विनाशकारी दुर्बुद्धि जब तब उभरती तो है, पर वह देर तक टिकती नहीं। प्रस्तुत किए गए अनर्थ के साथ-साथ वह स्वयं भी समाप्त हो जाती है। माचिस की एक तीली जला तो चपेट में आने वाले घर-मुहल्ले कोभी जला देती है, पर साथ ही यह भी निश्चित है कि तीली बच स्वयं भी नहीं पाती। दूसरों को जलाने के लिए उत्पन्न हुई दुर्बुद्धि उस उद्गम को भी समाप्त करके रहती है, जहाँ से कि वह उपजी थी।
नियति उद्दंडता को देर तक सहन नहीं कर सकती। उसने पिछले दिनों खोदी खाई पाटने और बेतुके टीलों को समतल करने की अपनी संतुलन व्यवस्था को अगले ही दिनों इस धरती पर उतारने का निश्चय किया है। हानि का वर्तमान स्वरूप और संसार का प्रस्तुत वातावरण उसे रास नहीं आता है, फलतः अवांछनीयता को निरस्त करने और उसके स्थान पर ऐसा कुछ अभिनव विनिर्मित करने का सरंजाम जुटाया है, जिसे सौम्य-सुंदर एवं सभ्यता-सुसंस्कारिता का प्रतीक कहा जा सके। यही है इक्कीसवीं सदी के रूपरेखा, जिसके साथ उज्ज्वल भविष्य की सुखद संभावना का समन्वय किया जा रहा है। यह गंगावतरण की पुरातन घटना के समतुल्य है, जिसने सूखे-वीरानों को शस्यश्यामला बना दिया था। इस संभावना को सतयुग की वापसी के नाम से भी प्रतिपादित किया गया है।
अगले दिनों बड़े काम संपन्न होने जा रहे है। बड़े प्रचलन आरंभ होने हैं और सबसे बड़ी बात है कि समय की प्रवाहधारा को उलटकर सीधा किया जाना है। यह नियोजन किसी सीमित क्षेत्र या वर्ग का नहीं, वरन इतना विस्तृत है कि उसके आँचल में समाए विश्वसमुदाय के करोड़ों मानवों और उनकी दिशाधाराओं में प्रायः आमूलचूल स्तर का परिवर्तन प्रस्तुत किया जाए। ‘यह सब दिव्य प्रतिभाओं के पराक्रम से ही संभव हो सकता है। उसका उपार्जन अभिवर्ध्दन हर उदारचेता और संयमशील के लिए संभव है। समय की आवश्यकता को देखते हुए प्राणवान सत्ताएँ अपने को इसी दिशा में विकसित करेंगी और उन कार्यों को संपन्न करके रहेंगी, जिन्हें आज की महती आवश्यकता के नाम से जाना और पुकारा जा रहा है।
महाकाल का अनुग्रह किन पर उतरा? युगदेवता का वरदान किन पर बरसा? प्रसुप्त अंतःकरण किनका समय की पुकार सुनते ही तनकर खड़ा हो गया? ऐसे सौभाग्यशालियों को ढूँढ़ना-खोजना हो तो उनकी जाँच-परख का एक ही मापदंड हो सकता है कि किनने युगधर्म पहचाना और उसे अपनाने के लिए किस स्तर का त्याग-बलिदान, शौर्य-पराक्रम चरितार्थ करके दिखाया? अर्धमृतकों से भरे जनसमुदाय में भी कभी-कभी कुछ ऐसे नररत्न निकल पड़ते हैं, जो सिर कट जाने पर भी मात्र रुंड के हाथों लगी तलवार का जौहर दिखाने से बाज नहीं आते। राणा सांगा के अस्सी गहरे घाव लगे थे, फिर भी वह शरीर में रक्त की एक बूँद रहने तक संग्राम की कर्म भूमि में जूझते रहे थे। ऐसे लोग भी होते तो कम ही हैं, पर कोयले की खदानें हीरों से सर्वथा रिक्त नहीं होती। कीचड़ में कमल खिलता है। वीर प्रसविनी धरित्री सर्वथा बाँझ नहीं होती।उसका प्रजननक्रम भी किसी-न-किसी रूप में कहीं-न-कहीं चलता ही रहता है। ऐसे लोग आत्मबोध होते ही इस स्थिति में पहुँच जाते हैं कि महाकाल का आमंत्रण सुन सकें और उस हुँकार की दिशा में शब्दवेधी बाण की तरह सनसनाते हुए बढ़ चलें। ऐसा भूतकाल में भी होता रहा है और आज की आवश्यकता भी उन्हें कहीं-न-कहीं से पकड़कर निर्णायक मोर्चे पर खड़ा होने के लिए बाधित करके रहेगी।
युगसंधि का वर्तमान समय ऐसा है, जैसा सृष्टि के अनादिकाल से लेकर अब तक कदाचित् ही आया हो और भविष्य में कदाचित् ही कभी आने की संभावना हो। कारण यह है कि भूतकाल में समस्याएँ आती रही है और उनके समाधान भी निकलते रहे हैं, पर वे सभी सामयिक एवं क्षेत्रीय थे। उनमें सीमित लोग ही प्रभावित होते थे। पर अबकी बार ऐसी विपन्नताएँ सामने आई हैं, जो समूचे संसार का समस्त मानव समुदाय के भाग्य-परिवर्तन का प्रयोजन सामने लेकर आई हैं। यह विकास या विनाश की चिरस्थायी समस्याएँ बन पड़ने या सुलझने का अभूतपूर्व समय है। इन दिनों किसे कैसे कहाँ क्या करना चाहिए? इन प्रश्नों का उत्तर एक उदाहरण से इस प्रकार समझा, समझाया जा सकता है कि सैनिकों के स्थान, कार्य, आयुध और मोर्चे परिस्थितियों की माँग के अनुसार बदलते रहते हैं, पर उनके लक्ष्य, दृष्टिकोण, एवं कर्त्तव्य की स्थिति सदा एक-सी बनी रहती है। उनके लिए राष्ट्र की सुरक्षा सब कुछ रहती है और सुविधा, शरीर, परिवार, भविष्य आदि सभी गौण हो जाते हैं। वे लक्ष्य पर अविचल रहते हैं और आवश्यकतानुसार प्राण से लेकर परिवार तक को दाँव पर लगा देते हैं। ठीक इसी प्रकार जिन्हें युग नेतृत्त्व के अनुरूप उच्चस्तरीय प्रतिभा से संपन्न होना है, उन्हें अन्य सब आकांक्षाओं और सुविधाओं की तुलना में नवसृजन के अनुरूप योग्यता-संवर्ध्दन एवं कर्त्तव्यनिष्ठा को निरंतर विकसित करते रहना चाहिए और व्यक्तित्व को इस स्तर का विनिर्मित करना चाहिए ताकि कथनी और करनी में एकता रहने के कारण हर किसी पर अनुकरण की छाप पड़ सके।
दो गिरगिट तालाब किनारे लड़ रहे थे। उसी जलाशय में एक हाथी बैठा कलोल कर रहा था। गिरगिट लड़ते-लड़ते हाथी के कान में जा घुसे और भीतर गहराई तक चले गए।
हाथी हड़बड़ाया। पीड़ा से बेचैन हो गया। उसने तालाब का बाँध तोड़ दिया और किनारे के पेड़ उखाड़ दिए। रुका हुआ पानी इन खंदकों से होकर बह निकला और समीपवर्ती खड़ी फसल के खेतों को डुबो दिया।
तालाब के किनारे दर्शक बहुत थे। उनने गिरगिटों को लड़ते, हाथी के कान में घुसते देखा था। पर उस छोटे अनर्थ को रोकने की किसी ने चेष्टा न की। जब दुष्परिणाम सामने आया, तब समझ उभरी कि गिरगिटों की लड़ाई को समय रहते रोक दिया गया होता तो फसल की बरबादी की इतनी बड़ी हानि न उठानी पड़ती।
मनुष्य मूलतः एक चिंतनशील प्राणी है, जो चाहे तो अपने मानसिक स्तर को इतना विकसित कर सकता है, जिसके माध्यम से ब्राह्मीचेतना से, परोक्ष जगत से संपर्क स्थापित कर भावी परिवर्तनों को पूर्व से ही वह जान ले। यह एक जाना माना तथ्य है कि हर परिवर्तन की रूपरेखा पहले सूक्ष्मजगत में बनती है, फिर वह अपने प्रत्यक्षरूप में आँखों से देखी जा सकने वाली स्थिति में घटित होती है।
विचार ही वे बीज हैं जो हर अच्छी-बुरी भवितव्यता का निर्धारण करते हैं। इन विचार तरंगों से जो भविष्य निर्धारण के पहले जन्म ले लेती हैं, अपना संपर्क स्थापित कर सकना हर विकसित मनश्चेतना वाले व्यक्ति के लिए संभव है। इस माध्यम से उन संभावित परिवर्तनों को भली-भाँति अपने दिव्य चक्षुओं द्वारा देखा जा सकता है। जैसा कि हम वर्तमान में दृश्य जगत को देखते व अनुभव करते हैं।
यह सब इस संदर्भ में कहा जा रहा है कि भविष्यकथन पूर्णतः संभव है, तथ्यसम्मत है एवं विज्ञान सम्मत भी। इसे अंतःस्फुरणा कहलें या किसी परोक्ष सत्ता का दैवी मार्गदर्शन। इसका कोई प्रत्यक्ष आधार न दीखते हुए भी, इसमें उतनी ही सच्चाई है जितनी कि दिन के आरंभ और अंत में सूर्य के उदयाचल से निकलने एवं अस्तांचल में छिपने में है। समष्टिगत रूप से घटने वाले आश्चर्यजनक क्रियाकलापों को कोई मिथक, यूटोपिया, कल्पनालोक की उड़ान, विज्ञान कथा मात्र भले ही कहलें; किंतु जब वह साकार हो जाती है, तब उनकी यथार्थता पर विश्वास करना पड़ता है। आज जो भी कुछ भविष्य के संबंध में उज्ज्वल संभावनाएँ व्यक्त करते हुए कहा जा रहा है, उसकी भी जड़ें वहीं विद्यमान हैं। इस निमित्त किया जा रहा पराक्रम, पुरुषार्थ प्रत्यक्ष भले ही न दृष्टिगोचर हो, परिणति निश्चित ही सुखद होगी।
इस का एक आधार आज घट रहे घटनाक्रमों को देखकर बनाया जा सकता है। आज पूर्वी यूरोप में प्रजातंत्र की जो लहर चल पड़ी है, तानाशाही मिटी है एवं कम्युनिज्म के नाम पर किए जा रहे व्यापक अनाचार का समापन हुआ है, उसका प्रत्यक्ष रूप से श्रेय भले ही रूस के राष्ट्रपति मिखाइल गोर्बाचेव को दे दिया जाए; किंतु परोक्ष जगत में यह सब भूमिका पहले से ही चल रही थी एवं इसका भविष्यकथन आज से साढ़े चार सौ वर्ष पूर्व ही फ्राँस के एक रहस्यवादी चिकित्सक नोस्ट्राडेमस ने अपनी सेंचुरीज नामक भविष्य वाणियों में कर दिया था। तब कोई उनके भविष्यकथन को नहीं समझ पाया था, ना ही आज के युग के “सेंचुरीज” के टीकाकार ही समझ पाए थे, किंतु अब जब ये परिवर्तन हंगरी, पूर्वी जर्मनी, चैकोस्लोवाकिया, पोलैंड एवं रुमानिया जैसे कट्टर साम्यवादी देश में घट चुके हैं तो सब को उनका भावार्थ समझ में आने लगा है। यह भविष्यकथन इतना पूर्व कैसे कोई कर सका, यह अत्यंत विलक्षण व रहस्यमय प्रसंग है।
जूलवर्न नामक एक उपन्यासकार ने भी भविष्यकथन की वैज्ञानिकता को इन्हीं दिनों प्रमाणित किया है। प्रसिद्ध पत्रकार एच.डी. क्वीग द्वारा लिखित 17 जुलाई 1969 के अर्कन्सास गजट में प्रकाशित एक लेख ने समूचे विश्व के मूर्धन्यों को यह सोचने पर विवश कर दिया कि मानवी मन उन सभी क्षमताओं, विभूतियों से संपन्न है, जिनसे वह आने वाले महत्त्वपूर्ण घटनाक्रमों को देख सकता है। श्री जूलवर्न के संबंध में प्रकाशित इस लेख में उल्लेख है कि इस सामान्य से उपन्यासकार ने 1865 में एक वैज्ञानिक मिथक लिखा था— ”फ्राम द अर्थ टू मून”, जिसमें यह कल्पना की गई थी कि मनुष्य पृथ्वी से किन माध्यमों से व किन परिस्थितियों में चंद्रलोक की यात्रा करेगा एवं वहाँ उसे क्या मिलेगा? जूलवर्न ने लिखा था कि “एक यान द्वारा तीन व्यक्ति चंद्रमा जाएँगे। उनसे पृथ्वी वासी सीधे वर्त्तालाप कर सकेंगे। वहाँ पर उतरते ही उनका शरीर बिना वजन का हो जाएगा एवं वे चंद्रमा पर ऐसे दिखाई देंगे मानों कोई शराबी अपने आपको सही स्थिति में खड़ा रखने के लिए प्रयत्नशील हो”।
आश्चर्य की बात है कि ठीक 104 वर्ष बाद उनका उपन्यास वस्तुस्थिति में परिवर्तित हुआ। उपन्यास में दिया गया एक-एक घटनाक्रम सही सिद्ध हुआ। इसका हवाला देते हुए श्री क्वीग ने लिखा है कि हर परिवर्तन का संबंध सीधा वैश्व मन से होता है, जिसे मनुष्य पकड़ सकता है तथा तद्नुरूप अपने क्रियाकलापों में हेरफेर कर सकता है। रामायण की घटना घटने से पूर्व ही महर्षि वाल्मिकी द्वारा उस घटनाक्रम को लिख पाना सूक्ष्मजगत से संपर्क स्थापित करने पर ही संभव हो पाया था।
जूलवर्न से भी अधिक स्पष्टता से चंद्रलोक की यात्रा संबंधी घटनाओं को देखा गिलबेंसन ने। जिसे उन्होंने “आल एब्रोड फॉर द मून” के रूप में 1947 में प्रकाशित किया व यह सिद्ध किया कि बड़े परिवर्तनों की रूपरेखा वास्तविक घटनाक्रम से काफी पूर्व सूक्ष्मजगत में प्रकाशित हो जाती है। उनने एक चंद्रयान में तीन व्यक्तियों विली, क्ल्विर एवं डियाना के बैठकर जाने का उल्लेख किया है। उनके अनुसार यह यान समस्त संचार-साधनों, आधुनिक वैज्ञानिक उपकरणों से सज्जित था। इसका नायक चंद्रमा पर पैर रखकर कहता है— ”यहाँ जीवन का कोई चिन्ह नहीं है और मैं चारों ओर सुनसान बियाबान बंजर दृश्यों को देख रहा हूँ। चारों तरफ ज्वालामुखी के पर्वत हैं, सतह पर दरारें हैं तथा लावाकण सतह पर बिखरे पड़े हैं। सामान्य रंग भूरा है; किंतु सफेद एवं काले रंग के टीलों के दर्शन भी हमें हो रहे हैं। हमारे उतरते ही यान दो भागों में बँटा गया। एक चारों ओर चक्कर लगाता रहा, एक ने चंद्रमा पर अपने को स्थापित किया। उतरते ही हमें संतुलन बिठाने में अत्यन्त कठिनाई हुई। प्रयोगों हेतु धूलिकण हम अपने साथ ले जा रहे हैं।”
आश्चर्य की बात यह है कि नील आर्मस्ट्राँग एवं एल्ड्रीन ने भी अपनी चंद्रमा यात्रा में यही सब देखा व वर्णन किया है। यह सब दो उपन्यासकारों ने क्रमशः 24 तथा 104 वर्ष पूर्व कैसे लिख दिया, यह समझने के लिए यह जानना होगा कि बेंसन एवं वर्न सामान्य उपन्यासकार मात्र नहीं थे, अपितु विचारक-मनीषी भी थे। ऐसे व्यक्ति भविष्य में होने वाली हलचलों को पहले ही देख लेते हैं। उनकी अंतःस्फुरणाओं को काल्पनिक उड़ानों का नाम दे दिया जाता है; किंतु कालांतर में यह सब होकर रहता है।
आज जो विद्वत्जनों, मनीषीगणों, भविष्य वक्ताओं, दैवी सत्ता के प्रवक्ताओं द्वारा उज्ज्वल भविष्य की संभावना का, जो उद्घोष किया जा रहा है, वह कपोल-कल्पना नहीं है, अपितु एक सुनिश्चित सत्य है। आने वाले दशक में ही यह सब परिवर्तन तेजी से होता दीख पड़ने लगे तो किसी को आश्चर्य नहीं करना चाहिए।
पांडवो ने एक तपस्वी ब्राह्मण के लिए भोजन का निमंत्रण भेजा। ब्राह्मण ने अन्यमनस्क मन से स्वीकार तो कर लिया, पर उसकी आँखों में से आँसू आ गए।
युधिष्ठिर ने सारा वृत्तांत सुना तो उनकी आँखों के आँसू भी न रुके।
इतने में कृष्ण आए। उनने भी अपनी दिव्यदृष्टि से सारा वृत्तांत जान लिया और वे भी रोने लगे। अर्जुन आए तो उनने भी अपने बड़ों को रोते देखा तो आँसू वे भी न रोक सके।
जब सभी भोजनकर चुके तो तीनों के प्रसंग में जुड़ी हुई सब बातें उगल देने का अनुरोध किया गया।
ब्राह्मण ने कहा— नित्य स्वयं उपार्जित खाता था। आज पराया धान्य खाना पड़ेगा न जाने, वह कुधान्य तो न होगा। इस असमंजस से वह दुखी था। राजा का आदेश टालने में भी खैर न थी।
युधिष्ठिर ने कहा— मैं इसलिए रो पड़ा कि हमारा धान्य यदि नीति उपार्जित ही होता तो ब्राह्मण को इस असमंजस में न पड़ना पड़ता?
कृष्ण ने कहा— अभ द्वापर है। लोगों को उचित-अनुचित का ज्ञान है। पर आगे ऐसा समय आयेगा जब कुधान्य के लिए सभी लालायित रहेंगे।
अर्जुन ने कहा हमने महाभारत तो जीता पर ऐसी व्यवस्था न बनाई; जिससे नीति निर्धारणों को तोड़ने की किसी की हिम्मत ही न पड़े।
अपने कर्त्तव्यों का स्मरण और निर्वाह न हो सकना सचमुच रोने जैसी बात ही है।
जीवन में परिस्थितियाँ सदा एक-सी नहीं रहतीं। यह भी सच है कि सभी लोग अलग-अलग परिस्थितियों में पैदा होते, पलते और बढ़ते हैं। इस संबंध में यह भी माना जाता है कि बुरी परिस्थितियाँ व्यक्ति के अपने कर्मों का दंड हैं और अच्छी परिस्थितियाँ उनके सत्कार्यों का पुरस्कार। यहाँ तक तो ठीक है, पर जब यह माना और समझा जाने लगा कि उन दंडों को सहने के अलावा और कोई चारा नहीं। इन परिस्थितियों में विकास अशक्य हैं। दुःख में जैसे-तैसे दिन बिताने के अतिरिक्त दूसरा कोई मार्ग नहीं है, व्यक्ति को निराशावादी बनाने का षड्यंत्रमात्र है। यही मान्यता व्यक्ति के जीवन में दुःखद अध्याय का प्रारंभ करती है।
डॉ. राधाकृष्णन अपनी कृति “आइडियलिस्टिक व्यू ऑफ लाइफ” में इसे एक प्रवंचना बताते हैं। उनके अनुसार जीवन का आध्यात्मिक दृष्टिकोणकष्टों को जहाँ धैर्यपूर्वक सहन करने के लिए कहता है; वहीं उसे परिस्थितियों से संघर्ष करने के लिए भी प्रेरित करता है। अपने दुष्कर्मों को दंड मानकर दुःखों का बोझ हल्का किया जा सकता है, पर इसका अर्थ नहीं है कि विषम परिस्थितियों में निष्क्रिय होकर बैठा जाए। आध्यात्मिक दृष्टि के अनुसार दुःख प्रकृति की पाठशाला के पाठ्यक्रम का अभिन्न व अनिवार्य अंग है। इसीसे मानव की अंतर्निहित क्षमता, प्रसुप्त प्रतिभा, योग्यता को उभरकर व्यक्त होने का मौका मिलता है। संसार के अधिकांश महापुरुषों ने इसी पाठ्यक्रम को पढ़कर स्वयं को प्रतिभावानों की पंक्ति में खड़ा किया है।
दुःखों के रूप में जिन परिस्थितियों से सर्वप्रथम सामना करना पड़ सकता है, वे हैं बाल्यकाल में माता-पिता के स्नेह संरक्षण का अभाव। लोग समझते हैं कि ऐसी परिस्थितियों में व्यक्ति की प्रतिभा कुंठित हो जाती है। पर यह भी एक तथ्य है कि अनाथ, असहाय और गरीबी में पले बालक प्रतिभाशाली भी निकल जाते हैं। स्विट्जरलैण्ड के डॉ. जे. पियरी रित्शनिक ने तो सिद्ध भी कर दिखाया है कि विभिन्न क्षेत्रों में नेतृत्व करने वाली विभूतियों को माता-पिता के स्नेह-संरक्षण से वंचित ही रहना पड़ा है। स्विट्जरलैण्ड से प्रकाशित होने वाली “मैडिसीन एण्ड हाईजीन” नामक पत्रिका के दिसंबर 75 के अंक में इस तथ्य को प्रस्तुत करते हुए, उन्होंने कहा है कि अभिभावकों का संरक्षण न मिलने से बालक में एक प्रकार की अभावजन्य क्षमता का प्रादुर्भाव होता और वह सुखों की खोज में आक्रामक हो जाता है। आक्रामक उन अर्थों में नहीं कि वह अपने निकटवर्ती लोगों की हिंसा करने लगे; वरन इस अर्थ में कि वह भाग्य पर हावी होकर समाज में महत्त्वपूर्ण स्थान अर्जित करना चाहता है। इस तथ्य को प्रमाणित करने के लिए; उन्होंने अनेकों उदाहरण प्रस्तुत किए हैं।
ईसा मसीह जिनके अनुयायी आज दुनिया के एक तिहाई लोग हैं, एक बढ़ई के पुत्र थे। उनका अधिकांश बचपन सड़कों पर अभावग्रस्तता की स्थिति में गुजरा। सिकंदर यद्यपि राजपुत्र था, पर आरंभ से ही उसे दुर्दिनों का सामना करना पड़ा। अपने प्रेमी के प्रणयजाल में फंसकर सिकंदर की माँ ने अपने ही पति राजा फिलिप की हत्या करवा दी और सिकंदर का भी तिरस्कार किया। परंतु सिकंदर का परिस्थितियों पर हावी होने का संकल्प इतना मजबूत था कि उसने अपने दुर्भाग्य को सौभाग्य में परिणत कर दिखाया।
साधारण मूर्तिकार के बेटे सुकरात ने अपना जीवन एक सामान्य सैनिक के रूप में आरंभ किया था। उसकी माँ दाई का काम करती थी। कुछ ही दिनों के बाद सुकरात को पितृस्नेह से वंचित हो जाना पड़ा। पर पुरुषार्थ व अध्यवसाय के बल पर वह पश्चिमी दर्शन के जनक के गौरव से मंडित हुआ। एक संपन्न परिवार में जन्म लेने वाला लियोनार्दाेनियी जन्म के कुछ ही समय बाद माँ के साथ पिता से अलग हो गया था। कारण था। पति-पत्नी का मनमुटाव। बड़ी विपन्न परिस्थितियों में माँ ने अपने बेटे का पालन-पोषण किया। थोड़ा समझदार होने पर लियोनर्दो आत्मनिर्भर हो गया तथा इटली ही नहीं संसार भर में अपनी चित्रकला और शिल्प के द्वारा अमर हुआ।
कठिनाइयाँ प्रतिभा के विकास में सहायक ही होती हैं। क्योंकि विपरीतताओं में शारीरिक एवं मानसिक क्रियाशीलता को उभरने का भरपूर अवसर प्राप्त होता है। विलासितापूर्ण जीवन जागृत क्षमताओं को भी सुलाने वाला सिद्ध होता है। भारतवर्ष को सर्वप्रथम एकसूत्र में आबद्ध करने वाले चंद्रगुप्त मौर्य भुरा नाम की एक दासी के पुत्र थे, उनका जीवन अभावों और गरीबी के बीच पनपा। चाणक्य जैसे मार्गदर्शकों के निर्देशन में उन्होंने अपनी आंतरिक क्षमताओं को जागृत किया और इसी के बल पर भारत को एक अखण्ड राष्ट्र के रूप में गढ़ने में समर्थ हुए। प्रसिद्ध विचारक और दार्शनिक कन्फ्यूशियस को जन्म के तीन वर्ष बाद ही पितृस्नेह से वंचित हो जाना पड़ा। अपने पिता को अभी ठीक प्रकार पहचान भी नहीं पाया था कि वह अनाथ हो गया और छोटी उम्र में ही उसे जीविकोपार्जन के कठोर श्रम में लग जाना पड़ा। लेकिन महानता के बीजों को उगाने की ललक उसमें प्रारंभ से थी। परिणाम स्वरूप गरीबी और तंगहाली में रहते हुए भी वह अपना लक्ष्य प्राप्त करने में सफल रहा।
शक्ति व सामर्थ्य का वास्तविक स्रोत मनुष्य का निजी अंतराल है। बाह्यसाधन भी इसी से जुड़कर अपना चमत्कार दिखाते हैं। इसके बिना सभी कुछ वैसे ही व्यर्थ साबित होता है, जैसे विद्युत के अभाव में विद्युत के उपकरण। सुदूर देशों की खोज में निकलने वाले कोलंबस के पास साधनों की प्रचुरता न थी। पर अपने साहस, सूझ-बूझ और व्यवहार-कुशलता के बल पर उसने परिस्थितियों को गढ़ा और अमेरिका को खोज निकाला। प्रसिद्ध चित्रकार माइकेल एजिलो फ्लोरेंस के एक गरीब परिवार का सदस्य था। चित्रकला के क्षेत्र में उसने अपनी क्षमताओं को नियोजित व विकसित किया। उसके व्यक्तित्व की यह भी एक विशेषता थी कि काफी कमाने पर भी गरीबों जैसा जीवन जीता था और आमदनी का अधिकांश हिस्सा दूसरे लोगों के लिए खर्च करता था।
निःसंदेह क्षमताएँ कहीं बाहर से नहीं बटोरनी पड़तीं। उन्हें सदैव अपने भीतर से उभारा जाता है। इसके लिए सिर्फ उन आवरणों को हटाना अनिवार्य है, जो भारी भरकम पर्वतशिला के सदृश इस स्रोत का रोके खड़ी होती हैं। आलस्य, प्रमाद, अकर्मण्यता रूपी इन शिलाओं को जैसे ही हटाया जाता है, अंतरशक्तियों का प्रवाह समूचे जीवन का कायाकल्प कर देता है।
युगप्रवर्तक के रूप में प्रख्यात मार्क्स गरीब परिवार में जन्मे व गरीबी में ही मरे। जीवन भर उन्हें कई स्थानों पर भटकना पड़ा। यद्यपि उनके पुरुषार्थ में उनकी पत्नी सहयोगिनी बनी, पर प्रतिकूलताओं से निखरने के कारण ही वे दुनिया के करोड़ों लोगों को अपना भाग्यविधाता बना गए। उनके विचार आज भी उतने ही सशक्त हैं, भले ही साम्यवाद के विकृत स्वरूप को जनसामान्य ने नकार दिया हो।
संगठन, कौशल, दूरदर्शिता के धनी शिवाजी एक साधारण दरबारी के पुत्र थे। जिनका कोई सहयोग शिवा को नहीं मिला। फिर भी वह स्वयं के सहारे मराठाराज्य की स्थापना करने में सफल हुए। ऐसे अनेकों व्यक्ति हुए हैं; जिनने अपना जीवन कठिन से कठिन परिस्थितियों से आरंभ किया। वे प्रतिकूलताओं से जूझते ही रहे। इन दिनों भी ऐसा ही समय सामने आ खड़ा हुआ है, जब परिस्थितियाँ विषमतम होती चली जाती हैं। क्रांतियाँ सदैव दमन के, प्रतिकूलताओं के विरुद्ध हुई हैं। यह महाक्रांति का समय है, एक सहस्राब्दी की परिवर्तन वेला है। ऐसे में अगणित प्रतिभाशाली महामानव विश्व भर में जन्मे हैं, तथा नवयुग की आधारशिला रखेंगे।
लुहार की दुकान पर अनेकों छैनी-हथौड़े टूटी-फूटी स्थिति में पड़े थे; किंतु जिस पर हथौड़े बजते थे, वह निहाई मुद्दतों से उसी स्थिति में बनी हुई थी।
राहगीर ने लुहार से पूछा— भला इतने छैनी-हथौड़े रखे गए, पर निहाई यथावत् कैसे बनी हुई है?
लुहार ने कहा— ”छैनी-हथौड़े आक्रमण करते रहे और टूट गए। निहाई ने सहा और अपनी मजबूती का प्रमाण दिया।”
एक किशोर वय का बालक प्रौढ़ आयु के व्यक्ति से कह रहा था, “दादा— आज माँ कह रही थी, तुझे अर्जुन जैसा बनना चाहिए। भला मैं कैसे अर्जुन बन सकता हूँ? उनके मार्गदर्शक तो स्वयं भगवान कृष्ण थे। मुझे ऐसी सुविधा कहाँ”? प्रौढ़ ने सारी बात ध्यान से सुन, फिर बोले— “बेटे! भगवान तो आज भी हर किसी का मार्गदर्शन करने को तैयार हैं, किसी-न-किसी रूप में सहायता देने को तत्पर हैं, पर हम उसके लिए ग्रहणशील कहाँ हैं?
