प्राप्त करना उतना कठिन नहीं है जितना कि उपलब्धि का सदुपयोग करना। सम्पत्ति अनायास या परिस्थिति वश भी मिल सकती है पर उसका सदुपयोग करने के लिए अत्यन्त दूरदर्शी विवेकशीलता और सन्तुलित बुद्धि की आवश्यकता पड़ेगी। सुयोग्य व्यक्तियों की समीपता तथा सद्भावना प्राप्त कर लेना उतना कठिन नहीं है, जितना कि उस सान्निध्य का सदुपयोग करके समुचित लाभ उठा सकना।
मनुष्य में बीज रूप से समस्त संभावनाएँ विद्यमान हैं जो अब तक कहीं भी किसी भी व्यक्ति में देखी पाई गई हैं। प्रयत्न करने पर उन्हें जगाया और बढ़ाया जा सकता है। कोई भी लगनशील मनस्वी व्यक्ति अपने को इच्छित दिशा में सफलता प्राप्ति की आवश्यक क्षमताएँ उत्पन्न कर सकता है और उनका सदुपयोग करके मनचाही सफलता प्राप्त कर सकता है। जो नहीं है उसे पाने के लिए अधिकाँश मनुष्य लालायित देखे जाते हैं। अप्राप्त को पाने के लिए व्याकुल रहने वालों की कमी नहीं, पर ऐसे कोई बिरले ही होते हैं जो आज की अपनी उपलब्धियों और क्षमताओं की गरिमा का मूल्याँकन कर सकें। जो मिला हुआ है वह इतना अधिक है कि उसका सही और संतुलित उपयोग कर के प्रगति के पथ पर बहुत दूर तक आगे बढ़ा जा सकता है। अधिक पाने के लिए प्रयत्न करना उचित है, पर इससे भी अधिक आवश्यक यह है कि जो उपलब्ध है उसका श्रेष्ठतम सदुपयोग करने के लिए योजनाबद्ध रूप से आगे बढ़ा जाय। जो ऐसा कर सके उन्हें जीवन में असफल रहने का दुर्भाग्य कभी भी सहन नहीं करना पड़ा है। यह एक शाश्वत चिरन्तन सत्य है।
हजारों की भीड़ दम साधे सुन रही थी। इसमें सम्भ्रान्त - नागरिक थे और आदिवासी भी। सभी एकम-एक हो रहे थे। भेद आड़ी तिरछी लकीरें तो बुद्धि अपनी तिकड़मी स्याही से खींचा करती है, पर यहाँ तो भावनाओं की बारिश ने सारी तिकड़म धोकर रख दी थी। कटक के इस छोटे से गाँव में आश्चर्यजनक रीति से उनका आना हुआ। उन्हें हिन्दी में भाषण का अभ्यास था किन्तु इस आशंका से कि कहीं ये लोग हिन्दी न समझ पाए, उड़िया अनुवाद की व्यवस्था कर दी गयी।
भाषण कुछ ही देर चला था कि भीड़ ने आग्रह किया आप हिन्दी में ही बोलें। सीधी सच्ची बातें जो हृदय से निकलतीं और हृदय तक पहुँचती हैं, उनके लिए बनावट और शब्द विन्यास की क्या जरूरत? आपकी सरल भाषा में जो माधुर्य छलक रहा है, उसी से काम चल जाता है, दोहरा समय लगाने की आवश्यकता नहीं। सचमुच उनके शब्द रह-रह कर दिलों में ज्वार ला देते।
उनकी सत्योन्मुख आत्मा पुलकित हो उठी। उन्होंने अनुभव किया सत्य और निश्छल अन्तःकरण के मार्गदर्शन भाषा-प्रान्त के भेदभाव से कितना परे होते हैं? आत्मा बुद्धि से नहीं हृदय से पहचानी जाती है। समाज सेवक जितना सच्चा और सहृदय होता है, लोग उसे उतना ही चाहते हैं फिर चाहे उसकी योग्यता नगण्य सी क्यों न हो? आत्मिक तेजस्विता ही लोक सेवा की सच्ची योग्यता है यह मान कर वे हिन्दी में भाषण करने लगे। अनेकों को सन्देह था कि उनकी वाणी उतना प्रभावित नहीं कर सकेगी पर उनकी भाव विह्वलता के साथ सब भाव विह्वल होते गये। सामाजिक विषमता, राष्ट्रोद्धार और दलित वर्ग के उत्थान के लिए उनका एक-एक आग्रह सुनने वालों के दिलों में बैठता चला गया।
भाषण की समाप्ति पर वह बोले - “आप लोगों से हरिजन फण्ड के लिए कुछ धन मिलना चाहिए। हमारी सीधी-सादी सामाजिक आवश्यकताएँ आप सब के पुण्य सहयोग से पूरी होनी हैं।” शब्दों की समाप्ति के साथ रुपयों-पैसों की बौछार होने लगी। जिसके पास जो कुछ था देता चला गया।
एक आदिवासी लड़का भी उस सभा में उपस्थित था। बुद्धि भले उसकी अधकचरी रही हो, पर भावनाएँ पूर्ण परिपक्व थीं। जेब में हाथ डाला तो हाथ सीधा पर कर गया। जेब ही फटी निकली पैसा तो क्या होता? एक क्षण के लिए अकुलाहट की रेखाएँ चेहरे पर चमकी। भावनाओं का आवेग सम्भाले नहीं सँभल रहा था। कुछ न कुछ तो करना ही है। जब सभी लोग लोक मंगल क लिए अपने श्रद्धा सुमन भेंट कर रहे हों, ऐसे में वह चुप रहे भी तो कैसे?
भीड़ को पार कर घर की ओर भागता दिखा। देखा तो अनेकों ने पर संवेदनाओं की इबादत न समझ सके। थोड़ी ही देर बाद कपड़ों में छुपायें कोई वस्तु लेकर दौड़ता हुआ लौटा। ठीक उन्हीं के सामने उसके कदम रुके। उनने धीरे से कपड़ा हटाया यह गोल-मटोल बड़ा से काशीफल था। इसे देखकर अनेकों की आँखों में अनेक तरह के भाव उभर उठे।
इसे स्वीकार करते हुए उन्होंने बालक की पीठ पर हाथ फेरते हुए पूछा कहाँ से लाए हो यह काशीफल।
“मेरे छप्पर में लगा था बापू!” लड़के ने सरल भाव से कहा। उसका साँवला चेहरा एक अनोखी आभा विकरित कर रहा था। हमने अपने दरवाजे पर इसकी बेल लगाई है, उसी का फल है, कहते हुए उसने दोनों जेबें खाली करके दिखा दीं।
आँखें छलक आयीं भावनाओं के साधक की। उनने पूछा बेटे आज फिर सब्जी किसकी खाओगे।
“आज नमक से खा लेंगे बापू! पर आप इसे लौटाना नहीं, नहीं तो ..........। गला रुंध जाने के कारण आगे के शब्द फँस कर रह गये।
दोनों ने एक क्षण के लिए एक दूसरे की ओर देखा। भावों की अनेकों तरंगें दोनों के अन्तर में उभरीं और एक दूसरे में समा गईं। काशीफल भण्डार में रखते हुए बोले तुम्हारा यह काशीफल मेरी आज की सर्वश्रेष्ठ उपलब्धि है। जब तक त्याग और लोक सेवा की भाव सम्पदा के धनी तुम जैसे लोग देश में रहेंगे तब तक देश-धर्म -संस्कृति को कोई भी शक्ति दबा कर नहीं रख सकेगी।
बाहर की वस्तुओं के सम्बन्ध में मनुष्य को बहुत सी जानकारियाँ रहती हैं। उनके द्वारा होने वाली हानि तथा उठाये जा सकने वाले लाभों का भी सहज बुद्धि से अता-पता रहता है, किन्तु आश्चर्य इस बात का है कि अपने आपके संबंध में नगण्य जानकारियाँ ही रहती हैं जो जाना जाता है उससे लाभ कैसे उठाया जाय और हानि से कैसे बचा जाय इस संबंध में भी इतना ही परिचय होता है, जिसे वस्तुस्थिति की तुलना में नगण्य ही कहा जा सके। शरीर के छोटे-बड़े अंग अवयवों को भली प्रकार देखा समझ भी नहीं जाता, इतने पर भी उनकी सशक्तता आश्चर्यजनक होती है। किसी बड़े मिल कारखाने को चलाने में जितनी बिजली खर्च होती है उसकी अपेक्षा शरीर संचालन में उनके कलपुर्जों को गतिशील रखने में ऊर्जा कहीं अधिक खप जाती है। फिर भी मोटी दृष्टि में इस उपयोग का कुछ पता नहीं चलता और लगता है कि शरीर अपने आप जीवित है। इसका ढर्रा अपने आप चल रहा है। खाने-सोने का क्रम अनायास ही चलता रहता है। एक महिला घरेलू काम काज करने में जितनी शरीर शक्ति खर्च कर लेती है वह इतनी होती है कि उसके बल पर समूचे-भूमण्डल की कई परिक्रमाएँ लगाई जा सकती हैं। हृदय, आमाशय, गुर्दे आदि अवयव निरन्तर कार्यरत रहकर जितनी सामर्थ्य खर्च करते हैं, उसके सम्बन्ध में इतना ही कहा जा सकता है कि मोटी जानकारी की तुलना में वह हजारों गुनी अधिक होती है। इस विद्युत उत्पादन और उपयोग का लेखा-जोखा लिया जा सके तो प्रतीत होगा कि बाहरी दुनिया के बारे में हम भले ही कुछ आधा अधूरा जानते हों, पर अपने सम्बन्ध में जितना समझा गया है उसे पर्वत की तुलना में अणु मात्र ही समझा जाना चाहिए।
मानसिक शक्ति के सम्बन्ध में भी यही बात है। सरकस में अनोखी करामातें दिखाने वाले, खेल के मैदानों में सामर्थ्य के कीर्तिमान स्थापित करने वाले जितने आश्चर्यजनक लगते हैं उससे कहीं अधिक मस्तिष्क की चेतनसत्ता है। वैज्ञानिक दार्शनिक, कलाकार, मनस्वी जो प्रस्तुतीकरण करते रहते हैं उससे प्रतीत होता है कि मानसिक सूझबूझ लगती तो नगण्य है पर उसकी कृतियों का चमत्कार किसी बड़े से बड़े कौतूहल से बढ़कर है। व्यसनी, प्रपंची, अपराधी जैसी सूझ-बूझ का परिचय देते हैं उसे देखते हुए बाजीगर की उपमा दी जा सकती है। शरीर से लेकर मानसिक क्षमता का समग्र आकलन कर सकना तथा कथित समर्थ व्यक्ति के लिए भी कठिन है जो उनका धारणकर्ता, निर्माता, प्रयोक्ता माना जाता है। चेतना ही है जो कुछ क्षण के लिए अवरुद्ध हो जाय तो समझना चाहिए कि समूचा खेल देखत-देखते बिखर गया। कुछ क्षण पहले का जीवित व्यक्ति इस स्थिति में पहुँचते भी देखा गया है जिसे मरते ही जल्दी से जल्दी दूर हटाने का प्रयत्न किया जाय। शरीर अद्भुत है उसकी का पुरुषार्थ और रसास्वादन है जो जड़ समझे जाने वाले पदार्थों को सचेतन से भी अधिक सरस अनुभव करता है। अशक्त को शक्तिशाली बना देता है। मनुष्य ही है जो परमाणु जैसी नगण्य इकाई को शक्ति सत्ता के रूप में प्रकट करता है। फिर सचेतन के सम्बन्ध में तो कहा ही क्या जाय? वह अद्भुत है। स्रष्टा की असीम क्षमता उसकी छोटी सी दिखने वाली इकाई में लगभग पूरी तरह समाई हुई है। जड़ पदार्थों को सशक्त, सक्षम और अनुभूतिगम्य बना देने में उसी का कौतूहल काम करता देखा जा सकता है।
इस सचेतन सत्ता को प्राण कहते हैं। प्राणियों की चित्र-विचित्र हरकतें-हलचलें मात्र इसीलिए दृष्टिगोचर होती हैं कि उनमें प्राण की सशक्तता काम करती हैं। यदि वह क्षीण हो जाये तो समझना चाहिए कि अशक्ति के अतिरिक्त और कुछ शेष नहीं बचा। दुर्बल, दीन, असहाय, असमर्थ मात्र उन्हें कहते हैं जिनकी चेतना लड़खड़ा जाती है। तब फिर शरीर के अंग अवयव भी जीवित रहने पर भी निर्जीववत् दीख पड़ते हैं। इसको शरीर से सम्बन्ध छूट जाना कहते हैं, जिसे जीवन का अन्त कहा जाता है। साथ ही यह भी स्पष्ट है कि यदि चेतना शरीर और मन पर अपना समुचित आधिपत्य बनाए हुए हो तो फिर काय कलेवर के दुर्बल रहने पर भी व्यक्ति असीम सामर्थ्य का धनी बना रहता है। गाँधी जी की ऊँचाई पाँच फुट दो इंच थी और वजन मात्र 96 पाउण्ड। इतने पर भी उनकी चेतना इतनी समर्थ थी कि करोड़ों जन साधारण में प्रचण्ड प्राण फूँका। व्यापक जन मानस का स्तर कुछ से कुछ बनाकर दिखाया। समर्थ शासकों को धूल चटाने में सफल रहे। विश्व के कोने-कोने में अपने ढंग की अनोखी चेतना का संचार किया। यह शरीर या बुद्धि का नहीं प्राण चेतना की समर्थता का ही चमत्कार था। ऐसे उदाहरणों की इस संसार में कमी नहीं जिनकी प्राण चेतना ने साधनों का एक प्रकार से अभाव रहते हुए भी असाधारण उपलब्धियों का पर्वत खड़ा कर दिखाया। तपस्वियों और सिद्ध पुरुषों द्वारा व्यक्तियों, परिस्थितियों एवं वातावरण को किस प्रकार समय-समय पर पलटा और सुधारा है यह विवरण भी इतिहास का सर्वविदित प्रसंग है।
मनुष्य को शक्ति का स्रोत कहा जा सकता है। वह प्राणियों को भी इच्छानुसार परिवर्तित करता और पदार्थों को भी कुछ से कुछ बना देता है। घटनाएँ दुख सुख की हानि-लाभ की निमित्त कारण प्रतीत होती हैं। पर वास्तविकता इससे भिन्न है। चेतना की अनुभूतियाँ ही चित्र विचित्र अनुभव करतीं और तरह-तरह के अनुभव कराती रहती हैं। घटनाएँ एवं वस्तुएँ तो उस प्रसंग में नाम मात्र की भूमिका निभा पाती हैं।
शास्त्रकारों का कथन है कि जिसने अपने को जान लिया उसने सब कुछ जान लिया। जिसने अपनी सत्ता और महत्ता का परिचय प्राप्त करने से लेकर प्रयोग करने तक की विद्या को जान लिया उसे समग्र सत्ता सम्पन्न एवं अति महत्वपूर्ण ही समझना चाहिए।
सम्पदा किसके पास कितनी है? कहाँ है? उसे किस प्रकार प्राप्त किया जाय? पाने के उपरान्त उसका सर्वश्रेष्ठ उपयोग क्या है? यह सब जान लेना ही सम्पदा का होना और लाभ उठाना कहलाता है। जिनके पास यह जानकारी -लाभ पाने का उपक्रम है, जिन्हें ऐसी कुछ जानकारी नहीं है, उसके पैरों तले खजाना दबा पड़ा हो तो भी उसका कोई उपयोग नहीं। रत्नराशि पास में होने पर भी यदि उसे काँच का टुकड़ा भर समझा जाय तो व्यक्ति धनाध्यक्ष होते हुए भी गरीबी के दिन गुजारेगा। मनुष्य की सबसे बड़ी सम्पदा चेतना पास होने का कारण आत्मशक्ति ही है। शरीरबल, बुद्धिबल आदि सभी सामने तुच्छ हैं।
सही उपयोग विदित होने पर साधारण सी घास–पात भी संजीवनी बूटी सिद्ध हो सकती है। जानकारी के अभाव में सब कुछ निरर्थक सा है। सही उपयोग ही समुचित लाभ उठाने की स्थिति विनिर्मित करता है। बखेरते चलने पर तो सब कुछ बरबाद हो जाता है। छलनी में दूध दुहने पर तो दुधारू गाय का मालिक भी हाथ मलता और दुर्भाग्य को कोसता है।
आत्मबल भी अन्य बलों की तरह लोगों के पास होता है, पर उसे संभालना, सँजोना न बन पड़े तो कुछ लाभ उठा सकना संभव नहीं। आतिशी शीशे पर सूर्य किरणों को एकत्रित कर लेने पर आग जलने लगती है। बन्दूक की नली द्वारा सही निशाने पर छोड़ी गई बारूद भयंकर विस्फोट करती और अपनी शक्ति का परिचय देती है। आत्म शक्ति होने पर भी उसको एकाग्र किए बिना सामर्थ्य की वृद्धि नहीं होती। इसीलिए योग साधनाओं, तपश्चर्याओं द्वारा आत्मशक्ति को उभारना, एकत्रीकरण करना और वरिष्ठता का परिचय देना संभव होता है। एकाग्रता, एकान्त साधना, मौन साधना जैसे प्रयोग इसीलिए किए जाते हैं कि आत्म शक्ति का चमत्कारी उपयोग बन पड़े। इसी आधार पर सिद्ध पुरुष, अनेकों दिव्य विभूतियों के अधिष्ठाता बनते हैं और वह कर दिखाते हैं जो सामान्यजनों की कल्पना से भी बाहर होता है। नर पशु के समतुल्य विचरण करने वाले भी यदि ऋद्धि-सिद्धियों के अधिष्ठाता बन सकें तो समझना चाहिए कि उनने देव पुरुष की स्थिति प्राप्त कर ली।
योगी जन अपनी दिव्य शक्ति का एक कण भी बिखरने नहीं देते। उसे सँभाल-सँजो कर रखते हैं। जबकि साधारण जन अपना समय निरर्थक क्रिया–कलापों में बरबाद रहते हैं। सघन वनों में एकान्त सेवी, गुफा निवासी प्रयोगरत सिद्ध पुरुषों द्वारा असाधारण क्षमताएँ कैसे प्राप्त की जाती हैं? इसका लम्बा इतिहास है। ऋषि-महर्षि यही करते थे। विगत दिनों भी योगी अरविन्द, महर्षि रमण आदि ने इसी मार्ग पर चलते हुए सिद्धियाँ पाई। अपना, दूसरों का, विश्व की विविध समस्याओं का समाधान किया। अनुभवी बताते हैं कि जिसका प्राण वश में हैं, उसके लिए सब कुछ उसकी मुट्ठी में है। विभूतियों को उसके पास कुछ कमी नहीं रहती। पार्वती, भगीरथ, ध्रुव आदि के तपस्याओं के प्रतिफल सर्वविदित हैं।
वह राजमार्ग अभी भी सभी के लिए खुला हुआ है। तप साधना के सत्परिणामों की परम्परा अभी भी यथावत है। यह दूसरी बात है कि उन उपलब्धियों को कोई क्षुद्र प्रयोजनों में बाजीगरी जैसे कौतुक-कौतूहल दिखाये जायें अथवा उसके साथ जन समस्या के हितार्थ लोक कल्याण के महान प्रयोजन पूरा कर सकें। युग परिवर्तन की इस बेला में ऐसी ही संग्रहित, परिष्कृत और प्रखर आत्मशक्ति के प्रयोग की आवश्यकता समझी गई है।
मनुष्य देखने में एक इकाई प्रतीत होता है, पर उसके व्यक्तित्व का तनिक बारीकी से पर्यवेक्षण किया जाय तो सहज ही पता चलेगा कि उसके तीन विभाग हैं। तीनों का समन्वय और अभिवर्धन ही समग्र प्रगति का आधारभूत कारण बनता है। पेड़ में जड़ें, तना और पत्र पल्लव यही तीन भाग प्रमुख हैं जो मिल जुल कर उसकी प्रगति का सर्वतोमुखी सरंजाम जुटाते हैं। इसी प्रकार मानवी सत्ता भी (1) पदार्थ परक (2) चिन्तन परक (3) व्यवहारपरक इन तीन भागों में बँटी है। इन तीनों की समन्वयात्मक प्रगति को देख कर यह समझा जा सकता है कि व्यक्तित्व आगे बढ़ा, ऊँचा उठा और प्रगति पथ पर आगे चल पड़ा। पैर, धड़ और सिर के तीनों ही भाग मिलकर एक समूचे शरीर को समग्र बना पाते हैं।
पदार्थपरक जीवन का तात्पर्य यह है कि निर्वाह की आवश्यक सुविधा सामग्री उपलब्ध हो। परिश्रम और कौशल ऐसा हो, जिसके सहारे अपना और आश्रितों का गुजारा भली प्रकार चलता रहे। इस प्रयास में शरीर और मन को इतना प्रयास करना पड़ता है कि दोनों की क्षमता तीक्ष्ण होती चले। यह प्रयास ईमानदारी भरा और न्यायोचित होना चाहिए। अन्यथा अनावश्यक आवश्यकताएँ बढ़ा लेना, ‘प्रदर्शन अधिक-परिश्रम कम’ वाली नीति अपनाते ही मनुष्य को अनीति पर उतारू होना पड़ता है। ऐसा पैसा कमाने वाले के लिए खर्चने वाले के लिए - और संपर्क क्षेत्र के लिए दुष्प्रभाव छोड़ता है और इस आधार पर जो कमाया या खाया दिखाया गया था उसकी तुलना में अन्तः क्षेत्र का कोसना और परिचितों की घृणा इतनी भारी पड़ती है, जिसे गरीबी से भी महँगा कहा जा सके।
इसलिए स्थूल जीवन का प्रत्यक्ष सादा जीवन उच्च विचार की नीति पर निर्धारित रहना चाहिए। शरीर का उचित सम्मान करें और पुष्ट बनायें। बात यहीं तक सीमित रहनी चाहिए। अपना उदाहरण प्रस्तुत करते हुए परिवार को सुसंस्कारी और स्वावलम्बी बनाना चाहिए। जो परिवार के प्रति, शरीर के प्रति अत्यधिक आकर्षित रहते हैं, उन्हें वासना, तृष्णा और अहंता के तीनों ही कुकर्म बुरी तरह घेरते हैं और सामान्य जीवन को ऐसा बना देते हैं, जिससे आरोग्य, संतुलन निर्वाह, सम्मान और प्रतिभा विकास में निरन्तर अवरोध पड़ता है। इन विपन्न परिस्थितियों में मनुष्य न सुखी रह सकता है, न संतुष्ट। उसे दुर्बलता, रुग्णता और भर्त्सना का शिकार होना पड़ता है। ऐसी दशा में यह आवश्यक है कि भौतिक जीवन को सुव्यवस्थित रखें। उसे नशेबाजी जैसे दुर्व्यसनों से आलस्य और प्रमाद से, अनीति उपार्जन से निरन्तर बचा कर रखें। ऐसा जीवन सहज ही ऊँचा उठेगा और आगे बढ़ेगा। चमड़ी काली, कुरूप होने पर भी वह अपने चरित्र के कारण सुन्दर, सम्माननीय और अनुकरणीय बनकर रहेगा।
जीवन का दूसरा पक्ष है चिन्तन, बौद्धिक विचारशील। इसके लिए स्वाध्याय सत्संग, चिन्तन और मनन चारों ही आवश्यक हैं। स्कूली शिक्षा जहाँ तक संभव हो, वहाँ तक प्राप्त करनी चाहिए पर नौकरी लक्ष्य न रखा जाय, तो ही अच्छा है क्योंकि भविष्य में हर शिक्षित को नौकरियाँ नहीं मिलने वाली हैं। उपार्जन के लिए पैतृक धन्धे को ही विकसित करने की योजना सरल पड़ती, पर यदि वैसा संभव न हो, तो दूसरे उद्योग की बात सोची जा सकती है। शिक्षा का उद्देश्य जीवनोपयोगी-समाजोपयोगी ज्ञान का संवर्धन है। इसके सहारे मनुष्य बुद्धिमान बनता है। इसलिए स्कूली शिक्षा के सम्बन्ध में कोई मतभेद नहीं है। पर साथ ही यह भी सोचते रहना चाहिए कि आर्थिक, वैयक्तिक, सामाजिक क्षेत्रों का उपयुक्त निर्वाह करने के लिए स्कूली पढ़ाई के अतिरिक्त भी और भी बहुत कुछ सीखना चाहिए। इसके लिए समस्याओं का समाधान करने वाली पुस्तकों का स्वाध्याय प्रामाणिक और दूरदर्शी व्यक्तियों के सान्निध्य-परामर्श का अवसर भी ढूँढ़ते रहना चाहिए। इसके अतिरिक्त प्रस्तुत समस्याओं तथा प्रचलनों के औचित्य -अनौचित्य के सम्बन्ध में पूर्वाग्रह रहित विचार मंथन स्वयं भी करना चाहिए और लोगों का अन्धानुकरण करने की अपेक्षा जो दूरदर्शी विवेकशीलता की कसौटी पर खरा उतरता हो उसी को स्वीकार करना चाहिए। सही निष्कर्ष तक पहुँचना ही पर्याप्त नहीं, उसे कार्यान्वित करने के उपयुक्त साहस एवं पराक्रम भी संचित करना चाहिए।
बहुमत जिस ढर्रे पर अपनी गाड़ी चलाता है, वह न तो बुद्धि संगत है और न अनुकरणीय। हमें स्वतंत्र चिन्तन का अवलम्बन करना चाहिए और विवेकशीलता को साहसपूर्वक अपनाना चाहिए। आदर्शों के सम्बन्ध में कौन क्या कहता है, इसे सुन तो लेना चाहिए, पर किसी के भी कथन परामर्श को अपनी स्वतंत्र विचारशीलता छोड़ कर अपनाना नहीं चाहिए।
अपने आपे के सम्बन्ध में कुछ तथ्य ऐसे हैं, जिन्हें समझना ही पर्याप्त न होगा, वरन् उसके आधार पर दिशा धारा भी निर्धारित करनी चाहिए।
मनुष्य जन्म, स्रष्टा की सर्वोपरि कलाकृति है। जो सुविधाएँ मनुष्य को मिली हैं वे अन्य किसी प्राणी को नहीं मिलीं। यह उपलब्धियाँ धरोहर की तरह हैं, ताकि आत्मशोधन करके पूर्णता का लक्ष्य उपलब्ध किया जाय। साथ ही स्रष्टा के इस विश्व उद्यान को अधिक सुन्दर समुन्नत बनाकर कर्ता के श्रम को सार्थक किया जाय। इसी इच्छा से उसने हमें मनुष्य जन्म दिया है। आमतौर से लोग आत्मा और शरीर के अन्तर को भूल जाते हैं और समस्त क्षमताओं को मात्र शरीर की, उससे सम्बन्धित भोगों को मात्र शरीर की, उससे सम्बन्धित भोगों की उचित अनुचित आकांक्षाएँ पूरा करने में खपा देते हैं। ऐसी दशा में वह अवसर ही नहीं मिलता जिसमें आत्मकल्याण और लोक मंगल के जीवन लक्ष्य पर विचार कर सकें। यदि यह विचार बन पड़े, तो मनुष्य अपने गुण, कर्म, स्वभाव को मानवी गरिमा के अनुरूप बनाये, चिन्तन में उत्कृष्टता का समावेश करे और क्रिया–कलापों में सज्जनता शालीनता का बढ़-चढ़ कर समावेश करें। हमारा चिन्तन जितना स्वार्थ के निमित्त लगता है उतना ही परमार्थ प्रयोजन में भी लगना चाहिए। विशेषतया अपनी विचार क्षमता का उच्चस्तरीय उपयोग करें। समझें कि मनुष्य जैसा सोचता है, वैसा करता है। जैसा करता है, वैसी ही परिस्थितियाँ बन जाती हैं और तदनुरूप भला-बुरा भोगना पड़ता है। इसलिए विचार संयम को समुचित महत्व दिया जाय। कुविचारों को काटने के लिए सद्विचारों की, श्रेष्ठ उदाहरणों की एक समर्थ सेना पहले से ही जुटा रखी जाय, जो कुविचारों का आक्रमण होते ही उन्हें निरस्त करने के लिए जुट पड़ें। जिस पर फूलों से लदा उद्यान विनिर्मित करने के लिए चतुर माली जैसा पराक्रम करना पड़ता है। भय स सतर्क रहना पड़ता है। वैसे ही अपने सद्विचारों की फुलवारी उगाने के लिए निरन्तर प्रयत्नशील रहना चाहिए। भय, निराशा, क्रोध, अहंकार, आलस्य, पाप, अपराध जैसे चिन्तनीय चिन्तन से जूझने के लिए हर समय कटिबद्ध रहा जाय। एक जागरूक प्रहरी का उत्तरदायित्व भली प्रकार निबाहा जाय।
उच्चस्तरीय विचारों के चिन्तन मनन से उन्हें अपनाने और कार्यान्वित करने के प्रयास में जब भी अवसर हो समय लगाना चाहिए और उसे आत्मशोधन की साधना मानकर चलना चाहिए जो ईश्वर उपासना के ही समतुल्य है।
जीवन की तीसरी परत है समाज परक। हम व्यक्तिगत रूप से गुण कर्म स्वभाव की दृष्टि से कितने पवित्र परिष्कृत हो सकें, इसकी परीक्षा दूसरों के प्रति अपने द्वारा किये गये व्यवहार को देखकर ही परखी जा सकती है। स्मरण रखना चाहिए कि मनुष्य सामाजिक प्राणी है। कितनों के ही सहयोग से हमें निर्वाह एवं प्रगति के अवसर मिलते हैं। यदि वे उपलब्ध न हुए होते, तो दुर्बलकाय मनुष्य का अपने बलबूते जीवित रह सकना भी संभव नहीं। अब तक जितनी भी प्रगति मनुष्य ने या समाज ने की है, उसमें एक - दूसरे का स्नेह सहयोग भी प्रधान कारण रहा है। मछली पानी में जीवित रहती है और मनुष्य समाज के बीच रह कर अपना निर्वाह करता है। इसलिए उसका परम पवित्र कर्तव्य हो जाता है कि समस्त क्षमताएँ स्वार्थ के लिए ही न गँवा दें। कम में अपना गुजारा करते हुए अपना समय, श्रम, ज्ञान, वैभव, प्रभाव आदि का उपयोग लोक मंगल के लिए करें। इसके बिना किसी की प्रामाणिकता, पवित्रता और प्रखरता की परीक्षा नहीं होती। पानी में प्रवेश करके ही यह सिद्ध किया जा सकता है कि किस तैरना आता है किसे नहीं। इसी प्रकार मनुष्य का व्यक्तित्व कितना पवित्र एवं उदात्त है कि इसकी परख एक ही आधार पर होती है कि उसका व्यवहार अन्यान्यों के प्रति कितना उदार एवं उदात्त है। मधुर भाषण, शिष्टाचार, ईमानदारी, वचन का पालन, समय का परिपालन लेन देन में सफाई रखने जैसे सिद्धान्तों को अपना कर दूसरों के साथ सद्व्यवहार किया जाय। सत्प्रवृत्तियों को ऊँचा उठाने में कुछ कमी न रहने दी जाय।
इस उदात्त व्यवहार का एक पक्ष यह भी है कि अनीति के कुरीतियों के अवांछनीयताओं के प्रति संघर्ष किया जाय, उन्हें सहन न किया जाय। अनीति सहना प्रकारान्तर से दुष्ट दुराचारियों को प्रोत्साहन देना है। इसलिए अवांछनीयताओं के विरुद्ध यथा संभव संघर्ष जारी रखना चाहिए। असहयोग, विरोध, और संघर्ष के लिए यदि भले लोग तत्पर रहें, तो मुट्ठी भर बुरे आदमियों का इतना दुस्साहस न बढ़े जितना कि इन दिनों निरन्तर बढ़ता चला जाता है।
आत्मोन्नति का मार्ग सरल है। इसके लिए किसी असाधारण पराक्रम की आवश्यकता नहीं है और न गुह्य कर्मकाण्डों का आश्रय लेना अनिवार्य है। शक्ति के महान भाण्डागार परमेश्वर के साथ अपने संबंध सुदृढ़ बना लेने से काम चल सकता है। उसका उपाय एक ही है कि हम अपनी पात्रता इतनी विकसित करें। कि उनकी निरन्तर हर किसी पर बरसने वाली अनुकम्पा को धारण किया जा सके। रात भर वर्षा होते रहने पर भी हम उतना ही पानी प्राप्त कर सकते हैं जितना कि अपना बर्तन होता है।
मनुष्य नर से नारायण बन सकता है इसी जन्म में, महामानव ऋषि, देवता इसी स्तर के होते हैं। उनमें से प्रत्येक को अपना ध्यान आत्मसत्ता की उत्कृष्टता पर केन्द्रित करना पड़ा है। इतना जो भी कर सकेगा उसके अन्तराल में इतनी स्फुरणा निश्चित रूप से जागेगी कि अपनी तृष्णा अहंता में कटौती करके बचे हुए साधनों को स्रष्टा के विश्व उद्यान को स्वच्छ, सुन्दर और समुन्नत बनाने के लिए नियोजित करें। प्राचीन काल में आध्यात्मिक उत्कृष्टता की संचित सम्पदा बढ़ाने वाले साधु-ब्राह्मण समुदाय की जीवनचर्या इसी प्रकार की होती थी, कि जिसकी शोभा-सुषमा पर जन सहयोग लोक सम्मान और दैवी अनुग्रह अनवरत रूप से बरसता रहे। वे निजी महत्त्वाकाँक्षाओं को पैरों तले कुचलते थे। आत्म संयम में कुछ उठा न रखते थे। इतना किये बिना किसी के पास ईश्वर अभ्यर्थना के लिए कुछ बचेगा ही नहीं।
ईश्वर के दरबार में चापलूसी, खुशामदखोरी, पूजा अर्चन, छुटपुट व्यवहार या काय-कष्ट काम नहीं देते। इन विडम्बनाओं के बल पर उसे बहकाया-फुसलाया नहीं जा सकता। जिस प्रकार आग में ईंधन अपने को समर्पित करके तदनुरूप बन जाता है। उसी प्रकार दैवी गुण, कर्म, स्वभाव को चिन्तन, चरित्र और व्यवहार में नियोजित करने के उपरान्त हम ईश्वर अनुग्रह के सहज ही अधिकारी बन जाते हैं और जीवन लक्ष्य की पूर्ति में अकारण प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती। उचित यही है कि हम अपना स्तर ऊँचा उठाने और नर से नारायण बनने की सफलता प्राप्त करें।
संत तुकाराम की धर्मपत्नी बड़े कर्कश स्वभाव की थीं। पति के साथ समय-समय पर दुर्व्यवहार भी कर बैठती थीं। पर वे सदा हँसते ही रहते। प्रतिशोध या क्रोध को पास में फटकने भी न देते।
एक दिन किसी किसान ने सन्त को गन्नों का एक गट्ठा दिया। सिर पर रखकर वे घर आ रहे थे कि रास्ते में मिलने वाले उनसे अनुरोध करके अपने लिए एक-एक गन्ना माँगते रहे। उदार सन्त से इनकार करते न बन पड़ा। हर एक माँगने वाले को एक-एक गन्ना देते हुए चले आये।
अन्त में एक गन्ना शेष रह गया वह लाकर उन्होंने पत्नी को दे दिया। पत्नी को गन्ने का गट्ठा मिलने और रास्ते में गन्नों को बाँटने की सूचना पहले ही मिल चुकी थी। वह क्रोध से भरी बैठी थी। एक गन्ना हाथ में देख वह उबल पड़ी और उसे सन्त की पीठ में पूरे जोर से मारा।
गन्ने के दो टुकड़े हो गये। सन्त शान्त भाव था। घर में हम-तुम दो के कारण गन्ने को तोड़ा ही जाना था। तुमने जल्दी ही उस कार्य को पूरा कर दिया यह अच्छा हुआ। लो बढ़िया वाला टुकड़ा तुम ले लो। घटिया को मैं लिए लेता हूँ।
सन्त की उदार क्षमाभावना चर्चा जिसने भी सुनी आश्चर्य किया और साथ ही यह भी समझा कि क पक्ष अगर अनुपयुक्त हो तो दूसरा पक्ष अपनी शिष्टता से उस दोष का परिमार्जन कैसे कर सकता है?
