हाड़-माँस का पुतला दुर्बलकाय मानव प्राणी शारीरिक दृष्टि से तुच्छ और नगण्य है। मामूली जीव-जन्तु पशु-पक्षी जिस तरह का निसर्ग जीवन जीते हैं, उसी तरह जिन्दगी की लाश नर पशु भी ढोते रहते हैं। इस तरह की जिन्दगी जीने से किसी का जीवनोद्देश्य पूरा नहीं होता।
‘विचार’ ही वह शक्ति है जिसने मनुष्य को अन्य प्राणियों की तुलना में अधिक सुख सुविधाएँ उपार्जित करने में समर्थ बनाया। यह विचार का प्रथम चमत्कार है। इससे अगला चमत्कार तब प्रारंभ होता है, जब वह विचारणा की महान शक्ति, जीवन का उद्देश्य, स्वरूप और उपयोग करने की सही जानकारी प्राप्त करने में प्रवृत्त होता है। उसी मार्ग एवं प्रयास पर तत्पर होने का नाम तत्वज्ञान दर्शन, अध्यात्म, आत्मिकी है। विचार शक्ति का मूल्य और महत्व जिसे विदित हो गया, वह अपनी इस ईश्वर प्रदत्त दिव्य विभूति को परम लक्ष्य की प्राप्ति में प्रयुक्त करता है। फलस्वरूप उसका सारा जीवन बदल जाता है। प्रत्येक क्रियाकलाप उत्कृष्टता और आदर्शवादिता से ओतप्रोत बनता चला जाता है।
यही मानव जीवन का गौरव तथा आनन्द है। विचारशीलता का अवलम्बन लेकर जीने में ही मनुष्य जन्म की सार्थकता है। रोटी के लिए मरते-खपते रहना मनुष्य का नहीं तुच्छ जीव जन्तुओं की कार्य है। अच्छा हो, हम अपनी-अपनी विचारशक्ति और जिन्दगी की कीमत समझें और वह गतिविधि अपनायें जो अपने स्तर और गौरव के उपयुक्त है।
धर्म जीवन का प्राण है। प्राणवायु के समान ही इसके बिना एक क्षण भी रह सकना संभव नहीं है। धर्म उतना ही व्यापक है। जितना कि यह सृष्टि। इसका सम्बन्ध मानव जीवन के साथ आदि काल से है। किसी न किसी रूप में वह मनुष्य जीवन के साथ सदा जुड़ा रहा है। आचरण की श्रेष्ठता, विचारों की उत्कृष्टता तथा भावनाओं की पवित्रता ही धर्म का व्यवहारिक लक्ष्य है। यही अपनी चरम सीमा पर पहुँच कर उन अलौकिक अनुभूतियों का मार्ग प्रशस्त करता है, जिन्हें ईश्वरानुभूति के रूप में शास्त्रकारों ने निरूपित किया है। धर्म की नाव पर बैठ कर ही आत्मकल्याण, आत्मशान्ति और आत्मिक प्रगति का समुद्र पार किया जा सकता है, उससे कम में नहीं।
मनीषियों ने धर्म को परिभाषित करते हुए कहा है ‘धारयते जनैरिति धर्म ‘ मनुष्य द्वारा जिसे धारण किया जाता है, अर्थात् मनुष्य मात्र जिसे अपने आचरण में लाये, वह ही धर्म कहलाता है। धर्म को धारण करने वाला, धर्म का अपने जीवन में आचरण करने वाला, धर्म के आधार पर जीवन जीने वाला व्यक्ति धार्मिक कहलाता है।
आस्तिकता, उपासना, शास्त्र श्रवण, पूजापाठ, कथा कीर्तन, व्रत-उपवास, संयम, नियम, सत्संग, तीर्थयात्रा, पर्व-संस्कार आदि समस्त प्रक्रियायें धर्म भावना को परिपक्व करने के उद्देश्य से विनिर्मित हुई हैं, ताकि मनुष्य अपने जीवन के महारिपुओं-वासना-तृष्णा, लोभ, मोह तथा आकर्षण एवं प्रलोभनों से मुक्त होकर अपने कर्तव्य पथ पर अवाधगति से अग्रसर हो सके। किन्तु आज तो इन सबकी उपेक्षा करके मात्र पूजा-पाठ के क्रिया कृत्यों में निरत रहना ही धर्म परायणता का चिन्ह बन गया है। धर्म के प्रति अनास्था इसी विकृति के कारण उत्पन्न हुई है।
प्रख्यात विचारक जी टी पैट्रिक ने अपनी कृति ‘इन्ट्रोडक्शन टू फिलॉसफी’ में लिखा है कि-अधिकाँश व्यक्ति धर्म का नाम लेते ही मन्दिरों, मस्जिदों, गुरुद्वारों, गिरिजाघरों, प्रार्थनाओं आदि का स्मरण करते हैं और धार्मिक क्रिया-कृत्यों को ही धर्म का स्वरूप मान लेते हैं। जबकि वे धर्म नहीं मात्र कलेवर हैं। धर्म के प्रति आस्था की अभिव्यक्ति के माध्यम भर हैं। पर कितने ही व्यक्ति ऐसे भी हो सकते हैं जिनका विश्वास इन चीजों-बहिरंग उपादानों पर न हो। जबकि वे पूर्णतः धार्मिक हो सकते हैं। उनका आचरण धर्म को-उनमें सन्निहित आदर्शों को स्वयं व्यक्त करता है।
मूर्धन्य मनीषियों ने धर्म को कर्तव्यपरायणता के रूप में परिभाषित किया है। ऐसी कर्तव्यपरायणता जो मनुष्य को व्यक्तिगत संकीर्ण दायरे से निकालती तथा समष्टि की ओर चलने-उससे बँधने की प्रेरणा देती है। सचमुच ही गंभीरता एवं सूक्ष्म दृष्टि से विचार किया जाय तो स्पष्ट होगा कि धर्म के मूल में वही प्रेरणाएँ परोक्ष रूप से उद्भासित होती हैं। गुण, कर्म, स्वभाव, की-चिंतन, चरित्र , व्यवहार की उत्कृष्टता, प्रखरता ही धर्म का व्यावहारिक लक्ष्य हैं। पुरातन ऋषियों ने धर्म का सृजन - आत्मानुभूति के महान लक्ष्य को प्राप्त करने एवं आत्मवत् सर्वभूतेषु की भावना के अनुरूप आचरण करने के लिए किया था। शास्त्र-पुराण, देवालय आदि का निर्माण इसी प्रशिक्षण के लिये हुआ। मानवी व्यक्तित्व के परिशोधन एवं सद्गुणों के अभिवर्धन के लिए यह मनोवैज्ञानिक शैली उसकी मानसिक संरचना को ध्यान में रख कर ही अपनाई गई थी। जो प्रकारान्तर से अपने प्रयोजन में विशेष रूप से सफल रही।
मानव बुद्धि का दुरुपयोग तो हर क्षेत्र में हुआ है, फिर भला धर्म ही उससे अछूता क्यों बचे? निहित स्वार्थियों ने उसकी आड़ में अनेकानेक विकृतियाँ भर दीं। समाज और उससे संबद्ध जिन आचार संहिताओं, रीति-रिवाजों, परम्पराओं का निर्माण व्यक्ति के सर्वांगीण विकास के लिए हुआ था, उनका स्थान रूढ़ियों और मूढ़मान्यताओं ने ले लिया। धर्मक्षेत्र की इन विकृतियों को देखकर कभी यदि महान विचारक कार्लमार्क्स का यह उद्गार फूट पड़ा हो कि- धर्म अफीम की गोली है जिसके नशे में जनता को सुला दिया जाता है तो आश्चर्य किस बात का?
पर उन्होंने धर्म के सही स्वरूप को एवं लक्ष्य को समझा, उनने एक मत से कहा कि धर्म मानवी विकास के लिए एक अनिवार्यता है। धर्मतत्व का गहराई से अध्ययन करने वाले मनीषी दार्शनिक काण्ट का कथन है कि- हम धर्म से दूर नहीं जा सकते, क्योंकि उसके बिना जीवन में समग्रता एवं परिपूर्णता नहीं आ सकती। यदि धर्म अपने विकसित रूप में जीवन में व्यक्त होने लगे तो मनुष्य अमरता को प्राप्त कर सकता है और यह वैयक्तिक तथा सामाजिक प्रगति का सूत्रधार बन सकता है।
वर्तमान समय को मानवी इतिहास का विशिष्ट काल कहा जा सकता है। यह इसलिए कि वर्तमान संधिकाल में मनुष्य ऐसे दोराहे पर खड़ा है, जहाँ से विकास और विनाश के दो मार्ग निकलते हैं। अब यह निर्णय मनुष्य को करना है कि वह विकास के पथ पर चलना पसंद करता है अथवा विनाश के। विकास के पथ पर चल कर वह हर प्रकार से न सिर्फ व्यक्तिगत रूप से फायदे में रहेगा, वरन् विश्व-वसुधा को भी देवत्व के मार्ग पर ले चल कर सतयुगी वातावरण विनिर्मित करेगा, पर यदि उसने विनाश के रास्ते का चयन किया तो, सृष्टि-संचालक सत्ता इसे किसी प्रकार सहन न करेगी और अपने वज्र दण्ड के प्रहार से अथवा प्रकृति प्रकोपों की विभीषिका के माध्यम से वैसे तत्वों को सही पथ पर लाने का, या उन्हें विनष्ट कर इस विश्व-उद्यान को सुरक्षित बचा लेने का अपना चिर−परिचित संकल्प दुहरायेगी। इस प्रक्रिया में यदि घुन के साथ गेहूँ पिस जाने का उल्टा उपक्रम भी देखने को मिले, तो आश्चर्य नहीं करना चाहिए।
पर विश्व-पटल पर दृष्टिपात करने से ऐसा लगता है कि मनुष्य की सद्बुद्धि धीरे-धीरे जग रही है अथवा यह कहा जा सकता है कि महाकाल की सक्रियता ने उन्हें ऐसा करने पर विवश किया है। कुछ भी हो, पर अब ऐसा प्रतीत होने लगा है कि वर्षा पूर्व दिल दहलाने वाली भयंकर गड़गड़ाहट सुना कर इन दिनों महाकाल यह दिखा देना चाहता है कि विरासत में सौंपी धरित्री को मनुष्य ने यदि बरबाद करने के लिए ठान लिया, तो वह इसे मूक दर्शक बन कर देखता नहीं रह जायेगा वरन् इसकी भागीरथी मुहिम अपने मजबूत कंधों पर उठा कर उसे सजाने-सँवारने का प्रयास आरंभ करेगा, और तब की भयंकरता मनुष्य को कोढ़ में खाज की तरह भुगतनी पड़ेगी। अतः मनुष्य का कल्याण इसी में है कि महाकाल के रौद्र रूप धारण करने से पूर्व वह स्वयं को और इस संसार को सँभाल ले, ताकि नियामक सत्ता को अपराधी के प्रति कठोर कदम उठाने के लिए बाधित न होना पड़े।
नटखट बालक जब ऊधम मचाना आरंभ करता है और किसी प्रकार वश में नहीं आता, तो अभिभावक पहले भय दिखा कर उसे सन्मार्ग पर लाने की कोशिश करते हैं, पर जब यह प्रक्रिया भी कारगर साबित नहीं होती, तो अपनी प्रिय संतान के प्रति भी उन्हें कठोर रुख अपनाना पड़ता एवं दण्डित करना पड़ता है। भय दिखाने की लगभग ऐसी ही प्रक्रिया महाकाल ने इन दिनों अपनायी है और लगता है उसकी यह चाल सही पड़ गई। इसका अनुकूल उत्तर मनुष्यों की ओर से मिलना आरंभ हो गया है। इसका आभास विश्व घटनाक्रमों पर दृष्टि निक्षेप करने पर सहज ही मिलने लगता है। कॉलिन काउड्रे ने अपनी पुस्तक “गॉड एण्ड हिज मास्टरपीस क्रियेशन- दि वर्ल्ड” में इसी आशय का मन्तव्य प्रकट करते हुए कहा है कि भगवद् सत्ता भले ही अदृश्य और परोक्ष हो, पर वह इतनी निर्बल और असमर्थ भी नहीं है कि जिस मनुष्य को उसने बनाया, वही उसकी सर्वोत्तम कृति को धूलि में मिला देने का दुस्साहस करे। वह कहते हैं कि परमसत्ता चाहे तो मनुष्य को, जिसे उसने बुद्धि की विलक्षण सम्पदा दी है, और जिसका मानव को गर्व भी है एवं उसी अहंकार के वशीभूत हो उसने भस्मासुर जैसा दुस्साहस करने का प्रयत्न किया है, उसे क्षणमात्र में धूलि चटा दे, पर वह दयालु सत्ता सब कुछ तब तक सहती रहती है, जब तक सहिष्णुता की अन्तिम सीमा को पार न कर जाये। इसके बाद ही वह कोई कठोर कदम उठाती है।
यदि हम मनुष्य के मूल स्वरूप के बारे में विचार करें, तो ज्ञात होगा कि मनुष्य जैसा कि उसे माना जाता है कि वह उठा हुआ पशु है भ्रमपूर्ण प्रतीत होगा, भले ही आज उसकी स्थिति इससे और भी दयनीय हो गई हो, जिससे उसे विकसित पशु तो क्या बुद्धिहीन पशु कहने में भी संकोच नहीं किया जाता, पर यह मान्यता नितान्त भ्रमपूर्ण है। जब वन्य प्राणी घने जंगलों में दिग्भ्रान्त हो फँस जाते हैं, तो वह वहाँ से निकलने की लाख कोशिश करने के बावजूद भी असफल होकर वहीं मर-खप कर समाप्त हो जाते हैं। मनुष्य की आज की स्थिति लगभग ऐसी ही है। इतने पर भी उसके मूल स्वरूप में कोई अन्तर नहीं आता। क्षणिक और सामयिक भटकाव से ही उसे पशु कह देना उचित नहीं है। वस्तुतः वह उठा हुआ पशु नहीं, अपितु गिरा हुआ देवता है। यह देवत्व आज भी उसमें मौजूद है, पर समस्या एक ही है कि देवासुर-संग्राम की तरह आज उसका असुरत्व उस पर हावी हो चला है, इसीलिए हमें वह पशु तुल्य जान दीख पड़ता है, किन्तु वास्तविकता ऐसी है नहीं। अब उसका देवत्व जगने का क्रम आरंभ हो गया है।
जैकब स्मिथ अपने बहुचर्चित ग्रन्थ मैन-डेविल और डीटी में इसी प्रकार की विचारधारा प्रकट करते हुए कहते हैं कि यदि मानवी असुरत्व को उसके वास्तविक सत्ता का उद्बोधन और दिग्दर्शन कराया जाय, तो कोई कारण नहीं कि उसके देवत्व में रूपांतरण न हो सके। इसके समर्थन में वह ढेर सारे पूर्वात्य और पाश्चात्य उदाहरण प्रस्तुत करते हैं तथा कहते हैं कि यह सारे प्रतिमान इस बात को सिद्ध करने के लिए पर्याप्त हैं कि मानवी सत्ता मूलतः देवत्व प्रधान है, देवत्व का ही वह प्रतिनिधित्व करती है। उनका यह कथन ऋषिकाल के प्राचीन भारतीय इतिहास का पर्यवेक्षण करने से भी सही साबित होता है और इन दिनों के विश्वस्तरीय चिन्तन-पद्धति में आये विलक्षण परिवर्तन से भी सत्य प्रमाणित हो रहा है, भले ही उसके पीछे महाकाल अथवा किसी उच्च स्तरीय सत्ता का परोक्ष हाथ हो, पर इनसे इतना तो निर्विवाद सिद्ध हो गया है कि जैसी मान्यता मानव के विषय में बना कर रखी गई थी, वस्तुतः वह भ्रामक है।
कहते हैं कि भटकता हुआ यदि देर से भी वापस आ जाये, तो हर्ज नहीं। अरबी की देर आयद दुरुस्त आयद कहावत प्रसिद्ध है। मनुष्य के लिए अभी भी कुछ बिगड़ा नहीं है और न विशेष विलम्ब हुआ है। यदि अभी भी वह देवत्व के अपने मूल स्वरूप में स्वयं को परिवर्तित कर लेता है, तो यह सृष्टि अभी सुरक्षित बच जायेगी और महाकाल को कोई कदम भी नहीं उठाना पड़ेगा, अन्यथा मनुष्य उसकी प्रताड़ना से किसी भी प्रकार बच न सकेगा।
पीटर टेलर ने अपनी पुस्तक “डिवाइन मैन” में ठीक ही कहा है कि मनुष्य यदि संकल्प कर ले, तो उसके लिए नेक इन्सान तो क्या देवता के समतुल्य बन सकना भी असंभव नहीं, पर इसके लिए पहाड़ को खोखला करने वाली दीमक जैसी दृढ़ता चाहिए। इस धैर्य व दृढ़ता के अभाव में ही आज वह दीन-दयनीय स्थिति में पड़ा पशुवत जान पड़ता है, किन्तु एक बार किसी प्रकार उसकी इस सामूहिक दृढ़ता का, जो उसे श्रेय पथ पर ले जाने में सक्षम होती है, उसका उद्दीपन-जागरण हो जाय, तो फिर वह असाधारण-अभूतपूर्व जैसा बन कर ही रहता है। अब मनुष्य के जागरण का अनुकूल समय आ पहुँचा है, जब एक बार फिर से वह देवत्व के अपने पुरातन इतिहास को दुहराने जा रहा है। इस क्रम में यदि आगामी शताब्दी के अन्त तक गोल्डन एज (स्वर्णिम युग) जैसा कुछ धरती पर अवतरित हो जाय, तो हमें आश्चर्य नहीं करना चाहिए।
एक लकड़हारा जंगल में लकड़ी काटने जाया करता था। एक निर्मल छाया वाले पेड़ के नीचे विश्राम करता। वहाँ बैठ कर भोजन भी करता। उसी पेड़ पर अदृश्य रूप से रहने वाले यक्ष से लकड़हारे की घनिष्ठता बढ़ गई। यक्ष विभिन्न रूप से उस बालक के साथ मनोरंजन करता रहता।
एक दिन प्रत्यक्ष प्रकट होकर यक्ष ने लकड़हारे से कहा मैं यक्ष हूँ। तुम्हें जो वरदान चाहिए माँग लो।
लकड़हारा लालची था। मेरे चार हाथ हो जायँ तो दुगनी लकड़ियाँ काट सकूँगा। दो सिर हो जाय तो उन दुगनी कटी लकड़ियों को दोनों सिर पर लाद भी ले जाया करूंगा। यह सोचकर उसने अपने चार हाथ और दो सिर हो जाने की वर याचना की। यक्ष ने उसका मनोरथ पूरा कर दिया। लकड़हारे को बहुत प्रसन्नता हुयी कि आज से ही आमदनी दुगनी बढ़ जायेगी और लोगों को अपने से दुगना दृष्टिगोचर होने की सम्पन्न प्राप्त कर सकूँगा।
शाम को लकड़हारा घर पहुँचा तो सभी लोग आश्चर्यचकित हो गये। उसकी इस अद्भुत आकृति को देखकर कुछ डरने लगे, कुछ ईर्ष्या करने लगे और कुछ उसे भूत प्रेत समझ कर डंडों से पीटने लगे।
इस दुर्गति से घिर जाने पर उसका लकड़ी काटने का स्वाभाविक काम भी छूट गया। लोग पीछा ही नहीं छोड़ते थे। अन्ततः उसी हैरानी से उसकी मृत्यु हो गई।
सामान्य जनों के बीच समरूप बनकर ही रहना चाहिए। जो अपने को असाधारण प्रकट करना चाहते हैं, वे दुर्गति का शिकार होते हैं।
एक ही कैमरे से एक ही वस्तु के अनेक कोणों से फोटो खींचें जायँ, तो वे सभी एक-दूसरे से भिन्न-भिन्न होंगे, किसी में पीठ आयेगी, तो किसी में चेहरा, किसी में बगल, इनमें से जो जिसे पसंद करेगा, वह उसे अंगीकार करेगा। धर्म के सम्बन्ध में यही बात है। उसका सही स्वरूप अध्यात्म है। इसी को उत्कृष्ट दृष्टिकोण कहते हैं। इस आधार पर जो देखा और जाना जाता है, उसी को सही कह सकते हैं, अन्यथा सम्प्रदाय पक्ष के साथ जुड़ें हुए प्रचलन परस्पर एक-दूसरे से अत्यधिक भिन्न हैं। कई बार तो सत्यान्वेषी विवेक-बुद्धि से उनका निरीक्षण परीक्षण किया जाता है, कि यह सारा जंजाल कहीं अन्ध विश्वासों का जमघट ही तो नहीं है।
कभी यह मान्यता थी कि अमुक सम्प्रदाय के लोगों को ही ईश्वर पसन्द करता है और अन्य सम्प्रदाय वालों के बारे में सोचता है कि जैसे भी बने उन्हें अपने मत में सम्मिलित किया जाय। सहमत न हों तो उनके सिर कलम कर दिये जायं। मध्यकाल के सामंतों को जहाँ लूट-खसोट, राज्य बढ़ाने की हवस थी, वहाँ यह जुनून भी कम न था कि अपनी बात न मानने वाले काफिरों का कत्लेआम किया जाय। इस मान्यता ने कितने निरीहों का रक्तपात कराया, इसे इतिहास के विद्यार्थी भली प्रकार जान सकते हैं।
सम्राटों-सामंतों को दफनाते समय उनके साथ कब्र में कितनी औरतें, कितने नौकर, कितनी दौलत दफन की जाती थी, कि परलोक में यह सभी वस्तुएँ उन्हें उपलब्ध हो सकें। सद्गृहस्थों को पकड़ कर दास-दासी बना दिया जाता, उन्हें खरीदने, बेचने और पशुओं जैसा काम करने के लिए विवश करना किसी जमाने में आम रिवाज था।
अमेरिका के रेड इण्डियनों, अफ्रीका के हब्शियों में पशुओं का ही नहीं मनुष्यों के भारी संख्या में बलिदान का भी भारी प्रचलन था। उसी कारण कितनी ही जातियाँ एक-दूसरे की बलि चढ़ाते-चढ़ाते नाम मात्र के लिए शेष रह गई। इन कृत्यों को करने वाले अपने को धर्मात्मा मानते थे और सोचते थे कि ईश्वर यही चाहता है और इसी से प्रसन्न होता है।
भारत में भी सती प्रथा, विधवा विवाह, बाल विवाह अपहरण जैसे अत्याचार नारियों के साथ किए जाते थे, उन्हें पर्दे में कैद रखा जाता था। मनुष्यों में भी एक चौथाई को अछूत कहकर मनुष्योचित अधिकारों से वंचित किया जाता था। देवताओं को प्रसन्न करने के लिए उनकी प्रतिमाओं के सामने सहस्रों निरीह पशुओं का वध किया जाता था, आदि-आदि ऐसे अनेकों प्रचलन थे, जिन्हें सही माना जाता था, और वैसा करने में शास्त्रकारों की आज्ञा का हवाला दिया जाता था। पिरामिडों के निर्माण में लाखों को मेहनत कराते-कराते उसी में पीस दिया गया। एक पुरुष सैकड़ों हजारों स्त्रियाँ हरम में रखता था। कभी लड़कियाँ बिकती थी, अब लड़के बिकते हैं।
ऐसी-ऐसी अनेक बातें हैं, जिन्हें धर्म, परम्परा, शास्त्र-आज्ञा, ईश्वर की इच्छा मानकर कहा जाता है और अनेकों भावुकों का शोषण किया जाता है। ऐसे धर्म व्यवसायी धन और सम्मान दोनों हाथों से बटोरते हैं और अपने को देवताओं का एजेंट कहकर उनका अनुग्रह दिलाने के लिए महँगी फीस वसूल करते हैं।
मात्र हिन्दू समाज में ही नहीं, अन्य सम्प्रदायों में भी ऐसे बेतुके प्रचलनों की भरमार है, जिनका विवेक की कसौटी पर कोई औचित्य सिद्ध नहीं होता, फिर भी समुदायों को मानने वाले पुरातन मान्यताओं को ही सब कुछ मानते हैं और समीक्षा या सुधार की बात कहने तक को अधर्म मानते हैं।
धर्म सबसे पुरानी परम्परा है। उनके साम्प्रदायिक खंड इतने अधिक हैं, कि उनकी गणना करते कठिनाई होती है, फिर उनके प्रचलन ऐसे हैं, जिनके स्वरूपों और सिद्धान्तों में जमीन-आसमान जैसा अन्तर है, फिर भी आश्चर्य इस बात का है कि उन सभी के अनुयायी अपनी-अपनी परम्पराओं पर इतने कट्टर हैं कि उनकी यथार्थता पर पुनर्विचार करने की तनिक भी गुंजाइश नहीं। अभी भी दहेज न मिलने पर स्त्रियों को जला देने, देवताओं को प्रसन्न करने के लिए बच्चे चुराकर बलि चढ़ा देने जैसे नृशंस कृत्य आये दिन होते रहते हैं और उन्हें करने वाले अपने को अपराधी नहीं मानते वरन् परम्परा के निर्वाह के लिए अपनाया गया औचित्य ही मानते हैं।
यह धर्म चर्चा का विषय हुआ। अपराधियों की, दुराचारियों की, व्यसनियों की अपनी बिरादरी है और वे अपने कृत्यों को शान दिखाने का प्रसंग मानते हैं, न लज्जित होते हैं और न उन कुमार्गों को छोड़ने की बात मानते हैं। यह दृष्टिकोण ही है, जिसके कारण मनुष्य ऐसे ढाँचे में ढल जाते हैं, कि जो किया-अपनाया गया है, उस पर नये सिरे से विचार करने और उचित-अनुचित का विचार करने तथा ढर्रे में परिवर्तन करने तक की आवश्यकता नहीं समझते। वेश्याएँ अपनी सफलता और चतुरता की डींगे अपने समुदाय में बढ़-चढ़ का मारती रहती हैं। यह बात सभी क्षेत्रों पर लागू होती है।
एक और कठिनाई है कि जिसने जो ढर्रा अपना रखा है, वह उसका औचित्य तर्कों के सहारे भी सिद्ध करने में पीछे नहीं रहता। यों तर्क में भी उचित-अनुचित का निर्णय करने का रिवाज है, पर बुद्धि के विकास के साथ-साथ बढ़े बुद्धिवाद-प्रत्यक्षवाद ने, इस क्षेत्र को भी अप्रामाणिक बना दिया है और विश्व मानव के एकता एक दिशा अपनाने की प्रगति में बाधक ही बना है। यह सुनिश्चित है कि मति भिन्नता के रहते प्रगति की किसी योजना को कार्यान्वित करना और सफलता के स्तर तक पहुँचना कभी भी संभव न हो सकेगा।
भूतकाल के अनौचित्य, वर्तमान के दुराग्रह और भविष्य के अन्धकार को ध्यान में रखते हुए हमें ऐसे उपाय खोजने चाहिए जिनसे विग्रहों के आधार टलें और एकता के, औचित्य के द्वार खुलें। दार्शनिक क्षेत्र की यह आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
आवश्यकता है कि न्याय, औचित्य, विवेक का आश्रय लिया जाय और पूर्वाग्रहों से अपने दृष्टिकोण को मुक्त रखा जाय। अपने आग्रहों को ईश्वर, देवता, पैगम्बर आदि की उक्ति बताने की दुहाई न दी जाय और न अपने मान्य जनों को चमत्कारी, दैवी शक्तियाँ से सम्पन्न-सर्वज्ञ ठहराया जाय। इन आधारों को अपनाने से औचित्य के प्रति अन्याय ही होगा। हमें स्वतन्त्र चिन्तन का आश्रय लेना चाहिए और प्रचलित मत-मतान्तरों में से कौन ज्येष्ठ, और श्रेष्ठ? के झंझट में न पड़ कर नई दृष्टि अपनानी चाहिए। क्या होता रहा है व कैसे वितण्डावाद बढ़ता रहा है इसका उदाहरण शास्त्रार्थों में भाषण प्रतियोगिताओं में ही नहीं अदालत-कचहरियों में भी देखा जा सकता है। झूठे मामले को सच्चा सिद्ध करने के लिए वकील जमीन-आसमान के कुलाबे एक करते हैं और उनमें से कितने ही अपनी चतुरता को सफलता के स्तर तक पहुँचा देते हैं। फैशन, जेवर, खानपान, नशा, व्यसन आदि के सम्बन्ध में जो जिसे सुहाता है वह उसके लिए इतना दुराग्रही होता है, कि सामने वाले पक्ष की उचित बात को भी सुनने के लिए तैयार नहीं होता। शादियों में होने वाली धूमधाम, फिजूल खर्ची, प्रदर्शन, दहेज आदि के विरुद्ध मुद्दतों से आन्दोलन हो रहे हैं पर नये तरीकों से वही बातें दूसरे रूप में सामने आ जाती हैं। कन्या और पुत्र के बीच बरता जाने वाला अन्तर ऐसा है, जिसे विचारशील लोगोँ के परिवारों में भी कार्यान्वित होते देखा गया है।
अनौचित्य के प्रति कट्टरता अपनाये रहने के लिए प्रचलनों की दुहाई देते रहने की बात ऐसी है, जो मनुष्य को यथार्थता से दूर पहुँचा देती है। प्रचलनों को किसी समय विशेष की आवश्यकताओं के अनुरूप गढ़ा हुआ मानना चाहिए। ग्राह्य और अग्राह्य का निर्णय तर्कों के सहारे नहीं, वरन् मानवी गरिमा के अनुरूप भावनाओं के सहारे करना चाहिए।
अर्थशास्त्र बताता है कि नई पीढ़ी को स्थान देने के लिए पुरानों को बूचड़, खानों कसाई घरों में पहुँचाना चाहिए, यदि यह सिद्धान्त पशुओं के लिए सही है, तो मनुष्यों के लिए गलत क्यों हो सकता है? फिर बूढ़े माँ-बापों को कसाई खाने भिजवाना पड़ेगा। जिसकी लाठी उसकी भैंस का जंगली कानून यदि सही ठहराया जाय तो बड़ी मछली छोटी को निगल लेती है, का सिद्धाँत मनुष्यों पर भी लागू करना होगा और इस संसार के सारे दुर्बलों का एक सिरे से सफाया करना होगा। देश भक्ति की दुहाई दी जाती रही तो क्षेत्र विशेष की सुविधा ही सब कुछ मानी जायेगी और किन्हीं विशेषों के साथ अन्याय होने की बात पर विचार न हो सकेगा।
हमें वास्तविक न्याय का निर्णय करने के लिए स्वयं सृष्टि का सृष्टा बनकर सभी को सन्तान मानते हुए उचित अवसर प्रदान करना पड़ेगा, या फिर अगली शताब्दी की देहरी पर खड़े होकर आदि से अन्त तक नये कानूनों का इस आधार पर निर्धारण करना होगा, जिससे भविष्य में किसी अनुचित विग्रह के लिए गुँजाइश न रहे। मनुष्यों में से प्रत्येक को मानवी मौलिक अधिकारों का संरक्षण मिले, साथ ही सृष्टि के अन्य प्राणियों को भी इस धरती पर रह सकने की सुविधा मिले।
दुर्जन मुट्ठी भर होते हैं, पर वे संगठित गिरोह बनाकर आक्रमण करते हैं और तथाकथित सज्जन मिलजुल कर उनका विरोध नहीं करते, फलतः संसार में अनीति ओर अपराधों की बाढ़ आती है। होना यह चाहिए कि अनाचारियों का सामूहिक बहिष्कार और विरोध हो, साथ ही सज्जन मिलजुलकर उनके विरुद्ध संघर्ष करें। शासन को कहा जाये कि सुधार की आशा से दर गुजर करने वाले या हलका दंड देकर जमानत पर छोड़ देने की अपेक्षा अपराधी के साथ उतनी कड़ाई की जाय, जिसे देखकर दूसरों को वैसा करने का हौसला न पड़े। शासन को जहाँ सत्प्रवृत्तियों का समर्थन, अभिवर्धन करना चाहिए वहाँ यह भी नितान्त आवश्यक है कि आततायी को प्रताड़ना सहनी पड़े और पश्चाताप करना पड़े।
सम्प्रदायों को अनुपयुक्त देखते हुए उनसे निरपेक्ष हो जाना और चाहे जिसको, चाहे जो करने देने की छूट नहीं दे देना चाहिए। ऐसी छूट प्रकारान्तर से अनीति का समर्थन एवं प्रोत्साहन है। हमें उपेक्षापूर्ण रिक्तता उत्पन्न नहीं करनी चाहिए, वरन् एक नवीन मानव धर्म की संरचना करनी चाहिए और उसका परिपालन करने के लिए लोगों से अनुरोध करते रहने की अपेक्षा, बाधित करने की कठोरता अपनानी चाहिए। राजनीतिक दल एवं व्यक्ति भी मात्र शासन की अर्थव्यवस्था की देख भाल करते हैं और मूर्खों के बहुमत का जिस-तिस प्रकार समर्थन प्राप्त करके अपनी मनमानी चलाते हैं। यह सब भी अपूर्ण है। हमें उतनी गहराई तक जाना होगा जिससे मानवी तत्व दर्शन का नवीन शिलान्यास हो। चिन्तन में उत्कृष्टता, चरित्र में आदर्शवादिता और व्यवहार में सज्जनता का समावेश हो। वस्तुतः इसी परिधि में मानव जीवन की समस्त समस्याएँ आती हैं। जिससे इस सुविस्तृत क्षेत्र का समाधान निकले उसी को सच्चे अर्थों में तत्वदर्शन, समाज विज्ञान या शासन तंत्र कहना चाहिए। फिर उसका नाम कुछ भी क्यों न रखा जाय। मनुष्य को सत्प्रयोजन अपनाने की पूरी छूट मिलनी चाहिए। पर उसकी धूर्तता को इतने कड़े शिकंजे में कसना चाहिए कि पीछे हटने या आगे बढ़ने की कोई गुँजाइश न रहे।
बढ़ते हुए विज्ञान और बुद्धिवाद ने दुनिया को सिकोड़कर एक बस्ती जैसी सीमित कर दिया है। इसमें एकता और समता की रीति-नीति ही चल सकती है। मनमौजी खींचतान चलाने की, कलह के सर्वनाशी विष बीज बोने की छूट पिछले दिनों मिलती रही होगी अब उसकी तनिक भी गुंजाइश नहीं है। हमें एक बिरादरी नहीं, एक परिवार बना कर रहना होगा और एक भाषा, एक देश, एक धर्म, एक दर्शन अपनाकर ही शान्तिपूर्वक रहना होगा। इस प्रयास में प्रत्येक वर्ग को अपनी पूर्व मान्यताओं के प्रति दुराग्रह छोड़ना होगा और यह सोचना होगा कि अगले दिनों इस संसार को ऐसा सुन्दर सुसंस्कृत कैसे बनाया जा सकता है जिसमें अमीर गरीब सभी मिल बाँट कर खायें। शक्ति और बुद्धि के सत्परिणामों से सभी लोग मिल जुल कर लाभ उठायें और हँसती-हँसाती जिन्दगी जियें। इसके लिए समुचित साधन भी मौजूद हैं और पर्याप्त अवसर भी। आवश्यकता इस बात की है कि दूरदर्शी, विवेकशीलता के धनी अपने चिन्तन को इस केन्द्र बिन्दु पर एकाग्र करें कि मानवी गरिमा के अनुरूप चिन्तन क्या हो? लोग उसे अपनाने और चरित्र में उतारने की प्रेरणा देने वाला शिक्षण किस प्रकार के विद्यालयों और किस स्तर के साहित्य के सत्संग, स्वाध्याय द्वारा प्राप्त करें।
नये युग की आवश्यकता है कि यह निर्धारण किया जाय कि समाज का स्वरूप क्या हो और उसकी आचार संहिता अपनाने के लिए जन-जन को किस प्रकार सहमत किया जाय। जिनकी नस-नस में धूर्तता भरी पड़ी है, उन्हें कड़ी प्रताड़नाएँ सहने के लिए बाधित किया जाय। अब इतना समय शेष नहीं रह गया है कि फिर पीछे कभी के लिए बात टाली जा सके। हम जीवन-मरण की विभीषिकाओं के बीच जूझ रहे हैं। उपाय एक ही शेष है आध्यात्मिक दृष्टिकोण का स्वरूप निर्धारण और उसका अनुशासनपूर्वक परिपालन। इतना सब कुछ करने पर ही नवयुग का नवोन्मेष संभव होगा।
‘लू’ नगर की एक पिछड़ी बस्ती में रहते थे, दार्शनिक यूआन सीन। फूस की झोंपड़ी, टूटा छप्पर, गीला फर्श व बाँस से बनी खिड़की। ऐसे टूटे-टूटे घर में वे रहते थे और फुर्सत के वक्त मस्ती से भरे हुए इकतारा बजाया करते थे।
अमीर त्सी कुँग अपनी शानदार बग्घी में बैठकर उनसे मिलने गये। गली इतनी छोटी थी कि बग्घी उस में घुस ही न सकी। उन्हें पैदल जाना पड़ा।
यूआन सीन अतिथि का स्वागत करने दरवाजे पर आये। फटा जूता, पत्तों की टोपी, पुराने कपड़े पहने उन्हें देखकर कुँग ने कहा- ओह सन्त आप इतने दुखी, दरिद्र, संकट ग्रस्त।
यूआन मुसकराये और बोले-मैंने सुना है-धन के अभाव में मनुष्य गरीब भर रहता है। दुखी वे हैं जो अज्ञानग्रस्त हैं। बताओ तो- मैं गरीब हुआ या दुखी?
त्सी कुँग सिटपिटाये से एक कोने में खड़े थे।
कहने को तो यह संसार आश्चर्यों से भरा पड़ा है, किन्तु यहाँ का सबसे बड़ा आश्चर्य स्वयं मनुष्य है। यह बात और है कि वह अपने को सामान्य मानता है, पर वास्तविकता यह है कि वह प्रकृति के रहस्यों से भी कई गुना अधिक विलक्षण है। जिस दिन वह अपने इस पक्ष को उद्घाटित कर लेगा, उस दिन उसके लिए कुछ भी जानना शेष नहीं रहेगा। फिर प्रकृति की हर रोमाँचकारी अद्भुत घटना उसके लिए सामान्य बन जायेगी। तब न इस सृष्टि में कुछ आश्चर्य रहेगा, न अचम्भा, जिसकी कि इन दिनों हम चर्चा करते हैं।
स्पेन में मैड्रिड के निकट एक शहर है-चट्टानों का शहर जो लगभग 500 एकड़ भूमि में फैला हुआ है। इसका नाम शहर अवश्य है, पर यहाँ है, सिर्फ चट्टान ही चट्टान। इस चट्टानी शहर का सबसे बड़ा आकर्षण और आश्चर्य का केन्द्र है इसका विशाल निहाईनुमा शैलखण्ड। इस प्रस्तर खण्ड का ऊपरी भाग निहाई की तरह काफी चौड़ा है और निचला भाग धीरे-धीरे पतला होते-होते एकदम नुकीला हो गया है। आश्चर्य की बात तो यह है कि यह ऊँची और विशाल चट्टान अपने नुकीले भाग की ओर से नाचते-लट्टू की तरह सीधी खड़ी है। अब तक वैज्ञानिक इसके संबंध में यह बताने में सर्वथा असमर्थ रहे है कि अपनी नोक पर टनों भारी वजन को संतुलित कर सैकड़ों वर्षों से प्राकृतिक आपदाओं को झेलते हुए स्वयं को इस तरह संतुलित कैसे बनाये हुए है?