“यह ग्रहणशीलता क्या है”? एक नया प्रश्न था। “जब कोई व्यक्ति स्वयं को ईश्वरीय कार्यों के प्रति समर्पित करता है। पूरी निष्ठा के साथ संकीर्ण स्वार्थों को भुलाकर उनमें जुट पड़ता है तो उसकी बढ़ती निष्ठा के अनुरूप वह आधार बन पड़ता है; जिस पर प्रतिष्ठित हो ईश्वरीय शक्ति क्रीड़ा कर सके। महानता के प्रति समर्पण तुच्छ को भी महान बना देता है। नगण्य-सा तिनका भी हवा के वेग से होकर मीलों ऊँचा उठ जाता है। बूँद अपनी महानता की ललक के आधार पर ही सागर से एक होती और महासागर का गौरव पाती है”।
“आपकी बातें तो बहुत अच्छी हैं, पर मुझे तो मेरी स्थिति के अनुरूप सलाह दीजिए कि क्या करें ? कैसे करें "बालक ने पुछा !" तू जागीर के सभी लोगों से घुलमिल, उनके कष्टों को अपना कष्ट समझ, उन्हें सुरक्षा प्रदानकर, वे भी तुझे अपना मानेंगे। ईश्वर की संतानों की सेवा ही ईश्वरीय कार्य है। तेरी बढ़ती लगन को देख भगवान तुझे मार्गदर्शन देंगे और तू अर्जुन की तरह दुष्प्रवृत्तियों का उन्मूलन और सत्प्रवृत्तियों का संवर्द्धन कर सकेगा”।
अर्जुन बनने की चाह रखने वाले बालक थे, शिवाजी और उनमें इस तरह की महानता के बीज बोने वाली माँ थी— जीजाबाई। बीजों को अंकुरित पल्लवित करने के लिए खाद-पानी जुटाने का श्रेय उनके दादा कोणदेव को जाता है।
बालक का भाव विकास उसके अपने पारिवारिकजनों की प्रेरणाओं और उनके व्यवहार के अनुरूप होता है। प्रौढ़ों पर ही नई पीढ़ी के गठन का दायित्त्व है, जिसे माता जीजाबाई ने सफलतापूर्वक निबाहा और शिवाजी का व्यक्तित्व गठन करने में सफल हुई।
उन दिनों भारत की स्थिति बड़ी करुण थी। शासकों की विलासिता, और जनता का शोषण, उत्पीड़न अपनी चरमावस्था पर था। ऐसे समय में शिवाजी ने अपनी जागीर के लोगों को सुरक्षा सुव्यवस्था प्रदान की। वहाँ के लोगों का सुखमय जीवन देखकर तोरण, चकन तथा कोंकण के लोगों ने गुहार की। उन तक अपनी दुर्दशा की खबरें पहुँचाई। सहायता माँगी-सहयोग का वचन दिया।
जनता की इस गुहार को वह अनसुनी न कर सके। उसे सुना और सोचा श्रेयस्कर यही है कि आगे-पीछे सोचने की जगह श्रेष्ठ कार्य में जुट पड़ा जाए। परिणाम यह हुआ कि उनकी सुव्यवस्था के घेरे में ये क्षेत्र भी आ गए। परंतु उन्हें संतोष न था। उनको एक ऐसे मार्गदर्शक की तलाश थी, जो कर्तव्य सुझा सके, जीवन विद्या सिखा सके।
संयोग कहें अथवा पूर्वनियोजित विधान-चाफल के पास के जंगल में शिवा-समर्थ का मिलन हुआ।” भक्ति व शक्ति का मिलन” “उत्कृष्ट चिंतन व प्रखर कर्म का मिलन” कुछ भी कहें। समर्थ ने शिवाजी की योजना व कार्यपद्धति सुनकर अपना मत प्रकट किया “आज के युग में आवश्यकता सुव्यवस्थित व संगठित प्रयासों की है। तू इसी में जुट पड़। पर ध्यान रख भेड़ों की भीड़ का नाम संगठन नहीं है। ऐसी भीड़ तो प्रायः जुटती है, पर दोष दुष्प्रवृत्तियों का एक ही हमला उसे तितर-बितर कर देता है। संगठन का तात्पर्य है— अनीति-अत्याचारों के खिलाफ सशक्त व्यूह की रचना। क्या तू इसे कर सकेगा? इसे कर सकने की एक ही योग्यता है— सशक्त चरित्र, उद्देश्य के प्रति दृढ़ता, संगठन के प्रत्येक सदस्यों के प्रति अपनत्व। एक साथ वज्र की तरह दृढ़ता-कुसुम की तरह कोमलता और पराग से परिपूरित होने से यह कार्य सधेगा।
“इस तरह यदि योजनाबद्ध रीति से कार्य किया जा सका तो इतिहास की पुस्तक में नए अध्याय की रचना होगी। धरती पर एक नया जमाना आएगा”। पर गुरुदेव हमारे पास तो सह्याद्रि के पर्वतपुत्र ही हैं; जो आदिवासी और अशिक्षित हैं। बुद्धिजीवी और विचारशील कहा जाने वाला वर्ग जिसे मनीषियों का समूह कहा जाता है साँस साधे मौन है, उससे कुछ भी आशा नहीं— शिवा जी ने जिज्ञासा की।
उत्तर में समर्थ का रोषपूर्ण स्वर उभरा— अरे! तू मनीषी किसे समझ बैठा है? पोथियाँ रटने वाले जानकारियों के ढेर को सिर पर ढोने वाले विद्वान तो हो सकते हैं, पर मनीषी नहीं। मनीषा वह उर्वर चिंतन क्षेत्र है; जिसमें समाज की तात्कालिक समस्याओं के समाधान सूझते हैं। जो इस मनीषा से संपन्न है, वह मनीषी। इस परंपरा में ज्ञानदेव, एकनाथ और तुकाराम आते हैं”।
“फिर तू क्या भूल गया? रघुवीर के साथ भी तो जंगलवासी असभ्य समझे जाने वाले वानर ही थे? उन दिनों कौन विद्वान मोर्चा संभालने आया था। पर इन असभ्य कहे जाने वालों के बीच से ही पवनपुत्र का व्यक्तित्व उभरा। आज भी इसी व्यक्तित्व की धारणा व उपासना का क्रम एक साथ उपजाना होगा। अभी तक व्यक्ति व चरित्र की पूजा होती आई है, पर अब हम व्यक्तित्व व चरित्र के पूजकों की श्रृंखला तैयार करना चाहते हैं, कहते-कहते समर्थ की आँखें गीली हो गईं। उन्होंने समझा कहकर शिवा की ओर देखा। शिवा का जवाब था, हाँ। तो बस जा रघुवीर की सामर्थ्य से तू उद्देश्य में सफल होगा।
सह्याद्रिपुत्रों के नायक ने अपने गुरु के वचनों को चिंतन चरित्र व व्यवहार में उतारना शुरू किया। बढ़ते क्रम के अनुसार कार्य की प्रभावोत्पादकता भी बढ़ी। उनके हृदय में जलती स्वाभिमान की आग भड़कती जा रही थी। अनीति-अत्याचार कीट-पतंगों की तरह भुनते जा रहे थे। 41 दुर्गों पर त्याग और सेवा का प्रतीक फहरा चुका था।
छत्रपति होने पर शिवा ने झंडे का रंग रखा भगवा। बाजीप्रभु देश पांडे के पूछने पर उन्होंने रहस्योद्घाटन करते हुए कहा— ”भगवा वर्ण त्याग व सेवा का प्रतीक है। तभी तो इसे समर्थ ने अपनाया। हम ठहरे समर्थ के आदर्शों पर चलने वाले। इस झंडे को स्वीकारना इस बात का सूचक है कि हम त्याग व सेवा के व्रत में दीक्षित हैं। समाज के हित में सभी कुछ होमने के लिए कृतसंकल्प हैं”।
इसी दृढ़ निष्ठा व कुशल संगठन क्षमता के बल पर वह निरंतर सक्रिय रहे। वह पहले नरेश थे, जिन्होंने जमींदारी का उन्मूलनकर मौलिक व्यवस्था की स्थापना की। उनका समूचा जीवन संघर्षमय रहा। इसी के बल पर युगधर्म को निभाते हुए सन् 1690 ई. को 53 वर्ष की आयु में समष्टि से एक हो गए।
उनका प्रेरक कृतित्व आज हम सभी को युगधर्म के निर्वाह हेतु पुकार रहा है। भले हम अल्पशिक्षित और थोड़ी क्षमता वाले हों, पर संगठित हों। भागवत कार्य के लिए अनीतियों के विरुद्ध व्यूह रचना करें। ईश्वरीय सहायता हमारी सामर्थ्य को अनेकों गुना कर देगी।
एक सेठ के घर में आग लगी। तुरंत पता चल जाने, पर उसने पड़ोसियों को बुलाकर सारा कीमती सामान बाहर निकाल लिया।
पत्नी पड़ौस में गई थी। लौटी तो सेठ ने सारा कीमती सामान सुरक्षित निकाल लेने का समाचार सुनाया और संतोष की साँस ली।
सेठानी ने पूछा— ”मेरे इकलौते लड़के का क्या हुआ? जिसे भीतर के कमरे में सोता छोड़ गई थी। “पता लगाया तो वह जलकर मर चुका था। दौलत उसी के लिए तो जमा की गई थी। लड़का मरने पर वह भी निरर्थक हो गई।
हम भी आत्मा को भूलकर उसे दुष्कर्मों में जल जाने देते हैं। दौलत भर के लिए आतुर रहते हैं।
इस संसार में जड़ के साथ चेतन भी गुंथा हुआ है। काम करती तो काया ही दीखती है, पर वस्तुतः उसके पीछे सचेतन की शक्ति काम कर रही होती है। प्राण निकल जाए तो अच्छी-खासी काया निर्जीव हो जाती है। कुछ करना धरना तो दूर मरते ही सड़ने-गलने का क्रम आरंभ हो जाता है और जो कलेवर दीख पड़ता था। उसका कुछ ही क्षणों में अंत हो जाता है। यह सब बताता है कि जड़ शरीर तभी तक सक्रिय रह सकता है, जब तक कि उसके साथ ईश्वरीय-चेतना जुड़ी रहती है। दोनों के पृथक होते ही समूचे खेल का अंत हो जाता है।
एकाकी चेतना का स्वतः अस्तित्व तो है। उसकी निराकार सत्ता सर्वत्र समाई हुई है। साकार होती तो किसी एक स्थान, पर एक नाम रूप के बंधन में बंधकर रहना पड़ता और वह ससीम बनकर रह जाती, इसलिए उसे भी अपनी इच्छित गतिविधियाँ चलाने के लिए। किन्हीं शरीर कलेवरों का आश्रय लेना पड़ता है। इस प्रकार इसका प्रत्यक्ष परिचय प्राप्त करना असंभव है। निराकार तो प्रकृति की लेसर, अल्ट्रावायलेट गामा तथा एक्स किरणें आदि अनेक किरणें काम करती हैं, पर उनको समझ सकना खुली आँखों से नहीं, वरन किन्हीं सूक्ष्मउपकरणों के सहारे ही संभव हो पाता है। गाड़ी के दो पहिए मिल-जुलकर ही काम चलाते हैं। इसी प्रकार इस संसार की विविध गतिविधियाँ विशेषतया प्राणि-समुदाय की इच्छित हलचलों के पीछे अदृश्य सत्ता ही काम करती है, जिसे ईश्वर आदि नामों से जाना जाता है।
विराट ब्रह्मांड में संव्याप्त सत्ता को विराटब्रह्म या परमात्मा कहते हैं। वही सर्वव्यापी, न्यायकर्ता, सत्, चित्, आनंद आदि विशेषणों से जाना जाता है। उसी का एक छोटा अंश जीवधारियों के भीतर काम करता है। मनुष्य में इस अंश का स्तर ऊँचा भी है और अधिक भी है। इसलिए उसके अंतराल में अनेक विभूतियों की सत्ता प्रसुप्त रूप में विद्यमान पाई जाती है। यह अपने निजी पुरुषार्थ के ऊपर अवलम्बित है कि उसे विकसित किया जाए या ऐसे ही उपेक्षित रूप में गई-गुजरी स्थिति में वहीं पड़ी रहने दिया जाए।
इस सम्मिश्रण का जहाँ भी अपेक्षाकृत अधिक विस्तृत स्वरूप दिखाई पड़ता है, उसे प्रतिभा कहते हैं। सदुद्देश्य के लिए प्रयुक्त किए जाने, पर यही प्रतिभा देव स्तर की बन जाती है और अपना परिचय महामानवों जैसा देती है। किंतु साथ ही यदि मनुष्य अपनी उपलब्ध स्वतंत्रता का उपयोग अनुचित कामों में करने लगे तो वह दुरुपयोग ही दैत्य बन जाता है। दैत्य अपने और अपने संपर्क वालों के लिए विपत्ति का कारण ही बनते हैं; जबकि देवता पग-पग पर अपनी शालीनता और उदारता का परिचय देते हुए अपने प्रभाव क्षेत्र में सुख-शांति एवं प्रगति का वातावरण बनाते रहते हैं। दैत्य स्तर के अभ्यास बन जाने पर तो पतन और पराभव ही बन पड़ता है। उसमें तात्कालिक लाभ दीखते हुए भी अंततः दुर्गुणों का दुष्परिणाम ही भुगतता है।
सृष्टि के नियम में कर्म और फल के बीच कुछ समय लगने का विधान है। बीज बोने पर उससे वृक्ष बनने में कुछ समय लग जाता है। गर्भाधान के कई मास बाद बच्चा उत्पन्न होता है। आज का दूध कल कहीं जाकर दही बनता है। अभक्ष खा लेने पर दस्त-उल्टी आदि होने का सिलसिला कुछ समय बाद आरंभ होता है। मनुष्यों में यह बालबुद्धि देखी जाती है कि वे तत्काल कर्मफल चाहते हैं। देर लगने पर अधीर हो जाते हैं और यह चाहते हैं कि हथेली पर सरसों जमे। कल तक उसमें पौधे जमने की प्रतीक्षा न करनी पड़े। उतावली आतुरता उत्पन्न करती है और मनःस्थिति प्रायः अर्धविक्षिप्त की सी बना देती है; जिसमें तात्कालिक लाभ भर दीख पड़ता है, चाहे वह कितना ही क्षणिक या दुखदाई ही क्यों न हो। वह विवेकवान दूरदर्शिता न जाने कहाँ चली जाती है, जिसे अपनाकर विद्यार्थी विद्वान, दुबले पहलवान, मंदबुद्धि विद्वान, निर्धन और पिछड़े धनवान बनते हैं। यह एक ही मनुष्य की प्रधान भूल है; जिसके कारण वह अपने जीवन का उद्देश्य, स्वरूप और वरिष्ठता तक भूल जाता है। मार्ग से भटककर झाड़-झंखाड़ों में मारा-मारा फिरता है। इस भूल को देखकर कई बार यह भी स्वीकारना पड़ता है कि मनुष्य वस्तुतः ईश्वर की संतान भी है या नहीं; वरन वह डार्विन के कथनानुसार बंदर की अनगढ़ औलाद ही तो नहीं है।
यह व्यंग्य उपहास मनुष्य के अचिन्त्य चिंतन का है। इसी के कारण उसके चरित्र और व्यवहार में भ्रष्टता घुस पड़ती है और तरह-तरह के आक्षेप उलाहना लगने शुरू होते हैं। दुष्ट चिंतन ही भ्रष्ट आचरण का निमित्त बनता है और इसी के कारण अनेकों अवांछनीयताएँ उसके सिर पर लद लेती हैं। कहना न होगा कि कर्मफल भोगे बिना किसी को छुटकारा नहीं। भले ही वह भटकाव के कारण ही क्यों न बन पड़ा हो। चारे के लोभ में चिड़ियाँ और मछलियाँ बहेलियों के हाथ पड़ती और अपनी जान गँवाती देखी गई हैं। जो बोया है वही तो काटना पड़ेगा। भले ही पीछे सतर्कता बरती गई हो या समझदारी से काम लिया गया हो।
यही है भ्रांति, विकृति और विपत्ति का केंद्र। इसके भँवर में फँसकर अधिकांश लोग गर्हित गतिविधियाँ अपनाते और दुर्गति के भाजन बनते हैं। यदि इस भूल से बचा जा सके तो मनुष्य को ईश्वर का उत्तराधिकारी, ज्येष्ठ राजकुमार कहने में किसी को क्यों आपत्ति हो? फिर उसकी प्रवृत्ति स्वार्थी बनकर आनंद का रसास्वादन करते रहने में क्यों किसी प्रकार बाधक बने? क्यों उसे वासना, तृष्णा और अहंता के लौह पाशों में जकड़ जाने, पर बंदीगृह के कैदी जैसी विडंबनाएँ सहनी पड़ें? क्यों मरघट में रहने वाले व्यक्तियों जैसा नीरस-निष्ठुर और हेय जीवन जीना पड़े? क्यों डरती-डराती और रोती-रुलाती जिंदगी जीनी पड़े?
इस संसार में अंधकार भी है और प्रकाश भी। स्वर्ग भी है और नरक भी, पतन भी है और उत्थान भी, त्रास भी है और आनंद भी। इन दोनों में से जिसे चाहे मनुष्य इच्छानुसार चुन सकता है। कुछ भी करने की सभी को छूट है, पर प्रतिबंध इतना ही है कि कृत्य के प्रतिफल से बचा नहीं जा सकता। सृष्टा के निर्धारित क्रम को तोड़ा नहीं जा सकता। करने की छूट होते हुए भी उसे परिणाम भुगतने के लिए सर्वथा बाधित रहना पड़ता है। यह दूसरी बात है कि इस प्रक्रिया के पकने में कुछ विलंब लगता है। मुकदमा दायर होने ओर सजा मिलने में अपने न्यायाधीश भी तो ढेरों समय लगा लेते हैं। ईश्वर का कार्य-क्षेत्र तो और भी अधिक विस्तृत है। उनके न्याय करने में यदि देर लग जाती है तो मनुष्य को धैर्य खोने की आवश्यकता नहीं है और न यह अनुमान लगाने की कि वहाँ अंधेरगर्दी चलती है। चतुरता के बलबूते अपने यहाँ तो भी अनेकों अपराधी दंड पाने से बच जाते हैं, पर सर्वव्यापी और सर्वसाक्षी न्यायाधीश के न्याय तुलना में बहुत करके किसी को ऐसे अवसर नहीं मिलते। इस वास्तविकता से असहमत रहने के कारण ही लोग अक्सर नास्तिक बन जाते हैं। कर्मफल की मान्यता का उपहास उड़ाते हुए स्वेच्छाचार बरतते हैं। यह समझ तो तभी आती है जब समयानुसार क्रिया की प्रतिक्रिया सामने आ खड़ी होती है।
यहाँ प्रसंग इस बात का चल रहा है कि ईश्वर और जीव आपस में अविच्छिन्न साथी-सहचर की तरह। स्थिति को देखते हुए इस बात की पूरी गुंजाइश है कि समर्थ बीज से उपजा समर्थ बालक अभीष्ट सहयोग प्राप्त कर सके और अभावग्रस्तता की दुखदाई स्थिति से सरलतापूर्वक छूट सके। पर प्रचलित विडंबनाओं में से एक यह भी है कि नितांत निकट रहते हुए भी परिचय ऐसा बना लिया गया है, मानो एक-दूसरे से नितांत अपरिचित हैं। कभी-कभी ऐसा देखा गया है कि विशालकाय नगरों में एक ही बड़े भवन की चारदीवारी में रहने वाले किराये दार एक-दूसरे से परिचित तक नहीं होते। हम अपने शरीर के भीतरी अवयवों को भी पूरी तरह कहाँ समझ पाते हैं। शरीर में समाए विषाणुओं का पता नहीं चलता और यह भी नहीं बन पड़ता कि उनके कारण उत्पन्न होने वाले खतरों को समझ सकें और समय रहते कुछ उपाय-उपचार कर सकें। समझदार कहे जाने वाले मनुष्य के इस भुलक्कड़पन को देखते हुए, उसे नासमझ कहा जाए तो कुछ भी अनुचित न होगा। स्वस्थ दीखने वाले भी इस अस्वस्थता से जकड़े हुए हैं। घुन लगी लकड़ी की तरह भीतर ही भीतर पोले हो रहे हैं। स्थिति इतनी बदतर है कि अणु से लेकर विराट विभु के कण-कण में एक अत्यंत सुव्यवस्था के संव्याप्त होने, पर भी अपनी अक्ल यही धोखा देती रहती है कि इस खेत का कोई बोने वाला या रखवाला नहीं है। चाहे जो करने और चाहे जो पाने की मनमानी करते रहने में कोई हर्ज नहीं। आम प्रचलन में इन दिनों ऐसी ही सोच की भरमार है।
यदि सृष्टा के, नियामक सत्ता के संबंध में संव्याप्त यह भ्रांति मानवमन में से निर्मूल की जा सके तो वह प्रखर प्रज्ञारूपी उस अनुदान से लाभ उठाने लगता है, जो उसे दूरदर्शी, विवेकशील, प्रखर प्रज्ञा संपन्न बनाता है। फिर अपने ही कृत्यों पर भी अपनी दृष्टि एक न्यायाधीश की तरह हो जाती है। अपने विराट से जुड़े होने की गरिमा का भान होते ही नासमझीरूपी कषाय–कल्मष मिट जाते हैं। वस्तुतः सही अर्थों में आस्तिक वही है, जो अपनी विवेकदृष्टि को जगा लेता है। आने वाला युग ऐसा ही प्रखर प्रज्ञासंपन्न मनीषा का होगा।
देव-दानव युद्ध में अर्जुन देवताओं की सहायता के लिए सुरलोक गए। वे इतने पराक्रम से लड़े कि दैत्य पीठ दिखाकर भागे, देवपक्ष विजई हुआ।
देवताओं ने अर्जुन के प्रति असाधारण प्रसन्नता प्रकट की और उपहार में उनकी सेवा करने वहाँ की सर्वोत्तम सुंदरी उर्वशी भेजी। अर्जुन ने उसकी ओर कोई ध्यान नहीं दिया।
इस पर अपना अभिप्राय प्रकट करने के लिए उर्वशी ने उनसे कहा— ”मैं आप जैसा एक सुंदर पुत्र चाहती हूँ। मेरी अभिलाषा पूरी करें।”
अर्जुन ने उनके आगमन का कारण समझा और गंभीर होकर कहा। जो तुम चाहती हो वह बन पड़े या नहीं इसका कोई ठिकाना नहीं। हो सकता है कि कन्या ही जन्मे। पुत्र भी हो तो मेरे समान पराक्रम वाला हो इसका भी कुछ ठिकाना नहीं। फिर संतान को मेरी जितनी आयु का होने तक तुम्हें लंबी प्रतीक्षा करनी पड़ेगी। इन सभी कठिनाइयों का मैं एक क्षण में समाधान किए देता हूँ। तुम मुझे आज से ही अपना पुत्र मानो और मैं तुम्हें कुंती के समान माता मानूँगा। यह कहकर अर्जुन ने अपना मस्तक उसके चरणों पर रख दिया।
उर्वशी निरुत्तर हो गई। उसे उलटे पैरों वापस जाना पड़ा। देवता इस आदर्शवाद पर मुग्ध हो गए। उनने नया उपहार भेजाः गांडीव धनुष। वह लक्ष्यवेधी बाण चलाता था और किसी युद्ध में पराजित न होता था।
आदर्शवादी घाटे में नहीं रहते, उन्हें यश भी मिलता है और बहुमूल्य अनुदान भी।
मानव जीवन में पग-पग पर ऐसी कठिनाइयाँ आती है। कि उनमें ईश्वरीय सहयोग न मिले और परमात्मा का अनुग्रह न प्राप्त हो तो मनुष्य का जीवन विश्रृंखलित हो जाए। ईश्वर पर विश्वास कर लेने के बाद अंतःकरण में इतनी दृढ़ता आ जाती है कि फिर बाहरी कठिनाइयाँ विक्षेप नहीं कर पातीं और सफलता का मार्ग खुलता चला जाता है। जब भी जिस अवस्था में भी जिसने परमात्मा को सच्चे हृदय से पुकारा वह अपने आवश्यक कार्य छोड़कर दौड़ा। जीवात्मा के प्रति उसकी दया अगाध है, अनंत है। वह भक्त का बंधनस्नेह ठुकराने में असमर्थ है। उसे स्मरण करते ही वह शक्ति मिल जाती है; जिससे मनुष्य कठिनाइयों को पार करता हुआ आगे बढ़ता चला जाता है।
आदिकाल से ही ऐसे उदाहरण इस धरा पर चरितार्थ होते रहे हैं, जो मनुष्य को ईश्वरीय सहायता मिलते रहने की पुष्टि करते हैं। इस युग में भी बुद्ध, ईसा से लेकर संत ज्ञानेश्वर, संत तुकाराम, आचार्य शंकर, सूर, तुलसी, नरसी मेहता आदि के उदाहरण सामने हैं। भारतीय स्वतंत्रता की उपलब्धि अभी कुछ दिन पूर्व ही हुई है। उसके प्रणेता गाँधी अकेले थे। कोई सेना साथ में न थी। कोई शस्त्र भी नहीं उठाया था उनने। दैवी सहायता का— ’राम-नाम’ का बल था गाँधी के पास। उनके स्मरण और चिंतन में भगवत आस्था की ऐसी प्रगाढ़ निष्ठा भरी थी कि गाँधी के नाम से लहर आती थी और सारे देश में एक विकट तूफान-सा उठ पड़ता था। वह शक्ति गाँधी की नहीं थी, जनता की भी नहीं। संपूर्ण क्रांति की वह शक्ति परमसत्ता की थी, जो गाँधी जी के हृदय में हिलोरें मार रही थी।
परमात्मसत्ता की ऐसी समष्टिगत कृपा का परिचय लोगों को तब हुआ, जब लुंका में ओसर नदी में भयंकर बाढ़ आई हुई था। सारा नगर कुछ ही क्षणों में जलमग्न हो जाने वाला था। इंजीनियरों के सारे प्रयास विफल हो गए थे और सभी जल समाधि की प्रतीक्षा कर रहे थे। उसी समय कुछ लोगों ने फ्रीडियन नामक संत से जाकर प्रार्थना की महात्मन! इस प्रकृति-प्रकोप से आप ही बचाने का कुछ उपाय करें। कहते हैं महात्मा फ्रीडियन ने ईश प्रार्थना के बल पर ओसर नदी की धारा बदल दी और नगर को डूबने से बचा लिया।
दैवी चेतना की परोक्ष सहायता की एक अन्य घटना जर्मनी के ब्रिस्टल नगर में निवास करने वाले जॉर्जमुलर के जीवन से संबंधित है। सारे योरोप एवं अमेरिका में वह प्रार्थना, मानव के रूप में विख्यात हुई है। अपने 93 वर्ष के दीर्घ जीवन में उन्होंने कभी भी स्वार्थपूर्ति के लिए, भगवान से प्रार्थना नहीं की। उनके सारे कर्म परमेश्वर की पूजा के उपकरण थे।
जॉर्जमुलर ब्रिस्टल में एक अनाथालय चलाते थे। कार्य आरंभ करने से पूर्व न तो उनके पास रहने के लिए कोई जगह थी, न मकान तथा न ही रुपया। ईश्वरविश्वास और परोपकार की प्रबल निष्ठा ने इन सब की कमी न रहने दी। जब भी आवश्यकता पड़ती वे प्रार्थना में बैठ जाते और पाते कि किस-न-किसी रूप में दैवी सहायता उपलब्ध है। एक बार जॉर्ज किसी सामाजिक कार्यवश समुद्र के रास्ते कनाडा के क्वेक नगर जा रहे थे। रास्ते में जहाज भयंकर कोहरे से घिर गया। मार्ग भटक जाने तथा किसी चट्टान से टकरा जाने की पूरी संभावना थी। कप्तान सहित सभी यात्रीदल परेशान था।
श्री मुलर ने कप्तान से जहाज के भीतरी कक्ष में चलने और साथ मिलकर प्रार्थना करने को कहा। यात्रीदल के सदस्यों सहित कप्तान ने भी इसे एक पागलपन समझा, पर पाँच मिनट बाद ही सबने देखा कि कोहरा साफ हो गया है। ईश्वर की अनुकंपा के समक्ष सभी नतमस्तक थे।
नरसी मेहता को परमार्थ के लिए धन की जरूरत पड़ी। उनके पास कुछ साधु पहुँचे और अपने सात सौ रुपए उनके पास रखकर हुंडी देने की इच्छाव्यक्त की। भक्त ने इसे प्रभु की भेजी सहायता समझकर, वह रुपए ले लिए और अपने इष्ट साँवलिया जी के नाम हुंडी लिख दी। द्वारिका जी में साँवलिया शाह के रूप में प्रभु ने वह हुंडी लेकर साधुओं को 700 रुपये दिए। वस्तुतः भगवान की सूक्ष्मशक्तियाँ ही उच्चस्तरीय साधकों में प्रेरणा का संचार करतीं एवं दुखी-पीड़ितों का त्रास मिटाती हैं। यह मार्ग सभी सुपात्रों के लिए खुला पड़ा हैं।
बंबई का आलीशान फ्लैट। इसी के ड्राइंगरूम में बैठा एक सूटेड-बूटेड व्यक्ति समाचारपत्र पढ़ रहा था। अचानक किसी के पदचापों ने उसका ध्यान भंग किया। सिर उठाकर देखा, वही सफाई करने वाला बूढ़ा भंगी था। इसके मैले-कुचैले फटे कपड़े जिन्हें चीथड़े कहना ज्यादा ठीक होगा, शरीर से आती दुर्गंध-मन में विरक्तिपूर्ण भावों का संचार करती थीं।
