला, सद्विचारों की फसल लहराए, इसी हेतु युग के सुकरात ने जहर का प्याला पिया।" आस्तिक शिवभक्तों ने कहा— "शव की तरह सोए जनमानस में विचारों का प्राण फूँककर सर्वहित में जुट पड़ने का शिवत्व जागे और जागता रहे, इसीलिए आज पुनः मृत्युंजय ने हलाहल पिया। कहा भर नहीं, सभी ने संकल्प लिया कि उनके विचारों को मरने नहीं देंगे। स्वयं की कर्त्तव्यनिष्ठा सुप्त न होगी और एक दिन ऐसा आया, जब गोमंतक क्षेत्र मुक्ति पा सका।"

सर्वहित के लिए सर्वस्व त्याग की आवश्यकता कम नहीं हुई है। पर इस बदलते समय में जो कुछ हम देंगे, उसका अनेकों गुना जनश्रद्धा, आत्मीयता भरे प्यार के रूप में मिलेगा। नए युग की नई  समाज-संरचना के लिए अनेकों गौरीनाथ आवश्यक हैं, जो “अरथ न धरम न काम रुचि, गति न चहौं निरवान” का संकल्प दुहराते हुए विराट भगवान की भक्ति करने का असाधारण साहस दिखा सकें।


सद्वाक्य

शास्त्र पत्थर की लकीर नहीं है और न श्रेष्ठ पुरुषों के वचन आत्यंतिक सत्यों पर आधारित हैं। ऐसा होता तो उनके बीच विरोध क्यों पाए जाते ? तुम सच्चाई को ढूँढ़ो और वह जहाँ भी मिले वहाँ से चुन लो।


जीवन देवता को कैसे साधें ?

प्रकृति अलमस्त बच्चे की तरह निरंतर अपने खेल-खिलवाड़ में लगी रहती है। पंचतत्त्वों के रेत-बालू को बटोरना, सँजोना, बढ़ाना-घटाना, बिगाड़ना, बस यही उसके क्रियाकलाप का केंद्रबिंदु है। बाजीगर का तमाशा देखने में अपनी सुध-बुध खो बैठने वाले मनचले दर्शकों की तरह लोग उस कौतुक-कौतूहल को देखने के लिए एकत्रित हो जाते हैं। हाथ की सफाई का कमाल उन्हें ऐसा सुहाता है कि कहाँ जाना था, क्या करना था, जैसे तथ्यों को भूल बैठते और बेतुकी कल्पनाओं में उड़ने-तैरने लगते हैं। इन प्रपंच-कौतुकों में मन भी सहायता देता है, रोने-हँसने तक लगता है। विचित्र है यह कौतुक-कौतूहल, जिसने समझदार कहे जाने वाले मनुष्यों को भी अपने साथ बेतरह जकड़-पकड़ रखा है। इस दिवास्वप्न की प्रवंचना का पता तब चलता है, जब आँख खुलती है, नशे की खुमारी उतरती है और भगवान के दरबार में पहुँचकर सौंपें गए कार्य के संबंध में पूछताछ की बारी आती है। इससे पूर्व यह पता ही नहीं चलता कि कितना गहरा भटकाव सिर पर हावी रहा और वह कराता रहा, जिसे करने के लिए उन्मादग्रस्तों के अतिरिक्त और कोई कदाचित ही तैयार हो सकता है।

अब आइए, जरा समझदारी अपनाएँ और समझदारों की तरह सोचना आरंभ करें। मनुष्य जीवन, सृष्टा की बहूमूल्य धरोहर है, जो स्वयं को सुसंस्कृत और दूसरों को समुन्नत करने के दो प्रयोजनों के लिए सौंपा गया हैं। इसके लिए अपनी योजना अलग बनानी और अपनी दुनिया अलग बसानी पड़ेगी। मकड़ी अपने लिए अपना जाल स्वयं बुनती है। उसे कभी-कभी बंधन समझती है तो रोती-कलपती भी है; किंतु जब भी वस्तुस्थिति की अनुभूति होती है, तो समूचा मकड़जाल समेटकर उसे गोली बना लेती और पेट में निगल लेती है। अनुभव करती है कि सारे बंधन कट गए और जिस स्थिति में अनेकों व्यथा-वेदनाएँ सहनी पड़ रही थी, उसकी सदा-सर्वदा के लिए समाप्ति हो गई ।

ठीक इसी से मिलता-जुलता दूसरा तथ्य यह है, कि हर मनुष्य अपने लिए अपने स्तर की दुनिया अपने हाथों आप रचता है। उसी घोंसले में वह अपनी जिंदगी बिताता है। उसमें किसी दूसरे का कोई हस्तक्षेप नहीं है। दुनिया की अड़चनें और सुविधाएँ तो धूप-छाँव की तरह आती-जाती रहती हैं। उनकी उपेक्षा करते हुए कोई भी राहगीर, अपने अभीष्ट पथ पर निरंतर चलता रह सकता है। किसी के भी बस में इतनी हिम्मत नहीं, जो बढ़ने वालों के पैर में बेड़ी डाल सके। भले या बुरे स्तर के आश्चर्यजनक काम कर-गुजरने वालों में से प्रत्येक की कथागाथा इसी प्रकार की है, जिसमें प्रतिकूल परिस्थितियों का झीना पर्दा उनने हटाया और वही कर गुजरें, जो उन्हें अभीष्ट था।

शास्त्रकारों और आप्तजनों ने इस तथ्य का पग-पग पर प्रतिपादन किया है। वेदांत विज्ञान के चार मह्त्त्वपूर्ण सूत्र हैं— “तत्त्वमसि”, “अयमात्मा ब्रह्म”, “प्रज्ञानं ब्रह्म", “सोहम्”। इन चारों का एक ही अर्थ है कि परिष्कृत जीवात्मा ही परब्रह्म है। हीरा और कुछ नहीं, कोयले का ही परिष्कृत स्वरूप है। भाप से उड़ाया हुआ पानी ही वह स्त्रीवत् जल (डिस्टिल्ड वाटर) है, जिसकी शुद्धता पर विश्वास करते हुए उसे इंजेक्शन जैसे जोखिम भरे कार्य में प्रयुक्त किया जाता है। मनुष्य और कुछ नहीं, मात्र भटका हुआ देवता है। यदि वह अपने ऊपर चढ़े मल, आवरण और विक्षेप को, कषाय-कल्मषों को उतार फेंके, तो उसका मनोमुग्धकारी अतुलित सौंदर्य देखते ही बनता है। गांधी और अष्टावक्र की दृश्यमान कुरूपता उनकी आकर्षकता, प्रतिभा, प्रामाणिकता और प्रभाव-गरिमा में राई-रत्ती भी अंतर न डाल सकी। जब मनुष्य के अंतःकरण का सौंदर्य खुलता है, तो बाहरी सौंदर्य की कमी का कोई मह्त्त्व नहीं रह जाता।

गीताकार ने इस तथ्य की अनेक स्थानों पर पुष्टि की है, वे कहते है— ''मनुष्य स्वयं ही अपना शत्रु है और स्वयं अपना मित्र है”। “मन ही बंधन और मोक्ष का एकमात्र कारण है”। “अपने आप को ऊँचा उठाओ, उसे गिराओ मत”। इन अभिवचनों में अलंकार जैसा कुछ नहीं है। प्रतिपादन में आदि से अंत तक सत्य ही सत्य भरा पड़ा है। एक आप्तपुरुष का कथन हे—” मनुष्य की एक मुट्ठी में स्वर्ग और दूसरी में नरक है। वह अपने लिए इन दोनों में से किसी को भी खोल सकने में पूर्णतया स्वतंत्र है।

यदि कस्तूरी वाले मृग की तरह निरर्थक न भटकना हो, तो अपना ही अंतःकरण टटोलना चाहिए। उसी पर्दे के पीछे बैठे परमात्मा को जी भरकर देखने की, हृदय खोलकर मिलने-लिपटने की अभिलाषा सहज ही पूरी कर लेनी चाहिए। भावुकता भड़काने या काल्पनिक उड़ानें उड़ने से बात कुछ बनती नहीं। ईश्वर जड़ नहीं, चेतन है। इसे प्रतिमाओं तक सीमित नहीं किया जा सकता। चेतना वस्तुतः चेतना के साथ ही, दूध-पानी की तरह घुल-मिल सकती है। मानवी अन्तःकरण ही ईश्वर का सबसे निकटवर्त्ती और सुनिश्चित स्थान हो सकता है।

मंदिर बनाने के लिए अतिशय व्याकुल किसी भक्तजन ने किसी सूफी संत से मंदिर की रूपरेखा बना देने के लिए अनुरोध किया। उनने अत्यंत गंभीरता से कहा— ”इमारत अपनी इच्छानुरूप कारीगरों की सलाह से बजट के अनुरूप बना लो, पर एक बात मेरी मानो, उसमें प्रतिमा के स्थान पर एक विशालकाय दर्पण ही प्रतिष्ठित करना, ताकि उसमें अपनी छवि देखकर दर्शकों को इस वास्तविकता का बोध हो सके कि या तो ईश्वर का निवास उसके लिए विशेष रूप से बने इसी काय-कलेवर के भीतर विद्यमान है, अथवा फिर यह समझें कि आत्मसत्ता को यदि परिष्कृत किया जाए, तो वही परमात्मसत्ता में विकसित हो सकती है। इतना ही नहीं, वह परिष्कृत आत्मसत्ता, पात्रता के अनुरूप दिव्य वरदानों की अनवरत वर्षा भी करती रह सकती है। भक्त को कुछ का कुछ सुझाने वाली सस्ती भावुकता से छुटकारा मिला। उसने एक बड़ा हाल बनाकर सचमुच ही ऐसे स्थान पर एक बड़ा दर्पण प्रतिष्ठित कर दिया, जिसे देखकर दर्शक अपने भीतर के भगवान को देखने और उसे निखारने-उभारने का प्रयत्न करते रह सकें।

मनःशास्त्र के विज्ञानी कहते हैं कि मनःस्थिति ही परिस्थितियों की जन्मदात्री है। मनुष्य जैसा सोचता है, वैसा ही करता है एवं वैसा ही बन जाता है। किए हुए भले-बुरे कर्म ही संकट एवं सौभाग्य बनकर सामने आते हैं। उन्हीं के आधार पर रोने-हँसने का संयोग आ धमकता है। इसलिए परिस्थितियों की अनुकूलता और बाहरी सहायता प्राप्त करने की फिराक में फिरने की अपेक्षा, यह हजार दर्जे अच्छा है कि भावना, मान्यता, आकांक्षा, विचारणा और गतिविधियों को परिष्कृत किया जाए। नया साहस जुटाकर, नया कार्यक्रम बनाकर प्रयत्नरत हुआ जाए और अपने बोए हुए को काटने के सुनिश्चित तथ्य पर विश्वास किया जाए। बिना भटकाव का यही एक सुनिश्चित मार्ग है।

मानव जीवन का परम पुरुषार्थ सर्वोच्च स्तर का सौभाग्य एक ही है, कि वह अपनी निकृष्ट मानसिकता से त्राण पाए। भ्रष्ट चिंतन और दुष्ट आचरण वाले स्वभाव-अभ्यास को और अधिक गहन करते रहने से स्पष्ट इनकार कर दे। भूल समझ में आने पर उलटे पैरों लौट पड़ने में भी कोई बुराई नहीं है। गिनती गिनना भूल जाने पर, दुबारा नए सिरे से गिनना आरंभ करने में किसी समझदार को संकोच नहीं करना चाहिए। जीवन सच्चे अर्थों में धरती पर रहने वाला देवता है। नर-कीटक, नर-पशु, नर-पिशाच जैसी स्थिति तो उसने अपनी मनमर्जी से स्वीकार की है। यदि वह कायाकल्प जैसे परिवर्तन की बात सोच सके, तो उसे नर-नारायण, महामानव बनने में भी देर न लगेगी। आखिर वह है तो ऋषियों, तपस्वियों और मनीषियों का वंशधर ही ।


प्रकृति पर बलात्कार को उतारू विज्ञान

प्रकृति की प्रत्यक्ष पदार्थ-संपदा और अदृश्य शक्तियों की अधिकाधिक उपलब्धि से ही मनुष्य इतना साधनासंपन्न और समर्थ बन सका है कि उसे सर्वसमर्थ कहा जाने लगा है। विश्वास किया जाना चाहिए कि यह प्रगतिक्रम दिन-दिन आगे ही चलेगा। जो लाभदायक पक्ष हाथ लगा है, उसे छोड़ते नहीं बनता। धरती से खाद्य उत्पादन और पशुपालन के लाभ जब तक विदित न रहे होंगे, तब तक आदिमकाल के मनुष्य का काम किसी अन्य प्रकारों के सहारे भी चल जाता होगा, पर अब जबकि वे विधाएँ उपलब्ध हो गई हैं, यह संभव नहीं रहा कि उनका परित्याग कर दिया जाए । आग से लेकर बिजली तक का प्रयोग जब से व्यवहार में आने लगा है, तब से यह निश्चित हो गया है कि भविष्य में कभी भी इनसे विमुख नहीं हुआ जा सकेगा। इसी आधार पर यह भी मानकर चलना चाहिए कि प्रकृति के रहस्यों का अन्वेषण और दोहन भविष्य में और भी द्रुतगति से चलेगा।

न संपदा को पर्याप्त माना जा सकता है, और न सुविधा-संवर्द्धन की ललक घट सकती है। यह क्रम पीछे नहीं हटेगा; वरन आगे ही बढ़ेगा। भावी पीढ़ियाँ अब की अपेक्षा और भी अधिक साधनसंपन्न होंगी। ऐसी दशा में यह खतरा और भी अधिक बढ़ेगा कि यदि कहीं उनका दुरुपयोग होने लगा तो उपलब्धियाँ अनर्थ का कारण बनेंगी। जब तक लाठी हाथ में है, तब तक उसके दुरुपयोग का बचाव भी हो सकता है, पर अब मशीनगन चलने लगे और बम बरसने लगे, तो फिर सुरक्षा का प्रश्न कठिन हो जाता है। असाधारण उपलब्धियाँ यदि कभी नियंत्रण से बाहर होने लगें और मनुष्य की उद्दंडता पर अनुशासन न लगे तो परिणति कितनी भयंकर होती है, इसका परिचय भूतकाल में भी मनुष्य जाति अनेक बार प्राप्त कर चुकी है।

वृत्तासुर, हिरण्यकश्यप, महिषासुर, भस्मासुर, रावण, कंस, दुर्योधन से, लेकर मध्यकालीन आक्रांताओं के दिल दहलाने वाले कृत्य अभी भी सामने हैं। जिनने कत्लेआम की शृंखला चलाई थी और निरीहों को गाजर-मूली की तरह काटकर रख दिया था। यह सामर्थ्य ही है, जो अनियंत्रित होने पर प्रेत-पिशाच का रूप धर लेती है और उपलब्धियों के अहंकार में कुछ भी कर बैठती है। यह अनर्थ अगले दिनों और भी अधिक तेजी से दुहराया जा सकता है। मदांध जो भी कर बैठे, वह कम है। अणुबम बने ही नहीं हैं, प्रयुक्त भी हुए हैं और सारे संसार पर आतंक की छाप छोड़ गए हैं। ऐसा ही दुरुपयोग भविष्य का शक्तिसंपन्न मनुष्य न करेगा, इसकी कोई गारंटी नहीं। ऐसी दशा में उपलब्धियों का हर्ष आशंकाओं के विवाद से घिरकर ऐसा बन जाएगा, जिसे वरदान नहीं अभिशाप ही गिना जाएगा।

उपार्जन सरल है, उसे तो लुटेरे भी बड़ी मात्रा में कर लेते हैं। पर सदुपयोग के लिए बढी-चढ़ी विवेकशीलता और दूरदर्शिता चाहिए। इसके बिना खतरा ही खतरा बना रहेगा। किसी उद्दण्ड के हाथ में पहुँची माचिस की एक तीली के सारे गाँव को भी देखते-देखते जलाकर भस्म कर सकती है। फिर महाविनाशकारी अस्त्रों के ढेर में किसी पागल द्वारा एक चिंगारी फेंक देने पर इस सुंदर पृथ्वी का, प्राणि जगत का अस्तित्व ही खतरे में पड़ सकता है। बात उस स्थिति तक न पहुँचे, तो भी सामान्य जीवन में शक्ति का दुरुपयोग कितना भयंकर हो सकता है, इसका अनुमान उन आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक कुचक्रों को देखते हुए लगाया जा सकता है, जिसके कारण मानवी कुटिलता ने हर दिशा में अनाचारों के आडंबर खड़े कर दिए हैं।

आश्चर्य इस बात का है कि सुविधा-साधनों की इतनी अभिवृद्धि होते हुए भी मनुष्य विलास, अनाचार और आक्रमण पर इस कदर क्यों उतारू है और यह ढीठता दिन-दिन क्यों अधिक बढ़ती जा रही है। कानून-कचहरी क्यों काम नहीं आ रही है ? धर्मोपदेश और नीति-नियमन के लिए किए जा रहे अनेकों प्रस्तुतीकरण क्यों अप्रभावी सिद्ध हो रहे हैं ? साहित्य, संगीत, कला का परंपरागत रुझान अपना परंपरागत राजमार्ग छोड़कर किस कारण पतन और पराभव का वातावरण बनाने को जुट गया है ? यह सभी प्रश्न जितने अनसुलझे हैं, उतने ही कष्टकारक भी हैं। साथ ही यह सोचा जा सकता है कि जब अगले दिनों मानव अधिक चतुर और समर्थ होगा, तो वह सार्वजनिक शांति के लिए कितना खतरनाक सिद्ध होगा ? ऐसी दशा में अगले दिनों जिस प्रगति की आशा की जाती और संभावना देखी जाती है, उसका लाभ मनुष्य को मिलेगा या वह और भी अधिक गहरे दलदल में फँस जाएगा, यह एक प्रश्न चिह्न है।

इस अनबूझ पहेली की जड़, उस वैज्ञानिक प्रगति के साथ जुड़ी देखी जा सकती है, जिसने आज हमें अपेक्षाकृत अधिक साधनसंपन्न बनाया है। आश्चर्य यह है कि ऐसी उल्टी गंगा कैसे बहने लगी ? जिससे अधिक सुविधाओं की अपेक्षा की गई थी, पर अधिक भारी पड़ रही है। नैतिकता, सामाजिकता, चरित्रनिष्ठा जैसे मानवी गरिमा के आधारभूत तथ्यों का एक प्रकार से दिवाला निकलता चला जा रहा है। एक ओर प्रगति, दूसरी ओर उससे भी अधिक अवगति ? एक ओर आँख से लाभ ही लाभ दिखता है, तो दूसरी से हानि और अनर्थ की विभीषिका उपजती जा रही है। इस असमंजस को क्या कहा जाए? और इस दुर्गति के लिए किसे दोषी ठहराया जाए?

मनीषियों का मत है कि आज की समस्याएँ बुद्धिवाद की उपज हैं। बुद्धि ने ही अविज्ञात के अंतराल को खोजा, टटोला एवं फिर उसके पीछे हाथ धोकर पड़ गई। प्राकृतिक संसाधनों का अविवेकपूर्ण दोहन इसी दुर्गति की परिणति है। अब जब चारों ओर उनके अकाल का हाहाकार मचने लगा है तो विज्ञान की सभी विधाएँ एकदूसरे को, सत्ताधीशों को, संपन्नों को दोष देती देखी जाती हैं। क्या इसका कोई समाधान नहीं है। यह सब इसी प्रकार चलता रहेगा, जब तक कि महाविनाश सामने न आ पहुँचे ?

अध्यात्मवेत्ता कहते हैं कि परोक्षसत्ता इन समस्याओं से अनभिज्ञ नहीं है। अध्यात्म तंत्र इन विभीषिकाओं से जूझने हेतु अपनी तैयारी कर रहा है। वे चाहे दिखाई पड़े अथवा न दिखाई पड़े; किंतु दृश्य समस्याओं के प्रतिरोध में अगले ही दिनों ऐसे बुद्धिपरक समाधान प्रस्तुत किए जाएँगे, जिन्हें देखकर स्वयं उत्पत्ति को जन्म देने वाले वैज्ञानिक भी हतप्रभ होकर रह जाएँगे। जिन स्रोतों से ये समस्याएँ चालू हुई है, वहीं से उनका उपचार होगा, ऐसा दिव्यदर्शी मनीषियों का कहना है।

विज्ञान ने साधन-संवर्द्धन के लिए जो अधिक परिश्रम किया है, उसकी सराहना ही की जाएगी। तथ्यों का पता लगाने में उसने पूर्वाग्रहों से तनिक भी लगाव नहीं रखा है, यह उसकी सत्यनिष्ठा है। अन्वेषणों में योगी स्तर की एकाग्रता का जो उपयोग हुआ है, उसने तथाकथित ध्यानयोगियों को एक कोने पर बिठा दिया है। समूची मनुष्य जाति उसके सुई, माचिस जैसे छोटे साधनों से लेकर माइक्रोचिप्स कंप्यूटरों से— विविधता से लाभांवित हुई है। शल्य चिकित्सा ने वरदान की भूमिका निबाही है। द्रुतगामी वाहनों और संचार-साधनों से असाधारण सुविधा हाथ लगी है। ऐसे-ऐसे अनेक कारण गिनाए जा सकते हैं, जिनके आधार पर विज्ञान की मुक्तकंठ से सराहना की जा सकती है। पर बात एक ही जगह अटक जाती है कि उसने मानवी आदर्शवादिता के तत्त्व दर्शन को अमान्य ठहराकर पशु और पिशाच की श्रेणी तक बढ़ चलने की छूट दे दी है। पशु के लिए कोई मर्यादा नहीं। पिशाच के लिए कोई कुकृत्य नहीं। मांसाहार और पशु शरीरों की परीक्षण के नाम पर चीर-फाड़, फैशन के लिए प्राणियों की चमड़ी उखाड़ना, वैज्ञानिक दृष्टि से अनुचित नहीं ठहरता। जब भावनात्मक करुणा का बोध टूटा तो फिर वह आगे ही बढ़ेगा। आज नहीं तो कल वैसा ही व्यवहार मनुष्य-मनुष्य के साथ करने में भी कोई संकोच न करेगा ? दार्शनिक छूट मिल जाने पर मनुष्य कुछ भी कुकृत्य कर सकता है। उसकी चतुरता समाज की आँखों में धूल झोंकने और कानून को चकमा देने में सहज सफल हो सकती है।

नास्तिकवादी मनोभूमि चाहे विज्ञान द्वारा समर्थित हो या किसी अन्य कारण उपजी हो, संसार के लिए विघातक ही साबित हुई है। मनुष्य से लेकर अन्य प्राणियों के कत्लेआम उसी निष्ठुरता की देन है, जो भावनातंत्र को मृत नहीं तो मूर्छित करके अदृश्य कर देती है। नृशंसता का लंबा इतिहास है, उसका व्यवहार भी चित्र-विचित्र रीति से व्यापक क्षेत्र में होता है। यों यह कुसंस्कार पाए तो अनायास भी जाते हैं। पर जब उन्हें विज्ञान जैसे प्रामाणिक समझे जाने वाले तंत्र का समर्थन मिल जाता है तो फिर “करेला नीम चढ़ा" की उक्ति चरितार्थ होती है। कामुकता की अति और तद्विषयक मर्यादाओं का समापन— 'यावत् जीवेत् सुखं जीवेत्' का ही एक रूप कहा जाएगा। इसी प्रकार अनेकानेक अनाचार जो इन दिनों बरसाती उद्भिजों की तरह उभर पड़े हैं, यदि उन्हें प्रत्यक्षवादी भौतिकदर्शन की देन कहा जाए तो अत्युक्ति न होगी।

तात्कालिक लाभ के लिए कुछ भी कर गुजरने की प्रत्यक्षवादी देन भौतिक विज्ञान ने दी है। जीव-जंतुओं की गतिविधियों का उल्लेख वे इसी प्रयोजन की सिद्धि के लिए करते हैं। मनुष्य की विशेष जिम्मेदारी की बात तो अध्यात्ममार्ग में आती है, उसे मान्यता क्यों मिले ?

