आड़े समय में परिजनों से सहयोग की अपेक्षा

परम पूज्य गुरुदेव की वाणी, उनका हृदय तथा उनका अंतःकरण तीनों “अखण्ड-ज्योति” में समाहित हैं। यह वह पावन प्रवाह है जो अविरल गति से बढ़ता व मूर्च्छितों में जीवन स्पन्दन पहुँचाता रहेगा। 1940 में प्रज्वलित की गयी यह ज्योति घोर तमिस्रा भरे समय में भी अपने पुरुषार्थ से प्रकाश किरणें बिखेरकर आदर्शवादी दुस्साहस दिखाती रही है। लाखों परिजन साक्षी हैं इस तथ्य के कि आज के विषम समय में आशावाद की लौ इस ज्योति के प्रकाश से ही जलती रही है व अगणित को श्रेष्ठता के पथ पर चलने की प्रेरणा मिली है स्वयं परोक्ष दैवी सत्ता महाकाल जिसका संचालन कर रहा हो उस तंत्र का यह जीता-जागता दृश्य रूप है।

अखण्ड-ज्योति मात्र कागज का, कतिपय लेखों का पुलिन्दा नहीं, अपितु वह संकल्प है जो नवयुग की स्थापना को लेकर जन्मा है व लक्ष्य पूरा होने तक अपना दायित्व निभाएगा किन्तु परोक्ष शक्ति को भी साधन तो प्रत्यक्ष ही चाहिए। अखबारी कागज, स्याही, छपाई की व्यवस्था का विशाल तंत्र आदि वे प्रत्यक्ष साधन हैं, जिनके अभाव में विचार चाहे वह कितना ही सशक्त क्यों न हो, जन-जन तक नहीं पहुँचाया जा सकता। विगत पाँच-छः वर्षों से इस क्षेत्र में अनेक झंझावात आए हैं व इन असाधारण आर्थिक आक्रमणों से डर लगता है कि कहीं ज्योति को वे प्रभावित न करें। परम सत्ता की अनुकम्पा व प्रिय पाठक परिजनों का सद्भाव ही है कि उसका अस्तित्व बना हुआ है। आघातों को सहने की शक्ति बनी हुई है।

इस वर्ष कागज, स्याही, छपाई तथा पोस्टेज में असाधारण वृद्धि हुई है। विशेष रूप से कागज की दरों में पैंसठ प्रतिशत से अधिक की बढ़ोत्तरी ने तो कमर तोड़ संकट पैदा कर दिया है। मन तो इस वर्ष यह था कि संजीवनी विद्या, सावित्री विज्ञान, गायत्री उपासना, जीवन जीने की कला, ब्रह्मवर्चस् शोध तथा भविष्य विज्ञान पर अति महत्वपूर्ण सामग्री और दी जाय। उसी कड़ी में इस वर्ष एक विशेषाँक गायत्री उपासना पर तथा पूज्य गुरुदेव के जीवन के लीला प्रसंगों पर एक अंक निकाला गया था। यदि यह सामग्री यथावत देते रहना है तो कागज का संकट सामने आ खड़ा होता है व वर्तमान दरों पर ही अखण्ड-ज्योति के साथ पृष्ठ कम करने की बात कहता है। दूसरा विकल्प यह है कि सामग्री दी जाती रहे, परिजनों को इस महत्वपूर्ण लाभ से वंचित न किया जाय एवं चन्दा इतना बढ़ा दिया जाय कि लागत मूल्य पर पत्रिका सब तक पहुँचती रहे। कोई भी परिजन सामग्री में घटोत्तरी के लिए तैयार नहीं है। मन सबका यही है कि युग संधि के इन महत्वपूर्ण वर्षों में मिल रहे इस बहुमूल्य मार्गदर्शन से हमें वंचित न किया जाय।

निर्णय यही लिया गया है कि बजाय कलेवर कम करने के चंदा पैंतीस रुपया वार्षिक से बढ़ाकर चालीस रुपया वार्षिक कर दिया जाय। यह निर्णय 1992 की जनवरी से प्रभावी होगा। अब बढ़े हुए कलेवर में वह सारी विशिष्ट सामग्री दी जाती रहेगी जो परम पूज्य गुरुदेव की लेखनी द्वारा लिखी जाती रही है व इक्कीसवीं सदी के आगमन तक सतत् प्रकाशन हेतु उपलब्ध है। अन्यान्य नये आकर्षण भी पत्रिका में रहेंगे जो उसे जन-जन की लोकप्रिय आध्यात्मिक पाठ्य सामग्री बनाते रहे हैं।

परिजनों को स्मरण होगा कि इस वर्ष प्रायः सभी पत्रिकाओं के मूल्यों में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है। “कादम्बिनी” मासिक 84 रुपये वार्षिक, “सरिता” 240 रुपये वार्षिक “सर्वोत्तम” डाइजेस्ट 190 रुपये वार्षिक तथा “इण्डिया टुडे” 240 रुपये वार्षिक पर आज सबको उपलब्ध हैं। अखण्ड-ज्योति से आधे कलेवर वाली पत्रिकाओं का भी चन्दा इसके वर्तमान वार्षिक मूल्य से कहीं ज्यादा है। ऐसे में अपनी प्राणों से प्रिय पत्रिका के सतत् इससे जुड़े रहेंगे, ऐसी अपेक्षा है।

इक्कीसवीं सदी की सतयुग लाने वाली महान क्रान्ति का अपने अनोखे ढंग से संचालन अखण्ड-ज्योति ही कर रही है। इस पत्रिका की सदस्य संख्या बढ़ाने का सीधा अर्थ है युग परिवर्तन के पुण्य प्रयोजन में अपनी भी एक अंजुलि चढ़ाना। आशा है कि इस संदर्भ में परिजन पहले से भी अधिक पुरुषार्थ करेंगे। नये पाठक-ग्राहक बढ़ाएँगे तथा पुरानों का उत्साह बढ़ाते रहेंगे। अब इस पत्रिका का बढ़ा हुआ मूल्य 40 रुपये वार्षिक ही अखण्ड-ज्योति संस्थान मथुरा के पते पर भेजा जाय। आजीवन ग्राहकों का चन्दे का मूल्य पाँच सौ पचास रुपया रहेगा।

वर्ष-53 संस्थापक- वेदमूर्ति तपोनिष्ठ पं. श्रीराम शर्मा आचार्य वार्षिक चंदा-

अंक-11 भारत में 35/-

नवम्बर-1991 विदेश में 300/-

वि.सं. अषाढ़ =श्रावण-2048 आजीवन 500/-


जीवन ईश्वर है या ईश्वर जीवन?

ताओ धर्म के दार्शनिक बहुत समय तक विचार कर इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि जीवन मनुष्य के लिए ईश्वर का सर्वोपरि उपहार है। इसकी गरिमा इतनी बड़ी है जितनी इस संसार में अन्य किसी सत्ता की नहीं। इसलिए उसे ईश्वर के समतुल्य माना जाय तो इसमें कुछ भी अत्युक्ति न होगी।

ईश्वर की झाँकी जीवसत्ता की संरचना और संभावनाओं में देखी जा सकती है। यदि उसकी ठीक तरह उपासना की जाए तो वे सभी वरदान उपलब्ध हो सकते हैं जो ईश्वर के अनुग्रह से किसी को कभी मिल सके हैं। यह प्रत्यक्ष देवता है। हमारे इतना समीप है कि मिलन से उत्पन्न असीम आनन्द की अनुभूति अहर्निशि की जा सके।

जीवन का उद्देश्य है, अपने अन्तराल में छिपे दिव्य का, अद्भुत का, सुन्दर का दर्शन करना। उसे ईश्वर के साथ जोड़ देना जो इस ब्रह्माण्ड की आत्मा है, पूर्ण है और वह सब है, जिसमें मानवी कल्पना से कहीं अधिक सौंदर्य का सुख का सागर लहराता है।

ईश्वर को हमें समझना है तो हम जीवन को समझें। ईश्वर को पाना है तो जीवन को प्राप्त करें। जीवन रहित जिन्दगी से आगे बढ़ें, गहरे घुसें, अपने आपको निर्मल करें और उस महान अवतरण को प्रतिबिम्बित करें, जो प्रेम के रूप में आत्मसत्ता के अन्तराल में आलोक की एक किरण जैसा विद्यमान हैं।


ब्राह्मणत्व अधिकार नहीं, साधना

“श्रावस्ती परम्परावादियों का गढ़ है आर्य श्रेष्ठ।” आनन्द ने परामर्श दिया-वहाँ जाने की अपेक्षा यदि राजगृह की प्रव्रज्या की जाय तो यह उत्तम रहेगा। अभी संघ का संक्राति काल है जब तक जड़ें सुदृढ़ नहीं हो जातीं,संघ शक्ति समर्थ नहीं हो जाती तब तक संघर्ष की नीति उचित नहीं है।

तात! तुम्हारा कथन ठीक है, तथागत ने समाधान किया किन्तु युग प्रवर्तक के लिए परिस्थितियों से समझौता करने की नीति भी अनुचित है। सिद्धाँत के प्रति अटूट निष्ठ व्यक्त किए बिना प्रामाणिकता सिद्ध नहीं की जा सकती। अतएव विवाद की चिन्ता किए बिना श्रावस्ती में ही आयोजन रखा जाना ठीक है।

तथागत श्रावस्ती पधार रहे हैं यह संवाद सर्वत्र फैलते देर न लगी। प्रतिक्रियावादी तत्वों ने जैसे ही सुना उन्होंने नया मोर्चा खड़ा कर दिया। आश्वलायन के नेतृत्व में कट्टर पंथी ब्राह्मणों ने बुद्ध से शास्त्रार्थ की रूप रेखा बनाई और नियत समय पर वे तथागत के समक्ष आ धमके और उनकी भर्त्सना करते हुए पूछा “भन्ते! आप चारों वर्णों के उद्धार की बात किस आधार पर करते हैं? क्या ब्राह्मणों के अतिरिक्त धर्म दीक्षा का अधिकार और भी किसी को है।”

रोषपूर्वक कही गई इस बात को महात्मा बुद्ध ने बड़े ही शान्त मन से सुना और मुसकराते हुए आश्वलायन से प्रति प्रश्न किया- भद्र! क्या आप बता सकते हैं कि ब्राह्मणों की सर्वोपरिता का आधार क्या है?

‘उनका ज्ञान, तप, साधना, ब्रह्मवर्चस और निर्लोभ निरहंकारिता।’ आश्वलायन के स्वर में पर्याप्त गम्भीरता थी।

“आप सच कह रहे हैं आचार्य प्रवर”! तथागत ने वृद्ध आचार्य को सौम्य दृष्टि से देखते हुए अगला सवाल किया। आप इस बात की पुष्टि करेंगे-ब्राह्मण कुल में जन्म लेने वाले चोरी नहीं करते, झूठ नहीं बोलते, व्यभिचार और दूसरी सामाजिक बुराइयाँ उनमें नहीं हैं?”

प्रश्न ने जैसे आचार्य के अस्तित्व के मूल में चोट की। एक क्षण को वे तिलमिला उठे। रही बची सत्य निष्ठ को समेटते-बटोरते हुए वे बोले-मेरा यह तात्पर्य नहीं भन्ते। ये अवगुण तो ब्राह्मणों में भी हैं, किन्तु उनमें धार्मिक संस्कारों की बहुलता रहती है, इसलिए वे श्रेष्ठ हैं। उनके कथन में, अपने प्रतिपादन में दृढ़ रहने की भरपूर चेष्टा थी।

किन्तु तभी तथागत ने अपने चिन्तन तुणीर से अगला बाण निकालकर सन्धान किया, तब फिर आपका कथन यह होना चाहिए कि उक्त अपराध करने पर ब्राह्मण नरक नहीं जाएँगे, पतित नहीं होंगे, जबकि दुष्कर्म करने पर अन्य वर्ग पतित समझे जाते हैं।

महात्मा बुद्ध ने हँसते हुए आचार्य आश्वलायन की ओर एक क्षण को देखा और कहने लगे आचार्य जिस तरह दुष्कर्म का दण्ड भुगतने के लिए हर प्राणी प्रकृति का दास है, उसी तरह सत्कार्य के पारितोषिक का अधिकार हर प्राणी को है, फिर वह चाहे जिस किसी वर्ण का हो। किसी वंश में जन्म लेने मात्र से कोई संत और सज्जन नहीं बन जाता। अन्तःकरण की उदारता, पवित्रता ही व्यक्ति को संत और देवमानव बनाती है। ब्राह्मणत्व अधिकार नहीं साधना है आश्वलायन।

वृद्ध आचार्य निष्प्रभ थे। शास्ता के तेजस्वी वाणी से निःसृत होता सत्य उन्हें मौन रखने के लिए विवश किये था। तथागत की वाणी अविराम सरित प्रवाह की भाँति गतिमान थी।

इसीलिए हम मानव को आत्मोत्कर्ष, आत्मशुद्धि की प्रेरणा और अवसर प्रदान करते हैं। सोचो यदि थोड़े से सन्त ब्राह्मण धरती को स्वर्ग बना सकते हैं तो हर व्यक्ति के अन्तःकरण में मुखरित ब्राह्मण सृष्टि को सुन्दर बना सकता है। यही तो ब्राह्मण के लिए अभीष्ट है, अतएव यदि ब्राह्मण इन पुण्य प्रयत्नों में बाधा डालते हैं तो यह उनकी प्रतिगामिता नहीं हुई क्या?

वृद्ध आचार्य के पास कोई उत्तर न था। उनने तथागत के आदर्श को न केवल मान्यता प्रदान की बल्कि स्वयं धर्मचक्र प्रवर्तन के महान कार्य के लिए समर्पित हो गए।


ईश्वर विश्वास का वैज्ञानिक आधार

शक्ति के स्रोत और सद्गुणों के समुच्चय का दूसरा नाम ईश्वर है। इसे नियामक शक्ति और उसकी विधि-व्यवस्था के रूप में भी समझ सकते हैं। पृथ्वी में गुरुत्वाकर्षण शक्ति है। यह अनादि काल से है और अनंत काल तक रहेगी। मनुष्य इसे पहचाने और इसका ध्यान रखते हुए उछले, गिरे, उठे और चले तो उसके कार्य ठीक रहेंगे। उसकी सत्ता का ध्यान रखे बिना हलचलें करने पर चोट लगना स्वाभाविक है। नदी की प्रचण्ड धारा में जो भी पड़ेगा बहेगा और निर्धारित नियमों के अनुसार तैरेगा या डूबेगा। किनारे बैठकर स्नान करने में, तैरना सीखकर पार जाने में नदी अपने लिए कोई अवरोध नहीं खड़ा करती। नाव चलाकर परिवहन का लाभ भी उस नदी प्रवाह से लिया जा सकता है। पर लोहे की नाव बनाकर अथवा छेद वाली लकड़ी की नाव में बैठकर चला जायगा तो फिर डूबना निश्चित है। परमात्म सत्ता को गुरुत्वाकर्षण अथवा नदी के प्रवाह जैसा सोचा जा सकता है। हमें उससे लाभ उठाना हो तो अनुकूलता प्रतिकूलता के नियमों को समझने और तदनुरूप आचरण करने की बात सोचनी चाहिए।

बिजली की उपयोगिता सुविदित है। इससे सम्बन्ध जोड़कर घर के पंखे, हीटर, कूलर, बल्ब, रेडियो आदि न जाने कितने यन्त्र चलाए जा सकते हैं। इन यन्त्रों के अनेकों लाभों से लाभाँवित हुआ जा सकता है। खुले तार छूने में प्राण संकट उत्पन्न होगा। नियामक सत्ता की विधि व्यवस्था भी कुछ इसी तरह है।

भगवान दयालु है, उदार है, भक्त वत्सल है दीनबन्धु हैं, यह सब कुछ ठीक है। यदि ऐसा न होता तो इतना बहुमूल्य शरीर यंत्र मुफ्त में हमें कैसे मिल जाता? जीवन निर्वाह के इतने उपयुक्त साधन किस तरह जुट जाते? प्रगति के पथ पर चलते हुए अपने पुरुषार्थ से भी अधिक परिस्थितियों की अनुकूलता का सहारा क्यों मिलता है? उसकी उदारता और दयालुता में सन्देह रखने जैसी कोई बात नहीं। किन्तु यह मान्यता तब तक अधूरी ही बनी रहेगी जब तक उसके रुद्र नाम को भी ध्यान में न रखा जाय। रुद्र का अर्थ होता है भयंकर। वस्तुतः वह उतना ही भयंकर भी है जितना दयालु।

बिजली, गुरुत्वाकर्षण, नदी, प्रवाह, आग आदि का सदुपयोग इन देवताओं से वरदान दिलाता है और हमारे क्रियाकलापों में इनसे अतिशय सहायता मिलती है। लेकिन दुरुपयोग आरम्भ होते ही ये सभी निर्दयता पर उतारू हो जाते हैं और मर्यादा उल्लंघन की धृष्टता के लिए तिल-मिला देने वाला दण्ड देते हैं। थोड़ी सी चूक भी उन्हें सहन नहीं। जितनी बड़ी शक्ति उतनी ही कठोर उसकी व्यवस्था। बैटरी छूने से मामूली झटका भर लगेगा, पर जहाँ प्रचण्ड विद्युत धारा बह रही होगी-वहाँ एक सेकेण्ड के स्पर्श से ही मृत्यु दण्ड का निर्णय हो जाएगा। ईश्वरीय चेतना प्रचण्डतम शक्ति है। इसी महान शक्ति स्रोत से विश्व की तमाम छोटी-बड़ी शक्तियाँ उद्भूत हुई हैं। उसकी सृष्टि-व्यवस्था मर्यादा के रूप में अपना काम चला रही हैं। सूर्य, चन्द्र, बादल, समुद्र, धरती सभी उसकी नियम व्यवस्था के अनुरूप चलते हैं। यदा-कदा दिखने वाले आश्चर्य भी मनमानी नहीं, विज्ञान के उन नियमों के अनुसार होते हैं जिन्हें हम साधारणतया अनुभव नहीं कर पाते।

ईश्वरीय नियमों का पालन करना मनुष्य के लिए अनिवार्य कर्तव्य है। इस अनुशासन को हम भूलते हैं। जो सामने नहीं दीखता उसकी चीजें चुराने का प्रायः दुस्साहस किया जाता है। ईश्वर को भुला बैठने का मतलब है उसकी उस व्यवस्था का विस्मरण जिसकी अनुकूलता रखकर हम अपना जीवन सुख-शान्ति और प्रगति की दिशा में चलाते रह सकते हैं। साथ ही उसका अतिक्रमण करके भयंकर विपत्ति में फँसते और दुःख उठाते हैं। चूँकि ईश्वर दीखता नहीं, मोटी बुद्धि उसकी सर्वव्यापकता की कठोर व्यवस्था को नहीं देख पाती इसलिए अवज्ञा का दुस्साहस करती रहती है। उपासना का अर्थ है उस अदृश्य सत्ता के अस्तित्व और विधान की अनुभूति और तदनुसार मर्यादा पालन के लिए अपनी मनोभूमि का प्रशिक्षण।

विद्युत की भारी भरकम मशीनें जहाँ लगी रहती हैं वहाँ “440 वोल्ट-खतरा” लिखा रहता है। इतना ही नहीं वहाँ एक मृत मुण्ड का चित्र, मौत का स्मरण दिलाने के लिए टाँग दिया जाता है। ऐसे खतरनाक स्थानों पर यह बोर्ड टाँगने का कानून है। इस बोर्ड को देखने पर ये तथ्य मन को सचेत करते हैं और बिजली के खतरे की विस्मृति से उत्पन्न होने वाली विभीषिका का खतरा कम करते हैं। ठीक इसी तरह मन्दिर, देवालयों, घरों में रखे ईश्वर के चित्र प्रतीकों से हमारी ईश्वरीय शक्ति के सम्बन्ध में विस्मृति दूर होती है और अप्रत्यक्ष सत्ता का प्रत्यक्ष से भी अधिक बढ़ी-चढ़ी शक्ति के रूप में आभास होने लगता है।

प्रार्थना के शब्दों में प्रायः ऐसी भाषा का प्रयोग होता रहा है, जिससे लगता है वह याचना है। याचना की बात उसी सीमा तक ठीक है जब तक उचित मूल्य चुकाने के साथ की जाय। हथेली पर पैसे रखकर टिकट बाबू से टिकट माँगें तो ठीक है। यदि मुफ्त में ही रेल टिकट की याचना करें तो उसकी पूर्ति होना कठिन है। ऐसे तो रेलवे प्रशासन ही ठप्प हो जायगा। मुफ्तखोरों को उदारतापूर्वक टिकटें बँटने लगें तो फिर रेल चलाने में जो खर्चा पड़ता है, वह कहाँ से आवेगा? ईश्वर से प्रार्थना की जाय और मनोकामनाएँ पूरी हो जायँ यदि ये बात इतनी सस्ती और इतनी वास्तविक रही होती तो निश्चय ही पूजा प्रार्थना से बढ़िया उद्योग इस संसार में और कोई न दिखाई पड़ता। फिर हर समझदार आदमी दूसरे सब काम छोड़कर अभीष्ट प्रयोजनों के लिए “अमुक विधान से अमुक देवता की अमुक पूजा पत्री” करने में ही अपनी सारी गतिविधियाँ केन्द्रित कर देते। ऐसी दशा में पुरुषार्थ पराक्रम, क्षमता, विकास, सतर्कता, प्रामाणिकता, प्रतिद्वन्द्विता जैसे वे तथ्य ही समाप्त हो जाते जो मानवीय व्यक्तित्व को विकसित करने के आधारभूत कारण रहे हैं।

प्रार्थना जिस ईश्वर से ही जाती है वह वस्तुतः अपनी ही अन्तरात्मा है। ईश्वर अर्थात् अन्तरात्मा में सन्निहित दिव्य चेतना। परमेश्वर अर्थात् विश्व व्यापी सृष्टि व्यवस्था। हमें परमेश्वर को जानना चाहिए। ब्रह्म विद्या का विचार साहित्य इसीलिए सृजा गया है कि मनुष्य की प्रत्यक्षदर्शी आँखें विवेक का तीसरा नेत्र खोलें और परोक्ष में विद्यमान परमेश्वर और उसके विधान का साक्षात्कार कर सकने में समर्थ बन सकें। ज्ञानयोग इसी का नाम है। गीता, उपनिषदों आदि के पाठ, पारायण, प्रवचन आदि के सहारे मनःचिन्तन के आधार पर ज्ञानयोग की साधना की जाती है और ब्रह्म दर्शन का लाभ मिलता है। पूजा उपासना का विधि-विधान भक्तियोग के अंतर्गत आता है। भक्ति ईश्वर की ही की जाती है। इसलिए सर्वत्र “ईश्वर भक्ति” शब्द ही प्रयोग में आता है। अपनी भुलक्कड़ चेतना को झकझोरने और उसे विकासोन्मुख बनाकर मनोकामना पूर्ति का वरदान दे सकने योग्य बनने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। इसी अनुनय-विनय का नाम ईश्वर प्रार्थना है।

ज्ञान और भक्ति का समन्वय कर्म में होता है। ज्ञान यदि सच्चा है तो उसे व्यवहार में उतरना चाहिए। इसी प्रकार भक्ति यदि सच्ची है तो उसकी मादकता शरीर के अवयवों पर छाई रहनी चाहिए। ज्ञानयोग के लिए रची गई ब्रह्मविद्या और भक्तियोग के लिए सृजे गए पूजा-विधान का समन्वय कर्म में होता है। कल्पना की उड़ाने कुछ काम नहीं देतीं। प्रयोजन तो कर्म से ही पूरे होते हैं। किसी के व्यक्तित्व की तौल उसके कर्मों को देखकर की जाती है, ज्ञानयोग और भक्तियोग किसका, किस स्तर का है? इसकी वास्तविकता परखने की एक ही कसौटी है प्रखर और परिष्कृत कर्म। गीता आदि शास्त्रों में यही कर्मयोग प्रतिपादित हुआ है। साथ ही यह भी कहा गया है कि कर्तव्य कर्म अनायास ही नहीं बन पड़ते। इस कल्प वृक्ष का परिपुष्ट और फलित होना उस खाद-पानी के बगैर सम्भव नहीं हो सकता जिसे ज्ञानयोग और भक्तियोग कहते हैं।


Quotation

वैसे तो सूर्य का प्रकाशित गोला अपनी पृथ्वी से इतनी दूरी पर है कि 500 मील प्रति घण्टे की रफ्तार से उड़ते वायुयान को वहाँ पहुँचते 21 वर्ष, 55 मील प्रति घण्टे की तेज दौड़ से चलती मोटर गाड़ी को 193 वर्ष व विनोबा जी की तरह 5 मील प्रति घण्टे के हिसाब से पैदल चलते 2,123 वर्ष लगेंगे।

प्रार्थना को दिशा निर्देश और उद्देश्य का उद्घोष कह सकते हैं। उपासना का वास्तविक स्वरूप तो जप ध्यान जैसे मानसिक अभ्यासों में और योग-तप जैसे शारीरिक पुरुषार्थों के साथ जुड़ा रहता है। जप ध्यान को व्यायाम और योग तप को आहार की संज्ञा दी जाती है। ईश्वर की मनुहार वस्तुतः प्रकारान्तर से आत्म परिष्कार का ही एक मनोवैज्ञानिक स्वरूप समझा जाय तो इससे हम वस्तुस्थिति को समझने में अधिक अच्छी तरह समर्थ हो सकते हैं।


हमें आस्तिक बनाते हैं, प्रकृति के ये अपवाद

यह प्रकृति विलक्षणताओं का भाण्डागार है। यहाँ एक-से-एक बढ़कर ऐसी विचित्रताएँ देखने को मिलती हैं, जिन्हें इसकी अद्भुतता कहा जाय या स्रष्टा की उद्देश्यपूर्ण सृजनात्मकता-कुछ समझ में नहीं आता। यदि उन्हें निरपेक्ष सत्ता की कृति मान ली जाय, तो इनके पीछे निहित प्रयोजन भी समझ में आना चाहिए, किन्तु जब ऐसा कुछ बुद्धि की समझ में नहीं आ पाता, तब इसे आश्चर्य, अचम्भा और रहस्य-रोमांच की श्रेणी में विवश होकर रखना पड़ता है। आये दिन ऐसी कितनी ही घटनाएँ देखने को मिलती रहती हैं, जिन्हें सामान्य बुद्धि की समझ से परे होने के कारण इसी शृंखला में सम्मिलित करना पड़ता है। इन्हीं में से एक है प्रकृति की रहस्यमय ध्वनियाँ। देखने-सुनने में तो यह भौतिक लगती हैं, पर जाँच से अब तक इनका न तो उद्गम, न कारण का पता चल पाया है। इसी से इन्हें परोक्ष और अलौकिक ध्वनियों की संज्ञा दे दी गई है।

मिश्र में नील नदी के पश्चिमी तट पर थीब्स के अवशेषों में अभी भी एक जोड़ी पत्थर की विशाल मूर्तियाँ खड़ी हैं। वैसे तो यह प्रतिमाएँ अब पूर्ववत नहीं रहीं। इनका काफी कुछ हिस्सा टूट चुका है, किन्तु फिर भी बहुत कुछ अभी भी विद्यमान है, जो इन्हें मूर्ति की शक्ल प्रदान किये हुए है। इनमें से प्रत्येक की ऊँचाई लगभग पचास फुट है और एक-दूसरे से दूरी भी करीब इतनी ही है। इन प्रतिमाओं का निर्माण काल का तो सही-सही अनुमान नहीं लगाया जा सका है, किन्तु ऐसे प्रमाण उपलब्ध हैं, जो सिद्ध करते हैं कि इनकी रचना ईसा से पन्द्रह सौ वर्ष पूर्व हुई है। इन्हें मेमनन-की प्रतिमा कहा जाता है। इनकी सबसे बड़ी विशिष्टता यह है कि ये सूर्योदय अथवा इसके आस-पास विचित्र प्रकार की ध्वनियाँ उत्पन्न करती हैं, इसी से यह पर्यटकों का आकर्षण केन्द्र बनी हुई हैं। सैलानी प्रायः फरवरी अथवा मार्च के महीने में नील नदी के किनारे इसीलिए इकट्ठे होते हैं, ताकि वे इन निर्जीव प्रतिमाओं की सजीव आवाजें सुन सकें, किन्तु विचित्रता यह है कि अब तक जितने लोगों ने इनकी बोलियाँ सुनी हैं, सभी ने उसे भिन्न-भिन्न प्रकार की ध्वनियाँ बतायी हैं। इन पर्यटकों में स्ट्रबो, प्लीनी, पाउसेनियस, जुवेनल, विलकिन्सन जैसे ख्याति प्राप्त तत्कालीन पुरातत्ववेत्ता भी सम्मिलित हैं। स्ट्रबो के अनुसार इनकी आवाज हवा के हल्के झोंके अथवा घूँसे के प्रहार से मिलती-जुलती हैं। पाउसेनियस इन्हें वीणा के तार टूटने जैसे बताते हैं। सर जी. विलकिन्सन (लन्दन) ने अपनी पुस्तक “मॉडर्न इजिप्ट एण्ड थिब्स” में इसे दो पीतल के टुकड़ों के आपस में टकराने से उत्पन्न हुई उच्च तारत्व जैसी ध्वनि बतायी है। “दि वायस ऑफ मेमनन” नामक रचना में लार्ड कर्जन ने इससे पैदा होने वाली धुन को न अधिक सुरीली न बहुत कर्कश कहकर वर्णित किया है।


धनी सज्जन (Kahani)

एक धनी सज्जन रामकृष्ण परमहंस के पास आये। उन्होंने परमहंस को धन देने का आग्रह किया और बोले, “महाराज, इस धनराशि को आप स्वीकार करें। इसे आप परोपकार के कार्यों में लगा दीजिएगा।” परमहंस मुसकराये “भाई मैं तुम्हारा धन ले लूँगा तो मेरा चित्त उसमें लग जायगा। इससे मेरी मानसिक शाँति भंग होगी।” धनिक ने तर्क दिया, “महाराज, आप तो परमहंस हैं। आपका मन उस तैल-बिन्दु के समान है जो कामिनी-काँचन के महासमुद्र में स्थित होकर भी सदैव उससे अलग रहेगा।” परमहंस गंभीर हो गये- “भाई क्या तुम्हें ज्ञात नहीं कि अच्छे से अच्छा तैल भी यदि बहुत दिनों तक पानी के संपर्क में रहे तो वह अशुद्ध हो जाता है और उससे दुर्गन्ध निकलने लगती है।”

पेरिस के तत्कालीन पुरातत्ववेत्ता जे.ए. लेट्रोन ने बहुत छानबीन और प्रतिमाओं के गहन निरीक्षण करने के उपरान्त एक पुस्तक लिखी है। “ला स्टेचू वोकेल डी मेमनन”। इसमें उनने अनेक तर्कों, तथ्यों और प्रमाणों के आधार पर यह सिद्ध करने का प्रयास किया है कि यह ध्वनियाँ मूर्ति के अन्दर किसी याँत्रिक उपकरण का परिणाम नहीं है। उन्होंने इसे मानने से स्पष्ट इन्कार कर दिया है कि संगीत प्रस्तर खण्ड के अन्दर किसी मानव निर्मित वाद्य यंत्र की फलश्रुति है। इसके समर्थन में वे यह तर्क देते हैं कि यदि ऐसा होता तो एक ही प्रकार की ध्वनि उनसे निःसृत होनी चाहिए थी किन्तु विभिन्न पर्यटकों के यात्रा-विवरणों से ऐसा विदित नहीं होता, दूसरे वे अपने निर्माण-काल के बहुत समय बाद तक मौन रहीं फिर उन्होंने बोलना शुरू किया और लम्बे समय के पश्चात एक बार पुनः मौन धारण कर लिया है। इतिहासकारों के अनुसार ईसा पूर्व 20वीं शताब्दी से लेकर सन् 196 तक यह मूर्तियाँ प्रत्येक सुबह नहीं तो कम-से-कम वर्ष में अनेक बार अवश्य बोलती थीं, किन्तु इसके उपरान्त यह एकबार पुनः मौनव्रत का अनुपालन कर रही हैं और कब तक करती रहेंगी, यह अविज्ञात है। लेट्रोन की अवधारणा है कि यदि याँत्रिक कारणों से आवाजें होतीं, तो उन्हें निश्चित अन्तराल पर बराबर होनी चाहिए थीं, पर अब तक के साक्ष्यों के अनुसार इनकी मौन की अवधि सदा अनिश्चित रही है। वे इन आवाजों को प्रकृति का कोई विशेष संकेत संदेश बताते हैं, जिन्हें समझने में अब तक मनुष्य विफल रहा है।

अँग्रेज पर्यटक सर ए. स्मिथ के अनुसार मेमनन की मूर्तियों ने 19वीं सदी के प्रारंभिक दशक में भी आवाजें उत्पन्न की थी, किन्तु इस बात की कोई और साक्षी उपलब्ध नहीं होने के कारण इतिहास वेत्ता इसे प्रामाणिक नहीं मानते। हाँ, फ्राँस का “रिव्यू एन्साइक्लोपीडिक” (भाग 9, पृ. 598, पेरिस, मार्च 1821) ही एक मात्र ऐसा उपलब्ध ग्रन्थ है, जो ए. स्मिथ के इस कथन को पुष्टि करता है, कि आधुनिक काल में भी ये मेमनन के प्रस्तर विग्रह अचानक एक बार पुनः मुखर हो उठे थे। इसके पश्चात अधुनातन समय में फिर किसी ने इनकी बोलियाँ नहीं सुनीं, और न ही इस संबंध में कोई लिखित रिकार्ड पाया गया है।

उपलब्ध ग्रन्थों से ज्ञात होता है कि ऐसी ही ध्वनियाँ नेपोलियन के मिश्र अभियान दल में सम्मिलित तीन मूर्धन्य वैज्ञानिकों जोमार्ड, जोल्वायस एवं डेविलियर्स ने वहाँ की अन्य कई मूर्तियों से उत्सर्जित होती हुई अपने कानों सुनी थीं। उन्होंने तब उन रहस्यमय आवाजों के कारण जानने की असफल कोशिश की थी, हर प्रकार से विग्रहों का निरीक्षण-परीक्षण किया था और संदेह की ऐसी कोई गुँजाइश शेष नहीं छोड़ी थी कि बाद में लोग उनकी जाँच पर उँगली उठा सकें, मगर नतीजा वही ढ़ाक के तीन पात वाला सामने आया। जब वे इस संबंध में किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँच सके, तो अन्ततः थककर उनने शोध कार्य अधूरा छोड़ दिया, परन्तु अध्ययन के उपरान्त उनने एक टिप्पणी अवश्य की थी कि मूर्तियों से निकलने वाली सुरीली धुनों के संबंध में किसी प्रकार की शंका करना नितान्त भ्रमपूर्ण है। उनके अनुसार यह संगीत प्रतिमा के अन्दर से ही यदा-कदा निकलता है-इसमें दो मत नहीं है। उन्होंने लिखा है कि मिश्र के सियोन और कारनक मन्दिर के विग्रहों के अन्दर से जो आवाजें प्रस्फुटित हुई थीं, उनकी ध्वनियाँ पाउसेनियस द्वारा वर्णित मेमनन की मूर्तियों से विकीर्ण साज से काफी कुछ मिलती जुलती हैं।


बातचीत के बाद सुलह (Kahani)

अमरीका के दो किसानों के बीच खेत की सीमा के बारे में झगड़ा उठ खड़ा हुआ। एक किसान अब्राहम लिंकन को अपना वकील बनाने के लिए उनके घर पहुँचा। लिंकन ने उस से कहा, “दोनों इस प्रकार झगड़ते रहोगे तो पीढ़ियों तक यह झगड़ा चलता ही रहेगा। तुम्हारा विरोधी भी मुझे ही अपना वकील बनाने आया है। मेरी एक सलाह है। दोनों मेरे इस कार्यालय में बैठो। मैं भोजन करने जाता हूँ। जब तक मैं लौट कर आऊँ तब तक तुम आपस में बातचीत करके कोई समाधान कर लो।” अब्राहम लिंकन देर तक जानबूझ कर नहीं लौटे। किसानों ने आपस में बातचीत शुरू कर दी। दिन ढलने पर लिंकन लौट आये। उन्होंने देखा कि दोनों किसानों ने बातचीत के बाद सुलह कर ली है।

कारण जो भी कुछ हो, है यह सब अति विलक्षण, अद्भुत व विज्ञान जगत के सामने एक अति महत्वपूर्ण प्रश्न चिन्ह। विज्ञान “क्या” की व्याख्या मात्र करता है। जबकि आत्मिकी-परोक्ष विज्ञान “क्यों” की व्याख्या करता है। जहाँ सामान्य ‘काँशनल’ बुद्धि सहारा न दे, मनीषी कहते हैं, वहाँ ‘प्रज्ञा’ का सहारा लेना चाहिए। ‘प्रज्ञा’ मात्र अध्ययन व जानकारी बढ़ाने से विकसित नहीं होती। प्रज्ञा बढ़ती है अध्यात्म उपचारों को दैनन्दिन जीवन का अंग बनाने से। संभवतः ये विलक्षण ध्वनियाँ ऐसा ही कुछ संदेश बौद्धिक मरीचिका में रास्ता भूले मानव को देती रहती हैं।


मन्युरसि मन्युँ मयि देहि

आग दुनिया में बहुत है, पर पानी से अधिक नहीं। इतने पर भी हम देखते हैं, चारों ओर से समाज जल रहा है। आतंक अलगाव की धधकती ज्वालाएँ मनुष्य के हँसते-खिलखिलाते अस्तित्व को राख की ढेरी बना डालने के लिए उतारू हैं। रोकथाम के प्रयत्न कितने भी क्यों न किए गए हों पर उसकी पकड़ में दुष्टता की पूँछ भर आयी है। सारा कलेवर जहाँ का तहाँ जमा बैठा अपने विस्तार के प्रयासों में संलग्न है। आश्चर्य इस बात का है कि सज्जनता का स्पष्ट बहुमत होते हुए भी दुष्टता क्यों पनपती फूलती-फलती जाती है? रोकथाम की सर्वजनीन अभिलाषा क्यों फलवती नहीं होती? असुरता की शक्ति क्यों अजेय बनती जा रही है? देवत्व उसके आगे पराजित होता और हारता क्यों दिखाई देता है?

