भौतिक प्रगति के लिए बलिष्ठ शरीर, प्रशिक्षित मस्तिष्क, आकर्षक व्यक्तित्व, अभीष्ट उपार्जन, आवश्यक वातावरण एवं अनुकूल अवसर की अपेक्षा रहती है। यह साधन जिस किसी को भी जितनी परिमाण में मिल जाते हैं, वह उतनी ही लौकिक सफलता प्राप्त कर लेता है।
आत्मिक प्रगति का मूल्य-महत्व, सुख, प्रतिफल, भौतिक प्रगति की अपेक्षा सहस्रों गुना अधिक है। इतने पर भी उसके लिए दो ही साधन पर्याप्त हैं। एक भावनापूर्ण उपासना, दूसरा जीवन को उत्कृष्ट-अनुकरणीय बनाने की साधना। आत्म शोधन कर इन दोनों के लिए यदि स्थिर मति और प्रगाढ़ निष्ठ के साथ प्रयास किया जाय तो निःसन्देह आत्मिक प्रगति भी उसी तरह मिल सकती है, जैसी कि भौतिक प्रगति।
जीवन की महत्ता और सफलता उसकी आत्मिक प्रगति पर निर्भर है, यह विश्वास मन में रखना चाहिए व नित्य सुदृढ़ बनाना चाहिए। भौतिक सफलताएं तो उतनी ही देर आनन्द देती हैं, जब तक कि उनकी प्राप्ति नहीं हो जाती। मिलते ही आनन्द समाप्त हो जाता है व और अधिक के लिए व्याकुलता, बेचैनी आरंभ हो जाती है। जो मानव जीवन का श्रेष्ठतम सदुपयोग कर उस आनन्द की प्राप्ति के इच्छुक हैं, जिसके लिए यह जन्म मिला है, उन्हें आत्मिक प्रगति के लिए तत्पर होना चाहिए और उसके दोनों आधारों उपासना और साधना का अवलम्बन लेना चाहिए।
मनुष्य में जो असीम एवं अपरिमित शक्तियाँ भरी पड़ी हैं उनके अस्तित्व में विश्वास करने और तद्नुरूप उन्हें हस्तगत कर लेने की योग्यता-क्षमता को प्रतिभा के नाम से जाना जाता है। यह न तो जन्मजात उपलब्धि है और न किसी का दिया हुआ वरदान-आशीर्वाद। भाग्यवश मिला हुआ आकस्मिक संयोग-सुयोग भी नहीं कहा जा सकता। वह स्व उपार्जित ऐसी विलक्षण सम्पदा है, जिसके सहारे जीवन की प्रतिकूल दीखने वाली परिस्थितियों को अनुकूल बनाया जा सकता है।
जिन व्यक्तियों ने अपनी प्रसुप्त प्रतिभा को उपयोगी दिशा में लगाया है, उसके सत्परिणाम उन्हें हाथों हाथ मिलते देखे गये हैं। परिस्थितियाँ कितनी विपन्न और विषम क्यों न बनी रही हों, पर धुन के धनी लोगों ने जीवन की महत्वपूर्ण सफलताएँ अर्जित कर दिखाई हैं।
फ्राँस में जन्मी मैडम क्यूरी अपने युवा काल में एक धनी परिवार के बच्चों की देख भाल करने में ही लगी रहती थी। उसने धैर्य का परिचय देते हुए पेरिस विश्व विद्यालय में पहुँच कर विज्ञान की कक्षा में प्रवेश पा लिया। आर्थिक अभावग्रस्तता के कारण क्यूरी को कितनी परेशानियों का सामना करना पड़ा, यह सर्वविदित है, पर उसने निराशा को पास में नहीं फटकने दिया और अपने मनोयोग और तत्परता का प्रमाण प्रस्तुत करते हुए रेडियम के आविष्कार से विज्ञान जगत का नक्शा ही बदल डाला।
अमेरिका के ख्यातिलब्ध मनोविज्ञानवेत्ता पादरी नार्मन विन्सेंट पील ने एल्युमिनियम के बर्तन बेचने से अपना कार्य आरंभ किया। उनके अंतर्मन में इतना विश्वास था कि एक कुशल ‘सेल्समैन’ की प्रतिभा के बीज उनमें विद्यमान हैं, पर परिस्थिति और वातावरण की प्रतिकूलतावश वह उभर कर बाहर नहीं आ पा रहे है। प्रारंभ में तो उनको लोगों की उपेक्षा, उपहास का शिकार बनना पड़ा फिर भी अपनी लगन निष्ठ के बल पर वे लक्ष्य को प्राप्त करके ही रहे।
श्री नारमन पील ने जो अन्ततः पादरी बने, जीवन काल में कई ऐसी पुस्तकें लिखी हैं जिनको पढ़कर जीवन विरोधी परिस्थितियों से जूझने और सफलता अर्जित कर सकने की प्रेरणा मिलती है। “एन्थुजीआज्म मेक्स द डिफरेंस” नामक पुस्तक में उनने ग्यारह शब्दों का एक फार्मूला सुझाया है ‘एव्री प्रोबलेम कन्टेन्स विदिन इटसेल्फ द सीड्स ऑफ इट्स ओन सौलूशन’ अर्थात् प्रत्येक समस्या स्वयं में समाधान के बीज रखती है। उन्हें अंकुरित और विकसित करने की जिम्मेदारी मनुष्य की होती है कि वह अपने उद्देश्य की पूर्ति हेतु संकल्पबद्ध प्रयास करे।
जीवन को प्रगतिशील दिशा देने वाली प्रतिभा को सुविकसित करने हेतु स्वतः स्वर्णिम सूत्र भी उनने सुझाये हैं, जो इस प्रकार हैं-
(1) मस्तिष्क से असफल होने के विचारों को निकाल फेंके और अपनी अन्तर्निहित क्षमताओं को समझें।
(2) स्व-सहानुभूति को पृथक करके अपने दोष दुर्गुणों अथवा दुर्बलताओं को निरीक्षण-परिक्षण करें।
(3) अपने ही स्वार्थ के विषय में सोच-विचार बन्द करें, दूसरों की सेवा-सहायता को भी सोचें और कार्य रूप में परिणत करें।
(4) ईश्वर-प्रदत्त इच्छा शक्ति का सही समुचित प्रयोग करें। उसकी दिशा धारा को व्यर्थ-निरर्थक न बहने दें।
(5) जीवन लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए ही जीवनचर्या का निर्धारण करें।
(6) मानसिक ऊर्जा को नियंत्रित करके उपयोगी दिशा में नियोजित करें। चिन्तन की दिशा को सदैव सृजनात्मक बनाए रखें।
(7) जीवन के प्रत्येक दिन सुबह और शाम उस परब्रह्म की समर्थसत्ता के साथ संपर्क-
(8) सान्निध्य बिठाने का अभ्यास किया जाय, जो असंभव दिखने वाले कार्य को भी संभव बना सकने की शक्ति प्रदान करती है।
(9) ये वे महत्वपूर्ण सूत्र हैं जिनका अवलम्बन लेकर हर कोई अपनी प्रतिभा को कुण्ठित होने से बचा कर स्वयं को प्रगति के परम शिखर तक पहुँचा सकता है। प्रतिभा ही तो सफलता का बीज है।
आग का सामान्य स्वभाव गर्मी और रोशनी है जो वस्तु उसके जितनी निकट आती है, वह उसे प्रस्तुत परिस्थितियों के अनुसार जलाती है। जब तक जितना ईंधन जिस स्तर का रहता है, वह प्रज्वलन उसी स्तर का होता है। आग बुझ जाय तो ईंधन के रहते हुए भी ज्वलन क्रम बन्द हो जाता है। इसी प्रकार ईंधन कितना ही क्यों न हो, यदि आग जल न रही हो, तो फिर सब कुछ जहाँ कहाँ पड़ा रहने पर भी जलने जैसा कोई उपक्रम दीख न पड़ेगा।
आग और ईंधन के मिलन से प्रज्वलन होता है-यह तथ्य यथावत् रहते हुए भी उस सम्मिलन की प्रक्रिया में यही अन्तर रहता है - लकड़ी गीलेपन समेत जलाई जाए, तो उसमें से धुँधला धुँआ भर निकलता और जलता बुझता रहेगा। इसके विपरीत सूखा ईंधन यदि भीतर तक हवा पहुँचने की स्थिती का हो, तो तेज आग जलेगी, जल्दी फैलेगी और ज्वलन भी वेगवान होगा। इन भिन्नताओं के कारण आग और ईंधन के मिलने पर लपट उठने के सिद्धान्त में बहुत कुछ अन्तर देखा और पाया जायेगा।
पेट्रोल या गैस हवा के साथ मिलकर एक चिंगारी भर से भक् जल जाती है और देखते-देखते बड़े क्षेत्र को अपने प्रभाव परिकर में लपेट लेती है। बारूद में मिले रसायनों के अपने-अपने गुण हैं। आतिशबाजी जलने पर अपने चित्र-विचित्र रंग-रूप दिखाती और अपने ढंग के मनोरंजक स्वरूप धारण करती है। आग्नेयास्त्रों के साथ संपर्क बनने पर उसकी प्रतिक्रियाएँ अलग-अलग तरह की होती हैं। बन्दूक के कारतूस और तोप के गोलों की शक्ति अलग-अलग तरह की उठती है। ‘डायनामाइट’ की कारतूस पहाड़ के चट्टानों को उड़ा देती है, मजबूत किले के धुर्रे बिखेर देती है। मुर्दा जलते समय वही आग अपनी परिधि को विषैले धुएँ से भर देती है। इसके विपरीत यदि चन्दन या कपूर आदि को जलाया जाय, तो उसकी मन-भावन सुगंध उठती है। पुआल में लगने पर वह तेजी पकड़ती जाती और दूर-दूर तक देखते-देखते फैल जाती है। इसके विपरीत गीला और मटमैला ईंधन ज्यों-त्यों करके थोड़ा-थोड़ा करके जलता और धुआँ बिखेरता रहता है।
आग के अपने गुण हैं, ईंधन के अपने। मोटी प्रतिक्रिया मिलने पर जलने की ही होती है, पर पदार्थों और परिस्थितियों के अनुरूप उस ज्वलनशीलता में असाधारण स्तर का अन्तर पाया जाता है।
मनुष्य के शरीर में एक तरह की और चेतना में दूसरे तरह की शक्ति रहती है। शरीर जीवनी शक्ति को धारण किये रहता है, जिसके सहारे अनेकों अंग और कल-पुर्जे चलते और अपना-अपना काम करते रहते हैं। गर्मी उसी के सहारे बनी रहती है और काम करने की क्षमता का उद्भव उसी से होता है। बलिष्ठता उसी पर निर्भर है। रोगों से लड़ने की शक्ति भी उसी में रहती है। इसमें कमी पड़ने पर अनेकों प्रकार की दुर्बलता और आ घेरती है।
चेतना मन की शक्ति, हिम्मत,साहस की जन्मदात्री है। ओजस्, तेजस्, और वर्चस् भी उसी की देन है। यदि यह न रहे, तो जीवित रहना भी कठिन और असंभव हो जाय। बौद्धिक प्रखरता भी इसी के बल पर मिलती है। मनोबल, आत्मबल चेतना की ही प्रखरता के गुण हैं। दोनों उपरोक्त शक्तियाँ यदि अक्षुण्ण रहे, तो ही मनुष्य जीवित या सशक्त रह पाता है।
यह शारीरिक और मानसिक प्रयोग है। आध्यात्मिक शक्ति इससे आगे एवं ऊपर है। उसका संबंध न केवल शरीर एवं मस्तिष्क से है, वरन् अदृश्य जगत में संव्याप्त दैवी सत्ता के साथ भी वह अपना संबंध जोड़ती है। देवी-देवताओं के नाम से भी उन्हीं विशेषताओं को भागो-उपभागों को संबद्ध समझा जाता है। परब्रह्म यही है। ईश्वर, भगवान, स्रष्टा आदि भी इसी के नाम हैं। विश्व-ब्रह्माण्ड में संव्याप्त होने के कारण इसी को विश्व-चेतना भी कहते हैं। यह थोड़ी मात्रा में तो सभी में होती है, पर इसकी विशेष मात्रा योग, तपस्वी अपनी विशिष्ट साधना के बलबूते अर्जित करते हैं। इसी के अनुपात से कोई देवात्मा, महामानव, सिद्ध पुरुष आदि बन सकता है। जिस प्रकार पतंग के पतले धागे में भी कभी-कभी कारणवश विद्युत प्रवाह आ जाता है, या उसे प्रयत्नपूर्वक आकर्षित - अर्जित कर लिया जाता है, उसी प्रकार मनुष्य में दैवी शक्तियों का समावेश भी हो जाता है। यह बड़ी मात्रा में होती है, तो उसे व्यक्तित्व की असाधारण मात्रा में देखा पाया जाता है। दिव्य व्यक्तित्व इसी के सहारे उपलब्ध या विकसित होता है, किन्तु अतिरिक्त प्रयत्न करने पर दोनों के बीच घनिष्ठता भी उत्पन्न हो जाती है और परस्पर का आश्चर्यजनक आदान-प्रदान भी आरंभ हो जाता है।
ब्रह्माण्ड में अगणित शक्तियों के भंडार भरे पड़े हैं उनमें से जितने अपने लिए पृथ्वी आवश्यक समझती है, उतनी ध्रुव केन्द्र के माध्यम से खींचती और धारण करती है। जो अनावश्यक है, बहिष्कृत कर दी जाती है। इस प्रकार जिस मनुष्य ने अपने सूक्ष्म अन्तःकरण को जितना परिष्कृत बना लिया है, वह उतना ही दैवी अंश अदृश्य जगत से अपने लिए आकर्षित कर लेता है। उसमें उतने ही बढ़े-चढ़े दैवी अंश पाय जाते हैं। उच्चस्तरीय शक्ति-स्त्रोत यही हैं। इसकी तुलना में शारीरिक जीवनी शक्ति और मानसिक विलक्षणता नगण्य है। उसमें उतना ही अंश पाया जाता है, जितना की अन्तराल में धारण कर सकने की विशिष्ट क्षमता होती है। इसे प्रयत्नपूर्वक अर्जित करना पड़ता है। साधना इसी प्रयत्नशीलता को कहते हैं।
उच्चकोटि के साधकों में जो कतिपय दिव्य शक्तियाँ पायी जाती हैं, वह उनके अपने साधना प्रयत्नों द्वारा अर्जित की हुई होती हैं। तपस्वी इसी प्रयत्न में लगे रहते हैं। योगियों का पुरुषार्थ इसी उपार्जन-अर्जन के लिए होता है। ऋषि, ब्रह्मर्षि, राजर्षि, देवर्षि इसी स्तर की क्षमता अपने भीतर अत्यन्त कष्टसाध्य प्रयत्नों द्वारा अर्जित करते हैं। जो जितनी, जिस स्तर की सफलता प्राप्त कर लेता है, वह उतने ही बढ़े-चढ़े स्तर का सिद्ध पुरुष बन जाता है।
मनुष्य कलेवर में सीमित मात्रा में विशेष शक्ति धारण करने की क्षमता है। शरीर की धारण शक्ति एक सीमा तक है। खेलों में कीर्तिमान स्थापित करने वाले इसी का परिचय देते हैं। पहलवानों, बलवानों, योद्धाओं,बलिष्ठों में इसी का बाहुल्य देखा जाता है। मानसिक बल की भी एक सीमा है। बुद्धिमान, मेधावान, विशेषज्ञ, विद्वान, मनीषी इसी धन के धनी होते हैं। कभी-कभी उनमें अतीन्द्रिय क्षमताएँ भी पायी जाती हैं। आधुनिक परामनोविज्ञान के अंतर्गत दूरदर्शन, दूरश्रवण, भविष्यज्ञान, प्राण प्रत्यावर्तन जैसी विशेषताएँ इसी आधार पर अर्जित करते देखी गई हैं। मानवी विद्युत के कई प्रकार के चमत्कार कितने ही लोगों में देखे गये हैं। यह भी इसी क्षमता का परिचय है।
ऊपर आँख उठा कर देखने से नीला-पीला आकाश दीख पड़ता है, इसकी परिधि कितनी बड़ी है, यह साधारण आंखों से या मोटी बुद्धि से नहीं समझा जा सकता। फिर भी वह इतना विस्तृत है कि उसे अकल्पनीय ही कह सकते हैं। साधारण समझ के अनुसार यह खाली दिखाई पड़ता है। जहाँ-तहाँ चाँद, तारे, गैसें, ग्रह-पिण्ड चमकते दिखाई पड़ते हैं, किन्तु उनकी भी एक सीमा है। जितने तारे दीखते हैं, उससे करोड़ों गुना वे हैं, जो आंखों की पकड़ में नहीं आते और सदा अदृश्य ही बने रहते हैं। दीखने में पोला या खाली दीखने वाला यह आकाश भी सर्वथा शून्य नहीं है। इसमें एक से एक बढ़ कर चमत्कारी शक्तियाँ भरी पड़ी हैं। एक्स-रे, अल्ट्रावायलेट, लेजर, रेडियो तरंगें, ईथर आदि का बड़ा शक्तिशाली भंडार इस पोले आकाश में भरा पड़ा है। यदि उसे नापा-तौला जा सके, तो उसका भरमार उससे कही अधिक बैठेगा, जितना कि इस अपनी दृश्यमान पृथ्वी की देन समझा जा सकता है।
जो वस्तुएँ खुली आंखों से नहीं देखी जा सकती, उसे सामान्य बोल-चाल में सूक्ष्म कहते हैं। दृश्यमान पदार्थों में से बहुत थोड़ा ही आंखों से दीख पड़ता है, शेष ऐसे हैं, जिन्हें अत्यन्त सूक्ष्मदर्शी यंत्रों में से ही किसी मात्रा में देखा-समझा जा सकता है। यह अदृश्य प्रतीत होते हुए भी स्थूल जगत की परिधि में आता है। पदार्थ इस संसार में जितना दृश्य है, उससे करोड़ों-अरबों गुना अदृश्य है। इतने पर भी उसे हम कदाचित् ही किसी सीमा तक देख-समझ पाते हैं।
सूक्ष्म पदार्थ जगत की तरह सूक्ष्म चेतना जगत का भी उससे भी विशाल सूक्ष्म जगत है सचेतन। इस समस्त विश्व-ब्रह्माण्ड में अदृश्य चेतना भी भरी पड़ी है। इसे सचेतन स्तर का सूक्ष्म जगत कहते हैं। यही विराट् ब्रह्म है। इसकी विशेषताएँ और विचित्रताएँ इतनी हैं कि उसकी आँशिक कल्पना कर सकना भी कठिन है परब्रह्म या विराट् ब्रह्म यही हैं। इसी विशाल सूक्ष्म चेतना जगत के मनुष्य की प्राण-चेतना का भी एक बहुत छोटा अंश रहता है। जिस प्रकार विशाल समुद्र में छोटे-छोटे असंख्य जल जन्तु रहते हैं, ठीक उसी प्रकार विराट् ब्रह्म के अंतर्गत भी मनुष्य में विद्यमान चेतना भी अणु-परमाणुओं के रूप में किसी प्रकार अपनी सत्ता बनाये हुए है। आमतौर से उसमें से उतना छोटा अंश लोगों के परिचय में आता है, जो शरीर अथवा मस्तिष्क की हलचलों के निमित्त काम आता है। इससे भीतर अन्तःकरण या कारण सत्ता है। इसे जीवधारी या आत्मा कहते हैं।
यों पृथक-पृथक लोगों ने आत्मा के परमाणु अलग-अलग स्तर के बताये हैं। इतने पर भी वे एक विराट् ब्रह्म के छोटे-छोटे घटक हैं, साथ ही इतनी सघनतापूर्वक जुड़े हुए भी हैं कि एक-दूसरे को असाधारण रूप से प्रभावित करते हैं। एक दूसरे को आवश्यक एवं अभीष्ट मात्रा में क्षमता का आदान-प्रदान भी करते हैं। जिस विशेष क्षेत्र में यह हलचल चलती है, उसे अदृश्य अथवा सूक्ष्म जगत कहते हैं। इसमें अनेकों अदृश्य जीवधारी भी रहते हैं, जिन्हें भूत, प्रेत, देव, दानव आदि नामों से जाना जाता है। जिस प्रकार दृश्य जगत के प्राणी पारस्परिक सहयोग या विद्वेष करते हैं, उसी प्रकार सूक्ष्म चेतना, सचेतक जगत के घटक भी परस्पर चित्र-विचित्र स्तर का पारस्परिक संबंध बनाये रहते हैं। इस सचेतक सत्ता का जिसमें जितना अधिक अंश किसी प्रकार बढ़ जाता है, वह महामानव दैत्य मानव बन जाता है। यदि यह शक्ति सात्विक स्तर की हो, तो उसे देवत्व कहा जाएगा और यदि वह असुरता प्रधान हो, तो फिर उसे दैत्य और दानव स्तर का कहा जाएगा। दोनों में ही साधारण मनुष्यों की अपेक्षा अतिरिक्त स्तर की असाधारण शक्ति पायी जाती है। इसलिए उनका कर्तृत्व जनसाधारण की तुलना में कही अधिक बढ़ा-चढ़ा और विशिष्ट, बलिष्ठ, अद्भुत एवं चमत्कारी भी होता है।
मनुष्य विशेष की तरह परब्रह्म सत्ता की भी समय-समय पर अपनी इच्छाएँ और योजनाएँ उभरती हैं। सृष्टि का संतुलन बनाये रहना ही उसका प्रधान उद्देश्य होता है। इस प्रयोजन के लिए वह कई प्रकार के निर्माण, अभिवर्धन एवं परिवर्तन भी करती रहती है, पर उस कर्तृत्व की प्रक्रिया विलक्षण होती है। व्यापक सत्ता का कोई आकार नहीं हो सकता। उसके अंग अवयव भी नहीं होते। उपकरणों से भी वह सिद्ध नहीं होती। इसके बिना कोई दृश्यमान क्रिया-प्रक्रिया बन कैसे पड़े? इसलिए सूक्ष्म जगत के विशिष्ट कार्य भी जब दृश्यमान स्तर पर सम्पन्न करने होते हैं, तो उसके लिए परब्रह्म को भी मनुष्य शरीर का आश्रय लेना पड़ता है क्योंकि इस विशाल विश्व में मात्र मनुष्य शरीर ही एक ऐसा है, जो दैवी चेतना के अनुरूप कोई क्रिया-प्रक्रिया कर सकने में समर्थ है, स्थूल और सूक्ष्म जगत का संचालन करने वाली परब्रह्म सत्ता की किसी इच्छा या अपेक्षा में योगदान दे सकता है।
इस स्तर के मनुष्यों को देवात्मा कहते हैं। मानवी संरचना वाले यह देव पुरुष पर ब्रह्म की आशा एवं योजना के अनुरूप आवश्यक प्रयोजन पूरा करने में समर्थ होते हैं। दिव्य मानव, सिद्धपुरुष, अवतार, देवदूत नाम से इन्हें ही जाना जाता है। भगवान अपने सामयिक अभीष्ट प्रयोजन विकासक्रम में मनुष्य स्तर की पूर्णता प्राप्त होने के इन शरीरों से ही पूरे कराते रहे है। जिन दिनों पृथ्वी पर सतयुग का वातावरण था, उन दिनों सृष्टि संतुलन की अनेकानेक महत्वपूर्ण प्रक्रियाएँ ऋषि स्तर के समर्थ व्यक्तित्वों द्वारा भी सम्पन्न होती रही हैं।
इन दिनों असामान्य समय है। एक ओर जहाँ असंतुलन का बोल बाला है, भटकावजन्य दुर्गति दीख पड़ती है, वहाँ दूसरे ओर परिवर्तन की प्रक्रिया पलक झपकते सम्पन्न होते दिखाई देने लगी है। निश्चित ही अगले दिन ऊँचे उठने और उठाने के है। उसमें जिनकी भूमिका हो सकती है, उन्हें देवदूतों की गणना में सम्मिलित किया जाना चाहिए। यों ऐसे कितने काम हैं जिनमें निजी विवेक के अतिरिक्त ईश्वरीय अनुग्रह भी सम्मिलित होता है। इस समन्वय से उत्पन्न शक्ति का पारावार नहीं रहता। शक्ति हाथ में हो तो श्रेय मिलने में कठिनाई नहीं पड़ती। भावना में प्रखरता हो तो परिस्थितियाँ दुर्बल होते हुए भी सफलता का सुयोग बन जाता है। जो भगवान के साथ जुड़ने का प्रयत्न करते हैं, उनके साथ भगवान भी गज और ग्राह जैसी भूमिका निबाहने के लिए दौड़ा आता है, यह तथ्य सदैव स्मरण रखा जाना चाहिए।
“भद्रे! अतिथि पधारे हैं! अर्घ्य! महापण्डित अपनी लेखनी छोड़कर बड़ी आतुरता पूर्वक उठे थे। उन्होंने आज न जाने कितने वर्षों के बाद पत्नी को उच्च स्वर में पुकारा था। गौर-वर्ण, कृशकाय, उन्नत भाल जैसे कोई जनःलोक का ऋषि धरती पर उतर आया हो। शिला पर एक जीर्ण कुशासन पड़ा था और आस-पास भोज पत्र बिखरे थे।
अद्भुत थी, कश्मीर की इस एकान्त कुटिया में ग्रन्थ प्रणपन करने वाले, इस महापुरुष की शक्ति। उनके जीवन काल में ही उनके ग्रन्थों की प्रतिलिपियाँ प्रयाग और काशी तक आ पहुँची थीं। नवीं शताब्दी के इस उत्तरार्ध काल में पुस्तकें छपती नहीं थी। पत्रों में समालोचना निकलने का सवाल कहाँ उठता ? उनके प्रचार का साधन थी उनकी श्रेष्ठता। उन्हें इतना उत्कृष्ट होना चाहिए की जो एक बार पन्ना पलटे, वह इतना उत्सुक हो उठे कि कई मास उसकी प्रतिलिपि करने में होने वाला श्रम उसे सहज स्वीकृत हो जाय। इस प्रतिलिपि परम्परा से ही सम्भव था उनका प्रचार-प्रसार। संस्कृत विद्या के महान केन्द्रों में देश भर के विद्वान उनकी ग्रन्थ प्रतिलिपियों का आदर करते थे। अभिभूत थे उनकी उस विचार शक्ति के समक्ष जो विद्वानों से लेकर सामान्य जन तक सभी को एक साथ प्रभावित किये थी। तभी तो इस शक्ति का स्त्रोत ढूंढ़ने के लिए मनीषियों का समुदाय प्रयाग से कश्मीर तक की पद यात्रा करके आ पहुँचा था और कोई साधन भी तो नहीं था यात्रा का सिवा पाँवों के।
आगत-जन उन्हें निहारते हुए कुछ सोच रहे थे कि मिट्टी के बर्तन में अर्घ्य के लिए जल लेकर महापण्डित की सहधर्मिणी उटज के बाहर निकलीं।
“हम आपके दर्शनार्थ आए हैं। साक्षात न सही-आपके वाङ्मय शिष्य है हम सब!” आगतों ने श्रद्धासमन्वित प्रणिपात किया। पण्डितराज उन्हें अर्घ्य समर्पित करें-यह अत्यन्त संकोच की बात थी। उन्होंने देख लिया की अतिथियों को संकोच हो रहा है तब उन्होंने स्वयं चरण धोने का आग्रह नहीं किया। शिला पर चटाई बिछा दी। तपस्वी के आश्रम का आतिथ्य उसके उपयुक्त ही तो होगा।
“आपकी सत्कीर्ति का चुम्बकत्व हमें खींच लाया।” आगन्तुकों ने अपना परिचय दिया। “हम लोगों की तरफ विद्वत् समुदाय में कश्मीर मण्डल कल्लट के कश्मीर के रूप में प्रचलित है।” उनमें से एक ने अपनी लोकप्रियता उजागर करनी चाही।
“अरे नहीं! नहीं!!” बात को नया मोड़ देते हुए वह बोले “यह भूमि कल्लट के कारण नहीं महर्षि कश्यप के कारण विख्यात है। तभी तो इसका प्राचीन नाम कश्यपमीर है। अभी भी श्रीनगर से तीन मील की दूरी पर कश्यप मुनि का आश्रम है। शारिका दैवी का मन्दिर, भगवती सती के कष्ट-पात का स्थान यही है। अमरनाथ की गुफा, शिव के रुद्र तीर्थ ने इसे गौरवपूर्ण बनाया है। भगवान मत्स्य की अवतार भूमि यही है।” वे कश्मीर की ऐतिहासिकता बता रहे थे। केसर और कवित्व की जन्म भूमि का इस रूप में परिचय सभी को उत्साहवर्धक लगा।
“अतिसाँनिध्यादनाद्रम्।” तनिक एकान्त पाकर प्रयाग के एक पण्डित ने अपने सहचरों से धीरे से कहा-”यहाँ का नरेश ऐसे अमूल्य रत्न का भी आदर नहीं कर सका।”
“यह जीर्ण कुटीर! यह कंगाली-सरस्वती के ऐसे वरद पुत्र के पास!” व्यथा सबके चित्त को पीड़ित कर रही थी। “हम कल उसे धिक्कारेंगे, बड़ा आया विद्वान के सत्कार का इच्छुक?”
दूसरे दिन प्रयाग और काशी के ये विद्वान राजसभा में पधारे। महाराज ने उनका श्रद्धा-समन्वित स्वागत किया। उन्हें वस्त्राभूषण एवं विपुल दान-दक्षिणा देनी चाही। किन्तु उनमें से एक ने नरेश के सम्मान के प्रति आस्था नहीं व्यक्त की। उल्टे स्पष्ट सुना दिया “नरेश! तू हमें कंचन से ठगना चाहता है? तेरी मंशा है कि इसे लेकर हम तेरा स्तवन करें, तेरी कीर्ति का प्रसार करें? कृपण! तेरे यहाँ अमूल्य रत्न और दो मुट्ठी अन्न की भी व्यवस्था नहीं। भारतवर्ष का सर्वश्रेष्ठ विद्वान यहाँ जीर्ण कुटीर में कच्चे फलों पर जीवन यापन करने पर विवश है। यह उसकी विवशता नहीं, तेरी उपेक्षा का परिणाम है कि इतना यशस्वी महापण्डित नितान्त दीन अवस्था में रह रहा है।” “आप सब सत्य कहते हैं” कश्मीर नरेश सिर झुकाये कह रहे थे। “किन्तु महापण्डित कुछ स्वीकार करेंगे, इसकी संभावना कहाँ ...?”
“प्रयत्न किया कभी?” विद्वानों का रोष शान्त नहीं हुआ था। अन्ततः उनका आदेश महाराज ने डरते-डरते स्वीकार कर लिया। एक उत्तम जागीर का दानपत्र लिखवाया उन्होंने और राजमुद्रा से अंकित करके उनको अर्पित कर दिया।
“क्या प्रश्न है? वैसे ही सुना दे आप सब? वह दानपत्र लेकर जब विद्वानों का समुदाय महापण्डित के आश्रम में पहुँचो और उनके चरणों के समीप वह दानपत्र धर दिया, तब उन्होंने समझा कि कोई लिखित शंका इन विद्वानों ने उनके सम्मुख रखी है।
“कोई प्रश्न नहीं।” नम्रतापूर्वक उन सबने कहा। “नरेश ने निर्वाह योज्य भूमि आपको अर्पित की है, उसका दानपत्र है यह।”
“राज्य को आश्रय देने वाला ब्राह्मण राजाश्रय में रहे!” वह झटके से उठ खड़े हुए। दानपत्र शिला से नीचे गिर पड़ा। उन्होंने चटाई गोल करके दबाई और कमण्डलु उठाया पत्नी को आवाज दी “भद्रे! यहाँ के शासक में धन पद आ गया। चलो, चले यहाँ से।”
सहधर्मिणी को क्या लेना था, कुटिया में जीर्ण उत्तरीय मस्तक पर डाला और द्वार से बाहर आ खड़ी हुई। “मुझे क्षमा कर दें। यह अपराध मैंने स्वतः नहीं किया है।” कश्मीर नरेश वृक्षों के पीछे से निकले और सिर झुका कर खड़े हो गए। उन्हें पता था जनता जिसे अपना आराध्य मानती है, उसके जाने से जन द्रोह हुए बिना न रहेगा। स्वयं उनके मन में भी पण्डितराज के प्रति कम सम्मान न था।
“यह अपराध हमारा है। हमने महाराज से अनुरोध किया था।” विद्वानों ने करबद्ध प्रार्थना की।
“ब्राह्मण धन की माँग करे? “एक क्षण के लिए उनके मुख पर रोष की रेखाएँ उभरी। लेकिन दूसरे ही क्षण संयत स्वर में बोले “आप सब तो अतिथि हैं।” उन्होंने संकेत दिया पत्नी को कुटिया में जाने का। चटाई शिला पर बिछाते हुए उन सबसे बोले “खेद है आप सबने अपरिग्रह को दरिद्रता समझ लिया, जबकि यह है मनुष्य में मनुष्य के विश्वास की चरमावस्था और ब्राह्मण का जीवन है इसका चरमादर्श। संग्रह का तात्पर्य है, इस विश्वास का अभाव। इस विश्वास के अभाव का मतलब अलगाव। आदमी के दिल और दिमाग पर खिंची अलगाव की रेखाएँ -मनुष्यता पर आरियाँ चलाए बिना न रहेंगी। परिणाम होगा-आतंक की दहशत में सिसकता जीवन।” उन्हें अभी तब इसका दुःख था कि इन सबने ब्राह्मण होकर व्यक्तिगत सुख के लिए धन चाहा। भले ही यह कार्य अनजाने में हुआ हो पर स्वयं ब्राह्मण होकर वे अतिथिगण ब्राह्मणत्व के मर्म को नहीं समझ पाए थे, यह सोच-सोच कर वे क्षुब्ध थे।
सभी मौन थे। व्याप्त होती जा रही नीरव स्तब्धता को तोड़ते हुए बोले “ब्राह्मण व्यक्ति नहीं संस्थान है। यह किसी जाति विशेष में उपजे कुछ मानवो का समुच्चय नहीं, महत्तर कर्म का आदर्श है। समाज रूपी शरीर के इस स्नायु संस्थान में गड़बड़ी हुई तो सब कुछ ठीक रहते हुए भी हर अंग अपाहिज हो जाएगा। हो क्यों न हर कहीं संवेदना के प्राण पहुँचने वाले स्नायु जो मरने लगे।”
सब सिर नवाये खड़े थे -उन्हें क्या पता था जिसे वे इस महा तापस की दरिद्रता समझ बैठे थे, उसमें इतने गहरे रहस्य छुपे हैं। उनकी वाणी अभी भी अबाध गति से प्रवाहमान थी, “ब्राह्मणों! अपने को पहचानो तुम्हारा धन जमीन और धातु के टुकड़े नहीं, तप और विद्या है। तप अर्थात् विद्या का अर्जन और विद्या यानी कि लोक जीवन का सृजन-पोथियों का भार वहन नहीं।” वार्तालाप के इस दौर में उनके हाथ दानपत्र को फाड़ रहे थे। उनके आसन की शिला के आस-पास दानपत्र के टुकड़े वायु में उड़ने लगे थे।
...”मैंने सारे जीवन इसी ब्राह्मणत्व की साधना की है। यही मेरी ऊर्जास्विता और शक्ति का स्त्रोत बना है।” इन शब्दों ने प्रयाग के पण्डितों को चौंका दिया-यही तो वे ढूँढ़ने आए थे क्या है महापण्डित कल्लट का शक्ति स्त्रोत? उन्हें स्वयं पर शर्म लगने लगी थी। इधर वह कह रहे थे-”मेरा कर्तृत्व भूर्जपत्रों पर कुछ अक्षरों को जोड़ने तक सीमित नहीं रहा। मैंने लोगों के दिलों को जोड़ा है।”
“हम सभी क्षमा चाहते हैं महापण्डित” उनमें से एक वयोवृद्ध सज्जन जैसे-तैसे करके बोल सके। “अब से हम सभी आपके आदर्श पर चलने की चेष्टा करेंगे। हमें अब कहीं जाकर आपके कर्तृत्व का मूल-उसका मर्म ज्ञात हुआ है।” “यह मेरा आदर्श नहीं, मेरा निजी कर्तृत्व नहीं है। ऋषियों का सनातन आदर्श आर्य भूमि की गौरवमयी परम्परा है ब्राह्मण बनने और ब्राह्मण बनाने की तुममें से प्रत्येक समाज के स्नायु संस्थान का जीवन्त स्नायु बने। ध्यान रखें! पहले दिल अलग होते हैं तब घर बँटते हैं। घर का यह बँटवारा एक माँ के लाड़लों के बीच अलगाव आतंक दुश्मनी की आड़ी तिरछी रेखाएँ खींचता है। इसे वही मिटा पाएगा जिसने ब्राह्मणत्व का अर्जन किया है जो विद्या और तप का धनी है। स्वयं की संवेदना के प्रवाह से औरों को संवेदनशील बनाने की क्षमता रखता है।”
नवीं शताब्दी में कहे गए ये वाक्य आज भी उतने ही प्रखर और सार्थक हैं। ‘सपन्दकारिका’ के यशस्वी लेखक कल्लट के आदर्श को आज की परिस्थितियों में वैसे ही शाश्वत,चिरन्तन, स्थायी नियम माना जा सकता है। संवेदना उसी में विकसित हो सकती है जो स्वयं तपा हो। औरों का दुःख जिसे अपना लगता हो। अपने ऊपर कठोरता ब्राह्मण इसीलिए करता है ताकि जीवन जीने की सही विधा का औरों को शिक्षण मिल सके तथा साधनों का दुरुपयोग न होकर मानव मात्र के लिए सदुपयोग हो।
हिन्दुस्तान को स्वराज्य देने के सिलसिले में जाँच पड़ताल करने के लिए साइमन कमीशन भारत आया। उसने सर्वप्रथम गाँधी जी से भेंट परामर्श करना आवश्यक समझा।
कमीशन दिल्ली आया, वायसराय ने गाँधी जी को टेलीफोन में सूचना देकर दिल्ली हवाई जहाज से बुलाया ताकि वे जल्दी आ सकें।
गाँधी जी थर्ड क्लास में चलते थे। गरीब देश की एक पाई भी अपव्यय नहीं करना चाहते थे। वे थर्ड क्लास वाली रेल में बैठ कर ही दिल्ली पहुँचे। उनने कहा समय का मूल्य तो अवश्य है पर आदर्शों का निर्वाह मूल्य उससे भी अधिक है।
निष्ठुरता, एकाकीपन, अलगाव से भरे आज के समाज में सतयुगी संभावनाएँ तभी साकार होंगी जब मानव के अन्दर ब्राह्मणत्व जागेगा। सादा जीवन, उच्च विचार की परम्परा का विस्तार होगा। गरीबी को जानबूझकर ओढ़ने वालों को सम्मान की दृष्टि से देखा जाएगा। बड़प्पन की कसौटी एक ही होगी, विकसित भावसंवेदना, श्रेष्ठ-उदात्त चिन्तन व समाज को ऊंचा उठाने वाले सत्कर्म। संधि वेला में ऐसे अनेक नव ब्राह्मण उभरकर आएँगे। जाति, वंश के भेद से परे इन महामानवों की जीवनचर्या परमार्थ पारायण होगी। सतयुग की वापसी तब ही तो होगी।
राजा की हार हुई। वह दुश्मनों से अपना पीछा छुड़ाने के लिए भाग निकला, पर दुश्मन भी उसे छोड़ने वाले कहाँ थे। उन्होंने भी नरेश का पीछा किया। शत्रुओं से अपनी जान बचाने के लिए सम्राट एक मकान में घुस गया। पीछे-पीछे विद्रोही भी वहाँ आये, पर यह क्या? कमरे में प्रवेश करते ही राजा मानो योगियों की भाँति अदृश्य हो गया। शत्रुओं ने इमारत का चप्पा-चप्पा छान मारा, किन्तु सम्राट का कोई पता न चला, जैसे कमरा जादुई हो और उसमें पाँव रखते ही वह आँखों से ओझल!