औद्योगीकरण के विस्तार का श्रेय विज्ञान को है। साथ ही पर्यावरण को प्रदूषण से भर देने का दोष भी उसे देना होगा। द्रुतगामी वाहनों और विशालकाय कारखानों के लिए जो ईंधन प्रयुक्त होता है, उससे वायु प्रदूषण, जल प्रदूषण, आकाश के तापमान की अभिवृद्धि, ईंधन के लिए लकड़ी का अतिशय प्रयोग होने से तापमान की अभिवृद्धि और वनों का विनाश जैसे अनेकों संकट खड़े होते हैं। उसकी प्रतिक्रिया जब प्रौढ़ता के स्तर तक पहुँचेगी तो उसका प्रतिफल समुद्रों के उफनने, हिमभंडारों के गलने के रूप में, अपनी भयंकरता प्रकट किए बिना न रहेगा। अणु-ईंधन के प्रयोग से फैलने वाला विकिरण प्राणियों की जीवनीशक्ति को भारी आघात पहुचाए बिना नहीं रह सकता। ओजोन परत फटने से ब्रह्मांड किरणें— सौर लपटें धरती पर बरसने लगने और जो उपयोगी है, उसे जला डालने की चेतावनी अभी से मिल रही है।

उपरोक्त सभी कथन से सहमत होते हुए भी यह कहना होगा कि प्रकृति का दोहन व विज्ञान की प्रगति एक सीमा तक ही संभव है। वैसे अति उत्साह में बरता गया अतिवाद जो भी कर-गुजरे, कम है। पर यह मानकर चलना चाहिए कि जैसे शरीर में घुसे जीवाणु-विषाणु से जूझने के लिए शरीर तुरंत एंटीबॉडीज तैयार करता है, उसी प्रकार प्रकृति की व्यवस्था में हस्तक्षेप करने वाले इस तंत्र में भी विज्ञान के अतिवाद से जूझने के लिए अपनी एंटीबॉडीज तैयार कर रखी है। ये दुर्बुद्धि से लड़ेंगी एवं जिस प्रकार “स्टारवार” का कार्यक्रम बनाने वाले वैज्ञानिकों का मानस बदलकर रचनात्मक चिंतन हेतु विवश करने में समर्थ हुई, अगले दिनों सारे बुद्धिजगत से मोर्चा लेगी।

सर्पविष का इलाज सर्पविष द्वारा उत्पन्न वैक्सीन से ही होता है। प्राकृतिक चिकित्सा के संस्थापक पितामह लुई कुने का सिद्धांत है— “कूलर इज बेटर” प्रतिघात द्वारा ही प्रतिक्रिया जन्म लेती है; व उलटे को उलटकर ठीक कर देती है। ठंडे पानी का स्पर्श ही खून के दौरे को तीव्र कर देता है, व विजातीय द्रव्यों को निकाल फेंकता है। जब दंगे-फसाद हो जाते हैं, तो चारों ओर कर्फ्यू लग जाता है, मिलिट्री को फ्लैग मार्च करना पड़ता है तथा दंगाई आतंकवादियों को खोज-बीनकर जेल में बंद कर देते हैं। अगले दिनों विज्ञान में छाए अराजकतावाद से जूझने के लिए मानवतावादी, उज्ज्वल भविष्य में विश्वास रखने वाले मनीषीगण ऐसा मोर्चा खड़ा करेंगे कि विज्ञान अपनी अतिवादी बलात्कारी प्रवृत्ति से मानवता का और बिगाड़ न करे। जिस प्रकार वैज्ञानिकों ने घातक एड्स रोग का उपचार खोज लिया है, उसी प्रकार विज्ञानवादियों के मन में घुसे एड्स का उपचार अब अध्यात्मवेत्ता करेंगे एवं असंतुलन को संतुलन में बदलेंगे। यह स्रष्टा का मानवजाति के लिए आश्वासन जो है।


क्रियाकलाप प्रत्यक्ष— प्रेरणा परोक्ष

प्रत्यक्षवाद को ही प्रमुख मानने वाले बुद्धिजीवियों में प्रथम गणना होती है—वैज्ञानिकों की। इनके उपहास की चिंता न कर ब्रिटेन और अमेरिका के कुछ परामनोवैज्ञानिकों ने ऐसे प्रकरणों का अध्ययन-विश्लेषण आरंभ किया, जिन्हें दिव्य प्रेरणा या संदेश की संज्ञा दी गई थी। अध्ययन का निष्कर्ष प्रस्तुत करते हुए उन्होंने इतना ही कहा कि जिन्हें संयोग या अपवाद कहकर टाल दिया जाता है, वस्तुतः वे परोक्ष के अनुदान हैं, जो अनुकूल माध्यमों को ही मिल पाते हैं।

यह सत्य है कि कई बार हम कुछ चिंतन कर रहे होते हैं, पर अनायास इस क्रम में ऐसे विचार कौंध जाते हैं, जिसकी आशा भी नहीं की गई होती है। कुछेक अवसरों पर ऐसे विचार क्रांतिकारी परिवर्तन के लिए जिम्मेदार होते हैं। 17वीं सदी के फ्रांसीसी दार्शनिक रेने डेस्कार्टिस के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने जो प्रतिपादन आधुनिक युग के वैज्ञानिक तरीकों, सिद्धांतों एवं उनसे संबंधित दर्शन के बारे में किया, उन सबके मूल में परोक्ष जगत की अदृश्य प्रेरणा की ही प्रमुख भूमिका थी। इस क्रांतिकारी प्रतिपादन के कारण ही उन्हें वैज्ञानिक युग का ‘जनक’ माना गया है।

ब्रिटेन के सर ई.ए. वेलिंगटन को पुरातन भाषाओं और लिपियों का विशेषज्ञ माना जाता है। इस दिशा में ये अपनी सफलता का श्रेय मुख्य रूप से देेैवी चेतना को देते हैं और कहते हैं कि यदि इसका सहयोग न मिला होता, तो आज मैं वह न बना होता, जो हूँ। 'डिवाइन हेल्प' नामक पुस्तक में ऐसी अनेक घटनाओं का उल्लेख किया है। एक घटना की चर्चा करते हुए ये लिखते हैं कि, "एक रात जब वे सोए हुए थेेे, तो किसी ने उन्हें झकझोर कर यह कहते हुए उठाया कि कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में पुरातन विद्या का एक शोध विशेषज्ञ नियुक्त किया जाना है, जिसके लिए जल्द ही एक प्रतियोगिता परीक्षा होने वाली है। तुम्हें उसमें अवश्य सम्मिलित होना चाहिए। सफलता मिलेगी।" वेलिंगटन हड़बड़ाकर उठ बैठे और चारों ओर देखने लगे, पर वहाँ कोई नहीं था। पत्नी-बच्चे भी सो रहे थे। उन्होंने उसे देैवी प्रेरणा मानकर वैसा ही करने का निश्चय किया। तैयारी शुरू कर दी। समय कम था, अतः अच्छी तैयारी तो नहीं हो सकी, फिर भी उन्हें जो-जो प्रकरण महत्त्वपूर्ण जान पड़े, उन्हें भली-भाँति हृदयंगम कर लिया। आश्चर्य की बात तो यह थी कि प्रश्न पत्र में जो-जो प्रश्न आए थे, सिर्फ उन्हें ही उन्होंने पढ़ा था। परीक्षा दी और वे प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुए। उनकी नियुक्ति विभागाध्यक्ष के रूप में हो गई। बाद में इस पद पर काम करते हुए उनने प्राचीन लिपियों का सफल अन्वेषण किया। उनके प्रतिपादन को प्रामाणिक माना गया और कितने ही अविज्ञात रहस्यों का उद्घाटन उनके द्वारा हुआ।

प्रख्यात अमरीकी शरीरशास्त्री डॉ. आट्टोलोबी ने जिन आविष्कारों के आधार पर नोबेल पुरस्कार प्राप्त किया, उसके आवश्यक सूत्र-संकेत उन्हें परोक्ष जगत की दिव्य प्रेरणा से ही मिले थे। शरीरकोश और स्नायुतंतुओं पर वे शोधकार्य कर रहे थे, पर ऐसा कोई सुनिश्चित आधार नहीं मिल पा रहा था, जिसके माध्यम से किसी निष्कर्ष पर पहुँचा जा सके। ईस्टर के दिन उन्हें अनायास वह सूत्र हाथ लगा, जिसके कारण उनका अनुसंधान सफल और पूर्ण हो सका।

यदि व्यक्ति दैवी संदेशों को ग्रहण करने हेतु पात्रता के अनुबंधों को पूरा कर सके, जागरूक रहे और उन संकेतों को समझ सके, तो वह सब कुछ कर-गुजरने में सफल हो सकता है, जिसे सर्वसाधारण असंभव मानते रहे है।


भारत की आत्मा का सिंहावलोकन

परिव्राजक विवेकानंद उन दिनों घूम-घूमकर समूचे देश की स्थिति का अवलोकन कर रहे थे। उन्होंने देखा कि परंपराए—रीति-रिवाज इस कदर अस्त-व्यस्त और विकृत हो चुके हैं कि भारत की आत्मा इस विकृति के बोझ से दबी-पिसी जा रही है। इसे उबारने और सँवारने का कार्य तो धर्म का है, तो क्या धर्म नहीं रहा ? अथवा धर्म की संजीवनी से नवजीवन का संचार करने वाले परिव्राजक— संन्यासी नहीं रहे।

इन दिनों वह दक्षिण भारत में थे। पदयात्रा के साथ विचार-मंथन चल रहा था कि मार्ग में एक मठ दिखाई पड़ा। साधु आ-जा रहे थे। जिज्ञासा बढ़ी और पैर उधर की ओर मुड़ गए। अंदर प्रवेशकर महंत से पूछा— “क्या मैं यहाँ एक-दो दिन रह सकता हूँ।” उद्देश्य था यहाँ की जीवन-प्रणाली का अध्ययन करना।

देखा कुछ लोग स्वाध्याय कर रहे हैं। पूछा— "क्या पढ़ रहे हैं ?" "उपनिषद्।"— उत्तर मिला।

“आप लोग इस ज्ञान को जीवन में उतारने के लिए क्या कर्म करते हैं?" अगला प्रश्न था ?

“कर्म!" अरे कर्म के झगड़े में हम क्यों पड़ने लगे? इससे हमारा क्या प्रयोजन?”

“पर ईशावास्य उपनिषद् तो सौ वर्ष सशक्त और समर्थ जीवन जीने और सतत कर्मरत रहने का उपदेश देता है, क्या आपने उसे नहीं पढ़ा?" कोई उत्तर नहीं मिला। “शरीर की आवश्यकताओं की पूर्ति आप लोग कैसे करते हैं?” “अरे इतना भी नहीं मालूम ?” जवाब देने वाले साधु ने इस तरह उनकी ओर देखा, मानो बहुत बचकाना सवाल हो। “यह काम गृहस्थों का है। वे ही हमारी आवश्यकताओं की पूर्ति करते हैं।”

“बदले में आप उन्हें क्या देते हैं ?”

“भला हमें किसी लेन-देन से क्या मतलब।” अब वह घूमते-घूमते एकदूसरे स्थान पर पहुँचे, जो साधुओं के निवास के लिए था। संगमरमर का फर्श, विशाल कमरे, गद्देदार पलंग, यह सब देखकर उन्होंने साधु से पूछा— “क्यों महात्मा जी! आपने वे बस्तियाँ देखी हैं, जहाँ यहाँ के शिल्पी मजदूर निवास करते हैं?” "हाँ! कभी-कभी हमें उन बस्तियों से होकर भी जाना पड़ा है। पर वहाँ तो दुर्गंध और धूल-मिट्टी के कारण खड़ा भी नहीं हुआ जाता।” “कभी उनके घरों से भी भिक्षा ली?” “अरे भला वे क्या देंगेय़ उनके पास खुद ही नहीं है।” “क्या कभी आप लोगों ने इस प्रश्न पर विचार किया है कि इन लोगों का दुःख-दारिद्र दूर होना चाहिए ?”

“संसार के मायाजाल में फँसे ये प्राणी अपने-अपने पापों का दंड भुगत रहे हैं। सो इनका भुगतना ही अच्छा है।”

“अरे क्या यही संन्यास है? जो पवित्रव्रत मानव समाज की सेवा के लिए लिया जाता था, उसकी यह दुर्दशा। जहाँ इन व्रतशीलों के समुदाय साहसी, सेवाभावी सृजनसैनिकों की अनुशासनबद्ध सेना के रूप में होना चाहिए, वहीं अब इन मूढ़ों, अकर्मण्यों-विलासियों का जमाव हो गया है। ”

उनका मन उद्विग्न हो गया। उनका मन रह-रहकर विचलित हो उठता। घूमते-घूमते वह कन्याकुमारी जा पहुँचे। आधी रात्रि में उत्ताल तरंगों को बेधकर, समुद्र की छाती को चीरकर जा पहुँचे, एक विशाल पाषाणशिला पर, जहाँ कभी आद्यशक्ति ने नवसृजन के लिए तप किया था। आज उन्हीं का पुत्र समाज के नवसृजन के ध्यान में डूब गया।

उन्हीं के शब्दों में यह ध्यान ईश्वर का नहीं, वरन भारत की आत्मा का था। समाज के करोड़ों मनुष्यों का था और नया संकल्प उभरा। परिव्राजकों की परंपरा को पुनः जाग्रत करना होगा। सुशिक्षित, अनुशासित कर्मठ व्यक्तियों का दल जो घूम-घूमकर द्वार-द्वार पर जाकर जीवन-बोध कराए, जिनके स्वरों से मानवीय कर्त्तव्य मुखरे और वे जुट जाएँ नवीन भारत के गठन में। एक नया भारत निकल पड़े। निकले हल पकड़कर, किसानों की कुटी भेदकर, मछुआ, माली, मोची, मेहतरों की झोपड़ियों से। निकल पड़े बनियों की दुकानों से, भुजवा के भाड़ से, कारखाने से, हाट-बाजार से। निकले, झाड़ियों, जंगलों, पहाड़ों पर्वतों से ! अतीत के कंकाल समूह ! यही है तुम्हारे सामने तुम्हारा उत्तराधिकारी भारत ! इन्हीं को सुधारकर, इन्हीं की सेवा करने से सारे पापों का प्रायश्चित होगा।

कन्याकुमारी की पाषाणशिला पर लिया गया संकल्प रामकृष्ण मठ-मिशन के रूप में मूर्त्त हुआ। ऐसे व्रतशील कर्मठ सृजनसेना के रूप में जो जीव को शिवमानकर सेवा में जुट पड़े। संन्यास का सही स्वरूप सामने आया। यह बोध कराने कि संन्यास का तात्पर्य सेवा लेना नहीं, सेवा करना है। ज्ञान अर्जित करना और ज्ञान बाँटना हैं, घर-घर, द्वार-द्वार जाकर। इसमें जो कष्ट मिले, भूखे रहना पड़े, अपमान सहना पड़े उसे सहर्ष सहना है। आगे बढ़ते जाना है।

रूढ़िवादी समाज, अंधमान्यताओं से पिछड़े बने समाज का कायाकल्प आज यदि होना है तो उपर्युक्त चिंतनशैली को आधार बनाकर ही। विराट विश्व की आराधना जो कर सकें, ऐसे संन्यासी-वानप्रस्थ-परिव्राजक समयदानी-लोकसेवी समाज के हर अंचल से निकलें एवं प्रतिगामिता से मोर्चा लें, धर्म—अध्यात्म को प्रगतिशील बना उसे नए प्राण दें।

यही है सच्ची प्रव्रज्या—यही है वह सच्चा संन्यास धर्म, जिसकी अवधारणा कभी स्वामी विवेकानन्द ने कन्याकुमारी की समुद्र-अवस्थित उस शिला पर ध्यानस्थ होकर की थी। हमारे कपड़े रंगे हों या न रंगे हों, भाव उतर आया हो, तदनुरूप कर्म बन पड़ रहे हों, यही बहुत है। समय की यही आवश्यकता है कि मानवमात्र का जीवन इस भावधारा में स्नात हो, सामाजिक कर्त्तव्य निभाने में जुट पड़े, इस दिशा में जागरूकता बढ़े। इतनी कि मुक्ति की नहीं, स्वयं के मोक्ष की नहीं, सबके हित हेतु उद्यत कर्मठता ही जीवन का ध्येय बन जाए।


जो आगे बढ़ते हैं। (कहानी)

बुद्ध बारह वर्ष के तप के उपरांत जब अपने गृहनगर लौटे तो सारे नगर में हर्ष की लहर फैल गई और पूरे नगरवासी उनके स्वागत के लिए दौड़ पड़े किंतु पिता शुद्धोधन बड़े कुपित थे कि मेरा बेटा और भिक्षुओं के वेश में, दर-दर मारा-मारा फिरे। मेरे राज्य में किस बात की कमी है। लोगों के बहुत समझाने पर पिता बुद्ध के स्वागत के लिए नगर की सीमा पर गए तो, किंतु भौंहें क्रोध से तनी थीं। बुद्ध के मुखमंडल पर परम शांति झलकती देखकर पिता का क्रोध ठंडा तो हुआ, किंतु शिकायत फिर भी बनी थी कि उनका बेटा होकर इस वेश में क्यों घूमता-फिरता है ? बुद्ध को समझते देर न लगी और वे पिता से बोले— “शायद आप मुझसे इसलिए रुष्ट हैं कि मैंने आपकी इच्छा के विरुद्ध यह मार्ग चुना है। किंतु स्रष्टा की यही मर्जी थी। आपने मुझे जन्म दिया, यह भी एक घटना थी। यशोधरा से विवाह किया, यह भी एक घटना थी। राहुल का जन्म तीसरी घटना थी। किंतु आगे और कितनी घटना मेरे जीवन में घटित होंगी, स्रष्टा को अभी मुझसे क्या कार्य लेना है, वह न आप समझते हैं, न मैं जानता हूँ और अब मैं वह नहीं जो बारह वर्ष पूर्व था या जो जन्म के समय था"।

कुछ मनुष्य उसी समय में ठहरे रहते हैं। कुछ आगे बढ़ जाते हैं। जो ठहरे रहते हैं, उन्हें समझदार नहीं कहा जा सकता, जो आगे बढ़ते हैं वे ही जीवन में कुछ कर जाते हैं।


नियति का निर्धारण रुकेगा नहीं

मानवी चिंतन और पुरुषार्थ का अपना महत्त्व है। उसकी शानदार प्रतिकृतियों को नकारा नहीं जा सकता। इस पर अदृश्य वातावरण द्वारा प्रभावित होने वाले अचेतन मन की अतिरिक्त क्षमता के दिशा बदल लेने पर जो आश्चर्यजनक परिवर्तन होते देखे गए हैं, उन्हें किसी अदृश्य सूत्रसंचालक का निर्धारण या प्रेरणा-संचार करने वाला प्रभातपर्व जैसा उदीयमान प्रकाश ही कह सकते हैं। उसमें मानवी कर्तृत्व का कहाँ कुछ योगदान होता है। वह विशुद्ध नियति-निर्धारण है, जो अपने समय पर अपने ढंग से प्रकट या फलित होता रहता है। ऋतुओं के परिवर्तन में मानवी प्रयास की कहाँ कुछ भागीदारी रहती है ?

