अन्तःकरण की पवित्रता स्वर्ग और उसकी मलिनता ही नरक है। इन दोनों दशाओं का भोग करने के लिए मनुष्य को अन्यत्र किसी लोक में नहीं जाना पड़ता। वह इन दोनों ही अवस्थाओं को अपने अन्तःकरण वाला मानो नरक की विभीषिका लिए फिरता है। पवित्र अन्तःकरण की स्थिति के माध्यम से घर में-बाहर,सोते जागते, खाते-पीते, उठते-बैठते हर समय भोगता रहता है।
पवित्र अन्तःकरण वाला मनुष्य मानो अपनी जेब में स्वर्ग डाल कर घूमता है और मलिन अन्तःकरण वाला मानो नरक की विभीषिका लिए फिरता है। पवित्र अन्तःकरण का अर्थ है एक पुलक, एक सिहरन, एक अलौकिक सुख, एक आनन्द तथा मलिन अन्तःकरण का अर्थ है एक त्रास, एक यंत्रणा, भयानक अस्त–व्यस्तता, एक जलन। दोनों में एक अनुकूल है, अभीष्ट है, दूसरा प्रतिकूल है, त्याज्य है।
पाप से बचना है, ताप से अपनी रक्षा करनी है, आनन्द की अनुभूति पानी है, देवत्व का अनुभव करना है तो अन्तःकरण को परिष्कृत करना होगा। दुष्प्रवृत्तियों की कँटीली झाड़ियोँ उखाड़ कर सद्विचारों के सुन्दर, सुकुमार प्रसून बोने होंगे।
स्वर्ग और नरक जाना अपने हाथ में है। अन्तःकरण की अवज्ञा कर अंतर्दृष्टि की आग में जलना और नरक और आत्म प्रताड़ना सहना भी अपने ही हाथ है। यह हम पर ही निर्भर करता है, हम अपने लिए क्या निर्धारण करते व क्या कदम उठाते है?
“तोम दिर दिर, नादिर दिर दिर तोम” “त दिर न”। वातावरण संगीतमय हो उठा। स्वर लहरियाँ हवा के साथ लहराती हुई बलखाने लगीं। कभी बलवती सागर की तरंगों की तरह घोर गर्जना करती हुई प्रतीत होती तो कभी कान्त कुसुम की तरह कोमल बन कर हवा पर पग रखती हुई उड़ जातीं। सुनने वाले विभोर थे। चारों ओर भावों का सागर उमड़ पड़ा। ऐसा कीर्तन-संगीत और गीत की यह कलुष-नाशिनी धारा जिसमें दोषों के मैल स्वतः धुलते जा रहे थे। यत्किंचित् मन की गंदगी बचती भी तो वही गायिका की टिप्पणियों की पटकन से पलायन कर जाती। खड़े हुए लोग मानो अपना अस्तित्व खोने लगे। लगा जैसे सभी कुछ सौंदर्य, समस्वरता और सामंजस्य के सागर में विलीन हो जायगा। कहीं कोई विषम स्वर न था और न लय टूटती थी।
“जीवन भी एक वाद्य यंत्र है, जो समस्वरता और सामंजस्य के अभाव में बेसुरा हो रहा है। बँटती-बिखरती, टूटती जिन्दगी को यदि सँवारा जा सके, मन्द तार और मध्यम सप्तक के रूप में शरीर, आत्मा और मन भली प्रकार सक्रिय हो सकें तो होने वाली अनोखी स्वर सृष्टि जिन्दगी की सार्थकता सिद्ध किए बिना न रहेगी”। वाद्य यंत्र एक ओर रखते हुए उसने अपनी बात कही।
जन समुदाय मंत्र-मुग्ध हो सुन रहा था। सुनने वालों में से कई ऐसे थे जिन्होंने राजदरबारों में श्रेष्ठतम कलाकारों के गायन-वादन का रस लिया था। किन्तु वहाँ उन्माद था, यहाँ थी शान्ति। वहाँ दोष उद्दीप्त होते थे, यहाँ विलय हो रहे थे। वहाँ विलासिता का नर्तन था, यहाँ वैराग्य की सृष्टि, कैसा विरोधाभास है। शायद इसी कारण कुछ ने संगीत और विलासिता दोनों को एक दूसरे का पर्याय मान लिया था। अब तक उनके मन में संगीत के सम्बन्ध में जो भ्रान्तियाँ थीं, वे मिटती जा रही थीं क्योंकि सामने थी वैराग्य मण्डित दिव्य भावों की जीवन्त गौरवर्ण, तपश्चर्या के प्रखर तेज से युक्त उस देवी का दीप्तिमान मुखमण्डल जनश्रद्धा को बरबस अपनी ओर खींच लेता था।
तभी एक ने पूछ लिया-”देवी जी मैं आपके संगीत कीर्तन की बात कहना चाहता था। दरबारी संगीत की अपेक्षा यह.......।” अच्छा! अच्छा!! यह बात है, उसने सामने खड़े व्यक्ति के मनोभावों को पढ़ते हुए कहा-दोषी संगीत नहीं है। यह तो सिर्फ भावों का वाहन है। इसके माध्यम से लोकजीवन को कामुकता और विलासिता की कैद में डाला जा सकता है और इसी के माध्यम से जनजागरण भी किया जा सकता है-”जनजाग्रति भी।” आश्चर्य प्रकट करने के साथ वह स्वयं में झेंप-सा गया। झेंपा इसलिए, क्योंकि उसने इस जाग्रति को अभी कुछ क्षणों पूर्व अनुभव किया था। वही क्यों, सभी ने अपने अन्दर के सच्चे इंसान को अँगड़ाइयाँ लेते हुए महसूस किया था। फिर उसकी इस सोच-विचार से अनजान वह बोल उठी, “हाँ जनजाग्रति”। स्वर में तेजी थी, अँगुलियों की थिरकन संगीत सृष्टि नहीं करती। इसमें प्राण भरने के लिए स्वयं के प्राणों की प्रखरता चाहिए। आज के संगीत को तो विलासियों और व्यसनियों की गुलामी करनी पड़ रही है। उसकी पीड़ा देखकर स्वरों की देवी शारदा व्यथित है वे सामगान के उद्गाता ऋषिगण, जिन्होंने सपने में भी नहीं सोचा था कि उनके द्वारा की गई स्वरों की सृष्टि को हतभाग्य मनुष्य पाशविकता की ओर मोड़ कर तहस-नहस कर देगा”। हृदय की पीड़ा आँखों में छलछलाने लगी-प्रश्नकर्ता ही क्यों पास खड़े सभी इस दृश्य परिवर्तन को देखकर हतप्रभ थे।
इधर वह भावाविष्ट हो बोले जा रही थीं-”संगीत अब बनकर रहेगा- जनजाग्रति का माध्यम। ऐसा होगा और अवश्य होगा। शुरुआत मैंने कर दी है। मेरे काम को पूर्णता देने के लिए प्रभु स्वयं अनेकानेक रूप धर कर आएँगे-तीसरी सहस्राब्दी में प्रवेश होने के पूर्व ही”। जैसे वह अन्तर्चक्षुओं से भविष्य निहारने लगी, “धरती पर प्रेम-सुन्दरता और सामंजस्य का साम्राज्य होगा। तब तक एक-एका कदम आगे बढ़ने की कोशिश तो करो। लो उठो! अपने प्रयास में लग जाओ......।”
अंतश्चेतना की अतुल गहराइयों से निकले इन वाक्यों ने सब के मनों में चैतन्य ऊर्जा भर दी। संगीत द्वारा लोकजीवन में जागृति की शुरुआत करने वाली यह तपस्विनी थी मीराबाई। जिन्होंने अपने महान उद्देश्य के लिए राजरानी का वैभव छोड़कर वैराग्य का बाना पहना था। उनका कार्य इन्हीं दिनों पूर्णता प्राप्त करने वाला है। तोड़ फेंकें उन बेड़ियों को जिनसे संगीत की आत्मा संतप्त है, कलेवर जकड़ा पड़ा है। सुगम संगीत की स्वर लहरियों से झंकृत हो उठे जनचेतना। नगर-नगर, गाँव-गाँव, घर-घर और हर दिल में, नए जीवन का नया तराना गूँज उठे।
संग्रह और उपभोग की ललक-व्याकुलता इन दिनों ऐसे उन्माद के रूप में लोकमानस पर छाई हुई है, कि उसके कारण धन ही स्वार्थ-सिद्धि का आधार प्रतीत होता है। ऐसी दशा में यदि उल्टा मार्ग अपनाने का निर्णय करते बन पड़े तो इसमें आश्चर्य ही क्या?
मानवी दिव्य चेतना के लिए इस प्रचलन को अपनाया सर्वथा अवाँछनीय है। ऐसा कुछ तो कृमि-कीटक और पशु-पक्षी भी नहीं करते। वे शरीर चर्या के लिए आवश्यक सामग्री प्राप्त करने के उपरांत प्रकृति के सुझाये उन कार्यों में लग जाते हैं, जिसमें उनका स्वार्थ भले ही न सधता हो, पर विश्व-व्यवस्था के सुनियोजित में कुछ तो योगदान मिलता ही है। संग्रह किसी को भी अभीष्ट नहीं उपभोग में अति कोई नहीं बरतता। सिंह, व्याघ्र तक ड़ड़ड़ड़ वाले ड़ड़ड़ड़ करते।
मनुष्य का दर्जा ऊँचा इसलिए नहीं है कि वह अपनी विशिष्टता को साधनों के संग्रह एवं उपभोग की आतुरता पर विसर्जित करता रहे। उसके लिए कुछ बड़े कर्तव्य निर्धारित हैं। उसे संयम-साधना द्वारा ऐसा आत्म परिष्कार करना होता है, जिसके आधार पर विश्व-उद्यान का माली बनकर वह सर्वत्र शोभा-सुषमा का वातावरण विनिर्मित कर सके। जब सभी प्राणी अपनी प्रकृति के अनुरूप अपनी गतिविधियाँ अपनाते हैं, तो मनुष्य के लिए ऐसी क्या विवशता आ पड़ी है, जिसके कारण उसे अनावश्यक संग्रह और उच्छृंखल उपभोग के लिए आकुल-व्याकुल होकर पग-पग पर अनर्थ सम्पादित करते फिरना पड़।
गहरी डुबकी लगाने पर इस उल्टी रीति का निमित्त कारण भी समझ में आ जाता है। भाव-संवेदनाओं का स्रोत सूख जाने पर सूखे तालाब जैसी शुष्कता ही शेष बचती है। इसे चेतना क्षेत्र की निष्ठुरता या नीरसता भी कह सकते हैं। इस प्रकार उत्पन्न संकीर्ण स्वार्थपरता कारण, मात्र अपना ही वैभव और उपभोग सब कुछ प्रतीत होता है। उससे आगे भी कुछ हो सकता है, यह सूझता ही नहीं। दूसरों की सेवा-सहायता करने में भी आत्मसंतोष और लोकसम्मान जैसी उपलब्धियाँ संग्रहित हो सकती हैं, इसका अनुमान लगाना-आभास पाना तक कठिन हो जाता है। आँख खराब हो जाने पर, दिन में भी मात्र अन्धकार ही दीख पड़ता है। कान के पर्दे जबाब दे जायें, तो कहीं से कोई आवाज आती सुनाई ही नहीं पड़ती। ऐसी ही स्थिति उनकी बन पड़ती है, जिनके लिए अनर्थ स्तर की स्वार्थपूर्ति ही सब कुछ बन कर रह जाती है।
शरीर से चेतना निकल जाने पर मात्र लाश ही पड़ी रह जाती है, जिसे ठिकाने न लगाया जाय, तो स्वयं सड़ने लगेगी, घिनौना वातावरण उत्पन्न ड़ड़ड़ड़ कि शरीर में चेतना विद्यमान ड़ड़ड़ड शरीर को समर्थ एवं सुन्दर बनाये हुए थी। निर्जीव तो नीरस और निष्ठुर ही हो सकता है। मुर्दा तो समीप बैठे आश्रितों या स्वजनों का विलाप भी नहीं सुनता, उस पर कुछ ध्यान भी नहीं देता। मानो उन सब से उसका कभी दूर का संबंध भी न रहा हो। भाव-संवेदनाओं का स्रोत सूख जाने पर मनुष्य भी ऐसा ही घिनौना हो जाता है। अपना हित-अनहित तक उसे नहीं सूझता, तो दूसरों की सेवा-सहायता करने की उत्कंठा उठने का तो प्रश्न ही कहाँ उठता है?
जीवितों और मृतकों की अलग-अलग दुनिया है। मुर्दे श्मशान, कब्रिस्तान में जगह घेर कर जा बैठते है और उधर से निकलने वालों को भूत-प्रेतों की तरह डराते-भगाते रहते हैं। जीवितों में से भला कोई ऐसी हरकत करता है? उन्हें तो आवश्यक प्रयासों में ही निरत देखा जाता है। इन दिनों संवेदनाओं को प्रेतों जैसी और संवेदनशीलों को जीवितों जैसी और गतिविधियाँ अपनाये हुए प्रत्यक्ष देखा जा सकता है।
करुणा उभरे बिना दूसरों की स्थिति और आवश्यकता का भान ही नहीं होता। इस अभाव की स्थिति में लकड़ी चीरना और किसी निरपराध की बोटी-बोटी नोंच लेना प्रायः एक जैसा ही लगता है। किसी के साथ अन्याय बरतने में, सताने-शोषण करने में कुछ भी अनुचित प्रतीत नहीं होता। भावना के अभाव में मनुष्य का अन्तराल चट्टान की तरह नीरस-निष्ठुर हो जाता है। संवेदनाशून्यों को नर-पशुओं की भी अपनी मर्यादायें होती हैं, जो प्रकृति-अनुशासन के विपरीत एक कदम भी नहीं उठाते, भले ही मनुष्य की तुलना में उन्हें असमर्थ-अविकसित माना जाता रहे।
लगता है भाव-श्रद्धाविहीनों के लिए नर-पिशाच, ब्रह्मराक्षस, मृत्युदूत, दुर्दान्त दैत्य जैसे नामों में से ही किसी का चयन करना पड़ेगा, क्योंकि उन्हीं की आपाधापी उस स्तर तक पहुँचती है, जिसमें दूसरों के विकास-विनाश से, उत्पीड़न एवं अभिवर्धन से कोई वास्ता नहीं रहता। उनके लिए “स्व” ही सब कुछ बनकर रह जाता है। बस चले तो वे हिरण्याक्ष दैत्य की तरह दुनिया को समुद्र में छिपाकर निरर्थक बनाना पड़े। जिनके लिए सभी बिराने हैं, वे किसी का कुछ भी-अनर्थ कर सकते हैं। ऐसा ही पिछले दिनों होता भी रहा है। स्वार्थांधों से इतना भी सोचते न बन पड़ा कि इस सृष्टि में दूसरे भी रहते हैं और उन्हें भी जीवित रहने दिया जाना चाहिए। वस्तुतः प्रस्तुत समस्याएँ अगणित है। उलझनों, संकटों, विग्रहों का कोई अन्त नहीं। यह सब कहाँ से उत्पन्न होते हैं और क्यों कर निपट सकते हैं,? इसकी विवेचना पर इसी एक निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि मात्र अपने आपे तक, गिने-चुने अपनों तक सीमित रहने वाला किन्हीं अन्यों की चिन्ता नहीं कर सकता और न उदार न्यायनिष्ठा का ही परिचय दे सकता है। ऐसी दशा में अनाचार के अतिरिक्त और कुछ बन ही न पड़ेगा, यही दुष्प्रवृत्ति जब बहुसंख्यक लोगों द्वारा अपनायी जाती है तो उसका परिणाम वातावरण को विक्षुब्ध किये व प्रतिक्रिया उत्पन्न किये बिना नहीं रहता।
संवेदना आत्मीयता के रूप में विकसित होती है, जब मनुष्य दूसरों के दुःख को अपना दुःख और अन्यों के सुख मानने लगता है। सहानुभूति के रहते ऐसा व्यवहार करना संभव नहीं होता है, जिनसे किसी के अधिकारों का अपहरण होता हो, अथवा किसी को शोषण का शिकार बनना पड़ता हो।
आमतौर से अपना, अपनों का हित-साधन ही अभीष्ट रहता है। यदि यह आत्मभाव सुविस्तृत होता चला जाय, जन-समुदाय को अपने अंचल में लपेट ले अन्य प्राणियों को भी अपने कुटुम्बी जैसा मानें, अपने जैसा समझें, फिर वैसा ही सोचते-करते बन पड़ेगा, जिससे सुख-शान्ति का पथ प्रशस्त होता हो। मात्र आतुरता के लिए उकसाती है और उसके फलस्वरूप अगणित संकटों का परिकर विनिर्मित करती है। यदि भाव संवेदना जीवन्त और सक्रिय बनी रहे, तो सृजन और सहयोग के आधार पर उत्थान और कल्याण का सुयोग ही सर्वत्र बन पड़ेगा।यही नवयुग की प्रतिष्ठापना का मूल आधार होगा।
बुद्ध का अन्तिम दिन था। आनन्द छाती पीटकर रोने लगा और बोला-” प्रभु अब आप तो जा रहे हैं मेरा क्या होगा?” बुद्ध ने कहा-” आनन्द! पागल मत बना! मुझसे पहले कितने ही बुद्ध हो गये और मेरे बाद अनेकों होंगे। यह सिलसिला कभी समाप्त नहीं होगा। यदि तू सीखने में कुशल है, तो किसी से भी सीख लेना। तू चालीस वर्षों तक मेरे रहा तू कहता है कि मुझे ज्ञान नहीं हुआ। “मैं जा रहा हूँ, उस दिन कह रहा है कि अब क्या होगा? यदि चालीस साल से तू ज्ञान को प्राप्त नहीं हुआ, तो चालीस जन्मों में भी तेरी क्या समझ में आयेगा? हो सकता है मेरे होने के कारण तेरी सीखने की क्षमता क्षीण हो गई हो। तू समझता था कि गुरु मिल गये, सब कुछ मिल गया। मिलना ही पर्याप्त नहीं, तुझे भी बदलने की जरूरत थी। संभव है मेरे न रहने पर तू बुद्धत्व को प्राप्त हो” और इतना कहकर बुद्ध ने अन्तिम साँस ली। ऐसा ही हुआ। कहते हैं कि आनन्द को बुद्ध के जाने के बाद ही परम ज्ञान उपलब्ध हो सका।
सहस्राधिक नेत्र उस पर टिके थे। फ्राँस का राजदरबार आज उसे राजकीय सम्मान प्रदान कर रहा है। यों यह सम्मान अब तक औरों ने भी पाया होगा, लेकिन उसके जैसा नहीं। पहले के सम्मान समारोहों में सिर्फ राजदरबार के वर्ग अथवा कतिपय गणमान्य व्यक्ति आकर्षित होते थे। लेकिन आज जन-सामान्य भी उमड़ पड़ा था। दर्शक दीर्घा के खचाखच भर जाने के कारण अनेकों दरबार के बाहर खड़े थे, इस आशा के साथ कि निकलने पर तो देख ही सकेंगे।
वह कोई बहुत बड़ा कवि-कलाकार न होकर पेशे से सामान्य चिकित्सक भर था। पर यहाँ उसे चिकित्सा विद्या नहीं वह अनूठी अनबूझ राहों पर चलने में कोई कठिनाई नहीं होती थी। सबके लिए अनजाना, अनसुलझा रहने वाला भविष्य उसके लिए सर्वथा परिचित और स्पष्ट था। अपने इस भविष्य दर्शन के करतब के कारण वह न केवल मोन्टेपिलर-पेरिस बल्कि समूचे फ्राँस में प्रसिद्धि पा चुका था।
अद्भुत है मानवी कलेवर भी-ऊपर से देखने पर तो हड्डियों के सहारे टिका, सर्वथा निकृष्ट दर्जे के चमड़े से मढ़ा खोल भर दिखता है, जिसका बाजार भाव मुश्किल से चालीस-पचास रुपये लगे पर क्या इतना ही है,? “नहीं तो “ शरीर, प्राण, मन और मन से आत्मा तक अनेक विधि स्तरों में ऐसे-ऐसे खजाने छुपे हैं, ऐसी-ऐसी सम्पदाएँ भरी पड़ी हैं जिसे देखकर अवाक् होना पड़ता है। मानने के लिए विवश होना पड़ता है कि मनुष्य निःसंदेह परमेश्वर का राजदुलारा है। आज लोग उसे देखकर कुछ इसी तरह विवश हो रहे थे। महारानी कैथेरीन द मेदिसी ने सम्राट और राजपुत्रों के भविष्य को जानने के लिए ही उसे बुलाया था।
उसके इस कर्तव्य पर दरबारी आपस में कुछ खुसफुसा रहे थे, पर बोले कौन? राजदरबार की मर्यादाएँ। साम्राज्ञी की दृष्टि उधर गई उनकी तेज आँखों से तथ्य छुपा न रह सका। उन्होंने उद्घोषक को बुलाकर कुछ कहा।
अगले ही पल वाणी गूँज गई-दरबार के सदस्य यदि कुछ कहना या पूछना चाहें तो पूछ सकते हैं; सम्राट व साम्राज्ञी आज्ञा देते हैं।
उत्तर में मंत्रीपरिषद् के एक सदस्य खड़े हुए। उन्होंने दरबारी शिष्टाचार का पूर्ण निर्वाह करते हुए पूछा-हमारे मानवीय अतिथि सिर्फ व्यक्तियों के ही भविष्य बता सकते हैं अथवा उनमें समूचे विश्व, अखिल मानव समाज की भवितव्यता उद्घाटित करने की भी क्षमता है।
कथन चुनौती भरा था। परन्तु इसके साथ ही अन्यों के चेहरों पर सन्तोष के भाव तैर गए। हो भी क्यों न? आखिर वे भी यही तो पूछना चाहते थे। उसने महारानी की ओर देखा, आँखों-ही-आँखों में बोलने की इजाजत माँगी। मिलने पर एक भरपूर दृष्टि मंत्रीपरिषद के सदस्यों, दरबारियों पर डालते हुए कहा-”आपका प्रश्न वाजिब है, यदि आप लोग व्यक्ति से ऊपर उठकर विश्व तक न पहुँचेंगे तो कौन पहुँचेगा? संभवतः आप सभी उत्तर भी चाहेंगे?” सभी का उत्तर सकारात्मक था।
तो सुनिये! आवाज किन्हीं अतल गहराइयों से रही थी। चेहरे पर पहले के सभी भाव लुप्त हो चुके थे। पहले हास-परिहास सहज मुस्कान सब गायब थी। अब थी एक अनोखी चमक-द्रष्टा का आभामण्डल। सभी दम साधे सुन रहे थे। “विश्व को अनेक कठिनाइयों से गुजरना पड़ेगा। अठारहवीं सदी के अन्तिम दशक में फ्राँस को राज्य क्रान्ति से गुजरना होगा। बीसवीं सदी में धरती दो महायुद्धों से हुए रक्तपात से भीग जाएगी। हिंसा, आग, बवण्डर, अलगाव-आतंक, क्रान्तियाँ और.........।” उसके कहने के भाव इतने भयंकर थे जैसे प्रत्येक शब्द से ज्वाला बरस रही हो। जन समुदाय सहम गया। क्या होगा? अभी तो 1442 चल रहा है, यह सब तो दूर है।
“हिटलर नामक तानाशाह का उदय-अस्त मार्क्सवाद का प्रादुर्भाव और विनाश, ब्रिटेन पर आघात न जाने कितनी बातें बयान कर डालीं। विनाश-विध्वंस चीत्कारें तो क्या धरती के भाग्य में महानाश के अलावा और कुछ नहीं है। सभी के मनों में उथल-पुथल थी। 1999 के होते-होते धरती पर एक महाक्राँति सम्पन्न होगी-एज ऑफ ट्रुथ “सतयुग” का आगमन होगा। सर्वत्र शान्ति, चहुँ ओर सृजन मानव के रूप में देवताओं का विहार, धन्य हो उठेगी धरा स्वयं को स्वर्ग का आधार बनते देखकर।” “कौन करेगा यह सब कहाँ से उठेगी महाक्रांति” एक ने दूसरे की ओर इशारा किया। महारानी सम्राट सभी आश्चर्यचकित थे, इस भावान्तर को देखकर। तभी प्रधान आमात्य ने सभी को शान्त किया।
वह कह रहे थे -”जहाँ तीन समुद्र मिलते हैं, उसी देश में आयेगा क्रान्ति का संचालक। उसे गुरुवार प्रिय होगा। वही महाशिल्पी इस अलौकिक सृजन को सम्पन्न करेगा। समस्त धरावासी “न भूतो न भविष्यति” कह कर सिर झुका लेंगे” जिन्हें भौगोलिक जानकारी थी, वे भारत का संकेत समझ चुके थे। पर असमंजस में थे। क्योंकि वे तो उसके वर्तमान को जानते ही न थे। एवं यह महापुरुष तो साढ़े चार सौ वर्ष बाद की भवितव्यता बता रहा था। महाविनाश से महासृजन तक का भविष्य दर्शन कर सभी भाव-विभोर थे। कुछ ही क्षणों में वे फिर पहले की तरह सामान्य सरल और हँसमुख बन गए, जैसे कुछ हुआ ही न हो।
मोशिए! आपका कथन कुछ समझ नहीं पा रहा हूँ। मंत्रीपरिषद के एक वृद्ध सदस्य ने अचकचाहट के साथ सवाल किया। “ धरती की वर्तमान अवस्था और....।”
समझा मैंने भी नहीं है। मैंने तो सिर्फ देखा है सूक्ष्म में घटते हुए। अब समझना चाहते हैं समझ लीजिए एक छोटी सी कहानी सुनना पसंद करेंगे? उसने हल्की मुस्कराहट के साथ अपनी बात पूरी की। अवश्य-अवश्य। सभी ने अनुमोदन किया।
जवाब में वह हँसते हुए सुनाने लगे। अपने फ्राँस में एक फकीर थे मोपलिए। एक दिन एक युवक उनके पास आया - उसे तीव्र वैराग्य था, आशा थी कि सन्त उसे मानवीय चेतना का मर्मज्ञ बनाएँगे। सन्त ने अनेकों तरह की परीक्षा की, समस्त लक्षणों को परखा और उसकी पीठ थपथपाते हुए कहा - तुममें सम्राट होने के लक्षण हैं।
पर मैं तो ....। युवक ने सकरुण नेत्रों से उनकी ओर ताका।
ठीक है, ठीक है साधना करो। सन्त की आँखें किसी अदृष्ट को निहार रही थी। साधना की प्रक्रिया समझायी, युवक भी तन्मय होकर साधना करने लगा। एक दिन सन्त ने कहा - “ पुत्र तुम्हारे अन्दर योगी के लक्षण दीखने लगे हैं। तुम किसी भी अवस्था में क्यों न हो, इच्छा होते ही मुझे अपने पास अनुभव कर सकोगे।
इसके एक-आध साल बाद ही साधनारत युवक के प्राणों ने शरीर छोड़ दिया। शरीर छोड़ने के बाद भी उसके प्राण सचेतन थे। उसने देखा कि वह एक अन्धेरी, संकीर्ण, दुर्गन्ध भरी गुफा में प्रवेश कर रहा है। दुःख और क्रोध से तमतमा कर उसने गुरु को पुकारते हुए कहा यही है आपका सत्य? आपने कहा था मैं सम्राट बनूँगा, अपने कहा था मैं योगी बनूँगा और मैं यह नारकीय यातना भुगत रहा हूँ।
पुकारते ही सन्त की सूक्ष्म उपस्थिति अनुभव हुई।”धैर्य मत खोओ बालक! तुम वैसे ही बनोगे जैसा मैंने कहा था। लेकिन तैयारी के लिए तुम्हें इस अँधेरी, विकट गुफा से गुजरना होगा। तुम इस देश की महान साम्राज्ञी के गर्भ में हो। जन्मते ही साम्राज्य तुम्हें विरासत में मिलेगा और योग संस्कारों वश प्राप्त होगा।” आज वह बालक....... कहते हुए उसने राजकुमार की ओर देखा।
सभी ने एक साथ कहानी के आवरण में छुपी यथार्थता को अनुभव किया। महारानी के मन में राजकुमार के जन्म से पूर्व के दिन सन्त का आशीर्वाद, सुखद अनुभूतियाँ एक-एक करके साकार हो उठी।
समझ में आया रहस्य, उसने अपनी रहस्यमयी दृष्टि सब पर घुमाई। विश्व व्यवस्था, अखिल मानव समाज अपनी गर्भावस्था से गुजर रहा है। प्रसव होने तक उसे अनेकों कष्ट सहने होंगे।
कौन है इस गर्भ को धारण करने वाला? अनेकों सवाल एक साथ उभरे। स्वयं सम्राट चकित थे। स्वयं महाकाल। संक्षिप्त उत्तर था। तो विश्व मानवता महाकाल के गर्भ में है। हाँ जहाँ उसे क्षण-क्षण परिवर्तन और अनिश्चितता का सामना करना पड़ेगा। दुःसह यातना जिसकी नियति होगी। यह यातना ही तो उसे सर्वांग सुन्दर बनाने वाली है।
काल के महाकाल के गर्भ में। ये शब्द सभी कानों में हथौड़े की तरह बज उठे। मस्तिष्क झनझना उठा। रुक-रुक कर सिहरन दौड़ उठती। नया मानव जन्म लेगा। सब कुछ नया होगा। नए प्राण, नया मनुष्य, नया समाज, नया जमाना, समूचा युग नया सब कुछ नया-नया। स्पष्ट हो गया न तथ्य। रहस्यमयी मुस्कान के साथ बोले गए शब्दों ने जैसे सभी को अशाँत भविष्य से वर्तमान में ला दिया। फ्राँस की राजसभा में तथ्य को स्पष्ट करने वाले यह भविष्यद्रष्टा थे-”माइकेलनोस्ट्राडेमस” जिनकी भविष्यवाणियों को अपने में सँजोने वाली पुस्तक “सेंचुरीज” आज भी प्रत्येक के आकर्षण का केन्द्र बनी हुई है। बीतती सदियों ने जिसे धुँधला करने के बजाय अधिकाधिक उज्ज्वल किया है।
1999 की घड़ियाँ निकट आती जा रही हैं। महाकाल की चेतना सघन से सघन तर सघनतम होती जा रही है। नवयुग जन्म लेने को है। अगवानी का समय आ रहा है। ऐसे में कदम पीछे क्यों हटें? जबकि कार्यक्षेत्र भारतवर्ष ही बनने जा रहा है।
कोई समय था, जब घर-घर में अंधविश्वासों की भरमार थी। भूत-प्रेत, टोना-टोटका घर-घर में चर्चा के विषय बने रहते थे। कोई किसी पर तंत्र-मंत्र करा रहा है, किसी ने किसी पर जादू करा दिया है, यह चर्चा घरों में किसी न किस के मुँह से सुनने को मिलती रहती थी। संदेह और आशंका का भय, पारस्परिक कलह और विद्वेष का कारण बना रहता था।
कुछ धूर्तों ने इस विडम्बना को अपना व्यवसाय बना लिया था। छोटी बीमारियों को किसी भूत-पलीत की करतूत मान लिया जाता था और जिस-तिस पर आरोप लगा दिया जाता था कि उसने यह टोना-टोटका कराया है। भोले लोग इन बातों पर विश्वास भी कर लेते थे और तिल का ताड़, राई का पहाड़ बन जाता था। आये दिन परस्पर कलह, संदेह, अन्धविश्वास और विग्रह खड़े होते रहते थे। झाड़-फूँक करने वाले इसी बहाने अपना अच्छा-खासा धंधा चला लेते थे। जहाँ शान्तिपूर्वक रहना चाहिए था और कोई कारण न होने पर दुर्भाव का कोई आधार नहीं बनना चाहिए था, वहाँ भी, छोटे-मोटे गाँवों तक में भी संदेह, अविश्वास और दुर्भाव का वातावरण बन जाता था। आग में ईंधन पड़ने पर और भी बढ़ोत्तरी होती है। कौतुकी भी मनोरंजन हेतु किन्हीं किंवदंतियों को तिल से ताड़ बना दिया करते थे और उसी बहाने किसी न किसी से कुछ-न-कुछ ठग लिया करते थे।
यह अविश्वास कहाँ से उपजता था और अब न जाने कहाँ चला गया, इस पर आश्चर्य होता है। नासमझी ही बात का बतंगड़ बनाती थी। समझदारी का उद्भव होते ही वह सारा जाल-जंजाल इस प्रकार तिरोहित हो गया, मानों गधे के सिर पर कभी सींग उगे ही नहीं थे।
ऐसी ही कुछ भ्रांतियां मनुष्य को अपने संबन्ध में अभी भी होती हैं। शरीर में आये दिन बीमारियाँ होती रहती हैं और उनके इलाज-उपचार कि लिए नित नई औषधियों का प्रयोग होता रहता है। इतने पर भी यह विवाद बना ही रहता है कि इनमें से कौन सी-लाभदायक सिद्ध हुई, कौन सी-हानिकारक। एक रोगी के लिए जो चिकित्सा उपयोगी हुई, वही दूसरे रोगी कि उसी रोग में हानिकारक सिद्ध होती देखी जाती है। आये दिन चिकित्सकों एवं औषधियों की अदला-बदली इसलिए होती रहती है। यह सिलसिला मुद्दतों से चल रहा है, पर अभी तक किसी एक निश्चय पर पहुँचना संभव न हो सका।
इतने दिनों बाद अब एक सही निष्कर्ष हाथ लगा है कि मन का शरीर के प्रत्येक पुर्जे पर अधिकार है। यदि मन को नियंत्रित और सन्मार्गगामी बनाया जा सके, तो शरीर के सभी कल-पुर्जे अपना-अपना काम सही रीति से करने लगता हैं और बीमारियों की जड़ कट जाती है। इसके विपरीत यदि चिन्तन का क्रम उलटा चलता रहे, कुविचार मस्तिष्क पर छाये रहें, तो शरीर में कोई स्थानीय व्यथा न होने पर भी कल्पनाजन्य अनेकों अव्यवस्थाएँ उठ खड़ी होती हैं और दवाओं में सिर्फ वही थोड़ा-बहुत काम करती हैं, जिन पर विश्वास गहरा होता है। इससे प्रतीत होता है कि बीमारियों की जड़ तो मन के भीतर रहती है। शरीर में तो उनका आभास भर होता है। यदि सरल, सौम्य और सद्भावपूर्ण विचार बने रहें, तो बीमारियों का जो प्रकोप आये दिन बना रहता है, उनका अस्तित्व ही न रहे। यह तथ्य यदि समय रहते लोगों को पहले ही अवगत हो गया होता, तो हर कोई अपना इलाज आप कर लेता और उसके लिए जहाँ-तहाँ भटकते रहने की आवश्यकता न पड़ती।
यही बात खिन्नता, उद्विग्नता के संबन्ध में भी है। लोग प्रतिकूल परिस्थितियों को चिन्ताओं, आशंकाओं और प्रतिकूलताओं का कारण मानते हैं, पर यह भूल जाते हैं कि उन्हीं परिस्थितियों में उतने ही साधनों में अनेक लोग प्रसन्न रहते हैं। चित्त की प्रवृत्तियाँ ही प्रधान भूमिका निभाती हैं। परिस्थितियों को बदलने के लिए भाग-दौड़ करने की अपेक्षा, यदि मन की बेतुकेपन की रीति-नीति को ही सुधार लिया गया होता, तो हर स्थिति को अपने अनुकूल बन जाने में कोई बड़ी कठिनाई न पड़ती। अपनी गलती को दूसरों के सिर इसलिए मढ़ा जाता हैं यदि कुटेव अभ्यास में न घुस पड़ी होती, तो सरलता और सज्जनता का सौम्य जीवन जीते हुए हर व्यक्ति अपनी वर्तमान परिस्थितियों को सुधार लेता। गलती सुधर जाने पर, जो प्रतिकूलताएँ चारों ओर घिरी दीखती हैं, उनमें से एक भी घिरी न दीख पड़तीं।
इन्द्रियों का दुरुपयोग कठिनाइयों का निमित्त कारण बनता है, यदि इस मोटे तथ्य को लोगों ने हृदयंगम कर लिया होता, तो इच्छा-आकाँक्षाओं को पूरा करने की दौड़-धूप न करनी पड़ती, मात्र संयम-साधना से ही अधिकाँश समस्याएँ सुलझ गयी होतीं। यदि स्वादेन्द्रिय पर काबू रखा जाता, तो अनावश्यक-अभक्ष्य खाने की ललक न उठती और पेट के संतुलित बने रहने पर पाचन-तंत्र में कोई व्यतिक्रम न खड़ा होता। कामुकता, मानसिक विकार है। लोग उसे शारीरिक माँग या आवश्यकता मानते हैं, जो कि सही नहीं है। यदि इस मोटे सिद्धाँत को समझ लिया जाय, तो फिर कामुकताजन्य जो अनेक अनाचार दीख पड़ते हैं, उनमें से एक भी कहीं दीख न पड़ता। नर-नारी मिलजुल कर उन उपयोगी और महत्वपूर्ण कामों में लगे होते, जिससे सुविधाओं की कमी न रहती और जिन अनौचित्यों का आये दिन सामना करना पड़ता है, उनसे कोई भी किसी को हैरान-परेशान न कर रहा होता। आँख, कान, नाक, इन्द्रियों में से जिन्हें क्रियाशील कहा जाता है, यदि उनके प्रयोग से पहले ही यह विचार कर लिया जाता कि औचित्य और अनौचित्य में क्या अन्तर हो है, और क्या अपनाने योग्य है, क्या अपनाने योग्य नहीं, तो मस्तिष्क द्वारा उलटी दिशा अपनाने और उसके फलस्वरूप कोई भी अहितकर प्रयास करने के लिए कदम न बढ़ता। फिर अच्छे-खासे सुख-शान्ति भरे जीवन को विद्रूप बनाने की किसी को भी आवश्यकता न पड़ती।
उपलब्ध वस्तुओं को ठीक प्रकार प्रयुक्त करना मनुष्य की बुद्धिमानी का प्रथम चिह्न है। जीवनचर्या के साथ जुड़े हुए मन को यदि सबसे अच्छा साधना माना गया होता और उसके सदुपयोग-दुरुपयोग का आरंभ से ही ध्यान रखा गया होता, तो सदा-सर्वदा हर किसी को हँसती-हँसाती जिन्दगी जीने का अवसर मिलता। जिन विग्रहों और अनाचारों का आये दिन सामना करना पड़ता है, उनमें से एक भी हैरान करने के लिए सामने न आते। इस संसार में ऐसी एक भी कठिनाई नहीं है, जिसका बुद्धिमत्ता अपनाने पर समाधान न खोजा और निवारण निराकरण का मार्ग न निकाला जा सके यह संसार भगवान का सुरम्य उद्यान है। उसमें हर दिशा में, हर प्रकार की सुविधाएँ ही भरी पड़ी हैं, जहाँ-कहीं प्रतिकूलताएँ दीख पड़ती हैं, वहाँ समझना चाहिए कि चिन्तन में कहीं कोई गड़बड़ी पड़ गई है। यदि ऐसी खोट को ढूँढ़ लिया जाय, तो वह कारण सहज ही समझ में आ सकता है। अगले दिनों मनुष्य अपने चिन्तन को सही करने जा रहा है और साथ ही उन सभी समस्याओं से पीछा भी छुड़ाने की तैयारी कर रहा है, जो आज हैरानी का वातावरण बनाये हुए हैं।
अमेरिका की हैरियट स्टी कई बच्चों की माँ थी। घर की आर्थिक स्थिति भी अब दीन थी। सुबह से शाम तक उन्हें काम में जुटा रहना पड़ता था।