अखबार को मेज पर रखकर उससे कहा— ”भई तुमसे कितनी बार कहा जरा साफ-सफाई से रहा करो। सफाई करने वाले होकर गंदगी को लपेटे फिरने पर तुम्हें शर्म नहीं आती”।
सुनकर वह बूढ़ा एक बारगी सहम गया, फिर रुआँसे स्वर में बोला— “आप नहीं समझेंगे बाबू। मैं भंगी हूँ इंजीनियर नहीं। जैसे-तैसे जी लेता हूँ तो यही बहुत है। आप भी हमारी जगह होते तो शायद हमारे जैसे हो जाते।”।
बूढ़ा तो कहकर चला गया। पर उसके इन शब्दों ने युवक इंजीनियर में तिलमिलाहट पैदा कर दी। यों समाज सुधार के कार्यों में वह पहले से रुचि लेते थे। लोगों को प्रोत्साहित भी किया था। पर इस तरह के चुनौती भरे वाक्य किसी ने नहीं कहे थें।
उन्होंने इसे स्वीकार किया। रूपांतरित हो गया जीवन। कभी का इंजीनियर अब भंगियों की बस्ती में रहने लगा। अब वह हरिजनों के हरिजन थे। जुट गए अपने स्वयं के जीवन के माध्यम से सिखाने में कि इन परिस्थितियों में भी कैसे साफ रहा जा सकता है? उनको जिंदगी जीने के तरीके सिखाते। उनके इस परिवर्तन को देखकर, गाँधी जी ने कहा— इंजीनियरी छोड़कर अमृतलाल ठक्कर हरिजनों के हरि हो गए। काश! मेरे पास भी उन जैसी संवेदना होती।
सचमुच यही उनकी सम्पत्ति थी। जिसके बलबूते वह हर किसी की सेवा-सहायता के लिए दौड़ पड़ते। देश के किसी कोने में पीड़ित मानवता की पुकार उठी हो, बापा के मन में बसे भगवान विष्णु के लिए यह गज की पीड़ा की तरह होती और वे गरुड़वाहन छोड़कर दौड़ पड़ते। जनकरुणा की सरिता उनके पीछे-पीछे चल पड़ती।
गुजरात के पंचमहल-क्षेत्र में अकाल पड़ा। वह अपनी समूची-सामर्थ्य के साथ जा पहुँचे। पर यह तो सागर में बूँद की तरह समा गया। अपना सब कुछ दे चुकने के बाद वह भूखों मरती मानवता के लिए भीख माँगने निकल पड़े। परमार्थ के लिए यह विश्वमित्र घर-घर बैठे हरिश्चंद्र की सोई करुणा को जगाकर मानवहित में अपना सब कुछ लुटा देने की प्रेरणा भरने लगा। त्याग-ही-त्याग का जन्म दाता है। सारे संसार से बंधुत्व रखने वाले विश्वमित्र ही राजा को त्यागी बना सके। बापा भी कोई अपने लिए माँगने वाले भिखारी न थे। उनका सारा जीवन मानवता के लिए समर्पित था। मानवता के लिए यही समर्पित कर्म व्यक्ति की प्रामाणिकता का आधार है। इसी के बलबूते ऐसे व्यक्ति संसार सागर को लोभ और मोह के तूफानों से बचकर, सेवारूपी जहाज पर बैठकर खुद तरते और औरों को तारते।
ऐसे प्रामाणिक लोगों को भला कौन इंकार करता है। हजारों रुपए की नौकरी छोड़कर गरीबों के लिए झोली फैलाने वाले को देने वाले भी कम नहीं मिलते। फिर उनके बाँटने का क्रम चलता। अकाल के दिनों बापा के लिए दिन-दिन न रहा, रात-रात न रही। वह कब सोते कब जाग जाते यह साथ चलने वाले स्वयं सेवकों को भी पता न चलता।
इस कर्मठता के सामने अकाल परास्त हो गया। फिर सुकाल आया। पर बापा के लिए बहुत काम बाकी थे। उनका ध्यान अशिक्षा, गरीबी, अंधविश्वास और उपेक्षा से ग्रस्त आदिवासी भीलों की ओर गया। उन्होंने इस पिछड़े वर्ग को उठाने के लिए कमर कस ली। पैदल ही सारे प्रदेश का दौरा किया। ग्राम सभाएँ आयोजित कीं। भील नवयुवकों को संगठित किया। उनके पूर्व सेवाकार्य से लोग प्रभावित तो थे ही। अब यह जानकर कि उन्हीं के बीच रहेंगे। लोग सहर्ष सहयोग करने के लिए तैयार हो गए।
लोगों में से बापा ने कुछ नवयुवक ऐसे चुने जो अपने भाइयों के लिए कुछ कर सकते थे। इन्हें बापा ने पढ़ाकर इस योग्य बना दिया कि वे स्थान-स्थान पर पाठशालाएँ और कार्यशालाएँ चला सकें। प्रौढ़ों को साक्षर बनाने का काम बापा ने अपने हाथ में लिया। सदियों से उपेक्षित इन आदिवासियों को उन्होंने जो प्यार दिया, प्रकाश बाँटा वह अतुल्य है।
साक्षरता के प्रकाश के साथ हीँ, वह उन्हें अपना सुधार करने की प्रेरणा भी देते। उन्हें कुरीतियाँ और अंधविश्वास त्यागने को प्रेरित करते। महिलाओं के लिए उन्होंने ऐसी कार्यशालाएँ स्थापित कराईं जिनमें ताड़ की चटाइयाँ सेठे व नरकुलों के खिलौने और बाँस की अन्य चीजें बनाई जाती। इनमें कई भील महिलाएँ पहले से भी प्रवीण थीं। अब वे इसे सामूहिक रूप से करने लगीं तो पहले उनका, जो समय व्यर्थ या लड़ने-झगड़ने में यूँ ही चला जाता। वह उत्पादन में लगने लगा, साथ ही उनमें सामूहिकता परस्पर सहयोग की भावना भी पनपने लगी।
मील सेवा संघ आदि संगठनों-संस्थानों की स्थापना और उनके द्वारा संचालित गतिविधियों का सूत्रसंचालन बापा ने अपने कुशल नेतृत्व में किया। भील जाति में जागरण के स्वर गूँजने लगे। ये जागरण के स्वर समाज का हित चाहने वालों को तो बड़े भले प्रतीत हुए। पर शोषक वर्ग तो क्षुब्ध हो गया। देवगढ़-वासियों के राजा ने उन्हें अपने राज्य से निर्वासित कर दिया। राज्य से बाहर होने पर भी उनके द्वारा जलाई ज्योति स्वयं सेवकों के अपने जीवन के स्नेह से दिन पर दिन प्रखर होती गई। गोपाल कृष्ण गोखले उनकी इस सेवाभावना से अतिशय प्रभावित हुए। उन्होंने ‘भारत सेवक समाज’ के लिए उनकी सेवाएं मांगी। वृद्धावस्था के बावजूद उन्होंने गोखले जी को निराश नहीं किया। उन्होंने पंद्रह दिन भील सेवा संघ और पंद्रह दिन भारत सेवक समाज का कार्य करना स्वीकार कर लिया।
अनवरत कार्य करता हुआ शरीर जरा जीर्ण होता गया किंतु अकर्मण्यता, शिथिलता नहीं आई। जीवन के अंतिम क्षणों में स्वयंसेवकों को संबोधित करते हुए कहा “अंधेरा कितना ही घना और कितने ही वर्षों से क्यों न छाया हो, पर दीपक का प्रकाश उसे एक ही क्षण में मिटा देता है। इसी तरह समाज में विकृतियाँ व दुरवस्था कितनी ही क्यों न हों पर कर्मठ भावनाशीलों के प्रयास उसे अल्प समय में ही सुधार देते हैं।”
मानवता ऐसे ही भावनाशीलों की पुनः गुहार लगा रही है, ताकि प्रस्तुत समय की विषमता से मोर्चा लिया जा सके।
डॉ. रॉबर्ट एंथँनी ने अपनी पुस्तक ‘टोटल सेल्फ कौन्फीडेंस’ में लिखा है कि बाल्यकाल में अभिभावकों द्वारा सुसंस्कृत वातावरण प्रदान किया जा सके तो प्रतिभा के बीज अंकुरित होकर सुविकसित होते चले जाते हैं। बालक के जन्म के समय वयस्क की तुलना में उसके मस्तिष्क का आकार आठ गुना कम होता है। आठ माह के अंतर्गत यह क्रम ठीक आधा हो जाता है। शरीर में सर्वाधिक गति से बढ़ने वाले प्रमुख अवयवों में मस्तिष्क की गणना पहले की जाती है। पाँच वर्ष की अवधि तक पहुँचते-पहुँचते मस्तिष्क में वे सभी संस्कार संचित हो जाते हैं, जो उसके आचरण का अविच्छिन्न अंग बनकर सिद्ध होते हैं। डॉ. एंथँनी ने बाल-विकास की इस महत्त्वपूर्ण अवधि को ‘इम्प्रिन्ट पीरियड’ के नाम से संबोधित किया है। प्रतिभा की विधेयात्मक और निषेधात्मक दिशाधारा के निर्धारण का यही समय अधिक सुनिश्चित समझा जाता है।
व्यक्ति और समाज के समक्ष इन दिनों इतनी अधिक समस्याएँ हैं कि उनकी गणना कर सकना कठिन है। परिस्थितियों, अभावों, विग्रहों आदि के जो स्वरूप उभरते हैं, उनका स्वरूप व्यक्ति और समाज के सम्मुख स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार चित्र-विचित्र रूप धारण करता रहता है। उन सब को गिनकर, उनके पृथक्-पृथक् समाधान ढूंढ़ना ऐसा है, जैसा शरीर भर पर उगी हुई चेचक की एक-एक फुंसी के लिए एक-एक चिकित्सक नियुक्त करना और एक-एक दवा का प्रबंध करना। क्योंकि हर फुंसी एक-दूसरे से भिन्न आकार की होती है। पर उनकी भिन्नता को देखते हुए चिकित्सकों और दवाओं में भिन्नता को देखते हुए चिकित्सकों और दवाओं में भिन्नता होने की योजना बनाना कुछ अप्रासंगिक भी नहीं लगता। इस भ्रम-जंजाल से उबरा जा सके तो एक सरल समाधान मिल जाता है कि पेट और रक्त को अशुद्ध बनाए हुए विजाई द्रव्यों को निकाल बाहर किया जाए और फिर उन्हें संचित न होने दिया जाए। उतने भर से न केवल चेचक की सामयिक कठिनाई से उबरा जा सकता है; वरन भविष्य में भी अन्य किसी रोग के न आने के संबंध में निश्चित हुआ जा सकता है।
जीवनी शक्ति का भंडार कम पड़ जाना ही विभिन्न भागों में दीख पड़ने वाली दुर्बलताओं और रुग्णताओं का प्रमुख कारण है। बाहरी विषाणुओं के आक्रमण करने में सफलता ऐसी ही स्थिति में मिलती है। भीतर के अपने जीवाणु भी इस आधार पर घटने, सिकुड़ने और दुर्बल रहने लगते हैं। इससे भीतर के अपने जीवकोश विषाणु बनाते और रोग उत्पन्न करने लगते हैं। जीवनी शक्ति की कमी न हो तो मनुष्य प्रकृति प्रकोपों एवं अनुपयुक्त वातावरण में भी गुजारा कर लेते है, इतना ही नहीं वह बाहर से आक्रमण करने वाले विषाणुओं से भी निपट लेते हैं। अच्छा हो जीवनी शक्ति को घटने न देकर अपनी समर्थता को सुरक्षित रखने पर ध्यान केंद्रित किया जाए। इस प्रयोजन में जितनी सफलता मिलेगी, उसी अनुपात से विभिन्न आकृति-प्रकृति के रोगों की आशंका से निवृत्त रहा जा सकेगा।
दरिद्रता अनेक अभावों की जननी है। एक-एक अभाव को पूरा करने के लिए एक-एक उपाय अपनाना भी बुरा नहीं है। पर समुचित समाधान तभी बन पड़ेगा, जब अभावों की सूची को एक कोने पर रखकर संपन्नता-संवर्ध्दन के लिए प्रयत्न किया जाए। उस प्रकार की सफलता मिल जाने, पर आए दिन नित नए रूप में आ खड़े होने वाले अनेक अभावों से एक बारगी ही निपटा जा सकेगा।
हमारे इस संसार में अनगिनत काँटे और कंकड़ बिछे पड़े हैं। उनके कारण चुभन और ठोकर का खतरा बना ही रहता है। इन सभी को बीन सकना और जमीन को साफ-सुथरा बना सकना किसी के लिए जन्म भर में भी संभव नहीं हो सकता। सस्ता और सरल तरीका यह है कि अपने पैरों में जूते पहन लिए जाएँ तो बेधड़क रूप से किसी भी रास्ते पर बढ़ते चला जाए, भले ही वह कंकड़ों और कांटों से भरा ही क्यों न हो।
हर प्रश्न को हल करने के लिए गणित के अलग-अलग सिद्धांत नहीं गढ़े जा सके हैं। जो निर्धारण लंबे समय से चला आ रहा है, उसी के सहारे अनेक सवाल हल किए जाते रहते हैं। मानवी प्रगति और सुख शांति के भी कुछ सुनिश्चित सिद्धांत हैं। उन्हें अपनाए रहने, व्यतिक्रम न करने पर राजमार्ग पल चलते हुए निर्धारित लक्ष्य तक पहुँचना संभव हो सकता है। जल्दबाजी में नई पगडंडी खोजने और कंटीले झाड़-झंखाड़ों से गुजरने में देर भी लगती है और परेशान भी बहुत होना पड़ता है। इसलिए जीवन चेतना के साथ जुड़े हुए अविच्छिन्न शाश्वत सिद्धंतों को अपनाए रहने में ही भलाई है। लालची लाभ तो बहुत नहीं पाते, पर हर घड़ी चिंताओं में फँसे रहते हैं और ऐसा कुछ कर नहीं पाते, जिसके सहारे संतोष की उपलब्धि हो एवं सभ्य-समुंनतों में गणना हो सके। अत्यधिक चतुरता कई बार ऐसे घाटे का कारण बनती है और हैरान करती कठिनाइयों में फँसाती भी देखी गई है। जेलखानों में बंद कैदियों की जाँच पड़ताल करने, पर इसी एक निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि उनने संतुलन गंवाया, आवेशग्रस्त हुए और आतुर भावावेश में ऐसा कुछ कर बैठे, जो उन्हें नहीं करना चाहिए था। ऊँची छलांगें लगाने वालों में से सफलता किन्हीं बिरलों को ही मिलती है। अधिकांश को औंधे मुँह गिरना और हड्डी-पसली तुड़ा लेने जैसा घाटा उठाना पड़ता है।
उपरोक्त प्रतिपादनों का एक ही तात्पर्य है कि नवयुग की आकांक्षा के अनुरूप हम संतुलित ढंग से जिएँ और जीने दें तो विग्रह उपद्रवों से सहज ही बचे रहा जा सकता है। आतुर लालसा और लिप्साएँ ही ऐसा कुछ करने के लिए प्रेरित करती हैं, जिसमें मानवी गरिमा के उपयुक्त मर्यादाओं को तोड़ने एवं निर्धारित अनुशासन को तोड़-मरोड़ डालने की उमंग उठती और विक्षिप्तों की तरह कुछ भी कर गुजरने, किसी भी ओर चल पड़ने के लिए प्रेरित करती है। इन आवेशों, आवेगों पर काबू पाया जा सके और सज्जनोचित जीवन जिया जा सके, तो न ही व्यक्तिगत जीवन को तोड़-मरोड़कर रख देने वाला संकट हो और न समाज में ऐसी परिस्थितियों, विपत्तियों के रूप में अवांछनीय स्तर के संकट खड़े करने का अवसर उभरे।
इन दिनों जो अगणित प्रकार के अनाचार, अतिवाद, असंतुलन एवं विग्रह उमड़ते घुमड़ते दिख पड़ते हैं, वे अनायास ही किसी अदृश्य लोक से नहीं आ टपके हैं। इन्हें मनुष्य ने स्वयं ही सृजा और पोषण देते हुए गगन चुंबी बनाया है। यदि उसने मर्यादाओं में रहना अंगीकार किया होता, निर्धारित अनुशासन पाला होता तो शांति से रहने और स्वाभाविक प्रगति का वरण करने में कहीं किसी प्रकार का संकट देखने एवं शिकायत करने जैसा अवसर आने का प्रश्न ही न उठता।
गिनती गिनना भूल जाने पर नए सिरे से गिनना आरंभ किया जाता है। रास्ता भूल जाने पर भटकाव को छोड़ना और वापस लौटना पड़ता है। तभी उस स्थिति को प्राप्त किया जा सकता है, जो कि निर्धारित लक्ष्य पर देर से सही, पर पहुँचा तो जा सके। संसार भर में निवास करने वाले 600 करोड़ मनुष्यों में से प्रत्येक के साथ अगणित शारीरिक मानसिक, आर्थिक सामाजिक समस्याएँ जुड़ी हुई हैं। उनमें से प्रत्येक का हल खोजना ओर उनके लिए समाधान ढूंढ़ना लगभग उतना ही कठिन है, जितना कि आकाश और पाताल को किसी एक कुलावे से मिलाकर जोड़ना।
संभव इतना ही है कि उन मानसिक विकृतियों के संबंध में विचार किया जाए, जो चिंतन, चरित्र और व्यवहार को प्रभावित करने के उपरांत ऐसी उलझनें विनिर्मित करती हैं, जिनका भौतिक आधार पर कोई निश्चित समाधान ही संभव नहीं। संभव इतना है कि उस मनःस्थिति के साथ अवांछनीय रूप से जुड़ी हुई प्रक्रिया को समझा और समझाया जाए, जो कि विचार क्षमता को दैत्य के चंगुल से छुड़ाकर देवता के हवाले करे। दृष्टिकोण और क्रियाकलाप में मानवीय गरिमा के अनुरूप सात्विकता-सदाशयता का समावेश करे। इतने भर से एक ही चाबी उन जैसे मजबूत तालों को खोल देगी और “खुल जा सिमसिम” के अली बाबा के इशारे से एक नया माहौल विनिर्मित करेगी।
एक जमींदार की आँखें भैंगी थीं। उसे स्वयं पता न था। एक दिन दर्पण देखा, तो उसने आँखों की बनावट को उपहासास्पद दिखाया।
दर्शक को क्रोध दर्पण पर आया। दूसरे, तीसरे, चौथे दर्पण मँगाए गए, फिर भी वह दोषदर्शन का सिलसिला बंद न हुआ।
जमींदार ने दर्पणों की प्रकृति को कोसा और अपने प्रभाव क्षेत्र के सभी दर्पणों को खोजा, खोजकर नष्ट करा दिया।
कुछ दिन तक ही संतोष रहा। बाद में जब लोगों से पूछकर इस खोट के संबंध में जानकारी प्राप्त की तो सभी ने दर्पणों की अभिव्यक्ति को सही बताया।
दोष अपने में रहे, तो आलोचकों को निंदा से रोका नहीं जा सकता।
मनोरंजन को जीवन की एक महत्त्वपूर्ण आवश्यकता समझा जाता है। इसके लिए लोग लालायित रहते हैं और जब अवसर मिलता है, तब समय एवं पैसा भी खर्च करते हैं। यह प्रचलन सर्वत्र देखे जाने पर भी ऐसा कुछ दीख नहीं पड़ता कि लोग मन का रंजन करके उसे उल्लासित, पुलकित, प्रफुल्लित कर पाते हों। यदि अभीष्ट प्रयोजन की पूर्ति न हुई तो समझना चाहिए कि प्रयास निरर्थक ही चले गए।
उथले लोग कामुकता की कल्पना अथवा उन क्रियाकलापों को चरितार्थ करने में मनोरंजन की पूर्ति अनुभव करते हैं। उसके लिए प्रयत्नशील भी रहते हैं, पर देखा गया है कि इस स्तर की कल्पनाएँ उत्कृष्टता की उस एकाग्रता और चरित्रता का अपहरण कर लेती हैं, जिन के आधार पर ऊँचे स्तर का बहुत कुछ सोचा और निर्धारण किया जा सकता था। इस प्रकार का ताना-बाना बुनते रहने वाले प्रायः विक्षुब्ध और असंतुष्ट ही देखे जाते हैं। अनियंत्रित कामुक-कल्पनाओं की आपूर्ति किसी भी प्रकार संभव नहीं। ऐसी दशा में दिवास्वप्न देखने और कल्पना की बिना पंख वाली उड़ाने उड़ते रहने के अतिरिक्त और किसी के कुछ हाथ नहीं लगता हैं, इन मनोरथों की आंशिक पूर्ति का कभी अवसर भी मिले तो उससे आग और भड़कती है। लालसा और अधिक उद्दीप्त होती है, साथ ही शरीर और मस्तिष्क को खोखला भी करती चलती है।
कौतुक और कौतूहल देखकर उछलने लगना, तालियाँ बजाने लगना क्रीड़ा का एक भाग है। मनुष्यकृत कौतुक देखने में जिन्हें रस आता है, वे बाजीगरों, मदारियों, सपेरों के द्वारा प्रदर्शित किए जाने वाले कौतुकों को देखने की अपेक्षा प्रकृति के कण-कण में चल रही हलचलों को ध्यानपूर्वक अवलोकन करें और देखें। वे पाएँगे कि यहाँ सब कुछ अद्भुत ही अद्भुत है। प्रत्येक क्षण में होता परिवर्तन कौतूहलों में क्या किसी से कुछ कम है। आसमान में उमड़ती मेघमालाएँ और उनकी कड़क, बिजली की चमक कितनी अद्भुत है कि उसके स्मरणमात्र से रोमांचित होने का अवसर मिलता रहे। हिमाच्छादित पर्वत शिखर, संध्याकाल का रंग-बिरंगा आसमान इतना विचित्र होता है कि उसे देखते-देखते मन नहीं भरता। निर्झरों के प्रवाह, नदियों के प्रवाह और समुद्रों में उठने वाले ज्वार-भाटे प्रत्यक्ष या दृष्टि माध्यम से देखने पर हतप्रभ रह जाना पड़ता है।
मनुष्य का अपना शरीर एक अच्छा-खासा अजूबा है। उसके साथ जुड़े हुए अगणित अवयव अपनी निराली संरचना और गतिविधियों पर दृष्टिपात करने से लगता है कि अपना आपा भी कितने कौतूहलों का भंडार है। हृदय की धड़कनें, स्नायु समूह का आकुँचन-प्रकुँचन, श्वास-प्रश्वास स्नायु समूह का आकुँचन-प्रकुँचन, श्वास-प्रश्वास क्रम, शयन जागरण आदि सभी कुछ ऐसा है कि इस कठपुतली को नचाने वाले अदृश्य बाजीगर का कौतूहल देखते-देखते चकित रह जाना पड़ता है। जीवन का जिस क्रम से आरंभ, अभिवर्ध्दन, परिवर्तनक्रम चलता रहता है, उस जीवनचक्र पर दृष्टिपात करने में आरंभ से लेकर अंत तक निरंतर यहाँ आश्चर्य-ही-आश्चर्य घटित होता दीख पड़ता है।
आकाश की ओर नजर उठाकर देखने पर चाँद-तारों से जगमगाता हुआ आकाश ऐसा लगता है, मानों किसी विशेष शामियाने को तानकर उसमें हीरे-मोतियों के बने झाड़-फानूस लटका दिये गये हों। ऐसी सुसज्जा का प्रबंध करने वाला कलाकार कितनी आश्चर्यजनक एवं विशेषताओं से भरा-पूरा होगा, उस विस्तार की कल्पना तक करने में बुद्धि थक कर बैठ जाती है।
अपने निज के मन-मानस की उठती-गिरती उमंगों का अवलोकन किया जाय, उसकी बुद्धिमत्ता और मूर्खता पर अलग-अलग विचार किया जाय तो प्रतीत होता है कि चर्चित “भानुमती का पिटारा” कदाचित् अपने ही सिर पर टोकरी की तरह बाँध दिया गया है। इसमें कितने आश्चर्य भरे पड़े हैं, जो एक से एक विलक्षण, दार्शनिक प्रतिपादनों का ढांचा खड़ा करते हैं और प्रकृति के रहस्यों पर से, पर्दे पर पर्दा उठाते हुए कितने आविष्कार करते और भविष्य में उस शृंखला को बहुत आगे बढ़ा देने के संकल्पों को पूरा करने में निरत हैं।
प्राणियों का समुदाय कितना विचित्र है। उनमें से हरेक की आकृति-प्रकृति में बहुत कुछ समानता होते हुए भी भिन्नता इतनी अधिक है कि इन लगता है कि इकाइयों में से प्रत्येक को भी पृथक-पृथक ढाँचे में ढाला गया है। उनकी आकृति ही नहीं, प्रकृति को भी पृथक-पृथक कलेवरों में निर्धारण किया गया है। पक्षियों की शृंखला ऐसी लगती है मानों आकाश में से जीवित-जाग्रत फूल उड़ रहे हैं और अपनी-अपनी बोली बोलकर उनके शब्दार्थ बताने की चुनौती दे रहे हैं।
जो कुछ दृश्यमान है, उसे तनिक गंभीरतापूर्वक देखा जाए तो प्रतीत होगा कि जिस पर भी गहराई के साथ दृष्टि जमाई और विलक्षणता की खोज में बुद्धि लगाई जाए तो वहाँ सब कुछ ऐसा लगेगा, जिसे देखते हुए विस्मय से अभिभूत ही हुआ जा सकता है।
जिस परिकर में हम रहते हैं, जो परिवार के सदस्य कहलाते हैं, उसमें बालकों से लेकर युवाओं और वृद्धों तक का व्यक्तित्व अपने-अपने ढंग का असाधारण है। उनके स्वभाव, क्रियाकलाप और अनुदान ऐसे हैं; जिन्हें एक दूसरे से सर्वथा पृथक प्रकार का रसास्वादन प्रस्तुत करते हुए देखा जाता है। मनुष्यों में से शरीर की बनावट तो प्रायः सभी की एक जैसी है, पर भावनाओं, मान्यताओं और दृष्टिकोणों के अंतर को देखते हुए लगता है कि करोड़ों-अरबों मनुष्यों में से प्रत्येक का अपना-अपना रचा हुआ संसार है। व्यक्ति स्वयं में एक जीता-जागता उपन्यास है। वह उसमें अपने-अपने ढंग के आचार-व्यवहार विनिर्मित करके अपने ढंग का अनोखा जीवनयापन कर रहा है।
उथली दृष्टि से देखने पर यहाँ सब कुछ अनगढ़ और अस्त-व्यस्त ही दीखता है, जिसके सोचने में बहुत कमी रह गई। उसे सुधारने के लिए सृष्टा से लेकर संबद्ध व्यक्तियों तक को बहुत कुछ सीखना-सिखाना पड़ेगा। ऐसा प्रतीत होने पर भी अंतिम निष्कर्ष यही निकलता है कि जो जिस भी रूप में विद्यमान है, वह अपने आप में पूर्ण है। पूर्ण से उत्पन्न हुआ घटक अपूर्ण हो भी कैसे सकता है, जो है सो प्रत्यक्ष अनुभव में आने के कारण सच भी है, किंतु जब हर कण भी फलन और गिरगिट जैसे रंग बदलने लगता है तो उसे माया का भ्रम-जंजाल कहने में भी किसी को क्यों कुछ आपत्ति होनी चाहिए?
आश्चर्यों में भी सबसे बड़ा यह है कि हम अपने अस्तित्व की निरंतर अनुभूति करते हुए भी यह समझ नहीं पा रहे हैं कि कौन हैं? क्यों है? किसलिए हैं? और जीवन के साथ जुड़े हुए उद्देश्य, दिशा निर्धारण और उत्तरदायित्वों को कितना समझ रहे हैं, और उसके अनुसार अपनी गतिविधियों के निर्धारण में कितने सफल हो पा हरे हैं?
अविवेकियों के लिए तो शरीर से लेकर संसार, ब्रह्मांड तक सब कुछ मात्र अनगढ़, कूड़ा-कबाड़ा ही है, पर ध्यान दे सकने वाले विचारकों को प्रतीत होता है कि यहाँ जो कुछ भी है वह इतना आकर्षक, अद्भुत और कौतूहलपूर्ण है कि इसी को समझाने के प्रयास में कुछ कदम बढ़ सकें तो प्रतीत होगा कि यहाँ मनोरंजन के अतिरिक्त और कुछ है ही नहीं।
बिंबलेडन स्थिति एक घर का ड्रॉइंग रूम। आठ-दस लोग जमा थे। इन्हें एक नजर देखकर कोई भी कह सकता था कि सभी विचारशील हैं। ये सभी शांत-भाव से एक पुस्तक के एक अंश को ध्यानपूर्वक सुन रहे थे। अध्याय की समाप्ति पर एक ने प्रश्नवाचक ड़ड़ड़ड़ पढ़ने वाली युवती से कहा— ’मिस नोबुल ड़ड़ड़ड़ एडविन अर्नाल्ड का 'लाइट ऑफ एशिया' में किया गया वर्णन निःसंदेह उत्तम है। समय-समय पर पूर्व ने संसार को बहुत कुछ दिया है। पर पूर्व ने संसार को बहुत कुछ दिया है। पर क्या भारत एक बार फिर बुद्ध के इस कथानक को दुहरा सकेगा? क्या भारत से फिर कोई नया प्रकाश उठकर धरती को आलोकित कर सकेगा? अंधकार की भटकनों में क्या कोई नई राहें निकलेंगी?”
