पतन के मौसम में गये-गुजरे ही बढ़ते हैं और उन्हीं का विस्तार होते देखा जाता है, किन्तु उत्थान का समय आते ही उसके भी चिन्ह समय से पूर्व प्रकट होने लगते हैं। वह लक्षण है प्रतिभाओं का अभिवर्धन और उनकी भावनाओं में, गतिविधियों में, उत्कर्षवादी तत्वों का अभिवर्धन।
अन्य जीव जन्तुओं की भाँति मनुष्यों में भी अनगढ़ों की, गये गुजरों की संख्या बढ़ती रहती है। यह वह चिन्ह है, जिसके सहारे अगले दिनों अशुभ संभावनाओं का विस्तार होने जैसा अनुमान लगाया जा सकता है। अनीति का, अवाँछनीयता का जब भी विस्तार हुआ है, तब उससे पूर्व यह पाया गया है कि कि घटिया व्यक्तित्व ही बढ़ने और क्रियाशील होने लगे हैं। इसी की प्रतिक्रिया परिस्थितियों में विपन्नता बढ़ने के रूप में देखी जाती है, किन्तु जब मानवीय उत्कृष्टता की पक्षधर आशावादी व्यक्तियों की समर्थता और अभिवृद्धि होने लगे, तो समझना चाहिए कि वे संभावनाएँ निकट आ गईं, जो अनौचित्य को गिराती और प्रगति के उत्साह भरे आधार खड़े करती हैं।
पिछले दिनों भी सराहनीय क्रान्तियाँ हुई हैं, तब अनुकूलताएँ आकाश से नहीं बरसीं, वरन् मात्र इतना हुआ है कि औचित्य की पक्षधर प्रतिभाएँ बढ़ीं, सुविस्तृत हुई और कार्यरत दृष्टिगोचर हुई हैं। मनुष्य की सामर्थ्य असीम है। जब वह प्रकट होती है, तो प्रतिभा कही जाती है। यदि वह उच्च स्तर की हो, तो समझना चाहिए कि उनका समुदाय छोटा अथवा स्वल्प साधन वाला होते हुए भी अपने मनोबल के आधार पर महत्वपूर्ण अनुकूलताएँ उपार्जित कर लेता है। साथियों की भी कमी नहीं रहती, अनुयायियों का अभाव भी नहीं देखा जाता, सबसे बड़ी बात यह है कि उनके अन्तराल में ऐसे तूफान उठते हैं, जो उच्चस्तरीय वातावरण बनाये बिना रह सकते ही नहीं। व्यक्तिगत वरिष्ठता के चरितार्थ होने पर ऐसा भी होते देखा गया है कि उस उत्साह में असंख्यों भाव तरंगित होने लगते हैं। यह समुदाय ही उन महाक्रान्तियों की भूमिका बनाता है, जिसे ऐतिहासिक माना और सराहनीय कहा जाता है। कुछ के अन्तराल में उठी आदर्श की उमंगे अन्यान्यों को भी अपने रंग में रंग लेती हैं और देखते-देखते उस दिशा निर्धारण पर चल पड़ने वाले असंख्यों मनस्वी ऐसे कार्य कर गुजरते हैं, जिनके अनुकरण करने वाले आश्चर्यजनक संख्या में दीख पड़ते हैं। अनुकूलता भी अपने अनुरूप अनेकों साधकों को एकत्रित कर लेते हैं।
जिन परिस्थितियों में कोई बड़ा काम बन पड़ने की संभावना नहीं होती, उनमें अनौचित्य को घटाने या मिटाने की संभावना इसलिए नहीं दीखती कि प्रतिकूलताओं का पलड़ा बहुत भारी दीखता है और टकराने पर जीतने के लक्षण कम ही दीख पड़ते हैं, हार की संभावना को देखते हुए उत्साह भी ठंडा पड़ जाता है। किन्तु होता कुछ ऐसा विलक्षण एवं विपरीत है, जिसमें आशा और अपेक्षाओं का अनुकूल प्रवाह बहने लगता है और अप्रत्याशित सफलताओं के आधार न जाने कैसे और कहाँ से बन जाते हैं। क्रान्तियाँ प्रायः अप्रत्याशित ही हुई हैं, उनके लिए न जाने कहां से उत्साह उभरा उफना कि परिस्थितियाँ बन गईं, जिनकी साधारण बुद्धि से कोई आशा या संभावना नहीं दीख पड़ती थी। हलके प्रतीत होने वाले व्यक्ति भारी पड़ते हैं और इतने बड़े काम कर दिखाते है, जिनकी पूर्व कल्पना कदाचित ही किसी में रही हो। असाधारण शक्ति आदर्शों को अपनाने से उभरती है। प्रतिकूलताओं को अनुकूलताओं में बदल देने वाले अवसर यों कभी-कभी सामान्य मनस्वियों को भी मिल जाते हैं, पर सर्वांगपूर्ण सर्वतोमुखी प्रतिभा उन्हीं में उभरती है, जिनमें आदर्शों के पराक्रम पर गुजरने के उल्लास की उमंगें अपने अन्तर में ज्वार−भाटों की तरह उठती-उमगती दीखती हों।
व्यवसाय -बुद्धि सदा हानि-लाभ का हिसाब लगाती है और वही करती है जिसमें अनुकूलता दृष्टिगोचर होती है। सफलता की संभावना के अवसर असंदिग्ध नजर आते हैं, किन्तु आदर्शवादी पराक्रमों में तो तत्कालिक घाटा ही दीख पड़ता है। व्यवसाय-बुद्धि ऐसे जोखिम भरे कदम उठाने से रोकती है। मात्र आदर्शों से प्रेरित साहस ही ऐसे समर्थन करता है, जिसमें आदर्शों की रक्षा में घाटा स्पष्ट दीखता है, किन्तु अन्तःकरण वैसा कर गुजरने के बिना रुकता ही नहीं। बलिदानियों की परम्परा मात्र उन्हीं के गले उतरती है, जिनके अंतःकरण में दैवी प्रयोजनों के लिए अपना सब कुछ निछावर कर देने हेतु संकट उठाने के साथ-साथ उत्साह भरी उमंगे हिलोरे लेती हैं और घाटे में नफा तथा नफे में घाटा देखती हैं। यह दैवी प्रेरणा है। वह अपने साथ अकृत शक्ति लेकर कार्य क्षेत्र में उतरती है और न जाने कहाँ कहाँ से संबंधी-सहयोगियों की प्राणवान मंडली बुला कर साथ चलने के लिए विवश कर देती है। ऐसे प्रसंगों में देखा यह गया है कि संख्या में कम और क्षमता की दृष्टि से साधारण दीखने वाले लोग भी साहस की दृष्टि से अतिशय बलिष्ठ सिद्ध होते हैं। यों आरंभ में ऐसे लोगों के बारे में सामान्यतया यह धारणा नहीं बनती कि वे इतने बड़े शौर्य- बलिदान कर गुजरने के लिए उच्चस्तरीय साहस दिखा सकें।
शरीर-बल, साधन-बल, संगठन बल आदि कितने ही लोगों में होते हैं, पर वे उनका उपयोग भी साधारण या हेय स्तर के कार्यों में ही कर पाते हैं। त्याग-बलिदान में एक प्रकार घाटे की, जोखिम की स्थिति दीखती है, साथ ही असफलता भी मिल सकती है। इतने पर भी यदि आत्मबल उच्चस्तरीय साहस उभार दे, तो यही समझना चाहिए कि आत्मबल के रूप में देवी प्रेरणा कुछ अद्भुत कर गुजरने की प्रेरणा भर रही है। नवयुग के अवतरण पर व्यक्ति में ऐसी ही प्रेरणाओं का बाहुल्य उभरता है और असंभव को संभव बना देता है।
महान परिवर्तन इसी प्रक्रिया द्वारा संपन्न होते रहे हैं व आगे भी महाकाल साधारण मनुष्यों को ही माध्यम बनाकर उनमें नवीन चेतना फूँककर जीवन्त प्राणवान के रूप में उभार कर उनसे असंभव प्रतीत होने वाले कार्य सम्पन्न कर दिखाएगा। मानव में निहित यह संभावना ही युग परिवर्तन आधार है।
परिवर्तन एक अनिवार्य प्रक्रिया है। संसार की हर वस्तु समयानुसार बदलती है। शैशव, यौवन, बुढ़ापा और मृत्यु की शृंखला ही इस संसार को गतिशील, स्वच्छ और सुन्दर बनाये हुए है। जड़ता तो मात्र कुरूपता को ही जन्म देती है।
सामाजिक ढर्रे जब बहुत पुराने हो जाते हैं, तब उनमें जीर्णता और कुरूपता उत्पन्न हो जाना स्वाभाविक है। इसे सुधारा और बदला जाना चाहिए। समय की प्रगति से जो पिछड़ जाते हैं, समय उन्हें कुचलते हुए आगे बढ़ जाता है। ऋतु परिवर्तन के साथ आहार-विहार की नीति भी बदलनी पड़ती है। युग की माँग और स्थिति को देखकर हमें सोचना चाहिए कि वर्तमान की आवश्यकताएँ हमें क्या सोचने और करने के लिए विवश कर रही हैं। विचारशीलता की यही माँग है कि आज की समस्याओं को समझा जाय और सामयिक साधनों से उन्हें सुलझाने का प्रयत्न किया जाय।
जो पुराना सो ठीक, जो अभ्यास में है, वही सही यह आग्रह बौद्धिक जड़ता का चिन्ह है। जीवितों को जड़ नहीं होना चाहिए। चेतनता ही मनुष्य का आभूषण है, उसकी शोभा है। चेतनता इस बात में है कि वर्तमान को समझें और अपने नवनिर्माण का सुदृढ़ आधार विनिर्मित करें।
बर्फ की हलकी परत अभी भी सड़क पर थी। सुबह के सूरज ने अपनी किरणों के पारस स्पर्श से इसे सोने का बना दिया था। बस यही लगता था सड़क पर किसी ने दूर-दूर तक सोना बिखरा दिया है। पहली नजर ही आँखों को चौंधिया देती। किनारे खड़े वृक्ष स्वर्ण लोलुपता से दूर निर्लोभी संत की भाँति मौन थे। एक अपूर्व निस्तब्धता वातावरण को चारों ओर से लपेटे थी। कभी-कभार हवा का हल्का झोंका इसे तरंगित कर देता अथवा इक्के-दूक्के आने-जाने वाले इसे चीरते निकल जाते। वह भी हल्के कदमों से गुजर रहा था। ओवरकोट और पैण्ट उसके शरीर को पूरी तरह लपेटे थे। भारी जूतों ने बर्फ और पैरों के बीच मोटी दीवार बना रखी थी।
अचानक उसकी दृष्टि पेड़ के नीचे पड़ी किसी चीज से टकराई। तो.. क्या.. सन्देह ने पैरों को उस ओर चलने के लिए विवश किया। पास पहुँच कर सन्देह विश्वास में बदला यही कोई पन्द्रह-सोलह साल उम्र रही होगी। गरीब के मुँह पर, छाती, मुट्ठियों और पैरों पर बर्फ के कण-चिपके थे। दस्ताने से अपना हाथ निकाल कर उसकी छाती टटोली। अभी साँस बाकी थी, लगता है देर नहीं हुई। एक पल में कर्तव्य निश्चित हुआ। अपना ओवरकोट उतार कर उसके शरीर पर लपेटा। उसे कन्धे पर डालकर एक ओर चल पड़ा। आज की सेंक चिकित्सीय सुविधा ने बालक को होश में ला दिया। होश में आने पर उसने बताया कि वह एक होटल में काम करता है। ओवरकोट और कुछ पैसे बालक को देकर एक अन्तर्द्वन्द्व के साथ चल पड़।
अन्तर्द्वन्द्व-क्या दिए गए धन और सामान के बारे में? नहीं पिता के व्यवहार ने उसे चिन्तित कर दिया था। ओवरकोट न देखकर वे क्या कहेंगे और मैं क्या जवाब दूँगा? मन के पन्नों पर इसी की एक लम्बी प्रश्नोत्तरी तैयार करने लगा। उसके पिता कोई गरीब हों-ऐसी बात नहीं। उनके धन के चर्चे तो आस-पास होते रहते। लाखों की सम्पत्ति थी उनके पास। पर उन्हें डर था लड़के की यह उदारता कहीं उन्हें कंगाल न बना दे। वे उसे डाँटते रहते।
वह करे भी तो क्या? फिजूल खर्ची, दुर्व्यसन उससे कोसों दूर थे। पर उसके मन में दुःखी दरिद्र और कष्ट पीड़ितों के प्रति अपार करुणा थी। निजी आवश्यकताओं में बेहद कम खर्च करने वाला वह पीड़ितों को सब कुछ दे डालता। एक बार तो अपने घर की कई वस्तुएँ गरीब लोगों में बाँट दीं। पूछने पर कहा जब हम इन वस्तुओं का कोई उपयोग नहीं कर पा रहे हैं तो जरूरतमंद इनसे क्यों वंचित रहें। पिता से मार खाने पर अब वह अपने व्यक्तिगत खर्चों में कटौती कर सेवा सहायता किया करता। कुछ समय तक घर वालों को इसका पता नहीं चला पर जब यह मालूम पड़ गया कि वह अपनी आवश्यकताओं में कटौती कर लोगों को बाँट रहे हैं। तब एक दिन पिता ने बुलाया और कहा-सुना है तुम अपनी जरूरतें कम कर दानवीर बन रहे हो।
उसने उत्तर दिया- “न जाने क्यों मुझे दूसरे लोगों को देख उनकी जरूरतों का ख्याल आ जाता है। मैं सोचने लगता हूँ कि मैं तो इन वस्तुओं के बिना भी अपना काम चला सकता हूँ। उन लोगों को क्यों कुछ न दूँ, जिनका इन पर हक है।” इस पर भी डाँट मिली।
एक-एक कर ऐसे ही अनेकों वाकयों को सोचते वह घर के पास आ पहुँचा। सामने पिता टहल रहे थे। देख कर मुँह सूख गया सारी सर्दी हवा हो गई। ओवरकोट के बिना इन्हें देखते ही उनके तेवर चढ़ गए। व्यंगात्मक भाषा में बोले-क्यों जी -दानवीर! आज कोट भी बाँट आए। जी.. ज.. जी घबराहट के कारण उससे कुछ बोलते नहीं बन रहा था। पिता ने डपटते हुए कहा यदि तुम्हें दान का इतना ही शौक है तो क्यों नहीं अपनी मेहनत से कमा कर लोगों को बाँटते हो।
“अब ऐसा ही करूंगा” युवक अपने पिता को प्रणाम कर उलटे कदमों से लौट पड़ा। यद्यपि उलाहना सामान्य ढंग से दिया गया था, किन्तु वे निकल पड़े। वापस न लौटने को।
ग्रह त्याग कर वे एक साधु मठ पहुँचे, साधुओं ने उनसे खाने के लिए पूछा। भूख के कारण पेट की आंतें तो कुलबुला रही थीं पर पिता की बात याद आ गयी और बोले “मैं इस प्रकार कोई वस्तु नहीं लेना चाहता। मेहनत करके पेट भरना चाहता हूँ आप पहले मुझे काम दीजिए।”
साधुओं ने उन्हें बरतन मांजने का काम बताया। एक दिन नहीं वर्षों यही सिलसिला चला। घर वापस बुलाने की कोशिशें नाकाम हुई। आत्म निर्भरता और सेवा भावना का समन्वय करने वाला यह युवक विश्व का महान सन्त बना। शताब्दियाँ बीत जाने पर भी विश्व मानवता संत फ्राँसिस के नाम से जाने जाने वाले इस मानव को आत्म निर्भर सेवा भावना के प्रतीक के रूप में आज भी नमन करती है।
जिन्दगी अनुभूतियों का पिटारा है। कड़वे-कसैले, मृदु-सुस्वादु सभी तरह की अनुभूतियों से भरे क्षण हरेक की जिन्दगी में आते हैं। अथवा यों कहें कि जीवन इन मनोरम और डरावनी पगडंडियों से गुजरता है या उसे गुजरने के लिए मजबूर होना पड़ता है। एक की हमें अभिलाषा रहती है, दूसरे से हम कतराना चाहते हैं। एक प्रिय लगता है दूसरा अप्रिय। एक को बिना देखे हम चुनना चाहते हैं, दूसरे को देखकर भी आंखें मींच ली जाती हैं। सुख की राहों पर चलते हुए सोचते हैं जीवन ठहर जाय। विषाद के क्षण भी युगों का भारी भरकम बोझ लगते हैं। लाख तिरस्कार, अनपेक्षा, उपेक्षा के बावजूद ये क्षण हम में से प्रत्येक की नियति बनकर आ ही जाते हैं। क्यों? क्या इनकी भी कुछ उपयोगिता है? या सृष्टि के कुशल सृजेता से यह अकुशल भूल रह गई।
सवाल बड़ा अहम् है और कौतुकपूर्ण भी। विषाद के क्षणों की उपयोगिता सुनने से पहले जी चाहेगा कान बन्द कर लें। पाँव उधर बढ़ने से स्वतः इनकार कर बैठेंगे। कहीं यह मानसिकता हमारी अपनी भ्रान्ति तो नहीं! अन्यथा जिसके द्वारा ऐसी अनुपमेय सृष्टि गढ़ी गई जहाँ प्रत्येक वस्तु घटना अपने उचित स्थान पर ठीक और उपयोगी है, वहाँ विषाद के बारे में बिना सोचे-समझे निर्णय ले डालना ठीक नहीं मालुम पड़ता।
प्रीतिकर क्षणों में हमारा अपना जीवनक्रम बँधे-बँधाए ढर्रे में चलता रहता है। बहुत कुछ अर्थों में हम बेहोशी जैसा समय गुजारते हैं। क्रियाशीलता और बेहोशी में विरोधाभास लगता जरूर है पर बेहोश आदमी भी क्रियाशील रहता है। दिल की धड़कन फेफड़ों की साँय-साँय रगों में खून की भाग दौड़ यह क्रियाशीलता नहीं तो और क्या है? क्रिया के घेरे को उठने-बैठने, खाने-पीने, सोने तक तो सीमित नहीं किया जा सकता। मनोवैज्ञानिकों ने अपनी नई-नई प्रायोगिक छान-बीन के द्वारा यह सूचित किया है कि इन्सान की क्रियाएं दो तरह की मानसिकता की उपज हैं। एक जिसे अचेतन मन कहते हैं अर्थात् संस्कार आदतों, यादों, पूर्वाभ्यासों के जखीरे के संकेतों द्वारा। दूसरा सचेतन मन जो सोचने-समझने विवेकपूर्ण निर्णय लेकर काम करने में भलाई समझता है।
पहले के द्वारा संचालित क्रियाओं में हमें सोचने की जरूरत नहीं पड़ती। उठने-बैठने, खाने-सोने में भला सोचने की क्या जरूरत। आदत पड़ गई है सब निभ जाता है। दिल-गुर्दे, फेफड़े भी तो इस तरह आदत के मुताबिक जिम्मेदारी निभाते रहते हैं। सोच-विचार का क्या काम? जहाँ सोच-विचार न हो, उचित अनुचित का विवेक न रह जाय, उस दशा का नाम बेहोशी ही तो है। बेहोश आदमी कैसे बैठा है, पड़ा है अर्धनग्न अथवा निर्वस्त्र उसे इसकी कोई चिन्ता नहीं। आखिर वह बेहोश जो ठहरा।
मनोवेत्ता एच. जी. अर्नहीम ने किताब लिखी है “काँशस लिविंग”। इस पुस्तक में उसने लम्बे-चौड़े सर्वेक्षण के बाद साँख्यिकीय आकलन प्रस्तुत किए हैं। उसके अनुसार बहुसंख्यक समुदाय ऐसा है जो सचेतन मन का कम से कम इस्तेमाल करता है। जिन में जीवन के प्रति स्वयं की जागरुकता है उनकी संख्या गिनी चुनी है। अपनी आदतों के मुताबिक एक ढर्रे जैसे जीवन-जीने वाले इस बहुसंख्यक समुदाय को नाम दिया है- बेहोश दुनिया। जब कभी यह बेहोशी अपनी सीमा को तोड़ती हुई ज्यादा गहरी होने लगती है तब आते हैं, विषाद के क्षण। इनका आगमन हमारी चेतना को झकझोरता है। हमारे आन्तरिक पौरुष को चैतन्य करने की कोशिश करता है। इस कोशिश से हम कितना फायदा उठाते हैं यह हमारी अपनी स्थिति पर निर्भर है। घर-परिवार में मित्रों के साथ बैठ कर आमोद मनाया जा रहा हो तो अपना तक ध्यान नहीं रहता। सब कुछ अनजाने में यन्त्र की तरह चलता रहता है। किन्तु वहीं यदि हिंस्र पशुओं से भरे जंगल से गुजरना पड़े तो अनजाने भय से मन संतप्त रहता है। यह विषाद-पूर्ण संतप्तता निरंतर चौकन्ना बनाए रखती है। सब ओर जाँच परख कर एक-एक कदम सोच समझ कर रखे जाते हैं।
विषाद की स्थिति आरम्भिक विचारशीलता की उपज है। जहाँ बिल्कुल विचार न हो अथवा सँवरे हुए परिपक्व विचार हों वहाँ विषाद नहीं होगा। पशु विषाद ग्रस्त नहीं होता क्योंकि वहाँ विचार नहीं हैं। मनुष्य राह है, पशु और देवता के बीच की। यहाँ विचार हैं। विषाद हैं और विषाद को पार करने की तकनीकें भी। पश्चिम में एक विचारक हुआ है जे. बर्टलेट। उसने एक पुस्तक लिखी है “डाईमेंशन ऑफ मैन”। बर्टलेट अपने इस चिन्तन कोश में कहता है - मनुष्य सेतु है पशु और देवता के बीच का। इस सेतु को पार करने का शुल्क है विषाद। इससे जूझकर इससे उबरा जा सकता है। पलायन करने वाले फिर पशुता के कुएँ में जा गिरेंगे। आज का आदमी विषादग्रस्तता से उबरने की तकनीक भुला कर पशुता की ओर मुड़ चला है। वह नशे का सहारा लेकर, कामुकता में डूब कर पशु की तरफ जाने को आतुर है। पशु की गहरी जड़ता में उसे विषाद की कोई अनुभूति नहीं। विषाद और पीड़ा को प्रायः एक समझने की भूल की जाती है। किन्तु इन दोनों में उतना ही अन्तर है जितना शरीर और मन में। पीड़ा पशु भी अनुभव करते हैं। पर विषाद का अनुभव उन्हीं को होता है जिनका मन सक्रिय और सचेतन है। जिनमें परिस्थितियों का विश्लेषण करने की क्षमता है। पीड़ा इसका कारण हो सकती है, पर इसके अलावा ऐसे अनेकों कारण है जब हमें किसी तरह के शारीरिक कष्ट के बिना शोक विह्वल होना पड़े। संवेदनाजन्य विचारशीलता की शुरुआत इस अनुभूति को उपजाती है।
मानव मन के जानकारों ने इस स्थिति का विवेचन किया है। मनोवैज्ञानिक आर. हाइमन ने “क्रिएटिविटी एण्ड प्रिपेयर्ड माइन्ड” में बताया है यद्यपि प्रारम्भिक विचारशील मानसिकता विषादग्रस्त होगी। किन्तु विचारों को उद्वेलित करने वाली परिस्थितियों में अनिश्चयात्मकता तथा स्वयं के ऊपर अविश्वास को वे प्रधान कारण मानते हैं। जिस किसी परिस्थिति का सामना होने पर ये दो कारण सामने आते हैं, इस मनोदशा का बोझ उठाना पड़ता है।
समाज के वर्तमान स्वरूप को परखने पर बहुसंख्यक व्यक्तियों की मनोदशा इस चारदीवारी में कैद देखी जा सकती है। यहाँ तक कि चिन्तकों में अस्तित्ववादियों का पूरा कुनबा ही विषादग्रस्त है। सार्त्र अनामुनो-जेस्पर, हाइडेगर पश्चिम के जो भी अस्तित्ववादी विचारक हैं इसी मनःस्थिति में हैं। यहाँ सवाल उपजता है कि लगातार ये विषाद के अवसर क्यों? यदि यह हमारी चेतना को झकझोरता है, उसकी बेहोशी तोड़ कर सोचने-समझने के लिए मजबूर करता है, तो हमारी यात्रा यहाँ से चलकर एक नव जीवन की शुरुआत तक होनी चाहिए। घटित होनी चाहिए-एक आत्म क्रान्ति। यदि यह आत्म क्रान्ति घटित होते नहीं दीख रही तब हमारी विचार प्रणाली में कहीं-कहीं जरुर भारी भरकम भूल है। अवश्य कहीं-कहीं हमारा विचारतन्त्र दोष-ग्रस्त है।
यूनानी कथाकारों ने अपनी कथाओं में इस दोषग्रस्तता को स्पष्ट किया है। ऐसी ही एक कथा पर कामू ने एक ग्रन्थ लिखा है “द मिथ ऑफ सिसिफस”। सिसिफस को सजा दी है देवताओं ने कि वह पत्थर को पहाड़ तक खींच ले जाए और सजा का दूसरा हिस्सा यह है कि जैसे ही वह शिखर पर पहुँचेगा, वैसे ही पत्थर उसके हाथ से लुढ़क जाएगा। फिर से वह नीचे जाए और पत्थर खींचे और चोटी तक जाए फिर यही होगा। फिर-फिर यही होता रहेगा। कथा का उल्लेख करता हुआ कामू कहता है। हम सिसिफस हैं, जो अपने विचारों के दोष से विषादग्रस्त हैं। कहानी अलग-अलग हो सकती है। पहाड़ अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन सिसिफस हम सब हैं जो मनुष्यता के सेतु को पार कर देवत्व की ओर नहीं बढ़ रहे। अनेकानेक परिस्थितियों की छान-बीन करने वाले हम सब उनका स्वयं की मनःस्थिति के सापेक्ष विश्लेषण करने में असमर्थ रहते हैं। कामू के अनुसार परिवर्तनशील परिस्थितियों का निर्माण इसलिए हुआ कि हमारी मनःस्थिति का प्रत्येक पहलू-तराश कर खराद कर चमकदार बनाया जा सके।
पर दोषपूर्ण विचार प्रणाली ऐसा करने कहाँ देती है। यही कारण है विषाद की उपयोगिता हमारे अपने जीवन में सिद्ध नहीं हो पाती। अनेकों अवसर आ चुकने के बावजूद आज भी हमें पहले की दशा में, पहले की तरह, पछताने, हाथ मलने, सिर धुनने के अलावा और क्या मिला है? हमारी विचार प्रणाली का प्रधान दोष यह है कि हम प्रत्येक अनुभूति का कारण बाहर तलाशते हैं। इस ढूँढ़-खोज के बाद उसमें फेर बदल करने की कोशिश करते हैं। यह प्रक्रिया पूरी तरह गलत तो नहीं पर त्रुटिपूर्ण जरूर है। अनुभूति सिर्फ बाह्य दशा पर निर्भर नहीं होती। यह कैसी और कितनी क्यों न हो? पदार्थ का अस्तित्व होते हुए इन्द्रिय संवेदना के बिना उसका अनुभव नहीं हो सकता और मन के बिना अनुभव पर विचार कर सकना सम्भव नहीं। मन की वकीली जिरह का तब तक कोई समाधान नहीं जब तक बुद्धि कुशल न्यायाधीश की तरह निर्णय न करे। यानि कि बात गहरी है पदार्थ तक सीमित नहीं और अनेकों चीजें हैं जो छान-बीन के योग्य हैं।
यह छान-बीन यदि की जा सके तो आश्चर्यजनक तथ्य हाथ लगेंगे। तब पता चलेगा दोषी बेचारे पदार्थ परिस्थिति नहीं हम स्वयं है। इन में यदि कहीं कोई दोष है भी तो बहुत मामूली। क्योंकि ये तो लम्बी शृंखला की एक कड़ी भर हैं। एक सुदीर्घ प्रक्रिया के घटक मात्र हैं और सर्वविदित तथ्य है कि मात्र एक घटक से प्रक्रिया की समग्र छान-बीन नहीं होती है। जहाँ इस छान-बीन की समग्रता हमारे जीवन में शुरू होती है, घटित होने लगती है एक आत्म-क्रान्ति। विषाद के क्षण-सीखने के अवसर बनने लगते हैं।
गीताकार के अनुसार अर्जुन की जीवन व्यापी क्रान्ति की शुरुआत ऐसे ही अलभ्य अवसर से हुई। इसी कारण प्रथम अध्याय का नामकरण ही विषादयोग कर दिया। प्रकारान्तर से अन्य योग इसी से निकले। विषाद गीता की ज्ञान गंगा का गोमुख सिद्ध हुआ। स्थिति पर मनन करने से पता चलता है कि अर्जुन को कोई शरीर कष्ट न था। कष्ट था मानसिक कारण से बनी सामने आयी परिस्थिति। उसने भी पहले बाह्य परिस्थिति का विवेचन करके निर्णय लिया भाग चलो। पलायन वाद का जामा सिर्फ इसलिए ओढ़ा गया क्योंकि विचार प्रणाली दोष पूर्ण थी। भगवान गुरु ने इसे सुधारा “आत्मन् विद्धि” उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत” अर्थात् विचार न कर पाने के दोष स्वयं की सत्ता को निरन्तर अवसाद में मत डालो। तथ्य समझ में आने पर घटित हुई एक आत्म क्रान्ति। जिसके हाथ गाँडीव का बोझ नहीं सँभाल पा रहे थे, उसी की वीरतापूर्ण हुंकार ने युगक्रान्ति कर डाली। धरती पर स्वर्गिकता मुस्कराने लगी।
एक मृत बालक की लाश को लेकर उसके कुटुम्बी शमशान घाट गये। उस समय बारिश पड़ रही थी। एक पेड़ के नीचे बैठ कर वे लोग विचार करने लगे कि अंत्येष्टि कैसे की जाये?