इस व्यस्त जीवन में भी वे बच्चों के सो जाने के बाद चुपके से उठतीं और उस पुस्तक को लिखने में लग जाती। जिसे पूरी करने की उनके मन में भारी उत्कंठा थी।
उन दिनों अफ्रीका में नीग्रो लोगों को पकड़कर लाया जाता था उन्हें पशुओं की तरह खरीदा, बेचा और वैसा ही कड़ा काम लिया जाता था। स्टी के मन में इसी क्रूर प्रथा के प्रति आग जल रही थी, वे इस प्रचलन के विरुद्ध विद्रोह खड़ा करना चाहती थी।
पुस्तक इसी प्रयोजन के लिए लिखी जा रही थी। पुस्तक पूरी हुई और छपकर बाजार में आई तो जन-जन ने उसे बड़े गौर के साथ पढ़ा। भावनाएँ उमड़ीं। पीड़ितों के प्रति सहानुभूति उत्पन्न हुई और उस व्यवसाय में लगे वर्ग के प्रति विद्रोह खड़ा हो गया। कुछ समय के संघर्ष के बाद उस देश में कानून बना और दास प्रथा से लाखों को छुटकारा मिला।
सैनिकों को युद्ध मोर्चों पर पराक्रम दिखाने के लिए तैयार कराने के लिए, उन्हें भेजने वाला तंत्र यह व्यवस्था भी करता है कि उन्हें आवश्यक सुविधाओं वाली साज-सज्जा मिल सके, अन्यथा वे अपनी ड्यूटी ठीक प्रकार पूरी करने में असमर्थ रहेंगे। नवसृजन के दुहरे मोर्चे पर इसी प्रकार की व्यवस्था, युग परिवर्तन का सरंजाम जुटाने वाली सत्ता ने भी कर रखी है। सफलता के उच्च लक्ष्य तक पहुँचने में कितनी ही बाधाएँ पड़ सकती हैं, उन्हें पार करने के लिए - वाँछित प्रगति के लिए अनेक आवश्यकताएँ पूरी करनी होती हैं। समझना चाहिए कि इस संदर्भ में किसी अग्रगामी आदर्शवादी को निराश न होना पड़ेगा, क्योंकि उसकी पीठ पर सर्वशक्तिमान सत्ता का हाथ जो रहेगा।
तेज हवा पीछे से चलती है, तो पैदल चलने वालों से लेकर साइकिल आदि के सहारे लोग कम परिश्रम में आगे बढ़ते जाते हैं और मंजिल सरल हो जाती है। इसी प्रकार नवसृजन का लक्ष्य, कल्पना करने वालों को कठिन दीखता तो है, पर उस स्रष्टा को विदित है कि उनकी नवसृजन योजना को पूरा करने के लिए, जो अपने प्राण हथेली पर रखकर अग्रगमन का साहस दिखा रहे हैं, उन्हें सफलता का लक्ष्य प्रदान करने के लिए क्या-क्या आवश्यकताएँ जुटानी और क्या जिम्मेदारी निभानी चाहिए।
माँगने वाले भिखमंगे दरवाजे-दरवाजे पर झोली पसारते, दाँत निपोरते, गिड़गिड़ाते हैं और दुत्कारे जाते हैं। मनोकामनाएँ पूरी कराने वाले ईश्वर भक्ति का आडम्बर ओढ़कर इसी प्रकार निराश रहते हैं और उपेक्षा सहते हैं, पर जिन्हें ईश्वर का काम करना पड़ता, उन्हें तो आदरपूर्वक बुलाया जाता है और अभीष्ट साधनों का उपहार भी दिया जाता है। इन दिनों गरज ईश्वर को पड़ी है। उस का उद्यान समुन्नत करने के लिए कुशल माली चाहिए। उसी की दुनिया को समुन्नत, संस्कृत, सुसम्पन्न बनाने के लिए कुशल कलाकारों और शूरवीर सैनिकों की आवश्यकता पड़ रही है। जो उसकी पुकार पर अपनी क्षमता को प्रस्तुत करेंगे, वे देवी अनुग्रह से किसी प्रकार वंचित न रहेंगे, वरन् इनसे कुछ प्राप्त करेंगे, जिसे पाकर वे निहाल बन सकेंगे।
हनुमान, सुग्रीव के सुरक्षा कर्मचारी थे। भयभीत सुग्रीव के लिए दो वन आगंतुकों का भेद लेने के लिए वे वेश बदलकर राम लक्ष्मण के पास गये थे और सिर नवाकर विनम्रतापूर्वक पूछताछ कर रहे थे। पर बाद में स्थिति बदली, सीता की खोज के लिए राम को हनुमान की जरूरत पड़ी। अनुरोध उनने स्वीकारा तो बदले में इतनी सामर्थ्य के धनी बन गये, जो उनकी मौलिक विशेषताओं में सम्मिलित नहीं थी। समुद्र छलाँगने, लंका को जलाने, पर्वत उखाड़ कर लाने जैसे असाधारण काम थे, जो उन्होंने अतिरिक्त शक्ति प्राप्त करके सम्पन्न किये।
ईश्वर के लिए आड़े समय में काम आने वालों को भी ऐसे ही उपहार-अनुदान मिलते हैं। विभीषण को लंका का सम्राट बनने का सुयोग मिला। सुग्रीव ने अपना खोया राज्य पाया। भगवान के काम के लिए देवपुत्र माँगने वाली कुन्ती को उत्कृष्ट स्तर के पुत्र रत्न देने में उनने आना-कानी नहीं की। भक्ति का प्रचार करने वाले नारद देवर्षि कहलाये। सूर-तुलसी ने ईश्वर के काम कि लिए प्रतिज्ञारत होकर ऐसी प्रतिभा पायी, जिसके सहारे वे अनन्त कीर्ति पा सकने के अधिकारी बने।
इन दिनों स्रष्टा ने ही विश्व-कल्याण, नवसृजन के लिए कर्मवीरों को पुकार है। जो उस हेतु हाथ बढ़ायेंगे, वे खाली क्यों रहेंगे? भगीरथ, गाँधी, बुद्ध आदि को जो समर्थता मिली, वह इसलिए मिली की परमार्थ प्रयोजन के काम आये।
इस दुनिया में ऐसी भी सुविधा है कि जब-तब बहुत सी उपयोगी वस्तुएँ बिना मूल्य भी मिल जाती हैं। हवा, पानी, छाया, खुशबू आदि हम बिना मूल्य ही पाते हैं, पर जौहरी या हलवाई की दुकान पर सुसज्जित रखी हुई वस्तुएँ उठा कर चल देने का कोई नियम नहीं है। उनका मूल्य चुकाना पड़ता है। गाय को घास न खिलायी जाय, तो दूध प्राप्त करते रहना कठिन है।
भगवान ने सुदामा को अपनी द्वारिकापुरी, टूटी सुदामापुरी के स्थान पर स्थानान्तरित कर दी थी, पर इससे पहले यह विश्वास कर लिया था कि इस अनुदान को उस स्थान पर कारगर विश्वविद्यालय चलाने के लिए ही प्रयुक्त किया जायेगा। चाणक्य की शक्ति चन्द्रगुप्त को ही मिली थी और वह चक्रवर्ती कहलाया था।
भवानी की अक्षय तलवार शिवाजी को मिली थी। अर्जुन को दिव्य गांडीव धनुष एवं बाण देने वालों ने अनुदान थमा देने से पहले यह भी जाँच लिया था कि उस समर्थता को किस काम में प्रयुक्त किया जायेगा? यदि बिना जाँच-पड़ताल के किसी को कुछ भी दे दिया जाय, तो भस्मासुर द्वारा शिवजी को जिस प्रकार हैरान किया गया था, वैसी ही हैरानी अन्यों को भी उठानी पड़ सकती है।
भगवान ने काय-कलेवर तो आरंभ से ही बिना मूल्य दे दिया है, पर उसके बाद का दूसरा वरदान है-”परिष्कृत प्रतिभा”। इसी के सहारे कोई महामानव स्तर का बड़प्पन उपलब्ध करता है। इतनी बहुमूल्य सम्पदा प्राप्त करने के लिए वैसा ही साहस एकत्रित करना पड़ेगा, जैसा कि लोकमंगल के लिए विवेकानन्द जैसों को अपनाना पड़ा था। इन दिनों परीक्षा भरी वेला है, जिसमें सिद्ध करना होगा कि जो कुछ दैवी-अनुग्रह विशेष रूप से उपलब्ध होगा,, उसे उच्चस्तरीय प्रयोजन में ही प्रयुक्त किया जायेगा। कहना न होगा कि इन दिनों नवयुग के अवतरण का पथ-प्रशस्त करना ही वह बड़ा काम है, जिसके लिए कटिबद्ध होने पर ‘परिष्कृत प्रतिभा’ का बड़ी मात्रा में अनुग्रह प्राप्त किया जा सकता है। उसे धारण करने पर ‘हीरक हार’ पहनने वाले की तरह शोभायमान बना जा सकता है।
ईश्वरीय व्यवस्था में यही निर्धारण है कि बोया जाय और उसके बाद काटा जाय। पहले काट लें, उसके बाद बोयें, यह नहीं हो सकता। लोकसेवी उज्ज्वल भविष्य वाले लोग ही प्रायः वरिष्ठ, विश्वस्त गिने और उच्चस्तरीय प्रयोजनों के लिए प्रतिनिधि चुने जाते हैं। विशिष्ट पुरुषार्थ का परिचय देने के उपरान्त ही पुरस्कार मिलते हैं। परिष्कृत प्रतिभा ऐसी सम्पदा है, जिसकी तुलना में मनुष्य को गौरवान्वित करने वाला और कोई साधन है नहीं। उसे प्राप्त करने के लिए यह सिद्ध करने की आवश्यकता है कि मानवी गरिमा को गौरवान्वित करने वाली धर्म-धारणा के क्षेत्र में कितनी उदारता और कितनी सेवा-साधना का परिचय देने का साहस जुटा पाया।
दूसरों के हाथ रचाने के लिए, मेंहदी के पत्ते पीसने पर अपने हाथ स्वयमेव लाल हो जाते हैं। समय की माँग के अनुरूप पुण्य-परमार्थ का परिचय देने वालों को भी सदा नफे में ही रहने का सुयोग मिलता है। बाजरा, मक्का आदि का बोया हुआ एक दाना हजार दाने से लदी बाल बनकर इस तथ्य को प्रमाणित और परिपुष्ट करता है। भगवान के बैंक में जमा की हुई पूँजी इतने अधिक ब्याज समेत वापस लौटती है, जितना लाभ अन्य किसी व्यवसाय या पूँजी-निवेश में कदाचित् ही हस्तगत होता हो।
किसी की वरिष्ठता उसके पारमार्थिक पौरुष के आधार पर ही आँकी जाती है। श्रेष्ठों, वरिष्ठों का आकलन इसी एक आधार पर होता रहा है। साथ ही यह भी विश्वास किया जाता है कि बड़े कामों को सम्पन्न करने में उन्हीं की मनस्कता काम आती है। पटरी पर से उतरे इंजन को उठाकर फिर उसी स्थान पर रखने के लिए मजबूत और बड़ी क्रेन चाहिए। उफनती नदी में जब भँवर पड़ते रहते हैं, तब बलिष्ठ नाविकों के लिए ही यह संभव होता है कि वे डगमगाती नाव को खेकर पार पहुँचायें। समाज की सुविस्तृत संसार की उलझन भरी बड़ी समस्याओं को सही तरह सुलझा सकना, उन साहसी और मेधावीजनों से ही बन पड़ता है, जिन्हें दूसरे शब्दों में प्रतिभावान भी कहा जा सकता है। युग परिवर्तन जैसे महान प्रयोजनों को हाथ में लेने के लिए अपनी साहसिकता का, गौरवभरी गरिमा का परिचय दे सकने वाले व्यक्ति चाहिए। आड़े समय में ऐसे ही प्रखर प्रतिभावानों को खोजा, उभारा और खरादा जाना है।
एक संभावना यह है कि संचित अनाचारों का विस्फोट इन्हीं दिनों हो सकता है। उसे न रोका गया, तो कोई महायुद्ध भड़क सकता है। बढ़ता हुआ प्रदूषण, भयावह बहुप्रजनन, बढ़ता हुआ अनाचार मिल-जुलकर महाप्रलय या खण्डप्रलय जैसी स्थिति उत्पन्न कर सकते हैं। उसे रोकने के लिए सशक्त अवरोध चाहिए। ऐसा अवरोध, जो उफनती हुई नदियों पर बाँध बनाकर उस जल-संचय को नहरों द्वारा खेत-खेत तक पहुँचा सके। वह साधारणों का नहीं, असाधारणों का काम है।
ताजमहल, मिस्र के पिरामिड, चीन की दीवार पीसा की मीनार, स्वेज और पनामा नहर, हालैण्ड द्वारा समुद्र को पीछे धकेलकर उस स्थान पर सुरम्य औद्योगिक नगर बसा लेने जैसे अद्भुत सृजन-कार्य जहाँ-तहाँ विनिर्मित हुए दीख पड़ते हैं, वे आरंभ में किन्हीं एकाध संकल्पवानों के ही मन-मानस में उभरे थे। बाद में सहयोगियों की मंडली जुड़ती गई और असीम साधनों की व्यवस्था बनती चली गयी। नवयुग का अवतरण भी इन सबमें बढ़ा-चढ़ा कार्य है, क्योंकि उसके साथ संसार के समूचे धरातल का जन समुदाय का संबन्ध किसी न किसी प्रकार जुड़ता है। इतने बड़े परिवर्तन एवं प्रयास के लिए अग्रदूत कौन बने? अग्रिम पंक्ति में खड़ा कौन हो? आवश्यक क्षमता और सम्पदा कौन जुटाये? अवश्य ही यह नियोजन असाधारण एवं अभूतपूर्व है। इसे, बिना मनस्वी साथी-सहयोगियों के सम्पन्न नहीं किया जा सकता। विचारणीय है कि उतनी बड़ी व्यवस्था कैसे बने?
आरम्भिक दृष्टि से यह कार्य लगभग असंभव जैसा लगता है, पर संसार में ऐसे लोग भी हुए हैं, जिन्होंने असंभव को संभव बनाया है। आल्पस पहाड़ को लाँघने की योजना बनाने वाले नेपोलियन’ से हर किसी ने यह कहा था कि जो कार्य सृष्टि में आदि से लेकर अब तक कोई नहीं कर सका, उसे आप कैसे कर लेंगे? उत्तर बड़ा शानदार था। असंभव शब्द मूर्खों के कोश में लिखा मिलता है। यदि आल्पस ने राह न दी, तो उसे इन्हीं पैरों के नीचे रौंदकर रख दिया जायेगा। अमेरिका की खोज पर निकले कोलम्बस को भी लगभग ऐसा ही उदाहरण प्रस्तुत करना पड़ा समुद्र से अंडे वापस लेने में असफल होने पर जब टिटहरी ने अपनी चोंच में बालू भरकर समुद्र में डालने और उसे पाटकर समतल बनाने का संकल्प घोषित किया और उसके लिए प्राणों की बाजी लगाने के लिए उद्यत हो गयी, तो नियति ने संकल्पवानों का साथ दिया। अगस्त्य मुनि आये, उनने समुद्र पी डाला और टिटहरी को अंडे वापस मिल गये। फरहाद द्वारा पहाड़ काट कर 32 मील लम्बी नहीं निकालने का असंभव समझे जाने वाला कार्य संभव करके दिखाया गया। इसे ही कहते हैं “प्रतिभा”।
भोज विद्वानों की बड़ी कदर करते थे और उन्हें सारस्वत सम्मान देते थे। एक बार उनके दरबार में एक विद्वान गीता की कथा सुनाने के अभिप्राय से गये। उनका उद्देश्य इस प्रकार कुछ धन प्राप्त करने का था। राजा उनका स्तर समझ गये और अवकाश न होने का बहाना बनाकर उन्हें लौटा दिया। कुछ समय बाद वे पंडित फिर पहुँचे और अवकाश निकाल कर कथा सुनने का आग्रह करने लगे। राजा ने अब की बार कहा आप गीता में प्रवीण हो जाइए तब कथा सुनाइये। पंडित जी ने गीता कंठाग्र कर ली। सन्देश भेजा और कब कथा सुनाने आयें यह पूछा। राजा ने इस बार उत्तर भिजवाया कि जब आप गीतामय हो जायें तब सूचित करें। पंडित जी ने इस व्यवहार पर गंभीरतापूर्वक विचार किया, बार-बार अपमानित होने का कारण समझा। उनने लोभवृत्ति छोड़ दी ओर मन, वचन, कर्म से अपने आपको गीता के अनुरूप ढालने में लग गये।
बहुत दिन बीत जाने पर राजा ने उनकी खोज खबर ली। जब पता चला कि उनका चरित्र-चिन्तन एक दम बदल गया है। तो उनने बुलावा भेजा। पर पंडित जी ने मना कर दिया और कहा अपने आप में संतुष्ट हूँ। कहीं जाने की आवश्यकता अनुभव नहीं होती।
राजा ने परिवर्तन की वस्तु स्थिति समझ ली। वे स्वयं पंडित जी के घर पहुँचे और अठारह दिन वहीं रहकर अठारह अध्याय कथा सुनी। साथ ही दक्षिणा में उनके घर जिन वस्तुओं की कमी प्रतीत हुई वे सभी पहुँचा दीं।
“भाभी, तुम्हारे अन्दर मानवता के प्रति कसक है। लगता है पीड़ितों, असहायों का दर्द तुम्हारे अन्तःकरण में उतर आया है। तुम्हारे मन में जो करुणा, दया और प्रेम निहित है, उसे पा दुःखी और भ्रमित, पीड़ित और दलित-समाज को नई ज्योति मिलेगी। इसलिए तुम्हें अपनी रोजी-रोटी बेटा-बेटी की समस्या से ऊपर उठकर समाज सेवा का भी कुछ व्रत पालन करना चाहिए।” पति की छोटी बहिन ने उक्त शब्द कहे।
उस समय उसकी गोद में नवजात बालक था उसने कहा- “दीदी भला मेरे पास ऐसी कौन सी प्रतिभा है जिससे समाज का उद्बोधन और समाज का मार्गदर्शन करूं। किससे क्या कहूँ, मेरी कौन सुनेगा? सेवा का मार्ग कठिन है, उस पर मुझ जैसी स्वल्प शक्ति वाली स्त्री चल सकेगी, इसमें संदेह है।”
“ऐसा कहकर मनुष्य को प्रदत्त परमात्मा की शक्ति को तिरस्कृत न कीजिए भाभी जी। भगवान ने हर व्यक्ति को कुछ न कुछ दिया है, जिससे वह दूसरों की सेवा कर सकता है। दूसरों को ऊपर उठाने में मददगार साबित हो सकता है। कठिनाई तो कुल इतनी सी है, लोगों ने अपने स्वार्थ की एक छोटी सी रेखा खींच ली है। बढ़िया कपड़ा, दमकते जेवर और सुस्वादु भोजन हो तो सिर्फ अपने लिए। दूसरे के बच्चे कैसे भी रहें, पर मेरे बालक को उच्च शिक्षा, अधिक सुविधाएँ, स्नेह और आदर मिलना चाहिए। अपने सुख अपनी तृष्णा, अपने स्वार्थ की मृगतृष्णा से कुछ समय निकले तो सेवा के लिए सर्वत्र स्थान है।
बहिन ने आगे समाधान प्रस्तुत करते हुए कहा-”भाभी जी आप लिखा कीजिए। अपनी बौद्धिक क्षमता, सूझ-बूझ और भीतर भरे गुणों का प्रकाश तो आप समाज को दे ही सकती हैं।”
“अच्छा जीजी लिखूँगी! जरूर लिखूँगी! उसने वचन दिया - जैसे ही बच्चा थोड़ा संभला, मैं लिखना अवश्य प्रारंभ करूंगी।”
यह वह समय था, जब अमेरिका में दास प्रथा खूब प्रचलित थी। दक्षिणी अफ्रीका में तो सामन्तवादियों ने दासों का घोर उत्पीड़न किया था, उनके साथ पशुवत् व्यवहार करते थे। मनमाना दण्ड देते और उनके जीवन को कंकड़-पत्थर की तरह अपनी सम्पत्ति मानते।
ऐसे समय में जब उनके खिलाफ एक शब्द भी कहने की किसी की हिम्मत ने होती थी। दृढ़ संकल्प करके एक साधारण गृहिणी जब कलम लेकर बैठ गई तो नज़ारा ही बदल गया। जो कल तक यह कहा करती थी कि उसके पास तो कुछ है ही नहीं, वह समाज का क्या हित कर सकती है। उसने जब सेवा का संकल्प ठान लिया तो सारे अमेरिका की आबोहवा गर्म होने लगी। उसने अपना सारा दर्द उतार कर कागजों में रख दिया। “अंकिल टाम्स केबिन”- “टाम काका की कुटिया” नाम से जब यह पुस्तक प्रकाशित हुई तो सारे देश में परिवर्तन का तूफान उठ खड़ा हुआ।
अवाँछनीयताओं के विषवृक्ष की जड़ें उखड़ने लगीं।
उसने इस किताब में दासत्व की अवाँछनीय प्रथा के खिलाफ ऐसे सशक्त विचार भरे थे कि हर पढ़ने वाला - तिल-मिला उठता और यही कहता -”मनुष्य, मनुष्य को उत्पीड़ित करना बंद करे।” घर-द्वार, कल-कारखाने, पार्क-पाठशाला सर्वत्र ये विचार व्याप्त हो गये। दास प्रथा समाप्त हो गई। दुनिया की 22 भाषाओं में अनूदित इस कृति को सभी ने सराहा।
एक दिन तत्कालीन राष्ट्रपति लिंकन ने उसका सार्वजनिक अभिनन्दन किया और कहा - यही हैं- हेरियट स्टो- जिन्होंने अमेरिकी समाज से सदियों से चली आ रही इस अवाँछनीयता को उखाड़ फेंका। यह इनकी निष्ठा और संकल्प का बल था - जिसने इतना बड़ा कार्य कर दिखाया। आप लोग यह अनुमान करें कि आप के पास भी उतनी ही शक्ति है। यदि आप कुछ करने को उद्यत हों, तो इससे भी अधिक चमत्कारपूर्ण कार्य कर सकते हैं।
अष्टाँग योग नाम से जा जाने वाला राजयोग यों स्थूल क्रिया कृत्यों के साथ भी जुड़ा हुआ है, पर उनका वास्तविक उद्देश्य चेतना के अन्तरंग क्षेत्र को पवित्र एवं प्रखर बनाना है। शारीरिक क्रिया-कलापों का भी यों चेतना पर प्रभाव पड़ता है, पर साथ में सिद्धान्तों, आदर्शों का उसके साथ सघन समन्वय भी होना चाहिए। यदि उसकी उपेक्षा की जाय और मात्र कर्मकाण्डों को ही सब कुछ मान लिया जाय, तो उतने भर से अभीष्ट की प्राप्ति नहीं हो सकती।
शरीर का अपना महत्व है, उसके क्रिया-कलापों का भी। इतने पर भी यह मानना पड़ेगा कि अध्यात्म क्षेत्र में क्रिया की अपेक्षा भावना का महत्व असंख्य गुना अधिक है। भावनाविहीन भक्ति का कोई मूल्य नहीं। देव प्रतिमाएँ बनती तो धातु-पाषाण आदि जड़ पदार्थों की हैं, पर उनमें चेतना का समावेश भक्त की सघन श्रद्धा के अनुरूप होता है। यदि श्रद्धा न हो, तो वे दुकानों पर रखे खिलौनों से बढ़कर और कोई अतिरिक्त प्रभाव दिखाने में समर्थ नहीं होते। यही बात मंत्र, अनुष्ठान, पूजन, अर्चन आदि के संबन्ध में भी है। उनकी शक्ति-सामर्थ्य उसी अनुपात से घटती-बढ़ती रहती है, जैसी कि उपासक की भावना गहरी-उथली होती है। आध्यात्मिक साधनाओं में से प्रत्येक का यही स्वरूप एवं यही प्रतिफल है। जो मात्र कर्मकाण्डों को ही साधना मान बैठते हैं, वे भूल करते हैं। शारीरिक अथवा पदार्थपरक क्रिया-कृत्यों का मूल्य नगण्य ही होता है। श्रमिक दिन भर काम करके थोड़ा-सा पारिश्रमिक पाते हैं, फिर कुछ समय तक किये जाने वाले जप-ध्यान आदि का कोई बड़ा माहात्म्य या मूल्य कैसे हो सकता है? इतने पर भी जिनका यही आग्रह है कि अमुक जप या पूजन की असाधारण महत्व होना चाहिए, उतने भर से बढ़ी-चढ़ी सिद्धियाँ मिलनी चाहिए, उनकी मान्यता फलीभूत नहीं होती। उन्हें निराश ही रहना पड़ता है। आशा के अनुरूप फल तो श्रद्धासिक्त भावना ही प्रदान करती है।
राजयोग की सभी साधनाओं के संबन्ध में यही बात है यम-नियम जीवन के चिन्तन-चरित्र एवं आचरण में उतारने पड़ते हैं। आसन व्यायाम नहीं, वरन् आसन जमा कर बैठना है। रसोई भी आसन पर बैठकर की जाती है। बाल-चाल की भाषा में किसी कार्य के लिए दृढ़तापूर्वक आरूढ़ होना भी आसन लगाना या आसन जमाना है। प्राणायाम प्राणवान बनने के लिए किया जाता है। प्राणवान अर्थात् मनस्वी-मनोबल सम्पन्न।
इसी प्रकार प्रत्याहार को संघर्षशीलता कहते हैं। गीता में अर्जुन को जिस युद्ध के लिए प्रेरित किया गया है, वह वस्तुतः आत्मिक क्षेत्र का युद्ध ही है। मारकाट वाली लड़ाई के लिए गीता जैसे आत्मिक प्रवचन की आवश्यकता नहीं थी। वह प्रत्याहार ही है, जिसे गीतोक्त महाभारत नाम दिया गया है। यह धर्मक्षेत्र में- कर्मक्षेत्र में लड़ा जाता है। संचित कुसंस्कारों एवं हेय प्रचलनों के आकर्षणों, दबावों को अस्वीकार करना ही प्रत्याहार है।
अब तीन प्रयोग और शेष रहते हैं- धारणा, ध्यान और समाधि। धारणा का तात्पर्य है- मान्यता, स्थापना, स्वीकृति, निष्ठा। आदर्शों के विषय में यही तथ्य लागू होता है। आदर्शों को तर्क और तथ्य के आधार पर तो सहज ही स्वीकारा जा सकता है, पर जिस आदर्श को श्रद्धा, प्रज्ञा, निष्ठा के आधार पर हृदयंगम किया गया हो, फलित केवल वही होता है। आस्तिकता, आध्यात्मिकता, धार्मिकता के त्रिविध आदर्श प्रमुख हैं। ईश्वर पर विश्वास, आत्मक्षमता पर विश्वास, कर्तव्य कर्मों के दायित्व पर विश्वास - इन तीनों के विश्वास को धारणा कहते हैं। यों साधारणतया किन्हीं देवी-देवताओं, मंत्रों, गुरुजनों, शास्त्रों पंथों आदि पर विश्वास करना भी धारणा के अर्थ में प्रयुक्त होता है। एक शब्द में धारणा को विश्वास भी कह सकते हैं।
ध्यान का तात्पर्य है - अभीष्ट निर्धारण का बार-बार चिन्तन करना। इससे मान्यता परिपक्व होती। भूली हुई बातों का स्मरण भी ध्यान के आधार पर हो आता है। अपने आदर्श का, लक्ष्य का, निश्चय का बार-बार स्मरण करने से वह आस्था के रूप में परिणत हो जाता है। यों किसी चित्र का, प्रतिमा का, व्यक्ति का, कल्पना-सपनों का इच्छानुसार ध्यान किया जाता है। नाद-योग में शब्दों का, मेरुदण्ड में षट्चक्रों का, मस्तिष्क में ब्रह्मकमल का, मूलाधार में कुण्डलिनी का ध्यान किया जा सकता है। मस्तिष्क में ड़ड़ड़ड़ हृदय में विष्णु ग्रंथि, नाभि में रुद्र ग्रंथि के ध्यान का विधान है। श्वास-प्रश्वास के साथ सोऽहम् ध्वनि की ध्यान-धारणा की जाती है। इसी प्रकार और भी योग संप्रदायों में कई-कई प्रकार के ध्यानों का निर्धारण है, विचार-चेतना को केन्द्रीभूत करने की साधना है। इन्हीं माध्यमों से मन एकाग्र होता है, बिखरी शक्तियों के केन्द्रीकरण का चमत्कार दृष्टिगोचर होता है।
अष्टाँग योग की अन्तिम स्थिति है - समाधि। उसके दो पक्ष हैं- एक सविकल्प समाधि, दूसरी निर्विकल्प समाधि। सविकल्प में चिन्तन बना रहता है और निर्विकल्प में चेतना शून्य स्थिति आ जाती है।
समस्त शरीर पर मस्तिष्क अपना अधिकार जमाये हुए है। इच्छाशक्ति के साथ सुदृढ़ संकल्प करके योगीजन शरीर के किसी भी अवयव को मंद गति शिथिल एवं अवरुद्ध कर देते हैं। देखा गया है कि इस मार्ग में क्रियाकुशल साधक हृदय की धड़कन बन्द कर देते हैं, रक्त प्रवाह और श्वास-प्रश्वास का क्रम अवरुद्ध कर देते हैं। प्राण ब्रह्माण्ड में चढ़ जाता है, तो काया निश्चेष्ट हो जाती है। यों इस स्थिति में भी जीवन बना रहता है। शरीर को सुरक्षित रखकर मनःचेतना को लक्ष्य पर केन्द्रीभूत कर दिया जाता है। ऐसी स्थिति आने पर भूमि समाधि भी ली जा सकती है। कई लेते भी हैं, पर वस्तुतः इसकी आवश्यकता नहीं है। मात्र प्रचार विज्ञापन होता है, जिससे साधक का लक्ष्य की तन्मयता से ध्यान बँटता है और ब्रह्मपरायणता का प्रयोजन दूर हटता जाता है। इस निर्विकल्प समाधि में खतरा भी है। यदि प्राण को ब्रह्माण्ड में चढ़ा तो लिया जाय, पर उतारना संभव न हो सके, तो उससे प्राण-हानि होने का संकट उत्पन्न हो जाता है। सविकल्प समाधि ही जोखिम से रहित है। उसमें बिना मार्गदर्शक के भी क्रमशः एकाग्रता परिपक्व की जाती रहती है और एक दिन ऐसी स्थिति आ जाती है कि चित्त संसार प्रयोजनों से वितर होकर परमात्मसत्ता के साथ तादात्म्य स्थापित कर ले।
लौकिक जीवन को पारलौकिक, पारमार्थिक बना लेना भी समाधि है। आत्मा को ईश्वर के अंश रूप में देखना-संसार के प्रति विराट ब्रह्म की मान्यता रखना और क्रिया-कलापों को ऐसा बना लेना कि वे स्वार्थ पूर्ति के लिए नहीं, परमार्थ प्रयोजन की पूर्ति के लिए किये जा रहे हैं वो इसे भी समाधि का ही एक अन्य रूप कहा जा सकता है। आत्मसत्ता के स्वरूप, प्रयोजन एवं उपयोग के संबन्ध में तत्वदर्शी ज्ञान भूमिका का रहना समाधि भावना का ही एक स्वरूप है। अपने को ईश्वर का अंश- युवराज मानना- चरित्र चिन्तन और व्यवहार को उच्चस्तरीय रखना गतिविधियों को विश्वउद्यान को समुन्नत बनाने में लगाये रहना, प्रकारान्तर से समाधि अवस्था ही है। सम्यक् + धी = समाधि। बुद्धि तत्व को दूरदर्शी विवेकशीलता में नियोजित रखे रहना है, ऋतम्भरा प्रज्ञा है। इसी को भूमा या तुर्या कहते हैं। योगी-तपस्वी इसी स्थिति में अपनी चेतना को बनाये रहते हैं। यद्यपि शरीर धर्म के अनुरूप नित्यकर्मों की, निर्वाह-व्यवस्था की गतिविधियाँ उन्हें भी सामान्य जनों की तरह सम्पन्न करनी पड़ती हैं। शरीर जब तक जीवित है, तब तक उसके लिए निर्वाह साधन तो जुटाने ही पड़ेंगे, पर राजयोग का योगी अपनी आत्मिक विशिष्टता को बनाये रहता है और समाधि लाभ सहित विभूतिवान जीवन जीता है।
प्रसिद्ध दार्शनिक डायोजनीज से जब सिकन्दर महान मिलने गये तो संत डायोजनीज धूप में लेटे हुए थे। सम्राट ने उन्हें नम्र स्वर में संबोधित किया और पूछा “मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूँ?” सिर्फ मेरी धूप छोड़ दो” संत डायोजनीज ने उत्तर दिया। यह उत्तर सुन कर सिकन्दर आश्चर्य से स्तंभित रह गया। उसके दरबारी साथी उक्त दार्शनिक को एक मूर्ख कह कर हँसी उड़ाने लगे तो सिकन्दर ने कहा “ यदि मैं सिकन्दर न होता, तो चाहता कि मैं डायोजिनीज बन जाऊँ।”
प्रकृति ने प्राणियों में से मात्र मादा को ही यह क्षमता प्रदान की है कि जब उसकी शारीरिक शक्ति नया शिशु उत्पन्न करने की हो, तो ही वह नर को कामुक संदेश दे और वह उस आदेश का पालन करने में रुचि दिखाये। अपनी ओर से प्राणि जगत का कोई भी नर-नारी के साथ किसी प्रकार की छेड़छाड़ नहीं करता है। दोनों वर्ग इस प्रकार साथ-साथ रहते और संयत जीवन जीते हैं जिसमें नारी और नर-बिना किसी प्रकार की उत्तेजना का परिचय दिये स्वाभाविक जीवन जीते हैं। नर को कामुकता प्रदर्शन करने की ऐसी छूट बिल्कुल भी नहीं मिली है कि वह मादा के आदेश या संकेत के बिना किसी प्रकार की अनुपयुक्त छेड़छाड़ करे। अपनी ओर से प्रथम कदम उठाये।
बच्चे को बहुत दिनों तक दूध की आवश्यकता होती है। जब वह साधारण आहार खाने और पचाने योग्य हो जाता है, तब कहीं मादा की स्थिति ऐसी बनती है कि वह नया बालक उत्पन्न करने सँभालने की अपनी क्षमता का परिचय दे और वैसा संकेत करे। मनुष्यों की यह नासमझी ही है कि पशुओं की संतानों को जितने दिनों तक जितनी मात्रा में दूध मिलने की सहज आवश्यकता रहती है, उससे कहीं पहले वे उस बच्चे को उसके स्वाभाविक आहार से वंचित करके उसकी खुराक को झपटने-हड़पने लगते हैं। यदि ऐसा न किया जाय तो पशुओं के बालक कई वर्ष तक माता के दूध पर निर्भर रहकर अपने शारीरिक विकास को परिपोषित करते रह सकते हैं। पर जब उनकी प्रकृति प्रदत्त खुराक को मनुष्यों द्वारा दुह लिया जाता है तो बच्चों का अविकसित रह जाना तो स्वाभाविक है ही; साथ ही अत्याधिक दबाव से मादा के प्रजनन अंग भी समय से पूर्व विकसित होने लगते हैं। फिर वे जोड़ा मिलाते हैं और जननी पैदा करने की प्रक्रिया से अपनी पीढ़ियाँ दुर्बल बनाती है। दूध सभी का स्वाभाविक भोजन है। जब तक बच्चा माँ के दूध पर निर्भर रहता है। यदि इस नियम का सर्वत्र पालन होने लगे तो संतान वृद्धि की वैसी समस्या उत्पन्न न हो, जैसी कि मनुष्य और पशुओं में देखी जा रही है। उनकी बढ़ती हुई वंशवृद्धि के कारण अनेकों समस्याएँ पैदा हो गयी हैं व उनकी जड़ कामुकता ही है।
नारी के साथ यदि अतिरिक्त छेड़खानी न की जाय तो वह पहला बच्चा चार-पाँच वर्ष का होने से पूर्व शारीरिक दृष्टि से इस तरह कमजोर न बने कि वह संतान की ठीक तरह साज संभाल करने के अनुपयुक्त ही बन जाए। ऐसा क्रम चल पड़ा तो महिलाओं को आये दिन दुर्बलता और रुग्णता से छुटकारा मिल सकेगा;
बच्चा और जननी दोनों को स्वस्थ रखना हो तो यह आवश्यक है कि दो प्रसवों के मध्य लम्बा समय हो। पिता का स्वास्थ्य, दायित्व और व्यवस्था, आर्थिक देखभाल, सुसंस्कृत बनाने के अवसर इसी आधार पर मिलता है। जल्दी बच्चे न हों, इसके लिए अनेक समाधानों की जानकारी अब सर्व सुलभ होती जा रही है। इनमें सबसे महत्वपूर्ण यह है कि पुरुष नारी के प्रति कामुकता की दृष्टि न रखे। उसे मात्र अपनी सहचरी समझे। कामुकता के विचार ही मस्तिष्क को खराब करते हैं और यौनाचार के लिए प्रेरित करते हैं। इसलिए नर और नारी के बीच स्नेह-सहयोग तो घनिष्ठ रहना चाहिए, पर साथ ही यह ध्यान भी रखना चाहिए कि कामुकता का दृष्टि का सीमा से बाहर हो जाना नर, नारी और बच्चे इन सभी के लिए समान रूप से हानिकारक है। इस व्यवधान को खड़ा कर देने के कार तीनों ही घाटे में रहते है और साथ ही समूल समाज को हानि पहुँचाते हैं।
शारीरिक और मानसिक स्वस्थता एवं समर्थता के प्रति जिनकी भी रुचि है, उन्हें इस तथ्य को स्मरण रखना चाहिए कि जिस कर्म से हर प्रकार हानि ही हानि हो, सबका अहित ही अहित हो उससे जितना बचा जा सके, उतना ही अच्छा है। कामुकता की कुदृष्टि को यदि मस्तिष्क को हटाया और व्यवहार से मिटाया जा सके तो इसमें हर किसी का हर प्रकार से हित साधन ही है
महल की सीढ़ियाँ चढ़ने के साथ ही एक बार फिर उनके हाथ कुर्ते की जेब में गए। दूसरे ही क्षण एक का हाथ में था। इसमें मोड़ कर रखे हुए कागज को खोला और पढ़ने लगे। अक्षरों के क्रम के साथ ही चेहरे पर भावों की लहरें उठ रही थी। इन लहरों में ऊर्जस्विता भर रहा था यह कागज का टुकड़ा। ऐसा क्या था इस सोलह अंगुल के कागज में। वह भी तो एक कागज ही था जिसने कल से ही उनके मन को मथ रखा था। कितनी बार पढ़ा होगा उसे कुछ ख्याल नहीं, हाँ यह अवश्य है कि जितनी भी बार पढ़ा विकलता बढ़ती गई और आखिर में लिखना ही पड़ा इस कागज को जो इस क्षण उनके हाथ में था। यह कागज का एक टुकड़ा नहीं, उनका आत्मा निर्णय था।
दरबान काफी देर से उनको बड़ी बारीकी से देख रहा था। जेब से लिफाफे का निकालना-उलटना पलटना कागज खोलकर पढ़ना फिर भावों के दरिया में डूब जाना। आखिर उससे रहा न गया पूछ ही बैठा क्या सोचने लगे पण्डित जी?
