जब मनुष्य नितान्त एकाकी होता है, उसके पास, आस-पास कोई भी नहीं होता तब कोई पा करने में जो भय लगता है, एक आशंका बनी रहती है, वह किसी कारण होती? बार-बार ऐसा क्यों लगता कि कोई अदृश्य आंखें उसके दुष्कर्म को देख रही हैं? क्यों पूरे उत्साह के साथ उसका मन पापकर्म में नियोजित नहीं हो पाता? क्या कभी कोई इस पर विचार करता है कि जब कोई उसके पाप को देखने वाला प्रत्यक्ष मौजूद नहीं, तब उसे भय किसका है, व किस से डर रहा है? वह कौन है जो उसके मन, प्राण व काया में कम्पन्न उत्पन्न कर देता है?
निस्संदेह यह उसका अपना अन्तःकरण ही है, जो उसे पापकर्म से विरत करने के सतत् प्रयासों द्वारा विविध प्रकार की शंकाओं, संदेहों व भय की कल्पना जैसे अनुभवों से वैसा न करने का संकेत देता रहता है। जो मनुष्य अपने अन्दर बैठे चित्रगुप्त के इन संकेतों की उपेक्षा नहीं करता, वह पापकर्म से बच जाता है। जो मनुष्य अवहेलना करता है व ऐसा कर बैठता है, उसका अंतःकरण एक न एक दिन उसकी गवाही देकर उसे दण्ड का भागी बनाता है। यह संभव है कि किसी का दुष्कर्म दुनिया से छिपा रहे किंतु उसके अपने अंतःकरण से कदापि नहीं छिप सकता। ऐसे व्यक्ति की एक-एक क्रिया और विचार उसके अंतःकरण से साक्षी रूप में अभिव्यक्ति देते हैं। यदि किसी कारणवश मनुष्य को अपने पाप का दण्ड नहीं मिला पाता तो समय आने पर अन्तःकरण स्वयं उसे दण्डित करता है। उचित यही है कि हम अन्तःकरण में विद्यमान परमात्मा की पुकार सुनें, उसका अनुसरण करें।
दोनों के कदम इस पहाड़ी राह पर साथ-साथ पड़ रहे थे। यों चेहरे-मोहरे से इनमें कोई पहाड़ी नहीं लगता, पर मुखर पर छाई उल्लास की रेखाएं, चाल में मस्ती साफ स्वरों में यह बता रही थी कि धरता का हर कोना उनका अपना है। गाँव, शहर, पहाड़, जंगल, नदी, झरने, सभी उनको एक साथ प्यारे हैं, वे भी सभी को प्रिय हैं। चलते-चलते उनमें से एक ने बर्फ की चादर लपेटे समाने खड़ी पहाड़ी की ओर ताका-सूर्यास्त हो रहा था। अस्तांचल की ओर जाते हुए आदित्य की रश्मियों को गले लिपटा कर विदाई दे रहे पहाड़ सुनहले दीख रहे थे। पक्षियों का स्वर इधर-उधर मँडरा रहा था।
“लगता है लौटने में हम लोगों ने देर कर दी क्यों?” इशारा साथ चल रहे साथी की ओर था। “नहीं, हम लोग अंधेरा होते-होते अपने स्थान पर पहुँच जाएँगे।”
चलते-चलते दोनों किसी गाँव के पास आ पहुँचे थे। राह के किनारे ही मन्दिर बन रहा था। शाम होने के बाद भी अभी निर्माण कार्य थमा नहीं था, शायद इसे जल्दी परिपूर्णता देनी हो। न जाने उन्हें क्या स्फुरणा हुई-उन्होंने निर्मित हो रहे मन्दिर के सीमा क्षेत्र में प्रवेश किया। ढेरों मजदूर, कारीगर, मिस्त्री और बढ़ई वहाँ काम कर रहे थे। पता नहीं क्या सोच कर एक ओर बैठे काम कर रहे मजदूर के पास जाकर पूछा-”भाई! क्या कर रहे हो?” “देखते नहीं हो। पत्थर तोड़ रहा हूँ”-मजदूर ने कहा। यद्यपि प्रश्न बड़ी विनम्रता से किया गया था, वाणी पर्याप्त माधुर्य से सनी थी। परन्तु इतना तिक्त जवाब पाकर लगा कि काम करने वाला तेज मिजाज है। यही नहीं वह किसी बात को लेकर दुखी है। तभी तो सीधी-सीधी बात का इतना कड़वा उत्तर।
वह कुछ और बढ़े। दूसरे मजदूर के पास पहुँच कर पहले वाला सवाल दुहराया। मजदूर के उत्तर में पहले जैसी तिक्तता तो नहीं थी पर यह जरूर लगता था कि उसे काम में आनन्द नहीं आ रहा है। उसने कहा था, “भैया! पेट के लिए काम कर रहा हूँ।
उसी वाणी में विवशता की बोझिलता और अनुत्साह का फीकापन था। वह इधर-उधर देखते हुए एक और कार्यकर्मी के पास गए। वह बड़े उत्साह, शक्ति और सुघड़ता से पत्थर तोड़ रहा था। उनने उससे पूछ ही लिया-”भाई यहाँ क्या हो रहा है और तुम क्या कर रहे हो?” मजदूर ने बिना हाथ हटाए उनकी ओर देखा। उसकी आँखों में आह्लाद की चमक और आनन्द की दीप्ति नाच रही थी। उसी भाव को व्यक्त करते हुए उसने धैर्यपूर्वक उत्तर दिया-”यहाँ भगवान का मन्दिर बन रहा है और मैं भी इस भगवत् कार्य को पूरा करने के लिए मेहनत कर रहा हूँ।”
वह फिर अपनी राह पर चल पड़े, साथ मित्र भी। साथी की ओर देखते हुए पूछा-”समझे कर्म का रहस्य?” “के....के... क्या?” लगता है उसे समझ में नहीं आया था। अब वह खुद समझाते हुए बोले- “देखो! पहला मजदूर जबरदस्ती लादी गई मजदूरी कर रहा था। दूसरा बेचारा स्वतः की विवशता के कारण जुटा था। दोनों अपने मनोभावों के कारण दुःखी निराश और उद्विग्न थे। जबकि तीसरा वही काम करते हुए आनन्दित था,” “जानते हो क्यों?” हल्की मुस्कान के साथ उसे देखा। “तीसरे व्यक्ति में एक गरिमा थी, आनन्द था, प्रवीणता थी और उन सबका कारण भी उस व्यक्ति की समर्पण आध्यात्मिक भावना, जो उसे तीनों विशेषताओं से आप्लावित कर रही थी। यही है कर्म का रहस्य, शुष्कता में सरसता भरने का नुस्खा।”
गंगा किनारे बनी कुटिया आ गई थी। दोनों ने साथ-साथ प्रवेश किया। वह दीपक जलाते हुए बोले-”काम कोई भी हो लेकिन उसे करते समय कर्ता का दृष्टिकोण कार्य को उत्कृष्ट अथवा निकृष्ट बनाता है। सामान्य परिणाम और लाभ तो उसे मिलते ही हैं पर उत्कृष्ट भावनाओं के घुल जाने से साधारण कर्म भी योग बन जाता है, चेतना में निखार लाता है।”
कर्म के रहस्य के उद्गाता थे- स्वामी रामतीर्थ और ग्रहीता थे उनके अभिन्न मित्र अध्यापक पूर्ण सिंह। यदि हम भी आध्यात्मिक भावों को स्वयं में प्रदीप्त कर पाएं तो हमारे जीवन में भी वैसी ही ज्योतिर्मय मुस्कान छलक सकेगी।
वह पौराणिक गाथा स्मरण रखने योग्य है कि सीता हरण के उपरान्त जब रावण को परास्त करने का प्रश्न सामने आया, तो राम के द्वारा भेजा गया निमंत्रण उन दिनों के राजाओं और संबंधियों तक ने अस्वीकृत कर दिया था, पर सुदृढ़ संकल्पों के अधूरे रहने से तो दिव्य व्यवस्था पर प्रश्न चिन्ह लगने की स्थिति आती है। वह भी तो अंगीकृत नहीं हो सकती।
‘जिन खोजा, तिन पाइयाँ’ वाली उक्ति के अनुरूप खोज की गई, तो रीछ-वानरों में से भी ऐसे मनस्वी निकल पड़े, जो आदर्शों के निर्वाह में बड़े से बड़ा जोखिम उठाने के लिए तत्परता दिखाने लगे। उनकी एक अच्छी-खासी मण्डली कार्यक्षेत्र में उतरने के लिए कटिबद्ध होकर आगे आ गयी। बंदरों ने लकड़ी-पत्थर एकत्रित किए, रीछों ने इंजीनियर की भूमिका निभाई और समुद्र पर सेतु बनकर खड़ा हो गया।
ईश्वर उन्हीं की सहायता करता है, जो अपनी सहायता आप करते हैं। प्रतिकूलताएँ हटतीं और अनुकूलताएँ लुटती चली गयीं। लंका विजय और श्रीराम की अवध-वापसी वाली कथा सर्वविदित है। सीता भी अनेक बन्धनों से छुटकारा पाकर वापस आ गयीं। वहाँ दो निष्कर्ष निकलते हैं-एक यह कि श्रीराम की प्रतिभा पर विश्वास करके वरिष्ठ वानर भी उत्साह और साहस से भर गये थे अथवा राम दल के मूर्धन्यों ने सामान्य स्तर के वानरों को भी प्राण-चेतना से ओत-प्रोत कर दिया हो और समर्थ व्यक्तियों की एक अच्छी-खासी मण्डली बन गयी हो? दूसरी ओर समर्थ शासनाध्यक्ष भी रावण की समर्थता और अपनी दुर्बलता को देखते हुए डर गये हों? निष्कर्ष यही निकलता है कि परिष्कृत प्रतिभा, दुर्बल सहयोगियों की सहायता से भी बड़े-बड़े काम सम्पन्न कर लेती है, जबकि डर कर समर्थ व्यक्ति भी हाथ-पैर फुला बैठते हैं। राणा प्रताप के सैनिकों में अधिकाँश आदिवासियों का ही पिछड़ा समझा जाने वाला समुदाय प्रमुख था। लक्ष्मीबाई रानी के घर के पिंजरे में बंद रहने वाली महिलाओं को भी प्रोत्साहन देकर युद्ध क्षेत्र में वीर सैनिकों की तरह ला खड़ा किया था। रानी लक्ष्मीबाई ने तो अपने समय के दुर्दान्त दस्यु सागर सिंह को लूट-मार करके भागते समय, केवल अपनी सहेली सुन्दरी के सहयोग से बन्दी बनाकर दरबार में खड़ा कर दिया था। उनकी मनस्विता के समक्ष उसका सारा दुस्साहस ढह गया। रानी के अन्ततः उसे अपना सहयोगी बनाकर उसकी प्रतिभा का उपयोग अपनी सेना की शक्ति बढ़ाने में किया। साधारण लोगों की प्रतिभा उभारकर साहस के धनी लोगों ने बड़े-बड़े काम करा लिए थे। चन्द्रगुप्त बड़े साम्राज्य का दायित्व संभालने के योग्य अपने को पा नहीं रहा था, पर चाणक्य ने उसमें प्राण फूँके और अपने आदेशानुसार चलने के लिए विवश कर दिया। अर्जुन भी महाभारत की बागडोर सँभालने में सकपका रहा था, पर कृष्ण ने उसे वैसा ही करने के लिए बाधित कर दिया जैसा कि वे चाहते थे। समर्थ गुरु रामदास की मनस्विता यदि उच्चस्तर की नहीं रही होती, तो शिवाजी की परिस्थितियाँ गजब का पराक्रम करा सकने के लिए उद्यत न होने देतीं। रामकृष्ण परमहंस ही थे, जिन्होंने विवेकानन्द को एक साधारण विद्यार्थी से ऊँचा उठाकर विश्वभर में भारतीय संस्कृति का संदेशवाहक बना दिया। दयानन्द की प्रगतिशीलता के पीछे विरजानन्द के प्रोत्साहन ने कम योगदान नहीं दिया था। साथियों और मार्गदर्शकों की प्रतिभा, जिस किसी को अपने आवेश में हस्तान्तरित कर दे, वही कुछ से कुछ बन जाता है।
रेल का इंजन स्वयं समर्थ होता है और अपने साधनों से गति पकड़ता है ड़ड़ड़ड साथ जुड़े हुए पीछे वाले डिब्बे भी गति पकड़ते हैं। इंजन की क्षमता यदि अस्त-व्यस्त हो जाये तो फिर वह रेल लक्ष्य तक पहुँचना तो दूर, अन्यों का आवागमन भी रोक कर खड़ी हो जायेगी।
दूसरों की सहायता मिलती तो है, पर उसे प्राप्त करने के लिए अपनी पात्रता को विकसित करने के लिए असाधारण प्रयत्न करने पड़ते हैं। पात्रता ही प्रकारान्तर से सफलता जैसे पुरस्कार साथ लेकर वापस लौटती है। वर्षा ऋतु कितने ही दिन क्यों न रहे, कितनी ही मूसलाधार वर्षा क्यों न बरसे अपने पल्ले उतना ही पड़ेगा, जितना कि बर्तन का आकार हो अथवा गड्ढे की गहराई बन सके। उन दिनों सब जगह हरियाली उगती है, पर चट्टानों पर एक तिनका भी नहीं उगता। उर्वरता न हो तो भूमि में कोई बीज नहीं उगेगा ही नहीं। छात्रों को अगली कक्षा में चढ़ने या पुरस्कार जीतने, छात्रवृत्ति पाने का अवसर किसी की कृपा से नहीं मिलता। उनकी परिश्रमपूर्वक बढ़ी हुई योग्यता ही काम आती है। प्रतियोगिताओं में पुरस्कृत होने वाले जिस-तिस का अनुग्रह मिलने की आशा नहीं लगाये रहते, वरन् अपनी दक्षता, समर्थता को विकसित करके बाजी जीतने वाले सफल व्यक्तियों की पंक्ति में जा बैठने की प्रतिष्ठा अर्जित करते हैं। देवताओं तक का अनुग्रह, तपश्चर्या की प्रखरता अपनाने वाले ही उपलब्ध करते हैं। बिना प्रयास के तो थाली में रखा हुआ भोजन तक मुँह में प्रवेश करने और पेट तक पहुँचने में सफल नहीं होता।
महान शक्तियों में जिस पर भी अनुग्रह किया है, उसे सर्वप्रथम उत्कृष्टता अपनाने और प्रबल पुरुषार्थ में जुटने की ही प्रेरणा दी है। इसके बाद ही उनकी सहायता काम आती है। कुपात्रों को यह अपेक्षा करना व्यर्थ है कि उन्हें अनायास ही मानवी या दैवी सहायता उपलब्ध होगी और सफलताओं, सिद्धियों, विभूतियों से अलंकृत करके रख देगी। दुर्बलता, धारण किये रहने पर तो प्रकृति भी “दैव भी दुर्बल का घातक होता है” इस उक्ति को चरितार्थ करती देखी गई है। दुर्बल शरीर पर ही विषाणुओं की अनेक प्रजातियाँ चढ़ दौड़ती हैं। शीत ऋतु का आगमन जहाँ सर्व साधारण के स्वास्थ्य संवर्धन में सहायक होता है वहाँ मक्खी मच्छर जैसे कृमि-कीटकों के समूह को मृत्यु के मुँह में धकेल देता है।
सड़क पर बसों मोटरों का ढाँचा दौड़ता दीखता है, पर जानकार जानते हैं कि यह दौड़, भीतर टंकी में भरे ज्वलनशील तेल की करामात है। वह चूक जाए तो बैठकर सफर करने वाली सवारियों को उतर कर उस ढाँचे को अपने बाहुबल से धकेल कर आगे खिसकाना पड़ता है। मनुष्य के काय-कलेवर के द्वारा जो अनेक चमत्कारी काम होते दीख पड़ते हैं वे मात्र हाड़-माँस की उपलब्धि नहीं होते, वरन् उछलती उमंगों के रूप में प्रतिभा ही काम करती है। स्वयंवर में माला उन्हीं के गले में पड़ती है, जो दूसरों की तुलना में अपनी विशिष्टता सिद्ध करते हैं। चुनावों में वे ही जीतते हैं, जिनमें दक्षता प्रदर्शित करने और लोगों को अपने प्रभाव में लाने की योग्यता होती है। मजबूत कलाइयाँ ही हथियार का सफल प्रहार कर सकने में सफल होती है। दुर्बल भुजाएँ तो हारने के अतिरिक्त और कुछ प्राप्त कर सकने में सफल ही नहीं होती।
भीष्म ने मृत्यु को धमकाया था कि जब तक उत्तरायण सूर्य न आवे, तब तक इस ओर पैर न धरना। सावित्री ने यमराज के भैंसे की पूँछ पकड़ कर उसे रोक लिया था और सत्यवान के प्राण वापस करने के लिए बाधित किया था। अर्जुन ने पैना तीर चला कर पाताल-गंगा की धार ऊपर निकाली थी और भीष्म की इच्छानुसार उनकी प्यास बुझायी थी। राणा साँगा के शरीर में अस्सी गहरे घाव लगे थे, फिर भी वे पीड़ा की परवाह न करते हुए अन्तिम साँस रहने तक युद्ध में जूझते ही रहे थे। बड़े काम बड़े व्यक्तित्वों से ही बन पड़ते हैं। भारी वजन उठाने में हाथी जैसे सशक्त ही काम आते हैं। बकरों और गधों से उतना नहीं पड़ता, भले ही वे कल्पना करते, मन ललचाते या डींगे हाँकते रहें।
प्रतिभा जिधर भी मुड़ती है, उधर ही बुलडोजरों की तरह मैदान साफ करती चलती है। सर्वविदित है कि योरोप का विश्वविजयी पहलवान सैन्डो किशोर अवस्था तक अनेक बीमारों से घिरे, दुर्बल काया लिए फिरते थे। पर जब उनने समर्थ तत्वाधान में स्वास्थ्य का नये सिरे से संचालन और बढ़ाना शुरू किया तो कुछ ही समय में विश्वविजयी स्तर के पहलवान बन गये। भारत के चंदेगीराम पहलवान के बारे में अनेकों ने सुना है कि वह हिन्दकेसरी के नाम से प्रसिद्ध हुए थे। पहले वह अन्यमनस्क स्थिति में अध्यापकी से रोटी कमाने वाले क्षीणकाय व्यक्ति थे। उनने अपने मनोबल से ही नई रीति-नीति अपनायी और खोयी हुई सेहत नये सिरे से न केवल पायी, वरन् इतनी बढ़ायी कि हिन्दकेसरी उपाधि से विभूषित हुए।
इंग्लैण्ड की एक महिला कैंसर रोग से बुरी तरह आक्रान्त थी। डॉक्टरों ने उसे जवाब दे दिया था कि छः महीने से अधिक जीने की गुँजाइश नहीं है। जिस मशीन से उपचार हो सकता था, वह करोड़ों मूल्य की थी, जिसे अपने यहाँ रखने में कोई डॉक्टर समर्थ नहीं था। रोगी महिला ने नये सिरे से नया विचार किया। जब छः महीने में मरना ही है तो अन्य अपने जैसे निरीहों के प्राण बचाने की कोशिश क्यों न करें। उसने टेलीविजन पर एक अपील की कि यदि तीन करोड़ रुपये का प्रबन्ध कोई उदारचेता कर सके, तो उस मशीन के द्वारा उस जैसे निराशों को जीवन दान मिल सकता है। पैसा बरसा। उससे एक नहीं तीन मशीनें खरीद ली गयीं और इतना ही नहीं कैंसर का एक साधन सम्पन्न अस्पताल भी बन गया। रोगिणी इन्हीं कार्यों में इतने दत्तचित्त और मस्त रही कि उसे अपने मरने की बात का स्मरण तक न रहा। कार्य पूरा हो जाने पर उसकी जाँच पड़ताल हुई तो पाया गया कि कैंसर का एक भी चिन्ह उसके शरीर में बाकी नहीं रहा है।
अस्पताल की चारपाई पर पड़े-पड़े वाल्टेयर ने अपने महत्वपूर्ण ग्रन्थों की रचना की थी। कालिदास और वरदराज की मस्तिष्कीय क्षमता कितनी उपहासास्पद थी, इसकी जानकारी सभी को है, पर वे जब नया उत्साह समेट कर नये सिरे से विद्या पढ़ने में जुटे, तो मूर्धन्य विद्वानों में गिने जाने लगे। व्यक्ति की अन्तःचेतना, जिसे प्रतिभा भी कहते है, इतनी सबल है कि अनेकों प्रतिभा भी कहते है, इतनी सबल है कि अनेकों अभावों और व्यवधानों को रौंदती हुई, वह उन्नति के उच्च शिखर पर जा पहुँचने में समर्थ होती है। प्रतिभा वस्तुतः वह सम्पदा है, जो व्यक्ति की मनस्विता, ओजस्विता, तेजस्विता के रूप बहिरंग में प्रकट होती है। यदि प्रसुप्त को उभारी जा सके, स्वयं को खराद पर चढ़ाया जा सके, तो व्यक्ति असंभव को भी संभव बना सकता है। यह अध्यात्म विज्ञान का एक सुनिश्चित सिद्धाँत एवं अटल सत्य है।
यूनान के प्रसिद्ध दार्शनिक सुकरात भ्रमण करते हुए एक शहर में पहुँचे। वहाँ उनकी वृद्ध व्यक्ति से भेंट हुई। दोनों काफी घुल-मिल गये। सुकरात में उनके व्यक्तिगत जीवन में काफी रुचि ली। उन्होंने काफी खुलकर बात की।
सुकरात ने संतोष व्यक्त करते हुए कहा- “आपका विगत जीवन तो बड़े शानदार ढंग से बीता है, पर इस वृद्धावस्था में आपको कौन-कौन से पापड़ बेलने पड़ रहे है, यह तो बताइये।”
वृद्ध किंचित मुस्कुराया- “मैं अपने पारिवारिक उत्तरदायित्व अपने समर्थ पुत्रों की देकर निश्चिन्त हूँ। वह जो कहते है कर देता हूँ, जो खिलाते हैं खा लेता हूँ और अपने पौत्र, पौत्रियों के साथ हँसता-खेलता रहता हूँ। बच्चे कुछ भूल करते हैं तभी मैं चुप रहता हूँ। मैं उनके किसी कार्य में बाधक नहीं बनता, पर जब कभी वे परामर्श लेने आते हैं, मैं अपने जीवन के सारे अनुभवों की उनके सामने रख, की गई भूल उत्पन्न दुष्परिणामों की ओर से सचेत कर देता हूँ। वह मेरी सलाह पर कितना चलते है। यह देखना और अपना मस्तिष्क खराब करना मेरा काम नहीं है। वह मेरे निर्देशों पर चलें ही यह आग्रह नहीं। परामर्श देने के बाद भी यदि वह भूल करते है तो मैं चिंतित नहीं होता उस पर भी यदि वे पुनः मेरे पास आते हैं, तो उनके लिए सदैव मेरा दरवाजा खुला रहता है। मैं पुनः नेक सलाह देकर उन्हें विदा करता हूँ। वृद्ध की बात सुनकर सुकरात बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा-”इस आय में जीवन कैसे जिया जाय यह आपने बखूबी समझ लिया है।”
छत्रपति को अपने राज्य के लोगों की सुख-सुविधाओं का बड़ा ध्यान रहता था। हर समय वे कष्ट पीड़ितों और समस्याग्रस्तों की सेवा-सहायता के लिए तत्पर रहते। समूचे शासन क्षेत्र में उन्होंने घोषणा करा दी थी कि कोई भी दुःखी व्यक्ति उनके पास पहुँच कर अपनी तकलीफें कह सकता था। वे उसकी परेशानियों को हल करने में कोई कोर-कसर न उठा रखेंगे।
स्वयं के साथ अपने राज कर्मचारियों को भी ऐसी ही हिदायतें दे रखी थी कि वे प्रतिपल लोगों की कष्ट-कठिनाइयाँ सुनने के लिए तत्पर रहें। राज्य के सभी किलेदारों से उन्होंने कह रखा था कि ऐसी कोई शिकायत न आए जिसमें कि प्रजाजन की तकलीफ न दूर की गई हो। जन सेवा से मुख मोड़ने वालों को सख्त से सख्त सजा देने की व्यवस्था भी की गई थी और अब तक किसी भी कर्मचारी को दण्डित करने का अवसर नहीं मिला था।
एक दिन की बात है-बृहस्पतिवार की रात को कोई व्यक्ति पुरन्दर के किलेदार के पास रात को बारह बजे पहुँचा। वह किसी काम से आया था। सम्भवतः उसे कोई ऐसा काम रहा होगा, जिसके कारण उसे वहाँ गये रात आना पड़ा। किलेदार के पास सम्बन्धित कर्मचारी आगन्तुक की सूचना लेकर पहुँचा तो उसने कहला दिया कि -”यदि बहुत ही आवश्यक काम हो तो वे बाहर आएँ, नहीं तो वे सुबह आकर शिकायत सुन लेंगे।”
सुनकर आगन्तुक को किलेदार पर गुस्सा आया कि उसके रात को चलकर आने को कोई महत्व ही नहीं दिया गया। उसने घर जाने के बजाय क्षत्रपति के पास जाकर उक्त किलेदार की शिकायत करने का निश्चय किया।
सुबह जब वह क्षत्रपति के पास पहुँचा और अपनी शिकायत दोहराई तथा किलेदार की घटना भी कह दी। सुनकर उन्हें आश्चर्य तथा आक्रोश दोनों की एक साथ अनुभूति हुई। आश्चर्य इसलिए कि उक्त किलेदार बड़ा ही कर्तव्यनिष्ठ तथा ईमानदार था। उसी के द्वारा यह गलती होने के कारण दुःख हुआ और क्रोध भी आया। उन्होंने फौरन उस किलेदार को बुलाया और जवाब-तलब किया कि-”आप कहीं लोगों का काम करने से मना तो नहीं कर देते?
ईश्वर साक्षी है- किलेदार ने कहा- ”मैंने कभी किसी को काम के लिए मना नहीं किया।”
“पर गुरुवार की रात तो तुमने इस आदमी को मना किया था।” क्षत्रपति ने फरियादी की ओर इशारा कर कहा तथा पूछा -क्या यह झूठ बोलता है? “नहीं महाराज! यह सच कहता है? पर उस गुरुवार की रात में किसी अन्य काम में व्यस्त था, फिर भी पुछवा लिया था कि यदि अत्यावश्यक हो तो मैं बाहर आऊँ। फिर से सीधे, आपके पास चले आये। शिवाजी ने पूछा- “आप कहाँ व्यस्त थे? ऐसी क्या मजबूरी थी?”
“महाराज! उसे न पूछिए मेरा, राज खुल जायेगा।” क्षत्रपति ने फरमाया- “गुप्त वे बातें रखी जाती हैं, जो अनुचित होती हैं। गुप्त रखना भय का द्योतक है। फिर जन-सेवक को तो काई बात गुप्त नहीं रखनी चाहिए। आप अपनी उस दिन की व्यस्तता का कारण बताइए।”
किलेदार ने बड़े संकोच के साथ उत्तर दिया। “मैं सप्ताह भर कर्तव्य पालन करने में लगा रहता हूँ। मात्र गुरुवार के दिन मुझे रात्रि में फुरसत मिलती है। उस दिन मैं वस्त्रों की सफाई करता हूँ। अपने एक मात्र वस्त्रों के जोड़े को गुरुवार की रात धोकर सुखाता हूँ तथा सुबह पहनता हूँ। इस बात को मैं लोगों से छिपाता हूँ ताकि कोई अपने एक मात्र हिन्दू राज्य का मजाक न उड़ाए और मैं सप्ताह भर नियमित उपासना भी नहीं कर पाता सो गुरुवार को उपवास और रात्रि में ध्यान करता हूँ। यही वह कारण है।” किलेदार ने जमीन में आंखें सुनकर क्षत्रपति की आँखों से आँसू झड़ पड़े। वह भावुक हो बोले-”धन्य हो तुम जो न जनता से गाफिल हो और न उस मालिकों के मालिक से। वेतन भी इससे अधिक नहीं लेते कि कपड़ों का दूसरा जोड़ा बन सके।” उन्होंने सिंहासन से उठकर किलेदार को छाती से लगा लिया। आगे से सभी को सप्ताह में एक दिन अवकाश की व्यवस्था बनादी। अपने कर्तृत्व से अनेकों में प्रेरणा भरने वाले यह किलेदार थे मुरार जी बाजी प्रभु। जिनका शौर्य भरा सादगीयुक्त प्रेरक जीवन मराठा इतिहास में सोने के अक्षरों में टैंका है।
आमतौर पर भक्तजन भगवान को पुकारते और उनकी सहायता के लिए विनयपूर्वक गिड़-गिड़ाते रहते हैं। पर कभी-कभी ऐसे समय भी आते हैं जब भगवान उन भक्तजनों से आवश्यकता याचना करते हैं और बदले में उन्हें इतना महत्व देना पड़ता है, जो उनकी अपनी महत्ता से भी बढ़-चढ़ कर होता है।
हनुमान की वरिष्ठता के सम्बन्ध में जानकारी प्राप्त करने पर राम-लक्ष्मण उन्हें खोजने ऋष्यमूक पर्वत पर पहुँचे थे और येन-केन प्रकारेण उन्हें सीता की खोज में सहायता करने के लिए सहमत किया था। गंगाघाट पर करने के लिए केवट की सहायता आवश्यक हो गई थी। इसलिए केवट को उन्होंने आग्रहपूर्वक सहायता करने के लिए किसी प्रकार मनाया। आड़े समय में काम आने वाले जटायु को छाती से लगाकर कृतज्ञता व्यक्त की, उसकी अनुभूति हर सुनने वाले को भाव-विभोर कर देती है। समुद्र पर पुल बाँधने में जिन निहत्थे रीछ वानरों ने सहायता की, उनकी उदार चेतना को हजारों लाखों वर्ष बीत जाने पर भी कथाकारों ने भुलाया नहीं है।
महाभारत अभीष्ट था। उसकी बागडोर संभालने के लिए अर्जुन जैसे मनस्वी का आवश्यकता थी। अर्जुन से पूछा गया तो वह अचकचाने लगा। कभी भीख माँग कर खा लेने, कभी कुटुम्बियों पर हथियार न उठाने का सिद्धांतवाद तर्क रूप प्रस्तुत करने लगा। भगवान ने उसके मन की कमजोरी पढ़ी और भर्त्सनापूर्वक कटु शब्दों में दबाव डाला कि उसे उस कठोर कार्य में उद्यत होना ही चाहिए। यों भगवान सर्व शक्तिमान होने से महाभारत को अकेले भी जीत सकते थे पर अर्जुन को श्रेय देना था जो सच्ची मित्रता का तकाजा था। उसे यशस्वी भी तो बनाना था। इसलिए संग्राम के मध्य खड़े होकर अर्जुन को सुविस्तृत दर्शनशास्त्र समझाते हुए अपने प्रयोजन में भागीदार बनने के लिए सहमत करना ही पड़ा। अर्जुन घाटे में नहीं, नफे में ही रहा।
सुदामा बगल में दबी चावल की पोटली देना नहीं चाहते थे, संकुचा रहे थे, पर उनने उस दुराव को बलपूर्वक छीना और चावल देने की उदारता परखने के बाद ही द्वारिकापुरी को सुदामा पुरी में रूपांतरित किया। भक्त और भगवान के मध्यवर्ती इतिहास की परंपरा यही रही है। पात्रता जाँचने के उपरान्त ही किसी को कुछ महत्वपूर्ण मिला है। जो आंखें मटकाते आँसू बहाते, रामधुन की ताली बजाकर बड़े-बड़े उपहार पाना चाहते हैं, उनकी अनुदारता खाली हाथ ही लौटती है। भगवान को ठगा नहीं जा सकता है। वे गोपियों तक से छाछ प्राप्त किये बिना अपने अनुग्रह का परिचय नहीं देते थे। जो गोवर्धन उठाने में सहायता करने की हिम्मत जुटा सके, वही कृष्ण के सच्चे सखाओं में गिने जा सके।
यह समय युग परिवर्तन जैसे महत्वपूर्ण कार्य का है। आदर्शवादी कठोर सैनिकों के लिए परीक्षा की घड़ी कहा जाय, तो इसमें कुछ अत्युक्ति नहीं समझी जानी चाहिए। पुराना कचरा हटता है और उसके स्थान पर नवीनता के उत्साह भरे सरंजाम जुटते हैं। यह महान परिवर्तन की, महाक्राँति की बेला है। इसमें कायर, लोभी, डरपोक और भाँड़ आदि जहाँ-तहाँ छिपे हों, तो उनकी ओर घृणा, तिरस्कार की दृष्टि डालते हुए उन्हें अनदेखा भी किया जा सकता है। यहाँ तो प्रसंग हथियारों से सुसज्जित सेना का चल रहा है। वे ही यदि समय की महत्ता आवश्यकता को, न समझते हुए जहाँ-जहाँ मटरगस्ती करते फिरें और समय पर हथियार न पाने के कारण समूची सेना को परास्त होना पड़े, तो ऐसे व्यक्तियों पर हर किसी का रोष ही बरसेगा, जिनने आपात स्थिति में भी प्रमाद बरता और अपना तथा अपने देश वे गौरव का मटियामेट करके रख दिया।
जीवन्तों, जाग्रतों और प्राणवानों में से प्रत्येक को अनुभव करना चाहिए कि यह ऐसा विशेष समय है जैसा कि हजारों-लाखों वर्षों बाद कभी एक बार आता है। गाँधी के सत्याग्रही और बुद्ध के परिव्राजक बनने का श्रेय, समय निकल जाने पर अब कोई किसी भी मूल्य पर नहीं पा सकता। हनुमान और अर्जुन की भूमिका हेतु फिर से लालायित होने वाला कोई व्यक्ति चाहे कितने ही प्रयत्न करे, अब दुबारा वैसा अवसान हस्तगत नहीं कर सकता। समय की प्रतीक्षा तो की जा सकती है पर समय किसी की भी प्रतीक्षा नहीं करता। भगीरथ, दधीचि और हरिश्चन्द्र जैसा सौभाग्य अब उनसे भी अधिक त्याग करने पर भी पाया नहीं जा सकता।
समय बदल रहा है। प्रभातकाल का ब्रह्म मुहूर्त अभी है। अरुणोदय के दर्शन अभी हो सकते हैं। कुछ घण्टे ऐसे हैं उन्हें यदि प्रमाद में गँवा दिये जायें तो अब वह गया समय लौटकर फिर किस प्रकार आ सकेगा? युग परिवर्तन की बेला ऐतिहासिक, असाधारण अवधि है। इसमें जिनका जितना पुरुषार्थ होगा, वह उतना ही उच्चकोटि का शौर्य पदक पा सकेगा। समय निकल जाने पर, साँप निकल जाने पर लकीर को लाठियों से पीटना भर ही शेष रह जाता है।
इन दिनों मनुष्य का भाग्य और भविष्य नये सिरे से लिखा और गढ़ा जा रहा है। ऐसा विलक्षण समय कभी हजारों-लाखों वर्षों बाद आता है। इसे चूक जाने वाले सदा पछताते ही रहते हैं और जो उसका सदुपयोग कर लेते हैं वे अपने आपको सदा सर्वदा के लिए अजर अमर बना लेते हैं। गोवर्धन एक बार उठाया गया था। समुद्र पर सेतु भी एक ही बार बना था। कोई यह सोचता रहे कि ऐसे समय तो बार-बार आते ही रहेंगे और हमारा जब भी मन करेगा, तभी उसका लाभ उठा लेंगे, तो ऐसा समझने वाले भूल कर ही रहें होंगे। इस भूल का परिमार्जन फिर कभी कदाचित ही हो सके।
लोग अपने पुरुषार्थ से तो अपने अनुकूल परिस्थितियां उत्पन्न करते ही रहते हैं,पर भगवान के उपायों का श्रेय मनुष्य को अनायास ही मिल जाय, ऐसा कदाचित ही कभी होता है। अर्जुन का रथ एक बार ही कृष्ण ने चलाया था। वे उसके केवल, मात्र सारथी नहीं थे कि जब हुकुम चलाया, तभी उनसे वह काम करा लिया। भगवान राम और लक्ष्मण को कंधों पर उठाये फिरने का श्रेय हनुमान को एक ही बार मिला था। वे जब चाहते तभी हनुमान हठी बनकर उन्हें कंधों पर बिठाते और सैर कराते, ऐसे अवसर चाहे कभी भी मिल जाते रहेंगे, ऐसी आशा सदा सर्वदा किसी को भी नहीं करनी चाहिए।
ब्रह्मा ने सृष्टि एक बार ही रची थी। उसके बाद तो वह ढर्रा ज्यों-त्यों करके अपने ढंग से चलाता ही आ रहा है। नए युग का सृजन इन्हीं दिनों हो रहा है। समुद्र मंथन एक बार ही हुआ 14 रत्न एक बार ही निकले थे। वैसी घटनाएँ जब मन आये तभी घटित कर दी जायेंगी, यह आशा नहीं करनी चाहिए।
इदरीस शाह एक बार बस्ती में भ्रमण पर निकले। संध्या का समय था। रास्ते में उन्हें एक बच्चा मिला जो अपने हाथ में दिया उठाये था। इदरीश शाह ने बच्चे से पूछा- “यह कहाँ से लाए हो?”