मनुष्य भावनाओं का पुतला है। उनकी अभिव्यक्ति के लिए स्रष्टा ने पंचतत्वों से विनिर्मित कायकलेवर की व्यवस्था की है। भावनाएँ विचारणाएँ जिस स्तर की होंगी व्यक्तित्व भी तदनुरूप बनता ढलता चला जायेगा। उनकी उत्कृष्टता-निकृष्टता ही व्यवहार में चरितार्थ होकर प्रगति अवगति का मार्ग खोलती और व्यक्ति, को उन्नत-अवनत स्थिति में ला प्रतिष्ठित करती हैं।
महान दार्शनिक अरस्तू का कहना है कि भावनाओं का काया पर उसी प्रकार आधिपत्य रहता है जैसा मालिक का नौकर पर, स्वामी का गुलाम पर। भाव-चिंतन की स्वच्छता जहाँ शारीरिक मानसिक स्वास्थ्य को अक्षुण्ण बनाये रखती है, वहीं उसकी विकृति अनेकानेक बीमारियों का कारण बनती है। इस तथ्य की पुष्टि मनोविज्ञानियों एवं मनःचिकित्सकों ने अब गहन अध्ययन एवं अनुसंधान के आधार पर की है।
सोवियत संघ की एकेडेमी ऑफ सांइसेज के वरिष्ठ सदस्य एवं स्नायु विज्ञानी प्रो. पावेल सिमोनोव के अनुसार भावनाएँ दो प्रकार की होती हैं- एक विधेयात्मक और दूसरी निषेधात्मक। इनमें से प्रथम श्रेणी में आशा, उत्साह, विश्वास, प्रेम, साहस, प्रफुल्लता आदि को गिना जा सकता है, जिनका मन-मस्तिष्क पर अच्छा व अनुकूल प्रभाव पड़ता है, जबकि काम, क्रोध, चिन्ता, भय, शोक, द्वेष जैसी निषेधात्मक भाव तरंगों से कायातंत्र के विभिन्न भाग अतिरिक्त रूप से उत्तेजित हो उठते हैं और दुख संक्षोभ से लेकर तनाव, उद्वेग तक उत्पन्न करते हैं। यह पूर्णतया व्यक्ति की मान्यताओं, इच्छा आकांक्षाओं पर निर्भर करता है क इनमें से कौन सी उसके लिए लाभदायक हैं और कौन सी हानिकारक। भावनात्मक असंतुलन स्वास्थ्य एवं व्यक्तित्व दोनों को लकड़ी में लगे घुन के कीड़े की तरह चट कर जाता है। विधेयात्मक भावनाएँ यदि संकीर्ण - स्वार्थपरता जैसी प्रवृत्तियों को भड़काने लगें तो वह व्यक्ति एवं समाज के लिए कष्टकर हो सकती हैं, जबकि छोटे बच्चों के निर्मल अन्तःकरण से प्रस्फुटित भाव हर व्यक्ति को आकर्षित करते और सेवा, सहायता एवं सहानुभूति प्रदान करने की प्रेरणा उभारते हैं।
मनीषियों का कहना है कि मनुष्य मूलतः पवित्र एवं परिष्कृत भावनाओं का पुँज है, किन्तु अनुपयुक्त परिस्थितियों के कारण आज उसमें अनेक विकृतियाँ भर गई हैं। उत्तेजनापूर्ण विषाक्त वातावरण तो उसने स्वयं विनिर्मित किया है जिसे अप्राकृतिक एवं अस्वाभाविक ही कहा जा सकता है। इसका दुष्परिणाम मनोकायिक आधि- व्याधियों के रूप में उसे भुगतना भी पड़ रहा है। उनके अनुसार जिसकी भावनाएँ जितनी संकुचित होती हैं, वह शारीरिक -मानसिक एवं आत्मिक दृष्टि से उतना ही कमजोर होता चला जाता है। विभिन्न तरह की आधि-व्याधियों से ऐसे ही लोग अधिक पीड़ित होते और समय से पूर्व दम तोड़ते देखे जाते हैं। जिसने अपनी भावनाओं की परिधि को जितना अधिक विस्तृत बना लिया, समझना चाहिए कि वह उतना ही स्वस्थ, समुन्नत और परिष्कृत बनता चला जायेगा। जन सम्मान और दैवी अनुदान घटाटोप बनकर उस पर बरसते रहेंगे। इसके विपरीत विकृत भाव सम्पन्न व्यक्ति से दूसरों का, समाज का हित साधन हो सकना तो दूर अपना भी वह कल्याण नहीं कर पाता। स्वार्थी व्यक्ति क्षणिक प्रसन्नता भले पा लें, पर उसकी जीवात्मा अपनाई गई शूद्रता के लिए उसे सदैव कचोटती रहती है। परिचितों की घृणा बरसती और सम्बद्ध जनों की रुष्टता सहनी पड़ती है, सो अलग।
इसी तथ्य को अधिक स्पष्ट करते हुए प्रख्यात मनःचिकित्सक एच. एफ. डनबार ने कहा कि जिनका अन्तराल और मनःसंस्थान उदात्त है, प्रसन्नता-प्रफुल्लता ही जिनकी प्रकृति है, ऐसे व्यक्तियों का शरीर स्वस्थ रहता है। चेहरे पर दमकती आभा और आँखों की चमक उनकी जीवनी शक्ति का प्रमाण स्वयं उपस्थित कर देती हैं। व्यक्तित्व का चुम्बकत्व सहज ही दूसरों को अपनी ओर आकर्षित कर लेता है। भाव संस्थान में छाई विषाक्तता जीवन ऊर्जा का अनावश्यक क्षरण करती रहती है। ऐसे में प्रगति की आकांक्षा बुझ जाती है। इच्छा शक्ति को उमंग को लकवा मार जाता है। बाह्य उपचार, औषधियाँ इसके लिए अस्थायी लाभ भले दिला दें, पर दीर्घकालिक एवं स्थायी सत्परिणाम अंतःकरण के परिष्कार से ही मिल सकता है। अतः भावनाओं का विवेकयुक्त सुनियोजन ही शारीरिक मानसिक स्वास्थ्य एवं आत्मिक प्रगति का मूलाधार है।
“प्रभु! आज इस दीन का गृह श्रीचरणों से पवित्र हो।” वैशाली के दण्डनायक करबद्ध हो तथागत के सम्मुख उपस्थित थे। उन्होंने अपना रथ-उपवन के बाहर हो छोड़ दिया था। श्रद्धा से प्रातःकालीन प्रवचन समाप्त होने पर वे खड़े हो गए थे और भगवान बुद्ध ने उनकी ओर दृष्टि उठाई, उनका कण्ठ गदगद हो उठा। “भिक्षु संघ का स्वागत करने का सौभाग्य माँगने आया है यह जन आपके समीप।”
“भन्ते! बुद्ध कृपण की भिक्षा स्वीकार नहीं करते। पहले भी किसी बुद्ध ने ऐसा नहीं किया है।” पता नहीं क्या बात हुई, दण्डनायक के मुख पर दृष्टि पड़ते ही तथागत के नेत्रों में एक अद्भुत तेज आ गया। केवल चिरंजीवी आनन्द ने लक्षित किया कि प्रभु आज कुछ असाधारण कह रहे हैं। तथागत का स्वर गम्भीर था। “दान करना चाहते हो तो दान का मर्म समझो और श्रेष्ठतम दान करो।”
कृपण की भिक्षा बुद्ध स्वीकार नहीं करते। उपस्थित गणनायकों तथा सम्मान्य नागरिकों ने एक दूसरे की ओर देखा। भिक्षुवर्ग में भी सब गम्भीर नहीं थे। अनेक दृष्टियाँ उठी दण्डनायक की ओर। उनमें घृणा-तिरस्कार अवहेलना के भाव उठे यह कृपण है।
दण्डनायक दो क्षण हतप्रभ रह गए। उनकी मुखकान्ति लुप्त हो गई। शरीर काँपने लगा। सबको भय लगा वैशाली का परम पराक्रमी उग्रतर दण्डनायक क्रुद्ध होगा। कुछ बखेड़ा उठेगा! कुछ भी तो नहीं हुआ इस प्रकार। दो क्षण पश्चात् दण्डनायक का अत्यन्त हताश स्वर सुन पड़ा जैसी प्रभु की आज्ञा! उनका मस्तक किंचित् झुका वह शीघ्रता से मुड़कर उपवन के बाहर हो गये।
“प्रभु! वह रो पड़ा।” चिरंजीव आनन्द प्रभु के पृष्ठभाग में खड़े थे। उनकी दृष्टि के ठीक सम्मुख थे दण्डनायक। अतः उसके नेत्रों में जो अत्यन्त प्रयत्नपूर्वक अवरोध करने पर भी बिन्दु झिलमिला उठे थे, आनन्द से वे छिपे नहीं थे। अब उन उदार का हृदय द्रवित हो उठा था और वे प्रभु से प्रार्थना कर रहे थे। आपकी अस्वीकृति ने उसे वेदना से झकझोर दिया है। प्रभु प्रातः उस पर कृपा कर सकते हैं।
एक दिन से अधिक का निमन्त्रण तथागत स्वीकार नहीं किया करते। भिक्षु कल और परसों का प्रबन्ध करने लगे इसे वे उनके त्यागपत्र से च्युत हो जाना मानते हैं। यह खूब जानते हुए आनन्द ने प्रार्थना की थी। वे इतना ही चाहते थे कि कोई ऐसा उत्तर मिले, जिससे उस संतप्त हृदय को आश्वासन प्राप्त हो जाय। यह तो निश्चित है कि दण्डनायक दान के मर्म को खोजेगा कृपणता के कलंक को धोने की चेष्टा करेगा पर कितनी? प्रश्न अतल में खोने लगा।
“उसका सौभाग्य उसे यहाँ ले आया।” भगवान अभिताभ के नेत्र अर्धोन्मीलित हो चुके थे। वे जैसे कहीं दूर से कुछ कह रहे हों। “उसके आगत को न जानकर तुम दुखी हो रहे हो।”
कुछ होने वाला है निश्चित ही कुछ अद्भुत दान का मर्म अब उद्घाटित होगा। आनन्द अब शान्त हो गए, क्योंकि वे जानते थे कि भविष्य का स्पष्टीकरण तथागत का स्वभाव नहीं है, वे संकेत भी यदा कदा ही देते हैं।
वैशाली का प्रचण्ड दण्डनायक -सम्मानित गणश्रेष्ठ भी उससे भय खाते हैं। वह नगर में जिस ओर से निकल जाये महान श्रेष्ठी भी अपने आसनों से उठकर उसे अभिवादन करते हैं। उस उग्रतेजा दण्डनायक का अपमान। गणनायकों, नागरिकों, श्रेष्ठियों, भिक्षुओं से भरी सभा में उसे कृपण का सम्बोधन! गौतम के शत्रु इससे सन्तुष्ट हुए। उन्होंने सैनिकों के प्रधान को भड़काने का अवसर पा लिया था।
“स्वामी!” साथ के सैनिक स्वतः उत्तेजित थे। दण्डनायक के लौटते ही उनका नायक सम्मुख आया। उसके नेत्र अंगार हो रहे थे मुख अरुण हो गया “भिक्षु गौतम अब अत्यधिक धृष्ट हो गया है।”
“भद्रसेन! तुम भगवान को अपशब्द कहने की धृष्टता कर रहे हो।” दण्डनायक ने दृष्टि कठोर कर ली। “केवल इस बार तुम्हें क्षमा किया जाता है।”
“आपका अपमान किया उस .............।”
“चुप रहो! झिड़क दिया दण्डनायक ने। शूर को कुछ समझदार भी होना चाहिए। मैं अपनी बात स्वयं समझ सकता हूँ।” वह सोचता हुआ रथ पर जा बैठा। सैनिक मुँह बाए खड़े थे। गौतम के शत्रुओं को कोई समय नहीं मिला।
घर पहुँचने पर चिन्तन की गति थमी नहीं अविराम बढ़ती गई। दान सत्कार्य में सत्प्रयोजन के लिए स्वयं की शक्तियों का नियोजन यही न। विचारों का घुमड़न क्रिया में बदले नहीं रहता। चिन्तन की तीव्रता का मतलब है गतिशील कर्म। ऐश्वर्य लुटने लगा पत्नी सहयोगिनी थी। दीन, दरिद्र, भिखारी, आर्त सभी कृतार्थ हो रहे थे। साधनों के बदले आशीष बरस रही थीं। चतुर्दिक् ख्याति फैल गई।
ख्याति के स्वर आनन्द के कानों तक पहुँचे। उनकी वाणी ने उसे बुद्ध तक पहुँचाया। वह सुनकर मुस्कराए-सम्पदा को लुटा फेंकने का नाम तो दान नहीं है। पात्र-कुपात्र का विचार किए बिना संचित साधनों को भावुकतावश फेंकने लगना, अर्जित पूँजी को अंधेरे कुएँ में डालना है जिसके सत्परिणाम कम दुष्परिणाम अधिक देखने में आते हैं। और समय आने पर सत्पात्र के आवाहन को अनसुना कर देना साँप की तरह कुण्डली बनाकर अर्जित साधनों पर बैठ रहना पास आने वाले को काटने दौड़ना उससे कहीं अधिक घातक हैं। आनन्द मौन हो उनकी वाणी सुनते रहे। दान का मर्मोद्घाटन अभी बाकी था।
अगले दिन प्रातःकालीन प्रवचन की समाप्ति पर सबने देखा कि कल की भाँति दण्डनायक आज भी कर बुद्ध सम्मुख खड़े हैं।
“भन्ते! बुद्ध कृपण की भिक्षा स्वीकार नहीं करते। पहले भी कभी किसी बुद्ध ने ऐसा नहीं किया है। आज दण्डनायक को प्रार्थना करने का भी अवकाश नहीं दिया।” “तुम दान करो प्रथम। प्रथम कोटि का दान दे सकने का साहस जुटाओ”
जैसी प्रभु की आज्ञा। बुद्ध की वाणी ने उपस्थित जन समुदाय को इतना आश्चर्यचकित नहीं किया, जितना चकित किया दण्डनायक की शान्त स्वीकृति ने। दण्डनायक ने अपने सर्वस्व दान की चर्चा तक नहीं की। उन्होंने तो कल की भाँति मस्तक झुकाया और शीघ्रतापूर्वक लौट पड़े अपने रथ की ओर।
चिरंजीव आनन्द आज भी प्रभु के पृष्ठप्रान्त में थे। आज भी उनके सम्मुख ही थे दण्डनायक। आज उनकी दृष्टि बड़ी सावधानी से उनके मुख पर स्थिर थी। आज नेत्रों में आँसुओं की जगह अपार गाम्भीर्य था। गणनायक सम्मान्य नागरिक श्रेष्ठिवर्ग, भिक्षुगण- आज कोई उपहास या अवहेलना पूर्वक उनकी ओर नहीं देख सका। आज सबके नेत्र प्रभु की ओर उठ गए। प्रभु इन्हें कृपण कहते हैं? क्या रहस्य है तथागत के इस अद्भुत व्यवहार का? वैशाली के दण्डनायक से और किस दान की उन्हें आशा है?
दूसरी ओर दण्डनायक के मन में मन्थन की गति अविराम थी। सत्कार्य में सत्प्रयोजन के लिए स्वयं की शक्तियों का नियोजन दान है। पर सत्कार्य और सत्प्रयोजन क्या है? इसका निर्धारण कौन करे? टिक-टिक करती चिन्तन की सुई यहाँ आकर अटक गई। यह निर्धारण तो युगावतार ही कर सकते हैं युगद्रष्टा से ही सम्भव है यह महान निर्णय। उन्हें स्वयं की भूल समझ में आ रही थी। सच अभी तक तो दान के नाम पर तो सिर्फ अहं का पोषण रहा। नाम को फैलाने यश को बटोरने की ओछी शुरुआत भर हुई। ओह! मन प्रायश्चित से भर उठा और स्वयं की शक्तियाँ क्या हैं? कहाँ है, इनका स्रोत? अन्तराल के किसी के उभरते इन सवालों के साथ जवाब भी डालें, शक्तियों के मूल हैं श्रम और समय। इनका स्रोत हैं स्वयं का व्यक्तित्व। तब तो श्रेष्ठतम दान है ............ कुछ और सोचते हैं इतने में सहधर्मिणी भागती हुई आयी। उल्लास और उत्साह के अतिरेक में वह हाँफ रही थी बड़ी मुश्किल से कह सकी, स्वयं प्रभु द्वार पर पधारे हैं।
कानों में जैसे संजीवनी का घोल पड़ा। वह धीरे से उठे पत्नी का हाथ पकड़ा द्वार पर आये। चरणों में प्रणति निवेदन करते हुए बोले, “प्रभु सम्पत्ति आपकी निवास आपका और हम दोनों आपके।”
महादान! का यह स्वरूप देख सभी आश्चर्यचकित थे। किसी को कुछ समझ में नहीं आ रहा था। सभी के आश्चर्य के आवरण को तोड़ते हुए स्वयं युगावतार की वाणी गूँजी सृष्टि के इतिहास में युगों बाद विरले क्षण आते हैं जब पराचेतना स्वयं मानव से दान की गुहार करती हैं। ऐसे में रंग-बिरंगे पत्थर धातुओं के टुकड़ों की अपेक्षा श्रेष्ठ होता है स्वयं के श्रम और समय का दान। और इससे भी कहीं श्रेष्ठतम है स्वयं का स्वयं के व्यक्तित्व का दान। दान के ये तीन प्रकार श्रेष्ठ- श्रेष्ठतम हैं। उस दिन सांयकाल भिक्षु संघ में एक भिक्षु और एक भिक्षुणी बढ़ गई। जिसे संघ ने महानाम और क्षेमा के नाम से जाना। भगवान स्वयं उन्हें समझाते हुए कह रहे थे “धर्मचक्र प्रवर्तन के लिए समर्पित परिव्राजकों लोक जीवन को अपना उदाहरण प्रस्तुत करते हुए कहा हे मानव! उठो दान के मर्म को समझ। जो कुछ है उसी से नहीं कुछ है तो स्वयं से ज्योति का सत्कार करो। नवयुग तुम्हारे द्वार तक जयघोष करता आ जायेगा।
बिजली की शक्ति -सामर्थ्य से सभी परिचित हैं। छोटे-बड़े अनेकों यंत्र-उपकरण उसी की शक्ति से चलते और महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ अर्जित करते हैं। मनुष्य शरीर में भी जीवनचर्या को सुसंचालित रखने में जैव विद्युत ही काम आती है। चेहरे पर चमक, स्फूर्ति और पुरुषार्थ कर दिखाना उसी के अनुदान हैं। मन मैं शौर्य-पराक्रम साहस-विश्वास आदि के रूप में जब उसका अनुपात संतोषजनक मात्रा में होता है, तो उसे प्रतिभा कहते हैं। वह अपनी प्रसुप्त क्षमताओं को जगाती है। कठिनाइयों से जूझ पड़ना और उन्हें परास्त कर सकना भी उसी का काम है। महत्वपूर्ण सृजन-प्रयोजनों को कल्पना से आगे बढ़ाकर योजना तक और योजना को कार्यान्वित करते हुए सफलता की स्थिति तक पहुँचाने की सुनिश्चित क्षमता भी उसी प्रतिभा में है, जिसे अध्यात्म की भाषा में प्राणाग्नि एवं तेजस्वी मानसिकता कहते हैं। उपासना क्षेत्र में इसलिए प्राणायाम जैसे प्रयत्न सरलतापूर्वक किए जाते हैं। तपश्चर्या में तितीक्षा अपनाते हुए साधन-सुविधा की आवश्यकता इसी अन्तःशक्ति के सहारे संपन्न कर ली जाती थी। शाप-वरदान एवं असाधारण स्तर के चमत्कार दिखा सकना और कुछ नहीं मात्र प्राणाग्नि के ज्वलनशील होने से उत्पन्न हुई ऋद्धि-सिद्धि स्तर की क्षमता ही है।
शरीर बल, धनबल, बुद्धिबल तो कई लोगों में पाये जाते हैं, पर प्रतिभा के धनी कभी कहीं कठिनाई से ही खोज- पाये जा सकते हैं। दैत्य दुष्प्रयोजनों में और देव सत्प्रयोजनों में इसी उपलब्ध शक्ति का उपयोग करते हैं। समुद्र-मंथन जैसे महापराक्रम इसी सामर्थ्य की पृष्ठभूमि से बन पड़े हैं।
सत्संग से उत्थान और कुसंग से पतन की पृष्ठभूमि बनती है। यह और कुछ नहीं किसी समर्थ की प्रतिभा का भले बुरे स्तर का स्थानान्तरण ही है। मानवीय विद्युत के अनेकानेक चमत्कारों की विवेचना करते हुए यह भी कहा जा सकता है कि यह प्रतिभा नाम से जानी जाने वाली प्राण-विद्युत ही अपने क्षेत्र में अपने ढंग से अपना काम कर रही है। जिसमें इसका अभाव होता है, उसे कायर, अकर्मण्य, डरपोक, आलसी एवं आत्महीनता की ग्रन्थियों से ग्रसित माना जाता है। संकोची, परावलम्बी एवं मन ही मन घुटने रहने वाले प्रायः इसी विशिष्टता से रहित पाये जाते हैं।
पारस को छूकर लोहा सोना हो जाता है, यह प्रतिपादन सही हो या गलत, पर इस मान्यता में सन्देह करने की गुँजाइश नहीं, कि प्रतिभा को आत्मसात् करने के उपरान्त सामान्य परिस्थितियों में जन्मा और पला मनुष्य भी परिस्थितिजन्य अवरोधों को नकारता हुआ प्रगति के पथ पर अग्रगामी और ऊर्ध्वगामी बनता चला जाता है। फूल खिलते हैं, तो उसके इर्द-गिर्द मधुमक्खियाँ और तितलियाँ कहीं से भी आकर उसकी शोभा बढ़ाने लगती हैं, भौंरे उसका यशगान करने में न चूकते हैं, न सकुचाते, देवता फूल बरसाते और ईश्वर उसकी सहायता करने में कोताही नहीं करते।
व्यक्तित्व का परिष्कार ही प्रतिभा परिष्कार है। धातुओं की खदानें जहाँ भी होती हैं, उस क्षेत्र के वही धातु कण मिट्टी में दबे होते हुए भी उसी दिशा में रेंगते और खदान के चुम्बकीय आकर्षणों से आकर्षित होकर पूर्व संचित खदान का भार, कलेवर और गौरव बढ़ाने लगते हैं। व्यक्तित्ववान अनेकों का स्नेह, सहयोग, परामर्श एवं उपयोगी सान्निध्य प्राप्त करते चले जाते हैं। यह निजी पुरुषार्थ है। अन्य सुविधा-साधन तो दूसरों की अनुकम्पा भी उपलब्ध करा सकती हैं, किन्तु प्रतिभा का परिष्कार करने में अपना संकल्प अपना समय और अपना पुरुषार्थ ही काम आता है। इस पौरुष में कोताही न करने के लिए गीताकार ने अनेक प्रसंगों पर विचारशीलों को प्रोत्साहित किया है। एक स्थान पर कहा गया है कि मनुष्य स्वयं ही अपना शत्रु और स्वयं ही अपना मित्र है। इसलिए अपने को उठाओ, गिराओ मत।
पानी में बबूले अपने भीतर हवा भरने पर उभरते और उछलते हैं, पर जब उनका अन्तर खोखला ही हो जाता है, तो उनके विलीन होने में भी देर नहीं लगती। अन्दर जीवट का बाहुल्य हो तो बाहर का लिफाफा आकर्षक या अनाकर्षक कैसा भी हो सकता है किन्तु यदि ढकोसले को ही सब कुछ मान लिया जाये और भीतर ढोल में पोल भरी हो, तो ढम-ढम की गर्जन-तर्जन के सिवाय और कुछ प्रयोजन सधता नहीं। पृथ्वी मोटी दृष्टि से जहाँ की तहाँ स्थिर रहती प्रतीत होती है पर उसकी गतिशीलता और गुरुत्वाकर्षण शक्ति इस तेजी से दौड़ लगाती है कि एक वर्ष में सूर्य की लम्बी कक्षा में परिभ्रमण कर लेती है और साथ ही हर रोज अपनी धुरी पर भी लट्टू की तरह घूम जाती है। कितने ही व्यक्ति दिनचर्या की दृष्टि से एक ढर्रा ही पूरा करते हैं, किन्तु भीतर वाली चेतना इस तेजी से गति पकड़ती है कि वे सामान्य परिस्थितियों में गुजर करते हुए भी उन्नति के उच्च शिखर तक जा पहुँचते हैं। सामर्थ्य भीतर ही रहती, बढ़ती और चमत्कार दिखाती है। उसकी को निखारने, उजागर करने पर तत्परता बरती जाय, तो व्यक्तित्व की प्रखरता इतनी सटीक होती है कि जहाँ भी निशाना लगता है, वहीं से आर-पर निकल जाता है।
उन दिनों जर्मनी मित्र राष्ट्रों के साथ पूरी शक्ति झोंक कर लड़ रहा था। इंग्लैंड के साथ रूस और अमेरिका भी थे। वे बड़ी मार से अचकचाने लगे और हर्जाना देकर पीछा छुड़ाने की बात सोचने लगे। बात इंग्लैंड के प्रधानमंत्री चर्चिल के सामने आयी, तो उनने त्यौरी बदलकर कहा आप लोग जैसा चाहें सोच या कर सकते हैं, पर इंग्लैंड कभी हारने वाला नहीं है। वह आप दोनों के बिना भी अपनी लड़ाई आप लड़ लेगा और जीतकर दिखा देगा। इस प्रचण्ड आत्मविश्वास को देखकर दोनों साथी भी ठिठक गये और लड़ाई छोड़ भागने से रुक गये। डार्विन के कथनानुसार बंदर की औलाद बताया गया मनुष्य, आज इसी कारण सृष्टि का मुकुटमणि बन चुका है और धरती या समुद्र पर ही नहीं अन्तरिक्ष पर भी अपना आधिपत्य जमा रहा है। कभी के समर्थ देवता चन्द्रमा को उसने अपने पैरों तले बैठने के लिए विवश कर दिया है।
लकड़ी का लट्ठा पानी में तभी तक डूबा रहता है जब तक कि उसकी पीठ पर भारी पत्थर बंधा हो। यदि उस वजन को उतार दिया जाय, तो छुटकारा पाते ही नदी की लहरों पर तैरने लगता है और भंवरों को पार करते हुए दनदनाता हुआ आगे बढ़ता है। राख की मोटी परत चढ़ जाने पर जलता हुआ अंगारा भी नगण्य मालूम पड़ता है, पर परत हटते ही वह अपनी जाज्वल्यमान ऊर्जा का परिचय देने लगता है। वस्तुतः मनुष्य अपने सृजेता की तरह ही सामर्थ्यवान है।
लकड़ियों को घिसकर आग पैदा कर लेने वाला मनुष्य अपने अन्दर विद्यमान सशक्त प्रतिभा को अपने बलबूते बिना किसी का अहसान लिए प्रकट न कर सके, ऐसी कोई बात नहीं। आवश्यकता केवल प्रबल इच्छा शक्ति एवं उत्कण्ठा की है। उसकी कमी नहीं पड़ने दी जाय, तो मनुष्य अपनी उस क्षमता को प्रकट कर सकता है, जो न तो देवताओं से कम है और न दानवों से। जब वह घिनौने कार्य पर उतरता है, तो प्रेत-पिशाचों से भी भयंकर
ईसा प्रचार पर जा रहे थे। रास्ते में उनके शिष्य मैथ्यू का गाँव पड़ा। तलाशा तो मिल गया। वह अपने मृत पिता की अंत्येष्टि करने वालों के साथ जा रहा था।
ईसा ने कहा मरो के साथ मरने वालों को जाने दे। तू मेरे साथ चल। उस पर जिसके पथिकों को अमरता का आनन्द मिलता है।
दीखता है। जब वह अपनी श्रेष्ठता को उभारने, कार्यान्वित करने में जुट जाता है, तो देवता भी उसे नमन करते हैं। मनुष्य ही है, जिसके कलेवर में बार-बार भगवान अवतार धारण करते हैं। मनुष्य ही है, जिसकी अभ्यर्थना पाने के लिए देवता लालायित रहते हैं और वैसा कुछ मिल जाने पर वरदानों से उसे निहाल करते हैं। स्वर्ग की देवियाँ ऋद्धि-सिद्धियों के रूप में उसके आगे पीछे फिरती हैं और आज्ञानुवर्ती बनकर मिले हुए आदेशों का पालन करती हैं। यह भूलोक सौरमण्डल के समस्त ग्रह-गोलकों से अधिक जीवन्त, सुसम्पन्न और शोभायमान माना जाता है पर भुलाया यह भी नहीं जा सकता कि आदिकाल के इस अनगढ़, ऊबड़-खाबड़ धरातल को आज जैसी सुसज्जित स्थिति तक पहुँचाने का श्रेय केवल मानवी पुरुषार्थ को ही है।
मनुष्य प्रभावशाली तो है, पर साथ ही वह सम्बद्ध वातावरण से प्रभाव भी ग्रहण करता है। दुर्गन्धित साँस लेने से सिर चकराने लगता है और सुगन्धि का प्रभाव शान्ति, प्रसन्नता और प्रफुल्लता प्रदान करता है। बुरे लोगों के बीच, बुराई से संचालित घटनाओं के मध्य समय गुजारने वाले, उनमें रुचि लेने वाला व्यक्ति क्रमशः पतन और पराभव के गर्त में ही गिरता जाता है साथ ही यह भी सही है कि मनीषियों, चरित्रवानों, सत्साहसी लोगों के संपर्क में रहने पर उनका प्रभाव-अनुदान सहज ही खिंचता चला आता है और व्यक्ति को उठाने - गिराने में असाधारण सहायता करता है।
आत्म-विश्वास बड़ी चीज है। वह रस्सी को साँप और साँप का रस्सी बना सकने में समर्थ है। दूसरे लोगों का साथ न मिले, यह हो सकता है, किन्तु अपने चिन्तन, चरित्र और व्यवहार को मनमर्जी के अनुरूप सुधारा -उभारा जा सकता है। संकल्प-शक्ति की विवेचना करने वाले कहते हैं कि वह चट्टान को भी चटका देती है, कठोर को भी नरम बना देती है और उन साधनों को खींच बुलाती है, जिनकी आशा अभिलाषा में जहाँ-तहाँ प्यासे कस्तूरी हिरण की तरह मारा-मारा फिरना पड़ता है।
मनुष्य यदि उतारू हो जाय, तो दुष्कर्म भी कर गुजरता है। आत्महत्या तक के लिए उपाय अपना लेता है, फिर कोई कारण नहीं कि उत्थान का अभिलाषी अभीष्ट अभ्युदय के लिए सरंजाम न जुटा सके? दूसरों पर विश्वास करके उन्हें मित्र-सहयोगी बनाया जा सकता है। श्रद्धा के सहारे पाषाण-प्रतिमा में देवता प्रकट होते देखे गये हैं, फिर कोई कारण नहीं कि अपनी श्रेष्ठता को समझा-उभारा और संजोया जा सके, तो व्यक्ति ऐसी समुन्नत स्थिति तक न पहुँच सके, जिस तक जा पहुँचने वाले हर स्तर की सफलता अर्जित करके दिखाते हैं।
आत्म निरीक्षण को सतर्कतापूर्वक संजोया जाता रहे, तो वे खोटे भी दृष्टिगोचर होती हैं, जो आमतौर से छिपी रहती हैं और सूझ नहीं पड़ती, किन्तु जिस प्रकार दूसरों का छिद्रान्वेषण करने में अभिरुचि रहती है, वैसी ही अपने दोष-दुर्गुणों को बारीकी से खोजा और उन्हें निरस्त करने के लिए समुचित साहस दिखाया जाय, तो कोई कारण नहीं कि उनसे छुटकारा पाने के उपरान्त अपने को समुचित और सुसंस्कृत न बनाया जा सके। इसी प्रकार औरों की अपेक्षा अपने में जो विशिष्टताएँ दीख पड़ती हैं, उन्हें सींचने-संभालने में उत्साहपूर्वक निरत रहा जाय, तो कोई कारण नहीं कि व्यक्तित्व अधिक प्रगतिशील, अधिक प्रतिभा सम्पन्न न बनने की दशा अपनायी जा सके।
इस संदर्भ में सबसे बड़ा सुयोग इन दिनों है, जबकि नव-सृजन के लिए प्रचण्ड वातावरण बन रहा है, उज्ज्वल भविष्य के निर्माण में नियन्ता का सारा ध्यान और प्रयास नियोजित है। ऐसे में हम भी उसके सहभागी बनकर अन्य सत्परिणामों के साथ ही, पर प्रतिभा-परिष्कार का लाभ तो हाथों-हाथ नकद धर्म की तरह प्राप्त होता हुआ सुनिश्चित रूप से अनुभव करेंगे।
सृजन-शिल्पियों के समुदाय को अग्रगामी बनाने में लगी हुई केन्द्रीय शक्ति अपने और दूसरों के अनेकानेक उदाहरण प्रस्तुत करते हुए यह विश्वास दिलाती हैं, कि यह पारस से सटने का समय है, कल्पवृक्ष की छाया में बैठ सकने का अवसर है। प्रभात पर्व में जागरूकता का परिचय देकर हममें से हर किसी को प्रसन्नता, प्रफुल्लता और सफलता भरी उपलब्धियों का भरपूर लाभ मिल सकता है, साथ ही परिष्कृत-प्रतिभायुक्त व्यक्तित्व संजोने का भी।
एक यात्री लम्बे सफर में जाते समय एक बियावान में किसी सुन्दर वृक्ष की घनी छाया में जा पहुँचा। संयोगवश वह कल्पवृक्ष का पेड़ था। उसमें इच्छा करते ही तत्काल कामना पूर्ण करने की शक्ति थी।
यात्री बहुत प्यासा था। उसने इच्छा की कि किसी प्रकार पानी मिलता। देखते देखते शीतल जल से भरी सुराही सामने आई। पीकर तृप्ति लाभ की।
अब इच्छाओं का सिलसिला बढ़ा। भोजन चाहा तो वह भी आ गया। पलंग माँगा तो वह भी प्रस्तुत हुआ। इच्छा की कोई सुन्दर युवती पैर दबाकर थकान उतार देती। देखते-देखते एक अप्सरा आई और उसकी सेवा करने लगी।
यात्री को आश्चर्य हुआ। उसे लगा कि यह किसी देव-दानव का वृक्ष मालूम पड़ता है। ऐसा न हो कि इसका अधिकारी मेरे ऊपर टूट पड़े और सफाया कर दे।
यही हुआ। पेड़ पर से एक दैत्य उतरा और यात्री की गर्दन मरोड़कर रख दी।
मन ही वह कल्पवृक्ष है जो हमारी भली-बुरी इच्छाओं को पूरा करने का ताना-बाना बुनता है और उसी के कारण व्यक्ति उत्थान एवं पतन का भागी बनता है।
महत्त्वाकाँक्षाएँ बड़ी रखने में कोई हर्ज नहीं। ऊँचा उठना, आगे बढ़ना और सफलताएँ प्राप्त करना मनुष्य की स्वाभाविक इच्छा है। वह सही रीति से उपलब्ध होती चलें, तो मनोबल बढ़ता है और प्रगति की दिशा में बहुत कुछ करते बन पड़ता है। ऊँचा लक्ष्य सामने हो तो शारीरिक श्रम और मानसिक उत्साह के उभरने की गुँजाइश भी रहती है।
महत्त्वाकाँक्षा उभरने या उभारने से पहले यह जरूरी है कि उनके औचित्य पर विचार कर लिया जाय। अनुचित होने पर उत्साह भी हानिकारक सिद्ध होता है। अपने गुणों को बढ़ाना उचित है, पर साधनों के लिए इतना लालायित नहीं होना चाहिए, जिनके लिए औचित्य की मर्यादाओं का उल्लंघन करना पड़े।
हर मनुष्य अपने श्रम, उत्साह और विवेक के आधार पर ही ऐसी सफलताएँ प्राप्त कर सकता है, और प्रशंसनीय होने के साथ -साथ दूसरे के औचित्य का अपहरण न करती हों, किसी के मार्ग में बाधक न बनती हों। जो सफलता दूसरों के लिए कष्टकारक हों, उसके अधिकारों का अपहरण करती हों, वह किसी प्रकार पायी तो जा सकती है, पर अन्ततः उसका परिणाम हानिकारक ही होता है। साधन उसी सीमा तक प्राप्त करने चाहिए जिस सीमा तक कि वह प्रामाणिकता को न गँवा दें। जिस सफलता के पीछे कुमार्ग पर चलने के लिए विवश होना पड़े, उसे काठ की हाँडी ही समझना चाहिए, जो दूसरी बार नहीं चढ़ती। अपने कृत्यों से सर्वसाधारण का विश्वास गँवा बैठना इतनी बड़ी हानि है, जिसकी क्षतिपूर्ति फिर अन्य किसी प्रकार नहीं हो सकती।
इस तथ्य को समझते हुए महत्त्वाकाँक्षा जगाने से पहले यह सोच लेना चाहिए कि इस प्रसंग में उन मर्यादाओं का उल्लंघन तो नहीं होता जिनके कारण व्यक्ति विश्वासपात्र बनता है और दूसरे का सहयोग सहज ही अर्जित कर लेता है।
सफलताएँ अपने स्थान पर मूल्यवान हैं। उनके कारण अधिक करने और अधिक आगे बढ़ने की उमंग उठती है, जिसके आधार पर मनुष्य की योग्यता में अभिवृद्धि होती है, पर जब वही योग्यताएँ अप्रामाणिकता को छूने लगती हैं तो जो कमाया है उससे अधिक गँवा दिया जाता है। कुछ चीजें ऐसी हैं, जिन्हें खोकर भी दुबारा प्रयत्नपूर्वक पाया जा सकता है। उदाहरण के लिए धन ऐसी वस्तु है, जो खर्च हो जाने पर नये सिरे से नया परिश्रम करके फिर से कमाया जा सकता है। स्वास्थ्य के संबंध में भी बहुत हद तक यही बात है। अनियमितता अपनाने और आहार-विहार में अनौचित्य बढ़ा लेने से स्वास्थ्य गिरता है। उसमें सुधार होना तब तक नहीं बन पड़ता है जब तक कि भूल न सुधारी जाय और संयम बरतने के लिए मनोबल न जुटाया जाय, अन्यथा प्रकृति जहाँ कठोर है, वहाँ वह दण्ड देना भी जानती है। उसे क्षमा करना आता है, पर उसे पात्रता का ही ध्यान रहता है। जो अपने को सुधारने में कठोर बनता है, प्रकृति उसके लिए दयालु बनती है, पर जो भूल पर भूल करता जाता है, गलतियों को खोजने और उन्हें सुधारने में उपेक्षा बरतता है, उसे किये दण्ड भी भुगतना पड़ता है। प्रकृति के अनेक अनुग्रहों में एक प्रताड़ना भी है। जो लोग अपनी सूझबूझ का उपयोग नहीं करते, परिणामों पर विचार नहीं करते और उद्दण्डतापूर्वक कुछ भी कर गुजरने के लिए उतावले रहते हैं, वे उस विधान से बच नहीं पाते जो ढीठता बरतने वालों के कान उमेठ कर रास्ते पर लाना भी जानती है।
शान्ति और धैर्यपूर्वक चलने के लिए जो अपनी रीति-नीति बना लेते हैं और उन्नति की उत्कंठा बनाये हुए भी औचित्य का ध्यान रखे रहते हैं, वे ही सही समय पर सही मंजिल पूरी कर पाते हैं।
सहन शक्ति की इस दुनिया में कमी नहीं। लोग दूसरों की गलतियों को भी सहन कर लेते हैं और बहुधा क्षमा भी कर देते हैं, किन्तु देखा यह भी गया है कि बात जब आगे तक पहुँचती है तो फिर सृष्टि का वह नियम भी लागू होता है जिसमें ढीठता के अहंकार को नीचे उतारने की व्यवस्था है और बदमाशों की हेकड़ी को रास्ते पर चलने के लिए विवश किया जाता है। अन्य मर्यादाओं का भी ध्यान रखना चाहिए, महत्त्वाकाँक्षाओं की दिशा में कदम बढ़ाते समय भी।
मन को वश में रखने के लिए अध्यात्म प्रसंगों में सदा कहा और दुहराया जाता है। पर यह नहीं बताया जाता कि यह किस प्रकार किया जाय? इसलिए ध्यान, प्राणायाम जैसी विधियाँ बताई जाती हैं। पर देखा गया है कि उन विधाओं को अपनाने पर भी मन एकाग्र नहीं होता, पकड़-पकड़ कर बिठाने पर भी मेंढक की तरह उछल जाता है। क्षण भर का अवसर मिलते ही कहीं से कहीं पहुँचता है। इस पकड़-धकड़ में प्रयत्नकर्ता ही थकता है। मन का तो स्वभाव ही ठहरा। वह पवन की तरह एक जगह स्थिर नहीं रह सकता। पखेरू की तरह उसकी उड़ते रहने जैसी आदत जो है। हिरन को पकड़कर बाँधना उसे हाथ-पाँव तोड़ लेने के लिए बाधित करता है।
मन रस की खोज से मारा मारा फिरता है। उसे उसी की लगन और ललक है। कस्तूरी के हिरन को उस गंध के प्रति अत्यधिक लगाव होता है उसी को खोजने के लिए पाने के लिए वह लालायित होता है। जिधर भी मुँह उठता है, उधर ही दौड़ पड़ता है। यह भाग दौड़ तब तक जारी रहती है जब तक कि उसे गंध के उद्गम का पता नहीं चल जाता।
मन को सरसता चाहिए। ऐसी स्थिति जिसमें रसास्वादन का अवसर मिले। आनन्द की अनुभूति हो। नीरस क्रिया-कलापों में उसे रुचि नहीं हो पाती इसलिए वह अपना अभीष्ट तलाशने दूसरी जगह चल पड़ता है। तितलियाँ, भौंरे जहाँ-तहाँ उड़ते फिरते हैं पर जब उन्हें सुगंध भरे फूल मिल जाते हैं तब शान्ति के साथ स्थिरतापूर्वक बैठ जाते हैं और प्रमुदित होकर समय गुजारते हैं फिर उन्हें उचटने उखड़ने की आवश्यकता नहीं रहती। यहाँ बंधन उसके लिए कारगर होता है कि जिसकी तलाश है उसे उपलब्ध करा दिया जाय। डोरी से जकड़ने पर तो पशु भी अपने हाथ-पैर तुड़ा लेते हैं। विवशता में ही कोई कैद में रहना स्वीकार करता है। हथकड़ी-बेड़ी बैरक, तालों, संतरी आदि की व्यवस्था न हो तो कोई कैदी जेल में रहना स्वीकार न करे। खिड़की खुलते ही तोता पिंजरे से निकल भागता है और फिर पीछे की ओर देखत तक नहीं। यही बात मन के संबंध में भी कही जा सकती है। उसे नीरसता पसंद नहीं, सहन नहीं। इसलिए उसे जिस तिस खूँटे में बाँधने पर भी स्थिरता अपनाते नहीं बनती। उसे उन्मुक्त आकाश के मनोरम दृश्य देखने का चाव जो है।
मन का वश में करने के अनेकानेक लाभ हैं। वह शक्तियों और विभूतियों का पुँज है। जिस काम में भी लगता है उसे जादुई ढंग से पूरा करके रहता है। कलाकार, वैज्ञानिक, सिद्धपुरुष, महामानव, सफल सम्पन्न सभी को वे लाभ मन की एकाग्रता, तन्मयता के आधार पर मिले हुए होते हैं। इस तथ्य को जानने वाले इस कल्पवृक्ष को दूर रखे रहना नहीं चाहते। इस दुधारू गाय को, तुर्की घोड़े को पालने का जी सभी का होता है। पर वह हाथ आये तब न?
