आज के संदर्भ में धर्म

धर्म की आज के संदर्भ में मानव ज्योति को जितनी आवश्यकता व उससे जितनी अपेक्षा है, उतनी आज से पूर्व संभवतः कभी नहीं रही । आज धर्म का धर्मान्धता से लेकर अंध श्रद्धा व मूढ़ मान्यताओं के जंजाल वाला जो रूप दृष्टिगोचर होता है, वह सही धर्म नहीं है, यह तथ्य जन-जन द्वारा हृदयंगम किया जाना चाहिए। धर्म व्यक्ति को कर्त्तव्योन्मुख बनाता है, पलायनवादी नहीं। वह व्यक्ति को श्रेष्ठ मार्ग पर चलाता है, आपस में लड़ाता नहीं। वह व्यक्ति की संवेदना जगाकर उसके अंदर का देवत्व जगाता है, उसके विवेकहीन भावुकता को उभारकर उसे फनेटिक-धर्मान्धता नहीं बनाता। धर्म वह है जिसे धारण किया जाता है एवं जीवन पथ पर प्रगति के कदम बढ़ाता चला जाता है।

शास्त्रकारों ने कहा है कि जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है। आज हमने मानव धर्म को उसके विराट रूप को छोटे-छोटे सम्प्रदायों के-कटघरे में बंद कर स्वयं को असुरक्षित बना लिया है, क्योंकि हम धर्म की रक्षा नहीं कर सके। धर्म की रक्षा का अर्थ है उसे सही अर्थों में जीवन में उतारना। चिन्तन को सही बनाते हुए उसे उदात्त बनाना। कौनसा धर्म सही है? हिंदू, ईसाई, मुस्लिम, ताओ पारसी, यहूदी, जैन शिण्टो या कोई और, इस व्यर्थ के विवाद में न पड़कर यदि विज्ञान सम्मत-प्रगतिशील चिन्तन पर आधारित धर्म धारणा को जीवन का अंग बना लिया जाए तो सारा ऊहापोह व आज समाज में छाई विषमता मिट जाए। आज युगधर्म यही है कि धर्म के संबंध में संव्याप्त भ्राँतियों का कुहासा मिटे तथा मानव मात्र को श्रेष्ठ पथ पर साथ लेकर चलने का चिन्तन जन-जन तक पहुँचे।


परिवर्तन एक सुनिश्चितता

ग्रीष्म की प्रचंडता प्रख्यात है। उसका दर्प घासपात का समूची जमीन पर से सफाया कर देता है, जलाशय सूख जाते हैं। अच्छी खासी जमीन तवे की तरह जलने लगती है। वायु का सहज प्रभाव अन्धड़ में बदल जाता है। लू चलती है, चक्रवात उठते हैं। उस माहौल में किसी से कोई कड़ा श्रम करते नहीं बन पड़ता है। उत्साह टूट जाता है और विश्राम के लिए अनुकूल स्थान की तलाश चल पड़ती है। न कृषि कार्य फलित होता है और न पशु समुचित दूध दे पाते हैं। यह प्रज्ज्वलन लम्बे समय चलता है तो समझना चाहिए कि पृथ्वी की स्थिति सूर्य के निकट रहने वाले की सी जलती बलती बन जाएगी । पृथ्वी की वर्तमान स्थिति का बने रहना संभव ही न होगा।

संतोष इसी बात का है कि सृष्टि व्यवस्था में परिवर्तन चक्र का गतिशील रहना एक सुनिश्चित नियति है। ग्रीष्म दो महीने ही टिकती है और शेष दस महीने संतुलित स्थिति में बीत जाते हैं। इस बीच दो दो महीने के युग्म तो ऐसे बीतते हैं जिसके कारण ग्रीष्म के आतंक को अनदेखा भी किया जा सके । वर्षा के दो महीने जल-थल एक कर देते हैं मखमली घास का हरा फर्श सर्वत्र बिछा देते हैं। पशुओं को हरा-भरा चारा मिलता है और गर्मी के दिनों में जो क्षति उठानी पड़ी थी, उसकी पूर्ति इन्हीं दिनों हो जाती है। मक्का जैसी कई फसलें इन्हीं दिनों उग पड़ती है और वर्षा समाप्त होने तक मनुष्य के लिए अनाज और शाक का प्रचुर भण्डार उपस्थित कर देती है इसी वर्षा काल के पानी को रोककर बाँध में इतना संचय हो जाता है कि साल भर तक जल की आवश्यकता पूरी होती रहे और पानी बिजली जैसा बहुमूल्य उत्पादन अनेक उद्योग एवं सुविधा साधनों का आधार बन सके। शीतकाल का पतझड़ भी कम कष्टदायक नहीं होता। पेड़ों तक पर पतझड़ सवार हो जाता है। उद्योग से लेकर जंगलों तक में हरे भरे पेड़ों के स्थान पर ठूँठ ही दीख पड़ते हैं। पर क्या यह दुर्दशा अधिक समय ठहरती है? संतुलन बनाने के लिए बसन्त दौड़ आता है। सुरभित फूलों के घास या गुल्म, क्षुप और पेड़ लद जाते हैं। रंग बिरंगे वस्त्र आदि पहनकर हरीतिमा नई नवेली जैसी सज जाती है। मोर, कोयल, भौंरे, तितली जैसे जीव-जन्तु भी उस परिवर्तन का अभिनन्दन उमंग, उत्साह से भावविभोर होकर करते हैं । मनुष्य की बात का तो कहना ही क्या? उनकी मस्ती रोके नहीं रुकती । हर्षोल्लास की अभिव्यक्तियाँ अपने-अपने ढंग से प्रकट होती हैं।

बसन्त मात्र आश्वासन देकर ही नहीं चला जाता। फूलों का स्थान फल ग्रहण कर लेते हैं। उनसे जीवधारियों को जीवन मिलता है। फलों में बीज पकते हैं। एक पेड़ में सौ फल तो एक फल में सौ बीज। बीजों के द्वारा नये वृक्ष उगते हैं औरों पेड़ों को विभिन्न वर्गों द्वारा काटे जाने पर होने वाली क्षति को पूरा कर देते हैं। पुराने भले ही कटते रहें, पर नयों का उत्पादन उस हानि की भरपाई करके रहता है।

पिछली शताब्दियों में मनुष्य की दुर्बुद्धि ने बढ़कर दुष्टता का, आचार का, दुरुपयोग का आतंक खड़ा करने में कुछ कसर नहीं छोड़ी है। सर्वत्र दीख पड़ने वाली खाइयां, खड्ड एवं खण्डहर उसकी साक्षी देते हैं। जलते हुए मरघट बताते हैं कि विनाश किस सीमा तक भयावह दृश्य खड़े कर चुका है और भविष्य को कितने अनगढ़ अस्त-व्यस्त होने की चेतावनी दे रहा है। यह सब कुछ सही होने पर भी एक सुनिश्चित आधार सान्त्वना देने के लिए पर्याप्त है कि नियति का परिवर्तन चक्र समस्वरता और शालीनता को ही लम्बे समय तक सहन एवं प्रोत्साहित करता है। विनाश से उसे घृणा है। असुरता उसे मान्य नहीं । इतिहास पुराणों में एक से बढ़कर दैत्य-दानवों की चर्चा है। उनके आतंक अनाचारों के भयावह वर्णन भी पढ़ने सुनने को मिलते रहते हैं पर वे लम्बी अवधि तक टिके कब ? रावण, कंस, वृत्रासुर, महिषासुर, भस्मासुर, हिरण्याक्ष आदि को रोमाँचकारी कृतियों का त्रास संसार ने सहा अवश्य पर वह सीमित समय तक ही टिक सका ।

इसी प्रकार जितनी आशंकायें एवं विभीषिकायें इन दिनों सामने अड़ती दिखती हैं। उनमें से अधिकाँश स्रष्टा के सृजन और प्रगति-परिवर्धन के प्रयत्नों के सामने टिकेंगी नहीं, यह एक सुनिश्चित तथ्य है।


आत्मासन्मुखी हूजिए

मनुष्य अनेकों बाहरी जानकारियाँ प्राप्त करता है। अनेकों वस्तुओं का संग्रह एवं उपयोग भी करता है । उसकी दिलचस्पी बाहर के दृश्यों में ही रहती है। अपने सम्बन्धियों एवं प्रियजनों के साथ मिलने-जुलने आदान-प्रदान के लिए उत्सुकता रहती है। व्यवसाय जैसी समृद्धि संवर्धन के कार्यों में भी कम रुचि नहीं रहती। ठाट-बाट दिखाने, रौब जमाने, वाहवाही लूटने के लिए अनेकों योजनाएं बनती एवं कार्यान्वित होती रहती हैं। विचारों पर भी संसार के ही क्रियाकलाप छाये रहते हैं। तात्पर्य यह कि समूची जीवनी शक्ति बहिरंग समस्याओं में ही उलझती सुलझती रहती हैं। समय उसी में चला जाता है। श्रम उसी में नियोजित रहता है। विचार प्रवाह भी उसी का ताना-बाना बुनता रहता है। समझदारी वाली सारी आयुष्य प्रायः इसी में व्यतीत हो जाती है। यही है संक्षिप्त विश्लेषण-मानव जीवन की सामान्य दिनचर्या का ।

इस व्यस्तता के बीच एक अति महत्वपूर्ण तथ्य छूट ही जाता है कि हम कौन हैं? क्यों हैं? और इस हम की भी कोई आवश्यकता, सत्ता है क्या? और उसे पूरा करने के लिए भी कुछ सोचा किया जाना चाहिए क्या?बहिरंग ही सबकुछ है या अंतरंग भी ऐसा है जिसके उत्थान पतन से अपना कुछ संबंध है?

यह प्रश्न वस्तुतः अत्यधिक महत्वपूर्ण है। क्योंकि जो कुछ भी, जिस रूप में भी बाहर दीख पड़ता है वह आत्मचेतना की ही प्रतिध्वनि है, प्रतिच्छाया है। वस्तुतः संसार वैसा है नहीं जैसा हमें दीखता या प्रतीत होता है। इसी संसार को अनेक व्यक्ति या जीवधारी अनेक दृष्टिकोणों से अपने-अपने चश्मों से देखते हैं और वह उनके लिए उसी रूप में वैसा ही बन जाता है। निद्रित होने या मर जाने पर इस समूचे संसार की समाप्ति हो गई प्रतीत होती है। तब सच क्या है? यह जानने के लिए नये दृष्टिकोण से सोचना होगा।

दृश्यमान संसार जड़ पदार्थों की चलती फिरती संरचना है। हर शरीर एवं पदार्थ जड़ परमाणुओं द्वारा विनिर्मित है। परमाणु द्रुतगति से भ्रमणरत रहते हैं। उनसे बने पदार्थ भी एक स्थिति में नहीं रहते। वे उपजते, बढ़ते, ढलते और नष्ट होते रहते हैं। हर क्षण, हर वस्तु के स्वरूप में, परिवर्तन होता रहता है। मनुष्यों के स्वभाव संबंधों में भी यही बात है तदनुसार वस्तुओं और व्यक्तियों की उपयोगिता में भी अन्तर आता रहता है। उनके प्रति अपनी मान्यता भी प्रिय अप्रिय एवं उदासीनता-उपेक्षा के रूप में परिवर्तित होती रहती है। इसीलिए शास्त्रकारों ने उसे अस्थिर कहा है और माया मरीचिका जैसे भ्रमजाल की उपमा दी है

मात्र संसार ही परिवर्तनशील नहीं है । अपना चिन्तन भी ज्वार भाटे की तरह उठता गिरता रहता है। विवाह के दिनों में नववधू अप्सरा जैसी लगती है। पर कुछ ही समय बाद साथ रहते-रहते वह सामान्य गृहिणी भर रह जाती है। परिवार में अन्य सदस्यों की तरह वह भी एक अंग बन जाती है। अनेक बच्चे जनकर दुर्बल या रुग्ण रहने पर उसका यौवन आकर्षण और भी अधिक चला जाता है। तब अरुचि उपेक्षा का नया दौर चल पड़ता है। पीछे गृहस्थी का जंजाल बढ़ता है। समस्यायें उपजती हैं और उनके हल करने में मतभेद रहने पर अनबन चल पड़ती है। जो कलह का रूप धारण कर लेती है। नववधू और जराजीर्ण वृद्ध की स्थिति में रहता तो प्राणी एक ही है पर उसकी स्थिति के अनुरूप अपने दृष्टिकोण में अन्तर पड़ता जाता है। कई बार ता वह परस्पर विरोधी जैसा हो जाता है। यह बात अन्य स्वजन संबंधियों, मित्रों, शत्रुओं के संबंध में भी है। उनकी स्पष्ट गतिविधियाँ जब तक अपने को प्रभावित करती हैं तभी तक घनिष्ठता रहती है। आमना-सामना न रहने पर रुख भी बदल जाता है।

पढ़ाई के दिनों में स्कूली छात्र आपस में घनिष्ठ मित्र रहते हैं पर बड़े होने पर जब वे अन्यत्र चले जाते हैं, अपने-अपने धंधे में लग जाते हैं तो फिर वह पहले वाली घनिष्ठता विस्मृत होती चली जाती है। यहाँ तक कि पहचानने तक में कठिनाई होती है।

दुधारू गाय और हल में चलता बैल अच्छे सहायक लगते हैं और उनकी अच्छी देखभाल भी होती है पर जब वे वृद्ध होकर अपनी क्षमता खो बैठते हैं तो कसाई के हवाले कर दिए जाते हैं। पदार्थों के संबंध में भी यही होता है। पेट खाली होने पर मिष्ठान्न-पकवान बड़े रुचिकर लगते हैं पर जब पेट भरा हो तो उनकी ओर आँख उठाकर देखने का मन नहीं करता। छोटे बच्चे गोदी में खेलते समय कितने अच्छे लगते हैं पर जब वे बड़े होकर अवज्ञा करने और टकराने लगते हैं तो शत्रु जैसे प्रतीत होने लगते हैं।

यह उतार चढ़ाव ऐसे हैं जिनके वास्तविक कारण ढूंढ़ने पर जहाँ वस्तुओं की बदली हुई स्थिति भी एक कारण होती है। वहाँ यह भी मानना पड़ता है कि अपना बदला हुआ दृष्टिकोण भी कम महत्वपूर्ण कारण नहीं हुआ होता भले ही वह किसी भी कारण क्यों न हुआ हो ।

मनुष्यों को यह दुनिया जिस रूप में दिखाई देती है वैसी अन्य प्राणियों को प्रतीत नहीं होती । पशु-पक्षी इस संसार को इस रूप में नहीं देखते जिस प्रकार कि हम। कीट-पतंगों की दुनिया अपने आप में बिल्कुल भिन्न होती है। हम कीड़े मकोड़ों को एक दृष्टि से देखते हैं, इसके विपरीत कीड़े मकोड़े हमें दूसरी दृष्टि से। संभव है वे हमें चलते-फिरते पर्वत के रूप में देखते हों। पदार्थ हमारे लिए एक प्रकार के होते हैं जो अन्य व्यक्ति व अन्य प्राणी उन्हें दूसरी दृष्टि से देखते हैं। हीरा जौहरी की दृष्टि में बहुमूल्य हो सकता है पर एक अनजान वनवासी तो उसे काँच के टुकड़े से कुछ भी अधिक महत्व न देगा। यही बात प्राणियों के संबंध में भी है। अपना बालक हमें प्राणप्रिय और भविष्य का आधार लग सकता है पर वह किसी सिंह, व्याघ्र की दृष्टि में कोमल माँस व सुस्वादु लोथड़ा भर प्रतीत होगा। नीम के पत्ते हमें कड़ुए लगते हैं पर वे ही ऊँट के लिए अत्यन्त प्रिय व्यंजन हैं।

पदार्थों का बदलाव और दृष्टिकोण में होते रहने वाला परिस्थितिवश परिवर्तन यह दोनों ही मिलकर पदार्थों व शरीरों के बारे में मान्यताओं का भारी उलट पुलट करते रहते हैं। मरण के उपरान्त शरीर तो यथावत बना रहता है किन्तु प्राणी के लिए समूची दुनिया ही कुछ से कुछ हो जाती है। यही है वह छलावा जिसमें उलझकर मनुष्य अपनी समूची जीवन सम्पदा को ऐसी उलझनों में उलझा लेता है, जिसका महत्व बालविनोद में काम आने वाले खेल खिलौने से अधिक कुछ है नहीं ।

तब सच्चाई क्या है? और आनंद उल्लास का उद्गम क्या है? यह प्रश्न यदि उभर सके तो उसके ऐसे उत्तर मिलेंगे जो आश्चर्यचकित करके रख देंगे। साथ ही इस बात के लिए भी विवश करेंगे कि बाल क्रीड़ाओं से ऊँचे उठकर किसी महत्वपूर्ण निष्कर्ष पर पहुँचना चाहिए और अपने चिन्तन तथा क्रियाकलापों की दिशा में असाधारण परिवर्तन करना चाहिए ।

पदार्थों के, प्राणियों के, परिस्थितियों के बारे में सही-गलत मूल्याँकन अपना अपना दृष्टिकोण ही करता है और वही यह करता है कि हमें क्षमताओं को किस निमित्त, किस में, किस प्रकार करना चाहिए। यह निष्कर्ष निर्णय यदि सही स्तर का बन पड़े तो फिर जीवन सम्पदा का अपव्यय रोककर उसका सदुपयोग कर सकने वाली नई विधा सामने आ सकेगी ।

तत्वदर्शन इस निष्कर्ष पर पहुँचाता है कि अपना अन्तराल ही जिस भले बुरे स्तर का होता है। उसी के अनुसार ये सारी दुनिया दीखने लगती है। अपनी अभिरुचि ही किसी के प्रति आकर्षित करती और उपेक्षित या विरोधी बनाती है। क्रियाकलाप भी वैसे ही चल पड़ते हैं जैसा कि अपना रुझान होता है।

यदि दृश्य जगत को ही सबकुछ माना जाए तो भी बात यहीं आकर रुकती है कि यदि अपना रुझान, निर्धारण और विवेक सही प्रकार काम करे तो ऐसा कुछ भी शेष न रहेगा जो अनावश्यक रूप से अपने साथ बाँधें या विरोधी बनाये यह संसार अपने ढंग से चल रहा है। हम ही उसके साथ असामान्य संबंध जोड़कर प्रिय अप्रिय का जंजाल मोल ले लेते हैं और कार्य-विशेष में इतने अधिक निमग्न हो जाते हैं कि उस महत्वपूर्ण चिंतन के लिए समय ही नहीं निकल पाता जिसे आत्मज्ञान कहते हैं।

आत्मसत्ता ही वह इकाई है जिसे शरीर में विद्यमान ईश्वर की प्रतिनिधि कह सकते हैं। यह जिस भी स्तर की ढल-बन जाती है, उसी के अनुरूप प्राणियों से संबंध बनने और व्यवहार चलने लगते हैं। मस्तिष्क बहुत कुछ सोचता व शरीर बहुत कुछ करता है यह ठीक है पर इससे भी अधिक सही यह है कि आन्तरिक स्तर के अनुरूप बना दृष्टिकोण ही अपना एक अलग संसार बना लेता है जो दूसरों के संसार से सर्वथा न सही अधिकाँश में दूसरों से भिन्न होता है।

एक संत के लिए यह विश्व विराट ब्रह्म की ही प्रतिमा है। सभी प्राणियों में अपनी आत्मा ही आत्मा के दर्शन करती है। प्रकृति का सौंदर्य उसे विश्वात्मा की शानदार संरचना और आकर्षक शोभा सज्जा प्रतीत होती है पर वह हर किसी के लिए वैसी नहीं है। नीरस निष्ठुर मनुष्य यहाँ सब कुछ कुरूप और अरुचिकर ही देखता है और उस पर अधिक विचार करने से अपनी खीज ही बढ़ाता है।

चोर के लिए यह सारी दुनिया चोरों से भरी है। व्यभिचारी सर्वत्र कामुकता का व्यापार ही चलता देखता है। नृशंस आततायी सर्वत्र खीज भर कर ही देखते हैं और जिस पर आवेश उतरता है उसी पर टूट पड़ते हैं। एक ही संसार जब इतने विभिन्न प्रकार का दिखता है तो उसका कारण एक ही समझा जा सकता है कि अपने-अपने रंग का चश्मा आँखों पर पहनकर वस्तुओं पर देखा जा रहा है। द्रष्ट की सत्ता और महत्ता ही सर्वोपरि है, वही अपने रुचि रूप इस संसार को चित्र विचित्र ढंग का गढ़ती तथा उस पर प्रसन्न अप्रसन्न होती रहती हैं।

संसार को अपने मनोनुकूल ढालने के लिए इतने भर से काम चल सकता है कि अपने स्तर रुझान और चिन्तन में आवश्यक परिवर्तन किया जाय। तभी हम आज कुरूप लगने वाले संसार को कल सुषमा और सौंदर्य से भरा पूरा देख सकते हैं। टार्च का प्रकाश जितनी परिधि में रोशनी डालता है उतना ही क्षेत्र चमकने लगता है। अपना दृष्टिकोण यदि टार्च जैसा परिष्कृत और प्रकाशवान हो तो वह जितने ही क्षेत्र पर पड़ेगा, वह सभी सुन्दर सुहावना और अनुकूल दीखने लगेगा।

अन्तराल में सन्निहित शक्तियाँ इतनी महान है कि उसकी खदान खोदकर बहुमूल्य मणि-माणिक पाये जा सकते हैं। अपने ही भीतर देव दानव छिपे बैठे हैं। उनमें से जिन्हें समझा और जगाया जा सके वे ही अपना काम प्रचंड शक्ति के साथ करने लगते हैं। प्रश्न केवल एक ही है कि उस आत्मसत्ता को कैसे जाना और जगाया जाय? इसके उत्तर में इतना ही कहा जा सकता है कि सर्वप्रथम अपने स्वरूप को, स्तर को, दृष्टिकोण को समझने के लिए अंतर्मुखी हुआ जाय और विश्व निरीक्षण पर भी ध्यान दिया जाए।


कोई चमत्कार नहीं हुआ (Kahani)

ख्याति प्राप्त सन्त से दीक्षा प्राप्त कर शिष्य ने भी प्रशंसा अर्जित करने, सम्मान बटोरने की बात सोची, किन्तु सन्त बड़े तपस्वी, बहुत पहुँचे हुए थे । वे शिष्य के मन की बात ताड़ गये और बोले-कि तुम गलत कारण से सही जगह आ गये हो। शिष्य ने कहा क्या मतलब? सन्त ने कहा-तुम अपने सुधार अथवा आत्मिक प्रगति के लिए नहीं आये, वरन् अपने को सजाने, ख्याति और प्रशंसा की दृष्टि से आये लगते हो, किन्तु अब आ ही गये हो तो तुम्हारी उत्सुकता पर कुठाराघात भी नहीं करते बनता, निराश वापस भी नहीं करना चाहता। अब तुम कुछ सीख कर ही जाओ।

शिष्य ने सोचा-चलो अच्छा ही हुआ लौटाया तो नहीं। सन्त ने शिष्य की परख करनी आरम्भ की और अपनी जेब से चमकता हीरा निकाल कर चौकी पर रखा। थोड़ी देर बाद पुनः वह हीरा जेब में डालकर चल दिये। शिष्य ने सोचा जरूर कोई यह चमत्कारी हीरा है। इसी में सन्त की ख्याति और सफलता का रहस्य छिपा है। रात को जब सब विश्राम करने चले गये तो शिष्य गुरु के कुर्ते सहित हीरा उठाकर भाग खड़ा हुआ। सन्त यह सब करतूत देख रहे थे। घर पहुँचकर शिष्य भी गुरु की तरह हीरे को जेब से निकाल कर चौकी पर रखता । धूप दिखाता लेकिन कोई चमत्कार नहीं हुआ।

एक दिन सन्त अचानक शिष्य के घर जा पहुँचे बोले बस कर बहुत हो गया। लौटा मेरा हीरा। शिष्य गिड़गिड़ाया महाराज कई दिन बीत गये इसी तरह पूजा करते धूप दिखाते, किन्तु कोई चमत्कार नहीं दिखाया इस हीरे ने।

सन्त ने कहा-जब तक तू स्वयं हीरा न हो जायगा, तेरा व्यक्तिगत परिष्कृत न हो जाएगा, तब तक तेरे हाथ में आया हीरा भी पत्थर है और अगर तू हीरा हो गया अर्थात् परिष्कृत हो गया तो पत्थर भी हीरा हो जायगा। हीरे में कुछ नहीं रखा है। मैं पहले दिन ही समझ गया था कि तेरी दृष्टि स्थल है । पदार्थ तक सीमित है। अब तू अपने अन्तःकरण को टटोल, अपने को सुधार। तू ही हीरा है। बात शिष्य की समझ में आ गई। वह वैसे ही बनने में जुट पड़ा।


भगवद् भक्ति का मर्म

भक्ति की महिमा-महत्ता तथा उसके कारण मिलने वाले आत्मिक स्तर के दिव्य प्रतिफलों की उपलब्धियाँ असाधारण हैं। इसकी समग्रता त्रिपदा गायत्री के सदृश्य हैं जिसमें ज्ञान, कर्म, उपासना का त्रिविध समन्वय अविच्छिन्न रूप से जुड़ा हुआ है। यह ठीक उसी प्रकार है जिस प्रकार जीवन की स्थिरता के लिए अन्न, जल और हवा आवश्यक हैं। मात्र इनमें से एक ही मिल सके तो शेष दो का अभाव किसी को जीवित रहने की स्थिति में नहीं रहने दे सकता पूजापरक उपासना की आवश्यकता-उपयोगिता कितनी ही कुछ क्यों न हो, पर जीवन साधना और परमार्थपरक आराधना को साथ लिए बिना वह सर्वथा अपूर्ण रहेगी और कोई उत्साहवर्धक परिणाम प्रस्तुत न कर सकेगी। गंगा, यमुना और सरस्वती के संगम से त्रिवेणी बनती है जिसका महात्म्य वर्णन करते-करते शास्त्रकार थकते नहीं । इनमें से किसी अकेली को तीर्थराज त्रिवेणी संगम नहीं कहा जा सकता। यही तथ्य भक्ति की समग्रता पर भी लागू होता है। अपूर्ण उपक्रम में असफलता के अतिरिक्त और कुछ हाथ नहीं लगता।

इन दिनों तथाकथित भक्ति और भजन पूजन की लकीर कुछ इस प्रकार पिटने लगी है कि उसे प्रवंचना और विडम्बना के अतिरिक्त और कुछ कैसे कहा जा सकता है। भगवान की अनुकम्पा स्वाति वर्षा की तरह है जो मात्र सत्पात्रों को ही निहाल करती है। जिन सीपियों में मोती बनते हैं, वे असाधारण स्थिति की होती है। जिन बाँसों में वंशलोचन और जिन केलों में कपूर बनता है, वे भी सामान्य न होकर असामान्य विशेषताएं लिये हुए ही होते हैं बादल की वर्षा कितनी ही व्यापक और कितनी ही उदात्त क्यों न हो, पानी मात्र वहीं ठहरता है जहाँ गहराई विद्यमान हो । ऊँचे टीलों और कठोर चट्टानों पर तो पूरा मौसम निकल जाने पर भी तनिक भी पानी नहीं ठहरता। इसमें दोष वर्षा ऋतु का नहीं, उस कुपात्रता को ही दिया जा सकता है जिसमें ग्रहण और धारण करने की क्षमता का अभाव है। व्यक्ति की गहराई यदि सत्पात्रता के रूप में विकसित न हो सके तो फिर न तो पूजा का कोई प्रयोजन रह जाता है और न दिव्य वरदान मिलने जैसी कोई अपेक्षा ही की जा सकती है। यही एक मात्र कारण है जिसके कारण तथाकथित भक्ति का लाभ न तो परिष्कृत व्यक्ति के रूप में मिलता है और न धन, वैभव जैसी वस्तु ही हाथ लगती है। सिद्धान्तहीन मृगतृष्णा में भटकने वालों की खीज,थकान, निराश के अतिरिक्त और कुछ क्या हाथ लग सकता है? भक्ति माँगने को नहीं समर्पण को, त्याग को अपना सर्वस्व दे देने को कहते हैं। ईश्वर के विश्वउद्यान में माली की तरह अपना पुरुषार्थ नियोजित करना ही सच्ची भक्ति है। ऋद्धि-सिद्धियाँ इसी आधार पर हस्तगत होती हैं। पर उन्हें क्या कहा जाए जो अपने पुरुषार्थ पर विश्वास न करके मात्र नाक रगड़ने मात्र से बहुत कुछ पाने के लिए लालायित रहते हैं। संकटों से जूझकर अपनी धार तेज करने की बजाय अपने मुँह पर बैठी मक्खियों को उड़ाते रहने के लिए स्तवन, पूजा प्रार्थना का आश्रय लेते रहते हैं। ऐसे लोगों को जेबकट भी कहा जा सकता है और साथ ही जेब कटाते रहने वाले भी । देवताओं की जेब काटने की फिराक में रहने वाले पाते कुछ नहीं, अपने को उनका एजेंट बताने वालों द्वारा बुरी तरह जेब कटाते रहते हैं। मानव समुदाय में यही जेबकतरापन आज भक्ति नाम से प्रख्यात हो गया है। फलतः परावलम्बन की प्रवृत्ति और अनुदारता की प्रवृत्तियाँ सिर बैंघने के अतिरिक्त और कुछ भी हाथ नहीं लगता । यह तथ्य एक प्रकार से भुला ही दिया गया है कि उच्च उद्देश्यों के लिए बढ़-चढ़ कर अनुदान प्रस्तुत करने से कम में आत्मसंतोष, लोक सम्मान और दैवी अनुग्रह जैसा कोई भी महान प्रयोजन पूरा नहीं होता।

हर किसी को यह समझना और समझाना चाहिए कि भगवान के पास जो बहुमूल्य सम्पदा थी, वह मनुष्य जीवन के रूप में आरंभ में ही दी जा चुकी है। यदि अपने समय, श्रम, चिन्तन और पुरुषार्थ को औचित्य की दिशा में नियोजित किया जा सके तो सफलताओं सिद्धियों विभूतियों का इतना बड़ा प्रतिफल पाया जा सकता है जिसके आधार पर कोई अपने को अभावग्रस्त अनुभव न करें। मनुष्य के पास न केवल अपना काम चलाने के लिए, वरन् दूसरों को बाँटने के लिए अपार सम्पदा विद्यमान है। एक बीज बोने पर मक्का और बाजरा जैसी फसलें जब हजार गुनी फलती हैं तो कोई कारण नहीं कि आत्म परिष्कार और लोकमंगल के लिए कुछ कहने योग्य कर सकने पर इतना वैभव हस्तगत किया जा सके जिसकी कि भगवद् भक्ति की प्रशंसा करने वाले उसका महात्म्य वर्णन करते रहे हैं। लोक-परलोक की असंख्य सम्पदायें मिलने की बात ऊँचे स्वर से कहते और जनसाधारण को उस पर विश्वास करने के लिए जोर लगाते रहते हैं।

सच्ची भक्ति में वस्तुतः उपासना तो प्रारम्भिक और छोटा चरण है इसमें खाद पानी देकर बड़ा पौधा बनाने और उस वृक्ष पर शाखा, टहनी, पत्तियों और फूल-फलों से लदने की आशा तभी की जा सकती है जब उसके साथ साधना और परमार्थ आराधना के अपेक्षित पुरुषार्थ किये जायँ। जो इन दोनों से वंचित है, उस भक्ति को ऐसा ही समझाना चाहिए जैसे ऊसर भूमि में बीज तो उग गया, पर उसमें खाद, पानी देने की आवश्यकता न समझी गयी।


लोकोत्तरवासियों के आगमन से लाभ उठाया जाय

जीवन के अस्तित्व एक मात्र पृथ्वी पर ही नहीं है,वरन् सहस्रों करोड़ों ग्रह-उपग्रह ब्रह्माण्ड में ऐसे हैं जिनसे हमसे भी अधिक उन्नत विकसित सभ्यता के लोग निवास करते हैं। जीव विकास की नयी खोजें भी अब इस निष्कर्ष पर पहुँचती जा रही हैं कि मानवी सत्ता किसी अन्य लोक से आयी हैं जहाँ उसका विकास और भी ऊँचे स्तर का हो चुका होगा । अन्तर्ग्रही शक्तियों का पृथ्वी के साथ संपर्क और आदान-प्रदान इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है।

वैज्ञानिकों के अनुसार विश्व-ब्रह्माण्ड की उपलब्ध जानकारी में पृथ्वी को सबसे अधिक सुन्दर समुन्नत एवं सुख-सुविधाओं से भरी-पूरी माना जाता है। यह स्थिति पृथ्वी की अपनी विशेषताओं के आधार पर विनिर्मित नहीं हुई है, वरन् सौर मण्डल के ग्रह-उपग्रहों ब्रह्माण्ड स्थित अन्यान्य तारकों के संतुलित अनुदानों से उसे यह सौभाग्य मिला है। इसलिए अन्य लोक वासी अपनी उत्सुकता को रोक नहीं पाते और भू लोक की खोज खबर लेने और तद्नुरूप अधिक सघन संपर्क बनाने की योजना में निरत देखे जाते हैं।

ब्रिटेन के प्रख्यात अन्तरिक्ष विज्ञानी एडमएड हैली का कहना है कि अपनी आकाश गंगा में अनेकों ग्रह ऐसे हैं जो अपने संकेतों के स्थान पर उड़न तश्तरियों के माध्यम से अनवरत पृथ्वी पर भेजते रहते हैं। ब्रह्माण्डीय किरणों का पर्यवेक्षण करने के उपरान्त ही उनने यह निष्कर्ष निकाला है कि निवास योग्य ग्रहों में से ढाई अरब ग्रहों में जीवन की संभावनाएँ सुनिश्चित हैं प्रकाश की गति से चलने वाले यान उनका पता नहीं लगा सकते। सन् 1716 में हैली ने एक उड़न तश्तरी को दो घंटे तक आकाश का चक्कर काटते हुए देखा था और उसी के प्रकाश में उन्होंने अपनी पुस्तक को पढ़ा और अनुभवजन्य अनुभूतियों को लिखा भी ।