लाश की गंध पाकर कई जानवर वहाँ एकत्रित हो गये और अपने-अपने लाभ को ध्यान में रखकर उन लोगों को सलाह देने लगे।
सियार ने कहा उसे जमीन में गाढ़ दें। मनुष्य मिट्टी से ही पैदा होता है उसी में उसे स्थान मिलना चाहिए।
गिद्ध ने कहा लाश की दुर्गति न करें उसे हवा धूप द्वारा सूख जाने का अवसर दें।
कछुए ने कहा इसे पानी में बहा दें। जल समाधि सबसे उत्तम है।
लाश लाने वाले, लोगों ने अपने अपने लाभ की दृष्टि से कही बातों को समझ लिया और टेढ़ी आँखें करके कहा- आप लोगों की सलाह की हमें तनिक भी आवश्यकता नहीं है। आप लोग चले जाये हमें जैसा उचित लगेगा अपनी समझ से करेंगे।
इस आत्मक्रान्ति के अनेक अवसर हमने भी पाए हैं, पा रहे हैं,और पाएँगे। यदि इन महत्वपूर्ण अवसरों को पहचानना सीख जाएँ। स्वयं के मन को, दोषों को समझ सकें, इनका निवारण कर सकें। मनःस्थिति बदलें तो परिस्थिति बदलने का सूत्र धारण कर पाएँ, तो हमारे जीवन में भी विषाद योग हो जाएगा। विषाद से संतप्त मनोभूमि से उगा योग का वह वट वृक्ष स्वयं के साथ अनेकों को अपनी शीतलता से त्राण दिलाएगा। अनुभूतियों का पिटारा बनी जिन्दगी में यह एक ऐसी चिर स्थाई अनुभूति डाल जाएगा जिसको पाकर न केवल जीवन मुस्कराएगा बल्कि पार्थ की तरह भगवान के यन्त्र बनकर अनेकों को खोई मुसकान दे सकेंगे।
क्रान्ति का अर्थ है “नवीन संरचना”, “आमूलचूल परिवर्तन।” यह परिवर्तन चाहे सामाजिक हो, आर्थिक, राजनीतिक, नैतिक, साँस्कृतिक अथवा धार्मिक कुछ भी हो, सभी के मूल विचार में विचार-क्रान्ति ही सन्निहित होती है। जब मनुष्य को एक सामाजिक संरचना अथवा व्यवस्था पुरानी या असंतोषजनक लगने लगती है, उसी समय से उसके मन में उथल-पुथल मचने लगती है। तब एक ऐसी व्यवस्था की आवश्यकता अनुभव की जाने लगती है, जो तत्कालीन समय और समाज के अनुरूप हो और उसकी शान्तिमय प्रगति में सहायक भी। प्रारंभ में ऐसी हर एक क्रान्ति का रूप वैचारिक ही होता है। बाद में यह अपने साकार रूप में आती है। इस प्रकार यह कहना अत्युक्तिपूर्ण न होगा कि विचार-क्रान्ति का इतिहास लगभग उतना ही पुराना है, जितना समाज के उद्भव का इतिहास।”
यह उद्गार प्रकट किये हैं मूर्धन्य समाज शास्त्री एफ. किंर्ग्डन वार्ड ने अपनी बहुचर्चित कृति “फुटसटैप्स इन सिविलाइजेशन” में। यह सत्य है कि आदिकाल में विचार-बुद्धि के उदय के साथ ही मनुष्य की भौतिक स्थिति में परिवर्तन होना आरंभ हो गया होगा। जब एक परिस्थिति एवं स्थिति उसे कष्टकर व असह्य लगती होगी, तो उसके विचार तंत्र सक्रिय होते होंगे और वह नई स्थिती एवं परिस्थिति की खोज के लिए प्रयास आरंभ करता होगा। इस प्रकार यह परिवर्तन उसके लिए कुछ समय तक संतोषजनक रहता होगा और फिर वही प्रक्रिया आरंभ होती होगी अर्थात् प्रारंभ में विचार एवं पुनः उसका मूर्तिमान रूप। यह प्रक्रिया जब व्यक्तिगत होती है, तो प्रगति कहलाती है और जब सामूहिक बन जाती है, तो वही ‘क्रान्ति’ कहलाने लगती है। “इन दि बिगनिंग” नामक पुस्तक में जी. ईलियट स्मिथ कहते हैं कि मानवी विकास के आरंभ काल में चूँकि समाज का सर्वथा अभाव था, अस्तु यह परिवर्तन व्यक्तिगत स्तर से आरंभ हुआ एवं कालक्रम में जब समाज राष्ट्र का विकास हुआ, तो क्रान्ति शुरू हो गई।
समाज के विकास के साथ क्रान्ति की शुरुआत क्यों व कैसे हुई? इस प्रश्न का उत्तर प्रिंस क्रोपाट्किन अपने निबन्ध “क्रान्ति की भावना” में देते हुए कहते हैं कि चूँकि क्रान्ति सामूहिक परिवर्तन का द्योतक है, अतः समाज के किसी क्षेत्र विशेष में आमूल-चूल परिवर्तन उसके एक इकाई में परिवर्तन से संभव न होगा, क्योंकि समाज की प्रत्येक इकाई एक-दूसरे से सम्बद्ध है, अतएव सभी इकाइयों को एक साथ वाँछित साँचे में ढाल कर ही इस लक्ष्य की प्राप्ति की जा सकती है। वे कहते हैं कि इन्हीं परिस्थितियों में क्रान्ति का जन्म होता है। एक ऐसी क्रान्ति जिसकी आँधी-तूफान रूपी सशक्त विचारधारा की चपेट में आकर समाज के समस्त तत्कालीन अवाँछनीय तत्व समाप्त हो जायँ और उनकी जगह ऐसे युगानुकूल तत्व ले लें, जो मानव समाज को शान्ति संतोष की विचारधारा से अनुप्राणित कर दें।
मूर्धन्य पुराविद् प्रो. गोर्डन चाइल्ड अपनी रचना “मानव प्रगति की कहानी” के “नव पाषाण युगीन क्रान्ति” अध्याय में लिखते हैं कि हिमयुगों की दीर्घकालीन अवधि में बाह्य प्रकृति के प्रति मनुष्य के दृष्टिकोण में कोई मूलभूत परिवर्तन नहीं हुआ था, यद्यपि उसने संग्रह विधियों में भारी सुधार कर लिये थे, किन्तु हिमयुग के तुरन्त बाद प्रकृति के प्रति मानवी दृष्टिकोण में ऐसा द्रुत और आमूल-चूल परिवर्तन आया, जो भविष्य में उसके लिए लाभकारी सिद्ध हुआ। वे आगे कहते हैं कि यद्यपि हिमयुगोत्तर काल मानवी अथवा मानवेत्तर प्राणियों के विकास काल की तुलना में अत्यल्प है और लगभग इसके बीसवें भाग के बराबर है, पर इस अत्यल्प काल में ही मनुष्य ने प्रकृति के साथ सहयोग द्वारा नियंत्रित करना सीख लिया।
प्रो. गोर्डन चाइल्ड इसे भी एक क्रान्ति मानते हैं, जो सत्य है और तथ्य भी। तात्विक दृष्टि से देखा जाय, तो इसके मूल में भी विचार-क्रान्ति प्रच्छन्न नजर आयेगी। हिमयुगों के उस काल में बार-बार की प्रकृति की इस विनाशलीला से बचने के लिए तत्कालीन लोगों ने सर्वप्रथम इसके निमित्त कारणों पर विचार किया होगा और एक बार जब इसका वास्तविक कारण उन्हें ज्ञात हुआ तथा पता चला कि प्रकृति के साथ सहयोग कर इस विपत्ति से बचा जा सकता है, तो उन्होंने सामूहिक रूप से यह प्रयास आरम्भ किया। अपनी चिन्तन-चेतना व विचारणाओं में से ऐसे परिवर्तन लाकर अपने जीवन के क्रियाकलापों एवं गतिविधियों को बदला, जो प्रकृति प्रकोप के आधारभूत कारण बनते थे। इस प्रकार स्पष्ट हो जाता है कि इसके पीछे भी विचार-क्रान्ति की ही सक्रिय भूमिका थी।
इसके बाद के क्रम में हम मानवी अर्थव्यवस्था का रूपान्तरण करने वाली क्रान्ति का प्रथम दर्शन करते हैं। इसके अंतर्गत मनुष्य ने खाद्य के अपने प्रमुख स्रोतों पर नियंत्रण स्थापित किया। इसमें प्रधान स्त्रोत कृषि ही था। कृषि की भी अनेक प्रणालियाँ थीं। एक पद्धति यायावरी कृषि की थी। अमेरिका, अफ्रीका की जनजातियों में कुछ वर्ष पूर्व तक यह पद्धति जीवित थी। इसमें एक स्थान पर लगातार खेती से जमीन की उर्वरता समाप्त हो जाने के बाद कृषक उस स्थान को छोड़ कर अन्यत्र प्रस्थान कर जाते थे। कृषि की यही स्थानान्तरण संबंधी कठिनाइयों को देखते हुए उनमें विचार आया होगा कि एक स्थान पर स्थायी बस कर ही खेती की जाय। उनकी इसी विचार क्रान्ति ने ग्रामों को जन्म दिया। गाँव से फिर शहरों का विकास हुआ। उद्योग धन्धे पनपे। हल, पहियेदार गाड़ी, नौका, धातुकर्म और कीमियागीरी जैसे भौतिक और रसायन शास्त्र के आरंभिक रूपों का विकास हुआ। यह सब अधिकाधिक साधन-सुविधाएँ जुटाने के लिए विचारों में आयी उथल-पुथल के कारण ही संभव हो सका। फिर अनेक प्राचीन सभ्यताओं का विकास हुआ और आज हम उन्हीं की अगली कड़ी के रूप में विद्यमान हैं, पर इस लम्बी यात्रा में हमें अनेकानेक क्रान्तियों से होकर गुजरना पड़ा, जिनमें धार्मिक, साँस्कृतिक, राजनीतिक, आर्थिक आदि कितनी ही प्रमुख हैं। अब हम आन्तरिक युग के कहे जाते हैं, किन्तु यह भी विचारों में विकास के कारण ही संभव हो सका। यदि व्यक्ति अपने विचारों को स्थिरता और स्थायित्व प्रदान कर दे, समय और परिस्थिति के हिसाब से उनमें आवश्यक फेर-बदल की ललक ही न उठे, तो निश्चय ही उसकी प्रगति भी स्थिर हो जायेगी। समाज और राष्ट्र के साथ भी यही बात लागू होती है। उन्नति की अभीप्सा ही उन्हें निरन्तर प्रगतिशील बनाये रख सकती है और यह ‘सामूहिक अभीप्सा’ ही तो ‘क्रान्ति’ है। इसके बिना व्यक्ति व समाज की कोई गति प्रगति संभव नहीं हैं।
इस संदर्भ में इस सदी के दूसरे दशक के रूसी एनार्किसटों का एकता-समता, शान्ति-सुव्यवस्था का मत ध्यातव्य है। उनका यह मूलभूत सिद्धान्त ही था “दूसरों के साथ वह व्यवहार न करो, जो तुम्हें अपने लिए पसन्द नहीं।” स्पष्ट है कि वे दूसरों द्वारा स्वयं के प्रति भी वैसा कोई भी व्यवहार सहन करने के पक्षधर नहीं थे, जो नैतिकता, समानता, शान्ति और सुव्यवस्था के मानदण्डों पर खरा न उतरता हो और जहाँ कहीं स्थिति ऐसी दिखाई पड़े, वहाँ क्रान्ति कर दो, क्रान्ति अर्थात् विचार-क्रान्ति उनका स्पष्ट उद्घोष था। क्योंकि यही एकमात्र उपाय है उस स्थिति से निपटने और शाश्वत शान्ति एवं स्थायित्व प्राप्त करने के लिए। कितना सही कथन है वर्तमान समाज शास्त्रियों का भी यही कहना है कि जिस समाज व्यवस्था में अशान्ति होगी उसका अन्तिम परिणाम भी क्रान्ति ही है- विचार-क्रान्ति। यही हमें उससे बचा कर आगे की स्थिति में पहुँचा सकती है। यहाँ एनार्किसटों की क्रान्ति खूनी न होकर रक्तहीन विचार-क्रान्ति ही है, क्योंकि वे साधन-साध्य, मार्ग-ध्येय की पवित्रता पर जोर देते हैं।
1917 की रूसी बोलशेविक क्रान्ति पर दृष्टिपात करें, तो ज्ञात होगा कि जारशाही की साम्राज्यवादी और दमनकारी नीतियों से परेशान होकर ही वहाँ की जनता को उसके विरुद्ध आवाज उठानी पड़ी थी। उनमें विचार चेतना जगी, तो क्रान्ति हो गई। भारत में अँग्रेजी उपनिवेशवाद व इटली में आस्ट्रियाई उपनिवेशवाद की समाप्ति, अमेरिका में दास प्रथा का अन्त, फ्राँस, चीन, क्यूबा तथा यूरोप में साम्यवादी देशों में हुई क्रान्तियाँ- इन सभी में प्रारंभ में प्रखर विचार चेतना ही प्रकारान्तर से काम करती रही है, जिसके परिणाम स्वरूप बाद में स्थिति बदली।
इस प्रकार यदि हमारे राष्ट्र व समाज के विभिन्न क्षेत्रों में हुई क्रान्तियों का सूक्ष्मतापूर्वक अध्ययन करें, तो पायेंगे कि उनमें से प्रत्येक के मूल में विचार-क्रान्ति निहित थी। यहाँ तक कि सृष्टि संरचना के लिए भी वही कारणभूत रही है। भगवान् सत्ता ने यदि “एकोऽहम् बहुस्यामि” का निश्चय न किया होता, तो शायद यह धरती आज वीरान और वियावान ही बनी रहती, पर विचारों में उथल-पुथल हुई और एक सुन्दर सृष्टि बन गई। संकल्प बल ने मूर्तिमान रूप धारण कर लिया, किन्तु आज वही सृष्टि भारी उथल-पुथल के दौर से गुजर रही है। मानवी अस्तित्व खतरे में पड़ा दिखाई दे रहा है। ऐसी दशा में उसी विचार-क्रान्ति की आवश्यकता है, जो अति प्राचीन काल से चली आ रही है, पर इस बार की विचार-क्रान्ति मनुष्य को अध्यात्म की ओर मोड़ देगी, क्योंकि यह उसका चरमोत्कर्ष है। इसके आगे उसकी गति नहीं और मनुष्य को भी बाधित होकर उसे स्वीकारना पड़ेगा। भू उपग्रह जब छोड़ना होता है, तो उसके साथ राकेटों की एक शृंखला संलग्न कर दी जाती है, जिनमें से प्रत्येक एक के बाद एक, उपग्रह को उदग्रडडडड दिशा में लेता चला जाता है किन्तु जब शृंखला के अन्तिम राकेट की बारी आती है, तो वह क्षैतिज दिशा में मुड़ कर उपग्रह को उसकी स्थायी क्षैतिज कक्षा में स्थापित कर देता है। यही उसकी लक्ष्य है और चरम स्थिति भी।
विचार-क्रान्ति की अब तक की चरम स्थिति बुद्धि का चरमोत्कर्ष है। अब आगे उसकी सरल रेखीय गति संभव नहीं। वह दिशा बदलने वाली है। पेण्डुलम जब चरम अवस्था पर पहुँच जाता है, तो उसकी दिशा स्वतः बदल जाती है। विचार-क्रान्ति का यह अन्तिम पड़ाव है, अस्तु आगे उसकी गति बुद्धि से भाव क्षेत्र, भौतिक से अध्यात्म क्षेत्र की ओर मुड़ने वाली है। विश्व के वर्तमान घटनाक्रमों पर दृष्टि डालने पर इसकी स्पष्ट झलक झाँकी मिलने भी लगती है कि इस प्रक्रिया का शुभारंभ हो चुका है और अगले ही दिनों हम भाव-जगत में पदार्पण करने वाले हैं। आत्मिकी का यह क्षेत्र निश्चित ही युगान्तकारी होगा।
विचार-क्रान्ति की अब तक की चरम स्थिति बुद्धि का चरमोत्कर्ष है। अब आगे उसकी सरल रेखीय गति संभव नहीं। वह दिशा बदलने वाली है। पेण्डुलम जब चरम अवस्था पर पहुँच जाता है, तो उसकी दिशा स्वतः बदल जाती है। विचार-क्रान्ति का यह अन्तिम पड़ाव है, अस्तु आगे उसकी गति बुद्धि से भाव क्षेत्र, भौतिक से अध्यात्म क्षेत्र की ओर मुड़ने वाली है। विश्व के वर्तमान घटनाक्रमों पर दृष्टि डालने पर इसकी स्पष्ट झलक झाँकी मिलने भी लगती है कि इस प्रक्रिया का शुभारंभ हो चुका है और अगले ही दिनों हम भाव-जगत में पदार्पण करने वाले हैं। आत्मिकी का यह क्षेत्र निश्चित ही युगान्तकारी होगा।
विचार-क्रान्ति की अब तक की चरम स्थिति बुद्धि का चरमोत्कर्ष है। अब आगे उसकी सरल रेखीय गति संभव नहीं। वह दिशा बदलने वाली है। पेण्डुलम जब चरम अवस्था पर पहुँच जाता है, तो उसकी दिशा स्वतः बदल जाती है। विचार-क्रान्ति का यह अन्तिम पड़ाव है, अस्तु आगे उसकी गति बुद्धि से भाव क्षेत्र, भौतिक से अध्यात्म क्षेत्र की ओर मुड़ने वाली है। विश्व के वर्तमान घटनाक्रमों पर दृष्टि डालने पर इसकी स्पष्ट झलक झाँकी मिलने भी लगती है कि इस प्रक्रिया का शुभारंभ हो चुका है और अगले ही दिनों हम भाव-जगत में पदार्पण करने वाले हैं। आत्मिकी का यह क्षेत्र निश्चित ही युगान्तकारी होगा।
उसने अपने अधीनस्थ कर्मचारियों को हिदायत दी। देखो मुझे अपने पर भरोसा नहीं है। जब भी कीमती कपड़ा आता है, मैं ललचा जाता हूँ। इस पुरानी आदत को बुढ़ापे में बदलना जरा कठिन है। तुम सब एक ख्याल रखना कि जब भी मुझे कपड़ा चुराते देखो तो बस इतना भर कह देना “उस्तादजी! झण्डी!” बस मैं सचेत हो जाऊँगा।
शिष्यों ने पूछा- “उस्ताद जी! इसका मतलब?” उसने कहा-इस सब में तुम मत उलझो मेरे लिए बस इतना इशारा ही काफी है।
एक सप्ताह तक शिष्य उस्ताद को झण्डी की याद दिलाकर रोके रहे। किन्तु इसके बाद तो बड़ी मुसीबत हो गई। किसी ग्राहक का विदेशी सूट सिलने आया। उस्ताद ने पीठ फेरी व लगा चोरी करने। शिष्यों ने टोका। उस्ताद जी झण्डी बार-बार सुनने पर उस्ताद चिल्लाया “बन्द करो बकवास। अपना काम करो। तुम्हें कुछ पता भी है, वहाँ इस रंग की झण्डी थी ही नहीं यदि इतनी झण्डियाँ लगी हैं तो एक झण्डी और लग जायगी।”
उथले नियम जीवन को दिशा नहीं दे पाते सपनों में सीखी बातें जीवन का सत्य नहीं बन पातीं। भय के कारण लोभ कितनी देर सँभला रहेगा। लोभ को स्वयं कड़ा अंकुश लगाकर नियंत्रित करना पड़ता है।
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टन्-टन्-टन् शहर के घण्टाघर की बारह चोटों ने उसकी चिन्तन कड़ियों को जैसे एक बारगी बिखरा दिया। लम्बी उसांस भर कर उसने एक क्षीण दृष्टि निक्षेप सामने जल रही अँगीठी पर किया। अंगारों की धधकन को राख अपने आवरण में ढ़कने लगी थी। ऊष्मा-ऊर्जा पूरी तरह चुकती इसके पहले वह उठी। उठकर कुछ कोयले लाकर अँगीठी में डाले। हाथ से पंखा झलकर उन्हें नयी प्राण वायु दी। नयी हवा में साँस ले कोयले-अँगारे बन धधकने लगे और वह..., अपने चिन्तन की कड़ियों को बटोरने की कोशिश करते हुए बुदबुदाई-अभी तक नहीं आए-बारह से ऊपर तो हो गया।
एक छोटा कमरा और किचन-यही इनका क्वार्टर था। इसी में ये दो प्राणी रहते थे- पति और पत्नी। पति तो सुबह से निकल जाते रात्रि में कब लौटेंगे कुछ ठिकाना नहीं, लौटें भी या ना लौटें कौन कहे? और पत्नी दिन भर अकेली बैठी-कमरे की ईंटों की संख्या का अनुमान लगाती रहती। खाना बनाने के अतिरिक्त करने के इस काम के सिवा और था भी क्या? सामान के नाम पर थोड़े से बर्तन और बिछौने थे। इन सबके बीच बैठे-बैठे थक जाती तो पढ़ने लगती, पढ़ते-पढ़ते थकान लगती तो निद्रा की गोद। इससे उबरो तो पति की प्रतीक्षा इस समय वही तो कर रही थी।
यही तो है सामान्य भारतीय नारी का जीवन जिसकी वह प्रतिनिधि थी। ‘नारी’ इन दो अक्षर और दो मात्राओं की चार दीवारों ने जैसे एक बाड़ा बना रखा है जिसमें आधा मनुष्य समाज कैद है और कैदी का जीवन-जिसकी प्रतिभा-क्षमता, योग्यता-प्रगति के बीज की विवशता है कि वह घुने-सड़े और गले। क्योंकि विकास के लिए जो उन्मुक्त आकाश-सुकोमल मिट्टी चाहिए वह उसकी नियति में कहाँ? नियति न न नियति नहीं। नियति बनाने वाला कौन? परमात्मा! उसे यदि यही अपेक्षित होता तो नारी को ‘जीवन वीणा’ के रूप में क्यों गढ़ता? जिसके हर तार में मार्मिक भावनाएँ भरी हैं। जिसकी हर झंकृति-किसी के दिल में प्रेरणा का राग भरती है। तब यह नियति कदापि नहीं यह है विपत्ति-जिसका निवारण.... उह.. कहते हुए उसने बुझाने लगी अँगीठी की आग को फिर भड़काया।
...वह जाने कब आएँगे। एक बज गया है। कुछ हो आदमी को अपनी देह की फिक्र तो करनी चाहिए। उसे अपने पति पर आक्रोश नहीं प्रत्युत गौरव है उनके क्रान्तिकारी होने पर। क्राँतिकारी-अर्थात् भविष्य के समुज्ज्वल क्षितिज पर नए समाज की रचना हेतु संकल्पित शिल्पी। वह यही थे ठीक ऐसे ही। तभी तो दिन उनके लिए दिन नहीं था रात्रि-रात्रि नहीं। अहो रात्रि उन्हें अपने संकल्प की दुरूह राह पर बिना रुके बिना थके चलना था और वे चल रहे थे। उसे इसमें आपत्ति कहाँ थी उलटे खुशी थी। अन्यथा राजाओं जैसे ऐश्वर्य को छोड़ साधुओं से जीवन को वह क्यों अंगीकार करती। पर ये शिल्पकार अपने कार्य में नारियों को बाधा क्यों समझते हैं? यदि नहीं तो कुमार सिद्धार्थ पत्नी को क्यों सोता छोड़ गए? क्या वह उन्हें महात्मा बुद्ध बनने से रोक लेती?
सोचते-सोचते उसने तवा अँगीठी पर रख दिया। अब वह रोटी बना ही देगी। आटे की थाली को सामने की ओर खींचा और रोटी बेलने लगी। थोड़ी देर बाद उसने जीने पर पैरों की आहट सुनी। उसके मुख पर हल्की सी स्मित की झलक आई। क्षण भर वह आभा उसके चेहरे पर रहकर चली गई और वह फिर उसी तरह काम में लग गई।
पति आए। उनके पीछे-पीछे तीन और उनके मित्र भी थे। ये आपस में बातें करते चले आ रहे थे और खूब गर्म थे। वे अपने मित्रों के साथ सीधे कमरे में चले गए। उनमें बहस छिड़ी थी। कमरे में पहुँच कर रुकी बहस फिर शुरू हो गई। भगवान जाने क्या होगा इस देश का अस्थिर नेतृत्व-स्वार्थों की बंदर-बाँट-लोक सेवी का बाना पहने लोक शोषक। अविश्वसनीयता से उपजा अलगाव-असुरक्षा से आतंक की पैदावार। यह भी कोई मनुष्य का जीवन है, कीट पतंगों-कुत्ते बिल्लियों से भी बदतर। कौन कब मसल दे, जब तक नहीं मसल रहा तब तक पेट प्रजनन के कीचड़ में डूबे रहो। मित्र के कथन को सुनकर वह बोल उठे-मनुष्य ने अपने हाथों अपनी दुर्गति की है, निर्माण के लिए भी उसे अपने फौलादी भुजदण्ड उठाने होंगे। भगवती बाबू ठीक कहते हैं जुल्म को मिटाने के लिए अपनी खुशियों को तो होमना ही होगा। इससे वे डरें जो बुज़दिल हैं। मातृभूमि के लिए सर्वस्व न्यौछावर करने वालों को डर क्या? तीसरे ने समर्थन किया।
ये सभी इसी तरह बातों में लगे थे। इतने में वह आयी और इन सबके बीच में चार थालियों में खाना लगा दिया निकट ही पानी के गिलास रख दिए। उसे देखते ही सबके चेहरे की थकान मिट गई। भाभी आपने खाना देकर तो हम लोगों को नए प्राण दे दिए। एक ने कह ही दिया। जवाब में वह हलके से हँस दी। भोजन के बीच-बीच में इसी तरह हँसी मजाक और विचारपूर्ण चर्चा होती रही। भोजन की समाप्ति के बाद मित्र मण्डल चला गया।
अब वे दोनों ही थे-
“क्यों जी! आपकी क्रान्ति में मैं भाग नहीं ले सकती?” उसने-आज अपने मन की बात कह दी। लगातार के इस बन्दी जीवन की अकर्मण्यता से वह ऊब गई थी। निठल्लापन किसे कुँठित और बोझिल नहीं करता?
“तुम।”? भगवती बाबू शायद इस प्रस्ताव के लिए तैयार नहीं थे। उनकी आश्चर्यपूर्ण मुद्रा में इसी भाव की झिलमिलाहट थी।
“मैं क्यों नहीं?”
प्रतिप्रश्न के उत्तर में उन्होंने समझाने के भाव में कहा, “इस काम में कहाँ कहाँ नहीं भटकना पड़ता न कोई मान-सम्मान। उलटे अपमान भले हो जाए। कुछ निश्चित नहीं...” वे कहते जा रहे थे और सुनते हुए वह सोच रही थी। लाखों कोशिशें अनेकानेक संत-महात्माओं-महापुरुषों के प्रयत्न इस समाज का कायाकल्प नहीं कर सके, पुनर्रचना नहीं हो सकी, इसका सिर्फ यही कारण रहा कि जड़ की उपेक्षा कर वे पत्तों पर पानी छिड़कते रहे, और जिसकी जड़ में दीमक लगी है उस वृक्ष की सिंचाई “सोचकर वह हँस पड़ी। हँस क्यों रही हो? बातों के बीच में इस तरह हँसना, शायद उन्हें अच्छा नहीं लगा।
“दीमक लगी जड़ वाले वृक्ष के पत्तों की सिंचाई की बात सोचकर हँस रही थी।”
दीमक, जड़, वृक्ष, सिंचाई करने वाला पहेलियाँ न बुझाओ साफ-साफ कहो।
“आप सुनें भी तो!”
“कुछ कहो भी या पहेलियाँ सुनता रहूँ।”
“समाज की जड़ नारी है नारी के बिना क्या समाज की उत्पत्ति और प्रसार की कल्पना सम्भव है? और आज वही जड़ कुरीतियों-मूढ़ताओं की दीमक से जर्जर प्रायः है। ऐसे में जड़ विहीन वृक्ष रूपी समाज के विकास के लिए किए जाने वाले प्रयत्न क्या समग्र होंगे?” सुनते-सुनते उन्हें कथन की गूढ़ता और अपने भ्रम का भान होने लगा। अब वह किंचित गम्भीर हो सुनने लगे “नारी की जाग्रति-नारी के बिना सम्भव नहीं। पुरुष उसका बाड़ा गिरा सकता है। अर्गलाओं को तोड़ सकता है, क्योंकि ये उसी की बनाई हैं पर मानसिक भ्रान्तियाँ परिस्थितियों की विवशता के कारण उसके अपने मन की उपज हैं जिसके निवारण के लिए नारी कर्तृत्व अपेक्षित है। इस अपेक्षा को पूरा किए बिना न देशोद्धार सम्भव है और न समाज की नवीन रचना।
अब कहने के लिए बचा ही क्या था। सारी बातें साफ हो गयीं। भगवती बाबू की नींद काफूर हो गयी थी। वह सोचने के लिए विवश थे। “तुम्हारी बात सौ फीसदी सच है”। वे बोल पड़े “नारी को अपनी और समाज की नयी नियति बनाने के लिए खुद जूझना पड़ेगा,” “और पुरुष को?” इसके पहले वाक्य पूरा करें कि वह बोल उठे “उसमें सहयोगी।” दोनों की आंखें एक दूसरे से मिलीं, संकल्प की एक दीप्ति उभर कर अधरों से फिसल गई। अपने क्रान्तिवीर पति भगवती चरण व्होरा की सहधर्मिता निभाने वाली इस नारी रत्न को राष्ट्र ने दुर्गा के रूप में देखा जाना। भगतसिंह, सुखदेव, चन्द्रशेखर जैसे क्रान्तिधर्मी इन दुर्गा भाभी की प्रेरणा स्नेह सहयोग से ही धधकते अंगारे बने। समाज को आज भी नारियों से उसी क्रान्तिकारी भूमिका की अपेक्षा है।
सूर्य को प्रकाश और तेज का प्रतीक माना गया है। लेटेन्ट लाइट, डिवाइन लाइट, ब्रह्मज्योति आदि शब्दों में मानवी सत्ता में देवी अवतरण के प्रकाश के उदय की संज्ञा दी गई है। प्रातः कालीन स्वर्णिम सूर्य को सविता कहा गया है और उसे ज्ञान स्वरूप परमात्मा का प्रतीक मानकर उपासना आराधना करने का निर्देश आर्षग्रंथों में दिया गया है। महाभारत में कहा गया है- “सूर्योदय के समय जो सविता देवता की भली प्रकार उपासना करता है वह धृति, मेधा, और प्रज्ञा को प्रचुर परिणाम में प्राप्त करता है। इसी तरह सूर्य पुराण, तैत्तरीय आरण्यक, एवं श्रीमद्भागवत् में भी उदय होते हुए, अस्त होते हुए सूर्य का ध्यान करने और सब प्रकार से कल्याण का भागी बनने- पवित्र बनने की बात कही गई है।
शास्त्रकारों का कथन है कि संध्या-वंदन के अनेक विधि-विधान हैं। वे कितने ही क्रिया-कृत्यों के साथ जुड़े हुए हैं। पर उन सब में संक्षिप्त और सरल यह है कि प्रातः सायं सूर्योपासना की जाय। क्योंकि सूर्य ही प्रत्यक्ष एवं परम ज्योतिर्मय सर्व प्रकाशक सब के उत्पादक देवता हैं। प्रजा के लिए प्राण बन कर वही उदित होते हैं। ऋग्वेद एवं प्रश्नोपनिषद् में प्रातःकाल के उदीयमान सूर्य की किरणों को प्राण वर्षा करने वाली कहा गया है। इसी कारण आत्म सत्ता में प्राणत्व का आकर्षण अभिवर्धन करने के लिए प्रातःकालीन उदीयमान सूर्य का ध्यान प्रक्रिया में विशेष महत्व है।
ईश्वर के सम्बन्ध में सर्वाधिक चर्चा “प्रकाश” की ही होती है। कोई उसे हृदय में, कोई मस्तिष्क में तो कोई आकाश में मानते हैं। प्रकाश का प्रतीक सूर्य को माना जाता है जो साकार भी हैं और निराकार भी। उसका चिन्तन करते ही गति और ऊर्जा का तारतम्य उसके साथ जुड़ा हुआ स्पष्ट होता है। इन्हीं की हमें प्रधानतया समर्थ जीवन के लिए आवश्यकता भी है। बुद्धिमत्ता को भी ज्ञान रूपी प्रकाश में गिना जाता है। यह सारी विशेषताएँ सूर्य में सन्निहित मानी जाती हैं।
प्रकाश की दिव्य ज्योति दर्शन की ध्यान-धारणा में ईश्वर को निराकार प्रकाश पुँज के रूप में स्वर्णिम सविता के रूप में मानकर उसके तमोनाशक-पापनाशक आनन्दकारक सद्गुणों को जीवन में उतारने का प्रयास किया जाता है। प्रकाश ध्यान का आरंभ सूर्य को पूर्व दिशा में उदय होते हुए परिकल्पित करने की भावना से होता है। जिसमें साधक की भावना रहती है कि सविता देव से निस्सृत दिव्य किरणें अपने कायकलेवर में प्रवेश करती हैं और तीनों शरीरों को असाधारण रूप से सशक्त बनाती हैं। स्थूल शरीर को अग्निपिण्ड, सूक्ष्म-शरीर को प्रकाशमय, ज्योतिर्मय तथा कारण शरीर को दीप्तिमय, क्रान्तिमय, आभामय बनाती हैं। समूची जीवन सत्ता ज्योतिर्मय हो उठती है। इस स्थिति में स्थूल शरीर को ओजस्, सूक्ष्म को तेजस् और कारण शरीर को वर्चस् के अनुदान उपलब्ध होते हैं। इस ध्यान-धारणा का चमत्कारी प्रतिफल साधक को शीघ्र ही दृष्टिगोचर होने लगता है। स्थूल शरीर में बल, उत्साह एवं स्फूर्ति, सूक्ष्म -शरीर में संतुलन, ज्ञान-विवेक, और कारण शरीर में श्रद्धा एवं भक्ति का दिव्य संचार इस प्रकाश ध्यान के सहारे उठता, उभरता दीखता है। तीनों शरीर इन अनुदानों सहित अवतरित होने वाले प्रकाश से परिपूर्ण होते चले जाते हैं। यह संकल्प जितना गहरा होता है, उसी अनुपात से चेतना में उपरोक्त विविध विशेषताएँ, विभूतियाँ उभरती चली जाती हैं। इस प्रकार यह ध्यान साधना आत्म-सत्ता के बहिरंग एवं अन्तरंग पक्ष को विकसित करने में असाधारण रूप से सहायक सिद्ध होती है। सामान्य सी लगने वाली यह साधना असामान्य प्रभाव उपलब्ध कराती है।
सविता के प्रकाश ध्यान का प्रथम चरण उसकी दिव्य किरणों का प्रवेश आत्मसत्ता में कराने का है। दूसरा चरण अन्तः सूर्य की मान्यता परिपुष्ट करके उसका प्रकाश बाह्य जगत में फैलाने का है। इसे अपने अनुदान विश्व मानव के लिए प्रेरित करने की प्रक्रिया कह सकते हैं। प्रथम चरण को संग्रह और दूसरे को विसर्जन कह सकते हैं। ध्यान करते समय अन्तः क्षेत्र में सूर्योदय होने की मान्यता की जाती है। स्थूल शरीर का मध्य केन्द्र नाभि चक्र है जिसे विज्ञान की भाषा में सोलर प्लेक्सस या एबडामिनल ब्रेन भी कहते हैं। सूक्ष्म शरीर का हृदय चक्र कार्डियक प्लेक्सस है। इनमें से किस साधक को किस केन्द्र पर ब्रह्म चेतना के प्रतीक सविता देव के उदय की भावना करनी चाहिए। इसका निर्धारण अपनी व्यक्तिगत स्थिति का सूक्ष्म पर्यवेक्षण करते हुए करना होता है।
अन्तः सूर्य की धारा परिपक्व होने पर उसका प्रकाश निकटवर्ती क्षेत्र को प्रकाशित करता ही है, साथ ही उसका प्रभाव बाह्य जगत में भी फैलता है। इससे वातावरण में किन्हीं सामयिक सत्प्रेरणाओं को सुविस्तृत किया जा सकता है। मनुष्य के किसी वर्ग विशेष को उपयोगी प्रेरणाओं से प्रभावित किया जा सकता है। व्यक्ति विशेष या समष्टि की आध्यात्मिक सेवा भी इस आधार पर की जा सकती है। मानवेत्तर प्राणियों पर भी इसका प्रभाव पड़ सकता है। इसी प्रकार वनस्पति जगत् पदार्थ सम्पदा की स्थिति में सुधार करने के लिए भी अन्तः सूर्य की क्षमता का परिपोषण होना संभव है। यह कितना प्रभाव उत्पन्न कर सकेगा, यह इस पर निर्भर है कि साधक की संयम तपश्चर्या मनोबल और श्रद्धा किस स्तर के हैं। यह समर्थता साधना की प्रखरता और व्यक्तित्व की उत्कृष्टता पर निर्भर रहती है।
वेद, उपनिषद्, दर्शन, मनुस्मृति, पुराण तथा तन्त्रशास्त्रों में सूर्योपासना का विस्तृत वर्णन किया गया है। मनुस्मृति में बताया गया है कि सूर्य से वर्षा, वर्षा से अन्न और अन्न से प्राणियों का अस्तित्व है। सूर्य प्रकाश के अभाव में जीवन के अस्तित्व की कल्पना भी नहीं की जा सकती। महाभारत वन पर्व 3/36 में सूर्य को विश्व का नेत्र तथा समस्त प्राणियों की आत्मा बताया गया है।
सविता देवता की उपासना से जहाँ भौतिक और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग प्रशस्त होता है, वहीं उनसे सतत् सत्कर्म करते रहने की भी प्रेरणा मिलती है। वह कर्मठता क्रियाशीलता एवं प्रखरता के प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। उस तथ्य को उद्घटित करते हुए ऐतरेय ब्राह्मण 33/3/5 में देवराज इन्द्र ने रोहित को कर्म कोशल का उपदेश देते हुए कहा कि “सूर्य की श्रेष्ठता इसलिए है कि वे लोकमंगल के लिए सतत् गतिशील रहते हुए तनिक भी आलस्य नहीं करते हैं। अतः सूर्योपासक को भी चाहिए कि वह अपने इष्ट की भाँति पथ पर निरन्तर चलता ही रहे।
वस्तुतः सूर्य साधना सार्वभौम साधना है। सर्व सुगम एवं सब धर्मों के लिए प्रयुक्त की जा सकने वाले इस अध्यात्म उपचार को महाकाल की साधना हेतु प्रयुक्त किया जा सकता है एवं प्राप्त प्रेरणाओं को जीवन में उतारकर निज का कायाकल्प किया जा सकता है। नवयुग की अगवानी के लिए सविता देवता की ही उपासना अगले दिनों की जाएगी।
फ्राँस बड़ा देश था हालैंड छोटा। एक बार फ्राँस ने हालैंड पर हमला किया पर बहुत प्रयत्न पर भी वह जीत न सका।
