आज की परिस्थितियों में आस्तिकता एवं ईश्वर की नयी प्रगतिशील व्याख्या करना अनिवार्य हो गया है। पारम्परिक शब्दावली में इनसे वही भाव निकलता है जो आप्त वचनों की दुहाई देते हुए अगणित धर्मोपदेशक कहते रहते हैं। वस्तुतः आस्तिकता ईश्वरीय अनुशासन को कूट-कूटकर अपने चिंतन-चरित्र एवं व्यवहार में समाविष्ट कर लेने का नाम हैं। जो आस्तिक है वह भले ही मन्दिरों, पूजा-गृहों में न जाता हो पर यदि वह परमसत्ता का अनुशासन जीवन में उतारता है, जीवन सही ढंग से जीता है, सृष्टि को एक उद्यान मानते हुए माली की तरह उसकी सिंचाई करता है तो वह सच्चे अर्थों में आस्तिक है। नास्तिक तो वह हैं जो बाह्याडंबर कितने ही रचता हो, दिखता तो धार्मिक हो पर जीवन के किसी भी कोने से आदर्शवाद, सच्चरित्रता, उत्कृष्टता का एक अंश भी न झलकता हो।
ईश्वर वह निराकार ब्राह्मी सत्ता है जो सत्प्रवृत्तियों के, आदर्शों के, सद्गुणों के, श्रेष्ठता के समुच्चय के रूप में तथा समष्टिगत अनुशासन के रूप में हमारे चारों ओर विद्यमान है। वह सत्ता हमें भले दिखाई न दे, हमारे रोम-रोम में बस कर हमें प्रतिक्षण अपने अस्तित्व का आभास कराती है। यदि ईश्वर की इस रूप में हमें सतत् अनुभूति होने लगे तो हमारे जीवन के क्रिया कलाप बदल जाएँगे हम सही अर्थों में आस्तिक कहलाने योग्य होंगे।
थक चुकी आंखें निस्तेज हो गई। पैर तपती रेत में झुलस रहे थे। शरीर पर पड़ते-उड़ रहे गरम रेत कण अंगारों की बौछार का अहसास करा रहे थे। मरुभूमि की गर्मी, दावानल सी धधकती धूप, अंगार वृष्टि करती मार्तण्ड रश्मियाँ किसी को भी बेहाल करने के लिए काफी है। उनके पास का जल कब का समाप्त हो चुका। थोड़ा बहुत जो बचा भी था, वह या तो कमण्डलु की उष्णता ने सोख लिया अथवा सूर्य रश्मियों से एकाकार हो गया। अब....?
इस विकट प्रश्न का उत्तर, ऐसे भीषण क्षणों में? जीवन नश्वर है इस तथ्य से ऋषि अपरिचित हो, ऐसा नहीं था। व्यथा-वेदना विकलता की हलचलें जीवन की परिधि तक ही होती हैं। मृत्यु तो इस सीमा से ऊपर उठ जाना है। मोह जीवन का नहीं-भय मृत्यु से नहीं किन्तु इन दोनों की मध्यवर्ती स्थिति कितनी असह्य होती है- यह बोध शब्दगम्य नहीं अनुभूतिगम्य है। ऋषि इस समय यही अनुभूति पा रहे थे। होठों पर जीभ फिराई। पर सूखे होठों पर सूखी जीभ फिराने का क्या औचित्य? किन्तु शुष्कता तो चतुर्दिक् थी। बाह्य परिवेश ही नहीं शरीर संस्थान की आर्द्रता की रही बची अन्तिम बूँद भी लगा निचुड़े बिना न रहेगी। ऐसे में....।
याद हो आई उनकी, उनके वचनों की जो प्रकृतिगत दीखते हुए भी प्रकृति से परे और प्रकृतिमय थे। समूचा घटनाचक्र मनः चक्षुओं के सम्मुख कुलाल-चक्र की तरह घूम गया। महाभारत युद्ध की समाप्ति के बाद योगेश्वर कृष्ण द्वारिका लौट रहे थे। वहीं मार्ग के एक वट वृक्ष की छाया में वह साधनारत थे उन्होंने ऋषि को प्रणाम किया- ऋषि की क्रान्तदर्शी आँखों ने नर देह धारी नारायण को पहचान लिया। विचार विनिमय के बीच कौरव-पाण्डव विग्रह की चर्चा चल पड़ी। हुए महासंहार की विस्तृत शृंखला की प्रत्येक कड़ी से कृष्ण ने उन्हें अवगत कराया।
सुनकर उनका मन कातर हो उठा। उनकी आँखों से संवेदना झर उठी। सहृदयता-कारुणिक संवेदनशीलता के इस अद्भुत संगम को देख कृष्ण प्रभावित हुए बिना न रहे। उन्हें धीरज बँधाते हुए वे बोले उत्तंक तुम अपने लिए कुछ माँग लो। वाणी में आए बदलाव एवं स्वरों के गाम्भीर्य ने ऋषि श्रेष्ठ उत्तंक को चकित कर दिया। एक पल को वे न सोच पाए कि वह कौन बोल रहा है। यह तो स्व में अधिष्ठित ऋषिकेश की वाणी थी।
निष्काम साधक गदगद कण्ठ से बोल उठा “आपके दर्शन के बाद भी किसी वरदान की अपेक्षा रह जाती है प्रभु।” अत्यन्त आग्रह करने पर वह बोले “मुझे किसी चीज के अभाव की अनुभूति न हो।” कथन को संशोधित करते हुए श्री कृष्ण ने कहा “भाव और अभाव की अनुभूति तो मानवी चेतना की प्रकृति हैं। हाँ आपको जब किसी चीज की आवश्यकता होगी उसकी पूर्ति हो जाय करेगी।” और आज इस समय...।
तभी उनकी निर्जीव हो रही आँखों ने एक चाण्डाल को देखा। ऐसे समय चाण्डाल की उपस्थिति आश्चर्य तो हुआ-पर उपेक्षा से आँखें बन्द कर लीं-फेरने लायक सामर्थ्य तो बची न थी। आखिर अस्पृश्य चाण्डाल से किसी सहायता की अपेक्षा तो की नहीं जा सकती। ऊँच नीच की भेद बुद्धि -कहीं अचेतन में गहरे जमे संस्कार साधना से समतल की गई मनोभूमि को अपने तुमुल- ताण्डव से ऊबड़-खाबड़ करने लगे। वह सामने खड़ा कह रहा था “आप प्यास से विकल है महाराज! मेरे पास पर्याप्त जल है, कृपया ग्रहण करें।” “दूर हट।” अपनी रही बची सामर्थ्य को समेट- बटोर कर मुश्किल से वे दो शब्द कह सके। वह सिर नवा कर चला गया।
इतने में ऋषि को किसी सुकोमल स्पर्श की अनुभूति हुई। स्पर्श ने उनको नयी चेतनता दी। आँखें खोल कर देखा -स्वयमेव श्री कृष्ण थे। वह कह रहे थे “महर्षि उत्तंक। समता ,निर्मलता, प्रेम तथा वसुधैव कुटुम्बकम की अनुभूति के बिना न सिर्फ ध्यान और समाधि असम्भव हो जाते हैं, बल्कि व्यावहारिक जगत में भी दुःख के फव्वारे फूटते रहते हैं। आपकी विकलता का कारण यही है। आपके द्वारा लौटाए गए चाण्डाल के रूप में स्वयं इन्द्र थे, जो आपके लिए अमृत कलश लेकर आए थे।”
ऋषि का अन्तराल पश्चाताप से भर गया। पश्चाताप का कारण अमृत न पी पाना नहीं बल्कि उस कारण की अनुभूति थी जिसकी वजह से अनथक साधना के बाद भी समाधि नहीं सिद्ध हो पायी। उमड़े पश्चाताप के ज्वर ने भेद-बुद्धि को धो दिया। इसी समय बादलों के समूह ने उन पर जल कणों की वृष्टि की। भेदभाव भी घुल गया व वे परम लोक को चल दिए।
कभी यह मान्यताएँ रही हैं कि बीमारियाँ ऋतु परिवर्तन से ,मक्खी मच्छरों से, वात-पित्त-कफ के प्रकोप से, विषाणुओं से, छूत से फैलती हैं। गन्दगी भी उनका एक मुख्य कारण है। किन्तु अब प्रगतिशील विज्ञान ने गहराई में उतर कर यह निष्कर्ष निकाला है कि चेतना को उद्वेलित करने वाले मन की विकृतियाँ रक्त को, तापमान को, अवयवों की ऊर्जा को प्रभावित करती है। इसी कारण सजातीय द्रव्य विजातीय में परिवर्तित होता है और जहाँ कहीं से इसे फूट निकलने का अवसर मिलता है वहीं ज्वर, दर्द, सूजन, जकड़न आदि की समस्याएँ पैदा हो जाती हैं।
उपचार करने वाले पीड़ा देने वाले अंग को टटोलते हैं और कुछ ऐसा करते हैं ताकि वह अंग सामयिक रूप से सुन्न बने और पीड़ा का अनुभव कम हो। इसके अतिरिक्त इन्जेक्शन समूचे रक्त में रोग विरोधी तत्व भरते हैं अथवा अधिक विकृत अंग को शल्य क्रिया द्वारा पृथक कर दिया जाता है। प्रचलित अनेकों चिकित्सा विधियाँ सिद्धान्त के इर्द- गिर्द घूमती हैं। कारण और निवारण की पुरातन मान्यताओं को ही मिला जुला कर निदान और उपचार किया जाता है। फिर भी रोग नियन्त्रण में नहीं आते। चिकित्सक और चिकित्सालय बढ़ते जाते हैं, पर उसी अनुपात से रोगों में भी बढ़ोतरी हो रही है। वे घटने में नहीं आते। बहुत बार तो ऐसा भी होता है कि नये रोग, नई आकृति प्रकृति धारण कर इस रूप में सामने आते हैं कि चिकित्सक समझ तक नहीं पाते कि रोग क्या है? उसकी उत्पत्ति कैसे, किस अजनबी कारण से हुई और उसका उपचार क्या होना चाहिए?
इन असमंजसों के बीच एक तर्क, तथ्य और प्रमाण पर आधारित निष्कर्ष यह निकला है कि चेतना स्तर की तरह आरोग्य और रुग्णता का केन्द्र मस्तिष्क है और उसी केन्द्र में कहीं गड़बड़ी पड़ने पर बीमारियों का सिलसिला चल पड़ता है। उड़ते बादलों में जैसे कई आकृतियाँ बनती बिगड़ती रहती हैं उसी प्रकार रोग भी अनेक नाम- रूपों में प्रकट होते रहते हैं।
जीवन और मरण का प्रत्यक्ष केन्द्र कभी हृदय माना जाता था। अब उसमें इतना और जुड़ गया है कि हृदय की धड़कन बहुत कुछ संस्थान पर निर्भर है और जीवन मरण का अन्तिम निर्णायक भी वही हैं। धड़कन बन्द हो जाने पर यदि मस्तिष्क में क्रियाशीलता विद्यमान हैं तो उसे मृतक नहीं जीवित ही माना जाएगा।
मस्तिष्कीय रोगों को दो भागों में विभक्त किया जा सकता है। एक संरचना क्षेत्र के, दूसरे संवेदना क्षेत्र के। संरचना क्षेत्र में चोट, अनिद्रा, सिरदर्द, ट्यूमर, हैमरेज, संक्रमण आदि की गणना की जा सकती है। इनका उपचार औषधियों से अथवा शल्यक्रिया से होता है। जन्मजात अविकसित मस्तिष्क के पीछे प्रायः अनुवाँशिकी रहती है। गर्भकाल में भ्रूण पर औषधियों के, चोट के, एक्सरे के आघात लगने से भी बच्चा मानसिक दृष्टि से अपंग हो सकता है। इन कठिनाइयों का समाधान क्या हो? इस संदर्भ में शरीर की माँसपेशियों एवं कोशिकाओं को उलटा पुलटा जा रहा है और निराकरण का उपाय सोचा जा रहा है।
मस्तिष्क का दूसरा कोमल पक्ष संवेदनात्मक है बुद्धि कौशल को तो प्रशिक्षण, वातावरण एवं अनुभव के साथ जोड़ा जाता है और इसके संवर्धन का उपाय समाज व्यवस्था में फेर करने के रूप में सोचा जा रहा है। किन्तु संवेदनायें विशुद्ध वैयक्तिक हैं। वे चिन्तन के अभ्यास से संचित-संस्कारों पर निर्भर है। कोई व्यक्ति बड़ी घटना को भी छोटी मानता है और किन्हीं की कल्पना में घटना भी पहाड़ तुल्य भारी होता है। इस हलकेपन और भारीपन का अचेतन, सुपर चेतन क्षेत्र में आघात लगता है। कभी- कभी तो वह सहज होता है और समय के साथ- साथ अनुभूतियाँ धीमी पड़ती जाती हैं किन्तु कभी कभी वे इतनी असह्य होती हैं कि चिंतन तंत्र को ही बुरी तरह झकझोर देती हैं। साथ ही ऐसी स्थिती बना देती हैं कि मानस सही तरीके से सोचने समझने में समर्थ न रहे और प्रवाह जिस ओर भी चल पड़े, फिर रोके न रुके।
समग्र विक्षिप्तता की यही स्थिति है। इसमें रोगी सामाजिक शिष्टाचार, जीवन निर्वाह एवं अनिवार्य दायित्वों तक की अपेक्षा करने लगता है। यह अपेक्षाएँ अनचाहे, अनजाने ही बन पड़ती हैं।
पागलखानों में रोगी इसी प्रकार के होते हैं। वे अपनी जीवन रक्षा और साथियों के प्रति जिम्मेदारी को भी वहन नहीं कर पाते। ऐसी दशा में उन्हें सुरक्षा की दृष्टि से भी और चिकित्सा की आवश्यकता की दृष्टि से भी पागलखानों में भर्ती किया जाता है।
विचारणीय है कि संरचना घटक यथावत् होते हुए भी ऐसी स्थिती किस प्रकार उत्पन्न हुई? खोज यह बताती है की उन्हें कोई सामाजिक विग्रह से उत्पन्न मानसिक आघात लगा है। किसी प्रियजन की मृत्यु, अपमान, विश्वासघात, भयावह दुर्घटना के दृश्य आदि कारणों से ऐसा हो जाता है कि संवेदना क्षेत्र में असाधारण उथल-पुथल हो जाती है। फलतः संरचना क्षेत्र भी उससे प्रभावित होता है और शारीरिक क्रिया कलापों तथा मस्तिष्क के ऊर्जा केन्द्रों की स्थिती विपन्न हो जाती है।
इस विश्लेषण से इस निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि अतिशय बढ़ी चढ़ी भावुकता भी एक विपत्ति की तरह है। घटनाक्रमों को देखा समझा तो जाय, पर उनका इतना गहरा प्रभाव न पड़ने दिया जाय कि बहुमूल्य मानस तंत्र की कार्यक्षमता से ही हाथ धो बैठना पड़े।
असाधारण और अप्रत्याशित घटनाएँ प्रायः मस्तिष्क पर असह्य दबाव डालती हैं और उनका प्रभाव हलकी भारी विक्षिप्तता जैसा बन जाता है। यह खतरा अतिभावुकों को अधिक रहता है। विचारशील लोग संसार में परिवर्तनों को सामान्य दृष्टि से देखते हैं।
अध्यात्म तत्वदर्शन का उद्देश्य मानवी मस्तिष्क को ज्ञानी उदासीन जैसा बना देने का है। स्थितप्रज्ञता इसी को कहते हैं, जिसमें प्रिय-अप्रिय दोनों ही प्रकार की प्रभावपूर्ण घटनाओं को हलका करके आँका जाय और समझा जाय की इस परिवर्तन भरे संसार में संयोग-वियोग के, हानि-लाभ के, मानापमान के द्वन्द्व तूफान की तरह उठते और झाग की तरह बैठते रहते हैं। जब सुख की स्थिति चली गई तो दुःख की पीड़ा भी सदा क्यों बनी रहेगी? समय बदलेगा और मन को किसी अन्य दिशा में मोड़ देगा। इस स्तर का तत्वज्ञान यदि हृदयंगम किया जाता रहे तो असह्य घटना भी सह्य स्तर पर वहन कर ली जाती है और मानसिक उद्वेग उत्पन्न होने पर शाँति और स्थिरता बनी रहती है। यही सही जीवन जीने की कला है।
विद्वान कैयट का विवाह तो हो गया था पर पति पत्नी ने मिलकर एक समझौता किया था कि पत्नी सच्चे अर्थों में उनकी सहयोगिनी रहेगी। उनके साहित्य सृजन कार्य में गृहस्थ का जंजाल बढ़ाकर बाधक ना बनेगी।
कैयट सृजन कार्य में निरत रहते। पत्नी आश्रम के समीप से मूँज काट कर रस्सी बंटती और उसे बाजार में बेच कर भोजन वस्त्र का सामान खरीद लाती।
इस प्रकार बीस वर्ष हो गये। पति के बाल सफेद हो चले। पुस्तक पूरी हुई तो कैयट ने ध्यानपूर्वक पत्नी का चेहरा देखा। प्रथम बार ही ऐसा अवसर आया जब दोनों ने एक दूसरे को पति पत्नी की आँखों में देखा हो। अब तक वे दोनों मित्र-मात्र बनकर रह रहे थे।
कैयट का मन पत्नी की गृहस्थ संबंधी इच्छा जाँचने का हुआ। उत्तर में भामती ने कहा अब तक आपने लिखा है। अब आप इस साहित्य को अन्य विद्वानों तक पहुँचाने और छात्रों को पढ़ाने में लगायें। लेखन और अध्यापन दोनों कार्य मिलकर समग्र बन जायेंगे।
कैयट ने आश्रम बना लिया गुरुकुल चलाया। विद्वानों और छात्रों के लिए भामती सारी व्यवस्था जुटाती। कैयट अध्यापन कार्य में लगे रहते। दोनों ने ब्रह्मज्ञानी और ब्रह्मवादिनी का आदर्श जीवन जिया।
मनुष्यों में से अधिकाँश का जीवन किसी न किसी प्रकार के सपने देखते हुए बीतता है। ऐसे कम ही लोग हैं जो वस्तुस्थिति जानते और यथार्थता की पृष्ठभूमि में समय बिताते हैं। तत्वज्ञान का उद्देश्य मनुष्य को सत्य और असत्य की पहचान कराना है और उस भगवान तक ले पहुँचना है जिसे सत्य नारायण कहते हैं। हम सत्य नारायण की कथा तो कहते सुनते हैं पर निर्वाह झूठ के वातावरण में करते हैं।
मनुष्य बचपन से ही सीखना आरंभ करता है। अभिभावक और परिवारी जो भाषा बोलते हैं, जैसा भोजन करते हैं, जैसी गतिविधियाँ अपनाते हैं, वैसी ही बालक भी अपनाने लगता है। अनुकरण प्रिय स्वभाव उसे नियति के उपहार स्वरूप मिलते हैं। वह जो देखता है उसी की नकल करने लगता है। कालान्तर में यही उसका स्वभाव बन जाता है। धीरे- धीरे यह मान्यता आस्था बनती और उसी साँचे में चरित्र व्यक्तित्व ढल जाता है।
आवश्यक नहीं की एक व्यक्ति की जो मान्यता है, जैसी आदतें है, वैसी ही अन्य वातावरण में पले व्यक्ति का स्वभाव भी हो। दोनों के बीच भारी असमानता हो सकती है। यहाँ तक की सर्वथा विपरीत रुख भी हो सकते हैं। कसाई के घर जन्में और जैन धर्मी के यहाँ पले बालक की प्रकृति सर्वथा भिन्न हो सकती है। एक माँसाहार में स्वाद लेता और औचित्य देखता है। जबकी दूसरे को उससे सर्वथा घृणा होती है और पाप भी प्रतीत होता है।
यह स्वभाव-अभ्यास की परतें इतनी मोटी और गहरी बन जाती हैं कि अपना पक्ष ही तथ्य और सत्य प्रतीत होता है। बुद्धि पूर्वाग्रहों का ही समर्थन करती हैं। उसकी उपमा चतुर वकील से की गई है जो मोटी फीस देने वाले मुवक्किल के पक्ष में ढेरों तर्क और सबूत जुटा देता है। वेश्या को जहाँ भी लालच दीखता है वही प्रेम प्रदर्शित करने लगती है। उचित-अनुचित का विभाजन करना ऐसों के लिए बहुत ही झीना होता है।
आत्म समीक्षा बहुत कठिन है। यह तभी संभव है जब अनेक मान्यताओं का बारीकी से अध्ययन किया गया हो। साथ में इतनी निष्पक्षता भी हो कि अपने पराये पूर्वाग्रहों को निरस्त करके सच्चाई की गहराई तक पहुँच सकना संभव हो। कभी कभी ऐसा भी होता है की सहानुभूति का झुकाव किसी एक स्थापना की ओर ढुलकने लगे तो फिर यह संभव नहीं रहा की यथार्थता की रक्षा हो सके। जिस धर्म, जाति, पड़ोस या वातावरण के साथ अपना गहरा संबंध रहा है, उसकी छाया न्यूनाधिक मात्रा में बनी रहती है। तराजू का काँटा तनिक सा फर्क रहने पर पलड़े को ऊँचा नीचा कर देता है। सच्चाई को खोज निकालना ही कठिन है फिर उसको अपनाना तो और भी अधिक जटिल है।
मान्यताओं का भ्रम भी एक प्रकार का सपना है, जिसके दबाव में मनुष्य उसी प्रकार से सोचता और वैसा ही क्रिया- कलाप अपना लेता है। इस संदर्भ में उसे यह संदेह भी नहीं होता कि जो अपना लिया गया है वह अपने लिए या सर्वसाधारण के लिए कितना उपयोगी या उचित है।
अन्यान्य मान्यताओं वाले लोगों की भी यही गति होती है। वे अपनी मान्यताओं को अपनाये रहते है। इस प्रकार विभेद की खाई चौड़ी होती रहती है और बैर-विग्रह के स्तर तक जा पहुँचती है। सम्प्रदाय-सम्प्रदायों के बीच, देश-देशों के बीच, जाति-जातियों के बीच इसी प्रकार मारकाट मचती रहती है कि पक्ष-विपक्ष को अपनी ही मान्यता सच मालूम पड़ती है और भिन्न विचार वालों पर सारा दोष थोप दिया जाता हैं। सब ओर से न्याय और औचित्य की दुहाई दी जाती है पर वस्तुतः किस की बात में कितनी सच्चाई का अंश है यह कहना कठिन है। ऐसी दशा में सत्य का अवलम्बन किस प्रकार बन पड़े और वास्तविकता और औचित्य किस प्रकार सूझे?
सत्य का अवलम्बन लिए बिना न कोई चैन से बैठ सकता है और न बैठने दे सकता है, न जीतता है न जीतने दे सकता है। जिस समता और एकता की नितान्त आवश्यकता है उन्हें इन विरोधों के रहते प्राप्त नहीं किया जा सकता। उस उपलब्धि के बिना न्याय की रक्षा नहीं हो सकती और न ऐसा कुछ हो सकता है कि मैत्री निभ सके और हँसती-हँसाती जिन्दगी जी सकना संभव हो सके।
दार्शनिक विचारणायें भी इतनी ही जटिल हैं। ईश्वर, आत्मा, परलोक, अवतार, चमत्कार एवं पौराणिक मिथकों के संबंध में किसे सच माना जाय? किसे झूठ? विशेषतया तब,जब कि भिन्न-भिन्न मत मतान्तरों में न केवल भिन्न वरन् सर्वथा प्रतिकूल अभिव्यक्तियों की भरमार है। इनमें से किसी एक को सच तथा अन्य सबों को झूठ भी नहीं कहा जा सकता। इसी प्रकार सबको सही ठहराने पर भी जमीन आसमान जैसी भिन्नताओं के रहते समन्वय की बात भी नहीं बनती। यह हो सकता है कि अपनी मान्यता को प्रमुखता देते हुए अन्य मतों के प्रति उपेक्षा सहिष्णुता के भाव रखे जायँ। यह मन समझाने और किसी प्रकार तालमेल बनाये रहने का काम चलाऊ उपचार मात्र है।
अच्छा होता, निष्पक्ष मनीषियों की एक प्रतिनिधि पंचायत बनती और वह तथ्यों का पता लगाने की अपेक्षा इतना भर निष्कर्ष निकालती की किन मान्यताओं को अपनाने से व्यक्तिगत चरित्र-निष्ठ और समाजगत न्यायशीलता की रक्षा किस प्रकार हो सकती है? इन निष्कर्षों को स्वीकारने अपनाने के लिए मूर्धन्य विज्ञजन सहमत हो। उनका तर्क, तथ्य, प्रमाण और उदाहरणों समेत प्रतिदिन विचार करें तो धीरे धीरे अन्य विचारशील लोग भी उसे अपनाते चले जायेंगे। मनुष्य की जहाँ हठवादिता की प्रकृति है, वहाँ उसे विवेक के प्रति भी श्रद्धा है। विवेक एवं न्याय के पक्षधर यदि आगे आवें तो दुराग्रहों की कट्टरता-का बहुत हद तक समाधान हो सकता है।
विलास, व्यामोह, अहंकार, पूर्वाग्रहों के स्वप्नों में उलझते सुलझते लोग, अपना-अपना ताना बाना बुनते रहते हैं और अपने ढंग की अनोखी रीति-नीति विनिर्मित करते हैं। सपने भी तो हर रात हर व्यक्ति अलग-अलग प्रकार के देखता है। उन्हें मनोरंजक उड़ाने समझकर सन्तोष कर लेता है। इसी प्रकार संसार भर में फैली हुई विविध मान्यताओं के संबंध में यदि ऐसी उड़ी दृष्टि रखी जाय तो कहीं अच्छा है कि उसमें से किसी एक की परिपूर्णता पर पूरा ध्यान दिया जाय।
सत्य की तलाश एवं उपलब्धि के लिए यह उपयुक्त होगा कि प्रचलित अनेकानेक मान्यताओं में उलझने की अपेक्षा मात्र मानवी गरिमा और सामाजिक सद्भावना की बात सोची जाय और उतने पर ही जोर दिया जाय जिसमें कि न्यायोचित की, एकता और समता की, समझदारी, ईमानदारी की रक्षा होती हो।
मनुष्य प्राणियों में श्रेष्ठ और धरती का देवता माना जाता है। उसे स्मरण रखना चाहिए कि चिन्तन, चरित्र और व्यवहार की उत्कृष्टता हर हालत में बनाये रखी जाय, भले ही इसमें कितनों का विरोध सहना अथवा घाटा उठाना पड़ता हो। आदर्शों के प्रति दृढ़ता और उस मार्ग में चलते हुए कठिनाइयों से जूझना यही तपश्चर्या है और इसी को शौर्य साहस कहते हैं। यदि इतनी सीमा में रहते हुए अपने व्यक्तित्व की उत्कृष्टता ढाल ली जाय, जनकल्याण में संलग्न रहा जाय, अनीति के प्रति जुझारू का रुख रखा जाय तो समझना चाहिए कि मनीषा की आवश्यक परिधि पर आधिपत्य स्थापित कर लिया गया।
हाथरस (उत्तर प्रदेश) के पास सासनी नाम का एक कस्बा है। उसके समीप जंगल में एक फूटे खण्डहर वाली झाड़ियों से भरी एक जमीन थी। किसी ने परमार्थ कार्य की योजना लेकर उसे बनाया होगा। पर वह कार्य अधूरा ही रहा।
उसी क्षेत्र की एक बाल विधवा लक्ष्मी देवी इस सोच में थी कि शेष जीवन वैधव्य के दुर्भाग्य का रोना रोते हुए बिताने की अपेक्षा उसे सेवा कार्य में लगाया जाय। उन्हें अपने लिए सर्वसुलभ सेवा कार्य नारी शिक्षा में संलग्न हो जाना लगा।
उस झाड़ियों वाले खण्डहर को उन्होंने साफ किया और किसी प्रकार योजना बनायी कि वहाँ एक छोटी पाठशाला चल सके। छात्राएँ कहाँ से आये इस प्रश्न का हल भी उन्हें ही करना था। वे प्रातःकाल स्वयं ही समीपवर्ती गांवों में जाकर वहाँ से छात्राएँ साथ लाती और शाम को उन्हें घर पहुँचाने भी स्वयं जाती।
इस निष्ठ को देखकर ग्रामवासी प्रभावित हुए और उस विद्यालय को समुन्नत बनाने के लिए उत्साह भरी सहायता करने लगे। साधन जुटाने लगे।
समयानुसार सासनी का कन्या गुरुकुल सुव्यवस्थित होता चला गया। आज वह नारी शिक्षा का एक मात्र केन्द्र है। जो भी उधर जाता है एक एकाकी महिला द्वारा आरंभ किये उस पुरुषार्थ परमार्थ को देख कर दंग रह जाता है।
इधर कई दिनों से उदासी, संताप और व्यथा का बोझ बढ़ता ही जा रहा था। सिन्दूर-मिश्रित कपूर की आभा के लिए उनके गोरे मुख पर पीड़ा के चिन्ह स्पष्ट थे। हूणों का नेता मिहिरकुल आँधी-तूफान चक्रवात की तरह नगरों को उजाड़ता- फसलों को जलाता क्षत-विक्षत मानव देहों को रौंदता बढ़ा चला आ रहा है। प्रत्येक मालव आज उद्विग्न है-फिर वो तो मालव सम्राट ठहरे। क्षण क्षण प्रतिक्षण आ रहे समाचार कानों में पिघला शीशा उड़ेल देते। पूरा अस्तित्व चरमरा कर रह जाता, किन्तु....।
पता नहीं कौन अनजानी शृंखलाएं उन्हें आबद्ध किए थी? न मालूम किस लौह दुर्ग में उनका शौर्य कैद था? धीरज रखिए महाराज। राज ज्योतिषी भास्कर मुनि के शब्दों ने उन्हें चौका दिया।”इस समय आप पर शनि की दृष्टि वक्री है, राहू द्वारा सीधे चंद्र स्थान को देखे जाने के कारण मनः सन्ताप स्वाभाविक है। ग्रहों के फेर ने किसे कष्ट नहीं दिया-फिर आप पर तो इस समय ये मारक हैं। ऐसे में कही सुरक्षित स्थान में रहना ही उचित है। ग्रह शान्ति के उपायों का मैंने प्रबंध कर दिया है।”
राज ज्योतिषी के शब्दों से साथ चल रहे महामंत्री भानु मित्र कसमसा कर रह गये। महाराज की ज्योतिष पर अंध श्रद्धा उन्हें कभी नहीं रुचती थी। जबकि यशोवर्मा को ज्योतिष से अगाध लगाव था। कई ज्योतिषी उनके यहाँ आश्रय पाते और अपनी विद्या का चमत्कार, भावी घटनाओं का पूर्वाभास कर दिखाते। इन चमत्कारों से फलित ज्योतिष में उनकी श्रद्धा बढ़ी। उन्हीं ज्योतिषियों में एक का कहना था कि सम्राट को कोई काम करने के पहले उसकी सफलता या असफलता को ज्योतिष के माध्यम से जान लेना चाहिए। अन्य ने भी इस का समर्थन किया। प्रस्ताव स्वीकृत हो जाने पर भविष्य में कोई भी काम करने से पहले ग्रहों का रुख तथा रेखाओं की स्थिति का अध्ययन किया जाने लगा।
की गई भविष्यवाणियाँ सच होती या न होती, पर इस गुणा भाग, जोड़-घटाव में इतना समय लगने लगा कि आवश्यक कार्यों में भी विलम्ब हो जाता। यहाँ तो शत्रु द्वारा आक्रमण होने पर मुकाबला न करने की सलाह दी जा रही थी। अपने सम्राट की उस अंध आस्था को देखकर अधीनस्थ अधिकारी और प्रजाजन बड़े खिन्न थे। समय पर काम न करने, भाग्य और देव आश्रित रहने से कार्यों में आवश्यक दायित्व बोध-अनुभव करने की प्रवृत्ति में ह्रास होना स्वाभाविक था। पुरुषार्थ परायण महामंत्री इससे पूर्व भी जब-जब सम्राट को सावधान करते, तब-तब उन्हें झिड़क दिया जाता था।
आज वह सूर्य की प्रथम रश्मि के साथ महाराज को लेकर घूमने निकले थे। भ्रमण के दौरान मार्ग में ही मिल गए राज ज्योतिषी- भास्कर मुनि द्वारा आज की गई चर्चा को याद कर तथा सोचकर ही महामंत्री ने कड़वा सा मुख बनाकर ऊपर की ओर देखा। पूर्व के आकाश में उषा की अरुण आभा दिखाई पड़ रही थी। जागरण के तप्त चुम्बन स्वरूप सूर्य भी धीरे-धीरे आ विराजे थे। प्रभाती की स्पर हिलोरें पृथ्वी के एक प्रान्त से दूसरे प्रान्त तक धावा मार रही थी।
समूची प्रकृति उल्लास में थी। चतुर्दिक् फैले इस उल्लास से घिरे-अकेले महाराज विषादग्रस्त थे। उनके विषाद का कारण...? तीखी नजर से महामंत्री ने राज ज्योतिषी की ओर देखा। फिर अपनी नजरें उस ओर से फेर कर महाराज को सचेत करते हुए बोले मिहिरकुल की सेनाएँ मथुरा से आगे बढ़ चुकी हैं।
“ओह! यशोवर्मा जैसे मूर्छा से जगे। तब तक राज ज्योतिषी ने फिर अपनी बातों का नशा देना शुरू किया। मंत्री महोदय ऐसे कठिन समय में युद्ध की ओर प्रेरित कर रहे हैं, जब राहू और शनि मारक है कितना भीषण होता है समय। ज्योतिष विद्या से अनजान, क्या समझेंगे आप?
