तैयारी उसकी भी (Kahani)

एक राजा की एक संत के प्रति बड़ी श्रद्धा थी। वे जब भी भ्रमण को निकलते, उन्हें प्रणाम करते। उनकी सादगी व साँसारिक विरक्ति की प्रशंसा करते। एक दिन राजा ने संत से महल चलने का आग्रह किया तो संत तुरन्त तैयार हो गये व चल पड़े। एक क्षण राजा को भी लगा कि एक बार भी मना न किया, मानों महल के निमंत्रण के लिए तैयार बैठे हों। फिर भी राजा उन्हें लेकर गये व महल में उनके रहने आदि की व्यवस्था की। एक भी सुविधा के लिए संत ने मना नहीं किया। राजा आतिथ्य स्वीकार करते हुए वे अपना साधना क्रम चलाते रहें।

एक माह गुजरने के बाद राजा ने संत के पास आकर कहा। “महात्मन्”। मैं तो आपको विरक्त योगी मानता था पर अब तो देखता हूँ कि आप और हम तो एक जैसे हैं। संत बोले “राजन्। अंतर तो अब भी है व हमेशा रहेगा। वास्तव में जानना चाहते हो तो मेरे पीछे आओ।” राजसी ठाठ बाठ छोड़कर दण्ड कमण्डल उठाकर चल पड़े सीमा पार कर घोर घने जंगल में अपनी एकान्त तपश्चर्या वाली गुफा में जाकर बैठ गए। बोले “ तुम्हारे राज्य की सीमा तो छोटी सी है, पार कर ली। हमारे राज्य की कोई सीमा नहीं। मैं तुम्हारे महल में था जरूर, पर महल मुझ में नहीं था। भोगों में रहकर भी उन्हें इच्छा हो छोड़ने की, तैयार हो सके वही संत वृति है।” सम्राट ने संत के पैर पकड़कर अपने चिंतन व व्यवहार के लिए क्षमा माँगी व लौटने को कहा। संत ने विनम्रता पूर्वक मना कर उसे लौटा दिया। हम सब रहते तो सुख विलास के साधनों बीच हैं पर कभी उनके बिना भी जीने का चिंतन कर पाते हैं? तैयारी उसकी भी होनी चाहिए।


उपासना की यथार्थता

आध्यात्मिक पुरुषार्थ का अर्थ होना चाहिए अन्तरंग की उत्कृष्टता का अधिकतम संवर्धन। यही है वह प्रयोग, जो व्यक्ति को आत्मसंतोष, जन सहयोग और दैवी अनुग्रह प्रचुर परिमाण में जुटा सकता है। ईश्वर की अनुकम्पा माँगने के लिए की गई मनुहारों-याचनाओं की सार्थकता भी तभी है, जब अनुग्रह को आत्म परिष्कार की प्रचण्ड आकुलता के रूप में जाना जा सके।

पात्रता के अनुरूप दैवी अनुकम्पा की उपलब्धि का तथ्य आत्मिक प्रगति की अपेक्षा करने वाले हर साधक को भली प्रकार ध्यान में रखना चाहिए। ईश्वर का अनुग्रह इस आधार पर नहीं मिल सकता कि मनुहार उपचार की घुड़ दौड़ में कौन कितना आगे निकल पाया गया। बात तब बनती है जब अंतरंग की उत्कृष्टता की चुम्बकत्व देव परिवार को अपनी ओर आकर्षित करता है और अपनी प्रामाणिकता के आधार पर प्राणियों का ही नहीं, देवताओं का भी मन मोहता है।

उपासना कितनी गहरी और सार्थक रही, इसका प्रमाण परिचय एक ही बात से मिलता है कि आन्तरिक सुसंस्कारिता और बाह्य सज्जनता का कितना विकास संभव हो सका। साधना का वास्तविक स्वरूप एक ही है-अंतरंग में विद्यमान देव शक्तियों को जाग्रत, प्रखर और समर्थ बनाने की आकुलता भरी चेष्टा। यही है अध्यात्म का मर्म यथार्थ स्वरूप।


सर्वोपरि उपलब्धि

यों तो कच ऋषि शुक्राचार्य के आश्रम में एक विद्यार्थी मात्र था। किन्तु उसके सद्गुणों, सहज ग्रहणशील बुद्धि, स्वभावगत मधुरता तथा कर्तव्यनिष्ठ व्यक्तित्व के कारण वे उसे पुत्रवत् मानते थे। उतनी ही आत्मीयता तथा स्नेह था उसके प्रति ऋषिवर का जितना अपनी निज की एक मात्र सन्तान देवयानी से था।

इस समय उसके सामने बड़ी ही जटिल समस्या थी। गुरु पुत्री देवयानी भी वर्षं से उसके साथ ही रहने के कारण निशि-दिवस की साहचर्य था। देवयानी को वह निज की बहिन के जैसा मानता था। गुरु कन्या आखिर बहिन ही तो होती है। और स्नेह भी उतना था उसके प्रति जिसकी तुलना नहीं हो सकती। गंगोत्री की पावन धारा सा निर्मल निष्कलुष स्नेह।

किन्तु देवयानी-पता नहीं कब उस निर्मल स्त्रोत से सींच-सींच कर अपने उर में प्रणयाँकुर लगा बैठी। मानस पटल पर कच की मूर्ति जीवन देवता के रूप में प्रतिष्ठित की और उसमें पता नहीं कितनी भावनाओं तथा सम्भावनाओं के अरुणाभ रंग भर दिए।

अब जब वह अपनी विद्याध्ययन की अवधि समाप्त कर देव लोक जाने को हुआ तो देवयानी का प्रणयासक्त निवेदन सामने रास्ता रोके खड़ा था। आज प्रातः ही तो देवयानी ने अनुरोध किया था कि “तुमसे विवाह किये बिना मैं नहीं रह सकती।” कच को वही समस्या उद्वेलित किये थी।

सायंकाल फिर वही प्रसंग। निस्तब्ध वातावरण। उद्यान की समस्त मधुरता जैसे स्पन्दनहीन थी इस समय। एक स्फटिक शिला पर दोनों बैठ थे। देवयानी अश्रुपूरित नयनों से देख रही थी कच की भाव भंगिमाओं को। आखिर उससे न रहा गया तो बोली “मैंने ने क्या अपराध कर डाला ऐसा जो बोलते भी नहीं कुछ।” कच ने तत्परता से कहा कि ऐसा न कहो देवयानी! मैंने कब कहा कि तुमने कोई अपराध किया है। मैं तो अपनी बात कह रहा था -आखिर तुम मेरी बहन हो गुरु कन्या। मैं तुमसे कैसे..................।”

“पर यह तो सोचो कच मैं तुम्हारे बिना कैसे रह रहूँगी। आज तक जिन सपनों के सहारे जीवन का सृजन किया था, उनके टूट जाने पर कैसे जीवन धारण करूंगी।”

कच बोला “स्वप्नों को आकाश महल से अधिक महत्व इस धरती पर बसे घरों का होता है। सिद्धाँत इस आदर्श कल्पनाओं से कही अधिक मूल्यवान होते हैं।” डबडबाई आंखें पोछते हुए देवयानी ने बोलने का प्रयास किया। उसकी वाणी में कंपकंपी की स्पष्ट झलक थी, “आत्म संतोष का अपना महत्व है कच। जीवन में उसको पाने के लिए ही तो हम सब निरन्तर प्रयत्न शील है। अनादि काल से जीवन उसी की खोज में निरन्तर धावमान है। कच मैं अंतिम बार फिर तुम्हारे सामने अपनी झोली फैलाती हूँ।”

किन्तु वह व्यक्तित्त्व तो जैसे पत्थर की चट्टान की तरह अडिग था। सान्त्वना के स्वर में कहने लगा मेरे हृदय के स्नेह की तुम सदा ही से अधिकारिणी रही हो और भविष्य में भी इसी प्रकार मैं सदा ममता ओर प्यार देता रहूँगा पर बहन मान कर ही निर्मल स्नेह की निर्झरिणी सर्वदा तुम्हारे लिए बहती रहेगी देवयानी।

आदर्शों ओर मर्यादाओं को छोड़कर जीवन धारण किये रहना मृत्यु से अधिक कष्टकारक है।

देवयानी का धैर्य टूट गया। दुःख जब अपनी सीमा पार कर जाता है तो फिर क्रोध में बदल जाता है। उसे क्षुब्धता ने इतना आक्रान्त कर दिया कि मानसिक संतुलन बनाये न रख सकी और शाप देने पर उतारू हो उठी, अंततः उसने शाप दे ही डाला “तुमने जो भी विद्या मेरे पिता से सीखी है- वह सब विस्मृत हो जाय।”

शाप सार्थक हुआ और कच संजीवनी विद्या जिससे मृतक दुबारा जीवित हो सकता था भूल गया। फिर भी उसे असीम संतोष था। विद्या खोकर भी उसने धर्म मर्यादा और नीति की रक्षा कर ली।

विद्या का अर्जन पुनः संभव है किन्तु मर्यादा एक बार टूटी तो समूची मानवता पतन के गहरे गर्त के सामने लगेगी। बड़ी वस्तु के लिए छोटी कम महत्वपूर्ण वस्तु का त्याग यही शाश्वत नियम है। इसी से लोक जीवन में आदर और सम्मान मिलता है। और इसी से मिलती हैं संसार में सबसे बड़ी उपलब्धि आत्म संतोष।


सर्वांगीण प्रगति का एक ही मार्ग

शरीर और प्राण मिलकर जीवन बनता है। इन दोनों में से एक भी विलग हो जाये तो जीवन का अंत ही समझना चाहिए। गाड़ी के दो पहिये संतुलन बनाते और गति देते है। इनमें से एक को भी टूटा फूटा, अस्त व्यस्त नहीं होना चाहिए, अन्यथा प्राण और मूलभूत की तरह अदृश्य रूप से आकाश में, लोक लोकान्तर में परिभ्रमण करना पड़ेगा। शरीर की कोई अंत्येष्टि न करेगा तो वह स्वयँ ही सड़ गल जायेगा।

दैनिक अनुभव में शरीर ही आता है। आत्मा को उसी के साथ गुँथा रहना पड़ता है। इसका प्रतिफल यह होता है कि आत्मा अपने आप को शरीर ही समझने लगती है ओर इसकी आवश्यकताओं से लेकर इच्छाओं तक को पूरा करने के लिए संलग्न रहता है। दूसरा पक्ष चेतना का, आत्मा का रह जाता है। उसके प्रत्यक्ष न होने के कारण उधर प्रायः ध्यान ही नहीं जाता है, फलतः ऐसा कुछ सोचते करते नहीं बन पड़ता, जो आत्मा की समर्थता एवं प्रखरता के निमित्त आवश्यक है। यह पक्ष उपेक्षित बना रहने पर अद्यर्गि पक्षाघात पीड़ित जैसी स्थिति बन जाती है। जीवन का स्वरूप एवं चिंतन कर्तव्य सभी में उद्देश्यहीनता घुस पड़ती है। जीवन प्रवाह कीट पतंगों जैसा, पशु पक्षियों जैसा बन जाता है। उसमें पेट प्रजनन की ही ललक छाई रहती है। वही कुछ बन पड़ता है, जो शरीर की निमित्त के काम आये। भूख की, कामुकता की, वासना, तृष्णा, अहंता की पूर्ति कर सके।

लोभ, मोह और प्रशंसा अहंता की ललक ही ऐसे व्यक्तियों पर अहर्निशि छायी रहती हैं। इसी ललक लिप्साओं को भव बंधन कहते हैं। इसी से जकड़ा हुआ प्राणी हथकड़ी बेड़ी के रूप में पहने हुए बंदी की तरह जेलखाने की सीमित परिधि में मौत के दिन पूरे करता है। इन परिस्थितियों में संकीर्ण स्वार्थ परता की पूर्ति ही लक्ष्य बन जाती है। समूचा चिंतन ओर प्रयास इसी हेतु नियोजित रहता है। ऐसी दशा में आत्मा के संबंध में कुछ विचार करते ही नहीं बन पड़ता। उपेक्षित की पुकार कौन सुने? जिसे उसकी आवश्यकताओं से वंचित रखा गया हो, अपेक्षित तिरस्कार किया गया हो, पोषण से वंचित रखा गया हो, दुर्बल तो होगा ही। आवश्यकता की स्थिति में उसकी वाणी भी क्षीण हो जायेगी। कड़क कर अपनी आवश्यकता पूरी हो जाने और शिकायत सुनाने की स्थिति भी न रहेगी। फलतः आत्मा की सत्ता होते हुए भी उसे जब कुछ कहने लायक, परामर्श देने लायक की स्थिति में न रहने दिया गया हो, तो समझना चाहिए कि उसके वर्चस्व का निखरना संभव ही नहीं रहा। शरीर के निमित्त ही अंग अवयवों की ज्ञानेन्द्रियों, कामेन्द्रियों, की विविध विधि हलचलें होती रहेंगी। ऐसी दशा में यदि जीवन चर्या पर संकीर्ण यथार्थ परता ही छाई रहें और उनकी पूर्ति के लिए सुविधा, सम्पन्नता बढ़ाने, उसका उचित अनुचित उपयोग करने की नशेबाजों जैसी खुमारी छाई रहे, तो इसमें आश्चर्य ही क्या है?

आत्म विस्मृतियाँ ही दुर्भाग्य भरी दुर्दशा है, इसके कारण मनुष्य अपने सुरदुर्लभ जीवन की गरिमा, जिम्मेदारी, संभावना आदि सभी कुछ भूल जाता है। भूल-भुलैयों में भटकता हुआ। मनुष्य मृगतृष्णा में भटकने वाले मृग का उदाहरण बनता है। भेड़ों के झुण्ड में पले सिंह शावक की उसी स्तर पर मिमियाने और घास खाने की कहानी प्रसिद्ध है। उसका उद्धार तब हुआ था जब उसे पानी में परछाई देखने और दूसरे सिंह द्वारा वर्तमान रीति-नीति बदल डालने के लिए समझाते हुए सहमत किया गया था। भृंग कीट की कथा भी इसी से मिलती जुलती हैं। भृंग द्वारा पकड़ा गया कीड़ा उसका निरंतर गुँजन सुनकर मोहित हो जाता है। वह तन्मयता इतनी बढ़ जाती है कि मन ही नहीं शरीर भी उसी सांचे में ढल जाता है। यों यह उदाहरण भक्त के भगवान बनने और उसके लिए साधना उपक्रम अपनाने पर भी लागू हो सकता है। पर वस्तुतः वैसा नहीं होता। अपने को शरीर मात्र समझने और उसी सेवा शुश्रूषा में निरन्तर लगे रहने के कारण आत्मा की स्थिति भी अन्य अंग अवयवों की भ्राँति एक सामान्य घटक जैसी रह जाती है। उसका उपयोग इतना ही रहता है कि उसके बने रहने पर शरीर भी जीवित बना रहता है। मनमर्जी की कर सकने के लिए जिस शक्ति सामर्थ्य की आवश्यकता है उसे उपलब्ध कराता रहे।

होना यह चाहिए कि जिस प्रकार शरीर की विभिन्न इच्छा, आवश्यकताओं का ध्यान रखा जाता है उसी प्रकार जीवन व्यवसाय के वरिष्ठ साझीदार को भी लाभाँशों में से उसके भाग को निकाला और दिया जाय। होता यह है कि काय पक्ष ही सब कुछ झपट निगल लेता है। आशा को निराशा और अभावग्रस्तता की स्थिति में रहना पड़ता है। ऐसी दशा में उसका दिन दिन दुर्बल होते जाना स्वाभाविक है। नियंत्रण ढीला पड़ जाने पर काया को पदार्थ संपदा के साथ खुलकर खेलने की छूट मिलेगी ही, उच्छृंखलता अपनाकर धृष्टता को परिपक्व करने से अराजकता जैसी स्थिति उत्पन्न करेगी ही, यही है मनुष्य का पतन पराभव। इसी स्थिति में दुष्टता और भ्रष्टता पनपती हैं, क्रिया की प्रतिक्रिया होनी अवश्यम्भावी है। चिंतन और चरित्र यदि गये गुजरे स्तर का हो तो प्रतिकूल दुःखद संकटग्रस्त एवं विनाशकारी होगा ही। उन दुष्परिणामों का कर्त्ता स्वयं तो भोगता ही है, साथ ही अपने संबद्ध परिवार को भी इस दल दल में घसीट ले जाता है। नाव की तली में छेद हो जाने पर उसमें बैठे सभी यात्री मझधार में डूबते हैं। स्वार्थी, विलासी, कुकर्मी स्वयं तो आत्म प्रताड़ना, लोक भर्त्सना, दैवी दण्ड विधान की आग में जलता ही है, साथ ही अपने परिवार को, संबंधी स्वजनों, मित्रों को भी अपने जाल जंजाल में फँसा कर अपनी तरह दुर्गति भुगतने के लिए बाधित करता है। नशेबाजी क्रिया की प्रतिक्रिया ऐसी ही होती है। बहुप्रजनन में व्यस्त व्यक्ति भी अदूरदर्शिता के कारण, अपना, पत्नी का, बच्चों का भविष्य बिगाड़ते हैं। बीमारों का परिकर भी त्रास पाता रहता है। राजदण्ड की पकड़ में आये हुए व्यक्ति तो स्वयँ जेल भुगतते हैं साथ ही परिवार को चिंता, बदनामी, कर्ज में डुबो जाते हैं। आत्मा की उपेक्षा करके उसकी भागीदारी देने में बेईमानी बरतने वाले भी इसी प्रकार पतन के गर्त में गिरते हैं और साथ ही अपने प्रभाव क्षेत्र में भी निष्कृष्टता का संवर्धन करते हुए उन्हें भी कुचक्र में फँसाते हैं।

यह है संक्षिप्त विश्लेषण उस वस्तु स्थिति का जो साधना संपन्न रहते हुए भी व्यक्तित्त्व को, प्रतिभाओं को ऊँचा उठाने के स्थान पर पतनोन्मुख बनाती और और उसकी दुखद प्रक्रिया से समूचा वातावरण विकृत दुर्गन्धित करती है। इसे आत्मिक दुर्बलता भी कह सकते हैं, जबकि आदर्शों को अपनाने की, दृष्टिकोण उत्कृष्टता भरने की, कार्यपद्धति को दूरदर्शी विवेकशीलता के अनुरूप बनाने की महती आवश्यकताओं को यही पूरा कर सकती है। सत्प्रवृत्तियां आत्मिक क्षेत्र से ही उभरती हैं। सन्मार्ग पर ले चलने वाला प्रकाश उसी केन्द्र से उपलब्ध होता है। यदि समुद्र के बीच में खड़ा हुआ यह प्रकाण्ड स्तम्भ बुझ जाय तो फिर उस क्षेत्र में चलने वाले जलयान चट्टानों से टकराकर दुर्दशाग्रस्त होंगे ही।

विचारशीलों का इस तथ्य के संबंध में गंभीरता पूर्वक विचार करना चाहिए। क्योंकि इससे प्रत्येक के व्यक्तिगत जीवन का उत्थान पतन तो जुड़ा ही है, साथ ही यह भी निश्चित है कि हर व्यक्ति अपना भला बुरा प्रभाव समाज पर छोड़ता है। विशेषतया सुगंध की अपेक्षा दुर्गंध का विस्तार भी अधिक होता है। और प्रभाव भी अधिक पड़ता है।


जप की गिनती (Kahani)

एक साधु महाराज को बराबर यह लगता कि जप की गिनती करोड़ों तक जा पहुँची, अभी तक परमात्मा से साक्षात्कार क्यों नहीं हुआ? ऐसे ही अपनी गिनती का हिसाब करते हुए वे एक गाँव के करीब जा पहुँचे। देखा कि कुओं में एक पनिहारिन बैठी दुहकर लाये दूध को बेच रही है। सभी को नियत परिणाम से दूध देती और पैसे ले लेती है। तभी एक युवक वहाँ आया। बड़ा सुन्दर गठीला था। उसके आते ही उस स्त्री ने उससे ढेर बातें की मानें एक दूसरे को वर्षों से जानती है। पात्र सामने करने पर उस महिला ने उसका पात्र लबालब भर दिया।

साधु महाराज को यह आचरण विचित्र लगा। पूछ ही बैठे “बहिन। यह पक्षपात क्यों? सबको तूने जितना माँगा उतना ही दिया पर इसे न माँगने पर इतना दे रही है। साश्चर्य वह स्त्री उनकी ओर देख कर बोल पड़ी -”महाराज। लगता है आप गिनती का खेल खेलते है इसी लिए आपने यह बात कही। यह मेरा प्रेमी है हम दोनों की जल्दी शादी होने वाली है तथा जहाँ प्रेम होता है वहाँ न गिनती होती है और न सौदेबाजी।” साधु को इस वार्तालाप से एक महत्वपूर्ण शिक्षा मिली। परमेश्वर से प्रीति वैसी ही होनी चाहिए जैसी प्रेमी प्रेमिका की होती है। जप की गिनती बीच में आ जाने से वह घनिष्ठता नहीं बन पा रही थी। उस दिन से उन्होंने गिनती का सौदा हटाकर परासत्ता को अपना आपा सौंपना आरंभ किया व लक्ष्य सिद्धि तक पहुँच कर ही रहे।

एक नशेबाज, जुआरी, अभिचारी, कुकर्मी अनेकों संगी साथी बना सकने में सहज सरल होता होता है। बेल आगे आगे पसरती जाती है, लहरें एक दूसरे को आगे धकेलती हैं और उनकी हलचल किनारे तक पहुँचकर रुकती है। अनुकरण प्रिय सामान्यजनों में आदर्शवाद का अनुकरण करने की क्षमता हल्की सी होती है। पर वे कुप्रचलनों को सहज ही पकड़ते हैं। दूषित साहित्य का अवाँछनीय एवं फिल्मी अभिनयों का प्रभाव जितनी तेजी से पशु प्रवृत्तियों को भड़काता है, उतनी तीव्रता सत्साहित्य की नहीं होती। गीता पढ़कर उतने आत्म ज्ञानी नहीं बने, जितने की अश्लील दृश्य, अभिनय से प्रभावित होकर कामुक अनाचार अपनाने में प्रवृत्त हुए हैं। एक संत सज्जन कम ही अपने जैसा बना पाते हैं। महामानव को अपने जैसे साथी उत्तराधिकारी विनिर्मित करने में एड़ी चोटी का पसीना एक करना पड़ता है। पर खल मण्डली की बिरादरी बरसाती मेंढ़कों की तरह देखते देखते तेजी से बढ़ती है। कुकुरमुत्ते की फसल और मक्खी मच्छरों का परिवार भी तेजी से बढ़ता है। पर हाथी की वंश वृद्धि अत्यंत धीमी गति से होती है।

समाज में छाया हुआ अनाचार, असंतोष पतन, पराभव का मात्र एक ही कारण है कि जन साधारण की आत्मचेतना मूर्छित हो गयी है और उसका स्थान शरीरगत लिप्सा लालसा ने ले लिया है। यदि स्थिति बदलना हो तो उलटे को उलटकर सीधा करना होगा। चिंतन के आदर्शों का समावेश करना होगा और दृष्टिकोण में उत्कृष्टता की प्रतिष्ठापना करनी होगी। व्यवहार में सज्जनता का पुट लाना और स्वार्थ पर अंकुश लगाते हुए पुण्य परमार्थ की प्रवृत्ति जगानी होगी। इसी आधार पर व्यक्तियों को उभारना और सत्प्रयोजनों को सफल बना सकने वाली प्रतिभा को निखारना पड़ेगा। संक्षेप में यही हैं आत्मिक प्रगति॥

इसी के साथ मानवीय गणना जुड़ी है। यही सद्गुण संपन्न महामानवों की बिरादरी उत्पन्न करती है। इसी तत्व ज्ञान को अपनाकर प्राचीन काल में साधु, ब्राह्मणों का विशाल संप्रदाय संकल्प पूर्वक सत्प्रवृत्ति प्रवर्धन की महती लोक साधना में लगा था। उसी आधार पर सतयुग का स्वर्णिम काल विनिर्मित हुआ था। उन दिनों यह भारत भूमि देव मानवों की जन्मदात्री और “ स्वर्गादपि गरीयसी” कहलाती थी। यहाँ के निवासियों ने असाधारण स्तर की सेवा साधना करके जनसंपर्क और जनसहयोग अर्जित किया था। जगद्गुरु और चक्रवर्ती के ऊँचे पदों पर उन्हें इसी सेवा साधना के बदले बिठाया गया था।

पुरातन काल में व्यैक्तिक और सामाजिक गरिमा का विकास विस्तार मात्र ही आधार पर संभव हुआ था कि यहाँ आध्यात्मवाद को मान्यता दी गयी थी। आज जितना ध्यान भौतिक विज्ञान के आविष्कारों ओर उसके द्वारा विनिर्मित उपकरणों को भोगने पर है, पुरातन काल में उतना ही ध्यान चेतना स्तर ऊंचा उठाने पर भी दिया जाता था। भावनाओं, मान्यताओं, आकाँक्षाओं उमंगों की प्रत्येक लहर में आदर्शों की ऊर्जा भरी रहती थी। फलतः हर किसी का मन ऊँचा सोचता था। हर शरीर आदर्शों को क्रियान्वित करने में तल्लीन रहता था। उस महान परम्परा का परित्याग करके ही हम आज अनेकानेक संकटों और उलझनों में फँसे हैं। उसी परम्परा की जीवन में पुनः अंगीकार कर हम उत्थान का मार्ग प्रशस्त कर सकते हैं।


एक सरल किन्तु समग्र उपचार पद्धति

ब्रिटेन के मूर्धन्य चिकित्सा विज्ञानी डॉ. हैरी एडवर्ड्स ने अपनी कृति “टुथ अबाउट स्प्रिचुअल हीलिंग“ में इस चिकित्सा पद्धति के सिन्द्धातों और विधियों का उल्लेख करते हुए बताया है कि आध्यात्मिक चिकित्सा एक निश्चयात्मक विधि है और इसका परिणाम भी तर्क संगत है। इस उपचार पद्धति का मूल आधार सिद्धाँत है - मनुष्य को उसके उद्गम स्त्रोत से जोड़ना उसके और सृष्टा के बीच उचित संबंधों को पुनः स्थापित करना । प्रायः मानवी मनः असंतुलित, उद्विग्न तथा शोक संतापो से भरा रहता है। उसमें रहने वाली दुश्चिन्ताएँ, कुँठायें, उलझने, ग्रंथियों और चिंतन की विकृतियाँ ही चित्त पर अपना डेरा जमाये रहती हैं परिणाम स्वरूप शारीरिक एवं मानसिक बीमारियाँ मनुष्य को घेरे रहती हैं। साथ ही मानसिक विकृतियाँ चेतना क्षेत्र पर आवरण बनकर छा जाती हैं। और व्यक्ति का अपनी आत्मा से परम चेतना से एक प्रकार का संबंध विच्छेद सा हो जाता है। इसके मूल में मानसिक विकृतियाँ ही विद्यमान रहती हैं और वही रोगोत्पत्ति का निमित्त कारण बनती हैं।

प्रचलित आधुनिक चिकित्सा प्रणाली मनुष्य को कुछ रासायनिक तत्वों का योग भर मानकर चलती है और स्वास्थ्य में खराबी के कारण उन रासायनिक संतुलनों-का हार्मोन का गड़बड़ा जाना मात्र समझती है। दवायें, परहेज, उपचार ओर शल्य चिकित्सा आदि सभी उपाय इस लड़खड़ाये संतुलन को साधने के लिए किये जाते हैं। यह रासायनिक संतुलन दवा और उपचार से कुछ समय के लिए स्थापित भी हो जाते हैं। किन्तु समग्र स्वास्थ्य का मूल प्रयोजन इससे नहीं सधता। डॉ. एडवर्ड्स के अनुसार समग्र स्वास्थ्य की सही सिद्धि अपने मूल स्रोत से जुड़ जाने पर ही पूरी होती है। वह मूल स्रोत आध्यात्मिकता या परम चेतना है॥ यही कारण है कि जिन कई रोगों को आधुनिक चिकित्सा असाध्य अथवा दुःसाध्य मानती है, आध्यात्मिक चिकित्सा द्वारा उन्हें बड़ी सरलता से थोड़े ही समय में ठीक कर दिया जाता है। इस चिकित्सा पद्धति को अपनाकर वर्षों पुरानी पीड़ा दूर होती देखी गयी है। नेत्रहीनों को, जन्मजात अंधों को पुनः नेत्र ज्योति मिलती देखी गयी है।

अपनी उक्त पुस्तक में डॉ. एडवर्ड्स ने ऐसे कई रोगियों के विवरण दिये हैं जिन्हें डॉक्टरों ने लाइलाज घोषित कर दिया था, किन्तु उनने उन्हें आध्यात्मिक चिकित्सा से ठीक कर दिया। लन्दन की एक महिला एलिजाबेथ विल्सन की रोग गाथा और उससे मुक्त होने की कथा का वर्णन करते हुए उन्होंने लिखा है कि सन् 1909 में जब वह साढ़े तीन वर्ष की थी, तभी उनकी रीढ़ की हड्डी में दर्द हुआ। फलतः उसे वर्षों बिस्तर पर पड़े रहना पड़ा परन्तु रोग ठीक होने के बजाय गंभीर होता गया। पूरे तीस वर्षों तक वह बिस्तर पर दर्द झेलती रही। चिकित्सकों ने भी हार मान ली और उसे असाध्य घोषित कर दिया। जब उसके अभिभावकों को किसी प्रकार डॉ. एडवर्ड्स के संबंध में ज्ञात हुआ तो उपचार के लिए एलिजा को उनके पास ले जाया गया। आध्यात्मिक चिकित्सा से वह कुछ ही हफ्तों में रोग मुक्त हो गयी। इसी तरह लंदन के ही विलियम ओल्सन ‘प्रोजेल्ड स्पाइनलडिस्क’ नामक बीमारी से ग्रस्त थे जिन्हें चिकित्सकों ने लाइलाज घोषित कर दिया था, इस उपचार से वे भी पूर्णतया निरोग होकर सामान्य जीवन व्यतीत करने लगे।

डॉ. एडवर्ड्स का कहना था कि आध्यात्मिक चिकित्सा पद्धति सुनिश्चित नियमों और तर्क संगत कारणों के आधार पर अपना प्रभाव उत्पन्न करती है। इसका उद्गम आत्मिक जगत के अभौतिक आयाम हैं और किसी भी अभौतिक अथवा अलौकिक विषय को भौतिक और लौकिक भाषा में या शब्दों में व्यक्त करना असंभव है। चूँकि हर बात का कोई न कोई कारण होता है और हर परिवर्तन के लिए किसी न किसी शक्ति का उपयोग किया जाता है, अतः अध्यात्म चिकित्सा के लिए भी एक विशेष प्रकार की समझ आवश्यक है। रोगोत्पत्ति के मूल में पहुँच कर ही उसका सफल निदान किया जा सकता है।

अध्यात्म चिकित्सा पद्धति पूर्णतः वैज्ञानिक और एक मात्र सच्चाई है। उपचार की इस समग्र किन्तु अति सरल पद्धति को जिस प्रकार सफलता मिल रही हैं उसे देखते हुए यह आश्चर्य नहीं मना जाना चाहिए कि अगले दिनों प्रचलित चिकित्सा पद्धतियों की तुलना में अध्यात्म चिकित्सा को ही सर्वोपरि महत्ता मिलें।


“धियो यो नः प्रचोदयात्”

“वत्स! तुमने अपने अभिवादन से कौटिल्य को गौरवाँवित किया है। जिनकी यशोगाथा हिमवान् के शुभ्र शिखरों से लेकर आसिन्धु भारत भूमि को पवित्र करती है। उनके मेधावी पुत्र जिसके अंतेवासी होने पधारे वह धन्य हुआ।” मगध के चक्रवर्ती सम्राट जिसके सम्मुख सेवक के समान कर बद्ध खड़ा होता था। वे आचार्य चाणक्य गदगद कंठ कश्मीर से आये युवक को अपनी भुजाओं पर बाँधे वक्ष से लगाये थे। उन राजनीति के परम चतुर सदा शुष्क कहे जाने वाले के नेत्रों में भावबिन्दु चमक रहे थे।

“आर्यावर्त आज आर्य की बुद्धि से श्रीसंपन्न है।” विनम्र ब्राह्मण युवक ने झुककर चरण स्पर्श किये। “पिता ने मुझे ‘धी’ की प्राप्ति का आदेश दिया है और आज देश में आर्य ही एक मात्र उसके ज्योति केन्द्र है।”

उस सुन्दर विशिष्ट विद्वान युवक को विश्राम की आवश्यकता थी। सुदूर कश्मीर की यात्रा करता वह मगध पहुँचा था। अपनी कूटी में ही आचार्य ने उसे आवास दिया था। चाणक्य के शिष्य गुरु का इंगित न समझ सके तो उनका शिष्यत्व कैसा? वे अपने नवीन सहचर की सुव्यवस्था तथा सत्कार में स्वतः लग गये। पर विश्राम उसके मन को शान्त न कर सका। रह रह कर उसके मानस पटल पर पिता का सौम्य चेहरा उभर उठता। अभी तो उसके द्वारा कहे गये शब्द उसके मस्तिष्क में सक्रिय थे। उस दिन काशी से लौटने के बाद वे कह रहे थे ‘नीलकण्ठ! विद्या वाग्देवी का वैभव है, किन्तु सारे जीवन को अनुभव ने मुझे बता दिया यह सर्वोपरि नहीं है। आशा भरी दृष्टि से उन्होंने उसकी आँखों में झाँकते हुए कहा था ‘पिता का अपूर्ण कार्य जो पूर्ण कर दिखाये, पुत्र होना उसी का सफल हुआ। मेरे पिता की आकाँक्षा शास्त्रार्थ जयी होने की थी। उसे पूर्ण करने में जीवन लगा दिया मैंने किन्तु ब्रह्मणत्व दूसरे को पराजय देने में नहीं है। विशुद्ध निर्मल ‘धी ‘ ब्राह्मण का धन है, तुम उसे उपार्जित करो।

इस प्रेरणा को जिज्ञासा में परिवर्तित कर वह आचार्य के सम्मुख बैठ कर पूछ रहा था “आर्य” ‘धी’ का स्वरूप क्या है?” गाय के गोबर से लिपी भूमि पर मृगचर्म बिछाकर कृष्ण वर्ण दीर्घारुण नेत्र, भारतीय नीति शास्त्र को साकार मूर्ति के समान आचार्य चाणक्य जब अपना प्रातः कृत्य करके, अग्नि को आहुतियाँ देकर विराजमान हो गये तब वह नवयुवा कश्मीर का आगत छात्र उनके सम्मुख वेदिका के नीचे कुशासन पर आ बैठा था। उसके नेत्र और मुख की आकृति कहती थी कि जिज्ञासा उसमें सचमुच जगी है।

कौटिल्य दार्शनिक नहीं नीतिज्ञ है वत्स! आचार्य गम्भीर हो गये। तुम्हारी आँखों की बनावट और मस्तिष्क की रेखायें कहती हैं कि तुम्हारी प्रतिभा जब जागेगी उसका आलोक विश्व को चमत्कृत कर देगा, तुम्हारे जैसे मंत्री पाकर मगध अपने को कृतार्थ मानेगा। तुम राजनीति में रुचि........।

“मैं तुम्हें निराश नहीं करूंगा।” दो क्षण चाणक्य मौन रहे। उन्होंने देख लिया कि उनका प्रयास असफल रहा है। उनके इस नवीन छात्र को राजनीति में कोई आकर्षण नहीं। अतः उसके प्रश्न का उत्तर दिया उन्होंने “बिना दर्शन के कोई विद्या पूर्ण नहीं होती, अतः चाणक्य दर्शन से अपरिचित है, ऐसा भी कहा नहीं जा सकता, धी एक धायक शक्ति है। वह पदार्थ नहीं हैं। इसे अभिव्यक्त करने वाले अंतःकरण की व्यवस्था के अनुरूप इस तत्त्व की अनुभूति होती है।

युवा छात्र आचार्य की बातों को पूर्ण गम्भीरता और तल्लीनता से सुन रहा था। आचार्य उसके मनोभावों को पढ़ते हुए कह रहे थे तमस् प्रधान अंतःकरण भी यह धी तत्व बुद्धि बनकर अभिव्यक्त होता है और उसकी अनुभूति हिंसा, छल आदि कार्यों में होती है। रजस् प्रधान अंतःकरण में यही विवेक है। राज्य व्यवस्था आदि कार्य इसकी अनुभूति के क्षेत्र हैं। सत्व प्रधान अंतःकरण में धी तत्व की अभिव्यक्ति प्रज्ञा बनकर होती है। साधना शक्ति की खोज में तन्मयता उच्चस्तरीय तत्वों का चिंतन आदि कार्यों में इसकी अनुभूति होती है। परन्तु ये तीनों प्रकार किसी न किसी गुण के आधीन होने के कारण विशुद्ध नहीं हैं।

“विशुद्ध धी......युवक ने पूछने का उपक्रम मात्र किया। ‘चाणक्य अर्थ और काम का विद्वान है वत्स! आचार्य ने बड़े स्नेह से देखा उसकी ओर। ‘तुम आज और रुको।’

राजनीति के कठिनतम प्रश्न जिसके माथे पर एक भी आकुँचन लाने में समर्थ नहीं हुए थे, वे आचार्य चाणक्य आज गम्भीर थे। वे एक साम्राज्य के सूत्रधार थे। अभीप्सुओं की जिज्ञासा को समाधान प्राप्त हो इसकी व्यवस्था क्या राज्य का कर्तव्य नहीं? पर विशुद्ध धी की अनुभूति करा पाना क्या राज्य व्यवस्था की शक्ति सीमा में है?

कश्मीर से कोरा हाथ हिलाते ही तो वह यहाँ नहीं आ गया था। कश्मीर ही कहाँ तपस्वी साधकों एवं सिद्धों से रहित है? स्वयं शिवाचार्य विद्यमान है वहाँ और उनका अनुग्रह प्राप्त हैं युवक के श्रद्धेय पिता को।

प्रज्ञा और प्राण को एक करके साधक जब मूलधार से उठती परावाणी को जीवन में अवतरित कर पाता है, उसके जन्म जन्म के कलुष उस धवल धारा में धुल जाते हैं। प्राणों से अवतरित परावाणी ही पिण्ड में जाह्नवी का अवतरण है। लेकिन प्रत्येक जिज्ञासु किसी एक ही साधन का अधिकारी तो नहीं होता, शिवाचार्य ने देख लिया था कि वह उनके कुल का नहीं है।

योगी चन्द्रनाथ मिले थे मार्ग में उन्होंने स्वतः परिचय किया था उससे। परीक्षण के पश्चात बोले ‘तू-जन्मान्तर का साधक है। आशाचक्र तक तेरी कुंडलिनी मासार्ध में पहुँच जायेगी यदि तू साधना प्रारम्भ करें। भ्रमर गुहा होकर बिन्दु बेध करते सहस्रार में पहुँचकर शून्य शिखर से ऊपर सत्स्वरूप में अवस्थित होने में तुझे अधिक समय अपेक्षित हो ऐसी संभावना नहीं है।’

जिनका अनुग्रह पाने की अच्छे साधक आकाँक्षा करते हैं, उन योग सिद्ध चन्द्रनाथ की सहायता का लोभ भी उसे आकर्षित नहीं कर सका। उसकी उदासीनता से चकित चन्द्रनाथ ने नेत्र बन्द कर लिए और जब ध्यान से उठे तो शिथिल स्वर से बोले- “तेरी उपेक्षा उचित है। तु इस कुल का नहीं है।”

मुझे मोक्ष की लालसा नहीं है। उसने कई सिद्ध साधुओं को यह उत्तर दिया है- “मेरा क्या होता है। इसकी चिंता मैं नहीं करता। पिता ने मुझे एक आदेश दिया है, वह जीवन में पूर्ण न भी हो तो भी मुझे संतोष रहेगा यदि मैं उसे प्राप्त करने के प्रयत्न में लगा रहा।”

पता नहीं उसका रूप था जिज्ञासा थी पिता की ख्याति थी या उनकी तितिक्षा थी क्या था? कुछ ऐसा अवश्य उसमें था, जो मिलने वाले उत्कृष्ट विद्वानों, साधकों, सिद्धों को उसकी ओर आकृष्ट कर लेता था। उसे महापुरुषों की कृपा मार्ग में प्राप्त होती रही यह उसने अपने लिए परम सौभाग्य माना। इतने पर भी उसकी जिज्ञासा का समाधान नहीं मिल सका।

आचार्य चाणक्य ने नवीन आगन्तुक से यह सब विवरण प्राप्त कर लिया था। कुशल राजनीतिज्ञ सम्पूर्ण परिस्थिति पहले जानना चाहता था। लेकिन परिस्थिति के परिचय ने समस्या को सरल करने में कोई सहायता नहीं की। समस्त भूमण्डल के विद्वानों में सर्वश्रेष्ठ माना जाने वाला बुद्धि की पहेली में उलझा था। जिज्ञासु ब्राह्मण कुमार को निराश लौटा देना भी आचार्य का हृदय भी स्वीकार नहीं करता था।

“वत्स! सभी जिनके अपने हैं उन ‘धी’ तत्त्व की परमाधिष्ठात्री की शरण में जाओ। बहुत चिंतन मनन के बाद चाणक्य इस निष्कर्ष पर पहुँचे थे। ‘धी’ अपने विशुद्ध रूप में ऋतम्भरा है। परन्तु अनुभूति करा पाना किसी व्यक्ति के बूते की बात नहीं। तुम कुछ काल यहाँ निवास करो और अपने को शान्त बनाकर उनकी कृपा पाने की चेष्टा करो।

आचार्य के शब्द उसकी शिराओं में विद्युत की भाँति दौड़ गये। योग दर्शन का सूत्र तस्य प्रज्ञा ऋतम्भरा उसके मस्तिष्क में उद्भासित हो उठा साथ ही जाग्रत हो उठी “धी” तत्व की परमाधिष्ठात्री ‘गायत्री’ महाशक्ति की मंत्र के रूप में शब्द मूर्ति।

अगले दिन प्रातः संध्या के लिए गंगा तट पर ही बैठ गया था। अभी गीले केशों से जल बिन्दु टपक रहे थे। संध्या का संकल्प करके अंगन्यास बोलते-बोलते चौक गया वह। मन में मंत्र का उत्तरार्ध जैसे स्वयँ जाग्रत हुआ -”धियो यो नः प्रचोदयात्।”

धी तत्व के प्रेरक हैं भगवान सविता। प्रतिदिन संध्या कर रहा है बाल्यावस्था से और अब तक इस तथ्य पर दृष्टि नहीं गयी। लेकिन केवल मंत्र जाप अथवा पाठ मात्र से कोई ऋषि नहीं हो जाता। मंत्र जब हृदय में स्वयँ प्रकाशित होता है। उस अद्भुत आलोक का वर्णन वाणी कैसे करे? किन्तु हुआ यह दीर्घकालीन अभ्यास के कारण। इसी महामंत्र के आश्रय ने उसे बुद्धि विवेक प्रज्ञा की क्रमिक अवस्थाओं के बाद आज चरमोत्कर्ष पर पहुँचा दिया। जो मानव विकास की श्रेष्ठतम अवस्था है।

सूर्योपस्थान करके वह गंगा तट पर स्थिर खड़ा हो गया था। उसकी वाणी मूक थी। किन्तु उसका मौन स्तवन किसी शब्द की उपेक्षा कहीं अधिक श्रद्धा सबल हो गया था।

आज उसके नेत्र भास्कर की ज्योति से विचलित नहीं हो रहे थे। वह ज्योर्तिमय सूर्यमण्डल को प्रत्यक्ष देखे जा रहा था? क्या? यह क्या? उसका शरीर पुलक प्रपूरित हो गया॥

“धियो यो नः प्रचोदयात्।” अचानक हृदय से परावाणी प्रकट हुई और उसने देखा विशुद्ध धी अपने मातृरूप में सूर्य मण्डल के मध्य विराजमान है। आद्यशक्ति की करुणा से उसका अणु-अणु आप्लावित है।

इन क्षणों में वह अनुभव कर सका विशुद्ध “धी” स्वयं आत्मा यही सविता है। अपने क्रियाशील रूप में यही गायत्री है। इस महामंत्र के आश्रय से अपनी जिज्ञासा का समाधान करने वाले उस युवक नीलकण्ठ को विश्व मनीषा प्रत्यभिज्ञा दर्शन के प्रतिष्ठापक के रूप में जान सकी॥


हम दर्शक नहीं, दृष्ट बनें!