मैक्सिको के विश्व प्रसिद्ध खगोलज्ञ जोस बोनीला अगस्त 1883 जेकेटिकाज वैद्यशाला में सौर्य धब्बों के कुछ चित्र खींच रहे थे तो उसी समय एक अलौकिक दृश्य उनके नेत्रों के सामने से गुजरा । चमकीली गेंद के आकार का यह वाहन पूर्व से पश्चिम की ओर बढ़ता जा रहा था । बोनीला ने उस यान का चित्र लेने में भी सफलता पाई उनके कथनानुसार अपनी पृथ्वी से परे भी कोई लोक है जहाँ के बुद्धिमान प्राणी भूलोक की खोज खबर के लिए बड़े ही उत्सुक रहते हैं वायुयानों के माध्यम से आवागमन का उपक्रम बैठाते रहते हैं। 11 अक्टूबर 1992 को क्रिस्टोफर कोलम्बस ने साँता मोरिया के डेक से एक चमकीले यान को मंडराते देखा था इसी तरह पिछले सन् 1987 में शंघाई शहर के वेधशाला के खगोलज्ञों ने भी लाल रंग की उड़न तश्तरी को आकाश में घूमते हुए स्पष्ट देखा है। वर्ष 1940 से 1950 तक अवधि में अमेरिका के सैकड़ों व्यक्तियों द्वारा इस तरह के आलौकिक यानों को देखा जा चुका है। वर्तमान में वैज्ञानिकों ने टेक्यान नामक कणों की खोज की है। जो प्रकाश की गति में भी तेज चल सकते हैं उनका कथन है कि विज्ञान जगत की खोजों का विकास क्रम यदि इस गति से चलता रहा तो संभवतः अन्यान्य ग्रहों के बुद्धिमान प्राणियों के संकेतों को आसानी से पकड़ा समझा जा सकता है। रूस की योरोवस्लेवल यूनीवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने वोल्गा नदी के किनारे सिर के ठीक आधा मीटर ऊपर प्रकाशयुक्त विद्युत गेंदों को उड़ते हुए देखा यह सेब के आकार की चमकीली गेंद गैस-स्टोव की तरह चिनगारी फेंकती जा रही थी । उनमें से एक ने जब उस अलौकिक दृश्य से अपने हाथ की उंगली का स्पर्श किया तो तुरंत ही बिजली के करंट जैसा झटका और अग्नि स्पर्श जैसा आभास होने लगा। वैज्ञानिकों ने इन कौतूहल भरे आश्चर्यजनक दृश्यों का पता लगाने के लिए कंप्यूटर प्रणाली पर आधारित एक गणितीय मॉडल तैयार किया है जिसमें उनकी सम्पूर्ण गतिविधियों को रिकॉर्ड किया जाता है। इसे एक प्रकार से अंतरिक्ष का अति सूक्ष्मतम तत्व यानी लम्बी अवधि तक जीवित रहने वाला प्लाज्मा ही कहा जा सकता है। स्थूल शरीर के तत्वों से इसका मेल नहीं खाता । उनका कहना है कि ऐसा प्रतीत होता है कि किन्हीं अन्य ग्रह- गोलकों से हमसे भी अधिक विकसित सभ्यता के लोग भू पर अवतरित होते और हमारे क्रियाकलापों का विहंगावलोकन करके वापस चले जाते हैं । उनके यान के अन्दर का प्रकाश तो नहीं आता, किन्तु किरणें अवश्य आती हैं। यदि भूलोक के निवासी अपनी चुम्बकीय क्षमता एवं मनोबल को विकसित कर सकें तो अंतर्ग्रही चुम्बकीय तरंगों के माध्यम से उन्हीं जैसा दिव्य जीवन का आनंद उठा सकते हैं।

फ्रेंच एकेडमी ऑफ साइंसेज ने बीसवीं सदी के आरंभ से ही एक लाख फ्रेंच का पुरस्कार किसी भी वैज्ञानिक को इस शर्त पर देने की घोषणा की है कि वह अंतर्ग्रही सभ्यता यानी पृथ्वी के अतिरिक्त अन्यान्य ग्रहों पर जीवन का पता लगा सके उत्साहवर्धक वैज्ञानिकों प्रयासों के फलस्वरूप मंगल ग्रह पर प्राणि जगत के अस्तित्व के होने के कुछ संकेत मिले हैं क्योंकि वहाँ की जलवायु में ऑक्सीजन और कार्बन जैसे जीवनदायी घटकों को खोजा जा चुका है। इन्फ्रारेड एस्ट्रानॉमी के अंतर्गत रेडियो तरंगों की नव विकसित तकनीक द्वारा अन्तरिक्षीय खोजों का सिलसिला अब तेजी से चल पड़ा हैं। अंतरिक्ष तकनीकी एवं रेडियो खगोल विज्ञान के अल्ट्रासोनिक अतिसंवेदनशील यंत्रों के माध्यम से अब अंतरिक्षीय किरणें तथा तत्वों की पहचान आसानी से की जा सकती है। एक वाट के दस अरबवें भाग तक के संकेतों को दिखा सकने में यह पूरी तरह सक्षम है। इन्हीं संकेतों के आधार पर खगोल-वेत्ताओं ने अनुमान लगाया है कि आज से 900 अरब वर्ष पूर्व भी इतनी बुद्धिमान सभ्यता ब्रह्माण्ड में अवश्य रही होगी ।

भौतिक विज्ञान के ज्ञाता भले ही इन अद्भुत एवं आश्चर्यजनक दृश्यों को ताप विपर्यय की मृगमरीचिका कहकर झुठलाते रहें पर तथ्यों की वास्तविकता को तो स्वीकार करना ही होगा । यजुर्वेद 1852 में यह लेख है कि लोक-लोकान्तरों में भौतिक साधन तथा विमानों द्वारा सरलतापूर्वक गमनागम का क्रम चल सकता है। महाभारत के द्रोणपर्व में बताया गया है कि राजा कर्ण ने रण कौशल को देखने के लिए देवता स्वर्गलोक से भूलोक पर विमानों से अवतरित हुए थे। गाड्स एण्ड स्पेसमैन इन द ऐंसीएन्ट ईस्ट नामक पुस्तक में डब्लू रेमोन्ड ड्रराके ने भारतीय संस्कृत भाषा के ग्रन्थों का सार निष्कर्ष प्रस्तुत किया है। विमान उत्पादन की तकनीकी का उल्लेख करते हुए उनने बताया कि ऋषि भारद्वाज 16 प्रकार की धातुओं का प्रयोग करके भूलोक पर ही इनके निर्माण कार्य को पूरा कर सकने में पूर्णतः सफल रहे थे । मैसूर की अंतर्राष्ट्रीय संस्कृत अनुसंधान अकादमी ने ए मैन्यूस्क्रिप्ट फ्राम द प्रीहिस्टोरिक पास्ट नामक विशाल ग्रन्थ का विमोचन किया है जिसमें लोक-परलोक के आवागमन के साधनों का विस्तृत विवरण है।

दरवाजा कहकर पुकारते हैं। यह किसी ग्रह नक्षत्र से प्रकट होने वाला देवताओं का यान ही हो सकता है।

पौराणिक गाथाओं में धरती और स्वर्ग के बीच आवागमन की अनेकों चर्चायें सम्मिलित हैं। उसके अनुसार समुन्नत लोकों की श्रेष्ठ आत्मायें पृथ्वी की अपनी दिव्य वाहनों से इसलिए यात्रा करती हैं कि वे धरती-वासियों से घनिष्ठता बढ़ा सके और अपने जैसा श्रेष्ठ समुन्नत बना सकें । अनादिकाल में मनुष्य रूप में जब जीवनतत्व यहाँ बिखेरा गया तब भी अंतरिक्षीय शक्तियों ने ही मानवी उन्नति में सहायता की थी। अब यदि लोकोत्तरवासी यहाँ आते और जब तब अपनी उपस्थिति का परिचय देते हैं तो यह आशा क्यों न की जाय कि इस बार वे देवमानवों के सृजन और देवलोक जैसी परिस्थितियाँ बनाने की कोई योजना लेकर आते होंगे। अपना आत्म बल बढ़ाकर हम उनके अनुदानों का लाभ आसानी से उठा सकते हैं।


सफलता की कुँजी - आशावादी मनःस्थिति

सफलता सभी को अभीष्ट है उसे प्राप्त करने पर सभी को प्रसन्नता होती है। असफलता कोई नहीं चाहता । यदि वह किसी प्रकार पल्ले बँध जाये तो दुःख और पश्चाताप ही प्रदान करती है। इतना होते हुए भी लोगों में एक बुरी किस्म की भ्रान्ति यह पाई जाती है कि अपने को असहाय परावलम्बी मानते रहते हैं और असफलता का दोष और सफलता का श्रेय दूसरों को देते रहते हैं । अपनी ओर नहीं निहारते और यह नहीं सोचते कि अपने गुण दोषों की ओर देखें। यह नहीं विचारते कि अपनी त्रुटियाँ दुर्बलतायें भूलें ही असफलताओं के लिए प्रधानतया जिम्मेदार होती हैं और जो सफल होते हैं। उनमें उनके गुण, स्वभाव एवं मान्यताओं धारणाओं का भी बड़ा हाथ होता है।

मनुष्य की संरचना इस स्तर की है कि यदि वह श्रेष्ठ स्वावलम्बी एवं सद्गुणी बनकर रहे तो असफलताओं से कदाचित ही कभी पाला पड़े। यदि वैसी विपन्नता आकस्मिक रूप से आ भी जाय तो देर तक टिकने न पाये । उसका हल-समाधान किसी-न-किसी प्रकार निकल ही आये।

असफलतायें लगातार ही मिलने, प्रगति की दिशा में कदम न बढ़ पाने और अवगति के देर तक बने रहने का एक ही कारण है अपने गुण, कर्म, स्वभाव में त्रुटियों का बाहुल्य होना, व्यक्ति के व्यक्तित्व का परिष्कृत परिपक्व न होना। भगवान ने मनुष्य को इतनी विशेषताओं और विभूतियों से सम्पन्न बनाया है कि वह साधारण स्थिति में न पड़ा रहकर क्रमशः उन्नति की दिशा में निरन्तर आगे बढ़ सकता है और इतना ऊँचा उठ सकता है जितना कि उसका सृजेता । क्रमबद्ध रूप से अनवरत चलने वाली चींटी भी इतने ऊँचे पर्वत शिखर पर जा पहुँचती है कि यह विश्वास करना कठिन होता है कि इतना छोटा प्राणी इतने नन्हें पैरों के सहारे इतनी ऊँचाई तक किस प्रकार ऊँचा उठ सकता है। किन्तु यदि पवन की गति से चलने वाला गरुड़ भी आलस्य प्रमोद से अपने पुरुषार्थ को तिलाँजलि दे तो वह आजीवन जहाँ का तहाँ ही बैठा रहेगा । विश्व की संरचना में आरोह-अवरोध के तत्व न्यूनाधिक मात्रा में तो रहते ही हैं, पर वे ऐसे नहीं हैं कि वे किसी को आगे बढ़ने में या कठिनाइयों का समाधान निकाल सकने में देर तक बाधक बने रह सकें । मनुष्य की निज की ऊर्जा इतनी शक्तिशाली है कि उसे इच्छित दिशा में तेजी के साथ आगे बढ़ाती चल सकती है।

ऐसे प्रमाण उदाहरणों से इस संसार का पुरातन और अर्वाचीन समय का इतिहास इस बात का साक्षी है कि परिस्थितियों ने, साधनों ने ऊँचा उठाने, आगे बढ़ाने में कदाचित ही किसी को कुछ सहायता की । व्यक्ति का अपना मनोबल ही उसे अग्रगामी बनाने में प्रधान रूप से शक्ति सामर्थ्य प्रदान करता रहा है। गुत्थियों के समाधान में उसी के द्वारा उत्पन्न सूझबूझ ने सहायता दी है और कठिनाइयों के भारी भँवर जाल से उतार कर उबारकर पार किया । इसमें किसी दैवी सहायता को अथवा किसी व्यक्ति विशेष को श्रेय देने में यही लाभ है कि अपना अहंकार नहीं बढ़ पाता, नम्रता बनी रहती है और आस्तिकता की भावना पनपती है कि दैवी सहायता के रूप में इतना अधिक मिल चुका है कि इससे अधिक की आशा करना अपने भिखमंगेपन या पुरुषार्थ की दृष्टि से अपंग होने के समान है।

वस्तुतः ईश्वर-विश्वास का ही दूसरा नाम आत्मविश्वास है, जिसमें जितना आत्मविश्वास सघन हो, समझना चाहिए कि वह उतना ही बड़ा ईश्वर विश्वासी है। जो अपने को दीन-हीन, अपंग, असमर्थ, अनुभव करता है वह उतने ही ईश्वर का नास्तिक है । आत्मविश्वास की गरिमा को भूल जाने और उसका प्रयोग करने में गड़बड़ाने, लड़खड़ाने में ही व्यक्ति दीन-हीन बनकर रह जाता है। और पग पग पर असफलताएँ प्राप्त करता है।

आत्मबोध की महिमा शास्त्रकारों ने असाधारण बताई है । उसे अध्यात्म तत्वज्ञान का मुख्य चरण कहा गया है। आत्मा अनन्त शक्तियों का, विशिष्टताओं का और विभूतियों का पुँज है। इस महानता को हृदयंगम करने के साथ ही यह भी अनुभव होना चाहिए कि मनुष्य की वर्तमान सामर्थ्य भी इतनी अधिक है कि वह उसके सहारे प्रगति पथ पर निरन्तर आगे बढ़ सकता है। और उस लक्ष्य तक पहुँच सकता है, जिस पर पहुंचने के बाद मनुष्य की गणना सहज ही महामानवों और देव पुरुषों में होने लगती है।

भूल जाने की बीमारी को मनःक्षेत्र की भयंकर दुर्गति कहा जा सकता है। जो अपने को, अपनों को अपनी साधना को भुला बैठे उसे, पागल के अतिरिक्त और क्या कहा जा सकता है। हममें से भी अनेकों ऐसे अर्धविक्षिप्त पाये जाते हैं, जो रोटी, कपड़ा, घर आदि को तो याद रखते हैं पर यह भूल जाते हैं कि अपने भीतर इतनी अजस्र शक्तियाँ भरी पड़ी हैं कि यदि उन्हें विस्मरण न कर दिया जाय। योजना बद्ध रूप से चलने अपनी सामर्थ्यों का समुचित प्रयोग करते रहने की रीति-नीति अपनाई जाय, तो उन अड़चनों से कदाचित ही वास्ता पड़े, जो आये दिन हैरान करतीं और निराशा जैसी स्थिति उत्पन्न करती हैं। उत्साह, परिश्रम और समझदारी के त्रिविध उपयोग यदि सहकार से बन पड़ें तो कोई कारण नहीं कि अभीष्ट प्रगति से भरी-पूरी संभावनाओं का रास्ता रुके और आये दिन असफलता का रोना रोते रहना पड़े ।

अपनी सामर्थ्य को भूल जाना अथवा उसका प्रयोग सही रीति से सही समय पर न बन पड़ना ही वह दुर्भाग्य है, जिसे असफलताओं का जनक कहा जा सकता है, दूसरे लोग भी अड़चन उत्पन्न कर सकते हैं, परिस्थितियाँ भी प्रतिकूल हो सकती हैं। इतने पर भी मनुष्य के पुरुषार्थ की धार इतनी कुण्ठित नहीं हो जाती, कि उन अगणित अवरोधों को निरस्त न कर सकें, अँधेरे में नये प्रकाश की नई किरण का उदय न कर सकें ।

भूलों से बड़ी भूल परावलम्बी होना है। अपनी सफलता के लिए दूसरों की सहायता की प्रतीक्षा में बैठे रहना गलत है । इसी प्रकार यह मान्यता भी अवास्तविक है कि यदि दूसरे सहायता न करें, तो अभीष्ट प्रगति का मार्ग अवरुद्ध ही बना रहेगा। यदि अपने ऊपर विश्वास रखा जा सके, उत्साह और साहस को कुण्ठित न होने दिया जाय, तो जो कुछ वर्तमान समय में वर्तमान परिस्थितियों में उपलब्ध है, वह भी शुभारम्भ की दृष्टि से कम नहीं। आगे जब आवश्यकतायें बढ़ानी पड़ें, तो साधन भी इतने जुटते चलते हैं कि उनकी पूर्ति अगले दिनों की परिस्थितियों के अनुरूप होती चलती हैं। बूढ़े लोग अपने बचपन या किशोरावस्थाओं के विवरण याद करते एवं सुनाते रहते हैं। इससे फालतू समय को कल्पना की उड़ान में गुजरते रहने के अतिरिक्त और कोई लाभ नहीं होता । हानि यह होती है कि उस जमाने की बातों को नई पीढ़ी के लोगों द्वारा अपनाये जाने के लिए परामर्श देते हैं और दबाव डालते हैं। बात व्यवहारिक समझ से परे की होने के कारण व्यर्थ की झंझट खड़ी करती है। होना यह चाहिए कि आज की परिस्थितियों में जो संभव है, जो आवश्यक है उसी को चिन्तन का विषय माना जाय और सोचा इतना भर जाय कि अगले दिनों जिसकी आवश्यकता पड़ेगी उसके लिए आवश्यक तैयारी करने में अभी से जुट पड़ जाय । वैज्ञानिकों का, राजनीतिज्ञों का, सेनानायकों का चिन्तन ठीक इसी प्रकार का होता है। आविष्कार करने वाले, योजनाएँ बनाने वाले, समुन्नत भविष्य की रूपरेखा बनाने वाले अपने मानस को इसी प्रकार प्रशिक्षित करते हैं। और संभावनाओं पर पूरा ध्यान केन्द्रित करते हैं। ऐसे ही लोगों को व्यावहारिक व सफलचेता कहते हैं। व्यवसायी व भावी योजनाओं के निर्माण में प्रायः यही रीति-नीति अपनाते हैं।उन्हीं को सूझबूझ और निर्धारण-उपयोगी मानी जाती हैं और उसी से जनसमुदाय की समस्यायें सुलझती हैं । ऐसे आरोपणों के प्रतिफल ही समय आने पर फलदार वृक्ष की तरह प्राणियों और आरोपण कर्ताओं को अनेक दृष्टि से लाभान्वित करते हैं।

अच्छा हो, भूतकालीन कथा गाथाओं को दुहराते रहकर कल्पना-लोक में उड़ते रहने और संयम क्षेप करते रहने की अपेक्षा उन्हीं प्रसंगों को चर्चा का विषय बनाया जाय, जो वर्तमान अथवा निकट भविष्य में अपने समाधान माँगने वाली हैं उन्हीं समस्याओं को ही चिन्तन का, चर्चा का, कल्पना का, निर्धारण का विषय बनाया जाय और समय के साथ चला जाय।


असफलता से निराश (Kahani)

सिफलिस रोग को औषधि खोजने वाले प्रसिद्ध विज्ञानी डॉ0 एर्लिक ने अपनी दवा का नाम रखा 606। ऐसा इसलिए क्योंकि उन्होंने 605 बार बुरी तरह असफल रहने के बाद 606वीं बार सफलता पायी थी इस विलक्षण नाम के पीछे उद्देश्य मात्र इतना था कि लोग यह जान सके कि असफलता ही सफलता की जननी है। असफलता से निराश नहीं हो जाना चाहिए।


एक और शुनः शेप चाहिए

आषाढ़, श्रावण और यहाँ तक कि भाद्रपद भी बीतने को चला, पर जल की एक बूँद भी न गिरी । जेठ कब का गुजर चुका था, किन्तु उसकी तपन अब भी शेष थी । अन्न के कोठार खाली हो रहे थे । सूखे कण्ठ को तर करने के लिए न जल था, न बेतरह गर्मी से राहत पाने के लिए किंचित ठंडा पानी। कुएँ-बावड़ी, नदी-नाले सब शुष्क पड़े थे तिस पर अन्न का अभाव मानों कोढ़ में खाज उत्पन्न कर रहा था। इतनी विकट स्थिति में सर्वत्र हाहाकार मच रहा था। इसका उपाय क्या हो ? इससे निपटा कैसे जाय? बुद्धि निरुपाय हो रही थी समाधान के उसके सारे अस्त्र चुक चुके थे । उस तरकश में कोई अजेय पाशुपात आयुष भी तो न था, कि इस विषम परिस्थिति का मुकाबला किया जा सके हाय! तो क्या यह धरती जनशून्य बन जायेगी ! मनुष्य के बीज किसी मनु के पास सुरक्षित न रह पायेंगे ? वर्षों की कठिन साधना से उपजी यह साधना देखते-देखते समाप्त हो जायेगी-मनीषा संत्रस्त हो रही थी ।

भूख से बिलखते शिशु, बिलखते किशोर, निराहार तप का कठोर व्रत लिए युवक और तड़पते, प्राण त्यागते वृद्ध वातावरण को और भी गाँभीर्य प्रदान कर रहे थे। सबों के चेहरे पर मुर्दनी छायी हुई थी। मरघट कर नीरवता घररों को और अधिक विकराल बना रही थी। रह-रह कर होने वाले नौनिहालों के क्रन्दन श्मशान में हुआ-हुआ करते शृंगालों की अनुभूति कराते थे। सर्वत्र गम के ही घटाटोप थे।

मुनि विश्वामित्र भी इनसे सर्वथा अछूते न थे । अपनी एकान्त कुटिया में बैठे गहन चिन्तन में निमग्न इसी विषय पर सोच रहे थे । क्षण-क्षण में उनके चेहरे के भाव बदल जाते, जिससे ऐसा प्रतीत होता कि ऋषि भी प्रस्तुत संकट के प्रति उतने ही चिंतित हैं, जितना जनसामान्य। कभी-कभी विचार उठते-तू क्यों वृधा परेशानी मोल ले रहा है ? किन्तु दूसरे ही पल उसके विपरीत विचारधारा हुँकारती सुनाई पड़ती तो तू क्या मौन दर्शक बना रहेगा? हाथ-पर-हाथ धर कर यों ही बैठा रहेगा? तेरी अन्तरात्मा तुझे धिक्कारती क्यों नहीं? समाज के सामने इतनी गम्भीर समस्या आ उपस्थित हुई है और तू अपनी ध्यान साधना के पीछे-अपने स्वार्थ एवं अपनी उन्नति के पीछे भाग रहा है- अपने निज की उन्नति के पीछे। नहीं इस तुच्छ प्रयोजन के लिए तू समाज का अंग है। उसके प्रति अपने कर्त्तव्यों की उपेक्षा नहीं कर सकता । अपने दायित्वों को तिलाँजलि नहीं दे सकता । इस संकट की घड़ी में समस्या का हल ढूंढ़ना ही तुम्हारी सबसे बड़ी साधना व सर्वोपरि लक्ष्य है। इन विपरीत विचार तरंगों से ऋषि तिलमिला उठे। बेचैनी उनके चेहरे पर स्पष्ट झाँकने लगी। निर्णय करने की बुद्धि जाती रही । वे दुविधा में ही पड़े थे कि आवाज पुनः गूंजी। तुम्हारा असमंजस अभी तक गया नहीं । उठ और हल की बात सोच ।

इस बार ऋषि के चेहरे में दृढ़ता झलक रही थी, कदाचित कर्तव्य बोध हो गया हो। हाँ बात ऐसी ही थी। एक बार पुनः उनके मुखमंडल के भाव तीव्रता से परिवर्तित होने लगे, पर इस बार निराकरण के प्रति चिंतित होने के कारण, किसी अन्य ऊहापोह के कारण नहीं। सहसा उनकी आँखों में चमक पैदा हुई । मन विचार आया कि इस समस्या का समाधान हो सकता है-यदि वरुण देवता की पूजा कर उन्हें प्रसन्न किया जा सके । बस फिर क्या था। वे जंगल छोड़ आबादी वाले क्षेत्र में आ पहुँचे सब उन्हें अपने बीच पा प्रसन्न हो उठे । सोचा, निश्चय ही कोई समाधान लेकर उपस्थित हुए है।

विश्वामित्र ने वहीं दूसरे दिन एक विशाल सभा-आयोजन की घोषणा की । अगले दिन प्रातः नियत समय पर लोग नियत स्थान में एकत्रित हो गये । उद्बोधन शुरू हुआ-

देवों वर्तमान विपदा निश्चय ही अत्यन्त गम्भीर है, पर ऐसा भी नहीं कि जिसका कोई हल न हो । एक हल अवश्य है। जिससे इस विषम परिस्थिति को टाला जा सकता है, किन्तु इसमें एक बड़ी अड़चन है। इतना कहकर मुनि विश्वामित्र कुछ रुक से गये । सभा मंडप से आवाजें आने लगी-महाभाग। वह कैसी बाधा है? हम उसे दूर करने में कोई कसर उठा न रखेंगे। आप आज्ञा करें ।

ऋषि-वाणी पुनः मुखरित हुई - समाधान कुछ जटिल है और उत्सर्ग की माँग करता है। बोलिए आप में से कौन है, जो यज्ञ की बलिवेदी पर चढ़ने के लिए तैयार है?

मंडप में सन्नाटा छा गया । ऋषि को उत्तर न मिला। थोड़ी देर इन्तजार करने के उपरान्त आवाज फिर गूँजी ।

ठीक है तो संकट का हल मैं अपनी आहुति देकर करूंगा । आप में से कोई आगे आकर मुझे यज्ञ मंडप की वेदी में यूप से बाँध और बलि चढ़ाकर क्रिया को सम्पन्न करें।

रुकिए देव ! सभा मंडप के मध्य से एक किशोर की वाणी उभरी । यह धरती अभी देवपुत्रों से सर्वथा सूनी नहीं हुई है। इस नरमेध यज्ञ के लिए मैं अपना बलिदान करने को तैयार हूँ ।

विश्वामित्र चौंके । दृष्टि आवाज की ओर अनायास उठ गई । देखा तो एक चौदह वर्ष का बालक बड़े गर्व से उनकी ओर चला आ रहा था।

ऋषि के सम्मुख उसने हाथ जोड़ लिए और यूप से कसने का आग्रह करने लगा।

मुनि ने एक प्रेम भरा दृष्टि-निक्षेप किया और मुस्कराकर बोले नहीं वत्स इस कार्य के लिए हम ही उपयुक्त हैं। तुम अभी बालक हो । यदि ऐसा हुआ तो बाद की पीढ़ियाँ यह कहते हुए हमें कोसेंगी कि ऋषि ने अपने प्राणों की रक्षा के लिए एक बालक का वध कर दिया।

इतना सुनना था कि किशोर खिलखिलाकर हँस पड़ा कहा आप मुझे बालक समझ रहे हैं आर्य ठीक है यह ता आपके अधिकार क्षेत्र में है । वय से कद काठी से आप ऐसा मान सकते हैं, किन्तु केवल स्वल्प आयु के कारण ही दया का पात्र घोषित होना और गौरव से वंचित रह जाना-यह मुझे स्वीकार नहीं है। मुझे उम्मीद है आप अष्टावक्र और अभिमन्यु के प्रसंग भूले न होंगे । क्या उनने जो कुछ किया, एक किशोर का कार्य था। निश्चय ही नहीं । कद उनके अवश्य ही किशोरों जैसे थे, पर चेतना शूरवीरों साहसियों की थी और शूरवीरों की आयु नहीं देखी जाती । मैं उन्हीं अष्टावक्र और अभिमन्यु का अंशधर हूँ, उत्तराधिकारी हूँ महाभाग! मेरी धमनियों में उन्हीं का रुधिर प्रवाहित हो रहा है। सीने में आर्यों का सा साहस और दिल में देवपुत्रों जैसी उमंग है। मुझे स्वयं में गर्व अनुभव होगा यदि समाज के किसी काम आ सकूँ। रही कलंक की बात सो उसकी चिन्ता आप न करें । यह दोष न आप पर और न किसी के सिर पर किसी भी प्रकार मढ़ा जायेगा। आप जीवित रहेंगे तो ऐसी विपत्तियों में समाज को मार्गदर्शन मिलता रहेगा । मेरा क्या है। एक शूनःशेप न रहा तो दूसरे पैदा हो जायेंगे, किन्तु आपकी अपूर्णीय क्षति समाज कैसे बरदाश्त कर सकेगा, उसकी भरपाई किस प्रकार हो सकेगी ? तनिक विचारिये तो सही । अस्तु आप सहर्ष मुझे स्वीकार करें । मुहूर्त निकाला जा रहा है। अब विलम्ब न करें देव!

विवश होकर विश्वमित्र शूनःशेप को लेकर आगे बढ़ गये और यज्ञमंडप में यूप से बाँध दिया । एक अधेड़ व्यक्ति ने खड़ग उठाया ही था कि आकाश में तीव्र गड़गड़ाहट हुई चकाचौंध करने वाली बिजली कौंधी। उपस्थित लोगों ने सिर उठाया तो खुशी से नाच उठे।

काले-काले मेघ बरस पड़ने के लिए मचल रहे थे। देखते-देखते घनघोर वर्षा होने लगी । शूनःशेप की परीक्षा पूर्ण हुई । वरुण देव ने उसके आत्मत्याग से प्रसन्न होकर इतनी वर्षा की,जितनी पिछले कई वर्षों में नहीं हुई थी । सर्वत्र किशोर की जय-जयकार होने लगी। जेठ की आतप जब बरसात की रिमझिम फुहार बनकर बरसती है, तो मनुष्य ही नहीं, पशु-पक्षी भी झूम उठते हैं। सम्प्रति वातावरण कुछ ऐसा ही हो रहा था। इसका सम्पूर्ण श्रेय शूनःशेप को मिला । वह इतिहास पुरुष बन गया।

इन दिनों अन्न-जल संकट का वह दौर-दौरा भले ही न हो, पर आस्था संकट का दुर्भिक्ष वैसा ही भीषण है। महाकाल चीख चीख कर गुहार लगा रहा है और शूनःशेपों को आगे आने का निमंत्रण दे रहा है। कहीं ऐसा न हो हम ऐसे सुनहरे अवसर को चूक जायँ।


हर दिन नया जन्म हर रात नयी मौत

मनुष्य जन्म वस्तुतः भगवान की सर्वोपरि कलाकृति है। इससे और कोई बहुमूल्य उपहार स्रष्टा की तिजोरी में है ही नहीं। जितनी सुविधा और संभावनायें मनुष्य जन्म में हैं, उतनी सृष्टि के और किसी प्राणि शरीर में नहीं। ऐसा क्यों हुआ? मनुष्य के साथ सृष्टा ने यह पक्षपात क्यों किया ? समझा जाना चाहिए कि समस्त प्राणियों के बीच जो वरिष्ठता विशिष्टता एवं असाधारण क्षमतायें हैं, उसका उपयोग उसे उन्हीं प्रयोजनों को प्रयुक्त करना है जिसके लिए कि इस धरोहर को सौंपा गया है। निजी क्षेत्र में अपूर्णताओं को पूर्ण करना, संचित कुसंस्कारों से पिण्ड छुड़ाना, स्रष्टा के विश्व उद्यान को अधिकाधिक समुन्नत बनाना-यह तीन ही वे कार्य हैं जिन्हें पूरा कर दिखाने के लिए मनुष्य जन्म मिलता है। जिनसे सही प्रयोग बन पड़ता है, उन्हें उपहार-पुरस्कार और पदोन्नति का अवसर मिलता है। महामानव, ऋषि, मनीषी, संत, ऐसे ही स्तर हैं जिन पर पहुँच कर व्यक्ति कृतकृत्य हो जाता है। असीम आत्मसंतोष प्रचुर लोक सम्मान और परिस्थितियों के अनुकूल नवल देव अनुग्रह पर्याप्त मात्रा में मिलता है। ऐसे देव मानव स्वयं तरते और दूसरों को तारते हैं। उन्हें पाकर देश, काल और समुदाय कृतकृत्य होता है।

इस तथ्य को आँख खुलते ही बिस्तर पर पड़े पड़े प्रायः पन्द्रह मिनट मस्तिष्क पर उभारते और जमाते रहना चाहिए, साथ- साथ यह भावना भी करनी चाहिए कि अभी नया जन्म हुआ। इसकी अवधि एक दिन की है। इस स्वर्णिम सुयोग का ऐसा सदुपयोग किया जाना चाहिए कि देने वाले को प्रसन्नता हो । लेने वाला उसे पाकर धन्य बने और इस आवरण से सारा वातावरण महक उठे । यह हर दिन नया जन्म वाला सूत्र है। सो जाना एक प्रकार का मरण है। इसलिये एक दिन को एक पूरा जन्म माना जा सकता है और उस अलभ्य अवसर का श्रेष्ठतम सदुपयोग करने का सुनिश्चित संकल्प किया जा सकता है।

दिन भर में रोज हर किसी को विभिन्न प्रकार के क्रियाकृत्य करने पड़ते हैं पर उनके पीछे उद्देश्य कुछ न कुछ निश्चित रूप से समाविष्ट होते हैं। सबेरे से लेकर शाम तक जो भी चिन्तन उठे, जो भी कृत्य बने उन्हें तीन कसौटियों पर कसते रहने की अनवरत जागरुकता बरती जाय। 1-पशु प्रवृत्तियों वाले कुसंस्कार हावी तो नहीं हो रहे हैं। उनकी प्रेरणा से ऐसा कुछ तो नहीं बन रहा जिसे मानवी-गरिमा के अनुपयुक्त कहा समझा जा सके। (2) जन साधारण द्वारा अपनायी जाने वाली भेड़चाल से ऊँचा उठकर अपने कृत्यों में आदर्शवादिता का ऐसा पुट लगा रहा है या नहीं, जिसे अभिनंदनीय और अनुकरणीय माना जा सके । (3) विश्व उद्यान को अधिक सुशोभित और अधिक सुसंस्कृत बनाने के लिए आवश्यक पुण्य परमार्थ की किसी अंश में पूर्ति हो रही है या नहीं।

प्रातः से लेकर सायंकाल तक उठने वाले हर विचार और शरीर से बन पड़ने वाले हर क्रियाकलापों के उपरोक्त तीन कसौटियों पर निरन्तर जाँच पड़ताल होती रहनी चाहिए। जो अनुपयुक्त दिखे उसे निरस्त करने और जो उपयुक्त दिखे उसे प्रोत्साहित करने का क्रम चलना चाहिए। चिन्तन और क्रिया के साथ- साथ समीक्षा का भी क्रम चलना चाहिए। वह समीक्षा भी ऐसी सशक्त होनी चाहिए जो अनौचित्य को हटाने और औचित्य को प्रतिष्ठित करने में सशक्त एवं सफल सिद्ध होती रहे ।

चिन्तन और क्रियाकलाप अपने ढंग से चलते रहें और समीक्षा तथा तितिक्षा अपने उद्देश्य को पूरा करने में लगे रहें । साधारणजन केवल चिन्तन और कर्म का ही भार वहन करते हैं, पर प्रज्ञायोग के साधकों को उसके अतिरिक्त आत्म निरीक्षण, आत्मसुधार, आत्मनिर्माण और आत्मविकास के चार प्रयत्नों को अपने प्रयासों में सम्मिलित करना पड़ता है। प्रातःकाल का हर दिन नया जन्म वाला उद्बोधन इसी स्तर की प्रतिक्रिया उत्पन्न करता है, यदि उसे गंभीरतापूर्वक समझा और अपनाया गया हो।

