मानव जीवन एक सौभाग्य है, वरदान है तथा मनुज काया देवताओं के लिए भी दुर्लभ है। वे तो इसे पाने के लिए तरसते हैं और कभी-कभी अवसर विशेष आने पर जब इस योनि में अवतरित होते हैं तो अपने भाग्य को सराहते हुये देव जीवन जीते हुए स्वयं को धन्य बना जाते हैं। पर यह तथ्य ईश्वर के ज्येष्ठ पुत्र, उसके युवराज, उसकी श्रेष्ठतम कृति इस इंसान नाम के जीव को क्यों समझ में नहीं आता, यह एक बड़ा दुविधा भरा प्रश्न है? संभवतः शास्त्रकारों-मनीषियों ने इसी कारण मनुष्य को “भटका हुआ देवता” कहा है अर्थात् देवतत्व धारी गुणों की आँतरिक सम्पदा के लिए जन्मी वह जीव सत्ता जो इस मानव चोले में जन्म लेती है पर अपने उद्देश्य के लक्ष्य को भूल कर प्रायः भटक जाती है। मृग-मरीचिका की तरह बहिरंग जीवन के सभी आकर्षण उसे लुभाते-ललचाते हैं व आनन्द के परम स्रोत से जन्मी यह दिव्य सत्ता क्षणिक सुख के उन्माद में अपनी ऊर्जास्विता को, जीवनी शक्ति को, क्षणशः नष्ट करती चली जाती है। अधिकाँश की नियति यही होती है कि वे पेट-प्रजनन के कोल्हू में विचरते हुए जीवन किसी तरह काट लेते हैं।
इस स्थिति से उबरना ही बंधन मुक्ति है। यही मोक्ष है। यही जीवन का परम लक्ष्य है। जो अपनी शाश्वत सत्ता को जान लेते हैं, वे परम सत्ता की आकाँक्षा के अनुरूप जीवन जीते हुए लक्ष्य सिद्धि की ओर बढ़ चलते हैं। इसके लिए साधना अर्थात् “अपने आपको साधना” अपना नियंत्रण अपने हाथ में रखना व श्रेष्ठता-उत्कृष्टता की ओर निरन्तर बढ़ते चले जाना। संक्षेप में यही अध्यात्म का मर्म है।
भारतीय संस्कृति की सर्वोपरि विशेषता है-जीवन और जगत को देखने का उसका आध्यात्मिक एवं दार्शनिक दृष्टिकोण, वस्तु पदार्थ से उठकर उनके कारण तत्व का अनुसंधान, क्षणभंगुर-मरणशील-पार्थिव जीवन से उठकर शाश्वत-चिरन्तन, अजर-अमर जीवन, व्यक्तिगत चेतना से उठकर विश्व चेतना की अनुभूति। भौतिक सीमाओं से उठकर विश्व का संचालन करने वाली सार्वभौम शक्ति का अनुसंधान। अपने इन्हीं उदात्त दार्शनिक विचारों के कारण उसने कभी समस्त विश्व का मार्गदर्शन करने और जगद्गुरु बनने का श्रेय हस्तगत किया था तथा यहाँ की देव संस्कृति विश्व-संस्कृति बन कर प्रतिष्ठित हुई थी, जिसकी विभिन्न देशों की तत्कालीन साहित्यिक रचनाओं में स्पष्ट झलक मिलती है।
यूनानी दार्शनिक अफलातून के वार्तालाप में जो यह कल्पना की गई है कि पृथ्वी परमात्मा का शरीर है, उपनिषदों की विराट कल्पना से प्रभावित है। जो वेद के पुरुष सूक्त की ही एक प्रकार से व्याख्या है।
विभिन्न स्वाभाविक कर्मों के आधार पर यहाँ समाज को चार वर्णों ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र के रूप में बाँटा था। इसी के आधार पर अफलातून ने अपनी रचना “रिपब्लिक” में समाज को गार्जियन्स, आक्सीलरिज, क्राफ्ट्समेन एवं दास के रूप में विभाजित किया है। आगे उन्होंने यह भी लिखा है इनके कर्मों में तो भिन्नता है, किन्तु मानवोचित दृष्टिकोण से चारों समान हैं। प्लाटिनस ने अरस्तू के दर्शन की नई व्याख्या करते हुये ईश्वर का वर्णन “नेति-नेति” कहकर किया है, जो उपनिषदों के नेतिवाद से प्रभावित है।
सामर सेट मॉम के “दि रेजर्स एज” में तथा एडिथ सिल्वेल, क्रिस्टोफर, इशरवुड और गेराल्ड हर्ड की रचनाओं में भी भारतीय प्रभाव स्पष्ट परिलक्षित होता हैं। सी. सी. जुँग ने मनोवैज्ञानिक आधारों पर भारतीय धर्म की व्याख्या करते हुए कहा कि हमें अभी तक यह ज्ञान नहीं है कि जहाँ हम अपनी तकनीकी क्षमता के सामने पूर्वी देशों की भौतिक उपलब्धियों को हेय समझते हैं वहाँ पौर्वात्य जगत विशेषकर भारतवर्ष अपने दार्शनिक एवं आध्यात्मिक उत्थान का मार्ग पूर्वी देश ही प्रशस्त करेंगे।
पाश्चात्य दार्शनिक कवि टी. एस. इलियट की कविताओं में उनके हिन्दुत्व और बौद्धधर्म से प्रभावित होने का प्रमाण एवं उनके प्रति सहानुभूति का स्पष्ट परिचय मिलता है। “द वेस्ट लैण्ड” में वृहदारण्यक उपनिषद् का प्रसिद्ध अनुच्छेद मिलता है, जिसे उन्होंने उपनिषदों की तरह ‘शान्तिः-शान्तिः’ के साथ समाप्त किया है। ‘द ड्राइ सालवैजेज’ में भगवत् गीता के आधारभूत सिद्धान्त ‘निष्काम कर्म’ का ससंदर्भ प्रतिपादन मिलता है।
सन्त तालमुद के संबंध में यह प्रसिद्ध था कि जो उनके पास जाता है, आनंदित होकर लौटता है।
एक अमीर उनके पास गया और आनंदित रहने की विधि बताने की पूछताछ करने लगा। तालमुद एक पेड़ के नीचे बैठे चिड़ियों को दाना चुगा रहे थे। चिड़ियों की प्रसन्नता के साथ सन्त अपने को जोड़ कर आनंद विभोर हो रहे थे।
उसने अमीर से कहा “दुनिया में प्रसन्न होने का एक ही तरीका है दूसरे को देना। देकर उनके आनन्द में भागीदार बनना। तुम चाहो तो अपनी अमीरी जरूरतमंदों को लुटा कर स्वयं आनंदित रहने वालों में अग्रणी रह सकते हो।”
‘एण्डस एण्ड मिस’ में एलडुअस हक्सले ने लिखा है कि “जब तक वासनाओं से पूर्णतया मुक्त होकर मनुष्य आत्मानुभव की ओर अग्रसर न होंगे, तब तक समाज में परिवर्तन नहीं आ सकता है”। इसमें भारतीय आर्य विचारधारा की स्पष्ट छाप है।
एक बार फिर इतिहास की पुनरावृत्ति होने जा रही है। भारतीय संस्कृति बन कर भारत को विश्व-गुरु की गौरव-गरिमा प्रदान करने जा रही है। इक्कीसवीं सदी इसी सुखद आनन्द को लेकर आ रही है, इसमें किसी को तनिक भी संदेह नहीं होना चाहिए।
वाल्टर स्कॉट ने एक स्थान पर लिखा है कि इस विश्व-ब्रह्माण्ड का सूक्ष्मतापूर्वक अध्ययन करने पर ऐसा लगता है कि इसे संचालित करने वाली कोई न कोई नियामक सत्ता होनी ही चाहिए, क्योंकि इसके अभाव में सब कुछ इतना सुव्यवस्थित और अनुशासित ढंग से चलता रहे, ऐसा असंभव सा लगता है, कि यह सब कुछ अनायास हो रहा है और आगे होता रहेगा।
यदि उनके कथन पर विश्वास किया जाय तो हमें यह मानने को विवश होना पड़ेगा कि सृष्टि-संचालन के पीछे कोई परोक्ष सत्ता अवश्य होनी चाहिए। सूक्ष्म अध्ययन से इसकी वास्तविकता समझी भी जा सकती है और अनुभव भी की जा सकती है। जिनके भ्रूणों में विलक्षण समानता और एकरूपता पायी जाती है, चाहे वह मानवी भ्रूण हो, बिल्ली का, गाय, भैंस, बकरी किसी का भी हो, विकास क्रम की प्रारंभिक अवस्था में उनमें विभेद करना और यह बता पाना कि यह किस जीवधारी का भ्रूण है, कठिन ही नहीं, असंभव भी है। फिर विकास काल के बाद की अवस्था में उनमें कैसे अपनी जाति के अनुरूप अंग-अवयव और आकार-प्रकार स्वतः विकसित होने लगते हैं? यह विचारणीय बातें हैं।
तर्क वादी इन सबका उत्तर देने में स्वयं को असमर्थ पाते हैं। जीव विज्ञानी संभवतः इसका यह कह कर जवाब दें कि ऐसा जीवकोष के जीन में निहित कूट-संदेश के कारण शक्य हो पाता है। कुछ क्षण के लिए इसे मान भी लें, तो अगले ही पल एक अन्य सवाल उठ खड़ा होगा कि हर प्राणी में इतने भिन्न-भिन्न प्रकार का कूट संदेश प्रतिष्ठित करने वाला कौन है? इसका आदि कारण क्या है? विज्ञान यहीं मौन हो जाता है। अध्यात्म विज्ञान इसका यह कहकर उत्तर देता है कि सब उस नियन्ता का खेल है, जिसने आरम्भ में एक से अनेक बनने की इच्छा की एवं सृष्टि बनायी। दूसरे प्रकार से इसे हम यों भी समझ सकते हैं कि आज के कम्प्यूटर युग में माइक्रोचिप्स विभिन्न प्रकार की पूर्व भण्डारित सूचनाओं के आधार पर काम करती है, उसी हिसाब से वे अनवरत काम करती रहती हैं, पर आखिर उसमें संदेश भरा किसने? इसका एक सामान्य सा उत्तर होगा, उस निर्मात्री कम्पनी ने जिसने उसका निर्माण किया, अर्थात् निर्माता ही उसमें संदेश निर्धारण का भी काम करता है। यही बात सृष्टि के समस्त प्राणियों में लागू होती है। स्रष्टा इनका निर्माण करके ही अपने कार्य की इतिश्री नहीं मान लेता, वरन् इस बात का भी समुचित ध्यान रखता है, कि संरचना के बाद उसकी कृति ठीक-ठीक काम करती रहे।
वनस्पति जगत में भी ऐसी ही नियमितता और नियमबद्धता दिखाई पड़ती है। इंग्लैण्ड के प्रख्यात वनस्पति शास्त्री और दार्शनिक जेम्स फ्रेजर ने कहा है कि ईश्वरीय सत्ता और उसकी अद्भुत विधि-व्यवस्था को सिद्ध करने का ज्वलन्त प्रमाण स्वयं पादप-जगत भी अपने में धारण किये हुए है। अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “प्लाण्ट किंगडम-दि विविड एविडेन्स आफ प्रेजेन्स ऑफ गॉड’ में वे लिखते हैं कि विभिन्न पेड़-पौधों द्वारा अपनी जाति के रूप-रंग, आकार-प्रकार वाले फूल-फलों को उत्पन्न करने संबंधी पादप शास्त्रियों का जीन-सिद्धान्त मान भी लिया जाय, तो वनस्पतियों की उस नियमितता का समाधान कैसे हो, जिसमें वे फलते-फूलते हैं। समय और मौसम की सूचना उन्हें कौन देता है? इनकी भलीभाँति पहचान वे कैसे कर लेते हैं? फ्रेजर महोदय लिखते हैं कि जब तक वनस्पतियों में चेतना की उपस्थिति की बात विज्ञान द्वारा प्रमाणित नहीं की जा सकी थी, जब तक तो यह गुत्थी अनसुलझी थी, पर भारतीय वनस्पति विज्ञानी जे.सी. बोस द्वारा जब यह सिद्ध कर दिखाया गया कि विष को देख कर पौधे, प्राणियों की तरह भयभीत होते और उसका इंजेक्शन देने पर मर जाते हैं तथा रागात्मक गतिविधियों के प्रति आनन्द प्रदर्शित करते हैं, अर्थात् मनुष्य की उसके प्रति अनुकूल क्रिया के संदर्भ में वे तत्सम प्रतिक्रिया प्रदर्शित करते हैं, तो यह स्पष्ट हो गया कि समय संबंधी सूचना उनके साथ गुँथी उस चेतना द्वारा संभव हो पाती है, जिस महत् चेतना का अंशधर मनुष्य है।
भूगर्भशास्त्री हीरा बनने की प्रक्रिया समझाते हुए कहते हैं कि कोयला जब एक निश्चित तापमान एवं दबाव पर आ जाता है, वह हीरा बन जाता है, पर आखिर उस तापमान पर हीरा ही क्यों बनता है? कोई अन्य पदार्थ क्यों नहीं बनता है, तो पुनः प्रश्न पैदा होगा कि यह सुयोग बिठाने वाला कौन है? परिवर्तन के बाद फिर वह अपने गुण-धर्म को कैसे समझता और निरन्तर अपनाये रहता है? तापमान और दबाव के हटते ही वह पुनः कोयला क्यों नहीं बन जाता? उसकी परमाणविक-संरचना को कौन−सी शक्ति बदल देती है? इस प्रकार के अनेकानेक सवाल उठ खड़े होंगे, जिनका जवाब दे पाना भौतिक विज्ञान के बस की बात नहीं होगी। इनका उपयुक्त उत्तर अध्यात्म विज्ञान ही दे सकता है, जो कण-कण में चेतना की उपस्थिति देखता और अनुभव करता है। खगोल विज्ञान भी खगोलीय पिण्डों के संदर्भ में ऐसी ही मर्यादित विधि-व्यवस्था सिद्ध करता है, जो यह अनुमान लगाने के लिए काफी है, कि निर्जीव पिण्डों का संचालन-सूत्र निश्चय ही किसी चेतनात्मक सत्ता के हाथों में है।
पदार्थ की सामान्यतः तीन अवस्थाएं मानी गई हैं-ठोस, तरल व गैस। इसकी चौथी अवस्था ‘प्लाज्मा’ कहलाती है। वैज्ञानिक कहते हैं कि जब तापमान ‘प्लाज्मा’ अवस्था से भी उच्च स्थिति में आ जाता है, तो पदार्थ शक्ति में परिवर्तित हो जाता है। इस बिन्दु पर पदार्थ विज्ञान और अध्यात्म विज्ञान की मान्यता एक-दूसरे से पूर्णतः मेल खाती है। अध्यात्म विज्ञान कण-कण में स्रष्टा की चेतनात्मक सत्ता की विद्यमानता का “ईशावास्यमिदं सर्वं” कह कर उद्घोष करता है, जबकि पदार्थ विज्ञान एक निश्चित तापमान के उपरान्त पदार्थ के चेतनात्मक शक्ति में परिवर्तन की बात कहता है। यहाँ ध्यातव्य यह है कि जहाँ जिस वस्तु की विद्यमानता है ही नहीं वहाँ उसकी उत्पत्ति समस्त भौतिक सिद्धान्तों के सर्वथा विपरीत है। जब कोयला, हीरा में परिवर्तित होता है तो दोनों के भौतिक स्वरूप में भले ही जमीन आसमान जितना अन्तर हो, पर रसायनवेत्ता जानते हैं कि उनका रासायनिक गुण-धर्म सर्वथा अभिन्न होता है। इसी प्रकार बर्फ और पानी बाह्य दृष्टि से पृथक्-पृथक् दीख सकते हैं, पर उनके रासायनिक गुण एक-से होते हैं, किन्तु पदार्थ के चेतना में परिवर्तन के संदर्भ में दोनों के न सिर्फ भौतिक स्वरूप, वरन् प्रकृति में भी भिन्नता दृष्टिगोचर होती है और एक सर्वथा नवीन सत्ता का उद्भव देखने में आता है। अतएव यह स्वीकार लेना ही उचित होगा कि पदार्थ, चेतना की स्थूल अभिव्यक्ति है एवं उसका कुछ अंश सूक्ष्म रूप में पदार्थ की आकृति प्रकृति को नियमित-नियंत्रित बनाये रखने के लिए उसमें विद्यमान होता है।
इस प्रकार विज्ञान ने उस आध्यात्मिक मान्यता को एक प्रकार से प्रमाणित ही किया है कि हर जड़ चेतन में वह चेतन सत्ता विद्यमान है एवं स्वयं वह भी उसी की स्थूल अभिव्यक्ति है, जिसने यह सृष्टि बनाई है। कहा गया है कि महाप्रलय के बाद इस सृष्टि के जड़ चेतन सभी पदार्थ अपने मूल रूप आकाश की शक्ति का स्त्रोत शब्द ब्रह्म (बिगबैंग) कहा गया है जिससे सृष्टि की उत्पत्ति हुई मानी जाती है। इस तरह इस बिन्दु पर अध्यात्म और विज्ञान दोनों की मान्यताएं एक ही फ्रीक्वेन्सी पर अपना प्रतिपादन करती दिखाई देती है। यही शाश्वत सत्य है। सभी जड़ चेतन में एक ही शक्ति क्रीड़ा कल्लोल कर रही है। वही उनकी निर्मात्री है और संचालक भी।
दो मुर्गे कूड़े के ढेर पर दाना चुग रहे थे। इसी बीच उनमें लड़ाई ठन गई। तगड़े मुर्गे ने दुबले को दबोच लिया और मार कर भगा दिया।
जीत का अभिमान उस तगड़े मुर्गे के सिर पर चढ़ गया।
वह टीले पर चढ़कर बाँग लगाने लगा कि है कोई मेरे बराबर जो मुझ से लड़ने की हिम्मत करे।
इस बीच एक मोटी चील आसमान से उतरी और मुर्गे को अपने पंजों में दबा कर बच्चों के नाश्ते के लिए घोंसले में ले गई।
जीवन समय के घटकों से मिलकर बना हुआ एक शृंखला समुच्चय है। इसका एक-एक दाना हीरक हार की मणि मुक्ताओं के समतुल्य है, वरन् उससे भी अधिक मूल्यवान। खोये हुए मणि-मुक्ताओं को प्रयत्नपूर्वक दूसरी बार भी पाया जाता सकता है, पर जो समय चला गया समझना चाहिए कि वह अनन्त के गर्त में विलीन हो गया। उसे फिर से प्राप्त कर लेने की कोई आशा संभावना नहीं है।
नदी के प्रवाह में दुबारा नहीं नहाया जा सकता है। जब तक दूसरी बार डुबकी लगाने की तैयारी करेंगे, तब तक पहले वाला पानी न जाने कहाँ से कहाँ बहकर जा चुका होगा। समझदार लोग समय का मूल्य समझते हैं और उसे योजनाबद्ध रूप से इस प्रकार खर्च करते हैं जिससे उसका श्रेष्ठतम सदुपयोग बन पड़े। जो भी भली बुरी उपलब्धियाँ हस्तगत की जाती हैं। वे सभी समय की कीमत पर खरीदी गयी होती हैं। मिनट, सेकेण्ड, घण्टे यह एक प्रकार के छोटे सिक्के हैं, जिनमें से प्रत्येक का अपना मूल्य है। उन सबको एकत्रित कर लिया जाय तो उस समन्वय से जीवन का विशालकाय पर्वत जैसा परिकर बनकर खड़ा होता है। यह दर्शनीय भी है और सौभाग्य जैसा प्रशंसनीय भी।
कुछ मूर्ख ऐसे भी होते हैं जो अपनी कीमती चीजों को बारबार करने में मजा लेते हैं। फुलझड़ी जलाना ऐसा ही खेल है जिसमें चिनगारियों की चमक तो दीखते बनती है पर उथले मनोरंजन के अतिरिक्त और कुछ हाथ नहीं लगता। कभी-कभी तो वे चिनगारियाँ उड़कर कपड़ों पर जा पड़ती हैं और अग्निकाण्ड खड़ा कर देती हैं। इसे कहते हैं पैसा खर्च करके उपद्रव मोल लेना। ठीक इसी प्रकार एक भौंड़ा मनोरंजन है समय की बरबादी। कितने ही आलसी-प्रमादी आवारागर्दी में अपना समय बिगाड़ते रहते हैं। कहते हैं आराम फरमा रहे हैं। मौज मस्ती कर रहे हैं। जब नौकर चाकर, परिवार वाले काम करने के लिए मौजूद हैं तो हम क्यों खटें? क्यों अपने हाथ घिसें? क्यों पैरों को कष्ट दें?
समय को बिताना ही, ठहरा-काटना ही प्रयोजन रहा, तो उसे दुर्व्यसनों में भी खपाया जा सकता है। स्वयं खाली बैठें हों तो गपबाजी के लिए और कोई अपने जैसा ठलुआ ढूँढ़ा जा सकता है। ताश, चौपड़, शतरंज जैसे कितने ही खेल खिलवाड़ हैं जिनमें मन भी लगा रहता है और समय भी कटता रहता है। किन्तु इसका परिणाम यह होता है कि जहाँ निम्नस्तरीय आदतें पड़ जाती हैं वहाँ उस बहुमूल्य समय की बरबादी भी होती रहती है जिसके बदले में बहुत कुछ पाया कमाया जा सकता है।
अनुकरणीय, आदरणीय महामानवों ने अपने जीवन में ऐसे उदाहरण छोड़े हैं जिन्हें पढ़ने-सुनने भर से अनेकों को प्रेरणाएँ प्राप्त होती हैं। मन हुलसता है कि इसी रीति-नीति को अपना कर हम स्वयं भी क्यों प्रगतिशील जीवन न बिता सकें?
वंश और वेष के कारण न कोई बड़ा होता है, न छोटा। सब मनुष्य भगवान ने एक जैसे पैदा किये हैं। वे अपनी चारित्रिक श्रेष्ठता-निकृष्टता से ही ऊँचे-नीचे बनते हैं।
साधारणतया मनुष्य साठ-सत्तर वर्ष तक जी लेता है। कई तो इससे भी बढ़ कर सौ तक जा पहुँचते हैं। पर देखना यह है कि उस लम्बी अवधि को किस प्रकार जिया गया? उसमें क्या उपलब्धियाँ हस्तगत की गयीं? धन दौलत की रखवाली के लिए पहरेदार नियुक्त किये जाते हैं ताकि चोर कुछ चुराने न पाये? पर आश्चर्य की बात यह है कि हम समय को सम्पदा नहीं समझते और उसकी रखवाली आप करने की सावधानी तक नहीं बरतते। सर्दी-गर्मी से कोई हानि न पहुँचने पाये इसके लिए कपड़े पहनते हैं। छाता और जूता आदि का प्रबन्ध करते हैं किन्तु यह भूल जाते हैं कि समय की बरबादी की हानि इतनी बड़ी है जिससे समूचा जीवन ही निरर्थक बनकर रह जाता है।
यह सोचना ठीक नहीं कि जितना समय मौज-मजा करने की मस्ती में गँवाया, जितनी आयु खेल-खिलवाड़ आवारागर्दी में बीत गयी वही सुख चैन की रही। कार्य व्यस्त लोग तो मजूर की तरह खटते रहते हैं और कैदी की तरह कोल्हू में पिसते हैं। पर यह मान्यता है सर्वथा गलत। इससे अपनी मूल्यवान शक्तियाँ घिसती बरबाद होती रहती हैं। बेकार पड़ा-चाकू जंग खा जाता है और अपनी तीक्ष्णता, उपयोगिता सहज गँवा देता है। चलती मशीनें ठीक रहती हैं, पड़े-पड़े उनका प्रवाह रुक जाता है। नदियाँ बहती न रहें तो उनका रुका हुआ पानी सड़ने लगता है। कलाकारी का कौशल प्रयोग में न आने पर कुछ ही समय में विस्मृत हो जाता है। आलसी पर थकान चढ़ी रहती है जबकि क्रियाशील की स्फूर्ति एवं सक्रियता में कोई आँच नहीं आती।
कौन कितना जिया? इसका हिसाब वर्षों से नहीं लगाया जाना चाहिए वरन् देखा जाना चाहिए कि उसने कितनी तत्परता बरती और उपलब्ध आयुष्य में कितनी सराहनीय तत्परता अपनायी। कई महापुरुष लम्बी आयु न जी सके किन्तु अपनी थोड़ी ही आयु में निरन्तर कार्य संलग्न रहकर इतना काम कर गये कि उन पर शतायुषों को भी निछावर किया जा सकता है।
रामतीर्थ, विवेकानन्द, शंकराचार्य, बीस या तीस से कुछ ही अधिक वर्ष जिये पर उनकी कृतियों को देखते हैं तो पता चलता है कि जितनी आयु लोग ऐसे ही गधा पच्चीसी में गँवा देते हैं, उतने ही समय में उनने तत्परता और तन्मयता बरत कर इतना काम कर दिखाया कि लोग आश्चर्य करते हैं कि इतनी छोटी आयु में इतना अधिक काम किस प्रकार करते बन पड़ा? इस प्रकार आश्चर्य उन्हीं लोगों को होता है जो समय का मूल्य नहीं समझते? और अपनी प्रत्येक घड़ी को योजनाबद्ध निर्णय और प्रयास के साथ कसकर नहीं बाँधते।
समय और काम की संगति बिठाने के लिए प्रतिदिन-दिनचर्या का निर्धारण करना पड़ता है। आज की परिस्थितियों में जो सर्वोत्तम है, जिसे व्यस्त रहकर किया जा सकता है, वह क्या है? जो इसे सोच सकते हैं, इस आधार पर अपना कार्यक्रम बना सकते हैं। साथ ही मुस्तैदी के साथ उस निर्धारण पर गतिशील रह सकते हैं। वे देखते हैं। वे देखते हैं कि कितना काम कर चुके। समय, श्रम और मनोयोग जहाँ इन तीनों का समन्वय हो चले, समझना चाहिए कि प्रगति द्वार खुला और सफलता के निकट जा पहुँचने का महत्वपूर्ण योग बन सका।
जीवन के सुयोग का लाभ उन्हीं को मिलता है जो पशु प्रवृत्तियों से ऊँचे उठकर किन्हीं महत्वपूर्ण कार्यों के साथ अपने को जोड़ते हैं। लोकहित जिन्हें सुहाता है और पुण्य-परमार्थ का ध्यान रखते हुए ऐसा कुछ करते हैं जिससे दूसरे लोग प्रेरणा प्राप्त कर सकें और अनुकरण करते हुए किसी सराहनीय दिशाधारा में अग्रगमन कर सकें।
संसार के महामानवों में एक ही विशेषता रही है कि उनने समय का मूल्य समझा और उसका सत्प्रयोजनों में उपयोग किया। यह एक ही सूत्र ऐसा है जिसे अपना लेने के उपरान्त श्रेष्ठताओं, के सद्गुणों के, अनेकानेक द्वार खुलते हैं, समय ही जीवन है। जिसने समय का सदुपयोग किया समझना चाहिए उसने जीवन को धन्य बना लिया।
अपने प्रिय शिष्य योत्जी के साथ ऋषि लाओत्जे किसी यात्रा पर जा रहे थे। वे उस नगर के पास से गुजरे जहाँ के राजा को कुछ दिन पूर्व युद्ध में मार दिया गया था। राज-प्रासाद जो कभी हास-विलास का केन्द्र था, आज भूत-प्रेतों का बास बना हुआ था।
खण्डहर देखकर लाओत्जे ने कहा-कितना भयंकर लगता है यह स्थान, आदमी की गति न होने से स्थान कितने नीरव और उदास लगते हैं। पता नहीं उस दिन धरती की स्थिति क्या होगी जिस दिन पृथ्वी से मानव का अस्तित्व उठ जायेगा।
“क्या यह संभव है भगवन् कि पृथ्वी से जनशून्य हो जायेगी। मानव का अस्तित्व उठ जायेगा?” शिष्य योत्जी ने प्रश्न किया। “हाँ वत्स पर संसार की गति उसमें बसने वाले साधारण आदमियों से नहीं है बल्कि उस आदमी के कारण है जिसकी स्फूर्ति से अनेक आदमियों के जीवन सही दिशा में चलते हैं। उनका न रहना और संसार को प्रेत-वास बनाना एक समान है।”
होठों ही होठों में वह कुछ बुदबुदाया। शब्द अस्फुट थे, सुने नहीं जा सके। कुछ पल के ठिठके कदम एक दिशा को बढ़ चले। यही दिशा क्यों, उसकी याद में आज हर दिशा बेचैन थी। नगर का प्रत्येक व्यक्ति उसकी ओर आशा भरी नजरों से ताक रहा था। यहाँ तक की लाशों की शून्य-अधखुली बन्द आंखों में उसी की पुकार थी वहीं था जो जीवितों को त्राण अर्धमृतकों को प्राण और मरे हुये को अन्तिम गति दे सकता था, दे भी रहा था। यह भिक्षु था तथागत का अनुयायी, करुणा उसके जीवन का केन्द्र थी। इन दिनों वह सेवामय हो गया था। संसार से विकृत रहकर अपनी साधना में मग्न रहने वाला था।
इन दिनों वह सेवामय हो गया था। संसार से विरक्त रह कर अपनी साधना में मग्न रहने वाला यह चीवरधारी भिक्षु इस तरह स्वयं को उत्सर्ग कर देगा-किसने सोचा था? किन्तु संवेदना स्वयं में रत्नाकर है-प्रत्यक्ष में भले यह जल लहरों का समूह नृत्य भर लगे। पर समय का मन्दराचल-इसमें से अनेकों गुणों विभूतियों को प्रकट कर सिद्ध करता रहता है। सब कुछ इसमें है-इसी में हैं।
नगर में भयंकर महामारी फैलने से उसकी सेवा स्फूर्त हुई थी। अनवरत बढ़ते महामारी के प्रकोप ने नगर में हाहाकार मचा दिया। जिधर देखो-उधर ही कराहटें सुनाई देती थीं। लोगों में भगदड़ मच गई । किसी को कोई पूछने वाला न था। महामारी ने सारे सम्बन्ध सूत्रों को एक झटके में तोड़कर फेंक दिया था। किसी-किसी मुहल्ले में प्रत्येक व्यक्ति रोग का शिकार बना था और कोई-कोई मुहल्ला एकदम जनशून्य हो गया था। ऐसे में जब सब नगर से जंगल भाग रहे थे, वह जंगल से नगर आया था। घूम-घूम कर लोगों की शुश्रूषा करना, दवा पहुँचाना, पथ्य की व्यवस्था करना यही उसकी दिवस-रात्रिचर्या थी।
वर्षों पूर्व एक बार इस नगर में आया था, लेकिन स्वेच्छा नहीं, राजा के आग्रह पर विवश होकर । तब....., कुछ सोचकर उसने आँख उठाकर ऊपर की ओर देखा, भगवान भास्कर का जरठ रथचक्र पश्चिमी क्षितिज की ओर जा रहा था। सन्ध्या कालीन वायु में उसका पीत चीवर फहरा उठा। जैसे बची हुई रश्मि राशि को तेजी से अपने में समेट लेना चाहता हो। लेकिन उसकी आंखें ने इस सबको देखकर भी नहीं देखा। वे अतीत की चित्रकारी देखने में निमग्न थीं।
उस दिन राजा के यहाँ उत्सव में वासवदत्ता का नृत्य था। अपनी पूरी तैयारी के साथ आयी थी वह। उसकी समूची देह लता किसी कवि द्वारा निबद्ध छन्दोधारा की तरह लहरा रही थी। द्रुत-मन्थर गति अनायास विविध भावों को इस प्रकार अभिव्यक्त कर रही थी, मानो किसी कुशल चित्रकार द्वारा चित्रित कल्पवल्ली सजीव होकर थिरक उठी हो। उसकी आँखें का कटाक्ष निक्षेप ऐसा था जैसे नील कमलों का चक्रवात चंचल हो उठा हो। पूर्ण शरत्चन्द्र के समान उसका मुख इस तरह घूम रहा था कि जान पड़ता था शत-शत चन्द्र मण्डल ही आरती प्रदीपों की आरक्त माला में गुँथ कर जगर-मगर दीप्ति उत्पन्न कर रहे हों। अद्भुत नृत्य था। ऐसा लगता था, वह छन्दों से बनी है, रागों से ही पल्लवित हुई है, तानों से सँवारी गई है और तालों से कसी गई है। सभी एकाग्र मन्त्रमुग्ध साँस रोके उसके नृत्य का आनन्द ले रहे थे।
नृत्य की समाप्ति के बाद वह उससे मिली थी। उत्सव की समाप्ति पर, उसके आवास पर भी आयी थी वह अनेकों हाव-भाव-शील अश्लील मुद्राओं के साथ आमन्त्रण देने स्वयं को समर्पित करने। “समय पर आऊँगा” यही तीन शब्द निकले थे उसके मुख से..... और वह समय शायद आज आया है तभी उसके कदम इस दिशा की ओर मुड़े हैं। समय जिसने इस महा नगर को महा श्मशान में परिवर्तित कर दिया है। जब उल्लास की हर्ष ध्वनि कराहटों, चीख पुकारों के रुदन में बदल चुकी है। बढ़ते हुए कदम उसे विशाल प्रासाद के सामने ले आये। चारों ओर भयंकर सुनसान था। घर का द्वार भर खुला था, किन्तु दिखाई कोई नहीं दिया। पूरा प्रासाद भाँय-भाँय कर रहा था। एक बत्ती तक नहीं जल रही थीं। भिक्षु को एक पल के लिए लगा कि कदाचित वह कहीं अन्यत्र चली गई है। क्षण भर के लिए ठिठका। मन में आया क्या लौट पड़ना उचित है?
तभी ऊपरी तल्ले से क्षीण कण्ठ के कराहने की ध्वनि उनके कानों में पड़ी। उन शब्दों का अनुसरण करते हुए वह सीढ़ियों पर चढ़ गया और उसके शयन कक्ष तक पहुँच गया। अन्धकार में कुछ भी दिखाई न दिया। फिर उसने निश्चित सूचना पाने के उद्देश्य से आवाज लगाई “कोई है?” उत्तर में अत्यन्त क्षीण कातर ध्वनि सुनाई पड़ी “पानी।” भिक्षु की आँखें भर आयीं। जिस कण्ठ स्वर को सुनने, जिसके दृष्टि निक्षेप को पाने के लिए संभ्राँत श्रेष्ठी गण, स्वयं राजाधिराज, हाथ बाँध पंक्तिबद्ध खड़े रहते थे उसी की यह दशा?, परन्तु शाश्वत को पाए बिना, स्वयं को जाने बगैर किसकी यह दशा नहीं होती। उमड़ी करुणा ने उसके गले को रुद्ध कर दिया। भर्रायी वाणी में बोले “मैं उपगुप्त हूँ देवि। तुम्हारा आमन्त्रण स्वीकार करके आ गया हूँ। चिन्ता न करो अभी सब ठीक हुआ जाता है।” अँधेरे में उसे कोई बरतन नहीं दिखाई दिया न वासवदत्ता का वह मुख ही, जिसे पानी से तर करना था। आँगन में नक्षत्रों के हल्के प्रकाश में एक मिट्टी का घड़ा दिखाई दिया। संयोग से उसमें थोड़ा पानी भी मिल गया। उसने अपना चीवर भिगोया। घर में आकर पुकारा “किधर हो देवि! उपगुप्त आया है।” क्षीण कण्ठ से फिर कराहने की ध्वनि हुई। धीरे-धीरे पैर रखते हुए जिधर से आवाज आई थी, उधर की ओर बढ़ा। हाथ से स्पर्श करके उन्होंने वासवदत्ता के मुख का पता लगाया और फिर उसके अधरों के पास एक हाथ रखकर दूसरे हाथ से चीवर के पानी की कुछ बूंदें गिरा दी। ऐसा जान पड़ा, मानो वासवदत्ता की चेतना कुछ अधिक सजग हुई। कदाचित उसकी आँखें भी खुली। क्षीण कण्ठ से पूछा “कौन है? “ उत्तर मिला, “उपगुप्त हूँ देवि!” उसे जैसे विश्वास न हुआ हो, बोली “कौन भिक्षु उपगुप्त?”
“हाँ देवि, आज मैंने तुम्हारा निमन्त्रण स्वीकार किया। साहस न छोड़ो। सब ठीक हुआ जाता है।” अँधेरे में कुछ दिखाई तो न दिया, परन्तु उपगुप्त को समझने में देर न लगी कि उसकी आँखें से अश्रुधारा बह रही है। वह सुबक-सुबक कर रो रही है। बड़े कष्ट के साथ उसने कहा “अब आए हो भिक्षु जब सौंदर्य नष्ट हो चुका। वह सब कुछ बीत चुका जिसके लिए मैंने तुम्हें आमंत्रित किया था। “ कहकर वह मौन हो गई लगा-अपनी निस्तेज हो रही आँखों से उसे देखने का प्रयास कर रही है।
“बीता नहीं उपज रहा है। नष्ट नहीं हुआ प्रकट हो रहा है। अपने को खो कर ही अपने को पाया जाता है। वही हो रहा है देवि ।” कहते हुए उसने वासवदत्ता के ललाट का स्पर्श किया, बर्फ की तरह ठण्डा मालूम पड़ा। कुछ सोचते हुए वह बोला “ जो सुन्दर है वह शरीर नहीं शरीर तो उसके सौंदर्य का एक लघु अंश प्रकट करके सुन्दर दिखता है। अन्यथा इस चमड़े से लिपटे हड्डियों के ढाँचे में जिसमें विष्ठा, मूत्र, खून, मवाद भरा है, क्या सुन्दरता है? “ कोई उत्तर न मिलने पर भी ऐसा लगा कि इन शब्दों को प्रयत्नपूर्वक ग्रहण किया जा रहा है।
“सौंदर्य तो सत्य के शिवत्व का है। आत्मा की परम ज्योति का प्रकाश है। जो शरीर की क्रिया प्राण की इच्छा, मन के चिन्तन के माध्यम से प्रकट होता है। किन्तु इसका प्राकट्य वहीं होता है जहाँ शिवत्व हो।” कहकर वह रुक गया।
अपने मन को जीतने वाले समस्त संसार को जीतने वाले से अधिक बलवान है।
“ कहो-कहो भिक्षु रुक क्यों गए। “ वासवदत्ता क्षीण कण्ठ से कह रही थी “आज प्रथम बार मुझे कोई सौंदर्य का पारखी मिला है, अन्यथा सारा जीवन तो मानव तनधारी माँस के भुक्खड़ भेड़ियों से जूझते बीता है। “
“ओह! रूपगर्विणी-महाभिमानिनी समझी जाने वाली इस वासवदत्ता के अन्दर भी व्यथा है “ उसे आज पता चला। प्रत्यक्ष में विपत्ति का ढेर लगा देने वाले-जीवन को दहकते अँगारों में झोंक देने वाले-कष्ट, परोक्ष में इसी आत्म सौंदर्य को प्रकट करने के लिए यह वेदना है। आत्मसत्ता पर चढ़े मल, विक्षेप, आवरणों को भस्म करने के निमित्त है, ताकि सत्प्रवृत्ति सत्चिंतन के रूप में जीवन अपने खोए सौंदर्य को प्राप्त कर सके।
रात्रि समाप्त हो रही थी साथ ही वासवदत्ता के जीवन की कालिमा भी। वह अपने खोए सौंदर्य को अनुभव करने लगी थी। उसने अपने अन्दर के देवता को पहचान लिया था।
महामारी समाप्त होने के बाद वासवदत्ता परिव्राजिका हो गई, तथागत की जीवनविद्या का प्रसार करने वाली भिक्षुणी। अब वह रूपगर्विता नहीं, स्वरूप का सौंदर्य बोध कराने वाली शिक्षिका थी। एक सौंदर्य का पारखी अनेकों को उनका खोया स्वरूप, वैभव उपलब्ध करा सकता है, उसका जीवन इस तथ्य का प्रमाण बना।
यह दुनिया बड़ी मायावी है। इसमें जो सत्य है, वह असत्य भासता है और जो मिथ्या है, अवास्तविक है, उसकी प्रतीती वास्तविक जैसी होती है। आकाश और समुद्र होते रंगहीन हैं, पर हमें नीले दीखते हैं। पृथ्वी गोल है, पर लगती चपटी है, वह परिभ्रमणरत है, किन्तु आँखें एवं अन्य इन्द्रियाँ उसे स्थिर अनुभव करती हैं और सूर्य, जो कि स्थिर है, हमें गतिमान प्रतीत होता है।
यह विपर्यय न सिर्फ पदार्थ जगत पर लागू होता है, वरन् मानवी जीवन के विभिन्न पक्षों से भी अक्षरशः इसकी संगति बैठ जाती है। धूर्त, ठग, चोर, बेईमान स्तर के लोग प्रायः सफल होते, धनवान बनते, प्रतिष्ठ पाते दिखाई पड़ते हैं और सज्जन-साधु पुरुष असफल होते, विपन्न बनते देखे जाते हैं। नकल करने वाला विद्यार्थी अच्छे अंकों से उत्तीर्ण होता है और अच्छाई का अनुकरण करने वाले फेल होते दीख पड़ते हैं। बुराई में अच्छाई और अच्छाई में बुराई प्रतीत होती है। सुख में दुःख और दुःख में सुख की अनुभूति होती है।
आखिर ऐसा क्यों? प्रथम बात तो यह कि बुराई कभी सफल नहीं होती, मात्र सफल होती प्रतीत हो सकती है और भलाई सर्वदा ही सफल होती है, केवल असफल होती भासती है। यदि फिर भी उथलापन दिखाई पड़े तो यही समझा जाना चाहिए कि कहीं न कहीं कोई भ्रान्ति अवश्य है-चाहे वह परिभाषा संबंधी हो या मान्यता संबंधी पर है अवश्य।
दूसरी, यह कि हर व्यक्ति का अपना एक पृथक् नजरिया होता है। किसी वस्तु को देखने का ढंग किसी का कुछ हो सकता है और किसी का कुछ अर्थात् एक ही वस्तु के भिन्न-भिन्न दृष्टिकोण हो सकते हैं। यह भी सत्य है कि जो कुछ भी हम देखते हैं, वह विशुद्धतः हमारा अपना दृष्टिकोण होता है। यदि हमें कोई अवाँछनीय व्यक्ति सफल होता दिखाई पड़ता है, तो इसका ही अर्थ है कि हम भी वैसी ही सस्ती सफलता चाहते हैं और ऐसी स्थिति में सत्पुरुष हमें निश्चय ही असफल होते प्रतीत होंगे, क्योंकि सफलता की हमारी परिभाषा पूर्व निश्चित है, हमने धारणा बना ली है कि हमें अमुक प्रकार की ही सफलता चाहिए। दुर्जनों की समृद्धि में हमें इसीलिए सफलता प्रतीत होती है, क्योंकि वही हमारी अपनी आकाँक्षा बन जाती है। गलत तरीके वही हमारी अपनी आकांक्षा बन जाती है। गलत तरीके से उपार्जित उसकी सम्पत्ति, विशाल कोठी, झूठी वाहवाही सब कुछ मन-ही-मन हम चाहने लगते हैं। इसी कारण से मन भी यह कहने लगता है कि गलत व्यक्ति फल-फूल रहा है, आगे बढ़ रहा है, सफल हो रहा है, जबकि सच्चा व्यक्ति विफल और विपन्न बनता दृष्टिगोचर होता है। यह दृष्टिकोण की ही तो भ्रान्ति है। यदि सचमुच हम सन्त हैं, तो अन्यों के जीवन का दुःख भी दिखाई पड़ना चाहिए कि कितनी पीड़ा में वह अपनी जिन्दगी गुजार रहे हैं। कई के पास महल, नौकर-चाकर, सुविधा-साधन सब कुछ हैं, फिर भी उनके मन में शान्ति नहीं, अशान्त हैं। रात की नींद उड़ी हुई है और दिन का चैन गायब है। रात में नींद इसलिए नहीं आती, क्योंकि उन्हें डर है कि चतुराई से कमायी सम्पत्ति कोई चोर चुरा न ले जाय और दिन का चैन इस ऊहापोह में बीत जाता है कि अब आगे और सम्पत्ति कैसे जोड़ी जाय? यह पीड़ा उनकी बाहरी चमक-दमक से कहीं विशाल है। यह विशाल है सन्तों की उस कष्ट-कठिनाई व गरीबी से जो उनके स्वयं के द्वारा ओढ़ी जाती है। यही अन्तर असाधुओं को नहीं पड़ता, जबकि साधु इससे भली भाँति परिचित होते हैं और इसमें निहित खोखलेपन को जानते हैं। अतः स्वयं को ही सफल सुखी मानते और अन्यों को भी इसी की सलाह देते हैं।
विवेकानन्द जब पहली बार सितम्बर, 1893 में विश्व धर्म सभा को संबोधित करने अमेरिका पहुँचे तो उनके जीर्ण-शीर्ण ढीले वस्त्रों को देखकर एक अमेरिकी ने फिकरा कसा-”बेचारे भारतीय बड़े गरीब होते हैं! “यही तो हमारे और आपके दृष्टिकोण में सबसे बड़ा अन्तर है। हम भारतीय फकीरी में भी अमीरी का अहसास करते हैं और आप अमीरी में भी फकीर बने रहते हैं। आप उसे धन सम्पत्ति, ऐशोआराम में ढूंढ़ते हैं जबकि वह तो अन्दर की सम्पत्ति है। आप उसे बाहर ढूँढ़ते हैं और हम गोताखोर की भाँति अन्दर तलाशते हैं।”
सचमुच, भीतर की अमीरी बाहर की ठाटबाट से कहीं अधिक बड़ी और सुखदायी है। जब हम उसे बाहर ढूँढ़ते और स्वयं भी प्राप्त करने की कल्पना करते हैं तो निश्चय ही उन लोगों की श्रेणी में सम्मिलित हो जाते हैं, जो असाधु हैं, क्योंकि कल्पना क्रिया की पूर्व भूमिका होती है। कल्पना से चिन्तन और चिन्तन से क्रिया बन पड़ती है। अतः अनीति युक्त गतिविधियों में प्रत्यक्ष रूप से संलग्न न होकर भी उसकी कल्पना कर हम मानसिक रूप से अपराध तो कर ही बैठते हैं। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि बुराई की नियति सिर्फ विफलता और दुःख ही है। बुराई सदा हारती है।
सिकन्दर विश्व-विजय का सपना लेकर आगे बढ़ता हुआ जब नील नदी के निकट आया, तो उसे कड़े प्रतिरोध का सामना करना पड़ा। जगह-जगह अवरोध खड़े थे, पर उन्हें पार कर आगे बढ़ा तो स्वागत द्वार खड़ा था। उसके स्वागत में लोग उत्सव मनाने की तैयारी कर रहे थे। सिकन्दर हैरान था कि अभी-अभी कड़ा मुकाबला हुआ और यहाँ लड़ने की जगह अब दुश्मन के स्वागत की तैयारी! वह भौंचक्का था। किसी तरह दिन बीता रात आयी। रात्रि भोज का आयोजन हुआ। सिकन्दर के सामने सोने की थाली में सोने की रोटियाँ और हीरे-मोती की सब्जियाँ रखी गई। उन्हें देखते ही वह आगबबूला हुआ, कहा-”मूढ़! सोने की रोटियाँ खाने की नहीं दिखाने की होती हैं, बड़प्पन जताने की होती हैं। मैं उन्हें ले तो जाऊँगा अवश्य, अन्यथा इतनी दूर आता ही क्यों, पर अभी मुझे भूख लगी है, आटे की रोटियाँ ला।”
सामने गाँव का वयोवृद्ध मुखिया खड़ा था, कहा-”यदि आटे की ही रोटियाँ खानी थीं, तो घर पर भी मिल जातीं। इतना कष्ट उठाने की क्या आवश्यकता ही क्या थी। मैंने तो समझा शायद सोने की रोटियों की तलाश है, इसलिए यह थाल सजाया था।” सिकन्दर को मुखिया के शब्दों के पीछे-छिपे भाव समझ में आ गये।
हमारी स्थिति भी सिकन्दरों जैसी है। हम सोने के पीछे, धन के पीछे, बाह्य आकर्षणों के पीछे भागते हैं, उसमें हमें सम्पन्नता और सफलता दिखाई पड़ती है, पर हम उनके अन्दर की भूख को, अशाँति को, पीड़ा को नहीं देख पाते हैं। यदि दिखाई पड़ती, तो हम उन्हें बड़ा और सफल नहीं मानते।
अब यदि बड़प्पन और सफलता, धन और अधिकार की अधिकाधिक प्राप्ति में नहीं है तो समृद्ध और सफल किसे माना जाय? इसका उत्तर मूर्धन्य मनीषी राल्फ वाल्डो ट्राइन अपनी पुस्तक “इन ट्यून विद दि इनफाइनाइट” में देते हैं। वे कहते हैं कि “यदि सम्पत्ति को सफलता और समृद्धि का कारण माना जाय, तो यह कहना अनुचित न होगा कि ऐसे लोग भगवान के अधिक निकटस्थ होते हैं, पर व्यवहार में विरोधाभास दिखाई पड़ता है। शान्ति की तलाश में सबसे अधिक भटकते ऐसे लोग ही दिखाई पड़ते हैं। यदि परमसत्ता की निकटता होती, तो उनमें शान्ति भी होती, क्योंकि जहाँ शान्ति और संतोष है, वहीं उस सत्ता की सघनता और प्रकाश अधिक है, “पर प्रत्यक्ष में ऐसा नहीं दीख पड़ता तो फिर सम्पन्न किसे माना जाय?” वे कहते हैं कि सच्ची सम्पन्नता व्यक्तित्व की होती है। चरित्र, चिन्तन, और व्यवहार की उत्कृष्टता ही वह सम्पदा है, जिसे प्राप्त करने वाला व्यक्ति ही सही अर्थों में सफल और महान कहा जा सकता है। यही सच्ची सम्पत्ति है। इसे पाने वाला ही जीवन में शान्ति और संतोष को उपलब्ध कर पाता है।”
यहाँ यह भी कहा जा सकता है कि जब प्रत्यक्ष और प्रच्छन्न तथ्य में इतना बड़ा अन्तर है, तो यह उलटबाँसियाँ क्यों? जो सही है, वह गलत और जो गलत है, वह सही क्यों प्रतीत होता है अथवा गलत काम में सुख का और सही में दुःख का अनुभव क्यों होता है?
