संग्रह से कलह और विग्रह ही हाथ लगेगा

बँटवारा करके अलग-अलग रखने की नीति अव्यावहारिक है। धरती कितनी बड़ी है, यह अपने ही पिता की बनाई है। इसलिए अपना हक बाँटने और उसे अलग-अलग रखने से सारी धरती के टुकड़े कट जायेंगे और अपने हिस्से का टुकड़ा इतना छोटा रह जायगा जितने पर जरूरत की सभी चीजें न उगाई जा सकेंगी न सँभाल कर रखी जा सकती हैं।

नदी, पर्वत, उद्यान सभी तो अपने पिता के बनाये हुए हैं। इनका बँटवारा करने पर इतने छोटे हिस्से में आवेंगे कि या तो उतने में काम न चलेगा या बँटवारा हो जाने पर वे किसी के काम न रहेंगे। पक्षी आकाश बाँट लें तो उतने भर से उड़ने का क्या आनन्द रहेगा। सरोवर का पानी बाँट कर रहें तो उतने भर से किसका काम चलेगा। बँटवारे को लेकर आये दिन का कलह खड़ा होता रहेगा।

बँटवारा सम्भव नहीं। इस विश्व वैभव की उपयोगिता उसी में है कि सब मिल बाँटकर खायें। सब मिलकर इसे संजोयें और अपने महान वैभव की प्रचुरता का आनन्द उठायें। संसार एक है, सबका है। जितना अपने लिए आवश्यक है उतना उपयोग करके शेष दूसरों के लिए छोड़ दें, इसी में दूरदर्शिता है। संग्रह से तो कलह और विग्रह ही हाथ लगेगा। ब्राह्मण सही अर्थों में वही कहलाता है जो संग्रह से दूर रहता है, अपरिग्रह की रीति-नीति अपनाता है।


शिक्षा से उठकर विद्या की ओर

कितना अक्षम्य अपराध किया मैंने। उफ! ऐसे तपस्वी का अपमान! कहते हैं भक्त का अपमान भगवान भी नहीं माफ करते। राजर्षि अम्बरीष का अपमान करने के बाद दुर्वासा ऋषि को तीनों लोकों में ठौर नहीं मिला। भागते फिरे कोई नहीं दे सका त्राण, आखिर अम्बरीष की शरण ने ही उन्हें त्रासदी से छुटकारा दिलाया। वह भी भक्त है और नहीं तो क्या? सचमुच का भक्त वही है जो विश्वात्मा में विलीन हो चुका हो। जिसका समूचा चिन्तन और प्रत्येक कर्म भगवान के कार्य हेतु समर्पित है। जिसका मन कामनाओं के कलुष से विहीन है जिसका व्यवहार कटुता से शून्य है और एक मैं अभिमानी, ज्ञान से गर्व से चूर क्या-क्या नहीं कह गया। शास्त्रों के मर्म को न जानकर भी इनकी दुहाई देता रहा।

सोचते-सोचते उसने अपनी दृष्टि सामने की ओर उठाई अरे! तो क्या वह आ पहुँचा है, शायद नहीं। अवश्य प्रत्यक्ष ने प्रमाण दिया। देखा सामने की कुटिया के बाहर एक विशाल चबूतरे पर मात्र कोपीन लपेटे नग्न बदन एक देवतुल्य पुरुष दोनों हाथ पीछे बाँधे टहल रहे हैं। कसा हुआ कसरती गौरवर्ण का शरीर चन्द्रमा के मन्द प्रकाश में झिलमिल कर रहा था।

देखकर सोचने लगा, मुझमें और इस महापुरुष में कितना अंतर हैं? मैं विद्वान हूँ पर उद्देश्यहीन, वह विद्वान है शिव संकल्पी योद्धा। जिसने महान सदुद्देश्यों के लिए विद्या उसका शस्त्र। मैं निर्जीव रूढ़िवादी हूँ परिवर्तन से घबराता हूँ। वह क्राँतिकारी है, जो समाज को सड़ाँध से निकालकर प्रकाशमय जीवन पथ पर लाना चाहता है, उसके मन में एक ज्वाला है जो उसकी कड़े जाड़े से रक्षा करती है, मैं उससे वंचित हूँ। निकट पहुँच कर वह उनके चरणों की ओर लपके। ऐसा करते ही उनकी दृष्टि उस पर गई। कुछ रुककर कहा कौन? ब्रह्मचारी जी? यह क्या करते हो भाई कह कर छाती से चिपटा लिया। “महाराज! मेरी आत्मा बहुत अधिक व्यथित है मैं क्षमा,”...

आगन्तुक का रुँधा गला आगे कुछ न कह सका।

नहीं भाई। आपने आत्मा की आवाज को सुन लिया यही क्या कम है। जो आपने पढ़ा है उससे में अनभिज्ञ हूँ। मैंने उस ओर ध्यान नहीं दिया इस कारण कि वह मनुष्य को जीवन के सौंदर्य से दूर करने वाला है, आत्मा में दुर्व्यसन उत्पन्न करती है। समाज का सर्वनाश असत्य और दुराचार से हुआ है। हम वह विद्या चाहिए जो इस तम को नष्ट कर सत्य का आलोक बिखेर सके। सृजन की अकुलाहट उमगा सके”।

“तो जो कुछ मैंने आज तक पढ़ा-उसने आश्चर्य से आँखें फाड़ीं।”

“क्षमा कीजिएगा- आपने अभी तक जानकारियों के बोझ को अपनी पीठ पर लादा है”। यदि “सा विद्या या विमुक्तये” का मर्म अनुभव किया होता तो उन रूढ़ियों-कुरीतियों, वृथा प्रथाओं का पक्षपात न करते जिनके लौह पाश में आबद्ध व्यक्ति और समाज छटपटा रहा है, पीड़ा से बेचैन है। कुछ रुककर उनकी ओर दृष्टि डालते हुए बोले कैसी विडंबना है—”मोक्ष को अपना आदर्श लक्ष्य मानने वाला समाज अपने को निरंतर इन वीभत्स रूढ़ियों के फंदे में फँसाता जा रहा है और सर्वाधिक आश्चर्य तो यह कि कसने वाले की हैं जो मुक्ति की महिमा का बखान करते नहीं अघाते।”

सुनने वाला चुप था उसने शब्दों में शत प्रतिशत सत्य अनुभव हो रहा था।

तो जानकारियों का अर्जन क्या है स्वामी जी। शिक्षा है। भले वह वेद शास्त्रों की ही क्यों न हों। जब इसे व्यक्ति की मनःस्थिति और समाज के परिवेश से तारतम्य बिठाकर कालक्रम के अनुरूप उच्चतर जीवन जीने में प्रयोग किया जाने लगता है तो इसे सम्यक ज्ञान कहते हैं। यही विद्या है जिसका एक ही लक्ष्य है शुद्ध बुद्ध मुक्त जीवन। समझ गया स्वामी जी मैं आपका महत्वपूर्ण उद्देश्य। अब मैं भी शिक्षा से ऊपर उठकर विद्या की ओर बढूँगा।

हाँ मित्र। मेरी यही एक चाहत है विद्या का विस्तार। जिसका परिणाम होगा हँसता मुस्कराता उल्लासपूर्ण जीवन। अपने दिल में यह चाहत सँजोने वाले विद्या के परमाचार्य थे स्वामी दयानन्द। जिनकी सारी आशाएँ अब हम पर टिकी हैं, सिर्फ हम पर।


प्रतिभा से बढ़कर कोई समर्थता है नहीं

आदर्शवादी प्रयोजन, सुनियोजन, व्यवस्था और साहसभरी पुरुषार्थ—परायणता को यदि मिला दिया जाय तो उस गुलदस्ते का नाम प्रतिभा दिए जाने में कोई अत्युक्ति न होगी।

कहते हैं कि सत्य में हजार हाथी के बराबर बल होता है। सच्चाई तो इस कथन में भी हो सकती है, पर यदि उसके साथ प्रतिभाभरी जागरूकता-साहसिकता को भी जोड़ दिया जाए, तो सोना और सुगंध के सम्मिश्रण जैसी बात बन सकती है। तब उसे हजार हाथियों की अपेक्षा लाख ऐरावतों जैसी शक्ति संपन्नता भी कहा जा सकता है। उसे मनुष्य जीवन की सबसे बड़ी शक्ति-संपन्नता एवं सौभाग्यशाली भी कही जा सकती है।

आतंक का प्रदर्शन, किसी भी भले-बुरे काम के लिए, दूसरों पर हावी होकर उनसे कुछ भी भला बुरा करा लेने के, डाकुओं जैसे दुस्साहस का नाम प्रतिभा नहीं है। यदि ऐसा होता, तो सभी आतंकवादी अपराधियों को प्रतिभावान कहा जाता, जबकि उनका सीधा नाम दैत्य या दानव है। दादागिरी, आक्रमण की व्यवसायिकता अपनी जगह काम करती तो देखी जाती है, पर उसके द्वारा उत्पीड़ित किये गये लोग शाप ही देते रहते हैं। हर मन में उनके लिए अश्रद्धा ही नहीं, घृणा और शत्रुता भी बनते हैं। भले ही प्रतिशोध के रूप में उसे कार्यान्वित करते न बन पड़े। सेर को सवासेर भी मिलता है। ईंट का जवाब पत्थर से मिलता है, भले ही उस क्रिया को किन्हीं मनुष्यों द्वारा संपन्न कर लिया जाय अथवा प्रकृति अपनी परम्परा के हिसाब से उठने वाले बबूले की हवा स्वयं निकाल दे।

यदि प्रतिगामी, प्रतिभावान समझे जाते, तो अब तक यह दुनिया उन्हीं के पेट में समा गयी होती और भलमनसाहत को चरितार्थ होने के लिए कहीं स्थान ही न मिलता। काया और छाया दो देखने में एक जैसी लग सकती हैं, पर उनमें अंतर जमीन आसमान जैसा होता है। मुँह मरोड़ने, आँखें तरेरने और दर्प का प्रदर्शन करने वालों की कमी नहीं। ठगों और जालसाजों की करतूतें भी देखते ही बनती हैं। इतने पर भी उनका अंत कुकुरमुत्तों जैसी विडंबना के साथ ही होता है। यों इन दिनों तथाकथित प्रगतिशील ऐसा ही अवाँछनीय हथकंडे अपनाते देखे गये हैं वर उनका कार्य क्षेत्र विनाश ही बन कर रह जाता हैं। कोई महत्वपूर्ण सृजनात्मक उत्कृष्टता का पक्षधर प्रगतिशील कार्य उनसे नहीं बन पड़ता।

यह विवेचना इसलिए की जा रही है कि जिनको बोलचाल की भाषा में प्रगतिशील कही जाने लगा है, वास्तविकता समझने में किसी का भ्रम न रह जाय, कोई आतंक को प्रतिभा न समझ बैठे। वह तो उत्कृष्टता के साथ साहसिकता का नाम है। यह जहाँ भी होती है वहाँ कस्तूरी की तरह महकती है और चंदन की तरह समीपवर्ती वातावरण को प्रभावित करती हैं।

गाँधी जी के परामर्श एवं सान्निध्य से ऐसी प्रतिभाएँ निखरीं, एकत्रित, हुई एवं कार्य क्षेत्र में उतरीं कि उस समुच्चय ने देश के वातावरण में शौर्य व साहस के प्राण फूंक दिये। उनके द्वारा जो किया गया, सँजोया गया, उसकी चर्चा चिरकाल तक होती रहेगी। देश की स्वतंत्रता जैसी उपलब्धि का श्रेय, उसी परिकर को जाता है जिसे गाँधी जी के व्यक्तित्व से उभरने का अवसर मिला उनमें सचमुच जादुई शक्ति थी।

इंग्लैंड के प्रधानमंत्री चर्चिल भारत के वायसराय को परामर्श दिया करते थे कि वे गाँधी जी से प्रत्यक्ष मिलने का अवसर न आने दें। उनके समीप पहुँचने पर, वह उनके जादुई प्रभाव में फँस कर, उन्हीं का हो जाता है।

बुद्ध को मार डालने पर षड्यंत्र अंगुलिमाल महादस्यु ने बनाया। वह तलवार निकाले बुद्ध के पास पहुँचा और आक्रमण करने पर उतारू ही था कि सामने पहुँचते- पहुँचते पानी-पानी हो गया। तलवार फेंक दी और प्रायश्चित के रूप में न केवल उसने दस्यु व्यवसाय छोड़ा वरन् बुद्ध का शिष्य बन कर शेष जीवन को धर्मधारणा के लिए समर्पित कर दिया।

ऐसा ही एक कुचक्र आम्रपाली नामक वेश्या रच कर लायी थी। पर सामने पहुँचते-पहुँचते उसका सारा बना-बनाया जाल टूट गया, वह चरणों पर जा कर बोली- पिता जी मुझ नरक के कीड़े को किसी प्रकार पाप-पंक से उबार दें। बुद्ध ने उसके सिर पर हाथ फिराया और कहा कि ‘तू आज से सच्चे अर्थों में मेरी बेटी है। अपना ही नहीं, मनुष्य जाति के उद्धार का कार्यक्रम मेरे वरदान के रूप में लेकर जा। सभी जानते हैं कि अंबपाली के जीवन का उत्तरार्द्ध किस प्रकार लोकमंगल के लिए समर्पित हुआ।

नारद कहीं अधिक देर नहीं ठहरते थे, पर उनके थोड़े से संपर्क एवं परामर्श से ध्रुव, प्रह्लाद, रत्नाकर आदि कितनों को ही, कितनी ऊँचाई तक चढ़-दौड़ने का अवसर मिला।

वेदव्यास का साहित्य-सृजन प्रख्यात है। उनकी सहायता करने गणेशजी लिपिक के रूप में दौड़े थे। भगीरथ का पारमार्थिक साहस धरती पर गंगा उतारने का था। कुछ अड़चन पड़ी, तो शिवजी जटा बिखेर कर उनका सहयोग करने के लिए आ खड़े हुए। विश्वामित्र की आवश्यकता समझते हुए हरिश्चंद्र जैसों ने अपने को निछावर कर दिया। माता गायत्री का सहयोग उस महा−ऋषि को जीवन भर मिलता रहा। प्रसिद्ध है कि तपस्विनी अनुसूया की आज्ञा पालते हुए तीनों देवता उनके आँगन में बालक बनकर खेलते रहने का सौभाग्य लाभ लेते रहे।

जापान के गाँधी ‘कागावा’ ने उस देश के पिछड़े समुदाय को सभ्य एवं समर्थों की श्रेणी में ला खड़ा किया था।

महामना मालवीय स्वामी श्रद्धानन्द, योगी अरविंद राजा महेन्द्र प्रताप, रवीन्द्रनाथ टैगोर की स्थापित शिक्षा संस्थाओं ने कितनी उच्चस्तरीय इन घटनाक्रमों को भुलाया नहीं जा सकता। जन-कल्याण बन पड़ा, उसे असाधारण ही कहा जायेगा। प्रतिभाएँ सदा ऐसे ही कार्यक्रम हाथ में लेतीं और उसे पूरा करती हैं।

रियासतों को भारत-गणतंत्र में मिलाया जाना था। कुछ राजा सहमत नहीं हो रहे थे और अपनी शक्ति का परिचय देते हुए तलवार हिला रहे थे। सरदार पटेल ने कड़क कर कहा—’इस तलवार से तो मेहतरों की झाड़ू, अधिक सशक्त है, जो कुछ कर तो दिखाती है। राजाओं को पटेल के आगे समर्पण करना पड़ा।

राणा प्रताप, छत्रपति शिवाजी, राजा छत्रशाल आदि के पराक्रम प्रसिद्ध हैं, जिनने स्वल्प-साधनों से जो लड़ाइयाँ लड़ीं, उन्हें असाधारण पराक्रम का प्रतीक ही माना जा सकता है। लक्ष्मीबाई ने तो महिलाओं की एक पूरी सेना खड़ी कर ली थी और समर्थ अँग्रेजों के छक्के छुड़ा दिये थे।

चाणक्य की जीवनी जिनने पढ़ी हैं, वे जानते हैं कि परिस्थितियाँ एवं साधन नहीं, वरन् मनोबल के आधार पर क्या कुछ नहीं किया जा सकता है। शंकर दिग्विजय की गाथा बताती है कि मानवी प्रतिभा कितने साधन जुटा सकती और कितने बड़े काम करा सकती है। परशुराम ने समूचे विश्व के आततायियों का मानस किस प्रकार उलट दिया था, यह किसी ने छिपा नहीं है। कुमार जीव ने एशिया के एक बड़े भाग को बौद्ध धर्म के अंतर्गत लेकर कुछ ही समय में धार्मिक क्षेत्र की महाक्रान्ति कर दिखायी थी।

नेपोलियन भयंकर युद्ध में फँसा था। साथ में एक साथी था। सामने से गोली चल रही थी साथी घबराने लगा तो नेपोलियन ने कहा-डरो मत, वह गोली अभी किसी फैक्टरी में ढली नहीं है जो मेरा सीना चीरे। वह उसी संकट में घिरा होने पर भी दनदनाता चला गया और एक ही हुँकार में समूची शत्रुसेना को अपना सहायक एवं अनुयायी बना लिया। प्रतिभा ऐसी ही होती है।

अमेरिका का अब्राहम लिंकन, जॉर्ज वाशिंगटन, इटली के गैरीबाल्डी आदि की गाथाएँ भी ऐसी हैं कि वे गयी-गुजरी परिस्थितियों का सामना करते हुए जन मानस पर छाए और राष्ट्रपति पर तक पहुँचने में सफल हुए। लेनिन के बारे में जो जानते हैं, उन्हें विदित है कि साम्यवाद के सूत्रधार के रूप में उसने क्या से क्या करके दिखा दिया।

विनोबा का भूदान आन्दोलन, जयप्रकाश नारायण की समग्र क्रांति सहज ही भुलाई नहीं जा सकती। भामाशाह की उदारता देश के कितने काम आयी। बाबा साहब आमटे द्वारा की गयी पिछड़ों की सेवा एक जीवन्त आदर्श के रूप में अभी भी विद्यमान है। विश्वव्यापी स्काउट आन्दोलन को खड़ा करने वाले बेडेन पावेल की सृजनात्मक प्रतिभा को किस प्रकार कोई विस्मृत कर सकता है। सुभाषचन्द्र बोस की आजाद हिन्द सेना अविस्मरणीय है।

भारतीय साहित्यकारों के उत्थान की गाथाओं में कुछ के संस्मरण बड़े प्रेरणाप्रद हैं। पुस्तकों का बक्सा सिर पर रखकर फेरी लगाने वाले भगवती प्रसाद वाजपेयी, भिक्षान्न से पले बालकृष्ण शर्मा “नवीन” भैंस चराने वाले रामवृक्ष बेनीपुरी आदि घोर विपन्नताओं से ऊँचे उठकर मूर्धन्य साहित्यकार बने थे। शहर के कूड़ों में से चिथड़े बटोरकर गुजारा करने वाले गोर्की विश्वविख्यात साहित्यकार हो चुके हैं। यह सब प्रतिभा का ही चमत्कार है।

उन्नति के अनेक क्षेत्र हैं पर उनमें से अधिकाँश में उठना प्रतिभा के सहारे ही होता है धनाध्यक्षों में हेनरी फोर्ड, रॉकफेलर, अल्फ्रेड नोबुल, टाटा, बिड़ला आदि के नाम प्रख्यात हैं। इनमें से अधिकाँश आरम्भिक दिनों में साधन रहित स्थिति में ही रहे हैं। पीछे उनके उठने में सूझ-बूझ ही प्रधान रूप से सहायक रही है। कठोर श्रमशीलता एकाग्रता एवं लक्ष्य के प्रति सघन तत्परता ही सच्चे अर्थोँ में सहायक सिद्ध हुई हैं, अन्यथा किसी को यदि अनायास ही भाग्यवान या पैतृक संपत्ति के रूप में कुछ मिल जाय, तो यह विश्वास नहीं किया जा सकता कि उसे सुरक्षित रखा जा सकेगा या बढ़ने की दिशा में अग्रसर होने का अवसर मिल ही जायेगा। व्यक्ति की अपनी निजी विशिष्टताएं हैं जो कठिनाइयों से उबरने, साधनों को जुटाने, मैत्री स्तर का सहयोगी बनाने में सहायता करती हैं। इन्हीं सब सद्गुणों का समुच्चय मिलकर ऐसा प्रभावशाली व्यक्तित्व विनिर्मित करता है, जिसे प्रतिभा कहा जा सके, जिसे जहाँ भी प्रयुक्त किया जाय, वहाँ अभ्युदय का श्रेय-सुयोग का अवसर मिल सके।

प्रतिभा के संपादन में, अभिवर्धन में जिसकी भी अभिरुचि बढ़ती रही है, जिसने अपने गुण, कर्म, स्वभाव को सुविकसित बनाने के लिए प्रयत्नरत रहने में अपनी विशिष्टता की सार्थकता समझा है, समझना चाहिए उसी को अपना भविष्य उज्ज्वल बनाने का अवसर मिला है। उसी को जन साधारण का स्नेह-सहयोग मिला है। संसार भर में जहाँ भी खरे स्तर की प्रगति दृष्टिगोचर हो, समझना चाहिए कि उसमें समुचित प्रतिभा का ही प्रमुख योगदान रहा है।


पुरुषार्थ में लगा रहना (kahani)

एक मच्छर मधुमक्खियों के छत्ते के पास गया। रानी मक्खी तक खबर पहुँचाई कि एक संगीत मास्टर आये हैं वे आपके बच्चों को संगीत पढ़ाना चाहते हैं।

रानी मक्खी ने पुछवाया कि वे क्यों ऐसी अहैतुकी कृपा करना चाहते हैं

मच्छर ने कहा बदले में थोड़ा सा शहद मिल जाया करे तो बहुत है।

इस पर रानी मक्खी ने स्पष्ट इनकार कर दिया और कहा जिस संगीत को सीख कर वे हमारे यहाँ भीख माँगने आये हैं उसे हम अपने बच्चों को नहीं सिखा सकते। हम लोगों को तो निरन्तर पुरुषार्थ में लगा रहना ही प्रिय है।


उपचार जड़ों का हो पत्तियों का नहीं

इन दिनों बढ़ती हुई सम्पन्नता और प्रचलनों की विकृति के कारण मनुष्य का समूचा व्यक्तित्व एवं चिन्तन ही गड़बड़ा गया है। अनीतिपूर्ण जीवन जीने और अचिन्त्य चिन्तन करने वालों की मनोदशा सदा विक्षुब्ध रहती है। जिस सही ढंग से सोचना नहीं आता। वह उलटा चलता और औंधे मुँह गिरता है। बढ़ती हुई शारीरिक व्यथाओं के कारण और निवारण में हमें इसी तथ्य को ध्यान में रखना और संकट उपजाने वाले केन्द्र का सुधार परिष्कार करना होगा।

“साइकोसोमेटिक मेडिसिन’ नामक अपनी कृति में चिकित्सा मनोविज्ञानी डॉ. ओ. एस. इंजिलिस ने कहा है कि शारीरिक रुग्णता के पीछे प्रायः मानसिक विक्षुब्धता ही कार्यरत देखी जाती है। मानसिक उद्विग्नता का दबाव क्षय एवं कैंसर जैसी घातक बीमारियों के रूप में फूलता है। जर्मन मनोचिकित्सकों ने इस संदर्भ में गहन खोजें की हैं और पाया है कि भीतरी अन्तर्द्वन्द्व के कारण कितने ही लोग असह्य मानसिक उत्तेजनाओं के दबावों को झेलते रहते हैं यह दबाव अनेकानेक रोगों का रूप धारण कर बाहर निकलने का प्रयास करता है।

अनैतिक आचरण अपनाने एवं पाप कर्म करने के कारण लोग अतिशय मानसिक त्रास सहते और परिणाम स्वरूप घातक रोगों के शिकार बनते हैं। मनोविज्ञान की भाषा में इसे लक्षण परिवर्तन-”सिम्पटम कर्न्वजन” कहते हैं। इसका सविस्तार वर्णन मूर्धन्य मनःचिकित्सक डैनियल टय़ूक ने अपनी पुस्तक “इन्फ्लुएन्स ऑफ दि माइण्ड ऑन दि बॉडी” में किया है। उनके अनुसार छद्म पाप कर्मों को करने और उन्हें छिपाने से अथवा दूषित भावनाओं के गहराई से जड़ जमा लेने पर सिर दर्द, माइग्रेन, एक्जिम जैसे कई लाक्षणिक रोग उत्पन्न हो जाते हैं। यह भी देखा गया है कि किन्हीं-किन्हीं रोगियों के शरीर में कभी एक जगह दर्द होता है, तो कुछ ही क्षणों पश्चात उस स्थान पर गायब हो जाता है और वैसे ही लक्षण अन्य जगहों पर प्रकट होने लगते हैं। इस प्रकार की व्याधियों एक स्थान से दूसरे स्थान पर, पैर से हाथ में और हाथ से अन्य अंग-अवयवों पर उछल कर प्रकट होती रहती हैं। विचारणाओं-भावनाओं का परिष्कार किये बिना यह व्यथा, विभिन्न बीमारियों के रूप में तब तक फूटती और जीवनीशक्ति को निचोड़ती रहती है, जब तक पापों का दुष्कर्मों का प्रकटीकरण नहीं कर दिया जाता और प्रायश्चित करके मन पर लदे उस बोझ को उतार कर फेंक नहीं दिया जाता।

विशेषज्ञों के अनुसार अधिकाँश बीमारियों की जड़ साइकोसोमेटिक हैं। सर्दी-जुकाम, त्वचा रोग, खुजली, एक्जिमा, एलर्जी आदि का कारण मन में छिपे दबाव आदि को ही माना गया है। त्वचा को उनने मानसिक एवं भावनात्मक अभिव्यक्ति का अंग माना और कहा है कि उनमें उपजी विकृति के कारण जीवनीशक्ति का क्षरण जिस तीव्रता के साथ होता है उसकी प्रतिक्रिया स्वरूप त्वचा की बाह्य सतह पर चार प्रमुख लक्षण तुरंत उभर आंतें हैं। ये हैं रुबर-लाल पड़ जाना, ट्यूमर-सूजन आना, केलोर-ताप बढ़ जाना और डोलोर-दर्द होना। कामुकता, विद्वेष, अप्रसन्नता, कुढ़न आदि की विकृत मनोदशा सिर दर्द आधाशीशी जैसी व्यथाओं को जन्म देती है, अतिसार, कब्ज, कोलाइटिस, अल्सर, जैसी पाचन संबंधी गड़बड़ियाँ चिन्ता, विक्षुब्धता एवं दबावयुक्त मनःस्थिति की देन है। श्वसन संबंधी रोग तनाव, भय, असुरक्षा आदि भावनाओं के कारण पनपते हैं, तो दमा मानसिक उद्विग्नता से उपजा हुआ रोग माना जाता है। क्षय एवं कैंसर को मनोकायिक रोगों की श्रेणी में रखा जाना सुनिश्चित तथ्यों पर आधारित है। डॉ. किसेन एवं डॉ. बेटलहीम ने इस संबंध में हजारों रोगियों का लंबे समय तक गंभीरतापूर्वक परीक्षण और अध्ययन करने के पश्चात् निष्कर्ष प्रस्तुत करते हुए बताया है कि मनोविकृतियों एवं भावोद्वेगों का शरीर की प्रतिरोधी क्षमता पर आश्चर्यजनक रूप से प्रभाव पड़ता है और वे उसे विश्रृंखलित करके रख देते हैं। फलस्वरूप बीमारियों के विषाणु शरीर में संक्रमित कर जाते हैं।

अतः देखा यह जाना चाहिए कि रोग जिस कारण से उत्पन्न हुआ हो उसका ही निराकरण किया जाय पत्ते तोड़ने से नहीं, जड़ उखाड़ने से संकट का समाधान होता है, इस तथ्य को समझ लेने पर उपचार का मार्ग सरल हो सकता है।


प्राणवान ही पायेंगे दैवी अनुदान

शरीर उन पंच तत्वों का बना है, जिन्हें जड़ कहा जाता है। चेतना ही उसमें प्राण रूप है। यदि वह निकल जाय, तो पाँच तत्वों का बना घोंसला निर्जीव बन कर रह जाता है। उसके लिए कुछ कर सकना तो दूर, अपनी रक्षा तक नहीं कर सकता। तुरन्त सड़ने-गलने लगता है और जन्तुओं का आहार बन कर अपनी शकल-सूरत तक गँवा बैठता है। प्राण रहते ही किसी को जीवित कहा जाता है। जीवन, वायु की तरह व्यापक और अनन्त है। फेफड़ों में जितनी जगह होती है, वायु उतनी ही मात्रा में ग्रहण की जाती है। शरीर कलेवर के संबंध में भी यही बात है। साँस लेते समय उसकी जितनी आवश्यकता पड़ती है, उतनी ही ग्रहण कर ली जाती है। शेष अनन्त आकाश में ही भरी रहती है। उसे अधिक मात्रा में ग्रहण-उपलब्ध करने की कला में प्रवीण लोग उसे ‘प्राणायाम’ से अतिरिक्त मात्रा में ग्रहण कर लेते हैं और आवश्यकतानुसार विशेष समय पर प्रयुक्त करते हैं। ऐसे ही लोग प्राणवान कहलाते हैं और उस संचय से अपना तथा दूसरों का भला करते हैं।

शरीर-बल प्रायः इतना ही होता है जितना सीमित मात्रा में प्राण शक्ति विद्यमान रहती है। पर जो आश्चर्यजनक-अद्भुत-असाधारण कार्य कर पाते हैं, उनकी चेतना ही विशेष रूप से सक्रिय होती और चमत्कार स्तर के काम करती देखी जाती है। शरीर मनुष्यकृत है। वह नर-नारी के गुण सूत्रों के माध्यम से विकसित होता है, किन्तु प्राण देवता है। उसकी असीम मात्रा इस विश्व-ब्रह्माण्ड में भरी पड़ी है। वह अपने वर्ग के साथ असाधारण मात्रा में एकत्रित भी हो सकता है और एक से दूसरे में-प्रवेश करके अपनी दिव्य क्षमता का हस्तांतरण भी कर सकता है। इस प्रकार के प्रयोगों को शक्तिपात नाम से जाना जाता है। छाया पुरुष स्तर में बना रहता है। जीवित स्थिति में भी अतीन्द्रिय क्षमताओं के रूप में उसके चमत्कारी करतब देखे जा सकते हैं। प्राणयोग के अभ्यास से इसका अतिरिक्त प्रवाह, शरीर से बाहर निकल कर भी सुषुप्ति, तुरीय, समाधि आदि में अपनी सत्ता बनाये रह कर, बिना शारीरिक साधनों के अपने अस्तित्व तथा सशक्त विशेषताओं का परिचय दे सकता है।

प्राण की सत्ता हस्तांतरण के उपयुक्त भी हैं। कोई समर्थ व्यक्ति अपनी दिव्य क्षमता का एक भाग किसी दूसरे को देकर उसकी सहायता भी कर सकता है। आदि शंकराचार्य की कथा प्रसिद्ध है, जिसके अनुसार वे कुछ समय के लिए अपने शरीर से निकल कर किसी दूसरी डडड में प्रवेश कर गये थे और लंबी अवधि तक उसी में बने रहे थे।

अन्य विशिष्ट शक्तियाँ भी मनुष्य के साथ अपने ताल-मेल बिठाती और उसके शरीर द्वारा अपने अभीष्ट प्रयोजन पूरे करती रही हैं। कुन्ती-पुत्र मनुष्य शरीरधारी होते हुए भी विशेष देवताओं के अंश थे। उसी स्तर के वे काम भी करते रहे, जैसी कि साधारण मानवी काया में रहते हुए कर सकना संभव नहीं है। रामायण काल में हनुमान अंगद आदि के पराक्रमों को भी ऐसे ही देवोपम माना जाता है। मनुष्य शरीरधारी सामान्य प्राण वाले प्रायः वैसे कार्य नहीं ही कर सकते। अवतारी सत्ताएँ मनुष्य शरीर में रह कर ही अपने विशेष कृत्य करतीं और “यदा-यदा हि धर्मस्य” वाली प्रतिज्ञा की रक्षा करती हैं।

भगवान जिन्हें विशेष कर्मों के लिए चुनते, नियुक्त करते हैं, उनमें इस दिव्य प्राण की मात्रा ही अधिक होती है, जिसके सहारे वे नर-वानरों की परिधि से ऊँचा उठकर सोचने, ऐसा साहस करने और आदर्श उपस्थिति करने में समर्थ होते हैं। भव-बन्धनों की रज्जुओं से जकड़े हुए सामान्य मनुष्य न तो वैसा सोच ही सकते हैं और न दिव्य आदर्शों को अपना पाते हैं। दैवी प्रयोजनों को सिद्ध करने के लिए अतिरिक्त आत्मबल का-मनोबल का परिचय वे दे नहीं पाते। डडड विघ्न ही उन्हें पहाड़ जितने भारी दीखते हैं और जब कुछ कर गुजरने का समय आता है, तो भयभीत होकर किसी अनर्थ की आशंका करने लगते हैं। कायरता न जाने कहाँ से आकर डडड पड़ती है और कभी की हुई प्रतिज्ञाएँ—लिये और उन संकल्पों को एक प्रकार भूल ही जाते हैं।

दैवी अनुग्रह के संबंध में भी लोगों की विचित्र कल्पनाएँ हैं। वे उन्हीं छोटी संभावनाओं को दैवी अनुकंपा मानते रहते हैं जो सामान्य पुरुषार्थ से अथवा अनायास ही संयोगवश लोगों को उपलब्ध होती रहती हैं। मनोकामनाओं तक ही उनका नाक रगड़ना, गिड़गिड़ाना सीमित रहता है, जिसे वे दैवी अनुकम्पा मानते हैं। आत्मबल-आत्मविश्वास न होने से जो कुछ प्राप्त होता है उसे पुरुषार्थ का प्रतिफल मान कर उनका मन संतुष्ट ही नहीं होता। उनके लिए हर सफलता दैवी अनुग्रह और हर असफलता दैवी प्रकोप मात्र प्रतीत होता है। ऐसे दुर्बल चेतनाओं की बात छोड़ दें, तो यथार्थता समझ में आ जाती है पर अंततः एक ही तथ्य सामने आता है कि मनुष्य जब आदर्शवादी अनुकरणीय-अभिनंदनीय कर्मों को करने के लिए उमंगों- तरंगों से भर जाता है तो वह असाधारण कदम उठाने लगता है। रावण की सभा में अंगद का पैर उखाड़ना तक असंभव प्रतीत होने लगा था। औसत आदमी को तो हर काम असंभव लगता है। ऐसे छोटे त्याग करना भी उसे पहाड़ उठाने जैसा भारी पड़ता है, जो वस्तुतः हलके-फुलके ही होते हैं, और हिम्मत के धनी आदर्शवादी जिन्हें आये दिन करते रहते हैं।

दैवी अनुग्रह का एक ही चिह्न है। आदर्शवादी की दिशा में साहसपूर्वक बड़े कदम उठाना और उस प्रयास में आगे वाली कठिनाइयों को हँसते-हँसते दरगुजर कर देना। भगवान का अनुग्रह एक ही है-आदर्शों के परिपालन में बढ़ी-चढ़ी साहसिकता का प्रदर्शन करते रहना। कायरों और हेयजनों के लिए यही पर्वत उठाने जैसा अड़ँगा प्रतीत होता है किन्तु जिनमें मनोबल की कमी नहीं, उनके लिए तो यह सब खेल-खिलवाड़ जैसा लगता है। संसार का इतिहास साक्षी है कि जिस किसी पर भगवान की प्राण चेतना-अनुकम्पा बरसी है, उनको एक ही वरदान मिला है, ऐसे सत्कर्म करने का साहस मिला है, ऐसा उत्साह मानस में विचरता रहा है कि अनुकरणीय और अभिनंदनीय कार्य सतत् करने की लगन उठती रहे। अवाँछनीय और अनौचित्य जहाँ भी दीखती है, वहाँ लड़ पड़ने का इतना शौर्य-साहस उभरता है कि उसे चरितार्थ किये बिना व्यक्ति शांति से बैठ ही नहीं सकता।


नारायण बनने का अवसर (kahani)

जहाँ सस्ता खरीदा और बेचा जाता है वहाँ धोखा है। न ईश्वर को पाना उतना सस्ता है और न धर्म का पालन। जितना कि धूर्त लोग मूर्खों को बहकाते हुए बताया करते हैं।

मनीषियों का अभिमत है कि इक्कीसवीं सदी में ऐसी ही प्रतिभाएँ सर्वत्र उभरेंगी जिनके पिछले किये क्रिया-कलाप देखने से निराशा होती थी, उनमें से भी कितने ही ऐसे उभरेंगे जो अपने को धन्य बनायेंगे। अपने इर्द-गिर्द के लोगों को भी पार करके निहाल कर देंगे। पैसा, औलाद, स्वास्थ्य, बड़प्पन को बुरे लोग भी अपने बलबूते अर्जित कर लेते हैं, पर आदर्शों की दिशा में साहसपूर्वक चल पड़ना मात्र उन्हीं के लिए संभव होता हे, जिन पर भगवान की विशेष अनुकम्पा बरसती है जिसे परमपिता कृपापूर्वक अपने उच्चस्तरीय प्राण का वह भाग प्रदान करते हैं, जिसके सहारे नर-वानर को नर से नारायण बनने का अवसर प्राप्त होता है।