फ्राँस के शासक ने सेनापति को बुलाकर पूछा कि क्या कारण है कि हम लोग इतने साधन सम्पन्न होते हुए भी एक छोटे से देश को न जीत सके।
सेनापति ने नम्रतापूर्वक कहा लड़ाइयाँ मात्र साधनों के बल पर ही नहीं जीती जातीं। उस देश के नागरिकों का मनोबल और सहयोग भी इसमें अपेक्षित होता है। इस दृष्टि से हालैंड के नागरिक हम से आगे हैं और वे सहज पराजय स्वीकार नहीं करते।
स्वप्न वस्तुतः है क्या? इस पर लम्बे समय से अध्ययन कार्य चलता रहा है, पर भिन्न-भिन्न शोधकर्ता अब तक अपने अलग-अलग निष्कर्ष पर पहुँचे हैं। शरीरशास्त्री मस्तिष्कीय क्रिया का मात्र इसे एक अंग भर मानते हैं, तो मनोवैज्ञानिक इसमें तरह-तरह के संकेत सूत्र के दर्शन करते हैं। फ्रायड ने इसे दमित-इच्छाओं का परिणाम बताया, तो जुँग ने इसमें भविष्य की झाँकी की। मूर्धन्य अमेरिकी खगोल भौतिकीविद् कार्ल साँगा ने इसे विकासवाद से जोड़ दिया जबकि ईवान्स जैसे शरीर विज्ञानी भी इसे ब्रेन-फिजियोलॉजी का एक हिस्सा मान कर छुट्टी पा लेते हैं। रूस एवं अमेरिका जैसे कई देशों में इसे भविष्य सूचक महत्वपूर्ण संकेत मान कर उससे संबंधित अनेक संस्थान स्थापित किये गये हैं, पर इनमें से किसी ने भी अब तक स्वप्न को रोग-विज्ञान से नहीं जोड़ा था। रूस के चिकित्सक डॉ. कसाटकिन ने ही सर्वप्रथम इसे रोग विज्ञान से जोड़ कर इस दिशा में एक नए अध्याय की शुरुआत की।
प्रसिद्ध चिकित्सक व रूसी वैज्ञानिक वासिली निकोलायेविच कसाटकिन की इस दिशा में गहरी अभिरुचि एवं अनुसंधान संबंधी लगन कैसे उत्पन्न हुई, इसका भी एक रोचक प्रसंग है। वे अपनी तत्संबंधी पुस्तक “थ्योरी ऑफ ड्रीम्स” में इसका उल्लेख करते हुए लिखते है कि बात उन दिनों की है, जब द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान रूस पर ताबड़तोड़ जर्मनी के हमले हो रहे थे, तब वे एक चिकित्सक के रूप में लेनिनग्राद में कार्यरत थे। इन्हीं दिनों सपनों के प्रति इनका लगाव बढ़ा और उन ने उस पर अनुसंधान करने की ठान ली। हुआ यों कि एक दिन उनके पास चिकित्सा हेतु एक रोगी महिला पहुँची। प्रथम परीक्षण के बाद जब किसी प्रकार की व्याधि का पता न चला तो बीमार ने कई दिनों से बार-बार आने वाले अपने एक डरावने स्वप्न की चर्चा डॉक्टर से की। उक्त महिला स्वयं को एक बालू के टीले में सोयी हुई पाती और फिर अचानक टीले का एक हिस्सा टूट कर उसके चेहरे को पूरी तरह ढक लेता, जिससे साँस संबंधी कठिनाई उत्पन्न हो जाती। यह परेशानी इतनी गंभीर होती कि जगने पर भी उसे दम घुटा-घुटा सा अनुभव होता- इस स्वप्न चर्चा के बाद कसाटकिन ने यों ही महिला का मन बहलाने के लिए उसका एक्सरे फोटोग्राफ ले लिया। दूसरे दिन प्लेट की प्रोसेसिंग की तो वह यह देख कर सन्न रह गये कि उस महिला का फेफड़ा क्षयरोग से ग्रस्त था जब कि बहिरंग में कोई लक्षण न थे।
बस, यहीं से स्वप्न संबंधी अध्ययन के प्रति उनका रुझान पढ़ा और वे अपना अधिकाँश समय लोगों से मिलने एवं स्वप्न-संबंधी चर्चा में बिताने लगे। फिर वे उन स्वप्नों का विश्लेषण कर किसी निष्कर्ष पर पहुँचने का प्रयास करते। इनमें अनेक बार उन्हें सफलता भी मिली और बीमारी का सही-सही अनुमान लगाने में वे कई बार सफल हुए। ऐसे ही एक विचित्र, किन्तु रोचक सपने का विवरण प्रस्तुत करते हुए वे अपनी पुस्तक में लिखते हैं कि एक बार उनके पास बड़ा ही विलक्षण केस आया। एक व्यक्ति उनके पास आकर अपने सपने का उल्लेख करते हुए कहने लगा कि सुबह-सुबह कई सप्ताह से उसे लगभग एक ही स्वप्न दिखाई पड़ता है कि वह अपना काम निपटा कर अपने बिस्तर में आराम कर रहा है। तभी एक केकड़ा सामने से आता दिखाई देता है, जो क्रमशः नजदीक आते-आते उसके बिस्तर तक पहुँच जाता है और फिर उसके पेट में चढ़ कर त्वचा को काटते हुए अंदर प्रवेश करने लगता है। उसकी चीख निकल पड़ती है और इसी के साथ स्वप्न भंग हो जाता है, वह जग पड़ता है।
स्वप्न को सुन कर डॉ. कसाटकिन ने अनुमान लगाया कि इसके पेट में निश्चय ही कोई बीमारी पनप रही है, जो अपनी आरंभिक अवस्था में होने के कारण अपनी स्थूल अभिव्यक्ति नहीं कर पायी है, पर सूक्ष्म मन उसकी उपस्थिति का संकेत प्रतीकात्मक रूप में लगातार देते हुए व्यक्ति को उसके प्रति सचेत करना चाहता है। ऐसा निश्चय कर कसाटकिन ने उस व्यक्ति के पेट का सूक्ष्म परीक्षण करना आरंभ किया। कई दिनों के प्रयास से उन्हें उसके पेट में एक गाँठ की मौजूदगी का पता चला। बाद में यह भी ज्ञात हो गया है कि वह कैंसर की गाँठ है, क्योंकि इसके कुछ ही दिनों पश्चात् उस में दर्द आरम्भ हो गया। केकड़ा कैंसर की गाँठ के प्रतीक के रूप में ही उसे दिखाई देता था।
इसी प्रकार एक महिला को कई दिनों से बराबर स्वप्न आता था कि उसके शरीर को बुरी तरह क्षतिग्रस्त किया जा रहा है। इस स्थिति में वह इतना क्षत-विक्षत हो जाती कि साँस लेने में कठिनाई अनुभव करने लगती। ऐसा महसूस होता कि अब वह मरने ही वाली है। ताबूत भी सामने ही रखा दिखाई पड़ता। बस यहीं उसकी नींद टूट जाती। सपना भंग हो जाता। डॉ. कसाटकिन ने जब उसका गहन परीक्षण किया, तो मालूम हुआ कि उसे टी.बी. का संक्रमण हो चुका है, जो अभी बिल्कुल आरंभिक अवस्था में है।
ऐसे अनेकों रोग जन्य सपनों की चर्चा उन्होंने अपनी पुस्तक में की है और इनके अध्ययन से वे जिस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं, उसका भी विशद् उल्लेख है। इस संदर्भ में वे जिस सिद्धान्त का प्रतिपादन करते हैं उसके अनुसार यह सब प्रक्रिया प्रमस्तिष्क का एक अविच्छिन्न अंग हैं। वहाँ की अति संवेदनशील कोशिकाएँ रात के शान्त वातावरण में जबकि मस्तिष्क बाहरी प्रभावों से सर्वथा अछूता और अप्रभावित पड़ा रहता है, और भी संवेदनशील बन जाती हैं। इस दौरान रोगजन्य उन सूक्ष्म परिवर्तनों को भी पकड़ने में वे सक्षम हो जाती हैं, जो अन्य अवसरों पर प्रायः उनकी पकड़ से मुक्त बने रहते हैं।
स्वप्नों की जहाँ निदान में महत्वपूर्ण भूमिका हैं, वहीं उन्हें चिकित्सा रूप में भी प्रयुक्त किया जा सकता है। ड्रीम थेरेपी, जिसमें निद्रा की एक विशिष्ट स्थिति में विशेष संदेश “हेट्रोसजेशन” के माध्यम से व्यक्ति को सुनाकर उसके स्नायु कोषों को उत्तेजित कर वाँछनीय मस्तिष्कीय हारमोन्स का स्राव बढ़ाया जाता है, अब कई मनोविज्ञान प्रयोगशालाओं में प्रयुक्त हो रही है। तनाव,जो नब्बे प्रतिशत रोगों का मूल कारण होते हैं, की चिकित्सा इस विधि से अब और अच्छी तरह संभव हैं।
वस्तुतः स्वप्न मनुष्य की परोक्ष चेतना प्रवेश का मार्ग सुझाते हैं। यदि मनःसंस्थान को थोड़ा भी परिष्कृत किया जा सके तो न केवल रोगों, जटिलताओं का निदान वरन् समष्टिगत घटनाक्रमों, भवितव्यताओं का पूर्वाभास भी संभव है। स्वप्न उस असीम संभावनाओं का द्वार खोलते हैं जो प्रसुप्त मस्तिष्क को जागने पर सहज ही उपलब्ध हो सकती हैं।
एक किसान का इकलौता पाँच वर्ष का बच्चा मर गया। उसे अतिसार रोग रहने गला। मन अति खिन्न रहने लगा वह अक्सर आँसू बहाया करता।
एक रात उसने सपना देखा कि परलोक में बच्चों की एक कतार खेलने के लिए कहीं जा रही हैं, सब के हाथों में जलती मोमबत्तियाँ भी है। किसान का बेटा अन्त में था। उसे देखा तो किसान प्रसन्न भी हुआ। पर बच्चे को उदास देखकर उसका कारण पूछा। उसके साथी प्रसन्नतापूर्वक आगे बढ़ रहे थे और वही पीछे भी था और उदास भी।
बच्चे ने अपने पिता को पहचान लिया और कहा आप रोते रहते हैं। वे आँसू आकर मेरी जलती मोमबत्ती को बुझा देते है। इसी से मुझे उदास भी रहना पड़ता है और बार बार जलाने के कारण पीछे भी रह जाता हूँ। आप न रोया करें तो मुझे यहाँ परेशानी न उठानी पड़ा करें।
पिता ने आँख खुलने पर अपना मन समझा लिया और स्वर्गीय आत्मा की परेशानी को समझते हुए रोना बंद कर दिया।
“एक तरुण आपसे भेंट करने का इच्छुक है” सहकारी के ये शब्द उनके भावों के महल में घुसने के लिए प्रवेश द्वार की तलाश करने लगे। वह पियानो के संगीत यान में बैठे स्वर-लहरियों के आकाश में विचरण कर रहे थे। नित्य-नियम के अनुसार आज भी सूर्य-रश्मियों के धरा-अवलोकन के एक घण्टे पूर्व से यह यात्रा शुरू हो गई थी। अपने घर में हो या या बाहर स्वदेश में हों या विदेश में बचपन से प्रौढ़ावस्था में प्रवेश तक उनका यह नियम भंग नहीं हुआ। व्यवस्थित जीवन में अनुशासन का बज्रलेप ही तो व्यक्तित्व की कीर्ति मण्डित करता है। उनके साथ यही घटित हुआ था। सामान्य जीवन से लेकर विश्वविख्यात संगीतकार बनने की यात्रा यही शुल्क चुका कर पूरी की।
सहायक जो उनका शिष्य भी था उनके प्रत्युत्तर की प्रतीक्षा में था। तन्मयता के इन उत्कर्षमय क्षणों में उसे हिम्मत नहीं हो रही थी कि वह बार-बार व्यवधान पैदा करे। संगीत के स्वरों में चढ़ाव-उतार मन्दता और...। कुशल यान चालक की तरह भावाकाश से सक्रियता की सचेतन भूमि में उतरे। पियानो एक ओर रखा। दो-तीन बार पलकें झपकाई हलकी सी अँगड़ाई लेकर अपनी अधपकी डाढ़ी में हाथ फेरा और एक गिलास पानी माँगा। खाली पानी का गिलास रखने तक वह पूर्णतया प्रकृतिस्थ हो गए। सामने खड़े व्यक्ति ने अपना निवेदन पुनः दुहराया। सुनने के क्षण उनके माथे पर क्षीण रेखाएँ उभरीं जैसे वह स्मृतियों और घटनाओं को बटोरने की कोशिश में हों। कुछ सोचते हुए उन्होंने कहा “उसे यहीं भेज दो।” शब्दों के साथ सहयोगी के पाँव दरवाजे की ओर मुड़ चले।
लगभग पन्द्रह दिन पूर्व वह पोलैण्ड से अमेरिका आये थे। सदा की भाँति इस बार भी उनकी विदेश यात्रा का उद्देश्य था, संगीत आयोजनों में भाग लेना। विश्व के अनेक देशों में उनके स्वर तरंगित हो चुके थे। आयोजनों में उमड़ती भीड़ के कारण हर किसी की लालसा यही रहती थी कि आयोजक का ओहदा उसी को सँभालने का सौभाग्य मिलें। इस बार उन्होंने यह सम्मान साधारण लुहार के लड़के को दिया था। आयोजन की सार सँभाल, टिकटों की बिक्री आदि का दायित्व उसे देने के पीछे भाव यही था कि इस गरीब बालक की कुछ आर्थिक सहायता हो जाएगी। किन्तु प्रतिद्वन्द्वियों की कुटिल चालें, मौसम की गड़बड़ी जैसे अनेक कारणों ने इस सोच पर संघबद्ध हमला कर दिया। टिकटें कम बिकीं, श्रोता कम आए ऐसे में बेचारा आयोजनकर्ता तरुण करे तो क्या करे?
कमरे की किवाड़ खुलने की आहट के साथ साधारण सी पैण्ट कमीज पहने अठारह-बीस साल के नवयुवक ने प्रवेश किया। साधारण कपड़ों में लिपटा शरीर उसकी मनोदशा बयान कर रहा था। माथे पर लहरा आए उलझे रूखे बाल, सूखे होंठ, सूज गई आँखों से स्पष्ट हो रहा था उसे कई दिनों से नींद नहीं आई। हवाइयाँ उड़ रहे उसके चेहरे पर एक नजर डालते ही उन ने सारा मजमून पढ़ लिया।
“आओ बैठो।” स्वरों में केवल कंठ माधुर्य ही नहीं पितृ सुलभ सहज स्नेह भी था।
जी। हिचकिचाहट भरे इस एक शब्द के उच्चारण के साथ वह सिमटा-सिकुड़ा खड़ा रहा।
बैठो! अब उन्होंने स्वयं हाथ पकड़ कर अपने बिस्तर पर बिठा लिया।
जिस किसी तरह बैठ तो गया। पर उसे समझ नहीं आ रहा था कि किन शब्दों के साथ उनको ये थोड़ी सी पूँजी थमाएँ। अन्य आयोजनों में उन्हें आठ-दस हजार डालर मिल जाना सामान्य बात थी। लेकिन इस बार...पर वह भी क्या करे? क्या नहीं किया? कहाँ नहीं गया? टिकटों की बिक्री के लिए कितना श्रम नहीं किया... पर..।
सामने बैठे ख्यातिनामा संगीतकार की अनुभवी आँखें उसके इस भावोद्वेलन को पढ़ रही थीं। वस्तुतः स्थूल शरीर तो एक लिफाफा भर है। इसके भीतर एक भाव शरीर है, जिसमें भाव लहरियाँ प्रति क्षण उद्वेलित होती रहती हैं। ये ही भाव स्थूल रूप लेते हैं। तरुण के भाव-मन्थन से उमग रही लहरों को गिनते हुए उन ने दो कप काफी मँगाई। एक कप उसके हाथ में आग्रहपूर्वक थमा कर दूसरी अपने होठों से लगा ली।
कुछ पल इन्हीं चुस्कियों में गुजर गए। काफी पीने के बाद लड़के की बेचैनी में कुछ कमी के लक्षण दिखाई दिए। इसे काफी का असर कहें या स्नेह का संजीवनी स्पर्श! कुछ सोचते हुए उसने जेब टटोली। हाथ में नोटों की गड्डी उलटते पलटते हुए उन्हें थमाई। शान्त भाव से उन ने नोट पकड़े गिना और एक ओर रख दिए। ये तीनों कार्य बड़े निस्पृह भाव से निःशब्द माहौल में हुए।
नोट रखकर उन ने उसके कंधे पर हाथ रखते हुए पूछा-हॉल का किराया बिजली का बिल चुक गया। “नहीं” इस एक शब्द के पात्र में उसकी समूची वेदना इकट्ठी हो गई। थोड़ा रुक कर युवक बोला “टिकटों की बिक्री से सिर्फ आठ सौ सैंतीस डालर मिले थे सो आपके सामने हैं। आप इन्हें ले लें। हॉल का किराया मैं धीरे-धीरे चुकाता रहूँगा। हताशा की एक दीर्घ निःश्वास छोड़ते हुए उसने कहा।
“कैसे चुकाओगे?” लड़के की आर्थिक स्थिति से वह अनभिज्ञ नहीं थे। साधारण लुहार की आय ही कितनी! जैसे-तैसे तो उसने इस आयोजन की हिम्मत जुटाई। सोचा था कुछ बचेगा तो नया धन्धा करूंगा पर।
“निराश मत हो॥” उसकी पीठ पर हाथ फेरते हुए वह बोले “निराशा जीवन की शत्रु है। भावों का कुचला जाना व्यक्तित्व को कुचल देता है। तुम नहीं जानते भाव और किया किस प्रकार एक दूसरे से जुड़े हैं।” भावों का पारखी बोल रहा था। पर करूं क्या? न चाहते हुए भी माथे पर चिन्ता की लकीरें घहरा आई।
उन ने कोने में रखे नोटों के बण्डल में कुछ बड़े नोट और मिलाए और ये सभी नोट उसकी जेब में रखते हुए कहा “इनमें से हॉल का किराया बिजली का बिल चुकाने के बाद भी इतना कुछ बच रहेगा कि तुम कोई नया धन्धा शुरू कर सको।”
उनके द्वारा दी गयी राशि को हाथ में पाते ही तरुण अचकचा गया। उसकी आँखें आश्चर्य से फैल गई। यह अकल्पनीय उदारता.. वह भी इस सहज ढंग से। उसे सूझ नहीं रहा था क्या कहे? कहाँ तो सोचा था आयोजन में हुए व्यय को चुकाने के लिए न जाने कितने दिन खटना पड़ेगा। तकादे... अपमान... तिरस्कार के एक पर एक दृश्य उसके मन में मचल रहे थे और कहाँ अब? इस उदारता के बाद... परिवर्तित जीवन की कल्पना में वह स्वयं को खोने लगा।
“आपका यह... अहसान...मैं.. जीवन. में कभी. कभी.. भुला... नहीं”। भावावेग के कारण शब्द गले में अटक रहे थे। उन ने उसे टोकते हुए कहा “यह अहसान नहीं, जीवन्त मनुष्य का फर्ज है।” “जीवन्त मनुष्य का” कुछ न समझते हुए उसने उनकी ओर देखा।
“हाँ” वह कह रहे थे “ मुर्दे का सहज धर्म है निष्क्रियता निष्ठुरता। मुर्दा यदि सक्रिय भी हो तो सड़न और बीमारी फैलाएगा। पर जीवन्त व्यक्ति तो वही है, जो मानव मात्र की वेदना के प्रति संवेदनशील हो। यदि तुम इसे चुकाना चाहते हो तो स्वयं संवेदनशील बनना? जीवन चेतना का औरों में प्रसार करना। संवेदनाओं का वितरण कर सके, जिसे तुम उदारता कहते हो उस परम्परा को निभा सके तो समझना न केवल तुमने मेरा अहसान चुका दिया बल्कि मुझे अहसानमन्द बना दिया।” मार्मिक ढंग से कहे गए संगीतकार के ये वाक्य उसकी किन्हीं अदृश्य गहराइयों में उतर गए।
इस घटना के बाद कालप्रवाह ने अनेकों दृश्य बदले। परिस्थितियों के ज्वार-भाटों ने उसकी और उस जैसी न जाने कितनी जिन्दगियों में उलट-फेर की। लड़का-युवक बना उसने खानों के उद्योग में करोड़ों रुपए कमाए। प्रथम विश्व युद्ध की समाप्ति पर यूरोप की शोचनीय दशा में सुधार लाने के लिए अमेरिका ने दस करोड़ डालर का ऋण स्वीकृत किया उसके वितरण का जिम्मा उसे ही मिला। ऋण वितरण करते समय उसने 1874 की इस पुरानी याद को सँजोते हुए कहा “मैं यह अमेरिका का दिया धन नहीं, पोलैण्ड के संगीतकार पेडेरेवस्की की दी गई संवेदनाएँ बाँट रहा हूँ।” संवेदनाओं के इस वितरक को अमेरिका निवासियों ने राष्ट्रपति के सर्वोच्च आसन पर बिठाया। विश्व ने इसे ‘हर्बर्ट हूवर’ के नाम से जाना। उनके राष्ट्रपति के कार्यकाल में 1930 की भयानक मन्दी आई। इसी मन्दी से ग्रसित यूरोपीय राष्ट्रों ने ऋण चुकाने में असमर्थता व्यक्त की। तो हूवर ने उदारता पूर्ण व्यवहार करते हुए कहा मेरा कार्य मनुष्य धर्म का निर्वाह है, जीवन का प्रसार है। हूवर की भाँति यदि मानव आज की विषाद पीड़ित मानवता पर स्वयं की संवेदनाओं का अमृत छिड़क सके मनुष्य धर्म का निवाह कर जीवन का प्रसार कर सके, तो आने वाला कल उसे भी लोक नायक बनाए बिना न रहेगा।
वेदमाता गायत्री को आद्यशक्ति माना जाता है। सद्बुद्धि की अधिष्ठात्री इस महाशक्ति की उपासना को सार्वभौम, सर्वजनीन कहा गया है। सन्मार्ग पर चलने की प्रेरणा हर किसी को मिले, हर व्यक्ति श्रेष्ठता का वरण करे, इसमें किसी प्रकार का मत वैभिन्य नहीं हो सकता। इसीलिए कहा जाता है कि सब धर्म, जाति, लिंग व वर्ण के व्यक्ति बिना किसी भेद के इस उपासना के मार्ग को अपना सकते हैं।
सूर्य की धूप, चन्द्रमा की चाँदनी, में बैठने का स्वच्छ वायु में साँस लेने, जलाशय से जल पीने आदि का अधिकार मात्र मनुष्य को ही नहीं, प्राणी मात्र को है। गंगा स्नान पर किसी के लिए प्रतिबंध नहीं है। इसी प्रकार सत्य बोलने, उदारता बरतने, संयम से रहने, कर्तव्य परायण रहने जैसे सत्प्रयोजनों के लिए किसी को रोका नहीं जाता, वरन् प्रोत्साहित किया जाता है। ईश्वर का स्मरण भी ऐसा ही पवित्र कार्य है जिसमें हानि की कोई आशंका नहीं है और न ऐसा कुछ है जिस पर विचार करके किसी को प्रभु प्रार्थना का अधिकारी, किसी को अनधिकारी ठहराया जा सके। गायत्री महामंत्र के बारे में भी यही बात है।
सद्बुद्धि की देवी गायत्री महाशक्ति की उपासना का अधिकार हर किसी को है। इस तथ्य को सुस्पष्ट करते हुए ‘पारस्कर ग्रह सूत्र” 2/3/10 में कहा गया है “सर्वेषाँ वा गायत्री मनु ब्रूयात्।” अर्थात् गायत्री का उपदेश सब करें। तात्पर्य यह कि सम्पूर्ण मानव जाति बिना किसी भेद-भाव के गायत्री उपासना कर सकती है। इस सामान्य बुद्धि संगत तथ्य के समर्थन में कुछ कहने की आवश्यकता नहीं, तो भी इस संदर्भ में शास्त्रों में पग-पग पर भरे पड़े प्रमाणों का अवलोकन किया जा सकता है। महाभारत में उल्लेख है,
चतुर्णामपि वर्णानाम् आश्रमस्य विशेषतः।
करोति सततं शान्ति सावित्रीं उत्तमाँ पठन्॥
अर्थात् चारों वर्ण और चारों आश्रमों में रहने वाले कोई भी व्यक्ति जो उत्तम गायत्री महामंत्र जप करते हैं, वे परम शान्ति को प्राप्त करते हैं।
देवी भागवत 12/8 के अनुसार “गायञ्पुपासना नित्या सर्व वेदैः समीरिता।” अर्थात् वेदों में नित्य गायत्री उपासना करने के आदेश को ब्राह्मणत्व की ब्रह्मतेजस् की प्राप्ति के लिए मनुष्य मात्र का कर्तव्य बताया है और अत्यन्त आवश्यक एवं महत्वपूर्ण कार्यों में गायत्री उपासना को प्रथम स्थान दिया है। जो इस धर्म-कर्तव्य का पालन नहीं करते उनकी स्थान-स्थान पर तीव्र भर्त्सना की गई है और उन्हें चाण्डाल तक कहा गया है। भले ही उन ने ब्राह्मण कुल में ही क्यों न जन्म लिया हो।
यहाँ यह समझ लेना आवश्यक है कि धर्म शास्त्रों में जहाँ-जहाँ ऐसे प्रतिपादन मिलते हैं जिनमें द्विजत्व और ब्राह्मणत्व को गायत्री के साथ जोड़ा गया है। इस प्रतिपादन का तात्पर्य इतना ही है कि उत्कृष्टतावादी चिन्तन और आदर्शवादी कर्त्तव्य अपनाकर चलने वाले जीवन क्रम में ईश्वरीय उपासना की दिव्य उपलब्धियाँ अधिक अच्छी तरह हो सकती हैं। द्विजत्व का अर्थ है दूसरा जन्म। दूसरे जन्म से तात्पर्य है पशु प्रवृत्तियों से जकड़े हुए सामान्य प्राणि जीवन से ऊँचा उठकर मानवी उत्तरदायित्वों की विशिष्टता भरी भूमिका को अपनाया जाना। नर पशु की रीति-नीति छोड़ कर देव जीवन की महानता अपनाया जाना। इसके लिए व्रत लेना पड़ता है कि वासना-तृष्णा की क्षुद्रता में कृमि कीटकों की तरह निरत नहीं रहा जायगा, वरन् मानवी उत्कृष्टता को जीवनक्रम में ओत-प्रोत करते हुए उच्चस्तरीय सिद्धान्तों को अपनाकर चला जायगा।
ऐसा व्रतशील जीवनक्रम ही द्विजत्व है। पशु प्रवृत्तियों का त्याग और देव परम्परा को धारण करने का व्रत लेना भारतीय परम्परा में एक अत्यंत आवश्यक एवं पवित्र कर्म माना गया है। इसलिए ब्राह्मणत्व का द्विजत्व का संस्कार समारोह पूर्वक किया जाता है। इसे यज्ञोपवीत संस्कार कहते हैं। इसका प्रतीक यज्ञोपवीत धारण हैं। ऐसे ही व्रतधारियों को द्विज की संज्ञा दी गई है। योगी याज्ञवलक्य में स्पष्टोक्ति है “एवं यस्तु विजानाति गायत्रीं ब्राह्मण गुरुः।” अर्थात् जो गायत्री को जानता और जपता है, वस्तुतः वही सच्चा ब्राह्मण है जो गायत्री की उपेक्षा करता, वह वेद में पारंगत होने पर भी शुद्र के समान है।
गायत्री महाशक्ति की उपासना आराधना करने वाले के लिए आदर्शवादी रीति-नीति अपनाना और लोकोपयोगी कार्यों में निरत रहने की योजना बनाकर चलना आवश्यक होता है। ऐसे कार्यों में तीन प्रमुख हैं (1) अज्ञान का निवारण (2) अनीति का उन्मूलन (3) अभावों का समापन। व्यक्तिगत रुचि, योग्यता एवं परिस्थिति के अनुसार इनमें से कोई भी लक्ष्य चुना जा सकता है। संसार के समस्त कष्टों और संकटों के यह तीन ही कारण हैं। इन्हें जितना निरस्त किया जा सकेगा, उतनी ही सुख-शान्ति स्थिर रह सकेगी और प्रगति की संभावना बढ़ेगी। अज्ञान का निवारण करने में प्रवृत्त वर्ग को ब्राह्मण, अनीति से जूझने वालों को क्षत्रिय और अभाव दूर करने में जुटे हुए लोगों को वैश्य कहते हैं। जिनमें इस प्रकार की आदर्शवादी आकाँक्षाएँ नहीं हैं, जो अपनेपन आपा-धापी तक ही सीमित हैं, जिनकी उत्कृष्टता अपनाने में कोई रुचि नहीं हैं। जो पेट-प्रजनन से आगे की बातों में रुचि नहीं लेते, जिन्हें पशु-प्रवृत्तियों में डूबे रहना ही पर्याप्त है, वह सब शुद्र हैं। यह भावनात्मक वर्गीकरण है। इसमें जाति-वंश का कोई प्रश्न नहीं है। इसे विशुद्ध रूप से आचार प्रक्रिया या आदर्श पद्धति कहा जा सकता है। यह वर्ण भेद ही प्राचीनकाल से वर्ण भेद कहा जाता है। जन्म के आधार पर किसी को शुद्र या द्विज मानना निरर्थक है। ब्राह्मणत्व की प्राप्ति गायत्री उपासना से होती है, इस तथ्य को समझा और समझाया जाना चाहिए।
ईश्वर की उपासना कोई भी कर सकता है, पर अधिक लाभ उसी को होगा जो प्रभु समर्पित आदर्शवादी जीवन प्रक्रिया भी अपनाने का प्रयत्न करेगा। ईश्वर उपासना गाड़ी का एक पहिया है और आदर्शवादिता अपनाने वाली जीवन साधना दूसरा। इन दोनों के सम्मिलन से ही सर्वतोमुखी प्रगति का रथ अग्रसर होता है। मात्र कुछ पूजा पाठ कर लेने से भी यों तो कुछ लाभ होता ही है, पर पूरा सत्यपरिणाम देखना हो तो पवित्र एवं प्रखरता भरा जीवनक्रम अपनाने की साधना के साथ उपासना करनी चाहिए। पवित्र जीवन उर्वर भूमि है और भजन उपजाऊ बीज। दोनों की व्यवस्था पर समुचित ध्यान रखा जाना चाहिए। इसी का प्रतिपादन गायत्री और द्विजत्व का समन्वय करने की संगति बिठाकर किया गया है और उससे लाभान्वित होने का तथ्य शास्त्रों में समझाया गया है।
यदि किसी की वंश या जाति को द्विज ठहराया जायगा और मात्र उसी परिवार में जन्में लोगों को गायत्री उपासना का अधिकारी कहा जायगा, तब तो निश्चित रूप से अर्थ का अनर्थ हो ही जायगा। दुर्भाग्य से पिछले दिनों कुछ ऐसी ही भूल होती रही है और अमुक जाति-वंश के लोगों को इस महाशक्ति की उपासना का अधिकारी तथा अमुक को अनधिकारी ठहराया जाता रहा है। जबकि वास्तविकता इससे सर्वथा भिन्न है। तत्वदर्शी-मानवतावादी ऋषि इतने संकीर्ण हो ही नहीं सकते थे कि वे किसी अमुक जाति-वंश को आत्मिक प्रगति के साधनों को अपनाने का अधिकारी ठहरायें और अन्यों को उससे वंचित कर दें। ऐसा पक्षपात तो बहुत ही ओछे स्तर के संकीर्ण बुद्धि, पक्षपाती और विद्वेषी लोग ही कर सकते हैं। भारतीय धर्मशास्त्रों और उनके प्रस्तुतकर्ता ऋषियों पर ऐसे आक्षेप लगने लगेंगे तो यह उस महान संस्कृति का अपमान ही होगा जिसके कारण समस्त विश्व ने इस देशवासियों को देवमानव माना था और जगद्गुरु कहकर अपना मस्तक नवाया था।
गायत्री की चेतनात्मक धारा सद्बुद्धि के ऋतम्भरा प्रज्ञा के रूप में काम करती है और जहाँ उसका निवास होता है वहाँ ब्राह्मणत्व एवं देवत्व का अनुदान बरसता चला जाता है, साथ ही आत्मबल के साथ जुड़ी हुई दिव्य विभूतियाँ भी उस व्यक्ति में बढ़ती जाती हैं। अतः इसकी उपासना का अधिकार हर किसी को है। जो भी इस महाशक्ति का परिपूर्ण लाभ उठाना चाहें उन्हें जप, तप ही नहीं अपने व्यवहारिक जीवन में ब्रह्मणत्व का, द्विजत्व का अवतरण भी करना चाहिए। चरित्र जितना शुद्ध होगा यह महामंत्र उतना ही प्रखर लाभ पहुँचायेगा। चरित्रवान व्यक्ति की थोड़ी सी उपासना भी इतना अद्भुत लाभ दिखाती है, जितना कि दुश्चरित्र व्यक्ति के आजीवन क्रियाकृत्य भी नहीं कर सकते। ब्राह्मणत्व यदि अपने भीतर अर्जित कर लिया जाय तो गायत्री महाशक्ति की उपासना के जो भी लाभ शास्त्रकारों ने बताये है उनकी सत्यता प्रत्येक साधक अक्षरशः अपने जीवन में देख सकता है।
असल की नकल हर क्षेत्र में बनने लगी है। नकली सोना, नकली चाँदी, नकली रत्न फेरी वाले फुटपाथों पर बेचते रहते हैं। नकली घी, नकली खाद्य पदार्थ, नकली दवाएँ बहुत सस्ते मोल में कहीं भी मिल जाती हैं पर असली के भाव सर्वत्र ऊँचे हैं। उन्हें खोजने और परखने में भी पसीना आता है। सफलताओं के शिखर पर पहुँचने वाले विद्यार्थी को, हर व्यवसायी को समय साध्य और श्रम साध्य तत्परता बरतनी पड़ी है।
कोई नाटक में तो राजा ऋषि वैसे परिधान ओढ़कर ही बन सकता है पर यदि वस्तुतः वैसी स्थिति प्राप्त करनी हो समग्र तत्परता तन्मयता नियोजित करनी होगी और लक्ष्य की पूर्ति के लिए लम्बे समय तक सतत् प्रयास करना होगा हथेली पर सरसों बाजीगर जमाते हैं पर उनसे तेल का डिब्बा नहीं भरा जा सकता। तिलहन की कृषि करने पर लाभ पाने हेतु कारगर प्रयत्न करने पड़ते हैं। मंत्र पढ़ते ही देवता को खींच बुलाना और उससे मन चाहे मनोरथ पूरे करना जादूगरों द्वारा अपनायी जाने वाली हाथ की सफाई हो सकती है। नजर बाँधना भी उसे कहते हैं। यह कौतुक कौतुहल भर हैं। वास्तविक आस्तिकता, आध्यात्मिकता, धार्मिकता में अपने चिन्तन, चरित्र और व्यवहार का परिशोधन करना पड़ता है। दुष्प्रवृत्तियों से कुसंस्कारों से छुटकारा पाना ही सच्चे अर्थों में ‘मुक्ति’ है। दृष्टिकोण परिष्कृत होना मान्यताओं में आदर्शों के प्रति प्रगाढ़ आस्थाओं का समावेश होना यही है ‘स्वर्ग’ का संवेदनशील अनुभव। जिसे मानवी गरिमा को हृदयंगम करने वाले प्रस्तुत जीवन काल में ही अपने इर्द-गिर्द लहराता देखते हैं। उसके लिए काल्पनिक सुरलोक में पहुँचने की किसी को प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती।
कपड़े को रंगने से पहले उसे भली प्रकार धोना पड़ता है। वह मैला कुचैला रहे तो कोई भी रंग चढ़ेगा नहीं? आत्मा में परमात्मा का प्रकाश उतरे इसकी कामना करने वालों को मार्ग के अवरोधों को दूर करना होगा। छत के नीचे बैठने पर तो सूर्य का प्रकाश तक अपने ऊपर नहीं पड़ता। भगवान की निकटता का रसास्वादन करने के लिए उन पर्दों को हटाना पड़ेगा जो बीच में अवरोध बन कर खड़े हो जाते हैं। यह अवरोध और कुछ नहीं अपने ही दोष दुर्गुण हैं। वे ही साँसारिक क्षेत्र की सफलताओं में प्रधान रूप से बाधक होते हैं और उन्हीं के कारण आध्यात्मिक प्रगति का द्वार बन्द रहता है। शोभा सज्जा के लिए यथा अवसर सौंदर्य बोध कराने वाले अलंकार धारण करने पड़ते हैं। इन्हें आत्मिक क्षेत्र सुसंस्कार ही करना चाहिए। इन्हीं को अर्जित करने पड़ते है। इन्हें आत्मिक क्षेत्र में सद्गुण या सुसंस्कार ही कहना चाहिए। इन्हीं को अर्जित करने के प्रयास को अध्यात्म साधना कहा जाता है इसका प्रतिफल भी हाथों हाथ मिलता है। आत्म संतोष, लोक सम्मान और परिस्थितियों का अनुकूलन जिसे देवी अनुग्रह भी कहते हैं, इन तीनों का ही लाभ हर साधक अपने प्रयत्नों के अनुरूप प्राप्त करता चाहता है। यही है साधना से सिद्धि का सिद्धान्त।
वृक्ष उद्यान अपने ऊपर बादलों को बरसने के लिए आकर्षित कर लेते हैं। ऐसे क्षेत्रों में अधिक वर्षा होती देखी जाती है। जबकि रेगिस्तानों में बादल नीचे उतरने का नाम नहीं लेते। अदृश्यलोक की देवशक्तियाँ कर्मकाण्डों से प्रभावित नहीं होतीं। वे परिष्कृत व्यक्तियों को ही तलाशती हैं और जहाँ पात्रता विकसित होती है वहीं निहाल करने के लिए उतर पड़ती हैं। स्वाति की बूंदें बरसती तो सर्वत्र हैं पर उनसे लाभ अधिकारियों को ही मिलता है। मुक्ता सूक्तियों में ही उस वर्षा से मोती उत्पन्न होते हैं अन्य सीपें यथावत् बनी रहती हैं। उन्हीं बाँसों में वंशलोचन पैदा होता है जिनमें छेद हो अन्य को स्वाति बूंदें कुछ भी लाभ नहीं पहुँचा पातीं। देवी अनुग्रह हर किसी को नहीं मिलता। पुजारियों को भी नहीं। यदि ऐसा होता तो लक्ष्मी नारायण मन्दिरों के पुजारी अब तक करोड़पति हो गये होते। भगवान की अनुकम्पा उसकी पुत्री के समान है जिसका हाथ थमाने के लिए उपयुक्त सत्पात्र को ही वह भी तलाशता रहता है। भिखारी या रोगी के साथ कौन अपनी पुत्री का पाणिग्रहण निश्चय करेगा। कुपात्रों को भी सदा देव सान्निध्य से वंचित रहना पड़ता है। कुकर्मी और प्रमादी चाहना कुछ भी करते रहें पर उनके हाथ तो कुछ लगता ही नहीं। यही कारण है कि अध्यात्म साधना वाले पूर्वकाल में जिन ऋद्धि-सिद्धियों को प्राप्त करते रहे हैं, उनसे आज वंचित लक्ष्य तक कहीं पहुँच पाता है?