आमतौर से कामुकता, जिह्वा स्वाद, सैर-सपाटे विलास वैभव, यश, सम्मान पाने की सभी की इच्छा होती है। उन्हीं को खोजने की मन कल्पनाएँ होती हैं। उन्हीं को खोजने की मन कल्पनाएँ करता और उड़ाने उड़ता रहता है। विकल्प जब दूसरा नहीं दिखता तो उसी कुचक्र में उलझे रहना पड़ता है। जहाज के मस्तूल पर बैठे कौवे को कोई और गन्तव्य भी तो नहीं दीखता। मन को कहीं कोई ऐसा स्थान या ऐसा काम जो उसकी रुचि का हो, सुहाये, मिलना चाहिए।
रुचियाँ बदलती रहती हैं या बदली जा सकती हैं छोटे बच्चे खिलौनों के लिए मचलते हैं। कुछ बड़े होने पर सामर्थ्यों के साथ खेल खिलवाड़ के लिए उत्सुक रहते हैं। युवक होने पर अच्छे नम्बरों से उत्तीर्ण होने की लगन लगती है। तरुण होने पर धन कमाने-गृहस्थ बनने की इच्छा होती है। बूढ़े भजन करते और कथा सुनते हैं। बचपन में बढ़ी हुई स्फूर्ति हर घड़ी कुछ न कुछ करते रहने की उमंग करती रहती थी पर बूढ़े होने पर विश्राम करना और चैन से दिन काटना सुहाता है। यह परिवर्तन बताते हैं कि मन का कोई एक निश्चित रुचि केन्द्र नहीं है। व्यक्तित्व के विकास और परिस्थितियों के परिवर्तन के साथ वह अपना रुझान बदलता रहता है। जमीन के ढलान के अनुरूप नदी-नाले अपनी दिशा मोड़ते और चाल बदलते रहते हैं। मन का भी यही हाल है। वह चट्टान की तरह हठीला नहीं, मिट्टी की तरह उसे गीला किया जा सकता है और चतुर कुम्हार की तरह उसे किसी भी ढाँचे में ढाला जा सकता है। मन को चालू गाड़ी की तरह किसी भी सड़क पर चलाया जा सकता है। इस बदलाव में आरंभिक अड़चनें तो आती हैं पर सिखाने, साधने पर वह सरकस के जानवरों की तरह ऐसे तमाशे दिखाने लगता है जो उसकी जन्मजात प्रकृति के अनुरूप नहीं होते। मन को भी इसी प्रकार एक दिशा से दूसरी दिशा में ले जाया जा सकता है। एक प्रकार के अभ्यास से विरत करके दूसरे प्रकार के स्वभाव का बनाया जा सकता है।
जंगली वन्य पशु अनाड़ियों की तरह भटकते हैं पर जब वे पालतू बन जाते हैं तो मालिक की इच्छानुसार अपनी गतिविधियों को बदल देते हैं। मन के सम्बन्ध में भी यही बात कही जा सकती है। उसकी रंगीली उड़ाने वासना, तृष्णा की जन्म जन्मान्तरों से अभ्यस्त रही हैं इसलिए इस जन्म में भी वह पुराना, पहचाना मार्ग ही जाना-पहचाना समझ-बूझा लगता है। इसलिए स्वेच्छाचार के लिए वह आतुर फिरता है किन्तु मनुष्य पर अनेक बंधन हैं। पशुओं की तरह वह कुछ भी कर गुजरने के लिए स्वतंत्र नहीं है। मर्यादाएँ, वर्जनाएँ और जिम्मेदारियाँ एक सीमा तक ही सीमित रहने के लिए उसे विवश करती हैं इसलिए वह एक जगह काम न बनता देखकर दूसरी जगह दौड़ता है। मृगतृष्णा में भटकने वाले हिरन की तरह उसकी कुलाचें मार्ग-कुमार्ग पर भटकती रहती हैं। कल्पनाओं के अम्बार छाये रहते हैं। बन्दर जैसी उछल-कूद जारी रहती है। किसी डाली पर देर तक बैठे रहने की अपेक्षा उसे जिस-तिस का रंग-ढंग देखने और उन्हें हिलाने पर मिलने वाले चित्र-विचित्र अनुभव की तरह विभिन्नताएँ और विचित्रताएँ देखने की उमंग उठती रहती है। यही है मन की भगदड़, जिसे रोकने के लिए मूलभूत आधार बदलने की आवश्यकता पड़ती है।
मन का केन्द्र बदला जा सकता है। पशु प्रवृत्तियों की पगडण्डियाँ उसकी देखी-भाली हैं। पर मानवी गरिमा का स्वरूप समझने और उसके शानदार प्रतिफल का अनुमान लगाने का अवसर तो उसे इसी बार इसी शरीर में मिला है। इसलिए अजनबी मन की अड़चन होते हुए भी तर्क, तथ्य, प्रमाण उदाहरणों के सहारे उसे यह समझाया जताया जा सकता है कि पशु प्रवृत्तियों की तुलना में मानवी गरिमा की कितनी अधिक श्रेष्ठता है। दूरदर्शी विवेक के आधार पर यह निर्णय, निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि आदर्शवादिता और कर्तव्य परायणता अपनाने पर उसके कितने उच्चस्तरीय परिणाम प्रस्तुत हो सकते हैं।
पुराने ढंग की ईश्वर भक्ति में मन लगाने और साधनाओं में रुचि लेने के लिए परामर्श दिया जाता है किन्तु पुरातन तत्त्वज्ञान को हृदयंगम कराये बिना उस दिशा में न तो विश्वास जमता है और न मन टिकता है। बदली हुई परिस्थितियों में हम कर्मयोग को ईश्वर प्राप्ति का आधार मान सकते हैं। कर्तव्य को, संयम को, पुण्य परमार्थ को ईश्वर का निराकार रूप मान सकते हैं। कामों के साथ आदर्शवादिता का समावेश रखा जा सके तो वह सम्मिश्रण इतना मधुर एवं सरस बन जाता है कि उस पर मन टिक सके। बया अपने घोंसले को प्रतिष्ठा का प्रश्न मानकर तन्मयतापूर्वक बनाती है। हम भी अपने क्रिया–कलापों में मानवी गरिमा एवं सेवा भावना का समावेश रखें तो उस केन्द्र पर भी मन की तादात्म्यता स्थिर हो सकती है। मन को निश्चित ही निग्रहित किया जा सकता है।
खरगोशों ने हाथी को देखा तो उन्हें डर भी लगा और ईर्ष्या भी हुई। वे सोचने लगे हाथी वाले जंगल में हम किस मुँह से रहें।
एक दिन खरगोश तालाब में पानी पीने गये तो देखा कि उसके अन्दर छोटे-छोटे मेंढक उछल-कूद कर रहे हैं, मौज मना रहे हैं।
खरगोश ने सोचा जब इतने छोटे मेंढक इतनी खुशी से रह सकते हैं। हमसे नहीं डरते तो हमें ही क्यों बड़े जानवर से डरना चाहिए?
स्वर्ग में देवताओं की सुरक्षा में अमृत कलश है। इस कथन की व्यावहारिक संगति इस तरह बिठाई जाती है कि मस्तिष्क स्वर्ग है। उसमें ब्रह्मरंध्र को अमृत कलश समझा जाता है। उससे नीचे की ओर जो रस टपकता है वह सोमरस है। मनुष्य लोक का अमृत यही है।
साधारणतया मुख क्षेत्र में रासायनिक स्राव चलते रहते हैं। उनसे मुख गीला बना रहता है और अपने जिम्मे के कार्यों को ठीक तरह संचालित करने में समर्थ रहता है। यह स्राव न निकले तो मुँह सूख जाय। बोलते-खाते न बने। गला चटखने लगे। भोजन करते समय इन रसों के प्रवाह में तीव्रता आती है। ग्रास में उसका समुचित सम्मिश्रण हो जाने पर वह सुपाच्य भी बन जाता है और गले में नीचे सरलतापूर्वक खिसक भी जाता है। मोटी जानकारी के हिसाब में शरीर विज्ञानी इतना ही इस रस का उपयोग बता पाते हैं और उसकी उपयोगिता स्वीकार करते हैं।
किन्तु अध्यात्म विधा के आधार पर वह स्राव मात्र उच्चारण और पाचन की जिम्मेदारी निबाह सकने की स्थिति में मुख गह्वर को बनाये नहीं रहते, वरन् एक विशेष प्रकार के हारमोन स्तर के अनुदानों की आवश्यकता भी पूरी करते हैं। वे समूचे पाचन तंत्र को प्रभावित करते हैं और मस्तिष्क की जड़ों को उलट कर सींचते भी रहते हैं। मुँह सूखने लगे तो तीव्र ज्वर अथवा भय आतंक का बोध होता है। इन स्रावों के अभाव में मनुष्य जीवित भी नहीं रह सकता।
इनकी मात्रा बढ़ जाने से जीवनी शक्ति बढ़ती है और मस्तिष्क को उत्तेजना मिलती है। पान, सुपाड़ी, इलायची आदि मुँह में डाले रहने का प्रभाव यही समझा जाता है कि मस्तिष्कीय स्राव अधिक मात्रा में निकलने लगे और उनके कारण उत्साह एवं क्रियाशीलता का दौर बना रहे। इस निमित्त कई व्यक्ति तम्बाकू भी खाते हैं। पर वे यह भूल जाते हैं कि इस प्रकार के कृत्रिम दोहन में अक्षय के सूखने जैसी कितनी ही हानियाँ भी होती हैं।
इन स्रावों की मात्रा एवं गुणवत्ता बढ़ाने के लिए इतना ही पर्याप्त है कि उस ओर ध्यान दिया जाय। रसों के स्राव एवं उसकी गुणवत्ता पर विश्वास किया जाय। इतने भर से एक अन्तःस्रावी टानिक का लाभ मिलने लगेगा। उसका शारीरिक ही नहीं मानसिक स्वास्थ्य पर भी असर पड़ेगा। अध्यात्म संदर्भ में यह टानिक सोमरस है। उससे मानवी सत्ता के अन्तराल तक प्रभाव पहुँचता है जिससे जीवनी शक्ति बढ़ने के बहुमुखी प्रभाव परिलक्षित होते देखे जाते हैं।
दैवी भागवत् और शिव संहिता में बताया गया है कि कुण्डलिनी जागरण में बाधा पड़ने के विशेष व्यवधान खेचरी मुद्रा का अभ्यास न होना है। यदि उसे आरम्भ में ही सम्पन्न कर लिया जाय तो आगे चलकर कठिनाई न पड़े।
योग रसायन में यह कहा गया है कि मुख गह्वर में लघु कुण्डलिनी है जिसे खेचरी मुद्रा द्वारा जाग्रत किया जाता है। इसके लाभ भी न्यूनाधिक मात्रा में वैसे ही हैं जैसे विशाल कुण्डलिनी के जागरण में मिलते हैं।
योग सूत्र में लिखा है - तालु के ऊर्ध्व भाग महत् ज्योति का निवास है। उसके दिव्य दर्शन से सिद्धियों की प्राप्ति होती है।
घेरण्ड संहिता में उल्लेख है कि - खेचरी विद्या से शरीर सौंदर्यवान बनता है। समाधि का आनन्द मिलता है। दिव्य रसों की अनुभूति होती है। यह साधना परम श्रेयस्कर है।
शिव संहिता का कथन है कि - खेचरी मुद्रा का साधक आत्मनिष्ठ हो जाता है। पाप मुक्त हो वह परमगति को पाता है। मनोलय और ब्रह्मलीन होने के समाधि स्तर के लाभ मिलते हैं।
दैवी भागवत् का कथन है कि - “अमृतधारा, सोमवाहिनी- खेचरी तालु देश में कुण्डलिनी बन कर निवास करती है। इस रहस्य को जानने वाले सरलतापूर्वक बड़ी उपलब्धि प्राप्त करते हैं।
जिह्वा मूल में जो ऋणात्मक शक्ति है उसे नारी स्तर की कहा गया है और तालु का काक चंचु नर स्तर का प्राण है। इनका मिलन विषयानन्द और ब्रह्मानंद का सम्मिश्रण है। कुण्डलिनी जागरण में भी यह प्रक्रिया कार्यान्वित होती है।
कुण्डलिनी में कामेन्द्रिय को नियन्त्रित करके ऊर्ध्वगामी बनाने की प्रक्रिया है। खेचरी मुद्रा में रसना इन्द्रिय को परिमार्जित किया जाता है। रस के दो ही केन्द्र हैं एक स्वादेन्द्रिय दूसरा कामेन्द्रिय। कामेन्द्रिय को काबू में लाने से पूर्व जिह्वा की रसना शक्ति पर नियन्त्रण करना होता है। दोनों के आकार भी लगभग एक जैसे ही हैं और स्वाद में भी तनिक सा ही अन्तर है। इन दोनों में ही विलासिता की अति रहती है। दोनों की शारीरिक मानसिक क्षमताओं का असाधारण क्षरण करती हैं। इसलिए रस तन्मात्रा की उच्छृंखलता को नियन्त्रित करके इन्द्रिय निग्रह का उद्देश्य पूरा करना पड़ता है। जिह्वा के तालू भाग से स्रवित होने वाले सोमरस से सम्बन्ध जोड़ कर उसे स्वाद से सम्बन्धित मर्यादाओं का पालन करने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है। साथी ही उच्चारण में मधुरता, शिष्टता, नम्रता का समावेश रखने के लिए कहा जाता है। द्रौपदी के मुख से कौरवों के लिए व्यंग्य उपहास अपमान भरे शब्द निकल आये थे। उसका परिणाम महाभारत हुआ और द्रौपदी को अपने पाँच पुत्रों से हाथ धोना पड़ा। जिह्वा इन्द्रिय दसों इन्द्रियों में मूर्धन्य है, उसमें समाविष्ट शिष्टता और अशिष्टता के भले बुरे परिणाम मनुष्य को जीवन भर भोगने पड़ते हैं। इसलिए उसे सोमरस का रसास्वादन कराते हुए सज्जनोचित नम्रता के साथ उच्चारण करने की कला सिखायी जाती है।
तालु क्षेत्र को धन विद्युत का भण्डार कहा गया है। सर्वविदित है कि ऋण और धन प्रवाहों के संयुक्त हो जाने पर विद्युत धारा चल पड़ती है। वह जहाँ भी पहुँचती है वहाँ स्थिति के अनुरूप हलचल उत्पन्न करती है। मस्तिष्क क्षेत्र में जाकर उसके कार्य चिन्तन में उत्कृष्टता का और बुद्धि में तीक्ष्णता का समावेश संवर्धन होता है।
इतना ही नहीं प्रतिभा के अनेक केन्द्रों का स्थान जिस क्षेत्र में है, उसको इस तालु घर्षण में उत्तेजना मिलती है और साधक अपेक्षाकृत अधिक बुद्धिमान अधिक सूक्ष्मदर्शी बनने लगता है।
आत्मा का परमात्मा से मिलन जिस ब्रह्मरंध्र सहस्रार के साथ होता है, उसका समीपस्थ स्थान यह तालु भाग ही है। वहाँ सब कुछ प्रसुप्त निष्क्रिय पड़ा रहता है, पर खेचरी मुद्रा की रगड़ से पेण्डुलम जैसी गति उत्पन्न होती है और आत्मा को परमात्मा से - परमात्मा को आत्मा से लिपटने के लिए उत्तेजित करती है। यह उत्तेजना ब्रह्म मिलन ईश्वर सान्निध्य में अतीव सहायक सिद्ध होती है।
रगड़ से आगे बढ़ने और पीछे हटने की दो क्रियायें होती हैं। तत्व दर्शन में इसकी विवेचना इस प्रकार की गयी है कि साधक अवांछनीय दुष्प्रवृत्तियों से पीछे हटता और सत्प्रवृत्तियाँ अपनाने
इसके दो परिणाम और भी हैं - एक उत्साह दूसरा उल्लास। शरीर उत्साह के अभाव में आलसी अनपढ़ बनता है और मन में उल्लास न हो तो वह मन्दमति, प्रमादी, अदूरदर्शी बनता है। इन दोनों दुर्भाग्यों को दूर करने में खेचरी मुद्रा दैवी वरदान जैसी सिद्ध होती है।
मन्दिरों में शंख और घड़ियाल गिरजाघरों में घण्टियाँ, मसजिदों में अजान के स्वर गूँजे। सभी धर्मावलम्बी अपने-अपने पूजा स्थलों की ओर चल पड़े।
मस्जिद की मीनार, गुरुद्वारे का निशान साहिब, मन्दिर की गुम्बद और गिरजाघर का क्रास भक्तों की भीड़ को आता देख आपस में विस्मय की मुद्रा में मुस्कराये।
मस्जिद की मीनार ने निशान साहिब, गुम्बद और क्रास से कहा - “भाई साहब ये इंसान भी क्या खूब हैं? यह सारी भीड़ अभी अपने अपने पूजाघरों में जाकर भगवान के सामने बड़ी भोली बनकर स्तोत्र, आयत, कविताएँ गाएगी, परवरदिगार से दुआ करेगी कि हमसे कोई नासमझी न बन पड़े। गलत काम न हो जाय। हमारी नीयत साफ रहे, नेक इंसान बनें, फिर न जाने इसे पूजाघर के बाहर क्या हो जाता है। तब इंसान का दूसरा मुखौटा होता है। भोला बनने वाला वही इंसान शोषक बन जाता है और सजातीय मनुष्यों का गला काटने से भी नहीं चूकता।”
मंदिर के गुम्बद ने कहा -”चुप रह बहिन! धीरे बोल। यदि इन मनुष्यों ने सुन लिया तो तेरी-मेरी और इन सब पूजाघरों की खैर नहीं। यह इंसान बड़ा जिद्दी है। यह अपने को छोड़कर सब को मूर्ख समझता है। इससे सच्ची बात सहन नहीं होती। यही इसकी आज की दुर्गति का कारण है।
की दिशा में आगे बढ़ता है। उस अनौचित्य के परित्याग और औचित्य के अवधारण का परिणाम आत्मिक प्रगति के रूप में सामने आता है। उस महान प्रयोजन की पूर्ति में खेचरी मुद्रा जितनी सहायता करती है उतनी और कोई प्रक्रिया नहीं।
पिता का स्वप्न टूट गया। सगे-सम्बन्धी अवाक् थे। मित्र-परिचित हतप्रभ रह गये उनके निर्णय पर। अभी भी विश्वास नहीं हो पा रहा था ऐसा भी हो सकता है कोई ऐसा भी कर सकता है। वह भी आज के जमाने में - जबकि धन, पद, स्वार्थ लूटने के लिए अफरा-तफरी मची हो। ऐसी आर्थिक स्थिति में यह सोच। पर सोच तो सोच है - उसका बाह्य दशाओं से कुछ ज्यादा रिश्ता नहीं। यह तो मन के खेत में उपजने वाली फसल है, जिसका अच्छा या बुरा होना खेत, संस्कारों के बीज और विचारों को खाद-पानी पर निर्भर करता है।
साधारण शिक्षक पिता- जैसे-तैसे घर का गुजारा चला पाते थे। पिता अपनी बड़ी सन्तान से बहुत आशाएँ संजोता है। सोचता है, यह उसका भार बटायेगा। साँसारिक दायित्वों में सहयोगी बनेगा। और जा जब .............।
तुलेन्द्र! एक मित्र ने उनका कन्धा झकझोरा- होश में तो हो।
“मैं तो ऐसा ही सोचता हूँ।” शब्दों के साथ एक गहरी मुसकान देखकर ऐसा लगा- जैसे ओस से भीगे गुलाब ने अपनी पंखुड़ियाँ बिखेर दी हों।
“जरा सोचा- काका ने कितनी मुसीबत सहकर तुम्हें पढ़ाया है? क्या उसका यही परिणाम होना था? कहने वाला सही कह रहा था। कथन के साथ ही उनके अहसास के तार झनझना उठे। अभाव का कष्ट कितना मर्मान्तक होता है, इसकी उन्हें निजी अनुभूति थी। विद्यार्थी मित्र ने कहा तुलेन्द्र! उच्च शिक्षा इतने कम पैसे में भी - सपना हो सकती है - सच्चाई नहीं। उनका उत्तर होता - परिश्रमशील कम पैसे में भी अपना काम चला लेते हैं। अभाव उनकी विकास यात्रा में बाधक नहीं बनता।
और सचमुच वह दिन आज भी याद आता है - जब उनने प्रथम श्रेणी में मैट्रिक उत्तीर्ण किया। फिर तो जैसे सिलसिला चल निकला। 1941 में नागपुर विश्वविद्यालय से बी. एस. सी. प्रथम श्रेणी उत्तीर्ण कर मेरिट में द्वितीय स्थान प्राप्त किया। इसके बाद तो जैसे हद हो गई - एम. एस. सी. (गणित) और आई. ए. एस.) दोनों में एक साथ आश्चर्यजनक सफलता। एम. एस. सी. में विश्वविद्यालय में प्रथम स्थान आने के कारण स्वर्णपदक मिला। साथ ही आई. ए. एस. में प्रथम स्थान की प्राप्ति के कारण उच्चाधिकारी की कुर्सी उनकी बाट जोह रही थी।
ऐसे में उभरा उनका निश्चय - उच्च प्रशासनिक पद को ठुकराने और आत्म परिष्कार एवं लोक सेवा के व्रत में व्रती होने का। मन से यादों की पूरी भीड़ सी गुजर गई। सामने बैठे मित्रगण उनको मौन देखकर सोच रहे थे - शायद अभी निश्चय में उलट फेर हो जाय। पर कहाँ?
इसके पीछे तो उनकी दीर्घकालीन साधना थी, वह सतत् अभ्यास था - जिसके द्वारा मन को प्रशिक्षित किया था। साधना क्या है? संस्कारों, आदतों- चिन्तन का नए सिरे से गठन। बेतरतीब उछल-कूद करने वाले मन का प्रशिक्षण। इसे किये बिना उच्चतर जीवन के लिए कदम बढ़ाना कहाँ सम्भव है? विद्यार्थी जीवन में यही तो किया था - उनने। जब सब विद्यार्थी उपन्यास, कहानियों और फिल्मी जीवन का आनन्द ले रहे होते, उस समय वह उपनिषदों का चिन्तन करते अथवा नागपुर रामकृष्ण मठ के साधुओं का सत्संग।
सद्विचारों के इसी सतत् प्रवाह ने उनको निष्कल्मष बनाया था। जीवन यात्रा के कितने कटु, तिक्त, मृदु अनुभवों से गुजरना पड़ा है उनको।
क्या सोचने लगे? कुछ तो समझो जिन्दगी को। मित्र ने फिर कुरेदा। उसकी वाणी ने उन्हें अतीत के सागर से उबार कर वर्तमान की धरती पर ला पटका। वह कह रहा था - यह भी कोई उम्र है, धर्म - साधने की।
“फिर कौन सी उम्र होती है धर्म साधने की? कुछ तुम्हीं समझाओ।” उन्होंने हँसते हुए पूछा।
अरे भाई! कलक्टर तो तुम हो ही जाओगे, बढ़िया शादी करना। काका का वंश चलेगा। ऐशो-आराम ठाठ-बाठ में उनकी भी जिन्दगी मजे से कटेगी। बुढ़ापे में धर्म भी कर लेना। उसने कुछ इस अन्दाज में कहा- जैसे धर्म अध्यात्म निहायत गैर जरूरी काम हों।
अच्छा! उनने आश्चर्य के अन्दाज में आँखें पसारी- अरे! पहले क्यों नहीं बताया? पहले समझाते तो शायद स्वामी विवेकानन्द, की बातें न मानकर तुम लोगों की ही मान लेता।
उपेक्षा ओर हँसी के बीच कही गई इन बातों से समझाने वाले का उत्साह मन्द नहीं पड़ा। हाँ उनके भाई अवश्य बिना कुछ बोले गम्भीरता से सुन रहे थे। इनको अपने बड़े भाई पर अटूट श्रद्धा थी। उनकी चारित्रिक दृढ़ता, तपस्वी जीवन इनके, बनने होने की सोचते थे।
बात हँसने की नहीं रामेश्वर, फिर से विचार करो इतना बड़ा ओहदा बार बार नहीं मिलता वह समझाने पर तुला था। जैसे तैसे उन्हें घर ले जाने के लिए आया था।
ओहदा - पद- यही सब है या और कुछ एक विरक्तिपूर्ण मुसकान उभरी और वातावरण में लीन हो गई पटवारी कलक्टर, मिनिस्टर, नेता हिन्दू मुसलमान, क्रिश्चियन सभी कुछ है, नहीं है तो सिर्फ इंसान। पदों की भीड़ में मनुष्य खो गया। हर कोई भूल गया कि वह मनुष्य खो गया हर कोई भूल गया कि वह मनुष्य है और इस नाते भी उसका कुछ कर्तव्य बनता है।
सुन रहे व्यक्ति ने चकित नेत्रों से उसकी ओर ताका। अब उसकी समझाने की शक्ति मन्द पड़ती जा रही थी। अपनी अक्ल उसे बोझिल लगने लगी थी।
“मनुष्य की जिन्दगी क्या है?” आस पास मठ के कुछ और ब्रह्मचारी खिसक आए थे। उनमें से एक सवाल उनकी ओर उछाला।
जिन्दगी एक चुनौती है, एक संग्राम है एक जोखिम है, उसे इसी रूप में अंगीकार किए बिना कोई चारा नहीं। वाणी के घट से छलकते यह वाक्य सूचित कर रहें थे कि यह परिभाषा उनकी स्वयं की अनुभूति है।
पता नहीं कैसे -उनके अन्तिम शब्द पास से गुजर रहें एक संन्यासी के कानों में पड़ गये। वह एक क्षण ठिठक कर बोले-जीवन को जोखिम मत- समझो। यह तो पंचम स्वर में गाया जाने वाला गीत है वह स्वप्न है जिसमें अपने को खोकर आनन्द का रसास्वादन किया जा सकता है। वह अवसर है जिसे गँवाया तो सब कुछ गुम। जीवन आनन्द है, प्रेम है, सौंदर्य है। वह सब कुछ है जो नियंता की इस सुविस्तृत सृष्टि में सर्वोत्तम कहा जाने योग्य है।” कहते हुए वह हवा की तरह एक ओर चले गये। छूट गयी एक सुवास जिसने उपस्थित लोगों के चिन्तन को मधुर गन्ध से भर दिया।
सभी चुप थे। कोई कहे तो क्या? घर वापस न लौटने का उनका निश्चय अटल था। ‘आत्मनो मोक्षार्थ - जगदा हिताय च’ के महान उद्देश्य के लिए वह समर्पित थे। आई. ए. एस. के पद से मनुष्य का पद बड़ा था - उनके लिए।
“भैया हम लोगों के लिए कोई आदेश, घर-परिवार के लिए कोई सन्देश?” दोनों भाइयों ने लगभग साथ-साथ कहा।
आत्मविश्वास और भविष्य के प्रति अटूट आशा यह दो साधन ऐसे हैं जिनके सहारे मनुष्य संकट की चुनौतियों को उज्ज्वल भविष्य में बदल सकता है।
“भाई अब मेरा अपना कुछ भी नहीं है, या इस पृथ्वी पर सब कुछ मेरा ही है। मैं यह भूल गया हूँ कि और घरों के बीच कभी मेरा भी एक घर था। जिसका कोई घर बार नहीं, उसकी की सारी दुनिया घर है। जिसने जीवन के बन्धनों को काट डाला है, उसी के हिस्से में सच्चा जीवन आया है। जो अबोध है, उसकी को पूर्ण शान्ति है। मेरी केवल यही इच्छा है श्री श्री ठाकुर मुझे अपना यंत्र बनायें और मैं मृत्यु के क्षण तक लोकहित में समर्पित रहूँ। इसी में मुझे जिन्दगी की सार्थकता अनुभव हो रही है।
“और तुम लोग एक क्षण के लिए पास खड़े सहोदर अनुजों की ओर देखा और बोले - “तुम्हारे लिए भी यही पथ खुला है।”
लोकहित में समर्पण को जीव की सार्थकता मानने वाले साधक थे - स्वामी आत्मानन्द। जिन्होंने मध्य प्रदेश के आदिवासी ग्रामीण अंचल को अपना कार्यक्षेत्र बना कर, असंख्यों के अन्तःकरण श्री रामकृष्ण देव के विचारों के प्रकाश से प्रकाशित किये। मानवीय भावनाओं की इस ज्योति ने पिछले वर्ष भले शरीर - छोड़ दिया हो, पर उसकी अमर सम्वेदना यथावत है।
ईश्वर सर्वव्यापी हो अथवा एक स्थान पर वास करने वाला। यह विश्व ब्रह्माण्ड उसकी कृति हो या किसी अन्य की। वह सर्वसमर्थ हो, चाहे निर्बल। ससीम हो या असीम। प्रश्न यह उठता है कि आस्तिकता की मानवी जीवन में क्या उपयोगिता है? वह मनुष्य के लिए क्यों आवश्यक है? क्या इसके बिना मनुष्य सुखी नहीं रह सकता? यदि ऐसी बात है, तो संसार में ढेरों ऐसे व्यक्ति मिल जायेंगे, जिनका ईश्वर पर विश्वास नहीं है, जो अनीश्वरवाद का समर्थन करते हैं, तो क्या उन्हें जीवन भर दुख ही दुख भोगना पड़ता है?