आकर्षण और आभा का स्रोत

वर्तमान को देखकर भविष्य का अनुमान लगाया जा सकता है। वर्तमान फूल है और भविष्य उसके परिपक्व होने पर बनने वाला फल। यह सिद्धान्त सभी क्रिया-कलापों पर लागू होता है। मन पर अनुत्साह छाया हुआ हो, भविष्य की कुछ महत्वपूर्ण कल्पनाएँ न उठ रही हों, भविष्य की कई महत्वपूर्ण योजना न बन रही हों, तो फिर समझना चाहिए कि ऐसे व्यक्ति का भविष्य अंधकारमय है।

शरीर दीखता तो बढ़ा चढ़ा है, पर उसकी शक्ति मनःक्षेत्र में सन्निहित रहती है। मन खिन्न-विपन्न हो तो समझना चाहिए कि शरीर स्वस्थ होते हुए भी ऐसा कुछ काम न कर सकेगा, जिसकी प्रशंसा की जा सके। इसके विपरीत संसार में ऐसे मनुष्य हुए हैं जिन्होंने बीमारियों से ग्रसित रहते हुए भी अस्पताल में पड़े रहने पर भी अपने मनोबल, उत्साह और सूझबूझ के सहारे इतने बड़े काम कर दिखाये जिस पर सौ पहलवानों को भी निछावर किया जा सकता है। इसके ठीक विपरीत ऐसी घटनाएँ भी घटती रही हैं, जिनमें दुर्बल शरीर के रहते हुए भी मनोबल का इतना प्रचंड परिचय दिया गया कि लोग उन्हें शक्तिपुँज मानने लगे।

शारीरिक सौंदर्य सभी की आँखों को सुहाता है। देखने वाले का आकर्षण भी उसकी ओर अधिक पाया जाता है। इस मान्यता के कारण कितने ही व्यक्ति सज-धज के खर्चीले समय साध्य श्रृंगार करने में लगे रहते हैं। पर यह भूल जाते हैं कि यह आँखों को छलावा और भूल भुलैया मात्र है। यदि यही वास्तविकता रही होती तो नट–नटिनियों ने समूचे संसार को विमोहित कर लिया होता और उनके पीछे चापलूसी करता हुआ हर कोई मारा मारा फिरता।

इसी प्रकार का एक भ्रम यह भी है कि स्वर संगीत का विशेष आकर्षण का केन्द्र है। नर्तक गायक अनेकों का मन मोह लेते हैं। कई बार तो शरीरगत सौंदर्य और कंठगत माधुर्य जन साधारण में इतना महत्व बना लेते हैं कि लोग उनके पीछे मुग्ध हो फिरते देखे जाते हैं।

पर यह भ्रम जंजाल मात्र है। इसके पीछे वास्तविकता का अंश नगण्य होता है। यदि बात ऐसी ही रही होती तो संसार में मूर्धन्य नहीं रहे होते जो रंग रूप कंठ की कलाकारिता होने पर भी औरों को अपनी ओर आकर्षित करते देखे जाते हैं। अष्टावक्र की आकृति कुरूप स्तर की गिनी जाती थी, पर उनकी विद्वता ने बड़े-बड़ों को चकित करके रख दिया। गाँधी जी पाँच फुट दो इंच लंबाई के थे। शरीर का वजन भी 96 पौण्ड था। व्यक्तित्व का दर्शनीय स्वरूप देखा कोई यह नहीं कह सकता था कि इनमें कोई विशेषता होनी चाहिए। पर चरित्र बल और आत्मबल के धनी होने के कारण उन्हें उच्च स्तर का महामानव माना गया। उनके प्रभाव का स्तर असाधारण देखा गया। जो कार्य उनने कर दिखाये, उनका आकलन करने वाले उन्हें किसी सिद्ध पुरुष से कम नहीं मान सकते।

शरीर अथवा स्वर का आकर्षण तो सामयिक है। कुछ ही समय उनकी चमक-दमक रहती हैं। अपने समय की मानी हुई नर्तकियाँ अभिनेत्रियाँ आयु ढलते ही बुढ़िया जैसी लगने लगती हैं। उनके चित्र देखने के लिए जो लोग लालायित रहते हैं, वे भी समय ढलते ही उपेक्षा करने लगते हैं और मुँह फेर लेते हैं। कंठ भी एक आयु तक ही मिठास और आकर्षण धारण किये रहता है। आयु का ढलान आते ही न वह स्वर का आकर्षण रहता है और न रंग रूप ही समय के साथ चमड़ी का आकर्षण न जाने कहाँ से कहाँ चला जाता है और समय बदलते ही लोग समझ जाते हैं कि आँखें जिस व्यामोह के कारण धोखा खाती रही हैं, कान जिनका शब्द सुनकर अपने आपको भूल जाते रहे हैं, यह सब मात्र छलावा था।

व्यक्तित्व मनुष्य के चिंतन व चरित्र पर अवलम्बित है। सेवा और परमार्थ ही मनुष्य का वह आकर्षण बनाये रहता है जो जन्म जन्मांतरों तक आभा रहित नहीं होता। आदर्शवादी व्यक्तित्व और सेवा संलग्न कर्तव्य ही वह निधि है, जिसके क्षरण होने की कभी कोई आशंका ही नहीं की जानी चाहिए।


सद्विचार ही करेंगे समाज का उद्धार

“छोटी माता आ गई-छोटी माता आ गई”, कहते हुए बच्चों, युवकों, प्रौढ़ों, महिलाओं ने उसे घेर लिया। इस छोटी सी भीड़ से घिरी इस महिला की आँखों से सभी के लिए स्नेह झर रहा था। सभी मनों से उसके लिए श्रद्धा टपक रही थी। कुछ पल यों ही बीत गए। फिर एक ने उसके लिए कुर्सी ला कर रखी। वह बैठ गई। लगी एक-एक की परेशानी सुनने और समाधान सुझाने में। जादुई तरीके से प्रत्येक की परेशानी निबटती जा रही थी।

यह क्रम चल ही रहा था कि एक युवती महिला आगे बढ़ कर आयी। उसकी मुख मुद्रा से लग रहा था कि वह कुछ कहना चाहती है।

“कहो कुछ कहना है? सबकी श्रद्धा का केन्द्र बनी प्रौढ़ वय की महिला ने पूछा”।

“जी-वो-”। “निःसंकोच कहो पूछने वाली का स्नेहिल आग्रह था। मेरे पति मुझसे रुष्ट होकर घर से चले गए। “तो यदि आप मेरे घर भोजन करने चलें तो वह आपका आना जानकर अवश्य आ जाएँगे”।

“अभी चलें?” मुस्कराते हुए पूछा “बड़ी कृपा होगी।”

इतना सुनकर वह युवती महिला के साथ उसके घर की ओर चल दी और सचमुच उसका पति भी पहुँच गया। तीनों ने साथ-साथ भोजन किया। बीच-बीच में वह युवक को प्रेम भरी डाँट सुनाते हुए समझाती जा रही थीं। युवक भी अपने कमियों को स्वीकारता हुआ आगे से ऐसा न करने का वचन दे रहा था। उसके चमत्कारी व्यक्तित्व ने अमेरिका की सान-जुआन की इस बस्ती में न जाने कितने टूटतों को जोड़ा बिखरतों को सँवारा था। यह क्रम चल ही रहा था कि इतने में खबर आयी कि मिशिगन विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग के छात्र उनसे मिलना चाहते हैं। वे नवनिर्मित पुस्तकालय में उनका इन्तजार कर रहे हैं।

अच्छी आती हूँ कह कहकर वह चल पड़ीं।

पहुँचने पर सामान्य कुशल प्रश्न के बाद छात्रों ने कहा “यहाँ आने के बाद थोड़े ही समय में हम लोगों ने आपके चमत्कारी कृतित्व के कई किस्से सुने। क्या आप बताने की कृपा करेंगी कि कौन सा वह रहस्य है जिसके द्वारा आपने इस समूची बस्ती का कायाकल्प कर दिया”।

“विश्वास करेंगे?” “हाँ! क्यों नहीं?”

“तो सुनिये मानवीय दुःख, दारिद्रय, दैन्य, दुर्बलता संकट समस्याओं तथा विपत्तियों आपदाओं का कारण कहीं बाहर नहीं उसके अंतराल में है”। बाहर से तो वह पहले की अपेक्षा कहीं अधिक समृद्ध है साधन संपन्न है। पर अंदर से उतना ही रुग्ण है। अयोग्य व्यक्ति, अधिकार और मूढ़ मन्द मति लोग हथियार मिलने पर जिस प्रकार अनर्थ मचाते हैं ठीक वैसी ही स्थिति इन दिनों मनुष्य की है। इसका एक ही समाधान है सद्विचारों के द्वारा भावनात्मक परिष्कार।”

सो कैसे? सभी के मुख से एक साथ निकला। व्यक्ति के भावनात्मक स्तर में अवाँछनीयताओं के घुस पड़ने से ही तमाम समस्याएँ पैदा हुई हैं। इन समस्याओं का यदि समाधान करना है तो सुधार की प्रक्रिया भी वहीं से आरम्भ करनी पड़ेगी, जहाँ से ये विभीषिकाएँ उत्पन्न हुई हैं। अमुक समस्या का अमुक समाधान या सामयिक उपचार तो हो सकता है पर चिरस्थाई समाधान के लिए तो मूल भूत आधार को ही ठीक करना पड़ेगा। “तो वह रहस्य सद्विचार ही हैं छात्रों में से कुछ ने कहा। एक दम सही। इन्हीं से व्यक्ति और समाज का कायाकल्प होगा। इस छोटी-सी बस्ती में प्रयोग करने के बाद यह मेरा अपना निजी अनुभव भी है।

छात्रों का दल उनके कथन से सहमति जताकर चला गया और वह अपने काम में पुनः व्यस्त हो गई।

सद्विचार को आधार बनाकर सान-जुआन (लैटिन अमेरिका) की बस्ती का कायाकल्प करने वाली महिला थी “डोना फेलिया”। लोक सेवा के प्रतिदान में मिले जन सम्मान के बल पर वह वहाँ की मेयर बनीं और आजीवन अपने अभियान में निरत रहीं। आज भी जरूरत जन भावनाओं को सुधारने की है। परिष्कृत मानवीय व्यक्तित्व बाह्य परिस्थितियों में अपेक्षित सुधार लाए बिना न रहेगा।


दृष्टिकोण की परिपक्वता

धन वैभव बल, पराक्रम, सौंदर्य, श्रेय, यश आदि सम्पदाओं का उपलब्ध होना बहुत कुछ परिस्थितियों पर निर्भर है। अनुकूलता रहने पर सफलताएँ मिलती हैं किन्तु यदि प्रतिकूलताएँ आड़े अड़ जायें, व्यवधान खड़े हो जायें, सहयोग के स्थान पर विरोध का सामना करना पड़े तो यह भी हो सकता है कि सही निर्णय करने वाले और सही मार्ग पर चलने वाले को भी असफलता मिले।

बहुत से महामानव लौकिक दृष्टि से असफल भी हुए हैं। कष्ट सहते और प्राण गँवाते रहे हैं। कृष्ण को बहेलिये के बाण ने परलोक पहुँचाया। कितने ही देश भक्त फाँसी पर चढ़े कितने ही महामानवों को विरोधियों के हाथों प्राण गँवाने पड़े। ईसा, सुकरात, जोन ऑफ आर्क मेजीनी, भगत सिंह आदि को आदर्शवादी होने का पुरस्कार जीवन गँवा बैठने के रूप में हाथ लगा। गाँधी, मार्टिन लूथर जैसों को अकारण ही मृत्यु के मुख में जाना पड़ा। इतिहास में ऐसी अन्यान्य घटनाएँ भी हैं जिनमें अभीष्ट सफलताओं के निकट पहुँचते-पहुँचते स्थिति उलट गई और पराक्रम निष्फल हो गये।

किन्तु दृष्टिकोण के संबंध में यह बात लागू नहीं होती। यह स्वनिर्मित होता है। इसलिए उसे बदलना और किसी के हाथ में नहीं होता। उसे स्वयं ही सृजा जाता है और कोई चाहे तो उसे स्वयं ही अस्त-व्यस्त नष्ट-भ्रष्ट भी कर सकता है। इसमें मनुष्य की धारणा, मान्यता, भावना और विचारणा ही सब कुछ होती है। यदि चिन्तन में आदर्शवादिता का समावेश हो तो दृष्टिकोण उच्चस्तरीय बन जाता है। उसमें कच्चापन तभी तक रहता है जब तक बात सोचने-विचारने, कल्पना करते रहने तक सीमित रहती है। पर जब उसे व्यवहार में उतारना आरंभ कर दिया जाता है तो विचारणा और क्रियाशीलता का सम्मिलित स्वभाव बन जाता है। यदि उसे लगातार व्यवहृत होने दिया जाय। विक्षोभों को आड़े न आने दिया जाय। डगमगाने वाले अचिन्त्य चिन्तनों से जूझते रहा जाय तो स्थिति ऐसी बन जाती है कि उसमें परिपूर्ण दृढ़ता समाविष्ट रहे और उसे विचलित कर सकना किसी भी प्रतिकूलता के लिए संभव न रहे।

दृष्टिकोण उत्कृष्ट हो या निकृष्ट, अपना निजी संसार उसी प्रकार बनाकर खड़ा कर लेता है। आँखों पर जिस रंग का चश्मा पहना जाय समूचे दृष्टि क्षेत्र को उसी रंग में रंगा हुआ देखा जाता है। दृष्टिकोण के अनुरूप ही अपनी दुनिया का ढाँचा खड़ा होता है और उसे क्रिया का सँयोग होते रहने से निर्धारणों को विकसित होने का अवसर इसी प्रकार मिलता रहता है जैसे बोई हुई फसल में खाद पानी लगाते रहने से।

जिस व्यक्ति या वस्तु पर अपने पन की भावना का आरोपण किया जाय, वह परम प्रिय लगने लगती है। अपना कुरूप बच्चा भी दूसरों के सुन्दर बच्चों की तुलना में अधिक मनोरम लगता है। स्वजन संबंधी भी साधारण मनुष्यों की तरह ही होते हैं। पर उनके प्रति जितनी गहरी आत्मीयता सँजो ली जाय उसी अनुपात में वे अधिकाधिक प्रिय लगने लगते हैं। उनके बिछुड़ने पर उतना ही अधिक दुःख भी होता है। पड़ोसी के धर में किसी की मृत्यु हो जाय तो उस समाचार का कौतूहल मात्र होता है। श्मशान में अनेकानेक मुर्दे आये दिन जलते देखे जाते हैं पर उनके प्रति उपेक्षा भाव रहने से उनका अन्त्येष्टि क्रिया देखते हुए भी कोई आघात नहीं लगता। पर जब अपने परिवार का कोई स्वजन संबंधी बिछुड़ जाता है तो शोक संताप का ठिकाना नहीं रहता। मृत्यु सभी की एक जैसी होती है। अन्त्येष्टि कर्म में भी समानता रहती है, पर शोक की न्यूनाधिकता इसी अनुपात में होती है कि मृतक के साथ अपनी कितनी घनिष्ठता थी। यदि वह न हो और उपेक्षा की मनःस्थिति हो तो शोक होने, आघात मानने का कोई कारण शेष नहीं रह जाता। अपना सामान चोरी चले जाने पर बेचैनी एवं वेदना होती है। पर उतना ही पैसा या सामान किसी अन्य का चला जाय तो समाचार को सुनकर अपने को कोई व्यथा नहीं होती। यह वस्तुओं और व्यक्तियों के प्रति आत्मभाव की गहराई एवं उथलेपन की ही प्रतिक्रिया है जो एक दूसरे से सर्वथा भिन्न रहती है।

कुदृष्टि से देखने पर दीख पड़ने वाली सभी युवतियों के प्रति कामुकता के भाव जगते हैं और वे रमणी, कामिनी, वेश्या जैसी प्रतीत होती है। उनके प्रति अनैतिक व्यवहार करने को जो मचलता है, भले ही अवसर के अभाव में प्रत्यक्षतः वैसा करते न बन पड़े। इसके विपरीत यदि दृष्टि पवित्र रहे तो सभी युवतियों भगिनी, पुत्री जैसी पवित्र दीखती हैं। सरस्वती, लक्ष्मी, दुर्गा जैसी देवियों की प्रतिमाएँ युवतियाँ जैसी होती हैं। वे मातृवत् देवी स्तर की लगती हैं। पर वैसे ही चित्र यदि किसी नारी नर्तकी के हों तो उन्हें देखकर कुविचार मन में उठते हैं। यह दृष्टिकोण के परिवर्तन का ही प्रभाव है।

झाड़ी में भूत दीख पड़ना या पाषाण प्रतिभा में देवता के दर्शन होना वस्तुतः द्रष्टा की मनोदशा पर ही निर्भर है। जीवन के स्वरूप का निर्धारण दृष्टिकोण के अनुरूप ही होता है। एक व्यक्ति विलासी, लालची, निष्ठुर संकीर्ण, स्वार्थी स्तर का हो सकता है। दुर्व्यसनों दुष्प्रवृत्तियों में जुटा रह सकता है। पर दूसरा व्यक्ति जिसने जीवन को ईश्वर की परम पवित्र धरोहर माना है, उसे हर समय अपने व्यक्तित्व को परम पवित्र बनाने की आकाँक्षा रहती है। पुण्य परमार्थ की योजना बनाने में ही कल्पना एवं आकाँक्षा नियोजित रहती है। बुद्धि भी उसी दिशा में काम करती है और शरीर की गतिविधियाँ भी उसी प्रकार के क्रिया–कलापों में संलग्न रहती हैं। निकृष्टता अपनाना या उत्कृष्टता के मार्ग पर चल पड़ना एक दूसरे से सर्वथा भिन्न है। यह भिन्नता दृष्टिकोण की भिन्नता से ही उपजती है।

उथली कल्पनाएँ पानी के बुलबुले की तरह उठती और बैठती रहती हैं। उनमें स्थायित्व नहीं होता। किन्तु उन्हें यदि निरन्तर अपनाये रखा जाय, गंभीरतापूर्वक विचार करते रहा जाय तो उनमें परिपक्वता आती है और स्थिति सुदृढ़ बन जाती है। दृष्टिकोण में अनुभव भी होता है और अभ्यास भी। उसके पीछे चिन्तन भी काम करता है और मनन भी। इन सब के समन्वय से उद्देश्य लक्ष्य की एक दिशाधारा विनिर्मित होती है। संकल्प बनता है और वह गहराई में उतरकर व्यक्तित्व को एक विशेष ढाँचे में ढालता है जिसके कारण विचारणा और क्रिया का सुनिश्चित स्वरूप बनता है। यही दृष्टिकोण है। उसमें इतना बल होता है कि सैद्धान्तिक निश्चय और व्यवहारिक क्रिया−कलाप में सुनिश्चित रूप से एकीकरण हो जाता है यह एकात्मता ही व्यक्तित्व है। वह जैसा भी कुछ बन जाता है एक


Quotation

वचनों का बवण्डर भले ही समुद्र जितना विस्तृत क्यों न हो उससे आत्मा की प्यास नहीं बुझती। इसके लिए कर्म के चुल्लू का उपयोग करना पड़ेगा। भले ही वह आकार में छोटा हो।

प्रकार से सुनिश्चित बनकर रहता है। आसानी से बदलता नहीं, उसके अनुरूप व्यवहार भी बन पड़ने लगता है। भले और बुरे व्यक्ति इसी आधार पर राह पकड़ने और उसे अपनाकर निरन्तर चलते रहते हैं। यह चलना ऐसा होता है जो अभीष्ट गन्तव्य तक पहुँचे बिना रुकता नहीं।

तर्क, तथ्य, प्रमाण, उदाहरण के आधार पर मन्तव्य बनता है। विचारों को विश्वास के रूप में परिणत होने का अवसर मिलता है। किन्तु जब इसे संकल्प का रूप अपनाने की स्थिति तक पहुँच सकना बन पड़ता है तो उसे दृष्टिकोण की परिपक्वता कहते हैं। इसी आधार पर मनुष्य का भविष्य बनता है और उसका मूल्याँकन होता है। आज की परिस्थितियों में इसी चिंतन को अपनाना ही अभीष्ट है।


युग सन्धि के अगले दिन

समझदार और दूरदर्शी अध्यापक, अपने सभी विद्यार्थियों का हित समान रूप से चाहते हैं और उज्ज्वल भविष्य की ही कामना करते हैं। इतने पर भी परिस्थितियों के अनुसार उन्हें पृथक्-पृथक् प्रकार के व्यवहार करने पड़ते हैं। उद्दण्डता के प्रति नाराजी और प्रताड़ना में रहते तथा जिम्मेदारीपूर्वक अपना काम करते हैं, उन्हें तदनुरूप उपहार देने की भी व्यवस्था करते हैं। इन दो प्रकार के व्यवहारों में अध्यापक का कोई स्वार्थ नहीं होता, वरन् हित कामना के अनुरूप काम देने वाले तरीके ही वह अपनाता है।

नियन्ता ने भी दो ऐसे ही माध्यम अपने हाथ में रखे हैं, ताकि उनके सहारे परिस्थितियों के अनुरूप व्यवहार किया और काम चलाया जा सके। पापी नरक का त्रास भोगते हैं और पुण्यात्माओं को स्वर्ग-सुख का रसास्वादन करने का अवसर मिलता हैं। दंड प्रक्रिया का एक नाम महाकाल भी है, जो प्रताड़ना की-दुष्प्रवृत्तियों की व्यवस्था करता है। दूसरा पक्ष है-सुखद संभावना। अनुशासन में रहने वाले, मर्यादाएँ पालने वाले और मानवोचित सत्कर्मों को अपनाने वाले सुखद संभावनाओं के पात्र होते हैं। आलंकारिक कथा-गाथाओं में उसके कई नाम दिये गये है-पारस, कल्पवृक्ष तो प्रसिद्ध नाम है ही, एक तीसरा भी है-विश्वकर्मा। इन सब नामों के मूल में उद्देश्य मात्र यही है कि कर्म का प्रतिफल मिल कर रहता है। भले ही उसमें कुछ कारणवश विलंब लग जाय।

पिछले दो हजार वर्षों में लोगों ने विशेषतया शक्तिशाली वर्ग ने अपनी क्षमताओं का दुरुपयोग किया है, उसे मूलतः अनीति में उद्दण्डता-दुष्टता आदि में नियोजित किया है। उसका प्रतिफल सामने है। हम में से अधिकाँश शारीरिक और मानसिक त्रास सह रहे हैं। दुरुपयोग के कारण दरिद्रता का भाजन बनना पड़ता है। दुर्व्यवहार के कारण द्वेष और विग्रह बढ़ता रहता है। ईश्वरीय मर्यादाओं का उल्लंघन करने के कारण उन दैवी विपत्तियों का सामना करना पड़ रहा है, जिन्हें प्रायः पापात्मा लोग भुगतते हैं। निन्दा, भर्त्सना, अप्रामाणिकता, अविश्वास आदि का भाजन और दुर्घटनाओं के शिकार प्रायः ऐसे ही लोग बनते हैं।

जिन दिनों अनाचार का प्रचलन बढ़ जाता है, उन दिनों की परिस्थितियाँ ऐसी बन पड़ती हैं, जिन्हें कलियुग कहा जा सके। दुष्कर्म करने वाले अपने किये का दण्ड भुगतते हैं पर मूकदर्शक बन कर अनीति को देखते रहने वाले, प्रतिरक्षा न करने वाले भी अपनी कर्तव्यहीनता, असामाजिकता एवं कायरता के कारण उसी वर्ग में आ जाते हैं भले ही उनने प्रत्यक्ष दुष्कर्म न किये हों। ऐसी घटनाएँ घटित होती ही रहती हैं। कभी-कभी इसमें देर भी लग जाती है। आज का दूध का दही बनता है। आज का बोया बीज कई दिनों के बाद अंकुर बनता है और उसको वृक्ष में तो और भी देर लग जाती है।

पिछली दो सहस्राब्दियों में सत्ताधारियों ने, धर्मोपदेशकों ने, चतुरजनों ने, धनाध्यक्षों ने, कलाकारों ने अपने समय की धूर्तताएँ करने में कमी नहीं छोड़ी है। इस भूल के कारण अनाचार बढ़ता रहा है और उसकी प्रतिक्रिया इस प्रकार सामने आती रही है कि व्यक्ति और समाज का ढाँचा बुरी तरह लड़खड़ाने लगा है। इसी का प्रतिफल है कि सर्वत्र असंतोष और असमंजस अपने बुरे रूप में सामने आता रहा है। अगले दिनों यह स्थिति और भी भयंकर होने की संभावना है। इसी कारण सर्वत्र असंतोष विग्रह और अनाचार की मात्रा असाधारण रूप से बढ़ रही है और असंख्यों कुसंभावनाएँ एक के बाद एक उभरती चली आ रही हैं। यदि क्रम यही रहा, तो अगले दिन ऐसे दुर्दिन देखने को मिल सकते हैं, जिससे मानवी सत्ता और महत्ता दोनों ही संकट में पड़ी हुई दिखाई देने लगें।

स्रष्टा संतुलन का ध्यान रखता है। वह यह सब तभी तक सहन करता है, जब तक कि खेल-खिलवाड़ की प्रतिक्रिया सहनशक्ति की मर्यादा के भीतर रहती है। जब बात आगे बढ़ जाती है, तो उसे भी बड़े कदम उठाने पड़ते हैं। अस्पताल में जिस प्रकार भयंकर दुर्घटनाग्रस्त रोगी को उपचार क्रम में सबसे आगे रखा जाता है। ‘इन्टेन्सिव केयर’ की जाती है उसी प्रकार जहाँ अधिक भयंकर दुर्घटना की संभावना रहती है। वहाँ पहले हाथ डाला जाता है।

अन्याय करने और सहने वाले दोनों ही पातकी माने गये हैं। अनीतिपूर्वक प्राणहरण करने वाला और अन्याय के सामने सिर झुका देने वाला समान रूप से पाप का भागीदार माना गया है। साध ही वह भी पाप का भागीदार होता है, जो सब समझते हुए भी दूर से देखता रहता है प्रतिरोध का प्रयास नहीं करता।

भगवान तीनों पर ही नाराज होते हैं बिगड़ते को-बिगड़ने देना-यह मूकदर्शकों का-गैर जिम्मेदारी का काम है। भगवान ऐसा नहीं है। लोग भरा ही बिगाड़ करते हों, पर भगवान अन्ततः सब को सँभाल लेते हैं। बूढ़ा होने पर शरीर भर जाता है। घर वाले, कुटुम्बी उसे जला देते हैं, पर भगवान उसे नया जन्म देता है और फिर उसे हँसने- खेलने की स्थिति में पहुँचा देता है। पिछले दिनों बिगाड़ बहुत हुआ। प्रताड़ना का समय बीत चुका है। जो शेष रहा है, वह सन् डडडड से लेकर 2000 के बीच दस वर्षों में बीत जायेगा। इन दस वर्षों में महाकाल की दोहरी भूमिका संपन्न होगी, प्रसव-जैसी स्थिति होगी। प्रसव काल में एक ओर जहाँ प्रसूता को असह्य कष्ट सहना पड़ता है, वहाँ दूसरी ओर सन्तान प्राप्ति की सुन्दर सम्भावना भी मन ही मन पुलकन उत्पन्न करती रहती है।

युग संधि के यह दस वर्ष ठीक ऐसे ही दुहरी भूमिकाओं से भरे हुए हैं। पिछले दो हजार वर्षों में जो अनीति चलती रही है, उसकी प्रताड़ना स्वरूप अनेकों कठिनाइयाँ भी इन्हीं दिनों व्यक्ति के जीवन में, समाज की व्यवस्था में तथा प्रकृति के अवाँछनीय माहौल में दृष्टिगोचर होती रहेंगी। लोग अनुभव करेंगे कि पिछले दिनों जो बरता गया है, उसका समुचित दण्ड मिल रहा है और सिद्ध किया जा रहा कि भविष्य में ऐसी भूलें नहीं बरती जानी चाहिए। मनुष्य आपस में धोखेबाजी कर सकता है, पर स्रष्टा के नियम-विधान को झुठलाया नहीं जा सकता। स्रष्टा की आँखों में धूल झोंकना भी किसी के लिये संभव नहीं है। “जैसी करनी-वैसी भरनी” का उपक्रम सदा से चलता रहा है और सदा चलता भी रहेगा। इन दिनों की कठिनाइयों को इसी दृष्टि से देखा जाना चाहिये।

साथ ही यह भी स्मरण रखने योग्य है कि माता एक आँख जहाँ सुधार के लिए टेढ़ी रखती हैं, वहाँ उसकी दूसरी आँख में दुलार भी भरा रहता है। उसकी प्रताड़ना में भी यही हित-कामना रहती है कि सुधरा हुआ बालक अगले दिनों गलतियाँ न करे और सीधे रास्ते को अपनाते हुए सुख-सुविधा भरा जीवन जिये। वर्तमान युगसंधि काल इस दुहरी प्रक्रिया का सम्मिश्रण है।

अगले दिन सुन्दर संभावनाएँ भी अवतरित हो रही हैं। युगसंधि के वर्तमान दस वर्षों में ऐसा माहौल बन रहा है, जिसमें मनुष्य शाँति और सौजन्य के मार्ग पर चलना सीखे, कर्मफल की सुनिश्चित प्रक्रिया से अवगत हो और वह करे जो करना चाहिए उस राह पर चले, जिस पर कि बुद्धिमान को चलना चाहिए।


सच्चा प्रायश्चित (kahani)

कलिंग राज्य में अशोक ने आक्रमण करके असंख्यों का रक्त बहाया था। इस अहंकार का त्रास उनके भीतर सदा काँटे की तरह घूमता रहा। अंत में उन्होंने प्रायश्चित की ठानी। बौद्धधर्म ग्रहण किया। समस्त अर्जित संपदा धर्म चक्र प्रवर्तन के लिए दान कर दी। स्वयं भी भिक्षु जीवन जिये। अपने पुत्र महेन्द्र और पुत्री संघमित्रा को भी इस उच्च प्रयोजन में लगा दिया। इसी प्रकार होता है सच्चा प्रायश्चित।


महान कौन?

“कुछ भी कही भाई! आजकल के जमाने में महान तो वही है जिसके पास धन है।”

“तो अब महानता भी जमाने के अनुसार बदलने लगी।” मित्र के इस कथन पर दूसरे से रहा न गया। वह कह रहा था “चलो एक क्षण के लिए यह बात मान ली जाय तब तो लुटेरे ही महान होंगे और शोषक उत्पीड़क लोक पूज्य” कहने के स्वर में व्यंग का पुट था। “नहीं भाई महान वह है जिसके पास अकल होती है। आखिर जितने बड़े-बड़े काम हुए हैं सब अकलमंदों ने ही किए हैं, अपने साथियों में बढ़ती जा रही बहस को समाप्त करने के उद्देश्य से उसने अपनी टिप्पणी दी थी। पर कुछ भी तो असर नहीं हुआ काटने वाले ने इस भी काटते हुए कहा, दुनिया में जितना ध्वंस हुआ है वह भी अकल वालों की ही देन है। अभी हाल की बात ही लो हिटलर कुछ कम अकल का था, और जापान में डाले गए बमों के आविष्कारक भी बुद्धिमानों की ही जमात में थे। मुझे तो कभी-कभी लगता है इन बुद्धिमानों से बड़ा बुद्धू कोई नहीं है।”

“जब आप धन वालों को भी महान नहीं मानते, अकल वाले भी आपके अनुसार महान नहीं हैं तो फिर महान है कौन? आप ही बताइए”। आज सुबह से ही उनमें महानता के ऊपर निष्कर्ष विहीन बहस चल रही थी। ये सभी हिमालय भ्रमण के लिए आए थे और इधर कई दिनों से उत्तर काशी में ठहरे हुए थे। कार्यक्रम एक ही था। सुबह गंगा में स्नान करना फिर किसी दिलचस्प चर्चा में मशगूल होना। दोपहर के भोजन के बाद तनिक विश्राम करके घूमने निकल जाना। हाँ इनके दल नायक की दिनचर्या कुछ भिन्न थी और शायद ये उन्हीं के कारण रुके भी थे। दलनायक जिन्हें उनके साथी काका साहब कहते थे प्रातः स्नान आदि से निबट कर अपना सारा समय या तो ध्यान में बिताते थे अथवा पास के पहाड़ी गाँवों में जाकर उनके जीवन के अनेकों पहलुओं को जानने में आज भी वह रोज की तरह निकल गए थे।

संध्या की इस चर्चा में एक ने पुनः बात छेड़ी “बताया नहीं आपने कौन महान है? आपके अनुसार” मेरे अनुसार उसने दोनों की ओर देखते हुए कहा तो तपस्वी महान है जिसने अपने दोषों कल्मषों को गला डाला है” उनमें से तीसरे ने उत्तर दिया।

चर्चा चल ही रही थी कि किसी ने दरवाजा खटखटाया। खोलते ही काका साहब एक पंद्रह सोलह साल के पहाड़ी लड़के के साथ अन्दर आ गए। बैठते हुए पूछा “बहुत हँस रहे थे तुम लोग बात क्या थीं? बात यह भी हम लोग चर्चा कर रहे थे कि महान कौन है”? इस पर हमारे साथ रह रही हिमालय की आत्मा ने सारी बातों को काटते हुए कहा “कोई नहीं सिर्फ तपस्वी महान है—”।

अगर ऐसा नहीं है तो आप ही बताइए काका साहब तपस्वी को महान करार करने वाला बोल पड़ा। इसका कोई जवाब न देखकर वह बोले तुम्हारी किसी तपस्वी को देखने की इच्छा थी न इस बुद्धिसिंह के गाँव के पास एक साधु कठोर तपस्या में निरत हैं चलकर उनके दर्शन भी करेंगे रास्ते में महानता पर चर्चा भी कर लेंगे। तुम लोग भी चलो अन्य दोनों की ओर इशारा करते हुए उन्होंने कहा-घूमना भी हो जाएगा।

चारों एक साथ चल पड़े साथ में चल रहा पहाड़ी बालक बताने लगा। ज्ञानसू का पुल पार करके करीब दो मील किनारे-किनारे चलना पड़ेगा। वह लड़का काका साहब से बहुत घुल-मिल गया था। वह रोज उन्हें नए-नए स्थानों की सैर कराता बदले में वे भी उसे कुछ दे दिया करते किन्तु अब संबंध लेन-देन से ऊपर उठकर घनिष्ठ आत्मीयता में बदल चुका था। काका साहब उसी के द्वारा दी गई सूचनाओं के आधार पर साथ चल रहे नवयुवकों को बताने लगे-गंगा तट पर उनकी छोटी सी कुटिया है। शीतकाल में जब यहाँ बरफ पड़ती है यह श्यामला भूमि और पर्वतों पर लहराते चीड़ के वृक्ष भी श्वेत हिमवस्त्र ओढ़ लेते हैं। वे दिगंबर ही रहते हैं और मौन तो रहते ही हैं। इतना ही नहीं प्रतिदिन गंगा के बर्फीले पानी में तीन घण्टे नियमित खड़े रहकर जप करते हैं वर्षों से अबाध चल रही है उनकी साधना।

अनेकों तरह की चर्चा में पता नहीं चला, मार्ग कब समाप्त हुआ। पहुँच गए साधु के पास सचमुच उनके चेहरे पर साधननिष्ठता टपक रही थी। शीत ने शरीर के चमड़े को कठोर बना दिया था। कृष्ण वर्ण, अरुणाभी नेत्र बढ़ी जटाएँ प्रशाँत गम्भीर मुख तपस्या का तेज भाल पर धारण किए वह मौन थे। दर्शन प्रणाम के बाद जब वे सभी लौटने लगे तो बालक ने अनुनय की “पास में मेरा गाँव है मेरे घर भी चलें। रोज अपने माता-पिता से आपके बारे में बताया करता हूँ”।

बात ठीक भी थी सभी एक साथ उसके घर पर पहुँचे। एक सरल पर्वतीय घर के आतिथ्य ने सभी को विभोर कर दिया। आज की कृत्रिम सभ्यता में कहाँ मिलता है ऐसा अकृत्रिम प्रेम। अचानक उन्हें कुछ ध्यान आया, पूछ पड़े अरे बुद्धू तुम्हारा वह पगला कहाँ है? मैं उससे जरूर मिलना चाहता हूँ। उसके संबंध में बुद्धिसिंह अनेक बार चर्चा कर चुका है। जो रात वर्षा में बढ़ी नदी को, वन्य पशुओं के भय को भी भूलकर किसी के लिए चाहे जब उत्तरकाशी भेजा जा सकता है। किसी के लिए चाहे जब उत्तरकाशी भेजा जा सकता है। किसी का कोई काम करने से कभी इन्कार नहीं करता।

