दुख, सुख एक दूसरे के अभिन्न सहचर

आम मान्यता है कि सुख और दुख परस्पर विरोधी हैं। एक को दूसरा काटता है। सुखी और दुखी दो विपरीत स्थिति के व्यक्ति हैं, पर गहराई से विचार करने पर दूसरी ही बात सामने आती है। चिन्तन बताता है कि दुख नग्न सत्य है, सुख तो उसकी सुसज्जित करने वाला परिधान-अलंकार मात्र है।

पुत्र प्राप्ति की मुस्कान के पीछे माता की प्रसव पीड़ा झाँकती है। आज का गौरवान्वित कंठाभरण कल सुनार की भट्ठी में तप रहा था और हथौड़ों की चोटें खा रहा था। आग पर पकाये बिना स्वादिष्ट भोजन बन सकना कैसे संभव हो सकता है? धनी किसान, पदोन्नत श्रमिक और पुरस्कृत कलाकार के आज के सौभाग्य को सराहते हुए थोड़ा पीछे मुड़कर भी देखना होगा। उनसे पूछा जा सकता है कि उन उपलब्धियों के लिए उन्हें कितने समय तक-कितने मनोयोगपूर्वक कितनी कठोर साधना करनी पड़ी है? सफलता प्राप्ति के पूर्व उन ने कितनी ठोकरें खाई व कितनी असफलताएँ गले उतारीं? वस्तुतः पल्लवित वृक्ष का इतिहास वहां से आरंभ होता है जहाँ एक बीज ने अपने अस्तित्व की बाजी लगाई थी।

दुख बड़ा भाई है और सुख छोटा। दुख पहले पैदा हुआ और सुख बाद में। दोनों चिरन्तन सहचर हैं। उनकी एकता को कोई तोड़ नहीं सकता। दुख को स्वेच्छापूर्वक वरण किए बिना कोई सुख का सौभाग्य पा नहीं सकता।


भावनाओं का सौंदर्य

कमरे में लगे आदमकद शीशे के सामने बैठे उसे देर हो गई। पता नहीं दर्पण उसे क्या बता रहा है अथवा स्वयं इस काँच के टुकड़े में कुछ ढूँढ़ रही है। जरीदार लाल साड़ी, हाथों में भरी-भरी काली चूड़ियाँ, अंग-प्रत्यंगों में अपनी आभा-विकीर्णित करते स्वर्ण आभूषण, सिर में लाल रंग की रेखा बनाता सिन्दूर-उसके नववधू होने की पहचान दे रहे थे। कीमती साजो-सामान से भरापूरा कमरा ऐश्वर्यवान होने की गवाही देने के लिए काफी था। उसकी निजी थाती पुस्तकें यह बता रही हैं कि विद्या का भी वास है।

धन-ऐश्वर्य-विद्या अभिरुचि के बावजूद वह उदास थी। पलकें व्यथा के भार से बोझिल थीं। मुख पर उभरने वाली आड़ी-तिरछी रेखाओं ने उदासी का स्पष्ट रेखाँकन कर रखा था। मुख मनुष्य का भाव दर्पण है। किन्हीं गहन आयामों में होने वाली हलचलें, भावों का आलोड़न-विलोड़न इसमें उभरे बिना नहीं रहते। अनायास उसने होंठ सिकोड़े। माथे की लकीरें बिखरीं और कुछ शब्द फिसले “सौंदर्य” किसे कहते हैं सुन्दरता?” शब्द अस्फुट होने के बावजूद स्पष्ट थे। पता नहीं किससे पूछ था यह सवाल।

वैसे दिखने में यदि उसके नाक-नक्श तराशे हुए नहीं हैं-तो कुरूप भी नहीं कहा जा सकता। अंधी-कानी, लँगड़ी-लूली, बहरी तो वह है नहीं। सुन्दरता की पहचान क्या महज चमड़ी की सफेदी है? मोहक चाल, इतराती मदभरी आँखें, तराशी हुई संगमरमरी देह-यष्टि जो अपनी रूप ज्वाला में अनेकों को झुलसा दे अथवा व्यक्तित्व के गुणों का समुच्चय चरित्र उच्च मानवीय गुणों से युक्त हो और कर्तव्य सत्प्रवृत्तियों का निर्झर हो जिसकी विशालता के कारण अनेकों जिन्दगियाँ विकसित हों। उसके पूछे गए प्रश्न के यही दो उत्तर हैं-जो आदि काल से वातावरण में गूँज रहे हैं- “किसी एक को चुनना है।”

वह उठ खड़ी हुई। विषाद की लकीरें गहरी पड़ी। सोचने लगी-विवाह हुए अभी ज्यादा दिन नहीं हुए। पति का उसके प्रति यह व्यवहार-ताने, व्यंग्य कटूक्तियों की मर्म पीड़क बौछार। सुनते-सहते उसका अस्तित्व छलनी हो गया है। यदि उसके पास वासनाओं की उद्दमता भड़काने वाली रूप-राशि नहीं है, तो इसमें किसका दोष है? गुणों के अभिवर्धन में तो वह बचपन से प्रयत्नशील रही है। बेचैनी से उसके कदम कमरे की दीवारों का फासला तय करने लगे। विचारों की धारा प्रवाहमान हुई। रूपराशि भले-दो जीवनों में क्षणिक आकर्षण पैदा करे-पर सम्बन्धों की डोर मृदुल व्यवहार के बिना कहाँ जुड़ पाती है? चरित्र की उज्ज्वलता के बिना भी कभी-आपस में विश्वसनीयता पनपी है। रूपराशि क्या क्ल्योपेट्रा के पास कम थी, जिसकी रूप ज्वाला के अंगारों में मिश्र और रोम तबाह हो गया। विश्वविजयी कहलाने वाला सीजर पतंगे की तरह भुन गया।

आज निर्णय की घड़ी है। निर्णय की घड़ी क्या-निर्णय हो चुका। पति-साफ कह चुके “मैं तुमको साथ नहीं रख सकता।” उनकी दृष्टि ने शरीर के अलावा और कुछ कहाँ देखा? यदि देख पाते तो... काश...! बेचैनीपूर्वक टहलते-टहलते पलँग पर बैठ गई। अचानक उसने घड़ी की ओर देखा, शाम के 5.15 हो चुके। अब तो आने वाले होंगे। नारी रूढ़ियों से एक वस्तु रही है- पुरुष के हाथों का खिलौना। याद आने लगा इतिहास की अध्यापिका का वह कथन-यूनान के भारत प्रवेश के बाद मगध में नारियों की हाट लगने लगी थी। रूप विक्रेता लज्जा वसन तक तार-तार कर फेंक देते। खरीदार आकर उन्हें इस तरह टटोलते जैसे कोई कसाई देख रहा हो पशु में कितना माँस है। महामति चाणक्य ने इस का अन्त कराया। अब कहाँ है चाणक्य? कहाँ सुप्त है वह ब्राह्मणत्व? आज क्या नारी नहीं बिकती? सोचते सोचते उसका मन विकल हो उठा।

तभी दरवाजे पर बूटों की खड़खड़ाहट सुनाई दी। शायद....मन में कुछ कौंधा। अपने को स्वस्थ सामान्य दिखने की कोशिश करने लगी। थोड़ी देर में प्रवेश किया, जिसके मुख मण्डल पर पुरुष होने का गर्व था। एक उचटती सी नजर उसपर डालकर वह कुर्सी पर बैठा व प्रश्न दाग बैठा -”हाँ तो क्या फैसला किया तुमने?”

घुटन या संघर्ष में से वह पहले ही संघर्ष चुन चुकी थी। पति का निर्णय अटल था। अतः उसने बंधनों से मुक्ति पा ली। अधूरी पढ़ाई फिर चली, समय के सोपानों के साथ उसने कदम बढ़ाए। बढ़ते कदमों ने उसे स्वातंत्र्य यज्ञ का होता बनाया। संवेदना शक्ति बनी व गुणों के वृक्ष पर कविता के प्रसून खिले और यह कविता बन गयी। नारी की अनकही संवेदनाओं की। साहित्य के क्षितिज पर एक नीहारिका का अवतरण हुआ, जिसमें भावों के ब्रह्मांड सँजोए थे। कविता के भवन में उसका सौंदर्य दीप शिखा बन चमका। भावना के सौंदर्य से भरी इस महीमयी को भारत ने “महादेवी” के रूप में जाना।

उनकी जीवन गाथा एक सवाल दुहराती है यदि संवेदनशील, गुणवान, व्यक्तित्व, सौंदर्यशाली नहीं है तो फिर सौंदर्य की परिभाषा क्या है?


तर्क से परे है, ईश्वर का अस्तित्व

अनीश्वर-वादियों का कथन है कि विज्ञान द्वारा ईश्वर सिद्ध नहीं होता तो हम उसे क्यों माने? विचारणीय बात यह है कि क्या हम केवल उन्हीं बातों को मानते हैं जो प्रत्यक्ष या विज्ञान सम्मत है? जीवन के कितने ही आदर्श और तथ्य ऐसे हैं, जिनका सीधा सम्बन्ध अंतरात्मा से है। नीति-शास्त्र का आधार यही है। धर्म, सदाचार, नीति, कर्तव्य परमार्थ आदि को विज्ञान की कसौटी पर यदि कसा जाय, तो यह सभी कुछ व्यर्थ प्रतीत होगा और मनुष्य को पशु की तरह आचरण करना ठीक प्रतीत होगा ।

विज्ञान के द्वारा ईश्वर को सिद्ध या असिद्ध करने का प्रत्यक्षवाद हास्यास्पद है। जिसे विज्ञान कहा जाता है वह वस्तुतः पदार्थ विज्ञान है। जीवनोपयोगी प्रयोजन सिद्ध करना इस भौतिक विज्ञान की मर्यादा है। इसके अतिरिक्त सूक्ष्म तत्वों तक पहुँच सकने में असमर्थ है।

नीति-शास्त्र, सदाचार, त्याग, अतिदान, परोपकार, संयम जैसे आवश्यक विषयों में विज्ञान की कोई पहुँच नहीं। यदि इन विषयों को विज्ञान के आधार पर हल किया जाय, तो उन उपयोगी मान्यताओं को त्यागना पड़ेगा, जो मानवीय सामाजिक जीवन के लिये मेरुदण्ड के समान आवश्यक है।

विज्ञान के दृष्टि में नर और मादा का यौन संबंध स्वाभाविक है। उसमें बहिन, पुत्री या माता के साथ यौन-संबंध करने में कोई संकोच नहीं करते, तो मनुष्य ही क्यों करे? इस प्रतिबंध का इन मर्यादाओं का विज्ञान समर्थन नहीं करता, वरन् उन्हें व्यर्थ बताता है। यदि विज्ञान की कसौटी पर यौन-सदाचार व्यर्थ सिद्ध होता है, तो क्या हम उसकी व्यर्थता स्वीकार कर लेंगे और पशुओं की तरह बहिन, पुत्री एवं माता की मर्यादा को छोड़ देने के लिये उद्धत होंगे?

विज्ञान के अनुसार जीव, जीव का भोजन है। प्रत्येक प्रश्नों के लिये अपना स्वार्थ ही प्रधान है। फिर त्याग, बलिदान, उदारता, दान सेवा और परोपकार का अस्तित्व कहाँ रहेगा? जीवधारियों के गुण-धर्म के बारे में विज्ञान की कसौटी प्राणी की स्वभाविक प्रवृत्ति ही है। सभी जीवों को अपनी क्षुधाओं और वासनाओं की पूर्ति के लिये जो भी अवसर मिलता है उससे बिना उचित अनुचित का विचार किए लाभ उठाते हैं, फिर मनुष्य भी यदि वैसा ही करता है, तो भोगवाद का विरोध विज्ञान के द्वारा नहीं हो सकता, वरन् उसके आधार पर तो समर्थन ही करना पड़ेगा। ऐसी दशा में क्या हम विज्ञान को ही सब कुछ मानकर-परमार्थ की प्रवृत्ति को मानव जीवन से बहिष्कृत करने को तत्पर होंगे? और यदि होंगे तो क्या उसके फलस्वरूप किसी सत्परिणाम की आशा करेंगे?

विज्ञान बताता कि मौत से हर प्राणी डरता है, बचता है, लड़ता है और भागता है। यह इसका स्वाभाविक धर्म है। यदि मनुष्य को भी इस स्वाभाविक धर्म से बँधा हुआ मान लिया जाय, तो फिर मृत्यु के लिये हँसते हुये तैयार रहने वाले सैनिकों एवं देश, धर्म पर बलिदान होने वाले महा-मानवों को प्रकृति विरोधी एवं मूर्ख ही मानना पड़ेगा। फाँसी का हुक्म सुनने के बाद जिनके वजन जेल की कोठरियों में आठ-आठ पौण्ड बढ़ गए, उन क्राँतिकारियों को मौत से डर न लगने का विज्ञान के पास क्या उत्तर है?

इस प्रकार ईश्वर का आँखों से न दिखाई देना या वैज्ञानिक यंत्रों से उसका प्रमाणित न होना इतना बड़ा कारण नहीं कि जिसके आधार पर उस महान सत्ता के अस्तित्व से इनकार किया जा सके। इस संसार में सभी कुछ तो प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर नहीं होता।

ईश्वर दिखाई नहीं देता, इसलिये उसे न माना जाय, यह कोई युक्तिसंगत बात नहीं है। अनेकों वस्तुयें ऐसी हैं, जो आँख से नहीं दीखती फिर भी उन्हें अन्य आधारों से अनुभव करते हैं और मानते हैं। कोई वस्तु बहुत दूर होने से दिखाई नहीं पड़ती। पक्षी तब आकाश में बहुत ऊँचा उड़ जाता है तो दीखता नहीं। कोई वस्तु नेत्रों के बहुत समीप हो तो भी वह नहीं दीखती। अपनी पलक या आँखों में लगा हुआ काजल अपने को कहाँ दीखता है? यदि नेत्र न हो, कोई व्यक्ति अन्धा हो तो भी उसे वस्तुएँ नहीं दिखाई देती। चित्त उद्विग्न हो, मन कहीं दूसरी जगह पड़ा हो, किसी समस्या के चिन्तन में लगा हो, तो आँख के आगे से कोई चीज गुजर जाने पर भी वह दिखाई नहीं देती। बहुत सूक्ष्म वस्तुएँ भी कहाँ दिखाई देती हैं? परमाणु या रोग कीटाणु बिना सूक्ष्मदर्शी यंत्र के दीखते नहीं। किसी पर्दे की आड़ में रखी हुई, संदूक आदि में बंद की हुई, जमीन में गड़ी हुई वस्तुओं को भी आँखें कहाँ देख पाती हैं? सूर्य के प्रकाश के कारण दिन में तारे नहीं दिखते। पानी में नमक घुल जाता है फिर नमक दीखता नहीं, फिर भी पानी में उसका अस्तित्व तो रहता ही है।

जो वस्तु दिखाई न दे, वह है ही नहीं, यह मान्यता किसी प्रकार भी उचित नहीं ठहराई जा सकती। केवल आँखें ही किसी के अस्तित्व को प्रमाणित करने का एकमात्र साधन नहीं है।

ईश्वर के अस्तित्व से केवल इस कारण इन्कार करना है कि वह आज के अर्थ विकसित विज्ञान या बुद्धिवाद की कसौटी पर खरा नहीं उतरता, कोई ठोस कारण नहीं है। प्रत्यक्ष के आधार पर तो यह भी प्रमाणित नहीं किया जा सकता कि हमारा पिता वस्तुतः कौन है? माता की साक्षी को ही उसके लिये पर्याप्त प्रमाण मान लिया जाता है। मानव-जीवन की अनेकों महत्वपूर्ण अवस्थायें उस विज्ञान पर निर्भर हैं, जिसे अध्यात्म विज्ञान कहते हैं। पदार्थ विज्ञान से नहीं, अध्यात्म-विज्ञान से ईश्वर का अस्तित्व सिद्ध होता है। यदि यही प्रतिपादन जीवन में उतारा जा सके तो दैनन्दिन जीवन की अनेक कष्ट कठिनाइयों से उबरा जा सकता है।


सत्कर्मों के लिए सहायता (Kahani)

अर्जुन और कृष्ण में विवाद चल रहा था। अर्जुन कह रहे थे कि मनुष्य उदार तभी हो सकता है जब वह स्वयं अच्छी स्थिति में हो। कृष्ण कहते थे कि उदारचेता स्वयं मुसीबत में होने पर भी सत्प्रयोजनों में सहायता करने से नहीं रुकते।

समाधान के लिए कृष्ण अर्जुन को वहाँ ले गये जहाँ कर्ण घायल अवस्था में मरणासन्न पड़े थे। इन दोनों ने संत का वेश बना लिया था।

कर्ण ने आगन्तुक संतों का अभिप्राय पूछा। उन ने किसी परमार्थ कार्य के लिए धन की आवश्यकता बतायी। कर्ण विचार करने लगे। जीवन भर किसी याचक को खाली हाथ वापस नहीं जाने दिया अब कैसी विषम बेला है कि उस व्रत का निर्वाह टूट रहा है।

अचानक उन्हें ध्यान आया कि उनके दो दाँतों में सोना लगा है। प्रसन्नता खिल उठी। उन ने दोनों दाँत पत्थर से तोड़े और दोनों संतों के हाथ पर रख दिए।

दांत लेकर वे दोनों चल दिये। कृष्ण ने कहा अर्जुन देखा न उदारचेता स्वयं मुसीबत में होते हुए भी सत्कर्मों के लिए सहायता करने में नहीं चूकते।


कैसा था, कभी सतयुग?

सतयुग विश्लेषण करने पर सिद्ध होता है कि उस समय के व्यक्तियों की शारीरिक बनावट भले ही आधुनिक मानवों जैसी रही हो पर मानसिकता में, स्वभाव प्रयास में, भारी अन्तर रहा है। उन दिनों मनुष्य अधिक परिश्रमी और साहसी होते थे। यदि ऐसा न होता तो अनगढ़ प्रकृति को सुव्यवस्थित बनाकर कैसे समतल, सुविकसित बनाया जा सका होता। खड्डों, टीलों को काटकर किस प्रकार खेत बनाए गये होते। झाड़ियों को हटाकर किस प्रकार उद्यान लगाए गए होते। वन्य पशुओं में से गाय, भैंस, घोड़ा, ऊँट, हाथी जैसों को पकड़कर किस प्रकार वशवर्ती किया गया होगा। भेड़, बकरी, कुत्ता-बिल्ली आदि को सहयोगी किस प्रकार बनाया होगा?

प्रतिकूल प्रकृति वाले मनुष्यों तक को जब अनुकूल नहीं बनाया जा सकता तब जिनने भूखण्डों, सघन वनों, अनगढ़ पशुओं को अपना सहयोगी बनाने में सफलता प्राप्त की, वे कितने धैर्यवान, कितने बलवान, और बुद्धिमान रहे होंगे। इसका सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। संयम और उदार सहकारिता उनके स्वभाव बन गए होंगे। तभी तो वे परिवार बसाने और समाज का सुव्यवस्थित प्रचलन करने में समर्थ हुए होंगे। धर्म, दर्शन, तत्वज्ञान, अध्यात्म जैसे विषयों की संरचना तथा निर्धारण कितना कठिन है, इस बात का पता चलता है जब किसी को परम्परा से हटाकर नया तत्व ज्ञान नए सिरे से सृजन करने को कहा जाय।

सतयुगी महामानव वैज्ञानिक भी थे। अन्यथा अग्नि, का प्रज्वलन, कृषि वस्त्र निर्माण की कला पात्र, आयुध, भवन आदि का बना सकना उन दिनों कितना दुःसह रहा होगा जिन दिनों आदिम मनुष्य बन्दरों की तरह निर्वाह करता और गुफाओं में सिर छिपाने के लिए जगह ढूँढ़ता था। पक्षियों के घोंसलों, मक्खियों के छत्तों से प्रेरणा लेकर उसने वास्तु कला का विकास किया होगा। बोलना और लिखना सृष्टि का अन्य कोई प्राणी नहीं जानता जब कि मनुष्य चिरकाल पूर्व इन कलाओं में प्रवीण हो चुका है। सामूहिक रूप से बसने में उत्पन्न होने वाली भलाई बुराई को सम्मानित प्रताड़ित करने की जो शासन व्यवस्था बनी होगी, उस के लिए कितनी दूरदर्शिता का समावेश हुआ होगा? इसकी मात्र कल्पना की जा सकती है।

उत्पादन की तरह विनिमय भी कठिन है। इस हेतु वाणिज्य की शाखा प्रशाखाओं का विकास और यातायात के थलीय और जलीय साधन विनिर्मित करने में कितनी समझ और कितनी मेहनत करने की, साधन जुटाने की आवश्यकता पड़ी होगी? उस सब में सम्पन्न होने, सफल बनाने में कितने समाधान सोचने और कितने प्रखण्ड पुरुषार्थ करने पड़े होंगे? इसकी आज तो सर्वत्र सरलता से भरे पूरे युग में कल्पना तक करना कठिन है। पर उतना तो सहज अनुमान लगता है कि अभावों और विपन्नताओं के वातावरण में जितने सुविधा साधनों का निर्माण निर्धारण किया होगा वे कितने बड़े पराक्रमी, पुरुषार्थी, तत्पर, तन्मय प्रकृति के रहे होंगे। कितना उच्चस्तरीय धैर्य और साहस उन ने दिखाया होगा। आरम्भिक कौशल प्रकट करने की कितनी बड़ी क्षमता उनमें रही होगी। अपने समय के हमारे पूर्वज निश्चय ही महामानव रहे होंगे। अन्यथा इतनी समृद्धि, सम्पदा, प्रगति और सुव्यवस्था का ढाँचा इस प्रकार खड़ा करना संभव न हुआ होता।

सतयुगी पूर्वजों की प्रयास-परायणता की सराहना ही पर्याप्त नहीं होगी वरन् उनकी संयमशीलता एवं उदारता को और भी अधिक श्रेय देना होगा। सामान्यतया स्वार्थ का तकाजा यह होता है कि जो कमाए सो खाए। जिसमें बल हो वह अधिक कमाए। वन्य जीवों में जंगल का कानून चलता है। समर्थों में “जिसकी लाठी उसकी भैंस” वाली कहावत चरितार्थ होती रही है। मध्यकालीन लुटेरों, आक्रमणकारियों, सामन्तों में यह प्रकृति बड़े विकृत रूप में तत्कालीन इतिहासकारों ने भी पाई है। ठग और डाकू अपनी चतुरता का ऐसा ही घिनौना उपयोग करते रहे हैं किन्तु चिरपुरातन काल के सतयुगी प्रचलन सर्वथा दूसरी तरह के रहे हैं। उस समय के महामानवों ने उत्पादन तो असाधारण किए पर उनके उपयोग में संकोच ही करते रहे। संयमी बने और अपरिग्रही रहे। कम से कम में अपना काम चलाया और बचत के संबंध में यही सोचते रहे कि इससे पिछड़ों को आगे बढ़ाने का अनगढ़ों को प्रवीण बनाने का कार्य किया जाय। ऐसा सोचा ही नहीं गया वरन् उस सोच को कार्यरूप में परिणत करके भी दिखाया गया।

उपार्जन की सफलता अनुग्रह, अनुदानों पर न्यौछावर की जाती रही। जहाँ रहे, मिल बाँट कर खाया। पिछड़ों को उठाने के विशेष प्रयास किए और असमर्थों की सहायता करने के लिए प्राणों की बाजी लगाते हुए तनकर खड़े रहे, तभी मानवी गरिमा, सभ्यता और संस्कृति का वह विकास बन पड़ा जिसके कारण उस काल के प्रतिभावानों को देव मानव कहलाने का भरपूर श्रेय-सम्मान उपलब्ध हो सका।

मनुष्य एक जगह बसता है। तो उसके सहयोगी संबंधी भी बन जाते हैं। उत्पादन का जो सिलसिला कठिनतापूर्वक चलाया जाता है उसका सुविधाजनक प्रतिफल कालान्तर से ही मिलता है। इन सब बातों को जानते हुए भी जिनका मन यह करे कि सुविधाओं से लाभान्वित दूसरों को होने दिया जाय और स्वयं नई जगह जाकर नया घोंसला बनाया जाय, नयों को इकट्ठा किया जाय और नए सिरे से प्रगति का, संस्कृति का शुभारंभ किया जाय उनकी उच्च मानसिकता की भूरि भूरि प्रशंसा ही करनी पड़ती है। सिंह अपने बच्चों के बड़े हो जाने पर, उस क्षेत्र को उनके लिए छोड़ देता है और स्वयं अपने लिए किसी अन्य मन चाहे प्रदेश को अधिकार क्षेत्र बनाता है। इसी परम्परा को अपनाकर सतयुग की अवधि में महापुरुष भी अपनी रीति नीति का निर्धारण करते रहे। उन्हें सर्वश्रेष्ठ मनोरंजन भरा पुरुषार्थ इस उद्देश्यपूर्ण प्रव्रज्या में ही दिखा। इस लिए उन्होंने उस प्रक्रिया को तीर्थ यात्रा का नाम देकर बड़े उत्साह एवं संवेदनापूर्वक अपना भी लिया। रामायण काल में सुमित्रा माता और उर्मिला पत्नी ने अपने लक्ष्मण को वनवास के लिए खतरों से भरे क्षेत्र में भेज दिया था। उन दिनों प्रत्येक परिवार में से न्यूनतम एक सदस्य समाज सेवा के लिए समर्पित किया जाता था। मध्यकाल में यही परम्परा शासन के आह्वान पर घर घर से एक सैनिक भरती करने के रूप में रही है। अपने क्षेत्र को सँभालने के उपरान्त अन्यान्य पिछड़े क्षेत्रों को खोजना और वहाँ जाकर तब तक लिए बस जाना जब तक कि वहाँ प्रगति और समृद्धि के लक्षण प्रत्यक्ष न दीख पड़े, यही वह पद्धति थी जिसके चरितार्थ होते रहने के कारण आर्यावर्त में उगे छोटे उद्यानों के बीज संसार भर में फैले और वहाँ उगकर विशाल वृक्ष के रूप में फूले- फले।

चिरपुरातन काल की परिस्थितियों का परिचय यदाकदा जहाँ तहाँ पाये गए ऐसे ध्वंसावशेषों से प्राप्त होता है जो अच्छी स्थिति में तो नहीं मिलते पर जो कुछ सामग्री खोजी जा सकी वह यही सिद्ध करती है कि सतयुग में मनुष्य का पराक्रम और बुद्धि कौशल चरम सीमा तक पहुँचा था। इतना ही नहीं उसकी उदारता और सहकारिता भी बढ़ी-चढ़ी रही। प्रतिभावानों की महत्वाकाँक्षा एक ही केन्द्र पर केन्द्रित रही कि वे वीरान क्षेत्रों को किस प्रकार आबाद कर दिखाएँ और अपनी समूची प्रतिभा को इसी प्रयोजन की पूर्ति के लिए किस प्रकार गलाएँ। उनकी तीर्थ यात्रा इसी उद्देश्य के लिए गतिशील रहती थी। उनकी सम्पदा प्रतिभा इसी निमित्त उत्सर्जित होती थी। इसी आधार पर संसार भर में विभिन्न क्षेत्र विकसित देशों के रूप में समुन्नत हुए।

यही प्रचलन सतयुग की वापसी का निमित्त बन सकता है। जब ऐसे महान उद्देश्यों के लिए जीने वाले ब्रह्मनिष्ठ बनने बढ़ने लगे तो समझना चाहिए कि सतयुग आ गया।


बात मान लेने में ही औचित्य है (Kahani)

जल की बूँद सागर में घुलने लगी, तो अपने अस्तित्व के समाप्त होने का बड़ा दुख हुआ। सागर ने साँत्वना दी- “बेटी! तुम्हारी जैसी असंख्यों बूँदों का ही तो मैं सम्मिलित रूप हूँ। यहाँ आकर तुम लघु से विराट का अनुभव करोगी।” बूँद को सागर की बातें भायी नहीं। वह उड़कर बादल में चली गई। बादल बरसे। बूँद फिर जमीन पर आ गिरी। अब की बार धूल धूसरित भी हुई और नदी के प्रवाह में दुर्गति कराती हुई पुनः सागर की ओर ही वह चली। वहाँ पहुँच कर उसे बड़ा पछतावा हुआ कि उसने सागर की बात यदि पहले मान ली होती, तो इतनी उठा पटक एवं व्यर्थ के श्रम से बचती और सच्ची शान्ति का अनुभव करती।

अपने से बड़े और अनुभवी लोगों की बात मान लेने में ही औचित्य है।


मिलन, एक मनीषी व ऋषि का

उल्लास और संकोच के साथ उसने अपने पैर धरती पर रखे इस सपनों के देश में आगमन सुहृद आत्मीय नितान्त अपने से मिलन का सुयोग। ऐसे अवसर पर उल्लास न हो तो कब हो? पर साथ ही संकोच की एक झीनी चादर उसे अपने में लपेटे थी। चाहकर भी इस अनचाहे आवरण से अपने को छुटा नहीं पा रहा था। रह-रहकर हवाई जहाज के भीतर का माहौल, आगे की सीट पर बैठे हुए यात्री का चेहरा, चश्मे के नीचे से झाँकती उसकी दो गोलमटोल चमकीली आँखें और शब्द .......उफ ........वह सिहर उठा।

सामान के नाम पर एक अटैची को लेकर हवाई अड्डे के बाहर आ चुका था। पता नहीं कब तक अपने में खोया रहता पर ताँगे वाले ने टूटी फूटी अँग्रेजी में पूछा कहाँ चलेंगे और उसने एक पता बताया। इस पते पर रहने वाले को कौन नहीं जानता। कलकत्ते की जगह अगर उसने यह नाम भारत के किसी कोने में भी कहा होता, तो लोग उसे उनके पास तक पहुँचा देते। मोल-भाव करने की जरूरत नहीं समझी। इस तरह का वाद-विवाद करने जैसी अभी उसकी मनःस्थिति भी नहीं थी।

ताँगा चल पड़ा। पहिए सड़क पर तेजी से ढुलकने लगे। साथ ही चल पड़ी उसकी थमी हुई विचार शृंखला। भाव, कल्पना, विचार यही तीन तो मनुष्य को उसकी मनुष्यता प्रदान करते हैं। इनमें से एक भी गायब हुआ बस इन्सान जानवर बना। भाव के बिना प्रेरणा नहीं, कल्पना के बिना दूरदर्शिता नहीं और विचारों के बिना इनकी साज सँभाल नहीं। विचारों की शृंखला में बार-बार साथ सफर करने वाला यात्री आने लगा।

वह व्यक्ति भी लगभग साथ ही चढ़ा था। प्लेन के गति पकड़ लेने पर यात्रियों में चर्चा शुरू हो गई। चर्चा और क्या होती? विश्वयुद्ध की सरगर्मियां हरेक के दिलों दिमाग पर छाई हुई थीं। यही केन्द्र बिन्दु बना यात्रियों की बात-चीत का। मनुष्य क्यों करता है ध्वंस? इस रक्त तर्पण, उज्ज्वल धरती पर खून की लाल कीच फैलाने का दोषी कौन? इन्सानी लाशों, बेसहारा महिलाओं की करुण चीत्कारों के बीच हँसी की गूँज सफलता का उन्मत्त गान। यह सब किसका कर्तृत्व है?