“कब तक भाग्य, ग्रह दोष, समय का फेर, वक्र दृष्टि में उलझे रहेंगे महाराज”। भानुमित्र ने जैसे भास्कर मुनि के कथन को अनसुना कर दिया। उनकी आवाज में जन जन के मन की पीड़ा थी। हृदय वेदना से आकुल था। मन में जूझने, संघर्ष करने के लिए तूफान घुमड़ रहा था। वे बोल उठे- मथुरा के मन्दिर भस्मसात हो गए। शत-सहस्र लक्ष जनों की श्रद्धा के प्रतीक के रूप में अधिष्ठित देवमूर्तियाँ-आज धूल में मिल गयी है। मार्ग के ग्राम तक खण्डहर हो गए। सतियों को सतीव की रक्षा के लिए कुओं, सरोवरों और चिता की शरण लेनी पड़ी। अबोध शिशु पिशाचों के भालों पर उछाले गए। नृशंस आततायियों का अपार समुदाय उमड़ता चला आ रहा है अवन्ती की ओर। समस्त भारत भूमि की एक मात्र आशा मालव प्रान्त है और इस प्रान्त का प्रत्येक जन आपकी ओर देख रहा है
महामंत्री की बातें सम्राट यशोवर्मा की नसों में दौड़ रहे रक्त की संचार गति को तेज कर रही थी। रह-रह कर उनके अन्दर का जुझारू योद्धा खड़ा हो जाता, किन्तु शनि की वक्र दृष्टि व राहु के कोप का भय फिर उसे शिथिल कर देता। भास्कर मुनि पुनः महामंत्री की ओर आकर देख कर इस तरह हँसे-जैसे उनकी बातें बहुत बचकानी हों -”ग्रह गति को न समझने वाले लोग इसी तरह की बाते करते हैं। शनि का प्रभाव भगवान राम तक पर पड़े बिना नहीं रहा। चौदह वर्षों के वनवास का यही कारण था। युधिष्ठिर और नल को अपना राज्य गंवा कर वन-वन भटकना पड़ा। बुध की महादशा में राहु की अंतर्दशा का परिणाम है जो आप इस तरह की बाते कर रहे हैं।”
इन बातों को सुनकर महामंत्री ने जोरदार ठहाका लगाया। वे और कुछ कहते तभी उन तीनों की नजरें एक साथ उस किसान की ओर गयी जो सुन्दर बैलों की जोड़ी को हाँकते हुए कन्धे पर हल रखकर गीत गाता हुआ जा रहा था। अपने स्वभावानुसार ज्योतिषी जी की गणना चल पड़ी -कुछ जोड़ते-घटाते हुए बोले “कहाँ जा रहे हो मित्र। जिस ओर तुम्हारा खेत पड़ता है उस ओर तो दिशा शूल है। जाने पर हानि होने का डर है।”
“दिशा शूल क्या है?-’ सचमुच में अनजान किसान पूछने लगा।
प्रश्न को सुनकर सम्राट और ज्योतिषी दोनों चकित रह गये। जैसे-तैसे उसे दिशा शूल के बारे में समझाया गया। किसान बोला मैं तो हमेशा अपने काम पर जाता हूँ। आपके हिसाब से यदि प्रति सप्ताह दिशा शूल अलग-अलग होता है तो मुझे कभी का बरबाद हो जाना चाहिए था।
“जरूर तुम्हारी किस्मत अच्छी है।” भास्कर मुनि बोल पड़े “ जरा हाथ दिखाना तो।”
किसान ने अपने दोनों हाथ ज्योतिषी के आगे फैला दिये। पर हाथ इस तरह सामने किये गए गये कि हथेलियाँ जमीन पर रहे। अनगढ़ता पर झल्लाते हुए वह किसान बरस पड़ा “मूर्ख। इतना भी नहीं जानता। रेखाएँ हथेली की देखी जाती हैं।” किसान हँस पड़ा- महाराज हथेली की रेखाएँ वे लोग दिखाते हैं जो किसी के सामने हाथ फैलाते हैं। मैं मालव हूँ। भगवान महाकाल का सेवक-हथेली की क्या मजाल जो मेरे काम में आड़े आए। जब मैं हल चलाता हूँ तो ये सभी रेखाएँ चुपके से दुबक जाती हैं। फिर इन कामचोर रेखाओं को दिखाने से क्या लाभ।”
स्तब्ध महाराज को सुनाते हुए मंत्री बोल उठे “देखा महाराज, आपने भगवान महाकाल के अनुचर जड़ ग्रह पिण्डों की कृपा करुणा, गति-स्थिति की अपेक्षा नहीं किया करते। देवभूमि आज पुकार रही है, कालचक्र के अधीश्वर आज आपका आवाह्न कर रहे हैं। शूर सहायकों की अपेक्षा नहीं किया करता। सिंह कभी नहीं गिनता गीदड़ों की संख्या कितनी है। आपको भी निश्चिन्त होकर समय की पुकार सुनना चाहिए।”
“ठीक कहते हो भानु मित्र।” सम्राट का सम्मोहन टूट चुका था। इधर भानु मित्र भास्कर मुनि को समझा रहे थे राम को वन में शनि की वक्र दृष्टि नहीं ऋषियों के प्रति जगी भाव संवेदना ले गई थी। उनके कार्य के पीछे ग्रहों की स्थिति नहीं निशिचर हीन करों महि की कठोर प्रतिज्ञा थी। नल और युधिष्ठिर के वन गमन के पीछे द्यूत का व्यसन था। भास्कर मुनि मौन थे। सत्य ने उन्हें निरुत्तर कर दिया। सम्राट की आंखें खुल चुकी थी।
“जय महाकाल” के निनाद के साथ महाराज रण क्षेत्र की ओर चल पड़े। क्षण बीते, प्रहर बीता, पुरुषार्थ के स्वर गूँज उठे। सहस्रोसहस्र कण्ठों से उठी इस गूँज से भाग्यवाद की बेड़ियाँ तड़तड़ा गई। भाग्य कण-कण हो धूलि में बिखर गया। “जय महाकाल।” यशोवर्मा का अश्व उड़ा जा रहा था। उड़े जा रहे थे उनके पीछे सहस्रों अश्व और उनकी संख्या बढ़ती जाती थी, बढ़ती ही जाती थी। यह महायज्ञ था जिसमें मिहिरकुल की आहुति दी जानी थी। अन्याय, अत्याचार अनीतियों को भस्म होना था और भस्म होना था उस भाग्य को जिसने अमृत पुत्र को, ईश्वर के राजकुमार को भ्रम में डाल दिया था। पुरुषार्थ जागते ही वह होकर ही रहा। युग के अविस्मरणीय क्षण इसी अदम्य उत्साह को तलाश रहे हैं।
प्रायः देखने-सुनने में आता है कि अमुक व्यक्ति के प्राण अपने प्रिय पुत्र, पुत्री अथवा ऐसे ही किसी अन्य घनिष्ठ संबंधी के न आने तक तब तक रुके रहे, जब तक मृत्यु शैया पर पड़े व्यक्ति ने उसके अन्तिम दर्शन न कर लिये और दर्शन के उपरान्त शान्तिपूर्वक वह मृत्यु की गोद में चिरनिद्रा में सो गया। तो क्या इस प्रकार मृत्यु को कुछ समय टाला जा सकता है? मनोवैज्ञानिकों के अनुसार उत्तर हाँ, ऐसा सम्भव है। यदा-कदा मरणासन्न व्यक्तियों के मामले में यही बात देखने को मिलती है।
ऐसा क्यों व कैसे होता है? इस संबंध में डीलावेयर के मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि मरणासन्न व्यक्ति का जब किसी सगे-संबंधी से घनिष्ठ लगाव हो जाता है, तो उसे देखने की अन्तिम इच्छा एक प्रकार का संकल्प का रूप धारण कर लेती है और यह सर्वविदित तथ्य है कि जब एक बार दृढ़ संकल्प उभर पड़ता है, तो न सिर्फ परिस्थितियाँ, वरन् शरीर, मन, प्राण भी उसके अनुरूप बनने ढलने लगते हैं।
गीता में इसी बात को दूसरे रूप में समझाया गया है कि व्यक्ति जैसा सोचता है वैसा ही बनता चला जाता है। यहाँ भी आशय यही है कि व्यक्ति का सतत् एक दिशा में किया गया चिन्तन इतना प्रबल व शक्तिशाली बन जाता है, कि वह उसके अवचेतन मन की गहराइयों तक उतर जाता है और अपना काम करने लगता है एवं व्यक्ति को उसी चिंतन चेतना के ढाँचे में ढालना आरंभ कर देता है जैसा उसका निज का होता है। प्रकारान्तर से यह भी मनोवैज्ञानिकों की उसी अवधारण को परिपुष्ट करता है, कि संकल्प के अनुसार मन, प्राण, शरीर भी प्रभावित होते हैं। संकल्प जैसा हुआ प्रभाव भी वैसा ही उत्पन्न करता है। रामकृष्ण परमहंस के बारे में कहा जाता है कि जब वह दक्षिणेश्वर में रह कर हनुमान की साधना कर रहे थे, तो उस दौरान उनके हाव-भाव और आचरण बन्दरों की भाँति ही हो गये थे। वैसे ही उछल कर पेड़ों पर चढ़ जाते जैसे कोई बन्दर। बाद में जब वे राधा भाव में रहने लगे, तो उनके विचार-व्यवहार तो प्रत्यक्षतः महिलाओं जैसे हो ही गये थे, शारीरिक-संरचना में भी अनेक स्त्रैण लक्षण उभर आये थे।
एक बूढ़ा लकड़हारा दिन भर काम करते-करते थक गया था। उससे गट्ठा भी ढोया नहीं जा रहा था। निराश परेशान बैठा था, और कह रहा था कि इससे तो मौत आ जाती तो अच्छा होता।
संयोग वश मौत उसी जंगल में घूम रही थी उसने बात सुनी और पुकारने वाले लकड़हारे के पास जा पहुँची।
मौत को सामने खड़ी देखकर लकड़हारा बुरी तरह घबराया। वह तो ऐसे कुछ कहकर मन हलका कर रहा था। इसका इरादा सचमुच मरने का नहीं था। कुछ देर चुप रहकर लकड़हारे ने कहा। कृपया मेरा गट्ठा उठवाकर सिर पर रखवा दे आपको इतनी भर सहायता करने के लिए कष्ट दिया और कुछ इरादा मेरा नहीं था।
मौत ने गट्ठा उठाकर उनके सिर पर रख दिया और हँसती मुस्कुराती वापस चली गई।
इस प्रकार जब यह प्रमाणित हो चुका कि विचारों का मनुष्य पर बड़ा असर पड़ता है, और हमें प्रभावित किये बिना नहीं रहता, तो मनोवैज्ञानिक इस दिशा में शोधरत हुए कि ऐसे संकल्पों द्वारा मृत्यु को कुछ समय तक टाला जा सकता है क्या? अनुसंधान के दौरान उत्तर सर्वथा सकारात्मक प्राप्त हुआ। शोधकर्मी दल का इस संबंध में कहना है कि व्यक्ति यदि किसी कार्य के प्रति अत्यन्त गंभीर, उत्साही और उसे पूरा कर डालने के प्रति प्रबल आकाँक्षा रखता है, तो आसन्न मृत्यु को भी तब तक टाला जा सकता है, जब तक कार्य पूरा न हो जाय, पर दूसरी ओर वे यह भी कहते हैं कि यह सब आडम्बर स्तर का नहीं होना चाहिए, वरन् मरने वाले की यही तीव्र अभीप्सा होनी चाहिए, तभी वह क्रियान्वित हो सकेगी, अन्यथा उक्त भाव अपना परिणाम प्रस्तुत किये बिना ही रह जायेगा।
अध्ययन के दौरान इस बात की पुष्टि भी हो गई। कैलिफोर्निया यूनिवर्सिटी (सैन डियेगी) के समाज शास्त्रियों ने सन् 1960 से लेकर 1987 तक प्रत्येक वर्ष वहाँ के चीनी अमेरिकनों पर इस आशय के अध्ययन और प्रति वर्ष उनका मृत्यु-दर का विशेष अवलोकन किया। उन्होंने पाया कि चीनियों के एक प्रमुख पर्व के ठीक बाद बूढ़ी चीनी महिलाओं की मृत्यु आश्चर्यजनक ढंग से बहुत बड़े पैमाने पर होती है। उल्लेखनीय है कि चीनी समुदाय का यह एकमात्र ऐसा पर्व है, जिसमें परिवार के सभी सदस्य उसे साथ-साथ मनाने के लिए उक्त अवसर पर अवश्य इकट्ठे होते हैं। इस पर्व में परिवार की बूढ़ी महिलाओं पर भोजन एवं व्यंजन-निर्माण का विशेष दायित्व होता है। वे इससे भावनात्मक स्तर पर इतनी गहराई से जुड़ी होती है कि महीनों पूर्व इसकी तैयारियाँ शुरू कर देती हैं और पर्व के दिन अत्यन्त खुश नजर आती हैं, पर इसके उपरान्त एक सप्ताह के अन्दर-अन्दर ऐसी वृद्ध महिलाओं का बड़े स्तर पर शरीरान्त होते देखा जाता है। इस संबंध में अध्ययन दल का कहना है कि इस दौरान परिवार के सभी सदस्यों के देखने की इच्छा और सौंपा गया विशेष दायित्व वृद्धाओं के अवचेतन मन में इतना गहरा उतर जाता है कि वह एक तीव्र स्व संकेत का काम करता है, और यहाँ तक उनके प्राणों को भी शरीर त्यागने से रोके रखता है। पर्व के उपरान्त जब उनकी यह इच्छाएँ पूरी हो जाती हैं, एवं और कोई आकाँक्षा शेष रह नहीं जाती तो फिर मृत्यु अपनी गोद में सुला लेती है। ध्यातव्य है कि उत्सव के पश्चात् प्रति वर्ष बड़े पैमाने पर मृत्यु सिर्फ वृद्ध चीनी महिलाओं की ही होती देखी जाती है। वृद्ध चीनी पुरुष अथवा गैर चीनी महिलाओं के साथ ऐसी अप्रत्याशित बात अध्ययन के दौरान नहीं देखी गई अथवा देखी गई, तो छिट-पुट सामान्य घटना के रूप में। इस बारे में अनुसंधानकर्ताओं का कहना है कि चूँकि चीनी पुरुषों एवं गैर चीनी महिलाओं का उत्सव से भावनात्मक संबंध नहीं होता, इसलिए उनकी मृत्यु भी उसके लिए रुकी नहीं रहती और पूरे वर्ष स्वाभाविक ढंग से समय-समय पर होती रहती है।
इस प्रकार इस अध्ययन से उसे पहेली का भी उत्तर मिल गया कि क्यों किसी संबंधी के लिए मरणासन्न व्यक्ति के प्राण अटके पड़े रहते हैं। इससे यह भी सुनिश्चित हो गया कि जीवन में यदि कोई महत्वपूर्ण व आवश्यक कार्य शेष रह गया हो, और कर्ता का उसके प्रति सूक्ष्म स्तर का गहन तादात्म्य हो तो उसे पूरा होने तक मृत्यु को टाला भी जा सकता है।
कई अवसरों पर ऐसे समय में देवी सहयोग भी प्राप्त होता है। इसके प्रमाण भी उपलब्ध है। मैडम ब्लेवटस्की जब अपना महत्वपूर्ण ग्रन्थ “सीक्रेट डॉक्टीन्स” लिख रही थी तो वह जीवन के अन्तिम पड़ाव पर थी। दुर्भाग्यवश अभी वह आधा ही ग्रंथ लिख पायी थी कि मृत्यु-शैया पर आ पड़ी। साथ रहने वाली देवात्माओं ने संदेश दिया कि मृत्यु सुनिश्चित है, किन्तु साथ में आश्वासन यह भी था कि घबराये नहीं, आप सत्साहित्य सृजन जैसे पुण्य कार्य में संलग्न है, अतः हम आपका पूरा सहयोग करेंगे। ऐसा ही हुआ। ग्रन्थ जब तक पूरा नहीं हो गया तब तक वह जीवित रही और पूरा होते ही दिवंगत हो गई। इससे यह भी सिद्ध होता है कि कार्य यदि लोकमंगल के निमित्त किया जा रहा हो और दुर्भाग्यवश अधूरा रह जाय एवं लेखक का असामयिक बुलावा आ जाय तो देवसत्ताएं उस बुलावे को भी कार्य के पूरा होने तक टालने में समर्थ सहयोग करती हैं।
इच्छा मृत्यु भीष्म को मिली थी। हर किसी को यह वरदान अपनी इच्छाशक्ति के आधार पर मिल सकता है। यदि हम मरने का चिन्तन करे तो मौत जल्दी आ धमकेगी। यदि सौ वर्ष तक कर्म करते हुए जीने की इच्छा रखे तो मौत दूर ही रहेगी। मनुष्य सदैव ऊँचा सोचे व श्रेष्ठ चिन्तन करे तो वह जीवन मृत्यु का नियंत्रण भी अपने हाथ में ले सकता है। आखिर है भी तो वह स्रष्टा का ज्येष्ठ पुत्र।
स्टाक होम इण्टर नेशनल पीस रिसर्च इन्स्टीट्यूट द्वारा संग्रहीत आंकड़ों से प्रकट होता है कि इन दिनों युद्ध की तैयारी पर समस्त संसार में जो धन व्यय हो रहा है, वह इतना अधिक है कि उतने भर से समस्त संसार की स्थिति बदल देने वाली सृजन योजनाएँ पूरी की जा सके। इन दिनों हर वर्ष प्रायः 5000 अरब रुपया युद्ध आयुधों पर खर्च होता है। पिछले 30 वर्षों में यह व्यय 173 गुना अधिक बढ़ा है। विनाश साधनों की अभिवृद्धि में अभी भी विराम नहीं लगा है। वह दिन दूना रात चौगुना बढ़ रहा है।
दूसरी ओर निर्धन और पिछड़े देशों की स्थिति है, जिसमें जीवनोपयोगी सुविधाओं के अभाव में बेमौत मरने वालो में 50 करोड़ व्यक्ति होते हैं, जिनमें से 30 करोड़ तो 15 वर्ष से कम उम्र के बच्चे ही होते हैं। यदि युद्ध की तैयारी में खर्च होने वाला धन तीन चौथाई पिछड़े जन समुदाय को रोजी रोटी और शिक्षा, चिकित्सा जैसे साधन प्रदान करने पर लग सका होता तो दुनिया का नक्शा कुछ दूसरी तरह का होता।
इस संसार में जितने भी रहस्य रोमाँच है, वह सब मस्तिष्क की विज्ञात क्षमता से परे एवं अविज्ञात की परिधि में आते हैं। दैनिक जीवन में हम जो कुछ सीखते व समझते हैं वह मस्तिष्कीय सामर्थ्य का एक स्वल्प अंश भर है, जिसका कि हम भौतिक जानकारी बढ़ाने और सुविधा-साधन जुटाने के रूप में उपयोग करते हैं। यह तो मस्तिष्कीय शक्ति का स्थूल पक्ष है, जिसे बुद्धि के रूप में जाना समझा जाता है, पर इसका पक्ष इससे अनेक गुना विशाल और अनन्त संभावनाओं से भरा-पूरा है। जिस दिन इस विशाल शक्ति भण्डार को अनावृत कर लिया जायेगा, उस दिन यह विश्व उन घटनाओं से सर्वथा रहित हो जायेगा। जिन्हें इन दिनों हम दुनिया भर में रहस्य रोमाँच के रूप में घटित होते हुए देखते-सुनते हैं।
ऐसी ही एक रहस्यमय घटना सन् 1923 में शुलकौफ और उनके परिवार के साथ नार्थ सी के सिल्ट द्वीप पर घटी।
विलियम हटन और कैप्टन शुलकौफ बड़े घनिष्ठ मित्र थे। लंदन में इनका पास-पास ही मकान था। घनिष्ठता इतनी थी कि घूमने-फिरने का जब कोई कार्यक्रम बनता, तो दोनों परिवार साथ-साथ होते। इनकी गर्मियों की छुट्टियां प्रायः साथ-साथ सिल्ट द्वीप में बीतती।
प्रति वर्ष की तरह सन् 1923 में भी दोनों परिवार छुट्टियां बिताने सिल्ट द्वीप चले गये, किन्तु अभी वह समाप्त भी नहीं हुई थी कि विलियम हटन को आवश्यक कार्य हेतु ड्यूटी पर वापस बुला लिया गया। बड़ी अनिच्छा से वे जाने को तैयार हुए। 2 अगस्त को प्रस्थान का प्रोग्राम बना। इस दिन मित्र का परिवार तथा हटन के पत्नी-बच्चे सभी हटन को छोड़ने के लिए हवाई अड्डे तक आये। उन्हें विदा कर सभी लौट ही रहे थे, कि धीरे-धीरे शाम घिरने लगी। वे समुद्री तट पर सूर्यास्त के दृश्य का आनंद लेते हुए लौट रहे थे कि तभी अचानक शुलकौफ चलते-चलते रुक गये और असमंजस में पड़े समुद्र की ओर देखने लगे। सभी की दृष्टि उस ओर उठ गई। समुद्र में तेज ज्वार उठ रहे थे। इन्हीं के बीच फँसी एक नौका उससे सुरक्षित बाहर निकालने के लिए जूझ रही थी, पर भीषण समुद्री लहरों के बीच नाविकों का प्रयास बार-बार निष्फल हो जाता। प्रयत्न जारी था, नाव में सवार 15-20 मछुआरे नाव को लहरों से बाहर निकालने की जी तोड़ कोशिश कर रहे थे।
इसी बीच एक जोर का धमाका हुआ। शुलकौफ का ध्यान तट की ओर खिंच गया। देखा कि कुछ मछुआरे खड़े थे, जो अपने साथियो को बचाने का प्रयास कर रहे थे। इसी सिलसिले में उन्होंने लहरों में फँसी नाव तक तोप के सहारे लाइफ लाइन फेंकने की कोशिश की थी। नाव में सवार लोगों ने उसे पकड़ने का प्रयत्न किया, पर निष्फल गया। ज्वार ने उसे नाव से दूर जा पटका। तट पर खड़े साथियों ने दुबारा तोप दागी, किन्तु इस बार भी समुद्र में फँसे नाविक उसे पकड़ने में विफल रहे। पुनः तीसरी बार तोप द्वारा मझधार में फँसी नाव तक लाइफ लाइन फेंकी गयी, मगर न जाने तभी अचानक कहाँ से कई मीटर ऊँची एक ज्वार आ गया और उसने नाव व लाइफ लाइन को एक दूसरे से काफी दूर पहुँचा दिया। मौत से जूझते नाविकों के भाग्य ने इस बार भी साथ न दिया। इस बीच बार-बार के धमाकों से पास-पड़ोस की नाविक बस्तियों से अनेक स्त्री, पुरुष व बच्चे वहाँ एकत्र हो गये थे। उन्होंने मौत के मुँह में फँसे अपनी बस्ती वालों को देखा, तो सभी मिलकर ईश्वर से उनके सुरक्षित तट तक वापस आ जाने की प्रार्थना करने लगे। शुलकौफ दंपत्ति, उनके बच्चे तथा हटन की पत्नी-बच्चे ने भी उनका साथ दिया। वे अपने आराध्य ईसा को याद करने लगे।
उधर तट में स्थित रक्षक दल इन सब से अनभिज्ञ सुरक्षा उपायों में लगा हुआ था। नाविकों के बचाने के जब तीन बार के लाइफ लाइन प्रयास निरर्थक गये, तो उन्होंने इस बार लाइफ लाइन फेंकने के बजाय एक छोटी डोंगी के सहारे उन तक पहुँचने का निश्चय किया। इस निर्णय के बाद एक छोटी नौका में पाँच मछुआरों को बैठा कर उन तक रवाना किया गया। ऊँची-नीची लहरों के भीषण थपेड़ों से संघर्ष करती हुई डोंगी धीरे-धीरे मझधार की ओर बढ़ने लगी। सभी साँस रोके इस जीवन-मृत्यु के बीच का संघर्ष देख रहे थे और साथ ही भगवान से लगातार मनुहार भी करते जा रहे थे। शनैः-शनैः डोंगी लहरों के बीच फँसी नाव तक पहुँच गई। सभी खुशी से झूम उठे और ईश्वर को लाख-लाख धन्यवाद देने लगे, किन्तु यह क्या। अभी रक्षक नौका फँसी नाव के पास पहुँची ही थी कि एक भीषण ज्वार आया और दोनों नाव उसमें कहीं खो-सी गयी। लहरे शान्त हुई, तो नाव में सवार नाविकों का दूर-दूर तक कहीं अता-पता नहीं था। जो समुद्र थोड़े समय पूर्व विकराल बना हुआ था और सब कुछ लील लेना चाहता था, वह ऐसे शान्त हो गया, जैसे कुछ हुआ ही न हो। शुलकौफ और उनके पत्नी-बच्चे दुःख के सागर में डूब गये। साँत्वना देने के लिए जब साथी नाविकों की ओर मुड़े, तो भय मिश्रित आश्चर्य में पड़ गये। अभी-अभी जो रक्षक नाविक तट पर रक्षा के विभिन्न प्रकार के उपक्रम करते दिखाई पड़ रहे थे, वे न जाने यकायक कहाँ गायब हो गये। वहाँ चलायी जाने वाली न तोप थी, न तोपची और न स्त्री, पुरुष व बच्चों के वह झुण्ड, जो कुछ क्षण पूर्व तक वहाँ एकत्रित हो यह सब दृश्य देख रहे थे।
तो क्या यह दृष्टिभ्रम था? शुलकौफ मन ही मन बुदबुदाये, किन्तु उनके साथ उनके पत्नी, बच्चे और हटन के पत्नी-बच्चे भी थे। सभी को एक साथ इस प्रकार का दृष्टिभ्रम कैसे हो सकता है। इन्हीं विचारों में डूबते-उतराते वे कुछ आगे बढ़ गये, तभी उन्हें वहाँ एक चबूतरा दिखाई पड़ा। यह चबूतरा ठीक उसी स्थान पर था, जहाँ कुछ समय पूर्व तोप रखी दिखाई पड़ी थी। उत्सुकता वश वे उसके और समीप पहुँच गये तो पता चला कि उसमें एक शिलालेख अंकित है, जिसमें लिखा था- “ईश्वर उन सभी नाविकों और उनके रक्षक साथियों की आत्मा को शान्ति प्रदान करे, जो 2 अगस्त सन् 1872 की शाम समुद्र में आये भीषण तूफान में काम आ गये। उनकी चिरस्मृति में समस्त मछुआरा समुदाय।”
शिलालेख को पढ़ने के बाद शुलकौफ कुछ सोचने लगे कि अचानक चौंक पड़े यह जान कर कि आज भी तो अगस्त की दो तारीख है, अर्थात् 51 वर्ष पूर्व का वही दिन जिस रोज यह दुर्घटना हुई थी। इस रहस्यमय घटना के बारे में कुछ विशेष जानने के लिए सभी स्थानीय पादरी के घर की ओर चल पड़े। वहाँ पादरी ने जो कुछ बताया, उसे सुन कर सभी अचम्भे में पड़ गये। उसके अनुसार हर वर्ष इसी दिन इसी समय उक्त घटना की पुनरावृत्ति होती है, जिस को इस द्वीप के हजारों लोग ज्यों-की-ज्यों घटित होते हुए देखते हैं।
उक्त घटना के प्रत्यक्षदर्शी रहे विलियम हटन के पुत्र व मूर्धन्य मनोविज्ञानी डॉ. रैमजे वर्नाड हटन अपनी आत्मकथा में लिखते हैं कि बहुत कुछ इस जगत में घटता और प्रत्यक्ष देखा जाता रहता है। सबकी व्याख्या प्रत्यक्षवाद के आधार पर नहीं हो सकती है। परोक्षजगत से जुड़ी ऐसी अनेकानेक विलक्षणताएँ हैं जो बताती हैं कि भूतकाल व भविष्यत् में संभावित कई घटनाएँ ऐसी हैं जो समय-समय पर प्रत्यक्ष नेत्रों से देखी जा सकती हैं। मस्तिष्क को जो दीख रहा है वह सच है, यह एक अकाट्य तथ्य है। फिर भी जो घट रहा है, वह वर्तमान में ही है यह सुनिश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता।
शेखावाटी राजस्थान के संत युवावस्था में ही संन्यासी हो गये थे। तीर्थाटन, भजन, सत्संग आदि में लम्बे समय तक भ्रमण करते रहे। पर इन सब में जब उन्हें सार नहीं दीखा तो अपना कार्यक्रम बदला। सेवा कार्य के लिए मन मुड़ा। अपनी जन्म भूमि वाले क्षेत्र में लौट आये और वहाँ फैली हुई निरक्षरता को दूर करने का संकल्प लिया। उस विस्तृत क्षेत्र के हर गाँव में पाठशाला स्थापित करने की योजना थी।
इसके लिए उन्होंने बालकों और प्रौढ़ों को संपर्क साधकर कठिनाई से सहमत किया। स्थानीय शिक्षितों में से अध्यापक निकाले। विद्यालय खर्च के लिए एक मुट्ठी अनाज हर घर से जमा करने वाले ज्ञानघट रखवाये। उनके सहारे उन छोटी पाठशालाओं का खर्चा चलने लगा।
स्वामीजी के कार्य को सफलता मिलती चली गई। विद्यालयों की संख्या भी बढ़ी और उनकी स्तरीय प्रगति भी। समूचा इलाका विद्यालयों से भरापूरा हो गया। आवश्यकतानुसार मैट्रिक से लेकर कॉलेजों तक का एक समूह बनकर विनिर्मित हो गया।
स्वामी केशवानन्द की ख्याति चंदन सुगन्ध की तरह सुदूर क्षेत्र तक पहुँची। उनके साथ सहयोगी मिलते चले गये। जनता के आग्रह पर उन्हें लोक सभा का सदस्य बनना पड़ा। वे लगातार दस वर्ष तक एम. पी. रहे। उनकी सेवा साधना और निष्ठ सदा−सर्वदा अविस्मरणीय रहेगी।
हमारा मस्तिष्क मात्र अपनी सात प्रतिशत क्षमता का उपयोग कर पाता है। शेष तो प्रसुप्त है। संभव है यह जागृत हो जाय तो कई अविशात रूप से घटित होने वाले, रहस्य रोमाँच के रूप में परिभाषित घटनाक्रमों को अगले दिनों इसी आधार पर उद्घाटित किया जा सकेगा। हमें अपना मानस इस संबंध में बड़ा खुला व पूर्वाग्रह रहित रखना चाहिए।
चीवरधारी भिक्षु को पहचानने की कोशिश में उसके पाँव थम गए। आंखें कुछ ज्यादा चौड़ी हो गई, ताकि समूचा मन एक बारगी इनमें समा कर स्थिति का जायजा ले सके। पेड़ों के झुरमुट के मध्य से निकलते चले आ रहे भिक्षु की देह को कभी वृक्ष अपनी आड़ में छुपा लेते, कभी सूर्य किरणें उस पर अपनी ज्योत्सना बिखेर कर शतगुणित कान्तिमान बना देती। देह की गठन, चेहरे की बनावट, नाक नक्श सब वही। वह बुदबुदाया- “इससे क्या अन्तर पड़ता है, जो अब सिर घुटा है। देह पर कीमती वस्त्रों अलंकारों की जगह- साधारण चीवर है। पर यह सब हुआ कैसे?” उसका मन इस और उसमें सम्बन्ध नहीं बिठा पा रहा था।
“मैंने कितने बीज चुने हैं?” बड़े उल्लास से एक बच्ची पास आ गई। उसकी मुट्ठी में चिरमिटी के लाल-लाल चमकते सुन्दर बीज थे। “चल खेल अभी।” बच्ची उन्हीं की थी। उनके डाँटने पर उसका भोला मुख एक क्षण के लिए उदास हो गया। शायद वह अपने पिता के इस रूखे व्यवहार का कारण नहीं खोज पाई। असफल होकर थोड़ी दूर पर खेलने लगी। इधर वर्तमान उनकी मनोभूमि में अतीत को कुरेद रहा था। तब यह भिक्षु नहीं था, श्रेष्ठी था। सम्राट के और साम्राज्य के अर्थतंत्र का शायद सर्वाधिक-महत्वपूर्ण स्तम्भ। इसी महत्व के कारण राज्य परिषद और स्वयं सम्राट उसे सम्मान देते थे।
“सबका मूल्य है।” उस दिन दरबार से लौटते समय इसी श्रेष्ठी द्वारा कहे गए इन शब्दों की गूँज अभी भी कहीं न कहीं झनझनाहट पैदा कर रही थी। “यह दूसरी बात है कि किसी का मूल्य बहुत कम है और किसी का बहुत अधिक, किन्तु खरीदा सबको जा सकता है।”
“भले ही इसे आप अर्थ प्रधान युग कहते हैं, तथापि सम्पत्ति ही सब कुछ नहीं है।” श्रेष्ठी के कथन का उसने प्रतिवाद किया था। “ऐसे लोगों की संख्या पर्याप्त है जिन्हें किसी भी कीमत पर खरीदा नहीं जा सकता, अपने ही यहाँ।”
“हो सकता है कोई एक आध अपवाद हो, इस सृष्टि का अजूबा।” बात यह थी कि उनके सम्मुख कुछ नाम ऐसे रख दिए थे और उन नामो की महत्ता ठुकराने का उपाय नहीं था।
“एक सीमा तक धन की जरूरत है। “ उसने स्पष्ट किया था। “मान लेने में कोई आपत्ति नहीं कि बहुत बड़ी सीमा तक, किन्तु एक सीमा तक ही। व्यक्ति के व्यक्तित्व को तभी खरीदा जा सकता है, जब व्यक्ति मूर्ख हो अपने को मूर्ख बनाए बिना कोई अर्थ के हाथों स्वयं को नहीं सौंप सकता।”
“किस सोच में डूबे हैं मित्र महानाभ? “ वाणी ने उसे पुनः झकझोर दिया ठीक वही स्वर। आवाज बगल से आयी थी। वह उस ओर मुड़ा ठीक सामने वही भिक्षु था। उसका मन जिसे इतनी देर से अपने चिन्तन का केन्द्र बनाये था।
“यदि मैं सही हूँ तो आप श्रेष्ठी धनदत्त हैं?”
“कभी था।” भिक्षु के होठों से उभरी मुसकराहट उसके प्रशान्त मुख मण्डल पर फैल गई। “अब भिक्षु बुद्ध पालित।”
“हाँ-हाँ वही। मैं काफी देर से आपको पहचानने का यत्न कर रहा था।”
“मैंने तो पाटलिपुत्र के दण्डनायक को दूर से पहचान लिया था। तभी इधर से आया।”
“दरअसल आपके परिवर्तित वेश के कारण “
“वेश क्यों अब तक बहुत कुछ बदल चुका है, जो कुछ शेष है वह भी बदल रहा है। “ भिक्षु ने हँसते हुए उनकी आंखों में झाँका। वहाँ अविश्वास छाया हुआ था। वह बोला “ लगता है, आपको विश्वास नहीं हुआ बिना सुने तो हो भी नहीं सकता। “
“नहीं! नहीं!! अविश्वास जैसी कोई बात नहीं। फिर भी सुनने की उत्कण्ठा तो जरूर है।”
दोनों एक पेड़ की छाया में आ बैठे। मद्धिम पड़ती जा रही सूरज की किरणों ने अपनी तपन से वैराग्य ले लिया था। सबकी सब एक साथ आकर पत्तों की अंजलि से उनके ऊपर सुवर्ण राशि बिखेरनी लगी।
“याद है न, मैं उन दिनों सोना बनाने की फिराक में बेचैन था। लगभग पागल कहें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं।”
“समूचे नगर में इस बात से अविदित कौन रहा है।” कहने वाला मुस्कराए बिना न रह सका। “और तो और स्वयं सम्राट भी यदा-कदा इसकी चर्चा कर लिया करते। क्या रहा उसका?”
“वही बता रहा हूँ। उसी समय आ गए महासिद्ध सरहपा।”
“आप अप्रतिभ रसायनज्ञ, महान दार्शनिक- योगिराज नागार्जुन की बात तो नहीं कर रहे? “
“हाँ वही! सामान्य जनों में वह सरहपा नाम से प्रसिद्ध है। एक दिन मैं भी गया था उनके पास। यों गया कौन नहीं पर मेरे जाने का उद्देश्य और था। उस समय वह हाथ का तकिया बनाए एक पेड़ के नीचे लेटे थे। पास में बाँस की लाठी पड़ी थी, एक नारियल का पात्र जो शायद पानी पीने के काम आता होगा। देह पर सिर्फ एक कौपीन था। पहले तो समझ में नहीं आया जो सुवर्ण बनाने की प्रक्रिया में सिद्धहस्त है। समूचे देश की विद्वता- शून्यवाद के जिस प्रवर्तक के चरणों में स्थान पाने को लालायित रहती है। जिसके बारे में प्रसिद्ध है कि योग की सिद्धियाँ उसके चरणों में लोटती हैं। वह इस तरह क्यों रहता है। तनिक सी इच्छा करने पर क्या नहीं उपस्थित हो सकता उसके लिए।”
तभी स्वार्थी मन ने विचार किया हो न हो यह सनकी है। लोग क्या-क्या नहीं करते अपने को तो जैसे-तैसे काम निकालना है। अभिवादन प्रणाम के पश्चात् मैंने अपनी समूची विनम्रता को बटोरते हुए प्रार्थना की “स्वर्ण बनाने की प्रक्रिया जानना चाहता हूँ।”
“जरूर-जरूर किन्तु इसके पहले तुम ठीक से समझाओ कि स्वर्ण का क्या उपयोग करोगे?” वह इतनी आसानी से तैयार हो जायेंगे विश्वास न था। अघटित को घटते देख मन उल्लास से भर गया। और इस उल्लास के आवेग में एक क्षण के लिए भिक्षु ने पाटलिपुत्र के दण्डनायक की ओर देखा जो उसकी बातों को पूर्ण तन्मयता से सुन रहा था “आप हँसेंगे। मैं उतना सब तो आपको नहीं सुनाऊँगा। सम्भव है आपने कभी विश्व का सबसे बड़ा धनिक बनने का स्वप्न देखा हो?उसका भवन कैसा होना चाहिए? उसकी साज-सज्जा कैसी रखनी चाहिए, क्या-क्या उपकरण कहाँ-कहाँ से मँगाना है, देखा है कभी आपने ऐसा स्वप्न? देखा है तो आपसे कुछ कहना नहीं। आप मेरी बात समझ जायेंगे। न देखा हो तो अब बताकर हँसी कराने से फायदा क्या?”
“महासिद्ध बड़े धैर्य से सुनते रहे मेरी कल्पना। ढाई-तीन घण्टे पूरे वे सुनते ही नहीं रहे, मुझे प्रोत्साहित भी करते रहे। मेरे स्वप्न को बढ़ाने और स्पष्ट करने में योग देते रहे।”
“अब कल बाते करेंगे।” अन्त में वे अपने आवश्यक काम से उठ गए। आप समझ सकते हैं कि मैंने कितनी उत्सुकता से ‘कल’ की प्रतीक्षा की होगी।
“तुम्हारा स्वप्न सत्य हो जाएगा तब? समझ लो कि सब कुछ हो गया। “उन्होंने दूसरे दिन स्वयं प्रारम्भ किया यद्यपि मैं कम उतावला नहीं था शुरू करने के लिए।
“इस प्रकार रहेंगे तो लोग इतना सम्मान करेंगे।” मैंने अपनी स्वप्न कल्पना को स्पष्ट करने में संकोच नहीं किया।
“एक दिन बीमार पड़ोगे। “ महासिद्ध हँसे नहीं। “
“कौन-कौन वैद्य आएँगे, कैसे लोग देखने आया करेंगे यदि इस संबंध के स्वप्न सुना दिए मैंने।
शरशैया पर पड़े भीष्म से अनेकों जिज्ञासु ज्ञान लाभ करते रहते थे। उस आधार पर उनका समय भी कट जाता।
किसी ने पूछा द्रोणाचार्य के अनवरत शिक्षण में पढ़े कौरव संख्या में सौ होते हुए भी क्यों हारे? पाण्डवों ने पाँच होते हुए भी कैसे विजय प्राप्त कर ली?
भीष्म ने उसको दो कारण बताये एक तो द्रोणाचार्य को वेतन पर पढ़ाने का कार्य करना, दूसरे सुख सुविधाओं की भरमार रहते हुए पढ़ना। ऐसी विद्या आधी रह जाती है और समय पर काम नहीं आती। पाण्डवों ने धौम्य के आश्रम में रहकर श्रम, संयम और अनुशासन की साधना की। गुरुगृह में रहकर सेवा और श्रद्धा का अभ्यास किया। इसी कारण वे पाँच होते हुए भी सौ की तुलना में अधिक भारी पड़े।
“वैद्य के कष्ट कारण उपचार! शरीर उठने तक में असमर्थ रहेगा। “ “गजब की कल्पना शक्ति थी उनकी। उन्होंने बड़ी भयानक बातें बताई” “नौकर मनमानी करेंगे। पड़े-पड़े चिड़चिड़ाते रहोगे।”
“तिरस्कार, असमर्थता, हानि- इन सब का बड़ा मर्मान्तक वर्णन था उनके शब्दों में। कठिनाई यह थी कि मैं उसे अस्वीकार नहीं कर सकता था। यदि मेरा स्वप्न सत्य होता है, तो उनकी कल्पना के सत्य होने की संभावना ही अधिक थी। “
“प्रतिकूल स्वजनों का तिरस्कार, अकृतज्ञ सेवकों की उपेक्षा, असमर्थता, रोग हानि और बिना कुछ बोले कुढ़ते रहना, क्योंकि जो इतनी सम्पत्ति और प्रतिष्ठ पा लेगा, उसे अपने सम्मान को दूसरे के सम्मुख तो सदा सँभाल कर रखना होगा कितनी भयानक कल्पना थी। “
“अन्त में मर जाओगे। सम्राट के साथ राज्य के विशिष्ट व्यक्ति उपस्थित होंगे। बड़े समारोह से अन्त्येष्टि मनेगी। भव्य समाधि बनेगी। मर जाने वाले को इनसे क्या लाभ होने का। उसका सूक्ष्म शरीर तो अपनी अतृप्त वासनाओं की नरकाग्नि में झुलसता-तड़पता रहेगा। संपत्ति की लोलुपता के साथ भोग और तब नरक। बुरी बात है, बहुत बुरे स्थान पर तुम्हारा स्वप्न समाप्त होता है। अच्छा, अब, कल। वैसे मेरे पास लोहे, ताँबे जैसी धातुओं के ही नहीं, ऐसे अनगढ़ कुरूप व्यक्तियों को भी सोने जैसा चमकदार बना देने की विद्या भी है। जानना चाहोगे तो बता दूँगा।”
“ मेरी सारी रात उधेड़ बुन में बीती। क्या फायदा ऐसे सोने का जिससे जीवन नरक बन जाए। क्यों न व्यक्तित्व को हिरण्यमय बनाने की विद्या सीखें। मैं उस कल भी गया। अवश्य मुझे स्वर्ण प्राप्ति की ललक नहीं रह गई थी। अब तो अपने व्यक्तित्व को हिरण्यमय बनाना चाहता था। “कौन सी विद्या सीखना चाहते हो तुम?” पहुँचते ही पूछा था उन्होंने। “जिससे व्यक्तित्व स्वर्णमय बन सके” मैंने जवाब दिया।
“ चलो तुम अपनी मूर्खता से छुटकारा पा सके। “ उनके शब्दों में करुणा थी। “ताँबे, लोहे को सोना बनाने का महत्व रसायन विज्ञान तक सीमित है। अब मैं तुम्हें जीवन विद्या बताता हूँ जिससे तुम स्वयं आनन्द घट बन कर औरों में इसे उड़ेल सको। “
“क्या बताया उन्होंने। “ महानाभ के स्वरों में जानने की अकुलाहट थी।
“विचार करने की एक नूतन शैली।” भिक्षु ने उनकी उत्सुकता में साथ नहीं दिया। “ सम्पत्ति और साधनों का मोह मूर्खता है। उनका अन्तिम परिणाम तो दूर- उनके उपयोग की ठीक स्थिति भी समझ ली जाय तो उनका मोह समाप्त हो जाय।”
“तो इन्हीं विचारों ने आपका जीवन बदल दिया? “
“विचार नहीं- इन्हें व्यक्तित्व के हिरण्यमय बनाने वाले महा रसायन कहिए। अब मैं जीवन के उसी रसायन को घर-घर जाकर प्रत्येक व्यक्ति को वितरित करने के लिए परिव्राजक बन कर घूम रहा हूँ।”
“उस चिरमिटी के ढेर को मैं घर ले जाऊँगी।” बच्ची मचलने लगी थी। “सारे दिन कितनी मेहनत की है मैंने, पता है आपको? “ दण्डनायक- भिक्षु को देखकर हँस पड़े।” इसे भी महासिद्ध का रसायन चाहिए। “
इसे नहीं आपको भी। दोनों ने अर्थ पूर्ण दृष्टि से एक दूसरे की ओर देखा और चल पड़े। यह रसायन है जीवन को सही जीने की विद्या के रूप में। आज भी सबके समीप, बड़ी सरलता से उपलब्ध। किन्तु अभागा ही है मनुष्य, जो इसे छोड़कर स्वर्ण की, उस क्षणिक आनन्द की तलाश में - भोग विलास में भटकता रहता है। बदले में कुछ नहीं मिलता। यदि इसका बोध हो जाय तो जीवन का कायाकल्प हो जाय।
मौलवी साहब बड़े मनोयोगपूर्वक बच्चों को पढ़ाते। उनके अपने भी दो बच्चे थे, जिन्हें वे भरपूर प्यार करते।
एक दिन मकतब से लौट कर जब मौलवी साहब भोजन पर बैठे और बच्चों को न पाया तो पत्नी से पूछा वे कहाँ है। उनने कह दिया कहीं बाहर खेलने चले गये हैं।
भोजन करते जाते थे। साथ ही कुछ काम की बाते पूछते और उत्तर कहते जाते थे।
पत्नी ने पूछा एक दिन पड़ोसी के घर से जेवर माँग कर लाई थी। पहने तो बहुत अच्छे लगे। अब वह पड़ोसिन जेवर वापस माँगती है। मेरा मन देने को नहीं करता। वे मुझे अच्छे लगने लगे हैं। क्या करूं?
मौलवी साहब ने कहा माँगी चीज को वापस कर देना ही ठीक है। उसका लोभ करना ठीक नहीं। पत्नी चुप हो गई। जब मौलवी साहब भोजन कर चुके तो उनकी पत्नी भीतर के कोठे में गई जहाँ दोनों बच्चे कपड़े से ढके हुए मरे पड़े थे। अचानक ही वे बीमार पड़े और कुछ ही समय में मृत्यु के मुख में चले गये थे। आते ही चर्चा इस लिए नहीं की थी कि मौलवी साहब भोजन कर लें इसके बाद ही कहना ठीक होगा। मौलवी साहब रोने लगे। पत्नी ने कहा अभी तो आप माँगी हुई चीज को वापस करते समय लालच न करने की शिक्षा दे रहे थे। यह बच्चे भी ईश्वर की अमानत थे। जितने दिन उसकी मर्जी थी रहने दिये अब वापस माँग लिये तो क्या किया जाय?