पता लगाता हूँ बाबू जी। बुद्धिसिंह के पिता ने अपनी कन्या को पर्वतीय भाषा में कुछ कहा और बच्ची घर से चली गई।

बुद्धिसिंह के पिता उस पगले के बारे में बताने लगे उसे क्रोध तो कभी आता ही नहीं। वह दिन भर काम में जुटा रहता है कुछ भी न हो तो सारा दिन रास्ते के पत्थरों काँटों को कटाने में बिता देगा। गाँव की सफाई करने लगेगा बीमार की टहल करने बिना बुलाए जा पहुँचता है। इस पर भी सबसे बड़ा आश्चर्य है कि वह मन्दिर में नहीं जाता। बुद्धिसिंह ने बताया-मन्दिर में जाने को कहने पर कहता है उसके तो बहुत नौकर हैं। मैं क्यों करूं उसकी नौकरी? तेरी नौकरी करूंगा मैं।

सहसा एक फटे, चिथड़े पहने कुछ ठिगना गोरे रंग का अधेड़ पर्वतीय आ पहुँचा। उसके पैर बिवाइयों से फटे हुए थे। उसकी अँगुलियाँ मोटी और कठोर थीं। उसका शरीर भी मैला सा किन्तु उसके निर्मल नेत्र बालसुलभ हास्य और चमकता चेहरा बरबस अपनी ओर खींच लेते थे।

पगला है। बुद्धिसिंह हँस पड़ा।” आइए बैठिए-”! उन्होंने उसे कंबल पर बैठने को कहा और वह बिना किसी संकोच के उनके सामने बैठ गया। बैइने पर उससे पूछा “सुना है तुम मन्दिर नहीं जाते। वह अचकचा कर बोला जीते जागते इंसानों में जो भगवान नहीं खोज सका वह इमारतों और मूर्तियों में कहाँ ढूँढ़ पाएगा बाबू?” उसके कहने का स्वर कुछ ऐसा था कि अंतर पिघल उठा “एको देवः सर्वभूतेषु गूढ़ः वाली श्रुति जैसे साकार हो उठी।

वे सभी अपनी धर्मशाला की ओर लौट रहे थे, बुद्धिसिंह अपने घर में रह गया था। उन्होंने साथी नवयुवकों की ओर देखते हुए कहा-”ढूँढ़ पाए महानता कहाँ है कौन महान है? धनवान या अकलमंद अथवा वह साधु जो अपनी साधना में तनिक सा विघ्न उपस्थिति करने वाले को पत्थर मार कर भगा देते हैं।”

सुनने वाले चुप थे किसी को जवाब नहीं सूझ रहा था। एक ने कहा “हम लोगों की अकल नहीं काम कर रही काका साहब यह पहेली आप ही सुलझाइए।”

तो सुनो वह बोलने लगे महानता न धन में है और न अकल में यह तपस्या में भी नहीं है। इसका निवास तो संवेदनशील हृदय में है। जनहित के लिए सर्वस्व न्यौछावर करने वाली वृत्ति में है। जिसके दिल में ये भाव छलक रहे हैं तो लोक कल्याण के लिए बड़े से बड़ा कष्ट सहने में नहीं हिचकिचाता वही महान है। धन बुद्धि और तप के तीनों तो अलग-अलग प्रकार की शक्तियाँ भर हैं। भाव संवेदना से अलग होने पर धन अपने वैभव का कीड़ा ले गरीबों दीन हीनों पर कहर बरसाता है, बुद्धि विनाश के सरंजाम जुटाकर भी अपने ठसके में अकड़ी चलती है और तप तो सिद्धि, चमत्कार के घमण्ड में शाप वरदान की शेखी में पड़ा रहता है। जबकि भाव संवेदना से जुड़कर धन भामाशाह जमना लाल बजाज, बिड़ला पैदा करते हैं, अक्ल सुकरात और जगदीश चंद्र बसु और तप महात्मा बुद्ध ऋषि दयानंद तैयार करता है।

वे आगे बोले-”जिसके पास इन तीनों में से एक भी न हो, वहाँ जनसेवा में निरत भोले भाले पगले के रूप में महानता जन्म लेती है। क्या उसकी अंतः सम्पदा किसी तपस्वी से कम है? सभी एक साथ बोल पड़े- निश्चित ही नहीं।

महानता की खोज में मंथन कर रहे नवयुवकों को अब वह निष्कर्ष मिल गया था, सूत्र हाथ लग गया था, जीता जागता उदाहरण देखकर अपनी हिमालय यात्रा के दौरान महानता का यह तत्वज्ञान समझाने वाले सज्जन थे-गाँधी जी के अन्यतम सहयोगी- दत्तात्रेय-बालकृष्ण कालेलकर।


सही अर्थों में जीवनमुक्ति की परिभाषा

अद्वैत कहते हैं एकात्मा को। जब दो सत्ताओं का विलय-विसर्जन एक में हो जाता है, तो यह अद्वैत की स्थिति कहलाती है। भक्त का भगवान में, नर का नारायण में आत्मा का परमात्मा में मिलन-संयोग ही एकात्मा की स्थिति है। यह स्थिति प्राणी, पदार्थ और प्रकृति में समान रूप से पायी जाती है, जो आवश्यक और उपयोगी भी है।

सूर्य, प्रकाश बाँटने में कभी भेद-भाव नहीं करता। वह यह नहीं सोचता कि अमुक व्यक्ति महान है या क्षुद्र, ऊँच है या नीच, राजा है या रंक। वरन् सभी को समान रूप से प्रकाश प्रदान करता है। इसी प्रकार स्थान-भेद भी उसमें नहीं पाया जाता। यह नहीं विचारता कि कौन स्थान अच्छा है और कौन खराब, कौन गंदा है और कौन स्वच्छ, अपितु समदृष्टा भाव से हर वातावरण पर रोशनी बिखेरता है। यह समता भाव ही अद्वैत की स्थिति है। जिस दिन सूर्य संकीर्ण और कृपण बन कर ताप और प्रकाश देना संसार को बन्द कर देगा, उसी दिन वह जल कर भस्म हो जायेगा उसकी प्रचण्ड ऊर्जा उसे ही जला कर राख कर देगी। पर ऐसा होता अब तक देखा नहीं गया। वह संसार-सृष्टि की आवश्यकता को समझते हुए निरंतर जलता रह कर अपनी ऊर्जा का अजस्र अनुदान लुटाता रहता है।

हवा जब बहती रहती है, तो वह सुगंधित, सुरभित बनी रहती है, किन्तु जब वह एक कमरे में बन्द होकर सीमित-संकुचित हो जाती है, तो सीलनयुक्त बदबूदार बन जाती है। वायु का द्वैत भाव जाग्रत होकर जैसे ही औरों की उपेक्षा आरंभ करता है, उन्हें अपनी शीतलता व सुख से वंचित करता है, वैसे ही हाथों हाथ इसका दुष्परिणाम भी उसे भुगतना पड़ता है। वह दूषित हो जाती है।

परमाणु के मूल कण यदि उससे विलग रहना चाहें तो क्या वह संभव है? इस स्थिति में तो वे अपना अस्तित्व भी सुरक्षित नहीं रख सकेंगे। वस्तुतः मिलकर रहने में अद्वैत भाव में ही सब की सुरक्षा है। बूँद समुद्र-सरोवर के लिए है। उनके साथ एकाकार रहने में ही उसका श्रेय, सौभाग्य और जीवन है। पत्थर यदि इमारत की नीम में लगने के लिए तैयार न हो, तो वह कौड़ी मील का रह जाता है। ऐसे रोड़े तो यत्र-तत्र हजारों पड़े रहते हैं, और नित्य कुचले-रौंदे जाते रहते हैं। पर वे ही जब भवन, अट्टालिकाओं में प्रयुक्त होते हैं, तो हजारों लाखों के बन जाते हैं। यह एकात्मता का परिणाम है। पत्थर अपने पृथक् अस्तित्व रखते हुए भी इमारत बन कर रहते हैं। यह अद्वैत का लाभ है। इसी को अनेकता में एकता कहा गया है।

यह एकता और एकात्मता न सिर्फ प्रकृति और पदार्थ के लिए आवश्यक है, वरन् मनुष्य के लिए भी समान रूप से जरूरी है। मनुष्य समाज में रहता है, वह उसकी रचना करता और उन्नति-प्रगति की बात सोचता है। बदले में समाज भी उसकी देख-रेख शिक्षा-दीक्षा, जीवन-यापन आदि का प्रबंध करता है। प्रकारान्तर से इसमें भी एकत्व का भाव है। मनुष्य यदि स्वयं की ही चिन्ता करने लगे और समाज की परवाह करना छोड़ दे, उससे पृथक हो जाय, तो क्या वह जिन्दा रह सकेगा? फिर उसे भोजन, वस्त्र, शिक्षा, साधन कौन देगा। जीवन की अन्य अनेकानेक आवश्यकताओं की पूर्ति में उसकी मदद कौन करेगा? निस्संदेह इसके लिए उसे समाज का अभिन्न अंग बन कर रहना पड़ेगा। परस्पर शरीर और मस्तिष्क का संबंध अनुभव करना पड़ेगा। जैसे ही उसके मन में व्यक्ति और समाज के अस्तित्व के प्रति दो पृथक् भाव पैदा होंगे, उसका जीवन संकट में पड़ जायेगा। इससे बचने का एक ही उपाय है कि वह समाज में घुल-मिल कर रहे, उसे अपने शरीर का एक भाग समझे और उसी के अनुरूप उसके अभ्युदय व विकास की बात सोचे। इसी में उसकी स्वयं की गति-प्रगति और समाज का कल्याण है, अन्यथा जिस दिन उसमें सड़न पैदा हुई, व्यक्ति अपने को भी सुरक्षित नहीं रख पायेगा, उससे प्रभावित होगा और विनाश के गर्त में समा जायेगा।

अद्वैत का अर्थ है-अहंकार नाश। जब तक व्यक्ति अपने अहं को नहीं मिटाता, तब तक उससे द्वैत भाव का परित्याग नहीं बन पड़ता। इस स्थिति में दूसरों के प्रति स्नेह-श्रद्धा का विकास नहीं हो पाने के कारण सामने वाला व्यक्ति सदा तुच्छ जान पड़ता है। उपेक्षा भाव भरा रहने के कारण समाज में घुलना-मिलना भी संभव नहीं हो पाता, फलतः ऐसा कोई कार्य नहीं बन पड़ता, जिससे उसे समाज का शुभचिन्तक कहा जा सके। पर जैसे-जैसे उसका अहं गलता जाता है, सेवा कार्यों के प्रति रुचि बढ़ने लगती है, वह तदनुरूप प्रवृत्ति अपनाने लगता है। जनता में जनार्दन की, विराट ब्रह्म की झाँकी होने लगती है और वह उनसे ऐक्य का अनुभव करने लगता है।

अद्वैत अर्थात् प्रेम। यह प्रेम ही वह माध्यम है, जो एक को अनेक से जोड़ता है, दूसरों में अपनत्व का अनुभव कराता एवं परायेपन का भाव मिटाता है। जिस दिन मनुष्य प्रेम तत्व का परित्याग कर देगा, उस दिन से सारा संसार उसके लिए नीरस अरुचिकर, उबाऊ प्रतीत होने लगेगा। यहाँ तक कि घर-परिवार से, स्नेही कुटुम्बियों के प्रति भी रुचि समाप्त हो जायेगी और उसका स्वयं का जीवन ही भारभूत बन जायेगा। फिर उससे समाज के लिए तो क्या, अपने लिए भी कुछ करते-धरते न बन पड़ेगा और समाज में रहते हुए भी एकाकीपन अनुभव करेगा। यह स्थिति प्रेम के विकास से ही समाप्त हो सकती है। तभी व्यक्ति स्वार्थ के सीमित दायरे से निकल कर अपना आत्म-विस्तार कर सकता और समाज से, विराट ब्रह्म से गहन तादात्म्य अनुभव करता है। ऐसी दशा में सारे लोग उसे स्वजन और समस्त विश्व अपना परिवार महसूस होता है। फिर उससे जो कार्य बन पड़ता है, उसमें अपने-परायेपन का कुछ भेद-भाव होता ही नहीं। समस्त कार्य अपने निजी जान पड़ते हैं और वैसी ही तत्परता व निष्ठा से वह उसे पूरा करता है। महापुरुषों, महामानवों में यही विशेषता होती है। वे इतना प्यार लुटाते अपना बन जाता है। वे स्वयं में उनकी और उन में स्वयं की अनुभूति करने लगते हैं। यही समर्पण विलय, विसर्जन है। आत्मसत्ता का विराट ब्रह्म सत्ता से एकाकार। इसी स्थिति में कार्य उच्चकोटि के बन पड़ते हैं।

प्राचीन चीन में चित्रकारों को जब किसी वृक्ष, गुल्म या झाड़ी का चित्र बनाना होता था, तो वे उसके निकट तब तक बैठे रहते थे, जब तक उसकी अनुभूति न हो जाती। जब वे स्वयं अपने को उसके साथ एकाकार अनुभव करने लगते, तभी तस्वीर बनाना आरंभ करते थे। इस अवस्था में जो भावाभिव्यक्ति होती, वह ऐसी सजीव होती, मानो साक्षात् उस गुल्म को उखाड़ कर कागज पर रख दिया गया हो।

अद्वैत भाव की इसी स्थिति में सच्ची सेवा भी बन पड़ती है। जब तक व्यक्ति दूसरे की पीड़ा व वेदना की स्वयं अनुभूति नहीं कर लेता तब तक उसके अन्दर वह कसक भी पैदा नहीं हो पाती कि उससे किसी की सहायता बन पड़े। ऐसा मनुष्य जाति से गहन एकात्मता का अहसास करने पर ही संभव है और यह स्थिति तभी उत्पन्न हो सकती है, जब हमारे अन्दर प्रेम का विकास हो समाज प्रेम, राष्ट्र प्रेम, विश्व प्रेम, तथा मानव प्रेम। इससे कम में मन का तार मन व मानवता से जुड़ ही नहीं सकता, अपनत्व का अनुभव हो ही नहीं सकता। इसीलिए ऋषियों ने भी इसकी आवश्यकता को समझते हुए इसे विकसित करने का निर्देश किया है-

सहनाववतु सह नौ भुनक्तु सहवीर्यम् करवावहै। तेजस्विनावधीतमस्तु मा विद्विषावहै॥

निश्चय ही, स्नेह-सौजन्य के विकास से ही परायेपन और द्वैत भाव का पलायन हो सकता है। नदी अपने भीतर कितने ही प्रवाहों को उदारतापूर्वक समेट कर समभाव हो जाती है। यदि वह इनसे घृणा करे और इनके मिलन-समागम पर आपत्ति करने लगे, तो उसका स्वयं का अस्तित्व भी खतरे में पड़ सकता है, असमय सूख सकती है। अतः नदी की गति प्रवाहों को अपने में समन्वित कर लेने और प्रवाहों का विकास नदी से आत्मसात् हो जाने में ही है। इसी को द्वैत भाव का नाश और अद्वैत में अवस्थित होना कहा गया है। कार्ल मार्क्स के शब्दों में “बन फॉर ऑल एण्ड ऑल फॉर वन” की यही स्थिति है। स्वर्ग-मुक्ति का आनन्द इसी में है। मनुष्य-समाज का यही चरम लक्ष्य है।


कौन अपना, कौन पराया?

इंजन ने सीटी दी। गार्ड ने हरी झण्डी लहराई और गाड़ी सरकने लगी। शनैः-शनैः किन्तु तेजी से अनगिनत पहियों की लोहे की पटरियों पर फिसलन बढ़ती जा रही थी। साथ ही बढ़ रही थी मायूसी उनके चेहरों पर जो भीड़ के कारण नहीं चढ़ पाए थे। किन्तु वह पायदान पर पैर रखे अपनी दुर्बल अंगुलियों से दरवाजे की छड़ को पकड़े लटका था। इसी प्रयास में कि शायद अन्दर जा सके। मरियल सी सूखी वृद्ध काया को दरवाजे का लौह दण्ड कब तक थामे रहेगा, कुछ कहा नहीं जा सकता।

उसकी निस्तेज आँखें देख रही थीं, एक-एक को परख रही थीं प्रत्येक की मानवीयता को। शायद किसी को तरस आ जाए और उसे अन्दर घुसने की राह मिल जाय। ऐसा नहीं था कि डिब्बे के अंदर बिल्कुल जगह नहीं थी। थी तो पर किसी न किसी के कब्जे में। कोई पैर फैलाए बैठा था, किसी ने सामान जमा रखा था। भावनाशून्य निष्ठुरों का व्यवहार, इससे अधिक और हो भी क्या सकता है। वह कहीं भी रहें, अपनी संकीर्ण मनोवृत्ति प्रदर्शित करने से बाज नहीं आते। इस संकीर्णता का शिष्टता, शालीनता परदुखकातरता से क्या रिश्ता? ये गुण तो मानवों के लिए हैं। फिर रेल के कंपार्टमेंट में घुसे ये सब कौन थे? होंगे कोई, पर कम से कम मानव तो नहीं। बूढ़े की आँखें अभी निराश नहीं हुई थीं। वह ताक रही थीं-तलाश रही थीं किसी इन्सान को जिसकी अपनी विशिष्टतापरक रीति-नीति हो- परमदुःख कातरता।

इतने में खिड़की के सहारे सीट पर बैठे एक युवक ने बाहर की ओर झाँका। हवा में लहराते कपड़े दिखे। उसने अपनी ही सीट में बैठे अन्य युवक की बाँह हिलाते हुए कहा लगता है कोई बेचारा लटका हुआ है। तो? चलो देखते हैं कौन है? कह कर युवक उठा अपने साथी को उठाया। यदि सीट चली गई तो? भला यह कैसे जायेगी? इसके पैर तो हैं नहीं ज्यादा से ज्यादा कोई बैठ जायेगा। उठो! दोनों युवक भीड़ चीरते हुए आगे बढ़े-दरवाजे तक पहुँचे। बूढ़ा अभी भी जैसे-तैसे लटका हुआ था। शरीर की सारी ताकत अँगुलियों में निचोड़ कर लाने के बाद भी अब दरवाजा थामने की दम नहीं बची थी। एक-दो क्षण बाद वह गिर ही पड़ता कि युवक की बलिष्ठ बाँहों ने उसे थाम लिया। उसकी जान में जान आयी। सजल नेत्रों से उसने कई बार युवक को देखा। मानो स्वयं को विश्वास दिलाना चाहता हो कि इन्सान अभी बाकी हैं, इंसानियत जिन्दा है।

युवक उसका हाथ थाम कर बढ़ा भीड़ चीर कर अपनी सीट पर पहुँचा और बूढ़े को अपनी सीट पर बिठा दिया। उसके रोम-रोम से युवक के प्रति आशीर्वाद झर रहा था। बड़ी मुश्किल से उसके कण्ठ से वाणी फूटी तुम दोनों चिरंजीवी हो, तुम्हारा यह अहसान हमेशा याद रहेगा।

इसमें अहसान क्या यह तो फर्ज है। फर्ज? बूढ़े ने प्रश्नवाचक निगाहों से युवक की ओर ताका, और नहीं तो क्या। व्यवहार की खिड़कियों से व्यक्ति का समूचा जीवन झलकता है, उसकी इंसानियत परखी जाती है। आचरण की वे छोटी-छोटी बातें जीवन के साइन बोर्ड पर चमकते वह अक्षर हैं, जिन्हें देखकर कोई भी सहज अन्दाजा लगा सकता है यह कौन है? कैसा है? किस उद्देश्य के लिए जी रहा है? इसी के आधार पर समूची जिन्दगी की कीमत आँकी जाती है। सम्मान, तिरस्कार, विश्वास, अविश्वास का मन इसी आधार पर बनता है।

बूढ़ा ही नहीं पास खड़े, बैठे सहयात्री भी युवक के इस कथन को सुन हतप्रभ थे। आचरण की सामान्य बातें इस कदर महत्वपूर्ण हैं यह आज पता चला।

आप का शुभ नाम- एक ने सवाल किया। दोनों युवकों ने एक-दूसरे को मुस्करा कर देखा फिर हँसते हुए बताया-मेरा नाम है-भगतसिंह और ये हमारे साथी राजगुरु। इसी बीच अगला स्टेशन आया गाड़ी धीमी-और वे उतर कर चल दिये- अपने गन्तव्य की ओर सही अर्थों में उनने जीवन जीना सीखा था।


मनुष्य अपनी छठी इन्द्रिय विकसित कर सकता है

जीव जन्तुओं पशु पक्षियों, की तुलना में मनुष्य भले ही बुद्धिमान, विवेकवान और विकसित क्यों न हो? किन्तु अतीन्द्रिय सामर्थ्य के क्षेत्र में वह इन निरीह प्राणियों से पीछे हैं। मनुष्येत्तर प्राणियों में भी ऐसी विशेषताएँ पाई जाती हैं, जिनके रहते वह प्रकृति और वातावरण से समन्वय और संगति बैठा कर अपना अस्तित्व बनाए रखने में सफल रहते हैं। प्रकृति ने इन क्षुद्र प्राणियों को इन क्षमताओं से विभूषित न किया होता, तो बुद्धि और विवेक तथा बल और शक्ति के अभाव में अब तक ये प्रजातियाँ कब की विलुप्त हो गई होतीं। साधारणतः सृष्टि का ज्ञान पंचेन्द्रियों से ही होता है। किन्तु वैज्ञानिक शोधों से ज्ञात हुआ है कि इसके अतिरिक्त छठी इन्द्रिय भी हैं, जो इन पांचों से परे अति सूक्ष्म की जानकारी देने में समर्थ है। प्राणि जगत में यही छठी इन्द्रिय अधिक विकसित पाई जाती है और इसी के उपयोग से वे जीवन के क्रिया-कलाप चलाते देखे जाते हैं।

चूहों के नवजात शिशु यदि अपनी माँ से बिछुड़ जाते हैं अथवा किसी विपत्ति में फँस जाते हैं तब वे अश्रव्य ध्वनि में चीखते हैं, जिसे मनुष्य चाहे भी तो नहीं सुन पाता किन्तु शिशुओं के अभिभावकों को अश्रव्य ध्वनि के माध्यम से जानकारी प्राप्त हो जाती है और इतना ही नहीं, वे इन अश्रव्य ध्वनि तरंगों की दिशा का भी ज्ञान कर पाने में समर्थ होते हैं। वे उस सही स्थान पर आनन-फानन में पहुँचने में सफल हो जाते हैं। इसी प्रकार वेस्टइण्डीज में पाया जाने वाला ‘आँइल वर्ड’ पक्षी अँधेरी गुफा में छिप कर रहता है। किन्तु चमगादड़ों की भाँति अँधेरे में भी अल्ट्रासोनिक ध्वनि तरंगों के माध्यम से सही रास्ते, तथा दुश्मन की जानकारी प्राप्त कर लेता है।

महासागरों की अथाह गहराई में विचरने वाली डॉल्फिन एवं व्हेल मछलियाँ भी सोनार ध्वनि तरंगों के माध्यम से अपना आहार एवं मार्ग, खोजती और शत्रु की जानकारी प्राप्त कर लेती तथा बचाव करती हैं। स्ट्रिंग रेंज जलजीव को अद्भुत क्षमता प्राप्त है। वह बालू रेत में छिपे जीव जन्तुओं की खोज अपने शरीर से विद्युत आवेश का प्रवाह छोड़ कर करता है। जीवों के छिपने की जानकारी विद्युत प्रवाह में अवरोध आने से हो जाती है। इस तरह वह छिपे जीव जन्तुओं को खोजकर अपनी आहारपूर्ति कर लेता है। “रेटल स्नेक” रेंगता साँप अपने इर्द-गिर्द घूमने वाले क्षुद्र जीवों का अँधेरे में ऊष्मा चित्र बना कर उनकी उपस्थिति ज्ञात कर लेता है। क्योंकि उसके नथुनों के इर्द-गिर्द एक विशेष प्रकार की संवेदनशील झिल्ली होती है, जिसमें लाखों संवेदनशील कोशिकाएँ होती हैं, जिनसे वह अपने शिकार की उपस्थिति की जानकारी कर लेता है। यह संवेदनशील झिल्ली मनुष्य में भी होती है, किन्तु उसमें प्रतिवर्ग इंच केवल 19 कोशिकाएँ ही पाई गई, जबकि साँप के नथुनों के पास पाई जाने वाली झिल्ली के इर्द-गिर्द प्रति वर्ग इंच डेढ़ लाख संवेदनशील कोशिकाएँ होती हैं

ईश्वर सभी प्राणियों को अतींद्रिय क्षमताओं से संपन्न बना कर संसार में भेजता है। किन्तु मनुष्य द्वारा सबसे अधिक प्राकृतिक नियमों की अवहेलना, मर्यादाओं का उल्लंघन अनुशासनों का अतिक्रमण किया जाता है। भ्रष्ट आचरण करने, अचिंत्य चिन्तन करने से उसकी यह क्षमता नष्ट होती चली जाती है। यदि वह पवित्र आचरण को अपनाये तथा अपनी बुद्धि को भटकाव से रोक कर अपनी प्रसुप्त क्षमताओं को जगाने की प्रक्रिया संपन्न कर ले तो वह भी अपनी छठी इन्द्रिय को जगा सकता है। इसके लिए आवश्यक है अंतःकरण का परिष्कार, पात्रता का विकास तथा उच्चस्तरीय तप पुरुषार्थ।


प्रार्थना में है-चमत्कारी शक्ति

अध्यात्मवेत्ताओं ने ईश्वरीय सहायता उपलब्ध करने हेतु प्रार्थना को सर्वोत्तम एवं उच्चस्तरीय माध्यम बताया है। प्रार्थना की अद्भुत चमत्कारिक शक्ति के समक्ष नास्तिकों तक को अपनी मान्यताओं में परिवर्तन करते और आस्तिक बनते देखा गया है। सुख, शाँति और प्रगति का वास्तविक आधार आस्था है। भावभरी श्रद्धा एवं विश्वास के आधार पर घोर संकट के क्षणों में भी उसकी आन्तरिक पुकार पर ईश्वर की प्रत्यक्ष एवं परोक्ष सहायता घटाटोप बनकर बरसती और उबार लेती है।

विश्व इतिहास के पत्रों में ऐसे अगणित उदाहरण भरे पड़े हैं, जिनमें किसी को उसकी आन्तरिक पुकार पर दैवी सहायता उपलब्ध हुई। ध्रुव, प्रह्लाद, मीरा, नरसी मेहता आदि की कथा-गाथाएँ प्रसिद्ध हैं। एकाकी प्रयत्नों की अपेक्षा सामूहिक रूप से की गई प्रार्थना अधिक बलवती होती है और देखते ही देखते असंभव को संभव बनाकर रख देती है। प्राण रक्षा एवं स्वास्थ्य रक्षा के रूप में इस तरह की कितनी ही घटनाएँ सामने आती रहती हैं। आवश्यकता मात्र अपने अन्तःकरण को ईश्वर की ओर उन्मुख करने भर की है।

इस संदर्भ में विख्यात चिकित्सा विज्ञानी डॉ. अलेक्सिस कैरेल ने गहन खोजे की हैं और “मैन द अननोन” नामक पुस्तक में उन अनुसंधानपूर्ण अनुभवों को प्रकाशित किया है। वे स्वयं कैन्सर रोग के विशेषज्ञ थे और उसके अनुसंधान एवं उपचार के लिए किये गये प्रयासों के लिए अंतर्राष्ट्रीय पुरस्कारों से सम्मानित भी हो चुके थे। उनके आश्चर्य का तब ठिकाना न रहा, जब एक मरणासन्न कैंसर रोगी को उनने प्रार्थना-चिकित्सा द्वारा पूर्ण रूप से स्वस्थ होते देखा। परीक्षण करने पर पाया गया कि उस स्थान पर मात्र रोग के चिह्न भर रह गये थे और रोगी रोग मुक्त हो चुका था। यह वह रोगी था, जिसे उनने स्वयं असाध्य घोषित कर जवाब दे दिया था। इस घटना के पश्चात् उनने अपनी मान्यता में परिवर्तन करते हुए कहा कि प्रार्थना सृष्टि की सर्वाधिक शक्तिशाली ऊर्जा है, जो मनुष्य के मन-मस्तिष्क एवं उसके द्वारा संचालित संपूर्ण काय तंत्र को इच्छित दिशा में क्रियाशील होने के लिए विवश कर देती है और तदनुरूप अन्दर-ही-अन्दर प्रतिरक्षी प्रक्रियाएँ सक्रिय हो उठती हैं। प्रार्थना का लाभ न केवल भौतिक स्वास्थ्य के रूप में हस्तगत होता है, वरन् बौद्धिक प्रखरता, मानसिक ओजस्विता एवं आत्मिक प्रसन्नता के रूप में भी मिलता है। इसके अतिरिक्त महत्वपूर्ण ईश्वरीय सत्ता का भी बोध होता है।

अपने समय के ख्यातिलब्ध शल्य-चिकित्सक एवं रॉयल कॉलेज ऑफ सर्जन्स, लन्दन के वरिष्ठ सदस्य डॉ. होवार्डसमरवेल ने अपनी कृति-”ऑपटर एवरेस्ट” में इस तरह की कई घटनाओं का सविस्तार वर्णन किया है कि जिसमें चिकित्सकों द्वारा असाध्य घोषित किये गये रोगियों ने प्रार्थना द्वारा नव जीवन प्राप्त किया। अपने हिमालय अभियान के समय देखे गये एक भारतीय शिक्षक की घटना का उल्लेख करते हुए वे लिखते हैं कि उक्त शिक्षक के दोनों पैर क्षय रोग के कारण बेकार हो गये थे। तमाम उपचार करने के पश्चात् भी जब सुधार के कोई लक्षण नहीं दीखे, तो डॉक्टरों के पास उन्हें काटकर अलग कर देने के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं रहा। इस नीति से जब रोगी को अवगत कराया गया, तो उसने चिकित्सकों से 21 दिन का अवसर माँगा और छुट्टी लेकर वापस आ गया। इस अवधि में वह निरन्तर परिवार के सदस्यों के साथ अपने स्वास्थ्य रक्षा के लिए सामूहिक प्रार्थना करता रहा। तीन सप्ताह पश्चात जब अस्पताल पहुँचे तो जाँच करने पर पता चला कि स्वास्थ्य में सुधार हो रहा था। कुछ महीने पश्चात् रुग्णता पूरी तरह मिट गई और वह स्कूल पढ़ाने जाने लगा, बच्चों के साथ खेलते और दौड़ते भी देखा गया।

इसी तरह की एक अन्य घटना का वर्णन करते हुए डॉ. समरवेल लिखते हैं कि उनका एक रोगी गाल के कैंसर से पीड़ित था। रोग इतना बढ़ गया था, जिसका उपचार संभव नहीं था और अस्पताल से उसे छुट्टी दे दी गई थी। ऐसी दशा में रोगी के लिए ईश्वरीय सहायता के अतिरिक्त मरण से बचाने वाला कोई अन्य उपाय नहीं सूझा। वह अपना सारा समय प्रार्थना में लगाने लगा। उसके इस कृत्य में परिवार एवं पास-पड़ौस के सदस्य भी सम्मिलित होने लगे। ईश्वर ने उसकी पुकार सुन ली और वह रोगमुक्त हो गया। एक्स-रे आदि परीक्षणों से देखा गया तो पीड़ित स्थान पर एक गोल धब्बे के अतिरिक्त रोग का कोई चिह्न नहीं था। डॉ. समरवेल कहते हैं कि इस घटना ने मुझे भगवत्-सत्ता पर विश्वास करने को विवश कर दिया।

सुप्रसिद्ध मनीषी डॉ. शेरबुड एडी ने भी अपनी पुस्तक-”यू बिल सरवाइव आफ्टर डेथ” में प्रार्थना की शक्ति और जीवन में उसकी उपयोगिता का विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है। वे कहते हैं कि किन्हीं सी परिस्थितियों में सच्चे हृदय से ईश्वर को पुकारने पर प्रत्युत्तर अवश्य मिलता है। अंतःकरण की पुकार पर परमात्मा सत्ता द्रवित हुए बिना रहती नहीं। प्रार्थना करने और रोग मुक्त होने की एक घटना विशेष का उल्लेख करते हुए वे कहते हैं कि प्रार्थना या अध्यात्म चिकित्सा पर पहले उनकी तनिक भी आस्था नहीं थी। इसे वह मानव मन की कमजोरी मानते थे, परन्तु कैंसर रोगी की एक घटना ने उस मान्यता को बदल कर रख दिया। घटना इस प्रकार है-लंदन निवासी खेल प्रशिक्षक डब्ल्यू. टी. पारीश नामक व्यक्ति की पत्नी को कैंसर हो गया था, जिसका उपचार चिकित्सकों द्वारा किये जाने पर भी सुधार परिलक्षित नहीं हुआ। हारकर उसे अस्पताल से घर वापस भेज दिया गया। “हारे को हरिनाम” की उक्ति को चरितार्थ करती हुई उक्त महिला 9 महीने तक प्रार्थना में निरत रही। उसका परिणाम रोगमुक्ति के रूप में मिला।

चिकित्सा शास्त्री डॉ. सेस्ली वेदरहेड पाश्चात्य जगत में अध्यात्म चिकित्सा के सिद्धान्तों एवं प्रयोगों को विकसित करने में अग्रणी माने जाते हैं। अपनी प्रसिद्ध पुस्तक-”साइकोलॉजी रिलीजन एण्ड हीलिंग“ में उनने सामूहिक प्रार्थना से उद्भूत दिव्य ऊर्जा से कितने ही मरणासन्न व्यक्तियों के स्वस्थ होने की घटनाओं का आँखों देखा विवरण प्रकाशित किया है। इनमें से एक मर्मस्पर्शी घटना चार वर्षीय एक बच्चे की है, जिसे वृक्कशोध हो गया था। जितना अधिक उपचार किया जाता मर्ज उतनी ही तीव्रता से बढ़ जाता। अंततः विशेषज्ञों ने उसे असाध्य घोषित कर उसके स्वयं के भाग्य पर छोड़ दिया। माता के वात्सल्य भाव न साहस समेटा और आस-पास के जन समुदाय को एकत्रित कर प्रार्थना करने बैठ गई। एक निश्चित अवधि तक यह क्रम कुछ दिनों तक बराबर चलता रहा। उपचार करने और बाद में हार मान लेने वाले चिकित्सकों को यह देख कर भारी आश्चर्य हुआ कि बच्चे के दोनों गुर्दे भली-भाँति कार्य करने लगे और उसका स्वास्थ्य सुधरने लगा। चिकित्सकों के उस दल ने तब एक स्वर से स्वीकार किया कि प्रार्थना में अलौकिक शक्ति है।

मनोवेत्ता जॉनपिट्स के शब्दों में मनुष्य की यह सबसे बड़ी भूल है कि जीवन दाता परमेश्वर को भूल कर वह जहाँ-तहाँ सहायता के लिए मारा-मारा फिरता है। यदि वह ही एक जगह कहीं कुछ क्षणों के लिए शाँत मन से बैठकर भी ईश्वर को अन्तःकरण से पुकारे तो कोई कारण नहीं कि उसकी आँतरिक पुकार पर परमात्मा की सहायता उपलब्ध न हो। ईश्वरीय सहायता पाने- आत्मोत्कर्ष की दिशा में आगे बढ़ने का एक सर्वोत्तम उपाय प्रार्थना है।


सच्चे अर्थों में (kahani)

महाप्रभु ईसा ने मृत्युदण्ड से एक दिन पूर्व अपने सब शिष्यों को बुलाने भेज दिया। साथ ही उनके आदरपूर्वक पैर भी धोए।

किसी ने पूछा जो सम्मान गुरु को मिलना चाहिए, उसे आप शिष्यों की क्यों दे रहे हैं? उलटकर ईसा ने कहा- इन्हीं के प्रयासों से मुझे सम्मान मिला है और मरने के बाद भी इन्हीं के प्रयास से मेरा मिशन जीवित रह सकेगा। इसलिए ये सच्चे अर्थों में सम्मान के पात्र हैं।


नव सृजन की अनुपम अध्यात्म-साधना

दृश्यमान स्थूल शरीर के अतिरिक्त अदृश्य स्तर के दो शरीर और भी हैं, जिन्हें सूक्ष्म शरीर और कारण कहते हैं। सूक्ष्म में दूरदर्शिता का और कारण में भाव-संवेदना का निवास है। इन क्षेत्रों को उनकी आवश्यकताएँ उपलब्ध होती रहें, तो आरोग्य संतुलन उनमें भी बना रहेगा। इन पर प्रभाव तो स्वाध्याय सत्संग का भी पड़ता है, पर यदि निर्धारित साधन उपचार भी अपनाए जा सकें तो और भी अच्छा। इनका समावेश रहने से उपरोक्त दोनों केन्द्रों में प्रगति की और भी अधिक संभावना रहती है। सूक्ष्म शरीर के लिए जप और कारण शरीर के लिए ध्यान प्रक्रिया का, अनुभवी साधना विज्ञानियों ने निर्धारण किया है।