बच्चे ने दिया बुझा दिया फिर बोला- “यह रोशनी मैं वहीं से लाया था जहाँ अब यह चली गई है।”
बच्चे के मुँह से यह उत्तर सुन इदरीस अवाक् रह गये उन्होंने बच्चे को मन ही मन प्रण किया व वे सोचने लगे “यह बच्चा जन्म-मरण के सिद्धान्त को कितना सरल तरीके से समझाता है।”
अवाँछनीयता के पलायन का, औचित्य की संस्थापना का ब्रह्म मुहूर्त, यह एक बार ही आया है। फिर कभी हम लोग इस मनुष्य जन्म में ऐसा दिख सकेंगे, इसकी आशा करना एक प्रकार से अवाँछनीय ही होगा। अच्छा यही हो कि ऐसी पुण्य बेला का लाभ उठाने में आज के विचारशील तो चूक करें ही नहीं।
चित्र विचित्र जानकारियाँ अधिकाधिक मात्रा में उपलब्ध करते रहना मनुष्य का स्वभाव अथवा व्यसन है। जिस प्रकार पेट कुछ पाना पचाना चाहता है उसी प्रकार मस्तिष्क की माँग रहती है कि जिस प्रकार लोभवश अधिक संग्रह की ललक रहती है उसी प्रकार वह जानकारियाँ जुटाने का रसास्वादन अनुभव करता रहे। बच्चे इसी हेतु अभिभावकों, अध्यापकों से चित्र विचित्र प्रश्न पूछते रहते हैं। नानी से कहानियाँ सुनने के लिए मचलते हैं। साहित्यिक पुस्तकें पढ़े समझने की मनःस्थिति नहीं होती तो चित्र कथाओं से मन बहलाते हैं। जहाँ भी नजर जाती है वहीं से कुछ जानने समझने का प्रयत्न करते हैं। इस आधार पर उनके कौतूहल का समाधान होता रहता है।
आयु बढ़ने के साथ यह उत्सुकता और भी अधिक बढ़ती जाती है। अखबार पढ़ने, फिल्म, टीवी देखने, रेडियो सुनने, पर्यटन करने, मेले समारोहों में सम्मिलित होने का उत्साह भी इसी निमित्त बढ़ा चढ़ा रहता है। तृप्ति कभी भी नहीं होती। एक के बाद दूसरी प्रकार की जानकारियाँ प्राप्त करने की उत्सुकता उभरती है। जिस प्रकार पेट भरने, वैभव बटोरने के लिए अनवरत प्रयत्न चलते रहते हैं उसी प्रकार जानकारियों के संचय से मिलने वाले रसास्वादन हेतु भी कुछ न कुछ किया ही जाता रहता है। यह क्रम आजीवन चलता ही रहता है। यदि किसी की यह प्रकृति उभरे ही नहीं या कम उभरे तो समझना चाहिए कि उसकी मानसिकता अविकसित अपगस्तर की है।
जिस प्रकार आहार में तरह तरह के स्वादों की अपेक्षा रहती है, जिस प्रकार आँखों को नये दृश्य देखने और कानों को नये शब्द सुनने की उत्सुकता रहती है, उसी प्रकार मन को भी अपने व्यसन की पूर्ति करने के लिए कुछ न कुछ उधेड़ बुन जारी रखनी पड़ती है। उसे नवीनता चाहिए। इस कौतूहल के लिए ही नित नई पुस्तकें-पत्रिकाएं पढ़नी पड़ती है। चर्चा में कई प्रकार की जानकारियों के आदान प्रदान का सिलसिला चलता रहता है। अनेक व्यंजन चखने के लिए लोग होटलों के चक्कर काटते हैं। कामाचार के नूतन प्रसंग देखने के लिए व्यभिचार की ओर मुड़ते हैं। कुदृष्टि का तात्पर्य भी इसी प्रकार का मनोरंजन करना होता है।
यह व्यसन या स्वभाव, सम्पन्न लोगों में दृश्य, श्रव्य या स्वाद प्रदान रहता है। उनका मनोरथ इतने भर से पूरा हो जाता है पर शिक्षितों की जिज्ञासा इससे एक कदम बढ़ी-चढ़ी होती है उन्हें अध्ययन या श्रवण प्रवचन के अवसर तलाशते रहने पड़ते हैं। अत्यधिक पतन भी इसी का एक रूप है कइयों को तथाकथित सत्संगों, कथा-प्रवचनों में भी इसी स्तर का रस आता है। संगीत, नृत्य, अभिनय को भी इसी प्रसंग का एक पक्ष समझा जा सकता है। कथाएँ पढ़ना या सुनना इसी रुझान का एक पक्ष है। संसार भर में आधा साहित्य कथा कहानियों का छपता है। शेष आधे को अन्यान्य सभी विषय मिलकर पूरा करते हैं। इसे लोक रुचि के रुझान का एक प्रमाण माना जा सकता है। लोक रुचि अपने आप में एक बड़ी शक्ति एवं आवश्यकता है। उसी की पूर्ति के लिए अनेकानेक क्रिया-कलाप चलते और सरंजाम जुटते रहते हैं। इन्हें सार्थक या निरर्थक कुछ भी समझा जाय। इस प्रवाह को वस्तुस्थिति के साथ जुड़ा हुआ समझा जा सकता है। लोग इसी कौतूहल-कौतुक की पूर्ति में अपना जीवन खपा देते हैं। इतने पर भी यह नहीं कहा जा सकता कि उनके पल्ले ऐसा कुछ पड़ता है या नहीं, जिसे महत्वपूर्ण कहा जा सके।
जानकारी संग्रह करते हुए मनोरंजन का सरंजाम जुटाते रहना एक बात है और ऐसा ज्ञान सम्पादित करना दूसरी जो मनुष्य को ऊँचा उठा सके आगे बढ़ा सके। किसी अभिनन्दनीय और अनुकरणीय भूमिका को निभाने के लिए ड़ड़ड़ड़ के स्तर तक पहुँच सके, हो सकता है कि इस दिशा में चलने वाले प्रत्येक व्यक्ति को प्रख्यात होने का अवसर न मिले पर इतना निश्चित है कि सद्ज्ञान के आधार पर सत्कर्म बन पड़ना सुनिश्चित है और वे ही निमित्त कारण है किसी के सफल जीवन एवं अग्रगामी समुन्नत बनने के। इस स्थिति में और कुछ मिल या न मिले पर इतना निश्चित है कि आत्म संतोष और अपने दिशा निर्धारण पर गर्व तो अनुभव होता ही रहता है। यह भी किसी के लिए जीवन साधना में सिद्धि प्राप्त कर लेने जैसी उपलब्धि है।
जानकारियाँ वे संग्रह की जानी चाहिए जो जीवन को सन्मार्ग पर अग्रगामी बनाने में प्रत्यक्ष और प्रमुख भूमिका निभाने में कारगर सिद्ध हो सकें। इसके अतिरिक्त जो कुछ पढ़ा सुना जाता है उसे कौतुक कौतूहल या मनोरंजन की पूर्ति भर समझना चाहिए। इसमें समयक्षेप तो हो सकता है पर समझना चाहिए कि उससे पल्ले कुछ भी नहीं पड़ने वाला नहीं है।
ज्ञान की उपयोगिता, आवश्यकता और महत्ता कम करके नहीं समझी जानी चाहिए। उसे योजनाबद्ध और दिशाबद्ध रहना चाहिए। जिस प्रकार भोजन करते समय आहार के संबंध में यह जाना परखा जाता है कि उसमें उपयोगी, पौष्टिक तत्व है या नहीं। उसी प्रकार ज्ञान सम्पादन करते समय यह कसौटी लगी रहनी चाहिए कि उसमें ऐसे तत्व हैं या नहीं, जो व्यक्तित्व और कर्तव्य को ऊर्ध्वगामी बना सकने की क्षमता रखते हैं। अन्दर से जो ऐसा हो उसी को अपनाया जाय। राजहंस प्रवृत्ति से अपने दृष्टिकोण को परिवर्तित किया जाय। नीर क्षीर विवेक का मानस बने। मोती चुगने और कीड़े छोड़ देने की प्रवृत्ति को अपनाने का प्रयास अनवरत रूप से चलता रहे। मनोरंजन के लिए जो पढ़ा सुना देखा जाना है, उसमें कटौती करके इस स्तर का ज्ञान सम्पादन करते रहा जाय जो व्यक्ति के अंतराल में समाहित प्रसुप्त महानताओं का जागरण कर सके। गुण, कर्म, स्वभाव में मानवी गरिमा के अनुरूप सत्प्रवृत्तियों को उभारने बढ़ाने, परिपक्व एवं विस्तृत, सुदृढ़ बनाने में समर्थ हो सके।
जीवन सम्पदा ईश्वर की महानतम विभूति है। उसे पाकर मनुष्य को कृत-कृत्य और धन्य बन जाना चाहिए किन्तु देखा यह जाता है कि निरर्थक भटकाव में वह अनुपम वैभव कौड़ी मोल बिक जाता है। दुश्चिन्तन और अनाचरण के फलस्वरूप ऐसा बोझ ही शिर पर लद जाता है जिससे वर्तमान विपन्नताओं से भरा रहता है और भविष्य के अन्धकारमय बनने का आधार खड़ा होता जाता है। यदि यह पहचान सकने का विवेक जगे और समय रहते सुधार निर्धारण बन पड़े तो समझना चाहिए कि एक महती सफलता उपलब्ध हुई।
ठीक इसी के समानान्तर तथ्य यह है कि गुण, कर्म, स्वभाव को परिष्कृत करने वाली विचारधारा का परिपोषण प्राप्त करने का सुयोग बना या नहीं। कहा जा चुका है कि ज्ञान एक प्रचण्ड शक्ति है। उसका महत्व समझा जा सके, उपयोगी स्तर अपनाया जा सके और यह ध्यान रखा जा सके कि औषधि स्तर का रसायन स्तर का ज्ञान सम्पादन किया जा रहा है या नहीं? तो समझना चाहिए कि उज्ज्वल भविष्य का निर्माण करने वाला भविष्य का राजमार्ग उपलब्ध हो गया। इस दृष्टि से व्यावहारिक जीवन में प्रगतिशीलता का, तत्वों का समावेश कर सकने वाला सत्साहित्य ही उपयोगिता की कसौटी पर खरा उतरता है। इसके अतिरिक्त जो बचा रहता है उसे कूड़ा करकट नहीं तो अधिक से अधिक फुलझड़ी जलाने या पतंग उड़ाने जैसा पठन मनोरंजन कहना चाहिए, जिससे समयक्षेप करने वाले विनोद के अतिरिक्त और कुछ हाथ लगता नहीं है।
सरसरी निगाह से तो रेल में बैठे मुसाफिर आसपास के दृश्यों को भी देखते चलते हैं पर उससे दृष्टि रंजन के अतिरिक्त ऐसा कुछ भी उपलब्ध नहीं होता जिससे प्रगति या समृद्धि के संदर्भ में कुछ कारगर उपलब्धि हो सके। ठीक इसी प्रकार सरसरी निगाह से पढ़ते या सुनते रहने पर भी कुछ महत्वपूर्ण हस्तगत नहीं होता। सत्साहित्य का चयन करना ही पर्याप्त नहीं वरन् होना यह भी चाहिए कि उसे पूरी तरह समझते हुए ध्यान देकर पढ़ा जा सके। न केवल ध्यान दिया जाय वरन् यह भी देखा जाय कि अपनी वर्तमान जीवनचर्या में उपयोगी प्रेरणाओं का समावेश किस हद तक किस प्रकार संभव हो सकता है। इस आधार पर थोड़ा पढ़ना भी इतना उपयोगी हो सकता है जितना कि उथले दृष्टि से पढ़े गये विशाल कलेवर वाले शास्त्र, पुराण या शोध प्रबंध भी नहीं हो सकते। पठन की सार्थकता तभी है जब उसके उपयोगी अंशों को जीवन में उतारने-कार्य रूप में परिणत करने की योजना भी बनती रहे।
युधिष्ठिर ने पाठशाला में प्रथम पाठ पढ़ा- ‘‘सत्यबंद”। दूसरे सभी साथी उसे दूसरे दिन ही याद करके ले आय। पर युधिष्ठिर उसे समझ पाने में असमर्थता ही प्रकट करते रहे। कई दिन बीत जाने पर भी पाठ न सुनाया जा सका तो गुरु ने तमक कर पूछा कि ऐसा क्यों? युधिष्ठिर ने कहा “मैं यह योजना बना रहा हूँ कि पाठ में सन्निहित सत्यनिष्ठ जीवन कैसे जिया जाय? उस मार्ग में आने वाली कठिनाइयों से किस प्रकार निपटा जाय?”
हुआ यही। अन्य विद्यार्थियों ने अनेकों पाठ याद कर लिये। कितनी ही पुस्तकें पढ़ डाली, पर युधिष्ठिर उस आरंभिक पाठ को ही जीवन का अविच्छिन्न अंग बनाने की योजना में निरत रहे। उनने वैसा ही कर भी दिखाया। उस एक ही पाठ के प्रभाव से वे धर्मराज युधिष्ठिर के नाम से प्रख्यात हुए। उनका इतिहास अमर हो गया। एक ही राजमार्ग अपनाकर लक्ष्य तक पहुँचने में समर्थ हुए।
सर्व साधारण की मनोवृत्ति और प्रवृत्ति ज्ञानार्जन के सम्बन्ध में ऐसी ही होनी चाहिए। विषैला, दूषित भोजन कोई नहीं खाता। पशु प्रवृत्तियों को भड़काने वाला साहित्य किसी को भी नहीं पढ़ना चाहिए। भले ही उस घटिया मनोरंजन की अपेक्षा प्रकृति सान्निध्य में पेड़ पौधों से पशु पक्षियों से, कीट-पतंगों से मानसिक वार्तालाप करना पड़े।
इसी प्रकार कुसंग से मिलने वाले श्रवण, परामर्श से भी बचना चाहिए। भले ही वह तथाकथित सत्संग, प्रवचन कीर्तन आदि के साथ ही क्यों न मिला हो। धार्मिक क्षेत्र में कथा श्रवण आदि के नाम पर प्रायः ऐसी ही अफीम खिलाई जाती रहती है जो अन्य विश्वास उपजाती और दिशा भ्रम में धकेल कर उस मार्ग पर घसीट ले जाती है जिस पर कदम बढ़ाने वाला हर दृष्टि से घाटा ही घाटा उठाता है। जहाँ ऐसा माहौल हो वहाँ तथ्यों की कसौटी पर कस कर विवेक का आश्रय लेकर उपयोगिता-अनुपयोगिता का निर्णय करना चाहिए। सत्संग, प्रवचन, परामर्श के नाम पर कहीं भटकाव तो गले नहीं उतरा जा रहा है इस यथार्थता को भली भाँति जान लेना चाहिए। इसके बाद ही उस कथोपकथन के संपर्क में आना चाहिए। अन्यथा विचारों के आदान-प्रदान में दिग्भ्रान्त तत्वों के साथ संपर्क स्थापित करने की अपेक्षा प्रकृति के सौंदर्य भरे घटकों के साथ अन्तः संवेदनाओं के आधार पर मौन वार्तालाप करते रहना चाहिए। वहाँ नीरवता रहने पर भी धुआँधार कथोपकथन की अपेक्षा अधिक श्रेयस्कर सामग्री हस्तगत हो सकती है
अफ्रीका में बन्दरों को जीवित पकड़ने वाले शिकारियों ने एक नया तरीका निकाला था। वे छोटे मुँह वाले घड़े में चने भरकर रख देते थे। बन्दर उसमें हाथ डालता और चने मुट्ठी में भर लेता। ऊपर खींचता तो बंधी मुट्ठी हाथ को बाहर न निकलने देती। बन्दर सोचता हाथ को चनों ने पकड़ लिया। वह चीखता चिल्लाता पर मुट्ठी खोलने की बात न सोच पाता। अन्ततः पकड़ा जाता और मौत के घर पहुँचता। लोग इसी प्रकार प्रलोभनों में फँसते और उन्हें न छोड़ पाने के कारण आपत्ति में फँसते हैं।
“प्राचीन की शक्ति” शीर्षक से अमेरिका की पत्रिका “जर्नल ऑफ द अमेरिकन मेडिकल रिसर्च “ के जनवरी 1958 के अंक में एक महत्वपूर्ण लेख प्रकाशित हुआ था लन्दन में जान जेहू नामक डाकिया सड़क पर बस से कुचला गया। अस्पताल में परीक्षण होने पर विदित हुआ कि उसके कपाल में कई घाव आये हैं और दिमाग का दाहिना भाग बुरी तरह क्षत हुआ है। डॉक्टरी राय यह थी कि वह कभी चल नहीं सकेगा और उसके शरीर का एक अंग लकवे का सदा शिकार रहेगा। आपरेशन करने वाला सर्जन प्रार्थनाशील था। उसने अपने अधीनस्थ सभी कर्मचारियों और अस्पताल के बीमारों से निवेदन किया कि आओ हम सब जेहू के कल्याण के लिए ईश्वर से प्रार्थना करें और उसका आराम होने तक सेवा करते रहें। सामूहिक प्रार्थना का प्रभाव देखकर सभी विस्मय विमुग्ध हो गए। रोगी पैरों से चलने लगा और उसमें बोलने की शक्ति आ गयी। सर्जन ने सबसे कहा प्रार्थना का तात्पर्य है ईश्वरीय शक्ति का आह्वान साथ ही साथ अपने को इस शक्ति के प्रति खोल देना उद्घाटित करना। ऐसा कर पाना तभी सम्भव बन पड़ता है जबकि संकीर्ण स्वार्थपरता से ऊपर उठ कर सब के हित की प्रार्थना की जाय। इंग्लैंड में राष्ट्रीय स्वास्थ्य समिति द्वारा 3000 अस्पताल चलाये जाते हैं। इन सबमें बीमारों के इलाज के साथ प्रार्थना को भी महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है।
डाँट सुनकर वह सहम गया। फटी-फटी आँखों से कुछ देर उसकी ओर देखता रहा, जिसकी अंगुलियों में थमी कलम उसका भाग्य लिख रही थी। तो क्या इन्सान का भाग्य किसी की मुट्ठी में कैद रहता है? पर वह तो दिन भर हड्डी तोड़ परिश्रम करता है, तब कहीं एक दो नहीं पूरे तीस दिन के बाद उसे मजदूरी मिलती है। तब उसके भाग्य की सृजेता उसकी मजबूत बाहें हैं, उसकी श्रम शक्ति है अथवा कोई और? जबाब विचारों के जाल में उलझ कर रह गया। हाथ में आया बरखास्तगी का हुक्मनामा, जिसे लेकर वह चल पड़ा जिन्दगी की अनजानी राहों की ओर।
रह-रह कर उसके मन में सवाल उभरता “भाग्य बड़ा है या पुरुषार्थ “? कभी-कभी ऐसा भी होता है कि अपने ही अन्दर से सवाल फूटते हैं फिर अपने ही मन के अनेकों कोनों से जवाब झाँकने लगते हैं निकलते हैं पर दूसरे पर झपटते हैं। बड़ी गहमा–गहमी के बाद किसी को जीत मिलती है। उसकी भी हालत कुछ ऐसी ही थी। उधेड़-बुन में पड़ा वह सोच रहा था क्या किया जाय? कहाँ जाना चाहिए?
खैर जैसे-जैसे एक नाटक कम्पनी में काम करने लगा वह। दो-तीन ड्रामों में सफल भी हुआ। कम्पनी के डायरेक्टर ने उसे प्रमुख एक्टर की भूमिका सौंपी। उस दिन काफी खुश हुआ सोचा चलो इस बार पुरुषार्थ जीता। किन्तु कुछ ही दिनों के बाद किसी बात पर नाटक कम्पनी वाले ने भी निकाल दिया। यह घटना उसे अन्दर तक हिला गई। सोचने पर विवश हुआ दरे नहीं भाग्य ही सब कुछ है पुरुषार्थ की कहा चल पाती है? पर वह जो पुरुषार्थ का पुजारी रहा है अपने इष्ट की पूजा करना छोड़ दे।
‘नहीं’ इस दृढ़ निश्चय के साथ वह फिर चल पड़ा। इस बार उसने मल्लाह का काम हाथ में सँभाला। नया-नया था, नाव चलाना भली प्रकार कैसे जानता? कई बार डूबते-डूबते बचा। कहीं यात्रियों को ले डूबता तो अदालत और जेल की हवा खानी पड़ती, इसलिए पहले ही समझदारी का काम किया। नाव छूट गई। नाव बेचकर चौकीदारी कर ली। मित्र मिलते और उपहास करते हुए इस चौकीदार से हँसकर पूछते-कहो भाई यह चौकीदारी कितने दिन चलेगी। युवक उनसे कहता जब तक कोई पदोन्नति न हो। पर बेचारे की पदोन्नति तो तब होती जब कोई करता! और हाँ! एक दिन जाँच करने वाले सिपाही ने उसे अयोग्य ठहराकर चौकीदारी से भी निकाल दिया। अभाव उसकी सम्पत्ति थी विपत्ति उसकी सहचरी। इस सबके बाद पुरुषार्थ के प्रति उसकी निष्ठा बरकरार थी। मित्र परिचितों के ताने-उलाहने के साथ यह और मजबूत हो जाती। निरन्तर की असफलताओं के बाद उसने एक ही ध्येय बनाया था पुरुषार्थ जीवन के सौभाग्य की सृष्टि करता है इसे स्वयं जीवन व्यापी प्रयोग से सिद्ध करना है।
इस बार काफी भटकना पड़ा। आखिर में एक छोटे स्कूल में सामान्य शिक्षक की जगह मिल गई। पढ़ाता भी था पढ़ता भी था अपने समय के प्रत्येक अंश को सदुपयोग करने की अनूठी कला भी सीखता। अपने मित्रों में बैठकर पुरुषार्थ से सौभाग्यों की सृष्टि वाली बात कहता तो सभी हँस पड़ते। हरेक कहता यहाँ से निकाले न जाओ यही बहुत।
इस बार वह निकाला नहीं गया स्वयं निकला, सेना में नौकरी करने के लिए विद्यालय से जाँच रिपोर्ट माँगी गई तो वहाँ के हेड मास्टर ने लिख भेजा नेक परिश्रमशील परिस्थितियों से न घबराने वाला युवक। सेना में कप्तान बना। वहाँ से उसने अपने मित्र को पत्र लिखा “पुरुषार्थ तो बरगद का बीज है। दिखने में छोटा लगता है तनिक गहरे पड़ता है, और देर से अँकुरित होता है। मेरे पुरुषार्थ ने अंकुर देने आरम्भ कर दिये हैं, विकसित होने पर तो पूरे अमेरिका का छाया देगा।
सचमुच यह पुरुषार्थ का अंकुरण था। सेना से वह लोक सेवा के क्षेत्र में उतरा। राजनीतिक अभिरुचियों, जन संपर्क, व्यवहार कौशल सभी ने एक मत होकर उसे अमेरिका का प्रेसीडेण्ट बनाया। मजदूर से राष्ट्राध्यक्ष तक की यात्रा करने वाला यह व्यक्ति था गारफील्ड। यदि पुरुषार्थ का बीज जनजन के जीवन में अंकुरित हो सके तो सब न केवल सौभाग्यों की सृष्टि कर सकेंगे, बल्कि अनेकों को छाया देकर कृतार्थ भी।
सृजन और विनाश की, उत्थान और पतन की शक्तियाँ इस संसार में निरन्तर अपने-अपने काम कराती रहती हैं। इन्हीं को देव और दानव के नाम से जाना और उनकी प्रतिक्रियाओं को स्वर्ग-नरक भी कहा जाता है। मनुष्य को यह छूट है कि दोनों में से किसी का भी वरण अपनी समझदारी के आधार पर कर ले और तद्नुरूप उत्पन्न होने वाली सुख-शान्ति अथवा पतन पराभव की प्रतिक्रिया सहन करे। उठने यह गिरने का निश्चय कर लेने का तदनुरूप सहायता-सुविधा भी इसी संसार में यत्र-तत्र बिखरी मिल जाती है, इच्छानुसार उन्हें बीना-बटोरा अथवा धकेला-भगाया भी जा सकता है। इसी विभूति के कारण मनुष्य को अपने भाग्य का निर्माता एवं भविष्य का अधिष्ठाता भी कहा जाता है। अपने या अपने समुदाय, संसार के लिए विपन्नता अथवा सम्पन्नता अर्जित कर लेना उसकी अपनी इच्छा आकाँशा पर निर्भर है।
आम आदत पायी जाती है कि मनुष्य सफलताओं का श्रेय स्वयं ले, किन्तु हानि या अपयश का दोषारोपण किन्हीं दूसरों पर मढ़ दे। इतने पर भी यथार्थता अपनी जगह पर अटल ही रहती है। यह आत्म-प्रवंचना भर कहला सकती है पर सुधार-परिवर्तन कर सकने जैसी क्षमता उसमें है नहीं।
प्रसंग इन दिनों की परिस्थितियों के संदर्भ में उनका कारण जानना और समाधान निकालने का है। गहरी खोज-बीन इसी निष्कर्ष पर पहुँचाती है कि जनमानस ही है, जो अपने लिए इच्छित स्तर की परिस्थितियाँ न्यौत बुलाता है। कोई क्या कर सकता है, यदि हानि को लाभ और लाभ को हानि समझ बैठने की मान्यता बना ली जाय? कुरूप चेहरा दर्शाने के लिए दर्पण को आक्रोश का भाजन बनाया जा सकता है, पर इससे चेहरे पर छायी कुरूपता या कालिख को भगाया नहीं जा सकता। अच्छा हो, हम कठिनाइयों के कारण समाधान अपने ही भीतर ढूंढ़ें और यदि उत्कर्ष अभीष्ट हो, तो इसकी तैयारी के रूप में आत्मसत्ता को तद्नुरूप बनाने के लिए अपना पुरुषार्थ नियोजित करें।
क्रियाएँ शरीर के माध्यम से बन पड़ती हैं। उनके सम्बन्ध में सोचने की खिचड़ी मस्तिष्क में पकती है, किन्तु इन दोनों को आवश्यक प्रेरणा देने ऊर्जा प्रदान करने की प्रक्रिया अन्तराल की गहराई से आरंभ होती है। ज्वालामुखी फूटने, धरती हिलने जैसी घटनाओं का उद्गम स्रोत वस्तुतः भूगर्भ की गहराई में ही कहीं होता है। बादल बरसते तो अपने खेत या आँगन में ही हैं, पर वस्तुतः उनका उद्गम समुद्र से उठने वाली भाप है।
भली-बुरी परिस्थितियों के संबंध में भी ऐसा ही सोचा जा सकता है। क्रिया करने और योजना बनाने में शरीर एवं मस्तिष्क को बहुत कुछ करते देखा जा सकता है, पर यह सारा तंत्र कहाँ से खड़ा हुआ, यह जानने की उत्कंठा हो तो अन्तः चेतना में अवस्थित आकाँक्षाओं को ही सूत्रधार मानना पड़ेगा।
विज्ञान ने प्रदूषण उगलने वाले विशालतम कारखाने बनाये सो ठीक है, पर उसके द्वारा उत्पन्न होने वाली विषाक्तता और बेरोजगारी के संबंध में भी तो विचार किया जाना चाहिए था। यह प्रश्न उभरा न हो, सो बात नहीं, पर उस योजना को कार्यान्वित करने वालों के अन्तराल में अधिक कमाने की ललक ही प्रधान रही होगी। हानिकारक प्रतिक्रिया के विचार उठने पर उन्हें यह कह कर दुत्कार दिया गया होगा कि सर्वसाधारण से हमें क्या लेना देना? अपने लाभ को ही सब कुछ मान लेने में ही भलाई है।
जिन्होंने साहित्य सृजा और फिल्में बनाई, उनको अपना लाभ प्रधान दिखा होगा, अन्यथा प्रचार साधनों में अवांछनीयता का समावेश करते समय हजार बार विचार करना पड़ता कि निजी लाभ कमाने के अत्युत्साह से लोकमानस को विकृत करने का खतरा उत्पन्न नहीं किया जाना चाहिए। युद्धोन्माद का वातावरण बनाने और सरंजाम जुटाने में किसी वर्ग विशेष को लाभ ही लाभ सूझा होगा, अन्यथा उस आक्रमण प्रत्याक्रमण के माहौल से असंख्यों मनुष्यों की परिवारों की भयंकर बरबादी सूझ ही न पड़ती, ऐसी बात नहीं है। अपने को सर्व समर्थ सर्वसम्पन्न बनाने के लिए उभरे उन्माद ने शोषण से लेकर आक्रमण तक के अनेकों कुचक्र रचे हैं। इतना दुस्साहस तभी बन पड़ा, जब उसने अपनी चेतना को इतना निष्ठुर बना लिया। अन्यान्यों को इस त्रास से भारी कष्ट सहना पड़ सकता है, इसको दर गुजर करने के उपरान्त ही अपराधी, आक्रामक एवं आतंकवादी बना जा सकता है।
नशों का उत्पादक एवं व्यवसायी-तस्कर आदि यदि अनुमान लगा सके होते कि उनका व्यक्तिगत लाभ किस प्रकार असंख्य अनजानों का विनाश करेगा, यदि ऐसी संवेदना उनके अन्तराल में उमगी होती, तो निश्चय ही वे इस अनर्थ से हाथ खींच लेते और गुजारे के लिए हजार साधन ढूँढ़ लेते।
पशु-पक्षियों को उदरस्थ करते रहने वालों के मन में यदि ऐसा कुछ सूझ पड़ा होता कि उन निरीहों की तरह हम इतनी भयंकर पीड़ा सहते हुए जान गँवाने के लिए बाधित किये गये होते, तो कैसी बीतती? उस छटपटाहट को निजी अनुभूति से जोड़ सकने वाला कदाचित ही छुरी का निर्दय प्रयोग कर पाता।
नारी पर प्रजनन का असाधारण भार लादने वाला तथाकथित पति महोदय, यदि अपनी सहचरी के प्रति किये जा रहे उत्पीड़न को भी ध्यान में रख सके होते, तो उन्हें अपने इस स्वेच्छाचार पर अंकुश लगाना ही पड़ता। निजी मस्ती उतारने से पूर्व उसका भावी परिणाम क्या होगा, यह भी विचारना पड़ता। अपनी आर्थिक बरबादी और बच्चों की अनगढ़ जिन्दगी के लिए भी अपने को उत्तरदायी ठहराते हुए स्वेच्छाचार पर अंकुश लगाने के लिए सहमत होते।
दोष घटनाओं को ही देकर निश्चिन्त नहीं हो जाना चाहिए। सोचना यह भी चाहिए कि यह अवाँछनीयताओं का प्रवाह प्रचलन, जिस भावन क्षेत्र की विकृति के कारण उत्पन्न होता है, उस पर रोक-थाम के लिए भी कुछ कारगर प्रयत्न किया जाय।
संवेदनाओं के करुणा का समावेश होने पर दूसरे भी अपने जैसे ही दीखने लगते हैं। कोई समझदारी के रहते, अपनों पर आक्रमण नहीं करता, अपनी हानि सहन नहीं करता। इसी प्रकार यदि वह आत्मभाव समूचे समाज तक विस्तृत हो सके, तो किसी को भी हानि पहुंचाने, सताने की बात सोचते ही हाथ पैर काँपने लगेंगे। अपने आपे को दैत्य स्तर का निष्ठुर बनाने के लिए ऐसा कोई व्यक्ति तैयार न होगा, जिसकी छाती में हृदय नाम की कोई चीज है। जिसने अपनी क्रिया को, विचारणा को मात्र मशीन नहीं बनाया होता, वरन् उनके साथ उस आत्म-सत्ता का भी समावेश किया होता, तो आत्मीयता करुणा, सहकारिता और सेवा-साधना के लिए निरन्तर आकुल-व्याकुल रहती।
समस्याओं का तात्कालिक समाधान तो नशा पीकर बेसुध हो जाने पर भी हो सकता है। जब होश-हवास ही दुरुस्त नहीं, तो समस्या क्या? और उसका समाधान ढूँढ़ने का क्या मतलब? पर जब मानवी गरिमा की गहराई तक उतरने की स्थिति बन पड़े, तो फिर माता जैसा वात्सल्य हर आत्मा में उभर सकता है और हित-साधना के अतिरिक्त और कुछ सोचते बन ही नहीं पड़ता। तब उन उलझनों में से एक भी बच नहीं सकेगी, जो आज किसी को उद्विग्न-आतंकित किये हुए है।
बाबर ने अपने पुत्र हुमायूँ के नाम वसीयत नामा छोड़ा “हिन्दुस्तान में कई मजहब के लोग बसते हैं। खुदा का शुक्र अदा करो कि उन्होंने तुम्हें इस मुल्क का शहंशाह बनाया है तुम ताअस्सुब से काम न लेना, गैर जानिमदार रहते इंसाफ करना, सब मजहबों की भावनाओं का ख्याल रखना और किसी तबके की पूजा के स्थान को जाण (नष्ट) न करना (मेजर चार्ल्स स्टुअर्ट के संकलन से) वसीयतनामे का हुमायूँ ने पूर्णतया पालन भी किया। ईरान जाते समय जब रास्ते में उसे भूख लगी तो उन्होंने नौकरों को भेजकर कामरान शहर से साग सब्जी मंगवाई किन्तु गौमाँस के अतिरिक्त उन्हें कुछ नहीं मिला। उस दिन हुमायूँ भूखे ही सो गये और बोले इससे तो हिन्दुस्तान की धरती पाक साफ है। वहाँ तो हमारे पिता की कब्र को झाड़ने बुहारने वाले तक गौमाँस नहीं खाते।
अध्यात्म विज्ञान में प्रकाश साधना का विशेष महत्व है। अध्यात्मशास्त्रों में स्थान-स्थान पर इसकी चर्चा की गई है। यह प्रकाश सूर्य, चन्द्र आदि से निकलने वाला भौतिक प्रकाश नहीं, वरन् वह परम् ज्योति है जो इस विश्व चेतना का आलोक बन कर जगमगा रही है। गायत्री का उपस्थ सविता देवता इसी परम ज्योति को कहते हैं। इसका अस्तित्व ऋतंभरा प्रज्ञा के रूप में प्रत्यक्ष और कण-कण में संव्याप्त जीवन ज्योति के रूप में प्रत्येक व्यक्ति अपने में भी देख सकता है। गायत्री उपासना में इसी दिव्य प्रकाश को परम ज्योति को अपने अन्तः भूमिका में अवतरण करने और उससे समूचे व्यक्तित्व को प्रकाशित करने के लिए साधक सविता देवता का ध्यान करता है। इसकी जितनी मात्रा जिसके भीतर विद्यमान हो, समझना चाहिए कि उसमें उतना ही अधिक ईश्वरीय अंश आलोकित हो रहा है।
प्रकाश-साधना वस्तुतः एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है जिसमें साधक अपने भीतर के काले मटमैले और पापाचरण को प्रोत्साहन देने वाले प्रकाश अणुओं को दिव्य तेजस्वी, सदाचरण शान्ति और प्रसन्नता देने वाले प्रकाश अणुओं में परिवर्तित करता है। विकास की इस प्रक्रिया में उत्तरोत्तर अभिवृद्धि करते हुए वहाँ तक जा पहुँचना होता है जहाँ व्यष्टिगत आत्मचेतना को ब्रह्माण्डव्यापी समष्टिगत परमात्म चेतना का सान्निध्य प्राप्त हो जाता है और अंततः वह उसी में तिरोहित हो जाती है। सविता साधना से इसी उद्देश्य की पूर्ति होती है। गायत्री के देवता सविता की आराधना भीतर के दूषित प्रकाश अणुओं पाप-तापों एवं कषाय-कल्मषों को धो देती है और उनके स्थान पर दिव्य प्रकाश भर देती है जिससे समूचा जीवन ही ज्योतिर्मय हो उठता है। इस उपक्रम को अपनाकर हर कोई अपनी जीवन ज्योति को प्रकाशित-प्रज्ज्वलित कर सकता है। ज्योति साधना का उद्देश्य भी यही है।