वस्तुतः आध्यात्मिक विभूतियाँ बाहर से नहीं आतीं भीतर से ही उभरती हैं। वृक्ष पर फल लगते हैं वे आसमान से उतर कर टहनियों से नहीं चिपकते पर जड़ों द्वारा संग्रह किये गये रसों की प्रतिकृति होते हैं। खेत और उद्यानों में जो कुछ ऊपर सजा हुआ दीखता है वह अन्यत्र कहीं से नहीं आता जड़ ही उसे जमीन से खींचती है। हम अपने अन्तराल को जितना सुसंस्कारी बनाते हैं। हम अपने अन्तराल को जितना सुसंस्कारी बनाते हैं उसी अनुपात में मनुष्यों का स्नेह सम्मान और अदृश्य शक्तियों का वरदान प्राप्त करते चलते हैं। भूमि ऊसर हो उसमें क्या उगने वाला है। जबकि उर्वर भूमि में कुछ न बोने पर भी पशुओं को पर्याप्त चारा देने वाली घास प्रचुर परिणाम में अनायास ही उग पड़ती है। व्यक्तित्व की उत्कृष्टता ही वह उर्वर भूमि है जिसमें भौतिक सिद्धियाँ और आत्मिक ऋद्धियाँ सहज ही उगती और हस्तगत होती हैं।
कोयला उपयुक्त ताप में रहने पर हीरा बन जाता है। तपने से मिट्टी मिला कच्चा लोहा बहुमूल्य फौलाद बन जाता है। धातुओं के आभूषण तपाने के बाद ही बनते हैं। गलाई ढलाई की भूमिका गरम भट्टी ही पूरी करती है। ईंट पकने पर ही मजबूत होती है। आदर्शवादिता अपनाने पर उसी स्तर की ऊर्जा उपलब्ध होती है। तपस्वी इसी आधार पर देव मानव बनते हैं। संयम साधना से उत्कृष्टता अपनाने से और प्रचण्ड पुरुषार्थ से कोई भी व्यक्ति आत्मशोधन कर सकता है और महामानव स्तर तक पहुंच सकता है। आत्मा भी परमात्मा का ही अति समीपवर्ती प्रतीक प्रतिनिधि है। अंतर केवल इतनी ही पड़ गया है कि कुसंस्कारों की कालिमा से ढक जाने के कारण उसका प्रकाश धूमिल पड़ गया है। यदि उस पर जमी परत हटा दी जाय तो उसकी प्रखरता का प्रत्यक्ष दर्शन किया जा सकता है।
परमात्मा के माध्यम से जिन विभूतियों के प्राप्त होने की चर्चा रहती है वस्तुतः वे अपनी ही आत्मा में उभरे अनुदान हैं ईश्वर के लिए तो सभी समान हैं। वह न किसी के साथ पक्षपात करता है और न किसी को हैरान करता है। वह तो नियम रूप है जो जिस अनुपात में निर्धारित नियमों का पालन करता है वह उतनी ही मात्रा में प्रसन्नता भरे उत्साहपूर्वक अवसर प्राप्त करता है। जिनने जितनी उपेक्षा बरती, उच्छृंखलता अपनाई उसे उतना ही हैरान होना पड़ा है।
गीताकार ने सच ही कहा कि ‘आत्मा ही अपना मित्र और वही अपना शत्रु है।’ मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप है। सत्यप्रवृत्तियों की सम्पदा अपनाने वाला अन्य सभी प्रकार की सफलताएँ प्राप्त करता चला जाता है। वेदान्त दर्शन में परिष्कृत आत्मा को ही परब्रह्म की उपमा दी है और कहा कि महानता के केन्द्र बिन्दु अपने ही भीतर हैं। अपनी आँखें ठीक होने पर संसार के सभी दृश्य दीख पड़ते हैं। नेत्र-ज्योति चली जाने पर तो सर्वत्र अन्धकार ही अन्धकार है। भले ही सूर्य अपने स्थान पर उगा रहे। कान बहरे हो जाने पर संसार में निस्तब्धता भर जायगी। एक शब्द का भी अस्तित्व न बचेगा। मस्तिष्क गड़बड़ा जाने पर सर्वत्र उलटा होते दीख पड़ेगा। दर्पण में अपनी छवि दीखती है। गुम्बज में अपनी ही आवाज गूँजती है। अपनी ही छाया अक्सर भूत बनकर डराती हैं। अपने बोये बीजों की ही फसल कट कर कोठे भरती है। इसी तत्वज्ञान को अध्यात्म कहते हैं।
आध्यात्मवादी आस्तिकता में तीन भाग हैं (1) उपासना (2) साधना (3) आराधना। उपासना में उत्कृष्टता को भगवान मान कर उस पर अनन्य निष्ठ जमाई जाती है। साधना में जीवनचर्या को परिष्कृत एवं सुसंस्कारों से ओतप्रोत बनाया जाता है। आराधना का तात्पर्य है सत्प्रवृत्ति संवर्धन परमार्थ परायणता। इन तीनों को ही मिला देने से एक समूची बात बनती है। सर्वतोमुखी प्रगति की पृष्ठभूमि बनती है।
भोजन पानी और वायु इन तीनों के सहारे जीवन चलता है। सर्दी, गर्मी, वर्षा के समन्वय से ऋतुचक्र चलता है पूँजी श्रम और खपत के सहारे व्यवसाय से चलता है। कागज, कलम और लेखक के समन्वय से लेखन कार्य सम्पन्न होता है। मूर्तिकार, पत्थर और उपकरण मिल कर प्रतिभा गढ़ते हैं। ठीक इसी प्रकार उपासना, साधना और आराधना की समन्वित क्रिया पद्धति अपनाने से वह अध्यात्म उपक्रम बन पड़ता है जिसके असफल होने की कोई आशंका नहीं रहती। लक्ष्य तक पहुँचने का सत्परिणाम सुरक्षित रहता है।
संसार में धन, बल, कौशल, ज्ञान पद आदि सुयोग हैं पर उन सब में आत्मबल को सर्वोच्च स्तर का माना जा सकता है। उसके सहारे व्यक्ति स्वयं ऊँचा उठता है और अपनी नाव पर बिठा कर अनेकों को पार करता है। अन्य सब मिलकर भी आत्मबल के अभाव को पूरा नहीं कर सकते जबकि अकेला आत्मबल ही अन्य सभी बलों की आवश्यकता पूरी कर देता है। ईश्वर दर्शन, ब्रह्म साक्षात्कार, आत्मबोध यह सब एक ही तथ्य के कई नाम है। आत्मा को विकसित परिष्कृत करते करते उसे ब्रह्मोपम बनाया जाता है। द्वैत की अद्वैत में परिणति इसी प्रकार होती है।
समुद्र अपनी गहराई के कारण संसार भर के नदी निर्झरों को अपनी ओर आकर्षित करता है। क्षुद्रता से महानता की ओर, संकीर्णता से विशालता की ओर, कामना से भावना की ओर चलते हुए जीवन लक्ष्य तक पहुँचा जाता है। जब उत्कृष्ट मानवतावादी चिन्तन चरित्र और व्यवहार में उतर जाता है। तब दैवी शक्तियाँ अनायास ही उसके समीप खिंचती चली आती हैं। चुम्बक इर्द-गिर्द बिखरे हुए लोह खण्डों को खींचकर अपने साथ चिपका लेता है। महान व्यक्तित्व भी अपने में उच्चस्तरीय सद्गुणों को धारण करते हैं। सद्ज्ञान और सत्कर्म को अपनी जीवनचर्या का अविच्छिन्न अंग बनाते हैं। यह कृत्य जिस अनुपात से पूरा होता चलता है उसी गति से जीव को ब्रह्म बनने का सुयोग मिलता जाता है। वेदान्त दर्शन में परिष्कृत आत्मा और परमात्मा को एक ही बताया है। इसी को जीवन लक्ष्य कहा गया है। जिसे प्राप्त करने पर स्वर्ग, मुक्ति और सिद्धि का प्रतिफल सामने आ उपस्थित होता है।
उपासना को आत्मबल प्राप्ति का प्रथम चरण माना जाता है। उसकी समूची क्रिया-प्रक्रिया आत्म परिष्कार के उपाय उपचारों से ओत प्रोत है। उस के स्वरूप दिखाई तो ऐसा पड़ता है कि मनुहार उपकार के बदले दिव्य अनुकम्पा प्राप्त करने जैसा कुछ उपचार किया जा रहा है पर वस्तुतः बात ऐसी है नहीं। पूजा अर्चा के कृत्यों से आगे चल कर जब गहराई में उतरा जाता है तो उसका एक ही अभिप्राय सामने आता है कि कृत्यों को प्रतीक माना जाय और उनके सहारे साधना और आराधना के लिए अपने स्वभाव को उत्कृष्टता के ढाँचे में ढाला जाय।
चिन्तन और भावना को उपासना के माध्यम से संवेदनशील बनाया जाता है। साधना में शालीनता और सुसंस्कारिता की अवधारणा है। चरित्र निष्ठा भी इसी को कहते हैं। आराधना में परमार्थ परायणता अपनाने, सेवा साधना में संलग्न होने, उदारता अपनाने से लोक मंगल के कृत्य तथा समय बन पड़ते रहा करते हैं। तीनों का सम्मिश्रण गंगा, यमुना, सरस्वती के मिलने पर तीर्थराज त्रिवेणी संगम जैसा आधार बन पड़ता है। इसी स्थिति को मनुष्य में देवत्व का अवतरण कह सकते हैं। ऐसी मनःस्थिति वालों को विशाल विश्व को व विराट ब्रह्म को समुन्नत बनाने के लिए निरन्तर सेवा साधना में संलग्न रहना ही प्रिय विषय बन जाता है। इसी मनः स्थिति और ऐसी ही गतिविधि से अपने को ओत प्रोत करने के लिए वे सभी उपचार किये जाते हैं जिन्हें पूजा अर्चा कृत्य कहा जाता है।
अमेरिका में काले लोगों का नेतृत्व करने वाले लूथरकिंग को गोरों ने गोली से उड़ा दिया।
इस घटना की निन्दा करने वाले तो बहुत थे पर उस अपराध का प्रायश्चित करने के लिए किसी के मन में कसक न उठती थी।
एक गोरा पादरी आगे आया। उसने दस नीयो परिवारों के पालन और शिक्षण का व्रत लिया और दस नये लूथरकिंग बनाकर दिखाये।
सचेतन प्राणियों में विद्यमान विद्युत चुम्बकत्व एक प्रचण्ड शक्ति है जिसमें सभी वस्तुएँ अदृश्य रूप से प्रभावित होती हैं। इसमें होने वाले परिवर्तन ही प्रमुख रूप से विकास या ह्रास की -प्रगति या अवगति की दिशा का निर्धारण करते हैं। यह शक्ति पृथ्वी, सूर्य, चन्द्रमा सहित समस्त ग्रह -गोलकों अर्थात् पिण्ड-ब्रह्माण्ड से लेकर अनन्त अन्तरिक्ष में प्रचुर परिणाम में विद्यमान है जिसके फलस्वरूप आकर्षण, विकर्षण, द्वंद्व - संघर्ष, गति-प्रगति जैसी हलचलें दृष्टिगोचर होती हैं। मनुष्यों में विद्युत चुम्बकत्व विशेष रूप से और अन्य प्राणियों में साधारण रूप से परिलक्षित होता है।
यही शक्ति पेड़-पौधों में भी विद्यमान है और उसी अदृश्य प्रक्रिया से उनमें वृद्धि या अपघटन होता रहता है। मनुष्यों की भाँति वृक्ष वनस्पतियाँ भी ब्रह्माण्डीय तरंगों के प्रति संवेदनशील होते हैं। और इनसे उनके स्वयं के जैव विद्युत में भी परिवर्तन आता है। इस आधार पर वे प्राकृतिक घटनाओं की भी जानकारी दे सकने में सक्षम होते हैं। इस संदर्भ में गहन वैज्ञानिक अनुसंधान भी हुए हैं।
अनुसंधानों की इसी शृंखला में एक अध्ययन न्यू हैवन, कनेक्टीकट के मूर्धन्य वैज्ञानिकों ने पिछले दिनों मैपल पेड़ पर किया है। लगातार तीस वर्षों तक पौधे को वोल्टमीटर से संबद्ध रखकर उसकी विद्युतीय तरंगों को रेखाँकित किया जाता रहा। विश्लेषण करने पर विद्युतीय तरंगें अनियमित क्रम में पायी गयी । उनमें स्थानीय तड़ित झंझा और भू-चुम्बकीय क्षेत्र में न्यूनाधिकता के कारण वैद्युतिक गड़बड़ी का स्पष्ट अंकन था जिसे अनियमित तरंग-रचना का आधारभूत कारण माना गया। इसके अतिरिक्त पौधे ने ग्राफ में 24 घण्टे का एक सौर रिदम, 25 घण्टे का चन्द्र रिदम एवं एक लम्बी अवधि के चन्द्र चक्र का भी संकेत किया जो पूर्णिमा के दिन अपने उत्कर्ष पर पहुँचता था।
एक अन्य अध्ययन में पाया गया है कि पेड़-पौधे भी मनुष्यों एवं अन्य प्राणियों की तरह अपने अंतराल में भव संवेदनाओं की गंगोत्री से भरे होते हैं। अपने साथ सहानुभूति रखने वालों की और आकर्षित होते, पुष्पों को खिलखिलाते एवं क्रूरता-कठोरता बरतने वालों के प्रति विकर्षण का, उदासीनता का भाव प्रदर्शित करते उन्हें देखा जाता है। पौधे इस तरह के भावोद्दीपन का प्रदर्शन अपने वैद्युतीय तरंगों में घट-बढ़ के रूप में करते हैं। विज्ञानवेत्ताओं ने इसके मापन के सफल प्रयोग किये हैं। उनका निष्कर्ष है कि वनस्पति समुदाय में सन्निहित प्राण ऊर्जा को बढ़ाया और उनसे संवेदनशील एन्टीना का कार्य लिया जा सकता है।
इस संदर्भ में इण्डियन स्पेस रिसर्च ऑर्गनाइजेशन के प्रसिद्ध वैज्ञानिक डॉ. एस. पी. कोस्टा ने महत्वपूर्ण सफलता पाई है। आरंभिक प्रयोगों में उन ने रेडियो फ्रीक्वैन्सी एन्टीना के रूप में लीव साइप्रस, खजूर आदि का प्रयोग किया, किन्तु बाद में गुलमोहर कान्हा, बोरलबुरा, नारियल, डेट पाम तथा फर्न जैसे पौधों को चुना और उन्हें माइक्रो फ्रीक्वेन्सी इलेक्ट्रॉनिक एन्टीना के निमार्ण में प्रयुक्त किया। उनका कहना है कि पौधे अपनी जीवंत एवं जटिल संरचना के कारण विद्युत उत्पादन सहायक होते हैं। विद्युत चुम्बकीय तरंगें आसपास के वातावरण में सतत् छोड़ते रहने के कारण इनका सम्बन्ध माइक्रोवेव्स से सरलतापूर्वक हो जाता है। इन्हीं विशेषताओं के कारण अब लता-गुल्मों, वृक्ष-वनस्पतियों का उपयोग माइक्रोवेव कान्टैक्ट सिस्टम के माध्यम से पुलिस अपराधियों को पकड़ने में करने लगी है। टेलीविजन देखने हेतु ग्रीन लीव एन्टीना की प्रणाली क्रियान्वित की जाने लगी है। अति उच्च फ्रीक्वेन्सी वाले रेडियो संकेत ऊँचे वृक्षों की हरी पत्तियों के माध्यम से शीघ्रतापूर्वक उपलब्ध किये जा सकते हैं।
पेड़-पौधों में भी जीवन होता है। प्राण होता है। अब यह भी सिद्ध हो चला है कि उनमें विद्युत भी होती है। ऐसी दशा में उन्हें प्राणि बिरादरी में गिना जाना और सहानुभूति की दृष्टि से देखा जाना हमारा कर्तव्य होता है। उनकी जितनी क्षति होती है, उसकी पूर्ति भी वृक्षारोपण द्वारा हमें करनी चाहिए।
चार जुआरी जुआ खेलते हुए पकड़े गये। उन्हें राजा के दरबार में पेश किया गया। राजा ने चारों को ध्यान से देखा और उन्हें चार तरह की सजा दी।
एक को छह महीने के लिए जेल भेजा। दूसरे को देश निकाला दिया। तीसरे का मुँह काला कराके शहर में घुमाया। चौथे को नजर भर देखा और कहा आप भी। इसके बाद उसे छोड़ दिया।
राजा से मंत्री ने पूछा एक ही अपराध के चार अपराधियों को चार प्रकार की सजायें क्यों? भेद भाव किस लिए?
राजा ने इसका उत्तर देने से पूर्व यह कहा, जाकर यह देखा जाय कि वे चारों क्या कर रहे हैं?
जिसे जेल की सजा हुई थी। वह वहाँ जाकर भी दूसरे उपकरणों के सहारे जेल में जुआ खेलता पाया गया। जिसे देश निकाला दिया था वह शर्म से मुँह न उठा सका और रात में ही बिना मित्रों से मिले अन्यत्र चला गया। उसका पता भी न लगा। जिसका काला मुँह कराया गया, वह जन संपर्क से दूर रहकर किसी बाग में रखवाली से आजीविका कमाने लगा। जिसे कोई सजा नहीं दी गई थी। उसे भारी आत्म ग्लानि हुई और उसने नदी में कूद कर आत्म हत्या कर ली।
राजा ने दरबारियों को दिखाकर यह कहा हर अपराधी को समान सजा देने की जरूरत नहीं है उसका व्यक्तित्व भी परखा जाना चाहिए।
चोट खाया हुआ साँप आक्रमणकारी पर ऐसी फुँकार मार कर दौड़ता है कि उसके होश छूट जाते हैं, बचाव के लिए भागना ही पड़ता है। साँसारिक व्यथाओं से विक्षुब्ध मनुष्य की भी ऐसी ही स्थिति होती है जब मनुष्य को पीड़ायें चारों ओर से घेर लेती हैं और कोई सहारा नहीं सूझता तो वह निष्ठापूर्वक अपने परमेश्वर को पुकारता है। हार खाये हुये मनुष्य की कातर -पुकार से परमात्मा का आसन हिल जाता है और उन्हें सारी व्यवस्था छोड़कर भक्त की सेवा के लिए भागना पड़ता हैं। मनुष्य ने बुलाया हो और उसकी शुभेच्छा न आई हो, मनुष्य ने सहायता माँगी हो और परमात्मा ने मनोरथ पूर्ण न किया हो, मनुष्य की प्रार्थना पर परमात्मा दौड़ कर न चला आया हो, ऐसा कभी नहीं हुआ और न ही आगे कभी होगा। मनुष्य के विश्वास की शक्ति के आगे परमात्मा को सदैव झुकना ही पड़ा है।
उसे बुलाइये, वह आपके अंतःकरण में दिव्य प्रकाश बन कर उतरेगा, मधुर संगीत बनकर हृदय में गुंजन करेगा, आशीर्वाद बन कर आपके दुख-दर्द दूर करेगा, पर उसे सच्चे हृदय से बुलाइये, निष्कपट और निश्छल होकर पुकारिये।
ऐसा समय आता है जब मनुष्य संसार को भूल कर कुछ क्षण के लिये ऐसे दिव्य लोक में पहुँचता है जहाँ उसे असीम सहानुभूति और शाश्वत शान्ति मिलती है। प्रार्थना की इस आँतरिक स्थिति और उसके आनन्द को कोई भुक्त भोगी ही जान सकता है। परमात्मा के सन्निकट पहुँच कर आत्मा जब भक्ति भावना से अपनी वेदनायें प्रस्तुत करती है तो अनिर्वचनीय आनन्द मिलता है। अंतःकरण की समस्त वासनायें विलीन हो जाती हैं। इन्द्रियों की चेष्टायें शान्त हो जाती हैं। उस आनंद की अभिव्यक्ति करते हुए महाकवि सूर ने लिखा है :-
ज्यों गूँगहि मीइ फल को रस उर अन्तर ही भावै। अमित स्वादु सब ही जुनिरन्तर अमित तोष उपजावै ॥ मन वाणी को अगम अगोचर जो जानें सो पावै ॥
सूर की अनुभूति का आनन्द ध्रुव ने पाया था। उसके दुःखी हृदय ने संसार से संतप्त अंतःकरण ने परमात्मा को करुण स्वरों में पुकारा था। भगवान उसके पास आये थे। कुमार ध्रुव ने पूर्णतया की स्थिति प्राप्त की थी। परमात्मा का अनुग्रह न रहा होता तो ध्रुव अजर-अमर कैसे होता?
हिरण्यकशिपु की हठधर्मिता से दुखी बालक प्रहलाद ने उसे बार-बार पुकारा, उसका नारायण बार-बार उसकी मदद के लिये दौड़ा। विष पिया उसके भगवान ने, समुद्र के गर्त में पाथेय बना प्रहलाद को भगवान्। इससे भी काम न चला तो नृसिंह बनकर प्रहलाद का भगवान खंभा चीर कर दौड़ा आया। जिसने मनुष्य को पैदा किया उसके हृदय में अपनी संतान के लिये मोह न हों, ममता न हो यह कैसे हो सकता है? मनुष्य बुलाये और वह न आये ऐसा कभी हुआ नहीं।
द्रौपदी जान गई कि इस सभा में उसे बचाने वाला कोई नहीं है। दुःशासन चीर खींचता है। लाज न चली जाय इस भय से निर्बल नारी अपने दीनानाथ को पुकारती है। भगवान श्रीकृष्ण आते हैं, उसका चीर बढ़ता जाता है। दुःशासन थक गया पर चीर समाप्त न हुआ। परमात्मा की अनन्त शक्ति को नापने की सामर्थ्य किस में है? उसे तो उनका परम भक्त ही जान और समझ सकता है।
सामूहिक प्रार्थनाओं का सदैव परमात्मा को स्वर्ग से धरती पर उतार लाने में समर्थ रहा देवासुर संग्राम की कथाओं में ऐसे अनेक वर्णन हैं। महाभारत के युद्ध की घटना है। युद्ध भूमि में किसी टिटहरी ने अंडे दे रखे थे। युद्ध जोर का चल रहा था। पक्षियों को और कोई सहारा दिखाई न दिया तो उन्होंने ईश्वर की शरण ली। परमात्मा ने उनके विश्वास की रक्षा की। एक हाथी का घंटा टूट कर अंडों को छुपाकर बैठ गया युद्ध समाप्त होने पर उसमें से पक्षियों के बच्चे सकुशल निकाल लिये गये।
गजराज की पुकार पर उन्हें वाहन का भी परित्याग करना पड़ा था। नंगे पैरों वे दौड़े थे और गज को ग्राह के फंदे से मुक्त किया था। जब भी जिस अवस्था में भी जिसने परमात्मा को सच्चे हृदय से पुकारा वह अपने आवश्यक कार्य छोड़कर दौड़ा। जीवात्मा के प्रति उसकी दया अगाध है, अनन्त है। वह भक्त का स्नेह बंधन ठुकराने में असमर्थ है।
बहुत से लोग हैं जो ईश्वर और उसके अस्तित्व को मानने से इंकार करते हैं, पर यदि भली भाँति देखा जाय तो मूढ़ताग्रस्त व्यक्ति ही ऐसा कर सकते हैं। एक बहुत बड़ा आश्चर्य हमारे सामने बिखरा पड़ा है। उसे देखकर भी जिनका विवेक जाग्रत न हो, कौतूहल पैदा न हो उसे और कहा भी क्या जायगा? पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा कर रही है यह दृश्य हम किसी अन्य ग्रह में बैठे देख रहे होते हैं तो समझते मनुष्य का अभिमान कितना छोटा है। ब्रह्माण्डों की विशालता की तुलना में वह चींटी से भी हजार गुना छोटा लगेगा। अन्ततः आकाश और उस पर निरन्तर होती रहती ग्रहों, नक्षत्रों की हलचल, सूर्य-चन्द्र, सागर, पर्वत नदियाँ, वृक्ष वनस्पति मनुष्य के स्वर्ग के बदलते हुए क्षण क्या यह सब मनुष्य का विवेक जाग्रत करने के लिए काफी नहीं हैं। परमात्मा का अस्तित्व मानने के लिये क्या इतने से संतोष नहीं होता?