चर्चा कर रहे व्यक्तियों में वह प्रधान था। अपनी गोल आँखों को चमकाता हुआ वह बोला था “यह सब विज्ञान की करामात है, विज्ञान की। वैज्ञानिकों की अक्ल जो न करे सो थोड़ा।” इतना कहते-कहते वह आक्रोश में आ गया था। सारे शरीर में जैसे लाखों चींटियां एक साथ रेंग गई थीं। उसकी प्रतिक्रिया से बेखबर अन्य लोग रस ले रहे थे। “विज्ञान भला दोषी क्यों है?” एक ने पूछा। “वह नहीं तो और कौन?” दोषी ठहराने वाले व्यक्ति की एक तेज आवाज उभरी। “सैकड़ों तरह के बम, मारक प्रक्षेपास्त्र, जहरीले रसायन विनाश के रोज नए सरंजाम कौन जुटाता है? इसकी खोज में जुटे अकल के इन ठेकेदारों को क्या नहीं मालूम कि ये किस काम आएँगे। पर नहीं, पैसा सुविधा सम्मान पदक की चमक से चौंधियाई आँखों को मनुष्यता का क्षत विक्षत जिस्म कहाँ दिखता है? किसे फुरसत है जो उसकी कराहटों को सुने? “

जहाज में सन्नाटा था। सभी उसकी बातों को ध्यान से सुन रहे थे। सभी के साथ वह भी। बोलने वाला तो जैसे दहकते अंगारे उछाल रहा था और सारे अंगारे उसी के जिस्म पर पड़ रहे थे। वह सोचने लगा क्या सिर्फ विज्ञान दोषी है अथवा दोषी है मानवी प्रवृत्तियोँ? जब विज्ञान नहीं था तब क्या लड़ाइयाँ नहीं होती थीं - मार-काट नहीं मचती थी। भले उस में आज की तरह अणु आयुध न इस्तेमाल किए जाते हों किन्तु विनाश की ताँडव लीला तो आज की तरह पहले भी थी। बेचारा विज्ञान तो मानवी प्रवृत्तियों के हाथ की कठपुतली भर है और अधिक कुछ सोचता कि उसके कानों में पिघलते शीशे की तरह उसके शब्द पड़े। “आप कहेंगे-विज्ञान यंत्र है। मैं कहता हूँ विज्ञान शक्ति है। आज के मानव की सर्व समर्थ शक्तियों में प्रधानता। इस शक्ति को विनाशकारी बनाकर अनगढ़ मानवों के हाथ में सौंपने वाले कौन हैं? जब मालूम है मनुष्य अनगढ़ है तब उसके हाथों में ऐसे प्रलयकारी सरंजाम क्यों सौंपे जा रहे हैं?” यह जैसे उसी के सवाल का जवाब था।

उसने एयरहोस्टेस को इशारे से बुलाकर एक पत्रिका माँगी। इस पत्रिका की आड़ में उसने परेशानी पर छलछला आयी पसीने की बूंदों को पोंछा और विज्ञान-मनुष्य-दोषी कौन? इस गणित को सुलझाने लगा। उसके उतरने के पहले वह उतरकर चला गया था। किन्तु सवाल ज्यों के त्यों थे? मानवीय अस्तित्व के शाश्वत प्रश्न इन्हें कौन सुलझाए?

“साहब! आश्रम आ गया।“ ताँगे वाले ने कहा वह चौंका -देखा -ताँगा एक विशालकाय परिसर के सामने आने वालों की अगवानी करते कतार में खड़े वृक्ष, मखमली घास-प्रकृति की सार सुरम्यता जैसे विश्व कवि का सहचरत्व पाने के लिए यहीं आकर टिक गई हो। भीड़-भाड़ से दूर यह जगह अपने नाम के अनुरूप शाँति का उपवन थी। देखने पर आंखें नहीं अघाती थीं।

धोती कुर्ता पहिने एक व्यक्ति ने सौम्यता बिखरते हुए उनका परिचय पूछा। गुरुदेव के मित्र हैं, सुनकर बड़े आदर से उनका सामान रखा, साथ लेकर उनसे मिलाने चल दिए। कुछ ही क्षणों में दोनों आमने-सामने थे। ठेठ बंगाली पहनावे में लिपटे इस ऋषि कल्प व्यक्तित्व को देखते ही आँखें जुड़ गईं। उन्हें गले लगा लिया। भोजन आवास विश्राम की समुचित व्यवस्था हुई।

शाम को आश्रमवासियों से उनका परिचय हुआ। एक लाइन में सभी कुर्सियाँ डालकर बैठ गए। इस सब के बीच वायुयान की चर्चा उसके दिमाग में ज्यों की त्यों जमी थी। दोषी कौन? समाधान क्या? ये सवाल उसके चिन्तन आकाश में पूर्ववत मंडरा रहे थे ।

चर्चा के बीच उसने पूरी घटना को यथावत सुनाया। साथ ही अपने प्रतिक्रियात्मक चिन्तन को भी। प्रत्येक की सहानुभूतिपूर्ण दृष्टि का शीतल अहसास उसे हो रहा था। समाधान के लिए सभी ने गुरुदेव की तरफ ताका।

दाढ़ी के भीतर से झिलमिलाती मुस्कान के साथ उन्होंने कहना शुरू किया - आप ठीक कहते हैं, दोषी मानवीय प्रवृत्तियाँ हैं पर इन मानवी प्रवृत्तियों के परिशोधन की जिम्मेदारी किसकी है?

एक ऐसा सवाल-जिसके जवाब के बारे में पश्चिमी मन ने अभी तक सोचा ही नहीं। आगन्तुक वैज्ञानिक मौन थे। उन ने स्वयं जवाब दिया “अध्यात्म।” “मानवीय चेतना के विविध स्तरों की संरचना प्रक्रिया की जानकारी करने, इसमें आवश्यक फेर बदल करने में समर्थ विधा“।

“तब यह अपनी जिम्मेदारी से इतना विमुख क्यों?” हवा के तेज झोंके के साथ उभरा वैज्ञानिक महोदय का सवाल वाजिब था ।

“स्थूल के मोह से बँधे मनुष्य ने अध्यात्म के तत्व को भुलाकर उसके कलेवर रूप कर्मकाण्ड को पकड़ना चाहा। पर यह भी कहाँ पकड़ा जा सका? अस्तित्व की गहराइयों से निकल रही उनकी वीणा उपस्थित लोगों को एक पीड़ा का अहसास करा रही थी। देशकाल की अनेकों प्रथाएँ, परम्पराएँ, रीत-रिवाज, मान्यताएँ इससे आकर चिपट गए। अनेक मूढ़ताओं के अनुरूप अनेक धर्म। अध्यात्म का तत्व तो इन मूढ़ताओं के पहाड़ के नीचे दबा सिसक रहा है। कैथोलिक प्रोटेस्टेण्ट, हिन्दू मुस्लिम, सिख का जामा पहनकर दूषित मानवीय प्रवृत्तियाँ धर्मतन्त्र के शुभ्र नीर समुद्र में रक्त की कीच घोलती हैं। “

“ओह!” अनेकों के मुख से एक साथ निकला। कइयों की लंबी साँस एक साथ वातावरण में सरसरा उठीं।

“ऐसी दशा में विकृत मानवी प्रवृत्तियाँ विज्ञान द्वारा जुटाए जा रहे साधन-सरंजाम का उपयोग कैसा करेगी, यह भी कोई बताने की बात है। मानवीय बुद्धि की कुटिलता की परिणति....” आशंका के भयावह सागर में अनेकों मन डूबने लगे। “तब फिर क्या?” निराश वैज्ञानिक ने उनकी ओर देखा।

“समाधान है।” विश्व कवि की उर्वर कल्पना मुखर हो उठी। सुनने के लिए अनेकों मन अकुला उठे। वह कह रहे थे “विज्ञान और अध्यात्म एक साथ मिलें, एकाकार हों। इनमें विरोध की जगह सौहार्द पनपे।”

“पर..... पर..... विज्ञान की प्रवणता और प्रयोगों की कसौटी पर क्या अध्यात्म टिक सकेगा?”

“सुनकर कवि गुरु खिलखिलाकर हँस पड़े। भ्रमों से दूर रहने वाले विज्ञान को यही भ्रम है बारबार। विज्ञान के ये गुण तो अध्यात्म के सहयोगी बनेंगे। तर्क प्रवणता और प्रयोगों की छैनी-हथौड़ी ही तो इसे मूढ़ताओं के भार से मुक्त करेगी। जब सामान्य समझ सकेगा, अध्यात्म जमीन इमारतें नहीं, वेशभूषा माया नहीं, अलगाव आतंक नहीं, प्रेम हैं। इन्सान को इन्सानियत सिखाने की कला है।”

वैज्ञानिक हाइज़ेनबर्ग कह उठे तब तो वैज्ञानिक अध्यात्म या आध्यात्मिक विज्ञान सुखी मानवता के चिन्तन और जीवन की राह बनेगा। भावी मानवता का आधार भूत जीवन दर्शन बनेगा कवीन्द्र रवीन्द्र ने प्रसन्नता व्यक्त कर अपनी सहमति की मोहर लगा दी।

विश्व कवि रवीन्द्रनाथ टैगोर से भौतिक विज्ञानी हाइज़ेनबर्ग का यह मिलन उनके जीवन की अमूल्य निधि बन गया। “द होलो ग्राफिक पेरीडाइम” के उल्लेख के अनुसार इस मुलाकात के बाद उन्होंने न केवल भौतिकी की शोध में बल्कि अपनी जीवन पद्धति में भारी फेर बदल की। हमारा अपना जीवन भी भवितव्यता के अनुरूप कुछ ऐसा ही बदलेगा- नियन्ता यही आशा कर रहा है।


जीवन साधन ही सच्ची ईश्वर-उपासना

उपासना का आरम्भ कहाँ से किया जाय? इसका उदाहरण किसी स्कूल में जाकर देखा जा सकता है। वहाँ नये छात्रों का वर्णमाला, गिनती, सही उच्चारण, सही लेखन आदि से शिक्षण आरम्भ किया जाता है और पीछे प्रगति के अनुसार ऊँची कक्षाओं में चढ़ाया जाता है। स्नातक बनने के उपरान्त ही अफसर बनने की प्रतियोगिता में प्रवेश मिलता है और जो उस कसौटी पर खरे उतरते हैं उन्हें प्रतिभा के अनुरूप ऊँचे दर्जे के दायित्व सौंपे जाते हैं।

किसी मन्त्र-तंत्र को अनावश्यक महत्व देकर उसका कर्मकाण्ड पूरा करने भर से किसी बड़े प्रतिफल की आशा नहीं की जा सकती। बाल्मीकि को नारद ने गुरुदीक्षा में ‘राम’ नाम दिया था पर वे उसका सही उच्चारण न कर सके। अतएव उलटा नाम जपने लगे और ‘राम’ के स्थान पर मरा जपने लगे। भगवान शब्दों को महत्व नहीं देते। किसने किस देवता का किस विधि से कर्मकाण्ड सम्पन्न किया इसकी देखभाल का भगवान के यहाँ कोई लेखा जोखा नहीं है और न इस प्रकार की कोई जाँच पड़ताल होती है।

यदि शब्दों का ही महत्व रहा होता तो संसार के अनेक भाषा भाषी क्षेत्र में भगवान को तो अनेक रूप वाला माना जाता है। उनमें से कोई एक सही और शेष सभी गलत माने जाते। यही बात मंत्रों के सम्बन्ध में हैं। अपने देश में ही अनेकों जप-मन्त्र प्रचलित हैं। फिर उन सबसे आत्मिक उद्देश्य कैसे पूरा होता? कोई एक ही इन में से ठीक माना जाता और शेष सब को रद्द कर दिया जाता। किन्तु सभी मंत्र सभी नाम-रूप साधक की श्रद्धा और व्रतशीलता के अनुरूप प्रतिफल प्रदान करते हैं।

इससे स्पष्ट है कि आत्मिक प्रयोजनों के लिए किसी शब्दावली या क्रियाकृत्य का उतना महत्व नहीं है, जितना कि समझा जाता है। उनका प्रयोजन इतना ही है कि पशु जीवन को ऊँचा उठाकर उत्कृष्टता का प्रतिनिधित्व करने वाले ईश्वर के साथ अपने को जोड़ा जाय। ऊँचे तालाब से नीचे वाले तालाब का सम्बन्ध नाली खोदकर बना दिया जाय तो ऊँचाव का पानी निचाव की ओर चलना आरम्भ कर देता है और अन्ततः दोनों की सतह समान हो जाती है। किसी ने भगवान के साथ सच्चा सम्बन्ध जोड़ा होगा तो तत्काल उसका जीवन स्तर ऊँचा उठना आरम्भ होगा। उत्कृष्टता और आदर्शवादिता की मात्रा अनवरत रूप से बढ़ने लगेगी। यह एक पहचान है जिसके आधार पर किसी की श्रद्धा और भावना परखी जा सकती है। यदि ऐसा न हो रहा हो तो समझना चाहिए कि उपासना का, ईश्वर के पास बैठने का परिणाम दीख न पड़ने का कारण यही हो सकता है कि कहीं गड़बड़ी का अवरोध अड़ रहा है।

यह मान्यता सही नहीं है कि कोई मंत्र जपने या अमुक कर्मकाण्ड करने भर से अध्यात्म क्षेत्र में प्रवेश करने वालों को जिन लाभों की अपेक्षा की जाती है वे हस्तगत होने लगें। हमें ईश्वर को अपने से अधिक मूर्ख नहीं मानना चाहिए वरन् अधिक बुद्धिमान समझना चाहिए। किसी बैंक मैनेजर की स्तुति करने या चन्दन अक्षत चढ़ाने पर वह मनचाही राशि नहीं दे देता वरन् यह देखता है कि उसका पैसा जमा है या नहीं। अथवा उधार लिया जा रहा है तो उसके वसूल होने की आशा है या नहीं। यदि इन दोनों बातों में से एक भी बात अनुकूल न बैठती हो तो बैंक मैनेजर उसकी अभ्यर्थना के लिए धन्यवाद देकर उसे खाली हाथ ही लौटा देगा। यदि ईश्वर की समझदारी बैंक मैनेजर जितनी भी मानी जाय तो मनुष्य का महत्व घट जाता है और इष्ट का बढ़ता है। उपासना का प्रयोजन इतना ही है कि हम जिसके पास बैठते हैं उसकी विशिष्टता का समावेश अभिवर्धन अपने में होने दें। चंदन वृक्ष के समीप उगे हुए सामान्य झाड़ झंखाड़ भी सुगन्धित हो जाते हैं। सीप के मुख में स्वाति बूँदों का प्रवेश होने से मोती बन जाता है। पारस को छूकर लोहा सोना हो जाता है। भगवान के सान्निध्य संपर्क की बात करने वाले यदि अपने भीतर निरन्तर उत्कृष्टता की वृद्धि होती अनुभव नहीं करते और जीवनचर्या में आदर्शवादी परिवर्तन नहीं होता तो समझना चाहिए कि विडंबना को ही उपासना समझने की भूल की जा रही है।

ठग हमेशा शिकार फँसाने हेतु चापलूसी का आश्रय लेते हैं। मित्रता की दुहाई देते हैं। चापलूसी करते है और पान बीड़ी जैसे उपहार देकर अपनी सद्भावना का परिचय देते हैं। जो उनकी बात पर विश्वास कर लेता है। उसकी जेब बुरी तरह कटती है। पूजा के नाम पर अपने को हितैषी बनाकर जो ईश्वर से पक्षपात की, अनुचित लाभ उठाने की आशा करते रहे हैं, उनके बारे में समझदार मनुष्य तक चौकन्ने हो जाते हैं। फिर घट-घटवासी ईश्वर का तो कहना ही क्या? उसे किसी छद्म द्वारा अपनी मर्जी के अनुरूप नहीं चलाया जा सकता।

ईश्वर एक नियम, मर्यादा एवं व्यवस्था का नाम है। स्वयं को भी उसने अपने को इन अनुशासनों में आबद्ध कर रखा है। फिर मनुष्य के साथ व्यवहार करते समय वह अपनी सुनिश्चित रीति-नीति से पीछे कैसे हट सकता है। उसे चापलूसी के आधार पर किस तरह अपनी ओछी मनोकामनाएँ पूरी कराने के लिए सहमत किया जा सकता है। उस निष्पक्ष न्यायाधीश से कुछ अनुपयुक्त करा लेने की बात किसी को भी नहीं सोचनी चाहिए।

जिन्हें अध्यात्म तत्वज्ञान की सही जानकारी है उन्हें समझना चाहिए कि ईश्वर किसी अंधेर नगरी का बेबूझ राजा नहीं है। वरन् इतनी विशाल सृष्टि को वह किन्हीं नियम सिद्धान्तों के आधार पर ही चला रहा है। पुजारी का बाना पहनकर कोई उससे वह नहीं करा सकता जो उसकी नीति मर्यादा से भिन्न है। अवाँछनीयताओं को छाती से चिपकाये रहकर हम न तो ईश्वर के भक्त बन सकते हैं और न कृपापात्र।

अध्यात्म क्षेत्र में प्रवेश करने वाले को व्रतशीलता की दीक्षा लेनी पड़ती है। व्रत का अर्थ मात्र आहार क्रम में न्यूनता लाना नहीं है वरन् यह भी है कि सत्प्रवृत्तियों को अपनाने के लिए संकल्पवान होना, औचित्य को अपनाये रहने में किसी दबाव या प्रलोभन से अपने को डगमगाने न देना। श्रेष्ठता के मार्ग से किसी भी कारण विचलित न होना। जो दृढ़तापूर्वक ऐसी व्रतशीलता का निर्वाह करते हैं उन्हें अपने चारों ओर ईश्वर की सत्ता ज्ञान चक्षुओं से विद्यमान दीख पड़ती है। उन्हें किसी शरीरधारी की छवि चर्म चक्षुओं से देखने में न वास्तविकता प्रतीत होती है न आवश्यकता।

सर्वव्यापी निराकार सत्ता से व्यक्तिगत मैत्री इस प्रकार नहीं जगायी जा सकती जैसे कि दुनियादार मतलब के लिए गधे को भी बाप बना लेते हैं और स्वार्थ सिद्ध न होने पर उसके साथ उपेक्षा या शत्रुता का व्यवहार करने लगते हैं। स्मरण रहे ईश्वर पर किसी की निन्दा प्रेरणा का प्रभाव नहीं पड़ता। वह अपने सामने वालों को सदा महानता अपनाने की प्रेरणा देता है और जिसने इस अनुशासन को जितनी मात्रा में अपनाया, उसे उतनी ही मात्रा में अपने स्नेह एवं अनुग्रह प्रदान करता है।

ईश्वर के निकटवर्ती एवं विश्वासी वे हैं जो उसके इस विश्व उद्यान को अधिक सुन्दर, समुन्नत एवं सुसंस्कृत बनाने का प्रयत्न करते हैं, जो अपने आप को मलीनताओं से छुड़ाकर अधिक से अधिक पवित्र और प्रखर बनाने का प्रयत्न करते हैं। वस्तुतः जीवन साधना ही सच्ची ईश्वर उपासना है। पूजाकृत्य ऐसी ही मनोभावना विकसित करने के लिए अपनाये जाते हैं।


डॉ. जाकिर हुसैन (Kahani)

ईश-प्रार्थना के उपरान्त बच्चों को स्वच्छ रहने की बात नित्य कही जाती। स्वास्थ्य के लिए स्वच्छता का महत्व भी बताया जाता, किन्तु फिर भी कितने ही छात्रों के कपड़े गन्दे होते कितनों के नाखून बढ़े रहते। कुछ बालों में कंघी किये बिना ही स्कूल चले आते।

अगले दिन स्कूल के समय छात्र जब स्कूल पहुँचे, तो देखा कि स्कूल के दरवाजे पर काँच, कंघी और नाखून काटने की मशीन लिए कोई बैठा है। पास जाकर देखा, तो बच्चे देखकर हैरान थे कि ये तो अपने बड़े गुरुजी हैं। सबके बाल सँवारे नाखून काटे तब कक्षा में प्रवेश दिया। उस दिन से सभी विद्यार्थी सफाई का ध्यान रखने लगे। उपदेश की अपेक्षा आचरण द्वारा शिक्षा देना अधिक प्रभावी होता है। इस प्रकार शिक्षा देने वाले और कोई नहीं, वरन् भूतपूर्व राष्ट्रपति डॉ. जाकिर हुसैन थे ।


महाप्रज्ञा का तत्वदर्शन जन-जन तक पहुँचे।

गायत्री को आद्यशक्ति कहते हैं। उससे पहले इस संसार में और कुछ नहीं था। पुराण कथन के अनुसार सृष्टि के आरम्भ में सर्वत्र जल भरा था। विष्णु की नाभि से कमल उत्पन्न हुआ, उसके पुष्प पर ब्रह्मा जी अकेले बैठे हुए थे। असमंजस में पड़े थे, अब क्या सोचूँ? और क्या करूं? इतने में आकाशवाणी से गायत्री महामंत्र का उद्घोष हुआ। कहा गया कि इस आदि शक्ति का सौ वर्ष तक तप कीजिए, उससे कर्तव्य बुद्धि की महाप्रज्ञा और साधन जुटाने की प्रचंड शक्ति उपलब्ध होगी। ब्रह्माजी ने वैसा ही किया। उन्हें कर्तव्यबोध के निमित्त गायत्री का दर्शन हुआ। सृष्टि सृजन का उद्देश्य जाना। पर इसके लिए शक्ति और साधनों की आवश्यकता थी। उसकी पूर्ति के लिए आद्यशक्ति दूसरे सावित्री के रूप में भी प्रकट हुई। पंचमुखी सावित्री एवं उससे पाँच तत्व, पाँच प्राण उत्पन्न हुए और जड़ चेतन सृष्टि बनकर खड़ी हो गई।

इसके उपरान्त ब्रह्माजी ने गायत्री के रहस्य की चार मुखों से चार वेदों के रूप में विवेचना की। उससे शास्त्र, उपनिषदों, दर्शन, पुराण आदि का तत्वज्ञान के रूप प्रकटीकरण हुआ ।

इसके उपरान्त गायत्री के एक-एक अक्षर से प्रचण्ड सत्ताओं का प्रकटीकरण हुआ। 24 अक्षरों से 24 अवतार, 24 देवता, 24 ऋषि, 24 चक्रवर्ती प्रकट हुए। उन सबने मिलकर सृष्टि की समस्त साधन सामग्री उत्पन्न की। इन सबने गायत्री महामंत्र उपासना की और उसी के कारण उपलब्ध सामर्थ्य से सृष्टि का विकास और संचालन करने लगे। वह क्रम अब तक चला आता है। जब कभी जिस किसी को कोई महत्वपूर्ण कदम उठाना पड़ता है तब तब मनीषी-मुनि, ऋषिगण आवश्यक क्षमता की उपलब्धि लेते और अपने मनोरथ पूरे करते हैं।

शास्त्रों में गायत्री को देव संस्कृति की माता और यज्ञ को तत्वज्ञान का पिता कहा गया है। दोनों का परस्पर संयोग है। आग और ईंधन के समन्वय से ज्वाला प्रकट और प्रचण्ड होती है। उसी प्रकार गायत्री साधना के साथ यज्ञ प्रक्रिया का समन्वय हो जाने से वे चमत्कार उत्पन्न होते हैं जिन्हें ऋद्धियाँ, सिद्धियाँ, स्वर्ग, मुक्ति, शान्ति, समृद्धि आदि के नाम से जाना जाता है।

यज्ञ में कुछ जलाया जाता है। नष्ट किया जाता है, ऐसा नहीं सोचना चाहिए, वरन् वस्तुतः होम द्रव्य को मंत्र शक्ति और अग्नि ऊँचाई के समन्वय से उन्हें सुविस्तृत किया जाता है। इससे इन तीनों की शक्ति असंख्य गुनी हो जाती है और जो भी उसके संपर्क में आते है, असंख्य गुना लाभ उठाते हैं। इसलिए जहाँ कहीं गायत्री की आराधना होती है, वहाँ उसके साथ यज्ञ को भी जोड़ रखने की व्यवस्था की जाती है। माता और पिता दोनों का परिपूजन साथ-साथ हो जाता है।

प्राचीन इतिहास को पढ़ते हैं तो गायत्री की अपार शक्ति के अनेकानेक उल्लेख मिलते हैं। जहाँ भी यह ऊर्जा प्रकट हुई है वहीं उसका परिणाम ऐसा देखने को मिलता रहा है जिसे अनुपम अद्भुत कहा जा सके। संकटों के निवारण, अभ्युदय के संसाधन और लोक-परलोक को श्रेय उत्कर्ष से भरा पूरा इसके माध्यम से बनाया गया है।

ऋषियों ने हर देव संस्कृति के अनुयायी को इन दोनों का दैनिक जीवन में प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप में समन्वय किये रहने का आदेश दिया है। सद्बुद्धि की अधिष्ठात्री महाप्रज्ञा को सिर के किले पर ध्वजा के रूप में शिखा बनाकर स्थापित किया जाता है। यज्ञ से पवित्र किया हुआ प्रतीक सूत्र यज्ञोपवीत के रूप से कंधे पर धारण किया जाता है। गायत्री के तीन चरण और नौ शब्द ही यज्ञोपवीत में तीन लड़ी और नौ धागों के रूप में विनिर्मित किये गये हैं और हर शरीर को देवालय बनाकर इन दोनों को प्रतीक रूप में धारण किये रहने, इनका पूजन-अभिनन्दन करने का निर्देश दिया है। जन्म से लेकर मरण पर्यन्त सोलह संस्कार होते हैं। सभी में यज्ञ कर्म प्रधान होते हैं। जब शरीर का अन्त होता है तो भी उसे यज्ञ पिता की गोदी चिता में सुला दिया जाता है। नई फसल पकती है तो उसे खाने से पूर्व कच्चे अन्न का ही होली के रूप में नवान्न.... यज्ञ किया जाता है। विवाह को वेदी पर भी यज्ञ की साक्षी में दो आत्माएँ जन्म भर के लिए एक साथ जुड़ती हैं। दुर्भाग्य ही कहना चाहिए कि देव संस्कृति के इन रहस्यों और क्रियाकलापों को हम भूलते जा रहे हैं और उनकी चिन्ह पूजा मात्र शेष रह गई है। होली के अवसर पर कूड़ा कचरा एकत्रित करके जला दिया जाता है। पुरुषों की अपेक्षा महिलाओं को तो फिर भी अधिक स्मरण है। पुरुष चोटी नहीं रखते तो बहुत सी महिलाएँ दोनों के बदले की दो चोटी बना लेती हैं। पर्व त्यौहारों के अवसर पर चूल्हे से अग्नि निकालकर उस पर लोग बताशा आदि जलाकर अग्निहोत्र की ही चिन्हपूजा कर देती हैं। पुत्रों की अपेक्षा पुत्रियाँ अपने माता-पिता के प्रति अधिक स्नेहसिक्त और भावपूर्ण रहती हैं। इसका प्रमाण गायत्री और यज्ञ के प्रति महिलाओं में अधिक श्रद्धा अभी भी पाई जाती है जबकि कई निष्ठुर यह भी कहते सुने जाते हैं कि माता पिता की गोद में खेलने का पुत्रों को ही अधिकार है बेटियों को नहीं। वे महिलाओं के साथ-साथ यज्ञ और गायत्री की उपेक्षा अवज्ञा करने तक की धृष्टता करते हैं।

जब गायत्री यज्ञ और भारतीय धर्मतत्व ज्ञान परस्पर इस प्रकार अविच्छिन्न रूप से जुड़े हुए हैं और उनकी आराधना को नित्य कर्म बताया गया है। प्राचीनकाल के सभी महामानव उसी उपासना को अपनाते रहे हैं तो आश्चर्य लगता है कि आज क्यों इनकी इतनी अवज्ञा हो रही है? सद्बुद्धि और सत्कर्म की अवहेलना सर्वत्र क्यों होती दिखाई देती है? लोग अपने आध्यात्मिक माता-पिता तक को क्यों भूलते जा रहे हैं? जो माता-पिता का स्वरूप, व्यवहार और नमन तक भुला दे, उसे अपने समाज में बुरा कहा जाता है। सद्ज्ञान रूपी गायत्री और सत्कर्म रूपी यज्ञ की अवहेलना करने का ही परिणाम है कि सर्वत्र ‘आस्था संकट’ जैसा दुर्भिक्ष फैल रहा है। इसी अभाव के कारण लोग अपना शारीरिक, मानसिक, आर्थिक, पारिवारिक, सामाजिक संतुलन गँवा बैठे हैं। बुद्धि, विज्ञान और व्यवसाय कौशल में पूर्वजों की तुलना में कहीं आगे बढ़ जाने पर भी दुख-दरिद्रता के, शोक-संताप के संकट सह रहे हैं।

कितनों को ही इन पारस, अमृत और कल्पवृक्ष जैसे चमत्कारी रहस्यों पर विश्वास नहीं होता। भूतकाल के इतिहास पर विश्वास नहीं करते। शास्त्र के उल्लेख और आप्त वचनों पर विश्वास नहीं करते और गायत्री उपासना का, यज्ञों के आयोजन का जब प्रसंग आता है तक नाक-भौं सिकोड़ते उसकी उपेक्षा, अवज्ञा करते देखे जाते हैं। बहु प्रचलन आज ऐसा ही दृष्टिगोचर होता है। विचारणीय है कि हीरों को टूटे काँच में फेंक देने जैसी दुर्गति आज किस कारण हुई।

गंभीरतापूर्वक विचार करने पर एक ही कारण प्रतीत होता है कि महिमा और माहात्म्य बताया गया है कि वह प्रत्यक्ष होता दृष्टिगोचर नहीं होता। कई पूजा पाठ के प्रेमी गायत्री उपासना करते हैं, उनकी भौतिक और आत्मिक स्थिति में कोई उत्साहवर्धक परिवर्तन होता दिखाई नहीं पड़ता। उलटे भाग्यवादी, परावलम्बी, आलसी, प्रमादी जैसे बन जाते हैं। इस प्रत्यक्ष को देखना ही संशय उपजाता है कि जब इतने लोगों को कोई कहने लायक लाभ नहीं मिले तो हमें ही क्या हाथ लगने वाला है। यह असमंजस और अविश्वास ही बड़ा कारण है जिससे उस पुरातन परम्परा का लोप जैसा होता चला जाता है।

अधिक चिन्ता की बात इसलिए है कि वर्तमान की विनाशकारी विभीषिकाओं का अदृश्य दर्शियों ने एक ही समाधान सुझाया है कि अगले दिनों वर्तमान संकटों का समाधान महाप्रज्ञा का आश्रय लेने से ही निकलेगा। दुर्बुद्धि के कारण विकृत हुई मनःस्थिति ने ही परिस्थितियों को विनाशकारी बनाया है और आतंक का वातावरण उत्पन्न हुआ है। उसका निराकरण निदान के अनुरूप उपचार से ही संभव होगा। यदि प्रस्तुत संकटों से उबरना है तो दूरदर्शी विवेकशीलता का महाप्रज्ञा का ही आश्रय लेना होगा। उलटी परिस्थितियों को उलटकर ही सीधा किया जायेगा। प्रज्ञा युग का उज्ज्वल भविष्य ही आज की विपन्नताओं से त्राण दिला सकेगा।