प्रातःकाल उठते ही शुभारंभ होता है। और रात्रि को सोने के लिए बिस्तर पर जाते उसका समापन । निद्रावस्था व्यक्ति का दैनिक स्वरूप है। स्मरण उसे भी रखा जाना चाहिए । लोग या तो मृत्यु को भूल रहते हैं या फिर उससे अतिशय भयभीत रहते हैं। मरने से डरना तो इसलिए व्यर्थ है कि परिवर्तन प्रकृति का अकाट्य नियम है। पुराने वस्त्र फट जाने पर नये वस्त्र बदलने ही पड़ते हैं। पुराने घर से काम नहीं चलता तो नये में जाना पड़ता है। यह लड़कियों के ससुराल जाने की तरह एक सुव्यवस्थित उपक्रम है। डर उन्हें लगता है जिनने जीवन की बहुमूल्य सम्पदा का दुरुपयोग किया भगवान के दरबार में जाकर जो यह न बता सके कि धरोहर का निर्धारित उद्देश्य के लिए उपयोग हुआ या नहीं ? जिन्हें सन्देह हो वे डरें पर जिनने जीवन सम्पदा को लक्ष्य के लिए नियोजित किए रखा, उन्हें तो राष्ट्रपति के हाथों कोई बड़ा पुरस्कार पाने वालों के लिए उमंग भरी मनःस्थिति में जाने वालों के लिए महाप्रयाण के लिए चल पड़ते देखा गया है। इसकी पूर्व तैयारी के लिए जो करना आवश्यक है उसे बिना समय गंवाये आरम्भ कर देना चाहिए। भूतकाल की भूलों के लिए प्रायश्चित करना चाहिए । अनाचार के कारण समाज को पहुँचाई गया क्षति पुण्य परमार्थ के द्वारा पूरी करनी चाहिए मुख्य बात है अगले दिनों का सर्वोत्तम स्तर का योजनाबद्ध जीवनयापन। इसकी रूपरेखा विनिर्मित करने का उपयुक्त समय रात्रि को बिस्तर पर जाते समय का चिन्तन विषय है।

आज दिन भर जो सोचा व किया जाता रहा है, उसकी पूरी समीक्षा रात्रि को सोते समय किया जाना चाहिए जो ठीक बन पड़ा उसके लिए अपनी प्रशंसा करनी चाहिए और जितना गलत हुआ उसे अगले दिन सुधार लेने का निश्चय करना चाहिए। गलतियों की भरपाई करने के लिए कल के कार्यक्रम में ऐसे तथ्य जोड़ने चाहिए जो खोदे गये गड्ढे को पाट कर समतल कर देने की आवश्यकता पूरी कर सके। अगले दिन की परिस्थितियों का अनुमान लगाते हुए उनके साथ निपटने की रूपरेखा यदि रात को सोते समय ही बना ली जाय तो अधिक उपयुक्त है। इससे दूसरे दिन आँख खुलते ही जो दिन भर का कार्यक्रम बनाना है, उसके निर्धारण में इस पूर्व चिन्तन से सहायता मिलेगी ।

ध्यानयोग में सभी कल्पनाओं, चिन्ताओं और आवेशों को समाप्त कर दिया जाता है, तभी गहरी नींद आती है । आज की समीक्षा और कल की प्रतीक्षा में जो निराकरण निर्धारण किया जाता है उसके उपरान्त मस्तिष्क को पूरी तरह खाली कर देना चाहिए। समाधि स्थिति की भावना करनी चाहिए । इससे नींद भी गहरी आती है और डरावने स्वप्न की भी आशंका नहीं रहती । पूर्ण विश्राम मिलने से अगले दिन के लिए मानसिक संतुलन स्फूर्तिवान होकर जगता है। इस दैनिक अभ्यास से मरण के उपरान्त और नवीन जन्म से पूर्व वाला काल शान्त और सही रहता है। स्वर्ग नरक की प्रेत-पितर की यही स्थिति है । उस अवधि में कोई उद्विग्नता व्यथित न करने पाये । यह भी अपने हाथ की बात है। इसका अभ्यास हर रोज करने के लिए रात्रि का शयनकाल है । यों उस समय चेतना पर प्रत्यक्ष नियन्त्रण रहता, तो भी सोने के पूर्व की गई आत्मसमीक्षा उस में बहुत सहायक सिद्ध होती हैं । इस प्रकार का समीक्षा चिन्तन करते हुए सोने वाले को प्रायः गहरी नींद का आनन्द लेने से वंचित रहना पड़ता । दूसरे दिन उठने पर गत रात्रि को किए गए निर्धारण के अनुरूप अगले दिन का ढर्रा सरलतापूर्वक चल पड़ता है और अनवरत प्रगति क्रम में सिद्ध होता है।

प्रातःकाल का मन्त्र है-हर दिन नया जन्म । रात्रि को सोते समय की ध्यान-धारणा है-हर रात्रि नया मरण। उनका उच्चारण मात्र कर लेने से काम नहीं चलेगा। इनकी सुनियोजित कल्पना उभरनी चाहिए । उन्हें जीवन की सर्वोपरि समस्याओं का समाधान अनुभव करते हुए बिना नागा यह प्रयत्न करना चाहिए कि दोनों समय दोनों मान्यताओं के अन्तराल में गहराई तक जमाने का नियमित एवं निश्चित अवसर मिलता रहे।


भीड़ की अकुलाहट थम गयी (Kahani)

नाव मध्य नदी में थी । अचानक तूफान आया। नाव हिलोरों में बहती-डूबती नजर आने लगी । मल्लाह ने कहा भगवान को याद करो । तूफान न निकलने तक मृत्यु ही सामने है। एक चिल्लाया भगवान ! अब तेरे शिवा कोई बचा नहीं सकता । यदि बच गया तो अमुक आश्रम को इतना बड़ा दान दूँगा । दूसरा बोला यदि बच गया तो भागवत सप्ताह बिठाऊँगा! एक ने गौदान ब्राह्मण को करने की बात कही। संयोग से संकट टल गया । किनारा दिखाई देने लगा व व भीड़ की अकुलाहट थम गयी । नाव किनारे पर लगते ही नाव में ही यात्रा कर रहे एक संत ने गौदान, भागवत सप्ताह व धनदान वालों को अपने-अपने वचनों का स्मरण कराया । सभी ये कहकर अपने रास्ते चले गये कि यह तो तब की बात थी। सही है, मुसीबत में भगवान याद तो आता है पर हटते ही गाड़ी पुनः लीक पर चलने लगती है।


सच्चा शौर्य है, अपने आप पर विजय

बचाओ मेरी बच्ची को बचाओ । लगभग अर्ध रात्रि के समय आर्तचित्कार की नींद से उठा दिया था रघुनाथदास को । आतुरतापूर्वक उन्होंने प्रदीप उठाया और द्वार खोला ।

वे उसे लिए जा रहे हैं। वे पिशाच उसे घोड़े पर लिए जा रहे हैं। एक खून से सना व्यक्ति दौड़ता आ रहा था उसके पैर अस्त-व्यस्त पड़ रहे थे।

उसे बचाओ मेरी बच्ची...। रघुनाथदास तेजी से लपके किन्तु वह लड़खड़ाकर गिर पड़ा । दुर्भाग्य से उसका सिर एक बड़े पत्थर पर पड़ा । वह अन्तिम आघात पहले ही उस पर पता नहीं कितनी चोटें पड़ी थी । अवश्य उसने डट कर शत्रुओं का सामना किया होगा । एक बार शरीर में तड़पन हुई और शान्त हो गया।

दीपक पास रख कर रघुनाथदास जमीन पर बैठ गए। उन्होंने नाड़ी देखी, हृदय पर हाथ रखा, कोई जीवन चिन्ह नहीं था। शव को उठाकर आश्रम में ले आये ।

आज वे एकाकी रह गये थे आश्रम में । आवश्यक सूचना पर सभी साधु अन्यत्र सेवा कार्य के लिए जा चुके थे और ....किन्तु कोई आर्यकन्या अत्याचारियों के हाथ पड़ गई है। श्री समर्थ के आश्रम तक उसकी आर्त पुकार पहुँच चुकी तो उसका उद्धार अनिवार्य हो गया । अश्वारोही पता नहीं कितनी दूर निकल गए। एक एक क्षण मूल्यवान था । शव को सुरक्षित रखकर अपना अश्व कसा और शस्त्र सम्हाले। एक आश्रम का संचालक साधु दो क्षण में पीड़ित परित्राण का सैनिक बना घोड़े पर उड़ा जा रहा था।

आहत परिचित था। उसे उसके गाँव तक पहुँचाना कठिन नहीं हुआ। आक्रमणकारियों का दल कि धर गया, यह वहाँ से पता लग गया।

जय-जय श्री रघुवर समर्थ अरुणोदय से पूर्व रघुनाथदास का अश्व, आक्रमण करके निश्चित चले जा रहे शत्रु सैनिकों के पीछे पहुँच गया।

समर्थ का साधु । आततायियों में आतंकव्याप्त हो गया। वे यद्यपि संख्या में अधिक थे एक साधु दस सशत्र सैनिकों का क्या कर लेता ? किन्तु समर्थ के प्रत्येक साधु ने तो शिक्षा ही यही पाई थी शरीर अनित्य है। मनुष्य तो मृत्यु का ग्रास होता ही है। आर्त का परित्राण प्रभु की सेवा है। उसमें शरीर उत्सर्ग हो जाय परम सौभाग्य ।

उस लड़की को उतार दो चुपचाप । दस्युओं के बीच उनका अंश अशंकवाद से चला गया और सरदार की बगल में पहुँच कर उन्होंने ललकारा-समर्थ के साधु को शस्त्र उठाने पर विवश मत करो ।

उतार दो ! उतार दो, सरदार उसे । उसी के दल के सदस्य ही चीखने लगे। खुदा के लिए उतार दो। शैतान का पूरा काफिला इन काफिर फकीरों के बस में रहता है। ये शमशीर उठाते हैं तो डायनें खप्पर लेकर उतर आती हैं आसमान से। इस अत्याचारी वर्ग में पता नहीं कितनी ऐसी बाते फैली हैं। इनकी बद दुआ से पूरी फौज महामारी से मर जाती है।

चारों ओर घोर वन, मशालों की रोशनी आस-पास और ऊपर जहाँ तक जाती है, उससे आग लगता है। प्रेतों का झुँड मुँह फाड़े अंधेरे में छिपा है। भय से उन अत्याचारियों ने इधर-उधर और ऊपर देखा। वन के पत्ते डालियाँ वायु से लड़खड़ाते ही रहते हैं। वे काँप उठे अभी इसने शमशीर उठाई और भूतनियाँ खप्पर लेकर आसमान से उतरीं।

चुपचाप उसे उतार दो, अन्यथा ! रघुनाथदास का अश्व सरदार के अश्व से आ सटा था । अपना एक हाथ तलवार की मूठ पर रखकर सरदार के मुख पर नजर जमाई उन्होंने और दूसरा हाथ सरदार के आगे बैठी आकृति की ओर बढ़ा दिया। अश्व की लगाम इसी क्षण मुख में आ गई थी ।

उतार दो उसे ! साथी चीख रहे थे। सरदार का मुख पीला पड़ चुका था। वह कुछ करे या सोचे इससे पहले उसके आगे बैठी आकृति को रघुनाथदास के हाथ ने अपने अश्व पर उठा लिया और तब उनका अश्व पीछे मुड़ गया।

जान बख्शी खुदा ने । सरदार का श्वास ऊपर अटक गया था भय से। अब वह आश्वस्त हुआ।

मौत का फरिश्ता था काफिर ! दूसरों के घोड़े भी पास खिसक आये । इनके करिश्मों से खुदा बचाए। लड़की को उसके सम्बन्धियों तक पहुँचाने की व्यवस्था में रघुनाथ दास को सवेरा हो गया। अभी वह आश्रम के द्वार पर ही था कि अचानक समर्थ के स्वामी रामदास आते दिख पड़े । वह आते ही आते उस पर असन्तुष्ट हो गए थे। जिसमें शौर्य नहीं है वह साधना नहीं कर सकता ।

शौर्य से परिपूरित इतना बड़ा काम कर डालने के बाद भी शौर्य के लिए उलाहना । इस बीच और साधु भी आ गए थे। सबने अपने भाग का सेवाकार्य सम्पन्न कर लिया था। प्रातः स्नान सन्ध्या एवं अर्चन से अवकाश मिलते ही सबको श्री समर्थ ने अपने समीप बुला लिया । अब आपके सम्मुख वे संचालक को सम्बोधित कर रहे थे। अब तुम आश्रम के योग्य नहीं रहें । कहीं अलग रहो और गृहस्थाश्रम को अपना लो तो अच्छा ।

हुआ क्या है? किसी के समझ में बात नहीं आ रही थी । संचालक ने प्रमाद नहीं किया था। रात्रि में वे एकाकी जाकर यवनों द्वारा हरण की गई कन्या को ले आये थे। कहीं कोई कापुरुषता उनके द्वारा नहीं हुई किन्तु श्री समर्थ सर्वज्ञ हैं। वे अकारण इतने क्षुब्ध भी तो नहीं हो सकते । अब तो वे साधु भी आ गये थे, जिन्हें रात्रि के सुरक्षित शव को विसर्जित करने का आदेश मिला था।

वह लड़की कहाँ है? समर्थ ने पूछा लक्ष्मणदास उसे उसके मामा के पहुँचाने गया है। संचालक बोलने का साहस नहीं कर सके तो एक दूसरे साधु ने कहा। वह बार-बार मूर्च्छित हो रही थी । सम्भव है स्वजनों में पहुँच कर कुछ आश्वस्त हो ।

इस बार श्री चरण मुझे क्षमा करें । हिचकियाँ लेते हुए रघुनाथदास समर्थ के चरणों पर गिर पड़े।

सौंदर्य की वह सुकुमार मूर्ति-बहुत दूर तक उसे अश्व पर अपने आगे अपने अंक में बिठाकर लाना पड़ा था। अरुणोदय की आभा में उसकी वह म्लान मुख छवि रघुनाथदास को दोष कैसे दिया जाए ? साधन परिशुद्ध उनके चित्त में पता नहीं कहाँ से कामुकता का मनोभाव उठ खड़ा हुआ था । वे तरुण हैं, उनके बाहु कई बार थरथराए भी हैं। बालिका को सम्भवतः कुछ अधिक सावधानी से अश्व पर उन्होंने सम्हाल लिया था। अपने से सटा लिया था। संभवतः यही विकार समर्थ देख चुके थे ।

आँख का स्वभाव है रूप पर आकृष्ट होना सर्वज्ञ गुरु शिष्यों को सचेत कर रहे थे- इसी प्रकार अन्य इन्द्रियों का स्वभाव अपने-अपने विषयों की ओर जाना है। मनका स्वभाव संकल्प विकल्प करते रहना है। इन्द्रियों एवं मन के इस स्वभाव पर जिसने विजय प्राप्त कर ली, केवल वही शूर है। शेष सब कायर हैं। साधु लोकसेवी ही नहीं लोक शिक्षक भी होता है। उसके द्वारा अपने दायित्व का भली प्रकार निर्वाह तभी सम्भव है जब उसमें शौर्य हो । श्री रघुवीर समर्थ की सेवा तो मन इन्द्रियवर्ग के स्वभाव पर विजय पाना वाला शूर ही कर सकता है ।

केवल इस बार श्री चरण मुझे क्षमा करें रो रहे थे रघुनाथदास गुरु के चरणों में मस्तक रखे। आश्रम में तुम्हें स्थान नहीं दिया जा सकता कुसुम कोमल संत पता नहीं क्यों कभी-कभी वज्रकठोर हो उठते हैं। तुम्हें गृहस्थ बनने की आज्ञा तो मैं नहीं देता । वह तुम्हारी इच्छा पर निर्भर है किन्तु कहीं अलग रहो । लोकसेवी साधु रहना हो तो शौर्य उपार्जन करना चाहिए। वह शौर्य सबसे पहले आत्मसत्ता पर विजय प्राप्त कर ही संपन्न हो सकता है।


मृत्यु के नाम से क्षोभ क्यों (Kahani)

दो तार्किक भोजन कर रहे थे आत्मा-परमात्मा पर भोजन के दौरान ही वार्तालाप चल पड़ा । पहले ने दूसरे से पूछा आत्मा के सम्बन्ध में आपका क्या विचार है? दूसरे ने कहा आत्मा अजर-अमर अमर अविनाशी है। उसका कभी अन्त नहीं होता पहले ने फिर पूछा तब एक बात बताइए आप मर कर कहाँ जायेंगे, कुछ बता सकेंगे । मरने का नाम सुनकर ही पहला बिगड़ उठा। बोला- आप जैसे भद्र पुरुष को ऐसा आशालीन प्रश्न नहीं पूछना चाहिए । सभ्य सुसंस्कृत व्यक्ति ऐसे प्रश्न नहीं करते ध्यान रखना चाहिए ।

भोजन परस रहे रसोइए ने छोटी सी बात कहकर चर्चा का समापन कर दिया । उसने कहा-यदि आत्मा अमर है तो मरने के बारे में चर्चा में अभद्रता कैसी? मरकर जब प्रभु के राज्य में ही जाना है तो मृत्यु के नाम से क्षोभ क्यों व चिन्ता क्यों?


प्रत्यक्ष से परे परोक्ष

दृश्य जगत को ही सबकुछ मानने वाले लोगों की मान्यता है कि सृष्टि वहीं तक सीमित है, जहाँ तक हमारी आंखें देखती हैं । यदि इसी मान्यता को सर्वोपरि मान लिया जाय तो, तो ईश्वरीय अस्तित्व संबंधी अवधारणा ही नहीं अनेक वैज्ञानिक सिद्धान्त भी निराधार साबित होंगे अस्तु इस प्रत्यक्षवादी चिन्तन में संशोधन की आवश्यकता है।

उल्लेखनीय तथ्य यह है कि यदि नेत्र की दृश्य सीमा को ही अस्तित्व समझा जाता तो अगणित सूक्ष्म जीवाणुओं की सत्ता को हमें अस्वीकारना पड़ता, पर विज्ञान ऐसा नहीं करता । उसने अनेक ऐसे यंत्र-उपकरण विकसित किए हैं, जिसके माध्यम से अपने इर्द-गिर्द उड़ते-विचरते असंख्य सूक्ष्म जीवियों को देखा जा सकता है। यह बात और है कि नंगी आँखें उन्हें नहीं देख पातीं। उतने पर भी विज्ञान उनके अस्तित्व से इनकार नहीं करता ।

मात्र स्थूल दृष्टि का ही आधार यदि महत्वपूर्ण रहा होता तो रक्त के संबंध में शरीर शास्त्र की विचारणा आज कुछ और होती । ज्ञातव्य है कि रुधिर देखने में एक तरल पदार्थ लगता है, पर जब उसकी एक बूँद माइक्रोस्कोप के नीचे रखकर अवलोकन किया जाता है, तब ज्ञात होता है कि चक्षु कितने भ्रमपूर्ण थे । जो पदार्थ मोटी दृष्टि को केवल प्रवाहमान तरल प्रतीत होता था वह अपरिमित कणों से मिलकर बना है- इस तथ्य की जानकारी तो सूक्ष्मदर्शी से ही हो पाती है।

यों जानकारी के संबंध में पैमाने का निर्धारण भी एक महत्वपूर्ण बात है। प्रत्यक्ष जगत में लम्बाई, चौड़ाई, ऊँचाई, दबाव, तापमान आदि नापने के लिए कई प्रकार की इकाइयों की व्यवस्था हैं उनकी माप प्रायः इन्हीं में की जाती है। लम्बी दूरियों के लिए सौर वर्ष जैसी बड़ी इकाइयों का इस्तेमाल किया जाता है। इसका प्रयोग अक्सर खगोलीय पिण्ड की असाधारण दूरियों को मापने में होता है। इस क्रम में दूरी जैसे- जैसे घटती जाती है, इकाई को भी तद्नुरूप छोटा करने का सामान्य प्रचलन है। फिर क्रमशः वह घटते- घटते मील, किलोमीटर, गज, फुट, इंच, से. मीटर तक पहुँच जाती है। उससे छोटी माप के लिए मिली मीटर पैमाने का इस्तेमाल होता है, किन्तु जब केश बराबर मुटाई का मापना हो, माइक्रोन, मिली माइक्रोन एवं एंग्स्ट्राम जैसी अतिशय छोटी इकाइयों का ही प्रयोग करना पड़ता है। इंच फुट के बड़े पैमाने में इसे नापना कठिन है।

यही बात पक्ष यज्ञ के संबंध में भी लागू होती है। दृष्टि एक निर्धारित सीमा को ही देख पाती है। विज्ञान ने इसका निर्धारण वैनिआहपीनाला जैसे प्रकाश तरंगों के रूप में किया है। इसी तरंग दैर्ध्य के प्रकाश को देखने में हमारी आंखें सक्षम होती हैं। इससे उच्च और निम्न तरंग लम्बाई वाली किरणों के हमारे नेत्र देख नहीं पाते। इस आधार पर यह कहना कि प्रकाश रश्मियाँ मात्र इतनी ही हैं, ठीक नहीं। इस सीमा क्षेत्र से परे भी इतनी सूक्ष्म रश्मियाँ हैं, जिनका पता अभी भी विज्ञान नहीं लगा पाया है। उसकी जानकारी मात्र नौ प्रकार की किरणों तक ही सीमित है, जिसमें सात दृश्य हैं और दो अदृश्य स्तर के, जिन्हें यंत्रों के सहारे अपनी दृश्य क्षमता को और अधिक सूक्ष्म बनाकर ही देख पाना संभव है यह है बैंगनी से नीचे पराबैंगनी एवं लाल से ऊपर अवरक्त ।

सुनने की भी ऐसी ही सुनिश्चित सीमा-रेखा है। हम उन्हीं ध्वनियों को सुन समझ पाते हैं, जिनका कम्पन 20-20000 हर्ट्ज के बीच होता है । इससे कम और उच्च कम्पन सूक्ष्म जगत की चीज है। उन्हें स्वयं को सूक्ष्म रूप में विकसित करके ही समझा जा सकता है। लट्टू की गति अब तीव्र होती है, तब वह स्थिर जान पड़ता है और जब अत्यन्त धीमी होती है, तब भी ऐसा ही प्रतीत होता है क्योंकि उस गति को दृष्टि पकड़ नहीं पाती । वह उसकी दृश्य क्षमता से परे की है। पृथ्वी दिन रात घूमती रहती है पर उसके परिभ्रमण को हम कहाँ देख पाते हैं? कारण कि अपेक्षाकृत वह गति धीमी है। इसलिए इन्द्रियों को उसका आभास नहीं मिल पाता ।

तात्पर्य एक ही है कि स्थल स्थिति में रहकर सूक्ष्म को जान समझा पाना संभव नहीं । इसके लिए तरीका एक ही है माप की इकाई की तरह सूक्ष्म की ओर अग्रसर होने के साथ- साथ स्वयं को सूक्ष्म रूप में विकसित करते चलना। इसी प्रक्रिया द्वारा स्थल जगत में रहकर सूक्ष्म जगत की जानकारी प्राप्त कर पाना शक्य है। इस सिद्धान्त को भली-भाँति न समझ पाने के कारण ही प्रत्यक्षवादी लोग ईश्वर के अस्तित्व के संबंध में नास्तिकतावादी मान्यता का प्रतिपादन करते रहे हैं। यहाँ विचारणीय तथ्य यह है कि जब स्थूल सत्ता वाले सूक्ष्म स्तर के जीवाणुओं को ही आंखें नहीं परख पातीं तो सर्वथा चेतनात्मक रूप में विद्यमान ईश्वरीय अस्तित्व को किस भाँति जान सकेंगी इस संबंध में नियम ही यही है कि किसी वस्तु को ठीक प्रकार समझने के लिए स्वयं को भी उसी स्तर तक पहुँचाना पड़ता है, तभी जानकारी सही और सत्य मिल पाती है। इससे कम में नहीं।

प्राचीन चीन में जब किसी चित्रकार को किसी झाड़ी का चित्र बनाना होता था। तो वह झाड़ी के समीप लम्बे काल तक तब तक बैठा रहता, जब तक स्वयं उसकी अनुभूति न प्राप्त कर लेता। जब वह यह अनुभव करने लगता कि स्वयं ही झाड़ी हो गया है, तभी उसका चित्र बनाना आरंभ करता और इस स्थिति में जो तस्वीर बनती उसे देखने से ऐसा प्रतीत होता, मानो झुरमुट को ही कैनवस पर उखाड़ कर रख दिया गया हो । इससे पूर्व का प्रयास ऐसा जान पड़ता है जैसे कागज को किसी प्रकार काला कर दिया गया हो । यही बात ईश्वर के संबंध में भी कही जा सकती है। उसके अस्तित्व को समझाने के लिए बुद्धि और दृष्टि की सूक्ष्मता आवश्यक ही नहीं अनिवार्य भी है।

वैसे ईश्वरीय सत्य के संबंध में एक तथ्य यह भी है कि बहुत कुछ अनुमान के आधार पर भी जाना समझा जा सकता है। प्रत्यक्ष प्रमाणों में इसकी भी गणना होती है। जैसे धुँआ को देखकर आग का सहज ही अनुमान हो जाता है, वैसे ही इस सुव्यवस्थित व सुविकसित सृष्टि को देखकर भगवद् सत्ता को स्वीकारा जा सकता है। खगोल शास्त्रियों का पृथ्वी के गोल होने के संबंध में एक तर्क यह भी है कि सभी ग्रह गोल हैं। पृथ्वी भी एक ग्रह है। अतः वह भी गोल होगी । यहाँ अनुमान प्रमाण का सहारा लेते हुए ही ऐसा सिद्ध करने का प्रयास किया गया है, पर यह प्रयास काफी पुराना हो चुका। प्रस्तुत दलील तब की है जब इसे प्रमाणित करने के लिए विज्ञान के पास उपयुक्त यंत्र उपकरण नहीं थे। तब तर्क शास्त्र का उक्त तरीका ही सर्वोपरि माना गया अब तो पृथ्वी संबंधी यह तथ्य असंदिग्ध सिद्ध हो चुका है।

परम सत्ता के संदर्भ में भी हमें ऐसी ही आशा करनी चाहिए कि आने वाले समय में इस संबंध में किसी प्रकार की साक्ष्य की आवश्यकता न रहेगी। प्रायः सभी अपनी विकसित सूक्ष्म बुद्धि द्वारा इस सत्य को समझ ही नहीं, वरन् स्वीकार भी कर सकेंगे की भगवान का सुनिश्चित अस्तित्व है और उसे स्थूल चेतना द्वारा समझ पाना संभव नहीं।


किसान उत्तर से संतुष्ट (Kahani)

भगवान महावीर एक गाँव से गुजर रहें थे, तो एक जिज्ञासु प्रकृति के किसान ने प्रश्न किया-महाराज ! साधु और असाधु में क्या अन्तर है ? साधु कौन ? असाधु कौन ? क्या हमारे जैसे गृहस्थ भी साधु की संज्ञा पा सकते हैं?

भगवान महावीर ने जवाब दिया- जिसने स्वयं को साध लिया, वास्तविक साधु वही है। असाधु तो वह है, जो केश और वेष से साधु बनने का प्रपंच रचता है। यदि तुमने अपने आप को साध और सुधार लिया, तो निश्चय ही तुम गृहस्थ होते हुए भी साधु हो ।

किसान उत्तर से संतुष्ट था ।

प्रव्रज्या कर रहे तथागत रात्रि विश्राम के लिए एक गाँव में ठहरे। रात्रि सत्संग के समय भिक्षुओं को सम्बोधित करते हुए उन्होंने कहा-भिक्षुओं ! संसार में चार प्रकार के व्यक्ति हैं। एक वे जो केवल अपना भला करने में लगे रहते हैं। दूसरे वे जो न अपना भला कर सकें न दूसरों का, तीसरे वे जो अपना भला करने से पूर्व दूसरों का हित सोचते हैं। चौथे वे जो अपने साथ-साथ और अन्यों का भी भला करने में लगे रहते हैं।

जो न अपना भला कर सका, न दूसरों का उस का जीवन तो निरर्थक उस खरपतवार की तरह है जो उपयोगी फसल की खुराक भी चट कर जाती है। और

फसल, किसान, पशु पक्षी किसी के मतलब की नहीं होती ।

आप लोग सदैव अपनी स्थिति पर विचार करते रहना और जगत के लिए अधिक से अधिक उपकारी एवं उपयोगी बनने की बात सोचना ।


सृष्टि के अनसुलझे रहस्य

मनुष्य का प्रायः यह स्वभाव होता है कि वह सदा अपनी ही अवस्था एवं स्तर की वस्तुओं और घटनाओं को समझने में समर्थ हो पाता है। या कुछ हद तक अपनी परे की अवस्था को, पर पूरी तरह उस उच्च अवस्था को वह समझ सकता है ऐसा नहीं कहा जा सकता। अक्सर चोर चोर को आसानी से पहचान लेता है। इसमें वह तनिक भी गलती नहीं करता, किंतु एक फटेहाल संत को पहचानने में उसकी आंखें धोखा खा सकती हैं क्योंकि दोनों का स्तर असमान होता है। इस प्रकार पुष्प सुगन्धित क्यों होते है? इसका उत्तर रसायनशास्त्री यह कह कर दे सकते हैं कि इसमें अमुक अमुक रसायन हैं इसलिए इसकी ऐसी खुशबू है, पर यह रसायन कहाँ से किस प्रकार आये? इसका जवाब कोई स्थूल बुद्धि वाला नहीं, वरन् सूक्ष्म जगत में गति रखने वाला, अन्वेषण अनुसन्धान करने वाला सूक्ष्म स्तर का द्रष्ट ही दे सकता है। आये दिन कितनी ही ऐसी घटनाओं को, उच्चस्तर और आयाम की भूमिका में होने के कारण उसके वास्तविक हेतु को समझ पाना संभव नहीं होता । ऐसी ही घटना टाइटैनिक जलयान के सम्बन्ध में है।

कैप्टन राबर्ट एगनर अपने सहयोगी रोनाल्ड कैसरील्स एवं दर्जन के लगभग अन्य कर्मचारियों के साथ न्यूयार्क से इंग्लैण्ड की ओर यात्रा कर रहे थे । उनके जहाज कैलीफोर्निया में व्यापारिक माल लदा हुआ था। अनेक दिनों की यात्रा के बाद वे 14 अप्रैल 1963 को न्यूफाउण्डलैण्ड द्वीप के समीप पहुँचे । कैप्टन एगनर को द्वीप देख कर सैर करने का मन होने लगा। अस्तु जहाज को किनारे लगाया गया और लंगर डालकर खड़ा कर दिया गया । जब वे यहाँ पहुँचे तब शाम के सात बज चुके थे । योजना बनाई गई कि आज रात यहीं बिता कर दूसरे दिन आस-पास घूमने के उपरान्त तीसरे पहर यहाँ से प्रस्थान किया जाय। उक्त कार्यक्रम निर्धारित होने के बाद जहाज से सभी उतर पड़े और तट के निकट ही रात बिताने के लिए एक छोटा टेण्ट लगाया गया। इसके बाद वे सभी तटवर्ती क्षेत्र में घूमने के लिए निकल पड़े । करीब एक घण्टे बाद लौट कर तम्बू में आ गए । बातचीत करते आधी रात बीत गई । रोनाल्ड कैसरील्स जहाज से कुछ लाने के लिए उठे, तभी उनकी दृष्टि अचानक पूरब की ओर खिच गयी। वे ध्यान से देखने लगे। थोड़ी देर पश्चात् उन्हें ज्ञात हुआ कि कोई विशाल जहाज विपरीत दिशा से तीव्र गति से न्यूयार्क की ओर जा रहा है। वे उत्सुकतापूर्वक उसे देखने लगे। अभी मुश्किल से पाँच ही मिनट बीते होंगे कि एक जोरदार धमाका हुआ। इसी के साथ वह पर्वताकार हिचकोले खाने लगा। कैसरील को संदेह होने लगा कि वह कहीं डूब न जाय, क्योंकि वह अभी भी असामान्य रूप से डगमगा रहा था। इसी के साथ उसके अन्दर जोर जोर से शोर सुनाई पड़ने लगा। कैसरील्स ने कैप्टन एगनर एवं अन्य कर्मचारियों को जो अब भी वार्तालाप में व्यस्त थे, इसकी सूचना दी । सभी उठकर वह दृश्य देखने लगे । जहाज इस समय भी बुरी तरह काँप रहा था स्थिति देख जलयान के सुरक्षित बच जाने की आशा एगनर की भी जाती रही । उसने प्रस्ताव रखा कि अपने जहाज से छोटी डोगियाँ निकाली जायँ व यात्रियों के बचाव के लिए उन तक पहुँचा जाय। विचार सभी ने पसंद किया । 10-12 नौकाएं तुरन्त जलयान से निकाली गई और उनमें सभी सवार होकर उस ओर तेजी से बढ़ने लगे । अभी आधी दूरी भी तय नहीं हो पाई थी कि जलयान एक बार बुरी तरह काँपा और समुद्र के गर्भ में समा गया। सब इससे अत्यन्त दुखी हुए कि वे पास रह कर भी दुर्भाग्यग्रस्त जहाज के यात्रियों की सहायता न कर सके । सब कुछ समाप्त हो चुका था, फिर भी कैप्टन ने आधे रास्ते से लौट आना उचित न समझा यह सोच कर कि मृत्यु से संघर्ष कर रहे शायद किसी यात्री को हमारी आवश्यकता हो और हम उसकी मदद कर सकें, उसने घटनास्थल तक जाने का निर्णय लिया, पर बचाने के लिए वहाँ कोई भी न था । संभवतः सभी की जीवित जल समाधि हो गई थी । कैप्टन एगनर और उनके सहयोगी भारी मन से किनारे वापस आ गये। कैप्टन एगनर ने विश्व के सभी प्रमुख बन्दरगाहों से रेडियो संपर्क किया और दुर्घटना की जानकारी दी एवं यह जानना चाहा कि जलयान कहाँ से रवाना हुआ था। वैसे उसके ऊपर फहरने वाली ब्रिटिश पताका से तो इतना सुनिश्चित हो गया था कि जहाज ब्रिटेन का है, पर वहाँ से भी इसकी अनभिज्ञता प्रकट करने पर कैप्टन असमंजस में पड़ गए । उन्होंने दुबारा जलयान के आकार-प्रकार उसका रंग एवं झण्डे की सूचना देकर ब्रिटेन के सभी बन्दरगाहों में ऐसे किसी जहाज की जानकारी चाही, पर पुनः उन्हें निराशा हाथ लगी सबों ने ऐसे किसी जलयान के ब्रिटिश बन्दरगाहों से यात्रा के संबंध में स्पष्ट इनकार किया। इतना ही नहीं, यह भी सूचना मिली कि इतना विशाल आकार-प्रकार का जहाज ब्रिटेन में उपलब्ध नहीं है। निश्चय ही आपको धोखा हुआ है, किन्तु कैप्टन ने चाँदनी रात में उस पर लहराते ब्रिटिश झण्डे यूनियन जैक को स्पष्ट देखा था। फिर उस पर अविश्वास करने तथा आँखों के भ्रमित होने का सवाल ही पैदा नहीं होता था। एगनर बड़ी दुविधा में थे । वे ध्वज वाली गुत्थी किसी प्रकार सुलझा नहीं पा रहे थे। सचमुच आँखों को कहीं धोखा तो नहीं हुआ? इसकी पुष्टि के लिए उन्होंने अपने सहयोगी कैसरील्स से इस संबंध में पूछताछ की । कैसरील्स एवं दूसरे कर्मचारियों ने भी उसके ब्रिटिश ध्वज होने की पुष्टि कर दी । अब एगनर का असमंजस जाता रहा। उन्होंने पुनः एकबार ब्रिटिश गोदी कर्मचारियों से रेडियो संपर्क स्थापित किया और यह जानना चाहा कि उक्त विवरणों से मिलता जुलता कोई जलयान कभी ब्रिटेन के पास था क्या ? अधिकाँश ने इस संबंध में अपनी असमर्थता प्रकट की, पर एक ने इस संदर्भ में अत्यन्त महत्वपूर्ण जानकारी दी । उसने बताया कि वर्तमान सदी के प्रारंभिक दशक में ब्रिटेन की एक व्यापारिक कम्पनी के पास “टाइटैनिक” नामक ऐसा ही एक विशाल जलयान था, जो 14 अप्रैल 1912 के दिन मध्य रात्रि में “न्यूफ उण्डलैण्ड” टापू के समीप दुर्घटनाग्रस्त होकर अपने डेढ़ हजार से भी अधिक यात्रियों के साथ समुद्र में समा गया।

“न्यूफ उण्डलैण्ड” द्वीप और 14 अप्रैल सुनकर कैप्टन एगनर चौंक । पुष्टि के लिए एक सहयोगी से तारीख पूछी । पता चला आज भी 14 अप्रैल है। समय भी मध्यरात्रि था और स्थान भी वही। एकबार फिर कैप्टन ने इंग्लैण्ड के उस बन्दरगाह से संपर्क स्थापित किया और “टाइटैनिक” दुर्घटना के दृश्य के पुनरावृत्ति के संबंध में जानकारी चाही । बदले में उत्तर मिला कि आज से लगभग 10 वर्ष पूर्व टाइटैनिक दुर्घटना को यथावत देखे जाने की एक सूचना मिली थी। इसके अतिरिक्त और किसी सूचना का पता नहीं।

कैप्टन को अब पूरा विश्वास हो गया कि उन लोगों ने जो कुछ भी देखा वह उस दिन की कोई वास्तविक घटना नहीं थी, वरन् वर्षों पूर्व घटी घटना (टाइटैनिक दुर्घटना) का पुनरावलोकन मात्र था। बाद में खोजबीन से यह भी ज्ञात हुआ । कि उपरोक्त दृश्य हर साल उस तिथि को आधी रात में उस द्वीप के समीप घटता दृश्यमान होता है, मानो सचमुच कोई दुर्घटना हो गयी हो। इस विलक्षण घटना का उल्लेख कैपटन राबर्ट एगनर ने अपनी पुस्तक दि मैडेन वोयेज में विस्तारपूर्वक किया है।

आज तक किसी प्रकृतिविद् की समझ में यह नहीं आया कि निसर्ग क्यों इस दृश्य को बड़े सुनियोजित ढंग से पुनरावृत्ति कर घटना को अविस्मरणीय बनाना चाहती है। निश्चय ही इसके पीछे कोई न कोई बड़ा रहस्य है, क्योंकि प्रकृति घटनाएँ न तो अनावश्यक अनुपयोगी हो सकती है कि वे केवल कौतुक-कौतूहल मात्र हैं । यदि ऐसा मान भी लिया जाय तो भी यह कहना समीचीन न होगा कि वे निष्प्रयोजन हैं। यह बात और है कि हमारी स्थूल बुद्धि इसे समझ नहीं पा रही है, पर यह निरुद्देश्य हैं ऐसा नहीं हो सकता। इसे जानने के लिए यह आवश्यक है कि हम स्थूल से सूक्ष्म, जड़ पदार्थ से चेतन, प्रत्यक्ष से परोक्ष की ओर यात्रा करें। इससे कम में ऐसी पहेलियों का रहस्योद्घाटन न सरल है, न संभव।


उद्दालक के नाम से विश्वविख्यात (Kahani)

आचार्य हरिद्रुमत यज्ञ संचालन के लिए गाँधार जा रहे थे मार्ग में एक ऐसा गाँव मिला जहाँ के बारे में यह प्रचलित था कि उस गाँव का एक व्यक्ति भी नास्तिक नहीं है।

किन्तु यह क्या, जिस समय वे एक गली से गुजर रहे थे। एक गृहस्थ अपने बच्चे को बुरी तरह ताड़ना दे रहा था। हरिद्रुमत के पूछने पर उसने बताया महाराज नाराज न होऊँ तो क्या करूं ? सारे गाँव में यही ऐसा है जो नास्तिक है उससे मुझे अपयश मिलता है आप ही बताइए क्या किया जाय?