और वह जैसे सोते से उठे। चिन्तन की निमग्नता टूटी। दरबान को सम्बोधित करते हुए बोले- हिज हाइनेस को सूचना दो कि मैं मिलना चाहता हूँ।
अरे आपके लिए क्या सूचना चले जाइए।
नहीं-नहीं तुम बताकर आओ।
“अच्छा कहकर वह चला गया और वे फिर सोचने लगे ठीक ही तो लिखा है महामना ने ब्राह्मणत्व एक साधना है। मनुष्यता का सर्वोच्च सोपान है। इसकी साधना की ओर उन्मुख होने वाले क्षत्रिय विश्वामित्र और शूद्र ऐतरेय भी ब्राह्मण हो जाते हैं। साधना से विमुख होने पर ब्राह्मण कुमार अजामिल और कौण्डिलायन शूद्र हो गए। सही तो है जन्म से कोई कब ब्राह्मण हुआ है। ब्राह्मण वह जो समाज से कम से कम लेकर उसे अधिकतम दे। स्वयं के तप, विचार और आदर्श जीवन के द्वारा अनेकों को सुपथ पर चलना सिखाए। इस कसौटी पर कसे जाने.....। आगे कुछ सोच पाते कि दरबान ने खबर दी महाराज आपको बुला रहे हैं।
उनके नपे तुले कदम महल के एक आलीशान कक्ष की ओर बढ़ गए। यहाँ महाराज अपने खास मित्रों के साथ बैठ कर वार्तालाप किया करते हैं। उन्हें सामने देख कर वह बोल उठे आज असमय कैसे आना हुआ, खैरियत तो है।
जवाब में उन्होंने वही कागज थमा दिया। पढ़कर राजा साहब चौंक उठे जैसे कागज न होकर बिच्छू हो। बड़ी मुश्किल से उनके मुख से निकला के के .... क्यों? यह सब! कहकर नरेश ने उनके चेहरे की ओर देखा जैसे वह पूर्ण कारण जानना चाहते हों।
“कल मालवीय जी का पत्र आया था, उन्होंने लिखा है यदि तुम में ब्राह्मणत्व जागे तो रियासत की आराम तलबी छोड़कर हिन्दू विश्व विद्यालय के कर्त्तव्य क्षेत्र में आ जाओ”। यहाँ तुम्हारी उपयोगिता और आवश्यकता कहीं अधिक है।
ब्राह्मण तो आप हैं नहीं इसमें जगने और सोने की क्या बात है? महाराज को वाकया समझ में नहीं आ रहा था।
“आज से पहले मैं भी यही समझता था। किन्तु अब मालवीय जी की परिभाषा पढ़कर लगा कि अर्थ लोलुप भी कहीं ब्राह्मण हो सकता है?”
“कितना मिलेगा वहाँ “? “ यही तकरीबन अढ़ाई तीन सौ “ “और यहाँ आपको साढ़े तीन हजार प्रतिमास मिलता है आवास तथा अन्य सुविधाएँ अलग। मालवीय जी से पूछियेगा। ब्राह्मण होने का मतलब बुद्धिहीन होना तो नहीं है? “ और विवेकहीन होना भी नहीं है। ““बुद्धि और विवेक? क्या अन्तर है इनमें? “
“बुद्धि येन केन प्रकारेण तिकड़म भिड़ाकर उल्लू सीधा करती है और विवेक भावनाओं से एक होकर उच्चादर्शों के लिए अपनी राह खोजता है। “तो आपका यह अंतिम निर्णय है?”
“हाँ आत्मा की इस प्रकार की अवहेलना करने में असमर्थ हूँ।” सुनकर नरेश उनकी ओर देखते हुए बोले “आप हमेशा से मेरे श्रद्धाभाजन रहे और आज तो आपके प्रति मेरी श्रद्धा पहले की अपेक्षा द्विगुणित हो उठी है। सच पंडित जी आज मैंने जाना कि ब्राह्मण राजा से भी बड़ा होता है।”
यह महामानव थे पं. रामचंद्र शुक्ल जिनने कर्त्तव्य की पुकार पर कालाकाँकर नरेश के हिन्दी सचिव का पद ठुकराकर मालवीय जी का सहकर्मी बनना श्रेयस्कर माना। यही है सही माने में ब्राह्मणत्व का जागरण।
परमात्मा ने-प्रकृति ने-मनुष्य मात्र को बहुत कुछ ऐसा असाधारण दिया है, जिसके आधार पर वह सुख-सौभाग्य, प्रगति स्वयं प्राप्त करने के साथ-साथ औरों के लिए भी सहायक सिद्ध हो सकता है। परन्तु मनुष्य की दुर्बुद्धि कहें या माया का भटकाव-जिसके प्रभाव से सुख-सौभाग्य के स्थान पर वह अपने तथा औरों के लिए समस्याएँ एवं विडम्बनाएँ ही रचता रह जाता है। लालसा, वासना और अहंता के चक्र में मनुष्य स्वयं को दयनीय स्थिति तक पहुँचा देता है।
इस स्वनिर्मित दुर्गति से पार निकलना कैसे हो? गिरना तो किसी के लिए भी सरल हो सकता है, पर उबरने और ऊँचा उठने के लिए मात्र अपने पुरुषार्थ से भी काम नहीं चलता, उसके लिए किसी समर्थ सहायक की जरूरत पड़ती है। यह सहायता भी किसी को अकस्मात् अप्रत्याशित रूप से मुफ्त में नहीं मिलती। उधार देकर समर्थ सत्ता भी उसका कुछ बदला चाहती है। मुफ्त में तो यहाँ किसी को कुछ भी नहीं मिलता।
पात्रता के नियम मनुष्य पर तीन प्रकार से लागू होते हैं-एक उत्साह और स्फूर्ति भरी श्रमशीलता, दूसरी तन्मयता, तत्परता भरी अभिरुचि तीसरी उत्कृष्टता के लिए गहरी लगन और ललक। यह तीनों जहाँ-कहीं भी सम्मिलित रूप से पायी जायेंगी, समझना चाहिए कि सफलता तक दौड़कर जा पहुँचने का अवसर मिला। पात्र हो तो पानी से न सही, हवा से वह जरूर भर जायेगा। खाली तो कभी रहेगा ही नहीं। ईश्वर की अनुकम्पा भी ऐसे ही लोगों पर बरसती है। उच्च पदों पर नियुक्ति उन्हीं की होती है, जो निर्धारित प्रतिस्पर्धाओं में बाजी मारते हैं।
यों ईश्वर के लिए सभी समान और सभी प्रिय हैं, पर उनके साथ बेइंसाफी भी तो नहीं की जा सकती, जिनने अथक परिश्रम करके अपनी योग्यता का परिचय दिया है। कोई बड़ा कारखाना खड़ा किया जाना होता है और उसके निर्माण में जल्दी करनी होती है, तो एक ही उपाय रह जाता है कि सुयोग्य एवं अनुभवी अधिकारियों की बड़ी संख्या में नियुक्ति की जाय। अधिक कारीगर खोजे और जुटाये जायें। यही अगले दिनों होने जा रहा है।
प्रतिभावान व्यक्ति जहाँ तहाँ मारे-मारे नहीं फिरते। गुणवानों, प्रतिभावानों को कभी खाली नहीं पाया जाता। इस पर भी यह आपत्तिकाल है। गरज कारीगरों को उतनी नहीं पड़ी है, जितनी कि निर्माणकर्ताओं को अपने अच्छे और भव्य काम समय रहते करा लेने की है।
भक्त भगवान से सदा अनुग्रह माँगते हैं, पर अब की बार इन दिनों ऐसा समय है, जिसमें निर्माणकर्ता को ही बड़ी बेचैनी से सत्पात्रों की खोजबीन करनी पड़ रही है। काम तो नियन्ता का ही रुका पड़ा है। उसे ही उतावली है। जैसी सड़ी-गली परिस्थितियां आज हैं, वैसी अधिक दिनों नहीं रहने दी जा सकती। बदलाव में बढ़-चढ़कर जो भूमिका निभाई जानी है, उसके लिए सत्पात्र तेजी से ढूँढ़े जा रहे हैं। विशेष अनुदान और उपहार भी उन्हीं का अविलम्ब मिलने वाले हैं। औसत स्तर के व्यक्तियों से लेकर प्रतिभावानों तक को, इस अभिनव सृजन में भाव-भरा योगदान प्रस्तुत करने के लिए समुचित अनुदान उदारतापूर्वक दिये जाने हैं।
साधारण और औसत दर्जे का व्यक्ति भी यदि सामान्य चाल और धीमी गति से प्रगति पथ पर आगे बढ़ता चले, तो इसका परिणाम भी ऐसा हो सकता है, जिससे उज्ज्वल भविष्य का स्वप्न साकार होते देखा-समझा जा सके। प्रतिभाशालियों का समुदाय इसके अतिरिक्त है। जिनमें शारीरिक स्फूर्ति, मानसिक साहसिकता, और अन्तःकरण में उमंग भरी रहती हैं वे परिस्थितियों की दृष्टि से सामान्य होने पर भी इतना कुछ कर सकते हैं, जिसे अद्भुत कहा जा सके। जटायु जैसे अपनी आदर्शवादी उमंगों के आधार पर इतना कुछ कर सके, जितना कि हीन मनोबल वाले तरुण और बलिष्ठ भी नहीं कर सके। ऐसी कृतियाँ सदा स्मरण की जाती रहेंगी। अष्टावक्र जैसे टूटे-फूटे शरीर वालों ने ऐसे इतिहास की संरचना की, जिसका स्मरण करने मात्र से मन उल्लास से भर जाता है। लक्ष्मीबाई जैसी लड़कियाँ शत्रुओं के दाँत खट्टे करके अपने पौरुष का परिचय दे सकी। भामाशाह की थोड़ी-सी पूँजी ने राणा प्रताप की हारती बाजी को जिता दिया। संसार ऐसी प्रतिभाओं की कथा-गाथाओं से भरा पड़ा है।
साहित्य, कला, लगन, संगठन, सुनियोजन जैसे कितने ही गुण मनुष्य में ऐसे हैं, जिनका आँशिक उपयोग हो सके, तो वैयक्तिक और सामूहिक क्षेत्रों में आश्चर्यजनक चमत्कार सामने आ सकते हैं। ऐसे लोगों की तुलना में कहीं अधिक उपलब्धियाँ प्राप्त हैं। पैसे वाले ऐसे व्यापक व्यवसाय खड़े कर देते हैं, जिसके उत्पादन से अनेकों बहुमुखी आवश्यकताएँ पूरी होती हैं। वकील, इंजीनियर, डॉक्टर, वैज्ञानिक आदि बुद्धिजीवी अपने कला-कौशल के आधार पर इतनी बड़ी सफलताएँ अर्जित करते हैं, जितनी की साधारण लोगों से तो कल्पना करते भी नहीं बनती। गायक, वादक, अभिनेता स्तर के कलाकार इतना यश और पैसा कमा लेते हैं, कि साधारण लोगों की दृष्टि में वह कोई वरदान जैसा प्रतीत होता है। कितने ही ऐसे विश्वासपात्र प्रतिभावान होते हैं कि वे जिस काम को भी हाथ में लेते हैं, उसे सफलता के उच्च शिखर पर पहुँचा देते हैं।
देखा गया है कि ऐसे विभूतिवान भी मात्र लिप्सा, लालसा, तृष्णा, वासना, अहंता और संकीर्ण स्वार्थपरता जैसे हेय प्रयोजनों में ही अपनी उन उपलब्धियों को खपा देते हैं, जिनका उपयोग यदि लोक कल्याण के लिए हो सका होता, तो उतने पौरुष से निर्माण की दिशा में इतना कुछ बना पड़ा होता, जिनकी कीर्ति-गाथा चिरकाल तक गाई जाती और उनका अनुकरण करके कितने ही लोग अनुकरणीय आदर्श उपस्थित कर सके होते।
भगवान ने जिनको ऐसी सद्बुद्धि, सत्प्रेरणा और सत्साहसिकता प्रदान की है, उनने अपने साधनों की विलासिता अहंता और मोहजन्य वासना में न लगा कर, ऐसे महान प्रयोजनों में लगाया है कि उनसे प्रेरणा पाकर अनेकों लोग उसी मार्ग पर चल पड़ें। तब उस समुदाय का सम्मिलित क्रिया-कलाप इतना बड़ा होता है, जिनकी कल्पना मात्र से लोगों का हृदय हुलसने
दूसरों की निन्दा करने में खर्च किया जाने वाला समय अपने दोष ढूँढ़ने में लगाओ। दूसरों को सुधारने के लिए प्रयत्न करने का पहला चरण अपने सुधार से आरम्भ करो।
लगता है और देख-देखी वे भी ऐसा कुछ कर बैठने के लिए कटिबद्ध हो जाते हैं, जिससे असंख्यों के हित-साधन हो। जब सामान्य साधनों और सामान्य परिस्थितियों के लोगों ने इतने भर से बड़े कार्य कर दिखाये, तो जिनके पास साधन है, शक्ति है, संगठन है, मनोबल है, सूझबूझ है, वे कुछ अतिरिक्त उच्चस्तर के काम न कर सकें, ऐसी कोई बात नहीं।
मनुष्य की कृपणता, कायरता, संकीर्णता ही ऐसा अभिशाप है, जो उसे समर्थ रहते हुए भी कुछ करने नहीं देती, कठिनाइयों के जैसे-तैसे बहाने गढ़ लेती है। इसी को धिक्कारते हुए गीताकार ने कहा था कि- “क्षुद्रं हृदय दौर्बल्यं त्यक्त्वा तिष्ठ परंतप “। हृदय की इस क्षुद्रता, कृपणता से कोई अपना पीछा छुड़ा सके, तो आदर्शवादी उदारता उसके ऐसे पुष्ट आधार बना देती है, जिसके बल-बूते वह महामानवों की पंक्ति में बैठ सके और अपने साथ अन्यों को भी निहाल कर सके।
प्राणियों को उनकी आवश्यकतानुसार प्रकृति ने भविष्यज्ञान की क्षमता प्रदान की है। शीतऋतु में मक्खी, मच्छर जैसे प्राणी कहीं सुरक्षित स्थान में छिप कर अपने प्राण बचाते हैं, पर जैसे ही उनके फलने-फूलने का अवसर आता है प्रजनन कृत्य में लगते और असाधारण रूप से वंश वृद्धि करते देखे गये हैं। हिम प्रदेशों में रहने वाले सफेद भालू जैसे प्राणी घोर शीत के दिनों आहार उपलब्ध न होने की कठिनाई को ध्यान में रखते हुए किसी गुफा में लम्बे समय के लिए निद्राग्रस्त हो जाते हैं। मेढ़क और साँप भी प्रायः ऐसा ही करते हैं। सर्दी के दिनों वे किसी बिल में इस प्रकार शिथिलता धारण करते हैं कि उन दिनों उन्हें भोजन की आवश्यकता ही न पड़े। धरती में गहराई में छिपे पड़े रहने पर भी अनुकूल मौसम का भविष्यज्ञान उन्हें हो जाता है और वे उपयुक्त समय में बाहर निकल आते हैं।
पक्षियों में से अनेकों ऐसे हैं जो ऋतु प्रतिकूलता का आभास होते ही अनुकूल क्षेत्रों में जा पहुँचने के लिए लम्बी उड़ाने भरते हैं। समय काटते हैं और जब अनुकूलता उत्पन्न होती है, तो फिर अपने पूर्व निवास पर लौट आते हैं यह सब भविष्य ज्ञान की पूर्वानुभूति के आधार पर संभव होता है। ऋतुओं के अनुरूप मकड़ी अपना ताना फैलाती और समेटती देखी गई है। उपयुक्त ऋतु का ध्यान रखते हुए भी प्राणिवर्ग में उत्साह उभरता है, पर प्रतिकूलता का अनुमान रहने पर वे सर्वथा शान्त बने रहते हैं। कितने ही प्राणी भूकम्प, तूफान, महामारी जैसे प्रकोपों की समय से पहले ही जानकारी प्राप्त कर लेते है, अपने-अपने समुदाय को चिल्ला-चिल्ला कर सचेत करते हैं और कहीं अन्यत्र सुरक्षित स्थान के लिए पलायन कर जाते हैं।
मनुष्यों में भी कितनों में ही ऐसी अतीन्द्रिय क्षमताएँ पाई जाती है जिसके आधार पर वे अपने या दूसरों के संबंध में किन्हीं विशेष परिवर्तनों का आभास पा सकें और उस निमित्त पूर्व तैयारी कर सकें। ऐसी कितनी ही घटनाएँ घटित होती रहती हैं जिसमें मृत्यु का आभास समय से पहले ही मिल जाता है। कितनों को ही स्वयं के भावी घटनाक्रम की जानकारी मिल जाती है और वे समय पर सही भी उतरती हैं, कई वैज्ञानिकों को भी अपने आविष्कारों संबंधी गुत्थियाँ हल करने में स्वप्न संकेतों के आधार पर सहायता मिली है। अतीन्द्रिय क्षमताओं के अभ्यासी अनेक बार ऐसी अद्भुत जानकारी देते हैं जैसा कि घटित होने की उन दिनों आशंका तक न थी।
फ्राँस के प्रख्यात साहित्यकार जैककजोट को अपने देश में होने वाली महाक्रान्ति का आभास बहुत पहले हो गया था और पेरिस नगर में आयोजित एक समारोह में उसकी उन्होंने सार्वजनिक घोषणा भी कर दी थी। उक्त समारोह में देश के प्रायः सभी मूर्धन्य दार्शनिक, वैज्ञानिक, मनीषी, साहित्यकार, पत्रकार एवं गणमान्य नागरिक उपस्थित थे। उनमें उस काल के बहुमुखी प्रतिभा के धनी विख्यात दार्शनिक एवं संगीतकार मारकस, नाटककार निकोलस, नाटककार एवं आलोचक जॉनहॉर्पी भी सम्मिलित थे। जैक ने यह कह कर सभा में उत्तेजना पैदा कर दी थी कि यहाँ एकत्र सभी लोग सन्निकट खूनी क्रान्ति में मारे जायेंगे। फ्राँसीसी क्रान्ति के नायक मारकस के बारे में उनने भविष्यवाणी की थी कि उन्हें बंदी बना लिया जायगा और फाँसी की सजा सुनायी जायगी किन्तु उससे पूर्व ही वह जहर खाकर अपनी जीवन लीला समाप्त कर लेंगे। इतिहासवेत्ता जानते हैं कि मारकस, को जो उस समय क्रान्तिकारियों के सर्वोच्च कमेटी के सदस्य भी थे, और साथियों की दमनकारी नीति का विरोध करते थे, उन्हें जेल में डाल दिया गया। फाँसी की तिथि निश्चित हो चुक थी, किन्तु उससे पूर्व ही उनने विष खाकर आत्महत्या कर ली।
सुप्रसिद्ध नाटककार निकोलस की ओर देखते हुए जैक ने कहा था-’मरने से पूर्व वह बाईस बार ब्लेड से अपनी नाड़ियाँ काट कर मरने का प्रयास करेगा, किन्तु इसमें सफल नहीं होगा। हुआ भी ऐसी ही सन् 1973 में उसे गिरफ्तार कर लिया गया। कैदी जीवन में उसने आत्महत्या करने की इच्छा से 22 बार प्रयत्न का पर हर बार असफलता ही हाथ लगी। बाद में उसकी स्वाभाविक मृत्यु हुई।
इसी तरह ख्याति प्राप्त नाटककार एवं आलोचक हार्पी के बारे में किया गया भविष्य कथन अक्षरतः सही सिद्ध हुआ। उसके बारे में कहा गया था कि वह नास्तिक से आस्तिक बन जायेगा। जेल की कोठरी में बंद रहने पर एकांतिक जीवन अंतर्मुखी बन गया। आत्मचिंतन करते रहने के कारण जब वह कैद से छूटे तो सच्चे आस्तिक एवं कैथोलिक मत के अनुयायी बन कर निकले। उनके जीवन में कायाकल्प स्तर का परिवर्तन हो गया था। जैक को न केवल दूसरों के भविष्य में झाँकने की अतीन्द्रिय सामर्थ्य प्राप्त थे वरन् अपने बारे में भी उनने स्पष्ट कर दिया था कि उन्हें कई बार जेल की यात्रा करनी पड़ेगी और अंत में मृत्यु दंड दे दिया जायेगा। सभी घटनाएँ समयानुसार घटित होकर रहीं।
पीटरहरकौस का नाम मूर्धन्य भविष्य वक्ताओं में लिया जाता है। उनकी अतीन्द्रिय क्षमता का विकास एक दुर्घटना में हुआ जिसमें सीढ़ी से गिर जाने के कारण सिर में गंभीर चोट लग गई थी। दुर्भाग्य सौभाग्य में बदल गया और दिव्य दर्शन की क्षमता का नया आयाम लेकर सामने आया। अपराधियों, हत्यारों की तलाश करने में एवं खोये हुये व्यक्तियों की जटिल गुत्थियों को सुलझाने में पुलिस भी उनकी मदद लेती थी। अपने जीवन में उनने जितनी भी भविष्यवाणियाँ को थी, समयानुसार सभी सच निकलीं।
मानवी अन्तराल में एक से बढ़ कर एक अद्भुत क्षमताएँ विद्यमान हैं जिन्हें अभ्यास द्वारा हर कोई विकसित कर सकता है। दूर श्रवण, दूरानुभूति, दूरदर्शन, पूर्वाभास, भविष्य कथन जैसी अगणित क्षमताएँ प्रसुप्त स्थिति में दबी पड़ी हैं और कभी कभी किन्हीं व्यक्तियों में किसी कारणवश उभर भी आती हैं, पर कितने ही व्यक्ति इन्हें सतत् अभ्यास द्वारा विकसित कर लेते हैं। न्यूजर्सी की परामनोविज्ञानी श्रीमती डोरोथीएलीसन एक ऐसी ही महिला हैं जिन्होंने भविष्य के गर्भ में झाँकने की सामर्थ्य विकसित कर ली है। इसके माध्यम से उनने अब तक कितनी ही जटिल गुत्थियों को सुलझाया है। खोये हुए व्यक्तियों, हत्याओं एवं अपराधों के रहस्य खोले हैं। न्यूयार्क के प्रसिद्ध परामनोवेत्ता रिचर्डरिचनर ने डोरोथी की अतीन्द्रिय क्षमता को जाँचा परखा है और सही पाया है। एक दिन तो वह स्वयं यह जानकर आश्चर्यचकित रह गये कि उनके कमरे में बैठा व्यक्ति आत्महत्या करने की सोच रहा है। यह रहस्योद्घाटन भी डोरोधी ने ही किया था और बताया कि यदि उस व्यक्ति को बचाया जा सके तो एक दृढ़ मनोबल वाला सफल व्यक्ति होगा। पूछताछ करने पर बात सही निकली। उपचार हो जाने के बाद में वह एक सफल उद्योगपति बन कर रहा।
इसी तरह इंग्लैण्ड की सुजेन पेडफील्ड, न्यूयार्क की एस्टेला राबट्स एवं डर्बन-दक्षिण अफ्रीका के नेल्सन पामर ने भी अभ्यास द्वारा अतीन्द्रिय सामर्थ्य विकसित कर ली हैं। ये सभी व्यक्ति किसी वस्तु को देखकर ही उसके प्रयोक्ता के सम्बन्ध में सारे रहस्य उद्घाटित कर देते हैं। खोये हुए व्यक्तियों एवं छिपे हुए अपराधियों को, जिसका पता लगाने में प्रशिक्षित पुलिस भी असमर्थ रहती है, उनकी दूरदर्शी आँखें खोज निकालती हैं। सुप्रसिद्ध परामनोविज्ञानी जोसेफ बुकनन ने अपनी कृति में इस तरह की अनेकों घटनाओं का वर्णन किया है जिसमें दिव्यदर्शियों की सहायता ली गई और सफलता मिली।
दिव्य दर्शन की एक घटना महात्मागाँधी की अन्यतम सहयोगिनी रेहाना ब्याबजी के जीवन से सम्बन्धित है। गाँधी जी उन दिनों पूना के आगारवान महल में कैद थे और रेहाना नासिक में रहकर इनकी गतिविधियों का संचालन कर रही थी। गाँधी जी के साथ जेल में कब कैसा व्यवहार हो रहा है? महाभारत कालीन संजय की तरह प्रत्येक घटनाक्रम का वे बारीकी से नासिक में रहकर ही अनुभूति करती और उसे अपनी डायरी में अंकित करती रहती। जेल से छूटने के पश्चात् जब इसे बा और बापू को दिखाया गया तो उन्होंने सभी घटनाक्रमों को सही ठहराया। सुविख्यात अमेरिकी खगोलविज्ञानी डॉ. जॉर्ज डाडवेल के बारे में प्रसिद्ध है कि बिना किसी दूरदर्शी उपकरण के ही उनकी आँखें सुदूर आकाश में स्थिति सौर मण्डल के सदस्यों-ग्रह-नक्षत्रों, धूमकेतुओं आदि में हो रहे परिवर्तनों की स्पष्ट झाँकी प्राप्त कर लेती थी।
वस्तुतः मनुष्य की चेतना में असीम एवं अप्रत्याशित क्षमता विद्यमान है। यदि उसे परिष्कृत एवं विकसित किया जा सके तो न केवल भविष्य कथन जैसी अतीन्द्रिय सामर्थ्यों का वरन् भौतिक सिद्धियों एवं आत्मिक ऋद्धियों का भी स्वामी बना जा सकता है। आवश्यकता मात्र अन्तःकरण को पवित्र एवं व्यवहार में उतारने भर की है। उच्चस्तरीय चेतनात्मक विभूतियाँ तभी हस्तगत होती हैं
अचानक दरवाजा खुलने की आवाज से उसका ध्यान भंग हुआ। पुस्तक से सिर उठा कर देखा तो डाकबंगले का चपरासी सामने खड़ा था। उसकी ओर देखते हुए पूछा कहो क्या कहना है? “साहब कोई आपसे मिलना चाहता है टूटी-फूटी अँग्रेजी में चपरासी का जवाब था।”
उसने कैलेंडर की ओर देखा’ सन् 1937 चल रहा था। कुछ हिसाब लगाते हुए वह होंठों में बुदबुदाया आज तीन महीने हो गए। ठीक तीन मास पूर्व वह भारत की ब्रिटिश सरकार के निमन्त्रण पर अमेरिका से चला था, उद्देश्य था-आधुनिक मनोविज्ञान पर आयोजित भाषण श्रृंखला में बोलना। प्रत्यक्ष में तो मकसद यही था पर परोक्ष में उसने अनेकों आशाएँ सँजोई थीं। कुछ सीखना चाहता था अभी तक वह यही पढ़ता आया था कि विश्व में भारत एक मात्र ऐसा देश है जिसने मानवीय चेतना पर सर्वाधिक काम किया है। स्वयं भी उपनिषदों, पुराणों, शास्त्रों को कितना कुछ नहीं पढ़ा किन्तु....! वह आगे कुछ सोचता कि इसके पहले श्वेत पैण्ट कमीज पहने एक युवक ने कमरे में प्रवेश किया। विदेशी परिधान में वह भारतीय था’।
ओह! आप! बैठिए! एक ही वाक्य को तीन खण्डों में विभक्त कर बोलने के साथ ही उसने पास की कुर्सी की ओर इशारा किया।”
“मैंने आपके बारे में बहुत कुछ सुन रखा है थोड़ा बहुत पढ़ा भी है। सुना है आपने स्वप्नों पर मन की गहराइयों पर काफी काम किया है! मेरी अपनी भी एक समस्या है। समस्या का निराकरण और आप से मिलने का लोभ दोनों के सम्मिलित आकर्षण से आप तक खिंचा चला आया।”
“बताइए उसने सहज भाव से कहा।”
“मुझे कोई पुकारता है, उठो! समय सोने का नहीं है। जब में प्रगाढ़ निद्रा में होता हूँ तो कोई मेरा नाम लेकर स्पष्ट पुकारता है। उसने बतलाया सदा वह मुझे दो बार पुकारता है। हृदय से उठती है पुकार -कहती है “उठो!”
