आत्म विस्तार ही सर्वोच्च धर्म

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जीवन का एक लक्ष्य है ज्ञान और द्वितीय सुख। ज्ञान और सुख के समन्वय का ही नाम मुक्ति है। आत्मचिंतन के द्वारा हम माया बन्धनों और सांसारिक अज्ञान को काट लेते हैं और विषय वासनाओं से छूट जाते हैं तो हम मुक्त हो जाते हैं। किन्तु ऐसी मुक्ति तब तक नहीं मिल सकतीं जब तक कि सृष्टि के शेष प्राणी बन्धन में पड़े हैं।

जब हम किसी को क्षति पहुँचाते हैं तो अपने आप को क्षति पहुँचाते हैं। हम में और हमारे भाई में कोई अन्तर नहीं है। जिस तरह छोटे-छोटे अवयवों से मिलकर शरीर बनता है, उसी प्रकार छोटे-छोटे प्राणियों से मिलकर संसार बना है। कान को दुःख होता है तो आँख रोती है। उसी तरह समाज के किसी भी व्यक्ति का दुःख हमारे पास पहुँचता है, इसलिए केवल अपने सुख से मुक्ति की कल्पना नहीं की जा सकती।

इस कसौटी पर जब लोगों को अपने लिए बढ़-चढ़ कर अधिकार माँगते हम देखते हैं तो ऐसे आदमी से बड़ी घृणा लगती है। अधिकार ही व्यक्ति को स्वार्थी और संकीर्ण बनाते हैं। विश्व में जो कुछ अशुभ है, उसका उत्तरदायित्व प्रत्येक व्यक्ति पर है। अपने भाई से अपने को कोई पृथक् नहीं कर सकता। सब अनन्त के अंश हैं। सब एक दूसरे के रक्षक और सहयोगी है। वास्तव में वही सच्चा योगी है, जो अपने में सम्पूर्ण विश्व को और सम्पूर्ण विश्व में अपने को देखता है। अपने लिए अधिकारों की माँग करना पुण्य नहीं है। पुण्य तो यह है कि हम छोटे से छोटे जीव के प्रति अपने कर्तव्य का पालन कर सकते हैं या नहीं। इसके लिए अपने अधिकार छोड़ने पड़ते हैं। इस लोक में यही सब से बड़ा पुण्य है। आत्म विस्तार ही इस संसार का सर्वोच्च धर्म है। इसे सौ टके की एक बात समझ कर हृदयंगम करना चाहिए।


लोक-शिक्षण की कथनी व करनी

लगता है दुनिया की सारी गर्मी कलकत्ता में सिमट आई है और कलकत्ता की समूची तपन इस कमरे में-आपस में बातचीत कर रहे सदस्यों में से एक न उकताहट भरे स्वर में कहा। बाहर क्या स्थिति होगी? कहकर एक अन्य सदस्य ने उठकर दरवाजे पर पड़ी चिट उठाई और बाहर झाँका। देखकर उसे आश्चर्य हुए बिना न रहा कि ऐसे में कोई पैदल चला आ रहा है। बढ़ रहे कदमों के साथ रंग-रूप से स्पष्ट होने लगा कि कोई अँग्रेज है। इतनी तपन में पैदल चलना वह भी परतन्त्रता के दिनों में अँग्रेज का सचमुच विचित्र था।

थोड़ी देर में आने वाला नजदीक आ चुका था। देख कर सुखद आश्चर्य हुए बिना न रहा-अरे यह तो अपने-चिर-परिचित मित्र हैं। दोनों एक दूसरे को देखकर मुस्कराए। उनका हाथ पकड़ कर कमरे के अन्दर ले गए। घड़े के शीतल जल से हाथ मुँह धुलवाया और बिठाकर हाथ से पंखा झलने लगे।

बातों के सिलसिले में एक सज्जन ने आगन्तुक से कहा “भाई यह तो अत्याचार है” स्वर में पर”। “कैसे”?

“इतनी भीषण तपन में पैदल आना और क्या है? अब आप ही बताइए कहाँ जोरासाँको स्थित टैगोर निवास और कहाँ यह अपर सर्कुलर रोड पर स्थित यह ‘विशाल भारत’ का कार्यालय, दो मील से कम दूरी न होगी”?

“तो क्या हुआ”? “कहिए क्या नहीं हुआ”? “आप जैसे अहिंसक भी अपने ऊपर हिंसा करने से चूकते नहीं”।

सुनकर वह कुछ गम्भीर हो गए फिर मुस्कराने का प्रयास करते हुए बोले “यह हिंसा नहीं मर्यादा के अनुशासन है। अनुशासन सर्वदा कठोर दिखता है। मर्यादाओं से बँधा जीवन उच्छृंखल उपभोग न करने के लिए स्वेच्छया बाध्य है”।

“समझ में नहीं आता आप न जाने क्यों अपने को इन अनेक स्वनिर्मित बन्धनों में जकड़े रहते हैं? अब इतनी कड़ी धूप में ताँगा न लेना, सवारी का उपभोग न करना भी अनुशासन हो गया”। “बात ऐसी नहीं है समझने की कोशिश करिए चतुर्वेदी जी। अनुशासन तटबन्ध है जिनसे अपने को कठोरतापूर्वक बाँधे जीवन नदी सहज ही अपने उद्देश्य सत् चित आनन्द के महासागर को पा लेती है”।

“पर” पूरी बात तो सुनिये! “लोक शिक्षक की गरिमा सामान्य से कुछ अधिक ही होती है। उसे स्वयं के जीवन द्वारा प्रयोगात्मक रूप से यह प्रमाणित करना होता है कि कम से कम साधनों में औसत नागरिक स्तर पर जीते हुए किस तरह उत्कृष्टतापूर्वक महानता की राह पर चला जा सकता है। “किन्तु आप तो सिर्फ शान्ति निकेतन में शिक्षक हैं। क्या वहीं पर पूरा लोक समाया है”।

“नहीं इतना ही होता तो कुछ विशेष नहीं था। शान्ति निकेतन में पढ़ाने के साथ विभिन्न पत्रों में लेख लिखता हूँ और दूसरों को उन्नत जीवन के लिए प्रवचनों के माध्यम से भी प्रेरणा देता हूँ। ऐसी स्थिति में यदि स्वयं नहीं करूँगा तो लोग समझेंगे कि ये बड़ी बातें खाली लिखने और कहने भर के लिए हैं। आचरण और व्यवहार के लिए यदि इनका महत्व रहा होता तो प्रवचन करने, लेख लिखने वाला भला स्वयं के जीवन में क्यों न उतारता?”

“सो तो ठीक है पर इतनी अधिक कठोरता”। “ऐसा न होने पर कितने ही यह समझ बैठेंगे कि उत्कृष्ट जीवनयापन का मार्ग सिर्फ किन्हीं विशेष साधन सम्पन्नों के लिए है। यही कारण है आदि से संतों ने त्याग के मार्ग को अपनाया है। कुछ रुककर कमरे में उपस्थित लोगों की ओर देखते हुए बोले-लोक शिक्षक का दायित्व बड़ा कठिन है। जब वह सोलह आने आदर्शों को अपने जीवन में उतारेगा तो दूसरे एक आना उतारने की सोचेंगे।

“सुनकर सभी मित्र गण उनके अनूठे व्यक्तित्व से अभिभूत हो उठे। जीवन के माध्यम से व्यावहारिक लोकशिक्षण करने वाले यह तपः पूत मानव थे, सी. एफ. एण्ड्रूज। जो जन-जन के हृदय में दीनबन्धु बन प्रतिष्ठित हुए। उनके जीवन के आलोक में अपने अन्दर झाँक कर जरा स्वयं देखें कि औरों को हम जो सिखलाते, उसे स्वयं कितना अपनाते हैं”?


जाग्रत भावनाओं का युग अब निकट ही

संक्रान्ति के इन क्षणों में मानव सामूहिक रूप से एक नए जमाने के प्रवेश द्वार पर आ पहुँचा है। प्रवेश करते ही उसे सारी परिस्थितियाँ बदली हुई मिलेंगी। ऐसी दशा में हरेक का अपरिहार्य दायित्व हो जाता है कि प्रविष्ट होने के पहले अपने को तद्नुरूप ढाल ले। बदले परिवेश की विशिष्टताओं के अनुरूप स्वयं को विशिष्ट बना ले। इन विशेषताओं का केन्द्र बिन्दु होगी मानवीय संवेदना। जिसमें यह जितनी अधिक विकसित होगी वह उतना ही अधिक सुयोग्य साबित हो सकेगा। उतना ही कारगर सक्रिय सतेज बन सकेगा।

पहाड़ों पर चढ़ने वालों को महीनों पहले वहाँ की जलवायु को सह सकने की क्षमता देने वाले अभ्यासों से गुजरना होता है। शरीर और मन दोनों की कतिपय क्षमताएँ निखारनी पड़ती हैं। जो अपने को जितना अधिक प्रशिक्षित कर सका वह उतना ही सफल पर्वतारोही साबित होता है। अंतरिक्ष यात्रियों को यात्रा के पहले सालों-साल खाज जीवन शैली का अभ्यास कराया जाता है। हवा का दबाव सहा जा सके गन्तव्य के गुरुत्वाकर्षण में चला फिरा जा सके इसके लिए न जाने कितनी प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है। तब कहीं अंतरिक्ष में, अन्य ग्रहों में जाने का काम करने का गौरव हासिल होता है। जो इन प्रशिक्षणों को कष्ट साध्य बताते, अस्वीकार करते, उन्हें बदली हुई परिस्थितियों में खुद को बनाए रख पाना असम्भव प्रायः होता है। ठीक यही बात भावी समाज के अनुरूप अपने को ढालने के बारे में हैं। आज के बुद्धिवादी युग में अपनी सम्वेदनाओं को जाग्रत परिमार्जित और विस्तृत करने की बात कुछ विचित्र सी लगती है। पर किया क्या जाय? नियन्ता ने भावी समय के लिए इसे अनिवार्य योग्यता घोषित कर दिया है। निहायत जरूरी इस प्रवेश शुल्क को चुकाए बिना खैर नहीं।

योग संवेदनाओं का स्थान बौद्धिकता से सर्वदा उच्च रहा है। इनके कारण को विकसित जीवन की सर्वोच्च ऊँचाई भी कहा जा सकता है। आत्म जागरण अथवा अध्यात्म की शुरुआत यहीं से होती है। यह एक ऐसा तालाब है जिसमें अनेकों नेक सद्गुण अपने-आप सिमट-सिमट कर आ भरते हैं। इतना सब कुछ होते हुए इस ओर गति न होने का कारण है बुद्धिवाद की साँकल में जकड़े होना। बहुतों के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है, कि अब यह साँकल कैसे टूटेगी। युग तो बुद्धि का है भाव की तरफ गति कैसे होगी? भाव के विकसित होने का कोई उपाय भी नहीं दिखाई पड़ता। सारे जीवन की व्यवस्था का संचालन बुद्धि से होता मालूम पड़ता है। इस बुद्धि के शिखर पर बैठे युग में भाव की ओर रास्ता कैसे खुले?

पर जीवन का का विचित्र नियम है। वह यह कि एक अति पर जा पहुँचने पर दूसरी अति की ओर चल पड़ना आसान हो जाता है। ठीक घड़ी के पेंडुलम की भाँति। जब यह बायीं तरफ के आखिरी सिरे को छू लेता है तो दायीं और मुड़ना शुरू हो जाता है। आज का जमाना न सिर्फ बुद्धि से ग्रस्त है बल्कि त्रस्त और पीड़ित भी है। समाधान जितने खोजे जाते हैं उतनी ही नई समस्याएँ जन्म लेती हैं। प्रत्येक समाधान स्वयं में समस्या बन जाता है।

बौद्धिकता का संताप अपने चरम शिखर पर छू रहा है अब स्वाभाविक है कि जीवन का पेंडुलम भाव की ओर मुड़ चले। इस स्थिति को भाँप लेने के कारण ही डॉ. पाल ब्रान्टन का स्प्रिचुअल क्राइसिस ऑफ मैन” में कहना डडडड धरती पर शीघ्र ऐसा समय आने को है, तब पहली बार मनुष्य की भाव सम्वेदनाएँ इतनी गहरी और विस्तृत होंगी, जितना कि इसके डडडड भी नहीं हुई। कारण कि पहले मानव जाति ने बुद्धि का स्वाद नहीं चखा था डडडड के रहते उसमें इस ओर लालच था। अब इस स्वाद को चख लेने, उकता जाने के कारण एक साम्राज्य जन्म होगा। बुद्धि का संचालन संवेदना डडडड हाथ होगा। इनसे संचालित हो वह विवेक डडडड।

इस सदी के शीर्षस्थ बुद्धि माने में से एक हुए हैं बर्ट्रेंडरसेल। उनने अपनी जीवन कथा में एक स्थान पर अपना एक अनुभव बताया है। ग्रामवासियों का मस्ती भरा प्रेममय जीवन विस्मय हुआ और हर्ष भी। वह लिखते हैं कि बुद्धि की कमी के बाद भी जीवन इतना हलका फुलका और मस्ती हुआ और वह पहली बार मानने को बाध्य हुए कि भावनाओं का स्थान बुद्धि से ऊपर है। इतना ही नहीं वह इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि भावनाएँ व्यक्ति के व्यक्तित्व को विस्तृत बनाती हैं और बुद्धि उसे स्वार्थों के संकीर्ण दायरे में समेट देती है।

रसेल के अनुभव की सत्यता हर कहीं परखी जा सकती है। बुद्धिवादी सम्राट अशोक की सोच डडडड थी कि हर किसी को जीत कर अपने अहं के झण्डे तले ला पटकेगा। साधारण दृष्टि में भले उसकी योजना विस्तार की लगे पर असलियत में वह हर किसी को स्वार्थों के दायरे में घसीट लेना चाहता था। जिनने उसकी इस नीयत को परखा उसे चण्ड अशोक कहने लगे। पर कलिंग की विजय के दौरान तड़प रहे सिपाहियों, अनाथ-बेसहारा स्त्रियों भूख से व्याकुल बच्चों की पीड़ा देखकर उसकी भाव सम्वेदनाएँ जग पड़ीं। जाग्रत सम्वेदनाओं ने अहंकार स्वार्थ को कूड़े के ढेर में फेंक दिया। फिर जो विस्तार का क्रम शुरू हुआ रोके नहीं रुका। पहले का चण्ड अशोक अब अशोक महान बन गया।

राजकुमार सिद्धार्थ पहले सामान्य थे। राह चलते बीमार और पीड़ित वृद्ध ने उनके मर्म को छुआ। संवेदनाएँ जगी और इनने उन्हें बेचैन कर के रख दिया। मानव के कष्ट को कैसे दूर करें इस हेतु वह व्याकुल हो उठे। तद्नुरूप क्रियाशीलता- आत्म विस्तार ने उन्हें बुद्ध बना दिया। ऐसी ही घटना चैतन्य के जीवन में घटी। बंगाल में कोई मुकाबला न था उनकी प्रतिभा का। उनके तर्क के सामने कोई टिकता न था। उनके शिक्षक भी उनसे डरते थे। दूर-दूर तक खबर थी कि उनकी बुद्धि का कोई मुकाबला नहीं है। पर गया धाम में एक कोढ़ी के कष्ट ने माधवेन्द्र के उद्बोधन ने उनकी संवेदना को जगा दिया। विस्तृत हुआ व्यक्तित्व चाण्डाल, गरीब, दुखी-पीड़ित सभी को अपनाने में जुट गया और वह महाप्रभु बन गए। संवेदनाएँ न जगती तो छोटी सी पाठशाला के शिक्षक बन कर रह जाते।

अपनी बुद्धिमत्ता की धाक जमाने वाले आइन्स्टीन ने जब हिरोशिमा में हुई बर्बरता को सुना। वह अवाक् रह गए बुद्धि का यह दुरुपयोग। उनका समूचा व्यक्तित्व हिल गया और संवेदनशीलता की जाग्रति ने उन्हें बाल कल्याण में जुटा दिया। वह संत बन गए। फ्रेड्रिक हरनेक ने अपनी कृति “अलबर्ट आइन्स्टीन इन लेबेन वाहरहेत, मेन्सच्लिचेकेत एण्ड फ्रेडेन में उन्हीं के शब्दों को दुहराते हुए लिखा है संवेदनाएँ जीवन की दिव्यता हैं। वे ही जीवन की पहेली का हल हैं।

आज के मनोवैज्ञानिक भी इसी सत्या की ओर बढ़ रहे हैं। मनोविद् लेसली. डी. व्हीदरहेड अपनी रचना साइकोलॉजी इन द् सर्विस ऑफ सोल” में लिखते हैं भावनाओं को व्यक्तित्व से निकाल फेंकना सारी समस्याओं का मूल है। इस केन्द्र को पुनः स्थापित और सुदृढ़ किए बगैर वर्तमान के संताप से कोई छुटकारा नहीं। संताप छूटे जीवन की उलझनें सुलझे इसके लिए स्वयं की भावचेतना को जगाना होगा। दूसरे के कष्टों को सामयिक आवश्यकता को समझने का प्रयास करें। प्रयास की तीव्रता जब हमें कुछ करने के लिए बेचैन करने लगे तो समझें कि जाग्रति हो रही है। संवेदनाओं की सक्रियता की शुरुआत होने का लक्षण है सहानुभूति और प्रखरता का चिन्ह है सेवा। इसकी परिणति है अपनत्व का विस्तार अपने पराये के भेद का अभाव।

इसकी सामयिक अनिवार्यता समझ कर स्वयं में इनका विकास किया जाय। नयी परिस्थितियों के लिए ऐसे ही उत्कृष्ट भाव सम्पन्न व्यक्तियों की आवश्यकता है। लक्ष्मी और वैभव न होने पर किसी को रंज नहीं करना चाहिए। बुद्धि की ऊँचाइयों न दिख रही हों तो भी निराश न हों। लालसाओं आवश्यकताओं से सन्तुष्ट होकर समय की माँग को पूरा किया जा सका तो समझना चाहिए कि मानव जीवन धन्य हुआ। भविष्य के भावनात्मक समाज में रह सकने योग्य सुयोग्यता हासिल हुई। कालचक्र इन दिनों सिर से पैर तक संकीर्ण स्वार्थपरता से भरे हुए मानव समूह को आदर्शों की ओर मोड़ रहा है, नये जमाने लायक ढाल रहा है। जो मुड़ न सका उसे कटना पड़ेगा। स्थिति की गम्भीरता को समझें स्वयं को आदर्शवादी परिस्थितियों के अनुरूप मोड़ें। स्वयं प्रकाशित होकर औरों को प्रकाश का प्रतिदान करें।


जब धधक उठी अंतः में ज्वाला

“किधर चलूँ देव” छन्दक ने पूछा।

आज राजकुमार पहली बार राजमर्यादाओं के आडम्बर के परे हटाकर भ्रमण हेतु निकले थे। साथ था सारथी जिसके इस प्रश्न ने उनकी विचारमग्नता को भंग किया। छींक कर बोले ‘वन की ओर चलें।”

शब्दों के साथ रथ भाग चला। साथ ही कुछ पल ठहरी विचारश्रृंखला भी। तो क्या जीवन निरुद्देश्य है? यदि उद्देश्य है तो फिर क्या? प्रश्न जहन को मथ रहे थे। वह सब कुछ तो था उनके पास जिस अधिकतम की संसार में कामना की जाती है, फिर भी कुछ अभाव खटक रहा था।

अचानक वह सकपका गया। सामने एक जर्जर व्यक्ति पथ के मध्य खड़ा था। पोपला झुर्रीदार चेहरा सिर पर श्वेत केश, जो झड़कर थोड़े बचे थे, झुककर दोहरा हुआ जा रहा शरीर धँसी आँखें। हाथ से पकड़ी लकड़ी के सहारे काँपते हुए स्वयं को सँभालने की कोशिश कर रहा था। निर्बलता के कारण हटना चाहकर नहीं हट सका था।

“सौम्य! इसे क्या हो गया है”? उसने सारथी से पूछा। प्रभु! इसे बुढ़ापा हो गया है।

“बुढ़ापा! क्या यह भी दरिद्रता की कोई यातना है। नहीं आर्य। उसने मुस्कराकर महाकुमार की ओर देखते हुए कहा इसके सामने धनी और निर्धन दोनों समान हैं। वैभव का अतिरेक विलासिता की बाढ़ इसे रोकने की बजाय कहीं शीघ्र आकर्षित कर लेती है”।

ओह! वह चुप हो गया विचारों की तेज गति के साथ रथ गतिमान हो गया। फिर शरीर पर इतना अभिमान क्यों? क्यों वैभव के प्रदर्शन का आडम्बर? विलासिता की क्षुद्रता में डूबे अरे मनुष्य के अहं, चूर-चूर हो जा। आत्मा पर आस्था रखने वाले देख तूने स्वयं को कितने चक्रव्यूहों में आबद्ध कर रखा है। आँखें बंद करे कोल्हू के बैल की तरह घूमने वाले कहाँ है तेरा जीवनोद्देश्य।

हटात् वह फिर चौंक उठा। स्त्रियों का दारुण रुदन क्यों? उसे लगा जैसे गगन बिखर जायगा। गहन अंतराल में से वेदना के ज्वालामुखी फूटे पड़ रहे थे।

“सारथी”! उसने पुकारा “आर्य”! “ये पुरुष अपने कंधों पर किसे उठाए लिए जा रहे हैं”। देव! यह मृत शरीर है”। “तो इस मुर्दे के लिए लोग रोते क्यों हैं”।

“कुमार! स्नेह की अनर्गलाओं के तड़कने से किसका हृदय व्याकुल नहीं होता। मनुष्य स्वयं के स्वार्थी के परिप्रेक्ष्य में औरों के जीवन और मृत्यु का मोल करता है।” ऐसे नहीं! “नहीं श्रीमन्त”! इसी तरह हर किसी के मरने पर सब रोने लगे तो लोग जीवित क्यों हैं। “मरना तो सभी को होगा कह कर सारथी ने दीर्घ निःश्वास ली”।

“सभी को” उसके अपने मुख से निकला और रथ की गति के साथ विचार तेज होते गए। बुढ़ापा-मृत्यु-लाश का जलना एक एक दृश्य मन पर उभरने लगा। हर किसी के पास मृत्यु आती है। पर आती कहाँ है वह तो है, हाँ अभी भी हर साल वह व्यक्ति की आयु को एक-एक साल करके अपने मुँह में निगलती जाती है। ठीक उसी तरह जैसे अजगर किसी शिकार को पकड़ कर शनैः शनैः निगलता है। तो क्या जीवन अर्थहीन है। नहीं सिर झटक दिया ऐसा नहीं हो सकता इस सुगठित देहयष्टि चिन्तनशील मन, विभीषण की अपूर्व क्षमता बुद्धि के समन्वित स्वरूप का कुछ उद्देश्य जरूर होगा। कहाँ से आती है समस्त शक्तियाँ? कौन है शक्तिस्रोत? कोई न कोई अवश्य होगा!

वन आ चुका था। दूर वृक्ष के नीचे बैठे ध्यानरत गौरवर्ण पुरुष को देख वह चकित हुए बिना न रह सका।

आश्चर्य से बोल उठे “वह कौन है रे छन्दक” “वह परिव्राजक है श्रीमन्त”। “यह परिव्राजक क्या होता है”?

“जो स्वयं जीवन का उद्देश्य प्राप्त करके औरों को जीवन जीना सिखाता है”। जीवन का उद्देश्य वह बुदबुदा उठा यही तो वह कई दिनों से सोच रहा था। कुछ सोचकर बोला “क्या इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए भटकना अनिवार्य है”।

“नहीं स्वामी स्वयं के लिए नहीं। पर जानकर औरों को सिखाने के लिए तो घूमना ही पड़ेगा”।

“देख रे! वह अत्यल्प में कितना प्रसन्न है। कितना शांत। मन को जीतने पर ऐसा ही होता है, प्रभु लेकिन है यह बड़ा कठिन”। “भला क्यों-”?

“वासना, क्रोध, लोभ मोह आदि से उबरना होता है”। “अच्छा! अच्छा”! फिर कुछ सोचते हुए कहा “तू अभी कह रहा था कि वह जीवन का उद्देश्य जानता है। जीवन जीना सिखाता है”। “हाँ”। “मुझे सिखा सकेगा”? “क्यों नहीं”?

रथ उसके सामने से गुजर रहा था। कुमार ने रथ रुकवाया उतरे और चल दिये ओर जिस पेड़ के नीचे तपस्वी थे। उनके पीछे छन्दक भी चला।

पास पहुँचने तक परिव्राजक ध्यान से उठ रहा था। आगन्तुकों को देखकर मुस्कराया। पेड़ के नीचे बैठने का इशारा करते हुए पूछा कहो कैसे आना हुआ। कुमार वन भ्रमण हेतु आए थे, आपसे जीवन का उद्देश्य पूछना चाहते हैं।” छन्दक ने उत्तर दिया।

“क्यों कुमार? जानना चाहते हो या सिर्फ सुनना”। “सुनने से जाना नहीं जा सकता” उसने पूछा “कोई आवश्यक नहीं”। “जानने के लिए कोरा वाणी विलास नहीं साधना का पुरुषार्थ चाहिए। स्वयं बुद्ध बन कर ही औरों की बोधि में सहायक हुआ जा सकता है”। तब मैं जानना चाहता हूँ।”

“तब प्रयत्न करो। जीवन का उद्देश्य है आत्म कल्याण के साथ लोक कल्याण।”

“दोनों एक साथ”? हाँ। यही तो डडडड तथ्य है। दोनों एक सिक्के के दो पहलू है। लोक कल्याण की राह पर स्वार्थों को डडडड निष्ठापूर्वक चलने वाला राही आत्मकल्याण बिना किसी अन्य प्रयास के कर लेता है। इसी प्रकार आत्मकल्याण की साधना में निरत साधक को लोकजीवन की सेवा किए बगैर चैन नहीं मिलता”। फिर कुछ रुककर कुमार की आँखों में झाँकते हुए बोला-स्वल्पकालिक होते हुए जाना बहुमूल्य है। यह अनन्त यात्रा के पथ का पड़ाव है। जिसमें कुछ विशेष करना है। पर कितना भ्रम से ग्रसित है- जन जो इसे न समझ कर उन्मादी की तरह, सन्निपात के रोगी की तरह निरुद्देश्य ही जीता है। किन्तु उसे समझाया जा सकता है यदि कोई बुद्ध समझाए तो। अनुभवी का ज्ञान ही सार्थक और प्रेरक होता है। अन्यथा वाक्चातुर्य से कब किसका कल्याण हुआ है।”

“मैं बुद्ध बनूँगा” स्वयं के किसी गहन प्रदेश से संकल्प उभरा। कुमार की आँखें चमक उठीं। कुछ सोचते हुए उतने परिव्राजक को प्रणाम किया और लौट चला और एक रात्रि हुआ महाभिनिष्क्रमण आरम्भ हुई तपश्चर्या। धधक उठी साधना डडडड। जिसमें स्वार्थ वासना क्रोध लालसा डडडड एक करके भस्मीभूत होने लगीं। डडडड करुणा के बादल बरस पड़े। डडडड भी बह गई। अब शेष थी करुणा। गहरी भाव संवेदना। बोधिवृक्ष के नीचे बैठे वह अपने से कह उठे पीड़ा से आर्त हो संसार स्वयं को नष्ट करने पर उतारू है। एक दूसरे पर दुख को ठेलकर कर मनुष्य औरों को दुःखी करता स्वयं दुखी होता है। क्यों? सबके मूल में उसकी उलटी सोच है। इसलिए अब आवश्यक हो गया कि सोच परिवर्तित हो।

महाकुमार सिद्धार्थ व महात्मा बुद्ध हो उठ खड़े हुए। लोककल्याण के राही के रूप में वह भव्य ज्योतित गौरव से मण्डित करुणा दया, क्षमा की साकार प्रतिमा बन चल पड़े। बुद्धि की क्षुद्र सीमाओं से ऊपर उठ युग को बदलने लोकजीवन की आर्तावस्था को दूर करने काल गति की उलट फेर में आज बुद्ध ने नया जामा पहना है। विचारक्रान्ति का अमृत कलश लिए वह पुनः चल पड़े हैं। गति क्रमशः तीव्र होती जा रही है। इन दिनों पृथ्वी की धूलि में जीवन की पर्तों पर अमरता का जीवित संदेश लिखा जा रहा है। सचमुच अद्भुत क्षण हैं ये। ऐसे में भला हमारा पुरुषार्थ मौन क्यों?

संकट का हल ढूँढ़ने की उपहासास्पद विडम्बना

आज और कल की मिलन बेला की अपनी महत्ता है। ऐसे में समूचा जीवन स्पन्दनमय हो उठता है। उपवन में खड़े पादपवृन्द अपने पुराने बासी फूलों को गिराने-झाड़ने लगते हैं। कारण कि कुछ ही देर में अबकी कठोर सुरभिहीन बेडौल लगने वाली कलियाँ कोमलता, सुगन्ध और सौंदर्य का समन्वित प्रतिमान बनने वाली होती हैं। इस परिवर्तन से अनजान मन फूलों का गिरना देख परेशान हो उठता है। हैरान हो सोचने लगता है, तो क्या वाटिका उजड़ जायगी? फिर क्या होगा जो यहीं के निवासी है? तब क्या सब भाग चले? मन को दुःखी करने इन सवालों के जवाब में परिवर्तन को भली भाँति देख समझ रहा माली एक बात कहता है-धैर्य रखो! समय विशेष कुछ करने का है। अवसर को पहचान कर खाद पानी जुटाओ ताकि उद्यान दूना सौंदर्य प्राप्त कर सकें।

हम सबके जीवन के इन क्षणों में आज और कल ने कुछ अधिक व्यापक हो वर्तमान और भविष्य का बाना पहन लिया है। मिलन बेला दशक और सदी की न होकर दो सहस्राब्दियों की है। यही क्यों दो महायुग मिलने वाले हैं। ऐसे में मिलन मुहूर्त का गौरव असंख्य गुना बढ़ जाना स्वाभाविक है और सचमुच सम परिवर्तन का महापर्व बन चुका है। दृश्य जगत के स्पन्दन किसी अदृश्य महाशक्ति के संकेतों के अनुसार तीव्र-तीव्रतर तीव्रतम होते चले जा रहे हैं। ऐसे में अवाक् है एक वर्ग उसे सूझ ही नहीं रहा कि क्या करें? क्योंकि हो रहा सब कुछ तो उसकी बौद्धिक गणना शक्ति के बाहर है।

इन दिनों परिवर्तन की व्यापकता से अनभिज्ञ अधिकांश वैज्ञानिक कुछ इसी तरह हैरानी में है। इसका एक कारण उनके अपने कारनामों की दीख पड़ने लगे परिणाम है। समूचे वातावरण में जहर घुल रहा है। औद्योगिक कारखाने वायु को विषमय बना रहे हैं। इनके उत्पादकों के विषैले रसायनों के पानी में लगातार बहने से हर किसी को जहर के घूँट पीने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। रेडियोधर्मिता के कारण बढ़ते तापमान ने हिम भण्डार पिघलने और समुद्रों में बाढ़ लाने की चुनौती दे दी है। पृथ्वी के ऊपर फटते सुरक्षा कवच व ग्रीनहाउस प्रभाव के कारण खतरा और बढ़ गया है कि अन्तरिक्षीय मारक किरणें कहीं भून कर न रख दें। विज्ञान के कालिदास को अब समझ में आने लगा है कि अब तक उसने अपनी आश्रयदाता डाल पर ही कुल्हाड़े चलाएँ है। परन्तु अब क्या हो? बड़ी सकपकाहट में एक नयी योजना प्रकाश में आयी है पृथ्वी से भाग जाने की योजना।

इसके दो स्वरूप सोचे हुए हैं या तो किसी अन्य ग्रह की बस्ती में बतौर शरणार्थी के भाग चला जाय अथवा स्वयं अन्तरिक्ष में बस्तियाँ बनाकर रहा जा प्रथम सोच के तहत अमेरिकन बनाकर रहा जाय प्रथम शोध के तहत अमेरिकन स्थित “नेशनल रेडियो एस्ट्रोनॉमी आवजरक्ट्री” में खोज-बीन शुरू की डडडड वे जगहें कौन सी हैं, जहाँ बस्ती है। उन्होंने ८५ इंच बड़े आधुनिकतम रेडियो टेलिस्कोप की सहायता से जाँच पड़ताल शुरू की। इस परियोजना को नाम दिया गया। “प्रोजेक्ट ओज्मा” जो बाद में “लैण्ड ऑफ ओज” के नाम से जानी गई इसको अधिक सफलता ने मिलने पर “कॉस्मिक कनेक्शन” के कृतिकार एक ख्यातिलब्ध वैज्ञानिक कार्लसांगा ने सलाह दी कि अन्तर्ग्रही यात्राएँ करके निवास योग्य जगह ढूँढ़ जाय। प. जर्मनी के राकेट विशेषज्ञ हरम ओवर्थ ने अमेरिकी सरकार की एक गोपनीय योजना पर काम करते समय कुछ विशेष जानकारी हासिल करने की बात नहीं। उनके अनुसार उड़न तश्तरी एप्सिलोन और ताओ से टिके तारकों के किसी ग्रह से आती है। पृथ्वी से भागकर कहीं दूर जा बसने के कार्यक्रम बनाने वालों को एक आशा मंगल ग्रह से भी है। कैलीफोर्निया स्थिति एक्स रिसर्च लैबोरेट के डॉ. सीरल एवम् डॉ. हैरल्डक्लीन ने साबित कर की कोशिश की है कि तमाम सारी प्रतिकूलताओं बाद भी वहाँ नई दुनिया बस सकती है। भले इस धरती से थोड़ी भिन्न प्रकार की हो। फिर वह संभव है यहाँ से समझ में आने वाली प्रतिकूलता वहाँ पहुँचने पर झूठ साबित हों।

दूसरे पक्ष की पसन्दगी शरणार्थी होकर रहने की बजाय अन्तरिक्ष में नगर बसा कर रहने की है। वैसा ही नगर जैसा पौराणिक आख्यानों के अनुसार त्रिपुर और त्रिशंकु का बसा था। इस विज्ञान के क्लीवान जी ओस्टर ने अपनी पुस्तक “ट्वेन्टीएथ सेंचुरी इन स्पेस” में इसका प्रारूप प्रस्तुत करते हुए विशद चर्चा की है। जिसके अनुसार ये बस्तियाँ बहुत कुछ उपग्रहों का बृहदाकार स्वरूप जैसी होगी। यद्यपि एच. जी. वेल्स सदृश वैज्ञानिक शिल्पकार अब तक अपनी कथाओं में ऐसा स्वप्न लोक बसाते आए थे। किन्तु श्री ओस्टर ने अपने वैज्ञानिक साक्ष्य प्रस्तुत कर इसे एक विकल्प के रूप में बताया है।

प्रारूपों में पर्याप्त भिन्नता के बावजूद दोनों का उद्देश्य एक है। बुद्धिमानों के शीर्षस्थ वर्ग की इन योजनाओं पर समालोचनाजन्य क्षोभ प्रकट करते हुए लास एन्जेल्स के विज्ञानवेत्ता जैक कार्टन ने एक पुस्तक की रचना कर डाली। जिसका नाम रखा “इज देयर इण्टेलीजेण्ट लाइफ ऑन अर्थ” “अर्थात् क्या धरती पर बुद्धिमत्तापूर्ण जीवन है?” उनके अनुसार “यदि यह रहा होता तो शायद ऐसी योजनाएँ न बनतीं। इस कथन का तात्पर्य यह नहीं है कि अन्य ग्रहों पर जीवन का अभाव है अथवा अन्तरिक्ष में बस्तियाँ नहीं बसाई जा सकतीं। सम्भव है ऐसा हो सके। यद्यपि अभी तक इसके ठोस आधार नहीं हैं” उनका अभिमत है कि मानवी सभ्यता के अस्तित्व पर आए संकटों के कारणों की खोज किये बिना बनजारों की तरह अपना डेरा उखाड़ कर अनजाने अनबने लोक में जा पहुँचने की बात करना सोचना क्यों बाल कल्पना और दिवा स्वप्न जैसा नहीं है?