प्रायः सबके मन को मथने वाले इन सवालों पर विचार करने पर स्पष्ट होता है कि जन मानस में से उस रोष, आक्रोश का, शौर्य- साहस का अस्तित्व मिटा नहीं तो घट अवश्य गया है, जिसमें अनीति की चुनौती स्वीकार करने की तेजस्विता विद्यमान रहती है। इस कसौटी पर औसत आदमी संकोची, पलायनवादी बन जाता है। उसकी स्थिति कुछ वैसी हो जाती है, जैसी गीता के विषादग्रस्त अर्जुन की थी। उसमें रोष, आक्रोश उत्पन्न करने के लिए ही भगवान को गीता सुनानी पड़ी। अपने प्राणप्रिय मित्र को क्लीव, क्षुद्र, दुर्बल, अनार्य आदि एक से एक कड़वी गालियों की झड़ी लगाने की आवश्यकता अनुभव हुई।

गीता के पहले अध्याय में अर्जुन के कथन पर दृष्टि डालें तो उसे समझौतावादी, संतोषी प्रकृति का पाते हैं। वह क्षमा करने, सन्तोष रखने की नीति अपनाना चाहता है। संघर्ष का कटु प्रसंग उसे अच्छा नहीं लगा। आज हम सबकी मनःस्थिति ऐसी हो गई है कि झगड़े में न पड़ने, किसी तरह झंझट काट लेने, अनाचार से निगाह चुरा लेने में ही भलाई समझते हैं। यह भलाई दिखाने वाली सज्जनता का आवरण ओढ़े, क्षमाशीलता वस्तुतः कायरता ही है। इसमें अपने को झंझट में न पड़ने से बचाने के अतिरिक्त किसी से दुश्मनी न मोल लेने और बदनामी से बचने जैसे ऐसे तत्व भी मिले रहते हैं जिन्हें प्रकारान्तर से अनीति समर्थक और परिपोषक ही कहा जाएगा।

छोटे बड़े प्रत्येक अनाचार के अवसर पर यही दृश्य सामने आता है। विरोध-प्रतिरोध, असहयोग करने के लिए साहस दिखा सकने वाले ढूँढ़े नहीं मिलते। भरमार उन लोगों की होती है जो क्षमा का उपदेश देने वाले हैं। बात को जैसे-तैसे दबा देना जिन्हें प्रिय है। पश्चिमी नीतिवेत्ता इमानुएल काण्ट ने अपनी एक रचना में इसी मनोवृत्ति का उल्लेख करते हुए लिखा है अनीति को पोषण उन्हीं के हाथों होता है, जो अपने को नैतिक समझते हैं। इस मनोवृत्ति के कारण स्थिति दयनीय और विषम हो जाती है। लगता है लोगों ने पाप को सुरक्षित करने, उसे फूलने-फलने देने की ऐसी नीति अपना ली है जो बाहर से निर्दोष लगती है, लेकिन वस्तुतः वही अनाचार को बढ़ावा देने में खाद पानी का काम करती है।

भगवान की अवतार प्रतिज्ञा में “परित्राणाय साधूनाँ” के साथ “विनाशाय च दुष्कृताँ” का भी आश्वासन है। प्रत्येक अवतार के चरित्र में इन दोनों ही तत्वों का समावेश मिलता है। अधिक बारीकी से देखने पर स्पष्ट होगा कि अवतारों ने धर्मोपदेश तो कम दिए हैं वरन् पाप से जूझने और उसे निरस्त करने की प्रक्रिया में अपना अधिक समय लगाया है। रामचरित्र में विश्वामित्र यज्ञ रक्षा से लेकर पंचवटी दण्डकारण्य आदि में जूझते हुए अन्ततः रावण के सामने युद्ध में जा डटने के प्रसंग भरे पड़े हैं। कृष्ण चरित्र में भी उनके जन्मकाल से ही असुरों से जूझने की, महाभारत रचाने की और अन्ततः अनीति को पूरी तरह नष्ट कर डालने की संरचना में समय बीता। भगवान परशुराम, नृसिंह, वाराह, भगवती, दुर्गा आदि के अवतार चरित्रों में अनीति से संघर्ष का ही प्रसंग बढ़ा-चढ़ा है। उनके साथी समर्थकों की सेना को ध्यान और समाधि के लिए कितना समय मिला कह नहीं सकते पर स्पष्ट है कि भगवद् भक्तों ने ईश्वरीय प्रयोजनों के लिए अपनी सामर्थ्य झोंक देने का आदर्श उपस्थित किया। रीछ-वानरों ने, पाण्डवों ने प्रधानतया अनीति विरोधी तप साधना में ही अपना जीवन घुलाया था।

भगवान बुद्ध ने तत्कालीन अनाचारों के, मूढ़ मान्यताओं के विरुद्ध प्रचण्ड क्रान्ति खड़ी की थी। इसी मोर्चे पर जूझने के लिए उन्होंने प्रतिभाओं का आह्वान किया था। जिसे सुनकर आनन्द, अश्वघोष जैसे न जाने कितने आ जुटे। देखते ही देखते जीवधारी शिक्षुओं की सेना खड़ी हो गई। स्वार्थ के लिए सभी संघर्ष करते हैं किन्तु परमार्थ के लिए लड़ना मात्र आदर्शवादी लोगों के लिए ही सम्भव होता है। इसलिए बुद्ध शिक्षा में साधना और संघर्ष का समन्वय है। इसी आधार पर उनने अपने साधनों से सारे विश्व में नवयुग का शंख बजाया और नए जागरण का वातावरण बनाया। उनके न रहने पर अनुयायियों ने अहिंसा की, पूजा-पाठ की सस्ती लकीरें पीटते रहना तो जारी रखा किन्तु अनीति से लड़ने की कष्ट साध्य प्रक्रिया की ओर से मुँह मोड़ लिया। फलतः बौद्ध धर्म मध्य एशिया से चढ़-दौड़ने वाले डाकुओं द्वारा देखते-देखते पद दलित कर दिया गया। शौर्य-साहस की तेजस्विता को खो बैठने वालों की जो दुर्गति होती है वही अपने देश की भी हुई। एकाँगी सस्ती धर्म मान्यताएँ तो दीन दुर्बलों को भी अपनी खाल बचाने के लिए अच्छी लगती है। वास्तविक धर्म में तो अनीति विरोधी संघर्ष जुड़ा हुआ है उसके लिए शौर्य-साहस हो तो फिर मनुष्य बगलें झाँकता है और उन सिद्धाँतों की दुहाई देता है जो मात्र उच्चस्तरीय विशिष्ट आत्माओं को विशेष आदर्श प्रस्तुत करने के लिए ही बनाए गए हैं। पानी में बहते बिच्छू के बार-बार काटने पर भी उसे बार-बार निकलने की कथा किसी विशेष सन्त की कीर्ति में चार-चाँद भले लगा दे पर सर्वसाधारण के लिए उपादेय नहीं हो सकती। उसके लिए तो बिच्छू पर दया करना बच्चों को मार डालने के समतुल्य कहा गया है।

गुरुगोविन्द सिंह का अध्यात्म व्यावहारिक और जीवन्त था। उनने अपने शिष्यों को साधना के साथ संघर्ष का भी प्रशिक्षण दिया था। समर्थ गुरु रामदास ने अपने प्रौढ़ शिष्य शिवाजी को तलवार थमाई थी। चाणक्य ने चन्द्रगुप्त को अनाचार के विरोध में जीवन खपा डालने का निर्देश दिया था। गाँधी ने अपने सत्याग्रहियों को प्रत्यक्ष मृत्यु से लड़ने का निर्देश दिया और “टूट जाना पर अनीति से लड़ने की हट छोड़ना मत।”

भगवान राम ने ऋषियों के अस्थि समूह के टीले देखे। उनकी आंखें छलक पड़ी। किन्तु ये आँसू कायरों, दुर्बलों, भावोन्मादियों के नहीं वीरों के थे। उनने भुजाएँ उठाकर प्रतिज्ञा की, कि जिनने ये दुष्कर्म किए हैं उन निशाचरों से इस पृथ्वी को रहित करके दम लेंगे। यदि अनाचार पीड़ित पर वस्तुतः दया आती हो तो फिर उसका एक ही उपाय है कि उस अनीति के असुर से जूझा जाए जो सारी आपत्तियों-विपत्तियों का कारण है।

वैदिक वाङ्मय में एक ऋचा आती है “मन्युरसिमन्युँ मयि देहि” हे भगवान आप ‘मन्यु’ हैं हमें ‘मन्यु’ प्रदान करें। “मन्यु” का अर्थ है वह क्रोध जो अनाचार के विरोध में उमगता है। निन्दित क्रोध वह है जो व्यक्तिगत कारणों से अहंकार पर चोट लगने पर उभरता है और असन्तुलन उत्पन्न करता है। किन्तु जिसमें लोक मंगल विरोधी अनाचार को निरस्त करने का विवेक पूर्ण, संकल्प जुड़ा होता है वह मन्यु है। मन्यु में तेजस्विता, ओजस्विता और मनस्विता ये तीनों तत्व मिले हुए हैं। अस्तु वह क्रोध के समतुल्य दिखने पर भी ईश्वरीय वरदान है। इसकी गणना उच्च आध्यात्मिक उपलब्धियों से की गई है।

इस महान उपलब्धि से सम्पन्न व्यक्ति आज के समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। नवयुग की आधार शिला इन्हीं के सबल हाथों रखी जानी है। जिन्हें अपने भीतर इस विभूति की झलक मिले, कुछ करने की उमंग उठे उन्हें महाकाल की संघर्ष वाहिनी में आ मिलना चाहिए। अनीति के असुर की बढ़ती जा रही विकरालता के सामने एकाकी प्रयत्न पर्याप्त नहीं है ईश्वरीय संकल्प के साथ जुड़ सकी समूह शक्ति ही इसे समूल नष्ट कर सकेगी।

इन दिनों धार्मिकता की एक ही कसौटी है विराट के संकल्प के साथ हमारे प्रयत्न किस हद तक जुड़े हैं। जिसे ईश्वर भक्ति और आस्तिकता पर विश्वास हो वह ईश्वर विरोधी नास्तिकता के एक मात्र आधार अनाचार से बचे और बचावे। इसके बिना ईश्वर और शैतान को, पाप और और पुण्य को एक ही समझने की भूल होती रहेगी और भीतर तथा बाहर पनपता हुआ असुरत्व आत्मिक प्रगति की दिशा में एक कदम भी आगे बढ़ने न देगा।


दिव्य चेतना के शक्तिशाली गुच्छक मंत्र

मंत्र को शब्द ब्रह्म कहा गया है। जिसकी रचना शब्द विज्ञान के रहस्यों के आधार पर होती है। किस शब्द के बाद कौन सा शब्द रखने से किस प्रकार का, किस विद्युत शक्ति का प्रवाह उत्पन्न होता है, इस रहस्य को अभी पाश्चात्य विज्ञान नहीं जान पाया है। किन्तु शब्द की इस महान शक्ति से हमारे ऋषि परिचित थे। अमुक क्रम से शब्दों को रखने से, मुख से अमुक-अमुक अंगों का अमुक क्रम से संचालन होता है और उनके कारण शरीर के अमुक ज्ञान तन्तुओं, चक्रों, शक्ति संस्थानों, ग्रंथि-गुच्छकों एवं उपत्यिकाओं में अमुक प्रकार की हलचल उत्पन्न हो जाती है। उस हलचल की क्रिया-प्रतिक्रिया की उथल-पुथल से एक विशेष प्रकार का विद्युत प्रवाह आकाश में उत्पन्न होता है जो लोक-लोकान्तरों तक आसानी से पहुँच जाता है। उसकी पहुँच देवों तक, देवलोकों तक देव शक्तियों तक भली प्रकार हो जाती है। मंत्र बल से परम पद को प्राप्त करने तथा आत्मा को परमात्मा बना देने तक की सफलता ऋषियों ने प्राप्त की थी। आज भी वह हर किसी के लिए देवशक्तियों से जीवन का सान्निध्य करा देने वाला रहस्यपूर्ण माध्यम है।

आधुनिक विज्ञानवेत्ता ध्वनि की शक्ति-सामर्थ्य से भली भाँति परिचित हैं। उनने ध्वनि तरंगों के द्रुतगति से आकाश में भ्रमण करने की गतिविधि का पता लगाकर बेतार के तार एवं राडार जैसे यंत्रों का अविष्कार किया। यह यंत्र विद्युत प्रवाह की प्रेरणा से स्वच्छन्द आकाश में दौड़ रही तरंगों को पकड़ने और प्रेरक की इच्छानुसार उनकी गति, दिशा एवं दूरी का विश्लेषण आज्ञाकारी दूत की तरह करते हैं। मन्त्र को भी “आध्यात्मिक राडार” की संज्ञा दी जा सकती है। जब सामान्य शब्दों में ध्वनि तरंगों में इतनी क्षमता है, तो फिर वेद मंत्रों में जिस वैज्ञानिक ढंग से शब्दों का गुन्थन हुआ है, उसकी महत्ता तो अनिवर्चनीय ही है। इन शब्दों का मर्म एवं रहस्य कोई ठीक प्रकार समझ ले, इनकी शिक्षाओं के अनुसार आचरण करे अथवा इन शब्दों में छिपी हुई विद्याओं एवं शक्तियों से अवगत हो जाये, तो उसके लिए यह मंत्र कामधेनु के समान सब कुछ दे सकने वाले बन जाते हैं। महर्षि पतंजलि ने ऐसा ही अभिमत प्रकट करते हुए कहा है “एकः शब्दः सम्यग् ज्ञातः सुप्रयुक्तः स्वर्गे लोके च कामधुग्भवति।” अर्थात्-एक शब्द के अर्थ का सम्यक् ज्ञान होने और उसका उचित रीति से प्रयोग करने से स्वर्गलोक और समस्त मनोरथों की पूर्ति होती है। “मंत्र परम लघु” कह कर उसके वश में ब्रह्मा, विष्णु, महेश आदि सभी देव शक्तियों को बताकर मानसकार ने भी मंत्र की महिमा महत्ता का प्रतिपादन किया है।

वस्तुतः मंत्र विज्ञान महामाया प्रकृति की मूल उपादान शक्ति ध्वनि-ऊर्जा के विशिष्ट व्यवस्थित प्रयोगों की विद्या है। इसके प्रयोग का आधार उपासक का संकल्प और श्रद्धा बनती है। श्रद्धा समन्वित संकल्प ही मंत्र को जीवन्त और गतिशील बनाता है। शास्त्र का कथन है- “मन्त्राश्चिन्मरीचय” अर्थात्-मंत्र चिद्रश्मिमय हैं, चेतना की किरणों से मंत्र ओतप्रोत होते हैं। इसीलिए इन्हें संकल्प और श्रद्धा से समन्वित कर अति समर्थ बनाया जाता है। मंत्र जप में संकल्पयुक्त श्रद्धा की जितनी भी मात्रा बढ़ी चढ़ी होगी, उत्पन्न प्राण प्रवाह भी उतना ही प्रचण्ड एवं चेतनामय होगा।

मंत्र ध्वनि तरंगों के एक विशेष समुच्चय हैं। ये तरंगें अंतर्दृष्ट ऋतम्भरा प्रज्ञा द्वारा देखी जानी गयी है। पाया गया है कि मंत्र में उच्चारित ध्वनि तरंगों की एक निश्चित आकृति होती है। इसी आकृति के आधार पर मंत्रों के देवता आदि शास्त्रों में निर्धारित किये गये हैं। ध्वनि तरंगों के आधुनिक अनुसंधानों ने भी इन शास्त्रीय प्रतिपादनों के पक्ष में सामग्री जुटायी है। आज तो ध्वनि कंपनों से बनने वाले रूप-आकारों का अध्ययन करने वाली विज्ञान की एक नयी शाखा ही विकसित हो चुकी है जिसे “साइमेटिक्स” कहते है । इस क्षेत्र में अनुसंधानरत वैज्ञानिकों ने यह सिद्ध किया है कि हर स्वर, हर नाद, हर कम्पन एक विशेष आकार को जन्म देता है। मूर्धन्य वैज्ञानिक हंटिंग्टन और ड्यूवी ने यह निष्कर्ष निकाला है कि ब्रह्माण्ड के प्रत्येक घटक का अपना एक वाद्यमण्ड होता है और अपना इलेक्ट्रॉनिक नाद होता है।

साइमेटिक्स द्वारा ध्वनि कम्पनों की आकृति देखने का जो तरीका ढूँढ़ निकाला गया है उसमें जर्मनी के सुप्रसिद्ध भौतिक शास्त्रवेत्ता अरनेस्ट क्लाडनी को विशेष सफलता मिली है। वायलिन वादन के माध्यम से उनने बालुई सतह पर सुन्दर आकृतियाँ उभारने में सफलता पायी है। इन आकृतियों को ‘क्लाडनी के चित्र’ कहा जाता है। इसी से मिलता-जुलता प्रयोग स्विट्जरलैंड के प्रतिष्ठित भौतिकीविद् डॉ. हेन्स जेनी ने ‘टोनोस्कोप’ नामक स्वनिर्मित यन्त्र के माध्यम से किया है। इस उपकरण से मनुष्य आवाज को या उच्चारित मंत्र ध्वनि को जड़ वस्तुओं पर केन्द्रित करके उसकी तरंगों को त्रिआयामीय स्वरूप में क्रमबद्ध रूप से सजते देखा जा सकता है। उनने अपने अनेकों प्रयोगों द्वारा यह सिद्ध किया है कि ध्वनि तरंगों का वस्तु के आकार से गहरा सम्बन्ध है। एक प्रयोग में देखा गया कि ‘ओऽम्’ की ध्वनि माइक्रोफोन द्वारा करने पर गोल आकार विनिर्मित होता है।

मंत्र विज्ञान के ज्ञाताओं के अनुसार ‘ॐ’ का शुद्ध उच्चारण ‘आ’ से आरंभ होकर गुँजन करता हुआ ‘ओ’ से होता हुआ ‘म’ तक चला जाता है। ‘म’ का गुँजन स्वयं में ध्वनि न होकर अन्त के स्वर का विस्तार है। यह ध्वनि सभी याँत्रिक ध्वनियों से शक्तिशाली है। इसका वैज्ञानिक रीति से उपयोग करके चेतना को समुन्नत बनाया जा सकता है। कुछ विशेष ध्वनियों के योग से बने मंत्रों के उच्चारण से शरीर, चेतना एवं ब्रह्माण्ड में एक निश्चित प्रकार की ध्वनि तरंगें प्रवाहित होने लगती हैं जो प्रयोगकर्ता को, वातावरण को एवं समीपवर्ती व्यक्तियों को भी प्रभावित करती हैं। मन्त्रोपासना जिस स्थान पर होती है वहाँ से एक निश्चित आवृत्ति वाली ध्वनि तरंगें सतत् प्रवाहित होती रहती हैं जिसका अनुभव एवं लाभ वहाँ रहने वाले व्यक्तियों को भी अनायास ही मिलता रहता है। भारत भूमि में अभी भी ऐसे अनेकों पवित्र स्थान है जहाँ कभी प्राचीन ऋषियों ने दीर्घकाल तक तपस्या एवं मंत्रोपासना की थी। कालान्तर में उसकी विशिष्टता को जानकर परवर्ती साधकों, संतों ने भी उसे तपस्थली के रूप में चुना और आत्मोत्कर्ष को प्राप्त हुए। इसी तरह देवात्मा हिमालय में कितनी ही गुफाएं ऐसी है जहाँ यदि शाँतचित्त होकर बैठा जाय तो मंत्रोच्चार की ध्वनियाँ सुनाई देती हैं। उन स्थानों में कभी ऋषि-मुनियों ने लम्बे समय तक मंत्र जप किया था, जिनके कंपन अभी भी वहाँ के वातावरण में सघनता से छाये हुए हैं। उन्हें न केवल सुना व अनुभव किया जा सकता है, वरन् साधक उनसे लाभाँवित भी हो सकते हैं।

ध्वनि एक प्रत्यक्ष शक्ति है और अणु शक्ति, विद्युत शक्ति, ताप शक्ति लेजर आदि की तरह ही इसका भी कई प्रकार से प्रयोग होता है। इसके सृजनात्मक एवं ध्वंसात्मक दोनों ही प्रयोग विख्यात हैं। ध्वनि के कम्पनों से उत्पन्न ऊर्जा का व्यवस्थित उपयोग मंत्र विज्ञान में किया जाता है। मंत्र शक्ति में ध्वनि प्रवाह के सही होने की विशेष भूमिका है। इसीलिए मंत्रों में महत्व मात्र शब्दार्थ का नहीं, वरन् निश्चित ताल लययुक्त शुद्ध उच्चारण का भी होता है। मनुष्य के मुख की तार-तंत्रिकायें शरीरस्थ षट्चक्रों, दिव्य ग्रन्थियों से जुड़े रहते हैं। मंत्रोच्चारण द्वारा ये चक्र ग्रन्थियाँ, उपत्यिकायें वैसे ही प्रभावित होती हैं जैसे वाद्य यंत्रों के एक तार को छेड़ देने पर संलग्न सभी तार झंकृत हो उठते हैं। शरीर के विभिन्न स्थानों पर छिपे सूक्ष्म शक्ति भण्डारों पर श्रद्धा एवं संकल्पयुक्त मंत्रोच्चार का प्रेरक प्रभाव पड़ता है और जो मंत्र जिस प्रयोजन के लिए निर्धारित हैं, उस स्तर की ध्वनि ऊर्जा उत्पन्न करता है।

मंत्रवेत्ताओं के अनुसार मंत्रोच्चारण के समय सम्पूर्ण शरीर संस्थान-शक्ति संस्थान के रूप में परिवर्तित हो जाता है। ध्वनि की शक्ति के साथ ही मंत्र में गति के विज्ञान का भी अपना महत्व है। मंत्र जप के साथ ध्वनि ऊर्जा का एक निश्चित घुमाव बार-बार होता है। यह घुमाव अपकेन्द्री शक्ति ‘सेण्ट्रीफ्यूगल फोर्स’ को जन्म देता है, जो चक्रवात की तरह प्रचण्ड परिपोषण शक्ति से युक्त होता है। मंत्रजप से उत्पन्न शब्द शक्ति का प्रचण्ड तूफानी चक्रवात संकल्प, बल तथा श्रद्धाबल से अंतरिक्ष में संव्याप्त दैवी चेतन ऊर्जा के संपर्क से अनेक गुनी शक्ति अर्जित करता है और साधक के लिए सिद्धियों का द्वार खोलता है।

इस प्रकार मंत्र को चेतना रश्मियों के शक्तिशाली गुच्छक-या शब्द तरंगों के विशेष समुच्चय कहा जा सकता है, जो अपने इष्ट चेतन प्रवाह से सघन संपर्क का माध्यम बनते हैं। इनके जप विधान में इसीलिए भाव श्रद्धा, जप, विधि, ऊर्जा तथा उपासना से जुड़े अन्य व्रत सभी का अपना महत्व है। इन सबके अनुशीलन से ही साधक का व्यक्तित्व मंत्र जप से उत्पन्न दिव्य चेतन ऊर्जा के धारण और उपयोग में समर्थ होता है।


आस्था की ज्योति बुझने न पाये

धर्म तंत्र के प्रति विद्यमान लोक आस्था इस बात का संकेत है कि उसके द्वारा मानवीय अन्तःकरण के परिष्कार एवं समाज के कल्याण की सम्भावना के प्रति जनमानस गहनतापूर्वक आस्थावान रहा है। किन्तु लगातार इसके दोहन किए जाने और बदले में लोक मानस को समुचित मार्गदर्शन न दिए जाने के कारण आज यह छीजती हुई दिखाई देती है।

इसके इस तरह घटने का कारण सिर्फ यही है कि यह विद्या अनगढ़ लोगों के हाथ में आ गई। कोई भी उपकरण जानकारियाँ सूत्र जब इस तरह के गैर समझदार हाथों में पड़ जाते हैं तो उनका स्वाभाविक और समुचित उपयोग नहीं हो पाता। कुशल एवं लम्बे समय प्रशिक्षण पाया हुआ चिकित्सक ही लोगों का इलाज कर सकता है। यदि कोई अनाड़ी आदमी बीमारी ठीक करने का जिम्मा ले ले तो “नीम हकीम खतरे जान” वाली कहावत सत्य प्रमाणित होगी। यही बात भव निर्माण कला के सम्बन्ध में है। कुशल इंजीनियर शानदार गगनचुम्बी इमारतें सहजता से खड़ी कर सकता है। पर यही काम यदि अनजान आदमी ले ले तो इमारत में ढेरों कमियाँ, कुरूपताएं दिखाई पड़ेंगी। इन सारी कमियों का दोष चिकित्सा शास्त्र या भवन निर्माण विधा का नहीं है। इनमें निहित सत्य तो अपने आप में निर्दोष है पर गलत हाथों में पड़ जाने से उनकी अभिव्यक्ति विकृत रूपों में होती है।

अभिव्यक्ति की विकृति को विधा की विकृति समझ बैठना समझदारी की कमी ही मानी जाएगी। धार्मिकता और इसके प्रति आस्था के बारे में भी यही बात इसमें निहित सूत्रों के अनुकरण से क्रियाकलापों में पवित्रता, प्रखरता एवं उत्कृष्टता का समावेश होता है। यदि किसी धार्मिक कहे जाने वाले में ये गुण न दिखाई दें तो इसका सीधा मतलब है कि उसने इसके सूत्रों सिद्धाँतों को ठीक-ठीक समझा नहीं।

इसी तथ्य से सहमति व्यक्त करते हुए प्रख्यात मनीषी अल्डुअस हक्सले का अपनी रचना “द पेरीनियल फिलॉसफी” में कहना है कि धार्मिकता व आध्यात्मिकता का तात्पर्य उन विधाओं से है जिनकी अनिवार्य जरूरत मानवीय कल्याण एवं मानव जीवन के उत्थान के लिए है। इनसे जीवन में समरसता, सामंजस्य, शक्ति और सन्तुलन आता है। डॉ. राधाकृष्णन और पी.टी. राजू अपनी रचना “द कॉन्सेप्ट आफ मैन” में कहते हैं कि धार्मिकता ही वह नीति है जो सामाजिक व्यवस्था, जीवन की स्वस्थता तथा कल्याण का प्रसार करती है। इसका महत्व लोक जीवन के साथ स्वयं के जीवन में भी है। इसे सुख आनन्द की स्थापना की विधा के रूप में जाना जा सकता है। मानवता की भूमि में प्रेम से, द्वेष पर न्याय से, अन्याय पर सेवा से, स्वार्थ पर गुणों के द्वारा दोषों पर विजय पाने की एक मात्र प्रणाली यही है।

परन्तु इस प्रणाली की उपरोक्त परिणतियाँ स्वयं के जीवन में तभी अनुभव की जा सकती हैं, जब प्रणाली के प्रति गहन आस्था और क्रिया के प्रति वैज्ञानिक दृष्टिकोण हो। अन्यथा आलस्य प्रमाद को आश्रय देकर अधूरे मन से अपनाई गई पद्धति अपने परिणाम प्रस्तुत नहीं करती। वैज्ञानिक को अपनी विधा में गहन आस्था होती है। इसके साथ ही वह प्रयोग की विधियों में किसी तरह की कोई कमी भूल किसी तरह बर्दाश्त नहीं करता। उसकी दत्तचित्तता व एक निष्ठ मनोयोग के बारे में कहना ही क्या? ये सारी चीजें मिलकर ही चमत्कृत कर देने वाले नतीजे सामने लाती हैं। लोग सोचने पर विवश हो जाते हैं कि इसके ऐसे अकल्पनीय परिणाम भी हो सकते थे। धार्मिक प्रणाली के बारे में भी यह सत्य लागू होता है। धर्म जीवन विज्ञान है। इसके प्रयोगकर्ता में इसके प्रति गहन आस्था का होना आवश्यक है। साथ ही सारी कमियों, भूलों को दूर कर प्रमोद को दूर फेंककर समूचे जीवन को इसके अनुरूप ढालना होगा। ऐसा कर पाने पर परिणाम भी आश्चर्यचकित करने वाले आएँगे।

प्राचीन काल के ऋषियों ने अपने शोध प्रयासों तथा स्वयं के जीवन पर अनेकानेक प्रयोगों से प्राप्त निष्कर्षों के बलबूते न केवल स्वयं को श्रेष्ठ विभूति सम्पन्न बनाया था बल्कि जन मानस में इसकी सैद्धान्तिकता व व्यावहारिकता के प्रति आस्था भी जगाई थी। आज यदि यह घट रही है तो इसका कारण पिछली कुछ शताब्दियों से प्रतिभाशालियों के द्वारा इसकी उपेक्षा तथा उस प्रतिगामी तत्वों का एकाधिपत्य है। इस कारण ही उसमें विकृतियों की भरमार हो चली है। आज धार्मिकता सिर्फ सिद्धाँतों की बक-झक होकर रह गई है और भी न जाने कितनी विडम्बनाएँ इस क्षेत्र में चल पड़ी हैं। समाज के श्रम, धन, समय का शोषण होने लगा। जिस आदर्शवादी दृष्टिकोण, परिष्कार, धर्म तन्त्र की स्थापना का उद्देश्य था वह तो भूलता, बिसरता, गायब होता चला गया। फैलता गया झूठा आडम्बर, भाग्यवाद, पलायनवाद के साथ वह विकृत दृष्टिकोण जिसके अनुसार नदी स्नान, देवदर्शन, तीर्थ-भ्रमण जैसे छुटपुट कर्मकाण्डों से पाप के दण्ड भुगतने से छुटकारा मिल जाता है। अनैतिकता और अकर्मण्यता को बढ़ाया देने वाली मान्यताएँ इस क्षेत्र में लम्बे समय तक छाई रहीं। उस मृगमरीचिका में भटक रही जनता भ्रान्त क्लाँत हो चली है। विचारशील वर्ग में धर्मतन्त्र के प्रति आस्था वैसी अविचल नहीं रही। वे इसकी उपयोगिता को संशय की दृष्टि से देखने लगे हैं।

विचारणीय यह है कि भारत के लोक मानस में मानवतावादी सद्भावना और सत्प्रवृत्तियों की स्थापना किस पृष्ठभूमि पर हो सकती है? उपयोगी गतिविधियाँ अपनाने के लिए जनसामान्य को सहमत करने की सबसे अधिक सरल प्रक्रिया क्या होगी?

धार्मिकता भारतीय जनता का प्रिय तत्व रहा है। इसकी आस्थाओं के प्रति विचलन सामयिक है। कुछ ऐसे लोग अथवा समूह इस पवित्र कार्य हेतु सन्नद्ध हो जायँ जिनकी वैचारिकता, भावना तथा कार्य प्रणाली में समरूपता हो तो यह संकट दूर हो सकता है। श्री राम कृष्ण परमहंस के शब्दों में धार्मिक व्यक्ति जब सोलह आने आदर्शवादी होगा तो उसे देखकर लोग एक आने आदर्श का पालन जरूर करेंगे। अतएव उपदेशकों में राई रत्ती कमी को जनमानस बर्दाश्त नहीं करेगा। स्वामी विवेकानन्द के शब्दों में “भारत आह्वान कर रहा है ऐसे पुरुषार्थी एवं त्यागी लोगों का, जो स्वार्थ, वासना, कामना सभी कुछ को धार्मिक आस्थाओं की स्थापना की पवित्र वेदी पर अर्पित कर सकें। इससे कम में मानववादी विचार, आदर्शवादी मान्यताएँ सरलतापूर्वक जनसमुदाय को नहीं समझायी जा सकती।”

ऐसे लोग ही धार्मिक कलेवर का उपयोग विवेकपूर्ण विचारों के शिक्षण के लिए सफलता पूर्वक कर सकते हैं।

आज भी जनता के धन, समय और मनोयोग का बहुत बड़ा भाग धर्मतन्त्र के लिए स्वेच्छा से समर्पित होता रहता है। अतः उस शक्ति का सदुपयोग करना एक जरूरी कर्तव्य कर्म है। धर्म कलेवर में नए प्राण फूँकना भारत में एक राष्ट्रीय कर्तव्य है।

इसी के द्वारा लोकमानस का परिष्कार व परिमार्जन सम्भव है। प्राणी भी पदार्थों की तरह अनगढ़ होते हैं। पदार्थों को पकाना, गलाना, ढालना, खरादना जरूरी होता है तभी वे काँतिमान, सुन्दर, सुडौल और उपयोगी बनते है। किन्तु इस प्रक्रिया के लिए पहली जरूरत साँचे की है जिसके आधार पर यह महत्वपूर्ण कार्य सम्भव बन पड़े। ऐसा बन सकने के लिए सामर्थ्य वालों को आगे की पंक्ति में आना होगा।

एक लम्बे उसे से धर्मतन्त्र का काफी दुरुपयोग हुआ है और वह मनुष्य के लिए हानिकारक विकृतियों का पोषण केन्द्र बनता जा रहा है। इस पर भी इसके प्रति लोक आस्था हुई है। इसकी ज्योति को स्वास्थ्यप्रद प्राणवायु से प्रखर-प्रदीप्त बनाया


Quotation

अंधा मनुष्य सर्प की आशंका से गले में डाली गई पुष्प माला को भी उतार फेंकता है। अविवेकी लोग सत्परामर्श को भी घाटा पड़ने की आशंका से उपेक्षापूर्वक अनसुना कर देते हैं।

जाना चाहिए। दायित्व जीवट वाले प्राणवान तथा संकीर्ण स्वार्थपरता की बेड़ियों से मुक्त उन लोगों का है, जो लोकमानस के परिष्कार एवं प्रशिक्षण का महत्व समझते हैं और राष्ट्रीय संदर्भ में उसके उपयुक्त माध्यम के रूप में उपादेयता को जानते है।

धर्मतन्त्र रूपी मन्दिर में जल रही जन आस्था की ज्योति के बुझने में घाटा ही घाटा है। इसका अभ्यासी जनमानस इससे दिग्भ्रान्त हो जाएगा। अतः जरूरत इस बात की है कि इसको पर्याप्त मात्रा में प्राण वायु पहुँचायी जाय। यह काम सुभाष चन्द्र बोस, चन्द्रशेखर, विवेकानन्द, दयानंद जैसे महामानवों की परम्परा का है। आस्था संकट से जूझने के लिए जब भावनाशील, पवित्र अन्तःकरण, उत्कृष्ट चिन्तन एवं श्रेष्ठ आचरण वाले प्रबुद्ध जन इस क्षेत्र में उतरेंगे तभी धर्म तन्त्र को परिमार्जित, परिशोधित, नवनिर्धारित कर धार्मिक नीतिमत्ता के प्रति आस्था की ज्योति जगाए रखी जा सकती है। यह ज्योति ही मानवीय अन्तःकरण को आनन्दित, पुलकित, प्रफुल्लित रख कर प्रगति पथ पर बढ़ते रहने का पाथेय जुटाती रह सकेगी।


सुसन्तति का निर्माण किया जाता है!

“मुनि श्रेष्ठ!”-सुजाता कह रही थी “मुझे एक तेजस्वी और प्रतिभावान पुत्र चाहिए।”

“आँ” कहकर कहोड़ मुनि पुनः पाँडुलिपि को उलटने-पलटने में व्यस्त हो गये, क्योंकि आज उन्हें अपने शिष्यों को पाणिनि के अष्टध्यायी व्याकरण के अंतिम सूत्र की व्याख्या करनी थी।

“देव!” अनुरोध भरा स्वर पुनः उभरा “लगता है आज आप अधिक व्यस्त हैं। निवेदन फिर करूंगी।”

ऋषि की तंद्रा अब टूटी। उन्होंने अचकचा कर पूछा-”देवि! तुमने कुछ कहा क्या?

“ हाँ, आर्य! पर अभी आप अपना अध्ययन पूरा कर लें। बात फिर कर लेंगे।” सुजाता कह रही थी।

शाम से रात्रि घिर आयी। ऋषि का अध्ययन समाप्त हो चुका था। वे ग्रंथ को उपयुक्त स्थान पर रख कुटिया से बाहर ठंडी-ठंडी हवा में टहलने के लिए निकल पड़े। सामने ही वे टहल रहे थे और सूत्र की व्याख्या पर चिंतन मनन भी करते जा रहे थे, अभी थोड़ी ही देर हुई होगी कि कुटीर के अंदर से पत्नी की वाणी उनने कानों से टकरायी “स्वामी”! भोजन तैयार है, ग्रहण कर लें।”

वे अंदर प्रविष्ट हुए। हाथ-मुँह धोया और भोजन के लिए बैठ गये। सुजाता ने भोजन परोसा और सामने बैठ गयी। अब कहोड़ मुनि ने बात छेड़ी।

“भार्ये! तुम कुछ कहना चाह रही थीं? अब कहो, बात क्या है? “

तनिक लज्जा व संकोच प्रकट करती हुई सुजाता बोली -”आर्य! आप तो जानते ही हैं कि हर पत्नी की पहली इच्छा मातृत्व की होती है। तब मैं यही निवेदन करना चाह रही थी, किंतु एक शर्त भी है। “ इतना कहकर सुजाता रुक गयी।

“शर्त! शर्त कैसी? ऋषि प्रवर ने आश्चर्य प्रकट किया।

“अत्यंत छोटी है। मैं एक सामान्य संतान नहीं, तेजस्वी व मेधावी संतति चाहती हूँ।”

ऋषि हल्के से मुसकराये, बोले-”भद्रे! यह ‘शर्त’ शब्द जितना छोटा दिखता है अनुबंध उतना छोटा है नहीं। इसके लिए हम दोनों को जीवन साधना की कठिन तपश्चर्या करनी पड़ेगी, तभी ऐसा संभव है। बोलो तैयार हो? अपना व्यक्तित्व गंगा जैसा निर्मल और समुद्र जैसा शाँत बना सकोगी? अन्तस् की महानता हिमालय जैसा विशाल बनाने की दृढ़ता है? स्वयं के लिए कठोर और दूसरों के लिए उदार बनने की सामर्थ्य रखती हो? बोलो, यदि इतना कर सको, तो मैं तैयार हूँ, अन्यथा एक पक्षीय प्रयास वह परिणाम प्रस्तुत न कर सकेगा, जिसकी आशा सँजोये बैठी हो?