“आप को स्मरण है उस समय कैसे स्वप्न देखते हैं? मनोवैज्ञानिक ने पूछा।”
“हाँ ध्यान आया नीले प्रकाश के सागर जैसा आकाश और उसमें अद्भुत ढंग से मेरे पास आती हैं और साथ ही एक अलौकिक संगीत के स्वरों में पुकार। अच्छा सुनने वाले के स्वर में कुछ आश्चर्य था। उसने अब तक अनेकों स्वप्नों की मीमाँसा की है पर ऐसा स्वप्न? युवक आगे बोला “मुझे स्वयं आश्चर्य है, जब यह पुकार आती है मेरी गाढ़ी निद्रा पहली ही पुकार में टूट जाती है। उसने बताया परन्तु आँखें खोलने या सिर उठाने के पूर्व ही दूसरी बार पुकार आती है। दूसरी बार का पुकारना मैं सदा जागकर पूरी सावधानी से सुनता हूँ।”
“जब आप उठते हैं, आप को कैसा लगता है?” मनोवैज्ञानिक ने बीच में पूछा।
जब-जब में पुकार सुनता और स्वप्न देखता हूँ उठने पर अपने को एक अद्भुत आनन्द में डूबा पाता हूँ।’ मनोवैज्ञानिक की आशा के सर्वथा विपरीत उसने बताया-हमेशा की अपेक्षा दुगुनी स्फूर्ति रहती है, मन प्रसन्न रहता है।
दुबारा नींद आने में कितना समय लगता है? उसने फिर पूछा यह सर्वदा मेरी इच्छा पर रहा है। उसने फिर मनोवैज्ञानिक की इच्छा के विपरीत उत्तर दिया-कभी मैं लघुशंकादि कर दस पन्द्रह मिनट बाद सोता हूँ, कभी केवल सिर उठाकर देखकर एक मिनट बाद सोता हूँ और कभी तो नेत्र भी नहीं खोलता। सोने का प्रयत्न करते ही निद्रा आ जाती है पहले की भाँति प्रगाढ़ निद्रा।
समस्या टेढ़ी है। उसने गम्भीरतापूर्वक कहा शायद मैं अभी मानव मन की गहराइयों को ठीक से नहीं जान सका हूँ। मैं यहाँ कुछ सीखने आया था। सुना था भारत ऋषियों का देश है उसके स्वरों में कुछ विवशता थी। अब ऋषि नहीं आगन्तुक युवक अपना वाक्य पूरा करता इसके पूर्व डाक बंगले का चपरासी अन्दर आया और उत्साह भरे स्वर में बोला साहब कुछ ही किलो मीटर दूर पहाड़ पर एक ऋषि रहते हैं। मिलना चाहेंगे? वह शायद कोई वस्तु उठाने आया था, सुनकर बोल पड़ा। दोनों अवाक् हो उसके चेहरे पर देख रहे थे। फिर उन्होंने एक दूसरे की आँखों में देखा और हाँ कहने के साथ जाने की योजना बन गई।
अगले दिनों वह अरुणाचलम् कहे जाने वाले पहाड़ के पद प्रान्त में एक कोपीनधारी किंचित प्रौढ़ के पास बैठे थे। अद्भुत था दृश्य-हिंसक जानवर भी शालीन हो बैठे थे। मनुष्यों और पशुओं को एक साथ अनुशासित बैठे देख उसने जो कुछ पढ़ा था साकार होता लगा। संक्षेप में पूरी बात कही।
महर्षि कहे जाने वाले इस महामानव ने तनिक हँसते हुए कहा आप लोगों ने मन को दो भागों में बाँटा है बहिर्मन-अंतर्मन। परन्तु भारतीय मनोवैज्ञानिक चार भाग करते हैं, मन बुद्धि चित अहंकार। उन्होंने अपनी व्याख्या सुनाई। जगते समय हम संकल्प करते हैं और उसके अनुसार काम करें या न करें यह निर्णय भी करते हैं। आपने इन दोनों को बहिर्मन का काम माना है। पर भारतीय मानते हैं कि संकल्प करना मन का काम है और निर्णय करना बुद्धि का।
मनोवैज्ञानिक को अभी कुछ नहीं बोलना था। वह कहते गए-अंतर्मन को भारतीय चित्त कहते हैं। उसकी व्याख्या और कार्य की मान्यता में कोई मतभेद नहीं। वह संस्कारात्मक स्मृतियों का भण्डार है। सपने में वही कार्यरत होता है। परन्तु उसमें निर्णय की शक्ति न होने से स्वप्न में ऊँट के धड़ पर बकरी का सिर या बकरी के हाथी जैसी सूँड़ इसी अव्यवस्था की उपज है।
“अब भी मनोवैज्ञानिक कुछ बोले नहीं। वे गम्भीरता से सुन रहे थे। उन्होंने बताया सामान्य अवस्था में बहिर्मन और निर्णायक मन (बुद्धि) सो जाते हैं। अंतर्मन भी सो जाये तो प्रगाढ़ निद्रा आएगी। अंतर्मन जागता रहे तो स्वप्न दीखेंगे परन्तु किसी कारण केवल बहिर्मन सो जाय और अंतर्मन के साथ निर्णायक मन (बुद्धि) भी जागता रहे तो मनुष्य जाग्रत के समान व्यवस्थित रूप से काम करने लगेगा।”
“यद्यपि पश्चिमी चिन्तन के लिए” “अहं” को समझना कठिन है फिर भी कोशिश करो” वह बताने ड़ड़ड़ड़ सुना होगा जब कोई समाधि लगा लेता तब हृदय की गति खून का प्रवाह तक बन्द हो जाता है। समाधि का अर्थ है मन के सभी कार्यालयों को बन्द कर देना। शरीर का अन्तबर्हिः संचालन मन के द्वारा ही होता है। मन के इस संचालन भाग को, जो गहरी नींद में भी सदा जागता रहता है अहंकार कहते है।”
“बात समझ में आ रही थी” सुनकर वह बोले “आपने तो मन की व्याख्या ही अनूठी कर दी। पर इनकी समस्या?” उसका इशारा युवक की ओर था। वह भी उनकी बात को गहराई से सुन रहा था इनकी समस्या विश्व चेतना से जुड़ी है।” स्वरों में स्पष्टता के साथ सौम्यता थी।
“विश्व चेतना?” उसका वैज्ञानिक मन बोल उठा! “हाँ! मन यद्यपि प्रत्येक व्यक्ति में अलग-अलग होता है परन्तु सब ड़ड़ड़ड़ अपने आप में समेटने वाला विपुल ब्रह्मांड व्यापी एक समष्टि मन भी है। इसी की संचालक विश्व द्वारा जीवनोद्देश्य समझाती है। बताती है मनुष्य वैसा कुरूप भौंड़ा बनने के लिए नहीं है उसे अपने जीवन को, दिव्य व्यक्तित्व को परिष्कृत बनाना है। अन्तर की पुकार तम की तमिस्रा त्याग सत्य में प्रवेश करने का संकेत मात्र है। सुनहला सूर्य परम सत्य का प्रतीक है और नीला आकाश देवत्व की दिव्य चेतना का। पुकार का तात्पर्य है कि देवत्व ही सत्य है जीवन में इसी को लाना है। इसे लाए बिना चैन की नींद हराम है”
“मनोवैज्ञानिक आश्चर्यचकित थे। उनके आश्चर्य को परखते हुए महर्षि ने-युवक की ओर इशारा करते हुए कहा “पुकार सिर्फ इन्हीं के लिए नहीं है। सभी के लिए है। हर एक को अपने जीवन में सोते-जागते संकेत मिलते हैं। घटनाएँ घटती हैं सिर्फ यह बताने के लिए बहको मत, छलावे में मत आओ-तुम पशु नहीं अमृत पुत्र हो। जीवन बीज की तरह बन्द है। इसे जीने का मतलब है कर्तव्य की वेदी पर आत्मदान कर वृक्ष की तरह पुष्पित दिव्यता की सुरभि बिखेरना। मनुष्य में देवत्व का उदय मानवी चेतना का रहस्य है। इसे ही समझना और क्रियान्वित करना है।”
धन्य हो गया मनोवैज्ञानिक सफल हो गई उसकी भारत यात्रा। मनोविज्ञान के संसार में सर्वप्रथम सामूहिक मन की घोषणा कर मनुष्य में दिव्य जीवन की प्रेरणा भरने वाले मनोवेत्ता थे, कार्लगुस्ताव जुँग और मानवी चेतना के मर्मज्ञ वे ऋषि थे-महर्षि रमण। वैसा ही संक्रान्ति काल आज भी है और हम सबके मन को पुनः महाकाल की पुकार नींद से उठ बैठने का संकेत दे रही है।
स्व. डॉ. श्रीमती मनोरमा कौशिक
आदिकाल से अब तक के मानवी इतिहास का अध्ययन करें तो हम पायेंगे कि चाहे मनुष्य विश्व के किसी भी कोने का रहने वाला हो, वह सदा एक ऐसी सत्ता का अनुभव करता रहा है, जो उससे बड़ी हो, फिर चाहे वह ईश्वर हो, गॉड हो, मोनाठ हो, खुदा अथवा अननोएबिल कुछ भी हो, पर है अवश्य। प्रायः सबने उसकी निराकार कल्पना की है पर यदि उसका साकार स्वरूप देखना हो, तो उसकी छवि मनुष्य के रूप में ही देखी जा सकती है।
हिन्दू धर्म के प्राचीनतम ग्रन्थ ऋग्वेद के मंडल 1 सूक्त 24 में इस संबंध में लिखा है कि ईश्वर सर्वव्यापक होने से हमारे स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीर में निवास करते हुए हमें दोष-दुर्गुणों में फँसने से बचाने की क्षमता रखता है। उसकी प्रार्थना से दुष्कर्मों का विनाश और सत्कर्मों का विकास होता है। श्वेताश्वेतर उपनिषद् (3/20) में कहा गया है कि जो संसार के सभी भौतिक तत्वों से सूक्ष्म और बृहत् है, उसी को परम अविनाशी तत्व अथवा परब्रह्म की संज्ञा दी गई है।
बुद्ध के उपदेशों और आदर्शों से समूचा मानव समुदाय प्रभावित होने लगा तो बहुत से लोगों ने उनके समक्ष जाकर पूछा-’आप कौन हैं? क्या आप ईश्वर हैं? देवदूत हैं? अथवा साधु?’ बुद्ध ने कहा “नहीं मैं यह सब कुछ नहीं हूँ फिर लोगों ने पूछा तो आप क्या हैं? प्रत्युत्तर में उनने कहा “मैं बुद्ध हूँ”। इसी उत्तर ने उनके नाम का स्वरूप ग्रहण कर लिया। बुद्ध का अभिप्राय ही होता है- ज्ञानवान -प्रज्ञावान। उस समय बुद्ध ने ईश्वर के अस्तित्व संबंधी व्याख्या को भले ही टाल दिया हो, पर अनुयायियों के अन्तराल में किसी समर्थ सत्ता के विद्यमान होने की भावना को अवश्य जगा दिया। बौद्धों के धर्म ग्रन्थ ‘असंग’ और ‘मध्यमिका कारिका’ में यही लिखा है कि ‘वह है भी और नहीं भी। न वह इस तरह है और न किसी तरह। वह न पैदा होता है न बढ़ता है, न मरता है। वह कोई एक चीज नहीं है न उसका अस्तित्व है, न वह अस्तित्वहीन है। न वह दोनों से अलग है। इन अवस्थाओं से परे शाश्वत सत्य ही ईश्वर है। जो लोग मध्यम मार्ग का अनुसरण करते हैं वे ही उस परमात्म ड़ ड़ ड़ ड़ के स्वरूप को भली भाँति समझ सकते हैं बौद्ध धर्म में ‘महायान’ और ‘हीनयान’ दो प्रकार के मत प्रचलित हैं। महायान सम्प्रदाय के लोग दया और करुणा को जीवन की अनिवार्य आवश्यकता मानते है। सदाचरण के अभाव में ज्ञान की उपलब्धि निरर्थक ही समझी जाती है, जबकि हीनयान मार्ग के समर्थक एक मात्र ज्ञानवान बनने पर ही बल देते और इसे परमात्मा की प्राप्ति का प्रमुख आधार मानते है।
जैन धर्म की मान्यताओं के अनुसार ईश्वर को वीतराग और जितेंद्रिय कहा गया है। जिसके राग-द्वेष बीज चुक हों, उसे वीतराग और इन्द्रियों को जीत कर वशवर्ती बनाने वाले को जितेंद्रिय के नाम से जाना जाता है। जैन धर्म ग्रन्थों का अवलोकन करने से ज्ञात होता है कि 24 प्रकार के अध्यात्मवेत्ताओं ने इस धर्म को अपने-अपने मतों से परिपुष्ट किया। जिन्हें तीर्थंकर के नाम से पुकारा जाता है। वे किसी देवी देवता को नहीं मानते। उनका ईश्वर जिन है यानी जन्म-मरण से मुक्त आत्मा ही परमात्मा है। “जैसा करोगे वैसा भरोगे” उनका अकाट्य सिद्धान्त है। उनके प्रत्येक तीर्थंकर के साथ ‘पंचकल्याण की घटना अविच्छिन्न रूप से जुड़ी हुई है। स्वर्ग से अवतरण, धरती पर जन्म लेना, तपस्वियों की तरह दिनचर्या बिताना सर्वज्ञता की प्राप्ति और निर्वाण की उपलब्धि आदि की घटनाएँ तीर्थंकर की विशिष्टता को ही प्रकट करती है। दूसरे शब्दों में इन्हीं को परमात्मा तत्व की विशेषताएँ भी कहा जा सकता है हर व्यक्ति अपने साधनात्मक प्रयत्न से इस परम स्थिति तक पहुँच सकता है। जैन धर्म ग्रन्थों में ईश्वर के अस्तित्व का वर्णन इस प्रकार भी देखने को मिलता है “मैं उस निरंजन को नमस्कार करता हूँ, जो अनेक में एक है और एक में अनेक है और जो न एक है और न अनेक में है
गुरु नानक ने ठीक ही कहा है ‘काहे रे मन! बन खोजन जाई। सरब निवासी सदा अलेखातो संग रहत सदाई”। अर्थात् ऐ मेरे दिल! तू क्यों जंगलों में खोजने जाता है वह परमात्मा तो सबके अंदर विराजमान है। सब जगह विद्यमान है, पर दिखाई नहीं देता। जिस प्रकार फूल में सुगंधि छिपी रहती है वैसे ही परमात्मा भी सब के दिल में बसता है।”
पारसी धर्म में ईश्वर के लिए “आहूर मजूद” शब्द प्रयुक्त किया गया है। सरगाँन के असुरियन शिलालेख में 615 ईसा-पूर्व भी इस नाम का अस्तित्व देखने में आया है। पारसी धर्म के संस्थापक जरथुस्त्र ने अपनी भजनमाला और प्रार्थना में इसी शब्द को बार’-बार प्रयोग किया है। उनके कथनानुसार आहूर-मजूदा का निवास स्वर्ग की उच्चतम स्थिति में अवस्थित है, समूचे भूमण्डल पर है और पवित्र एवं पुण्यात्माओं के हृदय में भी। वह दैवीय गुणों से सम्पन्न और सामान्यजनों से महान और श्रेष्ठ है। वह सद्बुद्धि का अधिष्ठाता भी कहा जाता है इसलिए उसे बुद्धिमान स्वामी’ भी कह कर पुकारते हैं। उसकी विवेक बुद्धि के आधार पर ही इस सृष्टि की संरचना संभव हो सकी है। वह सर्वज्ञ, दूरदर्शी और सर्व-दर्शी है। त्रिकालदर्शी उसी को कहा गया है। उनकी स्तुति में ‘खत’ और चिस्ति’ सद्बुद्धि के लिए प्रयुक्त किये गये हैं, यानी मानवी बुद्धि को सन्मार्ग पर प्रेरित करने वाली शक्ति को ही ईश्वरीय सत्ता के नाम से पुकारा जाता है।
जरथुस्त्र ने अपने प्रतिपादनों में जिस ‘आशा’ शब्द का प्रयोग किया है, उसकी संगति वेदों के ऋतु के साथ बैठती है। ‘ऋतम्भरा प्रज्ञा इसी को कहते हैं। ईरानी में ‘अर्त’ और अरेता के नाम से प्रख्यात है। प्राचीन फारसी आलेखों में ‘अर्त’ वस्तुतः दिव्य सत्ता की सत्प्रेरणाओं के लिए ही प्रयुक्त होता है।
ईसाई धर्मग्रंथ बाइबिल में ईश्वरीय सत्ता का वर्णन इस प्रकार है “मैं ही आदि हूँ और मैं ही अंत हूँ। मेरे सिवा कोई नहीं है। मैं वह रोशनी हूँ जो हर आदमी को रोशन करती है। मैं नहीं रहूँ तो तुम कुछ नहीं कर सकते हो”। ईसाई लोग प्रार्थना में इसी समर्थ सत्ता की आराधना करते और कहते है’हे परम पिता तू स्वर्ग में रहता है, पर हम स्वर्ग इसी धरती को बनायेंगे। मैथ्यू 5,44,45,47 में यही लिखा है कि परमपिता सब प्राणियों के प्रति समता और एकता का भाव रखता है, उसी प्रकार मनुष्य को भी उसी के अनुरूप अपनी मनोवृत्ति का निर्माण करना चाहिए। ईसा के अनुसार ईश्वर एक ऐसे विवेकवान गड़रिये की तरह है जो समूचे भेड़ समुदाय को खाई-खड्ड में गिरने से बचाता और हित साधन का रास्ता दिखाता है। सेंटपॉल ने प्रथम काँरिथियन्स के तेरहवें अध्याय में परमात्मा की स्नेह सहकार की प्रवृत्तियों का उल्लेख करते हुए कहा है कि यदि उससे कोई दो कदम साथ चलने को कहे, तो वह उसके साथ एक मील तक जाने का उत्साह दिखाता है, किन्तु शत्रु एक ही है कि वह उसका सुपुत्र हो उसका अनुशासन पाले स्वयं ऊँचा उठे और दूसरों को आगे बढ़ाने, ऊँचा उठाने का दायित्व निभाये, तभी परमपिता भी पग-पग उसके साथ चलने का अपना वचन निभाते हैं अन्यथा अनुशासनहीन कुपात्रों की तरह उसकी उपेक्षा कर देता है।
“यदि भक्ति में कटौती करके सेवा में समय लगाना पड़े तो उसे घाटा नहीं समझना चाहिए।
भक्ति बिना, स्वर्ग हाथ से जा सकता है, पर सेवा के बिना तो आत्मा ही सड़ जायेगी।”
इस प्रकार विश्व के लगभग सभी धर्मों ने ईश्वर के अस्तित्व को स्वीकारा है और उसकी व्याख्या विवेचना एक कल्याणकारी सर्वोच्च सत्ता के रूप में की है। अमेरिका के प्रसिद्ध दार्शनिक थोरो तब मृत्यु शय्या पर अपनी अन्तिम साँसें गिन रहे थे, तो किसी ने उससे पूछा “क्या आपने ईश्वर से मित्रता कर ली है?” थोरो ने बड़े सहज भाव में उत्तर दिया “मेरी उससे शत्रुता ही कब थी। यदि इस संसार में सचमुच ही ईश्वर है, तो मैं उसकी मनुष्य में झाँकी करता हूँ और एक मानवतावादी होने के नाते उसकी सेवा सहायता में ही भगवान की भक्ति समझता हूँ। “इनके इस कथन की संगति प्रसिद्ध दार्शनिक मार्क ट्वेन के उस कथन से शब्दशः बैठ जाती है, जिसमें उनने कहा था कि “मेरा भगवान न गिरिजाघर में है न क्रूस में, मेरा भगवान तो चलता फिरता मनुष्य है वह मनुष्य जिसकी मैं अब तक सेवा करता आया हूँ।” सचमुच आने वाली सदी का भगवान मनुष्य रूप में ही होगा, तभी यह पृथ्वी उनका निवास अर्थात् स्वर्ग बन सकेगी।
वह अपनी बस्ती की ओर लौट रहा था। उसके कदमों में तेजी थी। परेशानी में रह-रह कर बल पड़ जाते, मुख पर व्यथा की छाप स्पष्ट थी। चाह कर भी नहीं भूल पा रहा था कल के नगरवास का अनुभव।उसने अपने होंठों को दाँतों से काटा, एक गहरी उसाँस ली और ऊपर की ओर देखा। नगर के ऊपर को होता हुआ सूर्य पश्चिम दिशा की ओर ढल रहा था। उसकी तिरछी किरणें वृक्षों की पत्तियों पर पड़ कर उन्हें स्वर्णिम बना रही थी। वायु शीतल हो चली थी। आकाश के विस्तार में पक्षियों की एक पंक्ति उड़ती चली जा रही थी ठीक उसी की तरह अपनों का सामीप्य पाने।
वह फिर सोचने लगा वे सुसभ्य हैं और हम असभ्य। क्या पहिचान है उनकी सभ्यता की? शराब के ढलते जाम, नर्तकियों के कुत्सित हाव भाव। कल इसी में तो डूबे थे सब, जब वह फरियाद लेकर पहुँचा था जन जीवन की दुरवस्था की। ये शासक हैं या शोषक। यदि शोषक नहीं हैं जो कहाँ से जुटते हैं ये विलासिता के सरंजाम? वासना के पशुओं की उठती हुँकारें कितनों का उत्पीड़न नहीं करतीं सब कुछ तो कृत्रिम था वहाँ। बेशकीमती साजो सामान और भोजन उसके तो प्रकार ही नहीं गिने जा सकते इसके ऊपर से मनोजूठन फेंकी गई। जब वह घुसा तब महोत्सव चल रहा था। सोचा तो था नरेश से मिल कर दुःख दर्द बयान करेंगे। किन्तु घुसते ही आवाजें उठीं निकालो इस भिल्ल को असभ्य बेहूदा यहाँ कहाँ आ गया? असभ्य! हाँ, वह असभ्य है क्योंकि उसके पास उन जैसी सभ्यता के दो प्रधान आधार विलासिता और कृत्रिमता कहाँ हैं? सोचते-सोचते कब आ पहुँचा बस्ती में, पता नहीं चला।
बस्ती में प्रवेश करते ही अनेकों ने उसे लिपटा लिया। वृद्धों ने सिर सूँघ कर आशीर्वाद दिया। बच्चे पैरों से लिपट गये। कितनी न्यारी है उसकी यह असभ्य दुनिया जिसमें चारों ओर प्यार छलकता है, सहकार उफनता है। “क्या कहा ईदर नरेश ने” एक वृद्ध ने प्रश्न किया। “यही कि हम असभ्य हैं।” उसका जवाब था। फिर उसी वृद्ध को सम्बोधित करते हुए बोला हम लोग तो फिर भी ठीक हैं बेचारे ग्राम वासी नगर के सामान्य जन......। क्या हुआ उनको? प्रश्न उभरा बेचारे जीने के लिए तरस रहे हैं। खैर छोड़। वृद्ध ने अनमने भाव से कहा तू नहा धो ले बेटा एक बड़े तेजस्वी साधु आए हैं रोज शाम को हम लोगों के पास बैठते हैं जिन्दगी जीना सिखाएँगे। नई व्यवस्था आएगी और पता नहीं क्या-क्या सचमुच बड़ी अच्छी-अच्छी बातें बताते है। तुझे भी पूछ रहे थे। “अच्छा” कहकर वह चला गया।
शाम को सभी एक स्थान पर जमा थे। ऊँचे टीले पर बैठे साधु कुछ कह रहे थे। वह सुनने का प्रयास करते हुए कोने में बैठ गया। साफ सुनाई पड़ रहा था-आज देश की नौका में अनेकों छेद हो गये हैं, समाज शतधा छिन्न हो रहा है। तनिक विचार करो। आज जो परिस्थितियाँ बनी है, यदि ये बढ़ती जायें तो कल और नहीं तो परसों देश की अखण्डता समाप्त हो जाएगी, समाज टुकड़े-टुकड़े हो जाएगा, धर्म बिखरता नजर आएगा। फिर कोई भी हो ब्राह्मण या भंगी, आक्रान्ताओं के आतंक से कोई बचेगा नहीं। यदि तुमसे कुछ बच भी गए तो सपनों में डर-डर उठा करोगे और मौत की कामना करोगे।
साधु ने अपनी वक्तृता की बाढ़ को जो हर वाक्य के बाद और अधिक भयंकर होती जा रही थी, एक क्षण के लिए रोका परन्तु वह फिर कहने लगा “ऐसे समय में हमारा दुर्भाग्य कि समाज ड़ड़ड़ड़ड़ बुद्धि जीवी वर्ग महत्वाकांक्षाओं के मद में चूर और धनिक! उन्हें भला विलास से अवकाश कहाँ? ये जाग्रत हो इसकी आशा बहुत कम है। इस दशा में मैं हारीत महाकाल का सेवक जन सामान्य को जगाकर एक चमत्कार करना चाहता हूँ। शोषण, उत्पीड़न कुरीतियों चारों ओर फैलती जा रही मूढ़ताओं की भयावह बाढ़ के रोकने के लिए हर नगर से ईंट पत्थर इकट्ठा कर आया हूँ। परन्तु अभी तक मुझे इन ईंटों के जोड़ कर मजबूत बाँध बनाने वाला कारीगर नहीं मिला था। परन्तु आज....... कहने के साथ उन्होंने कोने में बैठे उसकी ओर इशारा किया “इधर आओ।”
वह साधु के समीप आ खड़ा हुआ। गौर देखा विचित्र था वह साधु। उसके हाथों चमकता ड़ड़ड़ड़ जिसको तीनों नोंकें सिंदूर से रँगों थीं और इससे बढ़कर उसकी धधकती आँखें जो सैकड़ों हजारों पर पड़कर उनको निस्तेज बना सकती थीं। दूसरे लोगों की आत्मा की गहराई तक पैठकर उनका अंतर्दर्शन करने की क्षमता रखती थीं।
साधु ने उसका हाथ अपने हाथों में लिया और बहुत ही कोमल स्वरों में पुकारा-पुत्र! अरे यह क्या? स्वरों में तो माँ का वात्सल्य था, आँखों से स्नेह झर रहा। समाज देवता के लिए मैं तुमसे भीख माँगने आया हूँ, इनकार मत करना वत्स!
“मुझ से! मेरे पास है ही क्या महाराज”
“मुझे पत्थरों के ठीकरे और धातुओं के टुकड़े नहीं चाहिए। मेरी चाहत है भाव-संवेदना से अभिपूरित मनुष्य जो जमाना बदल डालने के लिए अपने को न्यौछावर कर सके।
“मैं ही क्यों मेरे अनेक साथी देश और धर्म के लिए अपने को सहज उत्सर्ग कर देंगे। किन्तु हम असभ्य हैं फिर जमाना बदलना कोई आसान काम तो नहीं”। ‘वाणी’ में शिथिलता थी। “मुझे प्रसन्नता हुई आयुष्मान। जमाना हम नहीं बदलेंगे, हम सभी तो सहायक भर बनेंगे, बदलने वाला तो कोई और है। जहाँ तक असभ्यता का सवाल है, वह हमेशा से सुसभ्यता की अकड़ में फूलने वालों का अहं चूर करता आया है। राम राज्य की स्थापना में उसने न तो सेठ-साहूकारों को पूछा और न अकल के ठेकेदारों को उसके साथी बने जंगली रीछ वानर और पूरा कर लिया अपना उद्देश्य। अद्भुत है वह-अपनी पर आ जाए तो गँवार ग्वालों के सामने वज्रधारी इन्द्र को भी कँपकँपी छूट जाती है। फिर हमें तो सभ्यता के मान दण्ड बदलने हैं, विलासिता और कृत्रिमता की जगह सहकार भरा प्राकृतिक जीवन स्थान ग्रहण करेगा। पूरी तरह बदला होगा भावी समाज” ड़ड़ड़ड़ड़ के साथ ही वह किसी सोच में डूब गए वे मानो कल्पना के नेत्रों से नवयुग की छटा निहार रहे हों?
वह खड़ा सोच रहा था, कौन है इस विराट अभियान का सूत्र संचालक? जिसका संकल्प उठते ही समस्त असफलताएँ दुम दबा कर भाग जाती है। ड़ड़ड़ड़ पूछ ही लिया कौन है वह? शब्दों ने उन्हें प्रकृति ड़ड़ड़ड़ महाकाल! सदाशिव! भगवान, एकलिंग अनेकों नाम हैं उसके।”
ओह! उसने श्रद्धा भरे मन से मस्तक नवाया। एकलिंग के प्रति तो उसकी बचपन से भक्ति रही है। भला ऐसा कौन भील है जो भगवान एकलिंग के नाम पर प्राण न्यौछावर न कर सके। किन्तु वह सोचने लगा कि पूछे या न पूछे।
साधु महाराज उसके चेहरे के भाव को ताड़ गए। स्वयं बोल पड़ कुछ पूछना चाहते हो तो निःसंकोच पूछो।”
“महाकाल की चेतना अभी तक क्यों नहीं पसीजी। सदियों की दुरवस्था बिलखते-छटपटाते प्राणियों पर उसे अब तक क्यों दया नहीं आती? आँसुओं की बरसात से धरती भीगती रही। निर्दोषों के रक्त से बर्बर अपना तर्पण करते रहे, यह देखकर भी सदाशिव मौन कैसे रह सके? “तुम्हारा आक्षेप उचित है, पर तनिक समझने का प्रयास करो। इस मानव ने ही उनकी शक्तियों को तिरस्कृत किया है। जब-जब वह आँसू पोंछने आए हैं उन्हें भगा दिया है।
सौ कैसे? वह समझ न सका। “साधु समझाने का प्रयास करते हुए कहने लगे-भगवान, सत्यनिष्ठ, कर्मठ, श्रमिकों के पसीने में सुगन्धि और प्राणों को न्यौछावर करने वाले वीरों के कर्म में अमोघत्व पैदा कर सकते हैं। वह स्वयं शक्ति हैं उन्हें अभिव्यक्ति के लिए मनुष्य चाहिए। उन्हें किसी से कोई पक्षपात नहीं जहाँ भी जिस देश में उदारता, ज्ञान, संघर्ष, त्याग और साहस का निवास है वहीं वह भी वर देने लगते हैं। इसके विपरीत जहाँ दुराचार, अज्ञान, और स्वार्थान्धता का कुचक्र चलता हो वहाँ भला वे कैसे अभिव्यक्त होंगे?
“पर पुत्र गलती करे तो पिता को दण्ड देना चाहिए न?”
“विषमताएँ, आज की परिस्थितियाँ दण्ड नहीं तो और क्या हैं? अब वह सब सुधार करके रहेंगे। भली प्रकार नहीं तो कान उमेठ कर। अब उनका संकल्प जाग्रत हो गया है वत्स! जिसका कोई प्रतिरोध नहीं। बात उसकी समझ में आ चुकी थी सारे भील एक जुट हो गए। फेल गया सर्वत्र सद्विचारों का प्रवाह उलटा उलटकर सीधा किया गया। महाकाल के संकेतों के अनुसार काम करने वाले युवक का नाम इतिहास ने स्वर्णाक्षरों में लिखा। कभी के साधारण भील बालक को आज इतिहास सम्राट बप्पा रावल के रूप में जानता है। औघड़दानी सदाशिव भला अपने सहचरों को पुरस्कृत करने से कब चूके हैं। आज वह पुनः महाकाल बन पुकार रहे हैं।
जीवधारियों में काम एक प्रचण्ड शक्ति है, जिसका रूपांतरण या ऊर्ध्वीकरण पशु-पक्षी, कीट-पतंगे जैसे प्राणी नहीं कर पाते, मात्र अपने जैसे दूसरे प्राणियों को उत्पन्न करने में ही उसे नियोजित करते और जीवन की इतिश्री कर लेते है॥
मनुष्य की स्थिति अन्य प्राणियों से सर्वथा भिन्न है। स्रष्टा ने उसे विवेक बुद्धि सहित उन अगणित क्षमताओं से सम्पन्न बनाया है, जो काम प्रवृत्ति का प्रयोग वंश-प्रवाह को बनाये रहने के अतिरिक्त शारीरिक बलिष्ठता, मानसिक दक्षता-प्रतिभा एवं आत्मिक प्रखरता के रूप में कर सकता है। आवश्यकता मात्र प्रवाह-परिवर्तन की होती है। वेगवती नदियों के प्रचंड प्रवाह को उपयुक्त दिशा में रूपांतरित कर देने पर उससे विद्युत शक्ति का असीम भण्डार पैदा हो जाता है। जल-वाष्प से बड़े-बड़े स्टीम इंजन चलने लगते हैं। इसी तरह यदि कामशक्ति को-जीवन ऊर्जा को ऊर्ध्वगति प्रदान की जा सके, तो वह प्राण-विद्युत के भाण्डागार के रूप में बदल कर मानवी गौरव-गरिमा के उपयुक्त उत्कर्ष में सहायक बन जाती है। कामशक्ति का दमन नहीं, वरन् उदात्तीकरण ही उसके सदुपयोग का सही मार्ग है। फ्रायडवादी प्रतिपादनों के अनुरूप आचरण करना अपने विनाश को स्वयं आमंत्रित करना है। इस शक्ति का समुचित सुनियोजन ही मानव जीवन के लिए कल्याणप्रद है।
काम तत्व की महत्ता एवं समर्थता से प्राचीन ऋषि-मनीषी भली-भाँति परिचित थे। यही कारण था कि उनने उसके दमन की नहीं, अपितु सृजनात्मक कार्यों में लगाने की विचारधारा को जन्म दिया था, और कामना की संज्ञा दे कर उसे व्यापक अर्थ प्रदान किया था। अथर्ववेद 1/2/19 में इस सम्बन्ध में कहा गया है, “कामों जशे प्रथमम्.............विश्वहा महान्” अर्थात् इस सृष्टि में काम शक्ति सबसे महान है। वह सृजन भी कर सकती है और दुरुपयोग होने पर ध्वंस भी खड़ा कर सकती है। यही वह शक्ति है, जो प्रत्येक प्राणी के अन्तराल में समाहित उल्लास के रूप में उमंग लाने, आगे बढ़ने, ऊँचा उठने, विनोद का रस लेने एवं साहसिक प्रयास करने के रूप में निरन्तर प्रस्फुटित होती रहती है। इसी को आकर्षण शक्ति कहते हैं। जड़ पदार्थों में ऋण और धन विद्युत के रूप में इसे ही कार्यरत देखा जाता है। भौतिकी के अनुसार भी सृष्टि की गतिविधियों का उद्गम यही है। शक्ति तरंगें उसी से उद्भूत होती और संसार की अनेकानेक हलचलों का सृजन करती हैं।
अध्यात्मवेत्ताओं एवं कार्लगुस्ताव जुँग जैसे विख्यात मनोविज्ञानियों ने काम प्रवृत्ति को साइकिक एनर्जी-मानसिक ऊर्जा के रूप में वर्णन किया है और कहा है कि इसका परिष्कृत स्वरूप ही शारीरिक बलिष्ठता, मानसिक दक्षता एवं आत्मिक प्रखरता के रूप में दृष्टिगोचर होता है। प्राणियों में उसका उभार उत्साह, उल्लास एवं उमंगों के रूप में होता है। पारस्परिक प्रेम, सहयोग से उत्पन्न उपलब्धियों से परिचित होने के कारण आत्मा इस स्तर के प्रयासों में और सहज विनोद के लिए उन प्रयासों में प्रवृत्त होती है। शास्त्रकारों ने भी इसी को काम कहा है और उसकी उपयोगिता का समर्थन किया है। मनोवेत्ताओं द्वारा प्रतिपादित मानसिक ऊर्जा ही शास्त्रकारों के शब्दों में वह जीवन तत्व है जिसे उत्तेजनाओं, वासनाओं को भड़काने से रोक कर मस्तिष्क की ओर प्रवाहित कर देने पर मनुष्य को ऊर्ध्वरेता बनने का सौभाग्य प्राप्त होता है। रेतस्-जीवन ऊर्जा का ऊपर- ही-ऊपर मस्तिष्क की तरफ प्रवाहित होना ही ब्रह्मचर्य है यही ऊर्जा जब आध्यात्मिकता की ओर मुड़ जाती है, तो आत्मा-परमात्मा में विचरण करने लगती है। ब्रह्मवर्चस परायण जीवन इसी का नाम है वेदों, उपनिषदों एवं महापुरुषों का यही आदर्श एवं आदेश भी है।
फ्रायड एवं एडलर जैसे पाश्चात्य मनोविज्ञानी ने काम प्रवृत्ति को अर्जेज, इड, लिबिडों, विल आदि नाम देकर जिस संकुचित रूप में उसके व्याख्या-विवेचना की है। शास्त्रकार के शब्दों में वह ऐषणाओं, का एक छोटा रूप है। ऐषणा का अर्थ है मनुष्य को प्रेरणा देने वाली शक्ति। इसका उदात्तीकरण ही सदुपयोग का सही मार्ग है। यह मात्र कामोल्लास तक समिति नहीं है। वृहदारण्यक उपनिषद् के सूत्र 1/4 के अनुसार ‘काम’-कामना रूप में व्यापक अर्थों वाला शब्द है। इसके उभार पर प्राणियों की प्रगति और पदार्थों की हलचलें निर्भर हैं। यही शक्ति अगणित उमंगों के रूप में प्रकट होती और विनोद भरे क्रियाकृत्य करने की प्रेरणा देती है। जीवन में सामान्य क्रिया–कलापों में मन लगाने और आनन्द मनाने का अवसर जिस अन्तःस्फूर्ति के आधार पर मिलता है मनीषियों ने उसे ‘काम’ कहा है। सद्कामना की पूर्ति में उत्साह और उमंग के साथ संलग्न होने वाली प्रवृत्ति ही काम है। इसका रसास्वादन जो न कर सका वह अर्धमृतकवत् जीवित रहेगा, उसे महत्वपूर्ण सफलताओं के दर्शन जीवन में कभी भी न हो सकेंगे। संसार में जितने भी महत्वपूर्ण काम हुए हैं, जितने भी महान व्यक्तित्व उभरे हैं, उन सब के मूल में अदम्य अभिलाषा और उसकी पूर्ति के लिए आतुर साहसिक पुरुषार्थ ही प्रधान भूमिका निभाता रहा है।
हँसती-हँसाती, खिलती-खिलाती, उछलती-फुदकती जिन्दगी के मूल में जो भाव भरा उल्लास काम करता है, वस्तुतः वही काम है। यह विनोद उल्लास अनेक अवसरों पर अनेक स्तर के व्यक्तियों में अनेक प्रकार से उभरता है। बच्चे इठलाते, इतराते, उछलते, मचलते रहते हैं। किशोर क्रीड़ाँगन में अपनी स्फूर्ति का परिचय देते देखे जाते हैं तो प्रौढ़ों को दूरदर्शी योजनाएँ बनाने और उन्हें कार्यान्वित करने में संलग्न देखा जाता है। गायन वादन में झूमते हुए नृत्य करते हुए अभिनय में थिरकते हुए कलाकार वस्तुतः अन्तरंग के उल्लास का परिचय दर्शकों को कराते और उन्हें भी अपनी ही तरह सरसता के निर्झर में आनन्द लेने का अवसर देते हैं।
वनस्पति जगत में पुष्पों का सौंदर्य और सौरभ उनके अन्तराल में उभरे हुए कामोल्लास का परिचय देते हैं। मयूर का नृत्य, भ्रमर का गुँजन, पक्षियों की चहचहाहट और फुदकन आदि में उनके उभरते हुए अन्तःउल्लास का परिचय मिलता है। इसे चेतना की विकास के लिए उभरती हुई उमंग ही समझा जा सकता है। उत्साह के अभाव में नीरसता और निस्तब्धता का अंधकार ही छाने लगेगा। प्रगति क्रम रुक जाने की इस स्थिति में पूरी आशंका है। अतएव प्रकृति ने जड़ चेतन में अपने-अपने स्तर का उत्साह उत्पन्न किया है। और उनका कलेवर ऐसा सृजा है। जिसमें क्रीड़ा-कल्लोल की हलचलों को कार्यान्वित होने का अवसर मिलता है। प्रगति और हलचलों का उभार इसी पर निर्भर है। संक्षेप में यही कामक्रीड़ा है, जो अगणित उमंगों के रूप में प्रकट होती है और विनोद भरे क्रियाकृत्य करने की प्रेरणा देती है।
कामशक्ति का प्रवाह विषयभोग-यौन लिप्सा की और मुड़ जाने के?पर मात्र विनाश ही हाथ लगता है। वासना, कामुकता, अश्लील चिन्तन आदि का समस्त परिकर वस्तुतः उस सुविस्तृत सृष्टि-संचरण प्रक्रिया एवं मानव जीवन की अतिशय महत्वपूर्ण और प्रेरक शक्ति का बहुत ही छोटा और हेय स्वरूप है। इसकी व्याख्या-विवेचना क्रीड़ा, उल्लास के रूप में ही हो सकती है। उसे उत्साह, उभार-उपचार ‘काम’ की परिधि में सम्मिलित किये जा सकते हैं, जिनसे स्नेह, सौजन्य, सहयोग, मिलन आदि की सुखद अनुभूति होती है। सहृदयता, करुणा, सेवा, सहायता उदारता, साहसिकता के रूप में इसी की परिणति होती है। सृजनात्मक सत्प्रयोजनों के लिए किये जाने वाले त्याग-बलिदान में जो भाव-संवेदना काम करती है उसे भी इसी शक्ति का ऊर्ध्वगमन कह सकते है। संगीत, साहित्य, कला के विभिन्न विधाओं के रूप में हम दिन-प्रतिदिन जो कुछ भी देखते हैं, वह भी काम शक्ति का परिष्कृत और प्रखर रूप है।