इसके लिए किन्हीं विशिष्ट आत्माओं को तो अपनी अस्थियों से वज्र बनाने वाला दधीचि स्तर का, स्वर्गवासिनी गंगा को धरती पर उतारने जैसा भगीरथ स्तर का, तप भी करना पड़ेगा, सूक्ष्म जगत में करना भी पड़ रहा है। पर काम इतने से भी नहीं चलेगा। असंख्य प्राणों की ऊर्जा के समन्वय से उत्पन्न होने वाली महाशक्ति के उत्पादन का विशिष्ट प्रयत्न भी करना होगा। देवताओं की थोड़ी-थोड़ी शक्ति एकत्रित करके प्रजापति ने महिषमर्दिनी दुर्गा को अवतरित किया था। त्रेता में ऋषियों ने थोड़ा-थोड़ा रक्त संचय करके रक्त घट भरा था और उससे उस सीता का जन्म हुआ जिसके कारण त्रैलोक्य को कँपा देने वाली लंकेश की असुरता का उन्मूलन संभव हुआ था। ऐसे ही प्रसंग और भी इतिहास में अनेकों हैं। बुद्ध के परिव्राजक, ईसा के पुरोहित, चाणक्य के धर्माचार्य, गाँधी के सत्याग्रही आदि की सामुदायिक शक्ति कलेक्टिव कान्शसनेस से ही वे कार्य संभव हुए जो आरंभ में असंभव दीखते थे। महाप्रयोजनों के लिए जनशक्ति को साथ लेकर चलना पड़ा है। इन दिनों युग परिवर्तन की बेला में एक दो तपस्वी ही सब कुछ प्रयोजन पूरा न कर सकेंगे। उनके पीछे विशाल जनशक्ति का समर्थन और सहयोग भी चाहिए।

युग अवतरण के लिए जो प्रज्ञा तप विश्वव्यापी बनने जा रहा है उसमें अग्रगमन मार्गदर्शन कुछ का हो तो हर्ज नहीं पर इसके अतिरिक्त इस अध्यात्म ऊर्जा उत्पादन में अनेकों का असाधारण सहयोग चाहिए। कुछ तो हो भी रहा है, 240 करोड़ गायत्री मंत्रों का जप एवं युग सन्धि महापुरश्चरण लाखों व्यक्तियों के सहयोग से ही चल रहा है। इतने से आरंभिक संतोष तो किया जा सकता है, पर यह पर्याप्त नहीं है। इसके लिए लाखों से काम नहीं चलेगा करोड़ों सहकर्मी चाहिए। पर यह सब हो कैसे? अधिकाँश लोग तो ऐसे हैं जो इस महाशक्ति के तत्व ज्ञान तक पर विश्वास नहीं करते, उसके रहस्य तो दूर अर्थ तक को नहीं समझते। ऐसी दशा में यह कैसे आशा की जाय कि प्रज्ञा प्रवाह को प्रचण्ड तूफान उत्पन्न करने में अपना सहयोग देने वाले करोड़ों लोग उत्पन्न हो जायेंगे, वह भी इतने कम समय में जिसे भविष्य के लिए नहीं टाला जा सकता।

चूकने पर तो सर्वनाश के अतिरिक्त और कुछ बनेगा ही नहीं। इसके लिए जो करना होगा उसे युद्ध स्तर पर तूफानी गति से ही करना पड़ेगा। इसके लिए असंख्य लोगों की श्रद्धा जगानी पड़ेगी। यह कार्य मात्र लेखनी और वाणी द्वारा प्रचार कार्य करते रहने की मंथर गति से भी नहीं हो सकता। इसके लिए ऐसा प्रत्यक्ष उदाहरण सामने रखना होगा जिसे अविश्वासी से अविश्वासी तक अपनी कसौटियों पर कसने के उपरान्त खरा पा सकें। ऐसा ही तप पुरुषार्थ मिशन के सूत्र संचालक पूज्य गुरुदेव द्वारा अपनी पैंसठ वर्ष की तप साधना में किया गया। वह क्रम अभी भी दूसरे रूप में चल रहा है।


गायत्री एवं यज्ञ के तत्वदर्शन (Kahani)

एक बार महामना पंडित मदनमोहन मालवीय ने बनारस हिन्दू विद्यालय के लिए एक सेठ से दान देने को कहा - उनकी बात सुनकर सेठ बोला मन्दिर बनवाना हो, तो हम से चन्दा ले लीजिए पंडित जी। चाहे जिस काम के लिए हम दान नहीं देते।

मालवीय जी ने तुरन्त समझ लिया कि सेठ को विद्या का महत्व ज्ञान नहीं है, इसलिए ये ऐसी बातें कर रहा है। उन्होंने धैर्य और नम्रतापूर्वक समझाया कि देश में मन्दिर तो पहले ही इतने हैं कि यदि वे अपनी सारी शक्ति लोगों का मनोबल चरित्र और नैतिकता जगाने में लगा दें, तो सारे विश्व की मूर्छा समाप्त हो सकती है। अब मन्दिरों की नहीं, ज्ञान-मन्दिरों की आवश्यकता है, जिससे नर, नारी, बाल, वृद्ध शिक्षित और सुसंस्कृत बन सके। सेठ मालवीय जी के कथन से बहुत प्रभावित हुए और उन्होंने विद्या विस्तार हेतु यथेष्ट दान देकर ससम्मान पंडित जी को विदा किया।

गायत्री सचमुच महाशक्ति है। उसका अवलम्बन लेने से एक साधारण व्यक्ति भी महा मानव स्तर के पुरुषार्थ सम्पन्न कर दिखा सकता है। सद्बुद्धि विस्तार, सौहार्द्र की भावना का प्रसार ही आज के समय की माँग है गायत्री की शब्दशक्ति को चेतना का ईंधन कह सकते हैं। समष्टिगत चेतना को जगाने के लिए हमें महाशक्ति का ही आश्रय लेना होगा। इस तथ्य को भली भाँति समझ लिया जाना चाहिए। देव संस्कृति ही अगले दिनों विश्व संस्कृति के रूप में व्यापक विस्तृत होगी एवं नवयुग का नेतृत्व करेगी। इसके दोनों ही स्तम्भों गायत्री एवं यज्ञ के तत्वदर्शन को जन-जन तक पहुंचाया जाना प्रस्तुत समय की सबसे बड़ी सेवा है।


जब पहचानी मानव जीवन की गरिमा

“ठहरो।” मानों किसी ने पीछे से जबरन खींच लिया हो। सचमुच दो पग पीछे हट गया अपने आप। मुख फेर कर पीछे देखना चाहा उसने इस प्रकार पुकारने वाले को, जिसकी वाणी में उस जैसे कृतनिश्चयी को पीछे घसीट लेने की ताकत थी।

थोड़ी दूर शिखर की ओर उस टेड़े-मेढ़े घुमावदार पथ से चढ़कर आते उसने एक पुरुष को देख लिया। मुण्डित मस्तक पर तनिक-तनिक उग आए पके बालों ने सफेदी पोत दी थी। यही दशा नासिका और उसके समीप के कपोल के कुछ भागों को छोड़कर शेष मुख की भी थी। कटि पर गेरुए कोपीन के अतिरिक्त शरीर पर अन्य कोई वस्त्र न था। खूब लम्बे शरीर को वृद्धावस्था न तो क्षीण कर सकी थी और न झुर्रियाँ डाल पाई थी।

नजदीक आने पर दिखा कि उनके शरीर का रंग भी कोपीन की ही भाँति रक्तिम है। उनका भव्य ललाट आत्म तेज की आभा से दीप्त है। उनके तेजपूर्ण नेत्रों से निकलने वाली ज्योति रेखाएँ किसी के अस्तित्व को भेदन में सक्षम हैं। वह अचानक खड़ा देखता रहा।

“तुम आत्म हत्या करना चाहते हो? इतने डरपोक हो तुम? छिः झिड़क दिया महापुरुष ने। नीचे अतल खड्ड था। एक उजाड़ ऊँची चोटी पर किनारे से कुल दो पद पीछे खड़ा था। वहाँ से झुक कर नीचे देखने में भी भय लगता था। नीचे गिरे तो हड्डी-पसली का पता भी नहीं चलने का। इसी चोटी से कूदकर अपनी विषय भावनाओं से मुक्ति पाने आया था वह। कोई” आकस्मिक बात न थी, कई सप्ताह मनोमन्थन के तुमुल संघर्ष के बाद यह निश्चय किया था। पर कहाँ हाय रे मानव! मरना भी तेरे हाथ नहीं। ठीक कूदने के क्षण उसे पुकार कर रोक लिया गया।

“तुम जानते हो कि मरकर परिस्थितियों को बदला नहीं जा सकता।” महापुरुष उसके कन्धे पर अपना दाहिना हाथ रखकर कह रहे थे “संकटों को मृत्यु हटा नहीं पाती और न उससे कुछ मिल पाता है। उनसे डरकर जीवन से भागना घृणास्पद भीरुता है और तुम्हें यह भी जान लेना चाहिए कि इस संसार में समस्त दण्ड विधान भीरु के लिए बनाए जाते हैं।”

“मैं ऊब गया हूँ। जलते-जलते मेरा हृदय असह्य पीड़ा से विदीर्ण हो चुका है”। उसकी सिसकियाँ फूट पड़ी। “किसी भी प्रकार मैं अब यह सब सहन नहीं कर सकता। एक बार इससे परिपात्र पाने का मैंने निश्चय कर लिया है।”

“बड़ा अच्छा निश्चय है तुम्हारा।” उनके चेहरे पर हँसी खेल गई। “भोले युवक। जब गाय क्षुधा-पिपासा हरे चारे के लोभ या बन्धन से ऊबकर रस्सी तुड़ाकर भागती है तो पुनः पकड़ कर बाँध दी जाती है। बन्धन और कठोर हो जाता है। लाठी-डण्डे ब्याज में मिलते हैं। “

यह पहेली उसकी समझ में नहीं आई। मुख उठाकर उसने उनकी ओर जिज्ञासा भरी आँखों से देखा।

“कर्मों का नाश नहीं होता। प्रारब्ध प्राप्त भोगों का परित्याग कोई अर्थ नहीं रखता। अगला जीवन वहीं से शुरू होगा, जहाँ से तुमने इसे छोड़ा था। आत्महत्या पाप है - उसका दण्ड, अपने कर्म क्षेत्र से बिना नियमित अवकाश का अवसर आए भागने का दण्ड दोनों को ही तुम्हें भोगना पड़ेगा। “

“ओह!” सिर पर दोनों हाथ रखकर घुटनों के बल वहीं बैठ गया। दोनों घुटनों के मध्य सिर करे सम्भवतः रोने लगा था। निस्सीम थी उसकी वेदना ओर छोर नहीं था उसकी पीड़ा का।

“मेरे बच्चे” महापुरुष के अमृतस्पन्दीकरों ने उसके मस्तक का स्पर्श किया। उनकी जीवन संचारिणी वाणी ने कानों में अमृत उड़ेला “तुम व्यर्थ अधीर हो रहे हो। जीवन उसका है जो दृढ़तापूर्वक उसे अपनाता है। जो कठिनाइयों के मस्तक पर अपने मजबूत पाँव जमाकर खड़ा हो सकता है। जीवन अधीर और भीरु का नहीं है।”

संध्या हो चुकी थी। अस्ताचल से एक बार दिनपति ने जगती को देखा और विराग की छाया सम्पूर्ण धरातल पर विस्तीर्ण हो गई। सम्पूर्ण हिमाच्छादित गिरि शिखर गैरिकवर्णी वीतरागी संन्यासी के वेष में परिवर्तित हो गए। तरु-वीरुधलताओं ने भी उसी वर्ण को अपना लिया। प्रत्येक शिला रंग गई उसी रंग में। पक्षियों ने दिशाओं में मंत्रपाठ प्रारम्भ किया और इसी समय गगन से उन दोनों व्यक्तियों के मस्तक पर धुनी रुई के समान सूर्य किरणों में रंगी हिम इस प्रकार गिरने लगी, जैसे आकाश से गेरू की वर्षा हो रही हो।

“आज हिमपात का प्रथम दिन है।” उन ने नभ की ओर देखा। सम्भव है अधिक बर्फ गिरे। उन्होंने संकेत किया और वह उनके पीछे अवश हो चल पड़ा। हिम पर नये चिन्ह बनते जा रहे थे और नवीन हिम उन्हें मिटाता जा रहा था। वे चले जा रहे थे, चुपचाप शाँत पैर बढ़ाए।

इन पैरों ने उन दोनों को एक झोपड़ी तक पहुँचा दिया। जल का एक घड़ा, मिट्टी के दो-तीन सकोरे, कटु तुम्बी के कटोरे जैसे कटे दो बोल, कुछ टाट, एक चटाई। थोड़ी सी पुस्तकें और कोपीन के दो गैरिक टुकड़े-उनके पास परिग्रह के नाम पर बस यही था।

“माता-पिता दस साल की आयु में छोड़कर चले गए। जमीन हड़पने को सगे-सम्बन्धी काफी थे।” चटाई के एक छोर पर बैठा वह उनको अपनी कहानी सुना रहा था। दूसरे छोर पर कमर को कुछ झुकाकर बैठे वह ध्यानपूर्वक उसकी बातें सुन रहे थे। “जिन्होंने सब कुछ हड़प लिया, वे भी रूखी रोटी देने में शर्माते हैं। सब मुझसे इस तरह दूर-दूर रहते हैं जैसे मैं छूत का रोगी होऊँ”।

मैंने सोचा “शायद यह भी भगवान का कोई अनुग्रह है। सो भटकता हुआ यहाँ चला आया। पर मेरा अंतर्जगत बाह्य से भी अधिक कोलाहलपूर्ण है। दुर्दय मन अदम्य नीरस हृदय।” बीस वर्ष के इस तरुण के जीवन अनुभवों को वे गहरी एकाग्रता के साथ सुन रहे थे। वह कह रहा था “शरीर का कोई उपयोग नहीं। हृदय की उत्सुकता और कौतूहल मर चुके। बुद्धि केवल कल्पना जाल में अपनी शक्ति व्यय करके रह जाती है।” रुक-रुककर कह रहा था वह “तब पृथ्वी का भार क्यों बढ़ाया जाय? निर्धन को संसार में जीने का अधिकार नहीं-साधना के लायक मेरा मन नहीं। तब ऐसे में.......।”

चन्द्रमा हल्का हल्का प्रकाश दे रहा था। वृक्षों की शाखाएँ धूमिल रजनों में हिम का उज्ज्वल भार उठाए चमक रही थी। क्षण-क्षण पर उनसे धप शब्द के साथ हिम का ढेर गिर पड़ता। पशु-पक्षियों की चीखें यदा-कदा सन्नाटे को कँपा देतीं। उटज के आले में मन्द-मन्द दीपक टिमटिमा रहा था। गहराती रात्रि उसकी पलकों को बोझिल करने लगी। बातों का अधूरापन उसमें खोने लगी।

दूसरे दिन रात्रि की बर्फ तो गल गई। पर कीचड़ हो गया था पथ पर। वृक्षों के पत्ते काले पड़ गए थे। लताओं की हरीतिमा लुप्त हो जाने से उनका कण्टकमय कंकाल साफ नजर आने लगा था। उनने स्नान क्या किया, मानों महासमर जीत लिया हो। सूर्य किरणें प्राणों का वितरण करने में तन्मय थीं।

“तुम मानव हो, वह मानव, जिसकी मानवता पर देव और दानव दोनों ईर्ष्या करते हैं। “ महात्मा बाहर एक स्थान पर बैठ गए थे, वह भी उसके सम्मुख बैठा था। “तुम्हें ठीक-ठाक मनुष्य बनना है, उससे कम नहीं। “

“किसे कहते हैं मानव?” प्रभावपूर्ण ढंग से वह रुक-रुककर बोल रहे थे “सबलता और दुर्बलता के मिश्रित पुतले को, जिसमें दूसरों के प्रति भी वही अनुभूति हो, जो उसे अपने सम्बन्ध में होती है। यही अनुभूति जीवन का सार है। जैसे-जैसे यह गहरी होती है दुर्बलताएँ पलायन कर जाती हैं और वह अपने ठीक स्वरूप में खड़ा हो जाता है। उसके इस भावमय स्वरूप को देख नारायण भी ललचा उठता है। वह भी नर रूप धरकर भाग चला आता है और मनुहार करता है भैया! तुम मुझे अपना मित्र बना लो। उसकी अनुनय तुमने सुनी है, सुहृद सर्वभूतानाँ के बहाने।”

शब्द उसके अंतर्मन में उतरते चले जा रहे थे। दूसरों की पीड़ा की भावानुभूति। उसने दूसरों के बारे में सोचा ही कब? वह तो सदा अपने बारे में सोचता चला आया है। औरों को ऊँचा उठाने में लगी दुर्बल भुजाएँ भी थोड़े समय में लौह दण्ड बन जाएँगी। पर उसकी नियति...... सोच की सुई यहीं अटक गई। यह नियति ही तो उसे पटकने आई है। “नियति...... नियति” मुँह से निकल ही गया आखिर यह शब्द।

शब्द के पीछे झाँकता मन का उद्वेलन उनसे छिप न सका। वे कहने लगे “नियति की यही इच्छा है कि मनुष्य ऊँचा उठे। उसे आगे बढ़ाने के लिए प्रकृति की शक्तियाँ निरन्तर सक्रिय रहती हैं। ईश्वर के राजपुत्र को सुखमय बनाना ही प्रकृति का क्रम है। सृष्टा ने इसीलिए उसे रचा और खड़ा किया है। “

“फिर भी स्वयं दुख में डूबा है वह।” चाहते हुए भी अपने आश्चर्य को व्यक्त करने से रोक न सका।

“अन्तःकरण की आकाँक्षा का सही निर्धारण नहीं कर पाया वह। यदि यह प्रथम पुरुषार्थ उससे हो सके तो आत्मसत्ता उसकी पूर्ति में जुट जाती है। मनः तंत्र अपनी विचारशक्ति और शरीर तंत्र अपनी क्रियाशक्ति को उसी आदेश के पालन में जुटा देता है। मनुष्य आगे बढ़ता है। उसके निर्धारण और पुरुषार्थ को इस विश्व में चुनौती देने वाला कोई है भी तो नहीं?”

वार्तालाप के इस अनवरत प्रवाह में उठ रही अनेकानेक विचार भँवरों में उसके मन की टूटी नाव चक्कर खाने लगी। गहरी मीमाँसाओं को सुनने जैसी मनःस्थिति उसकी अभी हो नहीं सकी थी। वह तो सीधे-सादे स्वरों में समाधान जानने का इच्छुक है। रात्रि-दिवस पर्यन्त उनके सान्निध्य से उसे यह तो अनुमान हो गया था जिसे वह खिलौने की तरह तोड़-पटककर फेंकना चाहता था, वह जीवन कोई बहुमूल्य सम्पदा है। पर उसका उपयोग किस तरह हो।

अवचेतन की गहराइयों से उमड़ रही उसके मन की हलचलें उनसे छिपी नहीं। संकोच ने वाणी पर भले बाँध बना रखा हो, पर विचारों की अविराम धारा को कौन रोके?

“मृणमय शरीर मन्दिर में शाश्वत चेतन आत्म देवता का निवास! यही है जीवन! इन आत्म देव की उपस्थिति मिट्टी के शरीर को भी चिन्मय बना डालती है। उनकी गंभीर वाणी जीवन का रहस्य उघाड़ने लगी। जीवन स्वयं में देवता है, अपरिमित शक्ति का स्त्रोत। भावमय प्रेम इसकी उपासना है, साहस भरा पुरुषार्थ इस परम देव की साधना और मौत की मनहूसियत से मरते जा रहे विश्व वसुधा में जीवन चेतना का प्रसार विस्तार इसकी आराधना है।”

शब्दों की प्राण ऊर्जा से उसकी सम्मोहन बेड़ी एकाएक तड़तड़ा कर टूट गई। इस नए तत्वदर्शन ने उसे चौंका दिया। अभी तक तो उसने जीवन को नोंचने-खसोटने-चबाने, दौड़ते-चीखते चिल्लाते पिशाच-प्रेतों से भरा महाश्मशान समझा था। विलासिता के क्रूर अट्टहास अथवा दारिद्रय का दैन्य क्रन्दन। उन्माद के चक्रवात और घुटन की मेघ मालाएँ अब तक इन्हें ही जीवन का नाम देता आया था। कितने भ्रम में पड़ा था, स्वयं की बौनी सोच पर उसे शर्म आने लगी।

“हुई पहचान मानव जीवन की गरिमा की? “ उस मौन देख उनका सवाल उभरा।

“हाँ “ इस एक शब्द के साथ एक क्षण के लिए दोनोँ की आंखें मिली। यही दीक्षा थी जीवन के महामंत्र की। स्वयं के जीवन को नष्ट करने के लिए उतारू युवक विष्णुपंत ब्रह्मन्द्र स्वामी में बदल गया। परम योगी ज्ञानेन्द्र सरस्वती की जीवन विद्या का प्रभाव था यह। जीवन के इस आराधक ने 17वीं सदी में महाराष्ट्र के इतिहास को नया मोड़ दिया। साधारण से क्लर्क बालाजी विश्वनाथ को गढ़कर पेशवा बनाया। अपने कर्तव्य से समर्थ रामदास की रिक्तता की पूर्ति की। यह महापरिवर्तन-जीवन देवता की आराधना का सुफल था। हमारे अपने शरीर मन्दिर में बैठा यह परम देवता अपने सवालों की झड़ी लगाए है, पतन अभीष्ट है या उत्कर्ष? असुरता प्रिय है या देवत्व? क्षुद्रता चाहिये या महानता? इसके निर्माता तुम स्वयं हो। पतन के पथ पर नारकीय मार सहनी पड़ेगी, उत्कर्ष के पथ पर स्वर्गोपम शाँति की प्राप्ति होगी।

निर्णय मनुष्य के हाथ में है। चयन की स्वतन्त्रता तो विधाता ने मनुष्य को दी है, किन्तु स्वच्छन्दता बरतने की नहीं।

यही अंतर्मंथन व्यक्ति को नर से देव मानव, महामानव व ऋषि, देवदूत बना देता है। समय-समय पर महाकाल की सत्ता विभिन्न रूपों में मानवी चेतना को झकझोरने आती रही है। उसे पहचानकर अवसर का लाभ जिसने उठा लिया, वह निहाल हो गया। मानव जीवन दुबारा नहीं मिलता। यह क्षय हेतु नहीं, गरिमा के अनुरूप शानदार जीवन जीने को मिला है, इस तथ्य को बार बार मनोपटल पर लाया व जीवन व्यवहार में उतारा जाना चाहिए।


मात्र यूटोपिया नहीं, वास्तविकता

विश्व के मूर्धन्य कहे जाने वाले लेखकों में से कइयों ने वर्तमान में होने वाले परिवर्तनों के आधार पर भविष्य की सुखद रूप रेखा तैयार की है, जिसे यूटोपिया नाम दिया गया है। उसमें से अधिकाँश ने सन् 2000 के बाद आने वाले समय को सुख और शान्ति से भरा-पूरा बताया है एवं उज्ज्वल भविष्य के रूप में प्रतिपादित किया है, जिसे आज हम कुछ हद तक सत्य सिद्ध होते देख रहे हैं।

ऐसे ही एक यूटोपियाकार हुए है ग्रीक के महान दार्शनिक प्लेटो। उन्होंने सन् 2000 के बाद के समय को “रिपब्लिक” नाम से अभिहित किया है। उनके अनुसार तब वैसे ही व्यक्ति शासन-सत्ता का सूत्र-संचालन कर सकेंगे, जो पूर्णतया परमार्थमय जीवन जियेंगे। वे लिखते है कि उन पर धर्म का अंकुश रहेगा, ताकि भटकने एवं सत्ता का दुरुपयोग करने का डर न रहे। उस समय मनुष्य जाति पूर्णतया सुख शान्ति अनुभव करेगी। राज्य तंत्र एवं धर्मतंत्र एक दूसरे में एकाकार हो जायेंगे। बच्चों की पढ़ाई 20 वर्ष की उम्र तक होगी। उसके बाद उनकी नैतिक, चारित्रिक, शारीरिक एवं मानसिक क्षमता को देखकर भविष्य में कुछ करने का निर्धारण होगा। इस आधार पर प्रतिभाशालियों का चयन होगा। जिनमें व्यवस्था बुद्धि की अधिकता एवं वसुधैव कुटुम्बकम की भावना होगी, उन्हें संगठन के रूप में शिक्षण दिया जायगा। शेष व्यापारी या किसान होंगे एवं सिपाही भी। प्रत्येक व्यक्ति को अध्यात्म विद्या अपनाना अनिवार्य हो जाएगा, यह मुख्य रूप से नैतिकता एवं चारित्रिक प्रखरता के रूप में होगी। ऐसी व्यवस्था बनाई जाएगी जिसमें प्रत्येक व्यक्ति को परमार्थमय जीवन बिताने के लिए न्यूनतम पाँच वर्ष का समय देना पड़ेगा। यह उनका व्यावहारिक शिक्षण होगा। सभी वर्ण अपने-अपने दायित्व को भलीभाँति पूर्ण करेंगे, और व्यावहारिक जीवन में साम्यवाद का वह स्वरूप प्रस्तुत करेंगे जो थोपा हुआ नहीं, अपितु स्वमेव धारण किया हुआ होगा, जिसके अंतर्गत सामर्थ्य भर पुरुषार्थ एवं आवश्यकता भर लेने की नीति ही सर्वोपरि होगी “एक प्रकार से यह ब्रह्मनिष्ठ लोकसेवियों की परम्परा के पुनर्जीवन की बात प्लेटों ने कही है। “

उनके अनुसार विवाह का आधार इन्द्रिय तृप्ति न होकर अधिक समर्थता अर्जित करना होगा। अधिकाँश दम्पत्ति वैवाहिक जीवन में एक दूसरे को आगे बढ़ाने एवं प्रतिभा को निखारने का कार्य करेंगे। विवाह होगा, किन्तु बच्चे उत्पन्न करने में जल्दबाजी न करेंगे। विवाह की उम्र कम न हो कर 30 से 35 वर्ष की होगी जिसके अंतर्गत नर एवं नारी की समान प्रगति ही मूल मुद्दा रहेगी।

ऐसे ही एक अन्य यूटोपिया-लेखक इटली के थामस काम्पानेला हुए है। उन्होंने अपने जेल-जीवन के दौरान सन् 1602 में एक उपन्यास लिखा “ला सीटा दि सोल” अर्थात् “दि सिटी ऑफ दि सन्” जिसमें उन्होंने सन् 2000 के बाद की समाज व्यवस्था का एक रोचक मॉडल प्रस्तुत किया है।

उन्होंने अपने सूर्य नगर के निवासियों को तीन श्रेणी में बाँटा है पान (शक्ति), सिन (ज्ञान) एवं मोर (प्रेम) अर्थात् वहाँ के निवासी इन तीनों गुणों से युक्त होंगे, जिसके कारण सूर्य नगर समस्त विश्व का आकर्षण केन्द्र बन जायेगा। “यह अपने सद्गुणों और सत्प्रवृत्तियों की आभा-ऊर्जा समस्त विश्व में सूर्यवत् बिखरेगा, जिसे अन्य देश ग्रहण कर प्रकाशवान बनेंगे। इसी उपन्यास में ये आगे लिखते है कि वहाँ के छोटे बच्चे तीन से सात वर्ष की उम्र से ही भाषा संबंधी समस्त ज्ञान प्राप्त कर चुके होंगे। इस अवधि में ही उनके भविष्य की रूपरेखा बन जायेगी। इसके बाद ऋषि परम्परा के अनुसार सभी बच्चे नंगे पैर रहेंगे, जो सादगी एवं सज्जनता का प्रतीक होगा। अध्ययन के अन्तराल वे स्वयं उपार्जन करेंगे। इसके दौरान ही उन्हें विज्ञान कृषि संबंधी तकनीकी एवं कला संबंधी भिन्न-भिन्न शिक्षा दी जायेगी।”

“सम्पत्ति व्यक्तिगत न रहेगी, अपितु सामूहिक होगी। लोग सामूहिकता का अर्थ न केवल समझेंगे अपितु अपनायेंगे। न कहीं अनावश्यक धन संचय होगा न चोरी, न हत्या, न बलात्कार। न कहीं जेल होगी, न लोग प्रताड़ित किये जायेंगे। यह व्यवस्था थोपी हुई नहीं, अपितु प्रायश्चित्त स्वरूप स्वमेव अपनाई गई होगी? “

सूर्य नगर में वंश चलाने की उसकी अपनी विशिष्ट शैली होगी। सन्तानोत्पादन के लिए उन्हीं माता-पिताओं को छूट मिलेगी, जो बच्चों में प्रसव पूर्व एवं बाद में सुसंस्कारों को डाल कर उन्हें महामानव के रूप में विकसित करने में समर्थ होंगे।

इसी शृंखला में श्री एच जी वेल्स का भी नाम आता है। यों तो उनकी ख्याति आरंभ में एक सामान्य उपन्यासकार से कोई बहुत अधिक नहीं थी और जैसा कि आम उपन्यासकारों को लोग सामान्य रूप में लेते और पढ़ते हैं, वैसा ही इनके साथ भी हुआ। पर समय के साथ जैसे-जैसे इनकी औपन्यासिक कल्पनाएँ मूर्तिमान होती गई, वैसे-वैसे ही इनकी प्रसिद्धि उपन्यासकार से यूटोपिया लेखक के रूप में होने लगी। इनकी अन्य रचनाओं को फिर काल्पनिक न मान कर परिकाल्पनिक (हाइपोथेटिकल) माना जाने लगा और विशेष रुचि एवं महत्व को साथ पढ़ा जाने लगा।

वे सबसे अधिक प्रसिद्ध हुए अपनी बहुचर्चित रचना “द टाइम्स मशीन” से जिसमें उन्होने 19 वीं सदी से 21 वीं सदी तक होने वाले वैज्ञानिक आविष्कारों, लोगों के रीति-रिवाजों में बदलाव एवं मानसिकता में परिवर्तन को स्पष्ट किया है एवं सुखद भविष्य के मानसून आने की एक झाँकी भी उन्होंने प्रस्तुत की है। उनकी विश्व प्रसिद्ध रचनाओं में “दि वार ऑफ दि वर्ल्ड एवं दि फूड ऑफ दि गॉड” आदि विशेष उल्लेखनीय हैं?