इसका आधारभूत कारण एक ही हो सकता है-हमारी बहिरंग दृष्टि। हम बाहर की उपलब्धि को ही शाश्वत और सच्ची मान लेते हैं, जबकि बात ऐसी है नहीं। सनातन तो आन्तरिक विभूतियाँ हैं। सच्ची सफलता, समृद्धि और शान्ति इसी में है। यदि हम आन्तरिक दृष्टि विकसित कर सकें, तो यह विपर्यय भी समाप्त हो जायेगा। फिर जो हम देखेंगे, वह सनातन सत्य होगा।
प्रेम की तन्मयता और प्रीति की व्याकुलता होने पर सज्जनों की तरह परमेश्वर का मिलना भी कठिन नहीं रहता है।
वैसे तो इस सृष्टि की उत्पत्ति ही शब्द-ब्रह्म नाद-ब्रह्म से हुई बताई जाती है और कहा जाता है कि तभी से ये सूक्ष्म नाद इस विश्व-ब्रह्माण्ड में गुँजायमान है। साधना विज्ञान के पथिक साधना के उच्च सोपानों में चढ़ कर इस नाद को पकड़ते, सुनते एवं विभिन्न प्रकार की जानकारियाँ अर्जित करते हैं, पर कई बार इस प्रकार की भौतिक ध्वनियाँ न जाने कहाँ से उत्पन्न होतीं, लोगों को सुनाई पड़ती और थोड़ी देर पश्चात् स्वतः विलीन हो जाती हैं, जब कि सब कुछ आश्चर्यजनक घटती ही रहती हैं।
बताया जाता है कि मध्य एशिया के आठ लाख वर्ग कि.मी. क्षेत्र में फैले हुए गोबी मरुस्थल के तकलामारान प्रदेश के अन्दास पारसा नामक स्थान पर यदा-यदा ऐसी ही मधुर ध्वनि निनादित होती हुई स्थानीय लोगों द्वारा सुनी जाती है। इसकी अवधि 15-20 मिनट तक रहती है, तत्पश्चात् स्वतः बन्द हो जाती है। एक अमेरिकी रेडियो कम्पनी ने टेप करके इस संगीत को रेडियो से प्रसारित किया, तो कितने ही श्रोताओं की आँखों से अनायास आँसू बहने लगे। कहा जाता है कि यह धुन इतनी कारुणिक है कि अन्तस्तल को छू जाती है। इस संगीत के रहस्य का पता लगाने का प्रयास तब से अब तक अनेकों बार किया जा चुका है, पर हर बार विफलता ही हाथ लगी है। एक बार इस पूरे क्षेत्र का कई दिनों तक आडियो रिकार्डिंग व वीडियो कैमरा लगा कर फिल्माँकन भी किया गया, किन्तु फिर भी रहस्य पर से पर्दा न हट सका।
“वण्डर बुक ऑफ दि स्ट्रेंज फैर्क्टस” नामक पुस्तक में नील नदी के तट पर स्थित कारनक के खण्डहरों में दो विशालकाय प्रतिमाओं की चर्चा की गई है। इनकी परस्पर की दूरी लगभग 1 किलोमीटर है। इन दोनों से एक विग्रह तो पत्थर की सामान्य प्रतिमा जान पड़ती है, पर दूसरी के निकट जाने से बोलने की कुछ अस्फुट ध्वनियाँ सुनाई पड़ती हैं। ऐसा लगता है मानो आगन्तुक से वह उसका कुशल क्षेम पूछ रही हों। जब से यह घटना प्रकाश में आयी है, तब से विश्व के कई शोध दलों ने वहाँ पहुँच कर इसका कारण जानने का प्रयास किया है, पर अब तक उन्हें निराशा ही हाथ लगी है। मूर्ति के भीतर छुपाये गए किसी संभावित रेडियो सेट का भी पता लगाने का प्रयास किया गया, किन्तु ऐसा कोई सूत्र-संकेत हाथ नहीं आया, जिससे ऐसा अनुमान लगाया जा सके।
इस प्रकार की एक घटना चैकोस्लोवाकिया के उस नदी तट पर घटित हुई, जो देश के मध्यवर्ती भाग से होकर बहती है। हुआ यों कि सन् 1980 की एक शाम कुछ लोग नदी-तीर पर सैर कर रहे थे। अभी धुन आती सुनाई पड़ी। पहले तो पर्यटकों ने सोचा कि कोई उन जैसा पर्यटक ही अपनी बाँसुरी बजा रहा है, मगर आस-पास जब उन्हें कोई अन्य दिखाई नहीं पड़ा, तो वे आश्चर्य में पड़ गये। खोजबीन के लिए वे ध्वनि-श्रोत की ओर आगे बढ़ते, त्यों-त्यों वह खिसकता चला गया। इस क्रम में अन्ततः वे नदी तट पर जल में पहुँच गये। अब संगीत नदी के जल के अन्दर से आता सुनाई पड़ने लगा। कुछ ही दिन पूर्व वहाँ कुछ सिपाही मारे गये थे। वे इसे उन्हीं मृतात्माओं की कारिस्तानी समझ कर डर कर भाग गये। पर अब तक भी आधिकारिक रूप से ये नहीं कहा जा सका कि यह किन्हीं भूतों का कौतुक है।
कवाई टापू हवाई द्वीप समूह के अंतर्गत आता है। होनोलूलू से लगभग 12 कि. मी. दूर पर स्थित इस टापू पर एक 20 मीटर ऊँची पहाड़ी है, जो रात के समय अजीबोगरीब ध्वनियाँ पैदा करती है। उस सुनसान पहाड़ी के आस-पास मीलों दूर तक कोई गाँव नहीं है। वहाँ जब रात का अन्धेरा घिरता है, तो कुत्तों के भौंकने की आवाजें न मालूम कहाँ से आने लगती हैं। दिन के उजाले में उस पहाड़ी पर चढ़ कर कई खोजी दलों ने घूम-घूम कर कुत्तों को ढूँढ़ने का प्रयास किया, पर प्रयत्न निष्फल गया। वहाँ कुत्ते तो क्या कोई अन्य जानवर भी दिखाई नहीं पड़े।
अफगानिस्तान में काबुल के निकट एक रेगिस्तानी मैदान है। उस मैदान से दिन के समय जब सूर्य अपनी प्रचण्ड किरणें बिखेर रहा होता है, ऐसी आवाजें आती हैं, मानों कई घुड़सवार एक साथ शनैः- शनैः निकट आते जा रहे हों, जबकि वास्तविकता यह है कि उस रेतीले मैदान में घुड़सवार कभी जाते ही नहीं। ऊँटों की सवारी भी उस क्षेत्र में नहीं की जाती, क्योंकि उसके आगे दूर-दूर तक का क्षेत्र जनहीन है। ऐसे में ऐसी ध्वनियों का होना निश्चय ही आश्चर्यजनक है।
न्यूयार्क में एक बार लोग रेडियो प्रसारण सुन रहे थे। कोई बड़ी अच्छी धुन आ रही थी। सभी उसमें खोये हुये थे, तभी अचानक संगीत बन्द हो गया और नारी स्वर में ऐसी अबूझ आवाजें आने लगीं जिसे कोई समझ नहीं सका। बाद में जब रेडियो स्टेशन से पत्र-व्यवहार कर उक्त घटना की जानकारी चाही गई, तो अधिकारियों ने ऐसे किसी विचित्र स्वर के बारे में अपनी अनभिज्ञता प्रकट की। उन्होंने कहा कि उस दिन ऐसा कोई रिकार्ड नहीं बजाया गया था एवं संगीत कार्यक्रम के दौरान केवल धुनें ही बजायी गई थीं।
इजरायल के सिनाई अंचल में स्थित पहाड़ी से रह-रह कर घंटियों की आवाज आती है। इसी कारण उसका नाम “बैल माउण्ट” रख दिया गया है। घाटियों के बजने का कारण अब तक अविज्ञात है और न यह ज्ञात हो सका कि यह आवाजें पर्वत से कैसे, क्यों और कहाँ से उत्पन्न होती हैं?
ईराक में जहाँ दजला नदी पहाड़ी भाग से गुजरती है, वहाँ से करीब दो किलो मीटर दूर एक पहाड़ी गुफा की विशेषता यह है कि इसमें सदा एक प्रकार की सुमधुर ध्वनि निनादित होती रहती है, जिसे सुनने के लिए लोग समय-समय पर इकट्ठा होते रहते हैं। कन्दराएं तो इस क्षेत्र में कई हैं, पर संगीत लहरियाँ सिर्फ एक ही से निकलती हैं। इसकी इसी विशेषता के कारण लोग इसे ‘म्यूजिकल केव’ के नाम से पुकारते हैं।
प्रसिद्ध अंग्रेज लेखक और पर्यटक पाल ब्रण्टन ने अपनी पुस्तक “इन सर्च ऑफ एनशियेण्ट इजिप्ट” में एक स्थान पर लिखा है कि नील नदी से 20 मील उत्तर में एक अत्यन्त प्राचीन खण्डहर है। यह कोई एक चौथाई कि. मी. क्षेत्र में फैला हुआ है। रात को वहाँ कोई जाता है तो बच्चों के खिलखिलाने की आवाजें सुनाई पड़ती हैं। ज्ञातव्य है कि वह स्थान पाँच मील की परिधि में जनहीन है, अतः रात के समय वहाँ किसी के आ पहुँचने की संभावना नगण्य जितनी दीखती है और यदि इसे सही मान भी लिया जाय, तो प्रतिदिन रात के समय यह घटना वहाँ कैसे घट सकती है? मजे की बात यह है कि दिन में वहाँ सब कुछ सामान्य रहता है।
यह रहस्यमय ध्वनियाँ क्यों व कैसे उत्पन्न होती हैं, एवं इनका श्रोत क्या है? यह अब तक अविज्ञात है और पदार्थ विज्ञान के लिए इनका उद्घाटन चुनौतीपूर्ण बना हुआ है। संभव है मनुष्य जब अध्यात्म विज्ञान का अवलम्बन लेकर सामान्य से ऊपर के आयामों में पहुँचेगा, तो वह न सिर्फ इन भौतिक ध्वनियों के रहस्य को अनावृत्त कर सकेगा, वरन् उन अभौतिक एवं सूक्ष्म दिव्य ध्वनियों को भी सुनने समझने और लाभ उठाने में सफल-समर्थ बन सकेगा, जो अनादिकाल से इस विश्व-ब्रह्माण्ड में तरंगायमान हैं, और सुपात्रों को समर्थ सहयोग प्रदान करने के लिए आकुल-व्याकुल भी।
एक चतुर हलवाई किसी सेठ के यहाँ से दावतों में काम आने वाले चाँदी के बर्तन किराये पर ले जाया करता था। नियत समय पर लौटा देता और किराया दे जाता।
इस हलवाई ने चतुरता का खेल खेला। दस छोटे बर्तन से लाकर सेठ को दिये और कहा कि इनने बच्चे दिये हैं। बर्तन आपके तो बच्चे भी आपके। इन्हें रखें।
मुफ्त की आमदनी सेठ को भी बुरी नहीं लगी उसने बढ़े हुए बर्तन रख लिये और आपको जितने अधिक बर्तनों की जरूरत हुआ करे प्रसन्नतापूर्वक ले जाया कीजिए। थोड़े दिन तो वैसा ही व्यवहार चलता रहा। एक दिन हलवाई ने बड़ी दावत की सूचना दी और घर के सारे बर्तन देने का आग्रह कर दिया। बच्चों के लोभ में सेठ ने सारे बर्तन निकाल दिये।
हलवाई चुप बैठ गया। कहा वो अपने आप लौटा जाता था पर अब तकाजे करने पर भी मौन था। एक दिन सेठ जी उसके घर स्वयं गये बर्तन माँगे, तो उसने चेहरे को दुखी बनाते हुए कहा बर्तन तो सभी मर गये किस मुँह से आपके पास जाता।
कहा सुनी हुई तो उसी किस्म के लोग इकट्ठे हो गये और एक मुँह होकर कहने लगे जो बर्तन बच्चे दे सकते हैं, वे मर क्यों नहीं सकते?
ठग इसी प्रकार मूर्खों को अपने जाल में फँसाते और करारी चपत लगाते हैं।
स्वामी विवेकानन्द ने मद्रास में दिये गए एक व्याख्यान में घोषणा की थी कि “मनुष्य का भविष्य उसके सही अर्थों में वैज्ञानिक और सच्चे आध्यात्मिक होने पर अवलम्बित है।” उनके अनुसार विराट् ब्रह्माण्ड में ‘माइक्रोकास्म’ एवं ‘मैक्रोकास्म’ नामक दो आन्तरिक और बाह्य विश्व हैं। अपने अनुभवों द्वारा हम दोनों में से सत्य को ग्रहण करते हैं। आन्तरिक अनुभूति द्वारा प्राप्त सत्य मेटाफिजिक्स या अध्यात्म कहलाता है, तो बाह्य अनुभवों से तर्क बुद्धि द्वारा प्राप्त ज्ञान फिजिकल साइन्स या भौतिक विज्ञान। दोनों क्षेत्रों के अनुभवों का समन्वय ही हमें पूर्ण सत्य के निकट पहुँचा सकता है। अब वह दिन दूर नहीं, जब विज्ञान और अध्यात्म एक दूसरे से हाथ मिलायेंगे। काव्य और दर्शन विज्ञान के समीकरणों के दोस्त बनेंगे। दोनों का समन्वित स्वरूप ही भविष्य का सार्वभौम धर्म होगा। इस दिशा में यदि गंभीरतापूर्वक प्रयास चल पड़े, तो निश्चय ही यह समूची मानव जाति के लिए सभी कालों के लिए उपयुक्त जीवन दर्शन होगा।”
अभी तक की वैज्ञानिक खोजें बहिर्मुखी हैं। इस क्षेत्र में संलग्न प्रतिभाएं खोजें बहिर्मुखी हैं। इस क्षेत्र में संलग्न प्रतिभाओं का विश्वास है कि जीवन में सुख-शान्ति एवं प्रसन्नता बाह्य जगत से प्राप्त की जा सकती हैं। धर्म-दर्शन या अध्यात्म अंतर्जगत की ओर ले जाता है और प्रसन्नता, प्रफुल्लता का द्वार वहीं से खोलने को कहता है। वस्तुतः वैज्ञानिक सिद्धान्त और उनकी उपलब्धियाँ और कुछ नहीं, मानवी मस्तक का खेल है। उसमें अद्भुत कल्पनाओं, विचारणाओं, चित्रों का प्रकृतिकरण मात्र है। मस्तक तो तथ्यों को जोड़ता, इनमें काट-छाँट करता है, कुछ को स्वीकारता है और उन्हें बार-बार कसौटियों पर कसता रहता है। जिससे उसमें सत्त नवीनता बनी रहती है। इसी तरह अध्यात्म भी मात्र कहने सुनने का कोरा सिद्धान्त नहीं है, वरन् स्वयं अनुभव करने, जीवन में उतारने और व्यवहार प्रकट करने का नारा है। यह महाग्रन्थ अपनी ही काया कलेवर के भीतर अन्तःकरण में लिपिबद्ध है। किसी भी वैज्ञानिक आविष्कार की भाँति उसका अपने ही मन मस्तिष्क की प्रयोगशाला में प्रयोग परीक्षण करना पड़ता है और पूर्ववर्ती अध्यात्मवेत्ताओं के-सन्त-महापुरुषों के अनुभव रूपी आँकड़ों से मिलाया जाता है। इससे अनावश्यक तत्वों को निकाल बाहर करने में सहायता मिलती, पुरानी-सड़ी गली परम्पराओं से पीछा छूटता है, साथ ही नवीनतम तथ्यों का समावेश होता रहता है।
मूर्धन्य वैज्ञानिक एफ. काप्रा ने अपनी पुस्तक ‘ताओ ऑफ फिजिक्स’ में कहा है कि विज्ञान और अध्यात्म दोनों ही सत्य की खोज में लगे हैं। आध्यात्मिकता अपने अन्तराल की गहराई में प्रवेश करके यह तथ्य उद्घाटित करते हैं, जो कि भीतर है वहीं बाहर अभिव्यक्त हो रहा है, जड़-चेतन एक दूसरे से गुँथे हुये हैं। यही बात अब विज्ञानवेत्ता भी कह रहे हैं। प्राकृतिक पदार्थों की गहराई तक प्रवेश करके सूक्ष्म-निरीक्षण-परीक्षण करने के उपरान्त जो निष्कर्ष उनने निकाले हैं उसके अनुसार वस्तुओं और घटनाओं के मध्य गहन एकता है। पदार्थ और चेतना समष्टिगत सत्ता के अनिवार्य अंग हैं। एक के बिना दूसरा अपने को व्यक्त करने में समर्थ नहीं हो सकता। दोनों की खोजें परस्पर पूरक एवं सृष्टि का सम्पूर्ण ज्ञान प्राप्त करने के लिए आवश्यक है। किन्तु अब तक विडम्बना यही रही है कि आत्मिकी का क्षेत्र चेतना के परिष्कार परिमार्जन तक सीमाबद्ध होकर रह गया है, धर्म पूजा-पाठ के बाह्याडम्बरों से उलझ गया है, तो विज्ञान ने अपने को प्राकृतिक रहस्यों, जड़ पदार्थों की खोज तक सीमित मान लिया। एक ने दूसरे की उपयोगिता एवं महत्ता को नहीं समझा और न स्वीकारा, जबकि दोनों का उद्देश्य सृष्टि रहस्य को समझना-जीवन उद्देश्य की प्राप्ति करना और उन उपलब्धियों से मानव मात्र हित साधन करना है। काप्रा के अनुसार यह दूरी अब क्रमशः मिटती जा रही है और दोनों शक्तियाँ मिलन बिन्दु की ओर अग्रसर हो रही हैं।
प्रसिद्ध रसायनवेत्ता इन्नो बोल्थू का कहना है कि मानव सभ्यता की समस्त समस्याओं का समाधान अकेले विज्ञान और टेक्नोलॉजी के सहारे सम्भव नहीं है। जीवन के कई पक्ष ऐसे हैं जिन्हें वैज्ञानिक तरीकों से नहीं सुलझाया जा सकता। आदर्शवादिता, चरित्रनिष्ठ, सामाजिकता, भाव संवेदना जैसे उच्च स्तरीय मानवीय मूल्यों की व्याख्या विवेचना न तो गणित द्वारा हो सकती है और न विज्ञान द्वारा। इसका समाधान मनोविज्ञान, नीतिशास्त्र या दर्शन के द्वारा ही सम्भव है। विज्ञान-ज्ञान की ही एक शक्तिधारा है किन्तु अकेले यह मानव हृदय को नियन्त्रित नहीं कर सकता।
विश्व का निर्माण स्रष्टा ने किसी महान उद्देश्य की पूर्ति के लिए किया है, यदि यह तथ्य सही है, तो हमें यह जानना होगा कि वह कौन सा उद्देश्य है, जिसके लिए इस सुरम्य धरती का, उस धरती का, उस पर रहने वाले प्राणियों-वनस्पतियों का सृजन हुआ है। निश्चय ही विज्ञान इस सम्बन्ध में मौन है। उसकी पहुँच केवल इतने तक सीमित है कि प्रकृति में कौन-कौन से घटक हैं, उनमें सन्निहित शक्ति का स्वरूप क्या है और उनका अपनी सुख-सुविधा के लिए कैसे और कितनी मात्रा में दोहन संभव है। मनुष्य में अंतर्निहित भाव संवेदनाओं, आत्मिक विभूतियों को न तो पदार्थ कणों की सूक्ष्म हलचलों के आधार पर और न तो पदार्थ कणों की सूक्ष्म हलचलों के आधार पर और न ही इलेक्ट्रोमैग्नेटिक वैव्स हलचलों के आधार पर जाना जा सकता है। स्नेह, प्यार, आत्मीयता, उदारता, सहिष्णुता, साहस, उमंग, क्रोध, आवेश आदि मनोभावों का समाधान वैज्ञानिक प्रयोगों द्वारा कहाँ हो पाता है? पदार्थों की भाँति मनुष्यों की प्रकृति एक जैसी नहीं होती। बाह्य रूप से मापक गुणों के आधार पर उन्हें समझना संभव नहीं। अतः जीवन की प्रायः अधिकाँश आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए विज्ञान पर अवलम्बित रहने पर भी यह नहीं कहा जा सकता कि उन सभी समस्याओं का समाधान वह प्रस्तुत कर सकता है, जो मानव जीवन की पूर्णता के लिए अभीष्ट है।
अध्यात्म जीवन दर्शन संबंधी समस्त समस्याओं का समाधान प्रस्तुत कर सकता है। इसके प्रयोक्ता अपने गुण-धर्म, स्वभाव में उत्कृष्टता का एवं चिन्तन, चरित्र, व्यवहार में आदर्शवादिता का समावेश करते और अन्तराल की गहराई में प्रवेश कर उस शाश्वत सत्य के दर्शन करते हैं जिसे पाकर और कुछ प्राप्त करने की इच्छा-आकाँक्षा का सर्वथा समापन हो जाता है। अध्यात्मवेत्ताओं के अनुसार मनुष्य वस्तुतः “स्प्रिचुअल बीइंग“ अर्थात् अध्यात्मिक जीव है। जीवित पदार्थ के अतिरिक्त भी वह कुछ और है। आत्मिक परिपूर्णता अर्थात् क्षुद्रता में महानता में परिवर्तन-प्रत्यावर्तन।
इस संदर्भ में प्रख्यात भौतिक विज्ञानी विलियम जी. पोलार्ड का कहना है कि विज्ञान और अध्यात्म दोनों महाशक्तियों का समन्वय उक्त उद्देश्य की पूर्ति सहजतापूर्वक करा सकता है। प्रगति का मार्ग इसलिए अवरुद्ध हो गया है कि विज्ञान को मात्र वस्तुनिष्ठ ज्ञान माना है। इसी तरह अध्यात्म को व्यक्तिगत-आत्मपरक मान लिया जाता है जिसकी नींव श्रद्धा और विश्वास पर टिकी हुई है। यही कारण है कि तर्क, तथ्य एवं प्रमाणों के अभाव में इसके अनुयायी को यह प्रमाणित करना कठिन पड़ जाता है भौतिक विज्ञान के प्राथमिक सिद्धान्त की तरह इसमें वास्तविकता कितनी है। कुशल वैज्ञानिक बनने के लिए सम्बन्धित विषय के प्रति लगन, दीर्घकालिक अध्ययन, तत्परता, अनुशासन आदि को भी धैर्यपूर्वक उसी मार्ग का अनुसरण करना पड़ता है।
वस्तुतः विज्ञान और अध्यात्म मानवी प्रगति की दो महत्वपूर्ण एवं परस्पर पूरक शक्तियाँ हैं। एक हमारे परोक्ष जगत की भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति को सरल बनाती है, तो दूसरी परोक्ष जगत की आत्मिक विभूतियों से हमें सम्पन्न करती है। दोनों का संतुलित विकास ही मानव के समग्र उत्थान का पथ प्रशस्त कर सकता है। वही आज की आवश्यकता भी है।
ओहियो के झाड़ियों भरे जंगल में एक लकड़हारिन विधवा ने बड़ी कठिनाई से अपने बच्चे का पालन पोषण किया था। वह सोचती थी कि शायद उसका लड़का भी लकड़हारा ही बन सकेगा।
किन्तु संभावना के विपरीत लड़के गारफील्ड ने बिना माता से कुछ अपेक्षा किये अपने बलबूते विद्याध्ययन और महापुरुषों के सान्निध्य में जीवन यापन करने का मार्ग खोज निकला। किसी योग्य होने पर उसने लोक सेवा के कार्यों में उत्साह बढ़ाया। आर्थिक स्थिति तो काम चलाऊ ही बनी रही पर उसने हर किसी की दृष्टि में अपनी प्रमाणिकता की छाप बढ़ाई।
छोटी-छोटी सीढ़ियों पर ऊँचा चढ़ते-चढ़ते गारफील्ड अन्ततः अमेरिका का राष्ट्रपति बना।
उस दिन ‘प्रीमियर साहब’ एक दूरस्थ जिले का दौरा करने निकले थे। साथ में वह भी था उनके। सर्किट हाउस में भारी भीड़, स्वागत सत्कार, तेज बारिश के झोंके की तरह आया और चला गया। दोपहर में उन्होंने उसे अचानक बुलाकर कहा “तुम्हें एक जगह मेरे साथ चुपचाप चलना है। तैयार हो जाओ।” अचानक कही गई इस बात ने उसे न तो हतप्रभ किया और न आश्चर्यचकित। जब से अंतरिम-सरकार बनी-इस तरह के दौरे नित्य के कार्यक्रम में शामिल हो गए थे। यों फरवरी 1937 के चुनावों के बाद अंतरिम सरकारें ग्यारह प्रान्तों में बनी थीं। संयुक्त प्रान्त की बात कुछ और ही थी। यहाँ तो जबरदस्त भूचाल आ गया था। व्यवस्था परिवर्तित परिशोधित होने लगी थी।
यद्यपि देश ने अभी आजादी नहीं पाई थी। पर विश्वास जमने लगता था कि आजादी मिल कर रहेगी। भले ही उसे पेट और परिवार के कारण क्लर्की करनी पड़ रही थी, लेकिन देश के लिए जज्बात कम न थे। उसे अभी भी याद है वह घटना जब उसे उसके डिप्टी सेक्रेटरी ने बुलाया था। सामने जाते ही वह बोले थे “अपने प्रीमियर तपे-तपाए गाँधी जी के खरे शिष्य हैं।” “इसमें क्या शक है साहब। “ उसका उत्तर भावों में सना था। “पाँच महीनों में वह छः पी. ए. बदल चुके, मगर उन्हें मन पसन्द पी. ए. नहीं मिल रहा। उनका कहना है ईमानदार मेहनती और देश के प्रति भावपूर्ण मन रखने वाला पी.ए. अगर मिल जाए तो जो वे करना चाहते हैं, वह बहुत सहज हो जाए। मैंने जब तुम्हारी विचारणा से उन्हें अवगत कराया तो वे बहुत खुश हुए।” डिप्टी केक्रेटरी के इन शब्दों से आज के इस क्षण तक वह उनका व्यक्तिगत सहकारी था।
“ क्या सोचने लगे मोहन? “ उसे कार में बैठाते हुए प्रीमियर साहब ड्राइवर से बोले “तहसीलदार के दफ्तर चलो।” चार शब्दों के इस समूह ने उसे थोड़ा चौंकाया। न कलेक्टर को खबर, न एस. डी. ओ. को, तहसीलदार को भी कुछ नहीं मालूम? स्वयं उसे भी नहीं मालूम था। थोड़ी देर में तहसील के द्वार पर जब उनकी गाड़ी रुकी तो हड़कम्प मच गया। प्रीमियर स्वयं आए हैं- सुनते ही तहसील का सारा अमला घबरा गया। तहसीलदार बदहवास भागे हुए आए। स्वागत करने के भाव में, बदहवासी में पता नहीं क्या क्या बके जा रहे थे। उनकी वाक्य शृंखला को अनसुना करते हुए उन्होंने बताया कि वे उनके दफ्तर का मुआयना करेंगे। अब तो तहसीलदार का पूरा शरीर पसीने से भीग गया।
उसे भी हैरानी कम नहीं थी, आखिर प्रीमियर महोदय देखना क्या चाहते हैं और यह तहसीलदार इतना नर्वस क्यों हैं? तहसील के अमले के चेहरों पर हवाइयाँ क्यों उड़ रही हैं? तभी उन्होंने कुर्ते की जेब से एक तुड़ा-मुड़ा कागज निकाला और फाइलों के नम्बर नोट कराने लगे। तकरीबन पचास-पचपन फाइलें लाने का हुक्म सुना दिया। अब तो तहसीलदार, पेशकार, नाजिर, वासिल बाकी नवीस, नकलनवीस सभी के चेहरों पर लगा कि गहरी स्याही पुत गई। टूटते लड़खड़ाते शब्दों में तहसीलदार बोला- “ आप विश्राम गृह पधारें मैं फाइलें ढुँढ़वा कर लाता हूँ। ढूंढ़ने में समय लगेगा, पेशियों को जनता बैठी है। आप बेकार परेशान होंगे।” मगर प्रीमियर साहब भी विचित्र, बोले “आप ढूँढ़िए जब तक मैं यही बैठा हूँ।” तब तक काफी भीड़ जमा हो गई।
थोड़ी देर में कलेक्टर, डिप्टी कलेक्टर, वगैरह भी भागे-भागे गए। सारी बात सुनाकर उनसे कहा “आप सब अपने-अपने दफ्तर जाएँ जरूरत होने पर बुलवा लूँगा। “ मगर किसी ने हिलने का नाम नहीं लिया।
शाम चार बजे तक थोड़ी सी फाइलें आयीं जिन्हें लेकर उपस्थित अफसरों की ओर कड़क कर बोले- “एक घण्टे में शेष फाइलें पहुंच जानी चाहिए।” विश्राम गृह में शाम तक कुछ फाइलें और पहुंची। प्रीमियर साहब ने बाहर कहलवा दिया सिवा कलेक्टर के और कोई अन्दर न आये। अंग्रेज कलेक्टर के साथ बैठकर फाइलों की शल्य क्रिया सम्पन्न होती रही। कैसे किसी की जमीन औरों को दी जाती है? किस तरह सैकड़ों एकड़ जमीन नौकरों, कुत्तों, बिल्लियों के नाम करा कर सीलिंग कानून से बचा जाता है। किसी ने कर्ज लिया ही नहीं मगर वसूली में उसकी जायदाद जब्त जमींदारों के नए-नए कारनामे आदि अनेकों बातें तरह-तरह से अपना रहस्य उजागर करती रहीं। अंग्रेज कलेक्टर भी इस घटना चक्र से भौंचक्का था।
रात एक बजे तक वह करिश्मा चलता रहा। जिसके परिणाम में भ्रष्टता, अन्याय और नियमों का उल्लंघन अपने चरम रूप में उजागर हुआ। प्रीमियर साहब गुस्से में होंठ काटते हुए पी. ए. से बोले “देखा मोहन! लोग कहते हैं अँग्रेजों ने भारत को तबाह किया है। पर नहीं इस तबाही के जिम्मेदार अंग्रेजों से ज्यादा भारतीय स्वयं हैं। चलो, अंग्रेजों के लिए तो यह पराया देश है, पर जिनका अपना देश है, उनके करतब तो इस कदर घिनौने हैं कि घिनौनापन भी उन्हें देखकर मुँह बिचकाले।”
कार्य विराम के बाद उसकी नींद लगी ही थी तभी द्वार खटका। कमीज पहन कर बाहर निकलने पर देखा कि हिन्दुस्तानी तहसीलदार और डिप्टी कलेक्टर इशारे से बुला रहे हैं। पास जाने पर एक कोने की ओर ले जाकर बोले “देखो हम तुम दोनों कर्मचारी हैं एक बिरादरी के आदमी। ये प्रीमियर साहब तो आज हैं कल नहीं। “कहते हुए एक चमड़े का बैग थमाया फिर आँखों में आँखें डाल कर बोले “कम हों तो वह भी पूरा कर देंगे पर सारी फाइलें आ जानी चाहिए। “ सुनकर वह एकबारगी सिहर गया, एक ओर महात्मा गाँधी की इतनी ऊँची कल्पनाएं उन कल्पनाओं के लिए अपना सर्वस्य न्यौछावर करने वाले प्रीमियर साहब जैसे आदमी। दूसरी ओर, दूसरी ओ... र लगा पिशाचों की पूरी सेना खड़ी है। सामने का धुँधका आँखों में समाने लगा, हाथ का बैग छूट गया और वह पीछे मुड़कर चल पड़ा। “मुझ से यह न होगा” उसके द्वारा कहे गए ये शब्द वातावरण को स्पन्दित करते रहे।
राजधानी लौटने पर हुई कार्यवाही के परिणाम स्वरूप तहसीलदार सस्पैंड हुए। सारे स्टाफ का तबादला हुआ। इसी बीच अंतरिम सरकारें भंग हो गई। प्रीमियर साहब असहयोग आन्दोलन में जेल चले गए। वह पुनः पी.ए. की जगह सामान्य क्लर्क बन गया।
इस बीच उसे तहसील वाली यह घटना भूल चुकी थी। लेकिन एक दिन वही तहसीलदार अपने पूरे रौब में उसके सामने आ कर बोला “मि. मोहन लाल मुझे पहचाना। मैं वही तहसीलदार हूँ, जिसको आपके प्रीमियर साहब ने सस्पैण्ड किया था। लेकिन मेरा क्या बिगाड़ पाए! जाँच होने पर मुझे इतने सालों की तनख्वाह मिली और साथ में प्रमोशन अब ठाठ से डिप्टी कलेक्टरी कर रहा हूँ। हो सकता है कल सचिवालय आकर तुम्हारा अफसर बन जाऊँ और तुम्हारे प्रीमियर साहब तो जेल में पड़े हैं। “ सुनकर उसका सिर चकरा गया यही है भगवान की कर्म व्यवस्था। अपराधी आनन्द लूटे और नीतिपूर्ण जीवन जीने वाला कष्ट उठाए। तब कर्मफल का सिद्धान्त...? प्रश्न दीवारों से टकराकर उसके पास पास लौट आया।
दिन-महीने साल के बहते काल प्रवाह में बहुत कुछ बदल गया। देश से अँग्रेजी शासन उठ गया। स्वतन्त्र भारत में पहले आम चुनाव हुए। अब की बार प्रीमियर साहब कभी के संयुक्त प्रान्त और अब के उत्तर प्रदेश के प्रथम मुख्य मंत्री बने। संयोग से पुनः वह उनका व्यक्तिगत सहकारी था। तभी एक दिन डिप्टी कलेक्टर साहब के बीमार होने की खबर सुनने में आयी। उनसे मिलने वह अस्पताल में गया। लकवा मार जाने के कारण उनका बांया अंग पूर्ण निष्क्रिय था। बोलने में भी पूरी तरह असमर्थ थे।
उसे देखते ही उनकी आँखें बरस पड़ी। मुँह से गें गें की आवाज आने लगी। उसने उनका हाथ अपने हाथ में लिया। उन्होंने पास खड़े व्यक्ति को कागज कलम लाने का इशारा किया। फिर सिरहाने की ओर रखे तकिए पर झुक कर वे कुछ लिखने लगे। लिखकर कागज उसके हाथों में थमा दिया और बिस्तर में फैल गए। वह कागज पढ़ने लगा उसमें लिखा था “तुम्हीं ठीक थे मोहन, मेरे जीवन के सारे अपराध आज मेरे मन में किस कदर तूफान मचाए हैं शायद ही कोई अनुमान कर पाए। परिवार बरबाद हो चुका। लड़के निकम्मे और आवारा निकल गए। हो सके तो भगवान से मेरे लिए प्रार्थना करना। काश.... मुझे यह सब पहले समझ में आ जाता....।” कागज पढ़ कर उनके चेहरे की ओर देखा और बेचैनी गहराई। आँखों से लुढ़कते अश्रु बिन्दु गालों को भिगो रहे थे। साँत्वना भरे शब्दों के अलावा और क्या था उसके पास?
अगले दिन कार्यालय में मुख्यमंत्री महोदय को सारी घटना कह सुनाई। पं. गोबिन्द वल्लभ पंत ने एक क्षण उसकी ओर देखा, फिर उनकी मूँछों से मुस्कान की पतली-पतली अनेकों किरणें चमकीं। अगले क्षण इन सब ने गम्भीरता का रूप ले लिया। वे कह रहे थे-”विचार जगत में दुष्कर्म का भाव उठते ही अस्त-व्यस्त उद्विग्नता छाने लगती है। किन्तु इसे अनदेखा कर देता है मनुष्य। दुष्कर्म करते समय भय, आशंका, अनिश्चय भरी आकुलता उसे घेरे रहती है पर अपने उन्माद में वह इसकी ओर भी ध्यान नहीं देता। दुष्कर्म हो जाने पर स्वयं को वह सतत् असुरक्षित महसूस करता है। स्वयं उसका मन उसके लिए काल दण्ड धारी यमराज हो जाता है ओर उसके भरपूर प्रहारों का सिलसिला उसके जीवन को बिखेरे बिना नहीं रहता। शृंखला लम्बी होने के कारण भले देर में समझ में आए। पर क्रिया की प्रतिक्रिया निश्चित है। अच्छे-बुरे भावों के अनुसार कर्म का परिणाम मिले बिना नहीं रहता। यह सुनिश्चित जान लेना।” उसका समाधान हो चुका था।
उस दिन को को खोया हुआ समझो जिस दिन सूरज डूबने तक कोई अच्छा काम न बन पड़े।
दूसरों की मनोदशा के सम्बन्ध में सही अनुमान नहीं लगा सकते कि वह हमारे सम्बन्ध में क्या सोचता और क्या चाहता है? संभव है वह हमें अधिक मेधावी या मूर्ख मानकर वैसी बढ़िया-घटिया अपेक्षा करता है। हो सकता है कि हमारा काम उसकी नजर में न आता हो और उसे घटिया या कम मानता हो। यदा-कदा प्रतिक्रिया प्रकट होने पर ही यह विदित होता है कि हमारे व्यक्तित्व के बारे में क्या धारणा बनायी गयी और ईमानदारी, वफादारी को किस हद तक मान्यता दी गयी। हो सकता है कि अपनी ओर से पूर्ण वफादारी और जिम्मेदारी बरतने पर भी दूसरे पक्ष को बेईमानी और गैर वफादारी का संदेह बना हुआ हो। ऐसी दशा में पेट खोलकर नहीं दिखाया जा सकता और न मान्यता बदलने के लिए शब्दों की सहायता से किसी को सहमत ही किया जा सकता है।
तब क्या किया जाय? क्या उससे अलग हो जाया जाये या जैसा लाँछन लगाया जा रहा है, जैसा संदेह किया जा रहा है वैसा ही बनकर दिखाया और अविश्वास का मजा चखाने के लिए उसे कोई करारी चोट लगाने का कुचक्र रचा जाय?
यह उचित न होगा। दूसरा गलती या नासमझी करे और बदले में हम अपना स्तर गिरा दें। अपनी आत्मा को कलुषित करें और वह बनें जो वस्तुतः हम नहीं थे?