आये दिन विश्व के मूर्धन्य कहे जाने वाले मनीषियों द्वारा इस प्रकार के प्रश्न उठाये जाते रहे हैं और आस्तिकता की महत्ता पर प्रश्न -चिन्ह लगाया जाता है। देखा जाय तो इसमें इनका भी कैसे इनकार किया जाय? शरीर के की जाय? हाँ, इतना आवश्यक है कि प्रत्यक्षवाद को ही सब कुछ नहीं माना जाना चाहिए। गलती यही होती है। जो लोग अपने भौतिक जीवन को ही सब कुछ मान बैठे हैं उनके लिए इस प्रकार के मन में “ भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरामनम कृत “ की बात आयी होगी, पर जो परोक्षवाद पर विश्वास करते और भौतिक जीवन से परे भी है, उनके लिए इतने से ही काम नहीं चलता उन्हें कुछ और प्रश्नों के पर विचार करना पड़ता है कि “ मैं कौन हूँ? कहाँ से आया हूँ और मेरा लक्ष्य क्या है?”
इन प्रश्नों पर विचार करने से निश्चय ही आस्तिकता की महत्ता जीवन में समझ में आ जाती है, मगर कार्लाइल का विचार है कि मनुष्य के अस्तित्व में आने से लेकर अब तक वह इन्हीं प्रश्नों की ऊहापोह में पड़ा हुआ है, फिर फिजूल के जाल-जंजाल में पड़ कर अपना बहुमूल्य समय गँवाना और स्वल्प जीवन को बरबाद कर उसके आनन्द लाभ से वंचित होना, किसी भी प्रकार बुद्धिमानी नहीं कही जा सकती है। उनका विचार है कि "मैं कौन हूँ?” इस पर मनन करने के बजाय, “मुझे क्या करना चाहिए?” इस पर विचार करना चाहिए?” कुछ क्षण के लिए कार्लाइल का यहाँ सुझाव मान भी लिया जाय, तो क्या बिना आत्मबोध और स्वरूपबोध के कर्तव्यबोध कर पाना संभव है? कदाचित् नहीं। जब गन्तव्य ही न मालूम हो, तो कोई कदम किस ओर बढ़ायेगा?
स्वयं को सही - सही न जानने की स्थिति में मनुष्य कर्तव्य- अकर्तव्य के बीच विभेद नहीं कर पाता और जिसकी रुचि जिस प्रकार की होती है, स्वतंत्रतापूर्वक वह उसी प्रकार का कार्य करने लगता है। व्यभिचार करता और अपराधी अपराध वृत्ति में संलग्न होकर लोगों को सताता, प्रताड़ित करता है। फलतः समाज व्यवस्था भंग होती है, पर जब उसे अपने स्वरूप और स्रष्टा के में संलग्न रहने का साहस नहीं संजों पाता।
उदाहरणार्थ किसी कार्यरत लिपिक को मालूम होता है, कि उसके जिम्मे निर्धारित कार्य क्या है और वह उन्हें करने के लिए बाध्य है, चाहे इनमें उसका मन लगे या न लगें, उसकी अपनी मर्जी यहाँ नहीं चल सकती। चूँकि उसे ज्ञात होता है कि यदि वह अपनी मर्जी की करने की धृष्टता करेगा तो सजा का पात्र बनेगा उसे किसी न किसी प्रकार की सजा अवश्य मिलेगी या तो आर्थिक दण्ड भुगतना पड़ेगा अथवा नौकरी से हाथ धोना पड़ेगा, अतः वह उसी कार्य के नियमपूर्वक करता रहता है, जो अधिकारी की ओर से उसे मिलता है। ईश्वरीय सत्ता की ओर से मनुष्य के लिए भी इस संसार में ऐसी ही नियम व्यवस्था है। जब मनुष्य इस व्यवस्था को भंग करने की कोशिश करता है तो परमसत्ता की दृष्टि में अपराधी साबित होता है तो फलतः उसका दण्ड भी झेलना पड़ता है। इस दण्ड से वह तभी बच सकता है, जब स्वयं को समझें, अपना जन्म धारण करने का उद्देश्य जाने और उसके अनुरूप कार्य करे। ऐसा तभी संभव है, जब व्यक्ति आस्तिकता को जीवन में धारण और सृष्टि की नियामक सत्ता पर विश्वास कर सके। यह जान सके कि वह स्वयं भी अविनाशी आत्मा है, परमपिता परमात्मा का अंशधर है।
मरणधर्मी शरीर तो कलेवर मात्र है, जो समय-समय पर बदलता रहता है। वस्त्र के जीर्ण शीर्ण पड़ जाने पर उसे त्यागना और नया वस्त्र धारण करना पड़ता है, पर इस परिवर्तन की क्रिया से शरीर प्रभावित होता हो, ऐसा कहाँ देखने -सुनने में आता है। शरीर तो यथावत बना रहता है। इसी प्रकार का संबंध शरीर और आत्मा के बीच है। शरीर के बदलते रहने पर भी मूल सत ज्यों की त्यों बनी रहती है जिन्हें यह तथ्य विदित है, और जो कर्मफल सिद्धान्त पर विश्वास करते हैं, वे अपना कार्य भी मानवी गरिमा के अनुरूप निर्धारित करते है, स्वयं शालीनतापूर्वक सच्चे इंसान की तरह जीते और दूसरों को भी इसी की प्रेरणा देते है। ऐसे ही लोगों की संख्या जब धरित्री पर बढ़ती है तो धरती स्वर्गोपम बनती और मनुष्य देवमानव होने का गौरव प्राप्त करता है, इससे जहाँ मानव अपने परम लक्ष्य को शीघ्रातिशीघ्र पा सकने में सफल होता है, वहीं दूसरी ओर संसार में हर प्रकार की सुख - शान्ति बनी रहती है। आस्तिकता का यही सबसे बड़ा लाभ है।
जो अनीश्वरवाद के समर्थक है, वह किसी अदृश्य सत्ता पर क्यों कर विश्वास करेंगे और क्यों कर वह उससे डरेंगे? स्पष्ट है, ऐसे लोगों के क्रिया−कलाप स्वतंत्र होंगे। जिनकी जो इच्छा होगी, निरंकुश शासक की तरह करते रहेंगे। न वर्जनाओं का ध्यान रहेगा न उच्छृंखलताओं का। न दण्ड व्यवस्था की चिन्ता होगी, न किसी के भय का खयाल होगा। परिणाम सर्वग्राही विभीषिका रूप में अपना आदि अन्त मानते है, वह निश्चय ही हर प्रकार की साधन सुविधा एकत्रित कर जीवन का भरपूर उपभोग करना चाहेंगे चाहे इस प्रक्रिया में उन्हें अनीति - अत्याचार का ही सहारा क्यों न लेना पड़े? पर वे ऐसा करेंगे अवश्य। यह अनीश्वरवादी भोगवादी नीति का दोष हैं।
चार्वाक और जे.एस. मिल दोनों ही इस प्रकार की भोगवादी मान्यता के समर्थक और अनीश्वरवाद के प्रशंसक रहें हैं, तो दूसरे का समूहवाद पर। जे. एस. मिल के समाज में अधिकतम मनुष्यों को अधिक से अधिक सुख दिलाना ही मात्र उद्देश्य होता है, पर सुखी समाज की यह कल्पना भी सर्वांगपूर्ण नहीं है, क्योंकि इस सुख की नींव कुकृत्यों रूपी आधारशिला पर भी रखी जा सकती है। यदि सुख दूसरों को कष्ट देकर ही मिलता है तो कोई क्यों कर परोपकार में निरत होगा क्योंकि उसका परिणाम तो तुरन्त मिलना भी नहीं है।
आस्तिकवाद ऐसे में आश्वासन देता है कि मृत्यु जीवन का अन्त नहीं है। हर व्यक्ति को अपने किये उपकार का बदला निश्चित ही आत्म संतोष एवं लोक सम्मान -दैवी अनुग्रह के रूप में इसी जन्म में तथा अगले जन्म में भिन्न रूपों में मिलकर ही रहता है। भगवद् सत्ता में पुण्य कार्यों का पारितोषिक निश्चित ही प्रदान करती है जो लौकिक भी हो सकता है, आत्मिक प्रगति के रूप में परोक्ष भी! इस पर भोगवादी नास्तिक कह सकते हैं कि यह भी तो एक प्रकार के लाभ हैं, तो ईश्वर विश्वास से अर्जित तथा अनीश्वरवादी लाभ में क्या अन्तर रहा? इस प्रकार का प्रश्न करने वाले वस्तुतः यह भूल जाते है, जिसकी गति सिर्फ इसी संसार तक सीमित है, पर ईश्वरवादियों का आधारित है। ऐसे लोगों को भौतिक संसार में श्रेय, सम्मान, श्रद्धा का सुख तो प्राप्त होता ही है, वे स्वर्ग, मुक्ति, शान्ति का आनन्द भी परलोक में उठाते है। यही मनुष्य का चरम लक्ष्य भी है।
इस प्रकार विचार किया जाय, तो नास्तिकता के कारण मनुष्य- जीवन अधूरा प्रतीत होता है। आस्था के अभाव में व्यक्ति न तो आनन्द की प्राप्ति कर सकता है, न चरम लक्ष्य की ओर बढ़ सकता है।
दो हजार वर्ष पूर्व चीन के महान दार्शनिक लाओत्जू ताओ ते चिंग ने कहा कि ‘ जो जानता है वह बोलता नहीं और जो बोलता है उसे ज्ञान नहीं।’ यही तथ्य अध्यात्म और विज्ञान के संदर्भ में भी लागू होता है आज एक गूँगा बहरा बनकर रह गया है तो दूसरा पंगु। पहले ने चेतन पक्ष को ही सब कुछ मानकर उसकी खोज तक में अपने सीमाबद्ध कर लिया हो विज्ञान प्रकृति पदार्थों के अविज्ञात रहस्यों का अनुसंधान करने और प्रगति के साधन जुटाने में निमग्न हो गया। सत्य की खोज में निरत होने पर होने पर भी दोनों पृथक् एवं असम्बद्ध दिशाधारा अपनाये हुए हैं। चेतना को परिष्कृत एवं सुसंस्कृत बनाये बिना जड़ पदार्थों से लाभान्वित होना, करतल गत प्राकृतिक शक्तियों का सदप्रयोग बन पड़ना संदिग्ध ही बना रहेगा।
समूची मानव सभ्यता का समूह विकास विज्ञान और अध्यात्म के एकत्व पर निर्भर है। दोनों महाशक्तियों के समन्वय की ओर मनीषियों के प्रयास अब चल भी पड़े हैं। विज्ञान और अध्यात्म के मध्य चलने वाला असहयोग का संघर्ष का क्रम धीरे-धीरे समाप्त होता जा रहा जा रहा है। जहाँ वैज्ञानिक अनुसंधानों की दिशाधारा चेतना की ओर मानवी भाव-संवेदनाओं के उन्नयन की ओर अभिमुख हुई है। अध्यात्म से दिशा लेकर ध्वंसात्मक प्रयोजन से निरत हो कर सृजनात्मकता की ओर अपनी शक्तियों को नियोजित करने की ओर प्रवृत्त हैं वही अध्यात्म भी तर्क, तथ्य पूर्ण वैज्ञानिक विधि अपनाकर लोक मान्यताओं, अंधविश्वासों चित्र-विचित्र प्रथा-प्रचलनों का कुहासा मिटा कर अपनी यथार्थता, प्रखरता को खरा सिद्ध करने को समुद्यत है। इसी तथ्य का उद्घाटन करते हुए वैज्ञानिक सर आर्थर एडिंगटन ने अपनी कृति “फिलॉसफी ऑफ फिजिकल साइन्स” में कहा है कि विज्ञान अब दर्शन या अध्यात्म का विरोधी नहीं, वरन् उसका पूरक बनने जा रहा है। संयुक्त रूप से दोनों शक्तियों सत्य और असत्य के मध्य के भेद का विवेक सम्मत समाधान प्रस्तुत करेंगी। उनके अनुसार वैज्ञानिक प्रत्यक्षवाद की कसौटी पर अब यह सिद्ध हो गया है कि चेतना की बोधगम्यता ही वास्तविक सत्य है।
“माइन्ड एण्ड मैटर नामक अपनी प्रसिद्ध पुस्तक में भौतिक विज्ञानी ई. थ्रोडिन्गर ने कहा है कि विश्व ब्रह्माण्ड का प्रमुख तत्व चेतना है। पदार्थ जगत का निर्माण उसी के द्वारा सम्पन्न हुआ है। जिस प्रकार शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ति भोजन के पाचन और उसके रासायनिक ऊर्जा में परिवर्तन से होती है, उसी तरह बौद्धिक प्रक्रियाओं, परिकल्पनाओं (थिंकिंग प्रोसेस) के लिए आवश्यक ऊर्जा चेतनसत्ता से प्राप्त होती है। चेतना की शक्ति से ही संसार की समस्त हलचलें, प्रक्रियाएँ संचालित, परिवर्तित एवं परिवर्धित हो रही हैं। मानवी चेतना उसी समष्टिगत सत्ता का एक छोटा घटक है। वह चाहे दृढ़ आस्था एवं संकल्पबल के आधार पर परमचेतना से घनिष्ठता जोड़ कर अपने में देवत्व का विकास कर सकता है। प्रत्यक्षवादी वैज्ञानिक बुद्धि तो मनुष्य के मस्तिष्क में कौंधने वाली चेतना के छोटे से प्रयास का प्रतिफल है। यदि उस सीमा बंधन को लाँघा जा सके तो सुपरचेतन जैसी उच्चस्तरीय उपलब्धियाँ हस्तगत हो सकती हैं। यह वह अवस्था है जहाँ प्रकृति का नियम नहीं चलता, चेतना का ही साम्राज्य रह जाता है। जन्म मृत्यु का, दिक्-काल का बंधन टूट जाता है।
भौतिक विज्ञान के उच्च शिखर पर पहुँचने के पश्चात् विश्व विख्यात वैज्ञानिक आइन्स्टीन ने अपने जीवन के अन्तिम दिनों में ‘लाइफ’ पत्रिका को दिये गये एक साक्षात्कार में कहा था कि वैज्ञानिक खोजों की लम्बी अवधि में मुझे जो सबसे सुन्दर और सुखद अनुभव हुआ है वह यह कि कोई अदृश्य चेतना इस विश्व-ब्रह्माण्ड की नियामक है। वही सम्पूर्ण सत्य, कला और विज्ञान का स्रोत है। अन्तराल की गहराई में प्रवेश कर कोई भी इसकी अनुभूति कर सकता है। उनके अनुसार विज्ञान का भी उद्देश्य सत्य की खोज करना है, पर मस्तिष्कीय चेतना के उथली परत से संचालित होने के कारण वह गहराई में प्रविष्ट नहीं कर पाता। हमने जो जानकारी प्राप्त की है वह एक स्कूली छात्र से अधिक नहीं है। उस ज्ञान के सहारे न तो वस्तुओं का सही स्वरूप जाना जा सकता है और न जीवन उद्देश्य की पूर्ति ही संभव है।
अपनी अनुपम कृति “आई क्लीव नाइन्टीन पर्सनल फिलासफीज” में आइन्स्टीन कहते हैं कि इस धरती पर हमारी स्थिति अनोखी है। हम में से प्रत्येक व्यक्ति यहाँ बहुत थोड़े समय की शोर्ट विजिट पर आता है परन्तु यह नहीं जानता कि वह कहाँ से और क्यों आया है? बिरले ही होते हैं जिन्हें कभी-कभी यह आभास हो पाता है कि उन सबके पीछे कोई दिव्य उद्देश्य सन्निहित है। सामान्य तर्क बुद्धि के आधार पर विशाल ब्रह्माण्ड पर छाये रहस्यमय पर्दे को नहीं उठाया जा सकता और न ही मनुष्य स्वयं के बारे में अधिक कुछ जान सकता है। इसी तरह जैव विकास की जटिल प्रक्रियाओं को तक और कल्पनाओं के द्वारा नहीं समझा जा सकता। वस्तुतः मानवी विकास बायोलॉजिकल न होकर मनोवैज्ञानिक एवं चेतनात्मक है। उनका कहना है कि हम उतना ही प्राप्त कर सकते हैं, प्रगति कर सकते हैं, जितना हमारी बुद्धि जानती और प्रमाणित करती है किन्तु एक क्षण जीवन में ऐसा भी आता है जब वह छलाँग लगा कर एक उच्चस्तरीय धरातल पर जा पहुँचती है, जिसे अंतःप्रज्ञा या सुपर कान्शसनेस कहते हैं। प्रायः सभी महान आविष्कारों का उद्भव कान्शसनेस माइन्ड के सुपर कान्सियस माइन्ड की और क्वान्टम जम्प से हुआ है। यह अति चेतन अवस्था ही सत्य की, आत्मबोध की स्थिति है। हमें अपने शोध के दायरे को विस्तृत कर इस दिशा में कदम बढ़ाना होगा। आन्तरिक परिपूर्णता का यही सुगम मार्ग है।
अध्यात्म वेत्ताओं का कहना है कि अदृश्य चेतना ने ही भौतिक पदार्थों का सृजन किया है। वही इसमें आवश्यक परिवर्तन परिवर्धन करती रहती है। विज्ञानवेत्ता भी अब इस तथ्य को स्वीकारने लगे है कि संसार में जो कुछ दृष्टिगोचर हो रहा है चेतना का खेल है। प्लाँक, ब्रोगली, जेम्सजीन जैसे विख्यात वैज्ञानिक इसी निष्कर्ष पर पहुँचे थे कि चेतना प्रमुख तत्व है और पदार्थ उसी के व्युत्पन्न हुए हैं। यह मान्यता इतनी सुदृढ़ हो गयी थी कि अपने जीवन के उत्तरार्द्ध में उक्त सभी वैज्ञानिक दार्शनिक हो गय थे और आत्मिकी के संश्लेषण में निरत हो गये थे।
डॉ. ई. रेगर एवं जे.जी टेलर नामक मूर्धन्य वैज्ञानिकों ने अपने अनुसंधान निष्कर्ष में बताया है कि जिस तरह मानवी चेतना का एक केन्द्र उसकी आत्मा है, उसी तरह प्रत्येक भौतिक प्रणाली का एक सचेतन सेन्टर है। चेतना एवं पदार्थ के मध्य अन्यान्य क्रिया के लिए वही उत्तरदायी है। उनके अनुसार चेतना और पदार्थ परस्पर पूर्वक हैं एवं निर्धनता से एक दूसरे से गुँथे हुए है। जिस प्रकार भौतिक जगत में पदार्थ और ऊर्जा परस्पर संबंधित हैं और आइन्स्टीन के समीकरण ई. एम.सी.2 के अनुसार एक दूसरे में परिवर्तित किये जा सकते हैं, उसी तरह आध्यात्मिक जगत में चेतन ऊर्जा और प्रकृति पदार्थों में आपसी सम्बन्ध है और दोनों एक दूसरे को आकार प्रदान करते हैं। इतना ही नहीं जड़ और चेतन “ई. एम. वी. 2’ सूत्र के आधार पर अपना रूप भी परिवर्तित कर सकते हैं। यहाँ ई. से तात्पर्य साइकिक एनर्जी, एम से मास अर्थात् मात्रा और वी. से वेलोसिटा आँट थाट से है।
अतीन्द्रिय सामर्थ्य द्वारा नये पदार्थों के निर्माण अथवा वस्तुओं के रंग, रूप आकार में परिवर्तन से उक्त तथ्य की पुष्टि होती है कि चेतना सर्वोपरि है और पदार्थों पर उसका आधिपत्य है। इच्छानुरूप वह उनमें हेर फेर करने में समर्थ है। उदाहरण के लिए स्वामी विवेकानन्द द्वारा वर्णित उस घटना क्रम को लिया जा सकता है, जिसमें एक व्यक्ति ने उनके समक्ष अपनी मानसिक शक्ति से अंगूर, सन्तरों, आदि के ढेर पैदा कर दिये थे। एक दूसरे प्रयोग में ताजे सुगन्धि गुलाब के पुष्प खिला दिये थे। इसी तरह स्वामी विशुद्धानंद के बारे में विख्यात है कि स्पर्श मात्र से जड़ वस्तुओं में मन चाही खुशबू पैदा कर देते थे। बनारसी साड़ी के एक गट्ठर को उनने एक बार तिब्बती परिधान में बदल दिया था। इजराइल के गुह्यविज्ञानी यूरीगेलर ने पिछले दिनों इस तरह कि कितने ही प्रयोग जाने माने वैज्ञानिकों के समक्ष प्रस्तुत किये हैं। कठोर धातुओं में रबड़ जैसी लचकता प्रकट कर दिखाई। वैनेडियम कार्बाइड जैसे कठोर धातु को मनःशक्ति के आधार पर विनष्ट कर ऊर्जा में बदल दिया। सभी उदाहरण यह प्रमाणित करते हैं कि चेतना द्वारा वस्तुओं का रूपान्तरण संभव है। एक ओर जहाँ पदार्थ को साइकिक ऊर्जा में बदलना संभव है, वहीं अतिचेतन मन मानसिक ऊर्जा से पदार्थ का संश्लेषण भी कर सकता है।
प्रस्तुत समय की माँग है कि विज्ञान की खोज प्रकृति पदार्थों और उनमें सन्निहित शक्तियों के उद्घाटन तक सीमित न रहकर चेतना की गहराइयों में प्रवेश करे जिसमें भाव संवेदनाओं, मान्यताओं, आस्थाओं, प्रज्ञा, श्रद्धा आदि के उच्चस्तरीय तत्व छिपे हैं। इनकी उत्कृष्टता एवं परिपक्वता ही मनुष्य को देवोपम बना सकेगी मनुष्य एक साथ सच्चा वैज्ञानिक एवं सच्चा आध्यात्मिक तभी कहा जा सकेगा।
मन की समस्त सफलताओं-असफलताओं का मूल माना गया है। मनुष्य को आगे बढ़ाने, ऊँचे उठाने की प्रेरणा यहीं से मिलती है। शास्त्रकारों ने इसे ही बन्धन और मोक्ष का कारण बताया है-मन एवं मनुष्याणाँ कारणं बन्ध मोक्षयोः” अर्थात् बन्धन और मुक्ति का कारण यह मन ही है। यही मनुष्य का मित्र और शत्रु भी है। वश में किया हुआ मन अमृत के समान और अनियंत्रित मन हलाहल विष जैसा विनाशकारी सिद्ध होता है। मनुष्य को नारकीय एवं घृणित पतित अवस्था तक पहुँचा देना अथवा उसे मानव -भूसुर बना देना मना का ही खेल है।
मन बड़ा चंचल और वासनामय है। इन्द्रियादिक सम्पूर्ण शरीर पर उसी का आधिपत्य है और आत्मा का मन पर। मन सदैव संकल्प-विकल्पों तर्क वितर्कों के जाल जंजाल में उधेड़बुन में उलझा रहता है। वह निश्चल कभी नहीं बैठता और न ही उसे मारा जा सकता है। वह बड़ा समर्थ और बलवान है। भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है “असंशयं महाबाहो मनोदुर्निग्रहं चलम्।’ (गीता 6/35) अर्थात् हे अर्जुन। निस्सन्देह यह मन चंचल और कठिनता से वश में होने वाला है। इसका धर्म सदा गतिशील, चंचल स्वभावयुक्त है ‘चंचलत्व’ मनो धर्मो वन्हिधर्मो यथोष्णता।” वह किसी एक वस्तु और ध्येय पर केन्द्रित नहीं होता। कोई एक सुन्दर कल्पना आती है तो उसके लिए ताने बाने बुनने लगता है। इसके बाद कोई और नई सूझ आती है तो वह पिछली बातों को भूलकर उसमें रम जाता है और उन्हें पूरा करने के लिए तानाबाना बुनने लगता है।
ऐसी बात नहीं है कि मन यह सब अकारण या निरुद्देश्य करता हो। उसकी इस चंचलता के पीछे सुख की आकांक्षा ही निहित हैं वह केवल महत्तर सुख की खोज में घूमता है। उसकी यह प्रवृत्ति अधिक से अधिक विकास के लिए तृप्ति-तुष्टि के लिए होती है। इसीलिए वह जिस बात में जिस दिशा में सुख प्राप्ति की कल्पना कर सकता है, जहाँ समझता है कि यहाँ सुख प्राप्त हो सकता है वहाँ अपनी कल्पना के अनुसार उसे एक सुन्दर और मनमोहक रूप प्रदान करता तथा रंग-बिरंगी योजनाएँ तैयार करता है। मस्तिष्क उसी ओर लपकता है और तदनुरूप शरीर भी उसी दिशा में काम करने लगता है। इस प्रकार वह न जाने किन-किन मृगतृष्णाओं में मनुष्य को भटकाता है और असफलताओं की अधूरे कार्यक्रमों की ढेरियाँ लगा कर जीवन को मरघट जैसा कर्कश बना देता है।
किन्तु अणुशक्ति से भी अधिक प्रचण्ड शक्ति वाले इस मन को जब साध लिया जाता है प्रशिक्षित, विकसित कर लिया जाता है, निर्मल और पवित्र बना लिया जाता है। उसे शुभ और कल्याणकारी विचारों से भर लिया जाता है तो वही निग्रहित मन शिव-संकल्प वाला बन जाता है ओर शाप वरदान से लेकर कहीं भी किसी भी क्षण किसी की भी सहायता कर सकता है-मार्गदर्शन दे सकता है। परिष्कृत पवित्र मन आत्मभाव में लीन होकर मोक्ष का मार्ग प्रशस्त करता है।
मन का वश में होने का अर्थ उसका बुद्धि के विवेक के नियंत्रण में होना है। बुद्धि जिस बात में औचित्य अनुभव करे, कल्याण देखे, आत्मा का हित-लाभ स्वार्थ समझे, उसके अनुरूप कल्पना करने, योजना बनाने, प्रेरणा देने का काम करने को मन तैयार हो जाय तो समझना चाहिए कि मन वश में हो गया है। क्षण-क्षण में अनावश्यक दौड़ लगाना, निरर्थक स्मृतियों और कल्पनाओं में भ्रमण करना अनियंत्रित मनका काम है। ‘जब वह वश में हो जाता है तो जिस काम पर लगा दिया जाय उसमें लग जाता है।
मन की एकाग्रता एवं तन्मयता में इतनी प्रचण्ड शक्ति है कि उस शक्ति की तुलना संसार की और किसी शक्ति से नहीं हो सकती। निग्रहित मन ऐसा शक्तिशाली अस्त्र है कि उसे जिस ओर भी प्रयुक्त किया जाएगा उसी ओर आश्चर्यजनक चमत्कार उपस्थित हो जायेंगे। सूर्य की किरणें जब चारों और बिखरी रहती हैं तो उनने गर्मी और रोशनी भर प्राप्त होती है और इसके अतिरिक्त उनका कोई विशेष उपयोग नहीं हो पाता। पर जब आतिशी शीशे द्वारा उन किरणों को एकत्रित कर दिया जाता है तो जरा के स्थान पर धूप से अग्नि जल उठती है और देखते-देखते वह दावानल का रूप धारण कर सकती है। जैसे एक दो इंच क्षेत्र में फैली हुई धूप का केन्द्रीकरण भयंकर दावानल के रूप में प्रकट हो सकता है वैसे ही मन की बिखरी हुई कल्पना, आकांक्षा और प्रेरणा शक्ति भी जब एक केन्द्र बिन्दु पर एकाग्र होती है तो उससे फलितार्थों की कल्पना मात्र से आश्चर्य होता है।
जप, तप एवं योगसाधना के विविध विधि विशाल कर्मकाण्डों का सृजन इसी लिए हुआ है कि चित्तवृत्तियाँ एक बिन्दु पर केन्द्रित होने लगें तथा आत्मा के आदेशानुसार उसकी गतिविधियाँ हों। महर्षि पातंजलि ने योग की परिभाषा करते हुए कहा है कि “योगश्चितवृति निरोध” अर्थात् चित की वृत्तियों का निरोध करना, रोककर एकाग्र करना ही योग है। इस दिशा में सफलता मिलते ही अन्तरात्मा का परमात्मा से सायुज्य हो जाता है और वह उनमें सन्निहित समस्त ऋद्धि-सिद्धियों का स्वामी बन जाता है। वशवर्ती मन के प्रयोग से संसार के किसी कार्य में प्रतिभा, यश, विद्या, स्वास्थ्य, भोग, अन्वेषण आदि जो भी वस्तु अभीष्ट होगी, वह निश्चित ही प्राप्त होकर रहेगी। उसकी प्राप्ति में संसार की कोई शक्ति बाधक नहीं हो सकती। पारमार्थिक आकांक्षाओं की पूर्ति से लेकर समाधि सुख तक एकाग्र मन से उपलब्ध होती है।
निग्रहित मन की इस शक्ति को भारतीय महर्षियों मुनियों ने बहुत पहले जान लिया था। उसकी महत्ता का प्रतिपादन करते हुए जनक के यज्ञ में याज्ञवल्क्य ओर आश्वलायन के संवाद में याज्ञवल्क्य ने कहा है-मन ही देवता है। मन अनन्त है अतः उस मन से मनुष्य अनन्तलोक भी जीत लेता है”। प्रज्ञोपनिषद (2/2) में भी मन को देवता कहा है। छान्दोग्य उपनिषद् में सनत्कुमार ने नारद को उपदेश देते हुए कहा है -”मन ही आत्मा है, मन ही लोक है और मन ही ब्रह्मा है। तुम मन की उपासना करो। उसकी उपासना करने वाला, जहाँ तक उसकी गति है वहाँ तक वह स्वेच्छापूर्वक जा सकता है।” मुक्तिकोपनिषद् में वर्णन है -”सहस्रों अंकुर, त्वचा, पते, शाखा फल-फूल से युक्त इस संसार वृक्ष का यह मन ही मूल है। वह संकल्प रूप है। संकल्प को निवृत्त करके उस मनस्तत्व को सुखा डालो जिससे यह संसार वृक्ष भी सूख जाये। “ तैत्तिरीय उपनिषद् में मन को ब्रह्म बतलाया है और कहा है कि ‘सचमुच मन से ही समस्त प्राणी उत्पन्न होते हैं, उत्पन्न होकर मन से ही जीते हैं तथा इस लोक से प्रयाण करते हुए अन्त में उसमें ही सब प्रकार से प्रविष्ट हो जाते हैं। गीता 10/12 में भगवान कृष्ण ने कहा है-इन्द्रियों में मन मैं हूँ।” वेद में इसे ही “ज्योतीषां ज्योति” कहा गया है।
इस प्रकार सभी शास्त्रकारों और योगी सिद्ध महापुरुषों ने मन को समस्त शक्तियों का भण्डार निरूपित करते हुए इसको वश में करना आवश्यक बताया है, क्योंकि जीवसत्ता और ब्रह्मसत्ता की बीच यदि कोई चेतन सत्ता काम करती है, उन्हें मिलाती है या विलग करती है तो वह मानसिक चेतना ही है। ऋग्वेद में कहा है तो वह मानसिक चेतना ही है। ऋग्वेद में कहा है” हे मनुष्य! यदि तू मन को स्थिर करने में समर्थ हो जाये तो तू स्वयं ही समस्त बाधाओं और विपत्तियों पर विजय पा सकता है।”
मन की पवित्रता, निर्मलता, एकाग्रता स्थिरता और निग्रह के लिए भारतीय तत्त्वदर्शियों योगाचार्यों ने विशिष्ट साधना उपक्रमों का आविष्कार किया और बताया है कि सतत् अभ्यास और विवेक वैराग्य द्वारा मन को वशवर्ती बनाना जाता है। अर्जुन को सम्बोधित करते हुए गीता के छठे अध्याय के 35 वें श्लोक में भगवान श्री कृष्ण ने कहा है-” मनोदर्निग्रहंचलम अभ्यासेन त कौन्तेय वैराग्येण च गृहृयते।” आद्यशंकराचार्य ने इसकी विशद व्याख्या की है। यहाँ अभ्यास का अर्थ है कि वे योग साधनायें जो मन को रोकती हैं। वैराग्य का अर्थ व्यावहारिक जीवन को संयमशील और व्यवस्थित बनाना। प्रलोभन को जीतना ही वैराग्य है। आद्यशंकराचार्य के अनुसार मन का सीधा सम्बन्ध श्वास-प्रश्वास से है। इस प्रक्रिया को नियंत्रित नियमित करने से मनःसंस्थान को वशवर्ती बनाया जा सकता है। प्राणायाम एवं ध्यान द्वारा मन की चंचलता घुड़दौड़ विषय-लोलुपता और ऐषणाओं प्रकृति को रोककर ऋतम्भरा बुद्धि के अन्तरात्मा के अधीन किया जा सकता है।
निश्चय ही मन की शक्तियाँ विलक्षण हैं। मनुष्य का सुख-दुख बन्धन-मोक्ष सभी इसी के अधीन है। तत्त्वदर्शी ऋषियों ने बहुत पहले ही कह दिया है “मनः मातस देवो चतुर्वर्ग प्रदायकम्” अर्थात् मन की शक्ति में धर्म अर्थ काम और मोक्ष दिलाने वाली सभी शक्तियाँ भरी पड़ी हैं। यदि मन शुद्ध पवित्र और संकल्पवान बन जाए तो जीवन की दिशाधारा ही बदल जाय। इसीलिए कहा गया है कि जिसने मन को जीत लिया उसने सारा संसार जीत लिया।
मनुष्य समेत समस्त प्राणियों को प्रगति का अवसर साथी-सहायकों की संख्या बढ़ने पर ही संभव हो पाता है। संगठित रहने पर सुरक्षा का भी लाभ मिलता है और पारस्परिक सहकार के आधार पर मनोबल ऊँचा रहने से लेकर सुविधा सम्पन्न जीवन यापन का अपेक्षाकृत अधिक अवसर मिलता है। संघर्ष या उपेक्षा की नीति अपनाने पर तो सर्वनाश या पिछड़ापन ही हाथ लगता है। छोटी बुद्धि वाले प्राणी किस प्रकार पारस्परिक सहयोग का लाभ उठाते हैं, इन्हें सभी जानते हैं। मिलजुल कर रहने और सहयोग के आदान -प्रदान की आदत मानवी प्रगति का प्रमुख आधार है। तालमेल बिठा लेने और एक दूसरे की सहायता करने वाले कभी घाटे में नहीं रहते।
पीटर्सवर्ग के प्रख्यात प्राणिवेत्ता प्रोफेसर केसलर का कहना है कि डार्विन व हर्बर्ट स्पेन्सर जैसा विकासवादियों की यह मान्यता सही नहीं है कि प्रत्येक प्राणी का अपना अस्तित्व कायम रखने के लिए अपने ही वर्ग के सदस्यों से संघर्षरत रहना पड़ता है। सृष्टि में इस तरह के कुछ अपवाद मिल सकते हैं, किन्तु व्यापक रूप से सहयोग सहकार का ही नियम दिखाई देता है। जीवन संग्राम की सफलता और प्रगतिशील विकास के लिए यह नियम कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। साथ साथ रहने वाले प्राणियों का अध्ययन करने पर इस तथ्य को अधिक स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है कि एक ही प्रजाति के जीवों में पारस्परिक समर्थन, सहयोग और सुसंगठित आत्मरक्षा के भाव कितने प्रगाढ़ रूप से विद्यमान रहते हैं। साथ-साथ मिलजुल कर रहना और एक दूसरे की सहायता करना प्रकृति का एक ऐसा उच्चस्तरीय अटल नियम है, जिसके समक्ष विकासवादियों के संघर्षपरक नियम को अपवादों की निम्न श्रेणी में ही रखना उचित होगा। हर्बर्ट स्पेन्सर के ‘योग्यतम कौन है? के उत्तर में निश्चयात्मक रूप से यही कहा जाएगा कि आपस में संघर्ष करने वालों की अपेक्षा वे अधिक श्रेष्ठ हैं जो परस्पर सहायता करते हैं। जिनका स्वभाव आपस सहकारिता अपनाने और साथियों के विकास में सहयोग देने का होता है वही समुदाय जीवित रहता और विजय भी ऐसों को ही मिल पाती है जिनका स्वभाव दूसरों की मदद करने, पिछड़ों को ऊँचा उठाने, आगे बढ़ाने का बन गया है। उन्नति के चरम शिखर पर पहुँचने और कम से कम शक्ति खर्च करके अधिक से अधिक जीवन का सुख प्राप्त करने में सहयोगी प्रवृत्ति महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
चींटियों का सहयोग विख्यात है। वे मिलजुल कर अपना परिवार बसाती हैं। लोहे की जंजीर की तरह आपस में एक दूसरे से जुड़ कर गोलाकार छल्ले बनाकर बड़ी-बड़ी नदियों तक को पार कर लेती हैं। इसी तरह दीमक भी इसीलिए अपना अस्तित्व बनाए हुए हैं कि उनका सारा काम सम्मिलित रूप से चलता है। मधुमक्खियाँ इसी नीति को अपनाकर छत्ता बनाती हैं। बर्फीले तूफानों से बचने तथा नदियों को पार करने के लिए हिरनों के झुंड के झुंड एकत्र होते और एक दूसरे का साहस उभारते हुए आसानी से उस संकट को पार कर जाते हैं। जंगली घोड़ों, भैंसों, नील गायों, हाथियों आदि का झुंड बनाकर रहना उनके लिए लाभदायक ही रहता है। हिंस्र पशुओं से अपनी सामूहिक रक्षा करने में इसी प्रवृत्ति के कारण ये सफल होते और अपनी-अपनी जाति का अस्तित्व बनाये रखते हैं। यह सहकारिता की भावना ही है जो समस्त जीवधारियों के उत्पत्ति रक्षण और भावी विकास का मूल आधार खड़ा करती है।
जर्मनी के प्रख्यात तत्त्ववेत्ता गेटे का कहना है कि मोटी दृष्टि में वंश-वृद्धि करने से लेकर जातीय सुरक्षा तक की भावना ही प्राणियों को एक दूसरे की सहायता करने को बाध्य करती दिखाई देती है, परन्तु गम्भीरतापूर्वक निरीक्षण करने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि उसके पीछे पारस्परिक सहयोग की नैसर्गिक प्रवृत्ति ही क्रियाशील रहती है। उनकी रचनाओं में इस तरह के अगणित उदाहरण भरे पड़े हैं जो हिलमिल कर रहने पर मिल-बाँट कर खाने की सद्प्रेरणाएं उभारते हैं। एक घटना का उल्लेख करते हुए वह लिखते हैं कि सन् 1827 में उनके मित्र जीव विज्ञानी एकरमैन की पालतू चिड़िया के दो बच्चे एक दिन उड़कर कहीं चले गये। बहुत खोजबीन करने पर दूसरे दिन उन्हें एक अन्य जाति के परिन्दे के घोंसले में पाया गया। देखा गया कि वह पक्षी अपने बच्चों के साथ-साथ उन दोनों को भी खिला रहा था। इस घटना से उन्हें अपने इस विचार को समर्थन मिला कि “ईश्वर सर्वव्यापी है” उनने कहा “यदि प्रकृति के इस सार्वभौम नियम का हम सभी पालन करने लगें और दूसरे अपरिचित प्राणी को भी खिलापिला कर बड़ा करने लगें, उनके विकास में सहयोग करने लगें तो संसार की बहुत सारी जटिल सदस्याएँ हल हो जाय
जब तुच्छ समझे जाने वाले पशु-पक्षी एवं कीड़े-मकोड़े तक सहयोग तथा संगठन शक्ति का महत्व समझते और परस्पर मिलजुल कर रह लेते हैं। तो कोई कारण नहीं कि विकसित एवं बुद्धिमान कहा जाने वाला मनुष्य साथ-साथ न रह सके और एक दूसरे के सुख-दुख में भागीदार न बने। वस्तुतः स्वार्थपरता की वह संकीर्ण रेखा ही है जो हमें जाति, वंश, वर्ग, सम्प्रदाय या ऊँच-नीच में विभाजित करती और हमें एक दूसरे से अलग करती है। यही कारण है कि मानव समुदाय अभी तक प्रगति से वंचित बना रहा है। इस संदर्भ में सुप्रसिद्ध प्राणिशास्त्री साइवर्टसोफ उदाहरण प्रस्तुत करते हुए कहते हैं कि शिकरा नामक बाज़ पक्षी की एक प्रजाति शिकार करते समय तो आदर्श संगठन प्रस्तुत करती है किन्तु कुछ ही क्षणों में छीन-झपट मचाती और एक दूसरे को लहूलुहान करने लगती है। संसार में इनकी संख्या भी अब घटती जा रही है। किन्तु उन्हीं की कुछ किस्में ऐसी भी हैं जो आपस में एक दूसरे की मदद करतीं और फलती फूलती जा रही हैं। इसी तरह बतख पक्षी का उदाहरण देते हुए उनने उसे सामाजिक पक्षी कहा है। बतखों के संगठन और पारस्परिक सहयोग को देखते ही बनता है। अपने इसी गुण के कारण ये संसार भर में सर्वत्र बहुतायत में पाई जाती हैं।
मनुष्य की वास्तविक प्रगति का आधार उसकी सहकारी प्रवृत्ति है। इसी शक्ति का उपयोग कर छोटे से छोटे जीवधारी तक अपना अस्तित्व बनाये हुए हैं। बुद्धिहीन समझे जाने वाले इन जीवों में मिलजुल कर काम करने की अद्भुत क्षमता होती है। प्राणि विशेषज्ञ ग्लेडिश ने इस तथ्य की प्रामाणिकता सिद्ध करने के लिए अनेकों प्रयोग किये। एक प्रयोग में उनने दो लकड़ियों के मध्य एक मृत पक्षी तथा डंडे के सहारे एक मेढ़क को लटका दिया। देखा गया कि थोड़ी ही देर में छोटे-छोटे प्राणियों ने मिलजुल कर बड़ी कुशलतापूर्वक उन दोनों को गायब कर दिया। उनने निष्कर्ष प्रस्तुत करते हुए कहा है कि जिन जीवधारियों में अच्छा संगठन नहीं होता, उनमें भी अपनी जाति के प्रति सहानुभूति होती है। केकड़ा जैसे असंगठित प्राणी भी समुद्री किनारों पर एक साथ संतति-वृद्धि के लिए जाते हैं। उनका यह प्रवास एकता, सहयोग और पारस्परिक सहायता के बिना संभव नहीं हो सकता। आवश्यकता पड़ने पर केकड़ा अपने साथी की कितनी अधिक सहायता करते हैं, इस सम्बन्ध में एक घटना का उल्लेख करते हुए वे लिखते हैं कि एक तालाब के किनारे एक एक केकड़ा उलटा पड़ा था। प्रयत्न करने पर भी सीधे खड़े होना नहीं बन पड़ रहा था। एक लकड़ी उसने मार्ग को अवरुद्ध किये हुए थी। देखते देखते उसके कई साथी सहायता को आ पहुँचे। कुछ ने अवरोध बनी लकड़ी को हटाया तो कुछ ने उसे सहारा देकर सीधे खड़े होने में मदद की। सम्मिलित प्रयास से कठिन से कठिन कार्य भी सरल बन जाते हैं।
वैज्ञानिक मनीषी ब्रेहम का कहना है कि मानव का विकास अनेक सहयोगात्मक जीवन पर निर्भर है। इसके अभाव में व्यक्ति न तो अपने को संरक्षित अनुभव करता है और न जीव का सच्चा सुख ही उठा पाता है। सारस एवं तोते जैसे पक्षियों का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए वे कहते हैं कि किस प्रकार ये मानवेत्तर प्राणी अपने सजातियों एवं अन्य परिन्दों के साथ मिलजुल कर रहते हैं कि उनकी बुद्धिमत्ता और दूरदर्शिता को देखते ही बनता है। वे जिसके भी संपर्क में आते हैं उसी को अपना बना लेते हैं। पकड़े जाने पर मनुष्य से भी उनकी अच्छी दोस्ती हो जाती है जिसे वह सदैव प्रसन्न रखने का प्रयत्न करते हैं। सारस तो अपनी दूरदर्शिता के आगे किसी को भी अपने शत्रु नहीं बनने देता और दीर्घ जीवन का आनन्द उठाता है। यह सब उसकी सहकारी प्रवृत्ति की देन है। मनुष्य इनसे बहुत कुछ सीख सकता है।
हिलमिल कर रहने और एक दूसरे के सुख-दुख में साथी रहकर ही मानवी कुटुंब फलते-फूलते हैं। इसी रीति-नीति को अपनाकर सभी सुख पाते और निश्चिन्त रहते हैं। सामाजिक विकास में इस प्रवृत्ति की महत्ता सर्वोपरि है। अगले ही दिनों सहयोग सहकार की यह भावना पारिवारिक सीमाओं को लाँघकर वसुधैव कुटुम्बकम् स्तर तक विकसित-विस्तृत होगी। सभी को एक दूसरे की उन्नति में सहज भागीदारी निभाते हुए देखा जा सकेगा। उज्ज्वल भविष्य की संरचना भी तभी साकार होगी।
धरती का स्वर्गीकरण न तो इतना बड़ा काम जिसे करने की बड़े-बड़ों की हिम्मत न पड़े? व्यक्ति के प्रयासों की एक सीमा है। सामान्य दिशा में उसे निजी जीवन तक को शुभ और आनन्द से परिपूर्ण करना दूभर लगता है। प्रकृति की शक्तियाँ भी छोटे मोटे परिवर्तन गति लय उभार करने में ही थकान अनुभव करने लगती हैं। फिर यदि सवाल स्वयं प्रकृति को बदलने का हो। मनुष्य की अन्तः प्रकृति एवं बाह्य प्रकृति को बदलने की आवश्यकता जब अनिवार्य समझी जाने लगे। जीवनक्रम एक नये ढाँचे में ढलने के लिए आतुर हो उठा हो तब इसे कौन करे?