इस संसार के महामानवों और महापुरुषों के संदर्भ में विचार करने से ज्ञात होता है कि उनका स्तर सदा सामान्य से ऊँचा रहा है। उनके चिंतन चरित्र व व्यवहार नितान्त असाधारण रहे हैं। उनके दृष्टिकोण में उच्च आदर्शवादिता का समावेश रहा है। यदि ऐसा न होता तो संभवतः वे महामानवों की श्रेणी में न आ पाते और इतिहास पुरुष नहीं बन पाते। इस असाधारण स्तर के विकास में उनके द्रष्ट भाव की ही प्रमुख भूमिका होती है। यदि वे द्रष्ट न होते तो काल के प्रवाह में न जाने कब, कहाँ खो जाते, कुछ पता न चलता और अंततः काल पुरुष बनकर अविस्मरणीय लोगों की पंक्ति में ला खड़ा कर देता है।

यहाँ ‘द्रष्ट’ का तात्पर्य सिद्ध पुरुषों से कदापि नहीं लगाया जाना चाहिए और न यही समझा जाना चाहिए कि द्रष्ट मात्र ऐसे ही व्यक्ति होते हैं। द्रष्ट एक सामान्य व्यक्ति भी तो हो सकता है। जो सतत् आत्म निरीक्षण कर अपनी कमियों को घटाने मिटाने का निरन्तर प्रयास करता हो। इस प्रकार ‘द्रष्ट’ का सामान्य अर्थ देखने वाला अथवा दर्शक माना जा सकता है, किन्तु दर्शक और द्रष्ट में जमीन और आसमान जितना अंतर हैं यह संभव है कि भाषाकोश अथवा शब्दकोश में यह अंतर न किया गया हो, किन्तु भाव की दृष्टि से इनमें उतना ही अंतर हैं, जितना रात व दिन में। दर्शक की दृष्टि सदा दूसरों पर होती हैं, लेकिन द्रष्ट की आँखें सदा स्वयं पर टिकी होती है। इस प्रकार जब हम ‘दर्शक’ कहते हैं, तो अभिप्राय वैसे व्यक्ति से होता है, जो दूसरों को देख रहा हो, पर जब द्रष्टा कहा जाता है, तो अर्थ किसी आत्म निरीक्षक से होता है।

रूस के मूर्धन्य मनीषी मैक्सिम गोर्की ने अपनी कृति ‘मानव और महामानव’ में इसी आशय का मन्तव्य प्रकट करते हुए कहा है कि मनुष्य की तीन श्रेणियाँ हैं दृश्य, दर्शक और द्रष्ट। वे अपनी उक्त रचना में लिखते हैं कि दृश्य सबसे निम्न कोटि का मनुष्य है। उसे दिखावे में, आडम्बर में रस आता है। वह कहते हैं कि जो मनुष्य दृश्य बन गया, समझना चाहिए कि वह जड़ वस्तु बन गया और जड़ में आत्मा नहीं होती, अस्तु इनकी स्थिति भी लगभग वैसी ही बन जाती हैं यद्यपि देखने, सुनने में तो सचेतन मनुष्य जान पड़ते हैं, पर उनकी अवस्था बाजीगर के इशारे पर नाचने वाली कठपुतली जैसी होती है। कोई अबोध बालक इन पुतलों को सजीव मान सकता है, पर वास्तविकता वैसी कहाँ होती है? वह तो काठ के निर्जीव खिलौने भर होते हैं, जो दृश्य बनकर लोगों का मनोरंजन करते हैं। अतः जिनने दृश्य बनने का कौतुक रचा, समझना चाहिए कि उनने स्वयं को खो दिया, अपनी सत्ता खो दी, और आत्मा खो दी। फिल्मों में काम करने वाला व्यक्ति कोई और होता है, पर अभिनय किसी और का करता है। रंगमंच के रंगकर्मियों का भी यही हाल है। यह सब अपनी स्वतंत्र सत्ता को खो देते हैं, आत्मा खो देते हैं और दृश्य बन जाते हैं। अतएव इनमें आत्मा को ढूँढ़ पाना कठिन है। इनमें श्रेष्ठ दिखने का अभिनय भर होता है, उत्कृष्ट बनने का प्रयत्न पुरुषार्थ नहीं इसीलिए पात्र दृश्य बनकर रह जाते हैं, द्रष्ट नहीं बन पाते।

विवेकानन्द ने एक बार कहा था कि भारतवर्ष में द्रष्ट पुरुष पैदा करने हों तो उनके अन्दर दर्शक को मिटाना पड़ेगा और यह सत्य है कि बिना दर्शक का विसर्जन किये, द्रष्ट का सर्जन सर्वथा असंभव है। यहाँ गोर्की और उनके विचार काफी मिलते जुलते हैं। गोर्की का मानना है कि जहाँ दृश्य होगा, वहाँ निश्चय ही दर्शक भी होगा, अर्थात् दृश्य और दर्शक एक दूसरे के पूरक हैं, क्योंकि दृश्य बिना दर्शक पैदा ही नहीं हो सकते और दर्शक के अभाव में दृश्य की महत्ता समाप्त हो जाती है। किन्तु इस संभावना से वे इनकार करते हैं कि जहाँ दृश्य हो वहाँ दर्शक न हो, वहाँ दर्शक न हो, ऐसा हो ही नहीं सकता। यह बात और है कि दर्शक


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धर्म सेवन का आनन्द प्राप्त कर लेने वालों का उत्साह उन्हें चैन से नहीं बैठने देता। वे हर किसी को जोर देकर कहते हैं कि सत्य को अपनाओ और आनन्द में निमग्न रहो।

कम हो, पर होंगे अवश्य। जहाँ रामलीला -रासलीला होती हैं, सिनेमा- नाटक होते हैं, वहाँ उन्हें देखने वाले भी मौजूद रहते हैं। यदि इनका मंचन न हो तो, दर्शक भी वहाँ इकट्ठे न होंगे। इस प्रकार गोर्की के अनुसार दृश्य ही वह मूलभूत कारण है, जो द्रष्ट बनने के रास्ते में रोड़े अटकाता है। यदि दृश्य को समाप्त कर दिया जाए, तो दर्शक भी स्वतः ही समाप्त हो जायेंगे और फिर जो उत्पन्न होंगे, वह द्रष्ट होंगे। यहाँ दृश्य का तात्पर्य बनावटीपन से, आडम्बर से है। यदि इसे छोड़ लोग साधारण जीवन अपना लें, तो रूसी लेखक के अनुसार लक्ष्य प्राप्त की काफी कठिनाइयाँ हल हो जायेंगी।

प्रख्यात अंग्रेज विचारक बट्रैण्ड रसेल ने अपनी पुस्तक ‘ह्नाट डज बैक लक मीन?’ में लिखते हैं कि आज की व्यक्तिगत और सामाजिक समस्याओं में से अधिकाँश का आधारभूत कारण यही हैं कि वर्तमान में हमने स्वयँ के अन्दर झाँकना बन्द कर दिया है। अब हम अन्दर की बजाय बाहर झाँकना अधिक पसन्द करते हैं। इसी बाह्य दृष्टि ने इन दिनों इतनी विपत्तियां खड़ी कर दी हैं। इनका समापन भी तभी संभव हो सकेगा, जब हम अंतर्दृष्टि विकसित कर सकेंगे। वे लिखते हैं कि इससे कम में कदाचित इसका हल शक्य न हो सके।

इस स्थान पर विद्वान अंग्रेज दार्शनिक और विख्यात रूसी लेखक की मान्यताओं में काफी साम्य दिखाई पड़ता है। रूसी ग्रंथकार ने भी तीन प्रकार के मनुष्यों में सर्वोपरि और सर्वश्रेष्ठ तीसरी कोटि के मनुष्यों को ही माना है और इस बात पर बल दिया है कि वर्त्तमान समस्याओं का आत्यन्तिक हल इसी में है कि हम दर्शक नहीं दृष्ट बनें। यहाँ दर्शक और दृष्ट में एक मूलभूत अंतर हैं। दोनों ही कहीं न कहीं खोये होते हैं, पर उनका स्थान भिन्न भिन्न होता है।

दर्शक रेडियो, टी.वी., सभा सम्मेलन, भाषण-संभाषण, वाद-विवाद, वार्तालाप, मेले-ठेले आदि को देखने सुनने में अपने को भूल जाता, सुध-बुध खो बैठता है। जब तक यह कौतुक चलते रहते हैं, तब तक वह आत्मसत्ता को भूल जाता है और आत्म विहीन जड़वत् प्रतीत होता है, किन्तु दृष्ट! वह खोता तो जरूर है, मगर स्वयँ में, अपने अंतराल में अपने अंतःकरण में। इसमें डुबकी लगाकर वह अपनी कमियों, त्रुटियों को हटाने मिटाने का प्रयत्न करता है। इस प्रकार यह कहना अत्युक्तिपूर्ण न होगा कि दर्शन यदि आत्म विस्मरण की अवस्था है, तो दृष्टपन आत्म-स्मरण की।

अब यहाँ एक प्रश्न उभरता है कि दृष्ट बना कैसे जाए? क्या कुछ जप ध्यान कर लेने मात्र से ही व्यक्ति दृष्ट कहलाने का अधिकारी हो जाता है? रूसी मनीषी का कहना है कि, नहीं, इतने ही से कोई दृष्ट नहीं बन सकता। वे कहते हैं कि दृष्ट के भीतर का भाव ही यही है कि वह अपने अंतस् में डुबकी लगाये और अपनी उन कमियों को ढूंढ़-ढूंढ़ कर बाहर निकाले, जो उसके दृष्टपन को प्रकट होने देने में बाधक हैं।

स्पष्ट है- दृष्ट के लिए अपने निज का स्रष्टा होना भी आवश्यक है, उसे अपना सृजन कर सुगढ़ता में बदलना भी अनिवार्य है, तभी वह यह संबोधन प्राप्त कर सकता है। यदि वह भी आत्म सृजन के संदर्भ में जनसामान्यों जैसा ही बना रहा, तो असामान्य अथवा असाधारण कहलाने का विशेषण कैसे प्राप्त कर सकेगा? निश्चय ही दृष्ट के लिए सृष्ट होना भी उतना ही अनिवार्य है। जितना जीवन के लिए प्राण वायु। इसी प्रक्रिया से मानव महामानव बनते और नर-नारायण की, भूसुर की पंक्ति में जा खड़े होने की गौरव - गरिमा अर्जित करते हैं। हम दर्शक नहीं, दृष्ट बनें।


माँद में ही भूखा मर गया (Kahani)

एक खरगोश बहुत भले स्वभाव का था। जंगल में सभी जानवरों से उसकी मित्रता थी। सभी की सहायता के लिए वह सदैव तैयार रहता था।

एक बार खरगोश बीमार पड़ा। समाचार सुनकर सभी आस पड़ोस के जानवर सहानुभूति प्रकट करने आयें।

बीमारी के लक्षण प्रकट होते ही खरगोश ने आड़े वक्त के लिए कुछ घास जमा कर रखी थी। सहानुभूति प्रकट करने वाले जो भी आते उसी संचित घास को चरते। इस प्रकार वह दो चार दिनों में ही समाप्त हो गयी, बीमारी के अच्छा होने पर खरगोश कमजोरी के कारण घास चरने न जा सका और अपनी माँद में ही भूखा मर गया।

मृतक भोज के दिन भी सहानुभूति प्रकट करने के लिए आने वाले प्रायः यही करते हैं।


बौने शरीर से भले हों, मन से नहीं

मानवी क्षमता असीम और अप्रत्याशित है। काया का रंग, रूप, आकार प्रकार, ऊँचाई निचाई कैसी भी क्यों न हो, यदि मनुष्य शारीरिक, मानसिक व भावात्मक रूप से स्वस्थ है तो तो प्रतिभा प्रखरता के क्षेत्र में वह कीर्तिमान स्थापित कर सकता है। शरीर से छोटे लोग मन से भी छोटे होते हैं, यह मान्यता किसी हद तक ठीक हो सकती है, पर उसे निर्विवाद व सुनिश्चित नहीं कहा जा सकता। चेतना सत्ता पर कोई बंधन नहीं लग सकते। वह इच्छा और संकल्प लेकर खड़ी हो जाए तो अद्भुत और असाधारण प्रगति हर परिस्थिति में करके दिखा सकती है।

प्रायः शरीर का बौनापन उपहासास्पद माना जाता है और समझा जाता है कि असाधारण कम ऊँचाई के कारण बौनेपन से ग्रस्त व्यक्ति सामान्य लोगों की तरह पुरुषार्थ नहीं कर पाते, फलतः उनकी प्रगति भी अवरुद्ध हो जाती है। जो लोग उन्हें अपनी तुलना में छोटे पाते हैं और कौतुक कौतुहल की दृष्टि से देखते तथा उपहास करते हैं, वे इस तथ्य को भूल जाते हैं कि वास्तविक बौनापन तो मन का बौनापन है, जो शरीर की ऊँचाई कम होने पर भी कही अधिक उपहासास्पद है। शरीर की वृद्धि रुक जाने में मनुष्य के अपने पुरुषार्थ का दोष नहीं होता। उसके कारण अविज्ञात होते हैं और उन्हें हटाने में व्यक्ति के प्रयत्न प्रायः कुछ अधिक काम नहीं आते, किन्तु मन के बौनेपन के बारे में ऐसी बात नहीं मनुष्य चाहे तो अपने गुण, कर्म, स्वभाव को चिंतन, चरित्र, व्यवहार की उत्कृष्टता ही नहीं मस्तिष्कीय चेतना की प्रखरता भी बढ़ा सकता है। मानसिक दृष्टि से ओछे एवं पिछड़े हुए मनुष्यों को बौने मन वाला कहा तथा और भी उपहासास्पद माना जा सकता है।

इतिहास में अनेक बौने व्यक्तियों की प्रतिभा का उल्लेख मिलता है। हिन्दू धर्म की अवतार शृंखला में एक वामन अवतार भी थे, यह नाम इन्हें इसलिए दिया गया कि वे वाबन अंगुल के थे, शब्द शास्त्र की दृष्टि से वामन और बौना लगभग एक ही अर्थ के बोधक हैं। अष्टवक्र ऋषि जो महाराज जनक के गुरु थे, आठ जगह से टेढ़े मेढ़े थे। उनके हाथ पैर मुड़े तुड़े थे, अपंग पीठ, कूबड़ के होते हुए वे ऊँचाई की दृष्टि से बौने जितने ही रह गये थे। इतने पर भी वह प्रतिभा के धनी थे और सर्वत्र पूज्यनीय माने जाते थे। यह इस बात का प्रमाण है कि चेतना सत्ता पर शारीरिक अपंगता या बौनेपन का कोई बंधन नहीं है। प्रयास और पुरुषार्थ के बल पर उसे हर कोई विकसित कर महानता का वरण का सकता है। बौने व्यक्तियों में कभी-कभी ऐसी विशेषताएँ देखी गयी हैं जिनसे भाग्य पर पुरुषार्थ की विजय का प्रत्यक्ष प्रमाण मिलता है।

प्रख्यात ग्रीक कवि फिलेटास की गणना बहुत छोटे कद के लोगों में होती है। पैरों में में बहुत भारी जूते वे इस डर से सदैव पहने रहते थे कि हल्के होने के कारण कही हवा में उड़ न जाएँ। वे मिश्र देश के राज गुरु भी थे। इसी तरह होमर, हैरोडोट्स, प्लिनी पोप्योनियम, अरस्तु आदि विश्व विख्यात मनीषियों का शारीरिक दृष्टि से बौने के रूप में उल्लेख हुआ है।

फ्राँस के प्रसिद्ध चित्रकार और फिल्म अभिनेता तुलूज लात्रे यों तो अपनी प्रतिभा के कारण ही प्रख्यात हुए थे, पर उनके बौनेपन ने इस प्रसिद्धि में और भी चार चाँद लगा दिये थे। इसी प्रकार इंग्लैण्ड के एक बौने ने रोते हुए व्यक्ति को भी हँसा देने की कला में भारी ख्यात और प्रवीणता प्राप्त की थी। जेफरी हडसन नामक इस बौने ने इसी आधार पर अपनी अच्छी आजीविका भी उपार्जित करने में सफलता पायी थी। ड्यूक आफ बर्मिंघम की रानी छोटे कद के कारण राज परिवार की कृपा पात्र मानी जाती थी। एक बार चोरों ने उनका अपहरण कर लिया तो रानी ने अपनी सूझ बूझ से एक बड़ी राशि फिरौती के रूप में देकर किसी प्रकार उनके पंजे से छुटकारा पाया।

अमेरिका में गत शताब्दी में जनरल टाम धम्ब अपनी प्रतिभा के लिए प्रख्यात थे। जटिल से जटिल गुत्थियों को सुलझा देना उनके बांये हाथ का खेल था। वे मात्र 31 इंच के थे। उनके नाटे कद के कारण वे चाहे जहाँ प्रवेश पा लेते थे। इनके समान या छोटे कद की पत्नी न मिली तो उन्हें अपने से दो इंच ऊँची लेविनिया वारेन नामक बौनी महिला से विवाह स्वीकार करना पड़ा।

फ्राँस में एक 23 इंच ऊँचा बौना रिचीवर्ग जासूसी दुनिया में सबसे अधिक विख्यात था। युद्धकाल में वह जासूसी की अति महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा। दुश्मन सेना उसे बालक समझती थी और वह युद्ध मोर्चे तक बहुत महत्व के कागज पहुँचाने ओर लाने का काम सरलता पूर्वक करता। 90 वर्ष की दीर्घायु तक वह जीवित रहा।

फ्राँस के मूर्धन्य नेतृत्ववेत्ता ब्रेसचिन ने अपनी पुस्तक में बौने व्यक्तियों में सामान्य व्यक्तियों की तुलना में कई गुणों की अधिकता रहने की बात लिखी है। उनके अनुसार बौने व्यक्ति अपने आकार की तुलना में अधिक फुर्तीले और हिम्मत वाले होते हैं। वे मिलजुल कर रहने और प्यार मोहब्बत का परिचय देने में किसी से कम नहीं होते हैं, सहयोग-सहकार की प्रवृत्ति इनके नैसर्गिक गुण हैं। विद्वान मनीषी बैफोन ने भी इसी तरह मैडागास्कर में पायी जाने वाली किमोस नामक एक बौने कबीले का कई दृष्टियों से विवेचन किया है। अपनी कृति में उन्होंने कहा है कि शरीर छोटे होने के साथ साथ यद्यपि मनुष्य की अनेक क्षमतायें घट जाती हैं, फिर भी चेतनात्मक स्तर पर वह सामान्य कद वालों की तुलना में किसी से कम नहीं ठहरते, उनका भावात्मक स्तर तो देखते ही बनता है।

इतिहास-वेत्ता जानते हैं कि संसार में पहले बौनापन अधिक था, अब वह क्रमशः घट रहा है। वंशानुक्रम की परतों तक जहाँ इस कमी ने प्रवेश कर लिया है। वहाँ अब भी पीढ़ी दर पीढ़ी यह कमी चलती रहती है और बौनी जातियां ही बन जाती हैं। अभी भी फिलीपीन्स, मलेशिया, न्यू गयाना, मध्य एशिया, अफ्रीका में कितने ही कबीले कद की दृष्टि से बौने ही बने हुए हैं। अफ्रीका का काँगो देश तो बौने नागरिकों के लिए प्रसिद्ध है। वहाँ के वन्य प्रदेश में चार फुट से भी कम ऊँचाई के लोगों की बहुत बड़ी आबादी है। पिछली सहस्राब्दी में लंका, भारत, जापान, चीन, फ्राँस, जर्मनी, स्विट्जरलैण्ड आदि एशिया एवं यूरोप के कई देशों में बौनी जातियां रहती थीं। अनुसंधानकर्त्ताओं का कहना है कि वे या तो अविवाहित रहने के कारण अथवा बड़ी आयु के लोगों के साथ रक्त मिश्रण के कारण समाप्त होते चले गये।

यह मान्यता सही नहीं है कि शरीर के छोटे होने से मन भी छोटा है और सूझ बूझ तथा परिस्थितियों का सामना कर सकने की कुशलता में भी कमी आ जाती है। कद की ऊँचाई-निचाई का प्रतिभा प्रखरता से कोई सीधा संबंध नहीं है। इसका एक उदाहरण बाल्टी-मोर में पिछले दिनों संपन्न हुए एक बौने सम्मेलन में बौने लोगों ने ही प्रस्तुत किया था, यह सम्मेलन इस विकृति के कारणों को खोजने और निवारण उपायों की खोज करने के साथ ही शारीरिक कमी के कारण उन्हें अर्थोपार्जन एवं नागरिक सम्मान पाने में जो कठिनाई होती हैं, उसके निवारण में सहयोग देने के लिए आयोजित किया गया था। जब यह सम्मेलन चल रहा था, उसी समय एक बहुत छोटे कद के बौने इंजीनियर अपने निजी विमान को स्वयं उड़ाते हुए भाग लेने पहुँचे तो उपस्थित सदस्यों का साहस बढ़ा और उनने समझा कि शरीर की ऊँचाई कम होने से अन्य विशेषताओं को ऊँचा उठने में कोई अड़चन उत्पन्न नहीं होती है। अमेरिका में बौने लोगों का संगठन “दी लिटिल पीपुल्स ऑर्गनाइजेशन”


मानवी पुरुषार्थ के लिए निताँत संभव (Kahani)

अपनी बात को हम कितना ही सही क्यों न माने पर साथ ही यह भी ध्यान रक्खें कि मतभेद वाले पक्ष भी हमारी ही तरह सच मानने वाले हो सकते हैं। सत्य तक पहुँचने के लिए मस्तिष्क खुला रखना चाहिए। “ही” की कट्टरता में भी ‘भी’ की गुंजाइश छोड़नी चाहिए।

की स्थापना विलीवार्टी नामक एक प्रतिभावान व्यक्ति ने की थी। वह माना हुआ विद्वान व प्रतिभाशाली होने के साथ-साथ बौना भी था।

वंशानुक्रम में उत्पन्न हुई खामी एवं हारमोन्स ग्रंथियों की विकृति शारीरिक बौनेपन के दो प्रमुख कारण माने जाते हैं। जिस तरह पिछड़ेपन के अनेकों अभिशाप विभिन्न कारणों से मनुष्य पर बरसते रहते हैं और व्यक्तित्त्व को दबाने का प्रयत्न करते हैं, उसी प्रकार बौनापन भी है। यह प्रकृति प्रदत्त लगते हुए भी वस्तुतः मनुष्यकृत है। उसे अन्य रोगों की तरह प्रयत्नपूर्वक हटाया जा सकता है। कोई भी कठिनाई ऐसी नहीं जो सरल न की जा सके। बौनापन भी इसका अपवाद नहीं है। मानवीय संकल्प और पुरुषार्थ सर्वोपरि है। वह हर कठिनाई से लड़ने और हर स्थिति में आगे बढ़ने में सफल हो सकता है। शारीरिक एवं मानसिक बौनेपन के कारण उत्पन्न पिछड़ेपन को निरस्त कर सकना मानवी पुरुषार्थ के लिए निताँत संभव है।


आत्मशोधन की परिमार्जन प्रक्रिया

उपासना का प्रथम चरण है- आत्मशोधन। आत्मशोधन के बिना उच्चकोटि की साधनायें भी निष्फल चली जाती हैं। अतएव सर्वप्रथम वर्तमान और भावी जीवन को पवित्र परिष्कृत बनाने की योजना बनायी जाती है एवं पिछले पापों एवं कुसंस्कारों के कारण आत्मिक प्रगति के पथ पर अवरोधों की तरह अड़े रहने वाले दुष्कृतों का निवारण परिमार्जन प्रायश्चित प्रक्रिया द्वारा किया जाता है। प्रायश्चित का अर्थ गिड़गिड़ाना या सस्ते मोल में विधि-विधान से बच निकलना नहीं, वरन् क्षतिपूर्ति करना है। दुष्कर्मों से अपने अंतःकरण को विचार संस्थान को तथा कार्यक्रमों को जिस प्रकार दुष्प्रवृत्तियों से भर दिया गया था, उसी साहस और प्रयास के साथ इन तीनों संस्थानों के परिमार्जन, परिशोधन एवं परिष्कार की प्रक्रिया को प्रायश्चित कहा गया है। इससे सदाशयता और साहसिकता तो बढ़ती ही है, साथ-साथ सफलता की प्राप्ति भी सुनिश्चित हो जाती है।

कर्मफल अकाट्य है। बन पड़े पाप कर्मों को तरकस से छोड़े गये तीर की तरह वापस तो नहीं लौटाया जा सकता, पर यह उपाय पीछे भी संभव रहता है कि प्रायश्चित करके उस दण्ड भार को काफी हल्का किया जाय। इसका एक प्रत्यक्ष लाभ यह है कि अंतःकरण पर चढ़ा हुआ दुष्चिंतन और आत्म-धिक्कार का भार हल्का हो जाता है। पापकृत्यों, दुराचारों के फलस्वरूप उत्पन्न आत्मग्लानि और आत्म प्रताड़ना से छुटकारा पा सकना प्रायश्चित के अतिरिक्त और किसी प्रकार के उपाय में संभव नहीं हो सकता। इसलिए भारतीय धर्मशास्त्रों में पाप निवारण का एक मात्र उपाय प्रायश्चित निर्धारित किया गया है।

अंगिरस स्मृति- 4/1 में प्रायश्चित की विवेचना करते हुए कहा है-

प्रायो नाम तपः प्रोक्तं चित्तं निश्चय उच्यते।

तपो निश्चय संयोगात् प्रायश्चितमिति स्मृतम्॥

‘प्रायः’ का अर्थ तप है और ‘चित्त’ का अर्थ निश्चय है। तप और निश्चय के संयोग से प्रायश्चित होता है। इसका प्रारम्भ सर्वप्रथम पाप परिमार्जन और आत्मशोधन के लिए साहस पूर्वक कदम बढ़ाने से होता है,साथ ही इसमें गायत्री की सामान्य साधना तथा उच्चस्तरीय साधना का नियोजन किये रहना पड़ता है। इस आधार पर खड़ी हुई साधना तपश्चर्या के सफल होने में फिर कोई अड़चन शेष न रह जाती।

शास्त्रों में प्रायश्चित के चार चरण बतायें गये हैं- (1)पश्चाताप (2)पाप का प्रकटीकरण (3) दण्डरूप व्रत उपवास जप तप अनुष्ठान आदि कृत्य करना और (4) क्षतिपूर्ति या ऋणमोचन। यह चार चरण मिला देने से ही प्रायश्चित का एक समग्र स्वरूप बनता है।

प्रायश्चित का प्रथम चरण है- पश्चाताप। इसमें जीवन भर के दुष्कर्मों की सूची बनाकर उसके द्वारा दूसरों को पहुँची हानि का स्वरूप मन को समझाना होता है। दुष्कर्मों के फलस्वरूप अपनी आत्मा को, अनीति पीड़ितों को तथा परोक्ष रूप से अन्यान्यों को जो क्षति पहुँचती हैं उस पर विचार करने से हर विवेकशील के मन में दुख होता है। यह ऐसा दुख ही पश्चाताप है। यदि ऐसा दुख नहीं उपजा, उलटे पाप समर्थन की धृष्टता बरती जाती रही - अनुचित को उचित सिद्ध किया जाता रहा तो समझना चाहिए कि ऊपर से ही लीपापोती की जा रही है। पाप की जड़े जहाँ की तहाँ है। वे अवसर पाते ही फिर फूलेंगी--फलेंगी और पुनरावृत्ति होती रहेगी।

पश्चाताप का स्वरूप है- सच्चे मन से दुखी होना। भूल की भयंकरता का अनुभव करना और भविष्य में इस प्रकार के आचरण न करने के लिए सच्चा संकल्प करना और उसे कठोरता पूर्वक निबाहना। इतना कर चुकने पर ही प्रायश्चित की यथार्थता सामने आती है। पश्चाताप की महत्ता का उल्लेख करते हुए विश्व पुराण में कहा गया है-

पाश्चात्तापः पापकृताँ पापानाँ निष्कृतिः परा।

सर्वेषा वर्णितं सद्भिसर्वपाप विशोधनम्॥

पश्चात्तापेनैव शुद्धिः प्रायश्चितं करोति सः।

यथोपदिष्ट सद्भिर्हि सर्वपाप विशोधनम्॥

अर्थात् पाप कर्म में संलिप्त व्यक्तियों के लिए पश्चात्ताप ही सबसे बड़ा प्रायश्चित है। मनीषियों ने महर्षियों ने सच्चे मन से किये गये पश्चाताप को ही समस्त पापों का शोधक बताया है। पश्चात्ताप से ही पापों की शुद्धि होती है। जो पश्चात्ताप करता है, वही वास्तव में पापों से मुक्ति प्राप्त करता है, ऐसा सत्पुरुषों का कथन है।

प्रायश्चित का दूसरा चरण है- पाप का प्रकटीकरण। इस उपक्रम में दुष्कर्मों का चिंतन कर आत्म-विश्लेषण करना, उन्हें पुनः नहीं दोहराने का संकल्प एवं विज्ञजनों महामानवों के समक्ष उनका प्रकटीकरण करते हुए प्रायश्चित का संकल्प करना होता है। इससे कई लाभ होते है। मन के भीतर जो दुराव की गांठें बँधी रहती हैं, वे खुलती हैं। मनोविज्ञान शास्त्र का सुनिश्चित मत है कि मनोविकारों के, दुष्कर्मों के दुराव से मानसिक ग्रंथियाँ बनती हैं और वे अनेकों मानसिक व शारीरिक रोगों के रूप में उभरती रहती हैं। मनः चिकित्सा शास्त्री मानसिक रोगियों से उसके पिछले जीवन के घटनाचक्र को विस्तार पूर्वक बताने के लिए प्रोत्साहित करते हैं। इसमें अप्रकट दुरावों का यदि प्रकटीकरण हो गया तो रोग का निराकरण सरल हो जाता है। आरोग्यशास्त्र की नवीनतम शोधों ने भी यह निष्कर्ष निकाला है कि रोगों की जड़ें शरीर में नहीं, वरन् मानसिक विकृतियों के रूप में मन में जमी रहती है। रोगों की चिकित्सा में औषधि उपचार का जितना महत्व हैं उससे कही अधिक मानसिक परिशोधन का अंतः शुद्धि का है। यह कार्य पिछले किये हुए दुष्कर्मों की जड़ काटने के रूप में प्रायश्चित की प्रकटीकरण प्रक्रिया के सहारे ही संभव हो सकता है।

ईसाई धर्म में दो अवसरों पर पापों का प्रकटीकरण आवश्यक माना जाता है। एक ईसाई धर्म की दीक्षा -’बपतिस्मा’ लेते समय। दूसरे मरण काल के पूर्व। दोनों ही अवसरों पर मनुष्य को अब तक के अपने पाप पादरी के सम्मुख निताँत एकाँत में कहने होते हैं। ‘बपस्तिमा’ और मरणकाल में इस स्वीकारोक्ति को “कन्फैशन” को उस धर्म में अत्यंत पवित्र और आवश्यक माना गया है। एकाँत में वह व्यक्ति अपने जीवन के प्रमुख पाप कर्मों को प्रकट करता है। पादरी उसके समाधान की प्रार्थना करता है। इस प्रकार जी हल्का करके मरने का निश्चित रूप से सत्परिणाम होगा और उससे आत्मा को शाँति, सद्गति मिलेगी। हिन्दू धर्म में भी श्रावणी पर्व पर हेमाद्रि संकल्प के साथ इसी प्रकार का प्रकटीकरण हर साल करते रहने का विधान है। इसके अतिरिक्त जब भी पाप बने तभी उसके प्रकटीकरण एवं प्रायश्चित का विधान संपन्न करने की परम्परा है। उन्हें जितने समय तक छिपाये रखा जाता है, उतना ही चक्रवृद्धि दर से उसका भार बढ़ता चला जाता है। शास्त्रों में कहा गया है-

‘आसम्वत्सरं प्रायश्चिताकरणे पापद्धैगुण्यम्।’

अर्थात् एक वर्ष तक किसी पाप कर्म का प्रायश्चित न किया जाये तो पाप दुगुना हो जाता है। अतः पाप का प्रायश्चित यथा समय अवश्य करना चाहिए। प्रकटीकरण से मन की ग्रंथियाँ खुलती हैं और उससे शारीरिक, मानसिक, और आत्मिक स्वास्थ्य सुधार का सुनिश्चित लाभ मिलता है। पर पाप कर्मों का इस तरह प्रकटीकरण हर किसी के सामने नहीं किया जाना चाहिए अन्यथा जोखिम ही जोखिम है। वरन् प्रकटीकरण के लिए सत्पात्र की तलाश करनी चाहिए, इसके लिए यथाकथित शुभचिंतक मित्र नहीं, वरन् सद्भाव संपन्न उदार हृदय तत्वदर्शी, सद्गुरु ही उपयुक्त हो सकते हैं।

सुधार, सद्भावना, उदार क्षमाशीलता और चिकित्सक जैसी उदार सहृदयता जिनके भीतर हो, मात्र वे ही पाप प्रकटीकरण के अधिकारी हो सकते हैं। वे ही पिछली दुखद घटनाओं की उचित समीक्षा कर सकते हैं। उन्हीं से प्रायश्चित का स्वरूप निर्धारित करने में सहायता मिल सकती है। प्रकटीकरण की इस महत्ता का उल्लेख करते हुए महाभारत अनुशासन पर्व में कहा गया है-

‘तस्मात् पापं गृहेत गुहमानं विवर्धयेत्।

कृत्वा तत् साधुष्वरवमेयं ते तत् शमयन्त्युत ॥ “

अतः अपने पापों को छिपायें नहीं, छिपाया हुआ पाप बढ़ता है। यदि कभी पाप बन गया हो तो उसे साधु -महापुरुषों से कह देना चाहिए वे उसकी शाँति कर देते हैं।

प्रकटीकरण के उपराँत तीसरा चरण प्रतीकात्मक दण्ड व्यवस्था एवं तप-तितिक्षा का आता है। इस प्रक्रिया के अंतर्गत अपने ऊपर दण्ड ऐसे दबाव डालना होता है जिनकी स्मृति देर तक बनी रहे और उस परिवर्तन की छाप को अंतः चेतना गहराई तक धारण कर ले। प्रायश्चित रूप से अपने आप दण्ड देने की यह पद्धति तप-तितिक्षा नाम से शास्त्रों में वर्णित की गयी है। इसमें अपने को शारीरिक, मानसिक यत्किंचित् कष्ट देकर स्मृति पटल पर दुर्घटना का स्वरूप और दुष्परिणाम अंकित किया जाता है। इससे भावी पुनरावृत्ति की आकाँक्षा बहुत हद तक घट जाती है।

ऐसी तितिक्षाओं में कई तरह के व्रत उपवास सम्मिलित हैं। चाँद्रायण, कृच्छ, चाँद्रायण, सन्तापन व्रत, पंचगव्य प्राशन, अस्वादव्रत आदि इसी प्रकार के हैं। मौनव्रत, ब्रह्मचर्य, भूमि शयन, ग्रीष्म तथा शीत सहन जैसी तितिक्षायें भी अमुक समय तक करने का विधान बनाया जाता है। जप, अनुष्ठान, पाठ आदि भी इस संदर्भ में कराये जाते हैं। केश मुण्डन, तीर्थ स्नान, आदि कितने ही विधानों का शास्त्र में उल्लेख मिलता है। इन सब में थोड़ी सी शारीरिक एवं मानसिक कठिनाइयाँ सहन करनी पड़ती हैं। इससे अनीति आचरण के दुष्परिणाम और छोड़ देने के लिए किये गये संकल्प का ध्यान भविष्य में भी बना रहता है। यह अंतः चेतना पर परिवर्तन की छाप छोड़ने का अच्छा उपाय है। इसलिए इस तीसरे चरण को प्रायश्चित विधान में समुचित स्थान दिया गया है।

चौथा चरण सबसे प्रमुख एवं आवश्यक है। प्रथम तीन चरणों को उसका भूमि का भाग माना जा सकता है। प्रायश्चित का यह अंतिम प्रभावशाली चरण है- क्षतिपूर्ति या ऋण विमोचन। जो लिया है उसे वापस लौटाना है। जो हानि पहुँचाई है, उसकी भरपाई करनी है। सड़क पर गड्ढा खोद कर यदि दूसरों के लिए उसमें गिरने का कष्टकारक आचरण किया गया है तो उसकी क्षतिपूर्ति इसी प्रकार होगी कि जितना श्रम गड्ढा खोदने में किया गया था, उतना ही उसे पूरा करने के लिए किया जाय। गड्ढा पट जाने पर ही उस अनाचार की भरपाई होगी, जिसके कारण अनर्थ होता रहा। विघातक कृत्य के वजन का विधेयात्मक कार्य करने पर ही संतुलन बनता है और क्षतिपूर्ति संभव होती है। अतः पाप कर्मों के द्वारा व्यक्ति की, समाज की नैतिक, आर्थिक एवं अन्य प्रकार की जो क्षति हुई है, उसकी भरपाई सत्प्रवृत्ति संवर्धन से उतना ही श्रम लगाकर की जा सकती है। दूसरों को गिराने के लिए जो खाई खोदी गयी थी, उसे पाटने के लिए समतल बनाने वाला श्रम नये सिरे से लगाने पर ही संतुलन बनेगा और प्रायश्चित संभव होगा।

यहाँ यह स्मरणीय है कि सारा समाज एक शरीर है। उसके किसी भी अंग को क्षति पहुँचाई गई हो तो पूरे शरीर की हानि मानी जायगी। आवश्यक नहीं कि हानि जिस रूप में पहुँचाई गई हो उसे उसी रूप में वापस लौटायी जाय। लोकहित के किसी भी श्रेष्ठ काम में उस ‘वापसी’ को लगाया जा सकता है। इस प्रयोजन में धन एवं श्रम का अधिकाधिक उपयोग लोक मंगल के कार्य में लगाया जा सकता है। प्रायश्चितों के साथ शास्त्रों में दान-पुण्य के विधान भी जुड़े रखे गये हैं। इनमें धन-दान और श्रम-दान दोनों की ही व्यवस्था है। क्षतिपूर्ति इसी रूप में हो सकती है। अनीति उपार्जित उपलब्धियों को सत्प्रवृत्ति संवर्धन के किसी श्रेष्ठ काम में लगाया जा सकता है। अशोक, अंगुलिमाल, चण्ड, सदन कसाई, अम्बपाली, पिंगला, वेश्या आदि ने अपनी अनीति उपार्जित धन-संपदा प्रायश्चित स्वरूप बौद्ध धर्म के प्रचार विस्तार में समर्पित कर दी थी। जिसकी जो हानि की, उसी की तलाश करना और उसी रूप में वापस करना उनके लिए संभव भी न था।


सत्प्रवृत्ति संवर्धन में लगाया हुआ समय (Kahani)

स्वामी रामतीर्थ जब जापान गये तो उन्होंने कितने ही बगीचों में छोटे देवदारु के पेड़ देखे जो बीस बीस वर्ष पुराने थे। इतने दिनों में तो यह वृक्ष पूरा बढ़ जाता है।

स्वामी जी ने माली से पूछा इनके इतना छोटा रह जाने का क्या कारण है। उनने बताया इसके बड़े होने पर हम लोग हर साल काटते रहते हैं और फैलने नहीं देते इसलिए वे आजीवन बौने ही बने रहते हैं।

स्वामी जी इस घटना का अपने प्रवचनों में प्रायः उल्लेख किया करते थे और कहते रहते थे कि जो लोग अपने सद्गुणों की जड़ें फैलने नहीं देते, उन्हें काटते ही रहते हैं वे व्यक्ति की दृष्टि में ऐसे ही बौने रह जाते हैं।

प्रायश्चित प्रकरण में अनेक प्रकार के दानों का उल्लेख हुआ है, पर धन का स्थानापन्न श्रम भी हो सकता है। वस्तुतः श्रम ही वह धन है जिसके द्वारा प्रायश्चित करना हर किसी के लिए संभव है।

सत्प्रवृत्ति संवर्धन में लगाया हुआ समय इस आवश्यकता की पूर्ति करता है। इस दृष्टि से धर्म-प्रचार के लिए की गयी पद यात्रा, तीर्थयात्रा सर्वश्रेष्ठ है। सद्भाव विस्तार के लिए जनमानस का परिष्कार आवश्यक है। यह कार्य धर्म प्रचार के लिए नियोजित की जाने वाली तीर्थयात्रा, पदयात्रा जितनी अच्छी तरह कर सकती है। उतना और किसी प्रकार संभव नहीं। प्रायश्चित के ऋण विमोचन चरण को पूरा करने के लिए अन्यान्य, सत्प्रवृत्ति, संवर्धन प्रयासों के साथ-साथ तीर्थयात्रा पर निकलने से पापकृत्यों का समाधान हो जाता है और अंतःकरण के परिमार्जन का वह लाभ मिलने लगता है जो उपासना पूर्व प्रायश्चित विधान का मूलभूत उद्देश्य है।


हम प्राण चेतना से परिपूर्ण हों!

हमारी जीव चेतना में प्राण की एक सीमित मात्रा ही भरी हुई है जिसके द्वारा जीवन का दैनिक व्यापार चलता है। भौतिक सफलताओं एवं आत्मिक विभूतियों की अतिरिक्त उपलब्धि के लिए हमें आँतरिक प्राण संपदा की मात्रा क्रमशः बढ़ानी पड़ती है और इसके लिए विराट ब्रह्माण्ड में विपुल परिमाण में संव्याप्त प्राणशक्ति से संबंध जोड़ना पड़ता है।

ब्रह्माण्ड एक ऐसा विराट सागर है जिसमें प्राणतत्व हिलोरे ले रहा है। पिण्ड सत्ता जीव सत्ता में समाहित प्राणतत्व को आत्माग्नि कहा जा सकता है और ब्रह्माण्ड में संव्याप्त प्राण को ब्रह्माग्नि। आत्माग्नि लघु है तो ब्रह्माग्नि विभु। ठीक इसी प्रकार आत्माग्नि में ब्रह्माग्नि का अनुदान सतत् पहुँचते रहना आवश्यक है। जिस साधना प्रक्रिया द्वारा इस प्रयोजन की पूर्ति होती है उसे प्राणायाम कहते हैं। प्राणायाम अर्थात् प्राण का आयाम जोड़ने की, प्राणतत्व संवर्धन की एक ऐसी प्रक्रिया जिसमें जीवात्मा का क्षुद्र प्राण-विराट चेतना के महाप्राण से जुड़कर उसी के समतुल्य बन जाय। विराट चेतना से जुड़ने और पूर्णता प्राप्त करने का यही राजमार्ग है।

यों तो “डीप ब्रीदिंग“ अर्थात् गहरी साँस लेने को आरोग्यवर्धक बताया गया है। इससे फेफड़ों को अधिक ऑक्सीजन मिलती है जो स्वास्थ्य संतुलन एवं संवर्धन में सहायक सिद्ध होती है, पर अध्यात्म विज्ञान में जिस प्राणायाम की चर्चा की जाती है, वह शरीर शास्त्रियों की प्रचलित डीप ब्रीदिंग से भिन्न होती हैं। गहरी साँस से अतिरिक्त ऑक्सीजन मिलने और स्वास्थ्य संवर्धन का मात्र शारीरिक स्थूल प्रायोजन पूरा होता है, पर यौगिक प्राणायामों से ब्रह्माण्ड व्यापी प्राण तत्व का असाधारण लाभ भी मिलता है।

वस्तुतः प्राणायाम में साँस की गति में असामान्य व्यतिक्रम निर्धारित है। इसमें घर्षण का असामान्य क्रम उत्पन्न होता है और उसकी प्रक्रिया जीवन निर्वाह की आवश्यकता पूरी करने से आगे बढ़कर शरीर में विशेष हलचलें उत्पन्न करती है। दाँये-बाँये नासिका स्वरों से चलने वाले विशेष प्रकार के मेरुदण्ड के इड़ा, पिंगला विद्युत प्रवाह को उत्तेजित करती है, वे असामान्य हलचलें ऐसे प्रसुप्त संस्थानों को जगाती हैं जो सामान्यता निर्वाह क्रम में तो आवश्यक नहीं होते पर जाग्रत होने पर मनुष्य में विशेष स्तर की अतिरिक्त मात्रा में विशेष क्षमता प्रदान करते हैं। प्राणायाम साँस की गति को तीव्र करना नहीं, उसे तालबद्ध और क्रमबद्ध करना है। इस ताल-लय और क्रम के हेर-फेर के आधार पर ही अनेक प्रकार के प्राणायाम बने हैं और उनके विविध प्रयोजनों के लिए विविध प्रकार के उपयोग होते हैं।

प्राणायाम का विधान सरल भी है और कठिन भी। सरल प्राणायाम यह है कि गहरी साँस ली जाय और पूरे फेफड़े खाली करके उसे बाहर निकाला जाय। साँस खींचते समय विश्व प्राण के अपने भीतर प्रवेश करने और स्थिर होने की भावना की जाय और निकालते समय भावना की जाय कि दुर्बलता, रुग्णता एवं अनैतिकता के सभी तत्व निकल कर बाहर जा रहे हैं और वे फिर कभी लौटने वाले नहीं हैं। यह एक प्राणायाम हुआ, यह न्यूनतम तीन बार किया जाय और फिर प्रति सप्ताह उसे एक-एक की संख्या में बढ़ाते चला जाय।

स्मरण रहे मात्र गहरी साँस लेना-छोड़ना ही प्राणायाम नहीं है। उसके साथ संकल्प, भावना और दृढ़ विश्वास भी जुड़ा रहना चाहिए। इस प्रकार अपने में प्राण तत्व की मात्रा निरन्तर बढ़ाई जाय। उसे निखिल ब्रह्माण्ड में संव्याप्त अनुभव किया जाय और खींचते समय तदनुरूप भावना की जाय। उसे इसी आकर्षण से साँस में प्राण तत्व की अधिक मात्रा अंतरिक्ष से खींचती और घुलती चली आती है। इस प्राणायाम में श्वास-प्रश्वास क्रम की विशेष प्रक्रिया और साधक की संकल्प शक्ति का समावेश होने से वह सामान्य साँस लेना न रहकर विशिष्ट ऊर्जा की उपलब्धि का विशेष आधार बन जाता है। इस प्रक्रिया द्वारा प्राणतत्व का विधिवत् आकर्षण और अवधारण किया जा सके तो ओजस तत्व उभर कर ऊपर आता है और साधक को मनस्वी, तेजस्वी एवं ओजस्वी बनने का अवसर मिलता है। भौतिक सिद्धियों एवं आत्मिक क्षेत्र की ऋद्धियों के उन्नयन का आधार प्राण प्रखरता का संपादन ही है।


ध्यान संबंधी गुत्थियाँ व उनका समाधान

जड़े जमीन में न हों ऐसे पेड़ की कल्पना करना कठिन है। ठीक उसी तरह जीवन अपना अस्तित्व, कर्म बिना भी बचाये रख सकता है, सोच पाना कठिन है। निठल्ले-निकम्मे समझे कहे जाने वालो को भोजन आदि शरीर की अनिवार्य जरूरतों को पूरा करने के लिए हाथ पैर हिलाने के लिए विवश होना पड़ता है। फिर जिनका मन सतेज, शरीर सबल है उनका कहना ही क्या? आठों प्रहर उन्हें कर्म की कठोर दीवारों और कर्म संबंधी विचारों के तन्तु जाल में बँधे फँसे रहना पड़ता है। कर्म की तपती भूमि से मानव ध्यान के शीतल सरोवर में प्रवेश कैसे करें? रोज नये कामों की नयी नयी उलझनों के चक्रव्यूह में फँसें, इसकी तप्त ज्वाला में सुलगते-झुलसते उसके मन को बचाव का एक ही उपाय सूझता है जैसे-तैसे ध्यान की शीतलता में कूद जाय। लेकिन इसके प्रवेश द्वार पर लटकी आवश्यक सूचनाओं की पट्टिका में शीर्ष स्थान पर उत्कीर्ण अक्षर समूह की चमचमाहट में स्पष्ट निषेध सुनाई देता है। कर्म नहीं इसे छोड़ना अनिवार्य है यदि ज्यादा देर तक न छोड़ सको तो कम से कम उतनी देर तक तो छोड़ना ही पड़ेगा जितनी देर ध्यान करना है।

मनीषी ए. एस. कुआ के चिंतन कोष “दि यूनिटी ऑफ मेडिटेशन एण्ड एक्शन” के अनुसार ध्यान और कर्म एक गहरे असामंजस्य के दो छोर लगते हैं। प्रबल विरोधाभास की यह अंतर्वर्ती मरुभूमि मानवीय सामर्थ्य को निश्चेष्ट करती रही है। अपने अस्तित्व की शुरुआत से मानव समाज यह धारणा संजोये रहा है, जिसे ध्यान करना है उसे कर्म का त्याग करना पड़ेगा, जिसे काम करने का मोह है उसे ध्यान का लाभ नहीं मिलेगा। बात सिर्फ हिंदू धर्म-आर्य भूमि की नहीं, जहाँ कहीं जिस किसी भूखण्ड, जाति समूह में आस्तिक भावनाएँ पनपीं व्यक्तित्त्व विकास को चरम स्तर पर पहुँचाने की ललक उमगी है। इन भावों का विकास हुए बिना नहीं रहा। ईसाई, मुस्लिम, पारसी, यहूदी, बौद्ध, जैन सभी को इन दो मनोभावों में बाँटा जा सकता है। मानव की प्रवृत्तियों और प्रकृति के इस विभाजन में कितनी ही निराशा की वेदना क्यों न सहनी पड़ी हो, पर होना इसकी मजबूरी रही है।

ऐसा नहीं कि इस गहरे असामंजस्य के बीच सेतु निर्माण की कोशिशें नहीं हुई। हर समाज ने अपनी रचना और परिवेश के अनुरूप प्रयास किये हैं। कर्मयोगी और संन्यासी दोनों के द्वारा स्वयँ को अपूर्व ठहराना और परस्पर पूरक होकर रहने की प्रतिज्ञा में बँधना इसी का एक रूप है। अब तक के सामंजस्य प्रयासों की यही सीमा रेखा है। इसे प्रमाण का अंतिम मापदण्ड मान लिये जाने के कारण लोक मानस में यह धारणा बद्धमूल हो गई कि जो ध्यानी है उसे संन्यासी हो जाना चाहिए, जो गृही है उसे ध्यान से क्या लेना देना, एक का स्वधर्म दूसरे का विधर्म बनकर रह गया, विधर्म के प्रति अधिक से अधिक संवेदना जन्य सहानुभूति भर हो सकती है। उसे अंगीकार किया जाने से तो रहा, संन्यासी गृही, भिक्षु श्रमण के रूप में दो समूह स्थायित्व पा गए।

इस बँटवारे का परिणाम यह रहा कि कर्मशक्ति और ध्यानशक्ति मिल नहीं पाई। इन दोनों महाशक्तियों का मिलन मनुष्य को जिस परमशक्ति की उपलब्धि कराता, उससे उसे वंचित रहना पड़ा। कर्म में ऊर्जा की जो प्रचण्डता समाई है, ध्यान में उससे कहीं कम नहीं। आज संसार में अपने आस-पास से दूर-दूर तक हलचलों की जो तीव्रता, सृजन और विनाश का नित नया उद्दाम प्रवेग दिखाई देता है वह और कुछ नहीं कर्म शक्ति के महासागर में उठने वाले बबूले लहरें-तरंगें भर हैं। ध्यान शक्ति की ऊर्जास्विता को आज थोड़े ही अंशों में समझा जा सकता है। वैयक्तिक रूप से यदा-कदा इसकी झलक भले दिखाई पड़ जाय। पर सामूहिक रूप में इसकी व्यापकता के बारे में सोच पाना भी कठिन है। जबकि भारत की पुरा संपत्ति पूर्व संस्कृति में इसके एक से एक अनूठे प्रयोगों की चर्चा भरी पड़ी है। यथार्थ कहा जाय तो ध्यान शक्ति की प्रबलता और प्रचण्डता कर्म से कही बढ़कर है। मनोविज्ञान के इस युग में उपर्युक्त कथन सर्वदा अनजाना नहीं है। जब शरीर की तुलना में मन की सामर्थ्य अजेय और अपराजिता मानी जाने लगी है, तब कर्म की तुलना में ध्यान की महत्ता को बड़ा स्वीकारने में आपत्ति क्यों?