क्या यह योजना मुहम्मद तुगलक के राजधानी बदलने वाले भारत के ऐतिहासिक कथानक जैसी नहीं लगती। जिसमें समूची जनता को इधर से उधर करने के फेर में आधे से अधिक मारे गए। यह तो दिल्ली से दौलताबाद की फेर बदल थी, वह भी एक छोटे से जन समूह की। कल्पना करके देखें यदि समूचे धरतीवासी एक साथ अनजाने लोक की और भागने को विवश हों तो परिणाम के बारे में सोचकर सिहरन के साथ हँसी आए बिना न रहेगी।

श्री कार्टन ने अपनी इसी रचना में वर्तमान संकटों का कारण स्पष्ट करने की कोशिश की है। उनके अनुसार आया संकट अपने बाहरी रूप में कितना ही अलग-थलग और अनेक रंग-रूपों वाला क्यों न लगे? पर जड़ में एक है। इसको वह विकृत मस्तिष्क और निष्ठुर हृदय का नाम देते हैं। जब तक इसे परिवर्तित नहीं किया जाता कल्याण नहीं है। क्योंकि इनके रहते स्वर्ग भी नरक बन जाएगा। इन्हें छोड़ने से नरक भी स्वर्ग के रूप में दिखाई देने लगेगा। कारण कि प्रत्येक जैव मण्डल का अस्तित्व अपने -अपने अनेकों घटकों में सामञ्जस्य रहने पर ही संभव है। यदि हम उसे बिगाड़ने के लिए तैयार बैठे हों तो कहीं ठिकाना मिलने की गुंजाइश नहीं।

निःसन्देह उलटी सोच और भावना शून्य हृदय के रहते कोई भी युक्ति समाधान नहीं बन सकती। परिवर्तन की इस आँधी ने हममें से प्रत्येक को चुनाव के बिन्दु पर ला खड़ा किया है जहाँ उसे दो में से एक को चुनना है स्वयं की सोच और निष्ठुरता का बदलाव अथवा अस्तित्व की समाप्ति। किन्तु यह समाप्ति समूची जाति अथवा सभ्यता की नहीं अपितु सिर्फ उनकी होगी जो महाक्रान्ति के अवरोध हैं। यद्यपि आश्रयदाता डाल कर कुल्हाड़ा चलाने वाले कालिदास को युग मनीषा अभी भी सिखा पढ़ा कर मूढ़ से महापण्डित निष्ठुर से भावुक हृदय कवि के रूप में गढ़ने को तैयार खड़ी है।

किसी भी दृष्टिकोण से क्यों न विचार करें, समाधान भाग निकलना नहीं, अपितु बदलाव है-निजी व्यक्तित्व और परिवेश का। प्रख्यात-अध्येता कार्ल मानहीम “द् डायग्नोसिस ऑफ ओवर टाइम” में इसे स्वीकारते हुए कहते हैं शायद समूची प्रकृति अथवा स्वयं नियन्ता व्यक्ति और समाज का आमूल-चूल परिवर्तन करने के लिए उठ खड़ा हुआ है। संकटों का व्यापकता का कारण यही है और महाक्रान्ति के प्रबल वात्याचक्र का उठ खड़ा होना यही सिद्ध करता है।

कारणों के निवारण के बाद अथवा परिवर्तन की दिशा में गतिमान होने के साथ विभीषिकाओं की काली घटाएँ उज्ज्वल-भविष्य के हिमालय के समझ अपना सिर फोड़ने और धूल चाटने के लिए मजदूर होती दिखाई देगी। आज की अन्धकारजन्य परिस्थितियाँ बीतते वर्तमान की समाप्त होती यात्रा का अन्तिम चरण भर है। यदि हम नियन्ता के प्रतिपल आ रहे संकेतों के अनुसार बढ़ सके तो इस ब्रह्ममुहूर्त को उषाकाल अरुणोदय में बदलते दोपहर के तपते ज्योतिर्मय मध्याह्न तक पहुँचाते देखकर हर्ष विभोर हुए बिना न रह सकेंगे। ऐसे में जबकि हमारे चरण उल्लसित होकर कर्तव्य निर्वाह की ओर बढ़ने चाहिए भाग निकलने की कल्पना कितनी हेय है? महायुगों के महामिलन के अवसर पर धरती को सँवारने विश्व उद्यान को हरा भरा करने का दायित्व उन सभी पर है जो वर्तमान में जी रहे हैं। आज के कर्तव्य का निष्ठापूर्वक निर्वाह ही कल का स्वर्णिम भविष्य है।


आइए! देखें विचारों के रंग एवं रूप को

विचारों को कभी चिन्तन क्षेत्र में घुमड़ते रहने वाले और मस्तिष्क को कुछ काम देते रहने वाली प्रक्रिया भर समझा जाता रहा है, किन्तु अब स्पष्ट हो गया है कि चिन्तन चेतना की यह एक महत्वपूर्ण शक्ति है। इस शक्ति का उपयोग करके ही विचारशील महत्वपूर्ण योजनाएँ बनाते, महत्वपूर्ण कार्य करते और सफल महापुरुष कहलाते हैं। भाग्य निर्माण का आधार भी यही है। उत्कृष्ट विचारणाओं-संकल्पों का महत्व समझने और जीवन व्यवहार में उतारने की कला जिन्हें आती है, धवल चरित्र वाले वही व्यक्ति अपनी यश गाथा शरीर न रहने पर भी अक्षुण्ण बनाये रखते हैं। विविध रंग-रूपों वाले सशक्त विचार प्रवाह अदृश्य रूप में अपनी विद्यमानता से समानधर्मी व्यक्तित्वों का सतत् पोषण करते और अमर बने रहते हैं।

वस्तुतः स्थूल वस्तुओं की भाँति विचारों के भी अपने रूप और रंग होते हैं, जिनकी सुन्दरता-असुन्दरता उनकी भली बुरी प्रकृति पर निर्भर करती है। व्यक्तित्व का वजन भी तद्नुरूप ही होता है। अध्यात्मवेत्ताओं के अनुसार चूँकि विचार सूक्ष्म होते हैं अतः उनके वर्ण और आकार चर्मचक्षुओं से दिखाई नहीं पड़ते। पर अन्तः नेत्रों द्वारा उन्हें अवश्य पहचाना जा सकता है और तद्नुरूप उनमें काट-छाँट कर व्यक्तित्व का गठन किया जा सकता है।

अध्यात्मवेत्ताओं की इस मान्यता पर अब विज्ञानवेत्ताओं, परामनोविज्ञानियों ने भी अपनी मुहर लगा दी है। फ्राँस के मूर्धन्य भौतिकशास्त्री डॉ. वेरडुक ने अतिसंवेदनशील कैमरे के माध्यम से विचारों के अनेक चित्र लेकर यह प्रमाणित कर दिया है कि इनके भी निश्चित आकार और वर्ण होते हैं जिनका व्यक्तित्व की गहराई से सीधा सम्बन्ध होता है।

विचार आकार कैसे ग्रहण करते हैं, इस संबंध में उनका कहना है कि चूँकि यह एक प्रकार की शक्ति है, अतः जब शक्तिशाली प्रवाह के रूप में वे मानवी मस्तिष्क से निकलते हैं तो अपने आस-पास आकाशीय परमाणुओं में भी हलचल उत्पन्न कर देते हैं। इस हलचल से परमाणुओं की गति प्रभावित होती है और वहाँ एक आकार उभर आता है। इसका रूप ठीक उस वस्तु की अनुकृति होता है जिसकी मन में कल्पना की जा रही होती है। कैमरा इसी की तस्वीर खींचता है। फोटोग्राफी की इस परोक्ष प्रक्रिया को “थॉट फोटोग्राफी” कहते हैं।

परामनोवेताओं का कहना है कि चूँकि मानव मन में सदैव किसी न किसी प्रकार के विचार उठते रहते हैं अतः इनके द्वारा बाह्यवातावरण में नित नाना प्रकार रूप बनते और बिगड़ते रहते हैं। इन संकल्प प्रवाहों के बाह्य रूप कभी स्पष्ट तो कभी अस्पष्ट होते हैं, जो यह प्रकट करते हैं कि संकल्प कितने बलवान है। चिंतन की उत्कृष्टता एवं संकल्प की प्रबलता जितनी अधिक सुदृढ़ होगी उतना ही अधिक स्पष्ट उनका रूप उभर कर आयेगा। यदि संकल्प विश्रृंखलित या कमजोर हुए विचारों में अस्त–व्यस्तता हुई तो उसके प्रकंपन भी कमजोर होंगे और स्पष्ट आकार न ग्रहण कर सकेंगे।

साधना विज्ञान में इसी सिद्धान्त का उपयोग कर छाया पुरुष की सिद्धि की जाती है। यह और कुछ नहीं संकल्पों द्वारा गढ़ी अपनी ही काया की छाया की साधना है। साधना के दौरान जब इस दृढ़ संकल्प को आरोपित किया जाता है तो धीरे-धीरे यह जीवन्त, जाग्रत और सशक्त बनने लगती है और अन्ततः एक पृथक् सत्ता का रूप धारण कर लेती है। अस्थिर एवं कमजोर संकल्प वालों का छाया पुरुष भी निर्बल होता है और यदा-यदा अपनी हलकी झलक-झाँकी दिखाने के अतिरिक्त और कुछ नहीं कर पाता। संकल्प की दृढ़ता न केवल व्यक्तित्व को सामर्थ्यवान बनाती है, वरन् इसके साधक अपने छाया पुरुष को भी बलिष्ठ बनाकर उससे कोई भी दुरूह कार्य सम्पन्न करा लेते हैं।

साधना विज्ञान के विशेषज्ञों का कहना है कि मात्र विचार परिवर्तन से उनके आकारों में परिवर्तन आता हो, ऐसी बात नहीं है, वरन् भाव परिवर्तन से भी आकृतियों में बदलाव आता है। उनके अनुसार स्नेहसिक्त भाव आकर्षक फूलों की भाँति होते हैं और अनायास ही हर किसी को अपनी ओर खींच लेते हैं। इसी तरह भगवद् भक्तियुक्त भावना प्रवाह के आकार गुम्बदनुमा होते हैं तो ईर्ष्या, द्वेष और हिंसायुक्त विचार आयुध की आकृति लिए होते हैं। शाप और वरदान इसी आधार पर कार्य करते एवं भले-बुरे परिणाम प्रस्तुत करते हैं। शाप में चूँकि अहितकर भावों का समावेश होता है, अतः वह जिस व्यक्ति को लक्ष्य कर दिये जाते हैं, उस तक पहुँच कर विचारों के यही अस्त्र अमंगलकारी प्रभाव उत्पन्न करते हैं। इसके विपरीत वरदान में जीवन की सफलता और सुख-समृद्धि का संकल्प जुड़ा होता है, फलतः वह निर्दिष्ट व्यक्ति के लिए वैसी ही परिस्थितियाँ उत्पन्न करते हैं।

विचारों की आकृतियों के अस्तित्व के सम्बन्ध में विशेषज्ञों का कहना है कि उनकी दृढ़ता और लघुता की प्रकृति के आधार पर ही उनकी समयावधि का निर्धारण होता है। उद्देश्यपूर्ण विचारों पर बारम्बार किया गया चिन्तन मनन उनके आकार को स्थायित्व प्रदान करने के साथ ही उन्हें चिरकालिक बनाता है। निरुद्देश्य एवं अस्थिर मनःस्थिति में किये गये संकल्प भी क्षणिक होते हैं। छोटे-मोटे प्रभाव छोड़कर वे थोड़े दिनों में समाप्त हो जाते हैं।

आकारों की भाँति विचारों के भी अपने पृथक्-पृथक् रंग होते हैं। भक्तिमय विचारों का रंग साधना विज्ञान में आसमानी बताया गया है और कहा गया है कि इस रंग की ध्यान साधना द्वारा इन्हें परिपुष्ट बनाया जा सकता है। रक्ताभवर्ण कामुकताजन्य विचारों की अभिव्यक्ति करता है। सात्विक लोगों के विचार पीत रंग वर्ण के बताये जाते हैं, जबकि स्वार्थ परायण व्यक्ति हरे रंग के विचार उत्पन्न करते हैं। भावनाओं में क्रोध का समावेश हो तो रंग लाल मिश्रित काला होता है। इस तरह विचारों में जो जो भाव समाविष्ट होते जाते हैं, तद्नुरूप उनकी आकृतियाँ भी उन वर्णों का सम्मिलित स्वरूप प्रकट करती हैं।

धर्मशास्त्रों में उपास्य देवों के वर्ण, रूप, अलंकार, आयुध आदि की मर्यादाएँ इसी कारण निर्धारित की गई है कि विचारों को अनुकूल रंग और आकार प्रदान किया जा सके। इससे साधना की सफलता सुगम बन जाती है। मंत्र-शास्त्रों में इसी हेतु विभिन्न प्रयोजनों के लिए इष्टदेव के भिन्न-भिन्न रूप रंग, छंद, ऋषि आदि निश्चित किये गये हैं। मंत्र सिद्धि के लिए इस संदर्भ में ऋषियों द्वारा निर्देशित नियमों-विधानों का पालन करना आवश्यक होता है। पर प्रायः लोग अनभिज्ञता या अज्ञानतावश इन निर्धारणाओं को मात्र मस्तिष्क की कोरी कल्पना मान लेते हैं और लकीर पीटते रहने भर से खाली हाथ रह जाते हैं। इसी तरह तामसिक पूजा विधान तथा हेय विचार भी सत्परिणाम के स्थान पर उलटे दुखदायी संकट ही खड़े करते हैं। उनसे मात्र अरुचि ओर घृणा ही उत्पन्न होगी और विचार एवं उसकी आकृति की अनुकूलता न बन पाने के कारण सिद्धि भी प्रायः संदिग्ध ही बनी रहेगी। तमसाच्छन्न विचार लक्ष्यवेध में सदैव विफल ही रहते हैं।

विचारों का स्थूल रूप शब्द-तरंग है, तो इसका सूक्ष्म रूप प्रकाश तरंग की तरह-लेसर स्तर का कार्य करता है। अपनी इसी सूक्ष्मता के कारण विचार अत्यधिक सामर्थ्यवान होते हैं, जिसकी शक्ति इनके विशेष आकार और रंग पर निर्भर करती है। भले-बुरे प्रभाव, इसी के प्रतिफल होते हैं। स्वाध्याय, मनन-चिन्तन सज्जनों का संग आदि कुछ ऐसे उपाय हैं जिनके द्वारा अपनी विचारशक्ति की प्रभावोत्पादकता को बढ़ाया और स्वयं के उज्ज्वल भविष्य की संभावना को सुनिश्चित किया जा सकता है।


सुख वस्तुओं में नहीं, अपनी दृष्टिकोण में है (kahani)

प्रसिद्ध दार्शनिक रसेल को गम्भीर मुद्रा में देखकर एक मित्र ने उन की सोच का कारण पूछ ही लिया। रसेल ने कहा कि मैं सोच रहा हूँ कि मेरे साथ ऐसा क्यों होता है कि मैं जब पादरियों के उपदेशों को सुनता हूँ तो लगता है कि इस पृथ्वी पर सुख की कल्पना एक दम असंभव है। किन्तु इसके विपरीत जब मैं अपने बाग के माली को देखता हूँ तो धारणा गलत सिद्ध हो जाती है। तब मैं महसूस करता हूँ। मेरे पास सब सुख सुविधाओं के साधन हैं फिर भी मैं दुखी हूँ और माली के पास में मेरे मुकाबले उतना कुछ भी नहीं फिर भी वह मेरी अपेक्षा अधिक प्रसन्न, और सुखी दिखाई देता है। बताओ सुखी कौन है मैं या मेरा माली? मित्र ने उतर दिया कि सुख वस्तुओं में नहीं, अपनी विचारणाओं, मान्यताओं और दृष्टिकोण में है। दार्शनिक उत्तर पाकर सन्तुष्ट हो गया।


आचार्य, जो दधीचि परमात्मा से जुड़ गए

तक्षशिला विश्वविद्यालय वधू की तरह सजा हुआ था। मण्डप चौक प्राँगण सभी जगह खुशी फूटी पड़ रही थी। आचार्य उपाध्याय विद्यार्थी सभी प्रमुदित थे। हों भी क्यों न? आखिर कल दीक्षान्त समारोह जो था। इस खुशी के समय भी उनके चेहरे पर चिन्ता की रेखाएँ चमक रही थीं, वह गृह वाटिका में टहल रहे थे। कदमों के रखने के ढंग माथे की सलवटें बता रही थीं कुछ विशेष जरूर है जिसके कारण मन में ज्वार आया है।

पर इस अवसर पर चिन्ता! वह भी विश्वविद्यालय के कुलाधिपति को जिसे सर्वाधिक प्रसन्न होना चाहिए। चिन्ता का सामान्य कारण तो कामना की पूर्ति में अवरोध है। पर उन जैसे तपस्वी को कामना आक्रान्त करे यह भला कैसे सम्भव है? तो फिर तपस्वी की चिन्ता सामान्य नहीं। सामान्यजनों की चिन्ता से जहाँ दुःखों की बेल बढ़ती मनोरोग उपजते हैं। वहीं तपस्वी की चिन्ता से सुख उपजता है, अनेकों अशान्त मन सुशान्त होते हैं। क्योंकि जहाँ अन्य सब स्वहित के लिए व्याकुल होते हैं वहीं वह सर्वहित के लिए बेचैन हो उठता है। तत्पश्चात व्यक्ति युग युग में नीलकण्ठ बन कर समाज में रहते हैं फैल रहे जहर को पीने और तप साधना से अर्जित अमृत का अभिसिंचन करने हेतु।

वह टहलते-टहलते बड़-बड़ा उठे तो क्या विश्वविद्यालय रूपी यह महावट ढह जाएगा। जिसे अनेकों विकसित किया और अनेकों की श्रान्ति हरण करने वाले के रूप में इसे वर्धित किया है? क्या ठप्प हो जाएगी वह कार्यशाला जो अब तक समाज के लिए अनेकों शिल्पी तैयार करती आयी है। यदि नहीं तो फिर मेरे बाद संचालन का गुरुतर दायित्व। एक एक शब्दों से पीड़ा छलक रही थी। मुखमण्डल के भाव बता रहे थे कि व्यथा हड्डियों तक को छेदे दे रही है।

कौन बनेगा अगला दधीचि? कौन दे सका बलिदान निज-सुख का मोह का वैभव का? किसे प्रियकर लगेगा स्वजनों का वियोग? धन की चमक किसकी आँखों की चमक न हरण कर पाएगी? अनेक वर्षों में एक जो आया वह भी कल के दीक्षान्त समारोह के बाद नहीं।

इतने में किसी आने वालों के कदमों की आहट ने उन्हें चौंका दिया। आने वाला उनके पदों में प्रणत होने के लिए झुका ही था कि उनके मुख से निकला “अरे तुम?”

जी हाँ मैंने सोचा महाचार्य के चरणों में अपनी प्रणति निवेदन कर दूँ। कल की व्यस्तता में आपको अवकाश न मिलेगा और कल के बाद में भी “घर चला जाऊँगा” आने वाले के स्वरों को काट कर उन्होंने स्वयं कथन पूरा किया।

जी जी आगन्तुक के स्वरों में एक सकपकाहट के साथ संकोच भी था।

“हर कोई यही दुहराता है। जन्मा, कुछ दिन खेला कूदा, किशोरावस्था आने पर कल्पना की रंगीली उड़ाने भरी युवा होते-होते विवाह बंधनों में बँधे, जो बोझ लादा उसे वहन करते रहने के लिए रात दिन कमाने के लिए खटते रहे, बढ़ाए हुए परिवार की बढ़ती समस्याओं को जिस तिस प्रकार किसी हद तक सुलझाया। ढलती आयु के साथ अशक्तता और रुग्णता चढ़ दौड़ी, समर्थ सन्तानों द्वारा समस्त वैभव पर कब्जा जमा लिया गया, स्वयं को असहाय अपमानित स्थिति में दिन गुजारने के लिए बाधित होना पड़ा और रोते कलपते मौत द्वारा दबोच लिया गया-क्या यही है आज के मनुष्य की नियति? जिसे स्वीकारने के लिए तुम जैसे विवेकी भी विश्वामित्र, अगस्त्य आदि के ज्योतिर्मय ऊर्ध्वमुखी जीवन को विस्मृत कर दौड़ पड़ते हैं।”

सुनने वाला स्तब्ध था। कुछ रुक कर वे फिर बोले। प्रतिभा ईश्वर की विभूति है-विष्णुगत ईश्वरीय कार्यों में इसका नियोजन ही व्यक्तित्व को सुभोभन बनाता है।

आचार्य मुझे याद नहीं कि मैंने आपकी कोई आज्ञा भंग की हो। आपके प्यार की अलभ्य निधि भी नहीं भूली है। इन क्षणों में भी आपके द्वारा दिखाया गया मार्ग मेरा जीवनपथ बनेगा और आपका आदेश मेरा पाथेय। सभी कष्टों को सहकर सब कुछ गँवा कर इस पर चलने में मुझे गौरव की अनुभूति होगी।

सच पुत्र! सब कुछ लुटा कर भी कहने के साथ उसे छाती से चिपटा लिया।

हाँ सब कुछ लुटाकर भी स्वर स्वस्थ था।

तो छोड़ दी घर लौटने का विचार और मानव गढ़ने की इस टकसाल में मेरे सहकर्मी बनो। इतना ही नहीं एक गुरुतर कार्य और है।

वह क्या? रूढ़ियों के आघातों मूढ़तापूर्ण प्रथा प्रचलनों के थपेड़ों और कुरीतियों की दीमक के प्रकोप से जर्जरित समाज को नया स्वरूप देना। उसे नूतन व्यवस्था देना।

अर्थात् समय क्रान्ति आगन्तुक चौंक उठा भला कैसे सम्भव हो सकेगी यह।

सद्विचारों के व्यापकतम प्रसार से जिसे तुम्हारा भगीरथ संकल्प पूरा करेगा।

संकल्प के बल पर इतना बड़ा कार्य उसे आश्चर्य हो रहा था।

संकल्प साधारण नहीं होते वत्स! ये कल्पनाओं और विचारों से नितान्त, भिन्न हैं। मन के सागर में कल्पनाओं की लहरें यों ही बिखरती नष्ट होती रहती हैं। इन्हें जब बुद्धि सँवारती है तब ये विचार कहलाते हैं। पर यही जब अन्तर के प्राण प्रवाह से जुड़ते हैं तो संकल्प बन जाते हैं। संकल्पवानों के प्राण मचल उठते हैं, मन व्याकुल हो उठता है और शरीर क्रियाशील हुए बिना नहीं रहता। प्राण की अन्तिम श्वास मन की आखिरी सोच, शरीर की अन्तिम क्रिया तक वह जुटा रहता है अपने संकल्प की पूर्ति में ऐसों के प्राण ही सृष्टि के सूत्र संचालक के महाप्राण से जुड़ते हैं-वह उसके पास प्राणवानों को भेजता है। तथ्य समझे?

जी उसे आश्चर्य हो रहा था संकल्प की अनजानी इस महत्ता पर वह सोचने लगा तो यही कारण था आचार्य की व्याकुलता का। उन जैसे तपोधन को भला सर्वहित के अतिरिक्त किस की चाहत चिन्तित करेगी। साथ ही कितना सौभाग्यशाली हूँ मैं कि उन्होंने मुझ अकिंचन को चुना। उन महाचार्य पुंडरीक ने, जिनके चरणों पर माथा नवाने के लिए देश देशांतर के मनीषी तरसते हैं। समग्र संसार का वैदूष्य-जिनके पाँवों की धूल से ईर्ष्या करता है।

उधर आचार्य पुलकित थे-उन्हें अपनी महात्याग की परम्परा में एक नया दधीचि मिला। दोनों ने एक दूसरे की ओर देखा। आचार्य की आँखों में वात्सल्य था विष्णुगत की आँखों में श्रद्धा।

“क्या सोचने लगे वत्स! ‘अपने सौभाग्य के बारे में सोच रहा था’ सचमुच उनके सौभाग्य के समक्ष त्रैलोक्य का सारा वैभव भी तुच्छ है जो महाकाल के अग्रदूत बनते हैं।

अगले दिन का दीक्षान्तपर्व विष्णुगुप्त के लिए संकल्प पर्व बन गया। यही विष्णुगुप्त इतिहास में चाणक्य के नाम से जाने गए। जिन्होंने वृहद्तर भारत का गठन किया। धरती पर सतयुगी परिस्थितियाँ लाने में सफल हुए। इस अनोखे सृजन की शक्ति का स्रोत उनकी संकल्प निष्ठा ही थी।

हम भी ढूँढ़ें और जगाएँ अपनी इसी निष्ठा को। वर्तमान के देवमुहूर्त में सचेतन हो उठे हमारा संकल्प स्वयं को बदलने समाज को सँवारने में। नियोजित हो जाए जीवन की समूची सामर्थ्य इसी ईश प्रयोजन में।


स्रष्टा का सर्वोपरि अनुदान-प्रतिभा

मनुष्य ने सृष्टि के समस्त प्राणियों की तुलना में वरिष्ठता पायी है। शरीर-संरचना और मानसिक-मस्तिष्कीय विलक्षणता के कारण उसने सृष्टि के समस्त प्राणियों की तुलना में न केवल स्वयं को सशक्त, समुन्नत, सिद्ध किया है, वरन् वह ऐसी संभावनाएँ भी साथ लेकर आया है, जिनके सहारे अपने समुदाय को, अपने समग्र, वातावरण एवं भविष्य को भी शानदार बना सके। यह विशेषता प्रयत्नपूर्वक उभारी जाती है। रास्ता चलते किसी गली-कूचे में पड़ी नहीं मिल जाती। इस दिव्य विभूति को प्रतिभा कहते हैं। जो इसे अर्जित करते हैं वे सच्चे अर्थों में वरिष्ठ-विशिष्ट कहलाने के अधिकारी बनते हैं, अन्यथा अन्यान्य प्राणी तो समुदाय में एक उथली स्थिति बनाये रहकर किसी प्रकार जीवनयापन करते हैं।

मनुष्य, गिलहरी की तरह पेड़ पर नहीं चढ़ सकता। बन्दर की तरह कुलाचें नहीं भर सकता। बैल जितनी भार वहन की क्षमता भी उसमें नहीं है। दौड़ने में वह चीते की तुलना तो क्या करेगा, खरगोश के पटतर भी अपने को सिद्ध नहीं कर सकता। पक्षियों की तरह आकाश में उड़ना उसके लिए संभव नहीं, न मछलियों की तरह पानी में डुबकी ही लगा सकता है। अनेक बातों में वह अन्य प्राणियों की तुलना में बहुत पीछे है, किन्तु विशिष्ट मात्रा में मिली चतुरता, कुशलता के सहारे वह सभी को मात देता है और अपने को वरिष्ठ सिद्ध करता है।

व्यावहारिक जीवन में मनुष्य अन्य प्राणी-समुदाय की तुलना में अनेक दृष्टियों से वह आगे है, वह उसी की नियति है। अधिकांश मनुष्यों को अन्य प्राणियों की अपेक्षा अधिक सुविधा-सम्पन्न जीवनयापन करते हुए देखा जाता है। इतने पर भी संभावना यह भी है कि वह इन उपलब्धियों की तुलना में और भी अधिक समर्थता और महत्ता प्राप्त कर सके। पर शर्त एक ही है कि उस अभिवर्धन के लिए वह स्वयं अतिरिक्त प्रयास करे। कमियों को पूरा करें और जिसकी नितान्त आवश्यकता है, उसे पाने-कमाने के मिल अधिक जागरूगतापूर्वक अधिक तत्परता एवं तन्मयता बरते। अपने पुरुषार्थ को इस स्तर का सिद्ध करे कि यह मात्र दैवी अनुदानों के आधार पर ही समुन्नत बनकर नहीं रह रहा है वरन् उसका निज का पुरुषार्थ भी समुचित मात्रा में सम्मिलित रहा है। यह प्रतिभा ही है जिसके बल पर वह अन्यायों की तुलना में अधिक सुसंस्कृत और समुन्नत बनता है। गोताखोर गहरी डुबकी लगाकर मोती बीनते हैं। हीरे खोजने वाले खदान का चप्पा-चप्पा ढूँढ़ डालते हैं। प्रतिभा को उपलब्ध करने के लिए भी इससे कम प्रयास से काम नहीं चलता।

प्रतिभा एक दैवी स्तर की विद्युत चेतना है, जो मनुष्य के व्यक्तित्व और कर्तृत्व में असाधारण स्तर की उत्कृष्टता भर देती है। उसी के आधार पर अतिरिक्त सफलताएँ आश्चर्यजनक मात्रा में उपलब्ध की जाती हैं। साथ ही इतना और जुड़ता है कि अपने लिए असाधारण, श्रेय, सम्मान और दूसरों के लिए अभ्युदय के मार्ग पर घसीट ले चलने वाला मार्ग-दर्शन वह कर सके। माँझी की तरह अपनी नाव को खेकर स्वयं पार उतरे और उस पर बिठाकर अन्यान्यों को भी पार उतारने का श्रेय प्राप्त कर सके। गिरों के उठाने, डूबतों को उबारने और किसी तरह समय गुजारने वालों को उत्कर्ष की ऊँचाई तक उछालने में समर्थ हो सके प्रतिभाशाली लोगों को असाधारण कहते हैं। विशिष्ट और वरिष्ठ भी कहा जाता है। साधारणजनों को तो जिन्दगी के दिन पूरे करने में ही जो दौड़-धूप करनी पड़ती है, झंझटों से निपटना और जीवनयापन के साधन जुटाना आवश्यक होता है उसे ही किसी प्रकार पूरा कर पाते हैं। पशु-पक्षियों और पतंगों से भी इतना ही पुरुषार्थ हो पाता है और इतना ही सुयोग जुट पाता है किन्तु प्रतिभावानों की बात ही दूसरी है, वे तारागणों के बीच चन्द्रमा की तरह चमकते हैं। उनकी चाँदनी सर्वत्र शान्ति और शीतलता बिखेरती है। वह स्वयं सुन्दर लगते और अपनी छत्र-छाया के संपर्क में आने वालों को शोभा-सुन्दरता से जगमगा देते हैं। प्रतिभावानों को उदीयमान सूर्य भी कह सकते हैं, जिसके दर्शन होते ही सर्वत्र चेतना का एक नया माहौल उमड़ पड़ता है, वे ऊर्जा और आभा के स्वयं तो उद्गम होते ही हैं, अपनी किरणों का प्रभाव जहाँ तक पहुँचा पाते हैं, वहाँ भी बहुत कुछ उभारते-बिखेरते रहते हैं। सच तो यह है कि नर-वानर को शक्ति-पुँज बनाने का श्रेय प्रतिभा को ही है। प्रतिभा ही शरीर में ओजस्विता, मानस में तेजस्विता और अन्तःकरण में विभूति भरी वर्चस्विता के रूप में दृष्टिगोचर होती है। मनुष्य की अपनी निजी विशेषता का परम पुरुषार्थ यही है। जो इससे वंचित रह गया, उसे मार्ग ढूँढ़ने का अवसर नहीं मिलता। मात्र अन्धी भेड़ों की तरह जिस-तिस के पीछे चल कर, जहाँ भाग्य ले पहुँचाता है, वहाँ जाकर ऐसा व्यक्ति अशक्त परावलम्बियों जैसा जीवन जीता है। कठिनाइयों के समय यह मात्र घुटन अनुभव करता और आँसूभर बहाकर रह जाता है।

संसार असंख्य पिछड़े लोगों से भरा पड़ा है। वे गयी-गुजरी जिन्दगी जीते और भूखे-नंगे तिरस्कृत-उपेक्षित रहकर किसी प्रकार मौत के दिन पूरे करते हैं। निजी समर्थता का अभाव देखकर उन पर विपन्नता और प्रतिगामिता के अनेक उद्भिज चढ़ दौड़ते हैं। दुर्व्यसन, दुर्बल मनोभूमि वालों पर ही सवार होते हैं और उन्हें जिधर-तिधर खींचते-घसीटते फिरते हैं। ऐसे भारभूत लोग अपने लिए साथी सहयोगियों के लिए और समूचे समाज के लिए एक समस्या ही बने रहते हैं। इन्हीं का बाहुल्य देखकर अनाचारी अपने पंजे फैलाते, दाँत गड़ाते और शिकंजे कसते है। प्रतिभारहित समुदाय का धरती पर लदे भार जैसा आकलन ही होता है। वे किसी की कुछ सहायता तो क्या कर सकेंगे, अपने को ही अर्धमृतक की तरह किन्हीं के कंधों पर लदकर चलने का आश्रय ताकते हैं।

संसार सदा से ऐसा नहीं था, जैसे कि अब सुन्दर, सुसज्जित, सुसंस्कृत और समुन्नत दीखता है। आदिकाल का मनुष्य भी वन-मनुष्यों की तरह भूखा-नंगा फिरता था। ऋतु-प्रभावों से मुश्किल से ही जूझ पाता था। जीवित रहना और पेट भरना ही उसके लिए प्रधान समस्या थी और इतना बन पड़ने पर वह चैन की साँस भी ले लेता था। संसार तब इतना सुन्दर कहाँ था? यहाँ खाई खन्दक टीले, ऊसर, बंजर, निविड़ बन और अनगढ़ जीव-जन्तु ही, जहाँ-तहाँ दीख पड़ते थे। आहार, जल और निवास तक की सुविधा न थी, फिर अन्य साधनों का उत्पादन और उपयोग बन पड़ने की बात ही कहाँ बन पाती होगी?

आज डडडड, हाट-बाजारों उद्योग-व्यवसायों विज्ञान-आविष्कारों सुविधा, साधनों अस्त्र-शस्त्र सज्जा-शोभा शिक्षा और सम्पदा से भरा-पूरा संसार अपने आप ही नहीं बन गया है। उसने मनुष्य की प्रतिभा विकसित होने के साथ-साथ ही अपने कलेवर का विस्तार भी किया है। श्रेय मनुष्य को दिया जाता है, पर वस्तुतः दुनिया जानती है कि वहाँ सब कुछ सम्पदा और बुद्धिमत्ता का ही खेल है। इससे दो कदम आगे और बढ़ाया जा सके, तो सर्वतोमुखी प्रगति का आधार एक ही दीख पड़ता है प्रतिभा-परिष्कृत प्रतिभा। इसके अभाव में अस्तित्व जीवित लाश से बढ़कर और कुछ नहीं रह जाता।

सम्पदा का इन दिनों बहुत महत्व आँका जाता है, इसके बाद समर्थता, बुद्धिमत्ता आदि की गणना होती है पर और भी ऊँचाई की ओर नजर दौड़ाई जाय, तो दार्शनिक शासक, कलाकार, वैज्ञानिक, निर्माता एवं जागरूक लोगों में मात्र परिष्कृत प्रतिभा का ही चमत्कार दीखता है। साहसिकता उसी का नाम है। दूरदर्शिता, विवेकशीलता के रूप में उसे जाना जा सकता है। यदि किसी को वरिष्ठता या विशिष्टता का श्रेय मिल रहा हो तो समझना चाहिए कि यह उसकी विकसित प्रतिभा का ही चमत्कार है। इसी का अर्जन सच्चे अर्थों में वह वैभव समझा जाता है जिसे पाकर गर्व और गौरव का अनुभव किया जाता है। व्यक्ति याचक न रहकर दानवीर बन जाता है। यही है वह क्षमता, जो अस्त्र-शस्त्रों की रणनीति का निर्माण करती है और बड़े से बड़े बलिष्ठों को भी धराशायी कर देती है। शक्ति की सर्वत्र अभ्यर्थना होती है, पर यदि उसका बहुमूल्य अंश खोजा जाय तो उसे प्रतिभा के अतिरिक्त और कोई नाम नहीं दिया जा सकता। विज्ञान उसी का अनुयायी है। सम्पदा उसी को चेरी है। श्रेय और सम्मान वही जहाँ-तहाँ से अपने साथ रहने के लिए घसीट लाती है। गौरव-गाथा उन्हीं की गायी जाती है। अनुकरणीय और अभिनंदनीय इसी विभूति के धनी लोगों में से कुछ होते हैं।

दूरदर्शिता, साहसिकता और नीति-निष्ठा का समन्वय प्रतिभा के रूप में परिलक्षित होता है। ओजस्, तेजस् और वर्चस् उसी के नाम हैं। दूध गर्म करने पर मलाई ऊपर तैरकर आ जाती है। जीवन के साथ जुड़े हुए महत्वपूर्ण प्रसंगों से निपटने का जब कभी अवसर आता है, तो प्रतिभा ही प्रधान सहयोगी की भूमिका निभाती देखी जाती है।

सफलताओं में, उपलब्धियों में अनेकों विशेषताओं के योगदान की गणना होती है, पर यदि उन्हें एकत्रित करके एक ही शब्द में केन्द्रित किया जाय, तो उसे प्रतिभा कहने भर से काम चल जायेगा और भी खुलासा करना हो तो उसे अपने को, दूसरों को, संसार को और वातावरण को प्रभावित करने वाली सजीव शक्ति वर्षा भी कह सकते हैं।

अन्यान्य उपलब्धियों का अपना-अपना महत्व है। उन्हें पाने वाले गौरवान्वित भी होते हैं और दूसरों को चमत्कृत भी करते हैं, पर स्मरण रखने की बात यह है कि यदि परिष्कृत प्रतिभा का अभाव हो, तो प्रायः उनके दुरुपयोग ही बन पड़ता है। दुरुपयोग से अमृत भी विष बन जाने की उक्ति अप्रासंगिक नहीं है। शरीर बल से सम्पन्नों को आततायी, आतंकवादी, अनाचारी, आक्रमणकारी, अपराधी के रूप में उस उपलब्धि का दुरुपयोग करते और अपने समेत अन्यान्यों को संकट में धकेलते देखा जाता है। सम्पदा अर्जित करने वाले उसका सही उपयोग न बन पड़ने पर विलास, दुर्व्यसन, उद्धत, अपव्यय, विग्रह खड़े करने वाले अहंकार-प्रदर्शन आदि में खर्च करते देखे गये हैं। अवांछनीय व्यक्तियों और कार्यों को उसको सहयोग मिल जाने पर अनर्थ खड़े होते देखे जाते हैं। बढ़ी हुई शिक्षा या चतुरता एक से एक बड़े प्रपंच रचती है। ऐसे जाल-जंजाल बुनती है, जिनमें फँसने वालों को मछुआरों और चिड़ीमारों से पाला पड़ने जैसा भाग्य कोसना पड़ता है। बढ़ा हुआ सौंदर्य व्यभिचार का ही रास्ता पकड़ता है। बड़े साहब, अफसर, रिश्वतखोरी से, खोटी कमाई से जिस प्रकार बड़े आदमी बनते हैं उसे देखकर यही सोचना पड़ता है कि यदि यह लोग शरीर-श्रम पर से पेट भरने वाले श्रमिक रहे होते तो हजार गुना अच्छा था। प्रतिभा ही है जो वैभव को उपार्जित ही नहीं करती, वरन् उसके सदुपयोग भर के लिए उच्चस्तरीय सुझाव, संकल्प और साहस भी प्रदान करती है। बड़प्पन भी तो इसी पर आश्रित है।


इन्द्र को झुकना पड़ा (kahani)

तथागत का परम प्रिय शिष्य था- आनन्द। उस दिन में बसने और धर्मप्रचार करने के लिए भेजा जा रहा था। सभी ने अपने परिचित एवं सुविधापूर्ण स्थान चुन लिए। आनन्द ने सुनापरान्त नामक गाँव चुना। वह दुष्ट दुर्जनों के लिए प्रख्यात था। वहाँ कोई साधु पैर जमा ही नहीं सका था। सभी ने आश्चर्य से पूछा-ऐसी विपरीत परिस्थितियों वाले स्थान को अपना कार्य क्षेत्र आप क्यों चुनते हैं?