1933 में प्रकाशित होने वाले उपन्यास “थिंग्स टू कम” में विश्व-व्यवस्था की सुखद एवं शान्ति पूर्ण कल्पना की गई है जिसमें बताया है कि उन्नीसवीं सदी विनाश एवं विश्व स्तर पर पतन का काल है। धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक कई खाइयाँ खोदी जायेंगी। इस सदी में ऐसा प्रतीत होगा, मानो सत्य, प्रेम, ईमान भाईचारा, मानवता जैसे शब्द मात्र आडम्बर बन कर रह गये हैं। नैतिक दृष्टि से व्यक्ति इतना गिर जायगा, जिसे पतित, पातकी की उपमा भी दी जा सके। विशेष रूप से नारी जाति को हीनता की दृष्टि से देखा जायगा, किन्तु बीसवीं सदी के अन्तिम में आमूल-चूल परिवर्तन होगा। इसका केन्द्र बिन्दु विकासशील देश प्रभावित हुए बिना नहीं रहेंगे। उस समय व्यक्ति अध्यात्मिकता से नियंत्रित होगा एवं विश्वव्यापी एकता, समता, संवेदनशीलता का इतना विस्तार होगा, जिससे मृत्यु एवं विनाश के सभी साधन सदा के लिए समाप्त हो जायेंगे। तब विश्व एक परिवार के रूप में विकसित होगा एवं सीमाओं का बन्धन लोगों को विश्व बन्धुत्व से पृथक नहीं रख सकेगा।

“व्हेन द स्लीपर अवेक्स” उपन्यास में उन्होंने नायक के सन् 1900 में सघन निद्रा में सोने की कल्पना की है। तब परिस्थितियाँ पतन पराभव, विनाश, विग्रह, एवं नैतिक व धार्मिक मूल्यों के असाधारण अवमूल्यन जैसी थी, किन्तु उसकी नींद 200 साल बाद खुली, तो यह देखकर उसे आश्चर्य हुआ कि परिस्थितियाँ सर्वथा बदल गई। वह देखता है कि आध्यात्मिकता की ओर बढ़ने वाला मनुष्य का झुकाव स्वर्गीय वातावरण उत्पन्न कर रहा है। हर व्यक्ति दैवी गुणों से सम्पन्न है। एक दूसरे को ऊँचा, अपने आगे बढ़ाने का सत्प्रयास चल रहा है। युद्ध एवं विनाश के स्थान पर विश्व प्रेम एवं भाईचारा का अजस्र प्रवाह उमड़ रहा है। वैज्ञानिक आविष्कारों, साधनों का सदुपयोग विनाश से हट कर सृजन प्रयोजनों में हो रहा है, फलतः विकराल दीखने वाले संकटों, विपदाओं का निदान सहज ही मिल रहा है। व्यक्ति भौतिक प्रगति को नगण्य मानकर गुण परक विकास को अपना चरम लक्ष्य मान रहा है और आध्यात्मिकता की विरासत को ही अक्षुण्ण रखने में अपना गर्व-गौरव अनुभव कर रहा है, वह विरासत जिसको वर्षों पूर्व उनके पूर्वजों के पूर्वज ने इस संसार को धरोहर के रूप में प्रदान किया था।

इसी प्रकार पुराण, महाभारत, जैसे भारतीय आर्य ग्रन्थों की अलंकारिक शैली में ही अन्यान्य लेखकों ने अपने उपन्यासों में भविष्य की झाँकी को प्रस्तुत किया है, जिसे आज हम काफी हद तक साकार होते हुए देख रहे हैं। सचमुच, अब तब हम सोये हुए ही तो थे, पर अब धीरे-धीरे हमारी तन्द्रा टूटती जा रही है। सन् 2000 आने में अभी 10 वर्ष की देरी है, तब तक हमारी खुमारी और हट जाय, तो इसे आश्चर्य नहीं माना जाना चाहिए और इसके ठीक सौ वर्ष बाद जब हम पूर्ण रूप से जग पड़ेंगे, तो उपन्यास के नायक का सपना सचमुच ही साकार हो उठेगा, जिसमें मनुष्य स्वयं को पूर्ण रूप से बदल कर मानव से महामानव और नर से नारायण बन कर इस धरती को “स्वर्गादपि गरीयसी” से महिमा मंडित करेगा।


हम विचारों के उपासक बनें।

पढ़ते - पढ़ते उन ने आंखें उठाई। दृष्टि सामने आ जा रहे लोगों को छूती हुई गंगा के उछलते-कूदते जल कणों से गले मिलने लगी। किताब अभी भी हाथों में थमी थी। वह निर्निमेष भाव से ताके जा रहे थे। गहरी झील सी इन आंखों में श्रद्धा, भक्ति, निरहंकारिता क्या कुछ नहीं था? इधर कई महीनों से छुट्टी के दिन कलकत्ता की भीड़-भाड़ से दूर इस ग्रामीण अंचल में आने लगे थे। उनकी मान्यता थी, इस देश का हृदय गाँव है। आज के पढ़े लिखे लोग इसको कितना महत्व देंगे, इससे उन्हें क्या?

नदी के किनारे बाँसों के भिड़े, बेल के झाड़, केले के पेड़ों के बीच बने इस शिव मन्दिर के पास बने चबूतरे में आकर या तो घण्टों पढ़ते रहते या फिर अपने ही भावों में खो जाते। सफेद धोती-कुर्ता धारा प्रवाह संस्कृत का उच्चारण कहीं से नहीं साबित होने देता कि वह विदेशी है। पर किया क्या जाय चमड़ी के रंग का? जिसे देखते ही पुजारी बिफर पड़ा था अन्दर मत घुसना बाबू। कोई बात नहीं बाहर तो बैठ सकता हूँ, उनके स्वरों में अटूट विनय थी। बैठ जाओ पुजारी भी विनम्रता से अप्रभावित न रह सका। पर उसके स्वर में उपेक्षा अधिक थी।

उस दिन से कितने दिन बीत गए। उनकी निरभिमानता ने अकेले अक्खड़ पुजारी ही नहीं उस जैसे अनेकों का व्यवहार बदल कर रख दिया है। अब तो सभी उनको अच्छी तरह पहचानने लगे हैं। इस पहचान में सिर्फ चेहरा- मोहरा भर शामिल है। कुछ अधिक पूछने पर जवाब में एक संकोच पूर्ण ‘न’ ही मिलती रही है। इतने पर भी सभी के अपनत्व में कहीं कोई कमी नहीं।

इस बीच कितने गुजर गए कुछ पता नहीं। ये भी उधर से गुजरने वालों में ही थे पर औरों से पर्याप्त भिन्न। इनकी आँखें इस ओर घूमी -नजर चेहरे से टकराई। एक-पल दो पल बहुत कुछ मन के पर्दे पर लिख गया। कलकत्ता हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस, अँग्रेजी, ग्रीक, लैटिन, हिब्रू, अरबी, फारसी, जर्मन भाषा के असाधारण विद्वान रॉयल सोसाइटी के फेलो। पर यहाँ क्यों ठेठ भारतीय वेश भूषा में। मामला समझ में नहीं आया। समझने के प्रयास में कदम उधर को मुड़ गए। बढ़ते पाँवों ने उन्हें उनके पार खड़ा कर दिया। वह अभी भी पूर्ववत देखे जा रहे थे। आहट पाकर विचारों की शृंखला भंग हुई। दोनों ने एक दूसरे की ओर देखा। उभरती मुस्कान परस्पर जा मिली। “लगता है यहाँ के लोग आपको जानते नहीं हैँ “आगन्तुक ने बात की शुरुआत की। “यहाँ के लोग मुझे जानते हैं, मेरी आत्मा को जानते हैं। वही तो मूल परिचय है। हाँ वे मेरे अहंकार से अभी अपरिचित हैं।”

वे यह सब कुछ समझ नहीं पाए थे। यह तो पता था कि वे आजकल संस्कृत के अध्ययन में मग्न हैं। पर इतनी जल्दी आत्मा जीव, अहं, ईश्वर की भूल- भुलैया इन्हें घेर लेगी, यह नहीं पता था। ‘आपकी यह पहेली मुझे समझ में आयी नहीं।’ कहने के साथ आगन्तुक ने उनकी ओर ताका।

वह हँसते हुए कहने लगे ‘आप भी बहुत भोले हैं राजा साहब। सीधी सी बात है मेरे अहंकार का परिचय यह कि मैं चीफ जस्टिस हूँ, रायल सोसाइटी का फेलो हूँ, यह हूँ वह हूँ। आत्मा का परिचय अर्थात् अस्तित्व का परिचय। एक आपस में दूरी पैदा करता है, विभाजन की खाइयाँ खोदता है दूसरा अंतरंग आत्मीयता स्थापित करता है।’

वे विचारक भी हैं, आज पता चला। न्यायाधीश के रूप में तो वर्षों से उन्हें जाना जाता रहा है। पर यह रूप? आने वाला थोड़ा खिसक कर सामने आ बैठा। ढलते दिन के कारण पूरा चबूतरा छाया से भरा था। सारी धूप गंगा में जा सिमटी थी।

‘आजकल आप’ आगंतुक सज्जन आगे कुछ कहते कि वह मुँह पर अंगुली रखते हुए बोले ‘अधिक कुछ नहीं बस पहले औरों के साथ न्याय करता था, अब अपने साथ न्याय करने लगा हूँ।’

‘अब देखो! वह अपने चिन्तन की शैली समझाने लगे। सिर की ग्रन्थि विशेष से यदि एक तोला रस निकाल लिया जाय तो संसार के बड़े से बड़े विद्वान की सब विद्या विस्मृत हो जाएगी। दिमाग के स्नायु विशेष पर एक चोट पड़ जाय तो बुद्धि का पता भी नहीं रह जाएगा।’

गौर से सुन रहे सज्जन ने भी ये बातें यदा-कदा पढ़ी थीं। पर यूरोपीय होने के कारण न्यायाधीश महोदय को कुछ अधिक ही पता था। वे आगे बोले बुद्धि विद्या की बात छोड़ भी दें तो शरीर के बल का, धन का, यश का, समर्थकों की बहुलता का गर्व क्या कम होता है? जबकि असलियत कुछ और ही है। एक अच्छे बलवान को तनिक सा जुलाब देकर देखिए। धन-यश समर्थक ये तो शरीर के अंश भी नहीं हैं। इन्हें नष्ट होते या रुख बदलते कितनी देर लगती है। किन्तु इनका अभिमान, अभिमान अन्धा जो है। वह तथ्य देखे भी कैसे?’

कहते-कहते वह भावुक हो उठे। कोई उनकी इस भावुकता को हो सकता है, दुर्बलता करार दे दे। पर यह दुर्गुण नहीं है। इसी ने उन्हें जागरुक किया है। इसी से वह अपने छोटे से छोटे दोष से बचे।

‘जहाँ रोग को ठीक समझा गया है, उसकी चिकित्सा पाने की आशा वहीं की जा सकती है।’ ‘उन्होंने बताया - भौतिकता को लक्ष्य मानने वाले देशों में तो अभिमान कोई बुराई नहीं माना जाता। वहाँ तो उसे पोषण दिया जा रहा है। ‘

अभिमान यहाँ के लोगों में भी कम कहाँ है?’ पास बैठे हुए सज्जन बोल उठे ।

‘यह तो मनुष्य की सामान्य दुर्बलता है। इसमें देश विशेष का नाम लेना व्यर्थ है’उन्होंने कहा ‘किन्तु इस महान देश ने बहुत पहले अनुभव कर लिया था कि यह एक भयंकर दुर्बलता है। अतः यहाँ इसकी चिकित्सा जितनी सहज है उतनी और कहीं नहीं।’

शरीर नश्वर है। इसका मोह करना झूठा है। इस पर अभिमान करना अज्ञान है। ‘वह कह रहे थे “भारतीय बच्चे को माता की गोद में यह सीख मिल जाती है। इस देश के अपठित ग्रामीण भी इसे जानते हैं।”

उनकी बातों की सच्चाई सुनने वाले को अनुभव हो रही थी। भारत का प्रायः प्रत्येक आदमी इन बातों को सुनता है और कहता भी है। किन्तु कितने लोग हैं जो गम्भीरता से इस तथ्य पर विचार करते हैं, सोचने-समझने की कोशिश करते हैं ।

विचार के अभाव में अभिमान उत्पन्न होता है और अभिमान से पनपते हैं व्यवहार के दोष। इन्हीं दोषों से अलगाव की खाइयाँ खुदती हैं, अपराधों की सृष्टि होती है। न्यायाधीश से अधिक व्यवहार के मर्म को और कौन जानेगा। उनका तो पेशा ही व्यवहार की समीक्षा है। सारी उम्र उन्होंने यही तो किया था।

“राजा साहब!” उन्होंने सामने बैठे अपने मित्र की ओर भावपूर्ण नेत्रों से देखा। कहने लगे “इस देश में वह सब कुछ है जो संसार में अन्यत्र नहीं। काश! कोई ऐसा उपजे जो यहाँ के निवासियों को विचार करना सिखा दे। मैं सच-सच कहता हूँ, झूठ मत मानना जिस दिन यहाँ के निवासी विचार करना सीख गए, सोच समझ कर जिन्दगी जीना उन्हें आ गया, उसी दिन इस धरती में स्वर्ग उतरे बिना नहीं रहेगा ।” कहते-कहते उनका चेहरा भावोद्दीप्त हो उठा। सुनने वाला इस आभा को देख कर चकित था।

“विचार से उपजा विवेक एक मात्र औषधि है अभिमान की, दूसरे शब्दों में मंगल पथ जीवन के शुरुआत की। “कहते हुए वह उठने लगे और तभी दोनों ने एक साथ देखा आकाश एक दम तारों ही तारों से भरा है, सर्दियाँ शुरू हो गई थीं। दूर-दूर तक न शब्द, न स्वर, न गंध, न रूप कुछ नहीं था। दोनों के पाँव एक साथ बढ़ने लगे।

निरभिमानता! सचमुच श्रद्धा, भक्ति, उन्नत विश्वास यहाँ तक कि समस्त सद्गुणों का एक मात्र आधार यही तो है और इसकी प्राप्ति की एक मात्र औषधि? सुनने वाला उनकी बातों पर सोच रहा था। अपनी क्षुद्रता एवं भगवत्ता की महत्ता पर बार-बार चिन्तन, जीवन के उद्देश्य का विवेक ही तो अभिमान को दूर करेगा।

निरभिमानता मूल मंत्र मानकर अपनी जीवन यात्रा पर चलते जीवन में उपलब्धियों का ढेर लगा देने वाले यह विदेशी थे प्राच्य विद्याविद् सर विलियम जोन्स जिन्होंने विश्व विख्यात ‘ऐशियाटिक सोसाइटी आफ बंगाल” की स्थापना की। उनकी मित्रता पाने वाले व्यक्ति थे, कृष्ण नगर के तत्कालीन महाराज शिवचन्द्र। यदि हम भी विचारों के उपासक बन सकें तो उनकी ही भाँति जीवन में दिव्यत्व उभरे बिना न रहे। विचारक्रान्ति- विचारों की सक्रिय उपासना पद्धति के अलावा और क्या है?


आत्मिकी को उसका गौरव लौटाया जाय।

भौतिकी के चमत्कार सभी ने देखे हैं। उस क्षेत्र के वैज्ञानिकों, आविष्कारकों, शिल्पियों एवं व्यवसायियों ने बढ़ चढ़ कर पुरुषार्थ किये हैं और उस आधार पर अपनी सम्पन्नता एवं वरिष्ठता को बढ़ाया है। जन-साधारण के मन में यह विश्वास जगाया है कि वैज्ञानिक प्रयोग किसी पूर्वाग्रह पर आधारित नहीं, वरन् यथार्थता को खोज निकालने के क्षेत्र में तत्परता और तन्मयता के साथ संलग्न रह कर अपनी उपलब्धियों का प्रमाण परिचय दे सके हैं।

यह बात आत्मिकी के संबंध में नहीं है क्योंकि उनकी कथनी और करनी में जमीन आसमान जैसा अन्तर है। जिन प्रयोगों का माहात्म्य वे जितना बताते हैं, उसके उपलब्ध होने की कोई झलक झाँकी तक नहीं मिलती। कथा पुराण सुनाने में, - कर्मकाण्डों का आयोजन करने में, ढेरों समय और श्रम चला जाता है पर उसका प्रमाण न धर्मोपदेशकों के व्यक्तित्व की वरिष्ठता बढ़ाने के रूप में मिलता है और न भविष्य के संबंध में कोई आशा बँधती दीखती है। अधिकाँश लोग साँसारिक लाभों के लिए देवी-देवताओं की पूजा पत्री करते हैं, पर देखा गया है कि किसी-किसी अंधे के हाथ ही संयोगवश बटेर लगती है। अधिकाँश को निराशा रहना पड़ता है। इस निराशा से या तो मनुष्य नास्तिक बन जाता है, या फिर जिस प्रकार स्वयं ठगा गया, उसी प्रकार दूसरों को ठग कर अपनी क्षति पूर्ति करना चाहता है। कुछ भोले भावुकों को छोड़ कर अध्यात्म प्रतिपादनों पर विश्वास करने वाले घाटे में ही रहते हैं और उपहासास्पद भी बनते हैं। ऐसी दशा में उस क्षेत्र को भौतिकी के समतुल्य व प्रमाणिक कैसे माना जाय यह प्रश्न सहज ही मन में उठता है। वह दिन दूर नहीं, जब बढ़ते हुए बुद्धिवाद की कसौटी पर धार्मिक प्रचलनों और प्रतिपादनों की ओर लोगों की श्रद्धा अब की अपेक्षा भविष्य में और तेजी से बढ़ेगी, ऐसा लगने लगता है।

वस्तुतः जब तक आत्मिकी की लकीर पीटी जाती रहेगी, तब तक ऐसा ही होता रहेगा। जबकि होना यह चाहिए कि उसे अध्यात्म की प्रयोगशाला में खरा और प्रामाणिक साबित करने के लिए प्रयोग-परीक्षण इन दिनों भी चलना चाहिए। प्रयोगशाला में किसी सिद्धान्त को सत्य सिद्ध करने के लिए कठिन परिश्रम करना पड़ता है, तरह-तरह के उपकरण जुटाने पड़ते हैं, अनेकानेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, तब कहीं जाकर वर्षों की मेहनत से उसकी सत्यता प्रमाणित होती है, किन्तु आत्मिकी के क्षेत्र में इनकी हम सर्वथा उपेक्षा कर देते हैं। न तो हम अपने अनगढ़ व्यक्तित्व को सुगढ़ बनाना चाहते हैं, न चिन्तन, चरित्र और व्यवहार को संशोधित परिष्कृत करने के लिए लम्बी अभ्यास प्रक्रिया से गुजरना चाहते हैं, जबकि सत्य तो यह है कि इससे कम में आत्मिकी के प्रारंभिक चरण की प्रक्रिया पूरी होती ही नहीं। दूसरी ओर अध्यात्म की धुरी समझी जाने वाली नैतिकता, आस्था, श्रद्धा, विश्वास जैसे आत्मिकी के उपादान कारणों को हम गौण मान बैठे हैं, जबकि यथार्थता यह है कि इसके बिना आत्मिकी का वह पक्ष अधूरा ही रह जाता है, जिसमें पत्थर में भी भगवान प्रकट करने की सामर्थ्य बतायी और वह सब कुछ हस्तगत होने की बात कही गई है, जिससे हमारे आर्षग्रन्थ भरे पड़े हैं। पर विडम्बना यह है कि आज जब श्रद्धा और विश्वास ही नहीं रहा, तो इस विश्व को हम किसी परमसत्ता की कृति क्यों मानने लगे? उसकी बनायी रचना है यह, इसे क्यों स्वीकारने लगे? तब तो हम निहिलिस्ट (शून्यवादी ) ही बन जायेंगे, जिसमें विश्व की उत्पत्ति और लय शून्य से मानी गयी है और यदि ऐसा हुआ तो व्यक्तित्व परिष्कार की भी कोई आवश्यकता नहीं समझी जायेगी तथा चार्वाक एवं चरनिस्मेस्की जैसे सुखवादियों के भोगवादी सिद्धान्त को ही लोग सर्वोपरि समझने लगेंगे कि जिसमें सबसे अधिक सुख मिले, वही कार्य करो। स्पष्ट है, इस में न तो आत्मिकी का महत्व रह जाता है, न माहात्म्य और जब इसका अस्तित्व ही समाप्त हो जाता है तो हम आस्तिकता, आध्यात्मिकता और धार्मिकता की त्रिवेणी के सुखद सत परिणाम की आशा ही कैसे कर सकते हैं? इनकी अनुपस्थिति में तो आत्मिकी का ढाँचा ही चरमरा जाता है।

आस्तिकता के आधार पर मनुष्य सर्वव्यापी न्यायकारी ईश्वर पर विश्वास करता है और तत्काल कर्मफल न मिलने पर भी यह भरोसा रखता है कि न्यायकारी परमात्मा के शासन में देर तो है पर अन्धेरा नहीं। आज नहीं कल कुकर्मों का दंड और सत्कर्मों का सत्परिणाम उपलब्ध होगा। स्वर्ग नरक का तत्वज्ञान भी इसी की पुष्टि करता है।

आध्यात्मिकता मनःस्थिति को परिस्थितियों की जन्मदात्री कहते हैं। मनुष्य को अपने भाग्य का निर्माता बताती है। व्यक्तित्व निर्माण को उच्चस्तरीय सफलताओं की जननी मानती है और इसी पृष्ठ भूमि पर अतीन्द्रिय क्षमताओं का विकसित होना, ऋद्धि-सिद्धियों का हस्तगत होना और व्यावहारिक जीवन में स्नेह और सहयोग के साथ देवी अनुग्रह की वर्षा होने की बात कहती है ।

तीसरी धार्मिकता मनुष्य को कर्तव्य परायणता और मर्यादा पालन की धुरी से बाँधती है। व्यक्ति को प्रमाणिक परिष्कृत, सज्जन और विश्वस्त ठहराकर वे अवसर प्रदान करती है जो समुन्नत व्यक्तित्व के लोगों को गई-गुजरी परिस्थितियों में मिले हैं वे सामान्य से असामान्य बने हैं। माना कि संसार में बेकारी और अपेक्षा ही सर्वत्र छाई दीखती है पर इसमें भी संदेह नहीं कि प्रमाणिक और कर्तव्य परायण लोगों की तलाश संसार के कोने-कोने में है। जो उस कसौटी पर खरे उतरते हैं वे सम्मान भी पाते हैं और समुन्नत भी बनते हैं।

आस्तिकता, आध्यात्मिकता और धार्मिकता के समन्वय का नाम ही आत्मिकी है। वह जहाँ जितने अंशों में जीवन्त है, वहाँ उतना ही सुख, शान्ति, प्रगति और समृद्धि की उपलब्धि है। इन्हीं विभूतियों को तत्वज्ञान की भाषा में स्वर्ग मुक्ति या सिद्धि कहा गया है।

आत्मिकी की इस आस्था के जीवन्त रहने पर ही वैयक्तिक सुख शाँति और सामूहिक प्रगति, समृद्धि निर्भर है। यदि इस महत्वपूर्ण तत्वज्ञान के प्रति अनास्था उत्पन्न हो गई ओर लोगों ने उस पर से विश्वास खोना आरंभ कर दिया तो यह मानवी गरिमा को धूलि में मिला देने वाली और अनाचार को प्रोत्साहन देने वाली भयावह दुर्घटना होगी और बाहरी बिजली न गिरे तो इस भीतरी घुनों के लग जाने पर ही शहतीर के धराशायी होने की तरह बिस्मार हो जायेगी। विश्व व्यवस्था को, मानवी भविष्य को भयंकर आघात लगेगा। हर हालत में आध्यात्मिक तत्वज्ञान और दिशा निर्धारण को जीवन्त ही रहना चाहिए।

आज स्थिति कितनी विषम है, इसका अनुमान सर्व साधारण की गतिविधियों को देख कर ही नहीं, प्रयोक्ताओं और शिक्षकों की कथनी और करनी में जमीन आसमान जैसा अन्तर देखकर यह समझा जा सकता है कि धर्मध्वजी बनने वाले भी केवल धार्मिकता का वेष-विन्यास बनाते हैं, प्रवचन भाषण करते हैं। उनका निजी जीवन यदि साथ रहकर परखा जाय तो प्रतीत होगा कि मात्र दूसरों का मन बहलाने के लिए सिद्धान्तवाद और आदर्शवाद की बातें कही जाती हैं। उस क्षेत्र पर अधिकार जमा रखने वालों पर क्या और क्यों, ऐसा प्रभाव पड़ सकता है जिसके कारण वे आत्मिकी की आत्मा उत्कृष्ट आदर्शवादिता को अपनाने के लिए तत्पर हो सकें। वहाँ गुरुओं से भी अधिक गई गुजरी स्थिति है। पूजापाठ करने वाले लोगों की मनःस्थिति को परखा जाय तो प्रतीत होगा कि वे किसी मनोकामना की पूर्ति अथवा आशंकित संकट से जान बचाने के लिए देवता का स्तवन तथा पूजा उपचार की लकीर पीटते हैं ।

अध्यात्म की पुस्तकों और उसके शिक्षकों द्वारा यह तो बताया जाता है कि इस पेड़ पर लगने वाले फूलों का स्वरूप कितना सुन्दर और स्वाद कितना मधुर होता है पर यह नहीं बताया जाता है कि उस पेड़ के आरोपण और अभिवर्धन के लिए जिन क्रिया प्रक्रियाओं से होकर गुजरना पड़ता है। उसके लिए उपयुक्त भूमि बनाने, खाद पानी का प्रबंध करने और रखवाली की चौकसी करने के लिए कितने धैर्य, कितने संकल्प एवं कितनी तत्परता का प्रयोग करना पड़ता है।

आज जो कदम उठे हैं, सुखद संयोग है कि अध्यात्म क्षेत्र की ओर से बढ़े हैं। अब हर अनुशासन को तर्क, तथ्य, प्रमाणों की कसौटी पर कस कर देखा जा रहा है। जब वे अग्निपरीक्षा से गुजर चुके होंगे तो निश्चित ही ग्राहय होंगे। हर समझदार व्यक्ति जब अध्यात्म और विज्ञान के समन्वित स्वरूप को जीवन में उतारते हुए उसके सत्परिणामों को देखेगा तो निश्चित ही आत्मिकी की प्रतिष्ठ वैसी ही होने लगेगी जिसकी कि वह पात्र है।


अंदर छिपा वैभव का जखीरा

मनुष्य के मस्तिष्क को यदि भानुमति का पिटारा कहा जाय, तो कोई अत्युक्ति नहीं होगी, क्योंकि इसमें इतनी और ऐसी-ऐसी अद्भुत और आश्चर्यजनक क्षमताएँ भरी पड़ी हैं, जिन्हें यदि जीवन्त जाग्रत कर लिया जाय, तो यह दावे के साथ कहा जा सकता है कि मनुष्य दीन-हीन स्थिति में पड़ा नहीं रह सकता। यदा-कदा यही क्षमताएँ दुर्घटनावश जग पड़ती है, तो हर कोई यह विश्वास करने लगता है कि यदि प्रयासपूर्वक मनुष्य इन्हें जगा ले, तो मनुज - चोले में ही वह नारायण की क्षमता अर्जित करने में सफल हो सकता है ।

ऐसी ही एक महिला थी मोली फेंचर। बुकलीन के एक सामान्य परिवार में जन्मी, पली, बढ़ी फेंचर जब बड़ी हुई, तो उसे घुड़सवारी का शौक चर्राया। अपने मित्रों की तरह वह भी नित्य घुड़सवारी करने लगी, पर दुर्भाग्यवश 10 मई 1864 को घुड़सवारी के दौरान वह अचानक घोड़े की पीठ से गिर पड़ी मस्तिष्क में कुछ स्थानों पर चोटें आयी, किन्तु सब कुछ सामान्य रहा। 8 जून, 1864 को इसी घटना की पुनरावृत्ति हुई। इसके बाद उसने खाना- पीना बन्द कर दिया। लाभ भी इसी क्रम में धीरे-धीरे मिलने लगा। 3 फरवरी 1866 को 8 माह बाद डॉ. राबर्ट स्पाइयर ने जब मोली का परीक्षण किया, तो मोली की चाची ससन कासबी एवं पड़ोसी अत्यन्त प्रसन्न हुए कि चलो स्वास्थ्य लाभ प्राप्त कर रही है। उसी दिन अचानक न जाने क्यों उसने आँखें बन्द कर लीं और कई महीनों तक नहीं खोलीं। जब आँखें खुलीं, तब अपने जीवन काल के किसी भी व्यक्ति को पहचानने से इन्कार कर दिया। यहाँ तक कि अपने निजी डॉ एवं चाची तक को नहीं पहचान सकी। इसके बाद सदा लेटी ही रहती। उसका बायाँ हाथ सिर के नीचे 9 साल तक पड़ा रहा। इसी अवधि में उन्होंने 6000 अद्भुत पत्र लिखे, जो अपने आप में विलक्षण एवं मित्रों को प्रभावित करने वाले थे।

फरवरी 1875 को नौ वर्ष के बाद अकस्मात वह बिस्तर से उठी और चलने लगी, तो सीढ़ी से गिर पड़ी। आँख खुलते ही अपने निजी डॉक्टर के भाई डॉ एस फ्लीट स्पाइयर से बोल पड़ी “क्यों डॉक्टर! आपके भाई नये घर में क्या कर रहे हैं।” अपनी चाची को देखकर वह कहने लगी “क्यों चाची! तुम्हारे तो बाल काले दीखते थे, इतनी जल्दी बूढ़ी हो गई। “ स्वयं के द्वारा लिखित पत्रों को देखकर कहने लगी “यह तो किसी मृतात्मा द्वारा लिखे गये पत्र हैं।”

यह मोली की असाधारण शक्तियों के जागरण का श्रीगणेश मात्र था। इसी बीच न जाने किन कारणों से उसी आँखों की दृश्य क्षमता लुप्त हो गई और वह चिकित्सकीय दृष्टि से अन्धी हो गई। परन्तु उसने अनुभव किया कि अन्धी आँखों के बावजूद भी वह सब कुछ देख सकती है। इस संबंध में उसका कहना था “मुझे ऐसा लगता है, मानों मैं अपने दोनों भौहों के बीच में विद्यमान तीसरी आँख से देख रही हूँ।”कई बार तो दूर की रखी चीजों को भी देख लेती थी और कहती मुझे ऐसा लगता है कि मस्तिष्क के ऊपरी हिस्से से प्रकाश किरणें निकल रही हैं, जो वस्तुओं से टकराकर मेरे पास आती हैं और मैं उन्हें देख लेती हूँ।”

1875 में कलीन युनिवर्सिटी के भौतिकीविद् प्रोफेसर हेनरी एम, पार्श्बस्ट्र ने मोली को अतीन्द्रिय क्षमताओं के सम्बन्ध में जाँच-पड़ताल की। वे दो चीजों को विशेष रूप से जानना चाहते थे कि क्या मोली के पास वस्तुतः अतीन्द्रिय क्षमता है अथवा कोई हाथ की सफाई जैसा कुछ है। दूसरी, मोली इसका प्रयोग कैसे करती है। इसके लिए उन्होंने कई प्रयोग किये। एक मोटे कागज वाले लिफाफे में कुछ लिखकर मोली को दिया गया तो वह बिना किसी कठिनाई के पढ़ने लगी। जब कोट की पुरानी फाइल से एक कागज लाया गया, उसे भी जब लिफाफे में बन्द कर पढ़ने को दिया गया, तो वह उसे भी आसानी से पढ़ने लगी। इन सब परीक्षणों के बाद डॉ. हेनरी सन्तुष्ट हुए और इसे उन्होंने उसकी मौलिक अतीन्द्रिय क्षमता की संज्ञा दी व कहा कि हर दृष्टि से दृष्टि हीन होने के बावजूद वह छठी इन्द्रियों से सब कुछ देख सकती है। इसका कोई वैज्ञानिक प्रतिपादन उनके पास नहीं था।