नारी की अवगति पिछली शताब्दी में प्रायः पिछड़े देशों में विशेष रूप से देखने को मिलती रही है। उसके लिए सामंतवाद से लेकर लंबे समय से चली आ रही अवांछनीयताएँ भले ही जिम्मेदार रही हों, पर तत्काल किसी ने उन पर कोई बड़े प्रतिबंध लगाकर तानाशाही शासन जैसा कुछ विचित्र खड़ा किया हो, ऐसी बात नहीं। उत्थान और पतन के आधार कई बार धीमी गति से चीरकाल से चले आते हैं और प्रचुर परिमाण में जब प्रतिक्रिया परिपक्व हो जाती है तो विस्फोट जैसा कुछ आकस्मिक परिवर्तन हुआ दीख पड़ता है। वस्तुतः उसके आधार पहले से ही संचित होते रहते हैं और अवसर आने पर भयंकर फोड़े की तरह फूट पड़ते हैं।

यह सब इसलिए कहा जा रहा है कि अनर्थों के लिए किसी तात्कालिक घटनाक्रम को ही दोषी न ठहराकर यह भी देखा जाए कि पिछले प्रयास किस प्रकार धीमी गति से अपना प्रयास जारी रखे रहे हैं। घुना हुआ शहतीर, खोखला पेड़ गिर तो किसी सामान्य आघात से ही पड़ता है, पर पीछे गला या घुला देने वाली प्रक्रिया अदृश्य रूप से चिरकाल से चल रही होती है। यही बात उत्थान की बड़ी घटनाओं के साथ भी जुड़ी हुई होती है। जनता का चिरसंचित आक्रोश समय-समय पर महान क्रांतियों के रूप में फूटता रहा है, पर उसके निमित्तकारण चीरकाल से बनते और सघन होते चले आ रहे होते हैं। नियति यही है। अदृश्य का अद्भुत निर्धारण इसी विधा के अनुरूप संपन्न होता है।

इन दिनों नारीजागृति की लहर है। इक्कीसवीं सदी को योगी अरविंद जैसे तत्त्वदर्शी ‘मातृ शताब्दी’ कह चुके हैं। यों राष्ट्रसंघ या समाज-समुदाय का इस प्रकार का कोई प्रचंड आंदोलन नहीं है,फिर भी नियति अपना काम कर रही है। प्रकृति में संभावित हलचलों का पूर्वाभास कई जीव-जंतु अपनी अतींद्रिय क्षमता के आधार पर समय से पहले ही कर लेते और  चित्र-विचित्र हलचलें प्रकट करने लगते हैं। ठीक इसी प्रकार शान्तिकुञ्ज द्वारा भी भावी संभावनाओं का सही अनुमान लगाकर यह घोषित किया है कि पूरी इक्कीसवीं सदी ऐसी संभावनाओं से भरी-पूरी है, जिसमें नारी अपनी वर्त्तमान दुर्गति से उबर ही नहीं रही है, वरन ऐसी स्थिति अपनाने भी जा रही है, जिसे उन्नति के उच्च शिखर पर पहुँचना भी कहा जा सके। नारीयुग के रूप में एक अद्भुत और असाधारण समय यकायक सामने आ उपस्थित हुआ देखा जा सके।

यह क्यों होने जा रहा है ? कौन कर रहा है ? जैसा विवेचन तर्कों के आधार पर सिद्ध कर सकना तो शायद संभव न हो सके, पर जिन्हें सूक्ष्मजगत की गतिविधियों का आकलन कर सकने की क्षमता है, वे इस पूर्वानुमान से सहमत हुए बिना नहीं रह सकते कि यथास्थिति बनाए रहने की अपेक्षा कोई अदृश्य शक्ति उपयोगी परिवर्तन करते रहने में भी अपने क्रीड़ा-कौतुक की सार्थकता अनुभव करती है। निकटवर्त्ती नारीयुग के आगमन को इसी दृष्टि से देखा जा सके तो ठीक है।

प्रजातंत्र के प्रचलन के उपरांत से ही यह माँग उठती आ रही है कि मानवी मौलिक अधिकारों को जब मान्यता मिल चुकी है, तो फिर नारी को भी मनुष्य मानने और उसे मताधिकार मिलने का कदम उठे। इस प्रयास में लंबा समय लग गया। प्रगति धीमे-धीमे अवश्य हुई, पर उसमें क्रमशः एक देश के बाद दूसरे देश में वह लहर पनपती गई और आज स्थिति है जिसमें समझदारी ने विश्व के अधिकांश भाग को अपने अनुरूप सहमत कर लिया है। मात्र मुट्ठीभर प्रतिगामी इसमें हास्यास्पद अड़चने उत्पन्न करने पर अड़े हुए हैं।

इस प्रसंग में इतिहास के पृष्ठों पर उन्नति— अभ्युदय के, आंदोलनों के, प्रतिभाओं के, अवसरों के खोजने का श्रम क्यों किया जाए ? इन्हीं दिनों इर्द-गिर्द जरा- सी गरदन मोड़कर हम इस संदर्भ में इतनी तेजी से, इतना आश्चर्यजनक घटित होते, उभरते देख सकते हैं, जो चकित कर देने वाला ही कहा जा सकता है।

नारी प्रगति के संदर्भ में अपना देश प्रतिगामी स्तर का ही माना जाता रहा है। यहाँ सतीप्रथा, कन्यावध, बाल-विवाह, कन्या विक्रय, देवदासी, बलात्कार जैसे प्रचलनों को सहज स्वाभाविक माना और बिना किसी विरोध-विग्रह के साथ सहन किया जाता रहा है। शिक्षा, व्यवसाय, शासन, नेतृत्व जैसे अवसरों से उसे प्रायः वंचित ही रखा जाता रहा है। पर्दाप्रथा अभी भी पूरी तरह मिटी नहीं है। घरों की चहारदीवारी से बाहर निकलकर कोई उपयोगी कार्य करने तक की छूट को पूरी तरह मान्यता नहीं मिली है।

राजसत्ता ने घोषणा की है कि नारी को तीस प्रतिशत आरक्षण शासकीय क्षेत्र में दिया जाएगा। उत्साही को वर्ग इस माँग को पचास प्रतिशत तक ले जाने के लिए अड़ा हुआ है। नारी शिक्षा को निःशुल्क किए जाने की योजना बन रही है। उन्हें लोकसभा से लेकर नगरपालिकाओं तक में उपयुक्त स्थान मिलने की संभावना है।

पड़ोसी पाकिस्तान में इस्लामी कानूनों को ताक में रखकर महिला प्रधानमंत्री नियुक्त की गई है और अनेक क्षेत्रों में उनपर लगे हुए प्रतिबंधों को अकस्मात् ही उठा लिया है। अफगानिस्तान में महिलाओं का सशस्त्र सैन्यदल अपना कमाल दिखा रहा है। तुर्की के कमाल पाशा ने इस संदर्भ में जो क्रांतिकारी सुधार किए थे, उनको नए सिरे से कार्यान्वित किए जाने की तैयारी चल रही है। जापान की महिलाओं का तो दावा है कि पार्लियामेंट ही नहीं, वे देश के अधिकांश महत्त्वपूर्ण दायित्वों को अगले दिनों अपने कंधों पर उठाएँगी और यह सिद्ध करेंगी कि नारी की मौलिक क्षमता नर की तुलना में कम नहीं, वरन कहीं अधिक है। उसे अबला तो अनीति भर प्रतिबंधों ने बनाया है। कुहासा छँटने ही जा रहा है, तो वे घुटनभरे वातावरण में गई-गुजरी जिंदगी क्यों व्यतीत करेंगी ?

भारतीय मूल की एक महिला ने ब्रिटेन व एक ने अमेरिका में सेना का उच्च पद प्राप्त किया है। दिल्ली ट्राँसपोर्ट कार्पोरेशन की तीन बसें महिलाएँ ही चलाती हैं, तथा एयर इंडिया का एक बोइंग जेट का संचालक दल समूचा महिलाओं का है। यातायात का संचालन भी महिला पुलिस भी करती हैं, वह भी सबसे व्यस्त चौराहों पर।

अफगानिस्तान की तरह ईरान ने भी अपने यहाँ महिलाओं की एक पूरी बटालियन खड़ी की है, जो महिला ब्रिगेडियर के तत्त्वावधान में ही काम करती है। लीबिया के कर्नल गद्दाफी की भी ऐसी ही योजना है। इन राष्ट्रपति महोदय का कहना है कि महिलाएँ बहादुरी, वफादारी और कुशलता में पुरुषों की अपेक्षा अधिक अग्रणी होती हैं। उनके अंगरक्षक दल में मात्र सशस्त्र पुरुष वेशधारी महिलाएँ होती हैं।

महिलाओं का भविष्य उज्ज्वल है। उनके आगे बढ़ने की संभावना सुनिश्चित है। समय के साथ चलते हुए जो इस प्रतिस्पर्धा के युग में अपने परिवार या प्रभाव-क्षेत्र में महिलाओं को अग्रगमन के लिए प्रोत्साहन एवं सहयोग प्रदान करेंगे, वे प्रगतिशील समझदारों की तरह नफे में रहेंगे। जो धीमे चलेंगे, उदासी अपनाएँगे, उपेक्षा करेंगे, वे पिछड़ों की अग्रिम पंक्ति में खड़े होंगे। बनना तो उन्हें भी वही पड़ेगा जो सर्वत्र बनने जा रहा है। पश्चाताप इसी बात का रह जाएगा कि समय आगे बढ़ा और हम हठवादिता अपनाते हुए “फिर कभी देखा जाएगा'' की बहानेबाजी का आश्रय लेते रहे।


चिंतन-प्रक्रिया में क्रांतिकारी परिवर्तन होकर रहेगा

“मानवी विचारधारा के अनुरूप ही वातावरण का निर्माण होता है। मन-मस्तिष्क में उठने वाले विचार-प्रवाह एक विशेष आकार धारण करते और चित्र-विचित्र या संतुलित क्रियाकलापों के रूप में प्रकट होते है। विचारों की, चिंतन-चेतना की उत्कृष्टता- निकृष्टता ही वह प्रमुख आधार है, जो मनुष्य समुदाय के उत्थान-पतन का, प्रगति-दुर्गति का निमित्तकारण बनती है। एक व्यक्ति के चिंतन की पद्धति दूसरे को भी समान रूप से प्रभावित करती है।” यह कथन है विश्व प्रसिद्ध दार्शनिक एवं मनोविज्ञानी विलियम जेम्स का।

आज समस्त विश्व में हिंसा व अपराध का व्यापक दौर चल रहा है। यह प्रकारांतर से विचार-प्रदूषण की देन है। आणविक प्रयोग—परीक्षणों से उत्पन्न विषाक्तता जिस तरह समूचे बायोस्फियर को निगलती जा रही है और पर्यावरण को जो क्षति पहुँच रही है, उसके प्रति वैज्ञानिकों में गहरी चिंता व्याप्त हो गई है। उनका कहना है कि हम जिस विषैले वातावरण में श्वास ले रहे हैं, उसे हमने स्वयं विनिर्मित किया है। अब इसका समाधान भी हमें ही ढूँढ़ना पड़ेगा। सोचने-समझने का तरीका बदलना होगा। चिंता का विषय मात्र वातावरण की विषाक्तता ही नहीं है, वरन प्रमुख समस्या सामूहिक विचारतंत्र में घुस पड़ी अवांछनीयताओं की भरमार भी है। सभी इस बात से चिंतित हैं कि आज मनुष्य-मनुष्य के बीच बढ़ती कटुता को कैसे रोका जाए ? उनमें आपसी स्नेह-सद्भाव, सौजन्य कैसे स्थापित किया जाए ? दुःख-कष्टों को दूरकर जीवन को सुखी कैसे बनाया जाए और स्वयं के तथा पर्यावरण के मध्य संतुलन स्थापित कैसे किया जाए?

इस संदर्भ में पिछले दिनों टोरोंण्टो (कनाडा) में एक सम्मेलन आयोजित किया गया जिसमें संसार भर के मूर्धन्य वैज्ञानिकों एवं मनीषी विचारकों ने भाग लिया। मानवी प्रगति की समीक्षा करते हुए ब्रिटिश विज्ञानी प्रो. जॉन डब्ल्यू वॉकर ने कहा कि हमारी वैज्ञानिक उपलब्धियाँ तो अभूतपूर्व व अत्यंत विशाल हैं, किंतु इसके साथ ही हमारे विचारतंत्र में घुस पड़े संकीर्ण स्वार्थपरता के विषदंश ने हमें कही का नहीं रहने दिया हैं। सर्वत्र लूट-खसोट मची है। इसके दुष्परिणामों से उत्पन्न खतरे को रोक पाने में हम अक्षम— असमर्थ सिद्ध हो रहे हैं। निरंतर बढ़ता जा रहा विचार प्रदूषण मानव अस्तित्व के लिए एक संकट बनता जा रहा है। मानवी मस्तिष्क से निस्सृत होने वाली विचार तरंगों के विज्ञान से संबद्ध इस संगोष्ठी में इस बात पर सम्मिलित रूप से जोर दिया गया कि यदि मनुष्य जाति को अपना अस्तित्व बनाए रखना है तो उसे अपने विचारों में क्रांतिकारी परिवर्तन लाना होगा। भौतिकवादी विचारधारा की बहुलता ने ही आणविक अस्त्रों को जन्म दिया, जिसने अपने सहित समस्त जीवों के अस्तित्व को संकट में डाल दिया है। जब तक इस विचार-प्रक्रिया में कोई बदलाव अथवा परिवर्तन नहीं आता, तब तक मानवजाति का भविष्य उसका अस्तित्व खतरे में पड़ा रहेगा।

मैसाचुसेट्स के मानसिक स्वास्थ्य-प्रभाग के वरिष्ठ प्राध्यापकों का कहना है कि प्रस्तुत समय की विचारणा-प्रक्रिया के सामान्य संचालन में मनुष्य-मनुष्य के प्रति एवं पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता का अभाव स्पष्टरूप से परिलक्षित हो रहा है। उनका मत है कि मस्तिष्क की सामान्य प्रक्रिया के इस दोष को मात्र ज्ञान या विचार परिष्कार द्वारा ही दूर किया जा सकता है और तभी एक आदर्श मानवतावादी ‘इकोलॉजी’ विकसित हो सकती है। मात्र इसी परिशोधित विचार-विकास के माध्यम से हम उस स्थिति को प्राप्त कर सकते हैं, जिसमें मानवी हृदय शुद्ध— परिष्कृत होकर सभी प्रकार की दुर्भावनाओं से मुक्त हो सकेगा। मनीषीगण कहते हैं कि विचार-विकास या परिवर्तन प्रस्तुत समय की अनिवार्य आवश्यकता है और वह असंभव भी नहीं है, प्रयत्नों द्वारा इस लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है। भूतकाल में भी ऐसा अर्जित किया गया है।

इस संबंध में अमेरिकी मनःचिकित्सक डॉ. जॉर्ज आर. बैच का कहना है कि हमारी अंतश्चेतना पर सुखवाद और भोगवाद के आक्रमण ने आज सभी को स्वार्थी बना दिया है। सर्वत्र अपने हित-चिंतन की ही बात सोची जाने लगी है। उसकी पूर्ति के लिए उचित-अनुचित सभी तरह के तरीके अपनाए जाते हैं। इस मनोवृत्ति को उनने ‘हैंडसम डैविल’ के नाम से सबोधित किया है। इस निषेधात्मक विचार-प्रक्रिया को अपनाने के कारण न केवल भोगवादियों को संत्रस्त रहना पड़ रहा है वरन, परोक्ष रूप से उसका प्रभाव समूची मानव जाति पर पड़ रहा है। दार्शनिकों ने इस मनोवृत्ति को ‘हैडोनिज्म’ कहा है, जिसके कारण मनुष्य मादक पदार्थों के सेवन से लेकर परपीड़न, कामुकता, अपराधों, मनोरोगों, और आत्महत्या की ओर अग्रसर होता जाता है। उनके अनुसार यह दुष्प्रवृत्तियाँ स्वयं के अंदर से तो प्रस्फुटित होती ही हैं, साथ ही दूसरों द्वारा छोड़े गए हेय विचार तरंगों से भी प्रभाव एवं उत्तेजना ग्रहण करती हैं। मनुष्य को अस्त-व्यस्त करके रख देने वाला यह विचार-प्रवाह जब सामाजिक जीवन में प्रवेश पा जाता है, तो वह एक प्रकार से ‘सोशियोजेनिक मॉनीटर' का रूप धारण कर लेता है। इसकी परिणति भयावह होती है। संसार जिस द्रुतगति से परिवर्तनशील और गतिशील होता जा रहा है, मानवी चिंतन, चरित्र और व्यवहार में गिरावट के दृश्य ही परिलक्षित हो रहे हैं। उत्कृष्टता का पक्षधर वातावरण विनिर्मित होता कहीं दीख नहीं पड़ता।

उलटे को उलटकर सीधा कौन करे ? विधेयात्मक दिशा कैसे मिले ? इसका उत्तर देते हुए मनीषीगण कहते हैं कि भोगवादी वातावरण का निर्माण जिन मस्तिष्कों ने किया है, उन्हीं का यह भी कर्त्तवय बनता है कि वैज्ञानिक प्रगति की दिशा-परिवर्तन करें। मूर्धन्यों की चिंतनशैली के बदलने पर जनसामान्य की विचारणा भी नवनिर्मित वातावरण के अनुरूप ढलती चली जाएगी।

प्रख्यात मनोवैज्ञानिक डॉ. रॉबर्ट एंथोनी का इस संबंध में कहना है कि जिस प्रकार किसी एक परमाणु के विखंडित होने पर भारी मात्रा में ऊर्जा उत्पन्न होती है और अदृश्य ऊर्जा की ये सूक्ष्म-तरंगें समूचे ब्रह्मांड में संव्याप्त होती चली जाती हैं, मनुष्य के अंतराल की भी लगभग वैसी ही स्थिति है। हृदय से उद्भूत सद्प्रेरण—सद्विचारणा का विखंडन किया जा सके, तो उससे सूर्य के सदृश ऊर्जा भंडार फूट पड़ेगा। हमारा मस्तिष्क इस विखण्डित ‘साइक्लोट्रॉन’ ऊर्जा समुच्चय को धारण करने की क्षमता रखता है। इच्छा-आकांक्षा को, कल्पना-विचारणा को सृजनात्मक दिशा देना इसी अद्भुत एवं आश्चर्यजनक उत्सर्जित मानसिक ऊर्जा तंत्र द्वारा संभव है। उनके अनुसार विश्व-ब्रह्मांड में जिस प्रकार एक प्रचंड विद्युत चुंबकीय शक्ति क्रियाशील है और आकर्षण-विकर्षण के अपने नियमानुसार कार्यरत रहकर सूर्यमंडल एवं उसके चारों ओर चक्कर काटने वाले ग्रह-गोलकों और तारागणों के गुरुत्वाकर्षण को नियंत्रित किए हुए है। ठीक उसी प्रकार मनुष्य के मस्तिष्क से निस्सृत विचार-प्रवाह का संतुलन अथवा असंतुलन उसके स्वयं के तथा वातावरण के भले-बुरे निर्माण में अपनी भूमिका निभाता है।

वस्तुतः मस्तिष्कीय चुंबकत्व का नियम प्रकृति के चुंबकीय नियम से बहुत कुछ मिलता-जुलता हेेै। चुंबक लौह-कणों को जिस तरह अपनी ओर खींच लेता है, मस्तिष्क भी लगभग वही प्रक्रिया अपनाता है। समानधर्मी विचारों से तो वह प्रभावित होता ही है, विधर्मी सशक्त प्रवाह भी उसे अपनी ओर आकृष्ट कर लेते हैं।

जब किसी तालाब में पत्थर का एक टुकड़ा फेंका जाता है, तो लहरें उठकर एक गोलाकार वृत्त बना लेती हैं। पर यदि पृथक-पृथक आकार के दो टुकड़े कुछ दूरी पर एक साथ फेंके जाएँ तो उनके द्वारा विनिर्मित लहरों में विशेष अंतर दिखेगा और भारी टुकड़े की लहरें छोटे वाली लहरों पर हावी हो जाएँगी। मानवी विचारतंत्र पर भी यही तथ्य पूर्णरूप से लागू होता है। मनुष्य के उत्कृष्ट, परिष्कृत एवं विधेयात्मक चिंतन की ऊर्जा-तरंगें अपेक्षाकृत अधिक सशक्त और प्रबल होती हैं। आज इनका पोषण, अभिवर्द्धन एवं उत्सर्जन ही समग्र प्रगति, सुखद वातावरण एवं उज्ज्वल भविष्य के लिए अभीष्ट है।


दूरदर्शी विवेकशीलता का जागरण त्राटक द्वारा

चित्रों में शिव-पार्वती के मस्तिष्क में तीन-तीन नेत्र देखे जाते हैं। दो नेत्र तो मनुष्य समेत सभी प्राणियों के होते हैं, पर यह तीसरा दिव्य नेत्र विशिष्ट और वरिष्ठ योगाभ्यासी जनों में ही होता हैं। दोनों भौंहों के बीच इसकी स्थिति है। सामान्यतया तो इस क्षेत्र में तोड़कर देखने पर एक बेर की गुठली जैसी आप्टिक चिआज्मा की गाँठ ही होती है, पर इसे प्रयत्नपूर्वक जगा लेने से यह तीसरे नेत्र का काम देने लगती है; और इसके द्वारा वह देखा जा सकता है जो मस्तक में जड़े हुए दो चर्मचक्षुओं की सामर्थ्य से बाहर है। दिव्यदृष्टि इसी में रहती है। ज्ञानचक्षु इसी को कहते हैं।

रामायण में कथा आती है कि कामदेव के उपद्रव करने पर शिवजी ने इसी तीसरे नेत्र को खोला और उस उद्दण्ड को जलाकर खाक कर दिया था। एकाकी दमयंती को वन-प्रदेश में पाकर जब व्याध उसके साथ बलात्कार का प्रयत्न करने लगा तो दमयंती ने उसे बेधक दृष्टि से देखकर जलाकर भस्म कर दिया था। इससे प्रकट है कि कुपित होने पर इस जग्रत तृतीय नेत्र के सहारे किसी को शाप दिया जा सकता है और नीचा दिखाया जा सकता है।

इसमें वरदान की सामर्थ्य भी है। गांधारी ने दुर्योधन का अनुरोध स्वीकार करके उसके शरीर पर दृष्टिपात किया था, इतने भर से उसका शरीर वज्र जैसा हो गया था। लज्जावश लंगोट पहने रहने के कारण उतना ही हिस्सा उसकी दृष्टि से बचा था, फलतः वही कच्चा रह गया। कृष्ण के संकेत पर भीम ने उसी स्थान पर गदा मारी और उसे धराशायी बना दिया। यह चर्मचक्षुओं का नहीं, तीसरे दिव्य नेत्र से बरसाई गई अनुकंपा का ही प्रतिफल था।

दिव्यदृष्टि से वह सब भी देखा जा सकता है, जो चर्मचक्षुओं के लिए देख पाना असंभव है। संजय ने धृतराष्ट्र को घर बैठे ही महाभारत का पूरा घटनाक्रम सुनाया था। वे यह सब अपनी दिव्यदृष्टि से देखते और मुख से कहते रहे थे। अर्जुन कृष्ण से हठकर रहा था कि आप तो मेरे सखा मित्र हैं। आपके ईश्वर स्वरूप को मैं देखना चाहता हूँ। कृष्ण ने समझाया कि सर्वव्यापी निराकार परब्रह्म को चर्मचक्षुओं से देख सकना संभव नहीं। न किसी ने अब तक इस प्रकार उसे देखा है और न भविष्य में कोई देख सकेगा। फिर भी अर्जुन हठ करता ही रहा तो भगवान ने उसे “दिव्य चक्षु” दिए और उनके सहारे उसने विराट ब्रह्म के रूप में इस समस्त विश्व को ही विराट रूप में देखा और समझा कि यह दृश्य संसार ही भगवान का विराट रूप है। यही घटना इसी रूप में यशोदा, कौशल्या और काक भुशुण्डि के साथ घटी थी। उनने भी तृतीय दिव्य नेत्र से संसार को इसी प्रकार भगवान के विराट रूप में देखा था।

अन्य योगी-तपस्वियों को भी अपने-अपने इष्टदेवों के दर्शन होते रहे हैं। वे चर्मचक्षुओं से नहीं, इसी दिव्य नेत्र से संभव हुए हैं। मनोवैज्ञानिकों की दृष्टि से यह दूरदर्शी विवेकशीलता का आवरण है, जो वर्त्तमान के कार्यों का भावी प्रतिफल समझ लेती है। मूर्ख तात्कालिक लाभ देखते और मछली, चिड़िया की तरह जाल में फँसकर अपने प्राण खो बैठते हैं। चींटी भी आँख मूँदकर चासनी परी कूद पड़ती है, पर पंख लिपट जाने पर तड़प-तड़पकर मरती है। यह अदूरदर्शिता हुई, चर्मचक्षुओं का अनुमान— निष्कर्ष— निर्णय, किंतु दूरदर्शी लोग बीज बोने में, विद्या पढ़ने में, व्यायाम करने में, कारखाना लगाने में, पूँजी फँसाने की बुद्धिमत्ता अपनाते हैं और समयानुसार उस घाटे की अनेक गुनी क्षतिपूर्ति का लाभ उठाते हैं। यह दूरदर्शी विवेकशीलता का सुझाव और निर्णय है। तीसरा नेत्र इस प्रकार की बुद्धिमत्ता को भी समझा जा सकता है।

अध्यात्म प्रयोगों में आदि से अंत तक इसी विवेकशीलता का प्रयोग होता है। संयम-सदाचार अपनाने में, तपश्चर्या एवं योगाभ्यास करने में पुण्य-परमार्थ में आरंभिक घाटा ही घाटा है, किंतु समयानुसार जब यह कल्पवृक्ष फलता है, तो साधक को हर दृष्टि से निहाल कर देता है।

इस तृतीय नेत्र का जागरण एक बहुत बड़ी सिद्धि है। साधना विज्ञान में इस प्रयोजन के लिए त्राटक-साधना का विधान है। त्राटक की मोटी रीति-नीति यह है कि आँखें खोलकर किसी वस्तु को देखा जाए। इसके बाद नेत्र बंद करके उसका कल्पना-चित्र मस्तिष्क में अंकित किया जाए। जब तक वह चित्र धुँधला न पड़े, स्मृति झीनी न पड़े, तब तक आँखें बंद रखी जाएँ और फिर आँख खोलकर उसी वस्तु को एकाग्रतापूर्वक देखने के उपरांत पहले की तरह फिर आँखें बंद कर ली जाएँ। इसी प्रकार देखने, स्मृति के आधार पर आँखें मूँदकर ध्यान करने और कल्पना धुँधली पड़ने पर फिर उसे आँख खोलकर देखने लगने की क्रिया बार-बार दुहरानी चाहिए।

प्रचलन इस क्रिया को दीपक के माध्यम से करने का है। कंधे की सीध— तीन फुट की दूरी पर दीपक को या मोमबत्ती को जलाकर रखा जाए और उसी के आधार पर उपरोक्त अभ्यास को बार- बार करने का क्रम चलाया जाए। तीस सेकेंड देखना और एक मिनट ध्यान करना। इस प्रकार एक-तीन के अनुपात से यह क्रिया चलानी चाहिए। कई लोग इसी प्रक्रिया को प्रातःकालीन स्वर्णिम सूर्य पर या उदीयमान चंद्रमा पर दुहराते हैं। कारण कि प्रकाशवान वस्तुओं के सहारे दिव्यदृष्टि जगाने के कार्य में सरलता पड़ती है।

मैस्मेरिज्म के अभ्यासी एक काला गोला बनाते हैं और उसके बीचों-बीच एक सफेद निशान छोड़ देते हैं। काले रंग के बीच सफेद रंग स्पष्ट चमकता है और उस आधार पर भी त्राटक हो सकता है, पर इसमें खुले नेत्रों से अधिक देर देखना पड़ता है। तब कहीं स्मृत प्रतिमा का ध्यान अच्छी तरह जम सकता है।

प्रकाश को लगातार बहुत देर तक नहीं देखा जा सकता। इससे आँखों पर दबाव पड़ता है किंतु साथ ही यह लाभ भी है कि प्रकाश की स्मृति बहुत देर तक बनी रहती है, जबकि सामान्य वस्तुओं को आधे समय देखना और आधे समय ध्यान करने का क्रम चलाना पड़ता है। यह ध्यान गुलाब के फूल पर भी हो सकता है, क्योंकि उसका रंग गहरा और एक ही रंग का होता है।

जिन्हें आत्मोत्कर्ष के लिए इस साधना की सिद्धि करनी है, उन्हें लंबे समय तक इस प्रयोग का अभ्यास करना चाहिए और जब प्रयोग करने, परिणाम देखने की इच्छा हो तो यह देख-भाल कर लेना चाहिए कि शक्तिसंचय का उपयोग सत्प्रयोजनों के लिए हो रहा है या नहीं ?