जप प्रयोजन के लिए अनेक मत-मतान्तरों के अपने-अपने नियम ओर निर्धारण हैं, पर यदि सार्वभौम स्तर पर निरीक्षण-परीक्षण किया जाए, तो गायत्री महामंत्र सर्वजनीन स्तर का बैठता है। उसकी जप पुनरावृत्ति करने पर व्यक्तियों में संयमित स्तर की प्रतिभा उभरती है, साथ ही अदृश्य वातावरण में भी प्रेरणाप्रद तत्वों का बाहुल्य बन पड़ता है। न्यूनतम 108 मंत्रों की एक माला जप ली जाय, तो अंतराल में ज्ञान जैसी स्फूर्ति का अनुभव होता है। अधिक जिससे जितना बन पड़े, उतना ही अधिक लाभदायक रहेगा। अच्छा तो यही कि नित्य कर्म से, स्नानादि से निवृत्त होकर शुद्ध स्थान पर बैठकर जल और अग्नि की साक्षी में उसे संपन्न किया जाय। पूजा की चौकी पर छोटा जल कलश और अगरबत्ती जलाकर वातावरण को अधिक अनुकूल बना लिया जाय, पर जिनके लिए ऐसी स्वच्छता अपनाने में कठिनाई पड़ती हो, वे बिना स्नान किए भी मौन मानसिक जप कर सकते हैं। एक माला जपने में प्रायः पाँच मिनट लगते हैं। इतना समय निकालते रहना किन्हीं उत्साही श्रद्धालुओं के लिए कठिन नहीं पड़ना चाहिए। इस प्रयास के आधार पर सूक्ष्म शरीर में पायी जाने वाली चौबीस ग्रन्थियाँ जाग्रत होती हैं और उस आधार पर गुण, कर्म, स्वभाव का परिष्कार होता है। मेधा निखरती और प्रतिभा उभरती है।

कारण शरीर की गहराई तक पहुँचने के लिए ध्यान-धारणा अपनाने की आवश्यकता पड़ती है। यों कई लोग अपने-अपने इष्ट देवों का भी ध्यान करते हैं। पर आप्त अनुभवी जनों के प्रतिपादन और निजी प्रयोग से यह जाना जा सकता है कि प्रातः के उदीयमान सूर्य के प्रत्यक्ष दर्शन भी किये जा सकते हैं और जल अर्घ्य भी चढ़ाया जा सकता है, पर जिन्हें नियम समय पर किसी बड़ी अड़चन के कारण प्रत्यक्ष दर्शन न बन पड़े, तो वे मानसिक ध्यान भी उसी स्तर का कर सकते हैं।

प्रभात कालीन अरुणाभ सविता का ध्यान-दर्शन करने के साथ-साथ यह धारणा भी करनी चाहिए कि दिव्य केन्द्र से निःसृत होने वाली किरणें साधक के प्रत्यक्ष शरीर में-सूक्ष्म शरीर में और कारण शरीर में प्रकाश भर रही हैं, साथ ही ऊर्जा, उष्णता और आभा स्तर की तेजस्विता का समावेश कर रही हैं। स्थूल शरीर में ओजस, सूक्ष्म शरीर में तेजस और कारण शरीर में वर्चस् का उभार आ रहा है। अपने रोम-रोम में, कण-कण में सविता की ऊर्जा-आभा ओत-प्रोत हो रही है। व्यक्तित्व ओजस्वी, मनस्वी और तपस्वी बन रहा है। सविता और साधक, आग और ईंधन की तरह परस्पर एकीभूत हो रहे हैं। आदान-प्रदान को समर्पण और अनुग्रह का उपक्रम अनवरत रूप से चल रहा है। यह दैनिक साधना है, यह जिनसे जितनी श्रद्धा और तत्परता के साथ बन पड़े, वे इसे नित्य कर्म के एक अविच्छिन्न अंग के रूप में करते रहें। यह युग संधि की बेला है। इक्कीसवीं सदी के आगमन से पूर्व तक बीसवीं सदी चलेगी। यह अन्तिम चरण कितनी ही उथल-पुथल से भरा हुआ होगा। इसमें प्रसव पीड़ा जैसी अनुभूति भी हो सकती है और नवजात शिशु के आगमन का उत्साहवर्धक समाचार भी मिल सकता है। जन्म और मरण के आदि और अन्त वाले अवसर भी ऐसी ही उथल-पुथल भरे होते हैं।

रात्रि का समापन और प्रभात का आगमन संध्याकाल कहलाता है। उसमें साधारण क्रिया-प्रक्रिया की अपेक्षा हर किसी को कुछ नये स्तर का क्रिया-कलाप अपनाना पड़ता है। युग संधि में भी शाँति कुँज की एक बारह वर्षीय योजना बनी है। इसमें दो वर्ष बीत चुके हैं। दस वर्ष शेष हैं। इस अवधि में एक आध्यात्मिक सामूहिक अनुष्ठान आरंभ किया गया है-हर दिन 24 करोड़ गायत्री जप करने का। दूसरों के लिए यह लक्ष्य हिमालय जैसा भारी प्रतीत हो सकता है, पर अपने 24 लाख परिजन यदि एक माला गायत्री जप और सविता के ध्यान में पाँच-दस मिनट लगाते रहें, तो इतने भर से संकल्पित साधना भली प्रकार से पूरी होती रहेगी।

प्रचार-विस्तार का क्रम तेजी से चल रहा है। इस साधना की पूर्णाहुतियाँ 1995 तथा 2000 में होंगी, जिनमें न्यूनतम एक-एक करोड़ व्यक्ति सम्मिलित होंगे। इन सबको, इस प्रथम चरण की पूर्णाहुतियाँ करके अगले नये सोपान में और भी अधिक श्रद्धा-संवेदना के, उत्साह एवं साहस के साथ प्रवेश करना होगा। इसलिए दो पूर्णाहुतियों के आयोजन की योजना बनी है, यदि इतने लोगों का एकत्रीकरण एक जगह न बन सका, तो उसे मिशन द्वारा संचालित 24 सौ प्रज्ञा केन्द्रों में विभाजित भी किया जा सकता है। पूर्णाहुति की इस विशालता का लक्ष्य यथावत रहेगा, पर उसे एक या अनेक स्थानों पर संपन्न करने की बात अवसर आने पर परिस्थितियों के अनुरूप ही निश्चित होगी।

सामूहिकता की शक्ति से सभी परिचित हैं। भव्य भवन, असंख्य ईंटों से मिलकर बनते हैं। अनेक धागे मिलकर कपड़ा बनता है। तिनकों को बंटकर मजबूत रस्से बनते हैं। सैनिकों का समुदाय मिलकर समर्थ सेना का रूप धारण करता है। मधुमक्खियाँ मिल-जुल कर ही छत्ता बनाती हैं। देवताओं की संयुक्त शक्ति से देवी दुर्गा का अवतरण संभव हुआ था। ऋषि रक्त से घड़ा भर जाने पर उससे असुर निकंदिनी सीता का उद्भव हुआ था। अणुओं से मिलकर यह दृश्य जगत विनिर्मित हुआ है। नव-युग के अवतरण में भी बुद्ध के परिव्राजकों एवं गाँधी के सत्याग्रहियों जैसा संगठन अभीष्ट होगा।

युगसंधि महापुरश्चरण को, नव युग की ज्ञान गंगा की धरती पर अवतरित करने वाली सम्मिलित स्तर की भगीरथ साधना कहा जा सकता है। उसे लघु से विभु बनाने में मत्स्यावतार जैसी भूमिका भी तो निबाहनी है। इसलिए देव मानवों को एक छत्र-छाया में एकत्रित करना अनिवार्य हों गया है। इस संदर्भ में सन् 1958 में एक सहस्र कुण्डी गायत्री महायज्ञ का

प्रथम प्रयोग गायत्री तपोभूमि मथुरा में हो चुका है। युग निर्माण योजना की सुविस्तृत रूप-रेखा उसी अवसर पर बनी थी और तब से लेकर अब तक की अवधि में उसने नैतिक, बौद्धिक और सामाजिक क्षेत्रों में आश्चर्यजनक समझी जाने वाली क्रिया-प्रक्रिया संपन्न की है। एक जोरदार धक्का भर इंजन देता है, तो डिब्बे उसी ठोकर के कारण दूर तक पटरी पर दौड़ते चले जाते हैं। अभी सन् 1990 से 2000 तक प्रायः दस वर्ष शेष हैं। इस अवधि में इतनी समर्थता अर्जित कर ली जायेगी कि पूर्णाहुति के रूप में मारी गई जोरदार ठोकर इक्कीसवीं सदी के उज्ज्वल भविष्य का प्रत्यक्ष दर्शन एवं अनुभव करा सके।


Quotation

भलाई करने की गरिमा तभी बनती है, जब उसके साथ प्रतिफल का पुरस्कार पाने या प्रशंसा सुनने की दुर्बलता छिपी न हो। इन्हें चाहने पर भलाई का पुण्य भी चला जाता है और दूरगामी प्रतिफल उत्पन्न करने वाला लोभ भी हाथ नहीं लगता। न चाहने वाले को इनसे वंचित नहीं रहना पड़ता, वरन् धकेलने पर भी पीछे दौड़ता है।


किन्तु जीना हमें हाय आता नहीं!

अखबार पढ़ते-पढ़ते वह खिलखिला कर हँस पड़ा। सुनने वाले ने विस्मय से पूछा-”क्या हुआ भाई?” “अरे एक मरदूद सेठ मर गया” उसकी हँसी अभी थमी नहीं थी। प्रश्नकर्ता उसके मुँह की ओर ऐसे ताक रहा था-जैसे दुनिया के सारे आश्चर्य एक साथ हँसने वाले के चेहरे पर आ टिके हों। कुछ रुक कर कहा-”किसी की मौत पर हँसी आप जैसे विचारशील को शोभा नहीं देती।” वाक्यों ने उसे संजीदा कर दिया। “नहीं भाई मुझे मृत्यु का शोक है किन्तु मरने वाले के सिरहाने बन्द लिफाफे में जो मसौदा मिला है-हँसी उसके विवरण पर आ रही थी” “क्या है ऐसा?” वह सुनाने लगा-”आत्महत्या करने वाले व्यापारी ने लिखा है-मुझे बहुत बड़ा घाटा हुआ है। सब हिसाब चुका देने पर अब मेरे पास सिर्फ दो करोड़ रुपया बचा रहेगा। मैं दरिद्र हो गया। इस दरिद्रता के जीवन से बचने के लिए मैं मर रहा हूँ।” “अब बताइए है न आश्चर्य दो करोड़ रहने पर भी दरिद्र” सुनने वाले के मुख की ओर ताकते हुए बोला-”वज्र मूर्ख था या नहीं-आप ही कहिए।”

“क्या मूर्खता की उसने?” सुनने वाले भी दुकानदार थे पर विचारशील और सुसभ्य। उन्होंने समाचार पढ़ रहे युवक की ओर देखते हुए कहा-”हम सभी ऐसी मूर्खता नित्य करते हैं। हम में से किसे अपनी स्थिति पर संतोष, किसे अपने पुरुषार्थ पर भरोसा है? अपनी स्थिति यदि सहसा गिर जाए हम में से कितने हैं, जिन्हें धक्का नहीं लगेगा? उस व्यापारी के पास दो करोड़ बच रहे थे, आप यही सोचते हैं। एक भिखमंगे के लिए किसी की जेब में दो रुपये पड़े हों, यह भी उतना महत्वपूर्ण है, जितना उस जैसे व्यक्ति के लिए दो करोड़ बचे रहना और वह दो रुपये जेब में रखकर व्याकुल होने वाला भी उतना ही मूर्ख है?” वह घूम पड़ा दुकानदार की ओर।

“हम सब अपने ऊपर की ओर ही देखते हैं। हमारी अशाँति का यही कारण है।” दुकानदार ने स्वस्थ चित्त से कहा-”हम अपने से नीचे की ओर देखें तो अशाँति का कारण मिले ही नहीं।” अन्ततः नन्हीं सी झोंपड़ी में पूरे परिवार को लेकर पड़े रहने वाले, फटे चीथड़ों में जीवन व्यतीत करने वाले, ज्येष्ठ की दोपहरी में सड़क पर कंकड़ कूटने वाले भी तो मनुष्य ही है। उनका काम जैसे चलता है, हमारा वैसे चल ही नहीं सकता, ऐसी क्या विशेषता है हम में?”

“वह व्यापारी इसलिए मूर्ख नहीं था कि रुपये की चिन्ता से मर गया।” दुकानदार ने कहा “उसकी मूर्खता यह रही कि जिन्दगी जीना न सीख पाया, शक्तियों के नियोजन की कला न जान सका। हम सभी मूर्ख हैं, एक क्षेत्र में नहीं। दूसरे में सही” कहकर वह हँस पड़े। उसने घड़ी देखी-अच्छा चलेंगे समय हो रहा है-वह शीघ्रता से उठ खड़ा हुआ। “आप दो मिनट रुकें, तो भी चलता हूँ।” दुकानदार को भी तो दुकान बन्द करने का अवकाश चाहिए था।

“आप ऐसे ही चलेंगे?” बड़े विचित्र लगे उसे ये प्राणी। धोती के ऊपर आधा कुर्ता-यही है उस महाशय की पोशाक। “इस गरमी में इतना कपड़ा पर्याप्त नहीं है?” उनके चेहरे पर मुस्कान थी कुछ पहन लेने से मुझे तो कोई सुख मिलेगा नहीं और दूसरे क्या कहेंगे? यह केवल धोखा है “क्या हम आप देखते चलते हैं कि किसके शरीर कैसे वस्त्र हैं और किसका वेश कैसा है? फिर बनाव श्रृंगार-चटकीली, भड़कीली पोशाकों में कितना धन और समय नहीं बरबाद होता?”

“फैशन” वह कहते-कहते रुक गया। उसे स्मरण लगने लगा था कि मूर्खता का ही दूसरा नाम कदाचित फैशन है और कितने मजे की बात है। इसे सभ्यता का चिह्न माना जाता है। क्या डडडड होता इसके नाम पर अल्लम-गल्लम और अस्त-व्यस्त वार्तालाप, असंगत चेष्टाएँ, क्लब डडडड जीवन तथा सुसभ्य पार्टियों के संस्मरण उसे याद आने लगे। फिर तो किसी को जिन्दगी जीना नहीं आता वह होंठों ही होंठों में बुदबुदा उठा।

ठीक कह रहे हैं-होंठों के अस्फुट स्वरों को यत्किंचित् सुनते हुए उन्होंने कहा-आप ही सोचिए डड आज हो रही सामाजिक प्रगति प्रकाश से अंधकार की ओर नहीं है? ज्ञान से अज्ञान की ओर हमारी गति तीव्र नहीं होती जा रही? क्या हम मूर्ख से वज्रमूर्ख नहीं बन रहे? आप तो पूरे विद्वत्वर्ग को ही मूर्ख कहने लगे। उसने चेतावनी दी।

विश्व के उच्चतम मस्तिष्क यही कोशिश कर रहे हैं न कि ऐसे साधन मिले जिससे कम से कम समय में अधिक से अधिक ध्वंस हो सके। मुझे उसकी प्रतिभा एवं विद्या में कोई संदेह नहीं है, किन्तु प्रतिभा प्रकाश में दौड़ रही है या अंधकार में भटकती जा रही है, यह भी क्या तर्क से सिद्ध करना होगा?

“विचित्र है आपकी यह विचार शैली।” उसने कहा। शैली का आग्रह कहाँ करता हूँ मैं। मेरा जोर तो विचार पर है। हम क्या कर रहे हैं, क्यों कर रहे हैं? क्या परिणाम प्राप्त होगा इससे? वह परिणाम न हो तो क्या बिगड़ जाय? इन बातों को हम विचार लिया करें-बस इतने से ही सारी उलझने सुलझ जायें। दुकानदार ने कहा-लेकिन हम विचार नहीं करना चाहते। विचार करने की बात सुनना नहीं चाहते और फिर भी हम विद्वान हैं, बुद्धिमान हैं, पता नहीं क्या-क्या हैं।

पहले व्यक्ति का आवास आ चुका था। उसे छोड़कर वे आगे बढ़ गये। घर में प्रवेश करता हुआ वह उन्हीं के बारे में सोच रहा था। विश्राम के समय बिस्तर पर विगत दिनों की घटनाएँ एक-एक करके याद आ रही थीं। बैरिस्टरी पास करने के बाद बंबई उतरना। फिर डॉ. मेहता के द्वारा इन दुकानदार का परिचय। साधारण वेश और सामान्य कार्य में लगा हुआ अद्भुत असामान्य व्यक्तित्व। व्यक्तित्व गठन के लिए भला विशेष पद, परिस्थिति, योग्यता की कब आवश्यकता पड़ी है। इसके लिए तो एक ही सूत्र है-”स्व कर्मण तभ्यचर्य सिद्धि विन्दति मानवः” यही तो किया है उनने। जब से परिचय हुआ है-तब से रोज ही जा बैठता है उनके पास और वे शास्त्र, व्यवहार डडड वैयक्तिक व सामाजिक आवश्यकताएँ क्या कुछ बातों- बातों में नहीं बता जाते। रह-रह कर उनकी बातें याद आ जातीं, लोग जिन्दगी जीना ही भूल चुके हैं, उन्हें यही सिखाना होगा। सारी विचित्रताओं के बावजूद सत्य हे यह कथन। विचित्र इसलिए कि सहसा किये विश्वास होगा कि डिग्रियों का गट्ठर लादे, सारी अकल का ठेकेदार बने इतराते फिर रहे मनुष्य को जिन्दगी तक सलीके से जीना नहीं आता। पर सौ फीसदी सच है यह बात।

इन्द्रिय कोई भी हो, उसके विषय का अत्यधिक सेवन उसे असमर्थ बना देता है। उन्होंने मूल विषय की ओर आते हुए कहा-समाज की विषयोन्मुख प्रवृत्ति विचारपूर्वक नहीं है। विषय सुख की वृद्धि और उसके अधिकाधिक सेवन की लोलुपता मूर्खता है। आज पूरा समाज इसी मूर्खता से ग्रस्त है, जिसका परिणाम रोग, शोक, अशान्ति, विनाश के अलावा और कुछ नहीं। “किन्तु समूचे समाज को इस स्थिति से उबार पाना” “असंभव नहीं है।” वाक्य को बीच में से काटते हुए वह बोल पड़े। हाँ व्यापक समाधान के लिए एक क्रान्ति का आधार विनिर्मित करना होगा। क्रान्ति! नव युवक की आँखों में आश्चर्य था। हाँ, जिसका उद्देश्य व्यवस्था उलटने, सरकार बदलने, प्राणियों को सिर के बल खड़ा करने तक सीमित न रह कर जीवन बदलना हो- मनुष्य को एकाकी नहीं समूची मानव जाति को विचारहीनता से विचार वान बनाना हो। ऐसी क्रांति जिसका आदि, मध्य, अंत सब कुछ विचार हो। “यानी कि विचार क्रान्ति” हाँ मोहन! उन्होंने युवक के कंधों पर हाथ रखते हुए कहा-”मानव इतिहास में जिस दिन भी यह क्रान्ति उठ खड़ी हो, समझना सतयुगी परिस्थितियाँ अब दूर नहीं।” विचार क्रान्ति की महत्ता परखने वाले यह दुकानदार थे- रायचन्द भाई। इसे स्वीकार ने वाले युवक मोहन थे- मोहनदास करमचन्द गाँधी-जो बाद में महात्मा गाँधी के नाम से जाने गए। सामान्य परिस्थितियों में रहकर असामान्य व्यक्तित्व वाले रायचन्द भाई का उल्लेख करते हुए गाँधी जी अपनी आत्मकथा में लिखते हैं-सजीव संपर्क से मेरे ऊपर गहरा प्रभाव डालने वाले अकेले रायचन्द भाई हैं जिन्होंने एक शिल्पी की तरह मुझे गढ़ा।


समन्वय प्रशस्त करेगा उज्ज्वल भविष्य के पथ को

विज्ञान और धर्म में परस्पर अन्योन्याश्रित संबंध है। दोनों एक दूसरे की कमी को पूरा करते हैं। एक ही दिशा धारा नेचर से सुपर नेचर की ओर प्रगति करने की है, तो दूसरा सुपर नेचुरल को प्राकृतिक डडड में व्यवहारिक डडडडड है। एक का परित्याग करने अथवा दूसरे पर हावी होने से ही टकराव की स्थिति उत्पन्न होती है एवं साथ चलने पर समग्र प्रगति का द्वारा खुलता है।

एक शताब्दी पूर्व जर्मन वैज्ञानिक डॉ. ड्रापर ने अपनी प्रसिद्ध कृति “द कनफ्लिक्ट बिट्वीन साइन्स एण्ड रिलीजन” में कहा था कि धर्म और विज्ञान में अभी जो संघर्ष दिखाई पड़ रहा है, भविष्य में वह समाप्त हो जायेगा। जैसे-जैसे मनुष्य की बौद्धिक चेतना विकसित होती जायेगी, यह स्पष्ट होने लगेगा कि यह दोनों ही समूचे विश्व-ब्रह्माण्ड एवं उसमें संव्याप्त विराट् चेतना को जानने- समझाने, जीवन में उतारने एवं व्यवहारिक स्वरूप प्रदान करने की विधाएँ हैं। अभी जो वैज्ञानिक बुद्धि हड़बड़ी में अनर्थकारी अपरिमित निर्माण करने, साधन-सुविधाएँ जुटाने में निरत हैं, आगे चल कर उस पर नियंत्रण सद्भावपूर्ण विवेक बुद्धि का होगा और तब दोनों का समन्वित प्रशिक्षण नूतन मानवी सभ्यता को जन्म देगा।

वाशिंगटन विश्वविद्यालय के सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक जॉन ई. बेन्टली का कहना है कि विज्ञान को कभी “फेथलेस फैक्ट” अर्थात् श्रद्धाविहीन तथ्य कहा जाता था, तो धर्म या अध्यात्म को “फैक्टलेस फेथ” अर्थात् तथ्य विहीन विश्वास। किन्तु आज दोनों के मध्य दूरी कम हुई है। उनमें एकत्व स्पष्ट दृष्टिगोचर होने लगा है। विज्ञान की अकड़ ढीली हुई है और वह विनम्रता पूर्वक यह सिद्ध करने में जुड़ गया हे कि इस विशाल ब्रह्माण्ड में कोई दिव्य चेतना विद्यमान है जो प्रकृति पदार्थों से लेकर चेतन प्राणियों तक का संचालन नियंत्रण एवं अभिवर्धन कर रही है। श्रद्धा-विश्वास की गहनता द्वारा उसकी अनुभूति सरलता पूर्वक कोई भी कर सकता है।

मूर्धन्य चिकित्साविज्ञानी डॉ. चार्ल्ससिन्गर के अनुसार मध्यकाल में जब विज्ञान अपनी आरंभिक अवस्था में था, तब उसका धर्म या अध्यात्म से कोई विरोध न था। किन्तु जैसे-जैसे आविष्कार होते गये, कोपरनिकस, गैलीलियो, न्यूटन, मेन्डलीफ आदि वैज्ञानिकों की खोजें सामने आयीं, तर्क तथ्य एवं साक्ष्य के अभाव में धार्मिक मान्यताओं की धज्जियाँ बिखरनी आरंभ हो गयीं। भावनाओं का स्थान तर्क बुद्धि ने ग्रहण कर लिया। कल्पनाएँ प्रयोग परीक्षण की वस्तु बन गयीं और समय के साथ खरी भी सिद्ध होने लगीं। एक छोर को पकड़ लेने पर अगली कड़ी अपने रहस्य स्वयं उगलने लगती है। धर्म या अध्यात्म के साथ ऐसा नहीं हुआ। जहाँ का तहाँ पड़ा रह कर वह अपनी उपयोगिता को पानी में पड़े लोहे की तरह जंग लगाता रहा। विज्ञान बुद्धि प्रधान है तो अध्यात्म भावना प्रधान। स्वर्ग-मुक्ति संबंधी, सुख-शाँति संबंधी इसकी बातें वैज्ञानिक यंत्रों की पकड़ से बाहर हैं। ऐसी स्थिति में विज्ञान का पलड़ा भारी रहा। दूसरे, वह जो कहता है या सिद्धान्त प्रतिपादित करता है-प्रत्यक्ष कर दिखाता है। अध्यात्म गुण, कर्म, स्वभाव में श्रेष्ठता एवं चिन्तन, चरित्र, व्यवहार में उत्कृष्टता की बात करता है, पर उच्चस्तरीय व्यक्तियों के उदाहरण ढूँढ़ने पर मुश्किल से ही मिलते हैं और साथ ही मशीनें भी उनकी गहराई को कहाँ माप पाती हैं। यही वह मूल कारण है जो दोनों के मध्य की खाई को गहरी बनाते हैं।

नोबेल पुरस्कार से सम्मानित प्रख्यात दार्शनिक एवं गणितज्ञ बर्ट्रेण्ड रसेल ने अपनी कृति-”रिलीजन एण्ड साइन्स” में विज्ञान और धर्म के सामाजिक जीवन के दो प्रमुख आधार बताये हैं। इनमें से एक आंतरिक एवं मानसिक विकास के लिए स्थायी सुख-शाँति के लिए आवश्यक है तो दूसरा भौतिक अस्तित्व को सुरक्षित रखने के लिए। एक पक्ष की उपेक्षा कर देने अथवा दूसरे को अधिक महत्व देने से असंतुलन उत्पन्न हो जाता है और जीवन के समग्र विकास का मार्ग अवरुद्ध हो जाता है। पिछले दो महायुद्ध इस बात के साक्षी हैं कि एकाँगी वैज्ञानिक प्रगति किस कदर मनुष्य को दिग्भ्रांत कर उसके स्वयं के अस्तित्व पर प्रश्न चिह्न लगा देती है। एकाकी धर्म या अध्यात्म भी आज के प्रगतिशील जीवन की उपयोगी आवश्यकताओं की पूर्ति नहीं कर सकता। चिकित्सा, परिवहन, उद्योग, शिल्प, इंजीनियरिंग, टेक्नोलॉजी जैसे महत्वपूर्ण विधाओं के बिना आज जीवन की कल्पना तक नहीं की जा सकती। दोनों का समन्वित विकास की अभीष्ट है।

मनुष्य पूर्णतः अध्यात्म जीवी है और आध्यात्मिक मूल्यों के आधार पर ही उसके व्यक्तित्व का मूल्याँकन होता है। वैज्ञानिक खोजों और उसकी मशीनी माप-तौल के द्वारा उसका मूल्याँकन संभव नहीं। इस से मात्र जीवन में सुखकारी साधन-सुविधाएँ जुट सकती हैं, कठिनाइयों को सरल मनाया जा सकता है, परन्तु सुरदुर्लभ मानव जीवन उतने तक ही सीमित नहीं है। पूर्णता की सत्य की तृप्ति उसका लक्ष्य है। प्राकृतिक रहस्यों का उद्घाटन, जड़ पदार्थों का विश्लेषण जीवन का एक अधूरा पक्ष है जिससे मात्र कलेवर की जानकारी डडड मिलती है। उसमें सन्निहित चेतन सत्ता की डडड सामर्थ्य का परिचय अंतराल की गहराई में प्रविष्ट करके ही प्राप्त किया जा सकता है।

इस संदर्भ में कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी के विख्यात डडड डॉ. आर्थर जेम्स का कहना है कि अध्यात्म तथा विज्ञान में अब परस्पर सहयोग के डड दृष्टिगोचर होने लगे हैं कि भौतिक जगत में डडड ऊर्जा का ही खेल चल रहा है और वह अध्यात्म जगत में संव्याप्त चेतन ऊर्जा का ही एक डड है। भौतिक ऊर्जा उसी से उत्पादित, संचालित एवं नियंत्रित है। उनकी यह मान्यता प्रकारान्तर छान्दोग्य उपनिषद् के सूत्र सर्व खिल्विदं ब्रह्म’ की पुष्टि करती है जिसके अनुसार एक ही परम डडड से पृथ्वी जल, अग्नि, ईथर, वायु जीवन डड और मन-मस्तिष्क की उत्पत्ति हुई है।

अर्थशास्त्र का ‘स्व’ और विज्ञान जगत की भौतिक डडड दोनों एक हैं। एक के बिना दूसरे की गति डडड। यही बुद्धि की, भावनाओं की, इच्छा-आकाँक्षाओं की शक्ति का स्रोत है। विज्ञानवेत्ता मेरीबेकर के अनुसार विज्ञान मस्तिष्कीय चेतना द्वारा मैटर पर आधिपत्य के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। यदि उसकी परिधि को बढ़ाया, विकसित किया एवं उच्च आयामों में प्रवेश करने दिया जा सके तो वही “दिव्य चेतन मस्तिष्क” के विकास में सहायक हो सकती है। सत्य का उद्घाटन उसी के द्वारा संभव है।

सहस्राब्दियों से अध्यात्मवेत्ता जिस परम सत्य की खोज करते आ रहे हैं, विज्ञान ने उसे “टेक्नीकल ट्रुथ” के रूप में जान लिया है। यह वह अवस्था या सिद्धान्त है जिसके द्वारा भविष्य में नूतन आविष्कार संभव हो सकेंगे। इससे वैज्ञानिक मन को अंतर्मन की गहराई में प्रवेश करने और उसमें समाविष्ट शक्ति स्रोतों के उद्घाटन में सहायता मिलेगी। कैंनन स्ट्रीकर इसी तथ्य को अधिक स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि अब यह स्पष्ट हो गया है कि अकेले पदार्थ जगत की खोज ही पर्याप्त नहीं है। विज्ञानवेत्ताओं का ध्यान चेतना की ओर मुड़ा है। कारण मात्र विज्ञान के सहारे न तो कला की, मैत्री अथवा अन्यान्य जीवन मूल्यों की व्याख्या विवेचना बन पड़ती है और न ही वह यह बताने में समर्थ है कि घृणा या प्रेम में से दयालुता या क्रूरता में से किसे अपनाया जाय। वह केवल इच्छा-आकाँक्षाओं की पूर्ति के साधनों के बारे में बता सकता है, पर यह निर्णय करते अभी उससे नहीं बन पड़ता कि इनमें से महत्वपूर्ण एवं अनुकूल कौन है? यह निर्णय करना विवेक-बुद्धि का काम है।

मनीषियों का मत है कि विवेक बुद्धि स्वामी है तो विज्ञान दास। उसका निर्माण प्रज्ञा की उथली परत तर्क बुद्धि से कल्पना शक्ति से हुआ है। सत्य का आधार प्रज्ञा है कल्पना नहीं। विज्ञान के प्रयोक्ता को गहराई में प्रवेश कर इसी को आश्रय लेना होगा। तब वह प्रकृति पदार्थों तक सीमित न रहकर चेतना क्षेत्र की रहस्यमयी शक्तियों से संबंध स्थापित कर लेगा। तर्क बुद्धि विवेक बुद्धि में, कल्पना शक्ति भावनाशक्ति में समाहित हो जायेगी और इनके समन्वय से जिस नये विज्ञान का जन्म होगा वह सत्य के बहुत समीप होगा। विश्व ब्रह्माण्ड की अद्भुत रहस्यमयी परतों का उद्घाटन तभी संभव है।


अध्यात्म पर आधारित नवयुग का साम्यवाद

आध्यात्मिक साम्यवाद की परिकल्पना अपने आप में अद्भुत एवं विलक्षण है। एकता समता की बात तो समझ में आती है, किन्तु क्या समता में भी आध्यात्मिक दृष्टिकोण सम्मिलित हो सकता है। जिस भी समाजशास्त्री, दार्शनिक, चिन्तक, विद्वान, महापुरुष, महामानव का ध्यान इस ओर गया है, सबने इसका उत्तर “हाँ” में दिया है। उनका कहना है कि वही साम्य तो अध्यात्मवादी हो सकता है, जिसमें व्यक्तिगत अहंकार पूर्णतः विसर्जित हो गया हो। “आत्मवत् सर्वभूतेषु” की भावना ने प्रगाढ़ रूप धारण कर लिया हो, योग्यता भर काम करने, आवश्यकता भर लेने की नीतिमत्ता का आवरण चढ़ा हो। “हम सबके, सब हमारे” की ही ध्वनि निनादित हो रही हो, मिल-बाँट कर खाने एवं हँसती-हँसाती जिन्दगी जीने की आकाँक्षा चहुँ ओर दिखाई दे रही हो। यही है आध्यात्मिक साम्यवाद का स्वरूप जिसकी संभावना अगले दिनों साकार होने जा रही है।

अँग्रेज राजनेता और दार्शनिक थॉमसमूर ने अपनी पुस्तक ‘यूरोपिया’ में वर्तमान समय में घट रही घटनाओं का सूक्ष्म दृष्टि से अवलोकन करते हुए भावी समाज की रूप-रेखा बनाई है। उनका कहना है कि इन दिनों व्यक्ति अपने आप में इतना सिकुड़ता जा रहा है, जिसके कारण वह पेण्डुलम की तरह एक निर्धारित सीमा तक सिकुड़ कर रह जायेगा और जब असह्य घुटन बर्दाश्त न कर सकेगा, तो अपने आपको विश्व मानवता के साथ जोड़ने के लिए बाध्य हो जायगा, फलस्वरूप समानता एवं सहकारिता से खुशहाली आने की मान्यता क्रियान्वित होगी। तब प्रत्येक क्रिया-कलाप में सहकारिता की आधारभूत व्यवस्था बनेगी, क्योंकि इसके बिना मनुष्य के शरीर और बौद्धिक विकास तथा समाज को सुगढ़ बनाने की सुविकसित एवं सुनियोजित करने की कल्पना ही नहीं की जा सकती।

इतालवी मुक्ति आँदोलन के एक सक्रिय कार्यकर्ता तोम्मासों काम्पानेला ने उज्ज्वल भविष्य के रूप में विकसित होने वाले समाज के स्वरूप का नाम ‘सूर्यनगर रखा है। थामस मूर के ‘यूटोपिया हीप’ की तरह ‘सूर्यनगर’ में शोषण उत्पीड़न स्वार्थपरता, संकीर्णता का कोई नामोनिशान न रहने की संभावना व्यक्त करते हुए काम्पानेला कहते हैं-उस समय लोग सूर्य की तरह तेजस्विता, ब्राह्मणत्व से युक्त होंगे, परस्पर समानता का भाव रखेंगे, शारीरिक एवं मानसिक क्षमता के अनुरूप शक्ति लगाने को सामाजिक एवं राष्ट्रीय दायित्व समझेंगे, करेंगे एवं खाली समय को मानसिक और शारीरिक विकास में लगाते रहेंगे। थामस मूर के यूटोपियाइयों की तरह वे उत्पादन तो भरपूर करेंगे, लेकिन स्वभावतया वह स्वयं ही जरूरत के अनुसार इसका उपयोग भी करेंगे। सूर्य भगवान की नियमितता का गुण अपनाते हुए शारीरिक एवं मानसिक श्रम से जी नहीं चुरायेंगे। इन्हीं सूत्रों के आधार पर समूचा विश्व-”सूर्यनगर” बन जायेगा।

सिर्फ कथनी से ही नहीं, वरन् कथनी को अपने आचरण में उतारने वाले फ्राँस में काल्पनिक समाजवाद की क्राँतिकारी धारा के प्रवर्तक जॉनमेल्थे अपनी पुस्तक ‘वसीयत’ में सार्वभौम एकता का समर्थन करते हुए भाषा, क्षेत्र, सम्प्रदाय, जाति, लिंग, प्रचलन की विविधता से उत्पन्न संकटों को स्पष्ट किया है। उन्होंने नये समाज के नियमों का एक प्रारूप तैयार किया है, जिसके आधार पर उनके अनुसार अब भव्य समाज की नव्य रचना होनी है। इसमें व्यक्तिगत उपयोग की वस्तुओं को छोड़कर शेष का उपयोग परहित में करने, अपने सुख के स्थान पर दूसरों को सुख देने, अधिकार के स्थान पर कर्तव्य का पालन करने एवं प्रतिभा और उम्र के अनुरूप लोकहित को बढ़ावा देने का प्रावधान है। इसमें पहली बार समाजवाद के एक मूलभूत सिद्धान्त, अर्थात् हर व्यक्ति द्वारा अपनी योग्यता के अनुसार शक्ति भर काम करने की आवश्यकता एवं जरूरत भर लेने के अधिकार को सुस्पष्ट रूप से परिभाषित किया गया है।

फ्राँसीसी दार्शनिक गैब्रिएल बोत्रों देमाबली ने एक ऐसे समाज की स्थापना की डडडडड प्रत्येक नागरिक को अधिकतम उल्लास और खुशहाली प्रदान कर सके। इस आधुनिक एवं आध्यात्मिक साम्यवाद के आधार पर बने समाज में हर व्यक्ति लोक कल्याण को बढ़ाने अपने देशवासियों के प्रति आदर और ईमानदारी से भरी प्रतिस्पर्धा में भाग लेगा।

द्वारा लोकमंगल में किये गये कार्यों को प्राथमिकता एवं श्रेय दिया जायगा। इसका परिणाम यह निकलेगा कि वैज्ञानिक, डॉक्टर, इंजीनियर, मनीषी, साहित्यकार कलाकार जैसी प्रतिभाएँ सार्वजनिक सम्पत्ति बन कर रहेगी। वे अपनी विशेष योग्यता का विशेष मूल्य माँगने का दुस्साहस न करेंगी। कारण कि उन्हें अधिक समय सुयोग्य बनाने में वर्तमान समाज एवं चिरकालीन संचित ज्ञान संपदा का ही तो भरपूर लाभ उन्हें मिला है। उन्हीं के सहचर ग्राहख वाव्योफ समाज के भावी स्वरूप की पुष्टि करते हुए कहते हैं कि समान लोगों के समाज की स्थापना होगी, जहाँ न कोई अमीर होगा और न गरीब। हर व्यक्ति लोकहित की खातिर अपनी योग्यता के अनुरूप शक्ति भर काम करेगा। उन्होंने यह तर्क भी दिया कि चाहे मनुष्य कोई भी काम करे, उसका पेट जितना बड़ा है, उससे बड़ा तो होगा नहीं। हाँ वासना, तृष्णा, अहंता को पोषण देने वाले लोभ, मोह, अहंकार सुरसा की तरह अपना आकार बढ़ा सकते हैं, जिसका न कोई आदि है न अंत, किन्तु तब मनुष्य इनसे उत्पन्न होने वाली हानि को देखकर समान श्रम, शिक्षा, डडडडडडडड आदि ही महती आवश्यकता का अनुभव करेंगे।

यह थे कल्पनावादियों के भावी समाज। यदि आने वाले समय में समाज की संरचना ऐसी ही हो, तो हमें कोई आश्चर्य नहीं करना चाहिए, क्योंकि महाकाल का चक्र इस निमित्त चल पड़ा है। वह अपनी सृष्टि को सजाने-सँवारने के लिए कृत-संकल्प है। यदि ऐसे अवसर पर हम भी उसके कदम-से-कदम मिला कर चल सकें तो घाटे में नहीं, लाभ में ही रहेंगे।

यह थे कल्पनावादियों के भावी समाज। यदि आने वाले समय में समाज की संरचना ऐसी ही हो, तो हमें कोई आश्चर्य नहीं करना चाहिए, क्योंकि महाकाल का चक्र इस निमित्त चल पड़ा है। वह अपनी सृष्टि को सजाने-सँवारने के लिए कृत-संकल्प है। यदि ऐसे अवसर पर हम भी उसके कदम-से-कदम मिला कर चल सकें तो घाटे में नहीं, लाभ में ही रहेंगे।


शाह अशरफअली (kahani)

शाह अशरफअली संत स्वभाव के थे। एक बार वे सहारनपुर से रेलगाड़ी द्वारा लखनऊ जा रहे थे। उसके साथ निर्धारित वजन से अधिक सामान था। साथ के परिजनों से जो उन्हें स्टेशन छोड़ने आये थे, उनने कहा कि “जितना सामान अधिक है, उसे तुलवा कर बुक कराई और नियम से पैसे भुगतान कर दे।”

निकट में ही गाड़ी का गार्ड खड़ा था। वह शाह को पहले से जानता था। वह उनसे विशेष रूप से प्रभावित डडडड बोला सामान बुक कराने की आवश्यकता नहीं। मैं तो साथ में ही चल रहा हूँ।” शाह ने चकित होकर पूछा “तुम कहाँ तक जाओगे?” गार्ड ने कहा-”मैं बरेली तक चल रहा हूँ, पर आप सामान की चिन्ता न करें। मैं बरेली से दूसरे गार्ड से कह दूँगा जो लखनऊ बिना किसी व्यवधान के पहुँचा देगा।” “फिर आगे क्या होगा?” अशरफअली ने पूछा। प्रश्न अटपटा था। असमंजस को दूर करने के लिए गार्ड ने पूछा। किन्तु आपको तो लखनऊ तक ही तो जाना है न? मुसकराते हुए शाह ने उत्तर दिया- “बरखुरदार! जिन्दगी का सफर बहुत लंबा है। यह खुदा के पास जाने से ही समाप्त होगा। तुम्हारी थोड़ी सी हमदर्दी के लालच में मेरा ईमान यदि डोल गया तो जुर्म की सजा से यहाँ बच भी गया किन्तु खुदा के यहाँ कौन बचायेगा। गार्ड यह सुनकर मुँह की तरफ देखता रह गया और उसने तुरन्त सामान का टिकट बना दिया। इसे कहते हैं-नीतिनिष्ठा, प्रामाणिकता।


यह एकान्त की तपश्चर्या क्यों, किसलिए?