कामतत्व की उच्चस्तरीय परिणति वह है, जो भावसंवेदनाओं की उत्कृष्टता कोमलता, करुणा के रूप में प्रस्फुटित होती है। इसे ईश्वर के साथ, विराट् ब्रह्म के साथ, नियोजित करने पर उसका स्वरूप उस भक्त जैसा बन जाता है जिसका इतिहास के पृष्ठों में गाँधी, बिनोवा, विवेकानन्द के रूप में उल्लेख है।
इस महाशक्ति का परिष्कार एवं ऊर्ध्वीकरण कार्यक्षेत्र में ओजस्, मनःक्षेत्र में तेजस् और अन्तराल में आत्मिक विभूतियों के रूप में वर्चस् बनकर उद्भूत होता और मानव जीवन को धन्य बना देता है। वेदों में कामशक्ति के इसी दिव्य स्वरूप का नमन वन्दन किया गया है।
मनुष्य प्राकृतिक रूप से शाकाहारी है। माँस उसका खाद्य नहीं है। उसकी संरचना भी शाकाहारी स्तर की आँतों वाले मनुष्य से तनिक भी तालमेल नहीं खाती, फिर दुष्प्राप्य भी होता है। मारे गये पशु के शरीर में जो रोग कीट पाये जाते हैं, वे उबालने, तलने पर भी बने रहते हैं, और खाने वाले के शरीर पर अहित कर प्रभाव छोड़ते हैं। वधकाल की पीड़ा, व्याकुलता, और चीत्कार के सूक्ष्म प्रभाव माँस पर छाये रहते हैं। वे खाने वाले में ऐसी प्रवृत्ति बढ़ाते हैं जो मानवी गरिमा के अनुरूप नहीं होती है। इन दुष्प्रभावों की चपेट में मनुष्य अपनी करुणा एवं शालीनता तक गँवा बैठता है।
भारत में माँसाहार का प्रचार प्रोटीन पौष्टिकता के नाम पर दिन-दिन बढ़ता जा रहा है। अमेरिका, इंग्लैंड, जापान मैक्सिको, चीन जैसे देशों के निवासी जहाँ अपने आहार में विशेष परिवर्तन कर शाकाहारी बनते जा रहे हैं, वहीं अपने देश में माँसाहार का प्रचलन अभिवृद्धि पर है। लगभग सत्तर प्रतिशत व्यक्ति सामिष भोजन करते हैं। प्रत्येक दस व्यक्ति में से सात व्यक्ति माँसाहारी हैं जबकि स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने निरंतर अनुसंधान के पश्चात् इस भ्राँतिपूर्ण धारणा को अब गलत सिद्ध कर दिया है कि माँस-मछली पौष्टिक तथा स्वास्थ्यवर्धक आहार हैं। इससे न केवल पाचन प्रणाली पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता और शरीर रोगग्रस्त होता है, वरन् अप्राकृतिक आहार होने से मन भी दूषित और विकारग्रस्त बन जाता है। वध किये जाते समय जानवर को जिस भयभीत और चीत्कार भरी स्थिति में होकर गुजरना पड़ता है, उसके कारण उनकी अन्तःस्रावी ग्रन्थियों तेजी से विध उगलने लगती हैं। उस स्थिति में तीव्रता से उभरते हुए हारमोन्स रसायन कुछ क्षण में समस्त रक्त में घुल जाते हैं और उसका प्रभाव माँस पर भी पड़ता है। इसके सूक्ष्म प्रभाव खाने वालों में भी पहुँचे बिना रहते नहीं। पेट में पहुँचते ही वह मनुष्य की तामसिक प्रवृत्तियों को भड़काते हैं, जिसके कारण हिंसा, क्रोध, तनाव जैसे अनेकानेक मानसिक विकास पैदा हो जाते हैं और समाज में पारस्परिक मनमुटाव, गृहकलह, लूट-खसोट खून खराबे आदि का निमित्त बनते हैं।
आहार विशेषज्ञों का कहना है कि माँस मनुष्य का प्राकृतिक आहार नहीं हो सकता। मानवी काया के उचित विकास के लिए जिन पोषक तत्वों की संतुलित मात्रा का होना अनिवार्य है, उसकी पूर्ति शाकाहार से ही होती है।
माँसाहार में जिन तत्वों को पुष्टिकर बताया जाता है उनमें एक और विपत्ति जुड़ी रहती है यूरिक एसिड की अधिकता। ब्रिटेन के सुप्रसिद्ध चिकित्सा विज्ञानी डॉ. अलेक्जेन्डर के अनुसार यह तत्व शरीर के भीतर जमा होकर गठिया, मूत्र विकार, रक्त विकार, हृदयरोग, यक्ष्मा, अनिद्रा, हिस्टीरिया, यकृत रोग आदि कितनी ही बीमारियों को जन्म देता है। इसके अतिरिक्त माँस में उपस्थित चर्बी एवं कोलेस्ट्रॉल की अत्याधिक मात्रा खाने वाले के शरीर में पहुँच कर रक्तवाही धमनियों में जमकर उसे मोटी बना देती है जो हृदय रोग, उच्च रक्तचाप, गुर्दे की बीमारी, पथरी आदि का प्रमुख कारण बनती है। समृद्ध औद्योगिक देशों में दो तिहाई लोगों की मृत्यु प्रायः इसी के कारण होती है।
अनुसंधानकर्ता वैज्ञानिकों ने पाया है कि माँसाहारियों के रक्त में उपस्थित क्षार और अम्ल के बीच का निर्धारित अनुपात बिगड़ जाता है और आँतों की बढ़ी हुई गर्मी के दबाव से उसकी अधिकाँश मात्रा मूत्र के साथ बाहर निकल जाती है। उस कमी को पूरा करने के लिए शरीर में हड्डियों के अतिरिक्त और दूसरा स्रोत मिलता नहीं। फलस्वरूप रक्त अपना सन्तुलन बनाये रखने लिए क्षार और अम्ल हड्डियों से चूसने लगता है। इस प्रकार माँसाहारी की हड्डियां कमजोर पड़ती जाती है। और उसे गठिया एवं संधिवात जैसी व्यथायें जल्दी ही धर दबोचती है। शरीर को शक्ति और स्फूर्ति उस खाद्य पदार्थ से प्राप्त होती है जिसे हमारा पाचन संस्थान सरलतापूर्वक पचा लेता है। शाकाहार न केवल पाचन की दृष्टि से शरीरोपयोगी है वरन् मानव अंतःकरण को प्रिय लगने वाले समस्त गुण उसी से उपलब्ध होते हैं। इसलिए शाकाहार की वरेण्य है
आहारशास्त्री एल.एच. एण्डरसन ने ठीक ही कहा है-”हम सभ्यताभिमानियों के हाथ मूक और उपयोगी पशुओं के रक्त से रँगे हैं। हमारे माथे पर उनके खून का कलंक है। हमारा पेट एक घिनौना कब्रिस्तान बन गया है। शरीर की दुर्गन्ध हमारे मुख्य से निकल रही है। क्या यही मानवोचित आहार है? माँसाहार मानवता के नाम पर एक कलंक, गुनाह है इसे बंद किया ही जाना चाहिए।
भगवान बुद्ध का कथन है-”अप्पदीपो भव” अर्थात् अपना दीपक आप बनो। वे आत्म विश्वास को बहुत महत्व देते थे। धर्मचक्र प्रवर्तन की प्रचार यात्रा में शिष्यों को इसकी महत्ता समझाते हुए वह कहते थे “आज अथवा मेरी मृत्यु के पश्चात् वे लोग जो अपने आप से प्रकाश ग्रहण करेंगे, आत्मनिर्भर होकर अपने आप पर विश्वास करेंगे, सत्य को अपना दीपक मानकर उसे दृढ़तापूर्वक धारण करेंगे और सत्य में ही अपने मोक्ष की खोज करेंगे, उन्हें किसी बाहरी सहायता की आवश्यकता न पड़ेंगे। ज्ञान प्राप्ति की अभीप्सा रखने वाले वे ही लोग उच्चतम स्थिति को प्राप्त कर सकेंगे, जिनके हृदय आत्मविश्वास से भरे होंगे। दूसरों का नेतृत्व भी ऐसे ही व्यक्तित्व कर सकेंगे, जिनमें आत्मविश्वास कूट-कूट कर भरा होगा।”
जिसे अपनी योग्यता, क्षमता और सामर्थ्य पर विश्वास होता है, विजय श्री भी उसे ही वरण करती है। जीवन की प्रत्येक सफलता इसी एक केन्द्र के चहुँ ओर चक्कर काटती है। दृढ़ निश्चयी ही आगे बढ़ते ऊँचा उठते और उच्चस्तरीय सफलताएँ अर्जित करते हैं। जिन्हें स्वयं की क्षमता पर विश्वास नहीं, दूसरे लोग भी उन पर विश्वास नहीं करते। ऐसे व्यक्ति संशय और दुविधा के दलदल में फँसकर छटपटाते भर रहते हैं। साथी सहयोगी भी उनका साथ छोड़ जाते हैं।
गीताकार ने इसी तरह की मनःस्थिति वाले मनुष्यों के लिए-’संशयात्मा विनष्याति” कहकर संवर्धन किया है। घड़ी के पेन्डुलम की तरह दोलनयुक्त अनिश्चयात्मक मनःस्थिति व्यक्ति को कहीं का नहीं रहने देती। वह कभी आगे बढ़ता है तो कभी दो कदम पीछे खिसकता है। इसके विपरीत दृढ़ विश्वास वाला व्यक्ति जो निश्चय कर लेता है, उसे पूरा करके ही छोड़ता है। भले ही उसके कर्म में कितने ही अवरोध चट्टान बन कर अड़ क्यों न रहे हों। उनका प्रभावशाली व्यक्तित्व संपर्क में आने वालों में भी प्राण फूँक देता है और वे अनायास ही उसके मित्र सहायक बनते चले जाते हैं ड़ड़ड़ड़ड़ मनीषी जेम्सएलेन का इस सम्बन्ध में यह कथन उपयुक्त ही है कि जिनके व्यक्तित्व से विश्वास और मस्तिष्क से श्रेष्ठता के भाव टपक रहे होंगे, सफलता उन्हें ही मिलेगी।
सुप्रसिद्ध मनीषी स्वेटमॉर्डन कहते हैं कि दूसरों का सफल मार्गदर्शन प्रतिभा के धनी आत्मविश्वासी व्यक्ति ही कर सकते हैं। जो स्वयं प्रज्ज्वलित नहीं, वह दूसरों को प्रकाशित कैसे कर सकता है। उनके अनुसार यदि हम दूसरे के प्रकाश पर निर्भर रहेंगे तो हो सकता है कि अंधकार हमें अभिभूत कर ले। यदि ऐसा नहीं चाहते तो स्वयं को प्रज्ज्वलित करना होगा। यह हो सकता है कि हम दूसरों से प्रकाश ग्रहण करके उस प्रकाश की परम्परा को आगे बढ़ायें, परन्तु अपने दीपक को उपेक्षापूर्वक जंग लगते रहने देना और केवल दूसरों के प्रकाश को पर्याप्त मान लेना अन्ततोगत्वा हमें अन्धकार के गर्त में गिरा देगा। अपना आन्तरिक आत्मविश्वास ही वह प्रकाश है, जो कभी साथ नहीं छोड़ता, धोखा नहीं देता। आत्मविश्वास से बढ़कर इस संसार में और कोई दूसरी शक्ति है नहीं आत्मविश्वासी के सामने दुनिया की कोई बाधा टिक नहीं सकती और न ही वह कभी किसी से हार मानता है।
आत्मविश्वास के चमत्कारिक प्रभाव से इतिहास के पन्ने भरे पड़े है। ‘स्वतंत्रता हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है, का उद्घोष करने वाले लोकमान्य तिलक का वह आत्मविश्वास ही था जिसने समूचे देशवासियों को स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़ने के लिए झकझोर कर रख दिया था। महात्मा गान्धी का आत्मविश्वास ही था जिनके अहिंसात्मक आन्दोलन ने सदियों से परतंत्र बने भारत को अंग्रेजों से मुक्त करा लिया। अब्राहम लिंकन एवं हैरियट स्टो के आत्म विश्वास ने हजारों वर्ष पुरानी दास प्रथा को अमेरिका से सदा के लिए जड़ से उखाड़ फेंका। महाभारत की वह कथा प्रसिद्ध है जिसमें कुरुक्षेत्र की रणभूमि में अर्जुन अपना आत्मविश्वास खो बैठा था और गाण्डीव को एक ओर रखकर भयभीत बना रथ के एक कोने में जा बैठा था। तब कृष्ण ने उसके हृदय में आत्मविश्वास भरा और उसकी परिणति पाण्डवों की विजय एवं महान भारत के अभ्युदय के रूप में हुई थी। हनुमान के प्रसुप्त पड़े आत्मबल को जामवन्त ने जगाया था और उसका परिणाम समुद्र लाँघने, लंका का विध्वंस कर सीता वापसी एवं राम राज्य की स्थापना के रूप में सामने आया था। प्रगति पथ पर अग्रसर होने के लिए पग-पग पर आत्मविश्वास की आवश्यकता पड़ती है। इसके अभाव में सफलता संदिग्ध ही बनी रहती है।
रात्रि के सघन अन्धकार में एक युवा अपनी कुटिया में टिमटिमाते दीपक के सामने बैठा कुछ पढ़ रहा था। पढ़ते-पढ़ते किसी गम्भीर सोच में डूब जाता। माथे पर चिन्ता की रेखाएं उभर आती। तब तक दूसरे कोने से एक वृद्धा के खाँसने की आवाज उभरी। खाँसते बुढ़िया ने पूछा अरे बेटा! तू अभी सोया नहीं, क्या सोच -सोच कर परेशान हो रहा है।
“नहीं माँ। सोना चाहकर भी नहीं सो पा रहा।”युवक के स्वरों में पीड़ा थी। उसने बात आगे बढ़ाते हुए कहा-कहाँ वेदों में वर्णित भारत (अजनाभ वर्ष) की भव्यता। ऋषितन्त्र और राजतंत्र का समन्वित गौरव। कहाँ आज-चारों ओर टकराहट, देश का एक भाग दूसरे से बड़े-बड़े पत्थरों की तरह एक दूसरे से टकरा रहे है। इनकी टकराहटों में जन सामान्य बुरी तरह पिस रहा है। ओह! आज कोई ब्राह्मण तपस्वी नहीं बचा जो इस टूटते बिखरते देश को सँवार सकें।
वृद्धा अपने युवा पुत्र की चिन्ता को सुनती रही। सुनने के पश्चात् बोली “ न जाने क्या सोचा करता है। अरे तू विवाह कर ले? मैं भी तेरी बहू का मुख देख लूँ।” “ नहीं यह मेरे से न होगा माँ! मेरा सुख विवाह में नहीं सबके सुख में समाया है। “ “ अच्छा”कहकर वृद्धा चली गयी वह फिर अपने चिन्तन में डूब गया।
उसके दिन रात इसी सोच में बीतने लगे। इसी बीच वृद्धा माँ भी चल बसी। अब वह एकाकी था। इसी समय पता चला कि यूनान देश का राजा सिकन्दर अनेक देशों को कुचलता - रौंदता भारत की सीमा पर आ पहुँचा है। तक्षशिला के राजा आम्भि ने उसका स्वागत किया। देशभक्त पुरू के विरोध में उसकी मदद की। कुछ छोटे छोटे राज्यों को उसने जीत भी लिया था।
इन जीते हुए राज्यों में यवन सैनिकों और शासकों ने जो अत्याचार किये उसे देखकर उसका दिल दहल गया। भारतीय सभ्यता और संस्कृति को इस प्रकार लुटते देखकर झोपड़ी में रहने वाले उस ब्राह्मण की आत्मा तड़प उठी। देश का अपमान तथा बहू बेटियों की लुटती अस्मत को वह चुप बैठ कर देख न सका। उसने प्रतिज्ञा की कि इन अत्याचारियों के व्यूह को ध्वस्त कर ऋषितन्त्र व राजतन्त्र के समन्वित स्वरूप की स्थापना करूंगा। एक बार पुनः इस धरती पर सतयुग ला कर रहूँगा।
उस समय देश में मगध का राज्य अपेक्षाकृत शक्तिशाली और बड़ा था। यद्यपि वहाँ का राजा घनानन्द खुद भी अत्याचारी था फिर भी युवक को आशा थी कि शायद देश के गौरव की रक्षा के नाम पर वह कुछ कर सके। बस इसी आशा में तक्षशिला से मगध अर्थात् पेशावर से पाटलिपुत्र की पदयात्रा शुरू कर दी। रास्ते में जन सामान्य की दीनता, पीड़ा कराहों को सुन कर उसका सत्ययुग के अवतरण का संकल्प वज्रक्त दृढ़ हो जाता। पर घनानन्द के दरबार में पहुँच कर भी उसे असफलता हाथ लगी। विलासी भला संवेदना के स्वरों को कब सुनते हैं? किन्तु इस असफलता के बाद भी वह दुगुने उत्साह के साथ सत्पात्र की खोज में जुट गया।
वह एक गाँव से निकला चला जा रहा था कि देखा कुछ लड़के खेल में मग्न हैं वे आँख-मिचौनी, आइस पाइस नहीं राज्य व्यवस्था का खेल रहे हैं। युवा ब्राह्मण खड़े देखते रह गये राजा बने बालक का कौशल। उसकी तत्परता,कुशलता अन्य सभी के प्रति प्रेम भाव देख कर उन्हें लगा इस किशोर में वे सभी सद्गुण बीज रूप में विद्यमान हैं जिनकी उन्हें खोज थी। इसके माध्यम से ब्रह्म तेज अर्थात् उत्कृष्ट चिन्तन और क्षात्र तेज अर्थात् प्रखर कर्म का समन्वय किया जा सकना सम्भव है।
वह बालक की माँ से मिले। अपने उद्देश्य से उसे अवगत कराया और बालक की माँग की। आपका परिचय?लड़के की माँ का प्रश्न ठीक ही था। भला अनजाने आदमी को कौन अपने हृदय का टुकड़ा सौंपता। ब्राह्मण ने संक्षेप में अपना परिचय दिया। मैं तक्षशिला विश्व विद्यालय का आचार्य चाणक्य हूँ। तक्षशिला और चाणक्य इन दो नामों को समूचा भारत जानता था। इनकी प्रामाणिकता में किसी को भी कोई सन्देह न था। आचार्य के सुयोग हाथों में बालक को सौंपने में उसे कोई हिचकिचाहट न हुई।
चाणक्य ने उसे पढ़ाया लिखाया, उच्च चरित्र बल से सम्पन्न किया। विन्ध्यवासी दस्युओं को धर्म व देश के नाम पर संगठित किया। सीमावर्ती जन पदों में अपने - शत- सहस्र विद्यार्थियों के द्वारा जनजाग्रति का शंख फूँका। लाखों जन युगान्तरकारी परिवर्तन के लिए आ जुटें। यवनों को निकाल बाहर किया। सेल्यूकस की पराजय मगध के क्लीव व्यवस्था के स्थान पर चन्द्रगुप्त के नायकत्व में अखंड बृहत्तर भारत की, स्थापना की पर इतना भर करके आचार्य ने अपने कार्य को विराम नहीं दिया।
उनका यथार्थ कार्य तो अब शुरू हुआ। दुष्प्रवृत्तियों के उन्मूलन के बाद सत्प्रवृत्तियों का सम्वर्धन बृहत्तर अखण्ड भारत का संस्थापक यह ब्राह्मण अभी भी कुटिया सेवी था सारे समय उनका एक ही कार्य था। मानवों में सुप्त सम्वेदना को जगाने उमगाने के लिए चिन्तन व श्रम। इसी के तहत उन्होंने कौटिल्य के नाम से अर्थशास्त्र व्यक्ति व समाज में नैतिक साहस जगाने के लिए चाणक्य नीति। इसको सुबोध बनाने के लिए विष्णु शर्मा के नाम से पंचतंत्र की रचना की।
उन्हीं के प्रयास थे कि मैगस्थनीज को विवश हो कहना पड़ा “ भारत धरती का स्वर्ग है और यहाँ के नागरिक जीवन्त देवता। हरेक के उन्नत चरित्र बल के कारण घरों में ताले तक जरूरी न थे। किसी महिला को भयभीत न होना पड़ता था। “ उसने एक अन्य स्थान पर आश्चर्य प्रकट करते हुए लिखा “ जहाँ सामान्य जन भव्य भवनों में निवास करता हों, वहाँ का प्रधान मंत्री सम्राट का गुरु एक टूटी झोपड़ी में निवास करता हैं।
यह था उनका त्याग। श्रेय और सम्मान से निस्पृहता। निष्कामता -कर्म योग और अनासक्ति की वह सम्पत्ति जिसके बल पर वह आज से बाईस सौ वर्ष पहले धरती पर स्वर्ग का अवतरण कर सकने में सक्षम हुए
इतिहास अपने को दोहराता है। आज की स्थिति कितनी ही टूटी -बिखरी बदतर क्यों न लगे पर चाणक्य के कार्य के प्रारम्भ के समय से कही अच्छी है। मनुष्य में देवत्व का उदय और धरती पर स्वर्ग के अवतरण जिसे चाणक्य ने चरितार्थ किया था, पुनः मूर्त होने को है।
इस महत्तर कार्य में अपनी भूमिका तलाशें क्रियापद्धति आज की परिस्थिति के अनुरूप बदली हुई लगने पर भी सारतः समान है। आज भी जन जाग्रति की आवश्यकता है। जागरण शंख को गली-गली दरवाजे -दरवाजे जाकर फूँकने में जुट पड़ने की आवश्यकता है। अब युग की भाव धारा से स्वयं अनुप्राणित करने में सहायक बनाना ही अभीष्ट है।
युवक तार्किक था। सन्त ने ईश्वर के पक्ष में अनेक प्रमाण दिये, किन्तु वह मानने के लिए तैयार न था। युवक ने कहा -स्वामी जी विज्ञान ने इतनी प्रगति कर ली है कि ईश्वर यदि हृदय की गुफा में भी होता, तो भी डॉक्टरों का हार्ट ऑपरेशन के समय मिल गया होता।
स्वामीजी को युवक की स्थूल दृष्टि समझते देर न लगी। उन्होंने युवक को इस तरह समझाया जिस तरह फूल की गंध आँख से नहीं। घ्राण से मालूम देती है, और संगीत का रस आँख से नहीं, कान से अनुभव होता है। दूध के अन्दर का मक्खन मथने से प्रकट होता है, उसी प्रकार कण-कण में व्याप्त ईश्वर करुणा और सेवा के दो नेत्रों से ही देखा जा सकता है।
मनुष्य की मूल प्रकृति आध्यात्मिक है। उसका मूल्याँकन खगोलकीय पिण्डों या पार्थिव वस्तुओं की तरह लम्बाई, चौड़ाई ऊँचाई आदि के त्रिआयामीय मापों द्वारा नहीं किया जा सकता। वह घनीभूत चेतना का पुँज है जिसकी एक से एक बढ़कर उच्चस्तरीय परतें हैं। गीता में वर्णित कीर्ति, श्रीवाब, स्मृति, मेधा, धृति एवं क्षमा जैसी दिव्य विभूतियों का वह स्वामी है। उसकी चेतना बहुआयामीय है जिसे दिक्काल की सीमा में भी नहीं बाँधा जा सकता।
भौतिक अनुभवों एवं उपलब्धियों से भी बढ़कर उच्चस्तरीय चेतनात्मक अनुभूतियों का भाण्डागार मानवी अन्तराल में भरा पड़ा है। साधना द्वारा अपनी चेतना का जो व्यक्ति जिस सीमा तक विकास कर लेता है, उसी अनुपात से वह आत्मिक प्रगति के उच्च सोपानों पर आगे बढ़ता और दिव्य क्षमताएँ अर्जित करता जाता है। योग एवं तप के द्विविध साधना उपक्रमों के आधार पर विकसित होती हुई चेतना अपनी अन्तिम स्थिति को पहुँच जाती है, जिसे ही पूर्णता की निर्वाण की प्राप्ति कहा जाता है। नर का नारायण में मनुष्य का देवत्व में परिवर्तन भी।
ब्रह्म विज्ञान में चेतना के सात आयामों की चर्चा की गई है। उन्हें सात लोक भी कहा जाता है। गायत्री मंत्र के साथ प्राणायाम करते समय सात व्याहृतियों का उच्चारण किया जाता है। भूः भुवः, स्वः, महः जनः, तपः, सत्यम्-यह सात व्याहृतियों सात लोकों की परिचायक हैं। इनकी चर्चा इस संदर्भ में होती है कि प्रगति पथ पर अग्रसर होते हुए हमें अगले आयामों में पदार्पण करना चाहिए। तीन लोक भौतिक हैं-भूः भुवः स्वः। इन्हें धरती पाताल और आकाश भी कहते। भौतिकी इसी सीमा में अपनी हलचलें जारी रखती है। अगले चार लोक सूक्ष्म हैं। चौथा भौतिकी और आत्मिकी का मध्यवर्ती क्षेत्र है। पाँचवाँ, छठा एवं सातवाँ लोक विशुद्ध चेतनात्मक हैं। इन्हें पदार्थ सत्ता से ऊपर माना गया है। इसे और भी अच्छी तरह समझना हो तो भूः भुवः स्वः को सामान्य जगत, तपः को चमत्कारिक सूक्ष्म जगत एवं जनः, महः सत्यम् को देवलोक कह सकते हैं। मनुष्य सामान्य जगत में रहते हैं। सिद्ध पुरुषों का कार्य क्षेत्र सूक्ष्म जगत है। देवता उस देवलोक में रहते हैं, जिसकी संरचना जनः महः, सत्यम् तत्वों के आधार पर की गई है।
प्रायः समझा जाता है कि उक्त सातों लोक ग्रह-नक्षत्रों की तरह वस्तु विशेष हैं और उनका स्थान कहीं सुनिश्चित है। वस्तुतः ऐसा है नहीं। यह लोक अपने ही चेतन जगत की गहरी परतें हैं। इनमें क्रमशः प्रवेश करते चलने पर चक्रव्यूह को बेधन करते हुए परम लक्ष्य तक पहुँचना संभव हो सकता है। इस प्रगतिक्रम में सशक्तता बढ़ती चलती है और अंतिम चरण पर पहुँचा हुआ मनुष्य ही सर्व समर्थ बन जाता है। इसी को आत्मा की परमात्मा में परिणति कह सकते हैं।
महायोग विज्ञान के अनुसार सात लोक आकाश में ढूँढ़ना व्यर्थ है। वे किसी ग्रह नक्षत्र के रूप में नहीं, वरन् आत्मसत्ता में सप्त चक्रों के रूप में विद्यमान हैं। भूः लोक मूलाधार में, भुवः लोक स्वाधिष्ठान में, स्वः लोक मणिपूरक में, महः लोक हृदय में, जनः लोक कंठ में, तपः लोक ललाट में तथा सत्य लोक ब्रह्मरंध्र में विद्यमान हैं। इनकी जाग्रति ही चेतन सत्ता के सप्त आयामों के सप्त विभूतियों के रूप में, भौतिक और आत्मिक सफलताओं के रूप में देवी अनुग्रह बनकर उभरती हैं।
अध्यात्मशास्त्रों में वर्णित सात लोकों, सप्त ऋषियों सप्त प्राणों की व्याख्या-विवेचना पाश्चात्य अध्यात्मवेत्ताओं ने अपने ढंग से की है। उनकी स्थापना में ब्रह्माण्ड और पिण्ड को तत्सम माना गया है और चेतना के आयामों को सात लोकों की संज्ञा दी गई। प्रथम भौतिक शरीर को वे ‘फिजीकल बॉडी’ कहते हैं जो पंच भौतिक तत्वों से बना है इसे इन्द्रियगम्य भी कहते हैं जिसमें मात्र शरीरगत अनुभूतियाँ ही विकसित हो पाती है। इससे आगे उच्चस्तरीय परत “ईथरीक बॉडी’ है जो अदृश्य एवं सूक्ष्म चेतन स्वरूप है। इच्छा, आकाँक्षा, भाव संवेदना, इस शरीर के जागरण की विशेषताएँ हैं। ‘एस्ट्रल बॉडी सूक्ष्मतम, दिव्यस्वरूप सुव्यवस्थित विचारणाओं का तर्क शक्ति का केन्द्र है। सामान्यजनों से लेकर सभ्य सुसंस्कृत नागरिकों तक को इसी स्थिति में विकसित हुआ देखा जा सकता है।
किन्तु इससे ऊँची परतें दिव्य क्षमताओं से सम्पन्न अन्तराल की गहराई में छिपी रहती हैं। ‘मेण्टल बॉडी को प्रतिभा का केन्द्र माना जाता है। मनस तत्व की प्रबलता वाले इस क्षेत्र का विकास कला-सौंदर्य विज्ञान एवं उच्चस्तरीय कल्पनाओं के विकास की स्थिति है। मनीषी, विचारक, कवि, कलाकार, वैज्ञानिक इसी भावलोक में विचरण करते हैं। समस्त सांसारिक भौतिक उपलब्धि, श्रेय-सम्मान इसी मानव शरीर के विकास की परिणति हैं। इससे आगे की विकसित अवस्था स्प्रिचुअल बॉडी कहलाती है। इस पाँचवे आयाम में अतीन्द्रिय क्षमताएँ सन्निहित मानी जाती हैं। भविष्य कथन, दूरश्रवण दूरानुभूति, पूर्व बोध आदि चमत्कारी दिव्य अनुभूतियाँ इसी से सम्बन्धित हैं। छटा आयाम-’कास्मिक बॉडी अर्थात् देव शरीर है। इसके विकसित हो जाने पर मानवी अन्तःकरण देवत्व से ओत−प्रोत हो जाता है। सातवें स्तर ‘बॉडीलेस बॉडी’ तक पहुँचा हुआ साधक ब्रह्म से सम्बन्ध स्थापित कर उस जैसा ही बन जाता है। वेदान्त की अद्वैत स्थिति यही है। सृष्टि संतुलन बिठाने एवं लोक मंगल के लिए जीने वाली अवतारी आत्माएँ सातवें शरीर में पहुँची आत्माएँ होती है। वे निर्विकार, निर्लिप्त एवं निस्पृह बने रहकर अनेकानेकों को अपने साथ तारती देखी जाती है।
अनुसंधानकर्ता परामनोवेत्ताओं एवं गुह्य विज्ञानियों का कहना है कि चेतना के विभिन्न आयाम वस्तुतः अपनी ही आत्म सत्ता के सूक्ष्म केन्द्रों में सन्निहित हैं। उनके अनुसार निम्न स्तरीय कायिक चेतना का सम्बन्ध मूलाधार एवं स्वाधिष्ठान चक्र से है, तो मणिपूरक का अतीन्द्रिय चेतना से। अनाहत चक्र को साइकोकाइनेसिस का केन्द्र माना जाता है। विशुद्ध एवं आज्ञा चक्र दिक्काल से पूर विश्वचेतना से संयुक्त अति समर्थ परतें हैं तथा सहस्रार सुपर चेतना का आधार है।
अमेरिकी मनोवैज्ञानिक डॉ. हरवर्ट के अनुसार उक्त तथ्य यह रहस्य उद्घाटित करते हैं कि चेतना के कितने ही धरातल अथवा रहस्यमय अनुभूतियों के आयाम हैं। वर्तमान भौतिक जीवन से परे भी जीवन सातत्य विद्यमान है जो उच्च आयामों को अपने अंदर समाविष्ट रखता है। जैसे’जैसे चेतना का विस्तार एवं परिष्कार होता जाता है, वह ऊर्ध्वारोहण करती जाती है और दिव्य क्षमताओं के द्वार खुलते जाते हैं। उनके अनुसार सत्कर्मों के आधार पर ही अनुभूतियों का एवं भविष्य का निर्धारण होता है।
वस्तुतः अभी हम जिन अनुभवों के चेतना-के धरातल पर निवास कर रहे हैं, वह द्विआयामीय या त्रिआयामीय हैं। सत्य का अनुभव भी हम इन्हीं आधारों पर करते हैं। गुह्यविज्ञानी एडगर कैसी का कहना है कि जब हम तीसरे आयाम को ही भलीभाँति नहीं जानते जिसमें हम सभी निवास कर रहे हैं, तो फिर उच्च आयामों को कैसे जान सकते हैं? उनके अनुसार चौथा आयाम सद्भावना का सद्विचारणा का है परन्तु यह कहाँ से आरंभ होता, कहाँ पर समाप्त होता और किधर प्रक्षेपित या प्रयुक्त होता है कहा नहीं जा सकता। यह अन्तहीन है। चार दशक पूर्व मनीषी प्रवर आइन्स्टीन ने विश्व-ब्रह्माण्ड में संव्याप्त अनेक आयामों की संभावना व्यक्त की थी और कहा था कि जब मनुष्य चतुर्थ आयाम के तथ्यों को कार्य रूप में परिणत करने लगेगा तब उसका ज्ञानबोध अब की तुलना में अनेक गुना अधिक बढ़ जायेगा। साथ ही ऐसी शक्ति हस्तगत होगी जिसे चमत्कारिक कहा जा सके।
उच्चस्तरीय आयामों में पाँचवाँ, छठा एवं सातवाँ आयाम पदार्थ सत्ता से परे हैं। ये विशुद्ध रूप से चेतना से सम्बन्धित है, किन्तु यदि चतुर्थ आयाम की जानकारी एवं प्रभाव-परिणाम से ही हम अवगत हो सकें तो हमारे सम्पूर्ण बोध क्षेत्र में उथल-पुथल मच जायेगी। जिन व्यक्तियों को अभी हम अपना मान बैठे हैं, वे भी पराये दीखने लगेंगे अथवा पराये भी अपने हो जायेंगे। व्यक्ति एवं वस्तु के प्रति वर्तमान मोह का दुराग्रह टूट जाने और पदार्थ एवं जीव का वास्तविक स्वरूप विदित होने पर उसे भ्रम जंजाल से छुटकारा मिल सकेगा जिसमें सामान्यतया हम सभी आबद्ध रहते हैं। चेतना का उच्चस्तरीय विकास कर लेने पर हमें उस तत्वदर्शन की सत्यता का भी बोध होगा जिसमें ऋषियों ने आत्मवत् सर्वभूतेषु’ की -’सर्वखल्विदं ब्रह्म की कल्पना की है।
आवश्यकता नहीं कि मनुष्य जहाँ जन्मे वहीं मरे भी। सुविधाओं और आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए अनेकों को अपने क्षेत्र छोड़ने पड़ते हैं। धन उपार्जन या सुविधा-साधना पर ध्यान केन्द्रित करके हमें ऐसे क्षेत्रों में रहने के लिए आकर्षित नहीं होना चाहिए जहाँ की जलवायु उपयुक्त नहीं है। कारण कि जलवायु का प्रभाव स्वास्थ्य पर तो पड़ता ही है, स्वभाव से भी उसका गहरा संबंध रहता है। शीतलता गर्मी की अपेक्षा अधिक उपयोगी है। यदि अवसर मिले तो अपने निवास के लिए ऐसे क्षेत्र का चयन करना चाहिए जिसमें हरियाली, शान्ति एवं शीतलता हो। ठंडे क्षेत्र प्राकृतिक न हों तो छोटे देहातों में प्रयत्नपूर्वक वैसी स्थिति पैदा की जा सकती है।
वातावरण का मानव स्वास्थ्य एवं स्वभाव पर पड़ने वाले प्रभाव का मूर्धन्य विज्ञानियों ने गहन अध्ययन किया है और पाया है कि ठण्डे क्षेत्रों में प्रकृति के साहचर्य में रहने वाले व्यक्ति अपेक्षाकृत अधिक श्रमशील, सहनशील, बहादुर तथा आत्मनिर्भर होते हैं। उनकी सृजनात्मक क्षमता बढ़ी चढ़ी होती है। इसके विपरीत गर्म जलवायु में निवासरत व्यक्तियों का स्वास्थ्य दुर्बल एवं उत्साह शिथिल होता है। सुविधा-साधनों की अधिकता रहते हुए भी ऐसे क्षेत्रों के बच्चे निरुत्साही तथा स्वभाव से चिड़चिड़े देखे गये हैं। कनाडा के ठण्डी जलवायु में निवास करने वाले उत्कू एस्किमो के संबंध में उनका कहना है कि वातावरण के प्रभाव के कारण उनके बच्चे 6 वर्ष की उम्र से ही संवेदनशील बन जाते हैं। उनकी प्रसन्नता-प्रफुल्लता सहिष्णुता देखते ही बनती है। अभिभावक या माता-पिता शान्त स्वभाव के होते हैं, जिसका अनुकूल प्रभाव बच्चों पर भी पड़े बिना नहीं रहता।
केन्या की गूजी जातियाँ अधिकतर अपना समय घर के बाहर गरमी वाले क्षेत्रों में व्यतीत करती हैं। उनमें भावनात्मक एकात्मकता एवं रचनात्मक प्रवृत्ति का प्रायः अभाव पाया जाता है। अनुसंधानकर्ता विशेषज्ञों का कहना है कि गरमी के कारण वे सदैव तनाव एवं आवेश से ग्रस्त रहते हैं और लड़ते-झगड़ते रहते हैं। पुलिस-आँकड़े भी बताते हैं कि ठण्डे क्षेत्रों की अपेक्षा गरमी वाले क्षेत्रों में अपराध अधिक होते हैं। मनोविज्ञानी भी जलवायु को मनुष्य की शारीरिक-मानसिक शक्ति को उत्तेजित करने में सहायक मानते हैं। उनके अनुसार जिन योरोपीय देशों ने अपने देश के शीतलता वाले क्षेत्रों में व्यवसायिक एवं औद्योगिक इकाइयाँ खड़ी की और आर्थिक दृष्टि से सम्पन्न बने, वहाँ भी वातावरण में काफी गरमी बढ़ जाने के फलस्वरूप जन मानस में अपराधी वृत्ति बढ़ी है।
स्वास्थ्य विज्ञानियों के अनुसार वर्षा के दिनों में जब कभी आकाश में इन्द्र धनुष दिखाई देता है तो सूर्य की किरणें भिन्न-भिन्न रंगों को पार करती हुई दृष्टिगोचर होती हैं। मानव मस्तिष्क पर उनका गहरा प्रभाव पड़ता है। शरीर में हार्मोन रसायनों की वृद्धि होती है और उत्साह उमगता है।
अभी तक हमने केवल जलवायु के प्रभाव का अध्ययन जीव विज्ञान के आधार पर किया है और माना है कि गरमी वाले क्षेत्रों में कँपकँपी सहते हुए असाधारण वातावरण को सह सकते हैं। इन्हीं उत्तर चढ़ावों की प्रतिक्रिया को झेलने के लिए असीम सुविधा साधन भी जुटा लिये गये हैं, फिर भी उक्त वातावरण के अनुसार हमारा स्वभाव एवं व्यवहार वैसा बन ही जाता है। कभी-कभी तो वातावरण परिवर्तन का दुर्बलों पर विशेष एवं बलिष्ठों पर कम प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। कई बार यह प्रतिकूलता शारीरिक और मानसिक दृष्टि से बहुत कष्टकारक होती है। अमेरिकी वैज्ञानिक विशेषज्ञों ने इसका उपाय बताते हुए कहा है कि हर मौसम में प्रातः काल ठण्डे पानी से स्नान करने की आदत यदि डाली जा सके तो इससे इतनी सहनशक्ति पैदा हो जाती है कि जलवायु परिवर्तन के विपरीत प्रभाव से आसानी से बचा जा सकता है।
यदि किसी का आजीविका उपार्जन हेतु कार्य क्षेत्र घने शहरों, आग उगलते कारखानों शोरगुल, घिचपिच या सड़न भरा है, तब तो उसे बदलना ही चाहिए। काम करने के लिए कुछ घंटे ऐसे गरम क्षेत्र में रहना पड़े तो भी प्रयत्न करना चाहिए कि रात्रि बिताने के लिए, बच्चों को खेलने के लिए हरा−भरा, पानी की बहुलता वाला ग्रामीण क्षेत्र ही चुना जाय। भले ही उसमें आने-जाने की कठिनाई ही क्यों न उठानी पड़े। जिनका कारोबार शीतल क्षेत्र में है, उन्हें तो भाग्यवान ही कहना चाहिए।
“मैं भी एक सम्पन्न घराने का था, पर जुए और शराब की लत ने मुझे सड़क पर लाकर खड़ा कर दिया” एक व्यक्ति अपनी करुण कथा दीनबन्धु एंड्रयूज से कह रहा था -”माता-पिता के प्यार और भाई-बहन के स्नेह से वंचित होना पड़ा। तभी से दर-दर की खाक छान रहा हूँ और अब स्थिति ऐसी है कि खाने के भी लाले पड़ रहे हैं। इसी मजबूरी ने चोरी करना भी सिखा दिया और कई वर्षों की जेल की सजा भी ड़ड़ड़ड़ भुला चुका हूँ। मेहनत-मजदूरी करते बन नहीं पड़ता। स्वास्थ्य भी साथ नहीं देता और फिर ऊपर से कोढ़ में खाज की तरह टी.बी. की शिकायत! जीवन से ऊब चुका हूँ। आत्महत्या करने को जी चाहता है।”