प्रश्नावली औचित्यपूर्ण थी। पढ़ने वाली महिला ने सांत्वना भरे स्वर में कहा— हाँ एक आश जगी है। पिछले दिनों अमेरिका में हुई 'पार्लियामेण्ट ऑफ रिलीजन' में एक मनीषी ने कहने की हिम्मत की है— "मेरे पास सन्देह है" उस धरती का जहाँ मानवीय सभ्यता की प्रथम फसल लहराई थी। यह संदेश नया नहीं है। एक बार बुद्ध ने भी यही संदेश धरती को सुनाया था। अब पुनः उसी धरती से बुद्ध की ही भांति मैं पुनः संदेश लेकर आया हूँ। महिला ने बात जारी रखी— "इन वाक्यों की श्रोताओं पर प्रतिक्रिया, वक्ता का प्रभाव देखकर यह कहा जा सकता है कि भारत ने एक नया बुद्ध पैदा किया है। सुनने वालों के चेहरों में संतोष की आभा उभरी। वे सभी एक-एक करके चले गए।"
वह पुनः 'लाइट ऑफ एशिया' पढ़ने लगीं। दैवी चेतना द्वारा सोए हुए बुद्ध को जगाने का बड़ा ही मार्मिक प्रसंग था। जीते तो पशु पक्षी और कीड़े-मकोड़े भी हैं, पर जीवन उनका धन्य है जो अपने को सत्य के लिए पूर्णरूपेण समर्पित कर देते हैं। यही बोधिसत्व है। अगले चरण में यही बुद्ध होते हैं और दूसरों को जीवन का बोध कराते हैं। यों इस पुस्तक ने अनेकों दिलों में कर्मठता, सत्यपरायणता के प्रति आग जलाई है। पर नोबुल के अंतराल में इन दिनों बेचैनी का बवंडर मचा हुआ था। पर क्या करे? कैसे करे? आवश्यकता मार्गदर्शक की थी।
इन्हीं दिनों स्वामी विवेकानंद इंग्लैंड आए। वेस्ट एण्ड स्थिति भवन पर उनकी गोष्ठी का आयोजन हुआ। वह उनसे मिली, अपने मनोभावों से अवगत कराया। स्वामी जी से अपने द्वारा चलाए जा रहे रस्किन स्कूल का निरीक्षण करने की प्रार्थना की। स्वामी जी गए । वहाँ के बच्चों को देखकर उन्हें भारतीय निर्धन परिवारों के बालक बालिकाओं की याद आ गईं। शिक्षा सुसंस्कारिता जिनके लिए आकाश कुसुम बनी हुई थी। उनकी आँखें गीली हो गईं। उनका दुःख नोबुल से छुपा न रह सका।
उन्होंने आश्वासन दिया कि वह भारत के दीन- दुःखियों की सेवा में अपना पूरा सहयोग करेंगी। उनके इस आश्वासन पर स्वामी जी ने कहा— ”भारत में कार्य की दृष्टि से तुम्हारा भविष्य उज्ज्वल है। वहाँ मनुष्य की नहीं; वरन संवेदनशील महिला की आवश्यकता है, जो सिंहनी की तरह वहाँ संव्याप्त दासता, निर्धनता और अंधविश्वास जैसी कठिनाइयों से लड़ सके। इन्हें पराजित कर सके। वहाँ तुम्हें ऐसे अर्धनग्न स्त्री-पुरुष के बीच रहना होगा। जिनकी जातिवाद के संबंध में विचित्र धारणाएँ हैं। वहाँ की जलवायु भयानक रूप से गर्म है। इन परिस्थितियों के बाद भी यदि तुममें काम करने का साहस जगे तो तुम्हारा स्वागत है।”
वस्तुतः इस तरह के साहस की अवरोधक बाहरी परिस्थितियाँ नहीं, हमारी अपनी मनःस्थिति है। स्वार्थ-मोह की वे बेड़ियाँ हैं; जिन्हें तोड़ने की हम हिम्मत नहीं जुटा पाते। नोबुल ने ये बेड़ियाँ तोड़ी। सारी बाधाओं को ठोकर मारकर राह से अलग किया और आ पहुँचा 28 जनवरी 1898 का दिन जब वे भारत पधारीं। स्वामी जी ने पुष्पहारों से स्वागत किया। इतिहास ने पुनः अपने को दुहराया युग के बुद्ध को सहयोग देने पुनः एक सुप्रिया पुनः एक सुजाता आगे आई।
17 मार्च 1898 को जब श्री माँ शारदा से मिलीं तो उन्होंने अपनी भुजाओं में समेटकर कहा— "बेटी तुम्हें पाकर भारत धन्य हुआ।" बाद में भी उनकी चर्चा करतीं। नरेन की बिटिया आई थी, वह बहुत बड़ा काम करेगी। माँ के हाथों से भोजन कर, प्रेम भरा स्पर्श पा नोबुल ने भी अपने को धन्य माना। एक सप्ताह बाद नीलांबर बाबू के बागान में नोबुल ने ब्रह्मचर्य व्रत के साथ ‘शिव भावे जीव सेवा' का मंत्र ग्रहण किया और सब कुछ समाज को निवेदित कर निवेदिता हो गईं।
कलकत्ता में प्लेग का प्रकोप हुआ। लोग जान बचा कर शहर छोड़कर भाग रहे थे। मेहतर मिलते नहीं थे और बात तो दूर लोग साफ-सफाई की बात भी न स्वीकारते थे। इस पर स्वामी जी ने कहा— मानव जैसा भी है, उसी स्थिति में तुम्हें उससे प्यार करना सीखना होगा। इस विकट स्थिति में उन्होंने प्राण का मोह छोड़कर फावड़ा हाथ में लिया और गंदी नालियों को साफ करने लगी। उनके इस कार्य से कितने ही युवक लज्जित हुए और अपनी सेवाएँ देने लगे। निवेदिता ने स्वामी जी के साथ अल्मोड़ा कश्मीर, बड़ौदा, और मद्रास आदि का भ्रमण किया। इस भ्रमण के पश्चात उनका यह विचार दृढ़ हुआ कि किसी देश का कल्याण करना है तो महिलाओं और जनमानस को जगाना होगा। जहाँ की मातृशक्ति अपमानित रहती हो उस देश से कोई आशा नहीं रखी जा सकती।
इसी उद्देश्य से 13 नवंबर 1898 को कलकत्ता में महिला विद्यालय की स्थापना की। विदेशी महिला के संपर्क में कोई अपनी लड़की देने को तैयार न था। हर शुभ कार्य का प्रथम चरण उपहास होता है, द्वितीय चरण सहयोग एवं परिणति सफलता होती है। यही बात यहाँ रही। उनके व्यवहार से प्रभावित होकर, रवीन्द्र नाथ टैगोर, जगदीश बसु जैसे प्रतिष्ठित लोगों ने अपनी अपने परिचितों की कन्याओं को भेजना शुरू किया।
वे युवा पीढ़ी को त्याग व सेवा का पाठ-पढ़ाना चाहती थी। इसके लिए उन्होंने विवेकानंद समिति, क्रांतिकारी समिति, जनसमिति, अनुशीला समिति की स्थापना की। युगांतर वंदेमातरम् के संपादन में सहायता की। यद्यपि 13 मार्च 1904 से उनका स्वास्थ्य खराब रहने लगा था, पर इसकी चिंता न कर किसानों और मजदूरों की आर्थिक स्थिति सुधारने में जुट गई। सहकारी समितियों की स्थापना की। काँग्रेस के वाराणसी अधिवेशन में गर्म दल और नर्म दल के बीच की खाई को पाटने की भरपूर कोशिश की। स्वतंत्रता संग्राम में भी सक्रिय सहयोग दिया।
क्षमता से अधिक कार्य करने के कारण शरीर दुर्बल होता जा रहा था। फिर भी रोग शय्या पर लेटे-लेटे 'मास्टर एज आई सा हिम', 'क्रेडम टेल्स ऑफ हिन्दूइज्म' आदि ग्रन्थों की रचना की। इसके अलावा अन्य ग्रंथ भी रचे। जो आज भी 'कम्पलीट वर्क्स ऑफ सिस्टर निवेदिता' के 5 खंडों में प्राप्त हैं। अनेक प्रयत्नों के बाद भी स्वास्थ्य न सुधरा, दार्जिलिंग गई। रास्ते में हालत बिगड़ गई और अपनी प्रिय रुद्राक्ष की माला पर जप करते-करते गुरु से एक हो गईं।
सागर पार से आकर उन्होंने भारत पर अपना सर्वस्य न्योछावर कर दिया। हम तो इसी देश के वासी हैं। श्रम से जी चुराते हैं, व भजन के नाम पर अकर्मण्यता अपनाते हैं। यदि भगिनी निवेदिता द्वारा लिए गए कार्यों में से किसी एक को भी भावनाशील महिलाएँ पूरा करने का संकल्प ले लें तो इस देश की कायापलट हो सकती है।
विद्वान पद्नाथ गाँव-गाँव जाकर कथा सुनाते थे। उनका निजी गुजारा लकड़ी बैचकर, जो पैसा मिलता था। उसी पर चलता था।
इस निस्पृहता और सेवा-भावना से जनता इतनी अधिक प्रभावित हुई कि उन्हें सिर-आँखों, पर उठाए फिरती थी और उनके उपदेशों को श्रद्धापूर्वक हृदयंगम करती थी। अपने समय में उनको असाधारण ख्याति थी।
मानवी काया में सतत विविध प्रकार के वैद्युतीय संकेत निकलकर बाह्य वातावरण में विसर्जित होते रहते हैं, जिन्हें विभिन्न उपकरणों के माध्यम से जाँचा, मापा और उनसे उत्पन्न संकेतों को सुना व देखा जा सकता है। तदुपरांत यह ज्ञात किया जा सकता है कि शरीर स्वस्थ है अथवा अस्वस्थ। हृदय से निस्सृत विद्युतीय तरंगें सबसे अधिक सशक्त होती हैं। इनके कमजोर पड़ने अथवा अधिक बढ़ जाने पर जीवन-संकट का सामना करना पड़ता है और धड़कन बंद होते ही व्यक्ति को मृतक घोषित कर दिया जाता है।
मस्तिष्क से भी लगातार स्थित तरंगें मानसिक स्थिति के अनुरूप विविध रूपों से निकलती रहती हैं, परंतु हृदय से निकलने वाली ड़ड़ड़ड़ की तुलना में ये अपेक्षाकृत कमजोर एवं जटिल होती हैं। इनके अतिरिक्त त्वचा एवं मांसपेशियों से निस्सृत संकेतों की आवृत्ति उच्च होती है। यह सभी संकेत यह बताते हैं कि मनुष्य की वास्तविक मनःस्थिति एवं उससे संचालित शारीरिक स्थिति कैसी है। मानसिक स्थिति के अनुसार ही व्यक्तित्व का निर्धारण होता है।
इस संदर्भ में प्रख्यात मनोवैज्ञानिक जे. कामिया तथा डॉ. बारबारा ब्राउन ने गहन अनुसंधान करने के पश्चात निष्कर्ष प्रस्तुत करते हुए बताया है कि यदि शरीर से निकलने वाले विभिन्न विद्युतीय संकेतों में किसी तरह आवश्यक परिवर्तन या परिवर्द्धन किया जा सके, तो न केवल शारीरिक स्वास्थ्य को अक्षुण्ण रखा जा सकता है; वरन मानसिक चेतना को भी परिष्कृत किया एवं उच्चस्तरीय बनाया जा सकता है। इनका मत है कि जब तक हम अपने अंतर-बाह्य प्रक्रियाओं तथा उन पर पड़ने वाले विचारों एवं संकल्पों के प्रभाव को अच्छी तरह समझ नहीं लेते, तब तक चेतना के क्षेत्र में वांछित परिवर्तन कर सकने में समर्थ नहीं हो सकते। क्रियाकलापों के प्रति जागरूकता न होने, पर उनको नियंत्रित नहीं किया जा सकता। इसके लिए बायो— फीडबैक-पद्धति को बहुत उपयोगी पाया गया है।
योग विद्या-विशारद जानते हैं कि योगाभ्यास की विविध प्रक्रियाएँ शारीरिक एवं मानसिक क्रियाकलापों के नियंत्रण में प्रभावकारी भूमिका निभाती हैं। उसके साथ विचारणाओं-भावनाओं के परिष्कार का उपक्रम भी जुड़ा रहता है। इसके बिना समाधिस्तर का सुख एवं चेतना के उच्च आयामों की उपलब्धि नहीं होती। परंतु यह एक लंबी समय एवं श्रमसाध्य प्रक्रिया है। आधुनिक विज्ञानवेत्ताओं ने योगाभ्यास परक प्रथम आवश्यकता पूर्ति के निमित्त बायोफीडबैक पद्धति को सर्वोत्तम पाया है। इसके द्वारा उपलब्ध परिणामों को मशीन पर चर्मचक्षुओं द्वारा सीधे देखा जा सकता है, जबकि पूर्ववर्ती प्रक्रिया अनुभूति मूलक है। सामने चलते हुए संकेतों अथवा कौंधते हुए विभिन्न लाइट बार को देखकर साधक अपने मानसिक स्तर को स्वयं समझ सकता है और तद्नुरूप उसमें हेर-फेर कर सकता है। इतना ही नहीं इसके द्वार समस्त शारीरिक हलचलों, हृदय मांसपेशियों, त्वचा, रक्त के अतिरिक्त प्रत्येक कोशिका की गतिविधि को जाना और स्वसंकेत द्वारा उन पर नियंत्रण साधा जा सकता है।
सुप्रसिद्ध मनोवेत्ता एल्मरग्रीन का कहना है कि शरीर पर मन का आधिपत्य है। अतः उसे प्रशिक्षित करके समस्त कायिक अंग-अवयवों, कोशिकाओं को वशवर्ती बनाया जा सकता है; क्योंकि यह सभी मन से संचालित हैं। अतः मांसपेशियों में उत्पन्न तनाव एवं सिरदर्द जैसी सामान्य बिमारियों को बायोफीडबैक द्वारा सरलतापूर्वक दूर किया जा सकता है। इससे संबद्ध व्यक्ति इलेक्ट्रोमायोग्राफ पर अपनी पेशियों द्वारा छोड़े गए विद्युत चुंबकीय विकिरण को देखता और इच्छाशक्ति का प्रयोगकर उन्हें इच्छित तरीके से सिकुड़ने-फैलने का निर्देश देता है। अभ्यास द्वारा इससे उसी तरह के सुखद परिणाम निकलते हैं, जिस तरह से प्रशिक्षित मस्तिष्क से शांतिदायक अल्फा-तरंगों के निष्कासन से मिलता है। इस उपचार में किसी बाह्य चिकित्सक की आवश्यकता नहीं पड़ती; वरन विशेषज्ञ द्वारा इलेक्ट्रोड लगाने की प्रक्रिया ज्ञात हो जाने पर अकेले भी किया जा सकता है। यह पूर्णतया आटा सजेशन प्रक्रिया पर आधारित है। डॉ. एडमन्ड डेवान ने इस विधि द्वारा विकलांग व्यक्तियों की संकल्पशक्ति को जगाकर बेकार बने अंगों को सक्रिय बनाने में आशातीत सफलता पाई है। उनके अनुसार इससे मांसपेशियों की निष्क्रियता एवं तनाव को भी सरलतापूर्वक दूर किया जा सकता है।
हृदय की गतिविधियों पर सामान्य मनुष्यों का कोई नियंत्रण नहीं होता, किंतु योगाभ्यासियों के लिए नाड़ी की गति, हृदय की धड़कन आदि को इच्छानुसार घटा-बढ़ा लेना, लयबद्धता को सुस्थिर बना देना एक सामान्य क्रिया होती है। अभ्यास द्वारा अनैच्छिक पेशियों को भी नियंत्रितकर लेने में वे समर्थ होते हैं। हृदयगति रुकने तक का निमित्त कारण बनती है। इसे लयबद्ध बनाया जा सके तो न केवल असामयिक मरण से छुटकारा पाया जा सकता है; वरन दीर्घ जीवन की उपलब्धि भी संभव है। अनुसंधानकर्ता डॉ. एल्मरग्रीन ने हृदय रोगियों पर किए गए बायोफीडबैक अध्ययनों में पाया है कि जिन व्यक्तियों की हृदयगति 110 प्रतिमिनट थी, तीन माह के अभ्यास से वे 80 प्रतिमिनट तक गति को कम करने में सफल हुए। उनके अनुसार इस तरह के बाह्य उद्दीपनों से, जो यंत्र पर लाल, हरे आदि प्रकाश के रूप में दिखते रहते हैं, व्यक्ति को अपने संकल्पबल को प्रखर बनाने एवं अधिकाधिक कुशलता प्राप्त करने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। इच्छाशक्ति के विकास के साथ ही अतः प्रक्रियाओं पर नियंत्रण सधता जाता है।
हाइपरटेंशन यानी उच्च रक्तचाप इस शताब्दी की सबसे बड़ी बीमारी है। विश्व में ऐसे लोगों की संख्या करोड़ों में है, जिन्हें उच्च रक्तदाब की शिकायत है। अकेले भारत में प्रायः पाँच करोड़ से अधिक व्यक्ति इस रोग से पीड़ित हैं। इस श्रेणी में प्रतिवर्ष लाखों की संख्या में नए रोगी जुड़ते जाते हैं। चिकित्सक एवं दवाइयाँ भी इसमें कोई स्थायी राहत नहीं दिला पाते। वस्तुतः यह एक मनोशारीरिक रोग है, जो चिंतन-क्षेत्र की विषमता व तनाव के कारण पनपती है। इसका उपचार भी तदनुरूप ही ढूँढ़ा जाना चाहिए। विशेषज्ञों ने ई.के.जी. बायोफीडबैक को इसके लिए बहुत उपयुक्त पाया है। एक और इस उपक्रम में जहाँ मन को विधेयात्मक विचारणाओं से परिपूरित करने का अवसर मिलता है, वहीं भावना-क्षेत्र का परिशोधन कर संकल्पबल को बढ़ाया जाता है। हृदय की गतिविधियों एवं ब्लडप्रेशर को नियंत्रित करने में यह युक्ति बहुत कारगर सिद्ध हुई है।
यह एक सर्वविदित तथ्य है कि वर्तमान समय की अधिकांश बीमारियों का जनक दैनिक जीवन में बढ़ता जा रहा तनाव है। इससे शरीर की ऊपरी त्वचा से लेकर रक्तवाही शिराओं की आंतरिक संवेदनशील मांसपेशियों तक प्रभावित हुए बिना नहीं रहतीं। शवासन, शिथिलासन जैसी योगाभ्यास परक प्रक्रियाओं द्वारा दूर कर लिया जाने का विधान योगशास्त्र में है फिर भी अब नए आविष्कारों के साथ ही मस्तिष्कीय शक्ति एवं यांत्रिक सुविधाओं के सम्मिलित प्रयोग से कम समय में सरलतापूर्वक इसे संपन्न किया जा सकता है। इसी प्रकार थर्मल सेंसर द्वारा शारीरिक तापमान के उतार-चढ़ावों को सूक्ष्मतापूर्वक निरखा-परखा जा सकता है। सिरदर्द जैसी सामान्य बीमारियाँ प्रायः ड़ड़ड़ड़ में असमान तापमा-वितरण के कारण उत्पन्न होती हैं। अतः हाथ की ऐच्छिक माँ ड़ड़ड़ड़ का तापमान बढ़ा लेने पर सिर में रक्त प्रवाह संतुलित हो जाता है और राहत मिलती है।
इसी प्रकार जी.एस.आर. बायोफीडबैक द्वारा त्वचा की विद्युतीय प्रतिरोधी क्षमता को घटाया-बढ़ाया जा सकता है। बढ़ी हुई त्वचा प्रतिरोध क्षमता, तनाव शैथिल्य एवं सक्रियता का चिन्ह है। मन की उत्तेजना, व्यग्रता सबसे पहले त्वचा प्रतिरोध में ही परिलक्षित होती है। शरीर की प्रतिरोधी सामर्थ्य को शक्तिशाली बनाने हेतु स्वसंवेदन, ध्यानप्रक्रिया या प्रयोग का संकेत, यह उपकरण देता रह सकता है। इसे इक्कीसवीं सदी के 'इलेक्ट्रॉनिक मेडीटेशन' की उपमा दी गई है।
'न्यूमाइण्ड- न्यूबाँडी' बारवना ब्राऊन कहती हैं कि “बायोफीडबैक” द्वारा मनःस्थिति की उत्तेजना को शिथिलीकरण में बदलना इस युग की सबसे बड़ी उपलब्धि है। सचमुच यदि मनश्चेतना पर यंत्रों के माध्यम से ही सही मनुष्य को योग-साधना द्वारा नियंत्रण करने की विद्या सिखाई जा सके तो इसे चिकित्सा विज्ञान का मानव जगत को अद्भुत अनुदान कहा जाएगा।
भूमि में उर्वरता की समुचित मात्रा हो तो उस पर खेत, उद्यान आदि की अनेकानेक सुषमा, हरीतिमा उगाई जा सकती है। यदि वह ऊसर हो, नमक उबलता हो, तो फिर घास का एक तिनका तक जमने वाला नहीं हैं। बालू, ईंट और खारी जमीन पर मकान, कारखाने तक खड़े नहीं किये जा सकते है। भूमि संबंधित कोई भी संपदा उपार्जित करने के लिए भूमि का सही-समतल होना आवश्यक है। रेगिस्तान में, पहाड़ी चट्टानों में, समुद्र के तटवर्ती नमक वाले क्षेत्र में सुविधाएँ मिलना तो दूर, उसके खाई-खंदक सामान्य क्रियाकलाप में भी बाधा उत्पन्न करते हैं।
सुविधा-संवर्ध्दन की योजनाएँ बनाने से पूर्व सर्वप्रथम उपयुक्त भूमि का चयन करना पड़ता है। संसार में अगणित प्रकार की सुविधा संपदाओं का अभिवर्ध्दन आवश्यक होता है, पर उसके लिए उस मानवी चेतना का स्वास्थ, संतुलित, समुन्नत होना आवश्यक है, जो वैभव उत्पादन के लिए अनिवार्य रूप से आवश्यक है। यदि भूमि पर, साधनों पर आधिपत्य जमाकर बैठे हुए अथवा योजनाएँ बनाने वाले लोग विकृत मस्तिष्क के होंगे तो वे कुछ बन सकना तो दूर विग्रह और ध्वंस ही खड़े करेंगे, उलझी हुई समस्याओं का समाधान तो उनसे बन ही कैसे पड़ेगा?
इन दिनों पतन पराभव का, संकट-विग्रहों का वातावरण बना कर खड़े हुए अराजकता स्तर के असमंजसों की चर्चा बहुधा की जाती है। इनका निवारण-निराकरण इन्हीं दिनाँक किया जाना आवश्यक है। देर करने का समय है नहीं, अन्यथा अवसर चूकने पर पछताने के अतिरिक्त और कुछ हाथ लगेगा नहीं। बात इतने पर ही समाप्त नहीं होती। क्षयजन्य रुग्णता को दूर करने को प्राथमिकता तो दी जाती है, पर अलग कदम यही होता है कि रुग्णता से क्षीण-जर्जर काया को सही स्थिति में लाया जाए और जीवनी शक्ति को इतना बढ़ाया जाए, जिससे दुर्बलता दूर हो सके और स्वस्थसमर्थ मनुष्य की तरह जीवनयापन कर सकना संभव हो सके।
मस्तिष्क विकृत, हृदय निष्ठुर, रक्त दूषित पाचन अस्त-व्यस्त हो, शरीर के अंग-प्रत्यंगों में विषाणुओं की भरमार हो, तो फिर वस्त्राभूषणों की भरमार, अगर, चंदन का लेपन और इत्र-फुलेल का मर्दन बेकार है। शस्त्रसज्जा जुटा देने और तकिये के नीचे स्वर्णमुद्राओं की पोटली रख देने से भी कुछ काम न चलेगा। पंचग्राम प्रधान, विधायक, या प्रतिनिधि चुनाव में विजई घोषित कर देने से भी प्रसन्नता-प्रफुल्लता का मानस कहाँ बन पाता है। जबकि स्वस्थ, सुडौल होने के कारण सुंदर दीखने वाला शरीर गरीबी में भी हँसती-हँसाती जिंदगी जी लेता है, आए दिन सामने आती रहने वाली समस्याओं से भी निपट लेता है, प्रतिकूलताओं को अनुकूलताओं में बदल लेता है औऱ किसी-न-किसी प्रकार, कहीं न कहीं प्रगति के साधन जुटा लेता है। वस्तुतः महत्त्व साधनों या परिस्थितियों का नहीं व्यक्तिगत स्वतंत्रता, प्रतिभा और दूरदर्शिता का है। वह सब उपलब्ध रहे, तो फिर न अभावों का शिकायत करनी पड़ेगी और न जिस-तिस प्रकार के व्यवधान सामने आते रहने पर भी अभ्युदय में कोई बाधा पड़ेगी। यही बात इन सब विपन्नताओं के संबंध में है, जो आज हर दिशा में सुरसा मुँह फाड़े महाविनाश का तुमुलनाद करती है। वे समस्याएँ जो अतिनिकट दीखती हैं, यदि दृष्टिकोण सुधरे, तो किसी के भी समाधान में कहीं कोई अड़चन न रहे।
औसत नागरिक स्तर का जीवन स्वीकार कर लेने पर सुविस्तृत खेतों-देहातों में रहा जा सकता है और वायुमंडल, वातावरण को प्रफुल्लता प्रदान करते रहने, संतुष्ट रखने में सहायक हो सकता है। प्राचीनकाल की सुसंस्कृत पीढ़ी इसी प्रकार रहती थी और मात्र हाथों के सहारे बन पड़ने वाले श्रम से जीवनयापन के सभी आवश्यक साधन अतिसरलतापूर्वक सभी जुटा लेते थे। न प्रदूषण फैलने का कोई प्रश्न था और न शहरों की ओर देहाती प्रतिभा पलायन का कोई संकट। न देहात दरिद्र, सुनसान पिछड़े रहते थे और न शहर गंदगी, पिचपिच, असामाजिकता के केंद्र बनते थे। आज भी उस पुरातन रीति-नीति को अपनाया जा सके, तो जिन समस्याओं के कारण सर्वत्र त्राहि-त्राहि मची हुई है, उनके उभरने का कोई कारण शेष न रहे। स्थानीय साधनों से बने मकान न केवल सस्ते होते हैं; वरन हर दृष्टि से सुविधाजनक भी सिद्ध होते हैं। अमीरी बटोरने की हविश ही औद्योगीकरण के लिए उत्तेजित करती है। बड़े कारखाने लगते, विष उगलते, पानी में जहर मिलाते, अत्यधिक ईंधन खपाते और देहाती उद्योगों का सफाया करके बेकारी, बेरोजगारी का माहौल बनाते हैं। पुरातन देहात प्रधान कुटीर उद्योगों पर निर्भर रीति-नीति को आमूलचूल बदल डालने में मनुष्य का विकृत चिंतन ही एक मात्र कारण है। यदि वह भविष्य में भी इसी प्रकार बना रहा, तो उपरोक्त समस्याओं में से किसी का भी महाविनाश से पूर्व समाधान होने की संभावना नहीं है।
“सादा जीवन-उच्चविचार” का सिद्धांत अपनाते ही प्रस्तुत असंख्य समस्याओं में से एक के भी पैर न टिक सकेंगे। अपराधों की भरमार भी तब क्यों हो, जब हर व्यक्ति ईमानदारी, समझदारी, जिम्मेदारी और बहादुरी की नीति अपनाकर श्रमशीलता, सभ्यता और सुसंस्कारिता को व्यावहारिक जीवन में स्थान देने लगेगा। गुजारे के लायक इतने साधन इस संसार में मौजूद हैं कि हर पेट को रोटी, हर तन को कपड़ा, हर सिर को छाया और हर हाथ को काम मिल सके, तब गरीबी-अमीरी की विषमता भी क्यों रहेगी? जाति-लिंग के नाम पर पनपने वाली विषमता का अनीतिमूलक और दुःखदाई प्रचलन भी क्यों रहेगा?
मनुष्य स्नेह और सहयोगपूर्वक रहने के लिए पैदा हुआ है। लड़ने, मरने और त्रास देने के लिए नहीं। यदि आपा-धापी न मचे तो फिर एकता और समता में बाधा उत्पन्न करने वाली असंख्य कठिनाइयों में से एक का भी कहीं अस्तित्व दृष्टिगोचर न हो। शुद्ध व्यवसाय की बलिवेदी पर जो प्रचुर साधन, प्रबंध, श्रम-कौशल का हनन करना पड़ता है, उसकी फिर क्या आवश्यकता रहे।
समाज के सामने असंख्यों विकृतियों और व्यक्ति के सामने असंख्य समस्याओं के अम्बार खड़े हैं। उनमें से प्रत्येक को अलग-अलग समस्या मानकर उनके पृथक-पृथक समाधान खोजने में, यद्यपि विश्व की मूर्धन्य प्रतिभाएँ अपने-अपने ढंग से समाधान खोजने और उपचार खड़े करने के लिए भारी माथापच्ची कर रही हैं, पर उनसे कुछ बन नहीं पा रहा है। न अस्पतालों, चिकित्सकों द्वारा भारी धनराशि खर्चकर रोग काबू में आ रहे हैं और न पुलिस, कानून, कचहरी आदि अपराधों को काबू में कर सकने में समर्थ हो रहे हैं। आत्मघाती दुर्व्यसनों के रहते बैंकों से भारी कर्ज व अनुदान बँटने पर भी गरीबी मिट सकेगी नहीं। इसके लिए समस्याओं के मूल में जाना होगा एवं यह सोचना होगा कि यदि जीवनक्रम अब भी न बदला गया तो सामूहिक आत्मघात सुनिश्चित है। अध्यात्म ही समस्त समस्याओं का एक मात्र समाधान सुझा सकता है। उसके पास ही सारे तालों की वह कुंजी है जो द्वार खोलकर प्रगति का पथ-प्रशस्त कर सके।
अमेरिका के राष्ट्रपति लिंकन किशोरावस्था में एक मोदी की दुकान पर छोटी नौकरी करते थे।
एक दिन दूर देहात से कोई महिला आई।
सामान खरीदा। कुछ नोट दिए। हिसाब में चूक रह जाने से उस महिला को कम पैसे लौटाए गए। वह अनपढ़ थी, लेकर चली गई।
शाम को हिसाब जोड़ा गया तो पैसा बढ़ा। लिंकन को ध्यान आया कि वह उसी महिला के रह गए हैं। दुकान बंद करके वे दूर गाँव को गए। रात में उस महिला के यहाँ पहुँचें। जगाकर भूल का पैसा उसे लौटाया। अपने घर पहुँचे।
ऐसी ही ईमानदारी थी; जिसने लिंकन को एक दिन अमेरिका का राष्ट्रपति बनाया।
चेतना का क्रमिक विकास हलचल, इच्छा एवं भावना के रूप में होता है। जीवन की स्वल्प मात्रा तो जड़ कहे जाने वाले पदार्थों में भी होती है। प्रकृति के दबाव से कुछ-न-कुछ हलचल तो वे भी करते रहते हैं। उत्पादन, अभिवर्द्धन और विघटन की दिशा में उनके क्रियाकलाप भी चलते रहे हैं। इतने पर भी उन्हें जड़ तथा पिछड़ी स्थिति का कहा— समझा जाता है। यह जीव-चेतना की प्रारंभिक अथवा अनगढ़ स्थिति है।
इससे आगे इच्छाशक्ति उभरती है। वह अधिक विकसित होने; अधिक सुविधाजनक स्थिति में पहुँचने की ललक से प्रेरित होती है। इसी आधार पर जीवधारियों का क्रमिक विकास भी बन पड़ा है। कृमि-कीटकों की गई-गुजरी स्थिति से आगे बढ़ते-बढ़ते जीवन पशुस्तर का बन पड़ा है और डार्विन के कथनानुसार मनुष्य बंदर का ही विकसित रूप है। इसी उपक्रम को मनुष्य की स्थिति के साथ जोड़ा जाए, तो उसे भी नर-कीटक, नर-पशु कह सकते हैं, जिसे भूख, वासना, ऋतु-प्रभाव जैसे दबावों से प्रेरित होने पर ही कुछ अतिरिक्त करना और अतिरिक्त सोचना पड़ता है। आकांक्षाओं की पूर्ति ही उसे कुछ सोचने करने के लिए बाधित करती है, किंतु सीमित उतनी ही परिधि में रहती है; जिसमें कि संकीर्ण स्वार्थपरता का साधन जुटता रहे।
अनगढ़ों को शैशव स्तर का कहा जा सकता है, जो अधिकांश समय सोते, उनींदे पड़े रहने में ही बिताते हैं। आलसी-प्रमादी प्रायः इसी स्थिति में रहते हैं। चिंतन का विकास न होने के कारण वे मात्र उसका अनुकरण भर कर पाते हैं, जो सामने दृष्टिगोचर होती हैं। उचित-अनुचित का भेद और मर्यादा-वर्जना का अंतर भी वे नहीं कर पाते, इसलिए उनके सामने प्रचलन ही प्रमुख होता है। विवेक की अविकसित स्थिति में उन्हें चतुर लोग आसानी से बहकाने, फुसलाने और दबाने-दबोचने में भी सफल होते रहते हैं। वे अपने को नियति के बंधनों से जकड़े हुए ही मानते हैं। यथास्थिति बनाए रहने में ही उन्हें संतोष करना पड़ता है। अंधी भेड़ें एक के पीछे एक चलती ही जाती हैं। भले ही आगे चलकर उन्हें किसी खाई-खंदक में ही क्यों न गिरना पड़े।
बचपन के बाद किशोरावस्था आती है। बच्चे अबोध रहते और शरीरगत आवश्यकताओं के लिए ही हाथ-पैर पीटते हैं। किशोरावस्था की स्थिति इससे भिन्न है। उसमें जोश तो बहुत रहता है, पर होश की कमी ही पाई जाती है। इस स्तर की मानसिकता वाले व्यक्ति महत्त्वाकांक्षाएँ तो संजोए रहते हैं, पर यह नहीं समझ पाते कि उनकी पूर्ति का सही मार्ग क्या हो सकता है? आवेग कई बार उन्हें भटका भी देता है, कुमार्ग तक अपनाने तक के लिए भड़का देता है। यही कारण है कि बच्चों के पालन-पोषण की अपेक्षा किशोरों को नियंत्रित करना और सुसंस्कृत बनाना काफी कठिन पड़ता है।
इसके आगे की स्थिति तरुणाई है, जिसमें प्रौढ़ता, परिपक्वता का समावेश होता चलता है, साथ ही समझदारी का इतना अभिवर्द्धन भी होता है कि भले-बुरे का अंतर होता रह सके। अनुभव के आधार पर यह अनुमान लग सके कि किए जा रहे कृत्यों का भावी परिणाम क्या हो सकता है। उसी आधार पर वे अपना नियमन भी करते है और ऐसे कदम भी उठाते हैं, जो आरंभ में भले ही कष्टसाध्य लगें, पर भविष्य में सुखद-संभावनाएँ विनिर्मित कर सकें। किसान, विद्यार्थी, व्यवसायी, कलाकार जैसे समुन्नत बनने वाले लोग इसी रीति-नीति को अपनाते हैं। वे विश्वास करते हैं कि बोने-सींचने के उपरांत ही वैभव काटा-बटोरा जा सकता है।
नासमझी से लेकर समझदार बनने तक की प्रगति में प्रायः यही मंजिलें पार करनी पड़ती हैं। शिशु स्तर के वे हैं, जिन्हें शरीर पर पड़ने वाली प्रकृति एवं परिस्थितियों के दबाव ही कुछ करने के लिए उकसाते हैं; अन्यथा उन्हें अपनी मरजी से किसी प्रकार समय गुजारने के अतिरिक्त और कुछ सोचते-करते बन ही नहीं पड़ता। इसे आदिम परंपरा भी कह सकते हैं, जिसे इस सभ्यताभिमानी युग में भी असंख्यों पर छाया हुआ देखा जा सकता है।
आज का किशोर समुदाय वह है, जिसे सुख-सुविधाओं को हस्तगत करने की ललक असाधारण रूप से आकुल-व्याकुल करती है। वे यह तो सोच नहीं पाते कि उसके लिए योग्यता, क्षमता, पात्रता और पुरुषार्थपरायणता अपनाते हुए क्रमिक विकास का क्रम धैर्यपूर्वक अपनाना चाहिए। उद्यान लगाकर माली की तरह धैर्य रखते हुए समयानुसार सुस्थिर प्रगति का प्रतिफल उपलब्ध करना चाहिए, किंतु बहुधा वे दूरदर्शिता और प्रगति-परंपरा के अनुशासन को तोड़-फोड़ करके ऊँची छलांगें लगाते हैं। तात्कालिक लाभ के लिए इतने अधीर हो जाते हैं कि उन्हें अनाचार अपनाने में भी कोई हिचक— झिझक नहीं लगती।
परिपक्वता का लक्षण है— भाव-संवेदनाओं का उभाव। आत्मसंयम और दूसरों को अनुदान प्रस्तुत करने का संतजनों जैसा अभीष्ट उत्साह। पेड़ पर फल जब पक जाते हैं, तो वे नीचे अनायास ही टपक पड़ते हैं, ताकि बालक और दुर्बल भी उनका लाभ सरलतापूर्वक उठा सकें। बादलों के पास जब प्रचुर जल-संपदा जुट जाती है तो वे उसकी सार्थकता इसी में समझते हैं कि बरसकर प्यास बुझाने और हरीतिमा उगाने की रीति-नीति अपनाई जाए। मोर अपने लंबे पंखों को समय-समय पर झाड़ते रहते हैं, ताकि उनसे शोभा-सज्जा के कई प्रयोजन पूरे किए जा सकें। मनुष्य समुदाय में भी साधु, ब्राह्मण, वानप्रस्थ, परिव्राजक अपनी क्षमता का अधिकांश भाग लोक-मंगल के लिए समर्पित करने में ही अपने को कृतकृत्य हुआ अनुभव करते हैं। उनके कार्यक्रमों में बाल विकास और किशोरों के प्रशिक्षण की प्रक्रिया की प्रमुखता रहती है। इसी के लिए वे गुरुकुल चलाते और तीर्थयात्रा जैसे धर्म-प्रचार के परिभ्रमण पर निकलते हैं।
विकासक्रम, हलचलें समझदारी की मंजिलें पार करते हुए भाव-संवेदना के उच्च शिखर पर पहुँचाता है। यही चेतना के परिष्कार का स्वाभाविकक्रम और सराहनीय सदुपयोग है। संवेदनशीलों को ही महामानव कहते हैं; क्योंकि विकसित करुणा का उपयोग गिरों को उठाने और उठों को शालीनता अपनाने के लिए बाधित करने पर ही संभव होता है।
श्रावस्ती के समीप एक ब्राह्मण रहता था— अपरिग्रही। धर्मधारणा और लोकसेवा के लिए व्यक्तित्व को संयम के तप से तपाना पड़ता है। सो उसने एक-वस्त्र-धारण का व्रत लिया। उसी को वह ओढ़ता, बिछाता और पहनता। जब धोता, तो घर में नंगा बैठा रहता।