संपूर्ण हिन्दू संस्कृति का आधार ईश्वर-निष्ठ ही है। कोई भी धार्मिक कृत्य परमात्मा के ध्यान के बिना प्रारम्भ नहीं करते। उसे स्मरण करते ही वह शक्ति मिल जाती है जिससे मनुष्य कठिनाइयों को पार करता हुआ आगे बढ़ता चला जाय। ऐसे उदाहरण इस युग में भी चरितार्थ होते रहते हैं। संत ज्ञानेश्वर, जगद्गुरु, शंकराचार्य, संत तुकाराम, सूर और तुलसी का जीवन बीते कुछ अधिक दिन नहीं हुये। भारतीय स्वतंत्रता की उपलब्धि अभी कुछ दिन पूर्व ही हुई है। उसका प्रणेता महात्मा गाँधी अकेला था। शरीर भी कुल 86 पौण्ड का। कोई सेना साथ में न थी। कोई शस्त्र भी नहीं उठाया था उन ने। “राम-नाम’ का बल था गाँधी के पास। पर उस नाम के स्मरण और चिन्तन में ऐसी प्रगाढ़ निष्ठ भरी थी कि गाँधी के नाम से लहर आती थी और उत्तर दक्षिण में एक विकट तूफान सा उठ पड़ता था। वह शक्ति गाँधी की नहीं थी, जनता की भी नहीं थी। संपूर्ण क्रान्ति की बीज वह “राम-नाम” था जो हर वक्त गाँधी की जबान पर रहता था, उसके हृदय में गूँजता रहता था।
आदि काल से लेकर अब तक जितने भी संत महापुरुष हुए हैं और जिन्होंने भी आत्म-कल्याण का लोक-कल्याण की दिशा में कदम उठाया है उन्होंने परमात्मा का आश्रय मुख्य रूप से लिया है। मनुष्य के पास शक्ति भी कितनी है। बहुत थोड़ा शरीर बल उस पर विषयों के प्रलोभन, बहुत थोड़ा साधन बल उस पर भी साँसारिक गतिरोध, अपनी ही सामर्थ्य पर वह न तो आत्म कल्याण कर सकता है न संसार की ही भलाई कर सकता है। पर जब भी उसने ईश्वर की जयकार की उसे अपना सहयोगी चुना और सहायता के लिये पुकार की वह दौड़ा और उसकी शक्ति बन कर दिशा प्रदर्शित करने लगा। परमात्मा की कृपा पाकर मनुष्य अपना शंख बजाता हुआ चला जाता है मोक्ष उसके पीछे चलता है। ज्ञान की मशाल लेकर आगे बढ़ता है लोक-कल्याण पीछे-पीछे भागता हुआ चला जाता है। इसमें श्रेय मनुष्य को नहीं परमात्मा को है। वही शक्ति बनकर पुरुष में अवतीर्ण होता है। जो भी उसे निष्ठापूर्वक बुलाता है उसकी मदद के लिये परमात्मा आता अवश्य है। आज तक ईश्वर विश्वास न किसी का निष्फल गया है और न आगे इसकी संभावना है।
दत्तात्रेय आत्मज्ञान संबंधी जिज्ञासाओं का समाधान करने के लिए कितने ही विद्वानों के पास गये। पर उनका समग्र समाधान न हो सका। इस पर वे प्रजापति के पास पहुँचे और ऐसा उपाय पूछने लगे जिससे उनका संतोष हो सके।
प्रजापति ने कहा दूसरों से पूछने पर यह प्रयोजन सिद्ध न होगा। अपने इर्द-गिर्द जो घटनाक्रम हों उसी से निष्कर्ष निकालो और अनुभव के आधार पर उसे अपनाओ।
इस सूत्र को लेकर दत्तात्रेय चल पड़े। उनने मकड़ी को देखा जो स्वयं ही जाल बुनती, स्वयं ही उसमें फंसती और जब मोजडडडडड आती तब उस धागे को लपेट कर मुँह में निगलती है। उनने निष्कर्ष निकाला कि मनुष्य स्वयं ही माया जाल बुनता और उसमें फँसकर त्रास पाता है। पर जब उसका विवेक जागता है तो समूची जंजाल को समेट कर स्वतंत्र हो जाता है।
इसी प्रकार उन्होंने अनेक प्राणियों की गतिविधियाँ देखी और उस उदाहरण के आधार पर निष्कर्ष निकालते हुए अपना समाधान किया। ऐसी 24 घटनाओं से उनका आत्मज्ञान पूरा हो गया। यह मार्ग दूसरों के लिए भी है। अनुभवजन्य ज्ञान ही प्रत्यक्ष निष्कर्ष निकालने में सहायक होता है।
“आपको लोग ‘एक्सरे’ आँखों वाली महिला कहते हैं? आखिर इसका रहस्य क्या? आप में इस दिव्य क्षमता का विकास कैसे हुआ? क्या आपने कोई विशिष्ट साधना की है?” एक पत्रकार ब्रिटेन की विलक्षण शक्ति सम्पन्न महिला एनी ओवन्स से ताबड़तोड़ प्रश्न किये जा रहा था। ओवन्स ने बड़े धैर्यपूर्वक उसके सवालों को सुना और संक्षेप में उत्तर दिया “जहाँ तक मुझे स्मरण है, मैंने ऐसी कोई साधना नहीं की है, जो ऐसे दिव्य सामर्थ्य के उद्भव के लिए जिम्मेदार होती है। हाँ, पर एक काम मैंने अपने जीवन में अवश्य किया हैं, वह है सच्चे अर्थों में अध्यात्म को समझने और उसे जीवन में चरितार्थ करने का प्रयास-अभ्यास। मैंने महत्वाकांक्षा रहित जीवन जिया और अपनी योग्यता, क्षमता और सम्पदा से अभावग्रस्तों की सहायता करने में कोई कोर कसर उठा न रखी। मैं इसे ही अपनी अद्भुत क्षमता के विकास के लिए उत्तरदायी मानती हूँ। मैंने भौतिक अनुदान सत्पात्रों को बाँटे और बदले में भगवान का दिव्य प्रतिदान हाथोंहाथ इसी जन्म में प्राप्त किया।”
यह उद्गार थे, एनी ओवन्स के, जो 1930 के दशक की इंग्लैण्ड की बहुचर्चित महिला रही थीं। उन्होंने “माइ लाइफ इटसेल्फ इज ए मिरेकल” नाम से अपनी एक आत्मकथा लिखी है, जिसमें ढेर सारी ऐसी घटनाओं को वर्णन किया है, जिन्हें आश्चर्यजनक कहा जा सके। एक घटना का उल्लेख करते हुए वह लिखती है कि एक दिन दोपहर में आराम करने की नीयत से जैसे ही वह बिस्तर में लेटीं और आँखें बन्द कीं, वैसे ही फिल्म की भाँति एक दृश्य मानस पटल में घूम गया। दृश्य ‘हैराल्ड ऑफ फ्री इण्टरप्राइज’ में फँसे एक पानी वाले जहाज का था, जिसके सभी यात्री बेचैन दिखाई पड़ रहे थे और मौत से बच निकलने का प्राणप्रण से प्रयत्न कर रहे थे। सहायता हेतु भगवान से करुण प्रार्थना कर रहे थे। वे कहती हैं कि उनके कानों तक वह आवाजें स्पष्ट पहुँच रही थीं। तभी उन ने देखा बचाव कार्यों में जुटे गोताखोरों ने भी निराश होकर बचाव कार्य बन्द कर दिये। वह उठ बैठी और ध्यान के माध्यम से दूर संवेदी तरंगें गोताखोरों तक भेजने और प्रेरणा देने लगीं- ‘प्रयास जारी रखो, बन्द मत करो।”
इसके बाद एनी ने आपात सेवा प्रदान करने वाले विभाग को फोन किया कि अमुक स्थान पर एक जहाज और उसके यात्री मौत के मुँह में फँसे हुए हैं, कृपया उन्हें जल्द ही आपात सेवा प्रदान की जाय, पर उन लोगों ने इस ओर कोई ध्यान नहीं दिया। संभवतः वे यह समझ रहे हों कि इस घटना कि जानकारी तत्संबंधी विभाग को न होकर एक सामान्य सी महिला को किस तरह हो सकती हैं, यह मानकर विभाग ने विनती टाल दी हो सकती हैं, यह मानकर विभाग ने विनती टाल दी हो जब वहाँ से इस दिशा में कोई कदम उठाता दिखाई न पड़ा, तो एनी ने स्थानीय रेडियो स्टेशन परिचित प्रोड्यूसर गैरी सैवेज को इस आशय का फोन किया और और उन्हें किसी प्रकार सहायता प्रदान करने की विनती की। गैरी ने पुनः संबंधित अधिकारियों से इसके लिए प्रार्थना की। इसके बाद ही संकट में फँसे यात्रियों को बचाया जा सका।
एनी ने अपनी इसी क्षमता के सहारे एक पुलिस अफसर की, हत्यारे को पकड़वाने में सहायता की थी। हत्यारा कोई भी सुराग नहीं छोड़ गया था। एनी ने हत्या की गई लड़की के फोटो और खून से लथपथ वस्त्रों को ध्यानपूर्वक अवलोकन किया। बस फिर क्या था, सारा घटनाक्रम फिल्म की तरह उसके नेत्रों के आगे घूम गया। उसके दिव्य नेत्रों ने देखा कि लड़की का हत्यारा उसका ही अन्तरंग मित्र कार्ल हैन्स स्काफ नर है। इसी सूचना के आधार पर वह पकड़ा गया। बाद में उसने अपना अपराध भी स्वीकार लिया।
एक बार एनी अपने पिता के साथ कार में सैर करने को निकली। अचानक उसके सामने एक दृश्य उभरा, जिसमें दिखाई पड़ा कि कार का एक पहिया निकल रहा है। वह चीख पड़ी -डैडी-डैडी कार रोकिये। दुर्घटना होने वाली है।” पिता ने कार रोकी और देखने के लिए बाहर निकले। जब दृश्य देखा, तो दुर्घटना की कल्पना कर ही रोमाँचित हो उठे। कहने लगे- “यदि थोड़ी भी देर होती तो कोई नहीं बचते बेटी।
किशोरावस्था से ही एनी के विलक्षण चमत्कार लोगों को दिखाई पड़ने लगे थे। वह अपनी आत्मकथा में लिखतीं हैं “मैं हमेशा जानती थी कि परिवार के किस व्यक्ति को क्या तकलीफ है। अपनी बेधक दृष्टि उन पर डालती और पूछती क्या तुम्हारी छाती में दर्द है? और हमेशा ही मेरा अनुमान सही होता, मैं व्यक्ति के वस्त्र के अन्दर छिपी किसी भी वस्तु को स्पष्ट देख सकती थी, जैसे वह वस्तु प्रत्यक्ष मेरे सामने रखी हो।”
एक बार उसकी चाची, जो कि पड़ोस में ही रहती थी, के यहाँ एक बड़ी मजेदार घटना घट गई। चाची रायसा का एक स्वर्ण आभूषण ड्रेसिंग टेबल से अचानक एक दिन गायब हो गया। रायसा ने समझा कि शायद उसने आभूषण कहीं अन्यत्र रख दिया हो, अतः सारी अलमारियों और दूसरे स्थानों में इसकी गहरी ढूँढ़ खोज की गई, पर वह वहाँ रहता, तब तो मिलता। आखिर हार कर उसने यह अनुमान लगा लिया कि वह चोरी चला गया, पर दोष किस पर लगाये? घर में तो कुल चार सदस्य थे- पति, पत्नी और बच्चे ऐसे थे नहीं, कि उन पर शक किया जाय। फिर गहना कहाँ गया? किसी के समझ में नहीं आ रहा था। अन्ततः मामला एनी के पास पहुंच सब कुछ सुनने के बाद वह थोड़ी देर चुपचाप आँखों बन्द कर बैठ गई। दूसरे ही पल आँखें खोलीं और मुसकराते हुए बोली “चाची! आभूषण आपके एक पालतू पशु ने अपने घर में छिपा रखा है” सभी चकरा गये। घर में जन्तु भी तो नहीं पाल रखा है, फिर चुराने वाला पशु कौन हो सकता है! जिज्ञासा जब चरमोत्कर्ष पर पहुँच गई, तो एनी ने रहस्योद्घाटन करते हुए कहा। “एक चूहे ने उसे अपने बिल में छुपा रखा है। घर के भीतर के कोने में ही वह स्वर्णाभूषण पड़ा हुआ है, अतः चिन्ता की कोई बात नहीं। उसे खोदकर निकाल लीजिए।” सचमुच वह वहीं पड़ा मिला, जिससे रायसा की खुशियाँ फिर वापस आ गई।
उसकी दृष्टि में एक यह भी विशेषता थी, कि वह जिस किसी भी रोगी पर नजर डालती, कुछ दिनों में वह बिल्कुल स्वस्थ हो जाता। मेडस्टोन कैंट की 46 ब्रैडा डायसन की पसलियों में कुछ दिनों से असह्य दर्द था। अनेक उपचार करवा चुकी थी। किसी से थोड़ा -बहुत अन्तर भी आ जाता था, पर पूर्णरूप से उसका दर्द नहीं जा पा रहा था। किसी मित्र ने उसे एनी के पास जाने की सलाह दी, तो वह तैयार हो गई। एनी ने थोड़ी देर उससे मधुर बातें की। इस मध्य वह अपलक दृष्टि से ब्रैडा को निहारती रही। फिर कुछ क्षण पश्चात् उसने दर्द वाले स्थान पर अपना हाथ रख दिया। कुछ देर वैसा ही रखे रही। इसके बाद ब्रैडा ने महसूस किया कि धीरे-धीरे उसका दर्द कम हो रहा है। चार दिनों के उपरान्त वह अपनी पसलियों के दर्द से पूर्णतः छुटकारा पा चुकी थी।
मानव के अन्दर सोया पड़ा जखीरा इतना सशक्त एवं प्राणवान है कि उसका निज के आत्मिक उत्थान व दूसरों के कल्याण के लिए सुनियोजन संभव है। योगी-ऋषि तपस्वी-महामानव मात्र अपने दृष्टिपात से मन के भावों को जानकर सुपात्र को वरदानों से लाभान्वित कर देते थे, उसके मूल में योग साधना द्वारा अर्जित दिव्य सामर्थ्य ही था। हर किसी में ये संभावनाएँ विद्यमान हैं।
स्वामी विवेकानन्द उन दिनों विश्व भ्रमण पर थे। एक दिन इंग्लैण्ड की एक सभा में उनका भाषण हुआ। उसमें उन ने कार्यकर्ताओं से अपील की और कहा विश्व के पिछड़ेपन को दूर करने के लिए संकल्पशील कार्यकर्ताओं की आज महती आवश्यकता है। यदि ऐसे सौ गतिशील कार्यकर्ता मिल जायँ तो जन जागरण में महती सहायता मिल सकती है।
सभी लोग एक दूसरे का मुँह देख रहे थे। सन्नाटे को चीरती हुई एक किशोरी उठी। उसने कहा -मैं आपके आवाह्न पर अपना जीवन समर्पित करती हूँ। इससे जो चाहें सो काम लें।
स्वामी विवेकानन्द उसे भारत ले आये। संन्यास की दीक्षा दी। उनका नाम बहिन निवेदिता रखा। उन ने आजीवन भारत में महिला समाज की महती सेवा सम्पन्न की।
प्रसिद्ध चिकित्सा शास्त्री डॉ. सैमसन ने अपन मत इस प्रकार प्रस्तुत किया है - मेरे पास एक ऐसा मरीज आया जिसके बचने की घर वालों को कोई आशा नहीं थी, मैंने रोगी से बड़ी दिलचस्पी और मुसकराहट के साथ उसकी स्थिति के बारे में पूछा। हास्य और मुसकराहट भरे व्यवहार से रोगी के चेहरे पर भी मुसकराहट की रेखा उभर आयीं। डॉ. सैमसन ने उपस्थिति लोगों से कहा कि “चिन्ता की कोई बात नहीं हैं, रोगी ठीक हो जायेगा, क्योंकि अभी इसमें हँसने की क्षमता शेष है।” कुछ समय की चिकित्सा के बाद रोगी ठीक हो गया। वे रोगों की दवा एवं चिकित्सा के साथ उसके मनोरंजन, हँसी, मुस्कराहटपूर्ण व्यवहार को महत्वपूर्ण समझते थे। उनका यह नुस्खा दवाओं से भी अधिक कारगर सिद्ध होता था।
दार्शनिक बायरन ने लिखा है “ जब भी सँभव हो, हँसों, यह एक सस्ती दवा है।” हँसना मानव जीवन का उज्ज्वल पहलू है। वस्तुतः हँसी यौवन का आनन्द है। हँसी यौवन का सौंदर्य और शृंगार है। जो व्यक्ति इस सौंदर्य को धारण नहीं करता उसका यौवन भी नहीं ठहरता। एक चिकित्सक ने अपने प्रयोगों के आधार पर सिद्ध किया है कि ठट्ठा मारकर हँसने से- सदैव प्रसन्न चित्त रहने से मनुष्य का पाचन संस्थान तीव्र होता है। रक्ताणु वृद्धि प्राप्त करते हैं। स्नायु संस्थान ताजा होता है और स्वास्थ्य बढ़ता है।
जीवन के चढ़ावों में तो प्रसन्नता का विशिष्ट महत्व है। संसार में शायद ही ऐसा कोई व्यक्ति होगा जिसके जीवन में विभिन्न मोड़, घटनाएँ, समस्याएँ कठिनाइयाँ न हों। इन सबसे हलके रहने के लिये इनसे बचने के लिये एक मात्र साधन हँसना ही तो है। हँसने से कठिन से कठिन समस्याओं का हल मनुष्य सरलता से निकाल लेता है।
यदि जीवन के हर क्षण को उलझनों में ही उलझायें रहें तो निःसंदेह विक्षिप्त हो सकते हैं। हास्य प्रधान व्यक्ति जीवन की बड़ी-बड़ी कठिनाइयों और समस्याओं का सामना भली प्रकार कर सकता है और जीवन संग्राम में हँसी के साथ ही विजय प्राप्त कर सकता है। महापुरुषों के भारी कार्यभार, संघर्षपूर्ण जीवन की सफलता का रहस्य उनके हँसते रहने मुसकराहट भरे जीवन दर्शन में छिपा रहता है। जिन्होंने महात्मा गाँधी, तिलक, दयानंद, विवेकानन्द आदि पुरुषों के संपर्क का लाभ प्राप्त किया है या उनके जीवन का अध्ययन किया है वे जानते हैं कि महापुरुष कितने विनोद प्रिय स्वभाव के होते हैं और उसी में इनके संघर्षमय, कर्तव्य प्रधान कठोर जीवन की सफलता का मंत्र सन्निहित रहता है। प्रसिद्ध जापानी विचारक योन नगीचो ने लिखा है “जब जिन्दगी की हरियाली सूख जाय, सूर्य ग्रहण की काली छाया में ढक जाय, प्रगाढ़ मित्र और आत्मीय जन मुझे कंटकाकीर्ण जीवन पथ पर छोड़कर चले जायँ और सृष्टि की सारी नाराजगी मेरी तकदीर पर बरसने को तत्पर हो तो ऐसे समय मेरे प्रभु मुझ पर इतना अनुग्रह अवश्य करना कि मेरे होठों पर हँसी की उजली रेखा खिंच जाय।”
शारीरिक दृष्टि से हँसने का बड़ा महत्व है। खिल खिलाकर हँसना, हास्य विनोद, मुसकराहट मनुष्य के स्वभाव को ठीक बनाने की अचूक दवा है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि हास्य और मुसकराहट के संपर्क से कठिनाइयाँ परेशानियाँ तो हल होती ही हैं, पर शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर भी इसका चमत्कारी प्रभाव पड़ता है। मानसिक स्वास्थ्य के लिए भी हँसना एक महत्वपूर्ण साधन है। हास्य जीवन का सौरभ है। कुन्द्र कलिका जब खिलखिला उठती हैं तो उसका सौंदर्य देखते ही बनता हैं। मनहूसों का भी दिल उसकी ओर आकर्षित हो उठता है। जीवन की विभीषिकाओं से दग्ध मनुष्यों के लिये भी वह कुछ क्षण नव जीवन का प्रेरणा केन्द्र बन जाते हैं। बाल सुलभ मुसकराहट, हँसी विनोद के संपर्क, में आकर निराशाग्रस्त, नीरस व्यक्तियों में भी स्फुरणा जाग पड़ती है। हास्य विनोद अपने दुख एवं अवसाद की अनुभूतियों को भी तिरोहित कर देता हैं।
दार्शनिक कार्लाइल ने कहा है कि “वस्तुतः हास्य एक चतुर किसान है जो मानव जीवन पथ के काँटों, झाड़ झंखाड़ों को उखाड़ कर अलग करता है और सद्गुणों के सुरक्षित वृक्ष लगा देता है। जिससे हमारी जीवन यात्रा एक पर्व उत्सव बन जाती है। मनोविज्ञान वेत्ताओं और शरीर विद्या विशारदों ने अपने प्रयोग, खोज और अनुभवों के आधार पर यह सिद्ध कर दिया है कि ईर्ष्या, द्वेष, क्रोध, उत्तेजना, भय,चिन्ता आदि मनोविकारों और शारीरिक गड़बड़ी से मनुष्य शरीर में जो विष पैदा हो जाता है उसके शोधन के लिए हास्य एक अनुभूत प्रयोग है।
खिलखिला कर हँसने पर मनुष्य के स्नायु व मानसिक संस्थानों का तनाव आश्चर्यजनक ढंग से दूर हो जाता है। हँसने से छाती और पेट की नसें, पेशियाँ विशेष प्रभावित होती हैं और सक्रिय बन जाती हैं। श्वास प्रश्वास द्वारा ऑक्सीजन अधिक मात्रा में ग्रहण की जाती है और रक्त की भी शुद्धि तेजी से होने लगती है। शरीर में जीवन तत्व सक्रिय होकर स्वास्थ्य को पुष्ट बनाते हैं।
जो हँस नहीं सकते, सदैव गम्भीरता और सोच विचार में लगे रहते हैं, मानसिक कुण्ठा जिन्हें घेरे रहती हैं वे कई शारीरिक और मानसिक रोगों से पीड़ित हो जाते हैं। जीवन के संघर्षों और कठिनाइयों में वे ही डूबे रहते हैं जो सदैव गम्भीर और उदास रहते हैं। वह संघर्षों से उभर ही नहीं पाते और अपनी हानि करते रहते हैं।
देखा जाता है कि स्त्रियाँ पुरुषों की अपेक्षा शारीरिक मानसिक रोगों से कम पीड़ित होती हैं। क्योंकि उनमें हास्य विनोद की वृत्ति अधिक होती है। स्त्रियाँ स्वयं को ही नहीं वरन् पुरुषों को भी जीवन निराशा और कुण्ठाओं से बचाये रखती हैं। उनके हास्य विनोद के लिए भले ही उन्हें साधन ही क्यों न जुटाने पड़े, वे घर का वातावरण प्रफुल्लित रखती हैं, ताकि वाह्य परिस्थितियों में गुजरा हुआ आदमी प्रसन्नचित रह सके और शारीरिक एवं मानसिक तनाव को दूर कर सके।
=कहानी=============================
एक अमीर बीमार पड़ा। बहुतों का इलाज कराने पर भी अच्छा न हो पाया। तब उससे किसी ने लुकमान के पास जाने को कहा। वहाँ पहुँचा।
लुकमान ऊँट चरा रहे थे। बताने वाले ने उनका पता बता दिया। वे वहाँ पहुँचे। लुकमान ने नाड़ी परीक्षा की, लक्षण पूछे और जेब से निकाल कर कुछ गोलियाँ दीं- कहा उन्हें अपने माथे के पसीने में गला करके कुछ दिन खाते रहिए। अच्छे हो जायेंगे।
रोग कुछ ही दिन में अच्छा हो गया। बदले में उन्हें बड़ा पुरस्कार और सम्मान मिला।
शिष्यों ने कहा जो दवा आपने दी थी उसका रहस्य हमें भी बता दें। लुकमान ने कहा- दवा तो उपलों की राख भर थी। पर उसे सिर का पसीना निकालने में नित जो मेहनत करनी पड़ी चमत्कार उसका था। परिश्रमी लोग या तो बीमार पड़ते ही नहीं या फिर जल्दी अच्छे हो जाते हैं।
शिष्यों ने कहा जो दवा आपने दी थी उसका रहस्य हमें भी बता दें। लुकमान ने कहा- दवा तो उपलों की राख भर थी। पर उसे सिर का पसीना निकालने में नित जो मेहनत करनी पड़ी चमत्कार उसका था। परिश्रमी लोग या तो बीमार पड़ते ही नहीं या फिर जल्दी अच्छे हो जाते हैं।
इसी तरह बच्चे भी शारीरिक और मानसिक दृष्टि से स्वास्थ्य मनोरंजन का त्याग नहीं करते। जो जितनी हँसी खुशी से जिन्दगी बितायेगा वह उतना ही स्वस्थ और मानसिक प्रसन्नता से युक्त रहेगा। कवीन्द्र रवीन्द्र ने कहा है जब मैं अपने आप में हँसता हूँ तो मेरा बोझ हलका हो जाता है। महात्मा गाँधी के अनुसार “हँसी मन की गांठें बड़ी सरलता से खोल देती है। मेरे मन की ही नहीं तुम्हारे मन की भी।” जार्ज बर्नार्डशा ने लिखा है “हँसी के कहकहों पर यौवन के प्रसून खिलते हैं।” सदा जवान और ताजा बने रहने के लिए खूब हँसिये ठहाके लगाकर हँसिए एवं ग्रन्थि मुक्त हो जाइए।
“बापू! बापू!! अरे देखिए न, काका को क्या हो गया है?” बच्चों का एक पूरा झुण्ड कोठरी के द्वारा पर दौड़ आया। अभी सवेरा हुआ ही था। दिसम्बर जनवरी के महीने में सूर्य रश्मियाँ वैसे भी अलसाई रहती हैं, फिर तो आज उन ने कोहरे की सफेद चादर तान रखी थी। ऐसे में इतनी सुबह बालकों के समूह का द्वार पर कमल की पंखुड़ियों की तरह सिमट आना। क्यों न सिमटें? आखिर एक वही तो हैं जिनसे छोटे-बड़ों की शिकायतें आपस की नोक-झोंक सब कुछ कह लेते हैं। कभी -कभी तो उनसे उनकी भी गलतियाँ बताने में नहीं चूकते। सुनकर वह हँसते हैं समझते हैं और तब जवाब में पूरा आश्रय परिसर खिलखिलाहट से भर जाता है। आज फिर पता नहीं क्यों?
द्वार खोलते ही सबके सब घुस गए। बच्चों से घिरे उन ने पूछा “क्या हुआ तुम्हारे काका को?” बच्चों के ये काका दुनिया की विचित्र वस्तुओं से भी विचित्रतम्। कहा जाता है कि संसार के सात आश्चर्य हैं किन्तु ये ऐसे कि सातों आश्चर्य इन्हें देखकर स्वयं आश्चर्य में पड़ जायँ। सभी आश्रमवासी उनके बारे में यही राय रखते थे। आपस में हो रही चर्चा में कहीं न कही उनका नाम अवश्य कूद पड़ता। इस नाम कूद से बातों का मजा बढ़ जाता था। उनका जीवन क्रम उपवास करने लग जाय तो 68 दिन तक बिना खाए पिए बने रहें और अगर खाने लग जायँ तो आश्रम का सारा दूध अकेले पी जाने लगें, तब गौशाला के इंचार्ज ने बापू से विनय की इस समय लगभग बीस सेर तो दूध ही होता है, वह सब का सब काका के पेट में चला जाता है। बापू हँस पड़े “कोई प्रयोग कर रहा होगा, मैं मना कर दूँगा” और दूसरे दिन से बारह-तेरह किलो खली खाने का क्रम चला। यह छूटा तो महीनों कड़वी नीम की पत्ती के घोल पर गुजरे। आश्रमवासी हैरत में पड़े आखिर ये हैं क्या? इतना कठोर जीवन कि कठोरता को भी कँपकँपी छूट जाय। इस पर बीमारी तकलीफ उनसे कोसों दूर।
तब आज फिर क्या कोई नया...? बापू की मुसकान अपने आप में गहरा रहस्य छुपाए थी। बच्चे तो अपना सारा आश्चर्य उन्हीं की झोली में उड़ेलने आए ही थे। तनिक सा संकेत मिलते ही सब के सब एक साथ बोल पड़े “आज रात क्या हुआ? तू नहीं मैं बताऊँगा... नहीं मैं।” आखिर हँसते हुए उन ने सबको चुप कराया फिर एक बारह-तेरह साल के बालक को बोलने का इशारा किया।
“कल शाम काका ने गायों की लम्बी वाली नाद को साफ किया फिर उसमें पानी भरा उसने बताना शुरू किया हम लोगों ने सोचा कि ऐसे ही सफाई चल रही होगी। पर नहीं वह तो टाट की एक लँगोटी पहने नंगे बदन सारी रात उसी पानी में लेटे रहे। कल रात की सर्दी उफ! जैसे उसे स्मरण मात्र से झुरझुरी हो आयी हो।” “असली बात बता।” एक साँवले से तनिक वाचाल लगने वाले लड़के ने अपनी आँखें मटकाते हुए टोका। इसके पहले कि दोनों में नोंक-झोंक हो जाती, उन ने मुँह सिलवा लिया बापू। मुँह सिलवा लिया।” अब तो उन्हें भी ताज्जुब हुआ। मुहावरा तो सुना है मुँह सिलवाना पर कोई सचमुच में। किस चीज से सिलवाया है। तांबे के तार से। कई लड़के एक साथ बोल पड़े।
अब की बार गाँधी जी को गम्भीर होना पड़ा। लोग जब कहते है बापू तुम्हारे आश्रम में चोर से लेकर संन्यासी तक तरह -तरह के आदमी रहते हैं। आपने इन्सानों का चिड़िया घर खोल रखा है। सुनकर वह हँसते हुए मजाक में कहते चिड़िया घर नहीं शिव की बारात है। नन्दी- भृंगी से लेकर भूत-बैताल, साँप-बिच्छू सभी हैं। वीरभद्रों की भी भारी तादाद है। भाँति-भाँति के इन्सानी नमूनों में एक यह भी फिर कुछ सोचते हुए पूछा अच्छा अब क्या कर रहे हैं? नदी के पानी में दोनों हाथ उठाए खड़े आकाश की ओर देख रहे हैं। बच्चों का जवाब था।
अपनी हलकी सी शाल को लपेटते हुए वह बच्चों के साथ चल पड़े। कदमों के सहारे पगडंडी को नापते उनका चिंतन चक्र चल पड़ा। अनेक गुण हैं उसमें स्वाध्यायी है, विनयशील है, कर्मठ है, सत्यवादी है। संक्षेप में एक महापुरुष के लिए जितने गुणों की अपेक्षा रहती है, प्रायः वे सभी हैं। यदि कोई दोष है तो यह कि हठी है। यों जीवन के अन्य विषयों में पारस्परिक व्यवहार में नीति परामर्श में उसका हठ कहीं भी आड़े नहीं आता। इसके प्रकटीकरण का क्षेत्र तो एक ही है जिसे वह ‘तप’ कहता है।
“तप” कितना गहरा अर्थ छुपा है इस शब्द में। जीवन का अरुणि मन्थन का, ऊर्जास्विता के अर्जन का नाम है ‘तप’। व्यक्तित्व के महासागर का मन्थन कर चौदह गुण रत्नों के प्रकटी करण की प्रक्रिया है यह। पर... अचानक उनकी नजर सामने की ओर उठी। चारों ओर कोहरे की सफेद धुँध अभी भी पगडण्डी खेतों-वृक्ष वनस्पति और इक्के-दुक्के आने-जाने वालों को अपनी सुविस्तीर्ण चादर में लपेटती जा रही थी। सन्नाटे के बीच कभी कभार नदी की लहरों की ध्वनि तरंगित हो जाती। आगे बढ़ गए बच्चों को पुकार कर पास बुलाकर स्नेहपूर्ण स्वरों में कहा साथ-साथ चलो। वह पुनः उनके बारे में सोचने लगे तप के नाम पर ही तो अपने शरीर को यातना देता है। कई बार उसे उन ने संकेत भी किए फिर वह कोई नासमझ तो नहीं है। जिसने इतिहास, अँग्रेजी, अर्थशास्त्र तथा फ्रेंच विषयों में एम.ए. (ऑनर्स) किया हो। जो सेण्ट जेव्हीयर कालेज में प्राध्यापक रहा हो।
इस ओर नहीं उस तरफ। एक बच्चे ने उनके कदमों को दूसरी ओर मोड़ा उस ओर जिधर इनके काका खड़े थे। वे सोचने लगे - “कितना प्यार करते हैं ये सब बच्चे उसको। तभी तो ऐसी कड़ाके की ठण्ड में भी आकर उसे देख गए। मुझे लेकर आये। वह भी इन बच्चों के लिए जान देता है। जब होता है तब इन्हीं बच्चों के विकास का चिन्तन। बिना किसी आशा अपेक्षा के इनके हित में लगे रहना। प्रेम भाव है, दिव्य भाव, मनुष्य में विकसित देवत्व है यह। जिस किसी भाव का स्वयं को विकास होता है, बाह्य जगत से उसी का प्रतिपादन मिलता है। जिसने अपने अन्दर घृणा पनपाई है, उसे बदले में घृणा के सिवा और कुछ न मिलेगा। जिसने अपने अस्तित्व को निचोड़ कर अमृत बिन्दु छिड़के सम्पूर्ण विश्व उसे अमृत कलश समर्पण करने में गौरव की अनुभूति करेगा।
कमर तक पानी में खड़ा उसका निष्कम्प शरीर कोहरे को बेधकर झिलमिलाता दीख रहा था।” “ये रहे।” बच्चों का समवेत स्वर गूँज उठा। नदी का जल अभी भी सफेद धुँध से ढका था। ये सब बिल्कुल पास जाकर खड़े हो गए। थोड़ी देर बाद हलका सा कंपन हुआ। आकाश की ओर उसने हाथ जोड़े और पीछे की ओर मुड़ा। शायद उसने आज की उपासना पूर्ण कर ली थी। मुड़ने पर एकाएक वह अपनी आँखों पर विश्वास न कर सका दो-चार बार पलकें झपकीं। तो क्या बापू स्वयं? दिल की धड़कने तेज हो गई?
इस तरफ आ जाओ। कानों के अन्दर चिर परिचित आवाज ने प्रवेश किया। अब तो अविश्वास का कोई सवाल न था। धीरे-धीरे पानी को पार करता हुआ उनके पास आ पहुँचा। “भणशाली! क्यों इतनी तकलीफ उठाते हो?” कहते हुए उन ने अपनी शाल के अन्दर से एक सूखा कपड़ा निकाल उनके शरीर को पोंछना शुरू किया। आहिस्ते-आहिस्ते ताँबे के तार को निकाला जिससे उन्होंने अपने होठों को बींध रखा था। दूसरे क्षण ऊनी खादी का एक मोटा कपड़ा उसे लपेटने को दिया। सम्भवतः वह इसे अपने साथ लेकर चले थे। बच्चे मौन खड़े अपने काका को देख रहे थे।
थोड़ी देर में सब साथ-साथ चल दिये। आश्रम की जानी पहचानी राह पर बच्चे उछलते कूदते भाग चले। आखिर उन्हें अपना विजय सन्देश सुनने की जल्दी जो थी। भणशाली काका को डिगाना और हिमालय को डिगाना एक। पर बापू की सहायता से सब कुछ...। देखते-देखते बालकों का समूह ओझल हो गया।
इधर बापू कह रहे थे “भणशाली जिद छोड़ो’ तपस्या हठ नहीं जीवन का शोधन है। वही तो करने की कोशिश कर रहा हूँ। शब्दों में बिंधे होठों का कष्ट सना था। जवाब में बापू ने वात्सल्य भरी झिड़की दी फिर वही बच्चों वाली बात, लगता है तुम लड़कों को पढ़ाते-पढ़ाते लड़के हो गए, जिद्दी लड़के। भले आदमी! रात भर पानी की नाँद में लेटने, तपती बालू में पड़े रहने, होंठ सिलवा लेने से जीवन का शोधन कैसे होगा? उत्तर में एक चुप्पी थी, जिसे तोड़ते हुए गाँधी जी की वाग्धारा पुनः बह चली। “जिस जीवन का परिष्कार कर सैकड़ों-हजारों लाखों क्षत-विक्षत जिन्दगियों में नये प्राण फूँके जा सकते हैं, जो परिष्कृत जीवन सहस्रों सहस्र नर पशुओं को देव मानव की दीक्षा देने में समर्थ है उसी को तिल-तिल करके गलाना परमात्मा की दिव्य धरोहर का अपमान नहीं तो और क्या हैं?”