इसी प्रकार उत्तरी अर्जेन्टीना की एण्डिन पहाड़ियों की तराई में वैली ऑफ मून नामक एक घाटी है। यहाँ एक दूसरे पर रखे बड़े-बड़े पत्थरों से कई ऐसे विशाल और ऊँचे स्तम्भ बन गये हैं, जिसे देख कर ऐसा लगता है कि किसी कुशल इंजीनियर ने बड़ी दक्षतापूर्वक एक के ऊपर एक चट्टान रख कर इन्हें निर्मित किया हो, पर सच्चाई यह है कि इन प्रस्तर स्तम्भों में रखी चट्टानें इतनी विशाल हैं कि आज के विकसित विज्ञान द्वारा भी इन्हें एक दूसरे के ऊपर रख कर इतना ऊँचा स्तम्भ बनाना संभव नहीं। फिर प्रकृति ने इसका निर्माण क्यों व कैसे किया ? यह सवाल आज भी अनुत्तरित है।
काला सागर के तट पर बुल्गारिया के प्रमुख बन्दरगाह वारना से करीब 12 मील दूर आठ सौ मीटर लम्बा और सौ मीटर चौड़ा ऐसा क्षेत्र है, जिसमें तीन सौ पत्थर के एक जैसे ऐसे स्तम्भ खड़े हैं, जो बिल्कुल वर्तुलाकार हैं। इनमें से कुछ टूट कर गिर गये हैं, पर अधिकाँश अब भी खड़े हैं। इनकी ऊँचाई 6-12 फुट तक है। सर्वथा मिट्टी वाली जमीन में इस प्रकार के पत्थर के स्तम्भ धरती फोड़ कर कैसे निकल आये-यह भूगोलवेत्ताओं और पुरातत्व विशेषज्ञों के लिए अब भी रहस्य का विषय बना हुआ है।
मध्य मोरक्को में डेड्स नदी एक बिल्कुल ही सँकरी घाटी से होकर बहती है। घाटी नदी के दोनों किनारों पर दो विस्तृत शैल खण्डों के कारण बन गई है। इन शैल खण्डों के मध्य एक लम्बी चट्टान इस प्रकार लगी हुई है, जैसे खराद की मशीन में खरादी जाने वाली लकड़ी फँसी होती है। बरसात में इस नदी का जल स्तर इस घाटी में इतना ऊँचा हो जाता है कि वह इस चट्टान को छूने लगता है और न सिर्फ छूता है, वरन् तीव्र जल-प्रवाह उसे मशीन में फँसी खराद की लकड़ी की तरह नचाने लगता है, जिससे वहाँ पानी खूब ऊँचाई तक उछलने लगता है। जिन दिनों यह दृश्य उपस्थित होता है, उन दिनों दर्शकों की भारी भीड़ उस मनोरम दृश्य को देखने के लिए वहाँ उपस्थित रहती है। अभी तक वैज्ञानिक इसका रहस्य नहीं जान पाए।
हो सकता है कि किसी को कार्य करने पर भी आनन्द न मिले। पर इतना निश्चित है कि आनन्द उसी को मिला है जिसने कर्तव्य मार्ग पर चलते रहने का निश्चय किया।
हार्ज नामक जर्मनी के उत्तर में स्थित पर्वत शृंखला में एक ऐसा झरना है, जो समय-समय पर अपना रंग बदलता रहता है। कुछ समय इससे निकलने वाले पानी का रंग लाल होता है, तो कुछ समय बाद बदल कर काला, फिर नीला, तत्पश्चात पुनः लाल हो जाता है। इससे निकलने वाला जल इतना गर्म होता है कि शरीर पर पड़ने से फफोले हो जाते हैं। इसका यह स्वभाव तो समझ में आता है पर गिरगिट की तरह यह रंग किस रासायनिक प्रक्रिया के कारण बदलता है यह समझ से परे है।
वस्तुतः जो हमें ज्ञात नहीं है व विचित्र-विलक्षण जान पड़ता है, उसके मूल में उस कुशल कलाकार की, सृजेता की विविधता से भरी संरचना है। यदि उस विराट स्तर पर दृश्यमान विलक्षणता से ही हमें उस विराट, अचिंत्य, अगम्य का साक्षात्कार हो सके तो जीवन लक्ष्य पूरा हो जाए।
उनने चौकी पर बेतरतीब बिखरे पड़े कागज एक ओर समेटे। फिर अस्त-व्यस्त पड़ी किताबों को कोने की अलमारी में जमाने लगे। हाथ अभ्यस्त यंत्र की भाँति काम कर रहे थे। मन कहीं ओर खोया था शायद अध्ययन की विषय वस्तु में निमग्न। यह भी सम्भव है प्रणयन किए जा रहे ग्रन्थ के बढ़ते कदमों के लिए नई राहें तलाशने लगा हो। खुली हुई खिड़की से प्रवेश कर रही सुनहली आभा धीरे-धीरे अपने को समेटने लगी।
हर वर्ष की भाँति इस बार भी वह पैठण में अपनी छुट्टियाँ बिता रहे थे। उनके लिए छुट्टियां बिताने का मतलब ताश-चौपड़, सैर सपाटा, गप-शप जैसा कुछ न था। वे तो चेतना की रहस्यमय गहराइयों में भरी पड़ी बेशुमार रत्न राशि को खोजने में जुटे थे, ताकि उससे व्यक्तित्व को अलंकृत किया जा सके। स्वाभाविक है इस अनुसंधान को एकान्त की जरूरत पड़े। बस यही जरूरत पूरी हो रही थी इन दिनों।
उनका यह कमरा बस्ती से दूर था। कमरे की जितनी दूरी बस्ती से थी उतनी ही शोर-शराबे और कोलाहल से। दिन में यदा-कदा पशु-पक्षियों की आवाजें और इक्के-दुक्के मानव स्वर गूँज जाते परन्तु रात के दूसरे पहर में थोड़ा विश्राम कर शेष समय को गम्भीर ध्यान में बिता देना और दिन में अपने ग्रन्थ को पूरा करने में लग जाना यही उनकी अहर्निशिचर्या थी, जिसमें तप और स्वाध्याय का गहरा सामंजस्य आ जुटा था।
खिड़की से महुए के पेड़ की ओर निहारते हुए पास की खूँटी में टँगा कुर्ता पहना, कन्धे में दुपट्टा डाला और पैर अनजाने में चप्पलों की तलाश में कोने की तरफ बढ़ गये। तभी बाहर घोड़ा-गाड़ी रुकने की आवाज आई। थमती टापों और हिनहिनाहट के शब्द साफ थे। भारी बूटों की पास आती जा रही ध्वनि ने उनके मन में स्मृति स्पन्दनों को जगाया। होठों पर हलकी मुसकान उभरी।
कुछ पलों में आगन्तुक ने कमरे के अन्दर प्रवेश करते हुए उन्हें सिर से पैर तक एक बारगी निहारा। उसे भाँपते देर न लगी कि कहीं जाने की तैयारी हो रही थी। कहीं जा रहे थे क्या? अनुमान ने प्रश्न का रूप लिया। बस। यहीं पैठण के अधिदेवता का दर्शन करने। ओह। उसने होठों को सिकोड़ते हुए कहा स्वामी दयानन्द जो तथ्य अपने बचपन में समझ गए उसे आप इतनी उम्र के बाद भी नहीं समझ पाए।
प्रायः इन दोनों के मिलन के अवसर पर यह विवाद कहीं न कहीं से प्रवेश कर ही जाता। फर्ग्युसन कालेज में दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर दर्शन और धर्म अकादमी के संस्थापक यौक्तिक रहस्यवाद नाम से दर्शन में नई विद्या को विकसित करने वाले होकर भी वे मूर्तिपूजा की महत्ता स्वीकार करते थे जबकि मित्र महोदय को उनकी इसी आदत से चिढ़ थी, जबकि अन्य गुणों की प्रशंसा करते नहीं अघाते थे। आज फिर आते ही आते यह विषय टपक पड़ा। सज्जन पुनः बोल उठे बचपन में जिस सत्य का साक्षात्कार उन्होंने किया था, वह तो शाश्वत ही था। वह सत्य का साक्षात्कार नहीं था, कल्पना थी। वे कह रहे थे निर्णय का भार चलो आप के ऊपर ही रहा। जरा यह बताइए, यदि स्वामी जी आज जीवित होते और उन पर कोई बच्चा मुट्ठी भर धूल फेंक देता तो क्या वे उसे डंडा लेकर मारने दौड़ते?
आप भी कैसी बात कर रहे हैं। आगन्तुक सज्जन ने कहा- स्वामी जी ने अपने प्रति किए गए बड़े से बड़े अपराध को क्षमा ही किया है। उनका जीवन तो अद्भुत क्षमाशील रहा है।
यह सत्य है कि स्वामी जी बड़े क्षमाशील थे, पर जिस सर्व शक्तिमान क्षमा सिन्धु की अनन्त क्षमा का एक कण पाकर महात्मा संत क्षमाशील होते हैं उस परम पुरुष की क्षमाशीलता का अनुमान कोई कैसे लगा सकता है। वही अनन्त करुणा वरुणाय अपनी मूर्ति पर चढ़कर घूमते और चढ़े हुए अक्षत को खाते एक चूहे को वैसा करने देता है, इससे मूर्ति में ईश्वर नहीं है ऐसा सत्य कहाँ से आ गया? आप आशा करते हैं कि अपनी ही सृष्टि के एक अबोध शिशु को जो प्रसाद से उदरपूर्ति के प्रयत्न में है, वह जगन्नियन्ता शिव त्रिशूल लेकर मारने दौड़ेगा? अपने कथन को पर्याप्त सौम्य बनाकर उनका हाथ थामते हुए बोले अच्छा पहले विठोबा का दर्शन करने चलते हैं समय हो रहा है।
रामचन्द्र तुम अच्छी तरह जानते हो। कहने के साथ एक रोष भरी दृष्टि से उनकी ओर ताका।
मूर्ति में श्रद्धा न हो यह बात तो समझ में आती है पर अकारण द्वेष का कारण भी तो नहीं। फिर स्वामी दयानन्द ने भी मूर्तिपूजा के आडम्बर-पाखण्ड का खण्डन किया उसके विज्ञान का नहीं। बोलते हुए उनका हाथ थामे कमरे के बाहर निकले और उस ओर चल पड़े जिधर गाड़ी खड़ी थी।
तो इसका कोई विज्ञान भी नहीं है। कन्धे उचकाते हुए उनकी ओर मुड़े।
पहले बैठो तो फिर बताते हैं। स्वयं बैठने के साथ उन्हें बैठाते हुए कोचवान को मन्दिर चलने का संकेत किया। उसने एक नजर अपने मालिक पर डाली जैसे नेत्रों की भाषा में पूछना चाहता हो आज गोदावरी का प्रवाह उल्टा कैसे?
सवाल अनुत्तरित रह गया। एक हिनहिनाहट के साथ घोड़ों की टापें राह को रौंदने लगीं, पहिए उनका अनुगमन करने लगे। पहियों की गति के साथ उनकी चर्चा चक्र का थमा वेग पुनः बह चला।
मूर्ति को प्रतीक और उपासना को मन की प्रशिक्षण पद्धति तो मानते हो? जवाब में सुनने वाले ने हाँ कहने के साथ कुछ और कहने के लिए पैंतरा बदला।
आशय समझ कर वह हँसते हुए बोले पहले पूरी बात सुन लो, फिर कह लेना। व्यवहार जगत का जर्रा-जर्रा प्रतीकों से भरा है। इनके हटाने का मतलब है चैतन्य चादर से सब कुछ ढक देना। जरा सोचो व्याकरण शास्त्र, शब्द शास्त्र, सारी भाषाएँ और वह सब कुछ जो तुम्हें किसी तथ्य का बोध कराता है प्रतीक ही तो हैं। इनके समाप्त कर देने पर क्या बैखरी, पश्यन्ती और मध्यमा वाणियों का अस्तित्व बचा रहेगा? क्या प्रतीकों की अवहेलना समूचे जीवन व्यवहार की अवहेलना नहीं है?
सुनने वाला तनिक कसमसाया किन्तु वह कहे जा रहे थे। मन विचारों को आकार में देखने का अभ्यासी है। दिन में सोचे गए विचार रात के स्वप्न में चिन्तन के रूप में नहीं घटनाक्रम और आकारों के रूप में दिखते हैं। अब तो मनोविज्ञान ने भी प्रतीकवाद को सिद्धान्त के रूप में स्वीकार कर लिया है।
हाँ। यह तो हैं। कहे गए स्वरों में पर्याप्त शिथिलता थी। सत्य को मानने के सिवा और चारा भी क्या था। जब हम सर्वत्र इनके महत्व को स्वीकारते हैं तब उपासना के क्षेत्र में हिचकिचाहट क्यों? प्रशिक्षित मन ही आत्मा की अनन्त भाव रश्मियों को जीवन में बिखेरता है और उसका प्रशिक्षण प्रतीकों के अभाव में सम्भव नहीं भले ही वे प्रकाश और ज्योति शिखा जैसे अन्तर प्रतीक क्यों न हों?
कथन के साथ मन्दिर की घण्टियाँ सुनाई देने लगी। मन्दिर से थोड़ी दूर पर घोड़ा गाड़ी थमी। वे दोनों उतरे। बढ़ते कदमों के साथ मन्दिर में प्रवेश किया। उनका मन जहाँ प्रसन्न था-वहीं साथ वाले सज्जन कुछ अनमने थे। अनेक राहों से चल कर आ रहे व्यक्ति मन्दिर के प्राँगण में प्रवेश कर रहे थे। मानो मन्दिर में स्थापित श्रद्धा पुँज अपनी भाव रश्मियों को आकर्षित कर रहा हो।
मानवतावादी दार्शनिक एलवर्ट श्वाइत्जर एक बार अमेरिका गये। उनके सम्मान में अमेरिका से सात वरिष्ठ नेता आये। स्वागत गोष्ठी में एक बड़ा केक रखा गया।
अमेरिकी शिष्टाचार के अनुसार ऐसे अवसरों पर सम्मानित अतिथि अपने हाथ से केक काटते हैं और सभी लोग उसे खाते हैं।
अनुरोध के अनुसार श्वाइत्जर को सात अतिथियों के लिए और एक अपने लिए कुल आठ टुकड़े काटने थे। पर उन्होंने नौ टुकड़े काटे। एक अधिक काटने का कारण पूछने पर उन्होंने बताया यह उस महिला के लिए है जिसने मेहनत करके इतना सुन्दर और स्वादिष्ट केक बनाया है। भला उसे हम लोग कैसे भुला सकते हैं?
कलात्मक ढंग से सजाए गए दीपों की प्रकाश माला के बीच खड़े विठोबा की अपूर्व शोभा थी। मूर्ति की मुसकराहट में कुछ विशेष था कुछ नितान्त अद्भुत। जिसके स्पर्श की सिहरन ये दोनों भी अनुभव किए बिना न रहे। मूर्ति के मूक स्वर कह रहे थे मेरे सान्निध्य ने साधारण से मानवों को एकनाथ, तुकाराम, नामदेव, ज्ञानेश्वर रूप में गढ़ा है। अभी न जाने कितने और गढ़े जाएंगे। आरती के स्वरों के साथ अनेकानेक भावनाएँ बरबस-पिघल कर भाव बिन्दुओं के रूप में पिघल उठीं।
आरती की समाप्ति पर वे दोनों मन्दिर परिसर के बाहर निकले। मित्र महोदय उनका हाथ थामे कह रहे थे, आज तुमने मुझे अपूर्व अनुभव दिया रानाडे। तुम्हीं ठीक हो रामचन्द्र-प्रतीक के बिना प्रतीक्य बोध सम्भव नहीं।
अष्टगयोग प्रकरण में जहाँ प्रत्याहार का प्रसंग आता है वहाँ ऋषि का उससे तात्पर्य प्रतिरोध से है। अन्तः क्षेत्र अनेकानेक अनगढ़ताओं से भरा बताया जाता है। मनुष्य अनेकानेक योनियों में परिभ्रमण करते हुए इस सुरदुर्लभ काया में प्रविष्ट होने का सुयोग उपलब्ध करता है। इतने पर भी क्षुद्र स्तर के जीवधारियों में पाई जाने वाली प्रवृत्तियों का प्रभाव अंतर्जगत पर बना ही रहता है। मानवी गरिमा की उत्कृष्टता को दृष्टिगत रख अनुपयोग व अवाँछनीय ये कुसंस्कारों चेतना के साथ किसी न किसी रूप में चिपके रहते हैं, अवसर पाते ही उभर उठते हैं। उनके प्रभाव से मनुष्य ऐसा कुछ सोचने और करने लगता है, जो उसके लिए कभी भी हितकर नहीं होता। प्रतिरोध इन्हीं से जब किया जाता है तो अधोगामिता से उबरकर ऊर्ध्वगामी होने की प्रेरणा मिलने लगती है। पतन सहज व उत्थान कठिन प्रतीत होते हुए भी उससे उबरकर प्रगति पथ पर चल पड़ना सहज ही रुचिकर लगने लगता है।
इन दिनों एक ही प्रश्न सबके समक्ष है कि अनौचित्य की दिशा धारा में चल पड़े प्रवाह को कैसे रोका जाय? मर्यादाओं का परिपालन एवं वर्जनाओं का अनुशासन किस प्रकार निभ सके? इस संदर्भ में यही होना चाहिए कि मदोन्मत्त हाथी पर अनुशासन का अंकुश लगाया जाय। बहाव को बाँध लगाकर रोका जाय। आक्रमणों को रोकने के लिए आत्मरक्षा का समुचित प्रबंध किया जाय। कुकल्पनाओं और दुष्प्रवृत्तियों को सद्विचारों और सत्संकल्पों के सामने खड़ा किया जाय। उद्वेग का समाधान कर सकने वाली विवेकशीलता को उगाया जाय। लाठी का जवाब लाठी से, घूँसे का जवाब घूँसे से देने की, जैसे को तैसा वाली नीति अपनाई जाय। दुष्प्रवृत्ति के उभरने से पहले ही सत्प्रवृत्ति के समुच्चय द्वारा उसे कुचल दिया जाय।
दुष्प्रवृत्तियाँ तभी सक्रिय होती हैं जब उन्हें प्रतिरोध सामने अड़ा हुआ दिखाई नहीं पड़ता। मैदान खाली देखकर ही टिड्डी दल बढ़ता चला आता है। प्रत्येक विचारशील को अपने ज्ञान भण्डार में इतनी सद्विचार सम्पदा भर रखनी चाहिए जो अनौचित्य अपनाने की हानियाँ और औचित्य के पक्षधर लाभों को भली प्रकार प्रतिपादन करने में समर्थ हो। व्यभिचार की ओर झुकने वाले को इसके दुष्परिणाम समझाये जाने चाहिए। नशे जैसे व्यसनों के दलदल में जो फँसता जा रहा है। उसे बाँह पकड़ कर भी गर्त में गिरने से रोकना चाहिए। उसकी भयंकर परिणति का स्वरूप पूरी छवि उभार कर दर्शाना चाहिए। इतने पर भी जो न रुके उसकी राह रोक कर खड़े हो जाना चाहिए। यही है प्रत्याहार।
निजी जीवन में कितनी ही बुरी आदतें जड़ पकड़ लेती हैं। अवाँछनीयताएँ, अनैतिकताएँ, भ्रान्तियाँ, कुरीतियाँ स्वभाव का अंग बन जाती हैं। इन्हें सहन करते रहा जाय तो वे दिन-दिन अधिक गइराई तक जड़ पकड़ती चली जायेगी और पीछे सुदृढ़ होने पर हटने का नाम न लेंगी। इसलिए जब भी होश आवे, तभी सँभल जाना चाहिए। दुर्बलता ओर अवाँछनीयताओं से कमर कसकर जूझना चाहिए। संकल्पपूर्वक उन्हें हटा कर ही चैन लेना चाहिए। यही है प्रत्याहार अर्थात् अनीति के विरुद्ध संघर्ष। महाभारत का आध्यात्मिक स्वरूप यही है। स्वजन जैसे दीखने वाले अनौचित्यों से भिड़ जाने के लिए अर्जुन की तरह गाण्डीव सँभालना चाहिए। गीताकार ने इसी संदर्भ में कहा है “उद्धरेदात्मानात्मानं” अर्थात् अपने द्वारा अपना उद्धार करें। अपने को स्वभाव जन्य दुर्बलता के कारण गिरने न दें। इस प्रकार की प्रतिरोधी चिन्तन व्यवस्था और संकल्प भरी साहसिकता को प्रत्याहार कहा गया है। यह आत्मोत्कर्ष की साधना में निरत होने वाले प्रत्येक मनस्वी के लिए नितान्त आवश्यक है।
उन्मूलन के कारण उत्पन्न हुई रिक्तता को आरोपण प्रयास द्वारा भरा जाना चाहिए। गिलास में भरे गँदले पानी को फेंक देना तो ठीक है। पर उसे खाली ही रहने देने पर अगले क्षणों प्यास बुझाने की आवश्यकता किस प्रकार पूरी हो सकेगी? खालीपन ठीक नहीं है। खाली दिमाग को शैतान की दुकान कहा गया है। दुष्प्रवृत्तियों का हटाया जाना ही उचित है, पर यह उससे भी अधिक आवश्यक है कि उस स्थान की पूर्ति सद्विचारों और सत्कर्मों के समुच्चय द्वारा की जाय। रिक्तता को पूरा किया जाना चाहिए। दुर्गुणों का स्थान सद्गुण ले सकें, इसके लिए रचनात्मक स्तर के प्रबल प्रयास किये जाने चाहिए।
अनौचित्य से बच जाना पर्याप्त नहीं। चट्टान, पर्वत किसी का कुछ बुरा नहीं करते। किन्तु उनकी समुचित उपयोगिता भी तो नहीं होती। ऐसी दशा में वे निरर्थक रूप से जगह घेरते भर प्रतीत होते हैं। किसी उच्चस्तरीय उद्देश्य की पूर्ति नहीं करते। ऐसी दशा में उनका न तो गौरव बढ़ता है और न सम्मान होता है। ऊसर बंजरों के संबंध में भी यही बात है। रेगिस्तान भी ऐसे ही होते हैं। उनका अस्तित्व किसी को प्रसन्नता प्रदान नहीं करता। वरन् एक बड़े भूखण्ड को घेरे पड़े रहने का लाँछन ही लगता है। जो यों ऊसर बंजर किसी पर आक्रमण नहीं करते। न उन्हें शोषण, अपहरण जैसे कुकृत्य करते देखा जाता है। फिर भी उनका दुर्भाग्य जहाँ तहाँ कोसा ही जाता है। यदि वे उपजाऊ स्तर के होते तो कितनी सुन्दरता उभरती, कितनी सम्पन्नता हस्तगत होती। दोनों परिस्थितियों की तुलना करने पर यही निष्कर्ष निकलता है कि उर्वरता का न होना भी एक अभिशाप है। सद्गुणों से रहित होना भी एक लाँछन है। किन्तु भले ही उन अनगढ़ों अपंगों द्वारा किसी का अनहित न किया जाता हो। नशा छोड़ देने भर से स्वास्थ्य नहीं बनता, उसके लिए व्यायाम जैसे उपचार भी आवश्यक हो जाते हैं। उचित आहार विहार का अभिनव प्रबंध भी तो होना चाहिए। इस प्रयास का नाम धारणा है।
योग दर्शन में प्रत्याहार और धारणा का युग्म साथ-साथ चलता है। शरीर पर चिपकी मलिनता तो धोनी चाहिए ही पर इसका अर्थ यह नहीं है कि स्नान के उपरान्त नंगे फिरा जाय। साफ सुथरे वस्त्र न पहने जायँ। उस स्नान करने वाले को कौन सराहेगा जिसने शरीर और वस्त्र तो धो डाले, पर नंगे शरीर फिरने लगा। सभ्य समाज की यह भी मर्यादा है कि मैले कुचैले न रहने की आधी बात पूरी कर लेने के उपरान्त इतना और किया जाय कि वैसे वस्त्र भी पहने जायँ, जो सभ्य समाज में मर्यादा पालन की दृष्टि से आवश्यक समझे जाते हैं। खेत की जुताई करके खरपतवार उखाड़ना आवश्यक है। पर इस जोते गये खेत में कुछ बोया भी तो जाना चाहिए जिससे जोतने में लगे श्रम की भरपाई हो सके। दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन मात्र एक पक्ष है। दूसरा पक्ष तब बनता है जब उसके पूर्वार्ध के साथ-साथ सत्प्रवृत्ति संवर्धन का उत्तरार्ध भी बन पड़े। इस दूसरे प्रयास का नाम धारणा है।
प्रत्याहार अर्थात् दोष दुर्गुणों को स्वभाव का अंग बनकर न रहने देना तथा जो जम गये हों उन्हें उखाड़ फेंकना। यह महाभारत जीतने या लंका विजय प्राप्त करने के समान है। सराहना तो इस पराक्रम की भी की जायगी। पर इसमें भी चार चाँद लगने चाहिए, सोने के धागे में मोती पिरोये जाने चाहिए। जीवन निर्मल निश्छल होना ही चाहिए पर इतने भर से कोई गौरव गरिमा का अधिकारी नहीं बन जाता। पुण्य परमार्थ के लिए पराक्रम भी किया जाना चाहिए। संयमशीलता उचित है पर उसकी शोभा तभी बनती है जब दूरदर्शी चिन्तनशीलता और सदाशयता भरी उदारता का भी उसमें सुयोग हो। प्रत्याहार और धारणा का सार्थक समन्वय इसी प्रकार होता बताया गया है। इसके उपरान्त अपनायी गयी ध्यान धारणा निश्चित ही सत्परिणाम देती है।
उन दिनों श्री जाकिर हुसैन जामिया मिल्लिया के अधिष्ठाता थे। छात्रावास की भी वे ही देख भाल करते थे।
उस दिन उन्हें छात्रावास निरीक्षण के लिए जाना था। दरवाजे में प्रवेश किया तो देखा लड़के भोजनालय में हैं। दरवाजे पर सभी के जूते अस्त−व्यस्त पड़े हैं। सबसे पहले उनने जूतों को लाइन से लगाया और पोंछकर ठीक किये।
इसके बाद भीतर घुसे तो देखा कि लड़के रसोइये से लड़ रहे हैं। रोटी के कच्ची जले होने की शिकायत कर रहे हैं। दाल को पतली बता रहे हैं। इनने बीच में एक थाली रख रखी थी जिसमें रोटी का नापसंद भाग और दाल का ऊपर का पानी जमा करते जा रहे थे, फेंकने और अफसरों को दिखाने के लिए। लड़ रहे थे सो अलग।
जाकिर साहब पहले तो एक कोने में खड़े होकर यह सब देखते सुनते रहे। पीछे वे बीच वाली थाली के पास पहुँचे और बैठ कर उस फेंके गये सामान को खाने लगे।
लड़के स्तब्ध रह गये। जाकिर साहब ने कहा बच्चों! हम लोग जिस देश में रहते हैं। उसमें करोड़ों को ऐसा भी नहीं मिलता जितना कि तुमने फेंक दिया है। खाना बरबाद करने से पहले यह भी तो सोचना चाहिए।
लड़कों ने माफी माँगी और भविष्य में सादगी से काम चलाने का आश्वासन दिया।
देव। मैं इस योग्य नहीं हूँ। उत्तरापथ के वणिक प्रधान आज स्थाण्वीश्वर में उपस्थित थे। उनने इस बार कुछ शैलेय कस्तूरी और थोड़े से पर उत्तम कोटि के मृगचर्म सम्राट के सामने उपहार में रखे। देखकर सभासदों को आश्चर्य हुआ। उन सबकी आँखें चेहरे की भाव-भंगिमा यही दर्शित कर रही थी। पर सभी मौन थे। मणियों के अम्बार लगा देने वाले ये प्रधान-किन्तु आश्चर्य तब और बढ़ा जब सर्वथा अप्रत्याशित भाव से सम्राट ने स्वयं उठकर उपहार स्वीकार किया और प्रधान मन्त्री को न देकर पार्श्व रक्षक को देते हुए आदेश दिया कि ये अमूल्य वस्तुएँ पूजा कक्ष में रख दी जाएँ। किसी के उपहार को आराध्य-सेवा में अर्पित करें सम्राट, इतना सम्मान शायद पहली बार किसी को मिल रहा था। सभासदों की दृष्टि तो सक्रिय थी पर मस्तिष्क सोचने में अवश था। प्रधान महोदय सम्राट के संकेत के बावजूद अपने सदा के निश्चय आसन को स्वीकार नहीं कर पा रहे थे।
आप मेरी गलती क्षमा करें। सचमुच वह आसन आपके योग्य नहीं। महाराज हर्ष से खड़े हुए और उन्होंने हाथ पकड़ कर उत्तरापथ के प्रधान को अपने सिंहासन के समीप-देश के गौरव भूत सम्मान्य जनों के लिए निश्चित आसनों में से एक पर बिठा दिया।
श्रीमान मेरी विनती....। प्रधान की आँखें भावाश्रुओं से भर रहीं थीं। वे गदगद कण्ठ से बोलते उठने लगे आसन से।
विनती बाद में सुनी जाएगी। पहले आप मुझे क्षमा कर दें। महाराज हर्ष ने न उन्हें उठने दिया और न बोलने दिया। उत्तरापथ में भयानक हिमपात हुआ। वहाँ के प्रजाजन बेघरबार हो गए। उनका पशु धन बर्फ की चपेट में नष्ट हो गया। उनकी अपार क्षति हुई और अपने को जनता का अभिभावक कहने वाला देश की रक्षा का उत्तरदायित्व लेने वाला वहाँ तक पहुँच नहीं सका। क्या हो गया जो उसे दस्युओं का प्रतिरोध करना था। देश की विस्तृत सीमाओं को एक साथ न सँभाल सकने वाले को सिंहासन पर बैठे रहने का क्या अधिकार है? उत्तरापथ की प्रजा की उपेक्षा करने वाला वहाँ का सम्राट कैसे कहला सकता है?
श्रीमान की प्रजा निरुपद्रव है। स्थाण्वीश्वर का प्रताप प्रकृति कोप पर भी जयी है। प्रधान ने उन्हें हाथ जोड़कर मस्तक नवाया। क्षेत्र का कोई ऐसा नागरिक नहीं जिसकी क्षतिपूर्ति न कर दी गई हो। सभी के घरों में पहले जैसी चहल-पहल है। उत्तरापथ का प्रत्येक जन पशुओं को वन में ले जाने के पूर्व श्रीमान की मंगल कामना करता है।
“यह सब उसकी कृपा से हुआ, जिसने अपना सर्वस्व लुटा दिया, वह आज कंगाल है।” स्थाण्वीश्वरेश्वर भरे कण्ठ से कह रहे थे। “वह महीनों से वन्य कन्दमूल पर अपने परिवार को और स्वयं को निर्भर रखता है। उसकी कोई सुधि नहीं ली गई, अन्ततः उसे विवश होकर निर्लज्ज सम्राट के समीप उपस्थित होना पड़ा।”
“महाराज! महाराज!!” लगभग चिल्ला उठा उत्तरापथ का वह वृद्ध। प्रधान- मैं अब और नहीं सुन सकूँगा। उसके गौर ललाट पर स्वेद बिन्दु छलछला आए।
“आप पहले मुझे क्षमा करें!” सामने खड़े होकर सम्राट ने हाथ जोड़े।
किसी को यहाँ तक आप को भी अधिकार नहीं कि स्थाण्वीश्वर के सिंहासन की मर्यादा नष्ट करें। आप विराजमान हों। सुपुष्ट देह पर्वतीय प्रधान ने उन्हें बैठने के लिए बाध्य किया। मैंने ऐसा कुछ नहीं किया जो स्तुत्य हो। हिमपात से पशु मरे, घर नष्ट हुए। प्रकृति के कोप को सह लेने के अतिरिक्त उपाय क्या था। मेरे पास जो भी था, वह मेरे उन भाइयों के यहाँ से ही आया। आकाश से तो मेरे घर सोना बरसता नहीं। जिनका द्रव्य था, अवसर पर उन्हें देने की जिम्मेदारी पूरी कर अपनी ईमानदारी भर निभा सका हूँ। अन्यथा अनैतिक और गैरजिम्मेदार कहलाता।
श्रीमान मुझे पूरी बात कह लेने दें। महाराज को कुछ कह लेने के लिए उद्यत देख प्रधान ने विनय की। पर्वतीय जीवन तो कन्द-मूल पर व्यतीत करने का जीवन ही है। जो औसत स्तर के नागरिक जैसा निर्वाह कर सके-क्या अधिकार है उसे वहाँ के नागरिक जीवन के प्रतिनिधित्व का। हाँ अब मैं उत्तरापथ के प्रधान के पद लायक अवश्य नहीं रह गया हूँ। अब उस पर कौन बैठेगा यह निर्णय राज्य सभा पर है। किन्तु मेरी एक प्रार्थना है।
प्रधान पद आपके कुमार सम्भालेंगे अब से। प्रधान मन्त्री ने तनिक हँस कर घोषणा कर दी। सभासदों का समर्थन मिल गया एक हर्षोन्मत्त जय ध्वनि से।
हिमपात फिर शुरू हो गया था। मैं चीन की सीमा देख नहीं सका। अब पता चला है कि सीमान्त के अरुण शिखर पर कोई यात्री अपने तीन रत्न छोड़ गया है। प्रधान ने अपनी बात कह सुनाई। वह जीवित है या नहीं पता नहीं है। रत्नों को वहाँ से हटा लेने पर वह आवे तो निराश लौट जायगा, वहाँ रहने दें तो गलता हुआ हिम, वन्य पशु आदि उन्हें सुरक्षित नहीं रहने देंगे।
उन रत्नों की रक्षा के लिए आप-अपने दोनों लड़के उस निर्जन वनस्पति शून्य प्रान्त में छोड़ आए हैं। सम्राट को अपने विस्तीर्ण देश के सुदूर प्रान्त की इतनी छोटी सी बात भी पता है, यह जानकर वह चौके बिना न रह सका। तभी उनने कहा- आप उन रत्नों को स्थाण्वीश्वर भेज दें। वहाँ एक पाषाण खण्ड गड़वा दें वह शिला लेख अंकित करके जिनके रत्न है, वे स्थाण्वीश्वर पधारने की कृपा करें। रत्न सुरक्षित है।
मैं मुक्त हुआ श्रीमान की कृपा। पर्वतीय प्रधान ने हाथ जोड़े। तभी सम्राट ने प्रधान अमात्य को देखा। दृष्टि संकेत समझ कर अमात्य ने घोषणा की आज उत्तरापथ के प्रधान स्थाण्वीश्वर के महामात्य सभासद बना दिए गए हैं।
कुछ ही समय बाद रत्न राज्यकोष में सुरक्षित हो गए। उनके रखने के स्थान पर एक पाषाण खण्ड गड़ गया।
ऊपर आओ ऊपर। वह चीनी यात्री पहाड़ी के ऊपर गड़े पत्थर के पास खड़ा होकर अपने मार्गदर्शक को पुकार रहा था। उसे याद हो आया पिछला समय जब वह भारत यात्रा पर निकला था। किन्तु हिमपात के प्रबल प्रतिरोध से विवश होकर उसे वापस लौटना पड़ा।
यह क्या है? क्या लिखा है इस पर? लगभग इसी जगह पिछली बार मेरे रत्न छूट गए थे। मार्गदर्शक को जोर से उसने बताया, यद्यपि मार्गदर्शक इतने पास आ गया था कि धीरे से बोलना काफी था।
यह शिला लेख हैं। मार्गदर्शक ने पढ़ा शिला लेख। आपके रत्न स्थाण्वीश्वर में सुरक्षित हैं। भारत के सम्राट ने इस शिलालेख में प्रार्थना की है कि आप अवश्य उनके अतिथि बनें।
वे मुझे जानते हैं। चीनी यात्री तो हक्का-बक्का हो रहा था। मार्गदर्शक द्वारा पूरी बात समझाने पर यह सोचने लगा-भारत की अमर संस्कृति को देव संस्कृति क्यों कहा जाता है। समझ में आने लगा उसके अपने चीन में प्रचलित लोकोक्ति में निहित तत्व-जिसमें कहा जाता है जो सर्वाधिक शुभ कर्म करता है, उसे भारत में जन्म मिलता है। बचपन से वह इस पुण्यभूमि भारत की साँस्कृतिक गरिमा का गौरवगान सुनता रहता था। बड़े होने पर उसने अपने जीवन का उद्देश्य बनाया उन तत्वों का शोध जिनने इस साँस्कृतिक को अक्षुण्ण महानता दी और वह चल पड़ा था।
प्रथम भारतीय जनपद में पहुँचने से पहले ही उत्तरापथ के प्रधान ने अपने कुछ साथियों के साथ आगे बढ़कर यात्री की अभ्यर्थना की- सम्भवतः आपने पिछले वर्ष भी इस देश में पधारने का प्रयास किया था। यों आप कहीं भी घूमने के लिए स्वतंत्र हैं। किन्तु सम्राट कृतज्ञ होंगे यदि आप स्थाण्वीश्वर पधारें।
यात्री अवाक् था प्रथम स्वागत की इस भव्यता और विनम्रता से ही। उसका आश्चर्य उत्तरोत्तर बढ़ता गया। अनेक बार उसने मार्गदर्शक ने कहा - अब मुझे पता चल रहा है क्यों भारत को देव भूमि कहा जाता है।
आप निर्विघ्न पहुँच सके? कोई कष्ट तो नहीं हुआ आपको यहाँ पर? स्थाण्वीश्वर में स्वागत सत्कार के पश्चात स्वयं सम्राट आए थे अतिथि के आवास पर।
स्वागत सत्कार देखकर चीनी अतिथि तो धरती पर लेट सा गया दण्डवत की मुद्रा में। उसके कण्ठ से शब्द ही नहीं निकल पा रहे थे।
मैं भगवान बुद्ध का एक तुच्छ श्रद्धालु जन हूँ। मेरा नाम हेनसाँग है। दुभाषिये ने यात्री के कथन से महाराज को अवगत कराया। भाव को समझकर महाराज हर्ष ने कहा-यह ठीक है कि आप तथागत के पवित्र देश में हैं। यदि आपने विश्राम कर लिया हो तो मेरे साथ पधारें।
ये आपके तीनों रत्न। रत्नागार में अतिथि को लेकर सम्राट स्वयं गए थे। आपके रत्न हमारी सीमा में इतने दिनों तक पड़े रहे, हम आपको सूचित न कर पाए। अतः आप हम पर अनुग्रह कर कोई तीन रत्न और स्वीकार कर लें। इस कथन को सुनकर वह चुपचाप खड़ा बहुमूल्य रत्न राशि को देखता रहा।
थोड़ी देर बाद उसने कहा ये रत्न आप तथागत के सिंहासन में जड़ित करने को अर्पित कर दें। मैं तो यहाँ की संस्कृति के अध्ययन हेतु आया हूँ। उन तत्वों को जानना चाहता हूँ जिनने इस संस्कृति को देव संस्कृति की गरिमा दी है। यात्री के मनोभाव को समझकर महाराज ने पास खड़े आचार्य सुगतभद्र की ओर देखा। उनकी दृष्टि में आचार्य के प्रति मौन निवेदन था।
निवेदन को समझते हुए आचार्य कह रहे थे “भद्र! इस संस्कृति के प्रेरक तत्व चार है। पहला-ईमानदारी अपने प्रति। जिस परमात्मसत्ता के हम शाश्वत अंश है उसके अनुरूप हमारा जीवन पवित्र और दिव्य है या नहीं। दूसरे तत्व के रूप में जिम्मेदारी समाज के प्रति, उस विशाल कुटुम्ब के प्रति, जिसकी कृपा के बल पर यह मानव देह पली बढ़ी है। तीसरा तत्व है बहादुरी, जिम्मेदारी के निर्वाह के लिए, भले स्वयं को दाव पर लगाना पड़ जाय। ये तीनों जहाँ उपस्थिति रहते हैं, वहाँ चौथे तत्व के रूप में समझदारी आए बिना नहीं रहती। यों भी कह सकते हो उपरोक्त तीनों का निर्वाह ही समझदारी है। इन चारों की उपस्थिति से मनुष्य देवता बनता है समाज देव समुदाय, संस्कृति-देव संस्कृति। इनमें से पहले के आने पर अन्य चारों को भी आना पड़ेगा।”
आचार्य ने अपने कथन की समाप्ति पर उसकी ओर देखा। यात्री का यह पहला पाठ था। उसकी अध्ययन यात्रा का प्रथम पग। इस अध्ययन में वह इतना रमा कि उसने चीन जाने का विचार छोड़ दिया। हेनसाँग के नाम से परिचित-संस्कृति के इस अध्येता ने अपने दस्तावेजों में स्वयं के जीवन की इस घटना का उल्लेख संवेदनशील शब्दों में करते हुए कहा है-मानव जब कभी जिस काल खण्ड में विश्व संस्कृति की रचना का अभियान छेड़ेगा ये ही तत्व उसके आधार बनेंगे।
एक साधु नदी तट पर बैठा हुआ माला जप रहा था। पास बैठे एक ब्राह्मण ने जप का कारण पूछा तो उसने बताया स्वर्ग प्राप्ति के लिए।
ब्राह्मण भी साधु के पास ही बैठ गया। वह एक एक मुट्ठी बालू नदी में डालने लगा। पूछने पर बताया कि नदी का पुल बनाऊँगा उस पर होकर पार जाऊँगा।
साधु ने कहा मित्र पुल इस प्रकार नहीं बनता उसके लिए इंजीनियर, श्रमिक, सामान एवं आवश्यक धन जुटाना पड़ेगा। बालू डालने भर से पुल नहीं बँध सकता।
उलटकर ब्राह्मण बोल मंत्र माला जपने से स्वर्ग कैसे मिल जायगा। उसके लिए संयम, ज्ञान एवं परमार्थ जैसे पुण्य भी तो करने पड़ेंगे।
साधु ने अपनी भूल समझी और कर्मयोगी बन गया।
एक जिज्ञासु ने किसी ज्ञानी से पूछा, मनुष्यों की बनावट तो एक जैसी है। फिर उनमें से कुछ पतन के गर्त में गिर कर डूब क्यों जाते हैं।
ज्ञानी ने दूसरे दिन शिष्य को बुलाया और उत्तर बता देने का वचन दिया। नियत समय दोनों समीपवर्ती तालाब के किनारे चलने की योजनानुसार तैयारी करने लगे।
ज्ञानी के पास दो कमंडलु थे उनमें से एक साबुत था। दूसरे के पैंदे में छेद था। दोनों जिज्ञासु को दिखा दिए।
साबुत कमंडलु पानी में फेंका गया तो वह लगातार तैरता रहा डूबा नहीं।
इसके बाद दूसरा कमंडलु फेंका गया। उसके पैंदे में पानी भर गया और कुछ ही दूर तैर कर पानी में डूब गया।
ज्ञानी ने जिज्ञासु से पूछा दोनों कमंडलुओं की भिन्न-भिन्न परिणति का क्या कारण हुआ?