“आप इस बालक के साथ और अपेक्षाकृत घनिष्ठ प्रेम

कीजिए ।” हरिद्रुमत ने उत्तर दिया और आगे बढ़ गए। पिता और परिवार ने बच्चे को प्रेम दिया प्रगाढ़ प्रेम उसी का परिणाम था कि यही बालक आगे चलकर महान धार्मिक सन्त उद्दालक के नाम से विश्वविख्यात हुआ।


जाग्रत विवेक द्वारा ही समाधान संभव

जलाशयों में अनेक छोटे बड़े जीव-जन्तु पैदा होते रहते हैं पर उनकी गरिमा मणि मुक्तकों की है। इसीलिए समुद्र का नाम रत्नाकर पड़ा है । वनों में अनेक प्राणी जन्मते और पलते हैं पर उनमें वरिष्ठता सिंह की है। क्योंकि वृक्षों की हरीतिमा की रक्षा उसी के कारण बन पड़ती है अन्यथा अन्यान्य प्राणी ही उस क्षेत्र को खाकर तोड़-मरोड़कर समाप्त कर दें। रक्षक होने के कारण ही उसे वनराज की उपाधि से अलंकृत किया जाता है।

मनःक्षेत्र में अनेकों लहरें-तरंगें उठती रहती हैं । इनकी प्रकृति भी चित्र-विचित्र स्तर की होती है। कल्पनाओं की संरचना अजीब और अनन्त है। वे क्षणभर में आकाश पाताल नाप लेतीं हैं और ऐसे जादुई महल खड़े करती हैं कि उनके आगे कोई तिलस्म नहीं ठहर सकते। तर्कों का कहना ही क्या? वे जिधर भी झुक पड़ती हैं, उधर ही समर्थन के प्रमाण पहाड़ खड़े कर सकती हैं। जो अप्रिय लगे उसे बुरा बताने और जो अच्छा लगे उसकी प्रशंसा करने, उपयोगिता सिद्ध करने में कोई कोर कसर नहीं रहने देती। झूठे को सच्चा और सच्चे को झूठा साबित करने में उनकी वकालत देखते ही बनती है। बुद्धि का भी यही हाल है। वह स्वार्थ के पक्ष में निर्णय देती है। उसे घूसखोर न्यायाधीश की उपमा दी जा सकती है। मन रूपी यजमान यदि चोर प्रकृति का है तो उसे रोकने की अपेक्षा ऐसे उपाय सुझाएगी कि उसकी इच्छा सरलतापूर्वक पूरी हो सके। छल प्रपंच बुद्धिमत्ता की देन है। कारगर हो सकने वाले कुचक्र और षड़यन्त्र बुद्धिमानों द्वारा ही रचे जाते हैं। अपराध प्रकृति को सफल बनाने वाली योजनाएँ बुद्धि ही बनाती हैं। जेलखानों में दण्ड भुगतने वाले लोगों में अधिकाँश एक से एक बढ़ चढ़ कर बुद्धिमान होते हैं।

कल्पना की, तर्क की, बुद्धि की, समर्थता से कोई इन्कार नहीं करता । उनका कार्य क्षेत्र भी बढ़ा चढ़ा है। किन्तु इन्हें दुधारी तलवार समझा जाना चाहिए। न्याय और नीति के पथ में यदि वे चल पड़े तो बढ़ चढ़ कर आदर्शवादी और लोकोपयोगी कार्य भी वे कर सकती हैं । किन्तु यदि वे पतन के प्रवाह में बहने लगें तो समझना चाहिए असीम गहराई वाले खारी समुद्र में ही गिरा कर रहेंगी । मनोविकार इसी दिग्भ्रान्त होने और कुमार्ग पर चलने की गति भी तेज हो जाती है। यही है वह प्रक्रिया जो प्रथम मनोविकारों से ग्रसित करती हैं और पीछे से अनाचार कराती हैं जिनका प्रतिफल भर्त्सना, प्रताड़ना और विपत्ति बनकर सिर पर टूटती है।

जिस प्रकार असंयम स्वास्थ्य की बर्बादी का प्रधान कारण है उसी प्रकार मनःक्षेत्र को गँदला बनाने में उसमें विषैले कृमि कीट उपजाने का निमित्त कारण अविवेक है। अविवेक का अर्थ है दूरदर्शिता का अभाव । बचकानी आदत अधिकाँश लोगों में यह होती है कि वे तत्काल का लाभ देखते हैं उसी के आकर्षण पर फिसल पड़ते हैं। यह नहीं समझ पाते कि इसका भावी परिणाम क्या होगा? तत्काल लाभ उठाने की आतुरता ही मनुष्य को अचिन्त्य चिन्तन कुकृत्य करने के लिए प्रोत्साहित करती है । इसी कारण चिड़िया जाल में फँसती और मछलियाँ मछुओं का शिकार बनती हैं। दूरदर्शी को भावी परिणाम पर विचार करना होता है और वस्तु स्थिति का निरीक्षण परीक्षण भी । जो इतना कर पाते हैं उन्हें भावी सम्भावनाओं को ध्यान में रखते हैं हुए सतर्कता भरे कदम उठाने के लिए अवकाश मिल जाता है। फलतः वे उन विपत्तियों से बच जाते हैं जो मृगतृष्णा में भटकने वालो का पीछा करती रहती हैँ।

संकीर्ण स्वार्थपरता एक प्रकार से मूर्खता की ही परिणति है। स्वार्थ और परमार्थ का आदान-प्रदान ही व्यावहारिक है। उसी नीति को अपनाकर कोई प्रगति पथ की दूरी को पूरा कर सकता है। सफलता पा सकता है और समझदार लोगों की पद्धति में बैठ सकता है। उतावले लोग वस्तुस्थिति तक का अनुमान लगा ही किस प्रकार पाएँगे। दिग्भ्रान्त होने के जंजाल से यदि आरंभ में ही फँस जाया जाय तो किसी महत्वपूर्ण उपलब्धि को हस्तगत करना संभव ही नहीं रहता। खीजते और खिजाते डरते और डराते रहने की स्थिति ही पल्ले बँधती है।

मनोविकारों की संख्या अत्यधिक है। उनके अगणित स्वरूप हैं । कुछ उत्तेजनापरक कुछ अवसादपरक। उत्तेजित स्थिति में उत्पन्न होने वाले क्रोध, आक्रमण, अपहरण, दर्प, अपमान, कटुवचन, ईर्ष्या द्वेष, कामुकता, तनाव जैसे मनोविकार उभारते हैं। अवसाद की स्थिति में भय, चिन्ता, आशंका, कायरता, आत्महीनता, आलस्य प्रमाद जैसे दोषों का उद्भव होता है। इन दोनों प्रकारों की प्रकृति तो एक वर्ग से दूसरे वर्ग की भिन्न है पर दुष्टपरिणामों की दृष्टि से कोई पीछे नहीं। मनःक्षेत्र को उद्विग्न विपन्न करते हैं।

ज्वार की लहरें पानी को ऊपर उछालती हैं और भाटे पानी को नीचे गहराई तक ले जाते हैं। यह प्रत्यक्ष अन्तर भिन्न-भिन्न प्रकार का होते हुए भी सतह को अस्थिर बनाने में दोनों की ही समान भूमिका होती है। मानसिक उद्विग्नता ही मनोविकारों की जननी है । उन्हीं के कारण मनुष्य दब्बू, कायर, निराश, खिन्न रहता और मन मसोस कर रोता कलपता है। इसके विपरीत आवेश में आकर मनुष्य आक्रामक बनता है। विद्वेष और प्रतिशोध के लिए उत्तेजित रहता है। डरपोक आत्महत्या की बात सोचता है और आततायी दूसरों की हत्या की । परिणति दोनों की एक जैसी है। अपने को या दूसरे को मारने में प्राण हरण की बात तो एक जैसी ही बनती है। क्रोधी का खून जलता है। भयभीत भी पीला पड़ जाता है । आवेश के दोनों सिरे लगभग एक जैसी स्थिति के हैं। उत्तरीध्रुव ठंडा है पर पश्चिमीध्रुव में भी शीत कम नहीं है। आग का गुण जलाना है चाहे चन्दन के काष्ठ में प्रकट हो अथवा बबूल की लकड़ी में । दुर्घटनाएं जितना अनर्थ करतीं हैं, कुकल्पनायें भी उससे कम उत्पात खड़े नहीं करतीं। भयभीत भी बेमौत मरते हैं और आवेशग्रस्त भी अपनी क्रोधाग्नि में आप जल मरता है।

अधीरता की तरह की दूसरी सहचरी है लोक लिप्सा। यह कई रूपों में अपना अभिनय प्रदर्शित करती है। जल्दी से जल्दी धनी बनने और अधिकाधिक मात्रा में वैभव बटोरने की ललक लिप्सा का एक रूप है जो सामान्य रीति से उपार्जन करने के लिए आवश्यक श्रम करने और समय पर फल आने देने की प्रतीक्षा नहीं करने देता। हथेली पर सरसों जमाने की उत्कंठा झकझोर कर रख देती है।ऐसा व्यक्ति धन संबंधी अपराध किए बिना नहीं रह सकता अनुचित रीति से किया गया अर्जन निश्चित रूप में दुष्प्रवृत्तियों,दुर्व्यसनों, प्रदर्शनों में खर्च होता है। इसमें दोहरी हानि होती है। बटोरने के समय जितना पाप सिर पर चढ़ता है अपव्यय में भी दुष्प्रवृत्तियों का विस्तार कम नहीं होता । इसलिए अनुचित अर्जन और निषिद्ध अपव्यय दोनों ही एक से एक बढ़कर दुष्परिणाम उत्पन्न करते हैं। कर्ता चक्की के दो पाटों के बीच पिसता है।

लिप्सा का दूसरा नाम है संग्रह। व्यापक क्षेत्र पर अधिकार जमाना है। परिवार से लेकर सम्पदा के अनेक क्षेत्र पर अहंकारी आधिपत्य जमाना। इस प्रवृत्ति से ग्रस्त व्यक्ति उदारता, न्यायनिष्ठ, औचित्य की सभी मर्यादाओं को लाँघने लगते हैं। निरन्तर अधिकाधिक समृद्ध बनने की बात सोचते हैं। इसकी पूर्ति का कोई सीधा तरीका नहीं है। दूसरों के अधिकारों का अपहरण ही मात्र एक तरीका है। समृद्ध कहलाने वालों में से अधिकाँश को यही करना पड़ता है। निष्ठुरता ही इसकी परिणति है दूसरों की स्थिति और आवश्यकता का निष्ठुर को ध्यान ही नहीं रहता। ऐसी दशा में दया, करुणा मैत्री के अंकुर उपजते ही सूख जाते हैं। लोकहित में अपनी सम्पन्नता को विसर्जित करने की बात मन में उठती ही नहीं। विज्ञापन छपवाकर वस्तुओं की बिक्री बढ़ाई जाती है। इसी प्रकार संकीर्ण स्वार्थ परता के दलदल में फँसे हुए लोग मात्र सस्ती वाहवाही लूटने के लिए दान-धर्म का पुण्य परमार्थ का ढकोसला जब तब रच देते हैं। इस प्रयोजन के लिए पैसा तब खर्चते हैं समय तब निकालते हैं जब उन्हें इसके बदले मान मिलने का, विज्ञापन छपने में मुनादी पिटने में, इच्छित मनोरथ पूरी तरह पूरा होता हो। इसमें कमी दिखती है तो वे सोचते हैं कि धंधे में घाटा पड़ गया । ऐसे लोग मन ही मन ऐसे अवाँछनीय ताने बाने बुनते रहते हैं जिनसे आत्मिक शक्ति कम विद्वेष के बीज अधिक पनपते हैं।

लिप्सा का तीसरा स्वरूप है दर्प। दर्प अथवा अपनी धाक जमाना और दूसरों को छोटा सिद्ध करके उनका उपहास उड़ाना, असम्मान करना । इसी निमित्त दूसरों की आँखों में चकाचौंध उत्पन्न करने वाले आडम्बर खड़े किए जाते हैं। अपने मुँह शेखी बघारने में आत्मश्लाघा की प्रशस्ति की कोई कमी नहीं रहने दी जाती है। चाटुकार चारणों के मुँह अपनी यशगाथा सुनते रहने के लिए उन्हें खरीदा और साथ रखे रहा जाता है। अपनी बलिष्ठता सिद्ध करने के लिए दीन दुर्बलों को त्रास देने में कमी नहीं रहने दी जाती। यही है असुर वृत्ति जो दर्प के कारण उभरती है। दुहरा व्यक्तित्व इसी कारण विनिर्मित होता है। कथनी कुछ करनी कुछ । इस प्रकार की विसंगति अंतःक्षेत्र में मल्लयुद्ध जैसा खड़ा कर देती है। उस गृहयुद्ध में समूची मानसिक पृष्ठभूमि का कचूमर निकल जाता है। ऐसा टूटा-फूटा मनः संस्थान अपनी दुर्गति का परिचय क्षण क्षण में देता रहता है खण्डित और अस्त-व्यस्त मन का परिचय चित्र-विचित्र सनकों के रूप में मिलता रहता है। पूर्ण विक्षिप्त पागलखानों की शरण लेते हैं अर्ध विक्षिप्त सनकी स्तर के व्यक्ति गिने तो साधारण लोगों में ही जाते हैं पर अपनी कल्पनाओं के कारण स्वयं हैरान रहते हैं तथा दूसरों को हैरान करते हैं।

मनोविकार एक प्रकार से सनकीपन की स्थिति है। इसका प्रतिफल अनेकानेक भ्रान्तियों, कुविचारों, कुटेवों के रूप में प्रकट होता रहता है। कहना होगा कि प्रत्यक्ष शरीर रोग जितनी हानि पहुँचाते हैं जितने कष्ट देते हैं उससे कम मनोरोगों की परिणति भी कम भयावह नहीं है। अन्तर इतना ही है कि शरीर रोग काय कष्ट देते हैं, परिवार वालों की परिचर्या के लिए विवश करते हैं और धन खर्च कराते हैं। ऐसा ही कुछ मनोरोग भी करते हैं । उनकी परिणति अनेकानेक व्यथाओं, बाधाओं,आपत्तियों के रूप में सामने आती हैं।

अच्छा हो हम विवेक को जाग्रत करें और आए दिन समस्याओं को इस प्रकार हलके फुलके ढंग से सुलझाएँ ताकि वे मनोविकार की स्थिति तक तो न पहुँचने पाएँ।


मनुष्य का अहंकार (Kahani)

भक्त को अपनी साधना पर बड़ा गर्व था । एक दिन देव ऋषि नारद उधर से निकले । उसने कहा भगवान् यदि आपकी भगवान से भेंट हो तो, इतना पूछने का कष्ट अवश्य करें कि मेरी मुक्ति कब तक होगी और साधकों में मेरा स्थान कौन-सा है?

नारद जी की भेंट जब भगवान से हुई तो अन्य विषयों के साथ उन्होंने साधक की जिज्ञासा को भी कह सुनाया ।

भगवान बोले उस साधक का तो यहाँ नाम तक नहीं । उसे अपने करे धरे पर कहीं घमण्ड तो नहीं रहता । ऐसे लोग स्वर्ग, मुक्ति से तो वंचित रहते ही हैं, लोक सम्मान भी गवाँ बैठते हैं।

नारद ने आकर साधक को सारी वस्तु स्थिति से अवगत कराया । उस दिन से साधक ने अपने जीवन में हेर फेर कर पूर्णतया परिवर्तित कर लिया ।फलतः आध्यात्मिक और भौतिक लाभ भी उसके जीवन में जल्द ही दिखाई देने लगे।

मनुष्य का अहंकार उसे अट्टालिका के कंगूरे पर बैठे कौवे की भाँति बना देता है।

व्याख्यान से पहले पादरी ने चर्च में बैठे श्रोताओं से पूछा कि सत्य पर बोलने से पहले वह जानना चाहता है कि आप लोगों में से मैथ्यू का छत्तीसवाँ अध्याय किन-किन लोगों ने पढ़ा है। एक श्रोता को छोड़कर सभी ने हाथ उठाया कि हमने पढ़ा है। पादरी ने कहा-बस तब ठीक है। फिर आप लोगों के लिए सत्य पर बोलना, सत्य का महत्व बतलाना परम आवश्यक है, किन्तु पादरी बहुत हैरान हुआ कि इतने लोग सत्य को क्यों नकारते हैं। मैथ्यू का छत्तीसवाँ अध्याय तो होता ही नहीं। जैसे गीता का बीसवाँ व उन्नीसवाँ अध्याय नहीं है । इसी तरह मैथ्यू का छत्तीसवाँ अध्याय भी नहीं है। पादरी को फिर भी संतोष था कि पूरी सभा में एक श्रोता फिर भी सत्य के प्रति सावधान है। प्रवचन के उपरान्त वह उस श्रोता के पास गया और पूछा -महाशय आपने हाथ क्यों नहीं उठाया । क्या आपने मैथ्यू का छत्तीसवाँ अध्याय नहीं पढ़ा है। वह बोला मैं कम सुनता हूँ । पहले मैंने आपका प्रश्न ठीक से सुना नहीं था। वह तो मैं नित्य ही पढ़ता हूँ पादरी ने सिर पीट लिया। सत्य का आखिरी स्तम्भ भी गिर गया


भ्रान्तियों ने बढ़ाया है नास्तिकता को

लोगों के उस भटकाव को क्या संज्ञा दी जाय, जिसके सिर चढ़े रहने पर मात्र देवसत्ता को फुसलाने भर का प्रयत्न उनके द्वारा किया जाता रहता है। उसमें भौतिक मनोरथों को पूरा करा लेने का स्वप्न देखा जाता रहता है । यदि ऐसा हो सकना होता तो ईश्वर को न्यायशील और निष्पक्ष न कहा जाता। तब वह अपने चमचों की हिफाजत करने वाला और उनके ओछे स्तर को दरगुजर करते रहने वाला कहा जाता। तब सत्ता स्थिति भाई भतीजेवाद में संलिप्त पक्षपाती कही जाती और विवेकशीलों के क्षेत्र में उसकी भर्त्सना ही होती । पर ऐसा है नहीं। भटके लोग कुछ भी सोचते या मानते रहें इस यथार्थता को नहीं उल्टा जा सकता पुरातन तत्वज्ञानी भ्रमग्रस्त नहीं थे। विचारशीलता के उदय होने पर भी यह स्थिति पन रहेगी जो इन दिनों मध्यकाल की भ्रान्तियों के कारण आसमान तक चढ़ गई है। तथाकथित पूजा उपचार को इतना महत्व मिल रहा है जिससे किसी को आत्मनिर्माण के लिए कोई प्रयत्न करने की आवश्यकता ही अनुभव नहीं होती । यहाँ तक कि पाप कर्मों से बचने की भी इच्छा नहीं होती क्योंकि पूजापरक कर्मकांडों के कारण कुकर्मों का दण्ड मिलने की अनिवार्यता भी समाप्त हो जाती है । नाम रट से पाप कटने का यही अर्थ तो समझा जाता है। इस आधार पर तो कुकर्म करने से कोई डर न रहने जैसी निश्चिन्तता भी मिलती है। इससे तो आस्तिकता का सारा आधार ही उलट जाता है।

आस्तिकता के, उपासना के क्षेत्र में प्रवेश करने से पूर्व भटकाव से निवृत्ति प्राप्त कर लेना आवश्यक है अन्यथा कस्तूरी के हिरन जैसी मृगतृष्णा में भटकने वाली निराशा ही हाथ लगेगी और प्रयास के निरर्थक जाने की संभावना सामने ही खड़ी रहेगी।

नास्तिकता के व्यापक अभिवृद्धि के दो प्रधान कारण हैं । एक-तुरन्त कर्मफल न मिलने पर अदूरदर्शी लोगों का यह मान बैठना कि विश्व-व्यवस्था में अराजकता संव्याप्त है यहाँ किसी नियामक सत्ता का अस्तित्व नहीं है । प्रत्यक्षवादी विज्ञानवादी यही कहते हैं न ईश्वर है न उसकी व्यवस्था । इन्द्रियों और उपकरणों की पकड़ में जो आये उसे वे अमान्य ही ठहराते हैं।

नास्तिकता का दूसरा कारण है आस्तिकता के रूप और प्रयोग के संबंध में संव्याप्त भ्रांतियां। स्वल्प प्रयास में बड़ी-बड़ी पर्वत जैसी भारी उपलब्धियों की आशा की जाती है । उन्हें भी हथेली पर सरसों जमाने की तरह तुर्त-फुर्त माँगा जाता है। प्रयास सफल होने में देर लगती है, इस तथ्य को भी भुला दिया जाता है। पूजा पाठ को जादूगरी स्तर का माना जाता है और पहले दिन से चमत्कार देखने के लिए लालायित रहा जाता है। यह बालक्रीड़ा किस प्रकार सफल हो ? जब मनोवाँछित प्रतिफल स्वल्प काल में सामने नहीं आता तो उत्साह पानी के बबूले की तरह ठंडा हो जाता है । जो किया जा रहा था वह समाप्त हो जाता है। निराशा की मनःस्थिति में खीज भी उपजती है। अविश्वास और संदेह उठता है श्रद्धा अश्रद्धा में बदल जाती है। यों तो उस क्रम को छोड़ बैठा जाता है या फिर कोई प्रयत्न आडम्बर गले बाँधकर इष्ट सिद्धि का प्रचार किया जाता है ताकि लोगों को ठगा जा सके। यह प्रकारान्तर से प्रच्छन्न नास्तिकता है। इसे अपनाने के बाद मनुष्य एक प्रकार से अनास्थावान ही हो जाता है। भ्रांतियां उसे पाप मुक्ति वाली बात को सही मानते रहने के लिए उकसाती रहती हैं। फलतः वह प्रपंच रचने में नास्तिकों को कही पीछे छोड़ देता है। व्यक्तित्व विकास की आवश्यकता ही नहीं समझी जाती । दैवी अनुकम्पा से भाग्योदय होने की कल्पनायें भर मानस पर छाई रहती हैं। स्वर्ग पहुँचने, मुक्ति लोक में विचरण करने जैसी कल्पनायें ही सुहाती और मन बहलाने लगती हैं । ऐसे व्यक्ति कर्तव्य पालन और पुरुषार्थ दोनों ही छोड़ बैठते हैं। नशेबाजों की तरह चित्र विचित्र दिवास्वप्न देखते रहते हैं। संपर्क में आने वालों को भी ऐसा ही कुछ सिखाते बताते हैं। जिसमें आत्म विकास के लिए प्रयत्न करने की कोई आवश्यकता ही अनुभव न हो।

आस्तिकता के क्षेत्र में भटकाव वाली स्थिति में फँसे हुए लोग आत्म विश्वास खो बैठते हैं । भाग्यवाद के परावलम्बन में अपने आपको स्वेच्छापूर्वक बदल लेते हैं यही कारण है कि तथाकथित भक्तिवाद में लीन व्यक्ति न तो व्यक्तित्व को प्रतिभासम्पन्न बना पाते हैं और न भौतिक क्षेत्र के प्रगति में कोई कारगर सफलता प्राप्त करते हैं । इन असफलताओं को ही वे त्याग वैराग्य का नाम देकर अपना मन बहलाते ओर दूसरों को बहकाते रहते हैं । अध्यात्म क्षेत्र की इन असफलताओं को समझा और सुधारा जाय तभी इस महान दर्शन का गौरव और इसके अनुयायियों का कल्याण हो सकेगा। आस्था संकट का निवारण तभी संभव है।


सच्चा विरक्त

‘महाराज किसी सच्चे विरक्त के हाथ लगें तो श्री विग्रह स्थान ग्रहण करें ।’ परम प्रतापी महाराज कृष्ण देवराय चिन्ता में पड़ गए राज ज्योतिषी की यह बात सुनकर। कोई सच्चा विरक्त क्यों राजसदन आएगा? उसे विजय नगर और उसके वैभव से क्या प्रयोजन । लेकिन मंत्री को आदेश दे दिया गया कि वे ऐसे विरक्त के अन्वेषण का पूरा प्रयत्न करें।

बड़े उत्साह से मन्दिर का निर्माण किया गया था । कला मूर्तिमती हो उठी थी । कृष्णदेवराय की श्रद्धा और राज ज्योतिषी का शास्त्रज्ञान साकार हुआ। कहीं कोई बाधा नहीं पड़ी। जितना समय लगने का अनुमान था, कार्य उसके पहले पूर्ण हो गया था।

भगवान महेश्वर का श्री विग्रह स्थापित होना था लिंग विग्रह के पीछे । मन्दिर के अंतर्ग्रह के बीच लिंगमूर्ति और दीवाल में बने सिंहासन पर श्री आशुतोष । लिंग विग्रह स्थापित हो गया और श्री मूर्ति सिंहासन पर पहुँचाई गई, किन्तु वह सीधी बैठती ही नहीं । बहुत कोशिशें हो चुकीं कभी एक ओर कभी दूसरी ओर मूर्ति का मुख तिरछा हो जाता है। जब मानव प्रयत्न विफल हो गए महाराज ने अपने राज ज्योतिषी के चरणों में मस्तक झुकाया ‘क्या कारण है कि प्रभु आसन स्वीकार नहीं कर रहे हैं?’

ज्योतिषी जी केवल ज्योतिषी नहीं थे। कहा जाता है कि विजयनगर की अधिष्ठात्री महाशक्ति ने उन्हें साक्षात् दर्शन दिए थे । वे उन वेदमाता के नैष्ठिक आराधक थे। महाराज के प्रश्न का उत्तर देने के लिए उन्होंने न पंचाँग खोला और न अपनी पट्टी पर कोई गणित किया। वे चुपचाप वहाँ से गए और भगवती के मन्दिर में श्रीमूर्ति के सम्मुख आसन लगाकर बैठ गए ।

“महाराज आपने श्री विश्वनाथ को यहाँ आराध्य रूप में प्रतिष्ठित करने की इच्छा नहीं की।” पूरे पाँच घण्टे बाद राज ज्योतिषी मन्दिर से निकले और सीधे राजसदन पहुँचे। तत्काल महाराज ने स्वयं आकर उनसे भेंट की। जो कुछ आभास उन्हें मिला था वही वे बता रहे थे -’ज्ञान और विद्या के आदि गुरु यहाँ श्री दक्षिणामूर्ति के रूप में आपको प्रतिष्ठित करने हैं। इस रूप में वे किसी नरेश का दिया आसन कैसे ग्रहण करें? कोई अधिकारी सच्चा विरक्त उन्हें आसन ग्रहण करावे, वे ठीक आसन ग्रहण कर लेंगे।’

भगवान शिव का यह दक्षिणामूर्ति विग्रह जब आया था उसे देखकर महाराज भावविभोर हो गए थे। जिसने देखा यही लगा कि प्रभु साक्षात् उपदेश करने आ बैठे हैं।

‘विजयनगर को महाशक्ति की अनुकम्पा पहले से प्राप्त है।’ श्रद्धाभरित स्वर में श्री विग्रह पर दृष्टि पड़ते ही राज ज्योतिषी ने कहा था-अब ज्ञान के अधिष्ठाता आपकी श्रद्धा स्वीकार करके स्वयं आचार्य रूप में आ गए हैं।

आपके श्री चरणों का अनुग्रह। महाराज ने सादर मस्तक झुकाया था।

विजयनगर विद्वानों का आश्रयस्थल, स्वामी विद्यारण्य की उपस्थिति, विद्वानों, साधकों, मनीषियों को बरबस आकर्षित करने के लिए काफी थे । फिर भी काशी पैंठा से विद्वान आमंत्रित किए गए। प्राणप्रतिष्ठा की समस्त विधियाँ सावधानीपूर्वक सम्पन्न की गई। विधि के ज्ञान में न त्रुटि थी न उसके पालन में प्रमाद हुआ। यजमान की श्रद्धा कहीं शिथिल नहीं हुई। शुद्ध सामग्री, सम्यक् विधि, श्रद्धा संयुक्त शास्त्रपूत यजमान और विधिज्ञ संयमी अप्रमत ऋत्विक् प्रतिमा में प्राण प्रतिष्ठित हो गए यह लक्षित कर लेना कठिन क्यों होने लगा?

सब सानन्द हुआ, लेकिन जब विग्रह को आसन पर पहुँचाया गया पूरे प्रयत्न के बाद एक स्वर से विप्रवर्ग ने कह दिया राजन ! कोई ऐसा कारण जरूर है जिससे प्रभु आसन ग्रहण नहीं कर रहे।

कितना अद्भुत निकला वह कारण-विजय नगर सम्राट की ओर से कुछ अच्छे विद्वान नियुक्त कर दिए गए हैं-विरक्त ढूंढ़ने की कोशिशें चल रही हैं। राज ज्योतिषी ने अपने कुछ शिष्य नियुक्त कर दिए हैं-भगवती की सविधि अर्चना चल रही है।

सब चल रहा है, लेकिन दक्षिणामूर्ति भगवान आशुतोष का विग्रह आसन नहीं ग्रहण करता। साधु आते हैं-संन्यासी, वैष्णव, संतमतानुयायी, जटाधारी, मुण्डितकेश, भस्मधारी, गैरिकवसन, श्वेतवस्त्र, पीतवस्त्र या केवल केले की छाल की कौपीन लगाने वाले दिगम्बर, अवधूत भी आए। जिनकी त्याग-तपस्या की ख्याति थी, उन्हें महामंत्री स्वयं आदरपूर्वक ले आए। निष्परिग्रह, अनिकेत, उग्रतप तपस्वी सभी तो आ गए। काष्ठमौनी, उर्ध्ववाहु सदा खड़े रहने वाले, पता नहीं कितने और कैसे-कैसे साधु आए। जिनसे बड़ी आशा थी, कुछ नहीं हुआ उनसे भी। पूरे तीन वर्ष होने को आए, श्रीविग्रह सम्मुख आसन पर नहीं आया ।

किसी ने कुछ अनुष्ठान बताया, किसी ने विशेष जप, यज्ञ अथवा अर्चन की आवश्यकता सूचित की । सब सम्पन्न हुए। किसी असफल साधु का तिरस्कार नहीं हुआ। कोई उपेक्षित-तिरस्कृत न हो जाय, महाराज ने इसके सम्बन्ध में अधिकारियों को सावधान कर दिया था। जो असफल होते थे-उनका चित्त खिन्न हो, स्वाभाविक था, किन्तु राज्य के कर्मचारी उन्हें आदरपूर्वक ही विदा करते थे।

‘मेरे राज्य में न सही पवित्र भारतभूमि में तो वीतराग पुरुष हैं ही।’ महाराज ने अंत में एक दिन राजपुरोहित से निवेदन किया। आप प्रयत्न करें और ऐसे पुरुष का पता न लगे मैं विश्वास नहीं कर सकता।

‘मैंने प्रयत्न में कोई प्रमाद नहीं किया है।’ राजपुरोहित ने तनिक गम्भीर होकर कहा-’किन्तु लगता है, हमारी परख का मापदण्ड ठीक नहीं है। ऐसी अवस्था में बात मानव प्रयत्न की नहीं रह जाती। मेरा तो एक ही आश्रय है। आप चिन्ता पन करें, पुत्र जब आग्रह करता है, माँ को उसका बाल हठ पूर्ण करना ही पड़ता है।’

महाराज को आश्वासन प्राप्त हुआ। राजपुरोहित ने भगवती के मन्दिर में जो आसन त्वयि अर्चा के लिए लगाया, उससे उठे ही नहीं। मध्याह्न हुआ और बीत गया। शिष्यों में घर के सदस्यों में व्यग्रता आयी। तृतीय प्रहर भी बीत गया और रात्रि का अंधकार भी अंत में फैलने लगा।

सायंकालीन भोजन न राज सदन में किसी ने किया और न राज्य के उच्च कर्मचारियों के गृहों में । राजपुरोहितों के घर तो पूरे दिन ही सब उपवास रहे। लेकिन मन्दिर में भीड़-भाड़ महाराज ने नहीं होने दी।

पूजा हुई, आरती हुई, रात्रि का नैवेद्य अर्पित हुआ। आराधक स्थिर बैठा रहे तो आराध्य शयन कर लेगी? भगवती की शयन आरती नहीं की मन्दिर के मुख्य पुजारी ने । वे बाह्य द्वार बन्द करके स्वयं मन्दिर में एक ओर आसन पर स्थिर बैठ गए।

‘माँ।’ प्रातः की अरुणिमा मन्दिर में प्रवेश करने लगी थी, जब राजपुरोहित के स्वर ने महाराज तथा पुजारी दोनों को चौंका दिया। पता नहीं कब कैसे दोनों को बैठे-बैठे ही तन्द्रा आ गई थी। दोनों ने देखा-राजपुरोहित प्रतिमा के सम्मुख साष्टांग प्रणाम कर रहे हैं।

तभी एक राज कर्मचारी ने लगभग दौड़ते हुए मन्दिर में प्रवेश किया । उसके मुख पर प्रसन्नता छलकी पड़ती थी । उसके प्रवेश करते ही राजपुरोहित पुजारी और महाराज तीनों के चेहरों पर एक प्रश्नवाचक भाव गहरा उठे। आशय भाँप कर कर्मचारी ने समाधान के स्वर में कहा- दक्षिणामूर्ति श्री विग्रह सीधा हो गया।

कैसे? लगभग एक साथ तीनों के मुख से निकला । बाड़ा बाँकपुर के दण्डनायक कनकदास नगर में आये हुए हैं। स्नान करके वे सपत्नीक मन्दिर गए। जल चढ़ाकर घूमे तो दक्षिणामूर्ति विग्रह पर दृष्टि पड़ी। तिरछा विग्रह-कनकदास ने मूर्ति के घुटनों पर हाथ रखा । मूर्ति जैसे स्वयं घूमकर सीधे आसन पर आ गई।

दण्डनायक कनकदास -उन्हीं का अधीनस्थ सामन्त महाराज कृष्णदेव स्वयं आश्चर्यचकित थे इस वृत्तांत को सुनकर-पत्नी-बच्चे भरापूरा परिवार -एक बहुत बड़े इलाके का प्रशासन सम्भालने वाला आदमी सर्वश्रेष्ठ विरक्त। यदि यह व्यक्ति विरक्त है तो फिर आसक्त कौन होगा?