शास्त्रों में उल्लेख है कि सूर्य ही अग्नि है, अदिति भी उसी का नाम है सविता के रूप में गायत्री का अधिष्ठाता वही है जो सृष्टि में नवीन प्राण चेतना स्फुरित करने की क्षमता से उत्पन्न है। वही सर्वगुण सम्पन्न सविता प्रकाश और ताप के रूप में शक्ति एवं ऊर्जा के रूप में सर्वत्र विद्यमान है। प्राणों की रक्षा करने वाला होने से उसका सीधा सम्बन्ध मानव जीवन से है। सूर्य की 36 हजार प्रकाश-रश्मियां हैं जो प्राण चेतना के रूप में मानव मस्तिष्क के मध्य में स्थित ब्रह्मरंध्र के द्वारा प्रतिदिन एक के क्रम से अन्दर प्रविष्ट करती रहती हैं और इस तरह जीवन निर्वाह के लिए सविता का एक प्राण मनुष्य को प्रतिदिन उपलब्ध होता रहता है। आधुनिक वैज्ञानिक मनीषी भी इस तथ्य की पुष्टि करते हुए कहते हैं कि हम सभी सूर्य के आन्तरिक भाग में निवास करते हुए उससे संयमित हैं। हमारे प्रत्येक अंग-अवयव उसी से अदृश्य रूप से उत्तेजना ग्रहण करते और प्राण ऊर्जा से लाभान्वित होते हैं।
अध्यात्मवेत्ता वैज्ञानिक मनीषियों के अनुसार प्रकाश साधना के समय सविता के ध्यान से हमारे मस्तिष्क का चुम्बकत्व सूर्य के प्रकाश कणों के चुम्बकत्व को आकर्षित करता और ग्रहण करता हुआ हमारी प्राणचेतना में दिव्यता का अभिवर्धन करता रहता है। प्रकाश ऊर्जा या प्राण शक्ति का आकर्षण मस्तिष्क के मध्यभाग से करने का विधान है, जिसे ‘ब्रह्मरंध्र ‘ कहा जाता है। यही वह शक्ति केन्द्र है जहाँ से मस्तिष्क शरीर का नियंत्रण करता और विश्व में जो कुछ भी मानवकृत विलक्षण विज्ञान दिखाई देता है, उनका सम्पादन करता है। इसी मध्यभाग से प्रकाशकणों का एक फव्वारा सा फूटता रहता है। उसकी उछलती हुई तरंगें एकवृत्त बनाती हैं और फिर अपने मूल उद्गम में लौट जाती हैं। यह प्रक्रिया रेडियो प्रसारण और संग्रहण जैसी है। ब्रह्मरंध्र से निस्सृत प्रकाश ऊर्जा अपने भीतर छिपी हुई भाव स्थिति को विश्व ब्रह्माण्ड में ईथर कंपनों द्वारा प्रवाहित करती रहती है और इस प्रकार मनुष्य अपनी चेतना का प्रभाव समस्त संसार में फेंकता रहता है। प्रकाश किरणों की लौटती हुई धाराएँ अपने साथ विश्वव्यापी असीम ज्ञान चेतना की नवीनतम घटनात्मक तथा भावनात्मक जानकारियाँ लेकर लौटती हैं यदि उन्हें ठीक ठीक समझा, आकर्षित किया और अवधारित किया जा सके तो कोई भी व्यक्ति भूत, भविष्य और वर्तमान काल की अत्यन्त सुविस्तृत और महत्वपूर्ण जानकारियाँ प्राप्त कर सकता है। मनुष्य में सूक्ष्म आदान-प्रदान की, प्रवाह ग्रहण करने और प्रसारित करने की जो क्षमता है, उसका माध्यम यह ब्रह्मरन्ध्र स्थित ध्रुव संस्थान ही है।
सुविख्यात वैज्ञानिक मनीषी डॉ. जे. सी. ट्रस्ट का कहना है कि मनुष्य शरीर की प्रत्येक कोशिका प्रकाश चेतना से भरी होती है। सूक्ष्मदर्शी यंत्र उपकरणों के माध्यम से किये गये विशेष परीक्षणों में देखा गया है कि प्रत्येक कोशिका अपने आप में प्रकाश पुँज है और उसमें से टिमटिमाता हुआ प्रकाश निकलता रहता है। यह प्रकाश अणु ही मनुष्य के यथार्थ शरीर का निर्माण करते हैं और पंच महाभूतों से विनिर्मित काया को स्थिरता प्रदान करते हैं। प्रकाश की ध्यान−धारणा इन्हें परिपुष्टता और दिव्यता प्रदान करती है। उनके अनुसार स्वभाव, संस्कार, इच्छाएँ क्रिया शक्ति यह सब इन्हीं प्रकाश अणुओं का खेल है। मनुष्य का जो कुछ भी स्वभाव आज दिखाई देता है, वह इन्हीं प्रकाश किरणों की उपस्थिति के कारण है। इतना ही नहीं जन्म-जन्मान्तरों तक खराब प्रकाश अणुओं की यह उपस्थिति मनुष्य से बलात् दुष्कर्म कराती रहती है और इस तरह वह पतन के खड्ड में बार-बार गिरता और अपनी आत्मा को दुखी बनाता रहा है। जब तक दूषित प्रकाश कणों को निष्क्रिय नहीं बना दिया जाता अथवा उन्हें मिटाकर शुभ और दिव्य प्रकाश से अपने आपको परिपूरित नहीं बना लिया जाता तब तक परिस्थितियों में कोई कहने लायक विशेष परिवर्तन नहीं हो पाता। प्राचीन ऋषि मनीषियों ने दिव्य ज्योति की निराकार ध्यान साधना का निर्धारण इसी निमित्त किया था। सविता की दिव्य प्रकाश ऊर्जा को जो मनुष्य जितनी अधिक मात्रा में आकर्षित कर लेता है, वह उतना ही श्रेष्ठ, सद्गुणी एवं ओजस् तेजस् वाला बन जाता है। यदि इस विज्ञान को समझा जा सके और श्रद्धा भावनापूर्वक ध्यान उपक्रम को अपनाया जा सके, तो न केवल अपना जीवन शुद्ध, सात्विक दिव्य एवं सफल बनाया जा सकता है, वरन् औरों को भी लाभान्वित किया जा सकता है। परलोक और सद्गति का आधार यह दिव्य प्रकाश चेतना ही है।
आत्मचेतना जिन अणुओं से अपने को अभिव्यक्त करती है, वह प्रकाश अणु ही है, जबकि आत्मा स्वयं उससे भिन्न है। प्रकाश अणुओं को प्राण ऊर्जा, विधायी शक्ति, अग्नि, तेजस् आदि कहने चाहिए। वह जितने शुद्ध, दिव्य एवं तेजस्वी होंगे, साधक उतना ही महान ओजस्वी, तेजस्वी, यशस्वी, एवं वर्चस् वाला होगा। महापुरुषों, तपस्वी, ऋषि-मनीषियों में से प्रत्येक को अपने दूषित प्रकाश अणुओं को हटाने और दिव्य अणुओं से आप्लावित करने की साधना करनी पड़ी है। “तमसो मा ज्योतिर्गमय “ की प्रार्थना में इसी दिव्य प्रकाश की याचना का भाव सन्निहित है। इसकी विधि अत्यंत सरल, किन्तु महान प्रतिफल प्रदान करने वाली है।
दिव्य प्रकाश की निराकार ध्यान साधना अरुणोदय काल में सम्पन्न की जाती है, जब पूर्व दिशा की ओर अरुणिमा युक्त स्वर्णिम आभा के साथ भगवान सविता अपने समस्त वरेण्य, दिव्य भर्ग, ऐश्वर्य के साथ उदय होते हैं। यों तो सामान्य जप के साथ सूर्य मंडल मध्यस्थ भगवती गायत्री का ध्यान करने का विधान है, किन्तु इस साधना में गायत्री माता की छवि का स्थान सविता का दिव्य तेजोवलय ले लेता है। ध्यान मुद्रा में बैठकर भावना करनी पड़ती है कि हमारी प्राणचेतना अन्तरिक्ष की यह विशाल दूरी पार करने के लिए निकल पड़ी है। भावना की प्रगाढ़ता के लिए पृथ्वी और आकाश के विविध काल्पनिक दृश्यों को मानस पटल पर उभारना पड़ता है। धीरे-धीरे प्राणों को सविता के प्रकाश में डुबो देते हैं। मन हठात् भागना चाहे तो अनन्त सितारों की जगमग के मनोहारी दृश्य दिखा कर उसे फिर उसी सूर्य के प्रकाश में उतारा जाता है और दृढ़ भावना की जाती है कि अपनी प्रकाश चेतन में सम्मिलित कालिमायुक्त दूषित अणु पाप-ताप और अहंताएँ नष्ट होती जा रही हैं। अपने और सविता के प्रकाश में कोई अन्तर नहीं रहा। समस्त सौर मण्डल में अपनी ही प्रकाश चेतना-प्राण चेतना प्रतिभासित हो रही है। उसी प्रकाश स्फुल्लिंग से वृक्ष-वनस्पति बने हुए हैं। उसी से ब्रह्माण्ड गतिमान हो रहा है। साक्षी और द्रष्टा रूप में अपनी ही आत्मचेतना सर्वत्र संचरण कर रही है। समस्त प्राणि जगत में अपना ही प्राण समाया है और सबको परिचालित कर रहा है।
इस तरह दिव्य प्रकाश की ध्यान धारणा में सूर्य का तेजोमंडल मात्र भौतिक प्रकाश न रह कर ब्राह्मी चेतना की दिव्य ज्योति बनकर अनुभूति में उतरती चली जाती है। श्रद्धा-विश्वास की अभिवृद्धि के साथ ही ध्यान की प्रगाढ़ता जितनी अधिक बढ़ती जाती है, दिव्य दृष्टि का उतना ही अधिक विकास होता है। तन्मयता एकाग्रता जितनी बढ़ेगी, पुलकन और दिव्यता का अंश भी बढ़ता चलता चला जायेगा। ब्रह्मतेज से अनुप्राणित होने और ओजस्वी, तेजस्वी, मनस्वी बनने में सविता की प्रकाश साधना अतीव लाभकारी सिद्ध होती है। यह एक सुनिश्चित तथ्य है।
मंत्र-शक्ति की सामर्थ्य सर्वविदित है। रामायण एवं महाभारत काल में आग्नेयास्त्र, पाशुपतास्त्र, वायवास्त्र, वरुणास्त्र, ब्रह्मास्त्र जैसे कितने ही दिव्य अस्त्रों के प्रयोगों का वर्णन शास्त्रों में मिलता है। यह सभी मंत्रशक्ति एवं मनः संस्थान की संकल्पित ऊर्जा से परिचालित होते थे। आधुनिक परमाणु आयुधों एवं लेसर अस्त्रों की तुलना में वे कहीं अधिक सटीक निशाने पर निरत और निर्धारित लक्ष्यवेधन में सफल रहते थे। मंत्रशक्ति द्वारा उद्भूत यह मनुष्य की प्राणशक्ति का, पराशक्ति का चमत्कार है।
अब विज्ञानवेत्ताओं का ध्यान भी मानव में अन्तर्निहित ‘पराशक्ति’ की ओर आकृष्ट हुआ है। वे शत्रुपक्ष के गोपनीय क्रिया-कलापों की जानकारी प्राप्त करने से लेकर ‘माइण्डवार’- ‘पराशक्ति-युद्ध’ तक में इसे प्रयुक्त करने की योजनाएँ बना रहे हैं। संभावना व्यक्त की जा रही है कि मनुष्य मंत्रशक्ति से उद्भूत अपनी संकेन्द्रित ऊर्जा द्वारा गुप्तचरी कर सकता है। समुद्र के गर्भ में छिपी लड़ाकू पनडुब्बियों, प्रक्षेपास्त्रों को अपने प्रचण्ड प्राणशक्ति से उन्हें नष्ट कर सकता है। ऐसा भी हो सकता है कि शत्रु पक्ष के लिए प्रहार प्रयोजन के लिए उस शक्ति को काम में लाया जाय। आग्नेयास्त्र स्तर का विकास करके प्रचण्ड शक्ति से किसी को जीवित जलाया जा सकता है, या अग्निकाँड जैसी दुर्घटना खड़ी की जा सकती है।
तंत्रशास्त्र ऐसे ही विधानों से भरा पड़ा है। उसमें मारण, मोहन, उच्चाटन, वशीकरण, स्तंभन आदि के कितने ही प्रयोगों का विस्तृत उल्लेख है, साथ ही उनका प्रयोग करने की हिदायत भी है। कारण कोई अनाड़ी बंदूक चलाए तो उसका धक्का चलाने वाले की छाती को भी तोड़ सकता है। ताँत्रिक प्रयोगों में जिन विशिष्ट मंत्रों का उपयोग किया जाता है, उनका प्रभाव परिणाम भी अप्रिय होता है। उससे उपलब्ध शक्ति का उपयोग दूसरों को प्रताड़ित करने और हानि पहुँचाने में किया जाता है। यद्यपि उसे जाग्रत करने वाले विशेषज्ञ इस शक्ति का श्रेष्ठ सत्कार्यों में भी प्रयोग कर सकते हैं।
परन्तु मंत्रशास्त्र में ऐसी बात नहीं है। इस विधा से उद्भूत शक्तियाँ सत्प्रयोजनों में ही प्रयुक्त होती हैं। उसमें मंत्रों का उच्चारण जिस विशेष लय, ध्वनि और सुर के साथ किया जाता है, उसकी परिणति सुखद सात्विक शक्तियों के उद्भव के रूप में सामने आती है। एक निश्चित क्रम, लय और सीमा में बँधे मंत्रों के जप एवं उनके अर्थों के ध्यान का प्रभाव अवश्य होता है। अध्यात्मशास्त्रों में उल्लेख है कि प्रत्येक मंत्र का अपना विशिष्ट अर्थ, प्रयोजन और मूल्य होता है। उसमें सन्निहित शक्ति का प्रस्फोट उसके शुद्ध उच्चारण पर तो निर्भर करता ही है, साथ ही लय, ध्वनि एवं प्रयोक्ता की भावना, आस्था की भी प्रमुख भूमिका होती है। इन्हीं के सम्मेलन से प्रभावकारी शक्ति उद्भूत होती और तरह-तरह के प्रतिफल प्रस्तुत करती है। इस आधार पर मुँह से उच्चारित प्रत्येक शब्द मंत्रमय और सामर्थ्यवान बनता है। मंत्रवेत्ता आचार्यों का कहना है कि क्रमबद्ध एवं लयबद्ध शुद्ध मंत्रोच्चार से उत्पन्न ध्वनि पूर्ण रूप से परिवर्तित हो जाती है। उसके परावर्तन से चारों ओर तथा लक्षित क्षेत्र तक शक्तिशाली प्रकम्पन्नों का जाल सा बिछ जाता है। उसकी जितनी सघनता होगी, उतनी ही अधिक चमत्कारी परिणाम प्रस्तुत करेगी। मंत्रित ध्वनि तरंगों से उच्चारण कर्ता के मन-मस्तिष्क और प्राण में नवीन शक्ति प्रवाहित होने लगती है और वह क्रमशः शक्तिपुँज बनता चलता जाता है।
मंत्र विद्या पर अनुसंधानरत वैज्ञानिकों का कहना है कि मंत्रों में इन्फ्रासोनिक एवं कम आवृत्ति वाली अल्ट्रासोनिक स्तर की ध्वनियों का समावेश होता है। उन इन्फ्रासोनिक ध्वनि तरंगों को शाँत, सात्विक प्रकृति का माना है और कहा है कि इसमें नवजीवन प्रदान करने वाली प्रचण्ड ऊर्जा का भण्डार सन्निहित है। उच्च आवृत्ति वाली अल्ट्रासोनिक ध्वनियों की प्रकृति विनाशकारी होती है। तंत्रविज्ञान में इसी का प्रयोग होता है। इनसे प्राणी और पदार्थ को उसी तरह तबाह किया जा सकता है जैसे- शक्तिशाली शस्त्रास्त्रों से। सर्वविदित है कि परा ध्वनियों के माध्यम से धातु खण्डों को काटा या गलाया तथा इमारतों को क्षणमात्र में ध्वस्त किया जा सकता है। सोवियत संघ के सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक बी. कूद्रायवत्सेव ने इस बात की गवेषणा कर ली है कि अश्रव्य ध्वनियाँ मंत्रोच्चारण से निकली ध्वनि तरंगें पृथ्वी के अयन मण्डल को घेरे विशाल भू चुंबकीय प्रवाह से टकराती और परावर्तित होकर संपूर्ण वायुमंडल में छा जाती हैं। इसका प्रभाव न केवल प्रयोक्ता पर होता है, वरन् जड़-चेतन सभी उससे प्रभावित और लाभान्वित होते हैं।
ध्वनि की इस प्रचण्ड सामर्थ्य से प्राचीन काल के ऋषि-मनीषी अच्छी तरह परिचित थे। उनने कुछ ऐसे शब्द या शब्द समूहों का आविष्कार किया, जिन का प्रभाव असामान्य स्तर का होता है। इन्हें ही ‘मंत्र’ के नाम से पुकार गया। मंत्र विद्या के इन ज्ञाताओं ने अपने अनुसंधानों और अनुभवों के आधार पर यह पहले ही सुनिश्चित कर दिया था कि किस मंत्र का कितना अथवा किस प्रकार जप करने से कौन सी शक्ति उत्पन्न होगी और उसका मन पर या शरीर के किस अंग अथवा चक्र-उपत्यिका पर किस प्रकार का प्रभाव पड़ेगा। मंत्राक्षरों के गुँथन और उनमें सन्निहित ध्वनियों का महत्व मंत्रार्थ की तुलना में अनेकों गुना महत्व रखता है।
वर्जीनिया के प्रख्यात चिकित्सा मनोविज्ञानी एवं एसोसियेशन फॉर रिसर्च एण्ड इनलाइटेनमेण्ट के निदेशक डॉ. हर्बर्ट बी. पेरियर का कहना है कि पवित्र मंत्रों में मानव मन एवं अन्तराल को मथ डालने की आश्चर्यजनक क्षमता है। उन्होंने इसे अन्तर्निहित, प्रसुप्त पड़ी पराशक्तियों के जागरण एवं उन्नयन का शक्तिशाली माध्यम बताया है। मंत्र शक्ति का सही उपयोग किया जा सके तो प्रयोक्ता का संबंध, परमात्म सत्ता एवं उसकी सहायक शक्तियों से हो जाता है। मंत्र की सत्यता उसमें सन्निहित शक्तियों के प्रकटीकरण में सन्निहित है और यह प्रयोक्ता की निर्मलता सुदृढ़ आस्था एवं लक्ष्य की उत्कृष्टता पर निर्भर करता है।
मंत्र जप वस्तुतः एक विशिष्ट अभ्यर्थना है, जो अपनी परिपूर्णता या चरम सीमा पर पहुंचने पर इष्ट को शक्तिशाली चुम्बक की तरह अपने पास खींच बुलाने में ऊर्जा के उच्चस्तरीय रूपांतरण का यह एक सर्वोत्तम साधन है। मंत्र जप के साथ, मंत्रार्थ का, उसमें सन्निहित दिव्य भावों-प्रेरणाओं का ध्यान चमत्कारी सत्परिणाम प्रस्तुत करता है। मंत्रों में गायत्री मंत्र को बड़ा ही महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है। इसमें शब्दों का गुँथन कुछ इस प्रकार हुआ है कि यह शरीर की चक्र-उपत्यिकाओं को आँदोलित-उद्वेलित करके रख देता है। इससे प्रसुप्त क्षमताएँ उभरती-विकसित होती देखी जाती हैं। ब्रह्मवर्चस् की सिद्धि गायत्री मंत्र से ही प्राप्त होती है। यदि भावार्थ से जोड़ते हुए मंत्र शक्ति का सुनियोजन किया जा सके तो वे सभी लाभ उठा पाना संभव है, जिनकी महिमा सामगान में, वेद-उपनिषदों में गाई गई है।
एक दुर्बल व्यक्ति किसी चिकित्सा निष्णात के पास गया और बोला-”मुझे परिपुष्ट कर देने वाला कोई रसायन प्रदान कीजिये। मैं बलवान बनना चाहता हूँ और उसका कितना ही मूल्य चुकाने को तैयार हूँ।”
चिकित्सक ने उसे जुलाब की दवा देदी। पतले दस्त चलने लगे और उसके पेट में जमा विषैली, काली गाँठें निकलने लगी।
कई दिन बाद रोगी अच्छी दवा के विपरीत परेशानियों की शिकायत करने लगा। दस्त आरंभ हो गये, कमजोरी आने लगी
चिकित्सक ने उसे धैर्य दिलाया और कहा-”जब तक शरीर में संचित विषों का निष्काम नहीं हो जाता। तब तक बलवर्धन की कोई दवा कारगर सिद्ध नहीं हो सकती।”
रोगी संतुष्ट होकर चला गया। चिकित्सक का परिशोभ का प्राथमिकता देने वाला उपचार चलता रहा उसके बाद ही उसकी मलवृद्धि की आकाँक्षा अच्छे रहन-सहन भर से ही पुरी हो गई उसके लिए किसी मूल्यवान औषधि खरीदने की आवश्यकता नहीं पड़ी।
आत्मबल की वृद्धि द्वारा चमत्कारी सिद्धियाँ प्राप्त करने से पूर्व भी संयम साधना द्वारा आत्म परिष्कार की विधि व्यवस्था को कार्यान्वित करना पड़ता है।
नीले-भूरे रंग की कुर्सी पर पीठ टिकाए वह गहरे सोच में डूबा था। इसका कारण न तो पारिवारिक जीवन की उलझनें थी। और न व्यक्तिगत जिन्दगी की उधेड़-बुन। क्योंकि उसने स्वयं को पारिवारिक बाड़े और वैयक्तिक महत्वाकांक्षाओं के आकर्षणों से पर्याप्त ऊपर उठा रखा था। फिर भला ऐसी स्थिति में तनाव और परेशानियाँ उसे क्यों कर सताते। चिन्ताओं से दूर चिन्तन में खोए रहने वाले इस व्यक्ति की जीवन संरचना में व्यापक फेर-बदल करने का श्रेय उस पुस्तक को था जो इस समय भी उसके दाएँ हाथ में थमी थी। शायद इसी में सन्निहित किसी सूत्र के भावों ने उसे आत्मचेतना की गहराइयों में उतार दिया हो। आकेतिल दुपेरों द्वारा अनुदित इस किताब को पा उसे ऐसा लगा था जैसे जीवन निधि मिल गई।
तब से आज तक उसने क्षण-क्षण पल-पल का उपयोग इन्हीं विचारों के अनुरूप स्वयं को गढ़ने में किया। सचमुच विचार जब तक बौद्धिक विवेचना का विषय रहते हैं तब तक उनकी प्रभाविकता प्रखरता का ठीक-ठीक अन्दाज नहीं मिलता। किन्तु जैसे ही ये भावों की गहराइयों में उतने, प्रयत्नों से इनका सामंजस्य बैठा तो एक क्रान्ति घटित होती है उस दायरे में जहाँ पर ऐसा हो रहा है। उसके जीवन में कुछ ऐसा ही हुआ था हो रहा था। तभी तो उसने निज अनुभूतियोँ के आधार पर एक पुस्तक ही लिख डाली “विश्व-विचार और प्रयत्न के रूप में”।
उसने हल्के से पैर फैलाए, धीरे से आंखें खोलीं, हाथ की अँगुलियों को माथे पर इस तरह फिराया जैसे वह विचारों का कोई नया स्वर निकाला चाहता हो। धीरे-धीरे उसका मन अन्तः अनुभूतियों के सागा से उबरने लगा था। एक दृष्टि कमरे में घुमाई और हाथ में थमी किताब को धीरे से मेज में रखा। कुर्सी से उठकर कमरे का एक चक्कर लगाया। फिर उसने कैलेंडर की ओर देखा आज छुट्टी थी। इसका मतलब उसे विश्व विद्यालय नहीं जाना। तब....। वे दोनों शायद यहीं आएँ। वह होंठों ही होंठों में बुदबुदाया।
दृष्टि खिड़की की ओर गई। चौखटे से प्रवेश पाकर सूर्य की रश्मियाँ पूरे कमरे को सुनहले रंग में रंग रही थीं। बाहर पीछे वाली सड़क के दोनों ओर चीड़ के वृक्ष लगे थे, जिनके मध्य से गुजरती हुई सड़क थोड़ी ही दूर पर गुम होती प्रतीत होती थी। देखते देखते वह विचारों में डूब गया। द्वार पर कुत्ते की उभरती आवाज ने उसकी सोच को बीच में ही विराम दिया। कौन? इस प्रश्न के साथ उसने चिटकनी खोली।
द्वार खुलते ही प्रश्न का उत्तर उसके ठीक सामने था। ये और कोई नहीं उसी के विद्यार्थी थे अल्बर्ट और फ्रेड्रिक पढ़ने लिखने में मेधावी और अपने प्राध्यापक के व्यक्तित्व के प्रशंसक। किन्तु आज दोनों के चेहरे उखड़े-उखड़े थे। लग रहा था कि वे दोनों किसी विशेष मुद्दे को लेकर परेशान हैं। यों दुनिया में यदि कुछ सबसे अधिक सहज है तो वह है परेशानी। हर कहीं हर किसी को परेशान होता देखा जा सकता है। इतने पर भी परेशान होने वालों के दो वर्ग हैं। पहले में वे लोग आते हैं जिन्हें अपने जीवन की छोटी से छोटी तकलीफ परेशान कर डालती है, दूसरों की बड़ी से बड़ी आपदा से उन्हें तनिक भी लेना देना नहीं रहता। जबकि दूसरे में वे लोग आते हैं जिन्हें औरों की तनिक तकलीफ परेशान कर देती है जबकि अपने पर पड़ने वाली भारी भरकम विपत्ति के समय भी हँसते मुसकराते रहते हैं। इन दोनों का सम्बन्ध दूसरे वर्ग से था। उन्हें यह सूत्र पूर्णतया हृदयंगम हो गया था कि जो औरों की विपत्ति में हिस्सेदार होते हैं उनकी मुसकराहट स्वयं की विपत्ति पर साथ नहीं छोड़ती।
क्या हो गया है तुम्हें? उन्होंने उन दोनों के बैठते ही पूछा। इशारा चेहरे पर छा रहे विषद और आक्रोश के प्रति था। ‘इन दिनों फैल रहे समाचारों ने हम लोगों के मन में एक बवण्डर खड़ा कर दिया है। दूसरे देशों की तरह-तरह की धमकियाँ, अपने देश की आन्तरिक स्थिति पता नहीं क्या होगा? कहकर उसने गहरी उसाँस भरी। देखने में उसकी आयु अभी 23-24 साल होगी। अभी वह अध्ययनरत छात्र था। किन्तु जागरूक मानसिकता उसे विकल किए हुए थी।
ठीक से बताओ फ्रेड्रिक। उन्होंने पूरी दिलचस्पी के साथ पूरी बात जाननी चाही।
सर! देश की कहें या बाहर की। चलो देश की बात पहले लें। यहाँ की राजनीतिक अस्थिरता आप से छुपी नहीं। परस्पर अविश्वास का माहौल इतना घना होता जा रहा है कि पूछो ही मत। इस पर अन्तर्राष्ट्रीय चौधरियों के घड़ियाली दाँव-पेंच। इशारा नैपोलियन की ओर था और सामाजिक जीवन विच्छृंखलता विघटन। कुप्रथाओं स्वार्थों की महामारी से सब कुछ टूट-टूट कर बिखर रहा है। व्यक्ति के रूप में मनुष्य उसका न तो अपने ऊपर विश्वास है और न भविष्य के प्रति कोई आशा। अतीत का गौरव उसे पूरी तरह विस्मृत हो चुका है ऐसी दशा में.... वह आगे कुछ कह न सका। भविष्य की कुकल्पनाओं से होंठ काँप कर रह गए।
समग्रक्रान्ति के बिना कुछ होने का नहीं। अल्बर्ट ने स्थिर भाव से अपनी बात कही।
क्रान्ति! तुम लोग कुछ वैसी क्रान्तियों की बात तो नहीं कर रहे जैसी पिछले समय में कई हो चुकी हैं यदि कुछ वैसी सोच है तो जान लो इस तरह की क्रान्तियाँ मानव की समस्याओं का चिरस्थाई समाधान नहीं कर सकती।
कैसे? दोनों उनके चेहरे की ओर ताकने लगे। उन्हें अपने इस प्राध्यापक से बहुत कुछ आशाएँ थीं।
“क्योंकि इस तरह की क्रान्तियों का उद्देश्य होता है व्यवस्था को बदलना। अधिक से अधिक है सामाजिक प्रणाली में परिवर्तन कर इनकी इतिश्री हो जाती है। कहने के साथ उन्होंने सिर के बालों पर हाथ फिराया। तेज होती जा रही धूप के कारण खिड़की का एक सिरा हल्के से बन्द कर दिया।
“तो बदली व्यवस्था परिवर्तित सामाजिक प्रणाली समस्या का निदान नहीं है”। फ्रेड्रिक ले अटकते हुए पूछा। उसे आश्चर्य। हो रहा था।
नहीं! इससे थोड़ी देर के लिए आराम तो मिलता है। पर रोग का निदान नहीं होता। तुम जाते हो-उन्होंने गहरी दृष्टि से दानों की ओर देखा अब तक सब कुछ न जाने कितनी बार बदला गया इस पर भी परिणाम वही ‘ढाक के तीन पात।’ क्यों....? सिर्फ इसलिए कि मनुष्य नहीं बदला गया उसे बदलने की सोची भी नहीं गई।
पर पर मनुष्य तो।
समय के अनुसार कसके बदलते हुए रूप सामने आए हैं, यही कहना चाहते हो न। तो सुन लो यह बदलता स्वरूप ऊपर से की गई लीपा-पोती है। अन्दर से वह जैसा का तैसा बना रहा। परिस्थितियों की रगड़ से जब-जब यह रंग-रोगन उतरा है उसने पाषाण युगीन करतब ही दिखाए हैं। अब तब के इतिहास ने उसकी बर्बरता, क्रूरता, और सच कहा जाय तो पाशविकता की कहानियाँ ही लिखी हैं। क्रान्तियों के नाम पर नया रंग-रोगन चढ़ाना, क्या यही चाहते हो तुम?
तब फिर। वे सोच नहीं पा रहे थे।
उपाय एक ही है विचारों के द्वारा क्रान्ति। मनुष्य का सर्वांगपूर्ण बदलाव। उसके जीवन के केन्द्र में उथल-पुथल हो। सारी संरचना फिर से गढ़ी जाय। कैसे?
उन्होंने कमरे में टंगे दो चित्रों की ओर इशारा किया एक काण्ट का था, दूसरा महात्मा बुद्ध का। देख रहे हो न इन दोनों महामानवों को एक बुद्धि का प्रतिनिधि है दूसरा भावों का जिसमें ये दोनों एक साथ मिले जो दोनों को एक साथ मिला सके। उसी के द्वारा यह महान कार्य होगा।
“आप के विचार से यह कहाँ से होने की सम्भावना है”?
“सम्भावना नहीं सुनिश्चित तथ्य!” उनके अन्दर का ऋषित्व मुखर हो उठा। “उपनिषदों के देश से उठेगा विचार क्रान्ति का परिवर्तनकारी तूफान।” उनकी आवाज चेतना की अटल गहराइयों से उभर रही थी, “जब भी यह तूफान उठ खड़ा हो तो समझना मनुष्य देवता बनने वाला है और धरती स्वर्ग”।
“आह! कब होगा यह सब?” आगन्तुक भी सुखद कल्पना में खोने लगे।
धैर्य रक्खो बच्चों इस सहस्राब्दी के अन्त तक। तब तक सामयिक दायित्व का निर्वाह करो। उनके इस भविष्य कथन को उद्धृत करते हुए स्वामी विवेकानन्द ने 16 जनवरी 1870 के अपने व्याख्यान में कहा था कि यह भविष्यवाणी जर्मनी के ऋषि शाँपनहावर कर गए हैं शीघ्र ही विश्व विचार जगत में सर्वाधिक शक्तिशाली और दिगन्तव्यापी क्रान्ति का साक्षी होने वाला है।
आज वही क्षण है, यह वही बेला है जब शाँपनहावर की वाणी युगानुरूप प्रयासों के रूप में मूर्त हो रही है। साक्षी हैं हम सब।
कभी-कभी असमंजस होता है परमेश्वर की रीति-नीति को देखकर कि उसने कोटि-कोटि प्राणियों से भरी हुई इस विश्व वसुंधरा में मात्र मनुष्य को ही विशेष प्रकार की समुन्नत स्तर की विभूतियाँ क्यों प्रदान की? जब कि सृष्टि के अन्याय प्राणी उन सुविधाओं से वंचित ही बने रहते हैं। ऐसा लचकदार, हाथ पैरों की असाधारण संरचना वाला, सर्वांग सुन्दर, खड़े होकर चलने वाला ओर अगणित प्रकार के, असाधारण स्तर के कलाकौशल को सम्पन्न करने वाला शरीर और किसका है इसकी खोजबीन करने पर एक ही निष्कर्ष निकलता है कि मनुष्य के अतिरिक्त और कोई जीवधारी इस स्तर का सजा नहीं गया।
काय कलेवर की परत उधेड़ कर कुछ गहराई तक उतरने पर प्रतीत होता है कि मात्र शरीर ही विलक्षण नहीं, वरन् उसकी भीतरी परत में एक विलक्षण स्तर का मनः संस्थान भी है। खोपड़ी की कड़ी चहारदीवारी के भीतर उसका निवास होने से आँखों द्वारा उसे प्रत्यक्ष तो नहीं देखा जा सकता। पर उसकी चिन्तन परक क्षमताओं को देखते हुए प्रतीत होता है कि यह जादुई पिटारे से कम आश्चर्यजनक किसी भी प्रकार है नहीं। कल्पना, विचारणा, निर्धारणा, भाव संवेदना, मान्यता, आस्था जैसी अगणित परतें इस पिटारी के भीतर विद्यमान हैं। यदि वे प्रसुप्त मूर्छित स्थिति में पड़ी रहें तो बात दूसरी है, अन्यथा यदि उन्हें तनिक भी समुन्नत स्तर तक उठने का अवसर मिल जाय, तो मनुष्य अगणित सफलताएँ अर्जित कर सकने वाला सिद्ध पुरुष बन सकता है। यदि कुछ और उभार आ सके, तो उसे ओजस्वी, तेजस्वी, मनस्वी होने में देर न लगे। ज्ञान और विज्ञान से संबंधित उसकी अनेकों विशेषताएँ उभर पड़ें तो मनीषियों दिव्यदर्शियों जैसी उच्चस्तरीय भूमिका निभाते उसे देखा जा सकता है। इंजीनियर, डॉक्टर, आर्कीटेक्ट, योजनाकार, कलाकार स्तर के अनेकों विशेषताओं से सम्पन्न लोग तो मस्तिष्क को तनिक सा विकसित कर लेने भर से बनते देखे जा सकते हैं।
प्रश्न यह है कि ऐसे ही सुविधा सम्पन्न शरीर और मस्तिष्क अन्यान्य प्राणियों को क्यों नहीं मिले? यदि स्रष्टा और समदर्शी और न्यायनिष्ठ कहा जाता है तो उसने ऐसी अनीति क्यों बरती कि एक ही प्राणी को सृष्टि का मुकुटमणि बन सकने जैसी सुविधा प्रदान कर दी और अन्य सभी को अनपढ़ स्थिति में समय गुजारने जैसे तुच्छ स्तर के कलेवर देकर बहका कर भगा दिया गया।
मोटी दृष्टि से विचार करने वाले नास्तिक विचारधारा के लोगों का कहना है कि ऐसे अनेकों प्रश्न उठ खड़े होते हैं, जिनके कारण स्रष्टा में इतनी भर न्याय निष्ठा नहीं दीख पड़ती जितनी कि सामान्य लोगों में अपनी संतानों के बीच एक बड़ी सीमा तक निष्पक्षता के रूप में देखी जाती है। नैतिकता-नीति निष्ठा गँवा बैठने पर तो कोई सत्ता ऐसी नहीं रह जाती, जिसके प्रति निष्ठा उपजे, जिसकी भक्ति करने के लिए विचार बने जिसकी पूजा अभ्यर्थना करने के लिए अन्तःकरण हुलसित हो। वे कहते हैं कि समर्थता ही तो सब कुछ नहीं है अतीव शक्तिसम्पन्न महादैत्यों तक के नमन-वंदन के लिए जब उनका प्रचण्ड दमन सामने रहने पर भी मनुष्यता ने सिर नहीं झुकाया तो फिर ईश्वर का सर्वशक्तिमान होना भी वह निमित्त कारण नहीं बन सकता। जिसके लिए उसे उपास्य या आराध्य ठहराया जा सके। मनुष्य का अपना भी तो विवेक है। उसने स्वयं भले ही अनीति बरती हो, पर समर्थों का अन्याय तो उसने कठिन, प्रबल विरोध किए बिना छोड़ा नहीं है। फिर ईश्वर ही तर्कों के इस आक्रोश से क्यों कर बच सकेगा?