दीनबन्धु बड़ी धैर्य से उसकी कथा सुन रहे थे। सब कुछ सुनने के उपरान्त उनने प्रश्न किया-”क्या तुम्हें पता नहीं बुरी आदतों का परिणाम भी बुरा होता है?” युवक ने सकारात्मक जवाब में सिर हिला दिया।
दीनबन्धु बड़ी धैर्य से उसकी कथा सुन रहे थे। सब कुछ सुनने के उपरान्त उनने प्रश्न किया-”तुम्हें पता नहीं बुरी आदतों का परिणाम भी बुरा होता है?” युवक ने सकारात्मक जवाब में सिर हिला दिया।
“फिर तुमने यह गलती क्यों की?” दीनबन्धु का सवाल था।
कुछ तो मित्रों के बहकावे में आकर और कुछ बड़प्पन का अहंकार जताने हेतु।”
दीनबन्धु उसे समझाने की दृष्टि से कहने लगे-”व्यक्ति यहीं भ्रमित हो जाता है। यह समझता है कि वह पड़ोसियों पर, समाज पर ऐसे कृत्यों द्वारा अपनी छाप डाल लेगा। लोग उसे बड़ा प्रगतिशील, सभ्य, और आधुनिक मानने लगेंगे, पर होता ठीक इसके विपरीत है। उन्हीं के बिरादरी वाले ऐसे लोगों को बड़ा और आधुनिक मान सकते हैं, पर यदि कोई सचमुच ही विचारशील व्यक्ति हो, तो इस आधुनिक सभ्यता, और चिन्तन-चेतना की प्रवृत्ति द्वारा स्वयं को बड़ा बनाने और कहलाने को कभी उचित नहीं ठहरायेगा। व्यक्ति बड़ा और महान बाह्याडम्बर से पहनावे-ओढ़ावे से नहीं, वरन् कर्त्तृत्व से बनता है, चिन्तन-चरित्र से बनता है और यदि यह सब ओछे और बचकाने हों, तो भले ही आडम्बर का ढकोसला वह ओढ़े रहे, पर वास्तविकता जग-जाहिर हो ही जाती है और लोग उसके तथाकथित ‘बड़प्पन’ पर उँगली उठाने लगते हैं। याद रखो महानता सदा सादगी में होती है, बड़प्पन में नहीं।”
युवक का समाधान हो चुका था। वह बड़ी आर्तदृष्टि से दीनबन्धु की ओर देख रहा था, जैसे उसे अपना अपराध-बोध हो गया हो और वह उसे ड़ड़ड़ड़ स्वीकार रहा हो। दीनबन्धु ने उसे कई महीनों तक अपने साथ रखा एवं उसका उपचार कराया। अनेक महीनों के पश्चात् जब उसका स्वास्थ्य और रोग लगभग सही हो गया, तो उनने युवक से कहा-”अब तुम जा सकते हो, पर फिर से इन गंदी लतों को पास फटकने मत देना और कहीं मेहनत-मजदूरी कर ईमानदारी की जिन्दगी जीना।”
युवक उनकी नसीहत की स्वीकारोक्ति में नतमस्तक हो प्रणाम कर चल पड़ा। अनेक वर्षों बाद एक सुबह दीनबन्धु की झोंपड़ी के सामने आकर एक कार रुकी। उससे सीधे-साधे लिबास में एक प्रौढ़ सा दीखने वाला व्यक्ति उतरा। दरवाजा खटखटाया। कुछ क्षण पश्चात् दीनबन्धु बाहर आये। व्यक्ति ने भाव विभोर होकर कहा-”पहचाना।” दीनबन्धु असमंजस में पड़ गये तभी अपना परिचय न देते हुए उसने कहा “ मैं वही हूँ, जिसने आपसे अमुक महीनों तक सेवा करवायी थी।”
परिचय पाकर दीनबन्धु ने मुस्कराते हुए कहा-”अरे! तुम। अन्दर आओ।” युवक ने संक्षेप में अपनी प्रगति-कथा सुनायी कि किस तरह अखबार बेचते हुए आज वह एक फैक्ट्री का मालिक बन गया है। वह अपने साथ ढेर सारे उपहार और एक प्रस्ताव लेकर आया था कि वह इस झोंपड़ी से एक अच्छे मकान में चले चलें, जिसे उसने हाल ही में खरीदा था। प्रस्ताव अस्वीकारते हुए उन्होंने कहा-इस पैसे को गरीबों की सवा में लगा देना। रही उपहार की बात तो उनने एक गुलदस्ता भर रख कर शेष को अभावग्रस्तों में बाँट देने को कहा। चलते-चलते दीनबन्धु ने एक बात और कही कि “जीवन भर दूसरों की सेवा करना, पिछड़ों को उठाना। यही मेरे प्रति तुम्हारा सच्चा कृतज्ञता-ज्ञापन होगा”। निहाल वह व्यक्ति एक और मंत्र सीखकर पुनः सेवा क्षेत्र की ओर चल पड़ा।
विक्षिप्त और मूर्च्छित कुछ काम कर सकने में समर्थ नहीं होते। निद्राग्रस्त भी नशे पीने वालों की तरह सुध-बुध गँवा कर बेसुध पड़े रहते हैं। आपरेशनों के समय रोगी को दवा सुँघाकर बेहोश कर दिया जाता है। यह सभी अवस्थाएँ ऐसी हैं जिनमें समर्थ सुयोग्य होते हुए भी व्यक्ति कुछ कर नहीं पाता, फिर और कमाये बिना गुजारा कैसे चले? इसके लिए परावलम्बन ही एक मात्र गति रह जाती है। स्वजन संबंधी ऐसी स्थिति में जो सहारा देते रहते हैं, उतने से ही किसी प्रकार काम चलता है। अपंगों, अपाहिजों की भी यही स्थिति है उन्हें जहाँ से भी भिक्षा स्तर का सहयोग मिल जाता है, उसी के सहारे जीवित रहते और दिन गुजारते हैं। उन्मादी पागल की तो गतिविधियों पर भी दृष्टि रखनी पड़ती है, अन्यथा वे अपने लिए, दूसरों के लिए कोई संकट भी खड़ा कर सकते हैं।
उपरोक्त सभी दुर्दशाओं, दुर्भाग्यों का समुच्चय एक और भी है, जिसमें दीखने वाला शरीर तो भला चंगा प्रतीत होता है, पर कठिनाइयाँ वही सब सहनी पड़ती हैं जो ऊपर वाले दुर्भाग्यग्रस्तों पर सवार होकर उन्हें त्रास देती रहती हैं। इस व्यथा का नाम है-आलस्य। अन्य विपत्तियों में तो कितनी ही प्रारब्धवश आती और परिस्थितिवश व्यक्ति को अपने चँगुल में फँसाती हैं। वे चढ़ दौड़ती हैं, कोई निमंत्रण नहीं देता। नशेबाजी जैसी कुछ आदतें ही ऐसी हैं फिर छूटने का नाम नहीं लेती, किन्तु आलस्य ही एक ऐसा है जो पूर्णतया मनुष्य की इच्छा पर निर्भर रहता है। उसी के बुलाने पर आता है और जब उससे पीछा छुड़ाने की बात सोची जाती है तो अपनी इज्जत बचाते हुए चला भी जाता है।
आलस्य देखने-सुनने में एक असाधारण सी कुटेव है। एक भ्रान्ति के अनुसार उसे सौभाग्य का चिह्न भी माना जाता है। जिन्हें हाथ-पैर हिलाने न पड़ें, किन्तु जरूरतें यथा समय पूरी होती रहें तो उनके संबंध में कहा जाता है कि यह पूर्वजन्म के किसी संचित पुण्य का प्रारब्ध लाभ ले रहे हैं। इतना भी उनके संबंध में कुछ ठीक बैठता है जो बढ़ी-चढ़ी सम्पदा के स्वामी हैं, जिनका खर्च आसानी से चल जाता है, सहायता के लिए नौकर-चाकर उपस्थित रहते हैं। शेष आलसी अपनी और दूसरों की दृष्टि में गई-गुजरी स्थिति में ही दिन काटते हैं।
इज्जत सद्गुणी की होती है। सद्गुण दो प्रभाव दिखाते हैं- एक सम्मान दिलाते हैं और दूसरे धनोपार्जन में सहायता करते हैं। परमार्थ परायण ऋषिकल्प व्यक्ति अपना अभ्युदय उत्कर्ष करते हैं और साथ ही अनेकानेकों को ऊँचा उठाने, आगे बढ़ाने का दायित्व भी संभालते हैं। यह सब बन पड़ना कठोर परिश्रम के द्वारा ही संभव होता है। व्यस्तता के फलस्वरूप ही समृद्धियाँ, सफलताएँ और विभूतियाँ हस्तगत होती है। आलसी तो निद्राग्रस्त, मूर्च्छितों की तरह पड़े रहते हैं। नित्यकर्म भी वे तब करते हैं जब प्रकृति गत दबाव उन्हें विवश करते हैं। यदि ऐसा न होता तो वे कदाचित शौच, स्नान, भोजन आदि से भी कतराते और किसी प्रकार पड़े-पड़े समय काटने में संतोष करते।
तत्पर श्रमशीलता प्राणियों का स्वाभाविक गुण हैं। चिड़ियाँ सबेरे से शाम तक उड़ती, फुदकती रहती हैं। पशु चरने के बहाने निरन्तर यहाँ-वहाँ चलते रहते हैं। बन्दरों से लेकर मच्छरों तक सभी को विशेष उद्देश्य न होने पर भी इधर से उधर दौड़ लगाते देखा जाता है। अंग संचालन शरीर को सक्रिय एवं समर्थ रखने वाली एक परमावश्यक प्रक्रिया है। इसकी अपेक्षा करने पर अंग-अवयव जकड़ने, सिकुड़ने लगते हैं। निरर्थक पड़ी रहने पर क्रियाशक्ति चली जाती है, साथ ही उस समर्थता का भी समापन हो जाता है, जिसे कभी प्रयत्नपूर्वक अर्जित किया गया होगा। अध्ययन क्रम छूट जाने पर अर्जित ज्ञान विस्मृत हो जाता है। संगीतकार-कलाकार भी उस स्थिति में पहुँच जाते हैं। मानों उनने कभी कुछ सीखा-समझा ही न था। निष्क्रिय रहने पर पाचनतंत्र, श्वसनतंत्र, रक्ताभिसरण, स्नायुतंत्र आदि सभी में निष्क्रियता आ जाती है। कालांतर में स्वभाव ऐसा बन जाता है कि जी करने पर भी कुछ करते-धरते नहीं बन पड़ता।
आदतें देर में पड़ती हैं, पर जब वे अभ्यास में उतर कर आदतें बन जाती हैं तो छुड़ाये नहीं छूटतीं। नशेबाजी का व्यसन ऐसा ही है जो पनपता तो धीरे-धीरे है, पर जब परिपक्व हो जाता है तो छुड़ाये नहीं छूटता। शरीर की क्षीणता, आर्थिक दरिद्रता, समाज में बदनामी, परिवार की दुर्गति आँखों से देखते रहने पर भी इतना मनोबल शेष नहीं रहता जिसके आधार पर बंधनों से छुटकारा मिल सके। सामने उपस्थित शत्रु से तो अपने, दूसरों के साधन जुटाकर निपटा जा सकता है, किन्तु कैन्सर के विषाणुओं की तरह जो दुर्गुण अभ्यास एवं स्वभाव की गहराई में उतर जाते हैं, वे बिना विशिष्ट प्रयास के सहज विदा नहीं होते।
आलस्य के लिए किसी वैद्य, डॉक्टर से चिकित्सा नहीं करानी पड़ती, किन्तु फिर भी वह ऐसा रोग है जिसकी तुलना क्षय रोग के साथ की जा सकें। क्षयग्रस्त व्यक्ति भी क्रमशः अपनी जीवनी शक्ति खोता और खोखला बनता जाता है। यही हाल आलसी का भी होता है। वह कुछ करना चाहता है, पर यह भूल जाता है कि करने के लिए श्रम और मनोयोग की आवश्यकता होती है। समय का अनुशासन पालना पड़ता है। यदि व सब न बन पड़े तो फिर शक्ति घटती जाती है। वह निरर्थक पड़ी रहने पर स्थिर नहीं रहती। जो उपार्जन नहीं करते उनकी पूँजी समाप्त होती चली जाती है। घटना या बढ़ना एक क्रम है। जो बढ़ेगा नहीं, सो घटेगा।
शरीर का स्थान मन से भी है। पुरुषार्थरत का मात्र शरीर ही काम नहीं करता साथ में मस्तिष्कीय क्षमताओं का भी नियोजन होता रहता है। बुद्धिमत्ता की अभिवृद्धि का यही तरीका है कि उसे बड़े उत्तरदायित्व सौंपे और पूरा करने के अवसर दिये जायें। माँ के पेट से कोई बुद्धिमान नहीं जन्मता। मानसिक शक्तियों का निरन्तर प्रयोग करते हरने पर ही दार्शनिक, वैज्ञानिक, विद्वान, व्यवसायी, विशेषज्ञ कलाकार अपने-अपने क्षेत्रों में अधिकाधिक कुशलता प्राप्त करते प्रवीण, पारंगत होते देखे गये हैं, पर आलसी तो इस प्रकार के सुयोग से अपने आपको वंचित ही करते चले जाते हैं। जब शरीर ही काम नहीं करेगा तो मन को भी व्यावहारिक चिन्तन करते न बन पड़ेगा। शेख चिल्ली जैसी रंगीन कल्पनाओं वाली बिना पंख की काल्पनिक उड़ाने भर भले ही उड़ता रहें।
आलस्य का अर्थ काम को पूरी तरह छोड़ बैठना, पलंगों पर पड़े रहना ही नहीं है वरन् यह भी है कि कार्य को धीमी गति से, रुक-रुक कर उपेक्षापूर्वक, अन्यमनस्क होकर किया जाय। ऐसे कामों की परिणति बड़ी फूहड़ और कुरूप होती है। उसे बेगार की तरह भुगतने पर काम के बदले उपहास, तिरस्कार ही मिलता है।
आलस्य और प्रमाद का जोड़ा है। जहाँ एक रहेगा, वहाँ दूसरा पहुँचे बिना रहेगा नहीं। आलसी से प्रमाद उग आते हैं और प्रमादी को आलसी बनने की आदत पड़ जाती है। शरीर सक्रिय रहता है तो नियत कामों में पन भी लगता है। मन में उत्कंठा उभरे तो उस के लिए शरीर को काम करना पड़ेगा। यह डायनेमो और बैटरी जैसा संयोग है। दोनों की मध्यवर्ती सक्षमता तभी गतिशील रहती है, जब अपने को व्यस्त रखा जाय-शारीरिक दृष्टि से भी और मानसिक दृष्टि से भी। यही प्रगति का समृद्धि का मूल मंत्र है।
इन दिनों श्रम क्षेत्र में भी असन्तुलन का दौर चल पड़ा है। बुद्धिजीवी शारीरिक श्रम से बचते हैं और श्रमिकों को बुद्धिबल बढ़ाने की उत्सुकता नहीं उठती। यह एकाकीपन अस्वस्थता और मूढ़ता को जन्म देता है। शरीर श्रम से बचने वाले बुद्धिजीवी प्रायः अनेक रोगों से घिरे रहते हैं। इसी प्रकार जिन्हें पसीना बहाने वाले परिश्रम भर से संतोष करना पड़ता है उनकी बुद्धिमत्ता अविकसित स्थिति में ही पड़ी रहती है। होना यह चाहिए कि हर वर्ग को शारीरिक और मानसिक श्रम करने का समान अवसर मिले। कोई भी आलस्य और प्रमाद से ग्रसित न होने पाए। इसी में सबका सब प्रकार कल्याण है।
उसके कदम ठिठक गए। चेहरे पर कुछ झल्लाहट के चिह्न भी उभरे। सोचने लगा किससे मिलना था, यहाँ भेज दिया, वह भला यहाँ क्यों होंगे। उन्हीं से मिलने के लिए तो वह इतनी दूर से आया है, नहीं तो कहाँ अमेरिका और कहाँ यह भारत। बम्बई की भूमि का स्पर्श करके सीधा चला आ रहा था। चेहरे पर थकावट के चिह्न, कपड़ों पर गर्द स्पष्ट दिख रही थी। प्रश्न थकावट का नहीं उनके दर्शन का था। पर आगे कुछ सोच पाता इसके पूर्व पानी बाल्टी ले जा रहे एक सज्जन ने टोका आपको बापू जी से मिलना है?
“बापू जी नहीं, महात्मा गाँधी से उसका संक्षिप्त सा जवाब था। “वह रहे।” उसने तरकारी काट रहे व्यक्तियों में से एक की ओर इशारा किया क्या। सब्जी काटने में तन्मयता से जुटा तनिक सांवले रंग का यह व्यक्ति-सामान्य वस्त्रों में कुछ पास तो नहीं दिखता। वह गौर से उनकी ओर देखने लगा, लम्बे कान, सिर र हल्के से बाल मुस्कान की आभा को सर्वदा धारण करने वाला मुख और आँखें....। इस ओर दृष्टि जाते ही उसे लगा व्यक्ति सचमुच गहरा होगा। उनकी दृष्टि जैसे तीर के अग्रभाग की तरह अति दूर अदृश्य की ओर लक्ष्य किए है साथ ही कद भर में लौटकर पास की चीज पर भी बिजली की तरह चोट कर सकती है। वह अवाक् सा खड़ा उनकी ओर देख रहा था सोचा पर यहाँ सब्जी क्यों काट रहा है? इतने में वह स्वयं सब्जी काटना छोड़ ठीक उसी के सामने आ कर बोले “आप तो अचानक रुक गए आइए न। कहने के साथ ही उन्होंने उसे सिर से पाँव तक देखा। दो क्षण बाद कहने लगे शायद आप थके अधिक हैं। स्नान आदि से निबट लीजिए भोजन पर बातें होगी।” आने वाला एक व्यक्ति के साथ दूसरी ओ चला गया। ठीक दो घण्टे बाद दोनों साथ बैठकर भोजन करने लगे।
“भोजन ठीक लग रहा है”। गाँधी जी ने स्नेह पूर्ण शब्दों में पूछा। “क्यों न लगेगा। आखिर तरकारियाँ आपने जो काटी हैं। हाँ इसमें सामूहिक श्रम का स्वाद है।
“पर आप इन सब साधारण कामों में जुटते हैं, यह आज पता चला। वह अपने अन्दर के आश्चर्य को व्यक्त करने से रोक न सका।”
“साधारण क्यों, हर एक की अपने स्थान पर उतनी ही आवश्यकता और उपयोगिता है”। कहते हुए उन्होंने रोटी के कौर को थाली में रखी नीम की चटनी में डुबोया।
“किन्तु आप जैसे बड़े आदमी” “दुर्भाग्य है मानव समाज का जहाँ आलसी, विलास, कामचोर, मुफ्तखोर बड़े माने जाते हैं। इस मामले में मनुष्य से समझदार तो मधु मक्खियाँ है जो आलसियों मुफ्तखोरों को निकाल बाहर करती हैं। वाणी से हृदय की व्यथा छलक पड़ी। वह तो उनके चेहरे की ओर ताकता रह गया।
इधर वह कह रहे थे मेरा अटल सिद्धान्त है जो श्रम की अवहेलना करके भोजन करता है निश्चित रूप से चोर हैं। भले कोई भी क्यों न हो। मि. गाँधी श्रम मानसिक भी तो होता है उसके लिए क्या आवश्यक है कि सब्जी काटी जाए। कहकर उसने पानी का गिलास उठाया।
यह तो है पर अपाहिज हो जाना कोई अच्छी बात तो नहीं। अपाहिज! स्वर में आश्चर्य था। और नहीं तो क्या? जिस तरह शरीर के अनेकों अंग हैं उनमें से किसी के काम न करने पर अपाहिज माना जाता है। उसी प्रकार मानवीय व्यक्तित्व के अंग हैं शरीर मन, आत्मा। इनमें से किसी को निष्क्रियता बर्दाश्त नहीं। किसी के निठल्ले पड़े रहने का मतलब है अपाहिज हो जाना। जब शरीर को ही पड़ता घेर लेगी, तब मन, और आत्मा तो तम के गहरे कुएँ में चले जाएँगे। बात समझ में आने वाली थी “और जहाँ तक बड़े होने की बात है, उसका एक ही मानदण्ड है जो जितना अधिक श्रम करे वह उतना ही बड़ा। भावी मनुष्यता इसी पैमाने के आधार पर सम्मानित करेगी।” उसे भोजन की तृप्ति के साथ एक और भी तृप्ति मिल रही थी। समाधान पाने की। श्रम की गरिमा समझने वाले यह मुलाकाती अमेरिकन सज्जन थे रिचर्ड बी. ग्रेग और समझाने वाले थे अपने राष्ट्रपिता। अच्छा हो हम भी उनके इस स्वानुभूति को अपना सकें कि श्रमशीलता ही यथार्थ बड़प्पन और सम्मान का आधार है।
है माँग यह सबसे बड़ी, मिलकर चलो-मिलकर चलो॥ बाती किसी की, स्नेह सबका, किन्तु तुम मिलकर जलों॥
हैं अति कठिन, भीषण बहुत, इस जिन्दगी के रास्ते। संघर्ष करना है जरूरी, सफलता के वास्ते॥
कटता कठिन रस्ता, कि जब हमराह कोई साथ हो। उठता वजन भारी, कि जब, सहयोग का भी हाथ हो॥
सुख दुख सहो, मिलकर परस्पर-पीर सबकी बाँट लो। है माँ यह सबसे बड़ी, मिलकर चलो, मिलकर चलो॥
नदियाँ निरंतर दे रहीं, जलदान खारे सिन्धु को। श्रम कर उदधि बादल बनाता जा रहा हर बिन्दु को॥
सहकार की इस नीति पर, संसार सारा चल रहा। रस-प्राप्ति होती इस तरह, यों सृष्टि का क्रम चल रहा है॥
सहयोग का व्रत लो-घृणा, विद्वेष, ईर्ष्या को दलो। है माँग यह सबसे बड़ी, मिलकर चलो-मिलकर चलो॥
संवेदना का रस, बहुत मीठा-बहुत ही लाभप्रद। “कोई हमारे साथ है” -अनुभूति यह अति ही सुखद॥
मिलकर करो, तो काम दुस्तर भी सरल, लगता सखे! मिलकर जियो तो बोझ जीवन का मृदुल लगता सखे!
सहकार की जय बोलकर सुख-शान्ति के रस में पलो। है माँग यह सब से बड़ी, मिलकर चलो मिलकर चलो॥
इस समय जो ज्योतिवाहक बन सकेगा। कल उसी का काल अभिनन्दन करेगा।
आत्म केन्द्रित हो गया हर कार्य अब तो, दृष्टि मानव की हुई अब संकुचित है,
किन्तु केवल स्वार्थपरता की परिधि में, घूते रहना नहीं बिल्कुल उचित है,
दीन दुखियों के हृदय की वेदना से, जो हृदय होगा द्रवित, क्रन्दन करेगा।
कल उसी का काल अभिनन्दन करेगा॥ उचित पथ पर चल पड़ें ले ज्योति कर में,
यह नयी पीढ़ी हमें नेतृत्व देगी, आज मानवता अँधेरे में भटकती,
कल दिशा पाकर हमें अमरत्व देगी, लोकहित के ताप में खुद को तपाकर,
जो कि निज जीवन यहाँ कुन्दन करेगा। कल उसी का काल अभिनन्दन करेगा॥
हम जहाँ हों सौम्य मुस्कानें बिखेरें, फूल सा खिलता हुआ निज आचरण हो,
कार्य पद्धति और चिन्तन से हमारे,, श्रेष्ठता से पूर्ण हर वातावरण हो,
हर तरफ उगती लताओं पादपों को? गंध देकर काष्ठ से चन्दन करेगा।
कल उसी का काल अभिनन्दन करेगा॥ सौगुना होगा फलित-पुष्पित वही तो,
बीज सा भूगर्भ में जो गल सकेगा, बाँटने को जो यहाँ आलोक सबको,
दीप सा तिल-तिल निरन्तर जल सकेगा, लोक मंगल के लिए जो हो समर्पित,
युग उसी मनु पुत्र का वन्दन करेगा। कल उसी का काल अभिनन्दन करेगा।
गायत्री महामंत्र की गरिमा सर्वविदित है। उसकी साधना से जिस चमत्कारी शक्ति-सम्पदा की उपलब्धि होती है, उसका उद्गम केन्द्र ‘सविता’ है गायत्री का अधिपति सविता देवता है। विशिष्ट साधना विधानों की सहायता से उसी की दिव्य शक्तियों को आकर्षित किया जाता है और साधन को भौतिक तथा आध्यात्मिक दृष्टि से सर्व समर्थ बनने का अवसर मिलता है। प्राचीन काल के दिव्यदर्शी ऋषि-मनीषी इस तथ्य से भलीभाँति परिचित थे। उनने भूतकाल से ही सूर्य का उपयोग सविता-साधना के रूप में मनुष्य का सर्वतोमुखी प्रगति के लिए-उत्कर्ष के लिए किया है। युगान्तरकारी महापरिवर्तन की प्रस्तुत संधिवेला में भी उसी की दिव्य शक्तियों का आवाहन किया गया है।
अगले ही दिनों सूर्य की प्रबल प्रेरक शक्तियाँ अपने प्रचण्ड प्रवाह से मानवी मस्तिष्कों की अवाँछनीय दिशा धारा को, ध्वंसात्मक प्रवृत्तियों को तोड़कर-मरोड़कर सृजनात्मकता की ओर उन्मुख कर दें और धरित्री पर सर्वत्र स्वर्गोपम परिस्थितियाँ तथा मानव में देवत्व के दर्शन होने लगें, तो इसमें किसी को कोई आश्चर्य नहीं मानना चाहिए।
सूर्य विज्ञान और सविता साधना एक ही तथ्य के स्थूल और सूक्ष्म रूप हैं। सूर्य विज्ञान से भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति का सुयोग मिलता है तो सविता साधना से आध्यात्मिक उपलब्धियाँ हस्तगत होती हैं वैदिक युग में सूर्योपासना सर्वोपरि थी। वेद एवं उपनिषदों में सूर्य को जगत की आत्मा के रूप में उल्लेख किया गया है और कहा गया है कि सारा जगत उसी से प्रकाशित होता और प्राणवान बनता है। वह जीवनी शक्ति और चेतना शक्ति का घनीभूत रूप है। सबको वर्चस् और ज्योति उसी से मिलती है। प्राणियों की उत्पत्ति, पोषण आदि का तथा संसार की सृष्टि, स्थिति और संहार का निमित्त कारण भी सूर्य है, वरन् वह आरोग्यकारक, अनिष्ट निवारक एवं पीड़ा पतन का बिगाड़ का परिहार करने वाला भी है। समस्त आशंकाओं, अनिष्टों, अनाचारों का निवारक भी वह है। प्राकृतिक नियमों, मानवी मर्यादाओं का उल्लंघन करने वाले दुरात्माओं का संहारक-विघातक भी उसे कहा गया है। ‘ज्योतिषा’ ‘रविरंशुमान’ कहकर गीताकार ने उसे अपनी विभूति के रूप में निरूपित किया है। सूर्य की सविता देवता की प्रचण्डता, समर्थता एवं श्रेष्ठता के प्रतिपादनों से वैदिक साहित्य भरा पड़ा है। सूर्योपस्थान, सूर्य आराधना, सूर्य नमस्कार, सविता साधना जैसे आध्यात्मिक उपाय-उपचार मानवी चेतना की विभिन्न आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए ही विनिर्मित किये गये हैं।
पाश्चात्य मनीषी भी सूर्य के सम्पूर्ण सृष्टि का कारण मानते हैं। प्रख्यात दार्शनिक प्लेटो के अनुसार सूर्य मात्र प्रकाश या ताप का पुँज नहीं, वरन् जीवन ज्योतियों का रश्मि समूह है जो सौर मंडल में एकत्र होती और नाना विधि शक्ति उत्पन्न करती हैं। इसे उन्होंने सेफिरों ‘डिवाइनइन्टैलिजैन्स’ के नाम से सम्बोधित किया है। स्काँट ने अपनी कृति “द साइकिल्स ऑफ हेवन” में इसे ही ‘ब्रह्मांडीय प्रभाव’ कहा है। उनके अनुसार सूर्य मंडल की शक्तियाँ न केवल भौतिक परिवर्तन प्रस्तुत करती हैं, वरन् हमारे मस्तिष्क एवं व्यवहार को भी प्रभावित परिवर्तित करती रहती हैं। इनके बिना तो पृथ्वी पर जीवन की कल्पना तक नहीं का जा सकती। सूर्य की किरणें यदि धरती तक न पहुँचें तो यहाँ जीवन एवं हरीतिमा नाम की कोई वस्तु दृष्टिगोचर न होगी।
वस्तुतः सौर मण्डल के समस्त ग्रह-गोलकों सहित अपने धरातल की सारी हलचलें सूर्य के अनुदान पर ही अवलम्बित हैं। पृथ्वी की अपनी विशिष्टताएँ एवं क्षमताएँ परोक्ष रूप से सूर्य की ही देन हैं। ब्रह्माण्डीय अनुदानों के रूप में उसे जो कुछ प्राप्त होता है, उसमें सूर्य का भाग ही प्रमुख होता है। भौतिक जगत पर सविता का अजस्र अनुदान ऊर्जा, ताप और प्रकाश के रूप में बरसता है, तो आत्मिक क्षेत्र पर उसका अभिवर्षण प्राण के रूप में, सत्प्रेरणाओं-सद्भावनाओं के रूप में होता है। साम्ब-उपनिषद् में उल्लेख है कि सूर्य का समग्र तेजो मण्डल दो शक्ति धाराओं में विभक्त है जिन्हें ‘संज्ञा’ एवं छाया के नाम से जाना जाता है। इनका कार्य समस्त लोकों में निवास करने वाले प्राणियों के भीतर ज्ञान एवं क्रिया का उद्दीपन करना है। पुराणों में इन्हें ही सूर्य की दो पत्नियों के रूप में वर्णन किया गया है और कहा गया है कि ‘संज्ञा’ ज्ञान चेतना के रूप में ‘छाया’ कर्म एवं क्रियाशीलता के रूप में प्राणि चेतना में कार्यरत रहती हैं। सविता साधना में इन्हीं शक्तियों का अवगाहन अवधारण किया और ओजस् तेजस् एवं वर्चस् की बहुमूल्य विभूतियों-सम्पदाओं से लाभान्वित हुआ जाता है।
जरथुस्त्र ने सूर्य को विराट् चेतना का प्रतीक माना और जीवन को उससे उद्भव अविनाशी अंश बताया है। उनके अनुसार धरती पर पाये जाने वाले या निवास करने वाले जड़-चेतन सभी का उत्पादनकर्ता सूर्य है। उसी की रश्मियों से उन्हें गति और शक्ति मिलती है। भौतिक प्रकाश के अतिरिक्त आंतरिक प्रकाश भी हमें उसी से मिलता है। सविता की प्रकाश रश्मियाँ ब्रह्माण्डीय चेतना के रूप में मानवी अन्तराल में प्रविष्ट होकर उसे आत्मोत्कर्ष की दिशा में आगे बढ़ने, ऊँचा उठने के लिए प्रेरित करती है। सूर्य के प्रकाश में सप्तवर्णी रश्मियों के अतिरिक्त अल्ट्रावायलेट इन्फ्रारेड, कॉस्मिक आदि शक्तिशाली अदृश्य किरणें भी सम्मिलित रहतीं और धरातल तक पहुँच कर अपने-अपने गुणों एवं विशिष्टताओं के आधार पर वनस्पति जगत एवं प्राणि जगत को प्रभावित करती हैं। ठीक इसी तरह उससे भी अधिक शक्तिशाली सूक्ष्म ऊर्जा तरंगें सूर्य से निस्सृत होकर अपनी कृपा की वर्षा मानव समुदाय पर करती रहती हैं। जरथुस्त्र ने इन्हें ‘दिव्य आध्यात्मिक किरणों के नाम से सम्बोधित करते हुए कहा है कि अभ्युदय की अभीप्सा रखने वालों के अंतःकरण में यह सीधे प्रवेश करतीं और प्राण चेतना में उच्चस्तरीय उभार उत्पन्न करती हैं। उनके अनुसार विशेष परिवर्तनों के समय जब कभी ‘दिव्य आध्यात्मिक रवि रश्मियाँ’ अपनी समग्रता के साथ पृथ्वी पर उतर आती हैं तो सर्वत्र उथल-पुथल मच जाती है। आन्दोलनों, परिवर्तनों एवं महाक्रांतियों के अम्बार लग जाते हैं। विश्व में हुई विभिन्न महाक्रान्तियाँ इसकी साक्षी हैं। प्रस्तुत समय इसी तरह की सौर सक्रियता से भरापूरा हैं। अब विज्ञानवेत्ताओं ने भी इसकी पुष्टि कर दी है। ग्रीक अध्यात्मवेत्ता जूलियन ने सूर्य संबंधी अपनी व्याख्या-विवेचना में उक्त तथ्य की पुष्टि करते हुए सूर्य के तीन रूपों का विस्तारपूर्वक वर्णन किया है। प्रथम पार्थिव ईथर के रूप में, दूसरा-लाइट ऑफ हेवन के रूप में तथा तीसरा विशुद्ध आध्यात्मिक माना है। उनका मत है कि जब कभी धरती पर विध्वंसकारी प्रवृत्तियों का बाहुल्य हो जाता है, सर्वत्र विक्षोभकारी परिस्थितियां ही विस्तार ले लेती हैं, तब सूर्य अपने तीसरे रूप में प्रकट होता है और अपने प्रचण्ड शक्ति प्रवाह से ध्वंस को सृजन में बदल देता है। इसकी पुष्टि पाइथागोरस एवं एनाक्सागोरस की रचनाओं में भी की गई है।
वस्तुतः मनुष्य की आध्यात्मिक उन्नति में सविता देवता की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। उनके अनुसार मानव जितना अधिक पार्थिव शक्तियों से प्रभावित होता है, उससे भी कहीं अनेक गुना अधिक उसे सौर शक्तियाँ उत्तेजित, आन्दोलित करती हैं। पार्थिव शक्तियाँ गुरुत्वाकर्षण के नियमानुसार नीचे की ओर खींचने का प्रयास करती दीखती हैं, जबकि सूर्य की शक्तियाँ ऊर्ध्वगामिता की ओर ले जाती हैं। सूर्य ही है जो समस्त ग्रह पिण्डों को अपनी आकर्षण शक्ति से बाँधे हुए है और उन्हें अपनी-अपनी कक्षा में परिभ्रमण के लिए बाधित किये हुए है। उस की शक्तियाँ ही पृथ्वी पर उतरती और मनुष्य समेत समस्त प्राणियों एवं वनस्पतियों में प्राण भरती हैं। संसार में जितने भी महापुरुष हुए हैं, जिनने भी क्रान्तियों का संचालन किया है, मनीषियों ने उन्हें सविता-शक्ति से संचालित बताया है। प्राचीनकाल के ऋषि-मनीषियों के आराध्य देवता सूर्य ही थे। वैदिक ऋचाएँ सूर्य मंत्रों से भरी पड़ी हैं। इस रहस्य को यदि समझा जा सके तो ब्रह्माण्डीय शक्तियों को आकर्षित करने और महानता की ओर अग्रसर होने का अवसर हर किसी के समक्ष प्रस्तुत है।
दिव्य द्रष्टा मनीषियों का कहना है कि इन दिनों अपने सौर मण्डल में कुछ ऐसा ही घटित हो रहा है। एक और जहाँ किन्हीं अज्ञात कारणों से सूर्य की गर्मी में वृद्धि के साथ सौर-कलंकों-सूर्य धब्बों की बाढ़ सी आई हुई है और विनाशकारी विभीषिकाओं को आमंत्रित करती दीख रही हैं, वहीं दूसरी ओर अभिनव सृजन शक्ति से परिपूर्ण उज्ज्वल भविष्य का सरंजाम जुटाये सूर्य की आध्यात्मिक शक्तियाँ भी प्रचण्ड प्रवाह के रूप में धरती पर घटाटोप बनकर बरस रही हैं। आवश्यकता मात्र उनकी और अभिमुख होने और आत्मसात करने की है। सविता साधना में स्वयं के उत्कर्ष के साथ समूचे संसार का कल्याण सन्निहित है।
फ्राँस की राजधानी पेरिस के एक सभागार में हजारों लोग जमा थे। सभी उत्सुकता और आश्चर्य से मंच पर टकटकी लगाए हुए थे। इसका कारण था आज प्रदर्शित किया जाता विलक्षण प्रयोग। बात स्वाभाविक है-किसे यह जानकर आश्चर्य न होगा कि जिन पौधों को अभी तक निर्जीव समझते रहे हैं, जड़ता की मान्यता से विभूषित कर रखा, वे भी चेतन और सजीव हैं।
इस असम्भव सी लगने वाली बात को अपने वैज्ञानिक प्रयोगों कसे सिद्ध किया जाना था। ज्यों-ज्यों समय बीतता जा रहा था-उत्सुकता बढ़ती जा रही थी। इतने में एक भारतीय वैज्ञानिक अपने सहायकों के साथ मंच पर आए। उन्होंने छोटा सा उद्बोधन दिया। मित्रो! पादप वर्ग भी हमारी तरह सचेतन और प्राणवान है। जो विष हमारे प्राण हरण कर निर्जीव बनाता है उसे यदि पौधों में इंजेक्शन के द्वारा प्रवेश करा दें तो वे भी प्राणहीन और निर्जीव हो जाएंगे। इस कथन के तुरन्त बाद उन्होंने तीव्र विष-पोटेशियम सायनाइड की पुड़िया माँगी। वहीं के सज्जन ने इसे ला कर दिया। इसे बीकर में घोला गया। घोल को इंजेक्शन में भर कर गमले में लगे एक पौधे को लगाया। पर यह क्या? एक मिनट दो मिनट पूरे दस मिनट हो गए पौधा ज्यों का त्यों रहा। फिर क्या प्रयोग झूठा है? पूर्व मान्यताएँ ही सही थीं उपस्थित लोगों के बीच से असन्तोष के स्वर उभरे।
भारतीय वैज्ञानिक भी चकित था। यकायक उसके चेहरे पर दृढ़ भाव झलके-दृढ़ स्वरों में उसने कहा कि यदि इस जहर से पौध नहीं मर सकता तो मैं भी नहीं मरूंगा। इस वाक्य के साथ बीकर के शेष घोल को उठाया और गटागट पीने लगा। जन समुदाय की नहीं नहीं की आवाजें उसे विरत नहीं कर सकीं। पर अरे! वह भी तो नहीं मरा। तो क्या पोटेशियम सायनाइड नकली था। जी हाँ उसने आश्चर्य को तोड़ते हुए कहा मुझे विष की जगह शक्कर दी गई थी, घोल भी इसी का था। शर्बत पीने से भला पौधा क्यों करने लगा। यही कारण है वह मेरी तरह खुश है। ईर्ष्यालु षड्यंत्रकारियों के चेहरे झुक गए। उनकी सोच थी इस तरह उसे भरी सभा में अपमानित किया जा सकेगा। पर जिसमें लक्ष्य के प्रति दृढ़ता व अपने प्रति विश्वास है उन्हें मार्ग से विरत करने की सामर्थ्य किसी में नहीं होती।
असली पोटेशियम सायनाइड लाया गया। इसके घोल को चुभोते हुए पौधा कुम्हलाया सूखा और मुरझा गया। उपस्थित लोगों के चेहरे खिल उठे। क्यों ने हो आखिर ज्ञान के एक नए अध्याय का शुभारम्भ जो हुआ था। ईर्ष्यालु खिसक गए। भारतीय वैज्ञानिक के चेहरे पर एक आत्मविश्वासी का तेज था।
यह भारतीय वैज्ञानिक और कोई नहीं श्री जगदीश चन्द्र बसु थे। सत्य को उद्घाटित करने की तीव्र अभीप्सा को हृदय में सँजोने वाले श्री बसु की नीति थी कि विज्ञान मनुष्य के लिए है न कि मनुष्य विज्ञान के लिए। यह तभी तक उपयुक्त है जब तक मानव हृदय में धड़कती संवेदनाओं के साथ तैयार हों
यह स्वयं भी अपने को सर्वप्रथम सरस संवेदनाओं से युक्त मनुष्य मानते थे। उनके लिए इसकी एक ही कसौटी थी, मनुष्य वही है, जो मनुष्यता को खुशहाल बनाए रखने के लिए तत्पर हो जाए। उन दिनों बंगाल अकाल-महामारी की चपेट में आ गया। उन्हें भी प्रयोगशाला की दीवारें कैद न रख सकीं। आर्थिक सहायता दी। लोगों को अनेकों तरह से मदद करने के लिए प्रोत्साहित किया। यही नहीं इस अवसर पर उन्होंने कहा यदि जरूरत पड़ी तो प्रयोगशाला बेच देंगे। अरे यह क्या? मित्र-सहयोगी भौंचक्के रह गए। इतनी कठिनाइयों से स्थापित की गई प्रयोगशाला जिसमें घर का सब कुछ खप गया। शीर्षस्थ स्तर तक पहुँचाया अमूल्य-बहुमूल्य मान-सम्मान पदक उपाधियाँ सभी कुछ दिलाई। उसे बेचने की बात कहना क्या कृतघ्नता नहीं है?