मनुष्य की भावनाओं को जगाकर उन्हें ऊर्ध्वगामी बनाने और परमात्मा की अनुभूति कराने, प्रेम, करुणा, दया, वात्सल्य, साहस आदि गुणों को विकसित कर मनुष्य जीवन को दिव्यता प्रदान करने की अपूर्व शक्ति संगीत में है। संगीत के द्वारा कई प्रकार के शारीरिक, मानसिक रोगों का उपचार किया जा सकता है। दुर्बलता को सशक्तता में बदला जा सकता है। उत्तेजना उत्पन्न करने और भाव-संवेदना जगाने के अतिरिक्त इसके सहारे मनुष्य की आदतों को बदला और स्वभाव में आमूल चूल परिवर्तन किया जा सकता है। इसे उत्कर्ष का माध्यम बनाया जा सकता है।
चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार संगीत के स्वर ताल, लय, रिद्म के अपने विशिष्ट प्रभाव होते हैं। स्वर शास्त्र एवं नादयोग की अपनी स्वतंत्र विद्या है। विभिन्न राग-रागनियों के अलाप से विभिन्न प्रकार के चमत्कारों का वर्णन हमारे शास्त्रों और धर्मग्रन्थों में मिलता है। सामवेद का तो विषय ही संगीत है। उसमें संगीत के सूक्ष्मतम विज्ञान का विवेचन हुआ है जिसका कुछ अंश प्राप्त कर बाद में तत्वदर्शियों ने अनेक चमत्कार पैदा किये। कहा जाता है कि ‘दीपक राग‘ गाने से बुझे हुए दीपक जल उठते हैं। ‘मालकोश’ गाने से पत्थर भी पिघल जाते हैं। तानसेन ने टोड़ी राग गाकर मृगों को संगीत मुग्ध कर अपने पास बुला लिया था। उसके राग की विस्तीर्ण ध्वनियाँ जहाँ तक पहुँची वहाँ तक सारे वन्य मृग मृत्यु का भय भुलाकर राज दरबार में आ गये थे। सुविख्यात संगीतकार बैजू ने मृगरंजिनी टोड़ी गाकर केवल हार पहने हुए एक ही मृग को जंगल से बुलाकर अपने पास बिठा लिया था। भावनापूर्ण तन्मयता से युक्त मेघ- राग का गायन चिलचिलाती धूप में भी तत्क्षण वृष्टि कराने में समर्थ माना जाता था।
आधुनिक अनुसंधानकर्ता वैज्ञानिकों ने भी मानव जीवन के लिए संगीत को अत्यन्त प्रभावकारी पाया है। उनके अनुसार शरीरगत पाँच प्राणों पर भी इसका प्रभाव पड़ता है जिससे शरीर में भरी विषाक्तता के बाहर निकलने की क्रिया तीव्र होता है और प्राण ऊर्जा बढ़ती है। लन्दन के चिकित्सा विशेषज्ञों ने “हॉस्पिटल मैनेजमेंट “ नामक पत्रिका में कहा है कि व्यक्ति संगीत से बड़ी जल्दी स्वास्थ्य लाभ प्राप्त करते हैं। इससे मानसिक तनाव दूर होता है, शान्ति मिलती है और स्वास्थ्य स्थिर रहता है। डॉ. वाटर एच. वालेस के कथनानुसार- पीलिया, यकृत रोग और अपच में भी संगीत का सुनिश्चित विधेयात्मक प्रभाव पड़ता है।
चिकित्सकों ने अपने अनुसंधान निष्कर्षों में बताया है कि कुछ रागनियां ऐसी हैं जो शरीर के भीतर इतना कंपन उत्पन्न करती हैं जिससे रक्तप्रवाह की गति तीव्र हो जाती है। इससे शरीर के भीतर जो विषैले पदार्थ चिपके हुए होते हैं, वे उत्तेजित होकर निसर्ग मार्ग से बाहर निकल जाते हैं और रोगी को शीघ्र आराम मिलता है। इन विशेषज्ञों के अनुसार विभिन्न राग-रागनियों एवं वाद्ययंत्रों के माध्यम से मनुष्य की जटिल से जटिल मनोवैज्ञानिक समस्याओं का समाधान भी संभव है। मानसिक असंतुलन, क्रोध, आवेश, जैसे मनोरोगों का शमन संगीत की मधुर स्वर लहरियों के द्वारा तो होता ही है- साथ ही माइग्रेन, सिरदर्द, उच्च रक्त चाप, अनिद्रा आदि रोगों से भी संगीत चिकित्सा द्वारा सहज ही छुटकारा पाया जा सकता है। चिकित्सकों का मत है कि शरीर में जो तनाव या विकृति पैदा होती है उसका मूलाधार मस्तिष्क के ज्ञान तन्तु है। संगीत से कानों में लगी नैसर्गिक झिल्ली प्रकम्पित होती है, जिससे सम्बद्ध तंतुओं के सजग होने से सम्पूर्ण शरीर में नवीन प्राण चेतना दौड़ जाती है और शक्ति उत्पन्न कर आरोग्य लाभ प्रदान करती है। संगीत से न केवल चित्त को विश्रान्ति मिलती है, वरन् अनाहत चक्र के जागरण द्वारा आत्मिक शक्तियों, अतीन्द्रिय क्षमताओं की जाग्रति भी होती है।
विभिन्न राग-रागनियों तथा वाद्य यंत्रों के आधार पर उत्पन्न हुई ध्वनियाँ अद्भुत प्रभाव छोड़ती हैं। संगीत प्रवाह के माध्यम से न केवल शारीरिक-मानसिक रोगों का उपचार संभव है, वरन् भावना क्षेत्र में भी उपयोगी परिवर्तन किये जा सकते हैं। यह एक अतिशय प्रभावशाली शक्ति है, पर उसे सामान्यतया मनोरंजन के लिए ही प्रयुक्त किया जाता रहा है। यदि इस रहस्य को समझा जा सके कि किस-किस तरह के गानों और रागनियों का मनुष्य के मन-मस्तिष्क पर कैसा-कैसा प्रभाव पड़ता है, तो उससे मानवी प्रगति में चार चाँद लग सकते हैं।
प्राणशक्ति अभिवर्धन के जितने भी तरीके हैं, उनमें से कुण्डलिनी जागरण प्रमुख है। शरीर को यदि भूमण्डल के सदृश्य माना जाय तो उसके दो शक्तिशाली ध्रुव केन्द्र देखने होंगे। उत्तरी ध्रुव है- सहस्रार ब्रह्म रंध्र, दक्षिण ध्रुव है- जननेन्द्रिय मूल में मूलाधार चक्र। इन दोनों में मेरुदंड माध्यम से इतना ही संपर्क चलता है कि शरीर के अंग अवयवों का क्रियाकलाप सही ढंग से चलता रहे और जीवन यात्रा में अकारण ही कोई बड़ा व्यवधान उत्पन्न न हो। यह सामान्य स्तर के प्राण प्रक्रिया के क्रियाकलाप हैं।
मस्तिष्क भी एक प्रकार का विद्युत भण्डार है, जिससे कल्पना, विचारणा, तर्क और निष्कर्ष जैसे प्रयोजन पल-पल पर सिद्ध होते रहते हैं। इसी प्रकार अचेतन मन द्वारा निद्रा, भूख, रक्त संचार, आकुँचन-प्रकुँचन, नितेष-उन्मेष जैसी क्रियाएँ स्वसंचालित ढंग से चलती रहती हैं। उसी प्रकरण में सामान्य स्तर की कुण्डलिनी प्रक्रिया उत्पन्न होती और खपती रहती है।
विशेष प्रयत्न से कुण्डलिनी जागरण विधान अपनाकर प्राणशक्ति को असाधारण मात्रा में उत्पन्न किया जा सकता है। इस कार्य में मेरुदण्ड में विद्यमान इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना नाड़ियाँ विशेष रूप से सहायक होती हैं। सूक्ष्म शरीर के मेरुदण्ड में षट्चक्र हैं। उनमें कतिपय स्तर की शक्ति सम्पदाएँ तिजोरियों में रखी सम्पदा की तरह बन्द पड़ी हैं। इनको खोलने का प्रयत्न उन विशिष्ट साधनाओं से ही संभव है, जिन्हें कुण्डलिनी जागरण कहते हैं।
जगद्गुरु आद्यशंकराचार्य ने “सौंदर्य लहरी” नामक ग्रंथ से इसी कुण्डलिनी विद्या का काव्यात्मक अलंकारिक प्रक्रिया के साथ वर्णन किया है। शरीर शास्त्रियों के अनुसार शरीर में अनेक स्थानों पर नाड़ी गुच्छक-प्लैक्सस विद्यमान है, परन्तु वे स्थूल शरीर की संरचना में आते हैं। जब कि कुण्डलिनी जागरण से संबंधित षट्चक्र सूक्ष्म शरीर से सम्बन्धित है। उन्हें खुली आंखों से या सूक्ष्मदर्शी यंत्रों की सहायता से उस तरह नहीं देखा जा सकता जिस प्रकार कि नाड़ी गुच्छक दृष्टिगोचर होते हैं। वे षट्चक्रों से जुड़े अवश्य होते हैं।
चक्र विज्ञान के संदर्भ में थियोसॉफी ने पाँच ही प्लेक्ससों से जुड़े हुए चक्रों को मान्यता दी है -(1) सैक्रल (2) सोलर (3) कार्डियक (4) फैरिन्जियल (5) कैर्वनस। यद्यपि भारतीय पद्धति में छह चक्रों की मान्यता है, पर थियोसॉफी में मूलधारा, मणिपुर, अनाहत, विशुद्धि एवं आज्ञाचक्र को ही मान्यता दी है। स्वाधिष्ठान को वह सामान्य और दूसरे को प्रतिबिम्ब मात्र मानते हैं। इस मान्यता के अनुसार इन चक्रों में पाँच प्रकार की विभूतियाँ सन्निहित हैं। इनमें से एक के भी जाग्रत हो उठने पर मनुष्य असाधारण क्षमता सम्पन्न बन जाता है, फिर पांचों के जागरण पर तो कहना ही क्या?
भारतीय योगशास्त्रों के अनुसार चक्रों की संख्या छह है और यह शृंखला-मेरुदण्ड में अवस्थित है। संख्या संबंधी थोड़े मतभेद के रहते हुए भी उनके जाग्रत होने के परिणाम लगभग एक जैसे हैं। वस्तुतः यह सभी एक प्रकार के भँवर के समान उठने वाले विद्युत प्रवाह हैं, जो समूचे कार्यतंत्र एवं मन पर अपना प्रभाव छोड़ते हैं।
चक्र गणना में छह इस प्रकार हैं- (1) मूलधारा (2)स्वाधिष्ठान (3) मणिपुर (4) अनाहत (5) विशुद्धि (6) आज्ञा चक्र। शास्त्रकारों ने इनकी गणना सात में भी की है और सातवाँ ‘सहस्रार’ चक्र भी गिना है जो इन छहों का सूत्र संचालक है। इन्हें छह मील का पत्थर भी कहा गया है और सातवें मील पर पत्थर न लगा कर उसे देवालय ही बना हुआ बताया गया है। स्थूल एनाटॉमी की दृष्टि से ब्रह्मरंध्र स्थित “रेटीक्युलर एक्टिवेटिंग सिस्टम” जो चेतना का सर्वोच्च केन्द्र है, सहस्रार से संबंधित बताया गया है।
इन्हें ही अध्यात्मवेत्ताओं ने सात प्रकार के शरीर की संज्ञा दी है। वे हैं- (1)स्थूल शरीर- फिजिकल बॉडी (2) सूक्ष्म शरीर- ईथरिक बॉडी (3) कारण शरीर- एस्ट्राल बॉडी (4) मानस शरीर- मेण्टल बॉडी (5) आत्मिक शरीर- स्प्रिचुअल बॉडी (6) देव शरीर- कॉस्मिक बॉडी (7) ब्रह्म शरीर- बॉडी लेस बॉडी। मेरुदण्ड में अवस्थित प्राण ऊर्जा के इन सातों चक्रों का जागरण ही कुण्डलिनी जागरण कहलाता है। यही चक्र जाग्रत हो जाने पर रहस्यमय समष्टिगत प्राण ऊर्जा को सूक्ष्म जगत से आकर्षित करके स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीरों की विभिन्न आवश्यकताओं की पूर्ति करते रहते हैं। इन दिव्य शक्तियों का समन्वय ‘लोगोस’ नाम से अंग्रेजी में जाना जाता है। इस प्रत्यावर्तन का एक नाम ‘फोताह’ भी है जिसका शाब्दिक अर्थ है विश्व शक्ति का मानवीकरण।
यों तो कुण्डलिनी शक्ति काया कलेवर के प्रत्येक कण में समाहित है। शरीर के अंग अवयवों और मस्तिष्क के क्रियाकलापों में यह प्राण विद्युत ही खपती है और उसी के बलबूते यह सारा कल कारखाना चलता है। किन्तु अतिरिक्त ऊर्जा की तब जरूरत पड़ती है, जब जीवन यात्रा से कही आगे बढ़कर लोकमंगल एवं सार्वजनिक हित के कोई बड़े काम हाथ में लेने पड़ते हैं। ऐसी स्थिति में कुण्डलिनी द्वारा उत्पादित प्राणशक्ति ही काम करती है। फिर भी यह ध्यान रखने योग्य बात है कि वह शरीर तंत्र में उत्पादित होने के कारण होती भौतिक स्तर की ही है। इस आधार पर सूक्ष्म किया गया महाप्राण साँसारिक प्रयोजनों में विशेषतया व्यक्तिगत स्वार्थ सम्पादनों में ही प्रयुक्त होता है। इसे पाकर मनुष्य दैत्यवत् जाइंटवत् हो जाता है। उसे किस प्रयोजन में नियोजित करे यह लक्ष्य स्पष्ट न रहने पर तो उसका दुरुपयोग भी हो सकता है। इसीलिए कुण्डलिनी शक्ति जागरण के साथ उच्चस्तरीय लक्ष्य निर्धारण को प्रमुखता दी गयी है।
कुण्डलिनी जागरण प्रक्रिया के आधार पर योगों की सिद्धि हो सकती है और कालजयी बना जा सकता है। स्वयं महाप्राण बना जा सकता है और इन शक्तियों को एक शक्तिवान अपने भण्डार में से दूसरों को दे सकता है तथा उसे अपने स्तर से कहीं ऊँचा उठा सकता है। इसे शक्ति संचार कहते हैं। इससे प्रभावित व्यक्ति दुर्बल, अल्पशिक्षित प्रतीत होते हुए भी ऐसे पराक्रम करते देखे गये हैं, जो बलवानों और विद्वानों के भी कान काटने लगे। विवेकानन्द ने अमेरिका में जो भाषण दिये थे, वे इतने उच्चकोटि के थे कि उनके निजी अध्ययन और अनुभव को देखते हुए कहीं अधिक उच्चकोटि के तथा प्रभाव की दृष्टि से आश्चर्यचकित करने वाले थे। यह विशेषता उन्हें अपने गुरु रामकृष्ण परमहंस से अनुदान के रूप में उपलब्ध हुई थी। गुरु मत्स्येन्द्र नाथ एवं जन्म से ही सिद्ध पुरुष के रूप में विख्यात गोरखनाथ के घटना प्रसंग भी यही बताते हैं कि प्राण चेतना के प्रभाव से आश्चर्यजनक परिवर्तन प्रस्तुत किये जा सकते हैं।
वस्तुतः कुण्डलिनी उस सार्वभौमिक जीवन तत्व को कहते हैं जो इस विश्व के कण-कण में चेतना रूप में संव्याप्त है। इसके भीतर आकर्षण एवं विकर्षण की दोनों ही धारायें विद्यमान हैं। इन्हें स्थूल रूप में विद्युत ओर चुम्बकत्व के रूप में प्रत्यक्ष प्रतिपादित भी किया जा सकता है। प्रख्यात मनीषी हर्बर्ट स्पेन्सर के अनुसार इसे जीवन का सार- “ऐसेन्स आफ लाइफ” कहा जाना चाहिए। इसका ईसाई धर्म की महान पुस्तक बाइबिल में -”महान सर्प” के रूप में उल्लेख किया गया है। तंत्र विज्ञान में इसी को ईश्वरीय प्रकाश या दिव्य प्रकाश-”एस्ट्रल लाइट” के नाम से सम्बोधित किया गया है। पारसी धर्म में इसे “सीक्रेट फायर” कहा गया है। इसी से मानवी सत्ता का हर क्षेत्र प्रभावित किया जा सकता है। यह मूलतः प्राणाग्नि है जो चेतना के मंथन से उत्पन्न होती है। आज तो इसे “चक्रा मशीन” व इलेक्ट्रो मीटर द्वारा स्थूल दृष्टि से मापा भी जा सकता है।
साधनाशास्त्रों में पवित्र जीवन अग्नि के रूप में कुण्डलिनी शक्ति का वर्णन किया गया है। प्रदीप्त अग्नि जिस प्रकार अपने क्षेत्र को उष्ण एवं प्रकाशवान बना देती है, वैसा ही प्रकाश कुण्डलिनी जागरण का होता है। योगकुंडल्योपनिषद् में कहा गया है- “अग्नि और प्राणवायु दोनों के आघात से प्रसुप्त कुण्डलिनी जाग पड़ती है और ब्रह्मग्रन्थि, विष्णुग्रन्थि, रुद्रग्रन्थि तथा षट्चक्र का भेदन करती हुई सहस्रार कमल में जा पहुँचती है। वहाँ यह शक्ति शिव के साथ मिलकर आनन्द की स्थिति में निवास करती है। वही श्रेष्ठ परा स्थिति है। ऋद्धि-सिद्धियों का- मोक्ष का कारण है।
जो ब्रह्माण्ड में है वही पिण्ड में भी है। आकाश का सूर्य सहस्रार-मस्तिष्क है तो पृथ्वी एवं समुद्र की तरह मूलधारा। यह दोनों अपना आदान-प्रदान क्रम जारी रखने के लिए मेरुदण्ड का आश्रय लेते हैं, वही कुण्डलिनी है। हठयोग के अनुसार उसी के मध्यवर्ती भँवर चक्रवात षट्चक्र है। यह ऐसे प्राणशक्ति के निर्झर स्त्रोत हैं जो समूची काय सत्ता और अन्तः चेतना को प्रभावित करते हैं। इन अदृश्य एवं अविज्ञात प्रसुप्त क्षमताओं को जाग्रत-उत्तेजित करके साधक अपने को ऐसा शक्ति पुँज बनाता है जो उसे देवोपम बना सके। यही कुण्डलिनी जागरण है और विश्वशक्ति का मानवीकरण भी।
जो ब्रह्माण्ड में है वही पिण्ड में भी है। आकाश का सूर्य सहस्रार-मस्तिष्क है तो पृथ्वी एवं समुद्र की तरह मूलधारा। यह दोनों अपना आदान-प्रदान क्रम जारी रखने के लिए मेरुदण्ड का आश्रय लेते हैं, वही कुण्डलिनी है। हठयोग के अनुसार उसी के मध्यवर्ती भँवर चक्रवात षट्चक्र है। यह ऐसे प्राणशक्ति के निर्झर स्त्रोत हैं जो समूची काय सत्ता और अन्तः चेतना को प्रभावित करते हैं। इन अदृश्य एवं अविज्ञात प्रसुप्त क्षमताओं को जाग्रत-उत्तेजित करके साधक अपने को ऐसा शक्ति पुँज बनाता है जो उसे देवोपम बना सके। यही कुण्डलिनी जागरण है और विश्वशक्ति का मानवीकरण भी।
“संत महात्मा अनेक होते हैं। भजन करते, भीख माँगते और जहाँ तहाँ विचरते दिन पूरे करते हैं।
पर इस समुदाय में एक रत्न निकले बाबा जम्बूसर वे जोधपुर के पास धीमसर गाँव में रहते थे। उनने भक्ति भाव से भी अधिक ध्यान कुरीतियों और अनैतिकताओं के ठीक कराने के लिए जनसंपर्क साधने का किया। उन्होंने जाति-पाति, नशा, माँसाहार, बालविवाह जैसी अनेकों कुरीतियों को त्यागने व सत्प्रवृत्तियों को बढ़ाने में बड़ी संख्या में सफलता पाई। ऐसे व्रतधारियों का उन्होंने विशालकाय बिश्नोई संप्रदाय बनाया।
सुन्दर वस्तु सभी को प्रिय लगती है। सुन्दर कपड़े या खिलौने को छोटे बालक भी लपककर पकड़ते हैं। प्राणियों के संबंध में भी यही बात है। मोर, हंस, हरी चिड़िया जैसे पक्षियों की हलचलें देखते रहने को मन करता है। वन जीवों में से कोई बड़े सुहावने होते हैं। उन्हें पकड़ा नहीं जा सकता तो देखते रहने के लिए तो जी करता ही है। कुत्ते, बिल्ली के बच्चे तक को गोदी में खिलाने की इच्छा होती है। प्रकृति का सौंदर्य देख सकने वालों के तो नेत्र ही नहीं अन्तरंग की भाव संवेदना तक पुलकित हो उठती है।
मनुष्य की सौंदर्यप्रियता तो प्रख्यात है। वह दूसरे सुन्दर दीखने वालों के प्रति आकर्षित होता है। उनके सान्निध्य के लिए ललचाता है। उठती आयु की चमक-दमक सभी को आकर्षित करती है। विवाह की चर्चा चलने पर वर-वधू प्रधानतया साथी के बारे में कल्पना यही सँजोये रहते हैं कि वह सुन्दर हो। विशेषतया मनचले लड़कों का तो यही आग्रह रहता है। वे माँ-बाप तक की सलाह नहीं मानते। अपनी आंखों से देखकर अपनी पसन्द की वधू चुनने के लिए अड़े रहते हैं। यदि सुसम्पन्न, सुयोग्य और कमाऊ हुआ तो हठ उसी की निभती है। भले ही वह स्वयं कुरूप ही क्यों न हो। यही इच्छा विवाह योग्य कन्याओं की भी होती है। भले ही विवशता वश जहाँ अभिभावकों ने कन्या दान किया है, उसी के पीछे-पीछे चल दें।
सौंदर्य का एक आकर्षण है चुम्बकत्व, जो दूसरों को अपनी ओर खींचता है। इस खिंचाव से प्रेरित होकर कामुकता को भी उत्तेजना मिलती है। निकटता के प्रलोभन में कई आवेशग्रस्त होकर अपना बहुत कुछ गँवा भी बैठते हैं और ठगे जाने पर पीछे पछताते हैं। पतंगे का दीपक पर जल मरना प्रसिद्ध है।
दूसरे सुन्दरों की समीपता ढूँढ़ने की तरह अपने आपको अधिक सुन्दर बनाने के लिए कुछ विवेकवानों को छोड़ कर सभी प्रयास करते हैं। चेहरे की बनावट को बदल सकना तो मुश्किल है पर साज-सज्जा के आधार पर शरीर को अधिक आकर्षक, अधिक उत्तेजक बनाने के प्रयत्न में संलग्न अधिकाँश नर-नारी देखे जाते हैं। कीमती कपड़े, उनके चित्र-विचित्र फैशन इसीलिए बनते और बदलते रहते हैं। उनकी नवीनता देखकर लोगों का कौतुहल बढ़े और दूसरों की नजर उन्हीं पर जमें। जल्दी-जल्दी कपड़े बदलना, उनके फैशनों में फर्क रखना प्रायः इसी कारण होता था। लोग अनेक जोड़ी अनेक रंग-ढंग के कपड़ों से बक्से इसीलिए भरते हैं। वस्त्रों के बाद जेवरों का सिलसिला चल पड़ता है। पुरुषों में अंगूठी, घड़ी, बटन जैसे थोड़े से ही जेवर प्रयोग में लाये जाते हैं। पर स्त्रियाँ तो इसमें अति कर देती हैं। पूँजी तो लगती ही है। धातु के दबाव से जिस अंग पर धारण किये जाते हैं उसमें कड़ापन आ जाता है। कई तो अपने नाक कान को इस बुरी तरह छिन्न-भिन्न कराती और उनमें चित्र-विचित्र जेवर लटकाती हैं कि इन अंगों का प्रकृति प्रदत्त सौंदर्य सदा सर्वदा के लिए विदा हो जाता है। चौड़े छेदों को खुला न रखने के लिए उनमें कुछ न कुछ जाल-जंजाल भरे ही रहना पड़ता है।
सौंदर्य प्रसाधनों का विभाग भी इसी शृंगारिकता के साथ जुड़ा हुआ है। हाथों को रंगने के लिए मेहंदी, पैरों को रंगने के लिए महावर, माँग भरने के लिए सिन्दूर, होंठ रंगने के लिए लाली, नाखून रंगने के लिए पॉलिश, चेहरे पर लगाने के लिए क्रीम, पाउडर, लिपिस्टिक, इत्र-फुलेल आदि का इतना प्रयोग होता है कि किसी सम्पन्न परिवार के सदस्य इन पर इतना खर्च कर देते हैं जितने में कि एक मध्यम वृति वाले कुटुम्ब का चौका खर्च भली प्रकार चल सकता है। इसी शृंगारिकता की एक नई मद और खुली है लज्जा वस्त्रों को यथा संभव उघाड़ना, शील का प्रतिनिधित्व करने वाले अंगों का अर्ध प्रदर्शन करना, उन्हें उत्तेजक ढंग से उभारना। वक्षस्थलों तथा नितंबों का प्रदर्शन आज खुले आम किया जाता है।
इस प्रदर्शन की सार्थकता तभी बनती है जब दूसरे लोग आँख फाड़फाड़ कर उसे देखे। मन ही मन आश्चर्यचकित हो और लुभावनी दृष्टि से देखे। कहना न होगा कि यह प्रवृत्ति दुराचार को जन्म देती है। शारीरिक शील यदि अनुबन्धों के बंधन में बंधा भी रहे तो अनेकों की कुदृष्टि तो उन पर पड़ती ही रहती है। मानसिक व्यभिचार तो इर्द-गिर्द मँडराता ही रहता है। धन व्यय, सजावट, ढेरों समय का अपव्यय, साथ ही उत्तेजक अवाँछनीय-कुदृष्टि का उभार। यह सब मिलकर ऐसी स्थिति का सृजन करते हैं, जो धारणकर्ता व्यक्तित्व पर अंगुली उठाने का अवसर प्रदान करती हैं। उसे ओछा,बचकाना, अपव्ययी सिद्ध करती है उसके स्वभाव एवं चरित्र पर प्रश्न चिन्ह लगाती हैं। इस प्रकार यह सौदा हर दृष्टि से महंगा पड़ता है। इसे इसी स्तर का समझना चाहिए जैसा कि बारात की सजावट में हजारों रुपया फूँककर बाजार में निकलने वालों का हृदय अपनी ओर आकर्षित करना चाहता है, आये दिन निकलने वाले इस धमाल को कोई आँख उठाकर भी नहीं देखता। मूर्खता से चिढ़े हुए लोग पीठ फेर लेते हैं और बाजों की कर्कश ध्वनि से बचने के लिए कानों में रुई लगा लेते हैं। शानदार दावतों में यही आत्म प्रदर्शन और सस्ती वाहवाही लूटने का भाव रहता है। खाने वाले खा तो जाते हैं पर मन ही मन यही सोचते हैं कि हराम की कमाई बेदर्दी से उड़ाई। ऐसे लोग अपने मन में कुछ भी सोचते हैं पर वस्तुतः उनका यह बचकानापन, समझदार वर्ग की लानत ही लेकर वापस लौटता है।
विज्ञजन सदा सादगी को सर्वोत्तम सज्जा मानते रहे हैं। उसमें चार चाँद लगाने के लिए स्वच्छता का पुट हर विद्या के साथ जोड़ा जा सकता है। कपड़े स्वच्छ हो, करीने के साथ पहने हुए हो। बालों, दांतों आदि को व्यवस्थित रखा गया हो तो उस प्रयास में जागरुकता एवं सुव्यवस्था का सुयोग बना दीखता है। स्वाभाविकता, सरलता किसी के वजनदार व्यक्तित्ववान होने का चिन्ह है। श्रेष्ठ जन इतराते नहीं, वे शालीनता अपनाये और सादगी से अपने कलेवर को ढके रहते हैं। इनमें उनकी नम्रता, सज्जनता एवं दूरदर्शी विवेकशीलता का परिचय मिलता है। यह प्रामाणिकता और परिपक्वता का चिन्ह भी है। सादगी की वेष-भूषा अपनाने वाले को किसी अतिरिक्त साज-सज्जा की जरूरत नहीं पड़ती। पशु-पक्षी अपने प्राकृतिक स्वरूप में ही सुन्दर लगते हैं। उन्हें चित्र-विचित्र कलेवरों से ढक दिया जाय तो उपहासास्पद ही लगने लगेंगे। मनुष्य को लज्जा ढकने एवं ऋतु प्रभाव को हलका करने के लिए ही मात्र हलके फुलके वस्त्रों की आवश्यकता पड़ती है। साज-सज्जा शृंगारिकता की आवश्यकता है ही नहीं। जो धारण करने के लिए मचलते हैं वे दूसरों की आंखों में उठते नहीं वरन् गिरते ही है।
सामान्य मुखाकृति को असाधारण रूप से सुन्दर दिखाने के लिए मुसकराते रहने की आदत डाल लेना इतना अधिक प्रभावोत्पादक है कि जिसकी तुलना में ढेरों धन और समय खर्च कराने वाली शृंगारिकता तुच्छ ही पड़ती है। बिना अट्टहास लगाये सरल सौम्य मुसकान अन्तःकरण के सौंदर्य का प्रदर्शन करती है और किसी अन्य आकर्षण की तुलना में अधिक चुम्बकीय होती है।
इसके अतिरिक्त कुछ और भी विशेषताएँ है जो कुरूप व्यक्ति को भी सौंदर्यवान बनाती है। जिसकी आंखों में आशा की, उत्साह की, स्फूर्ति की चमक दृष्टिगोचर होती है उसकी प्रतिभा प्रकट होती है। हर अंग में एक नया प्राणसंचार होता परिलक्षित होता है। यह आन्तरिक सद्गुण है। इसे अन्तरात्मा की गहराई से उभरी सुसंस्कारिता भी कह सकते हैं। जिसने अपने स्वभाव एवं दृष्टिकोण को परिष्कृत कर लिया, उसके नेत्रों में, चेहरे पर उमंगे लहराती दृष्टिगोचर होंगी। आत्म विश्वासी, अभीष्ट के प्रति आशावान्, साहसी व्यक्ति अन्तःक्षेत्र में अतिरिक्त रूप से सुदृढ़ होते हैं। उसकी यह विशेषता सुघड़ता बनकर बाह्य क्षेत्र में थिरकती परिलक्षित होती है। चेहरा कमल पुष्प की तरह खिलता और सुरभि बिखेरता दृष्टिगोचर होता है। इस वास्तविक सौंदर्य का स्थायी रूप से अवधारण कर सकना मनुष्य के अपने हाथ की बात है। इसमें मात्र अपने को सुसंस्कृत बनाना होता है।
एक वेश्या और एक पतिव्रता का घर आमने सामने था। खिड़की में होकर दोनों एक दूसरे के कृत्यों को देखती रहती। पतिव्रता का मन क्रोध और घृणा से भरा रहता। वह उसे नीच समझती और मन ही मन अपशब्द कहती रहती।
दूसरी ओर पतिव्रता के कृत्यों को वेश्या देखती तो उसका मन श्रद्धा से भर जाता। उसकी भरपूर सराहना करती और ईश्वर से प्रार्थना करती कि हे प्रभू इस जन्म में तो मेरा पतन हो ही गया पर अगले जन्म में मुझे पतिव्रता होने का सौभाग्य प्रदान कर दे।
इसी प्रकार दोनों की जिन्दगी बीत गई। मरने के बाद वे परलोक गई। उन्हें कहाँ स्थान दिया जाय इसका निर्णय धर्मराज को करना था। उनने फैसला सुनाया कि वेश्या को ऊँचे स्वर्ग में स्थान दिया जाय और पतिव्रता को साधारण जगह में ठहरा दिया जाय।
देवदूतों ने शंका की और फैसले में गलती तो नहीं हुई है यह फिर से पूछा। धर्मराज ने कहा शारीरिक कृत्यों का जितना महत्व है, उससे कहीं अधिक उसके कर्ता की मनःस्थिति का। वेश्या के मन में श्रद्धा और पतिव्रता के मनमें घृणा भरी रही। इसीलिए उन्हें भावना के अनुरूप स्थान दिया गया।
“मैं समझा था कि बहिश्त में आ गया हूँ।” उस दिन फारस का राजदूत आया था विजय नगर में। नगर को देख कर ऐसा हक्का-बक्का रह गया था कि उसे राज सेवकों को संभालना पड़ा। आज भी उसकी लगभग वही दशा है। वह महाराज कृष्णदेव राय का अतिथि होकर आया है। राज्य भ्रमण-यात्रा में और राज शिविर को देख कर आश्चर्य से हतप्रभ हो कर रह गया है।
“पाँच-पाँच खण्डों के तम्बू, पुरा महल, दरबार घरों की कतारें कपड़े के तम्बू में बन सकती है।” उसने कभी नहीं सोचा और उसकी कल्पना में ही नहीं आयी थी की ये विशाल वस्त्र गृह आधी-घड़ी में कैसे खड़े हो गए। द्वारों पर बैठे कृत्रिम केहरि भेड़िए, व्याघ्र-कक्षों में कूदते से सजीव दीखते मृग, जहाँ-तहाँ उड़ने को पंख फैलाए पक्षी वह विदेशी नेत्र फाड़े देख रहा था। उसे लगता था-”हिन्दू बादशाह जादूगर है।”
“आप प्रसन्न तो हैं।” जब महाराज ने उसके कन्धे पर हाथ रख दिया, वह चौंक पड़ा। भूमि तक झुककर उसने अभिवादन किया।
‘हमारे कलाकारों ने ये मूर्तियाँ इसलिए बनाई है कि हमें यह स्मरण रहे कि मनुष्य भवनों में बन्द रहने के लिए उत्पन्न नहीं हुआ है।’ महाराज कृष्णदेव राय ने बताया कि मनुष्य को घर की चार दीवारी से निकल कर प्रकृति और समूची सृष्टि के साथ एकात्म होना है। इन पशु-पक्षियों के साथ मित्र की भांति रहना है और समस्त जगत को बनाने वाले परमात्मा की आराधना करनी है।
‘ये बुत हैं? जानदार नहीं हैं ये? उस विदेशी राजदूत ने महाराज की बात सुनी ही नहीं। सुनने की स्थिति में नहीं था वह।
‘आप किसी को भी सुनकर देख सकते हैं।’ महाराज मुस्करा उठे।
‘सचमुच। एक को छूकर उसने देखा और भली भाँति देखकर बोला विलक्षण बड़े विलक्षण हैं- आप लोग।’
‘हमारी कौम जहाँ गई वहां कब्रिस्तान बन गए। खून, तबाही, जुल्म और आखिर कब्रगाह या खाक हुए शहर।” राजदूत के नेत्र सजल हो गए। “मैंने सुना था विजय नगर हिन्दू राज्य है। मुझे लगा-महज शाही रकीब होने की वजह मुझे आने की इजाजत मिली है, मगर उस दिन आपके शहर में आकर मैं हैरान रह गया। मन्दिर की गिनती नहीं। कोई कहता था विजय नगर में चार हजार मन्दिर है और उन मंदिरों के बीच-बीच में मस्जिदों की मीनार बड़े मजे में खड़ी हैं।”
“ओह।” महाराज ने एक क्षण को कुछ सोचा और फिर मजे से मुस्करा दिये। “लगता है ‘हिन्दू’ शब्द को अब तक आप नहीं समझ पाए। शाही दूत उनका मुख ताक रहा था और वह कहे जा रहे थे, “यह शब्द आपके ही देश का दिया हुआ है। सिन्धु के इस पार बसे इस देश के लोगों ने उन्होंने सिन्धु कहना शुरू किया। फारसी में “स” का उच्चारण “ह” होने के कारण सिन्धु-हिन्दु हो गया, बाद में हिन्दु हिन्दू में बदल गया। राजदूत के चेहरे पर अभी भी आश्चर्य पुता था, कृष्णदेव सरल शब्दों में उसे बता रहे थे, हिन्दू व्यक्ति नहीं जाति नहीं यह उन समस्त व्यक्ति, व्यक्तियों का समुह है जो इस देश में रहते हैं। वर्तमान अर्थों में यदि इस शब्द का पर्याय ‘भारतवासी’ कहे तो ज्यादा ठीक रहेगा।
“वजा फरमाया आपने, मैंने आपके यहाँ देखा बिना किसी भेद-भाव के हर कौम सम्मानित ढंग से रह रही है। सेना और अन्य विश्वसनीय जगहों पर भी कोई भेद-भाव नहीं। पारस्परिक विश्वसनीयता से ही यहाँ की समृद्धि उपजी है।” आँखों की कोरों पर ढुलक आए पानी को साफ कर तनिक कन्धे उचका कर वह कहने लगा-’ ‘जब मैंने देखा कि नगर में राज बढ़ई और मजदूर तक कानों में सोने के हीरे मणित जड़े गहने पहने काम कर रहे हैं, तभी समझ गया कि मैं दुनिया के सबसे खूबसूरत नगर में नहीं बल्कि फरिश्तों की आबादी में आ गया हूँ।” राजदूत का कण्ठ भावोद्रेक से गदगद था “लेकिन तब भी मैं होश में नहीं था। आज मैं होश में हूँ और जानता हूँ कि खुदा ने अपने खास मुरीदों को जमीन पर भेज रखा है और ये सब यहाँ आबाद हो गए हैं।”
‘हम सब मनुष्य है। मनुष्य का कर्तव्य है मनुष्यत्व का पालन और मनुष्यता का रक्षण।” महाराज ने बड़े संकोच से राजदूत के प्रशंसा वाक्य सुने।
‘मैंने सुना है,” जैसे राजदूत को कोई भूली बात स्मरण हो आई-”महज विधर्मी राज्यों से मुकाबला करने के लिए विजय नगर की बुनियाद पड़ी है।”
“किसी धर्म या जाति का विरोध करने के लिए नहीं।” महाराज गंभीर हो गए-”अत्याचार और अन्याय का विरोध करके त्रस्त मानवता को परित्राण देने के लिए। कुछ रुक कर वह बोले” अपने अस्तित्व के उद्भव से विकास के चरम शिखर में आरुढ़ होने तक इस देश के निवासियों ने कभी आक्रमण की पहल नहीं की। यहाँ से उमगे विजय अभियान रक्त के कलुषित सरित प्रवाह में मानव के अस्तित्व को डुबाने के लिए नहीं संचालित हुए। इनका संचालन तो संस्कृति की शुभ्र, धवल, फेनिल लहरों से सारी धरती की आप्लावित स्नात करना रहा है। इस प्रवाह के प्रत्येक जल कण में सहिष्णुता का माधुर्य, त्याग की शीतल, उदारता की तरलता और करुणा का उद्दाम वेग रहा है।” महाराज के कण्ठ से झरती शब्द निर्झरणी के प्रवाह के साथ उनके मुख मण्डल पर अनोखी दीप्ति दृश्यमान हो रही थी। फारस का राज्य प्रतिनिधि इस भाव परिवर्तन को देख स्तब्ध था।
बहुत मुश्किल से उसके कण्ठ से स्वर फूटे-”आज जब हर कौम खुदगर्ज और जुल्म परस्त होती जा रही है। आप जैसे फरिश्ते कितने हैं रुयेडडडडडड जमीं पर?”
“यह हम नहीं जानते। पर जिस संस्कृति में हम उपजे हैं, उसकी एक ही चिर प्रतिज्ञा रही है मनुष्य को देवता बनना है। अकेले अपने निर्माण में संतुष्ट न हो कर समूची धरती पर स्वर्ग की सुषमा बिखेरनी है। हमारे प्रयासों के हर कदम में इसी प्रतिज्ञा की गूँज है। उद्देश्य के यज्ञ में जीवन की आहुति देने की प्रेरणा देने वाली यह संस्कृति देव संस्कृति कहलाई। यही इसकी यथार्थ संज्ञा है। इस देश के द्वार इन तत्वों की शोध हुई इस कारण इसे हिन्दू संस्कृति भी कहते हैं। किन्तु है सह सार्वभौम। इस संस्कृति के दायरे में सभी धर्म सम्प्रदाय सुरक्षित बने रह सकते हैं।”
“फरिश्ते हैं जनाब आप भारतवासी “ राजदूत ने भूमि तक झुक कर अभिवादन किया। तभी एक चर ने आकर उसके पास कुछ धीरे से कहा। वह राजदरबार की ओर धीरे से मुड़ चले, राजदूत ने उनका अनुसरण किया।
आज फिर से कालचक्र घूमकर आ रहा है। एक बार से भारत से वही शक्ति प्रवाह निःसृत हो रहा है, जो शीघ्र ही समस्त जगत को प्लावित कर देगा। देव संस्कृति के सभी तत्व पुनः मुखरित हुए हैं। मुखरित हुई है एक वाणी जिसकी प्रतिध्वनि चारों ओर व्याप्त हो रही है एवं जो प्रतिदिन अधिकाधिक शक्ति संग्रह कर रही है और यह वाणी अपने पहले की सभी वाणियों की अपेक्षा अधिक शक्तिशाली है क्योंकि यह अपनी पूर्ववर्ती उन सभी वाणियों का समष्टिगत स्वरूप है। जो वाणी एक समय कल कल निनादिनी सरस्वती के तीर पर ऋषियों के अन्तस्तल फूटी थी, जिस वाणी ने रजत शुभ्र गिरिराज के शिखर-शिखर पर प्रतिध्वनित हो कृष्ण बुद्ध और चैतन्य में से होते हुए समतल प्रदेशों में उतर कर समस्त देश को ऋषि संस्कृति के देवी प्रवाह से भर दिया था। वही एक बार पुनः मुखरित हुई है। एक बार फिर से द्वार खुल गये हैं। अच्छा हो विश्व के सभी नागरिक एक साथ इस आलोक राज्य में प्रवेश करे।
एक बगीचे में गाय घुस गई उसने कुछ पौधे चर लिए। इस पर मालिक को क्रोध आया, उसने लाठी मारी और गाय मर गई।
पंचायत जमा हुई। बगीचे के मालिक को गौ हत्या का दोषी बना दिया और ब्रह्म हत्या का पाप लगा दिया। उसे बड़ा प्रायश्चित करने का दण्ड दिया।
मालिक चतुर था उसने कहा सभी इन्द्रियों का स्वामी इन्द्र है। पापों का अधिष्ठाता भी वही है। हाथों ने गाय मारी तो उसका पाप इन्द्र को लगेगा।
ब्रह्म हत्या इन्द्र के पास पहुँचा उसने सारा विवरण बताया और इन्द्र को पाप का दंड भुगतने के लिए कहा।
इन्द्र ने धूर्तता समझी और साधारण व्यक्ति का भेष बना कर ब्रह्महत्या के साथ घटना स्थल पर चल पड़े।
जाते ही उसने बगीचे के मालिक से भेंट की और उनकी सद्बुद्धि और मेहनत की प्रशंसा की। प्रशंसा सुनकर वे बड़े प्रसन्न थे।
इन्द्र वेषधारी ने फिर से पूछा तो उस बगीचे का लाभ और श्रम तो आप को ही मिलता होगा? स्वामी ने उत्साह पूर्वक उसे स्वीकारा।
इन्द्र प्रकट हो गये उनने कहा जब हाथों की क्रिया का लाभ और यश आपको मिलता है तो गाय मारने का पाप भी आपको ही क्यों न लगेगा?