आनन्द ने कहा-चिकित्सक को वहाँ जाना चाहिए जहाँ भयंकर महामारी फैली हो। अपनी सुविधा और सुरक्षा की बात सोचने पर चिकित्सक और साधु दोनों ही हेय बनते हैं। दोनों के स्तर की परीक्षा तो कठिन परिस्थितियों में ही होती है।

भयंकर अकाल पड़ा। इन्द्रदेव ने कुपित होकर बाहर वर्ष तक पानी न बरसाने की घोषणा की।

यह अशुभ समाचार सुना तो सभी किसानों ने, पर वे विचलित न हुए। उनने अपने हल-बैल खेत जोतने में उसी प्रकार लगाये रखे।

इन्द्र को भारी कौतूहल हुआ कि यह लोग निरर्थक श्रम क्यों कर रहे हैं। उनसे रह न गया, कारण पूछने के लिए सामान्य वेश में किसानों के पास पहुँचे।

पूछा-जब बारह वर्ष वर्षा नहीं होने वाली है तो फिर लोगों के खेत जोतने का क्या लाभ?

किसानों ने धैर्यपूर्वक उत्तर दिया। बारह वर्षों तक हम और हमारे बैल निष्क्रिय बैठे रहें तो कृषि कार्य का अभ्यास ही गँवा बैठेंगे। इन्द्र अपना काम करे। हम अपना काम क्यों छोड़ें?

इतनी निष्ठा के सामने इन्द्र को झुकना पड़ा। उनने अपना विचार बदल दिया और वर्षा सदा उसी क्रम से होने लगी।


अगले दिनों होगा संगीत से उपचार

संगीत के सुनियोजित प्रयोग से रोगनिवारण, भावनात्मक परिष्कार, स्फूर्तिवर्धन एवं प्रतिभाउन्नयन जैसे महत्वपूर्ण लाभ संभव है। इस माध्यम से आनन्द भरी परिस्थितियाँ उत्पन्न कर संवेदनाओं को भाव तरंगों से जोड़ कर मनःस्थिति में वाँछित परिवर्तन लाया, जा सकता है। वनस्पतियों एवं प्राणियों के अभिवर्धन एवं कार्यक्षमता बढ़ाने के कितने ही सफल प्रयोग भी हुए है। जब यह प्रमाणित हो चुका है कि अचेतन सभी पर संगीत का चमत्कारी प्रभाव पड़ता है।

संगीत के माध्यम से जो ध्वनि तरंगें उत्पन्न होती हैं, वे स्नायु प्रवाह पर वाँछित प्रभाव डालकर न केवल उनकी सक्रियता को बढ़ाती है, वरन् विकृत चिन्तन को रोकती और मनोविकारों को मिटाती है। स्वर शक्ति की इस सृजनात्मक सामर्थ्य की ओर अब वैज्ञानिकों का भी ध्यान आकृष्ट हुआ है। जहाँ एक ओर अब शब्दचालित यंत्र उपकरण, बम एवं रोबोट आदि तैयार हो रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ प्रदूषण निवारण, मनोविकार शमन, कायिक-रोगनिवारण में ध्वनि-तरंगों का संगीत स्पन्दन का प्रयोग हो रहा है।

मानवी मन-मस्तिष्क पर पड़ने वाले संगीत के प्रभाव विषय पर वैज्ञानिकों ने गहन अनुसंधान किया है और पाया है कि दोनों के मध्य घनिष्ठ संबंध है। मूर्धन्य मनःचिकित्सकों एवं संगीत विशेषज्ञों ने इस तथ्य की पुष्टि के लिए कितने ही प्रयोग किये हैं। निष्कर्ष प्रस्तुत करते हुए वे कहते हैं कि स्वर माधुर्य के प्रभाव से ध्यान की गहराई में प्रवेश करने जैसी मानसिक अवस्था का निर्माण होता और मस्तिष्क अल्फा-स्टेट की स्थिति तक जा पहुँचता है। इसका प्रतिफल शान्तचित्तता एवं आन्तरिक प्रफुल्लता के रूप में हस्तगत होता है, साथ ही मनोविकृतियों से पीछा छूटता है। परीक्षणों में पाया गया है कि तेज शोर करने वाले वाहनों एवं जेट विमानों के चालक स्नायविक उत्तेजना के प्रायः शिकार बनते रहते हैं। उनकी नाड़ी चढ़ी रहती है। किन्तु जब उन्हें उपयुक्त राग-रागिनियों के संपर्क में रखा गया तो वे पूर्णतः स्वस्थ हो गये। मन-मस्तिष्क में नवीन स्फूर्ति का संचार होते देर न लगी उक्त अनुसंधान कर्ताओं ने इसे मानवी चेतना को मथ डालने वाली विश्व की एक सर्वाधिक महत्वपूर्ण शक्ति माना है।

हृदय स्थल को मानवी भाव संवेदनाओं, विभूतियों एवं सद्गुणों का केन्द्र माना गया है। इस अंतस्तल पर संगीत का असाधारण प्रभाव पड़ता है। डॉ. बारबरा ब्राउन के अनुसार हृदय स्पंदन की गति संगीतकार से अपना तालमेल बहुत जल्दी बिठा लेती है। प्रयोग परीक्षणों में देखा गया है कि संगीत के मधुर प्रकंपन हृदयगति को परिवर्तित कर देते हैं। इतना ही नहीं स्वर लहरियों के साथ उसे थिरकते हुए भी देखा गया है कि संगीत के मधुर प्रकंपन हृदयगति को परिवर्तित कर देते है। इतना ही नहीं स्वर लहरियों के साथ उसे थिरकते हुए भी देखा गया है। स्वीडिश वैज्ञानिक डॉ. हिल ने इस संदर्भ में पर्याप्त खोजें की हैं। वैज्ञानिक उपकरणों यथा पॉलीग्राफ आदि के माध्यम से हृदय के विद्युतीय एवं ध्वनि संकेतों की रिकॉर्डिंग करने के पश्चात उसने निष्कर्ष निकाला है कि ३० मिनट तक यदि कर्णप्रिय ध्वनि तरंगों को सुनते रहा जाय तो हृदय की गति क्रमशः धीमी पड़ती जाती है और एक स्थिति ऐसी भी आती है जब श्रोता ध्यानस्थ हो जाता है इसकी तुलना उनसे योगियों के अनाहतनाद साधना द्वारा प्राप्त समाधि अवस्था से की है।

मिडिल सेक्स हॉस्पिटल, लन्दन के सुप्रसिद्ध शल्य चिकित्सक डॉ. जे.डी. टॉयलर ने इस विधा को अपनाकर मूर्च्छा की स्थिति में पहुँचे हुए व्यक्तियों का उपचार करने में आशातीत सफलता पाई है। उनका कहना है कि भविष्य में इस विधा को अपनाकर चिकित्सा जगत में एक नवीन क्राँति की जा सकेगी और हृदय तथा मस्तिष्क संबंधी विकृतियों को दूर किया जा सकेगा।

संगीत मनुष्य सहित प्रत्येक जीवधारी के मस्तिष्क हृदय एवं स्नायुतंत्र पर आश्चर्यजनक प्रभाव डालता है। मानवी प्रकृति और मनःस्थिति के अनुरूप उत्कृष्टता की पक्षधर भाव सम्पन्नता से युक्त संगीत विधा यदि विकसित हो सके, तो उससे न केवल मानसिक प्रसन्नता एवं शारीरिक क्षमता-सक्रियता प्राप्त हो सकेगी, वरन् स्वास्थ्य सन्तुलन के साथ ही आन्तरिक विभूतियों-अतीन्द्रिय सामर्थ्यों को भी हस्तगत किया जा सकेगा।


आत्मिक प्रगति का प्रथम सोपान जीवन शोधन

उपासना में असफलता अथवा उस में धीमी प्रगति रहने का कोई विशेष कारण होना चाहिए। इस पर विशेष रूप से ध्यान देने की आवश्यकता है। यह न युग का प्रभाव है और न उपासनाओं के माहात्म्य एवं विधान में कोई त्रुटि ही है। यदि ऐसा होता तो इन्हीं दिनों कितने ही साधक क्यों अत्यन्त उच्चकोटि की स्थिति में पाये जाते हैं? क्यों उन्हें सिद्धियों से ओत−प्रोत देखा जाता है?

इसका स्पष्ट कारण एक ही है कि साधकों का चिन्तन, चरित्र और व्यवहार निकृष्ट कोटि का बना रहता है। वे उसमें सुधार नहीं करते। व्यक्तित्व को परिष्कृत करने की आवश्यकता अनुभव नहीं करते। इसी जन्म के किये हुए तथा पूर्वजन्मों के संचित कुसंस्कारों - दुष्कर्मों के परिमार्जन का प्रयत्न नहीं करते। फलतः मलीन वस्त्र पर रंग चढ़ाने की तरह, रेगिस्तान में बीज बोने की तरह पूजा कृत्यों का सत्परिणाम उत्पन्न ही नहीं हो पाता। कीचड़ के हौदी में एक बूँद गंगाजल डाल देने से उसमें शुद्धि कहाँ हो पाती है।

ध्यान रखे जाने योग्य बात यह है कि पूजा कोई जादू नहीं है। वह विशुद्ध विज्ञान है। उस मार्ग पर चलने वाले को सर्वप्रथम आत्मशोधन करना पड़ता है। धुले कपड़े पर ही रंग चढ़ता है। जोतकर तैयार की हुई भूमि में ही बीज उगता है। अंतरंग और बहिरंग जीवन में जितनी पवित्रता और प्रखरता का समावेश होगा, उतनी ही मात्रा में पूजा उपासना का चमत्कार उत्पन्न होगा। दुष्कर्मों में निरत व्यक्ति किसी देवी देवता का अनुग्रह अर्जित नहीं कर सकते, क्योंकि समूचा देव परिकर शुद्धता प्रधान है। जहाँ उसकी जितनी कमी होती है वहाँ उन्हें उतनी ही उपेक्षा या अप्रसन्नता उत्पन्न होती है। जब साधारण मनुष्य घिनौनी, दुर्गन्धित, अस्त-व्यस्त जगह में नहीं रुकना टिकना चाहता तो देवता किसी घिनौने व्यक्तित्व की ओर क्यों ध्यान देंगे?

इस तथ्य, को समझा जा सके तो मानना चाहिए कि उपासना को फलित होने का सूत्र हाथ लग गया। इसका अनुमान लगाया जा सकता है, कि अध्यात्म मार्ग की सफलता का प्रारंभ कहाँ से करना चाहिए। प्रथम सोपान है आत्म परिष्कार। इसके लिए अपने गुण-कर्म स्वभाव की वर्तमान त्रुटियों को पैनी नजर से परखा जाय और उन्हें बहार फेंकने का साहस भरा पराक्रम कर दिखाया जाये।

पूजा से पाप नष्ट हो जाते हैं। इस कथन का तात्पर्य इतना ही है कि यदि पूजा कृत्यों को भावनापूर्ण किया जाय तो उसके फलस्वरूप सन्मार्ग पर चलने और दुष्कर्मों को त्यागने की प्रबल आकांक्षा उत्पन्न होनी चाहिए। उसका यह अर्थ कदापि नहीं कि जो पाप कभी किये गये हैं उनके दण्ड दुष्परिणामों से बचा जा सकेगा। उसके परिशोधन का उपाय तो एक ही है सच्चे मन से, किया हुआ पश्चाताप और प्रायश्चित।

प्राचीनकाल के कितने ही पापियों की कथा गाथाएँ सुनने को मिलती है। उन में राम नाम का प्रताप नहीं वरन् जीवन शोधन में कायाकल्प जैसा परिवर्तन कर लेना कारण था। बाल्मीकि, बिल्व मंगल, अंगुलिमाल, अम्बपाली आदि ने अपने पुरातन जीवन क्रम में आमूल चूल परिवर्तन कर लिया था इतना ही नहीं उसने पिछले किये हुए पापों की क्षतिपूर्ति के लिए उतने ही वजन के सत्कर्म करके पुरातन अशुभ संकलन का प्रायश्चित भी किया था। अंगुलिमाल अम्बपाली ने अपनी संचित सम्पदा बुद्ध संघ को अर्पित कर दी थी। इतना ही नहीं भावी जीवन में लोकमंगल के लिए परिपूर्ण प्रयास करते हुए सत्प्रवृत्ति संवर्द्धन के क्रिया-कलापों में सारा जीवन खपा दिया था।

अशोक ने कलिंग विजय में जो रक्तपात किया था उसके प्रायश्चित हेतु उसने अपना सारा वैभव ही नहीं अपना पुत्री संघमित्रा पुत्र महेन्द्र का सारा जीवन धर्मचक्र प्रवर्तन के लिए लगा दिया था। अंगुलिमाल और अम्बपाली भी ‘धर्म’ शरणं गच्छामि का दीक्षा मंत्र लेते ही देश विदेश में धर्म धारणा को सुविस्तृत करने में जुट गये। संचित पापों का प्रायश्चित करने के लिए ही सूरदास ने अपनी आँखें फोड़ ली थीं।

इन उदाहरणों में साधक को आध्यात्मिक पृष्ठभूमि बनाने के अपने प्रथम प्रयास का पता चलता है। जो इस प्रकरण को अनावश्यक समझकर लंबी छलाँग लगाना चाहते हैं, जमीन से उछल कर छत पर बैठना चाहते हैं, उनके पल्ले निराशा और असफलता ही हाथ लगती है। फलतः पूजा पाठ से कोई स्वार्थ सिद्ध न होने पर वो उपासना विमान तथा उसके क्रिया–कलापों को कोसते देखे जाते हैं। बिना नींव की दीवार यदि एक धक्के में ढह जाय तो आश्चर्य ही क्या है? रेगिस्तान में बगीचा लगाने वालों को तद्नुरूप तैयारी करनी पड़ती है। इच्छा करने मात्र से या पूजा पाठ की बाल क्रीड़ाएँ करने भर से किसी उच्चस्तरीय सत्परिणाम की आशा करना आकाश कुसुम तोड़ने के समान है, जो शेखचिल्ली जैसी कल्पना ही बन कर रह जाती है।

शास्त्र का कथन है-देवता बनकर देवता की उपासना करनी चाहिए’ इसका तात्पर्य यह है कि देव परिकर की जैसी प्रवृत्ति है उसी के अनुरूप अपने को ढालना चाहिए। यह सोचना व्यर्थ है कि मनुष्य को अपने को बदलने सुधारने की आवश्यकता नहीं है। देवता ही उलट कर मनुष्य जैसे घिनौने बन जाय। काली भैरव आदि के संबंध में लोगों ने ऐसी ही मान्यता कर रखी है कि उन्हें गद्य माँस जैसी वस्तुएँ भेंट करके, स्तवन की जय-जयकार सुनाकर उन्हें अपने भक्त की मनोकामनाएँ पूरी करने के लिए सहमत किया जा सकता है। चाहे वे कामनाएँ सर्वथा अनीतियुक्त ही क्यों न हो? इस प्रकार की मान्यताओं वाले देव संपर्क के लिए जो सोचना करना चाहिए उस से ठीक विपरीत दिशा में चलते हैं। फलतः जब प्रतिकूल दुष्परिणाम सामने आते हैं तो उनका दोष देवता पर थोपते हैं।

भावी गतिविधियों को उत्कृष्ट आदर्शवादी बनाने के अतिरिक्त अध्यात्म के चमत्कार देखने वालों के लिए आवश्यक है कि वे पूर्व संचित दुष्कर्मों का प्रायश्चित करें। प्रायश्चित का अर्थ किसी नदी में नहा लेना, किसी प्रतिमा का दर्शन कर लेना पंचगव्य पी लेना आदि नहीं है वरन् यह है कि रास्ता चलने वालों की राह में जो काँटे बिखरे हैं, उन्हें मिट्टी डालकर समतल किया जाय। यह कार्य किन्हीं पूजाकृत्यों से नहीं हो सकते वरन् सच्चे अर्थों में इस बात का साहस जुटाना पड़ता है कि जितने पाप कमाये हैं उसी के भार के समतुल्य पुण्य भी इतनी मात्रा में कमाये जायें जिनसे तराजू का पलड़ा भारी नहीं तो कम से कम समान हो जाय। इन साहसिक प्रयत्नों को करने के लिए उद्यत समुचित लाभ उठाते हैं। शेष तो खिलवाड़ का परिणाम उपहास भर के रूप में पाते हैं।


सुकरात को अपने ज्ञान का अहंकार नहीं (kahani)

यूनान में देल्फी के मन्दिर में एक अतीन्द्रिय क्षमता जाग्रत देवी घोषणाएँ करती और लोग विशेष अवसरों पर अपने व समाज के भविष्य की बातें पूछते। किसी ने भीड़ में से पूछ लिया कि ‘इस समय यूनान के सबसे बुद्धिमान ज्ञानी पुरुष कौन हैं’।

देवी ने घोषणा की ‘सुकरात’। यह सुनकर लोग सुकरात के पास गये और बोले कि देवी ने ऐसी घोषणा की है। सुकरात ने कहा-गलत मैं तो अज्ञानी हूँ, वैसे ज्ञान प्राप्त करने की मेरी जिज्ञासा अवश्य है।’

यह सुनकर लोग फिर देवी के पास गये और बोले कि ‘सुकरात को आपने यूनान का सबसे ज्ञानी पुरुष बतलाया था। यह तो इंकार करता है और कहता है कि वह तो अज्ञानी है। देवी ने कहा ‘बस! इसीलिए तो सबसे बड़ा ज्ञानी है कि ज्ञानवान होते हुए भी उसे अपने ज्ञान का अहंकार नहीं है।’


देवता, जिसकी भटकन छूटी

वह ताँगे से उतर कर एक ओर चल पड़ा। रूखा चेहरा, उलझे बाल, सूखे होंठ, व्यथा और आक्रोश को अपने में संजोई हुई आँखें, सभी मिलकर उसकी मानसिक संतप्तता को मुखर होकर बता रहे थे। हो भी क्यों न? इन कुछ ही दिनों में उसे अपने कहे जाने वालों से क्या कुछ आघात नहीं सहने पड़े। क्या यही है जिन्दगी? द्वेष-कलह चिन्ता ईर्ष्या की आग में जलने सुलगने वाला ईंधन। यह नहीं तो फिर और क्या? जीवन या तो घुटन है या फिर उन्माद। वह सोचता हुआ बढ़ रहा था। आखिर सिसकते हुए जीने की भी हद होती है। कब तक जकड़ रहेंगे परिस्थितियों की जटिलता ही एक उपाय है सिर्फ एक। इस जिन्दगी से निजात वह अपने आपसे कह उठा। तभी तो वह इधर आया है परिचितों से दूर। उसके आगे बढ़ते कदम जैसे जिन्दगी में व्यथा के बवंडर परेशानियों के झंझावात को लिए चलता जा रहा था इन सभी से अन्तिम छुटकारा पाने हेतु। कब गंगा घाट आ गया पता ही न चला। सामने थी गंगा की विशाल जल राशि। जिसमें कुछ लोग तैर रहे थे। इन सभी को अनदेखा करता हुआ वह जगह ढूँढ़ रहा था वह जगह जहाँ से छलाँग लगाकर वह गंगा की गोद में चिरविश्रान्ति पा सके।

इतने में सामने से आ रहे एक किशोर ने उसे पहचानने का प्रयास करते हुए पुकारा-मामा आप यहाँ अकेले’। उसने आँखें उठाई होठों को दाँतों से काटा। फिर सामान्य बनने का प्रयत्न करते हुए कहा- अरे सिद्धू तुम?’

‘पर आप यहाँ कैसे’? ‘कुछ नहीं बस वैसे ही’ अन्तर के भावों को छिपाने का प्रयास करते हुए कहा। पर चेहरा मानव मन का दर्पण जो है। मन में उठने वाले विचारों की तरंगें, उमड़ने वाले भावों की लहरें इस पर प्रतिबिम्बित हुए बिना नहीं रहती।

‘छिपाने की कोशिश भले करें-पर आप परेशान जरूर है-किशोरवय से युवावस्था में छलाँग लगाते तरुण ने उसके चेहरे की ताकते हुए कहा। ‘मुझे अकेले छोड़ दो और तुम जाओ फिर कभी बैठेंगे उसने पीछा छुड़ाने की गरज से कहा। ‘नहीं आज मैं तो नहीं छोड़ने का’। किशोर ने अपने से वय में पाँच-सात साल बड़े मामा का हाथ पकड़ कर अपनी ओर खींचा। फिर जैसे कुछ सोचते हुए बोला-मामा एक बात कहूँ। ‘मामा दक्षिणेश्वर चलोगे’?

भाँजे की जिद्द के सामने उसे झुकना पड़ा घाट पर खुलने जा रही नाव पर बैठ कर चल पड़े दक्षिणेश्वर की ओर। उसकी समस्याओं से अनभिज्ञ बालक चटपटी बातें किए जा रहा था। न चाहते हुए भी मन पर चढ़ा आवेश का बुखार उतरता जा रहा था।

दक्षिणेश्वर का घाट आ गया। दोनों उतरे गंगा में हाथ-पाँव धोकर चल पड़े- सामने बने मन्दिर की ओर। देवालय में प्रणाम के अनन्तर सिद्धू ने कहा- ‘मामा उधर की ओर चलना है सामने वाले कमरे की ओर उसी में वह रहते हैं।’

‘कौन’? ‘वही संत’। कमरे में प्रवेश करते हुए उन्होंने देखा लाल किनारी की धोती उस पर एक कुर्ता पहने हल्की दाढ़ी वाला एक व्यक्ति हलकी सी तुतलाहट भरी किन्तु मोहक आवाज में सामने बैठे लोगों से कह रहा था- ‘इंसान भटका हुआ देवता है। भटकन छूटे तो देवता बने। भटकाव के कारण ही परमात्मा की अमूल्य धरोहर जिन्दगी उसे घुटन उन्माद भरी लगती है। ‘महाजनो येन गतः सपन्थाः’ की नीति न सुहाने के कारण वह पगडंडी छोड़कर चल पड़ा है बीहड़ में। ऐसे में काँटे लगे विषैले जीवों के दंश का शिकार होना पड़े तो आश्चर्य क्या’?

सन्त ने सहास्यवंदन उन आगन्तुकों को देखा मुस्कराए और बैठने का इशारा करते हुए अपना कथन जारी रखा पहचानो अपने को और उस राह को जिस पर चलना उचित है। जिन्दगी का उद्देश्य और उपयोग का पता चल जाने के बाद साफ अनुभव हो जाता है कि परिस्थितियों की जटिलता भी मानव विकास हेतु प्रशिक्षण मात्र है।’

उसे यह सब सुनकर लग रहा था जैसे वह सब कुछ उसी को कहा जा रहा है। तो क्या वह भी भटका हुआ देवता है। फिर राह कैसे पाए? देवत्व को कैसे उपलब्ध करे?

हिम्मत जुटाई। गले को खंखार कर बोला ‘एक जिज्ञासा है’? ‘पूछो’ सन्त ने बाल सुलभ मुस्कराहट के साथ कहा।

‘भटकन से कैसे उबरा जाय? स्वयं को कैसे पहचाना जाय’। ‘इधर आओ’ उन्होंने उसे स्नेह से बुलाया। पास पहुँच जाने पर कहा ‘यह शीशा देखते हो इसमें क्या दिखाई देता है’? ‘अपना चेहरा’ ‘उसका जवाब था।

‘ध्यान से देखा कुछ और दिखेगा’? प्रयत्न करते हुए अपने प्रतिबिम्ब की ओर निहारा पर कुछ तो नहीं दिखा। ‘भावों का परिवर्तन नहीं दिखा उस समय जब तुम खिलखिलाते थे तब और आज की सूजी आँखें चेहरे की रुपाई में परिवर्तन नहीं’। ‘हाँ सो तो है’। ‘और गहरे जाओ स्वयं की आँखों में प्रवेश करो’। उसने प्रवेश करने का प्रयास किया। ‘प्रतिबिम्ब की आँखों में आँखें डालो। कुछ समझ में आया? समझे हो तो सब-सच कहो’।

‘हाँ कुछ-कुछ उसने संत की ओर देखा संत के चेहरे पर पितृ सुलभ करुणा थी। आँखों में है विरक्ति वितृष्णा का भाव पलायन की दुर्बलता। किंचित् और अन्तर में प्रवेश करो। वहाँ पहुँचो जहाँ विचार समाप्त होते भाव उपजते हैं’ अब वह अपने को स्वस्थ महसूस कर रहा था। उसे थोड़ा विस्मय भी था।

दर्पण में भेदती उसकी दृष्टि अब अन्तर की ओर लौटने लगी थी। भावों का उद्गम बिन्दु। मन की कल्पनाओं के गहरे विश्लेषक बुद्धि के भी नीचे चित्तरूपी संस्कारों के जखीरे के भी परे आत्मा और प्रकृति का मिलन स्थल जिसे शास्त्र अहं कहते हैं ‘तो क्या यही है भावों का उद्गम। ‘नहीं और गहरे जाओ सत्ता के केन्द्र की ओर उस मूल की ओर जो तुम स्वयं हो’ और वह डूब गया गहरे ध्यान में।

काफी देर बाद संत ने उसके सिर पर हाथ फेरा ‘समझ पाए तुम कौन हो’?

‘हाँ’ उसके अधरों पर मुस्कान चेहरे पर आत्म तेज तथा। अन्तर में ‘अयमात्मा ब्रह्म’ का मधुर संगीत गूँज रहा था पर इस स्थिति में उद्देश्य और उपयोग।

उद्देश्य है आत्मचेतना को जीवन के सभी आयामों में उभारना। धरती पर दिव्य जीवन को सिद्ध करना। उपयोग है समूची मानव प्रकृति को दिव्य बना कर परम सत्ता के इस विश्व उद्यान को सुरम्य बनाना। धरती पर दिव्य जीवन भागवत कार्य है। ‘वसुन्धरा पर एक नया युग उदय हो रहा है अध्यात्मयुग। तुम स्वयं को पहचानने के बाद अपने कर्त्तव्य में तत्पर हो।’ ‘जो आज्ञा गुरुदेव। आज मैंने जीवन की सार्थकता समझी’ ‘और इस सार्थकता का बोध कराने वाला असली गुरु यह दर्पण है मैं नहीं।’ कहकर संत हंस पड़े। हंसी थमने पर गंभीर मुद्रा में कहा ‘सचमुच में दर्पण का महत्व है। इसकी सहायता से आत्मविश्लेषण आत्म परिमार्जन की साधना का क्रम नित्य रखना। इसे आत्मदेव की उपासना समझो’।

‘आप ठीक कहते हैं’। वह स्वयं अपना काया पलट देखकर आश्चर्य चकित थे। घर से चले थे जीवन को समाप्त करने। किन्तु अब? फिर कुछ सोचते हुए मुस्कराए सचमुच पिछला जीवन समाप्त हो गया। अब तो नया जीवन है पूर्णतया नया। २६ फरवरी, १८८२ ई. बन गई नवजीवन की जन्म तिथि। यह नया जीवन उपलब्ध करने वाले व्यक्ति और कोई नहीं श्री महेन्द्रनाथ गुप्त थे जिन्होंने श्री रामकृष्ण की सहायता से भटकाव से मुक्ति पा देवत्व को उपलब्ध किया। मास्टर महाशय के लघु नाम से परिचित इन महामानव ने अपना समूचा परवर्ती जीवन ईश्वरीय कार्य में नियोजित किया व इतिहास में अमर हो गए।


‘काम’ एक उल्लास, एक दिव्य प्रेरणा

अध्यात्म शास्त्रों में जीवनक्रम के सफलता के चार आधार महत्वपूर्ण माने गये हैं- धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। इनमें से ‘काम’ शब्द का अर्थ ठीक प्रकार से न समझ सकने के कारण असमंजस उत्पन्न होता है। योगी, तपस्वी, संयमी और ब्रह्मचारी लोग सोचते हैं कि कहीं वे कामवासना की उपेक्षा करके भूल तो नहीं कर रहे हैं। भौतिकवादी प्रतिपादनों में तो कामवासना को मानवी चेतना की मूल प्रवृत्ति ही ठहरा दिया है। कितने ही पाश्चात्य मनोविज्ञानियों ने उसे प्रकृति प्रेरणा ठहराते हुए कामुकता की पूर्ति पर बहुत जोर दिया है। भ्राँतियों का मूल कारण ‘काम’ का अर्थ यौनलिप्सा के निम्न स्तर पर करने लगाना है।

कामशक्ति का भ्रांतिपूर्ण प्रतिपादन करने में फ्रायड नामक मनोवैज्ञानिक को अग्रणी माना जाता है। कामवासना को उसने मनुष्य की मूल प्रवृत्ति माना और उसे ‘लिविडो’ नाम से संबोधित किया है। उसके अनुसार जीवन की समस्त क्रियाओं की संचालिका शक्ति यही है। सम्पूर्ण व्यक्तित्व को प्रभावित करने की क्षमता इसमें है। जब उसका असाधारण रूप से दमन किया जाता है तो अनेक प्रकार की शारीरिक, मानसिक बीमारियाँ पैदा हो जाती है। किन्तु उसका उदात्तीकरण कला, धर्म, परोपकार, भक्ति आदि की भावनाएँ जाग्रत करता है, इस तथ्य की ओर उन का ध्यान ही नहीं गया, ऐसा अध्यात्मपरक मनोविज्ञान के समर्थकों का मत है।

मूर्धन्य मनोवैज्ञानिक अल्फ्रेड एडलर ने उक्त प्रतिपादन को फ्रायड की एक बड़ी भूल बताते हुए कहा है कि ‘काम प्रवृत्ति सामान्य जीवन का एक अंगमात्र है, जिसकी प्रतिष्ठा वंश-वृद्धि में सन्निहित है इस आधार पर की गई एकाँगी विवेचना मनुष्य जीवन के समग्र व्यक्तित्व को प्रकाशित नहीं कर सकती। उनका कहना है कि मनुष्य के सामान्य व्यवहार का स्रोत सामाजिक प्रतिष्ठा की प्रबल इच्छा है, न कि कामुकता की इच्छा। सामाजिक प्राणी होने के कारण प्रत्येक मनुष्य अपने साथियों में समाज में एक विशिष्ट स्थान बनाना चाहता है जिसे प्रतिष्ठा की कामना कह सकते हैं। यही मनुष्य की प्रेरणात्मक शक्ति है जिसे उल्लास उमंग भी कह सकते हैं। काम प्रवृत्ति के स्थान पर उसके परिष्कृत रूप ‘आत्म स्थापन’ को उसने मानव जीवन में प्रमुख स्थान दिया है। काम शक्ति का यही उच्चस्तरीय परिवर्तित रूप भी है।

प्रख्यात मनोवेत्ता कार्ल गुस्तेव जुँग के अनुसार कामशक्ति को यौन उत्तेजनाओं के सीमित दायरे में केन्द्रित नहीं किया जा सकता। यह एक सशक्त साइकिक एनर्जी-मानसिक ऊर्जा है, जिसके द्वारा मानव मन के प्रत्येक क्रिया-कलाप संचालित होते हैं। ‘लिविडो’ का अर्थ है इच्छाशक्ति संयम-शक्ति इसी के आधार पर मनुष्य जीवन की दिशाधारा निर्धारित होती है। इस शक्ति का प्रवाह कई दिशाओं में हो सकता है। मनुष्य में अनेक प्रवृत्तियाँ होती हैं। जिसमें जिस प्रवृत्ति की प्रधानता होती है, उसकी मानसिक शक्ति का प्रवाह भी उसी दिशा विशेष में होने लगता है। इस प्रवाह की दिशाधारा ही मानव के चरित्र एवं व्यक्तित्व का निर्धारण करती है। दमन की अपेक्षा आकांक्षा एवं अभिरुचि का उत्साह का प्रवाह मोड़ने में विशेष कठिनाई उत्पन्न नहीं होती। अतः कामशक्ति का सृजनात्मक प्रयोजनों में नियोजन भी कठिन नहीं होना चाहिए।

‘द् साइकोलॉजी ऑफ द् अनकाॅंशस’ नामक अपनी कृति में जुँग कहते हैं कि काम प्रवृत्ति वस्तुतः एक अभेद्य जीवनशक्ति है। इस जीवन ऊर्जा की अभिव्यक्ति उत्कर्ष की खोज में, कलात्मक सर्जन तथा अन्यान्य सृजनात्मक क्रियाओं में होती है। यौन सुख तो उसका एक क्षणिक एवं आँशिक भाग है जिसका प्रयोग मात्र जाति संरक्षण के लिये किया जाता है। इस तथ्य को जानने वाले कामुकता के भ्रमजंजाल से बचते और कामबीज का उन्नयन एवं नियोजन साँस्कृतिक, सामाजिक उत्कर्ष या आत्मोत्थान के लक्ष्यों को प्राप्त करने में करते हैं। उनके अनुसार इस मानसिक ऊर्जा का उपयोग जब सही दिशा में निर्धारित लक्ष्य की पूर्ति में किया जाता है तो मन संतुलित अवस्था में बना रहता है और उसकी परिणति मानसिक उल्लास-उमंग के रूप में, साहस एवं प्रतिभा के रूप में सामने आती है।

मनोविज्ञानी जुँग का उक्त प्रतिपादन प्रकारान्तर से भारतीय ऋषियों की उस मान्यता का समर्थन करता है जिसमें कामबीज को परम प्रयोजनों में, ज्ञानबीज में परिवर्तित एवं नियोजित करने की बात कही गई है। अथर्व वेद में कामशक्ति के अवतरण की प्रार्थना करते हुए ऋषि कहते हैं ‘हे परमेश्वर! तेरा काम रूप भी श्रेष्ठ और कल्याणकारक है। उसका चयन असत्य नहीं है। आप कामरूप से हमारे भीतर प्रवेश करें और पाप बुद्धि से छुड़ाकर हमें निष्पाप उल्लास की ओर ले चलें।’

काम वस्तुतः प्रत्येक प्राणी के अन्तराल में समाहित एक उल्लास है। छिपी प्रेरणा है जो आगे बढ़ने, ऊँचे उठने विनोद का रस लेने एवं साहसिक प्रयास करने के लिए निरन्तर उभरती रहती है। इसी को आकर्षण शक्ति कहते हैं। जड़ पदार्थों में यह ऋण और धन विद्युत के रूप में काम करती है। परम्परा उन्हें जोड़ती खदेड़ती रहती है। भौतिकी के अनुसार सृष्टि की गतिविधियों का उद्गम यही है। परमाणु का नाभिक अपने भीतर इसी क्षमता का निर्झर दबाये बैठा है और समयानुसार उसे उभार कर विकिरण उत्पन्न करता है। शक्ति तरंगें उसी से उद्भूत होती और संसार की अनेकानेक हलचलों का सृजन करती है।