स्वीकृति में सुजाता का सिर हिल गया। “ठीक है, तो आज और अभी से यह जीवन साधना आरंभ कर दो।”

ऋषि कह रहे थे-” मैं भी शुरू कर रहा हूँ।”

चार साल बीत गये। दोनों ने अध्ययन-अध्यापन का नियमित कार्य और गृहस्थ जीवन की भलीभाँति निर्वाह करते हुए संयमपूर्वक व्यावहारिक जीवन में इतनी कठिन तपश्चर्या सम्पन्न की, कि स्वल्प अवधि में ही लहलहाती फसल के लिए अत्यंत उर्वर भूमि तैयार हो गई।

उपयुक्त समय में उपयुक्त फसल जब उपयुक्त भूमि में बोयी जाती है, तभी वह किसान के अन्तःकरण को गुदगुदा पाती और धन-धान्य से निहाल करती है।

ऋषि दम्पत्ति के लिए अब ऐसा ही अवसर उपस्थित हो चुका था। उनने अपने चरित्र, चिंतन और व्यवहार को तपा-तपाकर ऐसे स्थायी और सुगढ़ ढाँचे में ढाल लिया था, कि जिसके वासंती बयार से शिष्यगण भौंरों की भाँति उमड़े चले आ रहे थे। दिन-दिन उनकी संख्या बढ़ती ही चली जा रही थी और मलयानिल की तरह दम्पत्ति के सुमधुर आचरण की सुगंध का प्रसार भी विस्तृत होता जा रहा था। फलतः देर रात तक उन्हें अध्ययन संबंधी कठिन परिश्रम करना पड़ता।

दोनों प्रसन्न थे कि उन्होंने सुसंतति प्राप्ति के लिए स्वयं को वाँछित ढांचे में ढाल लिया और गदगद इसलिए हो रहे थे, शिष्यगणों की बढ़ती संख्या ने उस यथार्थता पर प्रामाणिकता की मुहर लगा दी, जिसके लिए मुनि-दम्पत्ति का मन शंकाग्रस्त बना रहता कि पता नहीं खरे सोने की सी प्रखरता उनके व्यक्तित्व में आ पायी या नहीं, किन्तु अब संशय करने जैसी कोई बात थी ही नहीं। जब कंगन कलाई में हो, तो उसे निहारने के लिए दर्पण की क्या आवश्यकता है।

सुजाता गर्भवती हुई। एक दिन जब मुनि कहोड़ अपने शिष्यों को पढ़ा रहे थे, तो उनकी सहायता के लिए पत्नी भी पास ही बैठी थी। इससे तीन कार्य सम्पन्न होते थे ऋषि का भार कुछ हल्का होता था, क्योंकि उनने सुजाता को इतना पढ़ा दिया था कि प्रारंभिक शिक्षा वह शिष्यों को दे सके, दूसरे वह स्वयं भी अपना ज्ञानवर्धन करती थी, तीसरे गर्भ में पलते भ्रूण पर इसका अनुकूल प्रभाव पड़ता था। इन्हीं सब बातों पर विचार कर वह अध्यापन के समय सदा उपस्थित रहती थी।

उस दिन भी इन्हीं कारणों से वहाँ मौजूद थी। आचार्य शिष्यों को पढ़ा रहे थे। शिष्य ध्यानपूर्वक उन्हें सुनते और हृदयंगम करते जा रहे थे, किन्तु बीच-बीच में आचार्य के कानों से एक तीखी सी आवाज टकरा जाती, मानों कोई कुछ प्रश्न कर रहा हो। कुछ समय तक तो वह उसे अपने कानों का विभ्रम समझते रहे, परन्तु जब थोड़े-थोड़े समय के पश्चात् लगातार यह ध्वनि उठने लगी तो वह तनिक सावधान हुए। ध्यान से सुनने पर पाया कि कोई अत्यन्त धीमे स्वर में कह रहा था। “सवरात्रिमध्ययनम करोषि नेदं पितः सम्यगिवोपवर्तते।” अर्थात् पिताजी आप देर रात तक अध्ययन करते रहते हैं, फिर भी उच्चारण और अध्यापन संबंधी यह त्रुटि क्यों? ऐसा न करें।

मुनि और शिष्यों ने इधर-उधर देखा, किन्तु आस-पास कोई दिखाई नहीं पड़ा। फिर मेरे अध्यापन को त्रुटिपूर्ण बताने वाला दुस्साहसी कौन है। आचार्य को कुछ समझ में नहीं आ रहा था। अचानक उनका ध्यान सुजाता की ओर खिच गया। ध्यान से सुना तो पता चला कि स्वर पत्नी के गर्भ में पलते शिशु से आ रहा है। रहस्य अब सुजाता की भी समझ में आ गया। पति -पत्नी की आँखें चार हुई? वे खुशी से फूले न समा रहे थे कि इतना प्रतिभावान शिशु कि पिता की भी गलतियाँ निकालने लगे, जबकि वह अभी गर्भ से बाहर भी नहीं आया।

मगर देर तक कहोड़ की यह प्रसन्नता बनी न रह सकी। उन्हें जब शिष्यों की उपस्थिति का भान हुआ, तो भृकुटियाँ तन गई। गर्भस्थ शिशु ही पिता के अध्यापन को दोषपूर्ण बताये यह अपमान वे तनिक भी बर्दाश्त न कर सके। उन्होंने शाप दे डाला “अरे दुस्साहसी! तेरी यह हिम्मत। तुमने अभी जन्म भी नहीं लिया और पिता में ही त्रुटि निकालने लगे। मैं तुम्हें शाप देता हूँ- “तू आठ अंगों से टेढ़ा पैदा होगा।”

सुजाता ने सिर पीट लिया। सजल नेत्रों से कहा। “हाँ! आर्य! यह आपने क्या कर डाला? अपने ही प्रतिभावान पुत्र को शाप दे दिया।”

क्रोध से काँपते ऋषि ने कहा “उद्दण्ड को उद्दण्डता का दण्ड मिलना ही चाहिए। हमने जो कुछ किया, उचित ही था।”

अपने भाग्य को कोसते, रोते, पछताते सुजाता कुटिया के अन्दर चली गई और भारी मन से एक कोने में बैठ कर सोचने लगी-”प्रभु! यह आपने किस पाप का बदला मुझसे लिया। प्रतिभावान संतान की इच्छा पूरी की, तो वह भी शापित-विकलाँग। यदि यही नियति व आपकी मर्जी थी, तो हम दोनों से इतनी तपश्चर्या क्यों करवायी?” सोच-सोच कर वे दुखी होने लगी। “आर्ये!” अकस्मात के संबोधन से उसकी तन्द्रा टूटी। आँखें ऊपर उठायी, तो सामने पतिदेव खड़े मिले, कहा- “दुःख मत करो देवि। हमें भी इस घटना से उतना ही क्षोभ हुआ है, जितना तुम्हें। क्रोधवश यह भूलकर डाली, पर इसका उपाय भी मुझे स्पष्ट दीख रहा है।” त्रिकालदर्शी कहोड़ शून्य में निहारते हुए बोले “अपना पुत्र आठ अंगों से टेढ़ा उत्पन्न अवश्य होगा,शाप का यह कलंक उसे अधिक दिनों तक ढोना नहीं पड़ेगा। दण्डी नामक पंडित को पराजित कर वह जब मुझे मुक्त करेगा, तो मेरे आशीर्वाद से समंगा नदी में स्नान करने से उसका टेढ़ापन जाता रहेगा। तब वह एक स्वस्थ सुन्दर,प्रतिभावान युवक के रूप में तुम्हारे सामने होगा।”

हुआ भी ऐसा ही। अष्टवक्र का टेढ़ापन कुछ काल पश्चात् समाप्त हो गया और उनकी अद्भुत विद्वता व प्रतिभा की चर्चा दिग्दिगंत में छा गई। जीवन-साधना का प्रत्यक्ष प्रतिफल अष्टवक्र रूपी विभूति के रूप में ऋषि-दम्पत्ति को मिल चुका था। यही उनकी अदम्य इच्छा भी थी।


सविता साधना से आज्ञाचक्र का जागरण

सृष्टि का मूल आधार सविता अर्थात् सूर्य है। वेदों, उपनिषदों आदि में सूर्य को ही इस सृष्टि की आत्मा और उसका प्रसविता माना गया है। यदि वह बुझ जाय या प्रकाश बखेरना बन्द कर दे तो यह सृष्टि और सम्पूर्ण सौरमण्डल निर्जीव हो जायेगा। प्रत्यक्ष सूर्य सविता देवता का स्थूल प्रतीक है, इसलिए उसे ही सविता कह दिया जाता है। वस्तुतः सविता, उस मूल चेतना शक्ति का नाम है जिससे कि शक्ति ग्रहण कर सूर्य सम्पूर्ण सृष्टि को सतत् जीवन चेतना प्रदान करता रहता है। विश्व ब्रह्मांड के कण-कण में जो जीवन चेतना अविराम स्फुरित होती रहती है- अनुभव में आती है उसका मूल आधार सविता की सत्ता ही है। उसी सविता देवता की साधना गायत्री साधना है। गायत्री उपासक को सविता आराधना से जो शक्ति प्राप्त होती है वह उसकी भावनात्मक उत्कृष्टता के अनुपात में ही उपलब्ध होती है।

प्रायः मनुष्य देवताओं को अपने से श्रेष्ठ मानता रहता है और समझता है कि वे उसकी मनुहार से प्रसन्न होते और वरदान देते हैं, किन्तु बात ऐसी है नहीं। वस्तुतः देवता मनुष्य की श्रद्धा एवं विश्वास के छेनी-हथोड़े से गढ़े-सँवारे गये उसके ही मानस पुत्र हैं। गीता में कहा भी गया है -”देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तिऽ व” अर्थात् भावनाओं से देवताओं का वन्दन होता है और वे देवता बदले में भावात्मक अनुदान देते हैं। ‘भावोहि विद्यते देव’ का क थन यह स्पष्ट करता है कि पाषाण खण्ड को दैवी सामर्थ्य सम्पन्न बना सकने की क्षमता का वास्तविक आधार भावना ही है। सविता साधना की सफलता का आधार भी यही श्रद्धासिक्त भावना है। इसके अभाव में देवाराधन निष्प्राण मात्र चिन्ह पूजा भर रह जाता है।

सविता देवता की शक्ति को समझ लेने पर तथा श्रद्धा−भावना की प्रगाढ़ता के साथ उससे अपना संपर्क जोड़ लेने पर मनुष्य के लिए कुछ भी असंभव अथवा अज्ञात नहीं रह जाता। मानवी सत्ता इतनी रहस्यमय है कि उसके तीन शरीरों, पंचकोशों, षट्चक्रों आदि सूक्ष्म परतों में सन्निहित एक से बढ़कर एक उच्चस्तरीय चेतनात्मक शक्ति रहस्यों का अनावरण सविता देवता से प्राप्त शक्ति के आधार पर ही होता है। उस शक्ति-स्रोत से प्रत्यक्ष संपर्क जोड़ने की साधना सर्वोत्तम एवं सर्वाधिक सहज कुण्डलिनी-साधना विधान है।

मूलाधार में यह कुण्डलिनी शक्ति प्रसुप्त अवस्था में पड़ रहती है। सविता की शक्ति से जब यह जाग्रत होकर सहस्रार स्थित परम शिव से जा मिलती है तो साधक स्वयं उस महाज्योति के साथ तद्रूप हो जाता है। शक्ति जागरण की यह प्रक्रिया क्रमशः जिन चेतना-स्तरों को पार करती जाती है, उन्हीं को साधना विज्ञान में ‘चक्र’ या ‘प्लेक्सस’ कहा जाता है। मूलाधार तथा सहस्रार के बीच मेरुदण्ड में ऐसे पाँच प्रमुख चक्र संस्थित हैं। ये हैं -स्वाधिष्ठान, मणिपुर, अनाहत, विशुद्धि और आज्ञाचक्र। मूलाधार और सहस्रार को मिलाकर ये सप्त चक्र हो जाते हैं। इन्हें ही सप्त लोक, सप्तऋषि, सप्तद्वीप, सप्तसागर आदि कहा जाता है। बीच में स्थित पाँच चक्र पंचतत्व, पंच प्राण के प्रतीक हैं। इनकी उपासना ही वास्तविक पंचोपचार है। कठोपनिषद् के यम नचिकेता संवाद में इसे ही पंचाग्नि विधा कहा गया है।

वस्तुतः यह सातों चक्र सूक्ष्म आध्यात्मिक केन्द्र हैं। ब्रह्मांड में जो चेतन-शक्ति की धारायें अविराम द्रुत गति से दौड़ रही हैं उनके कुछ निश्चित आवर्त केन्द्र हैं जो ब्रह्माण्ड स्थित चेतन संस्थानों के प्रतिनिधि हैं। ये चक्र भिन्न-भिन्न प्रकार के शक्ति-प्रवाहों के उद्गम केन्द्र माने जा सकते है। यद्यपि इन सभी का मूल उद्गम केन्द्र तो सविता देवता ही है। जो चक्र-संस्थान अविज्ञात चेतना प्रवाह के जिस केन्द्र से विशेष रूप से जुड़ा रहता है उसका जागरण उसी प्रकार की अनुभूतियों और विभूतियों को जन्म देता है।

प्रत्येक चक्र का अपना तत्व-बीज, अपना वाहन, अपना आधि देवता, अयन दल, यंत्र शब्द एवं रंग होता है। इन्हीं विशेषताओं की भिन्नता से उनके भेद किये गये हैं। जिस प्रकार ज्वालामुखी के छिद्र आग, धुआँ तथा दूसरी वस्तुयें उगलते रहते हैं, उसी प्रकार ये चक्र संस्थान जाग्रत होने पर भिन्न-भिन्न प्रकार की शक्तियाँ-विभूतियाँ उगलते हैं।

इन षट्चक्रों में आज्ञाचक्र को ‘गुरुचक्र’ कहा जाता है क्योंकि वही मार्गदर्शक है, शक्ति प्रवाह का ज्योति का उद्गम स्थल है। इस आज्ञाचक्र को ही तीसरा नेत्र-’थर्ड आई’ अथवा दिव्य दृष्टि भी कहते हैं। संतुलन अंतःदृष्टि, दिव्यदर्शन की क्षमता इस चक्र संस्थान में सन्निहित है। चक्रबेधन एवं कुण्डलिनी जागरण की प्रक्रिया, स्वरूप, निहितार्थ तथा उपयोग की विधि को जानने समझने की शक्ति इस चक्र के जाग्रत होने पर ही प्राप्त होती है। जिसका ‘आज्ञा चक्र’ जग गया,जिसे दिव्य दृष्टि मिल गयी, उसका साधनापथ आलोकित हो जाता है और लक्ष्य स्पष्ट हो जाता है। उस साधना-पथ पर चलते हुए साधक सुगमता से लक्ष्य को पा लेता है। इस आज्ञाचक्र को जाग्रत करने के लिए सविता के ज्योति पुँज के अवतरण की साधना करनी होती है।

आज्ञाचक्र मनुष्य के मस्तिष्क की दोनों भवों के मध्य में अवस्थित होता है। भृकुटी के नीचे अस्थियों का जो आवरण है उसके भीतर एक बेर की गुठली जैसी ग्रन्थि होती है। वही आज्ञाचक्र संस्थान है। इसके जागरण के लिए साधक कुशासन अथवा कम्बल बिछा कर मेरुदण्ड को सीधा रखते हुए पद्मासन या सुखासन में पालथी मारकर ध्यान मुद्रा में बैठता है। शरीर पर न्यूनतम वस्त्र ही रखे जाते हैं।

प्रारंभिक अभ्यास के लिए सूर्य पर त्राटक आवश्यक हो जाता है। अतः अरुणोदय के समय कोई ऐसा स्थान निश्चित करना पड़ता है जहाँ मकानों, पेड़ों आदि की आड़ न हो और ऊपर उभरता बाल-सूर्य स्पष्ट दिखाई दे सके। इस प्रकार स्थान चयन के बाद साधक ध्यानावस्था में सुदूर अन्तरिक्ष में उदित प्रभात-कालीन स्वर्णिम बाल-सूर्य को देखता है।

खुली आँखों से सर्वप्रथम एक या दो सेकेंड बाल सूर्य को देख कर आँखें बन्द कर ली जाती हैं। तीस सेकेंड तक बन्द आँखों से उसी प्रकार सूर्य को देखने की भावना-कल्पना की जाती है। यह क्रम तभी तक चलता है जब तक सूर्य की स्वर्णिम आभा समाप्त न हो जाय। दस-पन्द्रह मिनट के भीतर ही सूर्य श्वेत वर्ण होने लगता है। तब यह त्राटक सर्वथा निषिद्ध है। यहाँ यह ध्यान रखने योग्य है कि सूर्य का स्वर्णिम प्रकाश भी तीन सेकेंड से अधिक देर तक देखने से आँखों को हानि पहुँचती है। अति उत्साह में आकर सूर्य को देर तक देखने की भूल किसी को भी नहीं करनी चाहिए।

प्रारंभिक बीस दिन तक इस प्रातःकालीन सूर्य-त्राटक का नियमित रूप से अभ्यास करने से वह कल्पना में- भावना में गहराई तक बैठ जाता है। इसके बाद इस प्रारंभिक अभ्यास की आवश्यकता नहीं रह जाती। इसके उपरान्त अभ्यास, सिद्धि, कल्पना और आस्था पुष्ट भावना के सम्मिश्रण से सविता के ज्योति बिन्दु का ध्यान आगे बढ़ाया जाय।

उपासना अवधि में साधक गायत्री महामंत्र के जप के साथ ही अपने ‘आज्ञाचक्र’ संस्थान में वैसे ही स्वर्णिम सविता का ध्यान करता है। अगले चरण के इस ध्यान में यह प्रगाढ़ भावना करनी पड़ती है कि ईश्वरीय दिव्य प्रकाश की प्रेरणापूर्ण किरणें जो अपने ऊपर बरस रही हैं उनसे सम्पूर्ण स्थूल,सूक्ष्म एवं कारण शरीर जगमग हो गया है। आज्ञाचक्र स्थित आत्म-ज्योति जाग्रत हो गयी है। वहाँ एक्स-रेज जैसी प्रचण्ड किरणें निकल रही है जो वस्तुओं, व्यक्तियों को ही नहीं,विचारों भावनाओं, शास्त्रों और सैद्धान्तिक प्रतिपादनों तक के मर्म-वेधन में समर्थ हैं। जो अन्तर्निहित दिव्य दृष्टि को प्रखर बना रही है। अपने भीतर के कषाय-कल्मष, दोष−दुर्गुण भी स्पष्ट दिख रहे हैं और उन्हें दूर करने-फेंक देने, समाप्त कर देने की प्रक्रिया भी सामने स्पष्ट है। साथ ही अपनी आन्तरिक उत्कृष्टताओं, प्रसुप्त क्षमताओं को उभारने का मार्ग भी पूर्णतः प्रकाशित हो उठा है।

जितनी गहरी श्रद्धा भावना के साथ अन्तःक्षेत्र को दिव्य बनाने वाली यह सविता-साधना की जायेगी, आज्ञाचक्र के जागरण का उद्देश्य उतना ही मात्रा में पूरा होता जायेगा।

आज्ञाचक्र के जागरण की यह सविता-साधना नियमित रूप से लम्बे समय तक करने पर साधक के भीतर की उत्कृष्टतायें उभरती चली जाती हैं और वह गीतोक्त संजय की तरह दिव्य दर्शन की शक्ति-दिव्य दृष्टि भी प्राप्त कर लेता है। भूगर्भ में या सृष्टि के अन्तराल में छिपी दूरवर्ती वस्तुओं का ज्ञान आज्ञाचक्र से निकलने वाली अद्भुत सूक्ष्म किरणों द्वारा सहज ही हो जाता है। अविज्ञात के गर्भ में पक रही संभावनायें, भविष्य में घटित होने वाली घटनायें भी उसे दिख जाती हैं। आज्ञाचक्र के जागरण से ही साधक आत्म ज्योति के अनावरण में सफल होता और आप्तकाम बनता है। आज्ञाचक्र के जागरण की यह सविता साधना सरल भी है और बिना जोखिम की सर्वोपयोगी भी। इसे हर कोई सरलतापूर्वक सम्पन्न कर सकता है।


महत्वाकाँक्षी हों, पर अध्यात्म क्षेत्र के

आध्यात्मिक आकांक्षाओं की पूर्ति में कोई बड़ा व्यवधान नहीं है। सच्चरित्रता अपनाने और लोकसेवा में लिप्त होने का मन हो तो वैसे अवसर कहीं भी, कभी भी मिल सकते हैं। इस प्रकार की इच्छापूर्ति के अवसर कहीं दूर तलाशने के लिए नहीं जाना पड़ता। वे हर जगह इतनी अधिक मात्रा में विद्यमान हैं कि सरलतापूर्वक उनमें से कभी भी, किसी को भी चुना जा सकता है। निराश होने जैसा कभी कोई प्रसंग आने की आशंका नहीं है।

अपनी क्षमता बढ़ाने के लिए अध्ययन अध्यवसाय की जरूरत पड़ती है। इसके लिए 24 घन्टे वाले दिन रात में से प्रयत्नपूर्वक कई घंटे बचाए जा सकते हैं और योजनाबद्ध परिश्रम करते हुए प्रगति पथ पर धीमी या तेज गति से आगे बढ़ा जा सकता है।

अपने गुण, कर्म, स्वभाव में शालीनता, सज्जनता को अधिकाधिक मात्रा में समाविष्ट करते चलना भी ऐसा मार्ग है जिस पर चलने वाले को राह में कंकड़ों-कंटकों से नहीं उलझना पड़ता है। आत्मनिरीक्षण की प्रक्रिया तब कुछ भी कठिन नहीं रह जाती जब मनुष्य पूर्वाग्रहों और पक्षपातों से अपने को विरत कर लेता है। उसे अपनी त्रुटियाँ आसानी से दीख पड़ती हैं और यदि व्यक्तित्व को गरिमामय बनाने की आकाँक्षा है तो उन्हें सुधारते हुए प्रगति एवं प्रसन्नता का अनुभव होता है। यह प्रयास किसी के लिए कुछ भी कठिन नहीं है। कोई भी व्यक्ति अपने को क्रमशः अधिक शिष्ट सभ्य बनाता चल सकता है। असभ्यता और उद्दण्डता अपनाने में जितनी धृष्टताएँ मनुष्य को अपनानी पड़ती हैं, उनमें से एक अंश भी आत्मा के लिए आड़े नहीं आता। यह मार्ग सरल और चलते रहने वाले के लिए सफलताप्रद भी है। धीमी या तेज चाल से चलने वाला देर सबेर में अपने गन्तव्य तक पहुँचकर ही रहता है।

उद्विग्न करने वाली असफलताएँ वे होती है जो वैभव या विलास से संबंधित हों। वासना और तृष्णा का कोई अन्त नहीं वह जितनी भी मिलती जाय वे कम ही प्रतीत होती हैं, क्योंकि जैसे ही एक एक सीमित मात्रा हस्तगत हुई वैसी ही तत्क्षण उससे अधिक बड़ी कामना सिर पर आ सवार होती है और पिछली उपलब्धियों की प्रसन्नता का आनन्द उठाए बिना ही नई नई कामना की पूर्ति के लिए असंतोष सिर पर आ सवार होता है। इस तूफान में अपना रचनात्मक प्रयोजन पूरा कर सकने वाले का संतुलन गड़बड़ा जाता है और अधिक चिन्ता इस बात की लगती है कि अधिक वैभववान कैसे बना जाय? अधिक और ऊँचा उपभोग करने का अवसर कैसे मिले?

उपलब्धियाँ और विभूतियाँ हस्तगत करने के लिए लोगों को तपश्चर्या स्तर के प्रयास करने पड़े हैं। इतिहास साक्षी है कि बड़ी सफलता प्राप्त करने के लिए महापुरुषों ने अपने व्यक्तित्व को गढ़ा है। स्वभाव को सज्जनोचित बनाया है और धैर्यपूर्वक अपने लक्ष्य में इस प्रकार तन्मय बनाया गया है कि एक समय में एक बात ही सामने रहे। अर्जुन के मत्स्यवेध की तरह जो लोग अपने छोटे या बड़े काम में तादात्म्य हो जाते हैं, उन्हीं में उतना चुम्बकत्व उत्पन्न हो जाता है कि अभीष्ट मनोरथ को समीप देख सकें।

इसके विपरीत जो असंगत कल्पनाएँ करते रहते हैं वे समय का, मनोयोग का, एक बहुत बड़ा और महत्वपूर्ण अंश ऐसे ही बरबाद कर देते हैं। बदले में क्रोध के अतिरिक्त और कुछ हाथ नहीं लगता। कामुकता की दिशा में स्वच्छन्द उड़ाने उड़ने वाले जीवित व्यक्तियों में से किसी को भी दुराचार के लिए सहमत मानकर चलते हैं। निकटस्थ, दूरस्थ, परिचित, अपरिचित, इच्छुक, अनिच्छुक में वे कोई अन्तर नहीं कर पाते। दूसरे की सहमति प्राप्त करने की मंजिल कितनी लम्बी है यह भी नहीं सोच पाते वरन् सर्वग्रही बनकर इतना भर सोचते हैं कि यह सारा संसार हमारे ही उपयोग के लिए बना है। सोचने की हर किसी को छूट है पर प्राप्ति के मार्ग में हजार अड़चने हैं। शासन, समाज, अवसर अन्तःकरण आदि के प्रतिरोधी बनकर खड़े हो जाने पर सारे शेखचिल्ली वाले सपने धूल में मिल जाते हैं। असफलता हाथ लगती है। यह स्थिति दिन-दिन अधिक स्पष्ट होती जाती है। इस प्रकार सँजोये हुए सपने उसी प्रकार उड़ जाते हैं जैसे हल्की बदली को तेज हवा कहीं से कहीं उड़ा ले जाती है। तब प्रतीत होता है कि पाले हुए तोते हाथ से उड़ गये।

कामुकता की तरह ही धन वैभव की अभिलाषा है। समय, श्रम, ज्ञान और प्रयास का सम्मिलित स्वरूप धन है। जो उचित मूल्य चुकाने पर पाया जाता है वही फलता फूलता है पर जो ठगी, प्रपंच, धूर्तता, पाखण्ड, अनाचार अपनाकर किसी प्रकार,किसी मात्रा में संग्रह कर लिया जाता है वह देर तक ठहरता नहीं। जैसे कमाई होती है, वैसा ही रास्ता बना लेती है। जेबकतरे, जुआरी, उचक्के, लुटेरे जिन्दगी में ढेरों धन इन कुकृत्यों द्वारा प्राप्त कर लेते हैं पर वह राशि दुर्व्यसनों, अपव्ययों में इस प्रकार उड़ जाती है मानों जमीन पर फैला हुआ पेट्रोल हवा लगते ही ऊपर आसमान में उड़ गया हो। इस प्रकार वैभव एकत्रित करने वाले देखते हैं कि उनके सामने या पीठ पीछे वह धन किस तरह अवाँछनीय मार्गों द्वारा उड़ कर समाप्त हो गया, बदले में बुरी आदतें और बदनामी भर पल्ले बँधती है, इतनी मजबूती के साथ कि उनकी कालिख जिन्दगी भर किसी प्रकार न छूट सकें। यशस्वी बनने की, वाहवाही लूटने की ललक कितनों पर भी सवार हो जाती है। वे नेता, बड़े आदमी, प्रख्यात, बहुचर्चित बनना चाहते हैं। साथ ही यह भी सोचते हैं कि यह प्रयोजन आडम्बर रचने के सहारे ही पूरा हो सके। इस प्रकार किसी अंश में कोई कुछ प्राप्त भी कर ले, तो भी वस्तुस्थिति प्रकट होने पर छद्म खुलता है और आरंभ में जितनी प्रशंसा हस्तगत हुई थी उससे अनेक गुनी निन्दा और घृणा सिर पर लदती है। वह इतनी भारी होती है कि जीवन भर लदी रहती है और दुबारा वैसा ही कोई प्रपंच रचने के लिए गुंजाइश नहीं छोड़ती।

चापलूसों, चाटुकारों के द्वारा प्राप्त की गई सस्ती वाहवाही केवल मुँह के सामने ही टिकती है। पीठ फेरते ही उसका मुखौटा उतर जाता है और निन्दा, उपहास,तिरस्कार के रूप में उसका तत्काल रूप बदल जाता है। ऐसी मिथ्या सस्ती वाहवाही लूटने वाले को मूर्ख समझा जाता है। दूसरे उस मूर्खता भरी हवस को क्षणिक उत्साह देने के लिए उन्हीं लोगों द्वारा लूटा जाता है, जो चापलूसी करने भर से अपनी मित्रता का मूल्य चुका देते हैं।


आन्दोलन को मूर्धन्य मान्यता (Kahani)

वेडेन पावेल अध्यापक थे। अध्यापन को वे पेशे के रूप में नहीं प्रयोगशाला संचालक के रूप में उपयोग करते हैं। छात्रों को अधिक सुयोग्य एवं सुसंस्कारी बनाने के लिए वे निरन्तर प्रयोग करते रहे।

उनने अपने लम्बे प्रयोगों में ‘स्काउटिंग‘ की विधि व्यवस्था विकसित की। यह प्रयोग बहुत सफल पाया गया। अनेक देशों का ध्यान इस प्रयोग की ओर गया उसकी सर्वत्र सराहना हुई। संसार भर में उसकी शाखा प्रशाखाएँ खुलीं। अन्तरीय शिक्षा प्रयोगों में स्काउट आन्दोलन को मूर्धन्य मान्यता मिली।


क्षमता अर्जित करने का सामर्थ्य (Kahani)

पादरी आगस्तीन ने एक नया गिरजा बनवाया। एक चित्रकार को बुलाकर प्रवेश द्वारा पर मृत्यु का बड़ा चित्र बनाने का आदेश दिया।पादरी का कथन था-जो मृत्यु का स्मरण न करेगा वह ईश्वर के दरबार में प्रवेश न कर सकेगा। चित्र बनकर तैयार हो गया। मौत के हाथ में तेज धार वाला कुल्हाड़ा था। पादरी ने पूछा यह क्यों? चित्रकार ने कहा-मौत सबको काट पीट कर रख देती जो है।

पादरी ने सुधार का निर्देश दिया और कहा “कुल्हाड़ा हटाकर उसके स्थान पर चाबी भर मौत के हाथ में थमा दो।”चित्रकार ने परिवर्तन का कारण पूछा तो संत आगस्तीन ने यही कहा “मृत्यु किसी को नष्ट नहीं करती। परिवर्तन का एक उपयोगी द्वार भर खोलती है।”

अनीति से कमाने वाले दूसरों द्वारा ठगे जाते हैं क्योंकि उनके संबंध में किसी को भी यह विश्वास नहीं होता कि यह न्यायोपार्जित धन है। जो बेईमानी से कमाया गया है, उसे बेदर्दी से खर्च करने में किसी को कोई बुराई प्रतीत नहीं होती। “वेश्या की कमाई पर भडुए गुलछर्रे उड़ाते रहते हैं” इस उक्ति को तब भली प्रकार चरितार्थ होते देखा जाता है जब अनीति की कमाई कई दूसरे अनैतिक लोगों द्वारा जिस-जिस प्रकार उड़ा ली जाती है।

महत्वाकांक्षाएं बुरी नहीं, पर उन्हें पूरा करने के लिए उपयुक्त क्षमता अर्जित करने का सामर्थ्य अपनाना चाहिए। जो तिकड़म भिड़ाकर उपलब्धियाँ हस्तगत करने के फेर में रहते हैं वे अपना चरित्र और चिन्तन दोनों ही गड़बड़ा लेते हैं। उनका व्यक्तित्व दो कौड़ी का बनकर रहता है।


वेदना निवारण में योग की प्रभावी भूमिका

गीता में योग को दुखों से मुक्ति दिलाने वाला कहा गया है- “योगो भवति दुःखहा।” महाभारत युद्ध के प्रारंभ में अर्जुन की स्थिति वेदना से परिपूर्ण थी,उसका वह अन्तर्विषाद ही योग का प्रथम चरण बना था। आज भी योगाभ्यासों से वेदना से मुक्ति पाना असंदिग्ध है। योगासनों के अभ्यास से रोगों पर नियंत्रण ही नहीं, वरन् उन पर विजय भी प्राप्त की जा सकती है। विभिन्न शारीरिक एवं मानसिक बीमारियों में अधिकाँश का उपचार योगासनों से संभव है।

आपाधापी भरे इस युग में तनावों से ग्रस्त आज का मानव अकारण चिन्ता,भय एवं अनिद्रा रोग को आमंत्रित कर लेता है। नींद लाने के लिए नशीली दवाओं का प्रयोग करता है जिनसे क्षणिक आराम भर मिलता है। पीछे शारीरिक,मानसिक दर्द एवं वेदना और अधिक बढ़े हुए प्रतीत होते हैं। तनाव तो दूर होता नहीं, शरीर एवं मन को विश्राम भी नहीं मिल पाता, उलटे विषैली-नशीली दवाओं के दुष्प्रभाव परिलक्षित होने लगते हैं। तीव्र औषधियों की प्रतिक्रिया स्वरूप अनेक अन्यान्य छोटे-बड़े रोगों का जन्म हो जाता है। फलतः व्यक्ति का वेदना से मुक्ति पाने के लिए इन दवाइयों की शरण जाना मृगतृष्णा ही सिद्ध होता है।

वस्तुतः वेदना का स्वरूप उतना हानिकारक एवं दुखद नहीं होता जितनी कि उसकी कल्पना कर ली जाती है। वेदना के अभाव में सुख की अनुभूतियाँ भी फीकी पड़ जाती हैं। दुख-दर्द आदि से मुक्त होने, वेदना से त्राण पाने के लिए यह आवश्यक है कि उसकी मिथ्या काल्पनिक भयंकरता भरी मनोभूमि न बनायी जाय। शारीरिक, मानसिक एवं भावनात्मक स्तर पर जीवन में दुख, द्वन्द्व वेदना आदि को सहजता से स्वीकार करते चले जाने जैसी योगियों जैसी मनोभूमि बना लेने से उनसे मुक्ति ही नहीं मिलती, वरन् मानवी चेतना भी विकसित होती है।

योग विद्या विशारदों का कहना है कि योग के माध्यम से विभिन्न प्रकार की शारीरिक, मनोकायिक, मानसिक एवं भावनात्मक पीड़ाओं पर काफी हद तक नियंत्रण प्राप्त किया जा सकता है। शारीरिक, मानसिक तनावों को तो साधारण योगाभ्यास से ही दूर किया जा सकता है। आसनों के नियमित अभ्यास से शारीरिक तनाव दूर होते हैं। आंतरिक वेदनाओं को कम करने में प्राणायाम, शिथिलीकरण, ध्यान, सम्मोहन आदि की प्रक्रियायें बहुत कारगर सिद्ध होती हैं। योगाभ्यासपरक इन सामान्य सी दिखने वाली प्रक्रियाओं द्वारा मस्तिष्कीय स्नायु तंतु इस प्रकार व्यवस्थित हो जाते हैं कि पीड़ायें-व्यथायें दूर हो जाती हैं।

यौगिक क्रियाओं जैसा ही प्रभाव बायोफीडबैक आदि का होता है। यंत्रों द्वारा यौगिक प्रक्रिया सीखकर भी वेदना से मुक्ति पायी जा सकती है। इस संदर्भ में अनुसंधान कर रहे न्यूयार्क के माटेफाय हास्पिटल के मूर्धन्य चिकित्सा विज्ञानी डॉ. एन.जे. मारकास का कहना है कि बायोफीडबैक पद्धति के साथ-साथ शिथिलीकरण अभ्यास बहुत शीघ्र परिणाम प्रस्तुत करता है। इसी तरह के प्रयोग-परीक्षण शिकागो का ‘द डायमंड हेडेकक्लीनिक’ के शोधकर्मियों ने किया है। उनने लगभग 500 रोगियों पर बायोफीडबैक का उपयोग करके उनके स्नायुविक बीमारियों, सिरदर्द आदि को दूर करने में सफलता प्राप्त की है। बायोफीडबैक पद्धति में चेतना को किसी अंग विशेष या क्रम से शरीर के विभिन्न अंगों पर केन्द्रित करते चले जाते हैं। स्व संकेत परक यह प्रक्रिया अपने प्रति सजग होने का अभ्यास सिखाना है। भौतिक उपकरणों की सहायता से लोगों को ऐसा करने में सुविधा भी होती है। स्नायुविक दर्द, वेदना आदि विषयों पर पिछले दिनों मोंट्रियल में चिकित्सा विशेषज्ञों एवं मनोवैज्ञानिकों का सम्मेलन हुआ। उसमें विचार मंथन के उपरान्त यही निष्कर्ष निकला कि अपने प्रति अधिकाधिक सजग हो जाने से पीड़ा बहुत कम हो जाती है। योगाभ्यास, बायोफीडबैक, सम्मोहन आदि पर हुए अनुसंधानों का सार संक्षेप प्रस्तुत करते हुए, इन्हें वेदनायें दूर करने में उपयोगी बताया गया है।

मास्को के इन्स्टीट्यूट आफ जनरल साइकोलॉजी के सुप्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक जी.एन. क्राइजेन्पेन्सकी का कहना है कि योगाभ्यासपरक प्रक्रियायें आन्तरिक ऊर्जा की अभिवृद्धि करने एवं चेतना के विकास के लिए बहुत उपयोगी हैं। योगासनों द्वारा मस्तिष्क सहित समूचे तंत्रिकातंत्र पर नियंत्रण साधा और उन्हें सुव्यवस्थित किया जा सकता है। उनके अनुसार वेदना का मुख्य कारण निराशा एवं आत्म विश्वास की कमी है। अपनी आन्तरिक क्षमता पर विश्वास न होने के कारण ही व्यथा-वेदनाओं की उत्पत्ति होती है। कोलंबिया विश्वविद्यालय में अनुसंधानरत वैज्ञानिक डॉ. जे.एस. लिफ्टन एवं डॉ. जे.जे. मारकैन ने भी इसी तरह के निष्कर्ष एक सौ रोगियों का अध्ययन करके प्रस्तुत किये हैं। इन रोगियों में अधिकाँश निराशा से पीड़ित थे। इनका कथन है कि योग के अभ्यास से आत्मविश्वास उत्पन्न होकर जीवनी शक्ति का विकास होता जाता है जिसके फलस्वरूप निराशा,दुख एवं अंतर्वेदना पर नियंत्रण पा सकना शक्य हो जाता है।

विभिन्न प्रकार के मानसिक रोगों में मानसिक खिन्नता भी एक प्रकार का रोग है, जो व्यक्तियों में दो तरह से देखने को मिलती है। पहले प्रकार का रोगी कभी बैठा रहता है, कभी रोता है,कभी हँसता है तो कभी चिल्लाता है। उसकी मनःस्थिति में असामान्य रूप से परिवर्तन होने से उसकी मनःस्थिति उसके नियंत्रण से बाहर हो जाती है। दूसरे प्रकार के रोगी जिन्हें अपनी खिन्नता के बारे में खुद पता नहीं रहता वे ऊँची-ऊँची कल्पनायें करते रहते हैं और प्रायः विभ्रम में पड़ जाते हैं। इस प्रकार के रोगों में प्रायः जो उपचार काम में लाये जाते हैं, उनमें बिजली के शाक एवं ट्रैंक्यूलाइजर्स प्रमुख हैं। लेकिन इनसे शरीर के अन्दर पाये जाने वाले रासायनिक असंतुलन जो खिन्नता के प्रमुख कारण हैं, ठीक नहीं होते। उलटे रोगी की स्मरणशक्ति तक समाप्त होती देखी गयी है। दोनों प्रकार की खिन्नता के रोगियों का उपचार योगासनों से सरलतापूर्वक किया जा सकता है। योगासनों से अंतःस्रावी ग्रंथियों से स्रवित होने वाले हारमोन रसायनों का असन्तुलन दूर हो जाता है जिसके परिणाम स्वरूप मानसिक खिन्नता आसानी से दूर हो जाती है।

मानसिक रोगों के शमन में ध्यान योग को बहुत लाभकारी पाया गया है। हार्वर्ड मेडिकल स्कूल के वैज्ञानिकों ने ध्यान का शरीर और मन पर पड़ने वाले प्रभावों पर गंभीरतापूर्वक अध्ययन अनुसंधान किया है। उनका निष्कर्ष है कि मानसिक विकारों,तनावों से मुक्ति पाने-शान्ति प्राप्त करने के लिये दवाओं की अपेक्षा ध्यान अधिक उपयोगी एवं प्रभावी है। फ्राँस के सुप्रसिद्ध मनोचिकित्सक डॉ. बैर्थेलेयर ने भी योगाभ्यासियों पर किये गये परीक्षणों से निष्कर्ष निकाला है कि ध्यान एवं अन्यान्य यौगिक प्रक्रियाओं के नियमित अभ्यास से वेदनाओं का निराकरण होता एवं मानसिक शक्ति का विकास होता है। पाया गया है कि योगाभ्यासी व्यक्ति आशावादी दृष्टिकोण से सम्पन्न होता जाता है। उसकी श्वास-प्रश्वास प्रक्रिया सुसंतुलित हो जाती है। फलतः प्राणशक्ति के अभिवर्धन के साथ ही व्यक्ति दर्द से, वेदना से छुटकारा पा लेता है। वृद्धों में भी नवीन शक्ति, स्फूर्ति, आशा और उत्साह परिलक्षित होने लगता है। शारीरिक रोगों के साथ-साथ लोगों को मानसिक रोगों से छुटकारा पाने में भी योगाभ्यास बहुत सहायक सिद्ध हुआ है। इसे नियमिततापूर्वक अपनाकर मनुष्य बुढ़ापे में भी शारीरिक-मानसिक आरोग्य का भरपूर लाभ उठा सकता है।


चमत्कारी कहा जा सके (Kahani)

हजरत अबूबक सिद्धीकी मदीना के खलीफा बनाये गये। प्रश्न यह उठा कि उनको निर्धारित वेतन कितना मिले।

चूँकि उनके पूर्ववर्ती खलीफी का कोई वेतन नियत न था। वे आवश्यकतानुसार खर्च ले लिया करते थे। कोई नियत निर्धारण न था पर अब तो एक परम्परा बनाने की आवश्यकता पड़ी।

हजरत से कहा गया कि वे ही अपना वेतन निर्धारित कर लें। उनने उत्तर दिया इस क्षेत्र के साधारण मजदूरों को जो वेतन मिलता है वह ही मेरी भी नियत कर दिया जाय।

योग साधनाओं में ध्यान की विभिन्न साधनायें, आसन, प्राणायाम आदि विभिन्न प्रकार के अभ्यास इस दृष्टि से बनाये गये है जिससे शरीर के उन अवयवों तक की मालिश हो जाती है साधारण व्यायाम जिन पर प्रभाव नहीं डाल पाते। मर्मस्थलों में छिपी शक्तियों को उन्नयन करना,उभारना और उनका लाभ लेना इन क्रियाओं का उद्देश्य है। इनके द्वारा बुरी आदतों एवं कुसंस्कारों को,जो नाना प्रकार की व्यथाओं-वेदनाओं की जड़ है उनको बदल कर उनके स्थान पर स्वस्थ आदतों एवं सुसंस्कारों की स्थापना की जा सकती है।, इससे न केवल मन की कमजोरियाँ दूर होती है,वरन् प्रसुप्त पड़ी अंतःशक्तियाँ धीरे-धीरे जाग्रत एवं विकसित होकर ऐसे सत्परिणाम प्रस्तुत करती है जिन्हें चमत्कारी कहा जा सके।


आरुणि से उद्दालक

आज प्रातः से ही मूसलाधार बारिश हो रही थी, मानो जेठ की तपन से व्याकुल धरती आज महीनों बाद तृप्त हो रही हो।

मुनि धौम्य अपने तीनों शिष्यों आरुणि, उपमन्यु व वेद समेत कुटिया में विद्यमान थे। ऋषि इस वर्षा को देख गदगद हो रहे थे और सोच रहे थे कि इस वर्ष फसल काफी अच्छी होगी, किन्तु रह-रह कर उन्हें एक चिन्ता भी खाये जा रही थी कि कहीं घनघोर बरसात से खेत की मेंड़ न टूट जाय। फसल बोयी जा चुकी थी। पौधे भी उग आये थे। यदि जल निकल जाता है, तो पौधे सभी सूख जायेंगे और मन की पुलकन कल की सिहरन में बदल जायेगी। इसी द्वन्द्व में वे खो-से गये थे। तभी “आचार्य” शब्द से उनकी चिन्तन-शृंखला टूटी। वे जैसे सोये-से जगे। सम्बोधन आरुणि का था। वे कह रहे थे कि इस खुशी के अवसर पर आपके हृदय में कौन-सा शूल चुभ रहा है, जिसके कारण इतने गंभीर हो उठे हैं।

मुनि धौम्य ने कहा “वत्स! बात ही कुछ ऐसी है, मुझे परेशान कर रही है।”

तात्! आप आज्ञा तो करें मैं आपका कष्ट दूर करने का हर संभव प्रयास करूंगा।” आरुणि का दृढ़ता भर स्वर उभरा।

“अच्छा।” गुरु के चेहरे पर फैले विषाद को चीरते हुए मुसकान की एक हल्की रेखा उभर आयी।

“तो सुनो” गुरु का सम्बोधन था-”मुझे भय इस बात का हो रहा है कि इस तीव्र बारिश में खेत की मेंड़ न टूट जाय। यदि ऐसा हुआ, तो फसल सूख जायेगी। सोचा था इस साल अच्छी बरसात से अच्छी उपज होगी,पर अब संकट दूसरा ही सामने उपस्थित हो गया है।”

“बस इतनी सी बात के लिए आप इतने चिन्तित हैं।” आरुणि का स्वर था- “मैं आपकी परेशानी अभी दूर किये देता हूँ।”

“सो कैसे?” आचार्य ने प्रश्न किया।

“मेंड़ को बाँध कर।” उत्तर मिला।

“वत्स! तीव्र जल-प्रवाह को रोक पाना कोई आसान काम नहीं है।” गुरु मानो शिष्य के अन्तराल में झाँक कर उसके मन को पढ़ने का प्रयास कर रहे थे।

“सो तो ठीक है, पर प्रयत्न करना भी तो मनुष्य का कर्तव्य है। यदि वह हाथ पर हाथ धर कर बैठ जाय, तो भी तो बात बनने वाली है नहीं।”

गुरु की परीक्षा जैसे पूर्ण हुई, किन्तु फिर भी उन्हें पूरी संतुष्टि न मिली। एक और पासा फेंक कर शिष्य के मन को उन्होंने टटोलने का प्रयास किया।

“बेटे आरुणि।” धौम्य कह रहे थे -”तुममें उत्साह भी है, लगन और क्षमता भी, पर मेरा मन इस घनघोर वर्षा में तुम्हें बाहर भेजने का हो नहीं रहा है। डर यह लग रहा है कि बरसात में भीग जाने से तुम्हें ज्वर अथवा सन्निपात न हो जाय। हृदय इन्हीं शंका-कुशंकाओं से सम्प्रति भर उठा है।”

आरुणि समझ गये कि उन्हें कसौटी पर कसा जा रहा है। उनकी परख की जा रही है कि शिष्य सौ टंच खरा है या नहीं। धौम्य के प्रति तो उनकी निष्ठ अपूर्व थी ही और विश्वास यह था कि इन महान गुरु के सम्मुख इन क्षुद्र व्याधियों की क्या बिसात, जो अपने पाश में बाँध लें।

उनने कह दिया-”आचार्य! आपके रहते मेरा कौन क्या बिगाड़ सकता है। बस आपका आशीर्वाद चाहिए।”

रहस्यमय हल्की मुसकान के साथ आशीर्वाद की मुद्रा में धौम्य का हाथ उठ गया। शिष्य ने सिर नवाकर प्रत्युत्तर दिया।

वर्षा कुछ थमी, तो तीनों शिष्य अपने अपने कार्य के लिए निकल पड़े। आरुणि ने फावड़ा उठा कर खेत की राह ली। उपमन्यु गौवें चराने निकल पड़े। वेद के जिम्मे लकड़ी लाना और भोजन पकाना था, सो वे भी कुल्हाड़ी लेकर सूखी लकड़ी की तलाश में निकल पड़े।

आरुणि जब खेत पर पहुँचे तो देखा कि एक जगह से मेंड़ टूट कर पानी तेजी से बाहर निकल रहा है। उन्होंने फावड़े से आस-पास की गीली मिट्टी काट-काट कर उस स्थान पर डालना आरंभ किया, पर शायद गुरु की परीक्षा अभी पूर्ण न हुई थी। जब वे एक बार मिट्टी डाल कर दुबारा डालने आते तो पहले की मृत्तिका बह चुकी होती। लम्बे समय तक उनका यह उपक्रम चलता रहा, पर जब तीव्र प्रवाह को रोक सकने में उनका यह प्रयत्न निष्फल रहा तो कुछ क्षण तक खड़े रह कर बहाव को रोकने की कोई दूसरी युक्ति सोचते रहे। अचानक उन्हें एक उपाय सूझा कि क्यों न मेंड़ पर स्वयं लेट कर बहती धारा को रोक दिया जाय। उसके बाद उन्होंने वैसा ही किया।

जल-प्रवाह रुक गया।

इधर रुक-रुककर लगातार वृष्टि हो रही थी, कभी तेज, कभी धीमी सन्ध्या घिर आयी। उपमन्यु और वेद अपने-अपने काम से वापस लौट आये। और अध्ययन में जुट पड़े। उन्हें आरुणि की अनुपस्थिति का आभास तो हुआ, पर यह सोच कर उस ओर अधिक ध्यान न दिया कि आरुणि अपने कार्य से निवृत्त हो हम लोगों से पहले लौट आये हों एवं किसी अन्य कार्यवश आचार्य ने शायद उन्हें बाहर भेज दिया हो।

शाम से रात्रि घिर आयी। मुनि धौम्य ने शिष्यों को भोजन के लिए पुकारा। उपमन्यु और वेद उपस्थित हो गये। आरुणि को वहाँ नहीं देख ऋषि ने उनके बारे में पूछा। अब दोनों को चेतना आयी। वे एक-दूसरे की ओर देखने लगे, जैसे प्रश्न कर रहे हों “तो क्या आरुणि खेत से वापस अब तक नहीं लौटे?”