नैराश्य के इस तमस में आशा की ज्वाल माल बन पुनः उसी को संकल्पित होना पड़ा है जिसने कभी “एकोऽहं बहुस्यामः” का संकल्प पूरा किया था। जो प्रकृति एवं उसकी शक्ति का नियन्ता है। काल के गतिमान चक्र का अधीश्वर महाकाल है। मानव समाज के प्रत्येक बृहत् कार्य, सृष्टि की व्यापक फेर बदल में यह स्वयं सूत्र संचालक का दायित्व संभालता आया है। इसे ही पश्चिमी टसाइटगाइस्ट और पूर्वी तत्त्ववेत्ता महाकाल ने नाम से सम्बोधन करते हैं। यह नाम है कि गम्भीर अर्थ से परिपूर्ण। सड़ी गली मान्यताओं रूढ़ियों समाज का खण्डहर हो गए भवन का मटियामेट कर उसके स्थान पर नूतन सृजन करने वाली महाशक्ति का उद्गम स्रोत यही है जो मनुष्यों संस्थाओं और आन्दोलनों को यन्त्र बनाकर अपने शाश्वत प्रयोजन के लिए इस्तेमाल करता है। महाकाल अन्तः स्थिति वह विश्वात्मा है जिसकी शक्ति सर्वत्र संचरित है और विश्व की प्रगति एवं मानव की नियति का निर्माण करती है। उसी का आवेग खुद को काल में चरितार्थ करता है और जब उससे गति एवं प्रेरणा मिल जाती है तो काल और शक्ति उसका भार ग्रहण करते हैं। उसे तैयार करने, पकाने और पूरी तरह सफल बनाने में जुट जाती है। काल के इस अधीश्वर के अपने हाथों में बागडोर थामते ही संसार की समस्त शक्तियाँ एकजुट होकर उसके संकल्प की पूर्ति हेतु संलग्न हो जाती है। चाहे मनुष्य की सहायता दे, अथवा प्रतिरोध करें, किन्तु उसका काम रुकता नहीं, जब तक संकल्प पूर्ति न हो जाए। हाँ होशो-हवास पूर्वक सहयोग करने वाले युग सृजेता का गौरव अनायास ही पा लेते हैं।
मानव इतिहास के इन क्षणों में पुनः एक बार संकल्प गूंजा है। ठीक वे ही स्वर जो कुरुक्षेत्र में सुनाई दिये थे मैं महाकाल हूँ। खण्डहर हो गये लोकों को उजाड़ कर नष्ट कर नवसृजन करता हूँ। देखो मैं पूरी शक्ति के साथ उठ खड़ा हुआ हूँ। वे योद्धा जो विरोधी सैन्य दलों में व्यूह बाँधे खड़े हुए हैं, तेरे बिना भी नहीं बचे रहेंगे। इसलिए तू उठ खड़ा हो और महान यश का लाभ कर। क्योंकि सब कुछ पहले ही किया जा चुका है, केवल निमित्त मात्र बन सव्यसाचिन्।
हवा की प्रत्येक श्वास से सृष्टि के प्रत्येक स्पन्दन से उठ रही यह पुकार महाश्मशान बनती जा रही इस धरती को नन्दन कानन बनाने के लिए है। महाकाल स्वयं को दो रूपों में प्रकट करता है। अपने पहले रूप में वह रुद्र होता है और दूसरे में शिव। रुद्र की विनाश लीला शिव के सृजन के लिए भूमि तैयार करती है। बीसवीं सदी की शुरुआत से आज तक हुई घटनाओं का सरसरी नजर से जायजा लें तो रुद्र का ताण्डव नर्तन समझा जा सकेगा। प्रारम्भ से लेकर लगभग आधी सदी तक मानव जाति दो महायुद्धों की तैयारियाँ करने और विनाश के ज्वालामुखी को भड़काने में जुटी रही। जर्मनी के तहखानों का खून अभी तक सूखा नहीं था कि कोरिया युद्ध की लपटों में घिर गया। एक के बाद एक कम्बोडिया, वियतनाम, ईरान, ईराक जैसे अनेकों ने विनाश लीला में अपनी भागीदारी निभाई। जी. विकलिन की पुस्तक “ह्यूमन रेस इन ट्वेन्टियथ सेंचुरी” के अनुसार इस सदी में लगभग दो सौ छोटे-बड़े युद्ध लड़े गये। धरती पर कोई ऐसी जगह नहीं बची जिसे महारुद्र के चरणों ने प्रकंपित न किया हो। इस प्रकम्पन से न जाने कितने राजमुकुट भूमिलुँठित हुए, इक्के, दुक्के जो बचे हैं वे भी अपने विनाश की तैयारी कर रहे हैं। जिनके राजस में सूर्य नहीं अस्त होता था वे ही अब कोने में सिमटते जा रहे हैं।
बात युद्धों की नहीं है, मान्यताएँ, नीतियाँ प्रणालियाँ बनी और ढहीं। नाजीवाद, फासीवाद धूमकेतु की तरह उल्टा होकर काल के प्रचण्ड झोंकों में बह गया। साम्यवाद के वितान फैले और सिमटने लगे। हीगेल, मार्क्स, एगेंल्स गुजरे जमाने की चीजें होती जा रही हैं। जिनकी पूजा होती थी। उन्हीं के बुत टूटने लगे। हिटलर, मुसोलिनी, माराबों, दाँतों, रोब्सपियर, कापूर, नैपोलियन के व्यक्तित्व व कर्तृत्व दोनों तिरस्कृत हो काल के किसी कोने में जा पड़े है।
ऐसे में प्रकृति भला क्यों पीछे रहती। उसने भूकम्प, सूखा, बाढ़ जैसे पुराने युग के हथियारों के स्थान पर ग्रीन हाउस प्रभाव, ओजोन की छतरी को फाड़ना, खनिज सम्पदाओं का रिक्तता, हवा पानी की विषाक्तता जैसे अनेकों कारनामे दिखाकर 400 करोड़ मानवों में सिहरन पैदा कर दी। 9वें दशक में प्रवेश करते-करते धरती के विश्वविश्रुत वैज्ञानिक, चिन्तक, समाज के कर्णधार चीत्कार कर उठे- अब हम धरती को नहीं बचा सकते महाप्रलय आने ही वाला है।
किन्तु कहाँ? बीत चली कालरात्रि के ब्रह्ममुहूर्त आते-आते रुद्र की क्रिया–कलापों में से शिवत्व झलकने लगा। भले अभी यह सबको स्पष्ट नहीं हुआ हो किन्तु ऐसा कुछ हो रहा है जो अनोखा है, अद्भुत है अलौकिक है। इसे स्पष्ट करते हुए श्री अरविन्द “द ह्यूमन सायकिक” में कहते हैं-दक्षिणेश्वर में जो काम शुरू हुआ था, वह पूरा होना बाकी है। सामान्य जन तो इसे समझ भी नहीं सके। विवेकानन्द ने जो कुछ प्राप्त किया, जिसे अभिवर्धित करने का प्रयत्न किया वह अभी तक मूर्त कहाँ हुआ? विजय गोस्वामी ने भविष्य के जिस सत्य को निगूढ़ रखा वह उनके शिष्य तक नहीं जान पाए और अब अधिक उन्मुक्त ईश्वरीय प्रकाश की तैयारी हो रही है, अधिक ठोस शक्ति प्रकट होने को है। यह कार्य मनुष्य की प्रकृति में फेर बदल कर नया इंसान गढ़ना और इसी धरती में स्वार्गिकता लाना था। जिसे ये महाकाल के दूत करने में जुटे थे। इस विशिष्टता को इन वरिष्ठों के सिवाय और कौन जानता? किसमें यह अनोखी सामर्थ्य है जो रुद्र के तीव्र ताण्डव में छुपे शिव सृजन को निहार सके।
किन्तु अब जैसे-तैसे ब्रह्ममुहूर्त की घड़ियाँ अरुणोदय की ओर बढ़ती जा रही हैं विनाश के आवरण में स्वयं को ढके सृजन स्पष्ट होने लगा है। आज के समय में इसका एक सुस्पष्ट चिन्ह है विश्व के हर कोने में अंगड़ाइयाँ ले रही जन चेतना। उसे सिर्फ व्यवस्था को बदल डालने मात्र से सन्तुष्टि नहीं है। वह स्वयं में समूचे समाज में एक मौलिक परिवर्तन करना चाहती है। महर्षि का संकेत भी इसी ओर है। यों मानव को अपनी उत्पत्ति से लेकर आज तक अनेकों सुखद दुःखद घटनाओं से गुजरना पड़ा है। स्वयं को उसने कई तरह के दबावों में आकर ढाला और गढ़ा है। उसकी निजी चेष्टाएँ भी कम नहीं है। किन्तु इस बार भावी समाज के चिर स्थाई सुख का आधार बनने वाला परिवर्तन अपने आप में अनूठा है।
अब तो हो चुकी परिवर्तनों के इतिहास की ओर झाँके उनके प्रभावी कारकों की ओर देखें तो पाते हैं कि सारी फेर बदल राजनैतिक, आर्थिक, भौगोलिक, जैविक, जनसंख्यात्मक और साँस्कृतिक कारणों के इर्द-गिर्द घूमती रही है। यद्यपि ऊपर से न दिखते हुए भी इनका किसी न किसी प्रकार सम्बन्ध मनोवैज्ञानिक कारक से रहा है। किन्तु सामान्यता राजनैतिक कारणों की प्रधानता समझी गई है। व्यवस्था से कष्ट हो रहा है, व्यवस्था बदल दो। राजतन्त्र नहीं तो अधिनायकवाद, साम्यवाद, प्रजातन्त्र समाजवाद। बदलाव के बाद भी उद्देश्य कोसों दूर रहा। प्रिंस क्रोपाटकिन का “क्रान्ति की भावना” में कहना है कि परिवर्तन करने वाले जब शासन व्यवस्था संभाल लेते हैं तो कुछ समय बाद सारी समस्याएँ फिर से ज्यों की त्यों खड़ी दिखाई देती हैं। फ्राँस की राज्य क्रान्ति इसी का एक उदाहरण है।
ऐसा सिर्फ इसलिए कि व्यवस्था उतनी दोषी नहीं जितना कि दोषी वह समाज रहा जिसने व्यक्ति को सही गढ़ा नहीं। समस्त विसंगतियों, दुरावस्थाओं का मूल कारण समाज की जीवनी शक्ति कहे जाने वाले उस वर्ग का समाप्त प्रायः हो जाना है जिस पर व्यक्ति को तराशने की जिम्मेदारी थी। इसके अतिरिक्त प्रथाएँ, परम्पराएँ, रीतियाँ, रिवाज, मान्यताएँ मूल ओर प्रतिमान यही मिलकर वह साँचा बनाते हैं, जिसमें व्यक्ति ढलता है और आज यह इतना जर्जर हो अपनी सामयिकता खो बैठा है कि इसमें उस इंसान को ढालने की ताकत नहीं रही जो नए समय के अनुरूप नए आदमी तैयार कर सके। ऐसी दशा में आवश्यक हो गया है कि यह सब भी परिवर्तित हो जिससे कि मनुष्य सँवर सके।
किन्तु इंसान का मोह इन्हें हर हाल में चिपकाए रहना चाहता है। लिहाजा सतयुगी परिस्थितियाँ लाने के लिए संकलित महाकाल ने आन्तरिक एवं बाह्य ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न कर दी हैं, जिसके दबाव में आकर कोयले को हीरा बनना ही पड़े। विचार करें तो प्रकारान्तर से यह भी एक अनुग्रह हैं जिसके कारण हम सबको पुरानी सड़ चुकी केंचुल उतार कर नवीन सौंदर्य उद्भासित करने का अवसर मिल रहा है। सुविख्यात चिन्तक प्रीतम ए. सोरोकिन “रिकाँन्सट्रक्शन ऑफ ह्यूमेनिटी” में कहते हैं- इस बार के परिवर्तन पिछली फेर से कहीं अधिक चिरस्थाई और उपयोगी रहेंगे। उसके अनुसार इस हो रहे प्रत्यावर्तन में प्रधानता मनोवैज्ञानिक कारक की रहेगी और है भी।
आज मानव ने केवल सोचने के लिए बल्कि अपनी सोच बदलने के लिए विवश है। उसे साफ मालूम हो गया है कि व्यवस्था बदलने भर से पर्यावरण संकट, प्राकृतिक असन्तुलन सुधरने वाला नहीं है। उसके लिए तो हमें ही बदलना होगा। सच कहा जो तो असन्तुलित तो अपने नियन्ता के संकेतों के अनुसार उसे सुधारने के लिए सक्रिय भर हुई है।
महाकाल की इस अपरिवर्तनीय योजना का केन्द्र है व्यक्ति और परिधि है समाज। विवेकानन्द के शब्दों में इस सृजनात्मिका शक्ति की धुरी बनी हैं भारत भूमि। तीन चरणों वाली इस योजना का प्रथम चरण है व्यक्ति की सोच को उलटना। ओसवाल्ड स्पेंगलर के शब्दों में जहाँ अभी वह यह मान बैठा है कि आदमी श्रेष्ठ पशु है उसके पास औरों पर धौंसे जमाने का एक ही उपाय है बल। बदलते समय में यह मापदण्ड शरीरबल, धनबल बुद्धिबल तो हुआ पर काम नहीं बदला। वहीं बदली सोच के आधार पर उसे सोचना पड़ेगा कि क्षमताएँ, उत्पीड़न के लिए नहीं हैं। वरन् इसलिए हैं कि दूसरों की भी क्षमताएँ उभारी जाए और सारी मनुष्य जाति एक साथ लम्बे डग भार कर अपने को धरती का देवता सिद्ध कर सके।
दूसरे चरण में प्रथा, परम्पराओं, रीतियों मूल्यों में व्यापक स्तर की फेर-बदल होगी। जहाँ अभी इन्हें संयुक्त रूप में लोक भाषा में नाम दिया गया है धर्म इस जाल-जंजाल में उलझना नहीं हैं। वरन् यह वह तत्व है जिसके आधार पर क्रूरकर्मी अंगुलिमाल तक महाभिक्षु बन सका। आज की प्रथा परम्पराओं को कतर व्यौंत कर वे ही नीतियाँ रची जायेंगी जो मानव यात्रा को सुगम करने वाला पाथेय बन सके। स्वर्गीकरण के तीसरे और अन्तिम चरण में आएगा समाज। जिसने अभी बीहड़ जंगल का रूप ले लिया है। जहाँ उत्कृष्ट चिन्तन, उत्तम चरित्र मृदुल व्यवहार कभी किसी बिरले भाग्यशाली को दिखाई पड़ जाते हैं। वहीं समाज अपना स्वरूप बदल कर ऋषियों का आरण्यक बन सकेगा। स्वयं को ऐसी पाठशाला में विकसित कर सकेगा जो आदमी को सोचना, जीना और व्यवहार करना सिखाए। योजना के ये त्रिविध चरण मानव समाज रूपी नचिकेता को महाशिव के तीन वरदान है।
इन्हें ग्रहण करने, अपना सहचर बनाने के लिए उसने हम सबसे साहस भरा कदम उठाने का आवाहन किया है। परवाह नहीं यदि हम शक्तिहीन हैं, पुराने समाज ने हमें नगण्य माना है। जिन्हें भी अतिबल परिवर्तन का आदेश प्राप्त होता है। वे उसकी अनन्त शक्ति से पूरित होते हैं। यह वही सामर्थ्य है जो धरती से लाखों गुणा भारी भरकम नक्षत्रों को उनकी कक्षाओं में घुमाती है, ऐसी आसानी से जैसे कोई बालक गेंद घुमाता हो। उसके लिए असम्भव क्या? वह असम्भव हो साधित करने में ही सिद्धहस्त है। हम क्या हैं कैसे हैं? भूलकर जैसे भी हैं, संकल्प पूर्ति के इस महत्वपूर्ण चरण में अपनी भूमिका निभाने को तत्पर हों। आने वाले भगीरथ का गौरव हासिल हुए बिना न रहेगा।
वियना के मनः चिकित्सा विशेषज्ञ डॉ. विक्टर ई. फ्रेंक्ल ने अपने 50 वर्षों के चिकित्सा अनुभवों का सार बताते हुए लिखा है कि “ जो मनुष्य यह अनुभव करेगा कि उसका जीवन निरर्थक है उसका मन और शरीर कभी स्वस्थ न रहेगा। सार्थकता की अनुभूति न होने पर मनुष्य जिन्दगी को लाश की तरह ढोता है और उस नीरस निरानन्द स्थिति में सचमुच ही जीवन बहुत भारी पड़ता है। उस दबाव से इतनी थकान आती है कि कुछ करते-धरते नहीं बन पड़ता। मानसिक पराधीनता व्यक्तित्व विकास के सभी द्वार बन्द कर देती है। विवेक को विकसित होने का अवसर न मिलने के कारण अवांछित स्थिति में रहने और उसी में दम तोड़ने को विवश होते प्रायः ऐसों को ही देखा जाता है।
वैज्ञानिकों ने जब जीवन से निराश व्यक्तियों का अध्ययन किया, जिनमें अधिकाँश विधुर एवं विधवाएँ थी, जो ज्ञात हुआ कि मृत्युजन्य गहरा आघात उनके प्रतिरक्षा प्रणाली को भी प्रभावित करता है। तीन महीने बाद तक एक ही मनःस्थिति बनी रहने के कारण शरीर प्रतिरक्षा तन्त्र के महत्वपूर्ण घटक ‘टी’ तथा ‘बी’ लिस्फोसाइट कोशिकाएँ संख्या में कम तथा सक्रियता में मन्द पड़ जाती हैं। यह भी पाया गया है कि प्रियजनों की मृत्यु के पश्चात् जीवन के प्रति अधिक संवेदनशील बन जाते हैं। इसके अतिरिक्त उनके रक्त में कार्टिजोल नाम विषैले रसायन की अभिवृद्धि भी देखी जाती है। यह हारमोन इम्यून सिस्टम को तहस-नहस करके रख देता है।
वस्तुतः मन एवं शारीरिक फिजियोलॉजी परस्पर सम्बद्ध हैं। निराशा या निषेधात्मक भाव तरंगें रक्त, हार्मोन आदि कायिक रसायनों में उथल-पुथल मचा देती हैं तथा सभी प्रकार की अनैच्छिक क्रियाओं यथा चयापचय, हृदयगति, श्वास-प्रश्वास रक्तचाप आदि को भारी क्षति पहुँचाती है।
इन सभी तथ्यों के अध्ययन के पश्चात् नोबेल पुरस्कार से सम्मानित विख्यात वैज्ञानिक वाल्टर हैस ने निष्कर्ष निकाला है कि जब निषेधात्मक एवं निराशावादी चिन्तन शारीरिक स्वास्थ्य पर बुरा असर डाल सकते हैं, व्यक्तित्व को गया गुजरा स्तर का बना सकते हैं। तो कोई कारण नहीं कि आशा एवं उत्साहवर्धक विधेयात्मक चिन्तन अनुकूल परिणाम प्रस्तुत न कर सके। स्वास्थ्य संवर्द्धन के साथ व्यक्तित्व को उच्चस्तरीय गति प्रदान न कर सके। इसकी पुष्टि के लिए वाशिंगटन यूनिवर्सिटी के मूर्धन्य विज्ञानी निकोलस हाल ने ऑटोसजेशन का प्रयोग केंसरग्रस्त रोगियों पर किया। इसमें उन्हें आशाजनक सफलता प्राप्त हुई। देखा गया कि एन्ना जैसी मरणासन्न रोगी भी विधेयात्मक दिशा धारा अपना कर पूर्णतः स्वस्थ हो गई।
एन्ना कैंसर की अन्तिम अवस्था से गुजर रही थी, जिसे चिकित्सकों ने दुःसाध्य घोषित कर दिया था। उसके बाँये हाथ को लकवा मार गया था। सिर पर भी असह्य वेदना रहती थी। उसके लिए डॉक्टरों की सलाह थी कि जब वह अपने जीवन की चिन्ता छोड़ शेष बचे थोड़े समय में अपने बच्चों के निर्वाह की उपयुक्त व्यवस्था करे।
एन्ना लगभग निराश हो चुकी थी। कैंसर का जहर पूरे शरीर में फैलता जा रहा था कि इसी बीच उसकी मुलाकात डॉ. हाल से हुई। उन्होंने उसे विस्तार पूर्वक ऑटोसजेशन द्वारा विधेयात्मक चिन्तन से अपने को परिपूरित करने की कला से अवगत कराया और उसे पूर्ण स्वस्थ हो जाने का विश्वास दिलाया।
नियमित रूप से एन्ना उक्त क्रिया करने लगी। इससे उसे आश्चर्यजनक लाभ हुआ। एक वर्ष बाद जब चिकित्सकों ने उसका परीक्षण किया तो पूर्णतः स्वस्थ हो चुकी थी। कैंसर एवं पक्षाघात समूल नष्ट हो गये थे।
श्रुति कहती है-यो यच्छ्रद्धः स एव सः” अर्थात् मनुष्य जैसा सोचता है वैसा ही बनता चला जाता है। चिकित्सा जगत में अब इसी सिद्धान्त का प्रयोग होने लगा है। ऐसी अनेकों बीमारियाँ है, जिनका उपयुक्त उपचार अभी तक खोजा नहीं जा सका है उनकी गिरफ्त में आने का अर्थ ही होता है, रोगी की मृत्यु। ऐसी स्थिति में अध्यात्म विज्ञान की यह पद्धति जिसे सेल्फ इमेजिंग ऑटोसजेशन अथवा विधेयात्मक चिन्तन आदि नाम से जाना जाता है, बहुत ही कारगर एवं प्रभावयुक्त सिद्ध हुई है।
प्रातःकाल का समय।
दक्षिणेश्वर के उद्यान में एक फूस की कुटिया के सामने वट वृक्ष की घनी छाया में एक तरुण ब्राह्मण बैठा था।
उस स्थान के सम्मुख ही रानी रासमणि द्वारा बनवाएँ गये मन्दिर में प्राण प्रतिष्ठा समारोह उत्साहपूर्वक मनाया जा रहा था। रूढ़ संस्कार ग्रस्त ब्राह्मणों ने केवट जाति की महिला द्वारा बनवाएँ गये मन्दिर में प्रतिष्ठा करने से इंकार कर दिया था इसलिए रानी ने मन्दिर की सम्पत्ति कुलगुरु को दान कर दी। इससे ब्राह्मण वर्ग भी सन्तुष्ट हो गया।
प्रतिष्ठा पर्व पर रानी रासमणि ने ब्रह्म भोज दिया। हजारों नर-नारी आ-जा रहे थे। ब्रह्म भोज चल रहा था। भाँति-भाँति के ढेरों पकवान आते, ब्राह्मण भोजन करते और दक्षिणा स्वरूप एक सोने का सिक्का लेकर चलते बनते। परन्तु मन्दिर के सामने एक बारह वर्षीय बालक इस समारोह में बड़ी दौड़-धूप कर रहा था। वह मन्दिर की पृष्ठ दिशा में बनी कुटिया में इन दिनों रह रहा था। बारम्बार आता और चला जाता। साधारण वेश-भूषा पर, आकृति और व्यवहार में इतना लुभावनापन कि हर कोई आकृष्ट हो उठता। किन्तु इससे क्या? वह अविचल भाव से यह सब देख रहा था, न भोज में जाने की इच्छा और स सामने ही हो रहे कोलाहल का प्रभाव। शान्त ध्यान मग्न मन्दिर की और टकटकी बाँधे-देखे जा रहा था।
दोपहर ढल गयी। अतिथियों की भीड़ कम होने लगी। उसी बालक का ध्यान उस निर्विकार चित ब्राह्मण की ओर गया और पहुँचा उसके समीप। पूछा-आप कौन हैं?” “अभ्यागत” संक्षिप्त सा उतर मिला। “क्या आप ब्राह्मण कुल में जन्मे हैं? “हाँ” “भोज हुआ” “नहीं” ब्राह्मण ने कहा।
सब ब्राह्मण लोग तो भोजन करके चले गये फिर आप यहाँ क्यों बैठे हैं? जाइए भोजन कीजिए न! रानी एक मुहर दक्षिणा में दे रही हैं।
“मैं भिखारी नहीं हूँ” ब्राह्मण बोला “भोजन करने और दक्षिणा लेने यहाँ नहीं आया हूँ।”
तो किस लिए आये हैं फिर बालक ने पूछा। “दर्शन के लिए। जिसके पुण्य प्रताप का यह परिणाम दीख रहा है। मैं उन्हीं पुण्यात्मा रानी माँ के दर्शन करना चाहता हूँ।
उनके दर्शन तो अभी नहीं हो सकेंगे। रानी माँ! जब तक सब ब्राह्मण भोजन नहीं कर लेंगे, तब तक वे अन्न जल ग्रहण नहीं करेंगी। मन्दिर में रहेंगी।
तो जब दर्शन हो सकेंगे तब करूँगा ब्राह्मण ने कहा और बालक चला गया। सूर्यास्त के समय सब ब्राह्मणों के भोजन कर चुकने के बाद रानी रासमणि मन्दिर से बाहर निकलीं, साथ में बालक भी था। ब्राह्मण साधु के सन्मुख दोनों हाथ रुक गए। रानी न दोनों हाथ जोड़कर ब्राह्मण को प्रणाम किया इसके पूर्व ही ब्राह्मण ने धरती पर लेटकर दण्डवत प्रणाम किया। रानी चौंक कर पीछे हटी। आश्चर्य भरी वाणी में कहा “यह आपने क्या किया देवता! मैं अस्पृश्यता शुद्रा। आपने मुझे प्रणाम कर पाप चढ़ाया। तुम दिव्य रूपा हो माँ सर्वश्रेष्ठ मानवी। मैं प्रातः अरुणोदय वेला से ही आपके दर्शन की अभिलाषा लेकर बैठा हूँ”
“ आपने भोजन नहीं किया। आइए भोजन कीजिए।” “आप अपने हाथ से पकाकर खिलाए तो ही भोजन कर सकता हूँ। “ यह कैसे सम्भव है? मैं जाति की केवट जो हूँ।”
हाड़-माँस का कलेवर कहाँ उपजा। कहाँ पला? इससे क्या? बात अन्तःकरण के परिष्कार की है। इसकी परिष्कृति आप सही और कहाँ है?