यहाँ सहज समाधान एक ही रह जाता है कि हम अपना कर्तव्य पालन करें। अपनी अन्तरात्मा के सामने सच्चे रहें। जिस हद तक ईमानदारी और वफादारी बरती जा सकती है, उसे बरतें और इस बात की चिन्ता न करें कि कोई संतुष्ट हुआ या नहीं। किसी ने हमें ठीक तरह समझा या नहीं। यह अपने बस से बाहर की बात है कि किसी अविश्वासी को यह विश्वास दिला सकें और संदेह करने वाले का वहम पूरी तरह मिटा सकें। हम शब्दों द्वारा सफाई ही दे सकते हैं। अपनी मनःस्थिति और परिस्थिति का विवरण बता सकते हैं। इतने पर भी यह आवश्यक नहीं कि अपना कथन सही माना जायेगा और जमा हुआ वहम निकाल दिया जायेगा।
इन परिस्थितियों में अलग हो जाना अन्तिम उपाय है। इस कदम को आरम्भ में ही नहीं उठा लेना चाहिए। जहाँ तक हो सके स्थिति को टालना चाहिए। अपने आचरणों को और अधिक स्पष्ट होने देना चाहिए, ताकि जिन प्रसंगों में संदेह किये जाने की आशंका है उनमें उपेक्षा बरती जाय और वह काम अपने जिम्मे न रखकर किसी दूसरे के हाथों चला जाये, ऐसा प्रयास करना चाहिए। किसी काम में अतिशय उत्साह या लगाव दिखाना भी यह संदेह उत्पन्न करता है कि कहीं दाल में कुछ काला तो नहीं है।
इसी प्रकार आवेश में भाग खड़ा होना भी यह जताता है कि चोर की दाढ़ी में तिनका था। आगे दाल गलती न देखकर अपने आप ही बिस्तर गोल कर लिया। खीज और नाराजी प्रकारान्तर से यही बात प्रकट करती है कि पोल खुलने पर झेंप आयी और देर तक पैर टिकाये रहने की हिम्मत न रही। उथले व्यक्ति के साथ उथला व्यवहार दिखाना यह सिद्ध करना है कि बाजी हार गये।
यदि जाने अनजाने में गलती होती रही है तो उसे बिना ढोल बजाये चुपके से सुधार लेना चाहिए। बदला हुआ व्यवहार बताता है कि व्यवहार बदल गया। गलतफहमी जहाँ पलती हो उस स्थान से भागना तो नहीं चाहिए पर खिसकने की इच्छा जरूर प्रकट करनी चाहिए यह सोचा जा सकता है कि सन्देह और अविश्वास का वातावरण कैसे बना? यदि किसी चुगलखोर ने ऐसा किया हो तो मालिक को सफाई देने की अपेक्षा उस चुगलखोर को ही बातों-बातों में वह स्थिति प्रकट कर देनी चाहिए, जिससे संदेह करने की आशंका बनी और तिल ने ताड़ का रूप धारण किया।
जो प्रामाणिक है उन्हीं का विश्वास करो। जो अनेक कसौटियों का विश्वास करे। जो अनेक कसौटियों पर खरे उतरें मात्र उन्हीं से घनिष्ठता बनाओ। हर अवसर का मूल्याँकन करो और उसके सदुपयोग की बात सोचो। प्रगति के यही तौर तरीके हैं।
मन की घुटन मन में छिपाये रहने की अपेक्षा यह अच्छा है कि सफाई और धुलाई का अवसर मिले यह कार्य बिना विवाद खड़ा किये और सीधा नाम लिए, घुमा-फिरा कर इस ढंग से कहना चाहिए जिससे प्रतिष्ठ का प्रश्न न बने। न तो दूसरा ही अपनी तौहीन समझे और न अपने को ही अपराधी के कटघरे में खड़ा होना पड़े।
मन मुटाव उत्पन्न होने की स्थिति में सम्बन्ध तोड़ लेने या बिगाड़ लेने की अपेक्षा उन्हें सुधार लेने में अधिक बुद्धिमत्ता है। डोरी तोड़ देने पर एक प्रकार की परोक्ष शत्रुता का आरम्भ हो जाता है। ऐसी दशा में कोई हथियार न चले तो कम से कम बदनामी का सिलसिला तो चल ही पड़ता है। जिनके साथ देर तक अच्छे सम्बन्ध रहे हों, उन्हीं की ओर से यदि लाँछन लगाये जायें तो उन पर सहज विश्वास होता है। बदनामी चाहे छोटी ही क्यों न हो व्यक्ति के मूल्याँकन में कटौती करती है। अच्छा यही कि तनाव बढ़ने से पूर्व उसे सुधार लिया जाय।
कर्त्तव्य पालन आवश्यक है। इस कारण यदि सम्बन्ध टूटता हो तो टूट भी जाने देना चाहिए। अनाचार करने के लिए चाहे मित्र द्वारा कहा जाये या स्वामी द्वारा, उसमें अपनी असमर्थता, अयोग्यता व्यक्त करते हुए ऐसी स्थिति पैदा कर देना चाहिए कि वह चतुरता का कार्य किसी चतुर के जिम्मे सौंपा जाये। ऐसे प्रसंगों में यदि अपने को मूर्ख समझा जाने लगे तो उस लाँछन को खुशी-खुशी सह लेना चाहिए और कम दर्जे का, कम लाभ का काम स्वीकार कर लेना चाहिए।
दूसरों ने क्या समझा, क्या माना यह उनकी अपनी समझ और इच्छा के ऊपर निर्भर है। अपना गौरव तो इसी में है कि कर्तव्य का निर्वाह न्यायोचित रीति से करते रहा जाये। दूसरा अपनी जिम्मेदारी में चूक करता है तो उसका अनुकरण हमें क्यों करना चाहिए?
मित्र, कुटुम्बी, सम्बन्धी, स्वामी से भी बढ़कर अपनी अन्तरात्मा है। किसी को प्रसन्न करने के लिए हमें अपने आप को धोखा नहीं देना चाहिए। आत्मधिक्कार, से आत्म प्रताड़ना से तो हमें हर हालत में बचना ही चाहिए। ऐसे लाभ को छोड़ देना चाहिए जिससे कर्तव्य के प्रति विमुख होना पड़ता हो।
निष्ठापूर्वक-धैर्यपूर्वक यदि कर्तव्य पालन करते रहा जाय तो गलतफहमी अधिक दिन नहीं ठहर सकती। भ्रम अधिक समय टिका नहीं रहता। वस्तु स्थिति प्रकट होकर रहती है। इस विश्वास के साथ यदि ईमानदारी और जिम्मेदारी का निर्वाह करते हुए अपने निश्चय पर दृढ़तापूर्वक जमे रहा जाय तो अन्त में सत्य की ही विजय होती है। सूर्य पर बदली की कालिमा देर तक टिकी नहीं रह सकती। हवा का प्रवाह उसे अब नहीं तो तब उड़ा ही देता है।
डॉ. विश्वेश्वरैया ‘भारत रत्न’ की उपाधि लेने दिल्ली पहुँचे। राजकीय अतिथि होने के कारण उनके ठहरने की व्यवस्था राष्ट्रपति भवन में की गई थी।
एक दिन प्रातः वे डॉ. राजेन्द्र प्रसाद के पास पहुँचे और
बोले अब मुझे आज्ञा दीजिए। “ऐसी क्या जल्दी है? अभी आपको आये अधिक समय भी नहीं हुआ है मुझे कुछ आवश्यक विषयों पर आपसे चर्चा भी करनी हैं। “
“यदि ऐसी बात है तो मैं कुछ दिनों और रुका रहूँगा पर ठहरूंगा अन्यत्र।” तो क्या यहाँ आपको किसी प्रकार का कष्ट है?
“नहीं! नहीं बात यह है कि राष्ट्रपति भवन में कोई अतिथि केवल तीन दिन ही ठहर सकता है और मुझे तीन दिन पूरे हो गये हैं। मैं यहाँ के नियमों को नहीं तोड़ना चाहता। अन्यत्र कहीं भी ठहर जाऊंगा, जब आप आवश्यक समझें, फोन पर सूचना देकर मुझे बुला लें।”
राजेन्द्र बाबू ने यह सुना तो नियम-पालन की सुदृढ़ भावना से वह मन ही मन बहुत प्रभावित हुए। उन्होंने उन्होंने फिर भी कुछ समय और रुके रहने का आग्रह किया पर डॉ. विश्वेश्वरैया नियम तोड़ने को तैयार न हुए।
दूसरे लोग प्रसन्न रहते हैं या अप्रसन्न। इसका निष्कर्ष निकालते समय यह ध्यान रखना चाहिए कि ऐसा कहीं अपनी भूल या लापरवाही के कारण तो नहीं हो रहा है। आलस्य-प्रमाद ने यदि अपनी गरिमा पर दाग लगाया है तो उसे अपनी गलती मान लेते हुए अविलम्ब धो डालने का प्रयत्न करना चाहिए। किन्तु यदि सच्चाई-ईमानदारी ही किसी की आँख में अयोग्यता बन रही हो तो उसे बनी रहने देना ही श्रेयस्कर समझना चाहिए।
“राजन! नाशवान शरीर इतना जरूरी नहीं कि उसके मोह से ब्राह्मण अपने कर्तव्य को ठुकरा दे।” दुबले-पतले झुर्रीदार शरीर वाले इस वृद्ध के बाल ही नहीं रोएँ तक सफेद पड़ गए थे। किन्तु गोरे रंग के इस ब्राह्मण के विशाल माथे पर सौम्य तेज की चमक थी। उसकी आँखों में भय का नामोनिशान न था। “भगवान विश्वनाथ यह विग्रह स्वयम्भू है। उन प्रलयंकर ने यदि इससे अपना तेज समेटने की सोची है तो सेवक को अपने शरीर की अन्तिम भावांज्जलि भी अर्पित करनी चाहिए। तुम प्रजा और अपने परिवार की रक्षा करो।”
“प्रजा का रक्षणीय वर्ग यथा सम्भव सुरक्षित जगहों पर भेजा रहा है।” काशी नरेश के स्वर में कोई उत्साह नहीं था वैसे वह मृत्युदूत किधर से आएगा कोई ठिकाना नहीं। अब तो आप आशीर्वाद दें कि क्षात्रधर्म के पालन में यह शरीर सार्थक हो।”
“तुम शूर हो।” तपस्वी ने एक बार आकाश की ओर ऐसे देखा जैसे नियति की लिखावट पढ़ रहे हों। “मरण भी उसका मंगल पर्व है, जो जीवन यज्ञ की पूर्णाहुति देश, धर्म, समाज, संस्कृति की रक्षा के लिए कर सके।”
“लेकिन आतंक का अंत असंभव सा लगता है। कहीं सचमुच मैं इस भारत भूमि के आतंक का अन्त कर पाता।” राजा के इन शब्दों में संघर्ष के निश्चय के बावजूद निराशा की वेदना थी। “हाँ! आत्माहुति जरूर दे सकता हूँ और वह दूँगा।”
“नरेश! जो द्वेष और स्वार्थ रहित हैं, जिनने अपनी स्वाभाविक दुर्बलताओं को जीत लिया है, उनके बलिदान को बेकार कर देने की ताकत विश्व नियन्ता में भी नहीं।” ब्राह्मण का मुख तेजोदीप्त हो गया। नाभिकमल से उठते परावाणी के पूर्ववर्ती स्वर पश्यन्ती से अलंकृत आशीर्वाद दे गए -”तुम्हारा आत्मदान आतंक के अंत का निमित्त अवश्य बनेगा।”
“देव।” नरपति ने विह्वल होकर उनके चरण पकड़ लिये। “मेरे मरण को तो अशून्य कर दिया आपके इस आशीर्वाद ने, किन्तु आप.....,”
“मेरी चिन्ता न करो। मैं विश्वनाथ की गोद में अभय हूँ।” उन्होंने सुरक्षित स्थान जाने का आग्रह दुबारा अस्वीकार कर दिया। वह कह रहे थे “आतंक के अन्त में ब्राह्मण अग्रणी न बने तो कर्म की पूर्णता कैसे सधेगी।” विवश नरेश लौट गए।
“काला पहाड़ आ रहा है!” कितना भयंकर है यह संवाद। प्रलय का संदेश भी शायद इतना दारुण नहीं। वह नृशंसता की नग्न मूर्ति-जनपदों को फूँकते रौंदते मानव के छिन्न-भिन्न शवों से धरती को वीभत्स बनाते पिशाचों की सेना के समान आँधी के वेग से आने वाला निष्ठुर हत्यारा जिधर जाता है, दिशा उजाड़ हो जाती है। उड़ीसा को रौंदकर, उसके शासक मुकुँद देव को मारकर उसने मित्रता गाँठी है दिल्ली के बहलोल लोदी से। अब जौनपुर को तबाह करता चल पड़ा है काशी की ओर।
काला-पहाड़ हिन्दू समाज की जातीय संकीर्णता की उपज। उच्च ब्राह्मण कुल में जन्मे नयनचन्द राय का लड़का “कालाचन्द राय।” बंगाल के नवाब की लड़की दुलारी बीबी से शादी करने के बाद कितना अपमानित किया उसके पैतृक समाज ने। उसने आरजू-मिन्नतें की “जो कहोगे प्रायश्चित कर लूँगा मुझे अपने से बाहर न करो।” किसी ने नहीं सुनी उसकी एक। अब वह है प्रतिशोध का आतंक, मन्दिरों का विरोधी पूरी हिन्दू जाति का शत्रु। वह अपने को मुहम्मद फर्मूली कहता है, लोग कहते हैं उसे काला पहाड़ असलियत में है वह सामाजिक कट्टरपन से उपजा मूर्तिमान आतंक।
“उसका आना।” नगर उजाड़ बन गए। घर उल्लुओं सियारों के रहने के लिए छोड़ दिए गए। लोगों के समूह भाग रहे थे। पैदल-छकड़ों की असंख्य संख्या भाग रही थी। हर मुख पर एक ही चर्चा काला पहाड़ आ रहा है। इस समूची तेरहवीं शताब्दी में उस जैसा कोई नहीं शायद पहले भी नहीं बाद में भी नहीं। हर मुख श्री हीन, भय विह्वल। बालक वृद्ध स्त्री-पुरुष और उनके पशु भी साथ हैं। हर कोई भयभीत है चारों दिशाओं में भय समाया है आज। सामाजिक कट्टरता जाति से बहिष्कृत करने की प्रवृत्ति यही है भय की माँ। अभी तक हमने सीखा है अपनों को पराया बनाना, कब बनाएंगे परायों को अपना।
“देश पुकारता है! धर्म पुकारता है! “ अकस्मात् भेरीनाद के साथ उस दिन गाँव-गाँव-पथ में घोषणा सुनाई पड़ी “आतंक के दिन अधिक नहीं हैं,बढ़ चलो संघर्ष की राह पर। युवकों! तरुणों! देश तुम्हें पुकारता है। संस्कृति तुम्हारा आह्वान करती है! तुम इस पुकार को भी अनसुनी कर दोगे? “भागते कदम ठहर गए। नारियाँ कान उठा कर सुनने लगीं। उद्घोषक कह रहा था “एक ब्राह्मण के नेतृत्व में संस्कृति की रक्षा का महापर्व आज पुकार रहा है, तुम इसे अनसुना कर सकोगे? “
“नेतृत्व ब्राह्मण का है?” विश्वास जगा “हम सुनेंगे यह पुकार क्या करना है हमें?” युवकों, तरुणों ने ही नहीं वृद्धों तक ने उद्घोषकों को जगह-जगह घेर लिया। अनेक जगह पर नारियाँ आगे आ गई थी “ बतलाओ हमें क्या करना है?”
“संगठित हो जाओ और संघर्ष करो, तपस्वी सुगतभद्र का यही आदेश है। महाकाल के आराधक ने यही कहा है कि पहले तुम अपनी बुराइयां निकालो, ईर्ष्या-द्वेष को समूल उखाड़ दो तभी तुम संगठित हो सकोगे और तब बढ़ जाओ आसुरी शक्तियों से लोहा लेने यही अंतिम क्षण है। “
प्राणों का ज्वार अनेक रूपों में बह चला संघर्ष! संघर्ष!! संघर्ष अनीतियों से-कुविचारों से, वे चाहें कहीं क्यों न हों? बड़ा तुमुल संघर्ष था। दैवी शक्तियों और आसुरी शक्तियों की प्रबल भिड़न्त थी। लोमहर्षक रोंगटे खड़ा कर देने वाला संग्राम। वर्तमान के सघन तिमिर और भविष्य के उजाले के बीच जोरदार टक्कर।
“कापुरुष। तू और क्या कर सकता था? “ढाई हड्डी का दुर्बल ब्राह्मण काला पहाड़ को ये शब्द कहे, कौन कल्पना कर सकेगा। जिस प्रचण्ड झंझावात के सम्मुख समूचा महाअरण्य धराशायी हो जाता है उसके सामने...। भीषण ताण्डव मचा काशी में। रणभूमि से रक्तारक्त शरीर अंगारे जैसे नेत्र खून टपकती तलवार लिए काला पहाड़ सीधे विश्वनाथ मन्दिर आया था। नीले रंग के कपड़े पहने, म्लेच्छ सेना के कुछ मुख्य नायक उसके पीछे थे।उन उद्धत लोगों के घोड़े मन्दिर के भीतर गर्भगृह के सामने एक आ गए। किन्तु जैसे ही वह घोड़े से कूदा महाकाल का आराधक यह वृद्ध ब्राह्मण द्वार पर सामने दिखा।
“कापुरुष! काला पहाड़ तू कायर है?” “मूर्ख ब्राह्मण! क्या कहता है तू? “ चीखा वह काजल जैसे काले रंग का अत्यन्त दीर्घ एवं प्रचण्डकाय दैत्य।
“इन असहायों की हत्या से, अपवित्र शस्त्र और इन दौलत के लोभी पिशाचों को लेकर तू शूर समझता है अपने को? कायर कहीं का।” बूढ़े ब्राह्मण की वाणी में सिर्फ शब्दों का तीखापन नहीं था, उसमें वह उपेक्षा और तिरष्कार था, जो कोई किसी पशु को भी नहीं देता।” शूर थे वे जिन्होंने अन्याय का प्रतिकार करने में अपना बलिदान दिया। तू अभिमान में डूबा भीरु है।”
“ले” कहकर हाथ का शस्त्र काला पहाड़ ने पूरी ताकत से एक ओर फेंक दिया। झनझना कर टूट गई वह भारी तलवार। पीछे घूम कर उसने अपने अनुचरों को हुक्म दिया “दूसरे सब बाहर चले जायँ।”
“ नपुँसक! मैं नहीं जानता था तू मूर्ख भी है।” “ब्राह्मण ने झिड़क दिया।” अब तू मुझ बूढ़े से मल्ल युद्ध करेगा। तू समझता है कि शौर्य सैनिकों में और शस्त्र में नहीं है तो तेरे इस हिंसा परायण पापी शरीर में है। हड्डी, माँस, विष्ठा में है शौर्य, यह तेरे जैसे बेवकूफ की ही समझ है। “ वृद्ध की वाणी नहीं उनका तप प्रवाहित हो रहा था। वाणी तो सिर्फ माध्यम थी, उनकी दोनों आँखें दो मध्याह्न-कालीन सूर्यों की तरह प्रकाशित थीं। कुछ घट रहा था अद्भुत-अद्वितीय जिन्हें सामान्य साँसारिक आँखें देखने में असमर्थ थीं।
जिस भी साधना में दुष्प्रवृत्तियाँ तपाई-जलाई जा रही हों ऐसा कोई भी कृत्य तप है।
“ओह!” काला पहाड़ ने अपने होंठ दाँतों से इतनी जोर से दबाए कि उनसे खून की बूंदें छलछला आयीं। क्रोध के अधिकतम आवेश में आँखों से टपाटप आँसू टपकने लगे। पसीने से भीगा शरीर थर थर काँपा कुछ क्षण और स्तम्भित जड़ हो गया। वह पलक तक नहीं गिरा पाया। मूर्ति की तरह स्थिर खड़ा रह गया वह। आँखें अंगारे की तरह जल रही थीं। विष निचोड़े जा रहे नाग के समान फुँकार भरी साँसें छोड़ रहा था-वह।
“शौर्य अन्तरात्मा का गुण है। चित्त की स्वाभाविक प्रक्रिया पर विजय प्राप्त करने पर मिलता है। यह। क्रोध, राग, द्वेष को जीतने का नाम है शौर्य। है तुम में साहस शौर्य पाने का? “ ब्राह्मण श्रेष्ठ के इन शब्दों के बाद इतिहास के पृष्ठ मौन है, यह रहस्योद्घाटन करने के विषय में कि इस घटना के बाद तेरहवीं सदी का वह आतंक “काला पहाड़“ कहाँ चला गया?
कतिपय इतिहास विज्ञ लिखते हैं कि वह चला गया था भीषण-घनघोर जंगलों में तप-तितिक्षा द्वारा स्वयं को बदलने, बचा शौर्य पाने। “स्वभाव विजय शौर्य” उक्ति को चरितार्थ करने।
आद्यशक्ति गायत्री का विवेचन-विश्लेषण शास्त्रों में दो रूपों में हुआ है- एक गायत्री दूसरी सावित्री। पुराणों में ब्रह्मा जी की यह दो पत्नियाँ मानी गई हैं। ऐसा उल्लेख भी मिलता है कि सावित्री के द्वारा प्रकृति की संरचना हुई और गायत्री के द्वारा चेतना के पाँच स्तरों का आविर्भाव हुआ। इन्हें ही मनुष्य के पाँच आवरण, पंचकोश या पाँच लोक भी कहते हैं। ऋद्धि-सिद्धियों के भाण्डागार भी यही हैं।
गायत्री महाशक्ति की उपासना मनुष्य की भावनाओं, आकाँक्षाओं, उमंगों, प्रतिभा तथा प्रज्ञा को उभारती है और सावित्री आयु, प्रजा , कीर्ति धन आदि लौकिक सम्पदाओं को प्रदान करती है, क्योंकि वे सम्पदायें पदार्थ जगत से सम्बन्धित हैं। गायत्री को एकमुखी और सावित्री को पंचमुखी कहा गया है। सावित्री भौतिकी है और गायत्री आत्मिकी। दोनों का अपना-अपना महत्व है। मनुष्य अपने पुरुषार्थ से सम्पदाएँ अर्जित कर लेता है। दैत्य प्रकृति के व्यक्ति भी अपने पौरुष और चातुर्य के बल बूते रावण की तरह प्रचुर वैभव कमा सके हैं, पर आत्मिक विभूतियों के जागरण में तो मात्र दैवी अनुकंपा ही अपेक्षित रहती है। मनुष्य ज्ञान चेतना के अभाव में सर्व सुविधाओं के रहते हुए भी दुर्बुद्धिवश दुष्प्रवृत्ति अपनाता और विकट परिस्थितियों में पड़ता है। समस्याओं- उलझनों में उलझता है। इसलिए सर्वसाधारण के लिए जन-जन के लिए संध्या वंदन के रूप में नित्य गायत्री उपासना का विधान है। त्रिकाल संध्या न बन पड़े तो उसे एक बार प्रातःकाल तो किसी न किसी रूप में अनिवार्य रूप से करना ही चाहिए।
सावित्री उपासना कठिन है। उसमें प्राण विद्युत को उस स्तर तक उभारना पड़ता है कि आकाश में कड़कती बिजली को तरह वह इन्द्र वज्र की भूमिका निभा सके। आत्मिकी के क्षेत्र में सावित्री महाशक्ति का आह्वान सूर्य शक्ति के रूप में करना पड़ता है और इस योग्य बनाना पड़ता है कि अन्तराल में छिपी हुई ऋद्धि-सिद्धियाँ इसी काया में प्रकट-हो सकें और साधक को ऋषिकल्प ओजस्वी, तेजस्वी, मनस्वी और तपस्वी स्तर का बना सकें।
उसकी उच्चस्तरीय साधना अत्यन्त कठिन है जिसमें ऋषिकल्प तपश्चर्या की भट्ठी में साधक को तपना पड़ता है। इतने पर भी सर्व साधारण को उस पंचमुखी साधना से सर्वथा वंचित नहीं रहना चाहिए। ‘न कुछ से कुछ अच्छा’ की नीति के अनुरूप सामान्य साधकों को साँसारिक जनों को इन पंचमुखों का योगाभ्यास और तपश्चर्या के रूप में न सही, नीति और व्यवहार के रूप में तो अभ्यास करना ही चाहिए। इतना बन पड़े तो भी उससे साँसारिक और आत्मिक प्रगति के क्षेत्र में विशेष सहायता मिलेगी।
पाँच मुख न मनुष्यों के होते हैं, न देवताओं के यह रहस्यमय संकेत भर हैं। काय कलेवर के साथ जुड़े हुए पंचकोशों को ही पाँच मुख कहा गया है। इनके नाम क्रमशः (1) अन्नमय कोश (2) प्राणमय कोश (3) मनोमय कोश (4) विज्ञानमय कोश और (5) आनन्दमय कोश हैं। यह सभी अंतरंग के गुह्य क्षेत्र में तो हैं ही, पर वहाँ तक पहुँच सकना संभव न हो तो इन पाँचों के अनुरूप जीवन नीति तो विनिर्मित की ही जा सकती है।
इन पाँचों कोशों में पाँच प्रकार की विभूतियों का समावेश माना गया है और कहा गया है कि इनमें से एक के भी जाग्रत हो जाने पर मनुष्य असाधारण बन जाता है। सविता की सावित्री शक्ति को आकर्षित करने वाले साधक को सर्वप्रथम अन्नमय कोश को प्रगतिशील सक्रिय बनाने के लिए आहार में सात्विकता का समावेश करना चाहिए। उपनिषदों में कहा भी गया है कि “जैसा अन्न खाते हैं वैसा ही मन बनता है और उसका प्रभाव बुद्धि, भावना, क्रिया एवं समस्त जीवन पर पड़ता है।” इसलिए आत्मिक प्रसंग में उत्साह रखने वालों को अन्न की सात्विकता का परिपालन करते हुए अन्नमय कोश की साधना का निर्वाह करना चाहिए।
निर्वाह प्रयोजनों में काम आने वाले सभी पदार्थ उपनिषदों में अन्न माने गये हैं। यह न्यायपूर्वक, परिश्रमपूर्वक कमाई द्वारा अर्जित होने चाहिए। बेईमानी अनीति के आधार पर उपार्जन से अपना निर्वाह न हो। मुफ्त की, बिना परिश्रम की, उत्तराधिकारी की कमाई पर गुजारा न करें। जिसमें पसीना बहा होगा, जो न्यायोचित होगा, सीमित मात्रा में खाया गया होगा, वह शरीर को निरोग रखेगा और दीर्घ जीवन प्रदान करेगा।
दूसरा है प्राणमय कोश-प्राण अर्थात् साहस, पराक्रम। संसार का प्रचलित प्रवाह आलस्य, प्रमाद, भय, चिन्ता, निराशा, आत्महीनता, उद्दंडता की दिशा में है। अपना साहस ऐसा होना चाहिए कि लोगों की रीति-नीति के पीछे आँखें बंद करके न चालें और जो भी अनुचित हो उसके विरुद्ध संघर्ष करें। कृपणता की जकड़न में न पड़े रहें। उदार बन कर रहें। पुण्य परमार्थ के मार्ग पर चलने में लोगों का जो असहयोग-विरोध रहता है, उसकी परवाह न करें। अन्य कोई साथी न होने पर भी आदर्शवादी गतिविधियों का निर्धारण अपने बलबूते करें। आलस्य-प्रमाद को हावी न होने दें। साहसियों की तरह सन्मार्ग पर एकाकी चल पड़ने की हिम्मत सँजोये रखें, सदा कर्तव्यरत रहें। यह प्राणवान होने का चिन्ह है।
मनोमय कोश की व्यावहारिक जीवन में आस्था इस प्रकार जमानी चाहिए कि मन में कुकल्पनायें उठने ही न पायें। उठें तो उनके विरोध के लिए आदर्शवादी महापुरुषों का चरित्र तथा प्रतिपादन सामने रख कर कुकल्पनाओं से भिड़ा दें और उन्हें पछाड़ दें। मन का संतुलन हर स्थिति में बनाये रहना चाहिए प्रतिकूलताओं के बीच भी आवेशग्रस्त न हों। कठिनाइयों को देख कर भीरुता-निराशा के गर्त में न गिरें। सादा जीवन-उच्च विचार की नीति अपनायें। साँसारिक तृष्णाएँ घटायें और महानता अपनाने की आकाँक्षाएँ पल्लवित करें। मन को विलासिताग्रस्त न होने दें। उसे वासना घृणा अहंता के त्रिविध नारकीय दलदलों से बचायें। प्रतिकूल परिस्थितियों में भी हँसते-हँसाते रहें और हलका-फुलका जीवन जियें।
को अवस्थित रखने के लिए विशेष ज्ञान का-दूरदर्शी विवेकशीलता का अवलम्बन लेना पड़ता है। आमतौर से मनुष्य तात्कालिक लाभ को महत्व देते हैं और उसके लिए दुष्कर्म करने तक पर उतारू हो जाते हैं। इतना नहीं सोच पाते कि इनका परिणाम भविष्य में क्या होगा? दुर्व्यसनी तात्कालिक सुख के खातिर अपना व्यक्तित्व, चरित्र और भविष्य सभी गँवा बैठते हैं, किन्तु जिनकी विवेकबुद्धि सजग है वे जीवन जैसी बहुमूल्य सम्पदा का एक-एक कण का सदुपयोग करते हैं। वे उज्ज्वल भविष्य का निर्माण करने कि लिए आरंभिक दिनों में लगनशील विद्यार्थी की तरह कठोर परिश्रम करते, सुविधाएं छोड़ते और तात्कालिक शौक-मौज को ठुकरा कर लक्ष्य की ओर यात्रा करते रहते हैं। जिनमें इतनी समझदारी मौजूद है उन्हें विशेष ज्ञान वाले विज्ञानी कहना चाहिए।
पाँचवाँ आनन्दमय कोष है। आनन्दमय जीवन व्यतीत करने का तरीका है परिस्थितियों के साथ तालमेल बिठाना। प्रतिपक्षियों और प्रतिकूलताओं को जीवन में आते जाते रहने वाले उतार चढ़ाव मात्र समझना चाहिए। आशा भरे भविष्य का सपना देखना चाहिए। अपने से पिछड़ों को देख कर भगवान को धन्यवाद देना चाहिए कि सैकड़ों से पीछे हैं तो लाखों से आगे भी हैं। फिर मनुष्य जीवन का मिलना अपने आप में एक उच्चकोटि के आनन्द का विषय है। कर्तव्यपालन में निरत रहने वाला सदा संतुष्ट और प्रसन्न रहता है। इच्छित परिणाम न निकला तो इसमें मनुष्य क्या करे? परिस्थितियाँ किसी के हाथ में नहीं। संसार में जो उज्ज्वल पक्ष ही देखते हैं वे बुरी परिस्थितियों में घिरे रहने पर भी अपनी प्रसन्नता खिले फूल की तरह अक्षुण्ण बनाये रहते हैं।
इस प्रकार अपने जीवनक्रम और दृष्टिकोण को उत्कृष्ट बनाकर कोई भी पाँच रत्नों से बना भावनात्मक हार पहन सकता है और कैसी ही परिस्थितियों के बीच रहकर भी कीचड़ में उगने वाले कमल की तरह अपना विशिष्टता को बनाये व बढ़ाते रह सकता है। पंचमुखी सावित्री महाशक्ति का-पंचकोशों का यह व्यावहारिक पक्ष है जिसे दृष्टिगत रख यदि कदम बढ़ाये जायँ तो तदनुसार लाभ ही लाभ मिलते जाते हैं।
प्रार्थना हृदय के कपाट खोलती है, ताकि ईश्वर को उसमें प्रवेश करने का अवसर मिल सके।
प्रतिगामिता ओर प्रगतिशीलता के दो पक्ष ऐसे हैं, जिनमें से एक को रात्रि और दूसरी को दिन की उपमा दी जाती है। प्रतिगामिता के रहते विकासशीलता की गुँजाइश नहीं रहती। जो देखते सुनते होते दीख पड़ता है, उसका अनुकरण करते भर बन पड़ता है यह सोचने की आवश्यकता नहीं समझी जाती कि चल रहे ढर्रे में कितना उचित और कितना अनुचित है। क्या अपनाया और क्या छोड़ा जाना चाहिए?
नीर क्षीर विवेक बुद्धि को जाग्रत करने के लिए तर्क और तथ्यों का आश्रय लेने की आवश्यकता पड़ती है। प्रवाह में तो सब कुछ भला-बुरा बहता चला जाता है। उस दिशाधारा में बहने वाले को कुछ सोचने, औचित्य का पक्षधर निर्णय लेने की नये सिरे से आवश्यकता नहीं पड़ती। अंधी भेड़ें भले ही बड़ी संख्या में हों, पर उस झुण्ड की सभी इकाइयाँ एक के पीछे दूसरे के चलते जाने की ही अभ्यस्त होती हैं, भले ही अगली किसी खड्ड में जा गिरे। पिछली उसी का अनुकरण भर कर पाती हैं। उन्हें यह सोचने का न अवसर होता है और न अभ्यास कि ढर्रे को अपनाये रहने में कितना हित है, कितना अनहित?
ऐसी प्रतिभाओं का इन दिनों विशेष रूप से अभाव कही दृष्टिगोचर हो रहा है जो संकीर्ण स्वार्थपरता से आगे की बात सोच सकें। उनके लिए आदर्श के प्रति आस्था रखना और मनुष्य जीवन को सार्थक बनाने वाली गतिविधियाँ अपनाना बन ही नहीं पड़ रहा है। इस दुर्भिक्ष स्तर के आस्था संकट में उस चेतना क्षेत्र की हरीतिमा का उत्पादन एक प्रकार से रुक ही गया है, जो अपनी सुन्दरता और शीतलता से जन-जन का मन हुलसाती और पुलकित-तरंगित करती थी।
तपते ग्रीष्म में तो भूमि पर बिखरी रेत तक गरम हो जाती है और पैरों को जलाती है, जबकि सामान्य स्थिति में भूमि में लोट-पोट करने पर अति सरस अनुभूति का रसास्वादन होता है। उसी में लोट कर जीवधारियों में अधिकाँश प्राणी अपनी थकान मिटाते और नई शक्ति पाते हैं पर ग्रीष्म का आतप तो बहुत कुछ उलट देता है। वर्षा के दिनों संचित जल राशि तक को भाप बना कर उड़ा देता है और लबालब भरे सरोवरों को सुखा कर उसे, तलहटी तक को झुलसाने वाली गर्मी से विक्षोभकारी बना देता है। इन दिनों ऐसा ही जेठ महीना तप रहा है, जिसमें मानवी गरिमा को अक्षुण्ण रखे रहने वाली शालीनता सूखती और जलती भुनती दिखाई देती है।
इन दिनों जो लोक प्रचलन है, उसमें अवाँछनीयता की मात्रा अत्यधिक बढ़ जाने की बात को हर विवेकशील स्वीकार करता है। तब उसी मान्यता के अनुरूप दूसरा निष्कर्ष यह निकालना चाहिए कि प्रचलनों का अन्धानुकरण करने में मात्र खतरा ही खतरा है। उलटी दिशा में चलने की अपेक्षा तो यही अधिक उपयुक्त है कि जहाँ के तहाँ खड़ा रहा जाय, किन्तु आश्चर्य इस बात का है कि बन इतना भी नहीं पाता है और तथाकथित “समझदार” लोग भी भेड़ियाधसान में जा घुसते हैं। कई बार भारी भीड़ की धकापेल में अनेकों कमजोर जमीन पर गिर जाते हैं और उमड़े जनसमूह के पैरों तले कुचल कर मर तक जाते हैं। दुर्मति का प्रतिफल दुर्गति के रूप में प्रकट होते, इसी प्रकार देखा जाता है।
छूत की बीमारियाँ जब फैलती हैं, तो संपर्क में आने वाले को भी अपनी लपेट में ले लेती हैं। हैजा, प्लेग, मलेरिया, खुजली जैसी बीमारियाँ प्रायः एक से दूसरे को लगती हैं और अपना विस्तार करती चली जाती हैं। कुप्रचलनों, अन्ध परम्पराओं के संबंध में भी यही बात है। वे सहज ही दुर्बल मन वालों को अपनी ओर घसीट लेते हैं, जबकि बलिष्ठों का सम्वर्धन करने वाले अखाड़े प्रायः खाली पड़े रहते हैं। उसकी ओर आकर्षित होने वाले भी कुछ समय में उदासी-उपेक्षा अपनाकर उस आरंभ किये प्रयास से मुँह मोड़ लेते हैं। इसे विडम्बना ही कहना चाहिए कि दुष्प्रवृत्तियों का पलड़ा भारी रहता है। वे जलकुम्भी और ‘बेशरम बेल’ की तरह कहीं भी फैल पड़ती देखी जाती हैं, जबकि गुलाब जैसे पौधे बढ़ने में बड़े नखरे दिखाते और निरन्तर खाद पानी पाने और रखवाली बरते जाने की अपेक्षा करते हैं।
प्रतिगामिता हर किसी को हर दृष्टि से नीचे ही गिराती और क्रमशः रसातल के गर्त तक पहुँचाती देखी जाती है। जिन्हें यही सुहाती है उनके लिए अति सरल है कि वे अपने चारों ओर छाये हुए आलस्य, प्रमाद, अनाचार, अहंकार, व्यसन, व्यभिचार जैसे दुर्गुणों को अपने चारों ओर बिखरा देखें, उनसे प्रभावित हों और उन्हीं के अनुकरण के लिए सरलतापूर्वक खिसक जायँ। बदले में सर्वतोमुखी विपन्नता से ग्रसित होकर कुढ़ता-कुढ़ाता जीवन जियें। पर जिनका अभ्युदय, उत्कर्ष में उत्साह है, उनके लिए यही उचित है कि अब के न सही, पिछले, निकटवर्ती न सही, दूर के श्रेष्ठ सज्जनों की खोज करें, उनसे प्रेरणा प्राप्त करें और अपनी मानसिकता विनिर्मित करें कि हमें समुन्नत-सुसंस्कृत स्तर का जीवन यापन करना है। दूसरों के सामने अपना आदर्श उपस्थित करना है। यदि प्रेरणा प्रदान करने वाले महामानवों का अभाव दिखाई पड़ता हो तो उसकी पूर्ति के लिए एकाकी चल पड़ने का साहस जुटायें। प्राचीन काल में जिन देवमानवों का बाहुल्य था, उनमें से प्रत्येक को यही करना पड़ा कि दूसरे गये-गुजरों का अनुकरण करने की अपेक्षा उन्होंने स्वयं अपना मार्ग निर्धारित किया। उत्कृष्ट स्तर की आदर्शवादिता को अवलम्बन बनाया, अपने पैरों की क्षमता बढ़ाते हुए अभ्युदय के उच्च शिखर पर जा पहुँचने का लक्ष्य बनाया और उसे पूरा कर दिखाया।
वस्तुतः लगता भर ऐसा है कि प्रगतिशीलता का, आदर्शवादिता मार्ग कठिन है। पर यह मान्यता वस्तुतः एक प्रकार की भ्रान्ति है। जो काम स्वयं नहीं किया है, जिसे करते औरों को नहीं देखा गया है, वही कठिन मालूम पड़ता है, पर जब मस्तिष्क में आदर्शवादी व्यक्तियों की गतिविधियों पर चिन्तन को केन्द्रित किया जाय और वैसी ही रीति-नीति अपनाने के लिए उत्साह उभारा जाय, तो थोड़े से अभ्यास में ही यह अनुभव होने लगता है कि अनौचित्य अपनाने की तुलना में औचित्य, सौम्यता और सज्जनता को व्यवहार में उतरना कहीं अधिक सरल और संभव है। कुटिलता अपनाने वालों की, दुराव करने और दूसरों को कुछ का कुछ बताने दिखाने की बाजीगरी असाधारण रूप से झंझट भरा है। छल-प्रपंच में सफलता उन्हीं को मिलती है, जो धूर्तता की कला में प्रवीण पारंगत हो चुके हैं। सरल सज्जनता का मार्ग तो एक बालक भी अपना सकता है। उसे यथार्थता कह गुजरने में किसी प्रकार के दबाव का अनुभव नहीं करना पड़ता। आदर्शों का परिपालन इसलिए कठिन मालूम पड़ता है कि उन्हें अपने द्वारा या दूसरों के द्वारा प्रयोग में आते नहीं देखा गया। समुद्र किनारे रहने वाले मछुआरों के बच्चे भी अथाह जल राशि के ऊपर बिना किसी हिचक के नावें चलाते और मछली पकड़ने जैसा जोखिम भरा काम बिना किसी झिझक के आजीवन करते रहते हैं। इसमें दीखता भर भयानक दुस्साहस है, पर वास्तविकता यह है कि अभ्यास में उतारने पर कठिन कार्य भी सरल हो जाते हैं।
जब व्यक्ति इतना घमंडी हो जाय कि रो न सके। जब इतना गंभीर हो जाय कि हँस न सके और इतना स्वार्थी हो जाय कि अपने सिवाय किसी और की चिन्ता न कर सके तो समझना चाहिए कि उसने दारिद्र ही बटोर रखा है।
लोग क्या कहेंगे? यह सोचना व्यर्थ है। लोगों की तो आलोचना और निन्दा करने की आदत होती है। उन्हें अपनी आदत को चरितार्थ किये बिना चैन नहीं पड़ता। प्रतिगामियों की कायरता और मूर्खता पर हँसने वालों की कमी नहीं। इसी प्रकार प्रगतिशील एकाकी सन्मार्ग पर चल पड़ने पर भी उनके व्यंग-हास से बच नहीं पाते। ऐसी निरर्थक समीक्षा निंदा और प्रशंसा की परवाह किये बिना केवल अपनी अन्तरात्मा का परामर्श निर्णय लेना ही पर्याप्त समझा जाना चाहिए कि अपने द्वारा औचित्य अपनाया गया या नहीं। हंस की नीर-क्षीर विवेक बुद्धि पर भले ही कोई आश्चर्य प्रकट करे और उसे घाटे वाली अव्यावहारिकता बताये, पर राजहंस इसकी परवाह कहाँ करता है? अतः वह प्रशंसा और प्रतिष्ठ भी प्राप्त करके रहता है। यही बात प्रगतिशीलता अपनाने के संबंध में भी समझी जानी चाहिए।
काफी देर से वह अपने कमरे में इधर से उधर उद्विग्न से घूम रहे थे। उनका झबरा ‘वेली’ भी आज हैरान है। उसके मालिक कठिन से कठिन समय में स्वस्थ और स्थिर रहने वाले हैं, आज क्या हो गया उन्हें? वह कूँ-कूँ करता पास गया सामने भूमि पर लेटा, गोद में पहुँचने के लिए उछला बेचारा मूक प्राणी और क्या कर सकता है। आज उसे पुचकारा नहीं गया, प्यार भरी थपकी नहीं मिली। मालिक हैं कि बस गर्दन झुकाए इधर से उधर चक्कर काटे जा रहे हैं। कभी -कभी मस्तक पर गर्दन के पास दाहिना हाथ रगड़ लेते हैं। उनके उजले-घुँघराले बाल तनिक हिल जाते हैं और बस!
इधर लगभग दस साल उन्हें इंग्लैण्ड से कलकत्ता आकर रहते हो गए। सफल चिकित्सक के रूप में सारा कलकत्ता उन्हें जानता है। लेकिन वह स्वयं को चिकित्सक से कहीं अधिक चिकित्साशास्त्री मानते हैं। उन्होंने एलोपैथी का तो उच्च अध्ययन किया ही है यूनानी चिकित्सा पद्धति, होम्योपैथी, प्राकृतिक चिकित्सा-पद्धति, मानसिक चिकित्सा पद्धति तथा आयुर्वेद का भरपूर अनुशीलन किया है। अमेरिका और यूरोप की कई जगहों में वह रहे हैं। अफ्रीका के जंगलों में भटके हैं, चीन तथा तिब्बत के दुर्गम स्थानों पर सालों-साल का समय व्यतीत किया है। भारत आकर रहने का उनका मुख्य उद्देश्य आयुर्वेद का अध्ययन तथा मानसिक चिकित्सा से सम्बन्ध रखने वाले योग ज्ञान को पूरा करना था। धुन के पक्के, चाहे जितना श्रम करने और कष्ट सहने को उद्यत हंसमुख और विनम्र इन अड़सठ साल के वृद्ध के उत्साह के सामने युवकों को भी लज्जित होना पड़ता है।
यों आज बात कुछ खास नहीं थी। सुबह-सुबह एक नवयुवक डॉक्टर मित्र उनसे मिलने आये थे। उन्होंने बताया ‘कल कुछ भारतीय लोगों के साथ एक अँग्रेज सज्जन दोपहर में मोटर से घूमने गए थे। राह में सब को प्यास लगी। आस-पास पीने के पानी का प्रबन्ध देखकर इन लोगों ने मोटर रोकी और किनारे की पान की दुकान से सोडा की बोतलें लेकर गला सींच लिया। अन्य कोई चारा न देखकर अँग्रेज सज्जन को भी ऐसा करना पड़ा। इन पान वालों की गन्दगी के विषय में क्या कहा जाय। फिर सोडा भी कोई प्रामाणिक कम्पनियों का तो रखते नहीं। बेचारे को रास्ते में ही हैजा हो गया। भरसक उपायों के बावजूद वे चल बसे। अच्छे सबल स्वस्थ युवक थे। घटना तो सामान्य सी थी। प्रायः ऐसा होता ही रहता है। इसमें इतना सोचने जैसी कोई बात नहीं। पर न जाने क्यों उनकी प्रसुप्त चेतना को इस नन्हें समाचार ने उद्वेलित कर दिया है।
‘एक ही दुकान से एक ही तरह का सोडा सबने पिया अकेला अँग्रेज क्यों मरा? यूरोपियन लोग तो स्वास्थ्य के नियमों का बहुत ज्यादा पालन करते हैं।” उनका डॉक्टर मन अनेक बातें सोचे जा रहा था- “ये भारतीय मजदूर चाहे जहाँ खालें, चाहे जहाँ लेट जाएँ, अफ्रीका के जंगली लोगों की बात और कलकत्ते की गलियाँ साफ करने वाले ये भंगी कितनी गन्दगी साफ करते हैं, जिस तिस का झूठा खा लेते हैं फिर भी स्वस्थ। है क्या आखिर यह स्वास्थ्य? उन्हें मालूम है कि जो गन्दगी में रहते उनके शरीर में उसे सहने की शक्ति आ जाती हैं। लेकिन इस सबसे उनको सन्तोष नहीं। उन्हें कोई तर्क सन्तोष नहीं दे पा रहा। इधर से उधर घूमते-घूमते बार-बार उनके मुख से बहुत धीरे से स्वयं से पूछता सा सवाल उभरता है, स्वास्थ्य क्या है?
