परिष्कार की प्रवृत्ति सामाजिक क्षेत्र में सभ्यता और आंतरिक क्षेत्र में संस्कृति कहलाती है। शिल्पी, कलाकार, चिकित्सक, शिक्षक , विज्ञानी आदि वर्गों के लोग अपने श्रम और मनोयोग का नियोजन सृजनात्मक प्रयोगों के लिए , अनगढ़ को सुगढ़ बनाने के लिए करते हैं। धरती, जिस पर हम रहते हैं, को प्रचंड पुरुषार्थ के बाद हमने वह रूप दे दिया है जिसमें कि आजकल हम रह रहे हैं। मनुष्य के संकल्प , श्रम व कौशल के आधार पर ही धरती रहने योग्य बन सकी। मनुष्य को सृष्टि का मुकुटमणि होने का लाभ इसी मार्ग पर चलते हुए मिल सका है। परिष्कार की यह प्रवृत्ति ही मानवी गरिमा और प्रगति कास सार तत्व कही जा सकती है।
मानवी सत्ता इस सृष्टि की सबसे छोटी इकाई है। ईश्वर के बाद वरीयता क्रम में उसी की बारी आती है। उसका परिष्कार कर सकना इतना बड़ा प्रयोग है , जिसे भौतिक प्रगति के लिए खड़े किये गये आधारों से कम नहीं, अधिक ही महत्व दिया जाना चाहिए । मनुष्य की कुसंस्कारिता उसके लिए पग-पग पर अवरोध खड़े करती है-असहयोग और आक्रोश बटोरती है, विकृत चिन्तन के कारण शारीरिक व मानसिक व्याधियों को आमंत्रित करती है। पिछड़ापन , असफलता , उद्विग्नता व असंतोष इसी की परिणति है, इसमें कोई संदेह नहीं। इसके विपरीत जो आत्मसत्ता को सुसंस्कृत कर लेता है, परिष्कृत कर लेता है, वह अपने सुधरे हुए दृष्टिकोण तथा व्यवस्थित क्रियाकलाप के आधार पर सम्मान अजस्र परिमाण में बरसता है।
देव संस्कृति ने उत्कृष्ट चिंतन की पृष्ठभूमि बनाने वाले तत्वज्ञान को “अध्यात्म नाम” दिया है तथा आदर्श कर्तव्य में निष्ठा उत्पन्न करने की प्रक्रिया को “धर्म” कहा है। ‘गायत्री’ महाशक्ति के तत्वज्ञान एवं विज्ञान में धर्म की सारी शिक्षाएँ निहित मानी जा सकती है। आत्मसत्ता के परिष्कार की भारतीय संस्कृति के प्रणेताओं द्वारा प्रतिपादित ये दो विधाएँ उज्ज्वल भविष्य के रूप में सतयुग का मूल आधार है, ऐसी संस्कृति-पुरुष की मान्यता है।
(परमपूज्य गुरुदेव के साथ अंतरंग वार्ता के दौरान हुए प्रश्नोत्तरों की शृंखला, जो विगत माह से धारावाहिक प्रकाशित की जा रही है-विषय है भारतीय संस्कृति एवं हिन्दुत्व )
प्रश्न:-वर्णाश्रम धर्म की व्याख्या आपने प्रगतिशील ढंग से की है, जबकि हिन्दू धर्म के प्रवक्तागण इस संबंध में बड़ा कट्टर रुख रखते हुए जन्म से ही जाति माने जाने की बात कहते हैं?
उत्तर:- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र यह चार वर्ण हैं तथा ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास यह चार आश्रम हैं। यह संस्कृति का शाश्वत विज्ञान है किन्तु यह भी स्पष्ट समझा जाना चाहिए कि वर्णों का , जाति का, विभाजन गुण, कर्म, स्वभाव के आधार पर होता है, न कि जन्म के आधार पर । यदि जन्म से कोई किसी वर्ण में है, पर कर्म तदनुकूल नहीं हैं तो वह जाति से भले ही वह कहा जाता रहे, उसके कर्म ही यह निर्धारण करेंगे कि चिंतन-कर्म कौशल की दृष्टि से उसे क्या संबोधन दिया जाना चाहिए। समाज व्यवस्था का यह आदिकाल से चला आ रहा सुनियोजित क्रम है। चिंतनशील ज्ञानार्जन व अध्यापन में रुचि लेने वाले वर्ग को प्राचीनकाल में ब्राह्मण कहा गया था । दुर्धर्ष साहस , काम का सृजनात्मक उल्लास में प्रयोग करने वालों को ‘क्षत्रिय’ तथा अर्थ व्यवस्था व उसके सुनियोजन में रुचि लेने वालों को वैश्य बताया गया । साधारण रुचि वाले किन्तु श्रमनिष्ठ सेवाभावी व्यक्तियों को जो ऊपर के तीनों ही वर्गों में नहीं आते थे , शूद्र कहा गया। यह विभाजन विशुद्धतः कर्मों के आधार पर व्यक्ति के संस्कारों के अनुरूप किया गया व आज भी यही युगानुकूल है। जन्म से तो सभी शूद्र होते हैं, यह मनु की मान्यता है व आज के मनोवैज्ञानिक की भी किन्तु प्रयास-पुरुषार्थ, साधना-संस्कारादि द्वारा सब ब्राह्मण बन सकते हैं, यह सबकी मान्यता रही है। हमने ब्राह्मणत्व के वर्ण व्यवस्था के अंतर्गत तथा परिव्रज्या, वानप्रस्थ के आश्रम व्यवस्था के अंतर्गत नवजागरण व विस्तार का संकल्प लिया है। निश्चित ही अगले दस वर्षों में पूरा होगा।
प्रश्न:- स्त्रियों के संबंध में मध्यकाल व अब तक के विचारकों का मत उन्हें दोयम दर्जे का मानने का रहा है। आपने न केवल नारी जाग्रति अभियान का शंखनाद किया, इक्कीसवीं सदी को नारी सदी कहा है, इसका क्या आधार है ?
उत्तर:- वस्तुतः संस्कृति के प्रणेताओं ने तो नारी को पूज्य मानकर उसकी स्थान-स्थान पर अभ्यर्थना की है। वेदमंत्रों का साक्षात्कार करने व संहिताओं का निर्माण करने वाली बहुसंख्य तपस्वी नारियाँ हैं। ऋषि व ऋषिकाएँ एक साथ तप -जप-यज्ञ संपन्न करते थे। तब नारी को सम्मान ही नहीं , पुरुष से भी ऊँचा स्थान प्राप्त था। पर व नारी में नारी देहयोनि सौभाग्यवान आत्माओं को ही मिलती है ऐसी संस्कृति की मान्यता रही है किन्तु मध्यकाल में भटकाव के दुर्दिन आए । ऐसा कुछ अनर्थ उन दिनों हुआ कि पूज्यभाव कुदृष्टि में बदलकर उसे वासना की आग में झोंक दिया गया । पुरुष वर्ग के इस षडयंत्र में तत्कालीन धर्मतंत्र प्रवक्ताओं ने भी साथ दिया व शास्त्रों में मिलावट से लेकर नारी के किसी भी धर्म कृत्य में भागीदारी, गायत्री जप करने व यज्ञ संस्कार आदि कराने के अधिकार छीन लिये । कन्या जन्म दुर्भाग्य का सूचक घोषित कर दिया गया व यह भेदभाव इतना बढ़ा कि दोनों की अलग-अलग आचार संहिताएँ बन गयीं। विवाह में दहेज व तत्पश्चात् उत्पीड़न इन सब में उलझी नारी अपनी सभी विशेषताएँ गरिमाएँ भुलाती गयी। बहुत जरूरी था कि धर्म तंत्र से एक आँदोलन जन्म ले व समग्र नारी समुदाय लोक नेतृत्व के क्षेत्र में आगे आए । नारी संवेदना का समुच्चय है। नारी सदी से आशय है- संवेदना जिनकी जाग्रति है, उनका युग । अगले दिनों नारी जैसे विशाल हृदय वाले विश्वमानवता के प्रति विराट स्तर का ममत्व रखने वाले नर व नारी ही देव संस्कृति के माध्यम से समग्र मानवता का मार्गदर्शन करेंगे यह एक भक्तिव्यता है, जो पूरी होनी ही है।
प्रश्न- देव संस्कृति महान है, उसका गौरवपूर्ण अतीत रहा है। फिर भी क्या कारण है कि उसके पक्षधर कहे जाने वाले ही आज मात्र भूतकाल की दुहाई देते दिखते हैं, स्वयं उनके जीवन में वह तत्वदर्शन उतरता नहीं दीखता। उलटे पाश्चात्य संस्कृति उन पर हावी होती जान पड़ती है। इसका क्या कोई समाधान है?
उत्तर:- हमने बार-बार कहा है कि संस्कार परम्परा के पुनर्जागरण तथा धर्मतंत्र से जन-जागरण लोक शिक्षण द्वारा ही धर्म-संस्कृति के नाम पर घर करती जा रही प्रतिगामिताएँ मिटायी जा सकती हैं। भूतकाल के गुणगान से ही नहीं, देव संस्कृति के तत्वदर्शन को जीवन में उतारने से ही नवयुग आयेगा । यह बात हमने अपने आचरण से लेकर लाखों व्यक्तियों के अंतःकरण व चिंतन तंत्र पर प्रयोग करके कही है। हमारा विश्वास है कि बावजूद इस तथ्य के कि पाश्चात्य संस्कृति अपना आधिपत्य जमाती दिख रही है, राष्ट्र का ब्राह्मणत्व जागेगा, प्रबुद्ध वर्ग अपने दायित्वों को समझेगा तथा सत्तर प्रतिशत से अधिक देहात व कस्बों में रहने वाला वर्ग धर्मतंत्र के प्रगतिशील रूप की ओर झुकेगा। सारे राष्ट्र के कण-कण में समाए देवत्व को जो प्रसुप्त पड़ा है , जगाने के लिए हम ही नहीं , अगणित ऋषिगण सक्रिय हैं। इस राष्ट्र की नियति ही यह है कि इसे अगले दिनों सारे विश्व का मार्ग दर्शन व्यक्तित्व निर्माण व परिष्कार से लेकर समाज देवता की आराधना क्षेत्रों में करना है। यह इतना ही सत्य है जितना कि सूर्य का अस्तित्व है। हम शरीर से समर्थ न रहने पर भी इसी प्रक्रिया में सतत् जुटे रहेंगे यह हमारी घोषणा है ।(क्रमशः)
संस्कृति’-बोध का गौरव -ग्रन्थ उल्लास और उत्साह अभिवर्धन के साथ किन्हीं स्वर्णिम सम्भावनाओं की ओर संकेत करता है। इसके बावजूद मन में उफनते सवालों का तूफान धीमा नहीं पड़ता । अध्यात्म की कही सुनी जाने वाली विशालकाय शक्ति सामर्थ्य के बाद भी देवभूमि भारत को हजारों साल इतनी आपदा-व्यथा क्यों भुगतनी पड़ी ? इस बीच संत-महात्मा, अपने चमत्कारों से लोक को लुभाने वाले औघड़ ताँत्रिक कम नहीं हुए। उनकी शक्ति एवं प्रयासों का कितना ही गान क्यों न किया जाय पर परिणाम में विजय तो हासिल नहीं ही हुई। अरबों के हमले यूनानियों के आक्रमण ग्यारहवीं शती में घुस पड़ी बर्बरता जिस समय साँस्कृतिक चिह्नों की रौंदती-मसलती रही उस समय देव शक्तियों को मौन, अकर्मण्यता क्यों सूझी ? आक्रान्ताओं, गुलाम, साँस्कृतिक तहस-नहस का वेग धीमा कहाँ हुआ? वर्ष, सदी और पूरी हो चली सहस्राब्दी गुजरने के बाद भी अकेले भारत ही नहीं समूचे विश्व क्षितिज पर असुरता का प्रलय नर्तन कहाँ कम पड़ा है?
ये सवाल किसी नास्तिक के नहीं, उस हृदयवान आस्तिक के हो सकते हैं जो स्वार्थों से ऊपर उठकर दिन पर दिन बढ़ती रही समय की विपन्नता, साँस्कृतिक मूल्यों के हास को देखता-समझता और बिलख उठता है। सर्वनाशी विभीषिकाएँ जिस क्रम में गहरा रही हैं, उसे देखते हुए कहा जा सकता है, कुछ भी अनिष्ट कभी सम्भव है। कुविचारों और कुकर्मों के चरम सीमा तक पहुँच जाने पर वर्जनाएँ लगभग समाप्त होती जा रही हैं, उच्छृंखलता, उद्दण्डता, अपराध, अनाचार अति की सीमा लाँघ रहे हैं। छल-प्रपंच कौशल , के रूप में मान्यता प्राप्त कर चला है। परिवार बुरी तरह टूट-बिखर रहे हैं। समूचा जीवन आतंकवाद के साए के नीचे सहमा-सिसक रहा है। चरित्र कहने सुनने की वस्तु रह गयी है। आदर्शों का अस्तित्व इसलिए है कि वे कथन और प्रवचन को लच्छेदार बनाने के काम आते हैं। लिखते समय भी उनका पुट लगाने की आवश्यकता पड़ती है। मूर्धन्यों ने इस विग्रह को अपने लिए तो अपनाया ही है, छुटभइयों को भी अनुगमन की प्रेरणा देकर वैसा ही अभ्यस्त कर दिया है। प्रचलन और आन्दोलन उस दिशा में चल रहे हैं, जिनका अन्त सर्वनाशी परिणति के अतिरिक्त और कहीं कुछ हो ही नहीं सकता। न व्यक्ति को चैन है न समाज में शान्ति । पीढ़ियाँ अपने जन्मकाल से ही ऐसे दुर्गुण लेकर जन्मती हैं कि अपना, परिवार का और समाज का सर्वनाश करके ही रहें।
यह कल्पनाएं नहीं, मान्यताएँ नहीं, ऐसी परिस्थितियां हैं जो दर्पण की तरह सामने हैं । ऐसी स्थिति में परमपूज्य गुरुदेव द्वारा किया गया विश्व में साँस्कृतिक मूल्यों की प्रतिष्ठापना , धरती पर स्वर्ग के अवतरण का अभय घोष! क्या आधार है इसका ? वह कौन सी आध्यात्मिक प्रक्रिया है जो आज तक सम्पन्न नहीं हुई अब सम्पन्न होकर उलटे प्रवाह को उलट देगी ?विचारशीलों, भावनाशीलों, पुरुषार्थी आशावानों के मन में युगऋषि के इस प्रचण्ड तप के बारे में जानने की ललक स्वाभाविक है।
देश और विश्व में जो कुछ दृश्यमान है उसके पीछे ऐसा बहुत कुछ है जो अदृश्यमान है । कर्म के प्रेरक शक्तियाँ हैं ऐसा समझ पाने का बूता सर्वसामान्य में नहीं है। फिर भी सत्य ने किसी मान्यता अथवा सोच की परवाह कब की है ? सच्चाई कभी अनुगमन नहीं करती, उसका बल औरों को अनुगमन करने के लिए विवश करता है। विचारों की प्रेरक शक्तियों की बात कुछ इसी तरह का सच है जिसका विवरण देवों और असुरों के रूप में पुराण वर्जित है। देवों का बल, उनकी विजय-विचारों में उच्चस्तरीय प्रेरणा भरती , कर्म के प्रवाह में संवेदना की संजीवनी घोलने में समर्थ होती है। इसके विपरीत असुरों के बलवान होने का परिणाम वही सब होता है जो आज हो रहा है। देवों और असुरों का संघर्ष अस्तित्व के आरम्भ से है सूक्ष्मदर्शी ऋषियों ने इसी वजह से मनुष्यों को देवताओं के सहभागी होने का निर्देश दिया है । आध्यात्म सही अर्थों में देव शक्तियों और उनके अधिष्ठाता परमात्मा से सामंजस्य सम्बन्ध स्थापित करने एकात्म होने की प्रक्रिया है। जब-जब यह प्रवाह टूटता है, असुरता का बल बढ़ने लगता है, जीवन पतन पराभव के गर्त की ओर ढुलक पड़ता है। इतिहास पुराणों के कलेवर में दिव्य द्रष्टाओं ने अनेक तरह से इसका उल्लेख किया है।
महाभारत की कथा कृष्ण के नेतृत्व में देव शक्तियों के विजय का वृत्तांत है। इसी के वन पर्द्र में कथा आती है- पाण्डव जब, वनवास में थे दुर्योधन उन्हें छेड़ने, चिढ़ाने के उद्देश्य से वहाँ जा पहुँचा। संयोग से चित्रसेन गंधर्व से उसका झगड़ा हो गया, जिसमें सपरिवार बन्दी होना पड़ा। दयार्द्र युधिष्ठिर ने अर्जुन आदि भाइयों को इन्हें छुड़ाने के लिए निर्देश दिये। अर्जुन के पराक्रम से मुक्त हुआ। दुर्योधन आत्मग्लानि से भर गया। विक्षुब्ध मनःस्थिति में वह प्रयोपवेशन (आमरण उपवास) करके उपवास करके प्राण त्यागने का संकल्प करके बैठ गया। उसके मन में इस बात का अपार दुःख था कि जिन्हें वह चिर शत्रु मानता था उन्हीं पाण्डवों ने उसे छुड़ाया। इतने में सूक्ष्म रूप से असुरों की पूरी जमात प्रकट हो गयी। उन्होंने दुर्योधन को समझाया-”हम तुम्हारे विचारकों के प्रेरक हैं। तुम इस लोक में हमारे माध्यम हो । उठ खड़े हो हमारा बल तुम्हारा सहायक बनेगा।” दुर्योधन उठ खड़ा हुआ-आगे की कथा स्पष्ट है किस प्रकार योगेश्वर कृष्ण के प्रयासों ने असुरों के प्रयोजनों को निरस्त किया।
घटना की प्रवाह सीमा रामायण महाभारत काल तक सीमित नहीं रही। दुबले-पतले सामान्य सिपाही हिटलर को दुर्दान्त दैत्य बना डालने में एक विशिष्ट असुर का हाथ था। मातृवाणी में श्री माँ ने रोचक विवरण देते हुए बताया है-किस तरह श्री अरविन्द ने उसे नष्ट किया और विनाश की ओर बढ़ रही दुनिया के कदम यकायक लौट पड़े। परन्तु यह सामयिक उपचार भर था। श्री माँ के शब्दों में कहें तो अभी एक असुर नायक और उसके सहचर बाकी है। इन्हीं के प्रभाव विश्व में उत्पात मचाए हैं। जैसे ही ये नष्ट होंगे-धरती पर स्वर्ग उतर आएगा। देव शक्तियों के नायक कार्तिकेय की भाँति पूज्य गुरुदेव का पराक्रम इन्हीं से जूझने और निरस्त करने में लगा है।
उनके प्रयासों को सर्वसामान्य सामाजिक आन्दोलन का रूप भले समझे पर जिनके पास आंखें हैं, भाव जगत में हो रही उलट फेर को देखने की सामर्थ्य है, व यहाँ के प्रत्येक क्रिया-कलापों को असुरता के विरुद्ध सशक्त व्यूह रचना समझ सकते हैं। युगावतार बार-बार अपने समर्थ सहायकों को देवमानवों की सशक्त वाहिनी कहते आए हैं। उसके पीछे यही रहस्य है। उनके द्वारा प्रवर्तित अध्यात्म पहले के अध्यात्म से पूर्णतया भिन्न है। इसका लक्ष्य व्यक्तिगत स्वर्ग मुक्ति न होकर स्थूल और सूक्ष्म में हुए प्रदूषण को धो डालना है। यह व्यक्ति से ऊपर उठकर समष्टि में किया जाने वाला प्रयोग बन गया है।
इस प्रवर्तन के पहले तक आध्यात्मिक रुचि प्रायः व्यक्तिगत स्तर की साधनाओं तक केन्द्रित थी। जनसामान्य से लेकर विशिष्ट कहे जाने वाले तक इसी के लिए प्रायः इच्छुक, प्रयत्नशील और व्यस्त रहते थे। जिस प्रकार निजी स्वार्थी लोग व्यक्तिगत रूप से धनवान-सम्पन्न बनने तक ही अपनी इच्छाओं को सीमित रखते हैं उसी प्रकार साधु, सन्त साधक भी स्वर्ग-मुक्ति की व्यक्तिगत उपलब्धियों, या कुछ विशिष्ट शक्तियों के संचय को ही अपना लक्ष्य बनाते रहे हैं । उनके ये क्रियाकलाप बाहर से कितने ही उत्कृष्ट लगें पर भिन्न-भिन्न स्वार्थपरक रुचियों के कारण इससे देव -मन को विखण्डित होना पड़ा है, जब कि असुरता अपनी समस्त दुष्प्रवृत्तियों के बावजूद परस्पर संगठित और एकात्म होने के लिए प्रतिबद्ध है। ऐसे में यदि देवसंस्कृति को अपन पुत्रों की वजह से पराजय का मुख देखना पड़ा तो आश्चर्य क्या ?
इतिहास के पृष्ठों और साधना सम्प्रदायों के कलेवर को देखें तो विवरण भी मिल सकेंगे। गजनी के आक्रमण के समय फेरुक वज्र नाम के विख्यात ताँत्रिक थे । उनकी शक्तियाँ जन सामान्य को अभिभूत किये थीं । आक्रमण के लिए बढ़ती आ रही सेना का दुर्मद वेग देखकर तत्कालीन समाज के व्यक्तियों ने बड़े विश्वास से उनसे प्रार्थना की कि गजनवी के पाँव मोड़ दें । फेरुक वज्र अपने सारे प्रयासों के बावजूद असफल रहे। उन्हें स्वीकार करना पड़ा , इन सबके मन आपस में इतने गुँथे हैं, इनमें उत्साह का इतना तीव्र वेग है जिसे तोड़ पाने में मेरी समूची साधना अक्षम है।
महायोगी-गोरखनाथ के मन में योगियों की इस मूर्खता को दूर करने के लिए कितनी विकलता थी इसे तनिक उन्हीं के शब्दों में सुनें “क्या संसार के इतर प्राणियों के मूर्ख समझने से योगियों और सिद्धों की मूर्खता कम हो जाएगी ? जब हमारी आँख के सामने’-लाख-लाख निरीह प्राणियों का वध हो रहा है? जब अधमरे युवकों, परित्यक्त शिशुओं और लाँछित-बहिनों के क्रन्दन और आह से वायुमण्डल व्याप्त है, उस समय क्या सहज समाधि सम्भव है। योगियों! आज सब कुछ भूल कर संगठित होने की आवश्यकता है! व्यक्तिगत स्वार्थ के लिए ध्यान-धारणा के प्रयोग रुक सकते हैं मारण, मोहन की विधियाँ स्थगित रखी जा सकती हैं। मोक्ष की चिन्ता में भटकने का व्यवसाय बन्द किया जा सकता है। “ उन्होंने अपने एक मित्र अमोघवज्र को सुनाते हुए कहा था “ अब भी तुम इस घपले में पड़े हो अमोघ ? गजनवी से साकल तक के विहार और रत्न स्तूप ध्वस्त हो गए, सामेश्वर तीर्थ लुट गया। नालन्दा और ओदन्त पुरी जल रही हैं और तुम्हारी ये जादूगरी की साधना अब भी अव्याहत गति से चल रही है ?” महायोगी में साधना शक्ति के सम्मिलित प्रवाह को लोक-मानस के-परिष्कार, लोक जीवन में सुख संचार के लिए मोड़ने की कसक थी। पर उनकी वेदना को किसने पहचाना ?