एक दिन तथागत का विशेष उद्बोध होने वाला था। उसमें सम्मिलित होने सारा नगर पहुँचा; अपरिग्रही ब्राह्मण भी। सभी उपस्थितजनों ने धर्मचक्र-प्रवर्तन के लिए दान दिया। ब्राह्मण का मन रह-रहकर कचोट रहा था कि वह गरीब है तो क्या? अपने वस्त्र तो दे ही सकता है। इसमें लज्जा और लज्जित होने का संकोच क्या? यह संकोच ही उसे कदम बढ़ाने से रोक रहा था।
बहुत तरह विचार करने के उपरांत उनने वस्त्र दे डालने का निश्चय कर ही डाला। लज्जा को पत्तों से ढक लिया और आनंदविभोर होकर चिल्लाया— जीत गया, जीत गया।
लोगों ने पूछा। उसने मन जीत लिया है। राजा ने नए वस्त्र दिए, वे उसने लेने से इनकार कर दिए और कहा— यह अपरिग्रह ही मनुष्य को कृपण और विलासी बनाता है, उसे जीत लेने पर आत्मजयी बना मनुष्य त्रैलोक्यजयी जैसा हो जाता है। इसी उपलब्धि से मनुष्य का अजस्र तेज चमकता है, फिर इस लाभ को मैं क्यों छोड़ूँ।
शरीर उन पंचतत्त्वों का बना है, जिन्हें जड़ कहा जाता है। चेतना तो उसमें प्राणरूप है। यदि यह निकल जाए, तो पाँच तत्त्वों का बना घोंसला निर्जीव बनकर रह जाता है। इसके लिए कुछ कर सकना तो दूर, अपने शरीर की रक्षा तक नहीं कर सकता। तुरंत सड़ने-गलने लगता है और जीव-जंतुओं का आहार बनकर अपनी शकल-सूरत तक गँवा बैठता है। जीवित होने पर ही किसी को जीवित कहा जाता है। अस्तु वही प्रमुख है।
जीवन, वायु की तरह व्यापक और अनंत है। फेफड़ों में जितनी जगह होती है। उतनी ही मात्रा में वायु ग्रहण की जाती है। शरीर-कलेवर के संबंध में भी यही बात है। साँस लेते समय उसकी जितनी आवश्यकता पड़ती है, उतनी ही ग्रहण कर ली जाती है। शेष अनंत आकाश में ही भरी रहती है, उसे अधिक मात्रा में ग्रहण— उपलब्ध करने की कला में प्रवीण, ’प्राणायाम’ से अतिरिक्त मात्रा में ग्रहण कर लेते हैं और आवश्यकतानुसार उसे विशेष समय पर प्रयुक्त करते हैं। ऐसे ही लोग प्राणवान कहलाते हैं और उस संचय से अपना तथा दूसरों का भला करते हैं।
शरीरबल प्रायः इतना ही होता है, जितना कि सीमित मात्रा में प्राणशक्ति विद्यमान रहती है, पर जो आश्चर्यजनक, अद्भुत, असाधारण कार्य कर पाते हैं, उनकी प्राणसत्ता ही विशेष रूप से काम करती और चमत्कार स्तर के काम करती देखी जाती है। शरीर मनुष्यकृत है। वह नर-नारी दो जननेंद्रियों के माध्यम से विकसित होता है; किंतु प्राण देवता है। उसकी असीम मात्रा इस विश्व-ब्रह्मांड में भरी पड़ी है। वह अपने वर्ग के साथ असाधारण मात्रा में एकत्रित भी हो सकता है और एक से दूसरे में प्रवेश करके अपनी दिव्य क्षमता का हस्तांतरण भी कर सकता है। इस प्रकार के प्रयोगों को ‘शक्तिपात’ नाम से जाना जाता है। छाया पुरुष स्तर में भी उसी का विशेष कर्तृत्व देखा जाता है। मरणोपरांत उसका स्वतंत्र अस्तित्व भूत-प्रेत आदि के रूप में बना रहता है। जीवित स्थिति में भी अतींद्रिय क्षमताओं के रूप में उसके चमत्कारी करतब देखे जा सकते हैं। प्राणयोग के अभ्यास से इसका अतिरिक्त कार्य-कौतुक शरीर से बाहर निकलकर भी, सुषुप्ति, तुर्या, समाधि आदि में अपनी सत्ता बनाए रहकर भी, बिना शारीरिक साधनों के अपने अस्तित्व तथा सशक्त विशेषता का परिचय दे सकता है।
प्राण की सत्ता हस्तांतरण के उपयुक्त भी है। उसे कोई समर्थ व्यक्ति अपनी दिव्य क्षमता का एक भाग किसी दूसरे को देकर उसकी सहायता भी कर सकता है। आदि शंकराचार्य की वह कथा प्रसिद्ध है, जिसके अनुसार उन्होंने कुछ समय के लिए अपने शरीर से निकलकर किसी दूसरी काया में प्रवेश कर गए थे और लंबी अवधि तक उसी में बने रहे थे।
अन्य विशिष्ट शक्तियाँ भी मनुष्य के साथ अपना तालमेल बिठाती और उसके शरीर द्वारा अपने अभीष्ट प्रयोजन पूरे करती रही हैं। कुंतीपुत्र मनुष्य शरीरधारी होते हुए भी विशेष देवताओं के अवतार थे। उसी स्तर के वे काम भी करते रहे, जैसे कि साधारण मानवी काया में रहते हुए कर सकना संभव नहीं है। रामायणकाल में हनुमान, अंगद आदि के पराक्रमों को भी ऐसे ही देवोपम माना जाता है, जैसा कि मनुष्य शरीरधारी सामान्य प्राण वाले प्रायः नहीं ही कर सकते। अवतारी सत्ताएँ मनुष्य शरीर में रहकर ही अपने विशेष कृत्य करतीं और ‘यदा यदा हि धर्मस्य’ वाली प्रतिज्ञा की रक्षा करती हैं। देवदूतों, संदेशवाहकों के नाम से जाने जाने वाले महामानवों में भी ऐसी ही विशिष्ट शक्तियाँ पाईं जाती हैं।
भगवान जिन्हें विशेष कार्यों के लिए चुनते, नियुक्त करते हैं, उनमें इस दिव्य प्राण की मात्र ही आधिक होती है, जिसके सहारे वे नर-वानरों की परिधि से ऊँचा उठकर ऐसा सोचते; ऐसा साहस करते; ऐसा आदर्श उपस्थित करने में समर्थ होते हैं; जैसा कि सामान्य मनुष्य भवबंधनों की रज्जुओं से जकड़े हुए न तो सोच ही सकते और न दिव्य आदर्शों को अपनाते, दैवी प्रयोजन सिद्ध करने के लिए अतिरिक्त आत्मबल-मनोबल का परिचय ही दे पाते हैं। छुटपुट विघ्न ही उन्हें पहाड़ जितने भारी दीखते हैं और उनके कर गुजरने का समय जब सामने आता है, तो भयभीत होकर किसी अनर्थ की आशंका करने लगते हैं। कायरता न जाने कहाँ से आकर दौड़ पड़ती है और कभी की हुई प्रतिुज्ञाएँ— लिए हुए संकल्पों को एक प्रकार से भूल ही जाते हैं।
दैवी अनुग्रह के संबंध में लोगों की विचित्र कल्पनाएँ हैं। वे उन्हीं छोटी संभावनाओं को दैवी अनुकंपा मानते रहते हैं, जो सामान्य पुरुषार्थ से अथवा अनायास ही संयोगवश लोगों को उपलब्ध होती रहती हैं। मनोकामनाओं तक ही उनका नाक रगड़ना, गिड़गिड़ाना सीमित रहता है, जिसे वे दैवी अनुकंपा मानते हैं। आत्मबल— आत्मविश्वास न होने से तो जो कुछ भी हाथ लगे, उसे पुरुषार्थ का प्रतिफल मानने से उनका मन संतुष्ट ही नहीं होता। उनके लिए हर सफलता दैवी अनुग्रह और हर असफलता दैवी प्रकोपमात्र प्रतीत होता है। ऐसे दुर्बल चेताओं की बात छोड़ दें, तो यथार्थता समझ में आ जाती है, पर अंततः एक ही तथ्य सामने आता है कि मनुष्य जब आदर्शवादी अनुकरणीय एवं अभिनंदनीय कार्यों को करने के लिए उमंगों-तरंगों से भर जाता है, तो वह कदम उठाने लगता है, जो रावण की सभा में अंगद का पैर उखाड़ना तक असंभव प्रतीत होने लगा था। औसत आदमी को तो हर काम असंभव लगता है। ऐसे छोटे त्याग करना भी उसे पहाड़ उठाने जैसा भारी पड़ता है, जो वस्तुतः हलके-फुलके ही होते हैं और हिम्मत के धनी आदर्शवादी, जिन्हें आए दिन करते रहते हैं। बर्फ में रहने वाले एस्किमो, समुद्र में कल्लोल करने वाले मछुआरे, पर्वतों की गुफाओं में गुजारा करने वाले संतजन, कंदमूल खाकर दिन गुजारने वाले आदिवासी, उस प्रकार के वातावरण में रहने के कारण अपनी जीवनचर्या को साधारण ही मानते हैं, पर अनभ्यस्त लोगों के लिए वैसी कल्पना तक मौत की तरह मुश्किल मालूम पड़ती है।
दैवी अनुग्रह का एक ही चिह्न है— आदर्शवादिता की दिशा में साहसपूर्वक बड़े कदम उठाना और उस प्रवास में आने वाली कठिनाइयों को हँसते-हँसते दरगुजर कर देना। भगवान का अनुग्रह एक ही है— आदर्शों के परिपालन में बढ़ी-चढ़ी साहसिकता का प्रदर्शन करते रहना। कायरों और साहसिकता का प्रदर्शन करते रहना। कायरों और हेयजनों के लिए यही पर्वत उठाने जैसे अड़ंगा प्रतीत होता है, किंतु जिनमें मनोबल की कमी नहीं, उनके लिए तो यह सब खेल-खिलवाड़ जैसा लगता है। इसे कर गुजरे बिना उन्हें चैन नहीं पड़ता। संसार का इतिहास साक्षी है कि जिस किसी पर भगवान की प्राणचेतना-अनुकंपा बरसी है, उनको एक ही वरदान मिला है कि ऐसे सत्कर्म करने का साहस मिले, ऐसा साहस मानस में विचरता रहे कि अनुकरणीय और अभिनंदनीय कार्य सतत करने की उमंग उठती रहे। अवांछनीयता और अनौचित्य जहाँ भी दीखता है, वहाँ लड़ पड़ने का इतना शौर्य, साहस उभरता है कि उसे चरितार्थ किए बिना व्यक्ति कभी शांति से बैठ ही नहीं सकता। इक्कीसवीं सदी में ऐसी ही प्रतिभाएँ सर्वत्र उभरेंगी। जिनके पिछले किए क्रियाकलाप देखने से निराशा होती थी, उनमें से भी कितने ही ऐसे उभरेंगे, जो अपने को धन्य बनावेंगे। अपने इर्द-गिर्द के परिकर को भी निहालकर देंगे। पैसा, औलाद, स्वास्थ्य, बड़प्पन को बुरे लोग भी अपनी बलबूते पर अर्जित कर लेते हैं, पर आदर्शों की दिशा में साहसपूर्वक चल पड़ना, मात्र उन्हीं के लिए संभव होता है, जिन पर भगवान की विशेष कृपा बरसती है, जिसे परम पिता कृपापूर्वक अपने उच्चस्तरीय प्राण का वह भाग प्रदान करते हैं, जिसके सहारे वानर से नर बनने का, नर से नारायण बनने का अवसर प्राप्त होता है।
अंधा सड़क के किनारे पर बैठा भीख माँगा करता और किसी प्रकार गुजर करता।
राह चलते एक पथिक ने अंधे के दुर्भाग्य को कोसा। बात अंधे ने भी सुन ली। बोला— “अभागा मैं अकेला ही नहीं, अन्य लोग भी हैं, जो आँखें होते हुए भी अपनी गतिविधियों का परिणाम नहीं सोचते और पग-पग पर ठोकरें खाते हैं।”
कई बार ऐसा असमंजस देखने को मिलता है, जिसमें प्रतिपादन और निष्कर्ष में जमीन-आसमान जैसा अंतर पाया जाता है। तब चौराहे पर खड़े व्यक्ति को सामान्य स्तर की बुद्धि के सहारे यह निर्णय करते नहीं बनता कि वह परस्पर विरोधी प्रतिपादनों और निष्कर्षों में से किसे स्वीकार और किसे अस्वीकार करे? उलझन उसे किंकर्त्तव्यविमूढ़ बनाकर रख देती है।
कर्म और उसका प्रतिफल समूचे धर्मशास्त्र, तत्त्वज्ञान, नीतिशास्त्र, विश्व-व्यवस्था का आधार माना जाता है। दंड-पुरस्कार की विधि-व्यवस्था ही सरकारें बनाती रहती हैं। स्वर्ग और नरक की संरचना भी इसी एक प्रयोजन के निमित्त बन पड़े हैं। दर्शनशास्त्र ने नैतिकता एवं सामाजिकता के पक्ष में लोक-मानस को ढालने के लिए इसी हेतु अनेकानेक तर्कों और तथ्यों का आश्रय लिया है। इसी आधार पर सम्मान और तिरस्कार का व्यवहार होते देखा गया है। यदि कर्मफल की मान्यता को निरस्त कर दिया जाए, तो उपरोक्त आधारों में से किसी की भी आवश्यकता या उपयोगिता नहीं रह जाती। मनुष्यों को मर्यादापालन और वर्जनाओं का अनुशासन अपनाने के लिए भी कर्मफल की मान्यता ही अंकुश लगाती और मार्गदर्शन करती है। इसे मानवी गरिमा का मेरुदंड कहा जाए तो भी अत्युक्ति न होगी।
इतने बड़े आधार को झुठला देने में एक अनगढ़ मान्यता महती भूमिका निभाती, सब कुछ चौपट करती देखी जाती है। वह है— अमुक देवता के दर्शन झाँकी कर लेने, अमुक जलाशय में डुबकी लगा लेने, अमुक कथा-वर्त्ता पढ़ या सुन लेने, अमुक खेल-खिलवाड़ स्तर के कर्मकांड पूरे कर लेने भर से पापकर्मों के प्रतिफल का नाश-निराकरण हो जाना। वर्तमान जन्म के ही नहीं, पिछले अनेक जन्मों के किए गए संचित पाप भी इन अत्यंत सस्ते क्रियाकलापों की चिह्नपूजा कर लेने भर से उड़न छू हो जाते हैं। इसके बाद नरक की कोई संभावना शेष नहीं रह जाती और स्वर्गलोक में अनायास ही जा पहुँचने का द्वारा खुल जाता है।
यह धारणा किसी स्थान या कृत्य की ओर आकर्षित करने के लिए बाल-प्रलोभन की तरह प्रस्तुत की गई हो, तो बात कुछ समझ में भी आती है। पर जब इसे वास्तविकता या विश्वस्त मान्यता के रूप में जोर देकर कहा जाने लगे, तो एक प्रकार से ऐसा लगता है कि विश्व-व्यवस्था के सारे उपक्रम को उलटकर ही देखा जा रहा है।
पापकर्मों के दंड से चुटकी बजाने जैसे खिलवाड़ों के आधार पर छुटकारा मिल सकता है तो इसकी बिलकुल सीधी प्रतिक्रिया यही सामने आती है कि पापकर्मों के आधार पर जो लाभ उठाए जाते रहते हैं, उनसे डरने— झिझकने जैसी कोई बात नहीं है। उनके दुष्परिणाम मिले ही, यह कोई निश्चित बात नहीं है। “शार्ट कट” मौजूद है। उस पगडंडी को अपनाकर विशालकाय भयंकर बीहड़ से क्षण भर में पार हुआ जा सकता है। जब दंडफल से छुटकारा पाने का इतना सरल उपाय निकल गया, तो फिर किसी को भी ऐसा कुछ नहीं कर गुजरना चाहिए, जिसमें लोक-लज्जा या भर्त्सना-प्रताड़ना आड़े आने का आगा-पीछा सोचना पड़ता है। यह मान्यता विशेषतया अनाचारियों के लिए मन की मुराद पूरी करने, कुकृत्य करने जैसे अलभ्य सौभाग्य देती दीख पड़ती है।
इनसे रोक-थाम की एक ही कारगर व्यवस्था युग-युगांतरों से चली आ रही थी कि अंतःकरण में यह विश्वास गहराई तक जमाया जाए कि कोई भी कुकृत्य अंतर्यामी की जानकारी से बचकर नहीं रह सकता। वह जानकारी सुनिश्चित परिणामों से भरी पूरी है। अनाचार अपने साथ दुष्परिणाम भी कसे-जकड़े रहता है। यही था वह भय, जो नर-पशु एवं नर-पिशाचों तक की दुष्प्र वृत्तियों पर अंकुश लगाता रहा है। उसी की प्रमुख भूमिका ने अनाचारों की रोक-थाम की है, साथ ही इस विश्वास को भी परिपक्व किया है कि सदाशयता अपनाने की प्रतिक्रिया स्वर्गोपम सुखद संभावनाएँ सामने लाती हैं। जिनने भी इन मान्यताओं को परिपक्व किया है, वस्तुतः उनने मानवी गरिमा को अक्षुण्ण बनाए रखने में असाधारण योगदान दिया है। उन्हें जितना भी सराहा जाए उतना ही कम है।
किंतु इस समूची नीतिमत्ता के दुर्ग को तो एक ही अणुबम से बिस्मार कर देने का प्रयत्न इन दिनों चल पड़ा है कि नगण्य-सा काम और राई-रत्ती जितना धन खरचने भर से अमुक कर्मकांडों के सहारे समस्त पापदंडों से छुटकारा पाया जा सकता है। इतना ही नहीं, जन्म-जन्मांतरों के, अनेक पीढ़ियों के पूर्वजों को भी सद्गति का अधिकारी बनाया जा सकता है। इतना सस्ता नुस्खा हाथ लग जाने के बाद कोई वज्र मूर्ख ही ऐसा बनेगा, जो दुष्कर्मों के माध्यम से तत्काल मिलने वाले अनेकानेक लाभों को उठाने के लिए आतुर न हो चले।
स्वर्गीय सुखद संभावनाओं को उपलब्ध करने के लिए तपश्चर्या स्तर की संयम-साधना, धर्म-धारणा और परमार्थपरायणता को अनिवार्य रूप से आवश्यक माना जाता रहा है। अब उस पर्वत शिखर पर नंगे पैरों चढ़ने की झंझट से सहज निवृत्ति सुझा दी गई है कि अमुक कर्मकांड संपन्न करने से वह स्वर्ग, अंधे के हाथ बटेर लगने से भी अधिक सरल हो गया है। जब स्वर्ग इतना सस्ता है; मोक्ष इतना सुगम है, तो फिर उपासना, साधना, आराधना जैसे पुण्य प्रयोजनों में अपने को नियोजित करने के लिए कोई क्यों तैयार हो?
इस 'रामनाम की लूट' वाली भ्रांति से जितना जल्दी उबरा जा सके, ठीक होगा। स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि, "यदि भगवान इसी भ्रांतिपूर्ण मान्यता के रूप में जिंदा रहेगा तो इसे समाप्त करने में हमें एक क्षण की देरी भी नहीं लगनी चाहिए। बोए-काटे का, देकर पाने का, साधना से ही सिद्धि का सिद्धांत जब तक व्यक्ति आत्मसात नहीं कर लेता, तब तक उसे सही अध्यात्म की कड़ुई, किंतु प्रामाणिक कुनैन खिलाते ही रहना पड़ेगा। यदि नया ईश्वर भी रचना पड़े तो इसके लिए तैयार होना पड़ेगा।"
बालक एडीसन को विज्ञान में बहुत रुचि थी। वह उस विषय में जानना और कुछ करना चाहता था। पर घर की स्थिति ऐसी न थी, जो पढ़ाई का खरच उठा सके, साथ ही पेट भी भरता रहे। उसकी अकेली माता ही घर चलाती थी।
एडीसन और उसकी माता ने सलाह की कि किसी वैज्ञानिक के यहाँ लड़के को रख दिया जाए। जहाँ वह उनके घर का काम भी करता रहे, पढ़ता भी रहे, वैज्ञानिक प्रयोगों का पर्यवेक्षण भी करता रहे। एडीसन की माता इस प्रयोजन के लिए लड़के को कितने ही वैज्ञानिकों के पास लेकर गई, पर किसी ने भी इस झंझट में पड़ना स्वीकार न किया।
अंत में एक वैज्ञानिक ने उसे दूसरे दिन लाने को कहा, ताकि वह उसकी मौलिक प्रतिभा को जाँच सके और वह यदि उपयुक्त हो तो उसे अपने यहाँ रख सके। माता दूसरे दिन नियत समय पर लड़के को लेकर पहुँची।
वैज्ञानिक ने लड़के को झाड़ू थमाते हुए कहा— "बच्चे इस कमरे को ठीक तरह झाड़ू लगाकर लाओ।" लड़के ने पूरा मनोयोग लगाया और न कमरे के फर्श को साफ किया, वरन दीवारों-छतों-फर्नीचर को इस सफाई और व्यवस्था से सजाया कि उसकी समग्र प्रतिभा उस छोटे काम में ही लगी दीख पड़ी।
परीक्षा में लड़का उत्तीर्ण हुआ। उसे वैज्ञानिक ने अपने घर रख लिया। छोटे-मोटे घरेलू कार्यों के अतिरिक्त उससे अधिकतर वैज्ञानिक कार्य ही कराते। दिलचस्पी और समझदारी का समन्वय हुआ तो उसके सभी क्रिया-कलाप बढ़िया स्तर के होने लगे। वैज्ञानिक-क्षेत्र में भी उसने असाधारण वरीयता प्राप्त कर ली। बड़ा होने पर उनने अनेकों वैज्ञानिक आविष्कार किए और यश के साथ धन भी कमाया।
एक अल्प वय की बालिका अपनी बड़ी बहिन से इस बात के लिए जिद कर रही थी कि वह उसे हंटर से पीटे। बच्चों में कहासुनी चल रही थी, कि उनके पिता आ गए। उन्होंने दोनों बालिकाओं का सिर सहलाते हुए कहासुनी का कारण पूछा। बड़ी बहिन ने सारी बात बयान कर दी। आश्चर्य से पिता ने छोटी बच्ची की ओर देखकर कहा— "क्यों हैरि! बच्चे तो मार खाने के नाम पर घबड़ाते हैं। तू क्यों पिटना चाहती है"? वह भी हंटर से।" उसने धीरे से कहा— "दरअसल कल मैंने देखा कि एक गोरा आदमी एक काले आदमी को लगातार पीटे जा रहा है। छोटे-छोटे बच्चों की भी बेमुरब्बत पिटाई कर रहा है। मैं यह देखना चाहती थी कि हंटर से पिटने पर कैसा अनुभव होता है"?
पिता ने बालिका को गोद में उठाते हुए कहा— ”ओह! तू उन काले लोगों की पीड़ा अनुभव करना चाहती थी। प्रभु की कृपा से अवश्य कर सकेगी।” यह बालिका अपने पिता के द्वारा किए गए सुसंस्कारों के अमृतवर्षण के बीच पली बढ़ी। उच्च शिक्षा प्राप्त की और पिता द्वारा दलितों, निर्धनों के बच्चों के कल्याण के लिए चलाए जा रहे कार्यों में सहयोगिनी बनी। इन्हीं दिनों वह पिता की अनुज्ञा से 'केल्विन ई. स्टो' के साथ दाम्पत्य-सूत्र में बँधी।
अब वे दोनों बर्नसविक में आ बसे। कभी की हैरि अब हैरियट स्टो थी। यहाँ दास-दासियों के नारकीय जीवन को निकट से देखने— अनुभव करने का अवसर मिला। बीती-बिसरी बचपन की यादें पुनः मन को मथने लगीं। सचमुच नीग्रो लोग पशु से भी गया-गुजरा जीवन जीने के लिए विवश थे। जानवरों जैसा उन्हें बेचा-खरीदा जाता। छोटे-छोटे दुधमुँहे बच्चे को माँ से, नवविवाहिता पत्नी को पति से निर्दयतापूर्वक अलगकर उन्हें गुलामी के लिए मजबूर करना सामान्य बातें थीं। यही क्यों? घोड़ों और नीग्रो लोगों में घोड़ा होना सौभाग्य का चिह्न था, बजाय नीग्रो होने के। हाय! मनुष्य की दुरावस्था मनुष्य ही कर रहा है। उसका दिल रो उठा। क्या करे? अनीतियाँ, अत्याचार यदि एक छोटे घेरे में हों तो बाह्य प्रयास प्रभावी हो सकते हैं। किंतु जब इनका दायरा समूचे समाज को घेरे में ले-ले। यही नहीं, इन्हें प्रथा-प्रचलन का रूप देकर समाजीकरण कर दिया जाए तब? एक ही चारा बचता है— विचार-क्रांति। मर्मस्पर्शी साहित्य के द्वारा मनुष्य के भीतर सोई पड़ी मनुष्यता को झकझोरना, उसे जागने के लिए विवश करना। समाज में अब तक हुए महत्त्वपूर्ण परिवर्तन इसी की सत्यता को प्रामाणिक ठहराते हैं।
वह भी कुछ ऐसा ही साहित्य लिखेगी, जो मानव मन को उलटकर रख दें। अंदर की बेचैनी संकल्प में बदली और रविवार की एक सुबह, जब वह गिरजाघर में धर्मोपदेश सुन रही थी, “शुभ काम में देर नहीं करनी चाहिए”, कि परिपक्व हुआ संकल्प क्रिया में बदलने लगा और वहीं बैठे-बैठे उन्होंने पहला अध्याय लिख डाला। घर आकर जब बच्चों और पति को सुनाया, तो उनकी आँखें छलछला उठीं।
उन दिनों मिंस्टो बीमार थे। सारे घर की जिम्मेदारी उन्हीं पर थी। साधनहीनता की स्थिति में परिवार को संभालना कितना कठिन है, इसे वे ही अनुभव कर सकते हैं; जिन्हें कभी ऐसे अवसर पड़े हों। खाना पकाने, कपड़े धोने-सीने, मेहनत-मजदूरी करके अर्थव्यवस्था जुटाने तक के सारे काम उन्हीं को करने पड़ते और लेखन। यह रुका नहीं, रुके भी कैसे? इन दिनों की मनःस्थिति को एक सहेली को लिखे गए पत्र में उन्होंने स्वयं उद्घाटित किया था। उन्होंने लिखा— “जब भूख-प्यास को बुझाए बिना चैन नहीं मिलता, तो अंतर की संवेदनाएँ भला कैसे चैन लेने देंगी। आजकल भी मैंने नीग्रो लोगों के पास जाकर उनकी सेवा-सहायता करना, रात्रि में सबके सो जाने पर उनकी करुण कथा लिखना बंद नहीं किया है। यद्यपि आजकल ऐसे दिन भी बीत जाते हैं, जबकि रोटी का एक कौर नहीं नसीब होता, पर मेरी अपनी दिनचर्या मुझे अपार खुशी देती है। सही है, सुधरी हुई मनःस्थिति विषम परिस्थितियों में भी आह्लाद को समेट-बटोरकर ले आती है।”
भावनाओं को मथने वाली यह कृति ‘इरा’ नामक पत्रिका में धारावाहिक प्रकाशित होने के बाद जिस दिन पुस्तकाकार में प्रकाशित हुई। उसी दिन उसकी 3000 प्रतियाँ बिक गईं। दो वर्षों के अंदर ही उसके 120 संस्करण छापने पड़े और उसकी तीन करोड़ प्रतियाँ बिकीं। विश्व की अनेक भाषाओं में इसका अनुवाद हुआ। इस प्राभाविकता का कारण दास नीग्रो वाली यंत्रणा का ऐसा मर्मस्पर्शी चित्रण है कि पाषाण हृदय से भी संवेदनशीलता का झरना फूटे बिना न रहे।
‘टाम काका की कुटिया’ नाम से छपी इस पुस्तक ने तत्कालीन सामान्य लोगों पर विलक्षण प्रभाव डाला। बोझा ढोते समय मजदूर परस्पर चर्चा करते ‘भाई तुमने ‘टाम काका की कुटिया, पढ़ी है? बड़ी मार्मिक पुस्तक है। पढ़कर दिल दहल जाता है। मुहल्ले की औरतें आपस में चर्चा करतीं— "बहन! जरा उस पुस्तक को पढ़कर देखना, बड़ी हृदयवेधक है। धीरे-धीरे यह चर्चा बढ़ती गई और एक दिन सचमुच हजारों-लाखों व्यक्ति गुलामीप्रथा के विरोधी बन गए। अमेरिका में क्रांति उठ खड़ी हुई, जिसने इस नृशंसप्रथा को जड़ से उखाड़ फेंकने का काम किया।
करोड़ों दिलों को बदलने वाली इस कृति की विश्वकर्मा 'श्रीमती हैरियट स्टो' ही थी। दिखने में अति सामान्य नाटे कद की घरेलू महिला। पर इस सामान्य कलेवर में संवेदना व अनुभूति का सागर छुपा था। उन्होंने कितने भावुक हृदय से दासों की पीड़ा को अनुभव किया होगा, जिसकी अभिव्यक्ति ने समाज की संरचना ही बदल डाली। राष्ट्रपति लिंकन जब उनसे मिले, तो कद-काठी देखकर वह सहज विश्वास नहीं कर पाए कि यह वही महिला है, जिसने क्रांति खड़ी कर दी। पर सच्चाई तो सच्चाई रहती है।
मानवीय यंत्रणा क्या आज कम हुई है? नहीं! शायद उस समय से भी अधिक। दूर नहीं, हमारे अड़ोस-पड़ोस में। दासप्रथा न सही तो दहेजप्रथा; खरीद-फरोख्त चालू है। अब तो पहले से भी अधिक विडंबना यह है कि सफेदपोश डकैतों के चंगुल में फंसी लड़की को फिरौती पर फिरौती दिए जाने के बाद भी मरने पर विवश होना पड़ता है। यदि मरी नहीं तो सारा जीवन आँचल से मुँह छुपाकर रोते-सिसकते बीतता है। और न जाने ऐसी कितनी सामाजिक मान्यताप्राप्त प्रथाएँ हैं, जो रोज हँसती-खेलती जिंदगियाँ तबाह कर रही हैं। मानवता की छाती फाड़कर खून पीते हुए ठहाके लगा रही हैं। हैरियट स्टो तो सारा जीवन संघर्ष करते हुए चल बसी। पर इस आशा के साथ कि हम सब धरती के कोने-कोने में बसे मनुष्य उसके काम को आगे बढ़ाएँगे, समाज का नवसृजन करेंगे।
फिर हम निकम्मे-निठल्ले क्यों? कायर-पलायनवादी क्यों? संभवतः इसलिए; क्योंकि हमारे अंदर वह अनुभूति नहीं जगी; मानवीयता उठ खड़ी नहीं हुई। यह जागृत और सक्रिय हो सके, इसके लिए स्वयं को युग की भावधारा से जोड़ना होगा। महाकाल की उस व्यथा, पीड़ा, बेचैनी को अनुभव करना होगा, जो युग साहित्य में सँजोई जा रही है।
फार्म-4
1- प्रकाशक स्थान -मथुरा
2- प्रकाशन अवधि-मासिक
3- मुद्रक का नाम- मृत्युँजय शर्मा
(क्या भारत का नागरिक है)-भारतीय
पता-जन जागरण प्रेस
वृन्दावन रोड, मथुरा
4- प्रकाशक का नाम मृत्युँजय शर्मा
(क्या भारत का नागरिक है)-भारतीय
पता- अखण्ड-ज्योति संस्थान
मथुरा
5- सम्पादक का नाम- माता भगवती देवी शर्मा
(क्या भारत का नागरिक है)-भारतीय
पता- शान्ति-कुँज हरिद्वार
6- उन व्यक्तियों के नाम व पते जो समाचार-पत्र के स्वामी हों तथा जो समस्त पूँजी के एक प्रतिशत से अधिक के साझेदार या हिस्सेदार हों।
अखण्ड-ज्योति संस्थान मथुरा
मैं मृत्युँजय शर्मा एतद् द्वारा घोषित करता हूँ कि अधिकतम जानकारी एवं विश्वास के अनुसार ऊपर दिये गये विवरण सत्य हैं।
प्रकाशक के हस्ताक्षर
दि. 28-2-90-मृत्युँजय शर्मा
फार्म-4
1- प्रकाशक स्थान -मथुरा
2- प्रकाशन अवधि-मासिक
3- मुद्रक का नाम- मृत्युँजय शर्मा
(क्या भारत का नागरिक है)-भारतीय
पता-जन जागरण प्रेस
वृन्दावन रोड, मथुरा
4- प्रकाशक का नाम मृत्युँजय शर्मा
(क्या भारत का नागरिक है)-भारतीय
पता- अखण्ड-ज्योति संस्थान
मथुरा
5- सम्पादक का नाम- माता भगवती देवी शर्मा
(क्या भारत का नागरिक है)-भारतीय
पता- शान्ति-कुँज हरिद्वार
6- उन व्यक्तियों के नाम व पते जो समाचार-पत्र के स्वामी हों तथा जो समस्त पूँजी के एक प्रतिशत से अधिक के साझेदार या हिस्सेदार हों।
अखण्ड-ज्योति संस्थान मथुरा
मैं मृत्युँजय शर्मा एतद् द्वारा घोषित करता हूँ कि अधिकतम जानकारी एवं विश्वास के अनुसार ऊपर दिये गये विवरण सत्य हैं।
प्रकाशक के हस्ताक्षर
दि. 28-2-90-मृत्युँजय शर्मा
एक व्यक्ति का कंबल उसकी लंबाई से कुछ छोटा पड़ता था। जाड़े के दिनों में कभी उसका सिर खुल जाता, कभी पैर। कोई ऐसा उपाय न सूझता था कि सारा शरीर ढँक सके।
एक समझदार ने सुझाया कि भाई आप अपने पैर थोड़े सिकोड़ लिया करो। इतने भर से समस्या का समाधान हो गया।
साधन कम पड़ते हों तो अपनी आवश्यकता घटाई जा सकती है।
सुख-सुविधाओं की, समृद्धि और प्रगति की आकांक्षा सभी करते हैं। पर यह भूल जाते हैं कि बोने और खाद-पानी देने के उपरांत ही अच्छी फसल काटने और धन-धान्य से कोठे भरने का अवसर मिलता है। सत्प्रवृत्तियाँ ही समृद्धि और प्रगति के रूप में फलित होती हैं और प्रसन्नता भरे वातावरण का सृजन करती है।
दुर्बुद्धिजन्य-दुष्प्रवृत्तियों को अपनाकर कभी-कभी लुटेरे, उठाईगिरे भी जेब भारी कर लेते हैं, पर स्पष्ट है कि अनीतिजन्य उपार्जन न तो देर तक ठहरता है और न सुखद संभावनाओं का दर्शन होने देता है। गंदा पानी, सड़ी नालियों में बहते-बहते अंततः दुर्गंध और गंदगी, बीमारी का ही उद्भव करता है। अनीति की कमाई कुटेवों, कुकर्मों, बीमारी, मुकदमेबाजी, विग्रहों आदि के माध्यम से न जाने कहाँ-से कहा चली जाती है। कहीं भी जेब कटों के महल बनते नहीं देखे जाते। बन भी जायं, तो वे बालू की भीति की तरह ढह जाते हैं। उस कमाई का जो भी उपयोग, उपभोग करता है, ओलों की तरह गलता और माचिस की तरह जला हुआ आत्मप्रताड़ना और लोक-भर्त्सना का भाजन बनता है। कुमार्ग अपनाने वाले जल्दी और सरलतापूर्वक बहुत लाभ कमाने के लिए आतुर रहते हैं। जोखिम भी उठाते हैं, पर अंत में दुर्दशा जाल में फँसी चिड़ियों और मछलियों जैसी ही होती है। आँख मूँदकर चासनी के कड़ाव में घुस पड़ने वाली मक्खी बेमौत मरती है। अपनी मूर्खता पर पछताती और देखने वालों की भर्त्सना भी सहती है। जल्दी-जल्दी बहुत कमाने और उसके बलबूते गुलछर्रे उड़ाने की कल्पनाएँ करते ओर योजनाएँ बनाते रहने वाले अंततः घाटे में ही रहते है।
समझदारों को नीति-निष्ठा अपनाने के सत्परिणामों को ध्यान में रखना चाहिए। संसार में जितने भी अनुकरणीय, अभिनंदनीय व्यक्तित्व वाले सज्जन प्रकाश में आए हैं, उन सभी को अनिवार्य रूप से अपने को “सादा जीवन-उच्चविचार” की रीति-नीति अपनानी पड़ी है। प्रामाणिकता और प्रखरता की दुहरी कसौटियों पर खरा उतरना पड़ा है। सोने को तपाए जाने और काले पत्थर पर घिसे जाने के उपरांत ही मूल्यवान होने की मान्यता मिलती है। खोटे सिक्के तो जहाँ कहीं पहुँचते हैं, वहीं दुत्कारे जाते हैं।
अच्छा हो, हम औसत नागरिक स्तर का निर्वाह अपनाएँ। मिल-बाँटकर खाएँ और हँसती-हँसाती जिंदगी बिताएँ। “जियो और जीने दो” का यही राजमार्ग है। मनुष्य की मौलिक आवश्यकताएँ इतनी अधिक नहीं हैं कि उनकी पूर्ति मेहनत और ईमानदारी की कमाई से सरलतापूर्वक संभव न हो सके। इंद्र जैसा वैभव और कुबेर जितनी संपत्ति-साधन बटोरने के लिए ही उन्मत्त हुआ, व्यक्ति कुकर्मों पर उतारू होता है और
नीति-अनीति का विचार किए बिना कुछ भी करने पर उतारू होता है। यदि इस उन्माद पर अंकुश किया जा सके, तो विलासिता, तृष्णा, संचय एवं अपव्यय की वह ललक भी काबू में आ सकती है, जिसके कारण दुष्ट−चिंतन और भ्रष्ट आचरण अपनाए बिना काम नहीं चलता।
जिनका उपार्जन अधिक है, उनके लिए भलमनसाहत का एक ही मार्ग है कि बचत को लोक-मंगल के लिए, सत्प्रयोजनों के लिए नियोजित करने की योजना हाथों-हाथ बनती रहे। अपव्यय की होली जलाने की अपेक्षा उसे गिरों को उठाने और उठों को उछालने के निमित्त खर्च करते रहने की बुद्धिमता अपनाएँ। शांति से रहने और प्रगति का वातावरण बनाने के लिए यही उचित है और यही आवश्यक।
श्री भगवानदीन को बालशिक्षण में बड़ी रुचि थी, उनका प्रयत्न था कि भावी पीढ़ी विकसित व्यक्तित्व वाली बने। इसी प्रयोजन में उनने अपना समूचा जीवन खपाने का निश्चय किया। वे आजीवन अविवाहित रहे। निजी पाठशाला चलाई और विभिन्न शालाओं में जाकर बालकों और समग्र उत्कर्षों की शिक्षा देते रहे। उनके एक निष्ठाकार्य को देखकर, उन्हें महात्मा भगवानदीन के नाम से पुकारा जाता था। यद्यपि वे वस्त्र साधारण ही पहनते थे।
चिंतित मुद्रा में बैठे पिता को युवा पुत्री ने टोका— “आप कुछ परेशान से लग रहे हैं?”