ज्ञातव्य

गत अंक में पाठकों में से प्रत्येक का परिचय प्राप्त करने के लिए एक पत्रक संलग्न किया गया है। अधिकांश ने उसे भरकर भेज दिया हेै। जिन्होंने नहीं भेजा है, उन सभी से अनुरोध है कि वे इसी मास इन जानकारियों को भेज दें।

उस परिचय के आधार पर अनेकों को उज्ज्वल भविष्य विनिर्मित करने के लिए उपयोगी मार्गदर्शन उपलब्ध होता रह सकेगा।


अब जाना सेवा का सही अर्थ

अस्पताल में काफी भीड़ थी। बाहर बरामदे में बैठे लोग एक-एक करके कमरे के अंदर बैठी महिला डॉक्टर के पास जा रहे थे और अपने रोग का निदान पा रहे थे। रोगियों की इस भीड़ के दो कारण थे। प्रथम— उसका व्यवहार, स्नेहपूर्ण बर्ताव, कर्त्तव्यनिष्ठा, मातृसुलभ परिचर्या, जो सभी को अपने दायरे में घेरकर समेट लेती। दूसरा उसने अपना अस्पताल ऐसी जगह खोला था, जहाँ कोई दूसरा तैयार न होता। कारण कि लंदन के इस गरीब इलाके में अधिक कमाई की उम्मीद न थी।

इस समय में वह एक ऐसे मरीज की परिचर्या में जुटी थी, जिसके सिर में घातक घाव हो गया था। परिचर्या समाप्त होने वाली थी कि एक व्यक्ति भीड़ को चीरता हुआ उसके कक्ष में घुसा। सहायिका की रोकने की कोशिश भी नाकाम रही। सामने आ खड़े होने पर उसका ध्यान भंग हुआ। पूछा— "कहिए ?" “मुझे पेट में हल्की तकलीफ रहती है।” “ठीक है! लाइन में बैठिए, नंबर आने पर आपको देख लूँगी।”

आगंतुक कब मानने को तैयार था। उसने कटाक्ष करते हुए— “ये सलीके, कायदे-कानून, सभी कुछ पैसे के लिए ही तो हैं और आपको वह दे रहा हूँ, उचित से कुछ ज्यादा ही।”

“ओह ! तो धन ही सब कुछ है। इसके लिए कुछ भी किया जा सकता है, कुछ भी छोड़ा जा सकता है। यह आज पता चला। रोगी मरते हों तो मरें ! किसी माँ की गोद सूनी हो, किसी युवती का सहारा छिने, किसी का भाई तड़पकर जान दे दे। कोई दुर्घटनाग्रस्त इलाज के अभाव में छटपटाकर जान दे दे। क्यों ? सिर्फ इसलिए कि उनके पास धन नहीं है और चिकित्सक, वह आपके कहे मुताबिक यह सिद्धांत बना ले कि धन ही सब कुछ है।” कहते-कहते उसका गला भर्रा गया। अभ्यस्त हाथ घायल के सिर की पट्टी करने में संलग्न थे। काम पूरा हो गया और मरीज जा रहा था।

पर आगंतुक ने तो जैसे उसके घावों को कुरेद दिया था। कुछ रुककर वह फिर बोली— “आह री मनुष्यता ! तूने ही दूसरों के कष्टों के लिए सूली की पीड़ा सहने वाले ईसा पैदा किए हैं। तेरे बीच से जन-जन का दरद बाँटने वाले फ्रांसिस निकले हैं और आज हतभाग्य ! तेरे परिकर में संवेदनाशून्य प्राणियों की भरमार है। जो बुद्धि के तिकड़म का जाल बिछाकर “धन सभी कुछ है”, यह मानते हुए उसके द्वारा कुछ भी करने को तैयार हैं।

सुनने वाला अवाक् था। उसके मुँह से निकला— "मैडम ! आप संत हैं, मुझे नहीं पता था। मुझे क्षमा करें।” संत कहकर मुझे अपवाद मत घोषित करो भाई ! "मैं एक सामान्य मनुष्य हूँ, इससे कम और अधिक कुछ नहीं। मेरे अंदर की मनुष्यता अभी साँसें ले रही हैं, वर्त्तमान में अपने अंदर की संवेदनाओं का लगातार गला घोटते जाने के कारण बहुसंख्यक जन ऐसा मानने लगे हैं कि संवेदना किसी संत नाम वाले विशेष प्राणी की बपौती है। पर ऐसा नहीं है। वास्तव में यह प्रत्येक मनुष्य की मनुष्यता की कसौटी है। इसके बिना तो मनुष्य मनुष्य नहीं, सचल पुतला भर है।”

"मैं तो मात्र चिकित्सक हूँ; सिर्फ चिकित्सक, जिसका धर्म है— कराहती मानवता के घावों में मरहम लगाना, सेवा करना। मेरे लिए सेवा ही सब कुछ है और धन वह सब कुछ न होकर कुछ है। जब कम से काम चल जाता है, तो अधिक के लिए क्यों भागूँ-दौड़ूँ ।

"मैं तुम्हें लौटा तो नहीं सकती मित्र !” कहते हुए उसने दवा दी। "पर मैं फीस नहीं लूँगी। जब तुम्हें यह महसूस होने लगे कि सेवा सब कुछ और धन कुछ है। उस समय आना और इस सेवा कार्य में जो बने सहायता कर देना।" इतना कहकर उसने दूसरे मरीज को बुलाने का इशारा किया। सामने खड़े व्यक्ति का धनमद उतर चुका था, वह “कुछ और सब कुछ” का मर्म समझकर चलता बना। सेवा का सही अर्थ बताने वाली यह महिला थी, ब्रिटेन की प्रथम महिला चिकित्सक एलिजाबेथ गेरेट, जिनकी उक्त नीति और तदनुरूप कर्म आज भी हर मानव के लिए एक आदर्श है।


विवेक जागा, दिशा मिली

गृह की सफाई-सुव्यवस्था में व्यस्त गृहिणी को कमरे में रखे एक बक्स में दो पांडुलिपियाँ प्राप्त हुईं। सरस्वती के उपासक के घर इनकी प्राप्ति कोई अस्वाभाविक न थी। वह स्वयं पढ़ी-लिखी थी। कोई भारी-भरकम उपाधि का बोझ न ढोने पर भी स्वाध्याय की निरंतरता ने उनके भीतर विवेक को जाग्रत किया, चिंतन को विकसित किया था। पति के द्वारा तैयार की गई इन पांडुलिपियों को एक सरसरी निगाह से देखा तो अवाक रह गई। लज्जा और क्रोध से उनका चेहरा आरक्त हो गया। साहित्य के नाम पर यह प्रवंचना उन्हें असह्य लगी।

वस्तुतः ये पांडुलिपियाँ कामशास्त्र पर थीं। जिन्हें उनके पति ने लगातार परिश्रम के बाद तैयार किया था। इस विषय पर उनकी एक पुस्तक सुहागरात पहले छप चुकी थी। इस किताब को जनसमुदाय ने खूब पसंद किया। बिक्री भी खूब हूई, पर्याप्त धन भी मिला। धन और सस्ती लोकप्रियता के यों ही मिल जाने पर मित्रमंडली ने आग्रह किया कि ऐसा ही कुछ और लिखें। परिणाम उक्त दो पांडुलिपियाँ थीं। अपने पति की यह करतूत देखकर सिद्धांतनिष्ठ पत्नी तिलमिला गई। जनमानस में कुत्सित भावों को पनपाने पर जो लोकप्रियता और धन मिलता है, उस पर धिक्कार है। ऐसे साहित्यकार से तो गँवार होना अच्छा।

उस विवेकशील नारी को साहित्यकार की उत्तरदायित्वहीनता एकदम असहनीय लगी। उनकी दृष्टि में साहित्यकार की प्रतिभा ईश्वरप्रदत्त विभूति थी और जनमानस को श्रेयपथ पर चलाने वाले साहित्य का सृजन करना उस विभूति का सदुपयोग था। इस सिद्धांत का हनन करना किसी भी साहित्यकार के लिए उचित नहीं। अतएव उन्होंने निश्चय किया कि वे अपने पति को इस मोह से विरत करके रहेंगी।

यह विचारकर उन्होंने पांडुलिपियाँ पृथक संदूक में रख लीं, चाबी उनके अपने पास थी। कई दिनों बाद पति अपने संदूक में इन्हें खोज रहे थे, न मिलने पर परेशान भी थे। पर पूछें किससे ? पत्नी के स्वभाव से परिचित थे, पूछने की हिम्मत नहीं हो रही थी। इसी उधेड़बुन में माथे पर पसीने की बूँदें छलछला आई।

परेशानी को भाँपकर गृहिणी ने पूछा— "आप क्या खोज रहें है” ?

“कुछ भी नहीं। “कुछ तो नहीं। ”

“अपनी किताबों की पांडुलिपियाँ ढूँढ़ रहा हूँ। “

जहाँ रखी थीं, वहाँ मिल नहीं रही हैं।”

“वह मेरे बक्से में ताले में बंद है और आपको कभी नहीं मिलेगी।”

“लेकिन मैंने उन पर बड़ा परिश्रम किया है। कुएँ में पड़े ऐसा परिश्रम।“ “स्त्री-पुरुषों के शारीरिक संबंधों के उद्दीपक भावों को चित्रित करने जनमानस में कुत्सा भड़काने में ही अब श्रम करना सार्थक हो गया है। भगवान ने अकल दी है, कलम में ताकत दी है, तो सामाजिक समस्याओं के निदान क्यों नहीं सुझाते ? जनरुचि को परिमार्जितकर आदर्शों की ओर मोड़ने के लिए क्यों नहीं लिखते ? कलम चलाना है तो मनुष्य में मुरझाई-कुम्हलाई संवेदनाओं को क्यों नहीं सींचते ? यदि यह नहीं कर सकते तो साहित्य लिखने की जगह मजदूरी करिए। इससे मुझे भी संतोष मिलेगा और आप दुष्कर्म से बचेंगे”।

पत्नी की फटकार से पति का सोया विवेक जाग पड़ा। क्षमा-याचना के स्वर में कहा— "तुम ठीक कहती हो देवी ! तुमने मेरी आँखें खोली दी”।

जाग्रत विवेक ने साहित्यकार को दिशा दी। वह दायित्व को पहचान जुट पड़ा लोकमानस का परिष्कार करने। साहित्यकार के दायित्व व गरिमा को पहचानने वाले मनीषी थे— पं. महावीर प्रसाद द्विवेदी और दिशा बोध कराने वाली थीं— उनकी पत्नी, जिनके प्रयासों व आदर्शनिष्ठा से वह युगनिर्माता, साहित्यकार के रूप में जाने गए, अनेकों को गढ़ा और निखारा।


आसन्न विभीषिकाएँ व उनके पीछे छिपी यथार्थता

वैभव को कमाया तो असीम मात्रा में भी जा सकता है, पर उसे एकाकी पचाया नहीं जा सकता। मनुष्य के पेट का विस्तार थोड़ा-सा ही है। उसमें सीमित मात्रा में ही आहार भरा जा सकता है। यदि बहुत कमा लिया गया है तो उसे सबको उदरस्थ कर जाने, उपयोग में लगाने की ललक, लिप्सा कितनी ही प्रबल क्यों न हो, पर वह संभव हो नहीं सकेगी। नियत मात्रा से अधिक जो भी खाया गया है वह दस्त, उलटी, उदरशूल जैसे संकट खड़े करेगा, भले ही वह कितना ही स्वादिष्ट क्यों न लगे।

शारीरिक और मानसिक दोनों ही क्षेत्र भौतिक पदार्थ-संरचना के आधार पर विनिर्मित हुए हैं। उनकी भी अन्य पदार्थों की तरह एक सीमा और परिधि है। जीवित रहने और अभीष्ट कृत्यों में निरत रहने के लिए सीमित ऊर्जा, सक्रियता एवं साधन, सामग्री ही अभीष्ट है। इसका उल्लंघन करके असीम संचय और उपभोग की ललक जगे, तो समझना चाहिए कि तटबंधों को तोड़कर बहने वाली बाढ़ अपनी उच्छृंखलता के कारण अनर्थ ही अनर्थ करेगी। बिखरा हुआ पानी तो व्यर्थ जाएगा ही, उस उन्माद के कारण कितने ही खेत, खलिहान, बस्ती, झोंपड़ी तथा उपयोगी पदार्थ भी उसी प्रवाह में बहते और पड़ते, गलते दीख पड़ेंगे।

उपभोग की दृष्टि से थोड़े साधनों में भी भली प्रकार काम चल सकता है। पर अपव्यय की कोई सीम— मर्यादा नहीं। कोई चाहे तो लाखों के नोट इकट्ठे करके उनमें माचिस लगाकर होली जलाने जैसा कौतूहल करते हुए प्रसन्नता भी व्यक्त कर सकता है। पर इस अपव्यय को कोई भी समझदार न तो सराहेगा और न उसका समर्थन करेगा। बेहद चाटुकार तो कुल्हाड़ियों से अपना पैर काटने के लिए  उघत अतिवादी की भी हाँ-में-हाँ मिला सकते हैं। मन के छुपे रुस्तम का तो कहना ही क्या ? वह पीपल पर निवास करने वाले यक्ष-राक्षस की तरह अदृश्य तो रहता है, पर कौतुक-कौतूहलें इतने बनाता-दिखाता रहता है कि उस व्यामोह में फँसा मनुष्य दिग्भ्रांत होकर भूल-भुलैयाें में भटकने वाले बनजारे की तरह इधर-उधर मारे-मारे फिरने में ही अपनी समूची चिंतनक्षमता गँव— गुमा दे। तृष्णा तो समुद्र की चौड़ाई और गहराई से भी बढ़कर है। उसे तो भस्मासुर, वृत्तासुर, महिषासुर जैसे महादैत्य भी पूरी न कर सके। फिर बेचारे मनुष्य की तो बिसात ही क्या है?, जो संतोष की अभिव्यक्ति के लिए कहीं कोई आश्रय प्राप्त कर सके ?

दिग्भ्रांत मनुष्य आज अपने आपे को शरीर तक सीमित मान बैठा है, क्योंकि प्रत्यक्ष तो इतना ही कुछ दीख पड़ता है। मन यद्यपि अदृश्य है पर वह भी शरीर का ही एक अवयव है। इसे ग्यारहवीं इंद्रिय भी कहा जाता है। वासना, तृष्णा इन्हीं दोनों का मिला-जुला खेल है, जो अनंतकाल तक चलते रहने पर भी कभी समाप्त नहीं हो सकता है। इसी उलझन के भवबंधनों में बँधा हुआ जीव चित्र-विचित्र प्रकार के अभाव अनुभव करता, असंतुष्ट रहता और उद्विग्नता-चिंता, आशंका के त्रास सहता रहता है। कोल्हू के बैल की तरह पिसते-पीसते रहने पर भी उसके पल्ले थकान और निराशा के अतिरिक्त और कुछ नहीं पड़ता। आश्चर्य इस बात का है कि अवांछनीय जाल-जंजालों से अपने को उबारने के लिए कुछ करना तो दूर, सोचने तक का अवसर नहीं देता। उलटे अनाचारों पर उतारू होकर कुछ भी करते रहने के लिए स्वयं सनकता, औरों को उकसाता रहता है, भले ही वह घृणित एवं अनर्थ स्तर का ही क्यों न हो ?

यही है अपने समय के मनुष्य का तात्त्विक पर्यवेक्षण। मूर्खता को कहने-सुनने में तो उपहासास्पद बताया जाता है, पर वस्तुतः वह इतनी प्रबल, आतुर एवं आवेशग्रस्त होता है कि उसके आवेग को रोक सकना अच्छे-अच्छों तक के लिए कठिन हो जाता है। यह उन्माद जब सामूहिकता के साथ जुड़ जाता है तो फिर स्थिति विशालकाय पागलखाने जैसी हो जाती है, जिसमें उस क्षेत्र के रोगी एकदूसरे को उकसाने, भड़काने, गिराने, सताने जैसी विडंबनाओं में ही लगे रहते हैं। वे सभी मात्र हानि ही हानि उठाते हैं।

गीताकार ने सच ही कहा है कि जब दुनिया सोती है, तब योगी जागते हैं। यह अनबूझ पहेली तभी प्रामाणिकसिद्ध हो सकती है, जब यह सोचा जाए कि असंख्यों अवांछनीयताओं की लहरें उठाते चलने वाले प्रस्तुत प्रवाह के साथ बहते रहने की अपेक्षा कोई आश्रय दे सकने वाला किनारा खोज सकने का मन उभरे। प्रचलनों को एक किनारे पर रखकर नए तौर-तरीके अपनाकर यथार्थता का आश्रय लेने वाली उमंग उमगे, अन्यथा अच्छे-भले नदी-नाले वाली जलसंपदा खारे समुद्र में गिरकर अपेय ही बनती चली जाएगी।

वर्त्तमान में सर्वत्र कुहासा छाया दिखता है। पतझड़ की तरह सर्वत्र ही ठूँठों का जमघट दीख पड़ता है। पतन और पराभव का नगाड़ा बजता सुनाई देता है। भविष्य अंधकारमय प्रतीत होता और लगता है कि मनुष्य समुदाय अब सामूहिक आत्महत्या करने पर ही उतारू होने के आवेश से बुरी तरह ग्रसित हो रहा है। चूहों और खरगोशों की संख्या जब असाधारण रूप से बढ़ जाती है, और उनके लिए खाने, पीने, रहने के लिए सहारा शेष नहीं रहता, तो वे किसी बड़े जलाशय में स्केण्डिनेवियन लेमार्क की तरह डूब मरने के लिए बेतहाशा दौड़ लगाते देखे जाते हैं। चल रही गतिविधियों का प्रभाव, परिणाम समझने के लिए जो भी समझदार प्रयत्न करते हैं उन्हें ऐसी ही विनाशकारी विभीषिका पूर्व की दिशा में उठने वाले घटाटोपों की तरह बढ़ती चलती आ रही प्रतीत होती है; साथ में चला आ रहा तूफान अपनी भविष्यवाणी अलग से करता है कि मानवी सत्ता, महत्ता, संपदा और प्रगति जैसे संचय में से कुछ भी उसकी चपेट से बचकर रह नहीं सकेगा।

अहंकारी यदुवंशी आपस में ही लड़कर कर खप गए थे। उनपर बाहर से कोई वज्रपात नहीं टूटा  था। आग सबसे पहले उसी स्थान को जलाती है, जहाँ से वह प्रकट होती है। बाहर फैलने और अन्यान्य वस्तुओं को जलाते चलने की प्रक्रिया तो बाद में आरंभ होती है। उद्दीप्त वासना, अनियंत्रित तृष्णा और उन्माद जैसी अहंकारिता का त्रिदोष जब महाग्राह की तरह मानवी गरिमा को निगलता, गटकता चला जा रहा तो बच सकने की आशा यत्किंचित ही शेष रह जाती है। वर्त्तमान में उफनते तूफानी अनाचार को देखते हुए औसत आदमी भावी संभावनाओं के संबंध में आशंकित और आतंकित ही हो सकता है। सचमुच हम महाविनाश की प्रलय-प्रक्रिया की ओर सरपट चाल से दौड़े जा रहे हैं।

प्रचंड प्रवाह को रोक सकने वाला बाँध विनिर्मित करने, जलधारा को नहरों के माध्यम से खेत-बगीचे तक पहुँचाने का काम तो निश्चय ही बड़ा कष्टसाध्य और श्रमसाध्य है। पर करने वाले जब प्राणपण से अपने पुरुषार्थ को सृजन की सदाशयता के साथ संबद्ध करते हैं, तो उनकी संसाधना भी कम चमत्कारी परिणाम उत्पन्न नहीं करती। फरहाद शीरी को पाने के लिए पहाड़ खोदकर लंबी नहर निकाल सकने में एकाकी प्रयत्नों के बलबूते ही सफल हो गया था। गंगा को स्वर्ग से घसीटकर जमीन पर बहने के लिए बाधित करने में भगीरथ अकेले ही सफल हो गए थे। व्यापक अंधकार पर छोटा दीखने वाला सूरज ही विजय प्राप्त कर लेता है, फिर यह आशा भी की जा सकती है कि मनुष्य में उत्कृष्टता का उदय होगा तो यह वातावरण भी बदल जाएगा, जो हर दृष्टि से भयंकर ही भयंकर दीख पड़ रहा है। यह आशावाद ही उज्ज्वल भविष्य का प्राण है।


आदर्शोन्मुख कर्मनिष्ठा

लंदन के एक होटल में दो व्यक्ति बैठे काफी की चुस्कियाँ लेते हुए बात कर रहे थे। इनमें एक था— भारतीय दूसरा यूरोपियन। चर्चा का विषय था, भारतीय व्यक्ति द्वारा दिया गया आज का भाषण। वह भारतीय अभी 35-36 वर्ष का युवक ही था, परंतु आज के व्याख्यान में विज्ञान के जिन नए क्षितिजों की ओर उसने इंगित किया था, उनसे विज्ञान-जगत की नइ संभावनाएँ साकार होने लगी थीं। भारतीय वैज्ञानिक ने अपने अन्वेषणों का सार-विश्लेषण करते हुए सिद्ध किया कि बिना तार की सहायता के भी एक स्थान से दूसरे स्थान पर संदेश भेजे जा सकते हैं। तब रेडियो वायरलैस की कल्पना भी किसी को न हुई थी। ये आविष्कार तो उसी खोज के बाद किए गए; जिनका श्रेय निश्चित रूप से भारत के प्रतिभासंपन्न वैज्ञानिक— ऋषि और लंदन के होटल में ठहरे उस युवक को हैं, जिसे लोग जगदीश चंद्र बसु के नाम से जानते थे।

चर्चा के बीच बसु के व्याख्यान की प्रशंसा करते हुए यूरोपियन व्यक्ति ने कहा— “तो आप इस आविष्कार को कब करवा रहे हैं”? “क्षमा करना ! मेरा ऐसा कोई इरादा नहीं है। मैं विश्वास करता हूँ कि वैज्ञानिक आविष्कार मनुष्यमात्र की संपत्ति है और उनका ।करना उचित नहीं है।" — जगदीश बसु का उत्तर था।

इस विश्वास को सराहते हुए यूरोपियन व्यक्ति ने कहा— “मित्र एक सुझाव है। मेरे एक मित्र हैं, जो आपको इस आविष्कार के बदले जो चाहेंगे मूल्य चुकाएँगे। आप इस आविष्कार के संबंध में किसी से चर्चा न करें।”

“यह सुझाव भी मेरे सिद्धांतों के विपरीत है। मैं मानव जाति की सेवा के लिए विज्ञान की आराधना करता हूँ। किसी व्यापारी को अपनी पूजा कैसे बेचूँ” ?