जिज्ञासु ने सहज भाव से बता दिया कि जिसके पैंदे में छेद था उसमें बाहर का पानी भर गया और वह डूब गया।
ज्ञानी ने इसी उदाहरण का हवाला देते हुए कहा कि जिसके पैंदे में छेद था वही डूबा। इसी प्रकार जिस मनुष्य में असंयम के दोष होते हैं, उसी से बाहर की दुष्प्रवृत्तियाँ उसमें घुस पड़ती हैं और उसे डुबा देती हैं।
जिज्ञासु समझ गया कि अपने व्यक्तिगत दोष दुर्गुणों से ही संसार की दुष्प्रवृत्तियों के चपेट में आता और डूब जाता है। जिनमें छिद्र नहीं हैं, वे तैरते हैं और पार उतरते हैं।
श्रुति कहती है-
न ब्रह्मणो वेदपाठान्न शास्त्र-पठनादपि।
देव्यास्त्रिकालाभ्यासाद् ब्राह्मणः स्याद् द्विजऽन्यथा॥
(वृ. संध्या भाष्य)
अर्थात् - वेद और शास्त्रों के पढ़ने से ब्राह्मणत्व नहीं हो सकता। तीनों कालों में गायत्री उपासना से ब्राह्मणत्व होता है, अन्यथा वह द्विज नहीं रहता है।
सभी शास्त्र, अभिमतों में जहाँ गायत्री महाशक्ति की महिमा-महत्ता का गुणगान है, वहाँ उसके साथ परोक्ष रूप से एक शर्त भी लगी हुई है कि साधक को ब्राह्मण एवं तपस्वी होना चाहिए। ब्राह्मण का अर्थ है विचारणा और चरित्र निष्ठ का उत्कृष्ट होना। तपस्वी का अर्थ है- आदर्शों के निर्वाह में जो संयम बरतना पड़ता और कष्ट सहना पड़ता है, उसे दुखी होकर नहीं , प्रसन्नतापूर्वक सहन करना।
स्पष्ट है कि जिन्हें उच्चस्तरीय विचारणा और गतिविधियाँ अपनानी होती हैं, उन्हें विलासिता में, सम्पन्नता में कटौती करनी होती है और औसत नागरिक स्तर का जीवन-यापन करना पड़ता है। अन्यथा बड़प्पन की अहंता प्रदर्शित करने के लिए अधिक धन चाहिए। स्पष्ट है कि भारत जैसे पिछड़े देश की गई गुजरी स्थिति में कोई समृद्ध-सुसम्पन्न जीवन ईमानदारी में व्यतीत नहीं कर सकता। करे भी तो उस प्रयोजन में इतना समय लगाना पड़ेगा कि मानवी गरिमा के अनुरूप गतिविधियाँ अपनाने के लिए समय ही शेष न बचेगा। यही बात परिवार को अधिक विस्तृत करने और उन्हें अधिकाधिक साज-सज्जा-सुविधा प्रदान करने के संबंध में है। वह भी अपना चित्त और समय उसी प्रयोजन के लिए लगाये रहेगा। परमार्थ प्रयोजनों से लेकर आदर्श व्यक्तित्व निर्माण की योजना ऐसी दशा में आधी-अधूरी ही बनी रहेगी। दोनों में से एक भी प्रयोजन ठीक प्रकार न साध सकेगा।
ब्राह्मण को तपस्वी होना चाहिए, इसका तात्पर्य संयमशीलता से है। संयम की चार दिशायें हैं (1) इन्द्रिय संयम (2) अर्थ संयम (3) समय संयम (4) विचार संयम। इन्हें साधने पर दूसरे स्वेच्छाचारी लोगों की तुलना में ब्राह्मण को अभावग्रस्त भी रहना पड़ेगा। उपहास भी सहना पड़ेगा और जिनके स्वार्थों को धक्का पहुँचता होगा, उन्हें उनका विरोध प्रतिरोध करके झंझटों में-कष्टों में भी फँसना पड़ेगा।
जो इस स्थिति को प्रसन्नतापूर्वक सह सकता हो, इन कठिनाइयों को तपजन्य सुयोग मान सकता हो, उसे तपस्वी कहते हैं। शरीर को अकारण कष्टों में डालकर सताना तप नहीं। तप एक उच्चस्तरीय व्रत है, संकल्प है जिसमें प्रतिकूलता के रहते हुए भी अपने निश्चय पर अटल रहना पड़ता है। संयम द्वारा बचाई हुई श्रम, समय और साधनों की शक्ति को लोकमंगल के परमार्थ प्रयोजनों में लगाना पड़ता है। मोटी दृष्टि से यह मूर्खता है। चतुरों की दृष्टि में अपने को मूर्ख सिद्ध होने देना और इस कारण निजी जीवन में अभाव और बाहरी जीवन में विरोध-उपहास सहना भी कष्ट साध्य होता है। इसलिए उसे भी तप की ही एक शाखा माना गया है।
गायत्री ब्राह्मण की कामधेनु है अर्थात् ब्रह्म-परायण-उत्कृष्ट जीवन यापन करने वालों को ही उसका समुचित परिणाम मिलता है। गायत्री उपासक को ब्राह्मण होना चाहिए।
यहाँ जन्म-जाति और कुलवंश की चर्चा नहीं हो रही है। इस दृष्टि से किसी को ऊँचा-नीचा नहीं माना जा सकता। ब्राह्मण जाति के लोगों को ही इसका लाभ मिलता है, ऐसा सोचना सर्वथा निरर्थक है। क्योंकि मनुष्य मात्र एक ही जाति है। मानवी मौलिक अधिकार सबको समान हैं। धार्मिक क्रिया-कृत्यों में, पूजा-उपासना में भी कोई जाति-भेद, लिंगभेद व्यवधान नहीं डालता। ऐसी दशा में एक वर्ण को गायत्री का अधिकार होना और दूसरों को न होना यह न तो बुद्धि संगत है और न न्याय संगत और न भारतीय संविधान के अनुकूल। हिन्दू धर्म की वर्ण-व्यवस्था गुण, कर्म, स्वभाव पर आधारित है। स्तर बदलते ही वर्ण बदल जाते हैं। इसलिए यहाँ किसी को इस भ्रम में नहीं पड़ना चाहिए कि शास्त्रकारों का मन्तव्य ब्राह्मण शब्द से किसी जाति विशेष के संबंध में है। वे तो मात्र गुण, कर्म स्वभाव की दृष्टि से उत्कृष्ट व्यक्ति को अध्यात्मवादी, सत्पात्र, साधक, अधिकारी मानते हैं। गायत्री उपासना का यदि वास्तविक प्रतिफल देखना हो तो व्यक्ति को इतनी सुनिश्चित आदर्शवादी जीवनचर्या अपनानी पड़ेगी कि उसे ब्राह्मण या तपस्वी कहने में किसी को संकोच न करना पड़े। यदि सही अर्थों में ब्राह्मणोपम जीवन जिया जा सके तो गायत्री साधना का सम्पुट मिलकर जीवन में चमत्कारी परिवर्तन लाता व ब्राह्मणत्व को सार्थक बना देता है।
युग परिवर्तन की सन्धिवेला का यह अंतिम दशक है। इसमें पुराने और नये युग का संघर्ष होगा। अधोगामी प्रवृत्तियाँ अपना पसारा समेटेंगी और श्रेष्ठ विचारधाराओं का तीव्रगामी प्रवाह प्रचण्ड तूफान बनकर जन-जन को अपनी चपेट में लेगा। इस बीच संसार को अनेकों प्रकार के महापरिवर्तनों से होकर गुजरना पड़ेगा। युगपरिवर्तन की प्रसव पीड़ा प्रकृति में स्पष्ट दिखाई देगी। उज्ज्वल भविष्य की प्रबल संभावना होते हुए भी भयंकर उथल-पुथल होगी। गलाई-ढलाई का उपक्रम भी इन्हीं दिनों द्रुतगति से प्रकृति के गर्भ में चलेगा। प्रसूता के बाह्य लक्षण भी दिखाई देते हैं और उसे असह्य प्रसव वेदना भी होती है, पर यह एक सर्वविदित तथ्य भी है कि उन्हीं पीड़ाओं के बीच से नवागन्तुक सुकोमल शिशु की प्रसन्नतादायी सुखद संभावना भी जुड़ी रहती है। इन दिनों कुछ इसी प्रकार का नियति क्रम चल रहा है।
महाभारतकार ने जहाँ एक ओर इस युगान्तरकारी महापरिवर्तन का वर्णन करते हुए कहा है कि युग परिवर्तन के समय संसार में तीव्र संघर्ष और भयानक हलचलों का दौर उठता है। यथा-”ततस्तुमुल संघाते वर्तमाने युग क्षये” अर्थात् वर्तमान युग का क्षय समापन होते समय बड़ी हलचल तथा संघर्ष की स्थिति उत्पन्न हो जायेगी, वहाँ यह भी सुस्पष्ट लिखा है-
“द्विजातिपूर्वको लोकः क्रमेण प्रभविष्यति।
दैवः कालन्तरेऽन्यस्मिन्युनर्लोक विवृद्वये॥”
अर्थात् - युग परिवर्तन का सन्धिकाल आरंभ हो जाने पर क्रम से द्विजाति-संस्कार सम्पन्न लोगों का, ब्राह्मणत्व का अभ्युदय होगा और तब भगवान मानव समाज को वृद्धि और उन्नति की ओर अग्रसर करेंगे। ज्योतिषशास्त्र के अनुसार कलियुग के बीच सतयुग का मध्यान्तर इन्हीं दिनों आरंभ होने जा रहा है। ग्रह गणित के अनुसार भी यह समय युगपरिवर्तन का बैठता है। इसमें असुरता हारेगी और दैवी विभूतियाँ जीतती चली जायेंगी।
इस संदर्भ में जिनकी अप्रत्याशित भविष्यवाणियाँ प्रायः सिद्ध होती रही हैं, ऐसे अपने समय के दिव्यदर्शियों में जूलवर्न, जीन डिक्शन, प्रो. हरार, कीरो, नोस्ट्राडेमस आदि के नाम विश्व विख्यात हैं। उनकी भविष्यवाणियों का सार संक्षेप यह है।
“सारे संसार में युग सन्धि के दिनों में व्यापक उथल-पुथल होगी। यह समय व्यापक तनाव और शीत युद्ध तथा गृहयुद्धों का है। विश्वयुद्ध की प्रबल संभावना है। उसके कारण फैली महामारियों एवं प्रकृति-विग्रहों से करोड़ों लोगों की जान जाने का भय है। प्रकृति प्रकोप उभरेंगे। अतिवृष्टि, अनावृष्टि, मौसम का असंतुलन, हिमपात, भूकंप समुद्री तूफान जैसी विपत्तियों की संभावना है। साथ ही साथ इन समस्त विभीषिकाओं के गर्भ से ही एक नये युग का अभ्युदय भी सुनिश्चित है।”
सामयिक परिस्थितियों पर सही भविष्यवाणियाँ करने में अन्तर्राष्ट्रीय ख्याति की सूक्ष्मदर्शी महिला आयरीन ह्यजेज का नाम इन दिनों सभी की जबान पर है। वे अदृश्य में चल रही हलचलों को अभी दिव्य दृष्टि से देखतीं और उस आधार पर अगले दिनों घटित होने वाली संभावना व्यक्त करती हैं। उनने अपने एक वक्तव्य में कहा है - तृतीय विश्व युद्ध के रोमाँचकारी हृदयविदारक दृश्य मेरी आँखें चल चित्र की तरह देखती हैं। यह दुर्घटना अब से लेकर सन् 2000 के बीच कभी भी घटित हो सकती है। किन्तु साथ ही मैं यह भी देखती हूँ कि उत्तर भारत में एक ऐसे आध्यात्मिक सूर्य का उदय हो रहा है जो इन विकट संभावनाओं को निरस्त कर सकने वाला तेजस्वी वातावरण बना रहा है।
ठीक इसी से मिलती जुलती कनाडा की एक अन्य दिव्यदर्शी और सही भविष्य कथन के संबंध में सुप्रसिद्ध महिला माल्या डी का कथन भी बहुत विश्वस्त माना जाता रहा है। उनने अपने एक भविष्य कथन में कहा है कि इस सदी के अन्तिम दशक में विशेषकर सन् 1991 और 98 के मध्य विश्व भर में भयंकर उथल-पुथल होगी। उसमें जहाँ जन समुदाय को अतीव कष्ट सहने होंगे, वहाँ एक संभावना यह भी है कि इस विनाशलीला को उलट सकने वाली एक प्रचंड आध्यात्मिक आँधी चल पड़े। ऐसे तूफान का उद्गम मुझे भारत के हिमालय क्षेत्र से होता दीख रहा है।
मिश्र के प्राचीन पिरामिड पर भविष्यवाणी अंकित है। जिसमें इन दिनों युग बदलने, बुरा समय जाने और नया जमाना आने का उल्लेख है। इन पिरामिडों में अंकित भविष्यवाणियों को सबसे पहले डेविड डेविडसन नामक एक खगोल विज्ञानी ने अनूदित किया और “द ग्रेट पिरामिड-इट्स डिवाइन मेसेज” नामक पुस्तक में प्रकाशित किया। उसके अनुसार उसमें पाँच हजार वर्ष पूर्व पिरामिडों के निर्माण से लेकर अब तक के इतिहास और आगे की भविष्यवाणियाँ अंकित हैं। सिकन्दर का उदय, ईसा का जन्म और उनका क्रूस पर चढ़ाया जाना, पैगम्बर मोहम्मद का जन्म, तेरहवीं शताब्दी में क्रूरता के प्रतीक चंगेज खाँ, 19 वीं सदी में नैपोलियन तथा इस सदी में हिटलर के उत्थान-पतन आदि के सुविस्तृत भविष्य कथन, जो उन दीवारों पर खुदे हुए हैं, अब तक सही उतरे हैं। दोनों महायुद्धों, भारत की स्वतंत्रता, बांग्लादेश का उदय, ईरान-ईराक युद्ध के अतिरिक्त इस शताब्दी के अन्तिम दशक में होने वाली विश्वव्यापी हलचलों क्रान्तिकारी परिवर्तनों की भविष्यवाणियाँ भी पिरामिड की मीनार पर लिखी हुई हैं।
उसके अनुसार- सन् 1990 से 2000 के मध्य तीसरे विश्वयुद्ध की पूरी-पूरी संभावना है जिसमें दुनिया के लगभग सभी देश भाग लेंगे। युद्ध में भयानक मारक आयुधों को प्रयुक्त किया जायगा। इस संहार लीला से मात्र कुछ ही व्यक्ति बचेंगे जो नवयुग का सरंजाम जुटायेंगे। नया युग “रूहानी” अर्थात् आध्यात्मिक युग होगा और इसका नेतृत्व एक ऐसे तपः पूत आध्यात्मिक व्यक्तित्व द्वारा किया जायगा जो जीवन भर इसका ढाँचा तैयार करने तथा पृष्ठभूमि बनाने में लगा रहा है। यह विश्वव्यापी परिवर्तन सन् 1999 तक पूर्ण हो जायगा।
“सेंचुरीज” नाम से विख्यात नोस्ट्राडेमस की भविष्यवाणियों ने पूरे विश्व के प्रबुद्ध समाज के चिन्तन को झकझोरा है। कितने ही अनुसंधानकर्ताओं, लेखकों ने अपनी-अपनी भाषा में इसके अनुवाद प्रकाशित किये हैं। दि फाण्ट ब्रूनो नामक एक फ्रेंच लेखक की- “नोस्ट्राडेमस : हिस्टोरियन एण्ड प्रोफेट” नामक अनूदित पुस्तक सर्वाधिक प्रामाणिक मानी जाती है। इसके अनुसार लेटिन, इटेलियन, ग्रीक एवं पुराने फ्रेंच में लिखी गयी ये भविष्यवाणियाँ अब तक दो तिहाई इतिहास की कसौटी पर खरी उतरी हैं। इस सदी के अन्तिम दशक के सम्बन्ध में उसका कथन है- सन् 1990 से 2000 के मध्य एक जलता हुआ विशाल आग का गोला अंतरिक्ष से हिन्दमहासागर में गिरेगा। इससे जो ज्वार-भाटे आयेंगे, समुद्र में ऊँची तूफानी लहरें उठेंगी, वे सारे दक्षिण एशिया-आस्ट्रेलिया को पूरी तरह डूबो देंगी।
अमेरिका एवं सोवियत रूस में पारस्परिक आर्थिक एवं आयुध निर्माण सम्बन्धी समझौता होकर उनकी विचारधारा का एकीकरण हो जायगा। खाड़ी क्षेत्र का एक अरेबियन शासक अपनी सनक से समूचे विश्व को आणविक, रासायनिक एवं जीवाणु विश्वयुद्ध में झोंक देगा, जिसका प्रारंभ मध्यपूर्व के बढ़ते तनाव से 1990-91 के आसपास होगा। इसके फलस्वरूप सारा योरोप इस युद्ध की कर्म भूमि बनकर विनष्टप्राय हो जायगा। जो शेष बचेंगे वे 1999 के बाद मानव जाति का नूतन इतिहास रचायेंगे।
बाइबिल में तृतीय विश्व युद्ध को आर्मेगेडान नाम दिया गया है। ओल्ड टेस्टामेण्ट में इसका सुविस्तृत वर्णन है। इस संदर्भ में महात्मा जॉन ने महायुद्ध के अतिरिक्त प्राकृतिक विपदाओं और परिस्थितिजन्य महाविनाश की विभीषिकाओं का भी संकेत किया है। इसी प्राचीन ग्रन्थ में सात वर्षों तक चलने वाले विश्वयुद्ध की भी भविष्यवाणी है। दो खण्डों में बँटा हुआ यह युद्ध कब होगा? इसका हवाला देते हुए न्यू टेस्टामेंट में कहा है कि जब येरुशलम सेनाओं से घिर जायगा, तब निश्चित ही एक महा संहारक युद्ध होगा, जिसमें एक ओर आस्तिकता प्रधान शक्तियाँ होंगी, तो दूसरी ओर विनाश पर उतारू सामर्थ्य होगा। मैथ्यू अध्याय- 24 में जहाँ इस समय को भयानक विपत्तियों से भरा बताया गया है, वहीं साथ ही यह भी कहा गया है कि देव पुरुष का अवतार होगा और सुख शान्ति का समय आयेगा।
इन दिनों विश्व का राजनीतिक आकाश मेघाच्छन्न हो रहा है। रह-रह कर बिजली की कड़क और बादलों की भयंकर गरज सुनाई दे जाती है। अगर ये बादल फट पड़े तो पृथ्वी पर छोटी-मोटी प्रलय का ही दृश्य दिखाई पड़ने लगेगा। साथ ही यह भी असंभव नहीं है कि अदृश्य सत्ता हस्तक्षेप करे और वैसा ही जनमानस बने तथा नियंता के नियत निर्धारण के अनुसार देवमानवों का एक बृहद् वर्ग आगे आये। जीवन्तों और जाग्रतों के मन-मानस में समुद्र मंथन स्तर का हृदय मंथन-विचार परिवर्तन कर वह, मरने-मारने पर उतारू लोगों को दैवी आह्वान को सुनने-समझने और विनाश की ओर बढ़े कदम पीछे मोड़ने को बाध्य कर दे। सृष्टा अपनी शस्यश्यामला धरती को नष्ट नहीं होने देगा, पर साथ ही साथ यह भी सुनिश्चित है कि परिवर्तन के गर्भ में से ही नये युग का अरुणोदय होगा।
शरीर का संचालन मन करता है और मन को दिशा अन्तरात्मा से मिलती है। इसी को तत्वदर्शियों ने अहम, स्वत्व, स्व आदि नामों से सम्बोधित किया है। अँग्रेजी में इसी को ईगो कहते हैं। व्यक्तित्व का बीज स्वरूप यही है। ईगो को सुपर इगो तक, स्व को विराट स्तर तक विकसित एवं परिष्कृत करने वाले महामानव-देवमानव बनते और अपनी सघन आत्मीयता एवं सहृदयता का पग-पग पर परिचय देते हैं। विकसित एवं परिष्कृत आत्मचेतना ही ब्रह्म है, अध्यात्मदर्शन में पग-पग पर इसी की व्याख्या-विवेचना की गई है।
अपने व्यक्तित्व को सीमित रखने का नाम स्वार्थ है और विकसित करने का नाम परमार्थ है। सीमित स्व दुर्बल होता है, पर जैसे-जैसे उस का दायरा विस्तृत होता जाता है, आन्तरिक बलिष्ठता बढ़ती जाती है। प्राणशक्ति का विस्तार सुख, दुख की अपनी छोटी परिधि में केन्द्रित कर लेने से रुक जाता है, पर यदि उसे असीम बनाया जाय और स्वार्थ को परमार्थ में परिणत कर लिया जाय, तो इसका प्रभाव यश, सम्मान, सहयोग आदि के रूप में बाहर से तो मिलता ही है, भीतर की स्थिति भी द्रुतगति से परिष्कृत होती है और व्यक्तित्व प्रखर होता चला जाता है।
तत्वदर्शियों के अनुसार अधिसंख्य व्यक्ति अपनी छोटी-सी परिधि को ही समूचा संसार और उसमें चलती रहने वाली ऊहापोह को सबसे बड़ी समस्या मान लेते हैं। उतने ही सीमित दायरे में वे अपने स्वार्थ और सुख को सीमित किये रहते हैं। इस छोटे दृष्टिकोण में बँधा व्यक्ति छोटी सी समझ के अंतर्गत ही अपने को समेटे रहता है और जो कुछ करते बन पड़ता है, वह उतने ही छोटे क्षेत्र में सम्पन्न होता रहता है, किन्तु जब दृष्टिकोण का विकास एवं अपने आपे का विस्तार होता है, तो विशाल विश्व ब्रह्मांड की सुविस्तृत परिधि दीख पड़ती है। सम्पूर्ण संसार अपना घर जैसा दीखने लगता है। तब उसका हित-अनहित भी उतना ही विस्तृत हो जाता है और सोचने तथा करने के लिए उतना ही बड़ा दायरा अपने दायित्वों के अंतर्गत आ जाता है। यही स्वत्व-विकास या आत्मविकास है। क्षुद्रता की परिधि लाँघ कर विशाल एवं विराट की परिधि में इसी प्रकार प्रवेश किया जाता है। ऐसे व्यक्तित्व तब स्वयं को वैभव, वासना, तृष्णा की पूर्ति तक सीमाबद्ध नहीं रखते, वरन् समस्त विश्व का सुख-दुख उनका अपना बन जाता है। उस सुविस्तृत परिधि में ही उनका ‘स्व’ फैल जाता है और अपना-पराया एक होकर समग्र अद्वैत की स्थापना होती है। इस स्थिति में पहुँचा व्यक्ति ‘स्व’ और ‘पर’ को एकीकृत हुआ अद्वैत समझता और उसी विराट को अपना कार्य क्षेत्र बनाता है।
महान दार्शनिक प्लेटो के अनुसार जब हमारा परिकृष्ट स्व से साक्षात्कार होता है, तब हमें अपने सही स्वरूप का अपने बहु आयामी विस्तार का भान होता है। इसी उच्च स्थिति में पहुँचने पर आत्मा का परमात्मा तत्व में विलय या साक्षात्कार होता है। परिणाम स्वरूप व्यक्ति को फिर किसी के आश्रय अवलम्बन की आवश्यकता नहीं पड़ती, वह स्वयं समर्थ हो जाता है। यही प्रत्येक मनुष्य का अन्तिम लक्ष्य भी है।
प्रख्यात मनोवेत्ता कार्ल गुस्ताव जुँग आत्मीयता की परिष्कृत अहं की महत्ता का प्रतिपादन करते हुए कहते हैं कि न जाने क्यों यह तथ्य बुद्धिमानों के गले नहीं उतरता कि वे मस्तिष्कीय चमत्कारों की तुलना में कहीं अधिक विभूतियाँ अपनी अंतःचेतना को विकसित करते हुए हस्तगत कर सकते हैं। ‘स्व’ को यदि उच्च स्तरीय बनाया जा सके तो फिर ‘पर’ के प्रति न कोई शिकायत रहेगी, न कोई उपेक्षा-अवमानना ही बन पड़ेगी।
जब देशकाल की परिधि से बाहर निकल कर ‘सर्व खल्विद ब्रह्म’ की महान दृष्टि प्राप्त हो जाती है, तो ‘स्व’ की छोटी परिधि समाप्त होकर विशाल और विराट अपना आपा हो जाता है। इसी को ब्रह्मनिष्ठ या ईश्वर प्राप्ति कहते हैं। इस विस्तार को प्राप्त करने वाले को उस सबकी उपलब्धि या अनुभूति हो जाती है, जो कुछ इस समाज में फैला हुआ है। उसका चिन्तन और कर्त्तृत्व भी उतना ही विस्तृत हो जाता है। पूर्णता का-जीवनमुक्ति का रसास्वादन ऐसी ही स्थिति में होता है।
तत्वज्ञ शैलिन्ग ने अपनी कृति में कहा है कि मनुष्य के अन्तराल में चेतना की, भावसंवेदना की उच्च स्तरीय परतें विद्यमान हैं। किसी भाँति यदि उन्हें जाग्रत एवं विकसित किया जा सके, तो महानता की, जीवन के परम लक्ष्य की उपलब्धि सुगमतापूर्वक की जा सकती है। उनके अनुसार इस जगत में दो प्रकार के व्यक्तित्व देखे जाते हैं। एक तो वह हैं, जो अपने निजी स्वार्थ के लिए जीते और उसी छोटे दायरे में सीमाबद्ध रहते हुए जीवन की इतिश्री कर लेते हैं। दूसरे वे हैं, जो अपने एवं अपने परिवार के अतिरिक्त पड़ोसियों के लिए, देश एवं समाज के लिए स्नेह सौजन्यता जगाने-जताने के लिए अपने स्वार्थ का त्याग करते हैं और बदले में आत्म संतोष तथा लोक सम्मान अर्जित करते हैं। ऐसे ही व्यक्तित्वों का विकास ‘सुपर ईगो’ स्तर का माना जा सकता है।
मूर्धन्य मनीषी डॉ. मोटोयामा के अनुसार जब तक कोई भी व्यक्ति अपनी ही तरह दूसरों के दुख दर्द की अनुभूति नहीं करता, उसका स्व सीमित बना रहता है और जब तक स्व का विकास-परिष्कार नहीं होता, तब तक सन्तोष और स्थायी सुख मात्र कल्पना-जल्पना भर बन कर रह जाते हैं। वे कहते हैं कि जैसे-जैसे व्यक्ति की आत्मीयता का अपने आप का विस्तार होता जाता है, उसका हृदय विशाल होता जाता है। दूसरों के दुःख को वह अपना मान लेता है और अपने सुख को दूसरों के लिए लुटा देता है। बुद्ध, ईसा, गाँधी आदि महामानवों ने इसी गुण को अपने में विकसित कर के उसे सर्वोच्च कक्षा तक पहुँचाया और तभी अतीव आनन्द की अनुभूति की थी। अपने आपे के इस विकास को उनने अति चेतना का विस्तार कहा है। क्षुद्र अहं के सीमित दायरे में जकड़ कर व्यक्ति जहाँ निजी जीवन जीने वाले सामान्य व्यक्तियों की भाँति छोटे से परिकर तक ही सीमित रह जाते हैं, वहीं दूसरी कोटि के साधकों को अपना पराया नहीं दीखता। विराट् चेतना से एकात्मकता स्थापित कर लेने के कारण उनकी चेतना विलक्षण रूप से जाग्रत हो उठती है।
जापान में बहुप्रचलित ‘जेन’ साधना की यौगिक क्रिया “जो साकू” में त्याग के माध्यम से ‘स्व’ का विकास कराया जाता है। इसी प्रकार से विश्व के विभिन्न धर्मों में आत्मत्याग की तपश्चर्यायें निर्धारित हैं। मानव जीवन में उच्च समस्वरता लाने के लिए जेन पद्धति में सेल्फ निगेशन की तपश्चर्या को अनिवार्य माना गया है। डॉ. मोटोयामा ने अपनी कृति “हिप्नोटिज्म एण्ड रिलीजियस सुपर कान्शसनेस” में इसका सविस्तार वर्णन करते हुए बताया है कि इस साधना उपक्रम द्वारा उल्लेखनीय आत्मविकास किया जा सकता है। अन्तः प्रेरणा के माध्यम से सूझबूझ को चरमोत्कर्ष पर पहुँचाया जा सकता है। इसके अभ्यासियों का वैज्ञानिक परीक्षण जे. बी. राइन द्वारा आविष्कृत अतीन्द्रिय क्षमता टेस्ट द्वारा करने पर पाया गया कि अपने आपे का विस्तार करने वाले अन्यों के दुःख दर्दों को बिना किसी के बताये ही जान जाते हैं। उनके कष्ट-कठिनाईयों को अपने शुभ संकल्पों के माध्यम से दूर करने में भी उनने महत्वपूर्ण सफलता पाई। ऐसे व्यक्ति की अतीन्द्रिय क्षमताएँ भी बढ़ी चढ़ी देखी गई। मनुष्य जीवन का उद्देश्य ही है वैश्व चेतना से एकत्व स्थापित करना, स्वार्थ से ऊपर उठकर परमार्थ परायण बनना।
एक व्यक्ति घर से तय करके आया कि आज तो मन्दिर में सौ रुपया दान दे कर ही आना है। किन्तु सीढ़ियां चढ़ते-चढ़ते ख्याल आया कि पचास भी काफी होंगे और नीचे दुकानदार से सौ के खुले पैसे करा लिये। भीतर पहुँचा ख्याल आया कि कौन मजबूर कर रहा है। पचास भी न दूँ तो भी क्या बुरा है। बड़ी राहत मिली दिल को। सोचा दस रुपये दे देंगे। पैसे देने थे। सबसे आगे की सीट पर बैठ गया। प्रवचन प्रारंभ हुआ। आधा प्रवचन चला होगा। सोचा, इस तरह भावावेश में नहीं आना चाहिए। यहाँ देने वाले और भी बहुत हैं। एक दो रुपया देकर भी काम चल सकता है। दानपात्र घूमने लगा। लोग लगे पैसे डालने उसने सोचा कौन देखता है। आठ-आने भी डाले जा सकते हैं। मात्र दस पैसे आँख से बचा कर उसने डाल दिये।
अधिकाँश लोगों की यही मनोवृत्ति है। शुभ कार्य में दान देते समय मन ऐसे काँपता है जैसे नट रस्सी डगमगाता है।
मनुष्य और मनुष्य के बीच पनपने वाली अहं जनित विभेद बुद्धि ही समस्त विग्रहों का मूल है। यदि आत्मीयता की, अपनत्व की भावना विकसित हो सके, तो सब अपने दिखाई पड़ने लगें। सब में एकता की सूत्र शृंखला बँधी दिखाई पड़ने लगे तो व्यक्तिगत संकीर्ण स्वार्थपरता का अंत होने और सीमित परिधि में संकुचित स्व के विस्तृत होने में देर न लगे। वसुधैव कुटुम्बकम की भावना ही आध्यात्मिक समाजवाद है। इसी के प्रखर रहने पर भूतकाल स्वर्णिम युग बन कर रहा। उज्ज्वल भविष्य के लिए भी अपने आप को, एकता एवं आत्मीयता के तत्वदर्शन को सुविस्तृत बनाना होगा। आत्म कल्याण और विश्व कल्याण का यह एक ही उपाय है।
उस दरिद्र ने बुलवाया है मुझे। कहने के साथ ठठाकर हँस पड़ा। पास खड़े तीनों सैनिक उसे आँखें फाड़े देखे जा रहे थे, पता नहीं क्या था ऐसा उसमें। झेलम के रमणीक तट पर अपनी मस्ती में लेटा था वह। दाहिने हाथ को तकिए की तरह लगा रखा था। बायाँ पैर दायें पैर पर रखा था। रेत पर रखे उसके दाहिने पाँव को झेलम की तटवर्ती जल उर्मियाँ बड़े आग्रह के साथ धो रही थीं। अपूर्व आनन्द की आभा छायी थी उसके चेहरे पर। चेहरा ही क्यों ताम्र गौर रंग का उसका सम्पूर्ण शरीर यही आभा विकीर्णित कर रहा था। न जाने किस स्वर्गीय राज्य का मालिक है यह लंगोटी धारी बूढ़ा जो विश्व विजय का अभियान छेड़ने वाले सिकन्दर को दरिद्र कहता है, जबकि वह अपने नाम के आगे महान लगाना पसन्द करता है।
सैनिक सोच नहीं पा रहे थे, क्या करें वे ? तीनों कभी एक दूसरे की ओर देख लेते, कभी नदी की असीम जल राशि की, और उसके किनारे खड़े वृक्ष-वनस्पतियों की ओर। अजीब विवशता थी, जिसने उन्हें देखकर “आइए” नहीं कहा। यह भी नहीं पूछा “कहाँ से पधारे”, पूछना-ताछना तो दूर रीढ़ सीधी करके बैठा तक नहीं अजी, उसने तो आँख उठाकर देखने तक का कष्ट नहीं उठाया। अपनी मस्ती में पड़ा रहा-जैसे उसके पास सैनिक वर्दी में तीन मनुष्य नहीं तीन तितलियाँ या वृक्षों की टहनियाँ आ गयी हों। तीन कुत्ते के पिल्ले भी आते तो शायद वह विश्व विजेता सिकंदर के सैनिकों से अधिक महत्व देता।
यूनान से प्रस्थान करते समय सिकन्दर ने अपने गुरु अरस्तू का अभिवादन करते हुए पूछा था क्या लाऊँ आपको विजय उपहार के रूप में। ला सकोगे? उस दार्शनिक को जैसे अपनी माँग पूरी किए जाने का विश्वास नहीं हो रहा था। सिकन्दर ने देखा चमचमाती पोशाक पहने खड़े अपने सेनानायकों की ओर, पर्वतीय नदी की जैसी उफनती अपनी सेना की ओर और निहारा स्वयं की ओर जिस पर सबसे अधिक गर्वित था। क्यों नहीं? दर्प भरे हुँकार के साथ शब्द निकले। दार्शनिक गुरु हँसा उपनिषद् गीता की पोथियों के साथ एक ऐसे साधु को ले आना जिसने इनके तत्व को जीवन में आत्मसात कर लिया हो।
पोथियाँ तो जैसे-तैसे मिल गई पर साधु वह भी ऐसा-वैसा वेषधारी नहीं जैसा उसके शिक्षक ने माँगा था। इस समय उसे लौट जाने की जल्दी थी। लम्बी चोटी धारी घुटनों तक धोती लपेटने वाले ब्राह्मण चाणक्य की कूटनीतिक करामातें उसे यहाँ दो पल भी टिकने नहीं दे रही थी। दो पल टिकने का मतलब? नहीं टिक ही नहीं सकता वह। मतलब तो तब निकले जब पाँव जमने की राई-रत्ती गुँजाइश बाकी हो। डडडडडडमकदुनिया से लेकर यहाँ तक विद्रोह ही विद्रोह। सेनानायक से सिपाही तक सबके सब विद्रोही-जिन पर उसे गर्व था सबके सब वहीं? अब.....।
हूँ हं, सैनिकों को खाली हाथ वापस आए लौटे देखकर वह फुफकारा। विशाल तम्बू के बीचों बीच राजसिंहासन था। जिसके दाएँ भाग में विशिष्ट सामंत बैठे थे। बायीं ओर प्रधान सेनानायक और वरिष्ठ सैनिक अधिकारी। आवश्यक वार्तालाप चल रहा था। विचार विमर्श मंत्रणा जैसा ही गंभीर था वातावरण। बात-चीत का क्रम बीच में रोककर इन वापस आए सैनिकों की बातें ध्यानपूर्वक सुनता रहा। जो अपनी आप बीती बता रहे थे।
कथन को सुनकर भृकुटियों में आकुंचन गहराया। माथे पर बन मिट रही लकीरों की संख्या बढ़ी। सिंहासन की दायीं बाजू पर मुक्का मारते हुए गुर्राया। एक वह शैतान का दादा जो अपने को ब्राह्मण कहता है? क्या नाम है उसका? चाणक्य। सेनानायक रेमन धीरे से बोला।
चाणक्य! साढ़े तीन अक्षरों का यह नाम लेते हुए उसका पूरा मुख कड़वाहट से भर गया। शायद अत्यधिक नाराजगी थी उस पर और एक यह अपने को शहंशाह समझने वाला फकीर। क्या नाम है इसका?