स्वामी निरुत्तर था और उसी को ब्रह्महत्या ने पकड़ा और प्रायश्चित के लिए बाधित किया।
शरीर का सूत्र संचालन जिस चेतना केन्द्र से होता है, वह मस्तिष्क है। इस क्षेत्र से होने वाला उद्भव विचारणा, भावना, मान्यता, आकाँक्षा अभिरुचि के रूप में होता है। उसी आधार पर दृष्टिकोण और स्वभाव बनता है तथा गतिविधियों का तारतम्य चल पड़ता है। इस प्रकार काया की कठपुतली को मानसिक तंत्र ही नचाता है और जीवन को भला, बुरा, सफल, असफल विनिर्मित करता है।
स्वास्थ्य, आहार विहार की प्रकृति, अनुशासन के अनुरूप सुव्यवस्था रखने पर निर्भर है और आधा आहार मानसिक स्थिति पर अवलम्बित है। इसलिए जिन्हें निरोग रहना और दीर्घजीवी बनना हो, उन्हें अपनी मनःस्थिति को सही रखने पर पूरा-पूरा ध्यान देना चाहिए। मन को असंतुलित रखना, उत्तेजनायें और अस्त-व्यस्तताओं से भरने से अनावश्यक तनाव, उत्पन्न होता है और उसकी अवाँछनीय प्रतिक्रिया से आहार विहार का सामान्य क्रम रखने पर भी स्वास्थ्य का ढाँचा लड़खड़ा जाता है। दुर्बलता और रुग्णता का एक यह भी बहुत बड़ा कारण है।
इस संदर्भ में होना चाहिए कि हलकी-फुलकी, हँसती-हँसाती जिंदगी जिया जाय। हर काम को पूरा महत्व दिया जाय, और उसे पूरी जिम्मेदारी के साथ सम्पन्न किया जाय। किंतु साथ ही इस बात को भी मन में बिठा लिया जाय कि इच्छानुरूप परिस्थितियों का, अनुकूलताओं का होना आवश्यक नहीं। संसार हमारे लिए नहीं बना है, और न हर कोई हमारी इच्छानुरूप चलने के लिए बाधित है। यहाँ मनुष्यों की गतिविधियाँ और संसार की परिस्थितियाँ अपने ढंग से चलती हैं। उन्हें अपने अनुकूल बनाने में जितनी सफलता मिल सके उतने में ही संतोष करना चाहिए। ऊँचा सोचें, महत्वाकाँक्षाएँ रखें, पर साथ ही इसकी भी भीतरी तैयारी रहनी चाहिए कि यदि इच्छित बात पूरी न हो पाय और प्रतिकूलता या असफलता ही हाथ लगे तो उस स्थिति के लिए भी अपने को सन्निद्ध रखा पाया जाय।
जिंदगी एक खेल है। उसे ठीक तरह तभी जिया जा सकता है जब खिलाड़ी की भावना से जिया जाय। खिलाड़ी आये दिन हारते जीतते रहते हैं उन्हें इसके लिए कोई मलाल नहीं रहता। यदि वे इन हारों को अपना दुर्भाग्य और जीत को तारे तोड़ लाने जैसा सौभाग्य मानें तो इन मानसिक ज्वार−भाटों की स्थिति में खेलने का सारा आनंद ही चला जायगा और वह इतना बड़ा सिरदर्द बनेगा कि कभी खेल की बात सोचने तक की इच्छा न हो। ऐसी मनःस्थिति में निराशा, खिन्नता, खीज का ही बाहुल्य रहेगा और वह प्रयास, पुरुषार्थ जान के लिए एक बवाल बनकर रहेगा। इतना ही नहीं उस उथल पुथल का स्वास्थ्य पर भी बुरा असर पड़े बिना न रहेगा।
निरोग रहना हो तो मन को अलमस्तों जैसा रखना चाहिए। देखा गया है कि अनेक असुविधाओं के रहते हुए भी पागल न केवल स्वस्थ रहते हैं वरन् बहुधा मोटे भी हो जाते हैं। इसका एकमात्र कारण उनकी मानसिक निश्चिंतता ही है। उनमें से बहुत सोचते रहते हैं, वे सूख-सूख कर काँटा होते जाते हैं और असमय ही बेमौत मरते हैं। इस उदाहरण से यह शिक्षा लेनी चाहिए कि जो भी व्यक्ति मन को हलका रखेगा, वह स्वस्थ और बलिष्ठ रहेगा और जिसके ऊपर चिंताएँ, खीजें, शिकायतें चढ़ी रहेंगी, वह और किसी का तो उतना नहीं जितना अपने आपका ही अहित करेगा।
मन पर तनाव का बोझ नहीं पड़ने देना चाहिए। प्रतिकूलताओं को जिस हद तक सुधारा जा सकता हो, सुधारना चाहिए और इतने पर भी जो कमी रह जाए उसे भाग्यवादियों की तरह हँस कर टाल देना चाहिए। विपन्नताओं के बीच भी “जो हँसता रह सकता है और जो होना होगा-होता रहेगा “ यह कहकर मन बहला लेता है। वह दिन में मस्ती से भरा रह सकता है और रात को गहरी नींद सो सकता है। घबराने वाले, चिंतातुर लोगों की स्थिति तो ठीक वैसी ही होती है जैसी की बकरी के सामने शेर खड़ा कर देने पर उस बेचारी की हो जाती है।
इस प्रसंग में संतोषी प्रकृति के लोग नफे में रहते हैं वे न व्यग्र होते हैं और न उत्तेजित। जिन्हें यह स्थिति सहज ही प्राप्त हो सके वह भगवान है। अन्यथा गीता निचोड़ कर पीनी चाहिए जिसमें एक प्रतिपादन अत्यन्त महत्व का है कि सुख और दुःख में, हानि और लाभ में, अनुकूलता और प्रतिकूलता में समस्वरता बनाये रहनी चाहिए। दूसरे अध्याय में इसी सिद्धान्त को अपनाने पर जोर दिया गया है। अनासक्त कर्मयोग का सही सार संक्षेप है। भगवान का यह मार्मिक उपदेश हमें गंभीरतापूर्वक हृदयंगम करना चाहिए और जीवन व्यवहार में उतारने का प्रयत्न करना चाहिए।
स्वास्थ्य को सही बनाये रखने के लिए आहार विहार के अन्यान्य सिद्धान्तों से इस आवश्यकता को भी कम महत्व नहीं देना चाहिए कि हँसती-हँसाती हल्की-फुल्की जिन्दगी जिया जाय। इस प्रसंग में परिस्थितियाँ उतनी बाधक नहीं होती जितनी कि मनःस्थिति में घुसी हुई अनुपयुक्तताएँ और अवाँछनीयताएँ। इसलिए यदि उनका प्रकोप हो रहा हो तो सुधारने का तत्काल प्रयत्न करना चाहिए। इसके लिए स्वयं अपने मन को समझा बुझा कर चिन्तन को सही रास्ते पर लाने के अतिरिक्त और कोई नहीं हो सकता। इसमें दूसरों के परामर्श एवं सहयोग, कर्म और चिन्तन की दिशा में सुधारने का निजी प्रयत्न कही अधिक समर्थ सार्थक सिद्ध होता है।
मन को उद्विग्न रखने में अचिन्त्य चिन्तन ही एक प्रमुख बाधा है। इसी शृंखला में वे कुविचार भी सम्मिलित होते हैं जिन्हें आक्रमणकारी दुर्गुणों के रूप में गिना जाता है। ईर्ष्या, द्वेष, घृणा, प्रतिशोध,आक्रमण अपहरण के विचार अपने आपको अधिक और प्रतिपक्षी को कम जलाते हैं। अपराधी दुष्प्रवृत्तियाँ प्रतिपक्षी को कितना नुकसान पहुँचा सकेगी यह संदिग्ध है। किन्तु इतना निश्चय है कि जो इन्हें अपने भीतर भरे रहता है वह जीते मक्खी निगलने की तरह अपना अहित तो निश्चित रूप से करता ही है। वह अपना मस्तिष्क ही नहीं जलाता वरन् स्वभाव और स्वास्थ्य भी बरबाद करता है।
जिस तिस को संदेह की दृष्टि से देखना, आशंकाओं से चित्त विभ्रम में पड़े रहना भी कम घातक नहीं है। मात्र कुकल्पनाओं के आधार पर कुछ लोग विग्रह संकट टूट पड़ने की बात सोचते रहते हैं और तिल को ताड़ बनाकर अपने बुने मकड़जाल में स्वयं ही उलझते और छटपटाते रहते हैं। अपनी अन्तः स्थिति की सही समीक्षा करना और उसे सुधारना है तो कठिन,पर काम ऐसा है जिसे सुस्थिर स्वास्थ्य की आवश्यकता अनुभव करने वाले प्रत्येक व्यक्ति को उसी प्रकार ध्यान रखना चाहिए जैसा कि खाने-सोने का साधन जुटाना पड़ता है।
अच्छा हो हम जिन्दगी को एक खेल की तरह अलमस्त होकर खिलाड़ी बनकर खेले। जितना बन सके अच्छा खेलें। हार-जीत तो होती रहती है। यदि खिलाड़ी जैसी मनः स्थिति व “स्पोर्ट्मेन” जैसी मनोवृत्ति सही अर्थों में विकसित हो सके तो जीवन को तनाव रहित हो, समस्वरता की स्थिति में, प्रसन्नतापूर्वक जिया जा सकता है।
नई वधू विवाह होकर आई। उसने अपने पति का नाम पूछा, बताया गया -”ठन-ठन पाल”। यह नाम उसे बुरा लगा ‘ठन-ठन पाल’ तो दरिद्र को कहते हैं। दरिद्र की पत्नि बन कर मैं क्यों रहूँ।
उनने साथ रहने से इन्कार कर दिया और पिता के घर लौट पड़ी। रास्ता लम्बा था। एक खेत की मेंड़ पर मजदूर महिला घास काट रही थी। वधू ने उसका नाम पूछा उसने बताया ‘लक्ष्मी’। नाम और स्तर की तुलना करते हुए उसे आश्चर्य तो बहुत हुआ। पर चलना आगे ही था सो चलती रही।
आगे चलकर एक फटे कपड़े वाला किसान हल जोतते पाया। उससे भी वधू ने नाम पूछा। धनपाल और स्थिति का तालमेल यहाँ भी कहाँ खा रहा है।
यात्रा आगे चलती गई। कुछ कोस जाने पर लोग एक मुर्दे को श्मशान घाट ले जा रहे थे। साथ वालों से वधू ने पूछा जो मर गये हैं उनका नाम क्या था? लोगों ने बताया इनका नाम अमरसिंह था।
वधू एक घनी छाया वाले पेड़ के नीचे बैठ कर सुस्ताने लगी। साथ ही यही विचार करने लगी कि नाम के साथ ये आवश्यक नहीं की गुण भी वैसा हो। उसमें जमीन आसमान तक का अन्तर भी हो सकता है।
पेड़ की छाया में ही उसने एक दोहा गाया और वापस ससुराल की ओर लौट पड़ी। अपने घर जा कर रही। नाम और स्तर की भिन्नता वाला वह स्व निर्मित दोहा अकसर बहुतों को सुनाया करती थी।
घास खोदे लक्ष्मी, हल जोते धनपाल। अमर सिंह काठी कसे, सबसे भले मेरे ठन-ठन पाल।
ठन-ठन पाल वस्तुतः इतने गरीब नहीं थे जितना उनके नाम से प्रतीत होता था।
“जहाँ दो कोस तक चारों ओर जनशून्य स्थान मिले, वही आसन लगा।” अपने समर्थ शिष्य को दीक्षा देने के बाद मत्स्येन्द्रनाथ जी ने आदेश दिया। यह हिम प्रान्त जनशून्य क्या, प्राणी शून्य था। नेपाल में मुक्ति से काफी आगे दुर्गम पर्वत मालाओं में स्थित है यह शालिग्राम क्षेत्र। दामोदर कुण्ड के पास की इस भूमि को बर्फ ने अपनी लम्बी चौड़ी सफेद चादर से ढक रखा था।
कितना कठिन है देहाभ्यास। आज भी जहाँ जाने के लिए विशेष पोशाक, विशेष जूते और अनेकों औषधियाँ जरूरी पड़ती हैं। जहाँ आंखों पर चश्मे का नीलावरण न हो तो बर्फ पर प्रतिबिम्बित सूर्य की किरणें आधे क्षण में अन्धा बना दें। नासिका किसी चिकने लेप से ढकी न हो तो हिमदंश ने उसे कब गला दिया, पता ही न लगे। ऐसे विकट क्षेत्र में उन दिनों जो केवल काली कौपीन लपेटे नग्नदेह नंगे पाँव जा पहुंचा हो, उसकी कठिनाइयों का क्या ठिकाना?
“बहुत बाधक है देह की अनुभूति।” उन जैसे के लिए भी मन को देह से हटा कर एकाग्र कर पाना कठिन हो रहा था। प्राणायाम से प्राप्त ऊष्मा थोड़ी देर में चुक जाती। तब, ऐसा लगने लगता कि सर्दी हड्डी में बलात् घुस कर उन्हें टुकड़े-टुकड़े कर देगी। नाड़ियों को फटने की असह्य वेदना मन को चंचल होने के लिए विवश कर देती। पुनः प्राणायाम का सहारा लेना पड़ता।
“देह जब लक्ष्य की ओर जाने नहीं देती तब क्यों न देह को ही लक्ष्य बनाकर पहले उस ओर से निश्चित हो लिया जाए।” सर्वथा नया नहीं था यह तर्क। अवधूत गुरु दत्तात्रेय ने रसेश्वर - सम्प्रदाय की स्थापना इसीलिए की थी और वह सिद्ध रसेन्द्र, प्रक्रिया से अपरिचित न थे।
शुभ्र शशाँक धवल विप्र पारा आज अप्राप्य है और सुलभ कभी था भी नहीं। किन्तु महायोगी के लिए दुष्प्राप्य क्या? रस प्रक्रिया आरम्भ कर दी गयी। आधि दैविक शक्तियों ने स्वयं को असमर्थ पाया उस महासाधक के सामने। जहाँ छिद्र होता है, विघ्न वही आते हैं। प्रमाद रहित पूर्व जागरुक गोरखनाथ के समीप विघ्न कहाँ से जाते?
सहसा वह आसन से उठ खड़े हुए। उन्होंने जल और बिल्व पत्र हाथ में लिया। धरती और गगन को अपने पदाघात से पीड़ित करती भगवती छिन्नमस्ता दौड़ती आ रही थी। ‘गोरखनाथ जी अत्यन्त विनीत स्वर में बोले “माता। आप कोई रूप ले लें, अपने शिशु पर निष्करुण नहीं हो सकती।
क्षण भर में चारों ओर शांति छा गई। महादेवी का हस्त स्थिती मस्तक गले पर आ गया। उनके बगल में खड़ी दोनों मूर्तियाँ उनमें लीन हो गई। वे दिगम्बरा निरूपा अब पाटल अरुण वस्त्रों में किंचित श्याम रंग लिए त्रिपुर भैरवी बन चुकी थी।
“शंकर हृदि स्थिता करुणामयी अम्बे।” गोरखनाथ ने सविधि स्तवन किया। किन्तु वह रूप त्रिपुर सुन्दरी नहीं बना। कोई चिन्ता की बात नहीं थी। त्रिपुर भैरवी महाकाल शिव के हृदय में स्थित होने से अतिशय करुणामयी है। साधक के लिए सिद्धिप्रदा है।
“तुमने महाशक्ति की अर्चना के बिना ही यह कर्म प्रारम्भ कर दिया। यह भी याद है तुम्हें की समय कौन सा है। इस समय रस सिद्धि कदाचित ही होती है। तुम केवल इसे अपने तीन शिष्यों को दे सकोगे।” भगवती सीमा निर्धारित कर अन्तर्ध्यान हो गयी।
रस को संस्कारित करने का श्रम तथा संकट को जिसने स्वीकारा उस कौमारी शक्ति को तो वंचित नहीं किया जा सकता। सिद्ध रस के सेवन ने उन्हें अमर योगिनी बना दिया। विभिन्न योग सम्प्रदाय के अनेक ग्रन्थों में अनेक नामों से उल्लेख है। रसेन्द्र का सेवन करके देह सिद्ध हो गई। अब उन्होंने फिर से दामोदर कुण्ड के पास एक हिमशिला पर आसन जमाया। प्रकृति की शक्तियाँ अब उनकी देह पर अपना प्रभाव छोड़ने में असमर्थ थी। ध्यान में अब देह की बाधा नहीं थी।
“दम्भी कहीं का?”एक प्रबल अट्टहास के बीच गूँजते इन शब्दों ने उनका ध्यान तोड़ दिया। बिखरी जटाएँ, अंगार जैसी आंखें दिगम्बर, मलिन काय भारी भरकम डील-डौल वाला पागल इस निर्जन में कहाँ से आ गया। सबसे बड़ा आश्चर्य यह था की वह अपना ध्यान किसी भी तरह नहीं जमा पा रहे थे। सैकड़ों वज्र ध्वनियाँ करते शिलाखण्ड, जहाँ थोड़ी-थोड़ी देर में टूटते हो, उस प्रचण्ड कोलाहल में सर्वथा अप्रभावित रहने वाले इस योगी को इस पागल के अट्टहास ने विचलित कर दिया था। उसे लगता था किसी ने उसके मन को बलपूर्वक बाहर निकाल कर पटक दिया है।
“आप कौन हैं?” गोरखनाथ जी ने पूछा। वे अपनी आंखों की पलकें भी नहीं झपका पा रहे थे।
“अपने बाप का परिचय पूछता है, मूर्ख कहीं का।” पागल ने हाथ की तलवार से उन पर वार किया। किन्तु योगी जी की सिद्ध देह से टकराकर तलवार एक तीव्र झंकार ध्वनि के साथ पागल के हाथ से छूट कर दूर जा गिरी। उनके शरीर पर कोई चिन्ह नहीं बना था।
“दम्भी तेरा गुरु.... “ यह पागल गुरु को पता नहीं क्या अपशब्द कहेगा। गुरु के अपमान की संभावना को वह सहन नहीं कर पाये। उसने झपट कर तलवार उठाई और पूरी ताकत से पागल पर चोट की। पर यह क्या? आघात के वेग ने उन्हें स्वयं एक हिमशिला पर पटक दिया। पागल के शरीर से तलवार ऐसे निकल गयी जैसे हवा में चलाई गयी हो।
“आप कौन?” वह हतप्रभ थे, ऐसा कौन है जो उनकी सर्वज्ञ दृष्टि की पकड़ में नहीं आ रहा। “मैं झूठ नहीं कहता। अपने दम्भ के कारण तू अविश्वासी बन गया है।” पागल का स्वरूप बदल गया और वह अपने गुरु को पहचान कर उनके चरणों में गिर पड़े।
“आपको छोड़ कर ऐसा शक्ति संपन्न धरती पर और कोई नहीं।” उनकी आंखों से झरती अश्रुधारा गुरु के चरणों को धो रही थी।” वज्रदेह पाने का मेरा गर्व गल गया। मुझ पर अनुग्रह करें देव। मेरा दम्भी।” माँ को अपने अबोध शिशु की चिन्ता रहती है और गुरु का हृदय माँ से कही ज्यादा ममत्व लिए होता है। तू क्या समझता है मत्स्येन्द्र को, अपना कर्तव्य भूल गया। एक बार जिसे शिष्य स्वीकार किया उसे परम सिद्धि तक पहुँचाना तो मेरा कर्तव्य था। तेरे हर क्रियाकलाप पर मेरी दृष्टि रही है। छिन्नमस्ता को तूने प्रसन्न कर लिया पर यदि चामुण्डा आती तो?” सचमुच आना तो चामुंडा को था। उनकी वज्र देह पीपल के पत्ते की तरह काँप उठी। शिववत् ताण्डव करने वाली उग्र भैरवी को वे कैसे शान्त करते? वे तो कोई मर्यादा नहीं मानती।
जार्ज बर्नार्डशा आयरलैण्ड के प्रख्यात लेखक थे। उन्होंने मानव समस्या के अनेक विषयों पर अति महत्वपूर्ण लिखा। लेखक का पारिश्रमिक भी अच्छा ही मिलता था। वे आजीवन अविवाहित रहे। अपने विचारों को वे पारिवारिक कामों में अस्त-व्यस्त नहीं करना चाहते थे।
एक सुन्दरी ने सोचा, शा के साथ विवाह करते बन पड़े तो धन और यश की कमी न रहेगी। अपना अभिप्राय लेकर वह शा के पास गई और बोली आप जैसे विद्वान और मेरे जैसे रूपवान शरीर से जो संतानें उत्पन्न होंगी और माँ-बाप दोनों के गुणों से सम्पन्न होंगी। ऐसा सुयोग हम लोग बना ले तो कैसा रहे?
शा उसका मतलब समझ गये। मुसकराते हुए बोले। देवी यदि आप के कल्पना के प्रतिकूल परिणाम निकला तो कैसा होगा? मुझ जैसा कुरूप और आप जैसा मूर्ख यदि बालक जन्मा तो सभी के लिए सिर दर्द बनेगा।
जार्ज के इन शब्दों में इंकारी का उत्तर मिल जाने पर महिला को निराश वापस लौटना पड़ा।
“चामुंडा पीठ से चला आ रहा हूँ मैं। “ गुरु हँसे “मेरी अर्चा की उपेक्षा वह नहीं कर सकती।”शिष्य का मस्तक अपने समर्थ गुरु के चरणों में था।
“किन्तु तू दम्भी है” मत्स्येंद्रनाथ कह रहे थे। “मेरी इच्छा थी कि तू इस निर्जन में थोड़े दिनों तप करता। तप अपार शक्ति का द्वार खोल देता है।” “दम्भ।” गुरु मुख से अपने लिए अनेक वार निकले इस शब्द का आशय वह नहीं समझ पा रहे थे। दम्भ तो दूसरों के सामने अपना बड़प्पन दिखाने के लिए किया जाता है। इस निर्जन भूमि में उनके आचरण को कौन देखने वाला है?
“ तप का मूल है तितिक्षा और तितिक्षा कहते हैं शीत, ऊष्ण, सुख, दुःख आदि द्वन्द्वों को प्रसन्नतापूर्वक सहन करने को। तितिक्षा की आग में पक कर शरीर और मन निर्द्वंद्व होते हैं। समत्व का परम लाभ प्राप्त करते हैं।” मत्स्येन्द्र का स्वर खिन्न था। वज्रदेह से कौन सा तप करेगा तू? जब शरीर पर किसी सर्दी-गर्मी का प्रभाव ही नहीं हैं, तब यहाँ तेरा रहना तप का दम्भ नहीं तो और क्या है।”
वह चुप थे। उनके समीप कोई जवाब नहीं था। गुरु थोड़ा रुक कर बोले “मुझ से भी यही भूल हुई थी। व्योम देह पाने के बाद मैं प्रसन्न हुआ था। अब जानता हूँ वह मेरी हार थी। माया ने मुझे देह की ओर आकृष्ट कर पंगु कर दिया।”
“परमात्मसत्ता करुणा की निर्झरिणी है। देह को यदि वज्र या व्योम जैसा बनना जरूरी होता तो उसने ऐसा करने में संकोच न किया होता।” शिष्य की ओर देखते हुए परम गुरु बोले “ देह की दुर्बलता, कष्ट अनुभव करने की क्षमता ही मानव को तप एवं तितिक्षा के साधन देती है, जिसमें सम्पूर्ण सृष्टि को बदल डालने की शक्ति है।”
“ अब से मेरी तरह संसार में रहकर लोक कल्याण के लिए स्वयं को नियोजित करो। मनुष्य जीवन को ऊर्ध्वगामी बनाने के लिए जो मान-अपमान सहना पड़े उसमें समान रहो। यह तुम्हारा- मानसिक तप है। शारीरिक तप के लिए तुमने स्वयं को अयोग्य बना लिया।” “महाशिव की इच्छा पूर्ण हो।”
शिष्य गोरखनाथ गुरु के पीछे चल पड़ा। उसका मन ‘तितिक्षा मन दुःख सर्म्मषः’ के सूत्र पर मनन करने में लग गया था। अब उसे बोध हो गया था कि कैसे वह अपने पथ से विचलित हो गया था। सही समय पर आकर गुरु ने उसे मार्ग दर्शन न दिया होता तो संभवतः अपने ही अहंकार से चूर वह लक्ष्य से भटक कर न जाने किधर चल दिया होता। व्यवहारिक जीवन जीते हुए, संघर्ष करते हुए, दुखों का सामना करते हुए जो तपकर कुन्दन की तरह दमकता है, वही सही अर्थों में तपस्वी है।
श्रवण कुमार कंधे पर अंधे माता पिता को काँवर में बिठाकर तीर्थ यात्रा कराने के लिए ले जा रहे थे। वे पितृ भक्ति का आदर्श प्रस्तुत करना चाहते थे।
एक स्थान ऐसा आया जहाँ उसके विचार बदल गये। काँवर जमीन पर रख दी। बोले आप लोग तो पैदल चल सकते हैं। रास्ता बताने का काम मैं करूंगा, आप लोग पितृ भक्ति का अनुचित लाभ न उठाइये।
लड़के की इस प्रकार स्वार्थ सनी क्रोध भरी वाणी सुन कर पिता सन्न रह गये। उनने इतना ही कहा -बेटे रात तो हो गई है पर हम लोगों को इस क्षेत्र में नहीं ठहरना चाहिए। इस इलाके को रात में ही चल कर पार कर लेना चाहिए।
वैसा ही किया गया। वह क्षेत्र समाप्त होते ही श्रवण कुमार के विचार बदले उनने पिता माता से क्षमा माँगी और पुनः काँवर में बिठा लिया। यह तो उनका सौभाग्य था जिसके आधार पर वे अपना अनुकरणीय आदर्श स्थापित कर रहे थे। फिर ऐसी उन्हें दुर्बुद्धि कैसे उपजी।
वृद्ध पिता ने कहा यह पुरातन काल से कंस दानव की नगरी रही है। भूमि में उसी की दुष्टता के संस्कार भरे हुए थे उसी के प्रभाव से तुम्हें ऐसी कुबुद्धि उपजी।
स्थानों में भी भले बुरे संस्कार होते हैं। वे वहाँ के प्राणियों को अपनी विशेषता के अनुसार प्रभावित करते रहते हैं।
मनुष्य स्रष्टा की सर्वोत्तम कृति है, उसने उसे समर्थ सशक्त बनाने के लिए अनेकानेक प्रकार की विभूतियों से सुसज्जित किया है, पर अन्य प्राणियों की सर्वथा उपेक्षा कर दी हो, ऐसा भी नहीं कहा जा सकता। आवश्यकता के अनुरूप उनमें भी शक्तियाँ सँजोयी गई है, ताकि वे इतने अक्षम भी न रह जाये कि विभिन्न प्रकार की आपदाओं से अपनी रक्षा ही न कर सके और सृजेता के सिर यह कलंक लगे कि सृष्टि संरचना के संदर्भ में उसने दोहरे मानदण्ड की नीति अपनायी है।
एक घटना बीसवीं सदी के प्रथम दशक की है। अमेरिका के पश्चिमी द्वीप-समुह में स्थित पाँच हजार फुट ऊँचा एक पर्वत है - माउण्टपीरो। अब से लगभग नब्बे वर्ष पूर्व इसके आस-पास कितनी ही बस्तियाँ थीं, जिनमें हजारों लोग रहते थे, पर आज इतने वर्षों बाद भी वहाँ की आबादी उतनी सघन नहीं हो पायी है, जितनी पहले कभी थी। कारण वहां का जीवित ज्वालामुखी है। सन् 1903 की गर्मी के एक दिन माउण्टपीरो के जीव-जन्तु न जाने क्यों एक अज्ञात भय से इधर-उधर भागने लगे। यह आकुलता पालतु पशुओं में भी दिखाई पड़ी, पर लोग इसका कारण न समझ सके और पाश्विक उन्मन समझ कर इसकी उपेक्षा कर दी, किन्तु यह क्या। इस घटना के अभी चार दिन भी नहीं बीते कि पर्वत के मध्य एक तीव्र विस्फोट हुआ और लाल लावा पहाड़ के चारों ओर मीलों तक बिखर गया। दुर्घटना में करोड़ों की सम्पत्ति बरबाद हुई और लगभग 35 हजार व्यक्ति मारे गये। ज्वालामुखी विस्फोट के कारण ही जन्तुओं के पलायन का कारण विदित हो सका।
तो क्या माउण्टपीरो के जीवधारियों को इस विपत्ति का आभास समय से पूर्व हो गया था? प्रसिद्ध अमेरिकी प्राणिशास्त्री डॉ. विलियन जे. लाँग अपनी चर्चित पुस्तक “ई. एस. पी. इन एनिमल्स” में उक्त घटना का उल्लेख करते हुए लिखते हैं कि ऐसा होना आश्चर्य की बात नहीं है क्योंकि उनमें ऐसी क्षमताएँ होती हैं... कहते हैं कि उनकी इसी विशेषता के कारण जापानी लोग प्राकृतिक आपदा से आत्मरक्षा करने में समर्थ हुए हैं। ‘उनके अनुसार गोल्ड फिश नामक एक मछली होती है, जिनमें ऐसी क्षमता उच्च स्तर तक विकसित होती है। ज्वालामुखी विस्फोट अथवा भूकम्प जैसी प्राकृतिक विभीषिकाएँ जब उक्त क्षेत्र में आने वाली होती हैं, तो वह मछली उसकी सूक्ष्म तरंगों को समय से पूर्व पकड़ लेती है, जिसका आभास उसकी तीव्र बेचैनी और हलचल से मिलने लगता है। जब कभी ऐसे अवसर उपस्थित होते हैं, तो जापानी लोग इसका अनुमान लगा लेते हैं कि अवश्य ही कोई अनहोनी उस स्थान विशेष पर होने वाली है और इस आधार पर अपनी सुरक्षा करने लगते हैं।
अभी कुछ दिनों पूर्व प्रमुख अमेरिकी दैनिक “न्यूयार्क टाइम्स” में एक घटना प्रकाशित हुई थी, जिसमें कहा गया था कि वियना में एक कुत्ता माल चढ़ाने-उतारने की एक क्रेन के समीप पड़ा सुस्ता रहा था। अचानक वह चौंका उछला और दूर जा बैठा। अभी इसके पाँच मिनट भी नहीं बीते थे कि क्रेन की जंजीर टूटी और एक भारी उपकरण वहाँ आ गिरा जहाँ कुत्ता पहले बैठा था। घटना विद्लाग नामक एक इंजीनियर के सामने घटी थी। वे इससे इतना प्रभावित हुए कि अभियन्ता का अपना धन्धा छोड़ कर “प्राणियों में अतीन्द्रिय सामर्थ्य “ विषय पर अनुसंधान करने के लिए एक शोधशाला खोल बैठे। अब वे जेम्स डिकार्डो नामक एक प्राणि विज्ञानी के साथ इसी विषय पर शोध कर रहे हैं।
एक जुलाहे ने भूत की सिद्धि की। भूत प्रकट हुआ तो उससे वरदान माँगा कि उसके दो सिर और चार हाथ हो जाएँ ताकि वह अधिक काम कर सके और दोहरा वजन लादकर हाट को जा सके।
वरदान तो मिल गया पर लोगों ने इस प्रकार के विचित्र आदमी को कौतूहल समझा और प्रेत पिशाच का अनुमान लगा कर मार डाला।
महत्वकाँक्षाएँ ऐसा ही दुख देती हैं। सुखी औसत नागरिक का स्तर अपना कर ही रहा जा सकता है।
दोनों वैज्ञानिकों का विश्वास है कि विभिन्न जीवधारी अपने अन्तर्निहित अतीन्द्रिय सामर्थ्य का लाभ इस लिए उठा पाते हैं, क्योंकि वे सर्वथा प्राकृतिक जीवन जीते, और कृत्रिमता से दूर रहते हैं, जबकि मनुष्य आज अस्वाभाविकता से इस कदर लद चुका है कि उसका जीवन प्राकृतिक न रह कर एक प्रकार से यान्त्रिक बन गया है। इस कारण उसकी शक्तियाँ कुंठित हो गई हैं। यदि वह भी स्वाभाविक जीवन जी सके तो कोई कारण नहीं की उसमें वैसी पूर्वाभास की क्षमताएँ विकसित न हो सके, जैसी मानवेत्तर प्राणियों में है।
मनुष्य की शक्ति असीम है। शरीर बल में वह सीमित अवश्य है, पर आत्मबल, मनोबल एवं प्रतिभा-पुरुषार्थ में वह असीम और असाधारण है। प्रतिकूल परिस्थितियों एवं साधन-सुविधाओं के अभाव में भी वह अपनी आकाँक्षाओं और संकल्पों को पूरा कर सकता है। विश्व में सदियों पूर्व विनिर्मित जहाँ-तहाँ ऐसी अनेकों संरचनाएँ बिखरी पड़ी हैं जो मानवी पुरुषार्थ का बुद्धि कौशल का परिचय देती हैं। मिश्र के पिरामिड इनमें से एक हैं जिनके बारे में कहा जाता है कि मानवी सभ्यता का प्रतिनिधित्व करने वाले कुशल शिल्पियों ने इन बहुउद्देशीय भवनों का निर्माण किया था। नीरव विराट रेगिस्तान में विशालकाय चट्टानों को सुदूर पर्वत श्रृंखलाओं से लाकर उनसे ज्यामितीय प्रक्रिया द्वारा वृहदाकार पिरामिडों के निर्माण भूतकालीन मानवी पराक्रम का साक्ष्य तो प्रस्तुत करते ही हैं, साथ ही उन्नत एवं प्रगतिशील कहे जाने वाले आधुनिक विज्ञानवेत्ताओं के लिए अनुसंधान के विषय बने हुए हैं। आश्चर्यचकित करने वाले इन निर्माणों की दिशा धारा को अभी तक पुरी तरह से समझा नहीं जा सका है।
‘पिरामिडोलॉजी’ नामक एक विशुद्ध विज्ञान का विकास आज इन्हीं संरचनाओं के रहस्यों को समझने के लिए किया गया है। इसके प्रवक्ताओं का मत है कि पिरामिडों के विशिष्ट आकार-प्रकार में अलौकिक शक्ति छिपी पड़ी है। इनकी आकृति इतनी मायावी है कि उसे लिखित ब्रह्माण्ड का मानव कृत लघु संस्करण कहा जा सकता है। उसमें सूक्ष्म ब्रह्माण्डीय ऊर्जा का बहुलता से एकत्रीकरण होता है जो जीवित तथा निर्जीव पदार्थों को प्रभावित किये बिना नहीं रहती। कुछ अन्वेषणकर्ताओं का कहना है कि इन्हें लोकोत्तर वासियों ने विनिर्मित किया था, तो कुछ का मत है कि इन्हें भवनकला विशेषज्ञों ने बनाया है, जो ज्योतिर्विज्ञान और भौतिकी के निष्णात विद्वान थे।
डॉ. विलशुल, एडपेटिट, डॉ. टाम्पकिन्स, डॉ. पीटर जैसे विख्यात वैज्ञानिकों ने पिरामिडोलॉजी पर गहन अध्ययन किया है। इनका निष्कर्ष है कि पिरामिड के अन्दर कुछ विलक्षण प्रकार की शक्ति तरंगें काम करती है जो जड़ और चेतन दोनों को प्रभावित करती हैं। प्रयोग परीक्षणों में पाया गया है कि इन संरचनाओं के अन्दर नीचे के एक तिहाई ऊपर के दो तिहाई भाग के जंक्शन पर पुराने सिक्के एवं रेजर ब्लेड रखने पर शक्ति के प्रभाव से क्रमशः सिक्कों पर चमक एवं ब्लेड पर तेज धार आ जाती है। लम्बे समय तक रखे जाने पर भी दूध खराब नहीं होता, वरन् वह बाद में स्वतः ही दही में बदल जाता है, पर फटता नहीं।
अनुसंधानकर्ताओं के अनुसार पिरामिड आकार में वस्तुओं को जल शुष्क करके खराब होने से बचाये रखने की अद्भुत क्षमता है। इसमें रखे गये फूल एवं पत्तियां जल हीन होकर ज्यों के त्यों बने रहते हैं। न तो वे मुर्झाते हैं और न ही उनका रंग उड़ता है। इसी गुणवत्ता के कारण मिस्र के पिरामिड में अब से ढाई सहस्राब्दी पूर्व रखी गई वस्तुएँ यथावत पायी गयी हैं।
“वेव्स फ्राम फार्म्स “ नामक अपनी कृति में फ्रान्स के सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक एल. तूरेने ने कहा है कि ब्रह्मांड से अपने अनुकूल एवं प्रभावशाली ऊर्जा को प्राप्त करने के लिए ही सम्भवतः पिरामिडों की संरचना वास्तुविज्ञान विशारदों द्वारा की गई थी। इनका निर्माण मात्र मिस्र में ही नहीं हुआ, वरन् ऐसी संरचनाएँ दक्षिण अमेरिका, चीन, साइबेरिया, मैक्सिको, कम्बोडिया, फ्राँस, इंग्लैण्ड आदि देशों में भी पाई गयी है। नील नदी के तट पर लगभग एक सौ पिरामिड फैले हुए हैं। काहिरा के गीजा पठार पर एक वर्ग मील के दायरे में पिरामिडों के त्रिकोणकार पहाड़ खड़े हैं। इनमें ‘खूफू का पिरामिड सबसे पुराना एवं आकार में बड़ा है। आधुनिक वास्तु शिल्पियों एवं विज्ञानवेत्ताओं का ध्यान इन दिनों इस ओर विशेष रूप से आकृष्ट हुआ है और वे इस अध्ययन-अनुसंधान में निरत हैं कि भवनों की संरचनाओं के आकार का मानव स्वास्थ्य एवं मनः संस्थान पर क्या प्रभाव पड़ता है? व्यस्तता एवं तनावग्रस्तता भरे इस तकनीकी युग में इस तरह के निर्माणों में लोगों को बसा कर क्या उन्हें तनाव से मुक्ति दिलाई जा सकती है? एल. तूरेने इसका उत्तर ‘हाँ’ में देते हुए कहते हैं कि पिरामिडनुमा भवन चाहे वह चौकोर हो अथवा गोलाकार, विभिन्न प्रकार की ब्रह्माण्डीय तरंगों को आकर्षित कर अपना प्रभाव शरीर और मन पर अवश्य डालते हैं।
पर्यवेक्षकों का कहना है कि सभी पिरामिड उत्तर-दक्षिण पर बने हैं। यह भी एक वैज्ञानिक रहस्य है जो बताता है कि भू चुम्बकत्व एवं ब्रह्माण्डीय तरंगों का इस विशिष्ट संरचना से निश्चय ही कोई सम्बन्ध है। उत्तर-दक्षिण गोलार्द्धों को मिलाने वाली रेखा पृथ्वी की चुम्बकीय रेखा है। चुम्बकीय शक्तियाँ विद्युत तरंगों से सीधी जुड़ी हुई हैं जो यह दर्शाती हैं कि ब्रह्मांड में बिखरी मैग्नेटोस्फीयर में विद्यमान चुम्बकीय किरणों को संचित करने की अभूतपूर्व क्षमता पिरामिड में है। यही किरणें एकत्रित हो कर अपना प्रभाव अन्दर विद्यमान वस्तुओं या जीवधारियों पर डालती हैं। इन निर्माणों में ग्रेनाइट पत्थर का उपयोग भी सूक्ष्म तरंगों को को अवशोषित करने की क्षमता रखता है।
एक संभावना यह भी व्यक्त की गई है कि इन पिरामिडों का निर्माण ज्योतिर्विज्ञान के आधार पर किया गया है, जिसमें मानव जाति को लाभान्वित करने का उद्देश्य सन्निहित था। देखा गया है कि पिरामिड के अन्दर उत्पन्न ध्वनि तरंगें जब प्रतिध्वनित होकर वापस लौटती है, तो उनकी तरंगदैर्ध्य में परिवर्तन आ जाता है और उसके प्रभाव से अन्दर उपस्थित व्यक्ति को तनाव शैथिल्य एवं मानसिक स्फूर्ति की-शान्ति की अनुभूति होती है।
इस संदर्भ में अनुसंधान कर रहे चिकित्सा विशेषज्ञों का कहना है कि सिर दर्द और दाँत दर्द के रोगी को पिरामिड के अन्दर बिठाने पर वे दर्दमुक्त हो जाते हैं। गठिया, वातरोग, पुराना दर्द भी इस संरचना में संघनित ब्रह्माण्डीय ऊर्जा के प्रभाव से दूर हो जाते हैं। पेड़-पौधों पर पिरामिड के प्रभाव के अध्ययन से भी यह निष्कर्ष सामने आया है कि एक ही प्रकार के पौधों को अन्दर के तथा बाहर के वातावरण में रखने पर पिरामिड के अन्दर वे कहीं ज्यादा तेजी से पनपते हैं। उसकी ऊर्जा तरंगें वनस्पतियों की वृद्धि पर सूक्ष्म एवं तीव्र प्रभाव डालती है।