मन में अनेक अनबूझ पहेलियों को लिये ये सभी शिव मन्दिर चल पड़े । मन्दिर के पास पहुँचने पर कनकदास ने सपरिवार आगन्तुकों को प्रणाम किया। राज पुरोहित कृष्णदेव को समझाते हुए कह रहे थे-”राजन ! वैराग्य का अर्थ गृहस्थ का त्याग नहीं, मोह का त्याग है, पत्नी का त्यागी नहीं, वासनाओं का त्यागी ही सच्चा विरक्त है। विरक्ति कर्तव्य से पलायन नहीं कर्तव्य का दृढ़तापूर्वक पालन है। जो अनासक्तिपूर्वक गृहस्थ के दायित्वों का निर्वाह करते हुए लोक सेवा में निरत है वही त्यागियों में मुकुटमणि है”

सभी इस नवीन परिभाषा को आश्चर्यचकित हो सुन रहे थे। इसी विरक्ति ने कनकदास को कर्नाटक ही नहीं वरन् समूचे भारत के महान सन्तों की पंक्ति में जा बिठाया “मोहन तरंगिणी” नामक कृति उनके व्यक्तित्व की आभा विकसित करती हुई अनेकों को इस सच्चे वैराग्य की ओर आकर्षित करती है।


पूर्णता की ओर अग्रसर हम सब!

पूर्णता को प्राप्त करना ही मानव जीवन का परम लक्ष्य है। न केवल चेतन समुदाय, अपितु सृष्टि का प्रत्येक कण इसके लिए लालायित और गतिशील है। भौतिक जीवन में जिसके पास स्वल्प सम्पदा है वह और अधिक प्राप्ति के लिए प्रयत्नशील है, पर जो धनाढ्य हैं उन्हें भी संतोष नहीं । उसी के परिणाम में वह और अधिक प्राप्ति के लिए प्रयत्नशील दिखाई देता है, बड़े-बड़े सम्राट तक अपनी इस अपूर्णता को पाटने के लिए आपाधापी मचाते और दूसरे साम्राज्यों की लूटपाट करते पाये जाते हैं, तो लगता है सृष्टि का हर प्राणी साधनों की दृष्टि से अपूर्ण है। इस दिशा में पूर्णता प्राप्त करने की हुड़क हर किसी में चढ़ी बैठी दिखाई देती है।

इतिहास का विद्यार्थी अपने आपको गणित या विज्ञान में शून्य पाता है तो वह अपने आपको अपूर्ण अनुभव करता है। भूगोल का चप्पा-चप्पा छान डालने वाले को संगीत के स्वर बेचैन कर देते हैं, उसे अपना ज्ञान थोथा दिखाई देने लगता है। बड़े-बड़े चतुर वकील और बैरिस्टरों को जब रुग्णता के कारण डाक्टरों के शरण में जाना पड़ता है तो उनका अपने ज्ञान का अभिमान चकनाचूर हो जाता है। बौद्धिक दृष्टि से हर प्राणी हर प्राणी सीमित है, और हर कोई अगाध ज्ञान का पण्डित बनने को तत्पर दिखाई देता है।

नदियाँ अपनी अपूर्णता को दूर करने के लिए सागर की ओर भागती हैं । वृक्ष आकाश छूने दौड़ते हैं। धरती स्वयं भी अपने आपको नचाती हुई न जाने किस गन्तव्य की ओर अधर आकाश में भागी जा रही है। अपूर्णता की इस दौड़ में समूचा सौर मण्डल और उससे परे का अदृश्य संसार भी सम्मिलित है । पूर्णता प्राप्ति की बेचैनी न होती तो संभवतः विश्व ब्रह्मांड में रत्ती भर की सक्रियता न होती, सर्वत्र नीरव, सुनसान पड़ा होता, न समुद्र उबलता, न मेध बरसते, न वृक्ष उगते, न तारागण चमकते और न ही वे विराट की प्रदक्षिणा में मारे-मारे घूमते।

जीवन की सार्थकता पूर्णता प्राप्ति में है, इसका तात्पर्य यह हुआ कि अभी हम अपूर्ण हैं, असत्य हैं, अन्धकार में हैं। हमारे सामने मृत्यु मुँह बाये खड़ी है। अन्धकार, असत्य और मृत्यु पर विजय प्राप्त करने के लिए हम प्रकाश, सत्य और अमरता की ओर अग्रसर होना चाहते हैं। पर ऐसा हो नहीं पाता । हर कोई अपने आपको अशक्त और असहाय पाता है, अज्ञान के अन्धकार में हाथ-पैर पटकता रहता है।

इस अपूर्णता पर जब कभी विचार जाता है तब एक ही तथ्य सामने आता है और वह है ‘परमात्मा’ अर्थात् एक ऐसी सर्वोपरि सर्वशक्तिमान सत्ता जिसके लिए कुछ भी अपूर्ण नहीं है। वह सर्वज्ञ है, सर्वव्यापी, सर्वदृष्टा नियामक और एक मात्र अपनी इच्छा से ओतप्रोत है।

विकासवाद के जनक चार्ल्स डार्विन ने यह सिद्धान्त तो प्रतिपादित कर दिया कि प्रारंभ में एक कोशीय जीव-अमीबा की उत्पत्ति हुई। यही अमीबा फिर हाइड्रा में विकसित हुआ। हाइड्रा से क्रमशः कीट-कृमि, केंचुआ, कीट-पतंगे, तारामछली आदि से यह मछली, मेढक, सर्प, पक्षी स्तनधारी जीवों आदि की श्रेणियों में विकसित होता हुआ वह बन्दर की शक्ल तक पहुँचा । आज का विकसित मनुष्य शरीर इसी बन्दर की सन्तान है। इसके लिए शरीर रचना के कुछ खाँचे भी मिलाये गये । जीवाश्म खोज निकाले गये । जहाँ नहीं मिले वहाँ यह मान लिया गया कि वह कड़ियाँ लुप्त हैं और कभी समय पर उसकी भी जानकारी हो सकती है।

इस प्रतिपादन में डार्विन और इस सिद्धान्त के अध्येता वैज्ञानिक यह भूल गये कि अमीबा से ही नर मादा दो श्रेणियाँ कैसे विकसित हुई? अमीबा एक कोशीय था, उससे बहुकोशीय हाइड्रा पैदा हुआ। क्या अन्य सभी जीव इसी गुणोत्तर श्रेणी में आ सकते हैं? यदि सर्पणशीली जीवों में परधारी जीव विकसित हुए तो वह कृमि जैसे-चींटे, पतंगे, मच्छर आदि कृमि-कीटक जो उड़ लेते हैं, वे किस विकास प्रक्रिया में रखे जायेंगे? पक्षी, जल-जन्तु और कीड़े सभी माँस खाते हैं। स्तनधारी उन्हीं से विकसित हुए तो फिर गाय, भैंस, बकरी, हाथी आदि पशु माँस क्यों नहीं खाते? नर हाथी के दाँत होते हैं, पर मादा हाथी के नहीं, मुर्गे में कलगी होती है मुर्गी में नहीं। मोर के रंग-बिरंगे पंख और मोरनियाँ बिना पंख वाली -विकास प्रक्रिया में एक ही जीव श्रेणी में यह अन्तर क्यों? प्राणियों में दांतों की संख्या, आकृति, प्रकृति में अंतर पाया जाता है। घोड़े के स्तन नहीं होते हैं। पक्षियों की अपेक्षा सर्प और कछुए हजारों वर्श की आयु वाले होते हैं। यह सभी असमानतायें इस बात का प्रमाण हैं कि सृष्टि रचना किसी विकास का परिणाम नहीं, वरन् किसी स्वयंभू चेतन सत्ता द्वारा विधिवत् रची गई कलाकृति है। विकासवाद के सिद्धान्त के समर्थक यह कहते हैं कि अपने सुविधापूर्ण जीवन के लिए प्रबल इच्छा ने उन प्राणियों के शरीर संस्थानों में अन्तर किया और यह अन्तर स्पष्ट होते-होते एक जीव से दूसरी किस्म का उसी से मिलता हुआ जीव विकसित हो गया। थोड़ी देर के लिए ये बात मान लें और मनुष्य शरीर को इस कसौटी पर कसें तो भी बात विकासवाद पर ही बैठेगी । मनुष्य कब से पक्षियों को स्वच्छन्द आकाश में उड़ता देखकर स्वयं भी स्वतंत्र उड़ने को लालायित है, किन्तु उसके शरीर में आज तक कहीं कोई पंख उगा क्या? समुद्र में तैरती मछलियों एवं जहाज को देखकर हर किसी का मन करने लगता है कि हम भी गोता लगायें और मछलियों की तरह कहीं से कहीं जाकर घूम आयें, पर वह डूबने से बच पायेगा क्या?

ये प्रश्न अब उन लोगों को भी विपरीत दिशा में सोचने और परमात्म सत्ता के अस्तित्व में होने की बात मानने को विवश करते है जो कभी डार्विन के विकासवादी सिद्धान्त के समर्थक रहे हैं । सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक मनीषी राबर्ट ए. मिल्लरीकान ने इस संदर्भ में गहन अध्ययन किया है। उनका कहना है कि विकासवाद के सिद्धान्त से पता चलता है कि जिस तरह प्रकृति अपने गुणों और नियमों के अनुसार पदार्थ पैदा करती है, उससे विपरीत परमात्मा में ही वह शक्ति है कि वह अपनी इच्छा से सृष्टि का निर्माण करता है। प्रकृति बीज से सजातीय पौधा ही पैदा करती है। आम के बीज से इमली पैदा होते किसी ने नहीं देखी । इस तरह के बीज और ऊपर वर्णित विलक्षण रचनायें पैदा करने वाली सत्ता एक मात्र परमात्मा ही हो सकता है। वही अपने आप में एक परिपूर्ण समर्थ सत्ता है और वही विभिन्न इच्छाओं, अनुभूतियों, गुण तथा धर्म वाली परिपूर्ण रचनायें सृजन करता है।

क्रमिक विकास को ही नहीं, वरन् भारतीय दर्शन पूर्णता से पूर्णता की उत्पत्ति मानता है। श्रुति कहती है-

पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णमुदच्यते। पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते॥

अर्थात् पूर्ण परब्रह्म परमात्मा से पूर्ण जगत-पूर्ण मानव की उत्पत्ति हुई। पूर्ण से पूर्ण निकाल देने पर पूर्ण ही शेष रह जाता है। नदी का एक किनारा समुद्र से जुड़ा रहता है और दूसरा किनारा उससे दूर होता है। दूर होते हुए भी नदी समुद्र से अलग नहीं। नदी को जल समुद्र द्वारा प्राप्त होता है और पुनः समुद्र में मिल जाता है। जगत उस पूर्ण ब्रह्म से अलग नहीं। मनुष्य उसी पूर्ण ब्रह्म से उत्पन्न हुआ, इसलिए अपने में स्वयं पूर्ण है। यदि इस पूर्णता का भान नहीं होता, यदि मनुष्य कष्ट और दुखों से त्राण नहीं हो पाता तो इसका मात्र कारण उसका अज्ञान और अहंकार में पड़े रहना ही हो सकता है। इतने पर भी पूर्णता हर मनुष्य की आन्तरिक अभिलाषा है और वह नैसर्गिक रूप से हर किसी में विद्यमान रहती है।

शूद्रता की परिधि को तोड़कर पूर्णता प्राप्त कर लेना हर किसी के लिए संभव है । मनुष्य की चेतन सत्ता में वह क्षमता मौजूद है जिसके सहारे वह अपने स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीरों को विकसित कर उनका उपयोग करते हुए देवोपम जीवन जी सकता है, षट्चक्रों एवं पंचकोशों में समाहित विलक्षण क्षमताओं-सिद्धियों का स्वामी बन सकता है। यह क्षमता उसने खो दी है। मात्र जीवन निर्वाह क्रम पूरा होते रहने भर लाभ उस क्षमता से उठा सकना संभव होता है। यह उस प्रचंड क्षमता का एक स्वल्प अंश मात्र है, जब कि क्षमता की दृष्टि से वह उतना ही परिपूर्ण है जितना कि उसका सृजेता। इस चरम लक्ष्य की ओर ज्ञात-अज्ञात रूप से हर कोई अग्रसर है।


Quotation

जो अधिक जानता है, वह कम बोलता है और जो कम जानता है, वह अधिक बोलता और बकबक करता है।


जागे मनीषा, युग परिवर्तन हेतु

सुप्रसिद्ध विचारक फ्रसिस बेकन का कथन है कि जीवन तभी प्रवाहमान रहता है जब हम स्वयं तथा परिवेश के अंतर्संबंधों को समझकर व्यवहार करें। इसके न बन पड़ने के कारण ही विभिन्न तरह की समस्याएं-परेशानियाँ, उलझनें खड़ी होती हैं। हर युग में मानव जीवन की इन जटिल गुत्थियों को सुलझाने वाले मनीषी भी होते आये हैं। जिन्होंने अपने परिष्कृत चिन्तन चेतना के द्वारा मानवता को कठिनाइयों के दलदल से उबरने में मदद की। संसार की प्रत्येक प्राचीन सभ्यता के विकास में इन मनीषियों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। इसी वर्ग के चिन्तन के अनुरूप ये सभ्यतायें पनपीं और तद्नुरूप ही उनने अपने स्वरूप को विकसित किया और फली-फूलीं। मनीषियों का यही वर्ग भारत में ऋषियों एवं पाश्चात्य जगत में दार्शनिकों के नाम से विख्यात हुआ।

मानव समाज में प्रायः आज इसी वर्ग का अभाव है। मात्र सोचने विचारने भर से कोई मनीषी नहीं हो जाता। मन की बेतरतीब भागदौड़ भी किसी को चिन्तक नहीं बना सकती । गुण, कर्म, स्वभाव एवं चिंतन, चरित्र, व्यवहार को उच्चस्तरीय लेने पर ही संभव हो पाता है कि मनुष्य स्वयं के साथ समाज की भी समस्यायें सुलझा सकें। उनका मार्गदर्शन कर नूतन दिशा प्रदान कर सकें। जो इस समूची प्रक्रिया का भलीभाँति निर्वाह कर सके, वही वस्तुतः अपने को मनीषियों की कतार में खड़ा कर सकता है।

किन्तु इस प्रक्रिया में घुस पड़ने के पहले जो महत्वपूर्ण चीजें अपरिहार्य हैं, वे हैं-निर्भीक मन तथा व्यावहारिकता व आदर्श से समन्वित सुसम्बद्ध विचार।

कार्लमार्क्स ने इसी को स्पष्ट करते हुए कहा है कि दार्शनिक छान बीन की पहली जरूरत एक निर्भीक स्वतन्त्र मन है। सुकरात का कहना था कि मनीषी को सबसे पहले खुद को इस कसौटी पर खरा साबित करना चाहिए कि वह कथनी ही नहीं करनी में भी सौ टंच खरा है। वह केवल अपने नगर राज्य का सदस्य नहीं, अपितु मानव समुदाय रूपी विराट् ब्रह्माण्ड का नागरिक है। बात भी सही है, भला स्वयं के व्यक्तित्व विकास के बिना डरते-डरते नवनिर्माण की आधार भूमि कैसे तैयार करी जाती है? मनीषी विद्रोही नहीं, निर्माता है, पर उसे भी मानवता के लिए पुराने खण्डहरों पर चोट पहुँचानी पड़ती है। ऐसा करना उसका शौक नहीं, एक सामयिक मजबूरी है। अविवेकी लोग इसे उसका विद्रोहीपन समझ लेते हैं और उसको नष्ट करने के लिए उतारू हो जाते हैं। इससे डरने वाला व्यक्ति मनीषा के प्रवाह का संचालन नहीं कर सकता। सुकरात यदि जहर पीने से डरे होते तो सद्विचारों से यूनान के जनमानस को सराबोर न कर पाते। ईसा को यदि सूली पर चढ़ने से डर लगा होता, तो जीवन बोध की एक अनूठी शैली और भ्रातृत्व भावना न फैल पाती। जोन आफ आर्क यदि आग में जलने से डरी होतीं, तो फ्रांस उसके नूतन विचारों को ग्रहण करने लायक न बन पाता और न प्रख्यात फ्रांसीसी क्रान्ति का उदय ही होता।

विचारक के निर्भीक होने की अनिवार्य शर्त के साथ यह भी जरूरी है कि विचारों में व्यवहार और आदर्श दोनों का समन्वय हो साथ ही इनमें सुसम्बद्धता भी हो । अन्यथा एकाँगी और बिखरे हुए विचार सही मार्ग प्रदर्शित करने की जगह गुमराह ही करते हैं। ज्यादातर लोग जो स्वयं को मनीषी मानते हैं, अथवा जिन्हें ऐसा स्वीकारा जाता है, ऊपर बताई गयी अनेक योग्यताओं को पा लेने पर भी इस जगह असफल हो जाते हैं या व्यावहारिकता के नाम पर ये जड़वादी हो जाते हैं अथवा ठेठ आदर्शवादी जिसका व्यवहार से कोई लेना देना नहीं। सही कहा जाय तो दोनों ही धाराएँ अपूर्ण एवं अव्यावहारिक हैं। जड़ अथवा भौतिक साधन वह भूमि है, जिस पर हम खड़े हैं। जब कि आदर्श प्राप्तव्य है। आवश्यकता इन दोनों के समन्वय की है। ऐसा समन्वय, जिसमें अभी तक प्रायः सभी असफल होते चले आयें हैं।

इस असफलता के बाद भी विभिन्न मनीषियों ने अपने समय की समस्याओं को बहुत अच्छी तरह सुलझाया है। प्रख्यात मनीषी जान जाक रूसो ने सामाजिक प्रणाली में एक बड़े परिवर्तन की आवश्यकता पर बल दिया था। उन्होंने असमानता को मनुष्यता के लिए हेय बताकर प्रजातंत्र की प्रणाली को जन्म दिया। इसी तरह कार्लमार्क्स ने श्रम की गरिमा को पहली बार दार्शनिक आधार प्रदान किया। निःसन्देह श्रम को गौरवपूर्ण बनाने का श्रेय इसी चिन्तक को है। इनकी साम्यता को वैज्ञानिकता का पुट प्रदान करने वाले फ्रेड्रिक एगेल्स ने समूची चिंतन धारा को एक नया मोड़ प्रदान किया । जीवन जीने की एक नयी शैली विकसित हुई। अमेरिका में दास प्रथा को समाप्त करने का श्रेय हैरियट स्टो के चिन्तन तथा अब्राहम लिंकन के प्रयासों को है।

भारत में भी गुलामी की बेड़ियों में जकड़े जनमानस में साहस संचार करने का श्रेय स्वामी विवेकानन्द एवं महर्षि अरविन्द के चिन्तन की प्रखरता को मिलता है। इन्हीं मनीषियों की प्रवाहमान प्रखर मनीषा ने अनेकानेक मनीषियों को क्राँतिकारियों को, पैदा किया। “स्वराज्य हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है” का मन्त्र फूँकने वाले तिलक दरिद्रनारायण के सेवा व्रत में अनेकानेक को दीक्षित करने वाले गान्धी धरती पर अतिमानस को उतारने वाले श्री अरविन्द आदि अनेकों ने विवेकानन्द के चिन्तन प्रवाह को अपनी प्रेरणा का स्रोत स्वीकारा है इन मनीषियों ने अपने-अपने ढंग से राष्ट्र की, मानव समुदाय की समस्याओं को सुलझाने में मदद की।

आज के बदलते परिवेश में समस्याओं ने नया मोड़ लिया है। मनुष्य ने भावनात्मक क्षेत्र से बौद्धिक परिक्षेत्र में छलाँग लगाई है। उसकी सूझ-बूझ का आधार भी प्रायोगिकता है। ऐसी स्थिति में समस्याएँ व्यक्तिगत हों अथवा समूहगत, हैं बड़ी व्यापक और गहरी। मनुष्य प्रकृति और समाज के सारे पारस्परिक सम्बन्ध अस्त-व्यस्त होते दीख रहे हैं। इस विषमता की घड़ी में मनीषियों का लोप हो गया दीखता है। विचारों की वह प्रखरता दिखाई नहीं देती, जो मनुष्य के वर्तमान को सँवारे और भविष्य के लिए दिशा निर्देश दे।

यद्यपि यह वैचारिक प्रखरता सहज नहीं है। मार्क्स के शब्दों में दार्शनिक अथवा मनीषी कुकुरमुत्तों की तरह जमीन से नहीं निकल आते। वे अपने समय के, अपनी जाति के, उत्पादन होते हैं, जिसके सर्वाधिक गूढ़, मूल्यवान और अदृश्य रस, दर्शन के विचारों में प्रवाहित होते हैं । उनके अनुसार जो भावना मजदूरों के हाथों से रेलमार्गों के निमार्ण करती है, वही मनीषियों के दिमाग में नवयुग की संरचना गढ़ती है । हम में से प्रत्येक को अपने अन्दर झाँक कर देखना होगा। यदि मनीषा के अंकुर मौजूद हों तो इसे फलने- फलने का मौका दिया जाना चाहिए यदि हमारे पास निर्भयता, निस्पृहता और समझ की गहराई मौजूद है, तो इसे खाद पानी दिये जाने से मनीषा का अंकुर विशाल वृक्ष के रूप में पनप सकेगा।

भले ही अपनी छोटी सामर्थ्य के बल बूते हम व्यापक समस्याओं का समाधान न खोज सकें, किन्तु निश्चित ही अपने गाँव मोहल्ले, पड़ोस शहर की उलझनों को अवश्य ही सुलझा सकते हैं। तब बढ़ते विकास के अनुरूप स्तर भी बढ़ेगा। साधारण से व्यक्ति विष्णु गुप्त ने चाणक्य बनकर इसी विकास की सहायता से बिखरे भारत को एक सूत्र में बाँधा था। इस महान कार्य के पीछे उनके चिन्तन की गहराइयां थीं जो कौटिल्य के नाम से लिखे गये अर्थशास्त्र में, विष्णु शर्मा के नाम से रचे गए पंचतन्त्र में और चाणक्य द्वारा रचित नीतिशास्त्र में प्रकट हुई। यदि मनीषियों का वर्ग जाग्रत हो सका, हममें से हर विचारशील इसके लिए आगे आ सके, तो सारी समस्याओं, उलझनों, परेशानियों के समाप्त होते देर न लगेगी। साथ ही एक स्वस्थ परम्परा चल निकलेगी जिसे वैदिक युगीन ऋषि परम्परा का नूतन संस्करण कहा जाना अनुचित न होगा।


उपद्रव धरती पर होंगे (Kahani)

एक आदमी अत्याचार के बल पर लोगों पर रौब गाँठकर अपना गुजारा चलाता था। सभी इसके नाम पर काँपते थे। जान से मारना उसके लिए हँसी का खेल था। एक दिन एक संत उस गाँव में आए। उनसे पूछ बैठा कि “शास्त्र कहते हैं कि अधिक देर सोना अच्छा नहीं है व मैं देर सुबेरे दस-ग्यारह बजे सोकर उठता हूँ। आप का क्या विचार है? ”संत बोले“ शास्त्र में गलत लिखा है। तुम जैसे लोगों को तो चौबीसों घंटे सोना चाहिए। ”व्यक्ति ने कारण पूछा तो संत ने कहा- ”शास्त्रों में जो लिखा गया है वह भले सज्जनों के लिए लिखा गया है। अच्छा आदमी जितना अधिक जागे, उतना अच्छा । बुरा आदमी जितना अधिक सोये, उतना ठीक। वह जितनी देर सोएगा, कम से कम उपद्रव धरती पर होंगे।”


विक्षुब्ध आत्माएँ ही प्रेत बनती हैं!

चेतना का भी अपना स्वभाव होता है- यह कहने में यों कुछ अटपटा अवश्य प्रतीत होता है, पर यह चिरन्तन सत्य है कि शरीर के साथ गुँथी चेतना उसी के अनुरूप आचरण और व्यवहार करने लगती है, जैसा स्वयं व्यक्ति का होता है। देह के साथ अविच्छिन्न रूप से संबद्ध होने के कारण उसकी प्रकृति और प्रवृत्ति भी चेतना में उतर आती है, जिससे देहावसान के उपरान्त शरीर के न रहने पर भी वह स्वतंत्र रूप से वैसी ही प्रवृत्ति का परिचय देने लगती है, जैसी जीवित अवस्था में अभ्यासवश उसके आचरण में पलती और पकती है। फिर इसी दिशा में उसकी प्रगति यात्रा चल पड़ती है। आये दिन घटने वाली घटनाएँ इस तथ्य के प्रमाण हैं ।

बात सन् 1960 की है। पूर्व के सोवियत संघ के जार्जिया गणराज्य (अब स्वतंत्र देश) में राजधानी तिबलिसी के लगभग 20 मील दूर इफ्रोविच फर्क के निकट एक बहुत पुरानी भग्न इमारत में एक दिन अचानक जाने कहाँ से एक वृद्धा प्रकट हुई और रहने लगी । उस पोपले मुँह वाली फटेहाल बुढ़िया को यों तो देखा कितने ही लोगों ने था, पर असहाय-अशक्त व दूसरों की दया पर पलने वाली समझकर किसी ने उस ओर कोई विशेष ध्यान न दिया। वह पागलों की भाँति मन ही मन कुछ बुदबुदाती दिनभर वहीं अपने झोंपड़े में पड़ी रहती । यदा-कदा मन होने पर आस-पास चक्कर काट लिया करती । नाम पूछने पर प्रायः रोजेवा बताती।

रोजेवा जब से उस खण्डहर में आयी थी, सारे पक्षी उस क्षेत्र से पलायन कर गये। यहाँ तक कि समीपवर्ती पार्क में भी अब उनका कलरव बन्द हो गया था। पालतू गाय और बकरियाँ, जो उस क्षेत्र में निर्द्वन्द्व होकर चरा करती थीं, उधर जाना बन्द कर दिया। इससे वहाँ के वातावरण में अजीब पैशाचिकता-सी छायी रहती। प्रायः अकेले उस ओर आने-जाने में लोग भय महसूस करते । अभी इस घटना का एक सप्ताह भी नहीं बीता था कि वातावरण में विचित्र परिवर्तन आरंभ हुआ। वहाँ वर्षा शुरू हो गई। रह-रह कर बिजली कौंधती और साँय-साँय करती तेज हवा चलती। यद्यपि अभी बरसात का मौसम नहीं था, फिर भी झड़ी ऐसी लगी कि थमने का नाम न लेती। इसी दशा में एक दिन कुछ लोग उसके झोंपड़े की ओर निकल पड़े। वहाँ जो कुछ देखा इससे वे सन्न रह गये। वह बुढ़िया एक हाथ में खप्पर और दूसरे में लोहे का एक शूल लिये खण्डहर की परिक्रमा अधर में कर रही थी। इस क्रम में उसका रूप क्षण-क्षण में बदल जाता। कभी वह सुँदर रूप लावण्य वाली नवयौवना प्रतीत होने लगती, तो दूसरे ही पल उसकी अवस्था बदल कर उसी म्लान मुख, श्वेत केशों वाली बुढ़िया सी हो जाती।सभी स्तब्ध थे। मौसम वैसा ही बना रहा और वृद्ध महिला की गतिविधियों में भी कोई परिवर्तन नहीं आया। लोग इसे भली -भाँति समझ गये थे कि यह परिवर्तन महिला की विचित्र गतिविधियों के कारण ही है और जब तक यह बनी रहेगी, तब तक इसमें सुधार की कोई आशा भी नहीं है फलतः एक दिन उस इलाके के कुछ लोगों ने इकट्ठा होकर इस पर विचार किया और बुढ़िया को भगाने की योजना बनायी। सभी का विश्वास था कि वह महिला उसी खण्डहर में रहती है, अतः निदान उसे डायनामाइट से उड़ा देना ही समझा गया। योजनानुसार एक रात्रि को वहाँ डायनामाइट फिट कर दिया गया और उसके लम्बे तार दूर ले जाये गये। तार में विद्युत प्रवाहित किया गया, पर कोई विस्फोट न हुआ। सब अचरज में थे, तभी एक जोर का अट्टहास हुआ। सभी का ध्यान उस ओर खिंच गया। देखा, तो कुछ दूरी पर वही बुढ़िया हवा में तैरती दिखाई पड़ी । लोगों को उस ठंडी रात में भी पसीना आने लगा, किन्तु कुछ क्षण में वह बुढ़िया और अट्टहास दोनों गायब हो गए और प्रकट हुआ एक तीव्र चक्रवात, जो देर तक लोगों को उठा-उठा कर पटकता रहा। कइयों की टाँगे टूटी, अनेक अपनी आँख गँवा बैठे, कितनों को ही अपनी भग्न भुजा व दुस्साहस का दुःख था, जब कि कुछ एक सिर तुड़वाकर रक्तरंजित हो रहे थे । लगभग 20 मिनट तक यह नाटक चलने के बाद सब कुछ शान्त हो गया। फिर वर्षा भी धीरे-धीरे रुक गई। आसमान साफ हो गया। रह-रह कर होने वाली बिजली की गड़गड़ाहट भी पुनः न सुनी गई। सूर्य निकलने पर दूसरे दिन कुछ लोग साहस कर उस ओर निकल पड़े। उन्होंने दूर से ही इमारत और आस-पास के क्षेत्र का अवलोकन किया । आज न वह वृद्धा थी और न उसके अद्भुत कारनामे । थोड़े साहसी युवकों ने कुछ और मनोबल जुटाकर खंडहर में प्रवेश किया । वहाँ सिवाय चमगादड़ों के, कुछ न दिखाई पड़ा, न तो कुछ अवाँछनीय ही घटा। सब प्रसन्न थे कि तीन महीनों तक भय का वातावरण बनाने वाली घटना का आज पटाक्षेप हो गया।

जार्जिया के पुलिस-रिकार्ड के अनुसार यह घटना मात्र तिबलिसी में ही नहीं घटी, वरन् उक्त राष्ट्र (जार्जिया)के अनेक हिस्सों में भी रिकार्ड की गई। आश्चर्य तो यह है कि हर जगह उसका अस्तित्व -काल लगभग एक जितना रहा। सभी स्थानों के रिकार्ड अपने विवरणों में एक ही शक्ल-सूरत की बुढ़िया का वर्णन करते पाये गये। यह भी एक विचित्र साम्य है कि जहाँ- जहाँ उक्त घटना घटी उन-उन स्थानों में हल्की बारिश अवश्य हुई और यह तब तक होती रही, जब तक उस बुढ़िया का वहाँ से पलायन न हो गया।

जानकार लोगों का कहना था कि वह वृद्ध जीवितों की तरह दीखती भर थी । वस्तुतः वह थी एक प्रेतात्मा। वर्षों पूर्व इसी शक्ल सूरत की एक महिला की मृत्यु तिबलिसी के पास के एक गाँव में हुई थी। वह एक ताँत्रिक महिला थी और किसी-न-किसी प्रकार की दुरभिसंधि रचने एवं लोगों को हैरान करने में सदा संलग्न रहती। यद्यपि आज उसका स्थूल शरीर न रहा पर जीवन भर किये गए कुचक्रों की नकल अब भी उसकी चेतना करती और लोगों को डराती धमकाती रहती है। आत्मविद्या विशारदों का कहना है कि जो आजीवन कुकृत्य करते रह कर दूसरे को सताने में रस लेते रहे वे अन्तिम दिनों में दान-दक्षिणा के टंट-घंट द्वारा मरणोपराँत शान्ति प्राप्त कर लेंगे-ऐसी आशा नहीं ही करनी चाहिए । सृष्टि नियम में शान्ति के हकदार वही हैं जो दूसरों को शान्ति प्रदान करते हैं, अन्यथा चेतना इस नियम का उल्लंघन नहीं कर सकती और मृत्युपरांत वह उन्हीं गतिविधियों में निरंतर रहती है, जिन्हें शरीर आजीवन छाती से चिपकाये रहा। हम अपना चिन्तन बदलें और आदत सुधारें । प्रवृत्तियाँ तभी बदल सकती हैं। जीवन जीते समय और मरने के बाद शान्ति ऐसे ही लोगों को मिलती है, क्योंकि चेतना की शान्ति सत्प्रवृत्तियों की चिर सहचरी है।