समस्या-बुद्धि-विचारों और उसके प्रेरक तंत्र की रही है। पूज्य गुरुदेव तथाकथित साधकों से मिन्नतें करते इसके स्थान पर उन्होंने नए योगियों उन्नत साधकों की समर्थ सेना गठित कर डाली जिनके समस्त साधनात्मक प्रयास उच्चस्तरीय व्यापक आदर्शों के लिए समर्पित होना निश्चित हुए। इस साधना का केन्द्र उन्होंने भगवान सूर्य को माना। सूर्य के बारे में अभी तक बहुत कुछ कहा सुना लिखा पढ़ा गया है। पर इन पंक्तियों में सिर्फ उन्हीं सन्दर्भों की चर्चा है जो लोक स्पर्श से अछूते और गुह्य रहे हैं।
जब-जब असुरता के विरोध में व्यूह रचना हुई है। सूर्य शक्ति के अवतरण को व्यापक बनाना पड़ा है। बाल्मीकीय रामायण में युद्ध के समय महर्षि अगस्त्य द्वारा भगवान राम को सूर्य उपासना बताये जाने का वर्णन है। आदित्य हृदय का रहस्य जानकर ही रावण वध सम्भव हो सका। महाभारत में महर्षि धौम्य ने युधिष्ठिर सहित अन्य भाइयों को सूर्य उपासना में दीक्षित किया था। ध्यान रखने की बात यह है कि इसके प्रतिफल व्यक्तिगत स्वार्थों के लिए न थे।
वैज्ञानिकों की दृष्टि में सूर्य लोक में प्राण का संचारक हीलियम हाइड्रोजन की अन्तर्क्रियाओं का समुच्चय भर है। यह उसका आधि-भौतिक रूप है। जो अपने में समर्थ और सृष्टि का केन्द्र बिन्दु है इस सामर्थ्य से शत-सहस्र गुना बढ़कर उसके अधिदैवत रूप की चर्चा है। इस रूप में यह विचारों का नियंत्रक, भावों का प्रेरक और ग्रहों का अधिपति है। वराह मिहिर ने इसे जातक की आत्मा माना है। वेद भी “सूर्य आत्मा जगतस्थुषश्च” अर्थात् सूर्य को जगत की आत्मा स्वीकार करते हैं। व्यक्ति में इसकी शक्तियों का अभाव काम विकार, मनोरोगों को जन्म देने वाला सिद्ध होता है। जिसका सूर्य नीच का है उसे सारी सफलता के बावजूद दुर्विचारों , कुकर्मों से घिरे रहना पड़ेगा। आत्मिक उत्थान इसकी ऊर्जा के बिना सम्भव नहीं। इस ऊर्जास्विता को प्राप्त करने के लिए ज्योतिष शास्त्र ने एकमत से महाधिपति की उपासना के विधान सुझाए हैं। इनका परिपालन जहाँ उपासक को सभी ग्रहों को कष्ट से मुक्त करता है वहीं पवित्रता प्रखरता उपलब्धि के रूप में मिलती है।
अपने तीसरे रूप में सूर्य विराट पुरुष की ज्योति है। श्री अरविन्द ने इसे “अतिमानस की ज्योति” कहा है। विराट पुरुष के रूप में इसकी उपासना उपनिषदों में ब्रह्म विद्या दहरविद्या ( छा. उ. ) मधु विद्या उपकोशल विद्या, मन्थ विद्याएँ, पंचाग्नि विद्या के रूप में मिलती है। वेदों में ब्रह्म सूर्य समं ज्योतिः (यजुः 23/40) भवानों अर्वांग र्स्वणः ज्योतिः (ऋक् 4/10/3) कहकर इसे विराट पुरुष के रूप में अनुभव किया गया। ऋग्वेद में सूर्य की इस महिमा को सूचित करने वाले चौदह सूक्त हैं।
सूर्य की उपासना के तत्वों को यदि विश्व के विभिन्न भू भागों में ढूंढ़ें तो विस्मय जनक हर्ष होता है कि समूचा विश्व, सूर्य उपासना के रूप में कभी एकजुट था। इसे देवसंस्कृति के प्रति एक निष्ठा ही कहेंगे। आकाश के देवता ‘एना’ और पृथ्वी के देवता ‘इया’ में निष्ठा रखने वाले बेवीलोनीयाँ निवासियों ने दिन का आरम्भ सूर्योदय से माना। मिश्र की नीलघाटी सभ्यता में सूर्य पूजा मुख्य थी। फैल्डियन लोगों की श्रद्धा भी सूर्य पर टिकी थी। सुमेरियन सभ्यता के दो देवता थे सूर्य-चन्द्रमा। फिनीशियन भी सूर्य चंद्र के उपासक थे। पर वैदिक वाङ्मय में सूर्य तत्व की जो गहन शोध है वह विरल है। वेदों ने सूर्य को सु+इर सुन्दर प्रेरणा देने वाला माना है।
पूज्य गुरुदेव द्वारा सूर्य उपासना को सर्व प्रचलित करने में लोक जीवन के भाव और विचारों के परिष्कार का रहस्य छुपा है। यों सूर्य उपासना के अन्य अनेक मंत्र हैं तरह-तरह की उपासना पद्धतियाँ हैं पर उनकी सीमा अधिदैवत तक सीमित है। व्यक्तिगत स्तर पर भले उनसे लाभान्वित हुआ जा सकें । सामूहिक मन में हो रहे प्रदूषण का निवारण संभव नहीं । यह सम्भावना सिर्फ गायत्री मंत्र के माध्यम से स्वीकार हो सकती है। सूर्य रहस्य का प्रकटीकरण सिर्फ इसी समर्थ विधि से सम्भव हैं।
गायत्री आदि मंत्र है इसी के रहस्य की व्याख्या चारों वेदों में इसकी उपस्थिति इसके वैशिष्ट्य और महत्व के दर्शाने के लिए पर्याप्त है। ऋग्वेद , शाकल संहिता 3/62/10, शुक्ल यजुर्वेद माध्यन्दिनोय संहिता 3/35, 22/9, 30/2, 36/3 कृष्ण यजुर्वेद , तैत्तिरीय संहिता 1/5/6/12, 1/5/8/10, 4//11/61 तथा कृष्ण यजुर्वेद, तेतरीय संहिता 1/5/6/12 दृ 1/5/8/10, 4/1/11/62 तथा कृष्ण मैत्रायणी संहिता 4/10/77 सामवेद कौशुल संहिता उत्तरार्चिक 13/3/3 तथा 13/4/3/1 अथर्ववेद शौनक संहिता 19/71/1 में गायत्री के गान की गूँज हैं।
मंत्र शक्ति की अलौकिक सामर्थ्य-सूर्य रहस्य का ज्ञान, विराट पुरुष से एकत्व छुपी है। वहीं इसमें महान संस्कृति के उदय विस्तार का तत्व भी सँजोया है । इसका प्राकट्य जिस महान उद्देश्य से हुआ उसे बताने वाली एक कथा संकेत ऋग्वेद में मिलती है। ऋक् काल में भारत में आर्य और दो जातियाँ थीं। सुसंस्कृत आर्यों के नेता अगस्त्य थे, दस्युओं का नेतृत्व शम्बर के हाथ में था । अगस्त्य वरुण के उपासक थे । दस्यु अपनी दुष्प्रवृत्तियों के कारण आर्यों के शत्रु थे। अगस्त्य के शिष्य विश्वरथ के मन में विचार आया क्या इन दस्युओं का आर्य बनाना सुसंस्कृत कर सकना संभव है ? यदि हाँ तो कैसे ? इस प्रश्न के समाधान के लिए उन्होंने घोर तप किया। परिणाम में जो विद्या मिली वह गायत्री थी। जिसकी शक्ति से उन्होंने दस्युओं को सामूहिक रूप से आर्य बना डाला। उनके इस महान प्रयास पर ऋषियों ने चकित होकर उन्हें विश्व का मित्र-विश्वामित्र कहा उदय काल से सूर्य उपासना की महान विद्या सामूहिक हितों, सामूहिक मन को सुसंस्कृत बनाने के लिए प्रयोग की जाती रही है। महर्षि दयानन्द ने आधुनिक समय में व्रात्य हो चुके समाज को आर्य बनाने के लिए इसका प्रयोग किया उनके प्रयास की परिधि भले छोटी रही हो पर उद्देश्य गगनचुम्बी था। कहने सुनने के लिए गायत्री की साधना बहुतों ने की होगी। पर उसके 24 अक्षरों में एक अक्षर नः का तत्वज्ञान कितनों सद्बुद्धि के अर्जन और उपार्जन की यह प्रक्रिया ‘मम्’ अर्थात् मेरे लिए न होकर नः अर्थात् हमारे (हम सब) के लिए है। उपदिष्ट साधना प्रक्रिया भी डालने के लिए सक्रिय हुई है। इसका अर्थ, आर्य होना, सुसंस्कृत होने के बराबर समझा जाना चाहिए। यह महर्षि प्रयोगों का अति व्यापक और सुविस्तृत सामूहिक अनुष्ठान, उदय कालीन एक समय ध्यान-आदि अनेकों ऐसी गहन प्रक्रियाएँ हैं जिनके दुर्विचारों की प्रेरक आसुरी शक्तियाँ नष्ट होने के लिए विवश हैं। सामूहिक मन का परिशोधन अपने अन्तिम चरण में है। उन्होंने प्रारम्भ से लेकर अब तक साधना की जो प्रणालियाँ सुझाई हैं सबका उद्देश्य व्यष्टि का समष्टि में विलय माना जाना चाहिए। इनमें युग ऋषि की ओर हिमालय की दिव्य सत्ताओं की ओर स्वयं को खोलना होता है।
युग साधकों के लिए निर्दिष्ट-गायत्री महामंत्र का तीन माला का जप , उगते हुए सूर्य का सविता का ध्यान इसी उद्घाटन हेतु है, जिसके परिणाम में युगऋषि की चेतना उनके अस्तित्व में व्यापक फेर बदलकर सामूहिक चेतना को जोड़ती है। इसके व्यक्तिगत परिणाम आत्मसंतोष-आत्मानुभव ब्राह्मणत्व की जाग्रति के रूप में उभरेगी ही। सामूहिक मन में जो परिवर्तन हो चुके हैं हो रहे हैं उनके परिणाम-मूर्धन्यों की मूर्छना को तोड़ने वाले सिद्ध होंगे। राजनेता, वैज्ञानिक, धनाध्यक्ष मनीषी-इन चारों के मनः क्षेत्र में अनोखी सूझ’-बूझ का उदय होगा। उनके कदम सही दिशा में उठने के लिए विवश होंगे। यों परिणामों की शृंखला लम्बी है जिसे स्थानाभाव में दे पाना सम्भव नहीं। पर संक्षेप में इन चारों वर्गों को झकझोरने कचोटने के साथ अन्य महत्वपूर्ण परिणति है प्रतिभावान आदर्शनिष्ठ पीढ़ी का उदय जो परिष्कृत हो रहे सामूहिक मन से जुड़कर नवयुग का नेतृत्व सँभालेगी।
इस साधनाक्रम में सम्मिलित होने वाले साधकों से यही अनुरोध है कि वे गायत्री महामंत्र के नः अक्षर का तत्वदर्शन समझें । स्वयं को सूर्य से एकाकार हुए गुरुदेव की चेतना से जोड़े । विश्वास रखें हिमालय की दिव्य शक्ति धाराएँ उनकी ओर दौड़ पड़ने के लिए आतुर हो उठेंगी वह सब सहज मिल जायेंगे जो युगों की साधना से सम्भव न था और सामूहिक मन पर इसके परिणाम के रूप में विश्व के कर्णधार यह मानने के लिए विवश होंगे कि वर्तमान गठन अनुपयुक्त है। उसके स्थान पर नित नवीन का कलेवर धारण करना पड़ रहा है। उनके मस्तिष्क कुछ ऐसा ताना-बाना बुनेंगे जिसमें विश्व की एकता का व्यवहार में व्यापक उथल-पुथल की अनुभूत की जा सकेगी। समूचा विश्वचिंतन ऐसी उलट-फेर से भर जाएगा जिसे आज की तुलना में शीर्षासन की संज्ञा दी जा सके।
ऋजुकूला नदी अपनी गंभीर गति से बहती चली जा रही थी। जल का कल-कल तीरस्थ बन-भूमि में अपनी हल्की गूँज प्रतिध्वनित कर रहा था। ज्ञातृखण्ड की प्राचीन भूमि में किनारे खड़े शाल वृक्ष की छाया में वह गम्भीर मुखाकृति लिए खड़ा था। उसके चेहरे पर किसी गहन चिन्तन का झीना आवरण था। उसका रंग भव्य गौर था, किन्तु इस समय उस पर हल्की सी छाया आ गई थी। उसकी आँखों में असीम वेदना रहस्य, गौरव और जिज्ञासा कांप रही थीं। पलकों में एक अचंचल स्तब्धता थी , जिसे देखकर लगता था कि वह बहुत गहरी अँधेरी में पड़ा हुआ भी प्रकाश की ओर बढ़ रहा था। उसकी खिंची हुई भवें उसके उन्नत ललाट और लम्बी नाक के बीच में ऐसी दिखती थीं जैसे अरुणोदय वाले क्षितिज की पृष्ठभूमि पर रेखा मात्र से दिखाई देने वाले दो जहाजों के पाल अनन्त के वक्ष पर तन गए हों और अज्ञात आलोक की ओर बढ़ चलें हों। उसके लंबे और पतले होठों पर एक विचित्र स्फुरण थी मानो वे किसी अत्यन्त पवित्र शब्द का निर्घोष करने के लिए व्याकुल हो उठे हों। वह लम्बा, चौड़े स्कन्ध वाला पुरुष जो आज दुबला हो गया था, उस ऋजुकूला के तीर पर ऐसा स्तब्ध खड़ा था कि उसे देखकर सारा वन प्रान्तर जैसे हरकरा कर अभिवादन कर रहा था। समस्त वायुमण्डल से पुकार उठ रही थी.....लौट चल वर्द्धमान लौट चल।
शालवन के फूलों की सुगंध बार-बार झोंकों पर झूम उठती थी। कभी-कभी पक्षी पक्षी अपने कलरव से आकाश में पृथ्वी तक एक अजस्र मनोहारिता को भर-भर देते थे। शीतल स्पर्श से लुभा देने वाली वायु अंग-अंग की ऊष्मा को ऐसे ही थपेड़े दे रही थी जैसे तरल कल्लोलिनी हिलोरें नीरस तीर भूमि की मोहनिद्रा को बार-बार झकझोरने को आ-आकर अपना समर्पण करके बिखर जाती हों ।
वर्द्धमान का मन फिर भी दृढ़ था । उसने हठात् किसी दृढ़तम निश्चय से सिर उठाया और फिर उसने रात के उतरते अंधकार के पावों के नीचे बिछे सुनहले कंबल जैसे साँध्य गगन को देखकर धीरे से बुदबुदाया मा-मुज्जह-मा रज्जह-मूर्छा में मत बहो-राग की धारा में मत बहो। निश्चय के इन दृढ़ किन्तु धीमे स्वरों के साथ चिन्तन उभरा । मैं इतना आगे आ गया हूँ कि मेरे लिए लौटने के सब द्वार बन्द हो गए हैं। यदि मैं जीवन के सत्य को नहीं पा सकता तो मेरे लिए जीना निष्फल है, क्योंकि जिसे मन आज बार-बार याद कर रहा है , मैं उसी जीवन को तो निस्सार समझकर एक दिन छोड़ आया था। तब उसमें यदि मुझे सन्तोष नहीं मिला तो किस विर्फ्यय से आज इस साधना से विमुख होकर पराजित होकर मुझे फिर कहीं विश्राम मिल सकेगा? यह तो असम्भव है।
और तब वह दीर्घकाय भव्य पुरुष मन्दगति से ऋजुकूला की तट भूमि पर धीर पदों से घूमने लगा। वह मानो अपने उस घूमने से वायु को विक्षुब्ध करके अपने भीतर के समस्त संकुल क्षोभ को स्थिर कर लेना चाहता था। वह धीरे-धीरे शाल वृक्ष के नीचे जा पहुँचा । चंचल पल्लव वाले चलदल शाल की फुनगी पर अब आलोक तिरोहित होने के पहले अन्तिम मुसकान बिखेर रहा था। शाल का तना उस आती धुन्ध में स्तब्ध था पास आते जा रहे अन्धकार की मुसकान किसी गहरे रहस्य से भरी थी। वर्द्धमान खड़ा सोच रहा था अपने जीवन के बारे में उस जीवन के बारे में जो यात्रा बन गया था।
वर्द्धमान! कुण्डपुर के राजा का पुत्र !! वैशाली का राजकुमार ! कैसे माँग सका था वह भिक्षा ! लोग आश्चर्य से देखते थे। कोई-कोई हाथ हिला देता था। पहले अपमान सा लगा, परन्तु मन ने कहा वर्द्धमान! अपने अहं को कुचल दे उसे राजाकूल ने राजपुरुषों को पीछा करने की आज्ञा दी। वह प्रासाद पर खड़ा था। वर्द्धमान को देखा तो उसे आश्चर्य हुआ। उसे सन्देह हुआ।
वर्द्धमान पथ पर भीख माँग रहा था और उसके भीतर अब शान्ति का स्थान नम्रता ले रही थी।
पेट के लिए इतना काफी होगा, सोचकर जो भोजन मिला वही लेकर वह नगरद्वार के बाहर पूर्व दिशा की ओर मुख करके बैठ कर खाने लगा। कितना बुरा था भोजन!
लगा था आंतें उलट जायेंगी।
राजपुरुषों ने छिपकर सुना, वह सुन्दर तपस्वी बड़बड़ा उठता था तू अन्न-पान सुलभ राजकुल में तीन वर्ष के पुराने सुगंधित चावल का भाजन करता था..... नाना प्रकार का अत्युत्तम रसों के साथ भोजन किए जाने वाले स्थान में जन्म लेकर तूने सोचा था कि मैं अब सर्वत्यागी हो कर सत्य की खोज करूंगा...... आज क्यों हार रहा है.... दृढ़ हो, मन-दृढ़ हो।
यही सोचकर घर से निकला था अब क्या कर रहा है?
वर्द्धमान जब जाने लगा तो देखा सामने राजाकूल था। श्रमण! आप कौन हैं ? यह सुन्दर देह यह यौवन ! इस सबके रहते सर्वस्व त्याग क्यों ? कूल ने कहा क्या किसी रमणी ने आप का तिरस्कार किया ? वर्द्धमान मुस्करा दिया। राजा मैं स्त्री प्रेम में नहीं लोक प्रेम में प्रव्रजित हुआ हूँ।
‘श्रमण ! यह जीवन यों नष्ट करने से क्या लाभ । अभाव आते हैं चले जाते हैं। तुम निराश न हो युवक। फिर से जीवन बन सकता है। आओ मैं तुम्हें भूमि दूँगा, मैं तुम्हें धन दूँगा। तुम इतने हताश क्यों होते हो ?
वर्द्धमान हँस पड़ा “मुझे वस्तु और भोग की कामना नहीं है। मैं ज्ञातृ पुत्र हूँ । मेरे पास एक नहीं अनेक प्रासाद थे। उनमें सुन्दरी रमणियाँ भी थीं। परन्तु उसमें सत्य न था।
ज्ञातृ पुत्र! क्षत्रिय!!
‘तुम क्षत्रिय हो ?’
श्रमण हूँ महाराज!”
कल ने सोचा तब तो गहरा आदमी है।
उसने कहा ‘जाओ युवक! तुम निःसन्देह धन्य हो! राजनीति से कलुषित हो रही वसुन्धरा में यदि तुम्हारा स्वर मनुष्यों को सुख दे सके तो वह जीवन , वह भव्य जीवन इन कुचक्रों भरे जीवन से कहीं अधिक महान होगा। तुम सब कुछ छोड़ आए हो इन्द्र करे तुम सब कुछ पा जाओ और कठोर साधना में वर्ष बीतने लगे।
वैशाली के दूत आए और चले गए, इसका अब कोई मूल्य नहीं रह गया था। प्राणायाम के अवरुद्ध श्वासों ने शरीर को सुखा दिया । उस युग के वायु भक्षी तपस्वी पत्ते खाने वाले भी आश्चर्य से भर गए। रात आती जागते बीत जाती दिन आता एक ही आसन से बीत जाता और दिन रात की सन्धियाँ आँखें मूँदे बीत जातीं।
और उसने सोचा ‘क्या है सत्य का मार्ग ‘?
यातना!!
अचानक सत्ता के सत्य ने पुकारा ‘बुद्धि का आधार अन्न है। उसे छोड़कर शरीर को कष्ट देना बुद्धि को ही आतंकित करना है। उससे लाभ नहीं होता विकारों को हटाने के स्थान पर दृढ़तर किया जाता है।’
समय की गति अविराम थी । क्या मिला उसे इतने दिनों में ? केवल भटकन ! धूलि से भरा जीवन । माँगकर खाते-खाते अहं नष्ट हो गया। राह पर चलते-चलते पावों में छाले पड़ गये।
सारा अतीत धीरे-धीरे घुलने लगा। प्रियकारिणी त्रिशाला की ममता-भरी आंखें बुलाती फिर तिरोहित हो जातीं। पिता सिद्धार्थ की लालसाओं की थातना , बार-बार पुकारता नन्द्यावर्त प्रासाद कलिंगराज जितशत्रु की पुत्री यशोदा के समर्पित स्वर, सबके सब जीवित हो उठे। अधिकार , गर्व-धन फिर अंकुश मारकर क्रोध के हाथी को जगाने लगे।
परन्तु वर्द्धमान पुकार उठा ‘काम! नर्क की भीषण ज्वालाओं से घिराना चाहता है तू मुझे ! स्वर्ग छलना है अज्ञानी! ब्रह्मा मेरा स्रष्टा नहीं है।’ फिर शून्य में से साकार छवियाँ जन्म लेने लगीं। वासना के पशु हुँकारने लगे। चारों ओर जैसे महापक छा गया।
अंधकार मिटने लगा- वह घुमड़न वह विष अचेतन की सी वह मूर्छा वर्द्धमान ने सामने से दूर कर दी, क्योंकि वह आज सम बनकर बैठा था। नहीं लौटूँगा में, मेरी आत्मा जाग्रत हो इस अन्धकार को नष्ट करो। वह आसन मेरा ही है मैं दानी हूँ.......।
वासना ने अन्तिम प्रहार किया ‘क्या दानी है तूने वर्द्धमान’
मैंने! मैंने अपने को लोकहित के लिए दान दे दिया है।
‘कौन है तेरा साक्षी ?’