वे बोल उठे “बापू मैं तो शास्त्र विधान के अनुसार तप..।” वाक्य पूरा होने के पूर्व गाँधी जी ने टोका “शास्त्रों में गीता को पढ़ना भूल गए क्या?, जिसके सत्रहवें अध्याय में इस शरीर यातना को अविवेकियों के द्वारा किया जाने वाला आसुर कर्म कहा है। घर छोड़ो-जंगल भागो, कमरे छोड़ो-गुफा ढूंढ़ो। मनस्वियों के इसी पलायन धर्म के कारण विधाता के विश्व उद्यान का बंटाधार हुआ है। जिस बगीचे के माली भाग जाएं तो परिणाम जानते हो बगीचे और मालियों का, गाँधी ने तीव्र बेधक दृष्टि से उनकी आँखों में झाँका। कुछ पल एक कर शिक्षक के स्वर में बोले बगीचे को बनैले पशु रौंदेंगे। हँसते-खिलखिलाते फूलों को कुचले-मसले जाने के लिए विवश होना पड़ेगा और तप के नाम पर युग धर्म से मुख मोड़ने वाले इन पलायन धर्मियों को आत्मग्लानि के तुषानल में जन्म-जन्मांतर तक झुलसना पड़ेगा। आज अपने देश की दुर्दशा, उसके जिस्म पर हो रहे सहस्रशः आघातों का एक मात्र कारण इसके मालियों का पलायनवाद है।” बापू के स्वर गाम्भीर्य ने उसे सहमा दिया। मानवता के लिए उनके दिल में अहर्निशि उठने वाली घुमड़न से वह अपरिचित न था पर...।
शायद उन्होंने अपने स्वर की तीव्रता स्वयं अनुभव कर ली। इसी कारण अपने को अपेक्षाकृत सहज करते हुए कहने लगे। योगेश्वर कृष्णा तप की व्याख्या करते हुए कहते हैं शरीर का तप है सेवा के लिए श्रम। वाणी का तप है सत्य प्रिय हितकारक वचन और मन का तप है सौम्यता व विचारशीलता। हठ छोड़कर इसे अँगीकार करो-बदलो अपने मन की प्रवृत्तियों को।
वार्तालाप के क्रम में नदी से आश्रम का रास्ता कब पूरा हुआ इसका दोनों में से किसी को भान तक न होने पाया। उस दिन से प्रारम्भ हुआ उनका यथार्थ तप। हरिजन यंग इण्डिया का सम्पादन हो अथवा आटा चक्की चलाना, पूर्ण तन्मयता से आश्रम के हर छोटे-बड़े काम करते रहते। आश्रमवासी उनके इस परिवर्तित स्वरूप को देखकर चकित थे। 1942 के अगस्त महीने में महिलाओं के रक्षणार्थ किए गए उनके सत्याग्रह ने सारे देश को चकित कर दिया। चिमूर स्थान में किए गए इस सत्याग्रह पर स्वयं गाँधी जी कह उठे जय कृष्ण प्रभुदास भणसाली ने मेरा सिर दुनिया में ऊँचा कर दिया। युगधर्म के निर्वाह के लिए ‘कष्ट सहिष्णुता ही तप है।’ इसी आदर्श के निर्वाह में उनका जीवन बीता। कालप्रवाह के बदले स्वरूप में आज हमारी बारी है। इस तप का निर्वाह कर अपने मार्ग दर्शक का सिर ऊँचा करने की। ब्राह्मणोचित जीवन जी कर, ब्रह्म बीज की तरह गलकर सारी विश्वसुधा को ब्रह्म कमलों से सन्निहित कर दिया।
जिज्ञासु ने पीर फकीर से पूछा ईमान वाला और अल्लाह का प्यारा बनने का मार्ग बताने की कृपा कीजिए।
फकीर ने उसे कब्रिस्तान भेजा और कहा सभी कब्रों के मुर्दों को गालियाँ देकर आओ। उसने वैसा ही किया। दूसरे दिन फिर उससे वहीं जाने को कहा गया और आदेश मिला कि कब्रों पर फिर जायें और मुर्दों को उनकी भरपूर प्रशंसा कर सुनायें। जिज्ञासु ने वैसा किया और वापस लौट आया।
फकीर ने पूछा कि इन निन्दा प्रशंसा में उन कब्रों पर कोई फर्क पड़ा है उत्तर था नहीं।
समझाया गया कि “बन्दे! लोगों को, निन्दा प्रशंसा ही मनुष्य को विचलित करती रहती है और अल्लाह से दूरी बढ़ाती है। यदि कोई निन्दा प्रशंसा की परवाह किये बिना मात्र अपने कर्तव्यों को देखे और एक निष्ठाभाव से कल्याण मार्ग पर चले तो उसे लक्ष्य तक पहुँचने का राज मार्ग मिल जायगा।
मनुष्य की शारीरिक मानसिक आरोग्यता इस बात पर निर्भर करती है कि वह स्वास्थ्य स्रोतों का कितनी बुद्धिमत्ता के साथ पालन करता है। आरोग्यता अथवा रुग्णता इस बात पर भी निर्भर है कि व्यक्ति प्राकृतिक नियमों एवं साधनों का किस हद तक सदुपयोग अथवा दुरुपयोग करता है। संतुलित एवं उपयुक्त भोजन, जल, वायु, धूप-सेवन, व्यायाम विश्राम, पर्याप्त नींद और भावनात्मक स्थितियाँ यहीं हैं पूर्ण स्वास्थ्य के मूलभूत आधार, जिनका समुचित परिपालन करते रहने पर आरोग्य को अक्षुण्ण रखा और दीर्घ जीवन का आनन्द उठाया जा सकता है।
कनाडा के मूर्धन्य चिकित्सा विज्ञानी डॉ. जे. जैक्सन का कहना है कि संसार की वर्तमान परिस्थितियों में प्रचलित चिकित्सा प्रणाली ने स्वास्थ्य सम्बन्धी नियम, उद्देश्य और परिभाषा को ही बदल दिया है। उपचारात्मक आयुर्विज्ञान पर अत्यधिक जोर देने के कारण एक ऐसी तकनीकी पद्धति का विकास हो गया है जिसमें व्यक्ति अपने अन्दर झाँक कर स्वयं के अंतर्मन में छिपे रुग्णता के कारणों का निष्कासन न कर स्वास्थ्य की देखभाल का काम चिकित्सक को सौंप कर अपनी जिम्मेदारी से छुट्टी पा लेता है। अब ऐसा मान लिया गया है कि आरोग्य भी अन्य वस्तुओं की भाँति सुपर बाजार से खरीदा जा सकता है। अस्वस्थ व्यक्ति अपना रोग और धनराशि डाक्टरों के पास ले जाता है ओर बदले में वह उसे मनभावनी गोलियाँ और महँगे टॉनिक दे देता है। लोगों की अब ऐसी आम धारणा बन गई है कि डॉक्टर के पास प्रत्येक रोग की चिकित्सा उपलब्ध है। इस अत्युत्साह ने उस विवेकशीलता पर भी पर्दा डाल दिया है जिसके द्वारा भी कभी मनुष्य रुग्णता को अपने ही संचित दुष्कर्मों, प्रकृति-नियमों के उल्लंघन आदि को मानता था।
आध्यात्म मनोवेत्ताओं ने शारीरिक और मानसिक आधि-व्याधियों का कारण मानवी दुष्कर्मों, संचित कुसंस्कारों को माना है और कहा है मनः संस्थान जब मनोविकारों से पाप, ताप एवं कषाय-कल्मषों से विकृत हो जाता है तो उसका प्रभाव आरोग्य पर भी पड़ता है और मनःसन्तुलन पर भी। इसकी पुष्टि नवीनतम वैज्ञानिक शोधों ने भी कर दी है कि मन गड़बड़ाता है तो शरीर का ढांचा भी लड़खड़ाने लगता है। अतः मन का परिशोधन-परिष्कार ही समग्र स्वास्थ्य एवं आत्मोन्नति का मूल है। अध्यात्म शास्त्र में इस उपचार प्रक्रिया को प्रायश्चित के नाम से जाना जाता है जिसमें अपनी गतिविधियों का परिमार्जन किया और गुण, कर्म स्वभाव को सुधारा जाता है, साथ ही मन में जमा कूड़े करकट के ढेर को साफ किया जाता है। पूर्व में बन पड़े अनीति-अन्याय की भरपाई की जाती है और जीवन के श्रेष्ठतम् सदुपयोग की रीति-नीति अपनाई जाती है।
आधुनिक मनःचिकित्सकों के भी कदम अब इस दिशा में बढ़े हैं और उन ने “डाइनैटिक्स” नामक एक अभिनव चिकित्सा प्रणाली का विकास किया है जिसे ‘साइंटोलाजी’ के नाम से भी जाना जाता है। इसके अन्वेषक एल-रौन हुनई के अनुसार मनुष्य के अंतर्मन में छिपे कषाय-कल्मष एवं अपराध भाव ही जब-तब रुग्णता के रूप में फूटते रहते हैं जिनका उपचार न तो औषधियाँ कर सकती हैं और न जीन नियंत्रण की वर्तमान तकनीक ही। इनका निष्कासन प्रायश्चित प्रक्रिया से ही संभव है।
पापों के प्रकटीकरण और प्रायश्चित द्वारा शारीरिक-मानसिक रुग्णता से मुक्ति “क्रिश्चियन साइंस ऑफ हीलिंग ” का एक मुख्य अंग मानी जाती है। ऐसा प्रतिपादन डॉ. नारमन विसेण्ट पील तथा जे. सीट्रसट ने अपनी कृतियों में अनेक रोगियों का हवाला देकर किया है। वर्तमान प्रचलित समस्त चिकित्सा पद्धतियों में यदि इस विधा को स्थान दिया जा सके तो न केवल स्वास्थ्य संरक्षण का उद्देश्य पूरा होगा वरन् मनः परिष्कार व आत्मिक प्रगति के दुहरे लाभ भी हस्तगत होंगे।
संसार में दृश्यमान जड़ पदार्थों के साथ-साथ ऐसी एक सर्वव्यापी नियामक सत्ता भी है, जो इस आश्चर्य भरे ब्रह्माण्ड का सृजन करने से लेकर और भी न जाने क्या-क्या बनाती रहती है। अध्यात्म का तत्वदर्शन समझने की जिज्ञासा रखने वालों को इस तथ्य को हमेशा ध्यान में रखना चाहिए।
असल की नकल इन दिनों खूब चल पड़ी है। नकली चीजें सस्ती भी होती हैं। चलती भी अधिक है और बिक्री भी उन्हीं की अधिक होती देखी जाती है। नकली सोने के, नकली चाँदी के जेवरों की दुकानों में भरमार देखी जाती है। नकली हीरे मोती भी खूब बिकते हैं। नकली दाँत अधिक चमकते हैं। नकली घी से दुकानें पटी पड़ी हैं। नकली शहद सस्ते भाव में कहीं भी मिल सकता है? पर वह वस्तुएँ ऐसी चमकीली होते हुए भी असली जैसा सम्मान नहीं पातीं। बेचने पर कीमत भी नहीं उठती। अध्यात्म का नकलीपन भी बहुत प्रचलित हुआ है। उसे उपहार-मनुहार की टंटघंट पूरी करके उन लाभों को पाने की प्रतीक्षा की जाने लगती है। जिनके लिए प्रबल पुरुषार्थ और व्यक्ति के उठे हुए स्तर की अपेक्षा की जाती है। समुचित मूल्य चुकाने पर कोई कीमती वस्तु ऐसे ही तिकड़मबाज़ी के सहारे हाथ कैसे लगे? देखा जाता है कि मनोकामनाओं का पुलिंदा बाँधे फिरने वाले जिस तिस देवी-देवता के पीछे गिड़गिड़ाते फिरने के उपरान्त भी खाली हाथ लौटते हैं और विधि विधान में कोई गलती रहने या पूजापाठ को व्यर्थ बताने की नास्तिकों जैसी प्रतिक्रिया व्यक्त करते रहते हैं। आये दिन लाभ मिलते रहने की बात न बनते देख कर उस प्रक्रिया को छोड़ भी बैठते हैं या जब तब अनमने मन से लकीर पीट लेते हैं।
अच्छा होता अध्यात्म का दर्शन, स्वरूप, उद्देश्य और प्रयोग के संबंध में गहराई में उतर कर जानने का प्रयत्न किया गया होता और पूरा मूल्य देकर असली चीज पाने की मान्यता बनाई होती। तब इस संदर्भ में किसी को कोई शिकायत करने की आवश्यकता न पड़ती।
सर्वविदित है कि विश्व शक्ति के भण्डार में सर्वोपरि आत्मबल है। उसकी तुलना धन बल, बुद्धि बल, शस्त्र बल, सत्ताबल, आदि से नहीं हो सकती। वे सभी छोटे और बौने पड़ते हैं। जो कार्य आत्मबल सम्पन्न कर सके वे दूसरों से नहीं बन पड़े। पुरुषार्थ का अपना प्रयोजन तो है, पर यदि उसके पीछे आत्मबल का समावेश न हो तो फिर समझना चाहिए कि फुलझड़ी का तमाशा मात्र बन कर रह गया। असुरों में से अनेकों ने साधना बल के सहारे कई प्रकार की सिद्धियाँ प्राप्त कीं, पर वे न तो अधिक समय टिकीं और न अन्ततः सुखद परिणाम ही प्रस्तुत कर सकीं। भस्मासुर, महिषासुर, वृत्रासुर, रावण आदि की सिद्धियाँ अन्ततः उनके और उनके संबंधियों के लिए विनाश और विपत्ति का कारण ही बनीं। इसके विपरीत उस दिशा में उद्देश्यपूर्ण कदम बढ़ाने वाले स्वल्प साधना में भी उच्चस्तरीय एवं प्रशंसनीय सफलता प्राप्त कर सके। बुद्ध, गाँधी, अरविंद, रमण, रामकृष्ण, चाणक्य, रामदास, विवेकानन्द, दयानन्द, आदि की साधनाएँ जहाँ उन्हें मनस्वी बना सकीं वहीं उनके कर्तृत्व ने समाज का असाधारण हित-साधन किया। ऋषियों की समस्त शृंखला उसी प्रकार की है। वे स्वयं तो आकाश में नक्षत्रों की तरह अभी भी चमकते हैं, साथ ही उनके समय में उनके साथ जो भी रहे वे सत्संग जन्य लाभों से निहाल होकर रहे और उच्चकोटि के अनुदान-वरदान प्राप्त करके कृतकृत्य हो सके।
भगवान के अनुग्रह से कितने छोटे-छोटे असाधारण श्रेय साधन से सम्पन्न हुए हैं। हनुमान, अंगद, नल-नील, जामवन्त, भागीरथ, प्रह्लाद, सुदामा, विभीषण आदि की सफलताएँ ऐसी ही हैं जिन्हें वे अपने निजी पुरुषार्थ से प्राप्त नहीं कर सकते थे। मनुष्य के अपने पुरुषार्थ की भी महत्ता है, पर उसके साथ यदि दैवी अनुग्रह के रूप में आत्मबल भी सम्मिलित हो जाता है तो फिर सोने में सुगंध के सम्मिश्रण जैसी बात बन जाती है। महाप्रभु ईसा का जीवन उदाहरण के लिए सामने है। कुन्ती, सावित्री, द्रौपदी, सुकन्या, अरुन्धती आदि महिलाओं ने भी अपनी साँसारिक योग्यता की तुलना में आत्मिक विभूतियों के सहारे कहीं अधिक पाया था।
इक्कीसवीं सदी में मानवी पुरुषार्थ की आवश्यकता तो बहुत पड़ेगी। सतयुग की तरह साधु, ब्राह्मण, वानप्रस्थ, परिव्राजकों की तरह असंख्यों को आत्मोत्कर्ष की सेवा साधनाओं में भी अपने को खपाना पड़ेगा, किन्तु यह नहीं समझा जाना चाहिए कि इतना बड़ा काम मात्र मानवी भागदौड़ से पूरा हो जाएगा। जब अपने छोटे से कुटुम्ब के थोड़े से दायरे में वाद-विवाद, मनोमालिन्य, लोकव्यवहार के झगड़े काबू में नहीं आ पाते तो 600 करोड़ मनुष्यों में से प्रत्येक के पीछे लगी हुई ढेरों दुष्प्रवृत्तियों का कुप्रचलन कुछ थोड़े से व्यक्ति थोड़ी सी योजनाएं बनाकर हलके-फुलके व्यक्तियों के सहारे उसे पूरा कर सकेंगे, यह आशा कैसे की जा सकती है। इतने प्रबल पुरुषार्थ और समाधान के पीछे दैवी शक्ति का समावेश भी होना चाहिए अन्यथा मानवी पुरुषार्थ अपनी भूलों, कमजोरियों एवं प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण ही सफलता के स्थान पर असफल होते देखे गये हैं।
आत्मबल का सम्पादन कठिन नहीं वरन् सरल है। उसके लिए आत्मशोधन एवं लोक मंगल के क्रियाकलापों को जीवनचर्या का अंग बना लेने भर से काम चलता है। व्यक्तित्व में पैनापन, प्रखरता का समावेश इन्हीं दो आधारों पर बन पड़ता है। यह बन पड़े तो दैवी अनुग्रह अनायास बरसता है और आत्मबल अपने भीतर से ही प्रचुर परिमाण में उभर पड़ता है। केवट, शबरी, गिलहरी, रीछ वानर, ग्वालबाल जैसों की भौतिक सामर्थ्य स्वल्प थी, पर वे अपने में देवत्व की मात्रा बढ़ा लेने पर ही इतने मनस्वी बन सके जिसकी चर्चा इतिहासकार आये दिन करते रहते हैं। सुग्रीव की विजय के पीछे उसकी निज की बलिष्ठता मात्र ही कारगर नहीं हुई थी। नरसी मेहता ने अभीष्ट धन अपने व्यवसाय से नहीं कमाया था। अमृतसर का स्वर्ण मन्दिर किसी एक धनवान की कृति नहीं है। इनके पीछे देवत्व का अदृश्य सहयोग भी सम्मिलित रहा है। ध्रुव को ब्रह्माण्ड के केन्द्र बनने का श्रेय उसके तपोबल के सहारे ही संभव हुआ था। अगस्त्य का समुद्रपान और परशुराम द्वारा अपने कुल्हाड़े के बल पर लाखों -करोड़ों का जो “ब्रेन वाशिंग” हुआ था उसे किन्हीं वक्ताओं के धर्मोपदेश से नहीं किया जा सकता।
अपने परम तेजस्वी तमतमाते हुए रक्तवर्ण मुखारविंद के साथ जब सूर्यदेव घर पहुँचे तो उनकी पत्नी संध्या ने आंखें बंद कर लीं।
कुपित होकर सूर्य ने कहा-क्यों? तुम्हें मेरा तेजस्वी स्वरूप रुचता नहीं? संध्या की आँखें और भी नीची हो गई। उसने बादलों के घूँघट से कोमल मुख ढक लिया।
अब अभद्रता उन्हें और भी अखरी और वे लाल पीले होकर अपना दर्प दिखाने लगे। बेचारी संध्या भयभीत होकर अपने पितृ गृह चली गई और तपस्या में लीन हो गई।
सूर्य अपनी पत्नी के बिना उदास रहने लगे वे एक योगी का रूप बनाकर संध्या के पास पहुँचे और इस कठिन तपस्या का प्रयोजन पूछने लगे।
तपस्विनी ने कहा- तात! मेरे पति और भी तेजस्वी हों पर उनका स्वभाव इतना सरल हो कि मैं अपलक उनके दर्शन कर सकूँ।
सूर्य द्रवित हो गये। दर्प की प्रचण्डता को मानते हुए उन्होंने अपनी सोलह कलाओं में से एक के साथ ही प्रकाशित होना आरम्भ कर दिया।
सतयुग ऋषियुग का ही प्रकट रूप है। असुरता की अभिवृद्धि होते हुए ही कलहयुग-कलयुग आ धमकता है। उच्चस्तरीय प्रतिभाओं का पौरुष जब कार्य क्षेत्र में उतरता है तो न केवल कुछ व्यक्तियों को, कुछ प्रतिभाओं को वरन् समूचे वातावरण को ही उलट-पुलट कर रख देता है। धोबी की भट्टी पर चढ़ने से मैले कपड़ों की सफाई से चमचमाते देखा गया है। भट्ठी में तपाने के बाद मिट्टी मिले बेकार लोहे को फौलाद स्तर का बनते और उसके द्वारा कुछ न कुछ कर दिखाने वाले यंत्र-उपकरण बनते देखे जाते हैं। आत्मशक्ति की प्रखरता को इसी स्तर का बताया और पाया गया है।
इक्कीसवीं सदी से प्रारंभ होने वाला नवयुग अभियान सम्पन्न तो प्रतिभावान मनुष्यों द्वारा ही होगा, पर उनके पीछे निश्चित रूप से ऐसी दिव्य चेतना जुड़ी हुई होगी जैसी कि फ्राँस की एक कुमारी “जोन ऑफ आर्क” ने रण कौशल से अपरिचित होते हुए भी अपने देश को पराधीनता के पाश से मुक्त कराने में सफलता प्राप्त की थी। महात्मा गाँधी और संत बिनोवा जो कर सके वह उस स्थिति में कदाचित ही बन पड़ता जो वे बैरिस्टर, मिनिस्टर, नेता, अभिनेता आदि बनकर कर सके होते।
चन्द्रगुप्त जब विजय की योजना सुनकर सकपकाने लगा तो चाणक्य ने कहा “तुम्हारी दासी पुत्र वाली मनोदशा को मैं जानता हूँ। उसके ऊपर उठो और चाणक्य के वरद् पुत्र जैसी भूमिका निभाओ। विजय प्राप्त कराने की जिम्मेदारी तुम्हारी नहीं मेरी है।” शिवाजी जब अपने सैन्य बल को देखते हुए असमंजस में थे कि इतनी बड़ी लड़ाई कैसे लड़ी जा सकेगी, तो समर्थ रामदास ने उन्हें भवानी के हाथों अक्षय तलवार दिलाई थी और कहा था तुम छत्रपति हो गये। पराजय की बात ही मत सोचो। राम लक्ष्मण को विश्वामित्र यज्ञ की रक्षा के बहाने बल और अतिबल का कौशल सिखाने ले गये थे ताकि वे युद्ध लड़ सकें। असुरता के समापन और रामराज्य के रूप में सतयुग की वापसी संभव कर सकें। महाभारत लड़ने का निश्चय सुनकर अर्जुन सकपका गया था और कहने लगा था कि “मैं अपने गुजारे के लिए तो कुछ भी कर लूँगा फिर हे केशव! आप इस घोर युद्ध में मुझे नियोजित क्यों कर रहे हैं?” इसके उत्तर में भगवान ने एक बात कही थी कि “ इन कौरवों को तो मैंने पहले ही मार कर रख दिया है। तुझे तो यदि श्रेय लेना है तो आगे आ, अन्यथा तेरे सहयोग के बिना भी यह सब हो जायेगा जो होने वाला है। घाटे में तू ही रहेगा। श्रेय गँवा बैठेगा और उस गौरव से भी वंचित रहेगा जो विजेता और राज्य सिंहासन के रूप में मिला करता है।” अर्जुन ने वस्तुस्थिति समझी और कहने लगा “करिष्ये वचनं तव” अर्थात् “आपका आदेश मानूँगा।” ऐसे ही हिचकिचाहट हनुमान, अंगद, नल-नील आदि की रही होती तो वे अपनी निजी शक्ति के बल पर किसी प्रकार जीवित तो रहते, पर उस अक्षय कीर्ति से वंचित ही बने
पास पास तीन पहाड़ों की चोटियाँ थीं। उनके ऊपर से देवता निकलें। देवताओं को रोक कर तीनों ने प्रणाम किया। देवताओं ने उनसे एक एक वरदान माँग लेने के लिए कहा।
एक पहाड़ ने माँगा कि उसकी ऊंचाई बढ़ जाय ताकि वह बड़ा कहलाए और दूर दूर से दीखे। दूसरे ने माँगा उस पर घनी हरियाली छा जाय ऐसी जिसे कोई बरबाद न कर सकें। तीसरे ने माँगा कि उसे भूमि जैसा समतल बना दिया जाय ताकि उस पर खेती की जा सके और अनाज उपज सके। देवताओं ने इच्छानुसार वरदान दिया।
देवता बहुत दिन बाद उसी रास्ते वापस लौटे। तीनों पर्वतों की परिणति पर नजर डाली। सबसे ऊँचा पहाड़ सबसे अधिक सर्दी गर्मी सहता था। कोई उस तक पहुँच भी न पाता था। हरा भरा पहाड़ दूर से देखने वालों को तो सुन्दर लगता था पर उस में घूमने फिरने के लिए वन्य पशुओं तक को स्थान न था। मात्र पक्षी रहते थे।
तीसरा समतल हुआ पर्वत अत्यंत लोक प्रिय बन गया था। उस पर बस्तियाँ बसीं और खेती होने लगी। बगीचे उगने लगे। सौभाग्यशाली इस समतल बनने वाले को ही माना गया। वैभवशाली को नहीं।
रहते जो उन्हें अनन्त काल तक मिलने वाली है। युग सृजन में श्रेय किन्हीं को भी मिले पर उसके पीछे वास्तविक शक्ति उस ईश्वरीय सत्ता की ही होगी जिसने नई सृष्टि रचने जैसे स्तर की अभिनव योजना बनाई है और उसके लिए आवश्यक साधनों एवं अवसर विनिर्मित करने का साधन जुटाने वाला संकल्प किया है। कठिनाइयों को निरस्त करने वाला साहस अपने आप में एक ईश्वरीय अनुग्रह है जो जब बरसता है तो व्यक्ति को ही नहीं, समुदाय को ही नहीं, समूचे युग को निहाल कर देता है।
जिसकी तरफ निहारा तुमने, वह जीवित मधुमास बन गया।
जिस पर कर दी कृपा दृष्टि वह, पूरब का आकाश बन गया ॥
*
तुम थे स्वयं सिंधु करुणा के, सब जलधाराओं के आश्रय।
पास तुम्हारे आ जाये बस, मानव हो जाता था निर्भय ॥
तुम्हें समर्पित हर जीवन, लहरों का चिर उल्लास बन गया ॥
*
जिसको समझा पात्र उसे ही, लोकहितों की दीक्षा दी है।
जिसे बनाया कंचन-उसे सौख्य कम,अधिक तितिक्षा दी है ॥
जिसने ऐसा ताप पी लिया, वही तुम्हारा “खास” बन गया॥
*
सीख लिया जिसने साँसों का विलय, लोक सेवा में करना।
सबको देना गंध- स्वयं रहकर, काँटों के बीच - निखरना ॥
ऐसा हरेक प्राण तुमसे मिल, दिव्य मलय वातास बन गया ॥
*
और चलाया जिसको अपने साथ, उँगलियाँ पकड़ कर।
जिसके प्राणों में भर दिये, साधना युक्त तपे स्वर ॥
उसका क्रियाकला तुम्हारे, सँग शाश्वत इतिहास बन गया ॥
-माया वर्मा
वाणी और मस्तिष्क का सीधा सम्बन्ध है। मनुष्य जो भी कुछ सोचता और विचारता है, उसकी अभिव्यक्ति वाणी के माध्यम से करता है। भावनाएँ वाणी के द्वारा ही प्रकट होती और अन्तराल की उत्कृष्टता-निकृष्टता का परिचय देती हैं। वासना, तृष्णा, अहंता आदि की ज्वालाएँ अन्दर ही अन्दर धधकती रहती हैं और जब-तब अवसर पाकर वाणी के माध्यम से बाहर फूट पड़ती हैं अथवा मानसिक शक्तियों को घुन की तरह चाटती-कुतरती रहती हैं। अध्यात्म साधनाओं में इसीलिए वाणी के संयम को मानसिक संयम के साथ सम्बद्ध रखा गया है और कहा गया है कि विचारणा, भावना और आकाँक्षा पक्ष से मानसिक शक्तियों का क्षरण रोका जाय, पर अभिव्यक्ति पक्ष से वाक् संचय न किया जाय, तो शक्ति संचय की साधना अधूरी एवं एकाँगी रह जाएगी। इसलिए मानसिक संयम के साथ-साथ वाणी का संयम भी अनिवार्य रूप से आवश्यक है। मौन साधना इसी की पूर्ति करती है।
मौन की गणना मानसिक तप के रूप में की गई है। गीताकार ने कहा है ‘मन प्रसादः सौमत्व्यं मौनमात्म विनिग्रहः।’ अर्थात् मन की प्रसन्नता, सौम्य शालीनता, मौन मनोनिग्रह और विचारों की शुद्धि मानसिक तप कहे जाते हैं। वरन् शक्ति का अपव्यय भी रुकता है मानसिक संयम साधने में मौन का असाधारण महत्व है। शास्त्रों में इसके अनेकानेक उदाहरण भरे पड़े हैं।
महर्षि व्यास की वह कथा प्रसिद्ध है, जिसमें महाभारत जैसे विशाल ग्रन्थ की रचना कर लेने के पश्चात उन ने गणेश जी से लेखन कार्य पूरा न होने तक एक शब्द भी न बोलने का कारण पूछा था, प्रत्युत्तर में गणेश जी ने कहा था ‘यदि मैं बीच-बीच में बोलता जाता, तो आपका यह कार्य न केवल कठिन हो जाता, वरन् एक भार ही बन जाता। महर्षि रमण के बारे में प्रसिद्ध है कि वे सर्वथा मौन रहते हुए भी आगन्तुकों की समस्याओं का समाधान कर देते थे। सभी पूर्ण सन्तुष्ट होकर जाते और अपने प्रश्नों के उत्तर मौन वाणी से ही प्राप्त कर लेते थे। तभी तो मनीषियों ने मौन को पवित्रतम् विचारों का मन्दिर कहा है।
शरीर-क्रिया विज्ञानियों का कहना है कि शरीर के जिन कार्यों में सर्वाधिक शक्ति खर्च होती है, वह वाणी है। उसके संयम का महत्व न समझने वालों की प्रायः यही मान्यता होती है कि बोलने में क्या लगता है? उन्हें यह ज्ञात नहीं कि बोलने में कितनी अधिक मानसिक शक्ति खर्च होती है। एक घण्टे लगातार बोलने पर व्यक्ति इतना थक जाता है मानों चार घण्टे तक शारीरिक श्रम किया हो। कारण वाक् तंत्र का सीधा सम्बन्ध मस्तिष्क से है। अन्य कार्य यों तो हाथ-पैर से भी किये जा सकते हैं और उन्हें करते समय ध्यान कहीं और भी रह सकता है, पर बोलते समय सारा ध्यान बोलने पर ही रखना पड़ता है। अन्यथा मुख से उच्चरित शब्द बकवास मात्र रह जाते हैं। अधिक बकवास मानसिक शक्तियों को नष्ट करती हैं, वरन् उससे आध्यात्मिक दृष्टि से भी हानियाँ ही हानियाँ होती हैं।
मनीषियों ने वाणी के अपव्यय को रोकना आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य भी बताया है। मूर्धन्य मनोविज्ञान वेत्ताओं का कहना है कि मौन से विचार शक्ति बढ़ती है। सुविख्यात विचारक जेम्स एलन अपनी कृति “पावर्टी टु पीस” में कहते हैं कि समस्त शक्तियों में सर्वश्रेष्ठ शक्ति मौन की शक्ति है। जब वह उचित मार्ग में प्रयुक्त होती है, तो उन्नति एवं अभ्युदयकारक होती है, किन्तु दुरुपयोग होने पर विनाशकारी दुष्परिणाम प्रस्तुत करती है। भाप, विद्युत आदि शक्तियों का दुरुपयोग हो, तो अनर्थ ही खड़े करेंगी। विचार सम्पदा के बारे में भी यही बात है। वह संसार की सबसे अधिक शक्तिशाली शक्ति है। जिन्हें मन को वश में रखना एवं अपने आप पर नियंत्रण साधना हो, उन्हें नियमित रूप से कुछ समय के लिए मौन रहना चाहिए। एकाग्रता सम्पादन के लिए इससे बढ़कर कोई अन्य सरल उपाय है नहीं।
सामान्य जीवन में भी कार्य करते समय बोलने और मौन रहने का अन्तर समझा जा सकता है। जो व्यक्ति मौन रहते हैं, उनकी बुद्धि अपेक्षाकृत अधिक स्थिर तथा संतुलित विचारों वाला हानि-लाभ, हित-अनहित के प्रसंगों पर बड़े धैर्यपूर्वक सोच समझ सकता है। संकट या आपत्ति के समय मौन द्वारा प्रखर की हुई विचार शक्ति बड़ी सहायक सिद्ध होती है। कभी भी देखा जा सकता है कि जब मनुष्य किसी गहन प्रसंग पर सोचना चाहता है, तब वह एकान्त की तलाश करता है। न तो वह उस समय बोलता है और न किसी से बात ही करता है। बोलना और विचार करना दोनों क्रियाएँ एक साथ नहीं हो सकतीं। विचारक जितने गहरे मौन में उतरता जाता है, समस्याओं का सार्थक हल खोज लाता है। महात्मा गाँधी को जब कभी किसी विकट समस्या पर विचार करना होता था, तब वे कई दिनों तक मौन व्रत धारण कर लिया करते थे। सप्ताह में एक दिन तो वे मौन रखते ही थे, उनका कहना था कि मौन से आत्मिक बल बढ़ता है। आत्मिक बल बढ़ाने वाले मौन के साथ और बातें भी जुड़ी होती हैं। मौन को उन ने सर्वोत्तम भाषण बताया है और कहा है कि अगर बोलना ही पड़े, तो कम बोलना चाहिए। यदि एक शब्द से काम चल जाय, तो दूसरा मुँह से नहीं निकलना चाहिए।
“क्राइस्ट इन साइलेंस” नामक कृति में सी एफ. एण्डूज कहते हैं कि महान व्यक्ति वहीं होते हैं, जो यह जान लेते है कि आध्यात्मिक शक्ति भौतिक शक्ति से अधिक बलवान है। आत्मशक्ति को जाग्रत करने का सबसे अच्छा और सरल उपाय उन ने कुछ समय के लिए मौन होकर ईश्वर प्रार्थना को बताया है। उनके अनुसार मौन की गुप्त शक्ति असीम है। वाणी का संयम तो इससे होता ही है, मानसिक शक्ति का अनावश्यक क्षरण रुकता है, और एकाग्रता बढ़ती है। उच्चस्तरीय विचार प्रवाह शाँत-स्थिर मनःस्थिति में ही उठते और अभ्युदय का, प्रगति का आधार खड़ा करते हैं। मौन की महिमा का गान करते हुए इमर्सन कहते हैं “आओ हम चुप रहें, ताकि फरिश्तों के वार्तालाप सुन सकें।”
वस्तुतः मौन हृदय की भाषा है। मुँह से एक शब्द कहे बिना भी अपनी भाव-संवेदना व्यक्त की जा सकती है और जितना असर वाणी का होता है, उससे कहीं अधिक प्रभाव वह उत्पन्न कर सकती है। सुप्रसिद्ध मनीषी इनेरेट अपनी रचना में एक छोटी बालिका के संबंध में लिखते हैं कि वह पक्षियों और वन्य जीवों के साथ खेला करती थी और बीच-बीच में पास में बने परिसर में प्रार्थना करने के लिए दौड़ जाया करती थी। प्रार्थना करने के पश्चात् बिलकुल शान्त होकर चुपचाप कुछ देर के लिए वहीं बैठी रहती। पूछने पर कारण बताते हुए कहती कि - ‘मैं’ देर तक चुपचाप इसलिए बैठी रहती हूँ, ताकि यह सुन सकूँ कि ईश्वर मुझसे, कुछ कहना तो नहीं चाहता।’ शान्त और एकाग्र मन से ही उससे वार्तालाप संभव है। मौन रहकर ही अपने अन्तराल में उतरने वाले ईश्वर के दिव्य संदेशों, प्रेरणाओं को सुना समझा जा सकता है।
मौन के अभ्यास से न केवल अनावश्यक बोलने की प्रकृति पर अंकुश रखने की क्षमता आ जाती है, वरन् उसके विकसित होने पर वाणी के संतुलन के अनेकानेक प्रयोग करने की स्थिति भी पैदा हो जाती है। अतः मनः संयम के साधक को मौन साधना का कुछ न कुछ क्रम बनाकर रखना ही चाहिए। मौन का अर्थ यह नहीं है कि मुँह से कुछ न बोलते हुए हाथ चलाने या लिखकर बातें करने का क्रम अपनाया जाय। उससे मौन साधना के सत्यपरिणाम प्राप्त नहीं होते। शब्दों का उच्चारण भले ही न किया जाता हो, पर बोलने की वृत्ति दूसरी तरह से व्यक्त होती रहे, तो जो शक्ति बोलने में खर्च होती थी, वह उस विषय में खर्च होने लगती है। ऐसी प्रवृत्तियों पर अंकुश लगाकर किया गया मौन ही असाधारण प्रतिफल प्रदान करता है। मौन का अर्थ आन्तरिक है। बाह्य क्रियाओं का अपने ऊपर प्रभाव न होने देना, स्वयं को उनसे निरपेक्ष रखने का नाम मौन है। मौन द्वारा बहिर्मुखी दिशा में तथा विचार संयम द्वारा आन्तरिक दिशा में मानसिक शक्तियों का अपव्यय होने से रोक लिया जाय, तो फिर इन्द्रिय संयम आसान हो जाता है। अतः वाणी का संयम करने के लिए हर साधक को थोड़ा बहुत समय मौन साधना के लिए नियत रखना चाहिए। कम से कम सप्ताह में एक दिन या कुछ घण्टे ही सही मौन अवश्य रखा जाय। आत्मबल संवर्धन की यह सर्वश्रेष्ठ साधना जो है।