संभव है, इसे कोई दुर्घटना से मस्तिष्क के किसी न्यूरान के अस्त−व्यस्त होने व अतीन्द्रिय क्षमता के जाग पड़ने की प्रक्रिया बताए। पर एक तथ्य तो सुनिश्चित है कि यह संभावना मस्तिष्क में विद्यमान है। कभी ऐसा समय भी था जब साधक स्तर के प्राणवान व्यक्ति अपनी इन्हीं संभावनाओं को साकार कर दिव्य क्षमताओं को हस्तगत कर लिया करते थे। ऋद्धि-सिद्धियों का भण्डार हमारे अपने ही अंदर विद्यमान है व हम चमत्कारों को बहिरंग में तलाशते रहते हैं। अंतर्मुखी हो साधना पुरुषार्थ किया जा सके तो उद्देश्यपूर्ण प्रयोजनों के लिए भी अतीन्द्रिय सामर्थ्यों को जगाना संभव है।


संघशक्ति का जागरण ही एकमेव समाधान

सूरज अस्ताचल के पीछे छिपने जा रहा था। राह चलते ब्राह्मण समाज का मूर्धन्य वर्ग अपने परिजनों की लम्बी होती जा रही छाया को देखकर अनुभव कर रहा था कि उनकी चिन्ता भी इसी प्रकार बढ़ती जा रही है। कहीं दुष्ट और आसुरी प्रकृति के लोग उनका संहार करने के लिए पीछे न आ रहे हों। वे रह-रह कर पीछे मुड़कर देख लेते- दूर तक कहीं किसी के आने का संकेत नहीं मिल रहा था। फिर भी चिन्ता तो थी ही। जिस प्रान्त से वे लोग भाग कर आ रहे थे, वहाँ दुष्ट प्रकृति के अवाँछनीय व्यक्तियों ने ऐसा उत्पात मचा रखा था कि उनका वहाँ रहना भी दूभर हो गया और उन्हें अपनी प्राण रक्षा भी कठिन लगने लगी थी।

प्राण रक्षा के लिए यह दल अपने परिवारों सहित महर्षि गौतम के आश्रम में आश्रय पाने के लिए निकल पड़ा था। स्त्रियाँ व्याकुल होकर पूछ उठतीं “कितनी दूर है गौतम का आश्रम ।” तो उनके साथ वाले पुरुषों के साँत्वना भरे स्वर सुनाई देते “कल मध्याह्न तक पहुँच जाएँगे ।”

बढ़ी हुई सामाजिक अवाँछनीयताएँ- कुशंकाओं, अविश्वसनीयता के बीज हैं। इनके रहते चल रहे यात्री दल को रात्रि विश्राम की भी हिम्मत नहीं पड़ रही थी। पता नहीं कल कौन पीछे से घात कर दे। सो वे रात को भी चलते रहे और अगले दिन मध्याह्न के समय इन सबने महर्षि के आश्रम में प्रवेश किया। विदित था महर्षि का आश्रम सद्भावना और सामंजस्य का आगार है। वहाँ दुष्ट प्रवृत्तियाँ जाने से कतराती है। फलतः ये भी निर्भय हो गए।

आश्रमवासी मध्यानि कालीन विश्राम कर रहे थे। किन्तु अतिथियों का आगमन सुनकर सभी तत्पर हो गए तथा अभ्यागतों के आवास, भोजन और विश्राम की व्यवस्था में जुट गए। आतंकित ब्राह्मणों का भय तिरोहित हो गया। वे सभी अपनी गृहस्पत्याग्नियों के साथ आश्रम में निवास करने लगे। नित्य प्रति के अग्निहोत्र के धुएँ से आकाश में धूप छाँही चादर तन जाती। सामगान से आकाश गूँज उठता। पक्षियों का कलरव मानो उनको समवेत देता।

समय बीतने लगा। आगत जनों के अपने प्रदेश से समाचार आते रहते थे। वहाँ दुष्ट और अवाँछनीय तत्वों के उत्पात शाँत किए जाने के कारण उनकी कीर्ति भी बढ़ रही थी। एक बार भ्रमण करते हुए देवर्षि नारद महर्षि के आश्रम आए। उन्होंने उनकी प्रशंसा करते हुए कहा ऋषिवर आपकी यह कीर्ति तो दिग्दिगंत में गाई जा रही है। धन्य हैं आप जैसे परोपकारी और ब्रह्मनिष्ठ सन्त जिनके दर्शन कर मैं कृतार्थ हो गया।

देवर्षि नारद तो चले गए किन्तु ब्राह्मणों के मन में ईर्ष्या भड़क उठी। गौतम का यश चारों ओर फैल रहा है और उपजा एक षड़यंत्र अपने आश्रय दाता के विरुद्ध। ऋषि अग्निहोत्र से जैसे ही उठे और अपनी पर्णकुटी की ओर जाने लगे तो देखा आश्रम के आँगन में एक दुबली पतली गाय पड़ी है। निकट आने पर गाय जीवित है या मृत इसकी परीक्षा के लिए उसकी पीठ पर अपने हाथ के दण्ड से हलका प्रहार किया, चारों ओर से ब्राह्मण निकल पड़े और उन्होंने शोर मचाया “हाय! हाय!! इस पुनीत ब्रह्म बेला में गौ हत्या। छोड़ो-छोड़ो इस ढोंगी का आश्रम प्रकट हो जाने दो संसार के सामने इसके पालक को। “

ऋषि ने ध्यानस्थ होकर देखा तो पाया कि यह ब्राह्मणों द्वारा बनाया गया गाय का पुतला है जो उन्हें कलंकित करने के लिए रचा गया व्यूह था। ऋषि गुरु गम्भीर वाणी में उन सबको सम्बोधित करते हुए बोले “हे ब्राह्मणों! मैं समझ गया कि आपके क्षेत्र में उत्पात क्यों बढ़े और फैले? जिस समाज में मूर्धन्य लोगों के हृदय इस प्रकार ईर्ष्या और कलुष के तुषानल में सुलगते रहेंगे, वहाँ अशान्ति अव्यवस्था और विग्रह क्यों नहीं आएँगे?” ग्लानि से भरे मनों वाली भीड़ में से एक युवक भीड़ चीर कर निकला और महर्षि को प्रणिपात करते हुए बोला “मैं इन सबकी ओर से प्रायश्चित करना चाहता हूँ। कारण का निवारण भी सुझाएँ। “

‘निवारण’ महर्षि एक क्षण को चौंके मुस्कराते हुए बोले- तुम्हारा साहस स्तुत्य है। पुरानी पीढ़ी की भूल को नई पीढ़ी नहीं सुधारेगी तो और कौन सुधारेगा, भूल को सुधारने का एक ही उपाय है, “सहकार भरे जीवन की शुरुआत। एक ऐसा जीवन जिसमें दूसरों को ऊँचा उठाने के लिए जीवन जिया जाय?”निर्देश का पालन हुआ, नई प्रेरणा का संचार और ऋषि प्रेरणा से सभी बदली मनोभूमि के साथ अवाँछनीयता से, अनीति से मिलकर मोर्चा लेने व सृजन प्रयोजन में जुट पड़ने वापस लौट पड़े।

आज समय बदल चुका है किन्तु चिंतन चेतना वही, शाश्वत है। सामूहिकता-संघशक्ति का जागरण ही वैयक्तिक व समष्टिगत दुष्प्रवृत्तियों का समाधान है।


मुस्कान, एक मनोवैज्ञानिक आसन

मन-मस्तिष्क को सहज स्वाभाविक एवं संतुलित बनाये रहने के लिए हास्य-विनोद नितान्त आवश्यक है। हँसता व्यक्ति ही दूसरे को हँसाते रहने में समर्थ होता है। सुगंधित वस्तुओं के समीपवर्ती वस्तुएँ भी सुगंधित हो जाती हैं, उसी प्रकार हँसमुख स्वभाव वालों का सान्निध्य भी खिन्न और उदास चेहरों पर मुसकान बखेर देता है। प्रसन्नता-प्रफुल्लता की अभिव्यक्ति चेहरे पर खिले गुलाब पुष्प जैसी दीखती है। कुरूप शकल सूरत वाला व्यक्ति भी मुस्कान जुड़ जाने पर सुन्दर लगता और लोगों को अपनी ओर आकर्षित करता है। मुँह लटकाये खीजते व्यक्ति को देख कर सभी उससे बचने का प्रयत्न करते हैं। अतः हँसी और मुसकान को सफलता का सूचक माना जाता है। इससे निरन्तर नयी शक्ति और स्फूर्ति उभरती रहती है। ऐसे स्वभाव वाले सदा अधिक मात्रा में अधिक अच्छे स्तर का काम करते और सफलतायें अर्जित करते हैं।

मानव जीवन को नवीन ऊर्जा, ताजगी और स्फूर्ति से भर देने वाले “हास्य की शक्ति” पर पिछले दिनों सेनफ्रांसिस्को में एक सम्मेलन आयोजित हुआ जिसमें विश्व के हजारों मूर्धन्य वैज्ञानिकों, चिकित्सकों, मनोविज्ञानियों एवं विशेषज्ञों ने भाग लिया और अपने-अपने अनुसंधान निष्कर्ष प्रस्तुत किये। इस सम्बन्ध में सभी एकमत थे कि हँसना-मुस्कराना व्यक्ति को न केवल सदा तरोताजा बनाये रखता है वरन् यह एक मनोवैज्ञानिक आसन होने के कारण मानसिक स्वास्थ्य को भी अक्षुण्ण बनाये रखता है। हँसने से मन के तार-तार झंकृत हो उठते हैं और वहाँ विद्यमान ईर्ष्या, द्वेष, कुटिलता, दुर्भाव और तनाव रूपी विष जल कर भस्म हो जाते हैं।

सुविख्यात मनोचिकित्सा विज्ञानी ऐशले ओटाँगू ने किलकारी भरते एवं खिल-खिलाते हुए शिशुओं का उदाहरण प्रस्तुत करते हुए कहा है कि बढ़ती आयु के साथ यदि मनुष्य भी अपने अंदर उस बात सुलभ सरलता एवं निष्कपटता को बनाये रखे तो उसके चेहरे पर प्रसन्नता सदैव बनी रह सकती है। प्रफुल्लता की इस वेगवान धारा के साथ विघ्न-बाधाओं, शोक-संतापों की चट्टानें भी टूट कर उस प्रवाह के साथ बह जाती हैं चिन्तन की यह एक ऐसी विधेयात्मक दिशाधारा है जो शारीरिक-मानसिक विकास के साथ ही कार्यदक्षता को भी अनेक गुना बढ़ा देती है।

हास्य-विनोद की प्रवृत्ति मानव को ईश्वर प्रदत्त एक ऐसा वरदान है जो स्वभाव में घुल जाये तो जीवन नयी शक्ति, सबलता और सामर्थ्य से सतेज हो उठता है। इस तथ्य की पुष्टि करते हुए अनुसंधानकर्ताओं ने बताया है कि हँसने से अंतः-स्रावी ग्रन्थियों से स्रावित रसायनों में भारी फेर बदल हो जाता है। उनके अनुसार शिशुओं की मस्ती और उमंग देखते ही बनती है। इसके कारण उनकी पीयूष ग्रन्थि का स्राव और सक्रियता भी बढ़ी-चढ़ी रहती है, किन्तु शैशवकाल के पश्चात जैसे-जैसे आयु में अभिवृद्धि होती जाती है, बच्चे में क्रोध, भय, चिंता, ईर्ष्या, आवेश आदि मनोविकृतियाँ उभरने लगती हैं। प्रसन्नता घटने के साथ ही रसायनों के स्राव में न्यूनता आती जाती है जिसका प्रभाव शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य पर पड़े बिना नहीं रहता।

अँग्रेजी की यह उक्ति प्रसिद्ध है “हँसो और मोटे होओ।” यह एक तथ्य भी है कि सदैव प्रसन्न रहने वालों के पास बीमारी नहीं फटकती। सामान्यजनों की तुलना में वे स्वस्थ एवं दीर्घजीवी भी होते हैं। इस संदर्भ में कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी के सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक डॉ. मैरियान क्लीव्य डायमाण्ड ने गहन अनुसंधान किया है। उनका निष्कर्ष है कि प्रेम सद्भावयुक्त हँसती खिल-खिलाती जिन्दगी जीने से मस्तिष्क के सेरिब्रल कार्टेक्स की सघनता बढ़ जाती है, फलस्वरूप आकर्षक व्यक्तित्व के साथ-साथ स्वस्थ एवं दीर्घायु का दोहरा लाभ मिलता है। हँसते-हँसाते रहने वाले एवं उदासीन तथा खीजते रहने वाले व्यक्तियों के तुलनात्मक अध्ययन के अतिरिक्त उनने इस तरह के अनेकों प्रयोग मानवेत्तर प्राणियों पर भी किये और सफलता पाई। परीक्षणोपरान्त पाया गया है कि जिन जीवधारियों को हंसी-खुशी के खुले वातावरण में स्वतंत्रतापूर्वक उछलने-कूदने दिया गया, वे लम्बी अवधि तक जीवित रहे। किन्तु जिन्हें तरह-तरह के बन्धनों से जकड़ कर भयभीत, उद्विग्न अथवा उदासीनता के माहौल में रहने को विवश किया गया, खीझते-झुंझलाते रहने वाले वे प्राणी असमय ही दम तोड़ गये।

इसी तरह का एक प्रयोग-परीक्षण चूहों के दो समूहों पर किया गया। इसके लिए दो कटघरे लिये गये। पहले बड़े आकार वाले कटघरे में चूहों के तीन परिवारों को रखा गया जिसमें उनके उछल कूद करने का मनोरंजन का साधन भी जुटाया गया था। दूसरे छोटे कटघरे में केवल चूहे के एक ही परिवार को अकेला रखा और उसके साथ वातावरण भी उदासी का था। परखने के बाद देखा गया कि दूसरे की तुलना में पहले वाले कठघरे के चूहों के मस्तिष्क का सेरिब्रल कार्टेक्स वाला भाग अपेक्षाकृत 16 गुना अधिक मोटा था। इन चूहों को जीवन अवधि में भी अभिवृद्धि आँकी गई और वे एक हजार दिन तक जीवित रहे। दूसरे समूह वाले चूहे मात्र 766 दिन तक ही जीवित रहे। इनमें से कुछ मरणासन्न चूहों को जब प्रसन्नता वाला वातावरण प्रदान किया गया तो क्रमशः उनकी मस्तिष्कीय क्षमता बढ़ती गयी और वे 904 दिन तक की लम्बी आयु का उपभोग कर सके। डॉ. डायमाण्ड का कहना है कि जब मूक समझे जाने वाले विवेकहीन प्राणियों की प्रसन्न रहने से जीवनी शक्ति बढ़ सकती है तो कोई कारण नहीं कि सृष्टि का मुकुटमणि कहा जाने वाला विवेकवान मनुष्य हास्य-विनोद भरा हलका-फलका जीवन क्यों नहीं जी सकता और दीर्घायु का आनन्द क्यों नहीं उठा सकता है।

अमेरिका के अनुसंधानकर्ता चिकित्सा विज्ञानियों का मत है कि हँसने-मुस्कराने से शरीर की रोग प्रतिरोधी प्रणाली सशक्त बनती है और प्रसन्नता की इस मनःस्थिति में दर्द एवं तनाव दूर करने वाले मस्तिष्कीय रसायनों का स्तर बढ़ जाता है। इसका प्रभाव समूचे स्नायु तंत्र पर पड़ता है जिससे काया का प्रत्येक अंग- अवयव सक्रिय एवं जीवंत हो उठता है। जैसे ही हँसी का फुहारा फूटता है, पुष्प की तरह चेहरा खिल उठता है। उस समय श्वास-प्रश्वास की क्रिया में तीव्र परिवर्तन होता है। इनका प्रभाव हृदय की ओर प्रवाहित होने वाले रक्त पर पड़ता है ओर उसमें प्राणवायु का अधिकाधिक संचार होने लगने से अतिरिक्त जीवनीशक्ति का लाभ भी हँसने वाले को मिलता है। हास्य-विनोद का, प्रसन्नता प्रफुल्लता का जिसे जितना अधिक अवसर मिलता है, उसकी शारीरिक-मानसिक शक्तियों का विकास भी उसी अनुपात में बढ़ा-चढ़ा होता है।


होठों पर खिलती मुसकान (Kahani)

कोढ़ का दुःसाध्य रोगी था बड़ा नास्तिक और जिद्दी। सभी लोग उससे नफरत करते और कहकर निकल जाते कि अपने कर्मों का दण्ड भुगत रहा है। उसकी भी धारणा बन गई थी कि सभी लोग मुझसे नफरत करते हैं, अतः वह चलते राहगीरों को गालियाँ देता।

सन्त फ्रान्सिस उसकी गालियों की परवाह किये बिना ही आगे बढ़ गये और उसके पास पहुँच कर बोले, कि तुम भले ही मुझे कितनी गालियाँ दो, किन्तु मैं तुम्हारी मदद किये बिना न जाऊँगा। फ्रान्सिस की शीतल वाणी का उस पर आग पर पानी की तरह असर हुआ और ऐसा बदला कि अगले दिन से उसने लोगों को गाली देना बन्द कर दिया।

शालीनता की शिक्षा में ही हृदय-परिवर्तन का बल है।

प्रसन्नता जीवनी खुराक है। इसलिए दर्पण को बार-बार देख कर अपनी मुख मुद्रा को हँसमुख एवं प्रसन्नता भरी बनाये रहने का अभ्यास करते रहना चाहिए। कुछ समय के प्रयत्न से वह एक अच्छी आदत के रूप में स्वभाव का अंग बन जाता है। होठों पर खिलती मुसकान व्यक्तित्व की प्रखरता में चार चाँद लगा देती है।


इक्कीसवीं सदी समृद्धि का स्वर्णिम युग

इक्कीसवीं शताब्दी की विगत दिनों उज्ज्वल भविष्य की सुखद संभावनाओं से भरा पूरा होने की घोषणा की गई है और कहा गया है कि सूक्ष्म जगत में इसका ताना-बाना बुना जा चुका है। उन सुखद संभावनाओं की सूक्ष्म हलचलों की आहट मानवी मस्तिष्कों को यदा-कदा मिलती भी रहती है। अदृश्यदर्शियों के अतिरिक्त वैज्ञानिक, विचारक, मनीषी आदि सभी इस बात से सहमत हैं कि मानवी चिंतन में इन दिनों जो विस्मयकारी परिवर्तन परिलक्षित हो रहे हैं, आदर्शवादी कल्पनायें उठ रही हैं, उनसे यह सुनिश्चित आशा बँधी है कि आने वाला समय स्वर्णिम युग होगा।

यथार्थता में परिणत करने के लिए यह आवश्यक है कि जिस तरह वैज्ञानिक परिकल्पनाएँ मात्र स्वप्न बनकर नहीं रह जाती, वरन् प्रयोग-परीक्षणों द्वारा सिद्धान्तों में बदल जाती हैं और ठोस प्रतिफल प्रस्तुत करती हैं, ठीक उसी तरह मनुष्य के अन्तराल में उमड़ रही भावनाओं, आदर्शवादी प्रेरणाओं को कार्य रूप में परिणत किया जाय। उच्चस्तरीय मस्तिष्कों द्वारा अनुभूत भविष्य का मार्गदर्शन कराने वाले दिव्य स्वप्नों, कल्पनाओं को ठोस आधार प्रदान करने के साथ ही ऐसे उदाहरण प्रस्तुत किये जायँ जो दीपस्तंभ का प्रकाश बन कर असंख्यों को उत्कृष्टता की ओर कदम बढ़ाने के लिए प्रेरित, प्रोत्साहित एवं आकर्षित कर सकें। उज्ज्वल भविष्य का सशक्त आधार तभी विनिर्मित हो सकेगा।

वस्तुतः मनुष्य आशावादी एवं कल्पनाशील प्राणी है। बिना कल्पना अथवा स्वप्न के वैज्ञानिकों सहित जन सामान्य तक की गति अवरुद्ध हो जायगी। यदि यह कहा जाय कि कल्पना नहीं तो भविष्य भी नहीं, तो कोई अतिशयोक्ति न होगी। जिस तरह वृक्ष धरती से कितना ही रस एवं पोषक तत्व क्यों न सोख ले, परन्तु सूर्य के प्रकाश के अभाव में न तो वह विकसित हो सकता है और न ही पुष्प एवं फलों से लद सकता है, ठीक इसी तरह मनुष्य के लिए उसकी कल्पना ही वह सूर्य प्रभा है जो उच्चस्तरीय प्रेरणाओं का स्त्रोत बनती और अपने प्रकाश, गरमी और सृजनात्मक शक्ति के द्वारा भावी संभावनाओं का द्वार खोलती है। कल्पनाओं का, विचारणाओं का स्तर जितना उच्चस्तरीय होगा, मानव सभ्यता रूपी वृक्ष की जड़ें उतनी ही गहरी होती चली जायेंगी। जड़ों की गहराई पर ही तने एवं शाखा- प्रशाखाओं का भविष्य निर्भर करता है।

उज्ज्वल भविष्य की रूपरेखा खींच सकने का सामर्थ्य जिन दूरदर्शी मनीषियों में है, वे जानते हैं कि आज के कल्पना चित्र ही कल साकार रूप धारण करेंगे। प्रस्तुत वैज्ञानिक युग में जहाँ समय और दूरी सिमट कर मनुष्य की मुट्ठी में आ गये हैं, वह कभी किन्हीं उदात्त आत्माओं के मानस लोक की कल्पनाएँ ही थीं। समाज का जो व्यवस्थित एवं संगठित स्वरूप इन दिनों दिखाई दे रहा है, वह भी पूर्वजों के चिन्तनशील मस्तिष्क की देन है। वैज्ञानिक, आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक आदि क्षेत्रों में जीवन की जिन विविधताओं के दृश्य दिखाई दे रहे हैं, उनकी जड़ें भी विचारशील कल्पनाओं में सन्निहित हैं। मौसम विज्ञानी वायु मंडल में विद्यमान आर्द्रता के आधार पर यह पता लगा लेते हैं कि आने वाले दिनों में मौसम कैसा रहेगा। भविष्यदृष्टा मनीषियों का कहना है कि मानव मन में आज जो सृजनात्मक धारणायें जन्म ले रही हैं, उसके आधार पर यह अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है कि भविष्य कैसा होगा?

“रिपोर्ट्स फ्राम दि ट्वैन्टी फर्स्ट सेंचुरी” नामक पुस्तक में सोवियत संघ के सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक द्वय डॉ. एम वेसीलीव एवं एस गुश्चेव ने इस सम्बन्ध में विस्तारपूर्वक वर्णन किया है। उसके अनुसार भविष्य निर्माण में इन दिनों प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप से विश्व की कितनी ही मूर्धन्य प्रतिमायें ऋषि मनीषी एवं विचारक निरत हैं और अपनी साहसिक योजनाओं को कार्य रूप में परिणत करने में सक्रिय हैं। जिनकी मानसिक चेतना का तनिक भी विकास हुआ है, वे जानते हैं कि प्रचलित वर्तमान ढर्रे की विचारधारा से भी आगे की सुखद समुन्नत संभावनाओं की कल्पना की जा सकती है और तदनुरूप साधन उपकरण जुटाये जा सकते हैं। बौद्धिक एवं भावना क्षेत्र में चल रही इस द्रुतगामी उथल-पुथल में उज्ज्वल भविष्य के संकेत सन्निहित हैं। यह एक सुनिश्चित तथ्य है।

इन वैज्ञानिकों का कहना है कि लम्बी अवधि से जिन वस्तुओं के सम्बन्ध में मनुष्य कल्पना करता आया है, उनमें से अधिकाँश अब मूर्त्त रूप ले चुके हैं, अथवा ले रहे हैं। कल की कल्पनाएँ आज वास्तविकता बनती जा रही हैं। विश्व प्रसिद्ध घटनाएँ जिनकी कभी मात्र कल्पना तक की जाती थी, अब वे साकार रूप ले चुकी हैं। अग्नि एवं विद्युत का आविष्कार, लोहे का उत्पादन, भाप इंजन की खोज, परमाणु ऊर्जा का नियंत्रण, कृत्रिम उपग्रहों द्वारा ग्रह पिण्डों पर आवागमन आदि के सपने आज सबके सामने मूर्तिमान रूप में दिख रहे हैं। कभी समय था कि मनुष्य का एक मात्र अस्त्र तराशा हुआ पत्थर होता था। हजारों वर्ष पश्चात काँस्य युग आया और फिर लौह युग और अब हम परमाणु युग में रह रहे हैं जिनमें आणविक ऊर्जा का शांतिपूर्वक सृजनात्मक उपयोग भी किया जा रहा है। युगाँतरकारी सभी घटनायें यह सिद्ध करती हैं कि यदि हम में से प्रत्येक सुदूर भविष्य के समुज्ज्वल पक्ष का चिंतन करना आरंभ कर दे और उसके कल्पना चित्रों को मन में गहरी जड़ें जमाने दें, तो कोई कारण नहीं कि अगले ही दिनों वह कठिन श्रम, सत्प्रयोजनों एवं अध्यवसाय से जुड़कर वास्तविकता का रूप ग्रहण न कर ले और इक्कीसवीं सदी में प्रगति की उच्चस्तरीय संभावनायें साकार रूप में सामने खड़ी न दीखने लगें।

विज्ञजनों का मत है कि वर्तमान समय की विस्फोटक समस्याओं में से ऐसी एक भी नहीं है जिनका प्रयत्नशील मनुष्य समाधान न ढूँढ़ सके। जनसंख्या की अभिवृद्धि की ज्वलन्त समस्या को ही लें तो यह स्पष्ट हो जायेगा कि अब अधिक अभिवृद्धि की गुंजाइश नहीं दीखती। हममें से प्रत्येक विचारशील अब इस तथ्य से अवगत हो चुका है कि यदि अगले दिनों धरती पर मनुष्य को रहना है तो उस पर अधिक भार नहीं लादा जा सकता। डी. मैन्देलयेफ जैसे विख्यात विचारशीलों का कहना है कि इस सम्बन्ध में मनुष्य की मूर्च्छना जगी है और वह बहू प्रजनन जैसी कष्टकारक प्रक्रिया से पीछे हटने लगा है।

इक्कीसवीं शताब्दी में रहने वाली जनशक्ति के लिए भोजन, वस्त्र एवं आच्छादन जैसी अनिवार्य जीवनोपयोगी सुविधा-साधन जुटाए जायेंगे। इसी तरह मिलजुल कर सहकारी ढंग से विविध क्षेत्रों में महा क्रान्तिकारी उपलब्धियाँ हस्तगत कर ली जायेंगी। वसुधैव कुटुम्बकम की भावना ही सर्वत्र सभी मनुष्यों में सक्रिय दिखाई देगी। जिस तरह आधुनिक रासायनिक उद्योग ने “माल्थस सिद्धान्त” और उसके साथ ही “हासमान उर्वरता” के उस निराशावादी सिद्धान्त को झुठला दिया है जिसे कभी एक अकाट्य नियम के रूप में जाना जाता था। उसी प्रकार अगले दिनों किसी को भी भूखा न रहना पड़ेगा। विशेषज्ञों के अनुसार तब विविध तकनीकों के प्रयोग से रेगिस्तानों को भी उर्वर बनाया तथा कृषि उत्पादन को सात गुना अधिक बढ़ाया जा सकेगा। उस क्षेत्र का विस्तार करके उसमें 14-15 गुना तक की अभिवृद्धि की जा सकेगी। इस तरह मनुष्य को खाद्यान्नों में किसी प्रकार की कमी के बारे में चिन्तित होने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी ।

वैज्ञानिकों का कहना है कि चूँकि मनुष्य अभी अपने वास्तविक वैज्ञानिक कौशल एवं पुरुषार्थ का सही मूल्याँकन नहीं कर सका है इसलिए समस्याएँ जटिल और भयावह दीखती हैं। किन्तु जब उसे इसके सुनियोजन की कला ज्ञात हो जायेगी तो न केवल धरती और रेगिस्तान में वरन् समुद्र में भी वह खेती कर सकेगा और अधिक जनसंख्या के लिए भी पर्याप्त भोजन व्यवस्था जुटा लेगा। इस तरह निर्वाह समस्या सुलझा लेना एक महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटना होगी।

बादलों का पानी, सूर्य की रोशनी, पूर्वजों की सम्पदा तो अनायास मिल सकती है, पर ज्ञान तो हमें स्वयं उपार्जित करना पड़ता है। उसे अभ्यास में उतारने के लिए भी अपनी ही चेष्टा काम आती है।

आर्थिक क्षेत्र की तरह ही सामाजिक एवं राजनीतिक आदि क्षेत्रों में भी महाक्रान्तियाँ उठ खड़ी होंगी। युद्धोन्मादियों का समय रहते विवेक जगेगा और अणु-आयुधों के शस्त्रीकरण प्रतियोगिता में लगने वाले श्रम, साधन, समय और पूँजी की बरबादी रुकेगी और उस बचत का उपयोग शान्तिपूर्ण रचनात्मक कार्यों में होने लगेगा।

स्वर्णिम युग का शुभारंभ हो चुका है। अब वैज्ञानिक बुद्धि, प्रतिभा एवं क्षमता तथा भौतिक साधनों का उपयोग केवल विकासोन्मुखी प्रगतिशील प्रयोजनों के लिये ही होगा और मनुष्य के भौतिक एवं साँस्कृतिक जीवन में संव्याप्त होकर उसका रूपांतरण कर महानता की ओर मोड़ेगा। यह मात्र मनीषियों की संकल्पना भर नहीं, वरन् महाकाल द्वारा निर्धारित उज्ज्वल भविष्य की सुनिश्चित संभावना है जो अगले ही दिनों साकार होकर रहेगी।


ध्यानयोग की तात्विक पृष्ठभूमि

बच्चे दिन भर निरुद्देश्य मात्र मनोरंजन के लिए उछलते कूदते फिरते हैं। हिरन भी इस प्रकार चौकड़ी भरते रहते हैं। बन्दरों को इस डाली पर से उस डाली पर उचक मचक किये बिना चैन नहीं पड़ता। श्रम पूरा पड़ता है पर उससे प्रयोजन कुछ सिद्ध नहीं होता। मन का भी ऐसा ही स्वभाव है। जाग्रत में ही नहीं स्वप्न की स्थिति में भी निरर्थक कल्पनाएँ व्यक्ति करता रहता है। इसमें श्रम तो पूर पड़ता है, शक्ति भी खर्च होती है पर लाभ कुछ नहीं होता। इसी कार्य को किसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए क्रमबद्ध रूप से किया गया होता तो उससे कुछ प्रयोजन सिद्ध होता, लाभ मिलता।

ध्यानयोग की साधना का यही उद्देश्य है कि उसको बेतुकी हरकतों-हलचलों में निरत रहने से रोका जाय और क्रमबद्ध रूप से कार्य करने के लिए अभ्यस्त किया जाय यह अध्यात्म प्रयोजनों के लिए तो अनिवार्य है ही, साँसारिक क्रियाकलापों को भी ठीक तरह से सम्पन्न करने के लिए भी आवश्यक है। अन्यथा जो भी काम हाथ में लिया जायगा वह अस्त व्यस्त बनेगा और उसकी सफलता सन्दिग्ध रहेगी। गेहूँ एक टोकरी में रखे रहें तो उनका मनचाहा उपयोग किया जा सकता है। पर यदि दानों को रेत में बिखेर दिया जाय तो समझना चाहिए कि वह बरबाद हो गया। उसका एक दाना बीनने में जितना श्रम समय लगेगा उतनी ही कीमत उस गेहूँ की बैठेगी जिसे रेत में बिखेर दिया गया था ।