‘मेरा साक्षी ! यह अचेतन ठोस पृथ्वी ही मेरी साक्षी है।’
वासना थर्रा गई भयाक्रान्त कांप गई।
‘वसुँधरे! तू ही मेरी साक्षी है।’ उसने दाहिना हाथ उठाकर कहा। उसका वह स्वर जब उसके पास फिर लौट आया , उसे लगा वह समस्त आधार अपने ही सत्य के अनुकूल बना पाया था। क्योंकि उसे किसी प्रकार का पूर्वाग्रह नहीं था। वर्द्धमान का स्वर अब साकार आलोक बनता हुआ सा फैलने लगा अनेक जन्मों में दौड़ता हुआ मैं इस जग में फिरता रहा। जन्म के दुःख सहता हुआ मैं गृहकार को खोजता रहा। ओ गृहकार तू दुःख हैं। अब मैंने तुझे देखा है। अब फिर मुझे नहीं रहना है। दुःख ! तेरी सारी शृंखलाएं टूट गई हैं, देखा! त्रा शिखर टूटा पड़ा है। भग्न विध्वस्त संस्कारों से मेरा चित्त मुक्त है, मेरी तृष्णा नष्ट हो चुकी है। मैं विजयी हूँ। सारी ग्रन्थियाँ खुल चुकीं थीं वह अब निर्ग्रन्थ थे। रात्रि बीत रही थी साथ ही उनके जीवन की रात्रि भी। भारत की अमर संस्कृति नए स्वरों में मुखरित हो रही थी-’एगो में सासदा आदा सत्वे संजोग तक्खणा, चौदहवीं भूमिका से आते स्पन्दन कह रहे थे-एक मेरी आत्मा ही शाश्वत है। सारा संसार संयोग लक्षण वाला है। अद्भुत थी ई. पू. 557 रविवार वैशाख शुक्ल दशमी प्रभात की रश्मियों के साथ एक निनाद फूटा वीरता दूसरों को मारने स्वयं के अहं के विस्तार में नहीं है। वीर वही है जिसने स्वयं को जीता जो अपने देवत्व को औरों में उड़ेल सका।’ देव संस्कृति की इन स्वर तरंगों से विश्व को आप्लावित करने वाले वर्द्धमान अब महावीर हो चुके थे।
आत्मशक्ति संसार की सबसे बड़ी सामर्थ्य है। वैभव, शक्ति सामर्थ्य तथा ज्ञान-कौशल से भी बड़ी सम्पदा आत्मबल है। भौतिक सम्पदा एवं सामर्थ्य के सहारे मनुष्य निर्वाह तथा सुविधा की साधन-सामग्री प्राप्त कर जीवन यात्रा थोड़ी सरल बना लेता है किन्तु आत्मशक्ति तो चेतना की प्रसुप्ति को जगाती व मानव में सोया पड़ा देवत्व जगाकर रख देती है। इस शक्ति का जागरण ही नरपशु को माँ के उदर से जन्मे शिश्नोदर परायण जीवन जीने वाले एक सामान्य व्यक्ति को महामानव, ऋषि व देवदूत बना देता है। इसी आत्मबल के सहारे अपना निज का ही नहीं, असंख्यों का उत्थान अभ्युदय संभव हो सके। जहाँ साधन सम्पन्न सुख भोगते देखे जाते हैं वहाँ आत्मशक्ति सम्पन्न व्यक्ति इसी जीवन में स्वर्ग मुक्ति का परमानन्द प्राप्त करने पर ब्रह्म के साथ तादात्म्यता का जीवन लक्ष्य प्राप्त करते हैं।
भारतीय संस्कृति इस आत्मशक्ति को जगाने के लिए साधना का मार्ग बताती आयी है। प्राच्य अध्यात्म के अंतर्गत आने वाली सभी साधना पद्धतियों का एक ही लक्ष्य है जीव को ब्रह्म के समकक्ष बना देना, “जीवों ब्रह्मैव नापरः” की शक्ति को सार्थक करना , अनगढ़ मानव में निहित असीम संभावनाओं का द्वार खोल उसके देवमानव, महामानव-अवतारी पुरुष के रूप में विकसित होने का पथ प्रशस्त करना। मानवी चेतना का कायाकल्प करने वाली साधना उपचार प्रक्रिया को ब्रह्मविद्या के अंतर्गत दो भागों में बाँटा गया है- एक योग दूसरा तप। “योग” आस्था पक्ष से संबंधित है और “तप” क्रियापक्ष से। योग एक प्रकार से चिंतन क्षेत्र को प्रभावित करने वाली साधना है जो अवाँछनीयता के पशु-प्रवृत्तियों के कुसंस्कारों को छुड़ाने में आत्मसत्ता की मदद करती है। प्रज्ञा, भूमा, ऋतम्भरा उस परिष्कृत मनःस्थिति का नाम है जो ज्ञान साधना से प्राप्त होती है। योग का अर्थ है जोड़ देना-आत्मा को परमात्मा से। परमात्मा यहाँ व्यक्ति नहीं शक्ति है -उत्कृष्ट आदर्शवादी आस्थाओं-आकाँक्षाओं के समुच्चय के रूप में । आत्म साक्षात्कार का अर्थ यही है कि अपनी आस्थाएँ परिष्कृत स्तर की हो जाएँ, संवेदना इतनी उच्चस्तरीय हो जाय कि सब ओर अपनी ही आपा बिखरा दिखाई देने लगे। ‘योग’ की परिभाषा इस प्रकार पशु प्रवृत्तियों को देव आस्थाओं में बदल देने वाले मानसिक उपचार के रूप में बताई गयी है।
‘तप’ साधना उपचारों का क्रिया प्रधान पक्ष है। एक चरण इसका आत्म निमार्ण है, दूसरा लोक कल्याण। स्वार्थ सुविधा में कटौती करके परमार्थ की दिशा में किये जा रहे प्रयास तप की परिधि में आते हैं। आत्म निग्रह के लिए की गयी तितिक्षा, वासना तथा तृष्णा का निग्रह-नियंत्रण सेवा साधना हेतु बलिदान व त्याग का अभ्यास तथा साधनात्मक कर्मकाण्डों (जप, ध्यान, प्राणायाम, देवपूजन, संध्या, अनुष्ठान आदि) के माध्यम से आत्मशिक्षण कर प्रसुप्त को जगाना-ये सब प्रक्रियाएँ तप के अंतर्गत आती हैं।
मनीषीगणों-ऋषियों के अनुसार योग व तप के लिए सर्वश्रेष्ठ साधना गायत्री साधना है। आदिकाल से जब इस सृष्टि की उत्पत्ति अपौरुषेय वाणी के माध्यम से हुई है, गायत्री साधना का अवलम्बन ही त्रिदेवों से लेकर अवतारी सत्ताओं, ऋषि मुनिगणों से लेकर सामान्य नर-नारियों ने लिया तथा अपना प्रगति पथ प्रशस्त किया है। गायत्री को त्रिपदा कहा गया है। त्रिपदा अर्थात् तीन पद-तीन चरण वाली। तीन शरीर, तीन लोक , तीन ग्रन्थियाँ, तीन गुण, त्रैत ब्रह्म, तीन देव तथा तीन ही शक्तियों का विस्तार इस सृष्टि में माना और उसका विवेचन किया जाता है। इन तीनों की ही व्याख्या त्रिपदा के तीन चरणों में विस्तार से मिलती है । साथ ही त्रिपदा गायत्री के अनुग्रह से तीन भव-बंधनों को छुटकारा होता एवं तृप्ति, तुष्टि शान्ति के रूप में तीन विभूतियाँ’-अमृत, पारस, कल्पवृक्ष के रूप में तीन अनुग्रह-वरदान मिलने की बात बताई जाती है।
गायत्री को स्वर्ग लोक की अधिष्ठात्री बताया गया है। उसका नाम कामधेनु भी है। कामधेनु का पयपान करने से देवताओं को देवत्व की प्राप्ति होती है। देवताओं के सुख के स्रोत तीन बताये गये हैं-अमृत-आध्यात्मिक संपदाएँ, पारस’-आधिभौतिक संपदाएँ तथा कल्पवृक्ष-आधि दैविक सफलताएँ अमृत कोई भौतिक वस्तु नहीं अपितु चेतना का एक स्तर है। यह भावसंवेदन की दिव्य भूमिका है। साधक अमृत पीकर अजर,अमर , बन जाता है अर्थात् अपने आपको शरीर नहीं, आत्मा होने की मान्यता सुदृढ़ व परिपक्व हो जाती है । इस स्तर की आत्मानुभूति में सत्यं, शिवं, सुन्दरम् का आभास मिलता है। सर्वत्र सत् चित् आनन्द का मंगलमय समुद्र लहराता दीखता है। पारस उस पत्थर का नाम है जिसे छूने से लोहे जैसी काली कलूटी अनगढ़ धातु भी स्वर्ण जैसी बहुमूल्य बन जाती है। अध्यात्म क्षेत्र का पारस पुरुषार्थ है जो संकल्प शक्ति, तन्मयता-एकाग्रता तथा संयम प्रखरता के रूप में अंतः भूमिका में उतर कर आलस्य , प्रमाद तथा असंयम रूपी अनगढ़ताओं को मिटाता व प्रचण्ड संकल्प बल सम्पन्न व्यक्तित्व का निर्माण करता है। कल्पवृक्ष कहा जाता है कि स्वर्ग में है तथा जो उसके नीचे बैठता है , उसकी मनोकामनाएँ-वाँछित कल्पनाएँ पूर्ण हो जाती हैं। यह अलंकारिक रूप से आध्यात्मिक कल्पवृक्ष के रूप में परिष्कृत व्यक्तित्व का विवरण है, जो गायत्री साधक को एक महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में मिलता है। गायत्री सद्बुद्धि की देवी है। उसका आश्रय लेने वाला आप्त काम हो जाता है। अर्थात् उसकी सभी कामनाएँ पूर्ण रहती हैं, अभावजन्य कोई कष्ट नहीं उठाना पड़ता । इसी स्थिति को कल्पवृक्ष की सिद्धि कहा गया है।
त्रिपदा गायत्री की यह एक विवेचना हुई। दूसरे प्रतिपादन में उसे ज्ञान , कर्म व भक्ति योग के रूप में प्रज्ञा , निष्ठा व श्रद्धा से साधक को अनुप्राणित करने वाली तथा तीन ग्रंथियों को लेकर बेधन कर भवबंधनों से मुक्त कर देने वाली बताया गया है। साधना विज्ञान के तत्वदर्शी वैज्ञानिकों ने तीन ग्रंथियों का विस्तृत विवेचन एवं निरूपण किया है। उन्हें खोलने के साधन एवं विधि-विधान बनाये हैं। उनके नाम हैं- ब्रह्म ग्रन्थि , विष्णु ग्रन्थि, और रुद्रग्रन्थि। रुद्र ग्रन्थि का स्थान नाभि संस्थान माना गया है। इसे अग्नि चक्र भी कहते हैं। माता के शरीर से बालक के शरीर में जो रस रक्त प्रवेश करता है उसका स्थान यह नाभि संस्थान ही है। प्रसव के उपरान्त नाल काटने पर ही माता और सन्तान के शरीरों कास सम्बन्ध विच्छेद होता है। इस नाभि चक्र द्वारा ही विश्व ब्रह्मांड की वह अग्नि प्राप्त होती रहती है जिसके कारण शरीर को तापमान मिलता और जीवन बना रहता है। स्थूल शरीर को प्रभावित करने वाली प्राण क्षमता का केन्द्र यही है। शरीर शास्त्र के अनुसार नहीं अध्यात्म शास्त्र के सूक्ष्म विज्ञान के अनुरूप प्राण धारण का केन्द्र यही है। कुण्डलिनी शक्ति इसी नाभि चक्र के पीछे अधोभाग में मल मूत्र छिद्रों के मध्य केन्द्र में। इस केन्द्र के जागरण अनावरण का जो विज्ञान विधान है वह त्रिपदा गायत्री के प्रथम चरण का क्षेत्र समझा जा सकता है।
दूसरी ग्रन्थि है-विष्णु ग्रन्थि। यह मस्तिष्क मध्य ब्रह्मरंध्र में है। आज्ञा चक्र, द्वितीय नेत्र इसी को कहते हैं। पिट्यूटरी और पीनियल हारमोन ग्रन्थियों का शक्ति चक्र यहीं बनता है।
मस्तिष्क के खोखले को विष्णु लोक भी कहा गया है। इसमें भरे हुए भूरे पदार्थ को क्षीर सागर की उपमा दी गई है। सहस्रार चक्र को हजार फन वाला शेष सर्प कहा गया है। जिस पर विष्णु भगवान सोये हुए हैं। ब्रह्मरंध्र की तुलना पृथ्वी के ध्रुव प्रदेश से की गई है। अनन्त अन्तरिक्ष में अन्तर्ग्रही प्रचण्ड शक्तियों की वर्षा निरन्तर होती रहती है। ध्रुवों में रहने वाला चुम्बकत्व इस अन्तर्ग्रही शक्ति वर्षा में से अपने लिए आवश्यक सम्पदायें खींचता रहता है। पृथ्वी के वैभव की जड़ें इसी ध्रुव प्रदेश में हैं वहाँ से उसे आवश्यक पोषण निखिल ब्रह्माण्ड की सम्पदा में से उपलब्ध होता रहता है। ठीक इसी प्रकार मानवी काया एक स्वतंत्र पृथ्वी है। उसे अपनी अति महत्वपूर्ण आवश्यकताओं को पूरा करने का अवसर इसी ब्रह्म रंध्र के माध्यम द्वारा उपलब्ध होता है। यह ध्रुव प्रदेश अवरुद्ध रहने से मूर्छित स्थिति में पड़े रहने से सूक्ष्म जगत के अभीष्ट अनुदान मिल नहीं पाते और पिछड़ेपन की आत्मिक दरिद्रता छाई रहती है। विष्णु ग्रन्थि के जाग्रत होने पर वह द्वार खुलता है। जिससे दिव्य अनुदानों की अभीष्ट मात्रा आकर्षित और उपलब्ध की जा सके । मस्तिष्क का बहुत थोड़ा अंश प्रायः सात प्रतिशत ही जाग्रत होता है। उसी से तथाकथित विद्वता बुद्धिमानी आदि की ज्ञान सम्पदा से जिन्दगी की गाड़ी घसीटी जाती है। शेष 93 प्रतिशत ज्ञान संस्थान प्रसुप्त स्थिति में पड़ा है। उसी को विष्णु भगवान का शेष शैया शयन कहा गया है। इस क्षेत्र के बन्द कपाट खोले जा सके और उस अँधेरी कोठरी में प्रकाश पहुँच सके तो कहाँ की रत्न राशि टटोली और काम में लाई जा सकती है। दूर दर्शन, दूर श्रवण, भविष्य ज्ञान , विचार संचालन, प्राण प्रहार आदि अनेक योग और चौंसठ योगिनियाँ यहीं समाधिस्थ बनकर लेटी हुई हैं। उन्हें यदि जगाया जा सके तो मनुष्य सहज ही सिद्धि पुरुष बन सकता है, उनकी अविज्ञात , क्षमता विकसित होकर देव तुल्य समर्थता का लाभ दे सकती है। ऐसी उपलब्धि त्रिपदा गायत्री के दूसरे चरण विष्णु ग्रन्थि के खुलने पर होती बतायी गयी है।
त्रिपदा का तीसरा चरण ब्रह्म ग्रन्थि से सम्बन्धित है। इसका स्थान हृदय चक्र माना गया है। इसे ब्रह्मचक्र भी कहते हैं। ब्रह्म परमात्मा को कहते हैं। भाव श्रद्धा संवेदना एवं आकाँक्षाओं का क्षेत्र यही है। शरीर शास्त्र के अनुसार भी यहाँ रक्त का संचार एवं संशोधन करने वाला केन्द्र यही है। इस धड़कन को ही पेण्डुलम की खट-खट की तरह शरीर रूपी घड़ी का चलाना माना जाता है।
अध्यात्म शास्त्र की मान्यता इनसे आगे की है उसके अनुसार हृदय की गुहा में प्रकाश ज्योति की तरह यहाँ आत्मा का निवास है। परमात्मा भाव रूप में ही अपना परिचय मनुष्य को देते हैं। श्रद्धा और भक्ति के शिकंजे में ही परमात्मा को पकड़ा जाता है। यह सारा मर्मस्थल यही है।
हृदय चक्र ब्रह्म ग्रन्थि है। वहाँ से भावनाओं का आकाँक्षा अभिरुचि का परिवर्तन होता है। जीवन का दिशा धारा बदलती है। बाल्मीकि, अंगुलिमाल, अम्बपाली, विल्वमंगल, अजामिल आदि का प्रत्यावर्तन-हृदय परिवर्तन ही उन्हें कुछ से कुछ बना देने में समर्थ हुआ। जीवन का समग्र शासन सूत्र यहीं, से संचालित होता है। आकाँक्षायें ही भावनाओं को परिष्कृत करती हैं। अंतर्जगत का परिमार्जन करने वाली तथा भाव जगत के माध्यम से व्यक्ति का कायाकल्प करने वाली यह हृदय ग्रन्थि जाग्रत होने पर महान जागरण की प्रक्रिया संपन्न करती है।
रुद्रग्रन्थि, विष्णु ग्रन्थि और ब्रह्म ग्रन्थि ही स्थूल -सूक्ष्म व कारण शरीरों को परस्पर जोड़े हुए हैं और सूक्ष्म जगत के साथ आदान-प्रदान का सिलसिला भी बनाये हुए हैं। स्थूल शरीर नाभिचक्र (रुद्रग्रन्थि) के नियंत्रण में है। सूक्ष्म शरीर पर आज्ञा चक्र ( विष्णु ग्रन्थि ) का कारण शरीर हृदय चक्र ( ब्रह्म ग्रन्थि) का आधिपत्य है। ताले खोलने को चाबी डालने के छिद्र यही तीन हैं। योगाभ्यास से इन्हीं की साधना को रुद्र, विष्णु और ब्रह्मा की साधना माना गया है। इसी समूचे सत्ता क्षेत्र को त्रिपदा गायत्री की परिधि कहा गया है।
गुणों की दृष्टि से त्रिपदा को निष्ठा-प्रज्ञा और श्रद्धा कहा गया है। निष्ठा का अर्थ है-तत्परता दृढ़ता। प्रज्ञा कहते हैं-विवेकशीलता-दूरदर्शिता को श्रद्धा कहते हैं आदर्शवादिता और उत्कृष्टता को । कर्म के रूप में निष्ठा-गुण के रूप में प्रज्ञा और स्वभाव के रूप में श्रद्धा की सर्वोपरि गरिमा है। स्थूल,सूक्ष्म और कारण शरीरों के परिष्कार का परिचय इन्हीं तीनों के आधार पर मिलता है। गुण, कर्म, स्वभाव ही किसी व्यक्तित्व की उत्कृष्टता-निकृष्टता के परिचायक होते हैं।
त्रिपदा का एक पक्ष सृजनात्मक है तथा दूसरा ध्वंसात्मक । एक आध्यात्मिक है दूसरा भौतिक। आध्यात्म के सृजन पक्ष को गायत्री कहते हैं और भौतिक विज्ञान पक्ष को सावित्री । अवाँछनीयताओं के निराकरण का उत्तरदायित्व भी सावित्री का है। पौराणिक गाथा के अनुसार ब्रह्मा जी की इन्हें दो पत्नियाँ माना गया है। सृजन पक्ष के रूप में त्रिपदा की गायत्री कर चर्चा अधिक हुई है। श्रुति ने “असतो मा सद्गमय” “तमसो मा ज्योतिर्गमय” “मृत्योर्मामृत गमय” के रूप में त्रिपदा के इन तीनों चरणों की ही अभ्यर्थना की और तृप्ति-तुष्टि एवं शाँति का वरदान माँगा है।
गायत्री पक्ष की ऊपर चर्चा हुई है। यह दक्षिणमार्गी साधना है। वाममार्गी साधना जो तंत्र प्रधान है वह सावित्री साधना कहलाती है।
दुष्टता को निरस्त करने के लिए, आक्रमण अस्त्र रूप में त्रिपदा के सावित्री पक्ष का प्रयोग होता है। इस प्रकार के प्रयोग उपचार को ब्रह्मास्त्र कहते हैं। मेघनाद के पास ऐसी ही ब्रह्म शक्ति थी जिसे लक्ष्मण जी के विरुद्ध प्रयुक्त किया था। तन्त्र ग्रन्थों में ब्रह्मास्त्र का उल्लेख ब्रह्मशाप- ब्रह्मदण्ड के रूप में भी हुआ है इसका उपयोग दुष्टता के विरुद्ध किये जाने के कितने ही उल्लेख इतिहासों पुराणों में मिलते हैं। शृंगी ऋषि ने परीक्षित को, श्रवण कुमार के पिता ने दशरथ को गौतम ने इन्द्र को , गान्धारी ने कृष्ण को, कपिल ने सागर सुतों को, ऋषियों का नहषु को शाप देने के उपाख्यान सर्व विदित हैं। वरदानों की तरह शापों का भी सुविस्तृत इतिहास है। मारण, मोहन, वशीकरण, उच्चाटन, स्तंभन, आदि के ताँत्रिक प्रयोगों कास विवरण एवं विधान गायत्री तन्त्र एवं अन्यान्य ग्रन्थों में संकेत रूप से दिया गया है। विस्तारपूर्वक उसे इसलिए नहीं लिखा गया कि अनाधिकारी व्यक्ति उसे स्वार्थ सिद्धि के लिए अनीति-पूर्वक प्रयुक्त कर सकते हैं। ऐसा समय-समय पर हुआ भी है। वस्तुतः यह पक्ष गुप्त ही है। जिस प्रकार रिवाल्वर आदि प्रचण्ड अस्त्रों के लाइसेन्स हर किसी को नहीं मिलते। प्रामाणिक व्यक्तियों को ही उन्हें रखने की आज्ञा मिलती है । ठीक इसी प्रकार ताँत्रिक प्रयोगों की शिक्षा सर्व-सुलभ नहीं की गई है। किन्तु है वह भी त्रिपदा का एक महत्वपूर्ण पक्ष। गायत्री का ज्ञान पक्ष ब्रह्म विद्या कहलाता है और विज्ञान पक्ष ब्रह्म तेजस् । दोनों के समन्वय से ब्रह्म वर्चस् शब्द बना है । इसमें आत्मज्ञान और आत्मबल दोनों का समन्वय कर सकते हैं। अथर्व वेद में गायत्री विद्या की सात सिद्धियाँ गिनाई गईं हैं। सबसे अन्तिम सोपान ब्रह्मवर्चस् कहा गया है उसकी उपलब्धि के लिए जो संतुलित यात्रा करनी पड़ती है उसमें दक्षिण और वाम मार्ग का ब्रह्म योग और तन्त्र योग दोनों का समन्वय सम्मिलित है। इसी से उसे पूर्णयोग की संबा दी गयी है। त्रिपदा गायत्री की साधना आत्मविश्वास उपार्जन के लिए देव संस्कृति के प्रणेताओं ने सर्वश्रेष्ठ बतायी है व ऐसे माहात्म्यों से आर्ष साहित्य भरा पड़ा है। यदि आत्मशक्ति प्रचण्ड मात्रा में उपलब्ध हो सके तो ऐसे अगणित व्यक्तित्वों से युगपरिवर्तन का वातावरण बनेगा, इसमें किसी को भी संदेह नहीं होना चाहिए।
गायत्री वैदिक संस्कृत का एक छंद है जिसमें आठ-आठ अक्षरों के तीन चरण - कुल 24 अक्षर होते हैं। गायत्री शब्द का अर्थ है- प्राण रक्षक । गय कहते हैं प्राण को, त्री कहते हैं त्राण-संरक्षण करने वाली को। जिस शक्ति का आश्रय लेने पर प्राण का -प्रतिभा का -जीवन-जीवट का संरक्षण होता है उसे गायत्री कहा जायेगा और भी कितने अर्थ शास्त्रकारों ने किये हैं। इन 24 अक्षरों में से प्रत्येक की अलग-अलग संगतियां मिलाकर 24 ऐसे प्रेरक सूत्र प्रस्तुत किये हैं जिन्हें व्यक्ति की चरित्र-निष्ठा और समाज की प्रगति सुव्यवस्था के आधार भूत सिद्धान्त कहा जा सकता है। इस महामन्त्र के 9 शब्दों को नवधा भक्ति के सिद्धान्त- ब्रह्मतत्त्व रूपी सूर्य के नवग्रह कहा गया है। रामायण के राम-परशुराम संवाद में ब्राह्मण के परम पुनीत नौ ग्रहों की चर्चा है। यह धर्म के दस लक्षणों से मिलते जुलते हैं। इन सब अर्थों पर विचार करने पर यह कहा जा सकता है कि यह छोटा सा मन्त्र भारतीय संस्कृति, धर्म एवं तत्व-ज्ञान का बीज है। इसी थोड़े से अक्षरों में सन्निहित प्रेरणाओं की व्याख्या स्वरूप चारों वेद बने। ॐ भूर्भुवः स्वः यह गायत्री का शीर्ष कहलाता है। शेष आठ-आठ अक्षरों के तीन चरण हैं। जिनके कारण उसे त्रिपदा कहा गया है। एक शीर्ष तीन चरण , इस प्रकार उसके चार भाग हो गये ।इन चारों का रहस्य एवं अर्थ चारों भागों का व्याख्यान चार वेदों के रूप में दिया। इस प्रकार उसका नाम वेद माता पड़ा। गायत्री में सन्निहित तत्वज्ञान की दो प्रकार से व्याख्या होती रह है- एक ज्ञान परक, दूसरी विज्ञान परक। ज्ञान परक को ब्रह्म विद्या और विज्ञान परक को ब्रह्म शक्ति कहते हैं। इन दोनों पक्षों को अलंकारिक रूप में ब्रह्मा की दो पत्नियों के रूप में चित्रित किया गया है। एक का नाम गायत्री, दूसरी का सावित्री। गायत्री में योगाभ्यास की ध्यान धारणा है और सावित्री में तपश्चर्या की प्रेरणा, एक को दर्शन दूसरे को प्रयोग कह सकते हैं।