पिरामिड के अन्दर रखे जाल का प्रयोग करने वाले पाचन सम्बन्धी अनियमितता से मुक्ति पाते देखे गए हैं। यही जल जब त्वचा पर लगाया जाता है तो झुर्रियाँ मिटा देता है। घावों को जल्दी भरने में भी इस प्रकार का ऊर्जा संचित जल एण्टीसेप्टिक औषधियों की तरह प्रयुक्त होता है। विश्लेषण कर्ताओं का कहना है कि इस प्रकार के जल के अन्दर छिपी हुई सूक्ष्म सामर्थ्य उसमें ऋणायनों की अभिवृद्धि के कारण होती है।
पिरामिड के रहस्योद्घाटन के सम्बन्ध में अनेकों पुस्तकें लिखी गई हैं। टाम्पकिन्स कृत ‘सीक्रेट्स आफ द ग्रेट पिरामिड’ बिलशुल एवं एडपेडिट की ‘दि सीक्रेट पावर आफ पिरामिड,’ टोथ की ‘पिरामिड पावर’ आदि पुस्तकों में इन आकृतियों में छिपी सूक्ष्म शक्तियों का विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है। ‘साइकिक डिस्कवरीज बिहाइण्ड दि आयरन करटेन नामक पुस्तक में कहा गया है कि पिरामिडों के अन्दर विद्युत चुम्बकीय शक्तियाँ होती हैं। यह ब्रह्माण्डीय ऊर्जा इतनी सशक्त होती है कि अन्दर रखे किसी भी पदार्थ को सड़ने नहीं देती। इनके अन्दर हजारों वर्षों से जो शव एक विशिष्ट स्थान पर रखे हैं, वे अभी भी सुरक्षित हैं सड़े नहीं। इसका प्रमुख कारण यह है कि जिस विशिष्ट ज्यामितीय आधार पर उन्हें बनाया गया है, उस कारण उनके अन्दर विशेष प्रकार के ऊर्जा प्रवाह विनिर्मित होते हैं और सूक्ष्म माइक्रोवेव सिगनल्स सतत् प्रकम्पित होते रहते हैं। पूजागृहों की भाँति इन भवनों का निर्माण भी कभी किन्हीं उच्च उद्देश्यों की पूर्ति के लिए ही हुआ होगा, ऐसा विशेषज्ञों का मत है।
पिरामिड के अन्दर बैठ कर ध्यान साधना करने वाले साधकों पर भी कुछ प्रयोग परीक्षण हुए हैं। पाया गया है कि इसके अन्दर बैठने पर तनाव से सहज ही छुटकारा मिल जाता है और शरीर में एक नयी स्फूर्ति के संचार का अभाव होता है।
सृष्टि में जहाँ भी दृष्टि दौड़ाते हैं, संघर्ष का नहीं सहयोग का अस्तित्व नजर आता है। सामाजिक सहयोग से ही मानवी प्रगति संभव हुई है। निर्वाह से लेकर उल्लास तक की सभी आवश्यकताएँ सामूहिक सहयोग से ही उपलब्ध होती है। संघर्ष से तो अराजकता, अव्यवस्था फैलती और विकसित समुदाय भी पतन के गर्त में चले जाते हैं। सतत् लड़ने-मरने पर उतारू जातियाँ या देश-समाज आपस में ही लड़- भिड़कर आपस में ही समाप्त हो जाते हैं। इस तथ्य को मनुष्य सहित प्राणि जगत के विकास और अवसाद की घटनाओं के अध्ययन से भली-भाँति समझा जा सकता है। मनुष्यों के कितने ही समुदाय एवं राष्ट्र आपसी संघर्ष या दूसरे देशों पर आधिपत्य जमाने के चक्कर में किस प्रकार समाप्त होते चले गये, इतिहासवेत्ता इस तथ्य से भलीभाँति परिचित हैं। इसके विपरीत जिनमें सहयोग और सहकार की प्रवृत्ति जितना अधिक रहे वे उतना ही आगे बढ़ते गये और प्रगति के उच्च सोपानों पर चढ़ते गये। सहयोग और सहकारिता का जीवन दर्शन अपना कर ही कोई जाति अपना अस्तित्व अक्षुण्ण बनाये रख सकती है।
मनुष्येत्तर जीवों की कितनी ही बलिष्ठ एवं समर्थ जातियाँ केवल इस कारण विलुप्त हो गई कि उनमें मरने-मारने की हिंसात्मक प्रवृत्ति अधिक थी। उन्होंने आपस में ही लड़कर अपना अस्तित्व समाप्त कर लिया, पूर्वकाल में शक्ति और सामर्थ्य की दृष्टि से एक से बढ़कर एक जीव थे, पर उनके आपसी संघर्ष ने उन्हें जीवित नहीं रहने दिया। ‘डायनोसौर’ विशालकाय कहे जाते हैं। ‘डिप्लोडोकस’ नब्बे फीट लम्बा था। ‘ब्रैकियोसोरस’ का वजन पचास टन तथा ऊँचाई बीस फीट थी।
ये सभी ‘सरीसृप समूह’ के नाम से विख्यात थे तथा सारे भूमण्डल पर छाये हुए थे। इनमें से कुछ पानी में, कुछ पृथ्वी पर और कुछ आकाश में उड़ने वाले जीव थे। शक्ति की दृष्टि से ये महादानव थे, किन्तु आपसी संघर्ष के कारण विलुप्त होते चले गये। कुछ तो परिस्थितियों में परिवर्तन होने के कारण अपना सामंजस्य बिठा पाने में असमर्थ रहे क्योंकि मूलतः उनमें सहयोग का अभाव था। वातावरण की प्रतिकूलता के साथ संघर्ष की प्रकृति के सम्मिलित प्रहार ने उनका अस्तित्व ही समाप्त कर दिया।
इस संदर्भ में किये गये वैज्ञानिक अनुसंधान-अध्ययन इस बात के प्रत्यक्ष प्रमाण हैं कि जीवों में विषम से विषम स्थिति में भी सामंजस्य स्थापित करने का अद्भुत सामर्थ्य विद्यमान है। स्पष्ट है कि आपसी सहयोग रहा होता तो विषमताओं में अपना अस्तित्व सुरक्षित रखा जा सकता था, किन्तु ऐसा सम्भव न हो सका। जबकि शक्ति-सामर्थ्य की दृष्टि से तिलचट्टा जैसा जीव आपसी तालमेल के कारण प्रतिकूलताओं में भी जीवित बना रहा। मनुष्य का स्वरूप भूतकाल में जो भी रहा हो, पर यह तो सुनिश्चित रूप से कहा जा सकता है कि उसमें आपसी सहयोग सहकार की प्रवृत्ति थी, उसी कारण उसने अपना अस्तित्व बनाये रखा। अपनी इस विशेषता के कारण वह न केवल समुह रूप में सुरक्षित रहा, वरन् प्रगति के सोपानों पर क्रमशः बढ़ता गया। तर्कशील इस प्रगति को बुद्धि एवं विचारशीलता की परिणति कह कर संतोष कर सकते हैं, पर तथ्य यह है कि सहयोग एवं सहकार रूपी विचारशीलता ने ही उसे वर्तमान स्थिति तक पहुँचाया है।
अन्य प्राणियों की तरह मनुष्य ने भी संघर्ष को ही महत्व दिया होता तो वह भी आपस में लड़ मर कर समाप्त हो गया होता। विकासवाद के जनक चार्ल्स डार्विन ने जीवन के लिए जो सिद्धान्त प्रतिपादित किया, विज्ञान जगत में उसका अर्थ संकुचित रूप में लिया गया। इस सिद्धान्त की समग्रता तभी बनती है जब उसे स्थूल संघर्षों के अर्थ में नहीं, जीवन संग्राम में संघर्ष एवं विकास के लिए सतत् प्रयास के रूप में लिया जाय। संघर्ष का व्यापक अर्थ यह है कि -”विभिन्न प्राणी एवं मनुष्य मजबूत एवं समर्थ बने।” यह तथ्य स्थूल कम सूक्ष्म अधिक है। डार्विन ने स्वयं भी यह सिद्धान्त स्वीकार किया है कि -”प्राणियों का अस्तित्व परस्पर एक दूसरे के ऊपर निर्भर है।” व्याख्याकारों ने इसका अर्थ संघर्ष के रूप में लिया तथा कहा की अपने अस्तित्व को बनाये रखने के लिए शक्तिशाली जीव असमर्थों को समाप्त कर देते हैं। परिस्थितियों की महत्ता प्रतिपादित करने की दृष्टि से सम्भव है, डार्विन ने भी इस सिद्धान्त को संकुचित अर्थों में प्रयुक्त किया हो, पर ऐसा प्रतिपादन एक पक्षीय एवं एकाँगी है। उसे शाश्वत सिद्धान्त के रूप में तो तभी स्वीकारा जा सकता है जबकि वह शाश्वत सत्य के रूप में लागू होता हो।
वस्तुतः जीवन संघर्ष का अर्थ आपसी टकराव से नहीं था। इसकी पुष्टि स्वयं डार्विन ने अपनी प्रसिद्ध कृति “द डीसेण्ट ऑफ मैन “ में की है। वे लिखते हैं कि - ‘विकास के क्रम में असंख्य प्राणी समूहों में पृथक्-पृथक प्राणियों का आपसी संघर्ष मिट जाता है-संघर्ष का स्थान सहयोग ले लेता है और इसके फलस्वरूप उनका बौद्धिक एवं नैतिक विकास होता है। इस विकास से ही उन प्राणियों का अस्तित्व बने रहने के लिए अत्यन्त अनुकूल अवस्था पैदा होती है। “सरवाइवल ऑफ दी फिटेस्ट” की व्याख्या करते हुए उनने स्वयं कहा है कि -” ऐसे समुदायों में योग्यतम वे नहीं कहे जाते जो सबसे अधिक बलवान या चालाक हैं वरन् समर्थ वे हैं जो अपने समाज के हित के लिए निर्बल एवं बलवान सभी की शक्ति को संगठित करना जानते हैं, ताकि वे एक दूसरे के पूरक हों। जिन समुदायों में एक दूसरे के प्रति सहानुभूति रखने वाले प्राणियों की अधिकता होगी, वे ही सबसे अधिक उन्नत होंगे और फलेंगे-फूलेंगे। “वर्तमान में सर्वाधिक विकसित एवं प्रगतिशील समाजों के विशद् अध्ययन से यह बात और भी स्पष्ट हो जाती है कि पारम्परिक स्नेह-सहयोग एवं सहकार की भावना ने ही उन्हें उस स्तर तक बढ़ाया है। अविकसित, पिछड़ी और असभ्य जातियों का गहराई से अध्ययन करने पर एक ही तथ्य हाथ लगता है कि पिछड़ेपन का एकमात्र कारण है- आपसी सहयोग, स्नेह एवं सहकार का अभाव।
प्रख्यात विचारक रूसो का कहना है कि “प्रकृति में प्रेम, शान्ति और सहयोग कूट-कूट कर जो प्राणी अपना अस्तित्व बनाये हुए है कारण उनकी सामाजिकता एवं सहयोग भावना है। इस तथ्य की पुष्टि रूस के मूर्धन्य मनीषी केसलर ने भी की है। गंभीरतापूर्वक कई वर्षों तक अध्ययन करने के पश्चात उनने निष्कर्ष निकाला है कि “सहयोग प्रकृति का अकाट्य और विकास का मूल अंग है।” जीवन संघर्ष के सिद्धान्त का दुरुपयोग होते हुए देखकर उनने उसका वास्तविक स्वरूप समझाते हुए कहा है कि- “जो प्राणिशास्त्री तथा अन्य दूसरे वैज्ञानिक उस नियम पर जोर देते हैं, जिसे वे जीवन संघर्ष का निष्ठुर नियम कहते हैं, वस्तुतः वे इस नियम के यथार्थ रूप को भूल जाते हैं कि प्रगति एवं विकास के लिए पारस्परिक सहयोग-सहकार का नियम अधिक महत्वपूर्ण और शाश्वत पारस्परिक संघर्ष द्वारा नहीं,वरन् सहयोग द्वारा प्राणी संसार एवं मानव जाति का विकास संभव हुआ है!” सुप्रसिद्ध मनीषी प्रिंसक्रोपाटकिन ने भी इन्हीं तथ्यों का रहस्योद्घाटन अपनी बहुचर्चित पुस्तक में किया है और कहा है कि -” संघर्ष जीवन का दर्शन नहीं बन सकता। यदि ऐसा होगा भी तो अपनी अन्तःवृत्तियों- दुष्प्रवृत्तियों से लड़ने एवं परिस्थितियों के अनुकूलन मात्र के लिए। स्थूल परिप्रेक्ष्य में जीवन संघर्ष को सृष्टि का अनिवार्य नियम मान लेने पर तो हृदय विदारक स्थिति प्रस्तुत होगी। “
समाज की प्रगति एवं सुव्यवस्था आपसी सहयोग एवं सहकार पर टिकी हुई है। संघर्ष यदि सफलता का आधार बन जाय तो व्यवस्था को विश्रृंखलित होते देर न लगेगी। अनीति अत्याचार से, शरीर बल से, सैन्यबल से, हर व्यक्ति, हर समर्थ राष्ट्र दूसरों पर अपना प्रभुत्व स्थापित करने का प्रयत्न करेगा। नैतिक पुरुषार्थ की, मानवी भाव संवेदनाओं की कोई महत्ता न होगी। फलतः प्रगतिशील मानव समाज की भी वही दुर्दशा होगी जो विलुप्त जीवों एवं संघर्षरत आदिम जातियों की हुई। स्पष्ट है कि अस्तित्व समर्थ का नहीं, सहयोग का है -सहकार का है। मनुष्य जाति को, सभ्यता एवं संस्कृति को अक्षुण्ण बनाये रखने के लिए जीवन दर्शन के रूप में सहयोग एवं सहकार को स्वीकार करना होगा। प्रकृति का मूल आधार भी यही है।
किसे ने लिंकन से पूछा आप शत्रुओं से मित्रता का व्यवहार करने की अपेक्षा उन्हें मिटा क्यों नहीं देते? लिंकन ने कहा- अन्तर हथियार भर का है। यदि नम्रता से शत्रु को मित्र बनाया जा सके तो इस में क्या घाटा रहा?
विज्ञान भौतिक जगत की एक महाशक्ति है। प्रकृति के भण्डार में, असीम प्रयोजनों में काम आने वाली अगणित क्षमताएँ भरी पड़ी हैं। उनमें से क्रमशः प्रयत्नपूर्वक मनुष्य के हाथों में कितनी ही सामर्थ्य लगती गयी है। एक के बाद एक खोज करते हुए उसने सुख-समृद्धि के अनेकों सुविधा साधन जुटा लिए है। विज्ञान ने मनुष्य के हाथों असीम सामर्थ्य प्रदान किया है और बुद्धि-बल बढ़ाता प्रगति पथ पर निरन्तर आगे बढ़ा है। यह प्रकृति के रहस्य को खोजते जाने और उसके ज्ञान के सहारे उपयोगी उपकरण बनाते जाने का ही प्रतिफल है।
परन्तु संसार में पदार्थ क्षेत्र ही सब कुछ नहीं है, उसके समतुल्य एवं अधिक महत्वपूर्ण चेतना भी है। विज्ञान को मात्र भौतिक क्षेत्र तक ही सीमित नहीं होना चाहिए और व्यक्तित्व निखारने वाले कामों में भी हाथ डालना चाहिए। यह काम अध्यात्म विज्ञानियों का है। मनुष्य को अन्य प्राणियों की तुलना में स्वास्थ्य, बुद्धि, प्रतिभा, कला-कौशल का, व्यवहार, संयम आदि की दृष्टि से अधिकाधिक समुन्नत और सुसंस्कृत बनाना अध्यात्म क्षेत्र के विज्ञानियों- प्रज्ञावान मनीषियों-योगी तपस्वियों का काम है। उनका कार्य क्षेत्र भौतिक विज्ञान से भी कहीं अधिक बढ़ा चढ़ा और अधिक उपयोगी है। पदार्थ विज्ञान सुविधा साधन विनिर्मित कर रहा है। उन साधनों का उपयोग जिसे करना है, उस मनुष्य का दृष्टिकोण परिष्कृत करना असामान्य काम है। उसने अनेकों कुटेवें अपना ली है और ऐसे क्रियाकलाप अपना लिये हैं, जो मात्र व्यक्ति के लिए ही नहीं समूचे समाज के लिए हानिकारक हैं। ढेरों प्रवृत्तियाँ ऐसी हैं जिन से पीछा छूटना और छुड़वाया जाना चाहिए। ढेरों सत्प्रवृत्तियाँ ऐसी है जिन्हें अभी अपनाया नहीं गया अन्यथा सामान्य परिस्थितियों में रहने वाला व्यक्ति भी महामानव स्तर का बन सकता था। इस संदर्भ में प्रयोग करना और उपलब्धियों से जनसाधारण को अवगत कराना यह आत्म-वेत्ताओं का, मनीषियों का काम है।
मनुष्य का शरीर और मस्तिष्क बहुमूल्य यन्त्र है, उसके अन्तराल में प्रकृति की पदार्थ परक और परब्रह्म की चेतनापरक अनेकानेक विभूतियाँ समाविष्ट है। वह बीज रूप से प्रसुप्त स्थिति में रहती है, उन्हें अंकुरित और पल्लवित किया जा सके तो नर के भीतर सोया हुआ नारायण जगाया जा सकता है और पुरुष को पुरुषोत्तम की झाँकी करने को मिल सकती है। इस स्तर के प्रयत्नों को योगाभ्यास एवं तपश्चर्या कहते हैं। साधना भी इसी को कहा जाता है। पुरातन काल के तत्वदर्शी अपनी काया में सन्निहित उन सूक्ष्म केन्द्रों को समझते थे, साथ ही उन्हें प्रखर बनाने की विद्या का प्रयोग करके न केवल अपने को असामान्य बनाते थे वरन् अन्यान्यों को भी इस कौशल से लाभान्वित करते थे। यह गुह्य विद्या है तो भी है यह यथार्थ और प्रचण्ड। जिनमें श्रद्धा हो वे अनुभवी, प्रवीण पारंगतों के मार्गदर्शन में यह प्रशिक्षण प्राप्त कर सकते हैं और अभ्यास की परिणितियों से लाभान्वित हो सकते हैं। पिण्ड में ब्रह्माण्ड का समग्र ढाँचा विद्यमान है। बीज में समग्र वृक्ष और शुक्राणु में परिपूर्ण मनुष्य रहता है। इसी प्रकार पिण्ड में ब्रह्माण्ड है। मनुष्य में देवत्व का उदय करने के लिए उस प्रसुप्ति को जाग्रति में बदलना होगा। यह योगाभ्यास का विषय है। इसे चेतनापरक विज्ञान क्षेत्र ही समझना चाहिए। पिछले दिनों यह क्षेत्र पाखण्डियों के हाथों रहा है, अब उसे मनस्वी, तेजस्वी, और तपस्वी हाथ में ले तो विज्ञान के अधूरेपन की भी पूर्ति हो चले और उस प्रगति से ऐसा लाभ मिले जो भौतिक विज्ञान से भी उपलब्ध नहीं हुआ है।
इन दिनों ब्रेनवाशिंग के नाम से किये जाने वाले प्रयोग की महती आवश्यकता है। इस क्षेत्र में भौतिक विज्ञानियों ने भी यत्किंचित् प्रयोग किया है और विरोधियों को समर्थक बनाने में आँशिक सफलता पाई है। उनकी कल्पना है कि सशक्तों द्वारा दुर्बलों के मनों पर आधिपत्य करने के उपरान्त पालतू पशुओं जैसे इच्छानुवर्ती होने के लिए प्रशिक्षण किया जा सकता है। उनके प्रयोग सफल हुए तो समर्थ नफे में रहेंगे, किन्तु मनुष्य का स्वतंत्र चिन्तन और आत्मबल समाप्त हो जायेगा। अस्तु यह क्षेत्र विशुद्ध रूप से अध्यात्मवादियों का है, उन्हें लोक-कल्याण की दृष्टि से उत्कृष्ट चिन्तन और आदर्श कर्तृत्व अपनाने के लिए जन-साधारण को प्रशिक्षित करना चाहिए। ‘ब्रेन वाशिंग‘ उन्हीं का काम है। इसे हाथ से लेकर वे मनुष्य जाति की महती सेवा-साधना कर सकते हैं।
विज्ञान ने पंचभौतिक मानवी काया के हृदय फुफ्फुस आदि अवयवों और रक्त-माँस अस्थि आदि घटकों का स्वरूप और क्रिया-कलाप समझ लिया है। शल्य क्रिया क्षेत्र में उसने श्रेय भी प्राप्त किया है। मस्तिष्क घटकों व रसायन स्राव के स्थान एवं क्रिया-कलाप समझकर इलेक्ट्रोडों द्वारा उस क्षेत्र को वशवर्ती बनाया जा सकता है। वस्तुतः मनःक्षेत्र चेतना से जुड़ता है और इसे सँभालने की जिम्मेदारी तत्वज्ञानियों-अध्यात्मवादियों पर आती है। पर उनने गहराई में उतरना छोड़ दिया है। वे पाखण्ड के सहारे अपनी गाड़ी चला रहे हैं। यह जादू का खेल तभी चल सकता है, जब तक भारत में अन्ध श्रद्धा वाले अनपढ़ भावुक भक्तजनों का अस्तित्व बना रहेगा। भौतिक विज्ञानियों ने जब अध्यात्म क्षेत्र का मोर्चा खाली देखा तो उसमें भी अपनी टाँग अड़ानी प्रारंभ कर दी और प्रसन्नता की बात है कि कुछ न कुछ सफलता प्राप्त कर ली है। मैस्मेरिज्म-हिप्नोटिज्म का सिद्धान्त बहुत दिन पहले ही हाथ लग गया था। अब मैटाफिजिक्स साइको साइबर नेटिक्स एक मान्यता प्राप्त विज्ञान की शाखा है। दूरदर्शन दूरवार्ता भविष्य कथन, मन को पढ़ना आदि इसमें कई नई धाराएँ सम्मिलित हो गई हैं। परामनोविज्ञान ने मरणोत्तर जीवन अतीन्द्रिय क्षमता आदि पर नया प्रकाश डाला है। फिर भी संदेह इस बात का है,वे अध्यात्म के आत्मपरक अन्तःकरण से संबन्धित पक्षों पर अधिक सफलता न प्राप्त कर सके। क्योंकि उसके चारित्रिक पवित्रता की विशेष रूप से आवश्यकता होती है। जबकि पाश्चात्य विज्ञानी इस संदर्भ में काफी पिछड़े हुए होते हैं।
जिन रहस्यों पर अधिक प्रभाव पड़ने की आवश्यकता है उनमें मानवीय विद्युत, मस्तिष्कीय घटकों के कंपन, अंतःस्रावी ग्रन्थियाँ और उनसे निकलने वाले स्रावों पर नियन्त्रण करने की पद्धति मानवी चेतना को समुन्नत करने की दृष्टि से अत्याधिक आवश्यक है। हारमोनों के नियन्त्रण की तरह ही गुण सूत्रों को इच्छानुरूप प्रवाह दे सकने की बात भी असामान्य है। शरीर में संव्याप्त रासायनिक पदार्थों में हेरा-फेरी की बात भी है। जीव कोषों और ज्ञानतन्तुओं की सूक्ष्म संरचना को प्रभावित करना, मस्तिष्क की विभिन्न कोशिकाओं के प्रवाह में परिवर्तन करना वह तथ्य है, जिनके ऊपर आध्यात्मिक ऋद्धि-सिद्धियों का आधार है।
मनुष्य को हर दृष्टि से समुन्नत स्तर का बनाना है। उसमें देवत्व का अभ्युदय करना है, तो इन रहस्यों का समझना ही नहीं वशवर्ती भी करना आवश्यक है। यह कार्य भौतिक यन्त्रों, उपकरणों एवं क्रिया-कलापों से संभव नहीं। इस के लिए अध्यात्म क्षेत्र पर अधिकार रख सकने वाले पवित्रता एवं प्रखरता सम्पन्न लोगों की कार्यक्षमता एवं विशिष्ट योग्यता की आवश्यकता पड़ेगी।
भौतिक उपलब्धियों के समान ही यदि आत्म-विज्ञान अन्तःक्षेत्र की विभूतियों को करतलगत कर सके तो ही समझना चाहिए कि समग्र विज्ञान में प्रवेश पाना संभव हुआ। मात्र पदार्थों पर अधिकार करना उतना महत्वपूर्ण नहीं है, जिनके बिना मानवी विशिष्टता अवरुद्ध बनी रहे। बिना सुविधा साधनों के काम चल सकता है। आत्मवेत्ता तो विशेष रूप से कम से कम साधनों से काम चलाते हुए यह सिद्ध करने का प्रयत्न करते हैं कि यह अब इतनी आवश्यक नहीं कि इनके बिना व्यक्तित्व को उत्कृष्ट स्तर का न बनाया जा सके और उच्च अर्थों में विभूतिवान न बना जा सके। भौतिक साधनों की प्राचीन काल में कमी थी। इतनी बहुलता न थी, जितनी इन दिनों है, तो भी मनुष्य आत्मबल के सहारे सुखी भी रहते थे और समुन्नत एवं सुसंस्कृत भी। इस के अतिरिक्त इन दिनों जिनके पास साधनों की बहुलता है वे भी बहिरंग एवं अंतरंग क्षेत्रों में विपन्न-उद्विग्न माने जाते हैं।
भौतिक उपलब्धियों के समान ही यदि आत्म-विज्ञान अन्तःक्षेत्र की विभूतियों को करतलगत कर सके तो ही समझना चाहिए कि समग्र विज्ञान में प्रवेश पाना संभव हुआ। मात्र पदार्थों पर अधिकार करना उतना महत्वपूर्ण नहीं है, जिनके बिना मानवी विशिष्टता अवरुद्ध बनी रहे। बिना सुविधा साधनों के काम चल सकता है। आत्मवेत्ता तो विशेष रूप से कम से कम साधनों से काम चलाते हुए यह सिद्ध करने का प्रयत्न करते हैं कि यह अब इतनी आवश्यक नहीं कि इनके बिना व्यक्तित्व को उत्कृष्ट स्तर का न बनाया जा सके और उच्च अर्थों में विभूतिवान न बना जा सके। भौतिक साधनों की प्राचीन काल में कमी थी। इतनी बहुलता न थी, जितनी इन दिनों है, तो भी मनुष्य आत्मबल के सहारे सुखी भी रहते थे और समुन्नत एवं सुसंस्कृत भी। इस के अतिरिक्त इन दिनों जिनके पास साधनों की बहुलता है वे भी बहिरंग एवं अंतरंग क्षेत्रों में विपन्न-उद्विग्न माने जाते हैं।
ऋषियों ने इतने उच्चस्तर की विभूतियाँ उपलब्ध की थी जिन पर आज तो सहसा विश्वास करना कठिन होता है। समूचे मानव समाज को आगे बढ़ाने एवं ऊँचा उठाने की क्षमता जिस प्रवाह एवं वातावरण में है उसकी उपलब्धि आत्म विज्ञान की प्रगति से ही संभव हो सकती है।
अमर क्रान्तिकारी सरदार भगत सिंह को कुछ दिनों एक जगह ठहर कर काम करना था। इसके लिए उन्हें काँग्रेस दफ्तर का काम करने के लिए 150 / वेतन वाली जगह मिल गई।
पर उनने मात्र 30/- मासिक ही वेतन लिया। इतने में ही वे मितव्ययिता पूर्वक अपना खर्चा चला लेते थे, पर सार्वजनिक संस्था पर अतिरिक्त भार डालने की बात कैसे की जाय?
परिवार के आकार के संदर्भ में आध्यात्मिक दृष्टिकोण अपनाये जाने के लिए यह अध्ययन आवश्यक हो गया था कि इकलौती संतान फिसड्डी होती है अथवा प्रतिभाशाली, क्योंकि कुछ वैज्ञानिकों ने प्रथम संतान की प्रतिभा पर प्रश्न-चिन्ह लगा दिया था, किन्तु बाद के शोध निष्कर्षों से जो परिणाम सामने आया है, वह सर्वथा इसके विपरीत है।
इस संदर्भ में आस्ट्रिया के जीव विज्ञानी फ्रैंक सावले ने विज्ञान- जगत में तब तहलका मचा दिया, जब उन्होंने अपनी एक अध्ययन-रिपोर्ट “ अमेरिकन एसोसिएशन फॉर दि एडवाँसमेण्ट आफ साइंस” नामक प्रसिद्ध अमेरिकी संस्थान के समक्ष प्रकाशनार्थ भेजी। अपने अध्ययन में उन्होंने यह सिद्ध करने का प्रयास किया था कि प्रथम संतान प्रतिभाहीन होती है और बाद की प्रतिभाशाली। ज्ञातव्य है कि सलोवे के उपरान्त इस संबंध में महत्वपूर्ण अध्ययन पिछले चार वर्षों में विश्व के कई वैज्ञानिक संस्थानों ने किये, किन्तु कुछ अपवादों को छोड़ कर परिणाम सलोवे के विपरीत ही गया। अब से सात वर्ष पूर्व स्वीडन के दो मनोवैज्ञानिकों सीसाइल आर्नेस्ट तथा जुलियस संगस्ट ने कई वर्षों के अध्ययन के बाद एक पुस्तक लिखी “बर्थ आर्डर” अर्थात् जन्म-क्रम। इसमें उन्होंने इस बात का स्पष्ट खण्डन किया कि जन्म क्रम का प्रतिभा से कोई संबंध है, परन्तु अपने अनुसंधान में उन्होंने एक महत्वपूर्ण बात अवश्य देखी कि यदि संतान इकलौती हो तो उसकी बुद्धि और प्रतिभा सामान्य से कुछ ऊपर जरूर होती है। लगभग ऐसा ही निष्कर्ष कैलिफोर्निया विश्व विद्यालय की मूर्धन्य समाज विज्ञानी ज्यूडिथ ब्लैक ने निकाला है। ब्लैक को सलोवे के ‘जन्म-क्रम’ सिद्धान्त का प्रबल विरोधी माना जाता है, पर ऐसी बात नहीं है कि वे इसके एक मात्र प्रतिपक्षी है। वैज्ञानिकों का एक बड़ा समुदाय भी उनके साथ है। ब्लैक अपने शोध-निष्कर्ष में लिखती हैं-
“जन्म-क्रम सिद्धान्त बाह्य दृष्टि से भले ही लुभावना लगता हो, पर तथ्य की दृष्टि से यह सारहीन है। इसमें उस सच्चाई का सर्वथा अभाव है, जिसका दावा सलोवे महोदय ने अपने विस्तृत अध्ययन में प्रस्तुत किया है।” उनकी यह टिप्पणी गहन पर्यवेक्षण पर आधारित निष्कर्ष है। उन्होंने इसके लिए विभिन्न क्षेत्रों की एक लाख से ऊपर प्रतिभाओं से संपर्क साधा। साक्षात्कार से जो तथ्य सामने आया, वह चौंकाने वाला था। सर्वेक्षण के दौरान 70 प्रतिशत लोग ऐसे पाये गये, जो अपने माता-पिता की इकलौती संतान थे, जबकि 30 प्रतिशत लोग ऐसे थे, जिनके कई भाई-बहन थे। इस अध्ययन से एक और महत्वपूर्ण बात सामने आई, वह यह कि 70 प्रतिशत प्रतिभासम्पन्नों में नारियों का अनुपात पुरुषों से अधिक था। इस प्रकार ब्लैक के सर्वेक्षण से दो बातें उभर कर सामने आयी प्रथम यह कि लड़कियाँ लड़कों से प्रतिभा में किसी भी प्रकार कम नहीं होती और दूसरा इकलौती संतान चाहे लड़का हो या लड़की उसकी बुद्धि-लब्धि (आई.क्यू.) औसत से अधिक होती है। उन्होंने अपने शोध-निष्कर्ष में इस बात का स्पष्ट उल्लेख किया है कि व्यक्तित्व-विकास में परिवार के आर्थिक स्तर का प्रभाव निश्चित रूप से पड़ता है। वे कहती हैं कि यदि परिवार निर्धन और बड़ा हुआ, तो इससे सदस्यों की प्रतिभाएँ प्रभावित हो सकती हैं और उनके स्वतंत्र विकास के स्थान पर वह कुँठित बनी रह सकती है। उनका कहना कि संभवतः यही कारण रहा हो कि अध्ययन किये गये प्रतिभासम्पन्नों में आधे से अधिक इकलौती संतानें थीं, क्योंकि इस स्थिति में उनका शिक्षा-दीक्षा और व्यक्तित्व विकास परिवार छोटा होने के कारण बिना किसी दबाव के स्वतंत्रतापूर्वक सम्पन्न हो सका और वे विकास की ऊँचाइयों तक पहुँच सकीं।
इसी आशय का मन्तव्य प्रकट करते हुए प्रसिद्ध मनोविज्ञानी अब्राहम मैस्लो कहते हैं कि परिवार विश्रृंखलित, बड़ा और दयनीय आर्थिक स्थिति वाला हुआ, तो वह क्षमताओं के विकास में बाधक सिद्ध हो सकता है। ऐसे परिवार में प्रतिभाओं के विकास की संभावना न्यून बनी रहती है और व्यक्ति अपनी क्षमताओं को विकसित कर परिष्कृत प्रतिभा की वह स्थिति प्राप्त नहीं कर सकता, जिसे उन्होंने “सेल्फ एक्चुअलाइजेशन” के नाम से पुकारा। प्रकारान्तर से उनका “सैल्फ एक्चुअलाइजेशन” प्रतिभा-परिष्कार का ही दूसरा नाम है।”
लिवरपुल यूनिवर्सिटी के समाजशास्त्री के. फोर्स्टर का कहना है कि छोटे परिवार में प्रतिभाओं के विकास की जितनी संभावना होती है, बड़े परिवार के साथ वह उतना ही न्यून बन जाती हैं। इसका कारण बताते हुए वे कहते हैं कि बड़े परिवारों में माता-पिता के बाद चूँकि बड़ा सदस्य परिवार की सबसे बड़ी संतान होता है, अतः माता-पिता के साथ अपने छोटे-भाई-बहनों के पालन-पोषण की जिम्मेदारी उसके कंधों पर भी आ पड़ती है और दुर्भाग्यवश यदि बचपन में ही माता-पिता काल-कवलित हो गये, तो फिर मुश्किलों का अन्त नहीं। ऐसी स्थिति में वे अपनी क्षमताओं का विकास तो क्या, बड़ी मुश्किल से जीवन की गाड़ी घसीट पाते हैं और ज्यों-त्यों करके जिन्दगी गुजारते हैं। इसके विपरीत इकलौती संतान परिवार की एकमात्र संतान होने के कारण अपनी क्षमताओं का उन्नयन-विकास बड़े परिवारों की तुलना में कहीं अच्छी प्रकार कर लेती है, पर दूसरी ओर वे यह भी कहते हैं कि सभी इकलौती संतानें प्रतिभा सम्पन्न होती हैं, ऐसी भी बात नहीं है, किन्तु उसके सर्वेक्षण के 80 प्रतिशत मामलों में वे असाधारण पायी गयीं। शेष 20 प्रतिशत सामान्य बुद्धि वाले बच्चों के संबंध में उनका विचार है कि माता-पिता के अतिशय लाड़-प्यार ने ही उन्हें बिगाड़ दिया, अन्यथा वे भी किसी न किसी क्षेत्र में असाधारण बन सकते थे, क्योंकि उनके अनुसार असाधारणता उनकी अतिरिक्त विशेषता होती है।
हाल ही में कोलेरेडो यूनिवर्सिटी के समाज शास्त्रियों के एक अध्ययन दल ने इकलौती संतान को सदा औसत से ऊँचे दर्जे के होने की बात कही है। इस संबंध में वे एक सर्वथा नवीन तर्क प्रस्तुत करते हैं। उनका कहना है कि खेत में जब प्रथम बार कोई फसल लगायी जाती है, तो उपज बहुत अच्छी होती है और दाने भी पुष्ट होते हैं, किन्तु बाद की फसलों की उपज और गुणवत्ता क्रमशः घटती जाती है और इसी के साथ जमीन की उर्वरता भी। वे कहते हैं कि कुछ ऐसी ही संभावना प्रथम व एकल संतति के संस्कार और क्षमताओं के संबंध में भी हो सकती है।
यहाँ यह प्रतिपादन अध्यात्म विज्ञान से काफी कुछ साम्य रखता है। अध्यात्म भी इस बात को स्वीकारता है कि प्राण शक्ति के क्षरण के साथ-साथ शारीरिक, मानसिक क्षमताओं का हास हो जाता है और यह सर्वविदित तथ्य है कि जननेंद्रियों से प्राणशक्ति का जितना अधिक क्षरण होता है, उतना शायद ही और किसी मार्ग से। अस्तु प्रथम संतान की उत्पत्ति के साथ माता-पिता में जो शारीरिक-मानसिक क्षमता विद्यमान थी, ऐसे सिद्धान्ततः संतति में भी जानी चाहिए और यदि यह सही है, तो शोधकर्ताओं की इस बात में भी उतनी ही सच्चाई होनी चाहिए कि प्रथम संतान अधिक क्षमतावान होती है।
इतिहास के पृष्ठो को पलटने पर इस बात के अनेकानेक प्रमाण भी मिलते हैं, जो हमें यह विश्वास करने पर विवश करते हैं कि इकलौती संतान असाधारण प्रतिभायुक्त होती है। अष्टवक्र कहोड़ मुनि और सुजाता के एकमेव संतान थे, इसलिए प्रतिभाशाली भी। सुभद्रा से उत्पन्न अभिमन्यु इकलौते बेटे थे, इस कारण गर्भस्थ स्थिति में भी वे चक्रव्यूह भेदन की कला सीख सके। चाणक्य अपने माता-पिता के एकल पुत्र थे। किसी साधारण व्यक्ति को राजसिंहासन पर बैठा देना और किसी राजा को देखते-देखते पदच्युत कर देना उनके बायें हाथ का खेल था। आद्य शंकराचार्य अपने माँ-बाप के अकेले पुत्र थे। अध्यात्म की जिन ऊंचाइयों को वे छू सके, यह किसी से छुपा नहीं है। राजनीति क्षेत्र में जवाहर लाल नेहरू, इन्दिरा गाँधी, रुजवेल्ट आदि भी अपने जन्मदाता की एकाकी संतति थे। साहित्य क्षेत्र में भारतेन्दु हरिश्चन्द्र और इंग्लैण्ड के रस्किन प्रथम संतान थे। एक को खड़ी बोली का जनक, तो दूसरे को 19 वीं शताब्दी का महान साहित्यकार माना जाता है। विज्ञान के विकास में आइंस्टीन के सापेक्षवाद, न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण सिद्धान्त और पुनर्जागरण काल में पारा सेल्सस का कितना बड़ा योगदान रहा है, यह उल्लेखनीय है, किन्तु मजे की बात यह है कि यह भी अपने जनक-जननी की इकलौती संतान थे।
इस प्रकार के कितने ही उदाहरणों से विश्व-इतिहास भरा पड़ा है, जो यह सिद्ध करता है कि इकलौती संतान की क्षमता सामान्य स्तर से ऊंची होती है। इसे माता-पिता की प्रतिभा का हस्तान्तरण कहें अथवा एकल संतति होने के कारण उनकी निजी क्षमताओं के अत्यधिक विकास की सुविधाजनक स्थिति कुछ भी कह लें, पर अब यह लगभग निर्विवाद है कि इकलौती संतान प्रतिभा के क्षेत्र में औसत से ऊंचे स्तर की होती है।
कौए जिस घर की मुँडेर पर बैठते वहाँ से ढेले मार कर उड़ा दिये जाते जब कि कोयल की मीठी वाणी सुनने के लिए आम के पेड़ों के निकट जाते और मधुर कण्ठ का आनन्द लेते।
कौओं ने अपमान से दुखी होकर किसी दूसरे देश में जा बसने का निश्चय किया।
कोयल ने उन्हें समझाया कि यदि तुम कर्कश वाणी बोलने की आदत छोड़ दो तो तुम्हें कहीं भी न जाना पड़े। इस आदत के रहते तो तुम कहीं भी जाओगे वहीं से भगाये जाओगे।
ऋग्वेद 1-115-1 में सूर्य को विश्व की आत्मा बताते हुए कहा गया है-”सूर्य आत्मा जगतस्त- स्थुषश्च “। जिसका तात्पर्य है कि इस धरातल पर जो चेतना एवं हलचल है, उसका उद्गम स्त्रोत सूर्य है। उससे हमें मात्र ताप और प्रकाश ऊर्जा ही नहीं मिलते, वरन् वह सब कुछ उपलब्ध होता है जो चेतना से सम्बन्धित है। प्राणियों के जीवन का आधार सूर्य है।