“परेशान तो नहीं, पर कुछ सोच जरूर रहा हूँ। “क्या”?
"यही की अपनी कमाई किसे दूँ"?
“कमाई और आपकी! आपने तो अपने पास कुछ रखा ही नहीं, जो कुछ था सो समाज को दे दिया।”
“तो कमाई क्या रुपयों, पैसों, जमीन-जायदाद तक ही सीमित है। इसके न रहने पर भी मेरे पास कुछ है, जिसे में अपनी विरासत में देना चाहता हूँ” — वृद्ध का स्वर शांत था।
“तो दे दीजिए”। “किसे?”
“मुझे। मैं ही आपकी एक मात्र बेटी हूँ। आपकी संपत्ति की उत्तराधिकारिणी।”
“बेटी भर होने से कोई उत्तराधिकारिणी नहीं बन जाता। उसमें सँभालने की योग्यता भी चाहिए”।
“योग्यता जितनी है, उससे अधिक के लिए मन-प्राण से प्रयास करूँगी।”
“तो सुन बेटी! सारे जीवन मैंने मानवीयता के लिए दर्द कमाया हैं, उसके लिए सब कुछ होम देने की कसक कमाई है। इस सक्रियता से मुझे लोगों ने अपना हमदर्द माना, प्रामाणिक समझा है। यही है मेरी कमाई, मेरा वैभव मेरा, सब कुछ ले सकेगी तू”— पिता का स्वर भीगा था।
“हाँ पिता! ले सकूँगी” पुत्री ने पिता का अंतर्मन पढ़ते हुए कहा।
“फिर तुझे सब ओर से मुँह फेरकर यहाँ तक कि विवाह की झंझटों से उबरकर “मुक्ति सेना” का काम संभालना होगा। अपने को ऐसे छायादार वृक्ष के रूप में। अपने को ऐसे छायादार वृक्ष के रूप में विकसित करना होगा, जिसकी शीतल छाया में असंख्यों जीवन के तापों से त्राण पा सकें। यही मेरी विरासत है।”
“आपकी विरासत पाकर कृतार्थ हुई। अपना समूचा जीवन आपके आदर्शों के लिए खपा दूँगी” ये स्वर थे इवेजलीन बूथ के, जो अपने पिता “मुक्ति सेना के संस्थापक विलियम बूथ” की अनूठी विरासत की अधिकारिणी बनी। इसके लिए उन्होंने पर्याप्त ग्रहणशीलता अर्जित की थी। उसका अंतराल सदाचार, सेवापरायण स्वाभिमान व लोक-सेवारूपी धातुओं के मिश्रण से ही गढ़ा गया था। मानव की दीनता, पीड़ा, कराह को देखकर इससे आँखें फेर लेना उसके बूते की बात नहीं थी। अपनी इसी भावना व कर्मठता के संयुक्त प्रभाव से वह लोक-जीवन के घावों पर मरहमयथा समय लगाने वाले संगठन "मुक्ति सेना" की प्रधान बनी। साथ ही अपनी समूची शक्ति प्रतिभा, लगन और उत्साह के साथ मानवमुक्ति के इस रचनात्मक अभियान में जुट गई।
जिन दिनों व "मुक्ति सेना" की कप्तान बनी थी। इस रचनात्मक अभियान के सक्रिय सहयोगी मुट्ठी भर लोग थे। उसने घूम-घूमकर देश की युवा पीढ़ी का ध्यान आकर्षित किया। जगह-जगह जाती और प्रत्येक से कहती— "क्या तुम अपने को मनुष्य समझते हो? यदि हाँ तो मनुष्य को इस तरह बिलखते हो? यदि हाँ तो मनुष्य को इस तरह बिलखते, दुराचार-दुर्गुणों, तरह-तरह के दोषों से घिरे अपने ही बंधुओं को तड़पड़ाते-छटपटाते देखकर व्याकुलता क्यों नहीं उत्पन्न होती? यह सब देखकर भी जिसमें पीड़ा और पतन से जूझने की हुँकार नहीं उठती वह किसी भी कीमत पर मनुष्य नहीं। वह या तो हिंसक पशु है या मुरदा।" इवेजलीन का यह कथन सुनकर युवा पीढ़ी का रक्त गरम हो उठा। उसकी इस पुकार पर मुक्ति सैनिकों की संख्या कुछ ही वर्षों में तीस लाख तक जा पहुँची। इतने बड़े विशाल संगठन का नेतृत्त्व करना, उन्हें नियंत्रण में रखना, उन्हें दिशा देना कोई आसान बात न थी। इस जटिल समीकरण को युवा ने अपने व्यक्तित्व के माध्यम से आसानी से हल कर लिया। यद्यपि अनेकों कठिनाइयाँ आई। धनपतियों ने निरुत्साहित किया, सहयोग की जगह दुत्कार मिली। वे समझते थे कि यह दल उन्हें बरबाद करने के लिए गठित किया गया है। इस वर्ग द्वारा खड़ी की गई बाधाओं को इवा अपने विश्वस्त साथियों के साथ पर करती चली गई।
धीर-धीरे लोग इसके उद्देश्य व कार्यक्रमों को समझने लगे। "मुक्ति सेना" के सदस्य दुःखी व पीड़ित मानवता को अपना आराध्य तो मानते ही थे, पतित और गिरे लोग भी उनके अपने सेवा-क्षेत्र में थे। उन दिनों कैदियों को बड़ी बुरी दुर्दशा में रहना पड़ता था। जानवरों को रहने वाली कोठरियों से भी छोटे तंग और गंदे कमरों में अपराधी रखे जाते। इवा ने लोगों को समझाना शुरू किया कि आखिर वे भी मनुष्य हैं। परिस्थितियों तथा मानवीय कमजोरियों के वशीभूत हो आज अपने स्तर से गिर गए हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि उनके साथ जानवरों से भी बदतर व्यवहार किया जाए। मनुष्य के भीतर रहने वाली सद्गुणों की मौलिकता अभी भी उनमें है। यदि उसे सद्व्यवहार व प्रेमपूर्ण बर्ताव से जगाया जा सका तो, वे एक अच्छे नागरिक बन सकते हैं। यह मान्यता सभी को अच्छी लगी और “ब्राइटर डे लीग” नामक संस्था के माध्यम से उन्होंने कारागृहों की व्यवस्था पलटने में सफलता हासिल कर ली।
इसी प्रकार अवांछित मातृत्व की जटिल समस्या थी। आधुनिक सभ्यता की देनस्वरूप इन भटकी युवतियों को न तो समाज में आदर मिल पाता है न घर में। यही बात उनकी संतानों पर लागू होती। अपना सम्मान, प्रतिष्ठा व भविष्य खो चुकने वाली इन महिलाओं को इस मार्ग से लौट पड़ने का कोई अवसर न मिलता। और वे उसी अंधी सड़क पर दौड़ जातीं। इससे समाज को अनैतिकता व कामुकता के ज्वार से हानि उठानी पड़ती। उन्होंने इस समस्या के कारणों का अध्ययन किया और ऐसी महिलाओं और बच्चों के लिए शरणगृह स्थापित करने वाली एक संस्था “आउट आंव लव लीग” खोली। इसके द्वारा उन्हें सम्मानपूर्ण जिंदगी बिताने के लिए मार्गदर्शन व सहयोग दिया जाता।
विकसित सभ्यता के साथ इसके अनेकों दुष्प्रभाव भी समाज में फैलते जा रहे हैं। तनाव, अभाव, पारिवारिक विग्रह, गृहकलह आदि अनेकों कारणों से जीवन की शतरंज में बाजी हारे लोगों के सम्मुख अपनी जिंदगी समाप्त कर लेने के अलावा कोई चारा नहीं रहता। परिणामस्वरूप आत्महत्या करने वालों की संख्या का बढ़ना स्वाभाविक ही था। आत्महत्या का एक मात्र कारण मनोबल का अभाव कहा जा सकता है। इवा बूथ ने ऐसे लोगों के लिए “सुसाइड ब्यूरो” की स्थापना की। इसके द्वारा ऐसे व्यक्तियों को भगवान पर विश्वास करने की प्रेरणा दी जाती। सही माने में सभी परिस्थितियों में यही मनुष्य को संबल दे सकता है। इस आस्था ने अनेकों को आत्महिंसा से बचाकर जीवन की मधुरता का रसास्वादन कराया।
अपने तीस लाख साथी सहयोगियों को साथ रखकर इवेजलीन बूथ ने मानवता के स्वरूप को उज्ज्वल, प्रखर बनाने वाली ऐसी अनेकों गतिविधियाँ चलाई। जिससे समाज में सत्प्रवृत्तियाँ मुसकाई और दुष्प्रवृत्तियां मुरझाई। इन सफलताओं ने मुक्ति सेना को देशव्यापी-से विश्वव्यापी बना दिया। इंग्लैंड, अमेरिका, नार्वे, फ्राँस, डेनमार्क, स्वीडन आदि देशों में इसकी शाखाएँ कार्यरत हुई। मुक्ति सेना अपने सदस्यों के सहयोग व अनुदान से विश्व के किसी भी कोने में त्रस्त मानवता के लिए योगदान ले हाजिर होती। महायुद्ध में जापान और जर्मनी से लेकर भारत के अकाल तक "मुक्ति सेना" के सदस्यों द्वारा उत्साह व
सेवा-भावना का परिचय देना इवेजलीन बूथ की भावनाशीलता कर्मठता के प्रभाव का परिचायक था।
वस्तुतः बूथ ने सही मायने में पिता की दी हुई विरासत को सार्थक बनाया। पिछड़ों को उठाना, समस्त मानव जाति के उत्थान के लिए आत्मशील होना ही तो अध्यात्म है। यदि ऐसी अनेकों बूथ आज सक्रिय हो जाएँ तो “इक्कीसवीं सदी— नारी सदी” का उद्देश्य निश्चित ही सार्थक होगा।
स्वावलंबन कर्मठता के द्वारा इसमें प्राण-प्रतिष्ठा की जा सके तो इसके द्वारा अनेकों का उद्धार संभव है। भारत के गाँवों-शहरों में निवास करने वाली महिलाओं के समक्ष इवेजलीन बूथ का रास्ता खुला है। यदि उनमें अपने को समझदारों की श्रेणी में गिनने वाली खुद विकसित होकर दूसरों को विकसित करने का सूत्र समझ सकें तो नारी की महानता स्थापित हुए बिना न रहे। इस रहस्य को समझें और अपनाएँ।
भूतकाल कैसा भी क्यों न रहा हो, वह चला गया। अब उसके लौटने की कोई आशा या संभावना नहीं। अधिक-से-अधिक यह हो सकता है कि इन स्मृतियों से शिक्षा ग्रहण की जाए। जो भूलें हुई हैं, उनसे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि क्या करना चाहिए था और उसके स्थान पर क्या बन पड़ा? जो भूलें हुई हैं, उनको दुहराया न जाए। जो नहीं किया गया था, वह वैसा कोई दूसरा अवसर आने पर करने के लिए मानस बनाया जाए। यह भी हो सकता है कि गलती का प्रायश्चित किया जाए। जिसके साथ कोई दुर्व्यवहार हुआ है, उसकी भरपाई करके अथवा संतोष दे सकने वाले दूसरे प्रयत्न करके ऐसा कुछ किया जाए कि उत्पन्न हुए रोष का निराकरण किया जाए।
पिछला घटनाक्रम लौट तो सकता है, पर यह नहीं हो सकता कि उस घटना को नकारा जाए या अपनी ओर से भूल जाने पर यह सोच लिया जाए कि दूसरों ने भी उसे भुला दिया होगा। मनुष्य का स्वभाव है कि गलती को स्मरण रखता है। बुराई के प्रतिशोध के लिए योजना बनाता है। क्षमा करना या गलती की उपेक्षा कर देना, किसी-किसी उदारचेता से ही बन पड़ता है। गलती भले ही नासमझी से हुई हो, पर उसके संबंध में समझा यह जाता है कि वह द्वेषवश किया गया है। उसका उद्देश्य हानि पहुँचाना था।
औसत आदमी सामान्यतया ऐसी ही मान्यता बनाते हैं। जबकि अपनी ओर से सोचा जाता है जिसे खुद ने भूल माना है, उसे दूसरों ने भी वैसा ही समझा होगा। इस गलतफहमी के बीच ही बन पड़ी भूलें दूसरे पक्ष द्वारा द्वेष मान ली जाती हैं और उसका प्रतिशोध-बदला लेकर ही किया जाता है। कई बार तो ऐसी कटु स्मृतियाँ लंबे समय तक बनाए रखी जाती हैं और उसका बढ़-चढ़कर बदला लिया जाता है। पिछली भूलों को अनहोना या अनदेखा तो नहीं किया जा सकता पर इतना अवश्य हो सकता है कि भूल को स्वीकार कर लें। भविष्य में वैसा न करने या क्षतिपूर्ति का कोई दूसरा उपाय खोजकर काम चला लें।
अपने आप के प्रति की गई भूल का एक ही उपाय है कि वैसा कुछ दुबारा न करने के लिए पक्का मन बना लिया जाए। यदि यह उलट-पलट न बन पड़े तो उस भूल की चर्चा करके अपना मन हलका किया जा सकता है। यदि किसी के साथ नेकी की गई है तो उसकी चर्चा करने पर अपना अहंकार प्रकट होता है और दूसरा अपना अपमान समझता है। ऐसी दशा में उसे भूल जाना ही उचित है। उदारता हर इंसान का फर्ज है। इसलिए किसी के साथ किए गए उदार व्यवहार को मात्र कर्त्तव्यपालन के और कुछ नहीं समझना चाहिए। बार-बार तो ऐसे ही प्रसंगों का जिक्र किया जा सकता है; जिनमें दूसरों ने अपने साथ कोई असाधारण भलाई की हो।
जिनसे मात्र घटनाओं का ही स्मरण हो, उन्हें भूलने का ही प्रयत्न करना चाहिए। स्वप्नों को याद करते रहना निरर्थक है। उनसे किन्हीं भावनाओं का उत्तेजन भर हो सकता है। समय बेकार जाता है। इसलिए पिछले दिन बन पड़ी निरर्थक घटनाओं को स्मरण करते रहना निरर्थक ही सिद्ध होता है।
वृद्धा व्यक्ति प्रायः पिछली घटनाओं को ही याद करते रहते हैं, क्योंकि वही उनकी संचित संपदा है। यद्यपि उनसे निरर्थक भावनाओं को उत्तेजित करने के अतिरिक्त और कोई लाभ नहीं मिलता।
भविष्य की कल्पनाओं-भूतकाल की घटनाओं को याद रखना निरुद्देश्य है, निरर्थक है। अपने हाथ में केवल वर्तमान है। इसी का श्रेष्ठतम् सदुपयोग करना बुद्धिमानी है। खाली मस्तिष्क जब कभी हो, तब भूत या भविष्य की कल्पनाएँ करते रहने की अपेक्षा यही अच्छा है कि वर्तमान के श्रेष्ठतम उपयोग की बात सोची जाए और संभव हो तो वैसा ही किया भी जाए। किसी ने सही कहा है कि बीता हुआ कल कैंसिल्ड चैक है, आने वाला कल प्रांमिसरी नोट है, किंतु वर्तमान तो पूरा नकद (रेडी कैश) है। यदि इसी का सदुपयोग हो सके तो निश्चय ही प्रगति-पथ पर निश्चित हो बढ़ा जा सकता है।
भूतकाल कैसा भी क्यों न रहा हो, वह चला गया। अब उसके लौटने की कोई आशा या संभावना नहीं। अधिक-से-अधिक यह हो सकता है कि इन स्मृतियों से शिक्षा ग्रहण की जाए। जो भूलें हुई हैं, उनसे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि क्या करना चाहिए था और उसके स्थान पर क्या बन पड़ा? जो भूलें हुई हैं, उनको दुहराया न जाए। जो नहीं किया गया था, वह वैसा कोई दूसरा अवसर आने पर करने के लिए मानस बनाया जाए। यह भी हो सकता है कि गलती का प्रायश्चित किया जाए। जिसके साथ कोई दुर्व्यवहार हुआ है, उसकी भरपाई करके अथवा संतोष दे सकने वाले दूसरे प्रयत्न करके ऐसा कुछ किया जाए कि उत्पन्न हुए रोष का निराकरण किया जाए।
पिछला घटनाक्रम लौट तो सकता है, पर यह नहीं हो सकता कि उस घटना को नकारा जाए या अपनी ओर से भूल जाने पर यह सोच लिया जाए कि दूसरों ने भी उसे भुला दिया होगा। मनुष्य का स्वभाव है कि गलती को स्मरण रखता है। बुराई के प्रतिशोध के लिए योजना बनाता है। क्षमा करना या गलती की उपेक्षा कर देना, किसी-किसी उदारचेता से ही बन पड़ता है। गलती भले ही नासमझी से हुई हो, पर उसके संबंध में समझा यह जाता है कि वह द्वेषवश किया गया है। उसका उद्देश्य हानि पहुँचाना था।
औसत आदमी सामान्यतया ऐसी ही मान्यता बनाते हैं। जबकि अपनी ओर से सोचा जाता है जिसे खुद ने भूल माना है, उसे दूसरों ने भी वैसा ही समझा होगा। इस गलतफहमी के बीच ही बन पड़ी भूलें दूसरे पक्ष द्वारा द्वेष मान ली जाती हैं और उसका प्रतिशोध-बदला लेकर ही किया जाता है। कई बार तो ऐसी कटु स्मृतियाँ लंबे समय तक बनाए रखी जाती हैं और उसका बढ़-चढ़कर बदला लिया जाता है। पिछली भूलों को अनहोना या अनदेखा तो नहीं किया जा सकता पर इतना अवश्य हो सकता है कि भूल को स्वीकार कर लें। भविष्य में वैसा न करने या क्षतिपूर्ति का कोई दूसरा उपाय खोजकर काम चला लें।
अपने आप के प्रति की गई भूल का एक ही उपाय है कि वैसा कुछ दुबारा न करने के लिए पक्का मन बना लिया जाए। यदि यह उलट-पलट न बन पड़े तो उस भूल की चर्चा करके अपना मन हलका किया जा सकता है। यदि किसी के साथ नेकी की गई है तो उसकी चर्चा करने पर अपना अहंकार प्रकट होता है और दूसरा अपना अपमान समझता है। ऐसी दशा में उसे भूल जाना ही उचित है। उदारता हर इंसान का फर्ज है। इसलिए किसी के साथ किए गए उदार व्यवहार को मात्र कर्त्तव्यपालन के और कुछ नहीं समझना चाहिए। बार-बार तो ऐसे ही प्रसंगों का जिक्र किया जा सकता है; जिनमें दूसरों ने अपने साथ कोई असाधारण भलाई की हो।
जिनसे मात्र घटनाओं का ही स्मरण हो, उन्हें भूलने का ही प्रयत्न करना चाहिए। स्वप्नों को याद करते रहना निरर्थक है। उनसे किन्हीं भावनाओं का उत्तेजन भर हो सकता है। समय बेकार जाता है। इसलिए पिछले दिन बन पड़ी निरर्थक घटनाओं को स्मरण करते रहना निरर्थक ही सिद्ध होता है।
वृद्धा व्यक्ति प्रायः पिछली घटनाओं को ही याद करते रहते हैं, क्योंकि वही उनकी संचित संपदा है। यद्यपि उनसे निरर्थक भावनाओं को उत्तेजित करने के अतिरिक्त और कोई लाभ नहीं मिलता।
भविष्य की कल्पनाओं-भूतकाल की घटनाओं को याद रखना निरुद्देश्य है, निरर्थक है। अपने हाथ में केवल वर्तमान है। इसी का श्रेष्ठतम् सदुपयोग करना बुद्धिमानी है। खाली मस्तिष्क जब कभी हो, तब भूत या भविष्य की कल्पनाएँ करते रहने की अपेक्षा यही अच्छा है कि वर्तमान के श्रेष्ठतम उपयोग की बात सोची जाए और संभव हो तो वैसा ही किया भी जाए। किसी ने सही कहा है कि बीता हुआ कल कैंसिल्ड चैक है, आने वाला कल प्रांमिसरी नोट है, किंतु वर्तमान तो पूरा नकद (रेडी कैश) है। यदि इसी का सदुपयोग हो सके तो निश्चय ही प्रगति-पथ पर निश्चित हो बढ़ा जा सकता है।
यह युग-परिवर्तन की वेला। इसमें कोई नहीं अकेला॥
देव शक्तियाँ कार्य निरत हैं, असद हटा सतयुग लाने में।
सबको उनका संरक्षण है, भवन नया यह बनवाने में॥
प्रभु ने पुनः खेल यह खेला, यह...........
इंजीनियर कि बेलदार हो, यहाँ नहीं कोई अंतर है।
सबको शक्ति दे रहा वह प्रभु, क्योंकि मनुजता का यह घर है।
संग करोड़ों का है मेला, यह.........
पहले बहुत कहा था उसने, ‘होगी जभी धर्म की हानी।
तब-तब मैं खुद ही आऊँगा, रोकूँगा ऐसी मनमानी”॥
अतः रचा फिर से यह खेला,यह...........
कोई यहाँ नहीं एकाकी, संघशक्ति ही अपना बल है।
ऐसा है अस्तित्व हमारा, एक फूल-यद्यपि शतदल है॥
नभ-सा हृदय सभी का फैला, यह..................
हम सब ने मुस्का–मुस्काकर, संघर्षों की राह गही है।
पग में काँटा चुभा; किंतु, ना कभी किसी से पीर कही है
कष्टों को हँस-हँसकर झेला, यह..............
— माया वर्मा
दिव्य चेतना ही करती है, संपादित वे काज।
जिन से युग-परिवर्तन होता, पाता मुक्ति समाज॥1॥
सर्व समर्थ दिव्यसत्ता, प्रत्यक्ष न करती काम।
वह उपयुक्त माध्यमों द्वारा, करती सब गुमनाम॥
सीमित शक्ति और साधन होते, माध्यम के पास।
किंतु दिव्य-सामर्थ्य, उछाला करती है विश्वास॥
माध्यम से मुखरित होती है, उसकी ही आवाज।
जिससे युग-परिवर्तन होता, पाता मुक्ति समाज॥2॥
जामवन्त, हनुमान आदि, क्या कर पाते वे काम?