गायत्री का सार -शब्दार्थ इसी प्रार्थना में समाविष्ट हो जाता है कि “ हे तेजस्वी परमात्मा! हम आपके श्रेष्ठ प्रकाश को अपने में धारण करते हैं। हमारी बुद्धि को सन्मार्ग पर प्रेरित कीजिए”। शिक्षा की दृष्टि से इन शब्दों का सार ‘बुद्धि को सन्मार्ग की दिशा पर चलाने के लिए प्रयत्न करना ‘ है। सद्बुद्धि ही वह तत्व है जिसके आधार पर व्यक्तित्व निखरते-उभरते हैं कौन क्या बना? किसे कितनी सफलता मिली किसने कितना श्रेय सम्मान पाया ? उसका श्रेय समुन्नत लोगों की सद्बुद्धि को ही दिया जा सकता है जो दुर्गति के दलदल में फँसे, उनके दुर्भाग्य का सूत्र संचालन दुर्बुद्धि ही करती दिखाई देगी। स्वर्ग तक ऊँचा उठा ले जाने और नरक के गर्त में गिराने का कार्य मानवी बुद्धि की स्थिति और दिशा धारा पर ही अवलम्बित रहता है।
तत्वदर्शी महा-मनीषियों ने इस तथ्य को समझा और मनुष्य मात्र को शिक्षा दी है कि वे बुद्धि का महत्व समझें और उसे शालीनता की रीति-नीति अपनाने के लिए प्रशिक्षित-अभ्यस्त बनाने का प्रयत्न करें। यही है गायत्री मन्त्र का मूल विषय।
शब्दों की दृष्टि से इस महामंत्र का भावार्थ सरल है- ॐ परमात्मा का स्वयंभू स्वोच्चारित नाम। प्रकृति के गहन अन्तराल से एक दिव्य ध्वनि, झंकार, घर-घराहट के रूप में गूँजती है। ब्रह्म और प्रकृति का बार-बार संयोग आघात होने से ही तीन गुण-पाँच प्राण और पाँच तत्व उत्पन्न होते हैं। उन्हीं से पदार्थों और प्राणियों की संरचना होती है। शब्द- ब्रह्म को सृष्टि का आदि कारण माना गया है। इसी को प्रकृति और पुरुष की मिलन प्रक्रिया का अनवरत क्रम कहा गया है। यहीं से अनहद-नाद उत्पन्न होता है। यही ॐ कार है । घड़ियाल पर हथौड़े की चोट पड़ते रहने से जिस प्रकार झंकार-थरथराहट होती है। जिस तरह घड़ी का पेंडुलम हिलने से आवाज भी होती है और मशीन भी चलती है ठीक उसी तरह प्रकृति पुरुष के मिलन संयोग से ऊँकार उत्पन्न होता है और उस सृष्टि बीज से क्रमशः सूक्ष्म प्रकृति का आकार बनता जाता है। परा प्रकृति के अपरा बनने की अदृश्य के दृश्य होने की यही प्रक्रिया है। इस प्रकार ऊँकार ईश्वर का स्वच्चरित सर्वश्रेष्ठ नाम माना गया है। प्रत्येक वेद मंत्र के सम्मानार्थ सर्व प्रथम ऊँकार लगाये जाने की परम्परा भी है गायत्री मंत्र में ऊँकार का प्रयोग इसी दृष्टि से हुआ है।
भूः भुवः स्वः यह तीन लोक हैं। यों उन्हें पृथ्वी , पाताल और स्वर्ग-मध्य ‘ऊपर ‘ नीचे के रूप में भी जाना जाता है। पर आध्यात्म प्रयोजनों में भूः स्थूल शरीर के लिए, भुवः सूक्ष्म शरीर के लिए, और स्वः कारण शरीर के लिए, प्रयुक्त होता है। वाह्य जगत और अंतर्जगत के तीनों लोकों में ऊँकार अर्थात् परमेश्वर संव्याप्त है। व्याहृतियों में इसी तथ्य का प्रतिपादन है। इसमें विशाल विश्व को, विराट, ब्रह्म के रूप में देखने की वही मान्यता है जिसे भगवान ने अर्जुन को अपना विराट् रूप दिखाते हुए हृदयंगम कराया था। ईश्वर के सर्वव्यापी होने की भावना यदि ठीक तरह हृदयंगम हो सके तो फिर न तो छिपकर दुष्कर्म कर सकना बन पड़ेगा और न किसी पदार्थ का दुरुपयोग या किसी प्राणी से दुर्व्यवहार करते बन पड़ेगा। ॐ और व्याहृतियों का समन्वित शीर्ष भाग इसी अर्थ और इसी प्रकार को प्रकट करता है।
तत् अर्थात् वह । सवितु-प्रकाश और ऊर्जा से ज्ञान और वर्चस् से ओत-प्रोत परमेश्वर । वरेण्य-श्रेष्ठ । भर्ग-तेजस्वी, विनाशक । देव दिव्य इन चार शब्दों में परब्रह्म परमात्मा के उन गुणों का वर्णन है जिन्हें अपनाने का प्रयत्न करना हर अध्यात्मवादी के लिए, हर आत्मिक प्रगति के आकाँक्षी के लिए नितान्त आवश्यक है।
सविता-प्रातः कालीन स्वर्णिम सूर्य को कहते हैं। यह परमेश्वर की स्वनिर्मित प्रतिमा है। उससे वाह्य जगत में प्रकाश और अंतर्जगत में सद्ज्ञान का अभिवर्षण होता है। सूर्य से गर्मी-ऊर्जा वाह्य जगत को मिलती है। सत्संकल्प और सत्साहस से भरी हुई आत्म शक्ति का अनुदान अंतर्जगत को मिलता है। सविता शब्द का गायत्री मंत्र में सर्व प्रथम उल्लेख इसी दृष्टि से हुआ है कि साधक को प्रज्ञावान और शक्तिवान बनने के लिए अथक पुरुषार्थ करना चाहिए। वरेण्यं-श्रेष्ठ चुनने योग्य-स्वीकार करने योग्य वरिष्ठ। इस संसार में उत्कृष्ट-निकृष्ट, भला-बुरा सब कुछ विद्यमान है। उसमें से जो श्रेष्ठ है उसी को स्वीकार करना चाहिए। हंस जिस प्रकार नीर-क्षीर का विवेक रखता है-मोती ही चुनता है उसी प्रकार हमारा चयन मात्र उत्कृष्टता का ही होना चाहिए। निकृष्टता का तिरस्कार बहिष्कार करना ही उचित है। आकर्षक और हितकर में से किस का चयन करें इसी प्रश्न पर प्रायः भयंकर भूल होती रहती है। तात्कालिक लोभ के लिए दूरगामी हितसाधन की उपेक्षा की जाती है। यह भूल न होने देने की ओर गायत्री मंत्र संकेत है कहा गया है कि नीति निर्धारण करते एवं कदम उठाते समय हजार बार ठोक बजा कर देख लिया जाय कि यह वरेण्य है या नहीं । औचित्य न्याय हित का सम्मिश्रण है या नहीं।
भर्ग शब्द तेजस्विता का बोधक है। इसमें प्रतिभा , साहसिकता, तत्परता, तन्मयता जैसे तत्वों का समावेश है। क्रिया में ओजस्-विचारणा में तेजस् और भावनाओं में वर्चस् का आभास जिस, दिव्य तत्व के आधार पर मिलता है उसे भर्ग कहते हैं। भर्ग में एक भाव भूनने नष्ट करने जैसी विशिपरता का है दुष्प्रवृत्तियाँ छाई रहें तो मनुष्य माया ओर पतन के दलदल में फँसा ही रहेगा इनसे छुटकारा पाने के लिए ऐसी प्रखरता का उद्भव होना चाहिए जो अन्तर के कषायों और भीतर के कल्मषों से लोहा लेने में शौर्य पराक्रम का परिचय देती रहे। भर्ग तत्व की विशिष्टता ओजस्वी, तेजस्वी, मनस्वी और तपस्वी लोगों में देखी जाती हैं। इसी का सम्पादन करके प्रगति के पथ पर बढ़ चलना सम्भव हो सकता है।
परमेश्वर के अनन्त नाम हैं और इच्छानुसार नये रखे जा सकते हैं। किन्तु आत्मिक प्रगति के लिए जिन चार विशिष्टताओं की नितान्त आवश्यकता है उनके बोधक शब्दों का समावेश गायत्री मंत्र में हुआ है। सविता, वरेण्य, भर्ग के उपरान्त चौथी विभूतिमत्ता का नाम है ‘देव’ । देवताओं की गरिमा महिमा के सम्बन्ध में मोटी मान्यता और कल्पना प्रायः सभी को होती है। वे सुन्दर होते हैं, सदा युवक रहते हैं, उन्हें किसी बात की कमी नहीं पड़ती, प्रसन्न रहते हैं। वे दिव्य गुण कर्म स्वभाव के होते हैं। दूसरों की सहायता करते हैं, उनका निवास ऊँचाई पर होता है, जिस क्षेत्र में रहते हैं, वह स्वर्ग कहलाता है। असुरता से वे सदा जूझते रहते हैं। प्रायः इन्हीं विशेषताओं से युक्त स्वर्ग लोक के निवासी देवता माने जाते हैं। मानवी प्रगति की अगली सीढ़ी देवत्व ही है। पशुता के पाताल से वह ऊपर उठ आया। इन दिनों पृथ्वी के धरातल पर मनुष्य के कलेवर तक आ गया । इसे सार्थक बनाते ही उसका प्रवेश देव कक्षा में होता है ईश्वर को “देव” शब्द से सम्बोधन करने में यह आत्म-शिक्षण है कि हम परमात्म देव के भक्त बनें और देवत्व की विशेषता में उनका अनुकरण -अनुगमन करें।
“धीमहि” शब्द का अर्थ है-धारण करना। आदर्शों को व्यवहार में उतारना ही उनकी धारणा है। कल्पनाएं करते रहने-कहने सुनने मात्र में उलझे रहने से कुछ बनने वाला नहीं है। परिणाम ही क्रिया उत्पन्न करता है। क्रियावान ही सच्चा ज्ञानवान माना जाता है। उसी को सद्ज्ञान का सत्परिणाम उपलब्ध होता है जो चिन्तन को क्रिया में परिणत करने का साहस दिखाता है। आत्मानुशासन की साहसिकता को प्रखर बनाने के लिए ही विविध योग साधनाएं और तपश्चर्याएं सम्पन्न की जाती हैं।
शीर्ष भाग में ईश्वर के सर्वव्यापी होने की आस्था को विकसित करके पदार्थों के प्रति सदुपयोग की ओर प्राणियों के प्रति सद्व्यवहार की नीति अपनाने का निर्देश है। प्रथम चरण में सविता और वरेण्य की तथा द्वितीय चरण में भर्ग और देव की अवधारणा का प्रशिक्षण है। गायत्री के अन्तिम तृतीय चरण धियो यो नः प्रचोदयात्’ के अंतर्गत परम पिता परमेश्वर से प्रार्थना की गई है कि वह साधक अकेले की नहीं वरन् समस्त जन समुदाय में प्राणि मात्र में “धी” तत्व की-सद्बुद्धि की प्रेरणा करें। “नः” हम सबको और धियः बुद्धियों को कहते हैं यहाँ एक व्यक्ति की बुद्धि सुधर जाने को अपर्याप्त माना गया है। यह सुधार व्यापक रूप से हो तभी काम चलेगा। बहुमत दुर्बुद्धि “ग्रस्तों का बना रहा तो एकाकी सज्जनता मात्र से कोई बड़ा प्रयोजन पूरा न हो सकेगा। राक्षसों की लंका में अकेला विभीषण तो किसी प्रकार अपना निर्वाह ही कर सका था। सच तो यह है कि दुष्टता के वातावरण से एकाकी सज्जनता भी घनी घटाओं से घिरे चन्द्रमा की तरह धूमिल ही बनी रहती हैं।
भगवान से प्रार्थना की गई है कि अपना अनुग्रह व्यक्ति विशेष पर वर्षा कर हाथ रोक न लें वरन् सद्भाव के प्रकाश को उदीयमान सूर्य की तरह सर्वत्र बिखेरें । वैदिक शिक्षण की पद्धति यह है कि किसी विभूति एवं सम्पत्ति के लिए ईश्वर से प्रार्थना करने के रूप में आत्म-शिक्षण की व्यवस्था है। प्रार्थना एक शैली है जिसके आधार पर अपने लिए सबके लिए प्रबल पुरुषार्थ करने का भी निर्देश संकेत है। माँगने भर से ही सब कुछ पाना हो तो उसके लिए पात्रता की शर्त आवश्यक है। परमेश्वर से याचना से तो आकाँक्षा का, आवश्यकता का प्रकटीकरण मात्र है। किसी से कुछ पाना हो तो उसके लिए पात्रता की शर्त आवश्यक है। परमेश्वर से याचना करने का तात्पर्य यह नहीं है कि जो कुछ माँगा जा रहा है वह अन्धाधुन्ध बरसा दिया जाय, वरन् अन्तः करण में विराजमान आत्म देव से यह अनुरोध करना है कि वे अपनी पात्रता और प्रौढ़ता विकसित करें, ताकि सहज ही उपलब्ध होती रहने वाली ईश्वरीय अनुकम्पा का अभीष्ट लाभ उपलब्ध हो सके।
प्रचोदयात् शब्द से प्रेरणा का अनुरोध है। वस्तुतः यही ईश्वरीय अनुग्रह के प्रकट होने का केन्द्र भी है। प्रेरणा का तात्पर्य है अन्तःकरण में प्रबल आकाँक्षा की उत्पत्ति । यह ही समूचे व्यक्तित्व का सारतत्व है। अन्तः प्रेरणा का अनुसरण मनः संस्थान करता है। मन के निर्देश पर शरीर काम करता है। क्रिया का परिणाम सम्पत्ति और परिस्थिति के रूप में सामने आते हैं जिन्हें पाने या हटाने के लिए मनुष्य इच्छा करता है। इच्छा की पूर्ति होने न होने में सहायक बाधक और कोई नहीं, अन्तःकरण की प्रेरणा का स्तर ही आधार भूत कारण होता है।
गायत्री उपासना का उद्देश्य है व्यक्तित्व का ऐसा अनुकूलन जिसमें ईश्वर के अजस्र अनुग्रह को धारण करा सकने की पात्रता हो। उपजाऊ भूमि में ही वर्षा के बादलों के अनुग्रह से हरियाली उपजती है। कठोर चट्टानों पर तो एक पत्ता भी नहीं उगता। गायत्री उपासना का पूरा ध्यान आत्म परिष्कार में नियोजित हो यही है संक्षेप में गायत्री मंत्र का अर्थ और तात्पर्य। जो उसका पालन करता है, वह उन सभी लाभों से लाभान्वित होता है, जो गायत्री उपासना के संदर्भ में शास्त्रकारों और ऋषियों ने देव संस्कृति के विधान के अंतर्गत बताये एवं समझाये हैं।
मनुष्य को प्राणी कहा गया है। प्राण होने पर वह सजीव कहलाता है तथा प्राण निकलते ही निर्जीव हो जाता है। मनुष्य तथा प्राण निकलते ही निर्जीव हो जाता है। मनुष्य तथा अन्य जीव-जन्तुओं के जीवित रहने और विविध क्रियाकलाप करते रहने का सारा श्रेय इस प्राणशक्ति को है। जिसमें यह न्यूनाधिक होगी, उसी अनुपात में सशक्तता, समर्थता, प्रतिभा एवं व्यक्ति की समाज में स्थिति में कमोबेशी दिखाई देगी। मनुष्य व अन्य जीवधारियों में यही एक अंतर है कि उसमें प्राणतत्व का बाहुल्य औरों की अपेक्षा कुछ अधिक है, निरन्तर प्राण संचय करते रहने का बहुमूल्य तंत्र उसके पास है तथा विवेकयुक्त जीवनचर्या अपनाते हुए वह प्राणवान निरन्तर बना रह सकता है।
आज का सबसे बड़ा संकट यह है कि मनुष्य इस प्राण शक्ति के विपुल महासागर में रहते हुए भी प्राणहीन, निस्तेज, बलहीन जीवन जी रहा है। विक्षिप्तताओं से भरे आज के समाज में उनकी संख्या कहीं ज्यादा है, जिन में पर्याप्त प्राणशक्ति-जीवनी शक्ति का अभाव है। इसी कारण वे हेय, दुर्भाग्य भरा अभिशप्त, कुण्ठाओं व मनोविकारों से ग्रसित जीवन जीते देखे जाते हैं। चिकित्सकों का मत है कि मनःशक्ति की , संकल्प शक्ति की कमी से जन्में मानसिक क्षोभ भावनात्मक उद्वेलन तथा निषेधात्मक चिन्तन ने ही आज उन विकृतियों को पैदा किया है जो स्थूल शरीर के स्तर पर असाध्य रोगों के रूप में मनुष्य को प्रभावित करती दिखाई देती हैं। मनःवेद एरिक फ्राम अपनी कृति “मैन फॉर हिमसेल्फ” में लिखते हैं कि “वैयक्तिक जीवन में व्यक्ति का स्वयं को अशक्त-बलहीन महसूस करना आज के मनुष्य की सबसे बड़ी विडम्बना है। कहने को तो उसने बीसवीं सदी के उत्तरार्ध तक आते-आते प्रकृति पर विजय प्राप्त कर ली है किन्तु वह अपने आप पर से विश्वास खो बैठा है। सृष्टि के समस्त ज्ञान के बावजूद वह अपने आपे को विस्मृत कर बैठा है, जहाँ शक्ति का जखीरा छिपा पड़ा है किन्तु वह उसको प्रयोग नहीं कर पा रहा।”
ऋषियों के अनुसार संसार में तीन दुखों के कारणों में सबसे प्रमुख अशक्ति है अज्ञान व अभाव अन्य दो कारण हैं। अशक्ति अर्थात् प्राणतत्व की काय संस्थान व मनः संस्थान में न्यूनता। या तो उसका अधिक अपव्यय होना अथवा समुचित मात्रा में उपार्जन न होना। “ प्राण “ शब्द की व्युत्पत्ति ‘प्र’ उपसर्ग लगाकर “अन्” धातु से होती है। “अन्” शब्द जीवनीशक्ति चेतना-शक्ति का बोधक है। इस प्रकार प्राण शब्द का अर्थ हुआ चेतना का कण-कण में संचार। प्राण शक्ति जब रोम-रोम में जीवनी शक्ति के रूप में संचारित होती है तो व्यक्ति प्राणवान कहा जाता है शरीर में यह अधिक परिमाण में होती है तो व्यक्ति रूप लावण्य युक्त, तेजवान, ओजस्वी, नीरोग, दीर्घजीवी, परिपुष्ट दिखाई देता है। मन में जब इसकी मात्रा बढ़ने लगती है तो व्यक्ति कुशाग्र, बुद्धिमान प्रतिभा संपन्न, मनस्वी, मनोबल-संपन्न बन जाता है। यही शक्ति अध्यात्म क्षेत्र में व्यक्ति को शूरवीर , साहसी आदर्शवादी, निर्भय आत्मबल संपन्न बनाती है। प्राणशक्ति का उपार्जन व अभिवर्धन यदि व्यक्ति समुचित मात्रा में करता है तो उसका पुरुषार्थ सधता चला जाता है व जीवन -सुखी , सफल, प्रसन्नता-पारलौकिक विभूतियों से संपन्न माना जाता है। देव संस्कृति के प्रणेता ऋषियों ने आत्मविज्ञान के क्षेत्र में गहरी शोध कर प्राण-शक्ति के उपार्जन की बल की-जीवट की प्राप्ति की प्रक्रिया को भली भाँति समझ लिया था। गायत्री महाशक्ति के माध्यम से प्राणशक्ति के सतत् अभिवर्धन की शोध ऋषिगणों द्वारा ही की गयी है। गायत्री शब्द का अर्थ है आत्मिक क्षेत्र में प्राणशक्ति भर देने वाली विधा। गय और त्री शब्दों से मिलकर यह शब्द बना है। गय अर्थात् प्राण और त्र अर्थात् रक्षा-जो प्राणों की रक्षा करे-प्राण क्षमता का रमण करे-सतत् प्राणशक्ति बढ़ाती रहें, वह गायत्री है।
शतपथ ब्राह्मण में गायत्री शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार समझाई गयी है-
“सा हैषा गयाँस्तत्रे। प्राणा वै गयास्तत् प्राणाँस्तत्रे तद् गयाँस्तत्रे तस्माद् गायत्री नाम।” (14/8/15/7)
अर्थात्-”उसने “गयो” की रक्षा की। प्राण ही “गय” हैं। उन प्राणों यानी “गयो” का त्राण करने वाली का नाम गायत्री है।”
ताण्डंयोपनिषद् में “प्राणों गायत्रं” कौशितकी उप. में “प्राणों वै गायऋयः तथा पुनः शतपथ ब्राह्मण में “प्राणो वै गायत्री” कहकर उपरोक्त कथन की पुष्टि ही की गयी है। याज्ञवल्क्य स्मृति के अनुसार “गायन्ते त्रायते इति वा गायत्री प्रोच्यते तस्मात् गायन्तं त्रायते यतः” -अर्थात्-प्राणों का संरक्षण करने वाली होने के कारण ही उसे गायत्री कहा जाता है। निरुक्तकार का कथन है-”गायन्तं त्रायते इति गायत्री”- जो गान करने वाले का त्राण करती है, वह गायत्री है। गान का अर्थ है गायत्री मंत्र के माध्यम से संपूर्ण अन्तश्चेतना को झंकृत कर देना, उसमें तन्मय हो जाना शरीर का रोम-रोम कण-कण में प्राण-शक्ति का संचारित हो उठना।
ऋषिगणों ने प्राणशक्ति का महत्व समझा था व इसी कारण उनने जनसाधारण को संबोधित कर कहा-”बलभ् उपास्व” शक्ति की उपासना करो प्राण का संरक्षण करो। उपनिषद्कार कहता है कि -”नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः” बलहीनों को -प्राणशक्ति- क्षीण व्यक्तियों को न कभी आत्मा मिलता है, न परमात्मा। बात सही है। ऐसे व्यक्तियों को भौतिक जीवन में भी कुछ नहीं मिलता। जीवट, पराक्रम,प्राणशक्ति,मनोबल,आत्मबल का अभाव होने पर तो व्यक्ति निर्जीव वस्तु के समान है। जीवन की सार्थकता ही जीवट से है। जीवनीशक्ति युक्त को ही जीवित कह सकते हैं। इसके अभाव में तो वह जीवित मृतक, नरपामर, नरकीटक, मात्र है। गतिशील तो जीवाणु भी होते हैं, परन्तु उन्हें जीवितों की तरह-प्राणवानों की तरह सम्मान तो नहीं मिलता।
व्यक्ति रोजमर्रा के जीवन में बाधक बनने वाले-वातावरण में विद्यमान पतनोन्मुख कुसंस्कारों से जूझ सके, इसके लिए उसे प्राणशक्ति चाहिए। प्रगति के लिए, आवश्यक पुरुषार्थ का सम्पादन करने के लिए अभीष्ट साहस संचय हेतु भी उसे प्राणशक्ति चाहिए। आज की अधीरता, अशक्तता और कायरता की मनःस्थिति से जूझने हेतु भी प्राणशक्ति चाहिए। यह प्राण शक्ति साधनात्मक अवलम्बनों में ऋषिगणों द्वारा गायत्री साधन, सविता के ध्यान, तथा गायत्री जप के साथ जुड़े प्राणायाम से सर्वाधिक मात्रा में अर्जित होती बतायी गयी है। “चेतना क्षेत्र का यह पुरुषार्थ जितना सशक्तता से गायत्री साधना के माध्यम से संपन्न होता है तथा जिस प्रकार से मनःक्षेत्र पर छाए अवसाद- कुण्ठाएँ-हीनता-विक्षुब्धता आदि मनोविकारों का शमन इन आध्यात्मिक अवलम्बनों के माध्यम से होता है उतना संभवतः कोई और माध्यम से किसी अन्य साधना पद्धति में नहीं देखा जाता। अध्यात्म क्षेत्र में प्राण की परिभाषा चेतना की बलिष्ठता के रूप में की गयी है। प्राण से ऋषियों का तात्पर्य जीवात्मा की उस आँतरिक क्षमता से है जो शरीर में ओजस, चिन्तन में तेजस् और आस्थाओं में वर्चस् नाम से जानी जाती है। इस अंतरु “अतः क्षमता को -आत्म शक्ति को -प्राणतत्व को अधिकाधिक मात्रा में संचय करने हेतु जीवन का अधिकतम आनन्द लेने हेतु गायत्री महाशक्ति का आश्रय लेने की बात ही श्रुति कहती है।