बात यहीं तक सीमित नहीं है। जीवधारियों का पक्ष लेने वाले तथा मनुष्य को मिले अधिकारों को चुनौती देने वाले तो यह कहते हैं कि जो मनुष्य अतिरिक्त रूप से उत्पन्न हुई विभूतियों का पग-पग पर दुरुपयोग करने के लिए उतारू रहता है छल, प्रपंच, अनाचार, शोषण उत्पीड़न जैसे कुकर्मी का ताना-बाना बुनता रहता है, उसी को भगवान ने यह छूट कैसे दे दी कि जिस प्रकार अन्यान्यों को बहका फुसला कर अपना उल्लू सीधा करता रहता है, वही कुचक्र पूजा पाठ का रूप बनाकर ईश्वर को भी वशवर्ती बना सकता है और उससे वैसे ही लाभ वरदान रूप में पा सकता है जैसे कि पालतू पशुओं को बन्धनों से जकड़ कर मन चाहा लाभ उठाया जाता है। ईश्वर इतना भोला कैसे बन गया? उपासना कराने की ऐसी क्या ललक उस पर चढ़ दौड़ी कि वह चाटुकारों की मनुहार के पीछे छद्म को नहीं समझ सका।
यों ये आक्षेप कम वजनदार नहीं हैं। यदि धर्मराज की अदालत में ईश्वर पर दो मुकदमें चलाये जा सकें तो व्यवस्था का दावेदार बनने वाले ईश्वर पर उपरोक्त दोनों ही अभियोगों द्वारा तर्क और तथ्य को आधार बनाने वाला वकील इस प्रकार इल्जाम सिद्ध कर सकता है कि अभियोग की यथार्थता सिद्ध हो सके और भगवान को अभियुक्तों के कटघरे में खड़ा होना पड़े। इस पूरे प्रकरण का किसी नास्तिक की बकवास कहकर टाला भी तो नहीं जा सकता।
इन आरोपों का जवाब देना ईश्वर का नहीं, इसकी सत्ता का प्रतिपादन करने वालों का कर्तव्य है। ईश्वर की सच्ची परिभाषा जिसने समझी होगी, वह इसका वकील सही अर्थों में बनकर यह मुकदमा लड़ सकता है। ईश्वर सत्प्रवृत्तियों का नाम है। ईश्वर अनुशासन का, विधि-व्यवस्था का नीतिमत्ता का, सुव्यवस्था का नाम है। वह निराकार रूप में कहीं है तो इसी रूप में विद्यमान है। मनुष्य को उसने बुद्धि तो दी पर नर पशु का नर पामर का अथवा देवमानव का, ऋषि का जीवन जीने की स्थिति का चयन करने की स्वतंत्रता भी दे दी। यह मनुष्य की विवेक बुद्धि पर निर्भर है कि वह किस मार्ग का अवलम्बन करता है।
अन्यान्य प्राणियों में चेतना है, अतीन्द्रिय क्षमता है, इस्टींक्ट्स हैं, साथ ही भावनाएँ भी। यदि उन्हें मनुष्य की तरह बुद्धि मिलती तो वे भी कुटिलता के षड़यंत्रों के शिकार हो कर एक दूसरे के लिए दूरभिसन्धियाँ रच रहे होते। इस प्रकार प्राणियों में भी मानवी सद्गुण हैं एवं मानव में भी पाशविकता के सभी लक्षण। जो भी उस सृजेता द्वारा प्रदत्त विभूतियों का सुनियोजन करता है, वह आत्मिक प्रगति का पथ प्रशस्त करता चला जाता है एवं जो दुरुपयोग करता है वह पतन के गर्त में चला जाता है।
निष्ठुरता-सहृदयता, दुर्बुद्धि-सद्बुद्धि -सद्विवेक, दुष्कर्म सभी अपने चयन पर निर्भर हैं। इस तरह दोषी ईश्वर नहीं उसकी वह कृति है जो मनचाहा दुरुपयोग करने की उच्छृंखलता बरतने लगती है। पात्रता का ध्यान किये बिना उपासना का ढोंग रचकर उपहासास्पद विडम्बना रचती है। मुकदमा ईश्वर पर नहीं मनुष्य पर चलाया जाना चाहिए जिसने अपने हाथों इस विश्व उद्यान को सुरम्य बनाने के स्थान पर भग्नावशेषों में बदल डाला है। जिस दिन यह मर्म समझ में आजाएगा व्यक्ति मनःस्थिति बदलकर सही अध्यात्म पर चलने का मार्ग सीख जाएगा। फिर वह परिस्थितियों पर दोष न मढ़कर अपने चिन्तन को बदलने का कला को जीवन में स्थान देगा।
एक अवसर पर प्लेटो से उनके शिष्यों ने कहा, “आलोचक आपके खिलाफ बहुत बुरी-बुरी बातें कर रहे हैं। किसी तरह उनका मुँह बन्द करना चाहिए” प्लेटो ने उत्तर दिया - “ नहीं उनका मुँह बन्द करने की आवश्यकता नहीं है। उन्हें बोलने दीजिए, लेकिन मैं ऐसा जीवन जीऊँगा कि कोई भी उन आलोचकों की बातों पर विश्वास ही नहीं करेगा।”
“यह है अपना भग्न भारत।” उनमें से एक ने अपने बीच खड़े व्यक्ति से खण्डहरों की ओर इशारा करते हुए सम्मानजनक किन्तु क्षुब्ध स्वर में कहा। इन सभी नवयुवकों पर उनके व्यक्तित्व ने गहरा असर डाला था। अभी थोड़े ही दिन पहले इनका मद्रास आना हुआ। पता नहीं कैसे इन सब को उनका पता चल गया। फिर क्या! जैसे-तैसे करके उन्हें राजी कर लिया अपनी “त्रिपलीकेन साहित्य सभा” में उद्बोधन देने मार्गदर्शन करने हेतु। उनके द्वारा दिए गए उद्बोधन का प्रत्येक शब्द सुनने वालों के दिलों में गहरे अतरता चला गया। सभी हतप्रभ थे नवयुवक ही नहीं मद्रास के गणमान्य नागरिक भी जिसने सुना वही। कारण कि सामाजिक, साँस्कृतिक, नैतिक, आध्यात्मिक विधियों की इतनी सारगर्भित सरल और हृदयस्पर्शी विवेचनाएँ और कहाँ सुनने को मिलतीं। संस्कृत अँग्रेजी की मिली-जुली काव्यात्मक भाषा सुनकर सभी अकल्पनीय मनोदशा में तैरने लगे।
उस दिन से आज तक ये सभी उनके साथ थे। सभी के दिलों में एक गहरी टीस थी, दर्द की अनुभूति थी देश जाति के प्रति। सब के मनों की साध थी-खोया सौंदर्य वापस लाने की। पर कैसे? इन सब की दशा महासागर में डोल रही नाव में बैठे उन यात्रियों की भाँति थी जो जाना तो चाहते थे गन्तव्य का भी पता था पर मार्ग और केक्ट के अभावों की बेचैनी इनके अन्तर को मथ रही थी। इन्हें पाकर सभी यह महसूस कर रहे थे यही वह खिवैया है जिसकी चिरअतीत से तलाश थी। उन्हें लेकर आज ये सब महाबलीपुरम आए थे। एक ओर थे चोल और पाण्ड्य नरेशों द्वारा विनिर्मित वास्तुकला के अनोखे नमूने। जो सागर के थपेड़े, इतिहास के झटके खाकर जराजीर्ण हो रहे थे। दूसरी ओर था महासागर जिसके गर्भ से सूर्य उदय हो रहा था ठीक मानव जाति के सौभाग्य सूर्य जैसा। रश्मियों से जल राशि स्वर्णिम हो उठी थी। अपने इन स्वर्णिम जलकणों को सागर लहरों की अंजलि बना इन देव पुरुषों के चरणों में अर्पित कर कृतार्थ हो रहा था।
वह निर्निमेष दृष्टि से उस ओर ताक रहे थे जिसकी ओर उसने इंगित किया था। एक क्षण के पश्चात् पलकें नीचे झुकाई एवम् उसके कंधे पर हाथ रखते हुए बोले-”आलसिंगा निराश मत हो एक दिन इसी भग्नता के अन्दर से वह सौंदर्य प्रकट होगा कि जिससे विश्व की आंखें चौंधिया जाएँगी। वर्तमान दशा के कारण देश की साँस्कृतिक विरासत पर कटाक्ष और व्यंग करने वाला जनसमूह भविष्य के रुपहले-सुनहले रूप को देख दाँतों तले अँगुली दबा लेगा।” सिर पर पगड़ी बाँधे माथे पर वैष्णव तिलक लगाए अपने कलेवर को धोती-कुर्ते में समेटे वह उनकी ओर आंखें फाड़े आश्चर्य से देखने लगा। प्रायः सभी की यही दशा थी और वह गठा हुआ सुदृढ़ गौर शरीर, मुसकान को सर्वदा सँजोए रखने वाला मुख मण्डल अधख्ली स्वप्निल दीर्घ आंखें, जो बाहर की अपेक्षा अन्दर की ओर देखती हुई प्रतीत होती थी गैरिंक वसनों में ऐसे लग रहे थे जैसे अग्नि शिखाओं का परिधान पहने भारत का गौरव स्वयं आखड़ा हुआ हो।
एक इशारे से उन्होंने सभी को और नजदीक बुलाया और सबके साथ पास पड़ी पाषाण शिक्षा पर बैठ गए। “स्वामी जी! एक अन्य नवयुवक प्रस्तर खण्ड पर बैठते हुए कह रहा था-मैं अपनी बातों पर अविश्वास तो नहीं करता आप भला निराधार बात कहेंगे भी क्यों? फिर भी मेरे मन में सन्देह है?
“निःसंकोच कहो बंधु “। उन्होंने इस साँवले तरुण की आंखों में देखते हुए कहा।
कौन करेगा यह सब? कैसे होगा यह? उस दिन की बात याद है न आपको जब आपने “हिन्दू” में प्रकाशित समाचार को पढ़ते हुए.....। “वही समाचार न जिसमें कि बताया गया था कि कलकत्ता में भाषण देते समय एक मिशनरी महिला ने हजारों शिक्षित युवकों के सामने हिन्दूधर्म को ठोस अनैतिकता और पागलपन बतलाया था। सुनकर सभी ने सिर तो झुका लिया पर किसी के मुख से चूँ तक न निकली।
हाँ हाँ वही!
और मैंने इन्हें चूहा कहा था जो दूसरों की घुड़की पर बिल में दुबके रहते हैं जबकि अपनों की जीवन सम्पदा को कुतरने नष्ट करने में इन्हें मजा आता है। यही कहना चाहते थे न। तो क्या अब यही चूहे....। अविश्वास की मुद्रा में उसने देखा।
“शान्त हो सुनो!” इन शब्दों ने जादू का सा असर डाला। सब मौन हो उनकी वाणी की प्रतीक्षा करने लगे। उन्होंने अपनी अधखुली आँखों को पसार कर एक गहरी दृष्टि सब पर डाली। आँखों से निकलती नीली लहरें सभी को एक अनजाने प्रदेश की ओर ले जाने लगीं। “आज मैं तुम सबके सामने एक रहस्य उद्घाटित करता हूँ। यह रहस्य जिसे मेरे गुरु ने मुझे दिया था। वह रहस्य!! जो कठोर साधनाओं के द्वारा मेरे अन्तराल में उतरा है। वह रहस्य!!! जिसे हिमालय की ऋषि सत्ताओं ने मेरे सामने उद्घाटित किया है।”
सभी के मन एकाकार हो रहे थे हृदयों में जिज्ञासा की दीपशिखा प्रकाशित हो चुकी थी। एक शाँति थी, अचंचल नीरवता महासागर भी इसका सहभागी बनने लगा था। शायद वह भी इस रहस्य को आत्मसात् करने का इच्छुक हो उठा था। रहस्य! प्रकृति के गूढ़ गर्भ का अनमोल रत्न! सूक्ष्म चेतना की हलचलों का प्रकटी करण!
“वर्तमान युग समाप्त होने को है। इसके स्थान पर सत्य युग पुनः प्रतिष्ठित होगा। विश्व की प्राण शक्ति अकुला कर जाग रही है। विश्व कुण्डलिनों के इस जागरण का केन्द्र बनेगा भारत। ऋषियों की चिर पुरातन गौरव भूमि पुनः जगत गुरु का मुकुट पहनेगी।” आवाज किन्हीं अतल गहराइयों से उभर रही थी। वह वैश्व चेतना से एक हो बोल रहे थे। निस्तब्धता स्वरों को धारण कर रही थी।
वह कह रहे थे “नवयुग का निर्माण व्यक्ति जाति प्रशासन, जनसमूह की नहीं स्वयं ईश्वर की योजना है। उसी सृजेता का संकल्प है यह जिसके संकेत मात्र से निहारिकाओं की सृष्टि होती, सैकड़ों लाखों, करोड़ों ब्रह्मांडों को उदय अस्त, होता है। अनेकानेक सृष्टि संरचनाएं अभ्युदय और विस्तार पाती हैं। उसकी योजना के प्रायः अन्तिम चरण में उपयुक्त समय पर एक शक्तिपुँज महामानव बन जाएँगे।”
शब्द सभी की रगों में लहू के साथ दौड़ने लगे थे। रोमाँच का अनुभव होने लगा। सबको उनकी वाणी गतिशील थी “जब कभी कोई महापुरुष आता है, तो परिस्थितियाँ पहले से उसके पैरों के नीचे तैयार रहती हैं। वह ऊँट की पीठ को तोड़ देने वाले बोझ का अन्तिम तृण साबित होगा। हम उसके लिए भूमि तैयार कर रहे हैं।”
“नवयुग का निर्माण ईश्वर की योजना” है हमें उसके लिए भूमि तैयार करना है मेरे बच्चों!” सभी जैसे सोते से जगे। चेतना के अतल सागर से सभी के मन एक-एक करे उबरने लगे। थोड़े क्षण सभी मूक हो गए।
भूमि की तैयारी? पर किस तरह? कई कण्ठों से आतुर वाणी निकली।
“यह एक दिन का काम नहीं, एक शताब्दी में यह होगा। रास्ता भी कंटकों से आकीर्ण है। परन्तु पार्थ सारथी हमारे भी सारथी होने के लिए तैयार हैं। उनका नाम लेकर और उन पर अनन्त विश्वास रखकर भारत के युगों से संचित पर्वतकाय अनन्त दुःख राशि में आग लगा दो। हम लोग साधनहीन भले दिखें तो भी हम अमृत पुत्र और ईश्वर की सन्तान हैं। विश्वास सहानुभूति दृढ़ विश्वास और ज्वलंत सहानुभूति चाहिए। जीवन तुच्छ है, मरण भी तुच्छ है। आगे कूच करो- प्रभु ही हमारे सेना नायक हैं। उनकी योजना वे ही पूरा करेंगे। किन्तु हमें निमित्त मात्र बनने में कोई कोर कसर नहीं उठा रखनी है।”
युवकों के चेहरे पर उल्लास और विश्वास की रेखाएँ उभर उठीं। सभी की अंतर्चेतना भविष्य की उज्ज्वल झलक पा पुलकित हो उठी थी। ईश्वरीय योजना की इस पृष्ठभूमि के निर्माता गैरिक बसन से आवेष्ठित महाकाल के अग्रदूत थे विवेकानन्द। उनके द्वारा निर्देशित पल अब इस संधि बेला में आ पहूँवे हैं। योजना का अन्तिम चरण कारण और सूक्ष्म की गहराइयों से उबर कर प्रत्यक्ष हो रहा है। साथ ही हर ओर से एक ही ध्वनि गुँजित हो रही है- “निमित्त मात्र भव्य सव्यसाचिन”। जाग्रत सुसंस्कारित इसे सुनकर भग्न देश की सँवारेंगे नया जमाना लायेंगे।
भावनाओं में सर्वोपरि गणना प्रेम भाव की होती है। इसी के इर्दगिर्द दिव्य सम्वेदनाओं का सारा परिकर जुड़ा होता है। यह मानवी अन्तरात्मा का रस है, जिसे भक्तियोग की साधना प्रक्रिया द्वारा विकसित किया और दया, करुणा, मैत्री, उदारता, सेवा, सज्जनता, सहृदयता, आदि अन्तःकरण की दिव्य विशेषताओं के साथ विस्तृत एवं परिपुष्ट किया जाता है। यह जहाँ से अद्भुत होता है, वहाँ ऐसी उल्लासभरी किसी पदार्थ से नहीं की जा सकती। प्रेम को अलौकिक रस के नाम से भी सम्बोधित किया जाता है। इस निर्झर का जल जो भी पीता है, असीम तृप्ति अनुभव करता है। प्रेमी अन्तःकरण अपने से सम्बद्ध व्यक्तियों को अतिशय बल प्रदान करता है। वातावरण को परिष्कृत कर सकना भी इस भक्ति भावना के विकास विस्तार से संभव हो जाता है।
अन्न शरीर का आहार है, ज्ञान मस्तिष्क का। अन्तरात्मा की भूख प्रेम से बुझती है। अन्तराल को पोषण उसी सघन आत्मियता से मिलता है जिसे सामान्य व्यवहार में प्रेम और अध्यात्म की भाषा में ‘भक्ति कहते हैं। भक्ति के सम्वर्धन का अभ्यास ईश्वर उपासना के माध्यम से किया जाता है, पर वह इतने तक ही सीमित नहीं रहता। व्यायामशाला में शरीर को परिपुष्ट बनाया जाता है, पर उस पुष्ट शरीर का उपयोग व्यायामशाला तक सीमित न रहकर विभिन्न प्रयोजनों के लिए होता है। जिस तालाब में तैरना सीखते हैं, उसी में आजीवन तैरा जाय, अन्य कहीं उस कला का उपयोग न हो, ऐसा कहाँ होता है? ईश्वर भक्ति की साधना से परिष्कृत अंतःचेतना को अपनी सघन आत्मीयता एवं सहृदयता का परिचय पग-पग पर देना होता है। इससे प्रेमी तो धन्य होता ही है, प्रेम पात्र को भी अति महत्वपूर्ण लाभ होता है। गंगा तो स्वयं पवित्र होती है उसमें स्नान करने वाले भी पवित्र बनने लगते हैं।
प्रेम मानवी अन्तरात्मा की भूख है। इसका नियमित अभ्यास करने के लिए ही मित्र, प्रियजनों का परिवार बसाया, बढ़ाया जाता है। प्रेम का आदान-प्रदान दोनों के ही पक्षों के कारण शरीर को बल प्रदान करता है। जहाँ प्रेम का आदान-प्रदान न हो सका, वहाँ भौतिक सुख साधनों का बाहुल्य होते हुए भी किसी को तृप्ति न मिल सकेगी। इस अभाव के कारण अंतस्तल तृषित और मूर्छित ही बना रहता है।
संसार में कई छोटे बच्चे ऐसे मिल जायेंगे, जिनमें बाल्यकाल से ही विध्वंसात्मक प्रवृत्तियों का विकास आयु के अनुपात से कई गुना अधिक देखने को मिल जायगा। पिछले दिनों न्यूयार्क के मूर्धन्य चिकित्सा विज्ञानी डॉ. रंनीस्पिट्ज ने इस संदर्भ में गहन अनुसंधान किया और ऐसे बच्चों की पारिवारिक परिस्थितियों कि जानकारी प्राप्त की। पाया गया कि उनमें 99 प्रतिशत ऐसे थे, जिन्हें अपने जन्मदाताओं का विशेषकर माता का स्नेह-दुलार नहीं मिला था या तो उनकी माँ का देहावसान हो चुका था या सामाजिक परिस्थितियों ने उन्हें अपनी माँ से अलग कर दिया था।
इस आरंभिक अन्वेषण ने डॉ. रेनीस्पिट्ज से प्रेम भावना के वैज्ञानिक विश्लेषण की प्रेरणा भर दी। उन्होंने दो भिन्न सुविधाओं वाले संस्थानों की स्थापना की। एक में उन बच्चों को रखा गया, जिनमें उन्हें माँ का भरपूर वात्सल्य और दुलार प्राप्त होता था। वे जब भी चाहें, जब भी माँ को पुकारे, उन्हें अविलम्ब वह स्नेह सुलभ किया जाता था। दूसरी में उन बच्चों को रखा गया था, जिनके लिए बढ़िया से बढ़िया भोजन वस्त्र, आवास, चिकित्सा, क्रीड़ा के बहुमूल्य साधन उपस्थित किये गये थे, पर मातृप्रेम का अभाव था। माताओं के स्थान पर उन्हें संरक्षिका भी मिली थी, जो अकेले ही बारह बच्चों का नियंत्रण करती थी। प्रेम और दुलार और वह भी वह अकेली नर्स इतने सारे बच्चों को कहाँ से पाती? हाँ कभी-कभी झिड़कियाँ उन बच्चों को पिला देती। उन बच्चों का यही था जीवनक्रम। किया गया। उनकी कल्पना शक्ति की मनोवैज्ञानिक जाँच, शारीरिक विकास की माप, सामाजिकता के संस्कार, बुद्धि चातुर्य और स्मरण शक्ति का परीक्षण किया गया।
जिस प्रकार दोनों संस्थानों की परिस्थितियों में पूर्ण विपरीतता थी, परिणाम भी एक-दूसरे से ठीक उलटे थे। जिन बच्चों को साधारण आहार दिया गया था, जिनके लिए खेलकूद, रहन-सहन के साधन भी उतने अच्छे नहीं दिये गये थे, किन्तु जन्मदात्रियों का प्रेम प्रचुर मात्रा में मिला था, माया गया कि उन बच्चों की कल्पना शक्ति, स्मृति, सामाजिक संबंधों के संस्कार शारीरिक और बौद्धिक क्षमता का विकास 101.5 से बढ़कर एक वर्ष में 105 विकास दर बढ़ गया था। दूसरे संस्थान के बच्चों की, जिन्हें भौतिक सुख-सुविधाओं की तो भरमार थी, पर प्यार के स्थान पर गहन शून्यता मिली थी, उनकी विकास दर 124 से घट कर 62 रह गई थी। इन बच्चों को उसी अवस्था में एक वर्ष तक और रखा गया तो पाया गया कि वह औसत 62 से भी घटकर बहुत ही आश्चर्यजनक बिन्दु 42 तक उतर आया है।
पहली संस्था के बच्चों के शारीरिक विकास के साथ दीर्घ जीवन में भी वृद्धि हुई, क्योंकि देखा गया कि उस संस्थान में जो 236 बच्चे रखे गये थे, उनमें से इन दो वर्षों की अवधि में एक भी शिशु की मृत्यु नहीं हुई, जबकि प्यार-विहीन बच्चों वाले संस्थान के 36 प्रतिशत शिशु असमय ही काल के मुख में समा गये।
क्वींस यूनिवर्सिटी आन्टोरियो -कनाडा के वैज्ञानिकों प्रेम का प्राणियों पर पड़ने वाले भौतिक प्रभाव नामक विषय पर गंभीरतापूर्वक अध्ययन किया है। इस विश्वविद्यालय के फार्माकोलाँज के विभागाध्यक्ष डॉ. एल्डन वायड के अनुसार सक्त अनुसंधान का कार्य एक महिला कर्मचारी को सौंपा गया, जिसे स्वयं जीवधारियों से, विशेषतया चूहों से बहुत प्यार था। वह उन्हें दुलार भरी दृष्टि से देखती, उनकी सुविधाओं का ख्याल रखती और यथा संभव अपने व्यवहार में प्रेम प्रदर्शन भी करती। इसका प्रभाव चूहों पर आश्चर्यजनक हुआ। वह उसके साथ घनिष्ठता से जुड़ गये। जैसे ही महिला पिंजड़े के पास जाती, चूहे उसके पास इकट्ठा हो जाते और उसे एकटक देखते रहते। जो भी वह तरह-तरह की औषधि मिली रहने से वह भोजन उनकी रुचि और प्रकृति के प्रतिकूल पड़ता था। कई बार जानबूझ कर कष्टकर औषधियां भी उन्हें खिलाई गई जिन्हें जानते अनुभव करते हुए भी चूहे उस महिला द्वारा खिलाये जाने पर इस प्रयोग के लिए खुशी-खुशी उसका सहयोग करते।
इसी तरह उन पर कई बार विषैली दवाओं का भी प्रयोग किया गया। देखा गया कि एक ही प्रकार की दवा का प्रभाव दो महिलाओं द्वारा चूहों के दो अलग-अलग ग्रुपों पर करने पर भिन्न परिणाम सामने आये। उक्त प्रेम भावनायुक्त महिला के हाथ से दवा खाने पर 20 प्रतिशत चूहे मरे जबकि उसी दवा को उतनी ही मात्रा में दूसरी महिला ने खिलाया तो 80 प्रतिशत चूहे मर गये। प्रेम सर्वाधिक प्रभावी अमृत संजीवनी रस है, जिसको पीकर अशक्तों एवं मृत्यु की कगार पर पहुँचे हुओं को भी स्वस्थ, सबल और प्राणवान बनते देख गया है। डॉ. फ्रीट्स टालबोट ने अपने जर्मनी प्रवास के समय वहाँ कार्यरत एक वृद्ध नर्स को देखा। उसका वर्णन करते हुए वे लिखते हैं कि यद्यपि देखने में वह वृद्ध कोई आकर्षक भी नहीं थी फिर भी जितनी बार उसकी ओर देखा उसकी मुखाकृति में एक विलक्षण शाँतिप्रद सौम्यता और मुस्कान दिखी। हर समय उसकी बगल में कोई न कोई बच्चा दबा हुआ होता। टालबोट के मन में उस स्त्री को देखकर उसे जानने की अनायास जिज्ञासा उत्पन्न हो गई उन्होंने अस्पताल के डायरेक्टर से उसका परिचय पूछा तो डायरेक्टर ने बताया कि यह तो अन्ना है, डॉक्टरों की भी डॉक्टर। एक ही औषधि है उसके पास जिसका नाम है ‘प्रेम’। जिन बच्चों को हम असाध्य रोगी घोषित कर देते हैं, अन्ना उन्हें भी प्रेम रस पिलाकर अच्छा कर देती है।
निश्चय ही प्रेम वह निर्झर स्रोत है, जिसकी सृजनात्मक धारा ऊसर, बंजर एवं मरुभूमि को आप्लावित करके उसे भी उर्वर बना हरीतिमा से लहलहा देती है। इस अमृत रस को पीकर सूखे, सूने एवं र्भन हृदय में भी जीवन संचार हो उठता है। मानव समुदाय को आज इसी निश्चल प्रेमभाव को विकसित एवं वितरित करने की आवश्यकता है। अपनत्व का, प्रेम भाव का विस्तार ही सच्चा अध्यात्म है।
पता नहीं कब से दोनों हाथों से सिर थामे वह उकड़ूं बैठा था। चेहरे पर विवशता की रेखाएँ विपन्नता का दैन्य, अन्तर की हताशा-निराशा के भाव एक साथ उभर उठे थे। करे भी क्या? मन ही मन बड़बड़ उठा।वही चाक है, वही साँचे, मिट्टी भी वही, हाथ भी पुराने फिर क्या हो गया? पता नहीं क्या? बुदबुदाते हुए उसने एक वितृष्णा भरी दृष्टि चाक, अधसनी मिट्टी, मटमैले हो रहे सांचों, अधबने, अधरँगे खिलौनों पर डाली। दृष्टि निक्षेप के साथ मानो ये सभी भी विवश हो उसकी ओर निहारने लगे।
इसी बीच आया गोशालक। न जाने क्या उलटी सीधी पट्टी पढ़ाई उसने सब कुछ चौपट हो गया। अब काम धाम में मन ही नहीं लगता। सब भाग्य का खेल है नहीं तो क्या इस तरह सब बिगड़ जाता। घाटे पर घाटा एक के बाद एक नुकसान हद होती है।जब किस्मत ही खराब है तो हो भी क्या सकता है। सोचते-सोचते उसने कपाल ठोक लिया।
अरे! आज सुबह ही सुबह बड़े परेशान लग रहे हो। क्या सोचने लगे सकडाल भाई। अपने घर से बाहर निकल रहे पड़ोसी ने उसकी दीन-दशा का कारण जानना चाहा।
कुछ नहीं भाई किस्मत के फेरे हैं। निराशा भरे स्वर फूटे। अपने नगर के बड़े वाले प्राँगण में एक सन्त आने वाले हैं चलोगे, “क्या होगा चल कर सन्त हो चाहे कोई किस्मत बदलने से तो रही”। “बस वही किस्मत भाग्य एक ही रटन।” “चलो भी! तनिक मन ही बहल जाएगा।”
“तुम्हारी स्थिति अच्छी है तभी तुम ऐसी बातें करते हो, खराब होती तब पता चलता। खैर सब समय का चक्कर है। उसके स्वर में वेदना छलछला रही थी। पड़ोसी ने सहानुभूति के स्वरों में कहा-परेशान न हो सकडाल सन्त के पास चलकर देखो वे किस्मत भी बदल सकते हैं। कम से कम चलने से तो न इनकार करो।”
आग्रह और अनुरोध को वह ठुकरा न सका। कन्धे पर अंगोछा डाल कर चलने को तैयार ही हुआ था, तभी उसने देखा सड़क पर दूर से आता श्वेत-वस्त्र धारियों का जुलूस। धीरे-धीरे जुलूस को समीप आते देख पड़ोसी बोल उठा लगता वही हैं। “वही” तब तो लगता है मेरा भाग्य चेत गया। वह उनके तेजोदीप्त चेहरे की ओर देखता हुआ अपने मानसिक द्वंद्व में झाल रहा था। एक मन तो हो रहा था कि उनके चरण पकड़ ले, दूसरा कह रहा था क्या होगा इससे? सब कुछ भाग्य के ही आधीन है।
क्या करूं क्या न करूं के द्वंद्व में नाचते हुए उसे आश्चर्य तो तब हुआ जब वह उसके समीप रुक गया। रुके ही नहीं पूद भी बैठे इतने सुन्दर खिलौने इतने बढ़िया बर्तन कौन बनाता है इन्हें? इशारा पड़ोसी की ओर था।
पड़ोसी ने उसकी ओर देखते हुए कहा ये सभी सकडाल भाई की कलाकृतियाँ हैं। प्रभु।
अच्छा। उन्होंने तनिक आश्चर्य से उसकी ओर देखा।
इसमें क्या-सब संयोग-वश होता है महाराज! जब संयोग मिल जाते हैं तब ऐसा हो जाता है।
उनने फिर पूछा अगर तुम्हारे इन खिलौने और बर्तनों को कोई फोड़ दे तो?”
अब की बार वह तमक गया-फोड़ेगा कैसे, इससे मेरा नुकसान जो होता है?” अच्छा ठीक है और जी कोई अत्याचारी तुम्हारी पत्नी का शीलभंग करे तो........?” उनने पूछा।
“कौन माई का लाल है जो मेरे रहते मेरी पत्नी की ओर आँख उठा कर भी देखे” अब की बार सकडाल उबल पड़ा। पर उसका क्या दोष? जो होता है वह तो सब नियति के वश ही होता है।” उनका इतना कहना था कि सकडाल की आंखें फटी की फटी रह गई। उसे भान हुआ वह कैसी गलत मान्यता अब तक बनाए हुए था। तब उनने कहा “पुत्र! भाग्य का बीज पुरुषार्थ है ठीक इस आम की गुठली की तरह। गुठली जब अपने को गलाती है ‘कष्ट’ मिट्टी का दबाव सभी कुछ सहती तब वृक्ष जन्म लेता है जो समय पाकर फूलों फलों से लद जाता है” इशारा पास खड़े आम के फलदार पेड़ की ओर था। भाग्य और कुछ नहीं परिपक्व पुरुषार्थ है। मैं जानता हूँ तुम भाग्य का सृजन करो।” कहकर जैनधर्म के आदि प्रवर्तक भगवान महावीर वहाँ से चल दिये। एक थके हारे निराश व्यक्ति को जीवन का कायाकल्प का संदेश सुनाकर यही तो संतों की अवतारों की कार्यशैली रही है।
‘ऐसा कौन सका जादू आपके पास है, जिसके बल पर प्रत्येक रचना जीवन्त सृष्टि हो जाती है। पात्र मुखर हो समाज का दर्द बयान करते हैं और पाठक एक स्थाई कसक अनुभव किये बिना नहीं रहता।” शब्दों के माध्यम से कहने वाले की स्वानुभूति टपक रही थी। वह अपनी पत्नी राधारानी के साथ उनके बगल में चल रहा था। रात्रि के ग्यारह बज जाने के कारण सड़क सूनी हो गई थी। कभी-कभार उन्हीं जैसा कोई इक्का दुक्का दिखाई पड़ जाता। बातों के कारण रास्ते की बोरियत दूर भाग रही थी। तीनों नपे तुले कदमों से अपने गन्तव्य की ओर बढ़ रहे थे।
“यह ठीक कह रहे हैं भाई साहब। पत्नी ने पति के कथन का समर्थन करते हुए अपनी दृष्टि ऊपर उठाई। कृष्ण पक्ष की द्वादशी होने के कारण चन्द्रमा अभी नहीं उगा था। आसमान की काली चादर में असंख्यों सितारे टंक चुके थे। “देवदास का देवा हो या पाथेर दावी के डॉ. साहब और भाती अथवा शुभदा-परिणिता के पात्र हों संसार में मनुष्य के कर्तव्य को समझाए बिना नहीं रहते। इन भावों की गहरी अनुभूतियाँ मस्तिष्क के विचारों द्वारा किया गया जीवन का विश्लेषण हम जैसे अल्प शिक्षितों को जीवन की राह पर अँगुली पकड़ कर चलाए बिना नहीं रहता।”
बातें करते-करते वे लोग मण्डतिया रोड के एक मोड़ पर आ पहुँचे थे। पहुँच कर उन्होंने देखा तीन-चार लोग एक वृक्ष के नीचे जोर-जोर से बातें कर रहे हैं। उन व्यक्तियों की बातें इन लोगों के कानों तक भी पहुँची सुनकर से ठिठक। साथी भी रुक गये। तभी वृक्ष के नीचे खड़े व्यक्तियों में से किसी एक ने कहा महोदय! जरा सुनिए तो।
तीनों उधर चल दिए। जाकर देखा लाल कपड़े में लिपटा एक नवजात शिशु पड़ा है। कहना न होगा पथभ्रष्ट यौनाचार के ही परिणाम स्वरूप कोई युवती अपने मातृत्व का गला घोट कर यह दुष्कृत्य कर गई थी। उनने सद्योजात उस शिशु को देखा तो उसके शरीर पर चींटियां रेंग रही थी और उनके काटने से उसकी देह में स्थान-स्थान पर लाल रंग चढ़ गया था। ऐसी स्थिति में वह घर कैसे जाते। उपस्थित अन्य लोग कोई झंझट उठाने को तैयार न थे। किन्तु उनका विचार बना कि बालक को अस्पताल भिजवा दिया जाय ताकि संसार में हाल ही आया यह अतिथि योंही न विदा हो जाए।
कुछ सोचते हुए अपने मित्र की ओर मुखातिब होते हुए बोले नरेन्द्र! पास के किसी कमान में जाकर अस्पताल बालों को फोन कर दो। खुद बच्चे को गोद में उठा कर उस के लिए आहार की व्यवस्था जुटाने लगे। दूध तो बच्चे ने नहीं पिया, शहद अवश्य उसके गले के नीचे उतरा फिर वे नरेन्द्र के पास पहुँच गए जो पास ही एक दुकान पर से अस्पताल वालों को फोन कर रहा था।
अस्पताल वालों ने इस प्रकार मिले अवाँछित बालक को लेने से इनकार कर दिया। नियमानुसार पहले इसकी सूचना पुलिस को देनी पड़ती। अतः पुलिस को फोन किया गया। पुलिस स्टेशन से तत्काल कोई आने को तैयार न हुआ। नरेन्द्र ने जब उनका हवाला दिया तो वहाँ से आदमी भेजने की व्यवस्था की गईं।
कुछ देर बाद दो सिपाही घटना स्थल पर आए। वह और उनके साथी तब तक वहीं खड़े रहे। बच्चे को पुलिस के सुपूर्द करने तथा उसकी व्यवस्था करने में रात के दो बज गए पर उनके चेहरे पर न विषाद आया न सुस्ती। वे उसी प्रकार बच्चे की उपयुक्त व्यवस्था में लग रहे। कलकत्ता जैसे शहर में इस प्रकार की घटनाएँ उस समय भी कोई खास महत्व नहीं रखती थी-पर उनके समक्ष कहीं कोई तड़प-तड़प कर प्राण छोड़ जाए उनसे सहन कैसे होता?