रानी ने बहुतेरा समझाया। क्षमा माँगी। पर ब्राह्मण कब मानने वाला था। जाति पाँति और ऊँच-नीच परक मान्यताओं की व्यर्थता कहकर उसने पूर्व वृत्तांतों पर उल्लेख किया और कहा “जो इतना विरोध सह सकता है वह नीच या अछूत नहीं, ब्राह्मणों से भी श्रेष्ठ है। आप एक ही गलती कर रही हैं कि अपने आत्म सम्मान को विस्मृत कर चुकी हैं। अन्यथा जिस दिन नैष्ठिक ब्राह्मण नंदकुमार को फाँसी चढ़ाई थी, उस समय ये ब्राह्मण कहाँ थे? इन्होंने शाप से अंग्रेजों से भस्म क्यों नहीं कर दिया और आप जाति से शूद्र हैं तो आपके द्वारा प्रतिष्ठित देवता का पूजन नमन भी नहीं कर सकेंगे।
“परन्तु आप मेरे हाथ से भोजन करेंगे तो ब्राह्मण लोग आपको जाति बहिष्कृत कर देंगे शंका और आश्चर्य से रानी की निर्मल पारदर्शी आँखें थोड़ा फैल गई।
“वे क्या मुझे जातिच्युत करेंगे “-ब्राह्मण ने ठहाका लगाते हुए कहा-मैं तो पहले ही इन सब भोजन भट्टों को जाति बहिष्कृत चुका हूँ।”
उसके हठ के आगे रानी की एक नहीं चली। रानी ने अपने साथ वाले बालक से सब सामग्री जुटा देने के लिए कहाँ अब यह खबर गाँव में पहुँची कि एक ब्राह्मण रानी के हाथ का भोजन करने वाला है तो सभी लोग आ पहुँचे। विवाद होने लगा। राम और शिव के, शबरी और गोप बालों के, धर्म ओर शास्त्र और महाभारत के अनेकों उदाहरण दिए गए। अन्त में यही निष्कर्ष निकला ब्रह्मपरायण ब्राह्मण वह है जिसे सर्वत्र व्याप्त अद्वय सत्ता अनेकों रूपों में व्यवहार करती अनुभव हो। उसका कर्तव्य है कि शूद्र चाण्डाल को भी ब्राह्मणत्व के स्तर तक पहुँचाए। जो दलितों-अनगढ़ों का उन्नायक न बन सके वह ब्राह्मण कैसा? कहने वाले की तेजस्विता ने सभी को मौन कर दिया।
पास खड़ा बालक सारे वार्तालाप को गहराई से सुर रहा था। आखिर वह भी ब्राह्मण ही तो था। उसे भी कर्तव्य का निर्वाह करना था, और किया भी। समूचे विश्व ने इस बालक को रामकृष्ण परमहंस के रूप में जाना। बाद के दिनों में वह इस घटना को अपने शिष्यों का बड़ी रोचक शैली में सुनाकर कहते आखिर ऐसे मैं सच्चा ब्राह्मण बना।
उस मूर्धन्य वैज्ञानिक ने अनेक विषयों की प्रयोगशाला विनिर्मित कर रखी थी। सहस्रों वैज्ञानिक बहुमूल्य यंत्र उपकरणों पर अन्वेषण-परीक्षण निरत थे।
विशप एक दिन अकस्मात् उसे देखने आ पहुँचे। संचालक ने सम्मान के साथ अपने प्रयोग और परिणाम बताते हुए कहा “ हो रहे आविष्कारों से मानवीय सुविधा और समृद्धि में बढ़ोत्तरी होगी।”
विशप ने आशंकित मन से पूछा- यदि वैज्ञानिक उपलब्धियों का दुरुपयोग होने लगा तो क्या सुविधाएँ बढ़ने के स्थान पर उलटा विनाश ही तो न खड़ा हो जायेगा?”
वैज्ञानिक ने नम्रतापूर्वक कहा सुविधाएँ बढ़ाना हमारा काम है और उसके दुरुपयोग को रोकने का वातावरण बनाना आपके समुदाय का धर्मतंत्र का”।
भयंकर तूफान से गेलीलो झील का पानी बाँसों ऊँचा उछलने लगा। नावें चल रही थीं वे बुरी तरह थरथराने लगीं। लहरों का पानी भीतर पहुँचने लगा तो यात्रियों के भय का पारावार न रहा।
एक नाव में एक कोने में कोई निर्द्वन्द्व व्यक्ति सोया पड़ा था। साथियों ने उसे जगाया। जग कर उसने तूफान को ध्यानपूर्वक देखा और फिर साथियों से पूछा “आखिर इससे डरने की क्या बात है? तूफान भी आते ही है मनुष्य मरते ही हैं। इससे क्या ऐसी अनहोनी बात हो गई जो आप लोग इतनी बुरी तरह हड़बड़ा रहे हैं?
भयभीत यात्रियों के उतर की प्रतीक्षा किये बिना उस अलमस्त में आँखें बन्द कीं और अपने भीतर की झील में उतर कर कहा “शान्त हो जा मूर्ख।”
सहमे हुए नटखट बच्चे की तरह तूफान रुक गया। नाव का हिलना बन्द हुआ कि यात्रियों ने चैन की साँस ली। उस अलमस्त यात्री ने साथियों से पूछा-दोस्तों अब बताओ विश्वास बड़ा है कि नहीं। तूफान को तुमने उससे भी बड़ा क्यों मान लिया? यह फक्कड़ था “जीसस क्राइस्ट”।
छोटे आदमी और थोड़े साधनों को देखते हुए मोटा अनुमान यही लगता है कि इनके बलबूते कोई हलके अस्थाई काम ही सम्पन्न हो सकते हैं। बड़े कार्यों के लिए, बड़ी योजनाओं के लिए भारी भरकम व्यक्तित्व एवं प्रचुर साधनों की व्यवस्था होने पर ही बात बनती है। इन दिनों प्रतिभाओं को, साधनों की आवश्यकता पूरी करने के लिये सरकारी अनुदान या संरक्षण के लिए ताकना पड़ता है। ऐसा भी होता है कि धनाध्यक्षों का आश्रम पाकर कोई बड़ी योजनाएँ बनें और वे प्रगति या सफलता की स्थिति तक पहुँचे, आम आदमी की मान्यता यही है। उत्साहवर्धक उद्यमी इन्हीं की छत्रछाया में पलते या बढ़ते देखे गये हैं इसलिए यह मान्यता और भी अधिक मजबूत होती है कि जिन योजनाओं के पीछे खड़े प्रतिभाशालियों का नेतृत्व संरक्षण नहीं है अथवा बड़ी पूँजी की व्यवस्था नहीं है उनके संबन्ध में यही अनुमान लगाया जाता है कि कोई शेख चिल्ली जैसा ताना बाना बुन रहा है। बड़े क्षेत्र के बड़े स्तर पर कोई बड़े काम कर सकना कदाचित उनके द्वारा न बन पड़े जिन्हें थोड़ा या छोटा समझा जाता है। यह अनुमान इसलिये भी सही प्रतीत होता है कि बड़ी योजनाओं को छोटे लोग थोड़े से सीमित साधनों के बलबूते पूरा कर सके हों, ऐसे उदाहरण दीख नहीं पड़ते। थोड़ी पूँजी वाला योजना पूरी कर सकेगा इस पर सहज विश्वास नहीं होता। इसी प्रकार जिनके पास सीमित साधन हैं उनने बड़े क्षेत्र में बड़े रचनात्मक काम करके दिखाये हों, ऐसा कम ही दृष्टिगोचर होता है। उनकी शक्ति, प्रतिभा, दूरदर्शिता पर भी सर्वसाधारण का विश्वास नहीं जमता। इसी प्रकार छोटों की प्रामाणिकता एवं संगठनात्मक सृजनात्मक सूझ-बूझ पर भी सन्देह किया जाता है और सोचा जाता है कि आपसी लड़-झगड़ में बेईमानी, चालाकी या नेतागिरी की ललक में यह लोग अपनी सीमित शक्ति को बरबाद कर देंगे और असफलता एवं उपहास के भोजन ही बनेंगे। इन दिनों की लोक मान्यता यही है। इस कारण यों तो हलके लोग कोई बड़े साहस करते ही नहीं करते हैं तो सहयोग के अभाव में उनकी गाड़ी बीच में ही चरमरा जाती है। इन मान्यताओं के रहते बड़े नेतृत्व एवं बड़े साधनों के उपलब्ध न होने पर प्रारम्भिक मान्यता यही बन जाती है कि अत्युत्साह का परिणाम निराशाजनक ही निकलेगा। जिस कार्य की सफलता पर विश्वास न हो, कौन कोई प्रोत्साहन दे और किस आधार पर कहीं से कोई बड़ी सहकारिता उपलब्ध हो? असंख्य उपयोगी योजनाओं को इसी कारण असफल ओर उपहासास्पद होता देखा गया है। इस निराशा के वातावरण में साधारण लोगों द्वारा कोई महत्वपूर्ण योजनाएँ न तो बनती हैं और न ही कहने योग्य सफलता अर्जित कर पाती हैं। जहाँ निराशा की ही बहुलता हो वहाँ कोई किस आधार पर बड़े कदम उठाये। बड़ी योजनाएँ हाथ में ले।
उपरोक्त वर्णन कुछ बहुत हद तक सही है, इतने पर भी वह पत्थर की लकीर नहीं है वर्चस्व और वैभव का कितना ही महत्व क्यों न हो पर यह तथ्य अपने स्थान पर अडिग ही रहेगा कि मानवीय क्षमता, प्रतिभा, हिम्मत और लगन के उपयोग किन्हीं प्रामाणिक व्यक्तियों द्वारा किया जाय तो जिसे असंभव समझा जाता है वह संभव भी हो सकता है। महामानवों के आश्चर्यजनक कर्तृत्व इसी आधार पर ऐतिहासिक बने हैं। संसार में अगणित ऐसी घटनायें घटित हुई हैं जिनके पीछे न तथाकथित बड़े लोगों का हाथ रहा है और न कहीं से छप्पर फाड़ कर साधन ही टपके हैं। मनुष्य की वरिष्ठता यदि प्राथमिकता की कसौटी पर खरी उतरे, योजना में आदर्शवादिता का उच्चस्तरीय सम्मिश्रण हो तो सूझ बूझ में व्यावहारिकता का पुट हो तो वे व्यवधान भी हल हो जाते हैं जिनके कारण सामान्य स्तर पर उठाये गये कदमों के संबन्ध में असफलता की आशंका ही बनी रहती है। सत्य और तथ्य इस परिणति के साथ जी जुड़े हुए हैं कि मानवीय महत्ता का कोई मोल नहीं है। यदि कसौटी पर खरी उतर सके तो आशंकाओं को असफलताओं की कुकल्पना को अवास्तविक भी सिद्ध कर सकती है। जहाँ तथाकथित बड़े काम करने का श्रेय प्राप्त करते रहे है, वहाँ यह भी असंख्य अवसरों पर सही सिद्ध हुआ है कि प्रखर व्यक्तित्व और उच्चस्तरीय निर्धारणों में सहस्र हाथियों के बराबर बल होता है। वे असंभव को संभव में बदलने में असंख्य बार सफल हुए है।
पौराणिक गाथाओं में अगस्त्य के समुद्र सोख लेने, शेष जी द्वारा सिर पर पृथ्वी का भार वहन करने, नारद द्वारा विश्व में भावनात्मक कर देने, परशुराम द्वारा अनेकों बार विश्व कर देने परशुराम द्वारा अनेकों बार विश्व का “ब्रेन वाँश” करने भगीरथ द्वारा गंगा के सुविस्तृत क्षेत्र तक पहुँचाने जैसी अनेकों घटनाओं के उल्लेख हैं। जिनमें पूरी तरह मनुष्य द्वारा असंभव को संभव बना दिये जाने का आभास मिलता है। ऋषि युग में भारतीय लोक सेवकों द्वारा समस्त विश्व को अजस्र अभ्युदय से लाभान्वित किये जाने की घटनाओं से इतिहास के पृष्ठ भरे पड़े हैं। सप्त ऋषियों ने सातों महाद्वीपों की सुव्यवस्था और प्रगतिशीलता के अभिवर्धन की जिम्मेदारी अपने कंधों पर उठाई थी। ध्रुव प्रह्लाद, दधीचि, व्यास, वशिष्ठ, जैसा के महान कर्तव्य अविस्मरणीय हैं। देवताओं पर संकट आने पर मनुष्य ही दशरथ, अर्जुन आदि सामर्थ्य वाले ही मानवी सहायता पहुँचाने के लिए पहुँचाने के लिए पहुँचे थे।
धर्म सम्प्रदायों, संस्थापकों और संचालकों ने सुविस्तृत क्षेत्रों के अगणित मनुष्यों को अपने प्रभाव से प्रभावित किया और विविध प्रचलनों का अनुयायी बनाया था। योद्धाओं के पराक्रम, महाभारत, रामायण आदि ग्रन्थों में विस्तारपूर्वक पढ़े जा सकते हैं। बुद्ध का विशाल साहित्य सृजन, संगठन एवं विश्वभर में विचारक्रान्ति का जो सफल अभियान चलाया था उसकी जानकारी हर किसी को है। जैन धर्म के साधु और साध्वी जन मानस को परिष्कृत करने के लिए कितना तप और कितना प्रयास करते रहे हैं यह किसी से छिपा नहीं है। सिख धर्म प्रचारकों के पुरुषार्थ किसी से छिपे नहीं हैं। सन्त काल में जन साधारण का मनोबल बढ़ाये रहने के लिए लिए जो प्रयत्न हुए हैं उनमें दुर्दान्त दस्युओं को तलाशने, कुंठित करने में जो प्रयास किया, उसने देश की देव संस्कृति को जीवन्त बनाए रहने में कुछ कम सफलता नहीं पाई। दार्शनिक क्रान्ति के पुरोधा शंकराचार्य की दिग्विजय को भुलाया नहीं जा सकता। नालन्दा और तक्षशिला विश्वविद्यालय के संस्थापक ज्ञान और विज्ञान का भण्डार जिस प्रकार भरते रहे हैं उसका अपना अनोखा इतिहास है।
चाणक्य, समर्थ रामदास आदि ने जो नर सहर उत्पन्न किए उनकी गाथा कैसे भुलाई जाय? प्रताप, शिवाजी, छत्रसाल, चन्द्रगुप्त जैसों ने आक्रान्ताओं के दाँत किस प्रकार खट्टे किये, वह शौर्य पराक्रम की अपनी अनुपम कथा गाथा है।
स्वतंत्रता संग्राम के दिनों गाँधी, तिलक जैसी विभूतियों ने किस प्रकार लम्बे समय से चली आ रही पराधीनता को उखाड़ फेंकने के लिए कैसा प्रचण्ड जन मानस तैयार किया, यह अभी कल परसों की ही बात है। समाज सुधार के क्षेत्र में विवेकानन्द, दयानन्द ईश्वरचंद्र विद्यासागर राममोहन राय, विनोबा, जैसों के कर्तव्य भुलाए नहीं जा सकते। यह मानवी साहस और पुरुषार्थ ही है जिसने अपने-अपने समय की परिस्थितियों का कायाकल्प जैसा कर दिया। न केवल पुरुष वरन्, इस देश की महिलाएँ भी विभिन्न क्षेत्रों में ऐसे कीर्तिमान खड़े करती रही हैं जिन्हें देख कर यही कहना पड़ता है कि अबला समझी जाने वाली नारियाँ किस प्रकार सिंहनियों से बढ़ कर अपनी गरिमा का परिचय देती रही है।
भारत से बाहर भी मानवी पुरुषार्थ के अनेकों प्रतीक संसार के कोने-कोने में खड़े हैं। मिश्र के पिरामिड, चीन की दीवार, पनामा और स्वेज नहरें बताती हैं कि मनुष्य के लिए दुर्लभ कुछ भी नहीं है। नैपोलियन कोलम्बस, अशोक, हर्षवर्धन आदि की अपनी अपनी गौरव गाथाएँ हैं। जो बताती है कि हाड़-माँस का पुतला समझा जाने वाला मनुष्य जब अपने ओजस्, तेजस् और वर्चस का परिचय देता है तो वह कितना प्रबल, प्रखर और प्रचण्ड सिद्ध होता है?
प्रश्न इन दिनों की विपन्नताओं, समस्याओं और विभीषिकाओं का है। जिसके कारण ज्ञान-विज्ञान और वैभव का धनी कहाने वाला मनुष्य कितने अधिक संकटों में फँस गया है। प्रगति और अवनति में से किसी को भी किसी प्रकार चुना जा सकता है। इसका प्रणाम परिचय विगत दो शताब्दियों में देखने को मिला है। चौंकाने वाले युद्ध कौशल में प्रवीणता का परिचय देने वाली दुर्बुद्धि ने इसी शताब्दी में दो विश्व युद्ध और सैकड़ों क्षेत्रीय युद्ध स्तर के खड़े किए जिनमें धन जन की अपार हानि सहनी पड़ी। औद्योगीकरण के नाम पर खड़े किए गए कारखाने और दैत्याकार वाहन समूचे वायुमण्डल को किस प्रकार प्रदूषण से भर चुके हैं यह आज सबसे बड़ी चिन्ता का विषय है। पानी विषाक्तता से भरता जा रहा है। रासायनिक खाद और कीट मारक औषधियों का छिड़काव पृथ्वी की उर्वरता की भयानक बनाता जा रहा है। बढ़ते तापमान से ध्रुव पिघल जाने जैसे संकट खड़े हो रहे हैं। अणु उपकरणों का विकिरण जीवधारियों के लिए महाविनाश का संकेत दे रहा है।
बढ़ती हुई जनसंख्या का भार वहन करने में पृथ्वी असमर्थ हो रही है। गरीबी और अमीरी दोनों ही अपने अपने कीर्तिमान स्थापित कर रही है। अपराधों और अनाचारों की ऐसी बाढ़ आई हुई है कि हर कोई अपनी छाया से ही डरने लगा है। आशंकित और आतंकित जन मानस अनिश्चितता और अराजकता जैसे अनिश्चितता से शत्रु का घात करना आज का प्रचलन बन गया है। कुरीतियों और अवांछनीयताओं के बीच प्रगति का दावा करने वाला मनुष्य अवगति के घोर गर्त में गिरता हुआ बुरी तरह कराह रहा है।
गिरना सरल है। उठना कठिन। छत पर से फेंका हुआ ढेला सेकेण्डों में जमीन पर आ गिरता है। पानी ढलान की ओर बिना किसी प्रयास के अनायास ही बढ़ने लगता है। किसी को भी हलका सा धक्का मार कर गिराया जा सकता है। पर गिरों को उठाने के लिए सशक्त साधन जुटाने पड़ते हैं। पिछले दिनों मनुष्य ने गिरने और गिराने की नीति अपनाई है। अणु विज्ञान और वैभव असीम उपार्जन भी मात्र पतन और पराभव का कारण बनकर रह गया है। पूर्वजों की तुलना में सुविधा साधनों के सम्पादन में निश्चय ही प्रगति हुई है? पर साथ ही यह भी मानना पड़ेगा कि दुर्गति की प्रतिक्रिया भयावह दुर्गति के रूप में सामने आई है। भ्रष्ट चिन्तन ने दुष्ट आचरण को जन्म दिया है। तदनुसार परिस्थितियाँ भी ऐसी बन गई हैं जिन्हें विकट और विपन्न ही कह सकते हैं।
प्रश्न यह है कि सारे गिरे को उबारे कौन? ऐसा चिन्तन चरित्र और व्यवहार बन नहीं पड़ रहा है जिससे हर क्षेत्र में फैली हुई विकृतियों का निराकरण और समाधान बन पड़े।
इन दिनों आवश्यकता इसी बात की अनुभव हो रहीं है कि पटरी से उतरे इंजन को यथा स्थान उठाकर रख देने वाली क्रेन कहाँ से मिले? दल-दल में फँसे हुए हाथी को उसके सहचरों का जत्था कहाँ से आए जो फँसे को खींच कर किनारे तक पहुँचाए।
मान्यता बन गई है कि हर दिशा पराभव को प्रश्रय मिल रहा है। ऐसी प्रतिभाएँ दीख नहीं पड़ रहीं जो नरक से उबारने और स्वर्ग तक पहुँचाने का दावा कर सकें, साहस दिखा सकें। मान्यता यह बन गई कि यत्न ही स्वाभाविक है। उसे गतिशील बनाने वालों की बहुलता ही भरी पड़ी है। ऐसी दशा में वह अनहोनी कैसे घटे कि असमर्थ, दुर्बल, देय और साधनहीन साधारणजनों के द्वारा ऐसे प्रयत्न कैसे बन पड़े जिसके द्वारा अभ्युदय के प्रयत्न बन पड़ने की आशा की जा सकें। सघन अंधकार के वातावरण में आज कहाँ से प्रकाश किरण उगे इसकी हर किसी के द्वारा प्रतीक्षा की जा रही है।
रोमौरोला जब आइन्स्टीन से मिले तो उन्होंने प्रश्न किया कि जब भी आप अकेले होते हैं तब क्या सोचते हैं?
आइन्स्टीन ने उतर दिया स्वयं अपने को लेकर मैं प्रतिदिन यही सोच करता हूँ कि मेरे बाह्य और आन्तरिक जीवन निर्माण में समाज के अगणित व्यक्तियों का न जाने कितना योगदान है और इसी अनुभूति से उद्दीप्त मेरा अन्तःकरण छटपटाता रहता है कि मैं कम से कम इतना तो इस समाज को देकर जाऊँ, जितना मैंने अभी तक लिया है। समाज ऋण से उऋण होने का और कोई तरीका भी तो नहीं है।
जिन कार्यों या बातों को मनुष्य दुहराता रहता है, वे स्वभाव में सम्मिलित हो जाती हैं और आदतों के रूप में प्रकट होती हैं। कई मनुष्य आलसी प्रवृत्ति के होते हैं। यों जन्मजात दुर्गुण किसी में नहीं हैं। अपनी गतिविधियों में इस प्रवृत्ति को सम्मिलित कर लेने और उसे समय कुसमय बार बार दुहराते रहने से वैसा अभ्यास बन जाता है। यह समग्र क्रिया−कलाप ही अभ्यास बन कर इस प्रकार आदत बन जाते हैं मानो वह जन्मजात ही हो। या किसी देव दानव ने उस पर थोप दिया हो। पर वस्तुतः यह अपना ही कर्तृत्व होता है जो कुछ ही दिन में बार-बार प्रयोग से ऐसा मजबूत हो जाता है मानो वह अपने ही व्यक्तित्व का अंग हो और वह किसी अन्य द्वारा ऊपर से लाद दिया गया हो।
जिस प्रकार बुरी आदतें अभ्यास में आते रहने के कारण स्वभाव बन जाती है और फिर छुड़ायें नहीं छूटती, वैसी ही बात अच्छी आदतों के सम्बन्ध में है।
अच्छी आदतों के संबंध में भी यही बात है। हँसते मुस्कराते रहने की आदत ऐसी ही है। उसके लिए कोई महत्वपूर्ण कारण होना आवश्यक नहीं। आमतौर से सफलता या प्रसन्नता के कोई कारण उपलब्ध होने पर ही चेहरे पर मुसकान उभरती है। किन्तु कुछ दिनों बिना किसी विशेष कारण के भी मुसकराते रहने की स्वाभाविक पुनरावृत्ति करते रहने पर वैसी आदत बन जाती हैं फिर उनके लिए किसी कारण की आवश्यकता नहीं पड़ती है और लगता है कि व्यक्ति कोई विशेष सफलता प्राप्त कर चुका है। साधारण मुसकान से भी सफलता मिलकर रहती है।
क्रोधी स्वभाव के बारे में भी यही बात है। कोई व्यक्ति अनायास ही चिड़चिड़ाते रहते देखे गये हैं। अपमान, विद्वेष या आशंका जैसे कारण रहने पर तो खीजते रहने की बात समय में आती है, पर तब आश्चर्य होता है कि कोई प्रतिकूल परिस्थिति न होने पर भी लोग खीचते झल्लाते चिड़चिड़ाते देखे जाते हैं। यह और कुछ नहीं उसके कुछ दिन के अभ्यास का प्रतिफल है। आदतों को आरम्भ करने में तो कुछ भी नहीं करना पड़ता है। पर पीछे वे बिना किसी कारण के भी क्रियान्वित होती रहती हैं। इतना ही नहीं कई बार तो ऐसा भी होता है कि मनुष्य आदतों का गुलाम हो जाता है और कोई विशेष कारण न होने पर भी उपयुक्त अनुपयुक्त आचरण करने लगता है। बाद में स्थिति ऐसी बन जाती है कि उस आदत के बिना काम ही नहीं चलता।
आलसियों और गंदगी पसन्द लोगों के कुटेवों को लोग नापसन्द भी करते हैं और इनके लिए टीका टिप्पणी भी करते हैं। पर अभ्यस्त व्यक्ति को यह प्रतीत ही नहीं होता कि उसने कोई ऐसी आदत पाल रखी है जिन्हें लोग नापसन्द करते हैं और बुरा मानते है। अच्छी आदतों के संबंध में यह बात है। साफ सुथरे रहना, किफायत बरतना और किसी न किसी उपयोगी कामों में लगे रहना, न होने पर प्रयत्न पूर्वक सौंपा हुआ काम कर लेना, एक प्रकार की अच्छी आदत ही है जो अपने व्यक्तित्व का वजन बढ़ाती है। कुछ न कुछ उपयोगी प्रक्रिया बन पड़ने पर अनायास ही सहज श्रेय प्राप्त करते हैं।
तिनके-तिनके इकट्ठे करने पर मोटा या मजबूत रस्सा बन जाता है। अच्छी या बुरी आदतों के संबन्ध में भी ऐसी बात है। आरम्भ में वे अनायास ही आरम्भ हो जाती है और थोड़ा सा प्रयत्न करने कुछ बार दुहरा देने भर से मनःस्थिति अनुकूल बन जाती है। स्वभाव का अंग बन जाने पर समूचे व्यक्तित्व को ही उस ढाँचे में ढाल लेती है। अच्छी आदतों का अभ्यास किया जाय तो व्यक्तित्व सद्गुणी स्तर का बन जाता है। दूसरों के मन में अपने लिए सम्मान जनक स्थान बना लेता है। उसे सभ्य या शिष्ट माना जाता है। उसके संबंध में लोग और भी अच्छे सद्गुणों की मान्यता बना लेते है। उसके कार्यों में सहयोग करने लगते हैं या अवसर मिलते ही उन्हें अपना सहयोगी बना लेते हैं। सहयोग या असहयोग ही किसी की उन्नति या अवनति का प्रमुख कारण है। अच्छी आदतें फलतः अपना हित साधन करती हैं। इनका देर-सबेर में उपयोगी लाभ मिलता है। इसके विपरीत बुरी आदतों से प्रत्यक्षतः और परोक्षतः निकट भविष्य में हानि ही उठाने का अवसर आता रहता है।
शाकाहार मानव की आदि प्रकृति है। लोगों की यह धारण भ्रान्ति मात्र है कि माँसाहार स्वास्थ्य के लिए लाभदायक या शक्तिवर्धक है। वस्तुतः सच्चाई यह है कि माँस मानवी स्वास्थ्य के लिए अनेकानेक संकट ही खड़ा करता है। विश्व में ऐसे अनेकों उदाहरण है जिनके शाकाहार से विशिष्ट शक्ति सामर्थ्य प्राप्त करने की बात प्रमाणित होती है। पश्चिमी आयरलैण्ड के लोगों का मूल भोजन जौ, छाछ फल और शाक है तथा वे अत्यन्त तन्दुरुस्त पाये जाते हैं। स्काटलैंड के लोगों का स्वस्थ शरीर व बल विश्वविख्यात है। आहार में वे प्रायः जौ की रोटी व्यवहार में लाते हैं। फ्राँस के लोग मूलतः फलाहारी होते हैं। वे चेस्टनट नामक फल खाया करते हैं। तुर्की निवासियों का प्रिय आहार किसमिस, अंजीर और रोटी है। इटलीवासी मक्का व फल के प्रेमी होते हैं। खाद्यान्न में वे प्रायः मेकरोनी नामक अनाज उपयोग में लाते हैं। भारत आनी शारीरिक मानसिक सामर्थ्य की दृष्टि से विश्व विजेता रहा है। इतिहास साक्षी है कि यहाँ के निवासी मूलतः शाकाहारी ही थे। अभी भी यहाँ की अधिसंख्य जनता अन्न फल और शाकों पर निर्भर है तथा माँसाहारियों की तुलना में स्वस्थ एवं दीर्घ जीवन का आनन्द उठा रही है। शहरी क्षेत्रों में सभ्यता के नाम पर लोगों पर चिन्तनीय हास हुआ है।
विशेषज्ञों की दृष्टि में शाकाहार माँसाहार की तुलना में अधिक शक्तिदायक होता है। एक लीटर छाछ अथवा आधा लीटर दूध से उतनी ही शक्ति प्राप्त की जा सकती है, जितनी चार अंडे अथवा एक पौंड माँस से प्राप्त होती है। मूँग, चना, मूँगफली आदि से प्रचुर मात्रा में प्रोटीन मिलती है। दाल का एक औंस से दुगुना प्रोटीन प्रदान करता है। माँस के आधे से अधिक भाग जल और कीटाणुओं से युक्त होता है। उसमें विटामिन शर्करा आदि की मात्रा अत्यल्प ही पायी जाती है।
मनुष्य शाकाहारी वर्ग का प्राणी है। उसे शरीर और पाचन तन्त्र की संरचनानुसार क्षारीय और रेशेदार भोजन की आवश्यकता है। माँसाहार जैसे गरिष्ठ आहार से पाचन तन्त्र में अल्मता पैदा होती है इससे सड़न उत्पन्न होती है जो कितने ही रोगों का कारण बनती है। डॉ. रॉबर्ट-मेकेरियन के अनुसार मनुष्य को जीवित रहने के लिए अल्प एवं सात्विक भोजन की आवश्यकता है। विटामिन, कैल्शियम व फास्फोरस से युक्त शाकाहारी भोजन से ही मनुष्य अधिक स्वस्थ व प्रसन्न रह सकता है। उसके अनुसार -” माँसाहार करने वाले यह भूल ही जाते हैं कि माँस का समूचा भाग पौष्टिक नहीं होता। मात्र 60 प्रतिशत भाग ही पोषक रहता है। शेष 40 प्रतिशत भाग में ऐसा विकृत पदार्थ रहता है, जो नस नाड़ियों और रक्त में घुला रहता है, जिसे पृथक् किया जाना संभव नहीं है। यह भी पौष्टिक समझकर उदरस्थ कर लिया जाता है।”
माँसाहार के विषय में अभिमत व्यक्त करते हुए भगवान महावीर ने कहा था कि-यह एक नर्कगामी प्रवृत्ति है। इसमें इसका उपयोग तथा पेशा करने वाला दोनों ही पाप के अधिकारी बनते हैं”। माँसाहार का मनुष्य के स्वभाव पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है। इस बात की पुष्टि करते हुए अब आधुनिक वैज्ञानिक भी कहते हैं कि ईर्ष्या, द्वेष, क्रोध, चिड़चिड़ापन, उत्तेजना व हिंसक प्रवृत्ति के दैनन्दिन विकास का एक प्रमुख कारण माँसाहार है।” इससे मनुष्य के अन्दर क्रूरता का अहंकार का विकास होता है जिससे वह अत्यन्त निकृष्ट क्रिया–कलापों को करने पर भी उतारू हो जाता है।
खाद्य विशेषज्ञों का कहना है कि माँस को प्रायः मसालों के साथ तल-भुनकर स्वादिष्ट बना लिया जाता है, परन्तु इससे उसके दुष्परिणामों से बचा नहीं जा सकता। शिकारी जीव तो पशुओं को मारकर तुरन्त खा लेते हैं, परन्तु मनुष्य तो उसका भक्षण काफी देर बाद करता है। इससे उसमें अनेकों कीटाणु समाविष्ट हो जाते हैं। देर तक रखा माँस सड़-गल जाता है और उसमें प्रायः तपेदिक न्यूमोनिया हैजा आदि के कीटाणु पनप जाते हैं। खाने वाला व्यक्ति इन रोगों से प्रभावित हुए बिना नहीं रहता। गठिया, क्षयरोग आदि भी इसी की उत्पत्ति मानी गई हैं।
अपनी खोज निष्कर्ष में डॉ. मेककोलम ने कहा है-माँस से मनुष्य की आँत में अनेकों विषैले कीटाणु उपजते हैं जिससे वह अनेकानेक रोगों का शिकार हो जाता है।” डॉ. जोसिका ओल्डफील्ड के शब्दों में -” मनुष्य के लिए माँसाहार प्राकृतिक भोजन नहीं है। यह उसके शरीर और मन का सबसे बड़ा दुश्मन है। इससे शरीर को क्षय, कैन्सर व आँतों के रोग से तो ग्रसित होना ही पड़ता है, किन्तु उससे भी भयंकर मानसिक विकृतियाँ पनपती हैं जो भक्षणकर्ता को कहीं का नहीं छोड़ती।
मनुष्य की शारीरिक संरचना भी कुछ ऐसी है कि वह माँसाहार के योग्य नहीं बैठती। मनुष्य की आँतें लंबी होती हैं। अतः माँसाहार के कारण सड़न जल्दी पैदा हो जाती और विषैले तत्व रक्त में घुलकर पूरे शरीर को विषाक्त बनाते हैं। परिणाम स्वरूप शरीर में शर्करा ठीक तरह से पच नहीं पाती और और अन्ततः मधुमेह रोग उत्पन्न हो जाता है। विषैले तत्वों के निरन्तर बने रहने पर शरीर अस्वस्थ हो जाता है तथा मानसिक तनाव बनने लगता है। इस संदर्भ में इंग्लैण्ड के प्रो. हेगे ने अपनी पुस्तक ‘यूरिक एसिड ओर रोगों का कारण में यह स्पष्ट उल्लेख किया है-माँस और अण्डे यूरिक एसिड होती है। उसमें सिरदर्द, पागलपन, लकवा, गठिया, श्वाँस, अनिद्रा, मधुमेह, जलोदर, हिस्टेरिया, नेत्रविकार आदि रोग विकार होते हैं।” आज चारों ओर इन रोगों की बहुतायत है।
माँस में कोलेस्ट्रॉल की मात्रा अधिक होती है जो मनुष्य में हृदय रोग एवं रक्त विकार को जन्म देती है। वैज्ञानिकों ने पाया है कि माँसाहारी प्राणियों के शरीर में हाइड्रोक्लोरिक एसिड की मात्रा शाकाहारियों की तुलना में दस गुना अधिक होती है। इससे उनमें माँस के साथ-साथ हड्डी तक को पचा डालने की क्षमता रहती है। परन्तु मनुष्य में यह मात्रा उपलब्ध नहीं, अतः वह एक शाकाहारी प्राणी ही है।
श्वेतसार को पचाने के लिए शाकाहारियों की लार में रिपालिन नामक पाचक रस विद्यमान होता है जबकि माँसाहारी प्राणी में इसका सर्वथा अभाव रहता है सर्वविदित है कि मनुष्य में यह लार तत्व उपलब्ध है।
कलकत्ता स्कूल ऑफ टापिकल मेडिसिन के डॉ. हर्टर और डॉ. केन्टडेले ने बिल्लियों व वानरों के ऊपर प्रयोग करके पाया कि माँसाहार से उनके शरीर में जहर का समावेश हो गया तथा वे शीघ्र ही मृत्यु के शिकार होने लगे। प्रयोग के अंतर्गत गाय के माँस से कोढ़ जैसे रोग उत्पन्न होते देखे गये। माँसाहार से कैंसर की संभावनाएँ भी अधिक बढ़ जाती हैं वैर्स्टन आस्ट्रेलिया यूनिवर्सिटी के डॉ. बी.के. आर्मस्ट्राँग ने गहन शोध करने के उपरान्त यह निष्कर्ष निकाला है कि शाकाहारी महिलाओं की तुलना में माँसाहारियों की कैंसर से होने वाली मृत्यु 30 से 40 प्रतिशत अधिक है।
अमेरिका में पिछले दशक से अनुसंधानों से पता चला है कि माँसाहार बड़ी आँत, स्तन और गर्भाशय के कैंसर का कारण भी बन सकता है। जापान में माँसाहारी कम होने के कारण इस तरह के कैंसर बहुत विरल हैं। ऐसा अनुमान है कि अधिक चिकनाई तथा पित्त उकसाने वाले गुण के कारण माँसाहार से आँतों में कैंसरकारी प्राकृतिक रसायन जमा हो जाते हैं तथा इससे आँतों में एवं शरीर की चरबी में ईस्ट्रोजन जैसे हारमोन पैदा करते हैं। स्तन और गर्भाशय के कैंसर की उत्पत्ति अंततः ईस्ट्रोजन जैसे यौन हारमोन्स द्वारा संप्रेषित होती है।
हमें डॉ. एडवर्ड सौर्न्डस के इस कथन को स्मरण रखना चाहिए कि-आने वाली दुनिया माँसाहार के नाम मात्र से भयभीत हो उठेगी। भावी युग के लोगों को शाकाहार के लिए बाध्य होना पड़ेगा। “
महात्मा आनन्द स्वामी सरस्वती उन दिनों लन्दन प्रयास पर थे। उनके प्रवचनों में वहाँ के प्रसिद्ध समाचार पत्र “डेली टेलीग्राफ" के सम्पादक भी आते थे। स्वामी जी के स्वस्थ शरीर से आकर्षित होकर एक दिन उन्होंने स्वामी जी से पूछा “आपकी आयु कितनी है महात्मन्?”
स्वामी जी ने पलट कर पूछा लिया “आपके विचार में कितनी होनी चाहिए?”