प्रश्नोपनिषद् में ऋषि कहते हैं-”प्राणग्नय एवास्मिन ब्रह्मपुरे जागृति” अर्थात्-”इस ब्रह्मपुरी में प्राण की अग्नियाँ ही सदा जलती रहती हैं” तथा-
य एवं विद्वान् प्राणं वेद रहस्या प्रज्ञा हीयतेऽमृतो भवति तयेवश्लोकः ( प्रश्नों. 3/11 ) अर्थात्- जो बुद्धिमान इस प्राण रहस्य को जान लेता है वह अमर बन जाता है उसकी परम्परा कभी नष्ट नहीं होती।” साँख्यायन आरण्यक का ऋषि कहता है कि “मैं ही प्राणरूप प्रज्ञा हूँ। मुझे ही आयु और अमृत मानकर उपासना करो। प्राण ही जीवन है। इस लोक में अमरत्व की प्राप्ति का आधार प्राण ही है।” वस्तुतः प्राण ही प्रत्यक्ष ब्रह्म भी है गायत्री उसका प्रतिनिधित्व करने वाली शक्ति है। यदि गायत्री का तत्वदर्शन जीवन में उतर जाए, सूर्य की साधना द्वारा व्यक्ति अपने विचारों में मन को स्नान करा सके तो यह प्राण शक्ति उसके रोम-रोम में उतरकर उसे ब्रह्मवर्चस सम्पन्न बना देती है। आप्त वचनों के अनुसार ‘गा’ कारो गतिदः प्रोक्त, ’य’ कारो शक्ति दायिनी। ‘त्र’ त्राताच, ‘ई’ कार स्वयं परम्। गा अर्थात् गति, य अर्थात् गति, य अर्थात्-शक्ति, त्र अर्थात् त्राता ई अर्थात् परब्रह्म। इसका मतलब हुआ गायत्री वह परमसत्ता है- पर ब्रह्म की प्रत्यक्ष सत्ता है जो मानव जीवन में प्राण का संचार करती है उसको गति प्रदान करती है, शक्ति देती है, उसकी रक्षा करती है, निर्भय बनाती है, प्रकारान्तर से मनोबल-आत्मबल से अभिपूरित कर उसे ब्रह्मवर्चस् संपन्न बना देती है।
गायत्री महासत्ता की उपासना करते हुए वरदान रूप में ब्रह्मवर्चस् को प्राप्त कर सकने वाला हर क्षेत्र में विभूतिवान बनता चला जाता है। छान्दोग्योपनिषद् का ऋषि अथर्ववेद की सूक्ति “आयुः प्राणं प्रजाँ पशुँ कीर्ति द्रविणम्- ब्रह्मवर्चसम् मह्यम् दत्वा ब्रजत ब्रह्मलोकम्” को इस रूप में कहता है- “स य एवमेतद् गायत्रं प्राणेषु प्रोक्तं वेद प्राणी भवति सर्दमायुरेति ज्योग्जीवति महान्पव्रजया पशुर्भिभवति महान्कीर्त्या महामनः स्यात्तद्द्रतम्” ( 2/10/2) अर्थात्-”यह गायत्री तत्व समस्त प्राणों में विद्यमान है। जो इसकी उपासना करता है, वह विद्वान-प्राणवान-दीर्घजीवी यशस्वी-सुसंपन्न-उदार और महामनस्वी बनता है। “ यह सभी महामत्य जो बताए गये हैं, अकारण नहीं हैं। वस्तुतः स्थूल काय किन्तु तेजरहित दुर्बल मनः स्थिति का व्यक्ति बलवान नहीं कहा जा सकता है, न दूसरों की। नीति वाक्य है- तेजोयस्य विराजते सबलवान, स्थूलेषु कः प्रत्ययः “ अर्थात्-जिनमें तेज है, वही बलवान है। स्थूल काया के पुष्ट होने से क्या प्रयोजन सधता है ?” दुर्भाग्यवश आज औषधि उपचारों से लेकर आधुनिक विज्ञान के सारे प्रयास बहिरंग पर ही केन्द्रित हैं। अंतरंग की दृष्टि से तो व्यक्ति निताँत जर्जर दुर्बल होता दीखता है। ऋषियों की कल्पना थी कि वैश्वप्राण के क्षरण होते रहने से ऐसी स्थिति आ सकती है, आधुनिक प्रगति व्यक्ति को आत्मघाती स्थिति में भी पहुँचा सकती है। इसलिए उनने प्राणों की रक्षा किये जाने की-प्राणों का निग्रह करने की उन्हें धारण किये जाने की महत्ता योग साधनाओं के माध्यम से स्थान-स्थान पर प्रतिपादित की।
जिस प्रकार पंचतत्वों की हेरफेर से शरीर में विविध प्रकार के परिवर्तन होते हैं, उसी प्रकार आत्मिक क्षेत्र में प्राण की स्थिति में हेरफेर से शरीर में विविध प्रकार के परिवर्तन होते हैं, उसी प्रकार आत्मिक क्षेत्र में प्राण की स्थिति में हेरफेर होने से मनोभूमि में महत्वपूर्ण परिवर्तन होते हैं, अनेक जन्मों के संग्रहित कुसंस्कारों के कारण मन में विकृतियाँ भरती चली जाती हैं तथा सतत् साधक को पथ-भ्रष्ट करने के लिए निरन्तर दुरभि सन्धियाँ रचती रहती हैं। मनका उचटना, जहाँ तहाँ घूमना निर्दिष्ट लक्ष्य पर स्थिर न होना, कुसंस्कारों का कुमार्ग पर चलने को मन को , ललचाना, वासना प्रधान चिन्तन में रस लेने की प्रवृत्ति बढ़ाना-ये सभी वे विघ्न हैं, जिन्हें नियंत्रित करने का सुनिश्चित विधान प्राण-निरोध-प्राण संयम-प्राणधारण-प्राणायाम-सविता के ध्यान तथा गायत्री के जप द्वारा संपन्न होता बताया गया है। मनोभूमि का शोधन व चिर संचित कुसंस्कारों का उन्मूलन कर प्राणधारण की साधना व्यक्तित्व का सुनियोजन करती है तथा उसे मनःशक्ति आत्मबल संपन्न बनाती है।
गायत्री की साधना प्रमुख लाभ व्यक्ति को प्राण शक्ति उपलब्ध कराना है। प्रसुप्त अंतः शक्तियों का जागरण कर वह ब्रह्म तेज का संवर्धन करती है। देवी भागवत का सारा आख्यान, गायत्री की इसी महिमा से भरा पड़ा है। शास्त्रकार इस ग्रन्थ में कहता है-”ब्रह्मण्य तेजो रूपा च सर्व संस्कार रूपिणी पवित्र रूपा सावित्री वाँछतिह्यात्म शुद्धये”। अर्थात्- गायत्री ब्रह्मतेज रूप है। पवित्रता एवं संस्कार रूपिणी है। इससे आत्मशुद्धि होती है।” सबसे बड़ी उपलब्धि है पवित्रता-पापों का काटना तथा परमात्म सत्ता से साक्षात्कार हेतु पात्रता अर्जित होना। पवित्रता का दूसरा फलितार्थ है-मनोविकारों का शमन -उत्तेजना, अवसाद, तनाव, भय, जैसी मनःस्थिति से छुटकारा व पवित्र श्रेष्ठ विचारों का उद्भव मन की शान्ति व व्यक्तित्व का मनोवैज्ञानिक दृष्टि से सामंजस्य स्थापित हो जाना।
शतपथ ब्राह्मण में कहा गया है-”अमृत सु वै प्राणः” यह प्राण ही निश्चित रूप से अमृत है। गायत्री मंत्र की साधना, सूर्य का ध्यान, प्राण
धारण हेतु किया गया प्राणायाम व्यक्ति को अमरत्व प्रदान करता है तथा उसे ओजस्वी, तेजस्वी , मनस्वी बनाता है। सावित्री-गायत्री प्राणवान सविता देवता की अधिष्ठात्री शक्ति हैं तथा अनन्त प्राण शक्ति के स्रोत के रूप में सन्निहित प्राणशक्ति वस्तुतः परमब्रह्म परमात्मा का ब्रह्मतेज “भर्ग” ही है। पापनाशक यह तेज जब अंतरात्मा में स्थित होता है तो व्यक्ति को पापमुक्त कर पवित्र बना उसे आत्मबल संपन्न बना देता है।
वर्चस् की आत्मबल की आवश्यकता हर क्षेत्र में है भौतिक किन्तु आध्यात्मिक। आत्मबल जिस प्राणशक्ति के संचय से संपादित होता है। वह गायत्री महाशक्ति का अवलम्बन लेकर अर्जित की जा सकती है। गायत्री की प्रेरणा से आत्मबल ब्रह्मवर्चस् इसी तरह उभरता है, जैसे कि सौर मण्डल के ग्रह-उपग्रह सूर्य की आभा से प्रकाशवान दिखाई देते हैं। जीवन को जीवितों की तरह प्राणवानों की तरह जीना हो-उसमें कुछ रस लेना हो आनन्द लेना हो, सोद्देश्य जीवन जीकर अर्जित करना हो तो आत्मबल ही संपादित किया जाना चाहिए। बलिष्ठता की अनुगामिनी ही संपन्नता है। अस्तु, बलों में परमबल आत्मबल के उपार्जन को ही प्राथमिकता दी जानी चाहिए हम’वर्चस्’ की उपासना करें, गायत्री का ब्रह्मतेज धारण कर प्राणवान बनें, इसी में दूरदर्शिता है।
संस्कृति के प्रेरक-प्रणेता ऋषियों की अगणित उपलब्धियों में मंत्र विद्या का मूल्य एवं महत्व अद्वितीय है। इसी सामर्थ्य के कारण वे ऋषि कहलाए । वेदवाणी कहती है- ऋषियों मंत्र दृष्टारः अर्थात्- ऋषि वही है जिसने मंत्र की साधना की, गहराई को अनुभव और उपलब्धियों को हस्तगत किया। ऋषियों के अनुभूत कोश स्पष्ट करते हैं कि विश्वव्यापी ब्रह्म चेतना के साथ मनुष्य का सघन और सुनिश्चित सम्बन्ध है। पर उसमें मल-विक्षेप आवरण जैसे अवरोधों ने एक प्रकार से विक्षेप जैसी स्थिति पैदा कर दी है। बिजली घर और कमरे के पंखे के बीच लगे तारों में यदि कहीं गड़बड़ी उत्पन्न हो जाय तो पंखा और बिजली दोनों के अपने-अपने स्थान पर रहते हुए भी सन्नाटा छाया रहेगा। मंत्र साधना इन शिथिल सम्बन्धों को पुनः प्रतिष्ठापित करने वाली सुनिश्चित पद्धति है। विश्व चेतना के साथ व्यक्ति को जोड़ने वाला राजमार्ग है।
महायोगी अनिर्वाण के ग्रन्थ ‘अन्तरयोग;’ के अनुसार मंत्रों का शब्द चयन योग विद्या में निष्णात् तत्ववक्ताओं ने दिव्य चेतना के साथ सघन अनुभूतियों के आधार पर किया है। यों ये शब्द विन्यास संस्कृति सूत्र, और जीवन के उत्कर्ष का भाव सन्देश भी हैं। पर इससे कहीं अधिक महत्ता शब्द-गुन्थन की है। मंत्र विद्या के प्रख्यात ग्रन्थ मंत्र महार्णव में इन दोनों ही तत्वों को स्वीकारा गया है। इसके अनुसार मंत्र का अर्थ है, मनन, विज्ञान, विद्या और ज्ञान। मंत्र शक्ति से मनन का स्वभाव मिलता है। मनन कहते हैं बार बार विचारने को । जिस विचार को बार-बार मन में जमाने की कोशिशें की जाती है वह मन का स्वभाव बन जाता है। अतः मंत्र शक्ति मन तद्नुरूप ढलता है। साथ ही इसे वह ज्ञान व प्रकाश देता है जिससे अज्ञान और अंधकार को दूर किया जा सकता है। इसकी साधना से अन्तर्चेतना में कुछ ऐसी फेर-बदल होती है जिसकी वजह से ईश्वरीय शक्ति और आनन्द का अवतरण होने लगता है।
मंत्र प्रक्रिया की अनेकानेक विशेषताओं में सर्वाधिक महत्ता उसके स्फोट में है। स्फोट का मतलब है ध्वनि विशेष का ईश्वर तत्व में होने वाला असाधारण प्रभाव । तालाब में छोटा ढेला फेंकने से थोड़ी और छोटी लहरे उत्पन्न होती हैं। पर यदि बड़ी ऊँचाई से बहुत जोर से कोई बड़ा पत्थर फेंका जाय तो उसका शब्द और स्पन्दन दोनों ही अपेक्षाकृत बड़े होंगे और उसकी प्रतिक्रिया प्रतिध्वनि भी बड़ी लहरों के साथ दिखाई देगी। मंत्र विद्या के सम्बन्ध में इसी को स्फोट कहा जाता है। आगम और निगम का समस्त भारतीय आध्यात्म इसी पृष्ठभूमि पर खड़ा है। मंत्र और तंत्र की सभी शाखा-प्रशाखाएँ इसी का विशाल परिवार हैं।
शब्द की सामर्थ्य सभी भौतिक शक्तियों से बढ़कर, सूक्ष्म और विभेदन क्षमता वाली है, इस बात की निश्चित जानकारी होने के बाद ही मन्त्र-विद्या का विकास भारतीय तत्व-दर्शियों ने किया। यों हम जो कुछ भी बोलते हैं, उसका प्रभाव व्यक्तिगत और समष्टिगत रूप से सारे ब्रह्माण्ड पर पड़ता है तालाब के जल में फेंके गये एक छोटे से कंपन की लहरें भी दूर तक जाती हैं, उसी प्रकार हमारे मुख से निकाला हुआ, प्रत्येक शब्द आकाश के सूक्ष्म परमाणुओं में कम्पन उत्पन्न करता है उस कम्पन से लोगों में अदृश्य प्रेरणायें जाग्रत होती हैं।
यह शब्द शक्ति का परोक्ष प्रभाव हुआ। प्रत्यक्ष प्रभाव वैखरी वाणी के रूप में सामने आता है। वैखरी वाणी जब विशिष्ट उच्चारण प्रक्रिया द्वारा समर्थ होकर “वाक्”बनती है तो उसका विस्तार श्रवण क्षेत्र तक सीमित न रहकर तीनों लोकों की परिधि तक व्यापक होता है। वाणी में ध्वनि है, ध्वनि में अर्थ। किन्तु ‘वाक्’ शक्तिरूपा है। उसकी क्षमता का उपयोग करने पर वह सब जीता जा सकता है जो जीतने योग्य है।
कौत्स मुनि ने मन्त्र अक्षरों के अर्थ की उपेक्षा की है और कहा है कि उनकी क्षमता शब्द गुन्थन के आधार पर समझी जानी चाहिए। उसमें ‘वाक्’ तत्व ही प्रधान रूप से काम करता है। इस ‘परवाक्’ का स्तवन करते हुए श्रुति कहती है।
देवी वाचमजनयन्त देवास्ताँ, विश्वरुपाः पशवों वदन्ति। सा नो मंद्रेष्षमर्ग दुहाना, धेनुर्वागस्मानुपसुष्टुवेतु
परावाक् देवी है। विश्व रूपिणी है। देवताओं की जननी है। देवता मन्त्रात्मक ही हैं। यही विज्ञान है।
मंत्रों का चयन इसी ध्वनि-विज्ञान को आधार मानकर किया गया है। अर्थ का समावेश गौण है। गायत्री मंत्र की सामर्थ्य अद्भुत है पर उसका अर्थ अति सामान्य है। भगवान से सद्बुद्धि की कामना भर उसमें की गई है। इसी अर्थ प्रयोजन को व्यक्त करने वाले मंत्र श्लोक हजारों हैं। हिन्दी तथा अन्य भाषाओं में भी ऐसी कविताओं की कमी नहीं जिनमें परमात्मा से सद्बुद्धि की प्रार्थना की गई है। फिर उन सब कविताओं को गायत्री मंत्र के समकक्ष क्यों नहीं रखा जाता और उनका उच्चारण क्यों उतना फलप्रद नहीं होता ? वस्तुतः मंत्र स्रष्टाओं की दृष्टि में शब्दों का गुँथन ही महत्वपूर्ण रहा है। कितने ही बीज मंत्र ऐसे हैं जिनका खींचतान के ही कुछ अर्थ भले ही गढ़ा जाय, पर वस्तुतः उनका कुछ अर्थ है नहीं। ह्रीं. श्री. क्ली ऐ. हुँ. यं. फट् आदि शब्दों का क्या अर्थ हो सकता है, इस प्रश्न पर माथापच्ची करना बेकार है । उनका सृजन यह ध्यान में रखते हुए किया गया है कि उनका उच्चारण किस स्तर का शक्ति कम्पन उत्पन्न करता है और उनका जपकर्ता, बाह्य वातावरण तथा अभीष्ट प्रयोजन पर क्या प्रभाव पड़ता है ?
मानसिक, वाचिक एवं उपाँशु जप में ध्वनियों के हलके भारी किये जाने की प्रक्रिया काम में लायी जाती है। वेद मन्त्रों के अक्षरों के साथ-साथ उदात्त और स्वरित क्रम से उनका उच्चारण नीच-ऊँचे तथा मध्यवर्ती उतार-चढ़ाव के साथ किया जाता है। उनके सस्वर उच्चारण की परम्परा है। यह सब विधान इसी दृष्टि से बनाने पड़े हैं कि उन मन्त्रों का जप अभीष्ट उद्देश्य पूरा कर सकने वाला शक्ति प्रवाह उत्पन्न कर सके। मन्त्र जप की दुहरी प्रतिक्रिया होती है। एक भीतर दूसरी बाहर । आग जहाँ जलती है उस स्थान को गरम करती है, साथ ही वायु मण्डल में ऊष्मा बिखेर कर अपने प्रभाव क्षेत्र को भी गर्मी देती है। जप ध्वनि प्रवाह-समुद्र की गहराई में चलने वाली जलधाराओं की तरह तथा ऊपर आकाश में छितराई हुई उड़ने वाली हवा की परतों की तरह अपनी हलचलें उत्पन्न करता है। उनके कारण शरीर में यत्र-तत्र सन्निहित अनेकों ‘चक्रों ‘ तथा ‘उपत्यिका ‘ ग्रन्थियों में विशिष्ट स्तर का शक्ति-संचार होता है। लगातार के एक नियमित क्रम से चलने वाली हलचलें ऐसा प्रभाव करती हैं, जिन्हें रहस्यमय ही कहा जा सकता है। पुलों पर सैनिकों को पैरों को मिलाकर चलने से उत्पन्न क्रमबद्ध ध्वनि उत्पन्न न करने के लिए इसलिए मना किया जाता है कि इस साधारण-सी क्रिया से पुल तोड़ देने वाला असाधारण प्रभाव उत्पन्न हो सकता है।
यह प्रश्न उठता है कि मंत्र में जब कि किसी प्रकार की बाह्य शक्ति उन शब्द-तरंगों को रूपांतरित नहीं करती तो उनसे विज्ञान की तरह के लाभ कैसे प्राप्त हो सकते हैं ? इस प्रश्न का उत्तर ‘रेट्रॉमीटर’ यन्त्र के आविष्कार के साथ संभव हो गया है। इस यन्त्र में बाहरी शक्ति-स्रोत की आवश्यकता नहीं पड़ती वरन् ध्वनि में सन्निहित ऊर्जा ही विद्युत ऊर्जा का काम करती है। रेट्रोमीटर का आविष्कार न्यूमा, ई, थामस नामक अमेरिकी वैज्ञानिक ने किया है। श्री थामस लेंगले स्थित ‘नेशनल एरोनोटिक्स एण्ड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन’ रिसर्च सेन्टर के अन्वेषक हैं। इस यन्त्र में किसी भी माध्यम से प्रकाश फोटोसेस्टिव सैल में भेज कर विद्युत ऊर्जा में बदल दिया जाता है और फिर रिसीवर यन्त्र में विद्युत ऊर्जा में बदली तरंगों को ध्वनि में बदलकर सुन लिया जाता है।
इस सिद्धान्त से यह निश्चित हो गया है कि कर्णातीत तरंगों का स्वभाव लगभग प्रकाश तरंगों जैसा ही होता है। कर्णातीत तरंगों का तरंग दैर्ध्य जितना कम होता है,यह समता उतनी ही बढ़ती है, इससे पता चलता है कि कर्णातीत तरंगों को बड़ी हरी सुविधापूर्वक आवर्तित और परावर्तित किया जा सकता है। इनका व्यवहार भी प्रकाश-तरंगों से ठीक उलटा होता है, इसलिये इन तरंगों से विभिन्न प्रकार के प्रकाश-स्रोतों की शक्ति को प्रतिक्रिया द्वारा आसानी से अपनी ओर आकर्षित किया जा सकता है। ऐसा इसलिये होता है कि कर्णातीत तरंगें किसी सघन पदार्थ में तो तेजी से चलती हैं पर विरल माध्यमों में वे मन्दगति से चलने लगतीं हैं। वेदों में प्रयुक्त प्रत्येक मंत्र का कोई न कोई देवता होता है। गायत्री का देवता सविता है, अर्थात् - गायत्री उपासना से जो भी लाभ यथा आरोग्य, प्राण, धन-सम्पत्ति, पुत्र और महत्वाकांक्षायें आदि पूर्ण होती हैं, उसकी शक्ति अथवा प्रेरणा सूर्य लोक से आती है। किसी भी मंत्र का जब उच्चारण किया जाता है, तब वह एक विशेष गति से आकाश के परमाणुओं के बीच बढ़ता हुआ, उस देवता (शक्ति-केन्द्र) तक पहुँचता है, जिसका उस मंत्र से संबंध होता है। मंत्र-ज पके समय आवश्यक ऊर्जा मन को शक्ति के द्वारा प्राप्त होती है, इस शक्ति के द्वारा जप के समय की ध्वनि तरंगों को विद्युत तरंगों के रूप में प्रेक्षित किया जाता है। वह तेजी से बढ़ती हुई कुछ ही क्षणों में देव-शक्ति से टकराती हैं, उससे अदृश्य सूक्ष्म-परमाणु मन्दगति से परिवर्तित होने लगते हैं, उनकी दिशा ठीक उलटी होती है। सूक्ष्म और स्थूल दोनों तरह के परमाणु दौड़ पड़ते हैं और साधक को शारीरिक लाभ और मानसिक प्रेरणायें देने लगते हैं। यह शक्ति ही मनुष्य को क्रमशः उन्नत जीवन और अनेक अप्रत्याशित लाभों की ओर अग्रसर करती रहती हैं।
शब्द शक्ति का स्फोट मन्त्र शक्ति की रहस्यमय प्रक्रिया है। अणु विस्फोट से उत्पन्न होने वाली भयावह शक्ति की जानकारी हम सभी को है। शब्द की एक शक्ति सत्ता है। उसके कम्पन भी चिरन्तन घटकों के सम्मिश्रण से बनते हैं। इन शब्द कम्पन घटकों का विस्फोट भी अणु विखण्डन की तरह ही हो सकता है। मन्त्र योग साधना के उपचारों के पीछे लगभग वैसी ही विधि व्यवस्था रहती है। मंत्रों की शब्द रचना का गठन तत्वदर्शी, मनीषी तथा दिव्य द्रष्टा मनीषियों ने इस प्रकार किया है कि उसका जपात्मक, होमात्मक तथा दूसरे तप साधनों एवं कर्मकाण्डों के सहारे अभीष्ट स्फोट किया जा सके। वर्तमान बोलचाल में विस्फोट शब्द जिस अर्थ में प्रयुक्त होता है लगभग उसी में संस्कृत में स्फोट का भी प्रयोग किया जाता है। मन्त्राराधन वस्तुतः शब्द शक्ति का विस्फोट ही है।
शब्द स्फोट से ऐसी ध्वनि तरंगें उत्पन्न होतीं हैं जिन्हें कानों की श्रवण शक्ति से बाहर की कहा जा सकता है। शब्द आकाश का विषय है। इसलिए मान्त्रिक का कार्यक्षेत्र आकाश तत्व रहता है। योगी वायु उपासक है उसे प्राणशक्ति का संचय वायु के माध्यम से करना पड़ता है इस दृष्टि से मान्त्रिक को योगी से भी वरिष्ठ कहा जा सकता है। सच्चा मान्त्रिक, योगी से कम नहीं वरन् कुछ अधिक ही शक्तिशाली हो सकता है।
मन्त्र से दो वृत्त बनते हैं एक को भाववृत्त और दूसरे को ध्वनि वृत कह सकते हैं। लगातार की गति अन्ततः एक गोलाई में घूमने लगती है। ग्रह नक्षत्रों का अपने-अपने अयन वृत पर घूमने लगना इसी तथ्य से सम्भव हो सका है कि गति क्रमशः गोलाई में मुड़ती चली जाती है।
तन्त्र जप में नियत शब्दों को निर्धारित क्रम से देर तक निरन्तर उच्चारण करना पड़ता है। जप यही तो है। इस गति प्रवाह के दो आधार है। एक भाव और दूसरा शब्द । मन्त्र के अन्तराल में सन्निहित भावना का नियत निर्धारित प्रवाह एक भाववृत्त बना लेता है, वह इतना प्रचण्ड होता है कि साधक के व्यक्तित्व को ही पकड़ और जकड़ कर उसे अपनी ढलान में ढाल ले। उच्चारण से उत्पन्न ध्वनिवृत्त भी ऐसा ही प्रचण्ड होता है कि उसका स्फोट एक घेरा डालकर उच्चारणकर्ता को अपने घेरे में कस ले। भाववृत्त अंतरंग वृत्तियों पर, शब्दवृत्त बहिरंग प्रवृत्तियों पर, इस प्रकार आच्छादित हो जाता है कि मनुष्य के अभीष्ट स्तर को तोड़ा-मरोड़ा या ढाला जा सके इतना ही नहीं समूह स्तर को भी इससे प्रभावित-उत्तेजित किया जा सकता है। पिछले दिनों रूस ने ऐसे ही प्रयोग कनाडा के खनिकों पर किये था।