मनुष्य मात्र हाथों से ही काम नहीं करता उसके पीछे मस्तिष्क का भी तारतम्य रहता है। विचार भी जुड़े रहते हैं। दोनों का संयोग होने पर छोटे बड़े काम ठीक तरह बन पड़ते हैं। काम केवल हाथ पैर करे और दिमाग का उसके साथ संयोग न हो तो समझना चाहिए कि उस कार्य में गलती ही गलती रहेगी। डाँट पड़ेगी। भर्त्सना होगी और कहा जायगा कि मन लगा कर, ध्यान देकर काम नहीं किया गया।

छूट पुट काम भी जब बिना मन लगाये नहीं हो सकते तो बड़े कामों का तो कहना ही क्या? लम्बे चौड़े बही खाते करने वाले मुनीम ध्यान एकाग्र करके अपना काम करते हैं तभी काम बन्द करते समय एक एक पैसे का हिसाब मिलता है। बेमन से करने पर तो भोजन भी ठीक नहीं लगता। बार-बार गलती होती है और भूल पकड़ने में घंटों लग जाते हैं। महत्वपूर्ण मशीनों के उपयोग में भी यही बात है। छोटा सा टाइपराइटर तक दुचित्ते आदमी के हाथ में जाकर हर लाइन में गलतियाँ छोड़ता जाता है। मूर्तिकारों, चित्रकारों के सम्बन्ध में भी यही बात है। एकाग्रता के अभाव में उनकी कृतियाँ फूहड़ ही बनी रहती हैं। मनुष्य की तीन चौथाई योग्यता उसके मस्तिष्क में रहती है और एक चौथाई समूचे शरीर में। मस्तिष्क गड़बड़ाने लगे तो शराबियों की तरह पैर लड़खड़ाने लगते हैं। मुँह से शब्द कुछ के कुछ निकलते हैं। मूर्खों की मूर्खता इस तथ्य के साथ जुड़ी रहती है कि उनने मन लगा कर काम नहीं किया।

अन्यमनस्क भाव से पढ़ने वाले विद्यार्थी अकसर फेल होते हैं। जब कि कुन्द जहन समझे जाने वाले लड़के मन लगा कर पढ़ने पर अच्छी सफलता प्राप्त करते हैं। यही बात हर कार्य के सम्बन्ध में है। दर्जी, स्वर्णकार आदि शिल्पी यदि मन की एकाग्रता के अभ्यस्त हैं तो वे बढ़िया काम के बढ़िया पैसे वसूल करेंगे। इसके विपरीत कम मन लगाने वाले, इधर उधर चित्त डुलाने वाले प्रवीणता उपलब्ध नहीं कर पाते और ग्राहकों के मन से उतरे रहते हैं ।

योजनाएँ बनाने वाले, आर्चीटेक्ट स्तर के व्यक्ति मात्र परीक्षा पास कर लेने भर से ख्याति प्राप्त नहीं होते। उन्हें हर काम में दत्तचित्त होना पड़ता है। इसी आधार पर काम अधिक सही और सुन्दर बन पड़ते हैं। यदि उपेक्षा का मन रहा होगा तो उसके काम बेतुके होंगे और दर्जा घटता, गिरता जायगा।

लुहार दिन भर हथौड़ा चलाता है और पहलवान थोड़ी देर दण्ड पेलता है पर दोनों की उपलब्धियों में भारी अन्तर रहता है। व्यायाम की दृष्टि रखते हुए प्रातःकाल टहलने वाले जितना लाभ उठा लेते है, उतना दिन भर चिट्ठी बाँटने वाले पोस्टमैन नहीं ले पाते। इसका कारण काम के साथ तन्मयता का समावेश होना भर है।

किसी का भविष्य कैसा है? किसे किसी काम में सफलता मिलेगी या नहीं? इसका उत्तर पाने के लिए यह देखना होगा कि उसका मन अपने काम में कितना रस लेता है और कितनी तत्परता का सम्मिश्रण कर पाता है।

थामस डेवी जब छोटे थे तभी से उनकी इच्छा वैज्ञानिक बनने की थी। उन की माँ की आर्थिक स्थिति ऐसी न थी कि बच्चे को साइंस पढ़ा सके। बच्चे ने माँ से कहा मुझे किसी वैज्ञानिक के यहाँ नौकर रख दो। मैं रोटी भर वहाँ से पा लिया करूं तो फिर वहाँ की गतिविधियों को देखकर ही वैज्ञानिक बन जाऊँगा। माँ ने बहुत तलाश करने पर एक वैज्ञानिक से इसके लिए सहमति प्राप्त कर ली। उसने कहा बच्चे को कल लाना। उसमें ऐसी प्रतिभा होगी तो उसका खर्च भी उठा लेंगे और वैज्ञानिक भी बना देंगे। दूसरे दिन माँ उसे लेकर पहुँची तो वैज्ञानिक ने कमरे में झाडू लगाने के लिए उससे कहा। लड़के ने ऐसी दिलचस्पी से बुहारी लगाई कि चप्पा-चप्पा उस सफाई से चमक उठा। वैज्ञानिक ने उसे रख लिया। डेवी असाधारण वैज्ञानिक बना। यह शिक्षण उसने किसी कालेज में नहीं वरन् उस वैज्ञानिक के कामों में हाथ बँटाते हुए पूछताछ करते रह कर ही प्राप्त कर लिया? एकाग्रता के साथ ही मनुष्य का भाग्य और भविष्य जुड़ा हुआ है। संसार भर के प्रगतिशील मनुष्यों की यहीं विशेषता रही है कि उनने अपना मनोयोग अभीष्ट दिशा में लगाया और उसका समुचित प्रतिफल पाया।

टार्च में नन्हा सा बल्ब होता है। उसे यदि खुला जलने दिया जाय तो सिर्फ अपना मुँह चमकता रहेगा। थोड़े क्षेत्र में ही प्रकाश फैल सकेगा। किन्तु जब उसका प्रकाश छोटे घेरे में समेटा जाता है तो जो भी देखना हो अच्छी तरह देखा जा सकता है। विचारों को समेटने, एक-एक छोटे बिन्दु पर केन्द्रीभूत करने की कला को ही ध्यान कहते हैं। जीवन कला में इस विशेषता का महत्वपूर्ण स्थान है। कलाकारों और कारीगरों को भी इसका अभ्यास करना पड़ता है फिर जिन्हें आत्मिक प्रगति की उत्सुकता है उन्हें इसके लिए विशेष रूप से प्रयत्न करना पड़ता है। भूलों को सुधारने और प्रगति का अभीष्ट मार्ग प्राप्त करने में इसी प्रक्रिया का अनिवार्य रूप से अवलम्बन लेना पड़ता है।

ध्यान को योग का प्रथम चरण कहा गया है। पातंजलि ने योग की व्याख्या परिभाषा करते हुए एक संक्षिप्त सूत्र में गागर में सागर भरने की उक्ति चरितार्थ की है। उनने योग दर्शन में कहा है “योगश्चित्त वृत्ति निरोधः” अर्थात् चित्त की वृत्तियों को रोकना योग है। चित्त छोटे बालक के समान है। उसे विविधता और अनेकता प्रिय लगती है। हाट बाजार में उसे गोदी में लेकर जाया जाय तो जो कुछ भी चमकीला भड़कीला दीखता है उसी को पाने के लिए हठ करता है। उसे इस बात का ज्ञान नहीं होता कि वह उसके काम की भी है या नहीं। ललचाना मचलना यही बिखराव है। यही चित्त वृत्ति है। इसे रोकने पर ही सुई की नोक में से धागा निकालने जैसे काम पूरे होते हैं। इसी के आधार पर बन्दूक का निशाना सही बैठता है। यही वह अभ्यास है कि जो आत्मिक प्रगति के लक्ष्य को पूरा करा सकता है। उसमें अपने को एक केन्द्र पर केन्द्रित होने की कला सीखनी पड़ती है।


श्रम से जी नहीं चुराते (Kahani)

उड़िया आश्रम वृन्दावन के सामने सड़क पर एक साधु नित्य गिट्टी तोड़ता। जब साधु-मण्डली उधर से भिक्षा के लिए निकलती तो टोकती-अरे ! इतने समय में भजन करते, तो मोक्ष प्राप्त हो जाता। जब काम ही करना था तो घर काहे को छोड़ा! यहाँ आकर भी कमाने की ललक छूटी नहीं किन्तु साधु उस ओर बिना ध्यान दिये नियम से रोज चार घण्टे गिट्टी तोड़ता फिर आश्रम से पेट भरने लायक भोजन ग्रहण करता।

जब मृत्यु निकट आयी तो एक दिन व्यवस्थापक को एक थैली थमाते हुए उसने कहा- “यह मेरी जीवन भर की कमाई है, जिसे मैंने भजन करते हुए इकट्ठी की है। इसे किसी लोकोपयोगी काम में लगा दें, तो मेरा साधु-जीवन सार्थक हो जाय।” इतना कह कर उसने अन्तिम साँस ली और शरीर एक ओर लुढ़क गया।

सच्चे साधु श्रम से जी नहीं चुराते।


खण्ड प्रलय को निमंत्रण तो न दें।

प्रकृति मनुष्य के हाथ की घड़ी नहीं है जिसे चाहे जिस तरह घुमाते रहा जाय और फिर चाहे जिस कोने में पटक दिया जाय। वस्तुतः इस विश्व ब्रह्मांड की सभी गतिविधियाँ एक सुनिश्चित अनुशासन के अंतर्गत क्रमबद्ध रूप से चल रही हैं। ग्रह-उपग्रह एक दूसरे के बन्धन में हैं और उसकी गतिविधियों से प्रभावित होते हैं। अनभ्यस्त उथल-पुथल चलती है तो उससे समूचा वातावरण प्रभावित होता है। पृथ्वी को अन्तरिक्षीय घातक किरणों से बचाने के लिए कई परत थोड़ी ऊँचाई पर स्थित हैं। उन परतों में मनुष्य जब छेद करने पर उतारू होता है तो उसका स्वाभाविक परिणाम यह होता है कि सुरक्षा ढाल टूटने या झीनी पड़ने पर ऐसे परिणाम खड़ी कर दे जिसके कारण लेने के देने पड़ने लगें।

पृथ्वी पर कई बार हिमयुग आये हैं। सर्वत्र बर्फ ही बर्फ छाई है। इतना अधिक शीत न सह पाने वाले प्राणी उसी में अपना दम तोड़ गये फिर दस-पन्द्रह फुट तक हिम सतह जम जाने पर खाद्य संकट भी आता है और भूखों मरने की दूसरी विभीषिका खड़ी हो जाती है। ऊँचे स्थान पर जो प्राणी किसी प्रकार बच रहते हैं वे हजारों वर्षों का हिमयुग समाप्त होने पर नये सिरे से वंश-वृद्धि करते और नई दुनिया बसाते हैं।

हिमयुग वातावरण के विपर्यव से आते हैं। उनका आगमन भी भयावह है और विदाई भी रोमाँचकारी। जब तापमान बढ़ता है, बर्फ पिघलती है तो समुद्र की सतह ऊँची उठ जाती है। महाद्वीप टूट-फूट कर कहीं से कहीं जा पहुँचते हैं। समुद्र में से कुछ भूखण्ड ऊपर निकलते हैं और कुछ ऊपर वाले उसके गर्भ में समा जाते हैं। हिमयुग को एक प्रकार से खण्ड-प्रलय ही माना जाता है।

अपने क्रम से जब हिमयुग आये, तब उसे विधि-विधान कह सकते हैं, पर मनुष्य वातावरण को छोड़कर उस अत्यधिक जल्दी भी बुला सकता है। ध्रुवों का संतुलन बिगाड़ सकता है। उस पर जमी बर्फ पिघल पड़ने और समुद्री तूफान आने का संकट बुला सकता है। पर्यावरण की छेड़छाड़ करने से इस प्रकार के अनेकों संकट आ सकते हैं। मनुष्य आज उद्धत बालक की तरह कुछ ऐसी ही छेड़छाड़ कर प्रलय को आमंत्रित कर रहा है।

इसी संदर्भ में पिछले दिनों अमेरिका के न्यूयार्क स्थित “लेमण्ड डी. जियोलॉजिकल आब्जरवेटरी पेलीसीड्स” में एक सम्मेलन आयोजित हुआ जिसमें संसार भर के मूर्धन्य भू-वैज्ञानिकों, पर्यावरणविदों मौसम विज्ञानियों आदि ने भाग लिया। इस सम्मेलन में बहुचर्चित विषय “मिलटिन मिलेन कोविच” की हिमयुग शृंखला का विस्तृत वैज्ञानिक विश्लेषण किया गया जिसमें वैज्ञानिक मिलेन कोविच ने कहा है कि पृथ्वी पर पड़ने वाले सूर्य के कुल प्रकाश में प्रतिवर्ष 0.1 प्रतिशत की कमी होती जाती है। इसी कारण प्रति एक लाख वर्ष के बाद इस धरती पर हिमयुग आ जाता है।

इस तथ्य की पुष्टि करते हुए अनुसंधान कर्ताओं ने कहा है कि फ्राँस में नार्मन की समुद्र तट पर नौ करोड़ वर्ष पूर्व की ऐसी चट्टानें मिली हैं जिनमें प्रत्येक 20 हजार वर्ष में एक परत स्पष्ट दीखती है। इसी प्रकार पेन्सिलवेनिया राज्य के न्यूयार्क वेसिन में 20 करोड़ वर्ष पुराने पहाड़ों के पर्यवेक्षण से भी यह तथ्य उजागर हुआ है कि एक लाख एक हजार वर्षों में हिमयुग का आवर्तन होता है। इसमें 19 हजार से 23 हजार वर्षों में अलग-अलग प्रकार की परतें पाई गई हैं जो इस बात की द्योतक हैं कि किन्हीं कारणों वश प्रकृति संतुलन गड़बड़ाया होगा और पृथ्वी सामान्य से तीन गुना बर्फ से ढक गई होगी। कुछ इसी तरह के लक्षण इन दिनों भी प्रकट हो रहे हैं।

इस सम्बन्ध में मिनिसेटा विश्वविद्यालय के अनुसंधानकर्ता वैज्ञानिकों का कहना है कि धरती के गर्भ में छिपे प्राकृतिक संसाधनों के अन्धाधुन्ध दोहन एवं पर्यावरण के साथ की गई खिलवाड़ के कारण पृथ्वी के चुम्बकीय ध्रुवों में परिवर्तन होने लगा है। उत्तरीध्रुव में दक्षिण ध्रुव की प्रकृति विकसित हो रही है तथा दक्षिण में उत्तरी ध्रुव की। ध्रुव विपर्यय की इस घटना को अप्रत्याशित मानकर इसकी उपेक्षा करना मनुष्य जाति को बहुत महंगा पड़ सकता है। ध्रुव विपर्यय के कारण मनुष्य सहित सभी जीवधारियों को स्थान परिवर्तन के लिए विवश होना पड़ेगा, अन्यथा बदली हुई परिस्थिति के अनुरूप स्वयं में अनुकूलन न ला पाने के कारण मृत्यु वरण ही उनके लिए एक मात्र विकल्प होगा। इस प्रक्रिया से बैक्टीरिया जैसे छोटे प्राणियों से लेकर पशु-पक्षी एवं मनुष्य सभी को गुजरना पड़ेगा। ध्रुवों के बदल जाने पर अंतरिक्ष से आने वाली ब्रह्मांडीय किरणें उनकी ओर विक्षेपित होंगी, फलस्वरूप जलवायु भी प्रभावित-परिवर्तित हो जायेगी और प्रागैतिहासिक काल में जिस तरह बड़ी संख्या में जीवधारियों का विलुप्तीकरण हुआ था, मौसम परिवर्तन के कारण उसी की पुनरावृत्ति हो सकती है।

वातावरण में क्लोरो फ्लुओरो कार्बन एवं कार्बन डाइऑक्साइड जैसी जहरीली गैसों की बढ़ती मात्रा को देखते हुए वैज्ञानिकों ने यह आशंका व्यक्त की है कि आगामी दस वर्षों में जलवायु प्रलयंकारी स्वरूप धारण कर सकता है। सामाजिक अपराधों, मानसिक विकृतियों के अतिरिक्त हृदय रोग, त्वचा के कैंसर एवं मधुमेह जैसी बीमारियों की अप्रत्याशित वृद्धि के मूल में उनने पर्यावरण में भरी विषाक्तता को ही प्रमुख माना है। इस सम्बन्ध में हवाई उपमहाद्वीप स्थित मोनालोआ वेधशाला के वैज्ञानिकों ने गंभीरतापूर्वक अध्ययन किया है। आँकड़े प्रस्तुत करते हुए उनने बताया है कि इन दिनों वातावरण में प्रति वर्ष एक पी.पी. एम की दर से कार्बन डाइऑक्साइड भरती जा रही है। इस मात्रा में 30 प्रतिशत की अभिवृद्धि पृथ्वी के तापक्रम को एक से चार डिग्री सेंटीग्रेड तक बढ़ा देती है। इस तरह तापमान में यह बढ़ोत्तरी प्रति वर्ष “ग्रीन हाउस प्रभाव” को जन्म देती है। औद्योगिक चिमनियों एवं वाहनों से निकलने वाला धुँआ इसमें घृताहुति का काम करता है।

तापमान की इस अभिवृद्धि का सर्वाधिक प्रभाव ध्रुवीय बर्फ पर पड़ेगा। ‘आइस कैप’ के पिघलने से समुद्र की सतह ऊँची उठेगी और तटवर्ती प्रदेशों को जलमग्न कर देगी। बम्बई, कलकत्ता, न्यूयार्क, टोकियो साउहैम्पटन (ब्रिटेन), सेनफ्रांसिस्को तथा कैलिफोर्निया जैसे महानगर समुद्र के गर्भ में विलीन हो जायेंगे। ध्रुवीय असंतुलन भू चुम्बकत्व पर भी अपना प्रभाव डालेगा तथा सन् 1993 से सन् 2000 के बीच कहीं भी कभी भी भयावह भूकंप आ सकते हैं, ज्वालामुखी फट सकते हैं। वायुमण्डल में जमी ज्वालामुखीय धूल अभी भी इतनी ज्यादा है कि सौर ऊष्मा को पृथ्वी तक पहुँचने नहीं देती जो कि जीवधारियों की जीवनीशक्ति के लिए सर्वाधिक महत्वपूर्ण तत्व है।

अनुसंधानकर्ता विशेषज्ञों के अनुसार पिछले चालीस वर्षों से सूरज क्रमशः सिकुड़ता जा रहा है। इसके फैलने का क्रमशः अब से दस वर्ष बाद आरंभ होगा। सिकुड़ने फैलने का यह सूर्य चक्र 86 वर्ष का होता है। एक ओर जहाँ सूर्य के सिकुड़ने से पृथ्वी ठण्डी होती जा रही है वहीं दूसरी तरफ मानवी कृत्यों से वातावरण गरम होता जा रहा है। यह विरोधाभास तब प्रलय के रूप में फट सकता है जब सूर्य के फैलने का क्रम आरंभ होगा। वायुमण्डल का बढ़ता तापमान तथा पृथ्वी का गरम होना-दोनों मिलकर भयावह विभीषिकाओं को जन्म दे सकते हैं।

वैज्ञानिक कहते हैं कि वातावरण में जो व्यतिक्रम आ रहा है, उससे योरोप, अमेरिका और रूस अब की अपेक्षा अधिक गरम व सूखे हो जायेंगे। वहाँ बर्फ गिरनी बन्द हो जायेगी लेकिन उत्तर पूर्व अफ्रीका, भारत, मध्यपूर्व एशिया, मेक्सिको तथा पश्चिम आस्ट्रेलिया अधिक आर्द्र व गीले हो जायेंगे। इसके साथ ही साथ समूचे विश्व में समुद्र तल 15-20 मीटर ऊँचा उठ जायेगा। ग्लेशियर पिघलने से नदियों में बाढ़ आ जायेगी। मौसम में आमूल-चूल परिवर्तन हो जाने से उपजाऊ भूमि बंजर हो जायेगी एवं जहाँ अभी बर्फ है, वहाँ रेगिस्तान नजर आयेंगे। संसार की कृषि प्रधान अर्थ व्यवस्था चरमरा जायगी और यह सब परिवर्तन इस सदी के अंत तक मात्र 2 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान बढ़ जाने पर ही दृष्टिगोचर होने लगेंगे।

मौसम बदलने का मोटा अर्थ सर्दी, गर्मी, वर्षा का साधारण गति चक्र समझा जाता है, पर वैज्ञानिक भाषा में पृथ्वी पर छाये वातावरण में उथल पुथल होने के अर्थ में इस शब्द का प्रयोग किया जाता है। मनुष्य की गतिविधियाँ इन दिनों ऐसी चल रही हैं कि उसे तात्कालिक लाभ किसी भी मूल्य पर मिले। इस उद्देश्य के लिए की गई वातावरण के साथ खिलवाड़ उसी के लिए भयावह संकट की भूमिका बनेगी। महाकाल की प्रत्यावर्तन प्रक्रिया उस दण्डित करे, इससे पूर्व ही वह अपनी चाल बदल ले, इसी में उसका, सारी मानव जाति का कल्याण है।


गरीबी ओढ़कर जो लोक शिक्षक बने

“इस कारण पनपी समाज की टूटन। ऐसा बदला विशाल महल छोटे-छोटे जर्जर घरौंदों में।” सोचते हुए अन्तिम शब्द जरा जोर से निकल गया। किताब बन्द करके स्टूल पर रखी और उठ खड़े हुए। “किन घरौंदों की बात कर रहे हैं।” कोने में बैठी पत्नी बात शुरू करने की गरज से बोली। वह फटे कुर्ते को सिलने में लगी थी। बीच-बीच में किताब पढ़ रहे अपने पति के चेहरे पर उतरते चढ़ते रंगों को देख लेती। “यह अब और नहीं सिल सकता- शीर्ष होने के कारण-कपड़ा सुई डालते ही नुचने लगता। “कोशिश करो-कुर्ता भी खण्डहर हो चुका महल है” कहकर वह हंस पड़े इस विलक्षण उपमा पर वह भी मुस्करा उठी।

घड़ी की ओर देखा दस बजने में सात मिनट बाकी थे। अब तो अप्रैल का महीना चलने लगा-आज अठारह तारीख भी हो गई। इन दिनों सूर्य रश्मियों की ताका-झाँकी बड़े सबेरे से चलने लगती है। इस समय तो पूरे कमरे में उनका फैलाव है। आज कालेज जाना है रिजल्ट निकलने वाला था, शायद निकला हो। इधर कुर्ते में जोड़-गाँठ थमाते हुए वह बोली जैसा बन पड़ा कर दिया। वाह! क्या शानदार बन गया। प्रसन्न मन से उसे पहनने लगे। कुर्ता पायजामा-पहन कर चलने को हुए कि पत्नी ने टोका “अरे! आज क्या नंगे पैरों जाएँगे? “अब ध्यान पैरों की ओर गया सचमुच खाली पैरों जा रहे थे।” पर आपकी चप्पल। “समझने के लिए इशारा काफी था। चप्पलों को हाथ में लेकर उलटा-पलटा। एक को तो जैसे-तैसे पहना जा सकता है पर दूसरी की दशा तो किसी भी तरह पहनने लायक नहीं। इनमें तो कुर्ते वाली कारीगरी चलने से रही। एक क्षण को कुछ सोचते हुए बोले “तुम जरा अपनी चप्पलें देना।” मेरी चप्पल? कुछ न समझते हुए उसने चप्पलें उठाकर ला दी। उसे तो प्रायः कमरे में रहना होता इस कारण चप्पलों की दशा अपेक्षाकृत अच्छी थी। उसमें से एक पैर में डाली। कड़ी और थोड़ी छोटी होने के बावजूद पहनी जा सकती थी। एक अपनी वाली पहनी “चलो बन गया काम।” कहते हुए चैन की साँस ली। उनको चलने के लिए तैयार देख वह बोल उठी “ऐसे जाएँगे आप। एक पैर में काली चप्पल-एक में लाल, एक में मर्दानी-एक में जनानी क्या कहेंगे लोग?” क्या कहेंगे? इसी मिथ्या कुविचार ने मनुष्य जाति का सारा आत्म विश्वास चकनाचूर कर दिया। पूछो-विवेक क्या कहता है? काँच के टुकड़ों, कांटों, गन्दगी पर खाली पैर चलने से यह अच्छा है या नहीं कुछ न कहकर उनकी पत्नी एकटक उन्हें देखने लगी। अपने पति के चेहरे पर छाई, मनोबल की अजेय काँति की ओर, जो गरीबी के महासागर में पर्वत के उत्तुँग शिखर की भाँति अटल था। पूरे वेग से दौड़ती आती गरीबी की लहरों का उद्दाम वेग जिस का स्पर्श पाकर शिथिल हो जाता, नमन करते हुए उसे लौटते ही बनता।

पैर सड़क पर चल रहे थे, मन सुबह पढ़ी किताब के पन्नों में मंडरा रहा था अथवा यों कहें-किताब के पृष्ठ मन के झोंकों से फड़फड़ाने लगे थे। कौन करेगा इस कलुष समाज का शोधन। सर्वत्र धुन लगा है क्षुद्रता के अहंकार से हर मानव जर्जर है। हर सम्प्रदाय अन्तःविदीर्ण है। छोटेपन में अहंकार का दर्ष इतना प्रचण्ड होता है कि वह अपने को खण्डित करता रहता है। भारत देश की असंख्य छोटी इकाइयाँ अपने को खण्ड-विदीर्ण करती जा रही हैं। अन्तर्विदारी शक्ति की प्रबल तीव्रता कौन रोके? आज हमारी समाज व्यवस्था दुर्बल है विच्छेद परम्परा प्रबल है, क्षुद्रता का बोझ भयंकर है। सोचते-सोचते भावों का वेग प्रबल हो उठा-विचार मन्थन की गति तीव्र हो गई, ठीक ही है शिल्पकार के अभाव में यह विखण्डन समय के आघात प्रतिघातों के झटके किसे नहीं लगते। सचेत शिल्पी हर झटके के बाद अपनी कलाकृति को मजबूत बनाता है, ताकि-उसका अधुनातन रूप पहले की अपेक्षा अधिक लोहा ले सके। प्रकारान्तर से किसी भी वस्तु व्यवस्था का अस्तित्व और सौंदर्य उसका शिल्पकार है।

...पर आज उसने दीर्घ निश्वास ली सामने से ताँगे वाला हटो-बचो कहता चला आ रहा था। वह किनारे हो गया। घोड़ों की टापों, पहियों की खड़खड़ाहट क्रमशः दूर होती ही गई। चिन्तन का चक्र गतिमान हो उठा कहाँ है विश्वमित्र से महाशिल्पी, चाणक्य और पातंजलि जैसे वास्तुकार जो इस छिद्र-छिद्र हो गए पात्र का जीर्णोद्धार कर सकें तब गहन तिमिर में कहीं से कोई प्रकाश रश्मि झलकी यह उसकी आत्म ज्योति थी, महासूर्य न सही उसके उगने पर एक दीपक की टिमटिमाहट तो सम्भव है। ये अस्तित्व की गहराइयों के स्वर थे।

चिन्तन के प्रवाह और पाँवों की गति अनायास उसे कालेज द्वार तक बहा लायी। गवर्नमेंट काल की विशालकाय बहुमंजिली इमारत सामने थी। इसका विस्तीर्ण प्राँगण छात्रों के प्रसन्न कण्ठ स्वरों से भर उठा था। प्रवेश द्वार से ही अभिनन्दन का ताँता लग गया। अपनी श्रम निष्ठ और व्यवहार-माधुर्य के कारण वह सहपाठियों का सम्माननीय था और अध्यापकजनों का स्नेह पात्र। हर किसी के लिए उसका अस्तित्व प्रेरणा का निर्झर था। राशि की राशि सद्गुणों से दमदमाते व्यक्तित्व के विशालकाय परिसर में बेचारी गरीबी सिमटी-सिकुड़ी सहमी पड़ी रहती। इस सर्वथा उपेक्षित की बिसात क्या?