शरीर में किसी रोग के कीटाणु न हों कोई विजातीय द्रव्य न हो, रक्त परिवहन प्रक्रिया ठीक हो, श्वास प्रणाली, स्नायु व ग्रन्थिमंडल आदि शरीर के अवयव ठीक काम कर रहे हैं, यही स्वास्थ्य है। यूरोपीय विज्ञान को इसमें कोई आपत्ति नहीं। लेकिन उनने वह बड़ी सी सुनहली जिल्द वाली किताब झुँझला कर बन्द कर दी।
सम दोषः समाग्निश्च समधा तुमलक्रियः
प्रसन्नात्येन्द्रिय मनः स्वस्थ इत्यभि धीयते॥
आयुर्वेद के ग्रन्थ के पृष्ठो को उलटते हुए इस श्लोक पर आकर रुक गए। कफ-वात-पित्त-तीनों दोष समान रहें, पाचनक्रिया ठीक हो, धातुओं में कोई विकार न हो, यह तो एलोपैथी की परिभाषा है, भले शब्दों में फेर बदल हो। उनकी चिन्तनधारा आगे अटकी, चित्त, इन्द्रियाँ और मन प्रसन्न रहें-निर्मल रहें? ग्रन्थ बन्द करके रख दिया और मेज पर बायें हाथ की कुहनी टेककर हथेली पर सिर रख कर आँखें बन्द कर लीं।
‘चित्त निर्मल, इन्द्रियाँ निर्मल, मन निर्मल?’ आयुर्वेद पढ़ते समय संस्कृत का पर्याप्त अध्ययन कर लेने कारण उन्हें मालूम था कि संस्कृत के “प्रसन्न” शब्द का अर्थ ‘खुश’नहीं निर्मल होता है। चिकित्सा शास्त्र ने भी अब मनोविज्ञान के क्षेत्र में प्रवेश पा लिया है। यह बात किस चिकित्सक को नहीं ज्ञात है। किन्तु चित्त व मन की निर्मलता का जो मतलब है उस भारतीय अर्थ को जानते हुए वे यह कैसे मान लें कि आयुर्विज्ञान सिर्फ मनोविज्ञान की बात करता है और इन्द्रियों में क्लेश का न होना है। उनको साफ झलकता है कि आयुर्वेद यहाँ अध्यात्मशास्त्र बन गया है और वह चित्त को कामादि विकारों से रहित, इन्द्रियों को भोग लोलुपता से रहित और मन अचंचल स्थिति में चाहता है। “स्वास्थ्य के लिए अध्यात्म की यह जरूरत?” यूरोपीय विज्ञान ने तो अब तक इसे महसूस ही नहीं किया। वहाँ स्वास्थ्य का उद्देश्य भोग वासना का अभाव ही अपेक्षित माना गया है। डॉक्टर की समस्या की डोर सुलझने की बजाय उलझती जा रही थी।
तभी खानसामे ने डरते-डरते सिटपिटाते हुए कमरे में प्रवेश किया। उसे मालूम था कि अध्ययन के समय साहब कोई व्यवधान नहीं पसन्द करते। पर आने वाले को इन्कार भी तो नहीं किया जा सकता। “साहब! सरकार बाबू आप से...।” आधा वाक्य सुनते ही उनने आँखें खोलीं, ग्रन्थ को परे खिसकाया। “क्या कहा सरकार बाबू वही डॉक्टर महेन्द्र सरकार न।” “हाँ” मालिक के सौम्य स्वर को सुन उसकी हिम्मत बढ़ी। मालिक को भी लगा कि खानसामे के इन शब्दों ने उन्हें उधेड़-बुन की गहरी भँवर से उबार लिया। डॉ. महेन्द्रनाथ सरकार से उनका परिचय लगभग एक डेढ़ साल पहले हुआ था। तब वह होमियोपैथी का अनुशीलन करने में जुटे थे और डॉक्टर सरकार कलकत्ते के विख्यात होमियोपैथ ठहरे। कलकत्ता ही क्यों विदेश में भी उनके द्वारा लिखे गए लेख चाव से पढ़े जाते थे। बस यही उनकी मित्रता का मिलन बिन्दु बना।
सरकार बाबू को मालूम था कि डॉक्टर विलियम पैट्रिक भारतीय विद्याओं के गहरे जिज्ञासु हैं। तो जब भी कोई इस तरह का व्यक्ति उनके संपर्क में आता, डॉक्टर पैट्रिक को मिलवाए बगैर न चूकते। इतनी देर में खानसामा वापस मुड़कर दरवाजे के बाहर चला गया था। डॉक्टर भी दरवाजे की ओर मुँह किए उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे। इतनी ही देर में महेन्द्र बाबू का स्वर सुनाई दिया “हेलो! डॉक्टर पैट्रिक!” “हेलो। सरकार” कहते हुए दोनों गर्म जोशी से मिले। “लेकिन आज तुम्हारे चेहरे पर?” “पर पहले मेरी सुनो।” कहते हुए धीरे-धीरे उन्होंने कुछ कहा। तीन मिनट की इस बातचीत को द्वार के पीछे खड़ा नौकर भी नहीं सुन सका। फिर से उठे, पुस्तकों समेट कर यथा स्थान लगा दिया तथा बगल के कमरे में जाकर कपड़े बदले-आकर बोले “वेल मि. सरकार नाउ आय एम रेडी” और लगभग पौने दो घण्टे बाद कलकत्ते वाराह नगर क्षेत्र में गंगा किनारे बने एक मकान में दोनों ने प्रवेश किया। थोड़ी देर बाद वे जमीन पर चटाई बिछाए लेटे तनिक स्थूलकाय, गौरवर्ण दाढ़ी जटा धारी-वैष्णव तिलक लगाए एक साधु को प्रणाम कर रहे थे। इन साधु से सरकार महाशय का परिचय श्री रामकृष्ण देव की चिकित्सा करते समय हुआ था। परमहंस देव इनके गुणों के अगाध प्रशंसक थे। उनकी भी उन पर अपार भक्ति थी। परमहंस देव ने तो अब शरीर छोड़ दिया और ये ज्यादातर वृन्दावन में रहने लगे थे। अभी दो-तीन दिन पहले इनके यहाँ आने की खबर मिली। सो आज...।
“तीन दिनों से आँव पड़ रहा है थोड़ा ज्वर भी है।” इन दोनों की प्रश्नवाचक नजरों का समाधान करते हुए पास की दूसरी चटाई में बैठने का इशारा किया। उन्हें कष्ट में जानकार डॉक्टर पैट्रिक शरीर परीक्षण करने के लिए उठने लगे तो उन्होंने रोक दिया “क्या सोचते हो कि मैं अस्वस्थ हूँ?” संत ने पूछा “स्वास्थ्य तुम किसको कहते हो?”
“प्रातः से इसी समस्या में जूझ रहा हूँ, शाम होने को आयी। “डॉक्टर ने थोड़े में अपनी उलझन बता दी।
“तुम चिकित्साशास्त्र के विद्वान हो, भला ये बाते मैं क्या जानूँ।” “गोस्वामी जी हँस पड़े” मैं तो यह जानता हूँ कि शरीर और शरीर के किसी अंग तथा उसकी आवश्यकता का बोध बार-बार न हो, तो शरीर का स्मरण न हो तो मन को स्वस्थ कहना होगा?” डॉक्टर ने पूछा। उनके मुख की भंगिमा से लगता था कि कुछ प्रकाश मिला है।
“बात है तो ऐसी ही पर उसे सीधे ढंग से कहा जाय तो अच्छा।” गोस्वामी जी ने कहने के शब्दों में परिवर्तन करके एक परिभाषा गढ़ दी “मन भूतकाल की उधेड़बुन और भविष्य की चिन्ता न करके वर्तमान में शान्त और स्थिर रहे यह मन का स्वास्थ्य है।”
“लेकिन अनेक बार शरीर के भीतर ऐसे रोग बढ़ते रहते हैं, जिनका रोगी को कुछ भी पता नहीं होता।” डॉक्टर की शंका वाजिब थी।
“तुम शरीर की बात छोड़ दो।” संत के उत्तर ने दोनों चिकित्सकों को एकबारगी चौंका दिया। वे यदि शरीर की बात छोड़ दें तो फिर स्वास्थ्य जैसी क्या वस्तु रह जाएगी। उनने इनके भाव ध्यान नहीं दिया। वे कहते गए “मेरा शरीर इस समय अस्वस्थ है यह तुम देख रहे हो। शरीर में जो विकास है, उनसे पीड़ा भी है। लेकिन मैं मन को वहाँ से हटा सकता हूँ तब इस रोग और पीड़ा का कोई अर्थ नहीं।”
“मन को अन्यत्र लगा देना, यह भी एक पद्धति ही तो है।” डॉक्टर ने जानबूझ कर नहीं कहा कि यह सभी के लिए व्यावहारिक नहीं।
“जो स्वास्थ्य के सभी नियमों का पालन करते हैं, वे थोड़े से विपरीत कारणों में बीमार पड़ जाते हैं। जो स्वास्थ्य के विपरीत स्थिति में रहते हैं उनके शरीर को सब सहने का अभ्यास तो होता है, किन्तु यदि वे कभी बीमार पड़े तो उनकी चिकित्सा दुःसाध्य ही है। एक का मन रोग से भयाकुल रहता है। दूसरे का मन तो निश्चिन्त रहता है, लेकिन शरीर अनजाने में विकृतियाँ बटोरा करता है। दोनों स्थितियों का समन्वय किये बिना स्वास्थ्य कहाँ मिलेगा?”
“समन्वय?” ये दोनों अभी ठीक से नहीं समझ सके थे।
“वही जो आयुर्वेद कहता है। शरीर और मन दोनों का स्वास्थ्य।” उनकी वाणी में पर्याप्त गम्भीरता थी-”तुम स्वयं भी तो मानते हो कि मनोविकारों के रहते मनुष्य पूरा स्वस्थ नहीं हो सकता।”
“पर क्या यह सम्भव है?”
“क्यों नहीं यदि हम भूत और भविष्य की उलझन में अपने को व्यक्त करने का मूर्खता भरा पूर्वाग्रह छोड़ दें।” वे समझा रहे थे सामने उपस्थित कर्तव्य का पालन करने और उसी में पूर्ण मनोयोग से करने से किसी की कोई वैयक्तिक एवं सामाजिक हानि नहीं होती। बल्कि हर काम ज्यादा अच्छे ढंग से होता है। मन भी स्वस्थ रहता है, मन तो अस्वस्थ होता कामना से और कामना उपजती है भूतकाल की स्मृति और भविष्य के दिवास्वप्नों से। मन अस्वस्थ हुआ कि इन्द्रियाँ चंचल बनी। फिर तो शरीर को चिन्ता खाने लगती है, शरीर चिन्ता की चिता में जलने लगता है।”
“मन स्वस्थ रहे तो क्या शरीर स्वस्थ रहेगा?” लगता है आज पैट्रिक महोदय अपना पूरा समाधान कर लेना चाहते थे।
“ऐसा कब कहता हूँ।”विजय कृष्ण गोस्वामी स्नेहपूर्ण स्वर में समझा रहे थे। उनकी वाणी में इस उत्कंठ जिज्ञासु के प्रति पर्याप्त कोमलता की झलक थी। “तुम क्या पानी को विकृत होने से हमेशा के लिए बचा लोगे। शरीर तो पानी की तरह पार्थिव है, प्रारब्ध का बुलबुला। प्रारब्ध को इसे भोगना होगा, भोगना भी चाहिए। इसकी बहुत चिन्ता भी अस्वास्थ्य है। हाँ मन स्वस्थ रहे तो क्लेश नहीं होता। इससे अधिक मनुष्य और क्या चाहता है?”
“फिर हमारे चिकित्साशास्त्र के प्रयत्न?” पैट्रिक का स्वर बता रहा था कि समाधान मिल चुका है। इस प्रश्न के उत्तर की बहुत अधिक जरूरत नहीं।
“वह भी अन्य कर्तव्यों के समान एक कर्तव्य है। इनका लक्ष्य भी वही पूर्णता है- शरीर की यन्त्र की भाँति सार संभाल और व्यवहार करते हुए उससे निरपेक्षता। मनुष्य पूर्ण होने के लिए आया है और वही उसका स्वास्थ्य है।” दोनों ने योगी के समक्ष, उनके सामने मस्तक झुका दिया।
डॉक्टर विलियम पैट्रिक ने जो समझा उसे हम कब समझेंगे? इस प्रश्न का उत्तर देने की जिम्मेदारी हम पर है सिर्फ, पर जो आये दिन अपने ही रोगों को स्वयं आमंत्रित करते व विक्षुब्ध, आकुल-व्याकुल रुग्ण बने रहते हैं।
स्वच्छता अपनाओ शरीर, वस्त्र, घर, उपकरण की ही नहीं मन की भी सफाई करो।
लंदन के लंकाशायर में जन्में (1900-1954) जेम्स हिल्टन की छवि वैसे तो एक यूटोपियाकार की रही है और ख्याति भी उनकी इसी रूप में फैली, पर यदा-कदा वह ट्राँर्स में जाकर भविष्यवाणी भी किया करते थे, जो कई अवसरों पर अक्षरशः सत्य सिद्ध होती हुई देखी गयी।
एक यूटोपिया उन्होंने ‘शाँग्रीला’ नाम से लिखा है। वैसे इसे यूटोपिया कम और भविष्यवाणी कहना अधिक उपयुक्त होगा, क्योंकि इसकी शुरुआत ही उन्होंने कुछ इस रूप में की है, जैसे कोई द्रष्ट महापुरुष सुदूर भविष्य को अपनी आँखों के सामने प्रत्यक्ष दृश्यमान होता हुआ देख रहा हो। जब उनकी आयु मात्र 17 वर्ष की थी, तभी उन्होंने इस यूटोपिया को लिपिबद्ध करते हुए लिखा था-”आप चिन्ता न करें, भाव संवेदना एवं एकता-समता के प्रबल पक्षधर लोगों का समय जल्द ही आ रहा है, जिसमें भावनात्मक दृष्टि से लोग एक दूसरे के इतने निकट सम्बद्ध होंगे कि “वन फॉर ऑल एण्ड ऑल फॉर वन” का सूत्र-सिद्धान्त स्पष्ट रूप से क्रियान्वित होता हुआ देखा जा सकेगा।” वे आगे लिखते हैं कि उत्तरी भारत के एक स्थान पर मैं नवयुग का बीजारोपण होते हुए स्पष्ट देख रहा हूँ, जो देखते-देखते इक्कीसवीं सदी में विशाल वट-वृक्ष का रूप धारण कर अपनी समस्त शाखा-प्रशाखाओं समेत सम्पूर्ण संसार को अपनी अंकशायिनी बना रहा है।
“शाँग्रीला-दि अल्ट्रा न्यू मॉडल दि कमिंग वर्ल्ड-ऑर्डर” नामक अपनी पुस्तक में इस यूटोपिया बनाम भविष्य कथन का सविस्तार वर्णन है। उसमें उन्होंने अलंकारिक भाषा का प्रयोग करते हुए लिखा है कि “सूर्य को अपना आराध्य और इष्टदेव मानने वाला देश, जहाँ विश्व की सबसे ऊँची चोटी है, वहाँ मैं देख रहा हूँ कि एक ऐसे नगर का निर्माण हो रहा है, जहाँ हजारों देव तुल्य व्यक्ति रहते हैं, उस पठार में एक पवित्र नदी बहती है, जिसका प्रथम अक्षर अँग्रेजी का “जी” यहाँ उनका आशय गंगा नदी से हो सकता है। यही है आज से 73 वर्ष पूर्व देखा हुआ उनका “शाँग्रीला” अर्थात् शान्ति और सद्भाव, सेवा और सहकार से ओत-प्रोत देव नगरी।
वे इसी पुस्तक में आगे लिखते हैं कि मैं स्फुट देख रहा हूँ कि इस नगरी में लोग दूर-दूर से आध्यात्मिक शक्ति अर्जन और शान्ति के प्रवर्तन के लिए चले आ रहे हैं। यहाँ से समस्त विश्व में एक ऐसा शक्ति-प्रवाह बिखेरा जा रहा है, जिससे लोग युद्धोन्माद भड़काने वाली रीति-नीति को त्याग कर सहयोग व सहकार का, शान्तिप्रियता का शाश्वत सिद्धान्त अपना रहे हैं, किन्तु इस शान्ति का अजस्र प्रवाह जन-जन के मन-मन में चिरस्थायी रूप से प्रतिष्ठित करने के लिए उनका केवल स्थूल प्रयास ही काफी नहीं है। यदि मेरी दृष्टि देख रही है, तो मैं यह दावे के साथ कह सकता हूँ कि इसमें भगवद् सत्ता का मार्गदर्शन और कई अशरीरधारी योगियों का सूक्ष्म संरक्षण लोगों की इन गतिविधियों में उनका साथ दे रहा है, भले ही उन्हें इसकी अनुभूति व प्रतीति न हो रही हो, पर मेरे दिव्य नेत्र, उनके अथक प्रयास को स्थूल अभिव्यंजना देने में प्राणपण से लगे, जी तोड़ कोशिश करते देख रहे हैं। हिल्टन कहते हैं कि शाँग्रीलावासी लोगों के स्थूल प्रयत्नों और सूक्ष्म शरीरधारी सत्ताओं के अशरीरी प्रयासों से परिवर्तन-प्रवाह इतना तीव्र व तूफानी हो उठता है, जैसे भोर का मन्द और मन्थर अरुणोदय कुछ ही घण्टे पश्चात् अपनी प्रखर किरणों से समस्त विश्व को जीवनदायी आभा और ऊर्जा से भर देता है।
इसे कल्पना पर आधारित यूटोपिया कहा जाय अथवा अपने सामने घटित होती हुई एक सच्चाई-यह निर्णय करना तो पाठकों का काम है, पर यूटोपिया और यूटोपियाकारों के बारे में जो एक बात कही जा सकती है वह यह कि वे सर्वथा असत्य भी नहीं होते, क्योंकि यूटोपिया की कल्पना भी वर्तमान समय और परिस्थितियों को ध्यान में रख कर ही की जाती है, अतः प्रस्तुत यूटोपिया यदि सत्य सिद्ध होता है तो उसे एक ऐसी सच्चाई कही जानी चाहिए जिसे वर्षों पूर्व एक द्रष्ट मनीषी ने देखा था।
=कोटेशन===========================
कर्म किसी को नहीं बाँधते। कर्ता ही उन्हें गले में ढोलक की तरह लटकाये फिरता है।
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दूसरों को अपनी ओर आकर्षित करने के लिए कोई विशेषता होनी आवश्यक है। कलाकार, गायक, विद्वान, शिल्पी, पहलवान, डॉक्टर, धनवान आदि लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचते हैं और एक सीमा तक सामयिक प्रशंसा भी प्राप्त कर लेते हैं। दर्शकों को अजूबे जैसा कौतूहल ही हाथ लगता है। ऐसे कौतूहल प्रदर्शित करने में तो मदारी, बाजीगर भी सफल हो जाते हैं। वे दर्शकों की जेबें खाली करा लेते हैं। सरकस का तमाशा देखने लोग दौड़-दौड़ जाते हैं और अपने परिवार को भी साथ ले जाते हैं। टिकट खरीदने में पैसा खर्चते हैं सो अलग, ऐसा कौतूहल अपने व्यक्तित्त्व की विचित्रता से प्रदर्शित किया जा सकता है। यह कला का चमत्कार है। कला भी एक चतुरता है। उसके लिए भी खर्चना पड़ता है, पर अंततः है वह सरल। क्योंकि उसके सीखने-सिखाने के माध्यम अपने इर्द-गिर्द ही मिल जाते हैं।
लोगों को अधिक गहराई तक प्रभावित और आकर्षित करने के दो तरीके प्रमुख हैं। जो नितान्त सस्ते भी हैं और उनके लिए कोई विशेष परिश्रम भी नहीं करना पड़ता। पैसा खर्चने जैसी भी कोई बात नहीं है। मात्र मन में उनकी उपयोगिता, महत्व समझे जाने की आवश्यकता भर है। साथ ही उन विभूतियों को स्वभाव का अंग बनाने के लिए ध्यान देने की भी।
ये दो तरीके हैं मधुर वचन एवं मृदुल मुस्कान। इन दोनों को अपनाते ही चेहरा कमल पुष्प जैसा खिल उठता है, जिसकी शोभा भी असाधारण होती है और सुगन्ध भी। सुन्दरता के लिए सभी इच्छुक और आतुर होते हैं। इसके लिए खर्चीले शृंगार साधन भी जुटाते हैं पर यह भूल जाते हैं कि यह बनावट कागज के फूलों जैसी है जो अपनी अवास्तविकता प्रकट किये बिना नहीं रहती कितनी ही कुशलता उनमें लगी है पर कागज के फूल किसी को बहुत देर धोखा नहीं दे सकते। आच्छादनों के आधार पर साज-सज्जा के सहारे बनायी गयी सुन्दरता अपने नकलीपन को प्रकट किये बिना नहीं रहती। असली फूल की शोभा और सुगन्ध स्वाभाविक होती है इसलिए वह अपने समय तक यथावत् बनी रहती है। चेहरे की मुसकान के सम्बन्ध में भी यही बात है। वह मनःस्थिति को संतुष्ट, संतुलित, प्रसन्न रखने की प्रतिक्रिया मात्र है। उसे दर्पण के सहारे प्रयत्नपूर्वक भी अभ्यास में उतारा जा सकता है।
चेहरे की बनावट की दृष्टि से कोई कुरूप ही क्यों न हो, पर जब होठों पर मुसकान खिलती है तो दीखते हुए दाँत मोतियों जैसे फबते हैं। कमल की पंखुड़ियाँ जिस तरह फैलने पर अपने असाधारण सौंदर्य का प्रदर्शन करती है, वैसी ही बात मुसकराते हुए चेहरे की भी है। उदास, निराश, असंतुष्ट, असंतुलित व्यक्ति अपने को थका हारा, उपेक्षित, अभागा समझते हैं और मुँह लटकाये गंभीर बने बैठे रहते हैं। किसी से बात करते हैं तो कोई बेगार भुगतनी पड़ रही हो, ऐसा अनुभव करते हैं। जिनकी दूसरों में दिलचस्पी नहीं है, जो अपने को एकाकी अनुभव करते हैं, उन्हीं के चेहरे पर उदासी छायी रहती है। ऐसे लोगों के साथ संपर्क बनाने की हर किसी की अनिच्छा रहती है। उनके साथ रहने या उन्हें साथ रखने में हर किसी पर भार पड़ता है।
जब फूल खिलता है तो उसका आकर्षण भरा सौंदर्य अनायास ही निखर पड़ता है। उसके साथ घनिष्ठता बनाने के लिए तितलियों मधुमक्खियों के झुण्ड एकत्रित हो जाते हैं। भ्रमर मंडराने लगते हैं। आम पर बोर आते ही कोकिल कूकते हुए उसका यशगान करती है। बसन्तऋतु में खिलता हुआ माहौल पशु-पक्षियों कीट-पतंगों तक को अपनी ओर आकर्षित करता है। उन्हें उत्साह प्रदान करता है। ठीक इसी प्रकार मुसकराते हुए चेहरे की भी स्थिति है। उसकी उपमा बसन्त के आगमन से दी जा सकती है। खिले हुए कमल पुष्प से भी। इस सुन्दर अभिव्यक्ति को देखने के लिए हर किसी का मन चलता है।
मुस्कराने वाला सदा प्रशंसकों से घिरा रहता है। इस दर्शनीय प्रतिमा की निकटता हर किसी को सुहाती है। मन मोहती है। ऐसा सुयोग प्राप्त करने का मूलभूत आधार तो यही है कि हलका-फुलका, हँसता-हँसाता जीवन जिया जाय। हर स्थिति में प्रसन्न रहने की आदत डाली जाय। प्रतिकूलताओं की उपेक्षा की जाय। पर यदि दृष्टिकोण उतना परिष्कृत न हो सके तो उस अभ्यास को कलात्मक रूप से भी स्वभाव में उतारा जा सकता है। जब भी अवसर मिले, मुसकाने का उपक्रम करते रहा जाय। दर्पण सामने हो तो वह बताएगा कि इस स्वभाव परिवर्तन से चेहरा कितना सुन्दर, कितना आकर्षक बन पड़ा। कुछ दिन के अभ्यास से वैसा स्वभाव ही बन जाता है और प्रतिकूल परिस्थितियों में भी अपनी विशेषता बनाये रहता है। जिस पर यह माधुर्य है, वह कभी एकाकी नहीं रहेगा। उसकी विभूति का रसास्वादन करने के लिए अनेकों इर्द-गिर्द मँडराते रहेंगे।
दूसरी विभूति है मधुर वचन। इसके लिए किसी की खुशामद, चापलूसी करने की जरूरत नहीं है और न ऐसा कुछ करने की आवश्यकता है कि जो किसी ने चाहा है, उसे देने का झूठा आश्वासन दिया जाय। उथले लोग यही चाहते हैं कि उनकी मनमर्जी की सहमति प्रकट की जाय। इसमें उनकी स्वार्थ सिद्धि ही प्रमुख होती है। इस प्रकार के वचनों में अपना मतलब साधते देखकर लोग प्रसन्न होते देखे गये हैं। पर यह सब किसी यथार्थवादी, आदर्शवादी के लिए संभव नहीं। झूठे वायदे करना, झूठी खुशामद करना, हाँ में हाँ मिलाना दरबारियों या ठगों से ही बन पड़ता है, जो किसी को जाल में फँसाने के फिराक में रहते हैं।
मधुर वचन साधारण बोलचाल में ही समाविष्ट हो सकते हैं। अपनी नम्रता और दूसरे का सम्मान यदि वार्ता प्रसंग में मिला हुआ हो तो इतने भर से वाणी में मिठास आ जाता है। बेकार की बातें न करके यदि किसी की सराहनीय कृतियों या प्रवृत्तियों की चर्चा कर दी जाय तो उस प्रकार कथन अनायास ही मधुर बन जाता है। इससे उसे अपनी विशिष्टताओं को बढ़ने के लिए प्रोत्साहन भी मिलता है। वह प्रयत्न करता है कि इसी प्रकार की विशिष्टतायें उसमें और भी अधिक बढ़ें ताकि अनेक लोगों द्वारा प्रशंसापरक वचन सुनने को मिलते रहें।
स्मरण रहे दूसरों की वास्तविक गुणवत्ता को तो विस्तारपूर्वक और अभिनंदन की मुद्रा में कहा जा सकता है। पर अपनी शेखी बघारने से हर किसी को बाज आना चाहिए। उथले मनुष्य अपनी शिक्षा, सम्पदा, चतुरता का वर्णन सुनाने में रुचि लेते हैं। अपनी सफलताओं और योजनाओं को बढ़-चढ़ कर बताते हैं। यह ओछेपन का चिन्ह है। इसे अपने मुँह मियाँ मिट्ठू बनना कहा जाता है। आवश्यकता पड़ने या पूछे जाने पर अपने प्रयासों की प्रासंगिक चर्चा की जा सकती है पर उसमें अनेक मित्रों के सहयोग का कृतज्ञतापूर्वक समावेश करना नहीं भूलना चाहिए। यदि अपने अहंकार और दूसरों के असम्मान की गंध वाणी में न आने पाये तो वह सहज ही मधुर बनेगी और हर सुनने वाले को प्रिय लगेगी। मधुर वचन और सहज मुसकान की गुणवत्ता को जीवन व्यवहार में जितना अधिक समझा जाये उतना ही उत्तम है।
किशोर नेपोलियन जिन दिनों विद्यालय में पढ़ता था। उन दिनों उसे एक किराये के मकान में रहना पड़ता था। उस मकान में एक मनचली लड़की रहती थी जो उससे आये दिन छेड़खानी किया करती पर नेपोलियन उसकी ओर तनिक भी आकर्षित न होता। बेरुखी अपनाता और अपने पढ़ायी के काम में लगा रहता।
बड़ा होने पर वह अनेक मंजिले पार करता हुआ अपने देश का सेनापति बन गया। कुछ दिनों उसे फुरसत भी रही। उसने सोचा बचपन के हित सम्बंधियों से एक दौरा करके मिल लिया जाय। इसी संदर्भ में वह वहाँ भी पहुँचा जहाँ किराये के मकान में रहकर पढ़ा करता था। उस मनचली लड़की की उसे याद थी। पर वह भूल चुकी थी।
नेपोलियन ने उसे महिला से भेंट की और पूछा इसी मकान में बहुत वर्ष पहले एक नेपोलियन नामक लड़का पढ़ता था आपको उसकी स्मृति रही है क्या?
महिला ने स्मृति पर जोर दिया और कहा एक लड़के की धुँधली सी याद तो है जो सदा पुस्तकों में आँखें गड़ाये रहता था और किसी से सीधे मुँह बात भी नहीं करता था। रूखे स्वभाव का था वह।
नेपोलियन ने अपना परिचय देते हुए कहा वह बेरुखा लड़का मैं ही हूँ। यदि उस समय मैं भी चंचलता के फेर में पड़ गया होता तो आज अपने देश का प्रधान सेनापति न हो पाता।
परम पूज्य गुरुदेव लीला प्रसंग : 1
कलम की, लेखनी की अपनी सीमाएँ हैं, बंधन हैं। कलम उस सब को लिपिबद्ध नहीं कर सकती जो कुछ भी अनुभूति की परिधि के अंतर्गत आता है। यह लेखनी की सबसे बड़ी मजबूरी है। मन की बात अलग है। भाव संवेदनाओं के तरंगित होने से जो सुखपरक बोध मन को, अन्तःकरण को होता है, उसका स्वाद जिस किसी ने भी चखा है, वह उसे बार-बार पाने को ललक उठता है। कुछ ऐसी विशिष्टता है इस आनन्द में कि चिन्तन चेतना बार-बार इसी भावजगत में विचरण करने चली जाती है व रोम-रोम में पुलकन भर देती है।
ऐसी ही कुछ अनुभव हो रहा है, जब परम पूज्य गुरुदेव के स्थूल शरीर के महाप्रयाण के एक वर्ष पूरा होने पर उनसे संबंधित विभिन्न प्रसंगों-अनुभूतियों को लिपिबद्ध करने का आग्रह अगणित परिजनों की तरफ से आया है। सब उन प्रसंगों को जानना चाहते हैं, जिन पर कभी स्वयं पूज्यवर ने रोक लगाई थी। जो विषय भाव क्षेत्र का है, इसे शब्दों का आकार यह तूलिका कैसे दे यही सोच-सोच कर मन बार-बार उन्हीं अनुभूतियों में विचरण करने चल पड़ता है। कभी उनका ममत्व याद आता है, कभी उनका पल-पल का साथ। कभी यह याद आता है कि कैसे कभी वे चलकर उनके पास स्वयं आए थे व अपने से उन्हें जोड़ा था। प्रसुप्त संस्कारों की सुध कराके उस दिव्यसत्ता ने किस तरह अनगिनत प्रकार लीलाएँ रचाई थीं ताकि दैवी मिशन से हम जुड़ सकें। बार-बार स्मरण हो आता है कि किस तरह हम अपना अंतःकरण खोलकर उनके समक्ष रख देते थे व वे उसे पढ़ते हुए जीवन जीने का सही मार्गदर्शन देते चले जाते थे। उनसे जुड़ी हर बात याद आती हैं। उस स्थान का स्मरण हो आता है, जहाँ-जहाँ वे रहे, आए गए तथा भूमि के संस्कारों को प्रबल बना गए। किन-किन को स्मरण किया जाय व किन्हें लिपिबद्ध किया जाय, सोच-सोच कर मन असमंजस में पड़ जाता है।
कल्पना जगत में तरंगें उठने लगती हैं। महाप्रयाण किसका? क्या उस दिव्य सत्ता का जो एक शक्ति के रूप में आज से 81 वर्ष पूर्व अवतरित हुई पर कभी उसका अभाव किसी ने अनुभव नहीं किया। जब चाहा सतत् उसकी उपस्थिति का लाभ पा लिया। यही नहीं जब कोई कष्ट या विपत्ति आई उनका स्मरण मात्र करने से वह टल गई, नई दिशा मिल गयी, स्थूल शरीर के ब्रह्मलीन होने के बाद जिन्हें यह असमंजस था कि अब हमारा क्या होगा, कौन हमारी देख−रेख करेगा, उन्हें लगा कि वह सूक्ष्मीकृत सत्ता जो उनके पिता से भी बढ़ कर सतत् उनकी देख−रेख-रखवाली करती थी, उनके और समीप आ गई है। परमपूज्य गुरुदेव ने स्थूलतः जो पंक्तियाँ अंतिम समय में लिखी थीं उनमें सीधा सा आश्वासन था कि “सूक्ष्म व कारण शरीर से और अधिक सक्रिय होने के लिए देह का यह चोला हमें अस्सी वर्ष की आयु में त्यागना होगा ताकि करोड़ों-अरबों व्यक्तियों तक पहुँच सकें पर हर परिजन को यह आश्वस्त करते हैं कि उन्हें अपनी उपस्थिति का आभास और अधिक निकटता से कराते रहेंगे। किसी को भी अनाथ नहीं अनुभव होने देंगे।” कितना सही था यह आश्वासन यह हर स्वजन परिजन अपने मन में टटोल कर, इसका समाधान पा सकता है।
गिनती के अनुसार गायत्री जयन्ती 1991 को पूज्यवर के स्थूल शरीर से महाप्रयाण को एक वर्ष पूरा होने जा रहा है। किन्तु इन तीन सौ पैंसठ दिनों के साढ़े आठ हजार घण्टों के तीन करोड़ से अधिक पलों के हर पल में उनकी उपस्थिति प्रत्यक्ष अनुभूत होती जान पड़ती है। इन पलों को सही अर्थों में परम पूज्य गुरुदेव के निर्धारणों में निमित्त जीवन जीने वालों ने अपने अंदर जो अनुभूति की है, वह निश्चित ही अलौकिक, अनिर्वचनीय, अद्भुत है। इस सबको, इन पंक्तियों के लेखक से वर्णन करने को कहा जाय तो असंभव ही प्रतीत होगा कि वह उन अनुभूतियों को आकार दे सके। किन्तु कभी कभी यह भी अनिवार्य हो जाता है। जब पूज्यवर के महाप्रयाण के पश्चात् अगस्त-सितम्बर 1990 के अखण्ड-ज्योति संयुक्ताँक के रूप में एक स्मृति विशेषाँक प्रकाशित हुआ जब कई स्वजनों की इच्छा थी कि इसमें वह सब पढ़ने को मिले जो वे अपनी गुरुसत्ता के बारे में जानना चाहते थे, जिसका उनने अपने जीवन में अनुभूति रस के रूप में रसास्वादन किया था, पर शब्द रूप में वे एक धरोहर की तरह जिसे अपने पास सुरक्षित रखना चाह रहे थे। इस दृष्टि से स्मृति विशेषाँक से संभवतः उन्हें निराशा मिली होगी क्योंकि उसमें युगपुरुष के विराट रूप के मिशन का विशद वृत्तांत था। लिखा भी वह उसी सत्ता की प्रेरणावश ही गया था। पूज्यवर ने कभी भी अपने जीवन से मिशन को पृथक नहीं समझा। उनका समग्र जीवन रुग्ण, पीड़ित, मानवता को समर्पित एक मिशन था, जिसे उनने युग निर्माण प्रज्ञा अभियान नाम दिया। पूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी को सही श्रद्धाँजलि उनके जीवन से गुंथे इस विलक्षण अभियान जिसे सुधीजनों ने “मैन-मेकिंग फिनामिना अथवा ओडिसी” व्यक्ति का नवनिर्माण काया कल्प कर देने वाली प्रक्रिया के रूप में वर्णित किया है, का समग्र वर्णन किए बिना दी नहीं जा सकती। इसीलिए उस स्मृति अंक के विशेषाँक का महत्व अपनी जगह। इन पंक्तियों के लेखक को उस महासत्ता ने अपने सामने बिठा कर उस विशेषाँक का पूरा प्रारूप 1990 के मई माह में नोट करा दिया था। यह भी बता दिया कि वे स्वयं लेखनी में विराजमान रहेंगे। अतः जो कुछ भी तब लिखा गया, गुरुसत्ता की इच्छाओं के अनुरूप था। उसका स्वाध्याय हर स्वजन के लिए-परिजन के लिए अपनी जगह अनिवार्य है। उसी के माध्यम से नये- सभी व्यक्ति सही अर्थों में पूज्य गुरुदेव को समझ सकेंगे।
जब जून 1991 की अखण्ड-ज्योति पत्रिका को एक विशेषाँक का रूप देने की बात आयी तो उसी ऋषि सत्ता ने प्रेरणा दी कि अब एक वर्ष बाद अंशरूप में वह सब क्रमशः दिया जा सकता है जिसे पढ़ने जानने की अनेकों को ललक रही है। जिसे पढ़कर अगणित व्यक्तियों की शंकाओं का समाधान होगा तथा जिसका स्वाध्याय करने पर अनेकों की आस्थाएँ मजबूत होंगी। यह एक अविस्मरणीय तथ्य है कि “अखण्ड-ज्योति” एक शाश्वत-सनातन विचारधारा है जो परमपूज्य गुरुदेव की प्राण चेतना का साकार रूप है। पुस्तककार कोई जीवनी देने के पूर्व सर्व सामान्य जानकारी योग्य समझे गए संस्मरण पहले “अखण्ड-ज्योति” के विचार प्रवाह के रूप में ही दिये जायें, यही प्रेरणा शक्ति स्वरूप वंदनीया माताजी ने दी। वंदनीया माताजी जिनका जीवन पूज्यवर के जीवन से अविभाज्य है, सतत् पाण्डिचेरी की श्री माँ की तरह कहती रही हैं-”विदाउट हिम आय एक्जिस्ट नाट, विदाउट मी ही इज अनमेनीफेस्ट” (उनके बिना मेरा अस्तित्व नहीं है वह मेरे बिना उनकी कल्पना नहीं हो सकती)। उन्हीं प्रातः स्मरणीया स्नेहसलिला माँ की प्रेरणा से यह अंक श्रद्धा सुमन के रूप में पूज्य गुरुदेव के श्री चरणों में समर्पित है इस भाव के साथ कि हम कोई पुरुषार्थ नहीं कर रहे आपका काम कर आपका कर्ज चुका रहे हैं। कर्ज इतना अधिक कि जिससे कभी उऋण नहीं हुआ जा सकता। अनुदान इतने अधिक कि जिनका प्रतिदान दे पाने की कल्पना भी असंभव है। अनुभूतियाँ इतनी कि जिन्हें शब्द रूप उन्हीं परिप्रेक्ष्यों में दे पाना नितान्त असंभव कार्य है फिर भी उस गुरुसत्ता के विराट कर्तृत्व को नमन करते हुये पुण्यतोया गंगा में उसी की एक जलधारा से ली गयी एक अंजलि उसी को समर्पित है।
लाइब्रेरी के लिए तीन सौ अधिक नई पुस्तकें खरीदी गयी थीं। पूज्यवर के आदेश पर उनके समक्ष लाई गयीं। उनने सरसरी निगाह से देखकर कहा कि यहीं छोड़ दें। रात्रि में देख लेंगे सबेरे वापस ले जायँ। सोचा कि अँग्रेजी की किताबें वापस ले चलें क्योंकि पूज्यवर तो उन्हें पढ़ेंगे नहीं। ज्यों ही कार्यकर्त्ता महोदय उन्हें उठाने लगे, आदेश हुआ-सभी किताबें वही रहने दें। आश्चर्यचकित वे सभी पुस्तकें वहीं छोड़ कर चले गये।
अगले दिन अपने पर परमपूज्य गुरु देव ने उन्हें दो घण्टे अपने पास बिठाकर प्रत्येक पुस्तक में कहाँ कहाँ क्या जरूरी है, क्या पढ़ना चाहिए, क्या महत्वपूर्ण है, जो किसी दृष्टि से ध्यान देने योग्य है, यह समझाया। इनमें सौ से अधिक इंग्लिश में लिखी पुस्तकें थीं। बाद में वे बोले कि “ऋषि भाषा के बंधन से मुक्त होते हैं। जो भी श्रेष्ठ चिन्तन जहाँ कहीं भी किसी भी भाषा में किसी ने किया हो, वे उसे हृदयंगम करने की क्षमता रखते है।” अपनी मोटी बुद्धि पर शर्मिन्दा उस कार्यकर्त्ता को
उस दिन उनके विराट रूप की अनुभूति हुई।
परमपूज्य गुरुदेव लीला प्रसंग : 2
“आप पूर्व जन्म के ऋषि हैं। चिरकाल तक हमारे साथी-सहचर रहे हैं। वही पूर्व संबंध इस जन्म में फिर जाग्रत हो आए हैं। आपको पूर्णता के लक्ष्य तक पहुँचाने के लिए हम शक्ति भर प्रयत्न करेंगे।” यह पंक्तियाँ परम पूज्य गुरुदेव के पत्रों से उद्धृत हैं जो उनके द्वारा प्रकारान्तर से इन सभी को लिखी गयीं जिन्हें वे प्रसुप्त का बोध कराके महानता से जोड़ना चाहते थे व इसी शृंखला में अगणित परिजनों को मणि-मुक्ताओं को गूँथकर एक हार के रूप से विनिर्मित कर वे एक विशाल गायत्री परिवार बना गए।
हर हनुमान को यदि जामवंत की तरह आत्मबोध कराने वाला मिल जाय तो उसका अंतः का वैभव निखर सामने आ जाय। पूज्यवर ने यह अपने जीवन में साकार औरों को यही प्रेरणा देकर उन्हें कहाँ से कहाँ पहुँचा दिया? वस्तुतः मनुष्य जिस मूलभूत सत्ता का बना है वह हाड़-माँस का यह शरीर नहीं वरन् अंतःकरण में विद्यमान वे दिव्य संस्कार हैं जो उसे मानवी गरिमा का बोध कराके सतत् ऊँचा उठने की प्रेरणा देते रहते हैं। बाहर से दीखने में तो सभी एक जैसे हैं, सभी का चोला नर तन का है, परन्तु संस्कारों की सम्पदा ही वह विशिष्टता है तो एक को दूसरे से अलग करती है।
बहुधा हम देखते हैं कि परिस्थितियाँ नितान्त प्रतिकूल व पूरी तरह भौतिकता प्रधान होते हुये भी कुछ महामानव अपनी प्रसुप्त सुसंस्कारिता के कारण प्रबलतम पुरुषार्थ सम्पन्न करते, प्रवाह के विपरीत चलते वह अपनी विशिष्ट भूमिका सम्पन्न कर महाकाल के अग्रदूत बनते देखे जाते हैं। यहाँ आत्मिकी का पौर्वार्त्य अध्यात्म का वही सिद्धान्त चरितार्थ होता है परिस्थितियाँ कितनी ही विषम क्यों न हो, अंदर सोये पड़े संस्कार व्यक्ति के प्रचण्ड मनोबल के साथ जुड़कर विषमताओं के घटाटोप को भी निरस्त करने की सामर्थ्य रखते हैं।
बीज यदि सही है, गलकर अंकुरित हो कर ऊपर जाना चाहता है तो कोई भी शक्ति उसे रोक नहीं सकती। मिट्टी पानी खाद का होना अपनी जगह सही हो सकता है पर इन सबके होते हुए भी बीज में यदि घुन लगा हो, वह सही स्तर का न हो तो उससे अंकुर फूटने की संभावना न के बराबर ही रहती है। जब मानवी संस्कारों रूपी बीज की चर्चा की जाती है तो चाहे अनुकूल बनाने वाली परिस्थितियाँ हों न हों, वह विकसित होते देखा ही जाता है क्योंकि वह उसी अभीप्सा के साथ इस धरती पर आया है।
प्रस्तुत भूमिका जिस संदर्भ में प्रतिपादित है, वह परम पूज्य गुरुदेव के प्रारंभिक जीवन के घटनाक्रमों से संबंधित है। एक अद्भुत साम्य योगीराज अरविन्द एवं परम पूज्य गुरुदेव के जीवन में संबंध में देखने को मिलता है। दोनों के जीवन के प्रारंभिक वर्षों में कुछ ऐसे मोड़ आए जिनमें अंत की सुसंस्कारिता की प्रबलता की प्रचण्ड परीक्षा ली गई। दोनों ही उत्तीर्ण रहे व संघर्ष करके, उभर कर महामानव के रूप में विकसित होने में समर्थ रहे। बाद में श्री अरविन्द ने स्वयं को जीवन लक्ष्य की प्राप्ति हेतु पांडिचेरी जाकर एकाकी तप में नियोजित कर लिया व पूज्य गुरुदेव अपनी कोठरी में पधारे दैवी सौभाग्य के, परोक्षसत्ता के संरक्षण में चलते हुए करोड़ों के हृदय के सम्राट बने।