प्राणियों में उसका उभार उत्साह उल्लास एवं उमंगों के रूप में होता है। पारस्परिक प्रेम, सहयोग से उत्पन्न उपलब्धियों में परिचित होने के कारण आत्मा उस स्तर के प्रयासों में रस लेती है और सहज विनोद के लिए उन प्रयासों में प्रवृत्त होती है। इसी को शास्त्रकारों ने ‘काम’ कहा है और उसकी उपयोगिता का समर्थन किया है।

इसी प्रवृत्ति का एक छोटा रूप ‘यौनाचार’ है जिसे फ्रायड जैसे पाश्चात्य मनोविज्ञानियों ने पूर्ण प्रवृत्ति का नाम दे डाला और मनुष्य को उसका गुलाम बनने को प्रोत्साहित किया है। परिणाम की दृष्टि से यह नर और नारी के लिए बोझिल ही नहीं कष्टकारक भी है। भारतीय मनीषियों ने कामतत्व की व्यापकता को समझते हुए ही संतानोत्पादन को इसका एक अति सामान्य प्रकृति प्रयोजन भर माना है जिससे वंश प्रवाह को सुस्थिर रखा जा सके। किन्तु मनुष्य ने इस संदर्भ मर्यादा का उल्लंघन एवं स्वेच्छाचार का दुस्साहस किया है।

वनस्पति जगत में पुष्पों का सौंदर्य और सौरभ उनके अन्तराल में उभरे हुए कामोल्लास का परिचय देते हैं। भ्रमर के गुँजन, मयूर के नृत्य, पक्षियों के क्रीड़ा कल्लोल में उनके उभरते हुए अन्तःउल्लास का परिचय मिलता है। मनुष्यों में यही विनोद, उल्लास अनेक अवसरों पर अनेक प्रकार से उभरता है। बच्चे अकारण उछलते मचलते रहते हैं। किशोरों को क्रीड़ांकन में तथा युवतियों को नृत्य-गायन में अपनी स्फूर्ति, अंतःउल्लास की शक्ति का परिचय देते देखा जाता है। प्रौढ़ों को दूरदर्शी योजनाएँ कार्यान्वित करते एवं गुत्थियाँ सुलझाने में भावविभोर देखा जाता है। कवि, कलाकार आदि को अपनी ही तरह के सरसता के निर्झर में आनन्द लेते और दर्शकों को उल्लसित करते देखा जाता है जो अगणित उमंगों के रूप में प्रकट होता है और विनोद भरे क्रियाकृत्य करने की प्रेरणा देता है। प्राणियों की प्रगति और पदार्थों की हलचल उसी उभार पर निर्भर हैं। संसार में जितने भी महत्वपूर्ण काम हुए हैं, जितने भी व्यक्तित्व उभरे हैं उन सबके मूल में अदम्य अभिलाषा और भाव भरा उल्लास ही काम करता रहा है।

जिन्हें उक्तमन्द बनने की चाह हो, उन्हें अपनी जीभ पर काबू रखना चाहिए।

‘काम’ को हेय तब से समझा जाने लगा, जब से उसे यौनाचार के रूप में प्रतिपादित किया जाने लगा। यों अश्लील चिन्तन और उस प्रयोजन के लिए होने वाले अन्य कृत्य भी कामुकता की व्याख्या परिधि में आते हैं, किन्तु वास्तविकता यह है कि यह समस्त परिकर-सुविस्तृत कामशक्ति का बहुत ही छोटा और हेय स्वरूप है। वस्तुतः ‘काम’ शब्द की परिभाषा क्रीड़ा उल्लास ही हो सकती है, जिसका उभार या उमंग सृजनात्मक प्रयोजनों में निरत होने पर सामान्य से मानव को महामानव स्तर का बना देता है। इस शक्ति का उन्नयन आत्मोत्कर्ष के लक्ष्य को प्राप्त करने का प्रमुख आधार खड़ा करता है। धर्म और मोक्ष जैसे आत्मिक एवं अर्थ और काम जैसे भौतिक प्रगति की चतुर्विधि महान उपलब्धियों में उसकी गरिमा के अनुरूप ही ‘काम’ को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। हमें कामशक्ति के इसी उत्कृष्टता सम्पन्न स्वरूप को समझना और इससे जुड़ती रहने वाली भ्राँतियों से बचना चाहिए।


मुक्तिसेना के जन्मदाता धर्म गुरु बूथ

लन्दन की सड़क पर एक फटेहाल बच्चा हाथ में कुछ लिये तेजी से भागा जा रहा था और उसके पीछे दो चार लोग और पता नहीं कारण क्या था? कुछ देर दौड़ने के बाद लड़के को ठोकर लगी और वह सड़क पर ही गिर पड़ा। इतने में पीछे उसे पकड़ने के लिए दौड़े आ रहे लोगों ने उसे दबोच लिया और पकड़ कर ले जाने लगे उस दिशा की ओर जिससे कि वे पीछा करते आ रहे थे।

यह सारा घटनाक्रम एक पैंतीस वर्षीय पादरी देख रहे थे। उनकी समझ में नहीं आया कि लड़का क्यों भागा उसके हाथ में क्या था और उसका पीछा करने वाले लोग कौन थे? कहीं बदमाश या गुण्डे तो नहीं। इस आशंका से उनका हृदय भर आया और उसी दिशा में चल पड़े जिधर कि वे लोग गए थे। कुछ दूर तक तेज कदमों से चलकर उन्होंने देखा कि एक बेकरी की दुकान पर वह लड़का पीट रहा है और पाँच-दस लोग खड़े तमाशा देख रहे हैं।

अनुमान लगाया पादरी ने कि शायद लड़का इस दुकान से रोटियाँ चुराकर भागा है और दुकानदार ने उसे चोरी करते देख लिया है। इसी कारण उसकी पिटाई हो रही है। फिर भी उन्होंने अनुमान को परख लेना चाहा और दुकान वाले के पास जाकर खड़े हो गए। वहाँ खड़े लोगों ने अपने धर्म गुरु को देखा तो ठिठक गए और उनके अभिवादन में झुके। पादरी ने कहा मेरे बच्चों! तुम इस मासूम बच्चे पर क्यों यह अन्याय कर रहे हो।

‘फादर’ दुकानदार ने कहा ‘यह लड़का मासूम नहीं, चोर और शातिर है। प्रायः रोज ही हम लोगों की दुकान पर से रोटियाँ चुरा ले जाता है।’

‘राज नहीं’ फादर ने झूठ बोलते है-लड़के ने दुकान वाले की बात काट कर कहा-मैंने आज ही रोटी चुराई है।’

‘प्यारे बच्चे! तुमने ऐसा क्यों किया? तुम नहीं जानते कि यह समाज के लिए अपराध तो है ही प्रभु के राज्य में भी तुम्हें दण्ड मिलेगा।’

‘दण्ड मिलेगा, वह सह लूँगा फादर! पर भूख नहीं सही जाती’ लड़के ने बड़े कातर भाव से कहा और पादरी इसके आगे निरुत्तर हो गए। उस समय तो उन्होंने बच्चे को छुड़ा लिया पर उसकी निरुत्तर करने वाली बात ‘दण्ड सह लूँगा पर भूख नहीं सही जाती’ रह रहकर उन्हें बेचैन कर देती। उसी समय से वह विकल हो उठे। तो क्या धरती में अन्न नहीं रह गया? ओह नहीं। धरती तो अपनी छाती फाड़कर मनुष्य के लिए पोषण सामग्री उपजा देती है। पर धरती के बेटों की छाती में संवेदनशीलता की उपजन संभवतः बंद हो गई। निष्ठुरता से बंजर हुए अन्तःकरण ने ‘जिओ और जीने दो’ की सामान्य नीति भी भुला दी। उनकी आँखों के सामने निष्ठुरता की चपेट में आए और निष्ठुरता को अपना हथियार बनाए शत सहस्र मनुष्यों के चेहरे नाच उठे। उन्हें अपने सब उपदेश सारी सभाएँ और समूची प्रार्थनाएँ व्यर्थ जाती दिखाई दीं क्योंकि अब उन्हें लगने लगा था कि आप को कोसने से भी अधिक समस्या जीवन जीने की कला का व्यावहारिक मार्गदर्शन देने की है। यदि यह न सिखाई जा सकी तो संसार को स्वर्ग प्रभु का साम्राज्य बनाने के सारे प्रयास व्यर्थ जाएँगे।

तो क्या हाहाकार करवाती पशुता शैतानियत के गगनभेदी इन ठहाकों के बीच जिन्दगी जीना सिखाना संभव है? क्या इनसान एक बार पुनः ईश्वर पुत्र होने की अपनी गरिमा सिद्ध कर सकेगा। एक साथ एक कई प्रश्न उठते और क्रमशः उत्तर भी मिलते गए। पेट नहीं मन भी भूखा है। इसे प्यार और सद्विचार चाहिए। निष्ठुरता की पाषाण शिला के नीचे सिसक बिलख रही है मानव की आत्मा। जिसे उबार कर उदात्त भावनाओं से स्नान करना होगा। और आत्मा की यह दशा पेट की भूख से भी गई गुजरी है। यदि इसे सुधारा जा सका तो जिन्दगी की सामान्य जरूरतों भी पूरी होती चलेगी।

इस विचार मंथन ने पादरी को एक निर्णय तक पहुँचाया और उन्होंने १८६४ ई. में एक सभा का संगठन किया। जिसका उद्देश्य था मानवीय उत्कर्ष की मूल समस्या का समाधान पतित और दलित लोगों का उत्थान। मसीही धर्म के आद्य प्रवर्तक ईसा ने भी तो पतितों और दलितों को गले लगा कर उन्हें मनुष्य बनाया था और कहा था कि सौ भेड़ों की अपेक्षा किसी गड़रिये की भाँति में उस भेड़ की अधिक चिन्ता करता हूँ जो राह भटक गई है और उक्त पादरी ने एक बार पुनः ईसा का कार्य आरंभ करने के लिए क्रिश्चियन मिशन नामक एक संस्था की स्थापना की। मजदूर पेशा, निम्न वर्ग के और शोषितजनों को इसका सदस्य बनाया तथा उनके लिए हर आवश्यक सहायता कार्यक्रम चलाए गए। यही संस्था आगे चल कर साल्वेशन आर्मी (मुक्तिसेना) के से नाम विख्यात हुई और उसके नेता जनरल बूथ के नेतृत्व में उनके ही जीवनकाल में इसकी लगभग ९००० शाखाएँ विश्व भर में क्रियाशील हुई और चौंतीस भाषाओं में मुक्तिसेना के साहित्य का अनुवाद हुआ।

सन १८२१ में इंग्लैण्ड में नटिंघमशायर में जन्मे विलियम बुध का पालन-पोषण सामान्य परिवार में हुआ। अभावों के बीच भी उनकी माता सहज करुणाशील थी। वह कहा करती कोई भी व्यक्ति कैसा ही क्यों न हो आत्मीयतापूर्ण सद्व्यवहार से अच्छा बनाया जा सकता है। माँ का यह कथन बूथ की जीवन निधि बन गई। शिक्षा के उपरान्त उन्होंने पादरी का काम संभाला, किन्तु शीघ्र ही उन्हें लगने लगा कि उद्देश्य की प्राप्ति इस पद से चिपके रहने से न होगी। उन्नीस सौ वर्ष ईसा ने जो शिक्षाएँ दीं और उनका जो स्वरूप लोगों के सामने रखा वह कालक्रम से अब असंगत हो चला था जबकि परम्परागत रूप से उन्हें वही दोहराना पड़ता। जबकि सुनने वाला उसे व्यवहार में किस तरह उतारें यह बिल्कुल ही न समझ पाता। पादरी का पद छोड़कर अपनी पत्नी कैथराइन के साथ नगर-नगर गाँव-गाँव घूम कर धार्मिक सिद्धान्तों पर अपना व्यावहारिक दृष्टिकोण उसने लोगों को समझाना शुरू किया। पति पत्नी के इस स्वरूप को जिसने भी देखा उसने दाँतों तले अंगुली दबा ली। दाम्पत्यनिष्ठा, कर्मनिष्ठा आदर्शनिष्ठा की त्रिवेणी जहाँ भी जाति तीर्थराज का सा भाव उपस्थित हो जाता लोग विभोर हो जाते कारण कि उनकी अनेकों समस्याओं का समाधान जो मिल जाता।

इन्हीं यात्राओं के दौरान उन्होंने मुक्तिसेना का गठन किया। कार्य के विकास के साथ विरोधी भी बढ़े। यही नहीं इन विरोधियों ने एक समानान्तर संगठन भी तैयार किया ‘ठठरी सेना’। जिसका एक मात्र कार्यक्रम था मुक्तिसेना की गतिविधियों में बाधाएँ डालना और उसे असफल करना। लंबे समय तक यह विरोध चला पर बूथ ने न कोई प्रतिक्रिया व्यक्त की और नहीं बैर का सामना बैर से किया। इसे उन्होंने अपनी परीक्षा का समय माना और बैर का प्रत्युत्तर आत्मीयता से देते रहे।

आखिर सज्जनता की विजय हुई। प्रबुद्ध और विचारशील जनों ने मुक्तिसेना के उद्देश्य और क्रियापद्धति को समझकर उसका महत्व स्वीकार किया। सम्राट एडवर्ड, महारानी अलेक्जेंड्रा और कई देशों के राष्ट्राध्यक्षों से लेकर धार्मिक संस्थाओं के नेताओं तक उसके समर्थक हो गए। कठोर से कठोर परीक्षाओं को उत्तीर्ण करते हुए वह कार्य को गति व विस्तार देते रहे।

आज उनके न रहने पर भी मानव की समग्र मुक्ति का प्रयास जारी है। अपेक्षाकृत नए संदर्भ में इसकी बागडोर स्वयं दिव्यसत्ता ने थामी है। उसने अपने प्रत्येक संकेत से मनुष्य की अन्तश्चेतना को जगाना झकझोरना शुरू किया है। संकेत हम सब तक पहुँच रहे हैं। जरूरत पहचानने भर की है। इस आवाहन को सुन कर जो अपनी समूची सामर्थ्य को इन दिनों किए जा रहे इस अपूर्व सृजन में लगा सकें वह न केवल स्वयं सौभाग्यशाली बनेगा अपितु अनेकों अन्यों को भी जीवन की सौभाग्य भरी राहें उद्घाटित कर सकेगा।


विचारधारा का प्रगतिशील परिष्कार

छोटे बच्चे भूत पलीतों की परियों की पशु-पक्षियों की कथा गाथाएँ चावपूर्वक सुनते हैं। कल्पनालोक में विचरण उन्हें बहुत सुहाता है। अनगढ़ विचारप्रवाह के साथ उड़ने वाले पत्तों, तिनकों एवं रेतकणों की तरह उछाल भरते रहते हैं। अनियंत्रित विचार जिन पर स्वच्छंद कल्पनाएँ सवार रहती है, मस्तिष्क को व्यस्त तो बनाये रहते हैं पर उनसे किसी प्रयोजन की पूर्ति नहीं होती।

शेखचिल्ली की कहानी प्रसिद्ध है। उसने कल्पना के स्वेच्छाचारी घोड़े पर सवार होकर ऐसी मनगढ़ंत गढ़नी शुरू कर दी थी जो न व्यावहारिक थी न संभव। अन्त में घाटा भी उठाना पड़ा और तिरस्कार भी सहना पड़ा। इतने पर भी देर तक उसका मन तो रंगीले दिवास्वप्नों में डूबे रहने का मनोविनोद मात्र ही तो करता रहा। कितने ही व्यक्ति भावावेश की अधिकता और व्यावहारिक अनुभव की कमी के कारण कई प्रकार की कल्पनाएँ-जल्पनाएँ करते रहते हैं पर समयक्षेप के अतिरिक्त पल्ले कुछ भी नहीं पड़ता। असफलताओं की खोज और संपर्क वालों का उपहास तिरस्कार ही उनके ऊपर लदता है।

एक और प्रकार की मानसिकता होती है जिसमें शारीरिक आलस और मानसिक प्रमाद ही प्रेरणा स्रोत होता है। वे झंझटों से बचना चाहते हैं। जो है उसी में संतुष्ट रहते हैं और ऐसा कुछ नहीं सोचते जिसमें परिवर्तन की बात उठती हो, कुछ नया सोचने कुछ नया करने की आवश्यकता पड़ती हो। किसी तरह दिन, गुजारना, काम चलाना ही उन्हें पर्याप्त लगता है। ऐसे लोगों की नर पामरों की बहुलता सर्वत्र देखी जाती है अन्यथा गई गुजरी स्थिति में जीने वाले लोग अपने उत्कर्ष अभ्युदय की बात सोचते और संकल्प उभारते हुए, योजना बनाते हुए परिपक्व पुरुषार्थ के सहारे कुछ न कुछ कर गुजर और अनगढ़ स्थिति से उबर कर कहीं से कहीं जा पहुँचते। लंबे समय से पिछड़ी हुई परिस्थितियों में पड़े रहने का एक ही कारण है परिवर्तन के लिए उत्साह न उभरना। प्रयासों में उत्कर्ष व पक्षधर प्रेरणाओं का समावेश न होना। यदि ऐसा न रहा होता तो कोई कारण नहीं कि संसार का अकाट्य नियम ‘अग्रगमन’ इस प्रकार कुंठित होकर न पड़ा रहता।

विचार एक प्रकार की हलचल है। शरीर के भीतरी सभी अंग अवयव निरन्तर गतिशील रह हैं। बाहर से भी इन्द्रियों की कुछ न कुछ क्रिया होती ही रहती है। मनः संस्थान की भी अपने हलचलें हैं जो विचारों के रूप में जानी जाती है। यह सार्थक भी हो सकते हैं और निरर्थक भी। उनके पीछे योजनाएँ भी रह सकती है और बेतुकी हरकतें हलचलें भी। कई बार उपयोग सृजनात्मक विचार भी उठ सकते हैं और कई बार पतनोन्मुख ऐसे भी, जो अपने और दूसरों के लिए मात्र अनर्थ हो प्रस्तुत करें। ऐसे दोनों ही प्रकार के विचार सशक्त स्तर के होते हैं। इसलिए उनकी प्रेरणा शक्ति के नाम से जानी जाती है। किसी दिशा में प्रगति भी उसी आधार पर होती और भले बुरे स्तर की प्रतिभा के निखरने के आधार भी उसी के सहारे बढ़ता, परिपक्व होता है अन्तिम निर्णय अपनी बुद्धिमत्ता पर निर्भर रह है। यदि वह कुण्ठाग्रस्त हुई तो उस मार्ग को अपनाती है जिसमें तत्काल अधिक लाभ मिलने की संभावना प्रतीत होती है। भले ही कुछ समय उपरान्त उसके भयानक दुष्परिणाम सामने आवें अनाचारी, अतिवादी, अपराधी, दुर्व्यसनी इसी में को अपनाते हैं। तात्कालिक लाभ उसकी बुद्धी का समर्थन ही करता है पर यह नहीं समझता है कि अनैतिक उपायों को अपनाकर सफलता हस्तगत की जाती है। वह कुछ समय के उपरान्त व्यक्तित्व की प्रामाणिकता समाप्त कर देती है और भविष्य की सुखद संभावनाओं का द्वार स्थायी रूप से बंद कर देती है। ‘जाल में फंसने वाली चिड़ियाँ, मछलियाँ ऐसे ही अदूरदर्शी लालच के फेर में पकड़कर बहेलियों के हाथ पड़ती और अपना सर्वनाश करती हैं। यह विचारों की अधोगामिता का ही प्रतिफल है। कितने ही प्राकथित समझदार सुशिक्षित भी इसी मार्ग पर चल पड़ते हैं। उन्हें नीतिमत्ता की दिशा और उसे अपनाने पर उपलब्ध होने वाली सुखद संभावना का ज्ञान नहीं होता। इस विडम्बना को ‘समझदारों की नासमझी’ ही कह सकते हैं। फुलझड़ी घुमाकर हाथ हिला लेने वाले प्रायः इसी स्तर के अदूरदर्शी होते हैं।

प्रतिभा के पीछे आस्थाएँ और मान्यताएँ काम करती है। किसी भले बुरे तथ्य पर सघन विश्वास जमा लेना एक संकल्प शक्ति का प्रवाह उत्पन्न करता है। तस्कर, लुटेरे, ठग, आततायी प्रायः इसी प्रकार की निकृष्ट स्तर की प्रतिभा से सम्पन्न होते हैं। दुस्साहस भी उनका बढ़ा होता है। यदि इसका अभाव रहता है तो वे आगा पीछा सोचते और करने न करने की उधेड़बुन में फंसे रहते। साहसिक पुरुषार्थ करने की क्षमता जिस आधार पर उत्पन्न होती है, उसे भी प्रतिभा कहते हैं, भले ही वह अनैतिक या अनर्थ मूलक ही क्यों न हो?

प्रतिभा का उज्ज्वल पक्ष वह है जिसमें व्यक्ति मानवी गरिमा के स्तर को अक्षुण्ण बनाये रहने को सर्वोपरि महत्व देता है। आदर्श अपनाने पर श्रेष्ठ, वरिष्ठ बनने की उमंगें आती रहती है। वैसा ही कुछ कर गुजरने की योजना बनती हैं और उस राह पर चल पड़ने की तैयारी होने लगती है। उनके सामने ऐसे लोगों के जीवनचरित्र एवं संस्मरण सामने रहते हैं, जिन्होंने उत्कृष्टता के पक्षधर विचारों को अपनाया। उन्होंने अपने स्तर को बढ़ाने और प्रगति पथ पर चल पड़ने का राजमार्ग पाया।

आमतौर से अपने स्वास्थ्य धन और क्षमता संवर्धन के क्षेत्रों पर ध्यान रखा जाता है। कहीं कोई छेद तो नहीं उभर रहा है। समर्थता का अपव्यय तो नहीं हो रहा है इसके लिए अपनी-अपनी मनःस्थिति के अनुरूप सभी ध्यान रखते हैं। प्रत्यक्ष को बनाने और बढ़ाने का प्रयत्न किया जाता है पर यह भुला दिया जाता है कि समय एवं चिन्तन जैसी सर्वोपरि सम्पदा का सही नियोजन हो रहा है या नहीं। इन दोनों का अपव्यय उससे कहीं अधिक घातक है जितना कि वैभव को क्षति पहुँचने पर होता है। इन दोनों में भी विचारों के सदुपयोग दुरुपयोग का महत्व सर्वोपरि है। यदि चिन्तन प्रवाह गड़बड़ाने लगे तो स्थिति अर्धविक्षिप्त जैसी बन जाती है। अनगढ़ स्थिति में लोग मात्र इसी एक कारण में पड़े रहते हैं कि उन्हें प्रगति पथ पर चलने की आकांक्षा जगा सकने का अवसर नहीं मिलता। वे यह नहीं सोचते कि अब की अपेक्षा भविष्य में अधिक अच्छी स्थिति प्राप्त करने के लिए विचारों में क्या परिवर्तन करना चाहिए और तद्नुरूप अवसर ढूँढ़ने के लिए क्रिया–कलापों को किस दिशा में मोड़ना, मरोड़ना धकेलना चाहिए?

बीज आधारभूत कारण है, वृक्ष उसका प्रगति परिणाम। विचारों की प्रगतिशीलता, उमंग भरी साहसिकता उस बीज के समान है जो मनुष्य में उमंग उभारती, उकसाती और ऐसा कुछ करने के लिए बाधित करती है जो अब की अपेक्षा भविष्य को अधिक सुन्दर, समुन्नत, व्यवस्थित एवं अग्रगामी बना सके। इस तथ्य को समझ लेना और आधार को अपना लेना उन्नतिशील भविष्य के निर्माण का सुनिश्चित मार्ग है।


निष्ठुरों को उपहार नही दंड देना उपयुक्त होगा (kahani)

एक दयालु राजा ने चिड़ियों को बहेलियों द्वारा हत्या किये जाने से बचाने के लिए घोषणा की कि जो पकड़ी हुई चिड़िया लावेगा उसे पुरस्कार मिलेगा। जो चिड़िया इस प्रकार लाई जाती, राजा उन्हें मुक्त करा देता। उसकी दयालुता का यश फैलने लगा।

थोड़े ही दिनों में आम लोगों ने यह धंधा अपना लिया वे दिन भर चिड़िया पकड़ते। राजा के पास ले जाते और इनाम लेकर लौटते। हजारों नये बहेलिये बन गये और राज्यकोष खाली जो चला।

मंत्री ने राजा को रोका और कहा-निष्ठुरों को उपहार देने के स्थान पर उन्हें दंड देना उपयुक्त होगा’ राजा ने नीति बदल ली।


क्या सुन्दर? क्या असुन्दर?

अपने अन्तराल की प्रसन्नता अप्रसन्नता की मनुष्य को बाह्य जगत में दृष्टिगोचर होती है। संसार की हर वस्तु या व्यक्ति की सुन्दरता असुन्दरता के साथ भी यही तथ्य जुड़ा हुआ है। यद्यपि वस्तुएँ-वस्तुएँ होती हैं। उनके रंग, रूप, नाम और गुण अनेक होते हुए भी वे निष्प्राण होती है। आकार-प्रकार होते हुए भी उनमें ऐसा कुछ नहीं होता जिसमें वे अपनी भावनात्मक प्रतिक्रिया अभिव्यक्ति कर सकें। यह मनुष्य की अपनी मान्यता है जो सके साथ भले-बुरे का आरोपण करती है प्रिय-अप्रिय की मुहर लगाती है और अपने-पराये की मान्यता के साथ-साथ प्रिय बनाती अथवा अनुपयुक्त एवं घृणास्पद ठहराती है।

भ्राँतियाँ मनुष्य की स्वनिर्मित और स्वनिर्धारित हैं जिनमें वह एक को भला और दूसरे को बुरा बताता है, अन्यथा सृष्टा की हर संरचना अपने में विशिष्टताएँ धारण किये हुए हैं। मनुष्य ही है जो जिसके साथ चाहता है, प्रभावित होकर अपनत्व बढ़ाता, घनिष्ठता जोड़ता और राग-द्वेष का आरोपण कर लेता है। घृणा या प्रेम करता है जबकि वस्तुतः ऐसा है नहीं। सभी प्राणी एवं वस्तुएँ नियति नटी के किसी महान उद्देश्य की पूर्ति के लिए रची गई है। उनकी अपनी-अपनी विशिष्टता एवं महत्ता है। यही तथ्य मनुष्य पर भी लागू होता है। दृष्टिकोण का परिवर्तन मनःस्थिति को भी बदल कर रख देता है। मान्यताओं के बदलते ही घृणा के स्थान पर प्रेम की रसानुभूति होते देर नहीं लगती।

सर्वत्र दृष्टिगोचर होने वाली व्यथाओं का कारण मनुष्य की अपनी स्वनिर्मित मान्यताएँ ही हैं। किन वस्तुओं या व्यक्तियों के प्रति किसी का राग-द्वेष कितनी प्रगाढ़ता लिए हुए हैं, उसके चेहरे पर या आँखों में झाँकने पर इसकी स्पष्ट झाँकी हो सकती है। कारण मन की प्रसन्नता-अप्रसन्नता प्रियता-अप्रियता को व्यक्त करने के यही दोनों दर्पण की भूमिका निभाते हैं। यह अपने हाव-भाव के पीछे गूढ़ रहस्य जो छिपाये बैठे होते हैं। मनोविज्ञानी इस तथ्य को भली भाँति जानते हैं और कहते हैं कि मन और शरीर सहजीवी की तरह है। एक का दूसरे के साथ बड़ा ही घनिष्ठ संबंध है और दोनों मिलकर चेहरे पर प्रसन्नता या दुःख की झलकियाँ प्रस्तुत करते हैं यही कारण है कि मनःचिकित्सक चेहरा देखते ही भाँप जाते है कि व्यक्ति किस व्यथा से पीड़ित है।

विकृत दृष्टिकोण धीरे-धीरे मन को अपनी गिरफ्त में पूरी तरह जकड़ लेता है और उसे तनावग्रस्त बना देता है। इसका प्रभाव सौंदर्य पर भी पड़ता है और स्थूल रूप से स्वस्थ दीखते हुए भी व्यक्ति कुरूप लगने लगता है। वस्तुतः यह मन की कुटिलता ही है जो अन्दर के विषाक्त प्रवृत्ति को ढकने का प्रयत्न करती है फलस्वरूप व्यक्ति वाह्य जगत में कृत्रिम चेहरा बनाने का प्रयत्न करता है, पर गहराई से दृष्टिपात करने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि तनावयुक्त माँसपेशियाँ विशेष प्रकार की स्थिति से ग्रस्त होकर कठोर बन गई है ओष्ठ एवं तनी भौंहें अन्ततः यही सिद्ध करती है कि व्यक्ति किन्हीं विशेष मनः स्थितियों में उलझा है।

ईर्ष्या, द्वेष एवं घृणा की स्थिति में मन के धरातल में कंपन शीघ्र होने से नये-नये कुविचार शीघ्रता से उठते हैं, जबकि शांत एवं स्थिरमन तटस्थ चिन्तन करता है ऐसी स्थिति में भावनाएँ, विचारणाएँ सात्विक ढंग से निःसृत होती है और उनका आरोपण जिस किसी पर भी होगा, उसी में अपनत्व भरी तरंगों का प्रवाह प्रस्फुटित होने लगेगा। ऐसी दशा में स्वयं को प्रसन्नता होती है स्नायु मंडल को विश्राम मिलता है और विरोध आकांक्षाएँ, भावनाएँ मिटती हैं। मन एवं उसके शक्तियों का बिखराव भी रुकता है। यही शक्तियाँ मूलस्रोत पर पहुँचकर घनीभूत होती और तन, मन व स्वस्थ बनाती है।

चिन्ता एवं घृणा से मुक्त मन घनीभूत शक्ति सहित अनन्त चेतन सत्ता से विराट ब्रह्म से जुड़कर व्यापक प्रेम की अनुभूति कराने में सक्षम हो जाता है इससे मनोभावनाएँ शुद्ध व पवित्र तो बनती ही है समूचा व्यक्तित्व भी प्रभावित परिवर्तित हुए बिना नहीं रहता। यही क्रिया अन्तराल को देवत्व स्तर का बना देती है।

वस्तुतः इस संसार में कोई व्यक्ति या पदार्थ असुन्दर नहीं। सृष्टा की इस धरित्री पर कुछ भी कुरूप नहीं है। जिससे हम घृणा करने लगते हैं, वही हमारे लिए असुन्दर बन जाता है। यदि अपना दृष्टिकोण बदलकर आत्मीयता का अपनत्व का प्रकाश डालें और सृष्टा के सौंदर्य को सराहें उसकी उपयोगिता पर ध्यान दें तो ऐसा मानसिक कायाकल्प हो सकता है जिसके कारण विश्व में कहीं भी कुरूपता दृष्टिगोचर न हो।


अपने चिकित्सक एवं स्वयं

रोगों बैक्टीरिया, वायरस जैसे जीवाणु विषाणुजनित दुष्प्रभावों की रोकथाम कर सकती है, किन्तु मानसिक तनाव से उत्पन्न रुग्णता का उपचार दवाओं द्वारा संभव नहीं इसके लिए मनोवैज्ञानिक उपाय-उपचार ही कारगर सिद्ध हो सकते हैं।

विख्यात मनोचिकित्सक डॉ. नार्मन विन्सेन्ट पील ने अपनी पुस्तक ‘द् पॉवर ऑफ पॉजिटिव थिंकिंग‘ में समग्र स्वास्थ्य संरक्षण का उपाय इस प्रकार बताया है जिसे अपना सकना सभी के लिए सहज संभव है। उनके अनुसार मानसिक भावनात्मक बीमारियों से बचने का एक ही उपाय है कि सदैव प्रसन्नता-प्रफुल्लता की मनःस्थिति बनाये रखी जाय। हृदय को घृणा से और मन को भय और चिन्ता से मुक्त रखा जाय। परिस्थितियों की प्रतिकूलता को यह मानकर चलना चाहिए कि वह सा एक सी बनी रहने वाली नहीं, वरन् निश्चित रूप से जाने वाली कुहासे की परत भर है। विधेयात्मक चिंतन क्रम के अनुरूप अपनी गतिविधियों का निर्धारण कर लेने पर आधी से अधिक बीमारियों विपन्नताओं का समाधान को जीवन में ताक-झाँक करने का अवसर तक नहीं मिलता। तनाव से बचने के यह सहज उपचार है।

वस्तुतः आवेश एवं तनाव जैसी-भावात्मक विकृतियों का उपचार मनुष्य को स्वयं करना पड़ता है। चिकित्सक मात्र परामर्श भर दे सकते हैं। अतः जिन्हें इस तरह की शिकायत हैं, उन्हें परिस्थितियों को अपने अनुकूल ढालना चाहिए या स्वयं परिस्थिति के अनुरूप ढल जाना चाहिए। दोनों में से एक भी संभव न हो तो नया काम नया संपर्क एवं नया वातावरण ढूँढ़ना चाहिए। सबसे अच्छा यह है हम परिस्थितियों के साथ तालमेल बिठाना सीखें और खिलाड़ी की भावना से अनुकूलता-प्रतिकूलता का सामना करते हुए हँसती-हँसाती जिन्दगी जिएँ। मनःस्थिति को संवार लेने पर न केवल परिस्थितियों काबू में आ जायेगी, वरन् आरोग्य संवर्धन का, प्रगति का लाभ भी हाथों-हाथ उपलब्ध होता चला जायेगा।


ध्यान योग की व्यावहारिकता

बिखरे ध्यान को अन्तर्मुखी करने के उपरान्त भीतरी क्षेत्र में भी उसे नुकीला बनाना चाहिए जिसके आधार पर अन्वेषण-पर्यवेक्षण संभव हो सके। साथ ही अभीष्ट की उपलब्धि के लिए जो किया जाना चाहिए उसके एक नहीं अनेक विकल्प खोजें जा सकें।

वैज्ञानिकों के मस्तिष्क में यही हलचलें गतिशील रहती हैं। वे जिस विषय का अन्वेषण करते हैं, आविष्कार में निरत होते हैं उनकी कल्पनाएँ मोटे रूप में नहीं वरन् अत्यन्त बारीकी से करते हैं। वस्तुओं की जोड़-तोड़ से निकलने वाले परिणामों की आधे से अधिक जाँच पड़ताल मस्तिष्क क्षेत्र में ही कर लेते हैं। जब कोई बात तर्क, तथ्य और कल्पना के सहारे सही बैठती है तो ही उसे प्रयोगशाला में बनाते बिगाड़ते हैं। प्रयोगशाला का आधा काम तो उनके भीतर कल्पना क्षेत्र में पूरा हो चुका होता है। वे यथार्थ कल्पना कर सकने के अभ्यासी बन जाते हैं। इस क्षेत्र में जो जितनी सफलता संचित कर सका होता है उसका पासा उसी अनुपात में सही पड़ता है।

यह विशेषता किसी को भी अनायास नहीं मिलती। इस दिशा में एक-एक कदम आगे बढ़ाते हुए लक्ष्य तक पहुँचना पड़ता है। आरंभ में छोटा आधार अपनाने और उस पर अभ्यास करते हुए कल्पना को तीखा किया जाता है। उसके साथ आत्मीयता जोड़नी पड़ती है। उस कल्पना में रहने वाली पूर्णता अपूर्णता में अपनी व्यक्तिगत हानि लाभ होने वाली बात ध्यान में रखनी पड़ती है। पशुओं के मेले में बहुत जानवर बिकते हैं। पर उनमें से अपनी दृष्टि उसी पर जमती है जो अपनी इच्छा या आवश्यकता के अनुरूप हो। उसकी बारीकियों पर अधिक मनोयोगपूर्वक जाँच पड़ताल करने की इच्छा होती है और ऐसी बातें सूझती हैं जिनके आधार पर पसंदगी वाली वस्तु के हर पक्ष पर गंभीर विचार किया जा सके और इस निर्णय पर पहुँचा जा सके कि इसको खरीद करले जाना उचित होगा।

ध्यान में रूप की प्रमुखता रहती है। जैसा प्रत्यक्ष देखा गया है कल्पना में ठीक उसी आकृति और प्रकृति का समन्वय देखना चाहिए। यह कार्य तस्वीरों की सहायता से आरंभ करना उपयुक्त रहता है। यह किसी श्रद्धास्पद महापुरुष या आत्मीय परिजन का होना चाहिए ताकि उसके प्रति आत्मभाव का समन्वय सहज ही हो सके। जिसके प्रति प्रीति होती है उसका स्मरण जल्दी हो आता है।