विद्यार्थी उन्हें नया समाचार सुनने अपने घेरे में पकड़ कर ले गए। कोई उनके श्रम की तारीफ करता कोई व्यक्तित्व की। लाहौर विश्वविद्यालय की एम.ए. की परीक्षा में सर्वप्रथम स्थान प्राप्त करना, वह भी गणित जैसे जटिल विषय में कम बड़ी बात नहीं थी और फिर इस साल जैसे कूट प्रश्न शायद पहले कभी नहीं पूछे गए। ये लोग अभी प्रांगण में थे, तभी एक चपरासी तेज कदमों से उनके पास आया “प्रिंसिपल साहब ने कहला भेजा है, आप जैसे ही आएँ, उनके पास ले जाया जाय।”

“चलो” कहने के साथ चल पड़े। प्रिंसिपल मि. वेल्स महान प्राचार्य होने के कारण आदरणीय थे, ऐसी बात नहीं, सहृदय पिता जैसे उनके व्यवहार ने हर विद्यार्थी को अपना अनुगामी बना रखा था। उनके लिए तो वह अभिभावक ही थे बल्कि उससे भी सर्वोपरि। साथियों का झुण्ड-कमरे के बाहर से वापस हो गया। जाते-जाते चेतावनी देते गए “निकल कर भाग मत जाना चुपके से हम लोग प्रतीक्षा कर रहे हैं।”

चिकडडडडड उठाकर कमरे में प्रवेश करते ही प्रिंसिपल साहब का सुपरिचित कण्ठ स्वर कानों में पड़ा “बधाई मि. तीर्थराम। तुम्हारी श्रमशीलता ने कालेज के गौरव को नया आयाम दिया।” प्राचार्य के इस कथन के साथ पास बैठे प्रोफेसरों के चेहरे खिल उठे। वह सभी के आत्मीय जो थे।

कुशल वार्तालाप के बाद, प्राचार्य महोदय ने एक योजना उन्हें समझानी शुरू की। साथी प्राध्यापक सहमति में सिर हिला रहे थे। जबकि उनको कहा जा रहा हर शब्द विद्युत झटके सी पीड़ा दे रहा था। कुर्सी में पहलू बदलते हुए जैसे-तैसे कानों में पड़ते इस विष घोल को सहन कर रहे थे। मैंने असिस्टेंट कमिश्नर से बात कर ली है। अन्तिम वाक्य पूरा करते हुए उनने सवाल किया तुम्हारी क्या राय है?” “मेरी योग्यता की पूँजी सुखोपभोग के लिए नहीं जन-जन में वितरण हेतु है।” सिर नीचा किये उनने उत्तर दिया।

क्यों? प्राचार्य महोदय तो कुर्सी से आधे उठ गये। सर्वथा अप्रत्याशित इस एक वाक्य ने अन्य प्राध्यापकों को चौंका दिया। तब क्या तुमने-भविष्य के बारे में विचार नहीं किया? किया है “मैं शिक्षक बनूँगा।”“शिक्षक “इस शब्द के साथ उनके अन्तः सागर में न जाने कितनी भाव तरंगें गतिशील हो उठीं। समाजशिल्पी, मानवीय व्यक्तित्व का वास्तुकार क्रान्तिदर्शी मार्गदर्शक यही तो उसका अभिप्राय था, जिसके बारे में इधर कई दिनों से मानस मन्थन होता रहा है।

“शिक्षक” सभी के होठों ने मन्द स्वर में यह शब्द दुहराया। प्रिंसीपल फिर बोल उठे “गम्भीरतापूर्वक विचार करो तीर्थराम! शिक्षक की आजकल क्या हैसियत है? सिविल सर्विस में जाने के बाद तुम शासन के जिम्मेदार अधिकारी होगे। तुम्हारा एक इशारा महत्वपूर्ण हो जाएगा। शिक्षक और शासक का अन्तर पहचानो” “सर! परीक्षा दे चुकने से आज तक यही सोच विचार करता रहा हूँ।” बोलने का लहजा धीमा था। उन्हें सूझ नहीं रहा था इस सम्मानित बुजुर्ग को कैसे अपनी बात समझाएँ। अपने को सम्भालते हुए बोले “शिक्षक और शासक, एक निर्माता है, दूसरा निर्माण। एक के हाथ में जीवन संरचना का भार है दूसरा सिर्फ कर्मी है। एक व्यक्तित्व की दशा को आकार और दशा को ज्ञान देता है, दूसरा सिर्फ दिए हुए का उपयोग करता है। एक के प्रभाव को दिक्काल भी नहीं बाँध पाते दूसरा छोटे से दायरे में सिमटा रहता है।”

विद्यार्थी की वाणी प्राध्यापकों को भेद गई। अब तक शायद मूल्याँकन की यह पद्धति नहीं जान सके थे। फिर भी उनमें से एक समझाने के भाव में बोले “शब्दों के जाल में मत बाँधो, यथार्थ जगत में उतरो। कमिश्नर का सम्मान-प्रिंसिपल के सम्मान से कितना बड़ा है।” समझाने के ख्याल से कह तो दिया पर उनकी वाणी ने सभी को स्तब्ध कर दिया था। मन ही मन वे सोच रहे थे, जिसे आये दिन भूखे सोना पड़ता है, जिसके पास पहनने को कपड़े नहीं है, उसका यह अपरिमेय साहस। सबके सब उनका मुख ताक रहे थे। उनके शब्द थे “क्षमा याचना के साथ स्पष्ट बोलूँ तो सर, कुछ आप जैसे बिरलों को छोड़ आज समाज में शिक्षक नहीं हैं, हाँ उदर पूर्ति करने वाले नौकर अवश्य हैं। शिक्षक थे कन्फ्यूशियस, सुकरात, लाओत्से, समय की दीवारें, क्षेत्र के प्रतिरोध जिनके सम्मान को रोक नहीं सके थे। इस देश में महा कुमार सिद्धार्थ और महावीर ने सम्राट के पद को ठुकरा कर शिक्षक का पथ सँभाला था।”कुछ रुकते हुए बोले- “शिक्षक समाज की संजीवनी है, प्राण सुधा है यह समाज में रहे और वह मृत हो जाय यह कदापि सम्भव नहीं। समाज मरणासन्न है मतलब शिक्षक मर चुका। जिसने संस्कृतियां रचीं, सभ्यताओं का निर्माण किया, महामानवों में उसी शीर्ष स्थानीय व्यक्तित्वों को, समय समाज पुकार रहा है।”

इस परिपक्व विचारशीलता तथा स्पष्टवादिता के समक्ष प्राध्यापकगण मौन हो गए। उनके आदर्श की ओर बढ़ते कदमों ने ब्रिटिश प्राचार्य को अभाव विह्वल कर दिया। चश्मा उतार कर आँखें पोंछते हुए बोले “तीर्थ राम! पहले तुम प्रिय थे, अब सम्माननीय हो गए। भारत की समाज शिल्पी विश्व मनीषा तुममें अपना आदर्श खोजेगी। “इस आशीर्वाद को धारण कर वे चल पड़े उस ओर जहाँ मित्र समुदाय उनकी प्रतीक्षा कर रहा था।


उन्हीं को तो खोज रहा है (Kahani)

इंग्लैण्ड के पादरी सी.एफ .एन्डूज को मनुष्य की सेवा में ही अपने धर्म की सार्थकता और ईश्वर की भक्ति प्रतीत होती थी।

वे अधिक दुखी क्षेत्र को अपना कार्य क्षेत्र बनाना चाहते थे, इसके लिए उन्हें भारत सबसे उपयुक्त लगा। वे इस देश के शोषण दारिद्रय और भटकाव के सम्बन्ध में आवश्यक जानकारी प्राप्त कर चुके थे। उनने भारत को अपना सेवा क्षेत्र चुना।

पादरी का सुविधा सम्पन्न और सम्मान पद उनने छोड़ दिया। वे भारत की बहुमुखी सेवाओं में आजन्म लगे रहे। उनने गाँधी जी के साथ रह कर राजनीतिक क्षेत्र का भी बड़ा काम किया।

बदले समय ने उन्हें शिक्षक बनाया। किन्तु विद्यालय की लघुतर सीमाएँ उन्हें बाँध न सकीं। सारा विश्व समुदाय उनकी शिक्षण स्थली बना और लोक मानस बना विद्यार्थी। वसुधा ने उन्हें स्वामी रामतीर्थ के रूप में जाना। नामावली के शब्द इधर से उधर हो गए किन्तु समाज आराधना का संकल्प और भी दृढ़, दृढ़तम होता चला गया। अनगिनत व्यक्तियों को उनने विज्ञान व अध्यात्म के समन्वयात्मक प्रतिपादन प्रस्तुत कर जीवनदर्शन सिखाया। कहाँ हैं आज ऐसे लोक शिक्षक? उन्हीं को तो खोज रहा है महाकाल!


नास्तिकता के माया जाल से उबरें

नास्तिकता की फसल भावनाओं से रहित बौद्धिकता के खेत में उपजती है। इस क्षितिज पर जीने वालों में से अधिकाँश प्रायः इस पर अपना हक मानते हैं। ऐसे लोगों के लिए यह शान और फैशन दोनों हैं। शान इसलिए क्योंकि इसे अपनाकर उन्हें लगता है कि इस तरह वे सरल-विश्वासी आस्तिक जनों की अपेक्षा कुछ अधिक बुद्धिपरायण हैं। तनिक ऊपर उठे हैं। और फैशन यों क्योंकि बौद्धिकता के जमाने में उन्हें सरलतापूर्वक अद्यतन होने की प्रतीति बनी रहती है। इस प्रतीति को अपने से लिपटाए फिरने वालों में शायद ही कोई ऐसा हो, जिसने इस पर अनेक दृष्टिकोणों से विचार किया हो। विचार करते तो उन्हें नास्तिकता क्यों नहीं? इस प्रश्न के तर्क और अनुभव सम्मत अनेकों समाधान मिले बिना न रहते।

नास्ति अर्थात् “नहीं है” का नकारात्मक दृष्टिकोण रखने वाले अपने समूचे जीवन को एक अनचाही काल कोठरी में अनजाने कैद कर बैठते हैं। तभी तो सुविख्यात थियालॉजिस्ट वालटिलिक ने कहा है नास्तिकता बुद्धि का गौरव नहीं वरन् बौद्धिकता का माया जाल है। इस फेर में पड़ न केवल जीवन व्यक्तित्व बल्कि स्वयं बुद्धि की यात्रा थम जाती है। समूचा विकास अवरुद्ध हो जाता है। क्योंकि जो आदमी नहीं के ऊपर जिन्दगी खड़ी करेगा, वह खाली हो जाएगा। सार्त्र और कामू जैसे विख्यात बौद्धिक इस रिक्तता की व्यथा से अपने को नहीं बचा सके तब औरों की बात क्या?

नहीं के बीज से कोई अंकुर नहीं निकलता। नहीं के बीज से कोई फूल नहीं खिलते। नहीं के बीज से कोई जीवन विकसित नहीं होता। जीवन में कहीं न कहीं “हाँ” न हो तो जीवन खाली हो जाएगा। “नहीं” से बड़ा कोई मरुस्थल नहीं है और जमीन पर जो मरुभूमियाँ होती हैं वहाँ तो कुछ मरुद्यान भी होते हैं। पर इस नकारा भूमि में कहीं कोई हरियाली नहीं। एक रिक्तता शून्यता समूचे व्यक्तित्व को घेर लेती है।

आधुनिक मनोवैज्ञानिकों ने तथ्य को भली भाँति पहचाना और परखा है। तभी तो आई. जे. रोजेट “क्रिएटिवनेस ऑफ लाइफ” में विधेयात्मक चिंतन को सृजनात्मक जीवन का आधार बताते हैं। उन्हीं के शब्दों में विधेयात्मक चिंतन का मतलब आस्तिकता। आस्तिकता का मतलब कोई कर्मकाण्ड नहीं देवी-देवताओं की भीड़ के सहारे जीवन की परावलम्बिता नहीं। इसका तात्पर्य तो उस जीवन शैली से है जो न केवल स्वयं पर विश्वास करना सीखती है बल्कि यह भी शिक्षण देती है कि अपने विकास की असीम सम्भावनाओं को मत भूलो।

इसके अभाव में व्यक्तित्व बीज की तरह सड़ता घुनता और नष्ट होता है। बुद्धि जिसे भावनाओं से घुल मिल कर प्रज्ञा, स्वयं को खोज कर ऋतंभरा बनना था, विराट सागर में समाहित होने वाली सरिता का रूप लेना था, नास्तिकता के माया जाल में पड़ कर एक अवरुद्ध नाला मात्र बनकर रह जाती है। ऐसी दशा में उसका एक ही काम रह जाता है जीवन के प्रति विषाक्तता का वमन।

व्यक्तित्व के विकास की पहेली सुलझने की एक मात्र शर्त यही है कि हमारे अस्तित्व की गहराइयों से “हाँ”- निकले। अपने घर में आग लगा लेना, स्वर्णिम भविष्य की उज्ज्वल सम्भावनाओं को अपने ही पैरों से ठुकरा देना, कितनी बड़ी नादानी है इसका विचार स्वयं करना होगा। इस नादानी को करने वाले न केवल अपने विकास की सम्भावनाओं के द्वार पर वजनी ताला लटका देते हैं बल्कि उनके स्वयं के जीवन में अनेकों दरारें पड़ने लगती हैं। किसी न किसी स्तर पर उनको असुरक्षा, अनिश्चितता विक्षिप्तता, उन्माद, घुटन से वास्ता पड़े बिना नहीं रहता।

जीवन खिले, व्यक्तित्व की सुरभि चारों और फैल सके इस हेतु जरूरी है आस्तिकता को स्वीकारा जाय। आस्तिकता का एक ही मतलब है संवेदनशीलता। देश-काल के अनुरूप इसके स्वरूप अनेकों हो सकते हैं। इसको स्वीकारने तदनुसार जीवन जीने की सफलता की एक ही कसौटी है सर्वहित के लिए सर्वस्व उत्सर्ग करने की आतुरता। संवेदना का स्वर जिसके जीवन में हो, उसके जीवन में प्रार्थना ज्यादा दूर नहीं। संवेदना का स्वर जिस जीवन में गूँजे उसके जीवन में परमात्मा ज्यादा दूर नहीं। बदलते समय में यही आस्तिकता शानदार जीवन का मानदण्ड बनेगी अच्छा हो, हमारी बुद्धि नास्तिकता के मायाजाल से उबरने में अपनी शान समझे। अवरुद्ध प्रवाह की जगह एक सरिता बनकर उज्ज्वल सम्भावनाओं के सागर की ओर बहे।


वाक्शक्ति का एक सशक्त स्वरूप मौन

मौन, वाणी की शक्ति को संशोधित और संवर्धित करने की साधना है। वाणी के दुरुपयोग से हमारी शक्ति का एक बहुत बड़ा अंश नष्ट हो जाता है। इसीलिए जिस तरह इन्द्रिय संयम के लिए ब्रह्मचर्य आदि का विधान है, उसी तरह वाणी के संयम के लिए मौन की साधना बताई गई है। महात्मा गाँधी ने कहा है “मौन सर्वोत्तम भाषण है अगर बोलना ही हो तो कम से कम बोलो। एक शब्द से भी काम चल जाय तो दो न बोलो। फ्रैंकलिन के शब्दों में “चींटी से अच्छा कोई उपदेश नहीं देता और वह मौन रहती है। “कारलाइल ने कहा है “मौन में शब्दों की अपेक्षा अधिक वाक्शक्ति होती है।”

मौन प्रकृति का शाश्वत नियम है। चाँद, सूरज, तारे सब बिना कुछ कहे-सुने चल रहे हैं। संसार का सबसे महत्वपूर्ण कार्य मौन के साथ ही पूर्ण होता है। इसी तरह मनुष्य भी जीवन में कोई महान कार्य करना चाहे, तो उसे एक लम्बे समय तक मौन का अवलम्बन लेना पड़ेगा, क्योंकि मौन से ही शक्ति का संग्रह ओर उद्रेक होता है।

आध्यात्मिक जीवन के विकास के लिये तो मौन बहुत आवश्यक है। योगी अरविन्द ने कहा है, “आध्यात्मिक जीवन अपने भीतर ईश्वरीय चेतना को प्रतिष्ठित करने और उसे सहज रूप में व्यक्त होने देने की साधना है और इस साधना में सबसे बड़ी बाधा हमारी वाचालता ही है, जो विश्वात्मा की सूक्ष्म वाणी और उसके आदेशों को नहीं सुनने देती। मौन की अवस्था में ही हम आत्मा की वाणी सुन सकते हैं। कितनी ही उत्तम भाषा, बोली क्यों न हो, वाणी से आत्मा को नहीं समझा जा सकता, मौन ही आत्मा की भाषा है।”

शास्त्रकार ने कहा है “मौन उस अवस्था को कहते हैं जो वाक्य और विचारों से परे है। यह एक शून्य ध्यानावस्था है, जहाँ अनन्त वाणी की ध्वनि सुनी जा सकती है।” अध्यात्म जगत का साधक तो मौन के बिना एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकता। आत्मा से और विश्वव्यापी सूक्ष्मशक्ति से मनुष्य तब तक सम्बन्ध स्थापित नहीं कर सकता, जब तक वह बाह्य कोलाहल में उलझा रहेगा, बहिर्मुखी बना रहेगा। अंतर्मुखी होने और अपनी संपूर्ण शक्तियों को एकाग्र और संगठित करने के लिये मौन का अवलम्बन श्रेयार्थी के लिये आवश्यक है।

व्यावहारिक जीवन में भी मौन अनर्थों को पैदा होने से रोकता है। मौन कभी भी दूसरों को हानि नहीं पहुँचा सकता। समाज में विग्रह, लड़ाई झगड़े, कलह आदि की शुरुआत वाणी से ही होती है। एक दूसरे को भला बुरा कहने पर ही लोग उत्तेजित होकर अनर्थ करते हैं। लेकिन जब मौन का अवलम्बन लिया जाय तो बुरे शब्द मुख से नहीं निकलेंगे और न विग्रह की स्थिति ही पैदा होगी।इतना ही नहीं, कोई व्यक्ति लड़ना चाहे, छेड़छाड़ करे, झगड़ने लगे, ऐसी स्थिति में दूसरा पक्ष यदि मौन का अवलम्बन ले ले, तो झगड़ा कभी हो ही नहीं सकता।

मौन की स्थिति में ही हम दूसरों को अधिक सुन सकते हैं और अपने ज्ञानकोष को बढ़ा सकते हैं। लोगों को समझने, उनका अध्ययन करने के लिए भी मौन की आवश्यकता होती है। एक कहावत के अनुसार- “मौन बुद्धिमानी का चिन्ह है और अच्छे मित्र बनाता है ।” सचमुच जो वाचाल होते हैं, उनसे भले आदमी दूर रहने का ही प्रयत्न करते हैं। मौन की स्थिति में हम अपने अज्ञान, मूर्खता, फूहड़पन को भी प्रकाशित होने से रोक सकते हैं। भर्तृहरि ने कहा है- “विधाता ने मौन अर्थात् चुप रहना-अज्ञानता का ढक्कन बनाया है। ज्ञानियों की सभा में अज्ञानियों के लिये मौन ही सर्वोत्तम आभूषण और रक्षक कवच है। “अज्ञानी आदमी यदि वाचाल होगा, तो जल्दी ही अपनी मूर्खता प्रकट कर देगा, लेकिन मौन का अवलम्बन लेकर वह अज्ञान-प्रदर्शन से अपने आपको रोक सकता है। जिस तरह गंदगी के दुष्प्रभाव और बदबू को दूर करने के लिये उसे ढक लेना आवश्यक है, उसी तरह अज्ञान, मूर्खता, फूहड़पन को छिपाये रखने के लिये मौन अपेक्षित है।

शास्त्रों में तीन तरह के पाप बताए हैं वाणी, कर्म और मन से किए गये दुष्कृत्य ही वे त्रिपाप हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि मौन के अवलम्बन से हम वाणीकृत पापों से तो निश्चित रूप से बच ही सकते हैं। किसी के अप्रिय, कठोर, वचन बोलना, गाली देना, झूठ बोलना, चुगलखोरी, आलोचना, आदि वाचिक पापों से मौन ही हमें बचा सकता है। इस तरह मौन का अवलम्बन लेने से हम जीवन में किए जाने वाले एक तिहाई पापों से बच जाते हैं।

हम जीवन में जितना अनर्थक प्रलाप करते हैं, निरर्थक शब्द बोलते हैं, यदि उतने समय में कुछ काम किया जाय, तो उतने से एक नया हिमालय पहाड़ बन जाय। शब्दों की इस अथाह शक्ति को व्यर्थ ही नष्टकर क्या हम दीन नहीं बन रहे? यदि इन शब्दों का उपयोग हम किसी को सान्त्वना देने में, भगवद्भजन, प्रभु नाम स्मरण, संगीत, जप-कीर्तन आदि में करें, तो हमारा और समाज का कितना भला हो? साथ ही हम वाचालता से उत्पन्न दोष, जिनसे लड़ाई, झगड़े, क्लेश, ईर्ष्या, द्वेष आदि का उदय होता है, उनसे बच जावें।

वाचालता, व्यर्थ प्रलाप चाहे व किसी प्रेरणा से क्यों न हो, हानिकर है। इस सम्बन्ध में एक्रेन रिवले ने लिखा है “अण्डे देने के बाद मुर्गी यह मूर्खता करती है कि वह चहचहाने लगती है। उसकी चहचहाहट सुन कर डोम कौवा आ जात है, वह उसके अण्डे भी छीन लेता है तथा उन वस्तुओं को भी खा जाता है जो उसने अपनी भावी सन्तान के लिये रखी थी।” कहावत है वह कुत्ता अच्छा नहीं होता, जो ज्यादा भौंकता है। इसी तरह वाचाल व्यक्ति को भला नहीं कहा जा सकता।

संत ईसा ने कहा था- “अपने द्वारा बोले गए प्रत्येक बुरे शब्द के लिये मनुष्य को फैसले के दिन सफाई देनी होगी। बुरे शब्दों से हम मौन के द्वारा ही बच सकते हैं।” स्मरण रहे, सहज मौन ही हमारे ज्ञान की कसौटी है। जानने वाला बोलता नहीं और बोलने वाला जानता नहीं। इस कहावत के अनुसार जब हम सूक्ष्म रहस्यों को जान लेते हैं, तो हमारी वाणी बंद हो जाती है। ज्ञान की सर्वोच्च भूमिका में सहज मौन स्वयमेव पैदा हो जाता है। स्थिर जल बड़ा गहरा होता है। उसी तरह मौन मनुष्य के ज्ञान की गंभीरता का चिन्ह है।


विशिष्ट क्षमताओं हेतु (Kahani)

दीन बन्धु एन्ड्रूज टहलने निकले तो मार्ग में उन्हें एक नवयुवक मिला। उन्हें रोक कर बोला- “क्या आप मुझे ईश्वर के दर्शन करा सकते हैं या आप लोगों का ईश्वर एक कल्पना ही है। पहले तो वे प्रश्न कर्ता की ओर बड़ी देर तक देखते रहे किन्तु उसकी अल्पज्ञता और जिज्ञासा को देखकर उत्तर देने के लिए बाध्य होना पड़ा। उन्होंने नवयुवक से कहा ठीक है। कल मिलना। तुम्हें ईश्वर के दर्शन अवश्य करायेंगे।

नियत समय पर आकर युवक उसी स्थान पर बैठ गया। दीन बन्धु आये और युवक से बोले चलो मित्र तुम्हें परमात्मा के दर्शन करायें और वे उसे लेकर अछूतों की बस्ती में गये और एक हरिजन की झोपड़ी पर जाकर खड़े हो गये। झोंपड़ी के भीतर एक किशोर बालक टीबी से पीड़ित पड़ा था। बूढ़ा बाप उसकी सेवा में लगा था। उन्होंने इशारा किया देखो यही भगवान है जो अशक्त असहाय को सहारा देकर आशा के दीप को टिमटिमाने का अवसर दे रहा है।

निस्संदेह ईश्वर प्राप्ति के-उनके दर्शन के अनेक मार्ग हैं। यह मनुष्य की अल्पज्ञता है जो यह मानता है कि वह जो जानता है उतना ही सत्य है।

वाचालता पाण्डित्य की कसौटी नहीं है, वरन् गहन गंभीर मौन ही मनुष्य के पंडित, ज्ञानी होने का प्रमाण है।

मौन ही मनुष्य की विपत्ति का सच्चा साथी है, जो अनेक कठिनाइयों से उसे बचा लेता है। अतः सप्ताह में कुछ घण्टे मौन व्रत रखना एवं दैनिक जीवन में हिल-मिल भाषण का अभ्यास डालना ही सब प्रकार से श्रेयस्कर है।

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विशिष्ट क्षमताओं हेतु अन्तः परिशोधन अनिवार्य

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“राष्ट्रीय पूर्वाभास विभाग।” यह अतीन्द्रिय क्षमता संबंधी न्यूयार्क, अमेरिका में शोधशाला का वह प्रभाग है, जिसमें घटना से पूर्व उसका सही-सही आभास कैसे प्राप्त किया जा सकता है, इस पर अनुसंधान कार्य चल रहा है। संस्था के संस्थापक एवं निदेशक डब्ल्यू ई. कॉक्स ने इसी संदर्भ में अपनी एक आत्मकथा लिखी है। इसके “प्रिकॉगनीशन बिफोर इन्सिडेन्स” अर्थात् घटना से पूर्व पूर्वाभास नामक अध्याय में ऐसी ढेरों घटनाओं का वर्णन है, जिनकी उन्हें घटना से पूर्व ही जानकारी मिल जाती थी।

ऐसी बात नहीं कि वे कोई अतीन्द्रिय क्षमता सम्पन्न व्यक्ति हों। थे तो वे सामान्य व्यक्ति ही, फिर घटनाओं का पूर्वाभास कैसे हो जाता था? इस संदर्भ में वे लिखते हैं कि कुछ अनहोनी होने से पहले ही उन्हें स्वतः इसकी अन्तःप्रेरणा हो जाती थी। यह प्रश्न किये जाने पर ही क्या हर कोई इस प्रकार की अन्तःप्रेरणा प्राप्त कर सकता है? सकारात्मक उत्तर देते हुए भी लिखते हैं कि अवश्य ही ऐसा संभव है, पर इसके लिए जीवनकाल में, चिन्तन चेतना और भावना में तनिक परिवर्तन करने, उन्हें उच्चस्तरीय बनाने की आवश्यकता है। ऐसा बन पड़ने पर यह संभव है अपने दीर्घ अनुभव के आधार पर वे लिखते हैं।

इस निष्कर्ष पर वे इसलिए पहुंचे हैं क्योंकि वे स्वयं एक सन्त-सज्जन पुरुष हैं। अपनी आत्मकथा में इस आशय का उल्लेख करते हुए लिखते हैं कि उत्तरार्ध जीवन में उन्होंने किसी व्यक्ति को कोई हानि पहुँचायी हो, यह बात तो दूर, उनने ऐसा विचार भी किया हो, अथवा कभी कटु वाणी का प्रयोग किया हो, ऐसा कोई प्रसंग किसी को स्मरण नहीं है। अपनी पुस्तक “माइ लाइफ एण्ड दि ग्रेस ऑफ प्रोविडेंस” में जीवन की एक आरंभिक घटना का वर्णन करते हुए वे लिखते हैं कि जब एक ट्रेन दुर्घटना का शुरू में मुझे पूर्वाभास हुआ, तो मैंने इसे मन का भ्रम मात्र माना, पर कुछ दिन बाद जब वह दुर्घटना सचमुच घटित हुई तभी मुझे अपनी मनःशक्ति पर विश्वास हो सका।

वे कहते हैं कि इस घटना के बहुत दिनों तक सब कुछ सामान्य रहा। पूर्वाभास अथवा अन्तः प्रेरणा जैसी कोई विशेष घटना नहीं घटी। इसका आत्मविश्लेषण करते हुए वे लिखते हैं कि संभवतः ऐसा उनकी तामसिकता की ओर रुझान के कारण हुआ हो, क्योंकि इन्हीं दिनों कॉक्स अपने एक मित्र की बुरी संगत में पड़ गये थे। शराब और माँस भोजन के अभिन्न अंग बन गये थे और देर रात तक क्लबों में समय बिताना एवं महिलाओं के साथ नृत्य करना यही उनका नित्य का कार्यक्रम था।

एक दिन उनके एक परिचित ने उनकी यह दुर्दशा देख कर कहा “कॉक्स! तुम कहाँ थे और कहाँ पहुँच गये। क्या तुम्हारे दिवंगत माता-पिता को तुम्हारी यह दशा देख कर कष्ट नहीं पहुँच रहा होगा?”

वे लिखते हैं “यह वाक्य क्या थे, दिन-रात मेरे मर्म को काँटे की तरह चुभते रहते थे और मैं छटपटाता रहता था अपनी बुराइयों से त्राण पाने के लिए। बड़ी मुश्किल से धीरे-धीरे कर मैं अपनी बुराइयों से छुटकारा पा सका। जब पूर्णरूपेण मैंने उन पर विजय प्राप्त कर ली, उच्च जीवन की ओर अग्रसर हुआ, तो मुझे इतनी खुशी हुई, जितनी शायद नेपोलियन को आल्पस विजय पर भी न हुई हो। इसी के बाद से मेरी खोयी क्षमता पुनः प्राप्त हो गई और फिर मुझे घटनाओं का नियमित रूप से पूर्वाभास होने लगा।”

यह कॉक्स की आत्मकथा पुस्तक से उद्धृत कुछ अंश हैं, जो इस बात का स्पष्ट प्रमाण हैं कि यदि आत्मशोधन कर अपनी भाव संवेदनाओं को परिष्कृत और उच्चस्तरीय बना लें, तो वह भी पूर्वाभास की क्षमता को अर्जित कर सकता है इसमें जरा भी संदेह नहीं है।

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मधु-संचय

धर्म ध्वजा का अभिनंदन

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ओ धर्म की पताका! फहरो धरा-गगन में।

उड़ती हो गन्ध भीनी, ज्यों दूर तक चमन में॥

तू प्राण विश्व का है, अभियान विश्व का है,

उज्ज्वल भविष्य का तू, अनुमान विश्व का है,

उल्लास मिल सकेगा, तेरे ही अनुकरण में।

उड़ती हो गन्ध भीनी, ज्यों दूर तक चमन में॥

फैला जहर हवा में, धरती पे, आसमाँ में,

आशा बची है केवल, इस धर्म की ध्वजा में,

तम का मरण छिपा है, ज्यों भोर की किरण में।

उड़ती हो गन्ध भीनी, ज्यों दूर तक चमन में॥

कल्मष न कल मिलेगा, मानव सरल मिलेगा,

टूटेगा भ्रम जनम का, कर्मों का फल मिलेगा,

लहरा के भाव भर दो, तुम यह हरेक मन में।

उड़ती हो गन्ध भीनी, ज्यों दूर तक चमन में॥

आलस्य रह न पाए, अन्याय सह न पाए,

पाखण्ड-दम्भ-शोषण, भू पर जगह न पाए,

समता रहे सभी में, औरों में और स्वजन में।

उड़ती हो गन्ध भीनी, ज्यों दूर तक चमन में॥

नारी सुवंद्य होवे, पावन सुगन्ध होवे,

संकीर्ण सरहदों में, वह अब न बन्द होवे,

हर पंथ पर प्रगति के, हो प्रेरणा नयन में।

उड़ती हो गन्ध भीनी, ज्यों दूर तक चमन में॥

युवा शक्ति जाग जाए, हर व्यक्ति जाग जाए,

सद्वृत्ति के लिए फिर, अनुरक्ति जाग जाए,

फैले उदारता फिर, प्रत्येक आचरण में।

उड़ती हो गन्ध भीनी, ज्यों दूर तक चमन में॥

नव चेतना जागेगी, संवेदना जागेगी,

कल्याण को सभी के, भागीरथी बहेगी,

डूबेगी फिर कोई, असहाय अश्रु-कण में।

उड़ती हो गन्ध भीनी, ज्यों दूर तक चमन में॥

ओ धर्म की पताका फहरो धारा-गगन में॥

-शचीन्द्र भटनागर

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प्रार्थना याचना नहीं, ईश्वर आराधना है।

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भगवद् करुणा को जिस माध्यम से क्रियाशील बनाया जाता है, वह प्रार्थना है, पर प्रार्थना में न तो भिखमंगेपन का भाव होना चाहिए, न आलस-अकर्मण्यता का। वह तो अरण्य-रोदन की वह पुकार है, जिसमें प्रार्थी बिल्कुल अकेला-असहाय महसूस करने लगता और किंकर्त्तव्यविमूढ़ बन जाता है। यह ठीक है कि सारी सृष्टि परम पिता की बनायी हुई है, हम उसकी सन्तान हैं और संतान पर जब विपत्ति आती है, तो वह पिता को ही याद करता है, इसमें अनुचित-अनुपयुक्त जैसी कोई बात भी नहीं है, पर आज उसका जो स्वरूप है, वह अनुचित अवश्य है। बालक जब छोटा होता है, अबोध-अशक्त होता है, तब तक पिता उसका अपनी ओर से विशेष ध्यान रखता है, किन्तु जैसे-जैसे समर्थता और यौवन की ओर बढ़ता है, वह धीरे-धीरे हाथ खींचने लगता है और जब पूर्ण वयस्क बन जाता है, तो उसे अपने पैरों पर खड़ा होने के लिए छोड़ देता है। यह आवश्यक है और अभीष्ट भी। यदि पिता ऐसा न करे तो दैनिक जीवन में आने वाली झंझटों, समस्याओं का समाधान करने की हिम्मत न तो वह जुटा सकेगा, न उन्हें सुलझाने में उसकी विवेक-बुद्धि ही काम कर सकेगी। जीवन के संग्राम से जूझते हुए ही मनुष्य ठोस, मजबूत और ऐसे रूप में विकसित हो पाता है, जिसमें वह धैर्यपूर्वक उसका सामना करते हुए अपनी स्वतंत्रता, विवेक-बुद्धि का सही-सही इस्तेमाल कर सके, पर ऐसी बात भी नहीं कि नौका मझधार में फँस जाने पर पिता किनारे खड़ा-खड़ा तमाशा देखता रहे। सहायक की याचना पर वह उसे संकट से उबार भी लेता है। प्रार्थना की पुकार ऐसे ही अवसरों पर होती है और तब सहायता के लिए भगवान भी दौड़े चले आते हैं।