Quotation

पराक्रम वस्तुओं का उलट-पलट करता है और घटनाएँ विनिर्मित करता है, किन्तु मनुष्य के भाव संस्थान में हलचल उत्पन्न करना, दिशा देना और कुछ से कुछ बना देना वाणी के लिए ही सम्भव है। संसार में जितनी उथल-पुथल होती रही है, उनमें वाणी की भूमिका प्रधान रूप में रही है। इसी लिए इसे शक्ति कहकर वर्णित किया गया है। हम चाहे तो इसका सदुपयोग कर स्वर्ग का निर्माण कर सकते हैं और दुरुपयोग कर नरक का-यह पूर्णतः प्रयोक्ता पर निर्भर करता है।


विलासिता प्रतिभा को दीमक की तरह (Kahani)

सत्रहवीं सदी के फ्रांस के शासक लुई के सरदारों का पूरे यूरोप में वर्चस्व था। उनकी बहादुरी के आगे कोई नहीं टिक पाता। लुई को भय हुआ कि इससे तो कभी वे उसकी ओर भी आंखें उठा सकते हैं और शासन-सत्ता छीन सकते हैं। उसने अपने मंत्री से सलाह की कि उसे ऐसी स्थिति में उन पर कैसे काबू पाना चाहिए ।

मंत्री ने कहा- आप कुछ मत कीजिए। सिर्फ उनके ऐशोआराम की सुविधा इकट्ठी कर दीजिए। बस उनकी सारी बहादुरी धूल चाट जायेगी।

लुई ने ऐसा ही किया उनके लिए एक विशाल महल-”पैलेस ऑफ वर्सेल्स” का निर्माण करवाया और प्रत्येक सरदार की उसमें निवास की व्यवस्था कर दी, सुविधाओं का अम्बार लगा दिया। फिर तो वे ऐसे राग-रंग में डूबे कि उनकी स्थिति घुन लगे शहतीर की तरह हो गई। उनका पराक्रम ही समाप्त हो गया । कई शताब्दियों तक फ्राँस में फिर वैसे वीर पराक्रमी ही पैदा न हो सके। सचमुच विलासिता प्रतिभा को दीमक की तरह चटकर जाती है।


सामयिक संदर्भ- - असामान्य है,प्रस्तुत नवरात्रि पर्व

कुछ समय ऐसे विशिष्ट होते हैं कि उन दिनों अदृश्य जगत औसत समय की अपेक्षा कुछ अधिक ही सक्रिय होता देखा जाता है। उन दिनों परोक्ष जगत के दिव्य प्रवाह अधिकाधिक संख्या में उभरते और व्यापक स्तर पर जीवचेतना को प्रभावित करते देखे जाते हैं। इन अवसरों पर सुसंस्कारी जागृतात्माएं अपने भीतर समुद्रमंथन जैसी हलचलें उभरती देखती एवं अंतराल का परिष्कार कर श्रेष्ठता के पथ पर चलने की प्रेरणा पाती हैं। श्रेष्ठ व्यक्तियों-सत्पात्रों पर दैवी अनुग्रह यों हमेशा ही बरसता है, किन्तु इन विशिष्ट अवसरों पर परमसत्ता कुछ अधिक देने को उतारू हो जाती है वह भी कम पुरुषार्थ की कीमत पर । ऐसे अवसर विशिष्ट पर्व कहलाते हैं एवं वर्ष में दो नवरात्रियों नवदुर्गाओं के रूप में हम सबके लिए विशिष्ट मुहूर्त बनकर आते हैं।

दो ऋतुओं के मिलन की वेला नवरात्रि कहलाती है। यों वर्षा शरद शिशिर, हेमंत, वसंत, ग्रीष्म यह छह ऋतुएं हैं किन्तु प्रधानतया तो दो ही ऋतुएं मानी जाती हैं सर्दी एवं गर्मी। वर्षा तो दोनों ही ऋतुओं में होती है। गर्मियों में सावन-भादो में बादल बरसते हैं तो सर्दियों में पौष व माघ में । गर्मी जब आने को होती है व सर्दी भाग रही होती है तो वह चैत्र की नवरात्रि कहलाती है। जब गर्मी पलायन कर रही होती है व सर्दी का आगमन होने वाला होता है तो वह आश्विन की नवरात्रि कहलाती है, दो प्रधान ऋतुओं का मिलनकाल इस तरह अतिमहत्वपूर्ण है व उसमें भी नौ दिनों की यह विशिष्ट अवधि और भी अधिक।

नवरात्रि एक प्रकार की संधि है। संधि जोड़ या जॉइन्ट को कहते हैं। दो हड्डियां जिन स्थानों पर मिलती हैं वह भाग शरीर में अतिमहत्वपूर्ण भी बन जाता है व नाजुक भी। दिन व रात जब मिलते हैं तो वह भी संधिकाल कहलाता है। सूर्यास्त होते समय दिन का अवसान होता है व रात्रि का आगमन । इस थोड़ी सी अवधि में सूक्ष्म जगत में बड़ी तेजी से हलचलें होती हैं। ऐसा ही कुछ सूर्योदय की ब्रह्म मुहूर्त वेला में होता है जब रात्रि का पलायन होता है व दिन का शुभारंभ प्रकाश की पहली किरण के अवतरण के साथ होता है। इस संध्याकाल को ईश्वराराधना में आत्मिक जगत के पुरुषार्थ में लगाया जाय तो अनायास ही बहुत कुछ मिलने की संभावना रहती है व यदि आलस्य-प्रमाद, शयन, नरपशु की तरह पेट-प्रजनन मात्र में लगा दिया गया तो अनपेक्षित हानि पहुँचने की संभावना रहती है। मनीषियों ने इसीलिए प्रातः-सायं की ब्रह्मसंध्या को तथा फिर दो ऋतुओं को मिलाने वाली नवरात्रि वेला को आध्यात्मिक पुरुषार्थ हेतु ही समर्पित की जाने योग्य बताते हुए इनका विशेष महत्व ग्रंथों में प्रतिपादित किया है। आर्षग्रंथों में कहा गया है कि नारी की तरह ऋतुएं नौ दिन के लिए ऋतुमती-रजस्वला होती हैं। जैसे रजस्वला को आहार-विहार का, विश्राम आदि का विशिष्ट ध्यान रखना होता है वैसे ही इस संध्याकाल का, संधिवेला का महत्व माना जाना चाहिए।

वसन्त के आते ही कोयलें कूकने लगती हैं। तितलियाँ फुदकती व भौंरे गुँजन करते देखे जाते हैं। ठण्डक का संताप, ठिठुरन एवं निष्क्रियता भरा वातावरण ही चारों ओर संव्याप्त होता देखा जाता है। यह ऋतु परिवर्तन का चमत्कार है। इसी तरह गर्मी की उमस व तपन देखते-देखते कम होने लगती है व वातावरण में हलकी हलकी गुलाबी सी मन को अच्छी लगने वाली ठण्डक छा जाती है। यह आश्विन ऋतु के आगमन की शरद की पूर्ववेला है जो यह इंगित करती है कि दो प्रधान ऋतुएं बदल रही हैं। इन दिनों सूक्ष्म जगत में ऐसे विलक्षण स्तर के दिव्य प्रवाह उभरते मानवीचेतना को प्रभावित करते देखे जाते हैं, जिनका यदि उपयोग कर लिया जाय तो आध्यात्मिक क्षेत्र की सफलताएँ मिलने का सुयोग अनायास ही बन जाता है। जीवधारियों में से अधिकाँश को इन्हीं दिनों प्रजनन की कामुकता की उत्तेजना सताती है। इन दिनों अपनी उत्तेजना पर नियंत्रण कर उभरने वाले शक्ति प्रवाह का यदि ऊर्ध्व गमन कर सुनियोजन कर लिया जाए तो आत्मिक प्रगति का पथ सहज ही प्रशस्त होता चला जाता है।

जिस प्रकार ज्वार-भाटे रोज नहीं अमावस्या पूर्णिमा को ही आते हैं तथा अदृश्यजगत से प्रभावित कहे जाते हैं, ठीक उसी प्रकार नवरात्रियों में अंतर्जगत में कुछ ऐसी विशिष्ट उमंगों का उभार जन्म लेता है जो अन्य दिनों में नहीं देखा जाता। तब कुछ ऐसा बन पड़ता है मानों अदृश्यजगत से अप्रत्याशित अनुदान सत्पात्र पर बरस रहा हो। चिकित्सकगण बताते हैं कि ऋतु परिवर्तन के दिनों में विशिष्टतः चैत्र व आश्विन की इन संधिबेलाओं में शरीर व मन अत्यधिक प्रभावित होते हैं। इनके प्रभाव से स्वास्थ्य के बुरी तरह प्रभावित हो व्यक्ति के शारीरिक दृष्टि से रोगी व मनोविकारों से ग्रसित होने की संभावनाएं अधिक रहती हैं । अनेक व्यक्ति वायरल बुखार, मलेरिया, दस्त,जुकाम, उत्तेजना-अवसाद से ग्रसित इन्हीं दिनों होते देखे जाते हैं। इसी कारण वैद्यगण वमन विरेचन, नस्य, स्वेदन, वस्ति रक्तशोधन जैसे कार्यों के लिए चैत्र व आश्विन के माहों को ही सर्वश्रेष्ठ मानते हुए व्यक्ति को नीरोग बनाकर उसकी जीवनीशक्ति को उभारने के इन दिनों विशेष प्रयास करते हैं। कायाकल्प के प्रयोग इन्हीं दिनों किये जाते हैं। नीमगिलोय-सारिवाँ जैसे रक्त शोधक व अश्वगंधा-घृतकुमारी जैसे रसायन इन्हीं दिनों लिये जाने पर शरीर को अत्यधिक लाभ पहुँचते हैं। वस्तुतः शरीर में तीनों ही बात, पित्त, कफ के दोषों के कुपित होकर शरीर की जीवनी शक्ति को एक बारगी ही झिंझोड़ देने की प्रक्रिया उन्हीं दिनों ही सम्पन्न होती है। विगत छः माह में हमसे आहार-विहार की जो भी अनियमितताएँ हुई हैं, जो भी दूषित तत्व आहार श्वास द्वारा हमने ग्रहण किया उनके निराकरण का अर्थ पुरुषार्थ इन्हीं दिनों संपन्न होता है। यदि उपवास या स्वल्पाहार द्वारा शरीर को अपनी सफाई आप कर लेने का मौका दे दिया जाय तथा जप-उपासना द्वारा मनःक्षेत्र में छाये कषाए-कल्मषों का निवारण कर उसकी स्वच्छता का प्रयास नवरात्रि में कर लिया जाय तो न केवल नीरोग स्वस्थ जीवन बिता पाना शक्य है, वरन् आत्मशक्ति संवर्धन द्वारा समस्त प्रतिकूलताओं से लड़ते हुए अपना भौतिक व आध्यात्मिक दोनों ही क्षेत्रों से उत्कर्ष भी संभव है। इस दृष्टि से नवरात्रि एक असामान्य अवसर जनसाधारण के लिए लेकर आती है।

वस्तुतः नवरात्रि देवपर्व है। इसमें देवत्व की प्रेरणा व अनुकम्पा बरसती है। विशेष रूप से इन नवरात्रियों का महत्व तब और भी बढ़ जाता है जब सामूहिक रूप से करोड़ों साधक इसे शक्ति साधना वर्ष में संपन्न कर रहे हैं। सर्वविदित है कि युगसंधि काल के अंतिम बारह वर्षों के चौथे वर्ष में हम प्रवेश कर चुके हैं। आने वाले नौ वर्ष नवयुग के देवत्व प्रधान युग के अवतरण के पूर्ववेला के वर्ष हैं व इनका एक एक दिन नवरात्रि की नौ दिवसीय वेला के एक -एक पल की तरह अत्यन्त महत्वपूर्ण है। इस अवधि में बड़े व्यापक स्तर पर परिवर्तन हम सभी पूरे विश्व पटल पर संपन्न होते देखेंगे। सूक्ष्म जगत में छायी विषाक्तता के शमन हेतु सामूहिक आध्यात्मिक पुरुषार्थ की महत्ता सभी जानते हैं । युगसंधि में पड़ रही प्रत्येक नवरात्रि में विशेष संभावनाएँ उस बात कर हैं कि उनमें अदृश्य लोकों से देवत्व की अतिरिक्त वर्षा होगी व इस अनुदान को पाकर देव मानवों का समुदाय अधिक प्रखरता संपन्न होता दृष्टिगोचर होने लगेगा। विगत एक वर्ष से चल रही शक्ति साधना से करोड़ों नहीं, अरबों की संख्या में गायत्री जप स्थान-स्थान पर भारत व पूरे विश्व में संपन्न हुआ। अब विगत वसंत से शक्ति संचार की प्रक्रिया का शुभारंभ हुआ है जिसमें विशिष्ट पुरुषार्थ द्वारा साधक अतिरिक्त देवत्व व आत्मशक्ति पाने के लिए परमपूज्य गुरुदेव की सूक्ष्म व कारणसत्ता से अपना संबंध जोड़ने का प्रयास कर रहे हैं । जून में इस वर्ष की साधना की पूर्णाहुति एक विराट शपथ समारोह में होगी व फिर देव संस्कृति विस्तार वर्ष का शुभारंभ हो जाएगा। इस प्रकार यह अवसर हर दृष्टि से अति विलक्षण व लाखों वर्षों में कभी-कभी आने वाले क्षणों में से एक है।

इस वर्ष की चैत्र नवरात्रि चैत्रशुक्ल प्रतिपदा 14 अप्रैल से नवमी(12 अप्रैल)की अवधि में पड़ रही है। सब प्रज्ञासंस्थानों, शाखाओं, प्रज्ञामंडलों द्वारा इसे सामूहिक स्तर पर तथा साधकों द्वारा अपने स्तर पर इसे मनाया जाय। इन दिनों उपवास रखकर चौबीस हजार मंत्रों के जप का एक छोटा सा अनुष्ठान संपन्न कर लिया जाय। उपवास में निताँत जल पर न रहकर कड़ी तितिक्षा के बजाय एक समय अन्नाहार- जिसमें रोटी सब्जी या दाल चावल या अमृताशन लिया जाय व एक समय फलाहार दूध ले लिया जाय। अपनी सामर्थ्य के अनुसार ही व्रत करना चाहिए। लक्ष्य स्पष्ट रहना चाहिए शरीर मन की बुद्धि व सतोगुण वृद्धि का अभ्यास । यह ध्यान रहेगा तो फलाहार के नाम पर तली चीजों व फलों का अतिभक्षण करने से बचा जा सकेगा। सामान्यतया अतिवाद ही देखा जाता है। या तो कुछ नहीं खाकर अति दुर्बल होने की दशा में लोग बढ़ते देखे जाते हैं अथवा अत्यधिक खाकर (भले ही खाद्य फलाहारी हो) पेट को बिगाड़ते देखे जाते हैं। यदि दोनों समय रोटी- शाक जैसी दो वस्तुओं का जोड़ा सीमित सम रूप में लेते रहा जाय तो उसे भी हलके उपवास में गिना जा सकता है। बालकों, बीमारों, वृद्धों व गर्भवती स्त्रियों के लिए ऐसे सरल उपवास का ही परामर्श दिया जाता है। क्षुधा से पैदा हुई विक्षुब्धता तो साधक के लिए अनुष्ठान प्रक्रिया में शाँत मनःस्थिति के स्थान पर व्यतिरेक व तनाव और पैदा करती है।

नवरात्रि में कुछ और तितिक्षाएँ जीवन को ब्रह्मनिष्ठ बनाने का अभ्यास करने की दृष्टि से निभाई जाती है। इनमें ब्रह्मचर्य का पालन-शारीरिक व मानसिक दोनों दृष्टियों से, भूमिशयन, चमड़े की वस्तुओं का परित्याग व स्वयं सेवक के वृत्ति के विकास हेतु अपना काम स्वयं करना आता है। जहाँ तक जिनके लिए जितने अनुबंधों का पालन कर सकना संभव हो, वे उसमें कड़ाई-सतर्कता व ईमानदारी बरत कर निभाएं भूमिशयन से अर्थ है कोमलता के स्थान पर कठोरता को अपनाना । हर परिस्थिति से स्वयं का तालमेल बिठाने के लिए अपना आपा तैयार करना । यह प्रयोजन पलंग छोड़कर लकड़ी के तख्त पर सोकर भी पूरा हो सकता है। चिन्हपूजा न हो बल्कि तपश्चर्या में सन्निहित आदर्शों के लिए कष्ट सहन करने में प्रसन्नता अनुभव करने की मनःस्थिति विनिर्मित की जाय। जमीन पर फोम का गद्दा डालकर सोने से यह प्रयोजन पूरा नहीं होता, यह ध्यान रखा जाय।

आज भी चमड़े पशुवध से प्राप्त होते हैं। चमड़े के बने बैठने के आसन, पहनने के जूते, व कमर के बेल्ट आदि से परहेज रखने से मतलब है कि इन नौ दिनों में स्वयं को सतोगुणी बनाने का अभ्यास करके आगे भी इसी क्रम को चलाते रहने का व्रत लेना । इससे “आत्मवत् सर्व भूतेषु” की अध्यात्म मान्यता और बलवती होती चली जाती है। प्रकारान्तर से नवरात्रि में चर्मत्याग के पीछे अहिंसावृत्ति के विकास का तत्वज्ञान जुड़ा हुआ है। स्वयं सेवा से तात्पर्य है अपना काम स्वयं करना। अपने कपड़े धोने से लेकर अन्यान्य कामों के लिए हम दूसरों पर निर्भर रहते हैं । एक व्रत नौ दिन तक यह भी निभाया जाय कि हम यथा संभव शरीर को कष्ट देकर उससे उसके सारे क्रियाकलाप चला लेंगे। ऐसा स्वावलम्बन न हो जो अव्यावहारिक हो । माता, पिता, पत्नी, संतान की गणना उस समुदाय में होती है, जिनकी शरीर सेवा हम करते हैं। उनका श्रम बदले में एक समय का भोजन आदि रूपों में स्वीकार किया जा सकता है।

नवरात्रि अनुष्ठानों में उपवास द्वारा जो कुछ बचाया जाता है, उसे पूर्णाहुति के अंतिम दिन ब्रह्मभोज में खर्च करते हैं । ब्रह्मभोज से तात्पर्य है सत्कर्मों से परिपोषण हेतु किया गया पुण्य। सामूहिक रूप से किया गया यज्ञ तथा सम्पन्न ब्रह्मभोज द्वारा या इस प्रयोजन के लिए दी गयी सत्प्रवृत्ति संवर्धन के निमित्त दानराशि द्वारा भी यह उपक्रम पूरा हो जाता है। कुमारिका पूजन भी नवरात्रि उपक्रम के साथ जुड़ा हुआ है। इसके पीछे मूल तत्वदर्शन यह है यौवन का उभार खिलते फूल की तरह मात्र देखा जाय। उसे देखकर मन में वासना-कुत्सा न उठे वरन् देवी के प्रति सम्मान का भाव जगे। यह आध्यात्मिक ब्रह्मचर्य है। व्रतशीलता की दिशा में बढ़ाते चलन का यह एक ऋषि प्रणीत उपक्रम है।

उपासनाक्रम जो नवरात्रि में चलता है, उसमें माला की गिनती पर अधिक ध्यान न देकर जप के साथ ध्यान की प्रक्रिया समय विशेष में पूरी की जाय । होता यह है कि ध्यान गिनती में या सुमेरु की गति पर ज्यादा चला जाता है। सारा उद्देश्य इससे समाप्त हो जाता है । ढाई घण्टे न्यूनतम रोज जप किया जाय व भावनापूर्वक ध्यान सविता के महातेज का गायत्री की सद्बुद्धि प्रेरणा दायिनी शक्ति का किया जाय तो निश्चित ही यह अनुष्ठान साधना भौतिक एवं अध्यात्मिक दोनों ही दृष्टियों से अनेकों उपलब्धियाँ हस्तगत कराती है।

जैसा कि पहले कहा जा चुका है प्रस्तुत नवरात्रि पर्व हर वर्ष मनाये जाने वाले पर्वों की तरह सामान्य नहीं, वरन् असाधारण स्तर का है। एक ऐसा अवसर है जो हर कभी बार-बार नहीं आने वाला युगसंधि वेला की उल्टी गिनती चालू हो चुकी है व अब शीघ्र ही नवयुग का अरुणोदय होने वाला है। उसके पूर्ण संकेत दिखाई पड़ रहे हैं। यदि समय रहते आध्यात्मिक पुरुषार्थ कर स्वयं को महाचेतना के आदि स्रोत से जोड़ लिया जाय तो इससे बड़ी समझदारी और क्या हो सकती है?


उत्तिष्ठ युद्धस्वभारत


उत्तिष्ठ युद्धस्वभारत (Kahani)

आज दाँव पर लगा देश का, स्वाभिमानी सेनानी। और पड़ा सोया तू कैसे, जाग वीर बलिदानी॥

भारत माँ ने था तुझको, पौरुष का पाठ पढ़ाया। बलिपथ पर तूने, आगे ही आगे कदम बढ़ाया॥

लेकिन आज कौन सी तुझ पर, हाय पड़ गई छाया। सब कुछ लुटा जा रहा लेकिन तुझको होश न आया॥

रे दृग खोल और पढ़ पिछली गौरवपूर्ण कहानी।

विदेशियों के छद्म जाल में, फंसा देश यह सारा। असम और पंजाब कट रहा, है कश्मीर हमारा॥

भाई को भाई से अपने, लड़वाते कटवाते। हाय हन्त हम किन्तु न उनकी, चाल समझ हैं पाते॥

अपने ही सब रिश्ते-नाते, टूट रहे जिस्मानी।

अपराधों कास असुर चतुर्दिक्, झंडा गाड़ रहा है। बहन, बेटियों की इज्जत से, हो खिलवाड़ रहा है॥

हा-हाकार मचा धरती में भारी मारा मारी। ऋषियों की संतानों तुम पर, क्यों चढ़ रही खुमारी॥

जाग राष्ट्र के पौरुष जागे, सोई हुई जवानी।

सूरज रुके, चन्द्रमा रोये, रीते सागर का जल। आज हवाओं में करनी है, फिर से ऐसी हलचल॥

इज्जत लगी दाँव पर अपनी, जागो उसे बचाओ। नई विचार क्राँति का आओ, फिर से बिगुल बजाओ॥

उदासीन अर्जुन फिर से, पढ़ गीता वाली बानी।

-बलरामसिंह परिहार


परमपूज्य गुरुदेव की अमृतवाणी- - नवरात्रि साधना का तत्वदर्शन

परमपूज्य गुरुदेव की अमृतवाणी प्रसंग के अंतर्गत इस अंक में चैत्र नवरात्रि की पूर्व वेला में प्रस्तुत है 11 अप्रैल 1981 को शाँतिकुँज हरिद्वार में आयोजित नवरात्रि सत्र में उनका समापन व्याख्यान । स्वयं को प्रसुप्ति से जाग्रति में लाने व विगत का पुनरावलोकन कर आत्मिक प्रगति का उपक्रम बिठाने के लिए यह सारगर्भित व्याख्यान नयी दिशाएँ देता है व ऋषि संस्कृति के महत्वपूर्ण पड़ाव इस पर्व से नयी प्रेरणाएं हृदयंगम कराता है। तो पढ़ें इस अंक में, परमपूज्य गुरुदेव की अमृतवाणी चैत्र नवरात्रि के परिप्रेक्ष्य में।

गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ बोलिए-

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् ।

मित्रो ! नवरात्रि अब समाप्त होने जा रही है। आइए जरा विचार करें, इन दिनों हमने क्या किया व किस लिए किया? इन दोनों प्रश्नों के उत्तर ठीक तरह से सोच लेंगे तो यह संभावना भी साकार होती चली जायेगी कि इससे हमें क्या मिलना चाहिए व क्या फायदा होना चाहिए? आपकी सारी गतिविधियों पर हमने दृष्टि डाली व उसमें से निष्कर्ष निकालते हैं कि आपको अपने स्वाभाविक ढर्रे में हेर फेर करना पड़ा है। स्वाभाविक ढर्रा यह था कि आप बहुत देर तक सोये रहते थे। दिन में जब नींद आ गई सो गए, रात्रि देर तक जागते रहे । अब? अब हमने आपको दबोच दिया है कि सबेरे साढ़े तीन बजे उठना चाहिए। उठना ही पड़ेगा। नहाने का मन नहीं है। नहाना ही पड़ेगा। ये क्या है? यह हमने आपको दबोच दिया व पुराने ढर्रे में आमूलचूल हेरफेर कर दिया है।

आप क्या खाते थे हमें क्या मालूम ? आप नीबू का अचार भी खाते थे, चटनी भी खाते थे, जाने क्या-क्या खाते थे। हमने आपको दबोच दिया कहा-यह नहीं चल सकता। यह खाना पड़ेगा व अपने पर अंकुश लगाना पड़ेगा। टाइम का आपका कोई ठिकाना नहीं था। जब चाहा तब बैठ गए मन आया तो पूजा कर ली नहीं आया तो नहीं ही करी। अब आपको व्रत संकल्प के बंधनों में बाँधकर हमने दबोच दिया कि सत्ताईस माला तो नियमित रूप से करनी ही होगी। ढाई घंटे तो बैठना ही पड़ेगा। संकल्प लेने के बाद उसे पूरा नहीं करेंगे तो गायत्री माता नाराज होंगी, आपको पाप लगेगा, आप नरक में जायेंगे, अनुष्ठान खण्डित हो जायेगा, यह डर दिखाकर आपको दबोच दिया गया। पूर्व की गतिविधियों में हेर फेर करके आपको इस बात के लिए मजबूर जब किया गया कि जो आदतें अपने स्वभाव में नहीं है, उनका पालन भी करना आना चाहिए।

क्या नौ दिन काफी मात्र नहीं हैं? नहीं- नौ दिन काफी नहीं हैं ।यह अभ्यास है सारे जीवन को कैसा जिया जाना चाहिए, उसका। आप इस शिविर में आकर और कुछ सीख पाए कि नहीं पर एक बात अवश्य नोट करके जाना। क्या? वह है अध्यात्म की परिभाषा- अध्यात्म अर्थात् “साइंस ऑफ सोल”। अपने आपको सुधारने की विधा, अपने आपको सँभालने की विधा, अपने आपको समुन्नत करने की विधा। आपने तो यह समझा है कि अध्यात्म अर्थात् देवता को जाल में फँसाने की विधा, देवता की जेब काटने की विधा। आपने यही समझ रखा है न। मैं आपको यकीन दिलाता हूँ कि आप जो सोचते हैं बिल्कुल गलत है। जब तक बेवकूफी से भरी बेकार की बातें आप अपने दिमाग में जड़ जमाए बैठे रहेंगे, झख ही झख मारते रहेंगे। खाली हाथ मारे-मारे फिरेंगे। आप देवता को समझते क्या हैं? देवता को कबूतर समझ रखा है जो दाना फला दिया और चुपके-चुपके कबूतर आने लगे। बहेलिया रास्ते में छिपकर बैठ गया, झटका दिया और कबूतर रूपी देवता फँस गया। दाना फेंककर, नैवेद्य फेंककर, धूपबत्ती फेंककर बहेलिये के तरीके से फँसाना चाहते हैं, उसका कचूमर निकालना चाहते हैं? इसी का नाम भजन है? तपश्चर्या, साधना क्या इसी को कहते हैं? योगाभ्यास सिद्धान्त यही है? मैं आपसे ही पूछता हूँ, जरा बताइए तो सही।

आप देवियों को क्या समझते हैं? हम तो मछली समझते हैं । आटे की गोली बनाकर फेंकी व बगुले की तरह झट से उसे निगल लिया । धन्य हैं आप । आपके बराबर दयालु कोई नहीं हो सकता । मछली को पकड़ा तो कहा कि बहनजी आइए जरा। आपको सिंहासन पर बैठाएँगे आपकी आरती उतारेंगे और आपका जुलूस निकालेंगे। ऐसी ऐसी बाते करते हैं और जीवन भर इसी प्रवंचना में उलझे रहते हैं। देवियाँ कौन हैं? मछलियाँ । देवता कौन हैं? कबूतर। आप कौन हैं? बहेलिया । यही धन्धा है। चुप । बहेलिये का मछली मार का धन्धा करता है कहता है हम भजन करते हैं हम देवी के भक्त हैं । हम आस्तिक हैं। चुप, खबरदार। कभी मत कहना ऐसी बात। इसी को भजन कहते हैं तो हम यह कहेंगे कि यह भजन नहीं हों सकता आप ध्यान रखिएगा। आप अपने ख्यालातों को सही कीजिए अपने विचारों को सही कीजिए, अपने सोचने के तरीके को बदलिए यह हम आपको कहते हैं।

मित्रों ! मैं आप से कह रहा था कि आप एक सिद्धान्त यहाँ से नोट करके ले जाना कि अध्यात्म का अर्थ होता है- अपने आपको सही करना- साइंस ऑफ सोल। यह आत्मा को चेताने का विज्ञान है । चमत्कारों, मैजिक व सिद्धियों का विज्ञान नहीं है। सीधा सादा सा अर्थ है-अपने आपे को कैसे सही रखा जाय, यह प्रशिक्षण देने की विधा । जब आप अपने आपको सही कर लेते हैं तो यकीन रखिए कि आपकी सभी समस्याओं का हल स्वतः हो जाता है। फिर एक भी समस्या ऐसी नहीं है जो ठीक न हो सके। आपकी सेहत खराब रहती है न। चलिए अध्यात्म का मर्म समझिए व देखिए आप स्वस्थ होते हैं कि नहीं । बीमारियों से हमने एक बार पूछा -क्यों बहनजी। आप मारी-मारी फिरती हैं, चाहे जिस पर हमला कर देती हैं, चाहे जिसको बीमार कर देती हैं। ये क्या बात है? बीमारियों ने कहा-जो हमें बुलाता है, हम उसके पास जाते हैं। मनुष्य अपने असंयम द्वारा हमें हमेशा आवाज देता रहता है, बुलाता रहता है तो हम उसी के साथ बनी रहती हैं। आपने देखा, सुना? बीमारी कभी कबूतर के पास नहीं जाती, बन्दर के पास नहीं जाती सिर्फ आपके पास आती है। क्यों? क्योंकि आप बुलाते हैं। आप दैवी प्रकोपों को बुलायेंगे तो वे आएँगे व आप सौभाग्यों को बुलायेंगे तो वे आएँगे। आप कहेंगे नहीं, हम बीमारियों को नहीं बुलाते-दैवी प्रकोपों-दुर्योगों को नहीं बुलाते तो ऐसा ही होगा। पर काम तो वही करते हैं जिससे बीमारी को आना चाहिए व आप के पास सत्त बैठे रहना चाहिए। आप अपनी जीभ पर लगाम लगाइए इन्द्रियों पर नियंत्रण कीजिए, टाइम टेबल को ठीक कीजिए, तब देखिए कि क्या होता है, आपको कौन बीमार करता है?