प्रस्तुत पंक्तियाँ किसी तिलिस्मी उपन्यास अथवा जासूसी फिल्म का अंश नहीं, वरन् एक सच्ची घटना है बात सन् 1651 की है और सम्बद्ध व्यक्ति इंग्लैण्ड के सम्राट चार्ल्स द्वितीय थे। घटना के अनेकों वर्ष बाद जब पुरातत्ववेत्ताओं ने वारविकशायर स्थित उस मकान का गहन व सूक्ष्म परीक्षण किया, तो चार्ल्स के अचानक गायब होने का रहस्य खुल गया। वस्तुतः उस मकान में एक ऐसा तहखाना था, जिसे ढूँढ़ निकालना असंभव नहीं तो टेढ़ी खीर अवश्य था।
आज से चार दशक पूर्व भारत सहित विश्व के विभिन्न देशों के पुरातत्व विभागों ने अपने यहाँ ऐसे ढेरों स्थान-मकान ढूँढ़ निकाले, जिनकी संरचना तिलिस्मी उपन्यासों जैसी थी। उन्हीं के समान रहस्यमय सीढ़ियाँ, न दीखने वाले कमरे, उनमें लगे उपकरणों के विचित्र कारनामे-सब कुछ अचम्भे से भरा हुआ। लेसिस्टरशायर में पाँच सौ वर्ष पुराने एक ऐसे ही मकान का पता अभी हाल में चला है, जिसकी बनावट ऐसी है कि उसे तिलिस्मी की संज्ञा दी जाय, तो कोई अत्युक्ति न होगी।
यह मध्य युग का समय था, पर इसके बहुत समय पूर्व से ही यह विज्ञान लुप्त होने लगा और 19 वीं सदी का प्रारंभ आते-आते इसका लगभग पूर्ण लोप हो गया। इसके उपरान्त यह तिलिस्मी उपन्यासों और कहानियों के रूप में पुस्तकीय चर्चा का विषय भर बन गया। देवकीनंदन खत्री और दुर्गा प्रसाद खत्री के उपन्यासों “भूतनाथ”, “काजल की कोठरी” “रोहतास मठ” आदि में इसी की झलक-झाँकी मिलती है। इनमें वर्णित असली-से लगने वाले नकली शेर, बारहसिंघे, हंस जैसे कितने ही स्वचालित खिलौनों का पश्चिमी देशों द्वारा वर्तमान समय में निर्माण का उल्लेख एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटेनिका (भाग 15) में मिलता है। लन्दन के “विक्टोरिया एण्ड अल्बर्ट म्यूजियम” में एक यंत्र-शेर है, जिसे एक व्यक्ति को अपने नीचे दबाये हुए दिखाया गया है। यंत्र में संयुक्त मूठ को जब घुमाया जाता है, तो वह शेर की ही भाँति दहाड़ता है और उसी के साथ व्यक्ति की बाँहें भी हरकत में आ जाती है। “मैसाचुसेट्स इन्स्टीट्यूट आफ टेक्नालॉजी” ने एक ऐसा यंत्र-मानव बनाया है, जो एक कमरे से निकल कर गलियारे में से गुजरता हुआ दूसरे कमरे में प्रवेश कर उसे सुव्यवस्थित करता है और पुनः अपने पूर्व कमरे में लौट आता है। वैसे, अब तो इससे भी विकसित किस्म के रोबोट तैयार कर लिये गये हैं, जो अग्नि से जुड़े उपकरणों तथा विमान चलाने से लेकर दूसरे ग्रहों में काम-काज करने की क्षमता रखते हैं। इस दृष्टि से उक्त तिलिस्मी उपन्यासों में वर्णित जानवरों, तलवार चलाते सैनिकों,शतरंज खेलती पुतलियों, असली होने का भ्रम पैदा करने वाली महिलाओं एवं उनके करतबों तथा अन्यान्य ऐसे ही आश्चर्य में डालने वाले करिश्मों को कपोल-कल्पनामात्र कह कर नहीं टाला जा सकता। यह हमारे प्राचीन विकसित पदार्थ विज्ञान के जीवाश्म (फासिल्स) है और जीवाश्म को झुठलाया कैसे जा सकता है। उनके आकार, प्रकार और उभार से बहुत कुछ लुप्त जन्तु की आकृति-प्रकृति का अनुमान लग जाता है। वेद ऐसे ही प्रामाणिक ग्रन्थ हैं, जो हमारे प्राचीन विकसित विज्ञान के विश्वसनीय साक्ष्य हैं।
वेद शब्द ‘विद्’ धातु से व्युत्पन्न है, जिसका अर्थ होता है- ज्ञान। इस संसार में ज्ञान-विज्ञान की जितनी भी धाराएँ हैं, सभी का मूल उद्गम वेद ही है। वैसे भी वेद (ऋग्वेद को विश्व का प्राचीनतम ग्रन्थ माना जाता है। श्रीमद्भागवत (12/17/47) के अनुसार आरंभ में वेद (ऋक् के रूप में) एक ही था, किन्तु द्वापर के अन्त में समय और परिस्थिति की आवश्यकता को देखते हुए कृष्ण द्वैपायन व्यास ने उसे ऋक्, यजुः, साम और अथर्व चार भागों में बाँट दिया। इस प्रकार एक ही ज्ञानागार के चार खण्ड हो गये और सम्प्रति हम उन्हीं की विभिन्न धाराओं को ज्ञान एवं विज्ञान के रूप में पढ़ते, सुनते और देखते हैं।
मूर्धन्य मनीषी केशव पटवर्धन अपने शोधपूर्ण ग्रन्थ “ऋषियों के विज्ञान की श्रेष्ठता” की प्रस्तावना में लिखते हैं कि “वैदिक ग्रन्थों में निर्देशित वैज्ञानिक निष्कर्षों को हम चाहे किसी भी भाषा में निरूपित करें,यदि वे आधुनिक वैज्ञानिक सिद्धान्तों से संगति खाते और साम्य रखते हैं, तो हमें इस बात को स्वीकारने में तनिक भी संकोच नहीं करना चाहिए कि कई हजार वर्ष पूर्व हमारे प्राचीन ऋषियों को इन नियमों और सिद्धान्तों का सम्पूर्ण ज्ञान अवश्य था। शंका और संदेह की गुँजाइश तब और खत्म हो जाती है, जब विज्ञान के विकास को इंगित करने वाले सैंकड़ों-हजारों की संख्या में वाक्य प्राचीन साहित्य में देखने को मिल जाते हैं। इसे महज संयोग नहीं कहा जा सकता।”
कणाद प्रणीत “वैशेषिक दर्शन” के अवलोकन से ज्ञात होता है कि परमाणु विज्ञान में उन्हें महारत हासिल थी। अतः यदि उन्हें विज्ञान की इस विधा का जनक कहा जाय, तो कोई अत्युक्ति नहीं होगी। भारद्वाज रचित “भारद्वाज-संहिता” में विज्ञान की अनेक धाराओं का वर्णन आता है, जिसमें “वैमानिकी” विषय को विशेष प्रमुखता दी गई है। “शुल्ब सूत्र” में पदार्थ विज्ञान की विभिन्न शाखा-प्रशाखाओं का विशद् वर्णन था, पर अब यह शास्त्र प्रायः अप्राप्य है, मात्र यजुर्वेद का कात्यायन शुल्ब सूत्र ही सम्प्रति उपलब्ध है, जिसमें ज्यामिति शास्त्र का विस्तृत उल्लेख है। यजुर्वेद के उपवेद धनुर्वेद में शस्त्रास्त्रों के निर्माण-प्रक्रिया की चर्चा है।
एक आख्यान के अनुसार महाभारत युद्ध में महाराजा अम्बरीश के पास एक ऐसा शस्त्र था, जिसके प्रहार से एक अक्षौहिणी सेना का संहार करके शस्त्र सुरक्षित उनके पास वापस आ जाता था? आज इसकी तुलना परमाणु बमों से की जा सकती है, पर फिर भी आज का विज्ञान तब के विज्ञान के सदृश्य विकसित नहीं माना जा सकता, क्योंकि आज के बमों का प्रयोग सिर्फ एक ही बार किया जा सकता है। उसके बाद वे नष्ट हो जाते हैं, जबकि प्राचीन शस्त्रों की विशेषता थी कि उन्हें अनेकानेक बार काम में लाया जा सकता था। इसके अतिरिक्त प्राचीन साहित्यों में क्राकीक, चित्राग्नि तथा स्वाति जैसे अनेक विलक्षण यंत्रों का वर्णन आता है। क्राकीक में यह विशेषता थी कि व्यक्ति की एक बूँद रक्त से ही वह उसका पूरा चित्र प्रस्तुत कर देता था। चित्राग्नि वर्तमान टेलीविजन के सामने “क्रिस्टलबॉल” जैसा उपकरण था, जबकि स्वाति यंत्र की विशिष्टता यह थी कि वह वर्षों पूर्व कहे शब्दों को वायुमंडल से पकड़ कर पुनः सम्प्रेषित कर सकता था। इसके साथ ही चालक रहित मोटरों की भाँति गति से जमीन पर चलने वाले रथों (ऋक् 6/66/7, यजु 9/8) तथा अति वेगवान विमानों (ऋग्वेद /1/116/, 1/37/1) की भी स्थान स्थान पर चर्चा मिलती है।
भोज प्रबंध ग्रन्थ में इस बात का उल्लेख मिलता है कि राजा भोज के पास काष्ठ का एक ऐसा अश्व था, जिसकी गति एक घड़ी में ग्यारह कोस थी। “धम्मपद” ग्रन्थ में एक ऐसे ही यन्त्र का वर्णन आता है। कथा है कि कौशाम्बी नरेश उद्यन की उज्जयिनी नरेश चण्डप्रद्योत्त से शत्रुता थी। प्रद्योत ने उन्हें बन्दी बनाने के लिए एक “हस्ति यन्त्र” तैयार किया, जो हाथी के ही समान चल-फिर सकता था। प्रद्योत ने इस लकड़ी के हाथी को उद्यन के वन में छोड़ दिया। उद्यन को जब इस श्वेत हाथी के बारे में पता चला, तो देखने गये, जहाँ उन्हें यन्त्र ने पकड़ लिया। “गया चिन्तामणि” नामक पुस्तक में मयूर आकृति वाले विमान तथा बाल्मीकि रामायण (सुन्दर काण्ड) में पुष्पक विमानों का वर्णन मिलता है।
ये सभी साक्ष्य यह प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त हैं कि हमारा पुरातन विज्ञान अध्यात्म विज्ञान के साथ-साथ अत्यन्त विकसित स्थिति में था। इस आत्म गौरव को विस्मृति के गर्त्त में डालकर हम अपनी आज की स्थिति का रोना रोते हैं तो प्रकारान्तर से यह तथ्य सही ही प्रमाणित होता है कि जो पूर्वजों के गौरव की मात्र दुहाई ही देता रहेगा उसे काल की प्रबल चाल उपेक्षित कर पीछे छोड़ देगी।
हमारी अपनी साँस्कृतिक धरोहर आर्षग्रन्थों में निहित है एवं वह उपार्जन, उपभोग, सदुपयोग, सुनियोजन, कौशल व सामर्थ्य अर्जन सभी क्षेत्रों में मार्गदर्शन कर सकती है। मार्गदर्शन हम आत्मिकी से लें किन्तु परिस्थितियों को नहीं, मनःस्थिति को बदलने वाले प्रतिपादन को विज्ञान सम्मत सिद्ध कर विश्वमानवता के समक्ष रखें। यही समय की माँग है। सारे विश्व की आंखें टकटकी लगाए भारतवर्ष को ही देख रही है। जब भौतिकी का हमारा पुरातन गौरव आज के पश्चिम जगत की तुलना में कहीं अधिक वजनदार सिद्ध होता है, तो आत्मिकी का, अध्यात्म विज्ञान का तो कहना ही क्या? गौरव की याद मात्र न कर उसे परिस्थितियों के अनुरूप सत्यापित कर दिखाएँ तो सारा विश्व भारत का अनुकरण करता दीख पड़ेगा।
महर्षि पातंजलि ने अपने योगदर्शन में चित्त की भिन्नता को ध्यान में रखते हुए पाँच प्रकार के व्यक्तित्वों का उल्लेख किया है। इन्हीं आधारों पर व्यक्ति का उत्थान पतन निर्भर करता है जो अपने आप बनाया एवं बिगाड़ा जाता है। वस्तुतः मनुष्य किसी बाह्य शक्ति द्वारा नियंत्रित नहीं है। अपितु वह स्वयं चिन्तन चरित्र एवं व्यवहार में उत्कृष्टता अथवा निकृष्टता का चयन कर स्वयं को उठाता अथवा गिराता है। इसी को महर्षि पाताँजलि चित की विभिन्न भूमियाँ कहते हैं एवं इन्हें क्षिप्त, मूढ़, विक्षिप्त, एकाग्रता, निरुद्ध के नाम से पुकारते हैं।
क्षिप्तावस्था में मनुष्य न तो अपने उत्थान की बात सोच पाता है और न ही समाज में कोई महत्वपूर्ण भूमिका निभा पाता है। ऐसे व्यक्तियों को नर पशु की संज्ञा दी जाय तो अत्युक्ति नहीं होगी। ये शरीर से तो मनुष्य दिखाई पड़ते हैं किन्तु इनकी मानसिक संरचना पाशविक संस्कारों से युक्त होती है। मन इतना चंचल रहता है जिससे चिन्तन, पेट और प्रजनन के इर्द-गिर्द घूमा करता है एवं इसके लिए ऐसे व्यक्ति कुछ भी नीति-अनीति का आचरण करने के लिए सदा तत्पर रहते हैं। फलतः निरन्तर दुःखी, चिन्तित और शोकपूर्ण जीवन बिताते हैं। हमेशा कार्य में लगे रहने पर भी कोई महत्वपूर्ण लक्ष्य भेद नहीं कर पाते। अस्त-व्यस्त एवं अदूरदर्शितापूर्वक कार्य करने वाले भी इसी वर्ग में आते हैं।
दूसरी अवस्था है मूढ़ता की। इस प्रकृति के मनुष्य निद्रा, तन्द्रा, मोह, भय, आलस्य, दीनता आदि दुर्गुणों से घिरे रहते हैं एवं ठीक ढंग से सोच विचार नहीं कर सकते, क्योंकि बौद्धिक शक्तियों पर आवरण पड़ा होता है। काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार से ग्रसित होकर वे विपरीत और अनुचित कार्यों में प्रवृत्त रहते हैं। नैतिक मर्यादा एवं अनुशासन को तोड़ने वाले ऐसे ही व्यक्ति होते हैं। जन प्रवाह में बहने में इन्हें कोई भी हानि नहीं दीखती। मछली की तरह प्रवाह के विपरीत चलने की नीति का पक्ष लेने एवं उस प्रवाह को मोड़ने का साहस ये व्यक्ति नहीं जुटा पाते।
इस क्रम में विक्षिप्तावस्था तीसरा चरण है। इस प्रकार के मनुष्यों का स्तर पूर्व की दो श्रेणियों की तुलना में कुछ ऊंचा अवश्य होता है पर फिर भी इन्हें जनसंख्या का एक घटक भर माना जा सकता है। योग्यता, तत्परता एवं सम्पन्नता का अभाव न होते हुए भी कृपण एवं कायर बने रहते हैं। साहस एवं उदारता होते हुए भी वे संकीर्णता की परिधि में ऐसे जकड़े होते हैं, जिसमें कुछ करते धरते बनता नहीं। ये जिस तिस प्रकार जीवन तो जी लेते हैं, किन्तु आत्म सन्तोष, दैवी अनुग्रह एवं लोक सम्मान जैसी उपलब्धियों को प्राप्त कर सकने में वे सर्वथा असमर्थ होते हैं। उनकी गणना व्यक्तित्व की दृष्टि से अविकसित और असहायों में ही होती है, क्योंकि वे मात्र अपना ही बोझ किसी प्रकार उठा पाते और सहायता को अपने तक सीमित रख कर कृपण-कंजूस बने रहते हैं।
एकाग्रावस्था चित्त की अगली कड़ी है। इस से सम्पन्न लोगों की ही गणना प्रतिभाशालियों में होती है। वे लोभ मोह, अहंकार से सर्वथा बचे रहते हैं। वे चिन्तन चरित्र एवं व्यवहार में ऐसी उत्कृष्टता ले आते हैं, जिनका अनुकरण कर परिकर में रहने वाले अन्यान्य लोग लाभान्वित होते हैं। भौतिक प्रगति का श्रेय भी इन्हें ही मिलता है। सूझ बूझ के धनी एक साथ अनेकों पक्षों पर दृष्टि रख सकने की क्षमता होने के कारण व्यवस्थापक एवं शासनाध्यक्ष भी कहलाते हैं। कलाकारों, साहित्यकारों, बुद्धिजीवियों का वह वर्ग भी इनके अंतर्गत आता है जो लोकमंगल के लिए ही अपनी प्रतिभाओं का सदुपयोग करते हैं। इस प्रकार के मनीषी वैज्ञानिक, साधू, सज्जन, सेवाभावी लोग नगण्य से साधनों से सदाशयता की रीति-नीति अपनाते हुए,हँसता-हँसाता जीवन जी लेते हैं। इन्हीं लोगों ने कभी देश-देशान्तरों में प्रगतिशीलता का सर्वतोमुखी, सुसम्पन्नता एवं सुसंस्कारिता का वातावरण बनाकर रख दिया था। सतयुग के आदर्श ऐसे ही लोगों के स्थापित किये हुए हैं।
पांचवीं एवं अन्तिम अवस्था “निरुद्धावस्था “ है। यह चेतना की चरम स्थिति है। व्यावहारिक चारित्रिक दृष्टिकोण से सर्वोपरि अवस्था है। इस अवस्था को पातंजलि ने समाधि के रूप में तो योगी राज अरविन्द ने सुपरमाइंड के रूप में चित्रित किया है। वस्तुतः यही वह उत्कृष्ट अवस्था है, जिसमें समाधि जैसी क्षमताएँ एवं ऋद्धियों-सिद्धियों के भण्डार हस्तगत हो जाते हैं। इन्हें देवमानव एवं महापुरुष जैसे नामों से पुकारते हैं। ये सभी इन्द्रिय, समय, साधन एवं विचार संयम से उत्पन्न शक्ति को आत्म परिष्कार से लोकमंगल तक के उच्चस्तरीय प्रयोजनों में ही नियोजित करते हैं। इनकी निजी आवश्यकताएँ सीमित होती हैं। समाज का नवोत्थान एवं सामयिक समस्याओं का समाधान ही इनका मुख्य लक्ष्य होता है। फलतः प्रत्येक कार्य को जिसे हाथ में लिया गया है, वे अभिरुचि, उत्कण्ठा, मनोयोग एवं उत्साह के साथ सम्पादित करते हैं। लक्ष्य में लोक कल्याण जुड़े होने के कारण आत्मसन्तोष, लोक सम्मान एवं दैवी अनुग्रह की वर्षा इन पर अपने आप होती है। व्यक्तित्व चुम्बकीय एवं विश्वस्त स्तर का विकसित होता है। यह मनुष्य के प्रगतिक्रम की अन्तिम अवस्था हैं, जिसे “प्रतिभा की महासिद्धि” की अवस्था कहते हैं, जो समय का कायाकल्प करके वातावरण में नव जीवन का प्राण प्रवाह भर देती है।
प्रत्येक व्यक्ति को अपने अन्तराल में झाँक कर देखना चाहिए कि महर्षि पातंजलि द्वारा बतायी गयी उपरोक्त पाँच अवस्थाओं में उनका अपना स्थान कहाँ पर है, जिसे आगे विकसित किया जा सके और अपने व्यक्तित्व को पाँचवे स्तर तक देवमानव महापुरुषों के समकक्ष उठाया जा सके,ताकि जीवन लक्ष्य की प्राप्ति हो सके।
वस्तुतः जीवन मात्रा में जो अगणित पड़ाव आते हैं, प्रकारान्तर से उन्हीं की विवेचना महर्षि पातंजलि द्वारा वर्णित इन पाँच अवस्थाओं में हुई है। आज के मनोविज्ञान की कसौटी पर यदि इन पांचों स्थिति का विश्लेषण किया जाय तो इन्हें अचेतन, चेतन, अवचेतन, सचेतन,सुपरचेतन की परिधि में बाँटा जा सकता है। जिन भिन्न-भिन्न अवस्थाओं का वर्णन दृष्ट ऋषिवर ने किया, उनसे गुजरते हमारे आस-पास के लोग ही हमें दिखाई देंगे। “क्लीनिकल साइकोलॉजी” नाम की मनोविज्ञान की शाखा
दोनों पड़ोसियों के बालक आपस में उलझ पड़े, खेल-खेल में छीना-झपटी मारा-मारी हो गई। दोनों ने अपने माता-पिता से फरियाद की। उनकी शिकायत पर दोनों के अभिभावक भी लड़ पड़े। वर्षों पुरानी मित्रता में दरार पड़ गई। बोल-चाल, मिलना जुलना एक दूसरे के यहाँ आना जाना बन्द हो गया।
किन्तु दूसरे ही दिन देखा कि दोनों बालक पुनः आपस में मिलकर साथ-साथ खेलने में लगे हैं। न उनमें कोई मनोमालिन्य है, न शिकवा-गिला।
दोनों के अभिभावकों ने अपनी भूल सुधारते हुए परस्पर क्षमा-याचना की और स्वीकार किया कि बड़ों से तो बालक अच्छे जो लड़कर भी साथ रहते हैं और हम साथ रहते हुए भी लड़े हैं।
इन्हीं लक्षणों का वर्णन कर उन्हें न्यूरोटिक, साइकोटिक साइकोसोमेटिक, डेमन्टीक, मेण्टली रिटार्डेड आदि नामों से समझाती रही है। मूल तत्वदर्शन एक ही है कि मनुष्य अनगढ़ है, भटका हुआ है किन्तु सुगढ़ बनने की व प्रगति के मार्ग पर चल पड़ने की अनन्त संभावनाएँ इनमें विद्यमान हैं। कालीदास व वरदराज जैसे मूढ़ जब प्रतिभा सम्पन्न बन सकते हैं तो क्यों नहीं हर व्यक्ति उस दिशा में अध्यवसाय करता है। कुसंस्कारों की मलिन पर्त का अनावरण कर व्यक्ति यदि अन्तर्क्षेत्र को जगा सके तो प्रतिभा के चरम शिखर पर पहुँच सकने का पथ निश्चित ही प्रशस्त हो सकता है।
प्रातः काल आँख खुलने से लेकर चारपाई में नीचे उतरने में थोड़ा समय लगता है। इसी समय को नया प्रभात,नया जीवन मान कर बिस्तर पर पड़े-पड़े ही आत्मबोध की साधना करनी चाहिए।
इसी प्रकार रात को बिस्तर पर जाने से लेकर नींद आने के बीच में जो थोड़ा समय मिलता है उसे तत्वबोध की साधना में लगाना चाहिए।
आत्मबोध अर्थात् हर दिन नया जन्म। तत्वबोध अर्थात् हर रात को नया मरण। जन्म और मरण के साथ जुड़ी हुई विचारणा पर सच्चे मन से विचार करने पर मनुष्य अपने भीतर एक नई हलचल अनुभव करता है और अपने क्रियाकलाप को, चिन्तन, चरित्र और व्यवहार को उच्चस्तरीय बनाकर एक प्रकार से आत्मिक कायाकल्प की दिशा में कटिबद्ध और अग्रसर होता है।
हर दिन प्रातः काल उठते ही बिस्तर पर बैठकर अपने आप से इस संदर्भ में तीन प्रश्न पूछने चाहिए, उनके उत्तर भी स्वयं ही उपलब्ध करने चाहिएं। पर प्रश्नोत्तर प्रातः काल जीवन का क्रम आरम्भ करते हुए नित्य ही दुहराने चाहिए,ताकि जीवन का स्वरूप, उद्देश्य और उपयोग सदा स्मरण बना रहे और स्मरण के आधार पर अपनी दिशाएं ठीक रखने में भूल-चूक न होने पावे। अपने आप से प्रथम प्रश्न यह पूछना चाहिए कि -
(1) भगवान को सभी प्राणी समान रूप से प्रिय पात्र हैं। फिर मनुष्य को ही बोलने, लिखने एवं असंख्य सुख -सुविधाएँ प्राप्त करने का विशेष अनुदान क्यों मिला? मनुष्य को हर दृष्टि से उत्कृष्ट स्तर का प्राणी बनाने में इतना असाधारण श्रम क्यों किया?
उत्तर एक ही हो सकता है- “अपने उद्यान-इस संसार को अधिक सुन्दर और सुव्यवस्थित बनाने के लिए परमेश्वर को साथी सहचरों की जरूरत पड़ी और अपनी क्षमताओं से सुसज्जित एक सर्वांगपूर्ण प्राणी - मनुष्य इस प्रयोजन की पूर्ति के लिए बनाया। विशेष साधन-सुविधाएँ दी, ताकि इसके द्वारा यह ईश्वरीय प्रयोजनों की पूर्ति ठीक तरह कर सके।
(2) दूसरा प्रश्न अपने आप से पूछना चाहिए कि -जो सुविधाएँ, विभूतियाँ, सम्पदाएँ हमें उपलब्ध हैं, उनका लाभ यदि हम अकेले ही उठाते हैं, तो इनमें क्या कोई हर्ज है?
उत्तर एक ही मिलेगा-अन्य प्राणियों के अतिरिक्त जितनी भी बौद्धिक, आर्थिक प्रतिभायुक्त एवं अन्य किसी प्रकार की विशेषताएँ हैं, वे विश्वमानव की ही पवित्र अमानत हैं और इनका उपभोग लोक-मंगल के लिए ही किया जाना चाहिए। शरीर रक्षा भर के आवश्यक उपकरणों के अतिरिक्त इन साधनों का विश्व-कल्याण के लिए ही उपयोग किया जाये।
(3) तीसरा प्रश्न अपने आप से करना चाहिए कि- “क्या इस सर्वदुर्लभ मानव शरीर का सही उपयोग हो रहा है?”