इन शक्तियों की ऊर्जास्विता कितनी ही क्यों न हों, पर जब तक इनका मिलन नहीं होता परिपूर्ण लाभ की कल्पना कठिन है। मिलन के लिए जरूरी है इनकी प्रक्रिया और परिणामों से परिचित हुआ जाय। साथ ही उस बिन्दु की शोध हो जहाँ ये दोनों एकाकार हो सकें। आर्यभूमि के अध्यात्म ने हमेशा इस शोध परंपरा का अनुशीलन-अनुसरण किया है।

ध्यान महज एकाग्रता नहीं ठीक उसी प्रकार जिस तरह कर्म क्रिया कर्त्ता का योग भर नहीं, एकाग्रता ध्यान का आवश्यक किन्तु प्राथमिक चरण भर है। इसे पूरा कर लेने पर मनोलोक की सूक्ष्मताओं में अनेक घटनाएँ घटती है। मन पंचम सूक्ष्म इन्द्रिय पदार्थों से सूक्ष्म तन्मात्राओं में प्रवेश करता है। स्वयँ सूक्ष्म होकर प्रकृति की सूक्ष्मताओं को भेदता चेतना के एक के बाद दूसरे सोपानों में पहुँचने लगता है। इनमें से प्रत्येक स्तर अपने आपे में समूचा एक लोक ही है, प्रत्येक की अपनी अनुभूतियाँ अपना जीवन है, एक लोक के वासी दूसरे लोक की कल्पना नहीं कर सकते, करेंगे भी तो विकृत प्रायः। सामान्य व्यक्ति और ध्यान योगी के बीच ऐसा ही अंतर है। ये रूप आकृति की वाह्य दृष्टि से एक-सा दिखते हुए भी अंतर चेतना के धरातल पर धरती और आकाश जैसी दूरी पर निवास करते हैं।

ख्याति लब्ध विचारक आर. ए. स्ट्रेकर के चिंतन संग्रह “डिस्कवरिंग अवरसेल्वस” के अनुसार ध्यान मानव के चरम और परम विकास का सीधा, सरल व लघुत्तम मार्ग है। कर्म इस विकास की अभिव्यक्ति का माध्यम। यों किसी न किसी रूप में इनका थोड़ा बहुत संपर्क बना रहता है पर इतना काफी नहीं। अनिवार्यता इस बात की है कि शुरू से ही दोनों शक्तियाँ एकाकार हो चलें। ध्यान के प्रथम चरण में धारणा या एकाग्रता की गहरी जरूरत समझी जाती है। इसके लिए आचार्यों के आलम्बन की आवश्यकता सुझाई है। मार्ग विशेष के अनुसार इनमें भिन्नता संभव है। वास्तविक ‘अर्थों में यह विभेद मार्गों का नहीं मानव रुचियों का है। बौद्ध पूर्णिमा के चाँद को ध्यान का आलम्बन मानता है, तो आर्य सूर्य का, शैव-वैष्णव और शाक्तों में यह अपनी-अपनी इष्ट मूर्तियों का है। पर यह अंतर, अंतर नहीं है, इस कारण सूत्रकार पतंजलि प्रथम पाद के ध्यानयोग प्रकरण में “यथाभिमत ध्यानाद्धा” का उनतालिसवाँ सूत्र प्रतिपादित करते हैं। जो भी मनोनुकूल और तुम्हारे जीवन को ऊँचा उठाने वाला लगे आलम्बन के रूप में स्वीकार कर लो।

आलम्बन की उपयोगिता और महत्ता इतनी भर है कि वह चितवृत्तियों को एकाग्र करे। यह एकाग्रता साधन मात्र है, साध्य नहीं। साकारवादी हो या निराकारवादी हर किसी को इस रूप में कुछ न कुछ स्वीकारना पड़ता है। आखिर कहीं न कहीं तो मन को टिकाना ही है और यह आलम्बन के बगैर तो होने से रहा, फिर यह आन्तर हो या बाह्य-दीपशिखा, तारा, सूर्य, गुरुमूर्ति, इष्टमूर्ति, मंत्र, भाव, विचार कुछ भी क्यों न हो, रुचि विभेद के अनुसार फेर बदल संभव है। इसके लिए ऐसा सहारा क्यों न लिया जाय जहाँ सारी रुचियाँ एकाकार होती हैं, जो सभी को एक साथ संतुष्ट करें। यह आलम्बन है कर्म।

फ्रेंच विचारक देहलिन द यारदें के विचार कोष “द मेकिंग ऑफ माइंड” के अनुसार समूची सृष्टि में एक भी ऐसा मनुष्य न होगा जिसका मन किसी न किसी काम में न टिके। फिर काम किये बिना रहा भी नहीं जा सकता। इसी कारण योगेश्वर को ‘न हि कश्चित् क्षणमपि जातुतिस्ठस्यकर्मकृत’ का सूत्र रचना पड़ा। कर्म ध्यान का सहज और श्रेष्ठ आलम्बन है।

पर ध्यान के आलम्बन का निर्दोष-निष्कलुष रहना जरूरी है। यहाँ पर रह गया तनिक सा कलुष साधनामय जीवन के भविष्य और विकास समूचे को तहस-नहस कर देता है। इष्ट और गुरुमूर्तियों को स्वीकारने के पीछे पूर्णता और पवित्रता का भाव ही रहा है। सूर्य को भी सुन्दर, पवित्र, प्रेरणादायक होने के कारण स्वीकारा गया है। सामान्य कर्म दोषों से भरा रहता है। दोष जहाँ भरे रहते हैं वहाँ स्वरूप नहीं, उसके पीछे रहने वाला भाव है। शुरुआत करते ही जो दोष चढ़ दौड़ते हैं। वे यही काम करेंगे। कर्म विशेष के प्रति आसक्ति। मेरे द्वारा किया गया काम श्रेष्ठ बाकी सब कनिष्ठ। मुझसे कर्म किये बिना रहा नहीं जाता इसलिए मैं चौबीसों घण्टे काम करूंगा भले औरों का काम छीनना पड़े।

इस तरह का दूषित कर्म ध्यान का आलम्बन नहीं बन सकता। यह बात नहीं कि सिर्फ कर्म ही दोषयुक्त और अनाध्यात्मिक है और ध्यान सर्वदा दोषमुक्त और आध्यात्मिक। यह धारणा यदि त्रुटि पूर्ण नहीं होती तो ध्यान के गहरे आयामों को छूने वाले रावण, रासपुटिन अनाध्यात्मिक न होते, ध्यान के द्वारा उनका शक्ति संयम कुछ इसी तरह का था जिस प्रकार हिटलर मुसोलिनी जैसों का कर्म के द्वारा शक्ति संचय। अध्यात्म के अभाव में ये सभी स्वयं की शक्ति के द्वारा ही बुरी तरह तबाह हो गये।

इनमें आध्यात्मिकता का समावेश उस समय नितान्त जरूरी हो जाता है जब दोनों महाशक्तियों का मिलन और मिलन के रूप में परम शक्ति की उपलब्धि सोची जा रही हो, ध्यान के आलम्बन के रूप में कर्म के होने पर तन्मयता की उपलब्धि होती है। शरीर और मन की सामर्थ्य कई गुना बढ़ जाती है। लेकिन यह प्रथम चरण है। अध्यात्म के सिंहद्वार का दर्शन मात्र, प्रवेश नहीं। प्रवेश तो उस भाव के साथ होता है जिसमें हम भगवान की उपस्थिति को हृदय में अनुभव करते हैं। भावों के इस प्रवाह में भीग चुके अस्तित्व से यह निरंतर स्पन्दित होता रहे कि यह काम भगवान अपने एक यंत्र के द्वारा स्वयँ ही कर रहे हैं।

प्रक्रिया के इस सिलसिले में अनुभूतियों का वैसा ही दौर शुरू होता है जो ध्यान के अन्य साधक को मिलती हैं। क्रिया, कर्म, कर्त्ता का अलगाव ध्याता, ध्येय और ध्यान के अलगाव की भाँति है। साधना की प्रगाढ़ता में अलगाव की रेखाएँ मिट जाती हैं। साधक साकार से निराकार भाव में प्रवेश करता है। चित्त के परिपूर्ण समाधान की यही दशा समाधि की है।

ध्यान योग अष्टक योग में सर्वश्रेष्ठ बताया गया है। भक्ति ज्ञान, कर्म की तीनों धाराएँ यहाँ आकर मिल जाती हैं। यदि ध्यान का मर्म हृदयंगम किया जा सके तो सहज ही सिद्धि की उपलब्धि भी संभव है।


धर्मो रक्षति रक्षितः

अविनीत-सुनने वाले की भौहों पर बल पड़ गये माथे की रेखायें कुछ गहरी हुई। स्वर का कसैलापन झलकता पर अन्य कोई उपाय भी तो नहीं। कुछ बुदबुदाते हुए उसने एक ओर कदम बढ़ाये। शब्द अस्फुट और अस्पष्ट भले हो किन्तु उसके चेहरे से यही लग रहा था कि जैसे वह कह रहा हो धार्मिकों के इस महानगर में यह आध्यात्म कहाँ से आ गया? पर विवशता थी कि उसके बिना किसी का काम भी नहीं चलता।

उसका यह महानगर अब तो गहरे शोध प्रयत्नों का विषय बन चुका है। लेकिन इस सत्य को भौतिक विज्ञान में भूतत्व विशेषज्ञ या प्राणी विज्ञान के विशारद एक मत से स्वीकार कर चुके हैं कि पृथ्वी की केन्द्र से च्युति से पहले उत्तर दक्षिण दोनों ध्रुव प्रदेशों में मनुष्य सुख पूर्वक रहते थे। इसी दक्षिणी ध्रुव प्रदेश में एक महाद्वीप था अंतःकारिक जिसे अण्टार्कटिका कहते हैं इसी के एक महानगर की बात है यह, जिसे अंतःसालिक नाम से जाना जाता था।

यों अभी इस क्षेत्र में अनेकों रहस्य हैं। इनमें से कुछ को आधुनिक अन्वेषकों ने भी स्वीकारा हैं। जैसे वहाँ प्रत्येक वस्तु में दाहिने घूमने की विशेष प्रवृत्ति हैं। आँधियाँ दक्षिणावर्त्त चलती हैं, वहाँ के पक्षी बाँये से दाहिने मण्डलाकार चलते हैं। प्रकृति की यह शक्ति मन पर भी अनेकों प्रभाव डालती है। मन बहुत कम बाहरी दृश्यों, कार्यों में रस ले पाता है। स्वभाव से चुपचाप बैठने और अंतर्मुख होने का जी करता है यहाँ।

जहाँ प्रकृति स्वयं अंतर्मुख होने में सहायक है, मनुष्य एकाग्रता प्राप्त करने के अनेक साधनों को जीवन में उतार ले इसमें आश्चर्य की बात क्या? महाद्वीप के प्रत्येक नगर में बहुत कम कोलाहल था। राहों पर बहुत जरूरी होने पर भी कोई निकलता था। जीवन बहुत सादा और परिग्रह रहित।

कोई कान बंद किये दोनों कानों में गुटिका लगाये बैठा है। अनहद के माधुर्य के सामने जगत के सारे रस उसे फीके लग रहे हैं। कोई जिह्वा का दोहन छेदन कर उसे कण्ठ छिद्र से दबाये गगन गुफा से झरते रस के आस्वादन में मग्न है। इस स्वभाव का विचित्र परिणाम यह हुआ कि लोगों में बोलने की प्रवृत्ति नहीं रह गयी, सुनने के लिए तो जैसे किसी को अवकाश ही न था।

बस पूरे अंतःसालिक नगर में अगर कोई अपवाद था तो बस अविनीत। जहाँ प्रत्येक व्यक्ति को अपनी अंतर्मुखता के प्रयत्नों, उपलब्धियों और अपने धार्मिक होने का गर्व था। वही रहकर उसने कभी अंतर्मुख होने की कोई चेष्टा नहीं की। किसी के टोकने पर वह हँस कर बोल पड़ता। क्या परमात्मा तुम्हारे इसी हाड़ माँस के पिटारे में कैद हैं? बाहर की दुनिया में उसका अभाव है क्या? सुनने वाले का चिढ़ना सहज था। लेकिन सबको उचित सम्मान देता था वह, शायद उनके धार्मिक होने के नाते।

“मेरा पशु कीचड़ में फँस गया हैं। मैं अकेले उसे नहीं निकाल पाऊँगा। यदि आप चलते।”

वह शायद विनय के कुछ और शब्द कहता तभी कानों में यह नाम पड़ा “अविनीत”। मन ही मन झुंझलाकर रह गया लेकिन कहने वाला सहज ढंग से कह रहा था मेरे संध्याकालीन कृत्य का समय है। नियम को भंग करना असंभव हैं आप उसी को ढूँढ़ लें। अब विवशता वश इस अधार्मिक व्यक्ति से आश्रय लेना ही था।

मैं बीमार हूँ, बच्चा बहुत कष्ट में हैं। चिकित्सक को बुला देने की कृपा करेंगे आप। एक रोगी पड़ोसी से प्रार्थना करने के अलावा और कर भी क्या सकता है?

मैं अर्चन में बैठने जा रहा हूँ। आराधना में व्यतिक्रम अभीष्ट नहीं। आप राह पर नजर रखें अविनीत आता होगा इधर से। उत्तर अप्रिय अवश्य है किन्तु प्रार्थना करने वाले को मालूम है कि इस परिस्थिति में उसका उत्तर भी यही होता।

‘अविनीत’ इस शब्द के उच्चारण के साथ हर एक के मन में उपेक्षा, तिरस्कार, फटकार के भाव घुल जाते हैं। आखिर वह अधार्मिक जो है। पर वही एक आश्रय भी हैं इन विपत्ति में पड़े लोगों का। वह किसी के लिए औषधि लाने दौड़ रहा है और किसी के लिए चिकित्सक बुलाने। किसी का खोया पशु उसे ढूँढ़ना है अथवा किसी के प्रिय जन तक संदेश पहुँचा देना है। बनावट कृत्रिमता संकोच उसमें नाम का नहीं। सबके कार्य करके, सबकी सहायता करके, सबसे भिन्न रीति से रहने वाला यह अविनीत बड़ा विचित्र है। सभी कहते है साँसारिक है यह। कोई अंतर्मुख होने का साधन उसने नहीं अपनाया। उससे सेवा चाहें कितनी लोग लें, समाज में तिरस्कृत उपेक्षणीय ही है वह।

अचानक एक रात वह चौंक कर उठा। काफी कोशिश के बाद अपने गोल भवन का दरवाजा खोलने में समर्थ हुआ। बाहर उसने जो कुछ देखा उसे देख कर फूट-फूट कर रोया।

उसे अपने आस पास कुछ नहीं दिख रहा था। कोई भवन, कोई मार्ग, कोई जीवन चिह्न शेष नहीं थे। पृथ्वी की केन्द्र च्युति हुई है यह कौन बतलाता। संपूर्ण सृष्टि पर श्वेत अंधकार छाया दिख रहा था। काले अंधकार से कहीं अधिक भयानक था यह सफेद अंधेरा।

एक रात में समूचा अंतःकारिक द्वीप आज के अण्टार्कटिका में बदल गया था। पूरी रात में कितना हिमपात हुआ, जानने का कोई साधन नहीं था, कदम बढ़ाते ही अविनीत कमर तक कोमल बर्फ में धंस गया। कठिनाई से निकला लेकिन अब तक भवन का द्वार भी हिम के गर्भ में अदृश्य हो चुका था, जिसमें से अभी वह बाहर आया था।

वह सिर पकड़कर बैठ गया और रोता रहा। उसकी आंखों के सामने धुँधलका गहराता गया। लगा उसका शरीर ही नहीं मन, विचार शक्ति समूची चेतना एक गहरे अँधेरे में विलीन होती जा रही है।

उठो वत्स! पता नहीं कितनी देर के बाद उसे एक कोमल स्पर्श का आभास हुआ। आभास या सत्य? उसने बड़ी कठिनाई से आंखें खोली- सारा शरीर अभी भी थकान से चूर था। उसे अनुभव हुआ कि उसका शरीर किसी की गोद में है, किसकी? यह सोच पाये इससे पहले एक बेहोशी उसे पुनः दबाने लगी।

सिर पर स्नेह भरी थपकी देने वाले महापुरुष के प्रयत्न उसे होश में लाये। अब वह चैतन्य था। काफी देर बाद यह विश्वास कर सका वह मरा नहीं बल्कि जीवित है और यह हिमाच्छादित प्राँत अंतःकारिक द्वीप नहीं -बल्कि हिमालय है- और यह महापुरुष अध्यात्म के इस ध्रुव केंद्र में रहने वाली सिद्ध मण्डली के सदस्य परम सिद्ध कन्हैया हैं।

लेकिन स्वस्थ होते ही उसका मन पुनः चिंता से घिर गया। सामने बैठे महापुरुष ने कारण पूछा उनके स्वर में पर्याप्त वात्सल्य था।

“वह पूरा महादेश धार्मिक था। धर्म को जो धारण करता है, धर्म उसे धारण करता है।” किसी समय माता से सुने वचनों को स्मरण कर वह कह रहा था “धर्म ने वहाँ के धार्मिक लोगों का धारण रक्षण क्यों नहीं किया?”

“किया तो अवश्य पर धार्मिक का, उनका नहीं जिन्हें अपनी धार्मिकता पर दम्भ था।” महासिद्ध के होठों पर रहस्य पूर्ण मुस्कान थिरक रही थी।

“मैं और धार्मिक?” उसे इस विकट परिस्थिति में भी हँसी आ गई। हँसी थमने पर उसने उन कृपा पुरुष की ओर देखा।

“उन परम सिद्ध की आँखों से अभी भी स्नेह झर रहा है। अविनीत को संबोधित कर वे बोले वे सभी दया के पात्र थे वत्स। उनके साधनों की भीड़ में साध्य कही खो गया था। काश वे जान सके होते अपनी छलमयी झूठी तपस्या के बारे में। साधना धार्मिकता की और बढ़ चलने के प्रचण्ड पुरुषार्थ का नाम है पुत्र। महा सिद्ध एक क्षण के लिए रुके दूसरे ही क्षण उनकी वाणी का प्रवाह हिमसरिता के समान बह चला और धार्मिकता है संवेदनशीलता का चरमोत्कर्ष। इसकी प्राप्ति के लिए एक ही साधना है दूसरों की शाँति के लिए अशाँत होना, अपने आप को दलित द्राक्षा की भाँति निचोड़ कर महाअज्ञात के चरणों में उड़ेल देना। तुम इस साधना में सिद्ध हुए हो। तुम्हारी धार्मिकता के कारण उस महाअज्ञात की प्रेरणा मुझे तुम्हारे पास ले गई और आज तुम यहाँ सिद्धों की मण्डली के सदस्य हो।

अविनीत आश्चर्य से सब कुछ सुन रहा था, धर्म और साधना के गूढ़ तत्व उसे प्रत्यक्ष हो रहे थे। तभी हिमालय के स्वेत धुँधलके से कुछ छायाएँ उभरीं जो पास आकर प्रत्यक्ष हो गयी, सभी दिव्य ऋषि सत्ताएँ थी जिनका सान्निध्य उसे प्राप्त हो रहा था। सामने योजनों तक रुई की तरह बर्फ का साम्राज्य था।

अविनीत अभी भी अपनी सिद्ध देह से हिमालय के अदृश्य परिकर में रहने वाले कारक पुरुषों के साथ रहते हैं। सिद्ध समाज में उनका नाम अब अविनीतप्पा लिया जाता हैं। मादाम ब्लावतास्की जैसे अधिकारियों ने उनके दर्शन किये हैं। यह सुलभता उनके लिए भी होना संभव है जिन्होंने उन्हीं की भाँति धर्म-साधना को समझा हो।


हारमोन रसायनों का अद्भुत विलक्षण संसार

मानव की शारीरिक मानसिक और अध्यात्मिक खूबियों खामियों में हारमोन रसायन महत्वपूर्ण भूमिका संपन्न करते हैं। शरीर के प्रमुख क्रिया कलापों को यह रसायन तंत्र प्रभावित तो करता ही है, साथ ही व्यक्ति के स्वभाव, मानसिक स्तर आदि पर भी अपना असर डालता हैं। अंग-अवयवों के विकास, चयापचय, भावात्मकता, एवं समग्र व्यक्तित्व को हारमोन रसायनों की घट बढ़ से प्रभावित परिवर्तित होते देखा जाता है। इन हारमोनों के प्रमुख स्रोत अंतःस्थित नलिका विहीन कुछ ग्रंथियाँ होती हैं जिन्हें ‘एण्डोकाइन ग्लैण्ड’ या ‘अंतःस्रावी ग्रंथियाँ’ कहा जाता है। इनसे निस्सृत रसायन ही हारमोन कहलाते हैं और अपने उद्गम स्रोत से निकल कर सीधे रक्त प्रवाह में मिल जाते हैं। इनका संबंध मनुष्य जाति की विशेषताओं एवं सूक्ष्म शक्ति केंद्रों षट्चक्रों से भी होता है जिन्हें विज्ञान की भाषा में प्लेक्सस कहा जाता है।

पाया गया है कि हारमोन रसायनों का मानवी मन से गहरा संबंध है। एक के लड़खड़ाने पर दूसरा भी विकारों से ग्रस्त हो जाता है। अनुसंधानकर्त्ता वैज्ञानिक भी अब यह मानने लगे हैं कि एक ओर जहाँ हारमोन रसों को उत्पादन या प्रवाह में तनिक भी व्यतिक्रम या अवरोध उत्पन्न हो जाने पर शरीर का ही नहीं मन का भी सारा ढांचा गड़बड़ाने लगता है। वहीं दूसरी ओर यह भी सत्य है कि मनुष्य की अच्छी बुरी भावनाओं के द्वारा ही भले बुरे हारमोन शरीर में स्रावित होकर रासायनिक संतुलन या विकृति उत्पन्न करते हैं। प्रत्येक मनोभावों का पृथक विश्लेषण तो नहीं किया जा सकता पर विविध वैज्ञानिक प्रयोगों से यह अब निर्विवाद रूप से सिद्ध हो चुका है कि शुभ और अशुभ मनोभाव अंतःस्रावी ग्रंथियों को प्रभावित करके दूरगामी भले बुरे परिणाम उत्पन्न करते हैं। मन की, भावनाओं की शुद्धता और पवित्रता ही इस तंत्र की सक्रियता एवं सुदृढ़ता का आधार है। यदि यही तंत्र. दबा हुआ एवं विकृत बना रहे तो व्यक्ति स्वस्थ एवं प्रसन्न कैसे रह सकता है? व्यक्तित्व और प्रतिभा प्रखरता का लाभ उठा पाना ऐसी स्थिति में संदिग्ध ही बना रहेगा।

शरीर में चुस्ती, थकान, सर्दी, गर्मी का बाहुल्य, कद का बहुत छोटा या बहुत बड़ा होना, मंद और तीव्र बुद्धि, साहस और भीरुता, सौंदर्य और कुरूपता जैसी बातों का आधार ये ग्रंथियाँ हैं। जो हारमोन रसों को प्रवाहित करती रहती हैं और उसे रक्त में मिलाकर संजीवनी का काम करती हैं। मानवी काया में इस प्रकार की अंतःस्रावी ग्रंथियों की संख्या सात है (1) पीनियल ग्रंथि जो मस्तिष्क के मध्य में स्थित होती है (2) पिट्यूटरी ग्रंथि-मस्तिष्क मूल में (3) थाइराइड एवं पैराथाइराइड-ग्रीवा में (4) थायमस ग्लैण्ड- सीने में (5)एड्रीनल- गुर्दे के ऊपर (6) पैंक्रियाज- आमाशय के नीचे वाले भाग के पीछे स्थिति ग्रंथि एवं(7) गोनेड्स- प्रजनन ग्रंथियाँ। सामान्य अवस्था में ये ग्रंथियाँ बारह से अधिक प्रकार के हारमोन रसायन उत्सर्जित करती हैं। किन्तु भावनाओं से प्रभावित होने पर यह ऐसे विशेष प्रकार के रसायन भी उत्पन्न करती हैं जो हर्ष उत्साह आदि उत्पन्न करती और समूचे व्यक्तित्व को बदल कर रख देती हैं। शरीर के विभिन्न स्थानों में स्थित होते हुए भी सातों अंतःस्रावी ग्रंथियाँ संगीत के सप्त स्वरों की भाँति अपनी-अपनी जिम्मेदारियों का तालमेल बिठाये रहती हैं। इनमें से किसी एक के असंतुलित होते ही औरों की गतिविधियाँ भी असंबद्ध होने लगती हैं।

नलिका विहीन ग्रंथियों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण ‘पिट्यूटरी’ या ‘पीयूष’ ग्रंथि होती है। इसका स्थान मस्तिष्क में प्रति पृष्ठीय भाग में दोनों आँखों को मिलाने वाले स्थान पर ललाट के पीछे होता है। इसका मन से सीधा संबंध होता है, अतः मन में उठने वाली हर तरंग इसको प्रभावित करती हैं। पिट्यूटरी को मास्टर ग्लैण्ड भी कहा जाता है। बुद्धि की तीव्रता, आत्मीयता, उत्साह, आत्मनियंत्रण, इसका प्रमुख कार्य है। बौनापन या लम्बाई की बढ़ोत्तरी से इसी की विकृति का संबंध है। पुरुषत्व और नारीत्व का दिशा परिवर्तन यही से होता है, यौवन के उतार-चढ़ाव तथा प्रजनन सम्बंधी गतिविधियों का नियमन इसी केन्द्र द्वारा होता है। योगशास्त्रों में वर्णित सहस्रार चक्र के विकास एवं उससे स्रावित सोम का संबंध भी इसी ग्रंथि से है।

विशेषज्ञों के अनुसार पीयूष ग्रंथि यदि निकाल दी जाय तो शरीर की वृद्धि रुक जाती है। किसी कम उम्र के बच्चे के शरीर से यदि इसे हटा दिया जाय तो बुढ़ापे तक उसका शरीर बच्चों जैसा ही रहेगा। इसके विपरीत यदि उस ग्रंथि की सामर्थ्य बढ़ा कर इसके स्राव की मात्रा अधिक कर दी जाती है तो दैत्याकार शारीरिक विकास भी संभव है। वैज्ञानिक प्रयोगों के आधार पर कद के साथ पिट्यूटरी ग्रंथि का अविच्छिन्न संबंध सिद्ध भी हो चुका है। सिकंदरिया के राजदरबार के अलीपियस नामक विदूषक का कद मात्र सत्रह इंच था तथा तोते के पिंजड़े में भी वह आसानी से समा जाता था। इसी तरह विश्व का सबसे ऊँचा 9 फीट वाला राबर्ट वाइलो और 24 इंच ऊँचा बौना टामथम्ब अपनी विलक्षणता इसलिए प्रस्तुत कर सके कि उनकी पिट्यूटरी ग्रंथि के स्रावों का अनुपात रक्त में असाधारण स्तर का था।

वाशिंगटन विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक डॉ. एडगर एलन तथा डॉ. एडवर्ड ए. डौजी ने अपने अनुसंधान निष्कर्षों में बताया कि यौन उत्तेजना का प्रमुख कारण पीयूष ग्रंथि है। इससे स्रावित हारमोन रसायन यौन आकाँक्षाओं में तीव्रता ओर मंदता की स्थिति उत्पन्न करते हैं। यदि रोगियों की तरह साधारण मनुष्य भी इस ग्रंथि पर नियंत्रण साध सके तो वासनात्मक उभार पर सहजता से नियंत्रण पाया जा सकता है। इस ग्रंथि से उत्पन्न असंतुलन या विकृति से प्रजनन अवयवों का द्रुतगति से विकास होता है और प्रायः किशोरावस्था आने से पूर्व ही मनुष्य में युवावस्था के सभी चिह्न उभर आते हैं। इस तरह ग्रंथि सक्रियता के बढ़ जाने पर व्यक्ति का शरीर असाधारण रूप से ऊँचा और निष्क्रियता अपनाने पर कद बौना रह जाता है।

“द ग्लैण्ड्स आफ डेस्टिनी” नामक प्रसिद्ध कृति में मूर्धन्य वैज्ञानिक डॉ. कोब ई. गैकी ने बताया कि पिट्यूटरी ग्रंथि पर नियंत्रण रखने और उसका समुचित विकास कर लेने वाले कुछ लोगों ने इतिहास पर अधिकार रखा है और जमाने को बदल दिया है। ईसा, बुद्ध, गाँधी, लिंकन आदि ऐसे ही महापुरुष थे जिनमें आत्मानुशासन की, स्व नियंत्रण की, आत्म संयम की महान क्षमता थी। यही कारण था कि न केवल अपने समय में वरन् आने वाली मानव पीढ़ियों के लिए भी वे आदर्श कर्तृत्व एवं आदर्श नेतृत्व की अमिट छाप छोड़ गये। पिट्यूटरी ग्रंथि की विकृति का वर्णन करते हुए डॉ. गैकी ने आगे कहा कि नैपोलियन अपने पराक्रम एवं दूरदर्शी निर्णय लेने के लिए विख्यात था। जब तक उसकी हारमोन ग्रंथियाँ सशक्त बनी रही, वह युद्ध में सतत् जीतता रहा, कभी हारा नहीं पर वाटर लू के युद्ध में हार गया। उसके शव का अन्त्य-परीक्षण करने वाले डॉक्टरों ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि इस युद्ध के समय नैपोलियन की पिट्यूटरी ग्रंथि में विकृति आ गयी थी जिसके कारण वह सही समय पर उचित निर्णय नहीं ले सका और अंतर्द्वन्द्व एवं असमंजस ग्रस्त बना रहा और अवसर चूक गया।

अध्यात्म शास्त्रों में पिट्यूटरी ग्रंथि को हाइपोथेलेमस से जुड़े सहस्रार चक्र से संबद्ध बताया गया है और कहा गया है कि सहस्रार से स्रावित होने वाले अमृत रससोम के ग्रहण ओर वितरण में इसकी प्रमुख भूमिका है। आधुनिक शरीर क्रिया विज्ञानी भी इस तथ्य की पुष्टि करते हैं कि अनेक महत्वपूर्ण मस्तिष्कीय रसायनों का स्राव पीयूष ग्रंथि से होता रहता है। जो साधक या योगी इस रहस्य को जानते हैं, वे इन रसायनों को यों ही व्यर्थ नहीं होने देते, वरन् उसे धारण कर ओजस् तेजस् से लाभान्वित होते हैं। कुँडलिनी महाशक्ति से इसे संबद्ध कर मूलाधार चक्र एवं सहस्रार चक्र के मध्य समन्वय स्थापित करते और अमरत्व का पद प्राप्त करते हैं।

हारमोन रसों के बारे में यही मान्यता है कि उनकी न्यूनाधिकता को घटाया बढ़ाया जाना कठिन है। अपने निज के अंतःस्रावी ग्रंथियों को उत्तेजित या शिथिल करने में स्थायी प्रभाव उत्पन्न करने वाले उपचारों में अभी चिकित्सा विज्ञान को यत्किंचित् ही सफलता मिली है। हारमोन स्राव इतने महत्वपूर्ण और इतने अनियंत्रित हैं कि मनुष्य के लिए अभी भी एक पहेली बने हुए हैं। किन्तु प्राचीन तपस्वी, ऋषियों, योग विद्या विशारदों ने अनुसंधान के पश्चात यह जान लिया कि योगाभ्यासपरक किन उपाय उपचारों से शरीर में स्थित ग्रंथितंत्र, एवं सूक्ष्म शक्ति केन्द्रों, चक्रों को जाग्रत एवं विकसित किया सकता है। उन्हें सशक्त सक्रिय बनाया और उनसे लाभान्वित हुआ जा सकता है। आसन, प्राणायाम, ध्यान आदि परक अष्टग योग के विधि विधानों का सृजन इसी निमित्त हुआ था, इनका आश्रय लेकर हर कोई अपने ग्रंथि समूह एवं षट्चक्रों को जाग्रत कर अमृत रसायनों का रसास्वादन करते हुए महानता का वरण कर सकता है।


महामानवों की ढलाई करने वाला- उच्चस्तरीय मनोविज्ञान

सामान्यतया जीवनक्रम की इतिश्री साधन सुविधाओं को अर्जित करने और भोगने में मान ली जाती है। इतने पर भी हर युग में कुछ ऐसे व्यक्ति होते आये हैं जिन्होंने सामान्य से दीख पड़ने वाले जीवन को असामान्य बनाया। उसे इस रूप में ढाला कि देखने वाले कठिनतापूर्वक विश्वास कर सकें यह पहले वाला वही साधारण व्यक्ति हैं जो अब कतिपय सूत्रों को अपनाकर असाधारण हो गया है।

बाहर से रूप रंग काया ढांचा के आधार पर विवेचना विश्लेषण करने पर प्रायः सभी एक समान दिखाई देते हैं। इतने पर भी निर्विवाद रूप से यह स्वीकारा जाता है कि शंकराचार्य, विवेकानन्द, गाँधी, बुद्ध सरीके व्यक्ति सामान्य से परे महान थे। कौन सी चीज है, जो उनकी महानता का कारण बनी? शारीरिक ढांचे में अंतर तो कोई खास था नहीं। साधन सुविधाओं की दृष्टि से भी वे बहुत अधिक समुन्नत नहीं कहे जा सकते थे। फिर उन्होंने इसका आश्रय भी नहीं लिया जिससे कोई यह कह सके कि उनकी ख्याति इन्हीं से फैली हो। फिर भी कारण क्या है? उत्तर मनोविज्ञान देता है। इस दिशा में प्रगति की ओर बढ़ते कदम इस महानता के रहस्य को बहुत करीब से अनुभव करने लगे हैं। इसमें जुटे हुए वैज्ञानिकों ने अध्यात्म को महामानव ढालने का विज्ञान कह कर स्वीकारा है। वास्तविकता भी यही है। व्यक्ति की महानता बाह्य परिस्थितियों, साधन सामग्रियों अथवा किसी वस्तु पर निर्भर नहीं करती। यह तो मानवीय चेतना की एक अवस्था का नाम है। जिसकी प्राप्ति आध्यात्मिक प्रणाली के द्वारा काटने-छाँटने-तराशने से ही हो सकती है। कोई भी किसी स्तर का व्यक्ति बिना किसी भेद भाव के इसे उपलब्ध करा सकता है।

मनुष्य के चिंतन, चरित्र, व्यवहार की निर्भरता उसकी आँतरिक चेतना के स्तर पर निर्भर है। यदि यही अनगढ़ है, तो फिर जीवन में उत्कृष्टता आए कैसे? आँतरिक चेतना को समझाते हुए अध्यात्म मनोविज्ञान ने इसे कल्पना, मन, विवेचना बुद्धि, चित्त अचेतन संस्कार और अहं मान्यता कह कर स्पष्ट किया है। यही चार क्षेत्र मिल जुल कर मनुष्य जीवन के प्रत्येक क्षेत्र को ऊँचा उठाते या नीचा गिराते हैं। इसी को सुधारने सँवारने पर जीवन सुधर सँवर सकता है।

अभी तक इनको सुधारने सँवारने वाली अध्यात्म विद्या को गुह्य विद्या के रूप में जाना माना जाता था। अब भी इस प्रक्रिया के अस्तित्व से तो इन्कार नहीं किया गया है, पर उसके प्रति मान्यता कुछ ऐसी बन गयी थी कि इसका उपयोग कुछ ही व्यक्तियों द्वारा संभव है। इसके उपचार भी सर्वजनीन व वैज्ञानिक नहीं हैं न माने जाते थे। पर ये विगत युगीन मान्यताएँ अब समाप्त प्रायः हो गयी हैं। आज अध्यात्म एक सशक्त उच्चस्तरीय मनोविज्ञान के रूप में उभर कर सामने आ गया है।

आधुनिक समय में मनोवैज्ञानिक सिर्फ शरीर व मन तक सीमित नहीं रहा। इसका उपयोग न केवल गड़बड़ियों को ठीक करने में रहा, बल्कि इसकी और भी गति हुई कि अनगढ़ को सुगढ़ और सुगढ़ को और अधिक स्वरूपवान कैसे बनाया जाय? अध्यात्म के सूत्र सिद्धाँतों को वैज्ञानिकता की कसौटी पर खरा साबित करने वालों के लिए कई धाराएँ हैं। इनमें बुद्धि मनोविज्ञान प्रमुख है। जिसकी विवेचना जी. डब्लू. आलपोर्ट की “दि कोर्स ऑफ बिकमिंग“, सी. आर. राजर्स की “टूवर्डस ए थ्योरी ऑफ क्रिएटिविटी एण्ड इट्स कल्टीवेशन” आदि में मिलता है। इनके अतिरिक्त फ्रैंकल, इरा प्रोगाफ आदि ने अन्य धाराएँ विकसित की हैं जिसे उन्होंने “आर्थो साइकोलॉजी” नाम दिया है। इसी तरह राबर्टी असागिओली ने साइको सिंथेसिस नामक पद्धति विकसित की है। इन सभी धाराओं का समूह मनोविज्ञान के क्षेत्र में तीसरी शक्ति के रूप में विख्यात हुआ है। कुछ ने इसे मनोविज्ञान आध्यात्मीकरण की संज्ञा दी है।

प्रश्न नाम का नहीं है। सवाल यह है कि अध्यात्म के सूत्रों, तकनीकों, प्रक्रियाओं के वैज्ञानिकता की कसौटी पर खरे उतरने मात्र से ही क्या मानव जाति अपनी विस्मृत सम्पदा को फिर से पहचान सकेगी? मनोविज्ञान को समूचे खोजने में दो चीजें भरी हैं सूत्र और तकनीक। सूत्रों की स्थिति का विवेचन होने के साथ तकनीकों के संकेत हैं। तकनीकों द्वारा स्थिति को ठीक करने के प्रयास किये जाते रहे। सारी पद्धति का एक ही उद्देश्य था कि रोगी को निरोग कैसे किया जाय। अध्यात्म मनोविज्ञान न सिर्फ मानसिक परेशानियों से छुटकारा दिलाता है बल्कि उससे एक कदम और आगे बढ़कर महानता को उपलब्ध कराने, जीवन को गरिमापूर्ण बनाने का राज खोलता है।

बात सही भी है हमारे अंतराल (चित्र) के पाँच अवस्थाएँ हैं क्षिप्त, मूढ़, विक्षिप्त, एकाग्र और निरुद्ध। पहली में आँतरिक स्थिति हमेशा चलायमान रहती है। परिणाम स्वरूप चिंतन व व्यवहार भी अस्थिर होता है। सामान्यतया इस स्थिति में छोटे बच्चे रहते हैं, पर कभी कभी बड़ों में इसकी उपस्थिति रहने पर उनमें बचकानेपन के लक्षण दिखाई पड़ते हैं। मूढ़ स्थिति जड़ता अथवा पागलपन की दशा है। इसमें समूचा जीवन क्रम नष्ट प्रायः होता है। तीसरी स्थिति औसत व्यक्ति की है। कभी दुखी कभी सुखी कभी हैरान परेशान कभी प्रफुल्ल प्रसन्न। ऐसी दशा में मनुष्य साधारण सोच विचार वाला प्राणी भर होता है। अंतराल की गहराइयों में दिव्य क्षमताओं, शक्तियों का जो खजाना दबा छिपा है वह प्रकाश में नहीं आता। परिणाम स्वरूप इस अमूल्य धन के रहते भी वह उस क्षेत्र में निर्धन कंगाल सी जिंदगी गुजारता रहता है।

अध्यात्म की वैज्ञानिक प्रणाली इस स्थिति से आगे बढ़ने और स्वयं में निहित महानता को उजागर करने का मार्ग सुझाती है। यों तो इसके लिए बताई गई तकनीकों की संख्या सैकड़ों हजारों में हैं, पर सामान्य जन इसमें से जप, ध्यान प्राणायाम आदि उपचारों से थोड़ा बहुत परिचित हैं। यद्यपि इनमें हर एक के कई कई प्रकार हैं। व्यक्ति की स्थिति के अनुरूप इनमें से किसी उपयुक्त प्रकार का आलम्बन मन को एकाग्र स्थिति में ले जा सकता है। सारे अन्वेषण महत्वपूर्ण कार्य इसी स्थिति में संपन्न होते हैं। विभूतियों, महानताओं का दरवाजा इसी दशा में खुलना शुरू होता हैं। इस तत्व को स्पष्ट करते हुए स्वामी विवेकानन्द का कहना है कि संसार का हर महान व्यक्ति किसी न किसी रूप में आध्यात्मिक रहा है, भले ही वह इसके बारे में स्वयं पूरी तरह अवगत न हो।

आध्यात्मिकता और महानता परस्पर समानुपाती हैं। एक जितनी मात्रा में आयेगा दूसरा भी उतनी ही मात्रा में पनपेगा। बढ़ी हुई एकाग्रता पवित्रता के साथ मिलकर एक नया सोपान पाती है निरुद्ध अवस्था का। यह मनुष्य की महान स्थिति है। अंतराल के इसी विकास को उपलब्ध कर वह मानव से महामानव बनता है।

सुप्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक डॉ. इन्द्रसेन ने अपने शोध अध्ययन “इन्टीग्रल साइकोलॉजी” में “अध्यात्म विज्ञान को पूर्ण मनोविज्ञान का नाम दिया है। तथ्यतः यह बात ठीक भी है। मनो विज्ञान की पूर्णता और अध्यात्म की वैज्ञानिकता इसी बिंदु पर आकर मिलती हैं। विभिन्न प्रयोगों द्वारा इसके परिणामों को जाँचा-परखा और खरा पाया गया है। इस विज्ञान का व्यापक स्तर पर प्रसार ही व्यक्तिगत स्तर पर मनुष्य में देवत्व का उदय और समाजिक स्तर पर धरती पर स्वर्ग के अवतरण में सहायक सिद्ध हो सकेगा।

मानवीय चेतना के परिष्कार और उसके महामानव स्तर तक के उन्नयन का ठीक और सही समय यही है। इस तरह से ढले व गढ़े हुए व्यक्ति प्रारम्भ में संख्या की दृष्टि से कम हों तो कोई बात नहीं। बुद्ध अरविंद जैसे महामानव पहले भी कम ही हुए हैं, पर उन्होंने अपनी महानता के बल पर अनेकों को दिशा दी। ऋषि युग में मूर्धन्य सप्त ऋषियों की ही गणना की गयी, पर यह नहीं समझना चाहिए कि उनके अलावा और उच्चस्तरीय प्रतिभाएँ तब नहीं थीं। इन दिनों भी जरूरत भी इसी बात की है कि मानवी गरिमा को निष्कृष्टता के दलदल से उबारा तथा आत्मिक दृष्टि से उच्च शिखर तक पहुँचा दिया जाय।

हम सभी के अंतराल में दिव्य क्षमताओं का खजाना भरा पड़ा है। इसे निकालने के लिए स्वयं के जीवन में अध्यात्म मनोविज्ञान को अविच्छिन्न रूप से समाविष्ट करना होगा। ऐसा करने पर क्राँतिकारी परिवर्तन होने संभव नहीं सरल भी हैं। यदि हम इस उच्चतम मनोविज्ञान की तकनीकों का अवलम्बन लेकर स्वयं की चेतना को परिष्कृत करने के निमित्त तत्पर हो सकें, गुण, कर्म, स्वभाव को अपनी गरिमा के अनुरूप ढाल सकें, तो जीवन उत्कृष्ट, समुन्नत, प्रखर बन सकेगा यही देवत्व है। इन विशेषताओं और विभूतियों से मानवी अंतराल भरा पड़ा है। उसे निखारने व उभारने भर की जरूरत है। अध्यात्म की वैज्ञानिक तकनीकों द्वारा इसे सरलतापूर्वक संपन्न कर सकना हम में से प्रत्येक के लिए संभव है।


मंत्र सिद्धि का रहस्योद्घाटन!