चित्र को सरसरी नजर से नहीं वरन् गंभीरतापूर्वक देखना चाहिए। उसके चेहरे के नख-शिख केश, वस्त्र, मुखाकृति, मुद्रा आदि को पहले खुली आँखों से गंभीरतापूर्वक देखा जाय। इसके उपरान्त आँखें बन्द करके उसी छवि को ध्यान क्षेत्र में उतारा जाय। सूक्ष्म नेत्रों में वह छवि इस प्रकार बस जानी चाहिए मानों वह प्रत्यक्ष ही देखी जा रही हो। इसके उपरान्त आँखें खोल कर देखा जाय कि प्रत्यक्ष और कल्पना के बीच क्या अन्तर रहा। इसमें आभूषणों और वस्त्रों में बेलबूटे के स्वरूप में अन्तर रह सकता है। दूसरी बार के, तीसरी बार के ध्यान में यह अन्तर निकालते-निकालते इस स्थिति पर पहुँचा जाय, मानो वह नेत्र बन्द रहते हुए भी प्रत्यक्ष देखा जा रहा हो। चित्र की ही तरह यह प्रयोग किसी प्रतिमा को माध्यम बनाकर भी किया जा सकता है। जिनकी देवता, महापुरुष आदि में रुचि न हो वे अपने किसी संबंधी प्रियजन का चित्र सामने रख सकते हैं।

आर्चीटेक्ट अपने मस्तिष्क को ऐसा ही प्रशिक्षित कर लेते हैं। अपने द्वारा बनाई जाने वाली इमारत का कल्पना चित्र उनके मन में इतना स्पष्ट होता है कि वे उसमें लगने वाली खूँटियों तक की ठीक गणना कर लेते हैं। बिजली की लाइन कहाँ से जायेगी और बल्ब पंखे आदि कहाँ-कहाँ लगेंगे, इसकी कल्पना इतनी अच्छी तरह कर लेते हैं कि उसमें बनने के उपरान्त कोई भूल न निकाली जा सके। नदियों के पुल सड़कों के मोड़, उतार चढ़ाव आदि को सही रूप में अंकित कर सकना नहीं इंजीनियरों के लिए संभव होता है, जो कार्य क्षेत्र की स्थिति को ऐसी तरह नोट कर लेते हैं कि नक्शा बनाते समय कहीं कोई अन्तर न रहे। अच्छे सर्जनों की मनःस्थिति भी आपरेशन करने से पूर्व ऐसी बन जाती है कि अनावश्यक कतर–बतर न करना पड़े और न अनावश्यक समय लगे। इसी आधार पर उनकी वरिष्ठता समझी जाती है। रंगमंच पर पात्रों को भेजने से पूर्व जो व्यक्ति उनकी सजधज करता है। मेकअप बनाता है उसकी बुद्धि भी ऐसी तीक्ष्ण होती है जिससे उनकी कृति में कोई खोट न निकाला जा सके। ऐसा तभी संभव है जब क्रिया से पूर्व कल्पना का सही स्तर पर ढाँचा खड़ा कर सकें।

यह अभ्यास उस विषय के प्रवीण पारंगतों का निर्धारण और क्रिया−कलाप देखते रहने पर भी होने लगता है। फिर भी जिज्ञासा और अभिरुचि तो सीखने वाले की ही होनी चाहिए अन्यथा कुशलता का वातावरण रहने पर भी भोंड़ी बुद्धि का व्यक्ति हाथ पैर से सहायता करने वाला मात्र बनकर रह जायेगा।

यही बात लंबी यात्रा की या किसी बड़ी दावत की तैयारी करने से पूर्व करनी होती है। विवाह शादियों में अनेक प्रकार के छूट फुट सामान जमा करने पड़े तो अनेकों अवसरों पर अनेकों वस्तुओं की आवश्यकता पड़ती है। यदि वह सब परिस्थितियाँ मस्तिष्क में समय से पूर्व न आ सकें तो जब उनकी जरूरत पड़ती है तब भागदौड़ करनी पड़ती है और एक दूसरे पर दोषारोपण करने का सिलसिला चल पड़ता है।

प्रबंधक का पद सबसे ऊँचा है उसे वेतन भी अधिक मिलता है और अधिक सम्मान भी। जिस कारखाने में व्यवसाय में अच्छे प्रबंधकों का हस्तक्षेप होता है। वे कच्चा माल खरीदने, बने माल की हाथों-हाथ खपत करने, कार्य विस्तार को देखते हुए उपयुक्त मशीनों का चयन करने, कुशल कर्मचारी ढूँढ़ने, अयोग्यों को हटाने माल का स्टोर करने, बैंकों से व्यवहार रखने, पूँजी रुकने न देने आदि की अनेकों संबंधित बातों का पूरा ध्यान रखते हैं और व्यवसाय की उन्नति करके दिखाते हैं। जिनकी कल्पना भोंड़ी होती हैं वे पग-पग पर चुक करते हैं, अपमानित होते हैं और मालिक को डुबाने के साथ स्वयं भी बदनाम होते हैं। इस क्षेत्र में जो लोग सफल हुए हैं उनकी कल्पना शक्ति सही समय पर सही काम करती रही है। इसे व्यवसाय क्षेत्र का ध्यान योग ही कह सकते हैं।

ध्यानयोग को यों पारलौकिक-आध्यात्मिक प्रसंग माना जाता है। क्षेत्र कोई भी क्यों न हो प्रक्रिया एक ही काम करती है। कल्पना और यथार्थता को इस प्रकार मिला देना, जिसके आधार पर व्यक्ति को दूरदर्शी विवेकवान कहा जा सके। साथ ही व्यवहार कुशल भी।

कार्य पहले कल्पना क्षेत्र में आते हैं, बाद में क्रिया रूप में परिणत होते हैं तदुपरान्त वह स्थिति आती हैं जिसमें परिणति का कड़ुवा मीठा रसास्वादन करना पड़ा। बीज से अंकुर, अंकुर से पौधा, पौधे से पेड़ और पेड़ पर फल लगने का क्रम है। यही बात यथार्थवादी कल्पना के संबंध में भी है। उसी को ‘ध्यान’ कहलाने का श्रेय मिलता है। अन्यथा शेखचिल्ली जैसी कल्पनाएँ तो कोई भी करता रह सकता है जिसमें स्थिति के साथ वास्तविकता का सही तारतम्य न हो। मूढ़मति तो मात्र अनगढ़ अप्रासंगिक कल्पनाएँ करते हैं। पर जिन्हें इस क्षेत्र की कुशलता प्राप्त हैं वे अपने क्षेत्र के ध्यान योगी कहे जाते हैं।


ईमानदारी का श्रम (kahani)

एक लगनशील मजदूर था। कड़ी मेहनत करता और चार आने रोज कमा लेता।

घूमते हुए एक विद्वान ने पूछा-इस कमाई का खर्च किस प्रकार करते हो। यह बता सको तो तुम्हारी समझदारी का अनुमान लगाऊँ।

मजूर ने कहा-एक आने में अपना पेट भरता हूँ। एक आना उधार देता हूँ। उससे बच्चे पालता हूँ जो बड़े होने पर काम आवेंगे। एक आने से कर्ज चुकाता हूँ, ताकि ऋणी होकर न मरूं। यह मेरे वृद्ध माता-पिता की सेवा में लगते हैं। एक आना बचाता हूँ जो भविष्य में काम आते अर्थात् धर्म कार्यों में लगा पैसा परलोक को सुखी बनाये।

ईमानदारी का श्रम और उसका सही सदुपयोग सुनकर प्रश्नकर्ता तत्त्वज्ञानी को बहुत प्रसन्नता हुई।


गीता को जिनने जीवन में उतारा

आने वाले के पैरों की आहट से बेखबर वह मेज पर झुके लिख रहे थे। हाथ की अंगुलियों के सहारे कागज की भूमि पर थिरकती कलम अभिव्यक्त कर रही थी उनके अन्तर भावों को। अभिव्यक्त हो रही थी वह प्रचण्ड ऊर्जा जिसका स्पर्श मात्र देशवासियों को कुछ कर गुजरने के लिए बाध्य करता था। आने वाला काफी देर तक खड़ा सोचता रहा। तलाशता रहा अपने मन की पिटारी में से उस तकनीक को जिसके सहारे वह इस महायोगी की तल्लीनता भंग कर सके। आखिर बात भी तो कुछ ऐसी ही थी जिसे इस सतत् कर्मशील तपस्वी को बताना ही था। पर किन शब्दों में कहे उस व्यथापूर्ण संवाद को। नहीं मिल रहे थे वे अक्षर जो दर्दनाक भाव को सहज अपने से उड़ेल कर उन तक पहुँचा सके।

आखिर किसी तरह हिम्मत बटोरी शब्द जुटाए और कहा ‘आप को एक सूचना देनी थी।’ तनिक उच्च स्वर में कहे गए इन शब्दों को सुनकर वह चौंक से पड़ें। पर एक ही पल में पूर्ववत् सामान्य होकर बोले ‘अरे तुम कब आए, ठीक तो हो’? एक ही वाक्य में अनेक प्रश्न वह जवाब न दे सका। सोच रहा था कैसे कहे उस दारुण संवाद को। शब्दों से न कहकर भी उसकी मुखाकृति डबडबाई आँखें मुखर हो कर कह रही थीं कुछ विशेष घटित हुआ है। जवाब न सुनकर वह फिर बोले सब कुछ सामान्य तो है।

जी-वह-बाकी शब्द गले में अटक गए। ‘कहो! कहो! क्या है’?

‘आपका पुत्र चल बसा।’

वज्रपात सा करने वाले इन शब्दों के तीव्र आघात से उनके मुख से निकला ‘ओह’ और कुछ सोचने लगे बीमार तो पहले से भी था, पर इस तरह अचानक चलो भगवान को शायद यही मंजूर था। किन्तु ‘केसरी’? इसे तो पूरा करके अभी प्रेस में देना है। सम्पादकीय और लेख तैयार करना है। इसे तो किसी भी स्थिति में करना है अन्यथा--- कुछ आगे न सोच सके। चिन्तन से उबरते हुए उन्होंने सामने खड़े मित्र की ओर देखते हुए कहा ‘मित्र! तुम तो मेरे असमय के साथी रहे हो इस समय भी सहायक बनो।’

‘मैं तो सर्वदा आपकी आज्ञा पालन करने के लिए तैयार हूँ।’ ‘तुम शव को लेकर श्मशान पहुँचो।’ तुम सबको इस कार्य में लगभग ३-४ घण्टे लगेंगे। इतने में मैं सारा काम निबटाकर सीधा वहीं पहुँच जाऊँगा।

‘पर भाभी ने कहा है उन्हें लेकर आना। फिर ऐसी स्थिति में आप भी।’

आगन्तुक कुछ आगे बोलता इसके पहले उसे समझते हुए उन्होंने कहा लड़का सिर्फ मेरा मरा है किन्तु केसरी की प्रतीक्षा तो समूचा भारत कर रहा है। फिर मेरी उनके प्रति भी जिम्मेदारी है वे मेरे कहीं सघन आत्मीय हैं जो मेरे लेखों के पढ़कर समाज प्रणाली को बदलने के लिए दीवाने हो उठे हैं। न जाने कितनों ने अपनी पत्नी पुत्र के मोह को त्यागा है। न मालूम कितने बेघर बार हुए हैं। कितनों ने ही राष्ट्र समाज के लिए मेरे दर्द को नीलकण्ठ बन पीने की आतुरता दिखाई है। उठती जवानी में उनकी भीष्म प्रतिज्ञाएँ क्या मुझे भूल सकती है जिसके अनुसार वह विवाह, परिवार के सुख को तिलाञ्जलि दे समाज सेवा के लिए व्रती हुए हैं। नहीं मेरे परिवार बहुत बड़ा है। सत्यभामा को समझाना कि मैं यहाँ से सीधा श्मशान पहुँचूँगा वहाँ से सीधा पर आऊँगा। अच्छा, अब मुझे काम करने दो इन नम्र किन्तु दृढ़ शब्दों ने मित्र का वापस लौटने के लिए मजबूर कर दिया।

वह पुनः व्यस्त हो गए विचारों को गूँथ कर भावों को संवार कर राष्ट्र समाज के लिए ‘केसरी’ का हार तैयार करने में। न उन्हें व्यथा थी न सन्ताप। सभी कुछ तो पूर्ववत् था ऐसा लग रहा था जैसे कुछ हुआ ही न हो। यही तो योगी का कर्म है। इसे ही तो शास्त्रों ने कर्मयोग कहा है। सामान्य कर्म इसे छू भी नहीं सकता। साधारण कर्म के प्रेरक दो तत्व हैं लोभ अथवा भय। कर्ता या तो किसी लोभ से कर्म में जुटता है अथवा किसी दबाव डर के वशीभूत होकर। लोभ-लोभ ही है, वह प्रोन्नति धन वैभव सम्मान यश कीर्ति का हो अथवा स्वर्ग सिद्धि जैसे पारलौकिक भोगों का। इसी तरह भय किसी अधिकारी हानि असम्मान जैसा कुछ भी हो सकता है। कर्मयोग में निरत साधक इन दोनों प्रेरक तत्वों से ऊपर उठता है। वह तो कर्म के माध्यम से अपनी समूची सामर्थ्य को उड़ेल देता है विरोध के लिए। कर्म उसके लिए साधन बनता है परम पुरुष की अर्चा का।

उनका कर्म कुछ ऐसा ही था। इन घण्टों में उन्होंने अपना काम पूरा कर लिया। कागजों को प्रेस कर्मचारी को संभाला हल्की सी अंगड़ाई ली। कुल्ला करके एक गिलास पानी पिया। कर्मयोग के महोपदेष्टा योगेश्वर श्री कृष्ण के चित्र को प्रणाम करके चल पड़े श्मशान की ओर।

थोड़े ही समय पश्चात जा पहुँचे वहाँ, जहाँ उनकी सभी सगे संबंधी प्रतीक्षा कर रहे थे। पहुँचकर शव को चितारूढ़ कर अन्तिम संस्कार सम्पन्न किया। प्रातः की अरुणिमा के बढ़ने की गति चिता की लपटों के साथ शान्त होती जा रही थी। उनके भी कदम मुड़ने लगे थे घर की ओर। इसी बीच रात्रि आए मित्र ने निस्तब्धता भंग की ‘क्षमायाचना के साथ कुछ पूछना चाहता हूँ। मेरे मस्तिष्क में एक उलझन है।’ ‘बताओ’ स्वर गंभीर था।

‘कल आपका विचित्र व्यवहार समझ में नहीं आया’ ‘क्यों इसमें विचित्रता क्या थी?’

‘आप जैसा दयालु व्यक्ति इतना कठोर भी हो सकता है? मैं सोच भी नहीं पा रहा हूँ।’

‘सच में मैं हूँ भी नहीं। हाँ मोहासक्त जरूर नहीं हूँ।’ ‘भला मोहासक्त और दयावान में क्या भेद है।’। ‘मोह संकीर्णता से ग्रसित पाशविक वृत्ति है। दया ईश्वर की दिव्य विभूति है। मोह से जकड़ा व्यक्ति जिस किसी से आकर्षित होता है उसे शाश्वत बनाए रख अपने अधिकार में बनाए रखना चाहता है। भ्रम से पीड़ित उस बेचारे को नहीं मालूम कि भागवत विधान को उलट सकना किसी के बूते की बात नहीं है। जबकि दया परम सत्ता के दिव्यांश से जन्मी है। मानव की मूलसत्ता का सहज गुण धर्म है। मनुष्यता की कसौटी है। इसके प्रेरित हो मनुष्य गिरे को उठाने, उठे को खड़ा करने खड़े हुए को अंगुली पकड़कर प्रगति की राह पर चलाने हेतु तत्पर हो उठता है। पीड़ा पतन उसे सहा नहीं जाता। इसके निवारण के लिए वह वैयक्तिक हितों की बलि दे निज के अस्तित्व को दाँव पर लगाकर सर्वस्व होम देता है।’ कथन की समाप्ति पर उन्होंने मित्र की ओर प्रश्न वाचक निगाहों से देखते हुए पूछा-कल मैंने कुछ कड़वा तो नहीं कह दिया। व्यस्तता और भूल से ऐसे कुछ बन पड़ रहा हो तो क्षमता करना।

उदार भरने के लिए अपना ही मुँह चलाना पड़ता है। पढ़ने के लिए अपनी ही बुद्धि काम देती है। पराये मुँह से किस का पेट भरा है। दूसरों की बुद्धि से कौन विद्वान बना है। आत्मिक प्रगति की आकांक्षा भी अपने ही साधनात्मक पुरुषार्थ से पूरी होती है।

अरे नहीं मित्र तो नतमस्तक थे इन महामानव पर जिन्होंने अपनी सत्कर्म साधना के सातत्य के बल पर सर्वात्मबोध प्राप्त कर लिया था। तभी तो वह बाल गंगाधर से लोकमान्य हुए। उनके कृतित्व की प्रेरणास्पद दीप शिखा को बीतते बदलते समय की आँधियाँ बुझा नहीं पाई। इन दिनों महाकाल को पुकार हृदय के हर स्पन्दन के माध्यम से पुकार रही है हम सबको सामान्य से लोकमान्य बनाने हेतु।


सहकार पर ही टिका है मानवी अस्तित्व

रूस के प्रख्यात मनीषी प्रिंस क्रोपाॅट्किन ने अपनी कृति ‘म्यूचुअल एड’ में कहा है कि सृष्टि में संघर्ष का नहीं, वरन् पारस्परिक सहयोग-सहकार का ही अस्तित्व है। मनुष्य सहित समस्त प्राणिसमुदाय का वास्तविक अभ्युदय मिलजुल कर रहने और एक दूसरे के सुखदुःख में साथी बन कर रहने में ही सन्निहित है। संघर्ष से तो अराजकता, अव्यवस्था फैलती है और विकसित जातियाँ भी नष्ट हो जाती है। मरने-मारने पर उतारू जातियाँ आपस में ही लड़ भिड़कर समाप्त हो जाती है। इतिहास साक्षी है कि कितनी ही बलिष्ठ और समर्थ जातियाँ केवल इस कारण विलुप्त हो गई कि उनमें छीना झपटी की, मारा-मारी की हिंसात्मक प्रवृत्ति का बाहुल्य हो गया था।

आदिमकालीन नर-वानर की तुलना में आज के प्रगतिशील मनुष्य में जमीन आसमान जैसा अन्तर हो गया। इसका प्रमुख कारण उसका सहकारी स्वभाव है मिलजुल कर रहने की इच्छा से ही परिवार बसाए, समाज, समुदाय बनाये, संगठन खड़े किये। शासनतंत्र का सशक्त ढाँचा विनिर्मित किया। कारखाने, उद्योग चल पड़े। यदि सहकारिता को मानव स्वभाव में से निकाल दिया जाय तो वह मात्र लड़ने-भिड़ने और स्वच्छंदता अपनाने वाले प्राणियों की तरह अविकसित रह जाता। परस्पर सहयोग का ही प्रतिफल है कि समाज, शासन उद्योग, व्यवसाय आदि वर्तमान स्थिति तक पहुँचे। अलग-अलग व्यक्ति यदि उन्हें अपने ढंग से करते तो शायद इनमें से एक भी काम न बन पड़ता। मिलजुल कर काम करना और संयुक्त शक्ति का उपयोग कर सकना जहाँ भी संभव होगा, वहाँ समर्थता रहेगी और सफलता मिलेगी।

वर्तमान समाज व्यवस्था में प्रायः बड़े शहरों की घनी बस्तियों में सहयोग सहकार के भाव समाप्त होते जा रहे हैं। एकता के बंधन टूटते जा रहे है। एक-दूसरे की सहायता करना तो दूर से पड़ोसी तक को नहीं जानते। अन्यान्यों की आवश्यकताओं की चिन्ता न करते हुए अपने व्यक्तिगत स्वार्थों की जिस-तिस प्रकार पूर्ति करना ही आधुनिक जीवन की तथाकथित सभ्य सम्पन्नों की प्रवृत्ति बनती जा रही है। सुप्रसिद्ध विचारक प्लिमसोले का कहना है कि सम्पन्नता ने आज मनुष्यता का गला घोट दिया है। सहानुभूति की भावना में केवल संकुचित हो गई है, वरन् कुंठित भी हो गई है। निर्धन एवं पिछड़ों की सहायता करना तो दूर उनके साहसिक कार्यों, कष्टमय जीवन की दिन-रात की बहादुरी और हृदय की कोमलता की कदर करना तक उन्हें नहीं आता। इसके विपरीत श्रमिकों में निर्धनों में एक दूसरे की सहायता करने की भावना आज भी कूट-कूट कर भरी है। दूसरों की सहायता करने में वे अपने प्राणों पर भी खेल जाते हैं। इस संदर्भ में उन्होंने एक बहुत ही मर्मस्पर्शी घटना का उल्लेख किया है।

फ्राँस की जेल से एक बार एक कैदी भाग गया और दिन भर अपने आपको खेतों में छिपाये रखा। पुलिस उसकी तलाश कर रही थी। दूसरे दिन वह एक शहर के पास खुदी हुई खाई में जा छिपा। वह वहाँ कुछ समय तक ही बैठ पाया था कि पास के मुहल्ले में आग लगी। उसने देखा कि एक महिला जलते हुए मकान से बाहर निकल रही है और जोर-जोर से सहायता के लिए लोगों को पुकार रही है। उसका एक मात्र बच्चा जलते हुए मकान की दूसरी मंजिल में फंस गया था। कैदी ने स्त्री की करुणा, किन्तु नैराश्यपूर्ण पुकार सुनी और जब देखा कि सभ्य सम्पन्न पड़ोसियों में से कोई भी उसकी मदद करने और बच्चे को बचा लेने के लिए आगे नहीं आ रहा तो वह अपने को नहीं रोक सका। भागता हुआ आग के भीतर लपका और अन्दर जाकर उस बच्चे को सुरक्षित बचा लिया और उसकी माँ को सौंप दिया। बाहर निकलते समय कैदी के कपड़ों में आग लग चुकी थी और उसका चेहरा बुरी तरह झुलस गया था। पुलिस भी तब वहाँ मौजूद थी, जिसने उसे पुनः गिरफ्तार कर लिया। उसका अपराध मात्र इतना था कि मालिक द्वारा नौकरी से निकाल दिये जाने के कारण जब परिवार को भूखों मरने की नौबत आ गई तो उसने कहीं से खाना चुरा लिया था। विडम्बना यही है कि समाज के सफेद पोशवर्ग के निष्ठुर धनिक किन्तु अपराधी तो पकड़े नहीं जाते वे ऐसे भाव संवेदना के धनी छोटे से अनजाने में किये अपराध पर कानून की बेड़ियों में जकड़ दिये जाते है।

पाश्चात्य, मनीषी जोसेफ जी, फीतेसाज का कहना है कि श्रमिक जातियाँ, पहाड़ी अन्य जातियाँ, एस्किमो आदि इसलिए आज भी जीवित बनी हुई हैं कि उनमें व्यापक रूप से आपसी सहयोग बना हुआ है, अन्यथा विषम परिस्थितियों की कठिनाइयों के कारण वे कब की दम तोड़ गई होती। उनके अनुसार कितनी ही सभ्य एवं समुन्नत मानव जातियाँ केवल इसलिए मिट गई कि उनसे संकीर्ण स्वार्थपरता का रास्ता अपनाया और परस्पर संघर्ष करने लगे यद्यपि यह परम्परा परिवर्तित रूप में कहीं-कहीं अब भी विद्यमान है किन्तु मिलजुल कर रहने और मिल-बाँट कर खाने की सहकारिता की भावना जितनी अधिक श्रमिकों, धनिकों निर्धनों में है, सम्पन्नों में उसके कदाचित ही दर्शन होते है। बहुत से धनी यह नहीं समझ सकते कि अत्यधिक निर्धन आपस में एक दूसरे की किस प्रकार सहायता कर सकते है। कारण कि वे यह नहीं जानते कि निर्धनतम जातियों के परिवार का जीवन-मरण कितनी सी खाद्य सामग्री या पैसे पर निर्भर रहा करता है जिसकी पूर्ति प्रायः वे पारस्परिक सहयोग से कर लेते हैं। फीतेसाज ने अपने जीवनचरित्र में जिन संकटपूर्ण विषम परिस्थितियों का वर्णन किया है, उनके अनुसार कोई विरला ही मजदूर परिवार होता है जिसे अपने जीवनकाल में उनका सामना न करना पड़ा हो। विपन्न परिस्थितियों में भी यदि वे सभी नष्ट नहीं हो जाते तो इसका प्रमुख कारण उनका पारस्परिक सहयोग ही है। अपने स्वयं के बारे में वे लिखते हैं कि उन दिनों जब मेरा परिवार भूखों मरने ही वाला था, उस वक्त एक वृद्ध परिचारिका ने जो स्वयं अत्यन्त निर्धन थी, कुछ रोटियाँ, थोड़ा कोयला और बिस्तर लाकर पूरे परिवार की काल के मुँह में सामने से रक्षा की थी। वृद्धा इन वस्तुओं को कहीं से उधार माँगकर लाई थी। यदि वह न होती तो और कोई अथवा पड़ोस वाले ही पीड़ित कुटुम्ब की सहायता कर देते। मैक्सिसगोर्की तथा कार्ल मार्क्स ने ऐसी गरीबी स्वीकार करके औरों के साथ शोषितों के साथ रहकर जीना पसन्द किया था नहीं तो उनकी प्रतिभा उन्हें महलों का वैभव भी दे सकती थी। सहयोग सहकार एक मानवी सद्गुण है एवं जब तक वह है, मानवता जीवित रहेगी।

विकासवाद, ओरीजिन ऑफ स्पेसिज, डीसेन्ट ऑफ मैन, जैसी प्रसिद्ध कृतियों के रचयिता एवं जीवन के लिए संघर्ष को अनिवार्य मानने वाले विख्यात वैज्ञानिक डार्विन ने अपनी तीसरी कृति में स्वयं लिखा है कि सामाजिकता की मानवी विकास का प्रमुख कारण है। यद्यपि उसमें कई कमियाँ हैं किन्तु सहकार भाव के कारण असीम संभावनाएँ हैं। प्रकृति के अन्य प्राणियों की अपेक्षा आत्मरक्षा के साधन उसके पास नहीं है, फिर भी अपनी बौद्धिक शक्तियों एवं अन्य सामाजिक गुणों द्वारा वह इन कमियों की क्षतिपूर्ति सरलतापूर्वक कर लेता है। एक दूसरे की सहायता करके उसने इन शक्तियों को प्राप्त कर लिया है। मनीषी रूसो का कहना है कि प्रकृति में सर्वत्र प्रेम, शक्ति और सहयोग की कूट-कूट कर भरा है किन्तु मनुष्य ही उसे नष्ट कर संकट मोल लेता रहता है। उन्नीसवीं शताब्दी के अन्तिम दिनों में इस संदर्भ में प्रख्यात रूसी वैज्ञानिक प्रोफेसर केसलर ने प्रकृतिवादियों के एक सम्मेलन में कहा था कि सहयोग प्रकृति का एक अटल नियम एवं विकास का मुख्य अंग है। संघर्ष की अपेक्षा कहीं अधिक कारगर रूप से इसे प्रयुक्त होते हुए देखा जा सकता है। मानव जाति के विकास में पारस्परिक सहयोग का कितना अधिक हाथ रहा है, यह किसी से भी छिपा नहीं।

मनुष्य में साथ-साथ रहने और एक दूसरे की सहायता करने की प्रवृत्ति उतनी ही पुरानी है, जितना कि उसका धरती पर आगमन। समय-समय पर इतिहास में उतार-चढ़ाव होते रहे, मनुष्य पर आपदाओं के प्रहार होते रहे। कितने ही देश युद्धों के कारण बर्बाद हो गये, और मानव जाति दरिद्र बन गई। फिर भी जिन समुदायों में सहकारी प्रवृत्ति जीवित रही, वे समय के अनुकूल नवीन संरचना खड़ी करने में समर्थ हुए। विषम एवं विपन्न परिस्थितियों में भी मानव की रचनात्मक प्रतिभा को प्रेरणा एवं सुविधाएँ आपसी सहयोग की प्रवृत्ति से ही मिली है। आशा रखनी चाहिए कि आने वाले दिनों में सहयोग-सहकार की भावना का इतना अधिक विस्तार होगा कि समस्त मानव जाति भिन्न-भिन्न धर्मों, भाषाओं और जाति वर्गों के भेद को भूल कर उसे अपनी जीवनधुरी बना लेगी।


पलायन लोकसेवी को शोभा नहीं

विपरीत ही सिद्ध हो रही है। इसलिए त्याग पत्र देने का विचार कर आपकी अनुमति माँगने आया हूँ’ और इतना कह उन्होंने हस्त लिखित त्याग पत्र का प्रारूप बापू के सामने रख दिया।

‘गाँधी जी ने इसे ध्यान से पड़ा और ताकते हुए बोले मानवी वृत्तियाँ ऊर्ध्वगामी बनानी पड़ती हैं इनका अधोगामी होना सहज है। अच्छाइयाँ सिखानी पड़ती है बुराइयाँ खुद ही आ जाती है। संसार में अच्छाइयाँ ऊर्ध्वमुखी जीवन अभी तक नहीं बन पड़ा है। जानते हो ‘क्यों?’ नहीं।

‘क्योंकि तुम्हारे जैसे अच्छे लोग जिन पर उन्नत जीवन सिखाने की जिम्मेदारी रही है पलायनवादी होते आए हैं।’

‘पर कुछ हकलाते हुए उन्होंने कहना चाहा। ‘पूरी बात सुनो’ बापू ने अंगुली के इशारे से उन्हें रोकते हुए आगे कहा ‘कारण एक ही रहा है स्वयं के व्यक्तित्व को सामने ले आना। निजी मानापमान का प्रश्न सामने रखना। तुम सार्वजनिक कार्यकर्ता अर्थात् लोकसेवी हो। लोकसेवी लोक शिक्षक भी होता है। उसका एक ही आदर्श होना चाहिए सब कुछ सहकर भी मानवीय व्यवहार को गढ़ने में निरत रहना। मनुष्यता को अधिकाधिक गरिमामय बनाने की कोशिश में लगे रहना।’

सुनने वाले के अंतर्मन में ये वाक्य तीर की तरह जा घुसे। उन्होंने सोचा ‘कैसी क्षुद्र अहमन्यता में फंसा था मैं। जब व्यक्ति लोकसेवा में अपने जीवन प्रवाह को नियोजित कर देता है तो उसके वैयक्तिक चैतन्य पर उसका अधिकार ही क्या? सेवा कार्य में मानापमान का ख्याल तो अधर्म है।

बदल गया निर्णय। इस्तीफे के टुकड़े करके वहीं कूड़ादान में डाल दिया। पलायन से कर्त्तव्य की ओर मुड़ने सन्नद्ध होने वाले लोकसेवी थे डॉ. राजेन्द्र प्रसाद जो बाद में भारत के प्रथम राष्ट्रपति बने। अब उनके मन में उल्लास था अपने मार्गदर्शक को माथा नवाकर वे चल पड़े गन्तव्य की ओर।


रहने के लिए उचित क्षेत्र का चयन किया जाए

हिंस्र पशुओं की बहुलता वाले क्षेत्र में प्रवेश करने पर मन अनायास ही भयभीत होने लगता है। भले ही उन आक्रान्ताओं से सीधे पाला न पड़ा हो। भले ही उनके आक्रमण की घटना घटित न हुई हो, फिर भी आतंकवादी अपनी विशिष्टता वाला वातावरण बनाते हैं और उसमें ऐसे तत्व सूक्ष्म रहते हैं जो भय की मानसिकता बनायें, आशंका या आतंक अपने समीपवर्ती क्षेत्र में छोड़ें और उस क्षेत्र में जिनकी भी पहुँच हो उन्हें संत्रस्त या भयभीत करें।

हर व्यक्ति या क्षेत्र में अपनी अपनी प्रभाव शक्ति होती है। बुरों का जमघट जिस भी क्षेत्र में होगा वहाँ उसी स्तर का वातावरण बनते और प्रभावित करते देखा जाता है। चोर उचक्के अपने बचाव और सुविधा के अनुरूप क्षेत्र तलाश कर लेते है, और छिपने, छिपाने की सुविधा का लाभ उठाते हुए वहाँ एक प्रकार से अड्डा जमा लेते हैं। सहयोगियों का आदान प्रदान भी उन्हें मिल जाता है। फलस्वरूप उनका दुस्साहस वहाँ फलता फूलता है और अपने प्रभाव से उस क्षेत्र को अपने स्तर का बना देता है।

ऐसे अवांछनीयता के केन्द्र बने हुए क्षेत्र से होकर गुजरने वाले तक अनायास ही भयभीत और आतंकित होते देखे गये हैं। भले ही उन्हें उस क्षेत्र में छिपे हुए दस्युओं से सीधा पाला न पड़े। मुठभेड़ का अवसर न आवे, फिर भी सूक्ष्म चेतना उससे प्रभावित होती है और आतंक से समूचे परिकर को प्रभावित करती है। ऐसे क्षेत्रों से होकर गुजरते हुए भी भय लगता है।

वृक्ष वनस्पतियों में भी अपने-अपने प्रकार की विशेषताएँ होती हैं। कुछ न आरण्यकों का वातावरण ऐसा शुद्ध सात्विक होता है कि ऋषि मुनियों को भी उस क्षेत्र में निवास करने में साधना के लिए उस क्षेत्र का चयन करने में प्रसन्नता होती है। उच्चस्तरीय विचारधारा अनायास ही उठती और अन्ततः उस क्षेत्र को प्रभावित करती रहती है। वे वहाँ रहकर प्रसन्नता और सफलता अनुभव करते हैं। बिना किसी उद्वेग के वहाँ अपने सहचरों और शिष्यों समेत निवास भी करते रहते हैं। यह लाभ किसी प्रत्यक्ष कारण से नहीं होता वरन् वहाँ का वातावरण ही ऐसा होता है जो प्रोत्साहित एवं प्रसन्न करने में अनायास ही सहायक होता है।

गौओं के बेड़े-उनके चरने एवं रहने के स्थान अपने में आरोग्यवर्द्धक विशेषताएँ उत्पन्न कर लेते हैं। वहाँ रहकर रोगियों को आरोग्य प्राप्त होता है, और मानसिक उत्कृष्टता में अभिवृद्धि होती है। अध्यात्म स्तर के वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए ऐसे क्षेत्र विशेष रूप से उपयुक्त पाये जाते हैं।

वनौषधियों में रोग निवारक आरोग्यवर्द्धक गुण होते हैं। चिकित्सक उनको संग्रह करते, अनुसंधान करके उपयोगिता की जाँच पड़ताल करते और चिकित्सा की सफल साधना कर पाते हैं। यह प्रत्यक्ष प्रतिफल की बात हुई परोक्ष रूप में अनुसंधान करने पर पाया गया है कि ऐसी वनौषधियों को उपजाने वाले क्षेत्र में कुछ समय निवास करने पर भी उन गुणों का लाभ उठाया जा सकता है। वहाँ की वायु में रहने वाली आरोग्यवर्द्धक विशेषता शरीर और मन को ऐसे लाभ पहुँचाती है जो उत्पन्न हुई औषधियों के सेवन से बहुत श्रम और समय के उपरान्त प्राप्त होती है।

नदी सरोवरों के संबंध में भी यही बात है। गंगाजल के सेवन से उपलब्ध होने वाले लाभों की जानकारी अनुभवियों को मिलती रहती है। इसके विपरीत बहुत स्थानों का जलवायु ऐसा होता है जिसमें रहने वालों को कुष्ठ जैसा रोग घेर लेता है और वहाँ उत्पन्न होने वाली वनस्पतियाँ तक स्वास्थ्य पर घातक प्रभाव छोड़ती हैं।

उपयोगी लाभदायक वस्तुओं की, क्षेत्रों की सभी को खोज रहती है। इस संदर्भ में इतना और ध्यान रखने योग्य है जहाँ भी रहा जाय वहाँ का दृश्य या अदृश्य वातावरण भी उपयुक्त हो। बिना ऐसी देखभाल के कहीं भी रहने लगना लगभग वही प्रभाव उत्पन्न करता है जो दुष्ट दुर्जनों के सान्निध्य में अथवा वाले क्षेत्र में रहने पर होता देखा गया है।


जाग्रत संवेदना ने चैन से नहीं बैठने दिया

गौरवर्ण के तरुण के कदम जंगल में से गुजरने वाली पगडंडी पर तेजी से बढ़ रहे थे। शायद उसे घर पहुँचने की जल्दी थी अथवा ढल रहे दिन के कारण वह समय से सुरक्षित अपने गाँव पहुँच जाना चाहता था। भला इस वियाबान जंगल में क्या भरोसा कब कुछ अघटित घट जाए? अचानक उसके कानों में किसी नवजात शिशु के रोने की आवाज पड़ी। एक बार तो सोचा शायद भ्रम है। भला यहाँ बालक कहाँ? पर नहीं रोने का स्वर तो लगातार आ रहा था तनिक ठिठका मुड़ कर पीछे की ओर देखा, आस पास की झाड़ियों में झाँका, कहीं कुछ तो नहीं। पर बाल कण्ठ का रुदन तो साफ सुनाई दे रहा था। अरे यह क्या इस पेड़ की डाल पर लटकी टोकरी में तो कहीं कुछ नहीं है? जरूर यहीं कुछ होगा अन्यथा यहाँ टोकरी लटकाने का क्या प्रयोजन?