उत्तर यही मिलेगा - “हम सदाचारी, संन्यासी, परिश्रमी, उदार, सज्जन, हँसमुख, सेवाभावी बनें। बिना मानव-जीवन को सार्थक नहीं बना सकते। इसलिए इन सद्गुणों का अभ्यास बढ़ाने के लिए जीवनयापन की रीति-नीति में उत्कृष्टता और आदर्शवादिता का, सभ्यता और सज्जनता का, पुरुषार्थ और साहस का समुचित समावेश करना चाहिए।”
इन्हीं प्रश्नोत्तरों का अध्यात्म आत्मबोध प्रश्न जीवन की महान समस्या के रूप में सामने आये और उन्हें सुलझाने के लिए हम विवेक का उपयोग करें तो भावी जीवनयापन के लिए एक व्यवस्थित दर्शन और कार्यक्रम सामने आ खड़ा होगा। यदि इस तत्वबोध को ठीक तरह हृदयंगम किया जा सका, तो आकांक्षाओं और कामनाओं का स्वरूप बदला हुआ होगा। रीति-नीति और कार्य पद्धति में वैसा परिलक्षित होगा जैसे आत्मज्ञान सम्पन्न मनुष्य में प्रत्यक्षतः दृष्टिगोचर होना चाहिए।
इसके बाद “हर दिन नया जन्म हर रात नयी मौत” इस सूत्र को मन ही मन दुहराना चाहिए और भावना करनी चाहिए कि आज का दिन हमें एक नये जन्म के रूप में मिला है। वस्तुतः निद्रा और जागरण- मृत्यु और जन्म का ही एक छोटा नमूना है। इसमें असत्य भी कुछ नहीं। सचमुच की मृत्यु भी एक लम्बी रात की गहरी नींद मात्र है। हर दिन को एक जन्म कहा जाय, तो ऊपर से ही हँसी की बात लगती है, वस्तुतः यह एक स्थिर सच्चाई है। अतएव इस मान्यता में अत्युक्ति और निराधार कल्पना जैसी भी कोई बात नहीं है।
आज का नया जन्म अपने लिए अनमोल अवसर है, कहते हैं कि 84 लाख योनियों के बाद एक बार मनुष्य शरीर मिलता है, उसका सदुपयोग कर लेना ही शास्त्रकारों ने सबसे बड़ी बुद्धिमत्ता कहा है। अस्तु हमें प्रातःकाल चारपाई पर पड़े-पड़े ही विचारना चाहिए कि आज का दिन अनमोल अवसर है, उसे अधिक से अधिक उत्कृष्टता के साथ व्यतीत करना चाहिए। कोई भूल, उपेक्षा, अनीति, दुर्बुद्धि उसमें न रहे। आदर्शवादिता का, सद्भावना और सदाशयता का उसमें अधिकाधिक समावेश रहे, ऐसा दिन भर का कार्यक्रम बना कर तैयार किया जाय।
आमतौर से आलस्य, ढील पोल, शिथिलता में हमारा अधिक से अधिक समय बरबाद होता है। तत्परता, स्फूर्ति, परिश्रम और दिलचस्पी के साथ करने पर जो कार्य एक घण्टे में हो सकता है, उसी को अधिकतर लोग दो-दो, चार-चार घण्टे में पूरा करते हैं। आलस्य, अधूरा मन, मन्दगति, रुक-रुक कर शिथिलतापूर्वक काम करने में और ऐसे वैसे ज्यों-त्यों बेकार बहुत सा समय गुजार देने की आदत बहुतों को होती है और उनका आधा जीवन प्रायः इस आलस्य-प्रमाद में ही बरबाद हो जाता है। यह बुरी आदत सम्भव है,थोड़ी बहुत मात्रा में अपने में भी हो तो बारीकी से तलाश करनी चाहिए और निश्चय करना चाहिए कि आज हर काम पूरी तत्परता और फौजी उत्साह के साथ करेंगे। समय ही जीवन है। यही ईश्वर प्रदत्त हमारी एक मात्र सम्पत्ति है। समय का सदुपयोग करके ही हम अभीष्ट आकाँक्षा पूर्ण करने और मंगलमयी उपलब्धियाँ प्राप्त कर सकने में सफल हो सकते हैं। समय की बरबादी एक प्रकार की मन्द आत्महत्या है। संसार में जितने भी महापुरुष हुए हैं, उन सबने अपने समय का एक-एक क्षण ठीक तरह उपयोग करके ही अभीष्ट सफलताएँ प्राप्त की हैं।
इसलिए आज समय के सदुपयोग की, एक पल भी बरबाद न होने की, आलस्य, शिथिलता एवं अन्यमनस्कता से लड़ने की पूरी तैयारी करनी चाहिए और दिन भर के समय विभाजन की दिनचर्या ऐसी बनानी चाहिए, जिससे वक्त की बरबादी के लिए तनिक भी गुंजाइश न रहे। जो आवश्यक काम पिछले कई दिनों से टलते चले जा रहे हैं, जिनकी उपयोगिता अधिक हो उन सबको, सुविधा हो, तो आज ही करने के लिए नियम कर लेना चाहिए। दिनचर्या ऐसी बने जो सुविधाजनक भी हो और सुसंतुलित भी। अति उत्साह से ऐसा कार्यक्रम न बना लिया जाय, जिसको पूरा कर सकना ही कठिन पड़ जाय।
शारीरिक कार्यक्रम के साथ-साथ मानसिक क्रिया-पद्धति भी निर्धारित करनी चाहिए। किस कार्य को किस भावना के साथ करना है, इसकी रूपरेखा मस्तिष्क में पहले से ही निश्चित करनी चाहिए। समय-समय पर बड़े, ओछे, संकीर्ण, स्वार्थपूर्ण विचार मन में उठते रहते हैं। सोचना चाहिए कि आज के अवसर पर किस प्रकार का अनुपयुक्त विचार उठने की सम्भावना है, उस अवसर के लिए विरोधी विचारों के शस्त्र पहले से ही तैयार कर लिये जायँ।
इस प्रकार हर दिन नया जन्म वाले मन्त्र का आधा भाग रात को सोते समय तक पूरा होता रहना चाहिए। हर घड़ी अपने को सतर्क, सक्रिय, जागरुक रखा जाय,चूकों के लिए सतर्क रहा जाय-उत्कृष्टता का जीवन में अधिकाधिक समावेश करने के लिए प्रयत्न किया जाय, तो निस्सन्देह वह दिन पिछले अन्य दिनों की अपेक्षा अधिक सन्तोषप्रद, अधिक गौरवास्पद होगा। इस प्रकार हर दिन पिछले दिन की तुलना में अपेक्षाकृत अधिक आदर्श बनता चला जायगा और कर्मयोग के तत्वदर्शन में हमारी जीवन पद्धति ढलती चली जायेगी।
इस भावना में वैराग्य का अभ्यास है। अनासक्ति का प्रयोग है। उपलब्ध वस्तुओं में से एक भी अपनी नहीं, साथी व्यक्तियों में से अपना एक भी नहीं। वे सब अपने, परमेश्वर के और अपने कर्तव्य की उपज हैं। हमारा न किसी पर अधिकार है न स्वामित्व। हर पदार्थ और हर प्राणी के साथ कर्तव्य बुद्धि से ठीक व्यवहार कर लिया जाय, यही अपने लिए उचित है। इससे अधिक मोह-ममता के बन्धन बाँधना स्वामित्व और अधिकार की अहंता जोड़ना- निरर्थक है। अपना तो यह शरीर भी नहीं-कल परसों इसे धूलि बनकर उड़ जाना है तब जो सम्पदा, प्रयोग सामग्री, पद, परिस्थिति उपलब्ध हैं उस पर अपना स्वामित्व जमाने का क्या हक? अनेक प्राणी सृष्टि के आदि से लेकर अपने कर्म-भोगों को भुगतने अनेकों के साथ आये दिन संयोग वियोग करते रहते हैं। अपने साथ भी आज कितने ही प्राणी एक सज्जन साथी की तरह रह रहे हैं, इसके लिए कर्तव्य-धर्म का ठीक तरह पालन किया जाना इतना ही पर्याप्त है। उनसे अनावश्यक ममता जोड़ कर ऐसा कुछ न किया जाय जिससे अनुचित पाप कर्मों में संलग्न होना पड़े।
यह विवेक हमें रात को सोते समय जाग्रत करना चाहिए और अनुभव करना चाहिए कि अहंता और ममता के बन्धन तोड़कर एकाग्र भाव से भगवान की मंगलमय गोदी-निद्रा -मृत्यु में परम शान्ति और सन्तोषपूर्वक निमग्न हुआ जा रहा है।
इस प्रकार की मनोवृत्ति का विकास होने से जीवन के अनेक क्षेत्रों में प्रगति होने की सम्भावना रहती है और अन्त में मानव जन्म की सार्थकता उपलब्ध हो सकती है, इस प्रकार की भावना बनी रहने से मनुष्य माया-मोह के हानिकर बन्धनों से अधिकाँश में विमुक्त रहता है और आत्मोद्धार का वास्तविक लक्ष्य उसकी दृष्टि से ओझल नहीं होने पाता। इस प्रकार जो साधक जीवन के वास्तविक रहस्य को हस्तगत कर लेता है, उसको फिर बन्धनों के जंजाल में नहीं फँसना पड़ता।
किसी दिन सचमुच ही मृत्यु आ जाय तो इन परिपक्व वैराग्य भावनाओं के आधार पर बिना भय और उद्वेग के शान्तिपूर्वक विदा होते हुए मरणोत्तर जीवन में परम शान्ति का अधिकारी बना जा सकता है। यह भावना लोभ और मोह की जड़ काटती है। कुकर्म प्रायः इन्हीं आन्तरिक दुर्बलताओं के कारण बन पड़ते हैं। हर रात को एक मृत्यु मानने से लोभ और मोह का निराकरण और हर दिन को नया जन्म मानने में जीवन में आदर्शवादिता एवं उत्कृष्ट का समावेश करने की प्रेरणा मिलती है। यही प्रेरणा कर्मयोग की आधारशिला है।
हममें से प्रत्येक को “हर दिन नया जन्म-हर रात में नई मौत” के भाव मन्त्र की भावना करनी चाहिए। इससे स्थूल शरीर में कर्मयोग का समावेश इस क्षेत्र में होगा और देवत्व के जागरण की एक महती आवश्यकता पूरा करने का सरल मार्ग उपलब्ध होगा। उपासना की सफलता के लिए आत्मशोधन की यह प्रक्रिया कभी बन्द नहीं करनी चाहिए।
दो बालक नित्य साथ ही पाठशाला जाया करते थे। एक दिन शाला जाते समय उन्हें अपनी-अपनी शारीरिक शक्ति परखने की सूझी। वे दोनों कुश्ती लड़ने लगे। बलवान बालक जीत गया। कमजोर को पराजय का मुँह देखना पड़ा। इस पर हारे हुए बालक ने कहा “तूने कौन सी बहादुरी दिखाई है। तेरे जैसा पौष्टिक भोजन मुझे मिलता तो मैं भी तुझे हरा देता।” यह बात विजेता के मर्म को बेध गयी। विजय का उल्लास तिरोहित हो गया। उसका स्थान ग्लानि ने ले लिया। “कमजोर को हरा कर मैंने कौनसा श्रेयस्कर काम किया है। मुझे तो उसको अपने जैसा बनाना चाहिए था।” इस घटना ने उसकी विचार शैली बदल दी।
यही बालक आगे जाकर डॉक्टर बना। कमजोरों व असहायों की सहायता के लिये अफ्रीका के घने जंगलों में चला गया। यह डॉक्टर थे अलबर्ट श्वाइत्जर। इस महान सेवा साधना के कारण वे शान्ति के नोबुल पुरस्कार के अधिकारी व हजारों लोगों के प्रेरणा स्त्रोत बने।
इंग्लैण्ड स्थित “मैकडोनल्ड डगलस“ वेधशाला के निदेशक थियोडोर जे. गोर्डन एक भविष्यवक्ता भी है। उनकी अब तक की अस्सी प्रतिशत भविष्यवाणियाँ सत्य सिद्ध हो चुकी हैं। “उन्होंने भविष्य के बारे में भी अपने सहयोगी ओलाफ हेल्मर के साथ अनुमान लगाते हुए कहा है कि आने वाला समय मानवी इतिहास में ऐसा होगा, जिसे अभूतपूर्व कहा जा सके, ऐसा जिसका अब तक मात्र अनुमान ही लगाया जाता रहा है।
श्री गार्डन ने 1968 से 7 के बीच ऐसी गैसों का प्रयोग होने का संकेत दिया था, जिससे मनुष्यों को परेशानी तो होगी, किन्तु लोग मरेंगे नहीं। जो सत्य सिद्ध हुआ और आंसू गैस आदि का प्रयोग युद्ध में होने लगा। 1969-1970 के मध्य ही उन्होंने मनुष्य द्वारा चन्द्रमा पर विजय की भविष्यवाणी की थी, जो पूर्णतः सत्य सिद्ध हुई। 1970 से 1983 के मध्य पारिवारिक संख्या नियंत्रण के लिए नई विधा विकसित होने का उल्लेख उनने किया था, जो समय आने पर परिवार नियोजन की एक नूतन विधा के रूप में सामने आया।
उन्होंने सन् 2000 के सम्बन्ध में लिखा है कि विश्व की जनसंख्या छह अरब होने पर सबसे बड़ी समस्या संकट के रूप में सामने आयेगी, किन्तु सामूहिक श्रम एवं विशेष क्षमता वाली कृषि व्यवस्था अपनाने पर इसका सहज समाधान निकल आवेगा। तब समूचा विश्व एक हो जावेगा और अधिक उत्पादन के लिए सामूहिक प्रयास चलेंगे। जिन राष्ट्रों के पास जमीन है,किन्तु उत्पादन करने की क्षमता एवं साधन उनके पास नहीं हैं, उनका उपयोग सम्मिलित रूप में किया जायगा और खाद्य पदार्थों का उत्पादन इतने बड़े पैमाने पर होगा, जिससे अन्न संकट दूर हो जायेगा।
विदेशों में प्रयुक्त हो रहे माँस का स्थान सोयाबीन एवं दूसरे प्रकार के वानस्पतिक पदार्थ लेंगे। इनके द्वारा ही समूचे विश्व में भोजन की समस्या का समाधान होगा और माँस उत्पादन का क्रम बंद हो जायेगा। पशु पालन माँस उत्पादन का स्थान लेगा और समुन्नत कृषि में पशुओं के उपयोग को प्रोत्साहन मिलेगा।
कृषि क्षेत्र में वास्तविक क्राँति तब होगी,जब ऐसे हानिरहित बैक्टीरिया की खोज कर ली जायेगी, जिससे मिट्टी में नाइट्रोजन की मात्रा बढ़ जाने से उसकी उर्वरता बढ़े और अन्न-उत्पादन में अप्रत्याशित बढ़ोत्तरी हो। तब विशेष रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग किये बिना ही अधिकतम उत्पादन का क्रम चल पड़ेगा और अन्न संकट का सहज समाधान हो जायेगा।
तब प्रदूषण समस्या का भी हल उपलब्ध हो जायेगा, क्योंकि विज्ञान की शक्ति सृजनात्मक कार्यों एवं प्रदूषण-समाधान के उपाय खोजने में लगेगी, फलस्वरूप ऐसे नये-नये तरीके सामने आयेंगे, जिनसे न सिर्फ प्रदूषण को टाला जा सकेगा, वरन् उसके अतिरिक्त लाभ भी मनुष्य और समाज को मिलेंगे।
दृष्ट विद्वानों का मत है कि अगली शताब्दी की प्रथम दशाब्दी तक ऐसी आध्यात्मिक विधा हाथ लग चुकी होगी, जिससे लोग मनचाहे गुणों वाली संतान पैदा कर सकेंगे। तब अभिमन्यु जैसे पराक्रमी और अष्टवक्र जैसी उद्भट विद्वान संतान गर्भ में ही विकसित हो जाना कोई असंभव या अचम्भा नहीं रह जायेगा।
उस काल की सबसे बड़ी विशेषता यह होगी, लोग सूर्य ऊर्जा को सीधे सूक्ष्म आहार के रूप में लेने की विधा सीख जायेंगे। जिस प्रकार वृक्ष-वनस्पति सूर्य किरणों द्वारा भोजन का निर्माण करते हैं, उसी प्रकार तब अधिकाँश मनुष्य सूर्य किरणों द्वारा अपनी आहार संबंधी समस्या का हल ढूँढ़ लेंगे। किन्तु यह एक अति उच्च आध्यात्मिक प्रयोग होगा, जिसे आत्मबल संपन्न व्यक्ति सम्पन्न कर सकेंगे। अरविंद के “नास्टिक बीइंग“ इकबाल के “नायबे इलाही“ की ही तरह हरमन कान्ह ने ऐसे अध्यात्मजीवी लोगों का नाम “सुपरनेचुरल बीइंग“ रखा है। तब का मनुष्य और समाज सचमुच ऐसा बन सके, जिसे देख कर स्वर्ग की कल्पना साकार हो उठे, अभी से ही उसकी तैयारी की जानी चाहिए।
हमारा मस्तिष्क एक उर्वर उद्यान है। उसमें जो कुछ बोया जाता है वही उगता और फलता फूलता है। विचार ही वह बीज है जो बोये जाने पर उगे बिना नहीं रहते। यह उगना मात्र दर्शनीय बनकर नहीं रहता, वरन् उसके प्रतिफल भी समयानुसार सामने आते हैं।
समझा जाता है कि कर्म का प्रतिफल मिलता है। जो जैसा करता है वैसा भरता है। जो बोया गया है वही काटा जाता है, इस कथन में इतना और जोड़ा जाना चाहिए कि जो सोचा जाता है, वह कालान्तर में किया भी जाता है। मस्तिष्क में अनगढ़ विचार आते रहते हैं। ऐसी कल्पनायें उठती रहती हैं, जिनका न सिर होता है न पाँव। कितने ही व्यक्ति बिना पंख की रंगीली कल्पनाओं में उड़ते रहते हैं। कुछ का चिन्तन ऐसा होता है, परिस्थितियों के साथ कोई तालमेल नहीं बैठता। कई पिछली घटनाओं का स्मरण करते रहते हैं। जो बीत गया उसे ताजा करके गड़े मुर्दे उखाड़ने की कहावत चरितार्थ करते रहते हैं। कुछ की आदत भविष्य के सपने देखने की होती है, वे मात्र सुखद कल्पनाओं में डूबे रहते हैं और सहज सफलताओं के उपलब्ध होने की कल्पना करते रहते हैं। कइयों का चिन्तन इसके प्रतिकूल होता है। वे अनिष्ट की आशंका का भयावह चित्र खड़ा करते हैं। उन्हें लगता है मानो कोई विपत्ति का पहाड़ सिर पर टूटने वाला है। किसी व्यक्ति के द्वारा कष्ट या हानि पहुँचाये जाने की कुकल्पना उमड़ती घुमड़ती रहती है। यह विचार प्रक्रिया होती तो काल्पनिक है, पर उसकी प्रतिक्रिया समूचे मनः क्षेत्र को हड़बड़ा देती है। उद्विग्न मन उस योग्य नहीं रहता कि विचारों का विश्लेषण कर सके और उनमें से संभाव्य और असंभव का वर्गीकरण कर सके। यह न बन पड़ने पर मधुर कल्पनायें एक प्रकार के सुख और दुःखद संभावनायें दूसरे प्रकार के दिवास्वप्न विनिर्मित करती है। त्यों यह काल्पनिक संरचनायें निरर्थक और निराधार होती हैं तो भी उनका प्रभाव उत्पन्न हुए बिना नहीं रहता।
कामुकता के अश्लील विचार इतने आकर्षक और उत्तेजक होते हैं कि उनमें उलझा हुआ मन किसी उपयोगी, वास्तविक चिन्तन पर चित्त एकाग्र करने में असमर्थ हो जाता है। इस प्रकार के विचारों में निमग्न विद्यार्थी अक्सर परीक्षा में फेल होते रहते हैं। पाठ्यक्रम पर पाठ्य पुस्तकों पर चित्त एकाग्र ही नहीं होता। कुकल्पनायें उसे उड़ाये-उड़ाये फिरती हैं। फलतः वे योजनायें पीछे हट जाती हैं, जिन पर योजनाबद्ध ध्यान दिए जाने की आवश्यकता थी।
जो विचारों का महत्व नहीं समझते, वे उन्हें किसी भी दशा में उड़ते रहने की छूट दे देते हैं। यह उच्छृंखलता बाद में स्वभाव बन जाती है। अनगढ़ सपने रात में ही नहीं, दिन में भी देखते रहते हैं। उनमें से जो मधुर होते हैं लिप्सा, लालसा के साथ जुड़े होते हैं, शेखचिल्ली का उदाहरण बनते हैं और मन के मोदक खाते रहते हैं। जिन्हें अनिष्ट की आशंका घेरती है, वे हानियों, आक्रमणों, बीमारियों, ग्रह नक्षत्रों द्वारा उत्पन्न की जाने की विभीषिकाओं के डरावने दृश्य रचते और उन्हें वास्तविकता की तरह अनुभव करते, डरते, काँपते हैं। खाली दिमाग को शैतान की दुकान कहा गया है। मन खाली नहीं बैठ सकता। अवकाश के क्षण में वह ऐसी ही उड़ाने उड़ता रहता है, जिनमें हर्षातिरेक या भयावह संभाव्य के रंग-बिरंगे चित्र सामने आते रहते हैं यह नशेबाजी जैसी मनःस्थिति है, इसमें उद्विग्नता का ही आवेश भरा दौर चढ़ा रहता है।
छुट्टल मन उस घोड़े के समान है, जिस पर लगाम नहीं चढ़ाई गई। वह किसी भी दिशा में छलाँगे लगा सकता है। इसमें घोड़ा थकता है, ठोकरें खाता है। साथ ही सवार को भी किसी खाई-खन्दक में गिरा सकता है। अव्यवस्थित कल्पनायें करते रहने वाला एक प्रकार से विक्षिप्त, सनकी बन जाता है। ऐसी मानसिक अराजकता बहुमूल्य सम्पदा को बरबाद कर देती है, जिसे योजनाबद्ध रूप से किन्हीं सदुद्देश्यों के लिए प्रयुक्त किया गया होता, तो उसका उपलब्धियों से भरा-पूरा सत्परिणाम सामने आता।
बुद्धिजीवी यशस्वी होते हैं और साथ ही, अनेक उपलब्धियाँ, विभूतियाँ अर्जित करते हैं। इनकी प्रमुख विशेषता एक ही होती है कि वे मन को उद्धत उड़ानों में उड़ने न देने की सुव्यवस्था बनाते हैं, मनोयोग साधते हैं। अभीष्ट का निर्धारण करते हैं और उस पर गंभीरता भरी एकाग्रता का अभ्यास करते हैं। अर्जुन के मत्स्यवेध की कथा जिन्हें विदित है, वे जानते हैं कि एकाग्रता और सफलता का कितना घना संबंध है।
वास्तुशिल्पी विशालकाय भवन बना कर खड़ा करते हैं, पर इससे पूर्व उसकी समग्र कल्पना उनके मस्तिष्क में उतरती है, कागज पर नक्शा बनता है या छोटा मॉडल विनिर्मित होता है। यह मात्र मानसिक परिश्रम है। इसके सही बन जाने पर आधे उद्देश्य की पूर्ति हो जाती है, फिर साधन और श्रमिक जुटाने की धन साध्य व्यवस्था बनाना मात्र ही शेष रह जाता है। यदि नक्शा सही न बन सके, तो समस्त साधन उपलब्ध होते हुए भी निर्माण में भूल होती रहेगी और जब बन कर खड़ा होगा, तब कुरूप होगा। कल्पना कर्म का पूर्व रूप है। यदि सही विषय की सही कल्पना कर सकना बन पड़ा, तो समझना चाहिए कि कार्य का पूर्वार्ध पूरा हो गया। कलाकार, साहित्यकार,वैज्ञानिक अपने-अपने कार्य का पूर्व ढांचा खड़ा करने में ही अपनी समूची कल्पनाशक्ति को नियोजित करते हैं। उसके समग्र सम्पन्न हो जाने पर संरचना का प्रत्यक्ष ढाँचा खड़ा होने में कोई कठिनाई नहीं रहती है। तब मात्र श्रम करना,साधन जुटाना शेष रह जाता है।
छोटे बड़े सभी कार्यों में कृत्य की रूपरेखा सही कल्पना के माध्यम से ही खड़ी करनी पड़ी है। यह उन्हीं के लिए शक्य है, जो मन को अनगढ़ उड़ाने उड़ने से रोकने का अभ्यास कर लेते हैं। इसी को मनोनिग्रह या चित्तवृत्तियों का विरोध कहा गया है। इसी को अध्यात्म की भाषा में योग कहते हैं। योग का तात्पर्य है मानसिक क्षमता को अभीष्ट प्रयोजन में समग्र रूप से तल्लीन करने की क्षमता। यह बहुत बड़ी उपलब्धि है। इसे करतल गत कर लेने पर महान् मानसिक क्षमता का उच्चस्तरीय सदुपयोग बन पड़ता है और ऐसी सफलताओं का संयोग हस्तगत होता रहता है, जिन्हें सराहा और श्रेय दिया जा सके।
क्रिया का कितना ही महत्व क्यों न हो पर वह होती प्रत्यक्ष एवं दृश्य रूप ही है। उसका पूर्व ढाँचा मनःसंस्थान के क्षेत्र में ही विनिर्मित होता है। विचार ही उनका ताना-बाना बुनते हैं और कार्यान्वित भी वही करते हैं।
कोई व्यक्ति सुकरात से ब्रह्म विद्या के संबंध में जानकारी प्राप्त करने और इस मार्ग पर चलने का विधान पूछने आया।
सुकरात ने उसे सिर से पैर तक देखा और हर दृष्टि से गया गुजरा, मैला, कुचैला अस्त व्यस्त पाया।
सुकरात ने ब्रह्म विद्या का प्रथम पाठ बताया, जागरुक रहना, सुव्यवस्थित, स्वच्छ और सुन्दर बनना। इस प्रथम पाठ को जीवन में उतारने के उपरान्त ही ब्रह्म के संबंध में कुछ पूछने और आत्मिक प्रगति के बारे में कुछ करने की योजना बनाना।
अपना निज का व्यक्तित्व ढालने में भी विचारों की ही प्रमुख भूमिका रहती है। विचारों की अनुपयुक्तता मनुष्य को पतन-पराभव के गर्त में गिराती है और उनके उच्च, उज्ज्वल आदर्शवादी होने पर प्रतिभा-प्रखरता निखरती है। इसलिए कहा गया है कि जीवन की अन्यान्य विधि व्यवस्थायें बनाने से पूर्व विचारों की अनगढ़ उड़ाने उड़ने से रोकना चाहिए। निग्रहीत मन को ऐसे प्रयोजनों में तन्मय होने की कला सिखानी चाहिए जो प्रगति की दिशा में अग्रसर कर सके। विचारों को मानव जीवन की महती शक्ति माननी चाहिए और उसे संयत सुनियोजित करने की साधना करनी चाहिए।
“सत्य के लिए किसी से नहीं डरना, गुरु से भी नहीं, मन्त्र से भी नहीं, लोक से भी नहीं वेद से भी नहीं...” सालों पहले कहे गए गुरु के ये शब्द उनके मन को मथ रहे थे। हलचलें इतनी तेज थीं कि मन की विकलता शरीर पर भी हावी थी। सबेरे की उपासना के बाद बाहर वाले कमरे में टहल रहे थे। टहलते-टहलते कभी-कभार खिड़की से बाहर की ओर झाँक लेते।
जो परम तप है। धर्म की धुरी है, शास्त्रों के सारे कथन जिसके इर्द-गिर्द चक्कर लगाते हैं, जो जीवन को ऋतु से जोड़ता है, क्या है वह सत्य? बुदबुदाते होठों से शब्दों का अन्तिम टुकड़ा फिसल गया। एक क्षण के लिए शून्य की ओर ताका। कहीं कुछ खोज पाने असफल दृष्टि हताश होकर अन्दर लौटने लगी। आंखों की लालिमा पलकों की सूजन स्पष्ट कह रही थी कि वह रात सो नहीं सके हैं। विकट असमंजस था। अन्तः सागर में विपरीत दिशाओं से उठ रही विरोध भाव तरंगों की टकराहट का नाम है असमंजस। भूचाल की तरह जिसके तेज झटके समूचे व्यक्तित्व को उलट-पुलट कर रख देते हैं। व्यक्तित्व की यह कँपकँपी कब चढ़ दौड़ेगी- किसे पता रहता है। कल शाम तक तो सब कुछ ठीक-ठाक था।
“आप जैसे सत्यनिष्ठ को इतना सोच-विचार शोभा नहीं देता। भला सच बोलने में क्या सोचना-विचारना।” भीतर के दरवाजे से प्रवेश कर रही पत्नी के इन शब्दों ने उन्हें चौंका दिया। पदचापों की ध्वनि मन्द पड़ गई। पैर रुक गए पर अन्दर उठने वाला बवण्डर ज्यों का त्यों था। नजरें एक बारगी पत्नी के चेहरे पर टिक गई। अपनी बेधक दृष्टि से मानो उसके अस्तित्व में सचाई की तलाश करने लगे हों।
“समझते क्यों नहीं?” एक तीर से दो शिकार होंगे-वह बोले जा रही थी। “जिस सत्य को तुमने बड़ी से बड़ी कठिनाइयाँ सहकर बड़ा से बड़ा त्याग करके अपनाए रखा उसका पालन और . . “ कहने के पहले अन्दर का उल्लास चेहरे पर उमड़ पड़ा। उल्लास की आभा ने मुख मण्डल पर सर्वदा विराजमान रहने वाले काइयाँपन को और अधिक चमका दिया। “इस तरह कितना खुश हो जायेगा बादशाह! शाही रुतबे-खिताबों का ढेर और कोई बड़ी बात नहीं जो सात हजारी मनसबदार बना दिए जाओ। सारी जिन्दगी तुम्हारी इस ब्राह्मणत्व के पागलपन के कारण क्या-क्या दुख नहीं उठाने पड़े। अभी चेत जाओ, अवसर दरवाजे पर खड़ा दस्तक दिए जा रहा है।”
पत्नी के मुख से निकलने वाला एक-एक अक्षर उनकी पसलियों को भेदे जा रहा था। असह्य पीड़ा हुई उन्हें लगा कि दिल और जिगर का सारा लहू निचोड़ लिया गया हो। कुछ बोलने के बजाय एक उचाट नजर उस पर डाली और फिर टहलने लगे। जिस सत्य को उन्होंने सारी उम्र जीवन का केन्द्रीय आधार माना आज भी मान रहे हैं। पूरी निष्ठ के साथ इन क्षणों में भी उसे निभाना चाहते हैं। एक ओर वह हैं दूसरी ओर उनकी पत्नी जिसकी वाणी-मन अपने स्वार्थ के एक निष्ठ सेवा व्रती रहे हैं। इस समय सच बोलने की पैरवी किये जा रही है। क्यों? इसलिए न कि स्वार्थ सधेगा। यश-वैभव जागीर, खिताब,यही उम्मीदें उसे बोलने के लिए बाध्य किये हैं।
दोनों पक्षों में सत्य कहाँ है? शब्दों में जकड़ा है या भावों में उमड़ रहा है। वाणी के संकरे गलियारे में है या विचारों के सुविस्तीर्ण प्रांगण में। कौन करे इस का निर्णय? बेचैनी भरी दृष्टि इधर-उधर घुमाई। किवाड़ से चिपटी खड़ी पत्नी उनकी इन हरकतों को बारीकी से देख रही थी। इस लम्बे मौन से उसे आशा बँध चली थी कि नतीजा उसके पक्ष में जाएगा। वह पुनः मुखरित हो उठी “इतना परेशान होना कम से कम तुम्हें शोभा नहीं देता। तुम जो हमेशा कहा करते रहे कि ब्राह्मण की एकमात्र सम्पदा है सत्य। उसी अमूल्य सम्पदा को एक छोकरे के पीछे लुटा रहे हैं। लड़का शिवाजी का है अपना तो कुछ भी नहीं। वे छत्रपति हैं इससे हम लोगों का क्या भला हो गया, न रहेंगे तो क्या बिगड़ जाएगा।” उसकी वाणी का कठोर धनुष एक पर एक पैने वाक्य बाणों की बौछार किए जा रहा था। “जयसिहं भी हिन्दु है ठेठ राजपूत-उन्होंने ही तो छल करके पकड़वाया था शिवाजी को -क्यों? सिर्फ इस लिए कि उनका ओहदा बरकरार रहे। आज हर अच्छाई-बुराई न्याय-अन्याय का एक मात्र पैमाना है- स्वार्थ। जिधर स्वार्थ रहे- उधर ही सच्चाई, अच्छाई न्याय सब कुछ है।”
पत्नी की सीख सुनकर उनके परेशान चेहरे पर एक हल्का सा स्मित छलक आया। उसे सम्बोधित करते हुए बोले “ठीक कहती हो तुमने अपने सच का प्रस्तुतीकरण सही ढंग से कर दिया।” उनकी इस मुसकराहट ने उसके चेहरे पर झल्लाहट की रेखाएँ स्पष्ट कर दीं। खीझते हुए बोलने लगी “अपना सच और पराया सच क्या? सच-सच है। तुमने जाने कौन सा शास्त्र प्राप्त किया है।” अन्तिम शब्दों के साथ मुड़कर रसोई घर की ओर चली गई।
कमरे की दीवारों पर लगे एकनाथ, तुकाराम, ज्ञानदेव, समर्थ रामदास आदि संतों के हस्त निर्मित कला चित्रों की ओर देखते हुए सोचने लगे, एक सत्य है जिनके लिए इन देव मानवों ने जीवन जिया। दूसरी ओर है संसार का प्रचलित सत्य -जिसमें एक पल के लिए सच स्वार्थ का पर्याय है, दूसरों के लिए सत्य भाषण-विवेकहीन हठवादिता है।
विचार शृंखला में नयी कड़ियाँ जुड़ती जा रही थीं। वे सोचने लगे यदि सत्य विवेकहीन हठवादिता है तो इसके पालन का मतलब है सम्भाजी को बर्बर बधिकों के हाथ सौंप देना। जिसका परिणाम है, सम्भा जी की हत्या उस विश्वास की हत्या, जिसके सहारे क्षत्रपति अपने दिल के टुकड़े को मेरे यहाँ छोड़ गए। इतना ही नहीं उस मनोबल की भी हत्या जिसके बल पर क्षत्रपति बर्बरता का दमन, दलित मानवता की पीड़ा निवारण में जुटे हैं। नहीं... नहीं सत्य निर्दोष के रक्त से तर्पण नहीं कर सकता। सत्य बर्बर के निष्ठुर हाथों की रक्तपायी कृपाण नहीं बन सकता। इन विचारों ने उन्हें राहत दी और राहत ने प्रफुल्लता। आहट सुन कर पति-पत्नी दोनों की आंखें द्वार की ओर मुड़ी। वाणी में विराम लग गया।
सैनिक वेश में आ रहे इन आगन्तुकों के स्वागत में उठते हुए बोले “आइए मैं आप लोगों की राह देख रहा था।” बैठते हुए औपचारिक चर्चा के बाद उनमें से एक कहने लगा “क्या करें पण्डित जी? आप की बात की कीमत- इस सारे शहर में किसे नहीं मालूम पर सियासती मामला है। वास्तविकता आप से ही जाननी थी।” हिचकिचाते हुए उसने उनकी ओर देखा।
“अरे इसमें तकलीफ क्या? यह तो आप लोगों का फर्ज बनता है। फिर वह लड़का तो मेरा सगा भानजा है। भानजे के साथ भोजन करने में क्या हर्ज?”
उनके इस कथन के जवाब में उन लोगों ने आपस में एक दूसरे की ओर देखा। अब वे आश्वस्त हो चले थे। इधर पण्डित जी ने पत्नी को भोजन परोसने के लिए आवाज दी साथ ही तेज आवाज में पुकारा विनायक। सोलह-सत्रह साल का गठीले बदन का तेजस्वी लड़का भीतर से भोजन की थाली लेकर आया। आगमन करने के पश्चात दोनों साथ-साथ खाने लगे। भोजन कर चुकने पर सैनिक माफी माँग कर शिष्टतापूर्वक चले गए।
उनके चले जाने पर पत्नी क्रोधित नजरों से उनकी ओर देखते हुए बोली “अब्राह्मण के साथ खाकर कर दिया न सत्यानाश।”
“सत्यानाश नहीं सत्यपालन। सत्य के लिए किया जाने वाला प्रत्येक कर्म पवित्र है। सच्चाई भावों में बसती है। क्रिया कलेवर है भाव प्राण। यदि भाव न रहे तो कलेवर कितने दिन टिकेगा। सत्य-स्वार्थ नहीं परमार्थ है, यह उस त्याग और बलिदान की उच्चावस्था है, जिसमें परहित और सर्वहित छुपा है, विवेकहीन हठवादिता नहीं। पत्नी सिर नीचा किए भोजन के बरतन समेट कर जाने लगी। इधर वह कह रहे थे अन्त में जान लो-सत्य भावनाओं से भरी सदाशयता है।
आशय की सच्चाई के रूप में सत्यनिष्ठ को पालन करने वाले पं. पुरुषोत्तम राव ने मध्यकालीन इतिहास में एक अनूठे गौरव की स्थापना की। मिठाई की टोकरी में छुप कर निकले सम्भा जी की प्राण रक्षा कर धर्म संस्थापन के लिए जुटे शिवाजी के कार्य में सहयोगी बने। यही सदाशयता यदि हमारे प्रत्येक कर्म की कसौटी बन सके तो समझें, धर्म निभ गया -सत्यपालन बन पड़ा।