दण्डायन। भारत के गौरव को कलंकित करने वाले आम्भी बोल पड़े। ये ब्राह्मण और साधु कुछ सोचते हुए उसने एक सेनानायक से धीरे से कुछ कहा। शब्द स्पष्ट नहीं हो सके। शायद कहीं संदेशा भेजना था। अपना लोहे का भारी टोप सम्भालते हुए वह उठ खड़ा हुआ। समुदाय व्यक्ति में विलीन होने लगा।
एक शाम को झेलम का तट खचाखच भर गया। व्यक्ति समुदाय में बदल गए। पूरे लाव लश्कर के साथ आया था यूनान का सरताज अपने गुरु की भेंट को बटोरने। साधु की मस्ती पूर्ववत थी। उस सुबह और शाम में अन्तर इतना पड़ा था कि इस समय वह नदी की रेत की जगह पेड़ के नीचे लेटा था। पत्तों से झर रही सूरज की किरणें उसके सुनहले शरीर को और ज्यादा स्वर्णिम बना रही थीं।
जानता है न चलने का परिणाम तुझे नष्ट होना पड़ेगा मूर्ख। लगभग चिल्लाते हुए उसने ये शब्द कहे। खीझ की कालिमा उसके चेहरे पर पुती थी। शब्दों के खोखलेपन को वह खुद-जानता है। उसे मालूम था कि यदि इसको मार भी दिया तो पता नहीं दूसरा मिले या नहीं। बड़ी मुश्किल से यही मिला, अब चलने के समय....। एक उन्मुक्त हँसी ने उसकी सोच के हजार टुकड़े कर डाले। हँसता हुआ साधु कह रहा था मूर्ख कौन है यह अपने से पूछ और नष्ट दरिद्र होता है शहंशाह नहीं। नष्ट वह होता जो कामनाओं महत्वकाँक्षाओं के चिथड़े-लपेटे दर-बदर ठोकरें खाता है। जिसके इन चिथड़ों से क्रोध की दुर्गन्ध आती है। वासनाओं की रग कट जाने पर विक्षिप्त है। विक्षिप्त माने बेअक्ल-जिसकी अक्ल मारी गयी समझो वह नष्ट हुआ। सोच। किसे नष्ट होना है? साधु की निर्भीक वाणी उसे अपनी ही किन्हीं गहराइयों में कँपाने लगी। वह सिहर उठा।
इधर साधु कहे जा रहा था शहंशाह वह जिसने जीवन सम्पदा को पहचाना। जिसने जीवन की तिलिस्मी तिजोरी में रखे-प्रेम संवेदना, त्याग जैसे असंख्यों रत्न बटोरे। वह जो आँतरिक वैभव की दृष्टि से अनेकानेक विभूतियों से सजा उसके समक्ष मस्ती से लेटा हुआ था।
निर्वाक खड़ा सिकन्दर सुन रहा था। सामंजस्य बिठा रहा था इस वाणी और उस वाणी में जो उसने अपने गुरु से सुनी थी। जब बचपन में उसका शिक्षा गुरु भारत के किस्से सुनाता। इस देश का गौरव बखानता। तब वह कहा करता था जरा बड़ा होने दो लूट लाऊँगा भारत का वैभव - गौरव सब कुछ वहाँ का बेशकीमती है। अरस्तू हँस पड़ता यह सब सुनकर तुम नहीं लूट सकते सिकन्दर। उसे पाया जाता है लूटा नहीं जा सकता। सैनिक मन की बात की गहराई नहीं पकड़ सका। चलते-चलते उस तत्वेत्ता ने फिर से एक बार कहा था भारत का गौरव वहाँ के प्रशासन, पदाधिकारियों में नहीं बसता। वह धनिकों, सेठों, की तिजोरियों में भी कैद नहीं। वहाँ के गौरव है ब्राह्मण और साधु। विचार निर्माता व्यक्ति निर्माता। आस्थाओं को बनाने वाले समाज को गढ़ने वाले। इनके रहते भारत का गौरव अक्षुण्ण है। इनके जीवित रहते उस पुण्यभूमि का गौरव सूर्य अस्त नहीं हो सकता। समय के तूफानों में वह थोड़े समय के लिए छिप भले जाय पर फिर से प्रकाशित हो उठेगा।
एक भिखारी ने हाथी का शिकार किया। हाथी गिरा तो उसकी चपेट में शिकारी भी आ गया और दबकर मर गया।
उधर से एक सियार निकला। उसने दो बड़ी-बड़ी लाशें सामने पड़ी देखकर प्रसन्नता अनुभव की। बहुत दिनों के लिए इकट्ठा भोजन मिल गया।
खाना कहाँ से आरंभ किया जाय? उसका हल उसने शिकारी के धनुष की डोरी को ठिकाने लगाने से आरंभ किया।
धनुष चढ़ा हुआ था। उसकी डोरी जैसे ही कटी धनुष का एक सिरा उचट कर सियार की गरदन में लगा और उसका भी वहीं ढेर हो गया।
लालच हर किसी से कुकर्म कराता है और उसके ऊपर विपत्ति बुलाता है तथा साथियों के ऊपर विपत्ति बुलाता है।
अरस्तू के इस लम्बे कथन को सुनते हुए वह ऊबने लगा था। उसके चुप हो जाने पर वह मुस्करा कर चल दिया। यहाँ आने पर ब्राह्मण चाणक्य, साधु दण्डायन को देखने पर पता चला अरस्तू की बातों का मर्म। क्या करे? यह सोच रहा था। सैनिक अधिकारी आदेश की प्रतीक्षा में टकटकी बाँधे उसकी ओर निहार रहे थे।
तभी भीड़ को चीरते हुए एक दूत आया। उसके हाथ में एक पत्र था। सिकंदर ने खोला, पढ़ने लगा-सारी बातों की समीक्षात्मक विवेचना करते हुए उस दार्शनिक ने लिखा था उस महान साधु को तत्व जिज्ञासु अरस्तु का प्रणाम निवेदन करना। कहना एक विनीत विद्यार्थी ने शिक्षक को पुकारा है। यद्यपि उनके चरणों में उसे स्वयं हाजिर होना चाहिए। किन्तु उनके वहाँ आने से अकेले उसका नहीं अनेकानेक यूनानवासियों का कल्याण होगा। वे अपनी दरिद्रता मिटा सकेंगे।
पत्र के शब्दों को सुनकर साधु बरबस मुस्कराया। “तू जा” वह कह रहा था, “अपने गुरु से कहना कि दण्डायन आएगा। प्रव्रज्या की उस महान परम्परा को पालन करेगा, जिसके अनुसार जिज्ञासु के पास स्वयं पहुँचना शिक्षक का धर्म है। किन्तु” साधु ने आकाश की ओर दृष्टि उठाई ढलते हुए सूरज को देखते हुए कहा “तेरा जीवन सूर्य ढल रहा है सिकन्दर तू नहीं पहुँच सकेगा पर मैं जाऊँगा-अवश्य। यह उतना ही सच है जितना कल से सूर्य का उदय। अब जा।” कहकर उन्होंने उसकी ओर से मुँह फेर लिया।
सिकन्दर वापस लौट पड़ा। इतिहास साक्षी है इस बात का कि वह यूनान न पहुँच सका। रास्ते के रेगिस्तान में प्यास से विकल मृत्यु की ओर उन्मुख सिकन्दर अपने प्रधान सेनापति से कह रहा था मरने पर मेरे हाथ ताबूत से बाहर निकाल देना ताकि विश्व जान सके कि अपने को महान कहने वाला सिकन्दर दरिद्र था। दरिद्र ही गया। जीवन सम्पदा का एक रत्न भी वह कमा न सका। दण्डायन सत्य था सत्य है।
अपने वायदे के मुताबिक परिव्राजक दण्डायन यूनान पहुँचे। यूनानवासियों ने उनके नाम का अपनी भाषा में रूपांतरण किया “डायोजिनिस।” इस परिव्राजक की उपस्थिति ने यूनानी तत्वचिन्तन को नए आयाम दिये। जीवन की यथार्थ अनुभूति के साथ यह भी पता चल सका-दरिद्रता की परिभाषा क्या है? असली वैभव क्या है? जानबूझ कर ओढ़ी हुई गरीबी में भी आदर्शों का पुजारी कैसे शानदार जीवन जीता रह सकता है? विश्वभर में साँस्कृतिक चेतना की वह पूँजी जो भारत की अमूल्य थाती रही है, ऐसे दण्डायनों ने ही पहुँचायी। आज भी वह परम्परा पुनः जाग्रत होने को व्याकुल है। समय आ रहा है जब सम्पन्नता की सही परिभाषा लोग समझेंगे व ब्राह्मणत्व की गरिमा जानेंगे, अपनाने को आगे बढ़ेंगे।
पं. विष्णु पुलुस्कर किशोरावस्था में ही पटाखे की चिंगारी आँख में लगने के कारण दोनों आँखों से अंधे हो गये। फिर भी उनने निराशा नहीं अपनाई। पढ़ना बंद होने पर वे संगीत के अभ्यास में लगे। वह कार्य बिना आँखों की सहायता के भी हो सकता था।
लगन ने उन्हें संगीत में सफलता के उच्च शिखर तक पहुँचाया। बारह-बारह घन्टे तक अभ्यास ने उन्हें पारंगत बना दिया। उदयपुर राज्य में वे दरबारी गायक नियुक्त हुए। इसके उपरान्त वे काश्मीर राजा के भी राज गायक रहे।
विष्णु दिगम्बर ने नौकरी छोड़ दी और वे जन जीवन में भक्ति भावना का समावेश करने के लिए एक कीर्तन मण्डली बनाकर पद यात्रा पर चल पड़े। गाँव-गाँव उन्होंने संगीत के माध्यम से आस्तिकता की भावना उभारी।
साथ ही उन्होंने संगीत विद्यालयों की स्थापना का आन्दोलन चलाया। पुरातन पद्धति में अनेक सुधार किये। उनके प्रयत्न से देश के प्रमुख संगीतज्ञों का एक सम्मेलन जालंधर में हुआ। उसमें कई महत्वपूर्ण निर्णय हुए। उनके अखिल भारतीय संगीत परिषद की स्थापना हुई। जिसकी शाखाएँ देश भर में बनीं। उनने संगीत पर 50 पुस्तकें लिखी। एक संगीत मासिक पत्र भी 16 वर्षों तक चलाया। संगीत क्षेत्र में उनकी साधना अविस्मरणीय रहेगी।
मनुष्य जन्म को सुरदुर्लभ कहा गया है। इसे जीव के हाथों इस आशा अपेक्षा के साथ धरोहर के रूप में सौंपा गया है कि निजी अपूर्णताओं को विकसित किया जाय और साथ ही विश्व उद्यान को अधिकाधिक समुन्नत-विकसित बनाने की सेवा-साधना में निरत रहा जाय। इस दूरदर्शी विवेकशीलता को व्यावहारिक जीवन में उतारने पर ही कोई सच्चे अर्थों में भक्त या साधक बन सकता है। पात्रता का विकास भी यही है। इसी आधार पर किसी को दैवी अनुग्रह का अनुदान मिलता है। विभूतियाँ, ऋद्धियाँ, सिद्धियाँ हस्तगत होने का यह सुनिश्चित राज मार्ग है।
ईश्वर की मनुहार करने की अपेक्षा यही उत्तम है कि अपनी पात्रता-उत्कृष्टता बढ़ाने के प्राणपण से प्रयत्न किये जायँ। आग पर तपाये जाने और कसौटी पर कसे जाने पर खरे सोने की तरह अपनी प्रामाणिकता सिद्ध करने वालों का ही मूल्याँकन संसार में तथा भगवान के दरबार में होता है। साधना-उपासना से जहाँ आत्मशोधन और आत्म परिष्कार का प्रयोजन सधता है, वहीं सेवा-साधना में रत रहकर पुण्य अर्जित किया जा सकता है। इन आचारों को जो जितनी दृढ़ता और तत्परता के साथ अपनाता है, वह अपनी पात्रता बढ़ाते हुए परमेश्वर का प्राणप्रिय बनता और जीवन को धन्य बनाता है।
भगवान देते हैं, पर देने से पहले पात्रता की परख करते और भक्त का लोभ, मोह और अहंकार छीन लेते हैं। खाली बर्तन में ही घी भरा जा सकता है। जिसमें पहले से ही गोबर भरा है उसे कुछ प्राप्त होने की आशा नहीं करनी चाहिए।
एक लालची सेठ के आग्रह पर भगवान बुद्ध उसके यहाँ भिक्षा ग्रहण करने गये। जिस कमंडलु में भिक्षा लेनी थी, गोबर भरा हुआ था। सेठ ने कहा-गोबर भरे पात्र में स्वादिष्ट खीर कैसे भरी जा सकेगी? उसने पात्र भगवान के हाथ से लिया और धो-माँजकर साफ किया। इसके पश्चात उस में खीर भरी। भगवान बुद्ध ने उसे समझाया-यदि भगवान से या संत से कोई महत्वपूर्ण वरदान प्राप्त करना हो तो पहले अपने अन्तराल में से लिप्सा-लालसाओं को निकाल बाहर करना चाहिए।
भगवान ने अपने सभी भक्तों को साधु-ब्राह्मण बनाया है। उनकी कामनाओं-सम्पदाओं का अपहरण किया और बदले में अपना अपार अनुग्रह दिया। गोपियों की दही लूटने के बाद ही कृष्ण उनके आँगन में नाचने को तैयार हुए। बालि का राज्य छीनने के उपरान्त ही राम ने उसे निज धाम भेज था। कर्ण से घायल स्थिति में भी उसके दाँतों में लगे सोने के टुकड़े माँग कर उसे मोक्ष दिया था। सुदामा के बगल में लगे हुए चावलों की पोटली को छीनने के उपरान्त ही उन्हें द्वारिकापुरी की सम्पदा सुदामापुरी में पहुँचाई थी। यही संसार का क्रम भी है। बीज बिना गले वृक्ष के रूप में विकसित कहाँ होता है?
राजा हरिश्चन्द्र, मोरध्वज, शिवि आदि की महिमा-कथा पुराणों में भरी पड़ी है। यह उनके पात्रत्व-विकास का ही चमत्कार था। लालची को, चापलूस को भगवान का सहयोग एवं अनुदान कहाँ मिलता है। नारद मोह की कथा प्रसिद्ध है। उनके मन में सुँदर राजकुमारी को स्वयंवर में प्राप्त करने और उसके पिता का आधा राज्य प्राप्त करने का लालच हुआ। वे भगवान से सुन्दर रूप-यौवन माँगने गये, पर उन्हें निराश ही लौटना पड़ा। उस कामना पूर्ति में नारद का भविष्य गिरता ही।
भगवान के लिए सभी प्राणी समान हैं। सभी उनकी संतान हैं, पर अन्य जीवों को इतनी सुविधा प्रदान नहीं जितनी मनुष्य को। यह एक प्रकार से पक्षपात और अन्याय ही कहा जा सकता है। पर बात ऐसी है नहीं, जो भगवान ने दिया है, वह मनुष्य को विश्वास योग्य समझकर इसलिए दिया है कि उस धरोहर का उपयोग उसकी विश्व वाटिका को अधिक सुन्दर समुन्नत करने के लिए करेगा। यदि ऐसा नहीं किया जायगा तो वह अमानत में खयानत ही मानी जायगी।
मनुष्य जीवन सृष्टा की धरोहर है, उसको साझेदारी की दुकान माना जाय। उसमें भगवान के अजस्र अनुदान जुड़े हैं और साथ ही अपना पुरुषार्थ एवं कौशल भी जिसे एक शब्द में पात्रता भी कहा जा सकता है। इस हिस्सेदारी में यही न्यायोचित है कि जो भी कमाई हो उसका लाभाँश दोनों साझीदारों को मिले। पूँजी लगाने वाला खाली हाथ रहे और पुरुषार्थ करने वाला दोनों का हिस्सा हड़प ले तो यह हर दृष्टि से अनुचित माना जायेगा और कभी न्यायाधीश के दरबार में जाना पड़े तो वह कृत्य दंडनीय भी होगा।
आत्मा के ऊपर पाँच आवरण चढ़े हुए हैं। फूलों में जिस प्रकार रंग, आकृति, गंध, रस, नाम आदि समग्र रूप से समाहित होते हैं, उसी प्रकार कार्य सत्ता में पाँच कोशों का समग्र समावेश कहा जा सकता है। केले के तने की अथवा प्याज की परतों की तरह इन्हीं आवरणों से आच्छादित रहने के कारण आत्मा का प्रकाश प्रत्यक्षतया प्रस्फुटित नहीं होने पाता। इन्हें उघाड़ दिया जाय तो आत्मा के परमात्मा के प्रत्यक्ष दर्शन अपने ही अन्तराल में होने लगते हैं और आत्मा के बीच समर्पण के आधार पर एकात्मता स्थापित हो जाने के कारण भक्त और भगवान एक ही स्तर के हो जाते हैं। नाला गंगा में मिलने के बाद गंगाजल ही बन जाता है और वैसा ही प्रभाव दिखाने लगता है।
थियोसोफिकल मान्यता के अनुसार पाँच कोश मनुष्य के पाँच आवरण, पाँच शरीर या पाँच लोक हैं। इन्हें क्रमशः (1) फिजिकल बॉडी (2) ईथरिक डबल या बॉडी (3) एस्ट्रल बॉडी (4) मेण्टल बॉडी (5) काँजल बॉडी कहा गया है और इनमें पाँच प्रकार की विभूतियों का समावेश बताया गया है। अध्यात्म शास्त्रों में इन्हें क्रमशः (1) अन्नमय कोश (2) प्राणमय कोश (3) मनोमय कोश (4) विज्ञानमय और (5) आनन्दमय कोश के नाम से सम्बोधित किया गया है। उपनिषद् के तत्वदर्शी ऋषि पंचकोश सम्बन्धी जिज्ञासा का समाधान करते हुए कहते हैं -
अन्नमयः प्राणमयः मनोमयः विज्ञानमयः
विज्ञानमयः आनन्दमयश्चेति पंचकोशाः।
अर्थात् अन्नमय, प्राणमय, मनोमय, विज्ञानमय, और आनन्दमय, यह पाँच कोश हैं। इनमें जो अन्न के रस से उत्पन्न होता है, जो अन्न रस से ही बढ़ता है और जो अन्न रूप पृथ्वी में ही लीन हो जाता है, उसे अन्नमयकोश एवं स्थूल शरीर कहते हैं। प्राण, अपान, बयान, समान, उदान-इन पाँच वायुओं के समूह और कर्मेन्द्रिय पंचक के समूह को प्राणमय कोश कहते हैं। संक्षेप में यही क्रियाशक्ति है। मनोमय कोश मनन और पाँच ज्ञानेन्द्रियों के समूह के मिलने से बनता है। इसे इच्छाशक्ति कह सकते हैं। बुद्धि और पाँच ज्ञानेन्द्रियों का समन्वय विज्ञानमय कोश है। यह ज्ञान शक्ति है। इसी प्रकार कारण रूप अविद्या में रहने वाला, रज और तम से मलिन सत्व के कारण मुदित वृत्ति वाला आनन्देच्छुक कोश आनन्दमय कोश है।
इस प्रकार शरीर को पाँच तत्वों की-चेतना को पाँच प्राणों की मिश्रित संरचना माना जाता है, पर यह दृश्यमान शरीर की विवेचना हुई। शरीर और मस्तिष्क के क्रिया-कलापों से संलग्न एक विशेष विद्युतीय चेतना है। अध्यात्म की भाषा में उसी को अन्नमय कोश कहा गया है। इसे ही वैज्ञानिक भाषा में जैवीय विद्युत-बायो इलेक्ट्रिसिटी कहा जाता है। इसका कार्य शरीरगत क्रिया पद्धति को सुनियोजित और सुनियंत्रित बनाये रहना है।
शरीर की हर इकाई, हर कोशिका- सेल काया की सबसे छोटी इकाई मानी जाती है। हर सेल में एक नाभिक होता है। इसकी बहुमुखी कार्य प्रणालियाँ हैं। कोशों के टूटते रहने पर उनके स्थानापन्न कोशों की निर्माण पद्धति न्यूक्लियोलस एवं क्रोमैटिन नेटवर्क सँभालते हैं। भोजन निर्माण “गाँल्गी बॉडीज” के अधीन रहता है। इसी प्रकार की अन्यान्य शरीरगत सूक्ष्म संचालक पद्धतियाँ अन्नमय कोश के अंतर्गत आती हैं।
इस कोश का स्थान यों तो मुख है, क्योंकि मुख से होकर ही वह पेट में जाता है और रक्त-माँस बनता है, तो भी इसके परिष्कार की साधना भूख तक सीमित नहीं है। व्रत, उपवास, विशेष आहार या अमुक मात्रा में निर्भरता के कारण समूचे शरीर का ढाँचा बनता है और जैसा अन्न होता है, वैसी ही प्रकृति एवं प्रवृत्ति का सारा शरीर बनता है। काया का कण-कण अन्न से विनिर्मित है। ऐसी दशा में यह नहीं कहा जा सकता कि मुख ही अन्न का आधार क्षेत्र है।
दूसरा कोश है-प्राणमय कोश। यह एक प्रकार की चार्जर पद्धति है, जिसके द्वारा अन्नमय कोश की अंतरंग क्षमताओं में शक्ति व्यय होते रहने पर उन्हें खोखला नहीं होने देती। वरन् बैटरी को डिस्चार्ज होने के पूर्व ही चार्ज कर देती है। इस प्रकार यह एक डायनेमो सिस्टम बन जाता है।
प्राणतत्व को चेतन ऊर्जा-लाइफ एनर्जी कहा गया है। ताप, प्रकाश, चुम्बकत्व, विद्युत, शब्द , आदि ऊर्जा के विविध रूप हैं। आवश्यकतानुसार एक प्रकार की एनर्जी दूसरे प्रकार में बदलती भी रहती है। इन सबका समन्वय ही जीवन है। इस विश्व-ब्रह्मांड में मैटर-पदार्थ की तरह ही सचेतन प्राण विद्युत भी भरी पड़ी है। प्राणायाम प्रक्रिया द्वारा सविता शक्ति का प्राणाकर्षण करके मनुष्य अपने अन्तराल में उसकी अधिक मात्रा को प्रविष्ट कर सकता है। यह प्राण यों तो साधारणतया नासिका द्वारा खींची गई वायु द्वारा शरीर में प्रवेश करता है, पर उसके साथ संकल्प और चुम्बकत्व भी जुड़ा होता है तभी प्राण की मात्रा बहुलता के साथ शरीर में पहुँचती है और टिकती है। यह प्राण ही विभिन्न अवयवों द्वारा फूटता है। नेत्रों से, वाणी से, भुजाओं से, निर्धारणों से, व्यवहार से प्राण की न्यूनता एवं बहुलता परिलक्षित होती है। इस प्रकार वह नासिका द्वारा प्रवेश करने पर भी इस क्षेत्र में सीमित नहीं किया जा सकता। वह समस्त शरीर व्यापी है।
तीसरा-मनोमय कोश यों मस्तिष्क में केन्द्रित माना जाता है। कल्पनाएँ, विचारणाएँ, इच्छाएँ, गतिविधियाँ उसी क्षेत्र में विनिर्मित होती हैं, तो भी वह उस क्षेत्र तक सीमित नहीं। पंच ज्ञानेन्द्रियों की अपनी-अपनी भूख है। शरीरगत और मनोगत आवश्यकताएँ चिन्तन की अमुक सीमा निर्धारित करती है। इसलिए वह भी आत्मसत्ता के हर क्षेत्र में संव्याप्त माना जाता है।
चौथा विज्ञानमय कोश है। इसका स्थान हृदय माना जाता है, क्योंकि भावनाओं का उद्गम वही माना गया है। सहृदय, हृदयहीन शब्द बताते हैं कि भावनाओं का केन्द्र हृदय होना चाहिए, किन्तु बात इतने छोटे क्षेत्र तक सीमित नहीं है। अपनी आवश्यकताएँ दूसरे का व्यवहार और परिस्थितियों का तकाजा मिलकर भावनाओं का निर्माण करते हैं। देश भक्ति, समाज सेवा, दुखियों के प्रति सहानुभूति, प्रतिशोध, ईर्ष्या आदि का उद्भव समूचे जीवन क्षेत्र में उत्पन्न होने वाली क्रियाओं की प्रतिक्रिया के फलस्वरूप होता है। वह भी मात्र रक्त संचार की थैली तक सीमाबद्ध नहीं है।
पांचवीं कोश आनन्दमय कोश है। इसका उद्गम मस्तिष्कीय मध्यभाग सहस्रार चक्र को माना गया है, जिसे कैलाश मान सरोवर की, शेष शैय्या और क्षीर सागर की, कमल पुष्प पर तप करते ब्रह्मा की उपमा दी गई है। यह आनन्द वस्तुतः दृष्टिकोण के परिष्कृत होने से सम्बन्धित है। कई व्यक्ति जटिल परिस्थितियों में भी हँसते-हँसते रहते हैं और कई पर्याप्त सुविधा साधन होते हुए भी खीझते-खिझाते रहते हैं। यह सुसंस्कारिता और कुसंस्कारिता की प्रतिक्रिया है।
यह पंचकोश किसी स्थान विशेष से यत्किंचित् प्रभावित भले ही होते हों, पर उनका संबंध समूची जीवन चेतना से है। उनका स्थान षट्चक्रों की तरह मेरुदंड और मूलाधार-सहस्रार की परिधि तक सीमित नहीं है। वस्तुतः यह पाँचों कोश दिव्य शक्तियों के भाण्डागार हैं। जिस प्रकार पंच रत्न, पंच देव, पंचगव्य, पंच, वातावरण के पंच आयाम एवं ब्रह्मांडीय सूक्ष्म पंच कणों आदि की गणना होती है, उसी प्रकार पंच कोणों की महत्ता समझी जाती है।
इन्हें जाग्रत करने के लिए साधक को उच्चस्तरीय तपश्चर्यायें करनी होती है। तपाने से मनुष्य कुछ से कुछ हो जाता है। पर सामान्य अर्थों में सीमित संतुलित और सात्विक भोजन करना अन्नमय कोश की साधना कही जाती है। साहस, संकल्प, पराक्रम अनुसंधान को कड़ाई से अपनाने पर प्राणमय कोश सधता रहता है। श्रेष्ठ ही देखने, खोजने ओर सोचने विचारने से मनोमय कोश सध जाता है। इसी तरह संकीर्णता छोड़कर विशालता के साथ जुड़ जाने पर विज्ञानमय कोश सधता है और सादा जीवन उच्च विचार की, बालकों जैसी निश्छलता की आदत डालने पर, हार-जीत में हँसते रहने वाले प्रज्ञावानों की तरह हर किसी अवसर में आनन्दित रहने पर आनन्दमय कोश सध जाता है। यह सर्वसाधारण की अतिशय सुगम पंचकोशी साधना हुई, पर उच्चस्तरीय पंचकोश साधना के लिए एकान्त, मौन, स्वल्पाहार, संयम, लक्ष्य के प्रति तन्मयता जैसे अनुबंध अपनाने पड़ते हैं। तप-तितीक्षा का स्तर ऊँचा करना पड़ता है। और ‘स्व’ को ‘पर’ में पुरी तरह समर्पित करना पड़ता है। इस संदर्भ में ऐसी कष्ट साध्य तपश्चर्यायें करनी पड़ती है जिसके संबंध में अनुभवी मार्गदर्शकों की सहायता से ही योजनाबद्ध कार्यपद्धति निर्धारित की जाती है। इसमें पग-पग पर परामर्श और मार्गदर्शन की आवश्यकता पड़ती है, जिसकी पूर्ति अनुभवी सिद्ध पुरुष ही कर सकते हैं।
मानव जीवन की क्षमताएँ पाँच कोशों की पाँच धाराओं में विभाजित हैं। यदि यह सम्पदायें समग्र रूप में या न्यूनाधिक मात्रा में सिद्ध हो सके तो समझना चाहिए कि उसी अनुपात से सर्वतोमुखी प्रगति उपलब्ध हो गई और पाँचों प्रकार के सुख, पाँचों स्तरों की विभूतियाँ एवं वर्चस्व हस्तगत हो गये।
कौडिन्य ऋषि भारत में ही जप ध्यान में लगे रहते थे। उन्हें एक बार विदेश के अपरिचित लोगों को धर्म ज्ञान कराने की इच्छा हुई। वे मलेशिया क्षेत्र में गये और उससे लगे हुये देशों में धर्म प्रचार का काम करते रहे। कहते है कि बर्मा से लेकर इण्डोनेशिया तक के क्षेत्र में कौडिन्य ने ही बौद्धधर्म में दीक्षित करने की महती भूमिका निबाही थी।
गंगाधर। बाहर जाने के लिए मुड़ा ही था कि चाची की आवाज उसके कानों में पड़ी। तनिक वहाँ चले जाना तो ठीक रहेगा। वे कह रही थी। कहाँ? पीछे मुड़कर उसने चाची की ओर देखा। उसकी नजरों ने चाची के चेहरे पर छाए भावों को पढ़ लेने की कोशिश की। उन्हीं के यहाँ जहाँ हम लोग तुम्हारे लिए लड़की देखने गए थे। जिन्होंने उधार लेकर हमें नाश्ता कराया था।
उनके यहाँ जाकर......? वह अभी तक नहीं समझ पाया था कि माजरा क्या है? कह आओ कि हम यह रिश्ता करने की स्थिति में नहीं है। आप और कोई जगह ढूंढ़ लीजिए। अब कहीं जाकर उसका मन अतीत और वर्तमान के सम्बन्ध सूत्र को जोड़ पाया। पिछले दिनों की बातें घर में होने वाली खुसफुसाहट के स्वर एक-एक करके अपना रहस्य खोलने लगे। न जाने कितनी बातें दिमाग में उभरी और विलीन हो गई। वह अपनी जगह पर खड़ा रहा। जैसे उसी के विचार सूत्र पावों को आबद्ध कर रहे हो।
सोच क्या रहे हो ? सोचो मत और कोई होता तो किसी दूसरे से कहला देती, चिट्ठी डालने से काम चल जाता। पर ये तो दूर के अपने रिश्तेदार हैं।
शब्दों ने उसे चल पड़ने के लिए विवश किया। चाची की वाक्य व्यंजना, बाह्य शैली और अन्तर भाव इन सबसे वह बखूबी परिचित था। अपने और दूर के। अजब उलझन भरा समीकरण था जिसे उसका गणित प्रेमी मन सारी कोशिशों के बावजूद नहीं सुलझाता पा रहा था। जो अपना है वह दूर का कैसे? कौन सी चीज अपनेपन में परायेपन का जहर घोलती है। स्वार्थ और अहं से घिरी मानवीय सोच ने जीवन के अनुपमेय सौंदर्य को नोच-खसोट कर फूहड़, भद्दा और भयावना बना दिया है। जिस क्षण तक स्वार्थ सधे, जब तक अहं तुष्ट होता रहे तभी तक रिश्तों की सृष्टि होती है। उसका मन अजीब सी जुगुप्सा से भर गया।
एक झुरझुरी उसके सारे शरीर पर दौड़ गई। लड़की के परिवार वाले पुराने परिचित थे। लड़की के पिता सेवाभावना और सद्गुणों की मूर्ति-मानस चक्षुओं के सामने प्रदीप्त हो उठी। क्या कमी है उन सब में। व्यवहार का गिरगिटी रंग परिवर्तन एक विचित्र सी वितृष्णा उसको कुरेदने लगी। कैसी विडम्बना है? उसका दिल धड़कने लगा और महसूस होने लगा कि दिल का कोई कोना पसीजने को हो रहा है। द्वार पर दस्तक देते हुए सोचने लगा कि द्वार खुलने के पहले वह भाग क्यों न जाए? लेकिन विचार को कार्यान्वित करने के पहली ही किवाड़ खुल गया। सत्यभामा खड़ी दिखाई दी। आइए आइए। सत्यभामा हाथ जोड़े कर कह रही थी अंदर आइए और बैठिए। पिताजी अभी बाजार तक गए हैं। अभी आते होंगे। आप अन्दर आइए न।
गंगाधर की दुविधा उसकी चाल में प्रत्यक्ष थी। बाहरी बैठक इतनी छोटी थी कि एक चटाई ही बिछ सके। सत्यभामा बायीं ओर के छोटे कमरे में घुसी। वह भी उसके पीछे-पीछे गया। दीवार से टिकी मूठदार कुर्सी की ओर इशारा करते हुए बोली बैठिए।
बैठने के स्थान से रसोई घर साफ-साफ दिखाई दे रहा था। दीवार की खूँटी में टँगे बरतनदान में तश्तरी-लोटे करीने से सजे थे। वहाँ विलासिता से सने ऐश्वर्य का प्रवेश न होने पर भी, उसकी सुवास ऐसी मनोहारिणी थी कि मन अपने-आप बँध गया था।
सत्यभामा रसोई की चौखट से सटी खड़ी थी। उसने कहा आप भी बैठ जाइए।
वह धीमी चाल से आकर उसके सामने बैठ गई। उसे लगा वह आज ही उसे पहले-पहल देख रहा है। आज से पहले सगे सम्बन्धियों के यहाँ होने वाले विवाह आदि कार्यक्रमों के अवसर पर एक आध झलक पाई थी। तब वह बहुत छोटी थी। स्वयं उसकी भी कोई खास उम्र न थी। देखने की दृष्टि में भी बहुत फर्क था। आज उसी को तीन कदम के फासले पर वह पूरा-पूरा देख रहा था। उसने झुके-झुके ही पूछा-क की जी नहीं आयी? हूँ! कसे हुए गले से मुश्किल से कह पाया। उससे क्या कहे और कैसे कहे? उसे तो कहना यह चाहिए था कि मैं तुमसे विवाह नहीं कर सकता, क्योंकि तुम्हारे पिता का स्तर मेरे परिवार के बराबर नहीं है। स्तर इस एक शब्द को कई बार मन ही मन दुहरा गया। स्तर क्या है? सौंदर्य जो हड्डी-माँस का ढेर है अथवा धन का वह जखीरा जिसकी अति मनुष्य को निकम्मा-आलसी, विलासी बना देती है। या वे सद्गुण जो व्यक्तित्व के क्षितिज पर पड़ने वाली आत्म-प्रकाश की रश्मियाँ हैं जिनसे स्वयं का और औरों का जीवन प्रकाश से भर उठता है।
सोच में फँसे मन को निकालने के प्रयास में खँखारते हुए बोला आना तो चाहती थी पर कोई काम आ पड़ा और मुझे भेज दिया। क्या बात कहने आया था वह यही न कि तुम्हारे पिता दहेज देने में असमर्थ हैं...... और....... ऐसा लगा कि उसका प्रयत्न मात्र कुछ वाक्यों को कहने का नहीं बल्कि किसी के सिर पर तवे भर अंगारे उड़ेल देने का है। वह काँप कर रह गया। सत्य और न्याय की हिमायत उसे प्रिय थी। लेकिन आज बड़ा असमंजस था। एक ओर बड़ों व गुरुजनों के प्रति मन में आदर भाव, दूसरी ओर न्याय की माँग।
वह सिर झुकाए बैठी थी। तीन ही पगों की दूरी पर था उसका चेहरा। बरसात के बाद पेड़ों पर जो धुली-धुली हरियाली आती है, वही उसके चेहरे पर छाई हुई थी? यह रंग में गोरी कही जा सकती है? नहीं, पर कद काठी में ऐसी तंदुरुस्त थी कि नजर फिसल-फिसल जाए। स्वास्थ्य से बढ़कर सौंदर्य कहाँ है? वह जमीन पर आँखें गड़ाए अपने अनजाने में ही आँचल की छोर से गाँठ बाँधती, खोलती खेल रही थी। उसके हाथ हल्के-हल्के काँप रहे थे।
इधर वह अपने चिन्तन तन्तुओं को समेटने-बटोरने की कोशिश में लगा था। बाहरी आकर्षण का सम्मोहन कितनी देर टिकेगा यदि व्यवहार सुगढ़ न हो। इसी के द्वारा तो मिलने वाले एक दूसरे के चरित्र में प्रवेश करते हैं। यदि इस क्षेत्र में कमजोरियाँ रहीं तो व्यवहार कुशलता भी धरी रह जाती है। पनपती है वितृष्णा। अगला कदम तो विचारों, आकाँक्षाओं और उद्देश्यों का है। इसमें यदि सामंजस्य बैठ सका तो रिश्तों की मजबूती असाधारण हो जाती है। इस कसौटी पर खरे उतरने वाले ही तो अपने हैं।
आँखें एक बारगी उसके चेहरे पर जा टिकीं। अजब भोलापन था वहाँ। कोई लड़की कितने वरों का जूठन बनती फिरे। सारा नाश्ता लड़की देखने वाले उड़ा जाते हैं। जूठन के रूप में बचती है लड़की, हमारा यहाँ रिश्ता नहीं जुड़ सकता, मानों लड़की न होकर पैर की जूती हो। असंख्य अपमान की चोटों से अभिशप्त हुआ जीवन....। नहीं..... नहीं। सोचते-सोचते अंतिम शब्द जरा जोर से निकल गए।
तभी द्वार पर चप्पल की चाप सुनाई दी। काका ही थे। उनके बाल पकड़कर दूधिया गए थे। चेहरे की झुर्रियां जीवन की सारी विवशता को चित्रित कर रही थी। आखिर वे लड़की के पिता जो थे। अरे तुम हो बेटा। काहे की नाहीं कर रहे थे। मैं जरा काम से बाजार चला गया था।
उनके विस्मय विस्फारित नेत्रों और बात करने के तरीके से उनकी घबराहट साफ झलक रही थी। स्वर में छुपे असमंजस को उसने भाँप लिया था। इस बीच अपने दिल में मचे द्वन्द्व से वह उबर चुका था। मोह और आदर्श के बीच हुए संघर्ष में विजय आदर्श की रही।
हमें लड़की पसंद है। शुभ घड़ी शोधने का कार्य आपको करना है।
अच्छा। मुझे अपार प्रसन्नता है, खुशी में हाथ पकड़ते हुए बोले तो लगा कि रो पड़ेंगे।
उनके विस्मय विस्फारित नेत्रों और बात करने के तरीके से उनकी घबराहट साफ झलक रही थी। स्वर में छुपे असमंजस को उसने भाँप लिया था। इस बीच अपने दिल में मचे द्वन्द्व से वह उबर चुका था। मोह और आदर्श के बीच हुए संघर्ष में विजय आदर्श की रही।
हमें लड़की पसंद है। शुभ घड़ी शोधने का कार्य आपको करना है।
अच्छा! मुझे अपार प्रसन्नता है खुशी में हाथ पकड़ते हुए बोले तो लगा कि रो पड़ेंगे।
वह उठकर बाहर आया। वे भी बिदा करने दरवाजे तक आए। बोले, कल ही मैं आपके चाचा से मिलने आऊँगा। अच्छा।
उसने मुड़कर द्वार की ओर दृष्टि दौड़ाई तो देखा सत्यभामा खड़ी है। उसकी आँखें आंसुओं में तर रही हैं, होठ फड़फड़ा रहे हैं। उस एक पल में आँखों ही आँखों में सत्यभामा ने हजार-हजार बातें कह डालीं और उसने हर अक्षर के भाव को समझ लिया।
राह की ओर मुड़ते हुए उसने पहला कदम रखा। यह अनीति से संघर्ष की ओर पहला कदम था। बिना दहेज विवाह करने के लिए स्वजनों से संघर्ष करने वाले युवक गंगाधर को सारे देश ने संघर्ष के प्रतीक के रूप में माना। इस लोक मान्यता का तिलक जिसके मस्तक पर लगाया गया उसे लोकमान्य तिलक के रूप में जाना गया।
अमेरिकी धनपति फोर्ड ने एक दिन अपने सेक्रेटरी से पूछा। मित्र यदि हम तुम दोनों मरें तो तुम अगले जन्म में मेरे सेक्रेटरी बनना पसन्द करोगे अथवा धनपति फोर्ड। सेक्रेटरी बोला। फोर्ड बनने की गलती भूल कर भी न करूंगा? फोर्ड चौंका क्यों? सेक्रेटरी बोला प्रतिदिन देखता हूँ। फोर्ड प्रातः नौ बजे दफ्तर आता है। चपरासी दस बजे। क्लर्क साड़े दस बजे। मैनेजर ग्यारह बजे। डायरेक्टर एक बजे और सभी चार बजते-बजते अपने घर वापस चले जाते हैं और दफ्तर का बोझ दफ्तर में छोड़ जाते हैं। कारखाना घटे में है या लाभ में, इससे उनका कोई लेना देना नहीं। किन्तु फोर्ड फाइलों का पुलिंदा और कल की चिन्ताओं का गट्ठर लाद कर रात दस बजे घर लौटता है। पता नहीं चिन्ता में रात को सो भी पाता है या नहीं। जो चैन कर्मचारियों को है वह मालिक को कहाँ। खाते पहनते सब बराबर ही हैं फिर अतिरिक्त झंझट क्यों। यह अंतर है मालिक व नौकर की मनोवृत्ति का।