पेड़ पर चढ़ा देखा। सचमुच नवजात बालक हाथ-पैर चला रहा था। भला कोई यहाँ क्यों लटका गया अपने जिगर के टुकड़े को। तप्त स्वर्ण वर्ण के इस शिशु के सुडौल अंग, बड़ी कजरारी आँखें उन्नत भाल सभी कुछ उसे ऐसा मोहक बना रहे थे कि एक बार देखकर किसी का दिल उसे लेकर गोद में खिलने हेतु मचल उठे। उस पर ऐसी निर्ममता? उलझन सुलझी नहीं। उसने टोकरी से उतार बच्चे को गोद में लिया और चल पड़ा गाँव की ओर।

गाँव में पहुँचकर उसने पता करवाया क्या किसी के घर अभी हाल में बालक जन्मा है। जागीरदार होने के नाते उसे खोज-बीन करने में अधिक देर न लगी। शीघ्र ही मालूम पड़ गया कि यह पुत्र उसी के गाँव में रहने वाले एक क्षत्रिय परिवार का है। सुनकर आश्चर्य हुआ भला इस समृद्ध परिवार के समाज में उच्च स्थान प्राप्त सदस्यों ने ऐसा क्यों किया? समझदारों ने ऐसी नासमझी क्यों की?

स्वयं गया। जागीरदार को सामने खड़ा देख परिवार के सदस्यों ने आव-भगत की। सामान्य कुशल प्रश्न के बाद उसने गोद में लाए शिशु को दिखाकर ‘पूछा यह बच्चा आपका है’?

‘हाँ पर आपके पास कैसे’? परिवार के एक सदस्य का प्रश्न था।

‘किन्तु आप लोगों ने इसे जंगल में क्यों लटका दिया था’? ‘दरअसल कल इसकी छठी थी।’

‘छठी और जंगल का मतलब’?

‘वस्तुतः हमारे कुल में एक परम्परा है परिवार के अधेड़ वय के मुखिया ने गर्व के साथ बताना शुरू किया। छठवें दिन नवजात बालक की वीरता की परीक्षा ली जाती है। उसे जंगल में लटका देते हैं। यदि वह रात्रि भर जीवित रहा तो बहादुर मानकर परिवार में स्थान दे दिया जाता है। अन्यथा मृत की लाश या तो जंगली जीवों का आहार बन जाती है अथवा उसे नदी में बहा देते हैं।’

इस विचित्र परम्परा को सुन वह सिहर गया। सोचने लगा परम्परा मान्यता रीतियाँ सभी एक पिटारी में रहने वाले जहरीले साँप बिच्छू हैं। इनके दंश से न जाने कितने अबोध बालक, नारियाँ बिलखते तड़पते अपनी जान गँवाने के लिए विवश होते हैं। संभवतः इस अनन्त आकाश की भी कोई सीमा हो। पर अपने को बुद्धिमान कहने समझने वाले मानव की मूर्खता का विस्तार अनन्त है। खैर उसे जैसे-जैसे समझा-बुझा कर बालक का पालन-पोषण करने को राजी किया।

किन्तु इस घटना ने उन्हें व्यथित बहुत कर दिया। आसाम प्रान्त के निवासी होने के कारण वह अपने गाँव अलिपुखरी के पास टोना टोटका, तन्त्र मंत्र जैसी विचित्र चीजें प्रारंभ से सुनते आए थे। अपने को तन्त्रयोगी कहने मानने वालों के बीच में प्रचलित ‘रात्रिखोवस’ नामक की विचित्र पद्धति से उन्हें शुरू से घृणा थी। नारी को अपनी पाशविक वासना का शिकार बनाने वाली इस प्रथा से कोई भी विवेकी घृणा ही करता। एक दो नहीं मूढ़ मान्यताओं को पूरा जखीरा था। विष की वल्लरी नहीं समूचा जंगल था। कैसे इसे साफ करे? मन में ऊहापोह चल ही रहा था इसी बीच स्वयं के दाम्पत्य जीवन पर नियति का क्रूर आघात हुआ। पत्नी विछोह ने व्यथा को द्विगुणित कर दिया। सगे संबंधी दूसरे विवाह के लिए दबाव डालने लगे। उन्होंने जवाब दिया जब स्त्री पति के मरने के बाद दूसरा विवाह नहीं करती तो पति को पत्नी के मरने पर क्यों कर दूसरा विवाह करना चाहिए? किसी के पास कोई उत्तर नहीं था। इन दिनों वह गहन चिन्तन कर रहे थे। अतीत और वर्तमान की अनेकों घटनाओं स्वयं के जीवन और सामाजिक परिस्थितियों का समीकरण बनाते हुए उन्हें सूझा। क्रिया का आधार सोच ही तो है। यदि किसी तरह सोच बदला जा सके तो। चेहरा खिल उठा परिणाम की सुखद संभावना से।

वह निकल पड़े पदयात्रा पर, जन मानस की सोच बदलने। माध्यम बनी भागवत कथा। अपनी मर्मस्पर्शी शैली में जब वह प्राचीन घटना प्रसंगों को समसामयिक परिप्रेक्ष्य में कहते तो जन सामान्य अपनी भूलों को पकड़े बिना न रहता। विचारों में फेर बदल के प्रयास कहीं अधिक प्रभावी हो इसके लिए उन्होंने स्वयं लिखे नाटक का मंचन करना शुरू किया। ऐसा ही एक नाटक ‘चिन्ह यात्रा’ वहाँ की आंचलिक भाषा में लिखा। जिसे देखकर अनेकों के अंतर्मन में खुद को बदलने के लिए संकल्प जग उठे।

अपनी इस यात्रा के दौरान उन्होंने कीर्तन घोषा, भक्ति प्रदीप, रुक्मणी हरण, काव्य बड़गीत, गुण माला आदि कई कृतियाँ लिखीं जिसमें कीर्तन शैली में अपने विचार और भक्त हृदय को खोल कर रख दिया।

उनकी कोशिशों ने तत्कालीन आसाम के निवासियों की सोच में उथल-पुथल मचा दी। यद्यपि उन दिनों आज से चार सौ वर्ष पूर्व पन्द्रहवीं सदी में विचारों में फेर बदल कर डालने वाली क्राँति का संचालन सहज न था। पर वह पुरुष ही क्या जिसके प्रबल पौरुष के सामने परिस्थितियाँ नतीजतन न हो उठे। इस दिशा में उनका अगला कदम उठा राम नाम की पीठों की स्थापना के रूप में। जिसके माध्यम से लोकसेवी सृजन सैनिकों का प्रशिक्षण चलता। सौ वर्ष से अधिक अवस्था वाले इष्टदेव पुरुष को सुदर्शनचक्र के समान गतिमान देखकर तरु वर्ग तक हैरत में पड़ जाता। पर अनुभवों जानते हैं जाग्रत संवेदनाओं ने किसे कब बैठने दिया है? १९१ वर्ष की आयु तक सक्रिय सतेज रहकर मानवी सोच में सुधार लाने हेतु तत्पर यह महामानव थे शंकर देव जिन्होंने तत्कालीन आसाम अंचल के निवासियों को अनेकों कुप्रथाओं से त्राण दिलाया और वहाँ के जन समूह में देवता की तरह पूजे गये।

आज भी अनेकों सड़ी-गली रीतियों के बदबूदार कंकाल को अपनी छाती से चिपकाए मानव रुग्ण हुआ पीड़ा से बिलख रहा है। उसे भ्रम से मुक्त करने पीड़ा की त्रासदी से मुक्ति दिलाने हेतु संकल्पित महाकाल की परा पश्यन्ति बैखरी वाणियाँ पुनः गूँज उठी है आमूल-चूल परिवर्तन हेतु अनेकों शंकर देव चाहिए।

शिष्य के पास ध्यान सीखने गया। तो गुरु ने शिष्य से कहा कि इस तरह ध्यान करो कि तुम सुध-बुध भूल जाओ और जैसे तुम बचे ही नहीं। चेला मुसीबत में पड़ गया कि अच्छा ध्यान बताया। यदि बंधोगे नहीं तो ध्यान किस काम आयेगा। वह नित्य गुरु के पास आता और गुरु नित्य ध्यान के बारे में बतलाते। किन्तु गुरु सदैव यही पूछते कि ‘अरे तुम अभी तक बचे हो। फिर ध्यान क्या खाक करते हो?’ शिष्य चला जाता।

पुनः अगले दिन आया तो गुरु ने पुनः वही प्रश्न दोहराया। एक दिन शिष्य ने सोचा ऐसा कब तक चलेगा और प्रातः गुरु के दरवाजे पर पहुँचकर धम्म से गिर गया आँखें बन्द श्वाँस खींच ली ऊपर को। मानो मर गया हो। गुरु चाल को समझ गए। वे बोले, ‘मैंने तुझे एक सवाल दिया था। उसका जवाब दे।’ उस शिष्य ने आँखें खोली और कहा जवाब तो अभी नहीं मिला। सोचा शरीर को ही गिरा दूँ शायद आप सन्तुष्ट हो जायें कि शिष्य ने वचनों का पूर्ण पालन किया। गुरु बोले ‘मरने से मेरा अभिप्राय प्राणान्त से नहीं था। मैं तो तुम्हारे अन्दर छिपे बैठे अहंकार को निकालने उसे मारने की बात करता था, जो तुम नहीं समझ सके। अहं के रहते यदि तुम आँखें बन्द किये भी बैठे रहे तो ध्यान में कौन सी सफलता की आशा की जा सकती है। ढोंग मत करो, वास्तव में अपने ‘मैं’ को मारने का प्रयास करो। सब कुछ पा जाओगे।’


दृष्टिकोण के अनुरूप मान्यता

वस्तुएँ वस्तुएँ हैं। पदार्थों के रंग, रूप, नाम और गुण अनेक होते हुए भी अंततः वे निष्प्राण हैं, निर्जीव और चेतना रहित। उनका स्वरूप तो है, पर ऐसा कुछ नहीं जिसमें वे भावनात्मक प्रतिक्रिया उत्पन्न कर सकें। यह मनुष्य की अपनी मान्यता है जो उसके साथ भले-बुरे का आरोपण करती है वही प्रिय-अप्रिय की छाप लगाती है और अपने पराये की मान्यता के साथ-साथ किसी को प्रिय पात्र बनाती है और कई बार उसे अनुपयुक्त और घृणास्पद भी ठहराती है।

यह मान्यता या प्रवृत्ति मनुष्य की अपनी संपदा है। अपनी ही विनिर्मित और निर्धारित भी। इसी से प्रभावित होकर जिसके साथ चाहता है वह उसके साथ राग या द्वेष का आरोपण कर लेता है। प्रशंसा या निन्दा आमतौर से वस्तुओं की होती देखी जाती है, पर वस्तुतः वैसा होता नहीं। आँखों पर जिस रंग का चश्मा पहन लिया गया है, दृश्यमान वस्तुएँ प्रायः उसी स्तर की देखी पड़ती है। उनका अपना वास्तविक स्वरूप मात्र पड़ती है। उनका अपना वास्तविक स्वरूप मात्र जड़ पदार्थ का होता है। जिसका जैसा उपयोग बन पड़े, वह उसी स्तर के अनुभव में आने लगता है। इसका एक अर्थ यह भी है कि इच्छानुसार किसी को भी प्रिय से अप्रिय और अप्रिय से प्रिय भी बनाया जा सकता है। इस प्रकार के परिवर्तन बार-बार भी होते रहते हैं। अभी जो वस्तु सुन्दर लगती है, वह दृष्टिकोण बदलते ही अप्रिय अनुपयोगी कुरूप भी प्रतीत हो सकती है। एक बार की स्थिर की हुई मान्यताएँ भावनाएँ भी वैसी ही बनी रहेंगी, यह कोई निश्चित नहीं।

एक व्यक्ति अभी जीवित है। अपना संबंधी, कुटुम्बी या प्रियजन भी है। उसके साथ अपना पूरा सद्भाव या लगाव भी है, पर कदाचित कुछ ही क्षण बाद उसकी मृत्यु हो जाय तो मृत शरीर के प्रति दृष्टिकोण बदलने में देर न लगेगी। उसे हटाने या मिटाने की जल्दी पड़ेगी। कुछ देर घर में रखे रहना भी असह्य हो जायेगा। अन्त्येष्टि कर्मों से जल्दी निपट लेना ही श्रेयष्कर प्रतीत होगा। जीवित, कमाऊ, हितैषी या उपयोगी लगने पर जो व्यक्ति प्रिय लगता है, वह मृतक या संक्रामक रोग ग्रस्त हो जाने पर ऐसा लगता है कि उसकी निकटता से जितनी जल्दी हो सके दूर हटा या हटाया जाय। यह दृष्टिकोण का अंतर स्थिति बदलते ही हो जाता है।

किसी वस्तु पर अपना अधिकार हो तो उसकी सुरक्षा और साज-संभाल करने का मन सदा रहता है। पर यदि उस पर किसी दूसरे का अधिकार हो जाय, बेच दी जाय तो फिर उसकी चोरी या टूट-फूट हो जाने पर भी इस बात की चिन्ता नहीं रहती है कि वह कहाँ और किस स्थिति में है। अपनेपन का भाव ही उसे प्रिय बनाये हुए था। जब वह हट गया और उसके स्थान पर परायापन आ गया तो प्रिय भाव के उपेक्षा में बदलते देर नहीं लगती।

इन्द्रिय स्वाद के संबंध में भी यही बात है। जो पदार्थ अभी स्वादिष्ट लगता था, और खाने के लिए जी मचलता था, वही बुखार की दशा में मुँह कड़ुवा हो जाने पर बुरा लगने लगता है। पेट भरा होने अथवा उसमें हानिकारक वस्तु होने की मान्यता बन जाने पर वही वस्तु कुछ देर में अखाद्य बन जाती है।

मूर्तिकार की दुकान पर बिकने के लिए रखी हुई प्रतिमा एक खिलौना मात्र है, पर जब उसी को देवालय में प्राण प्रतिष्ठा करके देवता के रूप में स्थापित कर दिया जाय तो पूज्य स्तर की इष्टदेव बन जाती है। गंगा का जल प्रवाह भक्तजनों के लिए पुण्यदायक और पापनाशक है, पर मछली पकड़ने वाले उसी जलाशय में देर तक रहने पर भी उसे मात्र आजीविका का एक क्षेत्र भर मानते है। इसे दृष्टिकोण के अन्तर के सिवाय और क्या कहा जाय?

बच्चे के लिए खरगोश का बच्चा एक सुहावना खिलौना मात्र है, पर किसी हिंस्र प्राणी की उस पर दृष्टि पड़ते ही सर्वोत्तम खाद्य पदार्थ पर रह जाता है। आस्तिक के लिए इस संसार के कण-कण में विराट ब्रह्म की दिव्य चेतना का निवास है पर नास्तिक उसे मिट्टी कूड़े का ढेर भर मानता है। महत्व वस्तु का नहीं दृष्टिकोण का है जिसके आधार पर प्रिय और अप्रिय संबंधी मान्यता की स्थापना होती है।


मधु संचय


अपनों से अपेक्षा


अपनों से अपेक्षा (kavita)

प्रिय! ऐसे मत बनो कि तुमको लख कोई घबराये। या कि तुम्हारी आँख देख कर आँख कोई भर आये॥

मेघ बनो-जल की धारा ले इस दुनिया में बरसो। किन्तु किसी की आशा पर मूसलाधार मत बरसो।

इसी तरह ऊषा की लाली बनकर तमस् मिटाओ। धूम दुपहरी की बनकर मत कोमल अंग जलाओ॥

बना रहे संतुलन, न सीमा टूट कहीं भी पाये॥

वचन न बनने दो अंगारे वे भीतर जाते हैं। और जलाकर राख हृदय मानव का कर आते हैं॥

अपनी तरह दूसरे को भी ठण्डक ही भाती है। और आग मिलती है तो आत्मा तक जल जाती है॥

क्रोध त्याग दो, यह ज्वाला है जो बुझती न बुझाए। जितना बने-बनें हम औरों के हित फूल सुकोमल॥

कमल न बन पायें तो कम से कम न बनें हम दलदल॥

यह संसार चाहता है बस प्यार और कोमलता। अतः त्याग दो औरों के प्रति दंभ, द्वेष, छल, कटुता॥

पारस बनो-मिले जो हमसे वह सोना हो जाय॥

-माया वर्मा


आगे कदम बढ़ाओ


आगे कदम बढ़ाओ (kavita)

नहीं मिल सके साथ किसी का तो भी मत घबराना संकल्पों की दृढ़ता लेकर, निर्भय कदम बढ़ाना॥

अनगिन तारे एक चन्द्रमा के आगे फीके होते, एक सूर्य से भूमण्डल में प्राण-प्रकाश सभी लेते।

एक दीप की लौ से काली माक्स अरे सहम जाती, एक सिंह की तीव्र गर्जना से यह धरा दहल जाती।

सूर्य, चंद्र, दीपक जैसा तुम साहस तो दिखलाना। संकल्पों की दृढ़ता लेकर, निर्भय कदम बढ़ाना॥

पवन पुत्र हनुमान एक ने लंका पूर्ण जलाई थी, एक मात्र अंगद के आगे भरी सभा थर्राई थी।

अभिमन्यु के आगे सारे कौरव वीर विवश होते, उसके कौशल के सम्मुख तो सारे शस्त्र व्यर्थ होते।

ऐसा ही अद्भुत गौरवमय तुम इतिहास बनाना। संकल्पों की दृढ़ता लेकर, निर्भय कदम बढ़ाना॥

युग संधि का दुर्लभ अवसर, आह्वान करता महाकाल, देव संस्कृति की रक्षा कर पुनः पहन लो तुम जयमाल।

सृजन सूर्य बन नव प्रभात का, युग का काला तम हरना एकाकी हो पर चाह नहीं, एकाकी ही आगे बढ़ाना॥

अम्बर में एकल उज्ज्वल ध्रुव तारे सा पद पाना। संकल्पों की दृढ़ता लेकर, निर्भय कदम बढ़ाना॥

-सुरभि कुलश्रेष्ठ


कः विद्या?

तकनीकें सुझाता है सिद्धान्त सिखाता है तब वह शिक्षा होती है सिर्फ बुद्धि और स्मृति गम्य। मतलब इतना ही होता है कि बुद्धि समझे और स्मृति याद रखे।

शिक्षा की परिपक्वता के बाद जब संगीत साधक अन्तर भावों में डूब कर गाता है। स्वयं विभोर होकर औरों को विभोर करता है। तब इन क्षणों में शिक्षा कला का स्वरूप प्राप्त करती है। इस अपूर्व तन्मयता में उसकी विकसित होती जा रही भाव चेतना अपनी मौलिकता की अभिव्यक्ति विषय की निगूढ़ताओं अन्तर की अनेकानेक सूक्ष्मताओं में करती हैं।

भाव स्पर्शी कला यदि विकास की गति पर बढ़ सकी तो कला साधना बन जाती है। ऐसी साधना जो भावों के प्रगाढ़ परिपक्व होने पर जीवन बोध करा दे। अलाउद्दीन खाँ, रवीन्द्र नाथ टैगोर ने कला का विकास इसी तरह तक किया था। यह कथन सिर्फ संगीत के क्षेत्र में ही नहीं अपितु साहित्य यहाँ तक कि विज्ञान के क्षेत्र में भी सात्य है। इमर्सन ने साहित्य तथा रमन -आइन्स्टीन के विज्ञान के माध्यमों से विद्या के इसी स्वरूप के बाद भी आवश्यक नहीं कि प्रत्येक शिक्षा कला बने और प्रत्येक कला विद्या के स्तर तक विकसित हो सके।

इस विकास के न हो पाने का एक उदाहरण यूनान के साफिस्टों में मिलता है। ये लोगों से पैसा लेकर अपने स्कूलों में उन्हें तर्क करना सिखाते थे। इन्हीं में से एक बहुत बड़ा साफिस्ट था, जीनो। उसने घोषणा कर रखी थी, कि किसी को भी हराना हो, तो मैं तर्क की शिक्षा देता हूँ। वह आश्वस्त इतना था कि विद्यार्थी से आधी फीस लेता और कहता आधी तब देना, जब तुम किसी को तर्क में हरा दो।

उसके पास अरिस्तोफेनीज नाम का छात्र आया। आधी फीस दे कर दो साल पढ़ा। दो साल बाद शिक्षक राह देखने लगा कि कब आधी फीस मिले। इधर अरिस्तेफेनीज ने बहस करना बन्द कर दिया कारण कि अगर वह जीत जाए तो आधी फीस चुकानी पड़े।

जीनो मुश्किल में था। इधर अरिस्तोफेनीज ने कहा मैं फीस देने वाला नहीं, जब तक मैं जीतूँ न। शिक्षक भला क्यों हार मानता-मामला अदालत में गया। जीनो का ख्याल था कि अगर अदालत ने अरिस्तोफेनीज को जिता दिया तो मैं कहूँगा कि फीस ला क्योंकि तू मुझ से पहला विवाद जीत चुका है और यदि वह न जीत कर मैं जीता-तो फीस मिल ही जायेगी। लेकिन शिष्य भी कम चालाक न था। उसने कहा यदि मैं जीत भी गया तो पैसा नहीं देने का क्योंकि मैं अदालत में प्रार्थना करूँगा कि यह अदालत का अपमान है। और यदि हार गया तब तो पैसा देने की जरूरत ही नहीं है क्योंकि मैं पहला विवाद ही हार गया। हुआ यही अदालत से जीत जाने के बाद उसने पैसा न दिया। यह है शिक्षा अर्थात् विकसित बौद्धिकता जो अपने निहित स्वार्थों के रक्षण अभिवर्धन में खपती रहती है।

आज की स्थिति में भी इसका उपयोग धन सम्पदा के अर्जन तक सिमट कर रहा गया है। कला सम्मान अर्जित करने में खप रही है। फिर भला इनका विकास विद्या के रूप में कैसे हो? यही कारण है कि सच्चे अर्थों में कला भी खोती लुप्त होते जा रहे है। कारण एक ही है उनकी रीति-नीति का भाव स्पर्शी होने के स्थान पर वैभव स्पर्शी होना।

उपनिषदों ने इन सबका वर्गीकरण दो वर्गों में किया है अपरा विद्या व परा विद्या। पहले में शिक्षा व कला की समस्त विधाओं का समावेश है। दूसरे में जीवन बोध के सूत्रों का। इन सूत्रों को उचित ढंग से समाविष्ट करने पर जीवन का प्रत्येक कार्य आत्मोन्नति का साधन बनता है और अपरा विद्या भी परा विद्या का स्वरूप प्राप्त करती है। आचार्य शंकर की प्रश्नोत्तरी माला में एक सवाल आता है कः विद्या? वह उत्तर देते हैं सा विद्या या विमुक्तये। अर्थात् विद्या वही जो मुक्ति दिला सके। मुक्ति किससे? भ्रम जंजालों से इन्द्रियों की दासता से, स्वयं की दैन्यता से। हर उस चीज से जो जीवन बोध में अवरोध बनती है शिक्षा विज्ञानी टी.एम. श्रीनिवासाचारी अपनी कृति ‘काॅन्सेप्ट ऑफ रियल एजूकेशन में कहते हैं ऐसी विद्या भला विद्यालयों में कहाँ? उलटे वर्तमान स्थिति में विद्यालय विद्या के लय होने के आगार बन गए हैं। इसकी प्राप्ति एकाकी पुस्तकों के बल पर होती भी नहीं। अन्यथा ईसा के उपदेशों को अपने में संजोने वाली बाइबिल की प्रकाशित संख्या दुनिया में सबसे अधिक है। इसके बाद भी ईसा के उपदेशों को जीवन में धारण करने वाले नगण्य है। इसे तब तक सीखा जाना दुष्कर है जब तक सामने मानवी प्रकृति का ऐसा मर्मज्ञ न हो जिसने स्वयं का रूपान्तरण कर लिया है।

अतीत के भारत में गुरुकुल आरण्यक परम्पराओं के माध्यम से इस संजीवनी विद्या का विस्तार होता था। पुरोहित व परिव्राजकों दूसरे शब्दों में ब्राह्मणों व साधुओं का समूचा वर्ग इसके विस्तार के लिए सर्वथा तैयार रहता था। सिर्फ भारत ही क्यों संसार के किसी भाग में साँस्कृतिक गरिमा के दिवाकर की रश्मियाँ चमकी है। इन विद्या विस्तारकों की अप्रतिम भूमिका रही है। वसुन्धरा के प्रत्येक कोने में जिन्दगी की ऊँचाइयों गहराइयों की परख करवाने वाले ईसा फ्रांसिस संत पाल, लाओत्से, कन्फ्यूशियस जैसे जीवन विद्या के आचार्य हुए हैं। जिन्होंने कुम्हलाई मुरझाई मानवता पर अपनी संजीवनी विद्या का प्रयोग कर विद्यायाऽमृतमश्नुते के कथन को चरितार्थ किया है।

आज जबकि समाज समग्र प्रत्यावर्तन के मुहाने पर खड़ा है। ऐसे में उसे आचार्य शंकर, गौतम, बुद्ध, ऋषि, दयानन्द, स्वामी विवेकानन्द जैसे विद्या विस्तारकों की याद आना अस्वाभाविक नहीं है। जो अपनी जीवन विद्या के माध्यम से मानवता को गढ़कर तराशकर कल के प्रकाशमान युग के लिए तैयार कर सकें। कोई व्यक्ति अथवा वर्ग विशेष नहीं समूची मानव जाति तीव्र रूप से अभीप्सित है उस विद्या के लिए जिसे भगवान कृष्ण ने ‘अध्यात्म विद्या विधानां’ कहा है। शास्त्रकारों ने जिसे ‘नास्ति विद्या समंचक्षु’ कहकर जीवन दृष्टि देने वालों में अनुपमेय ठहराया है।

इस जीवन विद्या के विस्तार के लिए ही व्यापक स्तर पर लोक शिक्षकों की आवश्यकता है जो जीवन जीने की कला के साथ भावों की प्रगाढ़ता को भी गूँथ कर व्यक्ति के मन में समाहित कर सके। तभी परिलक्षित होगा-भावी देवमानव का रूपान्तरित स्वरूप।


धर्म संस्कृति के सच्चे उपासक प्रज्ञाचक्षु विरजानन्द

गंगा के जल में कटि प्रदेश तक डूबा वह शांत सुस्थिर खड़ा जप की साधना में निमग्न था। जल का उद्वेलन लहरों की बेचैनी उसकी स्थिरता का संस्पर्श पा सुशान्त हो उठी थी। बाह्य हलचलों से अछूते चेतना के अन्तरतम् में कुछ घट रहा था। मन तदाकार हो रहा था मंत्र से। हृदय गुहा से झर रहा था अलौकिक दिव्य नाद। आत्मा विकीर्णित कर रही थी अपना अद्भुत वैभव सत्ता के विभिन्न अंग-उपांगों पर। मन बुद्धि चित्त के प्रत्येक कोने के साथ प्राण भी दिव्य हो रहा था। लालसाओं-वासनाओं तृष्णाओं की मलीनता दुर्गन्ध गायत्री साधना की हवा में कहाँ उड़ गई कुछ पता नहीं। अब तो एक सुवास थी। प्रसारित थी एक अनोखी सुरभि जिसका स्रोत थी स्वयं की सत्ता का मूल केन्द्र आत्मा।

आज कितने वर्षों से चल रही थी उसकी यह तपश्चर्या किशोरावस्था के प्रवेश काल में आया था तब से एक ही क्रम बन गया आहार बिहार की कठोरता के साथ महाप्रज्ञा गायत्री के दिव्य मंत्र का जप। रात्रि के मध्यभाग को छोड़ कर शेष समय नियम बन गया। जप और उसके साथ अरुणोदय के सूर्य का ध्यान। कुछ वैसा ही सूर्य जैसा उसने अपने वचन में देखा था। रात दिनों के आवागमन से उपराम वह धियो यो नः प्रचोदयात्, की टेर लगाए था।

जप की समाप्ति के पश्चात उसने भाव सागर में डूब रहे मन को बाहर निकालने के साथ जल से बाहर निकलने के लिए किनारे की ओर कदम बढ़ाए। आहिस्ते-आहिस्ते एक एक कदम रखते किनारे को टटोला। दृष्टि के अभाव में हाथ और हाथ में रहने वाली लकड़ी यही तो उसका सहारा थी। इन्हीं के सहारे कुछ देर चलते हुए आ बैठे एक पीपल के पेड़ के नीचे। जो इन दिनों उसका एक मात्र संगी था। सुहृद छूटे मित्र सगे संबंधी छूटे परन्तु बदले में मिला यह एक आश्रय दाता। जिसने शीत में उसे अपने से चिपटाया वर्षा की बूँदों को स्वयं सहकर भीगने से बचाया ग्रीष्म में अपनी बयार से उसके शरीर को दुलराया।

उसी की छाँव में बैठ गया यह तरुण जिसकी देहयष्टि में यौवन की अरुणिमा का उल्लास था। पर इसकी मादकता उन्माद की जगह था साधना का तेजस। पता नहीं क्यों आज उसे अपना अतीत याद आ रहा था। वह तुलना करने लगा सबसे आज की। तब बही नदी के किनारे गंगापुर था आज गंगा नदी के किनारे कनखल तब पंजाब का करतारपुर था आज हिमालय का चरण प्रान्त। पाँच वर्ष की आयु में चेचक के प्रकोप से दृष्टिहीन को जाना। उस अंधे को भी पिता ने अपनत्व दिया था और माँ ने दुलार। पर दैव का विधान माता-पिता भी न रहे और तब का निराश्रित जीवन किसी ने अंधा कहा, किसी ने भाग्यहीन व्यंगबाणों की बौछार। उफ़! मानव इतना निर्मम क्यों है? पर सभी तो नहीं एक ये ग्रामवासी भी हैं जो मेरे लिए भोजन जुटा देते हैं और एक वह स्वामी जी नाम था जिनका पूर्णानन्द जी। हाँ! उन्होंने ही तो साधना मार्ग सुझाया। भगवान से सन्मार्ग प्रदर्शन की गुहार लगाने का मंत्र सुझाया था तो फिर इनमें इतना अन्तर क्यों है? जरूर वह ठोस कारण तत्व है जिसके कारण मनुष्य निर्मम हो उठता है न स्वयं जीता है न औरों को जीवित रहने देता है।

वह दूर से निकट होती जा रही पदचापों की ध्वनि से बेखबर सोच रहा था। न जाने कब तक चिन्तन प्रवाह गतिशील रहता पर आने वाले की वाणी ने उसे विराम दिया गया सोच रहे थे वत्स?

‘अ’ अ आप चौंक कर स्वर पहिचानने का प्रयास करते हुए बोला।

‘पहचान तो गए’ आगन्तुक के चेहरे पर पिता की दयालुता थी। वेशभूषा से वह संन्यासी लग रहे थे। अवस्था से वृद्ध प्रायः। पर काया पर छाए तप के तेजस प्राणों के छलकते ओजस और आत्मानुभूति के वर्चस से दमकते मुखमण्डल के समक्ष बढ़ती हुई अवस्था भी नतमस्तक थी।

‘भला आपको न पहचानूँगा तो और किसे? आप ही तो मेरे मार्गदीप हैं’। कहकर उसने अपने दृष्टिहीन नेत्र ऊपर उठाए। इनमें भाव विह्वलता रहस्य गहराई और जिज्ञासा छलछला रही थी। ‘आप किधर खड़े हैं’? ‘बस तुम्हारे पास ही पुत्र कहते हुए उन्होंने उसके सिर पर हाथ फेरा और उनके चरणों में झुक पड़ा।

‘पर तुमने मेरे प्रश्न का उत्तर नहीं दिया’?

‘ओह! यही सोच रहा था कि मानव इतना निर्मम क्यों हो गया है? उसे ऐसा बनाने का कारण क्या है? इसे दूर कैसे किया जाय’?

‘तो उत्तर मिला?’ नहीं।

तो चलो बताए देता हूँ। जीवनोद्देश्य स्वात्म गौरव की विस्मृति की वजह से निर्ममता उपज पड़ी है। इसको बढ़ाने में कारण बनी है संकीर्ण मनोवृत्ति जिसने महत्त्वाकाँक्षाओं ईर्ष्या द्वेष हिंसा कलह की पूरी सेना खड़ी कर दी है और इसके निवारण का उपाय है जीवन जीने की कला का शिक्षण। जिसका क्रियात्मक रूप होगा प्रव्रज्या। कहते कहते वह उसके चेहरे की ओर लगे जिस पर प्रव्रज्या शब्द ने उदासी ला दी थी।

‘क्यों उदास क्यों हो गए? अपनी दृष्टिहीनता के कारण। चर्मचक्षु न हुए तो क्या? इनके रहते हुए भी करोड़ों की भीड़ अनेकानेक भ्रमों के बीहड़ में भटकती हुई कलप रही है। असली तो वह अन्तर्दृष्टि है जिसे आद्यशक्ति वेद जननी की कृपा से तुमने पाया है।’

साथ ही गुर चरणों का प्रताप स्वर श्रद्धा सिक्त था। अब आपका अगला आदेश जिसे सिर माथे पर धर सकूँ।

‘तुम्हारी एकान्त साधना पूर्ण हुई अब प्रव्रज्या व्रत में दीक्षित हो’। जो आज्ञा।

समिधा चुनी गई। विरजा होम की तैयारी हुई। वर्षों का सहचर आश्वस्त एक बार पुनः सहायक हुआ नव सृजन के संकल्पों की पुष्टि करने में। जीवन विद्या के विस्तार के लिए प्राणपण से जुटने का व्रत लिया गया।

हवन की समाप्ति पर आगन्तुक संन्यासी ने कहा ‘अब तुम परिव्राजक हुए परिव्राजक विरजानन्द’। परम पूज्य गुरुदेव स्वामी पूर्णानन्द का अनुगत शिष्य विरजानन्द उसके मुख से मुस्कान के साथ निकला। घटना ने मोड़ लिया। संकल्प के धनी इस तरुण ने अपनी असाधारण स्मृति के बल पर समूचे आर्ष साहित्य का साँगोपाँग अध्ययन किया। वर्षों पैदल चल कर अनेकों का द्वार खटका कर जिन्दगी जीने का तरीका वितरित किया। वर्षों के इस प्रयास में लगे अब वह स्वयं वृद्ध हो चुके थे। पर वार्धक्य का मतलब निष्क्रियता नहीं थी। अभी भी वह वृन्दावन में रहकर अनेकों जीवन गढ़ रहे थे। कभी-कभी सचिन्त हो उठते-कौन बढ़ाएगा मेरे इस कार्य को? कौन कुरीतियों मूढ़ मान्यताओं के तम को चण्ड दिवाकर बन नष्ट करेगा? और एक दिन कुटिया का दरवाजा खटका?

‘कौन?’ प्रज्ञाचक्षु परिव्राजक का तेजस्वी स्वर था। ‘यही तो जानने आया हूँ’ वाणी में श्रद्धा और जिज्ञासा का पुट था।

तो प्रभु ने भेज ही दिया ऋषि संस्कृति के विस्तारक को यह अभीप्सा भला और किसी के पास कहाँ? वह होठों होठों में बुदबुदाए। उठाया हृदय से लगाया। अनवरत प्रयास से गढ़ा निखारा और अपने द्वारा तराशे हुए दमकते रत्न को नाम दिया दयानन्द। जीवन भर को तप-शक्ति सौंपते हुए कहा, ‘वत्स! करुणा की तुम्हारा आनन्द बने। अनेकों सूखते चटकते हृदयों तक करुणा की सरिता पहुँचाने वाले भगीरथ बनो। मत करना साधनों की बाढ़ की पुकार, मत डरना कि अवरोध कितने विषम हैं। बस बन जाना उस महाकाल के यंत्र जो नव सृजन के लिए तत्पर है। फिर किसी की क्या मजाल जो उसके निर्देशन पर चालित यंत्र को रोक सके। बढ़ जाओ। तुम्हारे चरणचिन्ह औरों का मार्ग प्रशस्त करे और वह स्वयं लीन हो गए महासमाधि में जीवन का मूल उद्देश्य जो पूरा हो गया था।

बुद्ध का जन्म हुआ। सभी देखने आए। एक महात्मा हिमालय से आए। पिता ने बालक बुद्ध को महात्मा के चरणों पर रखते हुए कहा, महात्मनः! आशीर्वाद दें प्रभु से मंगल कामना करें ताकि बालक दीर्घायु हो, यशस्वी हो, प्रतापी हो।’ किन्तु महात्मा कुछ उद्गार व्यक्त करने के पूर्व ही रोने लगे। राजा डर गए। पूछा कोई अपशकुन है? कुछ अशुभ है क्या?