आध्यात्मिक साधना की सफलता के लिए सबसे पहला एवं अनिवार्य कदम “इन्द्रिय निग्रह” है। यों ज्ञानेन्द्रियाँ पाँच मानी जाती हैं, पर उनमें से दो ही प्रधान हैं पहली- स्वादेन्द्रिय और दूसरी कामेन्द्रिय। इनमें से स्वादेन्द्रिय प्रधान है। उसके वश में आने से कामेन्द्रिय भी वश में आ जाती है। रसना को जिसने जीता, वह विषय वासना पर भी अंकुश रख सकेगा। चटोरा आदमी ब्रह्मचर्य से नहीं रह सकता, उसे सभी इन्द्रियाँ परेशान करती हैं, विशेष रूप से काम वासना तो काबू में आता ही नहीं। इसलिए इन्द्रिय-निग्रह की तपश्चर्या संयम, साधना, स्वाद को, जिव्हा को वश में करके आरंभ की जाती है। चटोरेपन की वेदी पर न केवल आरोग्य और दीर्घ जीवन बलि चढ़ जाता है, वरन् आत्मसंयम की साधना भी मात्र मखौल बनकर रह जाती है।
आरोग्य ही नहीं, मन को वासनासिक्त होने से रोकने के लिए भी यह आवश्यक है कि रसनेन्द्रिय पर अंकुश लगाया जाय। इस दृष्टि में नमक या मीठा दोनों में से एक को छोड़ने के रूप में आरंभिक कदम उठाया जा सकता है। यह एक निराधार भय है कि इन्हें छोड़ देने से स्वास्थ्य खराब हो जायगा। सच तो यह है कि इस संयम से पाचनक्रिया ठीक होती है, रक्त शुद्ध होता है, इन्द्रियाँ सशक्त रहती हैं, तेज बढ़ता है और जीवन काल बढ़ जाता है। इससे भी बड़ा लाभ यह है कि मन काबू में आता है।
नशेबाजी, अभक्ष्य भक्षण एवं चटोरेपन को रोक देने से वासना पर जो नियंत्रण होता है, वह धीरे-धीरे सभी इन्द्रियों को वश में करने वाला सिद्ध होता है। जिस प्रकार पाँचों ज्ञानेन्द्रियों में जिव्हा और ज्ञानेंद्रिय प्रबल हैं, उसी प्रकार स्वाद के षट्रसों में नमक और मीठा प्रधान हैं। चटपटा, खट्टा, कसैला आदि तो उनके सहायक रस मात्र हैं। इन दो प्रधान रसों पर नियंत्रण कर लेना षट्रसों को त्यागने के बराबर है। जिसने स्वाद और काम प्रवृत्ति को जीता, उसकी इन्द्रियाँ वश में हो गई, ऐसा ही समझना चाहिए। मन को वश में करने के लिए यह संयम-साधना हर साधक को किसी न किसी रूप में करनी ही होती है।
संयमी और सदाचारी ही प्राणवान, शक्तिवान, स्वस्थ एवं संस्कारी बनते तथा भौतिक और आध्यात्मिक आनन्द की उपलब्धि कर सकते हैं। ओजस्वी, तेजस्वी एवं मनस्वी होने का अर्थ है मन, वचन तथा कर्म से सभी इन्द्रियों पर नियंत्रण रखना। ब्रह्मचर्य इसे ही कहा जाता है। इसका पालन न तो कठिन है न असंभव। आवश्यकता मात्र ऊर्ध्वरेता बनने और ऊंचा उठने की आकाँक्षा की है। इस संबंध में महात्मा गाँधी का कहना है कि आत्म संयम की साधना करने वाले को सर्वप्रथम अपनी रसना को वश में रखना अनिवार्य है। इसके लिए स्वाद नियंत्रण परमावश्यक है। उनके अनुसार जो रसना अर्थात् जीभ के स्वाद पर विजय नहीं प्राप्त कर सकता, वह विषयों वासनाओं पर भी विजय नहीं प्राप्त कर सकेगा। इसलिए ब्रह्मचर्य पर जिनकी आस्था है, उन्हें अस्वादव्रत लेना चाहिए और सात्विक आहार भूख से कम खाना चाहिए।
आहार शास्त्रियों एवं मनोचिकित्सा विज्ञानियों का कहना है कि उत्तेजना पैदा करने और वासना को भड़काने वाले कारणों में आहार एक प्रमुख कारण है। इस सम्बन्ध में जर्मनी के मूर्धन्य मनोविज्ञानी डॉ. कैलाग ने गहन अनुसंधान किया है और निष्कर्ष प्रस्तुत करते हुए अपनी कृति- “प्लेन फैक्ट्स” में लिखा है कि प्रायः यह आम मान्यता है कि आहार एक साधारण सी वस्तु है, किन्तु यह सबसे बड़ी भ्रान्ति है। वस्तुतः मनुष्य जैसा भी, जो कुछ भी, भक्ष्य-अभक्ष्य स्वादवश या पोषण हेतु खाता है, उसका सीधा असर उसके मन पर पड़ता है। मन का पोषण खाद्य वस्तुओं के सूक्ष्म प्राण का अवशोषण करने पर होता है। उनकी दूषणता या सात्विकता के अनुरूप ही मन की चंचलता या स्थिरता निर्भर करती है। शरीर क्रिया विज्ञानियों ने भी अब इस तथ्य की पुष्टि कर दी है कि हमारे विचार खाद्य वस्तुओं के अनुरूप ही बनते बिगड़ते रहते हैं। जो व्यक्ति सुरापान करते, माँस-मछली भक्षण करते अथवा धूम्रपान करते हैं, उनके लिए अपने विचारों को पवित्र रख सकना तथा इन्द्रिय निग्रह कर सकना आसमान में बिना पंख के विचरण करने की आशा करने के समान है। यदि वह पवित्र जीवन व्यतीत कर सकें, तो एक चमत्कार होगा, किन्तु मानसिक पवित्रता रख सकना तो उनके लिए सर्वथा असंभव ही होगा।
इसी तरह का शोधपूर्ण निष्कर्ष डॉ. आर्थर कोवेन का है। अपनी पुस्तक- “साइन्स आफ न्यू लाइफ” में उनने लिखा है कि “काम वासना को उत्पन्न करने के कारणों में दूषित आहार मुख्य है। यह कल्पना करना कि खान-पान में माँस, मदिरा, अण्डा, बीड़ी-सिगरेट, मिर्च-मसाला, आचार, खटाई, मिठाई, और चाय-कॉफी आदि का स्वाद जिव्हा चखती रहे और व्यक्ति कामुकता से बचा रहे, एक असंभव कल्पना है।” यदि इस तरह का आहार आसमान के फरिश्ते को भी दिया जायगा, तो उसे खाने से उसमें वासना-विकृति उत्पन्न हुए बिना न रहेगी, फिर सामान्य मनुष्य का तो कहना ही क्या, जिसमें हजारों कुसंस्कार पहले से ही विद्यमान हों। ऐसे में न तो इन्द्रिय संयम सध सकता है, न मानसिक नियंत्रण में दृढ़ता आ सकती है। कामुकता से जीवन रस तथा स्नायु शक्ति दोनों का ह्रास होता है और अनेकानेक शारीरिक-मानसिक उपद्रव उठ खड़े होते हैं।
अपनी वासनाओं पर काबू रखना, उन्हें कुमार्ग पर न जाने देना मनुष्य के शौर्य, पराक्रम एवं पुरुषार्थ का प्रधान चिन्ह है। मनः क्षेत्र में कुहराम मचाने वाली उत्तेजनाएँ, आवेश, असंतुलन एवं विकार इन्द्रियों के असंयम के ही परिणाम होते हैं। जब तक स्वाद या चटोरेपन के वशीभूत हो स्वादेन्द्रिय पेट पर अत्याचार करती रहेंगी, तब तक इन विकारों से छुटकारा पाना संभव नहीं।
वस्तुतः आहार का, खान-पान का अदृश्य शरीर रूपी इंजन को सुचारु रूप से गतिशील रखने के लिए पर्याप्त ईंधन प्रदान करना है, न कि स्वादेन्द्रिय की कभी न पूरी हो सकने वाली इच्छापूर्ति, जैसा कि वर्तमान में प्रचलन है। भोजन को आवश्यकता से अधिक महत्व देना तथा स्वादपूर्ण आहार का सेवन करने को बिनोवा ने एक प्रकार की हिंसा कहा है। उनका यह कथन सर्वथा उचित भी है, क्योंकि खाद्य पदार्थों में कृत्रिम रस पैदा करना अंततः शरीर व मन को उत्तेजित करना है। ये विकार ही हिंसा को उत्पन्न करते या वासना को भड़काते हैं। स्वाद-नियंत्रण की उपलब्धियों के बारे में विवेकानंद का कहना है “मैंने अपने सोने और खाने पर इच्छित नियंत्रण रखा है। इसी आधार पर मैं अपना मनोबल, पराक्रम और धैर्य विकसित कर सका। इन्द्रिय संयम अर्थात् ब्रह्मचर्य पालन के लाभों में यह लाभ भी सम्मिलित है।
मन को वश में करने तथा कामेन्द्रियों सहित अन्याय इन्द्रियों को नियंत्रित रखने-निग्रहीत करने के लिए स्वादेन्द्रिय की संयम साधना हर साधक को किसी न किसी रूप में करनी ही चाहिए। इस दिशा में एक कदम उठना ही चाहिए, भले ही वह आरंभ में अस्वाद व्रत के रूप में ही क्यों न हो। वस्तुतः अस्वादव्रत अपने आप में एक महाव्रत है। महात्मा गाँधी ने इसकी भूरि-भूरि प्रशंसा की है और अपने सप्तमहाव्रतों में इसे प्रमुख स्थान दिया है। यह एक ऐसा महाव्रत है, जिसे उन्होंने स्वयं एवं विनोबा जैसे अनेकों महामानवों ने अपनाया और उस आधार पर अपने आहार विहार को उत्तरोत्तर शुद्ध-सात्विक बनाते हुए साधना पथ पर आगे बढ़े और अभिष्ट लक्ष्य को प्राप्त करने में सफल हुए। सप्ताह में एक दिन भी इसे पालन किया जाय, तो मन की संयम शक्ति और दृढ़ता बढ़ती है। यह बढ़ोत्तरी धीरे-धीरे मनुष्य में उन गुणों का भी विकास कर देती है, जो महापुरुषों-महामानवों में होने ही चाहिए।
मोटी बुद्धि वस्तु स्थिति का पता नहीं लगा पाती। उसके लिए गम्भीर पर्यवेक्षण से ही निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है।
पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा लगाने के लिए एक घंटे में 6600 मील की यात्रा करती है। मोटी बुद्धि से यही प्रतीत होता है कि जमीन जहाँ की तहाँ स्थिर है और हम जहाँ रहते हैं सदा वही बने रहते हैं। जब कि क्षण भर में हम कहीं से कहीं जा पहुँचते हैं।
मनुष्य वस्तुतः सच्चे अर्थों में कौन है? क्या विशिष्ट आकार-प्रकार का कलेवर या ढाँचा प्राप्त कर लेना ही इसकी निशानी है अथवा इसके कुछ अन्य मानदण्ड हैं? इन सब बातों पर गहराई से विचार करने पर यही ज्ञात होता है कि केवल बाह्य ढकोसले के आधार पर किसी को मनुष्य कह देना मनुष्यता के साथ अन्याय करना है। ऐसे मिलते-जुलते कलेवर तो वनमानुष, चिंपैन्जी जैसे अन्य वन्य जन्तुओं के भी होते हैं, फिर तो इस परिभाषा के आधार पर मनुष्य की श्रेणी में वे भी आ सकते हैं। इससे ऐसा लगता है कि परिभाषा अथवा चिंतन में कहीं कोई कमी अवश्य है। मनीषियों का कहना है कि मनुष्य अथवा मनुष्यता की परिभाषा उसके नैतिक मूल्यमानों पर, आन्तरिक उत्कृष्टता पर आधारित होनी चाहिए, जो सही भी है।
इसी का समर्थन करते हुए एरिक फ्राम अपनी पुस्तक “साइकोलॉजी एण्ड ह्युमन सोसायटी” में लिखते हैं कि मनुष्य के व्यवहार का आधार आचार है और आचार की अभिव्यक्ति व्यवहार। अन्तरंग को संवारे बिना उत्तम व्यवहार की कल्पना करना और सही अर्थों में मानवता का परिचय दे पाना हथेली में सरसों जमाने की तरह है। वे आगे लिखते हैं कि आज हम कहने को तो अन्तरिक्ष युग में प्रवेश कर चुके हैं और बाहरी दृष्टि से यह मनुष्य की एक बहुत बड़ी विजय का द्योतक भी है, पर जब हम उसके अन्तराल में झाँकते हैं, तो ऐसा लगता है कि वो एक बार फिर से पाषाण युग की ओर ही अग्रसर हो रहा है। वे चेतावनी देते हुए कहते हैं कि यदि हमारा ध्यान अन्तः के परिष्कार की ओर न होकर मात्र वाह्य उपलब्धियों की ओर ही केन्द्रित रहा, तो फिर हम आदि मानवों की श्रेणी से भी नीचे पशुओं की श्रेणी में आ जायेंगे, जिसका एक ही काम होगा, पारस्परिक विद्रोह और विध्वंस।
आर. ड्यूक्स अपनी रचना “सो ह्यूमन एज एनीमल” में मानवी पतन का एक मात्र कारण जीवनोद्देश्य को भूल जाना बताते हैं। वे कहते हैं कि ऐसा तब से आरम्भ हुआ, जब से हमने विज्ञान के प्रत्यक्षवाद को ही सब कुछ मानने की भूल की। जिस बात को विज्ञान द्वारा सिद्ध किया जा सका, उसे हमने सहजता से स्वीकार लिया, और जहाँ वह असमर्थ रहा, वहाँ हम उस तत्व के अस्तित्व से ही इन्कार करने लगे। प्रत्यक्षवाद ने जहाँ अन्धमान्यताओं एवं कुप्रथाओं को समाप्त करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी, वही सृष्टि संचालन के पीछे किसी समर्थ सत्ता के हाथ होने पर ही प्रश्न-चिन्ह लगा दिया। बस यही से चार्वाक, मिल, बेन्थम, नीत्से चरनिस्मेस्की जैसे अनीश्वरवादी भोगवादियों ने सिर उठाना शुरू किया और “ऋणं कृत्वा घृतं पिवेत्” का नारा देना शुरू किया। कहा-चाहे जैसे भी बन पड़े भले ही वह अनाचार-अत्याचार के माध्यम से ही क्यों न हो, ऐश-मौज करो। इस सिद्धान्त ने समाज व्यवस्था ही भंग कर दी और एक अराजकतावादी समाज को जन्म दिया। ड्यूक्स का कहना है कि अराजकता को समाप्त करने के लिए हमें ईश्वर और मनुष्य के बीच पुनः वही संबंध स्थापित करना पड़ेगा, जो प्राचीनकाल में था और जिसे कभी संसार की सर्वोपरि सत्ता के रूप में स्वीकार किया गया था। जब तक इतना कुछ नहीं बन पड़ेगा तब तक समाज में नैतिकता की आशा करना मनुष्य के लिए दुराशा मात्र होगी।
इसी को दूसरे शब्दों में जी. ई. पुघ अपनी कृति “दि बायोलॉजिकल ओरीजीन ऑफ ह्यूमन वेल्यूज” में लिखते हैं कि मनुष्य की पहचान उसकी भावनात्मक संगठना के कारण है। मात्र बुद्धि अथवा आकार वह मनुष्य कहलाने का अधिकार नहीं है। यदि ऐसा ही होता, तो प्रयोग परीक्षणों के दौरान बन्दरों एवं चिंपैन्जी को भी बुद्धिमान पाया गया है। इस आधार पर वे भी मनुष्य की पंक्ति में आ खड़े होते, पर वस्तुतः मनुष्य उदात्त भावनाओं का समुच्चय है। इसे यदि उससे पृथक कर दिया जाय, तो मनुष्य मात्र एक बुद्धिमान जन्तु भर बन कर रह जायेगा। इसी का समर्थन करते हुए “दि ह्यूमन साइक” में जॉन एकलिस कहते हैं कि मनुष्य अपने अन्तस् में उत्कृष्टता के बीज संजोये हुए है। यदि इसे निरन्तर पोषण देकर विकसित किया जा सके, तो कोई कारण नहीं है कि मानव महामानव न बन सके, पर विडम्बना यह है कि मानव देवत्व पर असुरत्व हावी हो जाने के कारण देवत्व के अंकुर विकसित वृक्ष बनने के पूर्व ही मुरझा जाते हैं। उन्होंने “ए क्लास वर्क आरेंज” एवं “जाँज” जैसी भयानक व डरावनी फिल्मों के निर्माता श्री क्यूब्रिक के इस कथन पर आपत्ति प्रकट की है कि मनुष्य मूलतः पाश्विक, हिंस्र व सनकी है। श्री एकलिस का कहना है कि वस्तुतः मनुष्य ऐसा है नहीं। यह तो उसके विकास काल के अवशेषी संस्कार है, जिन्हें प्रयासपूर्वक हटा कर वह अपने प्रखर और वास्तविक स्वरूप को प्राप्त कर सकता है।
नृतत्वविज्ञानी ई. ओ. विल्सन अपनी पुस्तक “ऑन ह्यूमन नेचर” में यह स्वीकारते हैं कि मानवी जीवन गरिमामय तभी माना जा सकता है, जब वो “अपना और अपनों” के संकीर्ण स्वार्थपरता के सिद्धान्त से ऊपर उठकर विश्व बन्धुत्व का परिचय दे। वे लिखते हैं कि इतनी विशेषता तो मनुष्येत्तर प्राणियों में भी पायी जाती है, फिर मनुष्य तो उनमें बहुत बुद्धिमान और विकसित है। उसने भी उसी लीक पर चलने का परिचय दिया, तो इसे उसकी संकीर्णता ही कहनी चाहिए।
मानव में सामाजिकता के विकास का आरंभ सिर्फ इस कारण हो सका था उसने इसकी आवश्यकता और उपयोगिता समझी थी, पर आज एकबार फिर से वह इससे विमुख होता जा रहा है, जिससे उसका भविष्य अन्धकारमय दिखाई पड़ता है। इसी आशय का मन्तव्य प्रकट करते हुए शेरिंगटन अपनी प्रसिद्ध रचना “मैन एण्ड हिज नेचर” में लिखते हैं कि दूसरों के प्रति सद्भावना और सम्मान ही ‘स्व’ के विस्तार का आधार है और इसी आधार पर उसके उज्ज्वल भविष्य की आशा की जा सकती है। इससे कम में विकास तो क्या अस्तित्व को सुरक्षित रख पाना भी उसके लिए असंभव होगा। इसी बात को श्री एल. आर. लक्ष्मीनारायण ने अपने शोध प्रबन्ध “श्री अरविन्दो एण्ड दि टू कल्चर्स” में दूसरे ढंग से कहा है। वे मनुष्य की वर्तमान चिन्तन पद्धति को ही आज के संकट के लिए जिम्मेदार ठहराते हुए कहते हैं कि चिन्तन की संकीर्णता जहाँ व्यक्ति के दायरे को स्वयं तक, सम्प्रदाय अथवा जाति तक सीमित कर देती है, वही उसकी अधोमुखता हिंसा, क्रोध एवं प्रतिशोध जैसी प्रवृत्तियों को जन्म देती है। इस संकट से उबरने का वे एक ही विकल्प सुझाते हैं- चिन्तन का परिष्कार और उदात्तीकरण।
फिनलैण्ड के विश्व प्रसिद्ध संगीतकार सिबिलियस से एक नौजवान संगीतकार मिलने आया और बताने लगा की आलोचक मेरी कितनी ही बार इतनी कड़ी आलोचना करते हैं कि मैं कई बार बेहद निराश हो जाता हूँ।
“कुछ भी करने धरने की आवश्यकता नहीं है मित्र” सिबिलियस ने कहा “बस उन नासमझों की बातों पर ध्यान न दो। यदि तुम्हारा उद्देश्य पवित्र है और नीयत साफ है, तो किसी निन्दक और आलोचक से मत डरो और यह भी जान लो कि किसी भी निन्दक या आलोचक के सम्मान में कोई मूर्ति या स्मारक आज तक दुनिया में नहीं बनाई गई है।”
यह सच है कि मानवी चिन्तन-चेतना में समाये इस प्रकार के दुर्गुण ही आज के संकट और मनुष्य के अस्तित्व के लिए प्रश्न-चिन्ह बन कर अड़े हुए हैं। जब तक वह अपने चिन्तन को परिष्कृत कर स्वयं को दुर्गुण मुक्त नहीं कर लेता तब तक न तो वह मनुष्य कहलाने का अधिकारी है और न वर्तमान दुर्गति से बच सकता है। इसी का अनुमोदन करते हुए डब्ल्यू. एच. थ्रोप अपने ग्रन्थ “एनीमल नेचर एंड ह्यूमन नेचर” में प्रसिद्ध जन्तु शास्त्री डॉ. कोनार्ड लोरेन्ज की पुस्तक “ऑन एग्रेसन” पर समीक्षा प्रस्तुत करते हुए कहते हैं कि मनुष्य का जो मूलतः हिंसक एवं क्रोधी स्वभाव का मानते हैं, वह वस्तुतः भूल करते है। यह मनुष्य के विकार हैं, न की मूल प्रवृत्ति इन्हें दूर कर वह, वह सब कुछ बन सकता है, जिसे महान, विलक्षण, अद्भुत, अलौकिक कहा गया है।
लोगों की समझ में उसे उन्माद था। कोई स्वस्थ सबल पुरुष, किसी सुन्दर पुरुष या सुन्दर युवती को देखते ही वह जहाँ का तहाँ खड़ा हो जाता। दोनों हाथों से नेत्र ढक लेता और उसके पैर काँपने लगते। मुँह से कुछ बड़बड़ाहट शुरू हो जाती। बड़बड़ाने के अस्फुट स्वरों में सिर्फ दो ही शब्द पल्ले पड़ते -”हे ईश्वर”। इस रोग का परिणाम यह हुआ कि वह नगरों के भीड़ भरे मार्गों से भय खाने लगा। उसे अपने एकान्त कमरे में बन्दी रहना प्रिय था और यदि वहाँ से निकलना निहायत जरूरी हो, तो वह तब निकलता जब उसे रास्ते में किसी से मिलने की सम्भावना न हो।
मस्तिष्क को धक्का लगा है। मानसिक विकृति है धीरे-धीरे ठीक होगी। चिकित्सक-मनोवैज्ञानिक कोई कारगर सहायता नहीं कर पाए। सिर्फ अपनी सम्मति सुना कर रह गये। बेचारी पत्नी-वह तो उससे भी घबराता था। उसके सम्मुख भी उसकी आंखें बन्द हो जाती पैर काँपने लगते। “भागो! भागो जल्दी! तहखानों में जा छुपो।” कभी-कभी बड़बड़ाहट के शब्द साफ हो जाते। “पिशाच आ रहे हैं। वे पिशाच जो अपने बमों से संसार को भून देने पर तुले बैठे हैं।”
बेचारा उसे क्या पता-इन्सान की पूरी जमात इन्सानियत को कुचलते रौंदते शैतान बनने के लिए दौड़ पड़ी है। परमाणु बम, हाइड्रोजन बम तो बहुत पीछे छुट गए। अब तो इन्सान के भीतर बैठा शैतान कहीं अधिक घातक अस्त्रों की शोध में है, उसकी चाहत है कि दूर बैठा बटन दबा दे और एक भारी नगर, जिसे वह शत्रु नगर मानता है, अपने समस्त भवनों, लक्ष-लक्ष मानव प्राणियों, पशुओं एवं विपुल वस्तुओं के साथ आधे क्षण में इस प्रकार भस् से राख की ढेरी बने जैसे धुनी रुई की राशि पर प्रज्वलित अग्नि गिरी हो।
संहारक शस्त्रों की बात उसके लिए नई नहीं है। इन सब के बारे में उसे सुनना पड़ता था, जानना पड़ता था और उपयोग भी करने के लिए वह बाध्य था, क्योंकि वह एक हवाई सैनिक था। हिरोशिमा-नागासाकी के भस्म स्तूप बनने के तीन दिन पहले वह युद्ध मोर्चे से आया था या यों कहा जाय कि उसे आना पड़ा।
अब तो डाक्टरों के मतानुसार उसका उन्माद छटने लगा। चिल्लाहटें कम हो गईं। हाँ बड़बड़ाहट अभी भी है। अन्तर केवल इतना ही पड़ा है कि अब केवल उसके होठ हिलते हैं। मनोवैज्ञानिकों का कहना है, ‘यह अच्छे लक्षण हैं, उसका मन सावधान होने लगा है। उसमें इतनी समझ आ गई है कि सबके सामने चिल्लाना बुरी बात है। इसी तरह सोचना जारी रहेगा तो वह शीघ्र समझ जाएगा कि उसका भय अकारण है।
क्या सचमुच उसका भय अकारण है? क्या मानव, इसे मानव के ठेकेदारों, शक्ति सम्पन्न शब्दों के कर्णधारों ने अपनी पैशाचिकता का परित्याग कर दिया? क्या उन्होंने खुशहाली से भरे चहकते विश्व उपवन को श्मशान बनाने वाली अपनी योजनाओं को पूर्णतया समाप्त कर दिया।
यदि नहीं तब तो भय है और तब तक बना रहेगा जब तक नियन्ता शैतानियत की राह पर बढ़ रहे इन्सान के कदमों को बलात् न मोड़ दे। वह यों ही नहीं भयभीत था। जो अपने समूह का नायक हो, पूरी स्क्वाडर्न का लीडर जिसने बहादुरी के बड़े-बड़े खिताब जीते हो। इस मानसिक उथल-पुथल के थोड़े ही दिन पहले अभी उस दिन वह अपने बाम्बर बी-उन्तीस पर जमा बैठा था। उसका बमवर्षक आज दिन में उड़ान ले रहा था। एक, दो, तीन बटन दब गया। बम पूरी तेजी से जा भागे। बड़ी शीघ्र गति से यान आगे बढ़ गया और पर्याप्त ऊपर उठ गया।
उसको कुछ नहीं हुआ उस समय। उल्टे वह प्रसन्न था। नीचे धुआँ और लपटों का अम्बार उठ रहा था। इसके हृदय में खुशी का ज्वार उमड़ रहा था। मन ही मन वह विचार कर रहा था, कितनी भाग्यशाली है जुलाई, 1945 की 27 तारीख जिसने उसे ‘ओकीनावा’ को ध्वस्त करने का श्रेय दिया। शत्रु जल रहा था- शत्रु! वह शत्रु जिससे उसको घृणा करना सिखलाया गया था। मजे की बात तो यह-यह सब मानवता की रक्षा के नाम पर हो रहा था और शत्रु-जिसके सम्बन्ध में कहा गया था कि वह नरक के कीड़ों से भी घृणित और शैतान से भी अधिक दुष्ट है।
आक्रमण सफल रहा। लौटने पर उसे समाचार मिला कि शत्रु को हटना पड़ा है। अग्रगामी सैनिकों ने शत्रु के मुख्य अड्डे को अधिकार में ले लिया है। मित्रों, सहयोगियों, अफसरों से कितनी प्रशंसा मिली उस दिन। द्वितीय विश्व युद्ध की सेनाओं के कमाण्डर इन चीफ जनरल मैक आर्थर ने स्वयं बधाई सन्देश भेजा था। वह उस महत्वपूर्ण बिन्दु को लक्ष्य बनाने में चूक गया होता। उसका यान गिर जाता या वह स्वयं जल जाता, तब...। परन्तु यह सब नहीं होना था, नहीं हुआ।
आप मुझे उस चौकी को खोलने की अनुमति देंगे। उसने उत्साहातिरेक में पूछा?
“अवश्य! अफसर बाधक नहीं बना। “यद्यपि अभी वहाँ खतरा है, किन्तु अपने एक अच्छे योद्धा का उत्साह हम नहीं तोड़ना चाहेंगे। हवाई जहाज वहाँ उतर नहीं सकेगा। तुम जीप से जा सकते हो।”
ओह! उसे मार्ग में ही मूर्छा सी आने लगी। उसके समीप से जो एम्बुलेन्स जा रही थीं, उनमें से दारुण चीत्कारें उठ रहीं थीं। जलते माँस की गन्ध से साँस घुट जाती थी। जलता माँस तो उसने जीते-जागते मनुष्यों को भून दिया है? हाँ यह उसी का कर्तृत्व है जो अपने को मनुष्य कहता है चार्ल्स ग्रोव। उसी का जिसे गर्व है कि सर्वम् प्रेम बाँटने वाले ईसा का अनुयायी है चीत्कार के करुण रव के बीच उसी के किसी अनजान क्षेत्र से उभरी ये ध्वनियाँ उसको धिक्कारने लगी।
जीप से उतरा वह, सामने ही एक शव पड़ा था। कोई आठ दस वर्ष का बालक रहा होगा। उसके शरीर के वस्त्रों का क्या पता चलता, चमड़ा व माँस की परत तक जल गई थी। उसका रंग काला, झुलसा, स्थान-स्थान से फटा और उसमें से बाहर आया माँस... ग्रोव ने नेत्रों पर हाथ धर लिये।
किन्तु कहाँ तक आँखें बन्द किये रहता। कुछ स्त्रियाँ चीखती-चिल्लाती उसी की ओर दौड़ी आ रही थीं। सैनिकों ने उन्हें थोड़ी दूर पर रोक लिया। कई गिर पड़ी वहीं। वे उन्मत्त हो चुकी थीं। सब के सिर के बाल जल गए थे। मुख ही नहीं सारा शरीर काला पड़ गया था। झुलस कर फट गया था। स्थान-स्थान से जब शरीर ही फटा था, तब वस्त्रों की बात कौन कहे? कभी ये भी सौंदर्य की जीवन्त प्रतिमाएँ रही होंगी। किसने दिया आज उन्हें यह रूप...?
“उफ।” वह वहीं बैठ गया धरती पर। उसको चक्कर आ रहा था। ‘शत्रु’-’शत्रु’। कोई उसके सिर के भीतर चिल्ला रहा था समूचे अस्तित्व से चिल्लाहटें उमग रहीं थीं। “ये अबोध बच्चे, ये सुकुमारी युवतियाँ, ये सब तुम्हारे शत्रु हैं। तुम ने इन्हें जला डाला। पिशाच कहीं के।”
पिशाच ... तो क्या वह पिशाच है नहीं वह तो मनुष्य है। क्या तुम अभी भी अपने को मनुष्य समझते हो? अन्तरात्मा के शब्द गूँज उठे। तब...त..ब..व..ह यही वह दिन था जब उसे युद्धस्थल से लौटना पड़ा। उसका प्रभाव दूसरे सैनिकों पर प्रतिकूल पड़ने का भय है। वे भी भयभीत है इन क्षणों में भी उसके उन्माद भरे ठहाके की गूँज बिखर गई।
वह स्वदेश लौट आया। चिकित्सकों के प्रयत्न कहा जाय या उसके अन्तरतम का सँभलता संतुलन एक-एक कर नब्बे दिनों में, या पूरे तीन महीने यह समतुलन सिद्ध हुआ सम, तुलन अन्तः और बाह्य जगत के बीच। अब उसे एक ही धुन हो गई वह मनुष्य बनेगा, मनुष्य अर्थात्- दो पावों पर चलने वाला जानवर नहीं। दो पांवों पर तो वन मानुष भी चलता है। मदारी के हाथ-बन्दर को वस्त्राभूषणों से सजा देते हैं। “तब क्या है मनुष्य?” अमेरिका से दक्षिण अफ्रीका जाते समय किसी ने उससे सवाल किया “हड्डी,खून, माँस, विष्ठा के ढेर को मनुष्य नाम मत दो। यह तो अन्तःकरण में छलछलाती उस संवेदना का नाम है जो मानवता की कराहटें सुन बेचैन हो सके। अपना सर्वस्व दे डालने के लिए विकल हो जाए।” कभी का स्क्वाडर्न लीडर वार्ल्स ग्रोव अफ्रीका के जूलू निवासियों का फादर ग्रोव हो गया। वहाँ उसने द्वितीय विश्वयुद्ध के अनुभवों को “ग्रोन्स आँव इन्ज्योर्ड ह्यूमैनिटी” (आहत मानवता की कराहटों) के नाम से सँजोया।
ग्रोव के यह अनुभव स्वर क्या आहत, मीत मानवता की करुण पुकार नहीं हैं? क्या ये कराहटें-हमें मनुष्य बनने के लिए विकल नहीं करतीं, ठीक वैसे ही मनुष्य जैसा ग्रोव बन सका।
वर्तमान सभ्यता के समक्ष धर्म एवं विज्ञान के रूप में ऐसी उपलब्धियाँ हैं जिन्हें शताब्दियों सहस्राब्दियों के सतत अन्वेषण के पश्चात् अर्जित किया गया है। दोनों का ही लक्ष्य मानवीय कल्याण एवं सत्य का शोध है। किसे स्वीकारा जाय? किसे अस्वीकारा जाय? यदि दोनों को तो किस तरह?, आदि जिज्ञासाओं का होना उस समय स्वाभाविक बन पड़ता है, जब दोनों के परस्पर विरोधी होने की मान्यता जड़ पकड़ती जा रही है।
इस किंकर्तव्यविमूढ़ता की स्थिति से उबरने के लिए आवश्यक है कि दोनों के स्वरूप एवं विरोधाभास के मुख्य बिन्दुओं को समझा जाय। विज्ञान की व्याख्या करते हुए आर. कार्नाप का “लॉजिकल फाउण्डेशन आफ द यूनिटी आफ साइंस” में कहना है कि यह व्यवस्थापूर्ण ज्ञान है। यहाँ व्यवस्थापूर्ण होने के तात्पर्य है- परीक्षण प्रयोग द्वारा उपलब्ध ज्ञान। यही नहीं इन प्रयोगों को किसी भी स्थान पर किसी के द्वारा दुहराकर उसे सत्यापित किया जा सकता है।
धर्म को परिभाषित करते हुए महर्षि कणाद का अपने वैशेषिक सूत्र में कहना है “य तोऽभ्युदयानिः श्रेयससिद्धि स धर्मः।” इस परिभाषा में अभ्युदय व निःश्रेयस दो तत्व हैं। जिनमें प्रथम का तात्पर्य एहलौकिक प्रगति एवं द्वितीय का भाव है चेतनात्मक उत्कर्ष। यहाँ ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि धर्म की अध्यात्मिक समग्रता क्या विज्ञान को अपने आँचल में नहीं समेट लेती? इस समग्रता का ही परिणाम है कि धर्म ग्रन्थ कहे जाने वाले वैदिक साहित्य में आयुर्वेद, धनुर्वेद, रसायनशास्त्र, भवन निर्माण कला आदि विधाओं के साथ ही नीति दर्शन, तत्त्वमीमांसा आदि के तत्व समान रूप से देखने को मिलते हैं।
दोनों के परस्पर विरोधी ठहराने वालों का मत है कि प्रश्न पारिभाषिक विरोध का नहीं अपितु उनकी व्यवस्थित एवं अव्यवस्थित स्थिति का है। यदि वेदों में ये सभी चीजें पायी जाती हैं तो उसे खिचड़ी कहा जाना ही ठीक होगा। स्वामी विवेकानन्द इसका औचित्यपूर्ण समाधान देते हुए कहते हैं “वेद का तात्पर्य है ज्ञान। वैदिक साहित्य कुछ पुस्तकों का संग्रह नहीं अपितु एक समग्र विश्वकोष (एनसाइक्लोपीडिया) है जिसमें अभ्युदय एवं निःश्रेयस दोनों के ही तत्व सूत्र रूप में संग्रहीत हैं। प्राचीनकाल में जब मुद्रण आदि का अभाव था, तब ज्ञान के संग्रह की इस पद्धति को आश्चर्यजनक ही कहा जाएगा।”
विज्ञान जिसे पाश्चात्य विज्ञान कहना कहीं अधिक उपयुक्त है, का उद्गम स्त्रोत बताते हुए जे. डी. बरनाल का “साइन्स इन हिस्ट्री” में मानना है कि इसका उदय ग्रीक दर्शन से हुआ है। इसी को मान्यता देते हुए एनसाइक्लोपीडिया ब्रिटेनिका में वर्णित विषय “साइन्स इन हिस्ट्री” में यह स्पष्ट किया गया है कि वर्तमान विज्ञान का मूल थेल्स, प्लेटो, अरस्तू आदि के दर्शन में है। इसे वर्तमान स्वरूप देने का श्रेय सत्रहवीं शती के वह प्रयास हैं जो गैलीलियो, देकार्त, फ्रांसिस बेकन आदि ने सम्पन्न किये। इसके विपरीत भारतीय ज्ञानकोष के तत्सम्बन्धी, सूत्र सूत्र रूप में ही पड़े रहे।
पश्चिमी विज्ञान की किसी भी शाखा को मूल ग्रीक या रोम के दर्शन में खोजा जा सकता है। अभी कुछ ही समय पूर्व विकसित विज्ञान की नवीन शाखा “मनोविज्ञान” भी इसी तथ्य को प्रमाणित करती है। श्री अरविन्द भारतीय जनमानस में अपनी ज्ञान सम्पदा के प्रति उपेक्षा का कारण बताते हुए स्पष्ट करते हैं कि इसका कारण वैराग्य के तत्व की वास्तविकता न समझ आलस्य को दिया गया पोषण तथा गुलामी का परिणाम है एवं इसी कारण संभवतः एक लम्बी मानसिक पराधीनता से भारतवासी गुजरते रहे।
इसी कारण धर्म के विश्वकोष में संग्रहीत कुछ शाखाएँ विस्मृत तथा कुछ अलग हो गयी हैं। इनमें से आयुर्विज्ञान प्रमुख है। आज धर्म के तत्वों के रूप में हम नीति शास्त्र, तत्त्वमीमांसा एवं आध्यात्म शास्त्र को ही जानते हैं। इन तीनों को वैज्ञानिक भाषा में व्यवहार विज्ञान (मनोविज्ञान), अचेतन मनोविज्ञान (परामनोविज्ञान) एवं सचेतन मनोविज्ञान के रूप में निरूपित कर सकते हैं।
विज्ञान व अध्यात्म के समन्वय के नाम पर जो प्रयास किए जा रहे हैं उन्हें बाल प्रयास ही कहना होगा। क्योंकि ऐसे अधिकाँश प्रयासों में भौतिक शास्त्र रसायन शास्त्र की किसी शोध अथवा किसी सूत्र का सामंजस्य अध्यात्म के किसी तत्व से बिठाने का प्रयास किया जाता है इस तीर-तुक्का भिड़ाने की प्रक्रिया को ही अध्यात्म एवं विज्ञान का समन्वय कहकर सन्तोष कर लिया जाता है। इस प्रकार का प्रयत्न करने वालों को हतोत्साहित तो नहीं किया जाता है किन्तु उनके यह प्रयत्न कौतुहल पैदा करने के अतिरिक्त कुछ भी ठोस और सार्थक नहीं कर सकेंगे।