आदि शंकराचार्य ने “ब्रह्म सत्य जगन्मिथ्या” कह कर यह तो प्रतिपादित कर दिया कि यह जगत मिथ्या है और सत्य केवल ब्रह्म है, पर उनने इसकी व्याख्या विवेचना नहीं की कि इस मिथ्या जगत में बने रह कर सत्य ब्रह्म तक कैसे पहुँचा जाय? उस परम लक्ष्य को कैसे प्राप्त किया जाय, जिसके लिये लोग संसार त्यागने और वन उपवनों में रह कर अपने कर्त्तव्य-धर्म से विमुख होकर लक्ष्य-प्राप्ति की बात कहते हैं। क्या संसार में प्रवृत्त रह कर अपने कर्तव्य कर्मों को करते हुए उक्त स्थिति को प्राप्त नहीं किया जा सकता? उत्तर हाँ में दिया जा सकता है।
यहाँ प्रतिपाद्य विषय यह नहीं है कि यह संसार सत्य है या मिथ्या। प्रश्न यह है कि मानवी जीवन के दायित्वों का भलीभाँति निर्वाह करते हुए हम उस स्तर तक अपना विकास कैसे करें, जिससे “पाछे-पाछे हरि फिरत, कहत-कबीर-कबीर” की उक्ति चरितार्थ हो सके। साधना विज्ञान में योग तो अनेकानेक गिनाये गये हैं, यथा-ध्यानयोग, लययोग, हठयोग आदि पर सर्वसाधारण के लिए आज के व्यस्त समय में न तो यह उतने उपयुक्त हैं, न उपयोगी। इसके दो कारण बताये जाते हैं- प्रथम तो यह कि इनमें नितान्त एकान्त की अनिवार्य आवश्यकता पड़ती है, द्वितीय मनुष्य का शरीर आज इतना खोखला और अशक्त हो चुका है कि कठिन तपश्चर्याएँ वह कदाचित ही बर्दाश्त कर सके। ऐसी स्थिति में किसी ऐसे साधन-मार्ग की आवश्यकता अनुभव होती है, जो पद्धति की दृष्टि से सरल-सुगम भी हो और वर्तमान जन-संकुल वातावरण के अनुकूल भी, साथ ही उपलब्धि भी संतोषजनक।
प्रस्तुत कठिनाइयों को देखते हुए विभिन्न योगमार्गों का परीक्षण-पर्यवेक्षण करने पर एक ही मार्ग आज की कसौटी पर खरा उतरता है, वह है-कर्मयोग। वैसे दैनिक जीवन में ध्यान-धारणा और पूजा-उपासना की हलकी-फुलकी अल्पावधि साधनाएँ कर लेने में भी कोई हर्ज नहीं, किन्तु जहाँ सुगमता और रोचकता की बात आती है, वहाँ कर्मयोग को ही प्रमुखता देनी पड़ेगी। इसके द्वारा भी हम उस लक्ष्य की प्राप्ति कर सकते हैं, जो अन्य मार्गों द्वारा सुनिश्चित बतायी गई है। वंचित प्रायः वही रहते हैं, जो अपने कर्तव्य धर्म को भूल जाते हैं। इसी बात को समझाने के लिए रामकृष्ण परमहंस एक उदाहरण दिया करते थे। वे कहते थे तालाब में बहुतेरी मछलियाँ हुआ करती हैं। मछुआरे के जाल डालने पर उनमें वे फँसी जाती हैं, मगर कुछ प्रयासपूर्वक निकल भी जाती हैं, जबकि कुछ निकलने का सतत् प्रयास करती रहती हैं और कुछ किंकर्तव्यविमूढ़ की स्थिति में उसी में फँसी रह जाती हैं। मुक्तात्माएँ प्रथम श्रेणी में आती हैं, जो व्यक्ति, समाज और राष्ट्र के प्रति अपना कर्तव्य समझती और करके चली जाती है। दूसरी श्रेणी में वे लोग आते हैं, जो उच्चस्तरीय स्वार्थ में परमार्थ की भूमिका निभाते हुए संसार-सागर से उबरने का प्रयास जारी रखते हैं, किन्तु जो विश्व के आकर्षणों में पड़ कर अपना उत्तरदायित्व भूल जाते हैं, वे तृतीय श्रेणी के लोग हैं। ऐसे ही लोग प्रवृत्त मार्ग को संदेहास्पद दृष्टि से देखते, मीन-मेख निकालते और किसी शार्टकट की तलाश में चतुर-चालाकों द्वारा मूड़े जाते हैं।
सच्चाई तो यह है कि हम जिस मार्ग द्वारा अन्दर प्रवेश करते हैं, निकलने के लिए भी वह एक मार्ग सुनिश्चित है क्योंकि जो रास्ता भीतर ले जाता है, वह बाहर निकालने का भी सामर्थ्य रखता है। पुरुषार्थ सिर्फ इतना करना पड़ता है कि हम उसकी दिशा बदल दें। द्वार तो वही रहता है, जो हमें अन्दर ले जाता है, पर उसकी दिशा भीतर से बाहर की ओर हो जाती है। हम इस संसार में जन्म लेते हैं, तो इससे उबरने का भी मार्ग इसमें अवश्य होना चाहिए। संसार को माया-मोह कह कर अपने दायित्वों से छुट्टी पाना और स्वर्ग-मुक्ति के नाम पर एकान्त-सेवन करना कस्तूरी मृग की तरह भटकने के समान है। यदि सचमुच बात ऐसी ही रही होती, संसार भवबन्धन रहा होता, तो भगवान ने इस दुनिया में हमें जन्म ही न दिया होता, किन्तु जब जन्म दिया है तो इतना सुनिश्चित है कि उबरने का उसी में कोई मार्ग अवश्य ही होगा। यह मार्ग सरल कर्मयोग ही है।
आज यह निष्फल इसलिए साबित हो रहा है, क्योंकि हम उसके मानदण्डों को अपनाना नहीं चाहते। उसकी कसौटी पर स्वयं को खरा सिद्ध नहीं कर पाते। श्री अरविंद “कर्मयोगी” पुस्तक के कर्मयोग अध्याय में लिखते हैं कि प्राणायाम, आसन, एकाग्रता, पूजा, विधि-विधान, धार्मिक कर्मकाण्ड यह सभी चीजें स्वयं योग नहीं हैं, योग के लिए मात्र साधन हैं। स्पष्ट है, जब ध्यान-धारणा, पूजा-उपासना लक्ष्य प्राप्ति के साधन मात्र हैं, तो वह साधन कर्तव्य कर्म की साधना क्यों नहीं बन सकती है? निश्चय ही वह बन सकती है, पर कठिनाई आड़े वहाँ आ जाती हैं, जहाँ हम अपनी जिम्मेदारियों को निभाने में ईमानदार बने नहीं रह पाते, जबकि होना यह चाहिए था कि ऐसे कार्यों में भी हम उसी कर्मनिष्ठ और ईमानदारी का परिचय देते, जो अन्य मार्गों के लिए भी अभीष्ट आवश्यक होता है किन्तु अंतस् की उत्कृष्टता के अभाव में ऐसा बन नहीं पड़ता और लक्ष्य प्राप्ति में यह रास्ता विघ्न प्रतीत होने लगता है, जबकि बात ऐसी है नहीं। सच्चाई तो यह है कि अन्य मार्गों में सफलता के लिए साधक को जो आत्मिक स्तर अभीष्ट है, उसी स्तर के त्याग, सेवा, संयम और सहिष्णुता जैसे उपक्रम इस मार्ग में भी अपनाने पड़ते हैं, तभी वह कार्य योग स्तर का बन पड़ता और सही अर्थों में कर्मयोग कहलाता है। इससे कम में सफलता यहाँ भी संदिग्ध ही बनी रहती है।
गीता के कर्मयोग का सारतत्व भी यही है कि यदि हमारा अन्तःकरण पवित्र हुआ, तो जीवन तथा चेतना भी रूपांतरित होंगे, फलतः कर्म के बाह्य स्वरूपों के ज्यों के त्यों बने रहने पर भी उसके सारे आन्तरिक भाव और हेतु परिवर्तित होंगे और परिवर्तित भाव की यही स्थिति तो कर्मयोग की सफलता है, अथवा दूसरे शब्दों में अधिक गंभीर व आध्यात्मिक अर्थ में कहें, तो यह कहना पड़ेगा, कि जो कर्म हमें संसार में करने पड़ते हैं, उसे आध्यात्मिक उन्नति का साधना बना लिया जाय। फिर भगवान का उपकरण बन कर लोकहित के लिए दिव्य कर्म किया जाय। यहाँ दो बातें हैं, जिन्हें समझना अनिवार्य है प्रथम है सत्ता के केन्द्र को ऊर्ध्वगामी बनाने का मार्ग और दूसरी कर्म के बाह्य रूप का महत्व नहीं, उसे बदलना आवश्यक नहीं, यद्यपि उसके हेतु व परिधि परिवर्तित हो जायेंगे। ये दोनों बातें तत्वतः एक ही हैं, क्योंकि एक को समझने से दूसरी समझ में आ जाती है। हमारे कर्म के भाव का उदय हमारी सत्ता के स्वभाव से होता है, किन्तु स्वयं यह स्वभाव भी कर्म से अप्रभावित नहीं रह पाता। कर्म के भाव में परिवर्तन हमारी सत्ता के स्वभाव में आमूल-चूल परिवर्तन लाता है। यह परिवर्तन चेतना के उस केन्द्र को बदल देता है, जिससे हम कर्म करते हैं। यदि जीवन, जगत और कर्म माया मिथ्या होते, जैसा कि कुछ विद्वानों की अवधारणा है, यदि आत्मा का कर्म अथवा जीवन से कोई संबंध नहीं होता, तो ऐसी बात नहीं देखने में आती। वस्तुतः हमारे अंदर जो जीवात्मा है, वह साँसारिक क्रिया-कृत्यों से स्वयं को विकसित करती है। आत्मोन्नति एवं चरम लक्ष्य की प्राप्ति के संदर्भ में व्यवहारिक कर्मयोग की यह सार्थकता है।
यदि इतना हम समझ सकें तो कर्मयोग हमें सारहीन और निरर्थक प्रतीत नहीं होगा। फिर वह भी आत्मोन्नति के लिए उतना ही उपयोगी साधन जान पड़ेगा, जितना अन्य। ईशोपनिषद में कहा भी गया है कि इस संसार में रहकर अपने कर्तव्य-कर्म में प्रवृत्त हों। कर्म बन्धन से मुक्त होने का इसके अतिरिक्त संसारी लोगों के लिए और कोई मार्ग नहीं। इस प्रकार इस उपनिषद् वाक्य से उस संशय का भी निवारण हो जाता है, जिसमें लोग कर्मयोग को शंका शंकित दृष्टि से देखते हैं।
भगवान बुद्ध काशी के एक सम्पन्न किसान के पास गये। उससे भिक्षा माँगी। किसान ने भिक्षा-पात्र लिये भिक्षु-प्रवर की ओर देखा और व्यंग्य-भाव से कहा मैं परिश्रम से खेत जोतता-बोता हूँ तब जो फसल उपलब्ध होती है उससे उदर पूर्ति करता हूँ। किन्तु आप बिना खेती किये भोजन पाना चाहते हैं।
मैं भी तो किसान हूँ, खेती करता हूँ, बुद्ध ने प्रशान्त स्वर में उत्तर दिया।
खेती। किसान ने काषाय वस्त्रधारी भिक्षु की ओर अचरज से देखा। हाँ! वत्स तथागत ने कहा मैं आत्मा की खेती करता हूँ। ज्ञान के हल से श्रद्धा के बीज बोता हूँ। तपस्या के जल से सींचता हूँ। विनय मेरे हल की हरिस, विचारशीलता काल और मन नरैली है। सतत् प्रयास का ज्ञान मुझे उस गन्तव्य की ओर ले जा रहा है जहाँ न दुःख है, न सन्ताप। मेरी इस खेती से अमरता की फसल लहलहाती है, वत्स।
मनुष्य का चिरन्तन अस्तित्व आत्मा के रूप में ही रहता है। मनुष्य जीवन में यह आत्मा शरीरगत ऐषणाओं से ऊपर उठकर मनुष्य को अपने शाश्वत स्वरूप के योग्य ही कार्य करने की प्रेरणाएँ देती रहती है। राजपुत्र गौतम को उसी प्रेरणा ने भगवान बुद्ध बना दिया था। यह पथ प्रत्येक आत्मदर्शी के लिए खुला है।
प्राणतत्व अनादि और अनन्त है। शास्त्रों में सृष्टि के आरंभ में सर्व प्रथम प्राणतत्व के उत्पन्न होने का वर्णन है। जड़ जगत में पंचतत्वों का और चेतन प्राणियों में विचारशक्ति का आविर्भाव उसी से हुआ है। प्रश्नोपनिषद् 6/4 में उल्लेख है -
“स प्राणमसृजत, प्राणच्छ्रद्धाँ रवं वायुर्ज्योति रुपः पृथिविन्द्रियमनोऽन्नम्।”
अर्थात् उस ब्रह्म ने प्राण उत्पन्न किया। प्राण से श्रद्धा, बुद्धि, मन एवं आकाश, वायु, तेज, जल, पृथ्वी आदि पंचतत्वों की उत्पत्ति हुई। तब अन्न उत्पन्न हुआ।
अथर्ववेद के प्राण सूक्त में आता है-
“प्राणाय नमो यस्य सर्व मिदं वशे, यो भूतः सर्वस्येश्वरों यस्मिन् सर्व प्रतिष्ठितम्।”
अर्थात् उस प्राण को नमस्कार, जिसके वश में सब कुछ है। जो सब प्राणियों का अधिष्ठाता है, जो सब में समाया है, जिसमें सब समाये हैं। गायत्री का अध्यात्म यह प्राण ही है।
मानवी काया का संचालन एवं स्थिर स्थापना इसी प्राण चेतना पर निर्भर है। यों तो शरीर की प्रकट संरचना पंचतत्वों से विनिर्मित रासायनिक पदार्थों द्वारा होती है। उसके क्रिया-कलापों का संचालन वैद्युतीय चेतना से होता है जिसे अध्यात्म की भाषा में अन्नमय कोश कहते हैं। पर इसका भी संचालन तंत्र अन्यत्र है। इसी को प्राण या प्राणमय कोश कहते हैं। जैसे बिजली का प्रवाह बंद हो जाने पर या घट-बढ़ जाने पर बल्ब, पंखे आदि के कार्यों में व्यवधान उत्पन्न हो जाता है, उसी प्रकार शरीर के समस्त अवयव यथावत रहने पर भी प्राण विद्युत के क्रमबद्ध संचार में बाधा पड़ते ही मनुष्य भयंकर रोगों से ग्रस्त हो जाता है या मृत्यु को प्राप्त हो जाता है।
यों सामान्य भाषा में प्राणवायु ऑक्सीजन को कहते हैं किन्तु वस्तुतः ऐसी बात है नहीं। प्राण एक सचेतन विद्युत है जिसका विस्तार तो ब्रह्माण्ड व्यापी है, पर वह मनुष्य को उसकी चुम्बकीय क्षमता के अनुरूप उतनी ही मात्रा में मिलती है जितनी कि वह खींच सकने, धारण कर सकने या प्रयोग में ला सकने में समर्थ होता है। बहती हुई नदी सामने होते हुए भी उसमें से अपने बर्तन के अनुरूप ही जल ग्रहण कर सकते हैं। उसी प्रकार मनुष्य कितना प्राणवान बने, यह उसकी निजी स्थिति पर निर्भर है।
संस्कृत में प्राण शब्द की व्युत्पत्ति ‘प्र’ उपसर्ग पूर्वक ‘अन्’ धातु से हुई है, जिसका अर्थ होता है-जीवनी शक्ति। यह मात्र जीवधारियों में ही काम करती है, जिसे उसका जितना अंश न्यूनाधिक मात्रा में उपलब्ध होता है, उसी अनुपात से वह दुर्बल प्राण या महाप्राण कहलाता है।
प्राणतत्व को विज्ञान की भाषा में चेतन ऊर्जा-लाइफ एनर्जी, वाइटल फोर्स, कॉस्मिक एनर्जी आदि कहा गया है। ऊर्जा के कई रूप हैं (1) हीट-ताप (2) लाइट-प्रकाश (3) मैग्नेटिक-चुम्बकीय (4) विद्युत-इलेक्ट्रिकसिटी (5) साउण्ड-शब्द आदि। आवश्यकतानुसार एक प्रकार की एनर्जी दूसरे प्रकार में बदली भी रहती है। इन सबका समन्वय ही जीवन है।
यही ऊर्जा शरीर में चमक, स्फूर्ति, ताजगी, उमंग, साहस, उत्साह, संकल्प आदि विशेषताओं के रूप में दृष्टिगोचर होती है। पेट में भूख और मन में कामोत्तेजना के रूप में भी इसी की प्रखरता का परिचय मिलता है। यह प्राण एक शरीर से दूसरे शरीर में भी आदान-प्रदान की स्थिति में रहता है। जिस प्रकार बिजली एक तार से दूसरे तार में - एक शरीर से दूसरे शरीर में दौड़ जाती है, उसी प्रकार बलिष्ठ का प्राण दुर्बल की ओर दौड़ जाता है। ऊँची सतह के तालाब को नीची सतह के तालाब के साथ जोड़ दिया जाय तो नीची सतह की ओर पानी दौड़ने लगेगा और तब तक दौड़ता रहेगा, जब तक कि दोनों बराबर लेवल पर नहीं पहुँच जाते हैं। बड़ों के चरण छूने, उनके सिर पर हाथ रखने, पीठ थपथपाने के पीछे यही सिद्धान्त काम करता है। बच्चों को गोदी में खिलाने के पीछे भी यही विद्या काम करती है। महाप्राण व्यक्ति स्वल्प प्राण वालों का स्पर्श करके रोग निवारण करते हैं। ब्रह्मचर्य के मूल में प्राण निग्रह ही काम करता है।
अध्यात्मवेत्ताओं के अनुसार प्राणतत्व ही जीवनीशक्ति है। इसका जो जितनी अधिक मात्रा में संरक्षण एवं ब्रह्मांडव्यापी प्राण से आकर्षण-अवधारण कर लेता है, उतने ही अंश में वह जीवनी शक्ति से भरपूर माना जा सकता है। स्त्री शरीर निगेटिव और पुरुष शरीर पॉजिटिव होता है। इस प्रकार के संयोग-मिलन में पुरुष ही घाटे में रहता है। चुम्बन-आलिंगन भी एक प्रकार का संयोग ही है। इसलिए आध्यात्मिक प्रयोजनों के लिए किये गये अनुष्ठानों में इस प्रकार की चेष्टाओं का निषेध है। प्रतिभाशाली प्राणवान लोगों के संपर्क से दुर्बलों को प्राणतत्व का लाभ अनायास ही मिलता रहता है। इसी को मानवी विद्युत या जैव चुम्बकत्व कहते हैं। ओजस्वी, तेजस्वी इसी स्तर के होते हैं।
बैटरी, जनरेटर, मैग्नेट आदि को स्पर्श करने से जिस प्रकार छूने वाले के शरीर में बिजली दौड़ जाती है, उसी प्रकार की प्रतिक्रिया प्राणचेतना के क्षेत्र में भी होती है। प्राण सम्पन्न एक प्रकार का डायनेमो बन जाता है जो अपने में विद्युत उत्पन्न करता और दूसरों को बाँटता रहता है। दुर्बल काया वाले भी तेजस्वी, प्रभावशाली होते देखे गये हैं और मोटे-तगड़ों में भी पस्त हिम्मत, डरपोक पाये जाते हैं। यह प्राणतत्व की न्यूनाधिकता का ही प्रतिफल है।
कभी -कभी प्राण विद्युत शरीर कलेवर में से उछलकर बाहर आने लगती है तो ऐसे व्यक्ति बिजली के आदमी बन जाते हैं। विश्व भर में इस तरह के सैंकड़ों व्यक्तियों की खोजबीन पिछले दिनों वैज्ञानिकों द्वारा की जा चुकी है। उन्हें छूने पर ही नहीं आँखों से आँखें मिलाने पर भी कमजोर व्यक्ति हैरान होता है। इस तरह के मानवी विद्युत के स्त्रोत तथा प्रयोग पर गहरे अन्वेषण करने के लिए संसार भर में कितनी ही संस्थाएँ काम कर रही हैं। जिनमें दि स्कूल आफ मैस्मेरिज्म विशेष रूप से प्रख्यात है।
इसके आधार पर मनुष्य अपने निज के व्यक्तित्व में बहुमुखी प्रखरता उत्पन्न कर सकता है। प्रतिभाशाली बन सकता है। आत्म विकास की अनेकों मंजिलें पार कर सकता है। पदार्थों को प्रभावित करके उन्हें अधिक उपयोगी बनाने तथा इस प्रभाव से जीवित प्राणियों की प्रकृति बदलने में भी सहायता कर सकता है। ऋषियों के आश्रमों के समीप इसी प्रभाव के कारण सिंह और गाय साथ-साथ एक घाट पर पानी पीते थे।
पदार्थ और मैटर की तरह ही इस विश्व-ब्रह्मांड में सचेतन प्राण विद्युत भी भरी पड़ी है। हम सभी प्राण विद्युत के लहलहाते महासागर के मध्य रहते हुए भी प्रायः उससे अनभिज्ञ हैं। हम में से हर कोई मनुष्य प्राणायाम जैसे उपचारों से उसकी अतिरिक्त मात्रा उपलब्ध कर सकता है और महाप्राण बन सकता है। जिस प्रकार फेफड़े गहरी साँस लेकर अधिक मात्रा में वायु उपलब्ध कर सकते हैं और उसमें विद्यमान ऑक्सीजन का लाभ उठा सकते हैं, उसी प्रकार प्राणायाम प्रक्रिया द्वारा प्राणाकर्षण करके उसे अन्तराल में अधिक मात्रा में भरा जा सकता है।
शरीर में इस प्राण विद्युत का अवतरण उस स्थान पर होता है जिसे ब्रह्मरंध्र या सहस्रार कमल कहते हैं। इसी विद्युत उत्पादन केन्द्र को वैज्ञानिक भाषा में “रेटीक्युलर एक्टिवेटिंग सिस्टम” कहते हैं। यहीं से सचेतन स्फुल्लिंग-इलेक्ट्रिक इम्पल्स उत्पन्न होते हैं और मस्तिष्कीय तंत्र द्वारा समस्त मस्तिष्क में फैल जाते हैं। इतना ही नहीं वे काया के विभिन्न अवयवों तक अपनी तरंगें फेंकते हैं। सिर के विभिन्न स्थानों पर यंत्र के रज्जु मेरुदंड के माध्यम से आगे बढ़ते हैं और सर्वत्र प्राण विद्युत का संचार कर उसे नवीन प्राण चेतना से भर देते हैं। सविता द्वारा प्रदत्त गायत्री के द्वारा आकर्षित प्राण चेतना का अवतरण साधक के अन्तराल में जितने अधिक परिमाण में होता चलेगा, उसी अनुपात में वह ओजस्वी, तेजस्वी एवं मनस्वी बनता जायेगा। प्रश्नोपनिषद् में कहा भी गया है।
“य एष विद्वान् प्राणं वेद रहस्य प्रज्ञा हीयते”
अर्थात् जो इस प्राण को जान लेता है उस पर प्रज्ञा के रहस्य भी प्रकट हो जाते हैं।
मिथला के गंगाधर शास्त्री एक संस्कृत पाठशाला चलाते थे। बड़ा नियमित और सौम्य था उनका जीवन क्रम।
शास्त्री जी की एक मात्र संतान थी गोविन्द। उसे भी वे पाठशाला साथ ले जाते।
एक दिन की बीमारी से अचानक गोविन्द का देहावसान हो गया। उसका क्रिया कर्म करके शास्त्री जी नियत समय पर पाठशाला पहुँच गये और पढ़ाने के कार्य में लग गये।
विद्यार्थियों को पता चला कि गोविन्द नहीं रहा तो उनने बहुत दुःख मनाया और शास्त्री जी से कहा शोक में आज पाठशाला बंद की जाय।
शास्त्री जी ने कहा तब तो दूना शोक बढ़ जाएगा। एक लड़के ने न रहने का, दूसरा तुम लोगों की पढ़ाई में हर्ज होने का। एक विपत्ति भगवान ने ऐसी भेजी उसे तो हम टाल नहीं सकते थे। पर दूसरी क्षति बुलाने का कदम उठाने से तो रुक ही सकते हैं।
कसैला मुख बनाते हुए उसने भीड़ के कथन का एक शब्द दुहराया धर्म। इस शब्द के उच्चारण के साथ न जाने कितने भाव उभरे, विलय हुए। शब्द सिर्फ ध्वनि तो नहीं और न अक्षर समूह। यद्यपि इसके बगैर इसकी अभिव्यक्ति नहीं। अक्षरों के घट में भरे भावों की पहचान सार है। पर स्वयं की अनुभूतियों-मान्यताओं की मिलावट में यह खो जाती है। उसके साथ कुछ ऐसा ही घटा। अभी कल ही यहाँ आया था। आने के पीछे सोच थी मित्र से मिलन और भारत भ्रमण। भ्रमण का प्रथम बिन्दु यही क्यों न रहे बस यही सोच उसे वाराणसी ले आयी। सफर की थकान मिटाने के बाद ये घूमने निकले थे। वे दो थे महज रूप-रंग, देश के विचार से नहीं बल्कि व्यक्तित्व विचार-अनुभूतियों और मान्यताओं में दो। इस सबके अलग-अलग होने पर भी कहीं अन्दर से कोई सूत्र उन दोनों को जोड़ता था। अन्यथा मित्रता कैसे निभती? यह थी संवेदना की धारा जो दोनों दिलों को सींचती थी। थी मन की वह कसक जो उन दोनों के बीच सेतु बनी जिसके कारण दोनों ने समाज को अपना मन, अपना अस्तित्व और अस्मिता अर्पण की। यही सौहार्द था उनके बीच, नहीं तो दो कब एक हुए हैं?
दिन चढ़े सड़क की यह उदासीनता विचित्र लगी। मन में हल्का सा कंप हुआ। चिंतन सागर में विचारों की एक लहर उठी। असंख्यों भूले-भटकों, बिछुड़ों को अपने ऊपर ढोकर मिलाने वाली राह की यह विरक्ति। राह की विरक्ति मानव से अथवा मानव की राह से। दार्शनिक मन में सहज तर्कशास्त्रीय सवाल उठा। खैर होगा सोच कर सिर झटका और चल पड़े। मित्र को बताने लगे यह वाराणसी है। हमारे शास्त्र इसे तीनों लोक से न्यारी कहते हैं। उमा-महेश्वर की शाश्वत निवास स्थली जिसके चरणों को धोने के लिए गंगा हिमालय से गंगा जल ले दौड़ी आती है। उनके ये विदेशी मित्र खासी हिन्दी समझते हैं, हाँ बोलने में अभी जरूर थोड़ी कठिनाई थी। कवित्व पूर्ण भाषा में अपने मनोभावों को व्यक्त करते हुए साथ चल रहे मित्र महोदय के चेहरे की ओर देखा, वहाँ उदासीनता थी। सहज नास्तिक मन को इस विवरण से क्या? बात को पलटते हुए उनने कहना शुरू किया बनारस, अपनी कथन को पूरा करते इतने में देखा दो तीन आदमी तेज कदमों से गुजर रहे हैं। उनका चलना लगभग दौड़ने जैसा है। चाल का अटपटापन, चेहरों पर छायी दहशत भरी मायूसी, फटी-फटी सी आँखें दोनों की दृष्टि को अपनी तरफ घसीटे बिना न रहीं।
क्या हो गया इन्हें? तब क्या। प्रश्न दिशाओं में खोने लगे। दोनों ने एक-दूसरे की ओर ताका? तब एक ने दूसरे से कहा, चलते हैं आगे बढ़ने पर पता चल जाएगा। यद्यपि कहने वाले का मन शंकाकुल था। कल कुछ ऐसी-वैसी बातें कानों में पड़ी थीं जो मन को मथने लगीं।
उसके कदम शिथिल हो गए। चेहरे पर छायी उल्लास की कान्ति एक क्षण को मन्द होती दिखी। भौहों पर आकुँचन की रेखाएँ आयीं, गहरी हुई पर शीघ्र विलीन होने लगी। कुछ दूर आगे बढ़े कि गली के मोड़ से शोर उभरा। शब्द अस्फुट थे, ध्वनियों के गर्जन में। हाँ भावों का जरूर कुछ अनुमान लगा। थोड़ा फासला और तय करने पर दिखाई दिया कि कुछ लोग आगे खड़े हैं। उनके हाथ-लाठियों-भाले-फरसे आदि धारदार हथियारों से लैस हैं। चोरी छुपे कुछ और भी लिये हों तो कोई अचरज नहीं। एक दूसरे के पास कानाफूसी और भद्दी गालियाँ....।
क्या हुआ? पर भीड़ ठहरी, वहाँ कौन सुनने को तैयार था। एक आदमी जो भीड़ से निकल रहा था तनिक सा पूछने पर उबल पड़ा होगा क्या साहब? यहाँ और क्या होने को है? दंगा हुआ है। सब एक-दूसरे की जान के दुश्मन बने हैं। कल तक जो एक साथ रहते थे आज वहीं.....। ऐसे में आप लोग कहाँ जा रहे हैं, ऊपर से नीचे देखते हुए बोला लौट जाइए बाबू लोग अपने घर जाइये। धोती-कमीज पहने हिन्दुस्तानी और अँग्रेजियत की खिचड़ी बने 35-40 साल के इस आदमी पर दोनों ने अपनी दृष्टि उठाई। आहिस्ते से सवाल किया किसने किया दंगा? और कौन करेगा? इन की ओर इस तरह देखा जैसे बहुत बचकाना सवाल पूछ बैठे हों। आँखें साफ कह रही थी इतना भी नहीं जानते मूर्ख कहीं के। पर मुख से बोला इन्सान करता है हुजूर इन्सान-कभी सुनाई पड़ा है कि जानवरों ने दंगे किए हैं। वे तो बेचारे मेल-मिलाप से रहते हैं। धर्म और मजहब लड़ मर रहे हैं। कहता हुआ एक ओर चलने लगा। सम्भवतः वह समय से सुरक्षित घर पहुँच जाना चाहता था और इनके साथी ने उसके कहे एक शब्द को चबाते हुए दुहराया।
चलो लौट चलते हैं। इन्होंने उसका हाथ पकड़ा और वापस लौट चले। देखा! डॉक्टर साहब आप धर्म की इतनी वकालत करते रहते हैं और धर्म जहर बुझी कटार की तरह इन्सान और इन्सानियत का दिल चीर रहा है। उसे अपने वहाँ के कैथोलिक प्रोटेस्टेण्टों के झगड़े याद आ गए। बोला आज न जाने कितनी हँसती-खिलखिलाती जिंदगियाँ धरती से उठ जाएँगी। न जाने कितनों को अपनों की याद में सारे जीवन झुलसते हुए जीना पड़ेगा। कितने बेसहारों के भविष्य की उज्ज्वलता पर हमेशा-हमेशा के लिए कालिमा पुत जाएगी। कौन दोषी है इसका? वह तीखे शब्दों में आक्रोश व्यक्त कर रहा था। लम्बे समय तक यह एक शब्द उन दोनों के बीच बहस का मुद्दा रहा है, भले पत्र माध्यम बनते आए हों। हमेशा वह उन्हें समझाते आए हैं प्रकृतिवाद, भौतिकवाद, मानववाद मानव को उसके लक्ष्य तक नहीं पहुँचा सकते। पर आज-विषाद के घुटन भरे माहौल में उनसे कुछ कहते न बन पड़ा। उनने आँखें उठाई एक नजर मित्र की ओर देखा और नजरें झुका लीं। नेत्रों की पुतलियाँ गहरे जल में तैर रही थी। लगता था कि सारे विवाद को वह पी जाना चाहते हैं पर असमर्थ हो रहे हैं।
उनकी भाव दशा साथ चल हरे सज्जन से छुप न सकी-स्वर धीमा हो गया, मैं कहता हूँ धर्म की जरूरत क्या है? है भी तो कोई एक होता। धर्म के नाम पर इतनी खाइयाँ-खंदक, टीले, पहाड़। जहाँ देखो जिधर देखो आदमी भावना और भूगोल के आधार पर बँटा है, बँटा रहा है, बँटना चाहता है। कौन जोड़ेगा इन्हें? कौन पाटेगा विषमता के गड्ढे? कौन मेटेगा विभाजन की रेखाएँ? किससे ढहेगी बँटवारे की दीवारें?
धर्म उनके मुख से फिर से यह शब्द सुनकर वह बौखला गया। सड़क किनारे खड़े पेड़ इन दोनों की बहस मौन हो सुन रहे थे। आस-पास के मकानों के दरवाजे बन्द थे। श्मशान से सन्नाटे पर इन्हीं की आवाज हथौड़े बजाती हुई आगे बढ़ रही थी।
आप का स्वास्थ्य तो ठीक है। अभी इतना सब देख कर आ रहे है फिर वही बात। मैं भला चंगा हूँ पर वह धर्म नहीं है और न लड़ने वालों को इससे मतलब है। यह इन्सान के अहंकार की टकराहट है, और धर्म का पहला कदम है अहंकार का विसर्जन। ऐसा होने पर लड़ाई की गुँजाइश कहाँ? इस टकराहट को बहाना चाहिए कभी एक-कभी दूसरा। मित्र जितना उत्तेजित थे वह उतने ही शाँत। बातों की रफ्तार से शायद पैरों की रफ्तार तेज थी। बातों के लम्बे सिलसिले के बीच उनका मकान आ पहुँचा। कभी के डिप्टी कलेक्टर पर आज काशी-विद्यापीठ के संस्थापक संचालक का मकान। काशी में उन्हें सब पहचानते थे, समूचे देश में उनके नाम की कदर थी विदेशों में प्रसार था। विरोधी भी उनके सामने झुकते थे। यह थे डॉ. भगवानदास।
दरवाजा खोल कर अन्दर पहुँचे। घर के सदस्यों की जान में जान आई। सभी चिन्तित थे। हवाई जहाज राकेट सब को अपनी गति सीमा में पीछे छोड़ने वाली अफवाहें भला यहाँ तक पहुँचने से पीछे कैसे रहतीं? पर प्रत्यक्ष के प्रकाश में इनका प्रभाव फीका पड़ गया। अतिशयोक्ति के अलंकरण धूमिल पड़ गए। घर वालों को खैर-कुशल सुनाते हुए ये दोनों अध्ययन कक्ष में पहुँचे। पूरा कमरा किताबों से भरा था। एक नजर में ऐसा लगता कि सारे संसार भर की विद्वता ने अपनी पार्लियामेण्ट जमा रखी है। खिड़की का एक सिरा खोल दोनों एक-एक कुर्सी से टिक गए। इतने में चाय आयी। चाय की चुस्कियों में मौन घुल गया। एक बात सोचो-धर्म निरपेक्षता के जमाने में धर्म। है भी तो कोई एक होता। इनमें इतनी भिन्नता क्यों है? मैं तो धार्मिक-वार्मिक हूँ नहीं आप ही कुछ बोलो। हर धर्म की अलग-अलग अनुभूति.....। कथन को बीच में छोड़ दिया।
हँसते हुए वह बोले देखो ब्राण्ट! धर्म निरपेक्षता शब्द को तुमने भारत में सुना है इसका मतलब भी जानते हो। सेक्यूलिरिज्म सुनने वाला तपाक से बोल पड़ा। ‘नहीं’ उनने सहज भाव से कहा यह संस्कृत शब्द है धर्म का अर्थ है राह और निरपेक्ष का मतलब है अपेक्षा नहीं। अर्थात् राह की अपेक्षा नहीं और जिसे राह की जरूरत नहीं वह कौन होगा ‘गुमराह’ यही न, कहते हुए थमी हँसी एक बारगी में बह निकली सुनने वाले सज्जन ध्यान से सुन रहे थे और जहाँ तक अनुभूति का सवाल है वहाँ भेद नहीं। हाँ अभिव्यक्ति का जरूर भेद है। इस अभिव्यक्ति को सब कुछ मानने वाले लड़ने लगते हैं, देख ही लिया। क्योंकि अभिव्यक्ति अनुभूति से नहीं आती, अभिव्यक्ति आती है व्यक्तित्व से। जरा इस वाटिका की ओर देखो। उन्होंने खिड़की से उस ओर इशारा किया। यहाँ फूल खिले हैं, पक्षी उड़ रहे हैं और यदि एक रुपया भी पड़ा हो तो जानते हो धन प्रेमी के लिए सब कुछ खो जाएगा, दिखेगा सिर्फ रुपया। कहीं कवि प्रवेश कर गया तो उसका सारा व्यक्तित्व-पक्षी के गीतों में बह जाएगा। चित्रकार रंगों में खो जाएगा। फिर उन तीनों की बातों में व्यक्तित्व की भिन्नता झलकेगी जबकि तीनों बगीचे में गए हैं।
बात समझ में आ रही थी। ब्राण्ट का रोष कम पड़ा। चाय भी समाप्त हो गई थी। प्यालों को एक ओर रखते हुए दोनों ने हाथ झाड़े, पैरों को फैलाकर हल्की सी अँगड़ाई ली। एक क्षण के मौन के बाद गेलार्ड कहने लगे तब तो यही कहा जा सकता है कि कोई ऐसा सूत्र नहीं जो एकता स्थापित कर सके और यह विरोध अन्ततः धरती को.....।
अस्थिर मत बनो मि. गेलार्ड, धरती ‘स्वर्गादपि गरीयसी’ ही साबित होगी। हाँ धर्मों को अनुभूति के आधार पर समझना होगा शब्दों के आधार पर नहीं।
कौन सी है वह अनुभूति। तनिक उत्सुकता बढ़ी।
‘संवेदना’ यह प्राण है धर्म का। हरेक धार्मिक यहीं एक है और जो यहाँ एक है वही धार्मिक है। यही संवेदना महावीर में अहिंसा बनकर अभिव्यक्त होती है। पग घुंघरू बाँधे हुए मीरा के नृत्य में। शंकर में विवेक और बुद्ध में करुणा, ईसा में वही प्रेम है। गंगा की तरह हिमालय से सागर पर्यन्त धर्म की शाश्वत समूचे विश्व में एक है, हाँ घाट जरूर अलग-अलग हैं। लड़ाई घाटों की है, जल धारा की नहीं। आप जैसे कोई मानववादी-धर्म संवेदना की धारा में बिना किसी घाट में प्रवेश किए सीधे धारा में नहा रहे हैं। इसी कारण सौ फीसदी धार्मिक होते हुए आज तक नहीं जान पाए कि आप धार्मिक भी हैं।
“खूब रही” गेलार्ड हँस पड़ा। मढ़ दिया वह सब मेरे मत्थे पर। वह मानववादी होने के साथ इण्डोलाजिस्ट भी था। मुख से कुछ भी कहे पर भारत और भारतीयता का अर्थ था उसके लिए महान सौंदर्य। इनकी समझ ने ही उसे यहाँ सूक्ष्मताएँ प्रदान कीं। उसकी हँसी थमने पर यह बोले धर्म पोथियों में नहीं रहता ब्राण्ट। इसका निवास ईंट पत्थरों के बेजान टुकड़ों में भी नहीं है। इसकी जगह है इन्सान का हृदय जो पीड़ितों के लिए पीड़ित है, जिसमें मानवीय विकलता के निवारण की तड़प है उसी के हृदय में धर्म है। वह जीता जागता मन्दिर, मस्जिद, चर्च, गुरुद्वारा है। उसके जीवन के क्रियाकलाप धर्म स्थान के विराट प्राँगण हैं, और इस अनुभूति को पाना उसकी आवाज पुनः उभरी।
इसी के बिना तो सारा विवाद है। भाषा का विवाद है सच्चाई का नहीं और जो भाषा का विवाद कर रहे है कम से कम वे धार्मिक तो नहीं। हाँ शब्द शास्त्री भले हो, और शब्द जाल तो भ्रमों का आरण्य है जिसमें मनुष्य जाति भटक रही है।
दोनों सोच में डूब गए। मि गेलार्ड ब्राण्ड शाम को निकलना चाहते थे। तब तक साँध्य समाचार में खबर थी दंगे के कारण कर्फ्यू लगा दिया गया है। कब तक कैद रहेगा मानव? इसके जवाब का चित्राँकन कागज की कैनवास पर वह करने बैठ गए। विचारों की लकीरों में कल्पना की कूँची भावों के रंग भरने लगी। दार्शनिक डॉ. भगवानदास के “इजेशियल यूनिटी ऑव ऑल रिलीजन्स” नाम से प्रकाशित इस शब्द चित्राँकन के सारे शब्द मिल कर एक ही शब्द उभारते हैं- संवेदना। नए जमाने के नए मनुष्य की पहचान, उसके धर्म और धार्मिकता की पहचान। जिसको अपनाए बिना वह मानव नहीं-पशु भी नहीं। क्या है वह, स्वयं सोचे?