वस्तुतः इस दृश्य जगत में जो कुछ दृष्टिगोचर होता है उसे सूर्य का ही चमत्कार कहना चाहिए। यह उभय पक्षीय शक्ति धाराओं का उद्गम स्त्रोत है। उसमें जीवनी शक्ति का अजस्र भण्डार है। वैज्ञानिक अनुसंधानों से अब यह सिद्ध हो चुका है कि प्राणियों और वनस्पतियों का अस्तित्व सूर्य के रासायनिक सम्प्रेषण से ही संभव हुआ है। जिस ऊर्जा स्त्रोत से पृथ्वीवासी प्राणशक्ति प्राप्त करते हैं, उसके गति क्रम में यदि थोड़ा सा भी अन्तर पड़ जाय तो प्राणियों का जीवन संकट ग्रस्त हो सकता है।
इन दिनों अन्तरिक्ष में कुछ ऐसे ही घटनाक्रम उभर रहे है जो दूरवर्ती होने के कारण संभवतः अभी समझ में न आए, किन्तु उनकी परोक्ष प्रतिक्रिया ऐसी है जिससे जनजीवन के बुरी तरह प्रभावित होने की आशंका है। इनमें से प्रमुख हैं- सौर कलंकों की इन्हीं दिनों हो रही अभिवृद्धि। विज्ञानवेत्ता इन्हें एक विशिष्ट विक्षोभ मानते हैं और कहते हैं कि उस स्थिति में सूर्य के अन्तराल में भयंकर आँधी-तूफान उठते हैं और प्राणियों के काया-कलेवर के भीतर वह असाधारण रूप ले लेता है। उसका प्रभाव दूर-दूर तक सौर मण्डल के साथ जुड़े हुए समस्त ग्रह-उपग्रहों पर पड़ता है। चूँकि पृथ्वी सूर्य पर अस्तित्व के लिए निर्भर है, अतः लाभ की तरह हानि भी उसे ही सब से अधिक उठानी पड़ती है।
सर्वविदित है कि पृथ्वी की जलवायु का नियंत्रण सूर्य द्वारा होता है। इसलिए इन सौर−कलंकों, विस्फोटों का भी पृथ्वी के जीवन पर गंभीर प्रभाव पड़ता है। सूर्यकलंको-”सन स्पॉट्स” का यह गति चक्र प्रायः 11 वर्ष एक माह एवं 22 वर्ष दो महीने में लौट-लौट कर वापस आता रहता है। फलस्वरूप कितनी ही उलट-पुलट धरती के वातावरण में भी होती रहती है। इस प्रकार के धब्बों-विस्फोटों की संख्या जब कभी भी बढ़ जाती है तो उस स्थिति में प्राकृतिक विपदाएँ तो कहर ढाती ही हैं, मनुष्य की प्रकृति एवं व्यवहार को भी असाधारण रूप से प्रभावित करती हैं। इसके कारण मनीषियों, चिन्तकों, नेताओं तक की विचारधारायें प्रभावित होती देखी गई हैं।
इस संदर्भ में विज्ञानवेत्ताओं, खगोल एवं अंतरिक्ष विज्ञानियों ने गहन अनुसंधान किया है। “अर्थ एण्ड होराइजन” नामक अपनी कृति में सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक डॉ. अलेक्जेण्डर मारशेक ने कहा है कि पृथ्वी पर घटने वाली घटनाओं का सूर्य के अन्तर्विग्रह से प्रत्यक्ष सम्बन्ध भले ही न जोड़ा जा सके, किन्तु साँख्यिकी की दृष्टि से उनका पृथ्वी से सम्बन्ध निर्विवाद रूप से सिद्ध हो गया है। जब-जब यह सौर सक्रियता बढ़ती है, वर्षा तथा तूफानों की बाढ़ आती है। वनस्पतियों में अभिवृद्धि, ग्रीष्म की बढ़ोत्तरी के साथ ही कहीं-कहीं अकाल, सड़क एवं वायु दुर्घटनाएँ, युद्धोन्माद तथा रक्तपात बढ़ता है। इस अवधि में न केवल भयानक भूचुम्बकीय उत्पात होते हैं, वरन् प्रकृति भी असामान्य रूप से प्रकुपित हो जाती है।
विशेषज्ञों ने अपने अध्ययन निष्कर्षों में यह विस्मय-जनक रहस्योद्घाटन किया है कि सूर्यकलंक वर्षों का मानव जाति के विश्व इतिहास की घटनाओं से बहुत गहरा सम्बन्ध है। जिस वर्ष सूर्य धब्बों या सौर लपटों की संख्या अपनी चरम स्थिति में होती है, उस वर्ष पृथ्वी पर जीवन असाधारण रूप से असामान्य हो उठता है। विश्व इतिहास की महत्वपूर्ण घटनाएँ इन्हीं वर्षों में घटित होती रही है। जब-जब सूर्यकलंको की संख्या बढ़ी है तब-तब संसार में बड़े-बड़े युद्ध विश्वयुद्ध और महान क्रान्तियाँ हुई हैं। अनुसंधानकर्ताओं के अनुसार पिछले 60 वर्षों में सन् 1936, 47-48, 57, 1968, 69 एवं सन् 1980 में सूर्य सर्वोच्च क्रियाशीलता में था। अब 11 वर्ष बाद पुनः सौर सक्रियता अपनी चरम अवस्था की ओर अग्रसर हो रही है।
इन सौर परिवर्तनों का प्रभाव न केवल व्यक्तिगत वरन् समष्टिगत मानव समाज की प्रवृत्तियों पर पड़ता है। अठारहवीं शताब्दी से लेकर अब तक के विश्व इतिहास की गवेषणाओं से यह तथ्य स्पष्ट होता है कि महत्वपूर्ण ऐतिहासिक क्रान्तियाँ, रक्तपात, हिंसक उपद्रव, युद्ध आदि घटनाएँ इन्हीं सौर कलंक वर्षों में हुई हैं। सन् 1789 में फ्राँस की प्रसिद्ध ऐतिहासिक क्रान्ति हुई जिसमें न केवल फ्राँस ने, वरन् पूरे विश्व समुदाय ने परिवर्तन के नये दौर में प्रवेश किया। इसी प्रकार ट्रेफलगर और वाटरलू की भयंकर लड़ाइयाँ इन्हीं सूर्यकलंको से जुड़े वर्षों में हुई है। सन् 1857 में भारत का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम सौर सक्रियता-वर्ष में ही लड़ा गया था। अमेरिकी गृह युद्ध एवं रूस जापान के मध्य चली भयंकर लड़ाई इन्हीं वर्षों में हुई। सन् 1914-19 में प्रथम विश्व युद्ध के समय भी सूर्यकलंको की संख्या बढ़ी-चढ़ी थी। सन् 1947 में भारत को स्वतंत्रता प्राप्त हुई, इसके पूर्व द्वितीय महायुद्ध लड़ा जा चुका था। चीन में भी इन्हीं सौर सक्रियता के दिनों क्रान्ति हुई।
सन् 1947 के बाद सूर्यकलंको के तीन परम वर्ष क्रमशः 1958, 1968, 69 एवं 1980 बीत चुके हैं। अंतरिक्ष विज्ञानियों के अनुसार तब सौर कलंकों की संख्या 160 प्रति वर्ष थी जो सन् 80-89 में 200 के करीब पहुंच गयी। बीच के वर्षों में इनकी संख्या प्रायः 60 से 80 के मध्य रही है। इसी अवधि में भारत चीन युद्ध, भारत पाक युद्ध अरब इजराइल युद्ध व यूरोप व अमेरिका में व्यापक युद्ध की स्थिति रही है।
पिछले दिनों इन सूर्य धब्बों की संख्या तेजी से उभरी है और ऐसा अनुमान है कि अगले सात-आठ वर्षों में यह और बढ़ेगी व इनकी चरम स्थिति 1998-99 में देखी जाएगी। ऐसे अवसरों पर युद्धोन्माद से लेकर कई प्रकार की दुर्घटनाओं में अभिवृद्धि की आशंका है, साथ ही कहीं कहीं आश्चर्यजनक उलट-पुलट परिवर्तनों की भी। अभी-अभी विगत दो वर्षों में हमने पूर्वी ब्लॉक में साम्यवाद के हटने व उदारवाद के आने, बर्लिन की दीवार टूटने व जर्मनी के एकीकरण के रूप में परिवर्तन देखे हैं। विगत तीन माह में एक भयावह खाड़ी युद्ध की विभीषिका से सारा विश्व समुदाय गुजर चुका है। बात यहाँ थमी नहीं है। राष्ट्रों के मध्य तनाव से लगता है पता नहीं कब पुनः विश्व स्तर पर युद्ध भड़क उठे। दूसरी ओर दिव्य दृष्टियों का मत है कि इस सन्धिकाल में महाकाल द्वारा व्यापक क्रान्तिकारी परिवर्तनों का सूत्रपात किया जा चुका है। अगले ही दिनों संसार की समस्त समस्याओं का समाधान अलग-अलग चरणों में न होकर एकमुश्त होने जा रहा है। सौर−कलंकों की अभिवृद्धि के साथ ही जहाँ एक ओर विध्वंस पर उतारू शक्तियाँ मारने-मरने को उद्यत हैं, वही मानवी पुरुषार्थ एवं आध्यात्मिक शक्तियाँ समाधान के लिए कमर कसकर तैयार हो रही हैं।
सौर स्फोटों के अधिक विघातक होने और उस प्रभाव से विश्व में हो रही उथल-पुथल एवं महायुद्ध की बन रही भूमिका की आशंका से अपना बचाव कैसे हो सकता है, यह प्रश्न ही मुख्य और महत्वपूर्ण है। इस विषम बेला में यही सबसे बुद्धिमानी है कि आतंकित होने की मनः स्थिति उत्पन्न न होने दी जाय, साथ ही पुरुषार्थ संजोकर असंभव को संभव बनाया जाय।
हमारे लिए यही उचित है कि भौतिक और आत्मिक स्तर पर ऐसा प्रचंड पुरुषार्थ सँजोयें- प्रबल पराक्रम उभारें, जिनसे रूठी प्रकृति को मना लेने और असन्तुलित हो रही मानवी मनः स्थिति को शान्त करने- सृजनात्मक दिशा प्रदान करने का अवसर मिल सके।
स्मरण रखने योग्य तथ्य यह है कि देव संस्कृति के पक्षधर इस विषम बेला में नियति की चुनौती को लेकर महाकाल के अग्रदूत के रूप में सामने आया है। प्रकृति और नियति की विभीषिकाओं से जूझने तथा इक्कीसवीं सदी की उज्ज्वल भविष्य की सुखद संरचना के लिए जुटने के दुहरे उत्तरदायित्व उन्हें सौंपे गये हैं। इसे लंका दहन और राम राज्य स्थापना के लिए अंगद- हनुमान आदि द्वारा निभाई गई भूमिका माना जा सकता है।
इस भूमिका का स्वरूप है- सूत्र संचालक द्वारा निर्धारित प्रज्ञा महापुरश्चरण की अनवरत चलने वाली साधना में भागीदारी। इसमें नित्य नियमित रूप से गायत्री महामंत्र का न्यूनतम पन्द्रह मिनट का जप और साथ में प्रातः कालीन उगते स्वर्णिम सविता-सूर्य का ध्यान करने का विधान है। इसे अनिवार्य रूप से हर परिजन को अपनाने के लिए कहा गया है। इस ध्यान−धारणा के माध्यम से सविता की शक्ति को अपने में आकर्षित एवं अवधारित किया जाता है। साथ ही अनुदान में अपनी प्राण चेतना का योगदान मिला कर अनन्त अन्तरिक्ष में नियति को अनुकूल बनाने के उद्देश्य से बिखेर दिया जाता है। चूँकि गायत्री मंत्र सूर्य का मंत्र है। अतः सविता देवता से न केवल ब्रह्मतेजस् प्राप्त करने का रहस्यमय विज्ञान उसकी साधना पद्धति में सन्निहित है, वरन् इस आधार पर उसको अपने अनुकूल भी बनाया जा सकता है। प्राण चेतना के माध्यम से सौर सक्रियता को अपने अनुकूल बनाया जा सकता तो निश्चित ही आसन्न विभीषिकाओं को निरस्त किया जा सकता है। विश्व-शान्ति की- नियति अनुकूलन की यह सामूहिक साधना प्रचंडता तभी धारण करेगी जब सभी धर्म, पंथ, जाति के अधिकाधिक व्यक्ति एक ही समय, एक ही भावना से, एकनिष्ठ होकर समष्टिगत चेतना को जगाने की दृष्टि से उसे सम्पन्न करेंगे। अब की बार मानवता का भविष्य ही दाँव पर लगा है और महाविनाश की आशंका बढ़ी है। अतः हमारे सुरक्षा उपाय- प्रयास भी बढ़े चढ़े हुए होने चाहिए।
इन दिनों एक मान्यता यह बनती जाती है कि अनैतिक माध्यम अपनाने जाने पर कोई व्यक्ति बड़ा बन सकता है। बड़े का अर्थ है सम्पन्न। सम्पन्न का अर्थ है इज्जतदार- दबंग। इस मान्यता को फलित होते देखकर सर्वसाधारण के मन में यह वहम बैठता जाता है कि प्राचीनकाल में जो भी रीति-नीति रही हो, पर इन दिनों यही प्रचलन है कि जो जितना चालाक है, जितनी धूर्तता अपनाता है, उतना ही उसका रौब-दौब है, उतना ही वह नफे में रहता है, उतना ही उसका रौब गालिब रहता है। जो दूसरा पर अपना जितना रौब जता लेगा। वह उतना ही नफे में रहेगा-यह मान्यता जनसाधारण की बनती जाती है।
यह वातावरण का बिगड़ना हुआ। लोगों की मान्यता यदि यही बनती जायेगी, तो फिर अन्ततः इसका परिणाम बुरा होगा। सर्वसाधारण में विवेकशीलता कम पायी जाती है। बहुतों को जो करते देखा जाता है, उसी का अनुकरण होता है। नकल भी उसी की करते हैं, जो मान्यता अनेकों को अपनाते देखी जाती है, जिस रीति-नीति को अधिक लोग अपनाते हैं, जिसमें लाभ उठाते और नफे में रहते देखा जाता है, उसी की साधारण मानसिकता के लोग नकल करने लगते हैं। यह विवेक कम लोगों में है कि किसी ने यदि अनुचित रीति से लाभ उठा लिया है, तो उसकी इज्जत घटेगी, प्रामाणिकता में उँगली उठेगी और साथी-समर्थक घटते जायेंगे। ऐसी दशा में आज नहीं तो कल उसका विश्वास घटेगा, लोगों की आंखों में गिरेगा। ऐसा व्यक्ति हर हालत में घाटे में रहेगा। प्रामाणिक व्यक्ति यदि अधिक बड़ा न बन सके, अधिक पूँजी न कमा सके, तो भी उसका विश्वास तो बना ही रहता है। इतने भर से उसके कितने ही सहायक बन जाते हैं। प्रामाणिकता में यह विशेषता है कि वह लोगों के मनों में अपने लिए श्रद्धा जमाये रहती है। इतने भर से उसके साथी- सहयोगियों की कमी नहीं रहती है। यह इतना बड़ा लाभ है कि आज न सही, कल वह इज्जतदारों में गिना जायेगा और नफे में ही रहेगा।
जिसने अपनी इज्जत गँवा दी, जिसकी ईमानदारी पर शक होने लगे, बेईमान और धूर्त समझा जाने लगे, उसके-संबंध में उन लोगों के मन में भी घृणा उपजती है, जो किसी प्रकार उससे सहायता पाते और लाभ उठाते रहे हैं। लाभ उठाना सबको अच्छा लगता है, पर जब यह पता चलता है कि लाभ बेईमानी से उठाया गया है, तो फिर अविश्वास उठे बिना, नफरत हुए बिना रह नहीं पाता। यह मन का चोर ऐसा है, जो किसी न किसी समय फलित होता है और मित्र को शत्रु में बदल देता है। ऐसा समय आने पर न सहयोग मिलता है न सम्मान। तब प्रतीत होता है कि अवाँछनीयता में लाभ समझने वाले व्यक्ति भी अपना विचार क्यों बदल देते हैं और सच्चाई को सच्चाई और झूठ को झूठ समझने लगते हैं। तब पता चलता है कि जिसमें लाभ सोचा गया था वह हानिकारक निकला। ऐसी स्थिति में विश्वास सदा के लिए चला जाता है।
एक ज्योतिषी से किसी व्यक्ति ने अपने तीन बच्चों का भविष्य पूछा। उसने पत्र के पन्ने पलटते रहने के बहाने उन बच्चों की गतिविधियाँ गौर से देखी। पिता ने तीनों बच्चों को एक-एक केला दिया। पहले बच्चे ने छिलका सड़क पर फेंक दिया। दूसरे ने उसे कूड़ेदान में डाला। तीसरे ने गाय को खिला दिया।
तीनों बच्चों में से ज्योतिषी ने एक को मूर्ख, दूसरे को समझदार और तीसरे को उदार बनने की घोषणा की।
इसका कारण पूछे जाने पर ज्योतिषी को पत्र के पन्नों की अपेक्षा तात्कालिक प्रतिक्रियाओं को महत्व दिया। उसने कहा मनुष्य की प्रकृति जैसी होती है, वैसी ही नियति बन जाती है।
संसार में जिनकी भी उन्नति हुई है, उनने पहले अपना विश्वास जमाया है और लोगों पर अपनी ईमानदारी की छाप छोड़ी है। इसके पश्चात ही उसके प्रशंसक, विश्वासी और साथी-सहयोगी बने हैं। उन्नति का वास्तविक मार्ग यही है। भलमनसाहत को सदा श्रेय और सहयोग मिलता रहा है। आरंभ में किसी से कुछ भूल होती रही हो, तो भी बाद में वास्तविकता समझाने पर लोग अपने विचार बदल लेते हैं गलत बात भी देर तक नहीं टिकती। सच्चाई देर तक छिपी नहीं रहती। गलतफहमी में लोग थोड़े समय ही धोखे में रह सकते हैं, पर जब यथार्थता प्रकट होती है, तो स्थिति ठीक उलटी हो जाती है और परिणाम वही होता है, जो होना चाहिए।
‘तन्मे मनः शिवसंकल्पमस्तु’ मंत्र हम साकार करें।
आओ! मन को साध, दिव्यता की सामर्थ्य करें ॥ 1॥
है प्रचंड ‘अणुशक्ति- साध से, मन की शक्ति अधिक।
मन प्रतिपल गतिमय रहकर के, करता काम अथक ॥
मन बंधन का और मोक्ष का, कारण होता है।
मन के ही ‘मनचाहा’ धारण होता है ॥
मनकी प्रबल शक्ति का, आओ! मन में ध्यान धरें।
आओ! मन को साध, दिव्यता की सामर्थ्य वरें ॥ 2॥
मन चाहे तो पतन! पराभव का भी गर्त बने।
मानव के शरीर में मन ही, पशुवत् क्त्य बने ॥
नये-नये संकल्प-विकल्प, खड़े कर लेता है।
नई-नई कल्पनाओं से, मन भर देता है ॥
पाप, पतन की ओर न जायें, इतना तनिक डरें।
आओ! मनको साध, दिव्यता की सामर्थ्य वरें ॥ 3॥
यदि विवेक का रहे नियंत्रण तो मन सधता है।
यह चंचल मन, संयम के द्वारा ही बँधता है ॥
आत्मोन्मुखी बनावें इसको, श्रेष्ठ दिशाएँ दें।
फिर इस देव तुल्य दाता से, जो भी चाहे ले ॥
मन यदि शिव संकल्प करे तो, फिर त्रयताप हरें।
आओ! मन को साध, दिव्यता की सामर्थ्य वरें ॥ 4॥
मन की प्रबल शक्ति को साधें, त्याग और तप से।
केन्द्रित मन की शक्ति, प्रबलतम होती है सबसे ॥
रवि किरणें केन्द्रित होकर के, दावानल बनतीं।
केन्द्रित मन की प्रबल शक्तियाँ, प्रबल क्रान्ति करतीं ॥
सद् विवेक से मन को जीतें, सद्संकल्प करें।
आओ! मन को साध, दिव्यता की सामर्थ्य वरें ॥ 5॥
- मंगल विजय
उस दिन जनपद के युवा नरेश घूमने निकले थे। इधर महीनों से खिन्नता का सघन आवरण उन्हें घेरे था। उनका गोरा मुख पीला पड़ गया। बड़ी-बड़ी आंखों की पलकों पर श्यामता झलकने लगी। सुगठित शरीर दुर्बल होने लगा था।
“श्रीमान्। आप इस तरह व्यथित क्यों हैं?” मंत्री की कोशिशें अब तक तो असफल ही रही हैं। जब राजमाता और रानी ही कुछ पता नहीं लगा सकी, तब मंत्री को क्या मिलना था सवाल करके।
“कोई विशेष बात नहीं! “ हमेशा की तरह नरेश का उत्तर था। शब्दों के झरोखों से टालने का मनोभाव झलक रहा था। उनकी मनोव्यथा जानी नहीं जाती। आज मंत्री उन्हें लेकर इस घाटी में आये थे। कदाचित यहाँ का सहज शान्त वातावरण थोड़ी देर के लिए नरेश को सुखी करे।
“महाराज। हम वहाँ बैठेंगे।” अचानक शिला पर शान्त बैठे राजा के समीप आकर मन्त्री ने आग्रह किया।
“क्यों?” जानश्रुति की सूनी आंखों में कोई उत्सुकता नहीं आई। एक मनोरम जगह को छोड़कर एक विषम स्थल पर बैठने का आग्रह क्यों किया जा रहा है -यह वे शायद नहीं समझ सके।
“आप वह दक्षिणावर्त लता देखते हैं।” मन्त्री का संकेत वृक्ष की ओर था “वह विशिष्ट भूमि है। कुछ काल बैठने पर उस जगह का प्रभाव मालूम पड़ जायेगा।” इस वृक्ष पर खूब मोटी सघन पत्तों से भरी एक लता चढ़ी थी। लता -वृक्ष के काष्ठ से एक हो गई थी। पहिले दूर तक सीधी चढ़ गई थी पेड़ पर और तब दाहिने से बाएँ मोड़ लिए थे दो- तीन।
नरेश में उत्सुकता जागी। उन्होंने पास में कुछ दूर जा कर वृक्षों, क्षुपों तथा तृणों तक पर लिपटी छोटी-छोटी लताओं को देखा। इनके लिपटने के ढंग की विलक्षणता ने उन्हें चकित किया। वृक्ष के नीचे उन्होंने अपना उत्तरीय बिछाया और सिद्धासन पर बैठ गए। उत्फुल्ल कमल के समान हथेलियाँ गोद में पड़ी थी। मेरुदण्ड सहज सीधा और बैठने के दो क्षण पश्चात् वक्रानाड़ी जब सरला बनी शरीर खिंच कर स्वतः सीधा हो गया। ठोड़ी किंचित झुक गयी कण्ठकूप के पास और नेत्र शाम्भवी मुद्रा में स्थिर हो गए।
“तुम ठीक कहते हो, विशिष्ट जगह है। मन सहज अन्तर्मुख होता है। “ काफी समय लग गया था नरेश को। चन्द्रमा पहाड़ी से ऊँचा उठ चुका था, घाटी उसकी ज्योत्सना में नहा रही थी। नेत्र खोलते हुए वह बोले “महत्व की बात यह है कि मुझे अनुभूति हो रही है कि मुझे किसी अच्छे विद्वान की आवश्यकता है।” उपनिषदों के उस युग में ऋषियों की कमी नहीं थी। किन्तु मंत्री सोच रहे थे,सिद्ध सिद्ध पुरुष की शोध राजा करते तो अच्छा रहता। साधू नहीं, साधक नहीं, तपस्वी नहीं, मंत्रज्ञ ज्योतिष के निष्णात् नहीं, विद्वान चाहिए उन्हें। मन्त्री ने चलते-चलते मार्ग में पूछा “ किस शास्त्र के विद्वान का आतिथ्य राजसदन करे, यह आज्ञा अपेक्षित है।”
“ विद्या धन है, इसे आप जानते हैं।” नरेश सहसा खड़े होकर मुड़े “मुझे धनी नहीं चाहिए। धन में मेरी रुचि नहीं-भले वह विद्या धन हो, विद्या धर्म भी है न?”
“ है श्रीमान्! “ मन्त्री ने स्वीकारोक्ति दी।
“ यह विद्या धर्म जिसके पास हो वह विद्वान? “ राजा फिर मुड़कर चलने लगे। मन्त्री को लगा कि अब तो उसकी प्रतिभा और कुशलता कसौटी पर चढ़ने वाली है।
वेद, स्मृति, दर्शन, नीति विविध विधाओं में निष्णात् कम नहीं थे ऋषिकुलों में। प्रतिभा जीवन्त होकर वास करती थी वहाँ। किन्तु दूत निराश हो कर लौट रहे थे। दिग्विजयी विद्वानों ने भी मस्तक झुका कर एक ही उत्तर दिया था “ विद्या धन है हमारे समीप। शास्त्रार्थ करने में हम पीछे नहीं हटेंगे। शास्त्रों का हमने अध्ययन किया है। किसी को उनका सम्यक् अध्ययन करा सकते हैं, किन्तु विद्या धर्म? वह हम नहीं जानते।”
कुछ आए भी। उनसे हुई चर्चा ने नरेश को और खिन्न कर दिया। मुझे विद्वान चाहिए। प्रमाण पण्डित की मुझे जरूरत नहीं। जानश्रुति उस दिन खीज उठे थे मंत्री पर। “ उसने पढ़ा बहुत है, यह सत्य है। किन्तु आचरण करना तो जाना ही नहीं। प्रत्येक बात में प्रमाण प्रमाण और प्रमाण! मनुष्य बुद्धि क्या विक्रय कर चुका है कि सिर्फ प्रमाण पर निर्भर करे।”
“उन्होंने स्वीकार किया था कि.....” मन्त्री के स्वर में प्रार्थना का भाव था।
“कि विद्या धर्म है उनका।” राजा क्षुब्ध थे “और तुमने मान लिया।” “सत्य से सौ कोस दूर रहना जिसका स्वभाव हो, असत्य जिसे असत्य जान ही न पड़े और प्रत्येक गलती की सुरक्षा के लिए जिसे बौद्धिक ब्रह्मज्ञान सूझे, तुम उसे पहचानने में भी अक्षम रहे।”
मौन के अलावा क्या जवाब होता। निराश नरेश एक दिन प्रातः कृत्य से निवृत्त होकर एकाकी जा रहे थे। तभी उनके कानों में वार्तालाप के स्वर पड़े। कोई किसी से कह रहा था “ हे मल्लाक्ष। जानश्रुति पौत्रायण राजा का यश द्युलोक के समान फैल रहा है। उससे टक्कर न ले बैठना, कहीं वह तुझे अपने तेज से भस्म न कर डाले।” “अरे तुमने इस साधारण से राजा को ऐसा कैसे कहा जैसे मानो वह गाड़ी वाला रैक्व हो?” दूसरे का स्वर था। राजा की उत्सुकता बढ़ गई।
“मन्त्री और आचार्य के साथ खोज करते हुए वे उस स्थान पर पहुँच गये, जहाँ गाड़ी वाला रैक्व रहा करता था। आस-पास के लोगों ने उस पूरे क्षेत्र का नामकरण ही रैक्वपर्ण कर दिया था। जिस समय राजा अपने सहकारियों के साथ पहुँचे ऋषि रैक्व एक अचेत बालक को होश में लाने में लगे थे। पास की नदी से पत्तों के दोनों में पानी लाकर उन्होंने बच्चे के मुँह में डाला। बच्चा कुछ सचेत हुआ। उसकी गड्ढे जैसी आंखों से आँसू झरने लगे। अपनी गाड़ी से थोड़ा शहद निकालकर उसे चटाया। क्या कुछ नहीं था उनकी गाड़ी में। जीवनोपयोगी वस्तुएँ औषधीय गुणों वाली वनस्पतियाँ और न जाने कितनी चीजें। बैलों के स्थान पर स्वयं जुतकर गाड़ी को खींचते हुए सारे राज्य में घूम-घूम कर-प्रत्येक के पास पहुँच कर स्वस्थ शरीर और स्वच्छ मन का विज्ञान समझाते रहते। जन आस्था उन पर इस कदर थी कि उनकी उपस्थिति लोगों में यह विश्वास जगा देती कि अब कष्टों से परित्राण हुए बिना नहीं रहेगा।
जिज्ञासु राजा के द्वारा सवाल पूछे जाने पर उन्होंने अपनी तीखी और बेधक दृष्टि से उसकी ओर देखा। उनके हाथ अभी भी बालक की सेवा में लगे थे। “ रे स्वार्थी! दुःख की धधकती ज्वाला में जल भुन रहे संसार की करुण दशा आर्त मानवता की पुकारें तुझे नहीं सुनाई देती। अखिल सृष्टि में संव्याप्त परमचेतना की ओर से आंखें बन्द कर योगाभ्यास तत्वज्ञान मोक्ष की तलाश वैसी ही है जैसे कोई क्षीर सागर में रह कर भी अपने मुख में मुश्के कस ले। दुग्ध के अभाव में व्याकुल हो रोये। दुर्भाग्य के सिवा और क्या है यह?”
“तनिक गहराई से सोच जानने योग्य को जानना, जाने हुए का आचरण करने में तन्मय हो जाना और आचरण करते हुए स्वयं वही हो जाना यही है विद्या धर्म। जिसे धारण करने आत्म सात करने पर स्पष्ट हो जाएगा यह निखिल सृष्टि ही परमात्मा है। सर्व खिल्विदं ब्रह्म का प्रति पल भान करते हुए उसकी सेवा ही परम समाधि है। इस समाधि में अपने को पूर्णतया विसर्जित करने की अनुभूति ही तत्वज्ञान है। यही मोक्ष है। यही है कैवल्य। यही परमयोग है। सर्व विद्याओं की सार इस विद्या धर्म को धारण कर।”
बालक अब तक पूर्णतया सचेत हो चुका था। उसे गाड़ी में सुलाकर वे गाड़ी में स्वयं जुतकर इसे एक ओर घसीटते हुए चल पड़े- विद्या धर्म की उसी सुवास को फैलाने हेतु जिससे सबका मन सुवासित होने लगा था।
ब्रह्मा जी सृष्टि का संविधान लिख रहे थे। उनने सभी प्राणियों का एक एक प्रतिनिधि बुलाया समिति का कार्य ठीक प्रकार चल पड़ा, जो निश्चय होता वह पीपल के पत्ते पर लिख दिया जाता। कागज का अविष्कार उस समय तक हुआ न था।
रात्रि होने पर सभी सभासद अपने-अपने निवास स्थान पर लौट जाते। एक गधा ही था जो छिपकर किसी कोने में बैठ जाता ताकि आराम से पड़ा रहे। व्यर्थ इधर उधर न घूमना पड़ा।
रात्रि को भूख लगी। गधे ने वे सभी पीपल के पत्ते खा लिए जिन पर बहुत दिनों से संविधान लिखा जाता था।
प्रातः जब गोष्ठी आरंभ हुई तो पत्ते तलाशे गये। मालूम हुआ कि उन्हें गधे ने खा डाला।
देवताओं को उसकी मूर्खता पर बड़ा क्रोध आया। उठा कर स्वर्ग से धरती पर पटक दिया। उसे थोड़ी चोट लगी पर कुछ ही दिन में चंगा हो गया।
गधे ने सब प्राणियों से कहना शुरू कर दिया कि समस्त धर्म शास्त्र तो उसके पेट में भरे हैं। सुनने वाले हँसकर रह जाते।
उस गधे की औलाद अभी भी बौद्धिक अहंकार से ग्रस्त लोगों के रूप में जहाँ तहाँ देखी जाती है। उनका दावा भी सही होता है और ज्ञान का भण्डार हमारे मस्तिष्क में भरा है। पर वे चरित्र की दृष्टि से शून्य होते हैं गधे की तरह।
अपनी इसी काया में समस्त देवताओं, समस्त शक्तियों, अतीन्द्रिय क्षमताओं का निवास है। हृदय गुहा में विराजमान आत्मसत्ता ही ब्राह्मी चेतना का आधार है। विभूतियाँ उन्हीं के दिव्य निर्झर। जो प्रसुप्त स्थिति में अन्तराल में दबी पड़ी रहती है। यदि उन्हें योगाभ्यास एवं तप साधना द्वारा जाग्रत कर लिया जाय तो अपने भीतर ही वह सब कुछ मिल सकता है जिसे ऋद्धि-सिद्धियों के नाम से जाना जाता है और जिसकी तलाश हम बाहर करते और भटकते हैं।
वस्तुतः मनुष्य के तीन शरीर हैं-स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीर। इनमें एक से बढ़कर एक उच्चस्तरीय दिव्य क्षमताएँ-विभूतियाँ विद्यमान हैं। इनमें स्थूल शरीर वह है जो चलता- फिरता, खाता, सोता, आंखों से दीख पड़ता है। सूक्ष्म शरीर वह है जिसमें अदृश्य शरीर रहता और प्रेत-पितरों जैसा वायुभूत होता है। कारण शरीर वह है जिसकी पहुँच प्रकृति के अन्तराल ब्राह्मी चेतना के गहन स्तर तक है। पर इन तीनों शरीरों में से प्रायः लोगों का स्थूल शरीर ही सक्रिय रहता है और सूक्ष्म तथा कारण प्रसुप्त स्थिति में पड़े रहते हैं। सूक्ष्म शरीर पर स्थूल शरीर के प्रभाव संस्कार जमते रहते हैं और वे अगले जन्म में स्वर्ग-नरक में अपने पूर्व कृत्यों के अनुरूप चेतनात्मक प्रसन्नता या सन्ताप सहते रहते हैं। कारण शरीर पर मात्र संकल्प और वातावरण का प्रभाव पड़ता है।
इन तीनों ही शरीरों को परिष्कृत बनाना मनुष्य के अपने हाथ की बात है। प्रयत्न करके वह इनमें से जिसे चाहे विकसित कर सकता है और विकास का आनन्द ले सकता है। इन आनन्द और गौरव भरी सफलताओं को ही ‘सिद्धियाँ’ कहते हैं। इनमें स्थूल शरीर की सिद्धियाँ है- स्वस्थता, बलिष्ठता, सौंदर्य, सम्मान, वैभव, सहयोग, प्रशंसा आदि। शरीर को ठीक तरह साधने वाले, जीवन साधना की उद्देश्यपूर्ण रीति-नीति अपनाने वाले, इन सभी को या अधिकाँश को उपलब्ध कर सकते हैं।
सूक्ष्म शरीर से वे कार्य हो सकते हैं जो शरीर रहित आत्माएँ, यक्ष, गंधर्व, पितर आदि जान या कर सकते हैं। विज्ञानवेत्ता इन्हें अतीन्द्रिय क्षमताएँ कहते हैं। दूर, श्रवण, दूरदर्शन भविष्य कथन, रहस्यों का उद्घाटन, परकाया प्रवेश, विचारों और शरीरों पर आधिपत्य, अपनी क्षमता के अनुरूप दूसरों को लाभ या हानि पहुँचाना यह सूक्ष्म शरीरों का काम है। वे उत्तम प्रकृति के हों तो अदृश्य सहायकों के रूप में कितनी ही महत्वपूर्ण सहायताएँ करते रह सकते हैं। निकृष्ट प्रकृति के हों तो उनके द्वारा दूसरों को अनेक प्रकार की हानियाँ पहुँचाना संभव है। उन्हें एक प्रकार से शरीर रहित और अदृश्य जगत में चलते रहने वाली गतिविधियों से भी किसी सीमा तक परिचित कह सकते हैं।
कारणशरीर- जिसे अन्तरात्मा भी कहते हैं, यदि सशक्त हो चले तो उचित-अनुचित कार्यों का बोध ही नहीं कराता, कुकर्मों से रोकता और सन्मार्ग पर चलाता है। उमंगों का स्तर ऊंचा हो तो देव स्तर के दैवी सामर्थ्यों से भरे पूरे होते हैं। उनमें व्यक्तियों को ऊँचा उठाने और दिशा देने की सामर्थ्य होती है। वे भवितव्यताओं को जानने तक ही सीमित नहीं होते, वरन् उन्हें सुधारने और बदलने में भी समर्थ होते हैं। वे अपने उच्च दृष्टिकोण के कारण हर स्थिति में स्वर्गीय प्रसन्नता अनुभव करते हैं और कुसंस्कारों के भवबन्धन काट सकने के कारण जीवन मुक्त भी होते हैं। इसके लिए शरीर त्याग की आवश्यकता नहीं होती।
इस तरह स्थूल शरीर में समाहित दोनों सूक्ष्म और कारण अपने-अपने काम करते रहते हैं और अधिक ऊँची स्थिति प्राप्त करने में प्रयत्नशील रहते हैं। अध्यात्मवेत्ताओं के अनुसार स्थूल शरीर की सिद्धियाँ प्राप्त लोगों को महापुरुष, सूक्ष्म शरीर वालों को सिद्ध पुरुष और कारण शरीर की दृष्टि से विकसित लोगों को देवात्मा या देव पुरुष कहते हैं। इन ऊँची स्थिति में पहुँची हुई आत्माओं को केवल भगवान के महान कार्यों में योगदान देने के लिए जन्मना पड़ता है। इन्हें कर्म भोग के लिए जन्म-मरण के फेर में पड़ने और परिणाम सहने के लिए बाधित नहीं होना पड़ता है।
समाधि उस स्थिति का नाम है जिसमें मनुष्य सदा उच्च लक्ष्य की ही बात सोचे और वैसी ही क्रियाएँ करे। साँसारिक व्यवधान जिसे मार्ग से डगमगा न सके। इस के दो स्वरूप हैं विकल्प और निर्विकल्प। जड़ समाधि वह होती है जिसमें मनुष्य शरीर की श्वास-प्रश्वास, रक्त संचार, क्षुधा-पिपासा आदि पर नियंत्रण स्थापित करके जड़वत् स्थिति बना कर उसमें मूर्च्छित जैसी स्थिति में बना रहता है। ऐसी समाधि में मनोबल की प्रखरता तो सिद्ध होती है, पर उससे अध्यात्म स्थिति की उत्कृष्टता से कोई सम्बन्ध नहीं है। यह एकाग्रता की ही कुछ अधिक ऊँची स्थिति है। एकाग्रता एक मानसिक सफलता मात्र है। इससे कबीर के शब्दों में वह सहज समाधि स्थिति कहीं भली जिसमें चेतना उच्च भावनाओं में निरन्तर डूबी रहती है। वस्तुतः उच्चस्तरीय सिद्धियाँ आत्मचेतना के ब्राह्मी चेतना से गुँथ जाने पर ही प्रस्फुटित होती हैं। इसके लिए योगाभ्यास और तप साधना का आश्रय लिया जाता है। चिन्तन, चरित्र, व्यवहार एवं गुण, कर्म, स्वभाव में तदनुरूप श्रेष्ठता का, शालीनता का समावेश किया जाता है। इस प्रकार से जिन सिद्धियों तथा दिव्यशक्तियों की उपलब्धि होती है, उनका सुविस्तृत वर्णन पतंजलि योग सूत्र विभूतिपाद में सूत्र 16 से 44 तक किया गया है। भूत और भविष्य का ज्ञान, सभी प्राणियों की भाषा समझने, पूर्व जन्म के बारे में जानने, दूसरों के मन की बात समझने की क्षमता, अन्तर्ध्यान, आत्मबल, दूरदर्शन, दूर श्रवण, सर्वज्ञान भूख-प्यास की निवृत्ति सूक्ष्म शरीरधारी दिव्य शक्तियों से संपर्क आदि अनेकों प्रकार की शक्तियाँ योग साधना से प्राप्त होने का उल्लेख है। इसके 36 वें सूत्र में 6 सिद्धियों का वर्णन करते हुए कहा गया है- ततः प्रातिभ श्रावण वेदनदर्शस्वाद वार्ता जायते, अर्थात् उससे प्रातिम, श्रवण, वेदन, आदर्श, अस्वाद और वार्ता-छह सिद्धियों प्रकट होती हैं। योगसूत्र भोजवृति भाष्य में इन सिद्धियोँ का स्वरूप इस प्रकार बताया गया है।