सुबह से ही लोग यही चर्चा कर रहे थे। जिधर देखो वही दो-चार लोग मिलकर इन्हीं बातों में मशगूल थे। जिसने सुना वही दौड़ा चला आया। वैसे भी नवम्बर का महीना दक्षिण भारत की यात्रा करने वालों के लिए सुखद माना जाता है। ये ही दिन हैं जब वहाँ “अति शीत न घामा” वाली उक्ति चरितार्थ होती है। फिर अपने “गुरु स्वामि सहायक मातु पिता” के अन्तिम चरण स्पर्श की लालसा भला क्यों न आत्मीय जनों को आकर्षित करती। हाँ वह एक ही शरीर में एक साथ सभी कुछ थे। इधर हर व्यक्ति के मन में हर्ष और विषाद एक साथ आ जुड़े थे। उनके पदों में माथा नवाने का हर्ष था तो बिछोह का दुःख भी।

वे दोनों आश्रम ब्लॉक के कोने में बैठे यही बात-चीत कर रहे थे। समझ में नहीं आता अचानक इस एकान्त वास की आवश्यकता कैसे आ पड़ी। उसने मित्र की बाँह पकड़ते हुए कहा-सुना है तप करेंगे। दूसरे का जबाब था। तप! तो अभी तक क्या कम तप किया है। तनिक गहराई से देखो, जन्म से ही सुरसरि प्रवाह की भाँति सतत् चलती आई है उनकी तपश्चर्या। इंग्लैण्ड का विद्यार्थी जीवन हो या बड़ौदा कॉलेज में प्राचार्य का समय, नेशनल कॉलेज का संचालन हो अथवा वंदेमातरम्, संध्या-युगाँतर आदि का संपादन। कितना कष्ट सहा, कैसा जीवन जिया यह घोर तप नहीं तो और क्या था? तुमने भी तो पढ़ी है, उनकी कारागार कहानी- उसने मित्र की ओर देखा। हाँ पढ़ी है। वह घटना याद हे न जब पुलिस सुपरिन्टैण्डैन्ट उन्हें फर्श पर एक कंबल बिछाए मात्र एक धोती पहने लेटे देखकर हत-प्रभ रह गया था। उसे समझ में ही नहीं आया कि कैंब्रिज का ग्रेजुएट आई.सी.एस. परीक्षा में उत्तीर्ण व्यक्ति सादगी भरा कठोर जीवन क्यों जीता है? उस बेचारे को तपश्चर्या का महत्व क्या पता? हाँ वही तो! तप तो महर्षि का स्वभाव ही है। सो तो है-मुझे भी उनके कठोर तप में पुनः संलग्न होने में तनिक भी आश्चर्य नहीं है। कि दो सवाल मेरे मन को उलझाए हैं। कौन से पूछने वाला भी जिज्ञासु हो उठा। पहला यह कि अध्यात्म जगत की सभी उपलब्धियों के बाद भी इस तरह का दुर्धषी तप किसलिए, वह भी जीव की सान्ध्य बेला में। दूसरा आश्चर्य यह हो रहा है कि जो व्यक्ति सभी से हँस डडडडड हम सभी को अपने पास बुलाकर कितना डडड नहीं की उनने, बच्चों जैसे निश्छल मजाक हँसी के वे फव्वारे.. इतनी मिलनसारिता के बाद एकान्त कुछ समझ में नहीं आता।

दोनों किसी सोच में डूब गये। स्वयं की चेतना की गहराइयों में खोने लगे। आने वाले आ जा रहे थे। क्रिया-कलापों के यथावत डडड रहने के बाद भी एक अभग्न शान्ति थी। पता नहीं कितनी देर तक वे दोनों इस तरह खोए से बैठे रहे। होश तो तब आए जब सफेद रंग का हाफ पैण्ट और शर्ट पहने एक आदमी ने आकर हल्के से उनके कन्धे पर स्पर्श करते हुए धीरे से कहा-माताजी ने बुलाया है तुम दोनों को, काफी देर से मैं ढूँढ़ रहा था, अभी तुरन्त चलो।

धीरे-धीरे चलते हुए एक के बाद अनेक सीढ़ियाँ चढ़कर वे उस कमरे में जा पहुँचे, जहाँ श्वेत परिधान में आवेष्ठित साक्षात् वात्सल्य की प्रतिमा बनी श्री माँ विराजमान थी। डडड प्रणति निवेदन करने के बाद माँ ने दोनों की ओर स्नेह भरी आँखों से देखते हुए पूछा-अरे! तुम दोनों तो कुछ उदास लग रहे हो? हाँ माँ! हम ही क्यों सभी के अन्दर एक व्यथा का बवंडर उठ रहा है। एक अनचाहे विछोह की कल्पना सब को विकल किए दे रही है। साथ ही उन्होंने अपनी दोनों उलझने कह सुनाई। सुनकर श्री माँ मुस्कराई अच्छा यह बात है उन्होंने कहना शुरू किया। उनके तप का प्रयोजन व्यक्तिगत स्वर्ग-मुक्ति नहीं है। सच पूछो तो उन्होंने सपने में भी इनकी कल्पना नहीं की वह तो एकान्तिक प्रचण्ड तप द्वारा समर्थ आत्म-शक्ति जुटा रहे हैं। किसलिए माँ? दोनों ने लगभग एक साथ पूछा देख नहीं रहे देश की वर्तमान परिस्थितियाँ, जराजीर्ण होता जा रहा समाज जिसमें नर रत्नों को पैदा करने की शक्ति नहीं रह गई। उनका तप वह वातावरण पैदा करेगा जिसमें अनेकों वरिष्ठ आत्माएँ आकर अपना विशिष्ट दायित्व निभा सकें। इतना ही नहीं सूक्ष्म और कारण शरीर की गहराई में प्रवेश करके उच्चस्तरीय प्राण चेतना का यह भण्डार संचित किया जायेगा, जो वर्तमान में दीखने वाली विषमताओं से लोहा लेगा, सूक्ष्म जगत में संव्याप्त विकृतियों को बुहार फेंकेगा। तभी तो नया इंसान, नया समाज, नई प्रणाली आ सकेगी।

तप का मकसद बहुत कुछ समझ में आ रहा था। इतने में मन में विचार उठा और विचार वह तो शब्दों के द्वारा शारीरिक गति करते हैं। पूछें या न पूछें इसी ऊहापोह में था वह इसी बीच माताजी ने पूछ ही लिया-कुछ और यद्यपि अप्रासंगिक है किन्तु फिर भी.. क्या हुआ बता?

यह अव्यवस्था उपजी कैसे? दुर्भिक्ष, युद्धोन्माद, राजनीतिक विग्रह, अपराधों की बाढ़ विचार विकृति का तूफानी सिलसिला कैसे चल पड़ा?

यह मानवीय इतिहास विशेषतया भारतीय इतिहास की उस दुर्घटना की उपज है जिसमें आत्मा, मन और शरीर के विकास से संतुलन टूट गया। जब तक यह सन्तुलन पुनः नहीं बैठ जाता तब तक समस्याएँ कभी एक, कभी दूसरा रूप धारण करती रहेंगी। मनुष्य चैन से नहीं बैठ पाएगा। इस एकान्तिक साधना का प्रयोजन उस महाकाली को अवतीर्ण करना है जो समस्त आसुरी शक्तियों को परास्त करके लोक जीवन का खोया गौरव वापस दिला सके। परन्तु हम लोग, दोनों ने आपस में एक-दूसरे की ओर देखा। मुख्यतः यही तो कहना चाहते थे वे। अरे! तुम सब बिछुड़ने के लिए थोड़ा ही जुड़े हो। हम लोगों के आपसी संबंध चिरस्थायी हैं। हम में से किसी का स्थूल शरीर रहे या न रहे फिर भी संबंधों की शाश्वत रज्जु टूटेगी नहीं। महर्षि भले ही एकान्त वास में चले जाएँ, किन्तु अपने परिजनों को जिनको उन्होंने अपने शरीर का अंग माना है-कैसे भुला सकते हैं। श्री माँ की वाणी भावों की अधिकता से रुंधने लगी। मुश्किल से गला साफ करके बोलीं मैं तो मिलती ही रहूँगी। उनकी घनिष्ठता अब पहले से अधिक अनुभव होगी। “पहले से अधिक” दोनों का आश्चर्य गैरवाजिब नहीं था। निश्चय ही श्री माँ के स्वरों में करुणा थी। पक्षी सुदूर आकाश में कितनी ही दूर क्यों न उड़ जाए, खुली आँखों से भले ही न दीख पड़े पर अपने दुधमुंहे बच्चों का ध्यान कहीं भूल सकता है? बछड़ा और गाय बिछुड़े हुए दीखने पर भी नहीं बिछुड़ते। बिछोह तो काल्पनिक है, घनिष्ठता ही सहज है। तुम दोनों ही क्यों सभी परिजन उन्हें हर मौके पर अपने नजदीक पायेंगे। उनकी लेखनी सतत् सन्देश देती रहेंगी। सोते-जागते उनकी प्रेरणाएँ अनुभव होंगी। दुखी क्यों होते हो मेरे बच्चे। माँ ने उन दोनों के सिर पर हाथ फेरा आँखों में ढुलक आए आँसुओं को अपने रूमाल से पोंछा।

अब उन्हें ऐसा अनुभव हो रहा था, जैसे सारा बोझा उतर गया हो। अन्दर से एक उल्लास फूटता महसूस हो रहा था। आखिर सारी शंकाओं का शमन जो हो गया था। इसी बीच माँ की वाणी पुनः सुनाई दी-जाओ उन्हें प्रणाम कर आओ।

आज के प्रणाम ने उन्हें सभी कुछ दे डाला। गुरु के पदों में प्रणाम करते समय उन्हें ऐसा लगा जैसे वह परावाणी से हृदय को झंकृत करते हुए कह रहे हों-”तुम मेरे अपने हो, आत्मीय स्वजन, तुम्हें मेरे महान उद्देश्य में सहयोगी बनना है। बिना रुके बिना टिके उस राह पर चलना है, जहाँ मैं ले चल रहा हूँ। भावों से परिपूरित सक्रियता ही जीवन का मर्म है।” पैरों से माथा उठाने पर एक क्षण के लिए आँखें मिलीं, जैसे सारे शरीर में बिजली दौड़ गई। साकार हो गया उनका वह कथन तुम सिर्फ कार्य करो, मैं शक्ति की कमी न पड़ने दूँगा। आज कल वही तो एकत्र करने में लगे थे। वही क्यों समूचा शिष्य समुदाय धन्य हो उठा। धन्य करने वाले महामानव थे-श्री अरविन्द जिनकी तप-साधना ने मानवीय चेतना में नयी फेर बदल की।

वर्तमान के क्षणों में फिर से चल पड़ा है-प्राण ऊर्जा का एक नया संयंत्र-जिसकी संचालक युगान्तर चेतना है, स्वयं महाकाल है।


निकट भविष्य में संभावित स्वर्णयुग

इस संसार में जितनी गतियाँ हैं, सब चक्रवत् हैं अथवा इसे यों भी कहा जा सकता है कि सृष्टि की हर वस्तु की गति वर्तुलाकार है। मनुष्य को लें, तो वह जन्म लेता है, इस भौतिक जगत में निर्धारित अवधि बिताने के बाद दिवंगत हो जाता है और पुनः शरीर धारण करता है। बीज मिट्टी में गलकर पौधे बनते हैं। पौधे से कालक्रम में विशाल वृक्ष, फिर उनमें फूल-फल लगते, बीज बनते और बीज से पुनः पौधा। जल का, मौसम का भी अपना-अपना एक चक्र है।

इसी प्रकार समय का भी एक चक्र है-कालचक्र। यह सदा अपने वर्तुल पथ में ग्रह नक्षत्रों की भाँति गतिमान है। जो समय अभी है, वह अवश्य ही पहले कभी रहा होगा, और जो बीत गया। वह निश्चित रूप से फिर आयेगा। यदि अभी बुरा समय चल रहा है, तो कालचक्र का दूसरा भला और उदात्त सिरा भी कभी न कभी अवश्य उपस्थित होगा और संभवतः तत्काल इसी के बाद, क्योंकि उसमें भले और बुरे दो ही सिरे हैं। इसी आधार पर मनीषियों ने आने वाले समय को उज्ज्वल बताया है और उस समय के समाज का भिन्न-भिन्न प्रारूप प्रस्तुत किया है। इसी क्रम में 91 वीं शताब्दी के महान मनीषी रूस के अफनास्येव “वैज्ञानिक कम्युनिज्म के मूल सिद्धान्त” पुस्तक में सेंट साइमन दे रुग्रुआ के व्यक्तित्व एवं कर्तव्य का उदाहरण देते हुए लिखते हैं कि उन्होंने मानव जाति के लिए भविष्य में एक वास्तविक ‘स्वर्ण युग‘ की कल्पना की है, जिसमें शोषण उत्पीड़न अहिंसा अत्याचार, अनाचार का सदा-सदा के लिए अंत हो जायेगा और लोग प्रकृति का संतुलन बनाते हुए उसका अपने लाभार्थ उपयोग करने के लिए एक होकर प्रयासरत होंगे।

सेंट साइमन ने संगठित और सचेत ढंग से संचालित भावी समाज की जो रूपरेखा प्रस्तुत की है उसमें उन्होंने मनुष्य तथा उसकी आवश्यकताओं और योग्यताओं को प्रमुख स्थान दिया है। उनके विचार में वह सामाजिक प्रणाली सबसे अच्छी है, जो संपूर्ण मानवजाति को सुखद और शान्तिमय जीवन प्रदान करती हो और उसकी बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति तथा सारी उपयोगी योग्यताओं के विकास के उद्देश्य अधिक से अधिक सुअवसरों की व्यवस्था करती हो वह यह मानते थे कि समूची मानव जाति के एक होना अपने को छोटे परिकर तक न सीमित रखकर विश्व मानव मानने और संयुक्त प्रयास के साथ नवसृजन के निमित्त मानव की क्षमताओं को पूर्ण रूप से उजागर एवं विकसित करने की वचनबद्धता ही भावी समाज की नव संगठन का सबसे महत्वपूर्ण आधार होगा उन्होंने ‘विश्व परिवार’ की भी परिकल्पना की है जिसे संघ का नाम दिया, जो सारे सामाजिक और राष्ट्रीय विरोधों का उन्मूलन करके शाँति और संपूर्ण मानव जाति की निरन्तर प्रगति सुनिश्चित बनायेगा उनका विश्वास था कि समय और समाज का विकास विचारों पर विश्व दृष्टिकोण पर आधारित होता है और यही आने वाले नवयुग का मूल मंत्र होगा। ऐसा वे मानते हैं।

धनी व्यापारी के पुत्र होने के बाद भी मजदूरी एवं गरीबी स्वयं ओढ़ने वाले फ्राँसीसी समाजवादी फ्राँसुआमरीशार्ल फुरिये की भी भविष्य द्रष्टा के समकक्ष मान्यता है। उन्होंने नया समाज बनाने को लक्ष्य रखकर एक ऐसे शान्तिपूर्ण तरीके का समर्थन किया है जिसमें भौतिक ललक लिप्सा को गौण समझा गया है एवं परमार्थ में मिलने वाले सुख को मुख्य। नगर और देहात के बीच अंतर मिटाने की भी बात उन्होंने कही है। जब हर व्यक्ति शहरों के चकाचौंध के साथ रहने वाली उदासीनता अन्यमनस्कता स्वार्थांधता, प्रदूषण अत्याचार से इतना ऊबा होगा कि वह पुनः छोटे से आदर्श ग्राम में रहना पसन्द करेगा। इस तरह बड़े-बड़े शहरों की संस्कृति बिखर कर छोटे कस्बों में बँट जायेगी, जहाँ व्यक्ति की संकीर्णता ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के रूप में परिवर्तित होकर मुक्त गगन में श्वास लेगी।

हमें इस कल्पना और फिलहाल यूटोपिया लगने वाली वास्तविकता को स्वीकारने के लिए तैयार रहना चाहिए और न सिर्फ तैयार रहना चाहिए। वरन् स्वागत-थाल सजाकर उसकी अगवानी के लिए भी मन बनाना और उपक्रम अपनाना चाहिए।


मनस्वी-तेजस्वी

बल्ब, पंखा, हीटर, कूलर आदि उपकरणों के साथ जुड़ जाने पर बिजली के गुण भिन्न-भिन्न प्रकार के होते हैं। इसमें उपकरणों का जितना महत्व है, उससे अधिक उस बिजली का हे जो शक्ति संचार करती और उपकरण को वैसी ही क्रिया करने के लिए विवश करती है, जिसके लिए उसे बनाया गया है।

मनुष्य में उच्चस्तरीय चेतन बिजली तो वह है जिसे प्राण कहते हैं। उसके साथ बने रहने पर शरीर के सभी अंग अवयव अपने-अपने काम करते रहते हैं। शक्ति भी बनी रहती है और वे सभी लक्षण विद्यमान रहते हैं, जिनकी देखते हुए किसी को जीवित या मृतक कहा जाता है। यह दिव्य चेतना ही पंच तत्वों के साथ जुड़े हुए शरीर के माध्यम से विविध प्रकार के क्रिया-कलापों का संचालन करती है। प्राणी में जीवन ही उसका सार तत्व है। यदि वह न रहे तो मृत शरीर को ऐसा कूड़ा करकट माना जाता है जिसे थोड़ी ही देर रखे रहने पर सड़न दुर्गंध और विषाक्तता फैलनी आरंभ हो जाती है।

दूसरी एक और भी चेतना जीवन में काम करती है जिसे उत्साह कहते हैं। उसकी जितनी मात्रा जिस किसी में होती है, वह उतने ही बढ़-चढ़ कर पुरुषार्थ कर सकने में समर्थ होता है। किन्तु यदि उत्साह शिथिल पड़ गया हो, उसकी गतिशीलता घट गई हो, तो समझना चाहिए कि जीवित होते हुए भी मनुष्य लगभग मरे हुए के समान है। अनुत्साही को आलस्य-प्रमाद जैसे अनेकों दुर्गुण घेरे रहते हैं, जिनके कारण उपयुक्त सामर्थ्य रहते हुए भी आधी-अधूरी मात्रा में बहुत धीमी गति से काम हो पाता है और जो होता है वह भी लगता है मानों शक्ति सामर्थ्य का भण्डार ही चुक गया हो। जो बन पड़ता है वह अस्त-व्यस्त, कुरूप और घटिया स्तर का होता है। इससे कर्म और कर्ता दोनों की हानियाँ होती हैं। जिस प्रकार यंत्र उपकरणों में बिजली काम करती है उसी प्रकार मनुष्य के समस्त शारीरिक-मानसिक अंग-अवयवों को उत्साह के आधार पर शक्ति और प्रेरणा मिलती है।

निराशा, उदासी, चिन्ता, लगभग एक दूसरे पर आश्रित हैं। जहाँ एक रहेगी, वहाँ दूसरी भी जा पहुँचेगी। यदि तीनों का समावेश हो गया तो समझना चाहिए कि मनुष्य मानसिक दृष्टि से अशक्त हो गया भले ही वह शारीरिक दृष्टि से समर्थ ही क्यों न दिखाई पड़े। ऐसे लोग कुछ काम करना ही नहीं चाहते। चाहते भी हों तो वह बन नहीं पड़ता। पड़ता भी हे तो आधा-अधूरा बन कर रह जाता है। अस्त−व्यस्त और काना कुबड़ा बनकर रह जाता है। जितने समय और श्रम में उसे होना चाहिए, उसकी तुलना में वह कोई अधिक विलंब लगा लेता है और जो कुछ बन पड़ता है, वह कुरूप, अव्यवस्थित स्तर का बन कर रह जाता है।

शक्ति वस्तुतः साहस पर केन्द्रित रहती है। साहस न हो तो फिर हाथों से जो करते बन पड़ता है वह निस्तेज निरर्थक बन कर रह जाता है। बिजली का करेन्ट कम होने पर कोई उपकरण पूरी तरह काम नहीं करता। मात्र टिमटिमाता भर रहता है। उसके द्वारा जा काम होते दीखते हैं, उसे चिह्न-पूजा स्तर का ही गिना जा सकता है। साहस की कमी का परिणाम भी यही होता है। उत्साह के अभाव में उदास मन से किये गये काम भी ऐसे ही होते हैं। मन की उदासी किये गये कामों की कुरूपता अधूरेपन के रूप में दीख पड़ती है।

मनस्विता, तेजस्विता अपने हाथ की बात है। मन की उदासी कहीं बाहर से नहीं आती। किसी घटना से भी संबंधित नहीं होती। वह मनुष्य के अपने स्वभाव पर निर्भर है जिसे इच्छानुसार घटाया या बढ़ाया जा सकता है। यह एक प्रकार का आत्मविश्वास है। आत्मनिर्भर मनुष्य उज्ज्वल भविष्य के सपने देखते हैं। उन्हें हाथ में लिए काम की सफलता पर विश्वास होता है।

इन्द्रियों को शक्तितंत्र माना जाता है। पैनी दृष्टि सूझबूझ से काम लेने पर यह वरदान जैसी प्रतीत होती है और उनके द्वारा बन पड़े कामों को सौभाग्य स्तर का गिना जाता है, पर वस्तुतः बात ऐसी है नहीं। आत्मविश्वासी मनुष्य की एक ही पहचान है-उसका उत्साह। उत्साह रहने पर साहस बढ़ता है और उसी उत्साह के सहारे शरीर के अंग-प्रत्यंग बढ़-चढ़कर काम करने लगते हैं। उनसे सफलता का बोध होता है। जो मनस्वी नहीं है उसे एक प्रकार से अशक्त, निस्तेज और असंयमी भी कहा जा सकता है।


बुद्धि नहीं, भावना प्रधान

मनीषियों के वचन एवं धर्मग्रन्थ मनुष्य को विचार करने का आधार प्रदान कर सकते हैं। विचारों को दिशा प्रदान करने में इनका स्थान महत्वपूर्ण है। तीक्ष्ण बुद्धि भौतिक प्रगति एवं प्रतिभा के विकास में विभिन्न समस्याओं के समाधान प्रस्तुत करने में योगदान दे सकती है, पर वह आधार प्रदान कर सकना इसके लिए असम्भव है जिसे अपनाने से कोई भी सद्गुणसंपन्न ही बन जाए। महानता को अपनाना तथा इसके पथ पर आगे बढ़ सकना जिससे संभव है वह है भाव भरा उत्कृष्ट चिन्तन। इसका उद्गम क्षेत्र है परिष्कृत अंतराल। श्रेष्ठता की ओर बढ़ पाने योग्य मनोबल जुटाना उदात्त भावनाओं की ही देन है।

बुद्धि भी उपयोगी है। इसका अपना महत्व है। इससे योग्यता प्रतिभा का विकास होता है। भौतिक प्रगति का आधार विनिर्मित होता है। अब तक के भौतिकता के विकास में, समृद्धि में बुद्धि ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। लेकिन इसके साथ यह भी एक सत्य है कि बुद्धि द्वारा जो भी विकास हुआ है उसका अस्तित्व भावनाओं के बल पर ही कायम है। यदि मनुष्य भावना शून्य होता तो प्रगति-समृद्धि कभी की गायब हो गई होती। अन्तःकरण की इन समुज्ज्वल भावनाओं ने मालाकार के सदृश संपूर्ण मानव जाति को एकता के सूत्र में पिरो रखा है। सहयोग सहकार का गुण इन्हीं की देन है। एक दूसरे के सुख-दुःख में शामिल होना, आपत्ति संकट में सहायता करना तथा प्राणि मात्र के बीच सद्भाव की जो प्रवृत्ति दृष्टिगोचर होती है उसका एक मात्र कारण उदार भावनाएँ ही हैं।

यही वह आधार हैं जिसका आश्रय लेकर वसुधैव कुटुंबकम् की कल्पना साकार हो सकती है। इसी के द्वारा मनुष्य संकीर्ण स्वार्थपरता की बेड़ियों को काट सकता है। उत्कृष्ट भावनाओं के अभाव में एकाँगी बुद्धि निपट स्वार्थी हो अनेकानेक समस्याओं की जनक ही सिद्ध हो सकेगी-पारस्परिक कलह सामाजिक विग्रह ही खड़े होंगे। उदात्त भावनाओं का आश्रय लेकर ही बुद्धि की प्रखरता मानव मानवता के हित में अनेकानेक नूतन अन्वेषण कर सकेगी और न केवल व्यक्तिगत उत्थान अपितु राष्ट्रीय सामाजिक प्रगति-कल्याण में सहयोगी सिद्ध होगी। भाव संवेदनाओं के अभाव में अकेली बुद्धि चाहे जितनी प्रखर और तीक्ष्ण क्यों न हो विभिन्न जटिलतायें ही पैदा कर सकेगी। इनकी महत्ता को जानने के कारण ही सभी चिन्तकों, धर्म ग्रन्थों ने हृदय की शुद्धि एवं अन्तःकरण के परिष्कार पर बल दिया है। साधना-उपासना की विभिन्न विधियों क्रिया पद्धतियों का आधार परिष्कृत अन्तराल ही है।

कोई भी व्यक्ति मानव मानवता के हित के लिए कोई महत्वपूर्ण कार्य कर सकने में तभी सक्षम हो पाता है जबकि उसका हृदय विशाल हो। इसके अभाव में करने की तो बात दूर इस बारे में सोचना भी संभव नहीं बन पड़ता है। संत, ऋषि, महापुरुष अपने अंतराल की इसी उत्कृष्टता व विशालता के कारण ही महानता के पथ पर चल कर मानव जाति के कल्याण हेतु कुछ करने में सक्षम हो सके। भावनाओं के द्वारा ही मानव के हृदय की पीड़ा व्यथा को जाना समझा और उसके निराकरण हेतु प्रयत्न कर सके। मनुष्य के अंतःकरण की आस्थाओं का स्पर्श कर पाना और उसकी गति विधियों में आवश्यक परिवर्तन कर सकना भावनाशील पुरुष के लिए ही संभव है। बुद्धि का क्षेत्र वैचारिक जगत ही है। क्षणिक प्रभाव पैदा करना विचारणाओं की गाठों को सुलझाने का आधार तो विचार हो सकते हैं। पर जिससे मनुष्य के जीवन में आमूल चूल विधेयात्मक परिवर्तन परिवर्धन किया जा सके वह बुद्धि से नहीं अपितु भावनाओं से ही संभव है।

मात्र बुद्धि ने मनुष्य की प्रकृति बदली है। ऐसे प्रमाण नहीं मिलते हैं। जबकि भावनाशील महापुरुषों ने अपने परिष्कृत अन्तःकरण के कारण दुराचारी पातकी व्यक्तियों को न केवल प्रभावित ही किया अपितु उनके जीवन को पूरी तरह से परिवर्तित कर दिया और पहले के कुकर्मी व्यक्ति अपने परवर्ती जीवन में संत-भक्त हो गए। जधाई, मधाई जैसे डाकुओं का सुधार चैतन्य देव की उदात्त भावनाओं के कारण ही हो सका। श्री गिरीश चन्द्र घोष जैसे शराबी व्यसनी व्यक्ति भी परमहंस रामकृष्ण के संपर्क में आकर संत बन गए। इसी तरह एक नहीं अनेकों ऐसे उदाहरण मिल जाएँगे जिनमें अनेक व्यक्तियों ने तत्कालीन महामानवों के संपर्क में आकर अपने जीवन को धन्य बनाया। इनमें उनके विचारों की शक्ति नहीं अपितु भावनाओं की उत्कृष्टता ही प्रधान कारण रही। जबकि कोरे बुद्धिवादी-भावसंवेदना से शून्य व्यक्तियों ने संसार का विकास कम विनाश ही अधिक किया है। हिटलर, चंगेज खाँ तैमूरलंग मुसोलिनी कम बुद्धिमान नहीं थे। परंतु इस एकाँगी बौद्धिक प्रखरता ने उनके अन्दर लिप्सा-स्वार्थ, संकीर्णता ही पैदा की और मानव जाति को विकास के पथ से सैकड़ों वर्ष पीछे कर दिया। वस्तुतः मनुष्य को सद्गुण संपन्न बनाने उसके व्यक्तित्व को सहयोग सद्भाव से अलंकृत करने में एकाँगी बौद्धिकता उपयोगी सिद्ध नहीं हो सकती। इसे भाव सम्वेदनाओं द्वारा ही अलंकृत कर सकना संभव है।

सभी धर्म संप्रदाय संत महात्मा एक स्वर से हृदय की शुद्धता, पवित्रता, विशालता की महिमा का गायन करते हैं। इन सब का एकमात्र उपदेश है आत्मोत्कर्ष की आधारशिला हृदय की विशालता। श्री रामकृष्ण परमहंस कहा करते थे “जिसका हृदय छोटे से शिशु जैसा निश्छल और पवित्र है वह शीघ्र ही परमात्मा को पा सकेगा।”

बुद्धिवादियों की एक कमी है वह तुरंत हो सकने वाले लाभ को ध्यान में रखते हैं। महानता और श्रेष्ठता के कष्टमय कंटकाकीर्ण पथ से विरत होने की ही सोचते हैं। तर्क से परे महानता के मार्ग पर चल सकना परिष्कृत अंतराल वालों के लिए ही संभव है। परिष्कृत अंतराल ऐसे निर्मल सरोवर की तरह है जिसमें सूर्य के सदृश परमसत्ता का बिम्ब चमकता है।

बौद्धिकता से जीवन संबंधी सुख सुविधाओं का अंबार तो लगाया जा सकता है पर चेतना की ऊंचाइयों को पा सकना भावनाशील के लिए ही संभव है। हृदय शून्य व्यक्ति भौतिक जीवन में वह कितना ही सक्षम क्यों न हो आत्मिकी के क्षेत्र में पूरी तरह से अक्षम ही सिद्ध होगा। जबकि अल्पबुद्धि वाला भावनाशील व्यक्ति भी ईश्वर सान्निध्य पा सकता है। संत रैदास, कबीर, दादू आदि के जीवन इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है।

आज बुद्धि की प्रखरता की कोई कमी नहीं परन्तु भावनाओं से शून्य होने के कारण उच्च कोटि के बुद्धिवादी अधिकाँश वैज्ञानिक मानवता के विनाश की सामग्री जुटाने में लगे हैं। इस बुद्धिवाद को दिशा देना तभी संभव है जब उत्कृष्ट भावनाओं तथा बुद्धि का सुनियोजित सामंजस्य स्थापित हो सके।

भावनाशीलता को अपनाकर व्यावहारिक जीवन में क्रियान्वित कर के ही जिन के व्यक्तित्व को सेवा, दया, करुणा प्रेम से अलंकृत करना तथा कोरे बुद्धिवाद को दिशा प्रदान कर मानव जाति को एक सूत्र में पिरोकर “वसुधैव कुटुंबकम्” के स्वप्न को साकार करने के प्रयत्न कर सकना सम्भव है। उत्कृष्ट तथा उज्ज्वल भावनाएँ ही मानव की गरिमा महानता की उपलब्धि का सबल आधार हैं?


महात्मा तिलमिला गया (kahani)

एक व्यक्ति ने सुन रक्खा था। तप करने से अहंकार मिट जाता है। क्रोध चला जाता है। वह घर छोड़ हिमालय चल दिया। जंगलों के पार बर्फीली गुफाओं में बैठकर लगा साधना करने। उसे ऐसा करते बीस साल बीत गये। अकेला रहता। अहंकार और क्रोध का मौका भी न मिलता। उसने सोचा चलो अहंकार से छुटकारा मिला। अब वापस लौट चलना चाहिए। नीचे उतर कर आया। लोगों को मालूम पड़ा कि हिमालय में रह कर बीस वर्ष तक तप किया है तो भीड़ इकट्ठी हो गई। दर्शनों के लिए लोग चले आते पैर छूते, परिक्रमा करते। महात्मा के मन में गुदगुदी होती सम्मान पाकर। एक दिन भक्तों ने कहा चलें कुम्भ स्नान करके आवें। महात्मा चल पड़े। मेला ठेला की भीड़ ने उनके पैर पर जमकर किसी का भूलवश पैर पड़ गया? महात्मा तिलमिला गया और उछल कर उस व्यक्ति की गर्दन पकड़ ली और बोला “जानता नहीं दुष्ट मैं कौन हूँ?” महात्मा के अन्दर छिपा बैठा अहंकार उछलकर ऊपर आया। लोग हैरान अरे यह कैसा महात्मा। यह तो अबोध बालकों से भी गया बीता है। कोई जानबूझकर पैर थोड़े ही रक्खा है। जो आगबबूला होता है। सच है। व्यक्ति अपने पर ही नियंत्रण न कर पाये तो उसकी एकान्त साधना तप तितीक्षा सब व्यर्थ है।


साधना कौन सी सच्ची?