यह विशेषता महामानवों, देवमानवों, पैगम्बरों, युग ऋषि स्तर का क्रान्तिकारी जीवन जीने वाले कतिपय उंगली पर गिने जा सकने वालों में ही देखी जाती है। अधिकाँश तो बहिर्जगत में चल रहे प्रवाहों में बहते या प्रचलनों के साथ अंधानुगमन देखे जाते हैं। जीवन का सबसे बड़ा पुरुषार्थ है, अपनी नहीं अपने अतिरिक्त अन्य अनेक जो जीवधारी हैं उनकी मुक्ति हेतु अध्यात्म पराक्रम में जुटना। सब के लिए संघर्ष करना व उन्हें सही मार्ग दर्शाना। यही पुरुषार्थ पूज्य गुरुदेव ने जीवन भर किया व इसमें सहायता दी उनके उच्चस्तरीय संस्कारों ने, उस बीज ने, जिसे गलकर एक विराट वृक्ष बनना था व अपनी छाया में अनेकों को शरण देनी थी।
शुद्ध बुद्ध निरंजन आत्मा के रूप यह जीव जब जन्म लेता है तो उस पावन दिन को जन्म दिवस के रूप में याद किया जाता है। परम पूज्य गुरुदेव का आध्यात्मिक जन्म दिवस हम बसंत पंचमी को को उनके ही निर्देशानुसार मनाते रहें हैं। पर काया का इस धरती पर अवतरण संवत् 1968 में आश्विन माह में कृष्णपक्ष की त्रयोदशी के दिन (20 सितम्बर 1911 को) प्रातः 8 से 9 के मध्य हुआ। एक संस्कारवान तपस्वी ब्राह्मण परिवार में जन्में बालक श्रीराम को किसी प्रकार की कमी न थी। भौतिक दृष्टि से संपन्नता थी, पढ़ लिखकर बड़ा बनकर गुजारा चलाने व ऐश्वर्य भरा जीवन जीने के लिए बना बनाया मार्ग था। चाहते तो वे भी पिता की तरह भागवत परायण पंडित बनकर, बिना बाधाओं को आमंत्रित कर एक सरल सुखमय जीवन जी सकते थे। लेकिन उनने ऐसा नहीं किया। प्रारंभ से ही उनके संस्कारों की प्रबलता व सुदृढ़ मनोभूमि अपना परिचय देने लगी।
यहाँ श्री अरविन्द के जीवन का प्रारंभिक काल देखते हैं तो एक विलक्षण साम्य हम पाते हैं। 15 अगस्त सन् 1872 को कलकत्ता में जन्मे श्री अरविन्द को डॉ. कृष्णाधन घोष के रूप में अपने पिता पूरे पाश्चात्य रंग में रंगे हुए मिले। माँ सतत् बीमारी रहती थीं पिता स्वयं चिकित्सा की डिग्री प्राप्त करने पश्चिम होकर आए थे। वह नहीं चाहते थे भारत की पौर्वार्त्य रहस्यवाद व अध्यात्म की कोई छाया भी उनके तीनों बच्चों पर पड़े। जिस समय बच्चों में संस्कारों का पोषण करने हेतु उन्हें धार्मिक कथाएँ सुनाई व विभिन्न प्रकार से उनके मानस को प्रभावित करने के विभिन्न उपक्रम रचे जाते हैं, उस समय श्री अरविन्द की पूरी तरह पश्चिमी सभ्यता में रंगने की तैयारी चल रही थी। उन्हें पाँच वर्ष की आयु में ही आयरिश कान्वेण्ट स्कूल, दार्जलिंग भेज दिया गया। मातृ भाषा बंगाली वे सीख नहीं पाए व मात्र अँग्रेजी ही उनके वार्तालाप का माध्यम बनी। छह वर्ष की आयु से बीस वर्ष की आयु तक दोनों भाई इंग्लैण्ड में साथ-साथ रहे। उन्हें गवर्नेस के रूप में मिस पैजेट नामक एक आँग्ल महिला मिली जिस ने उन्हें क्रिश्चियेनीटी के प्रभाव में डालने की अपनी पुरजोर कोशिश की। पिता का सख्त निर्देश था कि अरविंद व उनके भाई को किसी भारतीय की संगति से बचाया जाय। मैन्चेस्टर व बाद में स्कॉलरशिप प्राप्त कर कैम्ब्रिज में पढ़े अरविंद घोष ने शैली, होमर, एरिस्टोफेन्स, दाँते, गोथ आदि को रट डाला व फ्रेंच तथा आँग्ल साहित्य में निपुणता अर्जित करती। यदि श्री अरविंद के निज के संस्कार सशक्त न होते तो चौदह वर्ष के अपने बाल्यकाल के ही उस विदेशी भूमि के प्रवास में वे पूरी तरह वैसे ही ढल गए होते जैसा उनके पिता जी ने चाहा था।
यहाँ बीच में प्रवाह रोक कर परमपूज्य गुरुदेव के जीवन वृत्त पर एक दृष्टि डालना ठीक होगा। उन्हें श्री अरविन्द की तरह पाश्चात्य मनोभूमि वाले पिता का सामना नहीं करना पड़ता। उनके पिता पं. रूपकिशोर शर्मा जी वाराणसी में महामना मदन मोहन मालवीय जी के बाल सखा रहे थे व वे स्वयं बच्चे की शिक्षा-दीक्षा में रुचि लेते हुए उसकी आत्मिक प्रगति की दिशा में गतिशील थे। गायत्री माता के रूप में ब्राह्मण की कामधेनु की व्याख्या उन्हीं के द्वारा उन्हें सुनने को मिली थी व उनके ही कारण वे मालवीय जी के हाथों यज्ञोपवीत पहनने का सौभाग्य प्राप्त कर पाये थे। इतना सब होने पर भी आकाँक्षा उनकी यही थी कि उनका पुत्र सीधा सा मार्ग पकड़े, पाण्डित्य अर्जित कर वही काम करे जो जीवन भर उनने किया था। किन्तु माता-पिता की इच्छा के विरुद्ध औपचारिक शिक्षा प्राइमरी तक ही पढ़कर सारी परिस्थितियाँ अनुकूल होते हुए भी बालक श्रीराम ने समाज देवता की आराधना के बीजाँकुरों को पोषण देना आरंभ कर दिया। घर का वातावरण कट्टर, संकीर्ण जाति प्रधान था किन्तु वे गंदगी साफ करने वाले शूद्र व निम्न जाति के माने वाले वर्ग में घूमते देखे जाते। छपको नामक मेहतरानी के घाव धोकर उसकी सेवा में उन्हें जो स्वर्गोपम आनन्द मिला था, वह घरवालों की उपेक्षा, डाँट व कड़े से कड़ा दण्ड पाने के बाद भी सतत् याद बना रहता था। तत्कालीन ग्रामीण परिवेश में यह प्रकार की सामाजिक क्रान्ति ही थी। जब निरक्षरों को साक्षर बनाने का, असमर्थों को समर्थ बनाने का विद्यालय अपनी हवेली में खोले हुए थे। अपनी माँ को भी उनने सभी धर्मों की महिलाओं को उनके द्वारा दिये जा रहे प्रौढ़ शिक्षण में जबरन सम्मिलित कर लिया था। अमराई में बैठकर घण्टों साधना में निरत रहना, किन्तु असहायों में बैठकर घण्टों साधना में निरत रहना, किन्तु असहायों की मदद हेतु तुरंत पहुँच जाना पूज्यवर के जीवन की एक ऐसी विशेषता है जो बिरलों में पायी जाती हैं।
पिता पं. रूपकिशोर जी अधिक दिन जीवित नहीं रहे। जब बालक श्रीराम ग्यारह या बारह वर्ष के ही थे उनके पिता का निधन हो गया। लौकिक दृष्टि से संभवतः पिता को अपने पुत्र की जीवन शैली पसंद नहीं आई थी। यदि उनका पुत्र उनके जीवित रहते उनका पैतृक व्यवसाय अपना लेता तो वे प्रसन्न मन विदा लेते पर ऐसा नहीं होना था। लगभग यही बात हम श्री अरविंद घोष के जीवन में देखते हैं। बच्चे की आई. सी. एस. पास करा के भारत में उच्च नौकरी प्राप्त कर देखने का डॉ. कृष्णघन घोष का खूब मन था। पर आई. पी. एस. की परीक्षा के पूर्व बी. ए. स्कॉलरशिप के साथ प्रथम श्रेणी में प्रथम स्थान प्राप्त कर पास करने वाले अरविंद उस समय इंग्लैंड में मैजिनी, जोन ऑफ आर्क से प्रभावित थे व स्वतंत्रता के लिए आतुर भारतीयों की एक समिति “इंडियन मजलिस” के सचिव बन गए थे। आई. सी. एस. परीक्षा पास करने के बाद वे वूलविच जाकर घुड़सवारी का अंतिम टेस्ट देने के बजाय समधर्मी विचार वाले मित्रों के साथ घूमने निकल गए। मात्र इसी वजह से एक बुद्धिमान काला अँग्रेज भारत पर शासन न करने पाए, यह उनके आँग्ल शिक्षक को गवारा न हुआ व उसने पूरा प्रयास किया कि अरविंद घोष अपनी गलती कबूल कर किसी तरह डिग्री ले ले। पर अरविंद घोष को इस शिक्षा की तुलना में संस्कारों को प्रधानता देने वाली विधा का महत्व समझ में आ चुका था व वे वैसे ही सन् 1892 में अपने देश लौट आए। आते ही पता चला कि मार्ग में संभावित दुर्घटना की गलत खबर सुनकर हृदयाघात से उनके पिता चल बसे हैं व मात्र बूढ़ी माँ उनके पास है जो उन्हें देख पाने में असमर्थ है।
जो पिता अपने बच्चों को पाश्चात्य शिक्षा में प्रवीण बनाकर भारतीयता के प्रभाव से वंचित रखना चाहता था। वह अपने बच्चे को विदेश से लौटा देख न पाया। यदि वह जीवित रहता तो संभवतः पाता कि उनका बेटा विदेश जाकर एक निरासक्त कर्मयोगी, एक निस्पृह स्वतंत्रता सेनानी के रूप में विकसित होकर लौटा है। यह सब कैसे हो पाया, इस पर अरविंद पर जीवनी लिखने वाले विद्वान लेखक लिखते हैं कि बाह्य जगत में दबावों के बावजूद अरविंद के अंदर के संस्कार प्रबल थे व उन्हीं की प्रेरणा से वे एक ऐसे सशक्त व्यक्तित्व के रूप में स्वयं को गढ़ते चले गए। पाश्चात्य वातावरण में उसके अनुरूप न ढलकर स्वयं को अपनी मूलभूत संस्कार निधि मुमुक्षत्व के अनुरूप ढाला व साथ ही मातृभूमि के प्रति अपना प्रेम भी जिन्दा रखा।
पूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य भी पिता के देहावसान के पूर्व से ही अपना राष्ट्र प्रेम जता चुके थे। जमींदारी प्रथा के खिलाफ संघर्ष वे तब कर रहे थे जब स्वयं उनके पिता हजारों बीघा जमीन के मालिक एक जागीरदार थे। गाँव के हाट-बाजारों में जाकर पर्चे बाँटना व अँग्रेजी शासन तथा उनका साथ देने वालों के विरुद्ध आक्रोश जन-जन तक पहुँचाने के लिए नमक आँदोलन से लेकर जेल भरो आँदोलन में सम्मिलित होना यह सब कार्य उनने 11 वर्ष की आयु से चौबीस वर्ष की आयु तक किया। जहाँ अरविंद बड़ौद महाराज के सचिव बने लेख लिख रहे थे “शेक ऑफ दि ब्रिटिश योक” (अँग्रेजी सत्ता के जुए को उखाड़ फेंको), वहीं पूज्य गुरुदेव आगरा जिले के एक स्वतंत्रता सेनानी के नाते “सैनिक” पत्र के सम्पादन में श्री कृष्ण दत्त पालीवाल जी का सहयोग कर रहे थे। जहाँ अरविंद कलकत्ता में बमकाण्ड में गिरफ्तार होकर अपनी सुनवाई की प्रतीक्षा के साथ साथ लाखों युवकों में क्रूर शासन की दमनकारी नीतियों के खिलाफ मन्यु पैदा कर रहे थे, वहाँ पूज्य गुरुदेव भगतसिंह को फाँसी लगने पर मौन न रहकर सारे आगरा जिले में क्रान्ति की एक आग मचाते देखे जाते हैं।
एक विलक्षण साम्य है महर्षि अरविंद एवं युग ऋषि पं. श्रीराम शर्मा आचार्य के जीवनक्रम में। महर्षि अरविंद अड़तीस वर्ष की आयु में (सन् 1910 में) जन-जन की मुक्ति के लिए एक समग्र योग दर्शन की खोज करने पांडिचेरी चल देते हैं व एकाँकी जीवन क्रम अपना लेते हैं ताकि परोक्षजगत को अपनी तपश्चर्या से अनुकूल बना सकें। ज्ञानयोग का आश्रय लेकर वे अतिचेतन सत्ता के धरती पर अवतरण की, स्वर्णिम भारत के पुनरोदय की बात कहते हैं। वहीं पूज्य गुरुदेव भक्तियोग-ज्ञान-योग कर्मयोग के समन्वित स्वरूप के आधार पर साँस्कृतिक बौद्धिक-नैतिक क्राँति का, विचारक्रान्ति का, तथा इक्कीसवीं सदी के उज्ज्वल भविष्य का उद्घोष करते हैं। महर्षि अरविंद को दैवी चेतनसत्ता सतत् प्रेरणा देती रहती है तथा पूज्य गुरुदेव को उनकी हिमालय वासी परोक्ष मार्गदर्शक सत्ता जो सतत् उनके पास आती, अपने पास बुलाती है, उन्हें पग-पग सिखाती है। जहाँ अरविंद को महर्षि अगस्त्य की तपःस्थली वेदपुरी (अब पांडिचेरी) में जाकर मौन साधना करने की दैवी प्रेरणा मिलती है, वहाँ पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी को पहले महर्षि दुर्वासा की तपःस्थली में मथुरा में। जहाँ गायत्री तपोभूमि विद्यमान है तथा बाद में नवीन सृष्टि के सृजेता महर्षि विश्वामित्र की तपःस्थली सप्त सरोवर शाँतिकुँज में जाकर तप करने व ऋषि संस्कृति के गायत्री के तत्वज्ञान को जन-जन तक पहुँचाने की परोक्ष सत्ता की प्रेरणा मिलती है।
यह संयोगमात्र नहीं है कि अध्यात्म क्षेत्र के दो प्रचण्ड तपस्वी जिनका तुलनात्मक अध्ययन अति संक्षेप में ऊपर प्रस्तुत किया गया, भारत में ही जन्में एक ही उद्देश्य को लेकर तपे तथा जिनके प्रारंभिक जीवन से अंत तक संस्कारों की प्रबलता ही प्रमुख भूमिका निभाती रही। महामानवों की यही रीति-नीति होती है। वे धारा के प्रवाह के विपरीत चलते हुए स्वयं पार होते हैं अपनी नाव में असंख्यों को पार करते हैं। वे मल्लाह की भूमिका निभाते देखे जाते हैं। हम सब के जीवन का परम सौभाग्य कि हमारी जीवन नौका को उस काफिले से जुड़ने का अवसर मिला जो श्रेष्ठ पथ पर अग्रगमन कर रह था। हम नहीं जानते कि हमने अपने संस्कारों को दैवी सत्ता की प्रेरणा से स्वयं पहचाना व प्रवाह से प्रज्ञा अभियान से जुड़ गए अथवा अनुभूतियों से लेकर उपलब्धियों के रूप में अनेकानेक प्रकार से झकझोर कर हमें अपनी दैवी अंशधारी सत्ता का बोध कराके परम पूज्य गुरुदेव ने अपने साथ जोड़ा, किन्तु यह सत्य है कि जो मार्ग जब मिल गया है, वह मनुष्य जीवन के दुर्लभतम सुयोगों में एक है।
कुसंस्कारों के वशीभूत हो अनेक व्यक्ति कुपथगामी होते-भटकते देखे जाते हैं। नर पशु नर पामर, नर पिशाच की योनि में नारकीय जीवन जीते इसी चोले में सब कुछ भुगतते देखे जाते हैं। ऐसे में कोई अपने संस्कारों को पहचान ले व श्रेष्ठता से स्वयं को जोड़ ले तो वह कहाँ से कहाँ पहुँच सकता है, यह हम पूज्य गुरुदेव के जीवन वृत्त का अवलोकन कर अपने सौभाग्य को सराहते हुए भली भाँति समझ सकते हैं।
शक्ति पीठों के बनने का सिलसिला चालू हो गया था। गुजरात में जूनागढ़ के एक कर्मठ कार्यकर्ता को लगन थी कि अपने में विलक्षण माँ गायत्री की एक पीठ उस गिरनार की पहाड़ी की गोद में बने, जहाँ माँ अम्बा का भी मंदिर था। एक दिन उधर से घूमते हुए जा रहे थे कि एक स्थान को देखते ही अनुभूति हुई मानों स्वयं परमपूज्य गुरुदेव कह रहे हैं कि इसे यहीं स्थान उपयुक्त है। इसे ले लो। पता लगाया यह जमीन जंगल वालों की है व नहीं मिलेगी। वे धुन पर लगे रहे। उसी स्थान पर एक गायत्री महापुरश्चरण आरंभ कर दिया। घनघोर जगत य हिंसक जन्तु किन्तु भय तनिक सा भी नहीं। अनुष्ठान अवधि में ही ज्ञात हुआ कि एक संशोधन के तहत वह भूमि मिल सकती है। भूमि ले ली जाती पर पैसे थे नहीं। उसी दिन पुनः ध्यान लगाया तो पूज्यवर ने प्रेरणा दी कि आज ही राशि मिल जायेगी। पूर्वी अफ्रीका वासी एक करोड़पति उनके पास उस दिन मध्याह्न पहुँचा व उन्हें एक कोरा चेक देकर बोला कि जितना पैसा चाहिए ले लो। उनने उतनी ही राशि लिखी जितने की भूमि थी व आवश्यकता थी।
जमीन लेने के बाद भवन बनना आरंभ हुआ। कर्ज लेकर भी निर्माण होते ही प्राण प्रतिष्ठ हेतु पूज्यवर के पास दौड़े आ पहुँचे। पूज्यवर ने कहा “तुम्हारे यहाँ अवश्य आयेंगे।” पूज्य गुरुदेव के प्रवास चक्र में (1981-82) जूनागढ़ परिजन से पूछा कि कितना ऋण तुम पर है। उनने न कुछ कहा न उसके बाद सामने आए। पूज्यवर ने कहीं भी सार्वजनिक प्रणाम का क्रम नहीं रखा था पर वहाँ वे बैठ गए श्रद्धा स्वरूप चढ़ाई गयी राशि ठीक उतनी थी, न एक पैसे कम न ज्यादा जितना कि उन सज्जन पर कर्ज था। महासत्ता कर्ज उतारने स्वयं भक्त के आग्रह पर जा पहुँची थी। अब वह शक्ति पीठ ऐतिहासिक पीठों में से एक है।
परमपूज्य गुरुदेव लीला प्रसंग : 3
“मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप है-” यह मूल मंत्र परमपूज्य गुरुदेव ने जन-जन को दिया व इसके माध्यम से उन्हें पुरुषार्थ में नियोजित कर उनकी भाग्य रेखाएँ ही बदल दीं। यही नहीं, वे कहते रहे “आत्मबल यदि प्रचण्ड हो तो व्यक्ति कितनी ही प्रतिकूलताओं से जूझता हुआ परमात्मबल को आत्मबल का पूरक बनाते हुए अपने भविष्य का स्वयं निर्माण कर सकता है।” दैववाद व भाग्यवाद से ग्रसित समाज में यह एक विलक्षण विचारक्रान्ति थी जिसने अगणित रोतों को हँसा दिया, पुरुषार्थ में नियोजित कर उन्हें जीवन जीने की सही दिशा में चलने की प्रेरणा दी व उनका कायाकल्प कर दिया।
जहाँ परम पूज्य गुरुदेव ने पुरुषार्थ को प्रधानता दी व फलित ज्योतिष के निराशावादी, अकर्मण्य बना देने वाले स्वरूप का जीवन भर खण्डन किया, वहाँ स्वयं उनके जीवन में ज्योतिर्विज्ञान ने बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उज्ज्वल भविष्य के प्रवक्ता के रूप में वे अखण्ड-ज्योति के प्रकाशन वर्षों से ही सृजनात्मक चिन्तन को बढ़ावा देते आए हैं। स्वयं उनने लिखा है कि अन्तर्ग्रही प्रभावों की वैज्ञानिकता को समझा व दृश्य गणित पर आधारित ज्योतिर्विज्ञान को मान्यता दी जानी चाहिए। सत्प्रेरणा देने वाले व्यक्ति को विधेयात्मक चिन्तन की ओर ले जाने वाले ज्योतिर्विज्ञान के समर्थक होने के नाते उनने गायत्री नगर में देव परिवार बसाने के लिए एक वेधशाला स्थापित की, पंचाँग प्रकाशित कराया तथा यहाँ से जन्म समय के आधार पर श्रेष्ठता की दिशा में चलने का मार्गदर्शन तंत्र चलाया।
यह बात सही है कि एक ही समय में जन्में अगणित व्यक्तियों का भाग्य ग्रहों की स्थिति के आधार पर एक सा निर्धारित नहीं होता व उस आधार पर किया गया मूल्याँकन शाश्वत नहीं माना जाना चाहिए। परम पूज्य गुरुदेव ने ज्योतिर्विज्ञान संबंधी अपनी विवेचनाओं में यही लिखा कि ग्रहों के अन्तर्ग्रही प्रभाव हो सकते हैं परन्तु पुरुषार्थ द्वारा उन प्रभावों को वाँछित मोड़ दे पाना संभव है। ग्रहों की चाल व दशा-दिशा को मनुष्य स्वयं मोड़ व प्रभावित कर सकता है। इसके लिए संकल्प बल व आत्मबल चाहिए। इन दोनों ही ऋद्धि-सिद्धियों ने कैसे स्वयं परमपूज्य गुरुदेव के जीवन का स्वरूप बनाया व विकासक्रम पर चलते हुए वे अपनी यात्रा को किस तरह उत्कर्ष शिखर तक ले जा सके, इसके लिए उनकी ही जन्म कुण्डली का ज्योतिर्विज्ञान पर विवेचन किया जाय तो कोई हर्ज नहीं। इससे यह जानकारी मिलती है कि कैसे आत्मबल के धनी विलक्षण योगों का अनुकूलन करते हैं। साथ ही यह भी प्रमाणित होता है कि जटिलतम प्रतिकूलताओं से भी मोर्चा लेकर अपने लिए अपना भाग्य विनिर्मित कर पाना हर किसी के लिए संभव है। लक्ष्यसिद्धि की यात्रा की ज्योतिर्विज्ञान सम्मत व्याख्या यहाँ अखण्ड-ज्योति परिवार के विद्वान डॉ. प्रेम भारती (सारंगपुर, म.प्र.) के एक विशिष्ट अनुसंधान के आधार पर प्रस्तुत है। स्वयं पूज्य गुरुदेव एक प्रकाण्ड ज्योतिर्विद् थे व उनने स्वयं से जुड़ी सारी संभावनाओं का अध्ययन कर अपना भाग्य स्वयं अपने हाथों विनिर्मित किया था, वह इस अध्ययन से प्रतिपादित होता है। पूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी की जन्म कुण्डली इस प्रकार स्वीकृत की गयी है।
अंतरंग जीवन की घटनाओं की जानकारी लेने के लिए चन्द्रकुण्डली देखी जाती है जो इस प्रकार स्वीकृत मानी गयी है।
कुण्डली परीक्षण संबंधी जानकारी हेतु जिन तथ्यों की दृष्टि में रखना पड़ता है वे हैं प्रत्येक भाव और उसकी राशि, भाव का स्वामी और उसकी प्रकृति, भावेष की स्थिति व उसका अन्य ग्रहों से संबंध, भाव में स्थित ग्रह, भाव पर अन्य ग्रहों की दृष्टि से महत्वपूर्ण तथ्यों पर ही प्रकाश डाला जा रहा है!
प्रथम भाव को जन्म लग्न भी कहते हैं। इस भाव से शारीरिक स्वास्थ्य, संकल्प शक्ति, पूर्वकर्मों की स्थिति आदि का अध्ययन किया जाता है। पूज्य गुरुदेव के लग्न में तुला राशि है। जिसका स्वामी शुक्र एकादश भाव में स्थित है। इसी लग्न में गुरु व केतु भी हैं, जिन पर शनि व राहू ग्रहों की पूर्ण दृष्टि पड़ रही है। अब तुला लग्न एक श्रेष्ठतम लग्न है तथा शुक्र के बलवान होने पर व्यक्ति को सत्यप्रिय धर्मनिष्ठ व संगठन का स्वामी बनाता है। ऐसे व्यक्ति को धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष चारों पुरुषार्थों की प्राप्ति होती है। वायु प्रधान राशि विचार क्राँति से जुड़ी हुई है, विशेष कर जब तुला के साथ शुक्र व मिथुन का स्वामी बुध एकादश स्थान में हों और दोनों पंचम भाव को देख रहे हों। ऐसे महामानव स्थायी, नैतिक व धार्मिक क्रान्ति लाने वाले होते हैं यथा महात्मा गाँधी तुलसीदास, महर्षि रमण एवं ईसामसीह। इन सबको अपने-अपने स्तर में क्रान्तिकारी प्रवाह विनिर्मित करने में अपार सफलता मिली। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि पूज्य गुरुदेव की व ईसामसीह की जन्म कुण्डली में एक विचित्र साम्य है। ईसामसीह की कुण्डली में, जो नीचे दी जा रही है लग्नाधिपति शुक्र पर गुरु तथा चंद्र का शुभ प्रभाव है जो चतुर्थ भाव (जनता) को लाभान्वित कर रहा है। ऐसे व्यक्ति ममत्व द्वारा करोड़ों का संगठन खड़ा कर लेते हैं।
पूज्य गुरुदेव की कुण्डली में भी चतुर्थांश पर गुरु की लग्न में, बैठ कर दृष्टि की गई है। वस्तुतः लग्न में स्थित गुरु का विरोधी भी सम्मान करते हैं व ऐसे महामानव सब जगह आदर पाते हैं। साधना की दृष्टि से भी यह योग सर्वश्रेष्ठतम है।
पूज्य गुरुदेव की कुण्डली में द्वितीय भाव में वृश्चिक राशि है, जिसका स्वामी मंगल है। वाणी विद्या, साधन, शक्ति व संगठन शक्ति की दृष्टि से अत्यधिक संपन्नता इससे परिलक्षित होती है। ऐसे व्यक्ति होते तो खाली हाथ हैं पर अपनी साधना शक्ति के बलबूते करोड़ों-अरबों की योजनाएँ चलाते हैं व सफल होते हैं। उनके इशारे पर सैकड़ों व्यक्ति दौलत का ढेर लगा देते हैं। युग निर्माण योजना संगठन का आज का विराट रूप देखकर क्या यह सही नहीं लगता?
तृतीय भाव पुरुषार्थ, यात्रा लेखन, चिन्तन, शौर्य व योगाभ्यास से संबंधित है। पूज्य गुरुदेव के तृतीय भाव में धनु राशि है, जिसका स्वामी गुरु लगनस्थ है। गुरु की स्थिति यहाँ हर दृष्टि से शुभ है। ऐसे ग्रह प्रभावों वाले व्यक्ति श्रेष्ठतम लेखक होते हैं। पूज्य गुरुदेव के ही अनुसार “हमारा अभी तक का लिखा साहित्य इतना अधिक है कि शरीर के वजन से तौला जा सके। यह तभी उच्च कोटि का है।” 3200 पुस्तकों के लेखक पूज्यवर पं. श्रीराम शर्माजी के वेदान्त प्रधान लेखन तथा पाखण्डवाद के विरुद्ध सिंहनाद का परिचय गुरु के साथ-साथ तृतीय स्थान पर मंगल एवं राहू की दृष्टि से मिला है। ऐसे व्यक्तियों का जीवन श्रेष्ठतम स्तर के योगी का होता है। उनके कोई संकल्प अधूरे नहीं रहते।
चतुर्थ भाव जनता का भाव है। इस भाव में पूज्य गुरुदेव की कुण्डली में मकर राशि है, जिसका स्वामी शनि है। यह शनि यहाँ एक विशेष राजयोग बनाता है व गुरुदेव को करोड़ों के हृदय का सम्राट घोषित करता है। आने वाले समय में उनके विचारों के नेतृत्व में एक क्रान्तिकारी युग आने की उद्घोषणा करता है। ऐसे व्यक्ति पैतृक सम्पत्ति का त्याग कर जनहितार्थाय तीर्थों में निवास कर उन स्थानों को युगतीर्थ बना देते हैं। ज्योतिष का एक सिद्धाँत है-”यो यो भावः स्वामी युक्तो दृश्टोवा तस्य तस्यास्ति वृद्धि।” आचार्य वाराह मिहिर के इस कथन के अनुसार जो जो भाव अपने स्वामी द्वारा युक्त अथवा दृष्टि होता है उस उस भाव की वृद्धि समझनी चाहिए। चतुर्थ भाव को शनि के दशम दृष्टि से देखने के कारण उस भाव की शक्ति यहाँ कई गुना बढ़ गई है। इससे पूज्य गुरुदेव की जनता के मध्य अपार लोकप्रियता बढ़ाने वाला योग बनता है।
पंचम भाव की कुँभ राशि, उसके स्वामी शनि की स्थिति, जातक की कल्पना व विचार क्षमता तथा वाणी की प्रभावोत्पादकता की द्योतक है। सात्विक बुद्धि के धनी ऐसे व्यक्ति भावुक, निर्मल-पवित्र विचार वाले होते हैं व इसी नाते से अद्वितीय प्रज्ञा-पुरुष बन जाते हैं। ग्रहों का योग ऐसा है कि मंत्र शक्ति का उनके जीवन में महत्वपूर्ण स्थान हो जाता है। गायत्री मंत्र को जन-जन तक पहुँचाने वाले पूज्यवर पर यह योग पूरी तरह प्रमाणित होता है। उनकी वेद पिता और गायत्री माता की साकार उपासना इन्हीं प्रभावों को पुरुषार्थ द्वारा सहयोगी बना लेने से सिद्धिदायक बनती देखी गयी।
जहाँ पूज्य गुरुदेव की कुण्डली में षष्ठ भाव में मीन राशि के साथ गुरु का होना मंत्र शक्ति की सिद्धि तथा आध्यात्मिक दृष्टि से अद्वितीय सफलता रूपी महत्वपूर्ण उपलब्धि का परिचायक है, वहाँ सप्तम भाव में मेष राशि के साथ शनि व राहू का होने से जीवन में प्रतिकूलताएँ भी वरदान बन जाती हैं, यदि जातक पुरुषार्थ परायण हो। उनके प्रारंभिक जीवन में पिता का बिछोह, स्वतंत्रता संग्राम में एकाकी संघर्ष, घर वालों के साथ न होने से मात्र अपनी संकल्प शक्ति के सहारे लक्ष्य सिद्धि की यात्रा व फिर पूर्व जन्म की सहयोगिनी वंदनीया माताजी का साथ में मिलकर कार्य करना-यह सब ग्रहों की स्थिति से स्पष्ट होता है।
अष्टम भाव का संबंध अन्वेषण से भी है तथा मृत्यु से भी। अष्टम भाव में वृष राशि का स्वामी शुक्र लग्नेश होकर एकादश भाव में स्थित होने से ऐसे व्यक्ति मनन-चिन्तन करने वाले क्रान्तिदर्शी ऋषि-वैज्ञानिक होते हैं। विज्ञान व अध्यात्म का समन्वय स्थापित करने वाले ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान के संस्थापक परम पूज्य गुरुदेव को इस के लिए किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं। इस विशिष्ट ग्रह स्थिति से इच्छा मृत्यु का वरदान भी प्रमाणित होता है जो दो जून 1990 की (गायत्री जयन्ती की) निर्वाण दिवस की कुण्डली से स्पष्ट हो जाता है।
नवम भाव कुण्डली का त्रिकोण स्थल है व इसमें मिथुन राशि के साथ बुध स्वामी है, जो एकादश स्थान में है। यह पुण्य स्थान धर्म स्थान है। ऐसी सत्ता पर गुरुसत्ता की परोक्षसत्ता की कृपा बनी रहती है। ऐसे व्यक्ति द्वारा करायी या की गयी उपासना-प्रार्थना कभी निष्फल नहीं जाती। जन्म जन्मान्तरों के संस्कार प्रबल होने के कारण उनकी वाणी या भविष्य कथन पूरी तरह सत्य सिद्ध होते हैं। ऐसे जातक स्वयं आत्मबल संपन्न होते हैं व दैवी कृपा के कारण संपर्क में आने वालों में भी संचार कर देते हैं। पूज्य गुरुदेव के जीवन में सतत् उतरती रही भगवत्कृपा व उनके माध्यम से औरों को वितरित अनुदान उसके परिचायक हैं।
इस दृष्टि से उनकी कुण्डली का रामकृष्ण परमहंस की जन्मकुण्डली के साथ तुलनात्मक अध्ययन बड़ी महत्वपूर्ण समानता बताता है। ज्ञातव्य है कि पूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम आचार्य जी का पूर्व जन्म रामकृष्ण परमहंस की जन्मकुण्डली के साथ तुलनात्मक अध्ययन बड़ी महत्वपूर्ण समानता बताता है। ज्ञातव्य है कि पूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी का पूर्व जन्म रामकृष्ण परमहंस के रूप में हुआ था जैसा कि उनने अपनी आत्मकथा में लिखा है।
दोनों की कुण्डली में चन्द्र, बुध की युति तथा शनि राहू युति में अद्भुत समानता है। यह संयोग अध्यात्म व संन्यास की ओर व्यक्ति को ले जाता है। दोनों ही आत्मवेत्ता व ज्ञानी बने। दोनों कुण्डलियों में अन्नमय कोष व प्राणमय कोश की (बुध तथा शुक्र) समानता है। परमहंस जी की यात्रा मनोमय कोश तक हुई व वही यात्रा पूज्य गुरुदेव के रूप में मनोमय से आनन्दमय कोश तक होती देखी जा सकती है। मंगल मनोमय कोश का, शनि विज्ञानमय कोष तथा गुरु आनंदमय कोश का सूचक है।
एकादश भाव की सिंह राशि है तथा स्वामी सूर्य द्वादश भाव में स्थित होकर धर्म, कर्म, मोक्ष की प्राप्ति जातक को करा रहा है। लग्नेश शुक्र, कर्मेश चन्द्र तथा धर्मेश बुध के यहाँ एकत्र होने से एक विराट जनसमुदाय पूज्य गुरुदेव के साथ चलता रहा है व उन्हें एक विराट संगठन का अधिपति बनाता है। इसी योग से उन्हें अपार धन की प्राप्ति हुई जो उनने “बोया-काटा” के सिद्धान्त पर समाज रूपी खेत में पुनः लगाया व संगठन खड़ा किया। ऐसे जातकों का बुध के स्थान से अगली राशि में सूर्य के होने से आशीर्वाद शत प्रतिशत फलीभूत होता है। वे जिसे माध्यम बना जाते हैं, उसमें भी यही शक्ति आ जाती है।
द्वादश भाव आध्यात्मिक उन्नति एवं मोक्ष का द्वार है। यहाँ पूज्य गुरुदेव की कन्या राशि के साथ सूर्य स्थित है। अपूर्व स्मरण शक्ति, स्वाध्यायशीलता, आत्मीय जनों पर ममत्व की वर्षा तथा धर्म एवं कर्म द्वारा मोक्ष की प्राप्ति का संकेत इस विलक्षण युक्ति से मिलता है जो उनके जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे।
इस तरह ज्योतिर्विज्ञान के आधार पर पूज्य गुरुदेव का जीवन एक चमत्कारी सत्य का उद्घाटन करता है कि ग्रहों के प्रभाव के साथ पुरुषार्थ के जुड़ जाने पर व्यक्ति अपनी विकास यात्रा को चरम उत्कर्ष तक पहुंचा सकता है। दृश्य गणित के आधार पर खगोल विज्ञान का अध्ययन यदि किया जाय तो पूज्य गुरुदेव के प्रत्यक्ष जीवन की पृष्ठ भूमि में परोक्ष प्रभाव कार्य करता देखा जाता है जिसका उनने स्वयं अध्ययन कर उसे वाँछित प्रयोजनों के लिए नियोजित कर लिया।
परम पूज्य गुरुदेव के जीवन दर्शन का अध्ययन यह बताता है कि कितनी ही प्रतिकूलताएँ क्यों न हों, व्यक्ति यदि अध्यात्म तत्वदर्शन को हृदयंगम कर उसे जीवन में सही मायने में उतारे तो वह महामानव, युग ऋषि, अवतार स्तर तक अपना विकास करने में समर्थ है। यह संभावना सब में विद्यमान है। आत्मबल का उपार्जन ही इस सृष्टि का सर्वोच्च पुरुषार्थ है। यदि व्यक्ति को यह मिल जाय तो उससे वह ग्रहों के दुष्प्रभाव को टालते हुये अपने भाग्य का निर्माता स्वयं बन सकता है। गायत्री मंत्र की सिद्धि प्राप्त कर पूज्य गुरुदेव ने “ब्रह्मवर्चस” अर्थात् आत्मबल का ही उपार्जन निज के जीवन में किया व अपने साथ अनेकानेक को आत्मबल का वरदान उस परमसत्ता से प्रदत्त कराके उनके जीवन को धन्य बना दिया। महापुरुष का जीवन आज मार्गदर्शक बना खुली पुस्तक के रूप में सबसे समक्ष प्रस्तुत है। जो सौभाग्य सब के जीवन में गुरु सत्ता की कृपा बनकर बरसा है, उसे याद रखते हुए यदि उन्हीं के निर्देशों पर चलते रहा जाय तो सभी का जीवन महान बन सकता है।
परम पूज्य गुरुदेव लीला प्रसंग : 4
जन्मजात संस्कारों की भूमिका, महत्ता अपनी जगह है। उसे नकारा नहीं जा सकता। पर इनके साथ-साथ वातावरण के महत्व को भी स्वीकारा जाना चाहिए। वातावरण वह, जहाँ के सूक्ष्म संस्कार एक सिद्ध पुरुष का संपर्क पाकर, उनकी तप ऊर्जा के कारण इतने प्रबल हो जाएँ कि वह स्थान, एक जीता जागता शक्ति केन्द्र बन जाए। कमजोर मनोबल व सुसंस्कारों वाला व्यक्ति भी ऐसे वातावरण में बदल कर जाए व अपनी गरिमा को बोध के महान प्रयोजन में जुट जाए। स्थान विशेष को प्राणचेतना का जीवन्त शक्ति पुँज बनाने हेतु तप साधना हमारी भारतीय संस्कृति का एक अनिवार्य अंग रही है। तीर्थ, देवालय, आरण्यक, गुरुकुल, आश्रम आदि सबसे जुड़े इतिहास यही बताते हैं कि इस स्थान की प्रसुप्त संस्कारिता को किसी महापुरुष ने तप द्वारा उभारा व वातावरण सशक्त ऊर्जा सम्पन्न बनाया। शांतिकुंज जिसे युग तीर्थ की उपमा प्राप्त है, की चर्चा जब परम पूज्य गुरुदेव के जीवन दर्शन के संदर्भ में की जाती है तो सहज कही इस संबंध में अनेकानेक रहस्यों पर से पर्दा उठने लगता है।
आज जहाँ मनोरम शान्तिकुँज आश्रम गंगा की गोद व हिमालय की छाया में उत्तराखण्ड के द्वार पर स्थित है। वह आज से तेईस वर्ष पूर्व घनघोर वन था। दुर्गम हिमालय से ऋषि सत्ता की तपचेतना जहाँ सघनीकृत हो ऊर्जा के रूप में प्रकट होती है, गंगा, गायत्री व गुरुसत्ता की अद्भुत त्रिवेणी के रूप में गायत्री तीर्थ जहाँ विद्यमान है, यह जानकारी परिजनों को विदित होना चाहिए। मथुरा से दस वर्ष बाद हिमालय चल देना है, यह परमपूज्य गुरुदेव ने 1961 में अज्ञातवास से लौटते ही परिजनों को पत्र में लिखना व पत्रिका में उसकी घोषणा करना आरंभ कर दिया था। साथ ही यह भी क्रमशः स्पष्ट करने लगे थे कि वंदनीया माताजी गंगातट पर उत्तराखण्ड के द्वार पर तप करेंगी व मिशन का सूत्र संचालन संभालेंगी। 1967-1968 में परोक्ष सत्ता के निर्देश पर वे दो तीन बार हरिद्वार आए व जमीन की तलाश में घूमे। सही भूमि न मिलने पर वे अगले दिन वापस लौट गए।
1968 की जून माह की बात है। वे अपने एक निकट संबंधी जो वकील भी थे के साथ शाँतिकुँज हेतु भूमि के निर्धारण हेतु आए थे व गंगातट पर एक धर्मशाला पर रुके थे। दलाल के साथ भूमि की तलाश हेतु निकले तो कई जमीनें उनके संबंधी साथी व दलाल महोदय को ऐसी लगीं जो शहर के समीप थीं व जिनकी कीमत भी कम थी। पर उन्हें जिस सुसंस्कारित, ऊर्जा संपन्न चिर परिचित स्थान की तलाश थी वह उन्हें अभी नहीं मिला था। घूमते-घूमते तीनों सप्त सरोवर जा पहुँचे। जहाँ शांतिकुंज आज विद्यमान हैं, वहाँ आकर परमपूज्य गुरुदेव रुक गए व इसी भूमि के बारे में पूछने लगे। दलाल महोदय का कथन था कि यह भूमि जल के नैसर्गिक स्रोतों से भरी पड़ी है व दलदल है। कोई भी इसे लेकर एक घाटे वाला सौदा ही करेगा। आपको और भी जगह बताई हैं, वे इससे सस्ती भी हैं व अच्छी भी। “परन्तु वे नहीं माने। वे इसी पर अडिग रहे कि “यदि मुझे आश्रम बनाना है तो वह यहीं बनेगा चाहे इसके लिए हजारों ट्रक मिट्टी डालनी पड़े।
इसी स्थान के लिए वे क्यों उत्सुक हैं जबकि यह मुख्य सड़क पर भी नहीं है। शहर से प्रायः सात किलो मीटर दूर है, एक नितान्त निर्जन स्थान पर है, यह पूछने पर उनने वकील साहब को बताया कि वे नहीं समझ पा रहे हैं पर स्वयं गुरुदेव उस भूमि के प्रसुप्त संस्कार को देख रहे हैं व पहचान रहे हैं कि यह विश्वामित्र ऋषि की तपःस्थली है। कभी गंगा की धारा समीप से ही बहती थी। आज यह आधा किलोमीटर दूर चली गयी है। नूतन सृष्टि के सृजन का तप ब्रह्मर्षि विश्वामित्र ने यहीं किया था। इसी स्थान पर नवयुग की आधारशिला विनिर्मित होनी है, इसी हिमालय से लौटकर उन्हें बीस वर्ष ऋषि परम्परा के बीजारोपण का कार्य करना है।
महामानवों की यही विशेषता उन्हें सामान्य से अलग कर देती है। वे अंतर्दृष्टि से पहचान लेते हैं कि किस स्थान में क्या विशेषता विद्यमान है व किस स्थान पर किया गया तनिक सा अध्यात्म पुरुषार्थ ही वहाँ पर ऐसा प्रचण्ड आभामण्डल विनिर्मित कर देगा कि जो भी उस स्थान के संपर्क में आएगा वह आने वाले सौ वर्षों तक निहाल होता रहेगा। जैसे पांडिचेरी के लिए अरविंद घोष ने अपनी तपोभूमि को अगस्त्य मुनि की तपस्थली वेदपुरी के रूप में पांडिचेरी में चुना तथा महर्षि रमण ने शैव साधकों की तपस्थली अरुणाचलम का अपनी मौन साधना हेतु चयन किया, प्राणशक्ति को घनीभूत कर इन स्थानों को प्रचण्ड ऊर्जा संपन्न बना दिया, परमपूज्य गुरुदेव भी अपने लिए व अपने पद चिन्हों पर चलने वाले अनुयायियों के लिए भारतीय संस्कृति का एक समग्र शिक्षण करने वाले आरण्यक के रूप में शाँतिकुँज की भूमि, वातावरण का चयन कर चुके थे। जिनने इस आश्रम के निर्माण को प्रारंभ से देखा हैं, वे जानते हैं कि यहाँ खड़े भवन वस्तुतः जलधारा में तैर रहे हैं। न जाने कितनी मिट्टी डालकर इस स्थान को दुर्गम से रहने योग्य बनाया गया है। अभी भी थोड़ी सी भूमि को खोदते ही जलधारा स्पष्ट दिखाई देती है व गंगा नदी की तलहटी में पाए जाने वाले शालिग्राम पाए जाते हैं किन्तु यह आश्रम जो स्वयं में अनूठा है, व दिव्य संरक्षण प्रदान कर रहा है। यह वातावरण में छाए दैवी संस्कारों की प्रचुरता व सशक्तता ही है कि जो यहाँ आता है, उसकी मनोकामना हर इच्छा कल्प वृक्ष के नीचे बैठने की तरह यहाँ पूर्ण होती देखी जाती है। इस आश्रम की जन्म गाथा को जानने के बाद यहाँ के वातावरण की विशिष्टता को समझना हर किसी के लिए सरल हो जाता है।