विश्व व्यापी ब्रह्म चेतना के साथ मनुष्य का सघन और सुनिश्चित संबंध है, पर उसमें मल विक्षेप आवरण जैसे अवरोधों ने एक प्रकार के विच्छेद जैसी स्थिति पैदा कर दी है। बिजली घर और कमरे के पंखे के बीच लगे हुए तारों में यदि कहीं गड़बड़ी उत्पन्न हो जाय तो पंखा और बिजली घर दोनों ही अपने-अपने स्थान पर वही रहते हुए भी सन्नाटा छाया रहेगा। पंखा चलेगा नहीं निःचेष्ट पड़ा रहेगा। मंत्र साधना इन शिथिल संबंधों को पुनः प्रतिष्ठापित करने की सुनिश्चित पद्धति है। विश्व चेतना के साथ व्यक्ति को जोड़ने वाला राज मार्ग है।

मंत्र विद्या के प्रख्यात ग्रंथ “मंत्रमहार्णव” के अनुसार मंत्र का प्रत्यक्ष रूप ध्वनि है। ध्वनि भी क्रमबद्ध, लयबद्ध, और वृत्ताकार। एक क्रम से निरंतर एक ही शब्द विन्यास का उच्चारण किया जाता रहे तो उसका एक गति चक्र बन जाता है। तब शब्द तरंगें सीधी चलने की अपेक्षा वृत्ताकार घूमने लगती हैं। रस्सी में पत्थर का टुकड़ा बाँधकर उसे तेजी से चारों ओर घुमाया जाय तो उससे दो परिणाम होंगे। एक यह कि वह गोल घेरा जैसा दिखेगा। रस्सी और ढेले का गतिशील चक्र में बदल जाना एक दृश्य चमत्कार है। दूसरा परिणाम यह होगा कि उस वृत्ताकार घुमाव से एक असाधारण शक्ति उत्पन्न होगी। इस प्रकार यदि उसे फेंक दिया जाय तो तीर की तरह सनसनाता हुआ दूर निकल जायेगा। मंत्र जप से यही होता है। कुछ शब्दों को एक रस एक स्वर एक लय के अनुसार बार बार दोहराते रहने से उत्पन्न हुई ध्वनि तरंगें सीधी या साधारण नहीं जाती। वृत्ताकार उनका घुमाया जाना अंतरंग पिण्ड तथा बहिरंग ब्रह्माण्ड में एक असाधारण शक्ति प्रवाह उत्पन्न करता है। उसके फलस्वरूप उत्पन्न हुए परिणाम को मंत्र का चमत्कार कहा जा सकता है।

महायोगी अनिवार्ण के ग्रंथ ‘अंतरयोग‘ के अनुसार मंत्रों का शब्द चयन योग विद्या में निष्णात् तत्ववेत्ताओं ने दिव्य चेतना एवं सघन अनुभूतियों के आधार पर किया है। यों इन शब्द विन्यासों में प्रेरणाप्रद अर्थ और संदेश भी होते हैं पर इनकी महत्ता उतनी नहीं जितनी शब्द गुन्थन की। अर्थ की दृष्टि से भी उनसे भी अधिक भावपूर्ण कविताएँ हैं और हो सकती हैं। फिर सूत्र जैसे छोटे मंत्रों में उतनी विस्तृत भाव शृंखला भरी भी नहीं जा सकती जितनी आवश्यक है। वस्तुतः मंत्र की महत्ता उसके ‘स्फोट’ में है।

‘स्फोट’ का मतलब है ईश्वर तत्व में होने वाला ध्वनि विशेष का असाधारण प्रभाव। तालाब में छोटा ढेला फेंकने से थोड़ी और छोटी लहरें उत्पन्न होती हैं। पर यदि बड़ी ऊँचाई से बहुत जोर से कोई बड़ा पत्थर पटका जाय तो उसका शब्द और स्पन्दन दोनों ही अपेक्षाकृत बड़े होंगे और उसकी प्रतिक्रिया प्रतिध्वनि भी बड़ी लहरों के साथ दिखाई देगी। मंत्र विद्या के संबंध में इसी को स्फोट कहा कहा जाता है। इस दृष्टि से गायत्री मंत्र की शब्द संरचना अनुपम और अद्भुत है। आगम और निगम का समस्त भारतीय अध्यात्म इसी पृष्ठ भूमि पर खड़ा है। मंत्र और तंत्र की अगणित शाखा प्रशाखाएँ इसी का परिवार हैं। मंत्र की अगली धारा है लय। उसे किस स्वर में किस प्रवाह में उच्चरित किया जा रहा है, इसे लय कहते है। साधारणतया मानसिक, वाचिक, उपाँशु नाम से लय की न्यूनाधिकता का वर्गीकरण किया जाता है। वेद मंत्रों में इसे उदात्त अनुदात्त और स्वरित कहते है। सामगान में सप्त स्वरों तथा उनके आरोह अवरोह का ध्यान रखा जाता है। यह लय क्रम ही संगीत का मूल आधार है। जानकार जानते हैं कि शास्त्र सम्मत संगीत का शरीर और मन पर ही नहीं बाह्य वस्तुओं और परिस्थितियों पर भी प्रभाव पड़ता है। वैदिक और ताँत्रिक मंत्रों का सारा वाङ्मय लय तथ्य को अपने गर्भ में छिपाये बैठा है। किसी भी रीति से किसी भी ध्वनि में मंत्र साधना की भावात्मक आकाँक्षा भले पूरी कर ले पर उससे वैज्ञानिक लाभों का प्रयोजन पूरा न होगा।

मंत्र साधक अंतरिक्ष से अवतरित होने वाली शक्ति प्रवाह को धारण कर सकें, इसके लिए शारीरिक-मानसिक स्वच्छता और समर्थता के लिए प्रयास करना अनिवार्य है। राजयोग में यम-नियमों की साधना मानसिक परिष्कार के लिए और आसन-प्राणायाम का अभ्यास शारीरिक सुव्यवस्था के लिए है। यदि इन आरंभिक चरणों को पूरा न किया जाये तो फिर प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि की उच्चस्तरीय साधना में प्रवेश पा सकना संभव नहीं।

इसके अतिरिक्त अगली शर्त हैं- भाव भरी मनःस्थिति। इसे दूसरे शब्दों में श्रद्धा कहा जा सकता है। अविश्वासी और अन्यमनस्क व्यक्ति उपेक्षा और उदासीनता के साथ कोई साधना करते रहें तो चिरकाल व्यतीत हो जाने और लम्बा कष्ट साध्य अनुष्ठान कर लेने पर भी अभीष्ट लाभ की गुँजाइश नहीं है। श्रद्धा आत्मिक उपलब्धियों का प्राण है। प्राण रहित शरीर की कितनी भी सार-सँभाल की जाय उससे कुछ काम न बनेगा। साधना की सफलता के लिए जरूरी है कि साधक की प्रकृति और प्रवृत्ति श्रद्धासिक्त बनें।

‘जप सूत्रम’ नामक लोक विश्रुत ग्रंथावली के रचनाकार स्वामी प्रत्यगात्मानन्द के अनुसार उपर्युक्त पाँच शर्तें मंत्र साधना के कर्म पक्ष हैं। लेकिन कर्म की पूर्णता तभी है जब वह ज्ञान के साथ जुड़ा हो। इस ज्ञान पक्ष में पाँच तत्वों का आकलन किया गया है। ये पाँच तत्व हैं (1)ऋषि (2)छन्द (3)देवता (4)बीज (5)तत्व। इन्हीं से मंत्र शक्ति सर्वांगपूर्ण बनती है। प्रत्येक मंत्र के विनियोग में इनका स्मरण किया जाता है। इन पाँचों की तरह हमारे अस्तित्व की, परतें हैं जिन्हें आवरण या कोश कहते हैं। अन्नमय कोश, प्राणमय कोश, मनोमय कोश, विज्ञानमय कोश, आनन्दमय कोश इन पाँच आधारों को प्रस्फुटित प्रदीप्त एवं प्रयुक्त कैसे किया जाय मंत्र साधना के पाँचों तत्वों में इसी का पथ प्रदर्शन है।

‘ऋषि’ तत्व का संकेत हैं मार्गदर्शक गुरु। ऐसा व्यक्ति जिसने उस मंत्र में पारंगता प्राप्त की हो। सर्जरी-संगीत जैसे क्रिया कलाप अनुभवी शिक्षक ही सीख सकता है। चिकित्सा ग्रंथ और औषधि भण्डार उपलब्ध रहने पर भी चिकित्सक की आवश्यकता रहती है। विभिन्न मनोभूमियों के कारण साधना पथिकों के मार्ग में भी कई प्रकार के उतार चढ़ाव आते हैं, उस स्थिति में सही निर्देशन और उलझनों का समाधान केवल वही कर सकता है जो उस विषय में प्रवीण हो, गुरु का यह आवश्यक कर्तव्य भी है कि शिष्य का न केवल पथ प्रदर्शन करें बल्कि उसे अपनी शक्ति का एक अंश अनुदान देकर प्रगति पथ को सरल भी बनावे। अतएव ऋषि का आश्रय साधना का प्रथम सोपान है।

‘छन्द’ का अर्थ है मंत्र की शब्द संरचना और उच्चारण शैली। शब्दों के इस आश्चर्यकारी प्रयोग को साधना विज्ञान में यति कहा गया है। मंत्रों की एक यति सब के लिए उचित नहीं। व्यक्ति की स्थिति और उसकी आकाँक्षा को ध्यान में रखकर यति का लय का निर्धारण करना पड़ता है। साधक को उचित है कि मंत्र साधना में प्रवृत्त होने से पूर्व अपने उपर्युक्त छन्द की लय का निर्धारण कर ले।

मंत्र साधना का तीसरा तत्व हैं देवता। देवता का अर्थ है चेतना सागर में से अपने अभीष्ट शक्ति प्रवाह का चयन। आकाश में एक ही समय में अनेक रेडियो स्टेशन बोलते रहते हैं पर हर एक की फ्रीक्वेंसी अलग होती है। ऐसा न होता तो ब्रॉडकास्ट किये गये सभी शब्द मिलकर एक हो जाते। शब्द धाराओं की पृथकता और उनसे संबंध स्थापित करने के पृथक माध्यमों का उपयोग करके ही किसी रेडियो सेट के लिए संभव है कि अपनी पसंद का रेडियो प्रोग्राम सुने और अन्यत्र चल रहे प्रोग्रामों को बोलने से रोक दे।

अखिल ब्रह्माण्ड में ब्रह्म चेतना की अनेक धाराएँ समुद्री लहरों की तरह अपना पृथक अस्तित्व लेकर चलती है। इनमें से प्रत्येक के स्वरूप एवं प्रयोजन को ध्यान में रखते हुए भी उन्हें देवता कहा जा सकता है। साकार उपासना पक्ष इनकी अलंकारिक प्रतिमा बना लेता है। निराकार इन्हें दिव्य तरंगों के रूप में पकड़ता है। इस प्रकार ब्रह्म चेतना की किस दिव्य तरंग का प्रयोग किया जाय इसके लिए विभिन्न विधान आधारित हैं। किस के लिए देव संपर्क का क्या तरीका ठीक रहेगा यह निश्चय करके मंत्र साधक को अपने साधना पथ पर बढ़ना होता है।

बीज का अर्थ है उद्गम। मानवी शरीर अपने में समूचा रहस्य संस्थान है। इसमें षट्चक्रों एक सौ आठ उपत्यिकाओं सहस्र शक्ति नदियों का निर्धारित स्थान है। इन स्थानों को शक्ति संपर्क के स्विचबोर्ड कहना कोई अत्युक्ति नहीं। किस मंत्र के देवता का शरीर में संपर्क स्थान कहाँ है उसे किस विधि से प्रभावित करें इस जानकारी को बीज विज्ञान कहते है। ह्रीं -श्रीं -क्लीं -ऐं -यं -वं आदि बीज अक्षर भी हैं। इन्हें किसी मंत्र में अतिरिक्त शक्ति भरने का सूक्ष्म इन्जेक्शन कह सकते हैं। आवश्यकतानुसार मंत्रों के साथ इन अतिरिक्त बीजों को भी जोड़ दिया जाता है। गायत्री मंत्र में इन्हें लगाना अनिवार्य नहीं है, क्योंकि इस मंत्र का प्रत्येक अक्षर स्वयं में बीज जैसी शक्ति का स्त्रोत है। बीज स्थान और बीज शक्ति का प्रयोग करके मंत्र को सामर्थ्य बनाने वाली ब्रह्मचेतना के साथ संबंध जोड़कर उसका समुचित लाभ उठाया जा सकता है।

मंत्र के पाँचवे तत्व को ‘तत्व’ कहते हैं। यही मंत्र की कुँजी है। स्थूल रूप में पंच तत्वों और तीन गुणों के रूप में भी मंत्रों की प्रवृत्ति मिलती रहती है। उस तत्व के अनुरूप पूजा उपकरण इकट्ठे करके भी तत्व साधना की जाती है। इस आधार पर यह भी निर्माण निर्धारण किया जाता है कि किस मंत्र की, किस उद्देश्य के लिए, किस स्थिति की व्यक्ति साधना करें तो उसे आहार, वस्त्र, रहन-सहन, माला, दीपक, धूप, नैवेद्य आदि में किस प्रकार का चयन करना चाहिए। तत्व निर्धारण में इन्हीं बातों का ध्यान रखा जाता है।

दबी हुई प्रसुप्त क्षमता को प्रखर बनाने के लिए ऊर्जा की आवश्यकता पड़ती है। मंत्रों की सफलता का आधार इसी ऊर्जा का उत्पादन है। मंत्र विज्ञान का सारा कलेवर इसी आधार पर खड़ा किया गया है। आयुर्वेद में वमन, विरेचन, स्नेहन, स्वेदन- नस्य यह पंच कर्म शरीर-शोधन के लिए हैं। मंत्र साधना की भी पाँच शर्तें और पाँच तत्व हैं। जो इन साधनों को जुटाकर साधना में प्रवृत्त हो उसे अभीष्ट प्रयोजन की प्राप्ति निश्चित है।


समय की पहली माँग- दूरदर्शिता

आँखों की ज्योति जब अतिशय क्षीण हो जाती है तो मात्र निकटवर्ती चीजें ही दीख पड़ती हैं। दूर पर तो कुहासा ही छाया प्रतीत होता है। न कुछ सूझ पड़ता है न दीखता है। मोतियाबिंद पक जाने पर भी यही स्थिति हो जाती है। लाठी के सहारे निकटवर्ती स्थिति का कुछ अनुमान लगाकर ही किसी तरह काम चलाया जाता है। छोटे बच्चों की समझ भी निकटवर्ती चमकीली वस्तुओं पर ही ललचाती और टिकती है। वे जैसे ही रेंगना शुरू करते हैं सामने पड़ी चमकदार वस्तुओं को ही पकड़ते हैं और उनका उपयोग मुँह में डाल लेना भर समझते हैं। खिलौने, सिक्के, मिर्च, कीड़ा कुछ भी क्यों न हो। जो भी हाथ आता है, उसे पकड़ते और मुँह में रखते हैं। पीछे चाहे इसका परिणाम कुछ भी क्यों न भुगतना पड़े। भविष्य भी कुछ होता है और उसको भी ध्यान में रखा जाना चाहिए। इतनी समझ उन्हें होती ही कहाँ है? मानसिक दृष्टि से अविकसित पगले भी तात्कालिक चंचलता भर से प्रेरित रहते हैं। आगा पीछा भी उन्हें भी कुछ नहीं सूझता।

चिड़ीमार के जाल में चिड़ियाँ एक जगह कुछ दाने पड़े देखकर ही दौड़ पड़ती हैं और जान जोखिम उठाती हैं। मछलियों को भी सामने का चारा देखकर टूट पड़ने पर यही दुर्गति होती है। चासनी के कढ़ाव में कूद कर मक्खियाँ भी कम नहीं पछताती। उस भूल का प्रायश्चित वे जान गवाँ कर ही कर पाती हैं। यह सब अबोध स्थिति की चर्चा है। पर उन्हें क्या कहा जाय जो समझदारी का दावा करते हुए भी उसी प्रकार का आचरण करते हैं।

कई उजड्ड बच्चे बुरे लड़कों की संगति से आवारागर्दी के कुचक्र में फँस जाते हैं। पढ़ना लिखना छोड़ देते हैं। दुर्व्यसनों के आदी बन जाते हैं। आरंभ में तो अभिभावकों का रोकना समझाना तक बुरा लगता है पर बड़े होने पर प्रतीत होता है कि उनने आधी जिंदगी खराब कर ली। पीछे पछताते हुए मौत के दिन पूरे करने पड़ते हैं। छोटे कीड़े मकोड़ों की आंखें भी सिर्फ पास का ही देखती हैं। फलतः वे राहगीरों के पैर तले कुचलते रहते हैं।

यदि सैनिकों के पास दूरबीन न हो तो वे छिपे हुए शत्रु छापामारों के हमले का शिकार हो सकते हैं। जलयानों को दूरबीन के बिना अपनी यात्रा में भारी कठिनाई का सामना करना पड़ सकता है। आकाश में ऊँचे उड़ने वाले पक्षी भी तेज दृष्टि होने के कारण ही जमीन पर अपनी खुराक खोज पाते हैं। पैनी दृष्टि जिसे समझदारों की भाषा में दूरदर्शिता भी कहते हैं, मनुष्य के लिए एक वरदान है।

मूर्खता मात्र वर्तमान में ही जीती है। वह न भूतकाल के अनुभवों से कुछ शिक्षा लेती है और न भविष्य का अनुमान लगा सकने की क्षमता होती है। फलतः उनके लिए कोई उपयोगी लक्ष्य बना पाना तक संभव नहीं होता है, कि वे समय और श्रम को सुनियोजित करके कोई बड़ी उपलब्धि प्राप्त कर सकें। वह तो बन ही कैसे पड़े? हवा के साथ उड़ने वाले पन्नों की तरह भली बुरी परिस्थितियों के साथ उठते गिरते, उड़ते-पिछड़ते रहते हैं। इस संयोग को विदूषक का एक भोंड़ा मजाक ही कहना चाहिए।

किसी जमाने में दूरदर्शिता मनुष्य की समझदारी के साथ अविच्छिन्न रूप से गुथी हुई थी। फलतः वे सोच पाते थे। की जीवन के क्षणों की बहुमूल्य सम्पदा के बदले कुछ ऐसा खरीदना चाहिए, जिस पर अपने को संतोष और दूसरों को प्रकाश का लाभ मिले। इस स्तर के लोगों को ही दूरदर्शी प्रज्ञावान कहा जाता है। वे ही कुछ ऐसा कर पाते हैं, जिनके लिए उन्हें चिरकाल तक सराहा जा सके।

बहुमूल्य सफलताएँ अर्जित करने वालों में से प्रत्येक को दूरदर्शिता अपनानी पड़ती है। सोचना पड़ता है कि आज के विचार और कृत्य कल के लिए क्या परिणति परिस्थिति उत्पन्न करेंगे, यह समझ जिन्हें होती है, वे आरंभ में कष्ट सहकर भी भविष्य को उज्ज्वल बनाने वाला आवश्यक मूल्य चुकाते हैं। विद्यार्थी स्नातकोत्तर कक्षा उत्तीर्ण करने तक चौदह वर्ष की एकाग्रता भाव से तप साधना करते हैं और प्रतियोगिता में बाजी मारकर ऊँचे अफसर का पद पाते हैं। किसान एक वर्ष तक खेत की मिट्टी को पसीने से सींच कर कोठे भरी फसल काटता है और साथियों में सिर ऊँचा उठाकर चलता है। व्यवसायी, शिल्पी, कलाकार लम्बे समय तक साधनारत रहते हैं और उपर्युक्त समय पर श्रेयाधिकारी बनते हैं। लम्बे समय तक अखाड़े की साधना करने पर ही पहलवानों को मिलने वाले पुरस्कार को हस्तगत करने का अवसर मिल पाता है। इसे प्रकाराँतर की साधना कह सकते हैं। योगी जब इसी मार्ग पर अवलम्बन करते हैं तो सिद्ध पुरुष बनते हैं। आध्यात्मिकता अथवा भौतिक स्तर की बड़ी सफलताएँ पाने वाले मनमौजी नहीं रहे हैं। उनने भविष्य पर दृष्टि दौड़ाई है। तदनुरूप योजना बनाई है और एक निष्ठ भाव से अनवरत यात्रा करते हुए ऊँचे लक्ष्य तक पहुँचने में सफलता पाई है। जिन्हें सिर्फ आज ही सूझा कल पर दृष्टि नहीं गई वे घाटे में रहे हैं और उपहासास्पद बने हैं।

स्वाद में चटोरे व्यक्ति गरिष्ठ वस्तु अति मात्रा में खा जाते है और कुछ ही समय में पेट दर्द, उल्टी दस्त, आदि के विकार बनते हैं। इन्द्रिय लिप्सा के अनेक प्रसंग सामने आते हैं। आतुरतापूर्वक आंखें मींचकर टूट पड़ने वाले लोग अपना शरीर और मस्तिष्क बुरी तरह खोखला कर लेते हैं। बीमारियों का शिकार होते हैं और अकाल मृत्यु के मुँह में जा घुसते हैं। चोर, लबार, ठग अपराधी प्रकृति के व्यक्ति तत्कालिक लाभ देखते हैं और यह भूल जाते हैं कि कुकर्मों का देर सवेर में इतना महँगा मूल्य चुकाना पड़ेगा, जिसे वहन करना अतिशय कष्ट साध्य होगा। अनाचार अपनी आँखों में तो पतित होता है भेद खुलते खुलते वह किसी की आँखों में अविश्वस्त और घृणास्पद बन जाता है। दण्ड अवस्था तक पहुँचना पड़े तो प्रताड़ना और भर्त्सना का कहर बरसता है। ऐसे व्यक्ति की योग्यताएँ भी, अप्रमाणिक बन जाने पर एक कोने में धरी रह जाती हैं। एक से एक क्रिया कुशल और चतुर लोग प्रायः जेलखानों में बंद पाये जाते हैं। उनके लिए भविष्य में कहीं कोई स्थान नहीं रह जाता। किसी प्रकार पेट भर लेने के अतिरिक्त और कोई नियति उनकी रह नहीं जाती। पीछे के लिए अपयश का पिटारा ही छोड़ मरते है। चातुर्य, कौशल और साहस भरपूर होते हुए भी दुर्गति का निमित्त कारण एक ही होता है- दूरदर्शिता का अभाव। कृत्यों के परिणामों का अनुमान न लगा पाना, प्रकृति के उस नियम को भूल जाना जिसमें “जो बोया है वही काटना” की कर्मफल प्रक्रिया का सुनियोजित विधान है, इस तथ्य को सही रूप से समझकर अपने लक्ष्य का, दिशा को सुनियोजित निर्धारित करने वाले सफल जीवन बनाते हैं। भटकने वाले झाड़-झंखाड़ों में उलझते और ठोकर खाते दिन बिताते हैं। न आत्म संतोष ही मिल पाता हैं न गर्व गौरव की अनुभूति ही हाथ लगती है। सच्चे मित्रों, प्रशंसकों और सहयोगियों का तो प्रायः अभाव ही बना रहता है। इस क्षति की पूर्ति हो सकना कदाचित ही किसी अन्य उपाय से ही संभव हो सके।

नशेबाजों को अदूरदर्शी ही कहना चाहिए। जो पैसा, स्वास्थ्य, यश, भविष्य, परिवार सब कुछ गंवाने के अतिरिक्त गये गुजरे व्यक्तित्व की लाश किसी प्रकार ढो पाते हैं। आंखें बंद कर बच्चे पर बच्चा जनते जाने वाले आरंभ में तो कुछ बड़ी कठिनाई अनुभव नहीं करते, समय-समय बीतते पता चलता है कि नारी का स्वास्थ्य चौपट हो गया है। व्यय भार बढ़ जाने के कारण उसकी पूर्ति अवाँछनीयता अपनाने पर भी कठिन ही बनी रहती है। समुचित ध्यान न दिये जाने पर संतानें कुसंस्कारी बनती और अभिभावकों के लिए जो संकट खड़ा करती हैं, उसे देखते हुए यह अनुभव होता है कि यदि समय रहते यह भूल न की गयी होती, तो अनावश्यक भार से न लदने की स्थिति में जीवन किस प्रकार किन्हीं शानदार प्रयोजनों में लगाकर धन्य हो गया होता।

दुर्व्यसनी, अनाचारी, अंधविश्वासी वर्ग के लोगों का प्रधान दुर्गुण एक ही होता है कि वे सिर्फ आज की अभी की बात सोचते हैं और यह अनुमान लगा नहीं पाते कि विष बीज जब भयंकर विष वृक्षों के रूप में फलित होंगे तो इनकी कितनी भयावह प्रक्रिया का त्रास सहना पड़ेगा।

कर्म का फल यदि तत्काल मिल जाने का विधान ईश्वर ने रखा होता तो संभव हैं लोग अनाचार पर न उतरते। झूठ बोलने पर मुँह में छाले हो जाते, चोरी करने पर हाथ को लकवा मार जाता, ठगों की आकृति बिगड़ जाती तो कदाचित कोई भी अनीति अपनाने पर उतारू नहीं होता, पर फल कर्म तो बीज बोने पर वृक्ष बनने में समय लगने पर देर में मिलता है। इसी से भ्रम में भूल हो जाती है और लोग ऐसा काम करने लगते हैं जिन्हें दूसरे द्वारा अपने साथ किये जाने की कल्पना नहीं करते। सामाजिक कुरीतियाँ इस कारण उपजी और फैली हैं। धूमधाम की शादियाँ इसका प्रमाण है। उस खाई को पाटने में दरिद्र और बेईमान बनने के अतिरिक्त और कोई चारा शेष नहीं रहता, फिर भी मूर्खता पूर्ण होने पर भी प्रचलित परम्परा को पत्थर की लकीर मानकर अपनाये रहते हैं और अपने लिए तथा देखा-देखी अनुकरण करने वालों के लिए भारी विपत्ति खड़ी करते हैं। जाति-पाँति के आधार पर चल रही ऊँच नीच की भावना भी ऐसी ही है जिसके कारण समाज के टुकड़े टुकड़े होते हैं और हर टुकड़ा हर बार घाटे में रहता है। भिक्षा व्यवसाय भी ऐसा है जिसमें तथाकथित दानी को मिथ्या अहंकार और ग्रहणकर्त्ता को आत्महीनता से लेकर प्रपंच रचने तक की विडम्बना के अतिरिक्त और कुछ हाथ नहीं लगता।

दृष्टि पसारकर जिधर भी देखा जाय लोग निजी स्वार्थ के लिए सामूहिक स्वार्थ का हनन करते पाये जाते हैं और उसकी प्रतिक्रिया से सभी का सब प्रकार अहित करते हैं। प्रदूषण उगलने वाले कारखानों, युद्ध का सरंजाम जुटाने वाली अव्यवस्था, अमीरी के लिए अन्यान्यों का शोषण, फैशन, ठाठ-बाठ जैसे अपव्ययों के लिए पैसे की होली जलाया जाना जैसे अनेक कृत्य ऐसे हैं जिन्हें समझदार कहलाने वालों की मूर्खता के अतिरिक्त और क्या कहा जाय? वन प्रदेशों को काटते जाने और उपजाऊ जमीन को बंजर बनाते जाने की आतुरता अपनाकर किस प्रकार अपनी और अगली पीढ़ी के लिए सर्वनाश के बीज बोये जा रहे हैं, इसे ब्यौरे बार बताने वाला समय दूर नहीं समझा जाना चाहिए।

मनुष्य कभी विचारशील, दूरदर्शी रहा है तब उसने सुख शाँति और प्रगति का सतयुगी वातावरण भी देखा है। अब जब कि हर क्षेत्र में अनीति अपनाकर सर्वनाश के बीज बो रहा है और अगणित समस्याओं विपत्तियों का न्योता बुला रहा है, इस ना समझी को किस प्रकार प्रगति का नाम दिया जाय? कैसे माना जाय कि पहले के अपने मनुष्य अधिक संपन्न, शिक्षित एवं विज्ञानी कलाकार आदि बनकर उत्कर्ष की दिशा में आगे बढ़ते रहे हैं?

इन दिनों सबसे बड़ी सामयिक आवश्यकता एक ही है कि दिग्भ्रान्त चिंतन को उलट कर सीधा किया जाय। दिशाशूल को, दिशा भूल को ‘एक’ न नहीं अपने अपने ढंग से, अपने-अपने क्षेत्र में अधिकाँश ने अपनाया है। इसके लिए व्यापक विचार क्राँति की आवश्यकता है। हर हाथ में यह कसौटी देनी होगी कि औचित्य-अनौचित्य का निर्णय करे तो जो दूरदर्शिता की कसौटी पर खरा उतरे उसी को अपनाये। हर मनुष्य को ऐसी टार्च चाहिए ताकि इस घोर अंधकार के दिनों में जहाँ हाथ को हाथ नहीं सूझ पा रहा, सही वस्तु को सही रूप से देखा और अपनाया जा सके।

प्रस्तुत अगणित विपत्तियों, अवाँछनीयताओं के निराकरण का इन दिनों एक ही उपाय है अपने आपका विचार क्राँति में नियोजन। यदि इसे संपन्न किया जा सका तो समझना चाहिए कि युग परिवर्तन का सुनिश्चित आधार बना और उज्ज्वल भविष्य निकट आया।


अनुमान लगाना उचित नहीं (Kahani)

एक मनोविज्ञानवेत्ता ने भय से मुक्ति दिलाने वाले एक उपचार का वर्णन इस प्रकार किया है- एक छोटी लड़की को सपने में अक्सर शेर दिखाई पड़ता था। वह उससे बेतरह डरती और नींद में ही उठकर चीखने चिल्लाने लगती। उसे मनोरोग चिकित्सक के पास ले जाया गया। ध्यानपूर्वक सारी बातें सुनने के उपराँत वह बच्ची को पास बिठाकर खुली हँसी के साथ बात करने लगा - ओह ! वह शेर मेरे पास भी सपने में आता है। पहले मैं उससे डरता था, पीछे मालूम पड़ा कि वह बहुत भला और भोला है। सिर्फ खेलने और खिलाने की गरज से मेरे पास आता है। बस मैंने उससे दोस्ती बना ली है। रात भर हम दोनों मजे से खेलते हैं और कभी-कभी तो वह मुझे अपनी पीठ पर बिठाकर सैर कराने भी ले जाता है। तुम भी उससे दोस्ती कर लो, सचमुच बहुत मजा आयेगा।

लड़की को उसकी बात पर भरोसा हो गया और उसने शेर को सपने में दोस्त बना लेने का निश्चय किया।

बच्ची की माँ उस रात जागती रही। सोती बच्ची का चेहरा देखा तो लगा कि वह पहले की तरह शेर से डरने लगी और उसके चेहरे पर भय झलकने लगा। किन्तु थोड़ी देर में उसकी आकृति बदल गयी॥

जागने पर उसकी माँ ने पूछा तो वह खुशी भरे शब्दों में कहने लगी शेर सचमुच बहुत भोला था। वह मेरे साथ रात भर खेलता रहा। अब मैं रोज सपने में उसे बुलाया करूंगी। डर तो मुझे उसकी आकृति भर से लगता था। आकृति देखकर किसी की प्रकृति का अनुमान लगाना उचित नहीं।


अक्षय अनुदान महाप्रज्ञा की साधना से

सप्तऋषियों में महर्षि गौतम का विशिष्ट स्थान है। वे अपनी तप शक्ति के लिए विख्यात है। एक समय की बात है कि पृथ्वी पर घोर दुष्काल पड़ा। अनावृष्टि के कारण सब ओर सूखा ही सूखा दिखाई पड़ने लगा। सर, सरिता सब सूख गये। पशु-पक्षी सभी जल के लिए भटकने लगे। घरों में मनुष्यों की लाशें सड़ने लगी। नीचे से पृथ्वी का रस सूखा और ऊपर से सूर्य का ताप इतना बढ़ा कि अग्नि वर्षा सी होने लगी।

यह बात सभी जानते थे कि महर्षि गौतम की तप शक्ति बहुत बढ़ी चढ़ी थी। गौतम गायत्री महाशक्ति के उपासक थे। सर्वत्र घोर दुर्भिक्ष होते हुए भी उनके आश्रम में भूमि सुरक्षित थी। वहाँ जल की और अन्न की कोई कमी नहीं थी।

इस स्थिति में बहुत से ब्राह्मण एकत्र होकर महर्षि के आश्रम में पहुँचे और कुशल प्रश्न के अनन्तर उन्होंने अपना कष्ट कह सुनाया। महर्षि ने उन्हें हर प्रकार से सान्त्वना दी और उनसे वहीं रहने का अनुरोध किया। तदन्तर उनने भगवती गायत्री की प्रार्थना की। “अम्बे! मैं तुम्हें बारंबार नमस्कार करता हूँ। तुम प्राणियों की विपत्ति को दूर करने में समर्थ हो। इस घोर दुर्भिक्ष के समय में भी प्राणियों की सेवा कर सकूँ ऐसा बल दो। जगत् जननी तुम ही इस घोर संकट से उद्धार करने वाली हो।”

माता गायत्री ने प्रकट होकर कहा- महर्षे! “मैं तुम्हें यह अक्षय पात्र देती हूँ। कल्प वृक्ष के समान यह पात्र तुम्हारी इच्छित वस्तुओं से सदा पूर्ण रहेगा।” वही हुआ। अक्षय पात्र के द्वारा अन्न, वस्त्र, आभूषण, धन धान्य सभी के ढेर लग गये। ब्राह्मणों की पत्नियाँ श्रेष्ठ वस्त्रालंकार में दैवाँगनायें जैसी लगने लगी। गौतम ऋषि जब जिस वस्तु की इच्छा करते तभी उस वस्तु को अक्षय पात्र पूर्ण कर देता। उस समय वह आश्रम चारों ओर सौ सौ योजन बढ़ गया था और वहाँ की शोभा इन्द्रपुरी की शोभा से भी बढ़ी चढ़ी हो गयी थी।

उस समय गौतम नगरी में यज्ञादि श्रेष्ठ कर्म विधिवत होते थे। देव गण भी यज्ञ भाग पाते हुए प्रसन्न थे। गौतम का यश सर्वत्र छा गया था। देवराज इन्द्र ने भी अपनी सभा में उनकी अत्यंत प्रशंसा की। भगवती गायत्री के अनुराग से वे बारह वर्षों तक जब तक दुर्भिक्ष रहा परिवारों का भरण पोषण करते रहे।

महर्षि गौतम ने प्राणी मात्र के कल्याण की जो प्रार्थना गायत्री माता से की थी, उसके फलस्वरूप जल वृष्टि एवं धन-धान्यादि की उत्पत्ति होने लगी। सुर्य का ताप अपनी विकरालता छोड़कर पूर्वमान पर आ गया। इससे उत्पन्न हुए उत्कर्ष को कुछ ईर्ष्यालु व्यक्ति सहन नहीं कर सकें। उन्होंने माया की एक गाय निर्मित की, जिसकी देह जीर्ण शीर्ण थी। उनकी प्रेरणा से वह गौ महर्षि के आश्रम के सामने जाकर मर गयी। तब उन दुष्टों ने उसकी हत्या का आरोप महर्षि गौतम पर लगाने की चेष्टा की।

महर्षि को इस कार्य से अत्यन्त क्षोभ हुआ। वे नेत्र मूँदकर समाधि में लीन हो गये। तब उन्हें इस कुचाल का पता लग गया। समाधि भंग होने पर उनने उन्हें शाप दिया- “मूर्खों! तुम अपने कर्म का फल भोगो और वेदादि कर्मों से विमुख होकर अधमगति को प्राप्त करो।”

शाप के कारण उन ईर्ष्यालु व्यक्तियों का सभी ज्ञान लुप्त हो गया। उन्होंने जो भी अध्ययन आदि किया था, उस सबको भी वे भूल गये। उनका सम्मान नष्ट हो गया। समाज में उनकी प्रतिष्ठ नहीं रही। सभी मनुष्य उनसे घृणा करने लगे।

जब उन्हें अपने दुष्कर्म पर पश्चाताप होने लगा, वे उस स्थिति से मुक्त होने का उपाय सोचने लगे। जब कोई युक्ति न सूझी तब वे झिझकते हुए सिर झुकाये महर्षि के आश्रम में पहुँचे और उनके चरण पकड़कर क्षमा याचना करने लगे, उन्होंने कहा- “महर्षि! हमसे घोर अपराध हुआ है परन्तु आप उदार मन वाले हैं, हमारे दुष्कर्मों को क्षमा कर दीजिए। हे ऋषि श्रेष्ठ! हम पर प्रसन्न हो जाइये। हमारे अपराध को भूल जाइये।”

उनका रुदन सुनकर गौतम का हृदय करुणा से भर उठा। वे बोले- “भगवती गायत्री की उपासना से तुम्हारा कल्याण संभव है, अतः एकाग्र मन से उन्हीं का जप करो।” इतना कहकर उनने उन्हें क्षमा कर दिया।

वस्तुतः गायत्री महामंत्र में अपरिमित सामर्थ्य है। जो भी कुछ अलंकारिक वर्णन आप्तवचनों, शास्त्र उपकरणों के रूप में उपलब्ध है, वह यही साक्षी देता है कि इसकी उपासना जीवन में सुख, वैभव, शाँति, आत्मसंतुष्टि, यश, कीर्ति तथा आत्मबल जैसे सभी अनुदानों को बरसाने का निमित्त कारण बनती है।


क्या अर्थशास्त्र व अध्यात्म परस्पर विरोधी हैं?

विश्व व्यवस्था में सक्रिय रूप से दो शक्तियाँ कार्यरत देखी गयी हैं। उनमें एक का नाम अर्थ और दूसरे का नाम अध्यात्म है।परस्पर विरोधी दिखते हुए भी दोनों का लक्ष्य प्रायः एक है। अर्थशास्त्र का निष्कर्ष है कि व्यक्ति और समाज को समुन्नत सुविधा साधन सम्पन्न बनाने के लिए (1) उत्पादन बढ़ाने (2) पूँजी को उपयोगी कार्यों में लगाने तथा (3) सम्पत्ति के उचित वितरण का ध्यान रखे जाने की पूरी सावधानी बरतनी चाहिए। यदि इन सब में आलस्य प्रमाद बरता जायेगा अथवा अव्यवस्था फैलाई जायेगी तो अर्थ संकट की विपत्ति का सामना करना पड़ेगा और सबको अकारण ही अवाँछनीय स्थिति में पड़ना पड़ेगा।

अध्यात्म शास्त्र के नियम भी अर्थशास्त्र की ही तरह हैं। उनका निष्कर्ष हैं कि (1) व्यक्तित्व, प्रतिभा और सामर्थ्य को निरंतर बढ़ाया जाय (2)संपत्ति और विभूतियों को सत्प्रयोजन में लगाया जाय (3)ज्ञान और तप से जो लोग ऊँचे उठे उनकी उपलब्धियों से समस्त मानव समुदाय को, समाज को, लाभान्वित होने दिया जाय। यदि इन तथ्यों को ध्यान में न रखा जाय तो उपार्जित आत्मबल अवाँछनीय आसुरी दिशा में लग सकता है और रावण, हिरण्यकश्यप, भस्मासुर जैसे तपस्वी भी विनाशकारी विभीषिकायें उत्पन्न कर सकते हैं। इसलिए मात्र साधना, उपासना, तपस्या आदि आत्मिक उपार्जनों पर ही ध्यान केन्द्रित न किया जाय, वरन् यह भी देखा जाय कि उस भावनात्मक उत्पादन का प्रयोग उपयोग लोक मंगल के लिए अथवा किस प्रयोजन के लिए किया जा रहा है।

मूर्धन्य अर्थशास्त्री डॉ. फेयर चैल्ड, डॉ. टॉमस, डॉ. मार्शल आदि का कहना है कि कोई व्यक्ति निठल्ला न रहे, कोई हराम की कमाई न खाने पाये, किसी को बेकार न रहना पड़े, तभी किसी देश की आर्थिक स्थिति सुव्यवस्थित रह सकती है। हेग विश्व विद्यालय के सुप्रसिद्ध स्वास्थ्य विज्ञानी डॉ. अलबर्ट ने शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य संबंधी वर्तमान विकृतियों का बहुत बड़ा कारण, श्रम व्यवस्था में व्यतिरेक को माना है।

उनका कहना है कि समुचित श्रम की न्यूनाधिकता ही कायिक और मानसिक स्वास्थ्य संतुलन को नष्ट करने का प्रधान कारण है। व्यक्ति के जीवन क्रम में ऐसे श्रम का समुचित स्थान रहना चाहिए। जिसमें उपयोगी एवं आवश्यक तत्वों का बाहुल्य हो। साथ ही उसकी मात्रा भी संतुलन की दृष्टि से इतनी रहनी चाहिए जो न न्यून हो और न अधिक।

अध्यात्म शास्त्र का मन्तव्य यह है कि हर व्यक्ति को अपने कायिक और मानसिक क्षेत्र को उर्वर भूमि मान कर उसमें सद्गुणों की, सत्कर्मों की सत्स्वभाव की कृषि करनी चाहिए। सद्भावनाओं और सद्प्रवृत्तियों की बहुमूल्य फसल उगानी चाहिए। मात्र धन ही संपदा नहीं है। असली कमाई कृषि फार्मों, कारखानों आदि में नहीं होती, वरन् वास्तविक दौलत तो काया-कलेवर एवं मनःसंस्थान में उपार्जित की जाती है। प्रतिभा, समर्थता और गरिमा को बढ़ाने के लिए उसी लगन और तत्परता के साथ पुरुषार्थ किया जाना चाहिए। जिस मनोयोग से धनोपार्जन के लिए निरन्तर प्रयत्नशील रहा जाता है। व्यक्ति और समाज को समुन्नत बनाने के लिए धन से भी बढ़कर प्रतिभाशाली और उच्च चरित्र वाले नागरिकों की आवश्यकता पड़ती है। अध्यात्म उपार्जित यही संसार की सबसे बड़ी संपदा भी है।

मनीषियों का कहना है कि मनोबल बढ़ाने के लिए दुस्साहस और दुष्कर्मों का अवलम्बन अवाँछनीय है। असुर पक्ष में ताँत्रिक वाममार्गी उन उपायों को बेहिचक प्रयुक्त किया जाता है जिनकी गणना न्याय नीति की कसौटी पर खरी नहीं उतरती। अनेक सम्प्रदायों में पशुबलि प्रथा प्रचलित है। कहीं-कहीं साधनारत व्यक्ति मादक द्रव्यों का सेवन करते हैं। कापालिक और अघोर सम्प्रदायों में ऐसे कृत्य मनस्वी व तपस्वी बनने के लिए काम में लाये जाते हैं जिसे जिस-तिस प्रकार साधन एवं धन बटोरने वाले उपायों की तरह अनुकरणीय एवं प्रशंसनीय नहीं कहा जा सकता। कई सिद्ध योगी अपनी सिद्धियों को, अपने को चमत्कारी सिद्ध विख्यात करने में अथवा स्वर्ग मुक्ति के व्यक्तिगत लाभ में ही खर्च कर डालते हैं। इसी तरह अर्थ क्षेत्र में चन्द लोगों के हाथ में इतने साधन आ जाते हैं कि अगणित लोगों द्वारा कमाई जाने वाली आजीविका स्वयँ ही हड़पकर जाते है। अर्थशास्त्र की तरह अध्यात्मशास्त्र का भी यही नियम है कि विशिष्ट उत्पादन की वह पूँजी जो निर्वाह खर्च से बच जाये, ऐसे ही कामों में लगाई जानी चाहिए जिससे अतिरिक्त उत्पादन बढ़ने में सहायता मिले, भले ही वह पूँजी धन के रूप में हो अथवा विभूतियों के रूप में।

अर्थशास्त्री प्रो. वेनहम के अनुसार अर्थ की, पूँजी की सार्थकता इसी में हैं कि वह जन सामान्य की सम्पदा, आजीविका एवं सुविधा साधनों की अभिवृद्धि में सहायक हो। उनका मत है कि जिस प्रकार आचरण में नैतिक अनैतिक अन्तर किया जाता है और समाज व्यवस्था में न्याय अन्याय का वर्गीकरण किया जाता है, ठीक उसी प्रकार उत्पादन में वाँछनीय और अवाँछनीय का विभाजन किया जाना चाहिए। ऐसे नियम बनाये जाने चाहिए जिसके कारण अवाँछनीय उत्पादन की दिशा में बढ़ने वालों को कठिनाइयों का सामना करना पड़े। साथ ही यह व्यवस्था भी होनी चाहिए कि उपयोगी उत्पादन के लिए उत्सुक लोगों की अड़चनें सरल बनाने के लिए शासन एवं समाज का सहयोग उपलब्ध रहे।

धन की ही भाँति प्रतिभा, ज्ञान एवं आत्मिक विभूतियों की सार्थकता इसी में हैं कि परमार्थ उत्पादन में लगे। इसे आत्मिक क्षेत्र की सक्रियता कहते हैं। इस तरह की सम्पदा जिसके पास हैं वे उनको उदार धनी-मानियों की तरह लोक मंगल के लिए आयोजित करने का सत्साहस दिखायें। ढलती उम्र में बच्चों के समर्थ हो जाने अथवा रिटायर होने पर आमतौर से लोग बेकारी और मटरगश्ती में दिन काटते हैं। यह समाज का ऋण मार बैठने की तरह ही हेय है। किसी की भी प्रगति एकाकी प्रयत्न से नहीं हो सकती। जो भी ऊँचा चढ़ा या आगे बढ़ा है उसे समाज के सहयोग से ही इस प्रकार लाभान्वित होने का अवसर मिला है। अतः उसका कानूनी न सही नैतिक उत्तरदायित्व है कि जब भी अवसर मिले, समाज का ऋण चुकाने के लिए। अपने बचे हुए समय, ज्ञान एवं प्रभाव को लोक मंगल के लिए प्रयुक्त करे। जमीन में सोना गाड़ने अथवा जेवर लटकाये फिरने वाले लोग जिस तरह पूँजीगत लाभ से समाज में उद्योग व्यवसायों में गतिरोध उत्पन्न करते हैं,उस लाभ से अनेकों को रोजी प्राप्त करने में अवरोध उत्पन्न करते हैं। उसी प्रकार आत्मिक और बौद्धिक सम्पन्न लोग भी यदि अपनी विभूतियों को अपने या परिवार तक के लिए सीमित रखते हैं तो उससे मानव समाज की प्रगति में बाधा उत्पन्न होती है। विभूतिवान व्यक्ति यदि अपने को मिला विशेष ईश्वरीय अनुदान विलासी प्रयोजनों में खर्च कर डालते हैं, स्वयं के शौक-मौज या चमत्कार दिखाने तक सीमित रहते हैं तो समझना चाहिए कि भले ही यह सामान्य प्रचलन जैसा दिखे, पर आध्यात्मिक दृष्टिकोण के अनुसार इस रीति-नीति को गर्हित ही ठहराया जायेगा।

मनुष्य केवल धन ही नहीं कमाता, उसके उत्पादन में अन्य अनेक ऐसी विशेषताएँ, विभूतियाँ भी सम्मिलित हैं, जो व्यैक्तिक एवं सामाजिक सुख शाँति को बढ़ाने में धन से भी अधिक कारगर सिद्ध होती हैं। यह क्षेत्र विशुद्धतः अध्यात्म का है। साधन, तपश्चर्या द्वारा उपार्जित आत्मिक क्षेत्र की ऋद्धियों-विभूतियों एवं भौतिक क्षेत्र की सफलताओं -सिद्धियों का लाभ


Quotation

जो खाने और जोड़ने भर की चिंता करते हैं, उन्हें महान कार्य कर पाने का सुयोग मिल ही नहीं पाता।

धन-वितरण की तरह ही सर्वसाधारण तक पहुँचना चाहिए। ठीक इसी प्रकार मनुष्य के पास यदि अन्य प्रकार की विशेषताएँ और विभूतियाँ हैं। प्रतिभा और ज्ञान हैं। तो उसका प्रसार वितरण अधिक व्यापक क्षेत्र में होना चाहिए। इससे अधिक लोगों को लाभान्वित होने का अवसर मिलेगा और सर्वत्र सुख शाँति का, प्रगति का वातावरण विनिर्मित होता दृष्टिगोचर होगा। अर्थशास्त्र एवं अध्यात्मशास्त्र दोनों के क्षेत्र बाह्य दृष्टि से देखने पर भले ही भिन्न दिखते हों, पर लक्ष्य दोनों का एक ही हैं। उत्पादन की तरह ही समान वितरण व्यवस्था का महत्व दोनों क्षेत्रों में समान है। जो अर्थोपार्जन व अध्यात्म क्षेत्र में विभूतियों के अर्जन की प्रक्रिया को दो विपरीत ध्रुवों पर स्थित मानते हैं, उन्हें जानना चाहिए कि मूलभूत एक ही सिद्धाँत दोनों के मूल में कार्य करते हैं। यदि यह बात ध्यान में रखी जा सके तो जनमानस व्यावहारिक अध्यात्म जिसमें भौतिकवाद को भी समुचित स्थान हो, को लोकोपयोगी बनाया जा सकना संभव है। यही समय की माँग भी है।


आकुलता से भरी पुकार

“तुम प्रार्थना करने आये थे? “सभ्यता के नाते तो कहना चाहिए था मि. बुडफेयर, किन्तु चार्ल्स फिल्मोर में तो सहज आत्मीयता है अपने अल्प परिचितों के भी प्रति उसके कारण वे औपचारिकता का निर्वाह आवश्यक नहीं मानते।

उसका पूरा नाम है अल्फ्रेड जान्सन बुडफेयर। चौंककर उसने पीछे मुड़कर देखा। समुद्र के किनारे इस छोटे से गाँव में उसे जानने वाला, उसका नाम लेकर पुकारने वाला कौन है? उसे यहाँ आये अभी दो ही सप्ताह तो हुए हैं और खेतों में फसल काटने वाला एक मजदूर क्या इस योग्य है कि उसे लोग जाने और इतने स्नेह से नाम लेकर पुकारें।

“ ओह आप।” अल्फ्रेड पूरा पीछे घूम गया और उसने अपने हाथ आगे बढ़ा दिया। फिल्मोर से उसका घनिष्ठ परिचय है, यह तो नहीं कहा जा सकता, किन्तु सभी से आत्मीय संबंध रखने वाले इस विचित्र व्यक्ति से कई बार पहले भी वह मिल चुका है। उसे अभी तक याद हैं एक बार तूफानी रात्रि में फिल्मोर उसकी झोपड़ी में अतिथि रह चुके हैं।

मैं जानता था तुम यहाँ आओगे। आखिर आए न। फिल्मोर उसके बराबर आ गए और हँसते हुए उसका हाथ पकड़कर गिरजाघर की सीढ़ियां उसके साथ ही उतरने लगे। “मनुष्य कैसा भी हो, कोई भी हो अपने पिता के सामने आए बिना रह नहीं सकता।”

वह देखता रहा इस सामान्य व्यक्ति को। कौन नहीं जानता इन्हें। ये भी तो मनुष्य मात्र को अपना सगा मानते हैं। पर्यटन इनकी आदत है। इस गाँव में भी वे घूमते-घामते ही आ निकले होंगे, रविवार की प्रार्थना करके गाँव के अधिकाँश वृद्ध स्त्री -पुरुष जिनके साथ घरों के बालक भी हैं, गिरिजाघर से बाहर निकल रहे थे। बहुत थोड़े गिने चुने युवक प्रार्थना करने आते हैं, युवतियाँ उनमें अवश्य अधिक थी। तारुण्य का गर्व जब शिथिल पड़ने लगता हैं, तभी तो मनुष्य में जीवन के उस पार भी कुछ है यह झाँकने की समझदारी आती है।

“लेकिन वुडफेयर। मैं भूलता नहीं हूँ तो केवल बीस दिन पूर्व हम यहाँ से पर्याप्त, दक्षिण समुद्र के वक्ष में मिलें थे।” फिल्मोर को इसकी चिंता नहीं जान पड़ती थी कि उनके जैसे मूल्यवान उज्ज्वल वस्त्रधारी को एक मजदूर का हाथ पकड़कर चलते देख पास से जाने वाले वृद्ध और वृद्धाएँ किस प्रकार देखते हैं, किस प्रकार मुख सिकोड़ते हैं और परस्पर फुसफुसा कर क्या कहते हैं?