सम्पादक-” अधिक से अधिक 64 वर्ष।” स्वामी जी ने कहा-मेरे बड़े लड़के की आयु इस समय 69 वर्ष है और मेरी 84 वर्ष”। सम्पादक -आश्चर्य! आप क्या भोजन करते हैं। कौन सी ब्रांडी कौन सा माँस खाते है। स्वामी जी ने कहा-माँस मदिरा तो मेरे माँ-बाप और दादी-दादी भी नहीं खाते-पीते थे। मैं तो इस से बहुत दूर हूँ क्योंकि मेरा पेट कब्रिस्तान नहीं है। हाँ, भोजन में दाल, सब्जी एवं रोटी जरूर लेता हूँ।” स्वस्थ शरीर का राज शाकाहार है।
गायत्री और सावित्री में प्राथमिकता किसकी? इस प्रश्न का उत्तर प्राप्त करने के लिए उपयोगिता को ध्यान में रखते हुए उत्तर देना पड़ेगा। अन्न, जल और वायु जीवन का आधार माना जाता है। प्राथमिकता वायु की है। उसके बिना कुछ मिनट में ही दम घुट जाता है इसलिए साँस को एक मिनट में कई बार लेना पड़ता है। इसके बाद जल का नम्बर आता है। एक-एक दो-दो घण्टे बाद पानी पीना पड़ता है और दिन भर में एक सुराही पानी पी लिया जाता है। अन्न का नम्बर उसके बाद का है। उसे दो बार करने में ही तृप्ति हो जाती है।
वर्णमाला की पुस्तकें सबसे अधिक बिकती हैं। छात्र भी प्रथम कक्षा के ही अधिक होते हैं। एम. ए. में विद्यार्थी भी कम रह जाते हैं और उस पाठ्यक्रम की पुस्तकें भी कम बिकती हैं। स्नातकोत्तर कॉलेज भी कम-कम और दूर-दूर होते हैं। चूँकि अक्षर ज्ञान की सबसे प्रथम आवश्यकता होती है। इसके बाद ही गाड़ी आगे बढ़ती है। गायत्री को इसी प्रकार की प्राथमिकता दी गयी है और उसे हर किसी के लिए आवश्यक बताया गया है। उससे जी चुराने वाले की भर्त्सना भी की गयी है।
गायत्री सुमति की, सन्मति की प्रतीक है। उसकी आवश्यकता सर्वप्रथम है। छोटे से लेकर बड़े कामों तक में उसकी जरूरत पड़ती है। अभाव रहने पर हाथों में आयी चीज चली जाती है। कमाना तो दूर, जो पल्ले बंधा उसे भी नासमझ गँवा बैठते हैं। सम्पदा पूर्वजों की छोड़ी हुई भी हाथ लगे, तो भी वह नासमझी के कारण हजार रास्ते बनाकर निकल जाती है। कमाने में भी अधिक रखवाली की जरूरत पड़ती है। इन दोनों ही प्रयोजनों में समझदारी की आवश्यकता है। न उसके बिना कमाया जा सकता है न खाया।
रामायण का कथन है कि ‘जहाँ सुमति तहं सम्पत्ति नाना। जहाँ कुमति तहं विपत्ति नाना॥ और भी एक स्थान पर आया है-जाको पक्ष दारुण दुख तेहीं, ताकी मति पहले हरि लेंहि॥ संस्कृत में एक श्लोक आता है कि “देवता किसी की रक्षा के लिए उसके पीछे-पीछे लाठी लिए नहीं फिरते, वरन् ऐसी समझ देते हैं जिसके सहारे वह सुरक्षा और सफलता का लाभ ले सके। निश्चय ही सम्पत्ति की तुलना में समझदारी की आवश्यकता कहीं अधिक है। तभी तो बच्चों को अन्न, वस्त्र, की व्यवस्था के उपरान्त उन्हें पढ़ाने का ही प्रबंध किया जाता है।
ब्रह्मा जी द्वारा सृष्टि उत्पादन प्रसंग में उन्हें सर्वप्रथम आकाशवाणी द्वारा तप करके मेधा और प्रज्ञा प्राप्त करने में लगते देखा जा सकता है। उसके उपरान्त योजना बनती और साधन सामग्री की सावित्री की आवश्यकता पड़ती देखी जाती है। इस प्रकार प्राथमिकता गायत्री की ही रही।
गायत्री अर्थात् समझदारी। सावित्री अर्थात् क्षमता। समझदारी होने पर ही मनुष्य सम्पदा उपार्जित करने और उसका सदुपयोग कर सकने में सक्षम होता हैं। ना समझ के हाथों सम्पदा सौंप दी जाय तो वह रास्ते में ही गाँठ कटा बैठेगा। और रोकथाम करने पर जान गंवा बैठेगा। इसके विपरीत जेब में कुछ भी न हो, पर विद्या का भण्डार भरा हो तो वह कहीं भी पेट भर लेगा। जहाँ जायेगा वहीं सम्मानित होगा। सरकार ने भी प्राथमिक कक्षाओं की फीस माफ कर रखी। है, जबकि कॉलेज की पढ़ाई में विद्यार्थी को बहुत खर्च करना पड़ता है। प्राइमरी स्कूलों की संख्या भी सबसे अधिक है। गायत्री को मनुष्य की प्राथमिक आवश्यकता समझा गया है। इसलिए दिन में तीन बार उसकी संध्यावंदन करने के लिए कहा गया है। न्यूनतम एक बार थोड़ी बहुत उपासना करना तो अनिवार्य ही माना गया है चाहे वह बिना किसी विधि विधान के किसी भी स्थिति में मानसिक रूप से ही कर ली जाय।
निरक्षरों को उपहासास्पद माना जाता है और तिरस्कृत भी किया जाता है। आध्यात्मिक क्षेत्र में प्रवेश करने वालों के लिए गायत्री उपासना साक्षरता की तरह आवश्यक मानी गयी है। न करने वालों की कड़ी भर्त्सना की गयी है। उन्हें धर्मानुष्ठान करने तक के अधिकार से वंचित करने की धमकी दी गयी है। उन्हें शूद्र-गँवार तक कहा गया है। गायत्री सर्वसाधारण की साधना है। उसकी जानकारी प्राचीन काल में विद्याध्ययन के साथ ही करा दी जाती थी। पाठशाला में प्रवेश करते समय पुरातन काल में गुरुमंत्र के रूप में गायत्री को रटाया जाता था और उसकी प्रतिमा सदा साथ रखने के लिए जनेऊ पहनाया जाता था। इसमें वर्णभेद की कोई बात नहीं थी। वंशभेद या लिंगभेद के कारण किसी को भी इससे वंचित नहीं किया जाता था। सद्बुद्धि की देवी को प्राथमिकता देने में कौन इनकार करेगा? इसी दृष्टि से लोगों को आकर्षित करने के लिए उसके बड़े बड़े महात्म्य भी बताये गये हैं।
वर्तमान परिस्थितियों में सद्बुद्धि की देवती अपनाने के लिए व्यापक प्रचार किया गया कि लोग दुर्बुद्धि के कारण जो अनेकानेक संकटों में फँसते और पग-पग पर ठोकरें खाते देखे जाते हैं, उनसे बचाव हो सके। लोग अपनी समझदारी की जाँच पड़ताल करते रहें। उसका महत्व समझें और जहाँ, जब, जितनी कमी दिखाई पड़े उसे संभालने की चेष्टा करें। नासमझी को ही समस्त संकटों का मूलभूत कारण समझें और समझदारी को पूरी तत्परता के साथ अपनाये। गायत्री को अपनाने के निर्धारण में यही रहस्य छिपा हुआ है।
सृष्टि के सभी प्राणी निरोग रहते और दुर्घटना के अतिरिक्त कभी अकाल मृत्यु नहीं मरते। एक मनुष्य ही ऐसा प्राणी है जो जिह्वा और जननेन्द्रिय का असंयम बरत कर खोखला, दुर्बल और बीमार पड़ता रहता है और असमय बेमौत मरता है।
विचारों का सदुपयोग करने वाला सहल ही हँसती-हँसाती जिन्दगी जी सकता है। पर दुर्बुद्धिवश चिन्तन क्षेत्र में अनेकों विकृतियाँ भर लेता है और चिन्ता, निराशा, भय, उद्वेग आदि से संत्रस्त रहता है। मानसिक सन्तुलन गँवाकर उद्धत, उच्छृंखल आवेशग्रस्त रहता है। खुद कुढ़ता और सम्बन्धित लोगों को भी कुढ़ाता है।
अर्थव्यवस्था के बारे में भी यही बात है। आजीविका के अनुरूप बजट न बनाने वाले अपव्ययी सदा अर्थचिन्ता में डूबे रहते हैं। अपनी योग्यता बढ़ाते हैं, न कठोर श्रम में दिलचस्पी लेते हैं, न खर्च घटाते हैं। ऐसी दशा में दरिद्री ऋणी रहना स्वाभाविक है।
पारिवारिक तालमेल न बिठा पाने, परिजनों को कुसंस्कारी बनाते चलने, उन्हें आलसी और अस्त व्यस्त रखने, अनुशासन न सिखाने, ढेरों बच्चे पैदा करने वालों का कलह से सदा एक दूसरे के प्रति मुटाव बना रहता है। ऐसे बाहर से एक और भीतर से अनेक रहने वाले परिवार सहयोग अभाव में अस्त व्यस्तता ही उत्पन्न करते रहते हैं।
नशेबाजी जैसे दुर्व्यसन, बालविवाह, दहेज, मृतकभोज, भिक्षा व्यवसाय, जातिगत, ऊँच-नीच पर्दाप्रथा जैसे महारोगों घातक कुप्रचलनों का शिकार समुदाय निरन्तर नीचे ही गिरेगा, उसे ऊँचा उठने का कभी अवसर न मिलेगा। अन्धविश्वास अपने आप में इतने खर्चीले और मतिभ्रम पैदा करने वाले होते हैं कि अकारण ही मनुष्य पतन पराभव के गर्त में गिरता और भूलों पर भूलें करता है।
भावना जितनी गहरी होगी उत्साह उतना ही उभरेगा और प्रयास उतना ही अधिक बन पड़ेगा।
ऐसे मनुष्य न स्वयं चैन से बैठते हैं, न दूसरों को बैठने देते हैं।
धार्मिक, आध्यात्मिक क्षेत्र की भ्रान्तियाँ और भी बढ़-चढ़कर हैं। ईश्वर तुल्य सद्गुणी बनने का सीधा-साधा उद्देश्य छोड़कर लोग देवी-देवताओं की पूजा-पत्री का चारा दाना डालकर फुसलाने और सहज ही मनोकामनाएँ पूर्ण कराने की फिराक में रहते हैं। इसके लिए पशुबलि नरबलि करने तक में नहीं चूकते।
इस प्रकार की भ्रान्तियाँ ही हैं जो मनुष्य जैसे सुविधा साधनों से सम्पन्न जीव को भी नारकीय यंत्रणाओं में घेरे रहती हैं। कुकर्मी बनते और दूसरों को बनाते हैं। यह अंधेरे में भटकने जैसी स्थिति बहुसंख्यक लोगों की बनी हुई है। इसी से बचने के लिए चिन्तन, चरित्र और व्यवहार पर नये सिरे से विचार करने और उन्हें दूरदर्शी मंत्र विवेकशीलता की कसौटी पर कसने की प्रेरणा गायत्री मंत्र देता है। इसलिए उसकी महिमा गाते गाते ऋषि मुनि और शास्त्रकार थकते नहीं हैं।
परिवर्तनकारी शक्तियाँ इन दिनों उन व्यक्तियों को तलाशने-तराशने बटोरने में जुटी हैं, जिनसे भावी मानवता का श्रृंगार किया जा सके। उज्ज्वल भवितव्यता जिनके नेतृत्व में फूल-फल सके। यही कारण है कि व्यक्तित्व विकास इस समय जिन्दगी की सबसे गहरी जरूरत बन गई है। इसकी अवहेलना-अवमानना करने वाले तो आज भी हर कहीं-पिछड़े-उपेक्षित समझे जाते हैं। जिन्दगी के हर किसी क्षेत्र में उन्हें प्रवेश निषेध की तख्ती का सामना करना पड़ता है। भविष्य में काल का अनन्त प्रवाह इन्हें कहाँ से लाकर पटकेगा, कौन जानता है? यों इस बारे में हर कोई अपने-अपने ढंग से कोशिश करता है। किन्तु यह प्रक्रिया कहाँ अपनी पूर्णता प्राप्त करती है, इसका सांगोपांग विधान क्या है? इसे जानने वाले विरल हैं। प्राच्य मनोविज्ञान ने इसकी पूर्णता को ब्राह्मणत्व नाम दिया है। ब्राह्मण होने की साधना, व्यक्तित्व के परिष्कार परिमार्जन एवं विकास की पूर्णता को पाने के साधना है।
ब्राह्मण शब्द सम्भव है, अनेकों का भ्रम में डाल दे। सम्भव है बहुत से इसका नाम सुनकर गर्वित हो उठें। अनेकों के चेहरों पर हो सकता है-सुनते ही नमस्कार के भाव उभर आए। बहुतों की उपेक्षा इसे सहनी पड़े। किन्तु इन नानाविधि भावों का उद्दीपन गल अवधारणा का परिणाम है। यदि अवधारणा सही होती तो वैदिक वांग्मय के पारिभाषिक शब्दों का सम्यक् ज्ञान होने पर इन विवादों पर कोई फेन न पड़ता। प्राच्यविद् आई. ए. रोजेट ने भी अपनी रचना “वैदिक इण्डिया” में इस तथ्य का स्वीकरण किया है। उनके अनुसार यह शब्द जाति, कुल, गोत्र रूप, रंग का द्योतक न होकर एक मनोवैज्ञानिक अवस्था का द्योतक है। इसका ठीक-ठीक समानार्थी जब यहीं के प्राचीन अर्वाचीन चिन्तन में नहीं है, तब पश्चिम के रीते कोश में कुछ आशा करना व्यर्थ है।
वैसे भी पश्चिमी मनोविज्ञान ने ज्यादातर रोगियों की छान-बीन की है। बीमार मानसिकता इन विचारकों के कार्य की सीमा रेखा बन गई। स्वास्थ्य पर आधारित है और एक स्वस्थ व्यक्ति नितान्त अलग होता है- फ्रायड का कभी सामना नहीं पड़ा स्वस्थ व्यक्तित्व से। पड़ता भी क्यों? सही सलामत आदमी को क्या पड़ी है वैद्य डॉक्टरों के पास जाने की। इसी कारण उसने समूचे व्यक्तित्व को मुख, गुदा, लिंग प्रधान, काम प्रसुप्ति एवं जननाँरीय अवस्थाओं में समेट कर दिया। यही हाल उस जैसे अनेकों का है। इनका विवेचन करने से लगता है जैसे आदमी के जीवन में कामुकता के सिवाय और कुछ बचा ही नहीं। लेकिन इस सिद्धान्त रचना में उसकी गलती भी क्या? यदि मानसिक रूप से बीमार न हो तो उसे मनःचिकित्सक के पास जाने की क्यों सूझेगी? यही कारण है फ्रायड, एडलर, जैनेव, इन सभी ने अपने सिद्धान्तों की इमारत बीमार मन की जमीन पर खड़ी की।
समग्रता के परिप्रेक्ष्य में देखने पर समूचा व्यक्तित्व परक अध्ययन तीन वर्गों में बंटा दीखता है। एक रोगात्मक सारा पश्चिमी अध्ययन इसी खाँचे में समा जाता है। केवल अभी अभी इधर कुछ सम्पूर्ण धारणाएँ मजबूती पकड़ती जा रही हैं, जो कि स्वस्थ व्यक्ति के बारे में सोचती हैं। लेकिन वे एकदम आरम्भ पर ही हैं। पहले कदम भी नहीं उठाए गए। दूसरे प्रकार के अध्ययन वे जो स्वस्थ व्यक्ति के विषय में सोचते है। स्वस्थ मन पर आधारित है। ये हैं पूरब के मनोविज्ञान-बौद्ध पतंजलि, झेन सूफी इन्होंने इस पर गहरी ढूँढ़ खोज की है। इनकी मदद व्यक्तित्व विकास की पूर्णता पाने के लिए है।
फिर एक तीसरा प्रकार है जिसे गुरजिएफ “परम मनोविज्ञान” कहता है। इसकी दशा अविकसित है। इसमें विकास की पूर्णता पाए हुए व्यक्तित्व का अध्ययन करने की चेष्टा हैं। श्री अरविन्द की पुस्तक “सीक्रेट ऑफ द वेद” में वैदिक ऋषियों के इन प्रयासों पर संकेत है। उनका खुद का भी थोड़ा बहुत प्रयास है। ब्राह्मणत्व की साधना के चरम शिखर पर पहुँचने वाला कैसा होगा? यही पर उसकी एक झलक देखने को मिलती है।
स्वस्थ व्यक्तित्व की अगर बखूबी जाँच करें उसकी विकास यात्रा के आरम्भिक बिन्दु की ओर देखें तो वह अवस्था है जड़ता की। एक उनको घेरे रहता है। इस आवरण के कारण इनको न तो सोचने का मन करता है ओर न कुछ करने का। चिन्तन और कर्म दोनों से विरति एक मात्र लक्षण है इनका। कठोर श्रम। श्रम का कुठार ही इस तमस की ड़ड़ड़ड़ को तोड़ने में सक्षम है। इस ओर प्रयत्न करने का मतलब है ब्राह्मणत्व की ओर उन्मुख होना।
श्रम होगा तो अर्जन होगा। फिर शुरुआत भले शरीर करे-देर सबेर साथ तो मन की भी देना पड़ेगा। कर्म और चिन्तन इन दोनों पैरों में एक के बिना ब्राह्मणत्व की राह पर कैसे चला जा सकेगा। इस अर्जन की अवस्था में होता है रजस का जागरण। कामनाओं, इच्छाओं का उदय, भावनाओं का अनियंत्रित बहाव, अतृप्ति की जलन का अहसास इसी अवस्था की देन है। अर्जन का सदुपयोग अपने लिए नहीं औरों के लिए हो। पनपती विचारणा धीरे-धीरे व्यक्तित्व को उस धरातल पर ला खड़ा करती है जहाँ वह अनेकों को संरक्षण देने लगता है।
पर जहाँ पर संरक्षण के साथ मार्गदर्शन का सवाल है उसके लिए ऐसी अवस्था चाहिए जिसमें तम और रज पूरी तरह सन्तुलित हो। सही सन्तुलन सधने पर व्यक्ति को जानता है। तभी उसने आत्मनिरीक्षण को मनोवैज्ञानिक की अनिवार्य योग्यता बतलाया है। अपने का भली प्रकार जाने वाला, स्वयं के प्रकृति से, समाज से अपने सम्बन्ध को पहचानने वाला ही सही मार्गदर्शक हो सकता है। वैदिक भारत में ऐसे ही लोगों द्वारा मार्गदर्शन दिए जाने का प्रमाण मिलता है। इनके लिए एक शब्द आया है-श्रोत्रिय ब्रह्मनिष्ठ। अर्थात् शास्त्र और अनुभव लोक और वेद दोनों में पारंगत। जो अपनी समझदारी से समाज के लिए नयी राहें बना सके।
इन मार्गदर्शकों का जिस काल में बाहुल्य था उस समय को धरती का सतयुग माना गया। श्रीमद्भागवत के ग्यारहवें स्कंध, बारहवें अध्याय के दसवें श्लोक में साफ उल्लेख है कि सतयुग में सिर्फ एक वर्ण था ब्राह्मण (हंस)। तभी सतयुग का एक ओर नाम प्रचलित हुआ ब्राह्मण युग। इसका मतलब यह नहीं कि व्यक्तित्व विकास की अन्य अवस्थाएँ नहीं थीं। बल्कि सभी लोग अपनी अपनी अवस्था से इस ओर निष्ठापूर्वक बढ़े सो ब्राह्मण। जिस तरह ब्रह्मचर्य का साधक ब्रह्मचारी कहलाती है, उसी तरह ब्राह्मणत्व का साधक भी ब्राह्मण की संज्ञा से विभूषित होता है। अपनी इसी निष्ठा के बदौलत क्षत्रिय विश्वामित्र, धीवर कन्या के पुत्र व्यास, वैश्या के पुत्र वशिष्ठ, दासीपुत्र सत्यकाम जाबालि ब्राह्मणत्व की चरमावस्था को पा सके। आज के जमाने में भी कायस्थ घराने में जन्म लेने वाले श्री अरविन्द, विवेकानन्द, वैश्य कुल में जन्म पाने वाले गाँधी जैसे अनेकों हैं, जिन्होंने अपनी व्यक्तित्व विकास की साधना द्वारा ब्राह्मणत्व उपलब्ध किया। विदेशों में यह नाम भले न प्रचलित हो पर इसका मतलब यह नहीं कि वहाँ ब्राह्मण नहीं हुए। सुकरात, थोरो, इमर्सन, आइन्स्टीन सौ टंच ब्राह्मण थे।
व्यक्तित्व विकास की यह साधना पूरी हुई इसे कैसे पहचानें? इस पहेली को गीता ने अपने अठारहवें अध्याय के बयालीस श्लोक में सुलझाया है। इसके अनुसार अन्तःकरण का निग्रह, आवरण और व्यवहार की परिष्कृत स्थिति, सरल आस्तिक बुद्धि, अपरिग्रह आदि ऐसे लक्षण हैं जिनसे इन्हें पहचाना जा सकता है। अपरिग्रह तो जैसे इस साधना की कसौटी बन गई। पुराणों ने तो यहाँ तक कह दिया जिनके घर में तीन दिन से अधिक का अनाज हो वह ब्राह्मण नहीं। आज यह तथ्य भले अनोखा लगे पर तत्कालीन समय के समाज ओर ब्राह्मणों के पारस्परिक विश्वास को दर्शाने वाला तो है ही।
प्राचीन समय में ब्राह्मणों ने अपने कर्तव्य का निर्वाह किया भी। स्मृतियों की विविधता इसका प्रमाण है। जिसे देखकर हर्ष के समय आए चीनी यात्री युआन च्वाँग ने इसे ब्राह्मणों का देश घोषित या। व्यक्तित्व विकसित करने के लिए स्वयं दो वर्गों में बाँट लिया-विचारक और प्रचारक। दूसरे शब्दों में कहें तो ब्राह्मण और साधु। असलियत में दोनों एक से हैं। विचारक इनकी वह स्थिति है जो नव विधान का निर्माण करती ओर सामयिक समस्याओं का समाधान खोजती है। प्रचारक वर्ग समाज को पुराने अनुपयोगी विधान को छोड़ने और नव विधान पर चलाने के लिए कटिबद्ध होता है। कमोबेश दोनों पर बराबर का दायित्व है।
इसी दायित्व के निर्वाह पर समाज की स्थिरता समृद्धि और सतयुग की सृष्टि टिकी है। इसी कारण इन्हें सावधान करते हुए भागवतकार ग्यारहवें स्कंध बारहवें अध्याय के बयालीस श्लोक में कहते हैं-ब्राह्मणस्य हि देहोऽयं क्षुद्र कामाय नेष्यते” ब्राह्मण का जीवन क्षुद्र कामनाओं के लिए नहीं है। इस चेतावनी का परिणाम समाज ने जर्जरता, अलगाव अव्यवस्था के रूप में सहस्राधिक वर्षों तक भोगा और भोग रहा है। इसे देखकर ही स्वामी रामतीर्थ विकल हो उठे-” हाय! ब्राह्मणों का देश शूद्रों का देश बन गया।” तमोग्रस्तता शूद्रता’ नहीं तो और क्या है?
इसे दूर करने के समूचे समाज को एक बार फिर ब्राह्मण समाज के रूप में नवगठित करने के लिए महाकाल अपनी युग प्रत्यावर्तन प्रक्रिया के रूप में संकल्पित हुआ है। ब्राह्मणत्व की साधना फिर से एक बार पूरे वेग से चल पड़ी है। इसमें शामिल होने के लिए आवाहन के स्वर मुखरित हुए हैं। जो शामिल हुआ, जिससे इस साधना के प्रति निष्ठा पनपी, वह ने केवल अपने व्यक्तित्व विकास की पूर्णता को पाएगा, बल्कि नवसृजन में जुटी दिव्य शक्तियाँ उसी के नवयुग का श्रृंगार करेंगी।
याद तूने आ रहे हो! इस खुले वातावरण में, कष्ट हो या सुख प्रभो! रखना हमें अपनी शरण में।
हम भटकते थे जगते में, समय जड़ता में बिताया, तुम मिले तो लोकहित का, मार्ग तुमने ही बताया।
आपने पायी सफलता, पाप के भ्रम के हरण में, अंधता व कुरीतियों का जाल, कटवाया तुम्हीं ने,
नीति के सद्मार्ग पर, आरूढ़ करवाया तुम्हीं ने। प्रखरता, दृढ़ता भरी हर शिष्य, के शुभ आचरण में।
जिन्दगी भर खुद तपे, तब बात ऊष्मा की कही थी। त्याग कर सर्वस्य खुद, ने राह जनहित की गयी थी।
इसलिए था असर वाणी में, गिरा के अवतरण में॥
-माया वर्मा
तुम्हारी शपथ हम निरन्तर तुम्हारे, चरण चिन्ह की राह चलते रहेंगे। करेंगे हरेक स्वप्न पूरा तुम्हारा, उसी यत्न में पग मचलते रहेंगे।
वही युग पुरुष आज जिसने गलाया, मनुज के लिए बीज सा ही स्वयं को, अंधेरा मरण का भला क्या करेगा, कि जिसने मिटाया सघन घोर तम को,
तुम्हारी शपथ हम सभी अंकुरित हो, सदा सत्य बनकर निकलते रहेंगे। तुम्हारी शपथ हम निरन्तर तुम्हारे, चरण चिन्ह की राह चलते रहेंगे।
तुम्हारा लिए स्नेह अपने हृदय में, कभी आँधियों में प्रकंपित न होंगे, तुम्हारी किरण बाँटने हम रहेंगे, किसी कार्य में हम विलम्बित न होंगे,
तुम्हारे जलाए दिये हम सभी हैं, तुम्हारी शपथ रोज जलते रहेंगे। तुम्हारी शपथ हम निरन्तर तुम्हारे, चरण चिन्ह की राह चलते रहेंगे।
बहाई करुण-धार जो इस धरा पर, उसे हम कभी सूखने ही ने देंगे, हरा हर मरुस्थल बने, बस इसी का, प्रबल यत्न दिन-रात करते रहेंगे,
घनीभूत करुणा तुम्हारी संजोए, तुम्हारी शपथ हम पिघलते रहेंगे। तुम्हारी शपथ हम निरन्तर तुम्हारे, चरण चिन्ह की राह चलते रहेंगे।
नगर गाँव घर-घर चले जायेंगे हम, लिये चेतनापूर्ण चिन्तन तुम्हारा, यहाँ पा सके प्रेरणामय संदेशा, हरेक राष्ट्र, हर जाति, जन-जन तुम्हारा,
निमिष भर नहीं देर अब हम करेंगे, न अब और संकल्प टलते रहेंगे। तुम्हारी शपथ हम निरन्तर तुम्हारे, चरण चिन्ह की राह चलते रहेंगे।
तुम्हारी बताई हुई राह पर ही, अंधेरी निशा को किरण मिल सकेगी, कि निष्प्राण होने लगी जो मनुजता, तभी फूल जैसी पुनः खिल सकेगी,
तुम्हारी शपथ हम इसी पर चलेंगे, न अब हम दिशाएँ बदलते रहेंगे। तुम्हारी शपथ हम निरन्तर तुम्हारे, चरण चिन्ह की राह चलते रहेंगे।
-शचीन्द्र भटनागर
सृष्टा का सर्वोपरि उपहार मनुष्य जीवन है। उसमें ऐसी विभूतियों के अगणित भाण्डागार भरे पड़े हैं जिन्हें सर्व साधारण द्वारा ऋद्धि-सिद्धि के नाम से जाना जाता है। जीवन शक्तिशाली है। उसकी विभूतियों की कोई नाप-तौल नहीं। प्रश्न भाव सदुपयोग दुरुपयोग का है। जिनने जिस परिणाम में उनका सद्प्रयोग कर लिया उनके लिए समृद्धियों की, सम्पदाओं की कोई कमी नहीं, साथ ही यह तथ्य भी इसी संदर्भ में जुड़ा हुआ है कि दुरुपयोग करने पर यही जीवन दो ऐसे दुष्परिणाम भी उत्पन्न कर सकता है, जिन्हें असुरता, पैशाचिकता आदि नामों से जाना जाता है, जिनके कारण समूचा वातावरण विषाक्तता एवं नारकीय यंत्रणाओं से भर जाता है।
मनुष्य गलतियाँ करने में पूरा उत्साही है। आवेश में उसे कुमार्ग पर चलने और कुकर्म करने में भी देर नहीं लगती। इतने पर भी उस समझदारी का सर्वत्र अन्त नहीं हो जाता जो दुष्परिणामों को देखकर पैर पीछे हटाने और गलती सुधारने में भी तत्परता बरतती है। पिछली दो शताब्दियों में उसके हाथों ज्ञान विज्ञान की असाधारण उपलब्धियाँ हस्तगत हुई हैं। असाधारण सफलताएँ अनेक बार उन्माद जैसी परिस्थितियाँ उत्पन्न कर देती हैं। ऐसा ही कुछ पिछले दिनों भी हुआ। रस्सी के धोखे में कई बार बच्चे सर्प जैसे कालपाश को भी पकड़ लेते हैं। आकर्षक चमक को देखकर जलती आग में भी हाथ डाल देते हैं। जिन विकल्पों का सदुपयोग करके सुख-शान्ति के असीम भाण्डागार हस्तगत किये जा सकते हैं, उन्हीं का दुरुपयोग कर लेने पर ऐसे परिणाम भी सामने आते हैं जिनके लिए पश्चाताप करने, भर्त्सना का भाजन बनने और त्रास सहने के अतिरिक्त और कुछ हाथ नहीं लगता है। इन दिनों ऐसा ही हुआ है। बढ़ी हुई बुद्धिमत्ता और उसके सहारे संग्रह हुई सम्पदा का दुर्भाग्यवश दुरुपयोग ही होते बन पड़ा है और उसकी अवांछनीय प्रतिक्रियाओं के रूप में सामने आई हैं, जिसे कि हम चारों और बिखरी हुई देखते हैं। त्रास सहते और त्रास देते हुए देखते हैं।
जीवन के बदले कुछ भी खरीदा जा सकता है। उसका थोड़ा अंश भी जिस प्रयोजन के लिए लग जाता है उसी अनुपात में उसके परिणाम भी सामने आते हैं। भवितव्यता अब महाकाल के माध्यम से समझदारों को यह सिखाने आ रही है कि जीवन का समय का जितना अधिक बन पड़े उसका सदुपयोग ही करना चाहिए। इसी में अपने लिए और दूसरों के लिए लाभ है।
महाकाल ने इस परिवर्तित संभावना से हर बुद्धिमान को समझाया है कि जब शरीर-निर्वाह के लिए आसानी से कुछ घण्टे के श्रम से काम चल सकता है तो शेष बची विभूतियों को सत्प्रयोजनों में क्यों न लगाया जाय? समझदारों ने इस सत्परामर्श को स्वीकार भी कर लिया है। इसलिए नवयुग के आगमन के प्रथम चरण में जन साधारण की यह मान्यता बनने लगी है कि बचे हुए बहुमूल्य समय का एक बड़ा भाग सत्प्रयोजनों में क्यों न लगाया जाय? यह मान्यता क्रिया रूप में चल भी पड़ी है। परिवर्तन का तारतम्य बिठाने वाले महाकाल ने ऐसा प्रचलन आरंभ किया है जिससे मानवी शक्ति को विश्वकर्मा के क्रिया कौशल की तरह सृजन प्रयोजनों के लिए उपयोग क्यों न होने लगे? इस प्रश्न का उत्तर भी रचनात्मक ही मिल भी रहा हैं। युग सृजेताओं की एक ऐसी बड़ी मण्डली कार्यक्षेत्र में उतर रही है जैसी कि पिछले लम्बे समय से पुरुषार्थ कभी देखी नहीं गई।
महाकाल की इस योजना में प्राथमिकता यही दी गई है कि सृजन शिल्पियों की एक बड़ी टोली जिसमें न्यूनतम एक करोड़ सदस्य हों। कार्यक्षेत्र में उतरे और फैली हुई अवांछनीयता को झाड़ बुहार कर दूर करने के साथ-साथ वह सब भी उतने ही उत्साह के साथ करें जिसके आधार पर उज्ज्वल भविष्य का सर्वतोमुखी सृजन होने जा रहा है।
पिछले 80 वर्षों के प्रयत्न से पच्चीस लाख के करीब ऐसे व्यक्तियों का सृजन हुआ है जिन्हें बिना किसी असमंजस के देवमानव की संज्ञा दी जा सके। यह फल अब पक चुके है। और इस स्थिति में पहुँच चुके हैं कि अपने परिपक्व बीजों द्वारा नई पौध का सृजन कर सकें और यह अभिनव उत्पादन एक करोड़ से कम न रहे। इतना बड़ा उत्पादन ऐसे अभिनव उद्यान के रूप में दृष्टि गोचर होगा जिसे धरती पर नन्दनवन की, चंदनवन की कल्पवृक्ष परिकर की उपमा दी जा सके।
युगसन्धि के अगले दस वर्षों में एक करोड़ सृजन शिल्पी कार्यक्षेत्र में उतरने जा रहे हैं। भले ही वे समय की माँग को पूरा करने में समूचा समय न लगा रहे हों पर शरीर माँग के लिए 20 घण्टे लगाते रहने के उपरान्त चार घण्टे तो नव सृजन के लिए लगाते ही रह सकेंगे। औसत दो घण्टे की भी लगाई जाय तो 2 करोड़ घण्टे इतने में भी बन जाते हैं और करीब 5 लाख पूरे समय काम करने बालों जितने बनते हैं। इतने शिल्पी जिस निर्माण में अनवरतता रूप से संलग्न हो उसका स्तर और परिणाम इतना हो सकता है जिसके सहारे सत्प्रवृत्तियों के समुदाय को समूचे संसार में विस्तृत होते देखा जा सकें।
इन दिनों समूचे संसार में प्रायः 600 करोड़ मनुष्य हैं। इनमें से बाल, वृद्ध, रोगी, अपंग, अविकसितों की आधी संख्या छोड़ दी जाय तो समर्थ व्यक्ति 300 करोड़ ही रह जाते हैं। उनको सँभालने-सँवारने के लिए यदि पचास लाख व्यक्तियों का पूरा समय नियोजित हो सकें तो उसे कम नहीं आँका जाना चाहिए। अस्पतालों में रोगियों की तुलना में डॉक्टर कम ही होते हैं। हर विषय के जितने विद्यार्थी पढ़ते हैं उनकी तुलना में अध्यापक कम ही होते हैं। दो बैलों के कृषि श्रम से कितने ही परिवारों का उदर पोषण होता रहता है। प्रतिभा सम्पन्नों की नई पीढ़ी जो इन दिनों सक्रिय दिखाई दे रही है उसे न्यून नहीं माना जाना चाहिए। प्रतिभायें विकास के क्षेत्र में जब संलग्न होती हैं उसमें आशाजनक सफलता प्रस्तुत कर दिखायी हैं।
रेल, वायुयान, जलयान, कारखाने आदि विशालकाय संयंत्रों को चलाने वाले कुछ ही ड्राइवरों से काम चल जाता है। पिछले दिनों दुनिया में बिगाड़ उपस्थित करने वाली जनसंख्या थोड़ी ही रही है। उनकी सीमित बुद्धि, सीमित कौशल और सीमित साधनों के सहारे ही इतना अनर्थ खड़ा हो गया है जिसके कारण सर्वत्र शोक संताप ही बिखर पड़े हैं फिर कोई कारण नहीं कि सुजन प्रयोजन में जुटने वाले समर्थ साधकों की शक्ति का सुनियोजन उत्साहवर्धक सत्परिणाम उत्पन्न न कर सके। एक गड़रिया भेड़ों के झुण्ड को किसी भी दिशा में हाँक ले जाता है। जिनमें नेतृत्व की क्षमता है वे अनौचित्य पर उतारू होने पर भयंकर अहित खड़े कर सकते हैं तो ऐसा क्यों नहीं हो सकता कि प्रतिभावानों की नई पीढ़ी अपने नये उत्साह और नये पराक्रम के सहारे नव सृजन का प्रयोजन बढ़-चढ़ कर पूरा न कर सकें।
मनुष्य समुदाय के, प्राणी जगत के बहुद्देशीय प्रयोजन इतने अधिक हैं जिनकी साधारणतया गणना नहीं हो सकती और जिन्हें संभव बनने में बुद्धि चकराती है। फिर भी उस महाशक्ति के लिए असंभव क्या हो सकता है जिसने इतना विशालकाय ब्रह्माण्ड विनिर्मित कर दिखाया और उसके नियंत्रण में उस सब का सृजन, अभिवर्धन और परिवर्तन का क्रम निरन्तर चलता रहता है। सूर्य, चाँद बनाने वाला क्या नहीं बना सकता है। समुद्र की गहराई और पर्वतों की ऊँचाई जिनकी गरिमा की नाप-तौल करने में सर्वथा असमर्थ है।