नहीं समाए होते उनकी, रग-रग में यदि राम॥
पत्नी का अपमान सह गया, क्या अर्जुन था वीर।
किंतु कृष्ण-सामर्थ्य, बन गई गाँडीव का तीर॥
स्वर होते हैं किसी और के, बजता कोई साज।
जिस से युग-परिवर्तन होता, पाता मुक्ति समाज॥3॥
क्या विदेश में यूँ छा जाता, एक विवेकानंद।
क्या दुबले गाँधी की हो पाती, आवाज बुलन्द॥
कार्ल मार्क्स क्या भर सकते थे, साम्यवाद का रंग।
क्या गोरों से टकरा पाते, काले लूथर किंग॥
कठपुतलियाँ दिखाती रहतीं, कोई का अंदाज।
जिससे युग-परिवर्तन होता, पाता मुक्ति समाज॥4॥
जो माध्यम बन जाया करते, हो जाते वे धन्य।
दिव्य चेतना काम बनाती, उनकी कीर्ति अनन्य॥
युग-परिवर्तन की बेला का पुनः पुण्य संयोग।
वही धन्य हो जाए, जिसका हो जाए उपयोग॥
राम काज में जुटने का, फिर पुण्य पर्व है आज। जिससे युग-परिवर्तन होगा, होगा मुक्त समाज॥5॥
— मंगल विजय
जीवन का आधार प्राण-ऊर्जा है। उपनिषदों में इसे अग्नि और तेज की संज्ञा दी गई है। और उसके संवर्ध्दन एवं सदुपयोग का वर्णन किया गया है। इसका बाहुल्य मनुष्य के दुर्बल शरीर को भी ओजस्-तेजस्-वर्चस् से भर देता है और क्षीण काय-कलेवर से भी आश्चर्यजनक कार्य करा लेता है। प्राणशक्ति की मात्रा बढ़ी-चढ़ी हो तो व्यक्ति साहसी, पराक्रमी एवं निर्भय स्वभाव का होगा। उसकी इच्छाशक्ति, संकल्पशक्ति, स्फूर्ति एवं क्रियाशक्ति बढ़ी-चढ़ी होगी। अतींद्रिय सामर्थ्य इसी की देन है। जीवन की समस्त हलचलों का मूल भी प्राण-चेतना ही है। इसके साथ छोड़ देने पर काया का कोई मूल्य नहीं रह जाता और उसे तत्परतापूर्वक ठिकाने लगाने की बात सोची जाती है। विज्ञान वेत्ताओं ने भी अब इस तथ्य की पुष्टि कर दी है कि जीवन का प्रादुर्भाव इसी शक्ति की देन है। वे इसे बायोइलेक्ट्रोमैग्नेटिक फोर्स लाइफ फील्ड आदि नामों से संबोधित करते है और कहते है कि यही सर्वव्यापी शक्ति-प्रवाह मनुष्य सहित सभी छोटे-बड़े जीवों में प्रवाहित हो रहा है। शरीर निर्माण से लेकर जीवन के समस्त क्रियाकलापों में यही चुंबकीय प्रवाह कार्यरत है।
मनुष्य शरीर में विद्युत चुंबकीय शक्ति का प्राणविद्युत का कितना भंडार है। विश्व में इसके कितने ही उदाहरण भरे पड़े है। जो बताते है कि जैवकोश एवं आंतरिक स्रोतों में शक्ति-प्रवाह निरंतर फूटता रहता है। पिछले दिनों न्यूयार्क स्थिति डोनेमारा जेल में एक ऐसी ही अद्भुत घटना घटित हुई। 24 कैदियों को एक समान भोजन दिया जाता जिसे-खा लेने पर सब के सब बीमार पड़ गए। उनमें से मृत्यु तो एक की भी नहीं हुई, परंतु वे सभी एक विशेष प्रकार के विद्युत चुंबकीय आवेश से भर गए। घने अँधेरे में उनके शरीर से एक प्रकार का हलका प्रकाश निकलता दिखाई देता था। प्रत्येक व्यक्ति एक जीवंत शक्तिशाली चुंबक बन गया था। इसका पता तब चला, जब उनमें से एक ने पास खड़े जंग लगे लोहे के टुकड़े को उठाकर बाहर फेंकना चाहा। लोहे का वह टुकड़ा हाथ से ही चिपका रहा गया।
वास्तविकता का पता लगाने की दृष्टि से जेल चिकित्सक डॉ. जूलियस बी रैन्सम ने इस विलक्षण परिवर्तन का तत्काल परीक्षण किया। पाया गया सभी ने अपनी उपस्थिति से कंपास सुई को परिचालित कर दिया। उनके छूने मात्र से अधातु वस्तुएँ भी विद्युतमय हो जाती थी। लटकती हुई स्टील टेप इधर-उधर हिलने लगती थी। उनने अलग-अलग व्यक्तियों में उनकी रुग्णता की गंभीरता के अनुपात से उस क्षमता में भिन्नता को भी नोट किया। देखा गया कि पूर्णस्वस्थ हो जाने, पर उनकी विलक्षण क्षमता भी गायब हो गई।
परामनोविज्ञानियों ने इस घटना को साइकोकाइबोसिस से संबंधित बताया। विज्ञानवेत्ता एम. आर. को ने इस संबंध में अपना मत प्रस्तुत करते हुए कहा कि खाद्यपदार्थ में मिले विषैले तत्त्वों के शरीर में प्रविष्ट हो जाने के कारण उनके संपर्क में आने वाली कोशिकाओं के क्षतिग्रस्त हो जाने से उनमें सन्निहित प्राणविद्युत लीक होने लगी और अपने प्रभाव से शरीर की आवेशित बना दिया। जैव विद्युतीय चुंबकत्व की विवेचना करते हुए वे कहते है कि चुंबक ओर विद्युत दो पृथक-पृथक शक्तियाँ होने पर भी अविच्छिन्न रूप से संबंधित है और समयानुसार एक धारा का दूसरी में परिवर्तन होता रहता है। यदि किसी सर्किट का चुंबकीय-क्षेत्र लगातार बदलते रहा जाए तो बिजली पैदा होने लगेगी। इसी प्रकार लोहे के टुकड़े पर लपेटे हुए तार में विद्युतधारा प्रवाहित की जाए तो वह चुंबकीय शक्तिसंपन्न बन जाएगा। इसी प्रकार शरीर में जैव कोशिकाओं का क्रियाकलाप चलता है और उनके अंदर क्रोमोजोम इसी सिद्धांत के अनुसार कार्य करते हैं। व्यवधान पड़ने पर यही शक्ति-प्रवाह प्रचंड विकिरण के रूप में बाहर की ओर फूट पड़ता है।
उक्त तथ्य की प्रामाणिकता सिद्ध करने के लिए श्री को ने स्वयं में विद्युत चुंबकीय प्रवाह पैदा करने का निश्चय किया। वे वर्षों योगाभ्यास परक आसान, प्राणायाम, ध्यान एवं उपवास आदि का दृढ़तापूर्वक नियमित अभ्यास करते रहे। इसमें उन्हें सफलता भी मिली। 8 फुट की दूरी से ही किसी भी वस्तु को अपनी ओर आकर्षित कर लेने उनमें स्थान-परिवर्तन कर देने के कितने ही सफल प्रयोग उनने किए। उनका मत है कि अभ्यास द्वारा हर कोई इस तरह की क्षमताएँ अर्जित कर सकता है। भारतीय अध्यात्मवेत्ताओं ऋषि-मनीषियों द्वारा वर्णित प्राणशक्ति की क्षमता को उनने होमोइलेक्ट्रोमैग्नेटिक्स नाम से संबोधित किया है और कहा है कि अभी पाश्चात्य जगत के विज्ञानियों को इस संबंध में बहुत कुछ जानना शेष है।
अध्यात्मशास्त्रों के अनुसार प्राणविद्युत ही वह शक्ति है, जिसमें मानवी विकास प्रक्रिया को गति मिलती है। शारीरिक बलिष्ठता सुंदरता एवं मानसिक प्रखरता का आधार खड़ा करती है। अध्यात्म का संपूर्ण कलेवर प्राणोत्थान प्रक्रिया पर निर्भर है। पाश्चात्य जगत के प्रख्यात चिकित्सा विज्ञानी पैरासेल्सस ने भी इस रहस्य को जाना लिया था कि मानवी काया में प्राण चुंबकत्व भरा पड़ा है और जो जीवन विकास प्रक्रिया से लेकर प्रतिभा उन्नयन एवं उच्चस्तरीय व्यक्तित्व के गठन में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। भारतीय ऋषियों की भाँति प्राण-चेतना के आदान-प्रदान एवं इस शक्ति से चिकित्सा प्रयोजनों की क्षति-पूर्ति की कल्पना सर्वप्रथम उन्होंने ही की थी। उन्नीसवीं सदी के विख्यात चिकित्सक फ्रेन्जमेस्मर ने इस सिद्धांत को प्रायोगिक स्वरुप प्रदान किया और जैव चुंबकत्व के माध्यम से कितने ही असाध्य रोगियों का उपचार किया। इस संबंध में उनने गहन अनुसंधान किया था और अपनी खोजों को द इन्फ्लुएन्स ऑफ द प्लैनेट आन दि ह्यूमन बॉडी नामक शोध प्रबंध में प्रकाशित किया था।उनके अनुसार ब्रह्मांड में विपुल परिमाण में एक प्रकार का साइकिक फ्लूइड या ईथर विद्यमान है। मनुष्य अपनी आवश्यकता के अनुसार उसमें से प्राणतत्त्व को आकर्षित एवं अवधारित कर सकता है। इससे केवल स्वयं लाभांवित हुआ जा सकता है, वरन दूसरे जरूरतमंदों की सहायता की जा सकती है। अध्यात्मवेत्ता इसे ही आभामंडल का परिमार्जन कहते है।
मानवी प्राणविद्युत में घट-बढ़ होने पर शारीरिक और मानसिक संतुलन गड़बड़ा जाता है और व्यक्तित्व विकास की प्रक्रिया अवरुद्ध हो जाती है। योगविद्या के ज्ञाता इसकी पूर्ति प्राणाकर्षण प्राणायाम जैसी विधाओं द्वारा करने का मार्ग सुझाते हैं। तो चिकित्सा विज्ञानी अपने ढंग से करते हैं। इलेक्ट्रोबायोलॉजी के आरंभिक दिनों में इलेक्ट्रिकल हैलमेट डॉक्टर ओवेन की बॉडी बैटरी एवं मेंटल, क्राउन, एलिसा पर्किन्स का मटैलिक ट्रैक्टर, जैसी विधाएँ प्रयुक्त होती रही है। डॉक्टर नेबल का विद्युत चुंबकीय केज भी चयापचय संबंधी रोगों में प्रयुक्त होता था। पिछले दिनों डेनमार्क के कोपेनहेगन रिग्स हास्पिटल में चिकित्सा विज्ञानी डॉ. के. एम. हेन्सनने मेस्मर की चुंबकीय चिकित्सापद्धति का कई वर्षों तक अपने मरीजों पर सफल प्रयोग किया और पाया कि इससे प्राणशक्ति के संवर्ध्दन में महत्त्वपूर्ण सहायता मिलती है। उनके अनुसार प्राणतत्त्व की कमी ही सब प्रकार रोगों का मूल है।
'द साइकल्स ऑफ हेवन' नामक अपनी कृति में जी. एल. प्लेफेयर ने मानवी काया को एक जीवंत रेडियो ट्रांसमीटर की संज्ञा दी है; जिसके अंदर से विभिन्न तरह के संकेत विद्युत चुंबकीय-तरंगों के रूप में बाह्य वातावरण में विकिरित होते रहते है। कम आवृत्ति की होने पर भी ये तरंगें अपने प्रभावक्षमता में अत्यधिक समर्थ होती हैं। इनके अनुसार हमारा हृदय; सतत स्पंदित होता रहता है और एक से तीन चक्र प्रति सेकेंड की दर से रेडियो सिगनल बाहर भेजता रहता है, जिसे ई. ई. जी. द्वारा स्पष्ट रूप से देखा और उसका ग्राफांकन किया जा सकता है। इस विद्युतीय सक्रियता के साथ जुड़े चुंबकीय प्रभाव की अपनी महत्ता है। इसे मैग्नेटोकार्डियोग्राफ द्वारा मापा जा सकता है।
कनाडा के मूर्धन्य वैज्ञानिक जे. बिगू ने अपनी पुस्तक-'ऑन द बायोलॉजिकल बेसिस ऑफ; हृयूमेन आरा में बताया है कि मानव शरीर में बीटा एवं गामा स्तर की नाभिकीय किरणें; सतत निस्सृत होती रहती है, जो यह सिद्ध करती है कि स्थूलकाया में कोई अतिसामर्थ्यवान सूक्ष्मशक्ति विद्यमान है। आभामंडल का निर्माण इसी के द्वारा होता है। पवित्र अंतःकरण वाले संवेदनशील व्यक्तियों में इसकी मात्रा अधिक पाई जाती है। अभ्यास द्वारा इसी सूक्ष्मशक्ति को बढ़ाया और दूसरों में हस्तांतरित किया जा सकता है। अदृश्य प्राण-ऊर्जा की चर्चा करते हुए वे कहते है कि यदि इस भंडार को किसी प्रकार सशक्त बनाया जा सके तो निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि इस आधार पर प्राचीन ऋषि-मुनियों द्वारा शिष्यों में शक्तिपात करने की तरह परस्पर आदान-प्रदान का एक नया आयाम खुल सकता है।
प्राण एक जीवंतविद्युत है, जो शरीर से भी अधिक मनः क्षेत्र को प्रभावित करती है। मनुष्य को साहसी, पराक्रमी एवं ओजस्वी-तेजस्वी बनाती है। ब्रह्मांड में सर्वत्र संव्याप्त प्राण-ऊर्जा का समुचित मात्रा में आकर्षण-अवधारण किया जा सके तो सामान्य दीखने वाला मनुष्य भी अपनी साधारण-असाधारण विशिष्टता का परिचय दे सकता है।
जीर्ण, शीर्ण, पर्ण कुटीर के एक प्रकोष्ठ में एक बलिष्ठ तेजस्वी तरुण यात्रा के श्रम की क्लांति मिटाने नग्न भूमि पर लेटा था। अपनी सुगठित भुजा पर मस्तक रखे वह विचारमग्न था। उसके ओजपूर्ण चेहरे पर विचार मग्न था। उसके ओजपूर्ण चेहरे पर एक भाव आता, एक जाता था। कुटिया की स्वामिनी जरा-जर्जर वृद्धा और उसका पौत्र अपने इस अतिथि की चिंता से दूर दैनिक कार्यों में लगे थे। असमय मृत्यु के मुख में पहुँच जाने वाले पुत्र व पुत्रवधू के शोक ने वृद्धा के स्वभाव में चिड़-चिड़ापन भर दिया था। भूख से व्याकुल पुत्र ने गर्म-गर्म रोटी को बीच से खाना चाहा। इस मूर्खता भरे प्रयास में उसका हाथ जल गया। वह रोने लगा। इस पर वह डाँटते हुए बोली— "अरे मूर्ख!" पहले किनारे तोड़कर खा। वृद्धा की वाणी कुटीर के दूसरे सिरे पर लोटे तरुण के लिए समाधान साबित हुई। युवक भी यही भूल करता आ रहा था, जो वृद्धा के पौत्र ने की। उस सीख को मानकर तरुण ने किनारे तोड़-तोड़कर खाने अर्थात एक-एक कदम आगे बढ़ाने की नीति को अपनाने की सोची। इन कदमों के रूप में उसने संगठन-प्रशिक्षण व्यूहरचना करते हुए अनीति उन्मूलन, समाज के नवगठन हेतु सुव्यवस्था को कर्त्तव्य कर्म मानकर पूरा किया। इस तरह मंजिल पाने वाला यह युवक था— चंद्रगुप्त मौर्य।
उसके पिता एक वीर व नीतिपरायण क्षत्रिए थेः मगध साम्राज्य की वीरवाहिनी के योग्य नायकों में थे। मगधराज जहाँ उनके शौर्य का कायल था वहीं उनकी स्पष्टवादिता एवं नीतिपरायणता से कुपित भी था, उसकी अनीति व अन्याय का विरोध करने के कारण महानंद ने उसकी हत्या करवा दी। पिता की मृत्यु के उपरांत माता उसे लेकर अपने पितृगृह चली गई एवं घरों में कार्य करके गुजारा करने लगी। पिता का अन्यायपूर्वक वध, प्रजा के उत्पीड़न की कहानियाँ बालक चंद्र अपनी माता के मुख सुना करता था। यह सब सुनकर उसके मन में विचार कौंधते। क्या उत्पीड़न की समाप्तिकर समाज का नवगठन किया जा सकता है। कैसे? यह न सूझ पड़ता।
माँ ने बालक चंद्र में अन्यों के प्रति सम्वेदना जगाई, सहानुभूति को पनपाया व विकसित किया। अंदर की बेचैनी सक्रिय होने के लिए आतुर थी। इसी समय भारत की भावी-प्रगति की रूपरेखा अपने उर्वर मस्तिष्क में लेकर आचार्य चाणक्य अपने लोकनायक की खोज में निकले थे। उनकी भविष्यदर्शी आँखों ने इस किशोर के अंतराल में मानव हितों के लिए उमग रही बेचैनी को पहचाना। राह की धूल में पड़े हीरे को पारखी मिला और एक परखी को हीरा।
व्यक्तित्व के निर्माण में गुरु— मार्गदर्शक की अनिवार्यता असंदिग्ध है। लातों से ठुकराई, कुचली जाने वाली मिट्टी को मूर्तिकार जिस प्रकार सुंदर कलाकृति के रूप में बदल देता है काले कलूटे लोहे को जिस प्रकार तकनीकी का विशेषज्ञ बहुमूल्य यंत्र के रूप मे गढ़ता है। ठीक वैसे ही गुरु साधारण मनुष्य के अंदर छिपी असाधारण क्षमताओं को उभारता-निखारता अपने समूचे कौशल के बल पर उसे गढ़कर महान बना देता है। चंद्रगुप्त के निर्माण में चाणक्य की यही भूमिका रही।
उस समय समूचा भारतखंड छोटे-छोटे टुकड़ों में बँटा था। 'भारत माता' अपनी करोड़ों संतानों के साथ बिलख रही थी। उसका दुःख-दर्द समझने वाला कोई नहीं दिखाई पड़ रहा था। ऐसे विषय समय में चंद्रगुप्त ने अपने मार्गदर्शक के सामने प्रतिज्ञा की— "गुरुदेव! इस पुण्यभूमि की शपथ मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि प्राण के अंतिमकण को शरीर के अंतिम रक्तबिंदु को देकर भी इसके खोए गौरव को पुनः लाकर रहूँगा। इसको 'स्वर्गादपि गरीयसी' के रूप में पुनः स्थापित करूँगा। धरती पर स्वर्गीय वातावरण व नूतन समाज व्यवस्था आकर रहेगी।"
चंद्रगुप्त की दृढ़निष्ठा देखकर आचार्य भाव-विभोर हो गए। उनके कंठ से वाणी निकली— वत्स! तुम सफलकाम हो। अपने देश की यही प्राचीन परंपरा रही है। अकेले भगीरथ ने सूखती चटकती, ऊसर बनती जा रही भूमि को उर्वरा— शस्यश्यामला बनाने के लिए एकाकी संकल्प लिया था। वह गंगा की धारा को हिमालय की दुर्गम घाटियों, गिरि, गव्हरों से मैदानों तक लाने में सफल हुए। जनसमुदाय को नवजीवन व धरती का उसका सौंदर्य दिया। महानता को ओर बढ़ते कदमों के साथ देवनुग्रह भी जुडा है। इसी के बल पर पथप्रदर्शन व जन सहयोग जुटता जाता है। सबसे बड़ा व्यवस्थापक परमेश्वर स्वयं है, उसके इस कार्य में सहयोग देने जो भी उठ खड़ा होता, उसे उसका प्यार मिले बगैर नहीं रहता।
तुम्हारा कार्य भी उसे सहयोग देने जैसा ही है। आज की स्थिति में भारत में जनक्रान्ति की आवश्यकता है। क्रांति का तात्पर्य मार-काट नहीं, बल्कि सोए हुओं को जागाना, जगे हुओं को उठाना, उठे हुओं को आगे बढ़ाना है। आज सभी अमृतपुत्र दुर्बलता-कायरता की गहरी नींद में सोने के कारण मृत लग रहे हैं। पर जैसे ही इनको स्वरूप बोध होगा, दुर्व्यवस्था-अनीति भाग निकलेगी।
इसके लिए क्या करना होगा? चंद्रगुप्त का अगला प्रश्न था। पहले कुछ व्यक्तियों को लेकर उन्हें अपने उद्देश्यों को बताना, उनकी दबी-छुपी भाव-सम्वेदनाओं को छूना, उभरे उत्साह का नियोजन करना। इसे संगठितकर अनीति उत्पीड़न के खिलाफ एक व्यूहरचना करनी होगी— "पहला कदम होगा दोष-दुष्प्रवृत्तियों का उन्मूलन।" इसका बाह्यस्वरूप ध्वंसात्मक होते हुए भी सूक्ष्मवेत्ताओं को भावी सृजन साफ दिखाई देगा— "आचार्य का उत्तर था।"
चंद्रगुप्त को बात समझ में आ गई। इसी समय सेल्यूकस निकाटोर का प्रभाव बढ़ रहा था। फन काढते विषधर को दंड देने की योजना दी। सीमारण्य प्रांतों की क्रांतिवाहिनी के सफल नेतृत्व के सामने सेल्यूकस को घुटने टेकने पड़े। निढर्य मगध सम्राट पदच्युत हुए। अब चन्द्रगुप्त सम्राट थे।
दुष्प्रवृत्तियों को उखाड़ फेंकने के बाद सत्प्रवृत्तियों के नंदन कानन को विकसित करने का क्रम शुरू हुआ। दुर्व्यवस्था से जर्जरित भारत को पुनः सुव्यवस्थित किया जाने लगा। जागृतजन सहयोग के लिए कटिबद्ध थे।
इतिहासकारों के अनुसार चंद्रगुप्त के लगातार प्रयासों से भारत अध्यात्मिक एवं भौतिक उपलब्धियों का भंडार बन गया। ऋषि संस्कृति की पुनर्स्थापना के पश्चात, उन्होंने शासन की जिम्मेदारी उचित उत्तराधिकारी को सौंपकर परिव्रज्या व्रत ले लिया। अंतिम श्वास तक अपने आचरण व व्यवहार के माध्यम से सामान्यजन को घूम घूकरकर जीवन जीने की नीति सिखाते रहे। अधिकार, वैभव, परिवार का मोह, उन्हें कैद न रख सके।
गहराई से देखा जाए तो उनमें क्रांतिकारी महान उद्देश्य के लिए समर्पित जीवन जीने वाले एक कर्मनिष्ठ पुरुष के ही दर्शन होते हैं। समय की परिधियों में बंध वह कुछ और भले ही लगें, पर सच्चे अर्थों में वे जागृति के अग्रदूत थे।
एक चरवाहे की किसी ने राजा से बहुत प्रशंसा की। राजा आतुर स्वभाव का था। एकाध बात पूछने से ही इतना प्रभावित हुआ कि उसे राज्य का खजाँची बना दिया।
चरवाहे ने सौंपा हुआ काम तो सँभाल लिया, पर यह आशंका मन में बनी रही कि यह कान का कच्चा है। उतावले स्वभाव का भी है। कभी भी नौकरी से हटा सकता है। इसलिए उसने अपने चलने का सामान तैयार रखा।
उसने अपने रहने के लिए एक कोठरी पर्याप्त समझी। उसी में रहता और दिनभर उसका ताला लगाए रहता चुगलखोर ने रजा के कान भरे की इसने बहुत दौलत बटोर ली है, पर जिस कोठरी में रहता है उसी में जमा कर रखी है।
राजा को जाँच कराने का धैर्य न था। उसने तत्काल कोठरी की तलाशी लेने और खजाँची को बर्खास्त करने का हुक्म किया।
तलाशी ली गई। कोठरी में सिर्फ वे कपड़े जूते आदि मिले जो, उन्हें वह घर से लेकर आया था। पूछा गया कि यह पुरानी फटी चीजें किसलिए जमाकर रखी गई हैं।
चरवाहे ने कहा— "मैं जानता था कि वे कान के कच्चे हैं। आतुर स्वभाव के किसी व्यक्ति के यहाँ ज्यादा दिन ठहरना नहीं हो सकता इसलिए जिस हैसियत से आया था, उसी में घर लौट जाने की तैयारी में पुराना सामान सँजा कर रखा। राजा के रोकने पर भी वह रुका नहीं। सरकारी वर्दी उतार दी और पुराने कपड़े पहनकर खाली हाथ चला गया।"
ऊँचे टीले और गहरे खाई-खड्ड अपने घेरे में आने वाली भूमि को निरर्थक बनाकर रख देते हैं। घिरा हुआ क्षेत्र देखने में डरावना और पार करने में दुस्तर बन जाता है। इसलिए उनमें न कृषि हो पाती है, न उद्यान लग पाते है। प्राणी निवास की असुविधा देखकर वहाँ बसने का कोई साहस भी नहीं करता। इस निरुपयोगी भूमि को समतल बनाने में भारी श्रम और साधन लगाने पड़ते है। तब कहीं ऐसी स्थिति बन पाती है कि वहाँ घर बनाना या उद्योग चलाना संभव हो सके, इसलिए विषमता को सदा से अभिशाप माना और उसे घटाने-मिटाने के लिए समय-समय पर यथा संभव प्रयास होता रहा है। अब यह समस्या अधिक विषम हो जाने के कारण उसके उन्मूलन की आवश्यकता भी अधिक बढ़ गई है।
एक जगह ऊँची दीवाल उठाने पर उसके लिए कहीं-न-कहीं से अतिरिक्त मिट्टी लगानी पड़ेगी। जहाँ से भी वह उठेगी, वहाँ गड्ढा बने बिना रहेगा क्यों? विषमता एक प्रकार की कुरूपता भी है और अवांछनीयता भी। उसके कारण निश्चय ही संतुलन बिगड़ता है। सतयुगी स्वर्णिमकाल की विशेषता यही थी कि हर कोई औसत नागरिक स्तर जीकर संतोष करने लगा और प्रसन्न रहने का अभ्यस्त था। मिल बाँटकर खाने की नीति अपनाने से ही हिल-मिलकर रहने और हँसते-हँसाते जीने की स्थिति बनती थी। अब जहाँ कहीं भी अमीरी के सरंजाम जुटेंगे, उनके कारण खाली स्थिति में गरीबी के प्रतीक चमगादड़ और अबाबील ही आ बसेंगे।
सतयुग निर्धारण और विधिव्यवस्था में दो तत्त्व प्रधान हैं— एक समता, दूसरा एकता। विषमताओं में आर्थिक-क्षेत्र बुरी तरह उलझा है। गरीबी और गरीबी की अतिशयता ने ऐसा वातावरण बना रखा है; जिसमें कोई भी पक्ष चैन से नहीं बैठ सकेगा। गरीबी की दरिद्रता और दुर्बलता उन्हें कष्ट सहन के लिए बाधित करती है और साथ ही यह भी किसी से छिपा नहीं है कि अमीरों का ठाट-बाट अपव्यय और उन्माद किस प्रकार विद्वेष की आग भड़काता और उस आक्रोश से बचने के लिए अमीरों को कितने सुरक्षा के साधन जुटाने और नेकनीयती जताने के लिए पाखंडप्रपंच खड़े करने पड़ते हैं। देखा जा सकता है कि अमीरी और गरीबी के बीच किस प्रकार संघर्ष चल रहा हैं, उसकी अंतिम परिणति उसी बिंदु पर आकर रुकेगी; जिसमें विषमता का निराकरण और आर्थिक समता का निर्णय स्वीकार कर लिया जाएगा।
विषमता आर्थिक संपन्नता से आरंभ हुई या बलिष्ठों की शस्त्रसज्जा से, यह सोचना इतिहासकारों का विषय है, पर यह निश्चय है कि उस के कारण जंगल का कानून, मत्स्य न्याय और जिसकी लाठी तिसकी भैंस वाले सिद्धांत को असाधारण प्रोत्साहन मिला है। उसने अन्य अनेक क्षेत्रों को अपनी पकड़-जकड़ में कस लिया है। नर और नारी के बीच बरती जाने वाली विषमता में समर्थों द्वारा दुर्बल पक्ष पर अधिकार जमाने और शोषण में कमी न रहने देने की नीति लंबे समय से बरती जाने के कारण अब वह प्रथा-परंपरा बन गई है। उसे सही सिद्ध करने वाले शास्त्रों और कथानकों के गढ़ने में भी देरी नहीं हुई है। पत्नीव्रत को दुत्कारते हुए एकाकी पतिव्रत का समर्थन इसी व्यापक विषमता का एक पक्ष है। जाति–पाँति के आधार पर बरती जाने वाली ऊँच-नीच वाली मान्यता के पीछे भी संभवतः यही मनोविज्ञान काम करता रहा है, अन्यथा वंश और वेश के आधार पर किसी को ऊँचा-नीचा, माने-जाने के पीछे कोई तुक नहीं है। सभी पृथ्वीपुत्रों को मनुष्यमात्र को एक स्तर का गिने जाने में ही औचित्य है। उन्हें जाति, लिंग, भाषा क्षेत्रसंप्रदाय के आधार पर वरिष्ठ या कनिष्ठ नहीं ठहराया जा सकता। पतन और उत्थान तो व्यक्ति की विशेषता के आधार पर आंका जाना चाहिए। उत्कृष्टता और निकृष्टता का स्तर ही श्रेष्ठता-वरिष्ठता की कसौटी बनना चाहिए।
अगले दिनों न्याय एवं औचित्य की ही प्रतिष्ठा एवं प्रतिष्ठापना होने जा रही है। उसके विपरीत प्रतिपक्ष बनी खड़ी विषमता टिक नहीं सकेगी। मनुष्यमात्र को आर्थिक और सामाजिक-क्षेत्र में समानता के अधिकार मिलेंगे। मानवी भौतिक अधिकारों में सर्वतोमुखी समानता की भी एक धारा जुड़ेगी। अपराध ही प्रताड़ना के एक मात्र कारण बने रहेंगे गंगा-यमुना की तरह औचित्य की दूसरी धारा है, एकता। सहयोग और सहकार के आधार पर ही मानवी प्रगति की संभावना सार्थक हुई और व्यवस्था बनी है। सामूहिकता और सहकारिता ही वे प्रधानतत्त्व है; जिनने मानवी प्रगति में चार चाँद लगाए है। यहाँ तक कि जिस बुद्धिमता को मानवी विशेषताओं में प्रमुख समझा जाता है, उसके उद्गम एवं उद्भव में एकता एकजुटता ही अपनी महत्ता प्रमाणित करती रही है। अभ्युदय की सभी दिशाधाराओं में उसी की प्रमुख भूमिका रही है।
विलासिता का बिखराव हर कहीं अनर्थ से लेकर सर्वनाश जैसी परिस्थितियाँ उत्पन्न करता रहा है। बुहारी की सींकें बिखर जाने, पर उनमें से एक की भी उपयोगिता शेष नहीं रह जाती। धागे यदि परस्पर जुड़ने से इंकार ही करते रहे तो, उनकी क्या हस्ती शेष रहेगी। वे उपयोगी कपड़े की स्थिति में कैसे पहुँच सकेंगे। पृथक-पृथक रहने का मन ईंटें बना लें तो फिर इमारत बनाने की सँभावना साकार हो ही नहीं सकती। बिखरे कबीले अभी भी यायावरों की तरह विचरते और वन्य प्रदेशों में किसी प्रकार लुक छिपकर गुजारा करता हैं। आचार-संहिता न बना पाने और संगठन का तंत्र खड़ा न कर पाने के कारण ही वे इस प्रगतिशीलता के युग में भी जहाँ-तहाँ आदिमकाल जैसी विकट परिस्थितियों से होते हुए धीरे-धीरे घटते और मिटते जा रहे हैं। इसे बिसंगइन की विसंगति के अतिरिक्त और क्या कुछ कहा, समझा जा सकता है।
अगले दिनों सर्वतोमुखी एकता और समता का प्रचलन क्रियांवित होने जा रहा है। यत्किंचित भिन्नता रही हो तो, उससे टकराने की विसंगतियों का समय रहते समाधान कर लिया जाएगा। यों अभिनव विश्व में एक ही धर्म, एक ही भाषा, एक ही विश्वव्यवस्था और एक आचारसंहिता को अपनाते हुए, एक इंसान और एक भगवान का ढाँचा खड़ा करके ही युग-मनीषा चैन लेगी। इससे कम से नवसृजन के अंतिम लक्ष्य तक पहुँच सकना बन ही नहीं पड़ेगा। एक शासन के अंतर्गत समूचा मनुष्य समाज निर्वाह करे और एक समाज संरचना के अंतर्गत ही सभी अपने क्रियाकलापों का निर्धारण करें, इसी में चिरस्थायी सुख-शांति के तत्त्वों का समावेश है। वही होना चाहिए और वही होकर भी रहेगा।
एकता और समता का व्यवहार प्रचलन के रूप में बन पड़ने योग्य है। इसके अतिरिक्त दो तत्त्व इनसे मिले-जुले और रह जाते है; जिन्हें मानवी मान्यताओं और भावनाओं में समुचित स्थान मिलना चाहिए। इनमें एक है आत्मीयता। दूसरी है— "पारिवारिकता, सब को अपना समझने पर उसके साथ मात्र सद्व्यवहार ही बन पड़ता है।" अपनों के साथ हिल-मिलकर रहने में किसी को काई व्यवधान अनुभव नहीं होता, न अपनों के साथ अनीति बरतने का भाव उठता है। अभी आत्मीयतामात्र अपने शरीर-परिवार तक सीमित होकर रह रही है, इसलिए लोग इतनी छोटी परिधि में ही प्रगति और सुख-शांति की बात सोचते , पर अगले ही दिनों जब आत्मीयता का क्षेत्र विस्तृत होगा तो, आत्मवत सर्वभूतेषु की मान्यता बन पड़ेगी और अपनापन समूचे संसार को अपने में बटोरकर उसकी सर्वतोमुखी सुख-शांति के लिए भरपूर प्रयत्न करेगा।
दूसरा तथ्य है— पारिवारिकता। सभ्य और सुसंस्कारी परिवार के परिकर में जिस स्नेह, सहकार का परिवार के परिकर में जिस स्नेह सहकार का बाहुल्य देखा जाता है, उसी उदारता भरे दुलार के आधार पर भी समूची व्यवस्था का संचालन होता है। इसी प्रकार जब विश्व परिवार का निर्धारण प्रत्यक्षरूप से बन पड़ेगास तो छीन-झपट का नहीं; वरन देने और दिलाने का सिद्धांत ही कार्यांवित होते बन पड़ेगा। एकता-समता का आत्मीयता पारिवारिकता का, "वसुधैव कुटुंबकम" का सिद्धांत, जब भावना क्षेत्र में प्रवेश करेगा तो उन विग्रहों और संकटों का कोई आधार ही शेष न रह जाएगा, जो हर किसी को आज हैरान किए हुए है।
स्कूल तो खुल गया, पर कोई ग्रामवासी अपनी बालिकाओं को भेजने के लिए तैयार नहीं था। अच्छा अब लड़कियाँ भी पढ़ेगी? हमें इन्हें पढ़ा लिखाकर कोई बाबू नहीं बनाना; जितने मुँह उतनी बातें। मुख्याध्यापिका अपने सहयोगी मित्रों के साथ चरखा कातती और बचे समय में महिलाओं-पुरुषों को समझाने का प्रयास करती है, पर समझने की बात तो दूर ग्रामीणों में आक्रोश बढ़ रहा था।
एक दिन सभी गाँव वालों ने आपस में सलाह की कि इसे गाँव बाहर निकाल देंगे। यह हमारे परिवारों को तोड़ने, महिलाओं को भड़काने, लड़कियों को बहकाने आई है। सभी मिलकर स्कूल तक जा पहुँचे, देखा वह मित्रों-सहयोगियों के साथ चरखा कात रही हैं।
एक साथ सारे गाँववासियों को देखकर उसे भी कुछ आश्चर्य हुआ। जो बुलाने पर नहीं आते, सुनाने पर नहीं सुनते, बेवजह फटकारते-दुत्कारते है आज अपने आप आए है। उसने शालीनता सके कहा बैठिए। जवाब में एक साथ कई स्वर उभरे हम बैठने नहीं तुम सब को निकालने आए है।
"ठीक है निकाल भी देना। गाँव आपका है। पर क्या मेरा अपराध बताने की कृपा करेंगे।"
अपराध! गाँव के मुखिया ने दाँत पीसते हुए कहा तुम हमारे परिवारों को बिगाड़ने आई हो। बिगाड़ने नहीं सँवारने। शिक्षा जिस किसी के पास जाती उसे सँवारती-सुसंस्कारित होगी, फिर जब बालिकाएँ सुसंस्कारित तो उनका तो और व्यापक प्रभाव होगा। आज की बालिकाएँ कल गृहसंचालन करने वाली बनेंगी। माँ की भूमिका निभाएँगी। यदि वे सुसंस्कारित-सुशिक्षित हो सकीं, तो निश्चित ही संतानों को, परिवार को अपने अनुरूप गढ़ पाएँगी।
बढ़-बढ़कर बातें न बनाओ। हम लोग अपनी लड़कियों को पढ़ा-लिखाकर मैम नहीं बनाना चाहते। तो क्या विदेशी महिलाएँ-बालिकाएँ ही पढ़ती है क्या? अगर आप समझते हैं कि प्राचीन भारत में नारियाँ अपढ़-गँवार होती थीं, यह आपकी भूल है। याज्ञवल्क्य के साथ शास्त्रार्थ करने वाली गार्गी गँवार कैसे होगी? बिना पढ़े घोषा, अपाला शास्त्र मर्मज्ञ ब्रह्मवादिनी कैसे बनी? अपढ़ कुंती भीम-अर्जुन को कैसे गढ़ती। ये सभी पढ़ी थीं, सुसंस्कृत थीं, तभी स्वयं के साथ समूचे परिवार-समाज की उन्नति में सहायक बन सकीं।
प्रभाव पड़ता देखकर कुछ रुकते हुए उनने फिर समझाना शुरू किया। "विधर्मी वही बनेगा जिसे अपने धर्म का ज्ञान नहीं, उस पर गौरव नहीं; जिन्हें उपनिषदों के उदात्त सत्य ऋषियों के क्रांतिदर्शी जीवन का सौंदर्य मालूम है, वह विधर्मी क्यों बनने लगा? पर यह मालूम तो तभी होगा, जब व्यक्ति शिक्षित हो। अपढ़ होने पर आशंका जरूर रहती है कि कही पैर न डगमगा जाएँ।"
बातें सटीक थीं, समझ में भी आ रहीं थीं। उन सब को लगने लगा कि शंकाएँ निर्मल हैं। मुखिया सहित कुछ ने धीरे से कह—"लगता हैं कि आप ही ठीक है। हम लोगों से जो अपराध हुआ उसे विसार दें।"
"इसमें अपराध की क्या बात? तथ्य मालूम न होने पर आक्रोश स्वाभाविक है। तो फिर आप लोग अपनी बालिकाओं को भेजना शुरू करें।" सभी ने हामी भरी।
स्कूल चलने लगा। बालिकाओं को पाठ्यक्रम का ज्ञान कराने के साथ, सफाई, शिष्टता, सद्व्यवहार, श्रम की स्वावलंबन की अनिवार्यता समझाई जाती। अभिभावक बालिकाओं के व्यवहार और प्रगति को देखकर विभोर थे। शिक्षा और स्वावलंबन का संगम; उन्होंने सपने में भी न सोचा था। स्कूल में दिन-पर-दिन छात्राओं की संख्या बढ़ती जाती। पर मुख्य अध्यापिका को इतने से संतोष न था। जो भी समय बचता उसमें वह घर-घर जाती, प्रौढ़ महिलाओं को गाँधी तिलक सुब्रहमण्यम भारती आदि के लेखों को पढ़कर सुनाती। दोष-दुष्प्रवृत्तियों होने वाली व्यक्तिगत व सामाजिक हानियाँ बताकर छोड़ने का आग्रह करतीं। महिलाएँ ही क्यों पुरुष भी प्रभावित होते।
गाँव वाले उन्हें परम हितैषी साक्षरता की दैवी के नाम से जानने लगे थे। गाँव का होता जा रहा कायाकल्प भला किसे प्रसन्न करता। यह साक्षरता की देवी थी, दुर्गाबाई, देशमुख, गाँधीजी की सहयोगिनी। जिन्होंने अपने ने प्रयत्नों से सिद्ध कर दिया यदि किसी के अंदर सेवा की टीस उभरे तो आज भी ग्रामीण जीवन में सुख-शांति सहकार की वह चमक पैदा हो सकती है कि शहरी भी उस ओर ललक कर दौड़ पड़े।
बालक नरेंद्र को अपने बचपन में, एक खेल बड़ा ही प्रिय था। वह अपने साथियों को लेकर पास के बगीचे में चला जाया करता और घने पत्तों वाले आम के वृक्ष की एक मोटी डाली पर औंधा लटक जाता। साथी नीचे खड़े और ढंग के खेलखेला करते। बगीचे का माली डरा कि कहीं नरेंद्र उस पेड़ ,परसे गिर न जाए और हाथ-पाँव तोड़ न बैठे। सो उसने सब बच्चों को इकट्ठाकर कहा— "देखो तुम उस पेड़ के नीचे मत खेला करो। वहाँ एक ब्रह्मराक्षस रहता है। कभी वह नाराज हो गया तो तुम लोगों को खा जाएगा।"
“ब्रह्मराक्षस क्या चीज होती है बाबा” नरेंद्र ने जिज्ञासावश पूछा।”
“जो लोग किसी दुर्घटना में मारे जाते है, या उनके बैरियों द्वारा बुरी तरह कत्ल कर दिए जाते है, वे असमय में मरने के कारण भूत बन जाते है। असमय में मृत्यु होने से उनकी आत्मा इधर-उधर भटकती रहती है और लोगों को परेशान किया करती है।" माली ने कहा।
“तो कौन उस पेड़ के नीचे और मारा गया था और कब किसने उसकी हत्या की थी।”
“यह तो मुझे नहीं पता बेटा।”
“तो फिर तुम्हें कैसे पता है कि वहाँ ब्रह्मराक्षस रहता है, लोग कहते है?”