“तब मैं गोता लगाने को प्रस्तुत हो रहा था।” बुडफेयर ने इतनी देर बाद बोलना आवश्यक समझा। “वही समुद्र में मेरा अंतिम गोता था और फिर जब मैं चल सकने योग्य हुआ, सीधे गिरिजाघर पैदल चलकर आया। यद्यपि बहुत कष्ट हुआ उस दिन मुझे चलने में, किन्तु बहुत आनन्द भी मिला। प्रार्थना तो उसी दिन मैंने की।” वह पता नहीं क्या और कितनी बातें एक साथ बता जाना चाहता था, लेकिन उस दिन की प्रार्थना का स्मरण करके ही उसके नेत्र भर आए।

“मैं तुम्हारे साथ चल रहा हूँ। आज तो विश्राम का दिन हैं। फिल्मोर ने आमंत्रण की अपेक्षा नहीं की। जो व्यक्ति केवल बीस दिन पहले धर्म और आस्तिकता की बात सुनकर ठठाकर हँस पड़ता था, जिसे सुरा......जाने दीजिए किसी के दोषों का वर्णन भी दोष ही है। इतना जानना पर्याप्त होना चाहिए कि अल्फ्रेड खाओ पियो और मौज उड़ाओ के नियम को मानकर चलने वाला था। वह कहा करता था धर्म तो कायर और अशक्त लोगों के मन को संतोष देने का बहाना है। वही अल्फ्रेड किसी दिन की प्रार्थना का स्मरण करके पुलकित हो उठा। बिना विशेष घटना के यह कैसे संभव हैं लेकिन यहाँ मार्ग में कुछ पूछना शिष्टता नहीं होगी।

दोनों के कदम एक ओर मुड़ चले। फिल्मोर के मन में उसके समूचे को बदल डालने वाले रहस्य जानने की इच्छा बलवती हो रही थी। थोड़ी देर बाद उन्होंने छोटी कोठरी में प्रवेश किया। अल्फ्रेड ने चटाई बिछाई और दोनों एक दूसरे के सामने बैठ गये और वह रहस्य का आवरण खोलने लगा, “नित्य की भाँति मैं उस दिन भी समुद्र तल में उतरा। मेरे दोनों सहकारी बहुत सावधान और कार्यकुशल थे। लेकिन गोताखोर तो प्रत्येक गोते के समय मृत्यु के मुख में ही उतरता है और उसे केवल अपनी स्फूर्ति, प्रत्युत्पन्न बुद्धि तथा सतर्कता पर निर्भर करना पड़ता है।”

अल्फ्रेड मजदूर बनने से पहले अभी बीस दिन पहले तक समुद्री गोताखोर था। समुद्र के गहरे तल में उतरकर मोती के सीप उठा लाना ही उसका व्यवसाय था। सीप में मोती हैं या नहीं, यह बात तो ऊपर आकर देखने की होती है। समुद्र तल में तो यथा शीघ्र जो सीप मिलें, उन्हें समेटकर ऊपर आ जाना पड़ता है।

“मौसम अच्छा था। ऊपर चमकीली धूप निकल रही थी। जल के भीतर पर्याप्त दूरी तक इतना प्रकाश था कि मैं अपने आस पास दौड़ती भागती छोटी बड़ी मछलियों तथा तल प्रदेश की अद्भुत लताओं को सरलता से देख सकता था। अल्फ्रेड बता रहा था समुद्र तल में सृष्टिकर्त्ता ने जो उपवन लगा रखा है, कहीं-कहीं तो तल प्रदेश के पौधे, घासें और लताएँ अद्भुत सुन्दर हैं। उस दिन मैं ऐसे ही सुन्दर समुद्री उद्यान में उतर पड़ा था। नीचे पहुँचकर मैं खड़ा हो गया और झुककर कुछ सीपों को अपने झोले में झट से डाल लिया। फिल्मोर उत्सुकता से उसकी बात सुन रहे थे। मैं बहुत प्रसन्न था, वहाँ पर्याप्त सीप थीं। आज का गोता मुझे अच्छी रकम दे देगा। सहसा ऐसा लगा कि कोई कोमल गिलगिली वस्तु दाहिने पैर में लिपट गई है। मैं चौंका बायें हाथ का चाकू दाहिने में लेकर झुक गया। ऑक्टोपस के दो पैर मेरे चाकू ने काट दिए। इसी समय मुझे कसकर झटका लगा।”

“ऑक्टोपस समुद्र का सबसे भयंकर प्राणी और गोताखोरों का सबसे बड़ा शत्रु।” अल्फ्रेड सिहर उठा “पता नहीं मैं किस चट्टान के नीचे से निकलकर एक भयानक ऑक्टोपस ने अपने सूँड़ जैसे पैर मेरी कमर और कंधे में लपेट लिए थे। उसकी दोनों आंखें मेरी आँखों के सामने चमक रही थी और वह दुष्ट अपना विशाल मुख मेरे मुख के पास ला रहा था। मेरे मुख से भय के कारण चीख निकल गयी। ऑक्टोपस ने मुझे एक और झटका कसकर दिया। मेरा पूरा ललाट और कपोल हिल गया। नकाब कंधे पर खिसक आया। मेरी नाक से कुल चार इंच दूर मुझे ऑक्टोपस के क्रूर नेत्र चमकते दिखे। उसकी चोंच उसकी रक्त पिपासु चोंच नजदीक आती जा रही थी।” दीर्घ श्वास ली अल्फ्रेड ने “नकाब ठीक करने का समय भी नहीं रह गया था। मैं निराश हो गया था। सब ओर से हार कर चीख पड़ा मैं ‘हे भगवान!’ और फिर पता नहीं मुझे क्या हुआ। मेरी आँखों के सामने अंधकार छा गया।”

मि. फिल्मोर! एक बात अब तक मेरी समझ में नहीं आई। अल्फ्रेड ने बीच में दूसरी बात कही मुझे ठीक-ठीक स्मरण है पहले ही झटके में चाकू मेरे हाथ से छूटकर गिर गया था। और वह मुझे बीसों झटके देता रहा। उसके वे पैर जो मेरी कमर और कंधे को पकड़े थे काटे कैसे गये?

‘यह तुम्हारे सहायक की तत्परता होगी,’ फिल्मोर ने कहा।

‘मेरा सहायक बहुत सावधान है। आपेक्षित समय से अधिक देर लगने से उसे आशंका हो गई और वह स्वयं नीचे उतर पड़ा। अल्फ्रेड ने कहा, “मैंने उससे बार-बार पूछा है। वह कहता है कि उसने मुझे मूर्छित पाया। मेरी नकाब उसने ठीक की। कमर और कंधे में ऑक्टोपस के पैर ऊपर लिपटे थे, किन्तु वे कटे हुए पैर थे। भारी ऑक्टोपस सब पैरों के कट जाने से मेरे पास ही तड़फ रहा था।

“तुमने अभी बताया कि तुमने मूर्छित होते-होते कहा था। ‘हे भगवान!’ फिल्मोर के स्वर में दृढ़ता और विश्वास था ‘और भगवान ने मेरी रक्षा की।’ अल्फ्रेड के नेत्र भर गए” सचमुच भगवान ने मेरी रक्षा की मि. फिल्मोर। मैं इतना घायल हो गया था कि छुरा मेरे हाथ में होने पर भी मैं कुछ न कर पाता। मैं अपने सहकारी द्वारा जब ऊपर लाया गया, तब मेरा शरीर खून से लथपथ था। पूरे तीन दिनों बाद मैं चलने योग्य हुआ और अब सीधे गिरिजाघर आया।”

“भगवान तो सुनते हैं और रक्षा भी करते हैं किन्तु-” फिल्मोर रुके दो क्षण, “किन्तु हम मनुष्य इतने भाग्यहीन हैं कि प्राण संकट में होने पर भी वे दयामय स्मरण नहीं आते। उस समय भी हम अपने उस कृपालु पिता से प्रार्थना नहीं कर पाते।”

“सचमुच आश्चर्यजनक है प्रार्थना। वह पुकार जैसे चेतना की एक चिंगारी थी। नवजागरण की पहेली घण्टी थी, नव प्रभात की पहली आभा थी।” अल्फ्रेड ने बहते आँसुओं को पोंछने का प्रयत्न नहीं किया “माँस-मदिरा, दुराचार न जाने सब के सब कैसे हट गये। सारे पुराने विश्वास हट गये। एक नया विश्वास जम गया एक नया प्रकाश छिटक गया। मैं ईश्वर की प्रिय संतान हूँ मुझे उसके योग्य बनना हैं”

“फिल्मोर के चेहरे पर एक मुस्कान थिरक उठी” बस इन भावों को उसी तरह उमगना चाहिए, जैसे समुद्र तल में उमगें थे। “आज गज और ग्राह का उपाख्यान पुनः चरितार्थ हुआ था।” “प्रार्थना जीवन में दिव्यता के अवतरण का विज्ञान है।” इस महान संदेश के प्रचार के लिए चार्ल्स फिल्मोर ने यूनिटी स्कूल ऑफ क्रिश्चिएनिटी की स्थापना की। स्वयं के जीवन को बदले डालने वाले अल्फ्रेड उनके सहकारी हुए।


मनः चेतना के प्रखरीकरण की ध्यान-साधना

गीताकार ने मन को ही बन्धन और मोक्ष का कारण बताया है। प्रतिभा का, अतीन्द्रिय क्षमताओं एवं ऋषि सिद्धियों का भाण्डागार भी उसी की अतल गहराइयों में छिपा पड़ा है। सफल कहे जाने वाले व्यक्तियों की महान उपलब्धियाँ मन को परिष्कृत करने एवं साध लेने के उपराँत ही हस्तगत होती रही हैं। मन ही है जो समूचे कार्यतंत्र पर अपना आधिपत्य रखता है। वह जैसे निर्देश देता है, वैसी ही क्रियायें शरीर द्वारा होती रहती हैं। इसकी तुलना उस महा दैत्य से की जा सकती है, जिसे सिद्ध कर लेने पर उससे अद्भुत काम कराये जा सकते हैं, परन्तु यदि वह अनियंत्रित, कुमार्गगामी एवं कुसंस्कारी ही बना रहे तो उसके परिणाम हर प्रकार से हानिकारक ही होंगे। उपासना में साधक सर्वप्रथम इसी क्षेत्र पर अपना ध्यान केन्द्रित करता है और मन को परिष्कृत परिमार्जित करते हुए लक्ष्य की दिशा में आगे बढ़ता है।

साधना-उपासना की एकाग्रता तभी सध सकती है जब विचारतंत्र को- मानसिक हलचलों के बिखराव से बचाकर एक सीमित परिधि में सीमाबद्ध किया जाय। मन को एक सीमित परिधि में ही चिंतन करते रहने के लिए प्रशिक्षित किया जाय। इसके लिए सर्वोत्तम उपाय उपचार ध्यान साधना है, इसका स्वरूप यह है कि विचारों को केन्द्रीभूत करके किसी एक लक्ष्य पर नियोजित किया जाय। इसमें सफलता तभी मिलती है जब चेतना का मस्तिष्कीय हलचलों पर नियंत्रण सध जाय। गायत्री माता-के इष्टदेव के अथवा स्वर्णिम सविता के प्रकाश मण्डल के या अन्य किसी केन्द्र पर मन मस्तिष्क को सीमाबद्ध किये रहा जाय। इस उपक्रम में यदि सफलता मिल गयी तो समझना चाहिए कि विचार प्रवाह को स्वेच्छाचार बरतने से छोड़ने के लिए अनुशासन में रहने के लिए सहमत कर लिया गया।

वस्तुतः ध्यान एक व्यायाम है जिससे मन पर, विचारों पर नियंत्रण करना संभव होता है। इसके अनेकों उपयोग हैं। इन्हीं में से एक महत्वपूर्ण उपयोगी यह है कि आवेशों, उत्तेजनाओं, भावुकताओं का अवाँछनीय उभार जब भी उठे तब उसे रोककर प्रवाह को दूसरी दिशा में उलटा सकना संभव किया जाय। अनगढ़ मन मनुष्य को कहीं भी घसीट ले जाया जा सकता है और कुछ भी करा सकता है, किन्तु सुसंस्कृत मन विवेक का अनुशासन मानता है और अंतःकरण का निर्देश मिलने पर हलचलें बताई हुई दिशा में मोड़ देता है। ऐसी दशा में मस्तिष्कीय तंत्र रचनात्मक उपयोगी विवेकपूर्ण कार्य ही करता रहेगा। अवाँछनीयता के प्रवाह में नहीं बहेगा। यदि कुछ भटकाव आया तो ध्यानयोग के समय जो प्रबल आत्मचेतना मनःसंस्थान पर नियंत्रण रखने में सफल हुई थी, वही अपनी प्रखरता से उस भटकाव को सुधार कर सहज ही सुव्यवस्थित बना लेगी। गलती तुरन्त ही सुधर जायेगी। इस क्षेत्र में जितनी ही सफलता मिलेगी, व्यक्ति उसी अनुपात से प्रतिभा-प्रखरता संपन्न बनता चला जायेगा।

मनोविज्ञान वेत्ताओं का कहना है कि मन सही तो शरीर सही। विचारों को अभीष्ट लक्ष्य में नियोजित किये रहना जिसके लिए संभव हुआ, वह अपनी क्षमता को निर्धारित दिशा में लगाये रहेगा। सामान्य व्यक्तियों द्वारा असामान्य कार्य कर गुजरना-चमत्कार उत्पन्न कर सकना इसी कारण संभव होता रहा है। इस तरह दिशाबद्ध चिंतन और क्रियाकलाप जिनसे भी बन पड़ेगा वे भटकाव की अस्त व्यस्तता से अपनी बरबादी को बचा लेंगे और उस बचत के सहारे उच्चकोटि की सफलताएँ प्राप्त कर सकेंगे। सफल जीवन ऐसे ही लोगों का होता है। यशस्वी वे ही बनते हैं। ध्यान योग का छोटा सा अभ्यास, छोटी सी चेष्टा अंततः कितना बड़ा सत्परिणाम उत्पन्न करती है। इसे देखते हुए उनकी उपमा बीज के माध्यम से वट वृक्ष बनने के रूप से दी जा सकती है।

साधारणतया ध्यान साधना को पूजा उपासना के साथ जोड़कर रखा गया है। देवाराधना एवं योगाभ्यास का प्रयोग ही उसमें सम्मिलित रहता है। यह उचित भी है क्योंकि इसका दोहरा लाभ है- जीवन सम्पदा के सदुपयोग के लिए मनोविग्रह जैसी महान उपलब्धि के साथ ही उपासनात्मक लाभ। किन्तु ऐसा नहीं समझा जाना चाहिए कि देवाराधना या योगाभ्यास के अतिरिक्त और कोई उपाय ध्यान साधना का है ही नहीं। ऐसी भी साधनायें हैं जो अनीश्वरवादी उपासना में अरुचि रखने वाले अध्यात्म सिद्धाँतों से असहमत लोगों के लिए भी उपयोगी रहेगी। आस्तिक प्रवृत्ति के लोग भी उनसे समुचित लाभ उठा सकते हैं। प्रक्रिया इस प्रकार है। -

एकान्त कोलाहल रहित शान्तिदायक स्थान पर बैठकर ध्यान अभ्यास किया जाय। एक चौकी पर हरे या नीले रंग का कपड़ा बिछाया एवं उस पर खिला हुआ गुलाब का एक सुन्दर सा फूल रखा जाय। तदुपरान्त फूल की पंखुड़ियों की बनावट तथा रंगों के चढ़ाव-उतार और उसके मध्यवर्ती पराग केन्द्र को गहराई के साथ अवलोकन किया जाय। निरख व परख इतनी बारीकी से होनी चाहिए मानों कुछ समय पश्चात ही परीक्षा में वे सारे विवरण पूछे जाने वाले हैं। फूल को देखने से जब मन ऊबने लगे तो उसके द्वारा बनने वाली वस्तुओं की कल्पना की जाय। गुलाब, जल, इत्र, गुलकन्द, फूलमाला आदि के स्वरूप एवं निर्माण विधि पर कल्पना दौड़ाई जाय। गुलाब पुष्प के गुणों पर विचार किया जाय कि आध्यात्मिक प्रकृति हँसना और हँसाना, खिलना और खिलाना, सौंदर्य की अभिवृद्धि, सुगंध का वितरण, प्रभु समर्पण, काँटों के बीच संतोषपूर्ण निर्वाह, भ्रमर, तितलियाँ, मधुमक्खी आदि को मधुदान जैसी गुणपरक विशेषताओं पर और उनकी प्रक्रिया पर ध्यान केन्द्रित किया जाना चाहिए। इस प्रकार घण्टों गुलाब पुष्प से संबद्ध विस्तार का चिंतन किया जा सकता है। इससे मन की अस्त व्यस्त घुड़दौड़ रुकेगी और एक सीमित परिधि के अन्दर चिंतन करने के लिए अभ्यस्त होता चला जायेगा। तथ्यों पर जितनी गहराई और सजगता के साथ विचार किया जायेगा, उतनी एकाग्रता बढ़ेगी और मन के भागने का अनुपात घटता जायेगा। कुछ ही समय के अभ्यास में ऐसा समय आ जायेगा कि चिंतन की परिधि सिमट जाय और आरंभिक ध्यान भूमिका में सफलता मिल जाय।

जिस प्रकार गुलाब के फूल को लेकर ध्यान अभ्यास की बात ऊपर कहीं गयी है, उसी प्रकार किसी महापुरुष के जीवन वृत्तांत को चिंतन की परिधि बनाकर संबंधित घटनाक्रमों पर गहराई से विचार करते रहा जा सकता है। किसी गीत या श्लोक के भावार्थ पर भी देर तक चिंतन को केन्द्रित रखा जा सकता है। संगीत की कोई ध्वनि इसके लिए चुनी जा सकती है। किसी मनुष्य या प्राणी की किसी विशिष्टता पर भी ध्यान केन्द्रित किया जा सकता है।

किसी गुण विशेष के सिद्धाँत, स्वरूप, अभ्यास एवं परिणाम को लेकर भी चिंतन को देर तक सीमित किया जा सकता है। ब्रह्मचर्य, सत्य, अहिंसा, संयम, उदारता जैसे गुणों की व्याख्या, प्रयोग, पद्धति एवं प्रक्रिया के अनेक पक्ष हो सकते हैं और उन सब पर क्रमशः विचार करते हुए देर तक मन को उसी परिधि में प्रतिबंधित रहने के लिए बाध्य किया जा सकता है।

परमेश्वर का विराट रूप भी ध्यान के लिए उपयुक्त प्रकार है। स्वर्ग उसका शीर्ष, पृथ्वी उसके पाद, दिशायें हाथ, सूर्य चन्द्र नेत्र, वायु श्वास, अग्नि पाचन, धर्म हृदय, वनस्पति केश, पर्वत अस्थियाँ, नदियाँ नाड़ियाँ, समुद्र मूत्राशय, जैसी कल्पना विराट ब्रह्म की की जा सकती है और उन क्षेत्रों के प्रस्तुत दृश्यों में मन को उलझाये रहा जा सकता है।


Quotation

एक कलाकार स्रष्टा है जिसने मनुष्य को सृजा। दूसरा कलाकार वह है जो मनुष्य को सभ्य और समर्थ बनाता है।

“मैं शरीर नहीं हूँ। शरीर मेरा नहीं है। शरीर के साथ जुड़ हुआ अहम्भाव मिथ्या है, शरीर और सम्पत्ति की दृष्टि से मेरापन निरर्थक है। यह जड़ पदार्थ मुझसे भिन्न है। मैं सत्-चित् आनन्द का अविनाशी अंश हूँ।” इस प्रकार चिंतन करते हुए जब भौतिक अहम् विलीन हो जाय, तो समझना चाहिए कि मैं और तू से ऊपर उठा हुआ जीव परम सत्य को पा गया।

प्राणी जगत और पदार्थ मात्र में एक ही चेतन तत्व भरा हुआ है। मन जब उस व्यापक चेतना के साथ गुंथ जाता है तो एकाग्रता सधते ही समस्त विश्व चेतन सत्ता का स्वरूप दिखाई पड़ता है। मन स्वयँ विराट रूप बन जाता है और तद्रूप बन जाने पर परमात्मा की शक्तियों का क्रीड़ा स्थल भी। ऐसी स्थिति को ही भगवत्प्राप्ति, बंधनमुक्ति, स्वर्ग, समाधि आदि कहा जाता है। इस प्रकार उत्कर्ष को प्राप्त हुआ मन ही मोक्ष का, निर्वाण का कारण बनता है। ध्यान साधना की उक्त प्रक्रिया को अपने नियमित अभ्यास में सम्मिलित करके हर कोई उस स्थिति को प्राप्त कर सकता है।


बड़े भाग मानुष तन पावा

गन्तव्य स्थान का अता पता न हो, रास्ता ठीक से मालूम न हो तो चलने वाले का श्रम निरर्थक जाता है, वह भटकाव में किधर से किधर चलता है और कहीं से कहीं जा पहुँचता है। इसमें थकान, निराशा और खिन्नता हाथ लगती है। दिशा भूले तो लौटकर फिर वही आना पड़ता है, जहाँ से चला था। सही गन्तव्य और मार्ग का पता न लगा पाने पर यही भटकाव बार-बार होता रहता है और प्रयास की निरर्थकता में बहुमूल्य समय और श्रम ऐसे ही बरबाद होता रहता है। सही जानकारी न होना भी लापरवाही और बरबादी की तरह भर्त्सना का विषय बनता है।

जीवन का कोई लक्ष्य है और उस तक पहुँचने का राजमार्ग भी है। उसकी ओर से अनजान बने रहने या जान बूझकर उपेक्षा करने से वही दुर्दशा होती है जो भटकाव ग्रस्तों के पल्ले बँधती है। इसलिए उचित है कि इन दोनों के संबंध में जानकारी प्राप्त कर ली जाय और भ्रमग्रस्तों की तरह झाड़-झंखाड़ों में भटकते हुए कंकरीली, पथरीली, पगडंडियों में ठोकर खाते हुए उस बहुमूल्य अवसर को अस्त व्यस्त न किया जाय जो चौरासी लाख योनियों में भटकने के उपरान्त एक बार मिला है। यह उपहार असाधारण है। मनुष्य जीवन स्रष्टा की सर्वोपरि कलाकृति है। यह उपहार उसके अनुदानों में उच्चस्तरीय है। जो किसी प्राणी को नहीं मिला वह मनुष्य को देकर उसके साथ विधाता ने अनिवार्य प्रयोजन जोड़ रखे हैं अन्यथा निष्प्रयोजन इतनी सुविधाएँ मिलने पर वह पक्षपात कहा जाता और समस्त प्राणियों के सम्मुख ईश्वर को अन्यायी कहे जाने का दोष लगता।

ऐसी कायिक और मानसिक सर्वांगपूर्ण रचना और किसी प्राणी की नहीं है। सुविधा से भरे पूरे इस संसार के अनेकानेक पदार्थों का समुचित उपयोग कर सकना और उन्हें बढ़ाने, बदलने सुधारने की प्रतिभा मात्र मनुष्य को ही मिली है। अन्यथा विज्ञान, शिक्षा, दर्शन, आध्यात्म से लेकर कृषि, उद्यान, याँत्रिकी संचार जैसे जटिल निर्धारण वह पशु स्तर पर रह कर कहाँ कर पाता। प्रकृति के अंतराल में छिपी हुई रत्नराशि को उसने एक एक करके अपनी झोली में भर लिया साथ ही उसके और भी बड़े-बड़े अरमान है। ऊबड़-खाबड़ इस दुनिया को उसने तिलस्म बनाकर रख दिया है। प्राणी समुदाय पर उसी का आधिपत्य है। जिन्हें वह चाहे रहने दे, चाहे जिसका अस्तित्व मिटाकर समाप्त कर दे।

ऐसा विभूतिवान यदि अपने लक्ष्य को विस्मृत करता और मार्ग को अनदेखा करता है तो निश्चय ही वह उस परमात्मा के सामने अपराधी बनता है, जिसने उसे इतनी समर्थता और सुविधा प्रदान की है। साथ ही अपनी निज की आत्मा के सम्मुख भी आत्मघाती सिद्ध होता है।

ईश्वर का श्रेष्ठ पुत्र युवराज है, उसका स्तर और प्रयास ऐसा होना चाहिए जिसमें वरिष्ठता के लक्षण निरंतर दृष्टिगोचर होते रहें। मनुष्य का चिंतन ऐसा होना चाहिए जिससे उसकी गरिमा घटने न पायें। इस क्षेत्र में उसे फूँक-फूँककर कदम रखना चाहिए। मानव जीवन के साथ अनेकानेक जिम्मेदारियां, मर्यादा, और वर्जनायें जुड़ी हैं। उसे पशु की तरह पेट प्रजनन के निमित्त कुछ भी करते रहने की छूट नहीं मिली है। वह हिंसक पशुओं की तरह किसी पर भी आक्रमण नहीं कर सकता। लोभ और मोह की पूर्ति औचित्य की सीमा तक ही करने की सुविधा है। इसमें व्यतिरेक करने पर दूसरों द्वारा प्रतिरोध किये जाने या दण्ड मिलने के उपरान्त ही अनुबंध माने ऐसा न होकर उसे अपनी अंतः प्रेरणा से ही उद्भूत होते रहने वाले विवेक का आश्रय लेना होता है। दूसरों के अधिकारों पर कहीं व्यतिक्रम न बन पड़े, इस पर अंकुश उसे अंतःप्रेरणा के आधार पर ही लगाना होता है। नीति मर्यादा के आधार पर अनेकानेक अनुबंध लगे हुए हैं। नारी के प्रति उठने वाली स्वच्छंद कामुकता की दुष्प्रवृत्ति पर उसे धर्म चेतना को ध्यान में रखते हुए प्रतिरोध करना पड़ता है। जबकि पशुओं के ऊपर ऐसी कोई मर्यादा लागू नहीं होती। दुर्बलों के अधिकारों को अन्य प्राणी मान्यता नहीं देते। उन पर आक्रमण करने से नहीं चूकते। किन्तु मनुष्य को दया, करुणा एवं आत्मीयता का आँचल उढ़ाकर आश्रय देना पड़ता है। वह प्रकृतितः आक्रामक नहीं संरक्षक है। अपनी बुद्धिमत्ता और सशक्तता का उपयोग संबद्ध ही नहीं असंबद्धों को ऊँचा उठाने एवं आगे बढ़ाने में करना पड़ता है। न्याय और नीति के परिपालन के निमित्त उसे अनुशासनबद्ध रहने के लिए कहा गया है। संयम साधने और चारित्रिक अनुबंधों का पालन करने के लिए भी उसे आत्म नियंत्रण बनाये रखने के लिए कहा गया है।

अन्य प्राणी अपनी सुविधा, इच्छा एवं मौज के लिए किधर भी चल दौड़ते एवं उड़ान भरने के लिए स्वच्छन्द हैं, पर मनुष्य को न केवल अपनी चारित्रिक विशिष्टताएँ उच्चस्तरीय रखनी पड़ती हैं वरन् परिवार से लेकर संपर्क क्षेत्र की, समाज की परिस्थितियों को सुव्यवस्थित रखने, प्रगति पथ पर अग्रसर करने के लिए भी कार्यरत रहना पड़ता है। आदर्शों के लिए घाटा उठाते हुए कष्ट सहते हुए भी उसे प्रसन्न रहना पड़ता है। दूसरों को सताने में अहंता प्रदर्शित करने की छूट उसे नहीं है।

परिस्थिति के अनुरूप सुविधा-संपदा हस्तगत करने के लिए अन्य प्राणियों के विचार जगते और पैर उठते हैं, किन्तु मनुष्य को अपने चिंतन पर भी नियंत्रण करना चाहिए। उन्हें आदर्शों के अनुरूप होना चाहिए। कुविचारों से मनोविकारों से मस्तिष्क में कूड़ा करकट जमा करते रहने के लिए मनाही है। विचारों की आदत है कि वे सुविधा, संपदा और मौज करने के लिए कल्पना करते और योजनाएँ बनाते रहते हैं। मनुष्य अपने मस्तिष्क पर अंकुश लगाता और अनैतिक चिंतन को मोड़ मरोड़कर उस दिशा में प्रवाहित करने के लिए विवश करता है ताकि उसकी गरिमा पर आँच न आने पावे। यह मानसिक संघर्ष उसे निरंतर करते रहने के लिए कहा गया है जिसमें जन्म जन्माँतरों से संचित कुसंस्कारों को उभारने और चरितार्थ होने का अवसर न मिल पावे। पिछले जन्मों में मनुष्य अन्यान्य क्षुद्र प्राणियों के शरीर में रहता और उनमें रहने वाली दुष्प्रवृत्तियों का अभ्यस्त रहा है। नशेबाजी की तरह उन पुरानी आदतों की भड़क इस जन्म में भी उठती रहती है। उन्हें दबाया दबोचा न जाय तो वे आदतें चरितार्थ होने के लिए जोर लगाती हैं और ऐसे आचरण करने के लिए घसीटती हैं, जिनके कारण उसे नर पशुओं में, नर पिशाचों में गिना जाने लगे। यदि आत्म नियंत्रण में ढील पोल बरती जाय तो वह कर गुजरने का सिलसिला चल पड़े जो मनुष्य योनि में आने के बाद कुकर्म और अपराध श्रेणी में गिने जाते हैं और जिन्हें करने की आत्म प्रताड़ना लोक भर्त्सना और शासकीय दण्ड व्यवस्था सहनी पड़ती है। अपने आपे में संचित कुत्साओं और कुंठाओं से लिप्सा और लालसाओं से झगड़ने के लिए महाभारत स्तर की लड़ाई निरंतर लड़नी पड़ती है।

गुण, कर्म, स्वभाव की अनेकानेक उत्कृष्टताएँ ऐसी हैं जिनके विषय में हेय प्राणियों को कोई अभ्यास नहीं होता। उन्हें मनुष्य जन्म में आकर ही सीखना और बढ़ाना पड़ता है। स्नेह, सौजन्य, शिष्टाचार, सद्भावना, संयम अनुशासन,श्रम, संतुलन जैसे सद्गुण अनायास ही उत्पन्न नहीं होते, उसके लिए कुशल माली की तरह आरोपण और अभिवर्धन का प्रयास करना पड़ता है। यह असाधारण काम है। किसी कल कारखाने में उच्चस्तरीय उत्पादन की तरह-अशिक्षित को विद्वान बनाने की तरह। यह एक बड़ा रचनात्मक काम है। जो इसे तत्परता पूर्वक संपन्न करने में आनाकानी करते हैं उन्हें वे मानवी गौरव उपलब्ध नहीं है। अनगढ़ों, पिछड़ों और हेय स्तर का उन्हें गिना जाता रहता है। न उनकी प्रतिभा विकसित होती है और न स्वावलम्बी स्वाभिमानी कहला पाते हैं। मनुष्य की चिंतन, चरित्र और व्यवहार में उत्कृष्टता का समावेश करने की अपनी संस्कृति है जो उसे अपनाने अभ्यास में उतारने में आनाकानी करते हैं वे उस प्रसन्नता एवं यशस्विता से वंचित रह जाते हैं जो मनुष्य जन्म की जिम्मेदारी समझने वाले को मिलनी ही चाहिए।

अन्य जीवधारी अपनी शारीरिक संरचना के अनुरूप आवश्यकताएँ जुटाने के लिए जन्मजात रूप में प्रवृत्तियां साथ लेकर आते हैं। उसमें उन्हें कुछ घट बढ़ नहीं करनी पड़ती। प्रकृति प्रेरणा के अनुरूप वे जीवनचर्या व्यतीत करते रहते हैं। किन्तु मनुष्य के संबंध में ऐसी बात नहीं है। उसे शिक्षा, भाषा, वस्त्र, मकान, उत्पादन आहार आदि के संबंध में सब कुछ समाज से सीखना पड़ता है। मिल जुलकर काम करने की प्रवृत्ति से ही वह परिवार बनाता है। सामाजिक प्राणी कहाता है ओर विकसित जीवन के लिए जिन अनेकानेक वस्तुओं की आवश्यकता पड़ती है उसे जुटाता है। यदि आत्म निर्माण के लिए वह आरंभ से ही प्रयत्नशील न रहे तो वर्तमान परिस्थितियों में उसके लिए जीवित रह सकना संभव नहीं। अन्य जीवधारियों के अभिभावकों को कुछ ही दिन नवजातों की देख भाल करनी पड़ती है, किन्तु मनुष्य किशोरावस्था में पहुँचने तक एक प्रकार से परावलम्बी ही रहता है। यह सहकारिता प्रयत्नशीलता और इच्छाशक्ति का ही चमत्कार है। जन्मजात रूप से अत्यंत दुर्बल होते हुए भी वह अपनी बलिष्ठता से संसार भर के प्राणियों को इच्छानुसार नाच नचाता है।

उत्साह, साहस और प्रयास के निमित्त मनुष्य को अपनी गतिविधियाँ निरंतर तेज करनी पड़ती हैं। इसलिए कहा जाता है कि मनुष्य जन्म तो ईश्वर ने दिया है, पर उसे समुन्नत बनाने की पूरी जिम्मेदारी उसी पर छोड़ दी है। जो इस दिशा में जितनी उपेक्षा बरतते हैं वे वन मानुषों की तरह उतने ही पिछड़े हुए रह जाते हैं। आदिमानव के साधन हीन और पशुवत होने की कल्पना की गयी है। यह उदाहरण जन जातियों के पिछड़ेपन के देखते हुए कल्पित किया गया होगा। उस स्थिति में भी वह पशुवर्ग से और बातों में आगे रहता है। प्रयत्न चले और साधन मिले तो किसी भी मनुष्य प्राणी का आवश्यक उत्कर्ष हो सकता है। उत्तरी ध्रुव के हिमाच्छादित प्रदेश में रहने वाले एस्किमो जब कनाडा आदि देशों में बसने लगे तो उनने अन्य सभ्य मनुष्यों जैसी विशेषताएं उपलब्ध कर लीं। स्पष्ट है कि मनुष्य में प्रगति के मौलिक तत्व कुछ अपवादों को छोड़कर समान रूप से विद्यमान है। आत्म निर्माण की निजी आकाँक्षा जितनी तीव्र हो, और दूसरों का जितना सहयोग सहकार उपलब्ध हो, उसे उतना ही समुन्नत, सुसंस्कृत बनने का सुयोग मिलता जायेगा।

आत्म निर्माण आत्म परिष्कार तथा आत्म विकास के लिए प्रयत्नरत रहना मानवता का प्रमुख आधार है। जो इसमें तत्परता दिखाते हैं वे योग्यतम बनते जाते हैं। जो उस विकसित क्षमता का उपयोग निजी वैभव संवर्धन में करते हैं, वे पहलवान, विद्वान, धनवान, प्रतिभावान बन जाते हैं। और समृद्धिशील कहलाते हैं। दूसरों की आँखों में चमत्कार उत्पन्न करते हैं पर वस्तुतः यह मानवी प्रतिभा का दर्शन हैं गरिमा का नहीं। मानवी गरिमा का स्वरूप तब निखरता है जब वह जीवन उद्देश्य को समझते हुए समग्र अभ्युदय के राजमार्ग पर चलता है। यह मार्ग अपूर्णता से मुक्ति दिलाकर पूर्णता के लक्ष्य तक पहुँचाता है। इसमें आत्म परिष्कार और लोक कल्याण के दुहरे मोर्चे पर दोनों हाथों से लड़ना और दोनों पैरों से चलना पड़ता है। प्रगतिशील और सुसंस्कारिता का उपयोग अपनी सुविधा संवर्धन तक सीमित नहीं रखा जा सकता। मानवी अन्तरात्मा और ईश्वरीय प्रेरणा का संयुक्त तकाजा है कि विश्व उद्यान को अधिक समुन्नत, सुविकसित और सुसंस्कृत बनाने में वैभव का अधिकाँश भाग नियोजित किया जाय। अपना काम न्यूनतम में ही चलाया जाय।

मनुष्य दूसरों की सेवा सहायता स्नेह और सद्भावना से ही सुयोग्य और समर्थ बन पाता है। वह न मिले तो अनपढ़ पशुओं से मिलता जुलता जीवन ही उसे जीना पड़े। जिस ऋण भार ने उसे सुखी, समुन्नत बनने का अवसर दिया है उस ऋण से उऋण होना उसका नैतिक कर्त्तव्य है। फिर भगवान ने भी मनुष्य जन्म देकर यह परीक्षा भी ली है कि इस ऊँचे पद का गौरव निभ सका या नहीं। जिस प्रकार परीक्षाएँ प्रतियोगिताएँ होती हैं और उनमें उत्तीर्ण होने वाले बाजी मारने वाले पुरस्कार पाते, पदोन्नति का लाभ लेते हैं, उसी प्रकार मनुष्य जन्म को भी समझा जाना चाहिए। यह अवसर निजी विलासिता के लिए, स्वार्थ सिद्ध करने के लिए नहीं मिला है। इसका लक्ष्य पुण्य-परमार्थ है। गिरो को उठाने और पिछड़ों को आगे बढ़ाने में सहारा देने के लिए यह परीक्षाकाल जैसा है। इसमें उत्तीर्ण होने के थोड़े से ही प्रश्न पत्र हैं, पशु प्रवृत्तियों पर अंकुश लगाया जा सकता या नहीं। पवित्रता और प्रखरता का अनुपात बढ़ाया या नहीं? संपर्क क्षेत्र में शालीनता और सद्भावना का परिचय दिया जा सका या नहीं? जनकल्याण के निमित्त ऊँचे दर्जे का प्रयत्न-पुरुषार्थ बन पड़ा या नहीं? सत्प्रवृत्ति संवर्धन में साहस एवं पराक्रम किया गया या नहीं? अनीति और अवाँछनीयताओं के साथ जुझारू मल्ल युद्ध में पौरुष उभरा या नहीं? इन्हीं प्रश्न पत्रों का उत्तर व्यावहारिक क्रियाकलापों के द्वारा देना पड़ता है। मौखिक या लिखित उत्तर देने की इस जाँच पड़ताल में तनिक भी आवश्यकता नहीं पड़ती। सैद्धाँतिक बकवास तो कितने ही करते रहते हैं। यहाँ व्यवहार ही सब कुछ है। जो किया गया उसी का लेखा जोखा लिया जाता है।

जो उत्तीर्ण होते हैं, वे नर से नारायण, पुरुष से पुरुषोत्तम, क्षुद्र से महान बनते हैं। उन्हें महामानव, ऋषि देवात्मा, अवतार जैसी पदोन्नतियों का लाभ मिलता है व ओजस्वी, तेजस्वी, तपस्वी, यशस्वी बनते हैं और जीवन क्षेत्र में कृतकृत्य हुए समझे जाते हैं। प्रशंसा उन्हीं की है जो अपनी नाव में बैठाकर अनेकों को पार लगाने में समर्थ हुए। जो ऐसा कुछ भी न कर सके, पेट प्रजनन के लिए मरते खपते रहें। उन्हें एक दर्जा नीचे उतर जाने का दण्ड भी मिलता है। उन्हें लदे हुए पापों को ढोते हुए नारकीय यंत्रणाएँ भुगतनी पड़ती हैं और चौरासी लाख योनियों के चक्र में फिर से भ्रमण करना पड़ता है। भाग्यवान वे हैं जिन्हें मनुष्य जन्म मिला। बुद्धिमान वे है जिनने बिना भटके लक्ष्य तक पहुँचने का पुरुषार्थ कर दिखाया।


वास्तविकता देर तक छिपी नहीं रहती !

जल्दी नफा कमाने के भ्रम में लोग चोरी चालाकी का रास्ता अपनाते हैं और पीछे भेद खुलने पर स्थिति बिल्कुल उलटी हो जाती है। जिसे आरंभ में बुद्धिमान समझा गया था, उसे धूर्त और बेईमान समझा जाने लगता है। इसका सीधा प्रतिफल यह होता है कि जितना आरंभ में विश्वास और सहयोग होता है, वह भी चला जाता है।

विश्वास देर में जमता है और अनेकों प्रमाण पाने के उपरान्त उसकी जड़ जमती है, किन्तु अविश्वास तो थोड़े संदेह में ही पलने लगता है। फिर यदि एक के बाद एक प्रमाण मिलने लगे तो अविश्वास गहराता ही जाता है और जिनसे आरंभ में मैत्री और सहारे की अपेक्षा थी वह जल्दी ही उलट जाती है। विश्वास देर में जमता है पर अविश्वास की जड़े तो थोड़ा निमित्त कारण सामने आते ही पनपने लगती हैं। विश्वास को अविश्वास में बदलना सरल है। थोड़ा सा कारण होने पर भी वह अपनी जड़े जमा लेता है, पर विश्वास उत्पन्न करने के लिए बहुत समय चाहिए और अनेक प्रमाण भी।

औसत आदमी अविश्वासी पाया जाता है। इसकी ईमानदारी पर संदेह करने के भी अनेक वास्तविक और काल्पनिक कारण मिल जाते हैं। उनके पीछे वास्तविकता न होने पर भी प्रचलित संदेह के वातावरण को सर्वसाधारण के संबंध में भी संदेह किया और कहीं कुछ गड़बड़ी होने का अनुमान लगाया जाता है। फिर कहीं कोई कारण या प्रमाण हो, तब तो बात और भी बड़ी बन जाती है। पर इतनी जल्दी विश्वासी और ईमानदार समझे जाने के संबंध में बात नहीं बनती कारण कि अधिकाँश लोगों का कारोबार तथा क्रियाकलाप छल-छद्म से भरा होता है। ऐसे व्यक्ति कम ही होते हैं जो केवल ईमानदारी और भलमनसाहत का व्यवहार करते और प्रामाणिक जीवन जीते हैं। ऐसे लोगों के संबंध में भी बहुत संकल्प विकल्प उठते रहते हैं। फिर जिनमें खोट रहे हैं उनके बारे में संदेह किया जाय, तो आश्चर्य की बात ही क्या?

प्रचलन बेईमानी के आधार पर अधिक जल्दी और अधिक मात्रा में सफलता पाने का है। इन दिनों बहुत से लोग ऐसा ही करते देखे जाते हैं। फिर सच्चाई पर विश्वास सहज ही कौन करें? जब अधिकाँश लोग अनीति बरतते और छल कपट का व्यवहार करते हैं तो फिर अन्य औसत आदमी के संबंध में ऐसा ही अनुमान लगाया जाय, तो आश्चर्य की क्या बात है।

इतने पर भी निराश होने की बात नहीं है। किसी को भी यह नहीं समझना चाहिए कि अपना व्यवहार सच्चाई का रहा तो भी लोग अविश्वास करेंगे और संदेह की दृष्टि से देखेंगे। ऐसी दशा में सहयोगियों के अभाव में घाटा ही उठाना पड़ेगा। यह संदेह अवास्तविक है। भलमनसाहत को परखने में देर तो अवश्य लगती, पर ऐसा नहीं कि वह सदा टिकी भी रही हो। सज्जनों को भी झूठा या धोखेबाज समझा जा सकता है। मनुष्य को इतनी बुद्धि मिली है कि वह कभी-कभी ही धोखा खाता है। हमेशा भ्रम में ही रहे, ऐसी बात नहीं है। परख करने की बुद्धि मनुष्य की पूरी तरह कुण्ठित नहीं हुई है। झूठे लोगों से कभी-कभी ही कोई ठगा जा सकता है और कभी कभी ही गलतफहमी का शिकार हो सकता है, पर सदा ऐसा नहीं हो सकता कि वास्तविकता छिपी ही रहे और लोग गलतफहमी का शिकार ही बने रहें। वस्तुस्थिति तुरन्त ही प्रकट न हो, पर कुछ ही दिन में वास्तविकता खुल जाती है और लोग देर सवेर में यह समझ जाते हैं कि वास्तविकता क्या है?

वस्तुस्थिति उलटी निकलने पर लोगों को गहरा धक्का लगता है। ईमानदार समझा जाने वाला यदि बेईमान निकले, तो व्यक्ति अपनी नासमझी और दूसरों की धोखेबाजी पर इतना खिन्न हो जाता है कि फिर दुबारा उसे यथास्थिति में लाना कठिन पड़ता है। इसी प्रकार ईमानदार को बेईमान समझने वाले को खेद भी होता है और पश्चाताप भी। दूरदर्शिता इसी में हैं कि बिना जल्दी निर्णय लिए वास्तविकता को जानने का प्रयास किया जाय। उत्कृष्टता व ईमानदारी अधिक दिन तक छिपी नहीं रह सकती। गलतफहमियाँ टिकाऊ नहीं होतीं।


महत्वाकाँक्षाओं की पूर्ति कैसे हो?