(1) प्रातिभ-अर्थात् अतीन्द्रिय व्यावहित-छिपी हुई वस्तुओं, सुदूर स्थिति अतीत और अनागत वस्तुओं, घटनाओं को जानने की क्षमता (2) श्रवण -श्रोत्रेंद्रिय से दिव्य ध्वनि और दूरवर्ती शब्दों का श्रवण (3) वेदना-दिव्य स्पर्श का अनुभव (4) आदर्श-दिव्य दर्शन की क्षमता (5) आस्वाद-दिव्य रस का आस्वादन करने का सामर्थ्य (6) वार्ता-नासिका द्वारा दिव्य ग्रन्थों का अनुभव करने की क्षमता।
इन क्षमताओं की प्राप्ति कैसे होती है? इस सम्बन्ध में महर्षि पतंजलि ने कहा है कि चेतना के विकास हेतु किये जाने वाले प्रयासों, ध्यान-धारणा के अभ्यासों से ये क्षमतायें प्राप्त होती हैं। आत्मस्वरूप में की गई ध्यान-धारणा से प्रज्ञा की उत्पत्ति एवं छह सिद्धियों के अतिरिक्त आठ अन्य सिद्धियाँ भी हस्तगत होती हैं। इन सिद्धियों को अणिमा, लघिमा, महिमा, गरिमा, प्राप्ति प्राकाम्य, वशित्व, ईशित्व, नाम से जाना जाता है।
सूक्ष्म और कारण शरीरों को साथ लेने पर कार्य सम्मत और अनभिक्षात नामक सिद्धियों के प्राप्त होने का भी उल्लेख शास्त्रकार ने किया है। काय सम्मत से तात्पर्य शरीर की सुन्दर आकृति, दीप्तिमान अंग, अंगों का बलवान और वज्र की भाँति दृढ़ और परिपूर्ण हो जाना है। अनभिक्षात-से तात्पर्य साधक के कार्य में पंचतत्व अपने गुण और लक्षणों के कारण बाधा न पहुँचाने से है। वह पृथ्वी के भीतर भी उसी प्रकार प्रवेश कर सकता है जैसे कोई व्यक्ति जल में प्रवेश कर लेता है। सर्दी, वर्षा, ग्रीष्म, अग्नि आदि कोई भी भूतों के धर्म उसके शरीर में किसी प्रकार की बाधा नहीं पहुँचा सकते। इन सिद्धियोँ की उपलब्धि पाँचों महाभूतों पर विजय प्राप्त करने से होती है। अपनी चेतना को पूर्णतया जाग्रत और विकसित कर लिया जाय तो कोई कारण नहीं कि अन्तराल में समाहित दिव्यशक्तियों का उन्नयन और उनका सदुपयोग करना संभव न हो सके।
एक नगर में चार मित्र थे। एक बढ़ई, दूसरा दर्जी, तीसरा स्वर्णकार, चौथा माँत्रिक। चारों परदेश को चले। रास्ते में जंगल पड़ा। जानवरों का डर था। रात हो गई एक पेड़ के नीचे सोने का निश्चय किया। एक-एक को नम्बर से पहरा देना था। तीन को सोना था ताकि सो भी सकें और सुरक्षित रहें। पहले प्रहर में बढ़ई को जगना था उसने खाली समय बिताने की अपेक्षा लकड़ी की एक सुन्दर पुतली बनाई। दूसरी पारी दर्जी की थी उसने अपने पहरे वाले समय में पुतली के लिये कपड़े सी दिये। तीसरी पारी सुनार की थी उसने आभूषण बना दिये। चौथी पारी माँत्रिक की आई तो उसने मंत्रबल से उस पुतली को सजीव बना दिया।
प्रातः चारों उठे। पुतली बड़ी आकर्षक थी। चारों का मन उसे लेने को करने लगा। प्रतीत हुआ की चारों ही सुन्द उपसुन्द की तरह उस सुन्दरी के लिये आपस में लड़ मरेंगे।
पेड़ पर एक देव रहता था उसने चारों को समझाया कि एक उस पुतली को पुत्री, दूसरा, बहिन, तीसरा माता और चौथा पत्नी माने। जगने के क्रम से ही वह रिश्ते बना लिए जायँ।
चारों ने देव की बात मानी और कलह को सद्भावना में बदल लिया।
परन्तु सिद्धियोँ का प्रदर्शन निषिद्ध है, क्योंकि उससे प्रशंसा और अहंकार बढ़ने से साधक का आत्मिक स्तर गिरता है। कई निम्न स्तर के लोग बाजीगरों की तरह अपनी करामातें दिखाते फिरते हैं और इस आधार पर धन तथा सम्मान कमाते हैं। ऐसे व्यवसाय की शास्त्रकारों ने कड़ी निन्दा की है। अतीन्द्रिय क्षमताओं का विकास एवं परमात्मा का साक्षात्कार सूक्ष्म बुद्धि से ही संभव है। उपार्जित दिव्यशक्तियों- सिद्धियों का सदुपयोग पीड़ा और पतन के निवारण में, औरों के अभ्युत्थान के लिए ही किया जाना चाहिए, आत्मसत्ता ब्रह्मसत्ता के समान सामर्थ्यवान तभी बन पाती है। इसी आधार पर योगों की सिद्धि होती है और कालजयी बना जाता है।
यह एक विडम्बना ही है कि अपना महत्व न समझ पाने से मनुष्य परावलम्बी, पराधीन बन जाता है और यथार्थता से वंचित रहकर भ्रम जंजालों में भटकता देखा जाता है।
संसार में अनेकों परस्पर विरोधी प्रचलनों की भरमार है उनमें से जिस किसी को हम स्वीकारते हैं उसमें उन प्रतिपादनों की नहीं, हमारी चयन बुद्धि, वातावरण एवं पूर्वाग्रह के आधार पर बनी हुई अभिरुचि को श्रेय जाता है। अस्तु प्रधानता प्रतिपादन की नहीं, अपनी अभिरुचि या विचार क्षमता की ही रही। यदि उस वातावरण से अपना सम्बन्ध उतना घनिष्ठ न होता तो वातावरण का प्रभाव हमारे मानस की दूसरी स्थिति भी बना सकता था। तब कदाचित हम उस भिन्न प्रचलन के अनुयायी रहे होते, किन्तु देखा गया है कि हमारी मान्यताओं और अनुभूतियों में अन्तर आ जाने पर फिर वैसी स्थिति नहीं रहती और मित्रता घट कर अपेक्षा में और कभी-कभी शत्रुता में भी परिणत हो जाती है।
यह ठीक है कि साधारण स्तर के लोगों को वातावरण बनाता और ढालता है, पर यह कथन उन्हीं के लिए सही बैठता है, जिनकी मानसिक स्थिति दुर्बल होती है। मनस्वी लोग वातावरण से प्रभावित नहीं होते। उलटे वे अपने मनोबल से वातावरण को उलट देने में समर्थ होते हैं। कुसंग, सत्संग हर किसी को अपनी विशेषता से प्रभावित नहीं कर सकता। कई बार उत्कृष्ट प्रतिभाओं के संपर्क में आकर कुकर्मी भी सुधर जाते हैं और सज्जन बन जाते हैं। यह दो मनोबलों की लड़ाई है। जो प्रबल पड़ता है वह दूसरे पक्ष को परास्त ही नहीं कर देता, अपने अनुकूल अनुरूप भी बना लेता है। यहाँ भी व्यक्ति की वरिष्ठता ही स्वीकार करनी पड़ी है।
योग साधनाओं में हल्के-फुल्के प्रयोग हैं। न उनमें पहलवानों जैसी कड़ी कसरत करनी पड़ती है और न सरकस में काम करने वाले नटों जैसा कठिन अभ्यास करना पड़ता है। प्राणायाम में साँस लेने का स्वाभाविक क्रम यत्किंचित् ही बदलना पड़ता है। त्राटक में दृष्टि को उतना केन्द्रित करना पड़ा है, जितना अस्त्रों का निशाना लगाने वाले लोगों को करना पड़ता है। आसनों में हाथ पैरों को यत्किंचित् मोड़ना-मरोड़ना ही पड़ता है। यह क्रियायें अपने आप में- शारीरिक दृष्टि से कोई विशेष महत्व नहीं रखतीं, पर जब उनके साथ मनोयोग जुड़ जाता है और प्रतिफल के महात्म्य को श्रद्धापूर्वक स्वीकार कर लिया जाता है, तब उन योगाभ्यासों का जादुई प्रतिफल दृष्टिगोचर होता होता है। इसमें क्रिया का जितना महत्व है, उसकी तुलना में बीसियों गुना महत्व मनोयोग का है। यदि वह न लगे और मात्र शरीर के अवयवों को हिलाते-डुलाते रहा जाय तो उसका वैसा प्रतिफल नहीं हो सकता जैसा कि होना चाहिए। किसान, मजदूर, लुहार, बढ़ई, शिल्पी, कारीगर दिन भर कठोर परिश्रम करते हैं और उनके हर अंग का संचालन होता है। श्वास भी गहरी लेते हैं, इस प्रकार भी उनमें योगियों जैसी कोई विशेषता प्रकट नहीं होती।
देवताओं की कृपा से कई प्रकार के लाभ, वरदान मिलने की बात सोची जाती है और यह भी अनुमान लगाया जाता है कि उनके कुपित होने पर कोई हानि हो सकती है, किन्तु जो लोग उस प्रकार के देवताओं को नहीं मानते अनय धर्मावलम्बी या नास्तिक हैं, उनको लगता है कि अविश्वास की मनःस्थिति में कोई देवता लाभ या हानि नहीं पहुँचा सकते। यह मान्यता की ही महत्ता है, श्रद्धा का ही चमत्कार है। यह तथ्य संदेहास्पद ही है कि अमुक देवता ने कोई बनाव या बिगाड़ किया।
इष्ट देव की या गुरु की शरण में आने से उद्धार होने की बात कही जाती है, पर ऐसा होता तभी है जब मान्यता और भावना गहरी हो। उसमें कमी रहने पर वैसा कुछ लाभ मिल नहीं पाता जैसी की कल्पना की गई थी। रबर की गेंद जितने जोर से जिस दिशा में फेंकी जाय वह अगली वस्तु से टकराकर उसी दिशा में उसी वेग से लौट आती है। यदि फेंकने की शक्ति दुर्बल हो या गेंद ठोस हो तो वैसा बन पड़ना संभव नहीं। श्रद्धा का महत्व ठीक ऐसा ही है। उसे जितने वेग से जिस दिशा में फेंका जाय उसकी प्रतिक्रिया भी तद्नुरूप ही होती है।
उत्कर्ष के लिए, त्राण के लिए दूसरों पर निर्भर रहने की बात में सबसे बड़ी हानि यह है कि व्यक्ति अपनी क्षमता और गरिमा को भूलता जाता है। अतएव वस्तुस्थिति की जानकारी से वह अनभिज्ञ ही बना रहता है। विज्ञजनों को यथार्थता से अवगत होना चाहिए। इस आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए गीताकार में कहा है- “आत्मा का अपनी ही आत्मा से उद्धार करो। अपने आप को गिराओ मत। अपना आपा ही अपना मित्र है और स्वयं ही अपना शत्रु।” यह कथन जितना धर्मोपदेश की दृष्टि से सही है उतना ही मनोविज्ञान की दृष्टि से भी।
परिस्थितियाँ एक सीमा तक ही मनुष्य के उत्थान-पतन में सहायक होती हैं। यदि वह उनके आगे सिर झुका ले और अपनी विवशता स्वीकार कर ले तो फिर हवा के झोंके के साथ उसे सूखे पते की तरह जिधर-तिधर उड़ते रहना पड़ेगा। यदि वह परिस्थितियों के दबाव को अस्वीकार कर दे, तो उसे झुकाने या विवश करने वाला कोई भी नहीं हो सकता। इतिहास के पृष्ठो पर अंकित ऐसी अनेकों घटनाएँ विद्यमान हैं जिसमें मनस्वी लोगों ने प्रतिकूलताओं को चुनौती देते हुए अपना रास्ता आप बनाया है और गई बीती परिस्थितियों को ताड़ते-मरोड़ते हुए कहीं से कहीं पहुँचे हैं, जब कि उनके अन्यमनस्क साथी जहाँ के तहाँ उसी स्थिति में बने रहे।
कहा जाता है कि चिकित्सा से व्यक्ति रोग मुक्त हैं, पर यह बात उसी हालात में सत्य है जबकि रोगी का विश्वास चिकित्सक एवं चिकित्सा पद्धति पर बना रहे। यदि वह डगमगाने लगे तो उपचार का प्रभाव आधा रह जाता है। इसके विपरीत ऐसा भी देखा गया है कि साधुओं के अभिमंत्रित जल या भस्म को खाने, लगाने भर से लोग कठिन असाध्य समझे जाने वाले रोगों से मुक्ति पा लेते हैं। चिकित्सा की सफलता में उन्हीं को श्रेय मिलता है जो अपने रोगी पर अपने ज्ञान, अनुभव एवं औषधि के प्रभाव की धाक जमा लेते हैं। इसलिए चिकित्सा विज्ञान में आधा योगदान मनोविज्ञान का रहने की बात कही गई है। जो मनोविज्ञान से परिचित नहीं वह कदाचित ही सफल चिकित्सक हो सकता है।
साधना क्षेत्र में भी यह बात है। योगाभ्यास से सम्बन्धित क्रिया-कलापों के, विधि-विधानों के बहुत महत्व बताये गये हैं। उनकी सफलता इस बात पर निर्भर है कि साधक के मन ने उस उत्सव को कितनी गहराई से अपनाया। यदि वह उन्हें मखौल मानता रहे और गरिमा स्वीकार न करे, तो कितनी ही देर तक किसी क्रिया-कलाप को करता रहा जाय, कोई असाधारण बात दिख न पड़ेगी। योगाभ्यासों में गुरु की आवश्यकता पर बहुत जोर दिया है। इसका मात्र यही कारण नहीं है कि वह विधि-विधान ठीक से बताता रहे, वरन् यह भी है कि वह शंका-समाधान करता रहे। यदि कहीं अश्रद्धा के बीजांकुर उगे तो उन्हें अपने व्यक्तिगत प्रभाव से सन्तुलित करता रहे।
जापान की एक बौद्ध संस्था ने उपलब्ध सारे धर्म ग्रन्थों को प्रकाशित करने का संकल्प किया। उसके लिए धन राशि भी एकत्रित की। जब राशि लगभग पुरी होने को आई तभी भयंकर बाढ़ आई और भयंकर दुर्भिक्ष पड़ गया।
प्रकाशन के लिए राशि पीड़ितों की सहायता के लिए खर्च कर दी गई। समय ठीक होने पर प्रयत्न फिर से आरम्भ कर दिया गया और धन नये सिरे से एकत्रित करके आवश्यकता पूरी करने जितना प्रबंध कर दिया गया है।
तीसरी बार वह प्रयत्न फिर हुआ तब वह पहला संस्करण छप सका। पर प्रकाशित पुस्तकों पर तीसरा संस्करण छपना था। इसका कारण बताते हुए भूमिका में स्पष्ट किया गया कि दो बार संग्रह किया गया धन उस तात्कालिक आवश्यकता के कार्यों में खर्च किया गया जो इस प्रकाशन के समान ही महत्वपूर्ण था। साहित्य का उद्देश्य यही तो है कि वह करुणा और सेवा की भावनाओं को कार्यान्वित करे। इन ग्रन्थों के प्रथम दो संस्करण उसी प्रयोजन की पूर्ति में लगे समझे जायँ।
आध्यात्मिक या भौतिक जीवन में अनेकानेक प्रसंग, अवसर ऐसे आते हैं जिस में प्रतिकूलता भी रहती और अनुकूलता भी जुड़ी रहती है। यह मनुष्य के स्तर पर निर्भर है कि वह प्रतिकूलताओं से अपनी साहसिकता और सूझबूझ के सहारे जूझे और उन्हें सरल बनाने में सफलता प्राप्त करें। इसी प्रकार अनुकूल परिस्थितियों से लाभ उठाना और समय पर उपयुक्त कदम उठाना व्यक्ति के अपने कौशल पर निर्भर है। इसलिए मनोबल को प्रत्यक्ष वरदान माना गया है जो उसे अर्जित कर लेते हैं, प्रगति उनके चरण चूमती है।
गायत्री का अधिष्ठाता देवता सूर्य है। अध्यात्म की भाषा में इसे सविता कहते हैं। सूर्य में आभा-चमक, रोशनी और ऊर्जा-गर्मी और शक्ति, यह दोनों ही तत्व विद्यमान हैं। प्रकाश पुँज होने के कारण अपनी किरणों से जहाँ वह जगत के अन्धकार को दूर करता है, वहीं चेतनापुँज सविता रूप में उपासक के अज्ञानान्धकार को छिन्न-भिन्न करके अतः करण को ज्ञान से प्रकाशित करता है। प्रसुप्त अंतः शक्तियों, दिव्य क्षमताओं को उभार कर उसे महामानव, देव मानव एवं अवतार स्तर तक पहुँचा देता है। आर्षग्रन्थों में सूर्य स्नान, सूर्य उपस्थान, सूर्य नमस्कार, सूर्य ध्यान, सूर्याग्निहोत्र, सूर्य उपवास, सूर्य जप, सविता आराधना आदि उपचार सूर्योपासना के कहे गये हैं।
सविता द्वारा ज्ञान प्रदान करने तथा जड़ता को चैतन्यता में बदल देने की घटनाओं, कथानकों से वेदों की ऋचायें भरी पड़ी हैं। मनु, याज्ञवलक्य, व्यास, शाम्ब, भारद्वाज, पराशर, गौतम, वशिष्ठ, विश्वामित्र, मार्कण्डेय आदि महर्षियों ने इसी का आश्रय लिया और आत्मोन्नति के चरम उत्कर्ष पर पहुँच कर त्रेलक्य विख्यात हुए। 7/36/13-14 में स्पष्ट उल्लेख है कि हनुमान को सूर्योपासना से ही ज्ञान-विज्ञान की समस्त विभूतियाँ, परा-अपरा विद्यायें उपलब्ध हुई थीं। महाराजा पृथु ने सूर्य से अमोध रश्मिवाण प्राप्त किया था। कौषीतकि ऋषि ने सविता आराधना से पुत्र कामना की अभिलाषा को पूर्ण किया था। भगवान राम स्वयं सूर्य उपासक थे। वाल्मीकि रामायण के ही लंका काल में कथा आती है कि परिस्थितियों की विषमता देख कर जब राम चिन्तित बैठे थे, तो आगस्तय मुनि आ पहुँचे और उनने कहा-आप सूर्य की उपासना करें। उनकी शक्ति उपलब्ध करने पर आप महाबली असुर समुदाय पर भी विजय प्राप्त कर सकेंगे। वैसा ही उनने किया भी और शत्रुओं को सहज ही परास्त किया।
सविता देवता अनन्त ज्ञान एवं शक्ति के भाण्डागार हैं। वैदिक ज्ञान-परम्परा मनुष्य समुदाय को उन्हीं के द्वारा प्राप्त हुई है। इस तथ्य का रहस्योद्घाटन करते हुए गीता के चौथे अध्याय के प्रथम श्लोक में कृष्णा भगवान ने कहा है कि-सूर्य ज्ञान के भण्डार हैं। उनके द्वारा यह ज्ञान वैवस्वत मनु और मनु के द्वारा राजा इक्ष्वाकु को मिला। महर्षि याज्ञवलक्य इसके प्रत्यक्ष प्रमाण है कि सविता देवता अनन्त ज्ञान के समुच्चय हैं। शुक्ल यजुर्वेदीय माध्यन्दिनी संहिता उन्हें सूर्य से ही मिली थी। ‘आदित्य हृदय’ के अनुसार श्रीकृष्ण ने अर्जुन को सूर्योपासना की अनूठी विधा प्रदान की थी। शास्त्रों में अनेकों प्रमाण उपलब्ध हैं जिन में कहा गया है कि ऋषि-मनीषी ही नहीं, देवता भी अनादि काल से सविता की आराधना करते आये हैं। यजुर्वेदीय सूत संहिता में इस तथ्य का उद्घाटन करते हुए भगवान शंकर कहते हैं कि “मैं स्वयं श्रद्धापूर्वक सविता की, सावित्री मंत्र द्वारा, जिसे गायत्री कहते हैं, उपासना करता हूँ।”
योगाभ्यास परक उच्चस्तरीय साधना एवं तपश्चर्याओं में सविता शक्ति का ही आश्रय लिया जाता है। कुण्डलिनी जागरण में सविता शक्ति का ही अवगाहन अवधारण किया जाता है। दिव्य दृष्टि प्रदान करने एवं दिव्य क्षमताओं के उन्नयन में, रवि में रवि-रश्मियों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। पराशर कल्प सूत्र में इस संदर्भ में विस्तारपूर्वक वर्णन करते हुए कहा गया है कि मूलाधार में सविता देवता का ध्यान करने पर दिव्यदृष्टि की प्राप्ति होती है। इसी तरह अक्ष्युपनिषद एवं कृष्ण यजुर्वेदीय उपनिषद् में चाक्षुषी विद्या का वर्णन करते हुए कहा गया है कि इसी विद्या का आश्रय लेकर मनुष्य न केवल सभी प्रकार के नेत्र रोगों से मुक्ति पा सकता है, वरन् दिव्य दृष्टि भी जागृत कर सकता है। इस विद्या के ऋषि अहिबुध्न्य हैं, छन्द गायत्री एवं देवता सविता है। छान्दोग्य एवं बृहदारण्यक उपनिषदों में भी इसी प्रकार का उल्लेख है जिसके अनुसार समस्त प्राणियों की दृष्टि शक्ति के अधिष्ठाता सूर्य हैं। उनकी आराधना से दिव्य दृष्टि की उपलब्धि होती है।
पुरातन काल के ऋषियों से लेकर अर्वाचीन योगी-तपस्वियों की साधना-उपासना में सविता की प्रमुखता रही है। उससे प्राप्त ज्ञान के आधार पर उनने अनेकानेक भौतिक एवं आध्यात्मिक अनुसंधान किये। प्रकृति पर विजय पाई। एडिंगटन, जीन्स फाउलर, एडवर्ड आर्थर, मिलेन, रसेल आदि प्रख्यात वैज्ञानिक मनीषियों ने सूर्य-शक्ति के सम्बन्ध में गहन खोजें की हैं और वैदिक ऋषियों से प्रतिपादित सविता की सत्ता, महत्ता, गति आदि के सिद्धान्तों की पुष्टि की है।
मार्कण्डेय पुराण में सूर्य को ब्रह्म का मूर्त रूप बताते हुए कहा गया है कि ॐ अर्थात् प्रणव सूर्य का सूक्ष्म रूप है। उसी से भूः भवः, स्वः नामक तीन व्याहृतियाँ उद्भूत हुई हैं। तत्पश्चात् महः जनः तपः सत्यम् आदि सप्तलोकों का आविर्भाव हुआ। गायत्री महामंत्र इसी का विस्तृत रूप है जिसमें ज्ञान विज्ञान की समस्त शक्तियाँ सन्निहित हैं।
यही कारण है कि प्रचलित विविध उपासना पतियों में सूर्य मंडल में ईश्वर की इष्ट की भावना करना सबसे महत्वपूर्ण एवं सर्वाधिक फलदायी बतायी गई है। आत्म ज्योति को प्रखर-प्रचण्ड बनाने एवं ओजस्वी-तेजस्वी बनाने के लिए सविता की ध्यान साधना को अध्यात्मवेत्ताओं ने शीघ्र परिणाम प्रस्तुत करने वाला पाया है। बृहद्योगी याज्ञवलक्य ने सविता की ज्योति साधना को सर्वश्रेष्ठ माना है और कहा है कि गायत्री मंत्र का जप करते हुए सूर्य के दिव्य तेज को अपने में धारण करना चाहिए। ‘तत्सवितुर्वरेण्यं’ में वस्तुतः सविता ही ध्येय है। सूर्योपनिषद् चाक्षुषोपनिषद, अक्ष्युपनिषद् आदि आर्ष ग्रन्थों में इसी तेजपुँज की उपासना करने को कहा गया है। बृहत्पराशर स्मृति में सूर्य मंडल में स्थित भगवान विष्णु का ध्यान करने का विधान है। यथा- “ध्येयः सदा सवितृमण्डल मध्यवर्ती नारायण”। यजुर्वेद वा. सं. 40/17 का मंत्र भी आदित्य मण्डल मध्यस्थ परमात्मा की ध्यान-धारणा करने की और संकेत करता है। शिव उपासक इन्हें ही ज्योतिर्लिंग के रूप में ध्यान करते हैं। गायत्री एवं सावित्री उपासक तीनों कालों में दिव्य तेजोमय सूर्य की उपासना करते और सद्बुद्धि प्राप्ति के लिए अभ्यर्थना करते हैं। महाभारत वन पर्व 3/36-38 में इसकी महिता महता का वर्णन करते हुए ऋषि ने उन्हें ही साँख्य योगियों के प्राप्तव्य स्थल, कर्मयोगियों के आश्रय-दाता एवं मुमुक्षुओं के मुक्ति प्रदाता बताया है। समस्त प्राणियों के उत्पादक, पालक, पोषणकर्ता वही हैं। सकाम या निष्काम भाव से साकार या निराकार प्रकाश पुँज के रूप में जो इन्हें जैसा मानते और उपासना करते हैं, तदनुरूप उसकी पूर्ति सविता देवता अवश्य करते हैं। श्रद्धा-विश्वास की प्रगाढ़ता ही इस फलितार्थ में महत्वपूर्ण भूमिका सम्पन्न करती है।
भोजन पकाने में जिस प्रकार अग्नि अनिवार्य है, उसी प्रकार आत्मा को देवात्मा के रूप में विकसित करने के लिए दिव्य ऊर्जा की आवश्यकता है। देव शक्ति कोई भी क्यों न हो, किसी भी नाम, रूप या गुण, महत्व वाले देवता की आराधना भले ही की जाय, पर उसके साथ सूर्य तत्व का समावेश आवश्यक है। वेदों में देव शक्तियों का निरूपण सूर्यरश्मियों के रूप में किया गया है। अतः जिस प्रकार बिना अग्नि के भोजन नहीं पक सकता, ठीक इसी प्रकार बिना सूर्य समन्वय के किसी भी स्तर का देवाराधना सम्पन्न नहीं हो सकता।
गायत्री मंत्र अन्य वेद मंत्रों की भाँति एक शब्द समुच्चय ही है, पर उसमें जो महती शक्ति संवेदना का बाहुल्य पाया जाता है, वह सविता शक्ति के समन्वय से ही होता है। गायत्री महामंत्र का जप और प्रातः कालीन स्वर्णिम सूर्य-सविता का ध्यान इन दोनों प्रयोगों का समन्वय होने पर ही उन लाभों का अवतरण होता है, जिनका वर्णन इस महामंत्र के महात्म्य में किया गया है। गायत्री की समग्रता तभी आती है जब उसे सूर्य मण्डल मध्यस्था की स्थिति में अपना जाय। केवल मंत्र जाप भी अधूरा है और केवल ध्यान से भी अभिष्ट की पूर्ति नहीं होती। अग्नि के प्रज्वलन के लिए सूखे ईंधन की भी आवश्यकता पड़ती है, अन्यथा एकाकी रहने पर वे दोनों ही निरर्थक हो जाते हैं। ईंधन न हो या गीला हो तो अग्नि प्रज्वलित कैसे हो? अग्नि की चिंगारी तो हो, पर ईंधन न हो तो भी उद्देश्य की पूर्ति नहीं होती। मंत्र जप और सविता के प्रकाश पुँज का भाव प्रवण ध्यान मिल कर ही गायत्री माहात्म्य के समग्र बनाते और साधक को निहाल करते हैं।
जिस समय कलकत्ता में प्लेग का प्रकोप हुआ उस समय स्वामी विवेकानन्द सारी ध्यान साधना और योग उपासना भूल कर रोगियों की सेवा करने में जुट गये। उन्होंने अपने सारे शिष्य और साथियों को सेवा कार्य में लगा दिया। एक साधारण व्यक्ति की भाँति व्यग्र और व्याकुल देख कर अनेक लोगों ने कहा “आप तो एक वीतराग योगी हैं। फिर इस तरह साधारण मनुष्यों की तरह व्याकुल क्यों हैं?”
स्वामी विवेकानन्द ने कहा “योगी होने के कारण ही मैं इस तरह साधारण मनुष्य की तरह व्याकुल हो रहा हूँ। दूसरों की पीड़ा को अपनी पीड़ा अनुभव करना ही तो योग है। योग की न कोई अपनी पीड़ा होती है न कोई अपना दुख। बल्कि उसका तो अपना कोई अलग अस्तित्व ही नहीं होता है। क्योंकि वह समष्टि में मिल जाता है पूरी तरह।”
बुद्धि को शरीर का एक भाग माना गया है। इसे मस्तिष्कीय उत्पादन भी कह सकते हैं। जीवन संचालन के क्षेत्र में पशुओं और मनुष्यों में भिन्नता है। पशु परिस्थितियों के अनुरूप अपने को ढालते हैं और मनुष्य को अपने अनुरूप परिस्थितियाँ ढालनी पड़ती हैं। यह कार्य वह बुद्धि वैभव के सहारे ही कर पाता है। अन्यथा शरीर रक्षा ही उसके लिये एक समस्या बन जाय और अपनी दुर्बल काया के आधार पर प्रकृति परिवर्तन के प्रभाव भी सहन न कर सके। फिर उसकी इच्छाएँ ज्ञानेन्द्रियों के साथ-साथ ही उभरती रहती हैं। वासना तृष्णा जैसे प्रलोभन मस्तिष्क क्षेत्र में ही उपजते हैं और उनकी पूर्ति के लिए अनेकों चित्र विचित्र उपाय सोचने और कार्य करने पड़ते हैं। यह परिधि शरीरगत आवश्यकताओं और संरचनाओं से ही संबंधित है।
आत्मा का स्तर, स्वरूप और क्षेत्र शरीर से भिन्न हैं। उसमें दो विशेषताएँ हैं, जिन्हें स्नेह एवं करुणा कहते हैं। यह भाव-संस्थान मनुष्य के अन्तराल में ही विकसित रूप में पाया जाता है। अन्य प्राणियों में इसकी मात्रा नगण्य है। मादा अपने बच्चों की जीवन रक्षा के लिए जो प्रयास करती है, उसे जैविक स्नेह कह सकते हैं। करुणा की थोड़ी सी झलक साथी के प्रति लगाव के रूप में देखी जाती है। मनुष्य की स्थिति उससे कहीं भिन्न है। उसे भाव प्रधान माना गया है। भावनाएँ शरीर से सीधी संबंधित नहीं हैं। वरन् वे मनुष्य के अन्तःकरण के साथ जुड़ी रहती हैं और उनका स्तर एवं अनुपात यह बताता है कि व्यक्ति अन्तःकरण की आत्मसत्ता की दृष्टि से कितना विकसित हो सका है।
बच्चे भी साथ-साथ खेलते हैं। एक दूसरे को सहयोग करते हैं। मिल बाँटकर खाते, अपने अभिभावकों के साथ अधिक निकटता पसंद करते हैं। बड़ी आयु में भी यह विकसित होता रहता है। केवल माध्यम बदलता है। पति-पत्नी के बीच उत्पन्न होने वाली घनिष्ठता, मित्रों और साथियों का साहचर्य का आधार स्नेह ही है। सहकारिता इसी का विकास है। परिवार और समाज इसी आधार पर बनते हैं। संगठन बनने और सम्मिलित प्रयत्नों से किन्हीं बड़े कामों में जुटने में मात्र भौतिक लाभ ही कारण नहीं होते वरन् उद्देश्य की एकता सफलता को प्रतिष्ठ का प्रश्न बनाकर चलना स्नेह का ही प्रतिफल है।
प्राणियों में असमर्थ रहने तक ही मादा अपने बच्चों से लगाव रखती है। किन्तु मनुष्य समुदाय में पिता और अभिभावक उस प्रयास में सतत् बँधे रहते हैं। समान विचार और कार्यों से संबंधित व्यक्ति भी आपस में जुड़ जाते हैं। समाज की संरचना, परिवार का गठन, स्नेह के आधार पर ही संभव हो सकता है। अन्यथा कोई किसी के काम न आता न मिलजुल के रहने, मिल बाँट कर काम करने की ही आकाँक्षा किसी में उत्पन्न होती। यह दैवी गुण है। इसे आत्मा की विशेषता एवं उत्कृष्टता के रूप में भी निरूपित किया जा सकता है।
मानवी श्रेष्ठता की परिचायक दूसरी प्रवृत्ति है करुणा। इसी से प्रेरित होकर दूसरों के दुःख में भागीदार होने और अपने सुख बँटा देने की उमंग उठती है। दान, परोपकार, सेवा, सहायता इसी का प्रतिफल है। इसका स्वार्थ से कोई संबंध नहीं है। वरन् दुखियों की सहायता आकाँक्षा, अपना समय और धन लगाने की, स्वयं कष्ट सहकर दूसरों को सुविधा पहुँचाने की प्रवृत्ति भी उत्पन्न होती है। यह परिचितों से ही संबंधित नहीं होती वरन् अपरिचितों तक भी दौड़ती है। जिनसे किसी प्रकार का प्रत्युपकार होने की आशा नहीं है, उनके प्रति भी सहायता करने का यह भाव करुणा कहा जाता है। इसमें पिछड़ों को सहारा देने, गिरों को उठाने, उठतों को बढ़ाने का भाव निहित है अपने द्वारा दूसरों के प्रति ऐसे जो कार्य बन पड़ते हैं, इस प्रकार की प्रवृत्तियों को चरितार्थ होते हुए कहीं देखते हैं तो कहा जाता है कि यहाँ करुणा काम कर रही है। यह प्रवृत्ति प्राणी समाज में, मनुष्य में ही इतने विकसित रूप में देखी जाती है। इसकी श्रेष्ठता का एक बड़ा आधार यह भावनात्मक संवेदना है।
सम्प्रदायों की बात छोड़िये, उनमें तो प्राणि वध को अनेक स्थानों पर पुण्य तक माना गया है और देवताओं की प्रसन्नता के लिए इसे एक उत्तम उपहार के रूप में निरूपित भी किया गया है। किन्तु जहाँ तक धर्म-अध्यात्म के तत्वज्ञान का सम्बन्ध हैं, वहाँ दूसरों में अपनी आत्मा को देखने और उनकी पीड़ाओं को अपनी निम्न की पीड़ा मानने का निर्देशन है। ‘आत्मवत् सर्वभूतेषू’ की भावना दूसरों को अपने द्वारा प्रसन्नता पहुँचाते हुए प्रसन्न पुलकित करती है और अनजाने में किसी के अधिकार का अपहरण करते हुए पाप, नरक और विश्वात्मा को पीड़ा पहुँचाने के समान मानती है। इसलिए धर्मभावना को अधिकाधिक विकसित करने के लिए कहा गया है। इस प्रवृत्ति को मात्र मनुष्यों तक सीमित रखने में तो एक प्रकार का बिरादरीवाद उठता है। जातियों में युद्ध इसी आधार पर होते हैं। अपने समुदाय समाज और देश को लाभ पहुँचाने के निमित्त दूसरों, दूसरों के निमित्त निष्ठुर बनकर ही आक्रान्ताओं की योजनाएँ बनीं और कार्यान्वित हुई हैं। उपनिवेशवाद, दास प्रथा की घटनायें उसी आधार पर घटित होती रही हैं। ऐसे कृत्य मानवता की मूल प्रेरणा का उल्लंघन करके ही हो सकते हैं।
यों सभी धर्मों में सिद्धान्ततः इस तथ्य का समर्थन है, पर जैन और बौद्ध धर्म के संचालकों ने इस प्रवृत्ति को मनुष्य तक ही सीमित न रहने देकर प्राणिमात्र के प्रति चरितार्थ करने के लिए कहा है। मनुष्य की दया, करुणा केवल मनुष्य तक ही सीमित रहे और अन्य प्राणियों का प्रश्न आने पर निष्ठुरता बरतने लगे तो वह आदर्श का पालन कहाँ हुआ? वह तो सुविधा-सम्पादन की बात हुई। चूँकि अन्य प्राणी बदला नहीं ले सकते, उतनी अच्छी तरह बचाव भी नहीं कर सकते, इसलिए मानवी न्याय-पुस्तकों में उसे दंडनीय अपराध भी नहीं माना गया है। ऐसी दशा में यदि पशु वध की छूट मिली है तो उसे मत्स्य न्याय ही कहना चाहिए। बड़ी मछली छोटी मछली को इसलिए खा जाती है कि वह अपना बचाव करने में असमर्थ है। बड़ी मछली भी अपने से बड़ी पर आक्रमण नहीं करती और न उसे खाने की योजना बनाती है। इसमें दया या करुणा का स्वभाव नहीं है वरन् विवशता है। विवशता असमर्थता को संयोग से जिन आक्रमणों में सफलता नहीं मिलती, उन्हें स्नेह या करुणा का रूप नहीं दिया जा सकता।
मानवी भौतिक विकास में लाभ एवं स्वार्थ की ही प्रधानता है। अन्य प्राणी भी यह करते हैं। दूसरों की सुविधा का अपहरण करने में उन्हें इसलिए संकोच नहीं होता कि इसमें किन्हीं को कष्ट होगा या अन्याय, उत्पीड़न सहना पड़ेगा। इसकी साधारण मात्रा को पाशविक कहते हैं और जहाँ अन्याय की चरमसीमा का प्रयोग होता है उसे पैशाचिक कहते हैं। मनुष्य में देवत्व भी है और दानवत्व भी इनमें एक भौतिक है दूसरा दैवी। मनुष्य की गरिमा इसलिए नहीं है कि उसने सुविधा साधनों में अभिवृद्धि कर ली है और इस प्रकार का कौशल या प्रपंच सीख लिया है जिससे उसकी क्षमता का गुणगान होता रहे, वरन् उसकी गरिमा इसमें है कि ईश्वर प्रदत्त विभूतियों को अपनी और कितनी आकर्षित कर सका अपने में धारण करने में कितना समर्थ हो सका? स्नेह और करुणा ही वे दो कसौटियाँ हैं, जिन पर कसकर यह जाना जा सकता है कि कौन अपने वास्तविक वर्चस्व की और कितना आगे बढ़ सका।
एक पर्व था। गंगा स्नान के लिए अनेक धर्म प्रेमी आये। राजा और मंत्री इन आगन्तुकों की मनःस्थिति का विश्लेषण कर रहे थे।
मंत्री कहते थे। ये परम्परावादी हैं। लकीर पीटते हैं। अन्धानुकरण करते हैं। पर्व पर दृष्टि-कोणों का परिष्कार करना चाहिए इसका इन्हें ज्ञान भी नहीं है। राजा इस मत से सहमत न था। दूसरे दिन किसी प्रमाण के आधार पर बात सिद्ध करने की शर्त ठहरी।
एक साधु नित्य शौच के लिए गंगा तट पर जाया करते थे। लोटा बार बार लाने और ले जाने के झंझट से बचने के लिए उसे बालू में एक नियत स्थान पर गाड़ जाते।
पर्व दिन लोगों ने इस कृत्य को किसी प्रकार देख लिया और समझा कि यह सिद्धि प्राप्त करने का कोई विशेष प्रयोग है। यात्रियों में से जिन-जिन को यह समाचार विदित होता गया वे उसी मन से अपने-अपने लोटे जमीन में गाड़ते चले गये।
मंत्री राजा को साथ लेकर आए और अन्य विश्वास का जीता जागता प्रमाण प्रस्तुत करते हुए कहा। देखिये कितने लोगों ने अपने लोटे गाड़ दिये पर यह मालूम न किया कि यह परम्परा क्यों चली और किसने चलाई? इसका अनुकरण करने में लाभ है या हानि?