चर्चाएँ और भी चलती रहीं ! दोनों मित्र विदा हुए। परंतु दूसरे दिन जगदीश चन्द्र बसु को पता चला कि इस आविष्कार के संबंध में उन्होंने जो परीक्षण किए थे और जिन निष्कर्षों पर पहुँचे थे, उन्हें कोई चुरा ले गया है।

घटना सन् 1895 की है। पता नहीं किसने बसु की मेहनत और साधना के परिणामों और सफलताओं को चुराया, पर वह खिन्न न हुए और न ही उद्विग्नता ने उन्हें सताया। उसी शांतभाव से वह अपने आगे के कार्य में लगे रहें। अभी एक वर्ष पूर्व जब उन्होंने अपनी पैंतीसवीं वर्षगाँठ मनाई थी, तब अपना सारा जीवन विज्ञान की शोध और मानव जाति की सेवा में लगाने का निश्चय किया था। इस निश्चय की पूर्ति में यह पहली सफलता मिली थी, वह भी हाथ से फिसल गई।

परंतु हताश न हुए। उन्होंने सीखा था कि सफलता से भी कई गुना मूल्यवान उद्देश्य की महानता है, जिसके प्रति स्वयं को नियोजित किया गया। संघर्ष जीवन की शान है, जो हजार मुखड़े लेकर चुनौती देता है। उस चुनौती को जो स्वीकार कर लड़ने के लिए कमर कस ले, वे विजयी होते, पर जो चुनौतियों को सामने देखकर घबड़ा जाए, उन्हें काल किसी कूड़े के ढेर में फेंक सकता है।

इस घटना के कुछ दिनों बाद एक दूसरे यूरोपियन वैज्ञानिक ने रेडियो और वायरलैस के आविष्कार को अपने नाम से पेटेंट करा लिया। कहते हैं यह वैज्ञानिक ही उस दिन लंदन के होटल में वसु के साथ देखा गया था। जब तक आविष्कार प्रकट न हुआ था, तब तक बसु थोड़े चिंतित थे। परंतु जब आविष्कार की घोषणा हुई तो बसु को चेहरा खिल उठा। इसलिए नहीं कि अपराधी मिल गया। वरन इसलिए कि उनकी उपलब्धियों का लाभ मनुष्य जाति को मिलना संभव हुआ। अब इसका श्रेय किसे मिला, इसकी उन्हें कोई चिंता न थी।

डॉ. जगदीश चंद्र बसु को अपनी इस आदर्शनिष्ठा के कारण प्रायः घाटे में ही रहना पड़ा। आविष्कार पेटेंट कराने के बाद उसके आविष्कर्त्ता वैज्ञानिक अपने लिए पर्याप्त सुविधा और साधनसंपन्न परिस्थितियाँ निर्मित कर लेते थे, परंतु भारत का यह तप:पूत ऋषि आजीवन अपने आदर्शों के लिए कष्ट-कठिनाइयों से भरा जीवन जीता रहा। उनका हृदय इस बात के लिए तैयार ही नहीं होता था कि विज्ञान की साधना और उपलब्धियों का उपयोग पैसा कमाने के लिए करें, न ही उन्हें श्रेय की कभी चिंता होती थी।

आगे चलकर उन्होंने और अनेकों चमत्कृत कर देने वाली खोजें की। पहली बार उनके प्रयासों से संसार को मालूम हुआ कि पौधों में भी जीवन है। इन खोजों का परिचय जब विभिन्न देशों में फैला, तो कई देशों के पूँजीपति-उद्योगपति उनके पास यह प्रस्ताव लेकर आने लगे कि वे अपने आविष्कार को पेटेंट करवा लें अथवा बेच दें। परंतु सिद्धांतों और आदर्शों को प्राणों से अधिक मानने वाले आचार्य बसु के लिए पैसा नहीं, आदर्श मूल्यवान था। पूँजीपतियों के प्रस्ताव से उन्हें लगा कि ज्ञान और मानवता के कल्याण की जो साधना कर रहा हूँ और उससे जो उपलब्धियाँ मिल रही हैं, उन्हें यदि इन लोगों के हाथ बेच दिया तो साधना- पथ में व्यवधान उपस्थित हो जाएगा और यह भी कि इस कारण वह एक साधक की भाँति विज्ञान के क्षेत्र में अपना अस्तित्व खाे देंगे।

अंत तक उन्होंने अपनी खोजों से आर्थिक लाभ नहीं उठाया। वरन श्रमपूर्वक ही जीविकोपार्जन करते रहे। जिस संस्था में वह प्राध्यापक थे, वहाँ से उन्हें डेढ़ हजार रुपया प्रतिमास मिलता था। चाहते तो उस रकम में ठाट-बाट के साथ रह सकते थे। पर नहीं शान-शौकत उनका दर्शन नहीं था और न ही किसी से कुछ प्रशंसा करवाने की आकांक्षा। इस वेतन का भी पाँचवाँ हिस्सा अपने लिए रखते। बाकी जनसेवा और शोधकार्यों में खर्च करते।

उनकी इस जीवन-नीति पर आश्चर्य प्रकट करते हुए उनके एक मित्र ने पूछा— “आप अंतर्राष्ट्रीय ख्याति के व्यक्ति होते हुए जिस ढंग से रहते हैं, उससे आपका मूल्यांकन कैसे होगा ? आचार्य बसु ने गंभीरता से कहा— “ मित्र ! मनुष्य जीवन के मूल्यांकन की कसौटी उसके द्वारा किया गया शान-शौकत का अर्जन नहीं है। वरन वह आदर्शोन्मुख कर्मनिष्ठा है। जिसके बलबूते हम समाज को कुछ सार्थक और उपयोगी दे पाते हैं। शान-शौकत बटोरने वालों की तो नीति उलटी है। वह देने के स्थान पर समाज से हड़पन— दूसरों को हक छीनने और अपने पास बटोरने में ही सारा जीवन गँवा देते हैं। जबकि जीवन की सार्थकता कम-से-कम लेने और अधिक-से-अधिक देने में है। इस तरह व्यक्ति संतुष्ट और समाज सुखी रहता है।” बसु की यह व्याख्या सुन मित्र चकित रह गया। अब उसे पता लगा कि उन्होंने श्रेय-सम्मान, शान-शौकत को क्यों ठुकराया ? इसके पीछे जीवन के प्रति उनका सार्थक दृष्टिकोण ही था।


मनीआर्डर से भेज दिया (कहानी)

एक युवक दिल्ली के गाँधी साहित्य निधि का पुस्तकालय देखते-देखते एक गाँधी जी की लिखी पुस्तक बिना दाम दिए जेब में रख ले गया।

पुस्तक में बड़ी प्रेरक बातें थीं। पर साथ ही उसमें यह भी लिखा हुआ था कि साध्य के साथ साधना भी पवित्र होनी चाहिए।

वह गाँधी जी के मार्ग पर चलना चाहता था। उसे पुस्तक चुरा लेने की बात बहुत खटकी और तत्काल पुस्तक का मूल्य मनीआर्डर से भेज दिया। अपनी मानसिक दुर्बलता के लिए क्षमा माँगी।


नवयुग की आधारशिला रखेंगे क्रांतिदर्शी ऋषि

भ्रांतियों की भूल-भुलैया में भटके मानव को श्रुति सतत एक संदेश देती है कि भविष्य के प्रति आशान्वित रहो, यह मत सोचो कि जो तम अभी छाया हुआ है, सदैव बना रहेगा। मनुष्यों में से ही ऋषि वर्ग जन्म लेगा, उनका ऋषित्व जागेगा एवं आसन्न विपन्नताओं को मिटाएगा। तीन प्रकार के विकास मनुष्य में होते बताए जाते हैं। एक कर्मयोगी— कर्तव्यपरायण महामानव बनते हैं, दूसरे ज्ञानयोगी— ऋषि कहलाते हैं तथा तीसरे भक्तियोगी— जीवनमुक्त अवतारी देवदूतों में गिने जाते हैं। तीसरे कोटि के विकसित मानवों को दैवी सत्ता, परोक्ष सत्ता का प्रतिनिधि भी माना जा सकता है। प्रथम श्रेणी के व्यक्ति सारी गतिविधियों का क्रियान्वयनकर सृजन के श्रेयधारी बनते— कृत-कृत्य होते हैं, किंतु सबसे महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है ऋषि वर्ग की, जो युगानुकूल चिंतन करते तथा  कर्तृत्त्व का निर्धारण करते हैं। ये जब जिस काल या युग में सक्रिय होते हैंं, उसकी काया पलटकर दिखाते हैं।

प्रख्यात मनीषी इब्ने सिना के चिंतनकोश “दानिम नामे दुशात्वे” के पृष्ठ सूचित करते हैं कि जीवन के बहाव में विकास की गति यदि सही दिशा में है, तो कुछ विलक्षण क्षणों का आना अनिवार्य है। ऐसे क्षणों में अनुभव होने लगता है कि व्यक्तिगत अस्तित्व, हित, आवश्यकताएँ, लक्ष्य सभी कुछ समाज से किसी न किसी रूप में अभिन्न और अविच्छिन्न है। ऐसी दशा में व्यक्तिगत 'लघु अहं', जिसमें उसकी नियति तथा जीवन की परिस्थितियों की अनन्य प्रकृति परावर्तित होती है एवं “वृहत अहं”, जो समूचे जनगण का— सारी मानव जाति का समष्टि रूप है, में समा जाता है।

समा जाने के इन्हीं क्षणों में, बोध के इन्हीं पलों में, मानवी व्यक्तित्व के भीतर से ऋषित्व प्रस्फुटित होता है। वेद कहते हैं ऋषि वे होते हैं— जो क्रांतिदर्शी होते हैं, अर्थात् जिनकी दृष्टि संकीर्ण स्वार्थपरता, वर्त्तमान के लाभ-हानियों की दीवारों को भेदकर देखने में समर्थ होती है। दृष्टि की इसी विशेषता के कारण ऋषि को द्रष्टा कहा गया है, यों साधारणतया दिखाई सभी को देता है। 6 सौ करोड़ पहुँचती जा रही  विश्व की जनसंख्या में अंधों की संख्या मुश्किल से कुछ करोड़ के दायरे में होगी। पर आँखों से देखना ही तो सब कुछ नहीं है। यद्यपि शक्तिशाली टेलीस्कोप, इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप आदि बहुमूल्य यंत्रों की सहायता से दृष्टि का दायरा बढ़ाया भी जा सकता है, लोग बढ़ाते भी हैं। किंतु इस बढ़ी सामर्थ्य के बाद भी जीवन के कुछ क्षेत्र ऐसे हैं, जो अछूते रह जाते हैं। देखने की बढ़ी क्षमता भी नाकामयाब सिद्ध होती है।

जहाँ इन कीमती यंत्रों की सहायता नाकामयाब सिद्ध होती है, वहीं ऋषि की दृष्टि सफल होती है। सरलता से देखने, विवेचन-विश्लेषण करने में सक्षम होती है। कारण कि उसके देखने का माध्यम अंतःप्रज्ञा है। उपनिषद्कार इस दृष्टि के तीन आयाम बताते हैं। सूक्ष्मदृष्टि, अंतदृष्टि और दिव्यदृष्टि इस सूक्ष्मदृष्टि का प्रयोग क्षेत्र बैक्टीरिया, विषाणु जैसे नन्हें जीवों की गतिविधियों के निरीक्षण से भिन्न है। इसका क्षेत्र है मानवीय जीवन के सुविस्तृत पटल पर अनेक रंग-रूपों वाली इतनी गतिविधियाँ चलती रहती हैं, इनकी क्रियाओं-प्रतिक्रियाओं की संख्या इतनी अधिक और सूक्ष्म होती है कि सामान्यजन इसे नहीं देख पाते, पर ऋषि अपनी इस दृष्टि के सहारे इसे देखते, कारणों को समझते और तद्नुरूप समाधान सोचने में सफल होते हैं।

कारणों का वास्तविक उद्गम चिंतन चेतना का उर्वर-क्षेत्र है— मनुष्य का अपना अंतराल है। चरित्र व व्यवहार की कठपुतलियों की डोर घुमाना, उन्हें नचाना, यहीं से संभव बन पड़ता है। बाहर के जीवनक्रम में घटने वाली वांछित-अवांछित गतिविधियाँ— कार्य के रूप में सामने आती हैं। कारणों की परिपक्वता के बाद कार्य को रोक पाना असंभव प्रायः होता है। किसी भी तरह जबरदस्ती कर यदि रोक भी दिया जाए तो चिंतन-क्षेत्र में उपजे ये कारण अंदर ही अंदर नासूर की तरह पनपते और मनोंरोगों के रूप में फट पड़ते हैं। किसी भी तरह इन अवांछित कारणों को बीजरूप में ही समाप्त किया जा सके, तो इन विकृतियों की गुंजाइश न रहेगी। पर किया तो तब जाए, जब ये बीज दिखाई पड़ें। इन्हें देखने की सामर्थ्य ऋषि की अंतर्दृष्टि में होती है, जो इन अवांछित कुप्रवृत्तियों, दुश्चिंतन को बीजरूप में देखते-परखते और स्पष्ट करते हैं। साथ ही सत्प्रवृत्तियों, सद्गुणों के बीजों के अंकुरण लायक भूमि तैयारकर सत्चिंतन का खाद-पानी जुटाते रहते हैं।

दृष्टिक्षमता की इस महत्त्वपूर्ण उपलब्धि का तीसरा आयाम है—  दिव्यदृष्टि। सामान्य मनुष्य या तो वर्त्तमान की कठिनाइयों का रोना रोते अथवा अतीत की छोटी-मोटी उपलब्धियों से गर्वोन्मत्त हो उन्मत्त हाथी की तरह पगलाए फिरते हैं। उन्हें अभी के सिवा कभी का, किसी और आयाम का दिखाई नहीं देता। अभी के देखने का दायरा स्वार्थों की परिधि को संकीर्णता के अनुरूप छोटा— सिकुड़ा, सिमटा रहता है। यही कारण है कि बहुसंख्यक जन भ्रांतियों के भ्रम-भटकाव में उलझे जिस-तिस तरह जिंदगी के दिन गुजार रहे हैं। ऐसे में स्वाभाविक है मानवी गरिमा के अनुरूप मर्यादा का परिपालन न बन पड़े। आज की दशा यही है।

उलटी दशा को सुधारने का संकेत सिर्फ ऋषि की दिव्यदृष्टि देती है, क्योंकि वह इसके सहारे अतीत के इतिहास का मूल्यांकन करता—  मनुष्य की बीती भूलों को परखते— सुधार का उपाय सोचते हैं। सुधार के यही उपाय वर्तमान जीवन में लागू करने को प्रेरित करते हैं। इतना ही नहीं उन्हें वर्त्तमान के पटाक्षेप के बाद का भविष्य साफ नजर आता है। भविष्य के योग्य स्वयं के समाज को गढ़ा जाए इसी ओर प्रयत्न चलते हैं। भगवान कृष्ण ने अर्जुन को यही दृष्टि दी थी। जिसके सहारे वह दूरगामी भविष्य को देख पाने, समझने और तदनुरूप अपने को ढालने में समर्थ हुआ।

त्रिविध दृष्टियों के साथ ऋषि के स्वरूप भी त्रिविध होते हैं—  ब्रह्मर्षि, राजर्षि, देवर्षि। तीनों ही समाजपरायण हो, लोकहित में अपने-अपने ढंग से संलग्न रहते हैं। ब्रह्मर्षियों का क्षेत्र-चिंतन है। इसकी अपनी शक्ति होती है। जो चेतना की गहराई में जाकर विश्व की सूक्ष्मता में प्रवेशकर जीवन के सिद्धांतों की शोध करती है। इस चिंतनशक्ति के अभाव में समाज पंगु हो जाएगा। प्रगति रुक जाएगी। भौतिक वैज्ञानिक शोधकार्य के लिए जिस प्रकार चिंतन एकांत की आवश्यकता होती है, ठीक उसी प्रकार मनोवैज्ञानिक संशोधनों के लिए भी एकांत सेवन करना पड़ता है। ऐसे एकांतसेवी जो ब्रह्मर्षि होते हैं, वे संसार को जीवन के तत्त्वज्ञान का चिंतनात्मक सार देते हैं, जिसमें जीवन की समस्याओं का समाधान समाहित होता।

दूसरी शक्ति सेवा की है। ब्रह्मर्षियों के चिंतन के आधार पर समाजसेवी, लोकसेवा में निरत रहते हैं। इन्हें ही राजर्षि कहा जाता है। ऐसे सेवा करने वाले समाज में न रहें तो समाज सूखकर कुम्हला जाएगा। ऐसे लोकसेवी विचारशील समाज में आवाज बुलंद करते हैं। आंदोलन की जरूरत हो तो आंदोलन खड़ा करते, संगठन की जरूरत हो तो वह भी बनाते हैं। इस समूची कर्मठता के पीछे उनका कोई निजी स्वार्थ नहीं रहता। इधर ब्रह्मर्षि से सूत्र लेते एवं लोकसेवा के क्षेत्र में उसपर अमल करते हैं। ज्ञान द्वारा लोकरंजन करते हुए ये लोकसेवी राजर्षि समाज में एक बहुत बड़ी शक्ति की भूमिका निभाते हैं।

तीसरी शक्ति सुगम बोधपूर्ण साहित्य व प्रेरक वाणी की है। जिन विचारों का ज्ञानियों को अनुभव होता है, उन विचारों को ऐसे चुने हुए शब्दों में ये ज्ञानी ही प्रकट करते हैं, ताकि लोकवाणी में लोग उन्हें ग्रहण कर सकें। इसमें विचार को पहचानने के साथ उसे वाणी का जामा पहनाना पड़ता है। वरना उचित शब्दों के अभाव में प्रकाश की जगह तम संव्याप्त हो सकता है। विचार तो अंतर की गहराई में होता है। इसे प्रकट करने में शब्द का सहारा आवश्यक है। इसमें कुछ न्यूनता रहने का भाव होता है। दूसरा शब्द इस्तेमाल करे तो कुछ अतिरिक्त भाव भी आ सकता है, इसलिए एक-एक शब्द के संबंध में विवेक रखना पड़ता है, ताकि न न्यून भाव प्रकट हो, न अतिरिक्त भाव, न विपरीत भाव। इन त्रिविध दोषों को टालकर— जैसे का तैसा प्रकट करना चाहिए। यह तीसरी शक्ति जनता के हृदयों तक  सद्विचार पहुँचाने की कुशलता की शक्ति जिनमें होती है, उन्हें देवर्षि कहते हैं। नारद मुनि के पास यही शक्ति थी, जिससे उनने ध्रुव, पार्वती, वाल्मीकि आदि को प्रेरणा दी।

तीनों ही ऋषियों के कार्य का प्राण है— उनकी त्रिविध दृष्टि। सूर्य और प्रकाश की तरह दोनों एक हैं। एक के बिना दूसरे के बारे में सोचा नहीं जा सकता। ब्रह्मर्षियों की मिसाल देनी हो तो वशिष्ठ, याज्ञवल्क्य का उदाहरण दे सकते हैं। देवर्षियों में नारद की चर्चा ऊपर हो चुकी। राजर्षियों में जनक का नाम लिया जाता है। यह जरूरी नहीं है, ऐसे लोग राजा हों। वे सेवा में निर्लिप्तभाव से लीन हैं, इतना काफी है। इस जमाने में भी अपने देश ने श्री अरविंद जैसे ब्रह्मर्षि, रविबाबू (रवींद्र टैगोर) जैसे देवर्षि और गाँधी, पुरुषोत्तम दास टंडन जैसे राजर्षि पैदा किए हैं।

इन सभी के पास दृष्टि की संपदा तो एक-सी है, पर कार्य के अनुरूप लक्षण अलग हैं। ब्रह्मऋषि का लक्षण है— चिंतन की शक्ति । राजर्षि का लक्षण— उसकी निरहंकार सेवा भावना है। वैसे ही देवर्षि का लक्षण है— सबके लिए प्रेम भरा दिल। वह नारद की तरह देव-दानव-मानव सभी से मिलता है। उन्हें प्रेरित करता है। आज भी समाज में देव-दानव-मानव, विशिष्ट,अशिष्ट और शिष्ट के रूप में हैं। देवर्षि का कर्त्तव्य अपनी वाणी व लेखनी के प्रचार के द्वारा विशिष्ट को समाज के नेतृत्व हेतु आगे लाना, अशिष्ट को सुधारना और शिष्ट को सेवाकार्यों में लगाना है।

ऋषियों का यह तंत्र कभी समूचे भारत में सक्रिय था। ब्रह्मर्षि श्री अरविंद के भविष्यसंकेत के अनुसार निकट भविष्य में पुनः यही गौरवमयी परंपरा दुहराई जाने वाली है। ऋषि संस्कृति का तेजोमय प्रखर सूर्य अपने  सद्विचार, सद्गुणों व सत्कर्मों की शुभ रश्मियों से शीघ्र ही पुनः समाजरूपी क्षितिज को प्रकाशित करेगा।

इन दिनों जबकि एक तरफ आकाश में सघन तमिस्रा का साम्राज्य है, तो दूसरी ओर ब्रह्ममुहूर्त्त का आभास भी प्राची में उदीयमान होता दीख पड़ता है। ऐसे में चूकें नहीं। यही संदेश यह संधिवेला लेकर आ रही है। तमिस्रा के कारण मंद पड़ गई त्रिविध दृष्टियों को हम सब प्रखर करें। ऋषि संतान होने का गौरव बोधकर स्वयं को उसी अनुरूप गढ़ने तथा समाज में ऋषि संस्कृति की गौरवमयी प्रतिष्ठापना में जुट पड़ें। यदि हम ऐसा कर सके तो निश्चित ही उज्ज्वल भविष्य को मूर्तिमान कर सकेंगे, जो कि इक्कीसवीं सदी का पर्याप्त पर्याय होगा।


सूरज ने कहा (कहानी)

पृथ्वी ने सूरज से कहा— "आप दिनमान घटाते-बढ़ाते रहते हैं। स्थिर क्यों नहीं रहते ?”