सारे काम से निवृत्त हो जाने के बाद अंगड़ाई लेकर एक गहरी साँस ली। मित्र और उसकी पत्ी की ओर देखते हुए कहा- ‘‘अब पता चला किस जादू के बल पर मेरी रचनाएँ जीवन और प्राण प्राप्त करती हैं।” मित्र और उनको पत्ी मौन थे। वह उन्हें समझाते हुए बोले-”किसी भी रचनाकार की कृतियाँ उसकी कलम से नहीं, हृदय से ही अनुप्राणित होती हैं। रचनाएँ हर क्यों जीवन के प्रत्येक कार्य में कारुणिक संवेदनशीलता का जादू प्राण फूँक देता है। कर्ता, कार्य और परिवेश अभिभूत हुए बिना नहीं रहते।” एक नजर घड़ी पर डालते हुए कहा “आओ चलें।” तीनों एक साथ चल पड़े। कारुणिक संवेदनशीलता के यह जादूगर थे शरत चन्द्र चटर्जी।
महामानवों की प्रकृति परमार्थपरायण होती है। वे सदा दूसरों को आगे बढ़ाने ऊँचा उठाने की ही बात सोचते हैं, पर इनके प्रति लोकमानस में सदा एक भ्रान्ति बनी रहती है कि जब तक शरीर है, तब तक तो उनका प्रत्यक्ष मार्गदर्शन, सहयोग और सहकार मिलते रहेंगे, इसमें दो मत नहीं है, किन्तु उनके मृत्योपरांत? उसके बाद यह क्रम किस प्रकार अक्षुण्ण बना रह सकेगा? ऐसी शंका-कुशंका करने वालों को यह नहीं भूलना चाहिए कि मृत्यु जीवन का अन्त नहीं। सामान्य लोगों के लिए यह परिधान-परिवर्तन जैसी घटना हो सकती है, जिसमें पुराने वस्त्र को त्यागने और नया वस्त्र धारण करने की तरह शरीर को परिवर्तित कर लिया जाता है, किन्तु महामानव स्तर के लोग मृत्योपरांत भी लम्बे काल तक बिना शरीर धारण किये सूक्ष्म अवस्था में बने रह सकते हैं, ताकि लोगों की वे और अधिक सेवा-सहायता कर सकें, स्थूल जगत में भौतिक शरीर के बन्धन के कारण जैसे अति सामर्थ्यवान शरीरों में रहते हुए पूरा कर सकें। आये दिन ऐसी घटनाएँ देखने को मिलती ही रहती हैं, जिससे यह मान्यता और भी दृढ़ हो जाती है एवं लोगों को बाधित होकर इस पर विश्वास करना पड़ता है कि महामानवों की सेवा-सहायता वाली प्रवृत्ति सदा वैसी ही बनी रहती है, जैसी जीवनकाल के दौरान थी। उसमें राई-रत्ती भर भी कमी नहीं आती, वरन् बढ़ोत्तरी ही होती है।
घटना अमेरिका की है। कैलीफोर्निया के ब्रिटीवर्थ कस्बे की महिला रोजमेरीब्राउन अपनी आत्मकथा “डू वी रियली डाई” में लिखती हैं कि तब वह सात वर्ष की थीं। एक सुबह कमरे में अकेली पड़ रही थीं कि यकायक बिजली कौंधने जैसा प्रकाश हुआ। वह चौंक गई। तभी सामने एक परिचित व्यक्ति प्रकट हुआ। उसने अपना परिचय विश्व प्रसिद्ध संगीतकार फ्रेंजजित्ज के रूप में दिया। संयोग से ब्राउन को इतना मालूम था कि फ्रेंजलित्ज अब इस संसार में नहीं हैं। सो, उसने उस व्यक्ति से इस आशय की सहज की जिज्ञासा प्रकट की। फ्रेंजलित्ज नामधारी व्यक्ति ने उत्तर दिया “हाँ, तुम सही कहती हो, यह मेरा सूक्ष्म शरीर है। मैं तुम्हारी संगीत के प्रति रुचि देख कर ही यहाँ आया हूँ, पर अभी तुम्हारी वह आयु नहीं कि तुम कठिन संगीत सीख सको। समय आने पर मैं फिर उपस्थित होऊँगा।” इतना कह कर वह आत्मा अन्तर्ध्यान हो गई।
श्रीमती ब्राउन लिखती हैं कि वही आत्मा 1964 में 20 वर्ष बाद पुनः प्रकट हुई, पर उस बार वह अकेली नहीं थी। विश्व प्रसिद्ध संगीतकार आत्माओं को भी साथ में लायी थी, जिनमें चोपीन, स्क्यूबर्ट स्कूमेन, बीथेवेन, बेच, मोजार्ट, ग्रीज, बर्ललियोज, स्ट्रेबिनस्की, रैकमेनिआफ आदि प्रमुख थे। रोजमेरी लिखती हैं कि पहले तो वह उन्हें देख कर डर गई पर संभवतः मेरे विचार को पढ़ कर उन सभी ने आश्वासन दिया -”डरो मत। हमें तुम्हारे माध्यम से अपनी इच्छा पूरी करनी है, सो अपनी संगीत की योग्यता बढ़ाती जाओ, उसमें हम सभी तुम्हारी मदद करेंगे।”
श्रीमती ब्राउन तब दो बच्चों की माँ थी और विधवा जीवन बिता रही थी। सन् 1964 के एक अन्य अवसर का वर्णन करते हुए लिखती हैं कि एक दोपहर को वह अपने कमरे में बैठी कुछ पढ़ रही थीं कि एक घने बालों वाले वृद्ध व्यक्ति की आकृति कमरे में प्रकट हुई एवं कमरे में रखे पियानो की ओर संकेत करने लगी। जब वह पियानो बजाने बैठी, तो अतिविशिष्ट धुनें थोड़े से प्रयास से ही निकलने लगीं। बीच-बीच में उस आकृति का मार्गदर्शन मिलता रहा। बाद में उसने अपना परिचय ‘लिज्क’ नाम से दिया और कहा कि इन लिपिबद्ध भी करती जाना, ताकि भूलने की गुंजाइश समाप्त हो जाय।
वह आगे कहती हैं कि इसके बाद प्रायः प्रतिदिन कोई न कोई संगीतकार आ जाते और संगीत का मर्म सिखा कर चले जाते। हर संगीतज्ञ अपने प्रिय वाद्य की ही शिक्षा देते। इसकी अनुभूति का वर्ण करती हुई ब्राउन कहती हैं कि जब चोपीन संगीत शिक्षा के लिए आते, तो बड़े सज-धज कर आते। उनका स्वभाव विनोदी था और बीच-बीच में हँसी-मजाक भी किया करते। एक बार तो वे वाद्ययंत्र सहित अदृश्य हो गये, पर उसकी धुन स्पष्ट सुनाई पड़ती रही। कुछ क्षण बाद वे पुनः प्रकट हुए और वही तर्ज सिखाने लगे।
स्क्यूबर्ट के बारे में ब्राउन लिखती है कि वे मधुर प्रकृति के थे। सब कुछ बड़े भोलेपन से सिखाते। कभी कोई तर्ज समझ में नहीं आती, तो वे उसे बार-बार बजा कर सुनाते। लिस्उट का स्वभाव इनसे भिन्न था। जब उन्हें ऐसा लगता कि उनका उचित सम्मान नहीं किया जा रहा है, तो वे तत्काल तिरोहित हो जाते और फिर उस दिन दुबारा लौट कर नहीं आते। रिचमेनिआफ पास बैठने की अपेक्षा खड़ा रहना अधिक पसंद करते। डेबूसे दाढ़ी रहित रूखे स्वभाव के थे। कम बोलना उनके स्वभाव का अंग था। बीथोबेन नम्र प्रकृति के परिश्रमशील व्यक्ति थे। घंटों वे साज का अभ्यास करवाते रहते।
ब्राउन लिखती है कि यह क्रम लगभग 15 वर्षों तक चलता रहा और जब वह संगीत के विभिन्न वाद्ययंत्रों में निष्णात् हो गई तो सभी ने यह कह कर विदाई ली कि “अब तुम इस क्षेत्र में समर्थ हो गई हो। अब और किसी प्रकार के मार्गदर्शन की आवश्यकता नहीं है, फिर भी यदि कभी इसकी जरूरत महसूस हुई तो हम मार्गदर्शन के लिए प्रस्तुत होते रहेंगे, पर एक बात का ध्यान रखना, तुम इस क्षेत्र में कृपण कभी न बनना। जिज्ञासुओं को इसकी शिक्षा उसी प्रकार देती रहना, जैसी कि हम लोगों ने तुम्हें परिश्रमपूर्वक दी है।” इतना कह कर सभी आत्माएँ गायब हो गई। तभी से रोजमेरी ब्राउन अनेकों को संगीत-शिक्षा देने में लगी हुई है।
सन् 1971 में सर डोनाल्ड टोवे की एक संगीत कृति प्रकाशित होनी थी। इसका जिम्मा श्रीमती ब्राउन को सौंपा गया। महीनों की मेहनत से जब पाण्डुलिपि बन कर प्रेस में जाने के लिए तैयार हुई तो एक दिन दिवंगत टोवे स्वयं प्रकट होकर ब्राउन को पाण्डुलिपि की एक गलती की ओर इशारा करने लगे। बाद में सुधार के पश्चात् ही पुस्तक छापी गई।
17 अक्टूबर 1968 को बी.बी.सी. ने ब्राउन के संगीत पर आधारित एक वृत्तचित्र प्रसारित किया। विश्व के तत्कालीन संगीत विशारदों ने उसे देखने-सुनने के बाद एक ही निष्कर्ष निकाला कि यद्यपि यह सब ब्राउन की ही रचनाएँ हैं, इसमें शक की गुंजाइश नहीं है, तथापि यह निस्संदेह एक अविश्वसनीय घटना है। ‘न्यूयार्क मैगजीन’ के संपादक एलनस्पिटज लिखते हैं, क्योंकि इनमें से एक में भी उनकी मौलिकता नजर नहीं आती। ‘सटर्डे रिव्यू’ पत्रिका में इरविंग कोटडिंग कहते हैं कि एक व्यक्ति द्वारा विश्व के अनेक संगीतज्ञों की शैली में गूढ़ रचनाएँ प्रस्तुत करना निश्चय ही पितर स्तर की आत्माओं द्वारा प्रशिक्षण का उत्कृष्ट नमूना है।
इसी से मिलती-जुलती घटना सेण्टलुइस की एक महिला श्रीमती करेन से संबंधित है। 1913 में जब वह मात्र 6 वर्ष की थी, तभी उसे एक महान साहित्यकार की आत्मा का सहयोग प्राप्त हुआ था। इसी के कारण वह इस अल्पवय में भी सात उपन्यास, अनेक कहानियाँ एवं निबन्ध संग्रह लिखने में सफल हुई। तीन लाख शब्दों वाला उपन्यास “दि सारी टाल”को पढ़ कर उस समय के सभी साहित्यकार विस्मित हो गये थे कि इस अत्यल्प वय में इतना परिपक्व और शोधपूर्ण विचारों वाला ग्रन्थ कैसे संभव हो सका?
इस संबंध में मात्र इतना ही कहा जा सकता है कि महामानव कभी मरते नहीं और न सेवा सहायता के क्षेत्र में कृपणता का ही कलंक अपने ऊपर लगने देते हैं। पंचभौतिक शरीर का त्यागना जनसामान्य को मृत्यु जैसा प्रतीत हो सकता है, पर वास्तविकता यह है कि इस सूक्ष्म स्थिति में वे और समर्थ व सशक्त बन जाते हैं और उनकी सेवाएँ जो भौतिक शरीर के बन्धन के कारण सीमित परिधि में सीमाबद्ध थी, वह और असीमित-अपरिमित बन जाती है। शान्तिकुँज की सूत्र संचालक सत्ता के बारे में भी किसी को यह असमंजस नहीं करना चाहिए कि जो कुछ अभी प्रत्यक्ष मार्गदर्शन के सहारे सहज संभव बन पड़ रहा था वह उनकी अनुपस्थिति में कैसे गतिमान रह सकेगा? ऐसा सोचने वालों को उनका वह कथन विस्मृत नहीं करना चाहिए, जिसमें उनने बुद्ध की उक्ति दुहराते हुए कहा है कि जब तक इस धरित्री के एक-एक व्यक्ति की मुक्ति नहीं हो जाती, तब तक वे स्वयं भी मुक्त होना पसंद नहीं करेंगे और अगली एक शताब्दी तक निर्बाध रूप में सूक्ष्म व कारण शरीर के रूप में चौगुने-सौगुने वेग से सक्रिय बने रहेंगे।
“ बलि! महाबलि!! भारत माता बलिदान चाहती है-मस्तिष्क वाले युवकों की पशुओं की नहीं।” सन्नाटे को चीरकर उनकी वाणी उपस्थित शिष्य समुदाय के दिलों को बेधती हुई वायुमण्डल में गूँज उठी। वह कह रहे थे क्या तुम्हें इस देश की धरती से प्यार है? सदियों के अत्याचार के फलस्वरूप पीड़ा, दुःख, हीनता, दारिद्रय की जो आह भारत गगन में गूँज रही हैं क्या इनसे तुम्हारा अन्तःकरण विकल हुआ है? यदि हाँ तो आओ अपने समस्त जीवन की बलि दो- उन दीन हीनों उत्पीड़ितों के लिए जिनके लिए भगवान स्वयं युग-युग में दौड़े चले आते है। आओ! आगे बढ़ो आज के इस महायज्ञ को पूरा करने। पीछे मुड़कर मत देखो। मत परवाह करो यदि सब कुछ छूट रहा है।
सुनकर जैसे सभी को साँप सूँघ गया। सारी सुसुर-पुसुर शान्त हो उठी। श्मशान का सन्नाटा छा गया। कौन बोले? क्या बोले? बोलने का काम भी क्या रहा? आज तो करने की वेला है, करने की, कौन आग आए?
आज प्रातः से ही वे अपने गुरु के आह्वान पर इकट्ठे हुए थे। उनमें से प्रत्येक जानता था कि उन्हें कुछ करना है देश के लिए समाज के लिए। गुरु के प्रति प्रत्येक की श्रद्धा थी, उनकी वाणी सभी के विश्वासों का प्रतीक थी। किन्तु इस क्षण श्रद्धा चरमरा उठी विश्वास डावांडोल हो उठा। बात ही कुछ ऐसी थी प्राणों का मोह आ पड़ा था। उठा नहीं जाता। हाथ और पाँव जैसे हथकड़ी बेड़ियों से जकड़ गए हों। कण्ठ सूख रहा था, जीभ तालू से चिपक गई।
गुरु वीर देश में थे मानो साक्षात महारुद्र मानव का जामा पहन कर आ खड़े हुए हों। उनकी धधकती आँखें ज्वालाएँ फेंक रही थी। एक तेज दृष्टि सभी पर घूमी। यहीं हैं वे जो शास्त्रों के मर्म को जानने का दावा करते हैं। न जाने इन्होंने कितनी बार जीवन की अनित्यता संसार की नश्वरता का प्रवचन दिए होंगे लच्छेदार बातें वक्ता होने का अभिमान प्रवचन! प्रवचन!! प्रवचन!!! धिक्कार है ऐसे प्रवचनों पर। वह फिर मुखरित हो उठे। हाथ में थमी शमशीर हिल उठी “धिक्कार, सौ बार धिक्कार है तुम पर। तुमने सारा जीवन सिर्फ बेकार की बातें करना सीखा है। व्यर्थ बकवाद करने वालों तुम लोग क्या हो? संघर्ष की घड़ी में पलायनवादी बने खड़े हो।” उनकी वाणी में दर्द छलछला उठा। “तो क्या कोई भी नहीं? कोई भी नहीं जो भारत की मिट्टी माथे पर लगा कर कहने का साहस जुटा सके-मेरा सर्वस्व माँ! तुझ पर न्योछावर है। “ नजरें एक बार फिर घूमी। अबकी बार एक तरुण भीड़ में से कदम बढ़ाता हुआ निकला। उनके सामने आ मस्तक झुकाकर बोला “शीश हाजिर है गुरुदेव।”
“ठीक से सोच ले फिर दुःखी मत होना। “ “दुःखी! दुःख तो इस बात पर है कि इतनी देर सोचता रहा। ऐसी विषम घड़ी में भी सोच विचार करना आगा पीछा ताकना धिक्कार है मुझ पर।” उसकी वाणी में कठोरता थी पर दिल बलिदान के लिए तत्पर युवक के प्रति प्यार से उमंग रहा था। उसकी कलाई पकड़ वह पास में बनी झोंपड़ी में गए। अगले ही पल सबने उन्हें वापस लौटते देखा। हाथों में रक्त रंजित कृपाण थी। वाणी फिर गूँजी कोई और....। एक! दो!! तीन!!! चार!!!! नवयुवक एक क्षण में सन्न खड़ी उस भीड़ में से निकल कर उनके सामने आ खड़े हुए। प्रत्येक के साथ वह झोंपड़ी में गए एवं रक्त से भीगी कृपाण लेकर लौटे।
कुछ ही क्षणों बाद आश्चर्य! महाआश्चर्य!! यह क्या? गुरुदेव तो साक्षात् उन पाँचों के साथ आ रहे हैं। तो क्या यह मरे नहीं थे? तब क्या वह मरण नहीं था। फिर? अब तो सभी कह उठे “हम भी हाजिर हैं? हमें भी बलिदान करना है।”
एक हँसी गूँज उठी। वह मुस्कराते हुए कह रहे थे “अवसर चूकने पर पछताना ही शेष रह जाता है।” अवसर पहचानने वाले ये दयाराम, धर्मदास, मोहकमचन्द, हिम्मत राय तथा सहाबचन्द मेरे प्यारे हैं इतिहास इन्हें पंच प्यारों के नाम से जानेगा। गुरु के प्यारे कह इनकी चरण रज को लोक श्रद्धा से माथे पर धारण करेगा। यदि सीख सको तो सीखो। अपनी आलसी, कर्महीन, कटुभाषी, ईर्ष्यापरायण, डरपोक तथा विवादप्रिय प्रकृति को छोड़कर निष्ठा परायण बनो। गुरु के वचनों का यथावत् पालन करना सीखो मेरे बच्चे। सिक्खों के दशम गुरु गोविंद सिंह की वाणी करुणा और वात्सल्य से विगलित हो उठी। अब अवसर को खोना मत। कह कर वह मौन हो गए।
अवसर पुनः आ खड़ा हुआ है। पंच प्यारों की तलाश जारी है। नरमेध यज्ञ होना है। देखना यह है कि कौन आगे आता है?
मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। समाज में सुख-शान्ति का वातावरण होने पर ही वैयक्तिक सुख−शांति अक्षुण्ण रह सकती है अपने को अपने तक सीमित रखने की प्रवृत्ति जहाँ भी, जिस भी समाज में पनप रही होंगी, वहाँ व्यक्ति पारस्परिक स्नेह, सद्भाव की सहानुभूति को खो रहा होगा और उसके कारण उन सभी लाभों से वंचित रहेगा, जो सामाजिक जीवन में पारस्परिक सहयोग सहकार पर टिके हुए है। एक दूसरे की संकट में सहायता करना, अन्याय के विरुद्ध लड़ना, लोकहित के कामों में हिस्सा बटाना, उदारता भरा संयमी जीवन जीना आदि यों तत्काल तो घाटे का सौदा प्रतीत हो सकते हैं, पर बदले में अनेकों की श्रद्धा, मित्रता एवं सहायता के जो हाथ बढ़ते हैं, उसे देखते हुए यही कहा जा सकता है कि जो गँवाया जाता है, उससे अनेक गुना वापस लौटता है। महामानवों को प्रगति के उच्चशिखर पर पहुँचने का अवसर इसी आधार पर मिलता है। स्वार्थियों के लिए यह द्वार सदा बन्द ही रहते हैं।
सुप्रसिद्ध समाजशास्त्री आर. डैवी ने अपनी कृति “डेवलपमेण्ट ऑफ ह्यूमन बिहेवियर” में कहा है कि जब व्यक्ति सामाजिक जीवन में सक्रिय रूप से भाग लेने लगता है और अपने सामाजिक दायित्व का निर्वाह करता है, तब उसकी सामाजिक अभिरुचियों का समुचित विकास होता है। उसमें सामाजिक भावना पैदा होती है, वह अपने साथियों के प्रति सहानुभूति रखता है और उसकी परमार्थ चेतना जाग्रत हो जाती है। व्यक्ति में सामाजिक अभिरुचि जन्मजात होती है। जिस प्रकार व्यक्ति श्रेष्ठता एवं पूर्णता प्राप्त करने के लिए प्रयास करता है, उसी प्रकार वह अपनी जीवन को विकसित करने के लिए अपनी प्रसुप्त अभिरुचियाँ जाग्रत करता है। सामाजिक अभिरुचियों को जाग्रत एवं सक्रिय बनाने के लिए यह आवश्यक है कि व्यक्ति सामाजिक जीवन में भाग ले ओर यथाशक्ति उन कार्यों में लगा रहे, जिनसे लोकहित सधता हो। इस तरह के गुणों के बीज वस्तुतः प्रत्येक व्यक्ति के व्यक्तित्व में प्रसुप्त रूप में सन्निहित होते हैं और प्रयास करने पर अथवा अनुकूल वातावरण पाकर वे प्रस्फुटित हो उठते हैं।
डेवी ने सामाजिक चेतना के विकास को ही आत्म विस्तार कहा है। उनके अनुसार ‘सुपर व्यक्तित्व’ के प्रेरणा केन्द्र सामूहिक चेतना के पूर्ण विकसित स्वरूप को ही “सोशल सेन्स” अर्थात् सामाजिक वृत्ति कहते हैं। जिस भी समाज में यह वृत्ति जितनी अधिक विकसित होगी, वहाँ के व्यक्ति उतने ही श्रेष्ठ एवं महानता के युक्त होंगे। अनेकानेक मानी समस्याओं को सुलझाने एवं मनुष्य को देवोपम बनाने के लिए इस ‘सोशल सेन्स’ का होना परमावश्यक है। उत्कृष्ट व्यक्तित्व उसे ही कहा जाता है, जिसमें सम्पूर्ण निहित शक्तियों का सर्वांगीण विकास हो चुका हो। स्पष्ट है कि इन शक्तियों के विकास में मानव की शक्ति लालसा एवं सामूहिक चेतना की पूर्ण अभिव्यक्ति आवश्यक है। दोनों के सामंजस्य से बना हुआ व्यक्तित्व ही श्रेष्ठ कहा जाता है।
सामूहिक चेतना के विकास का एक अर्थ विस्तार भी है। नैतिक क्षेत्र में यही व्याख्या अधिक उपयुक्त पड़ती है। सीमित ‘स्व’ ही वस्तुतः तुच्छ है और विकसित वर्ग में हेय समझा जाता है। बौने अपनी बिरादरी में भले ही बढ़ चढ़ कर बातें करें पर लम्बे तगड़े पहलवानों के आगे उनकी घिघ्घी बँधने लगती और उपहास के भाजक बनते हैं। जीवनक्रम में क्षुद्रता वह है, जिसमें व्यक्ति अपने निजी लाभ की ही बात सोचता हैं और स्वार्थपरता की दुनिया में ही खोया रहता है। विकसित व्यक्तित्वों का ‘स्व’ अन्य जनों को भी अपनी परिधि में लपेट लेता है और अपने सुख-दुःख की तरह दूसरों की प्रगति अवगति में भी प्रसन्नता-खिन्नता की अनुभूति करने लगता है। ऐसा व्यक्ति समूह को समाज को अपना ही अंग अवयव मानकर उनका पिछड़ापन दूर करने के लिए भी वैसा ही प्रयास करता है, जैसा कि अपनी दरिद्रता, रुग्णता अथवा कठिनाई के निवारण में किया जाता है।
यह सामूहिक चेतना ही आगे बढ़ते-बढ़ते विश्व परिवार के रूप में ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के रूप में विकसित होता है ओर सबको अपना-अपने को सब का मानने लगती है। जहाँ भी यह प्रवृत्ति पनप रही होगी, वहाँ सहज ही ऐसे सद्गुणों, ऐसे सत्प्रयोजनों-सत्प्रयासों का बाहुल्य पाया जायगा, जो मनुष्य को सच्चे अर्थों में विकासवान प्रगतिवान बनाते हैं। आज मानव समुदाय को इसी सामूहिक चेतना की अनिवार्य आवश्यकता है।
वे प्रातः कालीन भ्रमण के लिए निकले थे। पूर्व दिशा में प्रकाश की पहली रश्मि अपना स्वर्णांचल फैलाए प्रातः कालीन पवन से अठखेलियाँ कर रही थी। तारे पीले पड़कर एक के बाद एक अपनी अस्तित्व मिटाते जा रहे थे। इनमें से एक अमेरिका का ही मूल निवासी था, दूसरा भारतीय। एक के लिए ईश्वर का अस्तित्व उपहास की वस्तु था, दूसरा उसे जीवन की धुरी मानता था। पहला प्रकृति को सर्वांगपूर्ण मानता था, दूसरा उसकी पूर्णता ईश्वर में देखता था।
“स्वामी जी प्रकृति के इस सुन्दर रूप को तो देखो। यहाँ कितना उल्लास है, कितनी शान्ति है, कितना सौंदर्य है। इसका उपभोग न करके परमसत्ता की खोज के फेर में पड़ना, तप-त्याग में समय गँवाना दिमागी फितूर ही कहा जायगा।” वाणी में तनिक व्यंग था।
वह मुस्कराते हुए उसके बगल में खड़े हो गए। उन्होंने एक बार अपने चारों ओर देखा “मित्र! मुझे तो प्रकृति में कोई सुन्दरता नहीं दिखलाई देती।”
“प्रकृति में आपको कोई सुन्दरता नहीं दिखाई देती।” उसने आश्चर्यचकित नेत्रों से उनकी ओर देखा-”आप सत्य कर रहे हैं यह हँसी कर रहे हैं।
“हँसी नहीं कर रहा हूँ भाई! मैं सत्य कह रहा हूँ।” आप कह रहे हैं कि प्रकृति सौंदर्य का स्रोत है, जबकि मुझे उल्लास, शान्ति स्वयं के अन्तराल से निकलते अनुभव होते हैं। यदि ऐसा न हो तो यह सर्वथा कुरूप दिखाई देगी।”
उसका मन इसे मानने को तैयार न हुआ “आप देखें इस हरी दूब को कितनी सुन्दर है। मेरी तो इच्छा होती है कि मैं यहीं पर रहूं यहीं पर बैठूँ और यहीं विश्राम करूं। “
वह हल्के से हँस पड़े- “नहीं यह न करना यहाँ पास में कोई चिकित्सक भी नहीं जिससे उपचार कराया जा सके। आप कहते हैं कि दूब कोमल है, सुन्दर है, केवल इसलिए कि आपने खुल में जीवन नहीं व्यतीत किया। इसमें कितने कीड़े-मकोड़े हैं, इस पर अधिक देर विश्राम करने से निश्चय ही शीत हो जाएगा। प्रकृति अपूर्ण है, यह तो ईश्वर प्रदत्त विवेक का करतन है जिसके बल पर मनुष्य ने इसे उपयोगी बनाया है।”
उसने नयी बात सुनी, पर बात बड़े आश्चर्यजनक ढंग से कही गई थी। तर्क सुन्दर थे। उसे अपनी मान्यता का भवन खण्डहर होता लगा। वह कह उठा- प्रकृति अपूर्ण है पर........।
“हाँ प्रकृति अपूर्ण है। इसकी पूर्णता ईश्वर से ब्राह्मीचेतना से मिलकर होती है। यह तो सिर्फ दर्पण है, व्यक्ति की मानसिक दशा का। बदलते मन के अनुसार इसके रूप भी बदलते हैं। जाड़े के दिनों में इन सुन्दर स्थानों को कुरूपता तो देखो, जहाँ कुहरा छाया रहता है, जब इतनी शीतल वायु चलती है कि शरीर काँपने लगता है। गरमी के दिनों में दोपहर के समय इतनी कड़ी लू चलती है कि शरीर झुलस जाता है। यह तो प्रतिभा के रूप में मिले ईश्वरीय अनुदान के बल पर ही मनुष्य ने इसे अपने लिए नियोजित कर लिया। अपनी रक्षा हेतु आवास आच्छादन जुटा लिए।”
आज उसे अपना प्रकृतिवाद का सिद्धाँत अधूरा लगने लगा। वह एक क्षण के लिए मौन होकर सोचने लगा- तो क्या सचमुच सौंदर्य को स्रोत अन्दर है। पर सामने खिले पुष्प, उठ रही मादक गन्ध, पक्षियों का कलरव गायन, तो क्या यह सब..... नहीं। वह बोल पड़ा, इन पुष्पों और पक्षियों के बारे में आप क्या कहते हैं?
“ये पुष्प कोमल हैं? ठीक हैं पर इनमें काँटे भी हैं। न जाने कितने छोटे-छोटे भुनगे इन फूलों के अन्दर घुसे हुए हैं। रही इनकी कोमलता तथा इनकी सुगन्ध ये क्षणिक हैं। फिर इनकी सुगन्ध किस काम की? एकान्त में ये अपना सौरभ व्यर्थ गँवा देते हैं और इस कलरव गायन में माधुर्य हो सकता है, केवल स्वरों का। यह कलरव गायन, भाषा के संयत न होने के कारण, उस भावहीन संगीत की भाँति है, जिसमें स्वरों का उतार-चढ़ाव नहीं है।”
“तब फिर.........तब.......फिर।” उसे समझ में नहीं आया कि वक क्या कहे, जैसे इस हिन्दू संन्यासी के सामने उसकी तर्क शक्ति कुण्ठित हो गई। यही कि प्रकृति अपूर्ण है मात्र प्रत्यक्ष है। इसमें पूर्णता की खोज बालू में तेल निकालने की तरह है। यही क्यों इन्द्रिय जनित भोग सिर्फ अतृप्ति की एक अबूझ आग भड़काते हैं और दूर ले जाते हैं उस लक्ष्य से जो मनुष्य का गन्तव्य है।
अतृप्ति की न बुझने वाली आग, मनुष्य का गन्तव्य, आस्तिकता ये शब्द उसके मन में विद्युत रेखाओं की भाँति कौंधने लगे। उसने अभी तक न जाने कितने व्याख्यान दिए थे। सुन्दर शब्दों के मोहक जाल में अब तक न जाने कितनों को बाँधा था। रंगीन सपनों की यह दुनिया सच है, यह प्रत्यक्षवाद ही सब कुछ है, जो भी कुछ दृश्यमान है, उपभोग हेतु है। यह सच है अथवा वह, जिसका इशारा संन्यासी कर रहा है। यह और वह की ऊहापोह से अपने विचारों की नींव हिलती नजर आने लगी।
“क्या सोचने लगे मि. रॉबर्ट....?” “यही अतृप्ति की इस न बुझने वाली आग को बुझाने का क्या उपाय है?”
साधनों को साध्य के रूप में प्रयुक्त करना न कि साधनों को ही साध्य समझ बैठना। “साध्य आप किसे कहते हैं।” “अन्तर शक्तियों का विकास, सभी से आत्मीयता भरे एकत्व का अनुभव और आस्तिकता।” “विवेकयुक्त जीवन शैली अपना कर चेतना के उच्चतर सोपानों की ओर गति, पाशविकता को त्याग कर देवत्व की ओर अग्रगमन।”
वह सुन रहे थे, सोच रहे थे, अन्दर ही अन्दर विश्लेषण की प्रक्रिया जारी थी। तीन प्रश्नों के जवाब में समूचा अध्यात्म सिमट आया था। भोग मनुष्य को क्षणिक सुख देकर एक स्थाई अतृप्ति की ज्वाला भड़का कर चल जाते हैं और प्रकृति निरन्तर बदलते उसके रूप, रंग द्वारा मात्र इन्द्रिय तृप्ति भर दे पाती है, क्षणिक सुख का आभास मात्र। अविवेकी मनुष्य संभवत’ इनके बीच अपने अस्तित्व को भी नहीं बचा पाता। चिन्तन गहरा चल रहा था। उसके सिमट कर बिन्दु रूप हो जाने से माथे की नसें उभर उठी। पूछ ही बैठे-”तो स्वामी जी! लोग सुख-आनन्द की तलाश में बाहर क्यों भटकते हैं। पर्यटन के नाम पर, परिवर्तन के नाम पर व्यक्ति प्रकृति की गोद में जाता है तो क्या मात्र क्षणिक मनोरंजन, इन्द्रिय तृप्ति भर ही करके रह जाता है। यदि ऐसा है तो सौंदर्य, उल्लास का स्थायी स्रोत क्या है?
“सौंदर्य, उल्लास, सृजन शक्ति का भण्डार बन्धु भीतर भरा पड़ा है। उसी तरह जिस तरह कस्तूरी मृग की नाभि में विराजमान सुगंधि। बाह्य साधनों से तो मात्र उसकी सुव्यवस्था, सुसज्जा ही संभव है। आनन्द का निर्झर तो आत्मचेतना की गहराइयों से ही फूटता है। और इसके लिए मनुष्य को चाहिए कि वह अन्तर्मुखी बने, विवेकयुक्त जीवन शैली का अभ्यास करे।”यही न।” सुनने वाला तुरन्त बोल उठा।
स्वामी जी-”हाँ यही,” कहकर मुस्करा उठे। समाधान जो मिल चुका था। किसी एक के लिए नहीं अखिल मानव जाति के लिए कस नया सूत्र जो मंथन से प्राप्त हुआ था। समाधान देने वाले सज्जन थे रामकृष्ण परमहंस के शिष्य स्वामी अभेदानन्द, जिनने वेदान्त को नये आयाम दिये तथा सुनने वाले सज्जन थे रॉबर्ट इंगरसोल।
स्वामी जी की ये स्वानुभूति व्याख्याएँ हमारे निज के जीवन में साकार हो उठें तो व्यर्थ का भटकाव बन्द हो तथा अंतस् सदैव आनन्द ही आनन्द से भरा दीख पड़े।
बायजिद स्वाध्याय में दत्तचित्त थे कि किसी ने दरवाजे पर दस्तक दी, वहीं से उन्होंने पूछा “अरे भाई! किसे खोज रहे हो?” आगन्तुक ने विनम्र वाणी में उत्तर दिया बायजिद को मिलना चाहता हूँ।” “बायजिद ने द्वार खोलते हुए कहा हाँ भाई मैं भी तो पिछले पच्चीस वर्षों से बायजिद को ही तलाश रहा हूँ पर वह अभी तक मिला नहीं।” आगन्तुक ने अनुभव किया,”आत्मा को पा लेना ही सर्वोपरि खोज है।”
साधारण श्वास-प्रश्वास प्रक्रिया से उत्पन्न ऊर्जा से मनुष्य की सामान्य जीवनचर्या चलती रहती है। शारीरिक अंग-अवयवों के अपने-अपने प्रयोजन सम्पन्न होते रहते हैं, किन्तु अधिक सशक्तता प्राप्त करने के लिए अधिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है। बड़ा कारखाना चलाने के लिए बड़ी मशीनें बना सकने वाली बड़ी मोटर फिट करनी पड़ती हैं। छोटी मोटरें तो छोटी मशीन ही चला पाती हैं।
महत्वपूर्ण शारीरिक, मानसिक या आध्यात्मिक कार्य करने के लिए जिस उच्चस्तरीय ऊर्जा की आवश्यकता पड़ती है, वह खाने-पीने या आग तपाने जैसे प्रयत्नों से नहीं, वरन् वहाँ से प्राप्त करने होती है जहाँ चेतना और पदार्थ दोनों को प्रभावित करने वाली क्षमता का उद्गम है। यह उद्गम ब्रह्माण्डव्यापी ‘प्राण’ है। प्राण ही वह तत्व है जो अन्तरिक्ष में जीवन और पदार्थ दोनों की संयुक्त शक्ति के रूप में प्रवाहित रहता है। प्राणायाम प्रक्रिया द्वारा उसी महाप्राण के लहलहाते महासमुद्र में से अभीष्ट द्वारा उसी महाप्राण के लहलहाते महासमुद्र में से अभीष्ट परिमाण में प्राणतत्व को आकर्षित करने और अपने में धारण कर महत्चेतना से परिपूर्ण बनने की प्रक्रिया अपनाई जाती है।
विविध प्रयोजनों के लिए प्राण प्रक्रिया के अनेकों भेद-उपभेद किये गये हैं। सम्बद्ध अनेकों प्रकार के प्राणायामों का वर्णन योग ग्रन्थों में आता है। विविध प्रयोगों के लिए विभिन्न प्रकार के प्राणायामों का अवलम्बन लिया जाता है, किन्तु ध्यान मिश्रित प्राणयोग दिव्य प्राण चेतना के संवर्धन की एक ऐसी सरल किन्तु बहुआयामी सशक्त विधा है जो जोखिम रहित भी है और सर्व साधारण के लिए उपयोगी भी। इस प्राणाकर्षण प्राणायाम के नियमित अभ्यास से आन्तरिक प्राण सम्पदा क्रमशः बढ़ती जाती है ओर उससे भौतिक सफलताओं एवं आत्मिक विभूतियों का अवरुद्ध मार्ग खुलता है। जीवात्मा का क्षुद्र प्राण ब्रह्म चेतना के महाप्राण से जुड़कर उसी के समतुल्य बन जाता है।
इस प्राणायाम को चित्त लेटकर शिथिलीकरण मुद्रा में आरंभ करना होता है। शिथिलीकरण मुद्रा का तात्पर्य हैं शरीर के प्रत्येक अवयव को इतना ढीला कर देना जितना वह नींद आ जाने पर होता है। प्रयत्न यह होना चाहिए कि किसी अंग पर तनाव न आने पाये। सभी अवयव इस स्थिति में हों मानो इनमें से जान निकल गई हो। मन को भी अर्ध निद्रित स्थिति में ले जाना चाहिए। गहरी नींद तो अपने समय पर ही आती है, किन्तु खुमारी जैसी स्थिति प्रयत्नपूर्वक भी क्या आ सकती है, इस स्थिति को योगनिद्रा कहते हैं। विचारों की भागदौड़ एकदम समाप्त कर दी जाती है। नशे की गहरी खुमारी जैसा अनुभव करना पड़ता है। शरीर और मन को पूरी तरह शिथिल करने में प्रायः पाँच मिनट का समय लग जाता है। इसमें स्व सम्मोहन जैसा प्रयोग करना होता है। अपने ही संकल्प बल से अपने को तंद्रा स्थिति तक पहुँचाया जा सकता है। यह समाधि का आरंभिक अभ्यास है। मनोबल अधिक सुदृढ़ होने पर इसी आधार पर गहरी और लम्बी समाधि भी लग सकती है।
यह कहने को तो प्राणाकर्षण प्राणायाम है, पर वस्तुतः इसे “ध्यान योग” कहना चाहिए। इसमें एक नथुना बंद करने दूसरा खोलने जैसा झंझट नहीं है और न श्वास को उलट-पुलट, रेचक, कुँभक, पूरक की क्रिया करनी पड़ती है।
इस प्रक्रिया में शरीर को शिथिल करते ही यह ध्यान करना पड़ता है कि अपने चारों ओर प्राण तत्व का सागर लहलहा रहा है। अपना शरीर उसके बीच इसी प्रकार रह रहा है, जैसे जलाशय में मछली रहती है। प्राण मात्र हवा नहीं है। उसमें मिला हुआ ऑक्सीजन भी नहीं, वरन् एक चेतन तत्व है, जिसमें जीवट, साहस, पौरुष, पराक्रम, प्रतिभा, प्रखरता, संकल्प आदि चेतन पक्ष को प्रभावित एवं उत्तेजित करने वाले गुण प्रचुर परिमाण में भरे हुए हैं। सर्वव्यापी उस प्राण चेतना में प्रकाश की चमक और ऊर्जा भी घुली हुई है। यह प्राण ही जीवन है। उसी के कारण जीवन को सुसंचालित रख सकने वाली प्राण ऊर्जा मिलती है।
शिथिलता के उपरान्त अपने सब ओर वायु की तरह प्राण भरा होने की भावना प्रगाढ़ करनी पड़ती है तत्पश्चात प्रयोग आरंभ होता है। दोनों ड़ड़ड़ड़ से धीरे धीरे साँस खींची जाती है और भावना की जाती है कि उसमें वायु के साथ प्राण भी बड़ी मात्रा में शरीर एवं मस्तिष्क के भीतर भर रहा है। श्वास धीमी गति से लेनी चाहिए। जब फेफड़े और पेट हवासे लेनी चाहिए। जब फेफड़े और पेट हवा स पूरी तरह भर जाएँ तो इस प्रथम चरण को रोक देना चाहिए। साँस खींचते समय यह धारणा बलवती होनी चाहिए कि शरीर में प्राण ने प्रवेश किया और उसके कण कण को जीवट से भर दिया है।
साँस रोकने की भीतर ही भरे रहने की क्रिया इस उपक्रम का दूसरा चरण है। इसे साधारणतया कुँभक कहा जाता है। थोड़ी देर इस स्थिति में रह कर भावना करनी चाहिए कि शरीर का प्रत्येक कण उस ऊर्जा को सोख रहा है। जिस प्रकार मिट्टी के ढेले पर पानी डालते है तो मिट्टी पानी को सोख लेती है ठीक उसी स्तर का अनुभव करना चाहिए कि जो ग्रहण किया गया था उसे अवशोषित भी कर लिया गया और काया में अभिनव चेतना का संचार हो चला।
इसके उपरान्त साँस को धीरे धीरे दोनों नासिका छिद्रों से बाहर निकालना चाहिए और भावना यह करनी चाहिए कि प्राण के प्रवेश से पूर्व शरीर में जो दुर्बलता रुग्णता थी मन में जो कुछ कुविचार कुसंस्कार भरे हुए थे उन्हें निष्कासित होना पड़ रहा है। उदाहरणार्थ किसी गिलास में पानी भरा हो और उसमें मिट्टी भरनी शुरू कर दी जाय तो स्वभावतः पहले का भरा पानी बाहर निकल कर फैलने लगा। यही स्थिति अपनी भी अनुभव करनी चाहिए कि शरीर में जा प्राण तत्व भरा गया है उसने पूर्व संचित रोग शोक एवं कषाय कल्मषों को निकाल बाहर कर दिया है।
इस प्रकार पूरी साँस धीरे धीरे बाहर निकला देनी चाहिए और अशुभ के निष्कासन की ध्यान धारण परिपक्व प्रखर करनी चाहिए। इसके बाद कुछ देर बिना हवा के रहना चाहिए। साँस रोक लेनी चाहिए और भावना करनी चाहिए कि निष्कासित दोष दुर्गुणों को वापस न लौटने देने के लिए कपाट बन्द कर दिये गये है। इस अवधि में धारणा यही रहनी चाहिए कि अन्तराल का हर कोना न केवल निर्दोष कलुष रहित हो गया है वरन् उसमें सर्वत्र दिव्य चेतना का सांर हो रहा है।
ध्यानयोग परक यह एक प्राणाकर्षण प्राणायाम हुआ। इसकी आरंभ में पाँच बार पुनरावृत्ति करनी चाहिए और फिर एक सप्ताह बाद एक की संख्या बढ़ाते चलना चाहिए। दस पर आकर रुक जाना चाहिए और अधिक मात्रा ग्रहण करने की गुँजाइश है या नहीं।
प्राण धारणा से शरीर में ऊष्मा एवं उत्तेजना बढ़ने लगती है। आलस्य प्रमाद छूटता है और आनन्द उत्साह की अनुभूति होने लगती है। दर्पण में मुँह देखने पर चेहरा चमकता हुआ प्रतीत होता है। आँखों में आनन्द और होठों पर प्रसन्नता दौड़ती है। साथ ही मस्तिष्क पर छाई हुई उदासी दूर होती है और काम करने का उत्साह उभरता है। तनाव से छुटकारा पाने में इससे बढ़िया और कोई दूसरा उपाय नहीं।
अति सर्वत्र वर्जित है। अधिक मात्रा में खाया हुआ पौष्टिक भोजन भी अपच उत्पन्न करता है। अति की ठण्ड और अति की गर्मी भी बुरा असर डालती है। ठीक इसी प्रकार प्राण की अधिक मात्रा भी उपरोक्त प्राणाकर्षण प्राणायाम के माध्यम से उतनी में ग्रहण और धारण करनी चाहिए जो अनावश्यक ऊष्मा या उत्तेजना न पैदा करने लगे।
सर्दी के दिनों में यह प्राणाकर्षण प्राणायाम धूप में अरुणोदय काल में किया जा सकता है किन्तु कपड़े भारी और मोटे किसी भी ऋतु में नहीं पहनने चाहिए क्योंकि प्राण का प्रवेश मात्र नासिका द्वारा ही नहीं रोम कूपों तथा अन्यान्य छिद्रों द्वारा भी होता है। उसी मार्ग से दूषित तत्व भी निकलते है। इसलिए मोटे कपड़े पहनने या बन्द घर में क्रिया करने की अपेक्षा खुले वातावरण में इसे करना और लज्जा ढकने लायक हलके वस्त्र ही शरीर पर रहने देना चाहिए। गर्मी के दिनों में इसके लिए सर्वोत्तम समय प्रातः काल का ब्रह्ममुहूर्त हे। उस समय अन्तरिक्ष में प्राण तत्त्व प्रवाह अत्यन्त तीव्र होता है तथा विशिष्ट प्रकार की चैतन्य धाराएँ सूक्ष्म केन्द्र से समूचे ब्रह्मांड में प्रवाहित होती है। अतः प्राण योग के लिए सबसे श्रेष्ठ समय वही है।
इच्छा भावना एवं संकल्प का पुट जुड़ने से ही क्रियाएँ प्राणवान बनती तथा अभीष्ट परिणाम प्रस्तुत करती है। ध्यान प्राण योग की प्राणाकर्षण प्राणायाम की सफलता भी इन्हीं की दृढ़ता के ऊपर निर्भर करती है। इस विशिष्ट साधना प्रक्रिया को अपना कर हर कोई ओजस तेजस वर्चस सम्पन्न बन सकता है।
अरे! यह क्या? वह हतप्रभ हो देख रहे थे। प्रत्येक फल के साथ उनका आश्चर्य द्विगुणित होता जा रहा था। न उसका विस्तार थम रहा था और न गुणित अनुपात में होने वाली उनकी आश्चर्य की बढ़ोतरी। यो चेतना का लक्षण ही है विस्तार सामान्य क्रम में इसे आश्चर्यजनक कैसे कहा जाय? पर जिस क्षण पर विस्तार समय के बाड़े को तोड़ दे जब देश और काल दोनों मिलकर उसकी सीमा रेखा खींच पाने में खुद को समर्थ पाने लगे तब..........।
वह आज प्रातः नित्य नियम के अनुसार सरिता के तट पर गए थे। उस समय पक्षियों का कलरव गुंजन लगा था जैसे भगवा आदित्य के साथ जाग कर वे भी उनका साहचर्य निभाने लगे हो। आश्रम में अन्तेवासी अपनी दिनचर्या आरम्भ कर रहे थे और वह ध्यान से निवृत्त हो सन्ध्योपासना के लिए बैठे थे।
आवश्यक उपचार पूरे कर उन्होंने गायत्री जप आरंभ किया। प्रातः काल के उदित रवि की भाँति अपनी अन्तरात्मा में बिम्बात्मा की जलती ज्योति का ध्यान किया और उस ज्योति में मन बुद्धि चित्त अहंकार के समस्त कषाय कल्मषों को जलते हुए देखा। गायत्री जप पूरा होते ही वह उठ खड़े हुए थे सूर्य भगवान को अर्घ्य देने के लिए।
कटि प्रदेश तक स्पर्श कर सके इतने गहरे पानी में प्रवेश किया और दोनों हाथों की अंजलि में पानी भर कर पूर्व दिशा में उसे छोड़ मंत्री पाठ करते हुए।
एक बार.......... दो बार.......... तीन बार इसी क्रिया को दोहराया। पर अन्तिम बार उन्होंने अपनी हथेली पर कोई जन्तु रेंगता हुआ अनुभव किया।
उनने शान्त चित से अंजलि का ध्यान से देखा। यह नन्हा दुबला मीन शिशु था कुछ तपे सोने जैसे रंग का। अंजलि के पानी में उसकी चंचल गति सूर्य रश्मियों के साथ मिलकर उसे सौंदर्य पुँज बना रही थी। बेचारा................. उन्हें दया आयी। इन भावों के साथ उसे अपने कमण्डलु में स्थान दिया।
इसी के साथ शुरू हुआ उसके विस्तार का अद्भुत क्रम कमण्डलु के कुण्ड कुण्ड से सरोवर और अब तो उसे सागर में छोड़ने के लिए बाध्य होना पड़ रहा था। प्रारंभ से वर्तमान क्षण तक की सारी घटनाएँ एक एक करके मन के चित्र पट पर उभर रही थी। वह एकटक देख रहे थे। मन सोचने में अक्षम हो रहा था। मीन शिशु से मत्स्य मत्स्य से महामत्स्य नहीं ...........नहीं........यह मत्स्य नहीं हो सकता है फिर है कौन यह? संसार भर का क्षेत्र घेरता जा रहा है।
वह इसी ऊहापोह से गुजर रहे थे कि एक वाणी गूँजी जिसने बैखरी मध्यमा पश्यन्ती परा के अनेक रूप धारण कर उनके समूचे अन्तः करण को सराबोर कर दिया, जीवन क्रम में हलचल मचा दी। वाणी अभी भी स्पष्ट थी मैं जीवधारी दीखता भर वस्तुतः युगान्तरीय चेतना हूँ। इस अनगढ़ संसार जब भी सुव्यवस्थित करना होता है तो उस सुविस्तृत कार्य को सम्पन्न करने के लिए अपनी सत्ता व नियोजित करता हूँ। आज वही समय है ठीक वही कार्य की सम्पूर्णता के लिए मुझे मानव सहचर चाहिए तुम आगे आ सकोगे?