महात्मन् तिरुवल्लुवर जन्म से जुलाहे थे। बड़े होकर वे कपड़े बुनते और जो कुछ मिलता उससे ही अपनी जीविका चलाते। एक दिन संध्या समय कोई युवक उनके पास आया और आज बुनी हुई साड़ी का दाम पूछने लगा। इस साड़ी को बुनने में दिन भर लग गया था। सन्त ने दाम बताया-दो रुपये।
चर से दो टुकड़े कर दिये बीच में से उस युवक ने और फिर पूछा अब इन टुकड़ों के अलग-अलग क्या दाम हैं। सन्त ने कहा एक एक रुपया। फिर उसने इन टुकड़ों के भी टुकड़े कर दिये बोला-अब तो सन्त ने उसी गम्भीरता से कहा आठ आने। इस प्रकार वह युवक टुकड़े करता गया और संत धैर्यपूर्वक उसे दाम बताते रहे।
युवक शायद उनके अक्रोध तप को भंग करने ही आया था, परन्तु सन्त थे कि हार ही न रहे थे। युवक ने अब अन्तिम वार किया। उसने तार-तार हुई साड़ी को गेंद की तरह लपेटा और कहा अब इसमें रह ही क्या गया है जिसके दाम दिये जायँ। यह लो तुम्हारी साड़ी के दो रुपये।
तिरुवल्लुवर ने कहा- बेटा। जब तुमने साड़ी खरीदी ही नहीं तो फिर तुमसे उसका मोल कैसे लूँ। अब भी इतना धीर गंभीर उत्तर सुनकर उद्दण्ड युवक पश्चाताप से विदग्ध होकर नत-मस्तक हो उठा।
मानवी अन्तराल दिव्य विभूतियों का भण्डारगार है। चिन्तन, चरित्र एवं व्यवहार की उत्कृष्टता एवं उदात्तता ही जीवन के वे वातायन हैं जिनके माध्यम से उनका जागरण होता है और दैवी अनुदान तथा दिव्य वरदान व्यक्तित्व में उतरते, उभरते और जीवन को धन्य बना देते हैं। अतीन्द्रिय क्षमताओं का विकास इससे कम में संभव नहीं।
अमेरिका स्थित फाइवर्ग यूनिवर्सिटी इन्स्टीट्यूट फॉर ब्रोडर एरिया ऑफ साइकोलॉजी के विभागाध्यक्ष प्रख्यात मनोवैज्ञानिक एलेन वाघेन एक ऐसे ही व्यक्तित्व थे। लोग उन्हें सादा जीवन उच्च विचार की जीवंत प्रतिमा मानते थे। स्वयं के प्रति कठोरता और दूसरों के प्रति उदारता उनका जीवन आदर्श था। जीवन के प्रति इसी उच्चस्तरीय दृष्टिकोण ने उनके अन्तराल को खरे सोने की भाँति प्रखर बना दिया। बिना किसी कठोर तप-तितीक्षा एवं योगसाधना के अतीन्द्रिय क्षमताएँ विकसित हो गई। इसका प्रथम आभास उन्हें 5 अप्रैल, 1968 को हुआ जिसमें तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति के भाई राबर्ट केनेडी की हत्या कर दिये जाने के स्पष्ट दृश्य मानस पटल पर दिखाई देने लगे। इसकी सूचना उन्होंने उन तक पहुँचाई भी, पर तब लोगों ने उन पर सहज विश्वास नहीं किया और बात आई गई हो गई। पर घटना के उक्त तिथि पर घट जाने से सभी को उन पर आश्चर्य भी हुआ और विश्वास भी।
इसी प्रकार 29 अप्रैल एवं 28 मई 1968 को उनने अपने अन्तरंग मित्र एवं मूर्धन्य परामनोविज्ञानी स्टेनली क्रिपनर को एक इसी आशय का पत्र लिखा, जिसमें जान एफ केनेडी एवं मार्टिन लूथर किंग की हत्या की आशंका प्रकट की गई थी और कहा गया था कि उन्हें सावधान रहना चाहिए, पर साथ ही इस बात का भी उल्लेख किया था कि वे सतर्क नहीं रह पायेंगे और घटना घट जायेगी। कुछ ही दिनों में उनकी आशंका सत्य साबित हुई और दोनों की थोड़े-थोड़े अन्तरालों में हत्या कर दी गई।
फ्राँस में जन्में प्रसिद्ध, भविष्यवक्ता पीटर हरकौस के बारे में शायद बहुत कम लोगों को यह ज्ञात होगा, कि उनमें अतीन्द्रिय क्षमता का विकास कैसे हुआ। हुआ यों कि जब वे पढ़ाई समाप्त कर चुके तो उनके परिवार वालों की इच्छा हुई कि वह कोई अच्छी और उच्च पद पर नौकरी करके परिवार का सम्मान बढ़ायें। कई प्रस्ताव भी इस हेतु उन्हें प्राप्त हुए, पर उनकी इच्छा कुछ और थी। पद और प्रतिष्ठ के चक्कर में न पड़ कर जीविकोपार्जन के लिए उनने एक सामान्य शिक्षक की नौकरी कर ली और शेष समय में वे फ्राँस के कबाइली क्षेत्र में जाकर उनकी सेवा करते, रहन-सहन का ढंग बताते, उनके बच्चों को शिक्षा देते। इसी कारण उस क्षेत्र के लोग आदर से उन्हें संत हरकौस कह कर पुकारने लगे। अनेक वर्ष बीत गये। इसी बीच उन्हें ऐसा महसूस होने लगा, जैसे उनमें कोई विशिष्ट क्षमता विकसित हो रही हो। एक दिन उस क्षेत्र में एक घटना घट गई। किसी ने वहाँ के एक कबाइली की हत्या कर दी। उन्हें सूचना मिली, तो वे तत्काल वहाँ पहुँचे। लाश को देखते ही उनके मस्तिष्क पटल पर हत्या का सारा दृश्य घूम गया। किसने, किन परिस्थितियों में किन कारणों से उसका कत्ल किया, अनायास ही यह सब कुछ उन्हें ज्ञात हो गया। बाद में इसी आधार पर अपराधी पकड़ा गया और उसने इसे स्वीकार किया। इसी के बाद फ्राँस का गुप्तचर और पुलिस विभाग ऐसे मामलों में उनकी सेवाएँ लेने लगे। उनका कहना था कि वह मृत व्यक्ति के वस्त्र को देखकर ही सारे घटनाक्रम पर विस्तारपूर्वक प्रकाश डाल सकता है।
जिज्ञासावश एक व्यक्ति ने उनसे प्रश्न किया कि ऐसी क्षमता तो कठिन साधना के बाद ही विकसित हो पाती है, फिर आप अपने जीवन की इस अद्भुत क्षमता के लिए किसे जिम्मेदार मानते हैं? उनका सीधा और सपाट उत्तर था- अपनी विशिष्ट सेवा और सादगी युक्त जीवनक्रम को।
इस प्रकार लगभग सभी अतीन्द्रिय सामर्थ्य सम्पन्न व्यक्तियों के जीवनक्रम को देखने और परखने से जिस एक निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है, वह है सादगी सच्चरित्रता और सेवापरायणता। यही जीवन के वह उपादान हैं, जो ईश्वरीय शक्ति को खींचकर अपने अन्दर प्रतिष्ठित व प्रकट होने के लिए विवश कर देते हैं। यदि ऐसा जीवन जिया जा सके, तो कोई कारण नहीं कि हम में से हर कोई विलक्षण और विशिष्ट कही जाने वाली शक्तियों के स्वामी न बन सकें।
प्रकाश को परम पवित्र चेतना का प्रतीक माना गया है। संसार के प्रायः सभी धर्मों में ईश्वर को प्रकाश पुँज के रूप में स्वीकारा गया और ज्योति अवतरण के रूप में उपासना करने का विधान बताया गया है। महाप्रज्ञा की ब्रह्म वर्चस् परक ध्यान-धारणा में भी प्रभातकालीन स्वर्णिम सूर्य प्रभा को आकर्षित अवधारित करने का उपक्रम अपनाया जाता है। सविता ब्रह्म का प्रतीक प्रतिनिधि भी है। उपनिषदों में आदित्योब्रह्म कहकर इस तथ्य की पुष्टि की है। सूर्य ही प्रत्यक्ष ब्रह्म है। बाल्मीकि रामायण में आदित्य को ही ब्रह्मा, विष्णु, शिव , स्कंद, प्रजापति, यम, सोम कहा है और इन सबका स्वामी भी बताया है। सूर्य से प्रकाश उत्पन्न होता है। देवता एवं वेद उसी से उत्पन्न हुए हैं। विश्व की सृजनात्मक शक्ति का मूल आधार सविता ही है। यह कहा गया है कि प्रकाश पुँज सविता की ध्यान-धारणा साधक को देवोपम बनाती एवं ओजस्, तेजस्, वर्चस् से भर देती है।
गायत्री विनियोग में उसका देवता-उद्गम स्त्रोत सविता माना गया है। यह सविता और आदित्य एक ही है। इस तथ्य की पुष्टि शतपथ ब्राह्मण 6/3/1/20 में की गई है जिसमें कहा गया है “असौवा आदित्यों देवः सविता।” अर्थात् यह आदित्य-सूर्य ही सविता है। दैवत काण्ड 4/31 में भी यही उल्लेख है- “आदित्योऽपि सवितैवोच्यते” अर्थात् आदित्य को ही सविता कहते हैं। सारे वैज्ञानिक प्रमाण एवं आप्त वचन सविता की महत्ता का ही प्रतिपादन करते हैं। महाप्रज्ञा गायत्री की सावित्री की उपासना में सविता की ही प्रकारान्तर से आराधना की जाती है और उस दिव्य प्रकाश से स्वयं को ही नहीं सृष्टि के हर प्राणी को जीवन चेतना, सत्प्रेरणा प्रदान किये जाने की प्रार्थना की जाती है।
गायत्री और सविता दोनों एक हैं। स्कन्द पुराण काशीखण्ड पूर्वार्द्ध 9/54 में सविता और गायत्री को वाच्य-वाचक की, कत्थक और कथन की उपमा दी गई है। दोनों की एकात्मकता सिद्ध की गई है। उसी के दिव्य प्रकाश की ध्यान-धारणा करने का संकेत वैदिक ऋषियों ने किया है और बताया है कि चिन्तन को बहिरंग से मोड़कर अन्तर्मुखी बनाकर कर कोई सूर्य की दिव्य सामर्थ्य का लाभ प्राप्त कर सकता है।
सूर्य की किरणों की भाँति मानसिक शक्तियाँ भी बिखरी रहने के कारण अपना प्रभाव अति स्वल्प मात्रा में ही पृथ्वी पर बिखेर पाती हैं। आतिशी शीशे पर जब सूर्य किरणें एकत्र की जाती हैं तो उसका केन्द्र बिन्दु देखते-देखते अग्नि उगलने लगता है। यही बात विचार शक्ति के बारे में भी है। वह अनेक क्षेत्रों की अनेक आवश्यकताओं की पूर्ति में नियोजित रहती है। उसे एकत्रित निग्रहीत कर लिया जाय तो विचारों की मूल शक्ति असाधारण रूप से शक्तिशाली हो जाती है। मानसिक ऊर्जा का एक सघन समुच्चय एकत्र हो जाता है। प्रत्यक्ष जीवन की सफलता का आधार यही है और यही आत्मिक उत्कर्ष का मूल भी।
विचारों की एकाग्रता साधने का सरल और प्रभावी उपाय ध्यान है। ध्यान में केन्द्रीकरण के लिए कोई छवि निर्धारित करनी पड़ती है। ऐसी वस्तु जो आकर्षक भी हो और गुणवत्ता से भरपूर भी थी। इष्ट निर्धारण में पूर्वनिर्धारण लक्ष्य पर गरिमा, महत्ता एवं चयन का आरोपण करना पड़ता है। इस दृष्टि से सार्वभौम ध्यान के लिए प्राचीन ऋषि मुनियों द्वारा निर्धारित प्रकाश पुंज प्रभात कालीन स्वर्णिम सूर्य का चयन करना हर मनुष्य के लिए अति उत्तम एवं निर्विवाद है। प्रायः इष्ट निर्धारण में जिन देवी-देवताओं की कथा गाथा होती है, उसके इतिहास में कितने ही उत्साहवर्धक तथ्य रहते हैं तो कई खोट भरे भी। ध्यान के कारण वह सभी भलाइयाँ बुराइयाँ साधना पर सवार होती है और श्रेष्ठताओं के साथ-साथ दोष भी साधक पर हावी होते चले जाते हैं। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए सूर्य को सर्वथा दोष रहित माना गया है। उसमें गुण ही गुण हैं। साथ ही शक्ति का भण्डार एवं आकर्षक सुन्दरता से भरापूरा भी उसे समझा जा सकता है। वह उभय पक्षीय शक्ति का भण्डार एवं आकर्षक सुन्दरता से भरापूरा भी उसे समझा जा सकता है। वह उभय पक्षीय शक्ति धाराओं का उद्गम है। उसमें जीवनी शक्ति का अजस्र भण्डार है। अतीन्द्रिय क्षमताओं का विकास ही इस पर निर्भर है। ऋद्धि-सिद्धियाँ इसी क्षेत्र से उतरती हैं। प्रसुप्ति को जाग्रति में बदलने का कार्य सूर्य द्वारा ही सम्पन्न होता है।
सविता गायत्री का अधिष्ठाता भी है। इसके द्वारा प्राणशक्ति का उद्भव और वितरण होता है। इसी कारण वह प्राणियों का-वनस्पतियों का जन्मदाता माना जाता है। प्रकाश वितरण करने, चर्म चक्षुओं को दृश्य देखने, चक्षुओं को दिव्य दृष्टि से भरने का अनुदान प्रदान करता है। उसे निरन्तर विश्व में निस्वार्थ सेवा में निरत देखा जाता है। वह अनुशासन का धनी है। समय साधना की दृष्टि से उसे आदर्श एवं अनुकरणीय माना जा सकता है। तेजस्विता उसकी विशिष्टता है। इन्हीं सब विभूतियों को ध्यान-धारणा द्वारा आकर्षित और अन्तराल में प्रतिष्ठित किया जा सके तो समझना चाहिए कि साधक की सर्वतोमुखी प्रगति का द्वार खुल गया। जिस उद्देश्य के लिए ध्यान किया जाता है उस गन्तव्य तक पहुँचने का राजमार्ग मिल गया।
प्रभातकाल के उदीयमान सूर्य में कुछ समय तक स्वर्णिम आभा रहती है। यही नेत्रों के लिए सह्य भी है। आरंभ में थोड़ी देर आँखें खोलकर देखना और फिर तुरन्त ही पलक बन्द कर लेना चाहिए। सूर्य के अभाव में दीपक की लौ को देखने से भी काम चल सकता है। दोनों ही त्राटक साधना के अंतर्गत आते हैं। खुले नेत्रों से प्रकाश को देखने की अवधि न्यूनतम होनी चाहिए। एक पल की झाँकी भर। इसके बाद पलक बंद कर लेनी चाहिए और उस प्रकाशपुँज की मानसिक अवधारणा करनी चाहिए। कुछ दिन के अभ्यास से सूर्य को या दीपक को खुले नेत्रों से देखने की आवश्यकता नहीं पड़ती। यह ध्यान स्वाभाविक हो जाता है और अनायास ही होता रहता है। उस समय सविता मंत्र गायत्री मंत्र का भी स्वचालित जप होता रहता है। प्राणयोग की ‘सोऽहम्’ साधना में श्वास-प्रश्वास के साथ निरन्तर चलते रहने की आदत स्वभाव का अंग बन जाती है।
प्रकाश पर निग्रहीत किया गया विचारों का एकत्रीकरण दोनों उपचारों के कारण एक विशेष शक्ति से सुसम्पन्न हो जाता है। उससे अन्तः क्षेत्र से दिव्य शक्ति का आविर्भाव होता है। इसका मनः क्षेत्र के किसी भी शक्ति केन्द्र पर आरोपण किया जाय तो वह प्रसुप्त अवस्था में न रह कर जाग्रत होने लगता है। इस जाग्रति का तात्पर्य एक अतिरिक्त शक्ति की उपलब्धि हस्तगत होना। इस प्रयोग को शरीर के किसी अवयव या शक्ति केन्द्र, चक्र, गुच्छक पर, उपत्यिका परिकर पर केन्द्रित किया जा सकता है। टार्च की रोशनी जिस स्थान पर पड़ती है वह परिधि चमकने लगती है। ठीक उसी प्रकार प्रकाशयुक्त ध्यान को जिस भी स्थान के लिए जोड़ा जाता है वहाँ अभिनव हलचल चल पड़ती है। प्रकाश से समाहित एकाग्रता को मन मस्तिष्क के अन्तराल के किसी क्षेत्र पर आरोपण करने से उसमें भरी हुई अवाँछनीयताओं का ठीक उसी तरह निष्कासन होता है। जिस तरह कि आपरेशन करने पर फोड़े से विषाक्त पदार्थ बाहर निकल पड़ता है। साथ ही वहाँ जो कुछ श्रेष्ठ है, प्रसुप्त स्थिति में पड़ा है, वह जाग्रत होकर अप्रत्यक्ष से प्रत्यक्ष स्तर पर आ जाता है। प्रकाश-ध्यान द्वारा उपलब्ध की गई इस बेधक दिव्य दृष्टि को किस स्थान पर किस प्रयोजन के लिए कितनी मात्रा में नियोजित किया जाय, इसका निर्णय करने से पूर्व यह जानना आवश्यक होता है कि स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीर में किसी दिव्य शक्ति का केन्द्र कहाँ है और उसके साथ सम्बन्ध जोड़ने के लिए बेधक दृष्टि को किस मार्ग से कितने मोड़-मरोड़ो में होकर गुजरते हुए पहुँचाया जा सकता है।
इतनी बारीकी में जा सकने की यदि सिद्धहस्त सर्जन जैसी योग्यता वाले किसी अनुभवी का सान्निध्य प्राप्त करके जान सकना संभव नहीं हो तो फिर सीधा मार्ग यही है कि स्थूल शरीर की दिव्य क्षमताओं को जाग्रत करने के लिए नाभिचक्र-सोलर प्लेक्सस के दिव्य कमल को ऊर्जा प्रदान करते हुए प्रस्फुरण को सूक्ष्म शरीर के केन्द्र हृदय चक्र एवं कारण शरीर की भाव संवेदनाओं का उद्गम मस्तिष्क मध्य अवस्थित सहस्र दल कमल ब्रह्म चक्र तक ले जाया जाय। इन्हें झकझोरने और जाग्रत कर लेने पर मनुष्य अलौकिक दिव्य शक्तियों का स्वामी बन जाता है।
आस्ट्रेलिया के हार्वर्ट क्षेत्र के वन प्रदेश में भयंकर आग लगी। उसकी लपेट में वन सम्पदा ही नहीं झोंपड़े, गाँव और कस्बे भी बुरी तरह जलते जा रहे थे। आग भड़काने वाली आँधी 115 किलोमीटर प्रति घन्टे की चाल से चल रही थी।
सेन्ट्रल जेल का फाटक जल गया। कैदियों ने बाहर निकल कर आग बुझाने में सहायता की। तीसरे दिन आँधी थमी ओर आग बुझाने में सफलता मिली। कैदी सभी अपनी-अपनी कोठरियों के खंडहरों में जा बैठे।
जेलर ने पूछा-आप लोग भाग सकते थे, फिर वापस क्यों आ गए?
कैदियों ने कहा हम अपराधी तो हैं, पर देश द्रोही और अराजकतावादी नहीं। शासन का अनुशासन न रहा तो अपराधी भी अपने परिवारों को सुरक्षित कहाँ रख सकेंगे? जेल से भागना शासन व्यवस्था को अस्वीकार करना होता न, हम इतना बड़ा नया अपराध करने की मनःस्थिति में नहीं थे।
शासन ने उसके सम्बंध में नया विचार किया और जो जितने समय तक जेल काट चुका था उसे ही पूरी कह कर सब को रिहा कर दिया गया।
भय को मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु माना गया है और कहा गया है कि बीमारियोँ से उतने लोग नहीं मरते जितने कि भय और आशंका से मर जाते हैं। मृत्यु न हो तो भी भीरुता मनुष्य की सक्रियता और अभिरुचि को अस्त−व्यस्त करके रख देती है, जिसके कारण उसे न तो किसी कार्य में सफलता मिल पाती है और न ही उद्देश्य पूरा हो पाता है। दार्शनिक इमर्सन के कथनानुसार यह एक ऐसा मानसिक रोग है, जो मनुष्य की क्षमता और चेतना दोनों का ही अपहरण कर लेता है। यदि मनोबल बनाये रखा जाय तो काल्पनिक भयों में से तीन चौथाई ऐसे होते हैं, जिनसे कभी पाला ही नहीं पड़ता।
मनःचिकित्सा विज्ञानियों का कहना है कि भय चेतन या अचेतन रूप से मानवी मस्तिष्क को दुर्बल बना कर रख देता है और तदनुरूप आचरण करने को विवश कर देता है। भयभीत व्यक्ति यह सोचने लगता है कि अमुक कार्य करने की या प्रस्तुत कठिनाइयों से टक्कर लेने की उसमें क्षमता है ही नहीं। साहस के अभाव में कल्पित भीरुता अपना जितना अधिक दबाव मस्तिष्क पर डालती जाती है, उसी अनुपात से शारीरिक अंग-अवयव शिथिल पड़ने लगते हैं, बुद्धि जवाब दे जाती है और कभी-कभी तो अकाल मृत्यु का ग्रास भी बनना पड़ता है। इस संदर्भ में चिकित्सा विज्ञानियों ने गंभीर खोजें की हैं और पाया है कि चिन्ता, तनाव, क्रोधावेश आदि के समान ही डर की भावना भी मनुष्य को न केवल रोगी बना देती है, वरन् आयु भी घटा देती है। देखा गया है कि जब कोई व्यक्ति भयाक्रान्त हो उससे पीछा छुड़ाने का प्रयत्न करता है, तो प्रायः उसी से अपने को चारों ओर से घिरा पाता है। यदि साहसपूर्वक उन कारणों का निवारण किया जा सके, जिससे भय उत्पन्न होता है, तो सरलतापूर्वक उस महाराक्षस से अपनी रक्षा की जा सकती है। निर्भयता की सम्पदा जिसके भी पास होगी, वह हर कठिनाई का सामना साहस एवं बहादुरी पूर्वक कर सकेगा।
सुप्रसिद्ध चिकित्सा विज्ञानी डॉ. डलर का कहना है कि प्रायः अधिकाँश व्यक्ति निषेधात्मक कल्पनाएँ कर भय की रचना करते और रोगी बनते रहते हैं। जबकि वास्तविकता वैसी होती नहीं। ऐसे कितने ही व्यक्ति कल्पित जंजीर से जकड़े हुए होते हैं जिनका कोई औचित्य ढूँढ़ने पर भी नहीं मिलेगा। वे सोचते रहते हैं कि कहीं बीमार न पड़ जायँ? घाटा न हो जाय? यदि बच्चे कुपात्र निकल गये तब क्या होगा? दूसरों के सामने आई विपत्ति देखकर आशंका करने लगते हैं कि कही वैसी कठिनाई उन्हें न घेर ले। संसार में दुःखी और असफल व्यक्तियों को देखते रहना और उसी वर्ग में अपने को जा पहुँचने की कल्पना करने से लोग भारी मानसिक कष्ट पाते रहते हैं। इस तरह की बीमारी को उनने आध्यात्मिक पंगुता के नाम से सम्बोधित किया है। इस पर विजय तभी पाई जा सकती है, जब अपनी विचारणा , भावना एवं कल्पना को विधेयात्मक गति प्रदान की जा सके।
डर केवल मन तक ही सीमित नहीं रहता। उसका दुष्प्रभाव अनेकानेक शारीरिक व्याधियों के रूप में भी प्रकट होता है। दिल की धड़कन का तेज हो जाना, मुँह सूखना, पसीना छूटना, कँपकँपी बँधना, सिर में तनाव होना, पीठ में दर्द होना, किंकर्तव्य विमूढ़ता और मूर्च्छा की भी स्थिति भय के कारण हो जाती है। स्मरणशक्ति भी कुँठित हो जाती है। यह बाह्य चिन्ह मानसिक तनाव और आन्तरिक अस्तव्यस्तता के कारण प्रकट होते हैं। इससे स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ता है। कितनी ही बार दबे रोग उभर आते हैं। काय-चिकित्सकों का कहना है कि इन रोगों से शरीर की रोग निरोधक शक्ति में बुरी तरह गिरावट आती है। अतः डर के भूत का जितना शीघ्र हो, निवारण किया जाना चाहिए।
भय निवारण में विवेक और दूरदर्शिता ही काम करती है। अतः यह समझने और समझाने का प्रयास करना चाहिए कि जिन भय, आशंकाओं, कुकल्पनाओं, और असफलताओं की कल्पना करके डरा जा रहा है, उनमें से अधिकाँश अवास्तविक हैं। कितनी ही बार जिन संकटों की आशंका की गई होती है, या तो वे आते ही नहीं, अथवा वे इतने सामान्य होते हैं कि थोड़े साहस, धैर्य और सूझ-बूझ से उनका निराकरण किया जा सके। वे धूप-छाँव की तरह आते और आँख-मिचौनी करके चले जाते हैं। सतर्कता, साहस यदि बनाये रखे जायँ, तो काल्पनिक भय और डरने से सदैव के लिए छुटकारा पाया जा सकता है।
पास में कुछ भी न रहे, साथ कोई भी न दे, तो भी आशा बनाये रहें। आज का दिन उदासी भरा है तो भी यह आशा रहनी चाहिए कि कल नहीं तो परसों का दिन तो अवश्य उत्साहवर्धक होगा।
मधु-संचय
परिवर्तन को, नये सृजन को, हो जाओ तैयार।
दिव्य चेतना का निश्चय है, सृजे नया संसार ॥1॥
बहुत हो चुका विकृत अब तो, मनुज-सृष्टि का रूप।
गहरे ही होते जाते हैं, पाप - पतन के कूप ॥
कहीं न हो जाये, मानव की संस्कृति का ही लोप।
दिखते तो ऐसे ही हैं अब, क्षुब्ध - प्रकृति के कोप॥
इसीलिए तो सृष्टि -सृजेता, करता गहन विचार।
परिवर्तन को, नये सृजन को, हो जाओ तैयार ॥2॥
जीर्ण-शीर्ण के रहते, कैसे होगा नव-निर्माण।
दिव्य-सृजन की कैसे होंगी गतिविधियाँ क्रियमाण॥
प्रकृति और मानव-स्वभाव में, दोनों में बहलाव।
ला सकता है, महाकाल का ही निर्द्वंद्व प्रभाव॥
महाकाल के कालचक्र का, होना है विस्तार।
परिवर्तन को, नये सृजन को, हो जाओ तैयार॥3॥
महाकाल की प्रबल चाल को, रोक सका है कौन।
महाकाल हुँकार भरे तो, हो जाते सब मौन॥
इतना ही क्यों, सबको करना होता उसका काम।
जिससे चाहे करवा लेता, रहता खुद गुमनाम॥
जड़ चेतन सब ही बन जाते, उसका ही हथियार।
परिवर्तन को, नये सृजन को, हो जाओ तैयार ॥4॥
पीड़ित मानवता पीड़ा से, है वह तो बेचैन।
इसीलिए नव सृष्टि - सृजन में, जुटा हुआ दिन-रैन॥
जिस को हो मानव पीड़ा का, अरे! तनिक भी दर्द।
हो जायेगा, महाकाल के हाथों स्वयं सुपुर्द॥
महाकाल को अर्पित होगा, श्रेय भरा सहकार।
परिवर्तन को, नये-सृजन को, हो जाओ तैयार ॥5॥
विध्वंसों से क्यों घबरायें , महाकाल के साथ।
महासृजेता के हाथों में, लगे सृजन के हाथ॥
काल रात्रि बस जाने को है, आता ब्रह्म मुहूर्त।
स्वर्ग-सृजन का स्वप्न, न रह पायेगा अरे! अमूर्त ॥
सभी दिशाओं में होना है, सतयुग का विस्तार।
परिवर्तन को, नये सृजन को, हो जाओ तैयार ॥6॥
महाकाल ने उन्हें पुकारा, प्राणवान जो व्यक्ति।
व्यक्त हो सके जिन माध्यम से, महाकाल की शक्ति ॥
महाकाल के अनुदानों को, चलो! चुकाएँ आज।
ज्ञान-मशाल, तमस हरने को चलो! उठाएँ आज ॥
झाँक रहे उज्ज्वल-भविष्य का, बन जाएँ आधार।
परिवर्तन को, नये-सृजन को, हो जाओ तैयार ॥7॥
-मंगल विजय
“दस्युओं ने आक्रमण कर दिया, जान पड़ता है। इस निरीह ग्राम पर।” लपटें धू-धू करके सारे गगन को जला देने की धमकी दे रही थीं। कुण्डलियाँ लेकर उठती धुएँ की राशि जैसे मानव के भाग्याकाश पर ही छा जाएँगी। बाँस चटाचट चटख रहे थे और बच्चों का रोदन , बूढ़ों की पुकार, अबलाओं की क्रन्दन ध्वनि किसी पत्थर को भी पिघला देने के लिए काफी थी। बीच-बीच में तरुणों की हुँकार और दस्युओं का अट्टहास, गाली-गलौज के कर्कश शब्द सुनाई पड़ जाते। घोड़ों पर इधर से उधर दौड़ते, हाथों में तलवार उठाए, भाला सम्हाले दस्यु आग की लपलपाती लपटों के तेज प्रकाश से साफ देखे जा सकते थे।
लगता है ये बहुत अधिक हैं। कम से कम दो सौ। महाराज शिवाजी को गाँव की ओर घोड़ा बढ़ाते देखकर सहचर ने सावधान किया। महाराज दिल्ली के बादशाह की कैद से अपने कौशल द्वारा निकल चुके थे। सिर्फ एक विश्वस्त सेवक था उनके साथ। इस समय दोनों यवन सैनिकों की वेश-भूषा पहने थे।
तुम्हारा अनुमान ठीक है। महाराज ने घोड़े की लगाम ढीली करके दांतों में पकड़ ली। घोड़ा कदम छोड़कर सरपट दौड़ पड़ा। कन्धे से धनुष उठाकर प्रत्यंचा चढ़ा दी गई उस पर। हम अब भी निरीह प्राणियों की बहुत सहायता कर सकेंगे। दाँतों में लगाम होने से शब्द साफ नहीं सुनाई पड़ रहे थे।
हम लोग सिर्फ दो हैं। सहचर अब अनुगत न रहकर घोड़ा दौड़ाते हुए बगल में पहुँच गया था। उसकी गति के तेवर से साफ पता चलता था कि यदि महाराज ने इस आग में कूद पड़ने का निश्चय न छोड़ा तो उसका अश्व छत्रपति के आगे चलेगा। समूचा महाराष्ट्र बड़ी आकुलता से श्रीमन्त की प्रतीक्षा टकटकी लगाए है। वैदिक संस्कृति को इन्हीं बाहुओं से आशा है। बोलने के लहजे में हृदय का सम्पूर्ण अनुरोध घनीभूत हो गया था। जब तक कोई साहस न दिखावे, सारा समूह निस्तेज पड़ा रहता है। महाराज समझा रहे थे। सज्जनों के साहस के अभाव में दुर्जनों का साहस पलता है। नीति के हमदर्दों के दब्बूपन में अनीति की बर्बर आक्रामकता पोषित होती है। बातों के साथ धनुष पर बाण चढ़ चुका था और केवल इतनी प्रतीक्षा थी दस्यु मार के भीतर आ जाएँ। हमारे इस साहस के साथ विभीषिका से पलायन कर रहे इन्हीं लोगों को उससे जूझने की हिम्मत आ जाएगी और तुम देखोगे कि हम पलक मारते दो से पाँच-सात सौ हो गए हैं। फिर अनीति में हिम्मत ही कितनी?
विजय हमेशा श्रीमन्त के पीछे चली है। साथ चलने वाले को सन्तोष नहीं हुआ था। इतने पर भी निरापद निकल जाना इतना आसान नहीं। आप इस समय यवन पोशाक में हैं। इस तरह तो वेश की कलई खुले बिना न रहेगी। इतनी बड़ी घटना का छिपा रह सकना नितान्त असम्भव है। बादशाह के गुप्तचर और सैनिकों के अनेकों दल पीछा करते हुए ढूंढ़ खोज में जुटे हैं।
शिवा आपत्तियों से डर कर जीवन के महान दायित्व से विमुख नहीं हो सकता। एक क्षण के लिए क्षत्रपति ने बगल में चल रहे उसकी ओर देखा। बड़ी कठोर थी वह दृष्टि। दूसरे ही क्षण धनुष से तीर छूट गया। एक चीख ने वातावरण को गुँजा दिया। हर-हर महादेव का मेघ गर्जन महाराज के कण्ठ से निकला ओर अनुचर के गले में उसकी प्रतिध्वनि हुए बिना न रही।
“शिशुओं के प्राण, नारी का सतीत्व और वृद्धों की करुण चीत्कारें- जीवन का मूल्य इनके सम्मुख भी अधिक है? छिः!” बराबर तरकस खाली होता जा रहा था। जिस समय सामूहिक जीवन पर आपदाओं की घटनाएँ छायी हों उस पल सच्चे मानव की कसौटी यही है कि प्रबल प्रभंजन बन इन घटनाओं को छितराये बिना रहे। समूह के सौभाग्य सूर्य को उदय करने हेतु स्वयं के जीवन की बलि भी महानतम प्राप्ति है। दस्युओं की अथक चेष्टा भी उन्हें एकत्र नहीं कर पा रही थी। प्रतिक्षण प्रतिपल उनकी संख्या घटती जा रही थी।
किन्तु श्रीमान के जीवन का मूल्य-? पार्श्वचर के हाथों की स्फूर्ति महाराज से कहीं कम न थी। उसका अश्व आगे बढ़ चुका था। बिना गर्दन घुमाए उसने शंका की और उसके कानों ने सुन लिया।
मेरे या किसी के भी-यहाँ तक श्री समर्थ के भी जीवन का मूल्य इससे अधिक नहीं। याद रखो कर्तव्य का मूल्य जीवन है जीवन का मूल्य कर्तव्य। दस्यु तब तक पलायन करने लगे थे।
जीवन है क्या? छत्रपति के लौटकर आने के बाद यह पहला दरबार था। सिंहासन के दायीं ओर अष्ट प्रधानों के ऊँचे और भव्य आसन थे। बायीं ओर सामन्तों की पंक्ति, सभी सभासद अपना-अपना स्थान ग्रहण किये थे। आने के बाद से कोई गम्भीर समस्या सामने नहीं आयी थी। शत्रु का समाचार न था और नवीन आक्रमण की कोई योजना अभी थी नहीं। यों इन सबके होने पर भी शिवाजी की निष्काम कर्म वृत्ति उनके मानस-पटल पर चिन्ता की लकीरें नहीं खिंचने देती। प्रश्न तानाबा जी ने उठाया था।
“जय-जय श्री रघुवीर समर्थ।” महाराज के अधरों से समाधान के शब्द निकलने ही वाले थे। तभी तोरण द्वार से यह मेघ गम्भीर ध्वनि उठी। महाराज अस्त-व्यस्त दौड़ पड़े। सभासदों को अनुगमन करना ही था और अगले क्षण महाराष्ट्र का गौरव किरीट-एक लम्ब-तड़ंग जटा जूट धारी कोपीन लपेटे हाथ में लम्बा चिमटा थामे एक साधु के चरणों में लुढ़क गया था।
क्यों रे शिवा। मुझे बाहर ही खड़ा रखेगा क्या? छत्रपति को पैरों से उठते न देखकर स्वामी रामदास हँस पड़े।
प्रभु पधारे। आँखें भरी हुई थी। मस्तक और नासिकाग्र ने धूल से सनकर नवीन छटा धारण कर ली थी। शिवाजी का कण्ठ स्वर गदगद था।
“तानाबा जी जानना चाहते हैं, जीवन का क्या मतलब है।” सबने समर्थ के चरणोदक से अपने मस्तक और गले को पवित्र कर लिया था। संत के चरण चन्दन चर्चित हो चुके थे, कण्ठ पुष्पहार से भर गया था। धूपदानी में सुलग रहा अगरु दोनों ओर सुरभित धूम्र बिखेर रहा था। सभी आसन छोड़कर भूमि पर बिछे गलीचे पर ही बैठे थे।
गति और शक्ति संत ने समाधान दिया प्रश्न का। इन दोनों से संयुक्त ही जीवन है और उसका मतलब है सतत जागरुकता।
सबने मस्तक झुका दिए। अब भी सभी के नेत्र उठकर संत के मुख पर इस तरह लगे थे कि वे अभी तृप्त नहीं हुए हैं। मूक नेत्र भाषा में सबने कुछ और सुनने की प्रार्थना की।
जिज्ञासा, प्रयत्न, विचार और त्याग का अविरल प्रवाह ही जीवन है। समर्थ की वाणी ने पुनः स्पष्ट किया। इनमें से किसी के भी मूर्छित होने का मतलब है जीवन की रुग्णावस्था। इनकी निवृत्ति में मृत्यु है और पूर्णता में मोक्ष। तुम सबको मोक्ष की ओर बढ़ना है। इनकी पूर्णता की परिणति है आनन्द। इस आनन्द की अभीप्सा ही यथार्थ जीवन है।
आसमान से गिरते अपने ओर आते हुए सितारे को देख पृथ्वी आश्चर्यचकित होकर बोली-तुम इतने उच्च स्थान पर से नीचे क्यों आ गिरे?