वस्तुतः अध्यात्म एवं विज्ञान में कोई मौलिक विभेद है ही नहीं। विरोधाभास की प्रतीत का कारण यह है कि धर्म में लगातार लोकाचार की जंग चढ़ती गई तथा उसी को वास्तविकता मान लिया गया। सम्भव है यह लोकमान्यताएँ कभी उपयोग में रही हों, किन्तु वर्तमान में उनकी अनुपयोगिता के कारण उन्हें परे हटा दिया जाना चाहिए। विज्ञान की प्रखरता का कारण यही है कि उसने हमेशा प्रयोग परीक्षण के द्वारा जंग को कभी पनपने नहीं दिया।
अध्यात्म-आत्मिकी के ऊपर चढ़ी जंग को उतार कर यदि अध्ययन किया जाय तो स्पष्ट हो जाएगा पारस्परिक विरोध एक प्रतीत मात्र है। डॉ. ए. कम्फर्ट का क्रिश्चियन-न्यूज लेटर में इन विरोधों की गणना करते हुए मानना है प्रथम विरोध यह है कि विज्ञान की प्रविधि व्यवहारिक व प्रायोगिक है जबकि धर्म मात्र मताग्रही व सैद्धान्तिक है। स्वामी विवेकानन्द इसका समाधान प्रस्तुत करते हुए कहते हैं यथार्थ धार्मिक होने का तात्पर्य किन्हीं शास्त्रों का पाँडित्य अथवा किसी मतवाद का समर्थन नहीं अपितु परम तत्व की प्राप्ति है। ईसा, मुहम्मद, कृष्ण का नाम पर्याप्त नहीं है अपितु उनके द्वारा अन्वेषित सत्यों को पुनः सत्यापित करना ही उनका अनुकरण करना है अतएव मात्र सैद्धान्तिक होने का कथन यथार्थ नहीं है।
विरोध का दूसरा बिन्दु यह है कि विज्ञान किसी का प्रभुत्व नहीं स्वीकारता जबकि समूचा अध्यात्म इसी पर निर्भर है। इस उक्ति का विश्लेषण करने पर स्पष्ट होता है यहाँ प्रभुत्व की धारणा भ्रमात्मक है। यदि कोई ऐसी चीज है तो दोनों में है अन्यथा किसी में नहीं। उदाहरणार्थ विभिन्न वैज्ञानिक सिद्धान्तों के नाम के साथ उनके अन्वेषकों का नाम जुड़ा है जैसे आइन्स्टीन का सापेक्षिकता का सिद्धान्त, हाइजन वर्ग का अनिश्चितता का सिद्धान्त। विज्ञान जगत में यह बात सर्वमान्य है कि अन्वेषक को ही अन्वेषिक सिद्धान्त के नामकरण का अधिकार होता है साथ ही उसका नाम भी उसके साथ जुड़ा रहता है। ठीक उसी तरह वैदिक मन्त्रों या सिद्धान्तों के साथ उसके अन्वेषकों का नाम जुड़ा हुआ है। जैसे गायत्री मन्त्र के साथ विश्वामित्र। इसे ही यदि प्रमुख मान लिया जाय तो दोनों में वह समान ही है।
विज्ञान जगत में सारे निर्णय तब तक अस्थाई माने जाते हैं जबतक कि उन्हें बार-बार सत्यापित न किया जा सके। जबकि अध्यात्म संकीर्ण सैद्धांतिक है। उसका अपनी सदियों, पुरानी धाती लिखे गए शास्त्रों पर अधिक आग्रह है। विरोध का यह बिन्दु भी आभास मात्र है। आत्मिकी के क्षेत्र में भी सत्यापित करने की परम्परा चली आई है। उपनिषदों का अध्ययन करने से यह बात स्पष्ट हो जाती है वामदेव, उद्दालक आदि के विविध प्रयत्न इसी का प्रमाण हैं। आज भी उन सिद्धान्तों को प्रामाणिकता की कसौटी पर कसने में कोई व्यवधान नहीं है। समय समय पर इसमें संशोधन भी हुए हैं। विभिन्न स्मृतियाँ दर्शन वेदों से लेकर आज तक के प्रयत्नों का समूचा विवरण इसका प्रमाण है। इस बिन्दु में एक महत्वपूर्ण तथ्य प्रयोग शाला का भी है। किन्तु यह प्रयोगशाला कोई इमारत में ही हो, यह आवश्यक नहीं है। उदाहरणार्थ समाज विज्ञान के अध्ययन के लिए हमें सम्बन्धित परिपेक्ष में अध्ययन करना होगा। गणित विज्ञान के अध्ययन हेतु किन्हीं उपकरणों की आवश्यकता नहीं क्योंकि इसकी खोज का विषय तथ्य नहीं, सम्बन्ध है। किन्तु आधुनिकतम मान्यताओं के अनुरूप ये सभी विज्ञान की शाखाएं हैं। ठीक इसी तरह अध्यात्म की अपनी प्रयोगशाला रही है, मानवी कायसत्ता तथा मनुष्य द्वारा जिया गया जीवन।
विरोध का एक महत्वपूर्ण बिन्दु और है कि विज्ञान के सिद्धान्त में समष्टिगत तत्व प्रधान है इसमें किसी भी तरह देश, काल, परिस्थिति की सीमा का बन्धन नहीं है जबकि धर्म में वे तत्व नहीं है। विरोध की यह मान्यता भी प्रतीती भर है। धर्म का वैश्व सिद्धान्त है ईश्वर सम्बन्धी मान्यता। विश्व के सभी धर्म विविध नामों से इसे सत्यापित करते हैं। “एकं सदविप्रा बहुना बदन्ति “ ईश्वर चेतना की एक अवस्था है जिसे नास्तिक कहे जाने वाले बौद्धों ने निर्वाण और जैनियों ने कैवल्य के नाम से बताया है। अतएव इसकी सार्वभौमिकता के बारे में भी कोई सन्देह नहीं है।
जिस तरह वैज्ञानिक सिद्धान्तों में तार्किक संगति पायी जाती है ठीक उसी तरह धर्म दर्शन भी तार्किक दृष्टिकोण से व्यवस्थित होता है। लियोन ब्रुलिन की “साइन्टिफिक इनसर्टेनिटी एण्ड इन्कारनेशन” में मान्यता है कि वैज्ञानिक सिद्धान्त वैज्ञानिक प्रयोगों पर आधारित होते हैं। वैज्ञानिक इन प्रयोगों तथा तथ्यों के बीच तार्किक सम्बन्ध प्रकट करता है और उसके उपरान्त सिद्धान्त की रचना करता है। यह तथ्य धर्म अध्यात्म के क्षेत्र में भी उतना ही खरा है। एस. एम. दास गुप्ता ने अपनी कृति “योग ऐज ए फिलॉसफी एण्ड रिलीजन” में इस तत्व को अधिक स्पष्ट किया है। योग में प्रयोग की विधि तथा तथ्यों के मध्य सम्बन्ध स्थापित करते हुए सामान्यीकरण के आधार पर सिद्धान्त की रचना की गई है।
वास्तविकता यही है कि धर्म एवं विज्ञान में कोई मौलिक भेद नहीं है। नामो में विभेद होते हुए भी उद्देश्यतः दोनों एक ही हैं। डॉ. दीवानचन्द अपनी कृति “तत्वज्ञान” में इसे स्पष्ट करते हुए बताते हैं। धर्म एक ऐसा महाराजा है, जिसे राजसिंहासन से उतार दिया गया है। सिद्धान्त के सम्बन्ध में एक समय तथा जब हर प्रकार के उच्च विचार दार्शनिक विचार समझे जाते थे, गणित का नक्षत्र विज्ञान, विज्ञान आदि स्वतंत्र विधाएँ न थीं। स्थिति बदली और अपदस्थ महाराजा की संतान ने बगावत कर दी। उन्होंने अपनी स्वतंत्रता की घोषणा कर दी। पारस्परिक समन्वय से विनिर्मित उस समग्रता से विलग हो जाने के कारण ही विज्ञान एकाँगी हो रहा है। इसी कारण इसकी व्यावहारिक परिणति बताते हुए स्वामी रंगनाथानन्द का “इटरनल वेल्यू चेन्जिंग सोसाइटी” में कहना है वर्तमान विश्व को विज्ञान की वास्तुकला से गढ़ा गया है। इस प्रकार की वास्तुकारी के कारण ही आज यान्त्रिक सभ्यता है। एक ऐसी सभ्यता जिसमें साधनों की भरमार होते हुए भी व्यक्ति प्रसन्न नहीं है।
प्रसन्नता के इस अभाव का मूल कारण यह है कि धर्म के दो तत्वों में अभ्युदय को तो याद रखा गया और निःश्रेयस को तिरस्कृत कर दिया। जबकि दोनों युग्मज है। श्री अरविन्द इसे स्पष्ट करते हुए बताते हैं कि विश्व मानवता तभी यथार्थ रूप से विकसित हो सकती है जबकि वह “सोशियो साइकिक “ अर्थात् सामाजिक और चेतनात्मक दोनों ही पक्षों में एक साथ प्रगति करे।
इस प्रकार की प्रगति का आधार सामंजस्य की उस अवस्था में है,जिसमें वर्तमान विज्ञान अध्यात्म के एक अभिन्न अंग के रूप में विकसित होगा। फिर इस सार्वभौमिक धर्म को विश्व धर्म कहा जाय या मानव धर्म। किन्तु धर्म का यह सच्चा व सार्वभौमिक रूप तभी प्रकट हो सकेगा, जब अवैज्ञानिक लोक मान्यताओं, प्रथा, प्रचलनों की परत को उससे अलग कर दिया जाय। इस प्रक्रिया के लिए आवश्यक है धर्म के तत्वों का, आध्यात्मिक अनुशासनों का एक बार पुनः जीवन विद्या के रूप में सुव्यवस्थित रूप से प्रायोगिक परीक्षणात्मक अध्ययन हो। इस तरह के क्रम से सत्यता की कसौटी पर कसे गए सूत्र सिद्धान्त अपनी गरिमा प्रकट कर मानव में देवत्त्व की अभिव्यक्ति करा अपनी सार्थकता व्यक्त कर सकेंगे। इस भाँति ही मनु के शब्दों में “धारणामि इत्याहु धर्मः” अर्थात् धर्म मानवता को सही माने में धारण कर सकने का अपना सामर्थ्य अभिव्यक्त कर सकेगा। तब आत्मिकी का अर्थ होगा ज्ञान और विज्ञान की दोनों धाराओं को साथ ले कर चलने वाली विधा। यह सर्वांगपूर्ण प्रगति का पथ प्रशस्त करेगी, मानव जाति को ऊंचा उठने संबंधी अभिनव मार्गदर्शन देगी, इसमें कोई सन्देह नहीं किया जाना चाहिए। ऐसे प्रयास अब विश्व मनीषा में व्यापक स्तर पर चल पड़े हैं। अतः भविष्य टकराव का नहीं, मान्यताओं के एकीकरण का, समन्वय का है, निश्चित ही उज्ज्वल है, ऐसा आभास होने लगा है।
एक कुत्ता बड़ी तेजी से दौड़ा जा रहा था। किसी ने उससे पूछा कहाँ जा रहे हो? गन्तव्य तक कितनी देर में पहुँचेंगे।
कुत्ते ने कहा जाना तो गंगा स्नान के लिए है और उसकी दूरी भी कुछ ही घंटों में पूरी हो सकती है। पर दुर्भाग्य इतना ही है कि गाँव-गाँव बिरादरी वाले लोग मिलते हैं और वे जी तोड़ कर आगे न बढ़ने देने का जी तोड़ विग्रह खड़ा करते हैं।
खण्डहर ढहाने-गिराने वाले मजदूरों के बाद उन महाशिल्पियों की ढूँढ़ खोज शुरू होती है, जो नई भव्यता मूर्त कर सकें। मजदूरों का काम सरल है। इसमें न किसी तकनीक की जरूरत है और न योग्यता की तलाश। बनाने वालों के बारे में यह बात नहीं। उनकी कुशल-कारीगरी जाँचे-परखे बगैर निर्माण परिसर में घुसने तक की इजाजत नहीं मिलती। तोड़ने का क्या? कौन मन चला कब तोड़-फोड़ मचाने लग जाय। समाज और सामाजिकता का खण्डहर आज अपने ध्वंस के अन्तिम क्षणों में है। ध्वंस के अन्तिम क्षणों का मतलब है-निर्माण के आरम्भिक क्षण। जिसमें नई भव्यता की कारीगरी शुरू होनी है। ऐसे में उन शिल्पकारों की तलाश स्वभावतः अनिवार्य हो जाती है, जो इस नए निर्माण की मजबूत नींव चिनने के साथ चमचमाते कँगूरों को सँवारें।
भवितव्यता की इस उज्ज्वल भव्यता के इन वास्तुकारों का लोक प्रचलित नाम है, ‘शिक्षक’। इस शब्द ने अब तक अनेकों भावों को उभारा और समेटा अथवा यों कहा जाय-कि इसमें अपनी-अपनी मर्जी के मुताबिक अर्थों-भावों का आरोपण-प्रतिरोपण हुआ। इस आरोपण के घने आवरण में ढके मूल उत्सडडडडड को कहाँ तक समझा अपनाया गया इसमें सन्देह है, सन्देह की पुष्टि करते हुए अध्येता पाल गुडमैन ने एक किताब लिखी है “ग्रोइंग अप एब्सर्ड।” इसमें उनने कहा है कि मनुष्य जाति ने जिन-जिन सुविधाओं की आकाँक्षा की थी, वे सब पूरी हो गई। मनुष्य जाति ने जो-जो सपने देखे थे, वे भी लगभग पूरे हो चुके हैं। इतने पर भी आज जैसी दारुण व्यथा कभी नहीं रही। इसकी तीव्रता में कमी की जगह दिन दूनी रात चौगुनी बढ़ोत्तरी होती जा रही है। कारण में गुडमैन का मानना है-सुविधाओं के अम्बार में मनुष्यता के शिक्षक दब गए, मनुष्य जाति की दुःख संहारक सेना समाप्त हो गई। शिक्षकों की भारी भरकम तादाद देखते हुए सम्भव है गुडमैन का कथन अविश्वसनीय लगे। किन्तु विचारों की शल्यक्रिया से तथ्य स्वयमेव उभर कर सामने आ जाता है।
यूरोपियन रहस्यवादी मेस्टर एकहार्ट कहते हैं शिक्षक वह व्यक्ति है, जिसने जीवन सिद्धान्तों का विचार और व्यवहार में एकात्म स्थापित किया। विचारों की व्यवहारिक अनुभूति के साथ उसके लिए जरूरी है बौद्धिक और भावात्मक संप्रेषण शैली। इनके बिना शिक्षण की सम्भावना नहीं। बौद्धिक भावात्मक दो आदितम मानवी भाषाएँ हैं, जिन्हें मानव ने अपने अस्तित्व के उद्गम से अपनाया है और चिर अनन्त तक अपनाता रहेगा। अतएव आवश्यक है सीखने वाला द्विभाषाविद् हों। पर भाषा जानने भर से तो काम नहीं चलता जब तक अनुभूति का प्राण न हो। जहाँ ये प्राण नहीं वहाँ शिक्षण नहीं। तब फिर आज की जमात? चौंकाने वाले इस सवाल का जवाब सहज है। ये उदरपूर्ति के लिए नौकरी करने वाले श्रमिक हैं, जिनकी निष्ठ शिक्षण में नहीं सुखोपभोग पर टिकी है। किसी कारणवश यदि कोई ऐसा अवसर आ टपके जहाँ साधन सुविधाएँ ज्यादा है, तो ये यहाँ से वहाँ चले जाएँगे।
मननीय तथ्य है कि शिक्षक कोई पद नहीं यह विकसित व्यक्तित्व की विशेष अवस्था है। इन्हीं विशिष्ट व्यक्तित्वों ने मानव की अनगढ़ भीड़ को समाज का स्वरूप दिया। भीड़-झुण्ड को समाज नहीं कहा जा सकता। इसका अपना विशिष्ट स्वरूप है। जिसके साथ शिक्षक के अंतर्संबंध गहनता से जुड़े हैं। इन्हें दोनों के स्वरूप से सुपरिचित हुए बिना नहीं पहचाना जा सकता। व्यक्ति की तरह शरीर का हर कोष अपने में स्वतंत्र सत्ता है। श्वसन से लेकर उत्सर्जन तक सारी क्रियाएँ उनमें होती हैं। इतने पर भी अकेले कोष अथवा कोषों की भीड़ को शरीर नहीं कहा जा सकता है। समान रचना व उद्देश्य वाले ये कोष ऊतक बनाते हैं। ऊतक इसी सिद्धान्त को स्वीकार कर अपने को अंग में बदलते हैं। अंगों की उद्देश्य समता शरीर का निर्माण करती है। इस बृहदाकार निर्माण के हर कदम पर समता का आलोक है जिसके बगैर मंजिल नहीं। व्यक्ति की भी समता के कई सोपानों से गुजर कर समाज का ढाँचा गढ़ा गया है। समाज (सम-ज) शब्द अपने में इसी अर्थ और भाव को छुपाए है। समता से जिसका जन्म हुआ वह समाज। जिसने समता से जन्म लेकर एकता पाई है उसका महान उद्देश्य भी समता और एकता है।
उत्कृष्टता के उत्कर्ष की विभूतियाँ ही नहीं स्वीकार हो गई। “संगच्छध्वं -संवदध्वं संवो मनाँसि” के प्रबलतम पुरुषार्थ के बाद ही सम्भव हो सका। संज्ञान सूक्त के इन मन्त्रों को ऋषि स्पष्ट करता है “समानो मंत्रः समितिः समानी “ तब बन पड़े जब “समानंमनः सहचित्त मेषाम” की कला साधी गई। शिक्षक भी थे वे प्रबल पुरुषार्थी जिन्होंने मोटे-महीन, छोटे लम्बे सब तरह के धागों को मिलाकर अम्बर जैसी चादर बुन डाली। अन्यथा मानव भेड़-बकरियों के झुण्ड से अधिक न होता।
विचारक वह स्तर है जहाँ विचारों का शोध होता है, समस्या के समाधान उपजते हैं। इस शोध को भली प्रकार समझ, स्वानुभव के आधार पर जो दोनों भाषाओं को अनेकों में समझा सके। सिद्धान्त और व्यवहार दोनों में समर्थ हो वह शिक्षक। जिसने अनुभूति का व्यवहार में क्रियान्वयन किया वह है लोकसेवी। मोटे तौर पर इन्हें डिजाइनर,इंजीनियर और मजदूर की भाँति समझा जा सकता है। इंजीनियर आवश्यक नहीं डिजाइनर हो पर उसे डिजाइन को समझना जरूरी है अन्यथा मजदूर को कौन समझाएगा? उसे मजदूर को समझाने के लिए मजदूर भी बनना पड़ता है। आवश्यक हो जाता है उसे डिजाइन और मजदूर दोनों की भाषाओं का ज्ञान। इसी तरह शिक्षक के लिए जरूरी नहीं वह विचारक हो किन्तु उसे विचारों को समझने वाला जरूर होना चाहिए। साथ ही वह क्षमता जिससे लोकसेवी तैयार कर सके।
आज जो समस्याओं की हुँकार-मानवीयता का करुण रव सुनाई पड़ रहा है-उसके पीछे सत्य इसी अनूठी कड़ी का टूटना है। जब मन ही समान और एक नहीं तब साथ-साथ कदम बढ़े तो कैसे? ऐसी दशा में घर के आँगन, देश के प्राँगण और वसुधाव्यापी प्रसार में विभाजन की रेखाएँ बँटवारे की दीवारें न खिंचेंगी तो और क्या होगा? नृतत्वशास्त्र के आख्यान बताते हैं कि मानव को अपनी उत्पत्ति के साथ यह दुःख भोगना पड़ा। उसमें और आज के मानव में अन्तर इतना भर है कि आज वह अलग हो रहा है, पहले परिस्थितियों के कारण अलग था। अलगाव और अकेलेपन की पीड़ा बड़ी मर्मान्तक है। इससे उबरने के लिए झुण्ड पनपे जो समूह में बदले। इनका रूपांतरण परिवारों में हुआ और इन परिवारों की जुड़ती कड़ियों ने समाज बनाया।
सिस्टर निवेदिता के चिन्तनकोष “द बेस ऑफ इण्डियन लाइफ” के अनुसार निर्माण के प्रारम्भिक दौर में विचारक, शिक्षक, लोकसेवी यहाँ तक कि व्यवस्थापक, प्रशासक तक के सारे दायित्व एक को ही निभाने पड़े। ए. जोली. अपने शोध निबन्ध “द ओरिजन ऑफ सोसाइटी” में इसी मत का समर्थन करते हैं। मेसोपोटामिया, सुमेर, मिश्र आदि प्रागैतिहासिक समाजों का हवाला देते हुए उनका कहना है कि मनुष्यता के उदय के साथ शिक्षक का उदय हुआ जो अपने समूह में सर्वोपरि था। उसी के मार्गदर्शन में समाज का ढाँचा बना गढ़ा। भारत के आदि शिक्षक प्रशासक विचारक मनु महाराज थे। फैलाव के साथ तन्तुओं में उलझन बढ़ी। निपटने के लिए दो विभाग हुए। एक ने विचार और शिक्षण सम्भाला-दूसरे ने व्यवस्था और लोक सेवा। लेकिन विस्तार की जटिलता कहीं मिले मन को तोड़ न दे। नए मन जो मिल रहे हैं, वह एकात्मता के भाव को सही ढंग से सीख सकें जीवन सही ढंग से चल सकें। इस भाव के कारण पुनः कार्य बँटा, विचारक और शिक्षक अलग-अलग हुए। विचारों की शोध और लोकसेवियों का निर्माण एकाकी सामर्थ्य में न रहा। फिर भी ऐसा नहीं कि विचारक ने शिक्षण समाप्त कर दिया। शिक्षण तो उसने किया पर लोक शिक्षणों का। विचारक व्यास द्वारा सूत शौनक जैमिनि जैसे अनेकों लोक शिक्षकों का निर्माण, वैशम्पायन द्वारा याज्ञवलक्य की गढ़ाई, जिन्होंने लोक सेवी जनकों की परम्परा चला दी। सनत्कुमार ने नारद के लोक शिक्षण को जन्म दिया जिससे अगणित लोकसेवी उपज पड़े, आदि अनेकों उदाहरण हैं। प्रशिक्षित लोक शिक्षकों द्वारा गढ़े गए लोकसेवियों ने व्यवस्था और प्रशासन सँभाला। तंत्र इतना मजबूत बन गया कि विशालता और जटिलता की खींचतान के बावजूद समाज रूपी चादर फटी नहीं बल्कि बढ़ी-चढ़ी। विशालता को ढ़कने के लिए विशालतर-विशालतम होती चली गई।
लोक शिक्षक ने जो गरिमापूर्ण दायित्व सँभाला उसे निभाना सहज न था। सिद्धान्तों की फूट-दुरूह भाषा को व्यवहार में भावगम्य बनाना। विचारकों की दार्शनिक शैली को-लोक जीवन में उतारना। साथ ही प्रभाविकता अपनी इस चरम प्रखरता तक बनी रहे-ताकि लोक जीवन सागर का मन्थन अगणित लोकसेवी रत्नों को उड़ेलता-उमगाता रहे। यही समस्या शिक्षण शैलियों का उद्गम बिन्दु बनी। कथा शैली और प्रवचन, ब्राह्मण और साधु का विकास यहीं हुआ। लोक शिक्षकों के कर्तृत्व के दोनों रूप आज हमें पौराणिक संकलन और उपनिषदों के रूप में दिखाई देते हैं।
वैदिक भारत के अलावा परवर्ती काल में तथा अन्य देशों में लोक शिक्षक और लोक शिक्षण का यही स्वरूप दिखाई पड़ता है। बौद्धों में जहाँ एक ओर जातक कथाएँ है वहीं दूसरी ओर शून्यवाद की जटिल मीमाँसा। जैन कथाओं और स्याद् वाद की जवचारणा इसी का रूप है। ईसा का वचनामृत कहानियों से भरापूरा है-बाद के समय में दार्शनिकता की भरमार कम नहीं मिलती। ताओ-शिन्तों, किन्हीं भी मतों और किन्हीं भी क्षेत्रों में दृष्टिपात करें लोकशिक्षण का वैदिक ढांचा थोड़े बहुत बदले रूप में नजर आता है।
आर्यभूमि की जो संस्कृति अपने यौवन में विश्वभर में प्रचलित प्रतिष्ठित हुई। उसका निर्माण यों ही नहीं हो गया। निर्माण के दौर में किन-किन पेचीदा-उलझनों से गुजरना पड़ा। इसे सुलझाने में श्रम सीकारों की जो मन्दाकिनी बही उसे देखकर आश्चर्यभूत होना पड़ता है। रक्तवाही नलिकाओं की तरह फैलाई गई साँस्कृतिक ऊर्जा के संवहन तंत्र में शिक्षक ने ही हृदय की भूमिका निभाई है। विचारक ने भले मस्तिष्क की तरह संकेत दिए हों पर लोक जीवन की आपदा-व्यथा की धड़कने उसी का जीवन की रहा है। कहीं कोई जीवन अंग प्राण संचार के अभाव में सूख तो नहीं रहा। लोक सेवा रूपी श्वेत रक्त कण क्षय तो नहीं हो रहे। किस की कब और कैसे साज-सँभाल करना है इसी व्याकुलता को अपना अस्तित्व मान-शिक्षक ने जीवन जिया।
बात अकेले भारत की नहीं जहाँ भी संस्कृतियाँ पनपी सभ्यताएँ मुखर हुई हैं। उनको प्राण इन्हीं से प्राप्त हुए हैं। अरब सभ्यता इब्नेसिना अलबरूनी जैसे अनेकों की रचना कुशलता झिलमिलाहटें नजर आती हैं। यूनान को उत्कर्ष के तंगशिखर पर प्रतिष्ठित करने में सुकरात, प्लेटो, जेनो, एपीक्यूरस की पीढ़ियाँ रही हैं। अरस्तू के बिना हम सिकंदर के अस्तित्व की कल्पना नहीं कर सकते। अरस्तू उसका शिक्षक था, शिक्षक का महत्व उसे पता था तभी तो उसने कहा “तुम भारत जा रहे हो वहाँ से यदि ला सको तो शिक्षक लाना।” सोना-चाँदी-जवाहरात नहीं शिक्षक की माँग। रोम की जिस महान सभ्यता का गुणगान अंग्रेजी और लैटिन के काव्यों में पढ़ते हैं वह सिसरो जैसे न जाने कितनों के श्रम ने बनाई-अकेला सीजर बेचारा क्या करता यदि सुगढ़ जनमानस विनिर्मित न होता। इटली की आस्था दाँते ने विनिर्मित की। ईसाइयत का जो उत्कर्ष हम देखते हैं उसकी जड़ों में आगस्टिन, अन्थोनी, एकहार्ट जैसे न जाने कितनों का प्राण है।
यह प्राण जहाँ-तहाँ सूखता गया वहीं की संस्कृतियाँ नष्ट होती चली गई, लोक जीवन मुरझाता चला गया। “डैन्जरस सी” नामक विश्व प्रसिद्ध ग्रन्थ में इसका ब्योरेवार खुलासा है। भारत के लोक शिक्षण तन्त्र में महाभारत काल से विकृति आनी शुरू हुई थी। चाणक्य, बुद्ध, शंकर, रामानुज इसमें तन्तु जाल का नवीनीकरण करने की अगाध चेष्टा में लगे रहे। चाणक्य की तो इतनी निष्ठ थी कि वृहत् भारत के प्रधानमंत्री का पद पूर्व मंत्री राक्षस को सौंपकर लोकशिक्षण का तन्त्र गठित करने में जुट गया।
इन प्रयासों के बावजूद लोक शिक्षकों की व्यापक सेना तो नहीं तैयार हो पाई,किन्तु प्रयत्न ऊर्जा ने महान परम्परा को जीवित अवश्य रखा। इसी का प्रभाव है कि जिस ऋषि संस्कृति की विरासत का दावा हम करते हैं उसकी श्वास-प्रश्वास चल रही है।
समय का बहाव मनुष्य को चेतन-अचेतन, अर्धचेतन रूप में यहाँ तक बहा लाया है। इस समय जो कुछ हो रहा है उससे सभी अवाक् हैं। जो सचेतन हैं, वे महाकाल द्वारा किए जा रहे समय सागर के प्रबल मंथन को देख रहे हैं। अब, जबकि समय झकझोर-झकझोर कर उठा रहा है, लगातार “तस्मात् युद्धस्व भारत” के स्वर उठ रहे हैं। मंथन की प्रचण्ड उर्मियों से एक ओर जहाँ भीषण रव मचा है तीव्र हलचलें उठ रही हैं, वहीं दूसरी ओर एक पर एक मानव रत्न छिटक-छिटक कर उभरते और महाकाल के कण्ठहार की मणियों में स्थान पाते जा रहे हैं। यही जगमगाता परिकर लोकशिक्षकों के विशाल तन्त्र में गठित होगा। इन महाशिल्पियों की कुशल कला पुनः समाज, सामाजिकता, जीवन मूल्यों की नवीन वसुधा व्यापी भव्यता का निर्माण करेगी। इन युग निर्माताओं में हमारा अपना भी स्थान हो, इसे सोचने और आ मिलने के क्षण अभी हैं।
“दुग्धोवा कहाँ है?” सुबह नाश्ता करते समय छोटी बेटी को न देखकर पिता ने सामान्य भाव से पूछा।
“दुग्धोवा! अरी दुग्धोवा! कहाँ है तू?-’ माँ ने वही से पुकारा। कहीं से कोई उत्तर न पाकर स्वयं उठी। इधर-उधर कही न देख उनके माथे की लकीरें गहरी हुई। कहीं आज फिर तो नहीं...। अपने भारी भरकम शरीर को सम्भालते हुए वे उसी कमरे की ओर लौटीं और दूर से ही बोली “लगता है आज फिर उसी जादूगरनी के यहाँ चली गई और चढ़ाओ उसे सिर पर।”
कहाँ गई? वह ऐसे चौंक कर उठे जैसे बिच्छू ने डंक मार दिया हो।
“वह तो कब की पहुँच गई होगी।” उनके बड़े बेटे ने शिथिल स्वर में कहा।
“हे भगवान!” गृहस्वामी ने दोनों हाथों से अपना सिर थाम लिया।
अब क्या होगा। पत्नी की आंखें स्थिर हो गई। वे पति के कन्धे पर हाथ रखकर खड़ी हो गई।
अभी कल ही उनकी लड़की उस जादूगरनी के यहाँ गई थी। कितने रुष्ट हुए थे, उपासना घर के प्रधान पुजारी। किन्तु कल की बात और थी। ‘किप्पूर’ का दिन साल में रोज-रोज तो आता नहीं। आज जब लोगों को यह खबर मिलेगी तब समाज की सारी परम्पराएँ एक साथ उनके छोटे से परिवार पर टूट पड़ेंगी। माँगियो के प्रधान देवता क्रोध पता नहीं कौन सी विपत्ति ढहाए।
ग्यारह साल की गोल मुख सुनहरे बाल,भूरी भोली आँखों वाली गोलमटोल गुड़िया जैसी चंचल बालिका दुग्धोवा। अभी उसे इतनी समझ कहाँ है। कल भी वह चली गई थी इसी तरह चली गई थी। बिना किसी से कुछ कहे सुने।
“बेचारी बुढ़िया बीमार है। उससे उठा बैठा नहीं जाता है, उसे कोई पानी देने वाला भी नहीं।” कल सीधे उपासना घर में बाहर से दौड़ी-दौड़ी दुग्धोवा आयी। प्रमुख पर्व की वजह से भीड़ भी ज्यादा थी। लेकिन वह सभी के बीच से गुजरते प्रधान पुजारी का लबादा थामकर कहने लगी “मैंने उसके लिए ‘आहुर मज्द’ से प्रार्थना की है। आप भी उसके लिए प्रार्थना करें।”
‘तू किस की बात कर रही है?’ प्रधान माँगी ने स्नेहपूर्वक उसका गाल थपथपा कर पूछा।
“वह जो अपनी बस्ती के बाहर थूहरो के घेरे में सफेद बालों वाली बुढ़िया रहती है” दुग्धोवा बाल सुलभ सरलता से बोली। “वही जिसने जानवरों की भीड़ जुटा रखी है, पोपले मुख वाली बुढ़िया” “दुराशषो!” प्रधान पुजारी चौंक कर दो कदम पीछे हट गए “तूने मुझे भी छूकर अपवित्र कर दिया।”
“यह बच्ची है। मैं क्षमा चाहता हूँ इसकी ओर से” उसके पिता सहमते हुए पुजारी के सामने आए। पुत्री को खींच कर पीछे कर दिया था उन्होंने।
“अच्छी बात है।” माँगियो के प्रधान के मुख पर रोष की रेखाएँ अभी भी थीं। किप्पुर तो अपराध क्षमा दान का पर्व है। इस दिन यदि मनुष्य के अपराध मनुष्य नहीं क्षमा करेगा तो ‘आहुरमज्द’ से स्वयं के अपराध की क्षमा पाने की आशा कैसे रखें। इस दिन क्षमा दान पुजारी की विवशता थी।
बेचारी जादूगरनी कौन करता उसके लिए क्षमा याचना? एट्रोपाटेन की समूची बस्ती में उसके बारे में तरह-तरह की अफवाहें फैली थीं। उसने शेर -चीते, रीछ, सर्प पता नहीं क्या क्या पाल रखे हैं। सुना तो यह भी जाता है कि शैतान भी उसके काबू में है। उसे अपनी झोपड़ी के साथ कब का जला दिया गया होता, किन्तु किसी का साहस उधर जाने का नहीं है। आखिर वह जादूगरनी जो ठहरी पता नहीं क्या कर दे? लेकिन सच्चाई यही है कि बस्ती के इतने निकट रहने पर भी कोई उसके सम्बन्ध में ठीक नहीं जानता। ऐसे भयावह स्थान पर दुग्धोवा कैसे चली गई। पर कल तो किप्पुर था, आज...।
“दुग्धोवा को नगर से बाहर अकेले निकाल देना होगा।” प्रधान पुजारी ने उस दिन सायं प्रार्थना के बाद सभी की उपस्थिति में अपना निर्णय सुना दिया। माँगियो के प्रधान विवश थे, परम्पराओं के सामने। फूल सी कोमल बालिका को दूर जंगल में अकेले छोड़ आने का दण्ड। ऐसी भी क्या विवशता? किन्तु मूढ़ताओं के घेरे में विवेक को स्थान कहाँ? जब विवेक नहीं तब संवेदना का रक्षण कौन करे? कौन उत्तर दे,सभी मौन थे। कुरीतियों के सामने किस की मजाल जो बोल जाय।
चित्र-विचित्र परम्पराएँ थीं उनकी बस्ती में उन्हीं असंख्यों में एक यह भी थी कि जो महिला खुल कर बोले, पुरुषों के सामने अपनी प्रतिभा को विकसित करना चाहे उसे डायन करार कर दो, जादूगरनी कह दो। फिर तो उसकी एक ही सजा है, सामाजिक बहिष्कार जो उसका साथ देना चाहे, उसकी भी यही गति। पुजारी के निर्णय का प्रतिवाद-अपने-आप में सबसे बड़ा अपराध है। सभी सन्न थे। दुग्धोवा के माता-पिता? उनकी कौन कहे उपस्थित सभी जनों की आँखें भरी थीं। परंपराओं की जकड़न में मानवता कसमसा रही थी।
तभी एक गड़रिया दौड़ता-हाँफता भीड़ में घुसा चला आया। नंगे पैर, फटे मैले कपड़े, तिनकों और धूलि से भरे सिर तथा दाढ़ी के केश। शरीर और वस्त्र दोनों से भेड़ों से निकलने वाली गन्ध आ रही थी। किन्तु उसका ध्यान न तो अपनी ओर था और न उस भेड़ की ओर जो वहाँ जमा थी। सीधा प्रधान पुजारी के पास जाकर उसके चोगे का छोर चूमते हुए बोला “सबाटान पहाड़ का तपस्वी पर जिन कुरुस उतर आया है। वह इधर ही आ रहा है। जैसे ही मैंने देखा आपको सूचित करने भागा आ रहा हूँ।”
“सबाटान के तपस्वी आ रहे हैं बस्ती की ओर!” वहाँ जमा लोगों में कानाफूसी होने लगी। बड़ी उत्साहवर्धक खबर थी। इतने बड़े तपस्वी की चर्चा होने लगी। दुग्धोवा का निर्णय शाम तक के लिए स्थगित होगा।
“ये तपस्वी कहाँ जा रहे हैं?” नगर से बाहर पर्याप्त दूर जाकर स्वागत करने गए बस्ती वासियों को इस बात का आश्चर्य नहीं हुआ कि सालों से मौन इस तपस्वी के स्वागत समारोह की ओर उसने स्वयं ने आँख उठाकर भी नहीं देखा। वे सब तो तब चौंके, जब तपस्वी बुढ़िया जादूगरनी के थूहरों वाले घेरे की ओर मुड़ा।
थूहरों के घेरे के बाहर सभी के पाँव ठिठक गए। एक अज्ञात भय से रोमाँच हो आया-पता नहीं क्या है भीतर? सिर्फ दो एक लोगों ने तपस्वी के साथ अन्दर जाने का साहस किया। प्रधान पुजारी भी उनमें से एक था। ये साथ जाने वाले अन्दर जाकर हतप्रभ रह गए यहाँ तो कोई ऐसी-वैसी बात नहीं। दो बकरे, एक कुत्ता, तीन गधे बस, ऐसे ही एक दो छोटे-छोटे पशु और। अन्दर की जमीन में साधारण साग-भाजी की क्यारियाँ थीं। कहीं भी तो नहीं था कुछ जादू-टोने जैसा उसने तो न जाने क्या-क्या देखने की आशा लगा रखी थी,पर यहाँ तो कुछ भी नहीं। लेकिन वह तो पिछले पचास सालों से न जाने क्या-क्या सुनता आया है? तब तो वह पुजारी भी नहीं था। तो क्या वे सब बातें झूठी थीं। यहाँ तो दो चार बर्तन, एक घड़ा और एक चूल्हा भर दिखा। मूढ़मान्यताओं का आधार कहाँ?