मनुष्य आगे बढ़ना चाहता हैं, ऊँचा उठना चाहता है। यह उसकी स्वाभाविक इच्छा है। इस दिशा में जिसे जितनी सफलता मिलती है वह उतना ही प्रसन्न और यशस्वी होता है इसलिए पेट भरने के उपरान्त हर जीवंत व्यक्ति का मन उन्नतशील बनने का होता है।

देखना यह है कि वास्तविक उन्नति क्या है और आकाँक्षाओं की पूर्ति क्या पाने कमाने में होती है। प्रचलन को देखते हुए कामना धन की रहती है। क्योंकि धन के बदले सुख-सुविधा के साधन खरीदे जाते हैं। यह खरीद कितनी मात्रा में होनी चाहिए यह विचारणीय है। धन कितना अभीष्ट है, इससे किसी को तृप्ति नहीं होती। वह जितना मिल जाय उतना ही कम है। सुविधा सामग्री आज तो सीमित भी हो सकती है पर भविष्य में वह कितनी अधिक चाहिए, इसकी कल्पना पर कोई अंकुश नहीं रखा जा सकता। आज जिसकी जेब में सौ रुपया है, वह भविष्य के लिए हजारों चाहता है, हजार मिल जाने पर दस हजार या लाख चाहिए। इसका क्या उपयोग होना चाहिए इसके संबंध में भी यही बात है। आज सूती कपड़ा शाल पर है तो कल रेशमी मखमली चाहिए। आज छोटा घर है तो कल कोठी बंगला चाहिए। यह सुविधा सामग्री है। कल्पना के आधार पर इसकी कोई सीमा नहीं, किन्तु वास्तविक उपयोग की एक सीमा है। वह सीमा पूरी हो जाने के बाद उपलब्धियों की बढ़ोतरी भारभूत हो जाती है।

पेट भरने के लिए आधा सेर अनाज चाहिए। यदि किसी के कटोरदान में दस सेर भोजन भर दिया जाय तो उसे सोचना पड़ेगा कि आवश्यकता से जो अधिक है उसका क्या किया जाय? तन ढ़कने को दस गज कपड़ा चाहिए। यदि पचास गज हाथ में हो तो विचार करना पड़ेगा कि जो अधिक है उसका क्या किया जाय? सोने के लिए एक चारपाई से काम चल जाता है पर कहीं से पाँच चारपाई मिल जाय तो सोचना होगा कि शेष का क्या किया जाय?

मनुष्य की व्यक्तिगत आवश्यकताएँ सीमित हैं। यदि व्यक्तिगत में कुटुम्बियों को भी सम्मिलित किया जाय तो वे भी सीमित होते हैं उनकी आवश्यकता जुट जाने के बाद फिर प्रश्न उठता है कि यदि इससे भी अधिक सामग्री है तो उसका क्या किया जाय? उत्तर सामने आता है कि अपने न सही किन्हीं बिरानों के काम आ जायेगी। इस प्रकार विस्तार करते-करते संग्रह की बात चल पड़ती है। संग्रह कितना हो, इसकी कोई सीमा नहीं है। क्योंकि इसका संबंध आवश्यकता से नहीं, इच्छा से है। इच्छाएँ असीम हैं।

इच्छाओं में धन ही प्रमुख है। हर कोई असीम धन चाहता है ताकि असीम सुख साधनों का उपभोग किया जाय। उचित उपयोग की एक सीमा है। अनुचित उपभोग करना हो तो व्यसनों के रूप में यह असीम भी हो सकता है, संग्रह के रूप में भी।

मनुष्य के कमाने का सामर्थ्य भी सीमित है। बाहुबल, बुद्धिबल साधन और पराक्रम आदि के सहारे हर आदमी एक सीमित मात्रा में ही कमा सकता है। पर यदि असीम कमाने की इच्छा है तो उपार्जन की मर्यादाओं से बाहर जाना पड़ेगा। अधिक मुनाफा लेना या श्रमिकों को कम देना आदि उपाय अपनाना पड़ेगा। बिना ऐसा कुछ किये असीम धन उपलब्ध कर सकना संभव नहीं। उचित कमाई की एक सीमा है उचित खर्च भी असीम नहीं हो सकता। ऐसी दशा में असीम धन किसी के पास कहाँ से आये? फिर मनुष्य की अंतरात्मा का भी तकाजा है। पिछड़े लोगों की सहायता के लिए समाज में सत्प्रवृत्तियां बढ़ाने के लिए अपने पास जो है उसका एक बड़ा अंश परमार्थ रूप में हस्तान्तरित किया जाना चाहिए। यह पुकार भीतर से ही उठेगी। समाज में दुखियारों पिछड़े हुए लोगों की कमी नहीं, वैसे अपने आस-पास ढेरों होते है। उन्हें न दिया जाय तो लगता है कि चोरी जैसा कुछ किया जा रहा है। सत्प्रवृत्तियों को बढ़ाये बिना समाज उन्नतिशील नहीं हो सकता। ऐसी ढेरों माँगें सामने रहती हैं।

उनकी ओर से कृपणता, निष्ठुरता अपनाई जाय तो भी आत्महनन जैसा होता है। दिया जाय तो जो थोड़ा बहुत जमाकर लिया गया था उसे खाली कर देने का मन करता है। ऐसी दशा में कोई ईमानदार आदमी संपन्न नहीं हो सकता। पूरी क्षमता लगाकर अधिक से अधिक जो कमाया जा सकता है, वह जरूरतमंदों के लिए चला जाता है।

आत्म हनन करके अनीतिपूर्वक कमाया और निष्ठुरता पूर्वक जमा किया जाय तो संचित धन का कोई महत्व नहीं। वस्तुतः धन संचित रहता भी नहीं, वह अहंकार प्रदर्शन करने में, दुर्व्यसनों में, किसी न किसी रास्ते खर्च होने लगता है। अपने काम न आये तो कुटुम्बियों संबंधियों के हाथों वह विलासिता और अहंकार प्रदर्शन में चला जाता है। इतने पर भी बचा रहे तो उसे चोर, चापलूस, कुकर्मी डॉक्टर आदि हरण कर लेते हैं। धनी दीखते तो हैं, पर वस्तुतः वे होते नहीं उनके धंधे का फेर ऐसा होता है कि पूँजी सदा कम ही प्रतीत होती रहती है। कुछ और होता तो अधूरी योजना पूरी होती। यही लगता रहता है ऐसी दशा में वह अभाव ग्रस्त दरिद्र ही रहा, भले ही बाहर वालों को सम्पत्तिवान दृष्टिगोचर होता रहे।

महत्वाकाँक्षाओं की प्रचलित मान्यताओं में धन ही प्रधान है, उसकी पूर्ति में कितने झंझट है यह स्पष्ट है। लाभ इतना ही है कि दूसरे लोगों को यह भ्रम बना रहता है कि यह धनवान है। कमाने में अनीति, खर्चने में अनौचित्य, इन दोनों कारणों से न तो अंतरात्मा संतुष्ट हो पाती है और न विवेकशील जनों की आँखों में वह दूरदर्शी ठहरता है। आतिशबाजी का तमाशा करने वालों की तरह ऐसे लोग ऊटपटाँग खेल खेलते रहते हैं। जिसे महत्वाकाँक्षा कहना चाहिए। वह हो नहीं पाती। न वे साँसारिक दृष्टि से आगे बढ़ते हैं और न आत्मिक दृष्टि में ऊँचे उठते हैं। बहुमूल्य मानव जीवन धीरे धीरे इसी गोरखधंधे में समाप्त हो जाता है।

फिर उस आकाँक्षा की तृप्ति कैसे हो, जो जन्म के साथ आरम्भ होती है और मरणपर्यन्त लगी रहती है। इसके लिए दूसरों का अनुसरण करने से काम न चलेगा। जब अपने को रोटी कपड़ा ही मिलना है तो उतने से ही संतोष करके श्रेय पथ पर क्यों न चला जाय। अपनी क्षमताओं को उन कार्यों में नियोजित क्यों न किया जाय जो हाथों-हाथ प्रसन्नता देती हैं, बुद्धिमानों की दृष्टि में विवेकशील ठहरती हैं और ऐसी राह बनाती हैं जिस पर चल कर अन्य लोग भी अपना कल्याण कर सके और दूसरों को पार उतार सके। सृष्टा ने जिस दिन मनुष्य शरीर दिया, उसी दिन यह काम सौंपा कि इस विश्व उद्यान को अधिक सुरम्य बनाने में अपनी क्षमताओं को नियोजित किया जाय। मनुष्य समुदाय को सुसंस्कृत बनाने के लिए अपना पुरुषार्थ नियोजित किया जाय। परमार्थ ही वास्तविक स्वार्थ साधन है। दूसरे को हित साधन के साथ अपना पराक्रम ऐसी क्षमताओं को विकसित करने में नियोजित किया जाय, जिनके सहारे लोकहित कर सकने की क्षमताएँ हस्तगत हो सकें।

गुजारे का प्रश्न अति सरल है। जिस दिन जन्म मिला, उसके पूर्व ही दूध के दो कटोरे भरे हुए प्रदान किये गये। माता के रूप में ऐसी सेविका भेजी गयी जो समय समय पर हर आवश्यकता को तत्काल पूरी करती रहती है। जब बोलना तक नहीं आता था तब जन्म काल में जीवन की आवश्यकता पूरी करने का समस्त सुयोग बनाकर भेजा तो बड़े होने पर निर्वाह का प्रश्न न हल हो सके ऐसा कोई कारण नहीं, कमी कुछ है नहीं। अधिक के लिए हाथ पैर पीटने पर जो हाथ लगेगा, वह हैरानी उत्पन्न करने और समस्याओं में उलझने के अतिरिक्त और कुछ कर सके ऐसा दीखता नहीं।


Quotation

न पैरों तले वाली जमीन कम है न सिर पर छाया हुआ आकाश छोटा है, छोटा तो केवल मस्तिष्क है, जो स्वार्थों के दायरे में सोचता है। यदि वह हृदय के आधीन हो सके तो किसी को किसी वस्तु की कमी नहीं।

विश्व उद्यान को सुरम्य बनाने के लिए परमार्थ मार्ग अपनाना, यही एक श्रेयस्कर निर्णय है। कब क्या करना चाहिए, इसके लिए अंतरात्मा का प्रकाश मार्ग दर्शन करने के लिए हर समय मौजूद है। सेवा का द्वार सर्वत्र खुला हुआ है।पुण्य परमार्थ की पुकार दशों दिशाओं से है। भूल भुलैया का बहकावा एक ही है कि लिप्सा की मृगतृष्णा में भटका जाय और संपन्नता के अहंता के दिवा स्वप्न देखे जायं। अपने को इस ‘स्वर्ण परी’ के प्रलोभन से बचाया जा सके तो वह मार्ग खुला हुआ है। जिसमें आगे बढ़ने और ऊँचा उठने का उभय पक्षीय श्रेय सामने खड़ा है। इतना निश्चय कर लेने के उपरान्त सामयिक परिस्थितियाँ स्वतः मार्गदर्शन करती चलती हैं। लक्ष्य निश्चित रहना चाहिए “विश्व उद्यान को सुरम्य बनाने के लिए प्राणपण से प्रयत्न करना।”


आत्म देव को जगाने की समर्थ साधना!

भौतिक प्रगति के क्षेत्र में विज्ञान समर्थ है तो आत्मिक प्रगति के क्षेत्र में समर्थ विद्या का नाम अध्यात्म है। अध्यात्म अर्थात् अपने आपे का विज्ञान- चेतना का विज्ञान। इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए जो कुछ करना होता है उसी का नाम उपासना एवं साधना है। इसे दो पहियों पर चलने वाली आत्मिक प्रगति की आत्म कल्याण की यात्रा कह सकते हैं। नर से नारायण, पुरुष से पुरुषोत्तम, लघु से महान-आत्मा से परमात्मा बनने का अवसर इसी पथ पर चलने से मिलता है। नर पशु को देवता बनाने की स्थिति इसी प्रयास द्वारा संभव होती है। अगणित ऋद्धि-सिद्धियों का राज मार्ग यही है। महामानव, देवदूत एवं ऋषिकल्प स्थिति प्राप्त करने का आधार यही है। जीवन लक्ष्य की पूर्ति इन्हीं प्रयत्नों से संभव होती है।

आत्म कल्याण के पथ पर अग्रसर करने वाले इस अध्यात्म विधि विज्ञान की दो धाराएँ हैं- आत्म दर्शन और विश्व दर्शन। इन्हें आत्मबोध एवं तत्वबोध भी कहते हैं। ब्रह्मविद्या का समग्र ढांचा इन्हीं दो धाराओं की सैद्धाँतिक एवं व्यावहारिक विधिव्यवस्था समझाने के लिए खड़ा हुआ है। आत्म बोध के अंतर्गत आत्म सत्ता के स्वरूप, लक्ष्य, धर्म चिंतन एवं कर्तव्य की स्थिति समझाई जाती है और तत्वबोध में शरीर एवं मन के साथ आत्मा के पारस्परिक संबंधों और कर्त्तव्यों का निरूपण किया जाता है। शरीर के साथ संबंध बनाते हुए परिवार और समाज के साथ उपयुक्त व्यवहार का पुनर्निर्धारण किया जाता है। अब तक जो ढर्रे का अव्यवस्थित एवं अस्त−व्यस्त जीवनक्रम चल रहा था, उसे दूरदर्शी विवेक के आधार पर सुव्यवस्थित सुसंचालित किया जाता है। अध्यात्म जगत को यही दो धारायें पवित्र गंगा जमुना कही जाती हैं। इन्हीं का संगम तीर्थ राज प्रयाग है- जिसमें स्नान करके परम पुरुषार्थ का पुण्य फल प्राप्त होता है।

उच्चस्तरीय गायत्री साधना के साधक को आत्मबोध एवं तत्वबोध की इन्हीं दोनों साधनाओं का समन्वय करना पड़ता है। इन दोनों का लक्ष्य एक ही है। दोनों अन्योन्याश्रित एवं परस्पर पूरक हैं। इसके लिए ध्यान मुद्रा में बैठकर सामने एक बड़े दर्पण में वक्षस्थल से ऊपर का अपना शरीर ध्यान पूर्वक देखा जाना ही आत्म बोध की प्रत्यक्ष विद्या है। अधिक बड़े साइज का दर्पण उपलब्ध हो तो पूरे शरीर को भी देखा जा सकता है। पर अपनी छवि लगभग उतनी ही बड़ी दीखनी चाहिए जितनी कि वह माप की होती है। छोटे दर्पण को दूर रखकर यों तो पूरा शरीर देखा जा सकता है, पर उसमें आकृति बहुत छोटी हो जायेगी। इससे काम नहीं चलेगा इसलिए सामान्यतया ऐसा ही करना पड़ता है कि डेढ़ फुट ऊँचा दर्पण किसी छोटी मेज पर इस तरह रख लिया जाय कि वह सामने लगभग ढाई फिट की दूरी पर रहे। इस दर्पण में अपने स्वरूप को देखना होता है साथ ही उसका दार्शनिक विवेचन-विश्लेषण गम्भीर मनःस्थिति में करना होता है।

दर्पण में अपना स्वरूप देखते हुए आत्मबोध करने वाला साधक अपनी इस दयनीय स्थिति पर विचार करता और करुणा व्यक्त करता है कि वह ईश्वर का अविनाशी अंश एवं उसका वरिष्ठ राजकुमार होते हुए भी किस तरह भवबंधनों से बँधा हुआ-दुर्भावनाओं और दुष्प्रवृत्तियों का सताया हुआ रुदन-क्रन्दन करता हुआ, संक्षोभों की आग में जलता हुआ जी रहा है। जबकि वह पृथ्वी पर प्रसन्नता पूर्वक जीवन व्यतीत करते हुए ईश्वरीय प्रायोजन पूरे करने के लिए पूर्णता का लक्ष्य प्राप्त करने के लिए आया था। पर वह सब तो इक प्रकार से सर्वथा विस्मरण ही हो गया। पैर उस जंजाल में फँस गया जिसे आटे के लोभ में गला फँसाने वाली मछली अथवा जाल में तड़पने वाले पक्षी के समतुल्य दुर्दशाग्रस्त स्थिति कहा जा सकता है। वह चाहता तो ईश्वरीय निर्देश और आध्यात्म कर्तव्य का पालन करते हुए पूर्णता के लक्ष्य को प्राप्त कर सकता था और अपूर्णता से पूर्णता का वरण करना चाहता था। पर वैसा न करके पशुता और पैशाचिकता की दुष्प्रवृत्तियों में उलझ पड़ा और फिर से चौरासी लाख योनियों में भ्रमण करने का दीर्घकालीन दुस्सह दुख सहने -कोल्हू में पेले जाने तथा चक्का में पीसे जाने की स्थिति आँखों के सामने आ खड़ी हुई।

तदुपरान्त दर्पण के सामने बैठकर अपनी छवि शीशे में देखते हुए आत्म विश्लेषण किया जाता है। ईश्वर का अविनाशी अंशधर विश्व में सुरम्य परिस्थितियाँ उत्पन्न करने के लिए नियुक्त किया गया विशेष प्रतिनिधि पूर्णता का लक्ष्य प्राप्त कर सकने के सुअवसर से संपन्न सौभाग्यशाली- यह है दर्पण में बैठा हुआ है। इसके काया-कलेवर में ईश्वर की समस्त दिव्य शक्तियाँ और विभूतियाँ भरी पड़ी हैं। इसका एक एक कण ऐसी विशेषताओं से संजोया गया है कि चाहे तो सहज ही महामानवों की, देवदूतों की पंक्ति में बैठ सकता है।

सूक्ष्म रूप में मानव शरीर में समस्त देवताओं की ऋषियों की दिव्य सत्ता विद्यमान रहती है। उसे थोड़ा भी पोषण मिले तो यह बीज विशाल काय वटवृक्ष में परिणीत होकर अपने को धन्य और विश्व मानव को सुसम्पन्न बना सकता है। इसमें महामानव देवमानव बनने एवं बुद्ध, ईसा, राम, कृष्ण जैसे अवतार चेतना से सुसम्पन्न बन सकने की परिपूर्ण संभावनायें विद्यमान हैं। इतना सब कुछ होते हुए भी अवाँछनीय गतिविधियाँ अपनाने के कारण यह दर्पण में बैठा महामानव किसी दयनीय दुर्दशा से ग्रसित ही रहा है, यह कैसे आश्चर्य या दुर्भाग्य की बात है। लोभ और मोह के, वासना और तृष्णा के स्वार्थ और संकीर्णता के बंधनों ने किस बुरी तरह से जकड़ रखा है। इन्द्रिय लिप्सा का गुलाम बनकर इसने अपने शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को किस बुरी तरह चौपट कर डाला। परिवार के उचित उत्तरदायित्वों को निबाहना और परिजनों को सुसंस्कृत बनाना तो कर्त्तव्य था, पर मात्र इसी छोटे समुदाय के लिए अपनी समस्त क्षमताओं को नियोजित कर देना कहाँ की समझदारी थी। कुत्साओं और कुण्ठाओं से ग्रसित जीवन का क्रम और स्वरूप बना लेने की उसी की पूरी जिम्मेदारी है, जो इस दर्पण में बैठा है और उसमें फँसा है। वह चाहे तो उसे समेट सकता है और स्वच्छंद विचरण की जीवन मुक्ति की स्थिति प्राप्त कर सकने में सफल हो सकता है।

इस प्रकार दर्पण में दृष्टिगोचर प्रतिबिम्ब के सहारे आत्म विश्लेषण की अधिक गहराई में प्रवेश किया जा सकता है और पतन से ऊँचे उठकर उत्थान के उच्च शिखर पर पहुँच सकने का पथ निर्धारण किया जा सकता है, भविष्य के लिए ऐसी सुसंतुलित गतिविधियों का निर्धारण किया जा सकता है, जिसमें भौतिक और आत्मिक उत्तरदायित्वों के निर्वाह की संतुलित गुंजाइश बनी रहे।

दर्पण आत्म बोध का एक माध्यम है। बाह्य जगत में इतने घुले हुए व्यस्त रहते हैं कि अपने को एक प्रकार से भूल ही बैठे होते हैं। याद तो शरीर और मन की क्षुधा, तृष्णा ही रहती है। आत्मा या परमात्मा भी कोई होता है? हम भी आत्मा है आत्मा के कुछ अपने स्वार्थ और कर्त्तव्य भी हैं क्या? यह बात पढ़ी सुनी तो कई बार होती है, पर उसने तथ्य के रूप में कभी हृदय की गहराई तक प्रवेश नहीं किया होता। यदि आत्मबोध की यथार्थता अंतःकरण में सजग हुई होती तो निश्चित रूप से भौतिक सुख सुविधायें प्राप्त करने की तरह आत्मोत्कर्षण के लिए भी कुछ करने की प्रेरणा उठी होती और उस दिशा में भी कुछ तो बना ही होता।

अकेला दर्पण आत्मबोध, आत्म दर्शन करा दे, यह किसी प्रकार संभव नहीं। पूजा उपासना के पीछे जो प्रेरणायें भरी पड़ी हैं उनसे प्रभावित होकर उपयुक्त चिंतन और कर्त्तव्य अपनाते हुए दिव्यजीवन की रीति-नीति अपनाई जा सके तो ही इन पूजा परक कर्मकाण्डों का महत्व है। आत्म बोध की विचार धाराओं से अंतःकरण को भरने में सहायता करना ही दर्पण उपकरण का उद्देश्य है। उसी प्रकार पूजा का उपयोग यही है कि जीवन निमार्ण की प्रेरणाओं को उभारे और उन्हें सक्रिय बनायें। लकीर पीटने जैसी चिन्ह पूजा से न तो आत्म कल्याण हो सकता है और न दर्पण की मनुहार करने से आत्म लाभ का प्रयोजन पूरा हो सकता है।

आत्मबोध की आत्म विश्लेषण की साधना दर्पण के सहारे की जाती है। इस साधना के द्वारा प्रायः संबंधित सभी समस्याओं पर प्रकाश पड़ जाता है। आत्मबोध, आत्म निरक्षण, आत्म सुधार और आत्म विकास की पृष्ठभूमि क्या हो सकती है? आस्थाओं में आकाँक्षाओं में क्या हेर फेर होना चाहिए? गतिविधियों में रीति नीति में एवं कार्यपद्धति में क्या उलट पलट की जानी चाहिए, इसकी एक प्रभु प्रेरित सुविस्तृत रूपरेखा सामने आती है।

यदि प्रस्तुत दिव्य संदेशों को अंतःकरण की गहन भूमिका में प्रतिष्ठापित किया जा सका और उन्हें क्रिया रूप में परिणत करने का प्रबल पराक्रम भरा आत्मबल उपलब्ध हो सका तो समझना चाहिए कि दर्पण के माध्यम से की जाने वाली आत्मबोध की साधना एक दैवी वरदान बनकर सामने आई है। आत्मोत्कर्ष के महान प्रायोजन की आवश्यकता पूरी हुई और अणु से विभु, नर से नारायण बनने का लक्ष्य हस्तगत हुआ।


गायत्री उपासना मातृरूप में ही क्यों?

गायत्री महाशक्ति को नारी रूप में क्यों पूजा जाता है? जबकि अन्य सभी देवता नर रूप में हैं। इसी प्रकार यह भी प्रश्न उठता है कि गायत्री मंत्र में सविता देवता की प्रार्थना के लिए पुल्लिंग शब्दों का प्रयोग हुआ है, फिर उसे नारी रूप में ही क्यों माना गया?

इस प्रकार के प्रश्नों या शंकाओं के मूल आधार में मनुष्य की वह मान्यता काम करती है, जिसके अनुसार नर को श्रेष्ठ और नारी को निकृष्ट माना गया है। स्त्री का वर्चस्व स्वीकार करने में पुरुष अपना अपमान समझते हैं। इसका कारण नर में नारी के प्रति सामंत कालीन धारणाओं के अवशिष्ट संस्कार ही हैं। उसी से प्रभावित होकर उसे यह सोचना पड़ता है कि वह नारी शक्ति की पूजा क्यों करे? जब नर देवता मौजूद हैं तो नारी के आगे मस्तक झुकाकर नर तत्व को हेय क्यों बनाया जाय? यह धारणा शंका या प्रश्न विचार करने पर निर्मूल और व्यर्थ ही सिद्ध होते हैं।

जिनके साथ घनिष्ठता स्थापित की जाती है उनके साथ कोई रिश्ता बन जाता है। रिश्ते का अर्थ है प्रेम का संबंध, आदान-प्रदान। इस संबंध में जितनी अधिक आत्मीयता होगी उतनी ही प्रक्रिया मिलेगी। गुँबज अथवा कुँए की प्रतिध्वनि की तरह हमारा प्रेम भी ईश्वरीय प्रेम और अनुग्रह बनकर हमारे पास लौटता है।

“त्वमेव माता च पिता त्वमेव” इस प्रार्थना में जिन संबंधों को गिनाया गया है उनमें माता का संबंध सर्वप्रथम है। वह सर्वोपरि भी है। क्योंकि माता से बढ़कर परम निःस्वार्थ अतिशय कोमल करुणा एवं वात्सल्य से पूर्ण और कोई रिश्ता हो ही नहीं सकता। जब हम भगवान को माता मान कर चलते हैं तो उसकी प्रतिक्रिया किसी सहृदय माता के वात्सल्य के रूप में उपलब्ध होती है। इन उपलब्धियों को पाकर साधक धन्य हो जाता है।

नर और नारी के बीच जो ‘रयि’ और ‘प्राण’ विद्युत धारा सी बहती है उनका सामीप्य संपर्क आध्यात्मिक स्तर पर वैसा ही परिणाम उत्पन्न करता है जैसा कि बिजली की नेगेटिव और पॉजिटिव धाराओं के मिलन से विद्युत संचार का माध्यम बन जाता है। माता और पुत्र का भावात्मक मिलन एक अत्यन्त उत्कृष्ट स्तर की आध्यात्मिक विद्युत धारा का सृजन करता है। यह साँसारिक स्तर की बात उपासना के भावना क्षेत्र में भी लागू होती है। माता का नारी रूप ध्यान भूमिका में जब प्रवेश करता है तो उससे प्राण की एक बड़ी अपूर्णता पूरी होती है।

युवा षोडशी नारी के रूप में माता का ध्यान करके हम नारी के प्रति वासनात्मक दृष्टि हटाकर पवित्रता का दृष्टिकोण जमाने का अभ्यास करते हैं। इसमें जितनी सफलता मिलती है उतनी ही बाह्य जगत में भी हमारी नारी के प्रति वासनात्मक भोगपरक दृष्टि हटती जाती है। इस प्रकार नर-नारी के बीच जिस पवित्रता की स्थापना हो जाने पर अनेक आत्मिक बाधायें, कुण्ठायें और विकृतियाँ दूर हो सकती हैं, उसका लाभ सहज ही मिलने लगता है। गायत्री माता का ध्यान एक वृद्ध नारी का नहीं वरन् एक युवती का होता है। युवती में यदि उत्कृष्टता और पवित्रता की दृष्टि रखी जा सके तो समझना चाहिए कि आत्मिक स्तर सिद्ध योगियों जैसा तपस्वी बन गया। गायत्री उपासना में इस महाशक्ति को नारी रूप देकर एक महत्वपूर्ण आध्यात्मिक आवश्यकता की पूर्ति का प्रयत्न किया गया है।

हम भगवान को प्रेम करते हैं और उसके अनन्य प्रेम का प्रतिपादन करना चाहते हैं। तब माता के रूप में उन्हें भजना सबसे अधिक उपयुक्त एवं अनुकूल बैठता है। माता का जैसा वात्सल्य अपने बालक पर होता है वैसा ही प्रेम -प्रतिफल प्राप्त करने के लिए भगवान से मातृ संबंध स्थापित करना आत्म विद्या के मनोवैज्ञानिक रहस्यों के आधार पर अधिक उपयोगी एवं लाभदायक सिद्ध होता है। प्रभु को माता मानकर जगज्जननी देवमाता गायत्री के रूप में उनकी उपासना करें तो उसकी प्रतिक्रिया भगवान की ओर से भी वैसी ही वात्सल्यमय होगी जैसी कि माता की अपने बच्चों के प्रति होती है।

नारी शक्ति पुरुष के लिए सब प्रकार आदरणीय है, पूजनीय एवं वंदनीय भी। पुत्री के रूप में, बहिन के रूप में, माता के रूप में वह, स्नेह करने मैत्री करने योग्य एवं गुरुवत् पूजन करने योग्य है। पुरुष के शुष्क अंतर में अमृत सिंचन यदि नारी द्वारा नहीं हो पाता तो वैज्ञानिक बतलाते हैं कि वह बड़ा रूखा, कर्कश, क्रूर, निराश, संकीर्ण एवं अविकसित रह जाता। वर्षों से जैसे पृथ्वी का हृदय हर्षित होता है और उसकी प्रसन्नता हरियाली एवं पुष्प पल्लव के रूप में फूट पड़ती है, वैसे ही पुरुष भी नारी की स्नेह वर्षा से इसी प्रकार सिंचन प्राप्त करके अपनी शक्तियों का विकास करता है। परन्तु एक भारी विघ्न इस मार्ग में वासना का है जो अमृत को भी विष बना देता है। दुराचार, कुदृष्टि एवं वासना का सम्मिश्रण हो जाने पर नर नारी के सान्निध्य से प्राप्त होने वाले अमृत फल विष बीज बन जाते हैं। इसी बुराई के कारण स्त्री पुरुषों को अलग अलग रहने के सामाजिक नियम बनाये गये हैं। फलस्वरूप दोनों पक्षों को उन असाधारण लाभों से वंचित रहना पड़ता है जो नर नारी के पवित्र मिलन, पुत्री, बहिन और माता के रूप में सामीप्य होने से मिल सकते हैं।

इस विष विकार की भावना का शमन करने के लिए गायत्री साधना परम उपयोगी है। विश्व माता के रूप में भगवान की मातृभाव से परम पुण्य भावनाओं के साथ आराधना करना मातृ जाति के प्रति पवित्रता की अधिकाधिक वृद्धि करना है। इस दिशा में जितनी अधिक सफलता मिलती जाती है उसी अनुपात में अन्य इन्द्रियों का निग्रह, मन का निरोध एवं अनेक मनोविकारों का शमन अपने आप होता जाता है। मातृभक्त के हृदय में दुर्वासनाएँ अधिक देर तक नहीं ठहर सकती। इसी कारण श्री रामकृष्ण परमहंस, योगी अरविंद घोष, छत्रपति शिवाजी, महात्मा गाँधी, स्वामी दयानन्द आदि कितने ही महापुरुष शक्ति के उपासक थे। शाक्त धर्म भारत का प्रधान धर्म है। जन्मभूमि को हम भारत माता के रूप में पूजते हैं। शिव से पहले शक्ति की पूजा होती है। माता का पिता और गुरु से भी पहले स्थान है। इस प्रकार विश्व नारी के रूप में भगवान की पूजा करना नर पूजा की अपेक्षा अधिक उपयोगी है। गायत्री उपासना की यही विशेषता है।

ब्रह्म निर्विकार है, इन्द्रियातीत तथा बुद्धि से अगम्य। उस तक सीधा पहुँचने का कोई मार्ग नहीं। नाम -जप, रूप का ध्यान, प्रार्थना, तपस्या, साधना, चिंतन, कीर्तन आदि सभी आध्यात्मिक उपकरण हैं। सतोगुणी, माया एवं चित्त के द्वारा ही जीव और ईश्वर का मिलन हो सकता है। यह आत्मा और परमात्मा का मिलाप कराने वाली शक्ति गायत्री ही है। ऋषियों ने इसी की उपासना की है, क्योंकि यह खुला रहस्य है कि शक्ति बिना मुक्ति नहीं। सरस्वती, लक्ष्मी, काली, माया, प्रकृति, राधा, सीता, सावित्री, पार्वती आदि के रूप में गायत्री की पूजा की जाती है। पिता से संबंध होने का कारण माता ही है। इसीलिए पिता से माता का दर्जा ऊँचा है। ईश्वर की असीम आनन्द राशि का आस्वादन


बंधन मुक्ति की ओर (Kahani)

नगर में प्रतिष्ठलब्ध व्यक्ति मंदिर गया और मूर्ति के समक्ष नत मस्तक हो कर बुदबुदाने लगा। “क्षमा करे भगवान ! मैं बड़ा कुटिल हूँ, अधम हूँ, अपराधी हूँ। मैंने जीवन में अब तक पाप ही पाप किये हैं।” बाजू में खड़े व्यक्ति के कान में शब्द पड़े। उसने आँखें खोली देखा अरे यह तो अमुक व्यक्ति है। इसकी शराफत, सादगी, सज्जनता की बड़ी धाक है। लोग इसे अव्वल दर्जे का ईमानदार, चरित्रवान समझ बैठे हैं यह तो अपनी असलियत मंदिर में कुछ और ही बखान रहा है। सोचा चलें चलकर नगर वासियों को अभी बता दें। प्रतिष्ठित व्यक्ति ने देखा बाजू वाले व्यक्ति ने सब कुछ सुन लिया। उसने रोककर कहा खबरदार तुमने तीसरे को यह शब्द बताये। यह मेरी व्यक्तिगत बातें हैं जो केवल मैं और भगवान ही जानते हैं। अन्यथा मेरी प्रतिष्ठ धूल में मिल जायेगी व्यक्ति सकपकाया उसने सोचा शायद इस लिए व्यक्ति का उत्कर्ष नहीं हो पाता कि वह दिखाई कुछ और देता है और होता ठीक उसके विपरीत है। प्रायश्चित पूरा तभी होता है जब लिए गये संकल्प जीवन में भी उतारे जाते हैं।

करने का सौभाग्य गायत्री माता द्वारा ही मानव को प्राप्त होता है।

ब्रह्म की इच्छा, शक्ति एवं क्रिया गायत्री है। उसी से उत्पत्ति, विकास एवं अवसान का आयोजन होता है। सुन्दरता, मधुरता क्रीड़ा, सम्पत्ति, कीर्ति आशा, प्रसन्नता, करुणा, मैत्री आदि रूप में यह महाशक्ति ही जीवन क्षेत्र को आनन्दित और तरंगित करती रहती है। इस विश्वनारी की, सर्वव्यापी महाशक्ति गायत्री की, महा माता की आराधना करके हम अधिकाधिक आनन्द की ओर, बंधन मुक्ति की ओर अग्रसर हो सकते हैं।


इच्छाशक्ति की महिमा

इच्छाएँ अनन्त हैं- यह सत्य है, पर यह भी मिथ्या नहीं कि यदि इच्छाएँ नहीं होती, तो मनुष्य आज भी पाषाण कालीन आदिम युग में पड़ा रहता। आज जो उसकी स्थिति है, वह उसकी इच्छा के कारण ही है, और आने वाले समय में जो उसकी दिव्यता प्रकट होने वाली है, वह भी उसी की इच्छा के कारण होगी। मनुष्य चाहें तो अपनी इच्छा के पतन पराभव के गर्त में गिर सकता है। सब कुछ उसकी अपनी इच्छाओं का ही खेल है।

यह सारा संसार भी इच्छाओं का ही मूर्त रूप है। एक मात्र ईश्वर की इच्छा का ही स्फुरण है। अनन्त हैं आनन्द के केन्द्र परमात्मा के हृदय में एक भावना उठी- “एकोऽहं बहुस्यामि” और इसी के मूर्तिमान रूप यह मंगलमय संसार बनकर तैयार हो गया। अपनी इच्छा शक्ति से उसने मनुष्य सहित संपूर्ण चराचर की सृष्टि कर दी और मनुष्य को विविध शक्तियों से संपन्न कर उसके कर्तव्य का खेल देखने के लिए स्वयँ उसकी हृदय गुहा में अवस्थित हो गया, साथ ही उसे क्रिया शील बनाने के लिए इच्छाओं के साथ सुख दुख का द्वन्द देकर संचालित कर दिया। इस तरह मनुष्य जो भी कुछ करता धरता है, उसके मूल में इच्छाशक्ति ही प्रधान रहती है।

प्रख्यात जर्मन दार्शनिक आर्थर शॉपेनहावर ने अपने प्रमुख ग्रंथ “द वर्ल्ड ऐज विल एण्ड आइडिया” अर्थात् ‘संकल्प और भावरूप में जगत’ उक्त तथ्य का प्रतिपादन करते हुए कहा है कि संसार एवं उसकी समस्त जड़ चेतन वस्तुओं, प्राणियों में इच्छाशक्ति की प्रबलता ही देखी जाती है। इच्छा, प्रयत्न, भावना अभिलाषा, आकाँक्षा सबके सब इसी के रूपांतरण हैं। एक तत्व दूसरे तत्व से इसी शक्ति से मिलता आकर्षित होता है। उनके अनुसार मानवी काया के निर्माण से पूर्व भी इच्छा शक्ति विद्यमान थी और उसी से प्रेरित होकर शरीर का निर्माण हुआ है। आत्मा की जैसी इच्छा होती है, वैसे ही शरीर में परिवर्तन होते आये हैं। काया के निर्माण में समग्र रूप में इसी शक्ति को सक्रिय देखा जाता है। उन्होंने मनुष्य को “आध्यात्मिक प्राणी” कहा है और स्पष्ट किया है कि आत्मिकी का आश्रय लेकर चाहे तो वह अपनी इच्छाशक्ति को परिष्कृत कर देवमानव, महामानव स्तर तक विकसित हो सकता है। किन्तु अन्य प्राणियों के साथ अध्यात्म विद्या का कोई संबंध न होने के कारण वह वैसा नहीं कर पाते। मनुष्य की विवेक बुद्धि साथ दे तो वह इच्छा शक्ति के आधार पर मृत्यु पर भी विजय प्राप्त कर सकता है। कारण इच्छा आकाँक्षा का नियंत्रण विवेक द्वारा ही होता है।

मनुष्य इच्छाएँ करें, यह उचित नहीं आवश्यक भी है। इसके बिना प्राणी जगत निश्चेष्ट एवं जड़वत् लगने लगेगा, किन्तु इसका एक विषाक्त पहलू भी है। ओर वह है इनकी अति और इनका अनुचित स्तर का होना। मनुष्य जीवन को क्लेशकारी, कष्टदायक परिणामों की ओर ले जाने में अति और अनुचित इच्छाओं का प्रमुख हाथ है। स्वामी रामतीर्थ का कथन है। “मनुष्य के भय और चिंताओं का कारण उसकी अपनी इच्छाएँ है। इच्छाओं की प्यास कभी पूर्ण रूप से संतुष्ट नहीं हो पाती।” उत्तराध्ययन 9/48 एवं आचारंग सूत्र 1/2/5 में भी यही कहा गया है कि इच्छाएँ आकाश के समान हैं। उन पर विजय पाना मुश्किल है। बात भी ऐसी ही है। आज जो हम सोचते हैं, उसके पूर्ण हो जाने पर अन्य अनेकों कामनाएँ उठ खड़ी होती हैं। यह वह आग है जो तृप्ति की आहुति से और प्रखर हो उठती है। एक पर एक अनियंत्रित इच्छाएँ यदि मन में उठती रहें तो मानव जीवन नारकीय यंत्रणाओं से भर जाता है।

मनुष्य इस धरती पर एक महान लक्ष्य लेकर अवतरित हुआ है। और उसी के अनुरूप उसे सदिच्छाओं को बलवती बनाना है। सुखी रहने और समुन्नत बनने का यही राजमार्ग है। वेदव्यास महाभारत शाँतिपर्व 177/48 में कहते हैं कि मनुष्य जिन जिन इच्छाओं को छोड़ देता है उस उस ओर से सुखी हो जाता है। यदि इच्छा अभिलाषा की दिशा को भोग से मोक्ष की ओर, स्व से पर की ओर अथवा पीड़ा, पतन निवारण की ओर मोड़ा जा सके, तो स्वर्गीय आनन्द का अहर्निशि रसास्वादन किया जा सकता है। संभवतः इसलिए दक्षिण के महान संत तिरुवल्लुवर ने अपनी कीर्ति ‘तिरुक्कुरल’ में लिखा है कि योगी वही हैं जो साँसारिक इच्छाओं को वशवर्ती कर, औरों की हित कामना में रत हो जाय। परमार्थ ही जिनकी वृति है, उन महामानवों में सदैव दुखों से पीड़ा से संतप्त प्राणियों के कष्ट निवारण की भाव भरी सदिच्छा ही कार्यरत देखी जाती है। इसीलिए तो वे अभिनन्दनीय, अभिवंदनीय होकर इतिहास पुरुष बन जाते हैं।

मधु-संचय


आदर्श-पथ

नये निर्माण के इस यज्ञ में समिधा बनो साथी।

बड़ा ही सुख मिलेगा गंध बन जग में बिखरने में ॥

हुए हम इकट्ठा युग नया निर्माण करने को।

शिवम् सत् सुन्दरम् से मनुजता का प्राण भरने को॥

मगन मन हो गया था लोकहित का लक्ष्य वरने में ॥

घरों में जाओगे जब ज्ञान का संदेश नव लेकर।

मिलेगा देवदूतों सा तुम्हें सम्मान और आदर॥

समय का पुण्य है फैला हुआ अज्ञान हरने में॥

चलें हम अग्रगामी बन, नये निर्माण के मग में।

भले चुभ जाये काँटे या फफोले ही पड़े पग में॥

मगर संतोष मिलता है जगत का काम करने में॥

जरा सोचो किसी घर में अँधेरा ही अँधेरा हो।

बहुत ही दूर सुख सौभाग्य का दिखता सवेरा हो॥

मिलेगा सुख वहाँ पर आस का एक दीप धरने में॥

चला है सूख साथी! संस्कृति का विमल जल पनघट।

पुनः मृग स्वर्ण का बनता, उतरता द्रौपदी का पट॥

भलाई है पवनसुत या कि अर्जुन बन सँवरने में ॥

वही है ज्ञान की गंगा नये निर्माण का जल है।

कराएँ हम सभी को प्राप्त यह कर्त्तव्य का पल है॥

कि कोई भी मनुज चूके न गागर आज भरने में ॥

सदा होता रहा है यह कि जब भी युग बदलता है।

मनस्वी ही हमेशा युग पुरुष के साथ चलता है॥

मरण जीवन बनेगा लोकहित की राह मरने में॥

-माया वर्मा


युग-कर्तव्य

महाकाल की हुँकारें अब गूँज रही,

उन्हें न हम पल भर भी अब अनसुनी करें।

चारों तरफ प्रमाद, अकर्मण्यता भरी,

यहाँ सभी सोये, अधसोये लगते हैं,

मुसकाने तो शिष्टाचार बनीं केवल,

सभी हृदय से रोये-रोये लगते हैं,

यह दुहरे व्यक्तित्व न ओढ़े हम बिल्कुल,

मन न और आश्वासन से हम यहाँ भरें।

अंतरिक्ष-यानों में ऊपर जा कर भी,

दिन-पर-दिन हम अधोमुखी होते जाते,

सुख सुविधाओं का अम्बार लगा जितना,


युग-कर्तव्य (Kavita)

उतने ही हम अधिक दुखी होते जाते,

सहें नहीं अब असंतुलन की पीड़ा हम,

पाँव जमाकर चलें, ढलानों पर ठहरें।

त्यागें हम आलस्य, खुमारी धो डालें,

देखो, कैसा हाहाकार मचा है अब,

महाकाल के स्वर में स्वर हम मिला, चलें,

समय बहुत थोड़ा ही शेष बचा है अब,

नवयुग की ऐसी नीवें निर्माण करें।

हिला न पायें जिन्हें प्रलय की भी लहरें।

परिवर्तन की अद्वितीय इस बेला में,

हमको भी अपनी आहुति देनी होगी,

संध्या को संकल्प अटल देकर अपना,

चिंताकुल मन की पीड़ा लेनी होगी,

पल भर की भी देर प्राणघाती होगी,

हम हृदयों की घोर हताशा अभी हरें।

-शचीन्द्र भटनागर

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अवसर को पहचानने की सूझ-बूझ

सच्चे मित्र, सच्चे परिजन एवं हृदय से जुड़े संबंधी कितने हैं? इसकी एक कसौटी है, विपरीत परिस्थिति आने पर कितनों ने साथ दिया, सहायता की, गिरतों को ऊँचा उठाया एवं उठतों को उछालने में किनने अपनी शक्ति का प्रयोग किया। यों स्वार्थी मित्रों, परिजनों एवं तथाकथित अपने कहलाने वालों की कमी नहीं है, जो अपना उल्लू सीधा करने तक लम्बी चौड़ी डींग हाँकते हैं एवं आड़े समय में दुम दबाकर ऐसे भाग खड़े होते हैं, मानों दूर-दूर तक उनका उनसे कोई संबंध ही नहीं, सोचते हैं इस झंझट में कौन पड़े। वृथा परेशानी होंगी, कष्ट उठाना पड़ेगा। यह तो इसका एक पक्ष है पर इसका दूसरा उज्ज्वल और महत्वपूर्ण पक्ष भी है, जिसमें वैसे ही लोगों की सराहना होती है, प्रमाणिक माने जाते हैं और समाज में सम्मान पाते है। जो किसी ऐतिहासिक समय के आड़े अवसर पर भागीदारी निभाते हैं। चिरस्मरणीय, अभिनन्दनीय एवं वंदनीय वही बन पाते हैं।

आज ऐसा ही समय आ उपस्थिति हुआ है। महाकाल हमें पुकार पुकार कर इसमें अपनी भागीदारी निभाने और अपना नाम शुनःशेपों में लिखा लेने का आमंत्रण दे रहा है। इतिहास साक्षी है जिसने भी आड़े समय में साथ दिया है, वह घाटे में नहीं रहा है।भगवान राम के आड़े समय में काम आने वाले रीछ, वानर, भालू, गिलहरी गीध धन्य हो गये और ऐतिहासिक श्रीराम के सच्चे संबंधी कहलाये। उस काल में बड़े बड़े राजा महाराजाओं का भी अस्तित्व था, किन्तु राम के सुखी समय तक ही अपना उल्लू सीधा करने के लिए वे हाँ में हाँ मिलाते रहे एवं आवश्यकता पड़ने पर अपना मुँह फेर लिया।

गाँधी जी के स्वतंत्रता आन्दोलन को भी आपत्ति काल के नाम से जाना जाता है। इस गहरायी तमिस्रा में दीपक की तरह जलने वाले एवं अपनी आहुति देने वाले लोग धन्य हो गये। उनके नाम स्वर्ण अक्षरों में अब भी अंकित हैं। वास्तव में उन्होंने समय को पहचान कर विपरीत परिस्थितियों में भी सत्य का साथ दिया। बुद्ध के धर्म चक्र प्रवर्तन आन्दोलन के समय भी अनेक धनवान एवं संपन्न लोग थे, किन्तु आगे आने वालों में अम्बपाली, अशोक, अंगुलिमाल जैसे गिने चुने सर्वस्व दान कर परिस्थितियों को बदल देने में समर्थ हुए। प्रताप के प्रतिकूल समय में काम आने वाले भामाशाह की तरह उन्हीं दिनों कितने ही लोग थे, किन्तु भामाशाह के आगे आने पर लोग भामाशाह को आज भी याद करते एवं प्रेरणा ग्रहण करते है। इतिहास इन्हें ही महापुरुष, देवमानव, महामानव, शहीद, सूरमा जैसे उपनामों से अलंकृत करता है। इनके व्यक्तित्व एवं कर्तृत्व सामान्य प्रचलन एवं प्रवाह से हटकर होते हैं। ये प्रवाह में, हवा के रुख में नहीं बहते वरन् एक ऐसा रास्ता तैयार करते हैं, जिसे नूतन और साहसिक कदम की संज्ञा दी जा सके। फिर उनका अनुगमन करने वाले अनेकों तैयार हो जाते हैं एवं उस पथ पर चल कर श्रेय और सौभाग्य के अधिकारी बनते हैं।