मन को शरीर राज्य का अधिपति कहा गया है। उसमें पनपने वाली विकृतियों से शरीर में गड़बड़ियों के लिये प्रशासन तंत्र को भले ही पूरी तरह उत्तरदायी न ठहराया जा सकें, क्योंकि समाज में ऐसे तत्वों का अस्तित्व भी रहता है जो शासन तंत्र की उपेक्षा करते हैं, उसकी परवाह नहीं करते और व्यवस्था में रुकावट डालते हैं। परन्तु शरीर के सम्बन्ध में ऐसा कुछ नहीं है, क्योंकि शरीर में ऐसा कोई घटक नहीं है जो मन की उपेक्षा कर सके। मन से बलवान कोई इकाई शरीर में है ही नहीं। निर्विवाद रूप से शरीर पर मन का ही एक छत्र राज्य है। इस तथ्य को जानने के बाद यह मानने से इंकार करने का कोई कारण नहीं है कि मन का असंतुलन, शोक, संताप तथा उद्वेगों के साथ रोग बीमारियों के रूप में भी अपना प्रभाव उत्पन्न करे। विज्ञान भी इस निष्कर्ष पर पहुँचता जा रहा है कि रोगों का कारण शरीर में नहीं मन में है।
इस तथ्य को अब चिकित्सा-विज्ञान ने सिद्धान्ततः स्वीकार भी कर लिया है और इस आधार पर रोगों के उपचार की नई पद्धतियाँ भी खोजी तथा अपनायी जाने लगी हैं। बड़े शहरों में साइकियाट्रिस्ट, फिजीशियन उपचार करते समय रोग परीक्षण के साथ रोगी के मनोविश्लेषण पर भी ध्यान देते हैं। उपचार की यह पद्धति काफी सफल रही है और कोई आश्चर्य नहीं की अगले दिनों प्रचलित चिकित्सा पद्धति की उपयोगिता को नकार दिया जाए तथा उसके स्थान पर मानसोपचार एवं औषधोपचार की मिश्रित चिकित्सा पद्धति अपनाई जाय। पिछले दिनों ब्रिटेन के डॉ. हैरी एडवर्ड्स ने बिना दवा और बिना औजार के एक नई चिकित्सा पद्धति विकसित की है, जिसे उन्होंने ‘स्प्रिचुअल हीलिंग” अथवा “आध्यात्मिक चिकित्सा” का नाम दिया है।
डॉ. हैरी एडवर्ड्स ने अपनी पुस्तक “ट्रुथ अबाउट स्प्रिचुअल हीलिंग” में इस चिकित्सा पद्धति के सिद्धाँतों और विधियों का उल्लेख करते हुए ऐसे कई रोगियों के विवरण दिये हैं जिन्हें डाक्टरों ने लाइलाज घोषित कर दिया था, किन्तु आध्यात्मिक चिकित्सा से वे ठीक हो गये। बम्बई के मनोहर लाल कुडालकर भीषण सूत्रण रोग से पीड़ित थे। वर्षों से इलाज कराते रहने के बावजूद भी वे ठीक नहीं हो पा रहे थे। बल्कि उनके सम्बन्ध में “मर्ज बढ़ता गया ज्यों-ज्यों दवा की” वाली उक्ति चरितार्थ हो रही थी। डॉ. हैरी एडवर्ड्स की अध्यात्म चिकित्सा से वे पूरी तरह ठीक हो गए। लंदन की एक महिला एलिजाबेथ विल्सन का रोग भी विचित्र है। सन् 1909 में जब वह कुल साढ़े तीन वर्ष की थी, उसकी रीढ़ की हड्डी में दर्द हुआ। दर्द इतना भयंकर था कि उसे पूरे एक वर्ष तक बिस्तर पर सीधे लिटाये रखा गया और उसका इलाज भी कराया गया लेकिन रोग ठीक होने के बजाए गंभीर ही होता चला गया। चौदह वर्ष तक पहुँचते-पहुँचते तो पीड़ा असहनीय हो चुकी थी और वह चलने फिरने में असमर्थ हो गई। इस तरह वह पूरे 30 वर्ष तक इस पीड़ा को झेलती रही। चिकित्सकों ने हार मान ली और उसके मर्ज को लाइलाज बताया। सन् 1950 में एलिजाबेथ के अभिभावकों को किसी ने डॉ. एडवर्ड्स के बारे में बताया उनके उपचार से वह कुछ ही हफ्तों में ठीक हो गई।
लंदन के ही विलियम ओल्सन “प्रोपल्स स्पाइनल डिस्क” नामक रोग से बुरी तरह पीड़ित थे। विशेषज्ञों ने एक्सरे आदि के बाद इस रोग की पुष्टि की। ओल्सन ने काफी इलाज भी कराया किन्तु रोग ठीक नहीं हुआ सो नहीं ही हुआ। अंततः ओल्सन डॉ. एडवर्ड्स के चिकित्सालय में गए। वहाँ उनका उपचार आरम्भ हुआ और कुछ ही दिनों बाद रोगी ने प्लास्टर जैकेट के बिना चलना शुरू कर दिया। चंद हफ्तों के इलाज से ओल्सन पूर्णतया निरोग भी हो गए। ओल्सन ने इसके कुछ ही वर्षों बाद 16 हजार मील से अधिक की यात्रा की और उन्होंने बताया इस यात्रा में मुझे कोई असुविधा नहीं हुई। रोग का कोई चिन्ह उनमें उपचार के बाद विद्यमान नहीं पाया गया।
डॉ. एडवर्ड्स ने अपनी चिकित्सा पद्धति के सम्बन्ध में “ट्रुथ अबाउट स्प्रिचुअल हीलिंग” में लिखा है - आध्यात्मिक चिकित्सा एक विधेयात्मक चिकित्सा विधि है और इसके परिणाम भी तर्कसंगत हैं। इसका काम मनुष्य और उसके सर्जक के बीच उचित संबंधों को पुनर्स्थापित करना है। जब कि आधुनिक प्रचलित चिकित्सा पद्धति मनुष्य को कुछ रासायनिक तत्वों का योग भर मानकर चलती है और स्वास्थ्य में खराबी का कारण इन रासायनिक संतुलनों को गड़बड़ा जाना मात्र समझती है। दवाएँ परहेज, उपचार और शास्त्र चिकित्सा को साधने के लिये किये जाते हैं। यह रासायनिक संतुलन दवा और उपचार से कुछ समय के लिये स्थापित भी हो जाते हैं किन्तु एडवर्ड्स के अनुसार स्वास्थ्य की सही सिद्धि अपने मूल स्त्रोत आध्यात्मिक सत्ता या परम चेतना है। यही कारण है जिन कई रोगों को आधुनिक चिकित्सा असाध्य अथवा दुःसाध्य मानती है। ‘स्प्रिचुअल हीलिंग’ द्वारा उन्हें बड़ी सरलता से थोड़े ही समय में ठीक कर दिया गया। इस चिकित्सा पद्धति को अपनाकर वर्षों पुरानी पीड़ा दूर होती देखी गई है।
डॉ. एडवर्ड्स का कहना है कि अध्यात्म चिकित्सा सुनिश्चित नियमों और तर्कसंगत कारणों के आधार पर अपना प्रभाव उत्पन्न करती है। उनके अनुसार हर बात का कोई न कोई कारण होता है और हर परिवर्तन के लिये किसी न किसी शक्ति का उपयोग किया जाता है, परन्तु स्वाभाविक चिकित्सा के रहस्य की खोज में एक मूल कठिनाई यही है कि हम केवल वही समझ सकते हैं जो हमारी समझ की सीमा में आती है। उदाहरण के लिये किसी ऐसे व्यक्ति को, जो जन्म से ही अंधा हो किसी रंग का वर्णन करके नहीं, समझाया जा सकता है। आध्यात्मिक चिकित्सा के साथ यही बात जुड़ी हुई है। इसके आत्मिक जगत के अभौतिक आयाम है और किसी भी अभौतिक अथवा अलौकिक विषय को भौतिक और लौकिक भाषा में या कि शब्दों में व्यक्त करना असंभव है। फिर भी चूँकि हर चिकित्सा का एक सुनियोजित क्रम है। अतः इसके लिए एक विशेष प्रकार की समझ आवश्यक है।
भारत सहित विश्व के कई देशों में इस तरह के उपचार केन्द्र कार्यरत हैं और लगभग सभी स्थानों पर इस उपचार पद्धति को मान्यता दी जा चुकी है। इसका कारण यही है कि इस पद्धति से हजारों रोगियों का सफलतापूर्वक इलाज किया जा चुका है। ऐसे रोगियों को भी इस पद्धति से लाभ पहुँचा है, जिन्हें डॉक्टर जवाब दे चुके होते हैं।
एक कृपण सत्संग में आया करता था। कभी एक पैसा भी पूजन में चढ़ाता न था। लोग मन ही मन उसकी निंदा करते। भावभंगिमा देखकर कृपण लोगों के मनोभावों को भाँप तो लेता था।
एक दिन सत्संग करके कृपण ने कथा पर एक सौ रुपया चढ़ा दिये। देखने वाले वाह वाह कहने लगे। कृपण ने लोगों से कहा देखा आपने पैसे का चमत्कार। क्षण भर में वाह वाही हो गयी। इसीलिए तो पैसा बचाता हूँ कि उसके बदले जब जो चाहे सो खरीदा जा सके।
कथा वाचक ने समझाया कि आज कि प्रशंसा आपके दान की परिणति है। धनी तो आप पहले से ही थे पर किसी ने आपके नहीं सराहा। आज तो आप त्याग अपना कर ही प्रशंसा के पात्र बने हैं।
कहा जा चुका है कि मन शरीर का संचालक और नियामक है। मनः शास्त्री इसे शरीर का स्वामी मानते हैं। परन्तु भारतीय तत्वदर्शन मन को शरीर संचालन के लिए आत्मा द्वारा नियुक्त एक कर्मचारी मात्र मानता है अर्थात् स्वास्थ्य, सुव्यवस्था और शरीर के सुसंचालन में आत्मिक शक्ति की न्यूनता या प्रबलता ही लड़खड़ाने अथवा सम्हालने का आधार बनती है। जो परम चेतना शक्ति अपने संकल्प मात्र से इतने बड़े विश्व ब्रह्माण्ड का सृजन कर सकती है, उसे बना और बिगाड़ सकती है, उससे संबद्ध होकर शरीर को स्वस्थ नहीं रखा जा सके तो आश्चर्य ही है। शक्ति से जुड़कर स्वास्थ्य लाभ अर्जित करने की ओर अब ध्यान दिया जाने लगा है। अच्छा यही होगा कि हम प्राकृतिक जीवन की ओर मुड़े और जीवन के हर कार्य में ईश्वर को साझेदार मानें।
अपना निज का तेजोवलय यदि बढ़ता है और उच्चस्तरीय बनता है, तो उसे प्राण क्षेत्र की दिव्य विभूति माना जा सकता है। उससे अपनी निजी न्यूनताओं को पूरा करना एवं त्रुटियों का परिशोधन -परिमार्जन कर सकना संभव हो सकता है। इसी को आत्मोत्कर्ष का प्रथम सोपान कहा जा सकता है। दूसरों की वास्तविक, गंभीर एवं चिरस्थायी सेवा-सहायता कर सकना भी इसी आधार पर संभव है।
योगी यती कष्टसाध्य तपश्चर्याएं करते हैं, पर सर्व साधारण को लक्ष्य रखकर लिखते समय उतना ही उल्लेख किया जाता है, जो जनसाधारण से बिना कठिनाई के बन सके। इसीलिए तप जैसे भारी भरकम शब्द के स्थान पर यहाँ ‘व्रत’ शब्द का प्रयोग किया जा रहा है। सरल शब्दों में इसे ‘संयम ’ भी कहा जा सकता है।
व्रतों में जिव्हा और ज्ञानेन्द्रियों को मर्यादा में रखना, वर्जनाओं में न भटकने देना, प्रमुख हैं। आत्म-साधना के मार्ग पर चलने वालों को चटोरेपन पर नियंत्रण करना चाहिए। नित्य के भोजन में सात्विक पदार्थों की सीमित मात्रा लेते रहने का क्रम चलाना चाहिये। अधिक दृढ़ता न अपनाई जा सके, तो सप्ताह में एक दिन अस्वाद-व्रत का तो पालन करना ही चाहिए। इसके लिए रविवार या गुरुवार के दिन उत्तम हैं। इस अनुपालन से दिव्य स्तर की अनुकूलताएँ निभती हैं।
उपवास को व्रत का पर्यायवाची माना जाता है। उसकी सर्वथा उपेक्षा करके आगे नहीं बढ़ा जा सकता। साप्ताहिक उपवास यदि दूध-छाछ के आधार पर चल सके, शाकाहार-फलाहार लिया जा सके तो उत्तम हैं। इनका रस लेकर भी प्रवाही आहार की मर्यादा निभ सकती है। इतना न बन पड़े तो न्यूनतम इतना तो करना ही चाहिए कि अमृताशन के सहारे साप्ताहिक उपवास पूरा किया जाय। उबले हुए धान्य को अमृताशन कहते हैं। दाल, चावल, दलिया, इसी वर्ग में आते हैं। परहेज तो पकवान-मिष्ठानों से करना चाहिए। तले, भुने, मसालेदार, शक्कर से लबालब पदार्थों को उपवास में छोड़ ही देना चाहिए। यह मनोबल की साधना है कि सप्ताह में एक दिन का उपवास किसी न किसी रूप में करते ही रहा जाय। जो तीसों दिन पेट को बंदूक की नली की तरह भरे रहते हैं, उनके लिए व्रतशीलता के आधार पर मनोबल को बढ़ा सकना कठिन है, आत्मिक प्रगति का अवरोध तो बना ही रहेगा।
दूसरा व्रत है- ब्रह्मचर्य में शारीरिक कम और मानसिक अधिक प्रतिबन्ध है। कामुक -अश्लील चिन्तन में जितना समय मन भटकता है, समझना चाहिए कि मानसिक स्तर के ब्रह्मचर्य का उतना ही अधिक क्षरण हो रहा है। नर को नारी के प्रति और नारी को नर के प्रति मित्र-सहयोगी की समतापरक भावनाएँ रखनी चाहिए। इसमें माता-पुत्र का, भाई-बहिन का, पिता-पुत्री का मानसिक सम्बन्ध स्थापित करना पड़ता है। नारी में पवित्रता के तत्व अधिक हैं। इसलिए उन्हें देवी के रूप में भी देखा जा सकता है। उसी स्तर की श्रद्धा को अपनाये रहा जा सकता है, पत्नी के साथ भी।
शारीरिक ब्रह्मचर्य उपयोगी तो है, पर उतने ऊँचे स्तर का नहीं, जितना कि मानसिक श्रद्धा का अवलम्बन। शारीरिक समागम में जो युग्म जितना अधिक अनुशासन, पारस्परिक सहमति से पालन कर सकें, करें पर साप्ताहिक उपवास के दिन तो उसे मर्यादा के रूप में ही निश्चित रूप से पालन करना चाहिए।
मौन, एकान्त-सेवन, चिन्तन, मनन यह चार मानसिक संयम हैं। इनके लिए साप्ताहिक उपवास के दिन न्यूनतम दो घण्टे नियत रखने की व्यवस्था करनी चाहिए। कौन सा समय किसे सुविधा-जनक पड़ता है, यह देखना व्यक्ति विशेष का काम है। प्रातःकाल सुविधा न रहती हों, तो कोई अन्य समय चुना जा सकता है। एकान्त स्थान घर में भी हो सकता है और बाहर खेत, पार्क उद्यान आदि में भी हो सकता है। साँसारिक क्रिया-कलापों वाले विचारों को न उठने दिया जाय, वरन् उन्हें आत्म-निरीक्षण, आत्म-विकास की साँगोपाँग योजना बनाने में ही निरत रखा जाय। मन को प्रारंभिक स्थिति में पूर्णतया रोका जा सकता है, संसार में अपने फैलाव को समेट कर अन्तर्मुखी किया जा सकता है। आत्मबोध और आत्म परिष्कार की परिधि में विचारणा को केन्द्रीभूत किया जा सकता है। उपरोक्त चारों प्रयोजन एक साथ सध जाते हैं, चारों आपस में गुंथे हुए हैं।
व्रतशीलता का महत्व समझा जाय। संकल्प शक्ति बढ़ाने के लिये आत्मानुशासन के निर्वाह को अति महत्वपूर्ण चरण माना जाय। साप्ताहिक व्रत साधना से उपरोक्त चरण निभते रहें तो समझना चाहिए कि चित्त वृत्ति निरोध की योग साधना और व्रत संयम की तप। साधना का छोटा, किन्तु महत्वपूर्ण प्रयास चल पड़ा।
उपरोक्त साप्ताहिक व्रत शरीर और मन की परिधि के अंतर्गत आते हैं, पर इसी से जुड़ा हुआ दिनचर्या-नियमन का आधार भी है।
तप-संयम व्रत का दैनिक जीवन में समावेश करने के लिए इन्द्रिय निग्रह के अतिरिक्त समय संयम, अर्थ समय और विचार संयम को भी अपनाना पड़ता है। समय ही जीवन है। उसका एक-एक घटक मिलकर ही जीवन रूपी महाकाल बनता है। दिनचर्या इस प्रकार बनानी चाहिए कि समय का एक क्षण भी निरर्थक न जाने पाये। प्रत्येक क्षण सार्थक, सज्जनोचित कार्यों में लगे। आलस्य और प्रसाद यही दो मनुष्य के निरन्तर साथ लगे रहने वाले शत्रु हैं। व्यस्तता ही जीवन की सार्थकता है। ओछे और घटिया कामों से समय बचाकर यदि उसे दूरगामी सत्परिणाम उत्पन्न करने वाले क्रिया-कलापों में लगाया जाय, तो उसका ऐसा प्रतिफल उपलब्ध हो सकता है, जिससे अपने को सन्तोष एवं दूसरों का सहयोग मिले।
अर्थ संयम का तात्पर्य है- औसत नागरिक स्तर के निर्वाह से गुजर चलाना। एक पैसा भी विलासिता में, अहंकारी ठाठ-बाठ में, प्रदर्शन और दर्प अहंकार के निमित्त खर्च न करना, लोभवश अधिक संग्रह की ललक से पिण्ड छुड़ा कर जो बचत हो सके, उसे परमार्थ में लगाना।
अनीतिपूर्वक कमाया हुआ, अनावश्यक रूप से संचित किया हुआ, दुर्व्यसनों में उड़ाया हुआ धन अन्ततः अनेकानेक संकट एवं दुष्परिणाम उत्पन्न करता है, पतन के गर्त में गिरा कर छोड़ता है।
विचार संयम का तात्पर्य है- मस्तिष्क में अनावश्यक कल्पनाएँ न घुमड़ने देना। ललक-लिप्साओं की रंगीली उड़ानों में चिन्तन को न भटकने देना। ऐषणाओं, महत्वकाँक्षाओं में मन को न उलझने देना। विचार शक्ति को रचनात्मक योजनाओं में नियोजित किये रहना। विचार ही वे बीज हैं, जो उगने पर अपने स्तर के अनुरूप ही भविष्य का निर्माण करते हैं। महामानवों ने अपने विचारों को दिशा दी है और आदर्शों से प्रेरणा ली है। हमें भी वहीं करना चाहिए।
कबूतर को घोंसला बनाना नहीं आता था। वह टेढ़ी तिरछी लकड़ी जमा कर लेता। हवा का झोंका आते ही टहनी पर जमी वे लकड़ियाँ जमीन पर गिर जाती और अण्डे नष्ट हो जाते।
कबूतर ने दूसरे पक्षियों से प्रार्थना की कि उसे अच्छा घोंसला बनाना सिखा दें । कई पक्षी उसका अनुरोध सुनकर मजबूत घोंसला बनाने सिखाने आये।
कबूतर ने उपेक्षापूर्वक उस शिक्षण को देखा और कहा इसमें क्या बड़ी बात है। ऐसा तो मैं भी बना सकता हूँ। कृतघ्नता भरे उसके वचन सुनकर सभी पक्षी अपने-अपने घर उदास होकर चले गये कहते हैं जब अच्छा तुम्हें आता ही था तो हमें बुलाने की जरूरत क्या थी।
सीखने में रुचि न लेने वाला कबूतर अभी भी आड़ी टेढ़ी लकड़ियों का घोंसला भर बनाता है और पहले की तरह आये दिन उसको बरबाद होता देखता रहता है। कर्तव्य होता देखता रहता है।
यह चारों संयम किस प्रकार सध रहे हैं, इसका निरीक्षण-निर्धारण, चिंतन-मनन के अंतर्गत किया जाता है। चिन्तन का तात्पर्य है भूतकाल की भूलों को सुधारना और वर्तमान की सार्थकता पर कड़ी नजर रखना। मनन कहते हैं- भावों योजनाओं का निर्धारण और उन्हें पूरा करने के लिए योजनाबद्ध क्रिया -कलाप का निर्धारण। यह चिन्तन-मनन थोड़ा समय हर दिन निकाल कर करते रहना चाहिए, ताकि संयम साधना में कहीं चूक न होने पावे। इसे साप्ताहिक रूप में तो विशेष तत्परतापूर्वक अपनाया जाना चाहिए। इसे अध्यात्मवादी जीवन का प्रारंभिक पाठ समझा जाना चाहिए।
सितम्बर 1963 का प्रभात। रविवार के इस रोज प्रायः सभी यीशु भक्त सामूहिक प्रार्थना के लिए चर्च जाया करते हैं। बर्मिंघम स्थित एक चर्च में इसी तरह लोग प्रार्थना के लिए जा रहे थे। इस गिरजाघर को लोग अश्वेतों के चर्च के नाम से जानते थे और जाते भी इसमें अधिकाँशतया अश्वेत ही थे। कुछ अन्दर प्रवेश कर रहे थे और कुछ इधर-उधर टहल रहे थे। काफी भीड़-भाड़ थी।
इसी बीच तेजी से आती हुई एक मोटर रुकी। उसमें चार-पाँच गोरे अमेरिकी उतर कर तीर की तेजी से गिरजाघर की ओर बढ़े। उनकी ओर किसी का ध्यान जाय इसके पहले उनमें से एक ने हथगोले निकाले और एक-एक साथियों के हाथ में थमा दिया, बचा एक उसके स्वयं के हाथ में था। तभी चर्च की घण्टी की आवाज हुई पर जोरदार धमाकों के बीच इसे कौन सुनता। यह आवाज श्वेत अमेरिकियों के हथगोलों से उभरी थी। विस्फोट होते ही भगदड़ मच गई। अनेकों मरे घायल हुए और बहुसंख्यक भगदड़ में कुचले गए। इन मौतों के दर्दनाक दृश्य को देखकर लगता था जैसे ईसा को सूली चढ़ा दिया गया हो और शैतान ठहाके लगा रहा हो।
इस तरह की यह अकेली घटना नहीं थी। उस क्षेत्र में आए दिनों ऐसी तबाहियाँ होती रहतीं। इन सबके पीछे किसी न किसी प्रकार गोरे लोगों का हाथ था। जिस जगह विस्फोट हुआ था, वहाँ मध्यम वर्गीय अश्वेत नागरिक रहते थे। ये सभी किसी न किसी प्रतिष्ठित व्यवसाय में लगे सम्मानित जीवन बिता रहे थे। विगत दिनों की घटनाओं ने सभी को आतंकित कर दिया था। इन विस्फोटों के कारण जन समुदाय ने उस पूरे क्षेत्र का नामकरण ही “डाइनामाइट हिल” कर दिया था।
इन सबका कारण था काले लोगों द्वारा अपने मानवीय अधिकारों की माँग। उसी बस्ती में एक प्रबुद्ध और विचारशील किशोरी रहती थी ऐंजेला डेविस। चर्च के बम काण्ड में उसकी चार सहेलियाँ मरी थी,। अपनी सहेलियों के शरीर के चिथड़े-टुकड़े देखकर उसकी आत्मा दहल उठी। उसके मन में रह-रह कर उभरता कि काले शरीर के भीतर भी लाल रंग का खून है वैसी ही हड्डियां है सभी कुछ वैसा ही है सिर्फ चमड़ी का अंतर रह जाता है और आत्मा तो दिखाई नहीं देती। उसका कोई रंग भी तो नहीं है। सारा कुछ एक सा होने पर भी बाहर के जरा से भेद के कारण पशु से भी बदतर, गया गुजरा स्वयं को मनुष्य तक कहने का अधिकारी नहीं? और दूसरे जो अपने को मनुष्य कहते हैं उनमें कहीं से मनुष्यत्व नहीं। अंतर जरूर है प्रवृत्तियों का, जीवन के प्रति दृष्टिकोण का। निश्चित ही बहुसंख्यक मनुष्यों की मानवीय संवेदनाओं, आत्मिक गुणों का गला शैतान बेदर्दी के साथ घोंटता जा रहा है। तभी, तभी तो मनुष्य सृजन का देवता होते हुए विनाश का शैतान बनता जा रहा है। धन, जाति, रंग आदि अनेकों भेद भाव पैदा कर अपने ही भाइयों को नृशंसता पूर्वक तड़प-तड़प कर मरने के लिए विवश कर रहा है। ऐसे ही न जाने कितने विचार उसके मन में आते रहे और उसने संकल्प लिया कि वह इन भेद की दीवारों को ढहाने, सोई सम्वेदना को जगाने की भरपूर कोशिश करेगी। इसके लिए सब कुछ न्यौछावर करने में उसे तनिक भी हिचक न होगी।
इन्हीं दिनों विद्यालय के व्यवस्थापकों ने उसका नाम न्यूयार्क के सुविख्यात एलिजाबेथ अर्विन स्कूल के लिए चुना। यह चुनाव उक्त स्कूल के मानवतावादी संचालकों की स्कॉलरशिप योजना के तहत हुआ था। छात्रवृत्ति पाकर वह न्यूयार्क पढ़ने चली गई। पुराने स्कूल और नए स्कूल के शैक्षणिक स्तर में जमीन आसमान का अन्तर था। यहाँ की शिक्षा कहीं अधिक ऊंचे स्तर की थी। परिश्रमशीलता की सारी पूँजी लगाकर उसने फ्रेंच भाषा में विशेष योग्यता के साथ स्नातक की परीक्षा पास कर ली।
उनकी श्रम निष्ठ और मनोबल से प्रभावित हो संचालकों ने छात्रवृत्ति बरकरार रखी। फ्रेंच साहित्य में प्रवीणता के साथ उसने इंस्टीट्यूट आफ सोशल रिसर्च में प्रवेश लिया। उनके यह सभी प्रयत्न, योग्यता अर्जन किन्हीं निजी स्वार्थों की पूर्ति के लिए न थे। वरन् इसके पीछे समाज के कर्णधारों को जताने का यह भाव था कि संसार के प्रत्येक मनुष्य में वह गरीब हो या अमीर काला हो या गोरा, अछूत हो या सवर्ण सभी में अपनी मौलिक विशेषताएँ हैं। यदि यह नहीं विकसित हो पा रही हों तो अधिकाँश दोष उन्हीं के मत्थे पर जाएगा जो समाज की नाव की पतवार सँभालने का दावा करते हैं। जिस बगीचे का माली सावधान हो तो क्या मजाल कि एक भी पौधा मुरझा जाय अथवा उसका समुचित विकास न हो। बुद्धिजीवी-विचारशीलों के वर्ण पर भगवान ने समाज वाटिका के माली का भार सौंपा है। यदि वह अपनी जिम्मेदारी को निभाने में प्रसाद करते हैं तो किसी न किसी समय, किसी न किसी तरह उन्हें इसका खामियाजा भुगतना ही होगा।
अब तक उसने डॉक्टरेट पूरी कर ली थी। पूरी करने के साथ अपनी जिम्मेदारी भी अनुभव कर ली कि उसकी भी गणना इन्हीं मालियों में होने लगी हैं। कर्तव्य के प्रति प्रसाद उसने सीखा न था। वह कार्य में जुटने का तरीका ढूंढ़ने लगी। तरीका एक ही समझ में आया। वर्षों से दलित पीड़ित कराह रहे निम्न वर्ग में स्व बोध जगाना। समानता और न्याय की स्थापना के लिए उनके कर्तव्यों को याद कराना। इसके व्यापक स्तर पर वैचारिक आँदोलन की जरूरत समझ में आयी।
इनके बीच वह स्थान -स्थान पर जाती घर-घर द्वार-द्वार जाकर पुकारती “तुम्हें स्वयं उठाना होगा। बाहरी सहायता से अधिक देर तक किसी का काम नहीं चलता। किसी को यत्किंचित् सहायता मददगार तो हो सकती है, प्रेरणा तो भर सकती है पर तुम्हें स्वयं अपना उद्धारक होना पड़ेगा। अपने पैरों पर खड़े होने से काम चलेगा। स्वयं की भुजाओं का पुरुषार्थ ही निर्वाह साधन जुटाने से लेकर प्रगति पथ पर अग्रसर होने जैसे सुयोग जुटाते हैं। रक्तदान आहत को तात्कालिक राहत तो पहुँचता है, पर जीवित रहने की आशा तभी बँधती है जब खुद का शरीर रक्त उत्पादन करने लगें।” उसके ये उद्बोधन वाक्य अधिक प्रभावी बन सकें इसके लिए उसने अनेकों, तरह-तरह के रचनात्मक कार्यक्रम हाथ में लेने शुरू किए।
प्रौढ़ शिक्षा साक्षरता, स्वास्थ्य संरक्षण आदि कार्यक्रमों के माध्यम से जहाँ मनुष्य की ध्वंसात्मक प्रवृत्तियों का शमन होता है, वहीं रचनात्मक प्रवृत्तियाँ उदय होतीं और समूची मानवी चेतना अपना सृजन कौशल प्रकट करने लगती है। जब जागृति के प्रयास सफल होना शुरू हुए। हों भी क्यों न? लगन, निष्ठ, महानता की ललक सभी कुछ मिल कर अपना चमत्कारी परिणाम प्रस्तुत किये बिना रहती।
इसके साथ विरोधी-आपदाओं का क्रम भी शुरू हुआ। “श्रेयाँसि बहुविघ्नानि”, तो सार्वभौमिक सूत्र ही है। हाँ, ये आपदाएँ कमजोरों, हीन मनोबल वालों को ही डिगाती हैं, दृढ़ मनोबल वाले तो उलटे इनसे संघर्ष की प्रेरणा व प्राण पाते हैं। उसे भी कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय की प्रोफेसरशिप से हटा दिया गया जान से मारने तक के प्रयास भी हुए
लोकमान्य तिलक ने एक शिक्षण संस्था बनाई। उससे वे मात्र 30 रुपये वेतन लेते थे और उसी में अपने परिवार का पूरा खर्च चलाते थे।
मित्रों ने कहा इतने कम से तो आपको कभी कफ न का भी इन्तजाम न हो सकेगा।
तिलक ने कहा जीवित रहने तक ही प्रबन्ध करने की मेरी जिम्मेदारी है। काठी कफ़न की चिन्ता वे करेंगे जिन पर इसकी जिम्मेदारी आती है।
अनेकों तरह से अपमानित भी किया गया। अनेकों झंझावातों और कठिनाइयों के बीच मानवीय गरिमा के लिए उनके प्रयास शिथिल नहीं हुए।
इतना ही नहीं इस गरिमा को बरकरार रखने वालों हेतु उनका जीवन प्रकाश दीप और कर्म पगडंडी बन गई।
आज की प्रगतिशील अमेरिकी नारी मुक्ति की जो साँस ले पाई है उसके मूल में अनेकों के साथ ऐंजेला डेविस का पुरुषार्थ मुख्य रहा है। विशेष रूप से शोषितों, पिछड़ों व दबे पिसे नीग्रो अमेरिकी महिलाओं के लिए वे देवदूत बनकर आयीं। परिवर्तन हर क्षेत्र में अवश्यम्भावी प्रक्रिया है। नींव के पत्थर बनने वाले प्रतिभाशील इसमें सदा से महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहें हैं। नवयुग का नवोन्मेष उन्हीं के माध्यम से अब आगे भी होना है।
संसार में प्रायः लोग अपने विभिन्न कामों के द्वारा सुख की तलाश करते रहते हैं। कोई एक तरह से इसकी ढूँढ़-खोज करते रहता है, कोई दूसरी तरह से। इसी के लिए अनेक तरह के साधनों को इकट्ठा करने की होड़ बढ़ती जा रही है। पर ऐसे लोग जिन्होंने ढेरों साधन सामग्रियों को बटोरा है उन्हें भी अशाँति शोक संताप से घिरा देखा जा सकता है। ये सभी सुविधाएँ मिलकर भी उन्हें इससे छुटकारा दिला सकने में समर्थ नहीं हैं। ऐसी स्थिति में सवाल यह उठता है कि वास्तविक सुख कहाँ है? इसे कैसे पाया जा सकता है।
विचार करने पर पता चलता है कि सभी साधन सामग्रियाँ आखिर हैं तो जड़ ही। इनमें अपनी कोई सामर्थ्य ही नहीं है। न तो कोई पदार्थ किसी को सुख दे सकता है और न दुःख। जिस प्रकार बन्दूक में अपनी कोई ताकत नहीं, वह यन्त्र भर है। चलाने वाला उससे किसी की रक्षा भी कर सकता है और मार भी सकता है। इसमें बन्दूक का क्या गुण-दोष? ठीक इसी तरह इन पदार्थों में न तो कोई सुखद तत्व है, और न दुखद जिससे वे किसी को अपनी इस विशेषता से खींच सकें अथवा दूर हटा सकें। यह मनुष्य की अपनी चेतना है, जो बहिर्मुखी प्रवृत्ति होने के कारण उससे सम्बन्ध स्थापित कर उसे सुखद या दुखद बना लेती है। इसकी उन्मुखता और भावों के अनुसार कोई पदार्थ किसी को सुखद किसी को दुखद लगता है।
भारतीय चिन्तकों ने इस चेतना को आत्मतत्व की संज्ञा दी है। पश्चिमी मनोवैज्ञानिक एरिक फ्राम ने अपनी पुस्तक ‘मैन फॉर हिमसेल्फ ” में इसे मनोविज्ञान तत्व कहा है। उनके अनुसार जिस समय मनुष्य की चेतना सुखोन्मुख होकर पदार्थ से सम्बन्ध स्थापित करती है, सुखद लगता है। जब यही दुःखोन्मुख होकर सम्बन्ध स्थापित करती है, वह दुखद लगता है। स्वयं में तो संसार की सभी चीजें जड़ हैं। वे अपनी ओर से किसी को सुख-दुख दे भी कैसे सकती हैं। ये तो अपनी चेतना गत भाव हैं, जो इनमें सम्बन्ध स्थापित कर उसे सुख देने वाला अथवा दुःख देने वाला बना देते हैं। पदार्थों से सुख या दुःख मिलने की धारणा पूरी तरह भ्रमात्मक है।
बुढ़ापा आ जाने पर मनुष्य को वही पदार्थ रसहीन लगने लगते हैं, जिनके पीछे वह अपनी जवानी में दौड़ा भागा करता था। सारा का सारा सुख पता नहीं कहाँ चला जाता है? असलियत यह है कि कमजोरी अथवा बुढ़ापे में बाहरी चीजों से सम्बन्ध स्थापित करने वाली इन्द्रियाँ दुर्बल या शिथिल हो जाती हैं। यह शिथिलता ही पदार्थों को नीरस और निस्सार बना देती है।
बुढ़ापे में ही नहीं, जवानी में भी सुख की अनुभूतियाँ समाप्त होती देखी जाती हैं। बुखार आने पर या स्वाद-इन्द्रिय जीभ में छाले पड़ जाने पर वही स्वादिष्ट भोजन जिनके लिए अभी तक लार टपकती थी, अब रसहीन और बेकार लगते हैं।
सही माने में रस की अनुभूति का कारण इन्द्रियों की स्थूल बनावट नहीं, बल्कि इनसे परे चेतना है। वही चेतना, जो समूची देह, प्राण और मन में समायी है। यही सर्व व्यापक चेतना आत्मा है। सुख का कारण एवं आनन्द का स्त्रोत यही है। यह न तो किसी पदार्थ में है न किसी अन्य वस्तु में। इसे तो आत्मा में ही जीवात्मा के द्वारा अनुभव किया जा सकता है। सुख का संसार इसी में बसा है। खोज का क्षेत्र भी वही होना चाहिए। साँसारिक विषय और वस्तुएँ साधन भर हैं। इनका उपयोग सिर्फ जीवन निर्वाह के लिए है। सुख के लिए इनके पीछे भागने -भटकने से वही परिणाम सामने आएँगे जो मरीचिका में भूले-भटके मृग के सामने आते हैं।
मनोवैज्ञानिक कार्ल युँग ने अपनी पुस्तक “मॉर्डन मैन इन सर्च आँव सोल” में सुख और दुख दोनों की अनुभूति को सापेक्ष बतलाया है। उसके इस कथन में भारतीय दर्शन की मान्यता को प्रयोगों की कसौटी पर खरा सिद्ध करने की झलक मिलती है। बात भी सही है। कोई मध्यम वर्ग का आदमी किसी मिल मालिक सेठ की तुलना में गरीब है, पर दरिद्र की तुलना में वह अमीर है। बुखार से पीड़ित व्यक्ति पूरी तरह से स्वस्थ पहलवान की तुलना में दुःखी है, पर कैन्सर रोग के रोगी की तुलना में सुखी। इसी तरह लगभग सभी दुःख और सुख सापेक्ष हैं। उसी स्थिति में एक आदमी अपने को दुखी महसूस करता है, दूसरा सुखी। फिर सही बात क्या है?