तपस्वी बालिका दुग्धोवा के चरणों पर झुक गया। बेचारी दुग्धोवा सहम कर उठ खड़ी हुई। सभी चकित थे। वह बहुत सालों बाद आज बोल रहा था “मुझे अकस्मात ‘आहुरमज्द’ की वाणी सुनाई पड़ी। उस वाणी ने मुझे आदेश दिया कि मैं प्रेम की देवी दुग्धोवा का दर्शन करूं। उस महिमामय मूर्ति का दर्शन जिसकी गोद में खेलने के लिए स्वयं आहुर मज्द लालायित हो उठे हैं। वे स्वयं अपने एक अंश से शीघ्र आने वाले हैं। नव धर्म की संस्थापना के लिए जो नए युग का धर्म होगा।”
तपस्वी एक पल के लिए पीछे खड़ी भीड़ की ओर मुड़े बिना, किसी व्यक्ति विशेष की ओर देखे बिना बोलने लगा “मूर्खों! समय विशेष की आवश्यकताओं के अनुरूप बनाए गए नियम-नीति होते हैं। तुम जैसों का विवेकहीन अनुसरण इन्हें परम्परा के रूप में बदलता है। जब ये परम्पराएँ प्रगति के बढ़ते कदमों पर कुल्हाड़े बरसाने लगती हैं, तब ये कुरीति बन जाती हैं। इन कुरीतियों को सर्प हार की तरह लपेटे फिरना-मोह है यही मूढ़ मान्यता है”।
सभी चुप थे “अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है अभी सम्भल जाओ स्वागत करो नए अवतार का। नए युग की नई नीतियाँ रचो, स्वीकारो नयी संहिता, बनाओ नए संविधान, जो तुम्हें अंधकार से प्रकाश की ओर ले जा सके। तुम ज्योति पुत्र कहा सको।” इतना कह कर तपस्वी वापस लौट गए जंगल में।
यही बालिका दुग्धोवा-महात्मा जरस्थुस्त्र की माँ बनी। प्रेम की देवी की गोद में आए इस अवतार ने पारसी धर्म के रूप में यही संदेश दिया कि “मानव प्रेम अमर है जो परम्परा इसके आड़े आए, तत्काल उसे अस्वीकार कर दो।”
मनीषियों के जीवन जीने की कला को धर्म का नाम दिया है। ऐसी कला जिसको सीखकर जीवन की सारी विकृतियों, कुरूपताओं का निवारण कर इसे सर्वांग सुन्दर और सुरुचिपूर्ण बनाया जा सकता है।
इसके स्वरूप को और अधिक स्पष्ट करते हुए मैथ्यू अर्नाल्ड ने इसे ‘भावनामय नैतिकता’ का नाम दिया है। उनके द्वारा दिया गया यह नाम निश्चित रूप से उचित लग सकता है। अकेली नैतिकता तब तक अधूरी है जब तक इसमें भावनाओं का संयोग न हो। इसके बिना यह कठोर नियन्त्रण बन कर रह जाती है।
मानव जीवन को श्रेष्ठ व उन्नत बनाने के लिए प्रारम्भिक समय से लेकर आज तक लगातार प्रयत्न होते रहे हैं। समय-समय पर विभिन्न मूल्यों एवं मर्यादाओं की रचना की गई है। इन्हें मान्यता भी मिली है, पर इनको वही ठीक ठीक अपना सके हैं, जिन्होंने भावनाओं को उभारने में सफलता पायी है। बाकी के पूरी तरह सफल न होने का कारण इनसे विलग रहना ही है।
जीवन जीने की शैली का निर्धारण मुख्यतः दो ढंग से हुआ है। एक वह जिसमें सुख-भोग की प्रधानता दी गई है। इसकी व्याख्या भारत में चार्वाक तथा पश्चिम में बैंथम, हाब्स, मिल आदि ने की है। दूसरी वह जिसमें भोगो की निन्दा कर आदर्श को प्रमुख बताया गया है। इसको बतलाने वाले स्टोडक, काण्ट शोपेनहॉवर आदि हैं, किन्तु जन सामान्य इसे ठीक तरह से अपना नहीं सका। उलटे इसे कठोरतावाद का नाम दिया। इसकी ओर उसकी स्वाभाविक अभिरुचि भी नहीं हुई।
इसके कारणों पर विचार करने पर स्पष्ट होता है कि उसके मर्म को छुआ ही नहीं गया। भाव सम्वेदनाओं को उभारा ही नहीं गया। मनुष्य का यह एक स्वाभाविक गुण है। कोई विचार वह तब तक नहीं अपनाता, जब तक उसके बुद्धिगत सारे सवालों का जवाब न मिल जाय। आदर्श का मार्ग त्याग की बात तो कहता है,किन्तु बदले में क्या मिलेगा, इसे वह बुद्धि को समझा नहीं पाता। गीता ने इसी तथ्य को व्यवसायात्मिक बुद्धि अर्थात् “बुद्धि का व्यवसायीपन “ कहकर समझाया है। आदर्श की कठोरता उसे न रुचे, यह स्वाभाविक ही है। यहाँ तक कि जो इसे किन्हीं तर्कों से मजबूर होकर स्वीकार लेते हैं, उनके द्वारा भी इसे किसी ऐसी चीज के रूप में देखा जाता है, जो विजातीय है और किसी खास वर्ग के लोगों के लिए है।
भाव-सम्वेदनाओं का क्षेत्र बुद्धि से ऊपर है। इसमें व्यवसायीपन नहीं है। धर्म एवं व्यावहारिक अध्यात्म इन्हीं के उद्गम स्त्रोत है। भावनाएँ भीतर से उमड़ती हैं। ये अन्तःकरण का उत्पादन हैं। इनसे प्रेरित व्यक्ति दूसरों की व्यथा, वेदनाओं को अनुभव कर सकता है। यही नहीं इनको दूर करने के लिए बड़े से बड़े त्याग करने में नहीं हिचकिचाता। प्रेम, सेवा, करुणा, उदारता जैसी आत्म सम्वेदनाएँ इसी से उपजती हैं। इन दिव्य सम्वेदनाओं से संचालित होकर लोग खुशी-खुशी कष्ट सहते हैं, अपने लाभों का परित्याग करते हैं, भौतिक दृष्टि से घाटा उठाते हैं। आदर्शवादियों द्वारा किसी न किसी रूप में अपने स्वार्थों की बलि दी जाती है। उदार व्यवहार में भी कुछ न कुछ त्याग करना ही पड़ता है। भौतिक लाभ जैसी कोई बात इसमें दिखाई नहीं पड़ती। इतने पर भी भावनाओं के सम्बल के आधार पर इस राह पर चलना सहज बन पड़ता है। इस तथ्य को बुद्धिवादी गणित से नहीं सुलझाया जा सकता है। यह भाव सम्वेदना के क्षेत्र की उर्वरता की परिणति है, जो समस्त तर्कों व बौद्धिकता से ऊपर जा कर जीवन को आदर्शोन्मुखी बनाती है।
किन्तु भाव-सम्वेदनाओं के अकेलेपन में अक्सर एक गड़बड़ी होती है वह यह कि इससे प्रेरित होकर अधिकाँश लोग भावनाशील होने की जगह भावुक अधिक हो जाते हैं। इसी को भ्रमवश भावनाशीलता मान लिया जाता है। इस भावुकता की स्थिति में उन्हें ठगा और परेशान किया जाता है। चालाक किस्म के लोग उनके भोलेपन का लाभ उठाकर उन्हें कठिनाई में डाल देते हैं। इसी कारण इन भाव-सम्वेदनाओं पर परिष्कृत नीतियों का अंकुश अनिवार्य है। इसी के आधार पर इन्हें व्यवहार में उतारा जा सकता है। श्रीरामकृष्ण ने इसकी आवश्यकता पर बल देते हुए एक भावुक शिष्य से कहा था कि आध्यात्मिक बनना है तो आध्यात्मिक बन बुद्धू नहीं। उनका कहना था कि भगवान ने विवेक दिया है,उसे काम में लाना चाहिए। विवेकयुक्त व्यवहार ही नैतिकता है सच्ची धार्मिकता है।
एफ. एच. ब्रैइले ने अपनी पुस्तक “एपियरेन्स एण्ड रियल्टी “ में इस बात को अच्छे ढंग से समझाया है। उनके अनुसार जब नैतिकता एक ऊंचे और शुभ स्तर तक पहुँचती हैं, तब उसका योग भाव- सम्वेदनाओं से होता है। इस स्थिति में यह धर्म बन जाती है। इसे उन्होंने जीवन जीने का परिष्कृत दृष्टिकोण कहा है। ब्रैडले की इस बात में यथार्थता है। अधिकाँशतया व्यक्ति इस तत्व को गहराई से न जानने के कारण ही इसकी उपेक्षा सी करते हैं। धर्म को कुछ कर्मकाण्डों का पर्याय भर मान लिया गया है, फलतः वे जिन क्रिया कृत्यों को ग्रहण करते हैं उसी में सीमित होकर रह जाते हैं अथवा यों कहें रूढ़िग्रस्त होकर धर्म के मार्ग से भटक जाते हैं।
मनीषियों के अनुसार भावनामय नैतिकता जीवन जीने की परिष्कृत दृष्टि है। इसके आधार पर जिन्दगी व्यतीत करने पर मानवी मूल्यों का संरक्षण और प्रसार होता है। धार्मिक होने का अर्थ है अन्तराल में पवित्रता, हृदय में सबके प्रति मैत्री भाव, मन में शान्ति, अपने पास विद्यमान साधनों में सन्तोष करने की प्रवृत्ति का होना। यही नहीं, व्यक्ति को कर्मनिष्ठ, श्रमशील एवं सहनशील होना चाहिए। इसी को सही अर्थों में धर्माचरण का पर्याय समझा जाता है।
इसके लिए न तो जाति, देश, काल का कोई बन्धन है, और न ही किसी प्रकार की बाहरी योग्यता जरूरी है। संसार में प्रायः सभी काम ऐसे हैं, जिन्हें करने के लिए परिस्थितिजन्य बन्धन होते हैं। एक निश्चित योग्यता और निश्चित स्थिति का व्यक्ति ही इन्हें कर सकता है उदाहरण के लिए यदि डॉक्टर, इंजीनियर अथवा प्रशासक का काम करना हो तो निर्धारित योग्यता होनी चाहिए, साथ ही इस योग्यता को पाने के लिए उपयुक्त धन भी चाहिए।
किन्तु अध्यात्मवादी होने के लिए ऐसी कोई बात नहीं, धनहीन और बिना पढ़े लिखे कबीर और रैदास भी अध्यात्मवादी बन सकते हैं और संत एकनाथ के गुरु जनार्दन पन्त तथा रामकृष्ण परमहंस के शिष्य डॉ. रामचन्द्र दत्त जैसे पढ़े लिखे और धनवान भी। इसके लिए अलग से समय और स्थान की भी जरूरत नहीं, अपितु प्रत्येक व्यक्ति जिस समय जो काम कर रहा है उसी में भावनामय नैतिकता को मिला देने से वह धर्माचरण बन जाता है।
जो लोग धर्माचरण को सिर्फ पूजा की कोठरी तक सीमित कर लेते हैं, उन्हें समझाते हुए जे. कृष्ण मूर्ति का अपनी कृति “मेडिटेशन “ में कहना है कि 24 घण्टों में एक दो घण्टे मन उच्च भावों में रखने से काम नहीं चलेगा। रात-दिन के प्रत्येक क्षण में भाव-सम्वेदनाओं व नैतिकता का समावेश करके इन्हें धर्माचरण के रूप में परिवर्तित करना चाहिए।
इस स्थिति को जीवन की व्यावहारिकता में उतारना ही सच्चे अर्थों में धार्मिक बनना है। शुरू में सम्भव है इसमें कठिनाई अनुभव हो पर महर्षि पातंजलि के शब्दों में “दीर्घकाल नैरन्तर्य सेविता दृढ़ भूमिः।” अर्थात् लम्बे समय तक लगातार इसका अभ्यास करने पर परिपक्वता सहज संभव बन जाती है।
इसी स्थिति को बताते हुए आचार्य शंकर का “उपदेश सहस्री” में कहना है कि फिर समूचा जीवन ही धर्मधारणा से भरा हो जाता है। धर्म की यही यथार्थ प्रक्रिया हम सभी के आचरण में लायी जानी चाहिए। गीताकार के शब्दों में “स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य भायते महतो भयात्” अर्थात् भावनामय नैतिकता रूपी धर्म का सही ढंग से किया गया थोड़ा सा आचरण भी व्यावहारिक जीवन की तमाम सारी कठिनाइयों को दूर करने वाला है।
डॉ. महेन्द्र सरकार कलकत्ता के माने हुए डॉक्टर थे। एक दिन वे रामकृष्ण परमहंस से मिलने गये। परमहंस जी बगीचे में कुछ काम कर रहे थे। डॉक्टर सरकार ने उन्हें माली समझा और कहा कुछ अच्छे से फूल लाओ परमहंस जी के चरणों में चढ़ाने हैं।
माली ने उन्हें अच्छे फूल लाकर दिए। साथ ही पीछे-पीछे स्वयं भी चलने लगे। दोनों अपने-अपने आसन पर बैठे तो डॉक्टर को बड़ा आश्चर्य हुआ कि माली होना कोई लज्जा की बात थोड़े है।
मन को ग्यारहवीं इन्द्रिय कहा गया है। शरीर का केन्द्र यही है। केन्द्र से जैसे संकेत, आदेश मिलते हैं, वैसे ही प्राणी मात्र का शरीर संचालित होता है। अदृश्य रूप से हमारे मन में भाँति-भाँति के विचार भाव और अनुभव भरे रहते हैं। इन गुप्त विचारों के अनुरूप ही जीवन में क्रियाशीलता आती है। मनोवैज्ञानिकों के अनुसार मनुष्य का आरोग्य उसकी मनोदशा पर निर्भर करता है। मन की विकृति, कमजोरी, आघात या मानसिक दुःख के कारण स्वास्थ्य में तुरंत गिरावट दिखाई देने लगती है।
मन की दो खुराक हैं। आहार और विहार। जैसा हम अन्न खाते हैं उसका स्थूल रूप शरीर के उपयोग में आता है और सूक्ष्म भाग मन की खुराक बन जाता है। जीवन के लिए भोजन अथवा भोजन के लिए जीवन इनकी प्रतिक्रिया सर्वथा भिन्न होती है। दो व्यक्ति एक साथ एक समय एक जैसा भोजन करते हैं, पर उनके परिणाम मन के ऊपर भिन्न प्रकार की छाप डालते हैं। भोजन सम्बन्धी रुचि और मर्यादा में अन्तर उपस्थित करते हैं। खाते समय जो छाप मन पर पड़ती है उसमें भारी अन्तर पड़ता है। भोजन को औषधि या ईश्वर का प्रसाद समझकर ग्रहण करने वाला व्यक्ति उसे अमृत समझकर श्रद्धा और प्रसन्नतापूर्वक उतनी मात्रा में खाता है जितना स्वास्थ्य के लिए आवश्यक है। वस्तुओं के चुनाव में उसे पोषक तत्वों और गुणों का ध्यान रहता है। जबकि भोजन के लिए जीने वाला स्वाद के पीछे पड़ा रहता है। मनचाहा स्वाद न मिलने पर आहार को फेंके-फेंके फिरता है, नाक-भौं सिकोड़ता है और स्वादिष्ट वस्तु मिलने पर पेट में अधिक ठूँसता चला जाता है। मिर्च मसाले, तले भुने नशीले पदार्थ तामसिक हैं। यह गुण मन को प्रभावित करता है। ऐसा आहार करने वाले प्रायः क्रोधी, तामसी कामुक, चंचल और पतनोन्मुख प्रवृत्ति से घिर जाते हैं। बेईमानी से दूसरों को दुःख या धोखा देकर अनीतिपूर्वक बिना परिश्रम कमाया हुआ पैसा जब पेट में जाता है, उससे मन अतीव उच्छृंखल, उद्दण्ड हो जाता है। तब वह न शास्त्र की, धर्म की बात मानता है और न सन्त की। ऐसा आहार मन पर कुत्सित प्रभाव ही डालेगा। उसे कुसंस्कारी ही बनायेगा।
पोषण का दूसरा माध्यम है विहार। जल, वायु, वस्त्र, निवास, सोना, उठना, श्रम, विनोद संयम, स्वच्छता, संगति, परिस्थिति, वातावरण आदि की मिली जुली व्यवस्था को विहार कहते हैं। इन बातों का शारीरिक स्वास्थ्य पर बहुत प्रभाव पड़ता है। अवाँछनीय विहार करने वाले उच्छृंखल लोग कभी स्वस्थ नहीं रह सकते। अकेला आहार अच्छा होने से काम नहीं चलता, विहार भी ठीक होना चाहिए, तभी गाड़ी के दोनों पहिए ठीक तरह से लुढ़केंगे और स्वास्थ्य ठीक रहेगा।
विहार का सूक्ष्म रूप भी है जो मन का पोषण करता है यह है काम करते समय रखा जाने वाला दृष्टिकोण। सामान्य जीवन यापन भी उच्च दृष्टिकोण युक्त हो सकता है और उसी को निकृष्ट भावना से किया जा सकता है। काम का बाहरी स्वरूप एक जैसा रहते हुए भी उसका सूक्ष्म प्रभाव विपरीत होगा और मन का पोषण उसी एक जैसे काम से भिन्न व्यक्तियों को भिन्न प्रकार का मिलेगा।
व्यापार कृषि, नौकरी आदि आजीविका के माध्यमों में दृष्टिकोण की भिन्नता रहती है। एक व्यक्ति इन माध्यमों से बिना नीति-अनीति का विचार किये जितना भी जैसे भी सम्भव हो अधिक उपार्जन का प्रयत्न करता है। दूसरा व्यक्ति दूसरों का प्रयोजन सिद्ध करने के फलस्वरूप निर्वाह की व्यवस्था रखने के लिए उपार्जन करता है। अपनी ही तरह वह उनके स्वार्थों का भी ध्यान रखता है जिनके माध्यम से वह आजीविका उपार्जित की गई। शिक्षा, विनोद, व्यायाम, मैत्री, सम्भाषण खर्च, परामर्श, चिन्तन आदि सामान्य दैनिक कार्यों से वह औचित्य और मनुष्यत्व को बनाये रखता है। फलस्वरूप यही रोजमर्रा के काम एक प्रकार से योग साधना बन जाते हैं। इसका प्रभाव मानसिक स्थिति पर पड़ता है। यह विहार क्रम जिसे सात्विक मिला है, उसका मन न कुमार्गगामी होगा न उच्छृंखल, वह उद्धत आचरण नहीं करता। जानता है कि मेरा अस्तित्व सेवा करना है, मुझे सेवक के रूप में बनाया गया है,मेरा कर्तव्य आत्मा की सहायता करना है। मुझे कोई ऐसा काम न करना चाहिए, जिससे जीवात्मा के जीवन लक्ष्य में बाधा-व्यवधान उत्पन्न होता है। ऐसा समझदार मन मर्यादा तोड़कर सेवक से शासक बनने का प्रयत्न स्वतः ही नहीं करता और उसके उच्छृंखल बनने की आशंका नहीं रहती।
प्रसिद्ध मनश्चिकित्सक डॉ. कैनन के अनुसार “आमाशय का सीधा सम्बन्ध मस्तिष्क के ‘ऑटोनॉमिक’ केन्द्र से होता है। सिंपैथेटिक और पैरासिंपैथेटिक यह ऑटो केन्द्र के दो भाग हैं जो पेट की क्रियाओं को संचालित करते हैं तथा पाचन उत्पन्न करते हैं। यदि व्यक्ति की मनः स्थिति आवेश ग्रस्त और अस्त व्यस्त होती है तो उसके पेट की क्रियाओं पर विपरीत प्रभाव पड़ता है और वह हमेशा के लिए खराब रहने लगता है।” चिकित्सा मनोविज्ञानी डॉ. केन्स डोलमोर और डॉक्टर कोओ ने अपने शोधप्रबंध में यह प्रकाश डाला है कि शरीर में कोई रोग उत्पन्न हो ही नहीं सकता जब तक कि मनुष्य का मन स्वस्थ है।
एक व्यक्ति की क्रूरता, हिंस्रता और अहंवादिता के कारण ही संसार के लाखों लोग अकाल युद्ध के गाल में कवलित होते हैं वही दूसरी ओर एक ही व्यक्ति की परिष्कृत शुद्ध सात्विक मनः स्थिति के कारण समाज में महत्वपूर्ण क्रान्तिकारी परिवर्तन हो जाते हैं।
मन की शक्ति अणु शक्ति से किसी प्रकार भी कम नहीं है। बल्कि उससे अधिक ही समर्थ और प्रचंड है। इतिहास पुराणों में वर्णित शाप और वरदान की घटनायें इसी मनः स्थिति के विध्वंस और सृजन उपयोगों के उदाहरण है। मन पर देख-रेख न रखी जाय तो वह भी अन्य चोर नौकरों की तरह भोले-मालिकों की हजामत बनाने का ढर्रा अपना लेगा। सरकस के शेर की तरह सधा हुआ मन, मालिक का हित साधन और दर्शकों का मनोरंजन करता है। पर यदि वह उजड्ड, अनगढ़ और अनियंत्रित हो तो मालिकों से लेकर दर्शकों तक सभी के लिए संकट सिद्ध होगा। मन को साध लिया जाय तो वह पारस से रासायन बनने की तरह उपयोगी भी अत्यधिक है। उसका कुसंस्कारी रूप तो विषैले पारे की तरह है जो जिस शरीर में भी जायगा उसे तोड़-फोड़ कर बाहर निकलेगा। मनोनिग्रह के लिए जहाँ उसे सत्परामर्श देना, समझाना बुझाना मनन चिन्तन के आधार पर परिष्कृत करना, स्वाध्याय, सत्संग से सन्मार्गगामी बनाया जाना चाहिए, वहाँ यह भी आवश्यक है कि उसके लिए आहार-विहार की ऐसी व्यवस्था बनाई जाय जिससे वह स्वयं उच्छृंखलता छोड़कर शालीनता को स्वीकार करने के लिए सहमत हो जाय इस तथ्य को भारतीय तत्वदर्शियों ने बहुत पहले ही जान लिया था कि मन में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष दिलाने वाली सभी शक्तियाँ भरी पड़ी हैं, उसकी सात्विक और विधेयक शक्ति का ज्ञान होने के कारण ही ईश्वर से प्रार्थना की गई है कि “मेरा मन शिव संकल्प वाला हो।”
सतोगुणी न्यायोपार्जित सज्जनों के संपर्क में बना हुआ आहार मन की सत्प्रवृत्तियों को उभारता है और हर कार्य में उदात्त दृष्टिकोण का समन्वय रखने से क्रियाकलाप की छाप मन पर ऐसे सुसंस्कार डालती है जिसे परिष्कृत विहार कहा जा सके। शरीर को स्वच्छ रखने की तरह मन को सुसंस्कारी रखने के लिए भी उपयुक्त आहार-विहार की व्यवस्था रखी जानी चाहिए, तभी वह आत्मा का शासक बनने की कुचेष्टा न करके एक सदाचारी सहयोगी की तरह सेवक बना रहने के लिए सहमत हो सकेगा।
=कोटेशन===========================
आयुर्वेद का एक सूत्र है- “तन्मना भुँजीत -” अर्थात् भोजन करते समय चित्त की एकाग्रता का ध्यान रखना चाहिए। यह स्वास्थ्य की दृष्टि से कही गई बात है, किन्तु जीवन में सफलता की दृष्टि से भी यह कम महत्वपूर्ण नहीं है। एकाग्रता से ही कार्य की संसिद्धि असंदिग्ध बनती है- यह सौ टंच खरा है।
अवचेतन तन मन को यदि मनुष्य तनिक साध-सुधार, और परिष्कृत विकसित कर ले, तो वह न सिर्फ अपना, वरन् अन्य अनेकों का कल्याण उससे कर सकता है।
घटना सन् 1914 की जनवरी माह की है। एक व्यक्ति अपने सीने से चिपकाये एक किशोर को लिये बेतहाशा दौड़ा चला जा रहा था और किशोर बुरी- तरह चीखता चिल्लाता जा रहा था। अलबामा नदी तट पर स्थित सेल्मा शहर के मिनोटा मुहल्ले की खिड़कियाँ और उनके दरवाजे खड़खड़ा कर खुलने लगे, यह देखने के लिए कि आखिर बात क्या है। उस मुहल्ले में रहने वाले डॉ. यूजिन भी जिज्ञासावश निकल पड़े, तो पता चला कि एक व्यक्ति अपनी गोद में एक बालक को लेकर दौड़ रहा है जो कि जल गया है। पीछे-पीछे वे भी अस्पताल पहुँच गये। वहाँ पहले से ही भीड़ इकट्ठा थी। उन्होंने बालक को देखा तो पता चला कि उसका चेहरा बुरी तरह झुलस गया है। यह सब कैसे हुआ? उसके जवाब में पिता ने संभावना व्यक्त की कि “फोटो फ्लैश का पाउडर फर्श पर बिखरा पड़ा था। अनुमान लगाया जाता है कि मेरी अनुपस्थिति में किशोर ने उसे इकट्ठा किया और माचिस जलायी होगी। इससे ज्वलनशील पाउडर में आग लगने और विस्फोट होने से इसका चेहरा जल गया।”
बालक को अस्पताल के गहन चिकित्सा कक्ष में लाया गया और उपचार आरंभ कर दिया गया। जब पिता पुत्र को लेकर अस्पताल के कमरे में पहुँचे, तो बाहर खड़ी भीड़ में से किसी ने उन्हें पहचानते हुए कहा कि ये सम्मोहन विद्या के विशेषज्ञ विलक्षण क्षमता सम्पन्न विश्व प्रसिद्ध व्यक्ति एडगर केसी हैं और बालक उनका पुत्र हगलीन।
चिकित्सालय में अवलोकन कर विशेषज्ञ डाक्टरों के दल ने अनुमान लगाया कि बालक को तो निस्संदेह बचाया जा सकता है, पर उसकी आँखों को बचा पाना मुश्किल ही नहीं, असंभव भी है। चिकित्सा चलती रही। एक सप्ताह बाद एक आँख में तेज दर्द आरंभ हुआ। डाक्टरों ने विचार विमर्श कर एडगर केसी से कहा कि बच्चे की एक आँख निकालनी पड़ेगी, अन्यथा स्थिति काबू से बाहर हो सकती है। किसी प्रकार यह बात बालक को ज्ञात हो गई, तो उसने चिकित्सकों का विरोध करते हुए कहा “नहीं आप ऐसा नहीं कर सकते। हमारे पिता स्वयं आध्यात्मिक चिकित्सक हैं। उन्होंने कइयों का सफल उपचार किया और गंभीर रोगों से उन्हें मुक्ति दिलायी है।”
आप कृपया इस संदर्भ में उन्हें अपनी चिकित्सा करने की अनुमति प्रदान करें। “चिकित्सकों ने किशोर की प्रार्थना स्वीकार कर ली और एडगर केसी से अपना उपचार आरंभ करने को कहा। एडगर केसी बैंच में बैठे और थोड़ी ही देर में स्वसम्मोहन द्वारा गहन तन्द्रा की स्थिति में चले गये। पत्नी को इसके बाद क्या करना है, इसे उसने पहले ही समझा दिया था।
पत्नी ने एडगर की बतायी प्रक्रिया आरंभ की। उसने पति के सम्मोहन अवस्था में प्रश्न करने प्रारंभ किये। इसी क्रम में एडगर ने बताया कि हगलीन की नेत्र ज्योति समाप्त नहीं हुई है। क्षति तो थोड़ी पहुँची है, पर उपचार द्वारा उसे पूर्व स्थिति में लाया जा सकता है। उनने आगे कहा कि डॉक्टर जो दवा चला रहे हैं, वह ठीक है, पर उसमें तनिक टेनिक एसिड भी स्वल्प मात्रा में मिलाना आवश्यक है। ऐसा ही किया गया। यद्यपि चिकित्सकों को विश्वास नहीं था कि नेत्र-दृष्टि लौट सकेगा, किन्तु सोलह दिनों के उपरान्त जब आँखों से पट्टी हटायी गयी, तो बालक उत्फुल्लता से चीख पड़ा “मैं देख सकता हूँ “और यह कह कर डाक्टरों को अचम्भे में डाल दिया।
एक सामान्य सा व्यक्ति नेत्र-विशेषज्ञ की वैज्ञानिक जानकारी से भी अधिक गहराई में कैसे प्रवेश कर सका? यह प्रश्न इस घटना के बाद से अनेकों के मन में उभरा, जिसका समाधान स्वयं एडगर केसी ने यह कहते हुए किया कि जिन्हें अवचेतन मन की विलक्षण क्षमता का थोड़ा भी ज्ञान है, उनके लिए यह आश्चर्य की बात नहीं होनी चाहिए। यदि मन को परिष्कृत कर उसकी उस सामर्थ्य को जाग्रत किया जा सके, तो ऐसा करतब हर कोई कर दिखा सकता है। यह माना हुआ तथ्य है और एक सत्य भी।
मधु-संचय
पतझरों से बोलो, कोई क्या माँगेगा।
बनो वसंती ऋतु, जग को जीवन दे जाओ॥
देने में ही सार सत्व है, इस जीवन का।
कोई पाये, यह सर्वोत्तम सुख है मन का॥
ले लो यह सुख, धन, सागर,मधुबन बन जाओ॥
देने वाले को, संसार पूजता आया।
देने वाले का यश, इस धरती ने गाया॥
दो प्रकाश सा ज्ञान, चाँद सूरज कहलाओ॥
शब्द पुष्प सम हों, सुगन्ध वाणी से फूटे।
सबको बाँटो स्नेह, न कोई पीछे छूटे॥
कथा महामानवों, सन्त, शहीदों की दुहराओ॥
धरती प्यासी हुई आज, मीठे वचनों की।
जाने कहाँ खो गयी है, भाषा नयनों की॥
प्रिय, न करो अब देर, निकलकर घर से आओ।
बनो वसंती ऋतु, जग को जीवन दे जाओ॥
-माया वर्मा
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इस तरफ है शिखर, उस तरफ खाइयाँ,
सोचना है कि, किसका करें हम चयन?
आज हम उस, तिराहे खड़े हैं जहाँ,
सिर्फ दो मार्ग हैं, आमने-सामने,
एक अध्यात्म-उत्कर्ष का मार्ग है,
दूसरे में खड़ा, नाश कर थामने,
सोच लें, जागकर हम, सृजनरत रहें,
या कि विध्वंस की, गोद में हो शयन?
मुट्ठियां बन्द है, किन्तु है एक में,
स्वर्ग की शक्तियाँ, दूसरी में नरक,
इस कदर रुग्ण मन, हो गया है कि हम
हित-अहित में न कर पा रहे है फर्क,
अब समय है कि हम, स्वार्थ की पट्टियां,
फेंक दे और खोले, मुँदे जो नयन।
हैं दिशाएँ बहुत भ्रम भरी, इसलिए,
सावधानी यहाँ है, जरूरी बहुत,
एक जैसे पतन और उत्थान के,
रास्ते हैं, न है शेष दूरी बहुत,
यह महाक्रांति का है समय, इसलिए,
अब करें पूर्ण दायित्व का हम वहन।
-शचीन्द्र भटनागर
“वत्स! कर्म ही गुरु है। कर्म ही महान है। कर्म ही ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति-स्थिति का हेतु है।”कर्म मीमाँसा के आचार्य शायद कुछ और कहते, किन्तु उन्होंने देख लिया कि उनका शिष्य इस समय कुछ अधिक सुनने की स्थिति में नहीं है। वह अन्तर्मुखी न भी हुआ हो, उसके नेत्र यज्ञ कुण्ड से उठते सुगन्धित धुएँ पर टिक गए हैं। जैसे वह इन धुएँ की कुण्डलियों में अपने सवाल का हल ढूंढ़ने लगा हो।
इधर वह काफी अन्तर्मुखी रहने लगा था। आज कई दिनों बाद गुरु चरणों के पास बैठा है, किन्तु इस समय उसकी नजर हवन कुण्ड से उठ रही यज्ञ-धूम पर टिकी है।
“आहुति रूप कर्म का वेग धूम्र-कुण्डलियाँ उठाता है और इनसे कुछ आकृतियाँ बनती हैं।” वह अपने आप कुछ कह चला- क्या स्थिरता है- कर्म के परिणाम में। तब कर्म और जीवन का सम्बन्ध? कर्म जीवन के लिए है या जीवन कर्म के लिए? कौन किसका प्रयोजन साधता है?
“तुम्हें महर्षि औषस्ति का आश्रय लेना चाहिए।” कर्म मीमाँसा के आचार्य ने सम्भवतः उसके लिए योग साधना जरूरी समझी होगी।
आचार्य की आज्ञा स्वीकार कर उसने हिमालय की ओर प्रस्थान किया था। रास्ते में मिल गए लय योग के आचार्य सुनेत्र। उन्होंने प्रेरणा दी “थोड़े समय यहाँ निवास करो। सामान्य श्रम से भी समाधि सिद्ध हो सकती है। जटिल श्रम- साध्य साधनाओं की आवश्यकता नहीं।”
उसे वैसे भी चातुर्मास्य करना था। यात्रा रुकती ही हो तो क्यों न अवरोध का उपयोग कर लिया जाय। शैवालिक अंचल अपनी सौम्य सुरम्यता में अनूठा था। उसे यहाँ पर्वतीय गुहा मिल गई रहने के लिए।
“नाद स्वर ही तो हैं।” उस दिन वह अपने मार्गदर्शक से कह रहा था “स्वर अन्तर में सुनाई दे या बाह्य जगत में, इन्द्रिय का ही विषय है। वीणा, वेशी, शंख, मेध गर्जन, श्रोत्रेन्द्रिय, प्रत्यक्ष होता है। माध्यम स्थूल बने या सूक्ष्म वह विषय है, अतः कर्म साध्य है और कर्म साध्य है तो नाशवान है। कर्म का नाम कोई साधन दे ले, क्या फर्क पड़ता है। कर्म साध्य तथ्य शाश्वत नहीं हो सकता।”
आचार्य सुनेत्र शुरू में बहुत उत्साहित हुए थे। उत्थित जाग्रत कुण्डलिनी, साधक मिला था उन्हें। मणिपुर-अनाहत चक्रों का भेदन शुरुआत में ही हो गया। मेरुदण्ड में महास्फोटनाद, कम्प और गति साधारण बात थी। आज्ञा चक्र अर्थात् त्रिपुटी भंग, बिन्दु बेध, बंकनाल, भ्रमर गुहा आदि का अतिक्रमण कर कुण्डलिनी में सहस्रार के महा कुण्ड में स्नान किया और अमृत निर्झर से उठकर वह दिव्य-आलोक की पीठ पर आसीन हो गई। “नित्य धाम की प्राप्ति” उस दिन आचार्य उल्लास में भर कर कह उठे और तभी उसने उन्हें निराश कर दिया।
“नित्य-धाम कैसे हो सकता है वह?” उस प्रबुद्ध प्रज्ञ को कोई मनोकल्पित अवस्था अपने में उलझाने में असमर्थ थी। “किसी नाद के न सुनने, किसी रूप के न देखने से जीवन में छटपटाहट नहीं है। मनुष्य का बन्धन उसके सुख-दुख का कारण है- देहासक्ति, राग, द्वेष। इनमें छुटकारा पाए बगैर किसी भी मानसिक अनुभव को लेकर ऐसा मान लेना आत्म प्रवंचना होगी।”
जो अनहद श्रवण से भी नहीं सन्तुष्ट हुआ, उसे अस्पर्शयोग, गन्धयोग, ज्योतिदर्शन अथवा शांभवी मुद्रा की सिद्धि से सन्तुष्टि हो जाएगी, इसकी आशा आचार्य सुनेत्र नहीं कर सकते थे। उन्होंने चातुर्मास्य के अन्त में उसे सस्नेह विदा किया।
यम और नियम उसके लिए सहज सिद्ध थे। जो आह्वानीय अग्नि के समीप बैठकर अहर्निशि अग्नि-सेवा कर चुका हो, आसन सिद्धि की बात उससे कौन करे? धारणा-ध्यान का अवलम्बन भले बदल ले, अहदोत्थान पर्यन्त ध्यान सिद्ध तो वह था ही। पर ये सभी मिल कर भी जीवन की पहेली तो नहीं सुलझाते।
“सिद्धिकामो भव!” अधिकारी की उपस्थिति महर्षि औषस्ति को अज्ञात नहीं रही। समाधि से उसी समय उठे थे वह। अपने पांवों में सिर झुकाते इस अद्भुत जिज्ञासु को उन्होंने उठा लिया। उसी दिन से एक गुफा इस नए योगी की साधन स्थली बन गई।
“भगवन्! समाधि काल से परे की अवस्था नहीं है क्या?” सविकल्प-निर्विकल्प समाधियों की अवस्थाओं को पार कर आज कई महीनों के बाद वह अपनी गुफा से महर्षि के चरणों में प्रणाम करने आया। उसका मुख तेजोदीप्त हो रहा था। अभिवादन के बाद उसने हाथ जोड़ कर सवाल उठाया “यह भी प्रयत्न साध्य स्थिति है। प्रयत्न कितना भी विशुद्ध, निर्बीज हो चुका हो कर्म ही है।”
“कर्म साध्य स्थिति शाश्वत नहीं होती।” महर्षि ने स्वयं वह बात कही जो वह कहना चाहते थे। “इसी से समाधि में व्यात्थान होता है।”
“जबकि जीव शाश्वत है। निरपवाद अमर है। काल उसे बाँध नहीं सकता।” उसने जिज्ञासा की “तब जीव को अपने स्वरूप की नित्य प्राप्ति क्यों संभव नहीं है? क्यों उसकी सारी कोशिशें काल का ग्रास बन कर रह जाती है। “
“ठीक कहते हो वत्स! पर हरेक की अपनी सीमा है शरीर और अन्तःकरण असीम शक्ति और संस्कार युक्त नहीं हुआ करते।” महर्षि स्नेहपूर्वक समझा रहे थे “तुमने व्यक्तित्व परिशुद्धि की सीमा पा ली अपने द्रष्ट स्वरूप में अवस्थिति, समाधि की निर्बीजता तुम पा चुके।”
“यह अवस्थिति बनी क्यों नहीं रहती प्रभू। उसका स्वर वेदना से आकुल था। जीवन का तत्व... इसके लिए तुम्हें परमाचार्य श्री कृष्ण द्वैपायन का आह्वान करना चाहिए। तुम्हारी निश्छल पुकार पर वे जरूर आएँगे।” महर्षि ने कहा और वह चल पड़ा, जिज्ञासा का अपूर्व सम्बल लिए। कुलूक्षेत्र (कुल्लूघाटी) में इलावर्त को दाँयी ओर छोड़ते यमुनोद्गम की परिक्रमा करके उसी दिन उनने गंगा के उद्गम में स्नान किया। दूसरे दिन दिव्य कैलाश को दाहिने छोड़ते वे अलकनन्दा में मिलने वाली उदीची सरस्वती के किनारे सभ्याप्रास में जा पहुँचे, जो कभी परमर्षि व्यास की तपस्थली थी।
“तुम कौन हो, यह जान लेना काफी नहीं है वत्स!” वेदान्त दर्शन के परमाचार्य को उसकी प्रबल पुकार ले आयी थी। “प्रचलित योग व्यक्तित्व की चरम ऊंचाइयों तक पहुँचा पाते हैं। यहाँ सिर्फ जीवन का संस्पर्श होता है, प्राप्ति नहीं। जीवन अस्तित्व है -व्यक्तित्व नहीं।” इसी को जानने के लिए क्या-क्या नहीं किया उसने। कुछ संकोचपूर्वक पूछा उसने “और कर्म?”