गायत्री का युग्म यज्ञ है। यज्ञ शब्द में उदार परमार्थ परायणता वातावरण में सत्प्रवृत्ति विस्तार का भावार्थ भरा हुआ है, साथ ही उसके कितने वैज्ञानिक पक्ष भी हैं। उसमें से एक है-पर्यावरण का परिशोध। आकाश में एक उत्तेजना उत्पन्न करके प्राण पर्जन्य की उत्पत्ति जिससे प्राणियों, वनस्पतियों तथा पदार्थों में जीवन तत्वों का प्रचुर अभिवर्षण होने लगे और इस आधार पर सभी सशक्त बनें। प्राणवान पदार्थों को अग्निहोत्र द्वारा वायुभूत बनाकर सर्वसाधारण के लिए श्वास द्वारा उसका लाभ पहुँचाना, शारीरिक, मानसिक रोगों का निवारण, जीवनी शक्ति का अभिवर्धन आदि अनेक प्रयोजन ऐसे हैं जिनके कारण यज्ञ को प्राणस्वरूप भगवत् सत्ता की प्रत्यक्ष प्रतिमा माना गया है। उसके सान्निध्य में बैठने पर अनायास ही उत्कृष्टता की भावनाओं का अभिवर्धन होता है। यज्ञ स्वयं में एक सर्वांगपूर्ण चिकित्सा विज्ञान है। वेदों एवं आयुर्वेद ग्रंथों में इसका सुविस्तृत वर्णन है।
अथर्ववेद में कहा गया है- ‘’हे यज्ञाग्नि। तू विभिन्न समिधाओं तथा औषधियों से परिपुष्ट होकर आरोग्य और दीर्घ जीवन प्रदान कर।” इसी में उल्लेख है कि-’’यदि रोगी मृत्यु के तक पहुँच गया तो भी यज्ञाग्नि उसे वापस लौटा लाती है और सौ वर्ष तक जीवित रहने के लिए फिर से जीवनीशक्ति भर देती बलिष्ठ बना देती है।”
अथर्ववेद के सूत्र 3/1/1 के अनुसार “मुँचामि त्वा हविष्य जीवनाय। कमज्ञात यक्ष्माद्रुत राजयक्ष्मात्” अर्थात् “यज्ञ के द्वारा अनेक रोगों से असाध्य मानी जाने वाले राज्यसभा से छुड़ाता हूँ और दीर्घ जीवन प्रदान करता हूँ “। उसके अगले सूत्र 7/76 में उल्लेख है कि यज्ञाग्नि से फेफड़ों में जमा हुआ, पसलियों को तोड़ने वाला छूत फैलाने वाला एवं मृत्यु तक ले जाने वाला तपेदिक रोग नष्ट हो जाता है।
चरक संहिता अ. 8 श्लोक 122 में भी इस तथ्य की पुष्टि कि गई है कि यज्ञ से जीवनशक्ति का संवर्धन होता और क्षय जैसे रोग दूर होते हैं। इस ग्रंथ में यज्ञ आयोजनों का निर्देश करते हुए कहा गया है कि- ‘यया प्रयुक्ताचेष्ट्या राजयक्ष्मा पुराजितः। ताँ वेद विष्टिमारोग्यार्थी प्रयोजयेत्।”
अर्थात् “प्राचीनकाल में जिन यज्ञ अनुष्ठानों से राजयक्ष्मा आदि रोग जीते जाते थे, अब भी उसी आयोजन को अपनाकर अनेक रोगों से छुटकारा पाया जाय।” स्मरणीय है कि राजयक्ष्मा ट्युबरक्लोसिस (टीबी) या तपेदिक नामक वह रोग है जो अभी भी एक घातक व्याधि के रूप में विद्यमान है।
पुरातन यज्ञ चिकित्सा की प्रमाणिकता असंदिग्ध है वैज्ञानिक परीक्षणों द्वारा अब यह सिद्ध हो गया है कि वासा तथा गूगल जैसी औषधियों के हवन से उत्पन्न ऊर्जा तपेदिक जैसी घातक बीमारियों के जीवाणुओं को नष्ट कर देती है। अपराजिता नामक औषधि के धूम्र ऊर्जा का उपयोग सभी प्रकार के कीटाणुओं-विषाणुओं को शमन करने में प्रयुक्त होता है। इसी प्रकार के गुण नीम नागरमोथा और बच में भी हैं। इनका अधिकतर उपयोग रक्त शोधन एवं वृण आदि में किया जाता है। इसकी पुष्टि ‘भाव प्रकाश’ नामक प्रसिद्ध आयुर्वेद ग्रंथ में की गई है। परीक्षणोपरान्त निष्कर्ष निकाला गया है कि गूगल, लौंग, घी, शर्करा चन्दन चूरा आदि का नित्य हवन करने वाले साधकों के शरीर में अग्नि तत्व की प्रधानता होती है। फलस्वरूप रोग प्रतिरोधी क्षमता में अभिवृद्धि एवं जीवनीशक्ति का साथ-साथ होता है। इसी तरह जायफल, गूगल आदि का मिश्रण हव्य रूप में प्रयुक्त करने पर जो यज्ञीय ऊर्जा वातावरण में फैलती है, उससे प्रायः सभी प्रकार के रोग कारक जीवाणु-विषाणु नष्ट हो जाते हैं। अग्निहोत्र से जो प्रचंड ऊर्जा युक्त सुगंधित ऊष्मा उत्पन्न होती है, उससे आसपास का वातावरण गरम हो जाता है और उससे एक प्रकार का फाइगोसाइटोसिस चक्र विनिर्मित होता है। एम्यूनटी और फाइगोसाइटोसिस दोनों प्रक्रियायें यजनकर्ता को स्वास्थ्य संवर्धन का लाभ देती हैं।
शरीर शास्त्रियों के अनुसार एक सामान्य युवा व्यक्ति के फेफड़ों में 230 वर्ग इंच वायु रहती है जिसमें से केवल 30 वर्ग इंच तक ही वायु साँस छोड़ने पर बाहर निकलती है। शेष फेफड़ों में ही जमी रहती है। पर यदि जोर से गहरी श्वास ली जाय तो 130 वर्ग इंच तक अंदर दूषित वायु बाहर निकल सकती है।
इस प्रकार जितनी अधिक मात्रा में विषैली वायु बाहर निकलती है, श्वसन तंत्र में उतनी ही अधिक परिमाण में शुद्ध प्राणवायु भीतर भर जाती है। इस तरह अधिक मात्रा में प्रविष्ट हुई शुद्ध प्राणवायु उसी अनुपात से रक्त परिशोधन एवं शरीर का पोषण करती है। जीवनी शक्ति अभिवृद्धि होती और अग्नि प्रदीप्त होकर रस-रक्त में संचित विषाक्तता को निष्कासित करती है। देखा गया है कि जहाँ यज्ञ आयोजन हो रहा होता है, वहाँ के वातावरण में यदि मनुष्य स्वभाविक रूप से गहरी श्वास-प्रश्वास ले और अपने फेफड़ों को प्राणवायु से भरे, तो इसका शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य पर गहरा एवं स्थायी प्रभाव पड़े बिना नहीं रहता।
इस संदर्भ में मूर्धन्य चिकित्सक डॉ. त्रिले ने गहन खोजें की हैं। उनके अनुसार अग्निहोत्र में अग्नि प्रज्वलन से वायु भार कम होता है और वह तीव्र गति से फैलता है। प्रकाश की अधिकता एवं तीव्र ताप के कारण सुगन्धित हव्य सामग्री-शाकल्य के परमाणु वायु को शुद्ध करते हैं और श्वास तथा रोम कूपों द्वारा शरीर में प्रवेश कर स्वास्थ्य लाभ प्रदान करते हैं। पाया गया है कि वनौषधियों और समिधाओं के जलने से जो उपयोगी वाष्पीभूत धूम्र एवं ताप ऊर्जा निकलती है, उससे सभी प्रकार के रोगोत्पादक जीवाणुओं का शमन होता है। साथ ही वातावरण में पर्जन्य की-प्राण ऊर्जा की सशक्त तरंगें प्रवाहित होने लगती हैं और काया प्रवेश कर नव जीवन प्रदान करती प्रतिरोधी क्षमता बढ़ाती-सामर्थ्य भरती हैं। यज्ञीय ऊर्जा से शारीरिक-मानसिक व्यथायें तो दूर होती ही हैं, मस्तिष्कीय क्षमताओं, विचारणाओं, भावनाओं में उच्चस्तरीय परिवर्तन का लाभ भी हस्तगत होता है।
वस्तुतः यज्ञ एक महत्वपूर्ण आध्यात्मिक चिकित्सा विज्ञान है, जिसमें औषधि के रूप में हव्य होम जाते हैं। यह बिना नष्ट हुए रूपांतरित होकर उच्चारित गायत्री महामंत्र की सम्मिलित एवं प्रभावपूर्ण स्वर शक्ति से परिपूरित होकर वातावरण में आध्यात्मिक तरंगें फैलाते हैं, जिनसे मानव मन में संव्याप्त विकृतियों, विद्वेष, दुर्भाव, अनीति-अत्याचार, संकीर्ण स्वार्थपरता, कुटिलता आदि बुराइयों का शमन होता है तथा तनाव मिटता है। इस तथ्य का अन्वेषण प्राचीन काल में ऋषियों ने बहुत पहले कर लिया था और यज्ञ को जीवन का एक अभिन्न अंग मानकर उसे नित्यकर्म में सम्मिलित किया था।
अथर्ववेद के सूत्र “इदं में अग्ने पुरुषाँ मुमुरध्वयं।” में कहा गया है कि उन्मादि-सनकी व्यक्ति भी इस यज्ञाग्नि के प्रभाव से रोगमुक्त हो जाते हैं। इस तथ्य की पुष्टि यज्ञ चिकित्सा क्षेत्र में हुए अधुनातन अनुसंधानों से भी हुई है। इस संबंध में वैज्ञानिक अनुसंधानों का सिलसिला अब विश्व भर में चल पड़ा है। कैलीफोर्निया की अग्निहोत्र यूनिवर्सिटी एवं सोलिसबर्ग (स्विट्जरलैंड) की यूरोपियन रिसर्च यूनिवर्सिटी ने इस संबंध में गहरे अन्वेषण किये हैं और इसके परिणामों से विज्ञान क्षेत्र की प्रतिभाओं को अवगत कराया है। अमेरिका के मेरीलैण्ड बाल्टीमोर में पिछले एक दशक से यह प्रयोग चल रहा है। वर्जीनिया में एक अग्निहोत्र मन्दिर की ही स्थापना की की गई है जिसमें विशेष स्तर की अग्नियों पर कुछ विशेष प्रकार के पदार्थ एवं वनस्पतियाँ हवन की जाती हैं, साथ ही खाद्य पदार्थ पकाये और रोगियों को खिलाये जाते हैं। यज्ञाग्नि से बची हुई भस्म का भी औषधियों की तरह प्रयोग किया जाता है। इसी तरह के प्रयोग-परीक्षण चिली, पोलैण्ड तथा पश्चिम जर्मनी में भी चल रहे हैं।
इन प्रयोगों में न केवल अनेक वनौषधियाँ प्रयुक्त होती हैं, वरन् अनेक स्तर की समिधाओं का भी एक दूसरे से भिन्न प्रकार का प्रतिफल पाया गया है। अनुसंधानकर्ताओं का कहना है कि जिन क्षेत्रों में इस प्रकार के यज्ञ आयोजन हुए हैं वहाँ अपराधों की संख्या कम हुई है। नशेबाजी घटना, हड़तालें कम होना, सड़क दुर्घटनाओं में कमी होना, मानसिक तनाव एवं पारस्परिक मनोमालिन्य में घटोत्तरी दीख पड़ना आदि यज्ञीय वातावरण की प्रत्यक्ष उपलब्धियाँ देखी गई हैं। जिन परिवारों में अग्निहोत्र का प्रचलन हुआ है, उनमें बीमारी के प्रकोप एवं औषधि व्यय में कमी हुई है। कैलीफोर्निया में सीनेटर राबर्ट वोडार्ड एवं अमेरिकी मनोवैज्ञानिक बेरी राथनेर ने इस दिशा में बहुत काम किया है।
ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान, शान्तिकुँज हरिद्वार की अग्निहोत्र प्रयोगशाला विश्व में अपने ढंग की अनोखी ही है। उसमें बहुमूल्य वैज्ञानिक यंत्रों द्वारा इस प्रक्रिया का समग्र विश्लेषण किया जा रहा है। एक विशाल वनौषधि उद्यान भी यहाँ लगाया गया है। इन प्रयोगों से जो प्रतिफल सामने आये हैं, वे आशाजनक एवं उत्साह वर्धक हैं। इन प्रयोग निष्कर्षों को अगले दिनों पाठक इन्हीं पृष्ठो पर पढ़ते रह सकेंगे। इनकी सफलता देव संस्कृति के माध्यम से मनुष्य के भाग्य और भविष्य का उज्ज्वल निर्माण कर सकेगी ऐसा आशा है।
महात्मा गाँधी ने अपने एक प्रवचन में कहा था कि प्रार्थना आत्मा की खुराक है। उत्कर्ष की अभिलाषा रखने वालों को इसका अवलम्बन अनिवार्य रूप से लेना पड़ता है। जिसे अपने भीतर दिव्य ज्योति जगाने की छटपटाहट हो, उसे प्रार्थना का सहारा लेना चाहिए। स्तुति, उपासना न तो वहम है और न ही शब्द या कानों का व्यायाम, वरन् हमारे खाने-पीने चलने फिरने जैसे आवश्यक क्रिया-कृत्यों से भी अधिक सत्य है।
ईश्वरीय स्तुति या प्रार्थना की महिमा-महत्ता से समस्त धर्मों के वाङ्मय आदि भरे पड़े हैं। संसार में जितने भी महापुरुष महामानव हुए हैं, उनका जीवन बताता है कि प्रार्थना उनके दैनिक जीवन का अनिवार्य अंग बनी रही है। आत्मबल की उपलब्धि इसके बिना संभव भी नहीं। इस संदर्भ में प्रख्यात पादरी एवं मनोवेत्ता नार्मन विंसेन्ट ने अपनी कृति-”ए गाइड टू कॉन्फीडैन्ट लिविंग“ में कहा है कि प्रार्थना मानव जीवन का सर्वाधिक सशक्त एवं सुगम एक ऐसा ऊर्जा स्त्रोत है जिसे हर कोई उत्पादित-अभिवर्धित करके अपने को प्राणवान और परिष्कृत प्रतिभा सम्पन्न व्यक्तियों की श्रेणी में सम्मिलित कर सकता है। उनके अनुसार हमारी आकाँक्षाओं, आवश्यकताओं एवं अभिलाषाओं की पूर्ति हेतु महामानवों ने तीन तरह के मार्ग निर्धारित किये हैं-
(1) कर्म (2) चिन्तन और (3) प्रार्थना। तीनों के समन्वित प्रयासों के माध्यम से ही जीवन लक्ष्य की प्राप्ति संभव हो पाती है। पर प्रायः देखा यही जाता है कि आमतौर से व्यक्ति प्रथम दो मार्गों पर चलने का प्रयत्न तो करता है, परन्तु तीसरे अति महत्वपूर्ण पक्ष को विस्मृत कर बैठता है।
चिन्तन और क्रिया के सामान्य जीवन क्रम से जुड़े रहने पर अपने अस्तित्व की जानकारी आसानी से की जा सकती है, किन्तु मानव को महामानव-देवमानव की श्रेणी में पहुँचाने का सामर्थ्य भगवत्-सान्निध्य से संभव है। प्रार्थना उपासना का विधान इसी की पूर्ति के लिए अध्यात्मवेत्ताओं द्वारा सुझाया गया है। यदि दैनन्दिन जीवन में पाँच मिनट का भी समय इस निमित्त निकाला जा सके तो उतने भर से उन दुष्वृत्तियों से पीछा छुड़ाया जा सकता है जो आये दिन सिर पर सवार होकर अनेकानेक प्रकार से त्रास देती रहती हैं। उनने प्रार्थना को प्रभावशाली बनाने के लिए कुछ सूत्र बताये हैं।
प्रथम सूत्र है- जीवन व्यापार के हर क्षेत्र में ईश्वर की साझेदारी को प्रमुखता देना। यही वह आधार है जिसका अवलम्बन लेने पर कर्तव्यों के प्रति जागरुकता बनी रहती है और दूरदर्शिता का विकास होता चलता है।
दूसरा सूत्र है- ईश्वरीय उपस्थिति का सतत् आभास होते रहना। दैवी चेतना का कार्य मनुष्य की सहायता करने तथा उसे सदैव ऊंचा उठाने, विकासोन्मुखी बनाने का होता है। यदि यह आस्था जीवन में गहराई से जड़ जमा सके तो आत्मोत्कर्ष की दिशा में आगे कदम बढ़ा सकना किसी के लिए भी कठिन नहीं है।
तीसरा सूत्र है- ईश्वर की पुकार अंतःकरण की गहराई से निकले और वह इतनी भावनापूर्ण हो, जिससे परमात्मा सत्ता का अनुदान, वरदान, स्नेह, सहयोग के रूप में बरसता स्पष्ट दिखाई देने लगे। अंतःकरण से की गई सच्ची पुकार को परमात्मा कभी अनसुनी नहीं करता। वह अपना परिचय अन्तराल में उमगती सद्प्रेरणाओं, सद्भावनाओं के रूप में तुरंत देता है। इसी आधार पर बाद में प्रत्यक्ष सहयोग-सहकार भी चारों और से बरसने लगता है।
चौथा सूत्र है प्रार्थना के समय चिन्तन की दिशाधारा विधेयात्मक हो। इसमें स्वयं के साथ, अन्यान्यों के कल्याण की भावना भी सन्निहित हो। तभी प्रार्थना का प्रत्युत्तर भी मिलता है। समर्थ सत्ता के समक्ष अपनी इच्छा आकाँक्षा रखते समय इस बात का ध्यान अवश्य रखा जाय कि उसमें कहीं संकीर्ण स्वार्थपरता तो प्रवेश नहीं कर रही है।
पाँचवा व अन्तिम सूत्र है- अपना अनहित चाहने-सोचने वालों के प्रति भी सद्भावना का बने रहना। उन्हें सन्मति मिले, इसकी प्रार्थना करना। ऐसे व्यवहार से न केवल निज का अन्तराल शुद्ध होता है वरन् प्रतिपक्षी को भी विनम्र बनाता है।
यह एक अकाट्य सत्य है कि लोक कल्याण के निमित्त की गयी प्रार्थना निश्चित ही सार्थक एवं प्रभावी होती है। कठिन से कठिन प्रतीत हो रहे कार्य भी समष्टि के कल्याण की प्रार्थना से सधने लगते हैं। जीवन का इसे एक अनिवार्य अंग बना लिया जाय तो लोक व परलोक दोनों सध जाते हैं।
गायन, वादन, संगीत, साहित्य, नृत्य जैसी भावाभिव्यंजनाएँ स्वस्थ मनोरंजन तथा मानसिक विकास का सर्वोत्तम साधन हैं। एक ही प्रकार के शारीरिक एवं बौद्धिक कार्यों से एक ऐसी ऊब पैदा होती है, जो मानसिक सरसता के अभाव में दूर नहीं होती एवं उसके बने रहने से जीवन नीरस बन जाता है, ऊब, खीज, पैदा होती है, जिसकी प्रतिक्रिया व्यक्तिगत जीवन में असंतोष एवं सामाजिक जीवन में विग्रह विद्वेष के रूप में सामने आती है। स्पष्ट है, जब स्थिति ऐसी बनने लगे, तो किसी भी क्षेत्र में सफलता की आशा दुराशा मात्र सिद्ध होगी।
तो फिर इससे बचा कैसे जाय? मनोवैज्ञानिकों ने इस संदर्भ में गहन अध्ययन किया है और लम्बे शोधकाल के उपरान्त यह निष्कर्ष निकाला है कि यदि ऊब और उसकी प्रतिक्रियाओं से बचना है, तो हर क्रियाशील व्यक्ति को अपने ढर्रे के कार्यों के अतिरिक्त किसी कलात्मक हॉबी का विकास करना चाहिए, जो सही अर्थों में मन को सरसता प्रदान करे और निरसता दूर करे। यह हॉबी रुचि के हिसाब से कुछ भी हो सकती है, पर इसका चयन करते समय ध्यान इस बात का भी रखा जाना चाहिए कि उससे न सिर्फ हमारा मनोरंजन भर हो, वरन् योग्यता संवर्धन के साथ-साथ शारीरिक, मानसिक और बौद्धिक विकास भी सुनिश्चित हो।
मनीषी कहते हैं कि यह प्रक्रिया कलात्मक अभिरुचियाँ पैदा करके संपन्न की जा सकती है। ऐसा कोई भी व्यक्ति इस संसार में नहीं है, जिसमें कलात्मकता न हो। हर व्यक्ति में इसके बीज विद्यमान होते हैं। आवश्यकता है उन्हें पहचानने और विकसित करने की। इनमें कौन सी उसके विशेष रुचि की है और किस कला क्षेत्र में उसकी गति है- इसे तनिक सूक्ष्मतापूर्वक अध्ययन-विश्लेषण करके जाना और पता लगाया जा सकता है कि कम से कम समय और परिश्रम में वह अपनी प्रतिभा को किस क्षेत्र में अधिक अच्छी तरह सुविकसित कर सकता है। गायन, वादन, सामाजिक समस्याओं को चित्रित करने वाली पेंटिंग, मूर्तिकला, समाज को दिशा देने वाला सामयिक साहित्य-सृजन, बागवानी, आदि कोई भी इसके अनुकूल विषय हो सकते हैं। खेल-कूद को भी इस वर्ग में रखा जा सकता है। इससे एक साथ कई लाभ मिलते हैं। यह मनोरंजन का एक अच्छा साधन तो है ही, साथ ही इसमें व्यायाम की आवश्यकता की भलीभाँति पूर्ति होती रहती है एवं शरीर चुस्त-दुरुस्त बना रहता है। यदि इसमें तनिक अधिक समय और श्रम लगाया जा सके, राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर तक पहुँच कर न सिर्फ अपना, वरन् देश का नाम ऊंचा किया जा सकता है।
यूनिवर्सिटी ऑफ ऐरिजोना के शोधकर्मी वैज्ञानिकों ब्रूस केमेल्सकी, डोनाल्ड हेस एवं मेल्विन पावर ने प्रयोगों की एक नई शृंखला शुरू की है। उनका शोध का विषय है- कलात्मक अभिरुचियों के मानव मस्तिष्क एवं मनःसंस्थान पर पड़ने वाले प्रभावों की जाँच, पड़ताल करना। बच्चों पर किये गये अध्ययन के दौरान उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि कलात्मक हॉबियों से मस्तिष्क की प्रखरता बढ़ती है। ऐसे बच्चे जो स्मृति-दोष से पीड़ित थे, उन पर उनने प्रयोग किये। उनमें गायन, वादन, पेंटिंग, ड्राईंग की भिन्न-भिन्न रुचियाँ पैदा की गई, साथ-साथ उनका अध्ययन भी चलता रहा। प्रयोग के अन्त में देखा गया कि जो बच्चे मंद स्मृति की शिकायत किया करते थे, उनकी स्मरण शक्ति और धारणा क्षमता में उत्साहवर्धक बढ़ोत्तरी हुई है।
एक अन्य अध्ययन में बालकों के दो ग्रुपों को एक-सी शिक्षण-सुविधा उपलब्ध करायी गयी। दोनों में अन्तर मात्र इतना रखा गया कि एक ग्रुप को अतिरिक्त समय में कला संबंधी रोचक विषयों की शिक्षा दी जाती। साल भर के इस शिक्षण क्रम में प्रयोग के अन्त में परिणाम आश्चर्यजनक देखा गया। जिन ग्रुपों को कला संबंधी शिक्षण की अतिरिक्त सुविधा मिली थी। उनमें सभी बालकों का आई. क्यू. दूसरे ग्रुप के बालकों से बढ़ा पाया गया है।
इन प्रयोगों से यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि नीरसता और उबाऊपन की बैठी-ठाली दशा से न सिर्फ हमारी शारीरिक क्षमताएँ घटती हैं, वरन् मानसिक क्षमता में भी ह्रास आने लगता है, अतः ऐसे अवसरों पर हर एक को ऐसे कार्य में स्वयं को व्यस्त रखना चाहिए, जो मनोरंजन की दृष्टि से भी उपयुक्त हो और शोर, मन एवं बुद्धि का भी उस दौरान पूरा-पूरा उपयोग होता रह सके। कलात्मक कार्यों में नियोजन इस दृष्टि से सर्वोत्तम है।
भारतवर्ष में स्थान-स्थान पर देवालय मन्दिर विनिर्मित देखे जा सकते हैं। इनके निमार्ण का मूल उद्देश्य था, जनमानस में धर्मधारणा का विस्तार करना, सत्प्रवृत्ति संवर्धन तथा आस्तिकता की भावना को जगाना और जमाना। स्थापित देव-प्रतिमाओं की उस स्थान विशेष पर जाकर पूजा-अर्चा से तात्पर्य था कि जन-जन के मन में भरे कुविचार, दुर्भाव निकलें तथा ईश्वर भक्ति के माध्यम से व्यक्ति सद्गुणी, सुसंस्कृत एवं व्यवस्थित बने।
मन्दिरों में मात्र देवपूजन ही नहीं होता था वरन् वे समस्त रचनात्मक प्रवृत्तियाँ भी पलती थीं जो लोक कल्याण के लिए आवश्यक थी। देवालय का स्वरूप एक प्रकाशस्तम्भ, लाइट हाउस की तरह था। वे अपने-अपने क्षेत्रों में मानवीय उत्कर्ष एवं कल्याण के सभी संभव आयोजन करते रहते थे। देवालय रूपी धर्म संस्था उन सभी सत्प्रवृत्तियों का केन्द्र रहती थी जो उस समय की आवश्यकताओं की दृष्टि से अभीष्ट मानी जाती थी। उनका उपयोग देव संस्कृति के निर्धारणों को जन-जन तक पहुँचाने, राष्ट्र के बौद्धिक-भावनात्मक उत्थान के निमित्त विद्या विस्तार प्रक्रिया हेतु होता था। ऋषिगण वहाँ निवास कर दर्शनार्थी, श्रद्धालुओं को प्रतीकों के माध्यम से शिक्षण देते थे एवं इस प्रकार पुरातन भारत का साँस्कृतिक गौरव अक्षुण्ण बना हुआ था।
साधु-ब्राह्मण परम्परा में भ्रमण करने वाले परिव्राजक तीर्थ यात्री इन पावन तीर्थस्थलों पर रुकते हुए आगे बढ़ते थे। उनका उद्देश्य विश्राम करना नहीं, अपितु जनता के मानसिक स्तर की, भाव संस्थान तथा चारित्रिक स्तर की देख रेख करने का था। वे जीवन में उतारे हुए अपने उपदेशों द्वारा जो शिक्षण देते थे, व स्वतः जन साधारण में गहराई तक उतरते चले जाते थे। इस प्रकार इन देवालयों को सत्प्रवृत्ति संवर्धन के विशिष्ट उद्देश्य के लिये विनिर्मित एक प्रकार का धार्मिक किला सर्किट हाऊस कहा जा सकता है।
चिरकाल तक मन्दिरों, तीर्थों, देवालयों का यही विशुद्ध स्वरूप बना रहा किन्तु आज स्थिति उलटी है। आज इस समूचे तंत्र में वे सभी विकृतियाँ समाहित हैं, जिनकी कल्पना की जा सकती है। आज देवालय इसलिए विनिर्मित होते हैं या हुए हैं कि प्रतिष्ठित मूर्ति में विद्यमान भगवान को नैवेद्य, स्नान, आरती की जो सुविधा जुटाई गई है, उसके बदले में कामना यह रही है कि उन्हें सेवा या प्रतिष्ठिता करने वालों को कई गुनी सम्पत्ति मिलेगी। भगवान के रहने के बढ़िया प्रबंध के बदले में उनसे इस लोक में कोठी, बँगले और स्वर्गलोक में बड़े-बड़े महलों की एडवाँस बुकिंग कराने की शेखचिल्ली की कल्पनाओं को लेकर ही आज भव्य मन्दिर बनते हैं। पुजारी प्रतिमा-शृंगार-भोग-आरती भर में छुट्टी मान लेते हैं। दर्शनार्थी प्रतिमा दर्शन-नमन परिक्रमा द्वारा दैवी अनुग्रह व वरदान का स्वयं को अधिकारी मान लेते हैं। द्रुतगामी वाहनों पर चलकर जिस-तिस की दर्शन झाँकी करते चलना, जेब काटना और अश्रद्धा तथा थकान लेकर घर वापस लौटना यही तीर्थयात्रा का स्वरूप रह गया है।
धर्म के प्रति जनमानस की गहरी आस्था बढ़ाने के उद्देश्य से विनिर्मित इन देवालयों को जनजाग्रति का केन्द्र बनना चाहिए था। किन्तु होता ठीक इससे उलटा है नित्य नये खड़े होते मन्दिर, उनके नाम पर उन्माद तथा पारस्परिक विवाद, कतिपय लोगों द्वारा लोगों की धार्मिक भावना का दहन कर धन संचय होते देख लोगों की इनके प्रति आस्था धीरे धीरे घटती जा रही है। देवालयों का वास्तविक उपयोग यदि संस्कृति एवं जन-जन के नैतिक उत्थान के निमित्त होता तो न आज आस्था संकट दिखाई पड़ता और न ही अशिक्षा, अज्ञान, अभाव से ग्रस्त यह राष्ट्र आर्थिक एवं भौतिक दृष्टि से पिछड़ा ही कहलाता।
ऐसा अनुमान है कि भारतवर्ष में पुराने नये प्रायः सात लाख से अधिक मन्दिर हैं, सब में तो नहीं अधिकाँश में पुजारी नियुक्त हैं। हजारों मन्दिर तो ऐसे हैं जिनका भोग-प्रसाद, शृंगार, सफाई, रोशनी आदि का खर्च ही लाखों रुपया मासिक है। इनकी बात छोड़ें पर न्यूनतम औसत खर्च की बात करें तो भोग-दीपक मरम्मत-पुजारी का वेतन आदि मिला कर प्रति देवालय पाँच सौ रुपया मासिक या छह हजार रुपया वार्षिक खर्च पड़ता है। आँकड़ों फैलाया जाय तो ज्ञात होता है कि सात लाख मन्दिरों का मासिक खर्च पैंतीस करोड़ रुपया मासिक अथवा चार अरब बीस करोड़ रुपया वार्षिक आता है। यह राशि मन्दिरों के निमार्ण व स्थायी न्यास आदि के खर्च से अलग है। राष्ट्र के वार्षिक बजट की समूची राशि का एक बहुत बड़ा हिस्सा उस मद में लगा है जहाँ इसका उपयोग वह नहीं हो पा रहा है, जो होना चाहिए था। यदि इतनी विशाल धन राशि वे इनके साथ लगी धर्म पुरोहितों की विशाल जन शक्ति का राष्ट्रीय पुनरुत्थान में सही उपयोग हो पाता तो उसका परिणाम जादू की तरह हो सकता था।
कभी समर्थ गुरु रामदास ने महाराष्ट्र भर में लगभग आठ सौ हनुमान मन्दिर स्थापित किये थे। इन मन्दिरों के साथ जुड़ी व्यायाम शालाएँ स्वास्थ्य संवर्धन का शिक्षण देती थीं। मन्दिरों में सेवा पूजा करने वाले महन्त पुजारी वस्तुतः समर्थ गुरु की धर्म सेना के सैनिक मात्र थे। वे मन्दिर में हनुमान जी की प्रतिमा के पूजन, वंदन, आरती प्रसाद की व्यवस्था के साथ यह भी ध्यान रखते थे कि अधर्म-अनीति के नाश और धर्म-नीति की रक्षा के लिए सर्वस्व होम कर देने वाले अंजनी कुमार की कृपा मात्र तुम्हीं को मिलेगी जो उनके आदर्शों को अपनाएगा। हर देवालय यह कार्य युगानुकूल धर्म के रूप में किसी न किसी सत्प्रवृत्ति को चलाने के रूप में करता रहता था। कहीं संस्कारों के अभिवर्धन का शिक्षण चलता था तो कहीं संतों का समागम व जन-जन की समस्याओं का निराकरण होता था। कहीं साक्षरता विस्तार से लेकर विद्याविस्तार की प्रक्रिया चलती थी तो कहीं लोक-सेवियों की ढलाई होती थी। आज के मन्दिरों में ऐसा कुछ देखा नहीं जाता। कहीं घण्टे-घड़ियाल भर बजते हैं व कहीं वे भी नहीं। मात्र कबूतर-अवावीलों चक्कर काटते व मन्दिर परिसर को अस्वच्छ बनाते देखे जाते हैं। ऐसे में जनश्रद्धा का इन पर से हटना स्वभाविक है। आज आवश्यकता है कि अब बिना अधिक विलम्ब किए वह परिवर्तन चक्र चल पड़े जिससे कि देवालयों की उपयोगिता सिद्ध हो एवं जन जाग्रति के मूल उद्देश्यों को पूरा करने की निमित्त उनका सक्रिय योगदान है।
कभी समर्थ गुरु रामदास ने महाराष्ट्र भर में लगभग आठ सौ हनुमान मन्दिर स्थापित किये थे। इन मन्दिरों के साथ जुड़ी व्यायाम शालाएँ स्वास्थ्य संवर्धन का शिक्षण देती थीं। मन्दिरों में सेवा पूजा करने वाले महन्त पुजारी वस्तुतः समर्थ गुरु की धर्म सेना के सैनिक मात्र थे। वे मन्दिर में हनुमान जी की प्रतिमा के पूजन, वंदन, आरती प्रसाद की व्यवस्था के साथ यह भी ध्यान रखते थे कि अधर्म-अनीति के नाश और धर्म-नीति की रक्षा के लिए सर्वस्व होम कर देने वाले अंजनी कुमार की कृपा मात्र तुम्हीं को मिलेगी जो उनके आदर्शों को अपनाएगा। हर देवालय यह कार्य युगानुकूल धर्म के रूप में किसी न किसी सत्प्रवृत्ति को चलाने के रूप में करता रहता था। कहीं संस्कारों के अभिवर्धन का शिक्षण चलता था तो कहीं संतों का समागम व जन-जन की समस्याओं का निराकरण होता था। कहीं साक्षरता विस्तार से लेकर विद्याविस्तार की प्रक्रिया चलती थी तो कहीं लोक-सेवियों की ढलाई होती थी। आज के मन्दिरों में ऐसा कुछ देखा नहीं जाता। कहीं घण्टे-घड़ियाल भर बजते हैं व कहीं वे भी नहीं। मात्र कबूतर-अवावीलों चक्कर काटते व मन्दिर परिसर को अस्वच्छ बनाते देखे जाते हैं। ऐसे में जनश्रद्धा का इन पर से हटना स्वभाविक है। आज आवश्यकता है कि अब बिना अधिक विलम्ब किए वह परिवर्तन चक्र चल पड़े जिससे कि देवालयों की उपयोगिता सिद्ध हो एवं जन जाग्रति के मूल उद्देश्यों को पूरा करने की निमित्त उनका सक्रिय योगदान है।
एक विशिष्ट श्रद्धाँजलि सत्र
परम पूज्य गुरुदेव ने जिस पावन पुनीत दिवस को अपनी स्थूल देह से महाप्रयाण किया था, 21 जून गायत्री जयन्ती के दिन उसे एक वर्ष पूरा होने जा रहा है। अश्रुओं पर बरबस नियंत्रण लगाकर अपने आवेग को सही दिशा होने की प्रेरणा उनकी सूक्ष्म व कारण शरीर की चेतना सतत् वर्ष भर सबको मिलती रही है व सभी ने उनका और अधिक सामीप्य अनुभव किया है। हम ऐसे महाप्राण-युगपुरुष को परंपरागत ढंग से नहीं, उनके कर्तव्य के अनुरूप ही इस वर्ष गायत्री जयंती गंगा दशहरा की वेला में पावन श्रद्धासुमन अर्पित करेंगे।
इसके लिए निर्धारण यह हुआ है कि सभी प्राणवान स्वजन-परिजन 17 जून से 21 जून की तारीखों में शांतिकुंज हरिद्वार में एक विशिष्ट पाँच दिवसीय सत्र में भागीदारी करें। इस पूरी अवधि में बारी बारी से सभी पाँच दिन तक चलने वाले अखण्ड जप में सम्मिलित होंगे तथा वंदनीया माताजी तथा प्रमुख कार्यकर्त्ताओं के विशिष्ट उद्बोधन पूज्य गुरुदेव के व्यक्तित्व कर्तृत्व पर सुनते हुए भावी निर्धारणों पर मनन चिन्तन करेंगे। यह सत्र अनेकानेक दृष्टियों से विशिष्ट होगा। ब्रह्मबीज के विस्तार तथा भारतीय संस्कृति के निर्धारणों संबंधी विभिन्न पक्षों पर एक विश्वविद्यालय स्तर की संस्था के निर्माण व स्वरूप पर भी इन्हीं दिनों चर्चा की जाएगी। पर्यटन में रुचि रखने वाले परिजनों के लिए इन दिनों न आना ही ठीक होगा। जो विशिष्ट उद्देश्यों के लिए पूज्यवर को सही अर्थों में श्रद्धासुमन अर्पित करना चाहते हों, वे अभी से आवेदन पत्र भेजकर अपना स्थान सुरक्षित करा लें। इस सत्र के छः दिन बाद 27 जून को नयी दिल्ली में पूज्य गुरुदेव की स्मृति में भारत सरकार द्वारा एक डाक टिकट का विमोचन किया जा रहा है। ताल कटोरा स्टेडियम में इस कार्यक्रम की अध्यक्षता भारत सरकार के राष्ट्रपति करेंगे।
इस वर्ष का जून 21 का अखण्ड-ज्योति अंक भी बड़े आकार का होगा व पूज्य गुरुदेव संबंधी विशिष्ट सामग्री से युक्त होगा। इसका अलग से कोई अधिक मूल्य न होगा व सब के लिए उपलब्ध रहेगा।
परम पूज्य गुरुदेव ने इसी परम्परा को पुनर्जीवन हेतु तीर्थों देवालयों के जीर्णोद्धार के निमित्त धर्म चेतना को गाँव-गाँव तक पहुँचाने के लिए तीर्थ यात्रा अभियान को-परिक्रमा अभियान को गति दी थी। इसका उद्देश्य था निष्क्रिय पड़े देवालयों में चेतना आए, व रचनात्मक गतिविधियाँ चल पड़े तथा अभी जहाँ मात्र पूजा आरती का उपक्रम चलता है, वहाँ नैतिक, भावनात्मक व राष्ट्रीय उत्थान की सक्रिय योजनाएँ न्यूनाधिक रूप में आरंभ की जाएं। नए मंदिरों के निर्माण की न तो अब आवश्यकता है न राष्ट्र की स्थिति को देखते हुए वह औचित्यपूर्ण कही जाएगी। अब तो जो उपेक्षा अब तक दिखाई गई है, उसकी क्षतिपूर्ति मात्र ही की जा सके तो प्रायश्चित की बात पूरी हुई मानी जा सकती है।
यदि भारत के प्रति सात ग्राम-कस्बों के पीछे एक मन्दिर मान लिया जाय तो भी एक लाख मन्दिरों की देख रेख व उनके पुनर्जीवन की बात सामने आती है। भारतवर्ष के लिए पुरातन इतिहास में तो हर गाँव-एक तीर्थ माना गया है। यदि इतना संभव न हो सके तो जो देवालय, पुरातन तीर्थ, ऋषियों की पावन तपस्थलियाँ विद्यमान हैं, जिनके बारे में ज्ञात जानकारी उपलब्ध है, उन्हीं में स्थानीय निवासियों के सहयोग से सत्प्रवृत्ति विस्तार का कार्यक्रम चलाया जा सकता है। इस के लिए पूज्य गुरुदेव ने साइकिलों द्वारा अथवा वाहनों द्वारा जन-जागरण की तीर्थ यात्रा का प्रचलन चलाया है। पद यात्रा की तीर्थ यात्रा को साइकिल यात्रा के रूप में मान्यता दी है। तीर्थयात्री टोलियाँ अपने-अपने स्थानों से निकालें व सात दिन का एक प्रवास चक्र बनाकर उस परिधि में आने वाले सभी देवालयों को केन्द्र बनाकर मार्ग में आदर्श वाक्य लेखन करते हुए चलें। देवालयों से जुड़ी आबादी में परिक्रमा लगाकर युग संगीत प्रस्तुत करते हुए युग संदेश हेतु सभी को देवालयों में आमंत्रित किये जाए। मन्दिरों में आयोजित समागमों में सोदाहरण यह बताया जाय कि मन्दिरों की झाड़ पोंछ-सफाई, प्रतिमा के नियमित पूजन के साथ-साथ प्रौढ़शिक्षा, बाल संस्कारशाला, अस्वच्छता निवारण, व्यायामशालाएँ, नशा बन्दी, मितव्ययिता, सहकारिता, वृक्षारोपण, जैसी, सत्प्रवृत्तियों के विस्तार की आज की परिस्थितियों को देखते हुए कितनी आवश्यकता है, कैसे मिलजुल कर इन्हें क्रियान्वित किया जा सकता है तथा उन प्रयत्नों का कैसे भरपूर लाभ उठाया जा सकता है। पीतवस्त्रधारी ये सभी तीर्थयात्री अपने ठहरने की व्यवस्था देवालयों में ही रखें व अपना भोजन स्वयं बनायें, दूसरों पर आश्रित न रहें।
यदि वाहनों द्वारा अपने-अपने स्थानों से अधिक संख्या में परिजन अपने गुरुद्वारे शान्तिकुँज की यात्रा पर निकलते हैं तो इस यात्रा को पर्यटन मात्र तक सीमित रख सोद्देश्य बना सकते हैं। वे मार्ग में पड़ने वाले देवालयों के दर्शन भी करें व उनमें जाग्रति लाने का भी प्रयास करें कुछ देर रुककर वहाँ सत्प्रवृत्ति विस्तार का शिक्षण देने का क्रम चलायें। यदि कम समय में इतना संभव न हो तो कम से कम सब मिलकर उस स्थान की सफाई करें, अपना श्रम सीकर बहायें, अपने हाथों से भोजन पकाकर, प्रसाद पाकर कुछ देर संकीर्तन करते हुए संक्षेप में अपना उद्देश्य उत्सुक जिज्ञासुओं को बताते हुए आगे बढ़ते जाएँ।
मूल प्रतिपादन इस जनजागरण अभियान के पीछे एक ही है कि चारित्रिक-सामाजिक उत्कर्ष के लिए बने देवालयों को इमारत, पूँजी व जन शक्ति को निरर्थक न पड़े रहने दिया जाय। जहाँ गतिशीलता है-वहीं जीवन है। धार्मिकता को जीवित रखना है तो मन्दिरों को भी जीवित रखना होगा व वहाँ से लोकसेवा की प्रवृत्तियों को बढ़ावा देते रहना होगा। इसके लिए स्थानीय स्तर के प्रयास तो चलें हीं, धर्म प्रचार की तीर्थयात्रा द्वारा देवालयों में चेतना के पुनर्जागरण की प्रक्रिया भी अविलम्ब चल पड़े यही समय की माँग है।
सम्राट ब्रूसो को जीवन में कई बार बड़ी लड़ाइयां लड़नी पड़ीं। बारह बार उसे पराजय का मुँह देखना पड़ा। अन्त में वह अकेले रह गया तो शत्रुओं से जान बचाकर एक पहाड़ की गुफा में जा छिपे। शेष जीवन उनने वहीं काटने का निश्चय किया। उस क्षेत्र में जीवन धारण कर सकने जितने साधन उपलब्ध थे।
बहुत दिन उनने उसी गुफा में गुजारे एक दिन ऐसे ही जमीन पर लेटे हुए थे। छत पर निगाह पड़ी तो देखा कि एक मकड़ी बार बार जाल बुनने की कोशिश करती है, और बार-बार असफल हो जाती है फिर भी वह हिम्मत नहीं छोड़ती अपने छूटे काम को दूने उत्साह से फिर आरम्भ करती है।
मकड़ी का जाला बारह बार टूटा। तेरहवीं बार वह सफलतापूर्वक पूरी तरह बन गया। ब्रूसो भी बारह बार ही हार चूका था। उसने मकड़ी के साहस से शिक्षा ली और तेरहवीं बार फिर युद्ध में नये सरंजाम एकत्रित करने की योजना को कार्यान्वित करने का प्रयास आरंभ हुआ।
शत्रु आशंका रहित हो गये थे। उनने ढाल तलवारें खूँटी पर टाँग दीं थी। ब्रूसो फिर हिम्मत कर सकेंगे इसकी उन्हें आशा नहीं रह गई थी।
ब्रूसो ने अचानक आक्रमण किया, शत्रु हड़बड़ा गये और इस बार जीत न सके। ब्रूसो विजेता बना। मकड़ी के अनुकरण की बात वह जीवन भर अनेकों से कहता रहा और निराशा किसी भी परिस्थिति में नहीं होने की साहसिकता के समय-समय पर गुण गाता रहा।
*समाप्त*