इस प्रश्न के जवाब में श्री बसु के नेत्रों में आँसू छलछला आए। बड़ी कठिनाई से भरे गले से जवाब दिया। नहीं मित्रों यह कृतघ्नता नहीं है। यद्यपि प्रयोगशाला मेरा जीव है प्राण है। पर मानवता के इतिहास में ऐसे क्षण आते हैं जबकि प्राणों का त्याग करना पड़ता है। ऐसे अवसर पर सहर्ष प्राण दान भी विजय का द्योतक होता है। मानवता बिलखती-तड़पती रहे-और मैं बैठा रहूँ प्रयोगशाला तो क्या कोई मुझे खरीदने को तैयार हो तो स्वयं भी बिक जाऊँ। डॉ. बसु के इन भावों ने अनूठी जाग्रति पैदा की। देने वालों की थैलियाँ खुल गई। सभी ने आश्वासन दिया नहीं प्रयोगशाला नहीं बिकेगी। श्रम, समय, धन देने वालों की ऐसी बाढ़ आयी। अकाल का मुख बन्द हो गया। पर बसु की भावनाएँ उतनी ही उदात्त रहीं। वह जो कुछ कमाते उसका पांचवां भाग अपने ऊपर खर्च करते। इसका कारण कंजूसी नहीं “सादा-जीवन उच्चविचार” की वह नीति थी जिसे उन्होंने घुट्टी के रूप में बचपन में सीखा था। शेष धन पर वह समाज का अधिकार मानते। नोबुल पुरस्कार की राशि भी उनने समाज को अर्पित कर दी थी।
देश में स्त्री शिक्षा की शुरुआत हुई। निवेदिता ने इस कार्य के लिए अपनी आहुति दी। श्रम तो था, पर धन नहीं। डॉ. बसु ने कहा-धन के कारण ऐसा पुनीत कार्य नहीं रोका जा सकता। उन्होंने एक लाख रुपया तुरन्त दिया। इसी प्रकार शराब बन्दी के लिए प्रयत्न किए गए। न जाने कितने लोग, व्यक्ति, परिवार मदिरा-राक्षसी की चपेट में आते और नष्ट होते। जनमानस में जाग्रति आए, इसके लिए एक लाख रुपये दिए। जिससे नाटक मंचन, साहित्य प्रचार आदि सार्थक साधनों के द्वारा जनमानस को झकझोरा जा सके।
देश आगे बढ़े समाज प्रगतिशील बने इसमें विज्ञान वैज्ञानिकता की भूमिका को अस्वीकृत नहीं किया जा सकता। यह भूमिका और अधिक प्रभावकारी बने इस हेतु उन्होंने “बसु विज्ञान मन्दिर” की स्थापना में अपना 14 लाख रुपया लगा दिया। यही उनकी समाज देवता को अर्पित की गई पूर्णाहुति थी।
अब वह वृद्ध हो चुके थे। सन् 1937 में 71 वर्ष की अवस्था में 23 नवम्बर के दिन कर्मठता
ज्ञातव्य
परम पूज्य गुरुदेव की पावन स्मृति में श्रद्धांजलि स्वरूप आगामी अगस्त-सितंबर माह का अखण्ड-ज्योति पत्रिका का संयुक्तांक प्रकाशित होगा जो परिजनों को अगस्त अंत तक मिलेगा। यह नियमित पत्रिका से काफी बड़े आकार का व रंगीन होगा। सभी नियमित पाठकों की यह विशेषाँक प्राप्त होगा। इसके बाद अगला अंक अक्टूबर माह में निकलेगा।
लगन और भावनाओं का मूर्तिमान स्वरूप इन्हीं गुणों का उपदेश देता हुआ चिरनिद्रा में लीन हो गया। महानतम वैज्ञानिक आइंस्टीन ने कहा “डॉ. बसु का एक-एक कार्य इतना महत्वपूर्ण है कि प्रत्येक के लिए विजय स्तम्भ स्थापित किया जाना चाहिए। “अच्छा हो यह स्थापना पाषाण शिलाओं की न होकर जाग्रत, जीवन्त, सतेज व्यक्तियों के रूप में हो। हम स्वयं उनकी कर्मठता भावनाशीलता को अपने में सँजो सकें। स्वयं में समाज देवता को सर्वस्व अर्पण करने का साहस जुटा सकें। हमारे दिल की धड़कनों में पीड़ितों की आवाज उभर सके तो निःसन्देह स्तम्भ के रूप में स्थापित हो सकेंगे।
आजकल विज्ञान की एक नई शाख का विकास हुआ है-”फ्यूचरालॉजी-भविष्य विज्ञान” जिसके आधार पर वर्तमान की परिस्थितियों का अध्ययन-विश्लेषण कर भविष्य का अनुमान लगाया जाता है। यह सही है कि वर्तमान के आधार पर भविष्य का थोड़ा-बहुत अनुमान लगाया जा सकता है। कोई व्यक्ति यदि आज बुरे कार्य में संलग्न है, तो उसे देख कर यह तर्क दिया जा सकता है कि उसका आने वाला समय खराब होगा, पर कई बार अनुमान गलत भी हो जाता है। समय से पूर्व यदि वह अपनी गलतियों को सुधार ले, तो उसका भविष्य ऐसा बनता है, जिस पर प्रसन्नता व्यक्त की जा सके।
कुछ ऐसे ही विचार आने वाले समय के बारे में प्रकट किये हैं न्यूयार्क (अमेरिका) के हडसन इन्स्टीट्यूट के भविष्य विज्ञानियों ने। इन्स्टीट्यूट के निदेशक हरमन कान्ह अपने सहयोगी एन्थोनीविनर के साथ कृषि एवं खाद्य संकट के समाधान के रूप में लिखते हैं कि सन् दो हजार के पहले वाली दशाब्दी में मनुष्य अपनी गलतियों को समझ जायेगा और सुधारने के लिए तेजी से प्रयास करेगा इसके अंतर्गत लोगों की रुचि औद्योगिक उत्पादन की अपेक्षा खेती करने एवं वृक्षारोपण करने की होगी। वृक्ष को खाद पानी एवं सुरक्षा देकर बड़ा करना लोग अपना व्यक्तिगत दायित्व मानेंगे। इसी को धार्मिक व्यक्ति पुण्य परमार्थ मानेंगे और ऋद्धि सिद्धियों से सम्पन्न होने की सही कसौटी मानी जाएगी कि कौन कितना विश्व वसुधा को संतुलित करने एवं विनाश से बचाने के लिए प्रयासरत रहा। अनेकों संश्लेषित खाद्य पदार्थों एवं पेय पदार्थों का विकास होगा जो मूलतः प्राकृतिक पदार्थ रहेंगे। आज के उद्योगों के विकल्प में मनुष्य ऐसी विद्या खोजने में समर्थ हो जायेगा, जिसका कोई भी विनाशकारी परिणाम उत्पन्न न हो।
वे ऊर्जा संकट के बारे में लिखते हैं कि जीवाश्म ईंधन स्रोत (कोयला, पेट्रोल, डीजल) समाप्त होने के पहले मानव जाति सूर्य एवं भू तापीय शक्ति को ऊर्जा स्रोत के रूप में बदल देने में समर्थ हो जाएगी और यह ऊर्जा प्राप्ति का सरल एवं सीधा माध्यम बनेगा। सच्चे अर्थों में भौतिक क्षेत्र में उपलब्धि का केन्द्र सूर्य ही होगा। अणु परमाणु का उपयोग वैज्ञानिक वर्ग विनाश के लिए नहीं, अपितु विकास कार्यों में करेंगे जिसका केन्द्र बिन्दु होगा न्यूक्लियर शक्ति का शांतिपूर्वक उपयोग ऊर्जा की उत्पादन।
मनुष्य शरीर के जैविक विकास के संबंध में उनकी मान्यता है कि मानव समाज धीरे-धीरे एक नई प्रजाति की ओर बढ़ रहा है जो सन् 2001 तक अपने चमत्कारी रूप में सामने आयेगा। वंशानुक्रम के परिवर्तन को लोग आश्चर्य की दृष्टि से देखेंगे, जिसकी रुचि भौतिकवाद की ओर न होकर आध्यात्म की ओर होगी। स्वस्थ रहने के नये तरीके वजन घटाने के लिए प्राकृतिक माध्यम स्वप्नों का सदुपयोग मनुष्य के अंग अवयवों का प्रतिरूप जो संकट में काम आ सके तथा वैचारिक आदान-प्रदान का मस्तिष्कीय तरंगों द्वारा प्रयोग, जिससे लोग आध्यात्म की ओर रुचि रखने लगेंगे। जनसंख्या अभिवृद्धि को रोकने के लिए संयम-नियम से जन्म दर को रोकने की नई एवं प्राचीन विद्या के प्रति विश्वास उत्पन्न होगा।
समूचा विश्व एक परिवार के रूप में विकसित होगा तब अपराधियों की संख्या स्वयं ही कम हो जायेगा। भ्रातृभावना जन-जन के मनों को आन्दोलित करेगी और बाध्य करेगी कि वह न अनीति बरते और नहीं इसे समर्थन दे। ब्राह्मणत्व पुनर्जीवित होगा, उसका एक ही आधार रहेगा कि किसने अपनी आवश्यकता को कम किया और कर साधनों में निर्वाह किया।
सभी राष्ट्र एक होकर जल एवं वायु प्रदूषण के लिए सामूहिक उपचार की बात सोचेंगे, क्योंकि इन दोनों का प्रदूषण किस न किसी रूप में समूचे विश्व को प्रभावित करेगा। इस प्रकार भौगोलिक सीमा बन्धन न रहेगा और सभी राष्ट्र अपनी-अपनी समस्याओं का एक साथ मिल बैठ कर समाधान सोचेंगे, तब एक विश्व एवं उसकी एक व्यवस्था की कल्पना साकार हो जायेगा। यह वही समय होगा, जिसे भविष्य वक्ताओं ने “इक्कीसवीं सदी बनाम उज्ज्वल भविष्य” का सम्बोधन दिया है।
सजातियों का एकत्रीकरण सृष्टि का एक सुनिश्चित नियम हैं चींटी, दीमक, मक्खी-मच्छर तक एकाकी नहीं रहते। उन्हें झुण्ड बनाकर समूहबद्ध रहने में प्रसन्नता भी होती है और सुविधा भी रहती है। वन प्रदेशों में एक जाति के पशु-पक्षी अपने वर्ग के सदस्यों के साथ रहते और मिल-जुलकर समय गुजारने में प्रयत्नशील रहते देखे जाते हैं। एक प्रकार की वनस्पतियाँ पास-पास उगती हैं। निवास के लिए एकाकी झोपड़ों में रहना पसंद नहीं किया जाता। सुविधा और आकर्षण नितान्त छोटे नगरों की अपेक्षा बड़े गाँवों, कस्बों और नगरों में रहता है। बारातों, प्रीतिभोजों, जुलूसों, मेलों में यह प्रवृत्ति काम करती देखी जाती है। उत्पादन, विक्रय, व्यवसाय के लिए क्षेत्र या मार्केट बनाये जाते हैं। दुर्व्यसनी और अपराधी भी अपने गिरोह बना लेते हैं। सभा, सोसाइटियां, संगठन, क्लब आदि एक जैसी प्रकृति या मान्यता वालों द्वारा विनिर्मित किये जाते हैं। आकाश में तारों का समूह ही शोभायमान होता है। बगीचे शोभायमान रहते हैं, पर रेगिस्तान की जहाँ-तहाँ उगी खैर-खजूरें कुरूप ही लगती हैं।
विभिन्न प्रकार की खदानें इसी नियम के आधार पर बनती हैं कि एक जाति के अणु-परमाणु साथ-साथ रहना चाहते हैं, इसलिए वे किसी अदृश्य चुम्बकत्व से प्रेरित होकर उस ओर चल पड़ते हैं जिस ओर सजातियों का बड़ा समुदाय पहले से ही एकत्रित रहता और साथियों के आगमन की प्रतीक्षा करता है। इसी आधार पर विभिन्न वर्ग के कण अपने समूह बनाते और धीरे-धीरे बड़ी खदानों के रूप में परिणत होते जाते हैं।
विचारों के संबंध में यही सोचा जाता है कि वे अपने निजी उत्पादन होते हैं। मनुष्य इच्छापूर्वक कल्पनाएँ करता और स्वनिर्मित चिन्तन में उलझा रहता है, पर यह आँशिक रूप से ही सही हैं सामूहिकता का एकत्रीकरण का नियम उन पर भी लागू होता है। समर्थ विचार दूसरों पर चढ़ दौड़ते हैं और जो अपने से कमजोर हैं उन्हें घसीट कर अपने शिकंजे में कस लेते हैं। समर्थ विचारक यदि मनस्वी हो, सघन श्रद्धा और प्रचण्ड विश्वास के साथ जुड़े हों तो फिर वे भी एकाकी न रहेंगे। अपनी सजातियों की उपस्थिति जहाँ भी देखेंगे, उन्हें घसीट कर अपने साथ चलने के लिए बाधित करेंगे, फिर चाहे वे उत्कृष्ट स्तर के हों या निकृष्ट स्तर के।
लोक व्यवहार में ऐसा ही घटित होता रहता है। दुर्व्यसनी, अनाचारी, क्रूरकर्मी अपने स्तर के लोगों को सहज तलाश लेते हैं। उन्हें अपना साथी बनाते और कुछ ही समय में एक गिरोह के रूप में संगठित हो जाते हैं। एक दूसरे को प्रोत्साहित करते और सहायता देते हैं। इसी आधार पर अवाँछनीयता को संगठित होते देखा गया है। इनके संगठित आक्रमण बहुत हद तक सफल भी होते हैं। गुण्डागर्दी और अपराधी प्रवृत्ति के बढ़ने का एक कारण यह भी है कि उनके गिरोह बन जाते हैं और वे फिर दाद, खाज-खुजली, कैन्सर आदि की तरह गहरी जड़े जमा लेते हैं। इतनी गहरी कि उनको उखाड़ फेंकना कठिन हो जाता है। दैत्य दानवों के समर्थ समूह इसी आधार पर एकत्रित और समर्थ बनते देखे गये हैं। इसलिए विज्ञजन अपने को अपनों को ऐसे वातावरण से बचाये रहने के लिए प्रयत्नशील रहते हैं।
सत्संग की, सज्जनों के समुदाय के साथ घनिष्ठता रखने की उपयोगिता को इसीलिए सराहा जाता है कि उस समुदाय में मिलने वाली सत्प्रवृत्तियाँ उन्हें भी श्रेष्ठता प्रदान करती हैं जो उस वातावरण के साथ अपनी घनिष्ठता जोड़ती हैं। ऐसे व्यक्ति न मिलने पर उनकी आँशिक आवश्यकता सत्साहित्य से भी पूरी हो जाती है। स्वाध्याय को भी एक प्रकार का सत्संग ही बताया गया है और उसके लाभों की प्रशंसा भी की गई है।
अनन्त आकाश में भले बुरे विचारों के प्रवाह भी परिभ्रमण करते रहते हैं। उनमें भी अपनी समर्थता के अनुरूप सहचर को खींचने या उनकी ओर खिंचे जाने की विशेषता होती है। बुरे विचार यदि भौतिक क्षेत्र में भी उठाये गये हैं तो यह स्वाभाविक है कि उसी स्तर के लोगों के मनों में उठने वाले कुविचार अपने स्तर वालों की ओर दौड़ पड़ें। सज्जनता के विचार भी इसी प्रकार अपने साथियों के सार्थक वातावरण की तलाश में रहते हैं। सज्जनों की समीपता से, विचार सदृश्यता से भी लोग इसी आधार पर लाभ उठाते रहते हैं।
भौतिक क्षेत्र की कई प्रत्यक्ष दीख पड़ने वाली उपलब्धियाँ हैं। उन्हें योग्यता और तत्परता के आधार पर अर्जित किया जाता है। सम्पदा, बलिष्ठता, बुद्धिमत्ता, प्रतिभा आदि को पुरुषार्थी अपने पराक्रम और कौशल के आधार पर उपार्जित करते हैं। व्यक्ति यदि स्वयं आलसी प्रमादी, अदूरदर्शी हो तो नया कुछ कमाना तो दूर अपितु जो संग्रह किया हुआ था। वह भी जिस तिस मार्ग से पलायन कर जाता है?
अध्यात्म क्षेत्र की अपनी विभूतियाँ हैं। उन्हें ऋद्धि-सिद्धि नाम से जाना जाता है। महामानव, देवमानव, ऋषि, मनीषी इन्हीं से अलंकृत होते हैं। यह विभूतियां भौतिक सम्पदाओं से किसी भी प्रकार कम महत्व की नहीं होती। वरन् उनकी गरिमा और अधिक बढ़ी चढ़ी होती है। व्यक्तित्ववानों के पीछे-पीछे सम्पदाएँ लगी पड़ती हैं। पर कोई सुसम्पन्न व्यक्ति यदि महापुरुषों जैसी विलक्षणता, सफलता, यशस्विता, सहयोगी, सद्भावना अर्जित करना चाहे तो उसे निराश ही रहना पड़ेगा। अध्यात्मवादी ही महामानव होते हैं। वे अपनी नाव तो पार लगाते ही हैं साथ ही असंख्यों को उस पर बिठाकर नदी की भयानक चौड़ाई को उस पर बिठाकर नदी की भयानक चौड़ाई को पार करते हुए उस पार तक पहुँचाते हैं। उनका यश अमर रहता है। न रहने पर भी उनके अनुकरणीय उदाहरणों के प्रकाश में लोग अपना पथ विनिर्मित करते हैं। विश्व-वसुधा उन्हें पाकर ही धन्य होती है। जबकि भौतिक सम्पदाओं के धनी मात्र अपनी ही साधन सुविधा बढ़ाकर विलासियों, अहंकारियों जैसे उपादान हस्तगत कर पाते हैं। साथ ही दुर्व्यसनों, दुर्गुणों और छीना झपटी के विग्रहों का संकट भी साथ-साथ उभरता, संत्रस्त करता रहता है।
भौतिक सफलताएँ भी अनायास ही किसी के हाथ नहीं लग जाती। इसके लिए आवश्यक योग्यताएँ एकत्रित करनी पड़ती हैं। साधन-उपकरण जुटाने पड़ते हैं। दूसरों का सहयोग लेना पड़ता है। भले ही वह प्रलोभन या दबाव द्वारा ही हस्तगत क्यों न किया गया हों। जो इतना कर पाते हैं वे भौतिक क्षेत्र में किसी कदर सफल हो जाते हैं। जिनसे यह सब करते नहीं बन पड़ता वे आशा लगाये, कल्पना करते रहते ही दिन गुजारते हैं। उन्हें निराशा के अतिरिक्त और कुछ हाथ नहीं लगता।
आत्मिक प्रगति के बारे में भी यही बात है। वह किसी देवी, देवता, मंत्र, तंत्र, आशीर्वाद, वरदान, के आधार पर उपलब्ध नहीं होती। यह सब सहायक उपचार हो सकते हैं। आरंभिक यात्रा में उत्साह प्रदान करने और अनुशासन के शिकंजे में कसने के लिए काम आ सकते हैं। पर इन बैसाखियों के सहारे सफलता के उच्च शिखर तक पहुँच सकना संभव नहीं। जो इन उपचार कर्मकाण्डों को ही सब कुछ मान लेते हैं वे मंजिल की दिशा में कुछ कदम बढ़ाने के उपरांत थक जाते हैं। निराश होकर वापस लौट आते हैं या फिर असफलता का दोष उन पर मढ़ने लगते हैं जिनसे बड़ी-बड़ी आशाएँ लगाई गई थीं। ऐसे व्यक्ति पर अवस्था को भी खो बैठते हैं जो कदम बढ़ाने से पूर्व किसी कदर मन में लगाई गई थी। असफलताजन्य निराश की मनःस्थिति में कई लोग ढोंगी-पाखण्डी भी बन बैठते हैं। इससे उतावले लोग अश्रद्धावान भी बन जाते हैं।
प्रगति के तथ्यों को गहराई तक समझ लेना और अभीष्ट दिशा में चलने से पूर्व उसकी आवश्यकताओं को समझ लेना आवश्यक है। अन्यथा भ्रम जंजाल में फँसकर भटकते रहना ही पड़ेगा। न भौतिकवादी भौतिक-प्रगति का आनंद ले सकेंगे और न अध्यात्मवादियों को ही उन सफलताओं के दर्शन होंगे, जिन्हें शास्त्रकारों, आप्तजनों और अनुभवी साधकों ने सौ टंच खरा कहा है।
उपरोक्त दोनों ही क्षेत्रों में असाधारण सफलता प्राप्त किये अनेकानेक लोगों के उदाहरण सामने रहते हैं। विपन्न साधनहीन परिस्थितियों में जन्मे, पले लोग किस प्रकार चकाचौंध उत्पन्न करने वाली सफलता प्राप्त कर सके इसके उदाहरण भी कम नहीं हैं। यदि उन उदाहरणों की भरमार न रही होती तो समान मनोबल वालों को कदाचित उस ओर चल पड़ने का साहस भी न हुआ होता और गये गुजरे लोगों की तरह किसी प्रकार जिन्दगी के दिन पूरे करते रहते। उदाहरण की उत्साह उत्पन्न करते हैं। उत्साह के बल पर ही पुरुषार्थ बन पड़ता है। पुरुषार्थ के सहारे ही सफलता की ऊँची मंजिल तक पहुँचा जा सकता है।
यही सिद्धान्त अध्यात्म क्षेत्र में भी लागू होता है। इस मार्ग का अवलम्बन भी इसीलिए बन पड़ता है कि अनेक सफल अध्यात्मवादियों के उदाहरण सामने रहते हैं। राजा हरिश्चन्द्र का नाटक गाँधी जी ने बचपन में देखा था। उससे उन्हें इतनी प्रेरणा मिली कि उसी मार्ग को अपनाने के लिए निश्चय कर लिया। विनोबा प्रभृति अनेकों सर्वोदयी कार्यकर्ता वस्तुतः गाँधी जी के ही मानस पुत्र थे। साँचे के बिना वस्तुएँ ढलती नहीं। उदाहरणों के अभाव में सामान्यजनों को दुस्साहसपूर्ण कदम बढ़ा सकना संभव नहीं होता। मनोविनोद तो लोग अपनी मन मर्जी से भी कर लेते हैं। पर पर्वतों की ऊँची चोटी पर चढ़ने के लिए साधनों, जानकारियों और प्रेरक उदाहरणों की तलाश करनी पड़ती है। इसके बिना कोई पर्वतारोही बनने के लिए मन चलाता तो रह सकता है पर वैसा कुछ कर सकने में समर्थ नहीं होता।
महत्वपूर्ण क्षेत्रों की महत्वपूर्ण प्रगति के लिए प्रत्यक्ष साधनों के अतिरिक्त परोक्ष विशेषताओं को भी कमाना, अपनाना और उन्हें आधार अवलम्बन बनाना पड़ता है। सफल जीवन जीने वाले मनुष्यों में से प्रत्येक की अपनी कुछ मौलिक विशेषताएँ रही हैं। वे डडडडडडडडड व्यंजनों की तुलना में अधिक मनस्वी रहे हैं। इनके संकल्पों में दृढ़ता रही है। लक्ष्य पर से उनकी दृष्टि कभी हटी नहीं है। वे यह सोचते और करते रहे हैं कि वर्तमान परिस्थितियों में, वर्तमान साधनों से क्या कुछ किया जा सकता है। जो संभव था उसे कर गुजरने में उन्होंने देरी नहीं की। निराशा को पास नहीं फटकने दिया। कठिनाइयों से जूझते रहे। अवरोध बीच में आते रहने पर उनने न तो प्रयास छोड़ा और न घबरा कर निराश हो बैठने का अवसर आने दिया ऐसे ही लोग हैं जो आत्म विश्वास के आधार पर अवरोधों से जूझते हुए दूने उत्साह के साथ निर्धारित लक्ष्य की ओर गतिशील रहते हैं।
सफलता की राजकुमारी हर किसी के गले में जयमाला नहीं पहनाती। उसकी प्रतिभा को हजार कसौटियों पर कसती है। जब अपने लिए किसी प्रतिभाशाली को सुयोग्य मान लेती है तभी उसे अपना हाथ थमाती है। मसखरे, बहुरूपिये ऐसा स्वाँग तो बना सकते हैं। मन न मानता हो तो नाटक के स्वयंवर में किसी नट को राजकुमारी बनाकर उसके हाथों तत्काल जयमाला भी पहन सकते हैं। पर बहुमूल्य उपलब्धियों के लिए तो बढ़े-चढ़े प्रयास ही करने पड़ते हैं। अर्जुन को द्रौपदी स्वयंवर जीतने के लिए मत्स्यवेध की दीर्घकालीन साधना मनोयोगपूर्वक करनी पड़ी थी। हर सफलता प्राप्त करने के आकाँक्षी को चाहे वह किसी भी क्षेत्र की ही हो, ऐसी ही एकाग्रता भरा मनोयोग जुटाना पड़ता है।
एक सम्पन्न घर की कन्या बड़ी रूपवती गुणवती थी। विवाह योग्य हुई तो उसने घोषणा की कि जो दौड़ में मुझसे आगे निकल सकेगा उसी के साथ विवाह करूंगी।
अनेकों इच्छुक आये और बाजी हार कर वापस लौटते गये।
एक दिन एक दुर्बल किन्तु चतुर धावक शर्त में सम्मिलित हुआ। दौड़ कर मार्ग निर्धारित था। मार्ग के दाहिने भाग में युवती को दौड़ना था। सो युवक ने उस भाग पर जहाँ-तहाँ सोने के सिक्के बिखेर दिये। दौड़ आरम्भ हुई। युवती की नजर सिक्के पर पड़ी। उसका मन ललचाया दौड़ती रहने के साथ-साथ वह सिक्के भी बीनती चली। दौड़ में रुकावट पड़ती रही और बाजी युवक ने मार ली।
अनमने मन से उसने कुरूप युवक से विवाह तो किया पर मन ही मन डरती हुई कहती रही कि लालच ने मुझे अभीष्ट से वंचित कर दिया।
“मुझे खेद है कि मैं आपका मुकदमा नहीं ले सकता।” बड़ी शांति से वकील साहब ने कहा और सामने मेज पर रखी फाइल को रखने वाले की ओर खिसका दिया।
“आप एक बार पूरी बात समझ लें।” अनुनय की गई और साथ ही जेब से नोटों की गड्डी निकाली गई- “आपकी फीस में अभी दे दूँगा, सामान्य से कुछ ज्यादा ही। आपकी मैंने बहुत प्रसिद्धि सुनी है, इसलिए मैं सीधा आपके पास आया।
आपकी बात ठीक है किन्तु मैं इस तरह के केस नहीं लेता। मान लो आप केस जीत भी जाएं तो क्या होगा उस बेचारी बूढ़ी विधवा का? नहीं भाई यह मेरे से न होगा। अच्छा होगा आप अपनी चाची की सेवा करें, मरने पर न केवल सम्पत्ति मिलेगी बल्कि फलने-फूलने का आशीर्वाद भी।
क्या करता बेचारा सुनने वाला! सोचने लगा विचित्र है ये वकील भी। संसार में सभी तरह के मनुष्य हैं। उन्हीं में इसकी भी एक अलग खोपड़ी है। नहीं तो कोई वकील कहीं घर आई फीस लौटाता है। पर किया क्या जाय, उनकी सनक का कि झूठे मुकदमे नहीं लड़ेंगे। कई बार तो चलते केस को बीच में छोड़ दिया, क्योंकि पता लगा कि उन्हें जो कुछ बताया गया, वह ठीक नहीं था। ऐसा नहीं था कि मुवक्किल को उनकी यह सनक मालूम नहीं थी। मालूम होने पर भी उसने सोचा, शायद दूनी फीस का लालच उसे केस की पैरवी करने के लिए विवश कर दे।
अभी वह कुछ कह पाता इसी बीच सूट के ऊपर गाउन पहने एक व्यक्ति ने चिक उठाई और अन्दर आ गया। आने वाला पहनावे से वकील लगता था और उसकी बेतकल्लुफी बता रही थी कि वह इन वकील का मित्र है।
आप न्यायालय रोज आते ही हैं। बिना फीस वाले मामले भी देखते हैं, फिर रुपये क्या काटते हैं आपको? जो आपको ही मुकदमा देना चाहते, उन्हें क्यों निराश करते हैं जबकि आपके पास समय भी है, आगन्तुक ने बैठते हुए पूछा। मुवक्किल का उतरा हुआ चेहरा देखकर उसने भाँप लिया था कि मामला क्या है?
न्यायालय तो मैं आता हूँ सीखने! उन्होंने आगन्तुक के चेहरे को पढ़ते हुए कहा। वकील के लिए यह निहायत जरूरी है कि वह अध्ययन करता रहे तथा जटिल केसों की पैरवी बहस करता रहे। पेट के लिए तो परिश्रम करना ही पड़ता है, कमाना भी जरूरी है। जो असमर्थ हैं, उनकी थोड़ी सहायता अवकाश के क्षणों में कर देना कोई बुराई तो नहीं। किन्तु मैं मानता हूँ, अन्याय का पक्ष लेकर धनोपार्जन सचमुच व्यक्ति को काट लेता है।
धन काट लेता है? आगन्तुक गंभीर हो गये। बैठा हुआ मुवक्किल दोनों के चेहरे बारी-बारी से ताक रहा था। इसके पल्ले कुछ नहीं पड़ रहा था। रुपये भी किसी को काटते हैं, आपकी खोपड़ी ही कुछ विचित्र किस्म की है। मित्र ने अपने दोस्ताना अन्दाज में कहा।
रुपये मनुष्य को चाकू की तरह अथवा कुत्ते की भाँति तो नहीं काटते हैं, किन्तु, वकील साहब ने गंभीर स्वर में कहा- “वे स्वास्थ्य, आचरण, समय, संयम अथवा नम्रता को अवश्य काट लेते हैं और मेरे हिसाब से इनकी क्षति शारीरिक क्षति से अनेकों गुना ज्यादा है।
अब आप पहेली मत बुझाइए। मित्र ने हँसते हुए कहा। लेकिन बात समझने लायक है, यह उन्हें लगने लगा था। इसलिए अपनी कुर्सी पर वे अधिक स्थिर हो कर बैठ गए।
उपयोग से अधिक धन होगा तो उपभोग करने की सूझेगी। वकील साहब ने कहा-”विलासिता बढ़ेगी। आलस्य बढ़ेगा। कहीं मन सावधान र रहा तो संयम-सदाचार पर विपत्ति आ पड़ेगी। यह न भी हो तो भी प्रमाद में समय जाएगा और भोग में रोग तो रखे ही रहते हैं। इतने पर भी खैर कहाँ? एक की विलासिता के उन्माद का मतलब है दूसरी जगह दरिद्रता का करुण विलाप। फिर अन्याय का पक्षपात व्यक्ति और समाज दोनों की जड़ें खोद कर ढहा देगा।
“आप अकेले के प्रयास से तो यह रुकेगा नहीं। अच्छा हो कुछ संतान के लिए संग्रह करें और शेष लोकोपकार में लगा दें। दान भी तो धर्म ही है” मित्र ने साधारण स्वर में कहा, क्योंकि उन्होंने न सोचा होगा, यह आशा कोई कैसे कर सकता हैं।
“संतानें अपना प्रारब्ध लेकर आती हैं फिर उन्हें पुरुषार्थ करना भी जरूरी है। पैतृक संपत्ति पाकर कितने युवक सुपथ पर रह पाते हैं, यह आपसे छिपा नहीं है।” वकील साहब ने कहा, “समर्थ होने तक मैं संतति का पालन रक्षण, शिक्षण कर्तव्य मानता हूँ, किन्तु उनके लिए धन संचय के लिए न्याय, अन्याय को भुला बैठना मोह के अलावा और कुछ नहीं है।”
“लोकोपकार-दान? “मित्र का प्रश्न उभरा। “अधर्म से धर्म नहीं होता और लोभ अधर्म है”। वह कर रहे थे- “जितना उपलब्ध है, उसी की सीमा में धर्म करना तो मनुष्य का कर्तव्य है, किन्तु अधिक संग्रह करके दान-लोकोपकार सिर्फ अभिमान भर है। यथेच्छ अथवा अहंकार की प्रेरणा है। अन्यथा लोकों का जिसने निर्माण किया है, उन विश्वम्भर के रहते मनुष्य के अभिमान की क्या बिसात?” सुनकर मित्र ने हँसते हुए कुछ खीझे स्वर में कहा- “भाई आपको समझा पाना असम्भव है। उत्तर में उन्होंने भी हँसकर कहा-”इसमें एक शब्द और जोड़ दीजिए “गलत” अर्थात्- मित्र महोदय ने विस्मयपूर्वक उनकी ओर देखा। मेरा तात्पर्य यह है कि समझा पाना असम्भव नहीं है- कहने की जगह कहना चाहिए कि गलत समझा पाना असम्भव है।
ओह! कहकर वह कुछ क्षण रुके फिर पास की कुर्सी पर बैठे मुवक्किल को देखकर कहा- इनका केस आपके न लेने पर भी तो कोई न कोई तो लेगा नहीं। बात जहाँ की तहाँ। अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ा करता।
कोई बात नहीं, मत फूटने दीजिए भाड़ को मनुष्य का सहज धर्म, व्यक्तित्व का निर्माण। उसे निभा रहा हूँ कि नहीं। किसी सत्पुरुष का कथन है- “अपना सुधार संसार की सबसे बड़ी सेवा है।” बस इसी कथन के मुताबिक मेरा आचरण आत्मपरिष्कार के लिए है।
“इसमें संसार की सेवा कहाँ से बन पड़ी मित्र के स्वर में कुछ व्यंग आ गया था। “जब व्यक्ति अपने आचरण को पूर्णतया आदर्शोन्मुखी बनाने का प्रयास करता है। जब वह अपने आचरण, व्यवहार से यह प्रमाणित कर देता है कि आज भी लोभ, मोह, लालसाओं, वासनाओं को ठुकराकर, वैभव में लात मारकर सुख चैन की जिन्दगी जीना संभव है तब औरों का भी साहस जगता है, उनके भी कदम इस राह पर मुड़ते और बढ़ते हैं। क्या यह समाज की सेवा नहीं हुई।” “आपको देखकर आज तक किसी के कदम मुड़े हैं कोई कुछ कहे, इसके पहले मुवक्किल बोल पड़ा “मेरे”‘.........। इस एक अक्षर के जादू से अवाक् होकर आगन्तुक ने उसकी ओर देखा और हकलाते हुए उसके भी मुख से एक शब्द निकल पड़ा ....के......के क्या?