गाँधी जी तीस साल की उम्र के थे । आंतें सूख गयी थीं। रोज एनीमा से दस्त कराते थे। उनने लिखा है कि जब वे दक्षिणी अफ्रीका में थे तो सोचते थे कि यही कोई पाँच बरस और जियेंगे। एनीमा सेट कोई उठा ले गया व जंगल में फँस गए तो बेमौत मारे जाएँगे। जिंदगी का अब कोई ठिकाना नहीं है लेकिन ऐसा नहीं हुआ। गाँधी जी ने अपने आपको ठीक कर लिया, सुधार लिया अपना आहार ठीक कर लिया तो आंतें भी उसी क्रम से ठीक होती चलीं गयी। 80 वर्ष की उम्र में वे मरे, मरने से पहले वे कहते थे अभी हम 120 साल तक जियेंगे । मेरा ख्याल है कि वे जरूर जिये होते यदि गोली के शिकार नहीं होते । जब गाँधीजी की आंतें उन्हें क्षमा कर सकती हैं शरीर उन पर दया कर सकता है तो आपके साथ यह क्यों नहीं हो सकता? शर्त एक ही है कि आप अपनी जीभ को छुट्टल साँड़ की तरह न छोड़कर उस पर काबू करना सीखें । जीभ ऐसी जिसने आपकी सेहत को खा लिया, आपके खून को खा लिया, माँस को खा लिया। कौन जिम्मेदार है-जीवाणु वातावरण । नहीं आप स्वयं व आपकी यह जीभ। यदि आप इसे काबू में कर सके तो मैं बीमारियों की ओर से मुख्तार नामा लिखने को तैयार हूँ कि आपको कभी बीमारी नहीं होने वाली।

ऐसे कई नमूने मेरे सामने हैं, जिसमें लोगों ने नेचर के कायदों का पालन कर के अपनी बीमारी को दूर भगा दिया। चंदगीराम भरी जवानी में तपेदिक के मरीज हो गए थे । कटोरा भर खून रोज कफ के साथ निकलता था। हर डॉक्टर ने कह दिया था कि उसके बचने की कोई उम्मीद नहीं है। एक सज्जन आए व बोले आप अगर मौत को पसंद करते हों तो उस राह चलिए व यदि जिंदगी पसंद हो तो मेरे बताए मार्ग पर चलिए। जिंदगी का रास्ता क्या अपने ऊपर संयम जीभ पर संयम। आहार का संयम-विहार का संयम। शरीर से श्रम कीजिए व वर्जिश कीजिए। प्राणों का सागर चारों तरफ भरी पड़ा है, खींचिए, सादा भोजन कीजिए व सीमा में करिए । फिर देखिए, क्या होता है? देखते-देखते टीबी का रोगी वह व्यक्ति पहलवान चन्दगीराम बन गया।

आप में से हर व्यक्ति पहलवान बन सकता है, अपनी कमजोरियाँ ठीक कर सकता है, अपनी सेहत ठीक कर सकता है, अपनी परिस्थितियाँ अपने अनुकूल बना सकता है, तनावभरी इस दुनिया में भी प्रसन्नतापूर्वक रह सकता है। पर क्या करें मित्रों? आप दूसरों को -उसकी कमियों को तो खूब देखते हैं पर अपनी कमियों गलतियों असंयमों को कम देखते हैं। अपने आप पर नियंत्रण बिठाने का आपका कोई मन नहीं है। इसीलिए मैं आपको कभी अध्यात्मवादी नहीं कह सकता। मात्र दीन-दुर्बल आदतों का गुलाम भर कह सकता हूँ।

मित्रों! मैं आपको इस नवरात्रि अनुष्ठान के बारे में बताते हुए मूलभूत सिद्धान्तों की समीक्षा कर रहा था। यहाँ हमने आपको दबोचा है क्यों ? क्योंकि आप अपने सोचने के तरीके से लेकर रहन-सहन, आहार-विहार के तरीकों को जब तक इस गलत प्रकार से अख़्तियार किये रहेंगे, सुधार और हेर फेर नहीं करेंगे तब तक आपकी एक भी समस्या हल नहीं होने वाली। नहीं गुरुजी! आप तो वरदान-आशीर्वाद देते हैं । सिद्ध पुरुष हैं। हाँ। हम वरदान भी देते हैं और आशीर्वाद भी । लोगों को चमत्कार भी दिखा देते हैं, यह बात भी सही है। पर हम देते उन्हीं को हैं जो अपनी सहायता स्वयं करते हैं, पहले अपने आपको ठीक करने के लिए एक कदम आगे बढ़ाते हैं । चमत्कार तो सिरदर्द के लिए एस्पीरिन की दवा की तरह है । आप ठीक हो जाते हैं ? नहीं, आप तब तक ठीक नहीं हो सकते, जब तक पेट ठीक नहीं करेंगे। टाइमली रिली फहम देते हैं पर ताकत तो ठीक होने की अंदर से उभारनी पड़ेगी। खून हम बाहर का आपको इसलिए लगाते हैं ताकि आपका अपना सिस्टम काम करना आरंभ कर दे । वरदान-चमत्कार किसी को परावलम्बी बनाने के लिए नहीं, उसे सहारा देने के लिए ताकि वह अपने पैरों पर खड़ा हो सके।

नवरात्रि अनुष्ठान में यही अध्यात्म के मूलभूत सिद्धान्त मैंने आपको समझाने का प्रयास किया कि आप अपने पैरों पर खड़ा होना सीखिए । अपने चिन्तन और व्यवहार को यही ढंग से रखना सीखिए । आपकी अब तक की जिन्दगी वहमों में बीत गयी। अब उनसे मुक्ति पाना सीखिए। अपने आपको दबोचना सीखिए यह नवरात्रि अनुष्ठान का तपश्चर्या वाला हिस्सा है, जिससे हमने आपको अपने आप पर नियंत्रण करना सिखाया। यह बताया कि कम खाने से शरीर का कोई नुकसान नहीं बल्कि लाभ ही होता है। इसलिए आपको आदतें बदलकर उपवास करना सिखाया, अस्वादव्रत समझाया । आध्यात्मिक प्रगति के रास्ते का यह पहला कदम है।

आहार संयम के बाद हमने आपको कहा था कि आपको विचारों पर संयम रखना आना चाहिए। आपको ब्रह्मचर्य से रहना चाहिए । गायत्री माता का फोटो आपने रखा था अपने सामने व उसी की आरती रोज करते रहे। क्यों कभी सोचा आपने ! मूर्ति क्यों रखी है, सोचा आपने? बताइए इस चित्र व मूर्ति को देखकर कि इसकी उम्र कितनी होनी चाहिए ? आपने देखा कि वह बीस साल की जवान युवती जैसी है। अस्सी साल की बुढ़िया तो नहीं है ? नहीं गुरुजी वह तो उठती उम्र की जवान षोडशी दिखती है। आपका ख्याल ठीक है यह हमने जानबूझ कर बनाई है। गायत्री माता की असली उम्र तो न जाने कितनी होगी । उस उम्र की आप कल्पना भी नहीं कर सकते । सृष्टि जितनी पुरानी है, उससे भी कहीं अधिक आयु की यह गायत्री माता है। फिर 16 साल की यह सुन्दर नयन-नक्शों वाली युवती क्यों बनायी ! अरे! हमने आपको विचार करना सिखाया कि युवा नारी के बारे में आपको पवित्र दृष्टि रखते हुए यौन शुचिता का अभ्यास करना चाहिए । आप बेहूदे हैं। नारी को बाहर के तरीके से देखते हैं । नारी में आपको माता, बहन, बेटी नहीं दिखाई पड़ती । आपको तो सब वेश्या ही वेश्या दिखाई पड़ती हैं। हम आपकी दृष्टि बदलना चाहते हैं। कामुकता प्रधान चिंतन से आपको निकालकर एक नई दृष्टि देना चाहते हैं । यही मानसिक ब्रह्मचर्य है। आपको इसका, मर्यादा का पालन करना चाहिए, यह हमने आपको सिखाया।

आप कहेंगे गुरुजी हम तो ब्रह्मचारी हैं। एक बार जेल चले गये थे, मारपीट हो गयी थी तो हम ढाई वर्ष पत्नी से दूर जेल में रहे। हाँ साहब आप तो पक्के ब्रह्मचारी हो गए। अखण्ड ब्रह्मचर्य से भारी तेजस्वी आँखों में आशीर्वाद-वरदान की क्षमता आप में आ गयी। पागल हैं न आप। ढेरों आदमी बीमार होते हैं, नपुँसक हो जाते हैं, सब ब्रह्मचारी होते हैं काहे का ब्रह्मचारी। मित्रों ! ब्रह्मचर्य चिन्तन शैली है। आपके विचारों का प्रतीक है, जो आपके जीवन में एक अंग बन गए हैं। जो संस्कार आपके जन्म-जन्मान्तरों से चले आ रहे हैं, उनका एक रूप आपकी कुदृष्टि व विचारों की झलकी के रूप में देखने को मिलता है । किसी जमाने में आप 84 लाख योनियों में एक कुत्ते भी थे क्या? हाँ गुरुजी जरूर रहे होंगे। बढ़ते- बढ़ते तभी तो आदमी बने हैं। जब कुत्ते रहे होंगे तब आपके सामने माँ-बहन का कोई रिश्ता था? नहीं साहब हमारी माँ एक बार हमारे सामने आ गई। कुआर का महीना था। माँ और औरत में हम फर्क नहीं कर सके व उससे हमने बच्चा पैदा कर दिया। उस योनि में हमें न बेटी का ख्याल था, न बहिन का, न माँ का।

बिरादरी तो बिरादरी है उसमें भला क्या फर्क करना । आप अभी करते हैं क्योंकि आप आदमी हैं। समाज की मर्यादाओं का एक नकाब आपके ऊपर पड़ा हुआ है । यदि यह नकाब ऊपर उठा दिया जाय, आपको नंगा करके देखा जाय तो वस्तुतः आप अभी भी उस बिरादरी में हैं, जिसका मैं जिक्र कर रहा था। बार बार नाम लूँगा तो आपको बुरा लगेगा । लेकिन है कि नहीं, छाती पर हाथ रख कर देखिये।

मित्रों ! हम ये कह रहे थे कि आप गलत सोचने का तरीका अपना बदल लें जो साधन सामग्री आप के पास है, रुपया पैसा चाँदी जमीन है, अक्ल है, इनका सदुपयोग आप करना सीख लें। आपके कमाने का क्या तरीका है ? मुझे नहीं मालूम । पर आप एक बात का जवाब दीजिए कि आप इन्हें खर्च कैसे करते हैं? किस आदमी ने कैसे कमाया ये हिसाब मैं नहीं करता । मैं तो अध्यात्म की दृष्टि से विचार करता हूँ कि किस आदमी ने कैसे खर्च किया? जो कमाया वह खर्च कहाँ हुआ? मुझे खर्च का ब्यौरा दीजिए । बस! अगर आप खर्च अपव्यय में करते हैं गलत कामों में करते हैं, फिजूल खर्ची करते हैं तो मैं आध्यात्मिक दृष्टि से आपको बेईमान कहूँगा। आप कहेंगे, यह हमारी कमाई है । हाँ आपकी ही कमाई है, पर आप खर्च कहाँ करते हैं यह बताइए आपका धन, आपकी अकल, आपके साधन, श्रम किन कामों में खर्च होते हैं, इनका ब्यौरा लाइए, उसकी फाइल पेश कीजिए हमारे सामने। आपने बेटे को खैरात में बाँट अय्याशी में उड़ा दिया, जेवर बनवाने में खर्च कर दिया तो हम आपको आध्यात्मवादी कैसे कहें? खर्च के बारे में भगवान का बड़ा सख्त नियंत्रण है। आदमी को हम अध्यात्म का अंकुश लगाते हुए ईश्वरचंद्र विद्यासागर जैसा जीवन जीने को कहते हैं । आपको 500 रुपये तनख्वाह मिलती होगी, मिले। लेकिन आप उसे औसत नागरिक के नाते खर्च कीजिए । विद्यासागर की तरह 50 रुपयों में अपनी गृहस्थी का गुजारा करें व 450 रुपयों में अन्यों के लिए समाज के लिए दुखी-अभावग्रस्तों के लिए सुरक्षित करिए। उनके साढ़े चार सौ रुपयों से हजारों विद्यार्थी निहाल हो गए। जो फीस नहीं दे सकते थे, जो कापी नहीं खरीद सकते थे, जिनके पास मिट्टी का तेल नहीं था उनके लिए सारी व्यवस्था विद्यासागर ने अपने यहाँ कर रखी थी। इसे क्या कहते हैं- यह अध्यात्म है। अध्यात्मवादी आप कब होंगे, मैं यह नहीं जानता किन्तु जिस दिन अध्यात्मवादी बनने का सिलसिला शुरू हो जाएगा, तब फिर मैं आपको भगवान की शपथ देकर अपने अनुभव की साक्षी देकर विश्वास दिलाऊँगा कि अध्यात्म के बराबर नगद फल देने वाली चमत्कारी विद्या कोई नहीं हो सकती । लाटरी लगाने, जेब काटने से भी ज्यादा फायदेमंद दूरदर्शिता भरा रास्ता है अध्यात्म का। यह आप समझ गए तो आपका मानसिक कायाकल्प आध्यात्मिक भावकल्प हो जाएगा व नवरात्रि साधना सफल मानी जाएगी।

इस बीच हमने आप से नित्य अग्निहोत्र करने को कहा जप का एक अंश अग्निहोत्र कीजिए। आप अग्निहोत्र को एक कर्मकाण्ड माने बैठे हैं । अग्निहोत्र यज्ञ विज्ञान का नाम है । यह एक परम्परा ही नहीं, इसका साइंटिफिक बेस भी है। यज्ञ कहते हैं कुर्बानी को, सेवा को। भूदानयज्ञ, नेत्रदानयज्ञ, सफाईयज्ञ, ज्ञानयज्ञ हजारों तरह के यज्ञ हैं । इन सबका एक ही अर्थ होता है लोक हितार्थाय आहुति देना। यज्ञ कीजिए पूर्णाहुति दीजिए, पर जनकल्याण का ध्यान रखिए। संस्कृति की रक्षा के लिए, देश व मानवी आदर्शों को जीवन्त रखने के लिए अपने पसीने की आहुति दीजिए, उस चीज की भी आहुति दीजिए जिसे आपने दबाकर रखा है अपने बेटे के लिए। मित्रों अगर आप अय्याशी-फिजूलखर्ची विलासिता की कुर्बानी देने की हिम्मत दिखा सके तो यज्ञ सफल है। तब आप असली अध्यात्मवादी होंगे। जिस दिन आप ऐसे बन जाएँगे तब आप देखेंगे असली चमत्कार । उस दिन आप देखेंगे असली भगवान । तब आपको सुदामा के तरीके से आप के चरणों को धोता हुआ, शबरी के तरीके से आपके दरवाजे पर झूठे बेर खाता हुआ और राजा बलि के तरीके से आपके दरवाजे पर साढ़े तीन गज जमीन माँगता हुआ, गोपियों के दरवाजे पर छाछ माँगता हुआ आपको भगवान दिखाई पड़ेगा।

आइए! भगवान ने आपको बुलाया है । जेब खाली कीजिए । बीज के तरीके से गलिए और दरख्त की तरह फलिए मैंने यही जीवनभर सीखा व आपको भी सिखाना चाहता हूँ आपको यदि यह समझ में आस गया तो मैं पूरे मन से आशीर्वाद देता हूँ कि जो भी नवरात्रि अनुष्ठान के, गायत्री साधना के चमत्कार आपने सुने हैं वह आपके जीवन में फलित हो जायँ। आप जिस मकसद से आए थे वह पूरा हो व आप जब भी अनुष्ठान करें समूचा लाभ उठा सकें इसलिए आपको यह समझ में आए व आप लाभान्वित हों। हमारी बात समाप्त । ॐ शाँतिः शाँतिः शाँतिः।


परमपूज्य गुरुदेव : लीला-प्रसंग

औघड़दानी उसे कहते हैं जो अनायास ही भक्तों पर प्रसन्न हो अपनी विभूतियाँ लुटाता रहता है । बाबा भोलेनाथ इसी नाम से प्रसिद्ध भी हैं। कालजयी, महाकाल समुद्रमंथन से निकले हलाहल को, वारुणी को अपने कण्ठ में धारणकर देवसत्ताओं को अमृतपान का लाभ देते हैं। हमारी गुरुसत्ता परमपूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जिनने मानवता के निमित्त दुष्प्रवृत्तियों का हलाहल स्वयं धारण कर विश्वहितार्थाय जीवन जिया, उनका वही साक्षात शिवरूप हममें से अनेकों ने प्रत्यक्ष अपने जीवन में देखा है। अगणित परिजन उनके द्वारा प्रदत्त संजीवनी शक्ति से लेकर दैवी संरक्षण तथा भौतिक विभूतियों से लेकर आध्यात्मिक सिद्धि के पात्र विगत साठ वर्षों में बने इन प्रसंगों को पढ़कर सहज ही मन में पुलकन व स्फुरणा होती है कि ऐसी सत्ता के अंशधर यदि हम हैं तो कोई हमारा क्या बिगाड़ सकता है। वे नहीं हैं स्थूलतः तो क्या, उनकी दैवी रक्षाकवच तो हमारे चारों ओर यथावत विद्यमान है। वह सूक्ष्म सत्ता भी हर परिजन के समक्ष ही है जो जब कातर भाव से माँगा जाय तो सब कुछ देने को आतुर है।

अनुभूतियों के पिटारे को खोलकर विगत आधे शतक के घटनाक्रमों पर दृष्टि डालते हैं तो अगणित ऐसे प्रसंग देखने को मिलते हैं, जिनसे परमपूज्य गुरुदेव की सत्ता के विभिन्न रूपों के दर्शन होते हैं । वैद्य श्रीमदनलाल श्रोत्रिय राजस्थान के एक प्रखर कार्यकर्ता रहे हैं। उन दिनों वे राजकीय आयुर्वेदिक चिकित्सालय पहुना जि. चित्तौड़गढ़ में सेवारत थे। एक दिन मथुरा में गायत्री तपोभूमि में पूज्य गुरुदेव के साथ बैठे थे । चर्चा चलती रही, फिर पूज्य गुरुदेव घीयामण्डी चल पड़े । साथ में उन्हें भी लेते गए। विभिन्न प्रसंगों पर चर्चा होती रही। घीया मण्डी में घर की छत पर बैठे वार्ता प्रसंग को उनने सहज ही विराम देते हुए कहा कि “मदन तुम्हें कुछ जरूरत हो तो माँग लो।” इनने कहा तो नहीं कि यह चाहिए पर सहज विनम्रतावश कहा कि “सब कुछ पूज्यवर आपका ही दिया हुआ है। कुछ भी तो नहीं चाहिए।” तो गुरुदेव बोले-”अच्छा! कल से किसी को मिट्टी की पुड़िया भी दोगे तो रोगी ठीक होते जाएँगे। विश्वासपूर्वक देना व जीवन भर हमारा काम करना। ”वैद्य जी श्रोत्रिय जी बताते हैं कि इसके बाद अनगिनत असाध्य रोगियों को उनने गायत्री मंत्र बोलकर एक ही दवा दी यज्ञ की भस्म के साथ रोग के लिए दी जाने वाली वनौषधि का चूर्ण, क्वाथ या असाव । देखा कि कई बार दवाएँ बदल जाने पर रोगी ठीक हो गया। एक श्वास रोगी प्रवाहिका की दवा चली गयी तो वह भी ठीक हो गया तथा प्रवाहिका के रोगी को कनकासब की बोतल में मात्र पानी दिया गया व वह भी ठीक हो गया। बाद में वे मात्र भस्म देकर ही रोगियों को स्वास्थ्य लाभ दिया करते थे । यह गुरुकृपा ही थी कि उनके पास आए सभी रोगी स्वस्थ-सानंद होते चले गये। यह औघड़दानी का वरदान ही तो है।

रामपुर के एक सज्जन श्री कौशल कुमार चौधरी व उनकी पत्नी अनिता चौधरी ने अपनी प्रथम संतान को जन्म के संबंध में एक विस्तृत विवरण मय प्रमाणों के हमारे समक्ष लिखकर भेजा है। वन्दनीया माताजी व परमपूज्य गुरुदेव के आशीर्वाद के साथ उन्हें निर्देश मिला कि सविता देवता की उपासना करो। निश्चित ही सुसंतति की प्राप्ति होगी। गर्भधारण करते ही खून में लौहतत्व की अत्यधिक कमी पाने से चिकित्सकों ने औषधियाँ आरम्भ कर दीं। किन्तु शीघ्र ही डेढ़ माह के अन्दर ही एबॉर्शन हो गया। ऐसा दो बार हो जाने पर पुनः यहाँ आकर पूज्यवर से प्रत्यक्ष आशीर्वाद माँगा बताया कि डॉक्टर्स ने जीन्स में डिफेक्ट बताया है। रिपोर्ट में लिखा था कि रक्त के कोषों का कल्चर करने के बाद पाया गया कि इस प्रकार की क्रोमोसोमल काम्पलीमेण्ट की बनावट बार-बार एबाँर्शन के लिए जिम्मेदार है। क्रोमोसोम नं-12 की लोकेशन पर मानोसोमी, ट्राइसोमी की विकृति पायी गयी। तय था कि लुकोसाइट कल्चर की रिपोर्ट के बाद उनके गर्भधारण के प्रयास के बाद हर चिकित्सक का जवाब एक ही होता कि वे एबॉर्शन करवालें व आगे संतान सुख की बात सोंचे ही नहीं। परमपूज्य गुरुदेव ने वंदनीया माताजी के पास से एक रक्षाकवच मँगाकर श्रीमती चौधरी को पहनने को दिया। इसके पहनने के बाद ही उनने नियमित सूर्य का ध्यान व गायत्री उपासना का क्रम आरंभ कर दिया। गर्भधारण हुआ। सोनोग्राफी व बच्चे की माँ के जीन्स के विश्लेषण से जानकारी मिली कि बच्चा बिल्कुल ठीक है व प्रायः बीस सप्ताह का बालक गर्भ में स्वस्थ है। पुँसवन संस्कार कराने संबंधी निर्देश परम वंदनीया माताजी को मिला। वह भी कराया गया। सब कुछ ठीक चल रहा था कि होमोग्लोबिन पुनः गिरने लगा। उनने पत्र लिखा व दवाएँ चालू रखीं। पत्र लिखने के अगले दिन ही होमोग्लोबिन सामान्य आ गया था जिसका कोई बुद्धि सम्मत समाधान चिकित्सकों के पास नहीं था। अंततः 18 नवम्बर सोमवार कार्तिक शुक्ल एकादशी 1991 के दिन उन्हें एक स्वस्थ, सुन्दर तेजस्वी संतति की प्राप्ति हुई। यह स्मरण रखा जाना चाहिए कि चिकित्सा उपचार उनकी ओर से सितम्बर 1988 से ही चल रहे थे पर प्रत्यक्ष आशीर्वाद पूज्यवर का व बाद में परम वंदनीया माताजी का उन्हें मिलता रहा जिसकी परिणति तब हुई जब स्वयं गुरुदेव सूक्ष्म व कारणसत्ता की अंशधारी सत्ता बन चुके थे। कितना अलौकिक दैवी स्तर का संरक्षण यह है ? इस घटनाक्रम के माध्यम से हम सभी परिजनों को आश्वस्त करना चाहते हैं कि परम पूज्य गुरुदेव की सत्ता का स्थूल रूप अब नहीं है, इस पर कदापि विक्षुब्ध न हों। उनकी सूक्ष्मसत्ता और भी सक्रिय व अतिव्यापी बन पूरे कार्यक्षेत्र में गतिशील है।

ईश्वरीय अनुकम्पा हर व्यक्ति पर बरस सकती है व बरसती है, यदि उसने अपना पुरुषार्थ करने में कोई कसर न छोड़ी हो उतना सब होने के बाद ईश्वर को कातरभाव से पुकारा हो। यह एक अनिवार्यता है कि व्यक्ति अपना प्रयास पूरा कर ले। फिर द्रौपदी की याचना से लेकर मगर के जबड़े में फँसे गजराज तक की पुकार वे सुनते हैं। हर परिजन यही सोचकर परमपूज्य गुरुदेव व परम वंदनीया माताजी को अपनी समस्या संबंधी पत्र लिखता रहा कि उसने अपनी ओर से पूरी कोशिश कर ली, अब उनकी कृपा से ही आगे गाड़ी बढ़ेगी। जबलपुर के श्री सूर्यभानु लिखते हैं कि सन् 1977 में उनकी पत्नी की तबियत अचानक काफी खराब हो गयी। चार माह तक बुखार ही नहीं उतरा। डॉक्टर बीमारी का इलाज तो कर नहीं पाए, कई एण्टी बायोटिक्स देकर जीवनी शक्ति को बुरी तरह झिंझोड़ जरूर डाला। तब उनने मजबूर होकर पूज्यवर को पत्र में अपनी व्यथा लिखकर पोस्ट कर दी। आश्चर्य यह कि इधर लेटर डाला व उधर बुखार कम होने वच तबियत क्रमशः अच्छी होने की प्रक्रिया आरंभ हो गयी जवाब भी आ गया। आशीर्वाद रामबाण सिद्ध हुआ व दो माह में वे बिल्कुल स्वस्थ हो नियमित दिनचर्या में भाग लेने लगीं । तब से आज तक नीरोग हैं। मानते हैं कि उनकी समर्पणभाव से की गयी याचना भरी करुण पुकार ही उनकी पत्नी के स्वास्थ्य के ठीक होने के मूल में पूज्यवर की अनुकम्पा बरसाने का निमित्त कारण बनी।

कई बार ऐसे प्रसंग भी आते थे, जब परमपूज्य गुरुदेव दूसरों के कष्ट अपने पर लेकर उन्हें हल्के कर देते थे। संयमित दिनचर्या नियत आहार व तप-साधना के चलते कभी किसी प्रकार की कोई व्याधि पूज्यवर को नहीं हुई। ऐसे में कभी किसी प्रकार की तकलीफ उन्हें हुई भी तो वह किसी का कष्ट निज पर ओढ़ना ही उसके मूल में था। श्रीमती मायावर्मा से सभी अखण्ड-ज्योति परिजन उनकी काव्य प्रतिभा के कारण परिचित हैं । 6/12/67 को अपने हस्तलिखित पत्र में पूज्यवर उन्हें लिखते हैं कि

“हमारा स्वास्थ्य अब ठीक है। किसी स्वजन की दुर्घटना का भार अपने ऊपर लेने के कारण ही इस बार हमें इस प्रकार का कष्ट सहन करना पड़ा। दूसरा कोई मार्ग न था। सब रास्ते बन्द हो जाने के कारण यह अन्तिम उपाय काम में लाना पड़ा । किस के लिए यह किया गया, इसकी चर्चा ठीक नहीं, क्योंकि व्यर्थ ही इसमें अहसान मानने या उपकारी होने का अहंकार बढ़ता है।”

यह पत्र उनके एक पत्र के उत्तर के रूप में लिखा गया था जिसमें उनने परमपूज्य गुरुदेव के अचानक अस्वस्थ हो जाने पर चिन्ता व्यक्त की थी लश्करा ग्वालियर वासी श्रीमती मायावर्मा ऊपर आये संकट कई बार स्वयं पूज्य गुरुदेव द्वारा अपने ऊपर लेकर हलके किए गए इसकी साक्षी वे स्वयं समीपस्थ परिजन व उनको लिखे गए पूज्यवर के पत्र हैं, जो अभी भी उनके पास सुरक्षित हैं।

1968-69 का प्रसंग है । परमपूज्य गुरुदेव को गुजरात के आणन्द नामक स्थान पर 108 कुण्डी गायत्री महायज्ञ में जाना था । साथ जाने वाले परिजन ट्रेन छूटने के ठीक दो घण्टे पहले उनके पास घीयामण्डी आ गए। ठीक उसी समय जब जाने का समय था, पूज्यवर को एकाएक बुखार चढ़ना आरंभ हुआ, जो क्रमशः 104 डिग्री तक पहुँच गया । आधे घण्टे में उत्पन्न हुई इस स्थिति को देखकर सब परेशान थे । तुरंत पारिवारिक चिकित्सक डॉक्टर अरोड़ा को खबर दी गयी। इस बीच बढ़ते तापमान के बावजूद परमपूज्य गुरुदेव निश्चिन्त लेटे हुए थे। बार-बार घड़ी पर निगाह डाल देते थे। इसी बीच उनने वन्दनीया माताजी से पूछा कि जयपुर से कोई पत्र या तार तो नहीं आया? इस प्रश्न का उस समय कोई प्रसंग था नहीं, नहीं ऐसा कोई तार उस समय आया था। पेट में पथरी के दर्द की वेदना, एवं चढ़ता बुखार एकाएक कम होना शुरू हुआ। डा. अरोड़ा की दवा तो निमित्त बन गयी पर तबियत लगभग सवा घण्टे में सामान्य हो गयी । ट्रेन का समय हो गया था। वंदनीया माताजी के रोकने के बावजूद वे चलने के लिए उद्यत हो गए। घीयामण्डी कार्यालय में ही रहने वाले एक कार्यकर्ता से यह कहकर कि जयपुर से तार आते ही उसे आणन्द भेज दिया जाय, वे स्टेशन व वहाँ से आणन्द रवाना हो गए। ट्रेन चूँकि एक घण्टा लेट थी अतः यात्रा समय से आरम्भ हो गयी। उनका उधर रवाना होना था कि इधर पूज्यवर के नाम तार आया कि माँ को तेज बुखार है, पथरी की डाइग्नोसिस है, हम सब चिन्तित हैं, कृपया आशीर्वाद भेजें । “तार भेजने वाली पूज्यवर की परम भक्त बालिका थी । तार तुरंत आणंद भेज दिया गया । आश्चर्य यह कि जो कष्ट पूज्यवर को हुआ था, ठीक वैसा ही उस महिला को हुआ जिसका कष्ट पूज्यवर ने अपने ऊपर ले लिया था । पूज्यवर के ट्रेन में बैठकर रवाना होते ही ठीक हो गया । पत्र द्वारा यह सब विस्तार से ज्ञात हुआ। आणदं का कार्यक्रम प्रसन्नतापूर्वक सम्पन्न हुआ।

दूसरों के कष्टों को अपने ऊपर लेकर उनकी रक्षा करना ठीक उसी प्रकार भगवत् सत्ता का संकल्प है, जो योगीराज श्रीकृष्ण ने “योगक्षेम वहाम्यहम”के रूप में अपने भक्त के समक्ष किया है। कैसे कोई सत्ता इतनी दूर से अपने भक्त के कष्ट को पढ़ लेती है व अपने पर लेकर उसे हलका कर लेती है, इसके अनेकानेक दृष्टांत परमपूज्य गुरुदेव जैसे महापुरुषों के जीवन में देखने को मिलते हैं । वस्तुतः परोक्ष जगत का यह लीलासन्दोह विज्ञान के स्तर पर प्रतिपाद्य है भी नहीं। श्रद्धा पर आधारित ये घटनाक्रम यही बताते हैं कि अतीन्द्रिय क्षमता संपन्न साधक स्तर के महामानवों के लिए अपने भक्त की दूरी कोई मायने नहीं रखती। वे जहाँ भी जाते हैं, उन्हें अपने हर भक्त, हर श्रद्धालु परिजन के सुख-दुख में भागीदार बनने की व्यग्रता हमेशा बनी रहती है। कुछ घटनाक्रम प्रकाश में आते हैं। अगणित ऐसे होते हैं, जिनका कोई विवरण न उपलब्ध है, न कभी मिल ही पाएगा। पर एक तथ्य अपनी जगह अटल रहेगा कि ऐसी गुरुसत्ता से जिसने ऐसे दैवी स्तर के अनुदान पाए, उसके मूल में उसकी प्रसुप्त सुसंस्कारिता ही, वह अविच्छिन्न संबंध भी था जो दोनों के बीच सतत् बना रहा । प्रत्यक्ष व दिखाई न पड़ा हो, पर परोक्ष रूप से यह संबंध बने रहे व दोनों सत्ताएं एक दूसरे के लिए अपना अपना काम करती रहीं ।

अभी अभी संपन्न हुए भारत वर्ष व विश्व भर के शक्ति साधना कार्यक्रमों से कई ऐसे घटनाक्रम प्रकाश में आए हैं, जिनमें ऐसे व्यक्ति जिनने कभी स्थूल नेत्रों से

परमपूज्य गुरुदेव व उनसे अविभाज्य शक्ति स्वरूपा माता भगवती देवी के दर्शन नहीं किए, विगत दो वर्षों में भिन्न भिन्न रूपों में लाभान्वित हुए

किन्हीं के कभी समाप्त न होने वाले कष्ट मिटे हैं तो किन्हीं के अप्रत्याशित सहायता ऐसे समय मिली है, जब सभी द्वार मदद के बन्द हो चुके थे। किन्हीं को सूक्ष्म सत्ता के दर्शन के साथ पर्याप्त मनोबल के रूप में अनुदान मिला है तो किन्हीं को सद्बुद्धि के रूप में अँधेरे भरे जीवन में नया प्रकाश मिला है। यह सारे घटनाक्रम अद्भुत अलौकिक हैं व इनसे परोक्ष जगत की दैवी सत्ता पर हम सबका विश्वास और दृढ़ होता है। इन सबकी चर्चा अगले कुछ अंकों में हम करेंगे।

(क्रमशः)


शक्ति साधना संबंधी (Kahani)

प्रज्ञामण्डल राँची के श्रीमोहन झा ने पौ नवम्बर से 12 नवम्बर 1991 की अवधि में हरम् राँची में सम्पन्न शक्ति संबंध में एक बड़ा ही विलक्षण विवरण लिखकर भेजा है उस शक्ति साधना कार्यक्रम में अखण्ड जप में हजारों परिजनों ने भाग लिया था। समापन दीपयज्ञ द्वारा होना था । परमपूज्य गुरुदेव व वन्दनीया माताजी के चित्र के समक्ष रखा हुआ कलश सभी परिजनों ने बड़ी तेजी से अपने स्थान पर घूमते देखा । सभी दृश्य देखकर भाव विभोर हो गए थे। सभा में उपस्थित बुद्धिजीवी स्तर के कई व्यक्ति भी सूक्ष्म की यह लीला देखकर हतप्रभ से थे, चमत्कृत थे कुछ ही मिनटों में पूर्णाहुति पूरी होते ही कलश का घूमना बन्द हो गया । शक्ति साधना संबंधी कार्यक्रम संबंधी अगणित स्थानों से इसी प्रकार के व प्रत्यक्ष घटनाक्रम लोगों ने लिख भेजे हैं।


अपनों से अपनी बात - देवसंस्कृति को विश्वव्यापी बनाने घर-घर पहुँचने की पावन प्रतिज्ञा

शाँतिकुँज में भव्य शपथ समारोह परमपूज्य गुरुदेव की द्वितीय पुण्यतिथि पर

“युग बदल रहा है। यह कहा और माना जाय, तो वरिष्ठों की अपनी निजी दिशाधारा बदलने के साथ आरम्भ होगा। प्रतिभाएँ आगे बढ़ती हैं, तो ही अनुयायियों की कतार पीछे चलती है। पतन और उत्थान का इतिहास इस एक पटरी पर आगे बढ़ता रहा है। प्रतिभाओं को दूसरे शब्दों में अंधड़ कहते हैं । उनका वेग जिस दिशा में तेजी से बढ़ता है, उसी अनुपात से तिनकों, पत्तों से लेकर छप्परों और वृक्षों तक को उड़ते और लुढ़कते देखा जाता है। आज की पतनोन्मुख परिस्थितियों और विभीषिकाओं का श्रेय या दोष समय के मूर्धन्यों को ही दिया जाएगा। भूतकाल में भी यही होता रहा है और भविष्य में भी यही शाश्वत चलेगा। गिरता उठता तो जमाना है, पर उसके लिए वास्तविक पाप-पुण्य का बोझ समय की अग्रगमन असंख्य में प्राण फूँकता है। वे गिरते हैं तो ओलों की तरह समूची फसल को चट करके रख देते हैं। जो चुप बैठे रहते हैं वे न तो शान्तिप्रिय कहलाते हैं, न निरपेक्ष न अनासक्त। आड़े वक्त में मुँह छिपाने के लिए शांति का भजन का -ब्रह्मज्ञान का लबादा ओढ़ने वाले अपना मन भले ही समझा लें आपत्तिकाल की यातनाएँ उन्हें कभी क्षमा नहीं कर सकती । दुर्घटना, महामारी, अग्निकाँड, आक्रमण, उत्पीड़न से संत्रस्त हाहाकारी वातावरण में जो एकान्त साधना की बात सोचे, उसे ब्रह्मज्ञानी कौन कहेगा? निष्ठुर पाषाण से कम उन्हें दूसरी उपमा क्या दी जाए? यह सोचने के बाद ही कदाचित कोई दूसरा शब्द मिल सके।”

“यह आपत्ति काल है । इसमें आपत्ति धर्म का ही पालन करना चाहिए । ओछे बचकाने लोगों की तरह बालक्रीड़ा का नहीं। वरिष्ठों पर भी यदि हेय स्तर का अवसाद चढ़ दौड़े तो इसे उनकी विशिष्टता पर लगा हुआ कलंक ग्रहण ही कहा जाएगा।”

उपरोक्त पंक्तियाँ परमपूज्य गुरुदेव द्वारा अप्रैल 1982 की “अखण्ड-ज्योति” के विशिष्ट सम्पादकीय के रूप में तब लिखी गयी थीं, जब वे पूरे भारत के दौरे से लौटकर आए थे व आस्था संकट की विभीषिका का दृश्य रूप चर्मचक्षुओं से देखकर उनने एक मार्मिक लेख लिखा था-”क्या काफिला बिछुड़ ही जायेगा ?” आज दस वर्षों के बाद यदि हम स्थिति का सर्वेक्षण करना चाहें तो पायेंगे कि उनकी अपेक्षा समय के अनुरूप कितनी विकट थीं व अब और भी कुछ बढ़ी-चढ़ी मात्रा में हमारे समक्ष है। प्रतिभाओं से, जागृतात्माओं से उनने अपनी मर्मस्पर्शी शैली में एक ही बात कही थी कि “समय की चुनौती प्रतिभाओं को कान पकड़कर झकझोर रही है इसके उत्तर में निर्णय उन्हीं को लेना है कि वे दाँत निपोरें या सीना तानें।”

वस्तुतः परमपूज्य गुरुदेव को संस्कृति पुरुष की मान्यता दी जाय तो अत्युक्ति न होगी । भारतीय संस्कृति को देवसंस्कृति-विश्वसंस्कृति की उपमा देते हुए अपने समग्र साहित्य में उनने उसी के तत्वदर्शन के आधार पर विश्व की आज की समस्त समस्याओं के हल की बात कही- उनका सारा जीवन, सारी सामर्थ्य व सारी सिद्धियां मात्र एक ही उद्देश्य के लिए होम हुए और वह था भारतीय संस्कृति को पुनः उसका पूर्ववत् स्थान दिलवाना, उसे विश्व संस्कृति की मान्यता दिलवाना। इसके लिए भारतीय संस्कृति के तत्वदर्शन को घर घर पहुँचाने वाले देवमानवों से जागृतात्माओं से आगे बढ़-चढ़ कर अपना पराक्रम दिखाने, अधिक सक अधिक समय समाज के लिए देने की उनकी अपेक्षा थी । भारतीय संस्कृति के प्रति यही कसक, मर्मान्तक पीड़ा मन में लिए उनके जीवन का एक एक क्षण जिया गया तथा अंतिम साँस तक वह ब्रह्मबीज के गलने, का ब्रह्मकमल के खिलने एवं देवसंस्कृति के निर्धारणों के ही आधार पर अगले दिनों सतयुग की वापसी की बात कहते रहे । सूक्ष्म व कारण सत्ता से अतिविराट व्यापक रूप में उनकी उपस्थिति हम सब अनुभव करते हैं व विगत दो वर्षों में हुई उपलब्धियाँ बताती हैं कि उनका संदेश विश्व के कोने-कोने तक पहुँचा हैं व अनेकों के मनों से उसने मथा है। अतः उसी प्रक्रिया को अग्रगामी बनाने हेतु यदि हम परमपूज्य गुरुदेव की पुण्यतिथि पर 8,9,10, जून 1992 की तिथियों में एक विराट शपथ समारोह के माध्यम से देवसंस्कृति के विस्तार का संकल्प लेते हैं तो उनकी प्रतिभाओं से की गयी अपेक्षाओं को पूरा करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम आगे बढ़ाते हैं।