वातावरण से जुड़े दो शब्द और हैं, परिवेश और पर्यावरण। “वातावरण” शब्द वात के आवरण इस अर्थ से बना है। “वात शब्द वायु का समानार्थी है। वायु से मतलब उस तत्व विशेष से है, जो अपने स्पर्श से जन-जन के अन्तःकरण में अनुभूतियों की इन्द्रधनुषी आभा बिखेर दे। संस्पर्श द्वारा अपनी अनुभूति करा सके, ऐसे आवरण को ही मनीषियों ने वातावरण कहा है। “परिवेश” से तात्पर्य है विशुद्धतः वे भौतिक परिस्थितियाँ जो वातावरण में विद्यमान हैं। स्थान विशेष की स्थिति, आस पड़ोस इत्यादि परिवेश की परिधि में आते हैं। “पर्यावरण” शब्द अपने अर्थ की व्यापकता के घेरे में परिवेश के अतिरिक्त और भी बहुत कुछ समेटे हुए हैं परिवेश की प्रभाविकता का अध्ययन-पर्यावरण (परिआवरण) के अंतर्गत आता है। पर्यावरण का अर्थ है न केवल परिवेश बल्कि वायुमण्डल-आकाशीय स्थिति के साथ जुड़ी वे सूक्ष्मताएँ जो हमारे जीवन को विभिन्न रूपों में प्रभावित करती हैं। मानव जीवन पर स्थूल शारीरिक ही नहीं, मानसिक स्तर पर क्या कुछ प्रभाव पड़ रहा है, यह विद्या आज “डीप इकॉलाजी” के रूप में मान्यता प्राप्त कर पर्यावरण का महत्व हमें भली भाँति समझाती है।
वातावरण परिवेश व पर्यावरण को समेटने वाला और भी अधिक सूक्ष्मतम तत्व है। यदि परिवेश स्थूल पर्यावरण सूक्ष्म है तो वातावरण को कारण तत्व कहा जा सकता है। तीनों की ही अपनी विशिष्टता है। स्थूल मोहक आकर्षण तो बहुत स्थान पर विद्यमान है पर शेष विशेषताओं का वहाँ अभाव है। कहीं परिवेश ठीक है तो कहीं पर्यावरण नहीं व कहीं पर्यावरण ठीक है तो कहीं वातावरण ठीक नहीं है। ये तीनों जब विशिष्ट बन जाते हैं तो इन दुर्लभताओं का सम्मिश्रण एक अनूठा योग बनाता है जिसकी प्रभाव-सामर्थ्य अनुभूति के स्तर पर पहुँच जाती है। आज अपनी अनिवार्यता और आवश्यकता के बावजूद धरती पर ऐसे स्थान नगण्य हैं जहाँ वे तीनों ही-परिवेश, पर्यावरण और वातावरण उच्चस्तरीय शक्ति संपन्न हों, परस्पर घुले मिले हों व एक दूसरे के प्रभाव को बढ़ाते हों। जहाँ जाकर व्यक्ति अपनी जीवनचर्या, स्वास्थ्य, व्यवहार और संस्कारों में सुनिश्चित कायाकल्प अनुभव करता है। जीवन की उल्टी धारा को मोड़कर सीधा कर सही अर्थों में जीवन जीना सीख लेता है। ऐसा ही एक विलक्षण संयोग गायत्री तीर्थ शाँतिकुँज, गायत्री तपोभूमि मथुरा, जन्मभूमि आंवलखेड़ा तथा उन सभी स्थानों पर देखने को मिलता है, जहाँ-जहाँ परम पूज्य गुरुदेव के चरण पहुँचे। उनके द्वारा वंदनीय माताजी के द्वारा जहाँ तप संपन्न हुआ, वह स्थान वहाँ के प्रसुप्त संस्कार ऋषि सत्ता के ओजमय आभामण्डल से अनुप्राणित हो धन्य बन गए।
यह तथ्य इस संदर्भ में इसलिए भी महत्वपूर्ण बन जाता है कि आज के इस भौतिकवादी युग में ऐसा पुरुषार्थ विस्मृतप्राय दीख पड़ता है, जो वातावरण के उच्चस्तरीय शक्ति स्पंदनों को सघन बनाए रख सके। मानवी विकास के लिए चेतना जगत में प्रवेश कर उच्चतम स्थितियों तक पहुंचने के लिए इसके सिवा कोई अन्य रास्ता भी नहीं है। कभी जब हमारी धरती पर सतयुगी परम्पराएँ जीवन्त थीं तो उसके पीछे वह प्रयास पुरुषार्थ ही था जिसके द्वारा हर ग्राम को एक छोटे-मोटे तीर्थ का रूप दे दिया गया था। मात्र यही नहीं विशिष्ट स्थानों में कठोर तपश्चर्या के बलशाली चुम्बक द्वारा पवित्रता, प्रफुल्लता शाँति जैसे जीवनदायी-ऊर्जामय तत्वों से भरी पूरी ऐसी चादर तान दी जाती थी, जिसके साये में मानव अपने दैनन्दिन जीवन के संताप, आकुलता, आधि-व्याधियों से छुटकारा पा सके। यह चादर मजबूती से तनी रहे इसके लिए सतत् जप-सत्प्रवृत्ति विस्तार तंत्र द्वारा तप की चुम्बकीय सामर्थ्य सक्रिय बनाये रखने का दायित्व जो सतयुग में पूरा होता था आज जिन उँगलियों में गिने जाने योग्य स्थान पर होता देखा जाता है, उनमें एक शाँतिकुँज है।
पौराणिक आख्यानों में ऋषियों की तपोभूमियों के वातावरण का, विशिष्ट प्रयोगशालाओं का वर्णन हमारे लिए कौतूहल का विषय हो सकता है, पर यह एक जाना माना तथ्य है कि व्यक्ति विशेष की तपचेतना से वह वातावरण जो उसके आसपास का है, विशिष्ट ऊर्जा से अनुप्राणित हो जाता है। ऋषि अरविन्द घोष अलीपुर जेल की जिस काल कोठरी में रहे, उनके जाने के बाद जेलर ने वहाँ किसी अन्य कैदी को रख दिया। योग से अनुप्राणित वातावरण की सघनता कैदी के मन पर हावी हो जबरन किन्हीं ऊँचाइयों की ओर ले जाने लगी, अनभ्यस्त मन घबरा गया। पागल होने की सी स्थिति पैदा हो गयी। अँग्रेज जेलर को जब कारण पता चला तो उसने स्थान बदलवाया। इतनी प्रबल प्रभाव सामर्थ्य होती है तप शक्ति से निकले स्पन्दनों में। “चम्पक लाल की वाणी” में लेखक ने उद्धृत किया है वह स्वयं पाटन शहर के पास बावड़ी नामक गाँव में तालाब के किनारे लेट गया। लेटते ही उसकी गहरी समाधि लग गयी। उसे इस अद्वितीय आनन्द की उपलब्धि पर महान आश्चर्य हुआ। बाद में उसे जानकारी मिली कि एक संत ने वहाँ वर्षों कठोर साधनाएँ की हैं। दक्षिणेश्वर में जहाँ स्वयं श्रीरामकृष्ण ने जिस कक्ष में अपनी तप साधना की थी, अभी भी जाकर उस आध्यात्मिक ऊर्जा की अनुभूति की जा सकती है। बहुत चंचल मन भी वहाँ एकाग्र हो जाता है। उत्तराखण्ड में-हिमालय के हृदय में ऐसे अनेक स्थान विद्यमान हैं जहाँ बैठकर ध्यान करने मात्र से ही मन सहज ही ऊंचाइयों को स्पर्श करने लगता है। थियोसॉफी की जन्मदात्री मैडम ब्लावट्स्की ने इसे सिद्धपुरुषों की उच्चतम समिति का स्थान बताया है, जो परोक्ष जगत से संबंधित महत्वपूर्ण निर्णय लेती है। स्वयं पूज्य गुरुदेव ने चार बार दुर्गम हिमालय के इसी स्थान पर पहुँच कर तप किया। ऋषि सत्ता से साक्षात्कार किया व उन्हीं की प्रेरणा से सारे महत्वपूर्ण निर्धारण किये।
वातावरण की सिद्धि के रूप में ही शाँतिकुँज के स्वरूप को समझा जाय तो अधिक अच्छा होगा। हिमालय की पर्वतीय शृंखला के मध्य कल−कल निनाद करती गंगा की सप्तधाराओं के मध्य स्थित इस स्थान की स्थूल अलौकिकता व नैसर्गिक सौंदर्य हमें कितना ही आकर्षित क्यों न करे पर यह सिर्फ उतना भर नहीं है। यहाँ गायत्री मंत्र के प्रथम दृष्ट विश्वामित्र से लेकर भारद्वाज, कश्यप, गौतम, अत्रि, जमदग्नि, वशिष्ठ ऋषि आदि ने ज्ञान-विज्ञान संबंधी महत्वपूर्ण प्रयोग यहीं सम्पन्न किए थे। पातंजलि, चरक, कणाद, पिप्पलाद जैसे ऋषियों की परम्पराएँ कभी यहाँ चलती थीं। आज उन सभी परम्पराओं का यहाँ जाग्रत जीवन्त कर इसे एक सिद्ध पीठ बनाया गया है।
चौबीस वर्ष तक जिसके मार्गदर्शन संरक्षण में पूज्य गुरुदेव के महापुरश्चरण संपन्न हुए वह अखण्ड दीपक यहाँ स्थापित है। उसी के प्रकाश में “अखण्ड-ज्योति” का लेखन कार्य संपन्न होता गया तथा अनेक करोड़ होता है। वंदनीया माताजी ने 16 कुमारिकाओं द्वारा यहीं अखण्ड महापुरश्चरण संपन्न कराया। परम पूज्य गुरुदेव की सूक्ष्मीकरण साधना जो वर्षों चली, यहीं संपन्न हुई। इस प्रकार से यह संस्कारित शक्ति केन्द्र है जहाँ आने वाले का भावनात्मक कायाकल्प हो जाता है एक अनिर्वचनीय अलौकिक शाँति की अनुभूति होती है तथा उसकी मन की इच्छाएँ सहज ही पूरी हो जाती है। पूज्य गुरुदेव के महाप्रयाण के बाद उनकी परोक्ष सत्ता को गायत्री तीर्थ के सूक्ष्म स्पन्दनों में अनुभव किया जा सकता है।
जिसकी जितनी ग्रहणशीलता है, उसी अनुपात में वह पाता है। ग्रहणशीलता के अभाव में ही सुमेरु शिखर पर चढ़ दौड़ने वाले पर्वतारोही वहाँ के दिव्य वातावरण के स्पन्दनों से रीते बने रहते हैं। तीर्थ यात्रा कर चारों धाम की उत्तराखण्ड की यात्रा कर आने वाले मात्र पर्यटन का ही लाभ ले पाते हैं। शारीरिक स्तर की ग्रहणशीलता बर्फ की कँपकँपी भर दे पाती है। यदि शरीर के साथ प्राण को गायत्री तीर्थ के महाप्राण से एकाकार करने की कोशिश की जाय तो न केवल व्यवहार की दुर्बलता से मुक्ति मिलेगी, प्रसुप्त संस्कार भी जागेंगे व्यक्तित्त्व रूपी उद्यान में दिव्यता के बीज बोए जा सकेंगे। जागरुक भावनाशीलों के लिए शाँतिकुँज प्रेरणा की गंगोत्री बना युगों-युगों तक मार्गदर्शन करता रहेगा।
“तारीख 6 को जो स्वप्न तुमने देखा था, वह स्वप्न नहीं-योगतन्द्रा की स्थिति थी। हम कभी-कभी अपने स्वजनों की देख भाल के लिए सूक्ष्म शरीर से जाया करते हैं। उस दिन तुम्हारे पास भी अपना वात्सल्य प्रकट करने गये थे। सा ही तुमने देखा।” ऐसे स्पष्ट संकेत परम पूज्य गुरुदेव की लेखनी से कम ही देखने को मिले हैं पर जहाँ लिखा है, सब खोल कर स्पष्ट लिखा है। वे सभी सौभाग्यशाली थे, जिनके पास उन्हीं की लेखनी में साक्षी रूप में ये पत्र हैं तथा अनुभूति रूपी निधि जिनकी अमूल्य धाती बन गयी।
परमपूज्य गुरुदेव लीला प्रसंग : 5
“आपकी भावनाएँ हमें पुलकित कर देती हैं। माताजी ने पत्र पढ़ा तो आँखों में आँसू भर लाई। भगवान को किसी ने देखा नहीं और न उनके स्थान आदि का कुछ पता है। फिर भी भावना के वशीभूत वह मदारी के बन्दर की तरह भक्त के इशारे पर नाचता रहता है और सामने आ खड़ा होता है। हम भी आपसे कभी विलग न होंगे। चमड़ी का पिंजड़ा यदि दूर रहे तो भी कुछ बनता बिगड़ता नहीं। हमारी आत्मा को आप सदा अपने ऊपर मंडराती अनुभव करेंगे।” 18 मार्च 1970 को परम पूज्य गुरुदेव द्वारा एक परिजन को लिखे पत्र की ये पंक्तियाँ बताती हैं कि कितने सशक्त सघन आत्मीयता के सूत्रों में बाँधकर उनने गायत्री परिवार रूपी विशाल संगठन खड़ा किया। भाव संवेदना शब्दों में से निर्झरिणी की तरह प्रवाहित हो रही हो, ऐसा उनका संदेश होता। अगणित व्यक्तियों तक यह भावना की गंगोत्री विगत पचास वर्षों में लेखनी व वाणी के माध्यम से बही व उसमें स्नान कर सभी धन्य हो गए।
सुनिश्चित आश्वासन देते हुये वे एक परिजन को लिखते हैं “हमारे जीवित रहते व उसके बाद भी हमसे जुड़े होने के कारण आपको कुछ भी चिन्ता करने की आवश्यकता नहीं है। पत्र द्वारा ही नहीं आत्मा से आत्मा की प्रेरणा द्वारा भी हमारी शिक्षा आप तक बराबर पहुँचती रहेगी” 31-12-63 को लिखा यह पत्र साक्षी है एक ऐसे मनस्वी का जो अपने शिष्य का पूरा दायित्व अपने कंधों पर लेते हुए कहता है “मामेकं शरणं व्रज”। जिस किसी से भी पूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी ने नाता जोड़ा उस तक अनुदान निरन्तर पहुंचते रहे।
शारीरिक कष्ट से लेकर आत्मबल की कमी जैसे व्यवधान सभी के रोजमर्रा के जीवन में आते हैं। सतत् उनका समाधान होता रहा। पत्र जब भी आता था, ऐसी प्रेरणा की संजीवनी से ही भरा होता था। 18-10-1943 को उनके द्वारा एक वरिष्ठ गायत्री परिजन को लिखे पत्र से उद्धत कुछ पंक्तियाँ इस प्रकार हैं “आप उलझन और कठिनाइयों में भी धैर्य को पकड़े रहें। दिन नहीं रहा तो रात भी न रहेगी। ईश्वर सब मंगल करेंगे। अमंगल में भी मंगल की भावना करने से मन को एक अद्भुत शान्ति प्राप्त होती है। आप सदा प्रसन्न रहिए और ईश्वर को स्मरण रखिए। “इसी प्रकार एक अन्य परिजन को जो पत्र उनने 20 मई 1961 को लिखा, की पंक्तियाँ हैं-” हम अकेले पार होना कभी स्वीकार न करेंगे। जब हम पार होंगे तो उस में तुम्हारा भी साथ अवश्य होना होगा, वही तुम्हारा भी होगा। इसलिए तुम निश्चिन्त रहा करो। किसी प्रकार का डर अपने मन में न आने दिया करो।”
यही आत्मबल बढ़ाने वाले उनके शब्दों का प्रभाव होता रहा है कि लाखों परिजनों में से एक-एक उनके साथ अविच्छिन्न रूप से संबंध स्थापित कर स्वयं की प्रगति यात्रा निश्चिन्त होकर चलाता गया है। जुड़ने के बदले में जो अनुदान मिले हैं, उनका वर्णन कहाँ तक किया जाय। परिजनों की अनुभूतियों से भरी अनगिनत फाइलें जो शाँतिकुँज में जमा हैं, प्रमाण देती हैं कि कैसे विभिन्न परिजन गुरुसत्ता के सामीप्य से निहाल होते चले गए।
अनुदान एक औघड़दानी की तरह उनने जीवन भर बाँटे। किसी की तकलीफ में हिस्सा बँटाया, कष्ट से उसे मुक्ति दिलाई। मानसिक वेदना में विगलित क्षुब्ध स्वजन को कष्ट से राहत किया, तो किसी के मनोबल आत्मबल को बढ़ाते हुए प्रतिकूलताओं से जूझने का पथ प्रशस्त किया। अनुदान हमेशा पात्रता परख कर बाँटे गए। बदले में व्यक्ति को यही प्रेरणा दी गयी कि वह अपना जीवन बदले, समाज के लिए कुछ करने के लिए आगे आए। इस प्रकार सत्प्रवृत्ति विस्तार के लिए आत्मकल्याण से लोक मंगल वाला मार्ग बनता चला गया। यही नहीं यह भी स्पष्ट होता चला गया कि जो भी क्षुद्रता को त्याग कर महानता के, श्रेष्ठता के साथ अपना संबंध जोड़ेगा वह दैवी सत्ता के अनुदानों से निहाल होता चला जाएगा। परम पूज्य गुरुदेव की सत्ता स्थूल रूप से आज नहीं हैं। वे और भी व्यापक व सघनतम हो गए हैं किन्तु सतत् अनुदान अब भी सबको सहज ही उन्हें स्मरण करने मात्र से मिलते हैं इससे दैवी सत्ता का शाश्वत नियम सही प्रमाणित होता है।
एक भी परिजन, नया या पुराना, ऐसा नहीं जिसके जीवन में विलक्षण कुछ घटा न हो। घटनाक्रम के विस्तार में सामान्य बुद्धि चली जाती है, वह उसके मर्म को नहीं समझ पाती। यही बात परम पूज्य गुरुदेव बार-बार समझाते रहते थे कि घटना को नहीं उसके पीछे छिपे दैवी संबंधों को महत्व दें, नहीं तो मात्र आदान प्रदान के इस प्रारंभिक उपक्रम तक ही वह व्यक्ति सीमित होकर रह जाएगा। इसीलिए प्रेरणा भरे वचन, न कि घटना का विस्तार पूज्यवर अपने पत्रों में लिखते रहे। वे एक बहिन को 6-12-1967 के पत्र में लिखते हैं-”तुम्हारा कष्ट हमें अपना निज का कष्ट प्रतीत होता रहता है और उसके निवारण के लिए वही उपाय करते हैं जैसा कोई व्यक्ति अपना कष्ट निवारण करने के लिए कर सकता है।”
बिलासपुर (मध्यप्रदेश) के एक कार्यकर्ता के श्वसुर पेट के कैंसर से अंतिम स्थिति में टाटा मेमोरियल कैंसर अस्पताल बम्बई में भरती थे। उनकी दो बच्चियाँ शादी योग्य थीं। कार्यकर्ता महोदय ने लिखा कि एक वर्ष का जीवनदान मिल जाए तो वे जिम्मेदारी से मुक्त हो जायेंगे। पूज्य गुरुदेव ने उन्हें लिखा-”......जी का जीवन जीवनकाल बहुत लम्बा नहीं खींचा जा सकता। थोड़ी ही रोकथाम संभव हुई है। सो आप यथा संभव जल्दी ही बच्चियों की शादी से उन्हें निवृत्त कराने का प्रयत्न करें।” अप्रैल 1963 में माँगा गया जीवनदान मार्च 1964 तक चला। इस बीच उनकी दोनों बच्चियों की शादी हो गयी। सामान्य चिकित्सा द्वारा ही जीवन कार्य चलाते हुए वे जीवित रहे। अवधि समाप्त होते ही पुरानी शिकायत यथावत हो गयी व उसी रोग से उनका देहावसान हो गया।
हमेशा किसी की रोग मुक्ति पर, परेशानियों के हटने पर पूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी, श्रेय माँ गायत्री को देते व लिखते या कहते कि “माता से की गयी प्रार्थना से ही आपको यह सब मिला है। इस जीवन का श्रेष्ठतम उपयोग करने, गायत्री के सद्बुद्धि के तत्वज्ञान को जन-जन तक पहुँचाने के संबंध में विचार करें।” पटना के एक सज्जन लिखते हैं कि उनके बड़े भाई को पेशाब की थैली में कैंसर बताया गया। सभी जाँच के बाद यह कहा गया कि तीन-चार माह से अधिक वे जी नहीं पायेंगे। वे आए और शाँतिकुँज से पूज्यवर का आशीर्वाद व भस्म ले गए। भस्म का सेवन श्रद्धापूर्वक गंगाजल के साथ इस भाव से कराया गया कि यह पूज्यवर का चरणामृत है। तकलीफ ठीक होती गयी व एक्सरे भी ठीक आया। आज सात वर्ष से अधिक हो गए हैं। वे पूर्णतः स्वस्थ हैं व संस्था के कार्यों में पूर्ण सहयोगी हैं।
जबलपुर के एक सज्जन को लम्बी प्रतीक्षा के बाद पुत्ररत्न प्राप्ति हुई जाँच पड़ताल के बाद चिकित्सकों ने बताया कि मल विसर्जन का द्वार नहीं होने से इसका आपरेशन करना होगा। उन सज्जन ने पूज्यवर का ध्यान किया व प्रार्थना की कि “आपसे अब तक कुछ नहीं माँगा। पुत्र हुआ व उसको भी जन्म के तुरन्त बाद चीरफाड़ से गुजर कर जीवन भर पेट के सामने वाले भाग के एक छेद से मल विसर्जन करना होगा। कुछ कीजिए, ऐसी नारकीय जिन्दगी से उसे बचाइए।” उनकी अंतरात्मा को आश्वासन मिला तथा भर्ती होने के बाद ही चाइल्ड सर्जरी के प्रमुख ने आकर केस अपने हाथ में लिया। जाँच पड़ताल के दौरान नली गुजारने की कोशिश में पाया गया कि पतली झिल्ली सी मल द्वार के मुँह पर आवरण के रूप में विद्यमान है व अंदर के दबाव से स्वतः वह खुल गया है तथा मल विसर्जन बराबर हो रहा है। सभी चिकित्सक आश्चर्यचकित थे कि यह सब कैसे हुआ। क्या जो पहले देखा था वह गलत था, या जो अब देखा है वह गलत है। अगले ही दिन वंदनीया माताजी का पत्र उन सज्जन को सब कुछ ठीक तरह होने के आश्वासन के साथ मिला। उनका वह पत्र आज समाज को समर्पित है।
दिल्ली के एक स्वजन जो बराबर शाँतिकुँज आते रहते हैं, शोध संस्थान से जुड़े चिकित्सकों के लिए एक चलते फिरते आश्चर्य है। कारण यह कि उनके हृदय के दो वाल्व इतने अधिक विकृत हो चुके थे कि बिना आपरेशन कोई चारा नहीं था। साँस लेने में भी कष्ट होता था व हाथ-पाँव में सूजन आदि तकलीफ बराबर बनी रहती थी सभी चिकित्सकों की राय थी आपरेशन होना चाहिए। पूज्य गुरुदेव ने कहा कि जाँच करा लो पर आपरेशन जरूरी नहीं है। बिना ऑपरेशन भी काम चल जाएगा। वे दिल्ली से जाँच करा के वापस आए तो पता चला कि वाल्व इतने अधिक सिकुड़ चुके हैं कि तीन माह में ही आपरेशन करवाना होगा। तारीख भी दे दी गयी।
परमपूज्य गुरुदेव ने जाते समय फिर आशीर्वाद दिया कि घूम आओ पर आपरेशन की जरूरत नहीं पड़ेगी। भरती होने के बाद आपरेशन से एक घण्टा पूर्व जब हृदय से जुड़ी धमनियों के प्रेशर की जाँच की जा रही थी तो सब आश्चर्यचकित थे कि सब कुछ ठीक है जब कि तीन माह पूर्व की जाँच बताती है कि स्थिति बिना आपरेशन के ठीक नहीं होने वाली। चूँकि यह अवरोध “मेकेनिकल” स्तर का था, इसमें किसी प्रकार कोई गलती की अब संभावना नहीं थी। जाँच के बाद बिना आपरेशन के उन्हें भेज दिया गया, यह कहकर कि अब यह जरूरी नहीं थीं। वे सज्जन अभी भी पूर्ण स्वस्थ स्थिति में पत्रकारिता से जुड़े मिशन के कार्य का विस्तार कर रहे हैं। परम पूज्य गुरुदेव से समीप से जुड़े चिकित्सक स्तर के एक वरिष्ठ कार्यकर्ता को अभी भी चालीस से अधिक रोगियों की जानकारी है, जिन्हें हार्टवाल्व या धमनियों की खराबी होने की वजह से सर्जरी की राय दी गयी थी पर उन्हें जब गुरुदेव का आशीर्वाद मिल मिल गया तो किसी तरह की बड़े स्तर की चीरफाड़ की कोई आवश्यकता नहीं पड़ी। वे सभी स्वस्थ हैं एवं सक्रिय हैं। यह मृत संजीवनी है जो परमपूज्य रूपी अवतारी सत्ता द्वारा अनगिनत लोगों को मिलीं। सारे घटनाक्रमों को लिपिबद्ध करना ही एक असंभव कार्य है।
एक सज्जन जिनका परिवार तीन पीढ़ियों से परम पूज्य गुरुदेव से जुड़ा मानता है, दिल्ली में रहते हैं व अंश-अंश को उनका ऋणी मानते हैं। उनकी अनुभूतियाँ विलक्षण हैं। उनकी बड़ी से बड़ी विपत्तियों को परम पूज्य गुरुदेव ने टाला। जब भी किसी की व्याधि चिकित्सकों की सीमा से पार हो गयी तो उनने गुरुसत्ता का स्मरण किया व इतने मात्र व उनके दृढ़ विश्वास से सब ठीक होता गया। उनकी पत्नी को असहनीय पीड़ा से मुक्ति मिली। स्वयं वे “पेम्फीगस वल्गेरिस” नामक एक भयंकर महाव्याधि से तब पूज्यवर के आशीर्वाद से मुक्त हो गए जब उनके चिकित्सक उन्हें निराश कर चुके थे। उनके छोटे भाई की मस्तिष्क की धमनी फटने से रक्तस्राव होने से जो स्थिति हुई, उसे इन पंक्तियों के लेखक ने स्वयं देखा है। मरणासन्न स्थिति से उठाकर उस स्थिति में पहुँचा देना कि वे कुछ वर्ष के एक्सटेंशन द्वारा अपने दायित्वों को पूरा कर सकें। परिवार संबंधी सारी जिम्मेदारियाँ पूरी होने पर व मिशन से संबंधित ऋण चुकते ही उन्हें एक्सटेंशन से मुक्त कर दिया गया।
एक अंतिम रोग मुक्ति व जीवनदान वाली घटना बताकर इस अध्याय को यहीं समाप्त करेंगे। मिशन से अपरिचित किन्तु पूज्यवर की प्राणदायिनी शक्ति से परिचित हुए एक नये सज्जन शाँतिकुँज आए व नीचे बैठे रहे, यह परीक्षा के लिए कि “यदि वे तत्वज्ञ त्रिकालदर्शी हैं तो मेरे आने की जानकारी उन्हें होना चाहिए”। मिलने की, दर्श की कोई उत्सुकता उनने नहीं दर्शाई। जब पूज्यवर ने ऊपर से पूछवाया कि फलाँफलाँ सज्जन क्या नीचे बैठे हैं? वे आश्चर्यचकित रह गए क्योंकि अपनी कोई जानकारी उनने किसी को नहीं दी थी। ऊपर वे दर्शन को पहुँचे तो उलाहना सुना कि “पेट का कैंसर है तो क्या ऐसे ही ठीक हो जाएगा? गुरु की शक्ति की थाह पाना चाहते हो क्या?” वे बोले “आप जैसी महासत्ता को कष्ट नहीं देना चाहता था। प्रारब्ध मेरा है, मुझे ही भोगने दें। गुरु सत्ता का उत्तर था कि तुम्हें इससे मुक्ति दिलाएँगे ताकि तुम समाज का काम कर सको ।”एक गुलाब का फूल दिया गया व कहा गया कि एक पंखुड़ी रोज खाना जब तक फूल सूखकर समाप्त, न हो जाय। इसके बाद ही रोग से मुक्ति मिल जाएगी। जिस परिजन ने यह घटनाक्रम देखा था उसने उस रोगी से चर्चा कर बाद के घटनाक्रमों पर दृष्टि रखी। वे रोग मुक्त हो गए व अभी भी स्वस्थ स्थिति में इस घटना प्रसंग के आठ वर्ष बाद सतत् कार्यरत हैं। क्या इन सब के बावजूद हम यह प्रश्न चिन्ह लगाते रहेंगे कि हमें अध्यात्म के तत्वदर्शन से सही अर्थों में जोड़ने वाली सत्ता असामान्य ईश्वरीय स्तर की थी कि नहीं?
1964 में गायत्री परिवार दक्षिण में इतना व्यापक नहीं हुआ था। बम्बई में कुछ ही व्यक्ति पूज्यवर की व गायत्री परिवार को जानते थे। बोरिवली के एक परिजन के यहाँ परमपूज्य गुरुदेव यज्ञ हेतु पहुँचे। यज्ञ के लिए धन संग्रह मात्र एक हजार रुपये ही का आया। उसी दिन प्रेरणा ने उन्हें एक नामी मिल के मालिक के पास पहुँचा दिया व शेष राशि उसने उसी समय नगद हाथों में दे दी। वह स्वयं यज्ञ में सम्मिलित होकर धन्य हुआ।
गुरुदेव के भोजन की व्यवस्था उनके ही घर में थी। कुल 6 व्यक्तियों का भोजन बना था, घर भी छोटा था। करीब पचास से ज्यादा व्यक्ति वहाँ उनके साथ पहुँच गए थे। उनने सबको भोजन के लिए बिठा दिया व परिजन की पत्नी से कहा “जहाँ पानी का मटका रखा है, वहाँ माँ गायत्री का फोटो रखकर एक दीपक जला दो। देखते ही देखते सीमित भोजन असीम हो गया। सभी ने भोजन पेट भर किया। बाद में उतना ही बचा जितने का भोजन बनाया गया था। मानो पूज्यवर के साथ बापा जलाराम की की झोली भी वहाँ पहुँच गयी थी”
परम पूज्य गुरुदेव लीला प्रसंग : 6
“आपकी आत्मा जिस तेजी से प्रगति कर रही है, उसे देखते हुए इस जीवन में लक्ष्य प्राप्त कर लेना पूर्णतया निश्चित है। आपके संबंध में हमें उतना ही ध्यान है जितना किसी पिता को अपने बच्चों का रह सकता है” तथा “चिड़िया की छाती की गर्मी से अण्डा पकता रहता है और समय पर फूट कर बच्चा निकलता है। आप हमारी छाती के नीचे अण्डे की तरह पक रहे हैं। समय पर पक कर फूट पड़ेंगे।” तथा “गाय अपने बच्चे को दूध पिला कर जिस प्रकार पुष्ट करती है वैसे ही तुम्हारी आत्मा को विकसित करने और ऊपर उठाने के लिए हम निरन्तर प्रयत्न करते रहते हैं”। यह तीन उद्धरण परम पूज्य गुरुदेव के पत्रों से हैं जो उनके द्वारा समय समय पर विभिन्न परिजनों पर मातृवत् स्नेह की वर्षा कर एक दैवी संरक्षण प्रदान करते हुए लिखे गए। शब्दों के पीछे भाव यही थे कि जुड़ने के बाद अब हर संकट से बचाकर आगे बढ़ाना आत्मिक प्रगति की ओर ले जाना अब गुरुसत्ता को हाथों में है। इसके लिए उन्हें मन में तनिक भी असमंजस नहीं आने देना चाहिए।
सभी को साधना का सुयोग्य मार्गदर्शन एक सिद्ध पुरुष द्वारा सतत मिलता रहा ताकि अनुदानों के लिए पात्रता अर्जित हो सके। एक परिजन जो छिन्दवाड़ा, म.प्र. के हैं, जब भी पूज्यवर के पास आते, तो गायत्री साधना करने की प्रेरणा मिलती। वे अपने मन की बात कई बार चाह कर भी नहीं कह पाते थे। उनकी पत्नी को एक विचित्र व्याधि थी कि दो पुत्रियों की अकाल मृत्यु के बाद उन्हें जब भी गर्भ ठहरता बालक की भ्रूण में मृत्यु हो जाती। तीन गर्भपात हो चुके थे। वे उस ओर से निराश हो चुके थे। अपनी कष्ट कठिनाई पूज्यवर को सुनाना चाहते थे। एक बार घर से चले तो यही सोचकर कि अब वे अपनी कहेंगे, बाद में उनकी सुनेंगे। चर्चा गुरु-शिष्य में आरंभ होने से पूर्व ही वन्दनीया माताजी ने भोजन के लिए बुला लिया। भोजन करते-करते उनकी आँखों से आँसू बहने लगे। परम पूज्य गुरुदेव ने कहा “हमें तुम्हारे कष्ट का ज्ञान है। तुम समझते हो कि कहने के बाद, तुम्हारी वाणी से शब्द निकलने के बाद ही हमें जानकारी होगी। हर अनुदान की एक निश्चित अवधि होती है। साधना द्वारा तुम्हें पकाना उद्देश्य था, वह हो चुका। तुम्हें पुत्र प्राप्ति होगी व तुम्हारी सभी मनोकामनाएँ पूर्ण होंगी।” ठीक एक वर्ष बाद उन्हें पुत्र हुआ। उसके माध्यम से पति-पत्नी के जीवन में प्रसन्नता आयी। कुछ शंकाएँ गुरुसत्ता को लेकर मन में थीं तो वे दूर हो गयीं। साधना से सिद्धि का सही स्वरूप जो वे स्वयं देख चुके थे।
संतों के इतिहास में अनेकानेक घटनाक्रम हम पढ़ते रहते हैं, जिनमें उनके माध्यम से अगणित पर कृपा बरसती बताई जाती है। परम पूज्य गुरुदेव ने कृपा भी बरसायी, जीवन लक्ष्य को उत्कृष्टता के साथ जोड़ दिया। संभवतः यह उनके लीलामय जीवन का एक महत्वपूर्ण पक्ष है।
एक सज्जन जो टीकमगढ़ (मध्यप्रदेश) के हैं, को परम पूज्य गुरुदेव 30-12-62 को लिखते हैं कि “बच्चे के स्वर्गवास का समाचार पढ़कर हमें भी आपकी ही तरह आघात लगा। आपका परिवार हमें अपने निजी परिवार जैसा ही प्रिय है। ईश्वर की इच्छा प्रबल है। उसके आगे मनुष्य का कुछ भी वश नहीं चलता। प्राणी जितने समय के लिए आते हैं, उतने ही समय ठहरते हैं । विवेक द्वारा शोक को शाँत करें। स्वर्गीय आत्मा फिर आप लोगों के घर अवतरित हो, ऐसा प्रयत्न कर रहे हैं।” इतना आश्वासन देने के बाद उन सज्जन को एक नियमित अनुष्ठान में जुटा दिया गया, एक साधना सत्र मथुरा गायत्री तपोभूमि में करवाया गया और ठीक डेढ़ वर्ष बाद एक संस्कारवान जीवसत्ता उनके घर आयी। समय-समय पर उसका व्यवहार देखकर लगता था कि यह वही बालक है जो कुछ वर्ष पूर्व दिवंगत हुआ था। परोक्ष जगत में हस्तक्षेप कर अपनी प्रचण्ड शक्ति के सुपात्र शिष्य को ऐसी गुरुसत्ता क्या कुछ नहीं दिला सकती?
परम पूज्य गुरुदेव के छत्तीसगढ़ निवासी एक चिकित्सक शिष्य की कामना थी कि दो पुत्रियों के बाद जो तीसरी पुत्री उन्हें प्राप्त हुई थी व कुछ वर्ष जीकर ही इस दुनिया से चली गयी, पुनः मिल जाय। संभव हो तो जीवात्मा भले ही वह हो, पुत्र रूप में मिल जाय। कहीं आक्रोश न आ जाय, इस भय से कभी गुरुदेव से कुछ कहा नहीं। शाँतिकुँज सत्र में आए तो दो बार गुरुदेव से मिल आए पर मन की बात कह न पाए। चौथे दिन पूज्य गुरुदेव ने ऊपर अपनी ओर से बुलवाया व कहा कि “जप करते समय बार-बार मन में यह मत लाया करो कि गुरुदेव देंगे कि नहीं! कहें कि नहीं? जप में अपने मन की लौकिक कामना की नहीं, आध्यात्मिक प्रगति की बात सोचा करो। जहाँ तक पुत्र का प्रश्न है, वह हम तुम्हें देंगे। मात्र 5-6 वर्ष तक उसे अपने कन्या-रूप में पूर्व जन्म की स्मृति रहेगी। फिर क्रमशः यह आत्मा उसे भूल जाएगी।” एक मनचाहा वरदान उन्हें मिल चुका था। यह भी स्पष्ट हो गया था कि त्रिकालदर्शी गुरुसत्ता उनके मन को स्पष्ट पढ़ रही थी। वे ही अनावश्यक संशय कर रहे थे। ठीक पौने दो वर्ष बाद उन्हें एक बेटा हुआ तो जन्म से पाँच छह वर्ष तक हर बात ऐसे करता जैसे वह लड़की हो। वेश विन्यास भी वही रखने का प्रयास करता। धीरे-धीरे यह स्मृति लुप्त हो गयी। आज वही बच्चा एक मेधावी किशोर के रूप में बड़ा हो चुका है।
एक दबंग ओजस्वी कार्यकर्त्री का परम पूज्य गुरुदेव के समीप रहने वाले एक घनिष्ठ कार्यकर्त्ता को अभी स्मरण है कि कैसे उसने अपनी मनचाही बात भक्त रूप में भगवान से पूरी करायी। पहली उसकी बच्ची थी वह चाहती थी कि एक बच्चा और होने के बाद वह पूर्णतः समाज को समर्पित हो निश्चिन्त हो कर कार्य करेगी। गर्भ ठहरने पर जाँच कराने पर पता चला कि यह भी कन्या है। पति ने सलाह दी कि गर्भपात करा लेना चाहिए। उसने पति की राय नहीं मानी व सीधे पूज्यवर के पास आकर लड़ने लगी कि “आपने जो कहा था, वह किया क्यों नहीं”? परम पूज्य कृपालु गुरुदेव ने उससे सामने बैठने को कहा व निर्निमेष उसकी ओर कुछ देर देखते रहे। फिर बोले कि “तुझे तो बेटा ही होगा। गर्भपात मत कराना। इसके बाद इस शरीर व मन को समाज के कार्य हेतु लगाना। इसी शर्त पर यह आश्वासन वरदान तुझे दे रहा हूँ” जाते ही उस उच्च शिक्षा प्राप्त शंकालु युवती ने जाँच करा ली कि वरदान मिला भी या नहीं। पता चला कि गर्भ में बालक ही है। अपनी ही रिपोर्ट को वे गलत कैसे कहते, अतः चिकित्सकों ने कह दिया कि पिछली रिपोर्ट में कहीं क्लर्क की गलती हो गयी थी, नहीं तो गर्भ में लड़का ही है। आज वह महिला एक पुत्री तथा पुत्र की माँ है तथा नारी जाग्रति के कार्यों में समर्पित भाव से लगी हुई है।
गया (बिहार) की एक बहन लिखती हैं कि 1979 में वे अपने पिता के साथ हरिद्वार से यह आशीर्वाद लेकर गयीं कि उनका शीघ्र ही विवाह होगा एवं सुख-शाँति भरा उनका दाम्पत्य जीवन होगा। पूज्यवर की वाणी पर उन्हें दृढ़ विश्वास था। 1981 में उनका उनका उनके मन से मेल खाते एक युवक से विवाह हो गया। प्रारंभिक जीवनक्रम ठीक चला किन्तु तीन-चार वर्ष बाद ही सास व ननद के तानों के कारण जीवन में अशान्ति आ गयी। संतान न होने से मन दुखी था व धीरे-धीरे कलह का दाम्पत्य जीवन में प्रवेश हो गया। किन्तु मन को निराश न कर वे सबके ताने सुनते हुए भी पूज्यवर के आश्वासन के अनुरूप जप-अनुष्ठान का क्रम यथावत् चलाती रहीं। पत्र शाँतिकुँज लिखा। एक सत्र यहाँ आकर करके शक्ति अनुदान लेकर जाने को कहा गया। 1987 में उनने यहाँ अनुष्ठान किया व 1988 की जनवरी में उन्हें पुत्र की प्राप्ति हुई। उनका विश्वास दृढ़ हो गया व अब उनकी ससुराल पक्ष के सभी पूरे तन-मन धन से मिशन के कार्यों में पूरा सहयोग देते हैं।
हमेशा पूज्य गुरुदेव ने श्रेय माता गायत्री के शुभाशीर्वाद को ही दिया। 1989 में परम पूज्य गुरुदेव के महाप्रयाण के ठीक एक वर्ष पूर्व एक सज्जन साधना सत्रों में आए थे। उनसे व्यक्तिगत मेल-मुलाकात के दौरान पूज्यवर ने पूछा कि “अभी तक तुमने संस्था की ही बात की। अपने लिए व्यक्तिगत कुछ नहीं माँगा। माँ की कृपा से तुम्हें सब मिलेगा।” निःसंतान वे सज्जन कहना नहीं चाहते थे कि 48 वर्ष की उम्र हो गयी व मिशन कार्य करते हुए प्रायः बीस वर्ष। अब उन्हें अच्छा लगेगा यह कहते हुए कि बच्चा चाहिए? किन्तु मन को पढ़ने वाले महायोगी ने औघड़दानी की तरह आशीर्वाद दिया” तुम जो सोच रहे हो वही होगा। हमारे द्वार से कोई खाली हाथ वापस नहीं गया।” परम पूज्य गुरुदेव के महाप्रयाण के अगले दिन ही उनकी पत्नी ने एक स्वस्थ पुत्र को जन्म दिया। जहाँ इष्ट के स्थूल शरीर त्यागने का संताप उन्हें था, वहाँ पुत्र रूप में देव संतति भेजकर उन्हें निहाल कर दिया गया।
समय-समय पर वे परिजनों को पत्र देते”कन्या बहुत ही शुभ घड़ियों में जन्मी है। उसे पुत्र समान ही प्यार करें।” कोई व्यक्ति जब पूज्यवर के पास आकर अपनी ओर से पुत्र होने न होने की बात करता तो उसे रोष का ही सामना करना पड़ता था। उन्हें बड़ा गुस्सा आता था लोगों की इस मानसिकता पर व वे बेटा-बेटी में भेद न करने पर सतत जोर दिया करते थे। किसी के अधिक आग्रह करने पर कहते कि “बेटा हो गया व वह तेरी सम्पत्ति हड़प कर तुझे घर से बाहर निकाल दे उससे अच्छा है कि तू बेटी से ही संतोष कर । वह देवी स्वरूपा है, तेरा नाम ऊँचा करेगी। कोई और आग्रह करता तो कहते कि” हमारे पास कुछ नहीं है। हम तो माँ से माँगते हैं। हमारे अपने बेटे की तीनों बेटियाँ हैं व वह उन्हें बेटे की तरह पालता है। हमने उसके लिए ही बेटा माँग लिया होता, यदि हमारे पास शक्ति होती। इसके बाद भी यदि किसी ने और आग्रह किया तो उनका क्रोध जिनने देखा है, वह जानता है कि स्वयं महाकाल रौद्र रूप धारण कर ले, ऐसी उनकी स्थिति होती थी। एक बार उनने एक जिद्दी दम्पत्ति को तो श्राप ही दे डाला कि बच्चों की इन्हें इतनी ही ललक है तो ध्यान रखें पहले छह लड़कियाँ ही होंगी फिर एक नाकारा पुत्र होगा। सारा जीवन पूरा श्रम-उपार्जन कर जो पूँजी वे एकत्र करेंगे उससे बेटियों का विवाह तो किसी तरह हो जाएगा पर उनकी शेष दुर्गति उनका बेटा करेगा, जिसके लिए वे इतना आग्रह कर रहे हैं। इस घटनाक्रम को जानने वाले कहते हैं कि यही हुआ। अब वे पश्चाताप भरे आँसू बहाते हैं कि ऐसी सत्ता के पास आकर माँगा भी तो क्या माँगा?