सहायता नहीं साहचर्य चाहिए। उसी वाणी शंका का शमन किया युगान्तर कारी कार्य विराट चेतना करेगी पर उसकी अभिव्यक्ति के लिए मानव यंत्र चाहिए। आदर्शों नवीन मूल्यों व प्रतिष्ठापना के श्रेयधारक न केवल न स्वयं बनेंगे बल्कि अनेकों का पथ प्रशस्त कर सकेंगे। मनुष्य व भावी सतति युगों तक उनका यशोगान करेगी।
अब कहाँ कुछ कहना बाकी रह गया। वह सोचने लगे धन्य होती है वह घड़ियां अद्भुत हो हे वे पल जब प्रभु स्वयं देहधारी बन प्राणियों बीच विचरण करते है। मानवों को पुकारते है जाग्रत अग्रदूतों! आगे आओ! देखो! कब से तुम्हें पुकार रहा हूँ। पर हाय रे, अभागे मनुष्य तूने कब उस महाप्राण की पुकार सुननी चाही है वह तो तुझे सीन के चिपटाने के लिए आतुर है तू तो उसे बराबर ठुकरा रहा हैं सभी जो करते सो करें पर वह स्वयं.......। मैं सर्वथा तत्पर प्रभु। दिल के उद्गार वाणी से बह निकले।
युग का अवसान हुआ। महाविनाश महासृजन बदलता दिखाई देने लगा। भगवान मत्स्य एकाकी पथप्रदर्शक थे और उन्हें इस महागुरु के निर्देशन में नूतन सृजन के विश्वकर्मा बनने का सौभाग्य मिला। वह धन्य हो उठे। युग ने उन्हें आदिपुरुष स्वीकारा। मनु स्वयं को उनकी सन्तान कहने में कृतकृत्यता अनुभव करने लगा। कहना न होगा ये युगशिल्पी वैवस्वत थे। जिनका कर्तव्य हमारा मार्गदर्शक है।
नवयुग को पोषण पालन करने वाली पर चेतना हम सबके बीच मीन शिशु की भाँति लघुत्तम रूप से प्रादुर्भूत हुई थी। आज उसके लघु महान तुच्छ से विशाल होने में हमें अचम्भे जैसा व्यतिक्रम भले मालूम पड़े। पर जिस प्रयोजन लिए दिव्य सत्ता की योजना काम कर रही उसका द्रुतगामी विस्तार उपरोक्त मत्स्यावतार भाँति स्पष्ट। उसकी पुकार को सुन नवयुग मनु की भूमिका निबाहने आगे आना ही होगा।
हाथों में थमी लेखनी कुशल शिल्पी के यंत्र की भाँति कृष्णार्जुन युद्ध नाटक को अन्तिम रूप दे रही थी। शिल्पी निमग्न था अपनी रचना में द्वार खटका निमग्नता में बाधा पड़ी। कौन? इतनी रात में। रुक रुक कर मन में ये शब्द उभरे। अभी दो ही दिन पूर्व तो यह अपने साहित्यिक गुरु आचार्य सप्रेजी के साथ इस स्थान पर आया हैं किसी से कुछ खास परिचय भी नहीं।
कौन? इस छोटे से प्रश्न के उत्तर में खट खट खट का दीर्घ नाद। भला यह भी कोई मिलने का समय है। मुख से निकलते अस्फुट स्वरों में झल्लाहट का पुट था। उठ कर द्वार गुना बढ़ गई। उनके ठीक सामने एक सुन्दर युवती खड़ी थी। वह सोचने लगे क्या परेशानी आ पड़ी है इस पर जिसके कारण इतनी रात्रि को द्वार खटखटाना पड़ा। यदि यह परेशान हे तब इतने अधिक श्रृंगार की आवश्यकता क्यों कर हुई? यदि नहीं..........तो? वह निश्चय नहीं कर पा रहे थे, क्या कहें? फिर भी जैसे तैसे वह बोले देवि मैं इस समय अपने काम में व्यस्त हूँ। यदि तुम्हारी कोई समस्या है तो सुबह मैं तुमसे बात कर लूँगा।
दिन में जमींदार के यहाँ भोजन करते समय चतुर्वेदी जी ने इस युवती को भोजन परोसते हुए देखा थ। पर बात ही ऐसी है कि इसी वक्त की जा सकती है युवती ने कहा।
ऐसी क्या बात है। उन्होंने पूछा ओर फिर तनिक तीखे स्वर में बोले खैर जैसी भी बात हो मैं सुबह ही करूंगा। क्यों क्या भला आपका पुरुष इस समय बात करने में घबराता है। आप इतने कच्चे आदमी है।
युवती ने जैसे उनकी सच्चरित्रता पर प्रश्नचिह्न लगा दिया सुन कर उन्होंने दरवाजा छोड़ दिया और युवती ने अन्दर प्रवेश किया। फिर स्वयं ही बोले तुम चाहे जो समझो पर मैं यहाँ हिन्दी साहित्य सम्मेलन के काम से आया हूँ। उसी काम में व्यस्त हूँ। किसी अन्य काम के लिए मरे पास क्षण भर का भी समय नहीं है।
फिर अपने दुखियों की सेवा करने का ढोंग क्यों रच रखा है? सामने खड़ी स्त्री की वाणी में व्यंग का पुट था। ओह तो तुम दुःखी हो। बोलो मैं तुम्हारी इस वक्त क्या सेव कर सकता हूँ। उनके स्वरों से कोमलता टपक रही थी।
दरअसल बात यह है कि मैंने इण्टर पास किया है। मेरे पति विलायत से आई.सी.एम पास करके आए थे। लगभग डेढ़ साल पहले उनका स्वर्गवास हो चुका है। मैं विधवा हूँ मेरे पास दस हजार रुपया है। मैं आश्रय चाहती हूँ क्या आप मुझसे शादी करेंगे।
परन्तु मैं तो छठी पास हूँ और विवाह की बात तुम्हारे माता पिता क्यों नहीं करते? और तुम भी करती हो तो इस वक्त क्या तुक है?
बात यह है कि मैं आपको पसंद करने लगी हूँ। कहकर उसने निर्लज्ज मुसकान बिखेरी।
वह बोल पड़े अच्छा हो तुम यह विचार त्याग कर अपना धन किसी सेवा कार्य में लगाओ। विवाह करना कोई बड़ा अर्थपूर्ण कार्य नहीं है और मुझसे तो विवाह कर तुम वैसे भी पछताओगी। दस हजार रुपये दस साल भी चल गए तो उससे क्या होगा? तुम मेरे साथ बड़ी दुःखी रहोगी।
उनने उस युवती को कई तरह से समझाया और अन्ततः उसके मस्तिष्क में सेवावृत्ति जाग्रत करने में सफल रहे। समझा बुझा कर उसे वापस भेजा। जब वह युवती वापस लौट गई तो वे ऊपर आए। उन्होंने विवाह की बात छोड़कर शेष सब कुछ बता दिया। परंतु सप्रेजी तो पहले से ही सब कुछ जानते थे। युवती के आने की आहट पाकर वे भी दबे पाँव ऊपर आ गए थे और बाहर से सब कुछ सुन रहे थे। उन्होंने उनकी पीठ थपथपाते हुए कहा माखनलाल! चारित्रिक दृढ़ता ही जीवन का प्राण है। यही वह पूँजी है जिसका प्रयोग करके मनुष्य हरेक दिशा में सफलता के चरम शिखर पर पहुँच सकता है। विशेष रूप से मनीषा को तो दृढ़ चरित्र का होना ही चाहिए ओर हुआ भी यही कालान्तर में माखनलाल चतुर्वेदी हिन्दी साहित्याकाश में सूर्य की तरह उद्भासित हुए। काश! श्रृंगार की अश्लीलता की रचनाएँ लिखने वाले आज के साहित्यकार इस कालजयी से कुछ सीख ले पाते।
प्रातः सूर्य के उदय होते ही जिन्दगी का एक नया दिन शुरू होता है। इस तरह रोज एक दिन उम्र से घट जाता है। जन्म लेने के बाद से ही आयु क्षय का यह कार्यक्रम शुरू हो जाता है किन्तु अनेक प्रकार के कार्यभार से बढ़े हुए विभिन्न क्रिया व्यापारोँ में लगे रहने के कारण इस प्रकार नष्ट हुए समय का पता नहीं चलता। ऐसे अवसर प्रायः प्रतिदिन आते है जब हम जीवों के जन्म वृद्धावस्था विपत्ति रोग और मृत्यु के कारुणिक विचार प्रेरक दृश्य देखते है किन्तु कितना मदाँध कामनाग्रस्त और अविवेकी है इस धरती का मनुष्य कि वह सब कुछ देखते हुए भी स्थूल नेत्रों से विवेक और विचार की आँखों से अन्धा ही बना हुआ है। मोह और साँसारिक प्रमाद में लिप्त मनुष्य घड़ी भर एकान्त में बैठ कर इतना भी नहीं सोचता कि इस कौतूहल पूर्ण नर तनु में जन्म लेने का उद्देश्य क्या है हम कौन है कहाँ से आये और कहाँ जा रहे हैं?
प्रकृति प्रवाह की अबूझ परम्परा के प्रवाहित मनुष्य संसार के सुखों को इन्द्रियों के भोगों को पदार्थों के स्वामित्व को धन पुत्र तथा विविध कामनाओं के ही जीवन का लक्ष्य बनाकर इस बहुमूल्य अवसर का खो देता है। अन्ततः काल की घड़ी जब सामने आती है और बिदा होता समय सिर पर पापों दुष्कर्मों का भयंकर बोझ चढ़ा दिखाई देता है तो भारी पश्चाताप घोर संताप और आँतरिक अशाँति होती है। सौदा बिक गया फिर कीमत लगाई भी तो क्या.... विशाल वैभव अपार धन धान्य राशि पुत्र कोई भी तो साथ नहीं देता। यह सारा संसार यहाँ की परिस्थितियाँ सब ज्यों की त्यों दिखाई देती है किन्तु वह सब उस समय उपयोग के बाहर होती है। अपना शरीर भी साथ नहीं देता। केवल अच्छे बुरे संस्कारों का बोझ लादे हुए जीवन परवश यहाँ से उठ कर जाता है कितनी अस्थिरता होती होगी उस समय यह कोई भुक्त भोगी ही समझता होगा।
मनुष्य के जीवन में यह जो विस्मृति हे वह सब असत के संग से है। ज्ञान का आदर करने से हमारे भीतर से प्रश्न उठेंगे। हम कौन है? हम क्या है? हमें क्या नहीं करना चाहिए? इसका ज्ञान हमारे अंदर मौजूद है पर अपने जीवन का कोई सही दृष्टिकोण न बना सकने के कारण वह सारी ज्ञानशक्ति विश्रृंखलित और बेकाम पड़ी हुई मनुष्य का पहला पुरुषार्थ है जीवन लक्ष्य में प्रमाद न होने देना। यह तभी संभव है जब कर्तव्यों का उचित ओर सम्यक ज्ञान हो। कर्तव्यों की विस्मृति मनुष्य ने अपने आप ही की है। जब वह कुछ करना चाहता है तो उसे औरों की आवश्यकता का ध्यान नहीं होता वरन् वह है जानना चाहता है कि इसमें मेरा लाभ क्या है। अपने लाभ की अपेक्षा औरों के लाभ की बात सोचे तो कर्तव्य की विस्मृति न हो। इस कर्तव्य और अकर्तव्य के ज्ञान पर ही मनुष्य का उत्थान और पतन अवलम्बित है।
व्यावहारिक जीवन में कोई नीचे नहीं गिरना चाहता। सभी ऊँचे बहुत ऊँचे उठने की आकाँक्षा लिये हुए है। प्रत्येक मनुष्य अपने आपको ऊँचा सिद्ध करना चाहता है। इसके लिए अपनी अपनी तरह के पुष्टि और प्रमाण भी एकत्रित करता हे और समय पड़ने पर उन्हें व्यक्त भी करता है। ऊँचा उठना मनुष्य का स्वाभाविक धर्म भी है यदि किसी से यह पूछा जाय कि क्या उसने इस गंभीर प्रश्न पर गहराई से विचार किया है क्या कभी उसने यह भी सोचा है कि इस आकाँक्षा की पूर्ति के लिए उसने क्या योजना बनाई है तो अधिकाँश व्यक्ति इस गूढ़ प्रश्न की गहराई का भेदन भी न कर सकेंगे। बात सीधी सी है। महानता मनुष्य के अंदर छिपी हुई है और व्यक्त होने का रास्ता ढूंढ़ती है। पर साँसारिक कामनाओं से ग्रस्त मनुष्य उस आत्म प्रेरणा को भुला देना चाहता है। ठुकराये रखना चाहता है। अपमानित आत्म चुपचाप शरीर के भीतर सुप्त रहती है ओर मनुष्य केवल विडम्बनाओं के प्रपंच में ही पड़ा रहा जाता है।
शारीरिक दृष्टि से मनुष्य कितना ही बली हो जाय बौद्धिक दृष्टि से वह कितना ही तर्कशील क्यों न हो धन के जखीरे भले ही लगे हो पर आत्म संपदा के अभाव में वह मणि विहीन सर्प की तरह अर्द्धविकसित कहा जायेगा। आत्मबल की उपलब्धि का एक सुख संसार के करोड़ों सुखों से भी बढ़कर होता। आत्मिक संपदाओं वाले नेतृत्व करते है लोक मानस का मार्गदर्शन करते है। निर्धन फकीर होने पर भी बड़े बड़े महलोँ वाले उनके पैरों में गिरकर दया की भीख माँगते हैं इससे यह सिद्ध होता है कि मनुष्य की महानता बाह्य नहीं आंतरिक है। उसकी शक्ति गुण विकास पर छिपी है। आँतरिक श्रेष्ठता के आधार पर ही उसकी श्रेष्ठता प्रामाणित करती है। भौतिक संपदायें तुच्छ है थोड़े समय बड़प्पन जताकर नष्ट हो जाती है।
मनुष्य शरीर जैसा अलभ्य अवसर पाकर भी यदि उसका उद्देश्य नहीं जाना गया तो क्या मनुष्य का शरीर क्या पशु का शरीर? आत्म कल्याण की साधना जो इस जीवन में नहीं कर लेता उसके लिए इस सुर दुर्लभ अवसर का कुछ भी उपयोग नहीं। श्रीमद्भागवत् 11-6-74 में कहा गया है:-
मोक्ष के खुले द्वार रूपी मनुष्य शरीर को पाकर भी जो पक्षियों की तरह अज्ञान के घेरे में कैद है उसे लक्ष्य से निरस्त ही समझना चाहिए।
थोड़ा बाहर आकर देखिये, यह संसार कितना विस्तृत है कितना विशाल है रात्रि के खुले आसमान के नीचे खड़े होकर थोड़ा चारों ओर दृष्टि तो दोहराये कितने ग्रह नक्षत्र बिखर पड़े है। कितना बड़ा फैलाव है इस संसार का। पर इन सब बातों पर विचार करने का समय तभी मिलेगा जब भोगोन्मुख वृत्ति से चित्त हटाकर इन चेतनाप्रधान विषयों की ओर भी थोड़ी दृष्टि जमायेंगे। कामनायें ही है जो हमारी राह रोके खड़ी है। स्वार्थ ही है जो आत्म विकास के मार्ग पर आड़े खड़ा है। ईर्ष्या द्वेष काम क्रोध भय लोभों वाले निविड़ में भटक गये है। इसलिए हम इस महानता के लक्ष्य की ओर अग्रसर ही हो पा रहे।
हम उदार बने साहस पैदा करें तथा आध्यात्मिक जीवन की कठिनाइयों को झेलने के लिए उठकर खड़े हो जायँ फिर देखे कि जिस महानता की उपलब्धि के लिए हम निरन्तर लालायित रहते है वह सच्चे स्वरूप में मिलती है या नहीं। सत्य हमारे अंदर छुपा है उसे अध्यात्म पथ पर चल कर जाग्रत करें शक्ति भीतर सोई पड़ी है उसे साधना से जगाएँ जीवन की सार्थकता का यही एक मात्र मार्ग है।
फ्रेडरिक महान शासक होने के साथ साथ कुछ नाटक लिखने का भी शौक रखता था। वह अपने लिखे नाटक अपने दरबारियों को सुनाया करता था। दरबारी नाटक अच्छा न होने पर भी उसकी तारीफ के पुल बाँध दिया करते थे। इससे फ्रेडरिक को अपने बहुत बड़े नाटककार होने का भ्रम हो गया
उसी के समय में व्हाल्टेयर नाम का एक बहुत ही जाना माना सिद्ध नाटककार भी था। फ्रेडरिक द ग्रेट ने एक बार उक्त नाटककार की आमंत्रित कर बड़े गर्व से अपना नाटक सुनाया। उसे आशा थी व्हाल्टेयर भी अन्य दरबारियों की तह राज रचना होने के कारण प्रभावित होकर प्रशंसा करेगा।
किन्तु उसका नाटक मर्मज्ञ व्हाल्टेयर न उसका नाटक सुनकर बड़ी ही स्पष्टता से असफल और रद्दी कह दिया। इस पर फ्रेडरिक को बहुत बुरा लगा और उसने व्हाल्टेयर को जेल भिजवा दिया
कुछ समय बाद फ्रेडरिक ने एक और नाटक लिखा और उसने व्हाल्टेयर को बन्दीगृह से बुलाकर अपना नया नाटक सुनाया। उसे विश्वास था कि व्हाल्टेयर का विभाग जेल की यातनाओं से बदल गया होगा और अब यह अवश्य नाटक की तारीफ करेगा।
किन्तु व्हाल्टेयर नाटक सुनते सुनते बीच में ही उठ कर चल दिया। फ्रेडरिक ने पूछा कहाँ जा रहे हो? इस पर उस नाटककार ने उत्तर दिया कि आपका यह नाटक सुनने से तो जेल की यातना अच्छी है।
उसकी इस प्रकार निर्भीक स्पष्टोक्ति से फ्रेडरिक महान बहुत प्रभावित हुआ और व्हाल्टेयर को जेल से मुफ्त करके उसे अपना साहित्यिक गुरु मान लिया।
इन दिनों विचार क्रान्ति के तूफानी झकोरों से अधजगे उनींदे आँखें मलते मानव समाज की अकुलाहटें साफ नजर आ रही है। साथ ही ध्वनित होते है ये सवाल क्या जरूरत आ पड़ी इस क्रान्ति की? विगत इतिहास में हो चुकी अनेकों क्रान्तियों की अपेक्षा इसमें क्या खासियत है? सवालों की जटिलता के बावजूद इनकी सामयिकता से इन्कार नहीं किया जा सकता। मानव जीवन के इतिहास की पोथी क्रान्ति के अक्षरों से रंगी पड़ी है। मानवीयता के महाउदधि में क्रान्ति के अनेकों ज्वार उठे और राय हुए। इतने पर भी वर्तमान क्रान्ति जो स्वर्ण युग की संदेशवाहक है की अपनी मौलिकता है। इसे अतीत के पृष्ठों में झाँके वर्तमान से संबंध में सूत्र जोड़े बिना नहीं परखा जा सकता है। समुज्ज्वल भवितव्यता की चिरस्थाई संस्थापना पर विश्वास जमाने का और आधार भी क्या है?
क्रान्तियों के इतिहास के अन्दर हम दो सिद्धान्तों को काम करते दीखते है। एक तो सातत्य का सिद्धान्त है दूसरा परिवर्तन का। ये दोनों सिद्धान्त परस्पर विरोधी लगते है परन्तु ये विरोधी है नहीं। सातत्य के भीतर परिवर्तन की झलक है। इसी प्रकार परिवर्तन भी अपने अन्दर सातत्य का कुछ अंश छिपाए रखता है। असल में हमारा ध्यान उन्हीं परिवर्तनों की ओर जाता है जो क्रान्ति के रूप में अचानक फूट पड़ते है फिर भी प्रत्येक भूगर्भ शासे जानता है कि धरती की सतह पर जो बड़े बड़े परिवर्तन होते हे उनकी चाल बहुत धीमी होती है। इसी तरह क्रान्तियाँ भी धीरे धीरे होने वाले परिवर्तन और रूपांतरण की एक बहुत लम्बी प्रक्रिया का बाहरी प्रमाण भर होती है। इस तथ्य के मुताबिक पिछली क्रान्तियों को इन दिनों सम्पन्न हो रही महाक्रान्ति की तैयारी के रूप में समझा जा सकता है।
पहली क्रान्ति उस समय घटी जब क्रान्तिधर्मी मानद अपने आरम्भिक काल में छोटे छोटे समूह बनाकर रहता था। सर्वथा अव्यवस्थित किन्तु उसके पास वे सारे उपकरण थे जिनसे जीवन में क्रान्ति घटे। हुआ भी ऐसा ही। राधाकुमुद मुखर्जी की एन्सिएण्ट इण्डिया के अनुसार समूहों की व्यवस्था के सविधि संचालन के लिए राज्य का उदय हुआ। राजतन्त्र पनपा। परस्पर के सम्बन्ध उदारतापूर्वक निभ सके इस हेतु समाज नीति निर्धारित हुई। विनियम व्यवस्था ने अर्थनीति को जन्म दिया और मनुष्य के अन्तरंग उन्नयन की प्रणाली ने आध्यात्म का रूप धारण किया। यह मानव जीवन की पहली क्रान्ति थी जिसका तथ्यपूर्ण विवेचन डॉ. राँगेय राधा ने अपनी रचना आदि से इन्द्र तक में सफलतापूर्वक किया है। उस समय के राजा और राज्य व्यक्ति ओर समाज की कल्पना वैदिक साहित्य का अवगाहन किए बिना अशक्य है।
न केवल भारत में बल्कि यूनान मिश्र रोग जहाँ भी मानव ने निवास किया समष्टि मन का यही चमत्कार घटा। प्रथम क्रान्ति से जीवन तीन अंगों में व्यवस्थित हुआ राज्य अर्थ बुद्धि राज्य का नियंत्रक राजा अथवा प्रशासक अर्थ के नियंत्रक व्यापारी और बुद्धि का नियामक मनीषी। मनीषियों का धन्धा कर्तव्य मनोरंजन कुछ भी नाम दे एक ही था जीवन की समस्याओं का हल। इसी वर्ग ने हर कही मेजिनी वाल्टेयर शीक्यू लेनिन गाँधी की भूमिका निभाई। अन्य दो में से प्रथम तो जड़ता से ग्रसित होकर क्रान्ति का विरोधी ही साबित हुआ दूसरे ने तटस्थता बरतने अथवा अवसरवाद अपनाने में अपनी सार्थकता मानी।
मानव की प्रबल अभीप्सा रही है उन्नयन। जब यह अन्तर में घटित हुआ है तब वह चेतना के गंभीरतम शिखरों पर बैठा है। जब बाहर हुआ है तब आत्म विस्तार पनपा है। इस विस्तार का रूप देश काल के अनुरूप कुछ भी हो। धीरे धीरे राज्य बढ़े समाज विशाल हुआ जीवन जटिल। संकीर्णताओं की जकड़न और विवशता की बेबस सिसकियाँ गूंजी। ऋषि मनीषी क्रांतिदर्शी थे और सामान्य जन क्रान्तिधर्मी। इन दोनों में जब जो अपना पथ भूला तब तब मानवता विकल हुई। जन विकलता की तड़प ही तो क्रान्ति की तड़ित है। यह तथ्य देशव्यापी क्षेत्रव्यापी जाति व्यापी न होकर जीवन व्यापी है।
आदमी की तकलीफ के दो कारण है पहला साधनों का अभाव दूसरा व्यवस्था का वह स्वरूप जो अपने लौह पाश के द्वारा स्वाभाविक विकास को रोकना चाहता है। ये चाहे शासन के शोषक हो अथवा रूढ़ियों कुरीतियों के पृष्ठपोषक दोनों एक ही थैली के चट्टे बट्टे है। इन दोनों कारणों के पीछे वह अज्ञान है जो व्यक्ति और समाज के बीच असन्तुलन की सृष्टि करता है। राजतन्त्र के चरमराते ढाँचे ने जब व्यक्तिवाद का रूप लिया शोषणवाद को प्रश्रय दिया वही से विश्व इतिहास में क्रान्ति की श्रृंखला चल निकली। फलतः न केवल भारत बल्कि फ्राँस रूस इटली अमेरिका जापान सहित लगभग समूचे विश्व ने कसम खाली कि राजतन्त्र को उखाड़ फेंकना है। व्यक्तिवाद को बिस्मार करना है। हुआ भी यही जहाँ कही भी क्रान्तियाँ हुई उनका पहला प्रकोप राजतन्त्र पर हुआ। चूँकि राजसत्ता ने अपनी पूरी प्रभाविकता में अर्थ और समाज पर अपनी पकड़ जमा रखी थी। इसलिए उसके प्रभाव अर्थव समाज पर पड़े बिना न रहे।
ऐन इलस्ट्रेटेड आउट लाइन हिस्ट्री आँव मैनकाँइड के सम्पादक के कूपर कोल के संकेतानुसार ये सभी क्रान्तियाँ संख्या की दृष्टि से भले अनेक हो पर स्वरूप और सिद्धान्त की दृष्टि से एक सी है। राजतन्त्र के विकल्प के रूप में लोकतन्त्र व साम्यवाद प्रकाश में आए। लोकतन्त्र की शुरुआत वैशाली के गणतन्त्र से हुई जिसकी श्रृंखला अभी तक प्रवाहमान है। व्यवस्था परिवर्तन के अलावा पुनर्जागरण काल में वैज्ञानिक क्रांति सम्पन्न हुई जिसने आगे चलकर औद्योगिक क्रान्ति से अपना सहचरत्व निभाया। जीवन मूल्यों के परिप्रेक्ष्य में वैज्ञानिकता की सीधा आघात धर्म पर हुआ और जीवनशैली के क्षेत्र में औद्योगिक क्रान्ति ने उथल पुथल मचा कर रख दी।
इन सब के बावजूद क्या मानव की विकलता थमी, वेदना कम हुई? यदि नहीं तो अवश्य इन परिवर्तनों में कुछ मूलभूत कमियाँ रही होगी। यदि ऐसा न होता तो व्यक्तिवाद की समाप्ति का दावा करने वाली लोकतान्त्रिक व्यवस्था में वे न होते जिन्हें अपनी रोटी दूसरों के साथ खाना मंजूर नहीं। जिन्हें पूरी रोटी सिर्फ अपने लिए चाहिए बल्कि बस चले तो औरों की भी रोटियाँ छीन कर बेच डाले और मिले धन से घूँट भर शराब पीने में चैन महसूस करें। साम्यवाद व्यक्ति की मौलिकता पर कुठाराघात करने वाला सिद्ध न होता। विनियम और अर्जन की प्रणाली इतनी दुर्बल कैसे होती?
वास्तविकता कुछ ऐसी ही है। क्रान्ति को संरचना और प्रक्रिया पर गौर करने पर स्पष्ट होता है कि इसका आरम्भ हमेशा कुछ विचारशील साहसी परम्पराओं की तुलना में विवेक को महत्व देने वाले व्यक्तियों के द्वारा होता है। आर्थिक ढाँचा या तो तटस्थ रहता है अथवा किन्हीं अंशों में सहयोगी अथवा विरोधी। राजसत्ता हमेशा विरोधी पाले में खड़ी मिलती है। क्रान्तिकारी सर्वहित में सर्वस्व दे डालने की मौलिक विशेषता के कारण व्यक्तिवान होते है। अपने इस गुण व अदम्य साहस से वह व्यवस्था बदल डालते है। प्रकाश में आती है क्रान्तिकारी सरकार। क्रांतियां क्षेत्रीय हे या राष्ट्रीय भारत फ्राँस का उदाहरण लें अथवा मिजोरम आसाम का। नेपाल इटली अमेरिका का कोई भी क्या न हो। हर कहीं अपने समय में क्रांतिकारी सरकारें आयी है। बस यहीं से क्रान्ति रुकी और गड़बड़ियां पनपी। रशियन विचारक प्रिंस क्रोपाटकिन ने “रिवोल्यूशनरी गवर्नमेण्ट” नामक निबन्ध में इसका सुंदर विवेचन किया है। उनके अनुसार ऐसी स्थिति में क्रान्तिधर्मी- क्रान्ति विरोधी का चोला ओढ़ लेते है। सामयिक निदान हो जाने के कारण कुछ दिन अमन चैन लगता है। जाग्रतजन फिर गाढ़ी नींद के खर्राटे में डूब जाता है। परथोडे दिन बाद पोल खुल जाती है। जर्जर व्यवस्था के ढाँचे आर्थिक रूढ़ियां आपस का विद्वेष कड़वी सामाजिकता अनगढ़ जनसमुदाय सब मिलकर ऐसा भोंड़ा प्रदर्शन करने लगते है कि विश्वास नहीं होता कि यहाँ कभी क्रान्ति हुई थी।
इसका एकमेव कारण है व्यक्ति और समाज की संरचना और अंतर्संबंधों को बिसार देना। जीवन का विकास मनोसामाजिक होता है। क्रान्ति क्यों नहीं ऐसी होनी चाहिए? व्यक्ति ढले नहीं समाज सुधरा नहीं ऐसी दशा में उलट फेर कितने दिन काम देगी। स्थाई समाधान एक ही है व्यक्ति बदले समाज सुधरे। आवश्यकता मनोसामाजिक क्रान्ति की है। होता यह कि व्यवस्था को बदलने वाले क्रान्ति दल के दो भाग होते है। एक नयी व्यवस्था में प्राण भरता दूसरा व्यक्ति गढ़ता है। समाज की प्रथा परम्पराएँ कुरीतियाँ सुधारता है। मात्र सामाजिक क्रान्ति से काम चलने वाला नहीं। जमाने को भारी तादाद में विवेकानन्द गाँधी मेजिनी चाहिए जब तक इस व्यक्ति निर्मा की फैक्ट्री में ताला लगा हुआ है तब तक क्रान्ति की पूर्णता सम्भव नहीं। व्यक्ति अच्छे होंगे हर बिगड़े ढाँचे को बना देंगे। यदि ये स्वार्थ लोलुप हुए तो बने ढाँचे को भी जर्जर हो चकनाचूर होना पड़ेगा।
आज की दशा में जर्जरिक ढाँचों में पिस रहे मानवी जीवन को देखने पर यही लगता है कि घूम फिर कर आदमी वहीं बल्कि उससे भी बदतर हालत में आ पहुँचा है जहाँ से उसने अपनी यात्रा शुरू की थी। अब उसे पुनः आवश्यकता पड़ गई है कि नई व्यवस्था का सृजन हो। परस्पर के सम्बन्ध नए सिरे से विकसित हो अर्थात् समाज नीति की नयी स्मृति बने। विनियम प्रणाली ऐसी हो जो हर किसी को सामान्य जरूरतें पूरी कर सके। मानवी चेतना के अवरोध बहिरंग जीवन को परिष्कृत करने वाली एक ऐसी प्रक्रिया विकसित हो अन्धविश्वास जिसके निकट न फटके।
इस आ पड़ी जरूरत को कौन पूरा करेगा? कहाँ है ये सब विशेषताएँ? इसके लिए क्रान्ति के उस नए आयाम को ढूंढ़ना पड़ेगा जो विगत की भूलों से मुक्त हो जिसमें व्यक्ति के मनोसामाजिक नवसृजन की अपूर्व क्षमता हो। क्रान्ति का वही नया आयाम विचार क्रान्ति है। इस नए आयाम द्वार सम्पन्न हो रही महाक्रान्ति ने अपना केन्द्र बनाया है, व्यक्ति को, उसकी परिधि है समाज। व्यक्ति की अन्तरशक्तियों को उजागर करे, समाज की प्रत्येक प्रणाली को नया रूप देने के लिए कटिबद्ध हो यह। विश्व के समस्त मानव समुदाय के क्षितिज पर क्रियाशील प्रथम अहिंसक महाक्रान्ति होगी हिंसा,विद्वेष मानवीय दुर्बलताओं को जो उखाड़ फेंकने के लिए तत्पर हो उस प्रक्रिया में इनका स्थान कहाँ?