किन्तु यदि हर छोटी-छोटी बात पर किसी व्यक्ति से बार-बार सहायता की याचना की जाय, तो वह याचक सहायक की दृष्टिं में गिर जाता है और उपेक्षणीय साबित होता है। भगवान के दरबार में भी यही नियम लागू होता है। आज हम प्रार्थी कम याचक अधिक हो गये हैं। हमारी प्रार्थना, प्रार्थना न होकर याचना बन गई है। हम बात बात पर भगवान के आगे गिड़गिड़ाते हैं, हाथ फैलाते हैं। कोई नौकरी के लिए मनुहार करता है, कोई बीमारी से त्राण पाने के लिए तो कोई उससे रुपये-पैसे एवं ऐसे ही बे सिर पैर की मनोकामना-शान्ति की, विनती करता है। यह तो हम दैनिक जीवन में भी देखते हैं कि श्रमिक वर्ग जब उचित-अनुचित का विचार किये बिना हर किसी माँग पर जोर देने लगता है, तो मालिक उसकी उपेक्षा कर देता है। यह अनुचित भी नहीं है, क्योंकि जो उसका हक बनता ही नहीं, उसे कोई क्यों स्वीकारेगा? पर यह भी नहीं है कि मालिक श्रमिक के अधिकार-क्षेत्र में आने वाली माँग को नकार दे।

हम प्रार्थना तो करें पर भिखारी न बने, हम याचना तो करें, पर साथ ही उचित-अनुचित का ध्यान भी रखें। जहाँ हमारी बुद्धि, जहाँ हमारा परिश्रम-प्रयास सब कुछ निष्फल-निरर्थक साबित होता हो, विवेक काम नहीं करता, चहुँ ओर अंधकार ही अंधकार दिखाई देता हो, वहीं हमें परम पिता के आगे हाथ पसारने का, कुछ माँगने का अधिकार है, अन्य अवसरों पर तो हमारी प्रार्थना स्वार्थ रहित ही होनी चाहिए। हम भगवान से सन्मार्ग की सद्बुद्धि की, श्रद्धा की, भक्ति की, सहिष्णुता की प्रार्थना स्वयं अपने लिए और दूसरों के लिए करें। महात्मा गाँधी कहा करते थे कि देह यष्टि को सुन्दर, स्वस्थ, सबल और सशक्त बनाये रखने के लिए जिस प्रकार स्थूल आहार की आवश्यकता पड़ती है, उसी प्रकार आत्मिक विकास के लिए भगवद्-स्मरण अथवा प्रार्थना की जरूरत पड़ती है। वह हमारी आत्मा का आहार है। हम जिसके उपहार हैं, यदि उसका ही कृतज्ञता-ज्ञापन न करें तो इससे बड़ी कृतघ्नता और क्या हो सकती है वे प्रायः कहा करते थे।

इस संदर्भ में यहाँ उनके एक संस्मरण का उल्लेख करना अप्रासंगिक न होगा। एक बार वे खादी प्रचार हेतु आन्ध्र प्रदेश के चिकाकोल स्थान की यात्रा पर थे। कई दिनों के उपरान्त जब वे उक्त स्थान पर पहुँचे, तो रात हो चुकी थी। थक भी काफी गये थे, अतः उपस्थित लोगों से औपचारिक मिलन के बाद वे सोने चले गये। बिस्तर में लेटते ही नींद आ गई। वे कब सो गये कुछ पता ही न चला। दो बजे रात जब उनकी नींद खुली, तब प्रार्थना की विस्मृति का भान हुआ। वे पश्चाताप करने लगे। भगवान से बार-बार क्षमा माँगने लगे कि जिसकी परम कृपा के कारण श्वास-प्रश्वास चल रही है, शरीर जीवित है, जीवन का सदुपयोग बन पड़ रहा है, उसे ही भुला दिया, विस्मृत कर दिया। हे प्रभो! माफ करना। अब आगे ऐसी गलती न हो, इससे बचाना! वे लिखते हैं कि उस रात फिर उन्हें नींद न आयी, जागते हुए बीत गई।

स्पष्ट है वे प्रार्थना को जीवन की नित्य नैमित्तिक क्रिया मानते हैं। रवीन्द्र नाथ ठाकुर इस संबंध में एक स्थान पर लिखते हैं कि “हे भगवान! विपत्ति से मेरी रक्षा करो, यह मेरी प्रार्थना नहीं है और न मैं तुम से व्यथित चित्त की शान्ति-साँत्वना की भिक्षा माँगता हूँ। पर इतना अवश्य करना कि मैं दुःखों को जीत सकूँ। यदि मुझे कोई सहायक न मिले तो कोई बात नहीं, पर हे सर्वेश्वर मेरा अपना आत्मबल न टूटे, इसका ध्यान रखना। मेरे इर्द-गिर्द, विनाश और वंचना का भीषण नर्तन चलता रहे, फिर भी मैं हार न मानूँ, तुम्हें याद कर लक्ष्य की ओर बढ़ता रहूँ-इतनी भक्ति देना।”

प्रार्थना ऐसी होनी चाहिए। यही सही श्रेणी में आती भी है। शेष तो सब याचना है, क्षुद्र स्वार्थ है, जिनकी पूर्ति तो हम अपने बलबूते भी परिश्रम और पुरुषार्थ के सहारे कर सकते हैं, फिर इनके लिए परमसत्ता के आगे गिड़गिड़ाना कैसा! और यदि कोई ऐसा करता भी है, तो भगवान उसे सुनेगा ही क्यों? क्योंकि इस हेतु तो उसे इतनी सामर्थ्य और विवेक बुद्धि दी है कि उसके आगे इन तुच्छ कारणों के लिए हाथ फैलाने की आवश्यकता ही न पड़े। मनुष्य स्वयं ही उन्हें हल कर सकता है, अन्यथा उसकी सर्वोपरि कृति का अर्थ ही क्या रह जायेगा, जब वह भी हर छोटी-छोटी बात के लिए स्रष्टा का मुँह तके। फिर उसकी और असमर्थ-अशक्त कहे जाने वाले मानवेत्तर प्राणियों में अन्तर ही क्या रह जायेगा। भगवान ने उसे इतनी विकसित बुद्धि, हाथ-पैर एवं समर्थ अंग-अवयव इसीलिए तो दिये हैं कि वह जटिलताओं का धैर्यपूर्वक सामना कर सके। फिर भी यदि कोई इतनी जटिल परिस्थिति सामने आ ही जाय कि सिवाय भगवद् सत्ता की सहायता के अन्य कोई विकल्प ही न रहे, उस पर भी हाथ पर हाथ धर कर भाग्य और भगवान के भरोसे नहीं बैठ जाना चाहिए। भाग्य सिर्फ पुरुषार्थियों का साथ देता है और भगवान के बारे में यह सूक्ति प्रसिद्ध है कि ईश्वर केवल उन्हीं की सहायता करते हैं, जो अपनी सहायता आप करने के लिए तत्पर होते हैं। निकम्मे और निठल्लों से तो वे भी घृणा करते हैं, फिर चाहे वह कितनी ही मनुहार क्यों न करे।

कथा है कि एक गाड़ीवान एक बार एक गाँव से होकर गुजर रहा था। सामने ही दलदल था। गाड़ी वहाँ फँस गई। गाड़ीवान हनुमान भक्त था। वह जोर-जोर से हनुमान चालीसा का पाठ करने लगा। सोचा कि शायद हनुमान जी की कृपा हो जाय और गाड़ी कीचड़ से निकल जाय। वह बार-बार चालीसा दुहरा रहा था, एक बार दो बार-तीन बार, पर प्रतिफल कुछ निकल नहीं पा रहा था। सामने ही एक समझदार उसका यह कौतुक देख रहा था। उसने उसका असमंजस समझा और कहा “मूर्ख! हनुमान जी तो विशाल पर्वत को उखाड़ लाये थे, समुद्र फलाँगे थे, तो तेरी छोटी सी गाड़ी नहीं निकाल पायेंगे। उतर और धक्का लगा। देख तेरी गाड़ी निकलती है या नहीं।” उसने वैसा ही किया और गाड़ी दलदल से बाहर निकल आयी।

प्रस्तुत प्रसंग में हनुमान जी ने गाड़ीवान की सहायता की या नहीं, यह तो सही-सही नहीं कहा जा सकता, पर उस सच्चाई के यह काफी करीब है, जिसमें कहा गया है कि भगवान सिर्फ पुरुषार्थियों की ही पुकार सुनते और सहायता करते हैं। वर्तमान समय के व्यक्ति की मनःस्थिति से तो यह प्रसंग करते हैं, मेल खाता है। हम आज प्रार्थना तो करते हैं, पर साथ ही निष्क्रिय बने रहते हैं। क्रिया की सफलता के लिए स्वयं अपनी ओर से कोई परिश्रम करना नहीं चाहते, सोचते हैं कि सब कुछ भगवान ही करेंगे। और जब ऐसे लोगों की प्रार्थना निष्फल हो जाती है, तो नीत्से के शब्दों में उद्घोष करते हैं कि ईश्वर मर गया। संभवतः ऐसे ही अकर्मण्यों को देखते हुए विवेकानन्द ने कहा होगा कि प्रार्थना के विभिन्न प्रकारों में सर्वश्रेष्ठ वह है, जो होंठ की बजाय हाथ से की जाती है (विवेकानन्द साहित्य भाग 10, पृ. 291)। इसी का समर्थन करते हुए जार्ज मेरेडिथ अपने ग्रन्थ “दि आर्डील ऑफ रिचर्ड फेवेरल” (अध्याय 12) में लिखते हैं कि जो प्रार्थना से श्रेष्ठतर मनुष्य बन जाता है, समझना चाहिए कि उसे उसका फल मिल गया। यहाँ के समन्वय की ओर ही इशारा करते हैं कि हम कार्य में संलग्न भी रहें और ईश्वर से अपनी सफलता की, उपादेयता की, सदाशयता की कामना भी करते रहें।

प्रार्थना की चमत्कारी सामर्थ्य “यूनिटि” पत्रिका के अक्टूबर 90 अंक में एक मर्मस्पर्शी लेख प्रकाशित हुआ है। इसमें अन्यान्य प्रसंगों के अतिरिक्त प्रार्थना की वैज्ञानिकता पर भी प्रकाश डाला गया है। डॉ. लैरी डाँसी लिखते हैं कि प्रार्थना एक ऐसा अस्त्र है जिसकी परिणति प्रमाणित कर प्रयोगशाला में भगवान तक को सिद्ध कर दिखाया जा सकता है। सेनफ्रांसिस्को की यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया मेडीकल स्कूल की कार्डियालाजी फैकल्टी के अध्यक्ष डॉ. रेण्डॉल्फ बर्ड का हवाला देते हुए वे लिखते हैं कि चार सौ हृदय रोगियों में से आधों के लिए प्रार्थना का स्वरूप बनाया गया व आधों को कण्ट्रोल के रूप में देखा गया। पूरे संयुक्त राज्य अमेरिका की विभिन्न धर्म संसदों के प्रतिनिधियों ने स्थान स्थान पर इनके स्वास्थ्य के लिए प्रार्थना की। दो माह के बाद देखा गया कि जिस समूह के लिए प्रार्थना की गयी थी, वे जल्दी ठीक होते चले गए, उन्हें तीव्र एलोपैथिक दवाओं की जरूरत कम पड़ी, श्वास धारण करने की उनकी क्षमता बढ़ी तथा ई सी जी में परिवर्तन तेजी से होते चले गए। यह शोध लेख बाद में सदर्न मेडीकल जनरल के जुलाई 1988 के अंक में छपा। इसने कई चिकित्सकों का ध्यान प्रार्थना की शक्ति की ओर मोड़ा।

प्रार्थना तब और प्रभावशाली बन जाती है जब जिसके लिए प्रार्थना की जा रही है, उसे यह ज्ञात हो जाता है कि उसका हितैषी कोई उसके लिए, उसको स्वस्थ समुन्नत बनाने के लिए परमसत्ता से मदद माँग रहा है। ऊपर वाले अध्ययन में तो वैज्ञानिकता लाने के लिए रोगियों को बताया भी नहीं गया था व इतने बड़े व्यापक परिवर्तन फिजियोलॉजी में देखे गए। प्रार्थना की रोग हर क्षमता निश्चित ही विज्ञान सम्मत है व अपनाए जाने योग्य भी।

प्रार्थना न तो याचना है, न अकर्मण्यता से भरा कर्मकाण्ड। इसमें सन्मार्ग की, सद्बुद्धि की दूसरों के कल्याण की, सौहार्द-प्रेम भावना के विस्तार की भावना निहित हो तो निश्चित ही यह फलदायी होती है। कर्तव्य परायणता अपनी जगह अनिवार्य है किन्तु निष्काम भाव से प्रभु से सही मार्ग पर चलने की अनुकम्पा बरसाने की प्रार्थना तो दैनन्दिन जीवन का एक अंग होना चाहिए। परिणाम भी उसके उतने ही चमत्कृतियों से भरे पूरे होते हैं।

पारसी धर्म के संस्थापक जरस्थुस्त्र धनी पिता के पुत्र थे। पिता ने अपनी संचित सम्पदा सभी लड़कों में बाँटनी चाही।

जरस्थुस्त्र ने अपना हिस्सा लेने से इन्कार कर दिया और कहा वह भाइयों को ही दे दे। वे धर्म प्रचार करेंगे। जब पिता ने बहुत आग्रह किया तो उनने उनका कमरबन्द ले लिया और कहा आप जिस प्रकार कमर कस कर रहे वैसा ही मैं बन सकूँ इसकी स्मृति में यह मार्ग कर रहा हूँ।

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विधाता का ऐसा मजाक न उड़ाएँ

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बड़प्पन की महत्वाकाँक्षा मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति है। अधिकाँश कार्य वह इसी से प्रेरित होकर यश और नाम हेतु करता है, जबकि होना यह चाहिए कि वह कर्तव्य के लिए कार्य करे, समाज निर्माण के लिए, समाज कल्याण के लिए काम करे, तभी सही अर्थों में उसका नाम अमर और काम सराहनीय कहा जा सकता है। किन्तु लोकेषणा का भूत आज लोगों पर इस कदर सवार है कि भला-बुरा, उपयोगी-अनुपयोगी का तनिक भी विचार किये बिना, जिससे उनके नाम का विज्ञापन होता हो, वही कार्य करने लग जाते है।

ऐसा ही एक व्यक्ति है फ्राँस का मिशेल लानीतो। आज-कल इसके कारनामों की धूम न सिर्फ फ्रांस में वरन् विश्व भर में मची हुई है और “जहाज निगलने वाले दैत्य” के उपनाम से प्रायः इसे पुकारा जाने लगा है। जब इसकी उम्र नौ वर्ष की थी, तभी से अजीबोगरीब अखाद्य वस्तुएँ खाने को इसकी लत पड़ गई। वह कीलें, छुरियाँ, काँच सभी देखते-देखते निगलने लगा। इन्हें देखते ही इसके मुँह में पानी आने लगता था। माता-पिता की आँख बचा कर घर में जब भी कोई धात्विक वस्तु, काँच, लकड़ी दिखाई पड़ती, तुरन्त पेट के अन्दर। माता पिता अपने पुत्र की इस विचित्र आदत से परेशान होकर उसके डाक्टरी परीक्षण के लिए एक विशेषज्ञ के पास ले गये, यह सोच कर कि शायद कोई उपाय उपचार निकल आये और इसके कारण उसका जीवन संकट में पड़ने से बच जाये, किन्तु वहाँ तो तथ्य ही कुछ और निकला। पता चला कि उसके पेट में तो धातु-काँच जैसी कोई चीज ही नहीं है। बाद में गहन परीक्षण से यह ज्ञात हुआ कि उसमें प्रतिदिन एक किलो से भी अधिक धातु पचाने की अद्भुत क्षमता है। अभी उसकी 40 वर्ष की आयु है, और इस उम्र तक में वह अनेकों तश्तरियाँ, फावड़े, खुरपी, बोतलें, ब्लेड पूरी की पूरी अनेक साइकिलें, कूड़ादान, ताबूत उदरस्थ कर चुका है। सन् 1978 में उसने टू-सीटर एक छोटा हवाई जहाज खाना शुरू किया तो दो वर्ष के भीतर-भीतर उसे पूरी तरह समाप्त कर दिया।

इस संदर्भ में उससे जब एक फ्राँसीसी पत्रकार ने इण्टरव्यू लिया, तो उसका कहना था कि वह यह सब कीर्तिमान के लिए कर रहा है और ऐसा तब तक करता रहेगा, जब तक वह इतिहास में अद्वितीय न साबित हो जाय।

आज से पाँच वर्ष पूर्व इंग्लैण्ड के नाटिंघम शहर की नैन्सी नामक एक किशोरी सिर्फ 10 पाउण्ड की खातिर डेढ़ किलो की एक लोहे की गेंद निगल गई। उन दिनों वहाँ के अखबारों में इस घटना की बड़ी चर्चा थी।

न्यूयार्क में माइकल क्राफ्टन नामक एक युवक है। वह जिस मुहल्ले में रहता है, वहीं कुछ दूर पर एक बड़ा सा कूड़ादान है। उसमें उसने अपने नाम का एक इश्तहार लिख छोड़ा है, जिसमें आस-पास के लोगों से आग्रह किया गया है कि वह अपने बेकार पॉलीथिन बैग को कूड़ेदान में न डाल कर उसके घर पहुँचाने का कष्ट करें। बस फिर क्या था उसका एक बड़ा सा कमरा इसी से भर गया है। लोगों ने जब पूछा आखिर ऐसा क्यों? तो उसका जवाब था “मुझे कूड़ा खाने में आनन्द आता है। अब तक कोई सौ ऐसे बैग वह खा चुका है। बड़ा विचित्र है यह मनुष्य जिसका पेट एक प्रकार का ट्रेण्चिग ग्राउण्ड है।”

एक महिला के पेट से दर्द की वजह से हुए आपरेशन के बाद मुड़ी लोहे की पिनें तथा एक महिला के पेट से बालों का गुच्छा निकला। दोनों को ही इन चीजों को खाने का शौक था। इसे मेडीकल साइंस में एक प्रकार की बीमारी कहा जाता है।

इन सब विवरणों से व्यक्ति विशेष को कोई सामयिक सस्ती वाहवाही भले ही मिल जाय पर कर्ता का, व समाज का इनसे कोई भला नहीं होता। उलटे स्रष्टा की इस कृति से किये जा रहे खिलवाड़ से विधाता का मजाक और उड़ता है। ऐसे नाटक अब बन्द होने चाहिए।

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समग्र सिद्धि दात्री महाकुण्डलिनी

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मानवीय प्रगति के तीन प्रधान आधार हैं आकाँक्षा, विचारणा और क्रिया। इन्हीं तीनों के विकास के आधार पर मनुष्य में प्रसन्नता, तत्परता और श्रमशीलता उत्पन्न होती तथा प्रगति पथ पर आगे धकेलती सफलता के द्वार तक ले जाती है। इसका सारा रहस्य कुण्डलिनी महाशक्ति के भीतर छिपा पड़ा है जिसके जागरण का मूल गायत्री महामंत्र में सन्निहित है। गायत्री को त्रिपदा कहा गया है। इसके तीन चरण ही कुण्डलिनी के तीन लपेटे हैं और गायत्री की तीन धाराओं का प्रतिनिधित्व कुण्डलिनी-शक्ति प्रवाह के तीन सूक्ष्म नाड़ी- पथ करते है जिन्हें इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना स्थल कहा जाता है। त्रिदेवों, त्रिशक्तियों का निवास स्थल यहीं है। प्रज्ञावान साधक इन्हीं में ध्यान रमाते हैं और भौतिक ऋषियों एवं आत्मिक विभूतियों के स्वामी बनते हैं।

आद्य शक्ति में आकाँक्षा, विचारणा और क्रिया अर्थात् साधन-उत्पादन की तीनों क्षमताएँ विद्यमान हैं। मानव जीवन की इन मूल क्षमताओं का विकास ही कुण्डलिनी महाशक्ति की साधना है। इन्हें ही इच्छा शक्ति, ज्ञानशक्ति और क्रियाशक्ति का विकास कहा गया है। देवी भागवत् में उल्लेख है “इच्छाशक्तिश्च भूःकारः क्रियाशक्तिर्भुवः तथा। स्वः कारः ज्ञानशक्तिश्च भूर्भुवः स्वः स्वरूपकम।” अर्थात् भूर्भुवः और स्वः ये तीन व्याहृतियाँ क्रमशः इच्छा, क्रिया और ज्ञानशक्तियों का स्वरूप है। इसी में आगे कहा गया है कि ज्ञानशक्ति सात्विक, क्रियाशक्ति राजस और द्रव्यशक्ति तापस होती है। इन्हें ही प्रकृति की तीन महाशक्तियाँ-महासरस्वती, महालक्ष्मी और महाकाली कहते हैं। अध्यात्मशास्त्रों में इन्हीं तीनों महाशक्तियों की साधना करने का निर्देश है। इन परम वैभवों की उपलब्धि जिस साधना उपक्रम को अपनाने से होती है, उसे ही कुण्डलिनी महाशक्ति का जागरण कहते हैं। अध्यात्म क्षेत्र का परम पुरुषार्थ भी यही है।

कुण्डलिनी महाशक्ति का स्वरूप क्या है तथा उसकी प्रसुप्ति को जागृति में बदलने के लिए किन साधना उपक्रमों का आश्रय लेना पड़ता है आदि रहस्यों का उपनिषदों तथा योगशास्त्रों में विस्तारपूर्वक वर्णन है। इसके स्वरूप का उल्लेख करते हुए महायोग-विज्ञान में कहा गया है “आत्मशक्ति कुण्डलिनी मूलाधार चक्र में साढ़े तीन कुण्डलिनी लगाये हुए सर्पिणी की तरह शयन करती है। जब तक वह सोती है, तब तक मनुष्य पशुवत बना रहता है। बहुत प्रयत्न करने पर भी तब तक उसे ज्ञान नहीं हो पाता। जिसकी यह आधार शक्ति सो रही है उसका सारा संसार ही सो रहा है,पर जब वह जागती है तो उसका भाग्य और संसार ही जाग पड़ता है। बिजली जैसी चमक वाली पंच तत्वों एवं पंच प्राणों की माता। परम चेतना, ज्ञान शक्ति तथा क्रिया शक्ति कुण्डलिनी, योग साधना से जाग्रत होती है। कर्मों की सफलता इसी के जागने से प्राप्त होती है। अतएव उस महाशक्ति को जगाने के लिए प्रबल प्रयत्न करना चाहिए।”

घेरण्ड संहिता 6/16/18 में कहा गया है।

मूलाधारे कुण्डलिनी भुजंगाकार रुपिणी।

जीवात्मा तिष्ठति तत्र प्रदीप कलिकाकृतिः।

बहुभाग्य वशाद्यस्य कुण्डली जाग्रत भवेत्।

अर्थात् मूलाधार चक्र में सर्पिणी आकार की कुण्डलिनी शक्ति है जो दीपक की लौ जैसी दीप्तिमान है। वही जीवात्मा का निवास है। जिसकी कुण्डलिनी शक्ति जागृत हो जाये उसे बड़ा सौभाग्यशाली मानना चाहिए।

शिव संहिता के अनुसार-

सुप्ता नागोपमाहयेष स्फुरन्ती प्रभवा स्वया।

अहिवत् संधि संस्थाना वाग्देवी बीज संज्ञका।

श्रेया शक्तिरियं विष्णोर्निभया स्वर्ण भास्करा॥

अर्थात् यह कुण्डलिनी शक्ति सप्त सर्पिणी के समान है। वही स्फुरणा, गति, ज्योति एवं वाक् है। यह विष्णु शक्ति है। स्वर्णिम सूर्य के समान दीप्तिमान है।

योग वशिष्ठ में इसे रस भावना से ओतप्रोत बताते हुए महर्षि वशिष्ठ श्रीराम से कहते हैं-

सवित्तिःसेव-यात्यंग रसाद्यन्तं यथाक्रमम्।

रसेनापूर्णतामेति तंत्रोमार इवाम्बुना।

रसापूर्णा यमाकारं भावयत्याशु तलथा।

धन्ते चित्रकृतो बुद्धो रेखा राम यथा कृतिम॥

अर्थात् यह कुण्डलिनी शक्ति रस भावना से ओतप्रोत है। उसके जागृत होने पर मनुष्य रस भावनाओं से ऐसे भर जाता है जैसे पानी भरने से चमड़े का चरस। यह रसिकता भाव संवेदना अनेक कलाओं के रूप में विकसित होते हुए जीवन को रससिक्त बना देती है। “रसौ वै सः” इसी स्थिति को कहा गया है।

महायोग विज्ञान में इसी तथ्य को स्पष्ट करते हुए शास्त्रकार कहते हैं “इच्छा-ज्ञान-क्रियात्मासौ तेजोरुपा सर्व विश्व प्रवर्तिनी “ अर्थात् तेजस्वरूप कुण्डलिनी जाग्रत होने पर साधक की इच्छा शक्ति, ज्ञान शक्ति और क्रियाशक्ति को प्रखर बनाती है। सम्पूर्ण शरीर पर उसका प्रभाव दीखने लगता है। प्रसुप्त मन्त्रमय जगत एवं विश्वात्म ज्ञान जाग्रत हो उठता है। विश्व का प्रवर्तन करने वाली कुण्डलिनी साधक को अनेक गुना शक्ति सम्पन्न बना देती है।

कुण्डलिनी जागरण के प्रतिबल से परिचित होने पर साधक उसके लिए साधना प्रयास आरंभ करता है और उस परम पुरुषार्थ का समुचित लाभ प्राप्त करता है जिसका उल्लेख शक्ति तंत्र में किया गया है। उसके अनुसार “कुण्डलिनी महाशक्ति के प्रयत्न से ही यह सारा संसार व्यापार चल रहा है, जो इस तथ्य को जान लेता है, वह शोक संतप्त भव बंधनों से बँधा नहीं रहता।”

मानवी काया में विद्यमान इस परम वैभव की उपलब्धि के दो मार्ग अध्यात्मवेत्ताओं योग विद्या विशारदों पर आध्यात्मिक और तंत्र के आधार पर भौतिक उन्नति का पथ प्रशस्त होता है। कुण्डलिनी जागरण में उभयपक्षीय संभावनायें सन्निहित है। यह दोनों ही प्रयोजन उससे सिद्ध होते हैं। गाड़ी के दो पहिये, पक्षी के दो पंख, मनुष्य के दो हाथ मिलकर जिस तरह उनकी क्षमता को मूर्तिमान बनाते हैं, उसी प्रकार कुण्डलिनी जागरण की प्रक्रिया जीवन के दोनों पक्षों को समुन्नत बनाती है। हठयोग प्रदीपिका में इसी तथ्य को इस प्रकार प्रतिपादित किया गया है।

सशैलवन धात्रीणाँ यथाधीराऽहिनायकः।

सर्वेषाँ योगतन्त्राणाँ तथा धारोहि कुण्डली॥

सप्ता गुरु प्रसादेन यथा जागृति कुण्डली।

तदा सर्वाणि पद्मानि भिद्यंते ग्रथयोऽपिच॥

अर्थात् जिस प्रकार सम्पूर्ण वनों सहित जितनी भूमि है, उसका आधार शेषनाग है, उसी प्रकार समस्त योग साधनाओं का आधार भी कुण्डलिनी ही है। जब गुरु की कृपा से सोयी हुई कुण्डलिनी जागती है, तब सम्पूर्ण पद्म-षट्चक्र और ग्रन्थियाँ खुल जाती हैं। इसी ग्रंथ के अगले श्लोकों 3/15 से 17 में कहा गया है कि जाग्रत होने पर ही यह कुण्डलिनी योगियों के मोक्ष का साधन बनती है और सोती रहने पर मूढ़ों के बन्धन का कारण बनी रहती है। इस रहस्य को जानने वाला साधक ही योगी होता है। जिस प्रकार कुँजी से किवाड़ खोले जाते हैं वैसे ही साधक कुण्डलिनी द्वारा मोक्ष द्वार को खोलते हैं।

महायोग सूत्र के अनुसार-अनन्त शक्तियों की भण्डार सुप्त सर्पिणी कुण्डलिनी अपने साधक का पालन और रक्षण करती है, सो मुक्ति के आकाँक्षी उसी की साधना करते हैं। प्राणवायु के द्वारा जाग्रत हुई यह कुण्डलिनी साधक के लिए सिद्धियों का आधार बनती है और उसे परमज्ञान प्रदान करती है। ऋग्वेद की ऋचा 10/125/5 में इस तथ्य का रहस्योद्घाटन करते हुए कहा गया है-

अहमेव स्वयमिदं वदामि जुष्ट देवेभिरुत भानुषेभिः।

यं यं काम ये तं तमुग्रं कृणोभि तं ब्राह्मणं तमृषि तं सुमेधाम॥

अर्थात् “देवताओं और मनुष्यों को अभीष्ट प्राप्ति का मार्ग मैं ही बतलाती हूँ। जो मेरी विवेक सम्मत उपासना कर मुझे प्रसन्न करता है- जाग्रत करता है, उसे ही मैं प्रखर बनाती हूँ। ब्राह्मण, ऋषि तथा मेधावी बनाती हूँ।”

इन आप्त वचनों और शास्त्रीय कथनों से स्पष्ट है कि आत्मसत्ता में सन्निहित इस महाशक्ति की साधना से अधिक और भौतिक सिद्धियों का पथ प्रशस्त होता है और ऐसा अजस्र भण्डार जो अपने ही भीतर छिपा है, प्रकट हो जाता है क


Quotation

मैंने चार गुरु चुने है और उन्हें हर दिन याद रक्खा है। एक भगवान दूसरा माँ, तीसरे नेकी करने वाले और खुश रहने वाले, चौथे बुराई की राह पर कदम बढ़ाने वाले और पग-पग पर ठोकर खाने वाले।

कुमारी सैडलर के इस लोक सेवी व्यक्तित्व और तितिक्षामय जीवन का,क्षेत्र वालों पर कुछ ऐसा प्रभाव पड़ा कि कार्य में आशा से अधिक प्रगति होने लगी। साथी कार्यकर्ताओं को “स्वयं गढ़े व्यक्तित्व करते है, औरों का निर्माण” इस सूत्र की सार्थकता समझ में आ रही थी।

जब कुछ महिलाओं ने उनसे आर्थिक सहायता की प्रार्थना की तो वे बोलीं “बहनों! दूसरों की मदद क्यों माँगती हो? अपनी ही शक्ति को जगाइए। भगवान ने आपको बहुत कुछ दिया है। इस धरती में और आपके दिल में सब कुछ है। मेरा तो अपना घर भी नहीं। मेरी आवश्यकताएँ समाज पूरी करता है और मैं उसकी सेवा करती हूँ।” उनकी इस निष्ठ ने उन्हें आत्म परितोष और उल्लास के ऐसे वरदान दे डाले जिनका कभी क्षय नहीं होता। साथ ही उनके जीवन ने फैलाया प्रेरणा का प्रकाश, जिसे ग्रहण कर भारतीय नारियाँ वह मजबूत नींव बना सकती हैं, जिस पर नारी युग की चिरस्थायी संस्थापना हो सके।

*समाप्त*