सूरज ने कहा— "तुम्हीं चैन से नहीं बैठती। नाचती और दौड़ती रहती हो। फिर ऐसी दशा में स्थिरता किस प्रकार रह सके।”


मधु-संचय (कविता-संग्रह)

(1)  प्रगति-गान

कर्मक्षेत्र में प्रगति पंथ पर, रहें चरण गतिमान ।

थकें नहीं, हम रुकें नहीं, प्रभु माँग रहे वरदान॥

हिमगिरि के ऊँचे शिखरों से गंगा की धारा बहती।

मंजिल को पाने से पहले कितनी बाधाएँ सहती॥

अनगिन चट्टानें धारा का मार्ग भले ही हो रोकें।

कितने ही वीरान मरुस्थल उस प्रवाह को यदि टोकें॥

सागर से जा ही मिलती तब जग करता गुणगान।

प्राणवायु का शीतल झोंका कभी राह में क्या थकता ?

अरे तेल रहते दीपक का जलना भी क्या रुक सकता ?

धरती, चंद्र और तारे पथ अपना-अपने आप बनाते।

वृक्ष, वनस्पति, सारे प्राणी सतत प्रगति करते जाते॥

नहीं ठिठकते बीच राह में यही सभी की आन।

सृष्टिमौर मानव आखिर फिर हो निराश क्यों थक जाएँ।।

मंजिल पर बढ़ने वाले पग, लक्ष्य पूर्व क्यों रुक जाएँ।

जीवन मग की हर बाधा हम फूल समझ बढ़ते जाएँ॥

काम, क्रोध और लोभ, मोह, सब प्रलोभनों टकरएँ।

बिन भटकें, बिन मुड़े मार्ग से करें लक्ष्य संधान।

कर्मक्षेत्र में प्रगति पंथ पर रहें चरण गतिमान॥

— सुरभि कुलश्रेष्ठ

(2)  प्रतिभा संवर्द्धन

प्रतिभा अमर हुई है, उसका पौरुष अमर हुआ।

उसकी साधों के सौरभ पर, जन-मन भ्रमर हुआ॥

प्रतिभा की विनम्रता ! उसकी नींव बनाती है।

अपने साहस, संकल्पों के, भवन उठाती है॥

वह ही जीता जग में, जिसका जीवन-समर हुआ।

प्रतिभा अमर हुई है, उसका पौरुष अमर हुआ॥

प्रतिभा ही जनमंगल की, आहुतियाँ देती है।

जनहिताय विष भी पीने की पीड़ा सहती है।

अमृत हुआ, अधर को छूकर शुभ कब जहर हुआ।

प्रतिभा अमर हुई है, उसका पौरुष अमर हुआ।

युग-पीड़ा प्रतिभाओं को, आवाज लगाती है।

मानवता के घर में, पशुता सेंध लगाती है॥

युग-प्रज्ञा का आहुतियों को, इंगित उधर हुआ।

प्रतिभा अमर हुई है, उसका पौरुष अमर हुआ।

— मंगल विजय

(3)  हम जिएँ किस तरह

हों खुले मन, खुली खिड़कियों की तरह।

रोशनी बाँटते हों दियों की तरह॥1॥

हों अगर खिड़कियाँ बंद, बढ़ती घुटन,

हो बंँधा नीर तो खूब बढ़ती सड़न,

वायु- से बह सकें हम सभी के लिए।

बज सकें हम मधुर घंटियों की तरह॥2॥

सूर्य बँधता नहीं बादलों में कभी,

कौन प्रतिभा रुकी दलदलों में कभी ?

यदि हृदय में प्रबल एक संकल्प हो।

विघ्न मिट जाएँगे गलतियों की तरह॥3॥

गिरिशिखर-सा सदा उच्च आदर्श हो,

फूल-सा शूल के बीच उत्कर्ष हो,

फूल बनकर खिलें पुण्य, उद्यान में।

हों नहीं हम विजन घाटियों की तरह॥4॥

कर सकें यदि न कुछ हम समय के लिए,

दे सकें कुछ न दुखते हृदय के लिए,

व्यर्थ रह जाएँगे काल की रेत पर।

हम पड़े खोखले सीपियों की तरह॥5॥

— शचीन्द्र भटनागर

(4)  पर-उदारता उसकी

पहुँच न पाए हम सागर तक— बहुत दूर था।

पर उदारता उसकी— बरस गया बादल बन॥1॥

छू न सके हम सूरज को— वह बहुत गरम था।

पर उदारता उसकी— हमको छुआ किरण बन।।2।।

भर न सके बाहों में हम, आकाश विशद था।

पर उदारता उसकी— आया नित ऊर्जा बन।।3।।

ला न सके आँगन में नंदन कानन को।

पर उदारता उसकी— आता रहा गंध बन॥4॥

हिमगिरि पर चढ़ते, यह बात असंभव ही थी।

पर उदारता उसकी— आया गंग नीर बन॥5॥

और परम प्रभु की दूरी तो बस अनंत है।

पर उदारता उसकी— तन में बसा प्राण बन॥6॥

— माया वर्मा


एक व्यक्ति ने सुधारा समूचे अपराधी वर्ग को

लंदन का ‘वालवर्थ’ नामक कस्बा। आज ही एक पढ़ा-लिखा सुशिक्षित-सा लगने वाला युवक यहाँ रहने आया था। कस्बे के निवासी भी उसे आश्चर्य की निगाहों से देख रहे थे। भला यह यहाँ क्यों आया ? इस समूचे आश्चर्य और सभी के भौंचक्के होने का कारण वालवर्थ के निवासियों का पतित जीवन था। जिसके कारण समूची बस्ती इस कदर बदनाम हो चुकी थी कि भूल से भी कोई उधर आने का साहस न करता।

इन निवासियों में थोड़े से मजदूर थे— बाकी चोरी, जेबकटी से अपनी रोजी चलाते। बात-बात में किसी की हत्या कर देना सामान्य बात थी। नोच-खसोटकर जो भी कमाते, वह शराबघर में चला जाता। बचा-खुचा बरबाद करने के लिए वेश्याघर-जुआघर भरपूर थे। इनके बीच में किसी सभ्य-सुशिक्षित का प्रवेश आश्चर्यजनक तो था ही।

धीरे-धीरे लोग उसके पास आने लगे। पास आते हँसते—  मजाक उड़ाते। उनके हँसने के साथ वह भी खूब हँसता। अब उसने बच्चों पर ध्यान केंद्रित किया। स्वास्थ्य और शिक्षा यही मुख्य मुद्दे थे। सारा दिन इसी में खपता। माताओं को स्वास्थ्यविषयक जानकारी देने के साथ बच्चों को सुसंस्कारित करने का क्रम चलाता रहता।

धीरे-धीरे लोगों का विश्वास उसके प्रति बढ़ता गया। बस्ती निवासियों को यह देखकर बड़ी प्रसन्नता हुई। कोई तो है जो उनके बच्चों के कल्याण का ध्यान रखता है। इस बढ़ते विश्वास का परिणाम यह रहा कि उस शिक्षित नवयुवक ने उन सभी से अनुरोध किया कि सभी रविवासरीय कक्षा में अवश्य पधारें। कृतज्ञता से अभिभूत हो प्रायः सभी आने लगे। सौम्य-सरल ढंग से उन्हें जीवनबोध बताया जाता। चरित्रनिष्ठा की गरिमा समझाई जाती। इसके साथ यह भी बताया गया कि कम-से-कम रविवार के दिन आप लोग कोई गलत काम न करें। अपनत्व और सेवा के वशीभूत हो सभी ने स्वीकार कर लिया।

एक दिन बस्ती के सभी निवासियों ने आपस में तय किया कि इस युवक को सेवा करते इतने दिन हो गए, आखिर हमें भी तो कुछ करना चाहिए। पूछने पर युवक ने कहा—" क्यों न हम लोग पिकनिक मनाएँ"। तीन-चार दिन के इस कार्यक्रम में यह तय किया गया कि कोई भी बदमाशी चोरी नहीं करेगा। उन लोगों की जिंदगी का यह पहला  अवसर था, जब चार दिन बिना किसी अपराध के कटे।

इसके बाद तो परिवर्तन शुरू हो गया। अपराध की जगह लोगों ने श्रम को अपनाया। कुछ सेना में भर्ती हुए, कुछ मिलों में। शनैः-शनैः समूची बस्ती का कायाकल्प हो गया। एक ही व्यक्ति के प्रभावकारी व्यक्तित्व ने प्रमाणित कर दिया कि व्यक्तित्व अन्यों को गढ़ सकते हैं। इस प्रभावकारी व्यक्तित्व के स्वामी थे सी. एफ. एण्ड्रयूज, जिन्होंने कैंब्रीज विश्वविद्यालय से अपनी शिक्षा समाप्त करने के बाद समाज सेवा को अपना कार्यक्षेत्र चुना।

‘वालवर्थ’ निवासियों के बदले जीवन को लोग हतप्रभ हो देखते और स्वीकारते कि एक ही किंतु सेवापरायण— आदर्शों का धनी अनेकों का जीवन बदलने में सक्षम है। श्री एण्ड्र्यूज कहा करते थे —"बुराइयाँ हैं, आदमी और समाज बुरा है— इसका रोना रोने की जगह यदि उनको परिवर्तित करने, नए ढंग से गढ़ने—नया रूप देने के प्रयत्न में जुट पड़ा जाए तो एक बस्ती ही क्यों, पूरे समाज का कायाकल्प संभव है।" दीनबंधु एण्ड्रयूज के विचार आज भी सामयिक हैं और तदनुरूप आचरण के लिए हम सभी को पुकारते हैं।


मधु-संचय (कविता-संग्रह)

(1)  प्रगति-गान

कर्मक्षेत्र में प्रगति पंथ पर, रहें चरण गतिमान ।

थकें नहीं, हम रुकें नहीं, प्रभु माँग रहे वरदान॥

हिमगिरि के ऊँचे शिखरों से गंगा की धारा बहती।

मंजिल को पाने से पहले कितनी बाधाएँ सहती॥

अनगिन चट्टानें धारा का मार्ग भले ही हो रोकें।

कितने ही वीरान मरुस्थल उस प्रवाह को यदि टोकें॥

सागर से जा ही मिलती तब जग करता गुणगान।

प्राणवायु का शीतल झोंका कभी राह में क्या थकता ?

अरे तेल रहते दीपक का जलना भी क्या रुक सकता ?

धरती, चंद्र और तारे पथ अपना-अपने आप बनाते।

वृक्ष, वनस्पति, सारे प्राणी सतत प्रगति करते जाते॥

नहीं ठिठकते बीच राह में यही सभी की आन।

सृष्टिमौर मानव आखिर फिर हो निराश क्यों थक जाएँ।।

मंजिल पर बढ़ने वाले पग, लक्ष्य पूर्व क्यों रुक जाएँ।

जीवन मग की हर बाधा हम फूल समझ बढ़ते जाएँ॥

काम, क्रोध और लोभ, मोह, सब प्रलोभनों टकरएँ।

बिन भटकें, बिन मुड़े मार्ग से करें लक्ष्य संधान।

कर्मक्षेत्र में प्रगति पंथ पर रहें चरण गतिमान॥

— सुरभि कुलश्रेष्ठ

(2)  प्रतिभा संवर्द्धन

प्रतिभा अमर हुई है, उसका पौरुष अमर हुआ।

उसकी साधों के सौरभ पर, जन-मन भ्रमर हुआ॥

प्रतिभा की विनम्रता ! उसकी नींव बनाती है।

अपने साहस, संकल्पों के, भवन उठाती है॥

वह ही जीता जग में, जिसका जीवन-समर हुआ।

प्रतिभा अमर हुई है, उसका पौरुष अमर हुआ॥

प्रतिभा ही जनमंगल की, आहुतियाँ देती है।

जनहिताय विष भी पीने की पीड़ा सहती है।

अमृत हुआ, अधर को छूकर शुभ कब जहर हुआ।

प्रतिभा अमर हुई है, उसका पौरुष अमर हुआ।

युग-पीड़ा प्रतिभाओं को, आवाज लगाती है।

मानवता के घर में, पशुता सेंध लगाती है॥

युग-प्रज्ञा का आहुतियों को, इंगित उधर हुआ।

प्रतिभा अमर हुई है, उसका पौरुष अमर हुआ।

— मंगल विजय

(3)  हम जिएँ किस तरह

हों खुले मन, खुली खिड़कियों की तरह।

रोशनी बाँटते हों दियों की तरह॥1॥

हों अगर खिड़कियाँ बंद, बढ़ती घुटन,

हो बंँधा नीर तो खूब बढ़ती सड़न,

वायु- से बह सकें हम सभी के लिए।

बज सकें हम मधुर घंटियों की तरह॥2॥

सूर्य बँधता नहीं बादलों में कभी,

कौन प्रतिभा रुकी दलदलों में कभी ?

यदि हृदय में प्रबल एक संकल्प हो।

विघ्न मिट जाएँगे गलतियों की तरह॥3॥

गिरिशिखर-सा सदा उच्च आदर्श हो,

फूल-सा शूल के बीच उत्कर्ष हो,

फूल बनकर खिलें पुण्य, उद्यान में।

हों नहीं हम विजन घाटियों की तरह॥4॥

कर सकें यदि न कुछ हम समय के लिए,

दे सकें कुछ न दुखते हृदय के लिए,

व्यर्थ रह जाएँगे काल की रेत पर।

हम पड़े खोखले सीपियों की तरह॥5॥

— शचीन्द्र भटनागर

(4)  पर-उदारता उसकी

पहुँच न पाए हम सागर तक— बहुत दूर था।

पर उदारता उसकी— बरस गया बादल बन॥1॥

छू न सके हम सूरज को— वह बहुत गरम था।

पर उदारता उसकी— हमको छुआ किरण बन।।2।।

भर न सके बाहों में हम, आकाश विशद था।

पर उदारता उसकी— आया नित ऊर्जा बन।।3।।

ला न सके आँगन में नंदन कानन को।

पर उदारता उसकी— आता रहा गंध बन॥4॥

हिमगिरि पर चढ़ते, यह बात असंभव ही थी।

पर उदारता उसकी— आया गंग नीर बन॥5॥

और परम प्रभु की दूरी तो बस अनंत है।

पर उदारता उसकी— तन में बसा प्राण बन॥6॥

— माया वर्मा


प्रतिभा संवर्धन


मधु-संचय (कविता)

/akhandjyoti/edition/1990/January/35


हम जियें किस तरह?


मधु-संचय(कविता)

हों खुले मन, खुली खिड़कियों की तरह। रोशनी बाँटते हों दियों की तरह॥1॥

हों अगर खिड़कियाँ बन्द, बढ़ती घुटन, हो बंधा नीर तो खूब बढ़ती सड़न,

वायु-से बह सकें हम सभी के लिये। बज सकें हम मधुर घण्टियों की तरह॥2॥

सूर्य बँधता नहीं बादलों में कभी, कौन प्रतिभा रुकी दलदलों में कभी?

यदि हृदय में प्रबल एक संकल्प हो। विघ्न मिट जायेंगे गलतियों की तरह॥3॥

गिरिशिखर-सा सदा उच्च आदर्श हो, फूल-सा शूल के बीच उत्कर्ष हो,

फूल बनकर खिलें पुण्य, उद्यान में। हों नहीं हम विजन घाटियों की तरह॥4॥

कर सके यदि न कुछ हम समय के लिये, दे सके कुछ न दुखते हृदय के लिये,

व्यर्थ रह जायेंगे काल की रेत पर। हम पड़े खोखले सीपियों की तरह॥5॥

-शचीन्द्र भटनागर


 पर उदारता उसकी


मधु-संचय (कविता)

/akhandjyoti/edition/1990/January/39


एक व्यक्ति ने सुधारा समूचे अपराधी वर्ग को

लंदन का ‘वालवर्थ’ नामक कस्बा। आज ही एक पढ़ा-लिखा सुशिक्षित-सा लगने वाला युवक यहाँ रहने आया था। कस्बे के निवासी भी उसे आश्चर्य की निगाहों से देख रहे थे। भला यह यहाँ क्यों आया ? इस समूचे आश्चर्य और सभी के भौंचक्के होने का कारण वालवर्थ के निवासियों का पतित जीवन था। जिसके कारण समूची बस्ती इस कदर बदनाम हो चुकी थी कि भूल से भी कोई उधर आने का साहस न करता।

इन निवासियों में थोड़े से मजदूर थे— बाकी चोरी, जेबकटी से अपनी रोजी चलाते। बात-बात में किसी की हत्या कर देना सामान्य बात थी। नोच-खसोटकर जो भी कमाते, वह शराबघर में चला जाता। बचा-खुचा बरबाद करने के लिए वेश्याघर-जुआघर भरपूर थे। इनके बीच में किसी सभ्य-सुशिक्षित का प्रवेश आश्चर्यजनक तो था ही।

धीरे-धीरे लोग उसके पास आने लगे। पास आते हँसते—  मजाक उड़ाते। उनके हँसने के साथ वह भी खूब हँसता। अब उसने बच्चों पर ध्यान केंद्रित किया। स्वास्थ्य और शिक्षा यही मुख्य मुद्दे थे। सारा दिन इसी में खपता। माताओं को स्वास्थ्यविषयक जानकारी देने के साथ बच्चों को सुसंस्कारित करने का क्रम चलाता रहता।

धीरे-धीरे लोगों का विश्वास उसके प्रति बढ़ता गया। बस्ती निवासियों को यह देखकर बड़ी प्रसन्नता हुई। कोई तो है जो उनके बच्चों के कल्याण का ध्यान रखता है। इस बढ़ते विश्वास का परिणाम यह रहा कि उस शिक्षित नवयुवक ने उन सभी से अनुरोध किया कि सभी रविवासरीय कक्षा में अवश्य पधारें। कृतज्ञता से अभिभूत हो प्रायः सभी आने लगे। सौम्य-सरल ढंग से उन्हें जीवनबोध बताया जाता। चरित्रनिष्ठा की गरिमा समझाई जाती। इसके साथ यह भी बताया गया कि कम-से-कम रविवार के दिन आप लोग कोई गलत काम न करें। अपनत्व और सेवा के वशीभूत हो सभी ने स्वीकार कर लिया।

एक दिन बस्ती के सभी निवासियों ने आपस में तय किया कि इस युवक को सेवा करते इतने दिन हो गए, आखिर हमें भी तो कुछ करना चाहिए। पूछने पर युवक ने कहा—" क्यों न हम लोग पिकनिक मनाएँ"। तीन-चार दिन के इस कार्यक्रम में यह तय किया गया कि कोई भी बदमाशी चोरी नहीं करेगा। उन लोगों की जिंदगी का यह पहला  अवसर था, जब चार दिन बिना किसी अपराध के कटे।

इसके बाद तो परिवर्तन शुरू हो गया। अपराध की जगह लोगों ने श्रम को अपनाया। कुछ सेना में भर्ती हुए, कुछ मिलों में। शनैः-शनैः समूची बस्ती का कायाकल्प हो गया। एक ही व्यक्ति के प्रभावकारी व्यक्तित्व ने प्रमाणित कर दिया कि व्यक्तित्व अन्यों को गढ़ सकते हैं। इस प्रभावकारी व्यक्तित्व के स्वामी थे सी. एफ. एण्ड्रयूज, जिन्होंने कैंब्रीज विश्वविद्यालय से अपनी शिक्षा समाप्त करने के बाद समाज सेवा को अपना कार्यक्षेत्र चुना।

‘वालवर्थ’ निवासियों के बदले जीवन को लोग हतप्रभ हो देखते और स्वीकारते कि एक ही किंतु सेवापरायण— आदर्शों का धनी अनेकों का जीवन बदलने में सक्षम है। श्री एण्ड्र्यूज कहा करते थे —"बुराइयाँ हैं, आदमी और समाज बुरा है— इसका रोना रोने की जगह यदि उनको परिवर्तित करने, नए ढंग से गढ़ने—नया रूप देने के प्रयत्न में जुट पड़ा जाए तो एक बस्ती ही क्यों, पूरे समाज का कायाकल्प संभव है।" दीनबंधु एण्ड्रयूज के विचार आज भी सामयिक हैं और तदनुरूप आचरण के लिए हम सभी को पुकारते हैं।


बदलते समय के साथ हम भी बदलें

युग-परिवर्तन की संभावना सुनिश्चित है। इक्कीसवीं सदी का आगमन गंगावतरण के समतुल्य माना जा रहा है, जिसके कारण इस संसार की गई-गुजरी परिस्थितियों में स्वर्गोपम परिवर्तन संभव हुआ है। वरिष्ठ अध्यात्मवादी और मूर्धन्य आकलनकर्त्ता इस मन्तव्य से सहमत हैं कि अगले ही दिनों महान परिवर्तन प्रस्तुत होंगे और उन सभी समस्याओं एवं विभीषिकाओं का समाधान होगा, जो इन दिनों पग-पग पर सर्वनाश की चुनौतियाँ प्रस्तुत कर रही हैं।

यों इन दिनों अधिकांश लोगों को व्यस्तता और अभावग्रस्तता में विग्रहों और उलझनों में, फँसे हुए असमंजसग्रस्त देखा जाता है। पर नियति ने जिस तत्परता के साथ नवयुग की संरचना का कार्य अपने हाथ में लिया है, उसे देखते हुए यह विश्वास बन पड़ता है कि नया इंसान बनने और नया संसार बसाने की संभावनाएँ क्रमशः उभरती आ रही हैं और परिस्थितियाँ इस प्रकार करवट ले रही हैं, कि अपनी दुनिया अवगति से उबरेगी और सर्वतोमुखी प्रगति के पथ पर द्रुतगति से आगे बढ़ेगी।

रात्रि होती तो बहुत भयानक है ,पर उसका अस्तित्व सदा ही नहीं बना रहता। अंत उसका भी आता है और प्रभात होते-होते दिनमान अपनी प्रखरता का परिचय देने लगता है। ऊर्जा और आभा बिखरती है। प्रकाश की सत्ता हर वस्तु का यथार्थ स्वरूप दर्शाने लगती है, जबकि रात्रि की धुंध अँधेरी में हाथ को हाथ नहीं सूझ पड़ता है। झाड़ी को भूत समझे जाने की गलती तब नहीं होती, जब सूर्य अपने प्रखर आलोक का परिचय दे रहा होता है।

नवयुग का प्रभातपर्व अब अतिसन्निकट है। सामंतवादी अंधकारयुग में अशिक्षा, गरीबी, गंदगी, प्रतिगामिता, दुर्बुद्धि जैसी अनेकानेक विभीषिकाओं ने अपनी जड़ें गहरी जमा ली थीं, पर अब नवचेतना का वह तूफानी बवंडर, उठता, उभरता, मचलता चला आ रहा है, जिसके दबाव से ऐसा कुछ भी टिक न सकेगा जो, पतन और पराभव का निमित्तकारण बनकर रहता रहा है। अरुणोदय का दर्शन होते ही फूल खिलने, पक्षी चहचहाने और खरगोश जैसे तुच्छ प्राणी भी उछलने लगते हैं। नींद की खुमारी उतरती है। बिस्तर बटोरे जाते और हर कहीं उत्साहभरे क्रियाकलाप चलने लगते हैं। प्रभात का प्रभाव हर किसी को झकझोरता है, नये सिरे से, नई आवश्यकताओं के अनुरूप पुरुषार्थ करने के लिए बाधित कर देता है। इक्कीसवीं सदी के साथ जुड़ा हुआ उज्ज्वल भविष्य ऐसी ही सत्प्रवृत्तियों का सूत्र-संचालन करने जा रहा है, जिनके नेतृत्व में अव्यवस्था को गलते एवं शालीनता-सद्भाव का वातावरण बनते देखा जा सकेगा।

पिछले दिनों हम बहुत गँवा चुके। प्रदूषण-अभिवर्द्धन, सर्वनाशी महायुद्धों का तांडव, जनसंख्या-विस्फोट, प्रतिगामी रीति-नीति का प्रचलन, तथाकथित ज्ञान और विज्ञान को प्रगतिशील समझकर, उस अविवेक द्वारा अपनाया जाता रहा है, जो प्रत्यक्षवाद के नाम पर अपने को उपयोगितावाद का समर्थक बताता रहा है। पर अब तो स्रष्टा ने उलटे को उलटकर सीधा करने का निश्चय कर लिया है। नवयुग का आगमन व्यक्ति और समाज के नये कायाकल्प की पूर्वसूचना दे रहा है।

खुली आँखों वाले उसे देख और खुले कानों वाले उसे सुन भी रहे हैं। अच्छा होता, हम बदलते समय के साथ अपने को भी बदलने में उत्साह प्रदर्शित करते और समझदारी का परिचय देते।


प्रतिभा संवर्धन


मधु-संचय (कविता)

/akhandjyoti/edition/1990/January/35


हम जियें किस तरह?