वस्तुतः परम पूज्य गुरुदेव रूपी दैवी-अवतारी सत्ता ने जीवन भर पात्रता व मानसिकता के अनुरूप बाँटने का क्रम रखा। लालीपॉप, टॉफी, खिलौनों के द्वारा बच्चों को जैसे बहलाया जाता है, ऐसे ही मनोकामना पूरी करते रहे किन्तु सतत यह प्रेरणा देते रहे कि मानव जीवन का लक्ष्य क्या है व उन्हें क्या करने भेजा गया है, इसे ध्यान में रखें। जिनने प्राथमिक कक्षा पास कर उनके दूसरे परामर्श को ध्यान में रखा वे प्रगति कर सके, जीवन को ऊँचा उठा सके। जो प्रथम तक सीमित रहे व थोड़ा पाने के बाद और पाने की ललक मन में बनाए रहे, उनका जीवन सामान्य ही रहा, जब कि ऐसी सत्ता का सामीप्य पाकर तो उसे आमूलचूल बदल जाना चाहिए था।
एक परिजन को 16-9-61 को लिखे गए पत्र में वे प्रेरणा देते हुए कहते हैं-”आपका छोटा बालक उन्हीं महान आत्माओं में से एक है जो युग परिवर्तन करने के लिए पृथ्वी पर आ रही हैं। यह बालक गौतम बुद्ध की तरह सारे संसार में धर्म की ज्योति जगाएगा। इसे बहुत प्रयत्नपूर्वक बुलाया गया है। ज्योतिषियों के जन्म पत्र इसके ऊपर लागू नहीं होते। इसके दीर्घ जीवन की देखभाल हम स्वयं कर रहे हैं।”इस उच्चस्तर का संरक्षण था व शक्ति का प्रवाह था, जो वह मथुरा व हरिद्वार में बैठे सतत् करते रहे। इसके माध्यम से अनगिनत को उनने अपनी सन्तान को सुसंस्कारी बनाने हेतु प्रेरित किया। पूर्व जन्म के सुसंस्कारों का हवाला देकर उन्हें स्वयं मनु-शतरूपा की तरह तप करते रहने व संतान की लौकिक नहीं, आध्यात्मिक प्रगति हेतु प्रयास करते रहने की सतत प्रेरणा दी। इक्कीसवीं सदी के लिए नवनिर्माण के स्तम्भ उन्हें इसी माध्यम से मिलने जो थे।
1958 के सहस्रकुण्डी गायत्री महायज्ञ की तैयारी चल रही थी। परमपूज्य गुरुदेव ने 1940 से जुड़े बाँदा (उ.प्र.) के एक परिजन को बुलाकर निर्देश दिया कि वे हिमालय से अपने वाले ऋषियों के आतिथ्य का कार्य भार हाथ में लें। उन्हें पाद-प्रक्षालन कर अलग से कंद-फूल-फल द्वारा उनका सत्कार करने का निर्देश मिला। यज्ञ शुभारंभ से कुछ पूर्व ही सूक्ष्म ऋषिसत्ताएँ इस पावन प्रयोजन पर शरीर धारण कर आयीं। यज्ञ स्थल की परिक्रमा के बाद एक अलग कक्ष में उन्हें स्वल्पाहार कराया गया। मात्र परमपूज्य गुरुदेव व वे परिजन इस पूरे घटनाक्रम के साक्षी हैं और किसी ने न यह सब देखा न किसी को स्मरण ही है कि उस पूरी अवधि में पूज्य गुरुदेव मुख्य यज्ञ कुण्ड छोड़ कर कहीं और भी गए थे?
एक पत्र में कार्यकर्ता को वे लिखते हैं कि वे अपनी धर्मपत्नी को उपासना के लिए प्रेरित करें, उन्हें मार्गदर्शन देते रहें। वे लिखते हैं “आपकी धर्मपत्नी इतिहास में अमर रहने वाली महापुरुषों की माताओं से एक होंगी। उसके अनुरूप ही उन्हें बनना है।” यह कितनी सशक्त प्रेरणा है, जिसके माध्यम से परम पूज्य गुरुदेव ने गृहस्थ संस्था में एक अभूतपूर्व क्रान्ति कर दी। उन्हें समय के अनुरूप संन्यासियों की नहीं, सही जीवन जीने वाले सद्गृहस्थों की आवश्यकता थी। उन्हीं के माध्यम से जन-जन तक पहुँच सकने वाली क्रान्ति संभव थी। आज पीछे मुड़ कर देखते हैं तो लगता है कि कितनी बड़ी प्रक्रिया उस महामानव के माध्यम से संपन्न हुई। श्रेष्ठता की ओर साथ यात्रा करने वाले, सही जीवन कला सीखकर वैसा ही जीवन में उतारने वाले सुसंस्कारी सद्गृहस्थ-दंपत्ति उनने युगनिर्माण परिवार के रूप में दिए, यह एक चमत्कार नहीं तो और क्या है? अपने परिवार के एक-एक बच्चे की उन्हें कितनी चिन्ता रहती थी, यह इस पत्र से स्पष्ट होता है, जो उनके द्वारा 3-10-58 को बरेली की एक बहिन को लिखा गया -”बच्चे के लिए जो अनिष्ट है उसे हम तुम से भी अधिक स्पष्ट रूप में देखते हैं। उसे टालने की हमें पूरी-पूरी चिन्ता है और तुम्हें बिना बताए ही जो कुछ संभव है सो हम सब कुछ कर रहे हैं। तुम्हारा बच्चा हमें अपने बच्चे से अधिक प्रिय है।” आज वह बालक मिशन का एक सशक्त कार्यकर्ता है व प्राणपण से नवनिर्माण के प्रयोजनों में लगा हुआ है। श्रेष्ठ आत्माएँ कहाँ व कब अवतरित हों, इस संबंध में वे समय समय पर पत्र द्वारा तथा लेखों द्वारा दिग्दर्शन कराते रहते थे।
अक्टूबर 1967 में “महाकाल एवं उसकी युग प्रत्यावर्तन प्रक्रिया के अंतर्गत पूज्यवर ने “अखण्ड-ज्योति” पत्रिका में लिखा कि “विशेष प्रयोजन के लिए विशिष्ट आत्माओं का अवतरण हो चुका है। परिवर्तन प्रक्रिया की पृष्ठभूमि तैयार करने की ईश्वरीय जिम्मेदारी कुछ विशेष आत्माओं पर सौंपी गयी है। उन्हीं को “अखण्ड-ज्योति परिवार “ के अंतर्गत संगठित कर दिया गया है। जो आत्माएँ बाहर हैं, वे भी अगले प्रवाह में साथ हो लेंगी।” इन आत्माओं का आह्वान वे 1971 के बाद अखण्ड-ज्योति के लेखों द्वारा सतत् करते रहे। 1980-81 में जब शाँतिकुँज में देव परिवार बसाने की उनने चर्चा की तब भी इसी पक्ष को प्रधानता दी। बाद में 1988 में 12 वर्षीय युग संधि पुरश्चरण आरंभ करते समय भी विशिष्ट आत्माओं के जन्म लेने की, या जन्म ले चुकी हैं तो उन्हें आत्म बोध होने की उनने बार-बार चर्चा की। शाँतिकुँज द्वारा इस वर्ष चलाए गए देवस्थापना कार्यक्रम के मूल में भी परम पूज्य गुरुदेव का ही निर्देश व प्रेरणा है कि इसी माध्यम से देव शक्तियाँ अवतरित हों युग परिवर्तन का मूल प्रयोजन अगले दिनों पूरा करेंगी।
जिन्हें पत्रों द्वारा, पत्रिका द्वारा अथवा व्यक्तिगत संपर्क के माध्यम से परमपूज्य गुरुदेव के दैवी अनुदान भिन्न-भिन्न रूपों में मिले, वे भूल न जाएँ कि किस सत्ता से उनका साक्षात्कार हुआ था, आश्वासन दिया गया है कि सूक्ष्म कारण शरीर से वे बराबर उन सभी को झकझोरते रहेंगे। पहले जो कार्य प्रत्यक्षतः किया था, उसी को परोक्ष रूप में पूरे विश्वभर में विस्तारित करने हेतु ही स्थूल काया के बंधन से परम पूज्य गुरुदेव मुक्त हुए हैं। यह स्मरण आते ही हमें अपनी नित्य साधना में उनकी अनुभूति सहज ही होने लगेगी।
सन् 1970 की यह घटना है। परम पूज्य गुरुदेव उन दिन बहुधा बाहर ही बने रहते थे। उस दिन मथुरा से यात्रा कार्यक्रम से लौट ही थे। बेतिया के एक गायत्री परिजन श्रीराम कृष्ण सिंह परिवार सहित शिविर हेतु मथुरा गायत्री तपोभूमि आए थे। परम पूज्य गुरुदेव के दर्शन हेतु वे घीयामण्डी पहुँचे। चरण स्पर्श के पश्चात् कुशल क्षेम पूछी गयी। रामकृष्ण जी ने सबसे वृत्तान्त बताते हुए कहा कि “श्री उमाकान्त जी झा ने आपको प्रणाम कहा है।” श्री उमाकान्त झा एक 42 वर्षीय कर्मठ कार्यकर्ता थे। पूज्यवर से वर्षों से जुड़े थे। कुछ क्षण बाद पूज्यवर बोले “उमाकान्त एक बार आ जाते तो भेंट हो जाती। अब उनका समय पूरा हो रहा है।” इतना कहकर बातों का प्रवाह उनने दूसरी ओर मोड़ दिया। रामकृष्ण यह सब समझ नहीं पाए कि ऐसा क्यों पूज्यवर ने कहा।
शिविर समापन के बाद रामकृष्ण सिंह वापस बेतिया चले गए। कुछ दिन बाद उनका एक पोस्टकार्ड परमपूज्य गुरुदेव के नाम आया, जिसमें लिखा था “हम उस समय समझ नहीं पाए थे पर यह यहाँ आने पर पता चला कि जब आप यह बता रहे थे कि उमाकाँत आ जाते तो अच्छा रहता, अब उनका समय पूरा हो रहा है, उसी दिन अचानक वे अस्वस्थ हुए व रात्रि को चिर निद्रा में सो गए॥ आपके कहे का गूढ़ अर्थ हमारी समझ में अब आया है।”
परोक्ष जगत में घट रहे एक एक घटनाक्रम की जानकारी जिस दैवी सत्ता की थी, उनसे संबंधित इस प्रसंग की साक्षी स्वरूप यह पोस्टकार्ड व उस वार्तालाप को सुनने वाले एक वरिष्ठ कार्यकर्ता शाँतिकुँज में अभी भी है। श्री रामकृष्ण सिंह तो इसके प्रत्यक्ष प्रमाण हैं हीं।
है यह बात सखे! स्थिर-हम तुम सबके अंतर्मन में।
अब भी रहते हैं वे “शान्तिकुँज” के ही आँगन में॥
करुणापूर्ण हृदय उनका है, मधु ममत्व की राशि।
छोड़ हमें-वे हो न सकेंगे, अन्य लोक के वासी।
याद करो आ जायेंगे वे, अभी उदास नयन में॥
उनके जाने का न तनिक दुख, हम निज मन में मानें।
पूर्ण करें युग परिवर्तन का कार्य, उन्हें पहचानें।
वे हैं शाश्वत दिव्य ज्योति, भर लें वह निज चेतन में॥
केवल तन ने यात्रा की है-मन तो यही बँधा है।
सिर्फ न रोये हम, उनका भी विह्वल कंठा रुँधा है।
रोज उतरते हैं प्रकाश बन, पूजा वाले क्षण में॥
आये थे वे हम सबकी ही, ब्रह्मकमल विकसाने।
अतः अधिक तप ऊर्जा लेने पहुँचे नंदन वन में॥
-माया वर्मा
व्याप्त हो मन-प्राण में, किसने कहा?
फूल ही ओझल हुआ है, गंध हमको दे गये हो॥
की तपश्चर्या-तपाकर, स्वर्ण की भी भस्म कर ली।
तुम बहे बन गंगा, हमने भूमि की हर चीर भर ली॥
प्रेम का झूला पड़ा, सबने मनाया खूब सावन।
शुष्कता हर कर तुम्हीं ने, मन बनाये सरल-पावन॥
“आऊँगा अगले बरस फिर,”बात यह कह के गये हो॥
बस-बसेरा किया, यह पीढ़ी उसी पर सो गयी है॥
जिस हवा में साँस ली तुमने, उसी में रह रहे हैं।
है न कोयल, सिर्फ स्वर को याद कर यह कह रहे हैं॥
आत्मगृह में बस गये, तब टिके हैं प्राण प्यारे॥
और गंगा जल भरा है, नयन के इन कोटरों में।
कूक कोयल की बसी है, प्राण में मन में, उरों में॥
अण्ड भी पकने लगा है तुम जिसे खुद से गये हो॥
-माया वर्मा
आप विश्वास देकर गये हैं हमें, अब अधिक हमारे पास में आयेंगे।
दिव्य संवेदना छलछलाते हुए, आप अन्तःकरण में उतर जायेंगे॥
इस विरह दग्ध अन्तःकरण में प्रभो, आप इस रूप में ही चले आइये।
लोक-पीड़ा शमन हेतु मन, प्राण में, दिव्य संवेदना बन समा जाइये॥
विश्व-पीड़ा कसकने लगे प्राण में, प्राण जब आप से प्रेरणा पायेंगे।
दिव्य संवेदना छलछलाते हुए आप अन्तःकरण में उतर जायेंगे॥
स्त्रोत संवेदना के रहे सूख अब, मानवी वेदना बढ़ रही इन दिनों।
व्यक्ति डूबे हुए व्यक्तिगत स्वार्थ में, भोग की वारुणी चढ़ रही इन दिनों॥
आप छाये न अन्तःकरण में अगर, क्रूर दुर्भाव मस्तिष्क पर छायेंगे।
आप विश्वास देकर गये हैं हमें, अब हमारे अधिक पास में आयेंगे॥
स्वार्थ को छोड़ सर्वार्थ पथ पर बढ़ें, बस यही प्रेरणा आप देना हमें।
प्राण पर पीर से छटपटाने लगें, दिव्य संवेदना आप देना हमें॥
दिव्य संवेदना स्त्रोत के साथ भी, प्राण क्या शुष्क पाषाण रह जायेंगे।
आप विश्वास देकर गये हैं हमें, अब हमारे अधिक पास में आयेंगे॥
-मंगल विजय
देह त्याग कर तुम अनन्त विस्तार हुए, स्वयं देह की सीमाओं के पार हुए।
सूक्ष्म हुए इतने कि तुम्हारी करुणा ने, छुआ धरा-नभ के हर कोने, हर कण को।
तुमने सोची जाति-वंश की बात नहीं, लक्ष्य तुम्हारा था सँवारना जन-जन को,
आत्म-चेतना का इतना विस्तार किया, काया छोटी पड़ी, तुम्हीं अवतार हुए।
विश्वामित्र, वशिष्ठ और ब्रह्मा जी ने, जिस गायत्री को कर सिद्ध, प्रसन्न किया,
प्रतिबन्धित जो रही, उसी गायत्री को, मुक्त किया, जन-श्रद्धा ये सम्पन्न किया,
प्रबल वेग धारण कर उसका स्वयं तुम्हीं, ज्ञान-शिखर बन, सुगम गंग की धार हुए।
तुमने दीप दिखाया यूँ मानवता को,स्वयं तुम्हीं सम्पूर्ण विश्व की दृष्टि बने,
तुमने किया प्रयत्न कि खण्डहर संस्कृति पर, श्रेष्ठ विचारों वाली नूतन सृष्टि बने,
ऐसी भीषण क्रान्ति विचारों में की जो, युग-दृष्ट तुम, युग के नवल विचार हुए।
आना है उज्ज्वल भविष्य अब-तुमने ही, दहशत भरी मनुजता को यह ज्ञान दिया,
किन्तु भयंकर तूफानों से लड़ने को, सभी प्रखर प्रतिभाओं का आह्वान किया,
महाकाल की वाणी बनकर तुम्हीं यहाँ, नये सृजन के लिये सुदृढ़ आधार हुए।
-शचीन्द्र भटनागर
परम पूज्य गुरुदेव की लेखनी, जो पत्रों व पत्रिकाओं द्वारा संजीवनी बनकर जन-जन तक पहुँची, से अनगिनत परिजनों को नूतन प्राण मिले हैं। जिनने उनकी वाणी सुनी है, वे जानते हैं कि वह सीधे अंतस् में प्रवेश कर व्यक्ति का कायाकल्प कर देती थी। उनके एक महत्वपूर्ण उद्बोधन के महत्वपूर्ण अंशों का अविकल रूप यहाँ उसी की जानकारी देने के लिए प्रकाशित किया जा रहा है। तीन जून, 1971 गायत्री जयंती को गायत्री तपोभूमि मथुरा में दिया गया उनकी कर्म भूमि का यह अन्तिम पर्व उद्बोधन था। इस वर्ष गायत्री जयंती (21 जून 1991) पर उनके महाप्रयाण (2 जून 1990) के ठीक एक वर्ष बाद उसी गुरुवाणी को सुविज्ञ भावनाशील पाठकों के लिए यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है।
गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ बोलिये “ऊँ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो योनः प्रचोदयात्।”
यह विश्व जब बना तब मानव भी अन्य प्राणियों की भाँति उसी तरह का था जैसा कि सभी प्राणी अपना शरीयापन करने के लिए संघर्ष करते, भूख पूरी करने के लिए परिश्रम करते और पैदा करने में लगे रहते हैं। ब्रह्माजी विचार करने लगें “इतना परिश्रम जो मनुष्य के ऊपर किया गया, किसलिए किया गया? अगर मनुष्य को भी कीड़े-मकोड़े की तरह जीना था तो उसके लिए इतना सारा परिश्रम किस लिये?” ब्रह्माजी ने विचार किया कि यदि यह प्राणी भी अन्य प्राणियों की तरह पेट पालता रहा, बच्चे पैदा करता रहा और अपने अहंकार की पूर्ति के लिए आपस में संघर्ष करता रहा तब फिर इतना परिश्रम बेकार गया समझा जाना चाहिए। विचार करने के बाद ब्रह्माजी ने कहा-”मनुष्य जिन विशेषताओं के लिए बनाया गया है, उसे विशेषताओं के लिए कुछ अनुदान भी देना चाहिए” ओर वह अनुदान उसे “ऋतम्भरा प्रज्ञा” का दिया गया। विवेकशीलता, विचारशीलता, उच्चकोटि के आदर्शों में निष्ठ इन सब चीजों समन्वय का नाम है- “ऋतम्भरा प्रज्ञा।” ऋतम्भरा प्रज्ञा अर्थात् विवेकशीलता, विवेकशीलता अर्थात् उन उद्देश्यों को याद रखना जिनके लिए भगवान ने मानव प्राणी को बनाया। इस ऋतम्भरा प्रज्ञा की, इस विश्व के प्रारम्भ में इस संसार स्वर्ग से गंगा भगीरथ के द्वारा लाई गई।
ऋतम्भरा प्रज्ञा की धारा, आध्यात्मिक धारा स्वर्गलोक से आई, देवताओं से जमीन पर आई और मनुष्यों में प्रवाहित होने लगी। मनुष्यों में जब वह धारा प्रवाहित होने लगी, तब ऋतम्भरा प्रज्ञा का नाम पूजा-उपासना की, आध्यात्मिकता की भाषा में रखा गया -गायत्री विद्या, ब्रह्म विद्या। आज उसी महान शक्ति का जन्म दिन है। वह महान शक्ति मनुष्य की तमाम शक्तियों को उभारने वाली है।
ऋद्धियों और सिद्धियों के बारे में अनेक बातें बताई जाती हैं। यह कहा जाता है कि मंत्र अनेक सामर्थ्यों के पुँज हैं, शक्तियों के-सिद्धियों के पुँज हैं। क्या यह बात सही है? हाँ, यह बात यह बात सही है, यदि गायत्री महामंत्र के स्वरूप को समझा जाए और जीवन में धारण किया जाय, तब। गायत्री का स्वरूप ही न समझा जाय और उपासना उसकी जिस तरीके से की जाती है, उस तरीके से न की जाय तो उससे न तो भीतर से सिद्धियाँ उपजती हैं, न विभूतियाँ। स्वरूप क्या? स्वरूप यह कि मनुष्य का जो विवेक सो गया है, उसे जाग्रत किया जाय।
ऋतम्भरा प्रज्ञा यह सिखाती है कि “मनुष्य! अहंकार में डूबे मत! बड़े आदमी बनने की चाह और ललक से अपने जीवन को बरबाद करे मत।”ऋतम्भरा प्रज्ञा के तीन शिक्षण हैं, गायत्री मंत्र के तीन चरण हैं। ऋतम्भरा प्रज्ञा अर्थात् ब्रह्म विद्या-ऋद्धियों-सिद्धियों से भरी विद्या। इसका स्वरूप समझा जाना चाहिए जैसा कि मैं आपको समझा रहा हूँ और जैसा कि मैंने अपने जीवन में इस महाविद्या का स्वरूप समझने की कोशिश की।
मैंने ऋतम्भरा प्रज्ञा का पहला चरण यह समझने की कोशिश की कि मनुष्य को यश का भूखा नहीं होना चाहिए, बड़प्पन का भूखा नहीं होना चाहिए, अहंकार का पुतला नहीं होना चाहिए। दूसरों के ऊपर अपना रौब गालिब करने का और दूसरों की आँखों में बड़ा आदमी बनने का इच्छुक नहीं होना चाहिए। अगर आदमी इस तरह का बन गया तब उसका सारा सामर्थ्य और सारी की सारी जो विशेषताएँ हैं, भगवान ने जिनके लिए मनुष्य को बनाया है, वे उसके पास रह नहीं जावेंगी। मनुष्य निकम्मा और बेकार होकर रह जाएगा। मनुष्य का अहंकार जब तक बना रहा, उसकी पूर्ति में जब तक वह इच्छुक है, तब तक वह भगवान की इच्छा को पूरा नहीं कर सकता। न उसके पास समय बच सकता है, न शक्ति,न पैसा बच सकता है। अहंकार आदमी का बादल के बराबर, सुरसा के मुँह के बराबर है। इतना बड़ा है कि उसमें एक जीवन क्या, हजारों जीवन समाप्त हो जाएँ तो भी इसकी पूर्ति नहीं हो सकती। ऐसा आदमी भगवान के लिए काम कर सकता है? नहीं। लोकमंगल और आत्मकल्याण के लिए काम कर नहीं सकता। समय और शक्ति को बरबाद करने वाले अहंकार को मिटाना ऋतम्भरा प्रज्ञा का गायत्री मंत्र का पहला चरण है।
दूसरा चरण यह कि मनुष्य को अपनी दो शारीरिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए इतना व्याकुल-बेचैन नहीं होना चाहिए। मनुष्य को जो शरीर मिला वह उसे पहनने का लिबास मात्र है, आदमी का निवास है घोड़ा है साइकिल है और इस साइकिल के लिए इतना बेचैन नहीं होना चाहिए कि सवार की इच्छा, आवश्यकता को ही भूल जाये। कलेवर की, इस शरीर की दो आवश्यकताएं हैं-एक वह कि आदमी को भूख लगा करती है और रोटी की जरूरत होती है और भगवान ने, जिस दिन वह पैदा हुआ था यह विश्वास दिलाया था कि “मनुष्य जब तक तू जिन्दा रहेगा, तब तक बराबर कोशिश करता रहूँगा और बराबर तेरी सहायता करता रहूँगा। कोई भी दिन ऐसा नहीं जाएगा कि अगर तू अपना पुरुषार्थ करता रहा तो पेट भरने के के लिए कमी पड़े।” भगवान ने, जिस दिन “मनुष्य पैदा हुआ था, यह शिक्षण दिया था कि माँ के पास गरम-गरम दूध के डिब्बे तुम्हारे लिए रखे हैं और यह सुविधा हमने इसलिए दी है कि जन्म होने पर तुम्हें यह मालूम पड़े कि हमारे ऊपर कोई संरक्षक शक्ति है।” उसने यह शिक्षण दिया था, पैदा हुआ था मनुष्य जब, कि तेरे लिए धोबिन तैयार तेरे कपड़े धोने के लिए, तेरा खर्च उठाने के लिए तेरा बाप तैयार, ये मेरे नुमाइन्दे हैं तेरे लिए । मनुष्य पेट के लिए भटकना मत। पेट के लिए सिद्धान्तों को भूलना मत। पेट मैं तेरा भरता रहूँगा। जब कीड़ों-मकोड़ों का सबका भरता हूँ तो तुझे पेट भरने के लिए कर्तव्य जरूर करना चाहिए लेकिन अपनी अक्ल और भावना को उस पर बलिदान नहीं करनी चाहिए। लेकिन हाय रे मनुष्य। गायत्री मंत्र के इस शिक्षण को लात से रौंदता चला गया और यह उम्मीद लगाता रहा कि उसे भगवान का प्यार मिलेगा, ऋद्धियाँ-सिद्धियाँ मिलेंगी। कैसे सम्भव था यह?
तीसरा चरण एक और था। इन्द्रियाँ मनुष्य की बनाई गयी थीं इसलिए कि मनुष्य का जीवन आनन्द से भरा हुआ रहे, उल्लास से भरा हुआ रहे। इस विवेकशील प्राणी को हँसने-हँसाने की, उल्लास की विद्या आनी चाहिए। इसके लिए उसे जिव्हा, कान, आँखें एवं कामेन्द्रिय मिली हुई थीं। सारी की सारी। इसलिए मनुष्य आनन्दित होकर जिये पर हाय रे अभागे मनुष्य इन इन्द्रियों के भीतर जो ब्रह्मवर्चस-ब्रह्मतेज था, उन्हें नष्ट करता हुआ चला गया। जीभ का उपयोग आया होता तो उसने हर आदमी से मीठा वचन और प्यारा वचन बोला होता। उल्लास और आनन्द से भरने वाला वचन बोला होता, लेकिन आदमी जिव्हा-इन्द्रियों का उपयोग न कर सका। यदि किया होता तो हममें, आप में से हर कोई 100 वर्ष जिया होता। हमने नशे पिये, जायके के लिए , मिर्च मसाले खाए जो हमारी खुराक में शामिल नहीं थे। एक इन्द्रिय का जिक्र मैंने किया, अन्य इन्द्रियों का मैं नहीं करना चाहता। करूंगा तो मनुष्य का निकृष्ट और पापी जीवन सामने आएगा और यह मालूम पड़ेगा कि जिसके लिए मनुष्य बनाया गया था, वह सारा का सारा उद्देश्य उसने चौपट करके रख दिया, ठीक उल्टी दिशाओं में चला।
ऋतम्भरा प्रज्ञा-गायत्री जिसका आज जन्म दिन है, तीन धाराओं के रूप में हमारे जीवन में प्रवाहित होती है। गंगा, यमुना और सरस्वती। इनका जहाँ, जब कभी सम्मिश्रण बन गया, उसी जगह का नाम तीर्थराज बन गया। तीर्थराज मनुष्य को बनाया गया था, तीन धाराओं के रूप में प्रवाहित होता हुआ। अहंकार से दूर लोभ-तृष्णा-कामनाओं से दूर, इन्द्रियों के दुरुपयोग से दूर, मनुष्य इन तीन पापों से बचा हुआ रहता, तब उसके पास जो भगवान का दिया ब्रह्मवर्चस् था, ब्रह्मतेज था, वह प्रस्फुटित होता और आदमी तीर्थराज बन गया होता।
ब्रह्माजी ने जब यह विश्व बनाया था, तब विवेकशीलता, विचारशीलता रूपी उपहार जिस दिन मनुष्य को दिया, वह आज का गायत्री जयन्ती का ही दिन था। गंगा आज ही अवतरित हुई थी और गायत्री मंत्र के रूप में ज्ञान की गंगा आज के ही दिन अवतरित हुई थी। गंगा का एक स्वरूप स्थूल और एक स्वरूप सूक्ष्म। गंगा का स्थूल स्वरूप आप देख सकते हैं बाँध, नहरों के रूप में। गंगा खेतों के लिए पानी देती है, बिजली पैदा करती है। गंगा का सूक्ष्म रूप यह कि जब आप नहाते हैं, यह प्रार्थना करते हैं कि स्वर्ग से आई देवी इस धरती पर प्रवाहित होती हो और हमारे मन, हमारे अहंकार, हमारी अंतरात्मा और हमारे अंतरंग जीवन इस सबको साबुन लगाती, मलिनताओं को धोती चली जाती है- पाप के कर्म फल को नहीं, पाप- के दण्ड को नहीं। पाप के दण्ड का तो एक ही बचाव है कि पाप का प्रायश्चित करना चाहिए। आदमी ने जितना गड्ढा किया है उतनी ही मिट्टी लाकर डालनी चाहिए। समाज को जितना नुकसान पहुँचाया है, उसकी पूर्ति होनी चाहिए।
गंगा जी के साथ जो पवित्रता भरी पड़ी है, शाँति और शीतलता भरी पड़ी है उसे यदि हम अपने जीवन में स्थापित कर सकते हों, तो यही भावना भीतर आएगी कि हमें गंगा के तरीके से निर्मल होना चाहिए, शीतल होना चाहिए। गंगा की ही तरह खेत और खलिहानों में, अपने चारों तरफ खुशी हरियाली पैदा करने वाला होना चाहिए। अगर यह भावना हमारे भीतर आएगी तो पाप-वृत्तियाँ नष्ट हो जाएँगी और तब हम स्वर्ग-शान्ति-मुक्ति के अधिकारी होंगे। गंगा के सूक्ष्म स्वरूप के साथ यदि हम गंगा में स्नान करें तो यह अनुभव करते चलें कि गंगा माँ का हम अपने जीवन में प्रवेश करा रहे हैं, गंगा माँ की शान्ति हमारे अन्तरंग में प्रवेश करा रहे हैं, गंगा माँ की शान्ति हमारे अन्तरंग में प्रवेश कर रही है, गंगा की लोक-मंगल वृत्ति हमारे रोम-रोम में समाविष्ट हो रही है। जब नहाकर निकलें तब यदि यह अनुभव करते हुए निकलें कि अपनी पाप-वृत्तियों को हम ने बहा दिया, भावी जीवन शुद्ध और पवित्र जिएँगे तो में कहता हूँ कि वह सारे का सारा माहात्म्य जो गंगा में स्नान का बताया गया है, वह जरूर सही होगा, जरूर लाभ देगा।
गायत्री मंत्र, ज्ञान गंगा, जिसका आज जन्म दिन है का स्थूल रूप वह है जो हमारी कल्पना के अनुसार एक महिला है कोई, कहीं आसमान में रहती है, हंस की सवारी करती है हमारी आपकी स्थूल कल्पना है कि वह देवी खुशामद से प्रसन्न हो जाती है। हम जब आरती करते हैं उसकी, तो देवी फूलकर कुप्पा हो जाती है और कहती है- वाह भाई वाह यह आरती करने वाला चेला खूब मिला और हम जब माला घुमाते हैं तो देवी बहुत खुश होती है कि हमारी जय बोलने वाला, पूजा प्रशंसा करने वाला दुनिया में कोई नहीं था। अब यह भगत पैदा हो गया है। कैसी हमारी जय बोलता है, आरती उतारता है। वह यही देखती है कि भगत दे रुपया, दे पैसा, दे औलाद, दे इम्तहान में पास, इन सब के अलावा और कुछ नहीं माँगता। यह स्थूल गायत्री है। इस स्थूल गायत्री के लाभों से मैं इन्कार करता हूँ। यह यदि रही होती तो हर मन्दिर के पूजा करने वाले पुजारी को वे लाभ मिले होते। आपमें से नब्बे फीसदी ऐसे हैं जो गायत्री मंत्र का जप करते हैं। आपकी यह माला स्थूल माला है-स्थूल पूजा है। इसके बारे में मैं इन्कार नहीं करता। मैं कहूँगा कि यह भी उपयोगी है। जितने समय आप पत्ते खेलते हैं, यहाँ वहाँ मटरगश्ती करते हैं, उतने समय आप बैठ जाइये और भगवान का नाम लीजिये। मैं क्यों इससे इन्कार करूंगा? लेकिन जो लाभ माहात्म्य बताया गया है, उसे यदि ग्रहण करना हो, वास्तव में अनुभव करना हो जैसा कि मैंने किया तो आपको उसके सूक्ष्म अन्तरंग में प्रवेश करना होगा जिसका नाम गायत्री है।
गायत्री मंत्र जिसे आज के दिन ब्रह्माजी ने बनाया था, बहुत ऊँची स्थिति का बनाया था। जिसमें श्रद्धा का समन्वय था, विराट दृष्टिकोण और आदर्शवादिता का समन्वय था। बाह्य कलेवर उसका था जरूर-स्थूल। गायत्री मंत्र के चौबीस अक्षर? हाँ चौबीस अक्षर। जप करने के लिए माला की आवश्यकता? हाँ, आवश्यकता। गायत्री मंत्र का पूजन करने के लिए रोली, चंदन, धूप-दीप की आवश्यकता? हाँ, आवश्यकता। यह कलेवर है गायत्री माता के । लेकिन उसका अन्तरंग? जो विभूतियों और सिद्धियों से भरा पड़ा है, जिसे हम छू भी न सके जिसके पास पहुँचने की कभी कोशिश भी नहीं की, वह अन्तरंग हम से अविज्ञात ही बना रहा।
गायत्री का अन्तरंग यह कहता है कि मनुष्य को लोक मंगल के लिए, उत्कृष्ट जीवन जीने के लिए, और प्रभु समर्पित जीवन जीने के लिए कटिबद्ध होना चाहिए। ये प्रेरणा है गायत्री मंत्र की। मनुष्य को अपने लिये ही नहीं जीना चाहिए। वह भगवान का सहायक है। भगवान ने उससे अपेक्षा रखी है कि वह उसकी दुनिया को सुन्दर बनाने की कोशिश करे। यह संकल्प धारण करे कि उसके पास जितना समय, बुद्धि, श्रम अपने व बच्चों को पालने के अतिरिक्त बचेगा उसे भगवान के लिए , लोकमंगल के लिए खर्च करेगा। भगवान बुद्ध, शंकराचार्य, गाँधी, लोकमान्य तिलक, जब लोकमंगल के लिए जुट गए तो उनके घर वालों ने उन्हें बेवकूफ कहा। लोकमंगल के लिए जब कोई आदमी बड़ा काम किया करता है, तब उसकी पहचान यह है कि इस दुनिया के लोग उसको आमूमन बेवकूफ बताया करते हैं इसलिए यह बात साफ है कि ये पागल मनुष्य जिस बात की प्रशंसा कर रहे हों तो समझना चाहिए कि दाल में कहीं काला है।
यह दुनिया इतनी बेवकूफ और बेहूदी है कि जिनकी प्रशंसा करती है वे उस लायक नहीं होते और जिन्होंने प्रशंसा की है उनका मुँह और तमीज तो प्रशंसा करने लायक है ही नहीं। इसलिए प्रशंसा के लायक वे व्यक्ति हैं आज, जिनकी कभी प्रशंसा नहीं होती। कभी आपका मन हो तो यहाँ से दो किलो मीटर की दूरी पर पिसनहारी का कुआँ है, वहाँ आइये। पिसनहारी कौन? पिसनहारी बारह वर्ष की उम्र में विधवा हो गयी थी। चक्की पीसती-पेट पालती। दो आने रोज कमाती सात पैसे में गुजारा कर लेती। एक पैसा बचा लेती। जब मरने को हुई बुढ़िया तो उसके पास पाँच सौ रुपये थे। गाँव वालों को बुलाया और कहा मेरी सारी जिन्दगी की धर्म की पवित्र कमाई है यह। यहाँ पानी का बड़ा अभाव है। इन रुपयों से एक कुआँ बना दिया जाय। जो भी इस रास्ते से गुजरें, उन्हें पानी मिले और वे मेरी जिन्दगी भर की कमाई का फायदा उठायें। पिसनहारी के इस कुएँ का पानी मथुरा जिले की सब जगहों के पानी में बढ़िया और मीठा पानी है। जबकि शेष स्थानों का पानी खारा है। लोग आते हैं, छाया में बैठते हैं, मीठा पानी पीते है। पिसनहारी का कहीं फोटो है? नहीं। पिसनहारी का जुलूस, किताबें? नहीं। पिसनहारी की कोई किताबें नहीं हैं, चंगेज खाँ की हैं, नादिरशाह के किस्से हैं, चीन की दीवार के हैं, डायनामाइट की खोज करने वाले अल्फ्रेड नोबुल की तारीफ की किताबें है। हमारे बच्चे उन्हें पढ़ कर याद करते हैं। पिसनहारी का नाम इतिहास में नहीं है। इसलिये पहला शिक्षण गायत्री मंत्र का यह है कि यदि मनुष्य ऋद्धियों-सिद्धियों की ओर चलना चाहता हो तो उसे अपने पाप और पतन के एक द्वार को बन्द करना होगा और वह है अपने अहंकार की पूर्ति की, बड़प्पन की इच्छा। लोगों के सामने अपना चेहरा दिखाने व तालियां बजवाने की इच्छा। यह इच्छा यदि बनी रही तो आदमी सिद्धाँत और आदर्श के लिए लोक मंगल के लिए काम नहीं करेगा। फिर तो पूजा भी यश के लिए करेगा। गायत्री मंत्र यह सिखाता है कि हमें बड़प्पन का भूखा नहीं होना चाहिए। अगर आदमी ने इस पर नियंत्रण कर लिया तो उसकी अस्सी फीसदी शक्तियों की बचत हो सकती है, उसकी जो अक्ल तबाह होती रहती है, उसका बचाव किया जा सकता है।
चुरु के एक तेजस्वी कार्यकर्ता के छोटे भाई को जन्म से हाथ-पैरों व नितम्बों में लकवे जैसी स्थिति थी। हड्डियां उपास्थियों के रूप में छोटी-छोटी थीं जो मुड़ जाती थीं। हलचल भी नहीं। बड़े दुखी थे। विदाई के पूर्व परम पूज्य गुरुदेव ने अप्रैल 1971 में उनसे उनके साँसारिक कष्टों के विषय में पूछा तो उनने अपना कोई कष्ट न कहकर छोटे भाई की वेदना बताई। पूज्यवर ने कहा कि “मैं माता से प्रार्थना करूंगा कि वह चलने फिरने योग्य हो जाय।” एक रक्षा कवच दे दिया गया।
कवच पहनाने के 2 माह बाद पूरे शरीर पर सूजन आ गयी व धीरे-धीरे उसके उतरते ही हाथ पैरों पर माँस चढ़ने लगा। हाथ पैरों में भी गति आ गयी। बालक घूमने-फिरने लगा। हाथ पैर उसके पुष्ट हो गए व अब वह एक सामान्य किशोर के रूप में विकसित हो कॉलेज में पढ़ाई कर रहा है। क्या कुछ नहीं दे दिया पूज्य गुरुदेव ने अपने वरदान के साथ?