महात्मा कुछ क्षणों बाद बोले- ‘नहीं राजन! ऐसा कुछ नहीं। जिसे खोजते खोजते सारी उम्र बीत गयी, वह प्रभु का भेजा संदेशवाहक अब मिला। करुणावतार आया तो सही पर मेरे लिए तो अब देरी हो गयी। उनकी लीला देखने का सुयोग मुझे तो मिल ही नहीं सकेगा। उसके चरणों में बैठने का अवसर मुझे न मिल सकेगा, बस यही सोचकर आँखें भर आई। राजन! आप धन्य है। ऐसी विभूतियाँ तो कभी-कभी हजारों लाखों वर्षों बाद अवतरित होती है।’

अन्तरिक्ष विज्ञानियों में आजकल यह चिन्ता का विषय बना हुआ है कि अब अन्तरिक्ष जगत के अनुदान पृथ्वी को मिलते रहने का क्रम कम क्यों होता जा रहा है? उसकी जगह उसके अभिशापों की वर्षा अधिक होने लगी है। ऐसा क्यों?

गंभीरता से विचार करने पर जिन तथ्यों की जानकारी मिलती है वह यह है कि इन दिनों विभिन्न देशों की अन्तरिक्ष में अपना-अपना कब्जा जमाने की होड़ असाधारण रूप से बढ़ती है। मनुष्य ने अब पृथ्वी के अतिरिक्त चन्द्रमा, मंगल, बुद्ध, बृहस्पति जैसे ग्रह उपग्रहों तक यात्राक्रम चलाकर अंतरिक्ष में अपना हस्तक्षेप आरंभ कर दिया है। चन्द्रमा पर तो बस्ती बसाने की भी योजना बन रही है। ऐसी दशा में इन ग्रह-पिण्डों के गति प्रवाह में गतिरोध उत्पन्न होता है, जिसकी प्रतिक्रिया विभिन्न प्रकार के विक्षोभों के रूप में सामने आती है।

इसके अतिरिक्त विभिन्न उद्देश्यों को लेकर प्रति वर्ष न जाने कितने कृत्रिम भू उपग्रह छोड़े जाते हैं। यह सभी पृथ्वी के रक्षा-कवच को भेदते हुए निकल जाते हैं। ओजोन से बने इस रक्षा कवच पर लगातार होने वाले प्रहार से अब वह कमजोर पड़ता जा रहा है। उसमें जगह-जगह छिद्र बन गये हैं, जिससे विनाशकारी किरणें बेरोक-टोक आने लगी हैं और पृथ्वी पर तरह-तरह के उपद्रव खड़े कर रही है। जब एक कवच क्षतिग्रस्त हो, और अन्य सही हो, तो किसी प्रकार काम चल जाता है, पर जब सभी रक्षा कवच क्षतिग्रस्त हो गये हो, तो निश्चय ही यह चिन्ता की बात है। अब तक तो हमें सिर्फ ओजोन परत के रूप में एकमात्र रक्षा कवच की जानकारी थी, पर विशेषज्ञ बातें हैं कि पृथ्वी के चारों ओर इस प्रकार के अनेकानेक कवच है रेडियो किरणें, ब्रह्माण्डीय किरणें, आयनोस्फियर, स्ट्रेटोस्फियर थर्मोस्फियर आदि परतों को इन्हीं के समतुल्य समझा जा सकता है। अन्तरिक्ष से छेड़-छाड़ के दौरान यह सभी परतें न्यूनाधिक रूप में विनष्ट होती है। इसके अतिरिक्त इस क्रम में हम प्रकृति के उस स्वाभाविक क्रम में भी व्यतिक्रम उत्पन्न करते हैं, जिससे समस्त ग्रह-नक्षत्र संबंध हैं। आँकड़े बताते हैं कि प्रति वर्ष छोड़े जाने वाले सैकड़ों भू-उपग्रहों के क्षतिग्रस्त पुर्जे का कबाड़ा अंतरिक्ष में अब तक इतने बड़े परिमाण से इकट्ठा हो गया है, जिसे टनों में आँका जा सकता है। दिन-दिन इस मलबे में बढ़ोत्तरी ही हो रही है जिससे अन्तरिक्ष जगत के प्रवाह में गतिरोध उत्पन्न होता है। इन दिनों अन्तरिक्ष के बढ़ते दुष्प्रभाव का, अनेक कारणों में यह एक प्रमुख कारण है कि उसे नगरपालिका का कूड़ा घर बना दिया गया है।

आखिर यह हस्तक्षेप क्यों?

साँप जब कुण्डली के भीतर रहता है तो वह हर प्रकार सुरक्षित होता है। पिंजरों में रहने वाले चूहों एवं अन्य पशु-पक्षियों के संबंध में भी यही बात लागू होती है। मनुष्य के संबंध में भी यही बात लागू होती है। मनुष्य के संबंध में यही बात सत्य है। उसकी सुरक्षा इसी में है कि वह पृथ्वी कवच की लक्ष्मण रेखा के भीतर रहे अन्तरिक्ष अन्वेषण के नाम पर उससे बाहर निकलने की अनावश्यक चेष्टा न करे, अन्यथा समस्त मानवता के लिए प्राण-हरण जैसी विपदा का सामना करना पड़ सकता है। समय-समय पर होने वाले परीक्षणों से इसकी जानकारी भी मिल रही है कि इन दिनों मनुष्य द्वारा उठाया गया कदम अन्ततः आत्मघाती सिद्ध हो सकता है, क्योंकि विभिन्न क्षेत्रों में पूर्व की और अब की परिस्थितियों में जब परस्पर तुलना की जाती है तो पाया जाता है कि दोनों की स्थिति में जमीन-आसमान जैसा अन्तर आ गया है। इन दिनों पृथ्वी की रक्षा कुण्डली के टूटने के कारण परिस्थितियाँ और खराब ही हुई है। जिन्होंने अन्तर्ग्रही परिस्थितियों और हलचलों के सूक्ष्म दृष्टि से अध्ययन किया है, उनका मत है कि विगत कुछ दशकों में असंतुलन इतना बढ़ गया है, जिसकी प्रतिक्रिया स्वरूप सूर्य, चन्द्र और पृथ्वी की प्रकृति में विपरीतता का व्यवहार दृष्टिगोचर हो रहा है। इसका कारण बताते हुए खगोलवेत्ता कहते हैं कि इस विशाल ब्रह्माण्ड का हर घटक परोक्ष रूप से एक-दूसरे से संबंध है। यहाँ एक ही हलचल सदा दूसरे को प्रभावित करती है अतः प्रत्यक्ष रूप से कोई अवांछनीय कार्य न करके भी परोक्ष रूप से हम वैसे कार्यों में संलग्न हो रहे हैं, जिनका दूरगामी दुष्परिणाम बाद में सामने आकार रहेगा।

क्रिया की प्रतिक्रिया का सिद्धान्त सर्वविदित है। जब किसी को अनावश्यक रूप से छेड़ा जाता है, तो उसका परिणाम सदा बुरा होता है। पिंजरे में बन्द शेर, भालू, बन्दर जैसे प्राणियों को छेड़ने पर वह कुपित होते और आक्रमण के प्रयास करते है। विषधर सर्प छेड़े जाने पर न फुफकारता है, वरन् कई अवसरों पर तो वह छेड़खानी करने वाले के लिए प्राणघातक सिद्ध होता है। अन्तरिक्ष के संबंध में हमारे वर्तमान क्रिया-कलाप भी इसी स्तर के हैं, फलतः उसके दुष्परिणाम भी भुगतने पड़ रहे हैं।

चन्द्रमा को ही लें। वह पृथ्वी के समीप होने के कारण आकाश मंडल में विद्यमान तारों की रश्मियों को हम तक पहुँचाने में संचार उपग्रह का काम करता है। पृथ्वी का मौसम बहुत कुछ इसी के संतुलन पर निर्भर करता है। इसमें थोड़ा सा भी व्यतिरेक भूकम्प, ज्वालामुखी, विस्फोट, उल्कापात, अतिवृष्टि, अनावृष्टि जैसे विनाशकारी परिवर्तनों को जन्म देता है। काफी पहले सन १९३० में अमेरिका में पड़े दुर्भिक्ष का प्रमुख कारण चन्द्रमा की असंतुलित गतिविधियों को बताया जाता है। स्काउट एयरफोर्स बेस के विलियम कैम्पबेल ने अध्ययनों के आधार पर बताया है कि पिछले दिनों भारत में पड़ने वाला असाधारण सूखा ऐसे ही अन्तर्ग्रही असंतुलन का परिणाम था। वैज्ञानिकों के अनुसार चन्द्रमा के गति-चक्र संबंधी ५०० वर्षों के रिकार्ड का जब अध्ययन किया गया, तभी अनेक देशों में बार-बार आने वाले प्राकृतिक प्रकोपों का रहस्योद्घाटन हो सका। उनका कहना था कि इसी अध्ययन के बाद यह जाना जा सका कि क्यों चीन का उत्तरी भाग बाढ़ और सूखे की चपेट में लंबे समय से आता रहा है। जापान और दक्षिण अमेरिका में आने वाले प्राकृतिक प्रकोप भी अन्तर्ग्रही असंतुलन के परिणाम बताये जाते हैं।

अन्तर्ग्रही संबंधों और प्रभावों का उल्लेख भारतीय मनीषियों ने हजारों वर्ष पूर्व ही कर दिया था और कहा था कि हम सब ग्रह नक्षत्रों से असंदिग्ध रूप से प्रभावित होते हैं। इसी आधार पर उन्होंने ज्योतिष का विकास किया था, ताकि ग्रहों का विशिष्ट लाभ विशिष्ट परिमाण में हस्तगत करने के लिए विशिष्ट एवं उपयुक्त समय की जानकारी प्राप्त की जा सके। उसकी गणना और परिणामों की सत्यता के आधार पर ही उसे विज्ञान स्तर की मान्यता मिल सकी और उसकी एक स्वतंत्र शाखा के रूप में उसे स्वीकार किया जा सका। इससे न सिर्फ इस विद्या की प्रामाणिकता सिद्ध हो सकी, वरन् अन्तर्ग्रही प्रभावों परिणामों की भी सत्यता असंदिग्ध सिद्ध हुई। तब ज्योतिर्विज्ञान का विकास इसलिए किया गया था कि अन्तर्ग्रही अनुदानों से लाभान्वित हुआ जा सके, पर अन्तरिक्षीय प्रवाह के स्वाभाविक क्रम में छेड़छाड़ से अब स्थिति वैसी नहीं रही। कारण है कि अब उसकी गणनाएँ और भविष्यवाणियाँ प्रायः गलत सिद्ध होने लगी है। तथा ग्रह पिण्डों के दुष्परिणाम बढ़ने लगे हैं, पर ऐसी बात नहीं है कि ग्रह-नक्षत्रों ने अपने अनुदान पूर्णतः बंद कर दिये हो। सूर्य अब भी महासूर्य से ताप और तेजस्विता अर्जित करके पृथ्वी सहित अन्य अनेक ग्रहों को आभा और ऊर्जा प्रदान करता रहता है। उसी प्रकार चन्द्रमा शीतलता प्रदान करता है। यदि उसकी शीतलता पृथ्वी को प्राप्त होती नहीं रहती तो यहाँ सब कुछ जल कर भस्मसात् हो गया होता।

क्रोध का अपना मूल्य है, इसको विशेष समय के लिये ही रखना चाहिए। मनीषी कहते हैं कि जब कभी गुस्सा आने लगे तो सोचना चाहिए कि यह बात मेरे गुस्से के लायक नहीं। मनुष्य को लकड़ी की छीलन की तरह नहीं होना चाहिए, जिसमें जो चाहे दियासलाई की एक तीली से आग भड़का दे। गुस्से को कुछ खास मौके के लिये सुरक्षित रखना चाहिए जहाँ वह न्याय संगत हो और उपयोगी भी। गुस्से का मृत्यु के रूप में उपयोग ही उसका सुनियोजन है।

यह सब ग्रहों के धरतीवासियों पर उपकार है, जो आगे भी बने रह सकते है, बशर्ते कि उपकार का बदला प्रत्युपकार से चुकाया जाय छेड़खानी न की जाय, अन्यथा माँ जैसी स्नेह-शीलता का अनुदान-वरदान प्रदान करने वाले ग्रह गोलक काली, दुर्गा, फुफकारती सर्पिणी, खूँखार शेरनी की भूमिका निभाने लगे, तो आश्चर्य नहीं करना चाहिए। अच्छा हो, हम पहले अपने ग्रह का पृथ्वी का ध्यान करें, अन्तरिक्ष में अनावश्यक हस्तक्षेप न करें, तभी हम उनके बढ़े-चढ़े अनुदानों को हस्तगत करने में सफल हो सकते हैं।


पत्नी गुरु-पति शिष्य

द्वार के सामने से निकलती पशुओं की कतार को देखकर वह चिल्लाया ‘उद्र उट्र’। भीतर से पति की वाणी सुनकर गृहिणी निकली उसके कानों में अन्तिम शब्द पड़े। व्याकरण की महापण्डिता, दर्शन की मर्मज्ञा, देवनागरी और देव भाषा की यह विचित्र खिचड़ी देखकर सन्न रह गई। आज विवाह हुए आठवाँ दिन था। यद्यपि इस एक सप्ताह में बहुत कुछ उजागर हो चुका था। मालूम पड़ने लगा था जिसे परम विद्वान बताकर दाम्पत्य बंधन में बाँधा गया था वह परम मूर्ख है और ऊँट को संस्कृत में बोलने के दाम्भिक प्रयास ने अनुमान पर प्रामाणिकता की मुहर लगा दी।

उफ! इतना बड़ा छल! ऐसा धोखा! वह व्यथित हो गई। व्यथा को पीने के प्रयास में उसने निचले होंठ के दाहिने सिरे को होठों से दबाया। सदियों से इसी प्रकार पुरुष ने नारी को ठगा है। कभी समर्पण की महत्ता बताकर कभी पतिव्रता के कानून बनाकर स्वयं पत्नीव्रत से च्युत होकर पर्दा प्रथा की दीवारें खड़ी कर। धोखेबाजी यहीं तक सीमित रहती तो भी खैर थी। ढेरों स्वाँग रचकर दहेज की लूट। लूटने के बाद भी त्रास यहाँ तक हत्या की नृशंसता भी। ओह! नारी कितना सहेगी तू? कितनी घुटन है तेरे भाग्य में कब तक गीला होता रहेगा आँचल आँसुओं की निर्झरिणी से। सोचते-सोचते उसे ख्याल आया कि वह उन्हें भोजन हेतु बुलाने आयी थी। चिन्तन का एक ओर झटककर पति के कंधे पर हाथ रखा ‘आर्य! भोजन तैयार है’। अच्छा कहकर वह चल पड़ा।

भोजन करते समय तक दोनों निःशब्द रहे। हाथ धुलवाने के पश्चात गृहिणी ने ही पहल की। ‘स्वामी’। कहो स्वर में अधिकार था।

‘यदि आप आज्ञा दें, तो मैं आपकी ज्ञान-वृद्धि में सहायक बन सकती हूँ।’

‘तुम ज्ञान वृद्धि में’ आश्चर्य से पुरुष ने आँखें उसकी ओर उठाई।

‘हाँ’ स्वर को अत्याधिक विनम्र बनाते हुए उसने कहा अज्ञान अपने सहज रूप में उतना अधिक खतरनाक नहीं होता जितना कि तब जबकि वह ज्ञान का छद्म आवरण ओढ़ लेता है, एक झूठी कलई अपने ऊपर पोत लेता है। ‘तो तो मैं अज्ञानी हूँ’ अटकते हुए शब्दों में भेद खुल जाने की सकपकाहट नर्तन कर रही थी।

‘नहीं’ नहीं आप अज्ञानी नहीं है’ स्वर को सम्मान सूचक बनाते हुए वह ‘बोली पर ज्ञान अनन्त है और मैं चाहती हूँ कि आप में ज्ञान के प्रति अभीप्सा जगे। फिर आयु से इसका कोई बंधन भी नहीं। अपने यहाँ आर्य परम्परा में तो वानप्रस्थ और संन्यास में भी विद्या प्राप्ति का विधान है। कितने ही ऋषियों ने आप्तपुरुषों ने जीवन का एक दीर्घ खण्ड व्यतीत हो जाने के बाद पारंगतता प्राप्त की।’

सो तो ठीक है पर पति की मानसिकता में परिवर्तन को लक्ष्य कर उसका उल्लासपूर्ण स्वर फूटा ‘मैं आपकी सहायिका बनूँगी। ‘तुम मेरी शिक्षिका बनोगी पत्नी और गुरु!’ कहकर वह ही ही करके हंस पड़ा। हंसी में मूर्खता और दंभ के सिवा और क्या था?

‘पति के इस कथन को सुनकर उसके मन में उत्साह का ज्वार जैसे चन्द्र पर लगते ग्रहण को देख थम सा गया। वह सोचने लगी आह! पुरुष का दंभ। नारी नीची है, जो जन्म देती है वह नीची, जो पालती है वह नीची है, जिसने पुरुष को बोलना चलना, तौर तरीके सिखाए वह नीची है। और पुरुष क्यों ऊँचा है? क्यों करता है- सृष्टि के इस आदि गुरु की अवहेलना क्योंकि उसे भोगी होने का अहंकार है। नारी की सृजन शक्ति की महानता और गरिमा से अनभिज्ञ है।

‘क्या सोचने लगी’? पति ने पूछा।

अपने को संभालते हुए उसने कहा,’कुछ खास नहीं। फिर कहने से लाभ भी क्या? नहीं कहो तो’? स्वर में आग्रह था।

सुनकर एक बार फिर समझाने का प्रयास करते हुए कहा हम लोग विवाहित हैं। दाम्पत्य की गरिमा परस्पर के दुख सुख हानि लाभ वैभव सुविधाएँ धन-यज्ञ का मिलकर उपभोग करने में है। पति-पत्नी में से कोई अकेला सुख लूटे दूसरा व्यथा की धारा में पड़ा सिसकता रहे क्या यह उचित है।

नहीं तो पति कुछ समझने का प्रयास करते हुए बोला।

‘तो आप इससे सहमत है कि दाम्पत्य की सफलता का रहस्य स्नेह की उस संवहन प्रक्रिया में है जिसके द्वारा एक के गुणों की ऊर्जस्विता दूसरे को प्राप्त होती है। दूसरे का विवेक पहले के दोषों का निष्कासन परिमार्जन करता रहता है।’

‘ठीक कहती हो’ नारी की उन्नत गरिमा के सामने दंभ नतीजतन हो रहा था।

‘तो फिर विद्या भी धन है शक्ति है ऊर्जा है जीवन का सौंदर्य है। क्यों न हम इसका उपयोग मिल बाँटकर करें।’

‘हाँ यह यही है।’ तब आपको मेरे सहायिका बनने में क्या आपत्ति है?

कुछ नहीं स्वर ढीला था शायद नारी की सृजन शक्ति के सामने पुरुष का अहं पराजित हो उठा था। तो शुभस्य शीघ्र और वह पढ़ाने लगी अपने पति को। पहला पाठ अक्षर ज्ञान से शुरू हुआ। प्रारंभ में कुछ अरुचि थी पर प्रेम के माधुर्य के सामने इसकी कड़वाहट नहीं ठहरी। क्रमशः व्याकरण छन्द शास्त्र निरुक्त ज्योतिष आदि छहों वेदाँग। षड्दर्शन ज्ञान की सरिता उमड़ती जा रही थी दूसरे के अन्तर की अभीप्सा का महासागर उसे निःसंकोच धारण कर रहा था।

वर्षों के अनवरत प्रयास के पश्चात पति भी अब विद्वान हो गया था। ज्ञान की गरिमा के साथ मन ही मन वह नत मस्तक था उस सृजन शिल्पी के सामने जो नारी के रूप में उसके सामने खड़ी थी।

सरस्वती की अनवरत उपासना उसके अन्तराल में कवित्व की अनुपमेय शक्ति के रूप में प्रस्फुटित हो उठी थी और एक दिन वह कभी का मूढ़ अब महाकवि हो गया। देश देशान्तर सभी उसे आश्चर्य से देखते सराहते और शिक्षण लेने का प्रयास करते। वह सभी से एक ही स्वानुभूति तथ्य कहता, पहचानो नारी की गरिमा, उस कुशल शिल्पी की सृजन शक्ति को जो आदि से अब तक मनुष्य को पशुता से मुक्त कर सुसंस्कारों की निधि सौंपती आयी हैं। महाराज भोज ने उन्हें अपने दरबार में रखा अब वह विद्वत् कुलरत्न थे। दाम्पत्य का रहस्य सूत्र उन्हें वह सब कुछ दे रहा था जो एक सच्चे इनसान को प्राप्त है स्वयं के जीवन से लोक जीवन को दिशा देते थे दंपत्ति थे महाविदुषी विद्योत्तमा और कविकुल चूड़ामणि कालिदास। जिनका जीवन दीप अभी भी हमारे अधूरे पड़े परिवार निर्माण के कार्य को पूरा करने के लिए मार्ग दर्शन कर रहा है। दिव्यसत्ता के सृजन संकेत भी इसी दिशा में चल पड़ने का निर्देश दे रहे हैं।

भारतेन्दु हरिश्चंद्र को हिन्दी के खड़ी बोली वाले स्वरूप के जनक के रूप में जाना जाता उदारवादिता के लिए वे प्रख्यात थे। उनकी विपुल सम्पत्ति इसी प्रवृत्ति के कारण कुछ ही समय में समाप्त हो गई। कर्ज चढ़ गया। एक महाजन से उन्होंने ऋण लेकर एक नाव खरीदी। जिसका भुगतान वे समय पर न कर सके। महाजन ने कितनी बार तकाजा किया किन्तु वे रकम चुकाने का वायदा तो करते रहे उसे पूरा न कर पाते। विवश होकर उसने न्यायालय में मुकदमा दायर कर दिया। न्यायाधीश उन दिनों सर सैयद अहमद खाँ थे। जो बाद में अलीगढ़ विश्व विद्यालय के संस्थापक बने। उन्होंने अकेले में बुलाकर भारतेन्दु जी से पूछा कि क्या वास्तव में उन्होंने कोई उक्त रकम महाजन से उधार ली है। यदि भारतेन्दु जी चाहते तो साफ मना कर सकते थे क्योंकि न्यायाधीश का उनका बहुत घनिष्ठ परिचय था। किन्तु नैतिकता का तकाजा था कि न्यायाधीश की सहानुभूति का उसने किंचित् भी दुरुपयोग नहीं किया।

हरिश्चन्द्र जी के मित्रों ने वकीलों ने भी उकसाया कि जब न्यायाधीश से उनका घनिष्ठ परिचय है तो लाभ उठाया जाना चाहिए और उन्हें नट जाना चाहिए। वे सब के सुझाव तर्क-वितर्क सुनते रहे। किन्तु वे सत्यनिष्ठा पर अडिग रहे। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में स्वीकार किया कि दावे में लिखित राशि उन्होंने ली है। चुकाने में विलम्ब हुआ जरूर है किन्तु उनकी नीयत में बेईमानी रच मात्र नहीं है।

ऋण का भार उन्होंने अन्ततः अपना मकान बेचकर उतारा। सत्यनिष्ठा पर आँच नहीं आने दी। ऋणी बने रहने, बेईमान कहलाने का कलंक का टीका उन्होंने नहीं लगने दिया।


हृदय क्षेत्र की अंतर्गुहा

काय-कलेवर का सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र हृदय संस्थान है। रक्ताभिसरण एवं प्राण प्रवाह का तो यह केन्द्र है ही, अध्यात्मवेत्ताओं के अनुसार इसी क्षेत्र विशेष को भाव संस्थान अंतःकरण, कारण शरीर आदि विभिन्न नामों से संबोधित किया गया है। धावना, आस्था, प्रेरणा साहस, आत्मीयता, आदर्श जैसे तत्व इसी क्षेत्र में उभरते हैं। किसी को महामानव स्तर तक विकसित करने की अलौकिकता इसी क्षेत्र में उभरती है। इसके विपरीत यदि इस क्षेत्र पर अनैतिक अवांछनीयताएँ आधिपत्य जमा लें तो व्यक्तित्व के आततायी असुरों जैसे स्तर का बनते देर नहीं लगती।

भाव संवेदनाएँ अन्तराल से ही प्रस्फुटित होती और बीज से वट वृक्ष बनकर आत्मीयों को ही नहीं, समस्त प्राणि समुदाय को अपनी चपेट में लेती हुई उन्हें तद्नुरूप सोचने, समझने और कुछ करने के लिए बाधित करती है। जिस किसी का यह क्षेत्र जग जाता है, हृदय ग्रंथि खुल जाती है उसे आत्म साक्षात्कार का ईश्वर दर्शन का परम लाभ प्राप्त करने और दिव्य विभूतियों से सराबोर होने का अवसर भी उपलब्ध हो जाता है।

योगशास्त्रों में हृदय स्थान को अनाहत चक्र कहा गया है। नीचे से ऊपर की ओर क्रमशः चलने पर मूलाधार, स्वाधिष्ठान एवं मणिपुर चक्रों के बाद इसी का नंबर आता है। तप-साधना द्वारा चक्रों के बेधन से प्राण ऊर्जा का ऊर्ध्वीकरण होता और साधक पशु-प्रवृत्तियों से ऊपर उठकर पेट प्रजनन से आगे की बात सोचता और प्रगति की दिशा में अग्रगमन करता है। परन्तु आत्मोन्नति का मार्ग इतने से ही प्रशस्त नहीं हो जाता। इससे आगे का मुख्य सोपान है गुण, कर्म, स्वभाव को परिष्कृत करना एवं हृदय की अन्तः मलिनता को धोना। उसकी जटिल गाँठों को खोलना, और उलझी गुत्थियों को सुलझाना पड़ता है। हृदय ग्रंथि यदि परिष्कृत हो सुलझ जाय तो फिर मनुष्य-मनुष्य नहीं रह जाता, वह देव मानव, महामानव बन जाता है। बुद्धत्व की और नारायणत्व की ओर बढ़ने का राजमार्ग यही है जब तक अन्तर में वासनाओं का दुर्भावनाओं का घटाटोप छाया रहता है, मनुष्य नर-पशु से ऊपर नहीं उठ सकता। पुण्य परमार्थ की उदार सहकार की बातें नहीं सोच सकता। किन्तु जब हृदय में ईश्वर प्रेम की, उच्चादर्शों सिद्धान्तों की स्थापना कर ली जाती है और हृदय के साथ परिपालन करने की ओर मानवी मन उन्मुख हो जाता है, तो यही से उसकी जटिलताओं ग्रंथियों की गाँठें खुलनी आरंभ हो जाती है। हृदय चक्र की ओर बढ़ने और हृदय गुफा में निवास करने का मार्ग खुल जाता है। अष्टावक्र गीता के अष्टादश प्रकरण के ८८वें श्लोक में इसी तथ्य का रहस्योद्घाटन करते हुए अष्टावक्र ने राजा जनक को संबोधित करते हुए कहा है कि जिसकी हृदय ग्रंथि टूट जाती है अर्थात् अहंभाव परमात्मभाव में विलीन हो जाता है, वह रज और तम प्रधान गुणों से मुक्त होकर आत्मा में ही रमण करने लगता है। जिसने अपने हृदय को पवित्र बना लिया है। वासना तृष्णा, अहंता जैसी विष बेलों को समूल नष्ट कर दिया है। उस निर्मल हृदय मनुष्य की तुलना सांसारिक भोग-लिप्सा की कीचड़ में फंसे मनुष्यों से नहीं की जा सकती।

प्रख्यात ग्रीक दार्शनिक एवं ज्योतिर्विद् एग्रीपा एवं बूनों ने जीवात्मा के केन्द्र हृदय की तुलना सृष्टि के केन्द्र से की है जिसमें सौर मण्डल के समस्त ग्रह अपने सूर्य के तथा विश्व ब्रह्माण्ड के सूर्य महासूर्य की परिक्रमा करते है। उसकी अनुकृति होने के फलस्वरूप ही संकल्प स्थल हृदय में विविध प्रकार के विश्व ब्रह्माण्डीय घटना चक्र, अविज्ञात प्राकृतिक होती रहती है। उनके अनुसार जिस तरह मनुष्य विश्व ब्रह्माण्ड के केन्द्र में स्थिति है उसी तरह सारी सृष्टि सूक्ष्म रूप में उसके हृदय में अवस्थित है। अतः ईश्वर और मनुष्य दोनों की समानता है। दोनों की अनुरूपता एवं मिलन का स्थान उसका हृदय ही हो सकता है। यही जगत का केन्द्र भी है। परमात्मा और जीवात्मा की अभिन्नता समरूपता एवं मूलभूत एकता होने के कारण ही सभी धर्मों एवं तत्त्वदर्शनों में हृदय की पवित्रता शुचिता पर बहुत जोर दिया गया है। हृदय गुहा में प्रवेश करके ही व्यक्ति अपनी वर्तमान स्थिति से ऊँचा उठकर श्रेष्ठतम सोपानों तक पहुँच सकता है एवं यही अध्यात्म साधना का लक्ष्य है भी।


आक्रोश और प्रतिशोध का कुचक्र

कीचड़ को कीचड़ से नहीं धोया जा सकता। मैल काटने के लिए कोयला नहीं साबुन चाहिए। दर्पण में चेहरा स्पष्ट देखना हो तो उसका स्वच्छ होना आवश्यक है। बुराई को बुराई से नहीं वरन् भलाई से ही दबाया जा सकता है। आग बुझाने के लिए उस पर ईंधन डालते रहने से उद्देश्य की पूर्ति नहीं हो सकती। उसे शांत करने के लिए पानी या बालू डालने की व्यवस्था करनी चाहिए। आक्रोश उत्पन्न होने पर प्रतिशोध की प्रतिक्रिया तो उभरती है। पर उत्तेजना से उत्तेजित होकर शान्ति करने की आशा नहीं ही करनी चाहिए।

यह हो सकता है कि किसी प्रतिद्वन्द्वी से रुष्ट होकर उसे नीचा दिखाने या मजा चखाने की योजना बनाई जाय। प्रतिपक्षी अधिक समर्थ हो तो उसके साथ अपने सामने ही टक्कर न लेकर कोई प्रपंच रखा जाय और छद्म प्रहार न लेकर कोई प्रपंच रचा जाय और छद्म प्रहार किया जाय। कई बार छापा मार लड़ाई की नीति अपनाकर विरोधी जोखिम उठावे बिना भी धराशायी किया जा सकता है। पर यह प्रत्यक्ष परिणाम की बात हुई। इसके पीछे भी एक बड़ी समस्या शेष रह जाती है, नई प्रतिशोध परम्परा चल पड़ने की। यह उतनी लंबी हो सकती है जो मुद्दतों तक, पीढ़ियों तक चलती रहे।

भिण्ड मुरेना क्षेत्र के चम्बल खंडहरों में डाकुओं की पीढ़ियाँ चम्बल के खाई खड्डों में छिपे रहने की घटनाएँ और किंवदन्तियाँ अनेकों को विदित हैं। इनमें असंख्य निरीहों की हत्याएँ हुई है। वह सिलसिला कब तक चलेगा, कब समाप्त होगा? कुछ ठीक से कहा नहीं जा सकता। कारण ढूँढ़ने पर आक्रोश और प्रतिशोध का सिलसिला चला आ रहा ही देखा जा सकता है। एक ने दूसरे पर प्रहार किया और अपनी छाती ठंडी कर ली, पर इतने भर से समस्या का समाधान कहाँ हुआ। उसे भी क्षति पहुँची, उसने यह नहीं विचार किया कि कारण क्या था, कैसे आक्रमण किया और पीछे प्रत्याक्रमण के लिए कितने कदम बढ़ाये? इतना सोचने विचारने की फुरसत मनःस्थिति में किसे होती है?

इस प्रकार एक ऐसी श्रृंखला बन जाती है जिसका लंबे समय तक कोई समाधान नहीं मिलता। इतिहास के अगणित पृष्ठ इसी कुचक्र के कारण रक्त रंजित भाषा में लिखे गये हैं। समुदाय सम्प्रदाय कबीले बिरादरियों इस प्रतिशोध के कुचक्र में एक के बाद दूसरी फँसती चली गई। हत्याकाण्डों से लेकर अनैतिकता का अनवरत सिलसिला चिरकाल तक चलता रहा है। दशाब्दियों और सहस्राब्दियों तक आक्रमण प्रतिक्रमण की आग ठंडी नहीं हुई। किसी ने यह नहीं विचारा कि अन्याय कहाँ से आरंभ हुआ। ऐसा अन्यायी कौन था जिसे प्रमाणित अपराधी कहा जा सके।

ऐसे प्रसंगों में प्रायः सभी अपने को पीड़ित और दूसरे पक्ष को अनीतिकर्ता ठहराते हैं और यह सिद्ध करने का प्रयत्न भी करते है कि उसने जो किया सो ठीक या गलती सामने वाले की ही थी। ऐसे किसी न्यायाधीश को बीच में आने की आवश्यकता नहीं समझी जाती। हर व्यक्ति स्वयं ही न्यायाधीश बनता है और अपनी बात सही होने के पक्ष में न केवल वकालत करता है, वरन् फैसला भी देता है। आश्चर्य इस बात का है कि हलका अपराध होने पर हलका दण्ड देने का औचित्य भी किसी को नहीं सूझता। कम से कम फैसले में मृत्युदण्ड देने की बात सूझती है, सो भी मात्र प्रतिद्वंद्वी को ही नहीं, उसके आश्रित या मित्र संबंधी को भी चपेट में ले लिया जाता है और ऐसे अनर्थों का सिलसिला चल पड़ता है जैसा कि कभी सामन्त या बादशाह नगर के नगरों में आग लगा कर किया करते थे। जिधर भी टेढ़ी नजर फिर उधर ही कत्लेआम का फैसला सुना देते थे। ऐसी घटनाओं की लंबी कहानी है जिनका स्मरण करने मात्र से रोंगटे खड़े हो जाते हैं।

किसी नेक आदमी की जिन्दगी को देखें तो उसमें दया, करुणा, उदारता, निरहंकारिता झलकती मिलेगी।

आक्रोश प्रति आक्रोश आक्रमण प्रत्याक्रमण की बातों में न कोई तर्क है न समाधान। मान्यता, मर्यादा आदि का कोई संयम नहीं। यह विशुद्धतः जंगल का कानून है। हिंस्र पशुओं जैसे बरताव इस मान्यता का, पुराने क्रम का अब तो अन्त होना ही चाहिए। इसी में सभी का कल्याण है।


नवसृजन का आधार-विद्या विस्तार

राजभवन का मंत्रणाकक्ष। उनके चेहरे पर रह-रह कर चिन्ता की रेखाएँ कौंध उठती थीं। उनके दाएँ मनीषियों की कतार थी, बायीं और मंत्री परिषद के सदस्य विराजमान थे। मनीषी मण्डल में से एक सदस्य ने उठकर धीरे से पूछा आप कुछ परेशान से दिख रहे हैं सम्राट?

परेशान तो नहीं पर चिन्तित अवश्य हूँ? इसी के निवारण के लिए आप सभी को आमंत्रित किया है। गौरवर्णीय राजपुरुष ने एक हल्की मुस्कान के साथ कहा।

कारण स्पष्ट करेंगे? एक अन्य प्रश्न दायीं ओर से उभरा। ‘कारण?’ थोड़ा रुककर वाणी गतिमान हुई। यही कि जनता किस प्रकार सच्ची उन्नति करे? लोक जीवन किस तरह प्रगतिशील रहकर कल्याण की ओर अग्रसर हो?