विज्ञान जगत में शब्द के सूक्ष्मतम प्रयोग की ये उपलब्धियाँ यह बताती हैं कि यदि भारतीय तत्वदर्शियों ने मंत्र विद्या की इतनी जानकारी कर ली हो कि शब्दों के कम्पनों द्वारा विष-निवारण, रोग-निवारण अदृश्य शक्तियों का आकर्षण मनोगति द्वारा मारण, मोहन, उच्चाटन आदि प्रयोग सफलतापूर्वक होते रहें हों तो उसे अतिशयोक्ति न माना जाय। महाभारत काल में मंत्र-प्रेरित शस्त्रों की मार होती थी , उससे परमाणु-बमों से भी भयंकर ऊर्जा उत्पन्न होती थी , उसका बड़ा सधा हुआ उपयोग सम्भव था। उस शक्ति से सैनिकों के समूह को भी नष्ट किया जा सकता था और हजारों की भीड़ में छिपे केवल एक ही किसी व्यक्ति को मारा जा सकता था । यह सब उस शब्द विज्ञान का ही चमत्कार था, जिसकी क्षीण-सी जानकारी भौतिक विज्ञान जान पाया है। यदि इस मंत्र शक्ति का रचनात्मक उपयोग हो सके तो चेतना के ईंधन कहे जाने वाले इस ऊर्जा के स्रोत से अनुकूलताओं के सृजन व सद्भाव विस्तार में असाधारण मदद मिल सकती है। भारतीय संस्कृति में मंत्र-विज्ञान-शब्द शक्ति का महत्वपूर्ण स्थान है व रहेगा।
अध्यात्म विज्ञान में स्थान-स्थान पर प्रकाश की साधना और प्रकाश की याचना की चर्चा मिलती है। यह प्रकाश बल्ब, बत्ती अथवा सूर्य, चंद्र आदि से निकलने वाला उजाला नहीं वरन् वह परम ज्योति है जो इस विश्व में चेतना का आलोक बनकर जगमगा रही है। गायत्री का उपास्य सविता देवता इस परम ज्योति को कहते हैं। इसका अस्तित्व ऋतम्भरा प्रज्ञा के रूप में प्रत्यक्ष और कण-कण में संव्याप्त जीवन ज्योति के रूप में प्रत्येक व्यक्ति अपने भीतर भी देख सकता है। इसकी जितनी मात्रा जिसके भीतर विद्यमान हो समझना चाहिए कि उसमें उतना ही अधिक ईश्वरीय अंश आलोकित हो रहा है।
गायत्री उपासना में सविता देवता का ध्यान करने की प्रक्रिया इसीलिए की जाती है कि अन्तर के कण-कण में संव्याप्त प्रकाश आभा को अधिक दीप्तिमान बनने का अवसर मिले। अपने ब्रह्म रंध्र में अवस्थित सहस्राँशु-आदित्य सहस्रदल कमल को खिलाये और उसकी प्रत्येक पंखुड़ी में सन्निहित दिव्य कलाओं के उदय का लाभ साधक को मिले।
ब्रह्म विद्या का उद्गाता ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ की प्रार्थना में इस दिव्य प्रकाश की याचना करता है। इसी की प्रत्येक जाग्रत आत्मा को आवश्यकता अनुभव होती है, अस्तु गायत्री उपासक अपने जप प्रयोजन में इसी ज्योति को अन्तः भूमिका में अवतरण करने के लिए सविता देवता का ध्यान करता है। उसे पवित्रता, मेधा, प्रखर प्रतिभा मिले।
“दि ह्यूमन सेन्सेज “ पुस्तक के रचयिता वैज्ञानिक डा. गेल्डार्ड ने अपनी पुस्तक में बताया है कि नक्षत्रीय गतिविधियाँ मनुष्य की मानसिक व शारीरिक गतिविधियों को प्रभावित करती हैं। इस सिद्धान्त के समर्थन में उन्होंने एक वैज्ञानिक प्रयोग का उदाहरण देकर यह समझाया है कि मनुष्य की कोशिकाओं में अनुकूल तत्वों को आकर्षित करने, अवशोषण कर अपने में धारण करने और इस आधार पर शरीर से टूटने वाली ऊर्जा की कमी को पूरा करने की अद्भुत सामर्थ्य है। इसकी जाँच तब हुई जब शरीर के जीवित अंश को काट कर अलग रखा गया उस स्थान पर पहले से एक विषाक्त रसायन रखा था मस्तिष्कीय प्रक्रिया से सम्बन्ध विच्छेद होने पर भी उस जीवित टुकड़े के अणु उस घातक वस्तु से दूर हटने की कोशिश करने लगे। वैज्ञानिक इस बात को देखकर आश्चर्यचकित रह गये तुरन्त उन्होंने उस विष को वहाँ से हटा दिया और अब उस स्थान पर लाभदायक औषधि रखी तो उन कोषाणुओं का गुण पूरी तरह बदल गया वे उस औषधि की ओर खिंचने का गुण दिखाने लगे। डा. गेल्डार्ड ने अपनी समीक्षा में बताया है कि प्रत्येक जीवाणु एक लघु उपस्टेशन है जो मुख्य स्टेशन मस्तिष्क से जुड़ा रहता है मस्तिष्क में जो भी भाव तरंग उठी उसका तत्काल स्पष्ट प्रभाव इन जीवाणुओं में झलक पड़ता है। इसी आधार पर मनुष्य आकाश की अदृश्य शक्तियों से तो प्रभावित होता ही है मन की चुम्बकीय शक्ति प्रवाह भी अपने अन्दर आकर्षित कर धारण कर सकता और अपनी अन्तरंग क्षमताओं को विकसित कर सकता है। प्राचीन भारतीय मनीषियों ने इन्हीं शक्ति प्रवाहों को सूक्ष्म दैवी शक्तियों के रूप में माना था, उनके गुणों की पृथकता के आधार पर उन्हें पृथक्- पृथक् देव शक्तियों की संज्ञा देकर उनकी उपासना की विधियाँ विकसित की थीं और उनके प्रचुर भौतिक एवं आध्यात्मिक उत्कर्ष उपलब्ध किया था। क्वांटम थ्योरी ने परिपूरक सिद्धान्त के रूप में यह स्वीकार किया है कि पदार्थ अपनी ठोस अवस्था से तरल, तरल से गैस, गैस से प्लाज्मा तथा इसी तरह के और भी उन्नत किस्म के प्रकाश-कणों में परिवर्तित हो जाता है उसी तरह उच्चस्तरीय चेतन कण क्रमशः एक स्थिति में पदार्थ के रूप में भी व्यक्त हो सकते हैं। इसी तरह का प्रतिपादन वैज्ञानिक हाइज़ेनबर्ग ने भी किया है। वे लिखते हैं कि अन्तरिक्ष में एक स्थान आता है जहाँ पदार्थ को छोड़ दिया जाये तो वह स्वतः ऊर्जा में परिणत हो जाता है जिस तरह पदार्थ सत्ता परिधि काल और रूप के ढाँचे में बंधी रहती है उसी तरह मनःसत्ता अनुभूति-स्मृति, विचार और बिंब के रूप में व्यक्त होती है इतना होने पर भी दोनों में अत्यधिक घनिष्ठता है। यह एक दूसरे को प्रभावित ही नहीं करते अपितु परस्पर आत्मसात भी होते रहते हैं। सविता ध्यान का अर्थ इस प्रक्रिया को ही प्रगाढ़ बनाकर उन शक्तियों से लाभान्वित होना है।
सविता देवता यद्यपि सूर्य का ही दूसरा नाम है। पर यह भली प्रकार समझ लेना चाहिए कि जो अन्तर शरीर और आत्मा का है वही सूर्य और सविता का है। गायत्री महामन्त्र का देवता सूर्य वही महाप्राण है। उसका स्पष्टीकरण शास्त्रों में स्थान-स्थान पर विस्तारपूर्वक किया गया है।
योऽसावादित्ये पुरुषः सोऽहम् (मैत्रेयी उपनिषद् 6/35)
अर्थात्-(जो सूर्य है सो मैं हूँ )।
सूर्य के माध्यम से प्रस्फुटित होने वाला महाप्राण परब्रह्म परमात्मा का वह अंश है जिससे इस विश्व-ब्रह्मांड का संचालन होता है। एक से अनेक बनने का ब्रह्म-संकल्प ही महाप्राण बन कर फूट पड़ा है। यह निर्झर जिस दिन तक झर रहा है। उसी दिन तक सृष्टि है। जिस दिन परम प्रभु उस संकल्प को समेट लेंगे उसी दिन महाप्राण शाँत हो जायेगा और फिर महाशून्य के अतिरिक्त और कुछ भी शेष न रहेगा। यह ब्रह्मसंकल्प-महाप्राण-परब्रह्म की सत्ता से भिन्न कोई बाहरी पदार्थ नहीं वरन् उसी का एक अविच्छिन्न अंग है। परमात्मा अनन्त है उसकी सत्ता असीम है। उस अनन्त, असीम, अचिन्त्य का एक भाग जो सृष्टि के संचालन में, उनकी समस्त प्रक्रियाओं को सुव्यवस्थित रखने में लगा हुआ है, उस महाप्राण को ही सूर्य की आत्मा-सविता देवता समझना चाहिए। प्राणी का, जीवधारी का सीधा सम्बन्ध इसी से है।
यह महाप्राण जब शरीर क्षेत्र में अवतीर्ण होता है तो आरोग्य, आयुष्य, तेज, ओज, बल, उत्साह, स्फूर्ति, पुरुषार्थ, इन्द्रिय शक्ति के रूप में दृष्टिगोचर होता है जब वह मनःक्षेत्र में अवतीर्ण होता है तो उत्साह, स्फूर्ति, प्रफुल्लता, साहस, एकाग्रता, स्थिरता, धैर्य, संयम आदि सद्गुणों के रूप में देखा जा सकता है। जब उसका अवतरण आध्यात्मिक क्षेत्र में होता है तो त्याग, तप, श्रद्धा-विश्वास, दया, उपकार, प्रेम, विवेक आदि के रूप में दिखाई देता है। तीनों ही क्षेत्र उस महाप्राण में जैसे-जैसे भरते जाते हैं वैसे ही मनुष्य अपूर्णता से पूर्णता की ओर, लघुता से विभुता की ओर, तुच्छता से महानता की ओर बढ़ने लगता है। आत्म कल्याण का, लक्ष्य प्राप्ति का यही मार्ग है। गायत्री के द्वारा सविता देवता को-महाप्राण को उपलब्ध करने का प्रयोजन ही यही है। शतपथ ब्राह्मण का ऋषि कहता है-
“यौ वे प्राण सा गायत्री “ (शत. 1/3/5/15)
“जो प्राण है, उसे ही निश्चित रूप से गायत्री जानना” ।
गायत्री की साधना को सूर्य के माध्यम से संपन्न कर कैसे अति मानस की इस दिव्य ज्योति द्वारा समष्टिगत वातावरण को प्रभावित करना संभव है, यह परमपूज्य गुरुदेव द्वारा सन् 1958 की शरदपूर्णिमा पर संपन्न किये गए 1008 कुण्डी गायत्री महायज्ञ के माध्यम से समझा जा सकता है। यह विलक्षण प्रयोग किया ही विश्व मानवता के भविष्य के निर्धारण के लिए गया था । लगभग उसी समय पांडिचेरी में श्री माँ ने सुप्रामेण्टल के अवतरण की घोषणा की थी। 1 जुलाई 1957 से 31 दिसम्बर 1958 तक-खगोल शास्त्रियों से अन्तर्राष्ट्रीय शाँत सूर्य वर्ष (इंटरनेशनल इयर ऑफ दि क्यायेट सन्) संक्षेप में ‘इक्विसी‘ मनाया। यह नाम इसलिये रखा गया कि इन दो वर्षों में सूर्य बिलकुल शाँत रहा और वैज्ञानिकों को उस पर अनेक प्रयोग और अध्ययन करने का अवसर मिला। लगभग इसी अवधि से मथुरा के 1008 कुण्डी यज्ञ की तैयारी हुई थी । साधकों ने एक वर्ष पूर्व से ही गायत्री के विशेष पुरश्चरण प्रारम्भ किये थे और अक्टूबर 1958 में 4 दिन तक यज्ञ कर शरदपूर्णिमा के दिन पूर्णाहुति दी थी। गायत्री अभियान का भी उद्देश्य उसका अध्ययन और प्रयोग ही था और उन उपलब्धियों से सारे विश्व समाज को लाभान्वित कराना भी जो ऐसे अवसरों पर देव शक्तियों के द्वारा सुविधापूर्वक अर्जित की जा सकती है।
उस यज्ञ के बाद से विश्व की गति-विधियों का मनीषियों ने बराबर अध्ययन किया है और यह देखकर वे आश्चर्यचकित है कि न केवल प्रकृति अपने विधान बदल रही है वरन् लोगों की भावनाएँ और विचार भी तेजी से बदल रहे हैं। योरोप की विलासिता प्रिय और भौतिकवादी प्रजा भी अध्यात्म का आश्रय पाने के लिए भागी चली आ रही है। भारतवर्ष को तो उसका सुनिश्चित लाभ मिलने वाला है भले ही उसका प्रत्यक्ष दर्शन 1999 के बाद दिखाई दे।
गायत्री का देवता सविता अर्थात् गायत्री उपासना के समय सूर्य के ध्यान की व्यवस्था है उसका अर्थ सूर्य की अदृश्य शक्तियों, किरणों को उपरोक्त वैज्ञानिक, सिद्धान्तों के आधार पर शरीर में धारण करना और उसके आत्मिक व वैज्ञानिक लाभों से लाभान्वित होना है। हमारी प्रगाढ़तम ध्यानावस्था हमारी मनश्चेतना को “ सूर्य” बना देती है। उस शक्ति, सामर्थ्य और अनुभूति की कल्पना की जो सके तो सहज ही अनुभव किया जा सकता है कि गायत्री की सावित्री की सिद्धि के क्या चमत्कार हो सकते हैं ?
भारतीय संस्कृति मानव को चेतना का समुच्चय मानती है तथा उसके उच्चतम विकास की संभावनाएँ बताती है। गायत्री देव संस्कृति का प्राण है-मेरुदण्ड है। समस्त साधना-पद्धतियों का समावेश गायत्री साधना में है। ऋषियों ने उच्चस्तरीय साधना के लिए गायत्री को अलंकारिक रूप में पाँच मुखों वाली बताया है तथा इस माध्यम से सूक्ष्म शरीर के पाँच कोशों की प्रसुप्त क्षमता को जगाने और इस महाविद्या का समुचित लाभ उठाने की बात कही गयी है। कायसत्ता की चेतन प्रयोगशाला में अनुसंधान करने वाले ऋषिगणों ने जीवात्मा के कायकलेवर को अपनी दिव्य दृष्टि से पाँच भागों में विभक्त माना है। ये हैं अन्नमय कोश, प्राणमय कोश, मनोमय कोश अर्थात्-जखीरा, भण्डार, खजाना। सारी प्रसुप्त क्षमताएँ-अस्तित्व की पाँच भूमिकाएँ इनमें छिपी पड़ी हैं। कोश का एक अर्थ आवरण या पर्दा भी होता है। परतें उठाते-आवरण हटाते चलने पर जीवसत्ता का “रसोवैसः” वाला कारण शरीर प्रधान आनन्दमय कोश वाला स्वरूप सामने आता है। इसके हटते ही पंचकोश जागरण की पंचकोशी जागरण साधना संपन्न हो जाती है तथा व्यक्ति ब्रह्म से, परमसत्ता से आत्म साक्षात्कार कर लेता है।
ऋग्वेद में इन पंचकोशों को पाँच ऋषियों की संबा दी गयी है व कहा गया है कि वे जीवन्त स्थिति में ही सारे जीवन उद्यान को पवित्र-सुरम्य बना सकते हैं।
अग्निऋषिः पवमानः पाँचजन्यः पुरोहितः।
तमीमहे महागयम् ( ऋग्वेद 9/66/20) अर्थात्- यह अग्नि ऋषि है । पवित्र करने वाली है। पंचकोशों की मार्गदर्शक है। इस महाप्राण की हम शरण में जाते हैं। छान्दोग्योपनिषद् का मनीषी इन पाँच कोशों को स्वर्गलोक के पाँच द्वारपाल बताता है, जिन्हें प्रसन्न (सिद्ध) कर लेने पर ब्रह्मपुरुष तक पहुँचना संभव हो जाता है (तेषां एते पंच ब्रह्म पुरुषा स्वर्गस्य, लोकस्य, द्वारपालस्य, एतानेकं, पंच ब्रह्मपुरुषात्) वहरीं प्रश्नोपनिषद् में जिज्ञासु नचिकेता को यमाचार्य पंचाग्नि विद्या का रहस्यमय उपदेश देते हुए कहते हैं कि यही पाँच अग्नियाँ अंतः क्षेत्र में पंचकोशों के रूप में -पंच प्राणों के रूप में प्रज्वलित रहती हैं “( प्राणाग्नय एवैतस्मिन्पुरे जाग्रति” ---4/3) । श्री दैवी भागवत तो पंचकोशी साधना के महात्म्य से भरा पड़ा है-
पंचप्राणाधिदेवी या पंचप्राण स्वरूपिणी॥ प्राणाधिक प्रियतमा सर्वाभ्यः सुन्दरीपरा॥ 36॥
अर्थात् - “पंच प्राण इसी पंचकोश सम्पदा के पाँच स्वरूप हैं। प्राणों की अधिष्ठात्री देवी वही हैं। वे सर्वांग-सुन्दरी हैं, पराशक्ति हैं। भगवान को प्राणों से भी प्यारी हैं।” ऐसी साधना कितनी महात्म्य भरी होगी, उसकी कल्पना की जा सकती है। पंचकोशी साधना का विधान पूर्णतः विज्ञान सम्मत भी है।
एक बात बड़ी स्पष्ट समझ ली जानी चाहिए कि चेतना का विशाल महासागर मानव की अन्वेषण बुद्धि की बोध की परिधि में आने वाला आभास भर है । बोध रूपी यह चतुर्थ आयाम मानव मेधा को उस परोक्ष जगत की एक झलक भर देता है, समग्र सम्पूर्ण जानकारी नहीं । चौथे आयाम सम्बन्धी विभिन्न वैज्ञानिक खोजें ऐसा आश्वासन अवश्य दिलाती हैं कि प्रगति क्रम में क्रमशः वह विधा खोज निकाल ली जाएगी जिससे और भी गहरे प्रवेश कर चेतना की सूक्ष्म परतों का रहस्योद्घाटन संभव हो सके । अभी लेसर एवं होलोग्राफी के आविष्कार ही अपनी चमत्कृतियों के रूप में वैज्ञानिकों को हतप्रभ कर रहे हैं तो चतुर्थ आयाम तो उन्हें मनुष्य की सूक्ष्म आध्यात्मिक संरचना के सम्बन्ध में बहुमुखी जानकारी दे सकेगा, इसमें कोई सन्देह नहीं।
पंचकोश सूक्ष्म हैं। सूक्ष्म अर्थात्-अप्रत्यक्ष-अदृश्य। किन्तु इस प्रकार की व्याख्या प्रत्यक्षवादी भौतिक विज्ञान को मान्य नहीं हैं। वे ऐसे प्रतिपादनों को काल्पनिक और अप्रामाणिक मानते हैं । अस्तु। प्रत्यक्षवादी अध्यात्म विज्ञान ने शरीर संरचना विज्ञान के अनुरूप ही पंचकोशों के प्रभाव क्षेत्र और परिणामों को देखते हुए प्रत्यक्ष शरीर में पंचकोशों की उपस्थिति बतायी है और उन्हें प्रत्यक्ष अनुभव में आ सकने योग्य कहा है।
अन्नमय कोश की चमत्कारी हारमोन ग्रन्थियों से, प्राणमय कोश की जैव विद्युत संस्थान से , मनोमय कोश की जैव चुम्बकत्व से, विज्ञानमय कोश की न्यूरोह्यूमरल रस स्रावों (स्नायु रसायन ) से तथा आनन्दमय कोश की मस्तिष्क मध्य अवस्थिति रेटिकुलर ऐक्टिवेटिंग सिस्टम रूपी विद्युत् स्फुल्लिंगों के फव्वारे से संगति बिठायी जाती है। वस्तुतः ये सभी घटक स्थूल जान पड़ते हुए भी जादुई क्षमताओं से भरे पूरे हैं। इनकी कार्य पद्धति और परिणति वैसी सीधी सादी नहीं है जैसी कि पाचन तन्त्र, श्वसन तन्त्र आदि की होती है। इन केंद्रों को यदि उपेक्षित पड़ा रहने दिया जाय, उनके उत्कर्ष का उपाय विदित न हो तो बात दूसरी है। अन्यथा व्यक्ति इन्हीं के सहारे उन ऋद्धि-सिद्धियों का अधिष्ठाता बन सकता है जो प्रत्यक्ष हैं, जो सामान्य को असामान्य बनाती हैं।
व्यक्ति की सूक्ष्म सत्ता का वर्गीकरण, तीन शरीरों के रूप में स्थूल, सूक्ष्म एवं कारण शरीरों में किया जाता रहा है। आत्मिकी की व्याख्यानुसार अन्नमय एवं प्राणमय कोशों का समुच्चय ही स्थूल शरीर है। हारमोन ग्रंथियों से स्रवित जादुई सूक्ष्म द्रव्यों एवं बायो इलेक्ट्रीसिटी की चमत्कारी क्षमताओं से भरी यह काया कितनी विलक्षण करने पर उपलब्ध होने वाली सिद्धियों से मिलता है। मनोमय कोश जैव चुम्बकत्व का भाण्डागार है। यह प्रभामण्डल के रूप में मनुष्य के चारों ओर तेजोवलय का घेरा बनाता है। साइकिक हीलिंग, सम्मोहन की प्रभाव सामर्थ्य एवं शक्ति हस्तान्तरण के रूप में इसकी परिणतियाँ देखी जा सकती हैं। इसे सूक्ष्म शरीर का पर्यायवाची माना जा सकता है। यही थियोसॉफिस्टों द्वारा बतायी गयी मेण्टल बॉडी है जो अपनी प्राण शक्ति की सामर्थ्य से दूसरों को प्रभावित करने की सामर्थ्य रखती है।
कारण शरीर विज्ञानमय कोश एवं आनन्दमय कोश का सम्मिलित रूप माना जा सकता है। स्नायु समुच्चय के सन्धि स्थलों (सिनेप्सों) से सुषुम्ना, मस्तिष्क एवं ऑटोनॉमिक नर्स सिस्टम के भिन्न-भिन्न महत्वपूर्ण केन्द्रों पर स्रवित होने वाले स्नायु रसायनों ( न्यूरो ह्यूमरल सिक्रीशन्स ) एवं थेलेमस मध्य स्थित रेटिकुलर ऐक्टिवेटिंग सिस्टम को क्रमशः विज्ञानमय एवं आनन्दमय कोशों का प्रतीक रूप माना जा सकता है। यह सारी संरचना इतनी जटिल किन्तु विलक्षण सामर्थ्यों से भरी परी है कि उनकी स्थूल प्रतिक्रिया मात्र वैज्ञानिकों को हतप्रभ कर देती है। जब योग साधना का अवलम्बन लेकर सूक्ष्म प्रयोगों द्वारा उनमें हलचल उत्पन्न की जाती है तो इसके परिणाम तो और भी अद्भुत एवं रहस्यमय होंगे। अभी तक जितना भी कुछ वैज्ञानिक इस सम्बन्ध में जान पाए हैं, वह जानकारी अध्यात्म को विज्ञान सम्मत बनाने के पक्षधर विद्वत् जनों को उत्साहित करने में सफल रही है।
काया के इस सूक्ष्म ढाँचे का विवेचन अन्नमय कोश से ही प्रारम्भ होता है। स्थूल शरीर की सूक्ष्म विशेषताओं एवं दृश्यमान विलक्षणताओं के लिए उत्तरदायी वस्तुतः इसी संस्थान में छिपे घटक हैं। नगण्य सी रसायन की बूंदें कैसे परिवर्तनकारी हलचलें उत्पन्न कर समग्र काया को क्या से क्या बना सकती है, इसे इस संस्थान में प्रत्यक्ष देखा जा सकता है।
जो कुछ भी प्रत्यक्ष दिखाई पड़ता है, उसका कारण तो शरीर संरचना व क्रिया पद्धति से तालमेल बिठाते हुए कहीं न कहीं जोड़ लेते हैं । ऐसे कई अद्भुत, रहस्यमय, परिवर्तन होते हैं जिनकी संगति रासायनिक हलचलों से बैठती प्रतीत नहीं होती। वस्तुतः इन रहस्यों की कुँजी सूक्ष्म शरीर से अवस्थित होने के कारण ही प्रत्यक्षवादी विज्ञान कुछ कह पाने में स्वयं को असमर्थ पाता है। हारमोन्स को ही लें तो लिंग निर्धारण के साथ ही स्वाभाविक पुरुषोचित दृढ़ता, पुँसकत्व, स्त्रियोचित कोमलता एवं कामोल्लास की व्यक्ति-व्यक्ति में पायी जाने वाली न्यूनाधिकता इत्यादि का मूलभूत कारण क्या है, यह शीघ्र समझ में आता नहीं। व्यक्तित्व का आमूल-चूल कलेवर इन सूक्ष्म रस स्रावों पर निर्भर है। शरीर विज्ञानी तो इनकी असामान्यता को पैथालॉजी के स्तर पर ही समझ पाए हैं। फिजियोलॉजी की परिधि में बने रहकर स्वेच्छा से किन्हीं योग साधनाओं के अवलम्बन से वाँछित परिवर्तन सम्भव कैसे हो जाता है, इसका समाधान चिकित्सा विज्ञानियों के पास नहीं है।