इतने पर भी इसकी शक्ति ने समूचे विश्व को चकित कर रखा है। विचारो का जबरदस्त तूफान क्या कुछ नहीं कर रहा इन दिनों 1917 की बोल्शेविक क्रान्ति गायब हिटलर का उत्थान और पतन दोनों समाप्त। हेनीर ट्रमैन रोनाल्ड रीगन तक चलने वाला शीत युद्ध पिघल कर बह गया। अटलाँटिक सन्धि का रक्षातन्त्र रदद जर्मनी का बँटवारा समाप्त। धर्म और विज्ञान के कदम एक दूसरे से मिलने के लिए बढ़े। तनिक गहरे उतरे तो पता चलेगा कि विचार क्रान्ति की वीणा ने सद्भाव सहनशीलता सदाशयता की नयी रागनियां बजाई है। हो भी क्यों न? तलवार से हम मनुष्य को पराजित कर सकते है जीत नहीं सकते। मनुष्य को जीतना उसके हृदय पर अधिकार पाना है और हृदय पर अधिकार पाना है और हृदय की राह समर भूमि की लाल कीच नहीं सहिष्णुता का शीतल प्रदेश है उदारता का उज्ज्वल क्षीर समुद्र है।
विचारों की क्रान्ति यही राह प्रशस्त कर रही है टूटे दिलों को जोड़ रही है और पुराने घावों को सहला कर उन्हें भरती जा रही है। वारसा सन्धि संगठन उत्तर अटलांटिक संगठन जिन्होंने दो दुनिया ही बसा रखी थी इस तरह एक दूसरे को छाती से चिपटाने के लिए आतुर हो उठेंगे, किसने सोचा था? पश्चिम एशिया के घोर शत्रु ईरान और ईराक का भी निकट आने के लिए सोचने लगता, बर्लिन की दीवार का धराशायी होना यही नहीं इनकी मुद्राओं ओस्तमार्क दूशमार्क का एक हो जाना सिर्फ विचारों की शक्ति का चमत्कार है इसी ने रूप को वह बल दिया जिससे “पेरेस्त्रोइका” यानी पुनर्निर्माण और “ग्लासनोस्त” यानी खुलेपन रूपी दो सबल भुजदण्ड उठे और लौह परदे को एक ओर समेट दिया।
ये तो विचारों की महाक्रान्ति के कुछ बबूले है अभी तो ज्वार आना शेष है। जिसके लिए श्री अरविन्द ने अपने ग्रन्थ “हृामन साइकल” में कहा है मनुष्य के जीवन प्रवृत्ति जो सामुदायिक मन को वशीभूत कर ले तो उसका परिणाम निश्चित ही मानव जीवन के समस्त क्षेत्र में एक गम्भीर क्रान्ति होगा। वह उसे प्रारम्भ से ही एक नया रंग और वातावरण एक उच्चतर भावना एक महत्तर उद्देश्य प्रदान करेगी इस प्रारम्भ की परिणति होगी नया युग जो व्यवस्थाओं प्रणालियों नीतियों की दृष्टि से अद्भुत होने के साथ व्यक्तित्व संरचना की दृष्टि से भी अभूतपूर्व होगा। मनुष्य को देवत्व की अनुभूति कराए और स्वर्ग के नन्दन कानन को धरती पर उतारे बिना न रहेगा।
गाय का बच्चा जब तक धीमी गति से नियम कायदे के अनुरूप दूध पीता रहता है तब तक गाय उसे पेट भर पीने देती है और दुलार से चाटती रहती है। पर जब वह उद्दंडता पर उतरता है और थन काटकर उन्हें लहूलुहान करने लगता है तो माता के तेवर बदलते है और वह करारी लात जमाकर दूर धकेल देती है। एक पक्ष का व्यवहार बदलते ही दूसरा पक्ष अपने तौर तरीके देखते देखते बदल लेता है।
प्रकृति हमारी माता है। उसी के अजस्र अनुदानों के कारण शरीर के ढाँचे से लेकर मानसिक विकास तक की जीवन को समुन्नत बनाने वाली अनेकानेक उपलब्धियां हस्तगत हुई। निर्वाह से लेकर लोक सुविधा के साधनों का भण्डार उसी की खदान से हाथ लगा है। जिस पर गर्व किया और अहंकार जताया जाता है वह समस्त साधन सामग्री प्रकृति का अनुदान भर है। इसे सीमित मात्रा में लिया और भले मानस की तरह सदुपयोग में लाया जाय तो सामान्यक्रम ठीक तरह चलता रहता है। मनुष्य को भी कुछ कभी नहीं रहती और प्रकृति संतुलन भी बिगड़ता नहीं। अदृश्य जगत में विक्षोभ की उत्पन्न नहीं होता। पर जब अतिवादी उद्दंडता अपनाई जाती है और एक सोने का अंडा देने वाली मुर्गी का पेट चीर कर देखते देखते स्वर्ण भंडार हथिया लेने की ललक उठती है तो उसका पेट चीरा जाता है और वह भी गँवा बैठा जाता है। जो सहज सरलतापूर्वक मिलता चला जाता था। यही अनौचित्य इन दिनों प्रकृति के साथ मनुष्य द्वारा अपनाया जा रहा है।
द्रुतगामी वाहनों और कारखानों के लिए तेल कोयला जैसी खनिज ऊर्जा का दोहन असाधारण गति से हो रहा है। फलतः वायुमण्डल में प्रदूषण तो भरता ही है साथ ही वह संचित भंडार भी चुकता चला जाता है। जो भूगर्भ में चिर संचय के रूप में जमा था। इस व्यतिक्रम से भूकम्पों एवं अन्यान्य प्रकृति प्रकोपों का सिलसिला बढ़ा है और वह स्थिति समीप आती जा रही है कि इस शताब्दी के भीतर वह संचय समाप्त हो जाएगा और कारखानों, दूतवाहनों के समक्ष ऊर्जा के अभाव में कबाड़खाने मात्र बन जाने की विभीषिका सामने आ खड़ी होगी।
मदिराजन्य उन्माद प्रसिद्ध है। उसकी अति मात्रा लेने पर मनुष्य नालियों में मुँह रगड़ता अनर्गल वचन बोलता ओर बावलों जैसी हरकतें करता है। दूसरा नशा सफलताजन्य अहंकार का है। जो उसे पचा नहीं पाते वे उद्दंडता का अनाचार अपनाते हैं। शरीर में बलिष्ठता आने पर गुण्डागर्दी सूझती है। पैसा बढ़ने पर दुर्व्यसनों की भीड़ दौड़ पड़ती है। अहं बढ़ने पर लोग दबाने ठगने की बात सोचते है। प्रकृति की परतों को असाधारण रूप से उधेड़ने में यत्किंचित् सफलता मिल जाने पर भी यही हो रहा है। विज्ञान को अणुबम रासायनिक बम बनाने की सूझी। विश्व विजय के सपने देखने वालों की पूरी चाण्डाल चौकड़ी जम गई। सर्वसाधारण भी अनुकरण में पीछे कैसे रहता। उसने अपना रहन सहन आहार विहार ऐसा अपनाया जिसे एक प्रकार से मुँह चिढ़ाना ही कहा जा सकता है।
एयर कंडीशन्ड कमरों में रहने वाले तात्कालिक मौज तो उठाते है पर शरीर की प्रतिरोधक शक्ति बुरी तरह गँवा बैठते है और आये दिन जुकाम जैसी बीमारियों के शिकार बने रहते है। पकवान मिष्ठान्न माँस व्यंजन जैसे स्वादों से स्वादिष्टता तो मिली पर पेट का कचूमर निकल गया और तज्जनित रक्त विकारों से अनेकानेक बीमारियों की झड़ी लग गई। यह चटोरेपन की प्रतिक्रिया है। धन लिप्सा ने कमाई के ऐसे तरीके ढूंढ़े निकाले जिनसे ढेरों सम्पदा कुछ ही समय में जमा कर लेने की ललकने ऐसा अनाचारों का ढेर लगा दिया जिनमें प्रयोक्ता को तो मनमाना लाभ हुआ पर अन्य असंख्यों को उस कुचक्र में पिसकर कंकाल भर रह जाना पड़ा। विनोद मनोरंजन के नाम पर कामुकता छद्म आक्रमण और शोषण के दृश्य देखने को मिले। फलतः आँखों को रस जरूर आया पर चिन्तन और चरित्र में निकृष्टता का दौर बढ़ता चला गया। सोचा गया कि नियन्ता की प्रकृति की कोई व्यवस्था तो है नहीं फिर संकीर्ण स्वार्थ की पूर्ति के लिए कुछ भी कर गुजरने में क्या हर्ज है। इसी ढीठता के अंतर्गत पेड़ बुरी तरह कटे और प्राणियों को घासपात की तरह उदरस्थ कर जाने की प्रथा पड़ी। कृत्रिम खाद कीटनाशक, कृत्रिम प्रजनन आदि से किसी को तात्कालिक लाभ भले ही मिले पर इनके दूरगामी परिणाम हानिकारक ही हो सकते है। होते हुए देखे भी जा रहे है।
प्रकृति के साथ बलात्कार अभी तथाकथित वैज्ञानिकों मूर्धन्यों को अपने कौशल की ध्वजा फहराने का निमित्त कारण भले ही प्रतीत होता है पर तत्वदृष्टि से देखने पर यही प्रतीत होगा कि स्वल्प सफलता के आधार पर उद्धत हुआ मनुष्य नशेबाजों की तरह ऐसा कुछ कर रहा है तो उसके लिए ही नहीं समूचे समुदाय के लिए घातक सिद्ध होगा?
आकाश में उपग्रहों का कबाड़ जमता जा रहा है। वायु में प्रदूषण भर गया है। जल शुद्धता गँवा रहे है। भूमि रेगिस्तान बनती जा रही है। दूसरों के साथ अनाचार बरतने का अभ्यासी अपनों के साथ भी वह दुष्टता बरतने में कोई अन्तर कर नहीं पा रहा है। फलतः शालीनता को भारी क्षति पहुंच रही हैं इस प्रकार के अनेकों कारण मिलते जाने पर समस्याओं और कठिनाइयों के अम्बार लगते जा रहे है।
यह अतिवादी उद्दंडतर प्रकृति एक सीमा तक ही सहन कर सकती है। अतिवादी व्यवहार किसी को भी क्षुभित कर सकता है प्रकृति को भी। समझदारी यदि वापस न लौटे तो फिर कान उमेठने और चपत जड़ने का काम दयालु माता को ही करना पड़ता है।
यह अनुभव कराने वाले अनेकों घटनाक्रम सामने आ रहे है जो बताते है कि कही कोई बड़ी भूल हो रही है। अवाँछनीयता की प्रतिक्रिया ही कई बार इतनी कठोर हो जाती है कि राह बदलने के लिए बाधित करती है। डायबिटीज, ब्लडप्रेशर आदि के रोगी अपनी खुराक पर नियंत्रण करने के लिए मन मार कर बाधित होते है असंयमी साधारण स्थिति में तो किसी के रोके नहीं रुकते पर जब उसकी प्रतिक्रिया प्राणघातक रोग खड़े कर देती है तो आपरेशन का कष्ट सहने से लेकर पैसा पानी की तरह बहाने के लिए बाधित होना पड़ता है। इसे मजबूरी भी कह सकते है प्रकृति की प्रताड़ना भी और नियन्ता की कठोरतापूर्वक शिक्षा देने की पद्धति भी।
मनुष्य में इतनी समझदारी अभी बाकी है कि वह एक सीमा तक ही उच्छृंखलता बरतता है। जब उसे संकट की भयंकरता सामने प्रत्यक्ष दीख पड़ती है तब वह सम्हलता और चाल बदलते भी देखा जाता हे। इसे समझदारी भी कह सकते है और विवशता भी। मस्ती में दौड़ने वालों के मार्ग में जब कोई बड़ा खड्डा आ जाता है तब वे बचने की बात सोचता है। सर्प सिंह का आभास मिलते ही अतिउत्साही भी वापस लौट पड़ते है। समय आ गया कि पिछली शताब्दी में प्रकृति के साथ जो अतिवादी अनाचार बरता गया है उसके परिणामों को समझा जाय और नवयुग की प्रभात किरणें आते जाते उस रवैये को बदल दिया जाय तो नींद की मीठी खुमारी में उचित और मनभावन की लगता था।
ड़ड़ड़ड़़ ईश्वरीय अनुशासन है। उसी की प्रकृति का नियंत्रण और सन्तुलन भी कहा जा सकता है। अब इसी सुधार परिष्कार का दौर चलेगा। शालीनता की रीति नीति अपनाये जाने का परिवर्तन एकाकी देखने वालों द्वारा महान परिवर्तन जैसा कहा जाएगा और अध्यात्म की भाषा में उसे “सतयुग की वापसी” नाम दिया जायेगा। इसकी उपयुक्त बेला अब आ पहुँची ही देखी जा रही हैं
अगले ही दिनों बछड़ा लात खाने के बाद सही रीति से थन चूसते का प्रयत्न करेगा। आहार में शाकाहार की ही प्रधानता होगी। लोग भूमि का भी सदुपयोग सीखेंगे। हरीतिमा उगायेंगे। शाकाहार पर निर्भर हरने में ही भलाई अनुभव करेंगे। बच्चों से लदे घरों में घुसे और कृत्रिम प्रकाश के बीच जीने के अभ्यासी नये निर्णय करेंगे कि गाँव के वातावरण में सूर्य और पवन का आश्रय लेकर स्वस्थ जीवन क्यों न जिया जाए? अगली शताब्दी शहरों से गांवों की ओर वापस लौटने की है। अधिकाँश का मानस यही चाहेगा और ऐसी ही योजनाएँ बनायेगा। गाँ बढ़कर कस्बे हो चुके होंगे। उपजाऊ भूमि नये सिरे से खोज निकालने पर इतनी गुँजाइश निकल आयेगी कि मनुष्य, पशु और पेड़ साथ-साथ सही अनुपात में जीवित रह कर एक दूसरे को संतुलित पोषण प्रदान करते रहें।
शहरों का विकास अभी तो सुरसा के मुँह की तरह फैलता जा रहा है। पर वह विस्तार अगली सदी में इस रूप में रहेगा नहीं। वे खंडहर होते जायेंगे। जिस प्रकार गाँवों का विकास नये ढंग से नये स्तर पर होने जा रहा है, उसी प्रकार शहर भी जन निवास के लिए किन्हीं उपयोगी प्रवृत्तियों के लिए सीमित प्रयोगशालाएँ, अनुसंधान-शोध संस्थान बनकर रह जायेंगे। विश्व विद्यालय-कालेजों के संस्थान बड़ी इमारतों का उलट-पुलट कर बनाये जायेंगे। पर लोग निवास के लिए ग्रामीण क्षेत्रों का ही चयन करेंगे। आखिर लौटना तो प्रकृति की समीपता की दिशा में ही है।
खाली समय में दिमाग पर चढ़ने वाली खुराफात ही कामुकता है। उसे उत्तेजना अश्लील साहित्य, संगीत कला से ही मिलता है। जब नर-नारी मिल कर सृजन प्रयोजनों में लगेंगे सगे भाइयों की तरह रहेंगे और मनोरंजन के लिए उच्च आधार उपलब्ध होने लगेंगे तो कामुकता एक हेय और उपेक्षणीय प्रवृत्ति भर रह जायेगी। ऐसी दशा में नर नारियों का स्वास्थ्य भी अच्छा रहेगा। समय भी पर्याप्त होगा। बच्चे सीमित होंगे और उन्हें समर्थ सुसंस्कारी बनाने के लिए आधार भी बड़ी मात्रा में उपलब्ध रहेंगे। प्रकृति प्रेरणा का अवगाहन करने की प्रवृत्ति जैसे ही बढ़ेगी, वैसे ही जनसंख्या का विस्फोट जा आज एक अति भयानक संकट बनकर सामने खड़ा है, सहज, सरल और सीमित होता चला जायेगा।
प्रतिभाएँ धनोपार्जन और दर्प प्रदर्शन की निस्सारता समझेंगी भी और वे उन प्रयासों में लगेंगी जिनके माध्यम से लोक मानस के परिष्कार की अनेकानेक विधाओं का उत्पादन और अभिवर्धन होता रहेगा। प्रबुद्ध लोग मनीषी बनने में अपनी उच्चस्तरीय उन्नति हुई अनुभव करेंगे। नये युग के मनुष्य को नये ढाँचे में ढालने के लिए जिस प्रकार के साहित्य की आवश्यकता है, आज उसका अभाव भले ही दीखता हो पर वह अगले दिनों पर्याप्त मात्रा में मिलने लगेगा और उसका स्तर क्रमशः अधिकाधिक दार्शनिकता और यथार्थवादिता का पुट लिये हुए होगा। मनोरंजन के भी ऐसे साधन निकल आयेंगे जो लोकरंजन और लोक मंगल की उभयपक्षीय आवश्यकता पूरी करते चलें।
प्रकृति की शरण में वापस लौटने का उद्घोष जब जन-जन के मन मन में प्रवेश करेगा तो प्रकृति पर आधिपत्य जमाने की वर्तमान उद्दंडता को पलायन करते ही बन पड़ेगा। संतों सज्जनों जैसा सादगी एवं शालीनता का जीवन कैसे जिया जाए, इसकी शिक्षा और प्रेरणा महाकाल जन-जन के मन जन में ठूंसता चला जायेगा।
कार्ल मार्क्स लन्दन में निर्वासित जीवन जी रहे थे। फ्रांस और जर्मनी की सरकारों ने उन्हें क्रान्तिकारी घोषित कर देश निकाला दे दिया था। यहीं पर रहकर उन्होंने अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ “दास कैपिटल” की रचना की थी। लन्दन प्रवास के दौरान मार्कस्् को घोर आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। इस बीच उन्हें गरीबी और भूख के कारण दो बच्चों से भी हाथ धोना पड़ा था।
समय पर किराया न चुकाने के कारण कई बार मकान मालिकों ने घरों से भी निकाल दिया था। रोटी के लिए बिस्तर भी बेचने पड़े किन्तु श्रमिकों के उद्धार का संकल्प उन्होंने उठाया था। उसे भूखे रहकर आजीवन निभाया। उसमें राई रत्ती भर शिथिलता नहीं आने दी।
उन्हीं दिनों जर्मनी में विस्मार्क का प्रभुत्व था। वे जर्मनी के प्रधान मंत्री भी थे। पूँजीवादी राष्ट्रों में जर्मनी अग्रणी था। विस्मार्क को डर था कि यदि मार्क्स् के विचार समाज में फैल गये तो मजदूरों को काबू में रख पाना सम्भव न होगा। पूँजीवाद की नींव जर्मनी से सदा के लिए उखड़ जायगी। विस्मार्क को एक उक्ति सूझी। क्यों न मार्क्स को प्रलोभन देकर खरीद लिया जाय और उसके बढ़ते प्रभाव को समाप्त कर दिया जाय। मार्क्स के पुराने साथी बूचर को लालच देकर अपने पक्ष में कर लिया। उसके हाथों गुप्त पत्र भिजवाया। जिसमें कार्ल मार्क्स को सरकारी समाचार पत्र का सम्पादक बनाने की बात कही थी। इस पत्र में पारिश्रमिक की मोटी रकम अदा करने की बात कही गई थी तथा सुरक्षा का पूरा आश्वासन भी दिया गया था। पत्र के अन्त में कहा गया था कि सरकार के समर्थन से राष्ट्र की सेवा और अच्छी तरह हो सकती है।
किन्तु मार्क्स खरीदे नहीं जा सके। विस्मार्क अपने कुटिल इरादों में असफल रहा। मार्क्स श्रेष्ठ सिद्धान्त और पवित्र लक्ष्य तथा जन कल्याण की भावना लेकर कार्य के प्रति समर्पित थे। इसलिए अभाव भरे जीवन से भी उन्हें कोई शिकायत नहीं थी। कार्ल न झुके न बिके। यह प्रलोभनों पर आदर्शों की महान विजय थी जो मार्क्स को सदा के लिए महान बना गई।
‘मनुष्य जीवन मिला ही भगवान को पाने के लिए है। संसार के भोग पदार्थ तो दूसरी योनियों में मिल सकते हैं। मनुष्य में भोगों को भोगने की उतनी शक्ति भी नहीं, जितनी दूसरे प्राणियों में है’। वक्ता की वाणी में शक्ति थी। उनकी बातें शास्त्र-संगत थीं, तर्क संगत थी और सबसे बड़ी बात यह थी कि उनका व्यक्तित्व ऐसा था जो उनके प्रत्येक शब्द को सजीव बनाए दे रहा था। भगवान को पाना है इसी जीवन में पाना है। भगवत्प्राप्ति हो गई तो जीवन सफल हुआ और न हुई तो महान हानि हुई।
प्रवचन समाप्त हुआ। लोगों ने हाथ जोड़े सिर झुकाया और एक-एक करके जाने लगे। सबको अपने-अपने काम हैं और वे आवश्यक हैं। यही क्या कम है जो इतनी देर हुई चर्चा में आकर बैठ गए। बैठने वालों में एक यह भी था पर औरों से नितान्त भिन्न। यह भिन्नता शक्ल सूरत की दृष्टि से नहीं। अंतर्मन की संरचना में थी। उसे पता नहीं था कि कथा प्रवचन पल्ला झाड़ कर भी सुने जाते हैं।
सरंजाम सिमटने लगा पर विचारों के वितान फैलने लगे। मुझे भगवत्प्राप्ति करनी है मन में यही घुमड़न चल रही थी। यों वह पढ़ा लिखा था अभी हाल में ही एम.एस.सी. प्राणिशास्त्र में किया था। विज्ञान का विद्यार्थी होने के कारण उसमें बुद्धि कौशल तो था पर साथ में श्रद्धा भी पर्याप्त थी। विज्ञान-आखिर सत्य की शोध ही तो है और कोई आवश्यक तो नहीं कि यह शोध प्रचलित दायरे में पूरी हो। वह सोचने लगा, प्रत्येक नयी शोध पुराना दायरा लाँघती है नया आयाम खोलती है तो यह शोध भी ...। चिन्तन की हवा में अतीत के पन्ने फड़फड़ा उठे। उसे याद आया कि विद्यालय में बिताया गया जीवन मानस पर साकार हो उठा। प्रयोगशाला का वह कक्ष जहाँ वह जन्तुओं की चीर फाड़ करते कहीं किन्हीं गहराइयों में खो जाया करता। साथी टोकते क्या सोचने लगे माधव। जीवन का सार खोज रहा हूँ डूबते मन से बुलबुलों की तरह जवाब फूट पड़ता। साथी खिलखिला पड़ते शिक्षक मुस्करा देते। साथियों की दृष्टि में वह बुद्धिमान, जुझारू पर सनकी था। शिक्षक उसे दार्शनिक वैज्ञानिक कहते थे। किसने उसे ठीक से समझा कुछ पता नहीं पर कुछ भी हो यह महाराष्ट्र वासी युवक अपने विगत में सभी से सम्मानित रहा। उसने अपनी अन्तहीन यात्रा लक्ष्य की दिशा में आरंभ कर दी।
चलते हुए उसे लगभग तीन महीने बीत गए। इन चौरासी दिनों में जैसे चौरासी लाख योनियों का अनुभव हो गया है। षट्–रस और नव रस में सिर्फ एक मृदु को छोड़ अन्य सभी का स्वाद वह चख चुका। भगवत्प्राप्ति तो नहीं हुई हाँ जीवन जरूर श्मशान जैसा भयावना लगने लगा। अध्यात्म साधु-मन्दिर मठ इनके बारे में सोच कर एक विरक्तिजनक मुस्कान ही उभरती। पर नहीं सब एक जैसे यह भी तो एक साधु ही है। मात्र देश नहीं गैरिक वस्त्रों की अग्नि मंजूषा में गुणों की अपार सम्पदा सिमटी है।
‘तुम पहले स्नान भोजन करो।’ गैरिक वसन से आवेष्ठित परिव्राजक ने युवक की पीठ पर हाथ फेरा जो भगवान को पाना चाहत है, भगवान उसे स्वयं पाना चाहते हैं। वह तो उन्हें पायेगा ही।
युवक ने स्नान किया और थोड़ा-सा प्रसाद शीघ्रतापूर्वक मुख में डाल कर जल पी लिया। उसे भोजन स्नान की नहीं पड़ी थी। उसकी अभीप्सा तीव्र थी लगन में प्राण थे। वह कुछ मिनटों में ही महात्मा जी के पद प्रान्त में बैठ गया।
पहले तुम यह बताओ कि “तुमने अब तक किया क्या”? साधु ने तनिक स्मित के साथ पूछा।
‘बड़ा लम्बा पुराण है’! उसने अपनी बात प्रारम्भ की। बताने लगा इधर वह बहुत भटका है। उसे एक योगी ने नेति-धोति-न्योलि ब्रह्मदांतौन तथा अन्य अनेक योग की क्रियाओं के मध्य ही उसके मस्तक में भयंकर दर्द रहने लगा। बड़ी कठिनाई से एक वृद्ध सज्जन की कृपा से दूर हुआ। उन्होंने ये सभी क्रियाएँ छुड़वा दीं।
‘ये मूर्ख साधु!’ कुछ रुष्ट हुए- ‘ये योग की कुछ क्रियाएँ सीख कर अपने अधूरे ज्ञान से युवकों का स्वास्थ्य चौपट करते फिरते हैं आज कहाँ हैं अष्टाँग योग के ज्ञाता। यम-नियम की प्रतिष्ठा नहीं हुई जीवन में और चल पड़ आसन तथा मुद्राएँ कराने। असाध्य रोग के अतिरिक्त और क्या मिलता है इस दूषित प्रयत्न में।’
‘एक ने मुझे कान बन्द करके शब्द सुनने का उपदेश दिया’ एक अन्य योगी मिले जिन्होंने ऐन्द्रजालिक जैसी तमाम क्रियाएँ दिखाईं।
‘योगी’। इस शब्द के साथ ही साधु हँस पड़े बाजीगरी योग नहीं है। अधिकारी के अधिकार को बिना जाने चाहे जिस साधन में जोत दिया जाय वह पशु तो नहीं है। साधु कह रहे थे धारणा-ध्यान समाधि चाहे शब्द योग से हो चाहे लययोग से किन्तु जीवन में चाँचल्य बना रहेगा। समाधि कुछ क्रिया मात्र से मिल जायगी, ऐसी दुराशा करने वालों को क्या कहा जाय।
उसने आगे फिर कहा “मैं सम्मान्य धार्मिक अग्रणियों के समीप भी रहा और विशाल मठों में भी। कुछ प्रख्यात पुरुषों ने मुझ पर कृपा करनी चाही। उसके स्वर में व्यंग नहीं, केवल खिन्नता थी जो अपने आश्रय धर्म का निर्वाह नहीं कर पाते, जहाँ सोने चाँदी का सेवन और सत्कार है, जो अनेक युक्तियाँ देकर शिष्यों का धन और शिष्याओं का धर्म अपहरण करने के कोशिश में लग रहते हैं, वहाँ परमार्थ और अध्यात्म भी है इसे मेरी बुद्धि ने स्वीकार नहीं किया।”
“ ओह!” इन अनुभवों ने साधु को खिन्न कर दिया। वह बोल पड़े “जहाँ संग्रह है विलासिता है, वहाँ साधुता कहाँ है। जहाँ सदाचार नहीं, इन्द्रिय तृप्ति है, वहाँ से भगवान बहुत दूर हैं। सच तो यह है कि हमें कुछ न करना पड़े कोई आशीर्वाद देकर सब कुछ कर दे, इस लोभ से जो चलेगा वह ठगा तो जाएगा ही। आज धन और नारी का धर्म जिनके लिए प्रयोजन है ऐसे वेशधारियों का बाहुल्य इसी कारण है। पर भगवान जहाँ हैं जहाँ से उनकी पुकार उठ रही है उस ओर तो तुमने आंखें उठाकर भी नहीं देखा। तुम सिर्फ भटकते रहे और इस भटकन से उपलब्धि का क्या वास्ता?”
“कहाँ है भगवान? कहाँ से उठती है उनकी पुकार”? लगभग चौंकते उसने ये सवाल पूछे। उसे लगा विषाद और आह्लाद की लगभग एक साथ अनुभूति है। विषाद समय गँवाने का और आह्लाद सही दिशा की ओर उन्मुख होने का।
‘मानवता की भूमि पर बने सेवा के मन्दिर में प्रेम की भाव मय मूर्ति बन कर प्रतिष्ठित है वह। उन निराकार की प्राप्ति संवेदना के रूप में होती है। जन मेदिनी के मध्य से उठ रहा कारुणिक रव उनकी पुकार है, उन्होंने अपना अनुभव कह सुनाया। मुझे भगवत्प्राप्ति इसी रूप में हुई है।
सन्त की वाणी ने युवक के अंतरतम को झकझोर दिया। श्री रामकृष्ण परमहंस के इन शिष्य की बात सुनकर उन्हें लगा जैसे अनुभव साकार हो बोल रहा हो। मुर्शिदाबाद में अकाल पीड़ितों की सेवा और अपने कष्ट सहिष्णु जीवन के कारण वे प्रायः देश भर में विख्यात हो चुके थे। यहाँ सारगाछी में भी नंग धड़ंग अनाथ बालकों को लेकर आश्रम में रहते। इनका व्यक्तित्व निर्माण ही उनकी उपासना थी। एक दिन तो सभी आश्चर्य में ऊब गए जब उन्होंने एक काले-कलूटे नंग धड़ंग बालक को पुरुष सूक्त के मूत्र से स्नान कराया वस्त्र आदि दिए भोजन आदि की व्यवस्था कर अपनी पाठशाला में भरती कर लिया। इस विचित्र किन्तु सत्य के इस अद्भुत संस्करण ने युवक के चिन्तन की चूलें हिला दीं।
“मुझे भगवत्प्राप्ति के लिए क्या करना है यह ठीक मार्ग आप बताने की कृपा करें” वह उनकी ओर ताकते हुए बोल पड़ा।
भगवत्प्राप्ति के लिए करना होगा पुरुषार्थ ऐसा पुरुषार्थ जो ललकार कर कह सके कोई भी व्यक्ति दुष्कृत्य से मेरे सहयोग पर निर्भर नहीं रह सकता कोई भी व्यक्ति मेरी उपस्थिति में निर्लज्जभाव से अनिष्ट चर्चा नहीं कर सकता। ऐसा पुरुषार्थ जब संवेदनामय हो उठेगा अथवा कारुणिक संवेदना जिस क्षण पुरुषार्थ मय हो उठेगी समझो उसी क्षण भगवत्प्राप्ति हो गई।
साधु के ये शब्द उसे अग्नि मंत्र लगे। इसी अग्निमंत्र से वह दीक्षित हुआ। ऐसी हो भगवत्प्राप्ति करूंगा युवा की वाणी में संकल्प के प्राण थे।
युवक की संकल्पित वाणी से अभिभूत होकर उन्होंने होकर उन्होंने उसके मस्तक पर अपना आशीर्हस्त रखा “बेटा! इस काम के लिए बड़ी घोर तपस्या की आवश्यकता है। जीवन विधाता जिसे अपना कठोर कृपाण देते हैं उसमें उसे ग्रहण करने की शक्ति है या नहीं इसकी कठिन परीक्षा वे लेते हैं। अविचलित रहो, महान संकल्प ही बड़ी वस्तु है।” इस बड़ी वस्तु को आजीवन धारण करने वाले युवक माधवराय सदाशिवराव गोलवलकर को भारत ने गुरुजी के रूप में जाना। डॉ. हेडडडड को उनमें अपना उत्तराधिकारी मिला। उनको मिली भगवत्प्राप्ति जिसकी उन्हें चिर अभीप्सा थी। ठीक उनके गुरु-स्वामी अखण्डानन्द की तरह जनक्रन्दन में उन्हें नियन्ता की पुकार सुनाई पड़ी। पुकार के वे स्वर युग सन्धि की ड़ड़ड़ड़ से सतत् उठ रहे हैं।
महायोगी का बहुआयामी व्यक्तित्व सागर में डूबी बर्फ शिला की भाँति होता है। सर्वसाधारण उसे देख और समझ ही कितना सकता है? कभी-कभी तो उसे यह भ्रम होने लगता है कि यह भारी भरकम जहाज को चकनाचूर करने की क्षमता वाली विशालकाय चट्टान न होकर बर्फ का एक छोटा सा टुकड़ा भर है। किन्तु दोष भ्रमित का भी नहीं वह अपनी सीमित दृष्टि के बूते जाने भी कितना? कुछ भी हो इनका शीतल स्पर्श अनेकों संतप्त जीवनों में नव प्राण तो भरता ही है। व्यथा उद्वेग, विक्षोभ, चिन्ता तनाव आदि न जाने कितने मनोविकारों से ग्रसित व्यक्ति उसके पास आकर मनःसन्तापों से छुटकारा पा स्वस्थ सन्तुष्ट जीवन की ताजगी पहले से भी अधिक महसूस करते हैं।
उपनिषद् प्रसंग, वेद मीमाँसा ग्रन्थों के रचनाकार मनीषी अनिर्वाण ने कहा था कि योगी मानव जाति का चिकित्सक होकर जीता है। चिकित्सक वही होगा न जा मनुष्य प्रकृति का पूर्ण जानकार हो, उसकी संरचना व क्रियापद्धति में निष्णात् हो। जिसे विकृति की क्रिया और उसके स्थान की भली प्रकार जानकारी हो। इस सबके बिना तो ‘नीम हकीम खतरे जान’ वाली उक्ति ही चरितार्थ होगी। शरीर शास्त्री सिर्फ शारीरिक गतिविधियों की जानकारी भर रखते हैं। फिर उनने यह भी भ्रम पाल रखा है कि मन भी शरीर का ही कोई टुकड़ा है। रही मनोचिकित्सकों की बात तो उनके अध्यवसाय से इन्कार नहीं किया जा सकता। पर अपने अधूरेपन को वह स्वयं स्वीकारने लगा है। मन तो मानव चेतना का एक छोटा सा हिस्सा भर है। समग्र की जानकारी प्रवीणता हासिल किए बगैर क्या उसके एक अंग को सुधारा जा सकता है?