गायत्री मंत्र का दूसरा शिक्षण यह कि मनुष्य के पास शरीर और मन की जो शक्तियाँ हैं, उन्हें वासना के द्वारा नष्ट नहीं करना चाहिए। उन्हें संग्रहीत और निग्रहीत करना चाहिए। अपने आपको समेटना चाहिए, बिखेरना नहीं। आँख, नाक वाणी, कान, कामेन्द्रिय आदि अपव्यय के लिए नहीं सद्व्यय के लिए मिले हैं। अगर हम इसे देख समझ सकते हों तो हमारे जीवन का पचास फीसदी भाग जो हमारी इन्द्रियों के द्वारा नष्ट होता चला जा रहा है, वह बच सकता है।
तीसरा शिक्षण यह कि हम अपने लोभ-लालच को अपनी कामना-तृष्णा को निग्रहीत कर सकें तो हममें से हर आदमी कबीर बन सकता है। क्या कबीर को रोटी नहीं मिलती थीं? रैदास, मीरा, गाँधी को रोटी नहीं मिलीं? किसको रोटी नहीं मिली? और जिनको खूब मिली, उन्होंने कोशिश की कि रोटी के ऊपर रोटी रखकर खाएँ पर वे खा नहीं सके। अगर उन्होंने अपनी इच्छा और अक्ल मोड़ दी होती लोकमंगल के लिए, तो फिर वे सरदार पटेल हो जाते, महामना मालवीय हो जाते, देवदूत हो जाते, भगवान हो जाते। पर तीन ही राक्षस-पिशाच हैं जो हमको खा गए। दुर्गा के आख्यान में तीन ही राक्षसों का नाम आता है महिषासुर, मधुकैटभ, शुम्भ-निशुम्भ। देवताओं को पराजित करने वाले इन तीन असुरों की तरह अहंता-तृष्णा और वासना रूपी असुर हमारी देव शक्तियों को नित्य खाये जा रहे हैं।
त्रिपदा गायत्री की धारा जिसका कि आज जन्म दिन है, इसलिये इस विश्व में आई थी कि गायत्री मंत्र के शिक्षण द्वारा-अर्चा पूजन, अनुष्ठान द्वारा अपनी तीन धाराओं को प्रवाहित करे कि “मनुष्य! यश के पीछे मत भाग, कर्तव्य के पीछे भाग। लोग क्या कहते हैं यह न सुनकर विवेक के पीछे भाग। दुनिया चाहे कुछ भी कहे, सत्य का सहारा मत छोड़।”
आज गायत्री का दिन हमारे और आपके लिए संदेश लेकर आया है कि हमको चिन्तन-मनन करना चाहिए। हजार बार सोचना चाहिए कि क्या हमारा जीवन प्रभु की इच्छाओं पर चलने वाला जीवन है? हमें जो विभूतियाँ मिली थीं, सामर्थ्य मिली थीं, उन्हें क्या हम मानव जीवन और भगवान के उद्देश्यों के अनुरूप खर्च कर रहे हैं या हम पेट के गुलाम होकर ही जी रहे हैं। जो इन्द्रियाँ हमारे पास हैं, जिन्हें हम दुनिया में शान्ति और सुविधा उत्पन्न करने में खर्च कर सकते थे, क्या हम उन्हें पतन के लिए खर्च नहीं कर रहे? इन तीनों प्रश्नों पर आज हमें तीन हजार बार विचार करना चाहिए।
परम पूज्य गुरुदेव अपने “ढाई” मित्रों की चर्चा अक्सर किया करते थे। आगरा से मथुरा आने पर उनने जो मित्र बनाए उनकी सबकी गिनती इन्हीं में होती थी। इनमें एक वकील साहब थे जिनसे पहली बार मुलाकात 1940 में पत्रिका का डिक्लेरेशन फार्म भरवाने के दौरान हुई थी। संबंध ऐसे प्रगाढ़ हुए कि वे घर जैसे हो गए। दैवयोग से उन्हें पंद्रह वर्ष बाद क्षयरोग हो गया। घर के सभी अंतरंग परिजन कहे जाने वाले रिश्तेदारों से भी इन्हें ऐसे समय उपेक्षा मिली। छूत के डर से कोई साथ रहने व सेवा करने को तैयार न था।
परम पूज्य गुरुदेव उन्हें अपने साथ तपोभूमि ले आए। नित्य अग्निहोत्र में अपने साथ बिठाते। अंकुरित अन्न व तुलसी दल अपने हाथों से उन्हें देते। प्राणायाम कैसे किया जाय, यह शिक्षण सतत देते। मात्र दो माह में ही वे स्वस्थ हो पुनः काम पर लग गए। जिनका कोई भी न हो, उनके स्वयं भगवान सखा होते हैं, यह उक्ति अक्षरशः सत्य हुई।
मेरी उपासना की प्रक्रिया इसी प्रकार चलती हुई चली गयी। लम्बे जीवन भर में गायत्री मंत्र का जप करता रहा, स्थूल उपासना भी करता रहा, पूजा-प्रार्थना भी करता रहा। लेकिन अपने अन्तरंग में गायत्री की उन तीन धाराओं को, जिन्हें मैं सूक्ष्म धाराएँ कहता हूँ, उनको भी अपने जीवन में धारण करने की कोशिश मैं करता रहा। अब जब कि मथुरा के मेरे जीवन का अन्तिम गायत्री जयन्ती का अवसर है, तब मैं आपको अपने जीवन के अनुभव न सुनाऊँ तो यह उचित न होगा। इस अन्तिम अवसर पर अपने सारे जीवन, साठ वर्ष के निष्कर्ष जिसको आप चाहें तो गायत्री चमत्कार का मूल आधार कह सकते हैं, बता रहा हूँ। मेरे व्यक्तित्व में महानता आप समझते हों, गायत्री मंत्र की महत्ता के द्वारा आदमी को कुछ परिणाम मिल सकते हैं अगर ऐसी आपकी मान्यता हो तो उस मान्यता के साथ एक और मान्यता जोड़ लेने की मेरी प्रार्थना है कि गायत्री ध्यान करने के लिए वास्तव में कोई महिला नहीं, विवेकशीलता और विचारशीलता की धारा के प्रवाह का नाम है जो इस विश्व में प्रवाहित है, जो मनुष्य के मस्तिष्क को, क्रियाकलाप को और अन्तरात्मा को छूता है। ध्यान के समय आप हंस पर सवार हुई गायत्री का ध्यान करें बेशक, लेकिन यह भी ध्यान करें कि गायत्री माता सिर्फ हंस पर सवार होंगी, बगुले पर नहीं। हंस वह जो नीर-क्षीर का भेद जानता हो। दूध पी लेता हो, पानी को फेंक देता हो। इस दुनिया में पाप और पुण्य, अनुचित और उचित दोनों मिले हुए है। अंतरात्मा जिसे अनुचित कहे, उसे हम ठुकराएँ। जिसे उचित कहे उसी को स्वीकार करें, यह है हंसवृत्ति। यह है हंस पर सवार भगवान हम पर सवारी करें इसलिए हमको हंस बनना चाहिए, सफेद बनना चाहिए।
यदि यह विवेकशीलता हमारे भीतर आ जाए तो हमारे जीवन की दिशाएँ बदल जाएँ। इस विवेकशीलता को मैं ऋतम्भरा प्रज्ञा कहता हूँ, गायत्री कहता हूँ । अगर यह हमारे अन्तरंग में आ जाए तो हमारे जीवन का कायाकल्प हो जाए, हमारे काम करने और इच्छा करने के ढंग बदल जाएँ। तब हम भगवान बन जायँ, हमारे पास न लक्ष्मी की कमी रहे, न विभूतियों की।
मैंने गायत्री उपासना को ऋतम्भरा प्रज्ञा के रूप में समझने की कोशिश की और समझाने की भी। लेकिन लोगों ने उसके बाह्य कलेवर को जो सुगम था और ऐसा मालूम पड़ता था कि हमारी कामनाओं और इच्छाओं को पूरा करने में सहायक है, उतने वाले हिस्से को पकड़ लिया और बाकी वाले हिस्से को भूल गया। असंयमी रोगी के लिए अच्छा हकीम कौन? वह जो मनमर्जी का भोजन करने दे। सबसे अच्छी देवी कौन? जो हमारी कामनाओं को पूरा करे। वही देवी है गायत्री। अपनी इच्छा के अनुरूप हमने देवता ढालने की कोशिश की इसीलिये देवता की समीपता से पूर्णतया वंचित रहे और वंचित ही रहेंगे। जिनने भगवान की इच्छा के अनुरूप स्वयं को ढालने की कोशिश की, वे भगवान के कृपापात्र बन गए और सारे माहात्म्य गायत्री के प्राप्त कर सके। मैंने ऐसा ही जीवन जिया, इसी रूप में गायत्री मंत्र को समझा, उपासना की, जप किया और जप के साथ भावनाओं को हृदयंगम किया।
जब मैं चला जाऊँ और जब आप लोग यह विचार करें कि क्या गायत्री मंत्र सामर्थ्यवान है तब आपको यह कहना चाहिए और समझना चाहिए कि हाँ-गायत्री मंत्र सामर्थ्यवान है। अगर आप उसकी भावना की अन्तरंग में प्रवेश करा सकें तो आपको यह मानकर चलना चाहिए कि सारी की सारी जो सामर्थ्य भगवान में है, वो सब की सब भक्त में हो सकती हैं तो वह दुनिया को लाभ दे सकता है और अपना कल्याण कर सकता है।
आप अपनी मान्यताओं में यदि यह एक अध्याय और जोड़ लें तो मैं समझूँ कि मथुरा में गायत्री जयन्ती का मेरा यह अन्तिम प्रवचन सार्थक हो जाए। गायत्री मंत्र और गायत्री विद्या का आविष्कार जिन महामानवों ने किया था, उनका उद्देश्य और प्रयोजन पूरा हो जाए।
इन शब्दों के साथ मैं अपनी बात समाप्त करता हूँ। ॐ शान्ति।
कानपुर के एक पूर्ण समय दानी कार्यकर्ता के मझले पुत्र ने एम. टेक. की परीक्षा पास कर इटली जाने की इच्छा व्यक्त की। पूज्य गुरुदेव का आशीर्वाद लेकर चले गए। एक नया उपकरण बनाने का मन था। उसी की डिजाइन जब वहाँ के इंजीनियर्स से माँगी तो उनने दस लाख रुपये की माँग की। पैसा उनके पास था नहीं। होटल वापस लौटकर स्नान कर संध्या वन्दना में कातर भाव से पूज्यवर से प्रार्थना की कि इतनी दूर आकर निराश न लौटना पड़े। रात्रि को पूज्य गुरुदेव के स्वप्न में दर्शन हुए आश्वस्ति मिली। अगले दिन प्रातः वही इंजीनियर जिसने एक दिन पूर्व डिजाइन के लिए पैसों की माँग की थी, होटल आया व उसने फैक्ट्री से जाकर उन्हें ड्राईंग दे दी। पूछने पर कहा कि आपके “गॉड ने मुझे रात भर सोने नहीं दिया। चैन नहीं मिला व वही निर्देश मिला कि बिना राशि लिए उसे वह दे दो जो वह माँग रहा है।” आगे वह बोला कि “आपके भगवान को भारत आकर देखूँगा।” आज वह इंजीनियर कानपुर में एक फैक्ट्री का मालिक है व पूज्यवर के कार्यों के प्रति समर्पित भी।
परम पूज्य गुरुदेव : लीला प्रसंग : 7
अलौकिक, अद्भुत लीला प्रसंग जानने की सबकी इच्छा रहती है। कुछ दुनिया की रीति ही ऐसी है कि यह सब सुने बिना उस व्यक्ति के अवतारी पुरुष, युगान्तरकारी व्यक्तित्व के रूप में होने की मन को आश्वस्ति नहीं होती। शिष्यों से घटना प्रसंग सुनकर अन्य व्यक्तियों को यह लग सकता है कि अमुक महापुरुष में हमने कोई ऐसी बात तो देखी नहीं। वे तो एक सामान्य से ही व्यक्त थे। ऐसे, जैसे हमारे घर में रहने वाले दादाजी, नानाजी। सौम्य व्यक्तित्त्व, सतत मुसकान व जीवन के अंतिम वर्षों में थोड़ा सा रौद्र रूप- यही बहिरंग में दृष्टिगोचर होने वाला परम पूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी का स्वरूप था। ऐसे में जब हम उनके सरल व्यक्तित्त्व के साथ ऋद्धि-सिद्धि सम्पन्न गायत्री के सिद्ध साधक वाला स्वरूप जोड़ देते हैं तो कुछ घटना प्रसंग व प्रमाण भी आज के बुद्धिवादी युग को देखते हुए जरूरी हो जाते हैं, मोटी दृष्टि-विज्ञान के, प्रत्यक्षवाद के चश्मों से पार देखती दृष्टि यही सब कुछ देखती है। किन्तु श्रद्धा जिसकी प्रगाढ़ हो, उसे किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं। श्रद्धा स्वयं में एक सशक्त मान्यता प्राप्त विज्ञान है।
रामकृष्ण परमहंस, महर्षि अरविन्द, महर्षि रमण, स्वामी विवेकानन्द जैसे कुछ विगत एक सदी में भारत में जन्मे महापुरुषों का जीवन हम देखते हैं तो पाते हैं कि ज्ञान व विज्ञान का अद्भुत सम्मिश्रण उनके जीवन प्रसंगों से जुड़ा रहा है। एक ओर वे ज्ञानेन्द्रियों की सीमा में आने वाले प्रत्यक्ष विज्ञान की कसौटी पर कसे जाने वाले प्रसंगों का विवेचन करते दिखाई देते हैं तो दूसरी ओर गुह्य विज्ञान, रहस्यवाद व परोक्ष विज्ञान की परिधि में आने वाले घटनाक्रम भी उनके जीवन में घटित होते दिखाई देते हैं। साधना द्वारा अपने प्रसुप्त को जगाकर इन सभी ने वह उच्चस्तरीय स्थिति प्राप्त की थी, जिसे साधना की चरमावस्था कहा जाता है या साधना से सिद्धि का अंतिम सोपान माना जाता है। यही सब कुछ परम पूज्य गुरुदेव के अस्सी वर्षों के जीवन का नवनीत भी है। विज्ञान व अध्यात्म का समन्वय करने वाले इस ब्रह्मर्षि ने अपने जीवन माध्यम से मनोविज्ञान, अतिचेतन व उससे जुड़ी उच्चस्तरीय शक्तियों का जो परिचय अपने निकटस्थ परिजनों को दिया उससे बड़ी साक्षी परामनोविज्ञान व गुह्य विज्ञान जैसी विधाओं में मिल नहीं सकती।
जो परम पूज्य गुरुदेव को सामान्य मनुष्य मानते रहे, उनके दुर्भाग्य को क्या कहा जाय पर जो भी उनके अलौकिक अवतारी-अतिमानवी रूप को समझ व हृदयंगम कर पाया, उसका आध्यात्मिक कायाकल्प हो गया। यों पत्रों, घटनाक्रमों, प्रत्यक्ष चर्चा व अनुभूतियों के माध्यम से इसका परिचय उनने अनगिनत व्यक्तियों को दिया। जो भौतिक अनुदान मात्र पाने की ललक तक सीमित रहे, वह वहाँ से आगे नहीं बढ़ सके। जो थोड़ा भी पुरुषार्थ आत्मिक प्रगति की दिशा में कर सके उन्हें सतत प्रवाह सशक्त चेतना का मिला रहा। यों उनने सुपात्रों को अपना शाश्वत रूप दिखाने का प्रयास प्रारंभ से ही किया था।
11 सितम्बर 1963 को लिखे एक पत्र में परम पूज्य गुरुदेव एक परिजन को लिखते हैं-”रामकृष्ण परमहंस का चित्र पूजा के स्थान पर रखने में हर्ज नहीं। अब से तीसरा पूर्व शरीर हमारी ही आत्मा ने रामकृष्ण परमहंस का धारण किया था। वही आत्मा आपके वर्तमान गुरु रूप में विद्यमान है।” इतने स्पष्ट संकेत पूज्यवर ने कभी-कभी ही किए थे। एक और परिजन को 13-3-70 को लिखे पत्र में (अज्ञातवास पर जाने से सवा साल पूर्व) उनने लिखा-”भविष्यवाणी सच्चाई समय सिद्ध कर देगा। उसका सीधा संबंध हमीं से है। लोग समय पर पहचान नहीं पाये, पीछे पछताएंगे। हम कहीं भी चले जायँ, कहीं भी रहें, आपका जीवन लक्ष्य पूरा कराने का पूरा ध्यान रखेंगे। आपको हम अपनी नाव में बिठाकर पार करेंगे।” क्या भविष्यवाणी थी व क्या लोग पहचान नहीं पाए, यह सब भली भाँति समझ सकते हैं।
भविष्य के गर्भ में झाँककर सब कुछ जान लेना पहले से ही भवितव्यता की जानकारी देना, सीमित दृष्टि वाले हम सामान्य मानवों को सचेत करते रहना महापुरुषों की रीति-नीति होती है। परम पूज्य गुरुदेव के जीवन से जुड़े इतने घटनाक्रम हैं जिनमें उनने पहले से ही परोक्ष हलचलों की जानकारी संबंधित व्यक्तियों को दे दी थी व उन्हें साधना पुरुषार्थ में जुटाकर संभावित विपत्ति को टाल दिया या हल्का बना दिया था।
एक परिजन अपनी अनुभूति में व्यक्त करते हैं कि 15 फरवरी सन् 1958 को उन्हें पूज्यवर का एक पत्र प्राप्त हुआ कि “तीन माह भारी विपत्ति के हैं इस अवधि में उन्हें विशेष सावधानी रखनी चाहिए। सूचना वे उन्हें दे रहे हैं पर मौत उनका कुछ बिगाड़ नहीं सकेगी।” पत्र प्राप्ति के बाद वे विशेष सतर्क रहने लगे। कुछ दिनों बाद कुछ न होने पर वे असावधान हो गए। एक दिन दोपहर को वे साइकिल से तेजी से बैंक की ओर जा रहे थे कि अचानक मोड़ पर खाली ट्रक साइकिल पर चढ़ गया। साइकिल दूर जाकर गिरी व वे आधे इंजिन के नीचे आधे बाहर की ओर ऐसे ट्रक के नीचे गिरे। कई व्यक्ति दौड़े आए व उन्हें ट्रक के नीचे से बाहर निकाला। देखा तो वे पूर्णतः स्वस्थ थे, कहीं खरोंच भी नहीं आई थी। साइकिल ठीक होने दी व वापस घर की ओर चल पड़े। घर जाकर देखा पोस्टमैन चिट्ठी डाल गया था। पूज्यवर का पत्र जिस दिन मिलेगा, वह दिन तुम्हारे संभावित संकट का अंतिम दिन होगा।” उनने आश्चर्य से तारीख देखी। ठीक तीन माह पूरे हो गये थे। उस दिन 15 मई थी, स्वयं पूज्य गुरुदेव उनके साथ इस अवधि में बने रहे, यह सोच-सोच कर ही उनकी आँखों से अश्रुप्रवाह होने लगा व अनुभूति हुई कि कितनी बड़ी सत्ता का संरक्षण उनके साथ था।
एक सज्जन ने अपनी संभावित मृत्यु व दुश्मनों द्वारा किये जा रहे ताँत्रिक अनुष्ठानों की जानकारी पूज्यवर को पत्र द्वारा दी। पत्रोत्तर आया कि “आपका मारकेश हमारे यहाँ रहते सफल नहीं होगा। हम अभी पौने नौ वर्ष इधर हैं, तब तक आप पूर्ण निश्चिंत रहें।” यह पत्र 28 सितम्बर 1962 को लिखा गया था। वे सज्जन परम पूज्य गुरुदेव की मथुरा से विदाई तक स्वस्थ जीवन जीकर सारे दायित्वों से मुक्त होकर निश्चिन्त तिथि में जुलाई, 71 में महाप्रयाण कर गए। सारी प्रतिकूलताओं से अपने भक्त को बचाकर भविष्य पर इतना सशक्त अधिकार और कौन−सी सत्ता जता सकती है?
1982 का एक घटना प्रसंग है। गुजरात पंचमहल जिले की एक महिला की युवा बेटी रहस्यमय परिस्थितियों में घर से लापता हो गई। सब ओर से निराश वह हरिद्वार आये। यहाँ वह कच्छी आश्रम में ठहरे। वहाँ के स्वामी जी के कहने पर वह पूज्य श्री के दर्शनार्थ व अपनी वेदना कहने शाँतिकुँज आये। कहने का मौका मिला तो आँखों से मात्र अश्रु ही निकले। पूज्यवर ने सारा घटनाक्रम समझते हुए उससे कहा-”परेशान न हों। बेटी घर आ जाएगी। कुछ समय लगेगा। बेटी का फोटो भिजवा देना। माँ गायत्री से प्रार्थना करेंगे।” फोटो ब्रह्मवर्चस् के एक कार्यकर्ता के माध्यम से पूज्यवर के पास पहुँचा दिया गया। इसके बाद दो-तीन पत्र दुखियारी माँ के आ गए कि अभी तक बेटी नहीं आई। छः माह से ऊपर होने को आ रहे हैं। कार्यकर्ता महोदय पुनः पूज्यवर से आकर उसकी समस्या बताने लगे तो बताया गया कि “बेटी शारदा अभी गर्भवती है। अतः यात्रा करने में दिक्कत है। जहाँ भी है, वह सुरक्षित है। प्रसव के बाद वह माँ के पास पहुँच जाएगी।” ऐसा ही हुआ। कुछ ही दिनों बाद नवजात शिशु सहित वह माँ व उसकी माँ जिसने अपनी अर्जी पूज्यवर के दरबार में लगाई थी शाँतिकुँज आए व स्वयं को कृतकृत्य मानते हुए चरणों में नमन किया।
ऐसे एक नहीं अगणित घटना प्रसंग हैं जिनमें पूज्य गुरुदेव ने व्याकुल-दुखी-क्षुभितों को संकट या विपत्ति से मुक्ति दिलाई। भविष्य में क्या कुछ होने वाला है, इसका विस्तार तो नहीं, फलश्रुति बताते हुए साधना पुरुषार्थ में उन्हें जुटा दिया तथा सारा श्रेय माँ गायत्री को दिया। राजनाँदगाँव (म.प्र.) के एक सज्जन लिखते हैं कि उनका ज्येष्ठ पुत्र उन्माद जनित मनोविकार से ग्रसित होकर घर से निकल गया। चार साल तक घर नहीं लौटा। अपनी परेशानी जान बूझकर पूज्यवर को नहीं लिखी क्योंकि कभी लौकिक दृष्टि से कुछ नहीं माँगा था। बच्चे की माँ एक माह के सत्र में शाँतिकुँज आई थी। व्यक्तिगत भेंट-मुलाकात के क्रम में वह रो पड़ी व बोल उठी “पिताजी! हमारे बच्चे का पता बताइये। वह जीवित है कि नहीं। है तो वापस बुला दें, चाहे वह कैसी भी मनःस्थिति में हो।” पूज्य गुरुदेव बोले-”बेटी! तुम हमारा काम करते रहो। हम तुम्हारा काम जरूर करेंगे।” बच्चे की माँ के घर लौटने के एक सप्ताह के अंदर चमत्कारिक ढंग से बच्चा लौट आया और वह भी पूर्णतः स्वस्थ। मिशन के कार्यों में पूर्ण समर्पित कर एक अनुदान देकर उस परिवार को उनने चिर ऋणी बना लिया।
सम्प्रति मथुरा गायत्री तपोभूमि में कार्यरत एक वरिष्ठ कार्यकर्ता की पत्नी उन्हें उलाहना देती थीं कि वे उनके छोटे भाई के बारे में पूज्यवर से क्यों नहीं पूछते? इन सज्जन के साले बचपन में ही घर छोड़ कर चले गए थे। कहीं पता नहीं चल पा रहा था कि जीवित हैं भी कि नहीं। पत्नी के बहुत आग्रह करने पर उनने साले के घर से जाने के प्रायः पंद्रह वर्ष बाद परम पूज्य गुरुदेव को पत्र लिखा। 6-7-1970 की ही तारीख में लिखा पत्र जो तेल अबीब (इजराइल) से चला था, उनके लापता साले साहब की हस्तलिपि में उन्हें दस दिन बाद प्राप्त हुआ जिसमें उनने अपने भारत आने की सूचना दी थी। जिस दिन पूज्यवर ने पत्रोत्तर दिया उस दिन वे लापता युवक से संपर्क स्थापित कर (दिक्काल से परे) उसे घर लौटने की प्रेरणा दे चुके थे।
दिल्ली के एक वरिष्ठ व विगत पैंतालीस वर्षों से परम पूज्य गुरुदेव से जुड़े परिजन को पूज्यवर ने 21-12-1954 को एक पत्र लिखा- “वशिष्ठ के रहते हुए भी रघुवंशियों को और कृष्ण तथा धौम्य के साथ रहते हुए भी पाण्डवों को कठिनाइयों से गुजरना पड़ा था। हम भी अपनी सामर्थ्य के अनुकूल ही आप लोगों की सहायता कर रहें हैं। मंजिल तो आपको ही पार करनी पड़ेगी।” इसके पश्चात् वे लिखते हैं- “तारीख 12 की घटना की सूचना मिली। अपना लक्ष्य किसी पर आक्रमण करना नहीं है पर किसी के हमलों को निष्फल करने में बहुत कठिनाई नहीं होती। आप लोगों के संरक्षण की व्यवस्था हमने कर दी है।” पत्र में आत्म पुरुषार्थ व परोक्ष सहायता दैवी संरक्षण का विलक्षण समन्वय है। इन्हीं सज्जन को 13-5-1955 को लिखे एक पत्र में उनने लिखा “विवाह का विस्तृत समाचार जाना। वह सब समाचार पूर्ण रूप से हमें मालूम है क्योंकि हमारा सूक्ष्म शरीर इस समय चौकीदार की तरह वहीं अड़ा रहा है और विघ्नों को टालने के लिए, शत्रुओं को नरम करने के लिए, आपत्तियों को हटाने के लिए जो कुछ बन पड़ रहा है सो बराबर करता रहा है। फिर भी आपके पत्र से सब बातें भली प्रकार विदित हो गयीं। सब कार्य कुशलपूर्वक हो गया। यह आपके पुण्य सद्भाव और बुद्धि चातुर्य का फल है। माता की कृपा तो सर्वोपरि है ही।”
दस वर्षों तक देव कन्या के रूप में वंदनीय माताजी के पास रही एक बच्ची के पिता अपनी अनुभूति में लिखते है कि जब वह आठवीं कक्षा में पढ़ रही थी, तब परम पूज्य गुरुदेव उनके यहाँ एक विराट यज्ञायोजन में पधारे थे। जैसे ही उस बालिका ने पूज्यवर के चरण स्पर्श किए, पूज्य गुरुदेव बोल उठे “इसकी शादी जल्द मत कर देना। उसका विवाह मैं करूंगा। यह मेरी बेटी है। इसे खूब पढ़ाना है भारतीय संस्कृति का शिक्षण देना है। यह माताजी के पास रहेगी। लौटकर यह प्रोफेसर बनेगी व नारी जागृति का खूब काम करेगी।”
कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि 11-12 वर्ष की कन्या में ऐसा वे क्या देख रहे थे। किन्तु त्रिकालदर्शी सत्ता ने जैसा देखा वैसा ही हुआ। दो वर्ष बाद ही वह बच्ची वंदनीया माताजी के चौबीस करोड़ के कुमारिकाओं द्वारा दिये जा रहे अनुष्ठान में हरिद्वार में तप कर रही कन्याओं में सम्मिलित हो गयी। नौ वर्ष वहाँ रहकर वह गयी, कॉलेज में प्रोफेसर बनी व गायत्री परिवार के एक सुशील युवा से उसका विवाह हुआ। वे सब कुछ देखते समझते व भविष्य के बारे में इशारा कर देते थे।
ऊपर की पंक्तियाँ कितने निश्छल अंतःकरण से लिखी गयी है। एक ओर वे स्पष्ट लिख रहे हैं कि आप पत्र देते रहें पर हम वहीं पर सूक्ष्म शरीर से विद्यमान हैं, अर्थात् ऊपरी जानकारी आये न आये, हमारा संरक्षण तो यथावत है। दूसरी ओर वे कहते हैं कि श्रेय उन्हें नहीं, शिष्य के पुण्य व माँ की कृपा को जाता है। कोई अहसान नहीं, कोई श्रेय लेने का संरक्षक भाव थोपने का भाव नहीं। यह एक कृपालु सिद्ध संत का स्वरूप है पूज्यवर का।
22 जुलाई 1962 को लिखा टीकमगढ़ के एक सज्जन के नाम पत्र भी कुछ इसी प्रकार है। “गुरु पूर्णिमा के दिन आप के जीवन के लिए एक अनिष्ट था। वही सर्प रूप में प्रस्तुत हुआ था। आप को चिन्ता न बढ़े, इसलिए बताया नहीं गया था। वह अनिष्ट टल गया। आपकी जीवन रक्षा हो गयी, यह बड़े संतोष की बात है। उस अनिष्ट को टालने में हमारी आत्मा स्वयं ही आपके पास थी। अब इस प्रकरण को समाप्त हुआ ही समझें।” “अनगिनत शिष्य, सब एक से एक निकट। किन्तु सबका ध्यान इतना कि विभिन्न रूपों में सहायता पहुँच कर उनकी रक्षा करना, यह विभिन्न लीला किसकी हो सकती है?
परोक्ष जगत में विचरण कर सूक्ष्म शरीर से विभिन्न रूपों में सहायता पहुँचाने, भवितव्यता को जानकर पहले ही संकट को निरस्त कर देने या उसकी सूचना किन्हीं रूपों में देकर पुरुषार्थ उभारने की प्रेरणा देने का कार्य महामानव सदा से करते आए हैं। परम पूज्य गुरुदेव अवतारी सत्ता की उसी कड़ी में से एक थे। उनके हाथों से लिखे एक दुर्लभ पत्र का हवाला देते हुए एक घटना का उल्लेख यहाँ करना चाहेंगे। 29-12-61 को उनने जबलपुर के एक वरिष्ठ परिजन को पत्र लिखा। -”श्री रणछोड़ जी की आत्मा ता. 22 की रात को हमारे पास आई थी। करीब एक घण्टा उनसे मिलन होता रहा। फिर वे ब्रह्म लोक को चले गए। तारीख 23 को हम उनका श्राद्ध तर्पण करने हरिद्वार चले गये थे। कल ही वापस लौटे हैं। आपके पत्र में भी वही समाचार पढ़ा। उनकी आत्मा को पूर्ण शान्ति है और सद्गति मिली है। स्वर्गीय आत्मा ने आपको तथा अपने परिवार को आशीर्वाद भिजवाने का संदेश कहा है। यह पत्र आप उनके बच्चों को सुना दें। उन के दुख में हम भी दुखी हैं। अब शोक को धैर्य और विवेक द्वारा शाँत करना ही उचित है।”
उपरोक्त पत्र बानगी है दिव्यात्मा से संबंध स्थापित करने की महापुरुषों के सामर्थ्य की। जिन सज्जन के दिवंगत होने पर सभी दुखी थे, वहाँ वे सभी यह जानकर कि वे अब पूरी तरह मुक्त हैं, उनका श्राद्ध-तर्पण स्वयं गुरुदेव द्वारा सूक्ष्म शरीर से यात्रा करके हुआ है, आश्वस्त हो गए व मन को अपार शाँति मिली।
लेखनी कहाँ तक बयान करे उन सब घटनाक्रमों का जो लाखों परिजनों के साथ भिन्न भिन्न रूपों में समय-समय पर घटते रहे। उनका शून्य में देखकर कह उठना कि “अमुक-अमुक नहीं आए। आ जाते तो उनसे मिलना हो जाता। अब तो उनकी शरीर यात्रा पूरी हो गई” व तभी उन सज्जन का यह पार्थिव देह डेढ़ हजार किलो मीटर दूर छोड़ देना क्या यह नहीं बताता कि वे सब कुछ देख सकने में समर्थ थे। गायत्री की सिद्धि की पूर्णता को प्राप्त वह ऋषि मुख से जो वाक्य निकालता था वह वरदान रूप में तीर की तरह लगता था। ऐसी सत्ता हम सब के जीवन में सौभाग्य बनकर आई, यह सोचने के साथ-साथ यदि उनके बताए निर्देशों पर चलें तो सूक्ष्म व कारण शरीर की उनकी सत्ता सतत हमारा मार्गदर्शन कर हमारा पथ प्रशस्त करती रहेगी।
1008 कुण्डी गायत्री महायज्ञ (1958) का प्रसंग है। भोजन भण्डार गृह में जिन सज्जन की ड्यूटी लगी थी। उन्हें बड़ा आश्चर्य था कि कुल बीस बोरी आटा उनके सामने गिनकर भण्डार कक्ष में रखा गया था। नित्य चार लाख से अधिक व्यक्ति भोजन करते थे। नित्य अठारह बोरा निकाला जाता था तब भी स्टॉक यथावत बना हुआ था। परम पूज्य गुरुदेव से पूछने गए तो बताया गया कि “भण्डार गृह में दो बोरे हमेशा बने रहे। शेष व्यवस्था यथावत होती रहेगी।” नियमित सवेरे, शाम भोजन चलता रहा पर उनकी समझ में यही आया कि यह तो नित्य लीला स्वरूप पूज्यवर की चमत्कारी लीलाओं की एक छोटी झाँकी भर थी, जिसे देखने का उन्हें सौभाग्य प्रारब्धवश मिल गया था। अंत में उनने देखा कि कुल बीस बोरे आटा सबको भोजन कराके बचा। इस सबको देखकर वे नतमस्तक थे व आज भी जब वह सब याद करके उनका समर्पण उसी परिमाण में बढ़ता रहता है। लगभग यही घटनाक्रम सभी ने पिछले वर्ष श्रद्धाँजलि समारोह में भी देखा।
आने वाले समय में अनगिनत ऐसी अनुभूतियाँ हम सब के समक्ष आने वाली हैं जो परम पूज्य गुरुदेव के सूक्ष्म शरीर के संपर्क में आने से देश-राष्ट्र महाद्वीप की परिधि से परे विभिन्न व्यक्तियों को होगी। देह त्याग कर वे अनन्त विस्तार को प्राप्त हो गए हैं व अपने पीछे एक राज मार्ग छोड़ गए हैं जिस पर चलते हुए हर कोई आत्मिक-भौतिक सफलता को हस्तगत करते हुए जीवन लक्ष्य की प्राप्ति करता रह सकता है। अनुभूतियाँ हमें चकाचौंध मात्र न करें, हमारा मनोरंजन न कर हमें सही दिशा दें। यही परम पूज्य गुरुदेव की ब्राह्मीसत्ता एवं माँ गायत्री से हम सबकी प्रार्थना है।
अपनों से अपनी बात—
परम पूज्य गुरुदेव ने सदा से स्वयं को व्यक्ति नहीं शक्ति माना। जीवन भर राजहंस की तरह उड़ाने भरीं और अनन्त अन्तरिक्ष में अपने खुले पंखों को उन्मुक्त रूप से विचरण करने दिया। ऐसी महाशक्ति जो स्थूल काया के महाप्रयाण के बाद और भी विस्तृत हो दिग्दिगन्त में संव्याप्त हो गयी हो, अपनी प्रथम पुण्यतिथि पर सच्ची श्रद्धाँजलि एक ही रूप में स्वीकार कर सकती है कि उनके जीवन भर के कर्तव्य को समर्पित अधिकाधिक सदाशयता सम्पन्न प्रतिभाएँ उनके कार्य को पूरा करने में जुटें। महान लक्ष्यों से जुड़ी अवतारी सत्ताओं को दी जाने वाली पुष्पाँजलि श्रेष्ठ कदम उठाने के रूप में ही हो सकती है। अब सही समय आ गया है कि अगले दिनों उठाये जाने वाले बड़े कदमों के लिए अधिक से अधिक प्रतिभाशीलों का घोंसला शाँतिकुँज ही में बने।
प्रतिभाओं को दूसरे शब्दों में अन्धड़ कहा गया है। उनका वेगमान प्रवाह जब भी जिस किसी दिशा में जिस तेजी से बढ़ता है, उसी अनुपात में तिनकों-पत्तों से लेकर छप्परों, वृक्षों तक को उड़ते-लुढ़कते देखा जाता है। जब भी कभी समाज में उठने-गिरने की प्रवृत्तियाँ चलती हैं तो उसके लिए पुण्य-पाप का श्रेय उस जमाने के अग्रगामी प्रतिभाशीलों के सिर पर ही लदता है। वे आगे बढ़ते तो असंख्यों में प्राण फूँक देते हैं। रेल के इंजिन की तरह अपने साथ जुड़े अनेकों डिब्बों को अपने साथ लेकर पटरी पर चल पड़ते है। समूह नेतृत्व उन्हीं के बलबूते संपन्न होता देखा गया है। जब प्रतिभाशाली-मूर्धन्य गिरते हैं तो ओलों की तरह समूची फसल को सफाचट करके रख देते हैं। विषम प्रतिकूल समय में उनका चुप बैठा रहना भी समाज पर कहर ही गिराता है। आपत्तिकाल की यातनाएँ उन्हें कभी क्षमा नहीं कर पातीं।
संत हसन ने प्रतिभावानों-अग्रगामियों के संबंध में एक बात बड़ी मार्के की कही है कि एक अकेला शराबी तो मात्र-अपने-अपने परिवार के पतन के लिए जिम्मेदार होता है किन्तु उसे नाली से निकालने का प्रयास करने वाला समाज सेवी-प्रतिभाशाली कहीं एक भी कदम यदि गलत उठाता है तो सारा समाज ध्वस्त हो जाता है। इतना महान दायित्व है उसके फौलादी कंधों पर।
ऐसे ही पुरुषार्थ सम्पन्न प्रतिभाशीलों को वरिष्ठ कहकर गौरवान्वित किया गया है। “वरिष्ठों” की परिभाषा परम पूज्य गुरुदेव ने इस प्रकार की है-”वे जो अपनी समस्याओं का आप समाधान कर सकें। साथ ही बचे हुए पराक्रम का उपयोग दूसरों को उबारने में कर सकें।” किसी भी युग में किसी भी समय विशेष में इन्हीं की महत्ता होती है। सभी की निगाहें इन्हीं पर लगी होती हैं। वे उस माँझी की भूमिका निभाते हैं जिसकी पुष्ट माँस पेशियाँ चप्पू को दोनों हाथों से पकड़ कर नाव पर लदे हुए असहाय-अपंगों को विश्वास भरा अभयदान देती हैं। सारी आकुलों-व्याकुलों की भीड़ एक तरफ तथा एक वरिष्ठ माँझी एक तरफ भगवान की अनुकम्पा सही अर्थों में किसी पर कभी बरसती है तो माँझी जैसी बलिष्ठता प्रदान करने के रूप में बरसती है।
किसी समाज ने प्रगति की तो कितनी की, इसका एक ही पैमाना है कि वरिष्ठ बनने की दिशा में प्रबल पुरुषार्थ करने वाले कितने अधिक व्यक्ति अंतःप्रेरणा से उछल कर सामने आए? सम्पन्नता व समर्थता-कुशलता की दृष्टि से जो मूल्याँकन किया जाता रहा है वह सही नहीं है। प्रगति का एक ही मापदण्ड है अधिक से अधिक व्यक्तियों के दृष्टिकोण में उत्कृष्टता का समावेश। चिन्तन और रुझान में आदर्शों के प्रति लगाव। उत्कृष्टता की दिशा में बह रहे इस प्रवाह से ही यह समझना चाहिए कि महामानव बनने-बनाने तथा युग को बनाने-समाज को बदलने वाली परिस्थितियाँ अनायास ही ढलती चली जा रही हैं।
जो काफिला परम पूज्य गुरुदेव ने आज से वर्षों पूर्व आरंभ किया वह सामान्य छोटी आयु वाले बच्चों का नहीं, वह वरिष्ठों का, विशिष्टों का, विशेषज्ञों का है। वरिष्ठ अर्थात् दिशादर्शक दूसरों का मार्गदर्शन करने वाले प्रौढ़। उत्तरदायित्व पूरी गंभीरता से निभाने वाले जिम्मेदार पीड़ित मानवता के चिकित्सक गहन चिकित्सा इकाई (इन्टेन्सिव केयर यूनिट) में पूरी तत्परता से जुटे वे सीनियर रेजिडेण्ट्स, जिनके हर क्रियाकलाप पर मरणासन्न रोगी की एक-एक श्वास व हृदय की धड़कन निर्भर होती है। वरिष्ठता का सौभाग्य ऐसे कुशल चिकित्सक की भूमिका की तरह है और आज के आपत्तिकाल में मानवी अस्तित्व और भविष्य की गरदन पर नंगी तलवार की तरह लटके उत्तरदायित्व यही कहते हैं कि यदि ऐसे वरिष्ठ कहीं हों तो काफिले से अलग न हटें, बल्कि साथ मिलजुलकर चलें।
आज का समय वस्तुतः आपत्तिकाल का है। अध्यात्म-दर्शन, राजनीति, समाज, युग नेतृत्व हर क्षेत्र में प्रतिभाशीलों की जब दुर्भिक्ष सी छाया दीख पड़ रही हो तो आपत्ति धर्म निभा सकने वाले वरिष्ठों से ही कुछ आशा-अपेक्षा की जाती है। आपत्ति धर्म का तात्पर्य है सामान्य सुख सुविधाओं की बात परे रखकर वह करने में तत्पर हो जाना जिसके लिए मानवी गरिमा आह्वान करती हो। जागृतात्माएं वरिष्ठ कही जाने वाली प्रतिभाएँ ऐसे आपत्तिकाल में बाल-क्रीड़ाओं की अपेक्षा कर विशिष्ट पुरुषार्थ में जुट जाती हैं।
पुरुषार्थों में सबसे बड़ा पुरुषार्थ है समय विशेष को पहचान लेना। इतिहास में कभी ऐसा समय भी आता है जब तनिक से प्रयत्नों से बड़े लाभ उठाने का अवसर लाटरी खुलने की तरह हाथ लगता है। ऐसे सुयोग जब कभी आते हैं तो बिना अतिरिक्त प्रयास या योग्यता के बहुत कुछ हस्तगत हो जाता है। किसी को समझदारी मिली है कि नहीं इसकी एक ही कसौटी है कि वह दीर्घ सूत्री-प्रमादी बन कर कहीं समय को पहचानने में चूक तो नहीं कर रहा, इतनी दूरदर्शिता है कि नहीं कि वह इतिहास-प्रवाह के अनुकूल होने की स्थिति को समझ पा रहा है? ऐसे अवसर युग सन्धिवेला में कभी कभी ही आते हैं और परिवर्तन का सूत्र संचालन करने वाले अवतारी तंत्र के साथ जुड़े रहते हैं, राम के समय गीध, गिलहरी, रीछ-वानर, केवट, शबरी ने तथा कृष्ण के समय बाल-ग्वालों, से लेकर सुदामा व पाण्डवों तक ने नगण्य से पुरुषार्थ के बदले जो ऐतिहासिक यशस्विता कमाई वह अवसर निकल जाने पर उससे कहीं अधिक कर दिखाने वालों को भी उपलब्ध नहीं हो सकी।
पूज्यवर की स्मृति में एक विशेष डाक टिकट का विमोचन
भारत सरकार के संचार विभाग द्वारा 27 जून, 91 गुरुवार के दिन सायं 5 बजे तालकटोरा स्टेडियम में परम पूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी की पावन स्मृति में एक डाक टिकट का उपराष्ट्रपति महोदय की उपस्थिति में विमोचन होने जा रहा है। प्रवेश आमंत्रित अतिथियों के लिए कार्ड के माध्यम से होगा। वन्दनीया माताजी भी इस कार्यक्रम में उपस्थित रहेंगी।
साधारण समय और विशेष समय में, साधारण व्यक्ति और विशेष व्यक्ति में, यही विशिष्ट अंतर होता है। तत्काल निर्णय व कदम उठाने तक की प्रक्रिया इतनी तेजी से विशिष्ट समय पर सम्पन्न होती है कि सोच विचार का, अनुकूल अवसर की तलाश का, साथियों की सलाह लेने का कोई अवसर ही नहीं मिल पाता! “डू ऑर डाई” “करना या मरना”, “करिष्ये वा मरिष्ये वा” की रीति-नीति ही अपनानी पड़ती है, नहीं तो मुहूर्त निकल जाने व फिर सिर धुन-धुन कर पछताने का ही उपक्रम हाथ लगता है।
यह समय आदर्शवादी साहसिकता अपनाने वाले, समय को पहचान कर अपनी चाल बदलने वाले, अग्रगामी पुरुषार्थ कर दिखा सकने वाले, अन्तः प्रेरणा का अनुसरण कर तुरन्त कदम उठाने वाले उदारचेताओं की प्रतीक्षा कर रहा है। महाकाल का निमंत्रण उन्हीं के लिए है और उसी से समाज रूपी दूध के कड़ाह में उबल कर उछलकर मलाई की तरह ऊपर आकर तैरने का आह्वान किया जा रहा है। आशा की जानी चाहिए कि जहाँ कहीं भी ऐसी विशिष्टता होगी, दूध के ऊपर तैरती दिखाई देने लगेगी।
शाँतिकुँज को परम पूज्य गुरुदेव ने इक्कीसवीं सदी के नवयुग की गंगोत्री की उपमा दी है। यह शाँतिकुँज है महाकाल का घोंसला है। बहुविधि उत्तरदायित्व, जो युग सृजन के अभियान के अंतर्गत यहाँ हाथ में लिये गये हैं, पूरे हों, इसके लिए हर योग्यता के भावनाशील, कर्मनिष्ठ व्यक्तियों की यहाँ आवश्यकता है। अपनी शर्तें न लादकर दिये जाने वाले दायित्वों को निभा सकने वाले विनम्र और समर्पित व्यक्ति ही युग देवता की इस महत्वपूर्ण आवश्यकता को पूरा कर सकते हैं।
जिनके मन में समय के साथ जुड़कर कुछ विशिष्टता को प्राप्त कर सकने की हूक उठती हो, जो महाकाल के अवतारी रूप को कुछ-कुछ समझ पाये हों व समाज के प्रति अपने दायित्व को निभाने की वरिष्ठता प्रसुप्त रूप में जिनके अंदर विद्यमान हो, ऐसे पूर्ण अथवा आँशिक समयदानी कार्यकर्ताओं की शाँतिकुँज में आवश्यकता अनुभव की जा रही है। संख्या एक हजार हो तो भी कम है एवं एक लाख हो तो भी कम। कार्य क्षेत्र अति व्यापक है। बहुविधि क्रियाकलाप चलने हैं। समाज का मार्गदर्शन करने वाला, राजनीति को दिशा देने वाला एक समग्र तंत्र विकसित होना है। सभी एकटक निगाह लगाये इसी ओर देख रहे हैं। अब किसी भी स्थिति में राजतंत्र को, समाज तंत्र को उपेक्षित नहीं छोड़ा जा सकता। विभिन्न भाषाओं से लेकर देव संस्कृति के अतिव्यापक क्षेत्र में कार्य करने वाले अगणित प्रतिभाशाली इस कार्य में झोंकने पड़ सकते हैं। घर-घर अलख जगाने के लिए अनेकानेक परिव्राजकों को प्रशिक्षित कर केन्द्र से भारत व विश्व के कोने-कोने में भेजना पड़ सकता है।
आह्वान उनका है जो जानबूझ कर गरीबी ओढ़ने को तैयार हों। जिनकी मनःस्थिति ब्राह्मणोचित निर्वाह में रहकर पूरे मन से युग-नियंत्रण में अपने को खपा देने की हो। जिन के पास अपनी निज की व्यवस्था हो व दायित्वों से मुक्त हों, वे विचार विनिमय के बाद यहाँ आने की भूमिका आरंभ कर सकते हैं। कुछ के पास निजी व्यवस्था सीमित स्तर की हो, वे न्यूनतम निर्वाह लेकर भी यहाँ आने का सोच सकते हैं। तीसरे वे हो सकते हैं जिनके दायित्व तो सीमित हों परन्तु स्वयं की व्यवस्था न हो। उनके लिए ब्राह्मणोचित निर्वाह की यहाँ व्यवस्था की गयी है। योग्यता न्यूनाधिक हो सकती हो पर सर्वाधिक महत्व भावनाशीलता व अनुशासन प्रियता को दिया गया है। कुछ कर गुजरने व परम पूज्य गुरुदेव के ब्रह्मनिष्ठ जीवन के निमित्त जीने की जिनकी उमंग हो, उन सभी को प्रस्तुत गायत्री जयंती पर्व पर शाँतिकुँज का भावभरा आमंत्रण है।
विशिष्ट गायत्री जयंती सत्र
इस जून माह की 21 तारीख को गायत्री जयंती का पावन पुण्य दिन है। विगत वर्ष इसी दिन परम पूज्य गुरुदेव ने स्थूल काया के बंधनों से मुक्ति ली थी। इस अवसर पर जीवन भर ब्रह्म कमल की तरह खिलने वाली शाश्वत कालजयी सत्ता को स्मरण करने के लिए पाँच दिन का एक विशिष्ट सत्र आयोजित है। यह 17 जून से 21 जून की तिथियों में होगा। देवात्मा हिमालय व स्मृति उपवन का जिसे पूज्यवर की श्रद्धाँजलि स्वरूप विनिर्मित किया जाना है, इसी अवधि में शिलान्यास होगा। पाँचों दिन संगीत प्रधान भक्तिमय दिनचर्या होगी। परम पूज्य गुरुदेव के व्यक्तित्व व कर्तव्य पर प्रेरक उद्बोधन होंगे तथा भावी निर्धारण पर चित्र प्रदर्शनी, वीडियो, गीत-नाटिकाओं के माध्यम से प्रकाश डाला जायेगा। पाँचों दिन अखण्ड जप भी गायत्री तीर्थ परिसर में चलेगा। जो परम पूज्य गुरुदेव को अपनी श्रद्धाँजलि देना चाहते हों वे इस सत्र में आमंत्रित हैं।
*समाप्त*