दोनों को मौन देख कर आचार्य ने प्रश्न किया-”आखिर बात क्या है? तुम दोनों इस प्रकार मौन क्यों हो? आरुणि कहाँ है?”

दोनों साथ-साथ बोल पड़े “देव! आपने ही तो उन्हें प्रातः खेत पर भेजा था।”

“तो क्या तब से वह वापस लौटा ही नहीं?” आचार्य ने विस्मय भरी प्रश्नवाचक दृष्टि उन दोनों पर डाली।

“शायद नहीं।” उपमन्यु का उत्तर था “यदि लौटा होता, तो वह यहीं होता। हम लोगों ने तो यह समझा था कि आपने किसी अन्य कार्य से उन्हें पुनः कहीं बाहर भेज दिया हो। यही सोच कर चुप थे, किन्तु अब ज्ञात हुआ कि वे अब तक सुबह से लौटे ही नहीं हैं।”

“ओह!” मानों आचार्य के हृदय में काँटे चुभ गये हों और मर्माहत दिल से अनायास यह पीड़ा बोधक ध्वनि फूट पड़ी हो।

इस बीच जल-वृष्टि शान्त हो चुकी थी। आचार्य ने हाथ में मशाल ली और दोनों शिष्यों से कहा “चलो उसे ढूँढ़े। बेचारा न जाने कहाँ किस स्थिति में पड़ा होगा। कहीं कुछ अनिष्ट तो नहीं हो गया। मन शंका-शंकित हुआ जा रहा है। ऋषि धौम्य की अकुलाहट भरी वाणी उभरी।

उपमन्यु और वेद भी ऐसी ही चिन्तन-धारा में बहे चले जा रहे थे। अनिष्ट की आशंका से रह-रह कर उनका हृदय काँप उठता। अन्ततः खेत आ पहुँचा। मशाल की रोशनी में सभी ने उन्हें ढूँढ़ना प्रारंभ किया


दो शिष्य (Kahani)

दो शिष्य थे- एक गुरु। दोनों रात्रि को गुरुदेव के चरण दबाते। उनने अपने -अपने पैर बाँट लिए थे। एक के हिस्से में बायाँ और दूसरे को दायाँ।

एक दिन एक शिष्य कहीं चला गया। दूसरे ने सिर्फ अपने वाला पैर दबाया। दूसरा पैर पहले के ऊपर आ गया तो उसने पास का डंडा उठा कर जड़ दिया, मुझे दूसरे के पैर से क्या वास्ता? वह मेरे पर इस प्रकार क्यों चढ़े?

गुरु को चोट लगी और तिलमिला गए। उस अनाड़ी को डाँटते हुए बोले। बँटवारा तो तुम लोगों ने किया है। पैर तो दोनों ही मेरे हैं। चोट पहुँचाने से तो मैं ही आहत होता हूँ।

सभी मनुष्य परमेश्वर की संतान हैं। अपने पराए के बीच किसी को भी चोट पहुँचाना स्रष्टा को आहत करना है।

पर दूर-दूर तक कोई व्यक्ति दिखाई नहीं पड़ा। इस बरसाती रात में अपने झोंपड़े से निकलता भी क्यों। जब कुछ भी अता-पता न चला, तो अन्त में आचार्य ने तेज आवाज लगायी “बेटे आरुणि! तुम कहाँ हो वत्स हम तुम्हें खोज रहे हैं?”

सन्नाटे को चीरती हुई खेत के दूरस्थ कोने से आवाज उभरी “मैं यहाँ हूँ देव!”

वाणी का अनुसरण करते हुए सभी उस दिशा की ओर चल पड़े, जिधर से स्वर निःसृत हुआ था। वहाँ का दृश्य देखा, तो सभी स्तम्भित रह गये। मुनि धौम्य शिष्य की कर्तव्यपरायणता और स्वयं के प्रति आरुणि की निष्ठा देख भाव-विह्वल हो उठे। उन्होंने शिष्य को उठा कर गले से लगा लिया।

यों तो वर्षा थम चुकी थी, पर अब गुरु की बारी थी, उनकी आंखें लगातार मेघ-वर्षा कर रही थी और शिष्य उस निर्झरणी में सराबोर हुआ चला जा रहा था।

दृश्य अत्यन्त कारुणिक था। दोनों देर तक आलिंगनबद्ध रहे। भाव का अतिरेक कुछ कम हुआ, तो गुरु ने भर्राये गले से कहा-

“वत्स! आज मैं तुम्हारी कर्तव्यनिष्ठ से अत्यन्त प्रसन्न हूँ और वह सब कुछ प्रदान करना चाहता हूं, जिसकी विभूति-अनुभूति लोग वर्षों की कठोर साधना के उपरान्त भी कदाचित ही कर पाते हैं।”

इतना कह ऋषि धौम्य ने प्यार से आरुणि के सिर पर हाथ फिराया, एक बार पुनः अपने बाहुपाश में जकड़ लिया, मानो प्राण-प्रत्यावर्तन की क्रिया चल पड़ी हो। थोड़ी देर पश्चात् जब ऋषि की भाव चेतना लौटी, तो शिष्य को संबोधित कर कहा-”आज से तुम आरुणि से उद्दालक हो गये। इस नाम की सार्थकता बनाये रखना।”

स्वीकृति में शिष्य ने सिर हिला दिया और भूमिलुण्ठित होकर प्रणिपात किया।

अब मुनि एक और खड़े यह सब दृश्य देख रहे उपमन्यु और वेद की ओर मुड़े। भूमि में गड़ी मशाल की लौ में उनके चेहरे चमक उठे। गुरु ने देखा कि उनकी आंखें भी अश्रुपूरित हो चली थीं।

“पुत्रों!” गुरु के अवरुद्ध कण्ठ से निःसृत स्वर था- “तुम अपना दिल छोटा न करना। तुममें अभी कुछ कमियाँ शेष हैं। कर्तव्य कर्म निभाते हुए जब तुम जीवन-साधना का अन्तिम चरण पार कर लोगे, तो तुम भी उसके अधिकारी बन जाओगे, जिसका आरुणि बना, पर शायद तब तक मेरा यह स्थूल शरीर न रहे।” देखो न, कभी की यह सुदृढ़ देहयष्टि अब कैसी जीर्ण-शीर्ण और कमजोर हो चली है, किन्तु तुम लोग अपने सौंपे दायित्व में तनिक भी कोताही नहीं बरतना और सिद्धाँतों के प्रति निष्ठ बनाये रखना। इस पंच भौतिक ढकोसले के न रहने पर भी मैं तुम लोगों की काया के साथ छाया की भाँति मौजूद रहूँगा एवं हर प्रकार की सहायता करने के लिए सदा तत्पर बना रहूँगा। फिर जब तुम्हारी जीवन-साधनापूर्ण हो जाये और खरे सुवर्ण की भाँति चमकने लगो तो ऋद्धियों की यह थाती हमेशा-हमेशा के लिए तुम्हारे सुपुर्द कर दी जायेगी, जिसे मैं वर्षों से तुम लोगों के लिए यत्नपूर्वक सँजोये आ रहा हूँ।

अब वेद से न रहा गया। उनने शंका प्रकट की “तात्! क्या ऐसा भी कभी संभव हो सकता है? सूक्ष्म से स्थूल देह में शक्तियों का हस्तान्तरण!” “अवश्य” संक्षिप्त सा उत्तर मिला “यह सर्वथा असंभव भी नहीं है, पुत्र? तुम सबने हमारे लिए जीवन खपा दिया और हम तुम्हारे लिए इतना भी न करें, यह कैसे हो सकता है। पिता-पुत्र का रिश्ता तब करें, तब भी अक्षुण्ण बना रहेगा वत्स, जब मैं इस स्थूल शरीर में न रहूँ। तुम्हें दिखाई भले ही न पड़ूं, पर हमारी उपस्थिति का आभास सदा तुम्हें मिलता रहेगा।”


देव संस्कृति की थाती (Kahani)

उदयसिंह तब छोटे थे इसलिए उनके बड़े होने तक के लिये बनवीर को राज्य का उत्तराधिकार सौंप दिया पर उसके मन में लोभ आ गया। उसने उदयसिंह और विक्रमसिंह को मार डालने का निश्चय किया।

उदयसिंह की माँ का देहान्त हो चुका था। उनका पालन-पोषण पन्ना थाय ने किया था। पन्ना का अपना पुत्र भी था जो उदयसिंह के साथ ही रहता था। एक दिन बनवीर ने विक्रमसिंह की हत्या कर दी। पन्ना को इसका पता चला तो उसने उदयसिंह को वहाँ से सुरक्षित स्थान पर पहुँचा दिया। क्रोध से भरा बनवीर उसके पास पहुँचा तो उसने अपने बच्चे को ही उदयसिंह बताकर उसका शीश कटा दिया पर कर्तव्य पर आँच नहीं आने दी।

नैतिक कर्तव्य पारिवारिक मोह-ममता से भी अधिक महत्वपूर्ण है।

एक बार पुनः गुरु के नेत्र सजल हो उठे। उनसे अविरल जल-धारा बह निकली। धौम्य शिष्यों की कृतज्ञता और श्रद्धा से भाव-विभोर हो उठे थे। उन्होंने दोनों शिष्यों के कन्धों पर हाथ रखा तथा उसी भाव-प्रवणता की स्थिति में शिष्यगण एवं गुरु चल पड़े। हमेशा की गुरु-शिष्य की चली आ रही शाश्वत परम्परा को सार्थक करते हुए, जो देव संस्कृति की थाती है।


मौत को आगे धकेला जा सकता है!

आहार-विहार की सरल सौम्य स्थिति बनाये रहने पर शरीर समर्थ, निरोग और दीर्घजीवी बनता है। ठीक इसी प्रकार सूक्ष्म शरीर को-मस्तिष्कीय चेतना को यदि विक्षोभों, उत्तेजनाओं और आवेशों के झंझट दचके लगने से बचाया जा सके और सरल संतोषी हँसता-खेलता हलका-फुलका मन रखा जा सके, तो मानसिक स्वास्थ्य ठीक बना रहेगा और उस स्थिति में शरीर के स्वस्थ, सुन्दर, स्फूर्तिवान रहने से भी अधिक ऊँचे स्तर का आनंद-उल्लास अनुभव किया जा सकेगा। अपने आप में प्रसन्न सन्पुष्ट रहना, आशान्वित और उल्लसित अनुभूतियों का रसास्वादन करते रहना कितना सुखद होता है, इसे अनुभवी ही जानते हैं।

रोग उत्पन्न करने वाली अस्वच्छता, अविवादिता एवं आवेशग्रस्तता से यदि बचे रहा जा सके तो शरीर की अन्तःशक्ति चिरकाल तक अक्षुण्ण बनी रह सकती है। आरोग्यशास्त्र के नवीनतम अनुसंधानों ने अब यह सिद्ध कर दिया है कि शारीरिक स्वास्थ्य वस्तुतः मानसिक स्वास्थ्य की प्रतिच्छाया है। मानसिक स्थिति की प्रतिक्रिया स्वास्थ्य की उन्नति एवं अवनति पर तत्काल देखी जा सकती है।

न्यूयार्क स्थित कोलगेट यूनीवर्सिटी हैमिल्टन प्रयोगशाला के मूर्धन्य मनोविज्ञानी डॉ. डोनाल्ड ए. लेयर्ड ने इस संबंध में गहन अनुसंधान किया है। उनका कहना है कि जिन व्यक्तियों को अपने जीवन में गहरा प्रेम न मिल सका अथवा वे अपने को उल्लसित न रख सके, उन्हें अपच, गठिया तथा दूसरे सिकुड़न संबंधी रोग अधिक सताते देखा गया है। चिकित्सक चाहें तो उन्हें अपना प्रेम देकर भावनात्मक रक्त संचालन कर सकते हैं और उसका वैसा ही चमत्कारी असर देखा जा सकता है। जैसा सर्वथा अशक्त रोगी की बाहरी रक्त देने पर देखा जाता है। इस तरह के उनने कितने ही प्रयोग-परीक्षण किये हैं और सफलता भी पाई है।

बालकों, युवकों और प्रौढ़ों की तुलना में वृद्धों को ही बीमारियाँ अधिक क्यों घेरती हैं? इस संदर्भ में अमेरिकन मेडिकल एसोसिएशन की एक शोष समिति ने निरन्तर सात वर्ष तक गहन अनुसंधान किया और निष्कर्ष निकाला कि-इसका प्रमुख कारण शरीरगत अक्षमता नहीं, वरन् उनके इर्द-गिर्द घिर जाने वाला वातावरण है। सबसे बड़ी कठिनाई उनके सामने तब आती है जब 55-60 वर्ष के बाद उन्हें बलात् कार्य मुक्त कर दिया जाता है। सिर पर थोपी गई बलात् अक्षमता उन्हें अयोग्य, अशक्त और निरर्थक हो जाने की अनुभूति कराती है और निराशा से ग्रसित होकर उस मनोबल को वे खो बैठते हैं जो उनकी सक्षमता और निरोगता के लिए अति महत्वपूर्ण था।

वे अपने को परमुखापेक्षी अनुभव करते हैं। सरकार पेन्शन देगी, कुटुम्बी उनकी सहायता करेंगे, वे अपने बाहुबल से अपनी नाव नहीं खे सकते, किन्हीं दूसरों की कृपा पर निर्भर रहना पड़ेगा-यह सोचते-सोचते उनका आत्मविश्वास हिल जाता है और उस हिली हुई खोखली नींव में होकर एक एक करके अशक्तताएँ और बीमारियाँ दीमकों की तरह प्रवेश करने लगती हैं। यहाँ तक कि उस व्यक्ति को समय से बहुत पहले मृत्यु के मुख में घसीट ले जाती हैं।


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धैर्य और दृढ़ता के मसाले से जीवन की इमारत बनती है। इसे शालीनता की पुताई से सुन्दर बनाया जाता है।

मनोविज्ञान चिकित्सा के निष्णात प्रो. ऐडम ने कितने ही असाध्य और कष्ट साध्य वृद्धों का उपचार किया है और उन्हें चिरकाल से चली आ रही आधि-व्याधियों से मुक्त कराया है। उनका कहना है कि जो व्यक्ति जी खोलकर हँस सकता है, उसे किसी भी रोग से छुटकारा दिलाया जा सकता है। असाध्य तो वे हैं जो हर समय उदास, निराश और खोजे हुए आवेशग्रस्त दिखाई देते हैं और मन का सदा भारी रहते है। हास्य-विनोद को अपने जीवनचर्या में सम्मिलित करके व्यक्ति अपना जी हलका-फुलका रख सकता है और व्याधियों तथा बुढ़ापे के चंगुल से बचकर ढलती हुई उम्र में भी नव यौवन का आनन्द लेता रह सकता है। झुर्रियाँ मिटाने और चेहरे पर चमक लाने का इससे अच्छा उपचार दूसरा नहीं है।

सुप्रसिद्ध मनीषी डेवी ने लिखा है कि-शरीर को सही रखने के लिए व्यायाम का, मस्तिष्क को सही रखने के लिए अध्ययन का और हृदय को सही रखने के लिए प्रेम का सहारा नहीं ही छोड़ा जाना चाहिए। यदि यह साधन संतुलित रूप से उपलब्ध होते रहें तो वृद्धावस्था और मौत दोनों ही बहुत आगे धकेले जा सकते हैं।


बड़प्पन चुनें या महानता?

उचित निर्वाह की साधन सामग्री सहज ही उपार्जित की जा सकती है। इसके विपरित संकीर्ण स्वार्थपरता में निमग्न व्यक्ति प्रायः असामाजिक और कई बार अपराधी प्रवृत्ति के भी होते हैं। ऐसे लोगों का मूल्य सर्वसाधारण की दृष्टि में गिर जाता है। फलतः वे दूसरों की सहानुभूति सहायता एवं आत्मीयता से वंचित रहने पर उपार्जन, उपभोग भी एक सीमा तक ही कर पाते हैं। उसकी छीन झपट का एक नया सिलसिला चल पड़ता है, फलतः कडुए मीठे आक्रमण करने वाले अपने-बिरानों से चमड़ी बचाना तक कठिन हो जाता है। ऐसे लोगों की सुरक्षा के अनेकों प्रत्यक्ष एवं परोक्ष उपाय सोचने पड़ते हैं। ऐसे चिन्तन एवं प्रयास में जो सुरक्षात्मक दीवार बनानी पड़ती है, वह सफल भी एक सीमा तक ही होती है, साथ ही अनेकों अन्तर्द्वन्द्व उत्पन्न करने के कारण महंगी बहुत पड़ती है। यह कठिनाई उत्कृष्टता की पक्षधर सज्जनता अपनाने में तनिक भी नहीं आती।

आदर्शवादी विचारणा और कार्य पद्धति अपनाने पर इतना हर्ज तो अवश्य होता है कि समस्त क्षमताएँ स्वार्थ साधन में ही नियोजित नहीं की जाती और इन क्षमताओं का उपयोग आत्मकल्याण एवं लोककल्याण के निमित्त भी होने लगता है। इस विभाजन से सम्पदा उतनी एकत्रित नहीं की जा सकती, जितनी कि मात्र स्वार्थपरता में ही डूबे रहने पर हो सकती थी। इतने पर भी एक बड़ा लाभ यह है कि असामान्य मात्रा में संग्रह करने के लिए जो असाधारण प्रयास करने पड़ते हैं, वे भारी भी पड़ते हैं, आदतें भी बिगाड़ते हैं और उद्धत अपव्यय की लत लगाकर अनेकानेक विग्रहों, संकटों का पथ प्रशस्त करते हैं। लालची लोग सदा असंतुष्ट, खिन्न, उद्विग्न पाये जाते हैं। असीम इच्छा की पूर्ति में जो भी व्यवधान आते हैं, वे अत्यधिक कष्टकारक लगते हैं। जितनी आतुरता उतनी खीज का मनोविज्ञान ऐसे लोगों की स्थिति को देखते हुए अक्षरशः सच पाया जाता है।

गुण-अवगुणों को कतिपय कसौटियों पर कसने के उपरान्त इसी निष्कर्ष पर पहुँचना होता है कि एकाँगी समृद्धि चमकीले साँप की तरह लगती तो आकर्षक है, पर अपने विष-दंश से असीम क्षति पहुँचाती है। इसके विपरीत व्यक्तित्व को उच्चस्तरीय बनाने का लक्ष्य निर्धारित करने पर घाटा तो इतना ही हो सकता है कि निर्वाह के अनिवार्य साधनों से संतुष्ट रहना पड़ेगा और ठाट-बाट में धनवानों जैसा सरंजाम न जुट सकेगा। इतने पर भी इस मार्ग पर चलते हुए जो संतोष और सम्मान मिलता है, उसका वैयक्तिक एवं सामाजिक मूल्य कुछ कम नहीं है। यह मूल्य इतना है जितना किसी भी स्तर की भौतिक सफलता की तुलना में कहीं अधिक भारी पाया जा सकता है। आरम्भ में सम्पदा के संबंध में सन्तोष रखने पर तथा कथित मित्र स्वजनों का उपहास सहना पड़ सकता है। इतने पर भी कितने ही व्यक्ति दूसरे हाथ से आदर्शवादी निष्ठ पर अपनी भाव श्रद्धाँजलि भी चढ़ाते देखे जाते हैं। जबकि तथाकथित धनाध्यक्षों को अपने मित्र-कुटुम्बियों के दाँव-धातों का ही पग-पग पर शिकार बनना पड़ता है।

प्रगति के दो मार्ग हैं एक बड़प्पन का, दूसरा महानता का। दोनों के अपने-अपने आकर्षण हैं। देखना यह है कि चयन का विवेक इनमें से किसका चुनाव करता है। मार्ग चुनने और उस पर चल पड़ने की हर किसी को छूट है। मनुष्य अपनी रुचि के कृत्य करता रह सकता है। उस पर विश्व व्यवस्था की रोक-थाम नहीं लगती। कोई स्वार्थी हो या परमार्थी इस पर दूसरे कुछ कहते-सुनते भले ही पाये जायें पर विवशता उत्पन्न करने वाला दबाव नहीं डाल सकते हैं। आखिर मानवी स्वतंत्रता भी तो कोई वस्तु है। उसके भौतिक अधिकारों का भी तो कोई मूल्य है। उनका उपयोग हर कोई प्रसन्नतापूर्वक करता है। समाज या शासन द्वारा रोकथाम तब की जाती है जब आचरण दूसरों के साथ टकराने लगे एवं सर्वजनीन बाहरी दबाव पड़ने जैसी कोई बात नहीं है। परामर्श, अनुरोध, आग्रह जैसा ही कुछ संबंधियों की ओर से मिलता रहता है। इतने पर भी अन्तिम निर्णय मनुष्य का अपना ही होता है। अपनी इच्छा ही दिशा बनाती और प्रयाण के साधन जुटाती है।

बड़प्पन या महानता के दो रास्तों में से किसे चुना जाय? किसे प्रगति माना जाय? इसका उपयुक्त निष्कर्ष निकालने के लिए कुछ कसौटियाँ निर्धारित करनी पड़ेंगी और प्रमाण उदाहरणों का आश्रय लेना होगा। तुलनात्मक दृष्टि रखकर दोनों के गुण-दोष देखने पड़ेंगे। न्यायधीश यही करते हैं। वे वादी-प्रतिवादी के दोनों पक्षों का ध्यानपूर्वक सुनते समझते हैं। इसके उपरान्त तथ्यों का वर्गीकरण करके यह देखते हैं कि किस पक्ष के साथ कितना औचित्य-अनौचित्य है। इस नीर-क्षीर विवेक के उपरान्त ही वे अपना फैसला लिखते और घोषित करते हैं। महत्वपूर्ण प्रसंगों पर कोई मत बनाने से पूर्व उनके संबंध में गुण-दोष परक मंथन और विश्लेषण किया जाना चाहिए।

सम्पन्नता और महानता दोनों में से कोई भी हेय नहीं है। दोनों की ही अपने-अपने स्थान पर उपयोगिता है। शरीर पंचतत्वों का बना होने से उसकी आवश्यकताएँ पदार्थ परक है। साधन-सामग्री को ही सम्पन्नता कहते है। शरीर में निर्वाह और विनोद की माँग करने वाले अवयव लगे हैं। आहार, निद्रा, सफाई जैसे कृत्य निर्वाह परक माने जाते हैं और जीभ, जननेन्द्रिय, नेत्र, कान आदि इन्द्रियों के सहारे मन को विनोद करने के लिए भी कई साधनों की आवश्यकता अनुभव होती है। दोनों को मिलाकर उन्हें शरीरगत आवश्यकता कहा जा सकता है। इनकी उपयोगी पूर्ति के लिए सीमित साधनों से काम चल सकता है और उन्हें जुटाने के लिए थोड़ी सी सम्पन्नता से काम चल सकता है। इससे अधिक संचय या उपभोग की बात सोची जाय तो उसमें आरम्भिक आकर्षण तो लगेगा किन्तु यह विवेक न रहेगा कि उनकी कितनी मात्रा का औचित्य है और उसका उपभोग-उपयोग किन प्रसंगों में किस सीमा तक किया जाना चाहिए। आमतौर से अनौचित्य अपनाया जाता है और उससे विग्रह खड़ा होता है। स्वाद वश अधिक खा जाने पर पेट में अपच जन्य अनेकों विकृतियाँ उठ खड़ी होती हैं। इन्द्रिय लिप्सा भी एक सीमा तक ही हजम हो सकती है अन्यथा अति विलास के फलस्वरूप इन्द्रियाँ स्वयं ही नष्ट होने लगती हैं और समूची स्वास्थ्य व्यवस्था के लिए संकट खड़ा करती हैं। विलासी की अतिवादिता किस प्रकार दुर्बलता, रुग्णता और अकाल मृत्यु का सरंजाम खड़ा करती है। इसके उदाहरण पग-पग पर प्रस्तुत मिलते हैं।

उपभोग एक सीमा तक ही संभव है। सम्पन्नता के क्षेत्र में कितनी ही प्रगति क्यों न कर ली जाय उस संग्रह का उपभोग उसी सीमा तक किया जा सकता है जितना कि औसत मनुष्य करता। पेट में रोटी उतनी ही ठूँसी जा सकती है, कपड़े उतने ही पर्याप्त होते है जितने कि आमतौर से उपयोग में आते है। यदि इन पर अधिक खर्च करना हो तो परिणाम तो बढ़ नहीं सकेगा, अपव्यय पर उतारू होकर उन्हें अधिक खर्चीला भर बनाया जा सकता है। उपभोग सामग्री महती होने पर प्रयोक्ता के लिए कोई विशेष उपयोगी तो होती नहीं, मात्र दूसरों की ही आँखों में चकाचौंध उत्पन्न करती है। देखना यह है कि क्या यह चकाचौंध उत्पन्न करना लाभदायक है भी या नहीं?

वे दिन बहुत पीछे रह गये जब सम्पन्नता जन्य ठाट-बाट के अपव्यय को देखकर लोग अमीरों को ईश्वर का प्यारा, भाग्यवान, बुद्धिमान मानते और नतमस्तक होते थे। अब मूल्याँकन की कसौटियों में जमीन आसमान जितना अन्तर आ गया है। इन दिनों


व्यक्तित्व का मूल्याँकन (Kahani)

डॉक्टर राममनोहर लोहिया अपने समय के मूर्धन्य लोक नायक थे। स्वतंत्रता में संलग्न रहते उनका सारा जीवन बीता।

उनकी प्रतिभा से प्रभावित होकर अनेक लोगों ने अपनी सुयोग कन्याएँ उन्हें देने के प्रस्ताव किये। पर वे सभी को एक ही उत्तर देते रहे कि जिस लक्ष्य के लिए समर्पित रूप से व्यस्त हूँ। उसमें इतना अवकाश कहाँ कि अपनी घर गृहस्थी पर भी ध्यान दे सकूँ और उसके

लिए अलग से समय निकालने की व्यवस्था कर सकूँ।

समाजवादी, साम्यवादी चिन्तन व्यवहार में भले ही न उतर पाया हो, अर्थदर्शन के रूप में पूरी तरह लोक समर्थन प्राप्त कर रहा है। उस मान्यता के अनुरूप अधिक संग्रही, अधिक विलासी-अपव्ययी लोग नीतिवान नहीं समझे जाते।

ऐसे लोग बहुत ही कम मिलेंगे जिन्हें सम्पदा के साथ सदुपयोग की सद्भावना भी मिली है। जिन्हें मिली होगी उन्हें बड़े आदमी नहीं महामानव एवं सच्चे अर्थों में प्रगतिशीलता सम्पन्न व्यक्ति कहा जायगा। उनमें सम्पन्नता का महत्व नहीं मिलेगा, वरन् शालीनता की गरिमा को सराहा जायगा और कहा जायगा कि अमुक श्रेष्ठ पुरुष ने अपने वैभव का सदुपयोग कर दिखाया। ऐसा सम्पन्नता के कारण नहीं, वरन् सज्जनता के कारण ही बन पड़ता है। व्यक्तित्व का मूल्याँकन सम्पन्नता से नहीं वरन् सज्जनता से होना चाहिए।


व्यक्तित्व की आधार शिला विचार शक्ति

मन ही मन लम्बी-चौड़ी योजना बना लेना जितना सरल है, उतना सरल उनको मूर्तिमान करना नहीं है। जहाँ कल्पना में नित्य ही बीसियों योजनाएँ बनकर सरलतापूर्वक कार्यांवित हो सकती हैं, वहाँ यथार्थ में किसी योजना का एक अंश भी सफल हो पाना, मुश्किल हो जाता है। उसके लिए वह कार्य क्षमता, वह सहिष्णुता और दक्षता जो किसी कार्य को करने के लिए आवश्यक होती है, काल्पनिक व्यक्ति में नहीं होती। उसकी तो सारी शक्ति यों ही काल्पनिक योजनाओं में विनष्ट होती रहती है।

यह बात गलत नहीं है कि संसार के किसी भी सृजन की योजना पहले विचार क्षेत्र में ही बनती है। उसकी कल्पना मस्तिष्क में ही उठती है। उसके बाद वह वाह्य क्षेत्र में व्यक्त होती है। किन्तु मस्तिष्क के वे विचार यों ही अपने आप अभिव्यक्त अथवा मूर्तिमान नहीं हो जाते। उनके लिए ठोस कार्य करना होता है। पसीना बहाना, संघर्ष करना होता है। अपने में इतनी सहिष्णुता और धैर्य उत्पन्न करना होता है, जिससे कि असफलता के प्रभाव से बचा जा सके।

यद्यपि संसार के सारे महापुरुष जिन्होंने बड़े-बड़े काम कर दिखाए कल्पनाशील रहे हैं। यदि उनके मानस में अपनी योजना न बनती आगामी कार्यक्रम की रूपरेखा न तैयार होती तो वे व्यवस्थित रूप से किस प्रकार काम कर सकते? पहले योजना बनती है, उसकी रूपरेखा तैयार होती है और तब उसके अनुसार कदम कदम चलकर लक्ष्य तक पहुँचना होता है। यदि ऐसा न किया जाए और बिना सोचे-विचारे किसी ओर चल पड़ा, जाय, तो यह गलती ही होगी। जिस गति का कोई लक्ष्य नहीं, कोई उद्देश्य अथवा निश्चित मार्ग नहीं उसकी यात्रा व्यर्थ ही होती है। किन्तु महापुरुषों के साथ ऐसा नहीं देखा जाता। उनकी यह विशेषता है कि वे सिर्फ कल्पनाशील ही नहीं होते। विचार के साथ क्रिया का समुचित समन्वय करना भी जानते हैं। बैठे-बैठे विचार करते रहने अथवा योजनाओं के कल्पनाचित्र गढ़ते रहने की जगह वे ज्यों ही कोई विचार दृढ़ कर लेते हैं, उसको क्रियान्वित करने के लिए जी-जान से जुट पड़ते हैं। एक विचारणा अथवा योजना को पूरी करने के बाद ही दूसरी मन में लाया करते हैं।

निर्माण का आधार विचार और क्रिया का सम्मिश्रण है, सिर्फ विचार नहीं। शिल्पी का विचार उसे किसी मूर्ति का एक काल्पनिक रूप भर देता है। किन्तु उसको साकार उसके हाथ तथा औजार ही करते हैं। यदि वह अपनी मानसिक मूर्ति को ही देख-देख कर सन्तुष्ट होता रहे और अपने को शिल्पी मानता रहे तो इससे संसार का क्या काम चल सकता है। वह अपने लिए शिल्पी, कलाकार हो सकता है, संसार के लिए वह कुछ नहीं होता। संसार तो उसका मूल्याँकन उसकी उस रचना के आधार पर करेगा, जिसका निर्माण वह


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विषयों की सड़क पर दौड़ने वाली इन्द्रियाँ उन स्वेच्छाचारी घोड़ों के समान हैं, जो जीवन रूपी रथ को तोड़ डालती हैं और उसके सारथी आत्मा को पतन के गर्त में धकेलती हैं।

यथार्थ के ठोस धरातल पर पत्थर से करेगा। कोई अपनी कल्पनाओं, इच्छाओं में कितना महान है, विश्व से इसका कोई संबंध नहीं। यहाँ तो उसे उस रूप में जाना जायगा, जो रूप वह अपनी क्रिया के द्वारा उपस्थित करेगा।

क्रिया का आधार विचार ही होते हैं, किन्तु मनुष्य के सारे विचार इस कोटि में नहीं आते, बहुत से विचार व्यर्थ तथा निरुपयोगी होते हैं। मनुष्य को चाहिए कि वह विचारों को परख कर अलग कर ले। उसी को विकसित करे और उसी के आधार पर जीवन का लक्ष्य निर्धारित कर अपनी सम्पूर्ण शक्ति के साथ उसे मूर्तिमान करने में लग जाए। क्षण-क्षण में उठने वाले विचारों के माया जाल में पड़ा रहने वाला जीवन में कोई महत्वपूर्ण कार्य नहीं कर सकता। बहुधा हम किसी का आध्यात्मिक प्रवचन सुनकर प्रभावित होते और मोक्ष प्राप्ति के लिए विचार करने लगते हैं। कभी किसी राजनीतिज्ञ की उक्तियों के प्रभाव में जाकर राजनीति में बढ़ने का विचार करने लगते हैं। कभी किसी का कारोबार देखकर व्यापारी बनने की सोचते हैं, तो यदा-कदा किसी की रचना देखकर चित्रकार, साहित्यकार, शिल्पकार होने की कल्पना में डूबने उतरने लगते हैं। इस प्रकार के प्रतिपल आने वाले विचारों को, विचारों की कोटि में नहीं रखा जा सकता। यह केवल बाह्य प्रभाव अथवा विकार ही होते हैं। इनमें कोई मौलिकता नहीं होती। मौलिक विचार वही होते हैं, जो अपनी आत्मा की प्रेरणा से प्रबुद्ध होता और मूर्तिमान होने के लिए मस्तिष्क में आन्दोलन संचार करता है।

अनेक बार लोगों में मौलिक विचार नहीं भी होते, किन्तु उन्हें जीवन में कुछ कर गुजरने की इच्छा जरूर होती है। ऐसी दशा में वह यह नहीं समझ पाता कि वह क्या करे अथवा उसे क्या करना चाहिए। इस स्थिति में विचार उधार भी लिए जा सकते हैं, अथवा यों कहा जाय कि दूसरों से ग्रहण किये जा सकते हैं। दूसरों से विचार ग्रहण करने में एक सावधानी यह रखनी होगी कि कोई ऐसा विचार ग्रहण न किया जाए, जो अपनी स्वाभाविक प्रकृति के अनुरूप नहीं। मान लीजिए किसी की स्वाभाविक प्रवृत्ति है-साहित्यकार की और वह किसी की सफलता अथवा उन्नति देखकर विचार ग्रहण कर लेता है, राजनीतिक और जीवन में नेता बनने की सोचने लगता है, तो वह अपने उद्देश्य में सफल न हो सकेगा। उसकी प्रवृत्तियाँ रह-रह कर उसका विरोध करती रहेंगी। उसकी क्रियाएँ अपनी पूर्ण क्षमता के साथ आगे नहीं बढ़ सकती। कोई कार्य सफल तभी होता है जब उसके साथ तन-मन तथा मूल प्रवृत्तियों का भी सहयोग है। केवल क्रिया ही कोई सफलता ला सकती है, यह संभव नहीं।

जीवन लक्ष्य पूरा करने के लिए किसी से विचार ग्रहण करते समय एक बात विचारणीय है कि जिस विचार को हम ग्रहण कर रहे हैं, साथ ही हमारी मूल प्रवृत्तियों से जिनका सामंजस्य, भी है, क्या उसके अनुसार हमारी क्षमता अथवा परिस्थितियाँ हैं भी अथवा नहीं? माना हम एक बहुत गूढ़ आध्यात्मिक साधना से हैं और उसको सफल करने के लिए बहुत बड़े संयम, त्याग, समय, एवं मार्ग निर्देशक की जरूरत है। हमारी प्रवृत्ति भी उसके अनुकूल है। किन्तु परिस्थिति इस योग्य नहीं कि सब कुछ त्याग साधना में जुटा जाए, तो वह विचार ग्राह्य होते हुए भी अग्रहणीय है। इसको क्रियान्वित करने के लिए समय की प्रतीक्षा करनी होगी और तब तक करनी होगी जब तक परिस्थिति अनुकूल न हो जाय। विचार ग्रहण करके उसे अपने अन्तराल में सँजो लेना होगा और धीरे-धीरे अन्दर मन में चिन्तन करते हुए उसे दृढ़ से दृढ़तर बनाते रहना होगा। साधना पथ पर धीरे-धीरे परिस्थिति से सामंजस्य करते हुए चलना होगा। सहसा कोई बड़ा कदम उठा लेना उचित न होगा।

तो इस प्रकार विचारों की भीड़ से अपने मूल विचार को छाँट लेना चाहिए और यदि मूल विचार न हों तो अनुकूल विचार कहीं से ग्रहण करके जीवन लक्ष्य तथा पथ निर्धारित कर उस पर योजना-बद्ध


नया उपाय (Kahani)

सौ वर्ष पहले की बात है। अफ्रीका में जूतों की खपत की संभावना खोजने के लिए एक जापानी और एक अमेरिकी कम्पनी ने अपने एजेन्ट भेजे, ताकि इस क्षेत्र में व्यवसाय धसाने की बात पर विचार किया जा सके। अमेरिकन एजेन्ट ने एक सप्ताह के दौरे के बाद रिपोर्ट भेजी “यहाँ कोई जूता पहनना जानता तक नहीं। व्यापार की कोई संभावना नहीं है।” वह वापस लौट गया।

जापानी एजेन्ट रुका रहा उसने कम्पनी को रिपोर्ट भेजी “ यहाँ कोई जुता पहनना जानता तक नहीं। हम लोग बिना प्रतिस्पर्धा के उस देश में व्यवसाय चलाकर आसानी से मालामाल बन सकते हैं।”

जापानी दृष्टिकोण सही निकला और वे सचमुच माला माल बन गए। नया रास्ता भी तो उन्होंने खोजा। नया उपाय भी तो उन्होंने ही सोचा।

रीति से चलना चाहिए। विचार को केवल विचार मात्र बनाए रखने से कोई सिद्ध न होगा। सिद्धि के लिए विचारों तथा क्रियाओं का समुचित समन्वय भी करना होगा। जो केवल कल्पना के ही घोड़े दौड़ता रहता है, उसकी यह क्रिया उसे निष्क्रिय एवं निरर्थक बना देती है। विचार, सृजन की आधार शिला जरूर है, किन्तु तब ही जब वे मौलिक दृढ़ तथा कार्यान्वित हों। अन्यथा वे केवल कल्पना बन कर अपने विचारों पर उसे लिए उड़ते फिरेंगे और कहीं का नहीं रखेंगे। अतएव आवश्यक है जीवन में विचारों और क्रिया में सामंजस्य बिठाते हुए अग्रगामी हुआ जाए।


भाग्य को जाना नहीं, बनाया जाता है!