सितारे ने जवाब दिया-देवी। तुम मुझे अपने स्थान से काफी ऊँची दिखाई देती थीं। लम्बे समय से तुम्हें पाने के लिये मैं तपस्या कर रहा था आज वह दिन शुभ दिन आया है।
“आकाश में तो बहुत चमकीले दिखाई देते थे अब तुम ऐसे नहीं लगते?” पृथ्वी ने पूछा “यही मैं भी तुमसे जानना चाहता था, दूर से तो तुम जगमगाती हुई नजर आती थी सोचा था तुम से मिलकर मैं अपना कालापन छुड़ा लूँगा।” सितारा बोला।
आश्चर्यचकित धरती ने कहा- “सचमुच मैं तुम्हें चमकती नजर आती थी।” यह कहकर उसने अपने आपको देखा। किन्तु उसे चारों ओर अन्धकार ही नजर आया। वह उदास हो गई।
सितारे ने कहा-जब दूर से मुझे तुम जगमगाती नजर आती थी और तुम्हें मैं, तो फिर ऐसा ही क्यों न मान ले कि उजले और जगमगाते हुए हमेशा ऊँचाई पर रहते हैं। बात समझ की थी। दोनों को ही भा गई। आलिंगन पाश में बँधे हुए दोनों ही अपने चारों ओर एक दिव्य प्रकाश अनुभव कर रहे थे। अँधेरे की कलूटी कुरूपता ने यह देखा तो वहाँ से चुपचाप चल दी।
आत्मोत्कर्ष के लिए जितनी भी साधनाएँ हैं, प्रायः उन सब में मंत्र जप का समावेश किसी न किसी रूप में अवश्य होता है। क्योंकि मंत्र विद्या मनुष्य के अंतरंग में सोई उन शक्तियों और क्षमताओं को जाग्रत करती है जो उसे उच्च आध्यात्मिक लक्ष्य तक पहुँचाती हैं। अन्य मंत्र साधनाओं में फिर भी अन्यान्य कर्मकाण्ड करने पड़ते हैं, पर गायत्री मंत्र की साधना एक ऐसी साधना है जो अपने आप में सर्वांगपूर्ण है।
अकेला गायत्री मंत्र ही वे सभी उपलब्धियाँ प्रदान करने में समर्थ है जो अन्य बहुत सी साधनाओं के करने से प्राप्त होती हैं। इस मंत्र की साधना को सफल बनाने में चार तथ्यों का समावेश है। 1-शब्द शक्ति 2-मानसिक एकाग्रता 3-चारित्रिक श्रेष्ठता और 4-अटूट श्रद्धा।
गायत्री मंत्र से कितने ही प्रकार के चमत्कार एवं वरदान उपलब्ध हो सकते हैं। यह सत्य है, पर उसके साथ यह तथ्य भी जुड़ा हुआ है। वह मंत्र उपरोक्त चार परीक्षाओं में उत्तीर्ण हुआ होना चाहिए।
गायत्री मंत्र का प्रथम आधार है शब्द शक्ति। इस में अक्षरों का गुँथन एक ऐसे विशिष्ट क्रम से किया गया है जो शब्द शास्त्र के गूढ़ सिद्धान्तों पर आधारित है। यों अर्थ की दृष्टि से गायत्री मंत्र सरल है। उसमें परमात्मा से सद्बुद्धि की याचना की गई है। इस शिक्षा को भी समझना चाहिए, पर मंत्र की शक्ति मात्र इस शिक्षा में नहीं, उसकी शब्द रचना से भी जुड़ी हुई है। वाद्य यंत्रों का अमुक क्रम से बजाने पर ध्वनि प्रवाह निस्सृत होता है। कण्ठ को अमुक आरोह-अवरोहों के अनुरूप उतार चढ़ाव के स्वरों से युक्त करके जो ध्वनि प्रवाह बनता है उसे गायन कहते हैं। ठीक इसी प्रकार मुख से उच्चारित मंत्र को अमुक शब्द क्रम के अनुसार बार-बार लगातार संचालन करने से जो विशेष प्रकार का ध्वनि प्रवाह विनिर्मित होता है वही मंत्र की भौतिक क्षमता है। मुख से उच्चारित मंत्राक्षर सूक्ष्म शरीर को प्रभावित करते हैं। उसमें सन्निहित तीन ग्रंथियों, षटचक्रों-षोडश मातृकाओं, चौबीस उपत्यिकाओं एवं चौरासी नाड़ियों को झंकृत करने में मंत्र का उच्चारण क्रम बहुत काम करता है। दिव्य शक्ति के प्रादुर्भूत होने में यह शब्दोच्चार भी एक बहुत बड़ा कारण एवं माध्यम है।
मंत्र विद्या में मुख से तो धीमे और हलके प्रवाह क्रम से ही शब्दों का उच्चारण होता है पर उनके बार-बार लगातार दुहराये जाने से सूक्ष्म शरीर के शक्ति संस्थानों का ध्वनि प्रवाह बहने लगता है। वहाँ से अश्रव्य कर्णातीत ध्वनियाँ या प्रचंड प्रवाह प्रादुर्भूत होता है। इसी में मंत्र साधक का व्यक्तित्व ढलता है और उन्हीं के आधार पर वह अभीष्ट वातावरण बनता है, जिसके लिए मंत्र साधना की गई। मंत्र का जितना महत्व है, साधना विधान का जितना महात्म्य है उतना ही आवश्यक यह भी है कि साधक अपनी श्रद्धा तन्मयता और विधि प्रक्रिया में निष्ठावान रहकर अपना व्यक्तित्व इस योग्य बनाये कि उसका मंत्र प्रयोग सही निशान साधने वाली बहुमूल्य बंदूक का काम कर सके।
शब्द शक्ति का महत्व विज्ञाननुमोदित है। स्थूल, श्रव्य, शब्द भी बड़ा काम करते हैं फिर सूक्ष्म कर्णातीत अश्रव्य ध्वनियों का महत्व तो और भी अधिक है। मंत्र का उच्चारण तो धीमा ही होता है उससे अतीन्द्रिय शब्द शक्ति को ही प्रचंड परिमाण में उत्पन्न किया जाता है।
ध्वनि तरंगें पिछले दिनों उच्चारण से उद्भूत होकर श्रवण की परिधि में ही सीमित रहती थीं। प्राणियों द्वारा शब्दोच्चारों एवं वस्तुओं से उत्पन्न आघातों से अगणित प्रकार की ध्वनियाँ निकलती हैं उन्हें हमारे कान सुनते हैं। सुनकर कई तरह के ज्ञान प्राप्त करते हैं। निष्कर्ष निकालते हैं और अनुभव बढ़ाते हुए उपयोगी कदम उठाते हैं। यह शब्द का साधारण उपयोग हुआ।
विज्ञान ने ध्वनि तरंगों में सन्निहित असाधारण शक्ति को समझा है और उनके द्वारा विभिन्न प्रकार के क्रिया-कलापों को पूरा करना अथवा लाभ उठाना आरम्भ किया है। वस्तुओं की मोटाई नापने-धातुओं के गुण दोष परखने का काम अब ध्वनि तरंगें ही प्रधान रूप में पूरा करती है। कार्बन ब्लैक का उत्पादन वस्त्रों की धुलाई, रासायनिक सम्मिश्रण, कागज की लुगदी, गीलेपन को सुखाना, धातुओं की ढलाई, प्लास्टिक धागों का निर्माण प्रभृति उद्योगों में ध्वनि तरंगों के उपयोग से एक नया व्यावसायिक अध्याय आरम्भ हुआ है।
इलेक्ट्रोनिक्स के उच्च विज्ञानी ऐसा यंत्र बनाने में सफल नहीं हो सके जो श्रवण शक्ति की दृष्टि से कान के समान संवेदनशील हो। कानों की जो झिल्ली आवाज पकड़कर मस्तिष्क तक पहुँचाती है उसकी मुटाई एक इंच के ढाई हजारवें हिस्से के बराबर है, फिर भी वह कोई चार लाख प्रकार के शब्द भेद पहचान सकती है और उनका अंतर कर सकती है। अपनी, गाय की या मोटर की आवाज को हम अलग से पहचान लेते हैं और उनका अंतर कर सकते हैं यद्यपि लगभग वैसी ही आवाज दूसरी गायों की या मोटरों की होती है, पर जो थोड़ा सा भी अंतर उनमें रहता है, अपने कान के लिए उतने से ही अंतर कर सकना और पहचान सकना संभव हो जाता है। कितनी दूर से, किस दिशा से, किस मनुष्य की आवाज आ रही है, यह पहचानने में हमें कुछ कठिनाई नहीं होती। यह कान की सूक्ष्म संवेदनशीलता का ही चमत्कार है। टेलीफोन यंत्र इतनी बारीकियाँ नहीं पकड़ सकता है।
यह यंत्र कान के समान ही संवेदनशील है। पर सुनता उससे भी ज्यादा है। मनुष्य के कान तो उन्हीं बातों को सुनते हैं जिनमें उसकी दिलचस्पी होती है अन्यथा पास में बहुत कुछ बकझक होते रहने पर भी अपने पल्ले कुछ नहीं पड़ता किन्तु यदि दिलचस्पी की बात हो तो फुसफुसाहट से भी मतलब की बातें आसानी से सुनी जा सकती हैं। प्रकारान्तर से कहा जा सकता है कि श्रवण शक्ति का पूरी तरह संबंध मानसिक एकाग्रता से है।
मनुष्य के कान केवल उन्हीं ध्वनि तरंगों को अनुभव कर सकते हैं जिनकी संख्या प्रति सैकिण्ड 20 से लेकर 20 सहस्र डेसिबल तक की होती है। इससे कम और अधिक संख्या वाले ध्वनि प्रवाह होते तो हैं, पर वे मनुष्य की कर्णेन्द्रिय द्वारा नहीं सुने जा सकते।
इस तथ्य को समझने पर मानसिक जप का महत्व समझ में आता है। उच्चारण आवश्यक नहीं। मानसिक शक्ति का प्रयोग करके ध्यान भूमिका में सूक्ष्म जिव्हा द्वारा मन ही मन जो जप किया जाता है, उसमें भी ध्वनि तरंगें भली प्रकार उठती रहती हैं।
रेडियो यंत्र केवल कुछ सीमित और संबंधित फ्रीक्वेन्सी पर चल रही ध्वनि तरंगें ही पकड़ पाते हैं। समीपवर्ती फ्रीक्वेन्सी के साथ यदि उनका संबंध न हो तो वे यंत्र सुन नहीं सकेंगे। कान की स्थिति उनकी अपेक्षा लाख गुनी अच्छी है। वे अनेक फ्रीक्वेन्सियों पर चल रहे शब्द प्रवाहों को एक साथ पकड़ और सुन सकते हैं।
नादयोग द्वारा आकाश-व्यापी, अन्तर्ग्रही तथा अन्तः क्षेत्रीय दिव्य शक्तियों का सुना जाना संभव है और उस आधार पर वैसा बहुत कुछ जाना जा सकता है जो स्थूल मस्तिष्कीय चेतना अथवा उपलब्ध साधनों से जान सकना संभव नहीं है। विश्व-व्यापी शब्द समुद्र में मंत्र साधक अपनी प्रचण्ड हलचलें समाविष्ट करता है और ऐसे
एक राजा के चार बेटे थे। चारों एक से एक बढ़ कर उद्दंड। उनके लिए अध्यापक नियुक्त होते रहते पर वे किसी को भी टिकने न देते। अनुशासन मानना तो दूर वे उनकी बात तक न सुनते। किशोर हो चले थे पर उन्हें फूटा अक्षर तक न आया।
इस पर राजा बहुत दुःखी रहता और सोचता कि वे राजकाज कैसे चला पायेंगे? परम्परा का निर्वाह कैसे कर सकेंगे? बिना विद्या के तो बुद्धि भी साथ नहीं देती।
हताश राजा ने घोषणा की जो कोई अध्यापक इन बच्चों को पढ़ा देगा उसे आधा राज्य इनाम में दिया जायगा। अनेक पंडित आये और असफल होकर वापस लौट गये।
विष्णु शर्मा ने यह कार्य अपने हाथ में लिया उनने शिक्षण की एक नई शैली अपनाई। कहानियों का मनोरंजन करते हुए उसमें घोल कर व्यवहारिक जीवन की गुत्थियों को सुलझाना। इस प्रयोग से उन्हें आरंभ से ही सफलता मिलती रही। उन्हें कहानियाँ सुनने में रस आने लगा। अध्यापक के पीछे लगे रहते और उन्हें नई कहानियाँ कहने का आग्रह करते। विष्णु शर्मा दूसरों की तरह मनोरंजन के लिए कहानियाँ नहीं कहते थे पर उनकी शैली में जीवन विज्ञान, के समाज गठन के हर महत्वपूर्ण पक्ष पर समाधान जुड़ा रहता। बालक तथ्यों में पारंगत हुए। उनने पढ़ने लिखने में ही उत्साह नहीं दिखाया वरन् व्यवहार कुशलता के क्षेत्र में भी पीछे न रहे।
विष्णु शर्मा की उनमें से कुछ कहानियों का संग्रह पंच तंत्र पुस्तक में दिया है। उन्हें पुरस्कृत भी किया गया।
शक्तिशाली ज्वार-भाटे उत्पन्न करता है जिनके आधार पर अभीष्ट परिस्थितियाँ विनिर्मित हो सकें। यही है मंत्र विद्या के चमत्कारी क्रियाकलाप का रहस्य।
शब्द शक्ति के बाद शेष आधार साधक को स्वयं प्रयत्नपूर्वक खड़े करने पड़ते हैं। इन्हें चेतनात्मक आधार भी कहा जा सकता है। चारित्रिक श्रेष्ठता और लक्ष्य के प्रति अटूट श्रद्धा साधक को सफलता की ओर अग्रसर करती है तथा उसे अभीष्ट लक्ष्य तक ले पहुँचती है।
चारित्रिक श्रेष्ठता के लिये मंत्र साधक को यम-नियमों का अनुशासन पालन करते हुए श्रेष्ठता का अभिवर्धन करना चाहिए। क्रूर कर्मी दुष्ट-दुराचारी व्यक्ति किसी भी मंत्र को सिद्ध नहीं कर सकते। ताँत्रिक शक्तियाँ भी ब्रह्मचर्य आदि की अपेक्षा करती है। फिर देव शक्तियाँ का अवतरण जिस भूमि पर होना है उसे विचारणा, भावना और क्रिया की दृष्टि से सतोगुणी पवित्रता से युक्त होना ही चाहिए।
इन्द्रियों का चटोरापन मन की चंचलता का प्रधान कारण है। तृष्णाओं में, वासनाओं में और अहंकार तृप्ति की महत्वकाँक्षाओं में भटकने वाला मन मृगतृष्णा एवं कस्तूरी गंध में यहाँ वहाँ असंगत दौड़ लगाते रहने वाले हिरण की तरह है। मन की एकाग्रता अध्यात्म क्षेत्र में सबसे महत्वपूर्ण शक्ति है। उसके संपादन के लिए अमुक साधनों का विधान तो है, पर उनकी सफलता मन को चंचल बनाने वाली दुष्प्रवृत्तियों का अवरोध करने के साथ जुड़ी हुई है। जिसने मन को संयत समाहित करने की आवश्यकता पूर्ण कर सकने योग्य अंतः स्थिति का परिष्कृत दृष्टिकोण के आधार पर निर्माण किया होगा वही सच्ची और गहरी एकाग्रता का लाभ उठा सकेगा, ध्यान उसी का ठीक तरह जमेगा और तन्मयता के आधार पर उत्पन्न होने वाली दिव्य क्षमताओं से लाभान्वित होने का अवसर उसी को मिलेगा।
अभीष्ट लक्ष्यों में श्रद्धा जितनी गहरी होगी उतना ही मंत्र बल प्रचण्ड होता चला जायेगा। श्रद्धा अपने आप में एक प्रचण्ड चेतन शक्ति है। विश्वासों के आधार पर ही आकाँक्षाएँ उत्पन्न होती हैं और मनः संस्थान का स्वरूप विनिर्मित होता है। बहुत कुछ काम तो मस्तिष्क को ही करना पड़ता है। शरीर का संचालन भी मस्तिष्क ही करता है। इस मस्तिष्क को दिशा देने का काम अंतःकरण के मर्मस्थल में जमे हुए श्रद्धा, विश्वास का है। वस्तुतः व्यक्तित्व का असली प्रेरणा केन्द्र इसी निष्ठ की धुरी पर घूमता है। गीतकार ने इस तथ्य का रहस्योद्घाटन करते हुए कहा है “यो यच्छद्वः स एव स” जो जैसी श्रद्धा रख रहा है वस्तुतः वह वही है। अर्थात् श्रद्धा ही व्यक्तित्व है। इस श्रद्धा को इष्ट-लक्ष्य में साधना की यथार्थता और उपलब्धि में जितनी अधिक गहराई के साथ तन्मयता के साथ नियोजित किया गया होगा, मंत्र उतना ही सामर्थ्यवान बनेगा। याँत्रिक की चमत्कारी शक्ति उसी अनुपात से प्रचण्ड होगी। इन तीनों चेतनात्मक आधारों को महत्व देते हुए जिसने मंत्रानुष्ठान किया होगा, निश्चित रूप से वह अपने प्रयोजन में पूर्णतया सफल होकर रहेगा।
उथली एकाँगी साधना करने से तो उसके सत्परिणाम से वंचित ही रहना पड़ता है। शब्द शक्ति, मानसिक एकाग्रता, चारित्रिक श्रेष्ठता, लक्ष्य के प्रति अटूट श्रद्धा, यह चार आधार ले कर की जाने वाली मंत्र साधना कभी निष्फल नहीं होती।
गायत्री को केवल एक मंत्र की दृष्टि से विचार करने पर उसमें दृष्ट और अदृष्ट, उच्च और नीच, मानव और देव को किसी रहस्यमय तन्तु से एकत्रित कर लेने की अद्भुत शक्ति जान पड़ती है।
इस मंत्र का एक गूढ़ रहस्य है। जिसका उल्लेख इसके प्रभाव का साक्षात्कार करने वाले महापुरुषों ने किया है। सृष्टि के निर्माण तथा संचालन की योजना को परमात्मा अपनी सेवा में रहने वाले देवदूतों तथा ऋषियों द्वारा कार्यान्वित कराते हैं। इन देवदूतों तथा ऋषियों का एक कार्य यह भी है कि दैवी आशीर्वाद प्राप्त करने के जो व्यक्ति पात्र होते हैं उनको वे आशीर्वाद देते हैं। जब इस प्रकार का पात्रता रखने वाला व्यक्ति गायत्री मंत्र के रहस्य और मंत्र पर मन तथा हृदय को एकाग्र करे उसका शुद्ध उच्चारण करते हैं, तब उसकी और दृश्यमान सूर्य के मध्य में स्थित महान सौर शक्ति के बीच एक सम्बन्ध स्थापित हो जाता है और उस सम्बन्ध तंतु द्वारा, वह मनुष्य चाहे जहाँ मंत्रोच्चारण कर रहा हो, तो भी उस पर तथा आसपास के वातावरण पर विराट आध्यात्मिक प्रभाव पड़ता है। यह प्रभाव ही वास्तव में आशीर्वाद है। जब अनेक सत्पात्र व्यक्ति अपने मन और हृदय को एकाग्र करके इस का मंत्रोच्चारण करलें तो उसका प्रभाव निस्सन्देह अद्भुत ही होता है।
-एनीवीसेन्ट
गीता में भगवान कृष्ण कहते हैं यज्ञाद् भरवति पर्जन्यः अर्थात् यज्ञ से पर्जन्य बरसता है। प्रायः लोग बरसने का अर्थ पानी बरसने से लगाते हैं। यह कथन यदि सही रहा होता तो पानी बरसाना मनुष्य के अपने हाथ में होता। कभी पानी की कमी न पड़ती। जब जितनी वर्षा की आवश्यकता होती, तब उतना पानी बरसा लिया करते। फिर बाढ़ आने का भी संकट न होता और वर्षा की कमी से दुर्भिक्ष पड़ने की कठिनाई भी सामने न आती। जब मन आया तभी पानी बरसा लिया। उसकी मात्रा भी अपने हाथ में होती। यज्ञ करना अपने हाथ की बात है। वह कुछ महँगा और कष्टसाध्य भी नहीं है। जो लोग अपने स्थान में मेह बरसा सकते हैं, वे आवश्यकता पड़ने पर अन्य किसी देश में जहाँ आवश्यकता होती, पानी बरसाने के लिए जा पहुँचा करते। इतना ही नहीं, जहाँ अधिक वर्षा होती वहाँ रोकने का उपाय कर दिया करते।
‘पर्जन्य’ का बरसना तो सही है, पर पानी बरसना नहीं है। तो क्या पानी के अतिरिक्त और कोई वस्तु भी बरसती है? इसका उत्तर हाँ में दिया जा सकता है और उस बरसने वाली वस्तु को ही ‘पर्जन्य’ कहा जाता है। यह पानी से भिन्न है। यह प्राण है। प्राण कहते हैं जीवनी शक्ति को। जीवनी शक्ति वह वस्तु है जो पुष्टि बल, समर्थता प्रदान करती है। जिनके शरीर में जीवनी शक्ति होती है, वह दुबले होते हुए भी बलिष्ठ होते हैं। गाँधी जी मरने के दिनों प्रायः 80 वर्ष के थे। वे कहा करते थे कि मैं 120 वर्ष जीना चाहता हूँ। यदि दुर्घटना न हुई होती तो संभव है उन्हें इच्छा मृत्यु मिलती। जीवनी शक्ति न केवल शरीर को बलिष्ठ, निरोग एवं दीर्घजीवी बनाती है, वरन् मनोबल की भी अधिष्ठात्री है। उससे ओजस, तेजस और वर्चस की विभूतियाँ हस्तगत होती हैं। इसे प्रतिभा कह सकते हैं।
प्रतिभा का स्त्रोत अन्तरिक्ष है। अन्तरिक्ष से जीवन भी बरसता है। सूर्य किरणों को जीवनदात्री कहा गया है। उससे वर्षा भी होती है। वैज्ञानिकों ने पता लगाया है कि उससे वर्षा के अतिरिक्त और भी बहुत कुछ बरसता है। वर्षा के पानी में उत्पादक शक्ति होती है। कभी-कभी उसकी न्यूनता भी रहती है। इन परिस्थितियों में वनस्पतियाँ उत्पन्न तो होती हैं, पर वे निर्जीव रहती हैं। विश्लेषणकर्ताओं के अनुसार उनमें रासायनिक पदार्थ स्वल्प मात्रा में पाये जाते हैं। फलतः उनके पल्लव, फूल, फल स्वल्प मात्रा में होते हैं। उन्हें खाने वाले पशु-पक्षी भी दुर्बल ही रहते हैं। दूध कम देते हैं। बच्चे कमजोर रहते हैं।
पर्जन्य का अर्थ प्रकारान्तर से जीवनीशक्ति है जो वर्षा के साथ बरस सकती है और प्राणवायु में भी घुली हो सकती है। हवा में प्राणवायु कम हो तो उसमें साँस तो ली जा सकती है, पर वह विशेषता नहीं होती जिसके लिए जलवायु बदलने और स्वास्थ्य संवर्धन करने के लिए जाते हैं। वनस्पति की प्रखरता प्राणवान जल के ऊपर निर्भर रहती है। प्राणियों का जीवन प्राण पर निर्भर है। प्राण के ऊपर ही आयुष्य अवलम्बित है।
इस सम्बन्ध में अनुसंधान कर रहे मूर्धन्य वैज्ञानिकों का कहना है कि आमतौर से लोग आहार-विहार को ही दीर्घ जीवन का कारण मानते हैं, पर उन लोगों में से ऐसी कोई विशिष्टता नहीं पाई जाती। तलाश करने पर विदित हुआ कि उनमें प्राणशक्ति का बाहुल्य होता है। यह प्राण वहाँ की प्राणवायु की अधिकता से होता है। खाद्य पदार्थ देखने में अन्यत्र जैसे होते हुए भी उनमें पुष्टाई की मात्रा अधिक रहती है और यह शक्ति जल के साथ आकाश से ही बरसती है। जहाँ का अन्न, जल प्राणवायु की दृष्टि से कमजोर होता है, वहाँ के निवासी अनायास ही दुर्बल होते हैं। अनेकों नमी वाले क्षेत्रों के लोग जवानी आते-आते वृद्ध हो जाते हैं। मलेरिया, फाइलेरिया आदि से घिरे रहते हैं और अल्पायु में ही काल के गाल में चले जाते हैं। वस्तुतः प्राण के रूप में जीवनी शक्ति ही उस क्षेत्र में कम बरसती है। उस अभाव की पूर्ति यज्ञ के अतिरिक्त और किसी प्रकार संभव नहीं।
यज्ञ एक प्रकार से अन्तरिक्ष की उर्वरता बढ़ाने का एक साधन है। जमीन में खाद पड़ने से फसल की पैदावार अधिक होती है। यज्ञ की यह विशेषता है कि उसकी ऊर्जा अन्तरिक्ष में ऐसे तत्व भर देती है जो प्राणियों, मनुष्यों, वनस्पतियों, सभी को पोषक तत्व पर्याप्त मात्रा में प्रदान करती है। यह पोषण ही पर्जन्य है। गीता में यज्ञ से पर्जन्य वर्षा का जो उल्लेख है, उसका तात्पर्य यही है कि अग्निहोत्र से अन्तरिक्ष में ऐसी विशेष हलचलें उत्पन्न होती हैं जो समस्त जीवधारियों का पोषण करती हैं।
आलू , मटर, टमाटर, गोभी आदि के बाजार में बिकने की बात तो अब तक देखी सुनी जाती रही है। इसमें विचित्रता भी नहीं, यह सामान्य बात है, किन्तु जब मानवी अंग अवयवों का क्रय-विक्रय होने लगे, तो इसे गंभीर मामला माना जाना चाहिए, साथ ही अनैतिक और अमानवीय भी। दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि इस प्रक्रिया द्वारा एक वर्ग द्वारा पैसे के बल पर गरीबों का शोषण और उन्हें अपनी मौत मरने के लिए बाधित किया जा रहा है।
यहाँ कहने का आशय यह कदापि नहीं है कि किसी जरूरतमंद की सेवा-सहायता एवं अंगदान द्वारा जीवन रक्षा करना बुरी बात है। नैतिकता की सीमा के भीतर ऐसा करना अनुचित भी नहीं है, किन्तु सवाल यह है कि ऐसे कितने व्यक्ति हैं, जो स्वेच्छा से परमार्थ परायणता के भाव से प्रेरित होकर ऐसा करना चाहते हैं। अधिकाँश मामलों में ऐसे प्रकरणों में दाता की विवशता और कंगाली ही प्रकाश में आती है। बस यहीं से इस अमानवीय कृत्य की शुरुआत होती है। इससे पूर्व अंग-अवयवों का अभावग्रस्तों को दान वसीयतनामे के माध्यम से मृत्युपराँत पूर्णतः परमार्थ की दृष्टि से किया जाता था, जो निस्संदेह नैतिक भी था और मानवीय भी। जो शरीर मृत्यु के बाद मिट्टी में मिल जाना है और सड़-गल कर नष्ट हो जाना है, उससे यदि किसी व्यक्ति की जीवन रक्षा हो जाय तो दिवंगत होने वाले को इसमें क्या आपत्ति हो सकती है। जीवन के अन्तिम क्षणों में उसका पवित्र कार्य उसे यह संतोष प्रदान करने के लिए काफी होता है, कि जीते जी भले ही किसी की सेवा-सहायता न कर सका हो, पर मौत के बाद तो वह ऐसा कर ही सकेगा, दूसरे किसी मरणासन्न को जीवनदान देकर पुण्य-परमार्थ का भागी बनता है, सो अलग, किन्तु अब जीवित अवस्था में ही मानवी अंगों का व्यापार होने लगे, तो इसे दुर्भाग्य कहना चाहिए और आज के तथाकथित सभ्य समाज के सिर पर काले कलंक का टीका भी।
सर्वेक्षणों से ज्ञात होता है कि अपने देश के बड़े-बड़े शहरों के अस्पतालों में रिक्शा चालक, मजदूर, गरीब किसान, कुली जैसे निर्धन तबके के लोगों की लाइनें लगी हैं। पूछने पर पता चलता है कि यह रक्तदाताओं की पंक्तियां हैं, जो अपनी छोटी कमाई के अतिरिक्त विभिन्न अस्पतालों में माह में अनेक अनेक बार रक्तदान द्वारा अर्थोपार्जन करते और परिवार की गाड़ी किसी प्रकार खींचते-घिसटते जीवन गुजारते हैं। यह व्यापार यहीं तक सीमित होता, तो संतोष की साँस ली जा सकती थी, किन्तु जब व्यक्ति अपने वृक्क (किडनी), त्वचा के टुकड़े, आँख (कार्निया), प्लासेण्टा ऊतक जैसे महत्वपूर्ण अंग-अवयवों को जीवित रहते ही आलू-गोभी की तरह बेच कर पैसा कमाने और अर्थोपार्जन का साधन मानने लगे, तो इसे क्या कहा जाय दुर्भाग्य? दुर्विपाक? अथवा उस समाज-व्यवस्था को दोष दिया जाय जिसने लोगों को अमीर-गरीब के दो खेमों में बाँट दिया।
सम्पन्न लोग तो पैसे के बल पर विलासिता के साधन जुटाते रहते हैं, वहीं दूसरी ओर गरीबों को अभावग्रस्तता की स्थिति में भली प्रकार एक जून का भोजन भी उपलब्ध नहीं हो पाता। ऐसी दशा में उनके पास दो ही विकल्प शेष रह जाते हैं या तो आत्म हत्या कर लें अथवा जीने के लिए कोई ऐसा उपाय-उपचार अपनायें, जिससे अधिक नहीं, तो कम से कम मौलिक आवश्यकताओं की भलीभाँति पूर्ति होती रह सके। आज नौकरी पाना तो जमीन आसमान के कुलाबे छानने की तरह है। महंगाई सर चढ़ कर बोल रही है, जिसमें छोटी पूँजी से कोई वाणिज्य-व्यापार भी संभव नहीं। ऐसी स्थिति में जीवित अंग-अवयवों का विक्रय कर अपना जीवन-यापन करना उनके लिए अस्वाभाविक भी नहीं लगता। प्रति वर्ग इंच त्वचा के लिए उन्हें तीन सौ रुपये प्राप्त होते हैं। बड़े-बड़े शहरों में आज गुर्दे 50 हजार रुपए तथा आँख 80 हजार रुपये में बिकती है। इसके अतिरिक्त सर्वेक्षण के दौरान कई ऐसे व्यक्ति भी प्रकाश में आये हैं जो पैसों के लिए अपना एक हाथ, कान एवं यहाँ तक एक टाँग भी बेचने के इच्छुक थे। हों भी क्यों नहीं, क्योंकि इससे उन्हें इतना धन प्राप्त हो जाता है, जो उन्हीं के कथानुसार तीन जन्मों में भी इतनी सम्पदा इकट्ठी करने की उनकी सामर्थ्य नहीं। ऐसी दशा में इस व्यवसाय का फूलना-फलना स्वाभाविक ही है।
एक अध्ययन के अनुसार सन् 83 में 60 और सन् 85 में 600 से बढ़ कर वृक्क (किडनी) व्यापार अब इतना बड़ा हो चुका है कि प्रति वर्ष 2 हजार तक ऐसे जीवित वृक्क खरीदे-बेचे जाते हैं। इसी के साथ अन्य अंगों के क्रय-विक्रय में भी तेजी आयी है। वैसे तो व्यापार विभिन्न राज्यों के कलकत्ता, बम्बई, नाड़ियाद, पुणे, मद्रास, बैंगलोर, जयपुर, मदुरई जैसे सभी छोटे बड़े शहरों में चल रहा है, किन्तु महाराष्ट्र को इसका मक्का कहा जाता है। तमिलनाडु का एक कस्बा है-विलिवक्कम। यहाँ यह धन्धा इतनी तेजी से चल पड़ा है कि लोगों ने इसका नाम बदल कर किडनीवक्कम-किडनीसोल्डम रख दिया है। इस प्रकार के व्यापार के लिए भारत विश्व भर में प्रसिद्ध है। किसी अन्य देश में ऐसा व्यापार चलता हो, इसकी कोई सूचना नहीं है। हाँ, विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट के अनुसार होण्डुरास और ब्राजील से बच्चे इसी प्रयोजन के लिए दूसरे देशों को बेचे जाते हैं, पर अभी तक इसकी पुष्टि नहीं सकी है। भारत में इस अनोखे धन्धे का प्रारंभ विदेशों से हुआ। आरंभ में भारतीय विक्रेता अपने अंग विदेशों में जाकर एजेन्टों के माध्यम से बेचते थे, पर जब वहाँ ऐसे आपरेशनों पर पाबन्दी लगा दी गई तो अब ऐसे जरूरतमंद लोग विदेशों से भारत की ओर आने लगे। सर्वेक्षण में देखा गया है कि खाड़ी देशों के निवासी वृक्क प्रत्यारोपण के लिए प्रायः बम्बई और सिंगापुर एवं थाईलैण्ड के निवासी मद्रास आया करते हैं।
ऐसी बात नहीं कि विदेशों में अंग प्रत्यारोपण कार्य नहीं होता, पर भारत और उसमें मौलिक अन्तर यह है कि उनमें मृतकों से अंग प्राप्त किए जाते हैं और रक्त बैंकों की तरह अन्य अंगों के लिए भी समुचित अंग बैंक स्थापित किये गये हैं। किन्तु भारत में अब तक ऐसी व्यवस्था नहीं हो सकी है। सन् 80 से पूर्व तक यहाँ भी अंग प्रत्यारोपण के लिए अंग प्राप्ति का कार्य मृतकों एवं जीवित व्यक्तियों में सिर्फ रोगी के निकट सम्बन्धियों तक ही सीमित था, पर इसके बाद जब शक्तिशाली इम्यून प्रतिरोधी दवाओं का आविष्कार हुआ तो इनके प्रयोग से गैर सगे-सम्बन्धियों से प्राप्त अवयवों को रोगी के इम्यून सिस्टम द्वारा अस्वीकार करने की प्रवृत्ति पर भी अंकुश लगा पाने में सफलता प्राप्त कर ली गई। इस प्रकार दूसरे लोगों के भी अवयवों का सफलतापूर्वक प्रत्यारोपण अन्य लोगों में किया जाना संभव हो गया। बस यहीं से इस घृणित व्यापार की शुरुआत हुई। वैसे पैसे की दृष्टि से देखा जाय, तो रोगी, अंग-क्रय से कोई आर्थिक लाभ में रहता हो ऐसी बात नहीं है, क्योंकि आँकड़े बताते हैं कि 50 हजार रुपया एक जीवित वृक्क को खरीदने में खर्च आता है। इसके अतिरिक्त 60 से 70 हजार ऑपरेशन का खर्चा। इसके बाद करीब तीन वर्ष तक 3 हजार प्रति माह के हिसाब से दवाओं का खर्चा। इस प्रकार कुल दो लाख से भी ऊपर का व्यय पूरी प्रक्रिया में आ जाता है। इतने रुपये में डायलिसिस जैसी मशीन से भी गुर्दे का काम लिया जा सकता है, फिर दूसरे व्यक्ति का जीवन खतरे में डालने का कोई औचित्य रह नहीं जाता और दाता की मृत्यु का दोष सिर पर ढोने के पाप से भी बचा जा सकता है, क्योंकि ऐसे आपरेशनों में लापरवाही के कारण कई बार अंग विक्रेताओं की मौत तक होती देखी गई है।
ऐसी दशा में प्रश्न उठता है कि उन निरीह मौतों और घृणित व्यापार के लिए दोषी कौन है? डॉक्टर? विकसित चिकित्सा विज्ञान? अथवा पैसे के बल पर जीवन खरीदने वाले तथाकथित सम्पन्न व्यक्ति का दलाल? आरोप चाहे जिसके सिर पर पड़े, मढ़ दें, पर मूल कारण वहाँ से आरंभ होता है, जहाँ हम संवेदना पक्ष की उपेक्षा-अवहेलना कर निष्ठुरतापूर्वक निर्णय लेते हैं। तब मानवी अंग को निकाल कर प्रत्यारोपण करना भी एक याँत्रिक प्रक्रिया हो जाती है। विज्ञान के विकास को अभी कई मंजिले पार करनी हैं। उसे तो प्रगति करना चाहिए पर संवेदना की नकेल भी उसे पहननी होगी, तभी यह घृणित व्यापार रुकेगा।
एक कुत्ता मुँह में रोटी लिये नदी के किनारे-किनारे जा पहुँचा। पानी में उसे अपनी परछांई दिखाई दी।
कुत्ता दूसरे के मुँह में लगी रोटी छीनने के लिए परछांई पर झपटा जैसे ही मुँह खुला अपनी रोटी भी पानी में गिर कर बह गई।
अति लालच का फल सदा बुरा होता है।
सौंदर्य की दो श्रेणियाँ होती हैं-एक आन्तरिक, दूसरी बाह्य। नाक-नक्श, रूप-रंग यह सब मिलकर बाह्य सौंदर्य का निर्माण करते हैं, जो अस्थायी होता है और उम्र ढलने के साथ-साथ चला जाता है। दूसरी श्रेणी आन्तरिक सौंदर्य की है। गुण, कर्म, स्वभाव से इसकी रचना होती है। समाज में मान प्रतिष्ठान हर किसी को इसी के कारण मिलता है। यही व्यक्ति की चिरस्थायी सम्पत्ति है। इसी के विकास की ओर ध्यान दिया जाना चाहिए।
पर आज प्रवाह उल्टा बहता दिखाई पड़ रहा है। जिस आन्तरिक सौंदर्य की महती आवश्यकता वर्तमान समय और समाज को है, लोग उसकी उपेक्षा करते देखे जा रहे हैं और एक ऐसे कृत्रिम सौंदर्य की ओर भाग रहे हैं जिससे शरीर की स्वाभाविक सुन्दरता भी मारी जाती है और बनावटीपन का आवरण हर घड़ी ओढ़े रहना पड़ता है।
आज सुन्दरता की परिभाषा ही बदल चुकी है। सुन्दरता का अर्थ लोग रूप लावण्य से लगाते हैं। गोरी त्वचा, आकर्षक नयन-नक्श, सुन्दर घुँघराले लम्बे बाल-बस यहीं तक सिकुड़ी सिमटी है वर्तमान की तथा कथित सुन्दरता। इसे ही मानवी सौंदर्य की कसौटी माना जाता है। जिन्हें प्रकृति की ओर से यह सब कुछ मिल गया, वह अपने को बड़े भाग्यशाली मानते और स्वयं पर गर्व करते हैं, पर जो इतने सौभाग्यशाली साबित नहीं हो सके जिन्हें आकर्षक चेहरा-मोहरा नहीं मिल सका, वे फिर कृत्रिम सौंदर्य का सहारा लेते और तरह-तरह के प्रसाधन सामग्रियों का प्रयोग कर खूबसूरती बढ़ाने की कोशिश करते हैं। तो क्या सचमुच रसायनों या शल्य क्रिया के माध्यम से सुन्दरता बढ़ायी जा सकती है? उत्तर नहीं में दिया जा सकता है।
संसार जिस सौंदर्य पर टिका हुआ है, वह मनुष्य का बाह्य नहीं, आन्तरिक सौंदर्य है और यही उसकी वास्तविक सुन्दरता है। रुपये-पैसे से खरीदी गई सुन्दरता वास्तविक कभी नहीं हो सकती, वह बनावटी ही होगी और बनावटीपन में वह सामर्थ्य नहीं, कि दूसरों में प्रेम-सद्भाव उत्पन्न कर सके, प्यार-दुलार दे सके, सहयोग सहकार कर सके। यह सब कुछ आन्तरिक सौंदर्य से ही संभव है, आन्तरिक खूबसूरती तथा बाह्य शारीरिक खूबसूरती का परस्पर कोई संबंध नहीं। कई अवसरों पर देखा जाता है कि हम जिन्हें हृदय से आदर और सम्मान करते हैं, वे शारीरिक दृष्टि से सामान्य स्तर के हैं। सुन्दरता के नाम पर न उनमें कोई आकर्षण है न रूप-लावण्य, किन्तु फिर भी हमारे दिल में उनके प्रति अपार श्रद्धा और सम्मान होता है। ऐसा क्यों? यदि शारीरिक आकर्षण ही सब कुछ रहा होता, उसे ही मनुष्य का वास्तविक सौंदर्य माना जाता, तो यह स्थिति उत्पन्न न होती। फिर कुरूप अथवा सामान्य रूप वाले व्यक्ति हमें कदापि आकर्षित नहीं कर पाते, पर वस्तु स्थिति इससे भिन्न पायी जाती है।
सन्त विनोबा के बड़े भाई बालकोवा एक बार अचानक बीमारी के शिकार हुए, उन्हें क्षय हो गया। उन दिनों यह राजरोग असाध्य माना जाता था। चिकित्सक और साथी भी कोई उत्साहवर्धक आश्वासन न देते थे।
इन परिस्थितियों में बालकोवा ने ईश्वर की शरणागति ली और समर्पण का व्रत लिया। अच्छे हो गये तो वे समाज सेवा के कार्य में अपने को पूरी तरह खपा देंगे। प्रार्थना का प्रभाव हुआ। बालकोवा अच्छे हो गये। उसने प्राकृतिक चिकित्सा का गहरा अध्ययन किया। गाँधी जी ने जब उरली काँचन में प्राकृतिक चिकित्सालय स्थापित किया तो उसके संचालक का उत्तरदायित्व बालकोवा को ही सौंपा और उनकी यह सेवा साधना आजीवन चली।
इसके विपरीत कई मौकों पर देखा जाता है कि जिन्हें असामान्य सुन्दरता प्राप्त है, उनके आचरण और व्यवहार इतने असुन्दर होते हैं कि लोग उनके नाम से ही घृणा करते हैं। फिर यह खूबसूरती किस काम की। तात्पर्य यह है कि आन्तरिक सौंदर्य यदि न हो तो बाह्य सौंदर्य बेकार साबित होता है। जबकि आन्तरिक खूबसूरती के लिए शारीरिक खूबसूरती होना कोई आवश्यक शर्त नहीं है। गान्धी जी, बिनोवा आदि रूप सौंदर्य में आकर्षक थे, ऐसा नहीं कहा जा सकता, किन्तु देशवासियों से उन्हें जो असीम श्रद्धा-सम्मान प्राप्त हुआ, वह किसी भी प्रकार कम नहीं था। अब्राहम लिंकन के बारे में कहा जाता है कि वे देखने में अत्यन्त ही कुरूप थे, किन्तु देश और देशवासियों के लिए उनने जो कुछ किया, उन्हें आज भी अमेरिकावासी भुला नहीं पाये हैं और उनका नाम सुनकर ही श्रद्धावनत बन जाते हैं। आखिर उन सब में विशेषता क्या थी? गंभीर चिन्तन के उपरान्त दृढ़तापूर्वक यह कहा जा सकता है कि इन सबके मूल में निश्चय ही उनकी आन्तरिक सुन्दरता विचारणाओं-भावनाओं की उत्कृष्टता निहित थी। इन्हीं ने उन्हें महान बनाया। यही बात सुकरात जैसे दार्शनिक पर भी लागू होती है।
हर व्यक्ति की यह आन्तरिक इच्छा होती है कि उसके दुःख में साथ देने वाला कोई व्यक्ति मिल जाय, मुसीबतों में धैर्य बँधाने वाला कोई सहयोगी मिल जाय। कष्ट-कठिनाइयों में सहभागी बनने वाला कोई मित्र मिल जाय। अनेक अवसरों पर ऐसे लोग मिल भी जाते हैं, जो अपनी परवाह न करते हुए विपत्ति में दूसरों का साथ देते, हर प्रकार से उनकी रक्षा करते हैं। इस स्थिति में वे यह नहीं देखते कि विपत्तिग्रस्त व्यक्ति का रूप-रंग कैसा है? वह सुन्दर है या नहीं, वरन् इस आपत्ति काल में वे अपनी आत्मा में उसकी आत्मा का और उसकी आत्मा में अपनी आत्मा के दर्शन करते हैं। आत्मा शाश्वत, सत्य और सौंदर्य का नाम है। यही उन्हें सहयोग करने के लिए प्रेरित करती है। यहाँ भी स्पष्ट हो जाता है कि व्यक्ति की आन्तरिक सुन्दरता ही प्रमुख है। जहाँ दो दिलों का, दो आत्माओं का मिलन होता है, वहाँ शारीरिक सुन्दरता गौण बन जाती है और आत्मिक सुन्दरता प्रमुख।