रात्रि में सभी जीव जन्तु चर-अचर प्रगाढ़ निद्रा में सोते हैं, उस समय समय का प्रवाह ऐसा कुछ होता है, जिसके कारण न चाहते हुए भी व्यक्ति को सोना पड़ता है। जबकि इस समय चोर-उचक्कों से सावधान एवं सचेत रहना अत्यंत अनिवार्य है। इन परिस्थितियों में जो चौकीदारी का काम करते हैं, उनकी महत्ता सामान्य लोगों से अधिक मानी जाती है। उन्हें अधिक वेतन भी मिलता है एवं उनकी ईमानदारी, जिम्मेदारी और वफादारी को देखते हुए समय-समय पर उपहार- पुरस्कार से सम्मानित किया जाता है।

सुरक्षा बल में कुछ ऐसे विभाग होते हैं जिन्हें रिजर्व बल की संज्ञा दी जाती है। इन्हें सामान्य सिपाही की अपेक्षा अधिक सुविधा साधन उपलब्ध रहता है। प्रश्न उठता हैं आखिर क्यों? इसका एक मात्र उत्तर है सामान्य प्रचलन से हटकर चलने का पुरस्कार। 24 घण्टे में वे हमेशा तैयार मिलते हैं। इन्हें रात में चैन नहीं मिलता, जब चाहें तब इन्हें कहीं भी मोर्चे पर भेजा जा सकता है। इनकी प्रतिभा, पराक्रम एवं जीवटता सामान्य सिपाहियों से बढ़ चढ़कर होती है। अवरोधों से लड़ना एवं खतरों से टकराना इनके स्वभाव का एक अनिवार्य अंग होता है। भारतीयों की इसी प्रखरता को देखकर इंग्लैण्ड के प्रधान मंत्री बोल पड़े थे “यदि भारत के सैनिक हों एवं इंग्लैण्ड की रसद, फिर हमें दुनिया की कोई ताकत हरा नहीं सकती।” यह है ढर्रे के जीवन से उलटा चलने का इनाम-इकराम।

यही बात औद्योगिक क्षेत्र में भी लागू होती है, जापान एवं जर्मनी इतने महाविनाश के बाद ऊँचाई के इतने सर्वोत्तम शिखर पर कैसे पहुँचे इसका एक उत्तर है - अपनी जीवट का परिचय देकर। औद्योगिक क्षेत्रों में सामान्यतया लोग 8 घण्टे श्रम करते हैं। शेष समय यूँ ही। बेकार भुगतने में गुजार देते हैं किन्तु जापान एवं जर्मनी वासियों ने देशभक्ति का परिचय इस रूप में दिया कि देश के लिए अधिक से अधिक उत्पादन करने के लिए जी जान से जुट पड़ा जाय। उन देशों के उस काल में श्रमशीलता को देखने से पता चलता है कि प्रत्येक उद्योग चौबीस घण्टे चला करते थे। विषम परिस्थिति में सीमित जनशक्ति द्वारा उत्पादन बढ़ाने का यही मात्र उपाय था। इसके साथ ही उन्होंने प्रामाणिकता और राष्ट्र के प्रति निष्ठ बरकरार रखी। फलतः जापान जिसकी द्वितीय विश्व युद्ध समय में इस प्रकार से कमर टूट चुकी थी पुनः अपने धवल रूप में उभरा और आज स्थिति यह हैं कि अमेरिका अर्थव्यवस्था को उसने बुरी तरह चरमरा दिया है। यह आड़े समय की जागरुकता -सक्रियता और सच्ची निष्ठा का प्रतिफल है।

ब्रह्म मुहूर्त के स्वर्णिम काल में समस्त प्राणियों को मंगल प्रभाती सुना कर विहान की पूर्व सूचना देने वाले मुर्गे की महत्ता क्या कम उल्लेखनीय है। भले ही इनका यह उपक्रम मोटी दृष्टि से नगण्य सा लगता हो, पर ग्रामीण जानते हैं कि उनके लिए मुर्गे की बाँग कितनी महत्वपूर्ण और उपयोगी है। जिस समय को आम लोग सुखद निद्रा का समय मानते हैं, उस काल में भी सजग रहते हुए अपने त्याग का परिचय देकर जागरण के आह्वान का दायित्व निभाता है। क्या कोई अन्य पक्षी यह कष्ट उठाने को तैयार होता। कदाचित नहीं। इसलिए मुर्गे की भाँति प्यारा, दुलारा और पालतु शायद कोई नहीं बन पाता।

वनस्पति पर दृष्टिपात करें, तो वहाँ भी ऐसे उदाहरण मिल जाते हैं, जो समय की प्रतिकूलता को पहचानते हुए भी अपनी सुरभि लुटाने में कोताही नहीं बरतते और धन्य बन जाते हैं। ‘रात की रानी’ ऐसा ही फूल है। दिन में तो सभी पुष्प अपनी सुगंध चहुँ ओर बिखेरते हैं किन्तु रात्रि के वातावरण को सुरभित करने का प्रश्न आया तो सभी फूल पीछे हट गये, आगे आई रातरानी, और उसने संकल्प लिया की रात में ही वह अपनी सुगंध से समूचे वातावरण को सुवासित करेगी। चाहे कितना ही प्रतिकूल समय क्यों न हो, उसने अपने इस शाश्वत संकल्प को डिगने नहीं दिया, फलतः विशेष सम्मान की अधिकारी बनी। लोग विशेष रूप से इसका रोपण घरों के आस पास करते हैं एवं इसी सुगंध से पुलकित होते रहते हैं।

मनुष्य जब भी अपनी मनःस्थिति में ऐसा कुछ परिवर्तन लाता है जिसमें सामान्य प्रवाह से विपरीत असाधारण कार्य संपन्न हो तो उसकी सराहना की जाती है। वर्तमान काल को हम आड़े समय की संज्ञा दे सकते हैं, जिसमें मनुष्य को पेट और प्रजनन में निरत रहना शोभा नहीं देता। आने वाली पीढ़ी उन्हें


Quotation

कई बार पुराने खण्डहर गिराने और पुराने कपड़े बदलने पड़ते हैं, यही बात प्रचलनों के संबंध में भी है। कई बार नये विवेकपूर्ण प्रतिपादन भी इतने सुन्दर होते हैं जैसे ओस बिन्दुओं में शोभायमान नवोदित कमल पुष्प।

धिक्कारेगी, कोसेगी और लाँछित करेगी कि उन्होंने क्षुद्रता को बंदर के मरे बच्चे की तरह अपनाकर महानता को पहचाना नहीं और संकीर्ण स्वार्थपरता की पूर्ति के जाल जंजाल में उलझकर वासना, तृष्णा और अहंता की पूर्ति को ही तुष्टि, तृप्ति एवं शाँति की संज्ञा देते रहे हैं।

यह संधिकाल भी मनुष्य जाति के लिए सोने का नहीं बल्कि जागरण गीत गाने का है। जब मुर्गे जैसे सामान्य जीव, रात रानी जैसी वनस्पति ऐसे अवसरों को पहचानकर अपने सामान्य क्रिया कलापों में हेर फेर कर सकते हैं तो कोई कारण नहीं कि मनुष्य इन परिस्थितियों को न समझ पायें। भले ही वह व्यस्तता की दुहाई देकर दूसरों की आँखें में धूल झोंकने का प्रयत्न करें किन्तु यह सुविदित तथ्य है कि ऐसे व्यक्ति सदा घाटे में ही रहते हैं और श्रेय सम्मान से वंचित बने रहते हैं जिसे सहजता से उपलब्ध किया जा सकता है। अच्छा हो आड़े समय की महत्ता को समझें और ऐसा कुछ कर दिखायें जिसे अनुपम अलौकिक एवं अविस्मरणीय कहा जा सके।


सूक्ष्म प्रयोगों द्वारा अदृश्य का परिशोधन

परोक्ष वातावरण जब कुपित होता है, तो उसका परिणाम प्रत्यक्ष जगत में स्पष्ट परिलक्षित होने लगता है। आयुर्वेद के मर्मज्ञ जानते हैं कि शरीर में जब वात, पित्त, कफ संतुलन बिगड़ जाता है, तो वह बुखार, खाँसी, सन्निपात जैसी भाँति भाँति की बीमारियों के रूप में सामने आता है। इसका उपचार भी वे उस समीकरण को सही करके ही पूरा करने में सफल हो पाते हैं। यदि औषधियाँ व्याधि के अनुरूप न दी जाय तो रोग को जड़-मूल से नष्ट कर पाना उनके लिए असंभव हो जाता है।

वर्तमान समय में आये दिन घटित होने वाली विभीषिकाओं के बारे में भी ऐसा ही समझा जाना चाहिए। दुर्भिक्ष, भूकम्प, ज्वालामुखी विस्फोट, महामारी, सुखा, सौर कलंकों की शृंखला और उनका अवाँछनीय प्रभाव, यह सब उसी क्रिया की प्रतिक्रिया है, जो परोक्ष जगत में समायी विषाक्तता के रूप में समय समय पर प्रकट होती रहती है। चोट जब तक नासूर नहीं बनती तब तक वह दबी पड़ी रहती है। किन्तु ज्यों ही वह समय की एक विशेष सीमा रेखा को पार करती है, विष के रूप में समाया मवाद शरीर फोड़कर प्रत्यक्ष हो जाता है।

इन दिनों मनुष्य की गतिविधियाँ कुछ ऐसी बन पड़ रही हैं, जो श्रेष्ठता को बढ़ावा न देकर दुष्टता और भ्रष्टता को ही गतिमान बनाने में लगी हुई है। यदि इसके मूल में समाये कारणों पर गंभीरता पूर्वक विचार किया जाय तो इसका हेतु एक ही दृष्टिगोचर होगा- चिंतन की विकृति- थोड़े साधन में संतोष न कर पाने का दुर्भाग्य। प्राचीन समय में न तो आज जैसी साधन सुविधा थीं और न विश्व के एक कोने से दूसरे कोने में क्षण मात्र में पहुँचने का उपाय- उपचार। फिर भी लोग आज के तथाकथित विकास युग से अधिक शाँति और संतोषपूर्वक जीवन बिताते देखे जाते थे। उनमें न तब अवाँछनीय आकाँक्षा थी, और न आज जैसी महत्वाकाँक्षा। इसी महत्वाकाँक्षा ने मनुष्य को साधन सुविधाओं की दिशा में प्रवृत्त किया और जो नहीं किया जाना चाहिए उसे भी कर गुजरने के लिए प्रोत्साहित किया। यहाँ महत्वाकाँक्षा का तात्पर्य यह कदापि नहीं है कि मनुष्य में यह होनी ही नहीं चाहिए। यह उन्नति -प्रगति का एक आवश्यक अंग है। मनुष्य जीवन में इसका सर्वाधिक और सर्वोपरि महत्व है। इसका होना नितान्त आवश्यक है, किन्तु शर्त एक ही है कि यह महत्वाकाँक्षा ओछी न हों, वरन् उच्च आदर्शों के प्रति हो, अपने जीवन में ग्रहण धारण करने से संबंधित हो, साथ ही साथ उसमें सर्वोन्नति की भावना भी निहित हो। यदि आरंभ में मनुष्य में उन्नति करने की महत्वाकाँक्षा न रही तो आज वह इस विकसित सभ्यता को जन्म दे सकने में नितान्त असमर्थ होता। पर महत्वाकाँक्षा की यह आकाँक्षा सर्वग्राही सर्वभक्षी तब सिद्ध होने लगती है, जब वह आकाश-कुसुम खिलाने की बात सोचने और करने लग जाता है।

आज यही हो रहा है। औद्योगीकरण के अंतर्गत कल कारखाने पूरे संसार में इस कदर तेजी से वृद्धि कर रहें हैं कि जितना मनुष्य को उनसे लाभ नहीं मिल पा रहा हैं उससे अधिक गुना हानि उठानी पड़ रही है।इससे न सिर्फ हवा अपितु मिट्टी, पानी और सूक्ष्म जगत बेहिसाब विषाक्त होते जा रहें है।

जनसंख्या का विस्फोट भी बरसाती उद्भिजों की तरह इस भाँति विस्तार करता जा रहा है कि मनुष्य को रहने के लिए धरती की कमी महसूस हो रही है। इस स्थिति में उस वातावरण को शुद्ध बनाने वाले जंगलों का भी सफाया करना आरंभ कर दिया। वर्षों से चले आ रहे इस अभियान के कारण आज संसार भर में यह स्थिति है कि अब जंगल पहले की तुलना में इतने थोड़े रह गये हैं कि वातावरण संशोधन की प्रक्रिया पूरी करने में सर्वथा अक्षम साबित हो रहें हैं। बात यही तक सीमित होती तो किसी हद तक संतोष की साँस ली जा सकती थी, किन्तु जब आत्मघाती सरंजाम दिन दूनी रात चौगुनी की दर से बढ़ते ही चलें जाय और उनके निराकरण के उपाय उपचार नहीं के बराबर हो, तो फिर शरीर में जगह-जगह घाव के उपजने और पीड़ा दायक त्रास की अनुभूति कराने जैसे ही दृश्य यत्र-तत्र-सर्वत्र दृष्टिगोचर होने लगते हैं। इन दिनों की बाढ़, बीमारी एवं इसी प्रकार के अन्यान्य प्रकृति प्रकोपों को सूक्ष्म जगत का ऐसा ही उपक्रम समझा जाना चाहिए।

इस बिंदु पर एक ही प्रश्न उठता है कि उल्टी सोच के कारण जो उल्टे कदम उठ पड़े, इससे परोक्ष जगत को जो अपरिमित हानि हुई, उसकी भरपाई कैसे की जाय? उसका निराकरण क्यों हो? इस संबंध में एक ही बात कही जा सकती है कि सूक्ष्म स्तर की विषाक्तता को प्रदूषण को सूक्ष्म स्तर के प्रयोगों द्वारा ही ठीक किया जा सकता है। स्थूल प्रयोगों द्वारा ऐसा कर पाना सूर्य को दीपक दिखाने के समान है। विश्व में कितने ही देशों में वातावरण में बढ़ती कार्बन डाइऑक्साइड को ऑक्सीजन में बदलने की कितनी ही मशीनें बनी और इसी से संबंधित अनेकानेक प्रकार के प्रयोग-परीक्षण हुए और हो रहे हैं, पर इतने से परोक्ष जगत में समायी विषाक्तता को सही कर देने का दावा नहीं किया जा सकता। यह तो एक प्रकार के प्रदूषण का संशोधन हुआ, मगर अदृश्य जगत में एक मात्र प्रदूषण यही तो नहीं है। इसमें वैचारिक असुरता से लेकर न जाने कैसी कैसी और कितनी विषाक्तता भरी पड़ी हैं जिसका निवारण निराकरण अध्यात्म स्तर के इन्द्रवज्र जैसे विशाल प्रयोगों से ही संभव है। गायत्री अखण्ड जप के विश्वव्यापी कार्यक्रम में इसी स्तर के महान उपचार हैं, जिनसे कम में अदृश्य जगत को शुद्ध कर पाना सरल नहीं है।

ज्ञातव्य है कि महत्वपूर्ण कार्यों और प्रयत्नों के लिए संयुक्त शक्ति का जुटाना आवश्यक होता है। भौतिक क्षेत्र में तो ऐसा ही हो सकता है कि तोप का एक गोला सौ गोलियों जितना काम कर दे पर अध्यात्म क्षेत्र में वैसा नहीं है। एक बड़े बल्ब के जलने की अपेक्षा यहाँ सौ दीपकों का महत्व अधिक माना जाता है। यों भौतिक क्षेत्र में भी छोटी-छोटी इकाइयों के मिलकर एक बड़ी रचना बनने की बात को सर्वथा नकारा भी नहीं जा सकता। तिनके के मिलने से एक मजबूत रस्सी बन जाती है। कई सींक मिलकर एक बुहारी बनाती हैं। सभी जानते हैं कि छोटी छोटी ईंटों का योग न हो, तो भव्य भवन का बनना कदापि संभव नहीं है।

मनुष्य में शरीर और प्राण दोनों हैं। शरीर में बल और प्राण में जीवन रहता है। शरीर की संयुक्त शक्ति जितनी बनती है, उसकी क्षमता से एक यंत्र मानव बन सकता है, किन्तु हर व्यक्ति की अपनी अपनी सूझ व जीवट होती है, उसका भी तो महत्व है। इस लिए सेना में अधिकाधिक सुयोग्य सैनिकों की आवश्यकता पड़ती है। अस्त्र-शस्त्रों की न्यूनाधिकता उतनी महत्वपूर्ण नहीं जितनी कि सैनिकों का कौशल, साहस और पराक्रम। यह जीवंतों की विशेषताएँ हैं। इसीलिए प्रीतिभोजों व जुलूसों, उत्सव- आयोजनों में जनशक्ति के सहारे शोभा बनती है। एक- दो सेनापति, धनाढ्य, विद्वान, नेता को विराजमान करे देने से न जुलूस बनता हैं, न समारोह। भौतिक क्षेत्र में एक और एक मिल कर दो ही होते हैं, पर अध्यात्म जगत में बात इससे नितान्त भिन्न होती है, वहाँ एक-एक मिलकर ग्यारह बनने का ही सिद्धाँत काम करता है। मुसाफिरखानों की भीड़ में भावनात्मक एकता न होने से उसका महत्व भले ही नहीं पर एक स्वभाव, एक शिक्षण, एक लक्ष्य वाले सैनिकों की संयुक्त शक्ति कैसा गजब ढाती है, यह किसी से छिपा नहीं है।

यह सामूहिक बल का परिणाम है। सूर्य की किरणें तो सभी जगह बिखरी पड़ी रहती हैं, पर इस स्थिति में वह सामान्य आभा-ऊर्जा ही संसार को दे पाती हैं किन्तु किरणों को जब आतिशी शीशे के माध्यम से पुँजीभूत करके किसी लक्ष्य पर संधान किया जाता है, तो परिणीत आग के गोले के रूप में सामने आती है। सैनिक जब किसी पुल के ऊपर से होकर गुजरते हैं तो कप्तान का उनको निर्देश रहता है कि कदम मिलाकर न चलें। इससे उत्पन्न कंपन के कारण पुल टूटने का खतरा रहता है।

साधना क्षेत्र यों होती तो व्यक्तिगत और एकान्तिक साधनाएँ भी हैं। पर उनका लक्ष्य प्रयोजन एवं सामर्थ्य सीमित होने के कारण साधक तक ही उसका लाभ परिमित होकर रह जाता है। सर्वजनीन साधना एवं संवर्धन के लिए यदि कोई बड़ा कदम उठाने की आवश्यकता हुई तो सदा समन्वित सहयोगी प्रयत्नों की आवश्यकता समझी और पूरी की गयी है, प्राचीन समय में राजतंत्र द्वारा राजसूय यज्ञ व धर्मतंत्र द्वारा वाजपेय यज्ञ ऐसे ही प्रयोजनों के व्यापक निराकरण के लिए आयोजित किये जाते थे। उन्हें समारोह, सम्मेलन, आयोजन, संवर्धन सह प्रयत्न की भी संज्ञा दी जा सकती है। जो काम विद्वान मण्डली या दो चार तपस्वी एवं शासक वर्ग अपने सीमित पराक्रम से संपन्न नहीं कर सकते थे, उन्हें मध्यवर्ती भावनाशीलों की संयुक्त शक्ति से संपन्न कर लिया जाता था।

उन्हीं तथ्यों को ध्यान में रखते हुए अदृश्य जगत के परिशोधन एवं परिमार्जन हेतु बड़े पैमाने पर गायत्री मंत्र का ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान स्थान-स्थान पर आयोजित करने की इन्हीं दिनों आवश्यकता अनुभव की गयी है।इसमें तीन दिवसीय सामूहिक व अखण्ड गायत्री मंत्रोच्चार का भावना पूर्वक श्रीगणेश का प्रावधान है। उससे उत्सर्जित होने वाले प्रचण्ड शब्द एवं भाव शक्ति न सिर्फ परोक्ष की असुरता को नष्ट करने में प्रभावी भूमिका संपन्न करेगी, अपितु स्थूल जगत में देवत्व पूर्ण वातावरण विनिर्मित करने में भी बड़ा प्रयोजन सिद्ध कर सकेगी। इस प्रकार इस एक उपचार से साँप के मरने और लाठी नहीं टूटने के दोनों उद्देश्य साथ साथ पूरे हो सकेंगे। इससे जहाँ एक ओर विषाक्तता के घटने मिटने से विषधर की तरह फन फैलाये और कालकूट उगलती विक्षुब्ध प्रकृति का सहज शमन संभव होगा, वही दूसरी ओर वातावरण को सतयुगी बनाने में मदद मिलेगी। यह संघ शक्ति का प्रभाव है।

सर्वविदित है कि जब सीता के अवतरण की ऋषियों को आवश्यकता अनुभव हुई, तो ऋषि-रक्त की एक-एक बूँद एक घड़े में इकट्ठा की गई। इसमें समायी दुर्धर्ष प्राण-ऊर्जा से जो शक्ति उद्भूत हुई वह सीता कहलायी है। यदि केवल रक्त जैसे उपादान कारण से ही सीता का उद्भव सहज संभव होता, तो संभवतः ऋषि अपने में से किसी एक का गला काटकर खून एकत्रित कर उस प्रायोजन की पूर्ति कर लेते, पर उन्होंने ऐसा नहीं किया, क्योंकि रक्त के साथ-साथ उसमें उस प्रचण्ड प्राण चेतना को वे कैसे डाल पाते, जिससे सीता का अवतरण होना था। यह कार्य एक-एक बूँद रक्त के रूप में एकत्रित प्राण चेतना ही संपादित कर सकती थी। इसलिए ऐसा किया गया।

आज इसी स्तर की सूक्ष्म प्राण-चेतना के एकत्रीकरण की महती आवश्यकता अनुभव की जा रही है। जिसे पुरश्चरण तथा ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान स्तर के सूक्ष्म व महान आध्यात्मिक प्रयोग ही संभव कर सकते हैं। स्थूल उपचारों से ऐसा शक्य नहीं हो सकता। इंजन की टंकी पानी से भरी तो रहती है, पर वह इंजन चला कहाँ पाता है, किन्तु उसी जल को जब भट्टी में तपाकर भाप के रूप में सूक्ष्मीकृत कर उसे एक पतली नली से गुजारा जाता है, तो प्रतिफल चमत्कार जैसा सामने आता है। इससे न सिर्फ इंजन खिसकने लगता है, वरन् अपने पीछे जुड़े सैकड़ों डिब्बों को भी खींचने घसीटने खिसकाने लगता है। यह सूक्ष्म का प्रभाव परिणाम है। ऐसे ही सूक्ष्म प्रयोगों द्वारा अदृश्य जगत का परिशोधन संभव है। इसलिए वर्तमान वर्ष को शक्ति साधना वर्ष घोषित करते हुए सामूहिक गायत्री साधना की आवश्यकता पर बल दिया गया है। प्रस्तुत संकट का समाधान इससे कम में संभव भी नहीं।


गायत्री परिवार की शुभ कामनाएँ (Kahani)

विगत 20 अक्टूबर को उत्तराखण्ड हिमालय के गढ़वाल क्षेत्र में आयें भूकम्प ने एक बार फिर प्रकृति का रौद्र रूप दिखा दिया है। भारत में इस सदी के भयंकरतम माने जाने वाले इस भूकम्प ने पर्यावरणविदों को पुनः चिंतन करने पर विवश कर दिया है। जो त्रासदी हुई है, उसे आँखों से देखने के बाद दिल दहल उठता है। मानवी संवेदना जिन्दा है इसलिए सहायता भी पहुँची है किन्तु जिन तक पहुँचना चाहिए था, उन तक या तो नहीं पहुँची या देर से पहुँची।

इस आध्यात्मिक संगठन ने सामूहिक पुरश्चरण का शुभारंभ विगत तीन वर्षों पूर्व से ही बड़े व्यापक स्तर पर कर दिया था ताकि विभीषिकाएँ जिनकी घोषणा परम पूज्य गुरुदेव ने की थी, क्रमशः निरस्त हों। फिर भी जन धन हानि जो हुई है, उसकी क्षति पूर्ति हेतु शाँति कुँज का एक दल स्वयं सेवकों सहित नवम्बर के प्रथम सप्ताह में गया व जन-जन तक दूर दराज के पहाड़ी स्थानों तक साधन सहायता पहुँचाने का उसने प्रयास किया। जन सहानुभूति ही उसने अर्जित नहीं की, कष्ट पीड़ितों के आँसू पोंछने में आगे बढ़−चढ़ कर इस दल ने औरों का हाथ बँटाया। सभी केन्द्र प्रज्ञा संस्थानों से शाँतिकुँज की कुशल क्षेम के तार-टेलीफोन आए। शांतिकुंज को किसी भी प्रकार की कोई क्षति नहीं पहुँची है। किन्तु हिमालय का हृदय जो घायल हुआ है उस घाव को दूर होने में अभी काफी समय लगेगा। पूरे गायत्री परिवार की शुभ कामनाएँ कष्ट पीड़ितों के साथ हैं।


गायत्री उपासक स्वामी विद्यारण्य जी

दक्षिण भारत के महान संत विद्यारण्य जी का नाम अपनी विलक्षण प्रतिभा के लिए विख्यात है। संस्कृत वाङ्मय में उनकी इतनी अधिक एवं इतनी उच्चकोटि की कृतियाँ हैं कि उन्हें इस युग का व्यास कहा जाता है। वे विद्या के भण्डार सरस्वती के वरद् पुत्र महातपस्वी और अद्भुत प्रतिभावान थे। उनकी प्रतिभा का इतना विकास गायत्री उपासना द्वारा ही हुआ था।

उनका जन्म दक्षिण भारत के एक संभ्रान्त ब्राह्मण परिवार में हुआ था। बाल्यावस्था विद्याध्ययन में बीती, किन्तु ज्यों ही उन्होंने युवावस्था में प्रवेश किया त्यों ही गायत्री महामंत्र की उपासना आरंभ कर दी। उनकी यह तपस्या पूरे चौबीस महापुरश्चरणों तक चलती रही। उसकी पूर्णाहुति करने के उपरान्त भी जीवनमुक्ति स्थिति में रहकर वे संसार का कल्याण करते रहे तथा जीवनपर्यन्त पीड़ा-पतन निवारण के कार्यों में संलग्न रहें।

साधनाकाल में ही विद्यारण्य की अंतर्निहित शक्तियाँ जाग्रत हो गयी थीं और वे अलौकिक क्षमताओं के स्वामी बन गये थे। छिपाये रखने पर भी उनका परिचय जब तब संपर्क में आने वालों को मिल ही जाता था। इसी अवधि में दो राजकुमार हरिहर राय व बुक्काराय उनकी शरण में पहुँचे। उनका राज्य छिन गया था और वे मारे मारे फिर रहे थे। स्वामी जी का आशीर्वाद प्राप्त करके उन्होंने अपना खोया हुआ राज्य फिर से प्राप्त कर लिया और जीवन भर उनकी शिक्षाओं एवं आदर्शों पर ही राज्य चलाते रहे। जिस प्रकार समर्थ गुरु रामदास की अप्रत्यक्ष प्रेरणा से छत्रपति शिवाजी ने आर्य संस्कृति की रक्षा के लिए राज्य स्थापना की थी, वैसे ही विद्यारण्य जी की कृपा और प्रेरणा से यह दो राजपुत्र विजय नगर राज्य की स्थापना में समर्थ हुए।

स्वामी जी को तप करते हुए दीर्घकाल व्यतीत हो गये, चौबीस पुरश्चरण पूरे हो गये, फिर भी उन्हें गायत्री माता का साक्षात्कार नहीं हुआ। अपनी इस असफलता पर उन्हें बड़ा दुख और निराश होकर उन्होंने संन्यास ले लिया। संन्यास धारण करने के उपरान्त ही उनका नाम स्वामी विद्यारण्य प्रसिद्ध हुआ।

जब वे संन्यासी हो गये तब एक दिन गायत्री माता ने उन्हें दर्शन दिया। इस पर उनको बड़ी प्रसन्नता भी हुई और आश्चर्य भी। उनने माता से पूछा - “मैंने चौबीस पुरश्चरण आपके दर्शनों की इच्छा से किये तब आपने मुझे दर्शन नहीं दिया और अब मैं सब प्रकार की, आपके दर्शन की भी कामना छोड़कर जब संन्यासी हो गया हूँ तब आप अनायास ही दर्शन देने क्यों पधारी हैं? इस पर माता ने उत्तर दिया कि इसके दो कारण हैं। एक तो यह कि जब तक साधक के दिव्य नेत्र नहीं खुलते, मेरा साक्षात्कार नहीं होता। तुम्हारे पुरश्चरणों से पूर्व जन्मों के 24 महापातक नष्ट हुए हैं। और अब तुम इस योग्य हुए हो कि मेरे दर्शन प्राप्त कर सको। दूसरा कारण यह है कि जब तक साधक के मन में कामनाएँ बनी रहती हैं, तब तक वह मुझसे सच्चा प्रेम नहीं कर सकता। कामना और इष्ट देव के साथ-साथ प्यार करते रहना संभव नहीं है। अधूरे प्रेम से मैं प्रसन्न नहीं होती। तुम्हारे मन में मेरे दर्शन की कामना थी। यद्यपि वह इच्छा सतोगुणी थी, फिर भी थी तो कामना ही। अब जब कि तुमने कामना त्यागकर मेरा आश्रय लिया है और सच्ची भक्ति में प्रवृत्त हुए तो फिर मेरा वात्सल्य रुक न सका और मैं तुम्हें दर्शन देने के लिए दौड़ी आई हूं।”

माता भगवती के यह वचन सुनकर स्वामी विद्यारण्य के आनन्द की सीमा न रही और वे आनन्द सागर में मग्न होकर प्रेमाश्रुओं से माता के चरण धोने लगे। गायत्री माता ने उनसे कहा-कुछ वरदान माँगों, उनने कहा- “जिस निष्काम भावना के कारण आपके दर्शन मिले हैं उसे मैं किसी वरदान के बदले नहीं खो सकता। मुझे किसी वरदान की आवश्यकता नहीं है।” तब माता ने अपनी ओर से वरदान देते हुए कहा- “तुम संसार के कल्याण के लिए सद्ग्रंथों की रचना करो। जैसे गणेश जी की कृपा से महर्षि व्यास अठारह पुराण लिखने में समर्थ हुए?, वैसे ही मैं तुम्हारी लेखनी पर सवार होकर संसार के जनमानस के कल्याण करने वाले ग्रंथों की रचना करूंगी”। विद्यारण्य ने माता का आदेश शिरोधार्य किया और सद्ग्रंथों की रचना में लग गये। उनके द्वारा रचित ग्रंथों की एक विशाल सूची है। चारों वेदों के, शतपथ, ऐतरेय, तैत्तरीय, ताण्ड्य, आदि ब्राह्मण ग्रंथों के भाष्य, देशोपनिषद दीपिका जैमिनीय न्यायमाला विस्तार, अनुभूति प्रकाश, ब्रह्म गीता, सर्वदर्शन संग्रह, माधवीय धातु वृत्ति, शंकर दिग्विजय, काल निर्णय, श्री विद्या महार्णव तंत्र, पंचदशी आदि। यह सब गायत्री उपासना का प्रतिफल था जो उनने अपने जीवन में कर दिखाया और अमर बन गये।

अखण्ड-ज्योति परिजनों के लिए विशेष सामयिक संदर्भ-


उलटे प्रवाह को उलटकर-सीधा करने की प्रक्रिया

आकाश में बादल बरसने की तरह नव युग का ऐसा आगमन नहीं होने वाला है जिसे दैवी अनुग्रह से बिना पुण्य के ही सब कुछ घर बैठे उपलब्ध हो जायेगा। छप्पर फाड़ कर संपत्ति बरसने की आशा किसी को भी नहीं करनी चाहिए। इसके लिए सूझ-बूझ, त्याग, साहस और पराक्रम को उपयुक्त मात्रा में जुटाना होगा। गिराने और बिगाड़ने में थोड़ा समय लगता है। पर यदि उसे नये सिरे से बनाना हो तो कुशल कारीगरों की, उपयुक्त निर्माण सामग्री की, और निर्माण कृत्य के अनुभवी इंजीनियरों की आवश्यकता पड़ती है। जो इतना जुटा लेते हैं, उन्हीं को दैवी अनुग्रह से मिलने वाला श्रेय और जन साधारण द्वारा मिलने वाला यश सहयोग भी हस्तगत होता है।

संसार बहुत बड़ा है। उसमें इन दिनों प्रायः 600 करोड़ व्यक्ति रहते हैं। इनमें से हर एक को उलटा सोचने और उलटा करने की अवाँछनीयता से विरत करना है। नये सिरे से वह सिखाया और अभ्यास में उतारना है जिसे अगले दिनों अनिवार्य रूप से अपनाना पड़ेगा। परिवर्तन की बेला सदा जटिल होती है। इसे प्रसव वेदना के समतुल्य समझा जा सकता है। अण्डे का कलेवर तोड़कर जब बच्चा बाहर आता है तो फिर विचित्र खींचतान करनी पड़ती है। मकान छोड़ने, बदली होने पर भी कई असुविधाओं का सामना करना पड़ता है। उसे संपन्न करने के लिए बढ़े चढ़े कौशल एवं साहस का परिचय देना होता है।

सतयुग ऋषि युग था। उन्हीं का पराक्रम और बाहुल्य ही धरती को स्वर्ग बनाये रखने और मनुष्य में देवत्व उभारने में सफल होता था। साधु, ब्राह्मण, वानप्रस्थ परिव्राजक जैसे समर्थ पुरोहित राष्ट्र को, विश्व को जाग्रत जीवंत बनाये रहने की जिम्मेदारी उठाते थे और विश्व व्यवस्थाएँ भी बनी रहती थीं जिसे स्वर्गादपि गरीयसी कह कर संबोधित किया जाता था।

आज पुरोहित वर्ग के पुरातन स्तर के पाँचों वर्ग गड़बड़ा और लड़खड़ा गये हैं। उनमें से अधिकाँश को, स्वर्ग मुक्ति की, बिना परिश्रम के सम्मान तथा दान दक्षिणा बटोरने की ललक बनी रहती है। निर्धारित दायित्वों को निभाने वाले कदाचित ही कहीं दीख पड़ते हैं। विश्व परिवर्तन के आधार भूत कार्य लोक मानस के परिष्कार को इसी वर्ग के लोग कर सकते हैं। अध्यवसाय समय और लोक मंगल के प्रति समर्पण की रीति-नीति अपनाकर वे ऐसा प्रखर व्यक्तित्व विनिर्मित कर पाते हैं कि लोक श्रद्धा के अधिकारी बनने के साथ-साथ अन्य अनेकों की गलाई ढलाई का कठिन कार्य संपन्न कर सकें।

आवश्यकता इन दिनों इसी वर्ग की है। जनसंख्या में कहीं कोई कमी नहीं। अनेक प्रकार की योग्यताओं और चतुरता के धनी भी इस धरती पर भरे पड़े हैं। पर इस कोयले की खदान में बहुमूल्य हीरे को ढूँढ़ निकालना कठिन हो रहा है। हनुमान, अंगद, भरत, जामवंत जैसों की मण्डली न बनती तो लंकाकाण्ड राम राज्य के सतयुग में कैसे बदलता, पाण्डव उभरकर आये न होते तो महाभारत कैसे जीता जाता? समय की पुकार युग सृजेताओं की है। पुरातन काल में वे उपरोक्त पाँच वर्ग के थे, पर अब तो अपने को ही सिख धर्म के पाँच प्यारों की तरह अग्रिम पंक्ति में खड़ा करना पड़ेगा। इसका नया नाम ‘व्रतधारी प्रज्ञा पुत्र’ दिया गया है।

उदारता घर से आरंभ की जाती है। दूसरों से त्याग और सृजन के निमित्त पराक्रम अपनाने और साहस दिखाने के लिए किस मुँह से कहा जाय। अपना उदाहरण प्रस्तुत किये बिना दूसरों से ‘पर उपदेश कुशल’ कहकर कुछ वैसा नहीं कराया जा सकता जिसकी इन दिनों निताँत आवश्यकता पड़ रही है। यह कार्य घर से ही आरंभ करना पड़ेगा। गुरु गोविन्द सिंह ने अपने बच्चों को अग्रिम मोर्चों पर खड़ा किया था। कुन्ती और मदालसा ने अपने पुत्रों को आदर्श प्रस्तुत करने के लिए आगे धकेला था। बुद्ध और अशोक के बच्चे भी पितृ परम्परा निभाने के लिए बिना ननुनच किये पुण्य परम्परा निभाने के लिए कटिबद्ध हुए थे।

युग परिवर्तन का यह अभूतपूर्व स्तर का पुण्य पर्व है। ऐसा संधिकाल भविष्य में फिर कभी किसी को भूमिका प्रस्तुत कर सकने के लिए मिल सकेगा, इसकी आशा नहीं ही की जानी चाहिए। ऐसे भविष्य के शुभारम्भ के लिए किन्हें छाँटा जाय? उपयुक्त यही लगा कि अपनों को ही अभिमन्यु की तरह चक्रव्यूह भेदन के निमित्त भेजा जाय।

सर्वविदित है कि अखण्ड-ज्योति के पृष्ठो पर मात्र विचार प्रतिपादनों का ही उल्लेख नहीं रहता, वरन् उसमें ऐसी प्राणवान प्रेरणाएँ भी भरी रहती हैं कि पाठकों के मन, मस्तिष्क और अंतराल को भी हिलाकर रख दें। उपयुक्त मार्ग दर्शन प्रदान करें और ऐसा साहस भी जिसके सहारे आदर्श निर्वाह का कठिन दिखने वाले मार्ग पर उल्लास पूर्वक चलते जा सकें। यही कारण है कि इस परिकर के वाचक प्रकारान्तर से युग सृजन के क्रिया कलापों में किसी न किसी प्रकार नियमित रूप से लम्बे समय से भाग लेते चलें आ रहें हैं।

इन सबके समय दान, अंशदान के समन्वय से नैतिक, बौद्धिक और सामाजिक क्राँति की दिशा में इतना अधिक कार्य बन पड़ा है, जिसके बिना किसी प्रचार विज्ञापन के विश्व के कोने कोने में अपने लिए श्रद्धा-विश्वास का प्रगाढ़ वातावरण बना लिया है। साथ ही यह आशा अपेक्षा दशों दिशाओं में उभरी है कि 21वीं सदी के संभावित महान परिवर्तन का श्रीगणेश इसी परिवार में होने जा रहा है। बात एक सीमा तक सही भी है। राजतंत्र, अर्थतंत्र, स्वेच्छा सेवी तंत्र, कला तंत्र, साहित्यिक तंत्र, प्रचार तंत्र अपने-अपने ढंग से प्रगति प्रयोजनों के लिए काम कर रहे हैं। लाँछन धर्म तंत्र पर ही लगता रहा है कि उसके पास व्यक्तियों, साधनों और सामानों की कमी न होने पर भी नव सृजन की दिशा में ऐसा कुछ नहीं किया जा रहा है जिससे उज्ज्वल भविष्य की आशा अपेक्षा उभरे।

अखण्ड ज्योति परिवार के परिजनों ने पिछले इक्यावन वर्षों में सृजन और सुधार की दिशा में जो कुछ किया है उसकी तुलना में उन्हें कई गुना पुरुषार्थ प्रस्तुत करना है। युग संधि के शेष नौ वर्ष इसी तैयारी में जुट जाने की विशेष अवधि है। ऐसी अवधि को समय की पुकार और युग धर्म की गुहार कह सकते हैं।

यों करने को तो पुनरुत्थान के क्षेत्र में बहुत कुछ पड़ा है, पर प्रारम्भ में थोड़े और छोटे से ही हो सकता है। भूमि पूजन एक छोटे स्थान में ही होता है।भले ही भवन निर्माण की परिधि कितनी ही विस्तृत क्यों न हो। छात्रों को आरंभ में कुछ अक्षर ही पढ़ाये जाते हैं, भले ही आगे चलकर वह स्नातकोत्तर परीक्षाएं पास करता ही क्यों न चला जाय? नये बछड़ों के कंधों पर थोड़ा ही वजन रखा जाता है, भले ही उसे आगे चलकर कितनी ही लम्बी मंजिल क्यों न पार करनी पड़ें। 21वीं सदी बहुमुखी परिवर्तन साथ लेकर आ रही हैं, उनमें अनेक स्तर की प्रतिभाओं के बहुउद्देशीय योगदान सम्मिलित होंगे। सामर्थ्य के धनी अपनी-अपनी विशेषताओं के अनुरूप महान परिवर्तन में महती भूमिका संपन्न करेंगे। पर अपने परिवार की योग्यता सीमित रहते हुए भी वे भावना की प्रबलता के अनुरूप कुछ कहने योग्य कदम उठायेंगे, ऐसे कदम जिनके अनुकरण की उत्कंठा अन्य असंख्यों को मिल सके। एक से पाँच पाँच से पच्चीस बनते चलने का क्रम चक्रवृद्धि रीति से गुणन विद्या के अनुरूप साथी-सहयोगियों का इतना विस्तार कर सकेगा जो समूचे मानव समुदाय को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से प्रभावित करेगा।

इस प्रकार क्रियाकलापों में संलग्न होने वाले अखण्ड-ज्योति के परिजन ‘व्रतधारी प्रज्ञापुत्र’ कहलावेंगे। इन्हें तैयार तो स्थानीय प्रज्ञा मण्डल ही करेंगे, पर उन्हें कुम्हार के अवे की तरह पकाया शाँतिकुँज में जायेगा। इससे वे युगशिल्पी नल-नील की, अंगद-हनुमान की भूमिका निभा सकने के लिए इस महाक्राँति के अंशधर बन सकेंगे। जो 21वीं सदी से “सतयुग की वापसी” बनकर इस धरती पर प्रत्यक्ष प्रकट होने आ रही है जिसमें बहुत कुछ सुधरा और बदला दिखाई पड़ेगा। आशा की जानी चाहिए कि 21वीं सदी की महाक्राँति के लिए युगसंधि के शेष नौ वर्ष में ही व्रतधारी प्रज्ञापुत्रों-की सृजन शिल्पियों की संख्या लाखों को पार कर करोड़ों में जा पहुँचेगी और सृजन तथा सुधार का दुहरा मोर्चा सँभालने के लिए कटिबद्ध हो सकेगी।


सूर्य की साधना से मिलती है-सद्बुद्धि!