शपथ समारोह किसी उद्देश्य विशेष के लिए एकत्र हुए सदाशयता सम्पन्न लोकसेवियों का एक विशिष्ट समागम है। ये सभी समय की विषमता को दृष्टिगत रख, युग की समस्याओं का हल सुझाने वाली देव संस्कृति जो पूर्णतः विज्ञान सम्मत भी है, के निर्धारणों के विश्वव्यापी विस्तार के निमित्त तीन दिवसीय ज्ञान यज्ञ में भाग लेंगे तथा अंतिम दिन गायत्री जयंती 10 जून को एक साथ गंगाजल व परमपूज्य गुरुदेव की जन्मस्थली आँवलखेड़ा की रज हाथ में लेकर शपथ लेंगे कि आगामी नौ वर्षों में हम इस प्रतिपादन के विस्तार हेतु बढ़ चढ़ कर समय व सम्पदा का एक बड़ा अंश नियोजित करेंगे। यह अपनी तरह का एक ऐसा संकल्पित अनुष्ठान होगा जो संघशक्ति की सामर्थ्य के साथ जुड़कर हजारों-लाखों गुना प्रतिध्वनित हो पूरे ब्रह्माण्ड में अपना शक्ति-प्रभाव फैलाएगा तथा देखते-देखते सतयुग की वापसी का सरंजाम जुटाएगा ।

वस्तुतः भारतीय संस्कृति जो कि प्राचीनतम है, में जीवन के हर पक्ष को स्पर्श करने वाली विभिन्न आदर्शवादी दिशाधाराओं का समावेश है। विचार परिष्कार से लेकर चरित्रनिष्ठ एवं समाज के नवनिर्माण के वे सभी तत्व उसमें विद्यमान हैं, जो मानवी गरिमा को अक्षुण्ण बनाए रख उसका मार्ग दर्शन करने में सक्षम हैं । मानव में देवत्व, धरती पर स्वर्ग, तथा सतयुग के अवतरण की समस्त संभावनाएँ देवसंस्कृति के निर्धारणों में समाई हुई हैं। समझदारी ईमानदारी, जिम्मेदारी, बहादुरी के चारों तत्व उसमें इस प्रकार समाविष्ट हैं कि उन्हें अपनाने वाला सच्चे अर्थों में महामानव ऋषि स्तर का महापुरुष बनता चल सकता है।

इसे एक विडम्बना ही कहा जा सकता है कि जब सारे विश्व में भारतीय संस्कृति के प्रति श्रद्धा जागी है, जानने व अनुकरण करने की वृत्ति उमगने लगी है, तब हमारे अपनी ही संस्कृति के अनुचर, हमारी संतानें देव संस्कृति से सर्वथा अपरिचित-अनभिज्ञ होती व विदेशी सभ्यता को जीवन में उतारती नजर आ रही हैं। संभवतः विगत 45 वर्षों में हमें राजनीतिक दासता से मुक्ति मिली है, हमने भारतीय संस्कृति को भूलने व पाश्चात्य सभ्यता का अंधानुकरण अधिक से अधिक करने की दिशा में कदम बढ़ाए हैं। दो सहस्राब्दियों का अनाचार-अंधकार भरा युग भी हमारी मानसिक तथा साँस्कृतिक गौरवगरिमा को अक्षुण्ण बनाए रख उसे युगानुकूल बनाते हुए अपने देशवासियों व समस्त विश्वसुधा के नागरिकों का शिक्षण ही नहीं, नेतृत्व भी करें । इसके लिए सर्वप्रथम हमारे देश के लोगों को ही सर्वप्रथम संस्कृति की प्रेरणाओं, तत्वदर्शन एवं व्यावहारिक पक्ष की जानकारी करानी होगी।

भारतीय संस्कृति मानवधर्म की बड़ी विशिष्ट व्याख्या करती है जो आज की परिस्थितियों में अभीष्ट भी है। आदि पुरुष मनु कहते हैं-

वेदस्मृतिः सदाचारः स्वस्थ च प्रियमात्मनः । एतच्चतुर्विधं प्राहुः साक्षात् धर्मस्य लक्षणम्॥

वेदों को अपौरुषेय वाणी मानते हुए वेद और शास्त्रों को प्रमाण मानकर एक प्रकार से आत्मानुशासन की बात ऋषि कहते हैं । सदाचार को महत्व देते हुए वे उसे व्यावहारिक धर्म कहते हैं । सबसे बड़ी विशेषता जो देवसंस्कृति में है, वह है विवेक का अनुपालन करते हुए मूल्यों का युगानुकूल निर्धारण तथा समस्याओं का परिस्थितियों के अनुरूप समाधान । इसके लिए प्रमाण वेदों को माना गया है जो कि निरन्तर कठोर तप करने वाले पुरुषार्थ परायण, ब्रह्मनिष्ठ जीवन जीने वाले, व्यक्तिगत रागद्वेष से परे, सत्य की खोज में जीवन होम कर देने वाले ऋषिगणों की अन्तःस्फूर्त प्रज्ञा में प्रतिबिम्बित सत्य हैं। अतः यह किसी एक पुरुष की वाणी नहीं, समष्टिगत जाग्रत प्रज्ञा की अभिव्यक्ति के रूप में अपौरुषेय वाणी कही जाती है। इनमें शब्द की कम व अर्थ की प्रधानता अधिक है।

सृष्टि के प्रारंभ से अब तक मूल्यों की व्यवस्था देते चले आ रहे दो प्रधान तत्व भारतीय संस्कृति में “सत्य “और ऋतु कहे गये हैं दोनों मिलकर एक धारा प्रवाह बनाते हैं, जिसे ‘धर्म ‘ कहते हैं। धर्म का एक स्वरूप स्थिरता प्रदान करता है व दूसरा उसे गति प्रदान कर आगे बढ़ाता है। इसे इसी कारण “सनातन धर्म” भी कहा गया हैं । यह धर्म यह नहीं कहता न मानता है कि मनुष्य को अपने गन्तव्य या लक्ष्य की प्राप्ति केवल एक उपाय या मार्ग का अवलम्बन लेने से होती है। अपितु वह यह स्वीकार करता है कि मार्ग असंख्यों हैं, अनेकानेक उपाय हैं, सभी अपनी अपनी जगह सही हैं किसी भी मार्ग-मत संप्रदाय को तिरस्कार से न देखकर हर व्यक्ति स्वधर्म को पहचाने, अपनी योग्यता के अंतर्जगत की क्षमताओं के आधार पर धर्म का निर्धारण करें । आज के समय की साम्प्रदायिक अलगाव व पारस्परिक विद्वेष की समस्या का इससे श्रेष्ठ समाधान और क्या हो सकता है?

भारतीय संस्कृति की कुछ मोटी लाक्षणिक मान्यताएँ हैं। यथा नदी, पर्वत, वृक्ष में देवता की भावना करना उन्हें सम्मानपूर्वक पूजना व उनके पारस्परिक संतुलन को बनाए रखने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाना। यही नहीं देवशक्तियों की तृप्ति हेतु नियमित यज्ञ करना ताकि उन्हें सूक्ष्म हवि के रूप में सामग्री मिले। परिस्थिति की असंतुलन पर्यावरण की सुरक्षा ही नहीं उससे अटूट लगाव हेतु भारतीय संस्कृति की यह विज्ञान सम्मत स्थापना है। विश्व ब्रह्माण्ड के विग्रह के रूप में देवालयों की स्थापना, आत्मशुद्धि हेतु व्रत-उपवास, दैनंदिन व्यवहार में बहिरंग व अन्तरंग की शुचिता का अभ्यास, प्राणिमात्र के साथ करुणा व सहानुभूति व्यवहार, योगाभ्यासों का पालन, माता-पिता और गुरु को देवसत्ताओं के समकक्ष मानना, पत्नी को सहधर्मचारिणी मानते हुए गृहस्थ संस्था का संचालन, श्रेष्ठ ग्रन्थों का स्वाध्याय व संतों-आचार्यों का सत्संग, तीर्थ यात्रा को जीवन में स्थान देना, देवता-पितर-ऋषि और मनुष्य मात्र के प्रति स्वयं को ऋणी मानते हुए उस ऋण से उऋण होने में ही जीवन की सफलता मानना जैसी कुछ ऐसी विज्ञान सम्मत मान्यताएँ भारतीय संस्कृति की हैं जो उसे आज युगधर्म देने के नाते सर्वांगपूर्ण बनाती हैं।

मोटे तौर पर देवसंस्कृति जिसके माध्यम से हम आस्था संकट का परित्राण होना सोचते हैं व जिसके शिक्षण की एक सुनियोजित प्रक्रिया का शुभारंभ करना चाहते हैं तीन भागों में विभाजित की जा सकती है।

संस्कृति का चिन्तन-दर्शनपक्ष-यह मूलतः भारतीय अध्यात्म का तत्वदर्शन वाला पक्ष है जिसमें वेद उपनिषदों -दर्शन ब्राह्मण- आरण्यक आदि आर्ष वाङ्मय का परिचय समसामयिक संदर्भ में आता है। यह वह शाश्वत चिन्तन है जिसके आधार पर सारी मान्यताओं का निर्धारण संभव बनाया जाता है। मानवी व्यक्तिगत के विभिन्न स्तर, उससे जुड़ी समस्याएँ व समाधान हेतु साधना पद्धतियों का निर्धारण भी उसी में आता है। मन, आत्मा, मोक्ष, परलोक और पुनर्जन्म की व्याख्याएँ इसी धारा में स्पष्ट की जाती हैं। वेदों का सार है गायत्री व उसकी समग्र व्याख्या इसी चिन्तन पक्ष में आती हैं। गायत्री सार्वभौम है, विश्वमाता है व आने वाले भविष्य के समाज का आधार बनेगी । गायत्री की दार्शनिक व व्यवहारिक विवेचना, उपासना पद्धतियाँ, प्राणाग्नि-कुण्डलिनी तथा मंत्र शक्ति का विज्ञान सम्मत विवेचन इसी पक्ष के अंतर्गत आता है।

संस्कृति का व्यवहार -क्रियापक्ष- इसमें सभी साँस्कृतिक प्रतीक यथा शिखा - सूत्र, देवता, बहुदेववाद, तीर्थ कर्मकाण्ड, षोडश संस्कार, पर्व-त्यौहार, यज्ञ, मूर्तिपूजा,खानपान, वेशभूषा, रीति रिवाज, युगानुकूल प्रचलन तथा गृहस्थ जीवन व परिवार संस्था से जुड़ी वर्जनाएँ व दायित्व आदि का क्रियापरक व्यावहारिक पक्ष आ जाता है। इन सभी की व्याख्या आत्मशिक्षण व लोकशिक्षण के परिपेक्ष में मनोविज्ञान की परिधि में रहकर कैसे की जा सकती है, इसका ऊहापोह इसी वर्गीकरण में होता है।

सतयुगी समाज भारतीय संस्कृति के परिपेक्ष में - इसी वर्गीकरण का मूल उद्देश्य है व्यक्ति-प्रकृति और समाज के ऋषि युगीन संबंधों के बहुविधि पहलुओं पर प्रकाश डालते हुए अतीत का मूल्याँकन करते हुए आज की परिस्थितियों के अनुरूप सतयुगी व्यवस्था का चिन्तन करना। उन सभी कारणों व तत्वों पर प्रकाश डालना जिनकी वजह से ऋषि सतयुग की व्यवस्था कर सकें। साँस्कृतिक कार्यक्रम के माध्यम से, संवेदना के जागरण द्वारा नये समाज की परिकल्पना किन आधारों पर की जा सकती है, यह इस विभाजन का मूल उद्देश्य है। आज राजनीतिक आधार पर जुड़े सारे देश, समूह व वर्ग टूटते जा रहे हैं। यदि हमें राष्ट्र की एकता-अखण्डता को बनाये रखना है, एक विश्वसंस्कृति का प्रचार- प्रसार करना है तो वह पारस्परिक संबंधों की संवेदना के आधार पर बनी घनिष्ठतम अवस्था द्वारा ही संभव है। उज्ज्वल भविष्य का स्वरूप जो दृष्टाओं, महामानवों, भविष्य वक्ताओं ने देखा कैसे व किन माध्यमों से स्पष्ट होता चलेगा, यह स्पष्टीकरण संस्कृति के संवेदना पक्ष की व्याख्या करते हुए जब सामने रखा जायेगा तब वे सभी संभावनाएँ साकार होती चली जायेंगी, जिनकी घोषणा पूज्यवर कर गए हैं।

वस्तुतः भारतीय संस्कृति एक विचार करने की शैली, जीवन जीने की क्रियापद्धति तथा वैशिष्ट्य पर आधारित एक सर्वांगपूर्ण चिन्तन पद्धति का नाम है इसका अतीत का गुणगान तो बहुत हो चुका, अब जरूरत है, युगानुकूल संदर्भों में इसके शाश्वत जाज्वल्यमान स्वरूप के प्रस्तुतीकरण की । जीवात्मा को अनन्त संभावनाओं से अभिपूरित बताते हुए उसे परमात्मा बनाने के उपक्रम का और तदनुसार निर्धारित जीवन पद्धति का नाम ही हिन्दु या देवसंस्कृति है। विज्ञान की तरह ही भारतीय संस्कृति भी मनुष्य को, जीवन को, विराट यात्रा की तरह जीने की प्रेरणा देती है। जो चाहें इस क्रम में आत्मिक प्रगति हेतु साधन योगाभ्यास का अवलम्बन ले सकते हैं । जो इसे कठिन समझे, वे समूची जीवन पद्धति को ऐसी बना सकते हैं जिससे भौतिकवादी जीव जीते हुए भी मनुष्य अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकें। यथा खानपान, रहन−सहन, अनुशासन-शिष्टाचार, संस्कार, पर्व रीति-रिवाज वेशभूषा आदि में साँस्कृतिक मूल्यों की प्रतिष्ठापना करते हुए सामाजिक जीवन जीना।

षोडश संस्कारों में व्यक्ति निमार्ण के सूत्र- भारतीय संस्कृति मानव जीवन को एक विराट यात्रा का एक महत्वपूर्ण अध्याय मानते हुए मानव के जन्म के पूर्व से मरणोत्तर विराम तक के महत्वपूर्ण मोड़ों की समुचित व्यवस्था संस्कार प्रक्रिया के माध्यम से हमें समझाती हैं। व्यक्तित्व के विकास की सारी संभावनाएँ षोडश संस्कारों में छिपी पड़ी हैं। ऋषियों की ये व्यवस्था अपने आप में इतनी समर्थ और सर्वांगपूर्ण है कि इस प्रक्रिया से निकले हुए निश्चित ही प्रतिभावान ही बनते हैं । संस्कार एक प्रकार से ऐसी खराद प्रक्रिया है जो कोयले को तराशकर हीरा, मिट्टी को सोना, अनगढ़ पत्थर को पूजा योग्य प्रतिमा तथा पतन की ओर बढ़ती वृत्ति को ऊर्ध्वगामी बनाकर जीवन को उल्लेखनीय ऊँचाई तक पहुँचा देती है। हमारे ऋषियों ने पाया कि माँ के गर्भ में आने से लेकर चिन्ता में अग्नि को समर्पित होने तथा उसके बाद के विभिन्न योनिक्रमों में यदि जीवात्मा को सँभाला व सँवारा न जाय तो मनुष्य जीवन की गरिमा को भुलाते हुए नरपशु, नरपिशाच, नरपामर का जीवन जीता चला जाता है। इन सभी महत्वपूर्ण मोड़ों पर सावधान करते हुए जीवात्मा में विद्यमान दोषों का निवारण कर गुणों का विकास करने व योग्यता को धारण कराने की प्रक्रिया संस्कार प्रक्रिया है। जैमिनी ने कहा है कि “जिसके होने पर कोई पदार्थ होने योग्य हो जाता है, उसे ही संस्कार कहते हैं (पूर्व मीमाँसा)” । संस्कार एक प्रकार से नया जन्म है।

चिन्ह पूजा के रूप में सोलह संस्कारों का प्रचलन अभी भी है पर वैज्ञानिक मनोवैज्ञानिक तथा आध्यात्मिक प्रशिक्षण के अभाव में वे मात्र कर्मकाण्ड और पैसे का अपव्यय मात्र बनकर रह जाते हैं विवाह संस्कार जैसे गृहस्थ प्रवेश वाले महत्वपूर्ण संस्कारों की आज जो दुर्गति हुई है, वह सभी के समक्ष है। संस्कारों का प्रचलन जब भी शिक्षण के साथ जुड़कर हमारे देश में हुआ । हमारा यह देश “स्वर्गादपि गरीयसी “ बना रहा । आज उस शिक्षण प्रशिक्षण के अभाव में समाज में भटकाव तथा आस्था संकट की विभीषिका का संकट सामने खड़ा प्रत्यक्ष नजर आता है। परमपूज्य गुरुदेव ने संस्कारों को अति महत्वपूर्ण मानते हुए उसके सारी विश्ववसुधा में विस्तार की बात विज्ञान-सम्मत ढंग से कही ताकि हमारी साँस्कृतिक विरासत अक्षुण्ण बनी रहे व प्रतिभाओं का नियमित उत्पादन होता रहे । आज देवसंस्कृति विस्तार के परिपेक्ष में सर्वाधिक आवश्यकता संस्कारों के माध्यम से लोकशिक्षण की समझते हुए भारत में स्थान -स्थान पर संस्कार महोत्सवों का प्रदर्शनयुक्त आयोजन करने तथा भारत में बाहर विश्व भर में बड़े स्तर के 28 संस्कार महोत्सवों के आयोजन की बात इन्हीं दिनों सोची गयी है।

यूँ तो सोलह संस्कारों में गर्भाधान, पुँसवन, सीमान्त, जातकर्म, नामकरण, निष्क्रमण, अन्नप्राशन, चूड़ाकर्म, कर्णवेध, उपनयन, वेदारंभ, समावर्तन, विवाह, वानप्रस्थ, संन्यास व अन्त्येष्टि यह क्रम से वर्णित किए गए हैं। किन्तु आज के समय में जो व्यवहारिक नहीं है या जिनकी उपयोगिता नहीं रही उन छः को छोड़कर तथा जन्मदिवस, विवाह दिवस जैसे आज के दो महत्वपूर्ण संस्कारों को छोड़कर कुल बारह संस्कार ऐसे हैं जो अपनी वैज्ञानिक महत्ता से सारे समाज को नयी दिशा दे सकते हैं। ये है पुँसवन, नामकरण अन्नप्राशन, चूड़ाकर्म, उपनयन, विद्यारम्भ, विवाह, वानप्रस्थ, अन्त्येष्टि तथा श्राद्धतर्पण जन्मदिवस व विवाह दिवस संस्कार।

शाँतिकुँज में उपरोक्त सभी संस्कारों के समुचित विज्ञान-मनोविज्ञान सम्मत प्रशिक्षण की न केवल व्यवस्था बनाई गयी है इसके विकेन्द्रीकरण का तन्त्र भी प्रस्तुत समारोह के माध्यम से करने की बात सोची गया है। परमपूज्य गुरुदेव के द्वारा लिखी गई पर्व, संस्कार, गायत्री यज्ञों व षोडश संस्कारों संबंधी पुस्तकों के कारण अब बुद्धिजीवी समाज भी संस्कारों के महत्व के बिना किसी ननुनच के स्वीकारने लगा है। अब आवश्यकता है इसे आँदोलन बनाते हुए देव संस्कृति के राष्ट्रव्यापी, विश्वव्यापी विस्तार करी तथा इस प्रयोजन हेतु समर्पित सुयोग्य कार्यकर्ताओं की । विगत एक वर्ष में शाँतिकुँज द्वारा सामूहिक स्तर पर स्थानीय गतिविधि के रूप में पूर्णिमा पर्वों पर संस्कारों का सम्पूर्ण साज सज्जा विधिविधान से शिक्षण का क्रम चला। कृत्य तो सम्पन्न होते ही रहे साथ ही शक्ति साधना वर्ष में स्थान स्थान पर अखण्ड जप आयोजन के साथ ये कार्यक्रम संपन्न हुए। इन सभी आयोजनों के पूरे दक्षिण भारत,पूर्वी भारत, पंजाब व जम्मू कश्मीर क्षेत्र तक विस्तार के निमित्त अगणित लोकसेवियों के समय की अब आवश्यकता प्रतीत हो रही है। अपने अपने क्षेत्रों में कार्यरत मूर्धन्य प्रतिभाओं को तलाशने के लिए ही यह विराट शपथ समारोह आयोजित किया जा रहा है।

शपथ समारोह में भागीदारी करने वालों के लिए अनिवार्य अनुबंध-

वे ही लोग शपथ समारोह में भाग लेंगे जो न्यूनतम अनिवार्य व्रतों के पालन का संकल्प लें व निभा सकें।

(1) प्रतिवर्ष न्यूनाधिक तीन माह का समय शान्तिकुँज के लिए देना। नियोजन केन्द्र द्वारा जो हो उसे स्वीकार किया जाना ।

(2) अथवा एक लोकसेवी परिव्राजक की तीन माह की अवधि के लिए ब्रह्मवृति जीवन निर्वाह का प्रबंध करना।

(3) शक्ति संचार साधना के वे भागीदार जो नियमित उपासना एक घण्टा व बीस पैसा प्रतिदिन अथवा एक दिन की आजीविका माह में एक बार शाँतिकुँज को देवसंस्कृति विस्तार के निमित्त देने के अनुबंध का पालन करें।

(4) आगामी वर्ष पूरे भारत व विश्व में संपन्न होने जा रहे संस्कार महोत्सवों का स्थानीय स्तर पर आयोजन करने का जो संकल्प लें।

(5) जून 92 से फरवरी 93 तक की अवधि में शाँतिकुँज में आयोजित बुद्धिजीवी वर्ग के सम्मेलनों में दस अपने परिचय के प्रतिभावानों को भेजने- भेजने से पूर्व उनका मानस तैयार करने के उद्देश्य से उन्हें “अखंड ज्योति” के तत्वदर्शन से जोड़ने के व्रत का जो परिपालन करें।

व्रतधारण के पश्चात् की विधि-व्यवस्था- व्रतधारियों को नियमित रूप से देव संस्कृति का पत्राचार पद्धति से विधिवत शिक्षण दिया जायेगा। सैद्धान्तिक एवं व्यावहारिक पक्ष की विस्तृत व्याख्या वाला शिक्षण डाक द्वारा तथा “अखंड ज्योति” पत्रिका के जून 92 से दिसम्बर 92 तक के नौ विशेषांकों के माध्यम से होता रहेगा। प्रतिमाह दो बार दो पाठ डाक से नियमित भेजे जायेंगे। छः माह पश्चात् पत्राचार परीक्षा और परीक्षाफल के आधार पर लोकसेवी कार्यकर्ताओं की कार्यक्षमता व क्षेत्र के निर्धारण कर उन्हें केन्द्र द्वारा मार्गदर्शन दिया जायेगा। व्रतधारी अपने शहर में स्थानीय स्तर पर जनसभा बुद्धिजीवी सम्मेलन, संगोष्ठी अथवा व्यापक स्तर पर देवसंस्कृति महोत्सवों का आयोजन करेंगे व इनके माध्यम से साँस्कृतिक तत्वज्ञान का जन-जन तक विस्तार करेंगे। तीन माह के उनके समयदान का निर्धारण कहाँ व कैसे हो, यह व्यवस्था केन्द्र करेगा।

शपथ समारोह कार्यक्रम की रूपरेखा

यह समारोह केवल तीन दिन का है 8-9-10 जून की तारीखों में । 10 जून गायत्री जयंती गंगा दशहरे का दिन है। आँवलखेड़ा होकर पूज्यवर की जन्मस्थली की रज लेकर आने वाले स्वीकृति प्राप्त वाहनों को छोड़कर सभी लोग 7 जून की शाम या रात्रि तक आ जायेंगे। ठहराने भोजन आदि की व्यवस्था शाँतिकुँज के आसपास के सहयोगी आश्रमों की निजी जमीनों व शाँतिकुँज में की गयी है। 8 जून को प्रातःकाल शोभा यात्रा की अगवानी की जायेगी जो 6 जून को आँवलखेड़ा से रवाना होकर 8 जून की प्रातः हरिद्वार 501 बसों गाड़ियों के काफिले के रूप में आएगी। प्रतिदिन 108 वेदीय यज्ञशाला में संकल्पित शक्ति−संचार साधना करी पूर्णाहुति का क्रम चलेगा जिसमें सभी को समान अवसर मिलेगा। 12 संस्कारों का दृश्य प्रदर्शन अलग से विनिर्मित एवं संस्कारशाला में चलेगा। दीक्षा संस्कार स्वयं परम वंदनीया माताजी के श्री मुख से संपन्न होगा। सभी परिव्राजक जो व्रत लेंगे एकसी वसंती वेशभूषा धारण कर परमपूज्य गुरुदेव की जन्म स्थली की रज व सप्तसरोवर कास गंगाजल हाथ में लेकर देवसंस्कृति के उद्धार व विस्तार की शपथ 10 जून को लेंगे। उसी दिन महापूर्णाहुति, वंदनीय माताजी का उद्बोधन व एक विराट ब्रह्मदीप यज्ञ भी संपन्न होगा।

शोभा यात्रा का स्वरूप एवं व्यवस्था- मध्यप्रदेश, राजस्थान, गुजरात, उत्तरप्रदेश, उड़ीसा, महाराष्ट्र व दक्षिण भारत में आने वाली बसें, कारें, जीपें, मेटाडोर आदि वाहन जिन्हें शाँतिकुँज से शोभा यात्रा में भाग लेने की अनुमति प्राप्त है कुल पाँच सौ एक संख्या में 5 जून की शाम आँवलखेड़ा ग्राम पहुँचेगी जहाँ परमपूज्य गुरुदेव की जन्मस्थली पर शक्तिपीठ स्थापित है । इससे शोभायात्रा में भागीदारी हेतु पंजीयन आरम्भ हो चुका है। सभी आंवलखेड़ा शक्तिपीठ में स्थापना हेतु अपने-अपने स्थानों शक्तिपीठों प्रज्ञा संस्थानों की जल-रज लेकर आएँगे। 6 जून की प्रातः जुलूस आँवलखेड़ा से प्रस्थित हो दोपहर को अलीगढ़ व शाम को बुलन्दशहर पहुँचेगा। रात्रि विश्राम कर 7 जून की सबेरे रवाना होकर दोपहर मेरठ व शाम को रुड़की पहुँचकर विश्राम करेगा। रात्रि में दोनों ठहरने के स्थानों पर सामूहिक भोज समूहगान- कैम्पफयर की व्यवस्था रहेगी। 8 जून की प्रातः यह जुलूस रुड़की से चलकर नौ साढ़े नौ तक हरिद्वार में प्रवेश करेगा। आँवलखेड़ा से हरिद्वार तक गणवेशधारी मोटर साइकिल सवार पायलेटिंग करेंगे तथा वीडियोवॉन, एंबुलेंस एवं मेकेनिक-रिपेयर आदि के समान से सुसज्जित वाहन साथ चलेंगे। सभी गाड़ियों पर मिशन के निर्धारित वाक्यों से सुसज्जित बैनर्स होंगे तथा लाउडस्पीकर द्वारा सत्त जयघोष, गीतों का क्रम चलता रहेगा। आँवलखेड़ा आगरा जिले में यमुना पार करके आगरा से हाथरस के मार्ग पर रामबाग चौराहे से चलकर टेढ़ी बगिया नामक तिराहे से जलेसर की ओर जाने वाली सड़क पर चौबीस किलोमीटर दूर स्थित है । सड़क पक्की है। गर्मियों के दिन होंगे। भोजन की व्यवस्था है फिर भी सूखा नाश्ता, दलिया, कनातें, बिछावन गाड़ी के साथ लेकर चलें।

जो भी परिजन वाहनों द्वारा जुलूस में भागीदारी करना चाहते हैं, वे अभी से वाहन का प्रकार, नंबर और साथ आने वालों की सम्मिलित जानकारी अलग पत्र से भेजें । गाड़ी के बीमा, रजिस्ट्रेशन पेपर्स, सभी साथ रखें ताकि चेकिंग आदि होने पर परेशानी न हो। जुलूस का अनुशासन यातायात व्यवस्था का क्रम बिठाने के लिए शांतिकुंज के वरिष्ठ कार्यकर्ता कानवाय के साथ चलेंगे। मार्ग में आवास, भोजन की व्यवस्था स्थानीय शाखाओं के परिजन साथ लेकर चलें। वृद्ध, बीमार, बहुत छोटे बच्चों को साथ लेकर न आयें।

चूंकि अभी से आवेदन बड़ी संख्या में आ रहे हैं अतः दर्शन कौतुक के लिए आने वाली भीड़ को अभी से मना किया जा रहा है। मात्र उन्हीं को आने को कहा जा रहा है जो व्रतधारी बनकर न्यूनाधिक तीन माह का समय या उतनी अवधि के लिए एक परिजन की ब्राह्मणोचित वृत्ति का देने का संकल्प लेकर आयेंगे । सभी यह ध्यान रखें कि आवास व्यवस्था श्रद्धाँजलि कार्यक्रमों की तरह टेण्टों, शामियानों में रहेगी। कोई भी स्थान विशेष व आग्रह लेकर न पत्र लिखें, न आयें। शिक्षक जन यदि जून माह होने के कारण आना चाहें तो विशिष्ट शिक्षक सम्मेलनों में जो 16 से 20 जून, 21 से 25 जून व 26 से 30 जून की अवधि में आयोजित है, अपनी भागीदारी अभी से पत्र लिखकर सुनिश्चित कर लें। प्रबुद्ध वर्ग के इन सम्मेलनों में भी संस्कारों का प्रदर्शन व शपथ का क्रम चलता रहेगा

कहना न होगा कि यह आयोजन पुण्य और सौभाग्य की दृष्टि से कितनी महती उपलब्धियों भरा होगा । अक्टूबर 90 में संपन्न हुए संकल्प श्रद्धाँजलि समारोह के विराट रूप द्वारा परिजनों व जन सामान्य को ब्रह्मबीज से ब्रह्मकमल के बनकर विकसित हो खिलने की एक झाँकी परोक्ष सत्ता द्वारा दिखाई जा चुकी है। यदि बदलते समय की इस वेला में सबको महाकाल की युग प्रत्यावर्तन प्रक्रिया पर थोड़ा भी विश्वास हो तो उन्हें देवसंस्कृति के उद्धार व विस्तार हेतु किए जा रहे इस पुरुषार्थ प्रयास को अब अनदेखा न कर समय व साधनों को समाज देवता के निमित्त समर्पित करने हेतु बढ़ चढ़कर आगे आना चाहिए । यह आह्वान हर उस व्यक्ति के प्रति है, जिसके मन में देश, धर्म, समाज, संस्कृति के लिए पीड़ा है, अंतरंग में संवेदना है व ऐसी बेचैनी है जो उन्हें चैन से बैठने नहीं दे रही। युग देवता को इन सबकी ही प्रतीक्षा है।


बुद्धिजीवियों के 5 दिवसीय सत्रों की लम्बी शृंखला


VigyapanSuchana

प्रतिभावान मूर्धन्यों से समाज की समर्थ सृजनशक्ति के रूप में उभरने का आह्वान करते हुए प्रज्ञा अभियान, युगनिर्माण योजना द्वारा बुद्धिजीवी समुदाय के विभिन्न वर्गों के 5-5 दिन के सम्मेलन शपथ समारोह के तुरंत बाद आयोजित किए जा रहे । संस्कारों के भव्य प्रदर्शन, ज्ञान संगोष्ठी व देवसंस्कृति विस्तार की शपथ का क्रम इनसे अनवरत चलता रहेगा। इन सम्मेलनों की तिथियाँ इस प्रकार हैं-

शिक्षक एवं शिक्षा जगत से जुड़े अधिकारीगण-16 से 20 जून। 21 से 25 जून। 26 से 30 जून 92।

देवस्थापना जिनके यहाँ हुई है व किसी सत्र में सहभागिता न कर पाये हों-10 से 14 जुलाई 92।

शक्ति पीठों के ट्रस्टीगण, कार्यकर्ता व संबद्ध परिजन -संबद्ध परिजन-17 से 21 अगस्त 92।

चिकित्सक व स्वास्थ्य सेवा से जुड़े परिजन 11 अक्टूबर से 15 अक्टूबर 92 ।

व्यावसायिक उद्योगपति, बैंक कर्मचारी, चार्टड एकाउन्टेंट 7 से 11 नवम्बर 92 ।

इंजीनियर्स, आर्चीटेक्ट, तकनीकी शिल्पी, डाक तार संचार आदि। 12 से 16 नवम्बर 92।

न्यायपालिका से संबद्ध अधिकारी, एडवोकेट, पुलिस प्रशासन-18 से 22 नवम्बर 92।

प्रशासनिक अधिकारी, कलेक्ट्रेट तहसील से लेकर ग्रामसेवक तक 24 से 28 नवम्बर 92।

जन प्रतिनिधि एम. पी., एम. एल. ए. ब्लॉक प्रमुख, सरपंच 1 दिसम्बर से 5 दिसम्बर 92।

कृषक वर्ग-7 दिसम्बर से 11 दिसम्बर 92।

नारी शक्ति (प्रथम सम्मेलन) 13 से 17 दिसंबर 92 ।

नारी शक्ति (द्वितीय सम्मेलन) 19 से 23 दिसंबर 92।

शिक्षक वर्ग चतुर्थ सम्मेलन 26 से 30 दिसंबर 92।

लोकसेवी संगठन, लायन्स, रोटरीज, जातीय संगठन, समाजसेवी 1 से 5 जनवरी 93।

पत्रकार, साहित्यकार, गीतकार, कलाकार, संगीतकार, चित्रकार आदि 4 से 11 जनवरी 93।

स्नातक वर्ग, शिक्षित बेरोजगार-13 से 17 जनवरी 93।

जो इन सब में न आए हों, वे 19 से 23 जनवरी 93 की तिथियों में तथा

देवस्थापना वाले परिजन (द्वितीय सम्मेलन) 24 से 28 जनवरी 93 ।

नोट : आगामी वर्ष वसंत पंचमी 28 जनवरी 1993 की है।

*समाप्त*