मधु-संचय(कविता)

हों खुले मन, खुली खिड़कियों की तरह। रोशनी बाँटते हों दियों की तरह॥1॥

हों अगर खिड़कियाँ बन्द, बढ़ती घुटन, हो बंधा नीर तो खूब बढ़ती सड़न,

वायु-से बह सकें हम सभी के लिये। बज सकें हम मधुर घण्टियों की तरह॥2॥

सूर्य बँधता नहीं बादलों में कभी, कौन प्रतिभा रुकी दलदलों में कभी?

यदि हृदय में प्रबल एक संकल्प हो। विघ्न मिट जायेंगे गलतियों की तरह॥3॥

गिरिशिखर-सा सदा उच्च आदर्श हो, फूल-सा शूल के बीच उत्कर्ष हो,

फूल बनकर खिलें पुण्य, उद्यान में। हों नहीं हम विजन घाटियों की तरह॥4॥

कर सके यदि न कुछ हम समय के लिये, दे सके कुछ न दुखते हृदय के लिये,

व्यर्थ रह जायेंगे काल की रेत पर। हम पड़े खोखले सीपियों की तरह॥5॥

-शचीन्द्र भटनागर


मधु-संचय (कविता)

/akhandjyoti/edition/1990/January/39


सम्मान दो, वह स्वतः तुम्हें मिलेगा

श्रेय-सम्मान की चाहत प्रायः सभी को होती है। दीपक लेकर ढूँढ़ने पर भी शायद ऐसा कोई नहीं मिलेगा, जो अपमान को अपनी झोली में डालना चाहे। चाहत की तीव्रता के बावजू इसके वास्तविक रूप को बिरले समझ पाते हैं। अधिकांश इसकी मृगतृष्णा में भटकते-भटकते बिना पाए ही प्राण गँवा बैठते हैं। कुछ एक असली के धोखे में नकली बटोरते और कलई खुलने पर सिर धुन-धुनकर पछताते हैं।

प्राचीन समय के राजघरानों से लेकर अर्वाचीन समय तक पद-प्रतिष्ठा को झटकने के लिए न जाने कितने षड्यंत्र पनपे और पनप रहे हैं। इस सबके पीछे एक ही चाहत रही है किसी भी तरह अधिक-से-अधिक सम्मान अपनी झोली में आ गिरे। पर होता है इसके विपरीत। इतिहास गवाही देता है कि जिन्होंने इसकी तनिक भी अपेक्षा न रखी— कर्त्तव्य कर्म में निरत रहे— इतिहास पुरुष कहलाए— मरकर भी सम्मानित हुए।

ऐसे ही सम्मान के लोभ-लालच से विरत एक सज्जन निरंतर सेवा कर्म में संलग्न रहते। जनसामान्य को अधिक-से-अधिक स्वास्थ्य के बारे में जागरूक किया जा सके। बिगड़े को ठीक किया जाए और ठीक हुए को न बिगड़ने दिया जाए— इसी प्रयोजन की पूर्ति हेतु उन्होंने एक दवाखाना खोल लिया था। सहायता के लिए कंपाउंडर की नियुक्ति भी कर ली, ताकि ज्यादा-से-ज्यादा लोगों को लाभ पहुँचे।

सेवा के साथ सहृदयता जुड़ जाने पर अस्पताल का वातावरण ऐसा चुंबकीय बन गया कि लोग खिंचे चले आते। ऐसे में भीड़ होना स्वाभाविक भी था। एक दिन ऐसी ही भीड़ के बीच कंपाउंडर एक मरीज का घाव साफ करके मरहम-पट्टी कर रहा था। डॉक्टर दूसरों को सलाह दे रहे थे। एक-एक को रोग का निदान बताते और उचित दवा देते। इसी बीच डॉक्टर के लड़के की उँगली में अस्पताल के बाहर चोट लग गई। चोट मामूली थी, वह दौड़ा-दौड़ा आया और कंपाउंडर से पट्टी बाँधने को कहा। उसके इस कथन पर कंपाउंडर ने बैठने का इशारा किया, क्योंकि वह एक मरीज के गंभीर घाव की मरहम-पट्टी में व्यस्त था। उसकी व्यस्तता उचित भी थी।

पर डॉक्टर का लड़का आदेश की अवहेलना सह न सका। उसने गुस्से में आकर कंपाउंडर को दो चाँटे जड़ दिए। बोला— “अस्पताल हमारा है और तुझे हमारे आदेश की अनसुनी कर दूसरों का इलाज करते शरम नहीं आती?” तब तक उसका काम समाप्त हो चुका था। उसने विनम्रतापूर्वक क्षमा माँगते हुए लड़के की उँगली में पट्टी बाँध दी।

शाम को यह बात डॉक्टर साहब को मालूम पड़ी। उन्होंने लड़के से कुछ नहीं कहा, वरन कंपाउंडर से क्षमा-याचना की और प्रायश्चित स्वरूप पेंटर को बुलाकर आदेश दिया कि अस्पताल के साइन बोर्ड से मालिक के स्थान से मेरा नाम हटाकर कंपाउंडर का नाम लिख दिया जाए। पेंटर ने ऐसा ही किया। अपने पिता का यह कार्य देखकर लड़के के अभिमान का हिमालय गलकर आँसुओं में बहने लगा। उसने क्षमा-याचना की। पिता ने कहा— "क्षमा माँगना है तो उसी से माँगो जिसके प्रति अपराध किया है।" गलती स्वीकारने माफी माँग लेने पर पिता ने समझाते हुए कहा— "सम्मान पाने का तरीका वह नहीं है, जो तुमने अपनाया। वास्तविकता तो यह है कि सम्मान की पूँजी देने पर मिलती, बाँटने पर बढ़ती और बटोरने पर समाप्त हो जाती है।"

सम्मान के इस सूत्र का प्रतिपादन करने और तदनुरूप जिंदगी जीने वाले सज्जन थे— लाला लाजपतराय। सारा देश जानता है, इस सूत्र के परिपालन से उनको कितना सम्मान मिला और आज भी युगपुरुष के रूप में उन्हें सराहा, पूजा और सम्मानित किया जाता है।


विवाह न करने का कारण

मानवीय जीवन प्रारंभ से अंत तक गुणों के अंकुरण, अभिवर्द्धन और विकास की अनोखी यात्रा है। सद्गुणों की यह फसल फले-फूले, इसलिए बतौर खाद-पानी के समय-समय पर अनेकानेक संस्कारों की व्यवस्था बनाई गई है। इन्हीं में एक विवाह संस्कार भी है। इसे कतिपय सद्गुण विशेष के अभ्यास की पाठशाला भी समझा जा सकता है।

प्रशिक्षण के लिए पाठशाला की आवश्यकता असंदिग्ध है। बहुसंख्यक जन इसकी अनिवार्यता को समझते और अपनाते हैं। परंतु मौलिक प्रतिभा वाले कुछ विशेष क्षमतावान ऐसे भी होते हैं, जो बिना पाठशाला गए, विविध विषयों में निष्णात होते और विशेषज्ञता हासिल करते हैं। मानवता हर युग में ऐसे नररत्न पैदा करती है। इसके विपरीत कुछ ऐसे भी होते हैं, जो स्कूल में दाखिला तो लेते, फीस भी जमा करते, सालों- साल भी खराब करते, पर शिक्षा या विद्या के नाम पर कोरे-के-कोरे निकलते हैं। ठीक यही स्थिति अधिकांश विवाहितों की है। ये भी सद्गुण-अभिवर्द्धन के उद्देश्य से विरत होकर सिर्फ संतान अभिवर्द्धन करते और धरती की भारभूत बनती जा रही जनसंख्या में कुछ अंकों में वृद्धि के साथ सीमित जीवनदाई साधनों में कटौती-पर-कटौती करते जाते हैं। अल्प मात्रा ऐसों की भी है, जिन्हें हर किसी हालत में उद्देश्य याद रहता और वे इसे प्राथमिकता देते, श्रेष्ठ कर्त्तव्य कर्म मानते हैं। कबीर, एकनाथ, नाग महाशय की गणना इन्हीं में होती है। इन्हें समर्थ रामदास, स्वामी विवेकानंद, दयानंद की ही कोटि में गिना जाएगा; क्योंकि स्थिति की भिन्नता के बावजूद दोनों ने ही उद्देश्य को समझा, इसे पूरा किया। विनोबा जी इन्हीं में से एक थे। एक दिन उनसे किसी ने पूछा— "आपको कभी शादी करने की इच्छा हुई या नहीं ? यदि नहीं तो क्यों ?"

विनोबा जी ने उत्तर दिया— "न ही मुझे विवाह करने की इच्छा हुई और न आवश्यकता। माँ की शिक्षा, शास्त्रों के अध्ययन से मुझे बहुत पहले यह पता चल गया था कि विवाह का उद्देश्य आत्मीयता का विस्तार है। इस विस्तार हेतु स्वार्थपरता का त्याग तथा त्यागने में जो कष्ट हो, उसे प्रसन्नतापूर्वक सह सकने हेतु सहिष्णुता है। मुझे अपने में लगा कि मैं किसी स्त्री की स्वतंत्रता का हरण किए बगैर उपर्युक्त गुणों का विकास कर सकता हूँ।”

“इसके अतिरिक्त एक कारण और भी था।”

“कौन सा ?”— पूछने वाले की जिज्ञासा उभरी।

"मेरा जन्म उस समय हुआ, मैंने युवावस्था उस समय प्राप्त की, जब समाज देवता चीत्कार-चीत्कारकर मानवीय क्षमताओं का आवहान कर रहे थे। भारतमाता रो-रोकर अपनी दुर्दशा सुना रही थी। माँ के क्रन्दन को अनसुनीकर विवाह रचना रंगरेलियाँ मनाना, कहाँ का न्याय है। फिर तब, जबकि उद्देश्य को इसके बिना ही पूरा किया जा सकता है।” उक्त सज्जन की जिज्ञासा शांत हुई।

देश और समाज की पुकार अभी मंद नहीं पड़ी है। गुलामी की बेड़ियाँ टूटने पर भी कुरीतियों, मूढमान्यताओं के असंख्य बंधन इसे जकड़े हुए हैं। इन्हें तोड़ने, समाज का नवगठन करने हेतु माँ अपने असंख्यों वज्र की पेशियों, फौलाद की नस-नाड़ियों वाले मजबूत, दृढ़ विषय-वासनाओं की कीचड़ से अछूती संतानों को बुला रही है।

पुकार सुनें! स्वार्थ बिसारें। परमार्थ की राह पर, नए युग के अवतरण, नए समाज का सृजन करने के लिए तत्पर हों।


सद्वाक्य

जो अपनी योग्यता, परिस्थिति और महत्त्वाकांक्षा के बीच संतुलन बनाए रहता है, वह सुखी रहता और सफल होता है। जो बहुत चाहता है, किंतु उसके उपयुक्त योग्यता नहीं बढ़ाता, उसे निराशा के अतिरिक्त और कुछ हाथ नहीं लगता।


लेखनी के योद्धा— मनस्वी वाल्टेयर

पेरिस के एक घर में पिता-पुत्र में बहस चल रही थी। पिता समझा रहा था—  "देखो बेटे ! अभी तुम्हें जीवन का अनुभव नहीं है। अपनी जिद पर अड़े रहने से तुम्हें दो जून की रोटी भी नहीं मिल पाएगी। अतएव इसे छोड़कर मेरा कहना मानो, वकालत शुरू करो।"

“वकालत करें और घर भरें, खुद के लिए, परिवार के लिए आलीशान भवन और नौकर-चाकर जुटाने में सारी ताकत खपा दें। नहीं ! यह मेरे से नहीं होगा, इन दिनों जनमानस के चिंतन में आई गिरावट को दूर नहीं किया गया, तो हमारे आस-पास भूख और पीड़ा से कराहते बच्चों की चीत्कार, उन्मादी होते जा रहे मनुष्य पर हावी शैतान के ठहाके क्या हमें चैन की जिंदगी जीने देंगे ?”— नवयुवक का तर्क था। अपनी जगह पर सही भी था। पिता तर्कों का उत्तर नहीं दे पा रहे थे, किंतु उनसे यह भी नहीं हो पा रहा था कि अपने होनहार बेटे को दुनिया से विमुख होते देख सकें। वकालत पास किया हुआ वह नवयुवक हालैंड चला गया।

इस बीच उसका चिंतन और दृढ़ हुआ। अब वह लेखनी के माध्यम से समाज में जागृति लाने के प्रयत्न में जुट गया। उद्देश्य के प्रति स्वयं की प्रगाढ़ता इतनी थी कि लाख प्रयत्नों के बाद भी पिता उसे तोड़ न सके। पिता ने उससे कहा कि, “यदि तुमने अपनी खब्त न छोड़ी, तो मैं तुम्हें अपनी जायदाद में एक कौड़ी भी नहीं दूँगा और हमेशा के लिए त्याग दूँगा।”

यह धमकी भी उसे झुका नहीं सकी। यह बात आज से ढाई सौ वर्ष पूर्व की है। प्रेरक साहित्य का सृजन आज भी धन भरने वाला नहीं है। उस समय तो स्थिति और बदतर थी, पर एक उद्देश्य के लिए समाज में विवेक और विचारशीलता विकसित करने के लिए उस युवक ने अपने परिवार से लेकर समाज के प्रभुत्वसंपन्न वर्ग का विरोध सहते हुए साहित्य द्वारा जनमानस को झकझोरने, सही दिशा देने की साधना जारी रखी। अपने कार्यों के द्वारा समूचे इतिहास में अमर यह समर्थ पुरुष था- 'वाल्टेयर'।

वाल्टेयर के समय में समाज में अंधेरगरदी थी। धर्म के नाम पर मूढ मान्यताएँ, परंपराओं के नाम कुरीतियाँ समूचे जनजीवन को जर्जर किए दे रही थीं। कतिपय लोग इन्हें शोषण के हथकंडों के रूप में अपनाकर अपने भोग-विलास को चिरस्थाई बनाने के सपने सँजो रहे थे। भले इससे समाज का कुछ भी और कितना भी अहित क्यों न होता हो ?

वाल्टेयर ने स्थिति के अध्ययन से पाया कि अंधेरगरदी का एकमात्र कारण है— जनसाधारण में विचारशीलता का अभाव। इसलिए समाज में उन्होंने विचारशीलता जगाने और विवेक की प्रतिष्ठा करने को अपना जीवन लक्ष्य बना लिया था। कठिनाइयों और विरोधों के बावजूद उनका संकल्प था कि भूखे मरेंगे, तिल-तिलकर गलेंगे, फिर भी जागरण का मंत्र सुनाते रहेंगे।

वाल्टेयर का असली नाम था— फ्रांकई माँरी आरुई। आरंभ में इसी नाम से उनने लिखा। उनकी अभिव्यक्ति इतनी मर्मस्पर्शी और पैनी होती कि पढ़ने-सुनने वाले के हृदय को बेधकर रख देती। उन दिनों फ्रांस में अशिक्षित बहुसंख्यक थे। इनमें जागृति लाने के लिए नया तरीका ढूँढ़ा। इसके लिए उन्होंने रंगमंच को माध्यम बनाया। वह नाटक लिखते और रंगमंच पर उसे अभिनीत कराते। पुस्तकीय विचारों की तरह रंगमंच पर भी उनकी प्रेरणाएँ प्रखर बन पड़ती थीं। जनमानस पर उनका व्यापक प्रभाव पड़ता।

इन सारे माध्यमों से वह जनमानस में दो तथ्यों को प्रवेश करा रहे थे; बुराइयों, अनीतियों के प्रति वितृष्णा, अच्छाइयों और नीतियों के प्रति लगाव। वह बताते कि काठ की हाँडी एक ही बार चढ़ती है, परिणाम में अपने अंदर के पदार्थ के साथ स्वयं भी राख होती और धूल चाटती दिखाई पड़ती है। अनीतिवान की भी यही हालत होती है। शुरू में सम्मान पाता हुआ दिखाई पड़ने पर भी परिणाम में अनीति स्वयं के साथ उसे भी नष्ट कर डालती है।

इन्हीं भावों को एक व्यंग नाटक के रूप में उनने मंचन किया। फलस्वरूप कुछ विकृत बुद्धि की दासता करने वालों ने मारने की कोशिश की, नहीं मार पाए तो जेल भिजवा दिया। पर जिस तरह सोना तपने पर और अधिक चमकता है, उसी तरह वह और अधिक प्रभावशाली बन गए एवं निर्दोष जेल से छोड़ दिए गए।

नाटक-मंचन, साहित्य लेखन से जो पैसा मिलता उसे वह दुखी, कष्टपीड़ितों की सहायता में लगाते। स्वयं के लिए कम-से-कम खर्च और दूसरों की सहायता में जी खोलकर खर्च करने की प्रवृत्ति ने उनकी लोकप्रियता में चार चाँद लगाए, अभिव्यंजना को भी प्राणवान बनाया।

पर षड्यंत्रकारी पीछे लगे थे। उनके चक्कर में पड़कर उन्हें इंग्लैंड, जर्मनी में भटकना पड़ा, स्विट्जरलैंड भी गए। पर जहाँ भी गए, उद्देश्य नहीं भूले। इसी बीच उनकी एक पुस्तक “लेटर्स ऑन द इंग्लिश” ने तहलका मचा दिया। जागृत जनचेतना अवांछनीयताओं के लबादे को उतार फेंकने को उतारू थी।

वह अभी भी शोषितों-पीड़ितों में नवजीवन का, चेतना का, संचार करने में जुटें थे। इस काम से विरत करने के लिए उन्हें धन का प्रलोभन भी दिया गया और जान से मारने की धमकी भी। किंतु सिद्धांतों पर दृढ़ और आदर्शों के प्रति निष्ठावान वाल्टेयर न उन प्रलोभनों से टूटे और न धमकियों के सामने झुके। उनके विचार और प्रयास निरंतर सोए अन्तःकरणों में प्राण फूँकते रहे।

वह जीवन के अंत तक कार्यरत रहे। काम ही उनका आनंद था। जीवन के अंतिम दिनों में लगातार श्रम करने के कारण यद्यपि वह बीमार रहने लगे थे, परंतु उनकी विचारों की धारा अविराम बहती रही। 83 वर्ष की आयु में वह पुनः फ्राँस लौट आए। इन दिनों चिकित्सकों ने उन्हें काम करने, अधिक सोचने को मना कर दिया था। इस पर उन्होंने कहा"—" नहीं, मैं निष्क्रिय जीवन नहीं जी सकता।"

जब तक प्राणों में एक भी श्वास है— शरीर में एक भी रक्तबिंदु है, तब तक समाजसेवा हेतु प्रयत्न भी चलते रहेंगे। आखिर सब कुछ उसी का जो है। सन् 1778 में मृत्यु से थोड़ा पहले अपने सचिव को सारे जीवन का निष्कर्ष नोट कराया, जिसमें यह कहा गया था कि मैं ईश्वर की उपासना करते हुए, अपने मित्रों से प्रेम करते हुए, मुझे शत्रु समझने वालों के प्रति किसी भी प्रकार का विद्वेष न रखते हुए और अविवेक, अंधविश्वास तथा अन्याय को दूर हटाने की गुहार करते हुए मृत्यु का आलिंगन करता हूँ। इस गुहार को सुनें और आगे आएँ।


मकान बनता है (कहानी)

किसी भक्त ने महर्षि रमण से पूछा— "अनेक लोग देशसेवा के अनेकानेक कार्यों में लगे हैं, तब आप क्यों निष्क्रिय बैठे रहते हैं?”