जिस प्रकार दीपक को ज्ञान का, राष्ट्रीय ध्वज को देशभक्ति का, प्रतिमा को देवता का प्रतीक माना जाता है उसी प्रकार आकाश को निरन्तर ज्योर्तिमय बनाये रहने वाले सूर्य को तेजस्वी परब्रह्म का प्रतीक माना और सविता कहा गया है। गायत्री का जप करते समय इस सविता का ही ध्यान किया जाता है। सावित्री का तो यह सविता युग्म ही है, गायत्री-सावित्री उपासना के माध्यम से इसी सविता शक्ति का अवतरण होता है। शाकानन्द तरंगिणी 3/4/1 में भी कहा है-

“गायत्री भावयेद्देवी सूर्यांसारकृताश्रयाम्।

प्रातमध्यान्ह सन्ध्यायं ध्यानं कृत्वा जपेत्सुधीः”

अर्थात् बुद्धिमान मनुष्य को सूर्य के रूप में स्थित गायत्री महाशक्ति का प्रातः, मध्याह्न और सायं त्रिकाल ध्यान करके जप करना चाहिए।

अन्यत्र भी उल्लेख है-

“देवस्य सवितुर्यच्च भर्गमर्न्तगतविभुम।

ब्रह्मवादिन स्वाहुर्वरेण्यम् तच्च् धीमहि॥”

अर्थात् सविता देव के अंतर्गत तेज को ब्रह्मज्ञानी वरेण्य-श्रेष्ठ कहते हैं, उसी का हम ध्यान करते हैं।

अर्थात् सविता की भौतिक और अध्यात्मिक क्षेत्र में महती भूमिका का शास्त्रकारों ने उल्लेख किया है और ब्रह्मतेजस् प्राप्त करने के लिए सविता के साथ संबद्ध होने का निर्देश दिया है। महामनीषी महीधर का कहना है कि सविता मण्डल में ब्रह्म स्वरूप पुरुष विद्यमान है। वह प्रकाश वान ज्योतिपुँज, प्रेरक तथा प्राणियों की अंतःस्थिति को जानता है। समस्त विज्ञान से विभूषित वह आनन्द स्वरूप है। वेदान्त में उन्हीं का प्रतिपादन हुआ है। वह समस्त सृष्टि का संहार करने में समर्थ है। वह वरण करने तथा प्रार्थना करने योग्य सत्य स्वरूप है। उनका ध्यान करने से हमारी अंतरात्मा में ज्ञान विवेक और आनन्द प्रदान करने वाला दिव्य तेज बढ़ता हुआ चला जाता है। शास्त्रकार कहते हैं-

‘बुद्धे बोधयिता यस्तु चिदात्मा पुरुषो विराट्।

सवितुस्तद्वरेण्यन्तु सत्यधर्माणभीश्वरम्॥’

अर्थात् बुद्धि के सन्मार्ग पर लगाने वाला जो विराट् चिदात्मा पुरुष है, वही सत्य, धर्म, ब्रह्म रूप, वन्दनीय, सविता है। महर्षि अगस्त्य भी इस तथ्य की पुष्टि करते हुए कहते हैं-

‘यो देवः सवितास्माकं धियो धर्मादि गोचराः।

प्रेरयेत्तस्य यद्भर्गस्तं वरेण्यमुपास्महे ॥’

अर्थात् सविता नामक जो देवता हमारी बुद्धि को धर्मादि में लगाते हैं, उनके वन्दनीय तेज की हम उपासना करते हैं।

महातपस्वी पराशर मुनि का कथन है-

‘देवस्ये सवितुर्भर्गो वरणीये च धीमहि।

तदस्माकं धियो यस्तु ब्रह्मत्वेव प्रचोद्यात्॥’

अर्थात् सविता देवता के प्रशंसनीय तेज का हम ध्यान करते हैं जो हमारी बुद्धि को ब्रह्मत्व में प्रेरित करे।

आत्मोत्कर्ष की दिशा में आगे बढ़ने के लिए देवता की आराधना या ध्यान-धारणा महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, मोक्ष पद के अभिलाषियों ब्रह्मपरायण साधकों के लिए उपनिषदों में माया के बंधनों से, कुसंस्कारों, कषाय-कल्मषों से छुटकारा पाने के लिए प्राणविद्या, पंचाग्नि, विद्या, मधु विद्या, पुरुष विद्या, षाडिविद्या, शाण्डिल्य विद्या आदि इन 32 प्रकार की विधाओं उपासनाओं का सुविस्तृत उल्लेख किया गया है। उनमें उद्गीथ विद्या के अंतर्गत अंतरादित्य विद्या का वर्णन है जिसमें सूर्य मण्डल में ध्यान करने का विधान है। सूर्यमण्डल मध्यस्थ महाप्रज्ञा गायत्री की आराधना साधक को परम पवित्र बनाती है और मनोरथों को पूर्ण करती है। महाभारत वन पर्व में स्पष्ट उल्लेख है कि सूर्य से ही समस्त जगत प्रकाश पाता है। वही जीवों की उत्पत्ति का कारण भी है। मुक्तिदाता भी वही हैं। उसकी उपासना कभी भी निष्फल नहीं जाती। जो व्यक्ति कोई मन को संयमित एवं चित्त को एकाग्र कर सूर्य की उपासना आराधना करेगा, उसकी इच्छा पूर्ति होगी, इसमें कोई संशय नहीं।

अग्नि पुराण में सूर्योपासना के संबंध में विस्तार पूर्वक वर्णन है। उसमें कहा गया है कि गायत्री महामंत्र द्वारा सूर्य की उपासना आराधना करने से वह प्रसन्न होते हैं और साधक का मनोरथ पूर्ण करते है। गायत्री का प्रज्ञा योग सविता शक्ति के साथ जुड़ा हुआ है। गायत्री उपासना इस रहस्य को समझाते हुए सूर्योपस्थान सूर्यार्घ्यदान आदि क्रिया-कृत्य संपन्न करते हैं और बदले में सद्बुद्धि का अनुदान प्राप्त करते हैं। प्रकाश पुँज सविता की ध्यान-धारणा साधक को प्रखर प्रज्ञा का, महापुराण का दिव्य वरदान प्रदान करती है, यह एक सुनिश्चित तथ्य है।


ब्रह्मवर्चस् का शोध-अनुसंधान

ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान का कार्य क्षेत्र अतिव्यापक है। अध्यात्म की पुनः प्राण−प्रतिष्ठ दो मोर्चों पर करने के संकल्प से यह संस्थान परम पूज्य गुरुदेव ने 1971 में स्थापित किया। पहले मोर्चे पर प्रत्यक्षवाद द्वारा उपेक्षित उत्कृष्टतावादी दर्शन की प्रतिष्ठापना होनी थी, दूसरे मोर्चे पर अध्यात्म तत्वज्ञान में घुसी विकृतियों का निष्कासन किया जाना था। अनुसंधान का क्रम विगत बारह वर्षों से इसी धुरी पर चला है। दर्शन का उत्तर दर्शन से, तर्क का उत्तर तर्क से और विज्ञान का उत्तर विज्ञान द्वारा देने का एक सशक्त प्रयास ब्रह्मवर्चस ने किया है। बुद्धिवादी युग व जमाने का समाधान करने का प्रयास अखण्ड ज्योति के अग्र लेखों में किया जाता रहा है व अब और भी प्रखर रूप से यह आगे प्रस्तुत होता रहेगा। प्रयोग परीक्षण का क्रम जो चलता रहा है। उस क्रम के क्या कुछ परिणाम हाथ लगे, किन निष्कर्षों पर हम पहुँचे व आगे की क्या संकल्पनाएँ हैं, यह सब इस स्तम्भ के अंतर्गत अगले दिनों प्रकाशित किया जाता रहेगा।

अध्यात्म उपचार कितने विज्ञान सम्मत हैं? यह प्रक्रिया, ध्यान साधना, अष्टगयोग की प्रक्रियाएँ, मंत्र शक्ति आदि शरीर मन व अंतःकरण को किस प्रकार प्रभावित करते हैं? तथा तनाव जैसी महाव्याधि से भरे इस समाज को क्या एक निरापद किन्तु सर्वांगपूर्ण चिकित्सा पद्धति अध्यात्म तंत्र दे सकता है, यह प्रतिपाद्य विषय लेकर ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान ने विगत बारह वर्षों में कार्य किया है। सीमित साधनों किन्तु समर्पित व्यक्तियों व सहज ही उपलब्ध होते रहने वाले “सब्जेक्ट्स” जिन पर प्रयोग परीक्षण का क्रम चला, के कारण यह कार्य सही गति से चल रहा है। शोध प्रक्रिया का उद्देश्य यह नहीं था कि रोग निवारण के लिए अध्यात्म उपचार कितने सक्षम हैं, यह पता लगाया जाय। यदि उद्देश्य यह रहा होता तो एक सैनीटोरियम बनाना जरूरी होता। अध्यात्म उपचार किस प्रकार हमारे सूक्ष्म संस्थानों को जाग्रत कर अंतःकरण को बलिष्ठ बनाते हैं। आत्म बल और मनोबल बढ़ने से जीवनी शक्ति किस प्रकार सुदृढ़ होती है इससे स्वास्थ्य संवर्धन की प्रक्रिया कैसे गतिशील होती है। यह जानने का प्रयास संस्थान के वैज्ञानिकों ने किया है।

वैज्ञानिक प्रयोगशालाएँ विश्व में सैकड़ों हैं। सभी आधुनिकतम उपकरणों से सुसज्जित हैं। विगत पन्द्रह वर्षों में इलेक्ट्रानिक्स का जिस तेजी से चिकित्सा विज्ञान में प्रवेश हुआ है, उससे शरीर के बहुविधि आयामों की जानकारी पाने की सुविधा बढ़ गयी है। अब कंप्यूटराइज्ड एक्जिअल टोमोग्राफी (कैट स्केनिंग) उपकरण से लेकर एन. एम. आर., एम. आर. आई. (मैग्नेटिक रेजोनेन्स इमेजिंग) जैसे उपकरण उपलब्ध हैं। बिना व्यक्ति को तकलीफ दिये नान इनवेजिव डायग्नोस्टिक उपकरणों द्वारा विस्तार से जाना जा सकता है कि शरीर के किस हिस्से में किस गहराई तक किस स्तर की गड़बड़ी है। अब केवल ई-ई-जी ही नहीं, चेतना का ध्रुव केन्द्र माने जाने वाले ब्रेन स्टेम व रेटिकुलर एक्टिवेटिंग सिस्टम से लेकर 1 अरब न्यूरॉन्स (स्नायुकोषों) में से एक विशेष सेल की मेम्ब्रेन पर विद्यमान विद्युत पोटेंशियल भी नापा जा सकता है। इतने संवेदनशील यंत्र अब उपलब्ध हैं कि मानवी काया का कोई भी क्षेत्र अविज्ञात है, ऐसा नहीं कहा जा सकता। मस्तिष्क में स्रावित होने वाले सूक्ष्म रसायन द्रव्यों जो प्रसन्नता, ईर्ष्या, क्रोध, भय, यौनतृप्ति, आहार तुष्टि व मन की शाँति के लिए जिम्मेदार माने जाते हैं, को भी नापा जाना संभव है। चिकित्सा विज्ञान का यह विकास स्तुत्य है, अभिनन्दनीय है। शोध संस्थान में इतने महँगे उपकरणों का न तो प्रावधान है और न ही इतने जटिल उपकरणों का प्रयोग कर पाने की स्थिति थी। फिर भी अपने सीमित साधनों से उसने दुस्साहस किया है। व्यक्ति के अंतराल में झाँकने व पारदर्शी वस्तु की तरह उसको परखने का। इस प्रक्रिया में उन्हीं उपकरणों का प्रयोग किया गया, जो किसी मेडिकल कालेज स्तर की प्रयोगशाला में उपलब्ध होते हैं।

वैज्ञानिक शोध एक आध्यात्मिक पुरुषार्थ है। विगत सौ वर्षों में हुई खोजें इसी माध्यम से हुई हैं। अंतःस्फुरणा अथवा प्रसुप्त प्रतिभा के जागरण से ही असंभव दीख पड़ने वाले अविष्कार संभव हुए हैं।

विडम्बना एक ही रही कि जिस गंभीरता से अन्यान्य विज्ञान क्षेत्र की विधाओं के अनुसंधान हुए, उतनी गहराई से अध्यात्म उपचारों की वैज्ञानिकता जानने का प्रयास नहीं किया गया। विविध प्रकार के योग अनुशासन जीवन में उतारने पर किन्हीं-किन्हीं में परिवर्तन दिखाई पड़ता है व किन्हीं में कुछ भी नहीं होता। बहिरंग को प्रभावित करने वाले हठयोग की क्रियाओं से लेकर अंतरंग को प्रभावित करने वाले ध्यानयोग की प्रक्रिया विशद वैज्ञानिक अनुसंधान माँगती है ताकि एक महत्वपूर्ण विधा से जन-जन को लाभान्वित किया जा सके। परामनोविज्ञान के क्षेत्र में छिटपुट प्रयोग तो कहीं हुए भी हैं किन्तु इन घटनाओं की सूचना कौतुहल ही रहा है। जबकि मनःक्षेत्र की गहन परतों से लेकर शरीर की दृश्यमान स्थूल परतें मनोविज्ञान, एनाटॉमी फिजियोलॉजी, न्यूरोलॉजी, बायोकेमिस्ट्री, हिस्टोलाजी से लेकर इम्यूनोलॉजी मॉलीक्यूलर बायोलॉजी जैसी विधाओं का गहन अध्ययन माँगती है। यह आवश्यकता भी प्रयोग अनुसंधान के साथ पूरी की जाती रही है एवं प्रयोग निष्कर्षों के साक्षी हेतु इन विधाओं के विभिन्न हवालों -पत्र - पत्रिकाओं में प्रकाशित उद्धरणों का भी सहारा लिया गया है।

शोध प्रक्रिया को सरल तरीके से समझना हो तो इस तरह माना जा सकता है कि शरीर व मन के दो घटक ऐसे हैं जो सीधे मानवी स्वास्थ से संबंध रखते हैं। आस्थाओं का उद्गम केंद्र अंतःकरण पहले मन व फिर शरीर को प्रभावित कर स्वास्थ्य संतुलन का पलड़ा इधर से उधर करता रहता है। आस्थाओं का मापन करने की कोई सीधी विधि विज्ञान के पास नहीं हैं? सुधार परिमार्जन परिष्कार की गुँजाइश कहाँ कहाँ और किस प्रकार की है? आस्थाओं से संपन्न व्यक्ति व रहित व्यक्ति के जैव रासायनिक परीक्षण बताते हैं कि दोनों में परिवर्तन भिन्न तरीकों से होता देखा जाता है। दूसरे स्तर पर मन आता है। मनोविज्ञान मूलतः मन का नहीं व्यवहार का विज्ञान है। ‘बिहेवियोरल साइकोलॉजी’ शब्द अब लगभग मनो विज्ञान के पर्यायवाची के रूप में प्रस्तुत होने ही लगा है। यह विज्ञान भी व्यक्ति के व्यवहार में न्यूनाधिक परिवर्तन को उसी तरीके या विधि विधान से मापता है जैसे शरीर में हो रहे परिवर्तनों को फोटो कैलोरी मीटर या स्पेक्ट्रोफोटो मीटर द्वारा मापा जाता है। एक ही अंतर होता है कि प्रयोगों के ऑब्जेक्ट जहाँ शरीर के मापन के समय लिया गया रक्त का नमूना या टीश्यू होते हैं, वहाँ मन का विश्लेषण करते समय ऑब्जेक्ट सीधा वह व्यक्ति ही होता है। वैसे शरीर और मन दोनों परस्पर गुंथे हुए ही हैं। इसीलिए मस्तिष्क की विद्युत (इलेक्ट्रो एन सेफेलोग्राफ) का मापन करते समय मन का सीधा संबंध विद्युतीय परिवर्तनों से होता है। व ये ‘इवेण्ट’ के बदलने के साथ बदलते रहते हैं।

मन के प्रयोग का ध्यान व एकाग्रता (अटेण्शन) में होने वाले विपर्यय, व्यवहार को प्रभावित करने वाली प्रतिक्रिया की अवधि (रिएक्शन टाइम) फार्म परसेप्शन, सीखने की प्रक्रिया (लर्निंग) व क्षमता, स्मरण शक्ति का मापन, आत्म प्रत्यय, (मोटीवेशन) काम से उत्पन्न थकान (मसल फटीग) मानसिक कार्य, समस्याओं को सुलझाने वाली व्यावहारिक बुद्धि, व्यक्तित्व का विश्लेषण, बुद्धि लब्धि का क्बोशेण्ट तथा भावसंवेदनाओं की मन पर प्रतिक्रिया जैसे घटकों का मापन किया जाता है। यह सब मापन यह बताते हैं कि मन मस्तिष्क की स्थिति कैसी है, स्वस्थ अथवा अस्वस्थ? मनोबल अथवा मनःशक्ति का पर्यवेक्षण करने के लिए व्यक्तिगत प्रश्नोत्तरी व पारस्परिक चर्चा का माध्यम बनाया जाता है। व्यक्ति के परिवेश से जुड़ी विभिन्न समस्याओं के प्रति उसकी दृष्टि क्या है, इससे जानकारी मिलती है कि उनका मन विभिन्न प्रतिकूलताओं से जूझने में कितना सक्षम है।

तनाव एक ऐसी प्रक्रिया है जो सामान्यता हर व्यक्ति को जीवन में झेलनी ही होती है। कुशल कलाकार वह है जो तनाव को रचनात्मक ऊर्जा में बदलते हुए अपने मन व शरीर को प्रभावित नहीं होने देता। ऐसा व्यक्ति स्वस्थ भी बना रहता है तथा उसकी उपलब्धियाँ भी महत्वपूर्ण होती हैं। तनाव का विश्लेषण हर व्यक्ति में किया जाना जरूरी है व यह विस्तार से व्यक्ति की मनःस्थिति जाने बिना उसके परिवेश की परिस्थितियों को समझे बिना संभव नहीं। मन को मोटे तौर पर वैज्ञानिक ‘माइण्ड स्टफ’ नाम से संबोधित करते हैं जिसकी कई परतें अभी भी अविज्ञात हैं। परंतु मन का शरीर पर पड़ने वाली प्रभावी प्रतिक्रिया के बारे में अब सभी एकमत हैं कि उसे मापा व भलीभाँति जाना जा सकता है। मन के तनाव ग्रस्त होने पर शरीर के रसायन में घट-बढ़ होती हैं, विभिन्न फिजियोलॉजिकल प्रक्रियाओं में परिवर्तन होता है व फलस्वरूप शरीर प्रभावित होने लगता है। प्रभावित शरीर रोगी हो जरूरी नहीं है किन्तु लक्षण दिखाई देने लगते हैं। इसी प्रकार मनःस्थिति के संवर्धन से शरीर पर दूसरी तरह की प्रतिक्रियायें होती हैं, जिसे कार्यशक्ति के संवर्धन संबंधी विभिन्न पैरामीटर्स द्वारा मापा जा सकता है। प्रफुल्ल-संतुलित मनःस्थिति, समस्वरता, संयमशीलता इन सबका प्रभाव मन ही नहीं शरीर के घटकों पर भी पड़ता है व इन्हें मापा जा सकता है।

शोध प्रक्रिया को समझने के लिए उपरोक्त विवेचन इसलिए किया जा रहा है कि अध्यात्म उपचारों का प्रभावी सामर्थ्य बड़ी गहरी होता है। वे अंतःकरण मन व शरीर पर समग्र प्रभाव डालते हैं व इसे अलग-अलग करके मापा जाना संभव नहीं हैं। यह नहीं कहा जा सकता कि शरीर में दिखाई देने वाले परिवर्तन समक्ष नहीं दिखाई दे रहे, अतः हम अध्यात्म अनुशासनों की प्रभावोत्पादकता से इन्कार करते है। कभी कभी आकाँक्षाओं में परिवर्तन व मन के स्तर पर सूक्ष्म आकलनों में घट बढ़ भी महत्वपूर्ण सिद्ध होती है। पर यह सच है कि शरीर स्तर पर क्रमशः सभी अनुशासन अपनी प्रक्रिया दिखाते देखे जाते हैं।

शरीर के सूक्ष्म रसायनों से लेकर जैव विद्युतीय तथा जीव कोषीय स्तर पर होने वाले परिवर्तन बड़ा महत्व रखते हैं। रक्त में पाये जाने वाले हीमोग्लोबिन जैसे घटकों से लेकर रक्त कणों की संख्या, आकार व प्रकृति में अंतर अध्यात्म उपचारों से होते देखे जाते हैं। रक्त में घुले एंजाइमों व हारमोन्स में कुछ मिलीग्राम प्रति सौ मिलीलीटर का परिवर्तन भी बड़ा महत्वपूर्ण होता है। रक्त में पायी जाने वाली इम्युनोग्लोबिन्स नाम की इकाइयाँ न केवल शरीर पर होने वाले प्रभावों से घटती बढ़ती है अपितु साइकोन्यूरो-इम्युनॉलाजी जैसी आधुनिकतम विधा के अनुसार भाव संवेदना व मन की सोचने की पद्धति से प्रभावित होती हैं। ये सभी जीवन शक्ति से संबंध रखती हैं व किसी एक इकाई का बढ़ना या घटना शरीर के स्वास्थ से सीधा संबंध रखता है। शरीर में गैसें भी घुली रहती हैं जिनको दबाव यंत्रों द्वारा मापा जा सकता है। इसका अनुपात विभिन्न स्थितियों में बदलता रहता है। फेफड़ों में विद्यमान वायु रूपी घटकों का मापन अब कम्प्यूटराइज्ड विधि से संभव है। इससे फेफड़ों की कार्य पद्धति का अंदाज लगता है। इसी प्रकार हृदय से लेकर मस्तिष्क तथा त्वचा से लेकर माँसपेशियाँ सभी अपनी विद्युत हलचलों का परिचय बाहर देती हैं जिन्हें विभिन्न यंत्र नापते हैं। ई .ई. जी, ई. सी .जी, ई. एम .जी तथा जी. एस. आर जैसे मापनों को अब पॉलीग्राफी द्वारा इलेक्ट्रो फिजियोलॉजी के नवीन उपकरणों द्वारा मापा जा सकता है। यही नहीं यह भी देखा जा सकता है कि व्यक्ति के परिपूर्ण विद्युतीय कवच जिसे ईथरिक डबल या प्राणमयकोश नाम से जाना जाता है, में उसके प्रभामण्डल में क्या कुछ कितना परिवर्तन अध्यात्म उपचारों द्वारा होता है।


मंत्र विज्ञान एवं यज्ञ विज्ञान (Kahani)

गुरु ने शिष्य से पूछा “यदि तुम्हारे एक हाथ में घी से भरा लोटा हो व दूसरे में छाछ से। रास्ते में कोई तुमसे टकरा जाय व दोनों में से एक लोटा गिर जाने की स्थिति बनने लगे तो तुम कौन सा संभालोगे।”

“शिष्य ने उत्तर दिया घी का लोटा ही संभालेंगे।”

गुरु प्रसन्न हुए और बोले “हमारा शरीर छाछ की तरह है व आत्मा घी की तरह है। फिर भी मनुष्य शरीर को संभालने की ही चिंता अधिक करता है। घी के लोटे की तरह आत्मा को संभालने की नहीं और जो मनुष्य तुम्हारी तरह आत्मा की चिंता करता है वही जीवन के आनन्द की प्राप्ति करता है।”

ये सभी मापन जिनका उल्लेख ऊपर किया गया है, ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान द्वारा यहाँ आने वाले शिविरार्थी साधकों पर परीक्षण कर नोट किये जाते रहे हैं। जिन अध्यात्म उपचारों के प्रयोग उन पर किये गये उनमें प्रमुख थे शरीर परक व्यायाम, आहार में परिवर्तन, योगसाधनाएँ, मंत्र विज्ञान एवं यज्ञ विज्ञान।

इन पाँचों उपचारों का प्रभाव नौ दिन व एक माह के शिविरार्थी साधकों पर देखने का प्रयास किया गया कि न्यूनतम कितनी अवधि में किस स्तर का परिवर्तन होता है। कुछ प्रयोग स्थायी उन साधकों पर भी किये गये जो शाँतिकुँज के साधना आरण्यक में निवास करते हैं। इन सब प्रयोगों के बारे में विस्तार से जाने से पूर्व ऊपर वर्णित अध्यात्म उपचारों के संबंध में अगली बार पढ़ें।

(-क्रमशः)

परम पूज्य गुरुदेव की अमृतवाणी-


युग मनीषा का आह्वान!

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इस अंक में प्रस्तुत है 24 जून 1980 को प्रबुद्ध वर्ग के मध्य शाँतिकुँज हरिद्वार में दिया गया प्रवचन। पृष्ठ संख्या सीमित होने के कारण मूल पाठ को थोड़ा संपादित कर निचोड़ा गया है। शब्द मूलतः वही हैं जो वक्तव्य में हैं, भाव भी वही रखे गये हैं, मात्र पुनरुक्तियाँ हटायी गयी हैं।

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गायत्री मंत्र हमारे साथ साथ बोलिए-

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य,

धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्!

देवियो, भाइयो-

अब्राहम लिंकन ने पार्लियामेण्ट की मेज पर एक बौनी सी महिला को खड़ा कर परिचय देते हुए कहा “यह महिला वो है, जिसने अपने संकल्प को पूरा करके दिखा दिया।” अब्राहम लिंकन ने अपनी आत्मा व अपने भगवान के सामने कसम खाई थी कि हम अमेरिका पर से एक कलंक हटाकर रहेंगे। कौन सा कलंक? कलंक यह कि अमेरिका के दक्षिणी भाग में नीग्रो-कालों को गुलाम बनाकर उनसे जानवर के तरीके से काम लिया जाता था। कानून मात्र गोरों की हिमायत करता था। ऐसी स्थिति में एक महिला लिंकन की कसम को पूरा करने उठ खड़ी हुई। उसका नाम था हैरियट्स्टो-। लिंकन ने पार्लियामेण्ट के मेम्बरों से कहा “ यही वह महिला है जिसकी लिखी किताब ने अमेरिका में तहलका मचा दिया। लाखों आदमी फूट फूटकर रोये हैं लोगों ने कह दिया जो लोग ऐसे कानून को चलाते हैं, इस तरह जुर्म करते हैं, हम उनसे लड़ेंगे।

आप क्या समझते हैं नीग्रो व नीग्रो की लड़ाई की बात लिंकन कर रहे थे। नहीं! नीग्रोज के पास न हथियार थे, न ताकत। उनके पास तो आँसू ही आँसू थे। वे तो रो भर सकते थे। लड़ाई गोरों व गोरों में हुई। उत्तरी व दक्षिणी अमेरिका में ग्रह युद्ध हो गया। इतना खौफनाक युद्ध हुआ कि व्यापक संहार हुआ पर इसका परिणाम यह हुआ कि कालों को उनके अधिकार मिल गये। इतना बड़ा काम इतना बड़ा विस्फोट करा देने वाली महिला थी हैरियट्स्टो जिसने किताब लिखी थी “अंकल टाम्स कैबिन” “टाम काका की कुटिया।”

एक छोटी सी महिला के अंतःकरण की पुकार से लिखी गयी इस किताब ने जन-जन के मर्म को, अंतःकरण को छुआ और अमेरिका ही नहीं, सारे विश्व में तहलका मचा दिया। हर आदमी ने उसे पढ़ा और कहा कि जहाँ ऐसे जुल्म होते हैं, इंसान इंसान पर अत्याचार करता है, हम उसे बर्दाश्त नहीं करेंगे और उखाड़ फेंकेंगे। लिंकन ने कसम तो खाई थी पर वे अकेले कुछ कर नहीं सकते थे। क्योंकि उनके पास गोरों का शासन तंत्र था। कालों का कोई हिमायती नहीं था। उनका हुकुम किन पर चलता? पर उस महिला की लिखी उस किताब ने हर नागरिक के दिल में ऐसी आग पैदा कर दी, ऐसी टीस पैदा कर दी कि आदमी कानून को अपने हाथ में लेकर दूसरे आदमियों को ठीक करने पर आमादा हो गया। गृहयुद्ध तब समाप्त हुआ जब वह कानून खत्म हो गया और सबको समान अधिकार दिला दिये गये।

क्या किताब ने यह क्राँति की? अरे “किताब” नहीं “दर्शन”। किताब की बाबत नहीं कहता मैं आपसे। मैं कहता हूँ- दर्शन। दर्शन अलग चीज है। विचार बेहूदगी का नाम है जो अखबारों में, नॉवेलों में, किताबों में छपता रहता है। कभी खाने कमाने का, कभी खेती बाड़ी का, कभी बदला लेने का, यही विचार मन में छाया रहता है और दर्शन वह आदमी के अंतरंग से ताल्लुक रखता है। जो सारे समाज को एक दिशा में कहीं घसीट ले जाने का काम करता है, उसको दर्शन कहते हैं। आदमी की जिंदगी में, उसकी संस्कृति में सबसे मूल्यवान चीज का नाम हैं -दर्शन। हिंदुस्तान की तवारिख में जो विशेषता है आदमी के भीतर का भगवान क्या जिंदा है, यह किसने पैदा किया? दर्शन ने। इतने ऋषि इतने महामानव, इतने अवतार किसने पैदा कर दिये? यह है दर्शन जो आदमी को हिला देता है। हमारी दौलत नहीं, दर्शन शानदार रहा है। हमारी आबोहवा नहीं, शिक्षा नहीं, दर्शन बड़ा शानदार रहा है। इसी ने आदमी को ऐसा शानदार बना दिया कि मुल्क देवताओं का देश कहलाया जाने लगा। दूसरी उपमा स्वर्ग की दी जाने लगी। स्वर्ग कहाँ रहेगा? जहाँ देवता रहेंगे? देवता ही स्वर्ग पैदा करते हैं, इमर्सन ने बहुत सारी किताबें लिखी हैं और प्रत्येक किताब के पहले पन्ने पर लिखा है “मुझे नरक में भेज दो मैं वही स्वर्ग बनाकर दिखा दूँगा।” यह है दर्शन। आज की स्थिति में हम क्या कहें मित्रों। हम सब के दिमाग पर एक घिनौना तरीका, छोटा वाला तरीका नामाकूल तरीका इतना वाहियात की सारी जिंदगी को हमने- हीरे मोती जैसी जिंदगी को हमने खत्म कर डाला। आदमी की ताकत विचारों की ताकत को हमने तहस नहस कर दिया। हमें कोढ़ी बना दिया। कसूर किसका है? सिर्फ एक ही कमी है-वह है आदमी का दर्शन। वह कमजोर हो गया है।

आज आदमी की समस्या सिर्फ एक है। उसका नाम है दर्शन की भ्रष्टता। उसके पास चीजों की कमी नहीं है। आदमी के पास जरूरत से ज्यादा चीजें हैं पर मुझे यह लगता है कि आदमी इनको खा भी सकेगा कि नहीं, हजम भी कर सकेगा कि नहीं। आदमी का दर्शन घिनौना होने की वजह से इतनी ज्यादा चीजें होते हुए भी मालूम पड़ता हैं कि बहुत कम है। गरीबी उसके पर हावी हो गयी है। परिस्थितियाँ, दरिद्रता, मुसीबतें उसके दर्शन के कारण उस पर हावी हो गई हैं। दर्शन सारे व्यक्तियों का, सारे समाज का, सारे विश्व का भ्रष्ट होता चला गया है। दुष्टों को पकड़ना, रोकना और मारकर ठीक करना चाहिए, मच्छरों को मारना चाहिए पर एक एक मच्छर को मारने से पहले उस गंदगी को निपटाना चाहिए जो मच्छर पैदा करती है हम मच्छर मक्खी मार नहीं सकते। हम समस्याओं को कैसे मार पायेंगे? समस्याएँ आदमी के सड़े हुए दिमाग में पैदा होती है। सड़े हुए दिल में पैदा होती हैं। पैसे वाले बड़ी-बड़ी योजनाएँ बनाते हैं कि हम गृह, उद्योग बढ़ायेंगे नहरें खोदेंगे, बाँध बनायेंगे ये सब ठीक है। आदमी को साक्षर बनायेंगे, हर आदमी को मालदार बनायेंगे। कोई कहता है कि आदमी को पहलवान बनायेंगे पर इतना सब कुछ करने के बाद फिर होगा क्या? जरा विश्लेषण पोस्टमार्टम करके देखिए कि इस सबके बावजूद विचारों की दर्शन की भ्रष्टता यदि बनी रही तो वह करता क्या है? वह खुद जलता है, दूसरों को जलाता है। दियासलाई अपने आप को जलाकर खत्म कर देती है। आज हमारी आपकी जिंदगियाँ दियासलाई के तरीके से जल रही हैं और अनेकों को जला रही हैं।

आपने ब्याह कर लिया। बीबी आई। हाँ तो ठीक है, अब आप क्या करेंगे उसको जला दीजिए। नहीं साहब बीबी तो बहुत अच्छी मालूम पड़ती है। इसीलिए तो कहते हैं कि फुलझड़ी बहुत अच्छी मालूम पड़ती है। तो आप दियासलाई लेकर के खत्म क्यों नहीं करते? हर चीज को आज आदमी जला रहा है। जिंदगी को जला रहा है, समाज को जला रहा है।देश को जला रहा है। बच्चों को जला रहा है। इस सब का मूल कहीं खोजना हो तो एक ही जगह है वह है आदमी के सोचने व ऊँचा उठने वाली शैली, तरीका, विद्या जिसे दर्शन कहते हैं। विचार नहीं। विचार तो अखबारों में गंदी किताबों में रोज छपते रहते हैं। कितना भ्रामक, अज्ञान, फैलाने वाले अखबार रोज निकलते रहते हैं। इनकी बाबत में मैं आप से नहीं कहता। मैं आपसे कहता हूँ - दर्शन की बात। सुकरात दर्शन जिन दिनों पैना होने लगा और विद्यार्थियों को पढ़ाया जाने लगा तो हुकूमत काँप उठी। हुकुम दिया गया कि यह आदमी बागी है। इस आदमी को जहर पिला देना चाहिए। डाकू या चोर एक या दो लोगों का नुकसान करते हैं, पर दार्शनिक, वह तो पूरे समाज को हिलाकर रख देता है। दार्शनिक दुनिया को उलट पलट देता है। ईसा संत थे, नहीं दार्शनिक थे। संत तो समाज में ढेर सारे हैं जो एक पाँव पर खड़े रहते हैं, पानी नहीं पीते, दूध नहीं पीते। बाबा जी की बात मैं नहीं कह रहा। ईसा कौन हैं? दार्शनिक थे। उनने अपने समय को बदलने वाला दर्शन दिया था। दर्शन वह, जो आदमी के अंतरंग को छुए, आत्मा को छुए, हृदय को छुए। अंतरंग को छूने वाला दर्शन जब कभी आता है तो गजब करके रख देता है। दुनिया में पहलवान बहुत हुए हैं, विद्वान बहुत सारे हुए हैं, लेखक भी, कवि भी ढेर सारे हुए हैं, मालदार आदमी बहुत हुए हैं पर दार्शनिक जब भी कभी हुए हैं तो मजा आ गया है। गजब हो गया है, समाज हिला दिया गया है।

कुछ हवाले दूँ आपको। रूसो नाम का एक दार्शनिक हुआ है, जिसने सबसे पहले एक विचार दिया, अंतरंग को छूने वाला, आदमी के मस्तिष्क को छूने वाला, समाज की व्यवस्था पर असर डालने वाला। दर्शन दिया रूसो ने जिसे डेमोक्रेसी नाम दिया गया। डेमोक्रेसी के बारे में मजाक उड़ाया गया था। जिन दिनों यह दर्शन प्रस्तुत किया गया कहा गया है कि यह पागलों की बातें हैं। हुकूमत तो राजा की होती है। रिआया के ऊपर। रिआया रिआया के ऊपर हुकूमत करेगी, यह तो पागलों की बातें हैं। लेकिन पागलों की बात आप देखते हैं? सारी दुनिया में घुमा फिरा के डेमोक्रेसी आ गयी है। यह विचार एक दार्शनिक ने दिया था और उसने सारी दुनिया को हिलाकर रख दिया। और हवाले दूँ आपको। एक नाम है नीत्से। उसका वह हिस्सा तो नहीं बताऊँगा जिसमें उसने यह कहा था कि खुदा खत्म हो गया, खुदा को हमने जमीन में गाढ़ दिया पर यह वह आदमी था जिसने कहा था कि आदमी को सुपरमैन बनना चाहिए। आदमी को गई गुजरी स्थिति में नहीं रहना चाहिए। अपने आपको विकसित करना चाहिए और दूसरों को ऊँचा उठाने की अपनी सामर्थ्य एकत्रित करनी चाहिए। यह किसकी फिलॉसफी है। नीत्से की। आपको इतिहास मैं इस लिए बता रहा हूँ कि आप समझें कि दर्शन कितनी जबरदस्त चीज है। दर्शन उस चीज का नाम है जो कौमों को बदलकर रख देता है। बिरादरियों को, मुल्कों को, परिस्थितियों को बदल देता है। दर्शन बड़े शानदार होते हैं। वे भले हो अथवा बुरे, कितनी ताकत होती है उनमें यह आपको जानना चाहिए। मैं आपको अपने जीवन की एक घटना सुनाता हूँ दर्शन की बाबत।

जब मैं शिलाँग डिब्रूगढ़ की तरफ अपने मिशन के लिए दौरा कर रहा था तो मेरी इच्छा हुई कि नागालैण्ड जाऊँ। नागा कैसे होते हैं? जरा देख कर आऊँ। हमारे कार्यकर्ता साथ चले, बोले हम दुभाषियों का काम करेंगे। उनकी जीप में बैठकर नागालैण्ड चला गया। उन लोगों के बीच जो रेलगाड़ी पलट देते थे, तीर कमानों से जिनने सेना की नाक में दम कर रखा था। नागाओं के इस गाँव में जाकर एक चबूतरे पर मेरे मित्रों ने बिठा दिया व नागाओं से उनकी भाषा में कहा कि कोई मनोकामना हो तो इनसे कहिए। कोई पचास सौ नागा वहाँ बैठे थे, एक ने दूसरे से कहा, दूसरे ने तीसरे से कहा। सब ने आपस में पूछताछ कर ली और कहा हमारा तो कोई दुख नहीं, रोटी मिल जाती है। सोने के लिए फूँस के मकान हैं, पहनने को लोमड़ी की खाल हैं, मौज करते हैं। हमें दुख काहे का। एक दूसरे की ओर देखा तो एक बुड्ढा नागा उठा व दुभाषियों से बोला कि इन स्वामी जी से पूछिये की इनको कोई दुख तो नहीं है। हमसे बोले, ‘हमें तो कोई परेशानी नहीं है किन्तु आप भूखे हो तो हमारे यहाँ चावल है। भूखे नहीं जायें हमारे दरवाजे से। पहनने को कपड़े न हो तो खाल ले जाये हमारा अपना कोई कष्ट नहीं। हम तो प्रसन्न हैं। स्वामी जी कोई दुख हो तो हम दूर कर दें। मैं समझ गया। आदमी का दर्शन यह है। नागाओं ने नागालैण्ड बना लिया। क्या वजह हो सकती है? यह उस बिरादरी का दर्शन है। जो कुछ हमारे पास है, उससे खुशी से जिंदगी जियेंगे। उसे देकर के खायेंगे। मस्ती से जीवन जियेंगे। यह दर्शन है। कौम, बिरादरियाँ, समय और जातियाँ हमेशा दर्शन के आधार पर उठी हैं। यह दर्शन पैदा करना मनीषा का काम है। दर्शन को बनाने वाली माँस का नाम है मनीषा। मनीषा कैसी होती है? मनीषा ऐसी होती है जैसी कि बुद्ध के भीतर से पैदा हुई थी।

बुद्ध ने जमाने को देखा था। बड़ा वाहियात जमाना बड़ा, फूहड़ जमाना। माँस, मदिरा, मद्य, मुद्रा, मैथुन ये पाँच चीजें उस जीवन का आधार बनी हुई थीं। यही उस समय का धर्म था, जो आज के समय का वाममार्ग है। वही उस समय का दर्शन था। ऐसी परिस्थितियों में एक बुद्ध नाम का आदमी उठ खड़ा हुआ। बुद्ध किसे कहते है? बुद्ध विचारशीलता, भावनाशीलता का प्रतीक था। लोगों को दिशा देने वाले को बुद्ध कहते हैं? कथावाचक धर्मोपदेशक उस जमाने के भी थे लेकिन मनीषी के रूप में केवल बुद्ध सामने आये। उनने लोगों से कहा कि बुद्धं शरणं गच्छामि- बुद्धि की, विवेक की, समझदारी की पकड़ में आ जाओ क्यों और कैसे के सवाल पूछों। उनने लोगों के समक्ष कसौटी रखी कि यदि आज के विचार, रीति रिवाज, क्रियाकलाप, गतिविधियाँ सही साबित हों तो स्वीकार कीजिए, नहीं तो मना कीजिए। लोगों ने इंकार करना शुरू किया- यह नहीं हो सकता। हमारे बाप-दादा किया करते थे तो हम क्या करें? इंकारी का नशा इस कदर चढ़ता चला गया कि सारी बातें वाहियात ठहराई जाने लगीं। यज्ञों के नाम पर जानवर काटे जाते थे अश्वमेध के नाम पर घोड़े मार कर हवन होता था। जो भी अनर्थ होता था इंकार किया जाने लगा। बुद्ध ने कहा कि यदि भगवान कहते हैं तो ऐसे भगवान को ही नहीं मानना चाहिए। उनने वेदों को मानने से इंकार कर दिया जिनका अर्थ निकाला जाने लगा था और कहा बुद्धं शरणं गच्छामि। बुद्ध को क्या कहेंगे? दार्शनिक मनीषी। बाबाजी नहीं मनीषी।

मनीषी इन्सान की समस्याओं का समाधान देते हैं, व्यक्ति तैयार करते हैं और समाज बनाते हैं। अरस्तू को तैयार करने वाले का नाम सुकरात है और शिवाजी को तैयार करने वाले का नाम समर्थ गुरु रामदास है। चन्द्रगुप्त को तैयार करने वाले का नाम चाणक्य है। और विवेकानन्द को तैयार करने वाले का नाम रामकृष्ण परमहंस है। ये कौन हैं? अरे भाई ये मनीषी हैं। मनीषी विचार नहीं दर्शन देते हैं। दर्शन जी कर देखते हैं। और अनेकों का जीवन बना देते हैं। आप कहेंगे दर्शन तो बद्रीनाथ का, केदारनाथ का, सोमनाथ का किया जाता है। किराया खर्च करके जो दर्शन आप करते हैं, वह दर्शन नहीं, दर्शन वह है जो जमीला ने किया। जमीला ने सारी जिंदगी भर के लिए पैसे जमा किये थे और कहती थी काबा जाऊँगी और दर्शन करूंगी। जाने के वक्त पड़ गया अकाल। पानी न पड़ने से, अनाज न होने से लोग भूखों मरने लगे। जमीला ने कहा मैं काबा हज करने जाने वाली थी अब हज नहीं जाऊँगी। बच्चे भूखे मर रहे हैं। इनके खाने का, दूध का, इंतजाम किया जाय ताकि वे जिंदा रह सकें और उसने काबा जाने से इंकार कर दिया। मेरे पास कुछ है ही नहीं मैं कैसे जाऊँगी। इसे कहते हैं दर्शन। ट्राफिलासॉफी। देखने के अर्थ में नहीं फिलॉसफी के अर्थ में। बाद में खुदा बंद करीम के यहाँ मीटिंग हुई तो यह तय किया गया कि हज किसका कबूल किया जाय। सारे फरिश्तों की मीटिंग में तय हुआ कि सिर्फ एक आदमी ने इस साल हज खुलकर किया। खुदाबंद ने उसका नाम बताया- जमीला। फरिश्तों ने अपने रजिस्टर दिखाये और कहा कि वह तो गयी ही नहीं। खुदाबंद ने समझाया। देखने के लिए न गयी तो न सही लेकिन उसने काबा के ईमान को, प्रेरणा को समझा और हज करके जो अंतरंग बिठाया जाना चाहिए था, वह यहीं बैठ कर कर लिया। शेष सब झक मारते रहे। इसलिए सबका नामंजूर। जमीला का कबूल।

मित्रो! मैं कह रहा था दर्शन की बात। दर्शन जिसको जन्म देती है मनीषा। मनीषा को हम ऋतम्भरा प्रज्ञा कह सकते हैं। दूसरे शब्दों में हम इसे गायत्री कह सकते है। श्रेष्ठ चिंतन करने वालों के समूह का नाम है मनीषा। इस मनीषा का हम आह्वान करते हैं उनकी पूजा करते है। माँ क्या करती है? माँ समय समय पर बच्चों के लिए जरूरतों की चीजें बनाकर खिलाती है। हजम कर सके, ऐसी खुराक बनाकर देती है। माँ! मनीषा वह है जो युग की आवश्यकताओं, समय की आवश्यकताओं, इंसान की आवश्यकताओं, को तलाशती रहती है। समझती है वह वैसी ही खुराक दर्शन को देती है, जिसकी जरूरत है। युग की मनीषा ध्यान रखती है। कि आज के समय की जरूरत क्या है। पुराने समय का वह ढोल नहीं बजाती। वह युग को समझती है और परिस्थितियों के अनुरूप युग को ढालने की कोशिश करती है। आस्थाओं से रहित हैवानी के गुलाम इंसान को आदमी बना देती है। उसे ऊँचा उठना सिखाती है, व उनके घरों में स्वर्गीय परिस्थितियाँ पैदा करती है। ऐसी ही मनीषा का मैं आह्वान करता हूँ और कहता हूँ कि आप में से जो भी यह सेवा कर सके, वह स्वयँ को धन्य बना लेगा। आज बुद्धिवाद ही चारों ओर छाया है। “नो गॉड, नो सोल” की बात कहता जमाना दीखता है। ये किसकी बात है? नास्तिकों की, वैज्ञानिकों की, बुद्धिवादियों की। इनने फिजा बिगाड़ी है? नहीं इनसे ज्यादा उन धार्मिकों ने, पण्डितों ने, बाबाजियों ने बिगाड़ी है, जो उपदेश तो धर्म का देते हैं पर जीवन क्रम में उनके धर्म कतई राई रत्ती भर नहीं है। पुजारी की खुराफात देवी को सुना दें तो देवी शर्मिन्दा हो जाय। धर्म व विज्ञान को सब कुछ ठीक करना होगा। आप को युग की जरूरतें पूरी करनी होगी। आदमी के भीतर आस्थाएँ कमजोर हो गयी हैं, उन्हें ठीक करना चाहिए। आज की भाषा में नीति की, धर्म की, सदाचार की, आस्था की बात कीजिए व सबका मार्गदर्शन कीजिए। बताइये सबको की आदर्शों ने सदैव जीवन में उतरने के बाद फायदा ही पहुँचाया है नुकसान किसी का नहीं किया।

अब्राहमलिंकन ने बीच मेज पर खड़ाकर के कहा था यह स्टो है। इसने अमेरिका के माथे पर लगा कलंक हटा दिया। आप क्या करना चाहते हैं? हम भारतीय संस्कृति को मेज पर खड़ा करके यह कहना चाहते हैं कि यह एक संस्कृति है जिसने दुनिया का कायाकल्प कर दिया। आज भी यह पूरी तरह से मार्गदर्शन देने में सक्षम है। मनीषी इसने ही पैदा किये हैं। यदि मनीषी जाग जायें तो देश समाज, संस्कृति सारे विश्व का कल्याण होगा। भगवान करे मनीषी जगे, जागे-जगायें व जमाना बदलें। हमारा यह संकल्प है व हम इसे करेंगे। आपको जुड़ने के लिए आमंत्रित करते हैं।

हमारी बात समाप्त।


देव संस्कृति को विश्वव्यापी बनाने का संकल्प

प्रज्ञा पुरुष परम पू. गुरुदेव ने अपना सारा जीवन, सारी शक्ति, सिद्धियाँ सामर्थ्य देव संस्कृति के पुनरुद्धान के लिए होम दीं। इस तपश्चर्या के ही पुण्य फल हैं कि सृजन शिल्पियों का विश्वव्यापी देव परिवार संगठित हो गया है। इस समर्थ संगठन शक्ति के समर्पण और सेवा भावना को आज हर विचारशील सर्वोपरि मान रहा है। कोटि कोटि अंतःकरण आज देव संस्कृति को विश्वव्यापी बनाने के लिए उसी तरह मचल रहे हैं जिस तरह ग्वाल-बाल गोवर्धन पर्वत उठाने और रीछ-वानर दुर्भाव और दम्भ की लंका जलाने के लिए मचले थे।

इस संदर्भ में समूचे वर्ष 1992 में गुरुदेव की लेखनी से निस्सृत संदेश, देवसंस्कृति के मूल भूत सिद्धाँत, धर्म व दर्शन, देव संस्कृति की जननी महामाया गायत्री, पर्व संस्कार, साधनायें, परम पू. गुरुदेव के आद्योपाँत साहित्य, मिशन के विश्वव्यापी स्वरूप का परिचय और भावी कार्यक्रमों के क्रमबद्ध प्रस्तुतीकरण की रूपरेखा बनायी गयी हैं ताकि लोग अनुभव कर सकें- देवसंस्कृति कितनी विज्ञान सम्मत, बुद्धिसंगत और मानवीय प्रगति और प्रसन्नता का आधार रही है। अखण्ड ज्योति का कलेवर तो उतना ही रहेगा, पर इस वसंत पर्व से अंक विशेषाँक जैसे संग्रहणीय होंगे। इसे देवसंस्कृति का समग्र परिचय-प्रशिक्षण समझा जाना चाहिए।

इसे दुर्भाग्य ही कहना चाहिए कि आज इस महान तत्वदर्शन से अपनी पीढ़ियाँ तो दूर जिन कंधों पर उसे संभाले रखने का भार और उत्तर दायित्व डाला गया है वे ही सर्वथा अपरिचित और अनभिज्ञ है। इसलिए पहली आवश्यकता तो यह है कि इसे देश के कोने कोने में प्रत्येक भाषा के प्रत्येक शिक्षित व्यक्ति तक पहुँचाया जाय। अखण्ड ज्योति सात भाषाओं में छपती है, उनमें तो यह सभी सामग्री यथावत अनुवाद प्रकाशित होगी पर अभी तक जिन भाषाओं में अखण्ड ज्योति छपती नहीं उसमें भी पुस्तकाकार सामग्री देने का प्रयास किया जायेगा। इसके लिए शाँतिकुँज में तैयारियाँ की जा रही हैं। सामग्री, संचयन, संपादन, अनुरूप चित्रों, ग्राफों के संदर्भ प्राप्त करने, डिजाइनों और ब्लॉक आदि बनवाने, अन्य भाषाओं के अनुवाद में तथा उपयुक्त छपाई आदि के लिए तत्काल दौड़-भाग प्रारंभ कर दी गयी है।

एक कार्य अपने परिजनों को भी सौंपा जा रहा है, वह है इसका विस्तार। एक से दस की प्रक्रिया अपनाकर इसे सहज ही पूरा किया जा सकता है। दस परिजनों, शिक्षितों, मित्रों, संबंधियों को देवसंस्कृति की महान विशेषताओं से परिचित कराना किसी के लिए भी कठिन नहीं होगा। इसे स्वाभिमान का प्रश्न बनाने और लोगों के पास जाकर अखण्ड ज्योति दिखाकर उसकी उपयोगिता पर चर्चा करने भर की बात है। अनेक लोग तो एक तरह से प्रतीक्षा के प्यासे से मिलते हैं और तुरन्त सदस्य बनने के लिए तैयार हो जाते हैं। विशेष रूप से बुद्धिजीवी वर्ग को उपरोक्त संदेश दिये जाये तो इस वसंत पर्व पर दस नये सदस्यों की श्रद्धाँजलि समर्पित करना किसी के लिए कठिन नहीं होगा।

वर्ष 1992 का वसंत पर्व 8 फरवरी को है। अपने परिजन, अपने बालक, अपना भावावेग छोड़ नहीं पाते और बड़ी संख्या में वसंत पर्व पर शाँतिकुँज श्रद्धा सुमन चढ़ाने आते हैं। आत्मीय कुटुम्बियों को उसके लिए मना करना तो संभव नहीं पर यदि यहाँ न आकर परिजन अपनी उपरोक्त श्रद्धांजलि समर्पित करेंगे तो यह मिशन, देव संस्कृति और समूचे राष्ट्र व विश्व के लिए कल्याणकारी होगा। देव संस्कृति को विश्व व्यापी बनाना है तो आइये इस संकल्प, श्रद्धाँजलि में हम सब भागीदार बनें।

*समाप्त*