“मेण्टल हेल्थ एण्ड हिन्दू साइकोलॉजी” के लेखक स्वामी अखिलानन्द ने स्पष्ट किया है कि एक योगी ही सफलतम मनोचिकित्सक हो सकता है। क्योंकि यह मानव प्रकृति की सूक्ष्मताओं और विचित्रताओं से भिज्ञ होता है। लूबाँर्स्की ने एक सफल मनोचिकित्सक के व्यक्तित्व के गुणों की सन् 1952 में अमेरिकन एसोसियेशन की एक मीटिंग में चर्चा करते हुए कहा “मात्र मनोविज्ञान की विधियों तथा तकनीकों में प्रशिक्षण पाने वाले व्यक्ति मनोचिकित्सक नहीं हैं। अधिकतम उसे मनोवैज्ञानिक तकनीकीशियन भर कहा जा सकता है। अच्छे मनोचिकित्सक अधिक संवेदनशील तथा चिन्तन एवम् निर्णय लेने में स्वतन्त्र होते हैं। वे व्यक्तियों से अधिक सम्मान पाते हैं व्यक्ति उन्हें पसन्द करते हैं” . .। परम पूज्य गुरुदेव ऐसे ही मनोचिकित्सक थे। उनके इस रूप का परिचय, अनुभव यों दो-चार, दस, सौ, हजार नहीं बल्कि लाखों को हुआ है। पर शायद वे उन्हें इस तरह न पहचान सके हों।
उन्होंने स्वयं इसे स्वीकारते हुए “हमारी वसीयत और विरासत” में एक स्थान पर लिखा है “हमारे पास कितने ही रोते हुए उद्विग्न विक्षिप्त आए हैं और हँसते हुए गए हैं।” यद्यपि उनके बहुमुखी जीवन को मनःचिकित्सक के छोटे से दायरे में तो किसी भी तरह नहीं समेटा जा सकता, किन्तु फिर भी उनके व्यक्तित्व का वह आयाम जिसने मार्गदर्शन दिया जो लोगों से मिला मिलने वालों की अन्तराल की गहराइयों में घुस कर उसे सँवारा, निश्चित रूप से ‘मनःचिकित्सा’ वाला पक्ष उजागर करता है।
वैज्ञानिक मनोविज्ञान की कसौटी पर उनके इस काम को परखें तो परिणाम को देखकर एक सुखद् आश्चर्य की अनुभूति हुए बिना न रहेगी। एरिकफ्राम ने आज के युग को मनःसन्ताप के युग के रूप में स्वीकारा है। आज के व्यक्तिगत व सामाजिक जीवन की दशाओं को देखने पर उसकी यह बात सौ टंच खरी दिखाई देती है। मनोरोग कितने होते हैं इसकी पूरी गणना के बारे में विशेषज्ञ अभी एक मत नहीं हो पाए। हाँ शैफर और लाँजरस जैसों ने इन सबको तीन हिस्सों में बाँट दिया है।
मनोस्नायु विकृतियाँ और व्यक्तित्व विकार। पहले में चिन्ता, तनाव, अति संवेदनशीलता भय, आदि आते हैं, दूसरे में हिस्टीरिया, भय, उद्विग्नता आदि की गणना होती है। इसे सरल ढंग से समझाते हुए पूज्य गुरुदेव ने लिखा है कि मनोरोगी अपनी दब्बू या आक्रामक प्रकृति के अनुसार घुटन या उन्माद में जीता है। इन्हीं दोनों की अन्तर्क्रिया व्यक्तित्व की अनेकानेक गड़बड़ियों के रूप में सामने आती हैं।
मनोरोग होते क्यों हैं? इसका कारण मनोवैज्ञानिक कितना स्पष्ट कर पाए यह तो विवाद का विषय है। पर आचार्यश्री स्वयं एक स्थान पर अवश्य लिखते हैं कि मनोरोग और कुछ नहीं कुचली, मसली, रौंदी गई भावनाएँ हैं। इनकी यह दशा हमारे अपने अथवा परिवेश के दूषित चिन्तन के कारण होती है। ‘सतयुग की वापसी’ पुस्तक में वह कहते हैं। “विकृतियाँ दिखती भर ऊपर हैं। इनकी जड़ें गहराई में कुसंस्कारिता के रूप में छिपी हैं। भावनाओं की यह टूट-फूट कब और कैसे हुई? इसके भेद के अनुसार मनोरोगों के अनेकों भेद हो जाते हैं।”
जहाँ ता इनके ठीक करने का सवाल है, संसार भर के क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट चार विधियाँ सुझाते हैं। रेचन, सुझाव, प्रत्यायन और पुनर्शिक्षा। बाकी प्रणालियाँ किसी न किसी तरह इनकी सहायता की हैं। इनमें से कोई एक विधि का प्रयोग करता है कोई दूसरी। उन्होंने इनमें से सभी विधियों का सफलतापूर्वक प्रयोग किया। रेचन-अर्थात् किसी के अन्दर दमित भावों को उगलवाना कोई सरल काम नहीं। मनोचिकित्सकों के इस हेतु सम्मोहन जैसी कितनी ही विधियों का प्रयोग करना पड़ता है। पर उनके सम्मोहक व्यक्तित्व के सामने आकर उनके विश्वास से अनुप्राणित होकर वह सारा हाल कह देते थे जिसे उन्होंने अभी तक अपनी पत्नी-पति जैसे घनिष्ठतम सम्बंधियों से छुपाए रखा।
इसके बाद वह आने वालों के जीवन के लिए हितकारी सुझाव देते। अब इस स्थिति में क्या करना है? न केवल इसका ब्यौरा बताते बल्कि आगे सहायता करने का वचन देते। उनके सुझाव में सिर्फ मनोरोग का शमन ही नहीं अपितु उच्चतर जीवन के लिए पर्याप्त मार्गदर्शन भी होता। यों उनके सामने आकर हर कोई अपने दिल का हाल खुशी-खुशी बखान देता। फिर भी ऐसे नए लोग भी होते, जिन्हें पहली बार आने के कारण झिझक होना स्वाभाविक था। उनके रेचन के लिए उन्हें वह विधि प्रयोग करनी पड़ती जिसके लिए श्री माँ ने मातृवाणी में कहा है कि “मैं सामने खड़े व्यक्ति की आँखों से उतर कर उसकी समग्र सत्ता की सूक्ष्मातिसूक्ष्म बातें पकड़ लेती हूँ।” इस सक्षम विधि से वे सारी बातों को जान हँसते-हँसाते ऐसी बातें सुना देतीं जो न केवल चिकित्सा रूप होतीं बल्कि व्यक्ति उनको अपना मान बैठता।
मनोवेत्ताओं ने मनःचिकित्सा को दो वर्गों में बाँटा है। पहली वैयक्तिक दूसरी सामूहिक। वैयक्तिक में रोग की तीव्रता होती है। यं सब विकट उन्माद या घुटन में जकड़े होते हैं। सामूहिक चिकित्सा में उन लोगों की गणना की जा सकती है जिन्हें चिन्ता, अनिद्रा, स्नायविक दौर्बल्य जैसी व्याधियाँ होती हैं। आध्यात्मिक सेनेटोरियम के रूप में विकसित शाँतिकुँज में प्रारम्भ के दिनों स अब तक के शिविरों का विश्लेषण इस संदर्भ में किया जाय तो उपलब्धियाँ चमत्कृत कर देने वाली होंगी। प्राण प्रत्यावर्तन, अनुदान, जीवनसाधना, कल्प साधना जैसे शिविरों में अपनी बीती बातों को उन्हें लिखकर देना, साधनात्मक उपचार, औषधि कल्प जैसी विधाओं से व्यक्तियों के जीवन में अकल्पनीय परिवर्तन घटित हुआ।
उनके द्वारा आरंभ की गयी सामूहिक मनोचिकित्सा का एक और सशक्त पक्ष है “गायत्री मंत्र”। “ऑकल्ट साइकोलॉजी ऑफ हिन्दूज” में एन. शुभनारायनन ने वैयक्तिक एवम् सामूहिक मनोचिकित्सा की उत्तम विधा के रूप में इसे स्वीकारा है। संक्षेप में इसे व्यक्तित्व समायोजन की उन्नत विधि के रूप में माना गया है। इसका जप अपने आप में पूर्ण प्रयोग है। जिसका यथाविधि पालन करने पर शब्द शक्ति का शरीर पर पड़ने वाला प्रभाव, जप की लब के द्वारा प्राण का परिमार्जन और एकाग्रतापूर्ण चिन्तन के द्वारा अचेतन का रूपांतरण घटित होता है। इतना ही नहीं इन तीनों का समायोजन सत्ता के उस मूलभूत केन्द्र के आस पास होता है जिसे कार्लगुस्ताव जुंग ने अपनी भाषा में ‘सेन्टर’ कह कर सम्बोधित किया है। इसमें प्रयोगकर्ता साधक का चेतन मन एकाग्र और हलचल रहित होने से सम्प्रेषित किए जा रहे मंत्र के दिव्य भाव उस स्तर का पुनर्गठन करने लगते हैं जिसे मनोवैज्ञानिकों ने मनुष्य में बालकः बर्बर, दमित वासनाओं का पिटारा कहा है। यह अपने आपमें मनःचिकित्सा क्षेत्र की अभूतपूर्व उपलब्धि है।
पू. गुरुदेव की भूमिका महज एक मनोचिकित्सक भर की नहीं रही। बल्कि उन्होंने सैद्धान्तिक व प्रायोगिक मनोविज्ञान के क्षेत्र में भी अद्भुत काम किया है। इस सम्बन्ध में यदि उन्हें भारतीय मनोविज्ञान का पुनर्जीवन करने वाला कहा जाय तो कोई अत्युक्ति न होगी। यद्यपि डॉ. यदूनाथ सिन्हा की “इण्डियन साइकोलॉजी” स्वामी अखिलानन्द की “हिन्दू साइकोलॉजी” आदि गिने-चुने ग्रन्थों में भारतीय ऋषि चिन्तन में यत्र-तत्र बिखरे मनोवैज्ञानिक तत्वों का सुन्दर संकलन किया गया है। इन मनीषियों का कार्य प्रशंसनीय होते हुए भी प्रायोगिक कसौटी पर न कसे जाने के कारण अधूरा ही कहा जाएगा।
सिद्धान्तों को प्रयोग की कसौटी पर सिद्ध करने के लिए उन्होंने ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान की संस्थापना की। ताकि शाँतिकुँज के आध्यात्मिक सेनेटोरियम में व्यक्तित्व की अनगढ़ता को उचित मार्गदर्शन में सँवार रहे व्यक्तियों का आधुनिक विधियों से सूक्ष्म व व्यापक परीक्षण किया जा सके। वैज्ञानिक कसौटी पर कसी जा रही इस पद्धति को उन्होंने दो विधाओं का एकीकरण कर पूर्णता दी। साइकियाट्रिस्ट सामान्यतया कुछ गिनी चुनी औषधियों पर निर्भर रहते हैं और साइकोलॉजिस्ट कुछ तकनीकों पर। इन औषधियों का स्नायु संस्थान पर कितना खराब असर पड़ता है इसे कोई भी डेविड जॉन इंग्लेबी द्वारा संपादित कृति “क्रिटिकल साइकियाट्री” पढ़ कर जान सकता है और मनोवैज्ञानिक भी अपनी तकनीकों का अधूरापन उस समय अनुभव करने लगते हैं जब रोग तीव्र होता है। पूज्य गुरुदेव ऋषि प्रणीत आयुर्वेद की प्रभावकारी औषधियों एवम् उपनिषद् योग आदि शास्त्रों में वर्णित विभिन्न तकनीकों का एकीकरण कर मनःचिकित्सा की ऐसी समग्र पद्धति तैयार कर गए, जो भावी मनःचिकित्सकों के लिए आधार भूमि प्रस्तुत करेगी।
सैद्धान्तिक मनोविज्ञान के क्षेत्र में उनकी गवेषणाओं का विस्तार कर पाना तो यहाँ सम्भव नहीं। फिर भी मानव की मूल प्रवृत्ति के रूप में व्यक्तित्व संदर्भ में उनकी अवधारणा का स्पष्टीकरण करने से काफी कुछ झलक मिल जाती है। उन्होंने फ्रायडवादियों की कामुकता के स्थान पर महानता, उल्लास और सहकारिता को मूल प्रवृत्तियों को प्रामाणित कर एक नया सोपान रचा। इसी प्रकार व्यक्तित्व के केन्द्रों की जगह तीन वर्ग किए-सामान्य, असामान्य और अतिसामान्य। पहले में औसत व्यक्ति दूसरे में मनोरोगी, तीसरे में महामानवों को रखा। इसके पहले मनोरोगियों एवम् महामानवों दोनों को असामान्य करार करने की प्रथा थी साथ ही व्यक्तित्व को पर्सोना अर्थात् मुखौटा के स्थान पर गुणों के समुच्चय के रूप में मान्यता दी।
इसी तरह उनकी अनेकों मौलिक गवेषणाएँ हैं जो मनोवैज्ञानिक चिन्तन को एक नई दिशा सुझाने वाली हैं। इनका निकट भविष्य में उसी तरह प्रकटीकरण होगा जैसी मनःचिकित्सक ए. एस. दलाल ने “लिविंग विद इन” व मनोवैज्ञानिक डॉ. इन्द्रसेन ने “इनटीग्रल साइकोलॉजी” में श्री अरविन्द के चिन्तन में व्याप्त मनःचिकित्सा व सैद्धान्तिक मनोविज्ञान के तत्वों को भली प्रकार स्पष्ट किया। इनसे भी कहीं अधिक व्यापक और शोधपरक संकलन अगले दिनों जिज्ञासुओं के समक्ष आएगा। जो अपनी उपादेयता मनोविज्ञान के नूतन आयाम के रूप में प्रस्तुत करने के साथ पूज्य गुरुदेव का परिचय मनोविज्ञान के दिशादर्शक के रूप में देने में समर्थ होगा।
महात्मा उधर से निकले, तो युवती ने रोक कर पूछा-”महाराज! क्रोध न आवे, घर में कलह न हो, इसका कोई उपाय बतलाते जाइए, बड़ा उपकार होगा। आप तो शास्त्रों के ज्ञाता हैं, बड़े तपस्वी हैं।”
महात्मा ने बिना देर किये उत्तर दिया “बेटी! क्रोध के उपचार यों तो शास्त्रों में अनेक दिये हैं, किन्तु तू उन झंझटों में मत पड़। एक सरल उपाय है कि जब भी तुझे क्रोध आवे और कलह का प्रसंग आता दिखाई दे, तू अपने मुँह में पानी का घूँट भर कर पाँच मिनट तक बिना निगले बैठी रहा कर। न तुझसे बोलना बन सकेगा, न तकरार आगे बढ़ेगी।”
युवती का समाधान हो गया।
आज के युग में चारों ओर दृष्टि डालते हैं तो छलावा, दुरभि सन्धियाँ, आपसी व्यवहार में कर्कशता ही दिखाई पड़ती है। दैनन्दिन जीवन की कठिनाइयों, प्रतिकूलताओं से परेशान मन शान्ति चाहता है दिलासा चाहता है, उसका मन करता है कि कोई अपना स्नेह भरा हाथ उसकी पीठ पर भी फिराए। किन्तु उद्विग्न करने वाले, जीवन का निषेधात्मक पहलू दिखाने वाले अधिक एवं जीवन को ऊँचा उठाने की प्रेरणा देने वाले कम ही देखे जाते हैं। साहित्य यह सेवा कर सकता था व व्यक्ति के मनोबल को ऊँचा उठाकर उसे सृजनात्मक दिशा दे सकता था। किन्तु वहाँ से भी हताशा ही हाथ लगती है। उसमें समाज में फैली विपन्नताओं, कष्ट कठिनाइयों का अच्छा खासा चित्रण रहता है जो व्यक्ति को सोचने की, जीने की सही दिशा देने के स्थान पर उसमें निराशा का संचार करता रहता है। ऐसी परिस्थितियों में विश्वास नहीं होता कि मात्र अपनी लेखनी के जादू से कुछ पंक्तियों द्वारा ममत्व भरा परामर्श देकर एक सामान्य से दीखने वाले सद्गृहस्थ ने ने केवल अनगिनत व्यक्तियों में नूतन प्रेरणा का अभिसंचार किया वरन् प्रगति की दिशा दिखा कर उन्हें महामानव बनने नवसृजन का निमित्त बन जाने तक का श्रेय प्रदान किया।
जिस युग पुरुष ने यह अपौरुषेय पुरुषार्थ संपन्न किया, हमारे बीच जो विगत पाँच दशक से हमारा अपना ही एक अभिन्न अंग बनकर हमारे हृदय पर राज्य करता रहा, उसके इस पहलू को इस तथ्य से जाना जा सकता है कि लगभग पचास पूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी के हाथ से लिखे, मूर्च्छितों में भी प्राण फूँकने वाली संजीवनी से ओत−प्रोत प. अभी भी सुरक्षित हैं। यही पत्र इन साधकों के जीवन की अमूल्य निधि हैं व वे उन्हें स्मरण करते रहने के लिए सदैव उन्हें छाती से लगाए रखेंगे। अब स्थूल रूप से वे तो हमारे बीच नहीं हैं किन्तु उनका बहुमूल्य परामर्श जो दैनन्दिन जीवन संबंधी था, साधना से जुड़ा हुआ था तथा अन्तरंग की गहन पत्तों को उखाड़ कर अंतःकरण की चिकित्सा करता चलता था, इन पंक्तियों के रूप में हमारे पास अभी भी है। पत्र लेखन की यह शैली संभवतः आने वाले वर्षों में अनगिनत छात्रों के लिए शोध का विषय बन। फिर भी जो इस पक्ष से अभी तक अनभिज्ञ हैं, संभवतः उन दिनों नहीं बाद में इस महामानव व ऋषि युग्म के तंत्र से जुड़े हों, उनको लाभान्वित करने के लिए ऐसे कुछ पत्रों के महत्वपूर्ण अंश यहाँ प्रकाशित किये जा रहे हैं।
21-6-1951 को लिखे गए अपने एक पत्र में पूज्य गुरुदेव अपने एक परिजन को लिखते हैं-”आप हमारी आत्मा के टुकड़े हैं। इस मानव शरीर से परम निस्वार्थ एवं सात्विक प्रेम जितना कोई किसी से कर सकता है, उतना ही हम आप से करते हैं। यह आप से कहने की नहीं वरन् मन में रखने की बात है। आप विश्वास रखें, जब तक हम जीवित हैं, आपको सदा ही अविरल पितृप्रेम प्राप्त होता रहेगा।” इसी प्रकार 5 दिसम्बर 1950 को एक आत्मीय शिष्य को अपने पत्र में वे लिखते हैं -”आप अपनी आत्मा के एक भाग है। आप जैसे स्वजनों को भूल जाने का अर्थ है अपने आपको भूल जाना। यह किसी प्रकार भी संभव नहीं है। आपके आत्मिक विकास का हमें पूरा पूरा ध्यान है।”
मनोदशा सब की यदाकदा गड़बड़ाती रहती है। ऐसी स्थिति में सही मार्गदर्शन मिलें तो कहाँ से? हर व्यक्ति हर समय तो चलकर किसी के पास जाकर अपनी मन की बात कहता नहीं रह सकता। ऐसी स्थिति में अगणित परिजन अपने मन की बात पूज्य गुरुदेव को लिख भेजते व हल्के हो जाते क्योंकि वे निश्चिन्त थे कि उनके मन पर छाया घटाटोप इसके साथ ही मिट जाएगा। समाधान भी ऐसा मर्मस्पर्शी आता कि व्यक्ति अंदर से हिल जाता था। एक सज्जन को ऐसी ही परिस्थितियों में लिखे गए एक पत्र का जवाब इस प्रकार मिला “हमारे आत्मस्वरूप,
आपका पत्र मिला। धूप-छाँह की तरह मनुष्य के जीवन में तीनों के उभार आते रहते हैं। समुद्र में ज्वार भाटे की तरह मन भी कई बार उतार चढ़ाव के झोंके लेता रहता है। महाभारत के बाद पाण्डवों न श्री कृष्ण जी से युद्ध के समय कही हुई गीता पुनः सुनाने की प्रार्थना की तो श्री कृष्ण जी ने उत्तर दिया कि उस समय मेरी जो आत्मिक स्थिति थी, वह अब नहीं है, इसलिए वह गीता तो नहीं सुना सकता पर दूसरा उपयोगी ज्ञान “अनुगीता” के नाम से सुनाता हूँ। इस प्रसंग से यह विदित होता है कि बड़े-बड़े की मनोदशा में भी उभार आते रहते हैं। आपको भी वैसा हुआ हो तो कोई आश्चर्य की बात नहीं है। बदली हटते ही सूर्य का प्रकाश प्रकट हो जाएगा। आपका आधार बहुत मजबूत है। उसे पकड़े रहने वाले व्यक्ति की कभी दुर्गति नहीं होती।” यह पत्र 21 नवंबर 1952 को लिखा गया था। कितना सशक्त मनःचिकित्सक के स्तर का प्रतिपादन है एवं प्रमाणित करता है कि यदि व्यक्ति की अंतरंग परतों को स्पर्श कर मनःस्थिति ठीक बनाये रखने का परामर्श दिया जाय तो उन्हें ऊँचा उठने हेतु समर्थ आधार दिया जा सकता है। पूज्य गुरुदेव ने आजीवन यही सेवा की।
12-11-1953 को एक अखण्ड-ज्योति पाठक को लिखे एक पत्र में पूज्य आचार्य श्री लिखते हैं “आप हमें हमारी आत्मा के समान प्रिय हैं। हम सदा आपके समीप हैं। जिस क्षण भी आप आवश्यकता समझें, आपके घर पहुँचने को अविलम्ब, तत्पर हैं।” यही नहीं वे पत्रों में ममत्व भरे मार्गदर्शन के साथ रचनात्मक दिशा निर्देश भी दिया करते थे। इसी पत्र में वे लिखते हैं-”आपका समय अमूल्य है। इसे आत्मवत् ही महत्त्वपूर्ण कार्यों में लगाना है। आपके आसपास का मण्डल आपके द्वारा आत्मिक ज्ञान के प्रकाश से आलोकित होगा। इस दिशा में आपको विश्वमित्र और भगीरथ जैसा प्रयत्न करना है। राजनीतिक झंझटों से आपकी शक्ति बचा कर उसी क्षेत्र में लगायी जानी है। आप इस के लिए तैयारी करते रहने में संलग्न रहें।”
यही मार्गदर्शन व्यक्ति की प्रसुप्त क्षमताओं को उभार कर कहाँ से कहाँ पहुँचा देता था। जो आज राजनीति के शीर्ष पर हैं, समाज सेवा के क्षेत्र में काफी ऊँचे सोपानों को पार कर चुके हैं उन्हें समय समय पर मिला बहुमूल्य मार्गदर्शन ही मूल प्रेरणा का स्रोत बना।
अपनी तप तपसाधना से औरों को लाभान्वित करना ही सदैव पूज्य गुरुदेव का लक्ष्य रहा। वे 21 जनवरी 1955 को लिखे गए एक पत्र में एक घनिष्ठ आत्मीय को लिखते हैं-”हम अधिक शक्ति प्राप्त करने जा रहे हैं और उसका परिपूर्ण लाभ आपको मिलने वाला है। आपके साथ हमारी आत्मा अविच्छिन्न रूप से जुड़ी हुई है और वह तब तक जुड़ी रहेगी जब तक हम दोनों पूर्णता का लक्ष्य प्राप्त नहीं कर लेते।”
परिजन विभिन्न साधनाओं की जटिलताओं में उलझकर उनसे मार्गदर्शन लेते थे। कोई कुण्डलिनी, चक्रवेधन तथा कोई हठयोग अथवा विरक्ति प्रधान साधना का विधान जानने व मार्गदर्शन प्राप्त करने का हठ करता तो उनका उत्तर यों होता था- “शबरी, निषाद, रैदास, आदि अनेक साधारण स्थिति के साधक बिना विशिष्ट योग साधनाओं के ही उच्च लक्ष्य को प्राप्त कर सके थे। आप भी वैसा ही कर सकेंगे। गृहस्थ त्यागने की, नौकरी छोड़ने की आपको आवश्यकता न पड़ेगी। कोई चमत्कारिक अनुभव आपको भले ही न हो पर आप गृहस्थ योग की भूमिका का ठीक प्रकार पालन करते हुए योगी और यतियों की गति प्राप्त कर लेंगे। आप इस संबंध में पूर्ण निश्चिन्त रहें और सब सोचना विचारना हमारे ऊपर छोड़ दें।” यह पत्र 21 फरवरी 1954 को एक जिज्ञासु आत्मीय परिजन को लिखा गया था। इससे प्रतिपादित होता है कि वे साधक के भटकने की सारी संभावनाओं की जानकारी रखते हुए मनःस्थिति के अनुरूप एक चिकित्सक के स्तर का ऐसा परामर्श देते थे जिससे कोई आकस्मिक कदम न उठाकर व्यक्ति सहज जीवन साधना के पथ पर सुगमतापूर्वक चलता रह सके।
आध्यात्मिक यात्रा ठीक चल रही है या नहीं इस संबंध में अपने सारगर्भित पत्र में वे लिखते-”साँसारिक झंझट तो आपके साथ इसलिए चलते रहेंगे कि जिसका जितना आपको देना-लेना है, उसको चुकाने की व्यवस्था करनी है ताकि आगे के लिए कोई हिसाब किताब ऐसा न रह जाय जो बन्धन कारक हो। आपका वर्तमान कालीन कोई कर्म बंधन कारक न बनने दिया जायेगा। उसका तो हम स्वयं परिमार्जन करते रहते हैं। उसकी तनिक भी चिन्ता नहीं करनी है। चिन्ता तो केवल पूर्व संचय की है जिसका लम्बा हिसाब-किताब इसी जीवन में बेबाक करना आवश्यक है।” कितना आश्वासन देता था यह कथन उस व्यक्ति को जो कर्म, बंधन, मोक्ष की ऊहापोह में फँसा इधर-उधर भटकता रहा था। अपनी समस्या पत्र पाते ही सुलझती देख सहज ही भावनाशील परिजन कभी कभी कुछ राशि “अखण्ड-ज्योति संस्थान” के नाम भेज देते, तब उनका जवाब होता था- “आपका भेजा हुआ (211) का मनीआर्डर मिला। आपके पैसे इतनी उच्चकोटि की श्रद्धा से भरे होते हैं कि उनको व्यक्तिगत उपयोग में लाते हुए हमारा अन्तःस्तल काँप जाता है। इन्हें पचाने के लिए उच्चकोटि का ऋषित्व अपने अन्दर होना आवश्यक है। इसलिए आमतौर से आपके पैसों को परमार्थ में लगा देते हैं यदि इस राशि का अन्न का एक कण भी हमारे उपयोग में आएगा तो उतने दिन की हमारी तपश्चर्या एवं सेवा साधना आपकी होगी व पुण्य आपको हस्तान्तरित होगा।”
क्या यह पंक्तियाँ पढ़ते हुए पाठकों को नहीं लगता कि इस पुरुष ने अपने वर्तमान विशाल परिकर को बनाने, संगठित करने के लिए कितने प्रचण्ड स्तर की तपश्चर्या की है? जिसने धनाध्यक्षों के धन को ठुकरा दिया, स्वेच्छा से भेजे गए परिजनों की राशि को सत्प्रयोजनों में लगा दिया वह निश्चित ही नरसी मेहता के, बापा जलाराम के स्तर का उच्चकोटि का साधक रहा होगा जिसे पुण्य के बीजों को बोने के बदले में अनगिनत मूल्य वाली फसल काटने को मिली। लाखों की श्रद्धा, सद्भावना निस्पृहता, निर्लोभिता की कड़ी परीक्षा से गुजर कर ही अर्जित की जा सकती है, इस तथ्य का साक्षी रहा है पूज्यवर का जीवन। जो बाबाजी बिना तपे आशीर्वचनों की मृगमरीचिका में, अपने शारीरिक गठन एवं आकर्षक व्यक्तित्व के माध्यम से शिष्यगणों को उलझाते व ठगते रहते हैं, उन के लिए यह एक सिखावन है कि पहले देना सीखो, तुम्हें मिलता स्वतः जाएगा। समाजरूपी खेत में बोए दानों की फसल ढेरों सोना उगल सकती है
यदि निस्पृह भाव से समाज देवता की आराधना की गयी हो?
उपयुक्त मार्गदर्शन पाकर साधक स्तर के अंतःकरण वाले सहज ही उन्हें पत्र लिखकर अपना गुरु बनाने को लिखते व पूछते कि इस के लिए उन्हें क्या करना चाहिए? 24 जनवरी 1945 को लिखे एक पत्र में वे परिजन को संबोधित करते हैं- “गुरु तत्व में हम सब की वैसी ही निष्ठा होनी चाहिए जैसी कि अपने मन में धारण करने का आप प्रयत्न कर रहे हैं। परन्तु इतना स्मरण रखना चाहिए कि मनुष्य आखिर मनुष्य ही है। उसमें दोष होना संभव है। मुझे आम निर्दोष न समझें। इतना मानने - समझ लेने के बाद ही अपनी निष्ठा को केन्द्रीभूत करें। देवता मान लेने से आपकी साधना को हानि पहुँच सकती है।” कितना बेबाक स्पष्टवादी मार्गदर्शन है। यहाँ यह बताना उचित होगा कि उस समय वे “मैं क्या हूँ?” जैसी गूढ़ उपनिषद् स्तर की पुस्तक लिख चुके थे। तथापि सभी को सत्साहित्य पढ़ते रहने व सत्यधर्म की दीक्षा लेने का ही आग्रह करते थे। गुरुदीक्षा तो उनने तब देना आरंभ की जब चौबीस लक्ष के चौबीस महापुरश्चरण पूरा कर उनने पूर्णाहुति कर ली। ज्येष्ठ सुदी 10 गायत्री जयन्ती 1953 (संवत् 2010) को उनने अपने जीवन की पहली दीक्षा तीस साधकों को देकर एक महान शुरुआत की। लगभग पाँच करोड़ व्यक्तियों को मात्र 36-37 वर्ष में अध्यात्म पथ पर दीक्षित कर जिसने उच्च प्रगति के सोपानों पर चढ़ा दिया हो वह स्वयं शक्ति अर्जित किए बिना औरों को अनुदान कैसे देता? यही कारण था कि उनके सत्परामर्श मनोवैज्ञानिक, आध्यात्मिक सूत्रों से युक्त होते थे।
ईश्वर भक्ति संबंधी परामर्श भी अध्यात्म पथ के पथिक अपनी ओर से उन्हें दिया करते थे, जिसे वे सिरमाथे रख अपनी महानता का परिचय देते थे। एक पत्र जो फरवरी 1946 में लिख गया, वे लिखते हैं -”ईश्वर भक्ति संबंध में आप का विचार ही हमें अधिक उचित प्रतीति होता है। राम और कृष्ण यद्यपि ऐतिहासिक पुरुष भी हुए हैं पर उनसे हमारे इष्टदेव भिन्न हैं? व्यक्ति आदर्श हो सकते हैं, ईश्वर नहीं। ईश्वरीय सत्ता वाले राम या कृष्ण की अन्तःकरण में धारणा करनी चाहिए। ऐतिहासिक राम, कृष्ण के चरित्रता के में कुछ दोष भी हैं उनको इष्टदेव मानने से हम घाटे में रहेंगे। ध्यान प्रतिमा-इष्टदेव उच्च आदर्शों एवं दिव्य गुणों से ही सम्पन्न होनी चाहिए। मानवीय दोषों का उनके साथ समन्वय कर देने से उलझनें बढ़ जाती हैं। अच्छा हो आप भी एक आदर्श नियत कर लें। राम, कृष्ण या बुद्ध की प्रतिमाएँ ध्यान के योग्य उत्तम हैं। आप हमें या किसी अन्य जीवित पुरुष को उस आसन पर बिठाने की भूल न करें।”
ईसा अपनी शिष्य मंडली समेत प्रधान प्रयास पर जा रहे थे। सन्ध्या को उन्हें एक स्थान पर विराम लेना पड़ा। भोजन की आवश्यकता सामने आई। प्रबन्ध कुछ था नहीं।
ईसा ने कहा “तुम लोगों के पास जो कुछ है उसे इकट्ठा कर लो और मिल बाँट कर खाओ”। ऐसा ही किया गया। सब के सामग्री इकट्ठी करने पर मात्र पाँच रोटी इकट्ठी हुईं। मंडली बड़ी थी। पर भोजन सामग्री को एक जगह जमा कर के जब मिल जुलकर खाया गया तो सभी का पेट भर गया।
इसे कहते हैं सम्मिलित शक्ति का चमत्कार।
कितना सही अध्ययन है एक व्यक्ति की मनःस्थिति का एवं तदनुरूप उसके समाधान का? जबतक बुद्धि सक्रिय हो, तर्क श्रद्धा-समर्पण में आड़े आता हो तब तक समाधान किस स्तर का दिया जाना चाहिए, इसे वे भली भाँति समझते थे। प्रतीकपूजा, मूर्तिपूजा, गुरुवरण पर भाँति भाँति के विचार रखने वाले परिजनों के लिए उनका इसी स्तर का मार्गदर्शन रहा करता था।
प्रत्येक पत्र स्वयं में एक पाठ्य सामग्री होता था गूढ़ विवेचना एवं व्यावहारिक तर्क सम्मत मार्गदर्शन से युक्त भी, यह लिखने वाले उस मनीषी की ही विशेषता थी। कभी यह आग्रह नहीं होता था कि सामने वाला उनकी बात को माने ही। वे अपना विनम्र निवेदन प्रस्तुत कर देते, आत्मीयता भरा अनुरोध भी तथा लिखते कि जो लिखा, वह आपको ठीक लगे तो ही ग्रहण करें।
यज्ञ की व्याख्या एक तार्किक जिज्ञासु को लिखते हुए उनने स्पष्ट - “यज्ञ मनुष्य का प्रधान कर्त्तव्य है। धर्म का प्रमुख आधार है। गीता के अनुसार यज्ञ कई प्रकार के हैं। उनमें से एक अग्निहोत्र भी है। कोई अग्निहोत्र को ही यज्ञ मानते हैं परंतु ज्ञान यज्ञ आदि भी उतने ही पवित्र हैं जितना अग्निहोत्र। रुचि भिन्नता के अनुसार सभी उत्तम हैं, सभी फलदायक हैं। हो सकता है कि महर्षि दयानन्द ने मूर्तिपूजा के पाखण्ड से लोगों का चित हटाने के लिए हवन की पद्धति के कर्मकाण्ड पर विशेष जोर दिया हो। वर्तमान समय में हमारे देश के दो प्रधान रोग हैं-(1) अज्ञान (2) दरिद्रता इन दो को हटाने के कार्य में जो क्रिया सहायक न होती हो, वह सामयिक युगधर्म के अनुसार शायद यज्ञ न ठहराई जा सकेगी। ज्ञानयज्ञ विचारक्राँति शायद उसका सही स्वरूप होगा।”
उपरोक्त पत्र उनने एक अक्टूबर 1943 को एक साधक को लिखा था। तब उनकी आयु थी 32 वर्ष, वे आर्य समाज (चौक) मथुरा के प्रधान थे एवं संभवतः पूछे गए प्रश्न का उत्तर इससे समुचित सटीक व अधिक कोई और नहीं हो सकता था।
समय-समय पर नर मानवों को उनकी प्रसुप्त सुसंस्कारिता जगाने के निमित्त वे लिखते “आप साधारण परिस्थिति में गुजर जरूर कर रहे हैं, पर वस्तुतः अत्यन्त उच्च कोटि की आत्मा हैं। रोटी खाने और दिन गुजारने के लिए आप पैदा नहीं हुए। विशेष प्रयोजन ले कर ही अवतरित हुए हैं। उस प्रयोजन को पूरा करने में ही लग पड़ना चाहिए। आत्मबल द्वारा ही साहसपूर्ण कदम उठाये जाते है। आप अब उसी की तैयारी करें और हमारे सच्चे उत्तराधिकारी की तरह हमारा स्थान सँभालें।
स्वयं अपने संबंध में बार-बार परिजनों के लिखने पर वे उन्हें प्रत्युत्तर देते “भविष्य वाणियाँ (जो आपने लिखीं) हमारे अपने ही संबंध में हैं। लोग पहचान नहीं पा रहे हैं समय निकल जाने पर पहचानेंगे और पछतायेंगे। आपको इस संदर्भ में क्या करना होगा से हम मिलने पर बतायेंगे।” (18-3-70)। इसी प्रकार एक साधक को 11-9-1963 को लिखते हुए उनने स्पष्ट किया- “रामकृष्ण परमहंस का चित्र पूजा के स्थान पर रखने में कोई हर्ज नहीं। अब से तीसरा पूर्व शरीर हमारी ही आत्मा ने रामकृष्ण परमहंस का धारण किया है। वही आत्मा आपके वर्तमान गुरुरूप में विद्यमान है।
हमारे आत्म स्वरूप,
पत्र मिला। कुशल समाचार मिला अशुभ स्वप्नों का डडडड कर दिया हैं। अभी चिन्ता न करें। सभी कृपया परमहंस का पत्र पूजा के सम्मान पर रखने में हर्ज नहीं। उसने तीसरा पूर्व शरीर हमने ही आत्मा के ग्रहण ड़ड़ड़ड़ का धारण उस है। नहीं आत्मा आपने वर्तमान मुझ रूप में विद्यमान है।
प्रस्तुत है इस पत्र की फोटो प्रतिलिपि।
इन सब विस्तृत जानकारियों के बाद भी क्या किसी के मन में कोई संदेह होना चाहिए? एक युग पुरुष के संबंध में उस उच्च मार्गदर्शक सत्ता के विषय में जो उन्हें उँगली पकड़ कर चलना सिखाती रही व अपने साथ नाव में बिठा कर उन्हें जन्म जन्मान्तरों के लिए निहाल कर गयी।
आत्मवत् सर्वभूतेषु” का संदेश देने वाले रामतीर्थ अमेरिका पहुँचे। जहाज सेन फ्रांसिस्को बंदरगाह पर रुका। जहाज खड़ा होते ही सभी यात्री जल्दी-जल्दी अपना सामान सँभालने लगे। सब में उतरने की जल्दी और उत्सुकता दिखाई देने लगी। जहाज में एक तरफ एक व्यक्ति शान्तभाव से डैक पर खड़ा था। उसके चेहरे पर न कोई घबराहट दिखाई दे रही थी और न ही उतरने की उतावली। वह कुछ देर तक एक अमेरिकन व्यक्ति देखता रहा और अन्त में बोला- “क्यों महाशय, आपको यहाँ नहीं उतरना है क्या? अपना सामान क्यों नहीं सँभालते”?
व्यक्ति स्वाभाविक मुसकराहट की मुद्रा में प्रत्युत्तर देते हुये बोला- “मेरे पास कोई सामान नहीं है”। “तो पासे में पैसे तो होंगे ही जिससे खाने-पीने का काम चलता होगा”? यह तुरन्त दूसरा प्रश्न हो उठा। “मैं अपने पास पैसे नहीं रखता।” “तब तो यहाँ कोई आपका मित्र होगा, जिसके यहाँ ठहरना होगा”? यह युवक का तीसरा प्रश्न था।
स्वामी रामतीर्थ में प्रचण्ड आत्म-विश्वास था और सबमें अपनी ही आत्मा देखने का आत्म-भाव भी। इसी आधार को लेकर तो वे इतनी लम्बी यात्रा आरम्भ कर रहे थे।
स्वामी जी युवक को प्रत्युत्तर देते हुये बोले, “हाँ यहाँ हमारा एक मित्र है जिसके यहाँ हमें रुकना है और जो हमारी सब सहायतायें भी करेगा।” वह व्यक्ति कौन है? सच्चे वेदान्ती रामतीर्थ जी हँसे और उसके कंधे पर हाथ रखते हुये बोले “आप ही मेरे मित्र हैं।”
सम्पूर्ण सृष्टि मेरा विधान, मैं ही अदृश्य, मैं दृश्यमान, मैं उद्गम मैं ही विलय स्वयं, फिर क्या मेरा उद्भव-पयाण?
तन की सीमा के आर-पार, बिल्कुल अछोर मेरा प्रसार। मैं अखिल विश्व का स्वयं मूल, मैं ही कारण, मैं ही निदान।
स्वयं धैर्य, मैं हूँ अधीर, मैं स्थूल-सूक्ष्म-कारण शरीर, सुगम-अगम हूँ एक साथ, मैं हूँ लघुतम, मैं हूँ महान।
मैं आदि मध्य हूँ, और अन्त, मैं हूँ अनादि, मैं हूँ अनन्त, मैं सुबह और दोपहर मैं ही, मैं ही संध्या दिवसावसान।
मैं चाहूँ तो बढ़ चले सूर्य, मेरी इच्छा से ढले सूर्य, पाकर मेरा संकेत मात्र, रुक जाता नभ में अंशुमान।
मैं सविता का स्वर्णिम प्रकाश, प्राणों में बहता हुआ श्वास, जन-जन, अणु-अणु में विद्यमान, चेतनता ही मेरा प्रमाण।
मेरी इच्छा से बनी सृष्टि,मेरी समष्टि, प्यारी समष्टि, मैं अंधकार मैं दिशाज्ञान, हर संशय का मैं समाधान।
मैं स्वयं बना नश्वर शरीर, हरने को जग की गहन पीर, संघर्ष असुरता से करके, करने धरती का परित्राण।
मेरे वंशज सपूत! बढ़ चलो, क्रान्ति के अग्रदूत! पुरुषार्थ तुम्हारा सावधान, लाएगा कल नूतन विहान।
-शचीन्द्र भटनागर
*समाप्त*