प्राचीन काल में ज्योतिष का सीधा सम्बन्ध नक्षत्र विद्या से था। सुदूर स्थित ग्रह-नक्षत्रों का ज्ञान, उनकी गति गणना और स्थिति का वैज्ञानिक अनुसंधान अपने देश में उस समय चरम उत्कर्ष पर था जब लोगों में कर्मफल के सिद्धाँत पर दृढ़ आस्था थी। जब तक ज्योतिष विशुद्ध विज्ञान का विषय रहा तब तक इस दिशा में प्रगति भी होती रही और लोगों में कर्म, परिश्रम तथा पुरुषार्थ के प्रति आस्था भी बनी रही। पर कालान्तर में न जाने यह मान्यता कैसे चल पड़ी कि लाखों-करोड़ों मील दूर पर स्थित तारे और नक्षत्र एक-एक व्यक्ति के निजी जीवन पर अपना विशिष्ट प्रभाव डालते और शुभ-अशुभ प्रदान करते हैं।

फलित ज्योतिष हस्तरेखा, अंक विज्ञान, आकृति, विज्ञान, कम्प्यूटर ज्योतिष आदि न जाने कितनी विद्यायें आज चल पड़ी हैं जिनके माध्यम से मनुष्य अनागत को जानने की चेष्टा करता है। कहा जाता है कि इन विधाओं के माध्यम से भविष्य को जान कर व्यक्ति संभावित विपत्तियों से बच सकता है। इस मान्यता की संगति भारतीय संस्कृति के प्राण-कर्मफल के सिद्धाँत से कहाँ मेल खाती है? देवसंस्कृति का प्रत्येक अनुयायी यह जानता और मानता है कि हम जो कर्म कर चुके हैं, उनका ही फल आज भोग रहे हैं और जो आज कर रहे हैं उनके भले-बुरे परिणाम कल भोगने पड़ेंगे। तब भविष्य की संभावित घटनायें जानकर व्यक्ति उनसे कहाँ तक बच सकता है। पहली बात तो यह है कि उन घटनाओं को इस विद्या द्वारा जाना ही नहीं जा सकता और यदि किसी तरह जान भी लिया जाय तो उनके परिणामों से बच पाना असंभव है। फिर उन्हें जानने से क्या लाभ?

मनीषियों का कहना है कि इससे लाभ तो कुछ नहीं होता। हाँ हानि की ही अधिक संभावना रहती है। इस तथ्य को प्रस्तुत कहानी के माध्यम से भली प्रकार समझा जा सकता है-

कहा जाता है कि सृष्टि के निर्माण होने के बाद विधाता ने प्रत्येक मनुष्य को जन्म लेने पर उसका भविष्य सुना देने का नियम बनाया था। उस नियम का बराबर पालन भी किया जाता। एक बार किसी कुकर्मी व्यक्ति ने पुनर्जन्म लिया। पिछले जन्म के पापों का दुष्परिणाम उसे इस जन्म में भोगना था, अतः उसका भाग्य बड़े ही भयंकर ढंग से लिखा गया। 60 वर्ष की आयु तक उसकी किस्मत में तमाम कठिनाइयाँ और विपत्तियाँ लिखी गई थी। फिर उसे ऐसे भयंकर रोग से ग्रस्त होना बताया गया था कि जो चालीस वर्ष तक कष्ट देता रहता। इस प्रकार इन यातनाओं को सहते हुए उसके भाग्य में सौ वर्ष की आयु पार करने पर मृत्यु लिखी गई।

यह भविष्य उस व्यक्ति के जन्म लेते ही नियमानुसार सुनाया गया। एक-एक विपत्ति का वर्णन सुनकर वह व्यथित होता गया और अन्त में जाकर वह इतना चिंतित तथा उद्विग्न हो उठा कि सौ वर्ष जीना तो दूर, तत्क्षण ही भय के कारण मर गया। यह कहानी वस्तुतः एक रूपक की तरह है जिसे पढ़कर समझना चाहिए कि दूरदर्शी और करुणामय परमात्मा यदि कर्मफल की दृष्टि से किसी का भाग्य निश्चित करता भी हो तो, उसे जानने के कोई सूत्र नहीं छोड़ता। यदि इस प्रकार के सूत्र छोड़े जाते हैं तो मनुष्य अपना सारा भविष्य पहले से ही जान लेता और यदि भाग्य में सुख-सुविधाएँ लिखी हैं तो पहले से ही निश्चित होकर बैठ जाता क्योंकि करने से तो कुछ तो कुछ होना ही नहीं है, नियति ने पहले से ही सब कुछ निश्चित कर रखा है। फिर कुछ करने-कराने से क्या अंतर पड़ता है, और यदि भाग्य में कष्ट और विपत्तियाँ ही हैं तो क्यों न पहले से ही आत्महत्या कर उनसे छुटकारा पाले।

कर्मफल के इन सामान्य सिद्धाँतों से परिचित होने के बावजूद भी शिक्षित-अशिक्षित लोगों को अपना भाग्य जानने के लिए इतनी उत्सुकता है कि ज्योतिष आजकल एक लाभदायक व्यवसाय के रूप में विकसित है। ज्योतिषी, हस्तरेखाविद्, आकृति विज्ञानी आदि भविष्यवक्ता भोली जनता का भाग्य सितारों की चाल बताकर दोनों हाथों से अपना उल्लू सीधा करते रहते हैं। यही नहीं तथाकथित प्रगतिशील अखबारों और पत्र-पत्रिकाओं में भी दैनिक, साप्ताहिक, मासिक तथा वार्षिक राशिफल छपते रहते हैं। समझ में नहीं आता कि अपनी प्रगतिशीलता का ढिंढोरा पीटने वाले अखबार भी इस अवसरवादिता से लाभ उठाने में क्यों संकोच नहीं करते?

हमें अनुग्रहीत होकर भाग्य जानने के लिए इधर-उधर भटकने की अपेक्षा परिश्रम और पुरुषार्थ द्वारा अपने भाग्य का स्वयं निर्माण करने में लगना चाहिए। भाग्य को जानना असंभव है, पर उसका निर्माण किया जा सकता है। यह चेतना जब प्रत्येक व्यक्ति में जायेगी तो समाज में कर्मठता, पुरुषार्थ और लगन की भावना होगी।


आत्मसत्ता कभी पापी नहीं होती

सहमते हुए उसने दृष्टि उठाई। लगा वह इस दृष्टि के माध्यम से अपनी समूची व्यथा एक बारगी उड़ेल देना चाहती हो, नेत्रों के मौन स्वरों से अस्तित्व के स्पन्दन झर रहे थे। न जाने कितने समय से वह उनके पास आने को सोच रही थी। कितनी आशाएँ, कितनी आकाँक्षाएँ नहीं सँजोई थी आज तक उसने। कभी-कभी तो दिवस रात्रि भावनाओं और कल्पनाओं की उमगती लहरों के बीच क्षण की तरह खो जाते। पर मिलना इतना सहज नहीं था। समाज की पारम्परिक व्यवस्था ने एक-एक अनगिनत लौह श्रृंखलाओं से उसके अस्तित्व को जकड़ रखा था। उबरने के हर प्रयास का परिणाम-होता विफलता और विफलता को निराशा के इस निविड़तम में आशा की एक मात्र किरण सोचते-सोचते अचानक उसके सारे शरीर में प्राण विद्युत की लहर दौड़ गई।

“कातूशा”। सामान्य स्वरों में कहे गए इन शब्दों के साथ ही वह स्वयं में चैतन्यता अनुभव करने लगी। निराशा, भय, डर का सम्मिलित कुहासा शब्दघात से छँटता प्रतीत हुआ। एक विलक्षण चमत्कार की अनुभूति कर रही थी वह। चमत्कार की विलक्षणता शब्दों में नहीं कहने वाले की वाणी में थी। अन्यथा शब्द तो उसके लिए चिर प्राचीन थे। शैशव से लेकर आज तक दिन में पता नहीं कितने बार अपने इस नाम का उच्चारण सुनती आयी थी। पर आज की बात ही कुछ और थी। पुकारने वाले ने पास आने का इशारा किया। पास बैठे हुए लोगों ने एक-एक कर दोनों को तीक्ष्ण नजर से देखा। देखने वालों की आंखों में आश्चर्य और तिरस्कार के मिले-जुले भाव थे।

यहूदी शमौन को भी कम आश्चर्य न था। उसी ने उन्हें अपने यहाँ भोजन के लिए निमंत्रित किया था। सोचा इसी बहाने महापुरुष के चरणों से अपना भवन पवित्र हो जाएगा। पर तब तो उसे असहनीय लगने लगा जब कातूशा ने पास बैठकर उनके चरण पोछे फिर उन्हें चूमने लगी। शमौन के मन को ढेरों शंकाओं ने घेर लिया। वह सोचने लगा “यदि यह सर्वज्ञ होते तो इस दुराचारिणी को अपना स्पर्श क्यों करने देते।”

वस्तुस्थिति को समझकर ईसा मुस्कराए। उन्होंने शमौन को अँगुली के संकेत से पास बुलाया। पास आने पर शंका का निवारण करने के लिए एक कहानी सुनाने लगे- “एक महाजन के दो कर्जदार थे। एक पर पाँच सौ दीनारों का कर्ज था और एक पर केवल पचास दीनारों का। महाजन के पास दोनों व्यक्ति गए और अपनी असमर्थता प्रकट पर गिड़गिड़ाने लगे।”

महाजन ने कहा-”यदि आप इस स्थिति में नहीं है कि कर्ज पटा सकें तो आपको माफ किया। राशि में कम ज्यादा का फर्क जरूर था, पर माफी दोनों को बराबर दी गई। यदि ध्यान से देख सको तो पाओगे कि सबसे ज्यादा माफी पाँच सौ दीनार वाले कर्जदार को मिली। क्योंकि महाजन की दृष्टि में इसके प्रति निष्ठ और पात्रता पहले की अपेक्षा कहीं अधिक थी।”

शमौन! यही बात तो आज कातूशा के संबंध में है। इसने अपने में जितनी पात्रता विकसित की है उतनी यहाँ मैं तुममें से किसी को नहीं देख रहा हूँ। क्या तुम्हें नहीं मालूम कि यह अपने समूचे जीवन को बदल डालने की योजना बना चुकी है। जबकि तुम केवल एक समय भोजन करवाकर ही उसका पुण्य लूटना चाहते हो। इसलिए मैंने तुम्हारी निष्ठ के अनुसार दिया है और कातूशा को उसकी निष्ठ और विश्वास के अनुसार।

उपस्थित सभी लोग एक स्वर से चिल्लाए-ईसा! तुम कातूशा को क्षमा कैसे कर सकते हो? यह तुम्हारा दुस्साहस है। दुष्टों को क्षमा करने का अधिकार तो केवल ईश्वर को है।

इन सबों के क्रोधित स्वर पर उन्हें हँसी आ गई। थोड़ा रुक कर हँसते हुए बोले-मैंने आज तक नहीं सुना कि ईश्वर किसी को वेश्या या दुराचारी बनाता है। किसी भली स्त्री को वेश्यावृत्ति की ओर ले जाने वाले तुम सब समाज के प्रतिनिधि हो। तुम्हें किसी कन्या को वेश्या बनाने का अधिकार किसने दिया? कातूशा को अपने विगत जीवन के दुष्कृत्यों पर कितनी आत्मग्लानि है। इस आत्मग्लानि से अधिक पवित्र भला किस सरिता का जल है।

ईसा ने कातूशा की ओर मुड़ते हुए उसके सिर पर आशीर्वाद का हाथ रखते हुए कहा-देवि! तुम्हारी आत्मग्लानि विश्वास की रक्षा करेगी और सारे कलुष तथा पापों को भस्म कर कंचन की तरह खरा बना देगी। प्रायश्चित्त अन्तःकरण की संरचना में फेर बदल कर डालने के लिए उतारू प्रबल पुरुषार्थ है। इसके द्वारा हर कोई अपने विगत पाप कर्मों का शमन करके नव जीवन प्राप्त कर सकता है।


कैसे होते हैं व्यक्तित्व सम्पन्न महामानव?

व्यक्तित्व क्या हैं? मोटे तौर पर तो इसका अर्थ बाह्य आकार-प्रकार और शारीरिक संरचना से लगाया जाता है। जो देखने में जितना मोटा-तगड़ा, लम्बा-तड़ंगा लगता है, उसे उतना ही उच्च व्यक्तित्व का समझा जाता है। अंग्रेजी में इसे “जाइण्ट पर्सनॉलिटी” कहते हैं, पर क्या मनुष्य का वास्तविक व्यक्तित्व सचमुच शारीरिक संगठन ही है? विचार करने पर ज्ञात होता है कि बात ऐसी है नहीं। यदि व्यक्तित्व का मापदण्ड शरीर-संरचना को माना जाय, तब तो पहलवान और जंगलों में रहने वाले कबीले के लोग ही भारी-भरकम व्यक्तित्व वाले साबित होंगे, जबकि मानवोचित गुणों की दृष्टि से उनका अन्तराल लगभग शुष्क होता है। जब मानवोचित गुण ही नहीं, तो उन्हें उस श्रेणी में कैसे रखा जा सकता है? वस्तुतः अन्तःकरण की उत्कृष्टता ही व्यक्तित्व का वास्तविक मापदण्ड है। जिसका अन्तस् जितना उदात्त होता है, वह उतना ही उच्च व्यक्तित्व वाला कहलाता है।

अधिकाँश मनोवैज्ञानिकों ने व्यक्तित्व को वंश परम्परा द्वारा निर्धारित होने की बात बताई है। उनका कहना है कि व्यक्तित्वों में विभिन्नता वंशपरम्परा के कारण है। किन्तु वाटसन् प्रभृति व्यवहार मनोविज्ञानी साँख्य योग का समर्थन करते हुए करते हुए वातावरण को ही व्यक्तित्व का प्रधान निर्धारक मानते हैं। साँख्ययोग ने इसे और भी स्पष्ट करते हुए कहा है कि संचित कर्मों की अपनी महत्ता है किन्तु व्यक्ति अपने व्यक्तित्व में अपनी इच्छानुसार परिवर्तन लाता है। शरीर का ढांचा, रूप, रंग पारिवारिक परिस्थिति, सामाजिक संबंध तथा आर्थिक अवस्था को मनुष्य अपने पुरुषार्थ से बदल सकता है। वर्तमान जीवन में ही उनमें व्यक्ति स्वयं बहुत कुछ परिवर्तन लाता है। अच्छाई अथवा बुराई को श्रेय अथवा प्रेय को व्यक्ति स्वयं ही अपनाता है, एवं उससे संबंधित योग्यता विकसित करता है। इसी को गीता ने आसुरी और देवी सम्पदा वाले दो व्यक्तित्वों में विभाजित किया है। आसुरी प्रवृत्ति वाले लोभ, मोह, अहंकार के दलदल में फँसकर वासना तृष्णा एवं अहंता की पूर्ति में और धंसते जाते हैं, इन आसुरी सम्पत्ति को जानकर भी व्यक्ति उससे दूर नहीं हो पाता वह चाहे तो इन्हें क्षणभर में तोड़ सकता है किन्तु अभ्यासवश तोड़ नहीं पाता। वहीं दैवी सम्पदा वाले उदात्त दृष्टिकोण एवं विस्तृत आत्मीयता अपनाकर अपने चिंतन चरित्र एवं व्यवहार में उत्कृष्टता का समावेश करते हैं फलस्वरूप गुण, कर्म स्वभाव की कसौटी में खरा सिद्ध हो कर आत्म सन्तोष एवं लोक सम्मान प्राप्त करते हैं।

गीता में व्यक्तित्व को और स्पष्ट करते हुए कहा है कि सत्व, रजस् एवं तमस गुणों के आधार पर तीन भागों में बाँटा गया है। सात्विक व्यक्ति चिंतन, चरित्र एवं व्यवहार में, प्रत्येक क्रियाकलाप में आयु,


जिम्मेदारी अनुभव करते हुए (Kahani)

तुकाराम महाराष्ट्र के प्रख्यात संतों में से एक हैं। वे शूद्र कुल में उत्पन्न हुए थे। उन दिनों छुआ छूत का दौर था तो भी वे अपने तप-त्याग तथा परमार्थरत रहने के कारण ब्राह्मण से भी बढ़ा चढ़ा सम्मान पाते रहे। रूढ़िवादी समुदाय ने उनकी ख्याति से चिढ़कर अनेकों कष्ट दिये पर वे बिना विचलित हुए अपना काम करते रहे। सेवा उनके रोम-रोम में भरी थी। उपासना और धर्मचर्चा के अतिरिक्त जितना भी समय बचता उसे दीन दुखियों की सेवा में ही लगाये रहते। जन मानस में धर्मधारणा भरने का कार्यक्रम बनाया और मण्डली समेत दूर-दूर क्षेत्रों में भ्रमण करते हुए वह कार्य जीवन भर करते रहे। उनने हजारों गीत लिखे जो धार्मिक जगत की अमूल्य निधि है।

बुद्धि, बल, स्वास्थ्य, सुख आदि को बढ़ाने वाले तत्वों का समावेश करता है। किसी भी कार्य को पूरी तत्परता एवं तन्मयतापूर्वक जिम्मेदारी अनुभव करते हुए सम्पादित करता है, फलतः वह एकाग्रता, जीवट एवं प्रतिभा की दृष्टि से सम्पन्न होता हुआ प्रखर बनता है और समाज का अनिवार्य अंग सिद्ध होता है। राजसिक प्रकृति वाले मनुष्य अपने गुण, कर्म, स्वभाव में ऐसे तत्वों का समावेश करते हैं, जिसमें लोभ, मोह एवं अहंकार का सम्पुट होता है, फलतः विकृत चिंतन एवं संकीर्ण स्वार्थपरता दृष्टिकोण में सम्मिलित होने के कारण अपनी शक्ति, अपना व्यक्तित्व, इतना घटिया एवं निकृष्ट बना डालते हैं, जिसे मानवोचित गरिमा के विपरित ही कह सकते हैं। ऐसे लोगों को नर तन धारी नर पशु की संज्ञा दे सकते हैं जिनके प्रत्येक क्रियाकलाप में पशु−प्रवृत्ति की बू आती है। उत्कृष्ट चिंतन एवं आदर्शवादी दृष्टिकोण अपनाना तो जैसे इन्होंने सीखा ही न हो। सामान्य जीव जन्तुओं की तरह पेट भरने और प्रजनन के कौतुक का रसास्वादन करने के लिए जीवित रहते हैं। उन्हें न मर्यादाओं के प्रति श्रद्धा होती है और न वर्जनाओं से बचने की ललक। अंकुश और नियंत्रण के अवरोधों से बाधित होकर ही वे अनुचित को अपनाने से रुक पाते हैं। स्वच्छता और क्षमता रहने की स्थिति में उन्हें मर्यादा पालन में कोई उत्साह नहीं रहता। अज्ञान तथा भ्रमवश अपने कर्तव्यों को छोड़ बैठते हैं। दूसरे के कष्टों को ध्यान में न रखते हुए उनके समस्त कार्य होते हैं। उनकी बुद्धि विपरीत दिशा में ही कार्य करती है और वे सदैव उल्टा ही सोचते हैं।

ये थे व्यक्तित्व के भिन्न-भिन्न आयाम एवं सामयिक परिस्थितियों की आवश्यकता एवं उस काल में विज्ञानियों का दृष्टिकोण जो इस प्रगति क्रम में विशिष्ट व्यक्तित्व लिए हुए लोगों के समूह की भविष्य वाणी करता है। ये भिन्न-भिन्न निष्कर्ष निकालते हुए निर्धारित करते हैं कि आने वाले दिनों में व्यक्तित्व की क्या परिभाषा होनी चाहिए अथवा मनुष्य को अपना व्यक्तित्व किस रूप में विकसित करना चाहिए।

निर्णय एक ही बनता है कि किसी व्यक्ति की बाह्य सफलता एवं भौतिक समृद्धि को देख कर उसके व्यक्तित्व को नहीं जाना जा सकता। इसकी एक ही कसौटी है कि चिन्तन, चरित्र और व्यवहार में अधिकाधिक शालीनता का समावेश किया गया या नहीं। अंतरंग एवं बहिरंग प्रामाणिकता एवं प्रखरता से भरा पूरा है या नहीं। अगले दिनों व्यक्तित्व की यही परिभाषा बनने वाली है। सज्जनता, सद्भावना, श्रमशीलता, मितव्ययिता स्वच्छता, सहकारिता, अनुशासन-प्रियता जैसे सद्गुणों को धारण करने वाले ही अपने व्यक्तित्व को प्रखर एवं तेजस्वी बना पाते हैं। उन्हीं की कृति युगों-युगों तक अमर रहती है। इस आधार पर वे गिरों को उठाने, उठों को चलाने, चलतों को दौड़ने एवं दौड़ते को उछालने जैसा महत्वपूर्ण कार्य सम्पन्न कर सकने में सफल होते हैं। साथ ही ऐसे व्यक्तित्व वाले लोग समाज के खेत में पुण्य परमार्थ के बीज बिखेर कर फसल को अपने लिए ही नहीं वरन् समाज के लिए काटते और विश्व वसुधा को लाभाँवित करते हैं। इन्हें ही कुशल नाविक की संज्ञा दी जाती है। ऐसे लोग अपनी नाव पर अनेकों को बिठाकर इस पार से उस पार पहुँचा देते हैं। आने वाले समय में यही परिभाषा रहेगी व्यक्तित्व की और यही कसौटी भी। इसके आधार पर ही इक्कीसवीं सदी में उज्ज्वल भविष्य का निर्माण संभव हो सकेगा।


Quotation

तृण पर्णोदकाहाराः सततं वन वासिनः।

जम्बूकाखुमृगाद्याश्च तापसास्ते भवन्ति किम्॥ 67॥

आजन्म मरणान्तं गंगादि तटिनी स्थिताः।

मण्डूकमत्स्य प्रमुखा योगिनस्ते भवन्ति किम्॥ 68॥

पारावत्शिलाहा हराः कदाचिदापि चातकाः।

न पिवन्ति महीतोयं ब्रतिनस्ते भवन्ति किम् ॥ 69॥

तस्मान्तिस्यादिकं कर्मलोकरंजन कारकम्।

मोक्षस्य कारणं साक्षातत्वज्ञानं खगेश्वर ॥ 70॥

घास, पत्ते, पानी का आहार करने वाले तथा नित्य वन में रहने वाले गीदड़, चूहे, मृगादि क्या तपस्वी हो जावेंगे॥ 67॥

जन्म से लेकर मरने तक गंगादि नदियों के किनारे रहने वाले मेंढक मछली आदि क्या योगी हो जाते हैं॥ 68॥

पत्थरों का आहार करने वाले कबूतर और कभी भी पृथ्वी का पानी न पीने वाले चातक क्या वे व्रती हो जाते हैं॥ 69॥

इसलिये नित्यादि कर्म तो लोगों को प्रसन्न करने के लिये हैं। मोक्ष का साक्षात् कारण तो ज्ञान ही है॥ 70॥


धर्म-दर्शन कैसे आचरण में उतरे?

कार्य में श्रेष्ठता की अभिव्यक्ति होना तभी सम्भव है, जब उसके मूल में चिन्तन की उत्कृष्टता हो। क्रिया-कलाप मूल्यवान अवश्य हैं किन्तु उसके पीछे लगे चिन्तन के महत्व को भी अस्वीकार नहीं जा सकता। करने के महत्व का आधार वह अव्यक्त चिन्तन ही है जो अपने प्रेरणा-प्रवाह के सातत्य से इसे जीवन्त बनाता है।

क्रिया का विश्लेषणात्मक विवेचन करने पर स्पष्ट होता है कि उसका स्वरूप एक वृक्ष के सदृश है जिसकी जड़े चिन्तन परिक्षेत्र में गहरी जमी होने के कारण अदृश्य होती हैं। दीख पड़ने वाला कार्य तने और टहनियों के सदृश है। इसके परिणाम ही वह फूल-फल हैं जो उद्देश्यों का स्वरूप अभिव्यक्त करते हैं।

आज मानवीय क्रिया-कलापों में एक मूल्यात्मक ह्रास की अनुभूति हो रही है, विश्व के विभिन्न चिंतक समाज विज्ञानी इसी उधेड़ बुन में पड़े हैं कि मानव के वैयक्तिक एवं सामाजिक जीवन को श्रेष्ठ कैसे बनाया जाय? मनोअध्येता एरिक फ्राम ने इस संकट को मानव मन का संकट कह कर निरूपित किया है।

निश्चित ही वैयक्तिक एवं सामाजिक जीवन में श्रेष्ठता की प्रतिष्ठापना तभी सम्भव है, जब चिन्तन में व्याप्त विकृति को दूर किया जा सके। चिन्तन परिक्षेत्र बंजर हो जाने के कारण कार्य भी नागफनी, बबूल जैसे हो रहे हैं। इनसे मानवता का कष्ट पीड़ित होना स्वाभाविक ही है। स्थिति का मूल्याँकन करते हुए आध्यात्मविदों ने इसे “आस्था संकट” का नाम दिया है। उद्योग विज्ञान एवं तर्कवाद की विकृति ने मानव मन से श्रेष्ठता का मूलोच्छेद करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी है। फलतः पशु प्रवृत्तियाँ, संचित कुसंस्कार भी भड़के हैं और समूची मानव जाति को स्वार्थान्धता की विडम्बना ग्रसित करती चली जा रही है।

इसका परित्राण तभी सम्भव है जबकि श्रेष्ठता का प्राण इसमें संचारित हो। किन्तु इसे होना भी अनिवार्य है। व्यापकता के साथ इसके संयुग्मन को ही आध्यात्मवादियों ने आस्तिकता का नाम दिया है। आस्तिक होने का सीधा तात्पर्य है कि सर्वज्ञ परिव्याप्त श्रेष्ठ तत्व की धारणा कर तदनुरूप ही जीवन जिया जाय।

धर्म ऐसी जीवन-प्रणाली का विस्तृत विवेचन है, जिसे सूत्रमय भाषा में “शालीनता” और “नीतिमत्ता” कहकर निरूपित किया जा सकता है। इसकी पूर्ति उच्चस्तरीय आस्थाओं के सहारे ही बन पड़ती है। दैनिक जीवन में प्रत्येक क्रिया कृत्य के साथ सज्जनता और उदारता के तत्वों को सँजो देने की विचार पद्धति ही आध्यात्म है। आध्यात्मिकता का समूचा चक्र आस्तिकता की धुरी के इर्द-गिर्द घूमता है। आध्यात्मिकता, आस्तिकता और धर्म सभी एक दूसरे से गहनता से संबंध हैं। इन सभी का एक दूसरे से तारतम्य है। एक कड़ी तोड़ देने से यह समूची जंजीर ही बिखर जाती है। वैयक्तिक जीवन में जिसे नीतिमत्ता कहा जाता है, वही सामूहिक रूप से विकसित होने के उपरान्त सामाजिक सुव्यवस्था बन जाती है। नीति क्या है? इसकी मीमाँसा करना सरल नहीं है। उसका स्वरूप विभिन्न विचारकों ने अपने-अपने ढंग से प्रस्तुत किया है। सिजविक अपने ग्रन्थ “मैथड्स आफ इथिक्स” में लिखते हैं कि अधिक लोगों के अधिक सुख का ध्यान रखते हुए नीति निर्धारण किया जाना चाहिए। लेस्ली स्टीफे न का अपने ग्रन्थ “साइन्स आफ एथिक्स” में मानना है- किसी के कार्य के स्वरूप का बाह्य अवलोकन करके उसे नीति या अनीति की संज्ञा नहीं दी जा सकती। कर्ता की नीयत और कर्म के परिणाम की विवेचना करने पर ही उसे स्पष्ट किया जा सकता है।

लेस्ली का कथन यथार्थ ही है। सम्भव है कोई व्यक्ति भीतर से छनी होने पर भी बाह्यतः धार्मिकता का आवरण ओढ़े हो। यह भी हो सकता है कि कोई धार्मिक प्रक्रियाओं से उदासीन रहकर चरित्र और चिन्तन की दृष्टि से बहुत ऊँची स्थिति में रह रहा हो। व्यक्ति की गरिमा का आकलन मात्र उसकी आँतरिक आस्थाओं को देखकर ही किया जा सकता है। नीयत सच्ची ऊँची रहने पर यदि व्यवहार में भूल अथवा भ्रम से कोई ऐसा काम बन पड़े जो देखने वालों को भला न लगे तो भी यथार्थता जहाँ की तहाँ होगी। व्यवस्था में गड़बड़ फैलाने के कारण उसे दण्डित तो अवश्य किया जा सकता है। किन्तु इतने पर भी उसकी उत्कृष्टता अक्षुण्ण बनी रहेगी। व्यक्तित्व और कर्तृत्व की सही परख उसकी आस्थाओं को समझे बिना नहीं हो सकती। धर्म तत्व की गहन गति इसीलिए कही गई है कि उसे मात्र क्रिया के आधार पर नहीं जाना जा सकता। नीयत या ईमान की व्यापक श्रेष्ठता ही उसका प्राण भूत मध्य बिन्दु है।

इसका निरीक्षण, परीक्षण, विवेचन तथा विश्लेषण आप्त वचनों व शास्त्र सूत्रों के मार्ग दर्शन में किया जा सकता है। पर ऐसा करना तभी सम्भव है जबकि मन पूर्वाग्रहों से मुक्त हो। अन्यथा उनकी व्याख्याएँ इस प्रकार तोड़ी, मरोड़ी जाने लगेंगी कि तर्क की दृष्टि से चमत्कारी कहा जाने वाला प्रतिपादन भी शास्त्रकारों एवं आप्त पुरुषों, शास्त्रकारों के मूल मन्तव्य की वास्तविकता को कुबड़ा बनाने वाला ही होगा।

धार्मिकता के इतिहास में सदियों यही होता आया है। होना यह चाहिए कि प्राज्ञ पुरुष अथवा ग्रन्थ के अनुरूप चिन्तन एवं क्रिया की संरचना तथा कार्य विधि को ढाला जाता है। किन्तु हुआ यह कि महापुरुषों के वचनों आर्ष ग्रंथों के प्रतिपादनों की अपने-अपने पूर्वाग्रहों के अनुसार चित्र विचित्र व्याख्याएँ की गई। फलतः स्वयं की भी आस्थाओं का परिष्कार परिमार्जन न हो सका और लोक मानस भी भ्रम में पड़ा।

उपनिषद्कार ऋषि इसी भाव को स्पष्ट करता हुआ कहता है “नायमात्मा प्रव्रचनेन लभ्य न मेधया न बहुना श्रुतेन।” अर्थात् परम सत्य की प्राप्ति न बहुत भाषण देने से होती है और न ही बौद्धिक, तार्किकता अथवा लगातार सुनते रहने से होती है। इसके लिए स्वयं की मनोभूमि का परिष्कार करना होगा। चिन्तन क्षेत्र में व्यापक श्रेष्ठता के तत्व की प्रतिष्ठापना के साथ कार्यों में इसकी बाह्याभिव्यक्ति का उत्कट प्रयास करना होगा।

समूचा आध्यात्मवादी तत्वदर्शन इन्हीं उच्चस्तरीय आस्थाओं के प्रति निष्ठावान रहने को प्रेरित करता है। धर्म व दर्शन की उपयोगिता इसी में है कि वह मानवीय चिंतन के स्तर को ऊंचा उठाए, उसे आत्म में उतारने का साहस भी प्रदान करे। वस्तुतः न तो नीत्शे का व्यक्तिवाद ही व्यावहारिक है और न ही मार्क्स का समाजवाद। उनमें से प्रथम व्यक्ति को ही सब कुछ मानता है द्वितीय समाज को। किन्तु व्यावहारिकता की कसौटी दोनों को ही असफल सिद्ध करती है।

एक मात्र आध्यात्मवादी चिंतन ही ऐसा है जो इन दोनों के मध्य सुरुचि पूर्ण से सामंजस्य का संस्थापन करता है, जहाँ वैयक्तिक उन्नति की ऊँचाइयों को आत्मा के शीर्ष स्थल पर ले जाता है वहीं यह भी उपदिष्ट करता है कि व्यक्ति और कुछ नहीं समष्टि का एक अभिन्न अंश है।

मानव के मानसिक संकट अथवा आस्था संकट के इस दुष्कर काल में इस आध्यात्मवादी चिंतन की आवश्यकता मरुभूमि में बरसात के सदृश है।


भविष्य को उज्ज्वल बनाने के लिए (Kahani)

डॉ. राजेन्द्र प्रसाद उन दिनों बिहार का दौरा कर रहे थे। राँची में उनके पुराने और घिसे जूते के स्थान पर नये जूता पहनने की आवश्यकता हुई। उनका निजी सचिव मुलायम चमड़े का आरामदेह कीमती जूता खरीद लाया। इस पर वे बोले “मैं कड़ा और सस्ता जूता पहनने का अभ्यस्त हूँ। फिर यह कीमती जूता क्यों खरीद लाये। इसे लौटा दीजिये।”

निजी सचिव जूता बदलवाने के लिये मोटर की ओर बढ़ा तभी उन्होंने उसे अपने पास बुलाकर समझाया- दो मील जाकर और दो मील लौटकर जितना पेट्रोल खर्च करोगे बचत उसकी आधी ही होगी। जब किसी काम से उधर जाओ तब बदल लाना।

स्वः राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद की यह प्रदर्शन-रहित सादगी कितनी अनुकरणीय और सराहनीय है। राष्ट्रीय धन के एक एक पैसे का वे कितना ध्यान रखते थे।

किन्तु इस तथ्य को हृदयंगम करने के लिए आवश्यक है कि मनोभूमि उदार चिंतन से युक्त तथा पूर्वाग्रहों से मुक्त हो। औचित्य को प्रधानता देकर मानवीय आदर्शों को सर्वोपरि रखा जाना चाहिए। यह एक ऐसी संजीवनी है जो शालीनता नीतिमत्ता को पुनर्जीवित कर सकती है। प्रगति व शान्ति का वातावरण सुरक्षित रख सकती है। आवश्यकता इस बात की है कि इस हेतु हर क्षेत्र से प्रबल प्रयत्न किया जाय। ऐसे सुव्यवस्थित प्रयत्नों को ही तत्वदर्शियों ने धर्मधारणा का नाम दिया है। वर्तमान को सुखद और भविष्य को उज्ज्वल बनाने के लिए उसकी आज सबसे बड़ी आवश्यकता भी तो है।


“एकला चलो रे” का सत्साहस

पानी का स्वभाव निचाई की ओर बहना है। गिरी वस्तु को गिराने पर वह नीचे की ओर अनायास ही गिर पड़ती है। पर यदि ऊपर की ओर चलना हो तो इसके लिए विशेष प्रयत्न करना पड़ता है। पानी को कुँए से ऊपर निकालना हो तो शक्ति लगाने का प्रबंध करना पड़ता है। किसी वस्तु को ऊपर उछालना हो तो भी उसे फेंकने के लिए अतिरिक्त प्रयोग करना पड़ता है। मनुष्य स्वभाव में जन्म जन्मान्तरों की संचित दुष्प्रवृत्तियों का भण्डार भरा पड़ा है। वे अपनी उछल कूद निरन्तर करती रहती हैं। उन्हें क्षण भर के लिए भी चैन नहीं। नटखट बन्दर की तरह उनकी हरकतें चलती ही रहती हैं। ऐसी इच्छाएँ मन में उठती रहती हैं जैसी कि निम्नकोटि के प्राणियों की होती हैं। पेट भरना, अवसर मिलने पर स्वच्छन्द यौनाचार करते रहना, हमला करने या प्राण बचाने के प्रयास में लगे रहना संक्षेप में यही तीन पशु प्रवृत्तियाँ हैं। दूसरे की हानि का उन्हें कोई विचार नहीं रहता अपना मन जो करे, अपना लाभ जिसमें दीख पड़े वह कर गुजरना हेय वर्ग के प्राणियों की प्रवृत्ति होती है। नर वानर भी उन्हीं हरकतों और हलचलों में समयक्षेप करते रहते हैं। नर-पशुओं से और कुछ सोचते करते बन ही नहीं पड़ता। यह हेय स्तर है, जो ईश्वर के राजकुमार मनुष्य को किसी भी प्रकार शोभा नहीं देता। इतने भर से यदि इस जन्म का सुयोग गलत होता चला गया तो समझना चाहिए उपलब्ध वरदान का कोई प्रयोजन ही सिद्ध न हुआ। क्षुद्र जीवधारियों की तुलना मानवी चेतना की गरिमा और संभावना कहीं अधिक बढ़ी-चढ़ी है। इस जन्म में कुछ सोचते या करने का अवसर ही न मिला तो समझना चाहिए कि उपलब्ध सुयोग दुर्भाग्य बनकर रह गया।

मनुष्य इस भूलोक का सर्वोच्च प्राणी है। उसकी शरीर संरचना और अद्भुत मानसिकता ऐसी है जिसे देखते हुए यह कहने में तनिक भी अत्युक्ति ऐसी है कि जिसे भी यह दिव्य सम्पदा हस्तगत हुई है वह असाधारण रूप से सौभाग्यशाली है। ऐसी स्थिति में उच्चस्तरीय श्रेय सम्पादित करने की पूरी संभावना रहती है। आवश्यकता केवल इतनी भर रह जाती है कि मनुष्य जीवन के साथ जुड़ी हुई उपलब्धियों का महत्व और कारण समझा जाय। जो किसी अन्य प्राणी को नहीं मिली वह यदि मनुष्य को प्राप्त हो तो उसे अकारण या अनायास जैसा संभाव्य नहीं मान लिया जाना चाहिए और इतना भर सोच कर नहीं रह जाना चाहिए कि उपलब्धियों को अधिकाधिक मौज मजा उड़ाने में ही समाप्त कर दिया जाना चाहिए। यह मौज भी नितान्त कल्पित है। वह जितने समय तक अनुपलब्ध रहती है, उतनी ही देर उस संदर्भ में उठने वाली आकाश कुसुम तोड़ने जैसी कल्पनाएँ उठती रहती हैं। पर जब इच्छित वस्तु या स्थिति हस्तगत होती है तो उसके साथ जुड़े हुए दायित्व भार इतने अधिक वजनदार होते हैं कि उन्हें वहन करने भर से कचूमर निकल जाता है। जो सोचा गया था वह रंगीली उड़ान भर बनकर रह जाता है। जो सिर पर लदा है उसकी न तो साज सँभाल बन पाती है, न उसे सुरक्षित रखना बन पड़ता है। प्रतिस्पर्धियों द्वारा ही झपट आरंभ हो जाती है। तथाकथित स्वजन उस लाभ में से बड़ा हिस्सा बँटाना चाहते हैं। न मिलने पर विग्रह खड़ा करते है, ईर्ष्या-द्वेष का ऐसा बवंडर चल पड़ता है जिसके कारण उपलब्ध हुई सम्पदाएँ जी का जंजाल बन जाती हैं। उनका सदुपयोग बन पड़ता तो दूर, उन्हें सँभालना और उपयोग कर सकना तक कठिन हो जाता है। तब फिर नई अधिक ऊँचे दर्जे की कल्पनाओं की नई संरचना करनी पड़ती है।

पहले की अपेक्षा क्रमशः अधिक सुविधा साधन मिलते चलने पर भी किसी को भी आज की स्थिति में संतुष्ट नहीं देखा जाता। जो मिला है वह तुच्छ प्रतीत होता है और उससे कहीं अधिक पाने की ललक उद्वेलित करने लगती है। जो उपलब्ध है वह भी इतना अधिक है कि यदि उसका सदुपयोग बन पड़े तो गई गुजरी दीखने वाली परिस्थितियों में भी आगे बढ़ने और ऊँचा उठने का सुयोग सहज ही बनता रह सकता है। भोजन के संबंध में विशेषज्ञों का प्रतिपादन है कि जितना आमतौर से खाया जाता है उससे आधे में शरीर रक्षा भली भाँति हो सकती है। शेष आधा तो भारभूत होकर पेट पर अनावश्यक रूप से लादता है। जीवनी शक्ति को खाता है और अनेक रोगों का शिकार बनाने के लिए ताना बाना बुनता है। ठीक वही बात पदार्थ सम्पदा के संबंध में भी है, बढ़ा हुआ वैभव आज तक किसी के भी व्यक्तित्व के विकास में सहायक नहीं हुआ। उसकी बढ़ोतरी दुर्गुणों, दुर्व्यसनों को बढ़ाती और ऐसे विग्रह खड़ा करती है, जिसका भार न लदा होता तो चैन के साथ जिया और साथियों को प्रसन्नतापूर्वक निर्वाह करने दिया जा सकता था।