“योग सिर्फ चित्तवृत्ति निरोध नहीं है यह तो उसकी शुरुआत है, “तत् दृष्टि स्वरूप वस्थातुम” उसकी मध्य स्थिति पतंजलि।” अब वह अपने अनुभव को सूत्र बद्ध कर रहा था “और चरम स्थिति” नवीन सूत्रकार को थोड़ी हिचक हुई। सस्नेह उसे उत्साहित करते हुए वह बोले “कर्मसु कौशलम्”। योगेश्वर कृष्ण के इन शब्दों को समझा नहीं गया। तुम्हें अपने जीवन से इसकी व्याख्या करनी होगी।” स्पन्दित वातावरण के बीच ऋषि बता रहे थे। “जीवन-शाश्वत अस्तित्व-अविरल चेतना प्रवाह है, शरीर की नावें उसमें बदले रूपों में प्रकट होती रहती है। इन्हीं के द्वारा जीवन अभिव्यक्त होता है और यह अभिव्यक्ति है कर्म। दोनों एक दूसरे के पर्याय हैं, इन्हें अलग न समझो।”
“पर आज कर्म का स्वरूप...” शंका जैसे बाकी रह गई थी। “उसे कर्म मत कहो वह अकर्म है, कुकर्म है, दुष्कर्म है। विराट अस्तित्व की नहीं क्षुद्र अहं की अभिव्यक्ति। जीवन संवेदना बाह्य जगत को, स्वयं को कर्म के रूप में प्रकट करती है। कर्म का यही उदार रूप हमें पूर्ण बनने के लिए बाध्य करता है। जिसमें हम तुच्छ व्यक्तित्व को समाप्त कर अधिकाधिक उदार बनते जाते हैं।”
..”कर्म जीवन वीणा से उभरा संगीत है। समूची प्रकृति में इसी की गूँज है। परमाणु पर परमाणु मिलते जाते हैं और पृथ्वी, सूरज, तारे बनते हैं। फिर वे भी एक दूसरे की ओर आत्मीय आकर्षण में खींचे जा रहे हैं। समूची सृष्टि में यही एकात्मता का प्रवाह है सर्वथा एक है जीवन और कर्म।”
..”इसी एकत्व की प्राप्ति इन दोनों का परम प्रयोजन है। जिसके लिए दोनों साध्य है, दोनों साधन है”। वेदांत दर्शन के सूत्रकार का भावबोध उसे अस्तित्व में मग्न कर रहा था।
इस भावपूर्ण उद्बोधन ने योग के सूत्रकार पतंजलि को कर्म का भाष्यकार बनाया। ईसा से 225 वर्ष पूर्व बँट -बिखर कर नष्ट हो रहे मौर्य साम्राज्य से त्रस्त भारत फिर से एक चाणक्य को पुकार रहा था। महर्षि पतंजलि आगे आए, पुष्पमित्र शुँग बना उनका माध्यम। विदिशा और उज्जैन के बीच स्थित गोनर्द हुआ उनके व्यापक कार्य का केन्द्र। ऋषि परम्पराएँ पुनर्जागृत हुई। “योगश्चि चित्तवृत्ति निरोधः, योग कर्मसु कौशलम्” पुस्तक के पन्नों में नहीं जन-जन की क्रिया में परिलक्षित हुए।
शारीरिक -मानसिक स्वास्थ्य को अक्षुण्ण बनाये रखने की दृष्टि से अन्यान्य चिकित्सा पद्धतियों की अपेक्षा यज्ञोपचार अधिक सरल, सुनिश्चित और प्रभावी है। उसके माध्यम से व्यक्ति विशेष को ही नहीं, जितने क्षेत्र में यज्ञ ऊर्जा फैलती हो, उस सारे वातावरण को रोगकारक कीटाणुओं के आक्रमण से सुरक्षा दुर्ग की स्थिति में रखा जा सकता है। पिछले दिनों में सम्पन्न हुई कॉमन वैल्थ कान्फ्रेंस में क्षय रोग विशेषज्ञ डॉ. बेंजामिन ने बताया कि संसार में विशेषतया आर्थिक और सामाजिक दृष्टि से पिछड़े देशों में क्षय रोग का आक्रमण तेजी से बढ़ रहा है और अन्य रोगों से मरने वालों की तुलना में इसके द्वारा होने वाली मृत्यु ही सर्वाधिक है। इस संबंध में बी. सी. जी. के उपचार के विशेषज्ञ डॉ. एण्डरसन का कथन है कि प्रायः एक तिहाई मौतें क्षय के कीटाणुओं से होती हैं। यद्यपि उन रोगियों के शरीर में उभरे हुए लक्षणों के अनुसार उन्हें किसी अन्य रोग का मरीज कहा जाता रहता है, पर वास्तविकता यह है कि क्षय के कीटाणु ही अपने उपद्रव सामान्य की अपेक्षा अन्य प्रकार के लक्षण उत्पन्न कर देते हैं। फलतः चिकित्सक रोगी का उपचार क्षय की अपेक्षा कि सी अन्य रोग का करते रहते हैं। पिछले दिनों शहरीकरण व कस्बों के फैलते फूलते जाने के कारण इस रोग का अनुपात बड़ी तेजी से बढ़ा है।
बड़े शहरों की नगर पालिकाओं में जन्म-मरण के निमित्त रखा जाने वाला लेखा-जोखा बतलाता है कि इस रोग से मरने वालों की संख्या अन्य सब रोगों से अधिक है। बाल रोग विशेषज्ञों ने बच्चों में अधिक सूखा रोग-जिगर बढ़ना-जुकाम तथा पतले दस्तों की बीमारी का गहरा पर्यवेक्षण करने पर यह पाया है कि यह चिन्ह प्रायः क्षय रोग के साथ-साथ पोषण संबंधी रोग ग्रस्तों में पाए जाते हैं।
ऐसे ढीठ रोगों के उपचार में सबसे बड़ी कठिनाई यह है कि कीटाणु हलकी दवाओं से मरते नहीं। तेज दवाओं से उनका विनाश तो होता है पर साथ ही सामान्य स्वास्थ्य संतुलन भी बुरी तरह डगमगा जाता है इन दवाओं से स्वस्थ जीवाणुओं को भी भारी क्षति पहुँचती है और रोग निरोधक शक्ति घट जाने से कई विचित्र रोग इस प्रकार जड़ जमाकर बैठ जाते हैं कि अनेक उपचार करते रहने पर भी टस से मस नहीं होते। इसके कीटाणु जिसे माइक्रो बैक्टीरिया ट्यूबरकुलोसिस कहते हैं बहुत ही सूक्ष्म तथा सुदृढ़ होते हैं। उन्हें नष्ट करने में वही रसायन काम कर सकते हैं जिन के कण इन कीटाणुओं से भी सूक्ष्म तथा सशक्त हैं। सशक्त मारक रसायन तो कई ढूँढ़ निकाले गये हैं, पर उसमें दो कमियाँ बनी रहती हैं, एक तो यह कि उनके परमाणु उतने सूक्ष्म नहीं होते जितने कि विष कीटक। दूसरे उनकी मारक शक्ति विवेक रहित होती, है वह मित्र शत्रु का भेद नहीं करती और विषाणुओं की तरह पोषक और रक्षक जीवाणु का भी समान रूप से संहार करती है। ऐसी दशा में रोग कीटकों का नष्ट होना तो निश्चित नहीं होता पर स्वस्थ कणों को हानि तो अवश्य ही पहुँच जाती है। ये स्वस्थ कण वे होते हैं जो जीवनीशक्ति को यथावत् बनाए रखने के लिए उत्तरदायी माने जाते हैं।
चिकित्सा विज्ञानियों का ध्यान अब इस ओर आकृष्ट हुआ है। फ्राँस के एक आरोग्य शास्त्री ने शक्कर व गुड़ के धुंए से फिनायल की तरह विषाणुओं को मारने में सफलता पाई है। डॉ. टिलेट ने सुखाये हुए मीठे फलों के धुंए को टाइफ़ाइड जैसे रोगों की चिकित्सा की दृष्टि से बहुत ही उपयुक्त पाया है। चेचक जैसे रोगों की चिकित्सा में कभी फ्राँसीसी डॉक्टर हेफकिन ने चिकनाई के धुँए को बहुत ही प्रभावोत्पादक पाया था। संसार के विभिन्न भागों में चिकित्सा शास्त्री इस अनुसंधान पर अधिक ध्यान दे रहे हैं कि भाप और धुँए के उपचार से रोग कीटाणुओं से जूझने के लिए किस प्रकार उपयुक्त माध्यम बनाया जाय। इस खोज में उन्हें आशाजनक सफलता भी मिल रही है।
हानिकारक गैसों की जानकारी बहुचर्चित और सर्वविदित है। जहरीले धुँए से दम घुटने-बंद कुँओं में भरी गैस में उतरने वालों के प्राण निकल जाने-दुर्गन्धयुक्त वायु से स्वास्थ्य को हानि पहुंचाने की घटनायें आये दिन सुनने को मिलती रहती हैं। युद्धों के समय जलने वाली बारूद के धुँए से महामारियाँ फैलती हैं। मारक गैसें युद्धास्त्र की तरह प्रयुक्त होती हैं। यह हानिकारक पक्ष है। उपयोगी गैसें वातावरण को शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए हितकर भी बना सकती हैं। यज्ञ से ऐसी ही प्राणवान गैसें उत्पन्न होती हैं।
आज का विज्ञान यद्यपि हानिकारक गैसें बनाना ही सीख पाया है, परन्तु विनाश की दिशा में चल रहे यह प्रयत्न उलटे भी जा सकते हैं और आत्मिकी के ज्ञाता ऐसे वायुमंडल का सृजन भी कर सकते हैं जिससे सुखद सँभावनाओं का जन्म हो सके। तत्वज्ञानी ऋषियों ने यज्ञ विज्ञान को अनेकों आध्यात्मिक लाभों के अतिरिक्त भौतिक दृष्टि से भी उपयोगी पाया और उसका महात्म्य बताया है।
रासायनिक विश्लेषण की दृष्टि से जायफल, जावित्री, चंदन, अगर, नागरमोथा जैसे पदार्थों में मनुष्य शरीर में पाये जाने वाले रोगों का निराकरण करने की क्षमता बताई गई है। सुगंधित तेल, गैसों का फेफड़ों की दृढ़ता पर अच्छा प्रभाव पड़ने की बात कही गई है। चरक संहिता (चिकित्सा स्थान) श्लोक, 122 के अनुसार जिस यज्ञ के योग से प्राचीन काल से राजयक्ष्मा रोग नष्ट किया जाता था। आरोग्य चाहने वाले मनुष्य को उसी वेद विहित यज्ञ का अनुष्ठान करना चाहिये। इसी प्रकार ऋग्वेद की एक ऋचा है “मुच्चामि त्वा हविष्य जीवनाय, कमज्ञाद् यक्ष्मादुत राजयक्ष्मात्।” अर्थात् हे रोगी, तुझे क्षय तथा दूसरे अन्य रोगों से इस यज्ञ हवि द्वारा छुटकारा दिलाते हैं। यहाँ प्रयुक्त मंत्र के साथ शाकल्य का विशिष्ट होना महत्वपूर्ण माना जाना चाहिए।
गायत्री उपासना-अनुष्ठानों में तो अग्निहोत्र को अनिवार्य रूप से जोड़ा गया है और कहा जाता है कि जप की दशाँश या परिस्थितिवश शताँश आहुतियाँ तो निश्चित रूप से दी ही जानी चाहिए। इसके प्रभाव से अन्नमय कोश को भेदकर ताप और मंत्र शक्ति को अंतराल में प्रविष्ट होकर प्राण शरीर और कारण शरीर के संशोधन को ऐसा सुयोग मिलता है जो पकड़ में न जाने वाले विषाणुओं और जन्म जन्मान्तरों के कुसंस्कारों को भी सुधारने लगता है। यह एक सफलतम चिकित्सकीय सिद्धान्त है।
यज्ञ विज्ञान की अपरिमित शक्ति और अपार महत्ता को देखते हुए ही ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान में यज्ञोपैथी पर गहन अनुसंधान चल रहा है। विश्वास किया जाना चाहिए कि इस यज्ञ के दूरगामी परिणाम समूची मानवता को चमत्कृत और उपकृत करने वाले होंगे।
आमतौर से किसी मनुष्य के व्यक्तित्व का निर्धारण उसके शारीरिक आकार-प्रकार, डील-डौल तथा पहनावे-औढ़ावे के आधार पर किया जाता है। परन्तु वास्तव में मनुष्य वह नहीं है, जो बाहर से दिखता है। वह तो मात्र बाह्य कलेवर की झलक झाँकी भर है जिसे महत्ता नहीं दी जानी चाहिए। मनुष्य के यथार्थ स्वरूप की पहचान उसके अंतरंग की उत्कृष्टता-निकृष्टता एवं चिन्तन, चरित्र व्यवहार को देखकर की जाती है। विचारणा, भावना एवं क्रिया-कलापों को देखकर ही उसके वास्तविक स्वरूप को जाना जाता है। मन में उठी विचारणायें ही बाह्य क्रिया-कलापों के रूप में दृष्टिगोचर होती हैं तथा उन कर्तृत्वों के आधार पर व्यक्तित्व का सही मूल्याँकन होता है।
स्वीडन के प्रख्यात मनोविज्ञानी कार्ल गुस्टाव जुँग को विश्लेषणात्मक मनोविज्ञान का प्रणेता माना जाता है। अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “एनालिटिकल साइकोलॉजी” में उन्होंने मानव व्यक्तित्व को दो श्रेणियों में विभाजित किया है। पहला-बहिर्मुखी व्यक्तित्त्व तथा दूसरा अन्तर्मुखी व्यक्तित्व। उनके अनुसार जिस व्यक्ति का मानसिक विकास जितना अधिक होता है उसमें उतनी ही स्पष्टता से व्यक्तित्व की विशेषता दिखाई देती हैं। दोनों प्रकार के व्यक्तियों की रुचि, रुझान एवं कार्य प्रणाली में भारी अन्तर होता है। ये एक दूसरे से ठीक विपरीत स्वभाव के होते हैं। बहिर्मुखी व्यक्ति ललक-लिप्सा, विषय भोगों तथा पद-प्रतिष्ठा आदि की पूर्ति में उलझे रहते हैं जबकि अंतर्मुखी व्यक्ति का स्वभाव और आचरण ठीक इसके विपरीत देखा जाता है। इसे और अधिक स्पष्ट करते हुए जुँग ने आगे बताया है कि बहिर्मुखी मनःस्थिति प्रायः ओछे व्यक्तित्व की परिचायक है। ऐसे व्यक्तियों का अपने मनोभावों पर नियंत्रण नहीं होता। थोड़े से उतार-चढ़ाव, उत्थान-पतन की स्थिति में ही वे अपना मानसिक संतुलन गँवा बैठते हैं। नैतिकता, सदाचार तथा आदर्श उनके चरित्र को छू भी नहीं पाते। यही कारण है कि ऐसे लोग प्रायः मनोविकारग्रस्त अथवा अपराधी प्रवृत्ति के होते हैं।
इसके विपरीत अन्तर्मुखी व्यक्ति बाह्य जगत को नहीं, वरन् अंतर्जगत को प्रधानता देते हैं। वे किसी वस्तु की आकर्षक बनावट के स्थान पर उसकी उपयोगिता को महत्व देते हैं। योजनाबद्ध तरीके से व्यवस्थित काम करने के अभ्यस्त ऐसे गंभीर लोग शाँत, एकाग्रता सम्पन्न एवं मितभाषी प्रकृति के होते हैं। विषम परिस्थितियों में भी अपना संतुलन गड़बड़ाने नहीं देते। उनके जीवन का परम ध्येय नैतिकता, सदाचार व आदर्श निष्ठ को अपनाना ही होता है। इसके लिए वह त्याग बलिदान या उत्कर्ष के लिए सदैव कटिबद्ध रहते हैं। उनके अन्दर सतत् प्रसन्नता, उल्लास व मस्ती की अजस्र धारा प्रवाहित होती रहती है। वह देवोपम जीवन जीते तथा अपनी विशेषताओं से अन्यायों का पथ प्रदर्शन करते हैं। स्वयं मुक्त होते तथा अपनी नाव पर बिठाकर असंख्यों को पार लगाते हैं।
जुँग ने अपनी दूसरी पुस्तक “साइकोलॉजिकल टाइम्स” में मानवी व्यक्तित्त्व एक अन्य विलक्षणता पर भी विशद् रूप से प्रकाश डाला है। उसमें उन्होंने दो भिन्न प्रकार के व्यक्तियों का वर्णन और किया है जिसमें से एक को विचार प्रधान श्रेणी में तथा दूसरे को भाव प्रधान श्रेणी में रखा है। पहले वर्ग में समाज के नेता, राजनीतिज्ञ आदि, दूसरे में कवि, कलाकार, दार्शनिक आदि आते हैं। उनके अनुसार दोनों वर्गों के जीवन में प्रायः साम्यावस्था का अभाव दिखाई देता है। जो व्यक्ति अपना सारा समय चिन्तन में व्यतीत करता है, किन्तु उसके भावों का विकास नहीं हो पाता। यही कारण है कि सामान्य से अप्रिय घटनाओं के उपस्थित हो जाने पर भी वे उद्विग्न हो उठते हैं। इसका कारण यह है कि अधिक विचार भावों का दमन करते हैं, जिससे वे अविकसित रह जाते हैं और समय-समय पर असामान्य व्यवहारों के रूप में प्रकट होते हैं। इसी तरह भावों की दुनिया में विचरण करने वाले-कपोल कल्पनाओं में निरत व्यक्ति विचारों की दृष्टि से बौने रह जाते हैं। इनमें अन्धविश्वास, रूढ़िवादिता अधिक पाई जाती है तथा दूरदर्शिता का अभाव होता है। सामान्यतया पुरुष विचार प्रधान और महिलाएँ भाव प्रधान होती हैं।
आमतौर से सामान्यजन बहिर्मुखी होते हैं और अपनी सार शक्ति चेतन मन के व्यापारों में लगा देते हैं इसके विपरीत जो व्यक्ति अपने अचेतन मन का जितना विकास कर लेता है उसी अनुपात से वह पूर्णता की ओर अग्रसर होता है। इस प्रक्रिया को जुँग ने आत्मस्थिति प्राप्ति की प्रक्रिया कहा है। उनका कथन है कि मनुष्य का प्रकट स्वरूप चाहे जैसा भी हो, उसे अपने अप्रकाशित स्वभाव की और भी ध्यान देना चाहिए, अन्यथा चेतन और अचेतन मन में द्वन्द्व होने लगता है और जीवन में अनेक बाधाएँ आ खड़ी होती हैं।
इस संबंध में प्रसिद्ध मनोविज्ञानी मार्टिन प्रिंस ने मानवी व्यक्तित्व का गहन अध्ययन एवं विश्लेषण किया है और अनेकों रहस्यात्मक तथा महत्वपूर्ण तथ्य प्रकट किये हैं। उनका कहना है कि मनुष्य के भीतर एक साथ कई प्रकार के व्यक्तित्व कार्य करते हैं। उनमें आपस में यदि सामंजस्य और सहयोग है, तो मनुष्य के विकास में असाधारण योगदान मिलता है। परस्पर असहयोग होने से विकास क्रम अवरुद्ध हो जाता है। फलतः विभिन्न प्रकार के दोषों के कुपित होने से रोगों का क्रम आरंभ हो सकता है।
मनोवैज्ञानिकों एवं मनःचिकित्सकों का कहना है कि अपने व्यक्तित्त्व को समुन्नत उत्कृष्ट बनाये रखने अथवा उसे छिन्न-भिन्न करने का जिम्मेदार स्वयं मनुष्य है। विभिन्न अनुसंधानों के आधार पर उनने अपने निष्कर्षों में बताया है कि प्रत्येक मनुष्य का मन जन्म के साथ ही अति सामर्थ्यवान एवं अंतर्मुखी होता है। वह भाव प्रधान भी होता है व बुद्धि की दृष्टि से ग्रहणशील भी। परन्तु प्रतिकूल प्रशिक्षण अथवा वातावरण के कुसंस्कारों के कारण उसकी यह आरंभिक स्थिति सुस्थिर नहीं रह पाती। क्रिया-कलाप एवं अनावश्यक चिन्तन के बोझ के कारण मन अपनी विलक्षणता को धीरे-धीरे गँवाता चला जाता है। इस प्रकार मनुष्य की चिंतन प्रक्रिया जनित विभिन्न सूक्ष्म संस्कार जमा होते रहते हैं और अचेतन मन का निर्माण करते हैं। यदि उनका स्तर निकृष्ट हुआ तो तदनुरूप व्यक्तित्त्व भी बनेगा और मन में भी विक्षोभ पैदा करेगा।
व्यक्तित्व को अंतर्मुखी बनाने -उत्कृष्टता से ओत-प्रोत भावसंवेदना प्रधान बनाने की कोई कला पाश्चात्य मनोवैज्ञानिकों ने अभी तक नहीं खोजी है। परन्तु भारतीय तत्वदर्शियों-आप्तपुरुषों ने इसका समाधान बहुत पहले ही ढूंढ़ लिया था। इसके लिए आर्ष ग्रन्थों में वित्ति संक्षेप सिद्धान्त का प्रतिपादन किया गया है जिसमें सहज प्रस्फुटित होने वाली वृत्तियों का आरंभ से निरोध करने, उन्हें केन्द्रित करने की प्रेरणा दी गई है। उनका निर्देश है कि यदि वृत्तियों को भटकने न दिया जाय तो व्यक्तित्व में सुघड़ता आती और अतीन्द्रिय सामर्थ्य जाग्रत होती है। साथ ही वे सभी विभूतियाँ हस्तगत होती हैं जिन्हें पाकर मनुष्य सिद्ध पुरुष, महामानव बनता है और इसी जीवन में स्वर्ग एवं जीवन मुक्ति का आनन्द प्राप्त करता है। इसी के लिए ऋषियों ने जप, तप, योगाभ्यास आदि के विविध विधि उपक्रमों का निर्माण किया था जिनका आश्रय लेकर मन की चित्तवृत्तियों को नियंत्रित किया और अंतर्मुखी बनाया जा सकता है। यही वह पुरुषार्थ है जो आज की परिस्थितियों में प्रतिभा के परिष्कृत करने के हर आकाँक्षी से अपेक्षित है।
फ्रान्स का एक सामान्य अध्यापक रोल्डशुज पढ़ने में इतना तन्मय था कि उसे हर घड़ी कुछ सीखने की धुन लगी रहती थी।
उसे विभिन्न भाषाएँ सीखने का असाधारण शौक था। जीवन के अन्तिम समय तक उसने संसार भर की प्रमुख भाषाओं में से 200 में प्रवीणता प्राप्त कर ली थी।
गायत्री उपासना सहज स्वरूप है व्याहृतियों वाली त्रिपदा गायत्री का जप। “ॐ भूर्भुवः स्वः” -यह शीर्ष भाग है, जिसका तात्पर्य यह है कि आकाश, पाताल और धरातल के रूप में जाने-जाने वाले तीनों लोकों में उस दिव्य सत्ता को समाविष्ट अनुभव करना। जिस प्रकार न्यायधीश की, पुलिस अधीक्षक की उपस्थिति में अपराध करने का कोई साहस नहीं करता, उसी प्रकार सर्वदा सर्वव्यापी, न्यायकारी सत्ता की उपस्थिति अपने सब और सदा सर्वदा अनुभव करना और किसी भी स्तर की अनीति का आचरण न होने देना। “ॐ” अर्थात् परमात्मा। उसे विराट् विश्व ब्रह्माण्ड के रूप में व्यापक भी समझा जा सकता है। यदि उसे आत्मसत्ता में समाविष्ट भर देखना हो, तो स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर, कारण शरीर में परमात्मसत्ता की उपस्थिति अनुभव करनी पड़ती है और देखना पड़ता है कि इन तीनों ही क्षेत्रों में कहीं ऐसी मलिनता न जुटने पाये, जिसमें प्रवेश करते हुए परमात्मसत्ता को संकोच हो। साथ ही इन्हें इतना स्वस्थ, निर्मल एवं दिव्यताओं से सुसम्पन्न रखा जाय कि जिस प्रकार खिले गुलाब पर भौंरे अनायास ही आ जाते हैं, उसी प्रकार तीनों शरीरों में परमात्मा की उपस्थिति दीख पड़े और उनकी सहज सदाशयता की सुगंधि से समीपवर्ती समूचा वातावरण सुगंधित हो उठे।
गायत्री मंत्र का अर्थ सरल और सर्वविदित है-सवितुः-तेजस्वी। वरेण्यं-वरण करना-अपनाना। भर्गो-अनौचित्य को तेजस्विता के आधार पर दूर हटा फेंकना। देवस्य-देवत्व की पक्षधर विभूतियों को, धीमहि अर्थात् धारण करना। अन्त में ईश्वर से प्रार्थना की गई कि इन विशेषताओं से सम्पन्न परमेश्वर हम सबकी बुद्धियों को सन्मार्ग की ओर प्रेरित करे, सद्बुद्धि का अनुदान प्रदान करे। कहना न होगा कि ऐसी सद्बुद्धि प्राप्त व्यक्ति, जिसकी सद्भावना जीवन्त हो, वह अपने दृष्टिकोण में स्वर्ग जैसी भरी-पूरी मनःस्थिति एवं भरी-पूरी परिस्थितियों का रसास्वादन करता है। वह जहाँ भी रहता है, वहाँ अपनी विशिष्टताओं के बलबूते स्वर्गीय वातावरण बना लेता है।
स्वर्ग प्राप्ति के अतिरिक्त दैवी अनुकम्पा का दूसरा लाभ है -मोक्ष। मोक्ष अर्थात्- मुक्ति। कषाय कल्मषों से मुक्ति, दोष-दुर्गुणों से मुक्ति, भव-बंधनों से मुक्ति। यही भव-बन्धन है, जो स्वतंत्र अस्तित्व लेकर जन्मे मनुष्यों को लिप्साओं और कुत्साओं के रूप में अपने बन्धनों में बाँधता है। यदि आत्मशोधनपूर्वक इन्हें हटाया जा सके, तो समझना चाहिए कि जीवित रहते हुए भी मोक्ष की प्राप्ति हो गयी। इसके लिए मरणकाल आने की प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती। गायत्री की पूजा-उपासना और जीवन-साधना यदि सच्चे अर्थों में की गयी हो, तो उसकी दोनों आत्मिक ऋद्धि-सिद्धियों, स्वर्ग और मुक्ति के रूप में निरन्तर अनुभव में उभरती रहती हैं और उनके रसास्वादन से हर घड़ी कृत-कृत्य हो चलने का अनुभव होता है।
गायत्री उपासना द्वारा अनेकों भौतिक सिद्धियों, उपलब्धियों के मिलने का भी इतिहास पुराणों में वर्णन है। वशिष्ठ के आश्रम में विद्यमान नन्दिनी रूपी गायत्री ने राजा विश्वमित्र की सहस्रों सैनिकों वाली सेना का कुछ ही पलों में भोजन व्यवस्था बनाकर, उन सबको चकित कर दिया था। गौतम मुनि को माता गायत्री ने अक्षय-पात्र प्रदान किया था, जिसके माध्यम से उन दिनों की दुर्भिक्ष−पीड़ित जनता को आहार प्राप्त हुआ था। दशरथ का पुत्रेष्टि यज्ञ सम्पन्न कराने वाले शृंगी को गायत्री का अनुग्रह ही प्राप्त था। जिसके सहारे चार देव पुत्र उन्हें प्राप्त हुए। ऐसी ही अनेकों कथा-गाथाओं से पौराणिक साहित्य भरा पड़ा है, जिनमें गायत्री-साधना के प्रतिफलों की चमत्कार भरी झलक मिलती है।
गायत्री के नौ शब्द ही महाकाली की नौ प्रतिमाएँ हैं, जिन्हें चैत्र तथा आश्विन की नवदुर्गाओं में विभिन्न उपचारों के साथ पूजा जाता है। देवी भागवत में गायत्री की तीन शक्तियों का-ब्राह्मी, वैष्णवी, शाम्भवी के रूप में निरूपण किया गया है और नारी वर्ग की महाशक्तियों को चौबीस की संख्या में निरूपित करते हुए, उनमें से प्रत्येक के सुविस्तृत माहात्म्यों का वर्णन किया है। इन चौबीस शक्तियों की प्रतिमाओं का उनके बीज मंत्र व व्याख्या सहित अवलोकन ब्रह्मवर्चस् की शक्ति पीठ में किया जा सकता है।
गायत्री के चौबीस अक्षरों का अलंकारिक रूप से अन्य प्रसंगों में भी निरूपण किया गया है। भगवान के दस ही नहीं, चौबीस अवतारों का भी पुराणों में वर्णन है। ऋषियों में सप्त ऋषियों की तरह उनमें से चौबीस को प्रमुख माना गया है- यह गायत्री के अक्षर ही हैं। देवताओं में से त्रिदेवों की ही प्रमुखता है, पर विस्तार में जाने पर पता चलता है कि वे इतने ही नहीं, वरन् चौबीस की संख्या में भी मूर्धन्य प्रतिष्ठ प्राप्त करते रहे हैं। महर्षि दत्तात्रेय ने ब्रह्माजी के परामर्श से चौबीस गुरुओं से अपनी ज्ञान-पिपासा को पूर्ण किया था। यह चौबीस गुरु प्रकारान्तर से गायत्री के चौबीस अक्षर ही हैं।
सौर मंडल के नौ ग्रह हैं। सूक्ष्म शरीर के छः चक्र और तीन ग्रन्थि समुच्चय विख्यात हैं, इस प्रकार उनकी संख्या नौ हो जाती है। इन सबकी अलग-अलग अभ्यर्थनाओं की रूप-रेखा साधना-शास्त्रों में वर्णित है। गायत्री को नौ शब्दों की व्याख्या में निरूपित किया गया है कि इनसे किस पक्ष की, किस प्रकार साधना की जाय, तो उसके फल-स्वरूप किस प्रकार उनमें सन्निहित दिव्य शक्तियों कि उपलब्धि होती रहे। अष्ट सिद्धियों और नौ निधियों को इसी प्रकार के विभिन्न क्षेत्रों की प्रतिक्रिया समझा जा सकता है। अतीन्द्रिय क्षमताओं के रूप में परामनोविज्ञानी मानवी सत्ता में सन्निहित जिन विभूतियों का वर्णन निरूपण करते हैं, उन सबकी संगीत गायत्री मंत्र के खण्ड-उपखण्डों के साथ पूरी तरह बैठ जाती है। दैवी भागवत सुविस्तृत उपपुराण है। उसमें महाशक्ति के अनेक रूपों की विवेचना तथा शृंखला है। उसे गायत्री की रहस्यमय शक्तियों का उद्घाटन ही समझा जा सकता है। ऋषि युग के प्रायः सभी तपस्वी गायत्री का अवलम्बन लेकर ही आगे बढ़े हैं। मध्यकाल में भी ऐसे सिद्ध पुरुषों के अनेक कथानक मिलते हैं, जिनमें यह रहस्य सन्निहित है कि उनकी सिद्धियाँ-विभूतियाँ गायत्री पर ही अवलम्बित हैं।
सर मेगनियर विलियम अँग्रेजी के एक प्रसिद्ध लेखक हैं। उन्होंने ‘बुद्धिज्म’ नामक पुस्तक में लिखा है।
ईसाई धर्म ईसा के बिना कुछ नहीं। मुस्लिम धर्म हजरत मुहम्मद के बिना कुछ नहीं। बुद्ध धर्म महात्मा बुद्ध के बिना कुछ नहीं। ये ही पुरुष इन धर्मों के ध्येय अथवा प्राण पुरुष है। परन्तु मुझे यह सत्य बात कहने में कोई संकोच नहीं यद्यपि मैं ईसाई हूँ, कि हिन्दुओं का ध्येय मंत्र गायत्री ऐसा है जो बिना किसी ऋषि-मुनि या महान पुरुष के बिना ही जीवित रह सकता है। हिन्दू धर्म का आधार किसी विशेष पुरुष पर नहीं है। इस मंत्र के द्वारा हर एक मनुष्य सीधा परमेश्वर से ज्ञान प्राप्त कर सकता है।”
अन्यान्य धर्मों में अपने-अपने सम्प्रदाय से सम्बन्धित एक-एक ही प्रमुख मंत्र है। भारतीय धर्म का भी एक ही उद्गम स्त्रोत है-गायत्री। उसी के विस्तार रूप में पेड़ के तने, टहनी, पत्ते, फल-फूल आदि के रूप में वेद, शास्त्र, पुराण, उपनिषद्, स्मृति, दर्शन, सूक्त आदि का विस्तार हुआ है। एक से अनेक और अनेक से एक होने की उक्ति गायत्री के ज्ञान और विज्ञान से सम्बन्धित अनेकानेक दिशाधाराओं से सम्बन्धित साधनाओं की विवेचना करके विभिन्न पक्षों को देखते हुए विस्तार-रहस्य को भली प्रकार समझा जा सकता है।
प्रकृति ने नर नारी को अधिक प्यार और सम्मान दिया है, साथ ही उसे इस योग्य भी बनाया है कि अपने बहुमुखी उत्तरदायित्वों का वहन भली प्रकार कर सके। कद और भार में नारी नर की तुलना में कुछ हल्की भले ही पड़ती हो, पर यह उसके लिए सुविधा की बात है। शरीरगत भार कम वहन करना पड़े तो वह हल्कापन उन्हें अधिक स्फूर्तिवान या क्रियाकुशल बनने में काम आता है। उनकी कोमलता, भाव संवेदना तथा सुन्दरता अपने परिकर को एक कोमल तथा मजबूत शृंखला में बाँधें रहती है और परिवार प्रसन्न तथा विकासवान बनते हैं। प्रजनन क्षमता तो प्रकृति का अनुदान है। जिसके आधार पर वे भली-बुरी पीढ़ियों का निर्माण कर सकें। छाती में दूध भर कर प्रकृति ने उसे शिशुओं को जीवित रहने का भी अनुदान प्रदान किया है।
पुरुष है जिसने सहचरी को दासी बनाया है। उसके मानवी अधिकारों का अपहरण किया है और दूसरे दर्जे का नागरिक बना दिया है। पग-पग पर उपेक्षित-तिरष्कृत होते रहने के कारण वे प्रतिभाएँ एवं क्षमताएँ कुँठित होती चली जा रही हैं, जिनके द्वारा वे अपना उत्थान कर सकती थीं। परिवार तथा समाज को कहने योग्य अनुदान दे सकती थीं। नारी का पिछड़ापन मानवी प्रगति में सबसे अधिक बाधक है।
जिन देशों में नारी को सम्मान की दृष्टि से देखा और उन्हें अपनी प्रतिभा निखारने और क्षमता बढ़ाने का सुअवसर प्रदान किये हैं, वह सामाजिक, आर्थिक दृष्टि से समुन्नत बने हैं। चीन की समाचार एजेन्सी ‘सिनहुआ’ के अनुसार उस देश में न्यायाधीश जैसे उच्च स्तरीय एवं सम्मानित पदों पर एक लाख से भी अधिक महिलाएँ कार्यरत हैं। शिक्षित महिलाएँ व्यावसायिक एवं औद्योगिक इकाइयों को तो सँभालती ही हैं, शिक्षा, चिकित्सा, शिल्प जैसे महत्वपूर्ण विभाग भी प्रायः उन्हीं के जिम्मे हैं। अन्य विचारशील देशों ने भी नारी शक्ति को विकसित किया है और उसे चौके-चूल्हे, कोल्हू में पेलने की अपेक्षा अधिक उपयोगी बनाया है। विकसित देशों में शिक्षा, चिकित्सा, शिल्प, कला, बाल-विकास, कृषि पालन जैसे विभागों को उनके ऊपर छोड़ा और उसका सफल सत्परिणाम देखा गया है। जापान, कोरिया, इन्डोनेशिया आदि देशों ने विभिन्न क्षेत्रों में महिलाओं को अपनी अभूतपूर्व क्षमता का परिचय देने का अवसर प्रदान किया है और आर्थिक दृष्टि से सुसम्पन्न बने हैं। ईरान, ईराक एवं अफगानिस्तान जैसे छोटे राष्ट्रों की नारियाँ संकट के क्षणों में पुरुष सैनिकों के कंधे से कंधा मिलाकर युद्ध मोर्चे पर अपनी साहसिक प्रतिभा का प्रमाण प्रस्तुत कर चुकी हैं।
नेतृत्व के क्षेत्र में भी वे पीछे नहीं रही हैं। प्रधानमंत्री से लेकर राष्ट्रपति तक के सर्वोच्च एवं उत्तरदायित्वपूर्ण पदों को उनने गौरवान्वित किया है। इन्दिरा गाँधी से लेकर मार्गरेट थैचर, श्रीमती भण्डार नायके, गोल्डा मायर, फिलीपिन्स की कोराजोन एक्वीनो, इण्डोनेशिया की श्रीमती केमारो, जापान की टकोका डोई आदि प्रतिभाशाली महिलाओं की एक लम्बी शृंखला है। इसे दुर्भाग्य ही कहा जाना चाहिए कि भारत जैसे विशाल देश में जहाँ कभी नारियों का वर्चस्व था, सदियों से उसकी प्रतिभा को कुँठित बना दिया गया। स्वतंत्रता एवं समानता का अधिकार मिलने के पश्चात् भी देश में अभी तक मात्र 12 लाख के लगभग महिलाएँ ही उच्च शिक्षा प्राप्त कर सकी हैं। अधिसंख्य महिलाएँ अशिक्षित दशा में रहते हुए घर की चारदीवारी में बंद कैदियों जैसे जीवन जीने को विवश हैं। इतने पर भी उनकी अन्तरात्मा अभी मरी नहीं है। वह अपने विकास के लिए, क्षमता-प्रतिभा प्रदर्शित करने के लिए आकुल-व्याकुल हैं। आवश्यकता मात्र अवसर प्रदान करने एवं उन्हें शिक्षित बनाने की है। इस दुर्गति से उबरने पर ही समग्र प्रगति संभव है।
नारी अपनी सुकोमल भाव संवेदनाओं के लिए विख्यात है। सुप्रसिद्ध मानव विज्ञानी डॉ. ली. साल्क ने अपने अनुसंधान निष्कर्ष में बताया है कि मातृ हृदय की धड़कन के साथ-साथ भाव संवेदनाएँ भी तरंगित होती उभरती रहती हैं। यही कारण है कि जाने-अनजाने प्रत्येक माता अपने शिशु को हृदय का अधिक सामीप्य देना चाहती है और उसे अपने सीने से चिपकाये रखती हैं। हृदय की ध्वनि तरंगों को सुनकर शिशु एक अनिर्वर्चनीय आनन्द में डूबा रहता है। डॉ. साल्क ने इस संबंध में कुछ प्रयोग भी किये जिसके आश्चर्यजनक सत्परिणाम सामने आये। उनने मातृ हृदय की धड़कन की ध्वनि को टेप कर जब रोते हुए नवजात शिशुओं को सुनाया, तो उनका रोना तत्काल बन्द हो गया। मुखमंडल पर शान्ति एवं प्रसन्नता के भाव उभर आये। उनने निष्कर्ष निकाला की माताओं के धड़कते हृदय के साथ उनकी और मृदुल भावनाएँ भी जुड़ी रहती हैं, जिनसे पूर्व परिचित होने के कारण बच्चे सहज ही उनकी ओर आकर्षित हो जाते हैं।
ऐसा ही मन्तव्य प्रख्यात मानवशास्त्री डॉ. डिस्पाड मॉरिश का भी है। उन्होंने अपने ग्रन्थ - “द इन्टिमेट बिहेवियर एण्ड द नेकेड एथ” में लिखा है कि हृदय की शाश्वत ध्वनि को शिशु गर्भावस्था से ही सुनता रहता है जन्म के बाद वह बाह्य संसार की विचित्र ध्वनियों से परेशान हो उठता है और रोने लगता है, परन्तु जैसे ही माता का सामीप्य पाता है, चुप हो जाता है। यह जन्मदात्री माँ के सम्वेदनशील हृदय की ही प्रतिक्रिया है जिसकी सुखद तरंगों की अनुभूति करते ही वह रोना भूल जाता है। उनके अनुसार इस संदर्भ में जो महिलाएँ सतर्कता बरतती हैं, उनकी संतानें अपेक्षाकृत अधिक प्रगतिशील एवं बलिष्ठ पाई जाती हैं।