जब हम स्वार्थपरता, क्रूरता, निष्ठुरता, विमूढ़ता आदि दोषों पर विचार करते हैं, तो हमारे सामने कुरूपता की तस्वीर खिंच जाती है। इसके विपरीत प्रेम, सौहार्द सहयोग-सहकार, सहिष्णुता-सहानुभूति जैसे सद्गुण हमारी आँखों में सौंदर्य का रूप खड़ा कर देते हैं। यही वे साधन हैं, जिनके द्वारा वास्तविक सौंदर्य और आकर्षण की प्राप्ति हो सकती है। इन्हीं के द्वारा दूसरों के हृदय पर छाप छोड़ी और सम्मान प्रतिष्ठ पायी जा सकती है। जो अपने अन्दर इन गुणों का विकास कर लेते हैं, वे देखने में भले ही शरीर से सुन्दर-आकर्षक न हों, दूसरों को प्रभावित-आकर्षित करने में सफल होते व उनकी दृष्टि में सुन्दर साबित होते हैं।
पर यदि कोई अपने शरीर-सौंदर्य पर गर्व करने लगे, स्वयं को अत्यंत सुन्दर व सौभाग्यशाली मानने लगे, तो इसे आत्म-प्रवंचना ही कहा जायेगा। ऐसे लोगों की दशा ग्रीक पुराण में वर्णित युवक नार्किसस की भाँति हो जाती है, जो अपने ही रूप जाल में मोहित होकर सब कुछ भूल गया और बरबाद हो गया। इसे विस्मृत नहीं किया जाना चाहिए कि दर्पण आँख, कान, नाक चेहरे की आकृति और बनावट तो बता सकता है, पर वास्तविक सौंदर्य तो अन्तरात्मा के आइने में झाँकने से ही विदित होता है। उसी सौंदर्य को बढ़ाये जाने की बात सोची जानी चाहिए। समय-समय पर निरीक्षण-परीक्षण इसी का होना चाहिए, क्योंकि यही मनुष्य का सच्चा सौंदर्य है।
विश्व विख्यात वैज्ञानिक आविष्कारक थामस अल्वा एडीसन ने जीवन भर एकनिष्ठ भाव से आविष्कारों में रुचि ली और अपनी समूची तत्परता उसी एक काम में लगाई। ग्रामोफोन, टेपरिकॉर्डर, चल चित्र, कैमरा, बिजली के बल्ब जैसे छोटे बड़े 2500 आविष्कारों का उनका अपना कीर्तिमान है। दूसरा कोई भी अभी तक इतने प्रकार के इतने महत्वपूर्ण काम नहीं कर सका है।
एडीसन बचपन से ही बहरे हो गए थे। लेकिन इसका उन्होंने कभी दुःख नहीं मनाया। वरन् इस कमी को ईश्वरीय वरदान कहते रहे। उनका कहना था कि दूसरे लोग बेकार की गप्पबाजी में अपना समय गुजारते हैं, मुझे ऐसी बरबादी का सामना नहीं करना पड़ता। वह समय मैं सोचने और पढ़ने में लगाता रहता हूँ। यदि दूसरों की तरह मेरे भी कान खुले होते तो इतना न कर पाता जो कर पाया हूँ। एडीसन ने छोटे कामों में भी कभी हेठी अनुभव नहीं की। वे हर काम को प्रतिष्ठ का प्रश्न बनाकर उसे सही, पूरा और शानदार स्तर का बनाने का प्रयत्न करते थे। रेलवे डिब्बों में सब्जी बेचना, अखबार बेचना, तार बाँटना जैसे अनेक छोटे काम उन्हें अपने आरंभिक दिनों में करने पड़े। पर इसमें कभी हीनता का अनुभव नहीं किया। उनने हर काम को इज्जत का और हर अवसर को महत्वपूर्ण शिक्षण का अवसर माना एवं साधना मानकर सम्पादित किया।
अपने आप को उठाना या गिराना मनुष्य के अपने हाथ की बात है। साहस, उत्साह, पराक्रम और विश्वास के आधार पर मनुष्य ऊँचा उठता है। यह उसका उत्कर्ष जन्य प्रयास है। इसके विपरीत यदि कोई हीनता की भावनाओं से ग्रसित हो। भय, निराशा, उद्विग्नता, अविश्वास, आशंका से घिरा रहे तो उसका भौतिक एवं आत्मिक पतन होता चलता है। साधन और अवसर सामने होने पर भी उसे अधोगामी मार्ग ही पकड़ना पड़ता है।
आन्तरिक उल्लास का, शान्ति का अक्षत स्त्रोत मनुष्य के अपने अन्तस्तल में सदा विद्यमान होने पर भी प्रायः देखा जाता है कि लोग अपनी चिन्तन चेतना को गड़बड़ाते और अनेकानेक मानसिक बीमारियों के शिकार बनते हैं। इसका दुष्प्रभाव न केवल मनुष्य की कार्यक्षमता पर पड़ता है वरन् वह शारीरिक अक्षमता-रुग्णता को भी जन्म देता है। सुप्रसिद्ध चिकित्सा विज्ञानी डॉ. डेविड बर्न्स के अनुसार मानसिक अवसाद के कारण प्रतिवर्ष लाखों व्यक्तियों को तद्जन्य बीमारियों का शिकार होते देखा गया है। उसके शमन के लिए लोग ट्रैक्युलाइजर जैसी नशीली दवाइयों का सेवन करते ओर अपनी शारीरिक मानसिक क्षमता गँवाते रहते हैं। अपनी पुस्तक “फीलिंग गुड” में उन्होंने मानसिक अवसाद का प्रमुख कारण भ्राँतिपूर्ण चिन्तन को माना है। उनका कहना है कि व्यक्ति अपने दोषपूर्ण चिन्तन और विकृत मनःस्थिति के कारण इसे स्वयं उत्पन्न करता है क्योंकि अंतर्मन की आत्म घृणा और अशुभ चिन्तन से ही इसका स्वरूप बनता है। इससे न केवल जीवनी शक्ति का क्षरण होता है वरन् प्रतिभा एवं सृजनात्मक गुणों के विकास का मार्ग भी अवरुद्ध हो जाता है व्यक्तित्व हेय बन कर रह जाता है। “हाऊ टू बी हैपी, टू बि ह्यूमन” नामक अपनी प्रसिद्ध पुस्तक में मनोविज्ञानी अल्फवेरान ने कहा है कि अवसाद मात्र एक धुएँ का पर्दा है और कुछ नहीं। इस अभिवृत्ति से ग्रस्त व्यक्ति स्वकेंद्रित हो जाता है। ऐसे व्यक्ति न तो कोई महत्वपूर्ण काम कर पाते हैं और न ही जटिल समस्याओं का सामना कर पाते हैं। ईमानदारी और जिम्मेदारी भी उनसे नहीं निभ पाती क्योंकि वे स्वयं के बारे में सोचते हैं कि वह एक निरर्थक व्यक्ति है। इसे अधिक स्पष्ट करते हुए वियना के मूर्धन्य मनःचिकित्सा विशेषज्ञ डॉ. विक्टर ई. फेंक्ले ने लिखा है जो मनुष्य यह अनुभव करेगा कि उसका जीवन निरर्थक है, उसका मन और शरीर कभी स्वस्थ न हरेगा। सार्थकता की अनुभूति न होने पर मनुष्य जिन्दगी को लाश की तरह ढोता है और उस नीरस निरानन्द स्थिति में सचमुच ही जीवन बहुत भारी पड़ता है। उस दबाव से इतनी थकान आती है कि कुछ करते धरते नहीं बनता। हारा-थका आदमी धीरे-धीरे गिरता घुलता जाता है और मरण के निकट बुलाने वाली बीमारियों को निमन्त्रण देकर स्वेच्छा संकल्प के आधार पर कष्ट ग्रसित रहने लगता है।
“अवसाद से उन्मुक्त व्यक्तित्व की” ओर जैसा मार्ग निर्देशन करने वाले प्रख्यात मनोविज्ञानी एडलर ने उदासीनता को मानवी मन की एक बड़ी दुर्बलता माना है। प्रगति पथ का यह एक बहुत बड़ा रोड़ा है जिसे मनुष्य स्वयं अपने चिंतन-मनन से उत्पन्न करता है, इसका समाधान प्रस्तुत करते हुए उन्होंने कहा है कि ऐसे व्यक्ति उन कारणों का पता लगाकर प्रयास करने पर स्वयमेव इस स्थिति से छुटकारा पा सकते हैं। विचारों को विचारों से काटा जाता है। उदासीनता के स्थान पर शान्ति और समस्वरता उत्पन्न करने वाले सृजनात्मक विचारों को आमंत्रित करना चाहिए तथा ऐसी रीति-नीति अपनाना चाहिए जो ध्यान बँटा सके, उत्साह बढ़ा सके। जीवन लक्ष्य सामने होने एवं सतत उसके उज्ज्वल पक्ष की ओर दृष्टिपात करते रहने से क्रियाएँ भी तद्नुरूप चल पड़ती हैं। सामाजिक प्राणी होने के कारण मनुष्य को समाज के अधिक समीप होना चाहिए अर्थात् उसे सामाजिक उत्तरदायित्वों, जिम्मेदारियों को अधिक सजगतापूर्वक वहन करना चाहिए। इससे जहाँ विचारों को उत्कृष्टता का पक्षधर बनाने का अवसर मिलता है वहीं व्यस्तता के कारण नकारात्मक चिन्तन से भी छुटकारा मिलता है वहीं व्यस्तता के कारण नकारात्मक चिंतन से भी छुटकारा मिलता है। एडलर के अनुसार विधेयात्मक चिन्तन से मानव मन की समस्त दुर्बलताएँ क्रमशः दूर होती जाती हैं और वह नूतन ज्ञान से जुड़ जाता है। इसी तरह के विचार मनोविज्ञानी जुँग ने भी प्रकट किये हैं। उनका कहना है कि हीन भावना के शोधन और परिष्कार के लिए विवेकशीलता को जाग्रत करना अनिवार्य है। सकारात्मक विचार एवं दृढ़ संकल्प शक्ति ही इन परिस्थितियों से मनुष्य को उबारते हैं।
इस संदर्भ में मनोविज्ञानी वेरन वुल्फ का कहना है कि जीवन की असम्बद्ध रीति-नीति, एकाँगी जीवन और स्वार्थपरता ही मानसिक अवसाद के प्रमुख कारण हैं। हीन भावना का शारीरिक एवं मानसिक दुर्बलता से घनिष्ठ सम्बन्ध है। इससे छुटकारा पाने के लिए आवश्यक है कि जीवन की रीति-नीति बदली जाय। अपना स्वाभिमान बनाये रखते हुए दूसरों के गुणों की प्रशंसा की जाय। निःस्वार्थ भाव से सामाजिक उत्थान के लिए किये गये कार्यों से जीवन में श्रेष्ठता के तत्वों का समावेश होता है। यूनिवर्सिटी आफ पेन्सिलवेनिया के प्रसिद्ध चिकित्साशास्त्री डॉ. ऐरोन बैक ने अवसादग्रस्त रोगियों के उपचार हेतु एक मनश्चिकित्सा पद्धति का आविष्कार किया है। जिसका नाम है काग्नीटिव थेरेपी। उनकी यह चिकित्सा प्रणाली पूर्णतः मनोवैज्ञानिक सिद्धान्तों पर आधारित है। विभिन्न परीक्षणों के आधार पर उनने निष्कर्ष निकला है कि भौतिक मृग मरीचिका के चंगुल में फँसा हुआ व्यक्ति अपनी मनोदशा को असंतुलित कर बैठता है, जिसके कारण उसे उदासी अथवा अवसाद का शिकार बनना पड़ता है। उपचार के समय उन्होंने पाया है कि ऐसे व्यक्ति एक ओर तो किसी की भर्त्सना करते बड़बड़ाते रहते हैं तो दूसरी तरफ वह स्वयं की समीक्षा भी करते जाते हैं। रोगियों द्वारा किये गये समीक्षात्मक विचारों का गहन विश्लेषण करने के पश्चात वह इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि निषेधात्मक विचारधाराओं की बहुलता के कारण ही यह मनोविकार उत्पन्न होता है और इससे आत्मचिन्तन की मौलिकता नष्ट होती चली जाती है। काग्नीटिव थैरेपी एण्ड दि इमोशनल डिसऑर्डर नामक अपनी पुस्तक में डॉ. बैक ने बताया है कि चिन्तन की विकृति के कारण ही मानसिक अवसाद उत्पन्न होता है। उनके अनुसार मनोवृत्तियाँ विचार जगत को प्रभावित करती हैं। उस पर संव्याप्त निषेधात्मक चिन्तन मनुष्य के पतन-पराभव का कारण बरता है। विचार परिवर्तन के द्वारा ही उस पर विजय पाई जाती है। चिकित्सकों ने संयुक्त प्रयासों के आधार पर कुछ और तथ्यों पर प्रकाश डाला है। उसके अनुसार व्यक्ति की मनोदशा विचारों का नियन्त्रण नहीं कर सकती वरन् विचारों द्वारा मनोदशा का निर्धारण होता है।
वस्तुतः मानवी मस्तिष्क एक यंत्र की तरह कार्य करता है। उसमें उत्पन्न हुई कोई भी योजना कार्य रूप में परिणत होना चाहती है। यह विवेक बुद्धि का काम है कि वह किन विचारों को रोकती है और किन्हें कार्य रूप में परिणत होने का दिशा निर्देश देती है। अतः आरंभ से ही इस सम्बन्ध में सतर्कता बरतनी चाहिए कि मस्तिष्क में उत्कृष्ट विचारों का ही उद्भव हो। निषेधात्मक चिन्तन से सदैव बचे रहना ही श्रेयष्कर है।
जिन विचारों के कारण आशंका, निराशा, भीति या उदासीनता उत्पन्न हुई हो, ठीक उसके प्रतिकूल विचारों को उत्पन्न करना चाहिए। सोचना चाहिए कि विपत्ति टल गई या टलने जा रही है। बादल साफ होने पर जिस प्रकार आकाश स्वच्छ होता है, समझना चाहिए कि उसी प्रकार अपने को दबोची हुई हीनता, विपन्नता का वातावरण बदल जायगा। सृजनात्मक सुखद, उज्ज्वल भविष्य के, अनुकूलता से भरे मानस चित्र बनाना एक ऐसी कला है जिसका अभ्यास होने पर वास्तविक कठिनाईयों के बीच भी मनुष्य अपना शौर्य-साहस बनाये रह सकता है। वह उपाय ढूँढ़ सकता है जो ऐसी दशा में प्रगति दिशा में बढ़ने में सहायक सिद्ध, हो सके।
अपना अस्तित्व और भविष्य ईश्वर के हाथों सुरक्षित मानने की भावना ऐसी है जिसे अपनाये रहने और बढ़ते चलने में हर कोई निश्चिन्तता प्राप्त कर सकता है। उल्लासित रहने की कला ऐसी है जो बहुमूल्य औषधियों की तुलना में अधिक सन्तोषप्रद परिणाम प्रस्तुत कर सकती है। अवसादग्रस्त व्यक्तियों के मित्रों सम्बन्धियों का भी कर्तव्य है कि वे ऐसे लोगों में जीवन के प्रति सरसता उत्पन्न करें। ऐसे लोगों का सच्चा मित्र एवं सहायक वही हो सकता जो उत्साह भरे, आशा दिखाये और साहस जगा कर हँसते-हँसाते जीने की मनःस्थिति उत्पन्न करें।
राजेस्टर नगर में डॉ. कैत्वी ने अपना एक अस्पताल बनवाया। जिसमें अधिकाँश कार्यकर्ता स्वयं सेवी स्तर के थे। पूरा काम करते और निर्वाह मात्र का वेतन लेते। उधर रोगियों को भी यह सुविधा थी कि स्वल्प मूल्य में अन्यत्र से कहीं अधिक प्रभावशाली चिकित्सा करा पाते। निवास जैसी सुविधाएँ भी उसमें थी। उनके जीवन काल में अस्पताल दूर-दूर तक प्रख्यात हो गया।
अब अस्पताल की चौथी पीढ़ी चल रही है। सन्तानों ने अन्य व्यवसाय ढूँढ़ने की अपेक्षा उसी प्रयोग में अपने को खपाया।
प्रगति दिन दूनी रात चौगुनी होती गई।
इन दिनों अस्पताल के संस्थापकों की चौथी पीढ़ी चल रही है। अस्पताल का अर्थ विस्तार इस बीच दस गुना हो गया है। प्रायः एक हजार डॉक्टर काम करते हैं। नित्य एक लाख रोगी प्रायः उससे लाभ उठाते हैं।
सामान्यतः मनुष्य देखने-सुनने में हाड़-माँस की एक मशक मात्र लगता है और स्वयं को वह इससे अधिक कुछ समझता भी नहीं हैं। तो क्या सचमुच बात ऐसी ही है? उत्तर होगा-नहीं। भले ही वह सामान्य दृष्टि में एक चलता-फिरता पुतला भर दीखता हो, पर वह इतना ही नहीं है। उसका जब वास्तविक स्वरूप निखरता है, तो अंगारे के ऊपर से हटी राख की भाँति प्रखर प्रतिभा बन कर प्रकट होता है। भले ही वह किसी भी क्षेत्र में हों।
लौह खण्ड जमीन के नीचे यत्र-तत्र कितने ही पड़े रहते हैं, पर उनकी महत्ता सामान्य पत्थर (अयस्क) से कोई बहुत अधिक नहीं होती है, किन्तु जब सामान्य पत्थर समझे जाने वाले उसी लोहे को भट्टी में अनेकानेक प्रकार से संस्कारित किया जाता है, तो वही धातु मजबूत फौलाद बन कर इस्पात के रूप में सामने आती है। यह ऐसी होती है, जिस पर न जंग चढ़ती है, न आसानी से झुकती है। मनुष्य में जब इतनी प्रखरता आ जाये कि वह विपरीत परिस्थितियों में भी रुके-झुके नहीं, वरन् प्रवाह को मोड़-मरोड़ कर अपने अनुकूल कर ले, तो यही उसकी प्रतिभा कहलाती है। सामान्यतः यह बीज रूप में होती तो सभी में हैं, पर उसकी पहचान कर प्रयासपूर्वक उगाने का झंझट हर कोई मोल लेना नहीं चाहता। यही जब जग पड़ती है, तो पदार्थ के छोटे कण में छिपी असाधारण शक्ति की भाँति मनुष्य इतना समर्थ और शक्तिवान बन जाता है कि जहाँ, जब जिस लक्ष्य पर भी चल पड़ता है, बम की तरह धमाका करता हुआ लोगों के अन्तराल को झकझोर कर अपने साथ-साथ चल पड़ने के लिए बाधित करता है।
इतिहास साक्षी है, जिस किसी ने भी समय और समाज के प्रवाह को मोड़ा है, उन सबने अपने अन्दर की इसी पराक्रमजन्य प्रतिभा को जगाया और जन-जन के मन-मन में चिंगारी से ज्वालमाल बन जाने की प्राण-प्रेरणा फूँकी है। इटली का उदाहरण हमारे समक्ष है। जब वह आस्ट्रिया के अधीनस्थ था, तो शासक वर्ग के शोषण और उत्पीड़न से जनता त्राहि-त्राहि कर रही थी। मैजिनी से अपने देशवासियों की यह वेदना नहीं देखी गई। उनने विदेशियों के उपनिवेशवाद को उखाड़ फेंकने का निश्चय कर लिया। वे चोरी छिपे वाणी और लेखनी के माध्यम से परतंत्रता के विरुद्ध जनचेतना जगाने लगे। इस क्रम में एक समय ऐसा आया, जब प्रत्यक्ष युद्ध की स्थिति बन पड़ी। देशवासियों ने विदेशियों के विरुद्ध युद्ध किया और स्वाधीन हुए। ऐसी होती है प्रतिभा। मैजिनी को इस सिलसिले में न जाने कितनी कठिनाईयों का सामना करना पड़ा, पर वे कभी झुके नहीं , उनके सामने हार नहीं मानी और लक्ष्य पर बढ़ते चले गये, जिसका सुफल-सत्परिणाम स्वतंत्रता के रूप में सामने आया। इसीलिए तो इटलीवासी उन्हें राष्ट्रपिता के नाम से पुकारते हैं।
यही बात वाशिंगटन के जीवन में भी दिखाई पड़ती है। भारत में जो स्थान और लोकप्रियता गाँधी जी को प्राप्त है, वैसे ही पूज्यनीय, अमेरिका में वाशिंगटन हैं। परतंत्र अमेरिका को स्वतंत्र बनाने और मूर्च्छना की स्थिति में पड़ी जनता में प्राण फूँकने का दायित्व उन्होंने ही निभाया था- अपने जीवट और पुरुषार्थ के बल पर। बाद में जब अमेरिका स्वाधीन हुआ, तो राष्ट्रपति पद का प्रश्न उठा। उनसे कइयों ने यह दायित्व भी उठा लेने का आग्रह किया, किन्तु उनने प्रस्ताव अस्वीकार कर दिया और जनमत संग्रह की सलाह दी, ताकि देशवासी पद लोलुपता का आरोप न लगा सकें। यह बात दूसरी है कि चुनाव में भी सर्वसम्मति से राष्ट्रपति वही चुने गये।
प्रतिभावानों की सबसे बड़ी विशेषता नम्रता होती है। वे अपने लक्ष्य के मार्ग पर जितने दृढ़ होते हैं, व्यवहार-क्षेत्र में उनकी शालीनता उतनी ही नमनीय होती है। गाँधी जी स्वराज्य प्राप्ति के अपने निश्चय से कभी डिगे नहीं, पर उनकी नम्रता भी देखते ही बनती थी। विनोबा ने कदाचित् इसीलिए कहा है कि हमारी गर्दन न अकड़ी हो-अहंकार से, अभिमान से, न आवश्यकता से अधिक झुकी हुई हो हीनता से, भीरुता से, वरन् वह प्रतन्य हो, समय आने पर वह सीधी तनी भी रह सके और अन्य अवसरों पर झुक भी सके, बाँस की तरह, तभी वह व्यक्तित्व प्रतिभावान कहला सकता है।
मैजिनी में यही विशेषता थी। जन-चेतना उभारने में उनने अग्रणी भूमिका निभायी, किन्तु जब युद्ध का अवसर आया, तो नेता पद से स्पष्ट इन्कार कर दिया। कहा-ठीक है, आप मुझे नेता मानते हैं, मैं आपका नेता हूँ, पर अभी युद्ध का अवसर है। इसमें मेरी गति नहीं। इसके लिए हम लोगों को गैरीबाल्डी को अपना नेता बनाना चाहिए। वे इस विद्या में निष्णात हैं। तब गैरीबाल्डी सामान्य सैनिक थे, किन्तु उनके नेतृत्व में भी उनने साधारण सिपाही की तरह इटली के स्वाधीनता संग्राम में हिस्सा लेने में तनिक भी हिचक नहीं दिखाई।
प्रतिभावानों की दूसरी बड़ी विशेषता है-कष्ट-कठिनाईयों से भरा परमार्थ परायण जीवन। उन्होंने दूसरों के आगे अपने सुख-सुविधा की बात कभी नहीं सोची और अंतिम साँस तक समाज के बारे में ही सोचा, चाहे वह आयरलैण्ड के मैक्स्वीनी हों, इटली के गैरीबाल्डी एवं उनकी पत्नी एनीटा हों, विनोबा, गाँधी अथवा विद्यासागर कोई हों, सदा मानवता के कल्याण के लिए जिया और उसी को अपनी बहुमूल्य विरासत सौंप कर इस संसार से विदा हुए, ताकि आने वाली पीढ़ी उस धरोहर से अभीष्ट प्रकाश-प्रेरणा ग्रहण कर उनके पद-चिन्हों पर चल सके, और उन्हीं के समान इतिहास के पन्नों में अमिट-अमर बन जाये।
पर इसे क्या कहें अपनी मूर्च्छना? समय का प्रतिकूल प्रवाह ? दुर्भाग्य ? या उस मिट्टी को दोष दें, जिसने संरचना तो गढ़ी, पर इतनी अनगढ़ जो आसन्न संकट में भी उठ बैठने का संबल नहीं जुटा पा रही है। कुछ भी हो, अब हमें इस सन्निपात की स्थिति को त्याग कर आपत्ति कालीन घड़ी में किसी न किसी प्रकार जागना ही पड़ेगा और महाकाल की इच्छा में ही अपनी इच्छा समझ कर वह कर गुजरना पड़ेगा, जिससे हम स्वयं धन्य बन सकें और अपनी पीढ़ी को भी निहाल बना सकें, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ हम पर यह लाँछन न लगा सकें कि हमने काहिली की जिन्दगी जी कर भगवान की पुकार अनसुनी कर दी।
तो फिर क्या किया जाय? उपाय एक ही है कि हम अपनी रुचि को जाने, प्रच्छन्न प्रतिभा को पहचानें और उसे तराश-खराद कर ऐसा सुन्दर-सुगढ़ बना लें, जिससे देखने-सुनने वालों का मन हुलसने लगे एवं संपर्क में आने वालों की भी इच्छा वैसा ही बनने की जग पड़े। प्रतिभावानों का इतिहास बताता है कि जो आज प्रतिभाशाली हैं, वे कल तक मिट्टी में सने सोने की भाँति थे। उन्होंने अपने को पहिचाना, चमकाया, तभी वे कसौटी पर सौ टंच खरे साबित हो सके। रामवृक्ष बेनीपुरी चरवाहा थे। उन्होंने अपनी साहित्यिक विशिष्टता को परखा और साहित्यकार बन गये। मिडिल पास जयशंकर प्रसाद अपना जातिगत धन्धा दुकानदारी करते थे, किन्तु जब उनका कवि हृदय जगा, तो हिन्दी साहित्य के महान कवि बन गये। अक्षर ज्ञान जितना साहित्य से परिचय रखने वाले यायावर की जिन्दगी बिताने वाले राहुल साँस्कृत्यायन अपने उत्तरार्ध जीवन में हिन्दी, संस्कृत, पाली, तिब्बती और रूसी भाषा के उद्भट विद्वान बन गये थे।
इसी प्रकार अन्य क्षेत्रों में भी प्रतिभावानों की ऐसी ही मिलती-जुलती कहानियाँ हैं। वनस्पति और प्राणिजगत में वैज्ञानिक नामकरण की पद्धति के कारण कार्ल वाले लीने नाम से जाना जाने वाला सामान्य सा व्यक्ति कैरोलस लिनियस नामक ख्याति प्राप्त वैज्ञानिक बन गया। पादरी का काम करने वाला ग्रेगर मेण्डल आनुवंशिकी के ‘जनक’ के नाम से प्रख्यात हुआ।
यह सब तो प्रतिभा के उन्नयन, विकास संबंधी चर्चा हुई, पर महत्वपूर्ण यह नहीं है कि प्रतिभा का विकास कर लिया गया, वरन् महत्ता इस बात की है कि उसका सुनियोजित बन पड़ा या नहीं। लोग धाराप्रवाह भाषण भी दे लेते हैं, साहित्य सृजन भी कर लेते हैं।
नदी के किनारे बड़े-बड़े पेड़ थे। पास ही बेंत की कितनी ही बेलें भी उगी हुई थी।
बाढ़ और अन्धड़ एक साथ आये। उनके दबाव से बड़े-बड़े पेड़ तो उखड़ कर गिर गये पर बेंत की बेलें ज्यों की त्यों बनी रही।
एक राहगीर ने बेलों से पूछा मजबूत पेड़ क्यों टूटें और तुम लोग ज्यों की त्यों कैसे खड़ी रहीं।
बेंत की बेलों ने कहाँ हम नम्र है। सब के सामने झुक जाती है। अन्धड़ के सामने भी झुक गई। पर यह बड़े-बड़े अपने बड़प्पन की शान में अकड़े ही खड़े रहे। दबाव ने इन्हें मरोड़कर रख दिया।
सब उन्हें चावपूर्वक सुनते-पढ़ते भी हैं, पर जब परिणाम की ओर दृष्टिपात किया जाता है, तो नतीजा वही ढाक के तीन पात वाला सामने आता है। जब इस बात का हिसाब लगाया जाता है कि उनसे कितनों के जीवन में प्रभाव-परिवर्तन आया, तो दुराशा ही हाथ लगती है। इसके कारणों पर जब ध्यान देते हैं, तो पता चलता है कि जो कुछ भी लिखा या कहा गया, वह लोक रुचि के अनुरूप था। इससे लेखक और वक्ता को सस्ती वाहवाही तो मिल जाती है, पर उनसे जो प्रयोजन साधना चाहिए, उसकी पूर्ति दिशाहीनता की स्थिति में नहीं बन पड़ती है, जबकि होना यह चाहिए था कि समय की माँग के अनुरूप लिखा या वक्तृत्व कला को नियोजित किया जाय। यही महाकाल की पुकार है-न सिर्फ वक्ताओं, लेखकों से, वरन् उन विधाओं के निष्णातों से भी जो अपनी प्रखर प्रतिभा द्वारा समय और समाज के प्रवाह को मोड़ने-मरोड़ने में समर्थ हैं।
अपनों से अपनी बात-
युगसन्धि वेला के अन्तिम दशक के इस पहले वर्ष में जो सर्वाधिक आवश्यकता अनुभव की जा रही है, वह है नवसृजन के लिए विशिष्ट आत्माओं का, सुसंस्कारी देवशक्तियों का धरती पर अवतरण। उनकी खोज व मार्गदर्शन , सही वातावरण देकर उन्हें युग प्रयोजन का बोध कराते हुए लक्ष्य की ओर बढ़ाना। नवसृजन के लिए सहयोगी तो गीध, गिलहरी भी हो सकते हैं, पर युगान्तरीय दायित्वों को देखते हुए अंगद , हनुमान, नल-नील जैसे मूर्धन्यों की आवश्यकता इन दिनों प्रतीत हो रही है। गौ चराने, गेंद खेलने, और लाठी से गोवर्धन उठाने में तो ग्वाल बाल भी अपनी उपयोगिता सिद्ध कर सके थे, किन्तु महाभारत जीतने में भीम, अर्जुन आदि से ही काम चला। महान् परिवर्तन में योगदान तो हमेशा से असंख्यों का रहा है, किन्तु उसका सूत्र संचालन संस्कार सम्पन्न महामानव ही करते रहे हैं।
जब खण्डहर बन गए, भवन को पूरी तरह विस्मार कर नए रूप में पुनः बनाने जैसा नवयुग सृजन का कार्य सामने हो तो मौलिक संस्कारगत प्रखरता वाले महामानवों की आवश्यकता पड़ती है। प्रशिक्षण, वातावरण एवं संपर्क का प्रभाव अपनी जगह महत्वपूर्ण है, पर महामानव इतने से ही नहीं बन जाते। उसके लिए जन्म-जन्मांतरों से संचित संस्कारगत मौलिकता की आवश्यकता होती है। विश्वामित्र ने राम लक्ष्मण को संस्कार पहचान कर ही आग्रहपूर्वक माँगा व उन्हें बला-अतिबला विद्याएँ सिखाकर महान् परिवर्तन के लिए क्षमता सम्पन्न बनाया था। चाणक्य ने चन्द्रगुप्त, समर्थ गुरु रामदास ने शिवाजी, बुद्ध ने आनन्द, रामकृष्ण परमहंस ने विवेकानन्द व मत्स्येन्द्रनाथ ने गोरखनाथ को भारी भीड़ से बड़ी कठिनाई से ढूंढ़ निकाला था।
देव भूमिका निभाने के लिए घुने बीजों की नहीं सही बीजों की, संचित संस्कारों वाली आत्माओं की ही खोज होनी है। खिलौने बालू के नहीं, चिकनी मिट्टी के बनते हैं। हथौड़े की चोट जंग लगे लोहे नहीं, फौलादी इस्पात ही सह पाते हैं। ऐसी भूमिका सम्पन्न कर सकने वाली आत्माएँ ऐसी धातु की बनी होती है कि उनका उपयोग विशेष प्रयोजन के लिए संभव हो सकता है।
ऐसी देव शक्तियाँ अगले दिनों अधिकाधिक संख्या में समाज में जन्म लेने जा रही हैं। जो जन्म ले चुकी हैं, उन्हें सहयोगी वातावरण अभीष्ट है। तभी वह प्रयोजन पूरा हो सकेगा। जिसे युगसन्धि के महत्वपूर्ण समय में किसी भी स्थिति में पूरा होना है। सम्पदा, शिक्षा, श्रमशीलता जैसी विभूतियों से भी अधिक आवश्यकता आज उन देवात्माओं की है जिनमें आन्तरिक वर्चस् विपुल परिमाण में भरा पड़ा है, जिनमें दैवी अनुदान की, संस्कारों की समुचित मात्रा विद्यमान है।
कृषि कार्य में किसान का पुरुषार्थ ही सब कुछ नहीं होता, उपयुक्त भूमि और सही बीज का कहीं अधिक योगदान होता है। शिल्पियों की कुशलता कितनी बढ़ी-चढ़ी क्यों न हो, उन्हें भी सही उपकरण चाहिए। कच्चा माल सही न हो तो कारखाने बढ़िया सामग्री कैसे बनाएँ? बालू से कोई भी कुम्हार टिकाऊ बर्तन नहीं बना सकता। चिकित्सकों के उपचार रोगी की जीवनी शक्ति के आधार पर ही सफल होते हैं। कच्चे लोहे की तलवार से कितना ही बलिष्ठ योद्धा क्यों न हो, जीत नहीं सकता।
इन सब साक्षियों का निष्कर्ष एक ही है कि मौलिक विशिष्टता अपनी जगह जरूरी है। नवसृजन का दायित्व पूरा करने के लिए उसे ढूंढ़ा जाना, खरीदा जाना व मोर्चे पर सही जगह लगाना जब बहुत जरूरी हो गया है। अवतार प्रयोजन को पूरा करने के लिए देवात्माएँ सदैव उपयुक्त माध्यम चुनती हैं। दुष्ट दुरात्माओं की गन्ध उन्हें नहीं भाती। सदाशयता सम्पन्न माता-पिता के रज बीज का ही वे आश्रय लेती हैं। स्वयं मनु एवं भगवती शतरूपा ने तप करके अपनी काया ऐसी बनायी थी कि देवात्माओं को गर्भ में निवास करने में कष्ट न हो। मदालसा, सीता, शकुन्तला जैसी महान् महिलाएँ ही अपनी कोख से दिव्य आत्माओं को जन्म दे सकने में सफल हुई। दिव्य आत्माएँ धार्मिकता से अभिपूरित श्रेष्ठ वातावरण में ही जन्म लेती रही हैं व आगे भी वहीं अवतरित होंगी। यदि किसी प्रकार कहीं अनुपयुक्त वातावरण में वे आ जाती हैं तो उन्हें वहाँ घुटन अनुभव होती है। इसलिए सन्धिकाल में संस्कारों की महत्ता से लेकर परिवारों में सुसंस्कारिता के अभिवर्धन की महत्ता समय-समय पर बताई जाती रही है।
शान्तिकुँज द्वारा ‘देव स्थापना’ कार्यक्रम इसी निमित्त परम पू. गुरुदेव के कारण सत्ता के मार्गदर्शन में आरंभ हुआ है। चूँकि यह समय विशेष महान आत्माओं के अवतरण का है। वे अपने लिए उपयुक्त स्थान का चयन कर सकें, श्रेष्ठ वातावरण के सान्निध्य का लाभ मिल सके, इसी प्रयोजन से चुने हुए घरों में ये देव स्थापनाएँ इस वर्ष से कराई जा रही हैं। यदि जिले का सर्वोच्च अधिकारी भी हमारे घर आने वाला हो, तो हम घर की सफाई करते हैं। साज-सज्जा की व्यवस्था बनाते हैं, उनकी गरिमा के अनुरूप तैयारी अनिवार्य है। जब प्रसंग संस्कारवान उच्चस्तरीय आत्माओं का हो तो मात्र स्वच्छता ही नहीं-सुसंस्कारिता, आध्यात्मिक ऊर्जा से अभिपूरित वातावरण बनाए जाने की आवश्यकता प्रतीत होती है। देव स्थापना आने वाले मेहमान के लिए, स्तर के अनुरूप तैयारी का ही एक पूर्वाभ्यास है। संत हर घर में नहीं जाते, उन्हें पवित्र तीर्थ ही प्रिय होते हैं। उच्चस्तरीय वातावरण यदि बनाया जा सके तो निश्चित ही वह हवाई पट्टी विनिर्मित हो सकेगी, जहाँ अन्तरिक्ष से आने वाले यानों के उतरने की तरह देवात्माएँ अपने पग धर सकें।
यह प्रतीक मात्र एक चित्र एवं जल-रज की स्थापना के रूप में नहीं है वरन् इसके साथ दिव्य प्रेरणाएँ जुड़ी हैं जो इन्हें मार्गदर्शक प्रकाश स्तम्भ के रूप में विनिर्मित करने जा रही हैं। लाइट हाउस के माध्यम से भटकने वाले जहाज भी गन्तव्य तक पहुँच जाते हैं ध्रुव तारा पथ प्रदर्शक की भूमिका निभाता हुआ घोर घने अन्धकार में भी यात्री को लक्ष्य तक पहुँचा देता है। देवस्थापना जिन-जिन घरों में होगी, वे उच्चस्तरीय आत्माओं के लिए लाइटहाउस की, ध्रुव तारे की भूमिका निभाएँगी। नित्य बलिवैश्व यज्ञ (अग्नि होत्र) नियमित उपासना व सतत् स्वाध्याय अनिवार्य शर्त के रूप में इन स्थापना के साथ जुड़े हुए तीन महत्वपूर्ण कार्यक्रम हैं। ब्रह्मकुण्ड के जल-रज के रूप में प्रतिष्ठित की साकार प्रतिमा प्रतिदिन उपासना का स्मरण करायेगी और ब्रह्मवर्चस् ब्रह्म तेजस्विता प्रदान करेगी। उपासना परिवार के प्रत्येक सदस्य, महिलाओं, बालकों तक के लिए इस देवा स्थापना का अनिवार्य कृत्य है भले ही वह स्थापित प्रतीकों के नमन वंदन जितना संक्षिप्त ही क्यों न हो। देवात्मायें अपनी ब्राह्मी शक्ति को समीप पाकर बिगड़े संसार को सम्हालने आने के अपने लक्ष्य को निरंतर स्मरण रखेंगे।
बलिवैश्व इस स्थापना का दूसरा अनिवार्य कृत्य है मध्याह्न भोजन से पूर्व रोटी के पाँच टुकड़े घृत और गुड़ या चीनी के साथ गायत्री मंत्र के साथ पाँच बार अग्नि में आहुति देने से बलिवैश्व पूर्ण हो जाएगा। जिन घरों में नित्य हवन की परम्परा हो, वे भी एक बरौसी में अग्नि रखकर यह कार्य अवश्य सम्पन्न करें। जहाँ रोटियाँ गैस पर पकती हों, वे छोटी-छोटी समिधाएँ कटी हुई रखें और मिट्टी की बरौसी में पहले उन्हें जला कर अग्नि बना लिया करें।
ज्ञान उपासना को आत्मसात करने की जुगाली है। ज्ञान ही भौतिक जीवन की सर्वोपयोगी शक्ति है, जल-रज उस पवित्रता का, गति का निरंतर बोध कराएँगे। युग साहित्य का न्यूनतम अखण्ड ज्योति-युगनिर्माण योजना या युगशक्ति गायत्री का सतत स्वाध्याय तीसरी अनिवार्यता है। जहाँ-जहाँ भी यह कार्यक्रम चल रहे होंगे, देवशक्तियाँ वातावरण बना देख स्वतः पहुँच जाएँगी। वन्य जीवों को सघन वन में देखना हो तो चुपचाप वहाँ किसी जलाशय के निकट बैठ जाना चाहिए। प्यास बुझाने वे निश्चित रूप से आते हैं, ऐसे जलाशयों की समाज में स्थान-स्थान पर निर्माण करने की आवश्यकता है, जहाँ देव शक्तियाँ अपनी युगों की प्यास बुझाने भगवत् प्रयोजन में स्वयं को निरत करने आ रही हैं।
प्रतीक के रूप में भेजे जा रहे चित्र का भाव यह है कि अंतरिक्ष से देवशक्तियों का अवतरण इस स्थान पर हो रहा है, जहाँ युग ऋषि ने इक्कीसवीं सदी को उज्ज्वल भविष्य के रूप में प्रतिपादित कर गंगा को धरित्री प्रवाहित किया। यह स्थान प्रखर प्रज्ञा-सजल श्रद्धा के रूप में गायत्री तीर्थ में विनिर्मित वे स्थापनाएँ हैं जहाँ पूज्य गुरुदेव के कारण शरीर की सत्ता परोक्ष रूप में विद्यमान है। उनके स्थूल शरीर को जहाँ अग्नि को समर्पित किया गया वह पावन स्थली है यह। यहाँ से उनकी शक्ति सभी परोक्ष जगतधारी देवात्माओं के साथ मिलकर इन सभी के यहाँ सघन रूप में बरस रही है, जो देव प्रयोजनों में निरत हैं। ऐसे घरों में वातावरण सुसंस्कारों से अभिपूरित हो, श्रेष्ठ बनता चला जाएगा।
स्वाधीनता संग्राम के दिनों में महर्षि अरविंद ने अपनी कारण सत्ता से अन्तरिक्ष को मथकर सरदार बल्लभ भाई पटेल, सर्वपल्ली राधाकृष्णन, लालबहादुर शास्त्री, रफी अहमद किदवई, दादाभाई नौरोजी जैसी महान् आत्माओं को जगाया था, तब स्वाधीनता का प्रयोजन पूर्ण हुआ था। युग को नई दिशा देने का कार्य उससे हजार गुना बड़ा है। परम पूज्य गुरुदेव के कारण सत्ता उसे पूर्ण करने के लिए अन्तरिक्ष को मथ रही है सो इस स्थापना को अहं महत्व का कार्यक्रम समझना चाहिए।
राज्यपाल, राष्ट्रपति के कार्यक्रम ऐन वक्त पर निरस्त हो जाते हैं, तो भी तब तक उस स्थान की स्वच्छता-साज-सज्जा ही मोहक बन जाती है, तब तक निरीक्षण के लिए छोटे मंत्रीगण, कलेक्टर, एस.पी. स्तर के अनेक लोग चक्कर काट जाते हैं, यह आवश्यक नहीं कि जिन घरों में देव स्थापना हो वहाँ देवात्मायें ही जन्म लें, यदि वे न भी आयें तो भी आई.ए.एस., पी.सी.एस., आई.पी.एस. स्तर की मूर्धन्य आत्मायें तो आएँगी ही, यह सुनिश्चित समझा जाना चाहिए।
सुयोग्य-व्यक्तियों के घर पू. गुरुदेव की चेतन सत्ता की प्राण प्रतिष्ठ करने हेतु यह एक सुनियोजित कार्यक्रम देवस्थापना के रूप में बनाया गया है। उसका लाभ हर संस्कारवान व्यक्ति को मिले व उनके माध्यम से देव शक्तियाँ अवतरित हों , समाज की नूतन संरचना हेतु महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकें, उसके लिए शान्तिकुँज के देव स्थापना अभियान को उतनी ही गंभीरता से सुपात्रों तक पहुँचाने की आवश्यकता है। इस देव स्थापना का एक अति महत्वपूर्ण पक्ष यहाँ शान्तिकुँज से पूरा किया जा रहा है। वह संस्कार चित्र और जल-रज में स्थापित किए जा रहे हैं। यह स्थापना मंत्र के बीजाक्षरों की भाँति शान्तिकुँज के ब्रह्मबीज की है। उसे उतनी ही श्रद्धा मिलनी चाहिए। चाहे जहाँ से चित्र या गंगाजल मंगाकर की गई स्थापना से उसकी तुलना न की जाए।
विद्वान चीरिय को बौद्धधर्म का प्रचार करने के लिए उन्हें देश देशान्तरों में भेजा गया। जहाँ उनका असाधारण स्वागत सत्कार हुआ। चीरिय का अहंकार इतने भर से बहुत बढ़ गया और वे अपने को असाधारण समझने लगे।
लौट कर वे जैतवन आये। उन दिनों अनाथ पिण्डक वहाँ की व्यवस्था सँभालते थे। चीरिय को एक दिन तो विश्राम करने दिया गया। दूसरे दिन उन्हें लकड़ी काटने के लिए कुल्हाड़ी थमा दी गई। यह उन्हें बहुत बुरा लगा। इतने बड़े विद्वान को इतना छोटा काम?
उनने लकड़ी काटने से इन्कार कर दिया। अनाथ पिण्डक ने कहा तब आप आश्रम में नहीं रह सकेंगे। आप सीधे तथागत के पास श्रावस्ती जाइए। अनुशासन न पालने का दूसरा विकल्प यही था कि वहाँ से विदाई ले लेना।
चीरिय श्रावस्ती पहुँचे। उन्हें तथागत से मिलने को जल्दी थी। पर वे आश्रम में नहीं थे। भिक्षा के लिए गये थे। उनसे कुछ करते न बन पड़ा। वहाँ से चल पड़े जहाँ तथागत भिक्षा के लिए गये थे। उनने एक झोले में भिक्षा का अन्न समेट लिया और दूसरे में रास्ते में पड़े हुए उपलों को समेटते चल रहे थे। एक कन्धे पर आहार दूसरे पर ईंधन लदा हुआ था।
चीरिय ने उनकी श्रमशीलता और निरहंकारता को देखा तो पानी-पानी हो गया। वे मन ही मन यह निश्चय करके लौटे-तथागत का सच्चा अनुयायी बनूँगा। अहमन्यता को पास न फटकने दूँगा।
*समाप्त*