सब एक-एक करके उन्हें प्रणाम करने लगे। परिव्राजकों का यह समूह एक लंबे अंतराल के बाद पुनः अपने गुरु का सान्निध्य पा प्रसन्न था। गुरु चरणों में माथा नवाने के साथ प्रत्येक अपने अंतर में इस प्रसन्नता को अनन्त गुणित अनुभव कर रहा था। मानो शिलासीन आचार्य के चरण आनन्द गंगा का उद्गम हों और प्रत्येक शिष्य स्वयं में भगीरथ। कुछ भी हो आनन्द अनेक धारा को प्रवाहित था। इस अद्भुत सरिता में उठ रही पुलकन की लहरों की थिरकन पास बह रही अलकनन्दा की जल उर्मिला की तीव्रता से भी कई गुना अधिक तीव्र थी।

बद्रीकाश्रम के समीप हिमालय के हृदय स्थल में बैठे आचार्य भी कम प्रसन्न न थे। अपनी एकान्त साधना के एक बड़े काल खण्ड के पश्चात् शिष्यों को वैसा ही सतेज प्रखर और सत्कर्म में तत्पर पा उनकी पुलकन का उमंगना स्वाभाविक था। प्रणाम के क्रम के अनन्तर आचार्य की दृष्टि सभी शिष्यों के मुखों से गुजरती हुई एक पर जा टिकी जिसके चेहरे पर जिज्ञासा के भाव घनीभूत हो रहे थे। “कहो कुछ पूछना है?” उनके प्रत्येक अक्षर से वात्सल्य टपक रहा था। “एक जिज्ञासा थी” सुनकर लगा जैसे नम्रता साकार हो उठी हो। “कहो”।

आपने हममें से प्रत्येक को अनेकों तरह की साधना प्रणालियाँ बताई हैं। प्रायः हरेक ने पर्याप्त अभ्यास भी किया है कहने वाले ने बैठे हुए गुरु भाइयों पर दृष्टि घुमाई। हरेक के मुख पर समर्थन के भाव पा वह आश्वस्त हो एक क्षण रुक कर बोला यों प्रत्येक प्रणाली का लक्ष्य भी एक है। किन्तु मैं जानना चाहता हूँ इनमें से सर्व श्रेष्ठ योग कौन सा है? साथ ही..।

स्वर की हिचकिचाहट को भाँप कर आचार्य ने कहा निःसंकोच अपनी बात पूरी करो।

आश्वासन पा उसने बात बढ़ाई प्रत्येक साधना मार्ग में मिलने वाली सफलताओं के स्वरूप भी अनेक हैं जिन्हें सिद्धि कहते हैं इनमें से परम सिद्धि क्या है?

तो तुम परमयोग और चरम सिद्धि जानना चाहते हो। “हाँ” “जिज्ञासा शमन हो इससे पहले अच्छा हो तुममें से प्रत्येक अपने साधनात्मक प्रयासों की प्रायोगिकता सिद्ध करे। प्रणाली के साथ तुममें से प्रत्येक की समीक्षा हो सकेगी साथ ही श्रेष्ठता का आकलन भी संभव बन पड़ेगा”। किसी को भला क्या आपत्ति होती सब सहज तत्पर थे। जैसी आज्ञा समवेत का स्वर उभरा। आचार्य के भृकुटि संकेत के साथ ही एक प्रौढ़ योगी आगे आए। उन्होंने डडड स्थिर किया। आधे क्षण में प्रत्याहार ध्यान डडड और ध्यान समाधि की भूमि में जा पहुँचा। स्थिर अर्धोन्मीलित दृग शिलासीन गुरु का दक्षिण कर उठा और योगी सविकल्प से निर्विकल्प पहुँचने के स्थान पर बहिर्चेतना में आ गया।

मनुष्य सदा समाधि में स्थित नहीं रह सकता! आचार्य के समीक्षा भरे शब्दों ने एक संदेश दिया। निर्विकल्प की शान्ति सामान्य जीवन में अवतरित करो वत्स! अनवरत कर्म के क्षणों में अभग्नशान्ति का बने रहना स्थितप्रज्ञता है समाधि की यह सहज स्थिति ही आदर्श है।

पोऽहं दीर्घ घण्आ निनाद। दूसरे साधक ने वह स्थान लिया पहले के उठ जाने पर और उनका प्रगाढ़ संयम-अनाहत उनके अंत से बाह्य में गूँजने लगा। शंख बंशी के स्वर उठे और लय हुए मेघगर्जन से ऊपर दिशा में प्रणव की पराध्वनि गूँजने लगीं।

वत्स! आचार्य के संकल्प के साथ साधक जाग्रत में आ गया वाद्यों का स्वर जगत में दुर्लभ नहीं है। मेघ गर्जन आकाश में बिना माँगे होता रहता है। शब्द साधना का लक्ष्य है जगत का कोलाहल में रहते हुए अविकंप शान्त बने रहना स्वधर्म में निरत रहना। “ॐ प्रज्ञानं ब्रह्म ॐ।” अन्य साधक आ बैठे थे उस प्रयोगशिला पर। नेत्रकोणों के संवेदन स्नायु सूत्र का उन्होंने तनिक स्पर्श किया और स्थिर हो गए। डड अद्भुत अपूर्व रंगों की छटा जब अंतर से उमड़ संपूर्ण हिम प्रदेश पाटलपीत, हरित रक्तनील रंगों से रंजित होने लगा। दो चार क्षण रंगों की छटा और फिर दृश्य अद्भुत अपूर्व! जैसे समूची दिव्य सृष्टि साकार हो उठी हो। अंत में एक परमोज्ज्वल प्रकाश राशि।

अलं! आचार्य के एक शब्द से उत्थित हो गया साधक। रंग और रूप समूची सृष्टि में बिखरे पड़े हैं। तुम आँखें बन्द करके संकल्प न भी करो भुवनभास्कर का अपरिमित तेज सहज सुलभ है। अनेकों रंग रूप वाले इस संसार में बिना चौंधियाए कर्तव्य निरत रह सको तो समझना कि यह साधना सफल हुई।

लं सिर्फ बीज का उच्चारण किया अब आसन पर आए साधक ने। शीघ्र दिशाएँ सौरभ से भर गई। क्षण-क्षण सुरभि का परिवर्तन और अंत में तुलसी मंजरी का अपार सौरभ।

गुरु ने उत्थित करके साधक को समझाया कहीं भी कोई जाय, गंध आयेगी ही, असगंध में स्थित रहना है।

इसी प्रकार रस का साधक आया। खेचरी मुद्रा तो की उसने किन्तु उसे उठाते हुए मार्गदर्शक मुस्कराए-रस तो इस लोक में भी प्राप्त है इनके आकर्षण से ऊपर उठ सको, तो समझो साधना सफल हुई।

स्पर्श का साधक कुछ अंग चालन की क्रियाएँ करके स्थिर हुआ था कि हिमप्रदेश में उष्णता अनुभव होने लगी। त्वचा ने सुकोमल स्पर्श अनुभव किया। पथ प्रदर्शक ने संदेश दिया सभी प्रकार के स्पर्शी को सहन करते हुए स्वयं में अवस्थिति होने का प्रयत्न करो।

अब पुनः सभी की दृष्टि आचार्य पर स्थिर हो गई थी। हरेक के अन्तर में यही उमड़ रहा था इनमें से कौन प्रणाली को श्रेष्ठ बतायेंगे गुरुदेव? कौन सिद्धि अपनी श्रेष्ठता का आकलन करा पाएगी। इतने में सामान्य कद काठी वाला युवक उन सबकी ओर आता दिखाई दिया। उसके सलोने चेहरे पर भोलापन था। उसे देख प्रायः सभी ने उपेक्षित किया सिवा आचार्य के जिनके मुख पर पुनः वात्सल्य उमड़ पड़ा था। स्नेह भरी दृष्टि से देखते हुए प्रणाम करते रहे उससे पूछा-कहाँ गए थे तोटक?

“प्रभु! पास के गाँव में एक वृद्ध बीमार था उसे दवा आदि देने उसके वस्त्रों को साफ करने में देर हो गई”। आजकल यह प्रायः इधर-उधर रहता है मण्डली एक धीमा स्वर उभरा।

कहाँ जाते हो वत्स! आचार्य की वाणी में पूर्ववत् करुणा थी। भगवन्! गाँव वाले सफाई स्वच्छता नहीं जानते सो पथ की सफाई कर देता हूँ कोई हारी-बीमारी हो तो उसकी सुश्रूषा करने लगता हूँ।

“तुम्हें किसी से कोई शिकायत तो नहीं” नहीं देव! ये सभी लोग विद्वान हैं, योगी हैं, मैं ठहरा मूर्ख इनका कुछ कहना मेरे लिए आशीर्वाद है फिर सभी अपने ही तो हैं। “इनके जैसी सिद्धियाँ प्राप्त करने की चाह नहीं उठती? तोटक”! “मेरे लिए आपकी आज्ञा ही सिद्धि है और सेवा करना ही योग। उसी में मेरा मन खूब शाँत रहता है।” कहकर वह आचार्य की ओर ताकने लगा।

“ठीक कहते हो फिर सबकी ओर देखते हुए कहा सेवा परम योग है और कामनाओं के कलुष से मुक्त मन चरम सिद्धि है”। सबके अंतर के प्रश्नों को एक साथ परखकर समाधान करते हुए बोले यही वह निरापद प्रणाली है जिसका अवलंबन तमस को सत्व में बदल देता है। इससे मन सिद्धियों की चाहत से उबर कर सर्वे भवन्तु सुखिनः के भाव में निमग्न रहता है। है न यह परमयोग कहकर उन्होंने शिष्य समुदाय की ओर देखा फिर कुछ रुककर वे बोले—”अन्य योगियों को ये स्थितियाँ कब मिलेगी, पता नहीं। पर सेवा योग का साधक तो इसी जीवन में मुक्ति ही क्यों जीवन मुक्ति विदेह मुक्ति का परम लाभ प्राप्त करता है। लोभ, मोह, अहंकार से छुटकारा मिला कि उक्त स्थिति आयी।” “हाँ! एक बात जरूर है “ सुनकर सभी तनिक और सावधान हुए “सेवा सिर्फ रोगी की सुश्रूषा तक सीमित नहीं है इसकी परिधि का विस्तार लोकहित में प्रव्रज्या करने, ज्ञान दान करने, जीवन विद्या का शिक्षण करने तक भी है यह ध्यान रहे।”

परिव्राजकों के समूह में सभी को शंकाएं शमित हो चुकी थीं। शिष्य उपदेष्टा को मस्तक नवाकर उठ रहे थे। उपदेष्टा किसी अन्य गहन चिन्तन में खोने लगे थे। यह उपदेशक थे आदि गुरु शंकराचार्य। लगभग डेढ़ हजार वर्ष बीज जाने पर भी जिनकी वाणी पहले से कहीं अधिक समीचीन है।


अंतरिक्षीय हलचलें व उनका प्रभाव

पृथ्वी पर उसके निवासी मनुष्यों, प्राणियों तथा वृक्ष-वनस्पतियों पर सौरमण्डल की उथल-पुथल का विशेष प्रभाव पड़ता है। उनमें से कुछ सामयिक होते हैं तो कुछ का प्रभाव स्थायी रूप से लंबे समय तक बना रहता है। उदाहरण के लिए समुद्र में उठने वाले ज्वार-भाटों का चन्द्रमा की घट-बढ़ के साथ तारतम्य बैठता है। इन्हीं दिनों लोगों की मानसिकता एवं स्वास्थ्य में विशेष परिवर्तन आँके जाते हैं। सूर्य मण्डल की हलचलों का प्रभाव सीमित न होकर व्यापक क्षेत्र को अपनी चपेट में लेता है। ज्योतिषियों के इस कथन में कोई दम नहीं कि जन्म काल के समय की स्थिति के आधार पर मनुष्य का भाग्य और भविष्य बनता है, परन्तु यह सत्य है कि सौर प्रवाहों, अन्तर्ग्रही प्रभावों एवं ब्रह्माण्डीय बौछारों का वातावरण सहित समूचे मानव समुदाय पर प्रभाव पड़े बिना नहीं रहता। यह सुखद एवं दुःखद दोनों प्रकार का हो सकता है।

बृहत् संहिता में उल्लेख है कि सूर्य में होने वाले परिवर्तनों एवं अन्य ग्रहों के प्रभाव से मनुष्य का स्वास्थ्य एवं व्यवहार प्रभावित होता है। शास्त्रों में ग्रहण काल में कुछ खाने-पीने की मनाही इसीलिए की गई है कि उस अवधि में निस्सृत अवाँछनीय ब्रह्माण्डीय किरणों से खाद्य पदार्थ दूषित हो उठते हैं और रोगोत्पत्ति का निमित्त कारण बन सकते हैं। इन्फ्लुएंजा, प्लेग, कालरा जैसी महामारियों को उस अवधि में अधिक उग्र रूप धारण करते हुए देखा गया है।

इस संदर्भ में थेल यूनिवर्सिटी (अमेरिका) के सुविख्यात वैज्ञानिक प्रोफेसर हेंटिग्टन ने गंभीर खोजें की हैं और पाया है कि सौर मंडल में उत्पन्न हलचलों एवं बढ़ते सूर्य कलंकों से हमारी धरती सबसे अधिक प्रभावित होती है। उससे निस्सृत हानिकर किरणें पर्यावरण का संतुलन बिगाड़ती और प्राकृतिक सुरक्षा कवच तक को तोड़कर रख देती हैं। इनके कारण जीव-जन्तु एवं पेड़-पौधे तो प्रभावित होते ही हैं, बुद्धिमान समझे जाने वाले मानव समुदाय भी अवांछित प्रवाहों में बहते और आपदाग्रस्त होते हैं।

खगोलशास्त्रियों एवं ज्योतिर्विज्ञानियों ने इसी शोधश्रृंखला में अपने अध्ययन निष्कर्षों की अगली कड़ी और जोड़ते हुए कहा है कि सूर्य कलंकों के सर्वाधिक सक्रियकाल में कभी-कभी मानवी मस्तिष्क युद्धोन्मादग्रस्त तक हो उठता है। लड़कियाँ छिड़ जाती हैं, गृह युद्ध भड़क उठते हैं। असाधारण राजनीतिक उथल-पुथल होते और महाक्रान्तियाँ फूट पड़ती हैं। कार्ल साँगा एवं जॉन नेल्सन जैसे प्रख्यात ज्योतिर्विदों का कहना है कि इतिहास प्रसिद्ध घटनाएँ प्रायः इन्हीं अवसरों पर घटित हुई हैं। उनके अनुसार सूर्य से निकलने वाला प्रचण्ड प्राण प्रवाह उसमें उठने वाले तूफानी प्रवाहों तथा बनने वाले धब्बों सौर-कलंकों की बढ़ोत्तरी के साथ ही बढ़ जाता है।

हार्वर्ड विश्वविद्यालय (अमेरिका) के सुप्रसिद्ध खगोल विज्ञानी डॉ. रॉबर्टनोयस ने अपने अनुसंधान निष्कर्ष में बताया है कि सूर्य के केन्द्र से असंख्य शक्तियों की धाराएँ सतत् प्रवाहित होती रहती हैं। जब कभी इनकी बहुलता हो जाती हे तो उस वक्त पृथ्वी पर अनेकानेक परिवर्तन परिलक्षित होते हैं। इन परिवर्तनों में ध्वंस और सृजन दोनों ही सम्मिलित होते हैं। उनके अनुसार सौर मंडल में होने वाले परिवर्तनों से धरती के आयन मंडल में होने वाले परिवर्तनों से धरती के आयन मंडल का सीधा संबंध होने के कारण उसमें भी भारी उथल-पुथल होने लगती है। फलतः मानवी मस्तिष्क भी असाधारण सीमा तक प्रभावित होते हैं। अपने वर्षों के अनुसंधान अध्ययन के आधार पर उनने बताया है कि सन् 1990 के जून माह से लेकर सन् 2000 तक सैर सक्रियता अपनी चरम सीमा पर होगी। इस मध्य पृथ्वी पर वातावरण एवं मौसम संबंधी अनेकों परिवर्तन तो होंगे ही, आर्थिक, राजनीतिक, सामाजिक एवं आध्यात्मिक महाक्रान्तियों जैसे ऐतिहासिक महापरिवर्तन भी होंगे। सूर्य की प्रचण्ड शक्ति अपने प्रबल प्रवाह से सब कुछ उलट पुलट कर रख देगी।

सविता देवता की भारतीय अध्यात्म में बड़ी महत्ता बतायी गयी है। गायत्री मंत्र सविता की उपासना का ब्रह्मतेजस् के अभिवर्धन का, सौर ऊर्जा के आध्यात्मिक अंश को ग्रहण करने की प्रेरणा देने वाला मंत्र है। अगले दिनों सूर्य मण्डल में भारी उथल पुथल की संभावना है, ऐसे में सविता साधना का आश्रय लेना चाहिए।


मधु संचय


परम सत्ता से


परम सत्ता से (Kavita)

दूर हम से हो गया जो तत्व, फिर उससे मिला दो। लिपट आत्मा से गये भ्रम जाल, उनका तल हिला दो॥

कण्टकों में ही उलझ कर, रह गये हैं पंख प्यारे। चमन तक पहुँचे नहीं पग, पंथ में ही दाँव हारे॥ है जरूरत इसलिये, अंतर कमल दल को खिला दो॥

कंठ पाकर भी न गाया, परम प्रभु का रूप या गुण। कर कहाँ पाया हृदय, आकर्षणों का श्राद्ध तर्पण॥ जो जहर मीरा गयी पी, आज हम सबको पिला दो॥

पा गये जिस पंथ चलकर, राम की तुलसी कबीरा। मिल गया जिस कुँज बन में, सूर को गोपाल हीरा॥ अब रहा जाता नहीं उस पंथ, हमको भी चला दो॥

मिलन में बाधक हुए हैं, स्वार्थ और दुर्बुद्धि अपने। खींच लेते पाँव हैं, संसार को दिग्भ्रान्त सपने॥ राम! फिर से आओ, यह दुष्वृत्ति की लंका जला दो॥

ईंट भी जोड़ी नहीं, कहता रहा मेरा भवन है। स्वर्ण धन की बात क्या, धरती मेरी, मेरा गगन है॥ मिलन के बाधक इसी, अभिमान का हिमगिरि गला दो॥

अब तलक सीमित रहा-सुत, पुत्रि, बनिता और भाई। इन तलक ही प्रेम उमड़ा, इन तलक ही पीर आई॥ पर लगें अपने सभी परमार्थ की गंगा न्हिला दो॥

हो गयी संसार में आकर सुनहरी कांति मन की। हो सका कब रोज प्राची में ऊगौ, आभा गमन की॥ किंतु तड़प प्राण अब, इस तेज के कुछ कण दिला दो॥

—माया वर्मा


प्रज्ञा-अवतरण


प्रज्ञा-अवतरण (Kavita)

माँ प्रज्ञा अवतरित हुई क्या, सद्गुण का भण्डार मिल गया। विकृतियों से क्लान्त मनुज को, संस्कृति का संसार मिल गया॥1॥

फटे स्रोत गुप्त वैभव के। पथ प्रशस्त, नूतन उद्भव के॥ जगा सुप्त-देवत्व मनुज का। कण कण स्वर्ग धरा की रज का॥

परिवर्तन के महापर्व को, अब सुदृढ़ आधार मिल गया। माँ प्रज्ञा अवतरित हुई क्या, सद्गुण का भण्डार मिल गया॥2॥

श्रद्धा, भक्ति हुलसती मन में। सेवा की तत्परता तन में॥ मन में वह विश्वास बढ़ रहा। नित नूतन संकल्प कर रहा॥

अब श्रद्धा विश्वास युगल को, जन-जन में विस्तार मिल गया। माँ प्रज्ञा अवतरित हुई क्या, सद्गुण का भण्डार मिल गया॥3॥

चिन्तन लोक मंगलोन्मुख है। चरित्र दिव्यता का आमुख है॥ टलने लगा आस्था-संकट। छलक उठा आशाओं का घट॥

स्वर्ग सृजन के दिव्य शिल्प को, अब तो और निखार मिल गया, माँ प्रज्ञा अवतरित हुई क्या, सद्गुण का भण्डार मिल गया॥4॥

इन विभीषिकाओं के बादल। फला नहीं सकेंगे आँचल॥ माँ प्रज्ञा आलोक पिलाती। उकसाती प्राणों की बाती॥

स्नेहविहीन मनुज को अब तो, स्नेह छलकता प्यार मिल गया। माँ प्रज्ञा अवतरित हुई क्या, सद्गुण का भण्डार मिल गया॥5॥

—मंगल विजय


आस्तिकवाद का विज्ञान सम्मत आधार

भारतीय संस्कृति की मान्यताएँ पूर्णतः वैज्ञानिक हैं। कर्मफल की सुनिश्चितता एवं पुनर्जन्म की मान्यता हमारी संस्कृति की एक सबसे बड़ी विशिष्टता है। इसमें ऋषियों ने मनुष्य के नैतिक-चारित्रिक एवं आत्मिक उत्थान के जिन महत्वपूर्ण तथ्यों का समावेश किया है वे निश्चय ही संपूर्ण मानवजाति के लिए समान रूप से हितकारी हैं। यह मान्यता जहाँ आत्मा की अमरता का-जीवन को अनवरत रूप से गतिशील रहने का विश्वास दिलाती है और प्रगति प्रयासों को तनिक सा विराम लेने के उपराँत फिर से गतिशील बनने का उत्साह उत्पन्न करती है, वहीं यह मनुष्य को अपने जीवनक्रम में नीतिमत्ता को अनिवार्य रूप से अपनाये रखने को भी बाध्य करती है। प्राचीनकाल में जब भारतीय संस्कृति चहुँ ओर संव्याप्त थी तब समस्त संसार इन मान्यताओं एवं सिद्धान्तों का अनुकरण करके गौरव की अनुभूति करता था।

जीवन की अविच्छिन्नता एक सच्चाई है और पुनर्जन्म उसका प्रत्यक्ष प्रमाण। मरने के बाद दूसरा जन्म मिलने का तथ्य हिन्दू धर्म में सदा से माना जाता रहा है। चार्वाक के अतिरिक्त सभी भारतीय दर्शन कर्म एवं पुनर्जन्म में विश्वास करते हैं। पुराणों में इसका पग-पग पर वर्णन मिलता है। धर्मशास्त्रों में, अगणित आप्त वचनों में आत्मा के पुनर्जन्म लेने की बात कही गई है। चौरासी लाख योनियों में भ्रमण करने के उपराँत मनुष्य जन्म मिलने, पुण्य और पाप का फल भोगने के लिए फिर से जन्म मिलने की बात को धर्मग्रन्थों में अनेकानेक उदाहरणों के साथ समझाया गया है। जैन एवं बौद्ध मतावलम्बियों ने इसे अपने ढंग से प्रतिपादित किया है।

वस्तुतः पुनर्जन्म का सिद्धान्त अकाट्य है। ऋग्वेद सूत्र 4।18।1 में कहा गया है कि ‘यह मार्ग अनादिकाल से चलता आ रहा है जिसके द्वारा विभिन्न भोगों और एक दूसरे को चाहने वाले सभी पुरुष ज्ञानी जन आदि उत्पन्न होते हुए जीवन यात्रा पर अग्रसर होते हैं। उच्चपद वाले समर्थ व्यक्ति भी इसी परंपरागत मार्ग द्वारा ही उत्पन्न होते हैं।” बृहदारण्यकोपनिषद् 1। 4।10 में ऋषि पुनर्जन्म का समर्थन करते हुए कहते हैं “शुभ कर्म करने वाला शुभ होता है और पाप करने वाला पापी होता है। पुरुष पुण्य कर्म से अगले जन्म में पुण्यात्मा बनता है और पाप कर्म से पानी होता है।”

कोई-कोई कहते हैं कि यह पुरुष काममय ही है। वह जैसी कामना करता है, वैसा ही संकल्प करता है, जैसे संकल्प वाला होता है वैसा ही कर्म करता है और जैसा कर्म करता है वैसा ही फल प्राप्त करता, जन्म ग्रहण करता है। वृहदारण्यक उपनिषद् के ही 4।4।5 6।8।1।14 सूत्रों में जन्म ग्रहण करने तक की विस्तृत विवेचना की गई है। छांदोग्योपनिषद् में भी पुनर्जन्म का प्रभावशाली ढंग से वर्णन किया गया है। प्रश्नोपनिषद् का कथन है-”वहाँ जो लोग अभीष्ट पूर्ति को ही कर्म मानकर उपासना करते है वह चन्द्रलोक को प्राप्त करते हैं, वही जब लौट कर आते हैं तब संतान की इच्छा वाले वे ऋषि दक्षिण में जाते हैं। ऐतरेयोपनिषद् (2।1।4।5) में उल्लेख आता है पिता के पुण्य कार्यों के निमित्त पिता की ही आत्मा पुत्र रूप में प्रतिनिधि बनती है तब पिता रूप आत्मा अपना कर्तव्य पूरा हो जाने पर मृत्यु को प्राप्त होकर संसार से गमन करती है और जाकर फिर जन्म लेकर लौट आती है। यही इसका तृतीय जन्म है।”

श्रीमद्भगवद्गीता में दूसरे अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है-जिस तरह इस जीवन में बचपन, यौवन और वृद्धावस्था आते हैं इसी तरह आगे दूसरा शरीर प्राप्त होता है। इसे अधिक स्पष्ट करते हुए इसी ग्रन्थ के 2।22 में वह कहते हैं कि—जिस तरह कोई व्यक्ति अपने पुराने कपड़ों को उतार कर नये वस्त्र धारण करता है। ठीक उसी तरह आत्मा पुराने शरीर को छोड़ कर नये शरीर को ग्रहण करती है। क्योंकि जिसने जन्म लिया है उसे मृत्यु की गोद में अवश्य जाना पड़ेगा और जिसकी मृत्यु हुई है उसका जन्म लेना सुनिश्चित है। अपना उदाहरण प्रस्तुत करते हुए वे अर्जुन को समझाते हैं कि-मेरे और तेरे अनेकों जन्म हो चुके हैं। उनको तो मैं जानता हूँ पर तू नहीं जानता। पुनर्जन्म का उद्देश्य समझाते हुए और पूर्ण विकास का आश्वासन देते हुए वे कहते हैं कि “प्रयत्नपूर्वक परिश्रम करते-करते पापों से पवित्र होता हुआ कर्मयोगी अनेक जन्मों के बाद सिद्धि पाकर अंत में उत्तम गति को पा लेता है।”

मृत्यु के समय जैसी गति जीव की रहती है वैसी गति और जन्म को वह प्राप्त होता है। इसी को स्पष्ट करते हुए आपस्तम्ब धर्म सूत्र (2। 1। 2।-3। 5। 6) में कहा गया है कि विभिन्न वर्णों के लोग अपने व्यवस्थित कर्तव्यों के संपादन से सर्वोच्च एवं अपरिमित स्वर्गीय सुखों का भोग करते हैं। कर्मफल शेष होने के कारण पुनः लोट आते हैं और यथोचित जाति या कुल, रूप, वर्ण, बल, बुद्धि, प्रज्ञा, सम्पत्ति के साथ जन्म लेते हैं, कर्तव्य पालन का लाभ उठाते हैं और यह सब आनन्द में परिणत होता है जो चक्र के समान दोनों लोकों में होता है। यही नियम दुष्कर्म करने पर भी लागू होता है और दुष्परिणाम नारकीय यातनाएँ भुगतने के रूप में भी सामने आता है। यही बात गौतम धर्मसूत्र (11।21।30) के भी कहीं गई है। गीताकार ने 1 वें अध्याय इसी तथ्य का उद्घाटन किया है।

आत्मा की अमरता और शरीर की नश्वरता भारतीय दर्शन का प्राण है। इसकी अमिट छाप अन्यान्य धर्मों एवं दर्शनों पर भी पड़ी है। उसे उसी न किसी रूप में उन्होंने स्वीकारा और अपनाया है। जातक कथाओं में भगवान बुद्ध के सैकड़ों पिछले जन्मों की कथाओं का संग्रह है। ईसाई एवं मुस्लिम धर्मों में तो पुनर्जन्म की मान्यता स्पष्ट नहीं है पर उनके यहाँ भी आत्मा का अस्तित्व मरने के बाद भी बने रहने और न्याय के दिन’ ईश्वर के सम्मुख उपस्थित होने की बात कही गई है। ईसा का यह कथन कि जब तक मनुष्य पुनः जन्म नहीं लेता, वह ईश्वर के दर्शन नहीं कर सकता। पुनर्जन्म का ही संकेत है यहूदी लोग भी इस सिद्धान्त को मानते हैं। दक्षिण अमेरिका, आस्ट्रेलिया और अफ्रीका के निवासी पुनर्जन्म की मान्यता पर विश्वास रखते हैं। तिब्बत में दलाई–लामा की नियुक्ति ही इसी सिद्धान्त के आधार पर की जाती है। इस प्रकार विश्व के प्रायः समस्त धर्मों के अनुयाइयों ने किसी न किसी रूप में पुनर्जन्म की मान्यता को स्वीकार किया है।

पुरातन काल में अनेक देश पुनर्जन्म में विश्वास करते थे। मिस्र एवं यूनान के निवासियों में यह विश्वास था कि मानव आत्मा अमर है और शरीर की मृत्यु हो जाने पर यह किसी अन्य जीवित वस्तु में, जो जन्म लेने वाली होती है, प्रवेश कर जाती है। मिस्र की पूजा पद्धति इसकी साक्षी है। हिरोडोटस के अनुसार यूनानी दार्शनिकों ने भी इस सिद्धान्त को अपनाया था। यही कारण है कि पाइथागोरस की रचनाओं में इसका विशद वर्णन मिलता है। हाप्किन्स एवं मैकडोनेल प्रभूति विद्वानों ने पाइथागोरस के ऊपर पड़ने वाले इस भारतीय प्रभाव की पुष्टि की है। एम्पीडाकिल्स एवं प्लेटो जैसे ग्रीस के प्रख्यात दार्शनिकों ने आत्मा के पूर्वजन्म और उत्तर जन्म में विश्वास किया है। जर्मन दार्शनिक मैक्समूलर, गेटे फिश आदि ने भी इसका समर्थन किया है। केनेथवाँकर ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “दि सर्किल ऑफ लाइफ” में लिखा है कि ईसा के काल में पुनर्जन्म का सिद्धान्त भारत में प्रसिद्ध था। सुविख्यात जर्मन दार्शनिक कान्ट ने नैतिक चेतना के लिए मृत्यु के उपरान्त जीवन की निरन्तरता एवं अमरता को आवश्यक एवं स्वयंसिद्ध माना है।

भारतीय ऋषियों दार्शनिकों ने अपनी प्रखर बुद्धि योगशक्ति और तर्क प्रणाली से यह सिद्ध किया था कि आत्मा की मृत्यु कभी भी नहीं होती यह वह एक अजर अमर अविनाशी तत्त्व है जो दैवी नियमानुसार—कर्मफल की सुनिश्चित विधि व्यवस्था के अनुसार भिन्न-भिन्न रूपों में प्रकट होती रहती है। आधुनिक काल के कुछ पाश्चात्य मनीषियों ने भी पुनर्जन्म और कर्मफल के मर्म को समझा है द “फ्यूचर ऑफ फेथ” में परसी कोल्सन ने कहा है कि—’पुनर्जन्म, सत्य या कल्पनात्मक’ इस भ्रमकारी विश्व ब्रह्मांड की एक बहुत ही प्रशंसनीय और कई अर्थों में संतोषप्रद व्याख्या है। विख्यात दार्शनिक वाँकर ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ‘रिइनकार्नेशन’ में लिखा है कि ‘केवल पुनर्जन्म ही मानव जीवन की समस्याओं को क्रमशः हल करता है।

‘द सुपर फिलिकल’ नामक पुस्तक में आँसबार्न ने कहा है—पुनर्जन्म एक उच्चस्तरीय संभाव्य एवं समीचीन कल्पना है जो जीवन की असमानताओं को समझने की इच्छा का समाधान प्रस्तुत करती है तथा सन्तोष प्रदान करती है। इसी में आगे कहा गया है कि “मैं ऐसे किसी अन्य सिद्धान्त से अवगत नहीं हूँ जो दैनिक अनुभव की समस्याओं का इस तरह संतोषप्रद उत्तर प्रस्तुत करता है।

“द प्रॉब्लम ऑफ रिबर्थ” नामक अपनी पुस्तक में सुप्रसिद्ध विद्वान रॉल्फशर्ले ने कहा है कि विश्व की जटिल गुत्थियों के जितने हल सोचे जा सकते है उनमें से पुनर्जन्म के सिद्धान्त को स्वीकार करने में सबसे कम कठिनाइयाँ है। वह कहते है कि इस सिद्धान्त में आस्था रखने वाला अपनी कल्पना के आधार पर उन सभी दशाओं और अवस्थाओं की व्याख्या कर सकता है जिसमें मनुष्य जाति के विभिन्न सदस्य पृथ्वी पर जन्म लेते है। उनके अनुसार पुनर्जन्म में विश्वास रखने वाला कम से कम शाश्वत न्याय में सर्वव्यापी सामान्य अवस्था के नियम में किसी असंगति का अपराध किये, विश्वास कर सकता है। भविष्य के जीवन के बारे में आस्था रखने वाला व्यक्ति थोड़े में बिना किसी निराश के हेतुवादी हो सकता है। पुनर्जन्म उन कई बातों की स्वतः व्याख्या कर देता है जिनकी आनुवांशिकता स्पष्ट नहीं कर सकती। विकास जैसी उलझी हुई अत्यन्त जटिल समस्याओं का समाधान जिस सरलता से पुनर्जन्म की मान्यता प्रस्तुत करती है, वैसा समाधान अब तक कोई अन्य परिकल्पना प्रतिपादित करने में सफल नहीं हो पायी है।

अध्यात्म तत्वज्ञान की आधारशिला समझी जाने वाली पुनर्जन्म की मान्यता को अब वैज्ञानिक अनुसंधान का विषय स्वीकार कर लिया गया है। इस पर नित नूतन खोजें हो रही है। इस संदर्भ में जो प्रमाण सामने आये है उनमें पुरातन असमंजस की स्थिति धीरे-धीरे समाप्त होती जा रही है। प्रत्यक्ष—प्रच्छन्न नास्तिकवाद को इस प्रस्तुत प्रमाणों के सम्मुख अपने पूर्वाग्रहों की छोड़ना या शिथिल करना पड़ रहा है। पुनर्जन्म का सिद्धान्त जीवनक्रम में न केवल नीतिमत्ता को अपनाने पर बल देता है वरन् इसे मानने से यह आत्म और विश्वास जाग्रत होता है कि जीवन अखण्ड और अनन्त है। इसका अंत पंच भौतिक कायकलेवर के नष्ट हो जाने पर ही नहीं होने वाला है। जो इच्छाएँ, कामनाएँ एवं योजनाएँ इस जन्म में अधूरी रह जाती है वह अगले जन्मों में पूरी होंगी क्योंकि जीवात्मा अपने पूर्व जन्मों में सूक्ष्म संस्कार साथ लेकर जाती है। जीवन की निरन्तरता पर विश्वास रखने वाले सदैव आस्तिक बने रहते है, मृत्यु से कभी भयभीत नहीं होते।


चूहे से उसका विवाह (Kahani)

साधु की झोपड़ी में एक चुहिया रहती थी। कुछ दिन तक अच्छा खासा भोजन प्राप्त करने के उपरान्त यह बड़ी हो गई है और विवाह की इच्छा करने लगी।

साधु ने उसके लिये कई समर्थ वर ढूंढ़े हाथी, शेर पहाड़ व बगीचे आदि। चुहिया ने उन सब में दोष बताये और कहा पहाड़ बगीचे आदि को तो एक चूहा ही खोखला कर सकता है। मेरी समझ में इन सबसे चूहा अधिक उपयुक्त लगता है। साधु ने उसकी पसंद भी समझ तो और एक मोटे चूहे से उसका विवाह कर दिया।


दीक्षा के साथ शिक्षा भी अनिवार्य

एक साधु से एक सर्प ने दीक्षा ली। दीक्षा का समय कुछ त्याग करने के नियम है। साधु ने सर्प से क्रोध न करने की दक्षिण माँगी और उसने वह दे भी दी।

सर्प एक पगडंडी के किनारे पड़ा रहता। जो घास-पात मिलता उसी से अपना पेट भर लेता। उसी रास्ते कुछ नटखट लड़के भी गुजरते। साँप को अपने स्वभाव के विपरीत पगडंडी पर चुपचाप पड़ा देखा, तो उनने आये दिन छेड़ना कभी-कभी कंकड़ फेंकना आरंभ कर दिया। इस स्थिति में बेचारा सर्प घायल होने लगा। लड़कों की शरारत और भी अधिक बढ़ती गयी। सर्प को अपनी प्रतिज्ञा का ध्यान था, सो वह न तो क्रोध करता और न किसी से बदला लेने की कोई चेष्टा करता। फलस्वरूप इस दुर्दशा में पड़े हुए उसे बहुत दिन हो गये।

एक दिन सर्प के वही गुरु उधर से निकले। शिष्य देव ने उनको पहचान लिया ओर साष्टाँग दंडवत करके अपनी दुर्दशा का हाल बताया और कहा क्रोध छोड़ देने का ही यह फल हुआ। आपकी गुरु दीक्षा लेने पर तो मेरी उन्नति होनी चाहिए थी। वैभव और प्रताप बढ़ना चाहिए था। पर यहाँ तो सब कुछ उलटा हो रहा है। कृपया कहीं भूल हुई हो तो बताएँ। आपका आशीर्वाद निष्फल क्यों जाना चाहिए?