सही स्थिती न जानने के कारण ही मनुष्य तरह तरह के सन्ताप भोगता और दुःखी होता है। योगवशिष्ठ में इस पर चर्चा करते हुए इसका कारण बताया है। इससे छूटने का उपाय वास्तविकता को समझना तथा उसके अनुसार व्यवहार करना है। यही स्थाई सुख की स्थिति है। इसी को दर्शन की भाषा में ब्राह्मी स्थिति कहकर संबोधित किया गया है।
ऐसा स्थाई सुख सामान्य दृष्टि से विलक्षण चीज है, क्योंकि सामान्य जिन्दगी में लोगों को थोड़े समय के लिए सुख मिलता है। हँसते-बोलते, खाते-पीते, ताश-चौपड़ खेलते, नृत्य-गीत का लाभ लेते इस का अनुभव किया जाता है। ऐसा लगता है कि आमोद प्रमोद में प्रसन्नता छुपी है। इसी कारण इसके लगातार बने रहने के उपाय किये जाते हैं। समझा जाता है कि इनके बने रहने पर प्रसन्नता भी रहेगी, पर यह कैसे संभव हो सकता है? क्योंकि सुख पदार्थ परक है ही नहीं, वह तो आत्म परक है, अन्दर की अनुभूति का तत्व है, माध्यम भले ही पदार्थ बन जायें, इससे कोई अन्तर नहीं पड़ता।
डॉ. राधाकृष्णन ने अपनी पुस्तक ‘आइडियलिसिटक व्यू आफ लाइफ” में इसे भली प्रकार समझाया है। उनके अनुसार स्थाई सुख के लिए हमें मन को प्रशिक्षित करना होगा। बाहरी परिस्थितियों के साथ यदि इसका ताल-मेल बिठाया जा सके तो सारी जिन्दगी सुखी रहा जा सकता है। मन के प्रशिक्षण के लिए यह सत्य जानना होगा कि सुख कहीं बाहर नहीं अपने में है। बाहरी चीजों का केवल इतना उपयोग है कि शरीर की सामान्य जरूरतें पूरी होती रहें। जिस तरह मोटर की सामान्य जरूरत पेट्रोल है, वह मंजिल तक पहुँचाने में सहायक तो है, पर स्वयं मंजिल नहीं। अगर पेट्रोल की जगह कोई इत्र का उपयोग करे तो लाभ की जगह हानि ही होगी।
इसी कारण आचार्य शंकर कहते हैं जिन्दगी की सामान्य जरूरतों को दवा की तरह लेना चाहिए। दवा को न कम लिया जा सकता है, न ज्यादा। इसे ठीक-ठीक मात्रा में लेना ही भलाई है, इसके लिए मन एकाएक तो तैयार नहीं होगा। क्योंकि अभी तक इसकी दौड़ -भाग बाहर सुख खोजने में रही है। इस उलटी गति को सीधा करना होगा। जे. कृष्णमूर्ति के शब्दों में यह प्रयासपूर्वक मन को अपनी सत्ता के केन्द्र “आत्मा” की ओर मोड़ना है। इसकी प्रक्रिया के बारे उनका कहना है कि जब-जब मन पदार्थों में सुख की खोज करे विवेकपूर्ण उसे धीरे-धीरे समेट कर वापस केन्द्र की ओर ले जाया जाय। उनके अनुसार यह काम छोटे बच्चे को सही चीज सिखाने की तरह है। छोटा बच्चा जब चमकीली आग को पकड़ने दौड़ता है, तो अभिभावक उसे रोक कर दूसरी ओर ले जाते हैं। मन बच्चा है और विवेक अभिभावक। इस प्रक्रिया से मन इस ढंग से ढल जाएगा कि आत्मा की निर्मलता और आनन्द को सही ढंग से व्यवहारिक जीवन में उतार सके।
यह प्रशिक्षण तुरन्त पूरा हो जाने वाला नहीं है। इसके लिए लगातार जुटे रहना होगा। जैसे-जैसे इसमें गति आएगी, मन हर प्रकार की परिस्थितियों से ताल-मेल बिठा सकेगा, क्योंकि बदली हुई स्थिति के अनुसार बाहरी चीजें भोग सुख की सुविधाएँ न होकर जिन्दगी की सामान्य जरूरतों को पूरा करने के लिए जरूरी साधन हैं। जिन्हें कम से कम लेकर काम चलाया जा सकता है।
जिन्होंने इस ढंग से मन को प्रशिक्षित किया है उनके जीवन में इस तथ्य और सत्य को देखा जा सकता है। श्री अरविन्द ने अलीपुर जेल की काल कोठरी की कठोर यातनाओं में भी सुख का अनुभव किया। तुकाराम की गरीबी उनके सुख को कम नहीं कर सकी। इस तरह के अनेकों महामानवों के उदाहरण हैं, जिन्होंने व्यावहारिक जिन्दगी के प्रत्येक क्षण को सुख में बदला है। इस स्थिति को पाने के लिए हम सभी को यह व्यवहारिक प्रक्रिया अपनानी चाहिए। इसी स्थिति को गीताकार ने “यं लब्धता चापरं लाभ मन्यते नाधिकं तत्” अर्थात् जिसको पाकर कुछ पाना बाकी नहीं रहता, कहा है।
“वयं राष्ट्रे जागृयाम पुरोहिताः”
वेद की इस ऋचा में ब्राह्मण की आजीवन पर्यन्त उत्तरदायित्वपूर्ण प्रतिज्ञा की झाँकी है कि हम पुरोहित राष्ट्र को जीवित एवं जागृत रखेंगे। सम्पूर्ण राष्ट्र जिसके इशारे पर चलने वाला हो, जिसका प्राण, दिशा, विचार भावना सभी कुछ ब्राह्मण हो, उसे क्यों न समाज का सच्चा नेता कहें। न केवल वह यही है, वरन् वह तो धर्म नेता भी है। वह मनुष्य के कुविचार, कुसंस्कार तथा कुकर्म पर निरन्तर कुठाराघात करता हुआ उनमें शांति सद्भावनाओं, सद्प्रवृत्तियों तथा सद्बुद्धि के बीजारोपण करने के लिये प्रयत्न करता रहता है।
इसीलिये उसने समाज में शीर्ष स्थान प्राप्त कर लिया है। वह भूसर की उपाधि से शोभित किया गया है। क्योंकि वह पृथ्वी पर देव तुल्य सृष्टि के हित में अहर्निशि कार्य करता रहता है। इन कार्यों को निरहंकारी भाव से सम्पादित करने के लिये वह ईश्वर-उपासना से तथा आत्म-निर्माण की कठोर जीवन-साधना में अमर शक्ति प्राप्त करता है।
ब्राह्मण को ऋग्वेद में मुख की उपमा इसी कारण दी गई है। वह मुख में स्थित मस्तिष्क के समान समाज में मस्तिष्क प्रेरणा तथा दिशा की पूर्ति करता रहता है। आँख सदृश वह स्वयं के चरित्र का सूक्ष्म दृष्टा बनकर स्वयं की त्रुटियों का परिमार्जन करता रहता है। जो चरित्र गढ़ने में पूर्णतया अग्रसर है, वह कान नाक के समान समाज की हर गंदगी का निवारण करते हुए सामाजिक शुभ कार्यों के लिये समर्थन तथा सहयोग प्रदान करता है। जिह्वा के समान ब्राह्मण विषैली दुष्प्रवृत्तियों को समाज-पुरुष के पेट में जाने से रोकता है। जिस प्रकार मुख अपने पास कुछ न रखते हुए पाचन हेतु उदर को भेजता है, उसी भाँति अपरिग्रही बन करके अपने समस्त आध्यात्मिक, बौद्धिक, भावनात्मक अर्जन के समाज हित में अर्पण कर देता है। जिह्वा के समान मधुर-भाषी बनकर समाज को सत्प्रेरणा देता है। वह इस प्रेरणा के युग में लेखनी द्वारा समाज को दिशा भी प्रदान करता है।
जहाँ ब्राह्मण हारते हैं, वह देश खोखला हो जाता है। वर्तमान समय में देश की दुर्दशा का मूल कारण यही है कि राष्ट्र को सही दिशा देने वाला प्रबुद्ध वर्ग अर्थात् ब्राह्मण अपने कर्तव्यों तथा उत्तरदायित्वों से च्युत हो गया है।
अपने पुरुषार्थ द्वारा अर्जित इस महान पद पर आसीन ब्राह्मण -पुरोहित के कर्तव्य बहुत कठोर हैं। सर्व प्रथम वह अपने दुर्गुणों को दूर करके सद्गुणी, चिन्तक तथा मनन कर्ता बनता है। जिससे उसका चरित्र समाज में सामान्य समाज पुरुष की अपेक्षा सदैव ऊँचा बना रहे, तभी वह अन्य लोगों पर अपने चरित्र का प्रभाव डाल सकता है। वह अपनी भावनाओं से जन-जन के हृदय में अपना स्थान बना लेता है। घर-घर अलख जगाने की प्रक्रिया संपन्न करता है। तभी तो समाज उसके पदचिह्नों पर चलता है तथा उसे भरपूर सम्मान भी देता है। जहाँ तक भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति का प्रश्न है वह आजीविका नहीं लेता। वरन् आवश्यकतानुसार समाज से समय-समय पर उसे आर्थिक सहयोग मिलता है। वेतन भोगी बनने पर समाज में उसका स्तर कर्मचारी के समान हो, तो वह कर्तव्यच्युत हो सकता है।
वर्तमान समय में अंधविश्वास, कुरीतियाँ, भ्राँतियाँ रूढ़ियां, अज्ञान आदि का अंधकार सामाजिक, नैतिक, धार्मिक, आध्यात्मिक, शारीरिक, मानसिक, आदि क्षेत्रों में छाया हुआ है। उस अंधकार में प्रकाश फैलाने के लिए गाँधी, दयानन्द, विवेकानन्द आदि महान पुरुषों के समान सामान्य जनों के बीच से ब्राह्मणत्व उभर कर आना चाहिए। ब्राह्मण वह जो ब्रह्म परायण जीवन जीता हो। वर्ग कोई सा भी हो किन्तु कर्तृत्व उसके ब्राह्मणोपम हों। संयमी, तपस्वी, ब्राह्मणोचित निर्वाह में जीने वाले आध्यात्मिक, महत्वाकांक्षा संपन्न लोकसेवी ही नवयुग की आधारशिला रखेंगे।
कालेज से निकल कर सड़क पर आते ही सामने के दृश्य ने उसे बुरी तरह झकझोर दिया। कितनी मर्मान्तक दुर्घटना थी। मरने वाले का शरीर बुरी तरह कुचल गया था। कटे हाथ-पैर टुकड़े-टुकड़े हो बिखरे पड़े थे। सड़क खून से रंग गई थी। और दुर्घटना का दोषी -खून के छींटों से रंगी अपनी कार भगाए ले जा रहा था- कार का नम्बर, कार चालक की शकल-सूरत देख वह पहचान चुका था कि वह और कोई नहीं उसी के अध्यापक महोदय हैं।
कुछ क्षणों के बाद पुलिस आयी-भीड़ छटने लगी। मर गए लड़के के अंग- अवयव बटोर कर एक कपड़े में सिले गये। सड़क से खून साफ हुआ। वह भी थोड़ी देर तक गुम-सुम खड़ा रहा फिर उसके कदम अपने घर की राह पर बढ़ चले। घर पहुँचने पर भी उसे चैन न हुआ। ऐसा लग रहा था जैसे मस्तिष्क की सारी नसें फट जाएँगी। न जाने कितने सवाल मन में कौंध रहे थे। बेचारा! अभी उसकी उम्र ही क्या थी? देखने में कितना सुन्दर सुडौल उफ्! एक पल में ही तो सब कुछ गुजर गया। कम से कम रुक कर संवेदना के दो शब्द ही कह देते प्रोफेसर परन्तु उनके चेहरे पर तो प्रायश्चित की एक लकीर भी नहीं उभरी। सोचते-सोचते नींद लग गयी।
अगले दिन विद्यालय पहुँचते ही उसको प्राध्यापक महोदय ने अपने कमरे में बुलाया। ठीक वही चेहरा कल जैसे हाव-भाव कुटिल आंखों में उनकी नियत साफ -साफ टपक रही थी। तो क्या..? वह कुछ अधिक सोचता इसके पहले प्राध्यापक महोदय बोल पड़े “राय! कल तुम घटना के समय में थे।” उत्तर मिला “मैं ही क्या पूरी भीड़ थी सर!”
‘बात तुम्हारी हो रही है औरों को समझा लिया गया है” “किस बारे में सर।”
“यही कि उलटी-पुलटी बयानबाजी न करें।”
उसके मन में आया साफ -साफ कह दे कि दोषी को दोषी कहना यदि उलटी-पुलटी बयान बाजी है तो फिर सीधी क्या है? पर कुछ सोच कर चुप रहा।
मतलब समझ गए न, प्राध्यापक की कुटिल मुसकान कमरे की सफेद दीवारों को धुँधला करने लगी। उसने सहज ही पूछा “क्या यह चेतावनी है?” “यही समझो-मान लोगे तो पुरस्कार मिलेगा। सर्व प्रथम पास हो जाओगे” “और अगर न मानूँ तो” इन चार शब्दों को सुनते ही प्रोफेसर की भौंहें तन गई फुफकारते हुए बोले “परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहना।” वह बिना कुछ कहे कमरे से बाहर निकल आया।
अदालत में प्रत्यक्षदर्शी गवाह के रूप में राय ने जो भी देखी थी उसका आँखों देखा विवरण यथा तथ्य सुना दिया। उन्होंने स्पष्ट बताया कि दुर्घटना प्राध्यापक महोदय की असावधानी से हुई है। कुछ छात्रों ने जो उस समय वहाँ उपस्थित नहीं थे प्राध्यापक के पक्ष में झूठी गवाहियाँ दे डालीं। लेकिन न्यायाधीश को राय का विवरण अधिक तथ्यपूर्ण और प्रामाणिक जँचा। इस अपराध के दण्ड स्वरूप जुर्माना हुआ।
इस मामले में प्राध्यापक ने जुर्माना तो भरा परन्तु राय के प्रति उसके मन में निन्द्य प्रतिशोध की भावना घर कर गई। शीघ्र ही विश्व विद्यालय की परीक्षाएँ हुई। राय ने प्रत्येक प्रश्न को पूरे मन से हल किया था। उत्तर ठीक लिखे गए थे।
पर उक्त प्राध्यापक ने अपने साथियों से अपने प्रभाव का उपयोग कर राय को अनुत्तीर्ण करा दिया। यही नहीं अपने विषय में बहुत कम अंक दिये ताकि पूरक परीक्षाओं में भी न बैठ सके। इस परिणाम की किसी को आशा न थी। हमेशा सर्वप्रथम आने वाले राय की यह दशा देखकर वे छात्र भी दुखी हुए जो स्वयं उत्तीर्ण होकर अपने मेधावी साथी से आगे निकल गए थे।
सबके दुःख मिश्रित आश्चर्य के बीच राय अब तक भली भाँति जान चुके थे कि उन्हीं प्राध्यापक महोदय की कृपा है यह, जिन्होंने अपने पक्ष में गवाही देने के लिए बहलाया, फुसलाया और धमकाया भी था।
विजय के दर्प के भाव से प्राध्यापक महोदय ने राय को बुलाकर पूछा “तुमने जानबूझ कर यह मुसीबत क्यों मोल ली? “विद्यार्थी राय का उत्तर था “सर! अनीति के साथ समझौता करके सफल होने की अपेक्षा नीति के लिए संघर्ष करते हुए हजार बार असफल होना मैं पसन्द करूंगा। अपनी आत्मा का हनन कर यदि सत्य को मैं छुपाता तो स्वयं को कभी क्षमा न कर पाता”। आदर्श की प्रति मूर्ति विधानचंद्रराय के सम्मुख प्राध्यापक शर्म से आँखें झुकाए सन्न से रह गए, इन शब्दों को सुनकर।
यही नीतियों के लिए संघर्ष करने वाला जुझारू विद्यार्थी पश्चिम बंगाल का एक आदर्श मुख्यमंत्री बना। आदर्शवादी खोता नहीं पाता ही है।
जो नहीं दे सका, कोई भी आज तक,
पूज्य गुरुदेव! वह, दे दिया आपने।
प्राण में प्रेरणा - भाव संवेदना,
बुद्धि को श्रेष्ठ चिन्तन, दिया आपने॥
वस्तुतः ये पंक्तियाँ दुहराते हुए सहज ही स्मरण हो आता है,उन अनगिनत बहुमूल्य अनुदानों का जो एक विशाल हृदय वाले पिता, लाखों प्रज्ञा परिजनों के आराध्य पूज्य गुरुदेव ने जीवन भर लुटाते रहने का अनवरत क्रम चालू रखा व अभी भी सूक्ष्म व कारण शरीर से सक्रिय हो, प्रत्येक को अपनी उपस्थिति का बोध करा रहे हैं। बसंत पर्व 21 जनवरी 1991 की पूर्व वेला में उनके आध्यात्मिक जन्मदिवस पर हर वर्ष पूज्य आचार्य श्री को अपने श्रद्धा सुमन चढ़ाने गायत्री तीर्थ आते रहे। अगणित शिष्य परिजन उन्हें सशरीर तो नहीं पाएँगे पर उन्हें यह कदापि बोध नहीं होगा कि उन्हें नवजीवन देने वाली, उनकी उपलब्धियों की मूल स्त्रोत गुरुसत्ता की उपस्थिति यहाँ नहीं है।
यह महामानवों की रीति-नीति होती है कि वे जीवन के हर पल की सुनियोजित विधि व्यवस्था बना कर आते व एक पल भी नष्ट किए बिना अपने कर्तृत्व में निष्ठापूर्वक लग जाते हैं। महाकाल की पक्षधर सत्ता जो समय की गति से भी तीव्र भागते हुए अस्सी वर्ष में अनेक गुना काम करती चली गयी, एक ही तथ्य प्रतिपादित करती है कि दैवी चेतना अवतरित हो सक्रिय जीवन्त बनने को सतत् उद्यत रहती है। आवश्यकता पात्रता विकसित करने भर की है। एक सुदूर देहात में जन्मी एक महान आत्मा कभी अपने व्यक्तित्व कर्तृत्व से विचार क्रान्ति को एक आँधी लाकर खड़ा कर देगी, लोकसेवियों की एक सेना अपने पीछे छोड़ जाएगी, यह संभवतः उन दिनों तीस व चालीस के दशक में किसी ने सोचा भी न होगा। यह तथ्य सही है कि बहुसंख्य महामानव, अवतारी पुरुष अपने कार्यकाल में कम, बाद में अपने पीछे छोड़े गए निर्धारणों व कर्तृत्वों के कारण पहचाने गए।
एक तथ्य और भी महत्वपूर्ण पूज्य गुरुदेव के जीवन से जुड़ा है, वह है लोक श्रद्धा, जनसम्मान के प्रति एक सही अर्थों में ब्राह्मण व्यक्ति की निस्पृहता। जीवन भर वे जिस फसल के बीज बोते रहे, प्रसुप्तों की सुसंस्कारिता जगाते रहे, नित नूतन निर्धारणों से, व्यक्ति से समाज निर्माण तक के विभिन्न सोपानों का उद्घाटन करते रहे, जब उसकी पराकाष्ठा का समय आया, तब उन ने अपने द्वार बन्द कर लिए व प्रतिष्ठ को वितरित कर दिया, अपने शिष्यों, कार्यकर्ताओं में। बड़े उत्साह से वे अपने इन किंचन अनुयाइयों का सब आने वालों से परिचय कराते पर प्रत्येक समझदार कार्यकर्ता भली भाँति जानता था कि जो कुछ भी कहा जा रहा है, वह उससे की जा रही अपेक्षा भर है, वह अभी उस प्रशंसा के समीप पहुँचने से कोसों दूर है। पर यही तो महानता है महामानवों की। यह जताने की कि या तो आदर्शवाद की इस परिधि में, जो बताई जा रही है, वे स्वयं को ले आएँ नहीं तो लोक सेवा युग का नेतृत्व का क्षेत्र छोड़ दें।
जिन दिनों पूज्य गुरुदेव ने अपने मिलने जुलने का क्रम बन्द कर स्वयं को कठोर तप तितिक्षा में नियोजित किया, उन दिनों यदि अन्याय धर्मोपदेशकों की तरह वे कदाचित एक बार भी कार्य क्षेत्र में निकल जाते व मात्र दो माह का दौरा कर पूरा भारत व विश्व घूम आते तो इसमें कोई सन्देह नहीं कि वे प्रसिद्धि के चरम शिखर पर होते किन्तु परिपक्वता -प्रौढ़ता की यही अवधि आते ही उन ने अपनी अगली तैयारी आरंभ कर दी। वह थी सूक्ष्म जगत में छाई विपन्नताओं, भावी विभीषिकाओं से जूझने हेतु अपनी आत्मसत्ता को तपाकर चतुर्दिक् संव्याप्त होने की प्रक्रिया। परिजन के हित की भी उन्हें देख−रेख करनी थी, साथ ही ऋषि सत्ताओं के साथ सघनताओं से तादात्म्य स्थापित कर परोक्ष जगत को तपाना था। इस के लिए प्रायः सात वर्ष यह सत्ता एक ही कक्ष में बैठी, वहीं से सारा वातावरण बनाने का कार्य करती रही। जब भी कार्य क्षेत्र- को संभालने, नेतृत्व करने या हार-पुष्प पहनने का अवसर आया तो उन ने अपने प्रतिनिधि आगे कर दिये। ऐसी निस्पृहता कहीं देखने को मिलती है आज के महत्वाकांक्षा से भरे इस जगत में? जिन्हें अनायास ही यह सम्मान मिल गया व जिन ने इसको पचाकर अपना दायित्व भी निभाया, वे निहाल हो गए, जन-जन के श्रद्धा भाजन बन गए। जो पचा नहीं सके, वे न जाने कहाँ विलुप्त हो गए। एक उदाहरण वे अपने सामने स्थापित कर गए कि मात्र वहीं लोकसेवी जनता के शाश्वत सम्मान का अधिकारी बनता है, जो अपनी मार्ग दर्शक सत्ता की तरह ब्रह्मनिष्ठ जीवन जीता है।
यही तथ्य पिछले दिनों परिजनों ने संकल्प श्रद्धाँजलि समारोह में साकार होते देखा। यदि किन्हीं या किसी को ऐसा लगा हो कि उसने या उन ने जो योजनाबद्ध कार्यक्रम बनाया उसी कारण यह कार्यक्रम सफल हुआ तो झुठलाने को व साक्षी हेतु अगणित प्रमाण सामने है,। श्रेय चाहे कोई भी ले ले किन्तु कोई यह कह सकता है कि इतनी बड़ी सारी व्यवस्था किसी एक या एक समूह के बस की बात थी? नहीं कदापि नहीं। जब राष्ट्रव्यापी अराजकता का दौर चल रहा हो, यातायात के साधन ठप्प पड़े हों, रिजर्व की गई स्पेशल ट्रेनें भी स्थगित कर दी गई हों, स्थानीय प्रशासन बार-बार कह रहा हो कि परिस्थितियों को देखते हुए आप अधिक से अधिक पचास हजार की आशा करिए। इससे ज्यादा व्यक्ति न तो आ सकेंगे न ही हमें स्वप्न में आशा है। किन्तु परिजन आए गाँवों से, कस्बों से, नगलों से, नगरों से तथा विश्व भर में फैले केन्द्रों से। 25 सितम्बर से 1 अक्टूबर के बीच आने वालों का ताँता लगा रहा व व्यवस्था परोक्ष सत्ता बिठाती रही। कहने को यह कहा जा सकता है कि आवास समिति ने व यातायात, आपूर्ति विभाग ने सबको सँभाला व सब को यथोचित ठहराया किन्तु सभी को भली भाँति अहसास था कि कौन सा छात्र उस अवधि में इस पूरे तंत्र पर छाया हुआ इसकी सुरक्षा कर रहा था। एक भी परिजन को रास्ते के अस्त−व्यस्त यातायात ने नहीं रोका व सभी अपने मुकाम पर पहुँचते चले गए।
छह लाख व्यक्तियों की चार या पाँच दिन तक व्यवस्था लगातार किसी कुम्भ में भी नहीं की जाती। कुम्भ में तो प्रतिदिन व्यक्ति आते व जाते रहते हैं। यहाँ तो अलग ही नजारा था। लोग ट्रैक्टर, बसों, रेलों, कारों व जो साधन मिले उनसे चले आ रहे थे, अपने आराध्य गुरु को श्रद्धाँजलि समर्पित करने। स्थानीय स्तर पर सभी आश्रमवासियों, धर्मशालाओं ने जो सहयोग भाव दर्शाया, वह अकल्पनीय था। लग रहा था कि कोई सत्ता इन से वह कहलवा रही है जो हम सुन रहे हैं। जो कभी फोम के गद्दों पर सोते थे, वे चैन से टेण्ट में, छोलदारी में सभी परिजनों के बीच सोए। जो विदा लेता मानसून 29 सितम्बर तक परेशान कर सप्तर्षि आश्रम के समीप बसाए गए एक नगर को जलप्लावित करता रहा था। वह थम गया था व पूरा कार्यक्रम तथा इसके पाँच दिन बाद तक किसी प्रकार का व्यवधान इंद्र देवता द्वारा नहीं हुआ। यह सारा तंत्र व्यक्ति ने नहीं, शक्ति ने सँभाला था तभी तो सब कुछ सुव्यवस्थित होता चला गया।
कुछ हजार की भीड़ शासन को परेशान कर देती है, अर्ध सैनिक बलों को तैनात किया जाता है व सारी व्यवस्था ऊँचे स्तर पर बनायी जाती है। ब्रह्मदण्ड धारी स्वयंसेवकों को किस देवी प्रेरणा ने इतना अनुशासित बनाए रखा कि दूर से दर्शन होने पर भी, सभी कार्यक्रमों में उपस्थिति न बना पाने के बावजूद भी तथा भोजन हेतु पंक्तियों में काफी देर खड़ा रहने पर भी किसी ने कोई शिकायत नहीं की, व्यवधान नहीं फैलाया एवं स्वयं को व दूसरों को भी व्यवस्थित बनाए रखा। संघशक्ति का अपना महत्व है। कार्यक्रम की पूर्व तैयारी व उसके सुसंचालन का दायित्व उसी महाशक्ति ने सँभाला किन्तु वह अपौरुषेय पुरुषार्थ जो उन सबने उन दिनों कर दिखाया, क्या उसकी पुनरावृत्ति संभव है। हनुमान को आत्मबोध करा के जाम्बवन्त ने उन से लंका तक पहुँचने हेतु उड़ान भरवा ली थी। क्या ऐसा ही कुछ उन दिनों सबकी स्थिति नहीं थी।
यह सारा विवेचन यहाँ उस परोक्ष सत्ता, सूक्ष्म में संव्याप्त ऋषि चेतना की महत्ता बताने हेतु किया गया, जिसे हम गुरुतत्व नाम से पहचानते व जिसकी अपने कण-कण में उपस्थिति की सतत् अनुभूति कर अपना आत्मबल बढ़ाते रहते हैं। वसंत पर्व उल्लास का पर्व है, नूतन निर्धारणों का पर्व है, उन सभी अनुदानों को स्मरण करने का पर्व है जो उस दैवी सत्ता द्वारा हमें मिले व अब वंदनीया माताजी के माध्यम से प्रत्यक्षतः आगे भी मिलते रहेंगे। कृतज्ञता ज्ञापन का सही स्वरूप तो यही है कि हम उनके बताए एक एक दिशा निर्देशों पर बार-बार चिन्तन करें व उस ऋण से मुक्त होने का प्रयास करें जो हम पर चढ़ा है। समर्पण यदि सही अर्थों में गुरु सत्ता को किया है तो लेना ही नहीं, देना भी सीखें। हम सब विभूति सम्पन्न हैं। श्रमनिष्ठा बुद्धिमत्ता, संपन्नता, समर्थता, कौशल अनेकानेक रूपों में हमारे पास रत्नों के भण्डागार हैं। यदि हम सच्चे मायने में अनुदानों का ऋण चुकाना चाहते हैं। यह कहना चाहते हैं कि त्याग नहीं अपना, बस कर्ज चुकाते हैं तो बार बार स्मरण करें कि हम क्या थे, क्या से क्या हो गए व क्या करने को हमें कहा गया था? यदि यह आत्मचिन्तन सतत् चला रहा तो समष्टि में संव्याप्त परब्रह्म के विश्व उद्यान को सुरम्य बनाये रखने में कोई कसर हम छोड़ेंगे नहीं।
सन् 91 से आरम्भ हुआ यह दशक बड़ा चुनौती भरा वर्ष है। मनुष्य के अंतर्जगत से लेकर दृश्य जगत में इतने व्यापक परिवर्तन इतनी तेजी से हो रहे हैं कि पलक उठाने भर की अवधि में क्या से क्या घट जाता है, पता नहीं चलता। विज्ञान की उपलब्धियों के चरमोत्कर्ष का समय है यह। इसे दोनों ही रूप देखने को मिल रहे हैं। जहाँ सुख सुविधाएँ, उपभोग व यातायात के द्रुतगामी साधन बढ़े हैं वहाँ पर्यावरण बुरी तरह प्रदूषित हुआ है, भोगविलास के साधनों ने कामुकता का उन्माद सा ला दिया है तथा युद्ध लिप्सा ने अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर बड़ी विषम स्थिति विनिर्मित कर दी है। कब खाड़ी क्षेत्र में या सीमा पर युद्ध भड़क जाए, कुछ नहीं कहा जा सकता। राष्ट्र में अलगाववादी शक्तियाँ बड़ी तेजी से सक्रिय हुई हैं। जिस शासन से बड़ी बड़ी उम्मीदें लगायी गयी थीं, उसने वर्ग विभाजन रूपी विरासत छोड़ते हुए राष्ट्र को अराजकता भरी स्थिति में ला खड़ा किया है। जहाँ सारे राष्ट्र को एक होने, संघबद्ध होने की बात बुलंद स्तर में कही जानी थी, वहाँ जाति, उप-जाति के नाम परस्पर संघर्ष आरंभ हो गए हैं। साँप्रदायिक सौहार्द का प्रतीक यह राष्ट्र मात्र देव संस्कृति के नेतृत्व में ही अक्षुण्णता बनाए रख सकता है, यह तथ्य भली भाँति ज्ञात होते हुए भी अलगाववादी विघटनकारी शक्तियाँ दुस्साहस करने से बाज नहीं आ रही हैं। अपना अस्तित्व असुरक्षित मानते हुए वे एक वर्ग से लड़ने को आमादा हैं। संभवतः यह सब युग संधि की इस बेला में संक्रातिकाल में घटना ही था। इन्हीं सबसे तो मोर्चा लेने हेतु ऋषि सत्ताएँ एक साथ ब्रह्मलीन हो सूक्ष्म जगत में सक्रिय हुई हैं। हमें परिस्थितियों का निषेधात्मक नहीं, उज्ज्वल पक्ष देखना है। ध्वंस तो कुछ सीमा तक होगा ही, रक्तपात भी होगा किन्तु इससे निखर कर जो भी कुछ प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर होगा वह निश्चित ही शुभ होगा, उज्ज्वल भविष्य का संकेत लिए होगा।
गायत्री परिवार से सभी को बहुत आशाएं हैं, यह संगठन अपनी जुझारू शक्ति के कारण सभी के लिए सुरक्षा का एक आश्वासन तो है ही, सबको साथ लेकर चलने की अपनी विलक्षणता के कारण सभी की आशा का केन्द्र बिन्दु है। पूज्य गुरुदेव ने जिस बीज का आरोपण कर इसे विराट वट वृक्ष के रूप में पल्लवित किया है, वह बहुत ही स्वस्थ स्थिति में अनुकूल परिस्थितियों व दैवी अभिसिंचन से गलकर इस लक्ष्य तक पहुँचा है। इसकी जड़ें बहुत गहरी हैं। प्रज्ञा अभियान, युगनिर्माण योजना का ध्वज लिए, बैज लगाए, गणवेश पहने व्यक्ति की कोई जाति नहीं पूछता क्योंकि सारा भारत अब जानता है कि इस संगठन की क्या हस्ती है। आने वाले पाँच वर्ष इस विशुद्धतः अराजनीतिक, सामाजिक पुनर्निर्माण को संकल्पित मिशन के लिए कठिन परीक्षा के रहेंगे। इसे विभिन्न भाषा-भाषी क्षेत्रों में अपना विस्तार भी करना है तथा एक निरक्षर ग्रामीण व जन जातीय स्तर से प्रबुद्ध वर्ग तक में अपनी पैठ बढ़ानी है। इसके लिए मात्र एक कदम बढ़ाना होगा। गुरुदेव द्वारा लिखे साहित्य को, उनके चिन्तन व निर्धारणों को दृश्य, श्रव्य माध्यमों से उन तक पहुँचा भर देना होगा। मनोभूमि तो पहले ही बन चुकी है। समाज रूपांतरण को कृतसंकल्प है। यह परिवर्तन, उतार-चढ़ाव उसी अकुलाहट के तो चिन्ह हैं। यदि चिन्तन क्षेत्र को पतन से उबार कर परिपक्व बनाया जा सका तो वह सब कुछ स्वतः होने लगेगा जिसे इक्कीसवीं सदी बनाम सतयुग बनाम उज्ज्वल भविष्य के रूप में पूज्य गुरुदेव बता गए हैं। उन्हीं की चेतना तो चारों ओर सक्रिय हो वह सब करा रही है जो परिवर्तन का पूर्वार्ध है।
शक्ति महासत्ता की, संरक्षण दैवी सत्ता का परोक्ष मार्ग दर्शन ऋषि चेतना का, तथा पुरुषार्थ हम नगण्य से देवमानवों का। यदि समन्वय और सशक्त रूप में इस वसंत पंचमी से क्रिया रूप लेने लगे तो मानना चाहिए कि बीसवीं सदी के इस अंतिम दशक का शुभारंभ वैसा ही हुआ जैसा पूज्यवर चाहते अथवा जैसी वंदनीय माताजी की हम से अपेक्षा है। एक भाव मन से निकालना होगा कि हम स्वयं अपने निजी कर्तृत्व से कुछ कर रहे हैं। यदि यह भाव रहा तो अपने संगठन व अन्य महत्वाकाँक्षी सामाजिक जातीय संगठन में क्या अंतर रहा? यदि निष्काम भाव से समर्पित हो अपने आराध्य के विद्या विस्तार के, सत्यवृत्ति-संवर्धन के निर्धारणों को राष्ट्र व्यापी, विश्वव्यापी बनाने हेतु हम सभी संकल्पित हों तो देखते देखते वसंत का उल्लास चहुँ ओर संव्याप्त होता नजर आएगा। तब दृश्य कुछ और ही होगा। वातावरण में महक कुछ अन्य प्रकार की होगी। उल्लास चारों ओर छाया दिखाई देगा व सभी एक स्वर से निनाद कर रहे होंगे कि सतयुग की वापसी सुनिश्चित है। ब्रह्म कमल बनकर विश्व सुधा को सुवासित करने वाले ब्रह्मनिष्ठ लोक सेवी इक्कीसवीं सदी के रूप में उज्ज्वल भविष्य लाकर ही रहेंगे। तब कविवर श्री सुमित्रानन्दन पंत की निम्न पंक्तियां साकार होती लगेंगी :-
सौरभ की शीतल ज्वाला से,
फैला उर - उर में मधुर दाह।
आया वसंत भर पृथ्वी पर,
स्वर्गिक सुन्दरता का प्रवाह ॥
कम्बोज राज में एक राज्य पुरोहित का स्थान खाली था। उसके लिए उपयुक्त व्यक्ति की तलाश चल रही थीं।
एक विद्वान स्वयं पहुँचे और राजा से बोले कि मुझे उस पद पर नियुक्त कर दिया जाय। उन ने अपनी योग्यता और शिक्षा का विस्तृत विवरण बताया। राजा ने उत्तर दिया आपने जो पढ़ा है उसे व्यवहार में उतारने का प्रयत्न करें। इस कार्य को पूरा करके एक वर्ष बाद आयें बाद में निर्णय किया जायगा। विद्वान लौट गया। एक वर्ष तक उन्हीं पुस्तकों का इस दृष्टि से घोंटता रहा कि राजा शायद उनमें से कुछ प्रश्न पूछे।
एक वर्ष बाद पुरोहित फिर आये तो इस बार भी उन्हें एक वर्ष बाद आने का उत्तर मिला वह निराश वापस लौटे। मन ही मन विचार करते रहे पुस्तकों का ज्ञान तो मैंने बहुत इकट्ठा किया पर उसे व्यवहार में नहीं उतारा। शायद इसी कमी के कारण मुझे बार-बार वापस लौटना पड़ता है।
अब उन्होंने धर्म सिद्धान्तों को जीवन में उतारना आरंभ किया तो राज पुरोहित बनने की आकाँक्षा ही समाप्त हो गई। वे लोक सेवा में लगकर और भी अधिक संतोष एवं उल्लास प्राप्त करने लगे।
तीसरी बार उनको तलाश करने राजा ने स्वयं अपने दूत भेजे। मालूम हुआ कि उन ने समस्त शास्त्रों का सार अपने जीवन में उतार लिया है जो फिर किसी परीक्षा या तैयारी की आवश्यकता ही न रही। राजा स्वयं जाकर उन्हें बुलाकर लाये और नये राजपुरोहित के पद पर आसीन कर दिया।
*समाप्त*