स्वस्थ शरीर, सभ्य मन और सज्जनोचित व्यवहार की तीन कलाएँ यदि विदित हों तो जीवनचर्या बिना विक्षोभ और टकराहट के चल सकती है। विवेकशील मन उपयोगी योजनाएँ बनाता है और अपने संकल्प बल तथा पुरुषार्थ के सहारे उन्हें सफल बनाने में बिना भटके भटकाये प्रयत्नरत रहता है। सही मार्ग पर सही रीति से चलने वाले की सफलता निश्चित है। अवरोध केवल प्रगति गति को धीमा कर सकता है। सफलता के चरम लक्ष्य तक पहुँचने में साधनों का अभाव कुछ विलम्ब लगा सकता है, पर यह नहीं हो सकता कि सुविधाओं के अभाव में मार्ग अवरुद्ध पड़ा रहे। इतिहास साक्षी है कि अभावग्रस्त परिवारों और पिछड़ी परिस्थितियों में जन्में व्यक्तियों ने भी अपनी प्रतिभा के बलबूते आगे बढ़ने का रास्ता बनाया है। साधन और सहायक घर बैठे नहीं मिल सके, फिर भी उन्होंने अपने चुम्बकत्व से सहयोग देने के लिए, उपस्थित होने के लिए बाधित किया है।

जब तक परख नहीं होती तभी तक किसी के संबंध में लोकमत अनिश्चित और शंकालु रहता है। पर जब कठिनाई, दबावों, आकर्षणों के सामने न झुकने की स्थिति स्पष्ट हो जाती है तो प्रशंसकों, समर्थकों, सहयोगियों की कमी नहीं रहती। साथ ही किसी न किसी प्रकार उतने साधन भी जुटते रहते हैं जो अग्रगमन के लिए नितान्त आवश्यक हैं। पुरातन काल के साधु-ब्राह्मणों द्वारा स्वेच्छापूर्वक अपनाया गया अपरिग्रह सर्वविदित है। इसके द्वारा यह सिद्ध करने का प्रयत्न किया गया था कि भौतिक अनुकूलताओं के न होने पर भी व्यक्तित्व की प्रखरता अपने बलबूते निज के पैरों पर खड़े रहने और लक्ष्य की दिशा में बढ़ चढ़ने में मनुष्य पूरी तरह समर्थ है। यदि ऐसा न हो तो सम्पन्न लोग वैभव के आधार पर हर स्तर की सफलता खरीद लिया करते। उन्हीं का वर्चस्व सर्वत्र दीख पड़ता। इसके विपरीत जिन्हें सहज सुविधा उपलब्ध नहीं है, वे विवश बाधित होकर गई गुजरी अनपढ़ परिस्थितियों में ही बँधे पड़े रहते, फिर किसी निर्धन या अशिक्षित को ऐसा कुछ करने का अवसर ही न मिला होता जिसे महत्वपूर्ण कहा जा सके। सुविधा से सुगमता तो रहती है पर प्रतिभा असुविधाओं के माहौल में ही निखरती है। पत्थर पर घिसने के उपरान्त ही औजारों की धार तेज होती है। ठीक इस प्रकार प्रतिकूलताओं से संघर्ष करने के उपराँत ही मनुष्य मनस्वी, तेजस्वी और प्रखरता सम्पन्न बनता है।


Quotation

गुणाश्च षण्मितभुक्तं भजन्ते,

आरोग्यमायुश्च बलं सुखंच।

अनाविलंचास्य भवत्यपत्यं,

न चैन माद्युर्नमिति क्षिपन्ति॥

मिताहार में छः गुण हैं। उससे रोग नहीं होता है। आयु बढ़ती है। बल तथा सुख लाभ होता है। मिताहारी के पुत्र आलस्य-परायण नहीं होते हैं और लोग उनको औदरिक भी नहीं कहते है।

अनारोग्य मनायुष्यमष्वर्ग्यंचाति भोजनम्।

अपुण्यं लोक विद्विष्टं तस्मात्तं परिवर्जयेत्॥

अमिताहार से रोग होता है, आयु घटती है, स्वर्ग नष्ट होता है, पुण्य नष्ट होता है और लोक विद्विष्ट भी है, अतः अतिभोजन त्यागना चाहिए।

सबसे बड़ा अवरोध जीवन प्रगति के मार्ग में एक ही है वह है दिशा भूल। संभवतः इसी को ज्योतिषी दिशा शूल कहते होंगे। लक्ष्य से भटक जाने वाले भूलभुलैयों में फिरते और थकान, निराशा, खीझ के अतिरिक्त और कुछ हस्तगत नहीं करते। मिथ्या आकर्षणों के वशीभूत होकर कितने ही क्षुद्र प्राणी भयंकर संकट में पड़ते हैं। दाने के लोभ में चिड़िया जाल में फंसती है। आटे की गोली के लालच में मछलियाँ जान गंवाती हैं। वीणा की स्वर लहरी सुनकर हिरन और सपेरे की बीन सुनकर साँप पकड़े जाते हैं। चासनी पर बेतहाशा टूटने वाली मक्खी भी अपने पंख फंसाती और उसी में तड़प-पड़प कर मरती है। मनुष्य के लिए कुछ ऐसे प्रलोभन हैं जो उसके पीछे लगते हैं तो भूत पिशाच की तरह निगल कर ही छोड़ते हैं। नशेबाजी के बारे में प्रसिद्ध है कि आरंभ में पीने वाले उन्हें शौक मजे का आभास करते हुए आदत में सम्मिलित करते हैं किन्तु बाद में वे ही सेवनकर्ता के स्वास्थ धन, सम्मान, संतुलन, परिवार आदि की पूरी तरह चौपट कर देते हैं, यह भ्रम जंजाल ही मनुष्य का सबसे बड़ा दुर्भाग्य है। इतने पर भी लोग उनके प्रलोभन में फंसते और जिन्दगी का सार तत्व उन्हीं के कुचक्र में बरबाद कर देते हैं, मृगतृष्णा वाला हिरन इसी प्रकार दुर्भाग्यग्रस्त होता है। कस्तूरी की सुगन्ध के लिए दिशा दिशा में छलाँगें लगाने वाले भी खिन्नता और असफलता के अतिरिक्त और कुछ पाते कहाँ है?

वासना कितनी मधुर लगती है। तृष्णा का लालच कितना आन्दोलित करता है। अहंता के उन्माद में इठलाता-अकड़ता व्यक्ति उद्धत प्रदर्शन और झूठे बड़प्पन के लिए न जाने कितने जाल जंजाल रचता रहता है। इन्हें मनमर्जी स्तर पर पूरा कर सकना किसी के लिए भी संभव नहीं हुआ। समुद्र जैसी इस खाई को पार कर सकने में अब तक कोई सफल नहीं हुआ और न भविष्य में कोई कर सकेगा। भौतिक महत्वकाँक्षाएँ किसी की भी पूर्ण नहीं हुई, जब तक एक सीढ़ी चढ़ा जाता है तब तक आगे की और दस सीढ़ियाँ दिखाई पड़ने लगती हैं। मनोरथों की प्रबलता एक क्षण के लिए भी संतुष्ट नहीं होती और अधिक पाने के लिए निरन्तर ललचाती और अगले कदम बढ़ाती रहती है। यही है वह चक्रव्यूह जिसमें फंसकर महाभारत वाला अभिमन्यु ही नहीं मरा था वरन् हर महत्वाकांक्षी को इसी प्रकार इतना फँसना पड़ता है जिसमें बाहर निकलने का कोई मार्ग ही नहीं रह जाता है। जीवन इतना लम्बा नहीं है कि इन प्रयोगों को अन्तकाल तक करते रहा जाय।

महत्वाकाँक्षा उचित भी हो सकती है और ग्राह्य भी पर वे होंगी तभी जब वे आदर्शवादिता के साथ जुड़ी हुई हों, उनमें पुण्य परमार्थ का पुट हो, ऐसे पुरुषार्थ करने की ललक हो, जो दूसरों के लिए प्रेरणाप्रद अनुकरणीय एवं अभिनंदनीय बन सकती हों। सच्चा बड़प्पन उन्हीं में सन्निहित है। महानता अर्जित एवं चरितार्थ करने के लिए उत्कृष्टता का अवलम्बन लेना पड़ता है। साथ ही संकीर्ण स्वार्थपरता से ऊँचा उठकर तप संयम एवं मर्यादा पालन की कसौटी पर खरा उतरना पड़ता है, भोगवादी प्रचलनों के आज के वातावरण में ऐसा कर सकना असाधारण शौर्य साहस का परिचय देता है। मनुष्य स्वभाव अनुकरण प्रिय है। जैसा घटनाक्रम संपर्क क्षेत्र में घटित होता रहता है, जैसे वातावरण में समय गुजरता है उसी का अनुकरण करने के लिए स्वभाव ढल जाता है। साथी सहयोगी भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में वर्तमान ढर्रे पर चलने के लिए आकर्षित करते रहते हैं। यह प्रवाह है। उसमें हल्के-फुल्के व्यक्तित्व सहज ही बहते चले जाते हैं। किन्तु जो सर्वसाधारण द्वारा अपनाया नहीं जा रहा है, जो महामानवों की जीवनचर्या में समाविष्ट देखा जाता है। उसके अनुकरण की योजना कैसे बने? उत्कृष्टतावादी प्रतिभाएँ निकट तो रहती नहीं, वे या तो पुरातन युग में हो चुकी हैं या कहीं दूर रहती हैं उन्हें कैसे और कहाँ पाया जाय? इस धर्म संकट में केवल आत्मविश्वास ही काम देता है। एकाकी चल पड़ने की हिम्मत ही आदर्शवादी महत्वाकाँक्षा को पूरा करने के लिए साहस प्रदान करती है।


बात मान ली (Kahani)

एक था, राक्षस। उसने एक आदमी पकड़ा। खाया नहीं, डराया और कहा, मेरी मर्जी के कामों में निरन्तर लगा रह। ढील की तो खा जाऊँगा।

आदमी से जब तक बस चला तब तक काम करता रहा, जब थक कर चूर-चूर हो गया और आजिज आ गया तो उसने सोचा, तिलतिल मरने से तो एक बार ही पूरी तरह मरना अच्छा। उसने राक्षस से कह दिया। “जो मर्जी हो करे इस तरह मैं नहीं खटता रह सकता।”

राक्षस ने सोचा, काम का आदमी है। थोड़ा-थोड़ा काम बहुत दिन करता रहे तो क्या बुरा है। एक दिन खा जाने पर तो उस लाभ से हाथ धोना पड़ेगा, जो उसके द्वारा मिलता रहता है।

राक्षस ने समझौता कर लिया और खाया नहीं, थोड़ा काम करते रहने की बात मान ली।

कथा सार यह है कि हममें ‘ना’- कहने की भी हिम्मत होनी चाहिए। “गलत काम का समर्थन नहीं करूंगा। उसमें सहयोग नहीं दूँगा।” जिसमें इतना भी साहस न हो सच्चे अर्थों में मनुष्य नहीं माना जा सकता।


दुराग्रहों का दुर्भाग्यपूर्ण इतिहास

अहंकार और व्यामोह का समन्वित रूप बनता है-दुराग्रह। इसमें आवेश और हठ दोनों जुड़े रहते हैं। फलतः चिन्तन तन्त्र के लिए यह कठिन पड़ता है कि वह सत्य और तथ्य को ठीक तरह समझ सके और उचित अनुचित का भेद कर सके। अभ्यस्त मान्यताओं के प्रति एक तरह की कट्टरता जुड़ जाती है। उसे अच्छा सिद्ध करने के लिए परम्पराओं के निर्वाह की दुहाई दी जाती है। उसका समर्थन धर्मशास्त्र आप्तवचन, आदि अनेकों तरह से किया जाता है। कई बार तो उसे ईश्वर का आदेश तक घोषित कर दिया जाता है।

अपना धर्म श्रेष्ठ-दूसरे का निकृष्ट। अपनी जाति ऊंची दूसरे की नीची! अपनी मान्यता सच दूसरे की झूठ। ऐसे दुराग्रह यदि आरम्भ से ही हों तो फिर सत्य, असत्य का निर्णय कहाँ सम्भव है? न्याय और औचित्य की रक्षा के लिए जरूरी है कि तथ्यों को ढूँढ़ने के लिए मस्तिष्क खुला रखा जाय। अपने पराए का नए पुराने का, भेद भाव न रखकर विवेक और तर्क का सहारा लेने की नीति अपनाई जाय। सत्य को प्राप्त करने का लक्ष्य इसी नीति को अपनाने से पूरा हो सकता है। पक्षपात और दुराग्रह तो सत्य को समझने से इन्कार करना है। ऐसे हठी लोग प्रायः सत्य और सत्य-शोधकों को सताने तक में नहीं चूकते।

टेलिस्कोप के अन्वेषक गैलीलियो ने जब पृथ्वी को गतिशील बताने का सर्वप्रथम साहस किया तो पुरातन पंथी धर्मगुरुओं ने इसे धर्म विरुद्ध ठहराया। उसे तरह-तरह से सताया गया और जेल में बन्द करके भाँति-भाँति की यातनाएँ सहने के लिए विवश किया गया। सबसे पहले जब पेरिस में रेलगाड़ी चली तो उस प्रचलन का पुरातन पंथियों ने घोर विरोध किया और कहा जो काम हमारे महान पूर्वज नहीं कर सके उन्हें करना अपने पूर्व पुरुषों के गौरव पर बट्टा लगाना है। रेलगाड़ी चलाने वाले जोसेफ केग्नार को उस जुर्म में सश्रम कारावास का दण्ड मिला। कहा गया कि वह ईश्वर के नियमों के प्रति अपराध करता है। इटली में शरीर शास्त्र की शिक्षा किसी समय अपराध थी। आप्रेशन करना पाप समझा जाता था और कोई चिकित्सक छोटा-मोटा आप्रेशन भी करता पाया जाता तो उसके लिए मृत्यु दण्ड की व्यवस्था नियत थी।

कारीगर रैंगर बैकन ने सर्वप्रथम दो कोनों को जोड़कर सूक्ष्मदर्शी यन्त्र बनाया था। इस काम की भरपूर निन्दा हुई। इतने पर बस नहीं हुआ उस कारीगर को इस खतरनाक काम करने के अभियोग में दस वर्ष की कैद सुनाई गई। बेचारे को जेल में ही तड़प-तड़प कर मरना पड़ा।

रसायन शास्त्र के कुछ नवीन सिद्धाँतों का प्रतिपादन करने के अपराध में अरहीनियस को प्राध्यापक पद से हटा कर एक छोटा अध्यापक बनाया गया। उसे सनकी ठहराकर अपमानित किया गया। कालान्तर में वही सिद्धाँत आगे चलकर रसायन वेत्ताओं में सर्वमान्य हुए और अरहीनियस को उन्हीं पर नोबेल पुरस्कार का सम्मान मिला।


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जो मुसकान का दीपक नहीं जला सकते, उन्हें समूची जिन्दगी अन्धेरी रात की तरह डरावनी प्रतीत होती है।

डॉ. हार्ले ने सर्वप्रथम जब यह कहा कि रक्त शरीर में भरा नहीं रहता वरन् चलता रहता है तो समकालीन चिकित्सकों ने उसे बेवकूफ ठहराया। ब्रूनो ने जब अन्य ग्रहों पर भी जीवन होने की सम्भावना बताई तो लोग उस पर इतने क्रुद्ध हुए कि उसे जीवित ही जला दिया।

दुराग्रह के अत्याचारों का इतिहास बहुत लम्बा और दुर्भाग्यपूर्ण है। अपने को धरती का सर्वश्रेष्ठ बुद्धिमान समझने वाली मानव प्रजाति अभी भी इसे गले से चिपटाए है। नवयुग के आगमन की विकरित होती सुवास से जो इस समय भी अछूते हैं समझना चाहिए कि इसका कारण रूढ़ियों, कुरीतियों, मूढ़ताओं की सड़न भरी दुर्गन्ध से घिरे रहना है। यह दुर्भाग्यपूर्ण हठवादिता ही कही जाएगी जिसके वशीभूत होकर सत्य एवं धर्म की आत्मा का हनन होता रहा है। पर अब इस बदले समय में मानवी विवेक में सत्यशोधक दृष्टि को ही प्रश्रय मिलना चाहिए। यही युग की माँग है।


सियाराम मय सब जग जानी।

सूफी संतों के इतिहास में सन्त इब्राहिम बिन अदहम का मूर्धन्य स्थान है। एक बार उनके मन में इच्छा जाग्रत हुई कि मक्का की यात्रा कर काबा के दर्शन किये जायँ। सो, वे विचार करने लगे कि यह किस प्रकार की हो। क्योंकि वे चाहते थे कि यह सामान्य प्रकार की न होकर कोई विशेष तरह की हो, ताकि पैगम्बर मुहम्मद उससे प्रसन्न होकर आशीर्वाद वरदान से उन्हें निहाल कर दें। ध्यान आया कि क्यों न हर कदम पर रकअत (एक विशेष प्रकार की नमाज) का पाठ करते हुए यात्रा सम्पन्न की जाय।

बस, फिर क्या था। विचार को क्रिया रूप दे दिया गया। यात्रा शुभारंभ हुई। पग-पग पर नमाज पढ़े जाने के कारण मक्का पहुँचने में उन्हें काफी विलम्ब हुआ। चौदह वर्ष लग गये। इतनी लम्बी यात्रा के उपरान्त भगवान की इबादत करते हुए गन्तव्य पर जब वे पहुँचे तो हतप्रभ रह गये। काबा अपने स्थान से गायब था। सोचा, शायद दृष्टि में कोई अन्तर आ गया है। कई बार आंखें मलीं, मुलमुलायीं, किन्तु फिर भी काबा नदारद। अभी वे इस संबंध में लोगों से पूछताछ करना चाह ही रहे थे कि आकाशवाणी हुई कहा गया- अदहम! न तो तुम्हारी आंखों में कोई फर्क आया है, न जो तुम देख रहे हो, वह भ्रम ही है। काबा वस्तुतः इस समय अपने स्थान पर नहीं है। वह अपने एक अत्यन्त प्रियपात्र के स्वागतार्थ गया हुआ है।

इतना सुनना था कि अदहम सोच में पड़ गये कि आखिर वह कौन-सा सौभाग्यशाली है, जिसकी अगवानी करने के लिए काबा को अपना स्थान छोड़ना पड़ा? हमने तो पग-पग पर, कदम-कदम पर भगवान को याद किया, उन्हें एक पल के लिए भी विस्मृत नहीं किया, फिर भी हम उनके प्रेम भाजन न बन सके।

इन्हीं विचारों में खोये इब्राहीम अदहम अपने भाग्य का रोना रो रहे थे कि चौदह वर्ष हमने बेकार में गँवा दिये। यदि इतना मालूम होता कि पैगम्बर इस तरह के मनुहार से प्रसन्न नहीं होते है, तो भला इतना समय और श्रम क्यों बरबाद करता। इतने में सामने से संत राबिआ आती दिखाई पड़ीं।

आकाशवाणी एक बार पुनः हुई-”ऐ! इब्राहीम! यही खुदा की वह हबीब है, जिसके स्वागत के लिए काबा गया हुआ था। तू अफसोस न कर और राबिआ से वह रहस्य ज्ञात कर कि वह हमारी इतनी प्रिय किस प्रकार बन गई। उपाय जान कर तू भी उसी तरह के कार्य में संलग्न हो जा। तुम्हारी वह सेवा हम ग्रहण करेंगे। फिर तुम भी हमारे उतने ही निकटतम व अजीज होंगे, जितनी राबिआ है।”

संत बीच ही में बोल पड़े-”ऐ बन्दानवाज आप ही क्यों नहीं बता देते कि मेरी बन्दगी में कमी क्या रह गई जिससे आपने उसे कबूल नहीं किया?”

“तो सुन”-इब्राहिम के कानों से आवाज टकरायी तुमने मेरी सच्ची सेवा की जगह प्रदर्शन और आडम्बर को अपनाया, सस्ती वाहवाही लूटनी चाही।


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आकाश में तारे दिन के समय भी रहते हैं, पर धूप की चकाचौंध में दीखते नहीं, परमात्मा का दर्शन और सान्निध्य हर समय पाया जा सकता है पर माया की मूढ़ता उसे दृष्टिगोचर नहीं होने देती।

इसलिए तुम्हें उसका फल प्राप्त नहीं हो सका, जबकि राबिआ ने इन सब से सर्वथा मुक्त रह कर मेरी सच्चे हृदय से सेवा की है, फलतः उसका परम पुनीत फल सामने देख रहे हो। “

अब तक राबिआ इब्राहीम के काफी करीब आ चुकी थी। उसने संत को पहचान कर आदाब में सिर झुका लिया। संत ने भी उसका प्रत्युत्तर दिया। इब्राहीम इस आश्चर्य में डालने वाली घटना से कुछ गंभीर और परेशान से लग रहे थे। राबिआ ने इसे भाँप कर संत से पूछा! “यदि इजाजत हो, तो एक सवाल पूछूँ?” हाँ में इब्राहीम ने सिर हिला दिया।

“आप अल्लाह के दरबार में इतने, गंभीर और गमगीन क्यों दिखाई पड़ रहे हैं? यह मेरी समझ में नहीं आ रहा है, कुछ रोशनी डालेंगे? इसका कारण क्या है? “

एक गंभीर निःश्वास छोड़ते हुए संत की करुण वाणी मुखारित हुई-”क्या बताऊँ राबिआ! तुमने जो कुछ इतनी जल्दी पाया है, उसे मैं अब तक न पा सका। इसे मैं तुम्हारी तपश्चर्या ही कहूँगा, जिसका हाथों हाथ फल तुम्हें मिला है।” उनकी आवाज से दुःखभरी करुणा टपक रही थी। उनने अपनी सन-की-सी श्वेत दाढ़ी को सहलाते हुए पुनः कहना आरंभ किया-”यह देख रही हो? जीवन भर परवरदिगार की इबादत में ही बाल सफेद हो गए, किन्तु आज समझ में आयी कि उनकी बन्दानवाजी के योग्य में क्यों न हो सका? अच्छा एक बात बताओगी राबिआ?”

“अँ! “ अचानक के प्रश्न से वह चिहूँक उठी। “फरमाइए।”

“तुम खुदा की बन्दगी करती हो? यह बता सकोगी।” संत का अनुरोध था।

“क्यों मजाक उड़ा रहे हैं मेरा” राबिआ ने तनिक संकोच भरे लहजे में कहा- “भला आपकी तुलना मुझसे कैसे हो सकती है। तनिक सोचिए तो तप-तप कर सफेद हुए आपके इन बालों और भव्य व्यक्तित्व के समक्ष मेरे श्याम केशों और क्षुद्र अस्तित्व की क्या बिसात!”

“नहीं-नहीं, इसे हँसी में न टालो राबिआ अभी-अभी इलहाम हुआ है कि मुझे तुमसे इबादत का वह रहस्य जान कर उसी में संलग्न हो जाना चाहिए, जिसे सिर्फ तुम्हीं जानती हो।”

“अच्छा!” राबिआ ने आश्चर्य प्रकट किया। “यदि परवरदिगार की यही मर्जी है तो सुनिए” राबिआ कह रही थी- “यदि बन्दगी से आपका मतलब नमाज की अदायगी से है, तो वह तो मैँ दिन में सिर्फ एक ही बार पड़ती हूँ। यही मेरी प्रतिदिन की दिनचर्या है। यहाँ मक्का भी मैं इसी दिनचर्या का पालन करती हुई आयी हूँ। रास्ते में मिलने वाले राहगीरों, अपंगों, अपाहिजों की खिदमत करते-करते आने के कारण ही मुझे यहाँ पहुँचने में पाँच वर्ष लग गये, अन्यथा एक महीने में पहुँच जाती, पर क्या बताऊँ मेरे अजीज! मुझसे इनकी पीड़ा सहन नहीं होती और बरबस इनकी सहायता करने को जी तड़फड़ाने लगता है। मैं तो इसी को खुदा की नेक बन्दगी मान लेती हूँ और प्रार्थना करती रहती हूँ कि जब तक यह शरीर जीवित रहे, इसी काम आये। खुदा इसे स्वीकारे या न स्वीकारे मुझे इसकी कोई परवाह नहीं।”

“नहीं-नहीं राबिआ! ऐसा मत कहो। उस बन्दा नवाज ने तुम्हारी सेवा प्रसन्नतापूर्वक कबूल की है और इसे ही अपनी सच्ची खिदमत बतायी है व मुझे भी इसी राह पर चलने की सलाह दी है। तुम धन्य हो, जो तुम्हें नूरे-इलाही के दीदार होने वाले हैं।”


ब्रह्म की आराधना (Kahani)

ज्ञानी के घर बेटा जन्मा। बड़ा सुन्दर था। सबने आकर बधाइयाँ दीं। कहा कि आप बड़े भाग्यशाली हैं जो की ऐसी सन्तति पाई। ज्ञानी ने आसमान की ओर देख कर कहा “सब उसका है।” जो भी आता, उसका एक ही जवाब होता। दुर्योगवश कुछ ही दिनों बाद बालक एक बीमारी से मर गया। अब जो भी मिलने जाता, सान्त्वना देता। ज्ञानी वैसे ही ऊपर की ओर देखकर कहता “जिसका था, उसने ले लिया।” लोगों ने कहा इतने सुन्दर बेटे की मौत का तुम्हें जरा भी गम नहीं? ज्ञानी बोला “जिसने भेजा जितने दिन रोकना चाहा, रोका व जब चाहा बुला लिया। उसमें मेरे हाथ या बस की क्या बात है। इसीलिए कहता हूँ सब ऊपर वाले की लीला है।”

हम सब भी अकारण दुख-सुख में डूब कर भ्रम पाले रहते हैं। जीवन मृत्यु का सत्य यदि हमेशा ध्यान में रहे तो कभी मोह अकारण न सताए।

इस घटना के बाद घर पहुँच कर इब्राहीम ने अपने छोटे से मकान और दौलत को गरीबों में बाँट दिया और स्वयं एक छप्पर तले रहने लगे व कंगालों एवं जरूरतमंदों की खिदमत करने लगे। कहते हैं कि इस बार की सेवा से खुश होकर पैगम्बर मुहम्मद ने इब्राहीम को उनके झोंपड़े में दर्शन व आशीर्वाद दिये, जो एक सच्चे संत हमें सेवा साधना का सच्चा रूप समझाती है व विराट ब्रह्म की आराधना करने की प्रेरणा देती है।


तनाव का प्रबन्ध, योग द्वारा

योगशास्त्रों में साधना में उच्चस्तरीय विकास के लिए साधक के चित्त में सम्प्रसादवृत्ति अर्थात् सहज प्रसन्नता का होना अनिवार्य बताया गया है। किन्तु सामाजिक पारिवारिक और भावनात्मक समस्याएं जन साधारण से प्रायः यह प्रसन्नता छीन लेती हैं। उपासना के क्षणों में भी वह तनावग्रस्त बना रहता है और उसमें वह तल्लीनता नहीं आ पाती जो साधना की सफलता के लिए अनिवार्य है। मानसिक प्रतिक्रियाओं की यह परस्पर विरोधी खींचातानी तनाव को और बढ़ा देती है। उपासना में बैठने के लिए आसन की स्थिरता भी आवश्यक है व उसके लिए शैथिल्य का अभ्यास आवश्यक है।

भौतिकवादिता के इस युग में याँत्रिकता, व्यस्तता और भाग-दौड़ की अधिकता के कारण मनुष्य अपने प्रतिदिन के कार्यों में तनाव का अधिक अनुभव करता है। शहर का विश्राम रहित जीवन, औद्योगिक प्रगति के कारण होने वाली भीड़, वातावरण में बढ़ता प्रदूषण, घरेलू समस्यायें आदि उसके मानसिक तनाव को बढ़ाती हैं। तनाव वह अवस्था है जब दो शक्तियाँ विपरीत दिशाओं में कार्य करती हैं। जब कोई व्यक्ति विशेष विधि से कार्य करना चाहता है तो दूसरी शक्ति उसे ऐसा करने से रोकती है। यही तनाव है। मनोविज्ञानियों के अनुसार यह एक चित्त विक्षेप है।

मनीषियों का कहना है कि तनाव दूर करने का सबसे सरल तरीका यह है कि स्वयं को आराम की स्थिति में रखा जाय तथा तनाव के मूल एवं प्रथम कारण का पता लगाया जाय। यह तनाव वस्तुतः भले-बुरे विचारों के शिव और अशिव बुद्धि के बीच का संघर्ष है। योगाभ्यास द्वारा मानसिक, पेशीय एवं भावनात्मक तनाव को दूर किया जा सकता है और एक स्थिति ऐसी आती है जबकि अन्तरतम में चल रहे इस संघर्ष का अन्त हो जाता है। यह परमशान्ति की अवस्था है। इस स्थिति की प्राप्ति के लिए अनिवार्य आरंभिक अभ्यास शिथिलीकरण का किया जाना चाहिए। स्वाभाविक शरीर चेष्टायें शिथिल कर देना ही शिथिलीकरण है।

अनुसंधानकर्ता चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार शारीरिक-मानसिक तनाव मनुष्य को असाधारण क्षति पहुँचाते हैं। पाया गया है कि एक घंटे का क्रोध एक दिन के बुखार जितनी क्षति पहुँचाता है। शोक-उद्वेग के सघन क्षणों में नींद, भूख सभी गायब हो जाती हैं। किसी भी कारण से उत्पन्न तनाव न केवल सामयिक पीड़ा उत्पन्न करता है, वरन् दूरगामी दुष्परिणाम भी उत्पन्न करता है। इनसे बचने के लिए प्रायः लोग शामक औषधियों, नींद की गोलियों आदि का सहारा लेते हैं। नासमझ व्यक्ति इसी के लिए नशे का सहारा लेते हैं, किन्तु ये उपचार तनाव की जड़ को नहीं उखाड़ फेंकते।

योगविद्या विशारदों ने प्राणों के पारस्परिक विरोध को तनाव की उत्पत्ति का कारण बताया है। प्राण ऊर्जा का असंतुलन समूचे कार्यतंत्र में अतिरिक्त गर्मी भर देता है। विचारों में उलझन उत्पन्न कर देता है और इस प्रकार तनाव एवं प्राणशक्ति का असंतुलन परस्पर पर्यायवाची बन जाते हैं।

पौराणिक आख्यान है कि सफेद और काले रंग के दो पक्षी रस्सी द्वारा एक खूँटे से बँधे हैं। जब तक वे बँधे रहते हैं तब तक उड़ने का प्रयास करते ही रहेंगे और ऐसा वे अनेकों बार करते रहते हैं। अंततः वे थककर शाँतिपूर्वक खूँटे के पास सो जाते हैं। यह शास्त्रीय व्यंजना वस्तुतः मानवी काया में मेरुदण्ड के भीतर विद्यमान “इड़ा- और ‘पिंगला’ नामक सूक्ष्म नाड़ियों के संदर्भ में है, जिनमें पक्षियों की तरह से दो प्राण धारायें निवास करती हैं, बहती हैं। दाहिनी नासिका से होकर जाने वाली ‘इड़ा’- प्राण नलिका तथा बाँयी नासिका छिद्र से होकर जाने वाली ‘पिंगला’ प्राण नलिका है। एक के बाद एक कार्य करने वाली इड़ा पिंगला अन्तः चेतना के एक ही मार्ग से आती हैं, परन्तु जब तक वे एक के बाद एक कार्य करती हैं तब तक शाँति की प्राप्ति नहीं होती। यह तभी होता है जब दोनों इड़ा-पिंगला एक ही केन्द्र पर आराम करती हैं और तब सुषुम्ना के जाग्रत होने पर ध्यान की क्रिया अपने आप आरंभ हो जाती है। यही स्वरयोग है जो प्राणविद्या का अंग है।”

स्वर विज्ञान के अनुसार जब दोनों नासिका छिद्रों में समान रूप से प्राणप्रवाह होता है तो यह प्रदर्शित होता है कि ‘सुषुम्ना’ बहाव हो रहा है। ऐसी स्थिति में सब साँसारिक कार्यों को छोड़कर व्यक्ति को उपासनारत हो जाना चाहिए, क्योंकि उस समय सम्पूर्ण प्राण संस्थान में एकरूपता होती है। जब सुषुम्ना कार्य नहीं करती, तब प्रयत्न के बाद भी एकाग्रता नहीं आती। साधना की सफलता के लिए यह आवश्यक है कि इड़ा-पिंगला के प्राण प्रवाह में एकरूपता लायी जाय। जब यह संभव होगा तभी सुषुम्ना क्रियाशील बनेगी।

इसके लिए जहाँ प्राणायाम तथा स्वर साधना का अभ्यास किया जाता है, वहीं शिथिलीकरण भी एक अति उपयोगी प्रक्रिया है। शिथिलीकरण का प्रगाढ़ अभ्यास इड़ा-पिंगला के प्राण प्रवाह में संतुलन स्थापित करता है। कुछ काल तक नियमित रूप से शिथिलीकरण का अभ्यास करने से सुषुम्ना प्रवाह चलने लगता है। यह उपासना के सर्वथा उपयुक्त मनोभूमि है। यदि मस्तिष्क में तनाव हो तो उस स्थिति में उपासना के लिए बैठने के पूर्व शिथिलीकरण की प्रक्रिया द्वारा तनाव मुक्त हो लेना चाहिए, तदुपरान्त उपासना करनी चाहिए।

शिथिलीकरण की प्रक्रिया सभी प्रकार के तनावों से मुक्ति पाने का एक सहज और प्रभावशाली उपाय है। मन-मस्तिष्क में अनियंत्रित हलचलें चल रही होती हैं तो वहाँ जल में उठ रही हिलोरों जैसी अस्थिरता बनी रहती है। उसे शाँत एवं तनावरहित बनाने पर ही तन्मयता उत्पन्न होगी और परमात्मा से मिलन की अनुभूति प्रगाढ़ होगी। बाकी दिन के किसी अन्य समय में भी तनाव रहित होने के लिए शिथिलीकरण मुद्रा लाभकारी होती है।

शरीर को पूरी तरह ढीला और मन को पूरी तरह खाली करना ही शिथिलीकरण मुद्रा का उद्देश्य है। न केवल उपासना के समय, वरन् किसी भी समय तनाव से पिंड छुड़ाने का यह उत्तम उपचार है। इस अभ्यास के लिए शवासन सर्वाधिक उपयोगी होता है। इसमें शरीर को ऐसी स्थिति में रखना सुविधा जनक होता है जब उसमें किसी भी प्रकार का दबाव न पड़े। शवासन का अर्थ है मुर्दे की तरह निश्चेष्ट पड़े रहना। यह बिस्तर पर पड़े-पड़े भी संभव है और आराम कुर्सी पर बैठकर या दीवार अथवा मसनद का सहारा लेकर भी किया जा सकता है।

इस स्थिति में पड़े रहकर यह प्रगाढ़ भावना करनी पड़ती है कि शरीर में से प्राण खिंचकर मात्र मस्तिष्क मध्य में, केन्द्रित हो गया है। शेष सभी अवयव मृतवत पड़े हैं। उनमें कोई भी हरकत नहीं हो रही है।

अभ्यास में एकाग्रता बनाये रखने के लिए किसी एक दृश्य की भावना कर उसमें ध्यान केन्द्रित करना, उसी के इर्द-गिर्द कल्पना करना सरल होता है। जैसे आज्ञाचक्र में दीपशिखा का या सम्पूर्ण मस्तिष्क में रहस्यमय प्रकाशपूर्ण ज्योतिपुँज की दृश्य-भावना की जाय अथवा यह सोचा जाय कि चारों ओर प्रलय काल की स्थिति की तरह अगाध नीली जल राशि फैली है। ऊपर नीला आकाश है। अपना शरीर भी शववत् है और इन्हीं लहरों में समा गया है अथवा यह भी कल्पना की जा सकती है कि शरीर-शव इस जल राशि में तैर रहा है, शरीर के किसी कमल पत्र में रखे होने


Quotation

केवल सिर मुड़ा लेने से कोई श्रमण नहीं होता, केवल नाम जपने से कोई सिद्ध नहीं होता, केवल क्रिया करने से कोई योगी नहीं होता। केवल मृगछाला पहनने से कोई योगी नहीं होता। संत को मन बदलना पड़ता है।

की भी कल्पना की जा सकती है। प्रमुख उद्देश्य है-शरीर को पूरी तरह ढीला करना तथा मन को भी शिथिल व शान्त करना।

इस प्रकार के शिथिलीकरण के नियमित अभ्यास से शारीरिक-मानसिक तनावों पर पूरी तरह नियंत्रण हो जाता है। यह मनोनिग्रह की भी प्रथम भूमिका है। उच्चस्तरीय आध्यात्मिक साधनाओं एवं ध्यान के लिए यह मनः स्थिति आवश्यक है। इससे उपासना में भी प्रगति होती है और दैनन्दिन जीवन में भी सहज प्रसन्नता समाई रहती है। प्रारंभ में शिथिलीकरण का अभ्यास 10-15 मिनट तक करना चाहिए, बाद में इसे आधे घंटे तक बढ़ा सकते हैं। आध्यात्मिक विकास के इच्छुक प्रत्येक साधक को यह अभ्यास बहुत सहायक सिद्ध होता है। अन्यथा तनावग्रस्तता एवं चित्त विक्षेप की स्थिति में मन कभी भी एकाग्र नहीं हो पाता और चित्त की तन्मयता-प्रसन्नता के बिना जप और उपासना-साधना से समुचित लाभ नहीं मिल सकता, पर्याप्त प्रगति नहीं हो पाती।


सत्य की ओर चल रही महायात्रा

सत्य का शोध वह परम लक्ष्य है, जिसे प्राप्त करने की दिशा में निरन्तर प्रयत्न किया जाना चाहिए। इस दिशा में जितनी प्रगति होती चलती है, पिछली पीढ़ियों का महत्व उतना ही घटता जाता है। यों पीछे-पीछे चल कर आने वाले के लिए वे पिछली पीढ़ियाँ भी अगली के समतुल्य ही होती हैं।

मनुष्य क्रमिक गति से अविज्ञात से ज्ञात की दिशा में चल रहा है। जो पिछले दिनों अज्ञात था, उसकी जानकारी अगले कुछ समय में प्राप्त कर ली जाती है। इस प्रकार अविज्ञात ज्ञात बन जाता है, फिर यही क्रम आगे चलता है एवं उससे और आगे की जानकारी उपलब्ध की जाती है। इस क्रम में अब तक लम्बी मंजिलें पार कर ली गई हैं, किन्तु जितना चलना शेष है, उसे भी कम नहीं माना जाना चाहिए। हम सत्य के शोधक भर हैं। क्रमिक गतिशीलता ही अपनी सफलता है। पूर्ण सत्य की उपलब्धि ही चरम लक्ष्य है।

दृश्य, बुद्धि एवं अनुभूतियों के सहारे जो जाना जाता है, वह आँशिक सत्य है। हमारी जानकारियाँ ‘सापेक्ष’ हैं। किसकी अपेक्षा क्या और कौन अधिक उपयुक्त है, इतना ही मात्र जाना जा सकता है। किन मान्यताओं को स्वीकार किया जाय, किन्हें छोड़ दिया जाय, इस संदर्भ में आवश्यक-अनावश्यक, उपयोगी अनुपयोगी, सार्थक-निरर्थक, छोटी-बड़ी को ध्यान में रख कर चुन लेना ही उपयुक्त है, किन्तु इसका अर्थ यह कदापि नहीं कि जिसे कनिष्ठ माना गया है, वह सचमुच कनिष्ठ ही है। अपने से घटिया से जब तुलना होती है, तब कनिष्ठ भी वरिष्ठ बन जाता है और अपने समुदाय में उसे सर्वश्रेष्ठ की उपाधि दी जाने लगती है। इतने पर भी वह सर्वोत्तम नहीं हो सकता, यह सर्वविदित है, जब उसे वरिष्ठों के दरबार में उपस्थित किया जायेगा, तो गणना कनिष्ठों में ही होगी। तब यह नहीं माना जा सकेगा, कि अमुक चुनाव में उसे सर्वश्रेष्ठ घोषित किया जा चुका है। यही बात उपयोगी-अनुपयोगी, आवश्यक, अनावश्यक, सार्थक-निरर्थक जैसी मान्यताओं के साथ भी लागू होती है। सबको समय, परिस्थिति, व्यक्ति, वस्तु के सापेक्ष ही ऐसी संज्ञाएँ दी जाती हैं।