पीनियल, पिट्यूटरी, थाइराइड, पैराथाइराइड, थाइमस एड्रीनल एवं गोनेड्स के नाम से जाने-जाने वाले ये सात ग्रन्थि समूह जन्म से लेकर मृत्यु तक अपनी भिन्न-भिन्न परस्परावलम्बित भूमिका निभाते रहते हैं। इन जादुई ग्रन्थियों द्वारा ही व्यक्तित्व के उतार-चढ़ाव स्वभाव, दृष्टिकोण इत्यादि का निर्धारण होता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि ब्रह्मांडीय चेतना सूक्ष्म रूप में अन्तःस्रावी ग्रन्थियों को प्रभावित करती हैं एवं व्यक्तित्व की विविध क्षमताओं को उभारने में सहायक भूमिका निभाती है। आवश्यक हारमोन्स को बढ़ाना एवं अनावश्यक को कम करना अन्नमय कोश की साधना द्वारा सम्भव है ऐसा योगवेत्ताओं का मत है।
बायो इलेक्ट्रिसिटी एवं प्राणमय कोश या “इथरीक डबल” की परस्पर संगति समझने के पूर्व जैव विद्युत के सम्बन्ध में कुछ प्राथमिक तथ्य समझ लेना जरूरी है। इसे उस जैव चुम्बकत्व से भी कुछ हटकर समझना चाहिए जो प्रभा मण्डल बनाता एवं मनोमय कोश से संबन्धित माना जाता है। यों शरीर में विज्ञान सम्मत ताप , प्रकाश, चुम्बक, विद्युत, ध्वनि, एवं यान्त्रिक छहों ऊर्जाओं के प्रमाण भिन्न-भिन्न स्थानों पर भिन्न रूपों में पाये जाते हैं किन्तु प्राणमय कोश को समझने के लिए उसे जैव विद्युत से भली-भाँति जोड़ते हुए समझा जाना चाहिए।
शरीर के लगभग सभी ऊतक, जीवकोश, प्रबल स्थायी विद्युत ऊर्जा सम्पन्न पाये जाते हैं। यहाँ तक कि यही सब मिलकर मस्तिष्क रूपी प्रधान कम्प्यूटर का नियन्त्रण सुसंचालन भी करते हैं। लगभग बीस मिली वोल्ट का स्थायी विद्युत् क्षेत्र तो मस्तिष्क की बाह्य परत के आरपार स्थायी रूप से पाया जाता है। शरीर में स्थायी रूप से चल रहे अनेकों चक्रों, जो रासायनिक, चयापचय (केमिकल मेटाबॉलिज्म) की प्रक्रिया निर्धारित करते हैं की तरह एक विद्युत चक्र भी चलता है जो रसायनों से बनी काया के सजीव या निर्जीव होने का कारण बनता है। ऑक्सीजन हम श्वास से भीतर सोखते व कार्बनडाइ आक्साइड प्रश्वास द्वारा प्रदूषित वायु के रूप में बाहर निकालते हैं । यह ऑक्सीजन जितनी देर शरीर में परिभ्रमण करती है ऋण आयनों द्वारा जीवकोशों को ऊर्जा प्रदान करती है। लगभग इसी प्रकार वायुमण्डल में संव्याप्त विद्युत् आवेश को हर व्यक्ति फेफड़ों एवं त्वचा के मार्ग से अवशोषित करता है। वातावरण में विद्युत विभव सौर ऊर्जा, कास्मिक किरणों और भूमंडल की स्वाभाविक रेडियोधर्मिता से विनिर्मित होता है। ये सूक्ष्माणू ऋण विभव धारण किए होते हैं एवं वायुमण्डल में 5 वोल्ट प्रति मीटर के औसत से आयनोस्फियर की निचली परत में विद्यमान होते हैं। मानव शरीर में प्रवाहित विद्युतधारा लगभग दस पीको एम्पीयर की ताकत की होती है। इस अल्प मात्रा में प्रवाहित विद्युत की सामर्थ्य कितनी प्रचण्ड होती है, यह सहज ही जाना नहीं जा सकता।
शरीर में लगभग पिचहत्तर हजार अरब, कोश हैं एवं सभी में विद्युत ऊर्जा विद्यमान है। प्रत्येक कोशिका के आस-पास 60 से 90 मिली वोल्ट का विद्युत विभव पाया जाता है। हर सेल एक बैटरी है व सम्पूर्ण शरीर इनका समुच्चय। हर सेल एक विद्युत सन्धारक (कैपसीटर) है एवं सम्पूर्ण शरीर एक समग्र कंप्यूटराइज्ड उपकरण। लगभग एक से. मी. कन्डक्टर या इन्टीग्रटेड सर्किट (आय. सी.) के समकक्ष हर कोश झिल्ली मानवी काया को विद्युत् भण्डार का स्वरूप दे देती है। त्वचा, जननेन्द्रिय, आँखों व चेहरे से यह विद्युत् ऊर्जा निरन्तर उत्सर्जित होती रहती है। त्वचा पर प्रतिरोध मापन (जी. एस. आर.) के माध्यम से इस उत्सर्जन को मापा जा सकता है। हृदय की विद्युत को इ. सी. जी. मस्तिष्कीय विद्युत को ई. ई. जी व डीप डी. सी. ब्रेन पोटेन्शियल्स के द्वारा तथा आँखों की विद्युत को इलेक्ट्रोनिस्टेग्मों व रेटीनोग्राम से मापा जाता है। माँस पेशियों की विद्युत इलेक्ट्रोमायोग्राम द्वारा मापी जा सकती है एवं नाक व होठों की विद्युत को इलेक्ट्रोनेजोलेबियोग्राम द्वारा मापा जा सकना सम्भव है। प्राण शक्ति का यह समुच्चय ही प्राणमय कोश की संरचना करता है। इसमें आने वाली कमीवेशी ही व्याधि का कारण बनती है। समय-समय पर आग के शोले फूटने की तरह शरीर से ज्वाला-चिनगारियाँ निकलने स्वतः जलन (ऑटोकम्बशन) के रूप में इनके प्रमाण भी देखे जाते हैं। अध्यात्म प्रयोजनों में यह ऊर्जा जीवनी शक्ति का संचय करने एवं अधोगामी प्रवाह को रोककर ऊर्ध्वगामी बनाने की भूमिका निभाती है। क्षरित विद्युत जब सत्प्रयोजनों में नियोजित होती है तो प्रसुप्त सामर्थ्य, संकल्प बल, इच्छा शक्ति को जगाकर असम्भव कार्य कर दिखाती है। इसका छोटा सा रूप सिद्धियों के रूप में देखा जाता है। जबकि यह जल के ऊपर दिखाई देने वाला हिमखण्ड का एक टुकड़ा मात्र है। जो मूलभूत सम्पदा है, वह विराट् है, अक्षय हैं। प्रश्न केवल सुनियोजन का है।
मनोमय कोश मानवी चुम्बकत्व (बायोमैग्नेटिज्म) के रूप में विद्यमान होता है जो प्रभा मण्डल, सम्मोहन, साइकिक हीलिंग (आध्यात्मिक मनश्चिकित्सा) शक्ति संचार इत्यादि आध्यात्मिक विभूतियों के रूप में अपने अस्तित्व का परिचय देता रहता है। क्वाण्टा के ब्रह्माण्डव्यापी महासागर में चुम्बकीय बल का ही आधिपत्य है। जिसके बलबूते ये ग्रह नक्षत्र परस्पर सन्तुलित क्रियाशील दिखाई देते हैं। चुम्बकीय ऊर्जा मानवी काया में उसी तरह ध्रुवीकरण रूप में विद्यमान है जैसे कि पृथ्वी के दो ध्रुवों में। एक चुम्बक डायपोल (द्विध्रुवीय मैग्नेट) होता है जिसमें उत्तरी व दक्षिणी दो सिरे होते हैं। एक उत्तरी सिरा ग्रहण करता है व दूसरा दक्षिणी सिरा चुम्बकीय बल निस्सृत करता है यह एक प्रकार का “इलेक्ट्रोमैग्नेटिक डायपोल” है। मानवी काया में शुक्राणु की सत्ता का आधिपत्य जमते ही डिम्ब में ध्रुवीकरण प्रक्रिया आरम्भ हो जाती है एवं यही सारे शरीर के 75 हजार अरब कोशों में इस चुम्बकत्व को फैलाती है। मूलतः यह चुम्बकत्व की शक्ति शरीर के दो ध्रुवों-स्थायी इलेक्ट्रोमैग्नेटिक डायपोल की तरह सुषुम्ना के मूलाधार रूपी दक्षिणी एवं सहस्रार रूपी उत्तरी ध्रुव के रूप में विद्यमान होती हैं।
पृथ्वी के धुरों पर उसका चुम्बकीय क्षेत्र (मैग्नेटोस्फीयर) सौर हवाओं से टकराकर “ध्रुव प्रभा” (अरोरा बोरिएलिस) बनाता है। ठीक इसी प्रकार मानवी चुम्बकत्व अपने उत्तरी ध्रुव पर आभा मण्डल के रूप में विराजमान होता है। आज सम्पन्न मनीषी इसी के सहारे अन्यान्य मनुष्यों की अन्तश्चेतना को परखते व प्राण सम्बल प्रदान करते रहते हैं। डा. किलनर ने इसे “आरा” के रूप में मापा व किर्लियन फोटोग्राफी के सहारे उँगलियों की पोरों से उत्सर्जित होता पाया। शक्तिपात, प्राण संचार, अध्यात्म चिकित्सा, आशीर्वाद इन्हीं प्रक्रिया के सहारे चुम्बकत्व की मात्रा अधिक रखने वाले अन्यान्यों को लाभान्वित करते देखे जाते हैं। मनोमय कोश को साधने में ध्यान योग एकाग्रता की प्रधान भूमिका है। इच्छा शक्ति के चमत्कार इसी अर्जित जैव चुम्बकत्व की सामान्य से अधिक की मात्रा के बलबूते बन पड़ते हैं।
विज्ञानमय एवं आनन्दमय कोश अन्तश्चेतना के गहन अन्तराल में निहित वे दिव्य संरचनाएँ हैं जिनका प्रत्यक्ष सम्बन्ध ब्राह्मी चेतना से होता है। स्थूल पदार्थ विज्ञान की दृष्टि से तत्त्ववेत्ताओं ने विज्ञानमय कोश की स्नायु रसायनों (न्यूरोहूयमरल सिक्रीशन्स) से तथा आनन्दमय कोश की थैलेमस मध्य मस्तिष्कीय फव्वारे “एसेण्डिन्ग रेटिकुलर ऐक्टिवेटिंग सिस्टम” से संगति बिठाने का प्रयास किया है। दोनों ही संरचनाएँ स्वयं में जटिल व बड़ी रहस्यमय हैं।
विज्ञान का अर्थ है कामकाजी नहीं-विशिष्ट ज्ञान। असामान्य प्रज्ञा, प्रतिज्ञा को उभारने वाली परत निस्सन्देह विलक्षण होती है। यह कार्य उन “न्यूरो ट्राँसमीटर्स “ के जिम्मे आता है जो सामान्य अवस्था में तो सिनेप्सों पर स्नायु संचार भर की भूमिका निभाते हैं किन्तु उत्तेजित किए जाने पर प्रसुप्त केन्द्रों विलक्षण प्रतिभा केन्द्रों को भी जगाने की सामर्थ्य रखते हैं। एसीटाइल कोलीन, मार्फीन, सलेक्टीव ओपिएट्स (एण्डार्फिन्स) एन्केफेलीन, एडीनोसिस समूह , गाबा समूह, सिरोटोनिन (5.भ्ज्) अन्फा एड्रीनजिक एवं मस्केरीनिक कोलोनर्जिक समूह के नाम से ये सारे मस्तिष्क एवं स्नायु तन्त्र में से एक भाग का प्रतिनिधित्व करने वाले ये सूक्ष्म रसायन मन की अचेतन, चेतन व सुपर चेतन परतों के उत्तेजन द्वारा विलक्षण प्रतिभाओं , आविष्कार बुद्धि, स्वप्नों के माध्यम से सन्देश आदि के रूप में अपनी सक्रिय बना कर अतीन्द्रिय क्षमताओं का धनी एवं विलक्षण आनन्द की अनुभूति कर सकने में समर्थ योगी बना जा सकता है। आनन्दमय कोश एवं सहस्रार चक्र परस्पर अन्योन्याश्रित सूक्ष्म संरचना संस्थान के दो नाम हैं जो रेटिकुलर ऐक्टिवेटिंग सिस्टम के रूप में मस्तिष्क के भिन्न-भिन्न केन्द्रों को जाते हैं। चेतना की उच्चतर स्थितियाँ इसी विद्युत् स्फुल्लिंग छोड़ते रहने वाले फव्वारे की सक्रियता पर निर्भर हैं। जो महत्व स्नायु रसायनों का है, उससे अधिक इस संस्थान का है जो मनश्चेतना की भिन्न-भिन्न स्थितियों के लिये उत्तरदायी है। वाणी से सम्बन्धित भिन्न-भिन्न केन्द्र (विजुअल, आडीटरी, स्पोकन, वीक्षण, दिक्-काल में सामंजस्य, भूतकाल की स्मृतियाँ आदि सभी मस्तिष्क में कैद हैं। दाहिना मस्तिष्क व उसका पैराइटल कॉर्टेक्स, दोनों को जोड़ने वाला कार्पस कैलोसम तथा लिम्बिक सिस्टम विभिन्न विलक्षणताएँ अपने अन्दर समाए हुए हैं। अभी तो मात्र 7 से 13 प्रतिशत इस पूरे समुच्चय का भाग वैज्ञानिकों को ज्ञात है। जब शेष प्रसुप्त की जाग्रति-आनन्दमय कोश के जागरण की फलश्रुतियों से वे परिचित होंगे तो मानवी असीम सामर्थ्य एवं ऋद्धि-सिद्धियों के प्रत्यक्ष रूप को देख हतप्रभ हो रह जाएँगे। बहुत कुछ विलक्षण इस उत्तरी ध्रुव केन्द्र में छिपा पड़ा है। गायत्री की उच्चस्तरीय प्राण ‘साधना कुण्डलिनी जागरण की विधि, व्यवस्था, शिव शक्ति का संगम यहीं बन पड़ता है। मानव के भाव पक्ष को उभारने एवं उसे महामानव-अतिमानव बनाने का पुरुषार्थ यहीं सम्पन्न होता है। भक्ति और शक्ति के समन्वय का प्रतीक आनन्दमयकोश बहुत कुछ रहस्यों को अपने अन्दर समाए हुए हैं।
ऋषियों के निर्धारणानुसार पंचकोश साधना में जप, तप, ध्यान, प्राणायाम, बंध, मुद्रा आदि का प्रयोग करना पड़ता है। इसके राजयोग, हठयोग, लययोग, प्राणयोग, ऋतुयोग, ज्ञानयोग, भक्तियोग, कर्मयोग, तत्वयोग आदि 84 योगों के आधार पर अनेकानेक व्यायाम क्रम बताये गये हैं साधक उन्हें अपनी परम्परा एवं पात्रता के अनुसार अपनाते हैं। इन सब साधनाओं में ज्ञान और कर्म से सम्मिश्रित तत्वयोग की साधना है जिसमें स्वाध्याय, सत्संग और चिन्तन-मनन के माध्यम से आत्म-शोधन करते हुए आदर्श कर्मनिष्ठा का अवलम्बन लिया जाता है और लक्ष्यपूर्ति की दिशा में आगे बढ़ा जाता है। निश्चित ही यह साधना व्यक्ति को देवमानव ऋषि के पद पर प्रतिष्ठित करती व उसे ऋद्धि सिद्धियों का स्वामी बनाती है।
परम पूज्य गुरुदेव ने जहाँ गायत्री को , पुनर्जीवन देकर राष्ट्र के घर-घर में उसे प्रतिष्ठित कर एक विराट स्तर की क्रान्ति की वहाँ सावित्री महाशक्ति संबंधी मार्गदर्शन कर कुण्डलिनी साधना जैसे गुह्य विषय संबंधी अनेकानेक भ्रांतियों का निवारण कर उनने वह कुहासा हटाया जो एक युग से इस साधना पर छाया हुआ था। एक अभूतपूर्व स्तर के ताँत्रिक के रूप में कुण्डलिनी शक्ति द्वारा प्रसुप्त का जागरण तथा व्यक्तित्व के परिष्कार में उसका सुनियोजन इस युगऋषि की विलक्षण स्थापना है। यह साधना सदा से ही व्यक्तिगत सिद्धियों के जागरण हेतु की जाती रही है । किन्तु इसे परम पूज्य गुरुदेव ने समष्टिगत मोड़ दिया। उनने कहा कि ब्रह्माण्ड-व्यापी सविता शक्ति का बीज-तत्व मानवी कायकलेवर में विद्यमान है । साधना प्रयोजनों द्वारा सामूहिक रूप से उस बीज को प्रसुप्ति से जाग्रति में लाकर साधक के “स्व” को “असीम” में बदला जा सकता है। इस माध्यम से उनने कल्पना की , कि विश्व की कुण्डलिनी जागरण की जो प्रक्रिया उनकी सूक्ष्मीकरण साधना के दौरान शाँतिकुँज में चली है वह अगले दिनों विराट रूप ले लेगी।
भारतीय संस्कृति की इस अनुपम विधा कुण्डलिनी शक्ति का लाइफफोर्स “सरपेन्टा इन पॉवर” वायटल फायर के रूप में वर्णन सदा से होता रहा है। कुण्डलिनी शक्ति का एक नाम ‘जीवन अग्नि’ (फायर आफ लाइफ) भी है। जो कुछ भी चमक, तेजस्विता, आशा, उत्साह, उमंग, उल्लास दिखाई पड़ता है, उसे उस अग्नि का ही प्रभाव कहा जा सकता है। शरीरों में बलिष्ठता, निरोगता, स्फूर्ति क्रियाशीलता के रूप में और मस्तिष्क में तीव्र बुद्धि, दूरदर्शिता स्मरण शक्ति, सूझ-बूझ कल्पना आदि विशेषताओं के रूप में यही परिलक्षित होती हैं। आत्म-विश्वास और उत्कर्ष की अभिलाषा के रूप में धैर्य और साहस के रूप में इसी शक्ति का चमत्कार झाँकते हुए देखा जा सकता है। रोगों से लड़कर उन्हें परास्त करने और मृत्यु की सम्भावनाओं को हटाकर दीर्घ-जीवन का अवसर उत्पन्न करने वाली एक विशेष विद्युत-धारा जो मन में प्रवाहित होकर समस्त शरीर को सुरक्षा की अमित सामर्थ्य प्रदान करती है उसे कुण्डलिनी ही समझा जाना चाहिए। वस्तुतः प्रकृति का शक्ति का इस कुण्डलिनी केन्द्र , मूलाधार को भौतिक क्षमता का मानवी उद्गम कह सकते हैं जिस प्रकार ब्रह्म सत्ता का प्रत्यक्षीकरण ब्रह्म लोक में होता है ठीक उसी प्रकार प्रकृति की प्रचण्ड शक्ति का अनुभव इस जननेंद्रिय क्षेत्र के कुण्डलिनी केन्द्र में किया जा सकता है। शारीरिक समर्थता-मानसिक सजगता और संवेदनात्मक सरसता की तीन उपलब्धियाँ इसी शक्ति केन्द्र के अनुदानों द्वारा प्राप्त की जा सकती है।
विभूतियाँ आत्मिक होती हैं। वे ब्रह्मलोक से उपलब्ध होती है। उनके सहारे मनुष्य को सन्त, ऋषि, और देव बनने का अवसर मिलता है। आत्म बल के सहारे ही इन अनुदानों को प्राप्त किया जा सकता है। तपस्वी इसी का साधन जुटाते हैं। सिद्धियाँ भौतिक होती हैं। इन्हें संपदाएं , सुविधाएँ एवं सफलताएँ भी कहते हैं। इन्हें पाकर व्यक्ति सुसम्पन्न और समुचित बनता है। शरीरगत ओजस्विता और मनोगत मनस्विता के यह प्रतिफल हैं। यह दोनों ही क्षमताएँ भौतिक हैं, शरीर में प्रकृति शक्ति का-बहुलता का परिचय इसी रूप में मिलता है। इसी क्षमता को अध्यात्म विद्या के विज्ञानी कुण्डलिनी शक्ति कहते हैं। सामान्यतया यह प्रसुप्त पड़ी रहती है और निर्वाह के साधन जुटाने तथा संभोग रस लेने का ताना-बाना बुनने जैसे तुच्छ कामों में ही उसकी समाप्ति हो जाती है। विवेकवान उसे जगाकर अनेक गुनी प्रखर बनाते हैं ओर जागरण की उस प्रखरता का उपयोग व्यक्तित्व को प्रतिभा सम्पन्न बनाने तथा उच्चस्तरीय काम हाथ में लेने तथा उन्हें पूर्ण बनाने के लिए प्रयुक्त करते हैं।
कुण्डलिनी योग को भौतिक और आत्मिक प्रखरता प्राप्त करने की समर्थ साधना माना जाता है। पृथ्वी मूलाधार स्थित शरीरगत शक्ति-सूर्य ब्रह्म रंध्र स्थित सहस्र दल कमल-इन दोनों के परस्पर सुयोग संयोग का नाम ही कुण्डलिनी जागरण है। साधनात्मक कर्म-काण्ड के आधार पर अभ्यासी लोग इन दोनों को जोड़ने के लिए प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि का, षट्चक्र बेधन का, हठयोग का, मन्त्र साधना का, सहारा लेते हैं। यदि यह क्रिया-कलाप मात्र हलचल एवं क्रिया कृत्य ही बने रहे तो काम नहीं चलेगा। भावनात्मक स्तर पर भी अनुकूलता एवं अनुरूपता विनिर्मित करनी पड़ेगी । पृथ्वी अर्थात्-भौतिक सम्पदा-अहंता-सूर्य अर्थात् आत्मिक सत्ता-ब्रह्म चेतना इन दोनों को जो जितना जोड़ सकता है उसे कुण्डलिनी जागरण के साथ जुड़ी विभूतियाँ मिलती हैं। स्वार्थ को परमार्थ से जोड़ने का, शारीरिक वासनाओं को आत्मिक उल्लासों में घुला देने का नाम ही आत्म समर्पण है। इसी को साधना क्षेत्र में पृथ्वी और सूर्य का संयोग कहते हैं। कुण्डलिनी साधना इसी केन्द्र बिन्दु पर पहुँचने की चेष्टा को कह सकते हैं।
इतना समझ लेने के बाद कुण्डलिनी शक्ति के जागरण-तत्संबंधी मान्यतायें-उसका आधार -साधना का स्वरूप समझने में सुविधा हो सकती है। व्यक्तिगत जीवन में मनुष्य कलेवर में परा प्रकृति के चेतन प्रवाह का केन्द्र स्थान मस्तिष्क के मध्य अवस्थित ब्रह्मरंध्र-सहस्रार कमल है। इसी को कैलाशवासी शिव या शेषशायी विष्णु एवं कालाग्नि कहते हैं। दूसरा केन्द्र जननेन्द्रिय के मूल गह्वर में है। उसे अपरा प्रकृति का केन्द्र कहना चाहिए । इसे शक्ति, पार्वती-एवं कुण्डलिनी जीवाग्नि कहते हैं।
इन दोनों को धन और ऋण विद्युत भी कहा जा सकता है । मानवीय शरीर को-पिण्ड को-इस दृश्य ब्रह्मांड का -विश्व विराट का एक छोटा नमूना ही कह सकते हैं। जितनी भी शक्तियाँ इस विश्व ब्रह्माण्ड में कहीं भी विद्यमान हैं उन सबका अस्तित्व इस शरीर में भी मौजूद है। जिस प्रकार वैज्ञानिक जानकारी प्रयोग विधि और यन्त्र व्यवस्था के आधार पर विद्युत ईथर आदि शक्तियों से प्रत्यक्ष लाभ उठाया जाता है ठीक उसी प्रकार योग साधना के वैज्ञानिक प्रयोगों द्वारा शरीरगत अपरा प्रकृति की प्रचण्ड शक्तियों का उद्भव किया जा सकता है। इसी को योगियों के दिव्य कर्तव्य के रूप में देखा जा सकता है। अलौकिकतायें-सिद्धियाँ चमत्कार एवं असाधारण किया कृत्यों की जो क्षमता साधना विज्ञान द्वारा विकसित की जाती हैं उसे शरीरगत अपरा प्रकृति का विकास ही समझना चाहिए और उस निर्झर का मूल उद्गम जननेन्द्रिय मूल-कुण्ड कुण्डलिनी को ही जानना चाहिए।