महर्षि ने सहज उत्तर दिया— "चक्की का निचला पाट स्थिर रहता है और ऊपर वाला घूमता रहता है, तभी आटा पिसता है। दोनों घूमें तो बात बनेगी नहीं, गड़बड़ी फैलेगी। किसी को चिंतन करने और प्रकाश देने के लिए स्थिर भी तो बैठना चाहिए।"

उनने और भी कहा— "मकान बनता है तब राज, मजदूर ईंटें ढोते और तोड़ते हैं। आवाजें होती हैं, पर जब रंगाई-पुताई का काम चलता है तो वहाँ कुछ भी शोर-शराबा नहीं होता। इसका मतलब यह नहीं है कि रंगाई-पुताई करने वाले निष्क्रिय बैठे हैं।"


निकटता और घनिष्ठता अनावश्यक नहीं

संचार-साधनों से विचार-विनिमय का तरीका भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं। पत्र-व्यवहार, साहित्य आदि के माध्यम से पारस्परिक विचार-विनिमय की आवश्यकता बहुत हद तक पूरी होती रहती है। चित्रों के सहारे भी दृश्यों और घटनाओं का पता चल जाता है। इस संदर्भ में विकसित वैज्ञानिक साधन भी बहुत कुछ कर दिखाता है। रेडियो प्रसारण, टीवी की फिल्मों और रिकार्डरों से भी प्रचार-प्रक्रिया में बहुत कुछ सहयोग मिलता है।

इतना सब कुछ होते हुए भी मिलन और पारस्परिक प्राणशक्ति के प्रत्यावर्तन की आवश्यकता अपने स्थान पर बनी ही रहती है। स्थानों की, वातावरण की भी अपनी-अपनी प्रभाशक्ति होती है, उनकी उपयोगिताओं और आवश्यकताओं से इंकार नहीं किया जा सकता।

तीर्थयात्रा, पदयात्रा, परामर्श, प्रवचन अपना काम करते हैं, क्योंकि उनमें स्थान की, वातावरण की एवं व्यक्ति की अपनी विशिष्ट क्षमता का समावेश होता है। यदि ऐसा न होता, तो पारस्परिक विचार-विनिमय करने की आवश्यकता न पड़ती। पत्र-व्यवहार द्वारा भी समस्याओं का समाधान हो जाया करता है। विवाह-शादी, बधाई, मृत्यु, शोक, संवेदना, दुर्घटना आदि के स्थलों पर स्वयं पहुँचने की आवश्यकता न रहती। इस संदर्भ में लोग इतना समय, श्रम और खर्च वहन न किया करते। जो मिलकर कहा जाना है, उसे पत्र की थोड़ी-सी पंक्तियों से तथा टेलीफोन आदि के सहारे कहकर काम चल जाया करता। जो देखने-दिखाने का प्रयोजन है, उसे फोटो, चित्र आदि के सहारे घर बैठे संपन्न कर लिया जाया करता।

संचार-साधनों का अपना महत्त्व होते हुए भी पहुँचने, बुलाने, मिलने और प्रत्यक्ष उपस्थिति के कारण उत्पन्न होने वाले प्रभाव से इंकार नहीं किया जा सकता। उसकी क्षमता और उपयोगिता को सर्वथा नकारा नहीं जा सकता। अशोक, अंबपाली, अंगुलिमाल आदि के जीवन में जो परिवर्तन हुए, वे बिना वरिष्ठों के साथ प्रत्यक्ष मिलन संपन्न हुए असाधारण परिवर्तन की स्थिति उत्पन्न न कर सके होते, देवर्षि नारद ने किसी माध्यम से संदेश भेजकर नहीं, वरन स्वयं सत्पात्रों के पास पहुँचकर, प्रत्यक्ष प्राण-प्रेरणा देकर ही व्यक्तित्वों में महान परिवर्तन संपन्न किया था। अब भी घनिष्ठता और निकटता अपने-अपने चमत्कार दिखाती हैं। परिवारों और गिरोहों की गणना इसी आधार पर संभव और संपन्न होती है। अखण्ड ज्योति परिजन, पत्रिका में छपती रहने वाली सामग्री से, पुस्तकों से, पत्रों से कुछ प्रभाव ग्रहण न करते हों, सो बात नहीं, एक से अनेक होने में, चिनगारी के ज्वालमाल बनने में इस आधार पर भी बहुत हद तक सफलता मिली है, फिर भी वह आवश्यकता पूरी तरह समाप्त नहीं हुई कि युगचेतना के उद्गम केंद्र शान्तिकुञ्ज पहुँचा जाए और वहाँ किन्हीं सत्रों में सम्मिलित होकर विद्यमान वातावरण और प्राण-प्रवाह के सान्निध्य का लाभ उठाया जाए।

गंगा जी का जल ही नहरों, रजवाहों, कुलावों आदि के माध्यम से खेतों और तालाबों तक पहुँचता हैं, फिर भी उस उल्लास को समाधान नहीं मिलता, जो गंगास्नान के लिए गोमुख-गंगोत्री तक पहुँचने-पहुँचाने के लिए उद्वेलित होता है। तीर्थ-पर्वों का दृश्य टी.वी., वीडियो आदि माध्यमों से घर बैठे भी देखने को मिल जाता है, पर उस उमंग को क्या कहा जाए और उसके समाधान के लिए क्या किया जाए, जो पर्वों पर उन विशिष्ट स्थानों तक स्वयं जा पहुँचने के लिए मचलती रहती है। तर्कों से उस उत्कंठा को निरस्त नहीं किया जा सकता, जो अन्तःकरण में अपने स्तर पर उमंग बनकर उभरती है।

शान्तिकुञ्ज में चलते रहने वाले पाँच दिवसीय, नौ दिवसीय और एक महीने वाले सत्रों का महत्त्व ऐसा है, जिसकी पूर्ति घर बैठे रहकर हो नहीं सकती। उसकी पूर्ति के लिए भावनाशीलों को अवसर एवं अवकाश निकालने का प्रयत्न करना ही चाहिए। बैटरी को दुबारा चार्ज कराने के लिए जिनने डायनेमो का प्रयोग होते देखा है, उन्हें यह समझने में कठिनाई नहीं होनी चाहिए कि प्रचंड प्राण-प्रवाह की निकटता किस प्रकार अपनी असाधारण प्रतिक्रिया उत्पन्न करती है। पारस, कल्पवृक्ष, अमृत आदि की निकटता उपलब्ध न हो तो दूरवर्त्ती माध्यमों से वह प्रयोजन सध नहीं पाता। माता के पेट में निश्चित अवधि गुजारे बिना भ्रूण-कलल को शिशु जैसी स्थिति प्राप्त कर सकना कहाँ बन पड़ता है ?

घर बैठे परीक्षा पास करने की भी एक विधा है। पुस्तकें पढ़ते रहा जाए और आवेदन-पत्र भरकर परीक्षा स्थान पर नियत समय पर जा पहुँचा जाए। परिणाम तो उसका भी छपता ही है, फिर भी विद्यालय में भर्ती रहकर पढ़ने और घर बैठे उसी प्रयोजन को किसी प्रकार पूरा कर लेने के बीच अंतर तो रहेगा ही। दोनों वर्गों की स्थिति में जो अंतर रहता है, उसे नकारा नहीं जा सकता।

भाषाएँ पढ़ाने का कार्यक्रम रेडियो पर आता रहता है, उन्हें निरर्थक तो नहीं कहा जा सकता, किंतु यह आवश्यकता बनी ही रहेगी कि जहाँ उस प्रशिक्षण की समग्र अवस्था है, उसमें भरती रहकर जो सीखना है, उसे प्रभावशाली ढंग से सीखा जाए। विश्वभ्रमण में जो ज्ञानवर्द्धन एवं अनुभव विकास का प्रयोजन पूरा होता है, उसे टीवी पर आने वाले दूरदर्शन कार्यक्रम देख लेने भर से काम नहीं बनता। झलक-झाँकी पा लेना एक बात है और निकटतम का लाभ उठाना सर्वथा दूसरी।

शिल्प, संगीत जिन्हें सीखना होता है, उन्हें अध्यापक ही नहीं, उपकरणों को भी साथ सँजोना पड़ता है। पहलवानी अखाड़े से दूर रहकर संदेशवाहक के द्वारा नहीं सीखी जा सकती।

डॉक्टर, इंजीनियर, आर्कीटेक्ट, वकील, वैज्ञानिक आदि को अपनों से मूर्धन्य लोगों के साथ रहकर व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त करना पड़ता है। पुस्तकीय पढ़ाई पूरी कर लेने भर से काम नहीं चलता। गाय के दूध दुहने के लिए उसके थनों तक पहुँचता पड़ता है। दूर रहने पर उस उद्देश्य की पूर्ति कहाँ हो पाती है ? यही बात व्यक्तित्व के विकास, प्रतिभा-परिष्कार और प्रगति के उच्च शिखर पर चढ़ने के लिए भी अभीष्ट होती है। शान्तिकुञ्ज आने और यहाँ से निस्सृत होने वाली ऊर्जा से लाभ उठाने के लिए इसी दृष्टि से परामर्श दिया जाता है।


दुर्व्यसनों में रस (कहानी)

नदी में एक कंबल जैसा बहता दिखा। तट पर खड़े साधुओं में से एक उसे पकड़ने के लिए कूद पड़ा। कंबल तक पहुँचा तो प्रतीत हुआ कि वह रीछ है।

रीछ ने साधु को जकड़कर पकड़ लिया। छुड़ाने पर भी छूट न सका और दोनों साथ-साथ डूबने-उतराने लगे।

किनारे पर खड़े दूसरे साधू ने आवाज लगाई कि, "झंझट में मत पड़ो। कंबल को छोड़ दो।" साधु ने डूबते-उतराते कहा—" मैं तो छोड़ना चाहता हूँ, पर यह कंबल ही मुझे नहीं छोड़ता।

लोग पहले तो दुर्व्यसनों में रस की बात सोचकर उन्हें पकड़ लेते हैं। पर कुछ ही दिन में दुर्व्यसन ही रीछ की तरह मनुष्य को जकड़ लेते है और उसकी दुर्गति बनाते रहते हैं।


अपने से अपनी बात— विशिष्ट परिजनों के लिए कुछ विशेष

गत मास की पत्रिका से जुड़े हुए पत्रक में अखण्ड ज्योति परिजनों को कुछ विशेष उद्बोधन दिए गए हैं और उनके संबंध में कुछ अतिरिक्त विवरण पूछे गए हैं। प्रसन्नता की बात है कि उस सामयिक सूचना को समुचित उत्साह और ध्यानपूर्वक पढ़ा गया है। उत्तर और परिचय आने शुरू हो गए हैं।

बसंत पर्व (31 जनवरी 90) से परिजनों के लिए लगाए जाने वाले पाँच-पाँच दिवसीय विशेष सत्रों का शुभारंभ हो जाएगा। स्वभावतः पिछले दिनों चल रहे सत्रों की तुलना में शिक्षाथियों की संख्या अत्यधिक बढ़ेंगे। सत्रों का कार्यकाल अभी एक वर्ष में ही पूरी कर लिए जाने का निर्धारण है। पाँच लाख स्थाई सदस्यों को एक वर्ष में किस प्रकार अभिनव प्राण-चेतना शान्तिकुञ्ज बुलाएँ और उनके लिए आवश्यक व्यवस्था कैसे की जाए ? यह एक अत्यंत जटिल प्रश्न है। समीपवर्त्ती क्षेत्र में खाली भूमि मिल न सकी, फलतः तात्कालिक निर्णय यही किया गया है कि शान्तिकुञ्ज में जितनी भी जगह है, उस सबको तीन मंजिले भवनों में बदल दिया जाए। इन दिनों इसी प्रकार की तोड़-फोड़ और नई संरचना तेजी से चल पड़ी है। आशा की गई है कि बसंत पर्व तक लगभग दूनी जगह की— दूने शिक्षार्थी ठहराने की, भोजन, विचार-विनिमय आदि की व्यवस्था हो जाएगी।

सन् 90 अपने ढंग का विलक्षण है, विशेषतया अखण्ड ज्योति परिजनों के लिए, क्योंकि उनमें से अधिकांश को अगले दिनों अपने-अपने स्तर के अनेक उत्तरदायित्व निबाहने पड़ेंगे। अतिरिक्त जिम्मेदारियाँ— अतिरिक्त शक्ति भी चाहती है, अतिरिक्त निर्माण भी और अतिरिक्त क्रियाकलापों को संपन्न करने के लिए नए स्तर का नया मार्गदर्शन भी। इस समय की माँग को ध्यान में रखते हुए सन् 90 में जो पाँच-पाँच दिन के प्रायः 60 सत्र संपन्न होने जा रहे हैं, उसकी गरिमा और उपयोगिता गंभीरतापूर्वक समझी जानी चाहिए। जिन्हें सूत्रसंचालक से कुछ पाने की उमंग व ललक हो, वे इस वर्ष की महत्ता को समझे व अपना शान्तिकुञ्ज आना सुनिश्चित करें।

स्थान की व्यवस्था और परिजनों की संख्या को देखते हुए लगता है कि इतने सीमित समय में प्रायः एक-चौथाई से भी कम लोगों को स्थान मिल सकेगा। शेष को बुला सकने के संबंध में अभी तो विवशता ही दिखती है। अगले दिनों कोई आकस्मिक प्रबंध हो जाए, तो बात दूसरी है।

नई सत्र-व्यवस्था में सम्मिलित होने के लिए समीपवर्त्ती परिजनों को कह दिया गया है कि वे उपरोक्त 60 सत्रों में से, जिनमें भी चाहें अपने स्थान रिजर्व करा लें। संख्या पूरी होते ही बाद में आने वाले आवेदन-पत्रों को रद्द कर देने के अतिरिक्त और कोई चारा शेष नहीं रह जाता। सीमित स्थान और सीमित समय में जो किया जा सकता है, वही तो हो सकेगा।

सन् 90 में सैलानियों, पर्यटकों को साथ लाने पर पूर्ण प्रतिबंध है। शक्तिसंचय और गंभीर विचार-मंथन के बीच यह बन नहीं पड़ेगा कि घुमक्कड़ लोग शान्तिकुञ्ज को धर्मशाला समझकर वृद्धों, वधिरों, अशिक्षितों, बच्चों को लेकर यहाँ आ डटें और जिनने भावनापूर्वक प्रशिक्षण के लिए स्थान रिजर्व कराए हैं, उनके लिए कुछ भी पा सकना असंभव कर दें। इसलिए सन् 90 में पर्यटक आगंतुकों के लिए आना पूरी तरह निषिद्ध कर दिया है। धर्मशाला आदि में ठहरने के बाद ही वे शान्तिकुञ्ज दर्शन आदि के लिए आएँ।

उपरोक्त सत्रों में साधना के माध्यम से दैवी चेतना का वर्चस्व प्राप्त करने को प्रमुखता दी गई है। शिक्षण की दृष्टि से एक घंटे का प्रवचन ही पर्याप्त माना गया है। शेष समय में तो आत्मचिंतन और अंतराल का समुद्र-मंथन ही प्रधान कार्यक्रम है। तदनुसार ही नियमोपनियम भी बनाए गए है। संभवतः यहाँ पाँच दिन शान्तिकुञ्ज की परिधि में रहकर उसी प्रकार काटने होंगे, जिस प्रकार कि गर्भस्थ भ्रूण माँ के पेट में ही निर्वाह करता है और जिस प्रकार भी भरण-पोषण अनुशासन निर्धारित रहता है, उसी के परिपालन में एकाग्र रहता है। अन्वेषण हेतु वैज्ञानिकों को अपनी प्रयोगशाला में, योगियों को ध्यान-साधना हेतु अपनी कुटी में, कायाकल्प-प्रक्रिया संपन्न करने वालों को एक छोटी कुटिया में रहना पड़ता है। लगभग वैसी ही स्थिति साधकों की रहेगी। इसीलिए उन्हें वैसी ही मनोभूमि बनाकर आने के लिए कहा गया है।

अपने जीवन के अंतिम वर्षों के ये कुछ विशिष्ट साधना सत्र हैं। इनमें देने व लेने की एक महत्त्वपूर्ण प्रक्रिया संपन्न होने जा रही है। वर्त्तमान समय की महत्ता को समझते हुए, उस अंतिम वर्ष के सत्र-आमंत्रण को सक्रिय परिजन अनदेखा न करेंगे, यही आशा एवं विश्वास है।

*समाप्त*


test

नाद ब्रह्म अथवा शब्द ब्रह्म का अभिप्राय उस अनाहत ध्वनि से है जो प्रकृति और पुरुष के संयोग स्थल से निरन्तर प्रसत और निनादित होती रहती है। ॐ कार वही स्वयंभू ब्रह्मनाद है। उससे सस स्वर प्रस्फुटित हुए। श्रुति शास्त्र में प्रयुक्त होने वाले उदात्त अनुदात स्वरूप उसी के आरोह अवरोह हैं। सङ्गीत शास्त्र में आगे चलकर वे

ही सा रे ग म प ध नि के स्वर सतक बन गये। सूर्य रथ के सप्तं अश्व उसके प्रभा किरणों में सन्निहित रङ्ग हैं । उसी प्रकार ब्रह्मनाद का ध्वनि गुंजन ससधा

स्वर लहरी में निनादित होता है ।

यों सुनने में सप्त स्वर और उनके आरोह अवरोह मात्र शब्द ध्वनि

का उतार चढ़ाव प्रतीत होते हैं और उनका उपयोग वाद्य गायन में प्रयुक्त होना भर लगता है पर

वस्तुतः उसकी सीमा इतनी स्वल्प नहीं है। मनुष्य कृत स्वर लहरी के अतिरिक्त प्रकृति गत स्वर प्रवाह जीव धारियों द्वारा विविध विधि उच्चारण भी कम महत्व के नहीं हैं। मेघ गर्जन, समुद्र तर्जन, विद्युत कड़क, वायु सन-सनाहट, निर्णन की सांय साँय, अग्नि शिखा की धू धू, निझर निनाद, प्रकृतिगत ध्वनियाँ हमें समय-समय

पर सनने को मिलती रहती हैं । इसके

अतिरिक्त विभिन्न पशु, पक्षी आवश्यकतानुसार अपनी-अपनी

बोलियां बोलते हैं । रात्रि की नीरवता में दिल्ली की झङ्कार सुनते ही बनती है। सूर्योदय के समय पक्षियों के कंठ कितने प्रकार की कितनी मधुर स्वर लहरियाँ प्रस्तुत करते हैं उन्हें सुनकर

मुग्ध होजाना पड़ता है । लगता है स्वर ब्रह्म 'अपने अगणित ध्वनि प्रवाहों में न जाने कितने भाव भरे संकेतों और संदेशों को इस विश्व ब्रह्माण्ड में भरता बहाता

रहता है।

यह सब आहत ध्वनियों हैं जो कानों

से सुनी जा सकती हैं । विज्ञान की पकड़ में वे ध्वनियाँ भी आगई हैं


test

1


test 2

प्राण प्रत्यावर्तन अर्थात् प्राण चेतना का आदान प्रदान । यह आदान-प्रदान

किसके साथ ? इसका उत्तर यही हो सकता है-लघु का

महान के साथ-आत्मा का परमात्मा के साथ-प्राण का महाप्राण के साथ ।

आत्मा

वस्तुतः महान परमात्मा का एक छोटा घटक है। बीज रूप से उसमें वे समस्त संभावनाएँ और

क्षमताएं विद्यमान हैं जो उसकी मूल सत्ता में हैं। वृक्ष की समस्त विशेषताएं बीज

में भरी रहती हैं-छोटे से दाने के अन्दर पूरे पेड़ का स्वरूप और क्रिया-कलाप

अन्तहित रहता है । अवसर पाते ही यह बीज विकासोन्मुख होता है और उसकी विभूतियाँ

अव्यक्त से व्यक्त होती हैं। यों देखने में बीज की सत्ता और वृक्ष की स्वरूप सत्ता

एक दूसरे से सर्वथा भिन्न स्तर की मालूम पड़ती हैं । बीज का मूल्य कानी कौड़ी और

पेड़ की कीमत मुहर, अशर्फी

होती है, अन्तर स्पष्ट है। पर कुछ अत्यन्त

महत्वपूर्ण क्षण ऐसे भी आते हैं जब बीज. के भीतर एक विचित्र हलचल उत्पन्न होती है

वह अपना दाने जैसा अकिंचन स्वरूप खोता है और गल बदल कर अंकुर-फिर पौधा फिर वृक्ष बनने के लिए विचित्र प्रकार के क्रिया-कलाप

अपनाता है। यह परिवर्तन का काल थोड़ा ही होता है। बीज को डालने और अंकुर का रूप

धारण करने की काया-कल्प जैसी प्रक्रिया कुछ ही दिनों की होती है । इसके बाद बीज की

सत्ता समाप्त हो जाती है और वृक्ष का अस्तित्व अपने ढङ्ग से काम करने लगता है ।

इसी हलचल भरी उथल-पुथल को प्रत्यावर्तन कह सकते हैं।

प्राण उस

इकाई का नाम है जो मनुष्य के काय कलेवर के अन्तर्गत काम करती है और चेतना की किया

का रूप धारण करने में महत्वपूर्ण भूमिका सम्पादित करती है । जीव सत्ता चेतना युक्त

है उसमें प्रेरणाओं का आलोक ज्योतिर्मय है। मस्तिष्क सहित शरीर काय कलेवर की

संरचना इस प्रकार हुई है कि वह निर्धारित क्रिया कलापों को कुशलता

पूर्वक

सम्पन्न कर सके । दोनों के संयोग से ही जीवन यात्रा चलती है । जीव की आकांक्षा और शरीर की क्रियाशीलता का समन्वय ही जीवन की

विभिन्न हलचलों के रूप में दृष्टिगोचर होता है। जीव चेतना और शरीर जड़। दोनों का सम्मिश्रण जिस स्तर पर-जिस

केन्द्र विन्दु पर होता है उसे 'प्राण' कहते हैं। और भी स्पष्ट करें तो चेतना और क्रिया की सम्मिश्रित

स्थिति को जड़ और चेतन के मिलन केन्द्र को प्राण तत्व कह सकते हैं। मोटे रूप से

जीवधारी की भौतिक सत्ता को प्राण रूप में ही देखा जाता और समझा जा सकता है । सरल

विश्लेषण की दृष्टि से जीवन तत्व का दूसरा नाम प्राण भी दिया जा सकता है। इसी

सत्ता की प्रधनता देखते हुए जीवधारी को 'प्राणी' कहते हैं। प्राण जब अपना काम बन्द कर देता है तो जीव तथा शरीर

की सत्ताएँ यथावत् विद्यमान रहते हुए भी मृत्यु हो जाती है और कहा जाता है प्राण

निकल गये।

व्यक्ति के

भीतर जो लघु एवं असीम प्राण है वह समष्टि में समाये हुए असीम महाप्राण का एक लघु

अंश है जैसा कि परमात्मा का एक घटक आत्मा । विन्दु वस्तुतः सिन्धु का ही एक घटक

है। बादल समुद्र से जल लाकर भूमि पर बरसाते हैं। जमीन पर गिरते ही वह इस उधेड़ बुन

में लग जाते हैं कि किस प्रकार वह सिन्धु तक पहुँचे । भूमिगत तुच्छ नलिकाओं में

होती हुई-नदी सरोवरों को पार करती हुई वह अन्ततः इस प्रयास में सफल हो ही जाती है

कि समुद्र में अपनी सत्ता मिलाकर असीम और अनन्त स्तर के आनन्द का उपभोग करे । जीव

की स्थिति भी यही है, वह ब्रह्म

का एक घटक है । तुच्छता एवं ससीमता में बेचनी रहना स्वाभाविक है समस्त संभावों और

असन्तोषों का समाधान असीमता की स्थिति आने पर ही मिल सकता है। इसी प्रयास में

जीवधारी लगा रहता है पर सही मार्ग मिलने से भटकाव