इस संदर्भ में आइन्स्टीन के सापेक्षवाद सिद्धाँत ने विज्ञान, दर्शन और व्यवहार के तीनों क्षेत्रों को चिन्तन की नई दिशा दी है और कहा है कि आग्रह व दुराग्रह पर न अड़ा जाय एवं समय, परिस्थिति व स्थिति के आधार पर जो औचित्यपूर्ण लगे, उसे अपना लिया जाय, क्योंकि सभी मान्यताएँ आँशिक सत्य होती हैं, उनकी उपयोगिता एक स्थिति में बहुत अधिक हो सकती है, किन्तु दूसरी स्थिति में उसे निरर्थक भी ठहराया जा सकता है। इसमें किसी प्रकार का मानापमान, हार-जीत का विचार नहीं बना लेना चाहिए, अपितु यह माना जाना चाहिए कि हम सभी पूर्ण सत्य की दिशा में खोज करते हुए क्रमशः आगे बढ़ रहे हैं। सभी अपूर्ण हैं, पूर्ण तो केवल ईश्वर है। ऐसी दशा में हम पूर्ण और हमारी मान्यता पूर्ण यह अड़ियल रुख अपना लेने से सत्यान्वेषण की दिशा में हमारी प्रगति ही अवरुद्ध हो जायेगी और हम प्रतिगामिता के पक्षधर बन कर रह जायेंगे, यहाँ सापेक्षवाद हमारी सहायता और जड़ता से रक्षा कर सकता है। सापेक्षवाद का अँगुली-निर्देश सत्यान्वेषी-तथ्यान्वेषी होने के लिए जन-चेतना को सहमत करना है। इसमें प्रगतिक्रम को बनाये रखने और पूर्वाग्रहों के प्रति लचीला रुख अपनाने का भी अनुरोध है।

दर्शन और विज्ञान के द्रष्ट मनीषी आइंस्टीन ने दूरी, समय और पदार्थ को भी सापेक्ष कहा है और बताया है कि इनके संदर्भ में अपनायी गई वर्तमान मान्यताएँ भी तुलनात्मक प्रयोजन से ही सत्य हैं, आँशिक सत्य, पूर्ण सत्य नहीं, उदाहरण के लिए यात्रा। साइकिल सवार को लिया जा सकता है। उस पर यात्रा करने वाले को व्यक्ति को मार्ग की वस्तुएँ उसी रूप में दिखायी देंगी, जिस रूप में वे हैं, जबकि एक ट्रेन यात्री को वे छोटी दिखायी देंगी। किसी अतितीव्र वाहन में सफर करने वाले व्यक्ति को मार्ग की कोई भी वस्तु दृष्टिगोचर नहीं होगी। आशय यह है कि लम्बाई, चौड़ाई की धारणा गति के सापेक्ष है। पृथ्वी पर समय की गणना सौर मण्डल की गति के आधार पर होती है, जबकि सम्पूर्ण ब्रह्मांड की तुलना में यह गति नगण्य है।

यदि मनुष्य किसी प्रकार ऐसे ग्रह पर पहुँच जाय, जो पृथ्वी से सैकड़ों प्रकाश वर्ष दूर तथा वहाँ से किसी शक्तिशाली टेलिस्कोप के माध्यम से पृथ्वी को देखे, तो हजारों वर्ष पूर्व घटित हुए घटनाक्रम उसे फिल्म की भाँति उसी प्रकार दिखाई देंगे, मानों अभी-अभी यह सब उसके सामने घटित हो रहे हों। ऐसी स्थिति में महाभारत व राम-रावण युद्ध एवं ऐतिहासिक काल के ऐसे ही ढेरों घटनाक्रम, देखे जा सकते हैं। अभिप्राय यह है धरती वासियों के लिए जो वर्तमान काल है, वह दूरस्थ ग्रह के लिए भविष्य एवं धरित्री के लिए जो भूतकाल था वह उनके लिए वर्तमान। इसी प्रकार अन्य ग्रहों के लिए जो भूतकाल था वह पृथ्वी वासियों के लिए वर्तमान है और जो वहाँ वर्तमान है, वह पृथ्वी पर सैकड़ों वर्ष बाद घटित होने वाला भविष्य। इस प्रकार स्पष्ट है कि भूत, वर्तमान और भविष्य का अपना कोई अस्तित्व नहीं होता, वे सब प्रकाश की गति के सापेक्ष है? पृथ्वी से प्रकाश के अन्य नक्षत्रों तक पहुँचने में सैकड़ों वर्ष लग जाते हैं। इसी प्रकार अन्य तारों से पृथ्वी तक प्रकाश किरणें आने में लम्बा समय लेती हैं। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि घटनाओं का सर्वथा लोप नहीं होता, उनका स्थूल स्वरूप भले ही लुप्त हो जाय, पर सूक्ष्म स्वरूप प्रकाश के गर्भ में अक्षुण्ण और अक्षय बना रहता है, जिसे आवश्यकतानुसार समर्थ आध्यात्मिक पुरुष देख भी सकते हैं।

योगविद्या के निष्णात विशिष्ट साधना प्रणालियों द्वारा भूतकाल की घटनाओं को दृश्यमान करते हैं। आराध्य के रूप में राम, कृष्ण, हनुमान मुहम्मद साहब, रामकृष्ण, बुद्ध आदि के दर्शनों के पीछे यही तथ्य निहित है कि वे भूतकाल के इन महापुरुषों के माध्यम से चैतन्य प्रक्रिया द्वारा अदृश्य जगत में पहुँच कर वहाँ विद्यमान देवमानवों का साक्षात्कार करते और आशीर्वाद ग्रहण करते हैं। इस संबंध में विवेकानन्द अपनी पुस्तक “राजयोग“ में लिखते हैं कि यहाँ भी गति की भूमिका महत्वपूर्ण है। हमारे इर्द-गिर्द अनेकों अशरीरधारी आत्माएँ घूमती-फिरती रहती हैं, किन्तु हम उन्हें सिर्फ इसलिए नहीं देख पाते हैं कि उनके प्राण का कम्पन हमारे प्राण कम्पन से कई गुना अधिक है। इसी असमानता के कारण हम उन्हें देखने की बात तो दूर अनुभव भी नहीं कर पाते हैं, योगीजन विशेष साधना उपक्रमों से जब अपने प्राण के प्रवाह को उनके कम्पन गति के समतुल्य बना लेते हैं, तो फिर उनसे संपर्क साधना उनके लिए तनिक भी कठिन नहीं होता। फिर वे स्थूल मनुष्य की तरह उनसे साक्षात्कार कर विचार विनिमय, बातचीत सब कुछ सामान्य ढंग से सम्पन्न कर सकते हैं।

वस्तुतः गति की तीव्रता के साथ-साथ प्रकृति के बन्धन ढीले पड़ते जाते हैं। गति यदि निरपेक्ष हो जाय, तो स्थूल बन्धन टूट जाते हैं। यही बन्धन-मुक्ति है। गति कम रहने के कारण ही स्थूल वस्तुओं का बन्धन बढ़ता जाता है। उदाहरणार्थ एक व्यक्ति हरिद्वार से आगरा जाता है, जिसमें वह साइकिल का प्रयोग करता है, तो इसमें उसे न सिर्फ अधिक समय लगेगा, वरन् पाथेय की भी समय और दूरी के हिसाब से आवश्यकता पड़ेगी। अन्य व्यक्तियों में से एक मोटर से तथा दूसरा हवाई जहाज से यात्रा करता है तो खाने-पीने की वस्तुओं की आवश्यकता और समय की व्ययिता कम पड़ेगी, पर यदि कोई प्रकाश अथवा टेकियोन (प्रकाश से भी तीव्र गति युक्त कण ) की गति से यात्रा करे, तो इन स्थूल वस्तुओं की तनिक भी आवश्यकता नहीं रह जायेगी। दूसरों शब्दों में स्थूलता का बन्धन पूर्णतः टूट जायेगा। यही चेतनात्मक स्थिति है। योगी लोग इसी में अवस्थित होकर हिमालय जैसे अति शीत प्रधान हिमाच्छादित प्रदेश में जीवित बने रहते हैं। प्रकाश की गति में स्थूल अस्तित्व लुप्त हो जाने से स्थूल चीजों की आवश्यकता भी नहीं रहती।

चेतना को आवृत्त किये रहने में इन्हीं दो की, समय और दूरी की प्रमुख भूमिका होती है। बन्धन में यही बाँधते हैं। विभिन्न साधनाओं का लक्ष्य इसी दूरी और समय को समाप्त करना है।

स्थूल जगत में भी यदा-कदा इस प्रकार की घटनाएँ घटती देखी जाती हैं, जिनमें स्थूल स्वरूप ही लुप्त हो गया हो। अटलाँटिक महासागर में फ्लोरिडा कोस्टारिका एवं बरमूडा के बीच एक ऐसा त्रिकोण है जिसमें ऐसी ही रहस्यमय गतिविधियाँ देखने को मिलती हैं। ऐसा क्यों होता है? तथ्य अब तक अविज्ञात है, पर यदि प्रकाश की तीव्रतम गति की उपरोक्त व्याख्या के आधार पर इसकी विवेचना की जाय, तो जहाज, वायुयान आदि के तिरोधान का कारण स्पष्ट समझ में आ जाता है। विज्ञान जगत में इन दिनों इसी सम्भावना पर अध्ययन चल रहा है कि क्या ऐसा संभव है? और यदि संभव है, तो उस त्रिकोण में ऐसी क्या बात है, जो हर वस्तु को प्रकाश की गति प्रदान कर देती है? मूर्धन्य विज्ञानी चार्ल्स वर्लिट्स ने अपनी बेस्ट सेलर पुस्तक “बरमूडा ट्रेंगिल” में इन्हीं संभावनाओं को लेकर अध्ययन-विश्लेषण किया है।

इस संबंध में गहन अध्ययन करने के उपरान्त भी वैज्ञानिकों को अब तक कोई ऐसा ठोस कारण उपलब्ध नहीं हो सका है, जिससे कि वे दावे के साथ कह सकें कि ऐसा अमुक कारण से होता है, पर अधिकाँश वैज्ञानिकों का विश्वास है कि उक्त क्षेत्र में चलने वाले साइक्लोन की गति प्रकाश की गति के बराबर है, फलतः जहाज, हवाई जहाज इस सीमा क्षेत्र में आते ही प्रकाश की गति पकड़ लेते और त्रिआयामी दृश्य जगत से किसी उच्च आयामी अदृश्य लोक में पहुँच जाते हैं। इस प्रकार की एक घटना 5 दिसम्बर सन् 1945 की है। अमेरिकी जलपोत से उड़े दो वायुयान चालकों सहित लुप्त हो गये। प्राप्त संकेतों के अनुसार चालक यह कहते हुए पाये गये कि हम विचित्र स्थान पर पहुँच गये हैं। यहाँ कुछ भी नहीं दिखाई पड़ रहा हैं। यहाँ हम लोगों के अपने स्वरूप भी स्पष्ट दृष्टिगोचर नहीं हो रहे हैं। उस क्षेत्र से बचे हुए कुछ लोगों का कहना था कि वहाँ दिशा, समुद्र, आकाश सभी का स्वरूप एक जैसा लग रहा था, भिन्न कुछ भी दिखाई नहीं पड़ता था।

वैसे इस संबंध में एक मान्यता यह भी है कि बरमूडा त्रिकोण लोक -लोकान्तरों से संपर्क साधने का अदृश्य मार्ग है। इस बात की पुष्टि महाभारत के बन तीर्थयात्रा प्रकरण के 132 वें अध्याय के उस तथ्य से भी हो जाती है, जिसमें शास्त्रार्थ में परास्त होने व शर्त के अनुसार समुद्र में डुबोने के बहाने कहोड़ मुनि को बन्दी नामक पंडित ने अपने पिता के यज्ञायोजन में सम्मिलित होने के लिए समुद्र मार्ग से वरुण लोक भेज दिया था और यज्ञ की समाप्ति पर ऐसे सभी शास्त्रज्ञों को पुनः उसी मार्ग से वापस बुला लिया था। तथ्य चाहे जो हो, पर इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि ऐसे स्थानों में प्रकाश अथवा उससे भी तीव्रगति वाली ऐसी शक्तियाँ कार्य करती हैं जो व्यक्ति, वस्तु अथवा यान को क्षणमात्र में एक से दूसरे लोक में पहुँचा दें। हम ऐसे मार्ग द्वारा दूसरे जगत में पहुँच तो जाते हैं, पर लौटने की विद्या मालूम न होने के कारण पुनः अपने स्थूल संसार में वापस लौट नहीं पाते।

आज उड़न तश्तरियों की चर्चा सामान्य और सर्वत्र है। उन्हें संसार के अनेक भागों में उड़ते देखने और उनकी तस्वीरें खींचने की खबरें समय-समय पर आती रही हैं, किन्तु किसी समाचार से उनकी यह पुष्टि न हो सकी कि दिखाई पड़ने के बाद वायुयान की तरह वह दूर तक उड़ती दिखाई पड़ती रही हों। प्रत्यक्षदर्शियों ने यही कहा कि आकाश में वह अचानक प्रकट हुई और उसी प्रकार गायब हो गई। संभव है ब्रह्माण्ड के किसी ग्रह में विज्ञान इतना विकसित हो चुका हो कि प्रकाश की गति से विमान को चलाने की विद्या उनके हाथ लग गई हो और इसी विकसित विज्ञान के आधार पर समय-समय पर वे पृथ्वी और पृथ्वीवासियों की टोह लेने आते रहे हों, इस क्रम में जब उन्हें दृश्यमान होना होता हो, तो वे विमान की गति कम कर देते होंगे और अदृश्य होने के समय उसे प्रकाश की गति प्रदान करते होंगे।


सत्यान्वेषण की दिशा (Kahani)

भारत में असहयोग आन्दोलन उन दिनों पूरे वेग पर था। सैनिक विद्रोह कर रहे थे। अँग्रेज घबरा रहे थे। सुलह सफाई के लिए बम्बई से अँग्रेज अधिकारी ने पटेल को बुलाया और परामर्श किया।

सरदार पटेल ने निर्भीक और स्पष्ट शब्दों में कहा सरकार से पूछ लें कि अँग्रेज इस देश में मित्रों के रूप में रहना चाहते हैं या लाशों के रूप में। हम दोनों ही स्थितियों को स्वीकार करेंगे। फैसला आपकी सरकार को करना है।

पटेल के इन निर्भीक स्पष्ट वचनों से अँग्रेज सरकार ने अपनी विदाई में ही खैर समझी और बिस्तर गोल करके भलमनसाहत के साथ चले गये।

वेदान्त दर्शन में जगत को माया, मिथ्या कह कर पुकारा गया है। यह इस अर्थ में सत्य है कि जो कुछ हम देखते हैं, वह निर्भ्रान्त नहीं है, जबकि उसकी प्रतीति सत्य जैसी होती है। विज्ञान संसार और उसके पदार्थ को परमाणुओं की संरचना और समुच्चय भर मानता है, जबकि अध्यात्म विज्ञानी जानते हैं कि तथ्य अनुभूति के सर्वथा विपरीत है।

सत्य को नारायण माना गया है। हम सत्यनारायण की पूजा भी करते हैं, पर उसके मूल भाव की सर्वथा उपेक्षा कर देते हैं, जिसमें अनवरत सत्य की ओर चलने और बढ़ने की शिक्षा निहित है। हम पूर्वाग्रही न बनें और सत्यान्वेषण की दिशा में गतिमान रहें तभी हम सापेक्ष से निरपेक्ष सत्य की प्राप्ति कर सकते हैं, यही हमारे साध्य और लक्ष्य भी हैं।


अग्नि विद्या का रहस्योद्घाटन

उपाख्यान है कि महर्षि उद्दालक ने एक विराट यज्ञ का आयोजन किया। यज्ञ पूरा हो जाने पर जब ऋत्विजों को दक्षिणा स्वरूप बूढ़ी मरणासन्न गायें दान में दी जाने लगीं तो उनकी दयनीय दशा को देखते हुए ऋषि पुत्र नचिकेता क। मन में प्रश्न उठा कि पिता जी ये कैसी गायें दक्षिणा में दे रहे हैं यही सोचकर उसने अपने पिताजी से पूछा-”कस्मै माँ दास्यमीति“ अर्थात् आप मुझे किसे देंगे? दो-चार बार पूछने पर उद्दालक चुप रहे, पर बार-बार यही प्रश्न दुहराये जाने पर उनने क्रोधपूर्वक कहा- “मृत्यवे त्वाँ ददामीति।” अर्थात् तुझे मैं मृत्यु को दान देता हूँ।

यही नचिकेता मृत्यु को प्राप्त होता है और यमसदन पहुँचकर यमराज को नहीं पाता, तो तीन दिन बिना अन्न-जल ग्रहण किये ही उनकी प्रतीक्षा करता है। यमसदन के लौटने पर प्रसन्न होकर तीन वरदान माँगने को कहते हैं।

प्रथम वर में नचिकेता ने अपने पिता के क्रोधावेश के शमन की ओर दूसरे वर में अग्निविद्या का उपदेश देने की प्रार्थना की। इस पर यमराज ने उसे गुह्य अग्निविद्या का उपदेश दिया। यमराज ने उस स्वर्गलोक की कारण रूपा अग्नि विद्या का उपदेश करते हुए उसमें कुँड निर्माण आदि के लिए जो और जितनी ईंटें आवश्यक होती हैं तथा जिस प्रकार उनका चयन किया जाता है, वे सब बातें भी बतायीं। नचिकेता ने भी यह सब जैसा सुना था, ठीक उसी प्रकार समझकर यमराज को पुनः सुना दिया। इससे यम देवता प्रसन्न होकर बोले “अब मैं तुमको यहाँ पुनः वह अतिरिक्त वर देता हूँ कि यह अग्नि तुम्हारे ही नाम से प्रसिद्ध होगी।” इस अग्नि का तीन बार अनुष्ठान करने वाला तीनों वेदों के साथ संबंध जोड़कर यज्ञ, दान और तप रूप तीनों कर्मों को निष्काम भाव से करते रहने वाला मनुष्य जन्म-मृत्यु से तर जाता है तथा वह ब्रह्मा से उत्पन्न सृष्टि के रहस्य इस अग्निदेव को जानकर तथा इसका निष्काम भाव से चयन करके इस अनन्त शक्ति को प्राप्त हो जाता है।

अग्निविद्या क्या है? उसका साधन किस प्रकार किया जाना चाहिए? इस संबंध में उपनिषद् मौन हैं। केवल संकेत ही किये गये है, मर्मज्ञों का कथन है कि यह अग्निविद्या और कुछ नहीं, गायत्री महाविद्या का ही रहस्योद्घाटन है जो यमराज ने नचिकेता को अधिकारी सत्पात्र मानकर बताया। शास्त्रों में गायत्री साधना के तीन चरण बतायें गये है, एक ‘भू’ इस चरण में साधक गुरु से मंत्र दीक्षा प्राप्त करता है। मंत्र दीक्षा लेते समय साधक प्रतिज्ञा करता है कि मैं गुरु का आदेश अनुशासन पूर्ण श्रद्धा के साथ मानूँगा। समय-समय पर उनके परामर्श और मार्गदर्शन से अपनी जीवन नीति निर्धारित करूंगा तथा अपनी सब भूलों को उनके सामने स्पष्ट रूप से प्रकट कर दिया करूंगा।

नचिकेता ने यमदेव से गुरुदीक्षा प्राप्त की थी और उनने कहा था- इस विद्या का तीन प्रकार से यज्ञ, दान और तप रूप में अनुष्ठान करने वाला व्यक्ति जन्म मरण से छूट जाता है। तीन बार अनुष्ठान अर्थात् साधना के तीन सोपान-दीक्षा के तीन चरण। पहला ‘भू’, मंत्र दीक्षा, दूसरा ‘भुवः’ प्राण दीक्षा और तीसरा ‘स्वः’ ब्रह्म दीक्षा। प्राणदीक्षा को ही अग्निदीक्षा कहा गया है। ब्रह्म दीक्षा उससे आगे की बात है।

‘भुवः’ दीक्षा अथवा प्राण दीक्षा अथवा अग्निदीक्षा में गुरु साधक के प्राणमय एवं मनोमय कोश की अन्तर्निहित शक्तियों को जाग्रत करने का शिक्षण देते हैं। सर्वविदित है कि साधना एक समर है जिसे प्राण शक्ति की प्रचुरता के बिना जीता नहीं जा सकता। इस शक्ति को अर्जित करना और उससे अपने व्यक्तित्व को परिष्कृत एवं सुसंस्कार सम्पन्न बनाना ही अग्निविद्या है। प्राण को अग्नि भी कहा गया है। अग्नि अर्थात् कषाय-कल्मषों, दोष-दुर्गुणों व्यक्तित्व में विद्यमान विकारों मलिनताओं को जला-गलाकर कुँदन सदृश तपाये हुए व्यक्तित्व का निर्माण करने वाली ऊर्जा। प्राण ही वह अग्नि है जिसके अभिवर्धन का रहस्य ज्ञात हो जाने पर साधना मार्ग में आगे वाले अवरोधों को दूर किया और व्यक्तित्व बना जाता है।

जब यह शक्ति पर्याप्त मात्रा संचित हो जाती है तो साहस, उत्साह, दृढ़ता, स्फूर्ति, धैर्य, मनोयोग जैसे कई गुणों का आविर्भाव और अभिवर्धन होता है। मानवी काया में विद्यमान कई गुप्त और अज्ञात रहस्यमय शक्ति केन्द्र इस भूमिका में आकर सक्रिय तथा जाग्रत होते हैं, जो इसके पूर्व प्रसुप्त स्थिति में पड़े रहते हैं। इसी भूमिका में मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार के अन्तःकरण चतुष्टय का संशोधन तथा परिमार्जन होता है। जब प्राण दीक्षा की भूमिका आती है तब गुरु साधक में कई दिव्य शक्तियाँ उड़ेलते हैं और उसमें बीज रूप से साधक के अन्तःकरण में आत्मबल का आरोपण हो जाता है, इसका प्रभाव यह होता है कि साधक तीव्रता से आत्मोन्नति की ओर बढ़ने लगता है।

यमदेव ने नचिकेता को इसी रहस्यमयी अग्निविद्या का उपदेश देकर उक्त भूमिका में पहुँचाया था। इसी का परिणाम था कि नचिकेता के मन में आत्मा संबंधी जिज्ञासा उत्पन्न हुई और आत्मिक उत्कर्ष की तीव्र उत्कंठा उत्पन्न हुई।


गायत्री साधना के दो रूप- दक्षिण मार्ग ही ग्राह्य

दक्षिण मार्गी सौम्य गायत्री साधना से उल्टा दूसरा मार्ग है ‘वाममार्ग।’ वाम अर्थात् टेढ़ा-उलटा। यह दैत्य पथ है। इसी को तंत्र कहते है। रावण, मारीच, कुँभकरण, भस्मासुर आदि तंत्र मार्ग के साधक थे। जो अपना, अपनों का स्वार्थ साधन करने के लिए दूसरों का शोषण, उत्पीड़न करते हैं। हिरण्यकश्यपु, वृत्तासुर, अघासुर, बकासुर, कंस आदि का पराक्रम और वैभव इसी स्तर का था। जरासंध इसी मार्ग का अनुयायी था।

गायत्री उपासना जैसे दक्षिण मार्ग में आत्मा की उच्चस्तरीय शक्तियों का उपयोग किया जाता है और इसके लिए तप संयम का मार्ग अपनाया जाता है, इसका प्रतिफल आत्मशान्ति और दूसरों को सद्गति प्रदान करने में होता है।

तंत्र का उपयोग प्रायः अनैतिक-अवाँछनीय कार्यों में ही होता है जैसे मारण, मोहन, उच्चाटन, वशीकरण, स्तंभन, सम्मोहन आदि। इन उपाय उपचारों से दूसरों का अहित ही हो सकता है, लाभ की आशा तो की नहीं जा सकती। किसी शत्रु से प्रतिरोध चुकाया जा सकता है या अपने से दुर्बल को भयभीत करके उसका मनमाना उपयोग किया जा सकता है। भले ही वह अनुचित अनैतिक ही क्यों न हो?

ऐसे क्रूर कर्म करने वाले को प्रायः पहले स्वयं इस प्रकार का जीवन ढालना पड़ता है जिसमें आत्मा की पुकार को दबाने-दबोचने में सफलता मिल जाय। ऐसे अनौचित्य का अभ्यास कर लेने के उपरान्त ही निर्भय होकर दूसरों पर हाथ छोड़ना संभव होता है।

तंत्र को वाममार्ग के अनुरूप पाँच साधनाएँ करनी पड़ती हैं (1) मद्यं (2) मास (3) मीनं (4) मुद्रा (5) मैथुन एवं च। यह पाँच मकार ही तंत्रमार्ग के आराध्य हैं। वे माँस खाते हैं और देवी देवताओं के नाम पर पशुओं का ही नहीं मनुष्यों तक का वध करते हैं, ताकि उनकी निष्ठुरता बधिकों की तरह अभ्यास में आ सके और स्वभाव का अंग बन सके। नशे की स्थिति में भी मनुष्य अर्धविक्षिप्त हो जाता है और वैसी स्थिति में क्रूर कर्म करते हुए संकोच नहीं होता। मछलियों को पकड़ना, तड़पाना, मारना भी उसी स्तर का क्रूर कर्म है। मुद्राएँ एक प्रकार की साधना हैं जिसमें वज्रोली मुद्रा का उद्देश्य वीर्यपात को रोकना भर है। कामोत्तेजना तो उसके लिए चाहिए ही। मुद्रा का अर्थ येन-येन प्रकारेण धन कमाना भी है। भले ही वह किराये के हत्यारों की तरह ही क्यों न करना पड़े। ऐसे अनुचित तरीकों से ही विपुल धन कमाने में चोर डाकू हत्यारे सफल होते हैं और उस धन को दुर्व्यसनों की पूर्ति में उड़ाते रहते हैं।

इस मार्ग को अपनाने वालों को सर्वप्रथम आत्महनन का अभ्यास करना पड़ता है, तदुपरान्त वे निर्भय हो कर दूसरों को अपंग करने, मनमर्जी के अनुरूप नचाने, विक्षिप्त करने आदि में सफल होते हैं, मारण के लिए किया गया ‘कृत्या’ घात-अभिचार इसी वर्ग के कृत्यों में सम्मिलित है। भावुकों को वशवर्ती बनाकर उन्हें वशवर्ती सहयोगी बनाने में भी वे सफल हो जाते हैं। ऐसे लोग त्रिपुरा, भैरवी, महाकाली, बगलामुखी, भैरव महाकाल आदि को अपना इष्ट बनाते देखे गये हैं।

सामान्य ताँत्रिक लोगों को छुटपुट हानियाँ पहुँचा सकते हैं, किन्तु बड़े अनर्थ करने में बड़ी श्रेणी के ताँत्रिक ही सफल हो पाते हैं। उन्हें अघोरी, कापालिक आदि कहते है। अघोरी, सरभंगी, अखाद्यों को, मलमूत्र आदि तक का सेवन करते रहते हैं। कापालिक श्मशान सेवन करते है मुर्दों की चिताओं पर भोजन पकाते, श्मशानों में निवास करते देखे गये हैं, वे प्रेत-पिशाचों को सिद्ध कर लेते हैं और धन ऐंठने, कुकर्म में सहयोग देने या उत्पीड़न का मजा देखने के लिए उनका उपयोग करते रहते हैं। ऐसे लोगों को बेताल, ब्रह्मराक्षस, कर्ण पिशाचिनी आदि की सिद्धि होती है, जिनके माध्यम से वे दूसरों को डराने-सताने में समर्थ होते हैं।

कुकर्मों में आरंभिक लाभ तो है ही। आततायी असावधानों पर अनायास आक्रमण करते हैं और उस हालत में तात्कालिक लाभ भी उठा लेते हैं। भले ही पीछे उन्हें उसका कितना ही भयंकर दुष्परिणाम क्यों न भुगतना पड़े, दैत्य प्रायः इसी नीति को अपनाते हैं, और दूसरों को हानि पहुँचाने के उपरान्त अपना-अपनों का भी कम अनर्थ नहीं करते। वाममार्गी प्रायः इसी मार्ग का अनुकरण कर अपना सब कुछ गँवा बैठते हैं।

भगवान बुद्ध के अवतार काल में ऐसे ही वामाचार का बोलबाला था। समर्थ लोग मदान्ध हो कर यही रीति-नीति अपनाते थे। उसका विरोध उनने प्राणपण से किया था और सदाचार की स्थापना में सर्वतोभावेन प्रयत्न करके सफलता पाई थी।

अफ्रीका के जंगली आदिवासियों में अभी भी ऐसी प्रथायें विद्यमान हैं। अपने देश का नैतिक स्तर अब बुद्ध, महावीर, शंकराचार्य गाँधी, विवेकानन्द आदि के प्रयत्नों से काफी सुधर गया है। इसलिए वैसे प्रचलन अब नहीं रहे। देवताओं को प्रसन्न करने के लिए पशुबलि का प्रयोग भी दिनोंदिन घटता जा रहा है। ‘कृत्या-घात’ आदि मारण क्रियायें भी किसी-किसी को ही सिद्ध होती हैं। अधिकाँश ताँत्रिक दूसरों को डराने भर की क्रिया कर पाते हैं। वस्तुतः उनमें वैसी सामर्थ्य पर्याप्त अभ्यास के अभाव में विकसित नहीं हो पाती। जो करते हैं वे बदनाम होने के अतिरिक्त तिरस्कार और दंड के भाजन भी बनते हैं।

यह बातें यहाँ इसलिए लिखी गई हैं कि ‘विलोम’ गायत्री के अभ्यास से तंत्र कृत्य भी हो सकते हैं, रावण वेदों का भाष्यकार था, पर वह दक्षिण मार्ग पर चलने की अपेक्षा वाममार्ग की ओर मुड़ गया, फलतः दूसरे असंख्यों को दुख देने के अतिरिक्त अपना तथा अपने कुटुम्ब का भी सर्वनाश करा बैठा। रावण ‘कृत लंकेश तंत्र’ प्रसिद्ध है।

विचारशील मनीषियों ने हर अध्यात्म साधक को दक्षिणमार्गी देव साधनायें ही करने के लिए परामर्श दिया है और तंत्र से दूर रहने के लिए कहा है। जिन्हें तंत्र विज्ञान की दृष्टि से ज्ञान भी हो उनके लिए भी आदेश है कि कुपात्र को न बतायें, अन्यथा वह दूसरों का अनर्थ करने के प्रलोभन से अपने को बचा न सकेगा। इसी दृष्टि से गायत्री तंत्र के प्रथम श्लोक में ही इसे कुपात्र को न बताने का निषेध कर दिया गया है।

‘अति गुह्यामिदं पुष्ट’ त्वया ब्रह्म तनुद्भव।

वक्तव्यं न कस्मैचित् दुष्टय पिशुनाय च॥

-गायत्री तंत्र

अर्थात् हे नारद! तूने गायत्री का रहस्य पूछा तो है, पर किसी दुष्ट, अनाचारी, कृपाल से इसका जिक्र भी न करना चाहिए।

पुस्तकों में ऐसे प्रयोगों का कई जगह वर्णन है। यहाँ तक कि छलपूर्वक सिद्धियाँ दिखाने की इन्द्रजाल विद्या का भी उल्लेख है। आग्नेयास्त्र आदि के प्रयोगों का वर्णन है। इतने पर भी उन प्रयोगों को सिद्ध करने की विधियों को गुप्त रखने और संकेत मात्र करने की विधियाँ तंत्र ग्रन्थों में वर्णित है। उन्हें बिना रहस्यों को समझे प्रयोग पर निष्फलता ही हाथ लगती है और उलटे अपने निज के पागल आदि हो जाने का डर रहता है।

वाममार्ग वस्तुतः शरीरगत विद्युतशक्ति का प्रयोग है। उसमें आत्मा को तो उलटा कुचलना ही पड़ता है, शरीरगत प्राणविद्युत को भी प्रचण्ड बनाना पड़ता है। मूलाधार और ब्रह्मरंध्र की मस्तिष्कीय क्षमताओं के समन्वय से कुण्डलिनी जाग्रत की जाती है। इस आधार पर ताँत्रिक अपने प्राणतत्व बढ़ाता और


एक रुपये को खींच लिया न? (Kahani)

कि सी व्यक्ति ने सुन रखा था कि “रुपया रुपये को खींचता है।” वह एक रुपया लेकर बैंक में खजाँची के पास जा खड़ा हुआ। अपना रुपया दिखाने लगा कि अन्य रुपये खिंच कर उसके पास आ जायें।

इस प्रयास से उसके हाथ का रुपया भी छूट गया और खजाँची के पास रखे रुपयों के ढेर में जाकर मिल गया।

व्यक्ति रोने लगा। खजाँची ने पूरी बात सुनी। उसके भोलेपन पर हँसा भी। रुपया वापस दे दिया और कहा तुमने जो सुना वह तो ठीक पर उसमें यह कमी रह गयी कि बहुमत अल्पमत को अपनी ओर खींच लेता है, ढेर ने तुम्हारे एक रुपये को खींच लिया न?

उस आधार पर दूरवर्ती लोगों को प्रक्षेपास्त्र को भाँति हानि पहुँचा सकता है या अपने चुम्बकत्व से उसे अपने पास खींच कर बुला सकता है। मेघनाद ने लक्ष्मण पर ब्रह्मास्त्र चलाया था। वह अस्त्र शस्त्र जैसा नहीं था वरन् सिद्ध की गई आन्तरिक शक्ति का ही प्रहार था। महाभारत में ऐसे अनेक अद्भुत अस्त्रों का वर्णन है जो अग्नि बरसाते थे और दूसरे प्रकार के आश्चर्यजनक मारक परिणाम प्रस्तुत करते थे। उनकी काट भी विपक्ष तंत्र शक्ति के द्वारा ही करता था।

गायत्री उपासकों को इन पंक्तियों द्वारा सावधान किया गया है कि वे दक्षिणमार्ग ही अपनायें वाममार्ग ताँत्रिक मार्ग पर न चलें और न किसी को इस और उत्साहित करें। कुपात्रों को अनर्थ मार्ग बताने या चलाने वाला भी पाप का भागी होता है।


संकटों से विचलित न हों

इस संसार में अवाँछनीयताओं व उत्कृष्टताओं दोनों का समावेश है। यहाँ पाप व अनीति अधिक और पुण्य, नीति स्वल्प रहे होते तो अब तक दुनिया का नामो−निशान न रहता। आग दुनिया में है तो सही, पर पानी से अधिक नहीं। इतने पर भी देखने में यह आता है अध्यात्म तंत्र से जुड़े धर्मपरायण व्यक्ति ही अधिक संकट पाते है। दुष्टता का प्रत्याक्रमण बढ़ता जाता है, घटता नहीं, प्राणों का संकट एकाएक आ चढ़ बैठता है। कभी-कभी यह अपने निजी संबंधियों से लेकर आत्मीयों का अहित कर बैठता है। असुरता अजेय बनती दीख पड़ती है एवं देवत्व मोटी दृष्टि से पराजित होता दिखाई देता है। साधारण बुद्धि वाले मनुष्य इसमें कार्य कारण की कुछ संगति बिठा नहीं पाते व नाना प्रकार की शंकाएँ उनके मन में उठती रहती हैं। इसका समाधान पाने हेतु कुछ प्रसंगों को पहले समझना होगा।

देवासुर संग्राम में ऐसे कई घटनाक्रम घटित हुए हैं जब असुरता देवत्व पर हावी हुई है। अच्छे काम में अड़चन डालने वाले असुर देव समुदाय को अपने मार्ग का रोड़ा मानकर उन पर आक्रमण करते आए हैं। देव शक्तियाँ चाहे वे अवतार के रूप में हों अथवा महामानव के रूप में धर्म के पथ पर जागरुक हो प्रतिरोध करती रहीं हैं। किसी को अपनी जान गँवाकर, किसी को कष्ट सहन करके, किसी को प्रिय का वियोग विछोह सह कर तथा किसी को प्रखर संघर्ष द्वारा व्यापक विध्वंस करके यह माहौल बनाना पड़ा है कि देवत्व सदैव जाग्रत रहेगा।

ईसा जीवन भर कष्ट सहते रहे। आज तीन चौथाई आबादी विश्वभर में उन्हें मानती है। अंतिम समय में मात्र आठ शिष्य उनके साथ थे उसमें से भी एक ने धोखा दिया व अंततः वे सूली पर चढ़ा दिये गए। उनके मरने के बाद भी क्रिश्चियन धर्म नहीं मरा।

गृहकलह से लेकर शत्रुओं की दुरभि संधियाँ प्रसिद्ध दार्शनिक सुकरात को जीवन भर त्रास देती रहीं। हमेशा प्रसन्नता से जीने वाले इस महामानव ने जहर का प्याला पीकर मौत स्वीकार कर ली किन्तु सिद्धाँतों से समझौता नहीं किया।

क्या महात्मा गाँधी ने किसी का कुछ बिगाड़ा था जो उन्हें स्वतंत्रता की लक्ष्य सिद्धि के बाद भी गोली खानी पड़ी। लाला लाजपतराय लाठियाँ खाकर व सैकड़ों निर्दोष व्यक्ति गोलियाँ द्वारा जलियावाला काण्ड के समय मारे गए। दीन दयाल उपाध्याय जैसे संत हृदय व्यक्ति की किसी से क्या दुश्मनी हो सकती थी कि वे एक आक्रमण का शिकार बनते। स्वामी दयानन्द ने किसी का क्या बिगाड़ा था कि कोई व्यक्ति उनका विश्वस्त बनकर उनकी जान ले बैठा। वस्तुतः इन सभी प्रकरणों में प्रत्यक्ष को नहीं परोक्ष को कारण समझा जाना चाहिए एवं यह निष्कर्ष निकाला जाना चाहिए कि सत्य व धर्म की रक्षा के लिए आदर्श कर्तव्य पालन के अतिरिक्त धर्मपरायणों-आस्तिकों समाज के लिए समर्पित जीवन जीने वालों को अपनी जान की कीमत पर वह काम करना पड़ा है जो शायद वैसे संभव न हो पाता, इसका कारण यह नहीं कि असुरता इसमें जीतती व देवत्व की हार होती रही है। दैवी चेतना का कुछ विधान है यह कि कुछ कारण न होते हुए भी महामानवों को अग्नि परीक्षा से गुजरना पड़ा है व अपनी आहुति देनी पड़ी है।

सत्य व धर्म का अवलम्बन लेने वाले समाज समर्पित व्यक्तियों के जीवन में एक ऐसी समानता देखने में आती है, जो त्रासदी से भरी है। वह है उन पर जीवन भर कष्टों का आना। न केवल कटु वचनों के हमलों के रूप में, रोगों के प्रत्याक्रमण के रूप में वरन् आक्रमणों के रूप में भी। एक सामान्य व्यक्ति यह सोच सकता है कि धर्म एवं न्याय के पक्षधर कभी किसी का बुरा न चाहने वालों के साथ ऐसा क्योंकर होता है? क्या विधाता के यहाँ ऐसी कोई भी व्यवस्था नहीं कि आसुरी शक्तियाँ ऐसे भले मानसों को कोई कष्ट नहीं पहुँचाएँ।

इस असमंजस का एक ही समाधान है कि दैवी व्यवस्था बड़ी विलक्षण है। बड़े काम बड़ों द्वारा खतरे उठाकर ही संपन्न किये जाते हैं। वे आत्मबल संपन्न होते हैं व बड़ी से बड़ी क्षति पर भी साहस नहीं खोते। ऐसे लोग होते तो गिने चुने ही हैं, पर दैवी कृपा, लोक सम्मान जनशक्ति के सहयोग व अनुग्रह के रूप में उन पर हमेशा बरसती है। प्रकृति का नियम अटल है। परोक्ष जगत में क्या हो रहा है-हम नहीं जानते पर उस महासत्ता पर विश्वास कर अपनी आस्तिकता को तो सतत् पोषण देते रह सकते हैं।

मधु संचय-


मंगलदीप जलाओ साथी!