समझा जाना चाहिए कि युग परिवर्तन जैसी विशालकाय योजना किसी व्यक्ति विशेष की नहीं है। इसके पीछे महाकाल की वैसी समर्थ योजना काम करती है जिसे विश्वकर्मा की सृजन कुशलता से कही अधिक बढ़-चढ़ कर माना जा सकता है। उस अरुणोदय की प्रथम झाँक प्रस्तुत संकल्प के रूप में अपनी प्रथम झलक झाँकी का दर्शन करा रही है। जिसका प्रभाव पूर्व के अरुणोदय से मिलता जुलता समझा जा सकता है।
मनुष्य की प्रमुख समस्याओं में से प्रत्येक का कलेवर असाधारण विस्तृत है। विश्व राजनीति पर दृष्टिपात किया जाय तो प्रतीत होगा कि यह मकड़ी का जाल कितना विस्तृत है। जिसमें अपने को लगभग सारे अन्तरिक्षीय ताने-बाने के अंतर्गत जकड़ सा लिया है। फिर सामाजिक समस्याओं की बारी आती है। छोटे-छोटे समुदायों में भाषा, सम्प्रदाय, संस्कृति, प्रथा-प्रचलन आदि के नाम पर इतना बड़ा विभाजन है जिसे एक मनुष्य जाति को असंख्यों प्रकार में बँटा कहा जा सकता है। मानसिक विचारणाएँ इतनी अधिक और इतनी चित्र-विचित्र हैं कि हर मनुष्य अपने आप में एक स्वतंत्र संसार समझा जा सकता है। बाहर से देखने में मानवी शरीर संरचना प्रायः एक जैसी मिलती जुलती मालूम पड़ती है। पर उसके भीतर विद्यमान अणु-परमाणु जीवाणु-विषाणु इतने अधिक आकार-प्रकार के हैं कि उन्हें एक दूसरे से भिन्न प्रकार की संरचना कह सकते हैं। मान्यताएँ, भावनाएँ, आकांक्षा, अभिरुचियाँ, क्रिया-प्रतिक्रिया भी ऐसी विचित्र हैं कि एक दीखने वाला मनुष्य अपने आप में एक स्वतंत्र विश्व ब्रह्माण्ड समेटे हुए है।
पदार्थ जगत और भी अधिक विचित्र है। वनस्पतियों, रसायनों, धरातलों, समुद्रों, अन्तरिक्ष की विभिन्नताओं को यदि गिना-समझा जाय तो मनुष्य को हतप्रभ होकर रहना पड़ता हैं। इस समूचे विस्तार का प्रत्येक कण अपनी असंख्य विशेषताओं से भरा-पूरा है। उनमें से प्रत्येक के साथ जुड़ी हुई अगणित भिन्नताओं और समस्याओं का कोई ठिकाना नहीं। इसमें से औचित्य और अनौचित्य का, उपयोगिता, अनुपयोगिता का इतना बड़ा ताना-बाना बुना हुआ हैं कि उस सबकी कल्पना तक कर सकना असंभव हो जाता है। इस सब को लगभग पूरी तरह उल्टे से सीधा करना कल्पनातीत कार्य हैं। इसके लिए एक करोड़ मनुष्य और एक लाख संगठनों की जो योजना बनी है उसे नगण्य स्तर का ही कहा जा सकता हैं। फिर भी एक झलक झाँकी तो मिलती ही है कि नियन्ता नई सृष्टि की कितनी नई विशेषताओं और विभूतियों को सँजोये हुए कितने बड़े परिवर्तनों का सरंजाम जुटा रहा है। वस्तुस्थिति को देखते हुए एक शब्द में इतना ही कहा जा सकता है कि मनुष्यों के एक छोटे वर्ग ने महापरिवर्तन के क्षेत्र में अपने हिस्से का जो प्रयास कंधे पर लिया है वह नगण्य है। लगभग वैसा ही जैसा कि किसी हाथी जैसे विशालकाय प्राणी का परिचय दूनी आकृति का मिट्टी का खिलौना दिखाकर बच्चे को सामान्य ज्ञान से अवगत कराया जा रहा हो। क्योंकि व्यक्ति विशेष या संगठन विशेष का, प्रयत्न विशेष का, नगण्य सा आभास पाकर हम मात्र इतना ही अनुमान लगा सकते हैं कि द्रष्टा को समय की समस्याओं को सुलझाने के लिए ऐसी चित्र-विचित्र सूझे सूझ रही हैं।
देश, काल, पात्र के अनुरूप कार्यों के विभाजन किये जाते और दायित्व सौंपे जाते हैं। ऐसा ही कुछ इन दिनों भी हो रहा है। सर्वप्रथम प्रतिभायें उभारी जा रही हैं। उनके अन्तराल में समय के अनुरूप उमंगों के ज्वार भाटे उठाये जा रहे हैं। कुछ महत्वपूर्ण कर सकने जैसी क्षमताओं के अनुदान दिये जा रहे हैं और कुछ उनके द्वारा विलक्षण किया जा रहा है उसके नक्शे बनाये और मॉडल ढाले जा रहे हैं। इन्हीं दिनों इसी स्तर का ऐसा ही कुछ हो रहा है। हम सब इसी कौतुक कौतूहल को आश्चर्य भरी नजर से देख रहे हैं। अपनी नन्हीं सी समझ के अनुरूप कुछ को संभव, कुछ को असंभव, कुछ को विश्वस्त और कुछ को अविश्वस्त मान रहे हैं। यह अपनी-अपनी मर्जी है किन्तु जो नियति का निर्धारण है वह एक प्रकार से सुनिश्चित है कि अन्धकार का समापन हो चला उषाकाल का अरुणोदय अपने अस्तित्व का परिचय दे रहा है। परिवर्तन को सुनिश्चित दिखा रहा है।
ध्वंस की अपनी शक्ति है। उसकी विनाशलीला से सभी परिचित हैं। चिनगारी किस प्रकार दावानल बनती हैं और विशाल वन क्षेत्र को किस प्रकार भस्मसात् कर देती हैं इसे सभी जानते हैं। किन्तु साथ ही जानना यह भी चाहिए कि क्षमता सृजन की भी कम नहीं है। वर्षा में उगने वाली हरीतिमा का विस्तार सर्वत्र सहज देखा जा सकता है। बादलों की घटाएँ जब बरसती हैं तो जल-थल एक करके रख देती हैं। यह दृश्य भी अविज्ञात नहीं है। वासन्ती बहार से कौन परिचित नहीं है। उद्भिजों की सृष्टि में किस प्रकार अनगिनत विस्तार होते हैं यह तथ्य भी अविज्ञात नहीं है।
ध्वंस के उपरान्त बना हुआ सृजन ही हम अपनी आँखों के सामने विद्यमान देखते हैं उसकी बहुलता भी कम नहीं है। अब तक हम ध्वंस के विनाशकारी परिणामों का ही परिचय प्राप्त करते रहे हैं। अब समय आ गया है कि सृजन की पारी को देखें। मरघट की वीभत्सता सर्वविदित है। अब नर्सरी में उगते हुए कौतूहल भी देखना चाहिए। प्रसूति गृह में नित्य कितने बच्चे जन्मते हैं इस पर भी दृष्टि डाली विदित होगा कि मृत्यु की तुलना में जीवन समर्थ है। ध्वंस की तुलना में सृजन की समर्थता अनेक गुनी बढ़ी-चढ़ी हैं। यदि ऐसा न होता तो सृष्टि में जो विस्तार, गौरव और सौंदर्य का माहौल बना हुआ है उसका पता भी न चलता।
सृजन की अपनी परम्परा है। वह जब कभी प्रकट होती है, सब कुछ हरा-भरा बनाकर रख देती है। बढ़ोत्तरी की क्षमता किसी प्रकार कमजोर नहीं रहने पाती। समर्थता ही प्रबल है। उसी ने ध्वंस को अनेक बार बरदाश्त किया है और उसी की समय-समय पर विजय दुदुंभी बजती रही है। अगले दिन ऐसा ही शुभ संदेश लेकर आ रहे हैं। इक्कीसवीं सदी उज्ज्वल भविष्य की घाटे की पूर्ति की घोषणा कर रही है। असुरता की विजय पताका जिन दिनों दसों दिशाओं में फहरा रही थी, उन दिनों देवताओं में पलायन के अतिरिक्त और कुछ बन नहीं पड़ रहा था। लगता था कि सृष्टि का क्रम ही उलट जाएगा। पर वैसा हुआ नहीं। महाकाली अपने विशाल रूप में प्रकट हुई थी और जो हो रहा था, होने जा रहा था उस सब को अपने प्रबल पराक्रम से उलट कर रख दिया। इस बार भी विनाश के उलट जाने का ही उपक्रम बन रहा है। बन चुका है।
अद्भुत, अभूतपूर्व, ऐतिहासिक बस यही शब्द अभिव्यक्ति के रूप में उन सबके मुख से निकल रहे थे, जो विगत 1 से 4 अक्टूबर के मध्य आयोजित विराट संकल्प-श्रद्धांजलि समारोह में उपस्थित थे। जैसा शानदार जीवन इस मिशन के संस्थापक, संचालक ने जिया, उतने ही शानदार ढंग से उनके कर्तव्य व्यक्तित्व को एक विराट समुदाय द्वारा श्रद्धांजलि व्यक्ति की गयी। यह श्रद्धांजलि महत्वपूर्ण इसलिए थी कि इसके साथ वे पुनीत संकल्प जुड़े थे जिनके माध्यम से शिष्य समुदाय ने परोक्ष में सूक्ष्मीकृत अपनी गुरुसत्ता को विद्या-विस्तार के पुण्य प्रयोजन के कार्यों को आगे बढ़ाते रहने का सुनिश्चित आश्वासन दिया।
भीड़ तो रैलियों में भी होती है, चुनावी सभाओं में थी, किन्तु ऐसी अनुशासित संकल्पनिष्ठ सृजन सैनिकों की छावनी व उनके क्रिया−कलाप पहली बार हिमालय के द्वार पर स्थित हरिद्वार नगर में प्रबुद्ध गणमान्य नागरिक, अधिकारीगण एवं जन सामान्य द्वारा पैनी दृष्टि से देखे गये। बिना किसी सरकारी सहायता के सिर्फ अपने बलबूते समग्र तैयारी अपनी गुरुसत्ता को समर्पित समुदाय किस प्रकार कर सकता हैं, इसका एक अनूठा उदाहरण पूरे उत्तर भारत की जनता को पिछले दिनों देखने को मिला। शिक्षकों से लेकर कृषक तथा चिकित्सकों-इंजीनियरों से लेकर न्यायाधीश, आई. एस. एस. अधिकारी तक इस मिशन से जुड़े हैं। इनमें से बीस हजार से अधिक स्वयं सेवक के रूप में 15 सितम्बर से ही आ गए थे एवं निष्ठापूर्वक सारे कार्यक्रम की तैयारी में लगे थे। बिना किसी पद या शिक्षा, जाति-वर्ण के पूर्वाग्रह के सभी एकजुट होकर संघशक्ति की महत्ता प्रतिपादित करने के निमित्त लगे थे।
इ.पी.टेण्ट, शामियाने, जल, बिजली आदि की व्यवस्था, ऊबड़-खाबड़ स्थानों की सफाई, विशाल भोजन-भट्ठियों का निर्माण आदि सभी काम स्वयंसेवी स्तर पर किये गए। पारस्परिक तालमेल बिठाकर सारे काम इस तरह पूरे होते चले गए कि उन अधिकारियों को भी हतप्रभ रह जाना पड़ा जो विशाल भूखंड की सफाई को न्यूनतम छह माह का काम मानते थे। प्रकृति ने भी जमकर परीक्षा जी। सामान्यतया मानसून की वर्षा 10-12 सितम्बर के बाद इस और नहीं होती। वैसे भी इस औसत से अधिक वर्षा पहले ही हो चुकी थी उम्मीद थी कि वर्षा व्यवधान उत्पन्न नहीं करेगी किन्तु परोक्ष शक्तियाँ संकल्प सिक्त को कसौटी पर कसने को जो बैठी थी। 21 सितम्बर तक रुक-रुक कर पानी बरसता रहा किन्तु एक भी व्यक्ति अपने संकल्प से डिगा नहीं। सप्तर्षि आश्रम के समक्ष स्थित विश्वामित्र नगर में रहने वाले स्वयं सेवक गायत्री मंत्र का जाप करते हुए पानी की निकासी की व्यवस्था करते रहे व सभी का मनोबल बढ़ाते रहे। पानी को तो मार्ग चाहिए था एवं वह उसमें सुगम मार्ग से ढूँढ़ा तो उसी नगर से वह तीव्र प्रवाह से बहा ताकि शीघ्र ही गंगाजी तक पहुँच सके। इस अंतिम परीक्षा के बाद रुका पानी फिर यज्ञ समापन के बाद अभिसिंचन हेतु बहुत दिन बाद तेजी से बरसा व सारे आयोजन स्थल की सफाई कर गया।
एक और परीक्षा सभी परिजनों की मार्ग में ली जा रही थी। सभी कार्यक्रम में पहुँचने को आतुर थे किन्तु आंदोलनों के कारण अधिकाँश रेले चल नहीं रही थीं, विशेष रेलें स्थगित कर दी गयी थी तथा बस सेवा भी पूरी तरह प्रभावित थी। इसके बावजूद सारी प्रतिकूलताओं से गुजरते हुए आने का ताँता लगा ही रहा एवं तीस सितम्बर की रात्रि को हरिद्वार नगर में मात्र इस कार्यक्रम के लिए आए पाँच लाख परिजन पंजीकृत किये जा चुके थे स्थानीय लोगों के लिए इतनी विशाल अनुशासित भीड़ का जुटना एक सुखद आश्चर्य था क्योंकि सभी कुछ सामान्य चल रहा था। कहीं स्थानीय यातायात में बाधा नहीं, कहीं कोई कानून व्यवस्था की गड़बड़ी नहीं। एक लाख परिजनों की रोलिंग भीड़ नित्य आती व जाती रही। सारा हरिद्वार पीले वस्त्र पहने, पीत दुपट्टाधारी स्त्री-पुरुषों से पटा हुआ था। एक प्रकार का बिना ड़ड़ड़ड़ का महाकुम्भ स्वतः आयोजित हो चुका था। ऐसा अनुमान है कि जितने व्यक्ति कार्यक्रम में आए उनसे दुगुने वे थे जिनने रास्ते की कठिनाइयों व नित्य के समाचार सुनकर अपना रिजर्वेशन या आना स्थगित करने का निर्णय मन मसोस कर लिया। अगणित पत्र कार्यक्रम के दौरान व बाद उनके आए हैं जो इन्हीं कारणवश आने का साहस जुटा न पाए पर मन से पूरी तरह कार्यक्रम में साथ रहे।
सुव्यवस्थित ढंग से ठहराने का प्रबन्ध किया गया था। पूरे हरिद्वार नगर की पंद्रह मील की लम्बाई व आठ मील की चौड़ाई में कनखल से मोतीचूर तक पंद्रह हजार से अधिक छोलदारियाँ, इ.पी. टेण्ट, शामियाने लगाकर चौबीस नगर बसाए गए थे। अतिरिक्त व्यवस्था हेतु अनुरोध किया गया तो सभी आश्रमों ने युगपुरुष को श्रद्धांजलि देने हेतु अपने द्वार खोल दिये एवं अस्सी हजार से अधिक व्यक्ति हरिद्वार भर के आश्रमों में ठहरे। जो कभी अपने बैडरूम में फोम के गद्दों में सोते थे, वे स्वेच्छा से पुआल पर टेण्टों में सोए तथा भूमि के संस्कारों से अनुप्राणित हुए। यह श्रद्धा की ही चमत्कारी परिणति है कि सब बिना किसी कठिनाई के निर्धारित स्थान में समा गए व नियमित कार्यक्रमों में भाग लेते रहे।
कार्यक्रम का शुभारंभ प्रातः ब्रह्मबेला में पूज्य गुरुदेव के जीवन वृत्त पर बनी एक विशाल प्रदर्शनी के वंदनीया माताजी द्वारा उद्घाटन के माध्यम से हुआ। दीप प्रज्वलित कर व उसका अवलोकन कर 1100 फीट की तीन कतारों में विनिर्मित इस प्रदर्शनी को वंदनीया माताजी ने जन समुदाय के लिए खुला घोषित किया। इसके पश्चात् वे ब्रह्मर्षिनगर के विशाल मंच पर पहुँची। झण्डारोहण किया गया तथा एक विशाल मशाल प्रज्वलित की गयी। कलशपूजन के पश्चात् 1008 कलशधारी शक्ति स्वरूपा देवियों की अगुआई में एक विशाल शोभायात्रा शाँतिकुँज के समीप स्थित इस विशाल नगर (प्रवचन सभागार) से निकली। प्रबंधन मंच के समीप ही पूज्य गुरुदेव का एक साठ फीट ऊँचा विशाल चित्र लगाया गया था।
इस शोभायात्रा में सर्व धर्म समन्वय, ऋषिपरंपरा, पूज्यवर की जीवनवृत्त, कुरीति उन्मूलन, सत्प्रवृत्ति संवर्धन, यज्ञ व पर्यावरण तथा मिशन के दस सूत्री कार्यक्रम संबंधी झाँकियाँ स्थान-स्थान पर थीं व जन आकर्षण का केन्द्र बनी हुई थीं। यह अनुशासित सुव्यवस्थित जुलूस हरिद्वार नगर से होते हुए निकला। हर की पौड़ी पर इसने विराम लिया। ब्रह्मकुण्ड से पीत वस्त्रधारी बहनों ने कलश में जल भरा व पुनः अपनी यात्रा पर आगे बढ़ गई। चौदह किलोमीटर लम्बा यह जुलूस प्रातः 7 बजे रवाना हुआ था व मध्याह्न साढ़े बारह बजे याज्ञवल्क्यनगर पहुँचा जो सप्तर्षि आश्रम के समीप महर्षि याज्ञवल्क्य की तपःस्थली में विनिर्मित किया गया था। यहीं 1008 कुण्डों की भव्य यज्ञशाला बनायी गयी थी। कलशों को यही विधिविधान से स्थापित कर प्रातःकाल के कार्यक्रम को विराम दिया गया। चौदह मील पैदल चलने के बावजूद भी लाखों लोगों का समुदाय भोजनोपरान्त प्रदर्शनी देखने, साहित्य स्टॉल में युग साहित्य लेने व पारस्परिक परिचय, जानकारियों के आदान-प्रदान में लगा रहा।
संध्याकाल में युग गायन के साथ कार्यक्रम की शुरुआत हरिद्वार-ऋषिकेश मार्ग पर अवस्थित प्रबंधन सभागार में हुई। शाँतिकुँज के प्रतिनिधियों के प्रारम्भिक उद्बोधन के बाद वंदनीय माताजी का प्रेरक ओजस्वी प्रवचन हुआ। उपस्थित समुदाय ने ब्राह्मणत्व की व्याख्या सुनी व ब्रह्मनिष्ठ लोकसेवी आत्माओं के उत्पादन का ऋषिसत्ता का संकल्प जाना। सभी के मन में यह ललक थी कि इस दिशा में हम क्या कुछ कर सकते हैं, अपनी लौकिक महत्त्वाकाँक्षाओं पर कड़ा नियंत्रण रखते हुए समाज हितार्थ अपनी विभूतियों, उपार्जन व समय का अधिक से अधिक अंश मिशन के सदुद्देश्यों के निमित्त लगा सकते हैं, यह प्रत्यक्ष मार्गदर्शन दिया जाय। अगले दिन के लिए यह निर्धारण छोड़ रात्रि 100 पर वीडियो फिल्म पूज्य गुरुदेव के व्यक्तित्व व कृतित्व पर बनायी गयी थी। पहले दिन “युगपुरुष” नामक एक घण्टे की फिल्म 300 इंच के चार बड़े पर्दों, चार वीडियो रथों तथा 100 टेलीविजन सैटों के माध्यम से सारे समुदाय ने देखी। अनेकों को पूज्यवर के जीवन के महत्वपूर्ण प्रसंग पहली बार देखने को मिले।
पूरी नगरी में बसाए गए विभिन्न नगरों में जिस प्रकार प्रकाश की व्यवस्था थी, उससे रात्रि में भी शहर से छः मील दूर कभी नीरद रहने वाले क्षेत्र में भी जंगल में मंगल जैसी स्थिति नजर आ रही थी। संकल्पित साधकों ने अगले दिन प्रातः 3.30 से दिनचर्या आरंभ की। प्रातः ध्यान साधना के बाद 1008 कुण्डीय गायत्री महायज्ञ आरंभ हुआ जो 11.30 तक अनवरत चलता रहा। इसमें प्रायः अढ़ाई लाख परिजनों ने पर्यावरण संशोधन एवं सूक्ष्मजगत के परिशोधन हेतु वनौषधियों की गायत्री मंत्र के साथ आहुतियाँ दीं। साथ-साथ शाँतिकुँज के साथ नई खरीदी गई भूमि, जहाँ देवात्मा हिमालय एवं स्मृति उपवन विनिर्मित होना है, में अखण्ड गायत्री जप एवं संस्कारों का क्रम नियमित चलता रहा। पुंसवन, जन्मदिवस, अन्नप्राशन, विद्यारम्भ, नामकरण, मुण्डन, यज्ञोपवीत, विवाहदिवस तथा श्राद्ध-तर्पण संस्कार नित्य संपन्न होते रहे एवं इस निःशुल्क व्यवस्था से पचास हजार से अधिक परिजन लाभान्वित हुए। उस भूमि को जो पूर्व संस्कारित है, प्रचण्ड प्राण ऊर्जा से अनुप्राणित करने हेतु साधना संस्कारों के बीजारोपण के निमित्त अखण्ड गायत्री जप की व्यवस्था की गयी थी। चारों दिन यह सतत् चलती रही। इसी के साथ प्रबंधन सभागार में वंदनीया माताजी द्वारा दीक्षा दी गयी। इस कार्यक्रम में प्रतिदिन पचास हजार से अधिक परिजन उपस्थित थे। सभी ने वंदनीया माता जी के साथ गायत्री मंत्र का उच्चारण कर ऋषि परम्परा से अपना सम्बन्ध जोड़ा।
मध्याह्न में कार्यकर्ता गोष्ठियाँ जगह-जगह विभिन्न नगरों में आयोजित की गयीं। इनका उद्देश्य था-पूज्य गुरुदेव का उज्ज्वल भविष्य के लिए एक महाकाल की साझेदारी का आमंत्रण जन-जन तक पहुँचाया जाय। युगसन्धि साधना में भागीदारी, चिन्तन-मनन स्वाध्याय का क्रम अपनाना तथा छोटे-छोटे दीपयज्ञों द्वारा जन-जन को युगपरिवर्तन की विचारधारा से अनुप्राणित करना, यही त्रिविध उद्देश्य इन कार्यकर्ता गोष्ठियों का था जो तीनों दिन टुकड़ों-टुकड़ों में पूरा होता चला गया। संध्याकाल में वंदनीया माताजी के उद्बोधन के पूर्व गायत्री तपोभूमि के व्यवस्थापक पण्डित लीलापत जी शर्मा का प्रेरक उद्बोधन हुआ। अपनी ओजस्वी शैली में पं. लीलापत शर्मा ने पूज्य गुरुदेव के विद्या-विस्तार कार्यक्रम के विस्तार हेतु उनके लिखे साहित्य को उन सभी क्षेत्रों तक पहुँचाने की प्रेरणा दी, जहाँ अभी मिशन का आलोक नहीं पहुँच पाया हैं। वंदनीया माता जी के उपासना, साधना, आराधना परक त्रिविध अध्यात्म प्रधान प्रसंगों, पर उद्बोधन इसके पश्चात् हुआ। “ऋषिचिन्तन” नाम फिल्म के साथ ही कार्यक्रम समाप्त हुआ।
तीसरा दिन अतिविशिष्ट था। इस दिन सामूहिक गायत्री महायज्ञ के साथ-साथ 301 जोड़ों के आदर्श विवाह भी थे। यों 1008 जोड़ों के दहेज रहित विवाह संस्कारों की घोषणा की गई थी किन्तु अपरिहार्य कारणवश कई परिजन कार्यक्रम में आने की व्यवस्था नहीं बना पाए। सभी जाति, वर्णों, वर्गों के युवा जोड़े इस विराट यज्ञ में सम्मिलित हुए। एक साधनहीन कृषक से लेकर एक पूँजीपति का लड़का आज आदर्श विवाह पद्धति द्वारा दाम्पत्य जीवन में प्रवेश कर रहा था। दहेज विरोधी आन्दोलन इस मिशन का एक महत्वपूर्ण कार्यक्रम रहा है। नगर व प्राँत के पत्रकारगण, दूरदर्शन व आकाशवाणी के प्रतिनिधि इस कार्यक्रम को देखने आए थे। मध्याह्न 12.30 पर उत्तर प्रदेश के राज्यपाल महामहिम श्री सत्यनारायण रेड्डी ने पधार कर अपने आशीर्वचन उपस्थित समुदाय के सम्मुख कहे व इसके साथ ही प्रातःकालीन सभा समाप्त हुई। इसी सभा में प्रातः वंदनीया माताजी द्वारा गुरुपरम्परा में दीक्षित होने तथा चैतन्य नगर में संस्कार सम्पन्न होने का क्रम चलता रहा।
भोजन व दोपहर की गोष्ठियों के बाद शाम की सभा आरंभ हुई। वंदनीया माता जी के प्रारंभिक उद्बोधन के बाद महामहिम राज्यपाल महोदय श्री रेड्डी ने उपस्थित समुदाय को दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन व सत्प्रवृत्ति संवर्धन के निमित्त लगे रहने हेतु भूरि भूरि बधाई दी एवं गुरुदेव के समाज निर्माण के कार्यक्रम को एक युगान्तरकारी अभियान बताया। उनके उद्बोधन के पश्चात् भी जनसमुदाय के आने का क्रम चालू था व शाम 6.30 बजे दीपयज्ञ आरंभ होने तक पूरा विशाल सभागार खचाखच भर चुका था। सवालक्ष दीपों का ब्रह्मयज्ञ आरंभ हुआ एवं “यन्मण्डलं दीपितकर। विशाल” की धुन के बीच सभागार के चारों और सजाए गए दीपक जला दिए गए। मंच के चारों ओर विशाल स्टैण्ड्स पर ड़ड़ड़ड़ के थाल सजा दिए गये थे। दृश्य देखते ही बनता था। शरद पूर्णिमा का दिन था परन्तु पूर्णिमा का चाँद भी छोटे-छोटे दीपों की समन्वित आभा ऊर्जा के समक्ष मद्धिम लग रहा था। चारों और प्रदीप्त दीपक व कहीं भी किसी प्रकार का कोई शोर नहीं, अव्यवस्था नहीं दुर्घटना नहीं, पर परोक्षसत्ता का ही संरक्षण था। पीछे ही शिवालिक पर्वतमाला थी। उस नीरद जंगल में सजी दीपमालिका में उपस्थित जनसमुदाय ने एक स्वर से उस संकल्प को दुहराया जिसके माध्यम वे गुरुसत्ता को उनके द्वारा प्रदत्त जिम्मेदारियों को उठाते हुए कार्य को आगे बढ़ाने का आश्वासन दे रहे थे। गायत्री माता की आरती जब अहमदाबाद शाखा के एक परिजन ने अपने मस्तक पर 151 दीप सजाकर नर्तन करते हुए गायी तो सबकी तालियाँ पूरी आरती तक एक साथ बजती रहीं। दृश्य नयनाभिराम था, अलौकिक था व ऐसा लगता था मानो स्वर्ग से देवता स्वयं दृश्य देखने धरती पर उतर आए हों। सवालक्ष वेदी ब्रह्मयज्ञ के बाद वीडियो फिल्माँकन हुआ व कार्यक्रम का समापन हो गया।
अंतिम दिन विदाई का था। सभी को लग रहा था कि देखते-देखते ये चार दिन कैसे बीत गए? नित्य अगणित व्यक्ति तीन विशाल भोजनालयों में भोजन करते रहे, कोई भूखा नहीं रहा, कोई बीमार नहीं पड़ा एवं कहीं किसी प्रकार की कोई अव्यवस्था नहीं देखी गयी। जाने की वेदना सभी को थी। वंदनीया माताजी द्वारा 1008 कुण्डीय यज्ञशाला में स्वयं आकर उपस्थित याज्ञिकों को ब्रह्मदीक्षा देने के उपरान्त विदाई गीत हुआ एवं वंदनीया माताजी द्वारा भावभरे शब्दों में कार्यक्रम का समापन घोषित कर दिया गया। वंदनीया माताजी ने स्वयं एक गीत गाकर परिजनों को अंतिम विदाई दी। चारों और आँसू ही आँसू थे। सभी सोच रहे थे कि ममत्व की साकार प्रतिमा, करुणा की मूर्ति माताजी से विछोह अब कैसे सहन होगा। पर सभी ने स्वयं को सँभाला व लौटने की तैयारी करना आरंभ कर दिया। सबसे मनमोहक दृश्य था वह जब वंदनीया माताजी खुली जीप में प्रवचन सभागार से वापस शाँतिकुँज लौटी एवं उनके पीछे विशाल जनसमूह उन्हें नमन करता हुआ पूरे रास्ते चलता रहा। यही श्रद्धा तो मूलभूत पूँजी है स मिशन की जिसने लाखों मणिमुक्तकों को गूँथकर एक हार के रूप में पिरो दिया है।
सभी मुक्तकण्ठ से कार्यकर्ताओं के व्यवहार तथा व्यवस्था बुद्धि की, आतिथ्य की, स्वयंसेवकों के संकल्पित परिश्रम की सराहना करते हुए गए। कार्यक्रम हर दृष्टि से सफल रहा व संघशक्ति की महत्ता प्रतिपादित कर गया। युगपुरुष को यह आश्वासन देना ही तो इस विराट समूह का मुख्य लक्ष्य था कि जिन कार्यों के लिए उनने अपना जीवन तिल-तिल कर जलाया उन्हीं के निमित्त वे भी समर्पित जीवन जीकर दिखायेंगे। यही सही अर्थों में उनके प्रति श्रद्धांजलि भी है।
आम पक चुका था, भला इसी में था कि किसी की तृप्ति बनता पर वृक्ष में लगे रहने का मोह छूटा नहीं। पेड़ का मालिक पके आमों की खो-बीन करने वृक्ष पर चढ़ा भी पर आम पत्तों की झुरमुट में ऐसा छिपा कि हाथ आया ही नहीं।
दूसरे दिन देखा कि उसके सब पड़ोसी जा चुके, उसका अकेले ही रहने का मोह नहीं टूटा था और अब मित्रों की विरह व्यथा और सताने लगी।
आम कभी तो सोचना नीचे कूद जाऊँ और अपने मित्रों में जा मिलूँ फिर मोह उसे अपनी और खींचता, आप उसी अधेड़-बुन में पड़ा रहा।
संशय का यही कीड़ा धीर-धीरे फल को खाने लगा। एक दिन उसका सारा रस चूस लिया। सूखी नर कंकाल के समान पेड़ में लगी रह गई।
आम की आत्मा यह देखकर बहुत पछताई कुछ संसार की सेवा भी न बन पड़ी और अन्त भी हुआ तो ऐसा दुःखद।
समझदार होकर भी जो साँसारिकता के मोह में फँसे-अब निकले, अब निकले” सोचते रहते हैं, उनका अंत दुःखद ही होता है।
1- अपने आराध्य गुरु पं. श्री राम शर्मा जी से अपने सघन आत्मीय सम्बन्धों की गरिमा बनाये रखने के लिए अपने चिन्तन, चरित्र एवं व्यवहार को परिष्कृत बनाये रखने के महान दायित्वों के निर्वाह के लिए हम वचन देते हैं।
2- हम यह मानते हैं कि महाकाल का चक्र युग परिवर्तन का सरंजाम जुटाने हेतु अब निरन्तर गतिशील हो रहा है। समय के विषम प्रवाह को सृजन की दिशा में मोड़ने के लिए चली यही प्रक्रिया अब उज्ज्वल भविष्य लाकर ही रहेगी। पूज्य गुरुदेव के तत्संबंधी निर्धारणों को हम निरन्तर आगे बढ़ाते रहेंगे।
जन-जन में नवयुग की पृष्ठभूमि बनाने हेतु अनिवार्य उच्चस्तरीय आस्थाओं का संचार करने के लिए यह विराट गायत्री परिवार निरन्तर संलग्न रह प्रज्ञा आलोक को विश्व के कोने-कोने तक पहुँचा कर ही रहेगा।
4- राष्ट्र की एकता व अखण्डता को बनाए रखने के लिए जाति, लिंग, पथ, धर्म व भाषा के मतभेदों से ऊँचा उठकर हम साँस्कृतिक पुनरुत्थान हेतु प्रज्वलित की गई संघ शक्ति की प्रतीक विचार क्रान्ति की लाल मशाल सदा प्रज्वलित बनाये रखेंगे।
5- सतयुग अर्थात्-ऋषि युग, ब्रह्मपरायण जीवन जीने वालों का युग। इस मान्यता को सुदृढ़ बनाये रखने के लिए अपनी आवश्यकताएँ न्यूनतम रखते हुए, अपनी महत्त्वाकाँक्षाओं को आध्यात्मिक मोड़ देते हुए हम अपनी समझ क्षमता को लोकहित के निमित्त लगाने का संकल्प लेते हैं। अपने श्रम, समय एवं उपार्जन का एक अंश समाज उत्थान के निमित्त सतत् लगाते रहेंगे।
6- अपने-अपने कार्य क्षेत्र को एक मण्डल के रूप में विकसित करते हुए केन्द्रीय तंत्र से मार्गदर्शन लेते हुए पूज्य गुरुदेव के निर्धारणों के अनुरूप क्षेत्रीय स्तर पर विद्या विस्तार की समस्त योजनाओं को क्रियान्वित करते रहेंगे। अज्ञान, अभाव, अनीति को मिटाने हेतु जो भी पुरुषार्थ हम संभव हो सका, करेंगे। अपने जैसे अगणित समाजनिष्ठ लोकसेवी विश्व मानवता को देने हेतु स्वयं को एक आदर्श साँचा बनायेंगे एवं देव संस्कृति के निर्धारणों को जन-जन तक पहुँचाएँगे।
7- जो जीवन हमारी गुरु सत्ता ने जिया, जिस आधार पर वे यह विशाल परिवार संगठित कर गये, उस आधार भूमि को सशक्त बनाये रखने के लिए औसत भारतीय का निर्वाह करते हुए समर्पण भाव का पोषण करते रहेंगे तथा ब्रह्मबीज से ब्रह्मकमल के विस्तार का गुरु सत्ता का लक्ष्य पूरा करके रहेंगे।
8- हमारी यह सुदृढ़ मान्यता है कि व्यक्ति बदलेगा तो समाज बदलेगा एवं इस प्रकार निश्चित ही युग परिवर्तन का आधार खड़ा होगा। इसका शुभारंभ हम अपने आप से करेंगे एवं दीप से दीप जलाने की इस प्रक्रिया को निरन्तर आगे बढ़ाते रहेंगे।
तीन अक्टूबर 1990 शरद पूर्णिमा एक विशेष साधना उपचार, इन्हीं दिनों
प्रस्तुत बेला संधिकाल की है। इन दिनों अनेक प्रकार के उलट-पुलट भरे परिवर्तन राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय एवं परोक्ष दृश्यपटल पर होते दृष्टिगोचर हो रहे हैं। ये अगले दिनों और भी बढ़ेंगे घटेंगे नहीं। भारत के लिए यह अग्निपरीक्षा का समय है। इन प्रतिकूलताओं के बीच सभी को संघबद्ध हो एकजुट बने रहने का प्रयास करना चाहिए। पारस्परिक आत्मीयता के सूत्रों में बँधे समुदाय का, इस विराट जनशक्ति का कोई भी ताकत कुछ बिगाड़ नहीं कर सकती है।
एक विशेष उपक्रम साधना अनुष्ठान के रूप में सूक्ष्म जगत के परिशोधन एवं सद्बुद्धि के विस्तार हेतु इन दिनों किया जाना चाहिए। वह है प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में 6 से 6.30 के बीच जो परिजन जहाँ भी हों पंद्रह मिनट पूर्व की और मुख करके बैठें व मौन गायत्री जप करें। सामयिक परिस्थितियों से उत्पन्न विषाक्तता के निवारण हेतु वे सन्मति के जन-जन तक पहुँचने व सौहार्द्र की भावना बढ़ने की प्रार्थना करें। उज्ज्वल भविष्य अवश्यम्भावी है। यह विश्वास रखते हुए इस प्रार्थना में अधिक से अधिक लोगों को सम्मिलित कर अनुकूल वातावरण तैयार करने में केन्द्रीय तंत्र को योगदान दें।
*समाप्त*