साधु ने कहा-मैंने क्रोध छोड़ने-किसी को न काटने भर के लिए कहा था। एक बात अधूरी रह गई वह यह कि नटखटों के प्रति फुफकार लगाना मत छोड़ना। यह भी समझना चाहिए कि “भय” के बिना प्रीति नहीं होती। आजकल सज्जनों को दुर्बल और कायर समझा जाता है। उनके बारे में यह समझा जाता है कि वे अशक्त हैं कुछ कर नहीं सकते हैं। यह भ्रम किसी को नहीं होने देना चाहिए। सज्जनता का बाना पहन कर कायरता को नहीं छिपाना चाहिए।

सर्प की समझ में बात आ गई और दूसरे दिन से ही उधर आने वाले पर फन फैलाकर क्रोध दिखाने लगा। फुफकार सुनते ही नटखट लड़के ही नहीं, उधर से गुजरने वाले बड़े भी डरने लगे और छेड़खानी करने की अपेक्षा डर कर बचने और दूसरे रास्ते निकलने लगे।

गुरु साधु-सर्प शिष्य जहाँ रहता था, उस ओर बड़े। जिस पेड़ के नीचे बैठे, उसकी डाली पर बर्र का एक छत्ता था। उसमें पीली बर्रें सैकड़ों की संख्या में भिनभिना रही थीं। साधु ने उनसे पूछा-तुम लोग भी दीक्षा लोगी क्या? हम सिद्ध पुरुष हैं। अनेक मंत्रों के ज्ञाता। हमने अनेक ऋद्धि-सिद्धियाँ उपलब्ध कर ली हैं। जो शिष्य हमसे दीक्षा लेता हे, उसे हम निहाल, कर देते हैं। तुम भी यदि चाहो तो यह लाभ प्राप्त कर सकती हो। दीक्षा तुम्हें भी मिल जायगी। बिना कुछ दिये इस प्रयास का लाभ यदि तुम चाहो, तो प्राप्त कर सकती हो।

बर्रे उसी पेड़ पर बहुत दिनों से रहती थीं। सर्प की दुर्गति वे एक वर्ष से देख रही थीं। यह भी देखा कि सर्प का संकट तभी टला था, जब उसने फन फैलाने और फुफकार लगाते रहने की कला सीख ली थी। जब तक वह दया धर्म का पालन करता रहा, तब तक उस बेचारे की दुर्गति ही होती रही थी। अतः उनने साधु से दीक्षा न लेकर क्षमा माँग ली। कहा कि हम इसी स्थिति में अच्छी हैं।

पेड़ की जड़ में एक बिच्छू रहता था। देखने में सुन्दर किन्तु डंक में हलाहल जहर भरे हुए। दीक्षा की चर्चा उसने भी सुनी, साथ ही छत्ते वाले बर्रों का उत्तर भी। बिच्छू मन ही मन हँसा और साधु से कहा-”भगवन्! आप शिक्षा तो बड़ी मार्मिक देते हैं पर यह भूल जाते हैं कि शिक्षा देने से पहले विद्यार्थी की परिस्थितियाँ भी जाननी चाहिए। आपके उपदेशों पर मेरे जैसा कोई चले, तो उसका एक दिन जीना भी मुश्किल हो जाय।” वस्तुतः शिक्षा वही सार्थक है जो व्यावहारिक हो, परिस्थितियों के परिप्रेक्ष्य में ही जा रही हो। सबको एक लाठी से भी तो हाँका नहीं जा सकता।


मानवी दायित्वों का गरिमापूर्ण निर्वाह

मनुष्य अन्य प्राणियों की तरह मात्र पेट प्रजनन तक की चिन्ताएँ करने तक सीमित नहीं है। उसके साथ कितनी ही जिम्मेदारियाँ भी जुड़ी हुई हैं। यह दायित्व बहुमुखी है। समझदारी के साथ-साथ इनकी भी अभिवृद्धि मनुष्य की समझदारी बढ़ने के साथ हुई है। यह इसलिए कि अन्य प्राणियों की तुलना में जो अतिरिक्त ज्ञान मिला है उसका सदुपयोग होता रहे। व्यक्ति स्वयं लाभान्वित होता रहे और दूसरों को उस प्रभाव से प्रभावित करते हुए सर्व साधारण के अभ्युदय का सुयोग बनाता रहे।

पशु-पक्षियों को अपने आपे तक का ही ध्यान रहता है। वे उसी परिधि में रहते हैं। प्रकृति उन्हें अपने अनुशासन में चलाती है। उसी प्रेरणा के सहारे वे अपना जीवनक्रम चलाते हैं। उनमें चिन्तन करने की कोई मौलिक क्षमता तो नहीं होती, पर स्वभाव अवश्य होता है जिसके सहारे अपना काम करते और निर्वाह चलाते रहते हैं। उनकी संरचना और व्यवस्था के बीच भी तालमेल है। समय का खालीपन प्रतीत न हो, इसलिए वे अपने बड़े पेट और छोटे मुँह के कारण पर्याप्त आहार खोजने और उदरस्थ करने में ही अपना सारा समय लगा देते हैं। कुछ बचता है तो प्रजनन के फेर में उसका उपयोग हो जाता है। एक दूसरे पर आक्रमण भी करते रहते हैं इसलिए आत्मरक्षा के लिए सींग, दाँत, नुकीले, पंजों, तेज चोंच का उपयोग भी उन्हें भी प्रकृति के प्राणियों की आवश्यकता को ध्यान में रखकर पूरा किया है। सर्दी-गर्मी से बचने के लिए बाल, पंख या मोटे चमड़े की ऐसी परत लगाई गई है कि किसी प्रकार की कठिनाई का अनुभव न हो। पशु-पक्षी कीट, पतंग प्रकृति के मार्गदर्शन में चलते हैं। उसके निर्देशन में रहते हैं। फलतः न तो उन्हें अतिरिक्त जिम्मेदारी उठानी पड़ती है और न सोच विचार करने के तंत्र का विकास करना पड़ता है।

किन्तु मनुष्य की स्थिति उनसे भिन्न है। उसकी संरचना में ऐसी विशेषताएँ घुली हुई हैं जिनके कारण उसे आहार उपार्जन, वस्त्र व्यवस्था, भवन आच्छादन परिवारगत निर्वाह आदि की जरूरतें पूरी करनी होती हैं। उसका निर्वाह सामाजिक लोक व्यवहार के सहारे संभव होता है। प्रगति का आधार भी इसी माध्यम से बन पड़ता है। प्रथाएँ, परिपाटियाँ, रीति-नीति, कानून-व्यवस्था आदि का सिलसिला भी इसी कारण शुरू हुआ है कि प्रकृति ने बहुत से उत्तरदायित्व उसके जिम्मे छोड़ दिये हैं। पशुओं की तरह उसे अपने पूर्ण नियन्त्रण में नहीं रखा है वरन् यह अवसर दिया है कि वह अपनी मौलिक सूझ-बूझ का सहारा ले। ऐसी रीति-नीति अपनाये जिससे अपने लिए तो सुविधा हो, किन्तु दूसरों से टकराने की जरूरत न पड़े।

विकसित बुद्धि बल के सहारे मनुष्य ने आहार-विहार की इतनी सुविधाजनक इतने प्रकार की सामग्री एकत्रित कर ली है कि उन सभी का आकर्षण अपने-अपने ढंग का अनोखा है। ललक लिप्सा का आकर्षण यह रहता है कि इनमें से अधिकाधिक प्रकार की, अधिकाधिक मात्रा में वस्तुएँ हस्तगत करें। उनके उपभोग का रस लें, किन्तु इस प्रकार का अतिवाद अपनाने पर उसकी प्रतिक्रिया अवाँछनीय होनी स्वाभाविक है।

स्वाद की लोलुपता, बहुविधि व्यंजनों को भूख से कहीं अधिक मात्रा में उदरस्थ कर लेने की उत्कंठा उत्पन्न करती है। महँगे प्रीतिभोजों में परोसा भी ऐसा ही जाता है जो पेट की सीमा और शरीर की आवश्यकता का दायित्व अनुभव नहीं करते हैं। वे मुँह के रास्ते अभक्ष्य कर अतिमात्रा में उदरस्थ करते नशे पीते हैं, फलतः बीमार पड़ते और अकाल मृत्यु मरते हैं। इस विपत्ति से बचने का एक ही उपाय है कि इन्द्रिय संयम बरता जाय। न केवल जिह्वा इन्द्रिय को, वरन् जननेन्द्रियों को उत्तेजना को भी नियंत्रण में रखा जाय। वस्त्रों की सीमा मर्यादा का ध्यान रखा जाय। स्वच्छता हर प्रसंग में ध्यान रखा जाए। इस प्रकार का विवेक और संयम अपनाये बिना कोई व्यक्ति निरोग नहीं रह सकता। आये दिन बीमार पड़ता और अपनी कार्यक्षमता गँवा बैठता है। यद्यपि मनुष्य उद्धत आचरण में भी स्वतंत्र है। इन्द्रिय परायण होकर कोई भी आहार-विहार में कितना ही व्यतिरेक कर सकता है। इसे रोकने के लिए ईश्वर ने उसे विवेक, बुद्धि दी है। उचित-अनुचित का विश्लेषण करके प्रकृति प्रेरणा के स्थान पर स्वास्थ्य संबंधी दायित्वों को निबाहने की समझ दी है इसे अपनाना उसका कर्त्तव्य है।

मस्तिष्क को कल्पना शक्ति मिली है, उसे किसी भी दिशा में दौड़ने दिया जा सकता है। कोई चाहे तो अचिंत्य चिन्तन की आदत डालकर मस्तिष्क को विकृत-विक्षिप्त स्तर का बना सकता है और ऐसे निर्णय-निर्धारण करता रह सकता है, जिन्हें आचरण में उतारने पर उद्धत, असभ्य या अपराधी स्तर का बना जा सके। इस उपलब्ध स्वतंत्रता का दुरुपयोग न होने देने के लिए मानसिक संयम की, चिन्तन क्षेत्र पर बड़ा अंकुश रखने की मनुष्य की जिम्मेदारी है। जो इसे निबाहते हैं केवल वे ही लोग सुख-शाँति से रहते हैं, दूसरों को चैन से रहने देते हैं।

धन मनुष्य कमाता है। उद्धत तरीकों से तो वह तुर्त-फुर्त अत्यधिक भी कमा सकता है। उपयोग करने की उसे छूट है। इस कमाई को वह दुर्व्यसनों में भी खर्च कर सकता है। इस स्वेच्छाचार से व्यक्ति बदनाम होता है, दरिद्र बनता है और अपने लिए विष बीज बोता है। यों ऐसा करने पर कोई बड़ा प्रतिबंध नहीं है तो भी इसे विवेकपूर्वक अपने को उस अनीति से रोकना, बचाना पड़ता है। जो इस जिम्मेदारी को नहीं निभाते वे विविध विधि दुःख पाते हैं।

परिवार कितना बढ़ना चाहिए इसका पूर्व निर्णय करके ही यह कदम उठाना चाहिए कि कितनों की खेलने-कूदने की सोने-खाने के लिए घर में उपयुक्त जगह है। प्रस्तुत आजीविका में से कितनों का गुजारा हो सकता है। उनकी शिक्षा, चिकित्सा, आजीविका शादी आदि का खर्च चल सकता है। बिना इन सब बातों को विचार किये सन्तानोत्पादन में लगे रहना, ऐसा ही है जैसा कि कुत्ता, बिल्ली आदि का अत्यधिक प्रजनन। उन सबकी दुर्गति ही होती है। ठीक तरह पालन-पोषण तो कुछ का ही हो पाता है। यही अनौचित्य मनुष्य भी अपनाये तो इसे गैर जिम्मेदारी ही कहा जायगा। मनुष्य के बालक प्यार, मनोरंजन आदि भी चाहते हैं। संख्या अधिक हो तो सभी को वह सब दे सकना शक्य नहीं होता। बिना खाद पानी के पौधे जिस प्रकार सूखते, मुरझाते और नष्ट होते रहते हैं वैसे ही मनुष्य के बालकों को भी दुर्गति हो तो इसे मानवी मर्यादाओं का उल्लंघन ही कहा जायगा।

देश, धर्म, समाज, संस्कृति के प्रति भी मनुष्य के कुछ कर्त्तव्य और उत्तरदायित्व हैं। यदि वो न बन पड़े और केवल स्वार्थ संजोने में ही जिन्दगी के दिन गुजरें तो यही कहा जायगा कि मानवी गरिमा के उत्तरदायित्व को जिस प्रकार निभाया जाना चाहिए था, उस प्रकार वह निभाया नहीं गया या उस संबंध में जितना ध्यान दिया जाना चाहिए था, उतना नहीं दिया गया।

ईश्वर ने मानव जीवन जैसी महती कलाकृति किसी उद्देश्य विशेष के लिए धरोहर रूप में दी हैं। इसके पीछे जन्म-जन्मान्तरों के संगृहीत कुसंस्कारों को घटाते-मिटाते हुए पूर्णता प्राप्त करना है। साथ ही यह भी जिम्मेदारी है कि ज्येष्ठ पुत्र के नाते युवराज की भूमिका संपन्न करनी है। सृष्टा के उद्यान को सुविकसित, समुन्नत बनाने के लिए उस प्रकार का आचरण करें, जैसा कुशल माली मालिक के बगीचे को फला-फूला बनाने के लिए तत्परतापूर्वक संलग्न रहता है।


Quotation

दुनिया में बुराइयाँ इसलिए अधिक हैं कि बुरे आदमी अपने पक्ष में ज्यादा बोलते हैं। सत्य के समर्थक यदि चुप न रहे और बुराइयों के विरुद्ध आवाज उठायें तो दुनिया में से आधी बुराइयाँ दूर हो सकती हैं।


जब बोल उठा महाकाल

“इतने समय कौन?” उन्होंने अचकचा कर इधर-उधर देखा न दिखाई देने पर भी पदों की आहटें, शरीरों के रगड़ खाने से उठी पत्तों की सरसराहट साफ सुनाई दे रही थी, वह सोचने लगे इस धुँधलके में यहाँ कौन भटक गया? सामान्यतया यहाँ तो कोई आता भी नहीं जानवर चराने वाले लड़के भी दिवस के तीसरे प्रहर तक वापस चले जाते हैं। इतने में कुछ सुनाई पड़ा, आवाजें क्रमशः साफ होती गई। वह भी कान लगाकर सुनने लगे। एक अपने साथियों से कह रहा था, “अरे! यहाँ कहाँ आ फँसे इस बियावान जंगल में रात हो चली है, कुछ सूझ भी नहीं रहा, अच्छा हो हम लौट चलें।

कोई और कुछ कहे, इसके पहले सभी की आँखें नजदीक आती जा रही मशाल की ज्योति शिखा की ओर जा टिकी, कौन? कौन मार्गदर्शक, देवदूत, आश्रयदाता सभी के मनों में अलग-अलग भाव उभरे। धीरे-धीरे मशाल के प्रकाश में एक आकृति स्पष्ट हुई अरे! यह तो साधू है-एक साथ कई कंठ स्वर बोल पड़े, हाँ भाई! मैंने आप लोगों की आवाजें सुनी, मुझसे रहा नहीं गया, मशाल जलाई और इधर-उधर चला आया। कौन है आप लोग? आने वाले ने सहज भाव से पूछा। “मैं ब्राह्मण हूँ” वृद्ध दिखने वाले व्यक्ति ने कहा। “साधु और ब्राह्मण, एक कर्महीन दूसरा विचारहीन।” कहकर ठठाकर हँस पड़ा सुनने वाले सकपका गए अपने को संभालते हुए एक ने कहा-”महाराज! एक के बाद अनेक असह्य दुःखों ने आचार्य जी को व्यथित कर दिया है, उनके कथन का बुरा न मानें।”

नहीं भाई इसमें बुरा मानने की क्या बात? यह तो कठोर सच्चाई हे, जजीरेत समाज की दुरावस्था का प्रधान कारण है-साधु ने सौम्य स्वर में बात आगे बढ़ाई, अच्छा हो आप सब यहीं पास में मेरी कुटिया तक चलें। थोड़ी ही देर से पच्चीस-तीस लोगों का समूह कुटिया के सामने था। सभी ने हाथ, पैर, मुँह धोए। इतने में गैरिक वस्त्रधारी संत ने भुने हुए कन्दों का एक छोटा ढेर सबके सामने लगा दिया, कुछ अन्य जंगली फल भी थे। सभी धीरे-धीरे खाने लगे, आज अनेक दिनों के बाद उन्हें तृप्ति अनुभव हो रही थी। तृप्ति सत्कार की, अपनत्व की, प्यार की सम्मान की। सिर्फ भोजन से भला कौन कब तृप्त हुआ है?

भोजन के बाद बातों का क्रम चल निकला। फूट पड़ी व्यथा कथा सिन्ध के राजा दाहिर पर आक्रमण की, किसी ने तो उसका साथ नहीं दिया। हे मानव! तूने पड़ोस में लगी आग बुझाने को कब सोचा है। मेरी नींद तो खुद के जल रहे घर को देखकर भी नहीं टूट रही। महिलाएँ कुचली-मसली गई। बच्चे भालों की नोंक पर उछलने के लिए मजबूर हुए। पुरुषों की रक्तधार से मेदिनी सिक्त हुई और आप लोग इतने पर भी भाग कर चले आए। साधु के शब्द बताने वाले के वाणी प्रवाह के सामने बाँध बन कर खड़े हो गये। एक क्षण के लिए वह सहमा फिर प्रकृतिस्थ होकर बोला-”भागे-भागते क्यों? नहीं हम सावधान करने आए हैं यह बताने आए हैं कि हम तो जल गए अब तुम्हीं झुलसने से बचो।” कहते-कहते वह तमतमा उठा। तमतमाहट सिसकियों में घुलने लगी। साधु ने सभी को आश्वासन दे जैसे-तैसी उन्हें सोने के लिए प्रेरित किया। वह भी कुटिया के अन्दर चले गए।

सोने की कोशिश की पर आँखों में नींद कहाँ? सोचने लगे आज समाज में चारों ओर छिद्र ही छिद्र हो गए हैं। जन अज्ञान, अभाव और आत्म चिन्तन से जर्जर है, कुरीतियों की सर्पमालाएँ रूढ़ियों के वृश्चिक दंश उसे मूर्छित और विकल कर रहे हैं, अनन्तधा विदीर्ण हो उठा है। जन जीवन। क्या करूं? तुम्हीं कुछ कर्तव्य सुझाओ। एकलिंग कहकर उसने सामने प्रतिष्ठित शिवलिंग की ओर कातर भाव से ताका। सोचते-विचारते पता नहीं उसे कब नींद आ गई। स्वप्न में देखा ज्योतिर्लिंग साकार हो उठा है। धीरे-धीरे उसने एक ज्योति पुरुष का रूप लिया। ज्योति रेखाओं से इसका शरीर बना है, मानो, अग्नि शिक्षा को छानकर स्वर्ण शलाकाओं से बाँधकर विद्युत शिखाओं से खरीदकर और सूर्यकान्त मणियों को गलाकर ही यह अपूर्व ज्योतिर्मंडल तैयार किया गया है। अहा यह अकारण दयालु परमदेव कौन हैं?

मानव का चिरपुरातन और चिरनवीन मार्गदर्शक अन्तः स्थित और बहिर्व्याप्त महाकाल। एक गुरु गम्भीर स्वर उभरा। समाज जर्जर है तो सिर्फ इस कारण कि हर कोई अपने स्वार्थों का घरौंदा बनाने के फेर में है। यहाँ तक कि तेरा भी जगत प्रवाह से विच्छिन्न होकर व्यक्तिगत साधना के कचुँक से निरंतर संकुचित होते रहकर स्वयं के मुक्ति लाभ की आशा करना और क्या है? समाज की रक्षा का अर्थ है-स्वार्थी का बलिदान। धरती पर स्वर्ग वही लाएगा, जिसके पास सहज जीवन का कवच होगा, सत्य को तलवार होगी, धैर्य का रथ होगा, साहस की ढाल होगी, मैत्री का पाश होगा, धर्म का नेतृत्व होगा, उठो, रौंदो इन स्वार्थों को तुम्हारे बलिदानों का प्रत्येक कण भावी पीड़ियों को साहस और निर्भीकता का संदेश देगा, प्रचण्ड सुधा की तरह बरसो, कायरों और निकम्मों के गढ़ पर धक्का मारो। उज्ज्वल भविष्य की ओर बढ़ने वाले प्रत्येक निःस्वार्थ कदम के साथ मैं स्वयं हूँ।

टूट गई उसकी झपकी, सोचने लगा कैसी सारगर्भित भी उद्बोधक वाणी, स्वप्न होने पर भी जाग्रत से कहीं अधिक सजीव, यही तो वह सन्देशा है जिसे सुनने के लिए मेरा अंतर तर व्याकुल था। सचमुच कहाँ समाज को स्तब्धता, अवमानना, भय कातरता और परमुखा पेक्षित्य से बचाने का महान सन्देश और कहाँ व्यक्तिगत चौखटों में छटपटाने वाली मुक्ति साधना के मेरे प्रयल! उपास्य के निर्देश ने उसके अंग-अंग में स्फूर्ति, उल्लास और प्रसन्नता भर दी थी।

लक्ष्य स्पष्ट था धरती पर स्वर्ग उतार कर रहूँगा। राह सुस्पष्ट थी- महाकाल का सहधर बनने की। योजना दिमाग में कौंध गई। कौन देगा मेरा साथ? धनिक! जो वैभव के मद में चूर हैं, विद्वान! बुद्धि के तिकड़में की पट्टी जिनकी आँखों में कस कर बंधी है, फिर कौन? शासन करने वाले, पर उन्हें शोषण और उत्पीड़न से फुरसत कहाँ? तब फिर? साधारण जन, भील, आदिवासी हर व्यक्ति जिसके कान निकलता की मर्म भेदी पुकारों को सुनने के लिए बहरे नहीं हुए हैं, जिनका सम्वेदनशील हृदय हर किसी छटपटाहट और तड़पन के साथ धड़क उठता है, और योजना के प्रथम चरण में वह जा पहुँचा भीलों की बस्ती में उनके तरुण नायक बप्पा के मन में अपनी सारी व्यथा उड़ेल दी। सहज जीवन को अपनी सम्पत्ति मानने वाले भील कह उठे हम तैयार है महाराज किन्तु.. किन्तु क्या? हम अनगढ़ और अशिक्षित माने जाते हैं, बुद्धिमान हमें उपेक्षित, तिरस्कृत समझते हैं, तैयार होने पर भी हम आपके अनुगामी बन सकेंगे सन्देह है। अनुगामी हमारे नहीं, भगवान एकलिंग के उस परा चेतना के जिसने मुझे झकझोर कर उठाया है अपना यंत्र बनाना चाहा है। वहीं तुम्हें, तुम जैसों को अपना यंत्र बनाना चाहते हैं। परवाह नहीं, यदि तुम बहुत नहीं हो, धन का अभाव हे, रहने के लिए गगनचुंबी अट्टालिकाएँ नहीं हैं, वर्तमान के जराजीर्ण समाज में तुम्हारा स्थान नहीं है। हमें नया समाज रचना है, नया समाज जिसका हर स्पन्दन मनुष्य में दिव्यत्व को उभार सके। जिसके समस्त मान दण्डों के आधार धन और बुद्धि न होकर संवेदनशील मानवीयता होगी। बोलो तैयार हो? हाँ शताधिक कंठस्वर गूँज उठे। ये शब्द सुनकर साधु भी हर्षपूर्वक बोला, “भीलो तुम्हारे काले शरीरों में उजले दिल हैं, तुम्हारी आत्माएँ महान और पवित्र हैं, आज के तुम्हारे ये संकल्पित स्वर आने वाली मानवता का दिग्दर्शन करेंगे। तुम्हारा कर्तृत्व प्रचलित दीपशिखा की तरह अनेकों के थके पावों को बल देगा। उसके ये शब्द हारीत मुनि की जय, बप्पा रावल की जय की प्रचण्ड ध्वनि के साथ फैल गए।

प्रचण्ड गति से बढ़ चला परिवर्तन का चक्र जिसकी धुरी हारीत मुनि थे। बप्पा रावल लोक नायक बने। उनकी प्रचण्ड कर्मनिष्ठा ने इतिहास में एक स्वर्णयुग रचा। बीतते समय में महाकाल के स्वर पुनः गूँजे हैं पहले की अपेक्षा कहीं अधिक सतेज सूरज की तपन हवा का बहाव, जल की लहरें एक ही गीत गा रही है-किसी भी स्थिति में लोक नायक चाहिए।


नवयुग का अरुणोदय अब निकट ही

भौतिक विज्ञानियों, समाजशास्त्रियों, अर्थशास्त्रियों एवं भविष्यविज्ञानियों ने अपने-अपने ढंग से अपने क्षेत्र के तथ्यों के आधार पर आने वाले समय के संबंध में अपने-अपने प्रकार की कल्पनाएँ की हैं। किसी ने उसे “सुपर इण्डस्ट्रियल एज” की संज्ञा दी है, किसी ने उसे “क्रियेटिव ह्यूमन एज” कहा है, किसी ने कुछ अन्य नाम से संबोधित किया है पर डडड लगभग सभी ने स्वीकारी है कि वह मनुष्य की भावनात्मक विकास चरमोत्कर्ष पर होगा और प्रायः हर कार्य उसका विवेक पर आधारित होगा। ऐसे ही एक द्रष्टा मनीषी रूस में विक्तोर ग्रिगोयोविच अफनास्टोव हुए हैं। उन्होंने एक पुस्तक लिखी है। वैज्ञानिक कम्यूनिज्म के मूल सिद्धान्त” जिसमें उनने भविष्य की लगभग मिलती-जुलती परिकल्पना की है।

“नये मानव को ढालना” एवं मानव जाति का उज्ज्वल भविष्य शीर्षक अध्यायों में वे कहते हैं कि उस काल में बौद्धिक विकास की सर्वोपरि नहीं होगा, बल्कि भावना एवं संवेदना के विस्तार की ओर तब विशेष रूप से ध्यान दिया जायेगा, क्योंकि मानव एक अत्यन्त संवेदनशील और भावुक प्राणी है और बिना इसके उन्नयन के समाज में परिवर्तन ला पाना असाध्य ही नहीं, असंभव भी है। इसे और स्पष्ट करते हुए वे आगे कहते हैं कि मानवीय भावनाओं के बिना सत्य के लिए न कभी कोई मानवीय खोज हुई है और न हो सकती है। अतः निकट भविष्य में व्यक्ति के मौलिक गुण इस रूप में विकसित होंगे, जिससे वह अपनी भावनाओं को नियंत्रित करने एवं स्वस्थ मनोवेगों को विकसित करने की दिशा में चरण बढ़ायेगा तथा उन्हें अपने तथा समाज कल्याण में लगायेगा। जिससे पिछड़े हुए ऊँचा उठें, उठे हुए प्रतिभाशाली बने और प्रतिभाशाली अपनी क्षमताओं का सुनियोजन लोक मंगल में कर सकें। यही है, भावनाओं आकाँक्षाओं, मान्यताओं का आदर्शवादी उत्कृष्ट स्वरूप, जो अंतःकरण में भाव संवेदना बन कर रहता है एवं जिसके परिष्कृत होने पर कोई व्यक्ति देवमानव बनता है।

जिस सामाजिक वातावरण के प्रभाव के अंतर्गत मनुष्य का विकास होता है उसकी परिधि में भौतिक तत्वों के साथ-साथ आत्मिक तत्व भी आ जाते हैं। यद्यपि भौतिक तत्वों की तुलना में स्थूल दृष्टिकोण से आत्मिक तत्वों का महत्व कम है। फिर भी वे मनुष्य की समग्र प्रगति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसके अंतर्गत अपने आपको विश्व वसुधा का अभिन्न अंग मानना, सामाजिक तथा वैयक्तिक जीवन में ईमानदारी, जिम्मेदारी, सच्चाई, नैतिक शुद्धता, नागरिक कर्तव्य की उदात्त भावना, हरेक सबके लिए और सब हरेक के लिए, एवं सब अपने और अपने को सब में मानने की आस्था, जैसे तत्व सम्मिलित हैं। इनके विकास के बिना न तो सुख-शाँति सुरक्षित रह सकती है, न व्यक्ति चहुँमुखी विकास कर सकता है। अगले दिनों इन्हीं से भरा पूरा कर व्यक्ति दिखाई देगा।

शारीरिक और मानसिक कर्मठता के प्रति लोगों की आस्था बढ़ेगी। शारीरिक श्रम के प्रति तिरस्कारपूर्ण और मानसिक तत्परता के प्रति रुझान भी बदलेगा। क्योंकि विज्ञान की प्रगति के बाद भी रोबोट उन व्यक्तियों का स्थान नहीं ग्रहण कर सकेगा, जिनमें मानवीय उदारता, दयालुता, सौहार्द्र विनम्रता और कलात्मक सुरुचि की अभिव्यक्ति होती है। पिछली सदी में तकनीकी प्रगति के फलस्वरूप मनुष्य के श्रम करने की शक्ति घटी है। जापान जैसे यंत्रीकृत देशों में तो शक्ति का यह अनुपात 15 प्रतिशत से घटकर 3 प्रतिशत हो गया है। इसके कारण बीमारियों की दर बढ़ी है और समय से पूर्व जीर्णता का खतरा पैदा हो गया है, जबकि मानसिक श्रम के साथ शारीरिक श्रम का संतुलन अवश्य होना चाहिए।

यही रूस की प्रगतिशील का रहस्य है। एक सर्वेक्षण के दौरान पाया गया कि सोवियत जनप्रतिनिधियों की कुल संख्या 22 लाख है। वे मात्र वैज्ञानिक क्षेत्र में ही व्यस्त नहीं रहते, वरन् चाणक्य, राजा जनक, नसिरुद्दीन की तरह अपना निर्वाह स्वयं उपार्जित करते हैं। इन प्रतिनिधियों में अधिकांश पेशेवर राजनीतिक नहीं, अपितु सामूहिक और राजकीय, वैज्ञानिक तथा साँस्कृतिक संस्थानों में काम करने वाले लोग हैं। प्रतिनिधियों के रूप में वे अपने कर्तव्यों की पूर्ति अपने खाली समय में बिना पारिश्रमिक लिये करते है। पेरेस्त्रेइका व ग्लासनोस्त जैसी उदारवाद की ठण्डी हवाओं के झोंकों के साथ अब ऐसे समाचार रूस से बड़ी संख्या में मिलने लगे है। आगामी सदी के उज्ज्वल भविष्य में यही स्वरूप सम्पूर्ण विश्व का होगा, जिसमें निर्धारित शारीरिक श्रम के साथ मानसिक विकास के लिए भी हर नागरिक को अवसर मिलेगा, ताकि उसकी बहुमुखी योग्यता विकसित हो सके।

प्रत्येक व्यक्ति राफाएल, बाइकोव्स्की, गोर्की, अथवा पुश्किन जैसा ख्याति प्राप्त महामानव एवं सुधारक बने या न बने, किन्तु हर व्यक्ति के अन्तराल में महामानव बनने की सुनिश्चित संभावना विद्यमान है। इसे ही विकसित करने की नई प्रक्रिया महाकाल की प्रेरणा से प्रारंभ होगी, जिससे मानव भ्रामक विचारों और मिथ्या धारणाओं से सदा के लिए मुक्त हो जाएगा। अपने व्यापक ज्ञान के आधार पर अपनी नियति का स्वामी बन जाएगा। कुप्रचलनों, अंधविश्वासों, कुरीतियों का विरोध करने में उसका आत्मबल एवं मनोबल डगमगायेगा नहीं, तब वह इन्हें विवेक की कसौटी में कसकर नये प्रतिपादन प्रस्तुत करेगा। उस समय हर व्यक्ति ऐसी महानता प्राप्त कर लेगा जिससे वह मानवीय उदात्त नियमों का पालन करेगा। अपने विचारों, भावनाओं और व्यवहार को स्वतंत्रतापूर्वक समाज के हितों के अनुरूप नियंत्रित करना भी सीखेगा। मनुष्य चिन्तनशील और संवेदनशील प्राणी के रूप में विकसित होगा, जिससे समय की अनेकानेक आवश्यकताएँ अनायास ही पूरी होती रहेंगी। यही मानवीय योग्यताओं एवं प्रतिभाओं के अधिकाधिक उपयोग तथा उसके आधार पर उज्ज्वल भविष्य को सुनिश्चित बना पायेगा।

आने वाले समय में जब व्यक्ति की आध्यात्मिकता की उच्चतम अवस्था की स्थापना हो जाएगी, तब मनुष्य बल प्रयोग के बिना अन्तराल की प्रेरणा से निर्देशित होकर अपने कर्तव्यों को समझेगा और जिम्मेदारी पूर्वक उन्हें निबाहने में स्वयं को नियोजित करेगा। प्रत्येक मनुष्य अपनी योग्यतानुसार काम करेगा और औसत नागरिक स्तर के निर्वाह में प्रसन्नता अनुभव करेगा। उस समय “व्यष्टि समष्टि के लिए और समष्टि व्यष्टि के लिए” जैसी भावना की अन्तराल में घुमड़ेंगी।

यूटोपिया जैसी लगने वाली इस वास्तविकता को कपोल कल्पना भर नहीं मान लेना चाहिए, वरन् इसमें सौ इंच सच्चाई को स्वीकारते हुए तदनुरूप तैयारी भी करनी चाहिए। प्रभातकाल जब निकट आने वाला होता है, तो विभिन्न माध्यमों से विभिन्न रूपों में हमें उसकी पूर्व सूचना मिलने लगती है। चिड़ियाँ चहचहाने लगती हैं, मुर्गे बाँग लगाने लगते हैं। युग-परिवर्तन के संदर्भ में आज ऐसा ही माहौल है। अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर घटने वाले तीव्र और अप्रत्याशित घटनाक्रमों को देखकर हम यह सहज ही अनुमान लगा सकते हैं कि परिवर्तन का प्रभात समुपस्थित हो गया है और हमें अब भावनात्मक सुषुप्ति से जगने की तैयारी करनी चाहिए।


कर्म योग की साधना (Kahani)

एक राजा की संन्यास लेने की इच्छा हुई। वह घर छोड़कर बन की और चल पड़ा। बहुत दूर निकल जाने पर एक किसान की झोंपड़ी मिली।

राजा बहुत भूखा था उसने कुछ खाने को माँगा। किसान ने हाँडी में खिचड़ी डाली और कहा अब इतना काम आप कीजिये कि चूल्हा जलाकर इसे पकायें। जब पक जाये तब मुझे बुला लें। हम दोनों उससे पेट भरेंगे।

राजा ने वही किया। जब खिचड़ी पक गई तो राजा ने किसान को बुलाया। दोनों अपनी-अपनी थाली परोस कर खाने लगे। किसान ने समझाया कि खिचड़ी रूपी काम भगवान ने दिया है इसके लिए चूल्हा जलाने पकाने जैसा पुरुषार्थ हमें करना होता है। आप कर्म योग की साधना करें। कर्त्तव्यनिष्ठ रहे, भगवान को संतोष दें। राजा की समझ में यह सीधा तत्वज्ञान भली प्रकार आ गया और वे घर लौट कर परमार्थ प्रयोजनों में लग गये।


मानव मात्र एक समान

उन दिनों चीन में कम्युनिस्ट शासन नहीं था। समाज देवता की आराधना में लगे हुए एक मिशनरी परिवार की किशोरी अपने पिता से चीन की कहानियाँ बड़े चाव से सुना करती। अकाल, महामारी, बाढ़, और सूखा ग्रस्त किसान परिवारों की मर्मस्पर्शी कहानियाँ उसके मन में विचित्र-विलक्षण हलचलें पैदा करतीं। ऐसे ही एक किसान की कहानी ने उसके मन में डेरा जमा लिया था। दाई कहानी कहती जा रही थी, चिंग जब बीमार रहने लगा तो उसके पुत्रों ने सोचा जमीन का बंटवारा कर लिया जाय। इस पर वे किसी सवाल पर सहमत न होने के कारण झगड़ने लगे।

एक सवाल-बालिका ने बात को काटकर कहा-क्या जमीन भी बँटती है।

उसे यह अजीबोगरीब बात समझ में ही नहीं आयी। पिताजी को मिठाइयाँ बाँटते हुए देखा था। सहेलियाँ भी आपस में मिलकर खाने-पीने का सामान बाँट लेती थीं। पर भला जमीन कैसे बाँटी जाती होगी।

हाँ लोग जमीन बाँट लेते हैं, धाय माँ ने कहा। लोग अपनी सीमा बनाकर उस पर अपना हक समझ लेते हैं। तो क्या हवा, पानी, प्रकाश भी बाँटा जाता होगा। बाइबिल में तो लिखा है, यह सभी भगवान का है, उनके लिए नहीं लड़ना चाहिए फिर लोग क्यों लड़ते हैं?