मैं काफी देर से आप दोनों की बातें गौर से सुन रहा था। अपनी स्थिति और वकील साहब की स्थिति पर विचार भी करता रहा। मुझे लगा एक ये हैं जिसमें शायद लोभ के अलावा कुछ नहीं है। मुझे तो चाची की जायदाद मिलनी ही थी। पर लोभी को सब्र कहाँ,? जिसने मुझे गोद में खिलाया - उसी से मुकदमा लड़ने लगा। किन्तु आज मेरी आँखें खुल गई। अब दोनों मित्रों ने एक साथ पूछा। साहब कहने वाले बड़बोले तो बहुत देखे - पर आप जैसा आचरण नहीं पाया। अब आपकी बात मान चाची की सेवा करूंगा, उनका उत्तराधिकारी तो मैं स्वयमेव हूँ। कहकर उसने झुककर वकील के पैर पकड़ने चाहे पर उन्होंने बीच में ही थाम लिया। आँसू भरी आँखों से उसने सिर झुकाया, नोट और फाइल उठाकर चल पड़ा।
अकस्मात हुए इस परिवर्तन को देखकर मित्र के मुख से निकल पड़ा - माफ करना भाई-यह तो सचमुच समाज की सेवा हो गई, कहकर वह भी हाथ मिलाकर चल पड़े। अपना सुधार संसार की सबसे बड़ी सेवा है, के आदर्श को मूर्त करने वाले वकील थे- देशबन्धु चितरंजनदास - जिनके आचरण ने अनेकों में जीवन जीने की दिशा सुझाई।
आयुर्वेदिक ग्रंथ-काश्यप संहिता में कहा गया है कि संसार में आहार से बढ़कर अन्य दूसरी औषधि नहीं है। इसको सुधार कर मनुष्य सभी प्रकार के रोगों से छुटकारा पा सकता है। उसके अनुसार आहार महाभैषज है। इसी तरह का प्रतिपादन गीताकार ने किया है और कहा है कि पथ्यकारक अन्न सेवन करने पर रुग्णता नहीं घेरती।
वस्तुतः अन्न-धान्य अपने मूल रूप में खाये जाने पर ही औषधि का काम करते हैं। इसलिए उसे ‘अमृतान्न’ भी कहा गया है। उबालने या तलने-भुनने पर इनके बहुत से आवश्यक तत्व नष्ट हो जाते हैं अथवा स्वरूप बदल जाता है। ऐसी स्थिति में कम पोषण ऊर्जा मिलने के कारण उसकी पूर्ति अधिक मात्रा में आहार ग्रहण करके करनी पड़ती है। भोजन की बढ़ी हुई यह मात्रा पूर्णतया पचने और आँतों द्वारा अवशोषित न होने के कारण कब्ज से लेकर अनेकानेक प्रकार की पेट संबंधी बीमारियों के रूप में समय-समय पर फूटती रहती हैं।
पोषणविदों के अनुसार कच्चे अन्न सजीव एवं जीवनीशक्ति से भरपूर होते हैं। प्रायः देखा जाता है कि नरम अवस्था में ताजे कच्चे अन्न को लोग चावपूर्वक खाते हैं। सूखे चने, मटर आदि की अपेक्षा हरे चने, मटर कहीं अधिक पसंद किये जाते हैं। इन्हें बिना नमक या मिर्च मसाले के भी हम खा लेते हैं और तृप्ति अनुभव करते हैं। समस्या कच्चे अनाजों की बारहों महीने उपलब्धता की आती है। इसका भी समाधान ढूँढ़ लिया गया है। स्वच्छ पानी में कुछ घंटों तक डुबोकर रखने पर काम करने लगते हैं। चने, मूँगफली एवं मूँग को भिगोकर कच्ची अवस्था में ग्रहण करने का आम प्रचलन है। व्यायाम के अभ्यासी, पहलवान आदि का तो भीगा हुआ चना उनके पुष्टिवर्धक खुराक का एक प्रमुख अंग होता है। सामान्य जनों के लिए यह पूर्ण आहार का काम कर सकता है।
इसी तरह जब चने भिगोकर खाये जा सकते हैं तो गेहूं, ज्वार, बाजरा जैसे अनाज न खाये जा सकें, इसका कोई कारण नहीं हो सकता। इन बीजों को आवश्यकतानुरूप थोड़े पानी में लगभग 12 घंटे तक रखने के पश्चात् मोटे गीले कपड़े में लपेटकर रख देने भर से ऋतु के अनुसार अंकुर निकल आते हैं। इससे उनकी उपयोगिता और पोषकता में पर्याप्त अभिवृद्धि हो जाती है। अमृतान्न यही है।
कच्चा गेहूं खाने में यह आशंका नहीं ही की जानी चाहिए कि वह उबले हुए आहार की तुलना में देरी से पचेगा या कोई परेशानी पैदा करेगा। तथ्य तो यह है कि जब हरा चना, कच्चेफल, सब्जियाँ या सलाद अच्छी तरह पक सकते हैं, तो कोई कारण नहीं कि भीगे हुए या अंकुरित गेहूं तो चने से भी हल्का होता है। कच्चे या अंकुरित खाद्य की सर्वाधिक विशिष्टता यह है कि पके आहार की तुलना में उसकी आधी मात्रा से भी काम चल जाता है। उससे न केवल क्षुधा निवृत्ति और शरीर पोषण की आवश्यकता पूर्ण होती है, वरन् उससे दूने परिमाण में आवश्यक पोषक तत्व भी उपलब्ध हो जाते हैं। इस तरह के जीवंत आहार उनके लिए विशेष रूप से हितकारी हैं जो सदैव कुपोषण का शिकार बने रहते हैं और आये दिन किसी न किसी प्रकार की रुग्णता से घिरे रहते हैं। ध्यान केवल इतना रखना पड़ेगा कि उत्साहवश नया अभ्यास आरंभ करने से पूर्व अपने पाचन तंत्र एवं स्वास्थ्य संबंधी सभी पक्षों से अवगत हुआ जाय और तब अपनी प्रकृति के अनुरूप उपयुक्त अन्न का चुनाव किया जाए। जीवंत आहार लेने की दिशा में क्रमशः धीरे-धीरे कदम बढ़ाना ही उपयुक्त रहेगा। व्यक्ति की उम्र, ढांचा, खुराक की चीजों के हल्के-भारीपन और शारीरिक कार्य क्षमता के हिसाब से आहार का निर्धारण किया जाना चाहिए।
आहार विशेषज्ञों का कहना है कि प्रायः सभी प्रकार के अन्य-धान्यों को उनके प्राकृतिक रूप में अंकुरित करके अथवा उबाल करके खाया जा सकता है। अंकुरित हो जाने पर वे द्विगुणित पोषक गुणों से भर जाते हैं। विटामिनें, जो बीज अवस्था में पहले प्रसुप्त पड़ी रहती हैं, भीगने और अंकुरित होने पर सक्रिय हो उठती हैं। सूर्य संपर्क में आते ही उनमें विद्यमान क्लोरोफिल नये जीवन तत्व का निर्माण करते और उसे अधिक उपयोगी बना देते हैं। गर्मी के दिनों में अनाजों से अंकुर 24 घण्टों में निकल आते हैं, परन्तु सर्दी के मौसम में अंकुर फूटने में कुछ विलम्ब हो सकता है। मूँग ही एक ऐसी दलहन है जो 92 घंटे में अंकुरित हो जाती है। यहाँ इस बात का भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि जिस पानी में अनाज को भिगोया गया था उसे फेंक नहीं देना चाहिए, वरन् आटा गूँथने, सब्जी पकाने के काम में ले लेना चाहिए क्योंकि उसमें कुछ क्षार और पोषक तत्व घुले रहते हैं।
मानव शरीर के विकास एवं मांसपेशियों के निर्माण के जिन 27 प्रकार के अमीनो एसिड की आवश्यकता पड़ती है, उनकी पूर्ति सूखी दालों से संभव नहीं हो पाती। स्वास्थ्य विज्ञानियों ने इस अभाव को पूरा करने के लिए गहन अनुसंधान किया और जो निष्कर्ष प्रस्तुत किया है, उसके अनुसार दालों को अंकुरित कर लेने पर इस कमी की भरपाई पूरी तरह हो जाती है। अंकुरित दालों में न केवल प्रोटीन की मात्रा बढ़ जाती है, वरन् विटामिन-’ए’ तथा ‘ई’ जैसे जीवनदायी तत्वों की भी बढ़ोत्तरी हो जाती है। जो दालें पहले पचने और आँतों द्वारा आत्मसात करने में भारी पड़ती थीं, वह इन तत्वों के अभ्युदय के कारण सुपाच्य बन जाती हैं। क्षारीय खनिजों की बढ़ोत्तरी के कारण अंकुरित दालों का महत्व और अधिक बढ़ जाता है। पौष्टिकता के साथ रोग प्रतिरोधी क्षमता की अभिवृद्धि में इससे पर्याप्त सहायता मिलती है।
सोयाबीन के अंकुरित दानों को चले की तरह सब्जी या सलाद में प्रयुक्त किया जा सकता है। सुपाच्य होने के साथ यह विभिन्न खनिज तत्वों एवं विटामिनों का भण्डार है। अंकुरित कर लिये जाने पर इनकी मात्रा कई गुनी अधिक बढ़ जाती है। मूँगफली के स्थान पर सोयाबीन का उपयोग सस्ता भी पड़ता है और लाभदायक भी। एक बर्तन में इसके बीजों को दिन में तीन-चार बार पानी बदल कर रखने से दो दिन के अन्दर अंकुर निकल आते हैं। दो इंच लम्बे अंकुरों में विभिन्न खाद्यतत्वों की भरपूर मात्रा उत्पन्न हो जाती है, जिन्हें सब्जी सलाद आदि रूपों में प्रयुक्त किया जा सकता है। चीन में इसका उपयोग बहुलता से सब्जी के रूप में किया जाता है। वर्ष भर बाजारों में इसकी भरमार रहती हैं। वहाँ का यह एक प्रमुख आहार है। इसका एक कारण यह भी है कि संतुलित आहार की कमियों की पूर्ति इससे सरलतापूर्वक हो जाती है। अंकुरित हो जाने से दाने आसानी से पचने योग्य बन जाते हैं और उनके भीतर जो प्रोटीन, शर्करा तथा विटामिन ‘बी’, ‘सी’ रहते हैं, उनके परिमाण में अभिवृद्धि हो जाती है।
अंकुरित बीजों को न केवल आहार के रूप में सीधे ग्रहण किया जा सकता है, वरन् अभिरुचि के अनुसार उन्हें पीस कर आटे में मिलाकर रोटी अथवा सब्जी के रूप में उपयोग किया जा सकता है।
“हँसेंगे तो सफल समझे जायेंगे और लोगों का सम्मान पायेंगे। रोयेंगे तो साथ देने वाले विरले ही होंगे। सामान्यतया रोने वालों से लोग बचते है कि कहीं अपने दुर्भाग्य की चपेट में हमें भी न लपेट ले।”
इससे आहार की पौष्टिकता भी बढ़ती है और पाचन तंत्र भी सशक्त बनता है। इस प्रकार की खाद्य सामग्री सुपाच्य रहती है, कारण उसमें अन्न से कार्बोज, दालों से प्रोटीन, मूँगफली आदि से चिकनाई एवं अंकुरों से क्षार-लवण, विटामिन आदि सभी तत्वों की एक साथ पूर्ति हो जाती है। इसी तरह सामान्य अमृताशन की अपेक्षा अंकुरित अन्न, मूँग, मूँगफली के साथ उसे पकाया जाय तो वह अधिक लाभदायक सिद्ध होगा। पोषकता प्रदान करने के साथ ही यह आँतों की सफाई का भी काम करता है। दलिया में भी गेहूं के अतिरिक्त पिसी हुई अंकुरित मूँग और मूँगफली मिला देने पर वह स्वादिष्ट, सुपाच्य और पुष्टिकारक बन जाती है।
इस प्रकार यह सहज खाद्य न केवल सतोगुणी होती है, वरन् सस्ता, पौष्टिक एवं सर्व सुलभ भी। अध्यात्म पथ के पथिकों को तो अपनी साधना हेतु विशेषतया इन्हें इसी रूप में प्रयुक्त करना चाहिए।
विशेषज्ञों की हर जगह माँग रहती है। विशिष्ट क्षमा सम्पन्नों की ही हर कोई खोज करता है। बेकार, बेरोजगार, उपेक्षित फिरने वालों में से अधिकाँश अयोग्य ही होते हैं। महत्वपूर्ण प्रयोजन पूरे कर सकने में दक्ष और विशिष्ट लोग ही सफल होते हैं। अयोग्यों से तो जीवन-निर्वाह करते भी सही रीति से बन नहीं पड़ता। इसलिए प्रत्यक्ष महत्वाकाँक्षी को सर्वप्रथम अपनी योग्यताओं, विशेषताओं का अभिवर्धन करने में प्रवृत्त होना पड़ता है, अन्यथा न कोई बड़ा स्वार्थ-साधन करते बन पड़ेगा और न कहने योग्य परमार्थ में सफलता प्राप्त कर सकना संभव होगा।
परमसत्ता ने इन दिनों युग निर्माण योजना सरंजाम जुटाने के साथ-साथ प्रतिभाशालियों को एकत्रित और प्रशिक्षित करने के कार्य को प्राथमिकता देते हुए हाथ में लिया है। इसके लिए विश्वसनीयता, वफादारी से भरे-पूरे व्यक्तियों के सहारे ही काम चलेगा। समुद्र पर सेतु बनाने के लिए नल-नील जैसे कुशल इंजीनियरों को बुलाया और जुटाया गया था। स्वेज और पनामा नहरें बनाने का नियोजन उच्चकोटि के प्रतिभावानों के हाथ में सौंपा गया था।
निर्देशक अयोग्य हो, तो अच्छी कहानियों वाली फिल्में भी हिट हो जाती है। अयोग्यों को सौंपे गये अन्य कार्य भी घाटा देते और असफल सिद्ध होते हैं। संसार के हर क्षेत्र में विशिष्टता और योग्यता की ही भारी माँग रहती है। महान परिवर्तनों के लिए नियोजित हुई महाक्रान्तियाँ भी उच्चस्तरीय नेतृत्व में ही सम्पन्न हुई हैं। यहाँ परिवर्तन की इस विषम वेला में विश्व का अभिनव निर्माण करने के लिए श्रद्धा, प्रज्ञा और निष्ठा के धनी लोगों को आमंत्रित करने की गुहार लग रही हो, तो आश्चर्य ही क्या? महाकाल में प्राणवानों को युगधर्म को पहचानने और आड़े समय में काम आने के लिए इसी प्रकार के आमंत्रण-आह्वान दसों दिशाओं से उठाने आरंभ कर दिये हैं। जिनकी भाव-संवेदना और आदर्शवादी साहसिकता जीवन्त है, वे कुछ कर गुजरने के लिए अग्रिम पंक्ति में खड़े होने की तैयारी भी कर रहे हैं।
जहाँ अध्यात्म ‘वर्चस्’ उभरता है, वहाँ बौद्धिक ‘तेजस्’ और पुरुषार्थ के प्राण ‘ओजस्’ की भी कमी नहीं रहती। पहलवान कसरत करते और पौष्टिक खुराक का सरंजाम जुटाते हैं। विद्वान बनने वाले को उपयुक्त साहित्य और निष्णात् अध्यापकों का आश्रय लेना पड़ता है। रोगियों को पथ्य-पालन और औषधि सेवन को शिरोधार्य करना पड़ता है। आना-कानी करने पर वे असमर्थ रहने की स्थिति से उबर नहीं पाते।
जिन्हें अपने समय का हनुमान, अर्जुन बनाना है, उन्हें अपने को दो कसौटियों पर कसे जाने और खरे उतरने की तैयारी में बिना इधर-उधर झाँके इन्हीं दिनों जुट जाना चाहिए। इनमें से एक है - प्रामाणिकता, दूसरी है - उदारता। इन दोनों विभूतियों से सुसज्जित होने पर उच्चस्तरीय व्यक्तित्व विनिर्मित करने का सुयोग सहज ही बन जाता है। प्रामाणिकता का पर्यायवाची है - आत्म परिष्कार। इसके लिए दुश्चिंतन और अनाचरण से मुक्ति पाना। इसी को तत्वदर्शियों ने लोभ और मोह की हथकड़ी, बेडिय़ों से छुटकारा पाना कहा है। उनने बड़प्पन प्रदर्शन की अहंता को भी तीसरी बाधा बताया है। इन तीन से निपट लेने पर, उन भव–बन्धनों से, कषाय कल्मषों से छुटकारा मिल जाता है, जो पतन, पराभव के लिए पूरी तरह जिम्मेदार हैं।
प्रतिभा परिष्कार का दूसरा चरण है -उदारता। इसे भी तपश्चर्या एवं पुण्य-पुरुषार्थ संचित करने की सुनिश्चित क्रिया-प्रतिक्रिया समझा जा सकता है। उसी दृष्टिकोण को अपनाने पर ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’ और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के दोनों महामंत्रों की क्षमता व्यावहारिक जीवन में प्रवेश पाती और सामान्य को असामान्य बना देने में पूरी तरह सफल होती है। जिनने अपनी विचारणा को कषाय-कल्मषों से लिप्सा-लालसा से ऊपर उठा लिया है, उनके लिए फिर कोई ऐसा बंधन शेष नहीं रह जाता, जिसके आधार पर युगधर्म अपनाने से आनाकानी करने के लिए बहाना ढूँढ़ा जाय।
प्रामाणिकता का एक ही आधार है-पवित्रतायुक्त निर्दोष जीवन। मानवी गरिमा को महत्व देने वाले व्यक्ति सहज ही अपने दृष्टिकोण को क्रिया-कलाप को औचित्य के राजमार्ग पर गतिशील रखे रह सकता है और हर किसी की दृष्टि में विश्वस्त ही नहीं, श्रद्धा, सम्मान और सहयोग का भाजन भी बना सकता है। ऐसे ही व्यक्ति अपने परामर्श को, कथनी और करनी की एकरूपता के आधार पर इतना सशक्त बना सकता है, कि उन्हें मानने अपनाने के लिए अनेकों को तत्पर पाया जा सके।
उदारता का प्रतीक परमार्थ है। इसी को दूसरे शब्दों में भविष्य को उज्ज्वल बनाने वाला पुण्य भी कहते हैं। सत्प्रयोजनों के खेत में अपने समय, श्रम और साधनों को बोने वाला साधारण किसानों की अपेक्षा कहीं अधिक नफे में रहता है। किसान के बोये बीज का वाँछित मात्रा में फलित होना कई बार प्रतिकूलताएँ उपस्थित हो जाने पर संदिग्ध भी रहता है, पर उत्कृष्टता के क्षेत्र में बोये गये अपने अनुदानों के फलित होने में किसी को भी घाटा सहन करने की कुण्ठा नहीं भुगतनी पड़ी। इस अध्यात्मवादी कृषि प्रयास में एक दाना बोकर हजार दाने पाने की सुनिश्चितता को कोई भी अनुभव कर सकता है। उदारचेता, आत्मसंयमी महामानवों के इतिहास का हर पृष्ठ यह साक्षी देने के लिए विद्यमान है कि प्रामाणिकता और उदारता की विभूतियां सम्पादित करने वाले सदा ऊँचाई की और तेजी से बढ़ते रहे हैं और ऐसा वातावरण बनाते रहे हैं, जिसको अनन्त काल तक सराहा और स्मरण किया जाता रहे।
नव सृजन की भवितव्यता सुनिश्चित है। उस संभावना में भागीदार होकर गोवर्धन उठाने में लाठी का सहारा देने वाले ग्वाल बालों जैसा अवसर हम सब के सामने भी है। इस अवसर से चूका क्यों जाए? श्रेय के भागीदारों में सम्मिलित होने में झिझकने और संकोच करने की आवश्यकता ही किसी बुद्धिमान को क्यों पड़नी चाहिए।
तैयारी के लिए इतना भर करना पर्याप्त होगा कि प्रामाणिकता, प्रतिभा और उदारता का इतना संचय किया जाय, जिसका अनुभव अपने को हो सके और परिचय सर्वसाधारण को मिल सके। भावनाएँ, मान्यताएँ और आकाँक्षाएँ अन्तराल की गहराई के रूप में अपना परिचय देने लगती हैं। इन प्रवृत्तियों का समुच्चय ही व्यक्तित्व रूप में विकसित होता है। सामर्थ्यवान जिस भी मार्ग पर चल पड़ता है, उसी में असाधारण स्तर की सफलताएँ अर्जित करता चला जाता है।
परिवर्तन की इस महान वेला में उच्चस्तरीय दायित्व जिन्हें सौंपे जाने हैं, जो उत्साहपूर्वक उन्हें अंगीकार और वहन करने वाले हैं, उनमें असामान्यता के कुछ लक्षण तो जाँचे-परखे ही जायेंगे। सोने की जाँच-पड़ताल कसौटी पर कसने और आग में तपाने से होती है। व्यक्ति की गरिमा भी ऐसे ही दो माध्यमों से जानी जाती है, जिनमें से एक है चिंतन चरित्र और व्यवहार में समाविष्ट उत्कृष्टता। यही वह है जिसे पवित्रता, प्रामाणिकता, और वरिष्ठता कहा जाता है और उन्हें कुछ भी दायित्व सौंपने पर ठीक तरह सम्पन्न किया जाने का विश्वास किया जाता है। यही है प्रामाणिकता जिसके आधार पर किसी को भी जनसाधारण की आँखों में श्रद्धास्पद बनने का अवसर मिलता है। ईश्वर तक उन्हें अपने प्रतिनिधि-पार्षद का गौरव प्रदान करता है।
प्रामाणिकता के अतिरिक्त उदारता दूसरा माध्यम है-जिसके आधार पर आदर्शों के प्रति भावभरी निष्ठा को जाँचा-परखा जाता है। प्रामाणिकता शरीर की स्वस्थता, सुन्दरता, के समतुल्य है और उदारता उसकी शोभा-सज्जा। शरीर भले ही कितना ही सुडौल हो, पर वह नग्न स्थिति में होगा, तो उसे अश्लील कहा जायेगा। हीरे का असली होना आवश्यक है, पर उसे चमकाने के लिए खराद पर भी तो चढ़ाया जाता है। वर-वधू विवाह के अवसर पर सुसज्जित परिधान धारण करते हैं। शालीनता, सद्भावना, सदाचरण का होना प्राथमिक आवश्यकता है, पर साथ ही यह भी आवश्यक है कि समर्थता का उपयोग सत्प्रयोजनों में करने की उदारता में भी कोई कृपणता न की जाय। नवयुग के लिए जिन्हें सृजेताओं की भूमिका निभानी है, उनका चयन प्रामाणिकता और उदारता की प्रवृत्ति अभ्यास में उतरी या नहीं, इसी जांच-पड़ताल के आधार पर उपयुक्त पाया और चयन किया जाएगा। श्रेय लाभ भी उन्हीं के हिस्से में आयेगा।
“माँ! हम लोग अलग-अलग सुदूर एकान्त में तप हेतु जाना चाहते हैं।” समूह में से एक युवा संन्यासी ने सकुचाते हुए विनय भरे स्वरों में याचना की। उसके स्वर सभी के दिलों में उमड़ रहे भावों को उड़ेल रहे थे।
“अलग-अलग।” जैसे उन्होंने इसके अतिरिक्त और कुछ सुना ही नहीं। इधर कई दिनों से जब से वह तीर्थ यात्रा करके लौटी बड़ी व्यथित-सी रहने लगी थी। मानों तीर्थ भ्रमण करके व्यथा बटोरी हों। उफ / क्या दशा हो गई है आज देश की। हर कहीं दिखाई दे रही है उसकी बेहाली। एक-एक दाने के लिए तरसते भूखे-नंगे इन्सान। पर्याप्त श्रम करके जिन्होंने अपनी हड्डियों से लहू की बूँदें तो निचोड़ी हैं पर रोटी के लिए मोहताज हैं। स्टेशनों पर जूठे पत्तलों के लिए कुत्तों से होड़ लगाते बच्चे। नारियाँ जिनकी किस्मत के अक्षरों में आजन्म कारावास गुलामी बेबसी, सिसकियाँ, घुटन इसके सिवा कुछ और बचा ही नहीं है।
क्या यही है वह भारत? वह अपने कल्पना नेत्रों के सामने उभर रहे वर्तमान भारत की तुलना सुदूर अतीत से करने लगी। नहीं नहीं कुछ और भी है वर्तमान में वे आलीशान कोठियाँ एक से एक बढ़कर कीमती आलीशान सामानों के ढेर उन्हें तो नाम भी नहीं मालूम। कहाँ से आते हैं ये सब? क्या कमी है आज के भारत में? वही धरती है ठीक वही रत्नगर्भा, स्वर्णगर्भा। लहलहाती फसलें, मीठे पानी के स्रोत, गंगा, यमुना, घाघरा, नर्मदा सब कुछ पहले जैसे हैं। बूढ़ा हिमालय उसने तो जैसे न बदलने की कसम खा रखी है। अपनी अगाध जल राशि को सर्वहित के लिए समर्पित करता हुआ सागर वह भी वही। सभी एक सूत्र में बँधे रहना चाहते हैं सिवा इन्सान के। कितना बदल गया है इन्सान जिसकी एक ही रट है “अलग-अलग”।
“क्या सोचने लगी माँ?” पूछने वाला उन्हें इस तरह चुप्पी साधते देख सहम गया था। कहीं उसकी बात से उन्हें कष्ट तो नहीं पहुँचा। वह इन सभी के अन्तर की गहराइयों में छुपी श्रद्धा का घनीभूत रूप थी और ये सभी तरुण उच्चशिक्षित, प्रखर मेधा सम्पन्न, दृढ़ शरीर बल के घनी जिनका चरित्र वज्रवत दृढ़ था। सब ने जीवन के उच्चत्तर सोपानों पर आरूढ़ होने के लिए गृह त्याग किया था। अभी कुछ ही वर्षों पहले उनके पथ प्रदर्शक, गुरु आराध्य कुछ भी कहें देह त्याग कर महाकारण में विलीन हो गए थे। अब उन सब की राह का एकमेव दीपक यही गुरु माता थी, जिन्हें ये सभी प्यास से माँ कह कर पुकारते थे। “माँ!” इस एक शब्द में कितनी मधुरिमा छुपी है। यों आयु की दृष्टि से वह यही करीब चालीस-बयालीस के आस-पास रही होगी किन्तु उनके हृदय से निरन्तर वात्सल्य की पयस्विनी प्रवाहित होती थी, जिसका मृदुल स्पर्श अनेकों में नए प्राण भरता था।
सभी उनकी ओर देख रहे थे उत्तर की प्रतीक्षा में। किन्तु उन्होंने उत्तर देने की जगह प्रश्न के जवाब में प्रश्न किया- “देश की इस गई गुजरी दशा का कारण क्या है”? कहने के साथ उनने एक बारगी सब की ओर देखा।
सभी मौन थे, किंतु बाहरी तौर पर भीतर तो सभी के अन्दर सुगबुगाहट चल रही थी। भला माँ को क्या बताएँ?
उत्तर न पा वह स्वयं बोली अरे! बताते क्यों नहीं? तुम लोग तो बहुत पढ़े लिखे हों नरेन! तू ही बता। इशारा एक सत्ताईस अट्ठाइस साल के तरुण की ओर था।
अज्ञान, शोषण कुरीतियाँ, यही सब न। युवक ने कहा। पर यह सब क्यों?
कुरीतियों, मूढ़ मान्यताओं का कारण तो अज्ञान है पर अज्ञान का कारण? क्या जवाब दें।
शरत् तू बोल, शशी तू बोल, निरंजन बू बता बेटा, राखाल तू कह, लाटू रे तू तो बहुत सोचता है तू ही कुछ कह तारक तू......। सब को एक एक बारगी पूछ लिया किन्तु कुछ सुझाई दे तब तो बताएँ। अद्भुत है यह माँ भी अब लो, बताओ अज्ञान का कारण। इसका कारण तो शाही जिन्दगी माथा-पच्ची करने के बाद आचार्य शंकर तक का नहीं मिला। आखिरकार हैरान-परेशान हो उनने अपनी सारी अला-बबता ‘माया’ के सिर थोप कर छुट्टी ली।
“नहीं ढूँढ़ पाए तो सुनो इन सब का कारण है अलगाव। यही सारी समस्याओं की जड़ है, यहाँ तक कि अज्ञान की भी।” सीधी-साधी पर सूत्रमयी भाषा में उनका समाधान था।
एक युगपुरुष, जिसने लगभग पौन शताब्दी तक करोड़ों व्यक्तियों को ममत्व के सूत्र में बाँधे रख एक परिवार के रूप में संगठित कर दिया, विगत गायत्री जयन्ती (02 जून 1990) के पावन दिन प्रातः 7 बजे महाप्रयाण कर गया। वेदमूर्ति, तपोनिष्ठ पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जिन्हें परिजन श्रद्धा से पूज्य गुरुदेव नाम से संबोधित करते रहे हैं, के पार्थिव शरीर को उसी दिन सायंकाल 5.30 पर लगभग पाँच हजार परिजनों की उपस्थिति में सजलश्रद्धा-प्रखरप्रज्ञा नामक उन्हीं के द्वारा विनिर्मित स्मारकों के समक्ष अग्नि को समर्पित कर दिया गया। इस प्रकार स्थूल काया की अस्सी वर्ष की एक सुनियोजित यात्रा समाप्त हुई।
युग निर्माण योजना, प्रज्ञा अभियान शाँतिकुँज, गायत्री परिवार के संस्थापक, संचालक होने के नाते उनके प्रत्यक्षतः हमारे बीच से चले जाने से परिजनों का शोकाकुल होना स्वाभाविक है। पर उनसे जुड़े सभी परिजन यदि उनके जीवन से जुड़े वैविध्यपूर्ण, चमत्कारी घटनाक्रम, महत्वपूर्ण प्रसंगों पर दृष्टि डालेंगे तो उन्हें अनुभव होगा कि उनके जीवन का हर निर्धारण अपने मार्गदर्शक के संकेतों के अनुसार सुनियोजित क्रम से होता आ रहा है। आज से पाँच वर्ष पूर्व हीरक जयन्ती वर्ष के समापन पर उनने पत्रिकाओं में लिख ही दिया था कि “हमारे मार्ग दर्शक ने हमारी स्थूल काया को पाँच वर्ष का एक्सटेंशन दे दिया है। तत्पश्चात् हमारा सूक्ष्म व कारण शरीर सक्रिय होगा एवं घनीभूत प्राण ऊर्जा के रूप में चारों ओर संव्याप्त होकर वह सब करेगा जो चमड़े की इस काया द्वारा संभव नहीं है।”
इन शब्दों पर संभवतः उस समय बिरलों का ध्यान गया होगा पर जिस प्रकार सूक्ष्मीकरण साधना के तुरन्त बाद उनने अपनी गतिविधियों में तीव्रता लाकर भारत भर में राष्ट्रीय एकता सम्मेलनों तथा दीपयज्ञों का ताना-बाना बुना था, शाँतिकुँज परिवार में विस्तार-क्रम आरंभ किया था और फिर क्रमशः अपने सारे उत्तरदायित्व वंदनीय माताजी को सौंपते हुए इस वर्ष वसंत पंचमी से मिलने-जुलने का क्रम बन्द कर दिया था, उससे भली-भाँति पूर्वानुमान लगाया जा सकता है। इस वर्ष की जनवरी एवं मार्च की अखण्ड-ज्योति जिनने पढ़ी हो तथा अप्रैल की इक्कीसवीं सदी लेखमाला का अवलोकन किया जो, उन्हें अनुमान हो गया होगा कि वसंत पर्व पर महाकाल के संदेश में दिये गये निराकरणों का ही उनमें निर्वाह हुआ था। सभी में स्पष्ट संकेत था कि वे अब सूक्ष्म शरीर की सत्ता से ही सक्रिय रह परिजनों के और निकट आ जायेंगे एवं इस वर्ष कभी भी अपनी पार्थिव देह छोड़ सकते हैं।
यह स्पष्ट संकेत उनकी मार्गदर्शक सत्ता द्वारा उन्हें मई मध्य में मिल गया कि गायत्री के सिद्ध साधक होने के नाते उन्हें अपने प्राणों को इसी पावन दिन गायत्री जयन्ती, गंगादशहरा के दिन महाप्राण में वर्जित कर देना चाहिए। जीवनभर जिसने स्वयं उच्चस्तरीय गायत्री साधना के शीर्ष तक स्वयं को पहुँचाया, अगणित व्यक्तियों को जाति, वंश, लिंग, वर्ण का भेद किए गायत्री उपासक बना दिया उसके लिए महानिर्वाण के लिए इससे श्रेष्ठ दिन और हो भी क्या सकता था।
यह कल्पना करने में भी रोम उठ खड़े होते है, मस्तिष्क वेदना होने लगती है कि अब वे हमारे बीच प्रत्यक्षतः उसी रूप में नहीं है जिस रूप में विगत बसंत तक उनके सपने दर्शन किए। अंतरंग से बहिरंग तक स्नेह से सराबोर, निर्मल अंतःकरण वाला वह महापुरुष, हम सबका पिता अब हमें मुसकराता, खिलखिलाता, प्यार लुटाता नहीं दिख पड़ो, यह कल्पना की वह डोर जिस ने करोड़ों परिजनों को एक सूत्र में आबद्ध कर दिया? इस संबंध में उनका अन्तिम पंद्रह दिनों में दिया गया वह आश्वासन हमें हिम्मत दिलाता है कि अब वे और अधिक सघनता व निकटता से सभी को उपलब्ध होंगे। सभी को उनका स्नेह एवं प्यार भरा मार्गदर्शन, समस्याओं के सुलझाने वाला हल उनका ध्यान करने मात्र से ही उपलब्ध हो जाया करेगा, क्योंकि अब वे कायपिंजर से मुक्त हो विराट से विराटतम तथा सूक्ष्म रूप में करोड़ों गुने आकार में सारी वसुधा पर संव्याप्त हो गये हैं। उनके द्वारा आरंभ किया गया विचारक्रांति का, युगपरिवर्तन का सारा कार्य अब और तीव्रगति से सारे भारतवर्ष व विश्वभर में चल पड़ेगा क्योंकि यह दैवी सत्ता द्वारा संचालित शक्ति का अभियान है। व्यक्ति के न रहने पर तो काम रुक सकता है। पर शक्ति का कभी क्षय नहीं होता, न मरण नहीं होता। वह तो सूक्ष्म रूप में और सामर्थ्यवान हो जाती है एवं अन्यान्य मनुष्यों, भावनाशीलों, लोकसेवियों के शरीरों को उपकरण बनाकर उनसे वह सारा काम करा लेती है, जिसके लिए उनका अवतरण हुआ था।
वे अपनी शक्ति वंदनीया माताजी को हस्तान्तरित कर गये हैं तथा उनके माध्यम से सारे परिजनों को वही ममत्व, दैनन्दिन जीवन तथा लोकसेवा के क्षेत्र से, नवनिर्माण से जुड़ा मार्गदर्शन सतत् मिलता रहेगा। निधि के रूप में वे करोड़ों की राशि से विनिर्मित शाँतिकुँज, ब्रह्मवर्चस्, गायत्री तपोभूमि तथा 2400 प्रज्ञा संस्थान, पच्चीस लाख सक्रिय भावनाशीलों का परिकर तथा चिंतन चेतना के रूप में प्रचुर परिमाण में साहित्य लिख कर छोड़ गये हैं। धर्म-तंत्र से लोक मानस का परिष्कार, अध्यात्म का विज्ञानसम्मत प्रतिपादन, व्यक्ति, परिवार व समाज का नवनिर्माण करने वाला मार्गदर्शन तथा न्याय की स्थापना हेतु तैयारी संबंधों जो संजीवनी उनकी लेखनी से प्रकट हुई थी, डडडड रुक नहीं है। वह आगे भी उनकी शक्ति से अनुप्राणित हो सतत् चलती रहेगी तथा असंख्यों व्यक्तियों का मार्गदर्शन करती रहेगी। आने वाले दस वर्षों के लिए तो साहित्य वे लिखकर रख ही गये हैं। इस संबंध में किसी को अवसाद नहीं करना चाहिए कि उनकी लेखनी का प्रकाश अब उन तक नहीं पहुँचेगा। वह सबको और प्रखर रूप में पत्रिकाओं एवं पुस्तकों के माध्यम से भारत की सभी भाषाओं में, तदुपरान्त विश्व की सभी भाषाओं में प्रकाशित हो उपलब्ध होता रहेगा।
समाज के नवनिर्माण तथा सतयुग की वापसी हेतु लोकसेवियों के उत्पादन की, प्रशिक्षण की, परम्परा जो वे स्थापित कर गये थे, वह अपना कार्य बखूबी निभाती रहेगी। ब्रह्मकमल के रूप में विकसित, पल्लवित हो पूज्य गुरुदेव ने जीवन जिया है तो उसका सुगंध एवं उद्भूत ब्रह्म बीजों से कोई क्षेत्र भला अछूता कैसे रह सकता है? शाँतिकुँज आश्रम का अभी दस गुना विस्तार होना है तथा इसको विश्वविद्यालय के रूप में परिणत होना है। सिद्ध साधना आरण्यक तो यह है ही जिसमें सुसंस्कारित बीजों को अंकुरित होने के निर्मित प्रचुर परिमाण में ऊर्जा विद्यमान है। परिजन अगले दिनों बड़ी संख्या में गुरुदेव के कर्त्तृत्व रूपी विराट रूप को देखने यहाँ आयेंगे तथा प्रज्ञा आलोक के विस्तार का संदेश लेकर यहां से जायेंगे। निःशुल्क छात्रावास, प्रशिक्षण तथा अतिथि सत्कार का क्रम यहाँ पहले की तरह ही चलता रहेगा।
पूज्य गुरुदेव ने अपनी देह परित्याग करने संबंधी पूर्वानुमान को परोक्ष रूप से तो समय-समय पर किंतु प्रत्यक्षतः दिन विशेष की सूचना देते हुए मई मध्य में घोषित कर दिया था। परिजनों को यह लग सकता है कि ऐसा था तो हमें सूचना दे दी जाती, हम भी अंतिम दर्शन कर लेते। किन्तु उनका निर्देश था कि ऐसा नहीं किया जाय। क्योंकि इससे तो परिजनों का मोह-काया तक सीमित होकर रह जाता एवं अंत्येष्टि के बाद वे काया को ही सब कुछ मानते हुए उनके कर्त्तृत्व की उपेक्षा करने लगते। उनने जीवनभर तिल-तिल कर अपना जीव परहितार्थाय होम किया है। एक परमार्थी ब्रह्मपरायण जीवन जिया है जिसमें अपने पर कड़ा अंकुश लगाया है एवं उदारतापूर्वक अपनी शक्ति, विभूति, सम्पदा को लुटाया गया। यही अपेक्षा उनकी परिजनों से भी रही है। समय का जो उपयोग उनने किया एवं समाज के हित के लिए जैसा उसका सुनियोजन किया, यदि उसका एक अंश भी हम लोग अपने जीवन में उतार सकें तो अपना जीवन धन्य कर लेंगे।
अस्सी वर्ष की आयु में उनने आठ सौ वर्ष की आयु में किये जाने योग्य जीवन जिया है। काया कब तक साथ देती। फिर भी चूँकि संकेत आ चुका था, किसी भी प्रकार की व्याधि न होते हुए भी उनने अपनी चेतना को शरीर के विभिन्न अंगों में सिकोड़ना आरंभ कर दिया था। चूँकि चेतना को मापने का कोई यंत्र अभी तक बना नहीं अतः यह अनुमान लगाना कठिन था कि रक्त आदि सभी का विश्लेषण एक स्वस्थ व्यक्ति जैसा होते हुए भी वे महाप्रयाण की बात क्यों सोच रहे हैं? स्थूल दृष्टि से सोचने वाले चिकित्सक जो शोध न कर सकते हैं, वह सब करने का उनने प्रयास किया परन्तु वे उस सीमा से परे थे। विजातीय द्रव्य की एक बूँद भी उनने स्वीकार नहीं की तथा एक सप्ताह पहले से क्रमशः कम करते-करते जल व अन्न बिल्कुल बन्द कर दिया। जब अवसान की बेला आई तो गायत्री माँ को प्रणाम कर स्वयं हृदय की धड़कन बन्द कर दी। सब कुछ इतना शीघ्र हुआ कि यह कह पाना कि उन्हें कुछ दिन और जीवित रखा जा सकता था, चेतना की सत्ता का मखौल उड़ाने के समान होगा।
पूज्य गुरुदेव ने बहुमुखी जीवन जिया है। बाल्यकाल में अपने गुरुदेव से साक्षात्कार से लेकर हिमालय यात्रा तक, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के नाते, यातना भुगतने से जेल यात्रा तक, परिजनों को स्नेह से अभिपूरित कर अपना अंग अवयव बनाने तक, एक विश्वव्यापी समाजसेवी संगठन बनाने से लेकर अगणित भावनाशील लोकसेवियों के निर्माण तक, अपनी चमत्कारी अनुभूतियों द्वारा अगणित व्यक्तियों को मृत संजीवनी देने से लेकर आत्मविकास संबंधी मार्गदर्शन तक तथा लेखनी द्वारा अपनी चिन्तन चेतना को जन-जन तक पहुँचाने जैसे कार्यों से भरा पूरा यह विराट व्यक्तित्व रहा है। उनके जीवन पर एक अविस्मरणीय श्रद्धाँजलि अंक अगले माह अगस्त-सितम्बर के संयुक्ताँक के रूप में प्रकाशित किया जा रहा है। हर परिजन को यह नियमित अंक के रूप में अगस्त अंत तक उपलब्ध हो जायेगा। इसका आकार वर्तमान अखण्ड-ज्योति से लगभग चार गुना होगा तथा पूज्य गुरुदेव के व्यक्तित्व एवं कर्त्तृत्व संबंधी दुर्लभ चित्र अनुभूतियाँ एवं लेख उसमें होंगे। परिजन उसकी प्रतीक्षा करें।
पूज्य गुरुदेव ने कहा है कि “मेरे जाने के बाद शोक न किया जाय क्योंकि मैं शक्ति के रूप में और अधिक विराट परिकर में पहुँच जाऊँगा। सभी को मेरी अनुभूति होती रहेगी।” उनकी इच्छानुसार ही किसी प्रकार की औपचारिकताएँ यहाँ नहीं की गयी, रूटीन यथावत रहा क्योंकि शक्ति का कभी अवसान नहीं होता। निष्कलंक प्रज्ञावतार के रूप में आया एक मसीहा जिनके संपर्क में रहा उन सभी को अपने आपको सौभाग्यशाली मानना चाहिए कि वे उनके जीवनकाल में उनसे प्रत्यक्ष वार्ता, नमन आदि का लाभ उठा सकें। सच्ची श्रद्धाँजलि यही है कि उनके विद्या−विस्तार के कार्य को और आगे बढ़ाया जाए अपना इस समय विशेष पर धरती पर आना सार्थक कर लिया जाय।
-ब्रह्मवर्चस्
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