प्रश्नों के जवाब में सभी ने अपनी-अपनी राय सुझायी। आखिर में विचार मंथन नवनीत यह निकला कि शिक्षा का व्यापक प्रसार हुए बिना सर्वजनीन उन्नति संभव नहीं। अतएव समूचे देश में जगह-जगह विद्यालयों की स्थापना हो। देश की उन्नति पाठशालाएँ क्रियाशील हो। देश की उन्नति के लिए इसकी अनिवार्य आवश्यकता है।

निष्कर्ष समीचीन है- सम्राट का स्वर था। शिखा के बिना बौद्धिक विकास संभव नहीं। विचार की दिशाओं का विकास इसी से होता है। बात दिमाग में बैठ जाने पर राजाज्ञा जारी हो गई समूचे देश में विद्यालयों की स्थापना का क्रम शुरू हो गया।

राजसेवक जगह-जगह डुगडुग्गी पीटने लगे ‘अब से प्रत्येक बालक के लिए शिक्षा अनिवार्य है जनता इसमें सहयोग करे।’ जन समुदाय ने कंधे से कंधा मिलाकर सहयोग किया। जिसके पास धन था धन दिया जमीन वालों ने जमीन दी, श्रमशीलों ने श्रम की पूँजी लगाई। शिक्षितों ने अपने योग्यताएँ समाज को साक्षर बनाने में समर्पित की देखते-देखते सारे राज्य से निरक्षरता भाग गई। क्यों न? जब समाज का प्रत्येक व्यक्ति समूह के प्रति जिम्मेदारी अनुभव करता है, निभाने के लिए तत्पर रहता है तो असंभव कुछ नहीं।

साक्षरता के साथ उन्नति की आकांक्षाएँ जंगी जगह-जगह नए-नए उद्योग स्थापित हुए। व्यापार बढ़ा। कृषि में अनेकों तरह के अनुसंधान हुए शिक्षा के प्रसार में राज्य ने जो तपस्या की थी व आर्थिक उन्नति के रूप में तुरन्त साकार दिखाई दे लगी।

पर यह स्थिति थोड़े दिन ही चल पाई कि सारे राज्य में धन, पद, प्रतिष्ठा की होड़ लग गई लोगों में इसके लिए द्वन्द्व उठ खड़ा हुआ मनोमालिन्य ईर्ष्या, द्वेष, छल कपट के दाँव-पेंच चले जाने लगे। भ्रष्टाचार अनाचार का बोल-बाला हो गया। सम्राट बड़े चिन्तित थे शिक्षा जैसी महत्वपूर्ण साधना के फल ऐसे भी हो सकते हैं यह किसने सोचा था? क्या उपाय किए जाय? जिससे सामाजिक अशान्ति दूर हो? सारे मंत्री सभासद सभी चिन्तित थे। किसी को सूझ नहीं रहा था किया क्या जाय?

भाई की चिन्ता तपस्विनी बहिन को भी ज्ञात हुई। एक दिन जब वह अन्यमनस्क से बैठे थे तभी बहिन राज्य श्री ने प्रवेश किया। सम्राट चौंक कर उठे। बहिन को आदर के साथ बिठाया बातों का सिलसिला चल पड़ा।

‘इतने उदास क्यों हैं भाई?’

‘अनपेक्षित परिणाम देखकर’।

जीवन विद्या से अपना रिश्ता तोड़ लेने वाले पाठशालाओं की शिक्षा भला और क्या परिणाम प्रस्तुत करेंगी? बहिन ने कुछ रुककर भाई की ओर देखा फिर कहना शुरू किया। सतयुगी परिस्थितियों के लिए व्यक्ति और समाज को जिस ढाँचे में ढलना है, उसका प्रकाश आभा शिक्षा में भला कहाँ? जिस सुधार और सृजन को समय माँग रहा है, उसके लिए इसमें कोई संकेत तक नहीं। तो फिर अब तक के प्रयत्न सम्राट के स्वरों में परेशानी थी।

ये एकाँगी हैं इन्हें समग्र बनाना पड़ेगा ठीक है पाठ्यक्रम संशोधित कर दिया जायेगा। ‘यह बात भी ठीक है पर इतने से काम नहीं चलेगा’। ‘तो फिर?’

जीवन विद्या पुस्तक रटन से नहीं सीखी जा सकती। इसके लिए प्रत्यक्ष उदाहरणों का प्रेरणाप्रद वातावरण सामने रहना चाहिए। विशेषतया सिखाने वाले इस स्तर के होने चाहिए, जो अपने साँचे में ढाल कर व्यक्तियों को प्रतिभावान प्राणवान बना सकें। इसके लिए इस संजीवनी विद्या में निष्णात निस्पृह किन्तु सक्रिय लोकसेवियों के समूचे तंत्र को सुव्यवस्थित करना होगा। जो मात्र वाणी से नहीं अपने जीवन से जन समुदाय को जीवनबोध कराएँ। द्वार-द्वार जाकर घर-घर पहुँच कर अपने उद्देश्य के प्रति सन्नद्ध रहें।

ठीक कहती है हो बहिन अपने यहाँ यह वर्ग बिखर गया है।

इसे फिर से संभालना होगा। लोकसेवी परिव्राजक सामाजिक जीवन के प्रहरी हैं। समाज रूपी शरीर की जीवनीशक्ति जो इसे जर्जर करने वाली व्याधियों से टकराती, नष्ट करती और शरीर को पुष्ट करती है। ये निस्पृह तपस्वी परिव्राजक समाज की रीढ़ है ‘भाई। इनका स्थान सम्राट से भी ऊँचा है। तुम स्वयं इन्हें सम्मानित प्रोत्साहित और सुव्यवस्थित करो, करने में सहायक बनो।

बात समझ में आ गई। भूल का परिमार्जन आज से ही करेंगे सम्राट की वाणी में संकल्प की गरिमा थी।

उस दिन से सम्राट जुट गए लोक शिक्षकों के तंत्र को सुव्यवस्थित करने से, प्रारंभ हो गई कुंभ मेलों में विद्या−विस्तार एवं सर्वमेध की परम्पराएँ। प्रहरी सशक्त हुए, उन्होंने कर्त्तव्य निष्ठा को समझा। लोक कल्याण के लिए शपथ उठाई। समाज का कायाकल्प होता दीखने लगा। मनुष्य में देवत्व का उदय और धरती पर स्वर्ग के अवतरण के स्वप्न को मूर्त होते देख वह विभोर थे। इस सबका श्रेय संजीवनी विद्या के प्रसार को था। इस हेतु प्रयत्नरत होने वाले सम्राट थे हर्षवर्धन।

विद्या विस्तार का यह कार्य आज के क्षणों में कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है जबकि समाज का कायाकल्प वसुन्धरा व्यापी होने जा रहा है। ऐसे में बहाने बाजी गढ़ने, भावनात्मक दुर्बलता पर पर्दा डालने की विडम्बना छोड़कर लोक शिक्षकों के वर्ग में शामिल हो प्रहरी की भूमिका निभाने में और अधिक तत्परता दिखानी अभीष्ट है।

स्टेशन मास्टर के कार्यालय के सामने भीड़ एकत्रित होती जा रही थी। स्टेशन मास्टर का क्रोध देखते ही बनता था। किन्तु बेचारी बुढ़िया ठण्ड के मारे अंगीठी पर हाथ सेंकना चाहती थी। स्टेशन मास्टर उसे दुत्कारने में लगा था। जो भी आता वहाँ रुकता। पूछता बाबूजी क्यों झल्ला रहे है? एक समझदार व्यक्ति भीड़ में से आया और बोला यदि इस बेचारी ने ठण्ड में हाथ सेंक लिए तो क्या जुर्म हो गया? मास्टर साहब आपने तो बाइबिल पढ़ी होगी। ईसा ने भी ऐसे गरीबों की हिमायत की है। फिर भी आप में सहानुभूति का बीजारोपण नहीं हुआ। इतना कहकर उस व्यक्ति ने अपने कंधे से ऊनी चादर उतारी और उस वृद्धा के कंधों पर डाल दी। ये सज्जन थे दीनबन्धु ऐंड्रूज।


अपनों से अपनी बात

उच्चस्तरीय प्रशिक्षण हर जगह नहीं हो सकते। उसके लिए उपयुक्त साधन, वातावरण एवं प्रशिक्षकों का स्तर भी ऊँचा होना चाहिए। सेना के उच्च अफसर प्रशिक्षित कहाँ किये जायें, इसके लिए ऐसा स्थान तलाश करना पड़ता है, जहाँ से गोपनीय राज-नीति के रहस्य फूट कर अनुपयुक्त लोगों तक न पहुँचे। सैनिकों के स्वास्थ्य से लेकर मनोभूमि बनाने की उपयुक्त स्थिति वहाँ है या नहीं? चूँकि प्रसंग देश की सुरक्षा से जुड़ा होने के कारण अत्यधिक महत्व का है। उसके लिए तीक्ष्ण बुद्धि वाले अनुभवी, बहुज्ञ और व्युत्पन्न मति वाले अध्यापक भी हुए, जो बहुत कठिनाई से थोड़ी ही मात्रा में मिल सकते हैं।

ऊँची क्वालिटी के पौधे जिन नर्सरियों में तैयार किये जाते हैं, वहाँ की भूमि में पाये जाने वाले रसायनों की विशेष रूप से देखभाल की जाती है। इसी प्रकार घटिया पौधे लगाने वाले मालियों की अपेक्षा इन विशिष्ट नर्सरियों को विकसित करने के लिए विशेषज्ञों का पता लगाना और उन्हें महँगे वेतन पर भी किसी प्रकार सहमत करने और नियुक्त करने की आवश्यकता पड़ती है।

प्राणवान प्रशिक्षण हेतु शान्तिकुञ्ज आएँ

वेधशालाएँ हर जगह नहीं बन सकती। जहाँ ग्रह-उपग्रहों की कक्षाएँ सीधे कोण बनाती हैं, वहाँ उनके लिए स्थान का चयन होता है। प्राचीन काल का कोणार्क इसी स्तर का होने के कारण वहाँ सूर्य मन्दिर बना था। उज्जयिनी की वेधशाला भी स्थान−विशेष की महत्ता के कारण बनी थी। मिस्र के पिरामिड भी निर्माण की दृष्टि से अत्यंत असुविधाजनक होते हुए भी इसी कारण एक विशेष स्थान पर बनाये गये थे। आधुनिक खगोलवेत्ताओं ने भी वेधशालाएँ जहाँ भी बनाई हैं, वहाँ अनेक तथ्यों और विशेषताओं की उपस्थिति का ध्यान रखा है। भले ही वहाँ का आवागमन कितना ही कष्टसाध्य क्यों न हो? उत्तरी ध्रुव और दक्षिणी ध्रुव जहाँ भी अवस्थित हैं, वहाँ से समस्त भूमण्डल असाधारण रूप से प्रभावित होता है। भूमध्य रेखा, कर्क रेखा, मकर रेखा आदि के अक्षांश अपने-अपने समीपवर्ती क्षेत्रों में वातावरण को असाधारण रूप से प्रभावित करते हैं।

सौर मण्डल की ग्रह-उपग्रहों की पृथ्वी के जिस क्षेत्र पर जिस स्तर की किरणें पहुँचती हैं, वहाँ के लोगों के रंग, कद, स्वभाव, आकार प्रकार भी उसी स्तर के बनते हैं। मोटे तौर पर समझा यह जाता है कि वंश परंपरा के अनुरूप जीन्स संरचना इसका प्रमुख कारण है, पर वस्तुतः ‘जीन्स’ अन्तरिक्षीय अभिवर्षण की सूक्ष्मता के अनुरूप ही अपना ढाँचा खड़ा करते है।

प्राचीनकाल में महामानव ढालने वाले विशेषज्ञों ने भी अपने क्रिया कलाप सफलतापूर्वक सम्पन्न करने के लिए उपयुक्त स्थानों का चयन किया था, भले ही वे आवागमन अथवा अन्य कठिनाइयों से घिरे हुए ही क्यों न रहे हों? राम-लक्ष्मण को शिक्षा के लिए अन्य स्थान भी सुविधाजनक हो सकते थे, पर दशरथ की असहमति होते हुए भी वशिष्ठ के दबाव से उन्हें विश्वामित्र के आश्रम में ही भेजा गया? भले ही उसकी तुलना में अन्य स्थान अधिक सुविधा-सम्पन्न ही क्यों न रहे हो? कृष्ण की शिक्षा उज्जैन में संदीपनि आश्रम में ही बहुत कुछ सोच समझकर की गयी। भले ही मथुरा के समीपवर्ती स्थानों में ही अधिक सुविधा संपन्न स्थान क्यों न रहे हो। कण्व आश्रम में चक्रवर्ती भरत का शिक्षण संयोगवश ही नहीं, किन्हीं विशिष्ट कारणों पर अवलंबित था। लव-कुश के शिक्षण हेतु अन्य स्थान अधिक सुविधा संपन्न ढूँढ़े जा सकते थे, पर बाल्मीकि आश्रम अभीष्ट प्रयोजनों के लिए हर कसौटी पर खरा समझा गया था। बुद्धकाल में तक्षशिला एवं नालन्दा विश्वविद्यालयों में दूर देशों से छात्र वहाँ की विशेषताओं के कारण ही पहुँचते थे। इसमें छात्रों की अपनी प्रयत्नशीलता तो कारण रही ही होगी, पर इससे भी इंकार नहीं किया जा सकता है कि उन स्थानों, शिक्षण केन्द्रों एवं अध्यापकों का भी उन सफल छात्रों पर अतिरिक्त अनुदान होगा।

प्राचीनकाल में ऋषिकल्प अध्यात्म विज्ञानी अपनी आत्मशक्ति का प्रयोग और प्रयोगशालाओं के लिए स्थानों के चयन को प्राथमिकता देते थे। छात्र सुविधा के सहारे कहीं भी पसर नहीं जाते थे। हिमालय की ऊबड़-खाबड़ जमीन और शीत की अधिकता आदि अनेक असुविधाओं के रहते हुए भी उन स्थानों का चयन अति गंभीरता में रखते हुए भी किया गया था। महाभारत के लिए कुरुक्षेत्र की भूमि का, बहुत बातों को ध्यान में रखे हुए चयन किया गया था।

मैसूर का चन्दन, अरब के खजूर, नागपुर के सन्तरे, लखनऊ के आम, भुसावल के केले, लसाड़ के चीकू अपनी-अपनी विशेषताएँ लिए हुए है। यों पौधे लगाने और सींचने आदि के कार्य अन्यत्र भी उसी प्रकार होते हैं, पर स्थान की विशेषता अपना अतिरिक्त परिचय वहाँ के उत्पादनों की गहराई तक घुस कर देती है। तद्नुरूप स्वाद था गुण-आकार आदि को भी प्रभावित करती है।

प्राचीनकाल में हर दृष्टि से विशिष्ट गरिमा से पूरे-पूरे क्षेत्रों में ही तीर्थ स्थानों की स्थापना होती थी। वहाँ की प्रेरणा अनायास ही आगन्तुकों में अतिरिक्त शक्ति संचार कर देती है। उन्हीं स्थानों में गुरुकुल आश्रम आरण्यक व तपोवन स्थापित किये जाते थे। आज के समय में तो कुछ कहा नहीं जा सकता, क्योंकि विकृतियों का प्रवेश और अवांछनीयताओं का प्रतिशत बाहुल्य हो जाने से तीर्थ भी वह प्रयोजन द्वारा नहीं करते। अब तो ये पर्यटन केन्द्र मात्र न कर रह गये हैं।

इन दिनों युग परिवर्तन की पृष्ठभूमि बन रही है। इक्कीसवीं सदी का गंगावतरण होने ही जा रहा है। इसके लिए कोई ऐसा ऊर्जा स्रोत चाहिए, जहाँ से युगान्तरीय चेतना का आलोक अद्भुत हो और समस्त विश्व को अनुप्रमाणित करे। मत्स्यावतार की तरह इस छोटे से कमण्डलु पैदा होकर भी विश्व-वसुधा को उस प्रभाव से अनुप्राणित करे जो इस संधि काल में अनिवार्य रूप से आवश्यक है। यह महाक्रान्ति की बेला है। पिछले दिनों छिट-पुट प्रयोजनों और क्षेत्रीय समस्याओं में हेर-फेर करने के लिये सीमित स्तर की क्रांतियाँ होती रही है, पर इस बार तो भौतिक क्षेत्र की ही नहीं, पर इस बार तो भौतिक क्षेत्र की ही नहीं, आध्यात्मिक स्तर की समस्याओं को प्रभावित करने वाली समस्याओं से भी जूझना है और उनके द्वारा अपनायी गयी उलटी रीति-नीति को उलट कर सीधा किया जाना है। इसके लिए धरती पर ही एक ऐसा केन्द्र अभीष्ट था, जहाँ से उदय होता दिनमान समूचे विश्व को अपनी आभा से अनुप्राणित करे।

स्थान ‘शान्तिकुञ्ज’ के छोटे से कार्य क्षेत्र के रूप में निर्धारित हुआ है। प्रत्यक्ष रूप से देखने पर यह गंगा की गोद हिमालय की छाया, सप्तऋषियों की तपोभूमि के रूप में देखा-जाना जा सकता है। पर इसके अतिरिक्त भी यहाँ बहुत कुछ है। जिस दैवी सत्ता ने महान परिवर्तन की रूप−रेखा बनायी है, उसी ने इस भूमि का भी परिशोधन, अखण्ड जप, नित्य नियमित रूप से नौ कुण्ड यज्ञशाला में अग्निहोत्र की प्रक्रिया आरंभ करायी है। इतना ही नहीं एक प्रशिक्षण शैली का उपक्रम भी निर्धारित किया है। साथ ही बैटरी चार्ज करने जैसी अतिरिक्त व्यवस्था भी बनायी है जिसका विद्युत प्रवाह उन सभी को अनुप्राणित उत्तेजित करता है जो उसके साथ भावनापूर्वक अच्छा उद्देश्यों को साथ लेकर आते और जो कुछ यहाँ विद्यमान है, उसके अवगाहन में लग जाते हैं।

शान्तिकुञ्ज में कम पढ़ाया जाता है, इसके लिए पाठ्यक्रम उलटने-पुलटने की आवश्यकता नहीं है। एक ही बात देखी जानी चाहिए कि यहाँ का एक ही मन्तव्य है ‘प्रतिभा परिष्कार’। यह किसी के हाथ लग सके, तो शरीर और बुद्धि तथा परिस्थितियों की दृष्टि से साधारण होते हुए भी व्यक्तित्व की दृष्टि से असाधारण बना जा सकता है। ऐसे कर्तृत्व प्रस्तुत हो सकते हैं, जैसा कि हनुमान, अंगद, नल-नील जामवन्त जैसों ने, साधारण दीख पड़ने वालों ने कर दिखाये। उन्होंने न केवल अनेक को उत्कृष्ट बनाया, वरन् अपने समय और वातावरण को भी परिष्कृत बनाने में वे समर्थ हो सके। तूफानी चक्रवात एवं प्रचण्ड धारा में दृष्टिगोचर होने वाली भंवरों के समतुल्य अपनी सत्ता व विशिष्टता का भी परिचय दे सके। समय की सबसे बड़ी आवश्यकता युग नेतृत्व की है। इसके साथ स्थानीय, क्षेत्रीय, वैयक्तिक, सामूहिक, राजनैतिक, आर्थिक, बौद्धिक, चारित्रिक एवं सृजन संभावनाओं का सही रूप में समाधान कर सकने की क्षमता भी जुड़ती है। संक्षिप्त में शान्तिकुञ्ज का प्रशिक्षण, शक्ति अनुदान एवं वह साहस कौशल उभारता है, जो बीज रूप में हर किसी के भीतर विद्यमान है।

शान्तिकुञ्ज की ५ या ९ दिवसीय सत्र साधना हर बीज को अंकुरित कर देने तक की सफलता उपलब्ध कराती है। यह प्रयत्न स्वयं का साहस और वातावरण जुटाने पर निर्भर है कि बीज में उगे हुए अंकुर किस गति से ऊँचे उठ सके और किस स्तर की द्रुतगामिता अपनाकर अपने को देव मानवों की, युग पुरुषों की पंक्ति में खड़े करने में सफल हो सके?

मिशन की पत्रिकाओं के पाठक परिजनों को प्रथम आवाहन में आमंत्रित किया गया है कि यथा संभव जल्दी ही युग संधि की बेला में एक रात्र प्रशिक्षण शान्तिकुञ्ज आकर सम्पन्न कर लें, और बन पड़े तो हर साल एक बार आकर अपनी बैटरी को नए सिरे से चार्ज करा लिया करें।

शान्तिकुञ्ज की भूमि एक प्रकार से अभिमंत्रित की गयी है। लक्ष्मण रेखा भी इसी प्रकार अभिमंत्रित की गई थी, जिसकी मर्यादा में रहने पर सीता हर दृष्टि से सुरक्षित रहती। इसी प्रकार इस भूमि को लगभग वैसा बनाया गया है जैसा कि माता के गर्भ में भ्रूण सुरक्षित रहता है। साधना एवं शिक्षण की अवधि में छात्रों को अधिकांश समय इसी परिधि में रहने का अनुबंध है। समुचित लाभ के लिए यह आवश्यक भी था। अनावश्यक लोगों को, अशिक्षितों, वयोवृद्धों, बीमारों, बच्चों को साथ लेकर चलने की मनाही इसीलिए की है कि सैर-सपाटे के उत्सुकों और अति गंभीर अध्यात्मप्रसंगों पर दत्तचित्त होने वालों के बीच किसी प्रकार का तालमेल बन नहीं पाता, साथ ही आश्रम का अनुशासन भी भंग होता है। जिस प्रकार इन दिनों पिता का नाम भी सरकारी कागजों में दर्ज किया जाता है, उसी प्रकार पुरातन काल में उस गुरुकुल का भी उल्लेख रहता था, जिससे ज्ञात होता था कि प्रशिक्षण का अविच्छिन्न अंग समझी जाने वाली महत्ता एवं गरिमा कहाँ से प्राप्त की? जिस प्रकार राजा की संतानें राजकुमार कहीं जाती और अपेक्षाकृत ऊँचे स्तर पर सम्मानित होती थीं, उसी प्रकार अगले दिनों शान्तिकुञ्ज के प्रशिक्षण के साथ अपने को जुड़ा हुआ होने के रूप में अपना परिचय देने वाले भी निश्चित रूप से गौरवान्वित होंगे। वंश-गोत्र के रूप में पूर्वजों के साथ जुड़ी परम्पराओं का उल्लेख चिरकाल तक होता रहता है। गुरुकुल एवं वंशकुल का स्तर प्रायः एक ही प्रकार की श्रृंखला में सम्मिलित होने वाले अपनी गौरव-गरिमा का अभिवर्धन करेंगे वरन् अपनी भावी पीढ़ियों को भी उस श्रेय से अभिभूत करने का सुयोग सौभाग्य प्रदान करेंगी। अनुमान के वंशज समझे जाने वाले बन्दरों की अभी भी मंगलवार के दिन अभ्यर्थना होती है। बगीचा लगाने वाला स्वयं यशस्वी होता है, उसकी दूसरी-तीसरी पीढ़ियाँ भी लाभान्वित एवं यशस्वी होती है।

शान्तिकुञ्ज का कोई प्रशिक्षण प्राप्त करने वाले अपने में कोई अतिरिक्त विशिष्टता उत्पन्न न करें, यह हो ही नहीं सकता। उस आधार पर कोई गौरव गरिमा भरे काम करने में जन नेतृत्व में समर्थ होकर ही रहेगा। इस आधार पर उस यशस्वी परम्परा की चर्चा भविष्य में भी होती है। अगले दिनों जब शान्तिकुञ्ज से संबंधित नवनिर्माण में योगदान करने वालों का इतिहास लिखा जायेगा तो हो सकता है कि उस प्रकाशन में मात्र पहली पीढ़ी का ही नहीं, वरन् उन पद चिन्हों पर चलने वाली दूसरी-तीसरी पीढ़ी भी अपने को गौरवान्वित अनुभव करे।

देवर्षि नारद कहीं कुछ समय ही ठहरते थे। संक्षेप में ही वार्तालाप करते थे। कभी-कभी तो उनका प्रयोग बैखरी वाणी की अपेक्षा मध्यमा, परापश्यन्ती वाणी में इस स्तर का होता था कि वह क्षण भर में अन्तराल की गहराई तक जा पहुँचता था और पाने वाले को असाधारण सौभाग्यशाली बना देता था। इतिहास साक्षी है कि नारद के संपर्क में आने वाले कितने सामान्य व्यक्ति असाधारण ऊँचाई तक पहुँचे। इसी प्रसंग को इन दिनों इस रूप में भी समझा जा सकता है कि शान्तिकुञ्ज का संपर्क जुड़ने पर विद्युत प्रवाह के साथ जुड़ जाने जैसा चमत्कार उत्पन्न होता है एवं व्यक्ति का कायाकल्प कर देता है।


विशेष ज्ञातव्य- - विराट स्तर पर साइकिल तीर्थयात्रा का आयोजन

तीर्थयात्रा से जब भी अर्थ लिया जाता है उसे धर्म प्रचार की पदयात्रा कहा जाता है। धर्म में यों अनेक विशेषताएँ हैं पर शास्त्रकारों ने उसे अपंग कहा है। वह अपने पैरों चल सकने में असमर्थ रहती है। इसलिए उसे कंधों पर बिठा कर चलने का विद्यमान है। श्रवण कुमार अपने माता-पिता को काँवर में बिठाकर कंधों पर रखकर तीर्थयात्रा कराने ले गये थे। माता-पिता को यात्रा कराने से श्रवण कुमार को पुण्य लाभ हुआ और माता-पिता की इच्छा भी पूर्ण हुई। धर्म के संबंध में भी यही बात है साधु व ब्राह्मणों को देव-संस्कृति में देवमानव का स्थान दिया गया है क्योंकि वे धर्म चेतना को गाँव-गाँव तक, व्यक्ति-व्यक्ति तक अपना श्रम और समय लगाकर पहुँचाने का पुण्यकार्य करते रहे हैं।

भूसुर या मनुष्यों में देवता उन्हीं को कहा जाता रहा है जो बिना बुलाये बिना माँगे सद्ज्ञान जैसी उच्चकोटि की सम्पदा वितरित करने के लिए घर-घर पहुँचते रहे हैं। तीर्थयात्रा को परमार्थ कहा गया है। इसमें लेने वाले की नहीं, देने वाले की महत्ता है। सद्ज्ञान से आगे बढ़कर सद्भावना का वितरण कर पिछड़ों को ऊँचा उठाया जा सकता इससे बड़ा कोई पुण्य नहीं।

परमार्थ परायणता की भावना का बाहुल्य होने व तप तितिक्षा कर स्वयं दुखी पीड़ितों दलितों तक पहुँचने की साधु ब्राह्मण परम्परा के जीवित होने के कारण ही पुरातन युग सतयुग कहा जाता था। जन-जन में अलख जगाने की प्रक्रिया जीवन्त होने के कारण धर्मधारणा का व्यापक विस्तार था। यही कारण था कि विचारों और सत्प्रवृत्तियों का बाहुल्य था न कहीं मानसिक क्लेश, संताप पारस्परिक विग्रह, कलह, अपराधी प्रवृत्तियाँ दृष्टिगोचर होती थी, न कोई दुष्प्रवृत्तियों को अपनाता ही था। आज जन-जागरण की वह परम्परा ऋषियों-साधुओं ब्राह्मणों के अभाव के कारण लुप्त हो गयी है। तीर्थ यात्रा तो अब भी चलती है, पर वह होती बसों से, रेलों से, विमानों से है तथा पिकनिक, चित्र विचित्र दृश्य देखने के मनोरंजन तक ही सीमित होकर रह गयी है।

श्रुति के अनुसार तीर्थ व देवालय भारत भूमि के चप्पे-चप्पे में विद्यमान हैं। श्री गोखले ने गाँधीजी को विशाल भारत की पदयात्रा कर फिर अपनी स्वतंत्रता संग्राम की रणनीति बनाने को कहा था। उसने वही किया, दरिद्रता अभाव की वस्तुस्थिति देखकर वैसा ही बना पहना एवं ग्रामीण अर्थ व्यवस्था को सुदृढ़ बनाने वाली नीति बनायी। स्वामी विवेकानन्द ने पूरे भारत की पैदल यात्रा कर जब कन्याकुमारी की श्रीपाद शिला पर ध्यान लगाया तब उनका भारत भूमि की विराट आत्मा से साक्षात्कार हुआ एवं मठ व संन्यासी परिव्राजक परम्परा द्वारा जन-जन तक पहुँचने की एक व्यापक योजना बन कर सामने आई।

आज की परिस्थितियों में यदि भारत का नये सिरे से पुनर्निर्माण करना हो, संव्याप्त दुष्प्रवृत्तियों से जूझना हो तो एक ही मार्ग रह जाता है- पैदल यात्रा के परिष्कृत रूप साइकिल यात्रा द्वारा बहुसंख्य ग्रामीण भारत के हर भाग तक पहुँचा जाय तथा यह कार्य साधु ब्राह्मणस्तर के परिव्राजकों द्वारा निस्वार्थ भावना से धर्मधारणा के विस्तार हेतु किया जाय सतयुग को ऋषि युग को इसी आधार पर पुनः लाया जा सकता है।

यह जाना माना तथ्य है कि साइकिल ही इक्कीसवीं सदी का एकमात्र वाहन होगा। ईंधन के चुकते संसाधनों के इस युग में भेड़ से भरे प्रदूषण भरे यातायात में मात्र साइकिलें ही जिन्दा रहेगी। जापान व चीन की तरह पैडल पॉवर की महत्ता समझते हुए हमें भी साइकिलें ही जन-जन तक पहुँचने के लिए प्रयुक्त करनी होंगी। यात्रा की दृष्टि से वे सुगम भी है तथा किसी ईंधन की माँग नहीं करती। साइकिल चलाने वालों का स्वास्थ्य ही औरों की अपेक्षा अधिक अच्छा रहता है।

विगत चैत्र नवरात्रि पूर्व से शान्तिकुञ्ज से १०० साइकिलों का एक जत्था विभिन्न ग्रामों का एक यात्रा बनाकर रवाना हो चुका है। इसमें प्रशिक्षित परिव्राजक दोपहर बाद एक गाँव पहुँचकर दिन भर वहाँ वाक्य लेखन तथा नुक्कड़ सभाओं द्वारा अपने आने का उद्देश्य समझाकर शाम को भजनोपदेशक शैली में उद्बोधन देते हैं। एक साइकिल पर टेपरिकार्डर, एंप्लीफायर माइक आदि की व्यवस्था है, शेष चार पर सद्वाक्य लेखन का सामान, दीपयज्ञ आयोजन व पूजा आदि की सामग्री, ५ व्यक्तियों के रहने ओढ़ने, खाने पहनने आदि का सामान है। कभी भोजन व्यवस्था न होने पर वे स्वयं अपना भोजन दाल-चावल की खिचड़ी बना लेते हैं। अगले दिन प्रातः शान्तिकुञ्ज जैसी दिनचर्या में सभी ग्रामवासियों को भागीदार बनाकर दीपयज्ञ आयोजित करते हैं, जिसमें बड़े उत्साह से सभी ग्रामवासी भाग लेते हैं, देव दक्षिणा में अपनी दुष्प्रवृत्तियाँ छोड़ते हैं। संक्षिप्त आयोजन के बाद पूरे गाँव की परिक्रमा होती है व फिर वे अगले गाँव की ओर बढ़ जाते हैं।

इस प्रक्रिया से ग्रामीण परिकर में बड़ा उत्साह आया है, धर्मधारणा के, सत्प्रवृत्तियों का विस्तार हुआ है। २७ मार्च से आरंभ हुए इन कार्यक्रमों को अभी तो १ दिन का ही रखा गया है परन्तु १ मई से डेढ़ से दो दिन के स्थान विशेष की आवश्यकतानुसार कर दिये गये हैं। आयोजनों की सुरुचिपूर्ण व्यवस्था तथा प्रभावोत्पादकता को देखते हुए स्थानीय ग्रामवासियों के अनुरोध पर कार्यक्रमों को थोड़ा लंबा करना पड़ा है। पीली साइकिलों पर पीत वस्त्रधारी साधु ब्राह्मणों की नव भोज लगाती टोली जहाँ नजर आती हैं, सभी समझ जाते हैं कि ये शान्तिकुञ्ज के तीर्थ यात्री हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश को अपने रंग में रंग कर ये तीर्थयात्री अब क्रमशः मध्य प्रदेश गुजरात, राजस्थान व समूचे उत्तर प्रदेश में फैलने वाले हैं। प्रारंभ तो १०० साइकिलों से किया गया था किन्तु अब १०० पीली साइकिलें ही सीधे फैक्ट्री में मंगाई गयी है लक्ष्य एक लाख साइकिलों का है। स्थानीय कार्य कर्ताओं को न्यूनतम चालीस दिन के लिए इस पुण्य कार्य के लिए निकलने का आमंत्रण दिया गया है।

शान्तिकुञ्ज से जुड़े सूत्रचालक के सभी आत्मीय घनिष्ठों से, पत्रिकाओं के पाठकों तथा समयदानी परिजनों से यह अनुरोध किया गया है कि वे एक लक्ष साइकिलों द्वारा एक लाख गाँवों तक पहुँचने के युग ऋषि के संकल्प को पूरा करने के लिए शीघ्र ही अपने सहयोग-योगदान की सूचना शान्तिकुञ्ज दें। जिनसे कभी केन्द्र को अपना समयदान भेंट कराया था, वे भी दस दिन का प्रशिक्षण लेकर एक माह के लिए ग्रामीण अंचलों तक जाने के लिए तैयार रहें। इसके लिए प्रारंभिक शिक्षण हेतु पहले शान्तिकुञ्ज आना होगा भले ही उनका यात्रा क्षेत्र यहाँ से दूर कहीं और हो। चूँकि ये ग्रामीण जनता के लिए कार्यक्रम है, उन्हें मूलतः लोक संगीत पर आधारित, लोकवाद्यों के माध्यम से छोटी-छोटी मार्मिक सत्प्रेरणाओं को गूँथकर बनाया गया है। इस संभाषणकला तथा पौरोहित्य विद्या आदि का शिक्षण अपने आप में एक समूचा नया प्रशिक्षण जिसे किसी तरह दस दिन में ही दिये जाने की व्यवस्था बनाई गई है।

महाकाल का दैवी सत्ता का यह संकल्प है कि प्रस्तुत संधिवेला में विराट स्तर पर पूरे भारतवर्ष में एक लक्ष्य दीप यज्ञायोजनों को संपन्न किया जाना है। ७८ प्रतिशत से अधिक जनता, गाँवों में रहती है। नवयुग का संदेश यदि इन सभी तक पहुँच सका तो यह समझना चाहिए कि पूरे भारत को जगा दिया गया। भारत एक महाशक्ति है किन्तु इसे सोया हुआ दैत्य कहा गया है। जब यह जाग पड़ेगा तो इसकी शक्ति कितनी होगी व किस प्रकार धर्मधारणा-सुसंस्कारिता पर आधारित वह महाराष्ट्र विश्वनेतृत्व में अपनी भूमिका अगले दिनों सम्पन्न करेगा इस संबंध में कल्पना करते ही रोमांच हो उठता है।

साइकिल तीर्थयात्रा से भारत भूमि की यात्रा का पुण्य तो अर्जित होगा ही, अहंकार गलकर नवयुग के अनुरूप देवमानव बनने, युग नेतृत्व में भागीदारी, साधु व ब्राह्मण बनने तथा स्वास्थ्य लाभ जैसी महत्त्वपूर्ण उपलब्धियाँ भी जुड़ी हुई है। ब्राह्मण की वाणी तभी फलित होती है। जब इसका वाणी व रसना पर नियंत्रण हो। जो बोले वह सोद्देश्य हो व जिह्वा का संयम इतना हो कि जो मिल जाय उसी में संतोष कर ले। यही कठोर व्रत लेकर धर धर अलख जगाने शान्तिकुञ्ज के साइकिल तीर्थयात्री वर्ते संकल्पों के साथ निकल पड़े हैं। ब्राह्मणों से अर्थ है, सभी जिनमें पुण्य-परमार्थ की भावना जिन्दा हो, तथा तितिक्षा का माद्दा हो तथा अपने समय के सुनियोजन के महत्ता युग के अनुरूप आवश्यकताओं को पूरा करने में ही वे समझते हो। उन सभी से अनुरोध है कि यूँ देवता के आमंत्रण को स्वीकार करें एवं विशाल भारत की इस विराट तीर्थ यात्रा के भव्य आयोजन में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करे।


VigyapanSuchana

निवेदन

शान्तिकुञ्ज से चली भारतवर्ष की साइकिल तीर्थयात्रा में किन परिजनों का क्या योगदान हो सकता है, इस संबंध में परामर्श हेतु सभी सक्रिय कार्यकर्ताओं को मई-जून के माह में शान्तिकुञ्ज बुलाया गया है। वे अपने स्थान का यात्राचक्र बनाने में भी सहयोग देंगे तथा चालीस दिन का समय इस पुण्य प्रयोजन हेतु देना सुनिश्चित करेंगे। वर्षा की प्रशिक्षण अवधि के बाद पुनः सितम्बर माह से यह चक्र आगामी ग्रीष्म तक के लिए रहना पड़ेगा। सभी समयदानी बंधु भी इस संबंध में पत्राचार कर लें।

*समाप्त*