बालिका के मन में यह चिन्तन चलता रहा। बड़ी होने पर उसने एक उपन्यास लिखा-”द गुड अर्थ”। यह इसी पृष्ठभूमि पर लिखा गया था। इसे आगे चलकर अंतर्राष्ट्रीय ख्याति मिली। श्रेष्ठ कृति के रूप में इसे नोबुल पुरस्कार देकर सम्मानित किया गया।

इस उपन्यास की लेखिका थी-पर्लबक। उन्होंने इसमें किसान की व्यथा, वेदना को चित्रित किया है। जो यह मानता है कि रुपया पैसा तो छीना जा सकता है पर धरती। वह तो सबकी माँ है, समृद्धिदात्री है। आगे चलकर बेटे बँटवारे के लिए लड़ते हैं। किसान दुःखी होता है, विपत्तियों से संघर्ष करता है। उसी की कहानी किसान की व्यथा के रूप में पर्लबक की सशक्त लेखनी से कागजों पर उतरी है। विश्व की अनेक भाषाओं में अनूदित इस पुस्तक के पाठक को यह सोचने पर मजबूर होना पड़ता है कि धरती एक है। हमारे आपस में झगड़े मनुष्यता का अपमान हैं। यह कार्य अपनी माँ के शरीर को बाँटने जैसा ही गर्हित और नृशंस है।

अमेरिका में जन्मी, चीन में पली और पुनः अमेरिका में पढ़ी पर्ल ने मनुष्यता की पीड़ा को अपने दिल की धड़कनों में अनुभव किया था। पीड़ा किसी व्यक्ति विशेष की हो तो उसकी सेवा सुश्रूषा करने, साँत्वना देने से इसका निवारण संभव है। किन्तु जब एक, दो, चार, दस, सौ, हजार नहीं बल्कि समूचे मानव समुदाय का जीवन क्षत-विक्षत हो गया हो, सभी को एक साथ विवशता की जिन्दगी जीनी पढ़ रही हो तब? फिर तो एक ही बात समझ में आती है कि हम सब जिन्दगी की राहें नहीं पहचान पाए, उलटा और बेतरतीब जीवनक्रम अपना लिया। ऐसी दशा में एक ही उपाय रह जाता है उलटे की उलट कर सीधा करना, सही राह की पहचान कर उस पर चल पड़ना। उलटे को सीधा करने का बोध कराने, सही राह की पहचान करने की जिम्मेदारी मनीषियों की है। उनकी हे जो जीवन विद्या में निष्णात् हैं। बक इन्हीं में से एक थी।

उच्च शिक्षित पर्ल ने वैभव के अर्जन, शान-शौकत, ठाट-बाट के नशीले सपनों में उलझने की जगह इसी युगान्तरकारी काम के लिए अपना समूचा जीवन समर्पित कर दिया। कोलम्बिया विश्वविद्यालय के पत्रकारिता स्कूल में भाषण देते समय उन्होंने अपने बारे में कहा-”मैं एक अजीबोगरीब किस्म की नारी हूँ, जो मनुष्यता के लिए अपने को तिल-तिल कर गलाए बिना सुखी नहीं रह सकती। यह तिल-तिल कर गलना ही चिन्तन के रूप में पुस्तकों की नदी में बहता है।

सन् 1932 में वह भारत आयीं। यहाँ के मनुष्यों में गहरे छपे संस्कारों ने उन्हें प्रभावित किया। ग्रामीण जीवन को देखकर वह विभोर हो उठीं। भारत के प्रवास के दौरान उन्होंने विशाल भारत के संपादक बनारसीदास चतुर्वेदी से कहा-”आज लंबे अर्से से चली आ रही मेरी खोज पूरी हुई। किस बात की खोज? मैं यह सोच रही थी कि अगली सदी तक साफ झलकने वाली डडडड केन्द्र कौन सा देश बनेगा, अब समझ में आ गया, वह यही देश होगा। पर कैसे? चतुर्वेदी जी ने आश्चर्यचकित हो पूछा। यहाँ की धरती, यहाँ के मनुष्यों और सबसे अधिक यहाँ के साँस्कृतिक चिन्तन में वह संस्कार हैं। इनके उभरते ही हर किसी को मेरी बात की सत्यता नजर आने लगेगी।

लंबे समय तक समाज का गहरा अध्ययन करके उन्होंने अपनी प्रत्येक रचना को समाधान के रूप में प्रस्तुत किया। यद्यपि साहित्यकार की कल्पना बहुत ऊँची उड़ती हैं। इस उड़ान से उसकी रचनाएँ बहुत दूर जाकर स्वप्नों की दुनिया बसा लेती हैं। यथार्थ और कल्पना में सामंजस्य का अभाव साहित्यकार को भटका देता है। इस भटकन के कारण भूल-भुलैया में फँसा वह वास्तविक उद्देश्य व साहित्य की सार्थकता से दूर जाकर गिरता है। पर्लबक ने स्वयं को इस भटकन में फँसने नहीं दिया। उन्होंने समाज का दुखी पीड़ितों का जो मार्मिक हृदयस्पर्शी चित्रण किया साथ ही उनके समाधान भी सुझाए उसके कारण वे सार्थक और मूल्यवान साहित्य की स्रष्टा बन सकीं।

इतने अमूल्य और दिशा परक साहित्य का सृजन ही काफी नहीं है। जन-जन तक वह पहुँच सके यह भी जरूरी है। इसके लिए उन्होंने अपनी पुस्तकों के सस्ते संस्करण भी तैयार कराए। एक स्थान पर लिखती हैं-”मैं अपनी किताबों के सस्ते संस्करण देखकर खुश हूँ। क्योंकि मैं सोचती हूँ इन्हें गरीब तबके का आदमी भी पढ़ सकता है। निश्चय ही पुस्तक हर आदमी की पहुँच के भीतर होनी चाहिए। अन्यथा उत्कृष्ट साहित्य भी महंगा होने के कारण पुस्तकालयों की शोभा बढ़ाने वाला बनकर रह जाता है।

अमेरिका में रह कर उन्होंने रंग भेद नीति से लेकर पूँजीवादी शोषण तथा सामाजिक अत्याचार के विरोध में कदम उठाए। इन समस्याओं का समाधान उन्होंने मानवतावादी जीवन मूल्यों में देखा। प्रेम, सहानुभूति, सौहार्द्र और आपसी भाई-चारे का सन्देश अपनी रचनाओं के माध्यम से जनजीवन को सुनाया।

यही नहीं पेनीसिल्वेनियों में चार सौ एकड़ जमीन लेकर नागरिक बस्ती से दूर विश्व संस्कृति की प्रयोगशाला की नींव डाली। यहीं उन्होंने विभिन्न राष्ट्रीयता, खून, जाति व रंग के अनाथ बालक बालिकाओं को गोद ले उनकी माँ बन छोटे रूप में विश्व को एक सूत्र में सँजोने का काम शुरू किया। उनके इस सेवा कार्य के पीछे मूलभावना इस सिद्धान्त का प्रतिपादन ही है कि मानव मूल रूप से समान है।

विश्व संस्कृति व विश्व व एकता में पूर्व व पश्चिम का विभाजन सबसे बड़ी बाधा है। उन्होंने सर्वप्रथम इस बात का ध्यान दिया व सारे संसारवासियों से अनुरोध किया कि वे बात-चीत, व्यवहार में धरती का पूर्व व पश्चिम नाम से विभाजन न करें। उनकी हार्दिक इच्छा यही रही कि विश्व एक सूत्र में बंधे।

वह स्वयं में एक संस्था थीं-मानवतावादी संस्था। वे स्वयं के द्वारा स्थापित पूर्व पश्चिम संघ की अध्यक्ष रहीं। वे एक लंबे समय तक जान सेजस के छद्म नाम से अमेरिकी जीवन का भी चित्रण करती रहीं। इसमें भी उन्हें असाधारण सफलता मिली। 50 से अधिक कृतियों में उनके भाव मुखर हुए। 6 मार्च 1973 को 80 वर्ष की अवस्था में वह सदा के लिए अपनी इस प्यारी धरती से एक हो गयीं। उनके द्वारा प्रतिपादित मूल्यों आदर्शों से आपकी पीढ़ी प्रेरणा ग्रहण कर विषमता की खाई को पाटने हेतु तत्पर हो सकती है।


संस्कृति का गौरव बनाम सतयुग

भारतीय संस्कृति को महान कहे जाने का श्रेय सतयुग के ऋषियों एवं ब्राह्मणों को जाता है। जब से लाखों करोड़ों वर्ष पूर्व जबकि ज्ञान और विज्ञान का विधि और निषेध का कोई निश्चित मापदण्ड मानव प्राणी के पास न था तब अंधे को लकड़ी ही नहीं आँखें देने के समान जीवन का स्वरूप, विधान और व्यवहार समझाकर भटके को राह बताने की प्रक्रिया उन्हीं के द्वारा संपन्न की गई थी। वेद इसके मूल स्रोत हैं। जन साधारण के दुःखों एवं विपत्तियों को उनने न केवल देखा, सुना और अनुभव किया था वरन् उनसे त्राण पाने के उपायों का गहन अनुसंधान भी किया था। उपनिषदों का दिग्दर्शन एवं दर्शनों का आविर्भाव इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए हुआ है। इसका परम लक्ष्य मनुष्य को त्रितापों के बंधन से छुड़ाना और मोक्ष की ओर ले जाना है।

भारतीय दर्शन की विशिष्टता है-उसका बहुमुखी होना। उसकी विविध शाखाओं में ज्ञान का जो भण्डार भरा पड़ा है, वह विश्व के किसी भी प्राचीन देश में उपलब्ध नहीं है। यह वह प्रयत्न है जिसके द्वारा मानव-संस्कृति आत्म-चेतना प्राप्त करती है। मुख्य दर्शन छः हैं-साँख्य, योग, न्याय, वैशेषिक, पूर्वमीमाँसा और उत्तरमीमाँसा या वेदान्त। षट् दर्शनों की विशेषता यह है कि उनमें समस्त शास्त्रों, विधाओं का सार सन्निहित है। धर्म, मीमाँसा, ब्रह्मविद्या, अध्यात्म विद्या, आत्मविद्या, अन्तःकरण शास्त्र, कला शास्त्र तर्क आदि सभी विषयों का उनमें समावेश है। वे जिन तत्वों की व्याख्या करते हैं उसका अभिप्राय न केवल विवेचना मात्र करना है वरन् उन्हें जीवन में उतारना भी अभीष्ट है। दर्शन जिस वास्तविक तत्व की खोज करता है उसके लिए एक नैतिक भूमिका अनिवार्य है। चार्वाक के अतिरिक्त सभी दर्शनों का संबंध मोक्ष से है जिसे मुक्ति, कैवल्य, निःश्रेयस, अमृतत्व, निर्वाण अपवर्ग आदि विभिन्न नामों से जाना जाता है। भारतीय संस्कृति का हर सिद्धान्त इसी भित्ति पर आधारित है। मानव धर्म की प्रत्येक सरिता इसी समुद्र की ओर प्रवाहित होती है।

भारतीय दर्शन की उत्कृष्टता सर्वव्यापक है। इनमें सन्निहित सिद्धान्त अकाट्य एवं सार गर्भित हैं। इसकी उत्कृष्टता को समस्त विश्व ने मुक्तकण्ठ से स्वीकार किया है। योरोपीय दर्शन का मूल भारतीय दर्शन ही है। प्राचीन काल से लेकर आधुनिक काल तक पाश्चात्य विद्वानों-विचारकों ने अपने मन मानस की परिपक्वता के लिए भारत की यात्राएँ की एवं यहाँ की दार्शनिक प्रवृत्तियों का वर्षों अध्ययन करके अपनी जिज्ञासाओं की पूर्ति के पश्चात् ही स्वदेश लौटे। तदुपरान्त उन्होंने भारतीय दर्शन का ही अपने देश में प्रचार-प्रसार किया। यद्यपि यह बात अलग है कि काफी समय बीत जाने पर लोग यह समझने लगे कि यह उनके अपने मौलिक विचार थे।

पाश्चात्य एवं भारतीय दर्शनों का तुलनात्मक अध्ययन करने से यह स्पष्ट होता है कि विश्व के समस्त दर्शनों का आदि स्रोत भारतीय दर्शन ही है। पाश्चात्य मनीषी भी इस बात को स्वीकार करते हैं। सुप्रसिद्ध विद्वान सर विलियम जोन्स का कथन है कि दर्शनशास्त्र के बारे में यह कहना पर्याप्त होगा कि पूर्व और पश्चिम दार्शनिकों के सिद्धान्त बहुत कुछ आपस में मिलते-जुलते हैं। उनके अनुसार न्याय तथा पेरिपेटेक, वैशेषिक और आयोनिक, वेदान्त एवं प्लेटोनिक, साँख्य व इटेलिक, योग और स्टोइक दर्शनों में समानता दिखाई देती है। जिसके आधार पर गौतम की आरिस्टोटल से, कणाद ऋषि की थेल्स से, जैमिनी की साँक्रेटीज से, व्यास की प्लेटो से, कपिल की पाइथागोरस से तथा पातंजलि की जेनों से तुलना की जा सकती है। परन्तु यहाँ यह जान लेना आवश्यक हे कि पाइथागोरस का जन्म ई. पू. 580 में हुआ था जबकि भारतीय दर्शन का विकास इससे बहुत पहले हो चुका था। इसकी पुष्टि करते हुए मैकडाँनेल ने अपने संस्कृत साहित्य में लिखा है कि डेमोकायटिस, एम्फीडोक्लीज, पाइथागोरस, ऐनेनेगोरस और थेल्स आदि विद्वानों ने भारतवर्ष जाकर वहाँ के दर्शनों का अध्ययन किया था। उन विद्वानों के सिद्धान्त इस सत्य को स्वयं प्रतिपादित करते हैं। पाइथागोरस का पुनर्जन्म संबंधी एवं पंच भौतिक तत्वों तथा ईश्वर जीव संबंधी सिद्धान्त भारतीय दार्शनिक प्रतिपादनों को ही प्रतिध्वनि करते हैं। हेराक्लीट्स, एपीक्यूरस जैसे यूनानी दार्शनिक साँख्य दर्शन से प्रभावित थे। प्लेटो ने अपनी प्रसिद्ध कृति “रिपब्लिक” में पुनर्जन्म और कर्मवाद के जिन सिद्धान्तों, तथ्यों का प्रतिपादन किया है, वह भारतीय दर्शन की ही दिन है। इसे मैक्समूलर, हार्टमैन और इमर्सन जैसे विद्वानों ने भी एक मत से स्वीकारा है।

षड्दर्शनों का विकास उपनिषदों से हुआ है। जर्मन दार्शनिक शोपेनहांवर उपनिषदों को अपना गुरु मानते थे। कुरान में जिस गुप्त पुस्तक का उल्लेख है वह उपनिषद् ही हैं। दाराशिकोह ने इसकी पुष्टि की है। बाइबिल के सिद्धान्त उपनिषदों पर आधारित हैं। ईसा ने अपने जीवन के महत्वपूर्ण सोलह वर्ष भारत में व्यतीत किये थे और भारतीय दर्शन का गहन अध्ययन किया था। इस रहस्य को प्रायः सभी जानते हैं। उनकी प्रसिद्ध शिक्षा-”अपने पड़ोसी से प्यार करो,” मैं और प्रभू एक ही हैं।” आदि वेदान्त के अद्वैत दर्शन का ही प्रतिपादन करते हैं।

भारतीय दर्शन एवं यहाँ के दार्शनिकों को जानने की विदेशियों के मन में कितनी अपूर्व जिज्ञासा थी, वह इस बात से स्पष्ट होती हे जिसमें प्रख्यात यूनानी दार्शनिक प्लाटिनस ईरान पर होने वाले एक हमले में हमलावरों के साथ इसलिए सम्मिलित हो गया था कि संभव है वहाँ किसी भारतीय दार्शनिक या ब्राह्मण से भेंट हो जाये। वस्तुतः उस समय भारतीय मनीषियों के चिंतन चरित्र एवं व्यवहार की उत्कृष्टता अपने चरम उत्कर्ष पर थी जिनके संपर्क सान्निध्य के लिए सभी लालायित रहते थे। जर्मन दार्शनिक मैक्समूलर का इस संबंध में कहना है कि भारतीय स्वभाव से ही दार्शनिक हैं। उनकी दार्शनिक जाति प्रसिद्ध है जिन्होंने सभी क्षेत्रों में आशाजनक उन्नति की थी। सभ्यता को पराकाष्ठा तक पहुँचाने वाले आर्यों ने दार्शनिक ज्ञान को भी ऊँचाई तक पहुँचाया था। प्रो. वेवर के अनुसार “आर्यों की चिन्तन शक्ति इतनी ओजपूर्ण थी कि वह दार्शनिक ज्ञान के क्षेत्र में सब से आगे थे।” “न्यू लाइट आन द मोस्ट ऐशिएंट ईस्ट” नामक अपनी पुस्तक में प्रो. फ्रैकफर्ट ने लिखा है कि यह निर्विवाद रूप से सत्य है कि सभ्य संसार का निर्माण करने वाली प्राचीनतम जटिल संस्कृति में यूनानियों के उत्थान से पूर्व भारतीय संस्कृति का अस्तित्व विद्यमान था। विद्वान जॉन हण्टर ने भी माना है कि पहले ग्रीक व रोमन जातियाँ मन, बुद्धि आत्म सुख, दुख कर्म एवं अकर्म आदि के संबंध में अंधकार में थी। इनके गूढ़ रहस्यों को उद्घाटित करने और प्रकाश में लाने वाले भारतीय दर्शन ही हैं। मनीषी कोलबुक ने भी दार्शनिक जगत में भारत को अपना गुरु माना है और कहा है कि इस क्षेत्र में हम सब उसके विद्यार्थी हैं। विश्वविख्यात अमेरिकी दार्शनिक हेनरीडेविड थोरो भारतीय दर्शन का दीवाना था। जन्म तो उसका अमेरिका में हुआ था पर उसकी आत्मा पूर्णतः भारतीय हो गयी थी। उसका दृढ़ विश्वास था कि जो भी व्यक्ति भारतीय मनीषियों का मार्ग अपनाएगा, वह अपने लिए स्वर्ग का निर्माण करेगा।

भारतीय संस्कृति की श्रेष्ठतम दार्शनिक प्रवृत्तियाँ किस प्रकार विदेशों में प्रसारित हुई, इसका वर्णन राबिन्सन ने अपनी पुस्तक में विशद रूप से किया है। उसके अनुसार सिकन्द्रिया योरोप का बहुत बड़ा व्यापारिक केन्द्र था जहाँ योरोपीय एवं भारतीय व्यापारियों का सम्मेलन होता था। वहाँ यूनानी और भारतीय दार्शनिकों में विचारों का आदान-प्रदान भी होता था। इससे ईसाई धर्म प्रभावित हुआ। इस नगर के विध्वंस के बाद ईरान ने उस स्थान की पूर्ति की, जहाँ भारतीय प्राच्य विद्या का अरबी और फारसी में अनुवाद किया गया। यहाँ से अनूदित साहित्य स्पेन पहुँचा जहाँ से योरोप में इसका प्रसार हुआ। “यूरोपियन सिविलाइजेशन” नामक अपनी पुस्तक में भी श्री गोम ने लिखा है कि यूनान पर भारतीय संस्कृति का आधिपत्य अवश्य था पर उसका समय अनिश्चित है। धर्मशास्त्र में इतिहास के प्रणेता श्रीकाणे ने भी कहा है कि यूनान अत्यंत प्राचीनकाल से ही भारतीय संस्कृति के मूल्यों से अनुप्राणित होता रहा है।

आज की आवश्यकता है कि ब्राह्मणत्व पर आधारित उस ऋषि-युग, को सतयुग को पुनः लाया जाय तो देवत्व से अभिपूरित था तथा जिसकी तेजस्विता ने समूचे विश्व के जन-जन के मनों को प्रभावित किया था। यह संभव है तभी जब इस भू सब ब्राह्मण परम्परा को पुनः जाग्रत किया जा सके।


अपनों से अपनी बात

एक मान्यता है कि कभी इस धरातल पर सतयुग था। सतयुग को भी स्वर्ग के समतुल्य ही माना जाता रहा है। अंतर इतना ही है कि परलोक वाला स्वर्ग विलासिता की सुविधाओं से भरपूर था एवं धरती वाले सतयुग में व्यक्ति और वातावरण में सात्विकता, सद्भावना, सहकार से भरीपूरी परिस्थितियाँ विद्यमान थीं। उत्कृष्ट जीवन जीने वाले, हँसती-हँसाती मिलजुल कर रहने वाली परिस्थितियाँ विनिर्मित करने वाले देवपुरुष जब भी धरती पर रहे होंगे, वास्तव में उन दिनों धरती पर सतयुग रहा होगा?

सतयुग का सीधा संबंध ऋषि परम्परा से है। उसका एक नाम ब्रह्मयुग भी है अर्थात् ऐसे व्यक्तियों का वर्चस्व जो ब्रह्मपरायण, सर्वहितार्थाय जीवन जीते हों, जो अपने पर कड़ा अंकुश लगा कर अपनी समस्त विभूतियाँ, समय, उपार्जन को समाजोत्थान के लिए नियोजित करें। ऐसी ऋषियों को, देवमानवों को ब्राह्मण भी का जा सकता है। ब्राह्मण वंश व वेश से नहीं, जाति एवं वर्ण से नहीं अपितु कर्म से। मनीषियों का मत है कि ब्राह्मण वर्ग ही सबसे पहले आर्यावर्त, ब्रह्मावर्त में अवतरित हुआ तथा स्रष्टा की तरह उसके अन्दर भी यह अभिलाषा उठी कि एकोऽहं बहुस्यामि’ की तरह फैल जाएँ। इस तरह गंगा, यमुना के दो आब से जिसे ब्रह्मावर्त कहा जाता था, निकला ब्राह्मण समुदाय पूरे भारतवर्ष व फिर पूरे विश्व में फैल गया, अनगढ़ों को सुसंस्कृत, शिक्षित, सभ्य बनाता चला गया। इस प्रकार सारे विश्व में आर्यों का साम्राज्य छा गया, परिस्थितियाँ सतयुगी हो गयीं।

आज ब्राह्मणवंश लुप्त हो गया है। हिमालय क्षेत्र में पायी जाने वाली दुर्लभ कायाकल्प जैसे चमत्कारी परिवर्तन कर देने वाली वनौषधियां क्रमशः लुप्त होती जा रही हैं, जिसके लिए सभी वैज्ञानिक प्रयास कर रहे हैं कि किस प्रकार इन लुप्त हो रही प्रजातियों को बचाया जाय? गिर का सिंह बड़ा प्रसिद्ध नाम है किंतु गिरनार के अभयारण्यक में प्रतीक चिह्न के रूप में अब कुछ सिंह ही शेष रह गये हैं, एक पूरा समुदाय ही, वंश का वंश ही नष्ट हो गया। लगभग यही स्थिति ब्राह्मण वर्ग की है, जो कभी सतयुगी वातावरण के लिए जिम्मेदार थे। तैंतीस कोटि ब्राह्मण ही देवता कहलाते थे। आज वह परम्परा लुप्त हो गई है।

यदि सतयुग की वापसी करनी है तो लुप्त ब्राह्मण परम्परा को पुनः जाग्रत करना होगा जिसके माध्यम से जड़ धरित्री पर सुसंस्कृत स्तर के देवमानवों की बेल उगायी, बढ़ायी, फैलायी जाती है। वह परम्परा है ब्रह्मबीज के ब्रह्मकमल में विकसित होने की, मानव में देवत्व के जागरण की, व्यक्ति के अन्दर प्रसुप्त सुसंस्कारिता के उभार की।

इक्कीसवीं सदी निश्चित ही नवयुग के आगमन का शुभ संकेत लेकर आ रही है, जिसमें ब्रह्मपरायण व्यक्तित्व उभरेंगे, बड़ी संख्या में धरित्री पर फैलेंगे तथा पुनः सतयुगी वातावरण की स्थापना करेंगे। ब्राह्मण के जो प्रमुख कार्य बताये गये हैं-वे हैं-विद्या पढ़ना-पढ़ाना, दान देना-दिलवाना तथा यज्ञ करना- यज्ञ कार्य में सबको सहभागी बनाना। कहते हैं कि “ब्राह्मण” शब्द की उत्पत्ति ब्रह्मा से हुई है जो स्वयं विष्णु की नाभिकमल से जन्मे थे वे एक भाव संपन्न सृष्टि का निर्माण करने में निरत होकर सृष्टिकर्ता-प्रजापिता कहलाये। ब्रह्मर्षि विश्वामित्र ने भी अपने ब्रह्मतेज से कभी नूतन सृष्टि का सृजन कर ओजस, तेजस्, वर्चस्, से संपन्न महामानवों से धरित्री को शोभायमान किया था। आज की विषम परिस्थितियों में वैसा ही प्रखर पराक्रम ब्रह्मर्षि विश्वमित्र की क्रियास्थली में ही कठोर एकाकी तपश्चर्या में निरत पूज्य गुरुदेव ने संपन्न किया है। उनने ही उज्ज्वल भविष्य का सतयुगी वातावरण का स्वप्न देखा व उसकी समग्र पृष्ठभूमि तैयार की है। कठोर तप के माध्यम से उनके अन्तःकरण से भी वैसा ही ब्रह्मकमल प्रस्फुटित हुआ है जो पूर्ण पुष्पित, सुविकसित हो कर अनेकानेक ब्रह्मतेज से युक्त आत्माओं के रूप में चरम स्थिति को पहुँचेगा, भाव-संवेदना से भरा-पूरा स्वर्गोपम वातावरण धरती पर लाने में सक्षम होगा।

ब्रह्म बीज के जागरण व ब्रह्मकमल के प्रस्फुटन की इस प्रक्रिया का शुभारंभ प्रथम चरण के रूप में छः विराट ब्रह्म यज्ञायोजनों के माध्यम से इसी जून माह की 8 तारीख (ज्येष्ठ पूर्णिमा) को भारतवर्ष के छः स्थानों से होने जा रहा है। वास्तुचक्र में 6 कोण होते हैं, शरीर में षट्चक्र होते हैं। इसी प्रकार भारतवर्ष की विराट आत्मा का ब्राह्मणत्व जगाने के लिए छः विराट ब्रह्मयज्ञ आयोजन संजीवनी विद्या के विस्तार तथा राष्ट्रीय एकता का संदेश पहुँचाने के निमित्त उत्तर प्रदेश में लखनऊ, बिहार में मुजफ्फरपुर, मध्य प्रदेश में भोपाल एवं कोरबा, राजस्थान में जयपुर तथा गुजरात में अहमदाबाद, इस प्रकार छः स्थानों पर होने जा रहे हैं। इनकी तैयारी युद्धस्तर पर आरंभ कर दी गयी है। इन्हें सूत-शौनिक समागम स्तर का ब्रह्मयज्ञ, कुम्भ महापर्व स्तर का सम्मेलन तथा बाजपेय राजसूर्य यज्ञ परम्परा के स्तर का महायज्ञ भी कहा जा सकता है। जिनने भी मथुरा का 1958 का सहस्रकुंडीय महायज्ञ देखा है, वे आज तक उस विराट आयोजन के स्वरूप एवं सत्परिणामों की यादें संजोये हुए हैं। जो भी उस महायज्ञ से जुड़ा, वह महाकाल से एकाकार होकर निहाल हो गया। उसे वैयक्तिक, पारिवारिक, सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक हर क्षेत्र में सफलताएँ ही विभूतियों के रूप में मिलती चली गयीं। यह एक सुविदित तथ्य है कि पच्चीस लाख से भी अधिक परिजनों का जो परिकर गायत्री परिवार के रूप में जाना जाता है परोक्ष रूप से उसी गायत्री महायज्ञ से जन्मा है।

प्रस्तुत यज्ञायोजनों को उसी स्तर का महाब्रह्मयज्ञ मानना चाहिए। इन्हें सफल बनाने के लिए शाँतिकुँज से सभी स्थानों पर सक्रिय कार्यकर्ताओं की टोलियाँ मई माह की पहली तारीख को ही भेज दी गयी थीं तथा आयोजन स्थान के आस-पास के सभी परिजनों को व्यक्तिगत पत्र द्वारा सूचना भेज दी गयी थी कि वे एक शुभ मुहूर्त में पूरे भारतवर्ष में एक साथ एक ही दिन छः स्थानों पर संपन्न होने वाले इस यज्ञ में भाग लेकर पुण्यार्जन करें।

ये ब्रह्मयज्ञ दो दिन के रखे गये हैं। 7 जून को भव्य कलश यात्रा निकलेगी, सभी शाखाओं का प्रतिनिधित्व उसमें होगा तथा राष्ट्रीय एकता, अखण्डता की द्योतक झाँकियाँ उसमें होंगी। पीत वस्त्रधारी पुरुष एवं पीली साड़ियों में पीले कलश लिए महिलाएँ यज्ञ के शुभारंभ का उद्घोष करेंगी। इसी दिन पूरे राज्य स्तर का कार्यकर्ता सम्मेलन होगा तथा संध्या को विशाल सभा होगी जिसमें नारी जागरण मुख्य विषय होगा। अगले दिन प्रातः न्यूनतम सहस्रवेदी, अधिकतम चौबीस हजार या इससे भी अधिक दीपों का यज्ञ सद्भावना भरे वातावरण में एकत्रित समुदाय द्वारा संपन्न होगा। मध्याह्न पुनः कार्यकर्ता सम्मेलन तथा संध्या को विशाल सभा में विद्या विस्तार एवं राष्ट्रीय अखण्डता का संदेश शाँतिकुँज के प्रतिनिधियों द्वारा दिया जायगा। सभी स्थानों पर तैयारियाँ पूर्ण हो चुकी हैं। जिन्हें निमंत्रण किसी कारणवश न मिल पाये हों, वे इन पंक्तियों को आमंत्रण मानकर अपने समीप के ब्रह्मयज्ञ में अवश्य सम्मिलित हों। एकता-समता का परिचय सामूहिक ब्रह्मभोज एवं सामूहिक दीपयज्ञ देंगे जिनमें सभी स्त्री पुरुष जो ब्रह्मकर्म में लगना चाहते हों, भाग लेंगे।

यह स्मरण रखा जाना चाहिए कि यह दीपों का प्रज्ज्वलन मात्र नहीं है, नवयुग की आरती उतारी जा रही है तथा यह पात्र योजकों का समागम नहीं है, यह एक विराट ज्ञानयज्ञ है जिससे अद्भुत निष्कर्षों के आधार पर राष्ट्र के भावनात्मक नवनिर्माण की आधारशिला रखी जायेगी। यह एक शुभारंभ मात्र है, एक संक्षिप्त यज्ञ आयोजन नहीं वर्षा के उपराँत ही ऐसे ही विशाल स्तर के वास्तु स्थापनापरक षट्यज्ञों का आयोजन भारत के उत्तर, दक्षिण, पूर्व-पश्चिम सभी राज्यों में किया जाना है। इस महत्ता एवं गरिमा को समझते हुए ऐसे ऐतिहासिक आयोजनों में सम्मिलित होने से किसी को भी वंचित नहीं रहना चाहिए।


काल ही है महाकाल

उसने तनिक सकुचाते हुए कमरे में प्रवेश किया। संकोच इसलिए कि वह नियम समय में दस मिनट देर से पहुँचा था। सामान्य जीवनक्रम में ये दस मिनट उसे शायद ही कभी कीमती लगे हों।

उसे इस प्रकार ठिठकते देखकर साथ लेकर आये श्रीमन्नारायण ने उनसे कहा, “यह आपसे मिलना चाहते हैं, इलाहाबाद से आये हैं।” एक साँस में कहे गये इन वाक्यों के जवाब में उन्होंने मुस्करा कर उसकी ओर देखा और पास पड़े मूढ़े की ओर इशारा करके बैठने का संकेत दिया। इस बीच चरखे पर चल रहे हाथों की गति यथावत बनी रही।

बैठने के साथ ही उससे कुशल-क्षेम पूछा। कुशल-वार्ता के एक-एक शब्द से पिता का वात्सल्य और आत्मीयता भरा माधुर्य टपकता था। वार्ता के साथ ही उन्होंने धोती में लटकी घड़ी की ओर देखते हुए तनिक उलाहने भरे स्वर में कहा, “भाई प्रोफेसर! तुम दस मिनट लेट हो।”

वह कहता भी क्या, सिर झुका लिया। इधर वह हँसते हुए कह रहे थे, “जब प्रोफेसर को दस मिनट देर होती है, तो उसके विद्यार्थी को दस घण्टे देर होती है। जब विद्यार्थी को दस घण्टे देर होती है तो समाज को दस महीने की देर होती है और समाज की इस दस महीने की देर से राष्ट्र दस वर्ष पिछड़ जाता है। क्यों प्रोफेसर! ठीक कह रहा हूँ न।” कथन के साथ ही दृष्टि उसके चेहरे पर थी।

वह निरन्तर था। उसके मौन पर पास खड़े श्रीमन्नारायण ने हँसी के स्वर में उनसे कहा-”अरे! आपने तो आते-ही-आते डाँट दिया।” “नहीं-नहीं डाँटा नहीं, मैं तो समझा रहा था। देखो भाई मैं तो समय का आराधक हूँ, सो अपने आराध्य का निरादर कैसे सहन करूं। तुम किसके आराधक हो?” उनका प्रश्न था। “भगवान का” उसने संक्षिप्त जवाब दिया।

“भगवान के अनेकों रूप हैं सगुण और निर्गुण। कोई राम, कृष्ण, शिव, शक्ति के रूप में मानता है, कोई ज्योति, धन अथवा चिदाकाश के रूप में। मैं उसी को समय के रूप में मानता हूँ और तुम?”

वह अनचाही उलझन में उलझा गया। कौन-सा रूप बताये कुछ तय नहीं कर पा रहा था। उसकी चुप्पी के उत्तर में यह स्वयं बोल पड़े “चाहों तो तुम भी इसे इस रूप में मान सकते हो—समय भगवान का रूप।” श्रीमन्नारायण को आश्चर्य हो रहा था। इसमें आश्चर्य क्या? वह मनोभाव को तोड़ते हुए बोले। “भगवान स्वयं गीता में कितनी ही बार इस सत्य को दुहराते है, ग्यारहवें अध्याय में “डडड” की स्वीकरोचित, दसवें अध्याय में डडड कालों कहना, और क्या है? काल का सीधा मतलब है समय, समय अर्थात् जीवन। यह जीवन के नियंत्रक हैं, इसी कारण उन्हें महाकाल भी कहते है। कितनी ही तरह से क्यों न कही उनकी उपासना आराधना का मतलब है समय की उपासना आराधना का मतलब है समय की उपासना आराधना। ठीक है न भाई।” उनका इशारा श्रीमन्नारायण की ओर था।

“समझ गया। आपने तो पूरी व्याख्या ही कर डाली। पर एक बात कहूँ” उसने मुस्कराते हुए पूछा। “कह चुप क्यों हैं” वाणी में वात्सल्य था। “भगवान की उपासना से तो सिद्धियाँ, शक्तियाँ मिलती है और आपके देवता क्या दे रहे हैं? सिर्फ सूत की डोरियां।” कहने के साथ वह हँस पड़े। “अच्छा इसलिए हँस रहा है तू” फिर अपनी मुसकान रोकते हुए बोले—”नहीं रे! जो समय की उपासना करते हैं, अर्थात् प्रत्येक पल के साथ अपने श्रम का सुनियोजित तन्मयतापूर्वक करते हैं, साथ ही दिल में प्रभु समर्पण के भाव छलकते रहते है, उन्हें इसी जीवन में एकाग्रता, प्रतिभा, परिष्कार आदि आन्तरिक विभूतियों से लेकर विराट की अनुभूति तक बाह्य जीवन की समृद्धि, व्यक्तित्व का परिष्कार तथा सफलता आदि की प्राप्ति हुए बिना नहीं रहती। ये सिद्धियाँ और शक्तियाँ नहीं तो और क्या हैं?”

“हाँ तो सो है। “ दोनों लगभग एक साथ बोल पड़े। “अच्छा तुम दोनों जाओ। अब मैं..। समय की आराधना करूंगा”—श्रीमन्नारायण ने हँसते हुए वाक्य पूरा किया। वे भी उत्तर में मुसका दिए। स्वानुभूति के आधार पर डॉ. रामकुमार वर्मा एवं श्रीमन्नारायण को समय की आराधना का मर्म सुझाने वाले यह महामानव थे- महात्मा गाँधी। समूचा देश राष्ट्र पिता के रूप में नमन करता है।

*समाप्त*