लोग कहते है — "परंतु तुमने कभी उसे देखा है, नरेंद्र एक के बाद, दूसरा प्रश्न किए जा रहा था। इन प्रश्नों के सुनकर माली घबड़ा उठा, क्योंकि वह एक प्रश्न का जवाब नहीं दे पाता था कि दूसरा प्रश्न तैयार मिलता। सो घबड़ाकर वह बोला— "बेटा नरेंद्र तुम से बातों में तो भगवान ही जीते, मैं तो केवल इतना कहे देता हूँ कि तुम उस पेड़ के नीचे मत खेला करो। कल से कुछ हो गया; ब्रह्मराक्षस ने तुम्हें कुछ कर दिया, तो मैं नहीं जानता।"
"अच्छा बाबा। अच्छा। नहीं खेलेंगे। इतना नाराज क्यों होते हो?" नरेंद्र ने कहा और अपने साथियों के साथ वहाँ से भाग चला।
उसी दिन शाम को नरेंद्र घर से गायब हो गया। पहले तो परिवार वालों ने सोचा कि वहीं-कहीं खेल रहा होगा। परंतु जब बहुत देर हो गई तो चिंता हुई। बच्चा बड़ा शरारती है; कही कोई दुर्घटना न हो, गई हो। यह भय सबको संतान लगा। खोज-बीन हुई नरेंद्र को मित्रों के घर तलाश किया। बालसखा तो सब चुपचाप सो गए थे। इतनी देर रात तक बच्चे जागते ही कहाँ है? फिर भी उन्हें उठा-उठाकर पूछा गया कि नरेंद्र को कही देखा था। सभी ने एक ही उत्तर दिया कहीं नहीं। उन बालसखाओं के अभिभावक भी चिंतित हो उठे, क्योंकि चंचल और शरारती होने के कारण नरेंद्र भीस अपने बच्चों के समान प्रिय था, इसलिए उनकी भी नींद जाती रही और वे भी खोज-बीन में लग गए।
नरेंद्र के स्वभाव से परिचित किसी वृद्ध व्यक्ति ने पूछा— "आज नरेंद्र को किसी ने कोई काम करने से रोका था क्या ?
“नहीं तो और रोकने से वह मानता थी कहाँ है?” नरेंद्र के ही किसी निकट संबंधी ने कहा।
लड़कों से पूछा गया तो उक्त घटना का पता चल गया और वृद्ध परिचित अंदाज में चलते हुए पहुँचे, उसी बगीचे में उसी आम के पेड़ तले जाकर रुके जिसमें कि माली ने ब्रह्मराक्षस का निवास बताया था, आवाज लगाई। नरेंद्र! ओ नरेंद्र।
“मैं यहाँ हूँ” बापू— ऊपर से नरेंद्र की आवाज आई। नीचे उतरो बेटा। सब लोग परेशान हो रहे हैं और नरेंद्र, जब नीचे उतरा तो पूछा कि वहाँ क्या कर रहे थे? नरेंद्र ने बताया कि ब्रह्मराक्षस की प्रतीक्षा। मैं उससे मिलना चाहता हूँ।”
चलो। घर चलकर सोओ। यहाँ कोई राक्षस नहीं रहता। माली ने मुझसे झूठ बोला था। नरेंद्र को घर ले जाया गया। सत्य को जानने के लिए यही निर्भीक जिज्ञासु आगे चलकर स्वामी विवेकानंद के नाम से विश्वविख्यात हुआ; जिसने सभी धर्मों का तत्त्व निचोड़कर एक शब्द में कहा निर्भीकता।
बंबई विश्वविद्यालय के प्रांगण में बड़ी चहल-पहल थी। चारों ओर उत्साह-उल्लास था, सभी के चेहरों पर खुशी फूट पड़ रही थी। इसका कारण था, आज का दीक्षांत समारोह वर्षों का परिश्रम आखिर आज डिग्री के रूप में मूर्त हो रहा था। युवकगण भविष्य के बारे में सुनहले स्वप्न संजोते, वैभवशाली जीवन का ताना-बाना बुनते घूम रहे थे। उन दिनों बी. ए. पास करने वालों के लिए यह असंभव भी न था। स्नातक उपाधिधारियों के लिए उच्च प्रशासनिक पदाप्राप्त करके साहबी ठाट-बाठ का जीवन व्यतीत करना बहुत आसान था।
मिसे! तुमने क्या योजना बनाई, एक गुमसुम से लगने वाले ने टोका। योजना— "अरे! हाँ ! मै शिक्षा युवक को उसके मित्रों के स्वरूप और उद्देश्य पर विचार कर रहा था। तो विचारक जी। क्या है आपका विचार? एक अन्य मित्र ने चुटकी ली। मेरे विचार में शिक्षा का तात्पर्य सुसंस्कारिता के साथ कुछ ऐसी तकनीकों को सैद्धांतिक व व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त करना है, जिसके द्वारा एक अच्छे नागरिक के रूप में समाज को लाभांवित किया जा सके। बदले में थोड़ा-सा लेकर अपना जीवनयापन किया जाए। यही शिक्षा का तात्पर्य और शिक्षित का कर्त्तव्य है।" आप लोगों के शेखचिल्लियों, जैसे ताने-बाने पाने की अकुलाहट को देखकर लगता है कि वर्षों बाद भी ये दोनों चीजें समझ में नहीं आईं। आप जैसे अनेकों और होंगे।
“ऐसे समय जबकि देश समाज बड़ी जटिल स्थिति से गुजर रहा है। तिलक, गोखले जैसे महापुरुष विचारशील युवकों को पुकार रहे हैं। इस पुकार को अनसुनी कर देना मेरे बस की बात नहीं। विदेशी सरकार की जी हुजीरियों की फौज में भर्ती होना शिक्षा का भी अपमान है और शिक्षित का भी। अतएव मैं तो नवजागरण के स्वयं सेवकों की टोली का सदस्य बनूँगा। गोखले एजूकेशन सोसाइटी में शामिल हो माध्यमिक विद्यालय में अल्प वेतन भोगी-अध्यापक बनूँगा। ताकि सही ढंग से शिक्षितों को राष्ट्र और समाज के लिए तैयार कर सकूँ।” मिसे ने अपनी बात पूरी की।
उनके इस कथन से सभी साथी भौंचक्के रह गए। किसी से कुछ कहते न बन पङा। घर आने पर परिवार वाले कुटुंबीजन, एक-एक पर युक्तियाँ सुझाने लगे। सभी का सार एक ही था—" धन-वैभव बटोरने के लिए प्रयास। सभी के कह चुकने पर शंकरराव ने अपना निर्णय सुना दिया। सुनकर जैसे सभी आसमान से उड़ते हुए जमीन पर आ गिरे। सभी ने समझाया यह बातें उनके लिए तो ठीक है; जिनके परिवार की आर्थिक स्थिति सुदृढ़ है, पर जिसके यहाँ रोज दो समय की रोटी नसीब न हो, उन्हें ऐसा निर्णय लेना ठीक नहीं।"
शंकरराव ने विनम्रतापूर्वक अपने घर वालों को समझाया। हमारे भारत में गौतमबुद्ध, महावीर विस्तीर्ण राज्य छोड़कर उतरे, यह सही है, पर यह एक पक्ष है। दूसरा पक्ष यह भी है कि जिस का घर-परिवार एक-एक रोटी के लिए तरस रहा था, उस घर का उच्चशिक्षित युवक नरेंद्र विवेकानंद बनकर समाजसेवा के लिए अर्पित हो गया। कारण एक ही है, संक्रमण कालीन स्थिति में समाज सभी को पुकारता है। जो जिस स्थिति में है, उसी स्थिति से निकल कर समाज देवता की आराधना के लिए आगे बढ़े। समाज देवता की आराधना के लिए आगे बढ़े। स्थिति सँवर जाएगी, तब आएँगे। यह तो कायरता है क्लीवता है। जो आज न कर सका वह कभी न कर सकेगा।
वह घर वालों को जैसे-जैसे समझाकर बंबई की जगह कोलाबा जिले के ग्रामीण अंचल में आ गए। यह बोर्डी गाँव आदिवासियों का था। यहाँ है। बहाव को रोक कर बाँध बाँधना और पानी को अभीष्ट दिशा में मोड़ देना संभव तो है, पर है कठिन।
कठिन कार्यों को संपन्न करने के लिए प्रखर-प्रतिभा की आवश्यकता होती है, साथ ही प्रबल प्रयत्नों की भी। इसके लिए आवश्यक साधन भी जुटाने पड़ते हैं। नीचे की दिशा में बहते प्रवाह को बाँध के रूप में जो लोग रोक सकते हैं, उनके लिए यह भी संभव हो जाता है कि उस निरर्थक दौड़ने वाले पानी का सदुपयोग करके बिजली घर बना सके पनचक्कियाँ चला सकें। यह श्रम साध्य प्रक्रिया जिनसे बन पड़ती हैं, वे अपनी मनस्विता बहाते चलते है। अपनी विशिष्टता से अनेकों को अनुप्राणित करते हुए अपने साथ घसीटते ले चलते हैं। एक साहसी के साथ अनेकों साहसी बनते हैं। जबकि एक कायर के साथ अनेकों को कायर बनने में भी देर नहीं लगती। विचारों की शक्ति अपार है, वह ऊँचा भी उठा सकती है और नीचे गिराने में भी समर्थ है। इस शक्ति की महिमा असीम और अपार है। उसकी क्षमता को अपनाया और कर्मरूप में परिणत किया जाना चाहिए।
मनुष्य अनेक प्रकार के कार्य करता है। करने से पूर्व वह प्रक्रिया विचार रूप में विकसित होती है। विचार तब बनते हैं, जब अनगढ़ कल्पनाओं का बुद्धि द्वारा इतना परिमार्जन कर लिया जाता है कि वे व्यवहार में उतारने योग्य बन जाएँ। विचारों का शरीर के समस्त अंग अवयवों पर आधिपत्य हैं। कठपुतली को धागों के सहारे बाजीगर नचाता है। मन के निर्देशन पर ही शरीर के विभिन्न अवयव निर्देशित प्रक्रिया पूर्ण करते है। इसी का नाम कर्म है। वे मात्र विचारों की परिणति है।
अपने भले-बुरे कृत्यों के लिए तो विचार उत्तरदाई है।ही इसके अतिरिक्त वे समीपवर्ती लोगों को विशेषरूप से प्रभावित करते है। एक दो विचारशील व्यक्ति ही मिल-जुलकर समूचे परिवार का स्तर एवं भविष्य विनिर्मित करते है। बालकों पर अभिभावकों ओर अध्यापकों का विशेष प्रभाव पड़ता है। बालक विशेषरूप से और बड़े सामान्यरूप से उन प्रभावों से प्रेरणा लेते है और अपने लिए कर्त्तव्य निर्धारित करते है।
एक प्रकार के विचारों वाले जब मिल-जुलकर रहने लगते है। एक दिशा में सोचते और कदम उठाते है तो वह संगठन बन जाता है। जब तक विचारों में एकता और घनिष्ठता नहीं, तब तक भारी भीड़ भी कही जमा होती है तो उनका स्वरूप मात्र मेले-ठेले जैसा बनेगा। प्लेट फार्मों, सड़कों में, बसों रेलों में, अनेक लोग बैठे और चलते-फिरते दीखते है, पर उनके उद्देश्यों की एकता न होने से वे मात्र भीड़ बनकर रह जाते है। एकदूसरे की सहायता तक नहीं कर पाते, पर जब भावनात्मक एकता और क्रियापद्धति में एकरूपता होती है तो छोटा समुदाय भी, बड़े चमत्कार दिखाने लगता है।
विचारोँ की विद्युतशक्तिमात्र संबद्ध व्यक्तियों तक सीमित नहीं रहती; वरन वह समूचे अंतरिक्ष में बिखर जाती हैं। वे हवा की तरह उड़ते रहते है और जहाँ भी अपनी अनुरूपता देखते है
वहाँ डेरा डाल बैठते हैं। धातुओं की खदानें भी इसी प्रकार जमा होती है। दूर-दूर तक रेत में बिखरे हुए कणों में किसी जगह एकत्रित हुआ ढेर अपने चुंबकत्व द्वारा बिखरे कणों को समीप घसीटता रहता है और छोटे-से बड़ा बनता रहता हैं। विचारों के संबंध में यही बात हैं। वे जब भी जहाँ भी एकत्रित होते हैं, वहाँ अपना समुदाय बना लेते हैं। विभिन्न प्रकार के वर्ग इसी प्रकार बनते हैं, उनमें प्रौढ़ता, परिपक्वता आती-जाती हैं तो क्षमता और भी अधिक बढ़ती है। अपने प्रभाव शक्ति से वे अनेकों को लपेट में लेते हैं और छोटे समुदाय को बड़ा बनाते है। इसी प्रकार संसार में अनेकानेक विचारधाराएँ बनती और वर्ग बनते रहते हैं। यदि कोई आदर्शवादी विचारधारा समूचे अंतरिक्ष को आच्छादितकर ले तो एकता समता का वातावरण सहज ही बन सकता है। इक्कीसवीं सदी ऐसे ही कुछ विचार पुंज लिए साथ आ रही है।
प्रयाग निवासी और दूर से आने वाले त्रिवेणी संगम की ओर जा रहे थे, कुछ उधर से लौट रहे थे। माघ मास की कड़कड़ाती सर्दी बिना किसी भेद-भाव से सभी को अपनी ठिठुरन भरी धमकी सुनाकर काँपने के लिए विवश कर रही थी। ऐसे में कुत्ते का छोटा-सा पिल्ला, जो थोड़ी देर बाद कूँ-कूँ कर देता, उसकी खबर किसे होती है। सड़क के किनारे पड़ा वह बस आने-जाने वालों को एक नजर उठा कर देख लेता। मानों पूछ रहा हो— "हे !" धर्मधुरंधरो! तुम्हारे धर्म में सेवा, सहिष्णुता, पर दुःख कातरतायुक्त सम्वेदनाओं का स्थान है या नहीं? पर अपनी प्यास को रोककर यक्ष के सवालों को सुनने, जवाब देन वाले युधिष्ठिर का सा धैर्य भला किसी में कहाँ था? उलटे उसे पैरों की ठोकर और लगा देते।
इसी बीच एक प्रौढ़ वय का व्यक्ति निकला, उसने पिल्ले को देखा, उठाया और अपनी छाती-से चिपटा लिया और चल पड़ा। त्रिवेणी संगम की ओर नहीं, बल्कि वापस टूटे-फूटे अपने आवास की ओर। द्वार खोलकर एक मात्र शीतकालीन वस्त्र, फटा कंबल उठाया और उसमें पिल्ले को लपेट लिया हलके-से गर्म दूध को सकोरे में भरकर पिलाना शुरू किया था कि एक महिला उन्हें खोजती हुई आ गई। क्या कर रहे हो भाई? बैठो बहिन कहकर उन्हें आत्मीयतापूर्वक चटाई पर बिठाया। बहन ने अपने भाई से थोड़ी देर अपने साथ घूम आने का आग्रह किया। इस पर वह बोले— "बहिन अभी इस पिल्ले की देख-रेख मेरे जिम्मे है। इसकी माँ आ जाए तो मैं चलूँ।"
पता नहीं आप इसे कहाँ से उठा लाए? कैसे ढूँढ़ सकेगी इसकी माँ? भाई ने जवाब दिया— "पशु कहे जाने वाले इन प्राणियों में हम मनुष्यों से अधिक भाव-सम्वेदना है। एक के प्राण दूसरों को पुकार ही लेते हैं। चाह-राह बना ही देती है। राह भूलकर भटका है तो सिर्फ मनुष्य क्योंकि वह भावनाओं और विवेक की कंपास खो बैठा है। फिर दिशा कौन सुझाए? पिल्ला दूध पी चुका था, उसने संतुष्ट हो कूँ कूँ की। लगा जैसे उनके कथन ये हामी भर प्रामाणिक ठहरा रहा हो। क्या कभी मूर्छित और जर्जर ढाँचा ढोने वाले धर्मोपदेशक समाजसेवी सच्चाई को जानने की कोशिश करेंगे? ईंट-पत्थर जुटाने जरा-जरा-सी बात पर दंगा फसाद करने में सारी शक्ति कचड़े में फेंक देने वालों को, कभी यह पता चलेगा कि उनका भगवान हाथी, गीध, गिलहरी तक की सेवा के लिए सब कुछ भुलाकर नंगे पाँवों दौड़ा है।" गोद में उठाकर छाती से चिपटाकर असीम प्यार दिया है। कहते-कहते गला रुँध गया हिचकियाँ शुरू हो गई, आँखों से आँसुओं का झरना बह निकला।
आगंतुक महिला की आँखों में भी आँसू डबडबा गए। जिस किसी तरह अपने को रोकर-समझाते हुए कहा— "होगा। भाई जरूर होगा कब? भर्राये गले से एक शब्द निकला।" उत्तर था— "जब आज की पीढ़ी मानव के सूखे-बंजर अंतराल भावनाओं की भागीरथी प्रवाहित करने के लिए भगीरथ बन जाएगी।" जब ये अनेकों भगीरथ इस गंगावतरण हेतु अपने अस्तित्व को होमने के लिए तैयार होंगे। जब भक्त भगवान की पीड़ा को समझेंगे और निवारण के लिए सर्वस्व त्याग को एक उपलब्धि मानेंगे।
हाँ ! तब तो होगा बहिन। तब अवश्य होगा। विश्वास जगा, आशा उभरी। "पर! आप इस जीर्ण-शीर्ण कुरते और फटे कंबल में इतनी भयंकर ठंड में गुजरा करते हैं। सब हो जाता है। नहीं इस बार तो नया कोट बनवाना ही पड़ेगा। बहिन का आग्रह पहले तो टालते रहे पर जब वे नहीं मानी तो उन्होंने स्वीकृति दे शरीर इस प्रक्रिया में चूँकि कोई साथ नहीं दे सकता, इसलिए वह पहले ही साथ छोड़ चुका होगा। इसका एक स्पष्ट कारण यह है कि स्थूलशरीर की विधिव्यवस्था बनाने परिजनों का इसके प्रति मोह होने से दर्शन झाँकी का कौतुक बने रहने से जो ढेरों समय नष्ट हो जाता है, उसे बचाया जाना है। सूक्ष्मशरीर बिना किसी अड़चन के एक व्यापक क्षेत्र में द्रुतगति से सक्रिय होता रह सकता है। इसी कारण प्रत्यक्ष मिलने-जुलने का क्रम क्रमशः कम करते-करते, अब बंद करने की स्थिति में लाने का निश्चय करना पड़ा।
सूक्ष्मशरीर से भी बड़ी कारणशरीर की सत्ता है, उसका कार्य-क्षेत्र अति विशाल है। महाकाल की चेतना सूक्ष्मशरीर धारी ऋषिसत्ताओं के द्वारा भूमंडल के जिस बड़े क्षेत्र में सक्रिय हो सकती है, वह मात्र कारणशरीर के बलबूते ही संभव है। अदृश्य जगत में जो अवांछनीयता घटित हो रही है एवं जिसकी प्रतिक्रिया दृश्य जगत में विभिन्न प्रकोपों विभीषिकाओं के रूप में दृष्टिगोचर हो रही है, उसमें हस्तक्षेप करने की सामर्थ्यमात्र, कारणशरीर में है। इक्कीसवीं सदी में कई ऐसे प्रयास संपन्न करने पड़ेंगे, जो स्थूल एवं सूक्ष्मशरीरों की क्षमता से परे है। ब्राह्मी-चेतना से जुड़कर दिव्य करणशरीर ही उन सब को क्रियांवित करता है; जिन्हें प्रायः अद्भुत एवं अलौकिक कहा जाता है।
इक्कीसवीं सदी निश्चित ही उज्ज्वल सँभावनाएँ लेकर आ रही है। इस अवधि में ऐसे अद्भुत परिवर्तन होंगे कि यह कैसे हो रहा है और कौन कर रहा है, यह अनुमान लगा पाना बहुतों के लिए कठिन होगा। यह कार्य असामान्य है। सूत्रसंचालक ने प्रत्यक्ष मिलने-जुलने का क्रम बंदकर, सूक्ष्मशरीर से सभी परिजनों से संपर्क बनाने एवं दिव्य कारणशरीर द्वारा परोक्ष स्तर, पर हो रहे परिवर्तनों में भागीदारी करने का निर्णय लिया है। ऐसे में प्राणवान परिजनों पर विशिष्ट जिम्मेदारियाँ आती हैं।
पूज्य गुरुदेव की समष्टिगत-साधना में भागीदारी करने का जिनका मन हो, वे न्यूनतम कार्यक्रम के रूप में इस बसंत पर्व से निम्न संकल्प तो कर रही ही ले। इन संकल्पों की पूर्ति जा कर सकेगा। वह सहज ही युग अवतरण का श्रेय भी प्राप्त करेगा तथा बड़भागी कहलायेगा।ये संकल्प इस प्रकार है
1. माह में एक बार गुरुदेव माता जी को अपने घर अवश्य बुलाएँ। यह कार्य अखण्ड ज्योति युगशक्ति गायत्री आदि में से किसी पत्रिका की एक प्रति अपने यहाँ मंगाने से पूरा हो सकता है। गुरुसत्ता की प्राणचेतना से घनिष्ठता स्थापित करने के लिए यह श्रेष्ठतम माध्यम हैं। बन पड़े तो पाँच अनुपाठक और तैयार करे तथा प्रत्येक से पाँच-पाँच साथी और बढ़ाने को कहे। युगऋषि की लेखनी इक्कीसवीं सदी में भी सूक्ष्मशरीर एवं कारणशरीर के माध्यम से यथावत चलती रहेगी। अखण्ड ज्योति को मात्र पत्रिका नहीं; उनकी प्रखर चिंतन चेतना का जीता-जागता स्वरूप माने, जो सतयुग की आधारशिला रखने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने जा रही है। पत्रिकाओं का पठन-पाठन ही परोक्षरूप से उनके द्वारा दी गई ज्ञानदीक्षा है।
2. जन मानस के परिष्कार के लिए युगसाहित्य का विस्तार अपने परिकर में झोला पुस्तकालय अथवा ज्ञानरथ (चलदेवालय) द्वारा करें। लोगों की दुर्बुद्धि को ठीक करने का यही सबसे सशक्त माध्यम है। विचार क्रांति इसी से होगी। इक्कीसवीं सदी संबंधी नूतन साहित्य, जो इन्हीं दिनों लिखा गया है स्वयं भी पढ़े न्यूनतम अपने मंडल के पच्चीस साथियों को पढ़ाए। स्मरण रखे कि विद्याविस्तार ही युग की सबसे बड़ी सेवा है। सद्विचारों का बीजारोपण किया जा सके। तो नवयुग के लिए महामानव तैयार किए जा सकेंगे।
3. अपने समय एवं उपार्जन का एक अंश नियमित रूप से निकाले एवं सत्प्रवृत्ति संवर्ध्दन हेतु, उनका नियोजन करें। प्रतिदिन 2 घंटे या प्रति सप्ताह एक नियत समय युगचेतना के विस्तार हेतु तथा बीस पैसा प्रतिदिन या माह में एक दिन की आजीविका नवसृजन के कार्यक्रमों के निमित्त निकाले। यदि इतना बन सके तो यह कहा जा सकेगा कि परिजनों में संवेदना जागृत है, जीवंत है। निकाले गए समय का उपयोग जन-जन में 21 वीं सदी उज्ज्वल भविष्य गोष्ठी, व्याख्यान, युगसंगीत, दीपयज्ञ, जन्मदिन, तीर्थयात्राएँ आदि। किन्हीं भी विधाओं का उपयोग अपनी रुचि और सामर्थ्य के अनुसार किया जा कसता है। अंशदान द्वारा इनके लिए साधन जुटाए जाते रह सकते है। इस न्यूनतम सेवा-साधना में निष्ठापूर्वक लगे रहने वाले कम-से-कम एक लाख लोकसेवी तैयार करने का संकल्प है।
4. नवयुग की अभ्यर्थना अगले दिनों दीपयज्ञ मालिका द्वारा की जानी है, इसके लिए 1925 की प्रथम महापूर्णाहुति तक इन एक लाख लोकसेवियों द्वारा एक करोड़ याजक तैयार करना है। इस हेतु अपना अधिक-से-अधिक योगदान दीप, यज्ञायोजनों तथा याज्ञकों को तैयार करने के रूप में दें। सारे भारत में यह पूर्णाहुतियाँ 1995 तथा 2000 के बसंत में संपन्न होंगीं। अपना पुरुषार्थ नियोजितकर अधिक-से-अधिक साथी सहयोगी तैयार करें, ताकि वे भी नवयुग की अगवानी में युगशक्ति के साझीदार बन सके।
5. साप्ताहिक सत्संग का आयोजन नियत स्थान पर करें और कुछ न बने, तो टेप के साथ माध्यम से सहगान कीर्तन वंदनीय माता जी के चौबीस गायत्री मंत्र पूज्य गुरुदेव के साथ उच्चारितकर ऋषि चेतना से अपने आप को जोड़े। इन माध्यमों से युगऋषि के विचारों को जन-जन तक पहुँचाने सक पुध्य कमाए। आज के युग की यह महत्त्वपूर्ण सेवा है।
6. अपने मौहल्ले समीपवर्ती स्थानों, कस्बों की प्रभातफेरी साइकिल यात्रा के माध्यम से संपन्न करें। यही इस युग की तीर्थ यात्रा है। घर-घर अलख जगाने हेतु संगीत प्रचार उपकरणों से सज्जित साइकिलों द्वारा सप्ताह में एक बार समूह सहित निकल सकें, तो नवयुग के आगमन का उद्घोष जन-जन तक पहुँच सकेगा।
"नया संसार बसाने" "नया इंसान बनाने" के लिए, अगले दिनों सारे भारत में एक लाख साइकिलों की तीर्थयात्रा; सतत चलाते रहने का युगऋषि का मन है। उन्हें आशा है ,उनका यह संकल्प अवश्य पूरा होगा।
7. महापूर्णाहुति तक, एक या दो वर्ष में, एक बार सिद्धपीठ शांतिकुँज की तीर्थ चेतना से अनुप्राणित हो; शक्तिसंचय बैटरी चार्ज कराने के लिए किसी एक सत्र में सम्मिलित होने का संकल्प लें। संभव हो तो अपना जन्मदिवस यही मनाएँ। स्मरण रखें गुरुदेव-माताजी की प्राण-ऊर्जा इस तीर्थ परिकर में विशेषरूप से आगामी दस वर्ष तक और तदुपरांत एक शताब्दी तक घनीभूत रूप में विद्यमान रहेगीं। वर्ष में एक बार उनसे से वह लाभ मिलता रहेगा, जो उनकी साधना में भागीदारी से किसी को मिल सकता है। प्रस्तुत पाँच दिवसीय सत्रों में, परिजनों द्वारा उठाए जा रहे उत्तरदायित्वों के अनुरूप प्राण अनुदान देकर, उन्हें समर्थ अग्रदूत के रूप में विकसित करने का सशक्त प्रयास किया जा रहा है।
उपरोक्त सातों सूत्रों को वसंतपर्व परम पूज्य गुरुदेव के आध्यात्मिक जन्मदिवस पर दिया गया विशेष उद्बोधन मानें। उनके दर्शन प्रत्यक्ष न हो पाने की स्थिति में भी, उनके सूक्ष्मशरीर तथा कारणशरीर की दिव्य चेतन-ऊर्जा से संपर्क जोड़ने का इसे प्रमुख माध्यम माने। ध्यान रखें कि अभी तक महाकाल की शक्ति से किए गए सभी संकल्पपूर्ण हो कर रहे हैं। अतः अपने को अर्जुन, हनुमान, शबरी, केवट की श्रेणी में रखते हुए, निमित्तमात्र मानकर श्रेय अर्जित करने का यह सौभाग्य हाथ-से न जाने दें।
बूँद समुद्र में मिल गई। पर उसे अपने आपका यह अंत सहन न हुआ, वह फिर अलग रहने के लिए छटपटाने लगी।
समुद्र ने समझाया— "नादान छोकरी! अलग रहकर क्या करेगी? मैं इतना विशाल हूँ, तुझ जैसी अनेक बूँदों के मिलने से ही तो बना हूँ। क्षुद्रता गँवाकर महानता पाने की ललक ही तो मेरी लहरों पर थिरकती है? तेरा साथ रहने में क्या हर्ज है?"
पर बूँद मानी नहीं, उसे अकेलापन ही भाया और उसी के लिए जिद करने लगी। सूरज ने कहा— "तो मेरी किरणों के साथ तप और धरती पर उतर जिस आपे को पाकर तू सुखी रह सके, वह उससे कम मूल्य पर नहीं मिल सकता। बूँद ने यही निष्कर्ष निकाला कि अलग रहने की बात व्यर्थ है। सही या तो समुद्र का रास्ता है या सूरज का बताया।
क्रमबद्ध काम करने से ही सफलता मिलती है। चूल्हा जलाना, पात्र उस पर रखना, पानी डालना, बाद में चावल डालना। यही है— भात बनाने का सही तरीका। यदि यह क्रम आगे-पीछे कर दिया जाए या उलट दिया जाए तो उस प्रयास में सफलता न मिलेगी। हमें अपने कार्यों का निर्धारण क्रमबद्ध रीति से करना चाहिए।
अच्छा मनुष्य उस मधुमक्खी के समान है, जो झाड़ियों में से भी मीठा शहद निकाल लेती है। बुरा मनुष्य मकड़ी के समान है, जो सुगंधित फूलों में से भी विष इकट्ठा करती है।
sadsadsadssasASas
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महान व्यत्कित्व झोपड़ों में भी शोभा पते हैं, पर निकृष्टजन महलों में भू अभागे बंदी की तरह जीवन बिताते हैं।