नारी का कद में छोटा होना कोई अकाट्य नियम नहीं है। इसका व्यतिरेक भी होता रहता है, संसार में कितनी ही महिलाएँ लम्बी, भारी तथा पुरुषों की तुलना में अधिक बलिष्ठ और बुद्धिमान पाई जाती हैं। जहाँ अवसर मिला है, वहाँ उनके विकास ने चमत्कार उत्पन्न किया है। खेल-कूदों में, परीक्षा के उत्तीर्ण अंकों में, प्रतिस्पर्धाओं में अब वे अपेक्षाकृत अधिक अग्रणी रहने लगी हैं। सोवियत चिकित्साविज्ञानी डॉ. कोडाकायन के अनुसार महिलाएँ पुरुषों की अपेक्षा अधिक परिश्रमशील भी होती हैं। यही कारण है कि वे रक्त चाप, मधुमेह मस्तिष्कीय रोगों आदि से बहुत कम पीड़ित पाई जाती हैं। बीमार पड़ने पर वे अपेक्षाकृत जल्दी स्वस्थ हो जाती हैं। उनकी जीवनी शक्ति एवं रोग प्रतिरोधी क्षमता के आगे नर कमजोर ही सिद्ध होता है।
फ्राँस के प्रसिद्ध प्राणिशास्त्र डॉ. ज्यों रेस्ताँ का कहना है कि संसार में स्रष्टा की सर्वोत्तम कृति नारी है। पुरुष अपनी वरिष्ठता, बलिष्ठता एवं बुद्धिमत्ता पर व्यर्थ ही गर्व करता है। वस्तुतः वह जो कुछ भी आज तक बन पाया है, मातृ हृदय की देन है। इस तथ्य से अनभिज्ञ रहने के कारण वह नारी को मात्र भोग्या एवं दासी स्तर का समझ बैठा और उसे विविध प्रलोभनों एवं बंधनों से जकड़ कर अनुवर्ती बनने के लिए विवश करने की भूल कर बैठा है। यह तो नारी की ही विशेषता एवं उदारता रही है कि इतने अत्याचार सहने के उपरान्त भी वह उसे सन्तानवत् दुलार देती रही है। इतने पर भी यदि नर की विवेकशीलता न जागी तो वह दिन भी अब दूर नहीं जब नारी उसे एक अनावश्यक विस्तार साधन समझ कर उसका परित्याग भी कर सकती है और संतान का निर्माण बिना पुरुष के संयोग से भी करती रह सकती है। उनके अनुसार वस्तुतः हमारे निर्माण में मातृत्व ही एक मात्र कारण है। पितृत्व को हम निरर्थक ही मूल तत्व मान बैठे हैं, क्योंकि विकास क्रम में पितृ प्रधान जीवाणु तो अपना अस्तित्व ही खो बैठता है और अंत में जिन तत्वों से हमारा निमार्ण होता है, वे मातृ प्रदत्त तत्व होते हैं। उनने इस तरह के प्रयोग परीक्षण भी किये हैं और सफल रहे हैं।
आत्मिकी की दृष्टि से नर-नारी दोनों में एक ही आत्मचेतना कार्यरत रहती है। कोमलता, मृदुता, उदारता, सहकारिता, स्नेह-सद्भाव आदि सद्गुण दोनों में ही होने चाहिए क्योंकि यह चेतना के सहज स्वभाव में सम्मिलित है। नारी उन मौलिक विशेषताओं को उभरने देती है, जबकि अपने मिथ्याभिमान के कारण पुरुष उन्हें विकसित नहीं होने देता। यही कारण है कि सद्गुणों की दृष्टि से नारी सदैव वरिष्ठ मानी और मातृशक्ति के रूप में सम्मानित की जाती है। नर-नारी दोनों में गहरी मित्रता और आस्था हो तो दोनों पक्ष एक दूसरे के लिए पूरक, आनन्दमय और प्रगति में सहायक होते हैं। पारस्परिक सहयोग-सहकार से दोनों में से एक भी घाटे में नहीं रहता।
विश्व के इतिहास पर यदि हम दृष्टिपात करें, तो ज्ञात होगा कि परिवर्तन चक्र घूमता रहता है, लट्टू की तरह-काल चक्र की तरह। जिस प्रकार कालचक्र कभी थमता नहीं, निर्बाध गति से चलता ही रहता है, उसी प्रकार परिवर्तन का भी एक चक्र है, जो सदा धावमान है। जो कुछ आज दिखाई पड़ रहा है, वह कल नहीं रहेगा, यह सुनिश्चित है और जो समय कल आयेगा, वह भी शाश्वत नहीं रहेगा, यह भी सत्य है। तात्पर्य यह है कि समय की तरह परिवर्तन भी चक्रवत् है। वह घूमता रहता है।
“हम आज जिस उथल-पुथल और अराजकतावादी समय से गुजर रहें हैं, वह कल नहीं रहेगा, क्योंकि उसी के बीच एक नयी समाज-व्यवस्था, एक नई सृष्टि का जन्म हो रहा है। यह नई व्यवस्था आज भले ही हमें नहीं दिखाई पड़ रही हो, पर कुछ ही वर्षों में उसका मूर्तिमान स्वरूप सामने आने ही वाला है। यही परिवर्तन है- क्रान्ति है, विचारक्रान्ति है” यह उद्गार हैं मूर्धन्य मनीषी हरिभाऊ उपाध्याय के “युग धर्म” पुस्तक में।
क्रान्ति अनादि काल से चलती आ रही है और अनन्त काल तक चलती रहेगी। आरंभ में प्रस्तर युग था। तब लोग पत्थर के औजारों का प्रयोग करते और वनों में रहते थे। धीरे-धीरे उनमें विकास हुआ। वे कबीलों में रहने लगें एवं लोहे के आयुधों का प्रयोग आरंभ किया। फिर उनमें सभ्यता और समाज का विकास हुआ। वे सभ्य कहलाने लगे। इसके बाद राजतंत्र का सूत्रपात हुआ, किन्तु जब राजतंत्र ने तानाशाह का रुख अपना लिया, तो एकबार पुनः लोगों की चेतना जगी। उनका उनींदापन हटा, तो राजतंत्र की नींव हिल उठी। गुलामी की प्रथा का अन्त हुआ, प्रजातंत्र आया और स्वराज्य मिला। यह सब स्वयं में एक परिवर्तन था, क्रान्ति थी।
इटली के इतिहास को देखें तो ज्ञात होगा कि वहाँ की पराधीन जनता जब गुलामी की जंजीरों में फँसी त्राहि-त्राहि कर रही थी, तो मेजिनी ने उनमें प्राण फूँके और विदेशियों से लोहा लेने के लिए गैरी वाल्डी के नेतृत्व में खड़ा किया। बाद में जब स्वतंत्रता मिली, तो कैहूर के राष्ट्रपतित्व में वहाँ की सरकार बनी। फ्राँस की राज्य क्रान्ति, अमेरिका की दास प्रथा, रूस की बालशेविक और अक्टूबर क्रान्ति सभी उसी परिवर्तन के चिन्ह हैं, जो यह सिद्ध करते हैं कि कालचक्र की तरह परिवर्तन चक्र भी सदा गतिमान है। अब भी वह अपने प्रकार से चल रहा है।
उपरोक्त सभी क्रान्तियाँ न्यूनाधिक खूनी थीं। इनमें कमोबेश रक्तपात हुआ था, पर अब की बार जो क्रान्ति होने जा रही है, वह विशुद्धतः रक्तहीन क्रान्ति-विचार क्रान्ति होगी। इसमें न रक्त बहेगा, न समर-युद्ध होंगे। बिना कुछ होते हुए परिवर्तन होता चला जायेगा ओर लोग बदलते चलेंगे। इस आध्यात्मिक क्रान्ति की शुरुआत हो चुकी है। विश्व पटल पर यदि हम दृष्टिपात करें, तो इसका स्पष्ट संकेत मिलने लगता है। बर्लिन की दीवार का टूटना, दोनों जर्मनी का एकीकरण, नारी अभ्युदय की दिशा में विश्व भर में उभरता उत्साह, साम्यवाद का अन्त, सूडान और लीबिया की एकीकरण की दिशा में पहल। दोनों कोरिया का मिलकर एक होने की तैयारी, नेपाल बंगला देश में जनशक्ति की विजय, इसे विचार-क्रान्ति ही तो कहा जायेगा, अन्यथा वर्ष भर पूर्व लोगों ने जिसकी कल्पना तक नहीं की थी, वह अनायास सम्पन्न कैसे हो सकता था? नाम चाहे जो दे लें, पर यह परिवर्तन विचार क्रान्ति का ही एक रूप है।
जीवन जब सरल-स्वाभाविक ढंग से चलता-बढ़ता रहता है, तब उसे प्रगति कहते हैं, किन्तु जब माया, मोह, अज्ञान, अन्धकार के वशीभूत हो वह अवरुद्ध हो जाता है, उसकी गति थम जाती है, तो यही पतन कहलाने लगता है। इन समस्त गतिरोधों को सहता हुआ जब धैर्य पराकाष्ठा को पार कर जाता है, तो भीतर का उमड़ा-घुमड़ता प्राण बम की तरह धमाका करता है। यही क्रान्ति है। कार्लमार्क्स का साम्यवाद, रूसो का ‘समाजवाद’ एक–सी ही क्रान्ति के प्रतीक थे। पतन जब अपने अन्तिम चरण में पहुँचता है और उत्थान की शुरुआत होती है, तो दोनों की संक्रान्ति अवस्था को ही “क्रान्ति” नाम से अभिहित करते हैं।
आज हम ऐसी ही प्रभात वेला से गुजर रहे हैं, जब पराभव चरमोत्कर्ष पर है और उत्क्रान्ति का दिनमान निकलने वाला है, भोर का आभास देने वाले कुक्कुट बाँग लगाने वाले हैं। ज्वर जब चढ़ता है तो लोग यह सहज ही अनुमान लगा लेते हैं कि शरीर विकारग्रस्त है, पर विशेषज्ञ यह भी जान जाते हैं कि विकार मुक्ति का यही स्वाभाविक और प्राकृतिक तरीका है शरीर का, और रोगी अब विकार मुक्त होने ही वाला है। परिवर्तन के महान क्षणों को क्रिया रूप लेते देखते हुए यह आशा कि जा सकती है कि अब उज्ज्वल भविष्य सन्निकट है। विचार-क्रान्ति से ही विचार परिवर्तन होने वाला है। विश्व के महान मनीषियों और भविष्य द्रष्टाओं का भी ऐसा ही कथन है। “युगधर्म” पुस्तक के “क्रान्ति युग“ अध्याय में मूर्धन्य विचारक हरिभाऊ उपाध्याय आगे लिखते हैं कि “मुझे यह स्पष्ट दीख रहा है कि भारत के अन्दर और बाहर विश्व भर में एक अदृश्य और किन्तु प्रबल और महान समुद्र-मंथन चल रहा है एवं फलश्रुति के रूप में रत्न-राशि अगले दिनों निकलने ही वाली है। यह मंथन इतना सशक्त और शक्तिशाली है कि संसार की कोई शक्ति उसे रोक नहीं सकती।”
“उसका वेग इतना दुर्धर्ष है कि जो कोई उसे रोकना चाहेगा, या तो वह खुद समाप्त हो जायेगा अथवा थक कर स्वयं को उसके अनुकूल बना लेगा।” आगे वे लिखते हैं कि “अब समाज में न धनपति कहलाने वाले लोग रहेंगे, न दरिद्र-कंगाल, वरन् दोनों की आर्थिक स्थिति एक समान होगी। कोई बात सिर्फ इसलिए मान्य न होगी कि उसे किसी प्रतिष्ठित व्यक्ति ने कहा, वरन् व्यक्ति, देश और समाज को ऊंचा उठाने वाली बात ही अच्छी और उपयोगी समझी जायेगी। लोग उसे ही अंगीकार भी करेंगे, जो कल्याणकारी और लोकोपयोगी जानी जायेगी तथा नीति ओर न्याय के मानदण्डों के अनुरूप होगी। जन्म के आधार पर कोई बड़ा-छोटा, ऊंच-नीच नहीं होगा, अपितु योग्यता ही इसका आधारभूत मापदण्ड होगा। नर-नारी को समानता मिलेगी और हर क्षेत्र में एकता समता के उदाहरण दृष्टिगोचर होंगे। नये भगवान और नये इंसान की रचना होगी। पुराण, कुराण, इंजील में सही बातें स्वीकार्य होंगी, जो समय, समाज और परिस्थिति की कसौटी पर नीति और बुद्धि सम्मत साबित होंगी। पुस्तकें अब सस्ती लोकप्रियता और वाहवाही के लिए नहीं लिखी जायेंगी अपितु उनका एक मात्र लक्ष्य पाठक का आत्म-विकास होगा, उन्हीं की पुस्तकें जीवित रह सकेंगी, जिनमें तपस्या, विद्या और सेवा की त्रिवेणी का संगम होगा”।
प्रिंस कोपाटकिन ने भी भविष्य का दर्शन किया था। वे अपनी पुस्तक “क्रान्ति की भावना” में लिखते हैं कि “सामाजिक जीवन में ऐसे अवसर आ जाते हैं, जब क्रान्ति एक अनिवार्य आवश्यकता बन जाती है। वह चीख-चीख कर कहती है कि अब आगे इसके बिना किसी कदर काम चलने वाला नहीं। चहुँ ओर संव्याप्त पुराने, सड़े-गले विचारों की जगह नवीन और न्याय संगत विचार आन्दोलित होने एवं लोगों के जीवन में बलात् अपना स्थान बना लेने के लिए उमड़ने-घुमड़ने लगते हैं।” आज हम ऐसे ही क्षणों से गुजर रहे हैं, जब हमें पुराने व प्रतिगामी विचारों को त्याग कर युगानुकूल नूतन विचारधारा को हृदयंगम करना चाहिए, जो स्वयं हमारे लिए और इस गुण के लिए कल्याणकारी हो। वास्तविक विचार-क्रान्ति तभी आ सकती है एवं तभी वर्तमान युग के उस युगद्रष्टा महामानव का वह स्वप्न साकार हो सकता है, जिसमें उन्होंने “नया भगवान बनायेंगे, नया इंसान रचायेंगे, नया संसार बनायेंगे” का स्पष्ट उद्घोष किया है। अच्छा हो, हम अपने को स्वयं ही बदल लें, अन्यथा महाकाल की प्रत्यावर्तन प्रक्रिया प्रताड़ित करके हमें विचार परिवर्तन के लिए बाधित करने ही वाली है।
संसार में बहुत कुछ ऐसा है जो श्रेष्ठ है और जिसे प्रयत्नपूर्वक बढ़ाया जाना चाहिए। पर साथ ही ऐसा भी कम नहीं जिसे निरस्त किये जाने की आवश्यकता है। खेतों में अनाज के साथ-साथ खर-पतवार भी उग पड़ता है। जहाँ पौधों को सींचने, रखवाली करने की आवश्यकता पड़ती है वहाँ यह भी ध्यान में रखना पड़ता है, कि खरपतवार की, कृमि कीटकों की बाढ़ उसे समाप्त न कर दे और सारे प्रयत्नों को मटियामेट न बना दे। शुभ के परिपोषण और अशुभ के उन्मूलन की आवश्यकता समान रूप में बनी रहती है।
सज्जा सजाने के साथ-साथ दौड़ती चली आ रही गंदगी को भी बुहारने हटाने की आवश्यकता पड़ती है। भोजन ग्रहण के साथ साथ मल विसर्जन की भी व्यवस्था बनानी पड़ती है, भले ही वह अरुचिकर क्यों न हो। हमारा दृष्टिकोण औचित्य के परिपोषण का पुण्य परमार्थ अर्जित करना तो होना ही चाहिए, पर साथ ही यह भी ध्यान रखना चाहिए कि आक्रमणकारी तत्वों की ऐसी घात न लग जाय जिससे सृजन के लिए किया गया प्रयत्न ही चौपट हो जाय। सरकार जहाँ उत्पादन बढ़ाने की योजनाएँ बनाती है। वहाँ आन्तरिक आक्रमण से निपटने के लिए पुलिस का और सीमा सुरक्षा के लिए फौज का भरकम सरंजाम जुटाती है। व्यक्ति को निजी जीवन में भी इस प्रकार की सतर्कता बरतनी पड़ती है। चोर-उचक्कों के, ठगों की घात न लगने पाये इसके लिए समुचित जागरुकता अपनानी पड़ती है। जहाँ आवश्यकता होती है वहाँ चौकीदार की नियुक्ति भी करनी पड़ती। संव्याप्त विषाणुओं से रक्षा करने के लिए डाक्टरों से टीके लगवाने पड़ते हैं। घरों में खटमल, पिस्सू, जूओं से लेकर घुन, तिलचट्टों की बढ़ोतरी भी रोकनी पड़ती है। हमारी गतिविधियों में जितना भाग सृजन प्रयोजनों के लिए, सद्भाव संवर्धन के लिए होना चाहिए उतना ही शौर्य, पराक्रम, अनीति उन्मूलन के लिए भी सुनियोजित होना चाहिए।
बच्चों के संतुलित विकास को ध्यान में रखते हुए एक आँख प्यार की दूसरी सुधार के लिए सुरक्षित रखने की नीति अपनानी पड़ती है। एकाँगी अतिवाद लाभ के स्थान पर हानि ही पहुँचाता है। पूर्ण संत और अहिंसक तो कोई परमहंस ही बन सकते हैं, सामान्यजन को धर्म के परिपोषण और धर्म के उन्मूलन के लिए कटिबद्ध रहना चाहिए। भगवान के अवतार भी इन्हीं दोनों प्रयोजनों को समान रूप से ध्यान में रखते हुए सुसंतुलन बनाने के निमित्त होते रहे हैं। मनुष्य भी समय रहते इन दोनों यथार्थताओं के साथ सुसंतुलित तालमेल बिठाने के लिए प्रयत्नरत रहे तो ही बात बनती है। एकाँगी दया, धर्म का पालन करते रहने से उसे दुष्टता मात्र दुर्बलता समझती है और अपने पंजे गहराई तक गड़ाने के लिए उत्साहित होती है। अनीति का अब तक बढ़ते चले आने का प्रधान कारण यह रहा है कि उसका डटकर विरोध नहीं हुआ। खाली मैदान देख कर तो कोई भी दौड़ने के लिए लालायित हो सकता है। प्रतिरोध का अंकुश लगने पर ही अनीति को दुबारा विचार करना पड़ता है और आक्रमण करने से पूर्व दस बार सोचना पड़ता है।
इन दिनों प्रचलित अनाचार का हर ओर बोल बाला है। इसका प्रमुख कारण चिन्तन में अवाँछनीयताओं का घुस पड़ना। तत्वज्ञान से जनमानस को प्रखर बनाये रहने वाला आधार घटते-घटते समाप्तप्राय हो गया। जो बहुमत का क्रियाकलाप है उसी का अनुकरण करने के लिए जनसाधारण का मानस बनता है। अनुकरण प्रियता मनुष्य की स्वाभाविक रुचि एवं प्रवृत्ति है। बच्चे इसी आधार पर बोलना, सोचना, करना सीखते हैं। बड़ों के सम्बन्ध में भी यही बात है। सब ओर अवाँछनीयता का प्रचलन दीख पड़े तो फिर मन उसी को सहज स्वाभाविक व्यवहारिक मान लेता है। उसी का अनुकरण करने लगता है। भले बुरे की मान्यतायें प्रायः इस आधार पर बनती हैं कि समीपवर्ती प्रतिभावान लोग क्या करते हैं। इस प्रभाव को उथले आदर्शवादी आदर्शों से निरस्त नहीं किया जा सकता। अनुपयुक्तता के विरुद्ध चिन्तन और प्रयास को जानना तब और भी अधिक कठिन पड़ता है जब आदर्शवादी आदर्श जीवन्त जाग्रत स्थिति में अपना उदाहरण प्रस्तुत न कर पा रहे हों। तब आदर्शवादी शिक्षा की कथा-वार्ता कह कर उपहास में डाल दिया जाता है, जो उचित, व्यावहारिक शाक्य है उसे प्रत्यक्ष प्रयास के रूप में जीवन्त भी तो होना चाहिए। भले ही आदर्शवादी व्यक्तित्व की संख्या अल्पमत में ही क्यों न हो।
आज चिन्तन, चरित्र और व्यवहार में मनुष्य कहीं अधिक गई गुजरी दयनीय स्थिति में पहुँच गया है। ऐसे लोग खोजे और देखें नहीं जा रहे हैं जो उचित को ही स्वीकार करें और अनुचित को अस्वीकार करके अपनी आस्था को आदर्शों के प्रति सुनिश्चित सिद्ध करें। ऐसे लोग दूसरों को पतन पराभव के गर्त में गिराने से बचा सकते हैं। पर जब नाविकों का ही कहीं अता पता नहीं तो पार उतारने की सुविधा जन साधारण को कैसे मिले?
मनुष्य का पराक्रम इस बात से जाँचा जाता है कि उसने कितनी उपलब्धियाँ उपार्जित कीं। पर साथ में यह भी देखा जाना चाहिए कि उसने अनीति के साथ असहयोग करने में कितनी बहादुरी दिखाई। अनुचित का कितना असहयोग किया और समय आने पर इसके लिए संघर्ष करने के लिए कितनी दिलेरी का परिचय दिया।
ऐसी प्राणवान प्रतिभा से ही अनीति के उन्मूलन की आशा की जा सकती है। दुर्भाग्य इसी बात का है कि ऐसे व्यक्तित्वों का अभाव हो चला है जबकि “पर उपदेश कुशल बहुतेरे” स्तर के लोगों की बाढ़ जैसी आई हुई है। प्रतिरोध के अभाव में तो आक्रमणकारी किसी भी क्षेत्र को रौंदते, तहस-नहस करते चले आते हैं। उस सफलता का श्रेय आक्रान्तों के दुस्साहस को नहीं, वरन् उन लोगों को दिया जाता है जिनने लापरवाही और कायरता बरत कर अन्य आक्रमण को सर्वथा सरल बना दिया।
दृष्टिपात करने पर चिन्तन क्षेत्र की भ्रष्टता घटाटोप की तरह छाई दिखती है। लोगों का सोचने का तरीका संकीर्ण स्वार्थपरता से बुरी तरह जकड़ गया है। लोभ और अहंकार की तृप्ति के अतिरिक्त और किसी को कुछ सूझता नहीं।
द्वितीय महायुद्ध में नोविल नामक एक रसायनवेत्ता ने डायनामाइट बारूद का अविष्कार किया। उसकी दोनों पक्ष द्वारा भारी माँग हुई, मुनाफा भी खूब कमाया गया।
नोविल ने अपनी सारी आमदनी का एक ट्रस्ट बना दिया। जिसको ब्याज से साहित्य विज्ञान जैसे अनेक क्षेत्रों को हर वर्ष पुरस्कार दिया जाता है। प्रत्येक पुरस्कार की राशि लाखों रुपया होती है।
असीम तृष्णा में आकुल व्याकुल लोग कुकृत्य करते और अनाचार बरतते दिखाई पड़ते हैं। समय का प्रवाह कुछ ऐसा ही चल पड़ा है। व्यक्तियों का समूह ही समाज है। कड़ियाँ मिलकर ही जंजीर बनती है। मनुष्य जैसे भी होंगे, उसी स्तर का समाज या शासन बनेगा। ऊपरी ढाँचे में सुधार लाने के लिए जड़ तक पहुँचने का प्रयत्न करना पड़ेगा।
लोक मानस को भ्रान्तियों से उबारने, न्याय के समर्थन में अड़ जाने और अनौचित्य के विरुद्ध सीना तान के खड़े हो जाने का साहस यदि जगाया जा सके तो इतने भर से वृत्तासुरों, हिरण्याक्षों, भस्मासुरों के सिंहासन हिल जायेंगे और वे जन समर्थन के अभाव में औंधे मुँह गिरने के लिए विवश होंगे।
स्वतंत्रता मिलने के समय से ही भारत को संत्रस्त करने और चिन्ता में डालने वाली समस्या वेष बदल-बदल कर सामने आती रही है। उनने क्षति भी कम नहीं पहुँचाई और वातावरण को विषाक्त बनाने में कोई कमी नहीं छोड़ी। इतने पर भी भगवान को धन्यवाद ही देना होगा कि किसी भी समय ऐसी स्थिति नहीं आई जो काबू से बाहर हो गई हो और जिसने जीवन भर का संकट खड़ा किया हो।
अभी भी वे उलझनें कम नहीं हैं और यह नहीं कहा जा सकता कि विग्रहों से निवृत्त होकर अपनी सूझबूझ और साधन-सम्पदा को प्रगति प्रयासों में पूर्णरूपेण लगाया जा सकेगा। यह परिस्थितियाँ अभी कुछ दिन और विपन्न रहेंगी। पर इतना निश्चित है कि उपद्रवों और गुत्थियों का रूप ऐसा विकराल न हो सकेगा जिनसे ऋषियों के गौरव इस राष्ट्र की क्षमता और प्रतिष्ठ पर आँच आये।
उलझनें आती और सुलझती रही हैं। यदि भीतरी और बाहरी विग्रहों की गणना करें तो वे बहुत हो जाती हैं और उस सब का भार इतना हो जाता है जिनसे लम्बी गुलामी से छूटी और अनुभवहीन जनता को असाधारण क्षति पहुँचती, पर ऐसा हुआ नहीं। घटाएँ आईं, गरजीं और तेज हवा के सामने पैर न टिका सकीं, अपने रास्ते चली गई।
यह भूतकाल की चर्चा हुई, वर्तमान भी कम विपन्न नहीं है। घर के साँप-बिच्छू और बाहर के बाघ, भेड़िये अपनी-अपनी घात लगाने में कमी नहीं छोड़ रहे हैं। पर महत्चेतना को यह विश्वास है कि ऐसा कोई अनिष्ट न होने पावेगा जिसे नवोदित देश की सहनशक्ति से बाहर कहा जाय और जिसकी क्षति पूर्ति न हो सके।
इन बचावों में राष्ट्रीय क्षमताओं ने समय-समय पर उपयोगी योगदान दिया है। इसके साथ ही ऐसी दैवी कृपा भी रही है जो नाव को भँवरों में से उबरते हुए किनारे तक ले आई। डूबने का कोई हादसा नहीं हुआ।
इन दिनों जो संकट एवं विग्रह सामने हैं, अलगाववाद एवं विखण्डन का खतरा ही सामने आ खड़ा हुआ है, उनके संबंध में मनीषियों का पूरा और पक्का विश्वास है कि यह सभी समस्याएँ हल हो जायेंगी। लड़ मरने के उतारू लोगों के मध्य रहकर भी राष्ट्र की एकता बीच बचाव करने और साथ ही अपनी सुरक्षा बनाये रहने में भी समर्थ रहेगी। भयंकरतायें दीखती भर रहेंगी, पर राष्ट्र का बाल बाँका न कर सकेंगी।
उस समय के आगमन में देर नहीं है जिसमें जनमानस में घट जमाए बैठीं भीतरी दुर्बलताएँ दूर हो जायेंगी। अधिकारी कर्तव्य पालन करने के लिए बाधित होंगे और लोकसेवियों की नई पीढ़ी इस प्रकार उभरेगी जो शोषक तत्वों से, उद्दंडताओं से, अपराधों से समाज को क्रमशः मुक्ति दिलाती चलेगी और सर्व साधारण का ध्यान और प्रयास उस दिशा में जुटेगा जिससे संव्याप्त पिछड़ेपन से, आलस्य, प्रमाद और अनाचार से छुटकारा पाया जा सके।
भारत का भविष्य उज्ज्वल है। उत्साह और उल्लासवर्धक समय आने में थोड़ी देर है, पर यह सुनिश्चित है कि भारत की गरिमा बढ़ेगी ही नहीं, स्थिर भी रहेगी। जबकि इन दिनों आसमान पर अन्धड़ की तरह छाये हुये लोग या देश धूलि चाटते दृष्टिगोचर होंगे। समय की प्रतिकूलता उनके दर्प को चूर-चूर कर देगी, पर भारत इन कटीली झाड़ियों के बीच भी गिरेगा नहीं, उठता ही रहेगा। भले ही उस उठाव की गति धीमी रहे।
भारत पर अभी उन ऋषि-तपस्वियों की छत्र छाया है जिनके प्रयास से निष्ठुर पराधीनता से पीछा छूटा। इन दिनों वे भीतर से उद्भूत और बाहर के प्रहार से बचाने में अपनी शक्ति लगाये हुए हैं। अनर्थ तक स्थिति न पहुँच पावे, इसके निमित्त संरक्षण दे रही है। इन उपलब्धियों को भी कम नहीं माना जाना चाहिए।
प्रगति पथ पर तेजी से अग्रसर होने और राष्ट्र के सुसम्पन्न और सुसंस्कृत होने का दौर कुछ ही दिनों में चल पड़ेगा। अभी जो कुछ हो रहा है, उसे भी उत्साह वर्धक नहीं तो संतोषजनक भी नहीं कहा जा सकता इतने पर भी भारत का अभ्युदय सुनिश्चित है। यह महाकाल का स्रष्टा का स्वनिर्धारित सत्य है। इस तथ्य की पुष्टि करते हुए महर्षि रमण, योगी अरविंद, रामकृष्ण परमहंस, विवेकानन्द जैसे महा तपस्वियों ने भी समय-समय पर अपने-अपने उद्गार व्यक्त किये हैं। यह एक सर्वविदित तथ्य भी है कि इन महान तपस्वियों की भारत को स्वतंत्र कराने और उसके पुनर्निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका रही है।
महायोगी अरविंद ने अपने दिव्य दर्शन के आधार पर कहा है कि भारत अपनी महान भूमिका में पुनः जाग्रत हो रहा है। प्रस्तुत समय उसके लिए पुराने युग की समाप्ति और नये युग का प्रारंभ सूचित करता है। इसका महत्व अपने लिए ही नहीं, वरन् एशिया एवं सम्पूर्ण विश्व के लिए भी है, क्योंकि यह राष्ट्रों की बिरादरी में एक नवीन शक्ति के प्रवेश का द्योतक है जिसमें अवर्णनीय संभाव्य शक्तियाँ सन्निहित हैं। उसे मानव जाति के राजनीतिक, सामाजिक, साँस्कृतिक एवं आध्यात्मिक भविष्य के निर्धारण में एक महती भूमिका निभानी है।
भारत केवल अपने भौतिक हितों की सिद्धि के लिए, विस्तार, महानता, शक्ति और समृद्धि पाने के लिए नहीं उठ रहा, यद्यपि इनकी भी उसे उपेक्षा नहीं करनी होगी, और निश्चय ही वह दूसरों की तरह अन्य देशों पर आधिपत्य जमाने के लिए भी नहीं उठ रहा, वरन् वह उठ रहा है समूची मानव जाति के सहायक और नेता के रूप में परमेश्वर और जगत हितार्थाय जीने के लिए भारत अपनी महान भूमिका में पुनः प्रतिष्ठित होगा। एशिया पुनरुत्थान तथा स्वातंत्र्य उसका मुख्य लक्ष्य होगा। इसके साथ ही साथ सम्पूर्ण मानव समुदाय के लिए एक नये, अधिक महान, उज्ज्वल और श्रेष्ठ जीवन का उदय होगा जो अपनी सम्पूर्ण चरितार्थता के लिए बाहरी तौर पर राष्ट्रों की पृथक् सत्ता के अन्तर्राष्ट्रीय एकीकरण पर आधारित होगा। भारत उन्हें सुरक्षा और सुदृढ़ता प्रदान करेगा, साथ ही उन्हें एक दूसरे के सन्निकट लाकर एक सार्वभौमिक एकता प्रदान करेगा। वह अपने आध्यात्मिक ज्ञान का और जीवन को आध्यात्मिक बनाने के साधनों का सारे मनुष्य समुदाय को दान करेगा और इसी क्रम विकास में एक और नया कदम चेतना को उच्च स्तर पर उठा कर जीवन की उन अनेक समस्याओं का हल करना आरंभ कर देगा जिन्होंने मनुष्य जाति को तभी से हैरान और परेशान कर रखा है जब से उसने वैयक्तिक पूर्णता और पूर्ण समाज के विषय में सोचना और स्वप्न देखना शुरू किया था।
श्री अरविन्द के अनुसार मानव जाति का एकीकरण प्रगति के पथ पर है, चाहे वह अभी अधूरा आरंभिक स्तर पर ही क्यों न हो, वह संगठित किया जा चुका है और भारी कठिनाइयों के विरुद्ध संघर्ष कर रहा है। परन्तु उसमें बल और वेग है और यदि इतिहास के अनुभव को मार्गदर्शक माना जा सके तो, वह अनिवार्य रूप से बढ़ता चला जायगा और अन्त में विजयी होगा। इस कार्य में भारतवर्ष की ऋषि सत्ताओं ने सक्रिय रूप से प्रमुख भाग लेना प्रारंभ कर दिया है। विश्व को उनका अजस्र आध्यात्मिक अनुदान मिलना प्रारंभ हो ही चुका है। भारत की आध्यात्मिकता यूरोप और अमेरिका में नित्य बढ़ती हुई मात्रा में प्रवेश कर रही है। यह आन्दोलन बढ़ेगा। प्रस्तुत काल की विपन्नताओं-विपदाओं के बीच अधिकाधिक लोगों की आंखें आशा के साथ भारत की और मुड़ रही हैं और न केवल उसकी शिक्षाओं का, वरन् उसकी अन्तरात्मिक और आध्यात्मिक साधना का भी अधिकाधिक आश्रय लिया जा रहा है।
उज्ज्वल भविष्य का निर्धारण परम इच्छाशक्ति का निर्धारण है और तदनुरूप ही उच्च स्तरीय आदर्शवादी विचारक्रान्ति का श्रीगणेश भी हो चुका है। इस महा अभियान ने भारत सहित समूचे पाश्चात्य जगत के दूरदर्शी विचारकों-मनीषियों को अपने वश में करना शुरू कर दिया है। इस मार्ग में यद्यपि अन्यान्य मार्गों की अपेक्षा जबर्दस्त कठिनाइयाँ हैं फिर भी समय रहते वे सभी निरस्त होंगी। अगले दिनों जो भी विकासक्रम घटित होने जा रहा है वह आत्मा और अंतर्चेतना की अभिवृद्धि द्वारा ही होगा। उसका शुभारंभ भारतवर्ष करेगा और वही आन्दोलन का केन्द्र होगा, तथापि इसका कार्यक्षेत्र विश्वव्यापी होगा। भारत का भविष्य उज्ज्वल है इस सुनिश्चितता पर सबको विश्वास करना चाहिए।
देवत्व की रक्षा करने से बढ़कर और कोई धर्म नहीं और देवत्व अपनाने से बढ़कर और कोई कर्तव्य नहीं।
“पावन वर्ष बसन्त कह रहा,
हम उपास्य को भूल न जायें।
नहीं बहाएँ आँसू ही हम,
सृजन कार्य का शंख बजायें।”
इन पंक्तियों के सस्वर गायन के साथ पूज्य गुरुदेव के जीवन वृत्त पर बनी विराट प्रदर्शनी के उद्घाटन के पश्चात् 1991 के बसन्तपर्व का शुभारंभ हुआ। वन्दनीया माताजी ने पाँच हजार परिजनों को उद्बोधन देते हुए कहा- “इस अवसर पर जुदाई का दर्द, एक पीड़ा, एक कसक हम सबके मन में है। किन्तु यह बसन्तपर्व जो स्थूल शरीर से पूज्य गुरुदेव की अनुपस्थिति में पहला है, हमें सतत् अपनी जिम्मेदारियों की याद दिला रहा है। वे सूक्ष्म व कारण शरीर से संव्याप्त होकर सतत् हमें स्मरण दिला रहे हैं कि जो कार्य अधूरा छूटा पड़ा है उसे उन ब्रह्मबीजों को पूरा करना है जो ब्रह्म कमल के रूप में विकसित होने के लिए वे छोड़ गए हैं।”
वंदनीया माताजी ने भावविह्वल होकर हृदय को छू लेने वाली अपनी वाणी में कहा कि “यह दीक्षा दिवस है, संकल्प दिवस है। आँसू सहज ही उन्हें याद करके आते हैं फिर भी दृढ़तापूर्वक रोक लगानी होगी। पूज्य गुरुदेव अपने आध्यात्मिक जन्मदिवस पर कभी आँसू पसन्द नहीं करते थे। न खुशी के, न दुख के। वे तो इस समय ऊपर से बैठे यह देख रहे हैं कि जिन दायित्वों को वे छोड़ कर आए हैं, उन्हें निभाया गया ही नहीं। कार्यों में वृद्धि हुई या नहीं?”
“आज से एक वर्ष पूर्व ही उनने “बसंतपर्व पर महाकाल का सन्देश” नामक परिपत्र लिखा था 80 ब्रह्म कमल के खिलने व अब मुरझाने जा रहे स्थूल शरीर की उनकी भविष्य वाणी थी। साथ ही यह भी लिखा था कि युग परिवर्तन का बीजारोपण हो चुका। अब खाद पानी भर देना शेष है। यह कार्य परिजन कर सकें, इसके लिए उन्हें परिपूर्ण शक्ति मिल सके, इस प्रयोजन के लिए बाधक बन रहे, विद्रोही रहे शरीर रूपी पिंजर से वे मुक्ति चाहते थे। इस मुक्ति की पूर्व घोषणा गायत्री जयंती से 5 माह पूर्व ही बसंत की पूर्ववेला में उनने कर दी थी।”
वन्दनीया माताजी ने यह बताते हुए आश्वासन भरे शब्दों में कहा कि “वे मुझे हर बच्चे को स्नेह-ममता बाँटते रहने का तथा उँगली पकड़ कर मार्ग दिखाते रहने का दायित्व सौंप गए हैं, जिसे मैं सतत् निभाती रहूँगी। यह मिशन हजारों-लाखों वर्षों तक चलेगा क्योंकि दैवी शक्ति इसके साथ है। ऐसे सबल हाथों में-शक्तिशाली, समर्थ, परोक्ष सत्ता के हाथों में मिशन का सूत्र संचालन है कि, न तो किसी को शंका करनी चाहिए, न ही भटकना चाहिए। यदि यह व्यक्ति पर टिका मिशन होता तो व्यक्ति के साथ ही समाप्त भी हो जाता। यह शक्ति पर टिका अभियान है, दैवी अभियान है। विवेकानन्दों-निवेदिताओं ने अभी अपनी प्रसुप्त क्षमता को पहचाना नहीं है। यदि सभी जाग्रत आत्माओं को यह अनुमान हो सके कि वे क्या हैं व किन उद्देश्यों के लिए उनका अवतरण हुआ था तो देखते-देखते प्रतिकूलताओं के बीच भी नवसृजन होता चला जाएगा। पूज्यवर की परोक्ष जगत से व मेरी प्रत्यक्ष जगत से तपश्चर्या इन्हीं उद्देश्यों के निमित्त है।”
अंत में वन्दनीया माताजी ने कहा कि गुरु शिष्य परस्पर मजबूत धागों से जुड़ें होते हैं। आज गुरुजी का बोध दिवस है जन्मदिवस है। इस अवसर पर सब उन्हें श्रद्धाँजलि दें इस संकल्प के रूप में कि आजीवन गुरुदेव के पद चिन्हों पर ही सब चलेंगे, वैसा ही उल्लास मन में बनाए रखेंगे तथा विद्या विस्तार के सभी महत्वपूर्ण दायित्वों को अंतिम स्थिति तक पहुँचा कर रहेंगे। लोक मंगल के लिए ही सबका समर्पित जीवन होगा। घर घर में गुरुजी के विचार पहुँचा कर ही रहेंगे।”
“अंतर के निर्मल प्यार हो तुम, भगवान मेरा संसार हो तुम” वंदनीया माताजी के स्वर में गायी गई इन पंक्तियों के साथ भाव भरे वातावरण में वंदनीया माताजी का उद्बोधन समाप्त हुआ। अखण्ड दीपक के दर्शन व नमन-वन्दन के पश्चात् संध्याकाल में सभी ने नये बने प्रज्ञा रथों के 100 इंच के पर्दों पर नयी बनी तीन वीडियो फिल्में देखीं। इस वर्ष का बसंत नये संकल्प, नये उल्लास के साथ इस प्रकार सम्पन्न हुआ।
*समाप्त*