मंगलदीप जलाओ साथी (Kavita)

चलो, गुरु-ज्ञान का दीपक, हमें घर-घर जलाना है।

अँधेरे से डरे हैं जो, उन्हें हिम्मत बँधाना है॥

अँधेरी रात पाकर के, निराशा ने जिन्हें घेरा।

निराशा में जमाना चाहते पीड़ा-पतन डेरा॥

नहीं वे सोच पाते हैं, लड़ें कैसे अँधेरे से।

निकल पाते निराशा के, न जब तक क्रूर घेरे से ॥

उन्हें आशा-किरण का करिश्मा, जाकर बताना है ॥

अरे! क्यों हारते हिम्मत, अँधेरा कब सदा रहता।

सुबह की ही प्रतीक्षा में, इसे संसार सह लेता॥

कहीं सूरज निकलने की, सुनिश्चित तैयारी में है।

अँधेरा हमेशा को ही, न किस्मत तुम्हारी में है॥

तिमिर से जूझने की, भोर तक हिम्मत दिखाना है॥

न घबराओ, पतन, पीड़ा पराभव से तनिक भाई।

समय इतना निकट है, अन्त होने की घड़ी आई॥

कि युग-ऋषि ने पुनः देवत्व मानव का जगाया है॥

दनुजता को मिटाने का, अरे! बीड़ा उठाया है॥

निराशा छोड़ दो, मन में तुम्हें आशा जगाना है॥

नया युग आ रहा है, फिर निराशा टिक न पाएगी।

नगर में, गाँव में, घर में, अँधेरी दिख न पाएगी॥

उदय होगा नये दिनमान का, पथ जगमगाएगा।

यही दीपक हमें गुरु-ज्ञान सूरज से मिलाएगा॥

यही है सूर्य का प्रतिनिधि, इसे साथी बनाना है॥

-मंगल विजय


जप के साथ ध्यान भी आवश्यक

जप के साथ ध्यान का अनन्य संबंध है। नाम और रूप का जोड़ा है। दोनों को साथ-साथ लेकर ही चलना पड़ता है। अन्यथा भजन करते समय मन स्थिर नहीं रहता। मन के केन्द्रित हुए बिना चित्त कहीं का मारा कहीं भागता फिरता है और यही शिकायत बनी रहती है कि साधना में मन नहीं लगता। यह एक तथ्य भी है कि मन प्रेम का गुलाम है। जहाँ भी जिस वस्तु में भी प्रेम मिलेगा वहीं मन उसी प्रकार दौड़ जायगा जैसे खिल-खिलाते पुष्प पर भौंरा जा पहुँचता है। यदि जप के साथ इष्ट के प्रति-आराध्य के प्रति भावना का समावेश कर लिया जाय तो निश्चित रूप से मन उसमें उसी प्रकार लगा रहेगा जैसा संसारी मनुष्यों का अपने स्त्री-पुत्र, धन आदि में लग रहता है। साधक और आराध्य के मध्य प्रेम और आत्मीयता का संबंध सूत्र ध्यान द्वारा ही सधता है। इसीलिए विज्ञ उपासक जप के साथ ध्यान किया करते हैं, ‘नाम ‘ के साथ ‘रूप’ की संगति मिलाया करते हैं। यही तरीका सही भी है।

जप, योग-साधना का एक अंग है। योग चित्तवृत्तियों के निरोध को कहते हैं। जप के समय चित्त एक लक्ष्य में लगा रहना चाहिए। यह कार्य ध्यान द्वारा ही संभव है। मात्र जप करते रहा जाय और ध्यान धारणा की उपेक्षा अवहेलना होती रहे तो साधना की सफलता संदिग्ध ही बनी रहेगी। यही कारण है कि साधना ग्रंथों में, अध्यात्म शास्त्रों में जप के साथ ध्यान को अनिवार्य बताया गया है। गायत्री उपासना के बारे में कहा गया है-

गायत्री भावयेद्देवी सूर्यासारकृताश्रयाम।

प्रातमध्यान्हे ध्यान कृत्वा जपेत्सुधीः॥

अर्थात् बुद्धिमान मनुष्य को सूर्य के रूप में स्थित गायत्री माता का प्रातः, मध्याह्न और सायं त्रिकाल ध्यान करते हुए जप करना चाहिए।

जप में मन लगे इसके लिए ध्यान का समावेश होना आवश्यक है। साधना की यह आरंभिक कक्षा साकार उपासना से शुरू होती है और धीरे-धीरे विकसित होकर वह निराकार तक जा पहुँचती है। मन किसी रूप पर ही जमता है। निराकार का ध्यान पूर्ण परिपक्व मन ही कर सकता है, आरंभिक अभ्यास के लिए वह सर्वथा कठिन है। इसलिए साधना का आरम्भ साकार उपासना से और अन्त निराकार उपासना में होता है। साकार और निराकार उपासनायें दो कक्षाओं की भाँति हैं जिसमें आरंभ में बालक पट्टी पर खड़िया और कलम से लिखना सीखता है और बाद में वही कागज स्याही और पेन से लिखने लगता है। दोनों स्थितियों में अन्तर है, पर इसमें कोई विरोध नहीं है। साकार का अवलम्बन लेकर ही निराकार में प्रवेश किया जाता है।

जब तक मन स्थिर न हो तब तक जप के साथ साकार उपासना करना उचित है। गायत्री महामंत्र के जप के साथ माता का एक सुन्दर नारी के रूप में ध्यान करना होता है। सुन्दर से सुन्दर आकृति की कल्पना करके उसे अपनी सगी माता से भी बढ़कर माना और जप करते समय अपने ध्यान क्षेत्र में प्रतिष्ठित करना होता है। साथ ही साथ अपने को एक साल के छोटे बच्चे की स्थिति में अनुभव किया जाता है। छोटे बालक का हृदय सर्वथा शुद्ध, निर्मल और निश्चिन्त, निश्छल होता है। वैसी ही स्थिति अपनी भी सोची जाती है। अपने को भी शिशु की अवस्था में अनुभव किया जाता है। कामना, वासना, भय, लोभ, चिन्ता, शोक, द्वेष आदि से अपने को सर्वथा मुक्त और सन्तोष, उल्लास एवं आनन्द से ओत-प्रोत स्थिति में अनुभव करना पड़ता है। साधक का अन्तःकरण साधनाकाल में बालक के समान शुद्ध एवं निश्छल रहने लगे तो समझना चाहिए कि साधना में तीव्र गति से प्रगति होना सुनिश्चित है। जप में मन तभी लगता है जब आराध्य के प्रति-माता के प्रति प्रेम का, आत्मीयता का, उफान उमगने लगे। इससे व्यावहारिक जीवन में भी निर्मलता बढ़ती जाती है और चहुँ ओर से साधक पर परमात्मा का अनुदान-वरदान बरसता दिखाई देता है।

माता और बालक परस्पर जैसे अत्यन्त आत्मीयता और अभिन्न ममता के साथ सुसम्बद्ध रहते हैं, हिलमिल कर प्रेम का आदान-प्रदान करते हैं, वैसा ही साधक का भी ध्यान होना चाहिए। “हम एक वर्ष के अबोध बालक के रूप में माता की गोदी में पड़े हैं और उसका अमृत सदृश दूध पी रहे हैं। गायत्री माता बड़े प्यार से उल्लासपूर्वक अपना दूध हमें पिला रही हैं? वह दूध रक्त बन कर हमारी नस-नाड़ियों में घूम रहा है और अपने सात्विक तत्वों से हमारे अंग-प्रत्यंगों को परिपूर्ण कर रहा है।” यह ध्यान बहुत ही सुखद है, छोटा बच्चा अपने नन्हें-नन्हें हाथ पसार कर कभी माता के बाल पकड़ता है। कभी नाक-कान आदि में अँगुलियाँ डालता है, तो कभी अन्य प्रकार की अटपटी क्रियायें माता के साथ करता है। वैसा ही कुछ अपने द्वारा किया जा रहा है ऐसी भावना प्रगाढ़ करनी पड़ती है। माता भी जब वात्सल्य प्रेम से ओतप्रोत होती है, तब बच्चे को छाती से लगाती है, उसके सिर पर हाथ फिराती है, पीठ खुजलाती है, थपकी देती है, पुचकारती है, उछालती तथा गुदगुदाती है। हंसती और हंसाती है। वैसी ही क्रियायें गायत्री माता के द्वारा अपने साथ हो रही हैं, यह ध्यान करना होता है। इस समस्त विश्व में माता और पुत्र केवल मात्र दो ही हैं और कहीं कुछ नहीं है। कोई समस्या, चिन्ता, भय, लोभ आदि उत्पन्न करने वाला कोई कारण और पदार्थ इस संसार में नहीं है। केवल माता और पुत्र दो ही इस शून्य नील आकाश में अवस्थित होकर अनन्त प्रेम का आदान-प्रदान करते हुए कृतकृत्य हो रहे हैं।

जप के समय आरंभिक साधक के लिए यही ध्यान सर्वोत्तम है। इससे मन को एक सुन्दर भावना में लगे रहने का अवसर मिलता है और उसकी भागदौड़ बन्द हो जाती है। प्रेम-भावना की अभिवृद्धि में भी यह ध्यान बहुत सहायक होता है। सूरदास, तुलसीदास, शबरी, मीरा, चैतन्य महाप्रभु, रामकृष्ण परमहंस आदि सभी भक्तों ने अपनी प्रेम भावना के बल पर भगवान को प्राप्त किया था, प्रेम ही वह अमृत है जिसके द्वारा सींचे जाने पर आत्मा की सच्चे अर्थों में परिपुष्टि होती है और वह भगवान को अपने में और अपने को भगवान में प्रतिष्ठित कर सकने में समर्थ बनती है। जप के साथ यह ध्यान इस आवश्यकता की पूर्ति करता है।

उपरोक्त जप युक्त ध्यान गायत्री उपासना की प्रथम भूमिका में आवश्यक है। जप के साथ श्रद्धा भाव की मात्रा भी पर्याप्त होनी चाहिए। इस ध्यान को कल्पना न समझा जाय, वरन् साधक अपने को वस्तुतः उसी स्थिति में अनुभव करे और माता के प्रति अनन्य प्रेम-भाव के साथ तन्मयता अनुभव करे, यह अनिवार्य है। तभी इस अनुभूति की प्रकटता में अलौकिक आनन्द का रसास्वादन होता है और मन निरन्तर इसी में लगे रहने की इच्छा करता है। इस प्रकार मन को वश में करने और एक ही लक्ष्य में रहने की एक बड़ी आवश्यकता सहज ही पूरी हो जाती है।

साधना की दूसरी भूमिका तब आरंभ होती है जब मन की भागदौड़ बन्द हो जाती है और चित्त जप के साथ ध्यान में संलग्न रहने लगता है। इस स्थिति को प्राप्त कर लेने पर चित्त को एक सीमित केन्द्र पर एकाग्र करने की ओर कदम बढ़ाना पड़ता है, उपरोक्त ध्यान के स्थान पर दूसरी भूमिका में साधक सूर्य मण्डल के स्वर्णिम प्रकाश तेज में गायत्री माता के सुन्दर मुख की झाँकी करता है। उसे समस्त विश्व-ब्रह्माण्ड में केवल मात्र एक पीतवर्ण सूर्य ही दीखता है और उसके मध्य में गायत्री माता का मुख हँसता-मुसकराता दृष्टिगोचर होता है। साधक भावनापूर्वक उस मुख मण्डल को ध्यानावस्था में देखता है और उसे माता के अधरों से, नेत्रों से, कपोलों की रेखाओं से एक अत्यन्त मधुर स्नेह, वात्सल्य, आश्वासन, साँत्वना एवं आत्मीयता की झाँकी होती है, वह उस झाँकी को आनंदविभोर होकर देखता रहता है और सुधि-बुद्धि भुलाकर चन्द्र चकोर की भाँति उसी में तन्मय हो जाता है।

इस प्रकार उपासना की दूसरी भूमिका में जप तो चलता रहता है, पर ध्यान की सीमा सीमित हो जाती है। साधना के उच्च सोपानों पर आगे बढ़ने के लिए मन को एकाग्र करने की परिधि को आत्मिक विकास के


भावनाओं की प्रगाढ़ता (Kahani)

आकाश को मुट्ठियों से न मारो, भूसा कूटकर तेल न निकालो, बालू के महल न बनाओ और पानी मथकर घी मिलने की आशा न करो। कुकर्मों के सहारे उन्नतिशील बनने की योजना न बनाओ

साथ-साथ क्रमशः सीमित ही करते जाना होता है। तीसरी सर्वोच्च भूमिका में तो गायत्री माता के दाहिने नेत्र की पुतली ही ध्यान का केन्द्रबिन्दु बन जाती है। पुतली के बीच में जो काला मध्य बिन्दु है, जिसे तिल कहते हैं उसका ज्योति स्त्रोत के रूप में ध्यान किया जाता है। उस ज्योति में साधक अपनी आत्मा को उसी प्रकार होमता है, जैसे जलती हुई अग्नि में लकड़ी को डालने से उसे भी अग्नि की समरूपता मिलती है। माता की ज्योति में अपने आपका आत्म-समर्पण करने से मनोलय की प्रेम समाधि जैसी स्थिति आ पहुँचती है और ‘लययोग‘ की सिद्धि होती है। उसी स्थिति में अद्वैत अनुभव होता है। आत्मा और परमात्मा एक ही हुए परिलक्षित होते हैं। आत्मा साक्षात्कार का अलौकिक आनन्द प्राप्त होता है।

उपासना का क्रम निराकार हो अथवा साकार, दोनों ही परिस्थितियों में जप के साथ ध्यान अनिवार्य है। ध्यान से चित्त में स्थिरता आती और अन्तः चेतना की प्रखरता बढ़ती है। प्रेम भाव का विकास होता है। श्रद्धासिक्त भावनाओं की प्रगाढ़ता जितना अधिक बढ़ती और उच्चस्तरीय बनती जाती है, साधना की सफलता भी उतनी ही तीव्रगति से अपना सत्परिणाम प्रस्तुत करती और साधक को धन्य बनाती है।


संत के संकल्प से हुआ कायाकल्प

नर्मदा तट पर बसे एक गाँव मेखलमती में एक धर्म सभा आयोजित की गयी। उसी दिन यहाँ मंत्र दीक्षा संस्कार सम्पन्न हुए थे। बहुत बड़ी संख्या में ग्रामवासियों ने पशुबलि न करने का संकल्प लिया था और काली के स्थान पर गायत्री महाशक्ति की उपासना का व्रत लिया था। धर्म सभा का आयोजन उन्हीं के उद्बोधन के लिए हुआ था।

बात उस समय की है जब गोंडवाना प्रदेश में व्यापक रूप से पशु हिंसा का प्रचलन था। काली को प्रसन्न करने के नाम पर निरीह जीवों की हत्या का क्रम इस तेजी से चलता था कि नवरात्रियों पर कई बार एक एक लाख पशुओं को देव बलि के नाम पर वध कर दिया जाता था। इन्हीं दिनों वहाँ चतुर्भुज नामक एक महापुरुष का अवतरण हुआ। वे उपासना के नाम पर होने वाली ऐसी निर्दय जीव हिंसा देखकर द्रवित हो गये। उन्होंने लोगों को बहुतेरा समझाने का प्रयत्न किया, किन्तु समर्थ को मानने और प्रभावशील व्यक्तित्व का आदेश स्वीकारने की अनादि काल से चली आ रही परम्परा झूठी कैसे होती? प्रभावशाली व्यक्तित्व और प्राणपूर्ण वाणी ही जन दिशा मोड़ती है। उसके अभाव में अत्यन्त करुणार्द्र चतुर्भुज का भी कोई प्रभाव पड़ा नहीं।

तब उन्होंने विधिवत गायत्री उपासना प्रारंभ की। गायत्री उपासना से उन्हें न केवल आत्मबोध हुआ, वरन् वह शक्ति भी मिली जिससे दूसरों को प्रभावित कर पाते। उनकी वाणी में वह शक्ति उभरी जिससे सुनने वाले ठगे से रह जाते। गायत्री उपासना से विमल हुई बुद्धि में विद्वता की तीव्रधार चढ़ती चली गयी जिससे अध्यात्म विद्या के गूढ़ रहस्य एक के बाद एक परतों की तरह खुलते चले गये। प्रतिफल यह हुआ कि बड़ी संख्या में लोग उनसे दीक्षा ग्रहण करने लगे। उन्होंने लोगों को बताया कि महाकाली गायत्री की ही एक शक्ति धारा है जिसका अर्थ पशु प्रवृत्तियों का उन्मूलन होता है-पशुवध नहीं, फलतः गोंडवाना प्रदेश का यह कलंक छूटा और लोग गायत्री महाशक्ति की सात्विक दक्षिणमार्गी उपासना में प्रवृत्त हो सके। चतुर्भुज ने सर्वत्र घूम-घूमकर गायत्री उपासना की दीक्षा दी और इस अन्धकार के युग में भी इस महाविद्या को विनष्ट होने, विलुप्त होने से बचा लिया। जिस समय यह सभा चल रही थी, श्रोताओं में चोरी के माल सहित एक चोर भी उत्कण्ठावश आ बैठा। उसी सभा में वह व्यक्ति भी उपस्थित था जिसके यहाँ चोरी हुई थी। संत ने कहा-गायत्री सद्बुद्धि की, सद्-विवेक की, ऋतंभरा प्रज्ञा की देवी है। इसका अवलम्बन लेने वालों का मन पाप पंक में कभी नहीं लिपटता। गायत्री दीक्षा का अर्थ ही है-दूसरा जन्म अर्थात् पापपूर्ण अन्धकारमय जीवन का अन्त और पवित्र प्रकाशपूर्ण जीवन का आरंभ। यद्यपि वह चोर को पहचान न सके परन्तु चोर के मन पर संत की वाणी का ऐसा प्रभाव पड़ा कि उसने अपने कृत्य का वहीं प्रायश्चित्त करने का निश्चय कर लिया। जैसे ही सभा विसर्जित हुई उसने चोरी का सारा सामान उनके चरणों पर रखते हुए स्वीकार किया कि उसने अभी तक अनेक अपराध किये हैं, उसकी सजा भुगतने के लिए वह तैयार है।

संत ने चोरी का माल जिसका था उसे लौटा दिया और चोर से प्रायश्चित्त स्वरूप कृच्छ्र चान्द्रायण करा कर उसे शुद्ध कर दिया।

गोंडवाना नरेश उस दस्यु को अपनी सारी शक्ति लगाकर भी नहीं पकड़ पाये थे। जहाँ कहीं भी उसका पता चलता, पकड़ने के प्रयास किये जाते, पर वह किसी के हाथ नहीं आता। संत चतुर्भुज के सामने आत्म समर्पण करने और दीक्षा ग्रहण कर साधनारत होने का समाचार पाकर वे स्वयं भी जन सभा में उपस्थित हुए। गायत्री उपासना से विकसित संत की तेजस्विता देखकर वे पराभूत हो उठे और उनने स्वीकार किया कि लोगों का हृदय परिवर्तन राजतंत्र से नहीं आध्यात्मिक धरातल पर ही संभव है। सो उनने भी विधिवत् गायत्री उपासना की दीक्षा ग्रहण की और मांसाहार जैसी दुष्प्रवृत्ति का परित्याग किया।

तेजस्वी संत के समक्ष दस्यु द्वारा आत्मसमर्पण किये जाने एवं नरेश द्वारा स्वयं दीक्षा ग्रहण करने का समाचार सारे प्रान्त में आग की तरह फैल गया। अब तो जन-जन में उत्साह की लहर दौड़ गयी। लोग देव-साक्षी में अपनी बुराइयों को बलि देने लगे और इस तरह पूरे गोंडवाना प्रदेश में व्यापक रूप से लगा पशु-हिंसा का पाप पूरी तरह धुल कर स्वच्छ हो गया।

गोंडवाना प्रदेश में विद्या व्यसन जाग्रत हुआ। लोग अध्यवसायी बने। देखते-देखते यह प्रान्त देश का समुन्नत और साक्षर क्षेत्र बन गया। संत चतुर्भुज की गायत्री उपासना का फल उस क्षेत्र की उन्नति के रूप में उभरा। सारे प्रदेश की जनता ने अपना दूसरा जन्म हुआ अनुभव किया। लोगों को जीव-हिंसा से विरत करने और उनका कायाकल्प करने का संत का संकल्प पूरा हुआ।

परम पूज्य गुरुदेव की अमृतवाणी


संजीवनी विद्या क्यों व किस के लिए?

“अमृतवाणी” स्तम्भ में प्रस्तुत है, परमपूज्य गुरुदेव द्वारा 22 अप्रैल 1984 को संजीवनी विद्या-जीवन जीने के कला के शिक्षण की महत्ता व अनिवार्यता पर परिजनों के लिए दिया गया संदेश व प्रशिक्षण हेतु शाँतिकुँज आने का आमंत्रण।

गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ बोलिए। “ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।”

मित्रो! जानवर की एक विशेषता यह होती है कि उसे अपने पेट की हमेशा फिक्र बनी रहती है। जब वह जवान होता है तो उसे सन्तान पैदा करने का ख्याल आता है। दो के अलावा वह और कोई काम कर नहीं पाता और इन्सान? इन्सान देखने में तो वह जानवरों जैसा ही मालूम होता है किन्तु उसमें भावनाएँ पाई जाती हैं, वनमानुष, बंदर, लंगूर शायद आपने देखे हों, इनसे मिलता जुलता है आदमी का देह। लेकिन उसकी विशेषता खास तौर से ये है कि उसमें भावनाएँ होती हैं। कहीं अकाल पड़ता है तो आदमी अपने अनाज के कोठों को खाली कर देता है। कहता है हम अकेले जीकर के क्या करेंगे। बाकी लोग भी खायें तो क्या हर्ज है? यदि किसी के छप्पर में, मुहल्ले में आग लगे तो वह सबसे पहले दौड़ता है, आग बुझाने के लिए। यह क्या है? यह है आदमी की भावनाएँ। दूसरों की सेवा के लिए दौड़ पड़ना यह इंसानियत की एक ही परीक्षा है। अगर यह परीक्षा में फेल हो जाय तो जानना चाहिए कि शकल इन्सान जैसी भले हो, पर है वो वास्तव में जानवर! जानवर!!

इस समय जिसमें आप हमारी बात सुन रहे हैं, ऐसा समय है जिसको सामान्य नहीं कह सकते। इसे असामान्य ही कहा जाएगा। वैसे आपका सूरज सबेरे निकलता है, शाम को अस्त हो जाता है। कुएं से पानी निकालते हैं, चक्की से आटा पीसते हैं, चौके से खाना खा लेते हैं। समय मामूली सा मालूम पड़ता है, लेकिन हम और आप विचारपूर्वक अगर इसका अन्दाज लगाना चाहें तो मालूम पड़ेगा कि यह बहुत भयंकर समय है। इस भयंकर समय में तूफान भले ही न आते हों आपके ऊपर। घनघोर बारिश भले ही न होती हो, लेकिन संसार की निगाह से और जरा लम्बी दृष्टि फेंककर देखेंगे तो आपको मालूम पड़ेगा कि यह बहुत ही असाधारण समय है। इस समय में हवा में जहर है। जहर घुला हुआ है। जो साँस आप लेते हैं उससे आपके भीतर जहर चला जा रहा है और आपकी जिन्दगी को रोज कम कर रहा है।

इस भयंकर समय में प्रत्येक आदमी के ऊपर मुसीबत छाई हुई है। थोड़े आदमियों के ऊपर नहीं बहुत आदमियों के ऊपर, सारे संसार के ऊपर। पानी गंदा हुआ जा रहा है। विकिरण बढ़ता जा रहा है। इससे बच्चे अपाहिज लंगड़े-लूले पैदा हो रहे हैं। जन संख्या की दृष्टि से आदमी किस कदर बढ़ता हुआ चला जा रहा है और खाने के लिए सामान कम पड़ता चला जा रहा है। आपने देखा, सुना? आपकी इतनी उमर हो गयी? जिस भाव से आपको आज गेहूँ मिलता है, चावल घी मिलता है, क्या आपने इससे पहले कभी सुना था-नहीं। कभी नहीं सुना था। यह महँगाई बढ़ रही है। अभी और बढ़ेगी। मुझे घटने की कोई सूरत नजर नहीं आती, वस्तुतः यह मुसीबत का समय है और आदमी पर मुसीबतें बढ़ती ही चली जा रही हैं, और बढ़ेगी अभी।

यह ऐसा समय है जिसमें किसी को किसी पर विश्वास नहीं रह गया है। आतंक और आशंकाओं से वातावरण चारों ओर घिरा हुआ है। सड़क पर जब आप निकलते हैं तो मालूम नहीं कि आपके साथ पड़ोस में चलने वाला व्यक्ति आपको चाकू घोंपकर कब आपकी सम्पत्ति छीन लेगा इसका क्या विश्वास है। इंसान का चाल-चलन, इंसान का विचार इतना गंदा घटिया हो गया है कि यह स्थिति अगर बनी रही तो कोई किसी पर विश्वास नहीं करेगा, न भाई-भाई पर विश्वास करेगा, न स्त्री पुरुष पर विश्वास करेगी न पुरुष स्त्री पर विश्वास करेगा। ऐसा गंदा-ऐसा वाहियात समय है यह। यह समय इसलिए भी घटिया और वाहियात है कि नेचर, हमसे आप सबसे नाराज हो गयी है। प्रकृति हम सबसे नाराज हो गयी है। जब उसकी मौज आती है तो अंधाधुन्ध बरसा देती है और जब मूड़ आता है तो सूखा नजर आता है। कहीं मौसम का ठिकाना नहीं कि मौसम पर पानी बरसेगा कि नहीं ठण्ड के समय ठण्ड ही पड़ेगी कि गर्मी पड़ेगी। कोई नहीं कह सकता। भूकम्प कब आ जाएँ कोई नहीं कह सकता, ज्वालामुखी कब फट जाएँ कोई नहीं कह सकता। बाढ़ कब आ जाए कोई ठिकाना नहीं। नेचर हम सबसे बिल्कुल नाराज हो गयी है, इसलिए उसने काम करना बन्द कर दिया है। यह ऐसा भयंकर समय है।

ऐसे भयंकर समय में क्या आपके ऊपर कोई जिम्मेदारी नहीं है? क्या आपके कोई कर्तव्य नहीं हैं? क्या आपके अंदर भावनाएँ नहीं हैं? क्या आपका हृदय पत्थर और लोहे का हो गया? नहीं मेरा ख्याल है कि सब आदमियों का ऐसा नहीं हुआ होगा। ज्यादातर लोगों का तो ऐसा ही हुआ है कि वे घटते-घटते जानवर के तरीके से बनते चले जा रहे हैं। जवान आदमी जब ज्यादा बुड्ढा हो जाता है तो कमर झुकने लगती है, आंखें नीची हो जाती हैं, लाठी टेक टेक कर चलता है, इन्सान की जवानी चली जाती है तो वह बौना हो जाता है, घटिया हो जाता है,, कमर झुक जाती है, उसका आसमान की ओर देखने का न मन होता है, न उसकी बनावट ही ऐसी रह जाती है कि वह ऊपर देखे। अधिकाँश आदमी आज ऐसे हो गए हैं।

ऊपर की ओर सिर उठाकर देखेंगे, हमें आपसे यह उम्मीद है। यह उम्मीद है कि ऐसे भयंकर समय में अपना सारा वक्त के वल पेट पालने के लिए और संतान पैदा करने के लिए जाया नहीं करेंगे। अगर आप चाहें तो ढेरों समय बचा सकते हैं, बीस घण्टे में अपना, अपने शरीर व कुटुम्ब का आराम से आप गुजारा कर सकते हैं। आठ घण्टा काम करने के लिए, सात घण्टा विश्राम के लिए और पाँच घण्टा घरेलू काम के लिए। फिर भी चार घण्टा आप समाज के लिए आयी हुई परिस्थितियों का मुकाबला करने के लिए, स्वयं को ऊँचा उठाने के लिए, इंसान का भाग्य और भविष्य शानदार बनाने के लिए आप लगा सकते हैं। करना ही पड़ेगा यह आपको। इसमें तो नुकसान पड़ेगा? नहीं, मैं आपको यकीन दिलाता हूँ कि नुकसान नहीं पड़ेगा। जिनने भी अपने समय को लोक सेवा में लगाया है, वे चाहे गाँधी रहे हों या नेहरू, विनोबा रहे हों या विवेकानन्द किसी भी तरह वे नुकसान में नहीं रहे हैं। वे ऊँचा उठे हैं, आगे बढ़े हैं और उनने हजारों आदमियों को ऊँचा उठाया व आगे बढ़ाया है। स्वयं भी नफे में रहे हैं। वे नुकसान में रहे? क्या नुकसान में रहे आप बताइए? किसी एक का नाम तो बताइए।

गाँधी जी ने वकालत की होती तो वकालत में कितना कमा लेते? लेकिन जब उनने अपना समय सेवा में लगा दिया तो आप बताइए, क्या कमी रह गयी उनके पास। उनने इस्तेमाल नहीं किया, यह उनकी इच्छा पर है। ब्राह्मण अपने लिए कभी इस्तेमाल नहीं करते। गाँधी ब्राह्मण थे, बड़े शानदार आदमी थे और शानदार सिर्फ इसलिए कि उनने अपने समय को पेट और सन्तान-जानवर के तरीके से नहीं, बल्कि इन्सान के तरीके से खर्च किया।

यह समय ठीक ऐसा ही है। इस विषम समय में मेरी आप लोगों से प्रत्येक से यही प्रार्थना है कि आप अपने समय का थोड़ा अंश निकाले। हमने कितनी बार कहा व छापा है कि आप समय दान कीजिए। चंद्रमा पर ग्रहण जब पड़ता है तब कितने ही लोग आते हैं व पुकार लगाते हैं कि चन्द्रमा पर ग्रहण पड़ा है,पुण्य कमाना हो तो दान करो। इस खराब समय में हमारी भी एक ही पुकार एक ही रट है- महाकाल की भी एक ही पुकार है। आप समय दीजिए, समय खर्च कीजिए। किस काम के लिए? आप इस काम के लिए समय लगाइए जिससे आप लोगों के दिमागों और विचारों को ठीक कर सकें। इन्सान के अन्दर क्या है? वस्तुतः न हाड़ है, न माँस है, न मिट्टी न पाखाना, जो भी कुछ काम की चीज है, वह है विचार।

विचारों से ही अब्राहम लिंकन जैसे, जार्ज वाशिंगटन जैसे, गारफील्ड जैसे छोटे-छोटे इंसान कितने महान बन जाते हैं। विचार अगर मनुष्य के पास हों तो, आज अगर विचारशीलता और दूरदर्शी विवेकशीलता लोगों के अन्दर आ गयी होती तो दुनिया खुशहाल होती। इन्सान इन्सान न रहकर देवता हो गया होता और जमीन का वातावरण स्वर्ण जैसा होता। पर विचारशीलता है कहाँ? समझदारी है कहाँ? अगर समझदारी बढ़ेगी तो आदमी के अन्दर ईमानदारी बढ़ेगी, ईमानदारी आएगी तो बहादुरी आएगी, चारों चीजें एक साथ जुड़ी हुई हैं। समझदारी इसका मूल है। हमको लोगों की समझदारी बढ़ाने के लिए जी-जान से कोशिश करनी चाहिए। प्राचीन काल के ब्राह्मण और सन्त यही काम करते थे, वे अपना गुजारा कम से कम में करते थे व जीवन का उद्देश्य यही रहता था कि लोगों की समझदारी बढ़ायें। आप लोगों से भी मेरी यही प्रार्थना है कि लोगों की समझदारी बढ़ाने के लिए अपने समय का जितना अंश आप लगा सकते हों, लगाएँ, दिमाग में से आप यह ख्याल निकाल पायें तो बड़ा अच्छा हो कि बहुत सा पैसा इकट्ठा होना चाहिए। पैसा रहेगा नहीं, मैं एक बात आपको बताए देता हूँ जिससे कि धन व्यक्तिगत नहीं रह जाएगा। सच्चा अध्यात्मवाद आपको मालदार नहीं बनने देगा। चौबीसों घण्टे आपका दिमाग व शक्तियाँ मालदार बनने की ख्वाहिश में लगते हैं, तो आप गलती पर हैं, आप ठीक कीजिए अपने आपको।

अपना गुजारा सामान्य मनुष्य जिस तरीके से करते हैं, आप भी उसी तरीके से गुजारा करना सीखिए। फिर आप देखेंगे कि आपके पास समय श्रम, बुद्धि, क्षमताएँ कितनी ही चीजें बच जाती हैं, समाज के काम में लगाई जा सकती हैं। जरूरी नहीं कि आप अपना मकान छोड़कर बाहर चले जायें। आप अपने घर रह कर भी बहुत से काम कर सकते हैं, जिससे आपका क्षेत्र, आपका गाँव आपके समीपवर्ती वातावरण में जाने कैसी हवा पैदा हो सकती है। कमाल हो सकता है। तो इसके लिए क्या करना पड़ेगा? इसके लिए मेरे ख्याल से आपको एक ट्रेनिंग लेनी चाहिए, छोटी से छोटी चीजों के लिए ट्रेनिंग चलाने वाले, मोटर चलाने वाले, अध्यापक, चिकित्सक सभी को ट्रेनिंग लेनी पड़ती है।

ट्रेनिंग बड़ी आवश्यक है। विश्वामित्र राम व लक्ष्मण को उनके पिता से माँगकर ले गए थे और उनको ट्रेनिंग दी थी। काहे की ट्रेनिंग दी थी। बड़ी महत्वपूर्ण ट्रेनिंग थी उनने। शिवजी का इतना भारी धनुष कैसे तोड़ा जाय? लंका में जो राक्षस रहते हैं, उनको किस तरीके से समाप्त किया जाय? रामराज्य की स्थापना कैसे की जाय? ये सारी बाते विश्वामित्र के आश्रम में जाकर सीखी थी। ऐसी ही एक ट्रेनिंग की व्यवस्था हमने शान्तिकुँज में की है। ताकि आप समाज में छाई असुरता से लड़ सकें। शान्तिकुँज को पहले से भी हमारा तीस गुना करने का मन था किन्तु अब बहुत दिनों से नालन्दा और तक्षशिला विश्वविद्यालय यही हमारे दिमाग में घूमते रहते हैं। हमें यही सपना आता रहता है कि नालन्दा, जिसमें हजारों धर्म प्रचारक तैयार किए गए थे एवं तक्षशिला जिसमें हजारों संस्कृति प्रचारक तैयार किए गए थे, यहाँ पर बने। धर्म का नाम तो मैं अब नहीं लूँगा। यह नाम बहुत बदनाम हो गया है। मैं समाज सेवा की बात आपसे कहूँगा। यह कहूँगा कि आपकी महानता की वृद्धि के लिए सेवा बेहद आवश्यक है और जब तक आप समाज की सेवा नहीं करेंगे, तब तक आप उन्नतिशील नहीं बनेंगे। आपकी आत्मा में सन्तोष और शान्ति का निवास नहीं होगा।

आत्मसंतोष के अलावा समाज का सहयोग व भगवान का अनुग्रह कैसे मिल सकता है, शानदार जिन्दगी कैसी जीनी चाहिए? इसके लिए हमारे यहाँ ट्रेनिंग चलती है। ट्रेनिंग तो पहले भी चलती थी। नौ दिन की,पाँच दिन, व एक माह की, पर अब हमने सारे के सारे शाँतिकुँज को विश्व विद्यालय के रूप में परिणत कर दिया है। कानूनन तो यह विश्वविद्यालय नहीं है क्योंकि विश्वविद्यालय के लिए जो खानापूर्ति की जाती है, वह बहुत बड़ी है। लेकिन पुराने समय में नालन्दा में कोई खानापूर्ति नहीं हुई थी और न तक्षशिला में कोई खाना पूर्ति हुई थी। ये गवर्नमेण्ट से कोई संबंधित नहीं हुए थे। हमारा यह विश्वविद्यालय इसी प्रकार का है।

आज मनुष्य को जीना कहाँ आता है? जीना भी एक कला है। सब आदमी खाते हैं, पीते हैं, सोते हैं और मौत के मुँह में चले जाते हैं किन्तु जीना नहीं जानते। जीना बड़ी शानदार चीज है। इसको संजीवनी विद्या कहते हैं- जीवन जीने की कला। यहाँ हम अपने विश्वविद्यालय में शान्तिकुँज में जीवन जीने की कला सिखाते हैं और यह सिखाते हैं कि आज के गए बीते जमाने में आप अपनी नाव पार करने के साथ-साथ सैकड़ों आदमियों को बिठाकर पार किस तरह से लगा पाते हैं? नाव चलाना भी कला है। हम आपको नाव दे दें व आपको नदी के किनारे छोड़ दें कहें कि आप जाइए तो इतने मात्र से आप नाव नहीं चला सकेंगे। कहीं लहरों के चक्कर में पड़ेंगे और बहते हुए चले जायेंगे। नाव को डुबो देंगे और आप भी डूब जाएंगे। लेकिन अगर आपको ट्रेनिंग मिली हो तो आप सकुशल पार हो जाएँगे। हमने अपने जीवन के इस अन्तिम समय में सारी हिम्मत और शक्ति इस बात में लगादी है कि शाँतिकुँज को हम एक विश्वविद्यालय बना देंगे। पाँच सौ व्यक्तियों के लिए हमने एक माह में शिक्षण देने की व्यवस्था की है। इतना बड़ा काम व मात्र एक महीना? हमने इस लिए बड़ा नहीं रखा क्योंकि हमको कम समय में एक लाख से अधिक सही जीवन जीने वाले आदमी तैयार करने हैं। हमने पाँच सौ आदमियों को प्रत्येक माह ट्रेण्ड करके स्वयं का महान और शानदार जीवन जीने के लिए शिक्षण देने का प्रबंध किया है। न केवल स्वयं का जीवन बल्कि समाज की सेवा का शिक्षण। न केवल समाज की सेवा बल्कि यह भी कि आज की समस्याएँ क्या हैं। गुत्थियों का हल और समाधान निकालने के लिए क्या कदम बढ़ाए जाने चाहिए और किस तरीके से काम करना चाहिए? यह सिखाने का प्रबंध किया है।

एक और आपको अचंभा होगा। यहाँ बहुत दिनों से जब से यह आश्रम बना है, यहाँ के निवास के लिए, बिजली जो जलती है, कुएं से पानी जो लेते हैं, उसके लिए किसी से कुछ भी नहीं लिया गया है। अब एक और हिम्मत बढ़ाई है। वह यह कि अब खाने की जिम्मेदारी भी हम अपने कंधों पर उठाएँगे, गरीब और अमीर दोनों के लिए हमने समान रूप से यह व्यवस्था की है कि यहाँ भोजन का अब कोई खर्च वसूला नहीं जाएगा। यदि कोई कहे कि हमने आपका खाया है, दान का पैसा है, ब्राह्मण का, साधु का पैसा है हम खाना नहीं चाहते तो हम कहेंगे कि मुट्ठी बन्द करके दे जाइए हम रसीद काट देंगे आपकी। तो इस शिक्षण में यह नवीन विशेषता है कि अधिक से अधिक आदमी लाभाँवित हो सकें।

सरकारी स्कूलों, कालेजों में आपने देखा होगा कि वहाँ बोर्डिंग फीस अलग देनी पड़ती है। पढ़ाई की फीस अलग देनी पड़ती है, लाइब्रेरी फीस अलग व ट्यूशन फीस अलग। लेकिन हमने यह हिम्मत की है कि कानी-कौड़ी की भी फीस किसी के ऊपर लागू नहीं की जाएगी। यही विशेषता नालंदा-तक्षशिला विश्वविद्यालय में भी थी। वही हमने भी की है, लेकिन बुलाया केवल उन्हीं लोगों को है जो समर्थ हों, शरीर या मन से बूढ़े न हो गए हों, जिनमें क्षमता हो जो पढ़े लिखे हों। इस तरह के आयेंगे तो ठीक है नहीं तो अपनी नानी को, दादी को, मौसी को, पड़ोसन को लेकर के यहाँ कबाड़खाना इकट्ठा कर देंगे तो यह विश्वविद्यालय नहीं रहेगा? फिर तो यह धर्मशाला हो जाएगा। साक्षात नरक हो जाएगा। इसे नरक मत बनाइए आप। जो लायक हों वे यहाँ की ट्रेनिंग प्राप्त करने आएँ और हमारे प्राण, हमारी जीवट से लाभ उठाना चाहें, चाहे हम रहें या न रहें वे लोग आएँ। प्रतिभावानों के लिए निमंत्रण है बुड्ढों, अशिक्षितों, उजड्डों के लिए निमंत्रण नहीं है। आप कबाड़खाने को लेकर आएँगे तो हम आपको दूसरे तरीके से रखेंगे, दूसरे दिन विदा कर देंगे, आप हमारी व्यवस्था बिगाड़ेंगे? हमारा उद्देश्य बिगाड़ेंगे? हमारे सपने बिगाड़ेंगे? हमने न जाने क्या क्या विचार किया है और आप अपनी सुविधा के लिए धर्मशाला का लाभ उठाना चाहते हैं? नहीं, यह धर्मशाला नहीं है यह कॉलेज है। विश्वविद्यालय है। कायाकल्प के लिए बनी एक अकादमी है। हमारे सतयुगी सपनों का महल है। आप में से जिन्हें आदमी बनना हो, बनाना हो, इस विद्यालय का संजीवनी विद्या सीखने के लिए आमंत्रण है। कैसे जीवन को सिखाया जाएगा। दावत है आप सबको। आप सब आप में से जिन्हें आदमी बनना हो, बनाना हो, इस विद्यालय का संजीवनी विद्या सीखने के लिए आमंत्रण है। कैसे जीवन को सिखाया जाएगा। दावत है आप सबको। आप सबमें जो विचारशील हों भावनाशील हों, हमारे इस कार्यक्रम का लाभ उठाएँ अपने को धन्य बनाएँ और हमको भी

हमारी बात समाप्त। ॐ शान्ति।

*समाप्त*