इसी प्रकार व्यक्तित्व गुण कर्म स्वभाव, संस्कार , दृष्टिकोण, विवेक, प्रभाव , प्रतिभा, मनोबल, आत्मबल आदि की जो विशेषताएं दृष्टिगोचर होती हैं उन्हें चेतना तत्व से भाव संवेदन की उपलब्धि माननी चाहिए। इसका केन्द्र मस्तिष्क स्थित ज्ञान केन्द्र सहस्रार कमल है। कालाग्नि यहीं शिव स्वरूप विद्यमान है। आत्म विद्या के दो लाभ बताये गये हैं (1) व्यक्तित्व की भावनात्मक चेतनात्मक प्रखरता (2) शरीर की असामान्य क्रियाशीलता। इन्हीं को विभूतियाँ और सिद्धियाँ कहते हैं। विभूतियाँ मस्तिष्क के केन्द्र से ज्ञान संस्थान से भाव ब्रह्म से प्रसृत होती हैं और सिद्धियाँ काम से शक्ति निर्झर से कुण्ड कुण्डलिनी से प्रादुर्भूत होती हैं। इन दोनों शक्ति केन्द्रों को मानवीय अस्तित्व के दो ध्रुव हैं ठीक इसी प्रकार मनुष्य का मस्तिष्क केन्द्र उत्तरी ध्रुव कहा जा सकता है। उन दोनों की असीम एवं अनन्त जानकारी प्राप्त करने और सामर्थ्यों को जीवन विकास के अन्तरंग और बहिरंग क्षेत्रों में ठीक तरह प्रयोग कर सकने की विद्या का नाम ही कुण्डलिनी विज्ञान है।
कुण्डलिनी को ‘सार्वभौमिक जीवन तत्व’ भी कहते हैं। इसके भीतर आकर्षण (अट्रेक्शन) और विकर्षण (रिपल्शन) की दोनों ही धाराएँ विद्यमान हैं। भौतिक विज्ञान की दृष्टि से उन प्रवाहों को जैवीय विद्युत एवं चुम्बकत्व वायो ‘इलेक्ट्रिसिटी एण्ड मैगनेटिज्म’ कह सकते हैं। दार्शनिक हवर्ट स्पेन्सर के अनुसार इसे जीवन-सार ‘एसेन्स आफ लाइफ’ कहा जा सकता है। बाइबिल के अनुसार यही तत्व महान सर्प है। अध्यात्म शास्त्र इसे ब्रह्माग्नि कहते हैं और उसका केन्द्र संस्थान ब्रह्मरंध्र को मानते हैं । वहाँ से वह मूलाधार की ओर दौड़ती और वापस आती है। सृष्टि के आरम्भ में ब्रह्माजी को अपने आसन से नीचे की जल राशि तक कमल नाल के सहारे असंख्य बार चढ़ना-उतरना पड़ा तब सृष्टि बनी। इस गाथा में सहस्रार शक्ति मूलाधार तक आते-जाते रहने का संकेत समझा जा सकता है । वही परा शक्ति है। कुण्डलिनी शक्ति भी शास्त्रों में इसे ही कहा गया है। इसका उद्दीपन-जागरण मार्ग सुषुम्ना अवस्थित चक्र-संस्थान है।
‘चक्र’ शक्ति संचरण के एक व्यवस्थित, सुनिश्चित क्रम को कहते हैं। वैज्ञानिक क्षेत्र में विद्युत, ध्वनि, प्रकाश सभी रूपों में शक्ति के संचार क्रम की व्याख्या चक्रों (साइकिल्स) के माध्यम से ही की जाती है। इन सभी रूपों में शक्ति का संचार, तरंगों के माध्यम से होता है। एक पूरी तरंग बनने के क्रम को एक चक्र (साइकिल) कहते हैं। एक के बाद एक तरंग एक के बाद एक चक्र (साइकिल) बनने का क्रम चलता रहता है और शक्ति संचरण होता रहता है। शक्ति की प्रकृति (नेचर) का निर्धारण इन्हीं चक्रों के क्रम के आधार पर किया जाता है। औद्योगिक क्षेत्र में प्रयुक्त विद्युत के लिए अन्तर्राष्ट्रीय नियम है कि वह 50 साइकिल्स प्रति सेकेंड के चक्र की होनी चाहिए। विद्युत की मोटरों एवं अन्य यन्त्रों को उसी प्रकृति की बिजली के अनुरूप बनाया जाता है। इसीलिए उन पर हार्सपावर वोल्टेज आदि के साथ 50 साइकिल्स भी लिखा रहता है। अस्तु शक्ति संचरण के साथ ‘चक्र’ प्रक्रिया जुड़ी ही रहती है। वह चाहे स्थूल विद्युत शक्ति हो अथवा सूक्ष्म जैवीय विद्युत शक्ति।
नदी प्रवाह में कभी-कभी कहीं भँवर पड़ जाते हैं। उनकी शक्ति अद्भुत होती है। उनमें फँसकर नौकाएँ अपना सन्तुलन खो बैठती हैं और एक ही झटके में उलटी डूबती दृष्टिगोचर होती हैं। सामान्य नदी प्रवाह की तुलना में इन भँवरों की प्रचंडता सैकड़ों गुनी अधिक होती हैं। शरीरगत विद्युत प्रवाह को एक बहती हुई नदी के सदृश माना जा सकता है और उसमें जहाँ तहाँ पाये जाने वाले चक्रों की ‘भँवरों’ से तुलना की जा सकती है।
चक्रों के जागरण का प्रभाव मनुष्य के गुण, कर्म स्वभाव, पर असामान्य रूप से पड़ता है। स्वाधिष्ठान की जाग्रति से साधक अपने अन्दर नवशक्ति संचार का अनुभव करता है। उत्साह एवं स्फूर्ति शरीर में सदा बनी रहती है। मणिपुर चक्र के जागरण से साहस एवं पराक्रमी बनता है। मनोविकार घटने लगते तथा सत्प्रयोजनों के परमार्थ में रस और आनन्द आने लगता है। अनाहत चक्र की महिमा ईसाई घरों में भी विशेष रूप से गाई गयी है। ईसाई धर्म के योगी हृदय स्थान पर गुलाब के फूल की भावना करते और उसे प्रभु ईसा के प्रतीक ‘ आइचिन कनक कमल मानते हैं। भारतीय योग ग्रन्थों में उसे भाव संस्थान कहा गया है। कलात्मक उमंगे यहीं से उठती हैं। संवेदनाओं का मर्मस्थल यही है। विवेकशीलता का प्रादुर्भाव अनाहत चक्र से होता है। विशुद्धि चक्र की विशेषता है बहिरंग स्वच्छता एवं अन्तरंग की पवित्रता। अचेतन की विशिष्ट क्षमताएँ प्रसुप्त रूप में विद्यमान रहती है। इसे अतीन्द्रिय सामर्थ्य का आधार माना जा सकता है। विशुद्ध चक्र चित्त को प्रभावित करता है। नादयोग से दिव्य श्रवण जैसी परोक्षानुभूतियाँ इसी माध्यम से होती हैं । सहस्रार को ब्रह्माण्डीय चेतना का रिसीविंग सेन्टर माना जा सकता है। यह शक्ति संचय में एरियल की भूमिका सम्पन्न करता है। मस्तिष्क के मध्य भाग में अवस्थित सहस्रार को ब्रह्मलोक कहा गया है।
शरीरगत विद्युत शक्ति का सामान्य प्रवाह यों सन्तुलित ही रहता है पर कहीं-कहीं उसमें उग्रता एवं वक्रता भी देखी जाती है। हवा कभी-कभी बाँस आदि के झुरमुटों से टकरा कर कई तरह की विचित्र आवाजें उत्पन्न करती है, रेलगाड़ी, मोटर और द्रुतगामी वाहनों के पीछे दौड़ने वाली हवा को भी अन्धड़ की चाल चलते देखा जा सकता है। नदी का जल कई जगह ऊपर से नीचे गिरता है-चट्टानों से टकराता है तो वहाँ प्रवाह में व्यक्तिक्रम, उछाल, गर्जन-तर्जन की भयंकरता दृष्टिगोचर, होती है। शरीरगत सूक्ष्म चक्रों की विशेष स्थिति भी इसी प्रकार की है। यों नाड़ी गुच्छकों-प्लेक्ससों में भी विद्युत संचार और रक्त प्रवाह के गतिक्रम में कुछ विशेषता पाई जाती है। किन्तु सूक्ष्म शरीर में तो वह व्यक्तिक्रम कहीं अधिक उग्र दिखाई पड़ता है। पवन प्रवाह पर नियन्त्रण करने के लिए नावों पर पतवार बाँधें जाते हैं उनके नाव की दिशा और गति में अभीष्ट फेर कर लिया जाता है। पन चक्की के पंखों को गति देकर आटा पीसने, जल कल चलाने आदि काम लिये जाते हैं। जल प्रपात जहाँ ऊपर से नीचे गिरता है वहाँ उस प्रपात तीव्रता के वेग को बिजली बनाने जैसे कार्यों के लिए प्रयुक्त किया जाता है। समुद्री ज्वार भाटों से भी बिजली बनाने का काम लिया जा रहा है। ठीक इसी प्रकार शरीर के विद्युत प्रवाह में जहाँ चक्र बनते हैं वहाँ उत्पन्न उग्रता को कितने ही अध्यात्म प्रयोजनों के काम में लाया जाता है। स्थूल शरीर में यही बलिष्ठता, समर्थता, स्वस्थता के रूप में सामने आती है, सूक्ष्म शरीर में चिन्तन क्षेत्र की परिष्कृत के रूप में जबकि कारण शरीर में जब यह उभार आता है, तो वह अन्तराल की भाव-संवेदना के रूप में फट पड़ता है। यह सब प्रकारान्तर से जीवन ऊर्जा के ही प्राकट्य की प्रभाव -परिणति है, जिसकी जानकारी भारतीय साधकों को थी । यही कुण्डलिनी शक्ति है और उसके जागरण की फलश्रुति भी। देव संस्कृति तथा संस्कृति की विश्व मात्र के लिए यह सबसे बड़ी देन है।
इतने ऋषियों तपस्वियों के रहते-एक राजा तत्वज्ञानियों की सभा का संचालन करे ? सभी के मनों में यह प्रश्न खटक रहा था । पर परमर्षि , याज्ञवल्क्य के निर्णय का प्रतिकार ? यहीं पर आकर बात अटक जाती । महर्षि इस अंतर्द्वंद्व से अपरिचित न थे। वन मार्ग पर पड़ते कदमों के साथ उनका मन समाधान के सूत्र खोज रहा था। साथ में चल रही तत्व जिज्ञासुओं की मण्डली अपने मन की तरंगों में उलझी थी । चलते-चलते महर्षि ने आकाश की ओर ताका सूर्यास्त हो रहा था। अस्ताचल की ओर जाते हुए आदित्य की रश्मियों को गले लिपटाकर विदाई दे रहे वृक्ष सुनहले दिख रहे थे। पक्षियों का साम-गाम वायुमण्डल को एक अनोखी गूँज से भर रहा था।
वन पथ कब राजपथ से मिलने लगा इसे जानने का किसी को अवकाश न था। चलते-चलते सभी किसी गाँव के पास आ पहुँचे थे। राह के किनारे ही देव-मन्दिर बन रहा था। शाम होने के बाद भी अभी निर्माण कार्य थमा नहीं था। शायद इसे जल्दी परिपूर्णता देनी हो, न जाने महर्षि को क्या स्फुरणा हुई -उन्होंने निर्मित हो रहे मन्दिर के सीमा क्षेत्र में प्रवेश किया। पीछे-पीछे तपस्वियों की मण्डली भी घिर आई। ढेरों-मजदूर, कारीगर, और बढ़ई वहाँ काम कर रहे थे। पता नहीं क्या सोच कर उन्होंने एक ओर बैठे काम कर रहे मजदूर के पा जाकर पूछा-”भाई! क्या कर रहे हो ?” देखते नहीं हो। पत्थर तोड़ रहा हूँ” -मजदूर ने कहा। यद्यपि सवाल बड़ी विनम्रता से किया गया था। वाणी पर्याप्त माधुर्य से सनी थी। परन्तु इतना तिक्त जवाब पाकर लगा कि काम करने वाला तेज मिज़ाज है। यही नहीं वह किसी बात को लेकर दुखी है। तभी तो सीधी-साधी बात का इतना
कड़वा उत्तर ।
वह कुछ और बढ़े। दूसरे मजदूर के पास पहुँच कर पहले वाला सवाल दुहराया। मजदूर के उत्तर में पहले जैसी तिरक्तता तो नहीं थी, पर यह जरूर लगता था कि उसे काम में आनन्द नहीं आ रहा है। उसने कहा था “ऋषिवर! उदर पूर्ति के लिए काम कर रहा हूँ।”
उसकी वाणी में विवशता की बोझिलता और अनुत्साह का फीकापन था। वह इधर’-उधर देखते हुए एक और कार्यकर्मी के पास गए। महर्षि के साथ चल रही मण्डली कुछ आश्चर्य और कौतुक के साथ उनका यह कार्य-व्यवहार देख रही थी । पर वह इस सबसे अनभिज्ञ तीसरे मजदूर के पास खड़े थे। वह बड़े उत्साह शक्ति और सुघड़ता से पत्थर तोड़ रहा था। उनने उससे पूछ ही लिया-”भाई यहाँ क्या हो रहा है और तुम क्या कर रहे हो ?” मजदूर ने बिना हाथ हटाए उनकी ओर देखा व किंचित सिर झुका कर तत्वज्ञ ऋषि को प्रणाम किया । उसकी आह्लाद की चमक और आनन्द की दीप्ति नाच रही थी। उसी भाव को व्यक्त करते हुए उसने धैर्यपूर्वक उत्तर दिया-”भगवन्! यहाँ प्रभु का मन्दिर बन रहा है। मैं भी इस भगवत् कार्य को पूरा करने के लिए मेहनत कर रहा हूँ।”
वह फिर अपनी राह चल पड़े। तनिक पीछे मुड़ते हुए ऋषिगणों को सम्बोधित किया-”आप सब समझे कर्म का रहस्य ?” उत्तर में उन सभी की आँखों में शून्यता का भाव उभरा । लगता था उनमें से किसी को समझ में नहीं आया था। अब वह खुद समझाते हुए बोले “ऋषिगणों! पहला मजदूर जबरदस्ती लादी गई मजदूरी कर रहा था। दूसरा बेचारा स्वतः की विवशता के कारण जुटा था। दोनों अपने मनोभावों के कारण दुःखी, निराश और उद्विग्न थे। जब कि तीसरा वही काम करते हुए आनन्दित था जानते हैं क्यों?” हल्की मुसकान के साथ उन्होंने देखा “तीसरे व्यक्ति में एक गरिमा थी, आनन्द था, प्रवीणता थी और उन सबका कारण थी उस व्यक्ति की समर्पण की आध्यात्मिक भावना जो उसे तीनों विशेषताओं से आप्लावित कर रही थी।
“यदि कर्म ही सब कुछ है तब योग और तपश्चर्या की प्रक्रियाएँ ?” एक जिज्ञासु ने प्रश्न उठाया।
“तप और स्वाध्याय से मनन और निदिध्यासन से ध्यान और समाधि से वह परम तत्व अनुभव का विषय बनता है। सत्संग और सदाचार से यह मनुष्य का शरीर इसके भीतर देखने वाला अन्तःकरण वह पवित्र अधिष्ठान बनता है जिसमें आत्मानुभूति स्थिर और अचंचल होकर निवास करती है। सत्य बड़ा गुण है, स्वाध्याय और सत्संग तप है। पर पर-दुःख कातर होकर रात दिन कर्म में तत्पर रहना सर्वत्र आत्मानुभूति का प्रत्यक्ष प्रमाण है। कार्य के स्वरूप का मूल्य नहीं मूल्यवान और महत्वपूर्ण उसके पीछे विद्यमान भाव है। भावों की इसी उत्कृष्टता के कारण जनक राजा होने के पर भी तत्व-ज्ञानियों में श्रेष्ठ हैं, उपदेश देने योग्य हैं।” ऋषिगणों को समाधान मिल रहा था महर्षि कह रहे थे-”उत्कृष्ट भावनाओं के घुल जाने पर साधारण कर्म भी योग बन जाता है। फिर महाराज विदेह तो भगवान के विश्व उद्यान को सुन्दरतम बनाने के लिए स्वयं को प्रतिफल दलित द्राक्षा की तरह निचोड़ रहे हैं। इससे अधिक साधना मुझे ज्ञात नहीं।”
“निश्चित रूप से वह श्रेष्ठतम तत्वज्ञानी है।” अनेक स्वर एक साथ उभरे।
साँस्कृतिक विभूतियों-उपलब्धियों की गौरव कथा ‘तंत्र-विज्ञान’ के विवेचन-विश्लेषण के बिना आधी-अधूरी ही कही जायेगी। इस देश के ऋषियों ने अन्तः प्रकृति व बाह्य प्रकृति के क्षेत्र में जो कुछ बहुमूल्य प्रयोग किए-प्रक्रियाएँ विकसित की, तंत्र को उन सब में बेशकीमती ठहराया जा सकता है। इसे हतभाग्य के सिवा और क्या कहें-कि इस समर्थ विज्ञान को सदियों से अगणित भ्रान्तियों में जकड़े रहना पड़ा। भारतीय और पश्चिमी विद्वानों ने बिना समझे बूझे इसकी निन्दा के पुल बाँध दिये । उन्होंने यह भी इच्छा व्यक्त की कि जनसाधारण को कुमार्ग की ओर प्रवृत्त करने वाले इस साहित्य का लोप होना ही जनहित में है। विद्वान इसके अध्ययन से दूर रहे, जनसामान्य का इधर ध्यान नहीं गया । परिणाम स्वरूप इसका धीरे-धीरे लोप होता गया।
जनसाधारण में इसके व्यापक प्रचार न होने का एक कारण यह भी रहा कि तंत्रों के कुछ अंश समझने में इतने कठिन और गहन थे जो योग्य गुरु के बिना समझें नहीं जा सकते थे। अतः जनता का इनके प्रति अन्धकार में रहना स्वाभाविक था। तंत्र ज्ञान का अभाव ही भ्रम और शंकाओं का कारण बना। इसी का जिक्र करते हुए अँग्रेज मनीषी हर्बर्ट वी. गैन्थर ने अपने ग्रन्थ ‘युग-नाथा’ में लिखा है-संसार में शायद ही कोई अन्य साहित्य होगा। जिसकी इतनी अधिक निन्दा की गई हो। वह भी ऐसे लोगों के द्वारा जिन्होंने न तो उसकी एक उसकी एक भी पंक्ति पढ़ी और न उस पर गम्भीरतापूर्वक मनन किया । इसके महत्व को बताते हुए वह आगे कहते हैं-’वास्तविक तथ्य यह है कि तंत्रों में जीवन सम्बन्धी बड़े गम्भीर और स्वस्थ विचारों का समावेश है। पर जिस प्रकार हम अपने शरीर में स्थित गुर्दे की उपयोगिता तब तक नहीं समझ पाते जब तक कि जीवित शरीर की संचालन क्रिया में अन्य भागों के साथ उसके सम्बन्ध को न जान लें। उसी प्रकार समस्त मानव जीवन की महत्वपूर्ण क्रियाओं पर विचार किए बिना हम इसकी वास्तविकता नहीं जान सकते। जिनमें वास्तविकता जानने की ललक है वे तंत्र का मूल वेदों में खोज लेते हैं। हरित ऋषि के अनुसार-”श्रुतिश्च द्विविधा वैदिकी ताँत्रिकी,” अर्थात्-श्रुति के दो प्रकार हैं- वैदिकी और तान्त्रिकी । ऋग्वेद का देवी सूक्त, वैदिक ऋषि विश्वामित्र द्वारा किए गए बला-अतिबला सावित्री महाविद्या के प्रयोग इन ऋषियों की ताँत्रिक समर्थता और वेदों से इनकी अविच्छिन्नता का परिचय देने के लिए पर्याप्त है। अथर्ववेद के प्रवर्तक महा अथर्वण की परम्परा तो इसका भरा-पूरा भण्डार है। तंत्र ग्रन्थों से अथर्ववेद में वर्णित प्रक्रियाएँ इतना अधिक साम्य उपस्थित करती हैं कि किसी भी अध्येयता को चकित रहना पड़ सकता है।
इसे न समझ पाने के कारण कुछ विद्वान वेदों और तंत्रों को अलग-अलग ही नहीं परस्पर विरोधी मान बैठते हैं। जबकि यथार्थ में इस साहित्य में जो ज्ञान और योग का वर्णन है वह वैदिक सिद्धांतों से भिन्न नहीं, उनका विकास मात्र है। उदाहरण के लिए अंतर्जगत का विस्तृत विज्ञान वैदिक वाङ्मय में दस भागों में बँटा हुआ है। (1) उद्गीय विद्या (2) संवर्ण विद्या (3) मधुविद्या (4) पंचाग्नि विद्या (5) उपकोशल विद्या (6) शाँडिल्य विद्या (7) दहर विद्या (8) भूमा विद्या (9) गंध विद्या (10) दीर्घायुष्य विद्या। यह विद्याएँ ही ऋषियों की सम्पत्ति थीं। इन्हीं के द्वारा वे अपरिग्रही व निर्धन रहते हुए भी इस भूलोक में कुबेर भण्डारी बने हुए थे। तंत्र मार्ग में यही दस विद्याएँ अन्य नामों से उपलब्ध हैं। यद्यपि तंत्रोक्त विधान वैदिक से भिन्न है। फिर भी उनके द्वारा भी उन्हीं सिद्धियों को प्राप्त करने का प्रयत्न किया जाता है। तंत्र मार्ग में (1) इन्द्राणी (2) वैष्णवी (3) ब्रह्माणी (4) कौमारी (5) नरसिंही (6) बाराही (7) माहेश्वरी (8) भैरवी (9) चण्डी (10) आग्नेयी- इन दस नामों से दस महाविद्याओं की साधना की जाती है।
इसके विकास और विस्तार क्रम में नेपाल, कम्बोडिया, बाली, लाओस, थाईलैण्ड, वर्मा, हिन्द’-चीन, वियतनाम, जावा’-मंगोलिया शैव तंत्र से प्रभावित हुए। चीन, जापान, इंडोनेशिया तिब्बत में शाक्त तंत्र का प्रभाव पहुँचा। अन्वेषकों ने अरब में काफी संख्या में शिवलिंग पाए हैं। ऐसा कहा जाता है कि मक्का शरीफ में संग ए असबद नामक शिवलिंग को हज पर जाने वाले यात्री बड़ी श्रद्धा से चूमते हैं। दक्षिण अमेरिका के पेरु राज्य में शिवलिंग मिले हैं। ब्राजील के खण्डहरों से शिव प्रतिमाएँ मिली हैं । मिश्र में असिरिस और आइसिस नामक शिवलिंग की पूजा की प्रथा है। शिव की तरह असिरिस व्याघ्र चर्म ओढ़े गले में सर्प लपेटे हैं। उनका वाहन एपिस नाम का बैल है यूनान में बेकस और प्रियसस नाम से लिंग उपासना का भी कुछ ऐसा ही विस्तार हुआ। “मिथ आँव चाइना एण्ड जापान” में लिखा है चीन देवताओं की माता चुनी थीं। जो आदिम जल राशि अपस की देवी मानी जाती है। ‘इजिन्शियन मिथ एण्ड आई एजेण्ड ‘ में लिखा है मिश्र में आकाश की देवी का नाम नटु था जो अपने शरीर से ही समस्त प्राणियों को पैदा करती थी। यूरोप की आदिम जातियों में दसु को धर्म में शिव-शक्ति का प्रतिपादन इन शब्दों में किया है कि आकाश पिता है। पृथ्वी माता है। तिब्बत में शक्ति उपासना की देवी संसर्गिया सस्पियनमा है।
तंत्र उपासना की पद्धतियों का क्षेत्र व्यापक और विस्तृत होने के साथ इनमें भ्रान्तियाँ भी पनपती गई। जो तत्व अलंकारिक विवरण में अपने किसी गुह्य उद्देश्य और रहस्य को छुपाए थे उनके शब्दशः अर्थ लिये जाने लगे। सर्वाधिक भ्रम पंच मकारों के संदर्भ में हुआ है मद्य, माँस, मौन, मुद्रा, मैथुन के रहस्य को न जानकर-इसके यथावत् उपयोग में ही अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ ली गई । जबकि तन्त्र शास्त्रों के अनुसार-व्योमं पंकजानित्यत्वं-सुधापान रतो भवेत्। मद्यपानामिदं प्रोक्तामितरे मद्यपायिनः ॥ ब्रह्म रन्ध्र सहस्रदल से जो स्रवित होता है उसका पान करना ही मद्यपान है। इसी प्रकार-माशष्दा द्रसना ज्ञेया तदंशान रसयपाप्रिये। सदा यो भक्षयेद्देवि स एव माँस साधकः॥ हे रसना प्रिये! मारसना-शब्द का नामान्तर है वाक्य का भक्षण करता है। अर्थात्-जो वाक् संयम करके मौन रहता है वही माँस साधक है। मत्स्य का रहस्य बताते हुए तंत्र ग्रन्थ कहते है-गंगा यमुनोर्मध्ये मत्स्यो द्वौचरतः सदा। तौ मत्स्यो भक्षयेद् यस्तु स भवेन्मत्स्यः साधकः॥ गंगा यमुना (इड़ा-पिंगला) के भीतर, दो मत्स्य (श्वास-प्रश्वास) विचरण करते हैं। (प्राणायाम के द्वारा) जो इनका भक्षण करता है। इसी तरह मुद्रा का अर्थ नवयुवती नहीं। आशा तृष्णा महामुद्रा, ब्रह्माग्नौ परिपाचिता (कैलाशतन्त्र 80 पटल) आशा तृष्णा महामुद्रा ब्रह्माग्नि परिपाचित करें । मैथुन के संदर्भ में योगिनी तंत्र का वचन है- सहस्रारों परिविन्दों कुण्डल्या मेलन शिवे । मैथुनं शयनं दिव्यं यतीनाँ परिकीर्तितम्॥
हे शिवे! सहस्र पदमोपरि बिंदु में जो कुल कुण्डलिनी का मिलन है वही यतियों का परम मैथुन कहा गया है। कितने दिव्य अर्थ हैं पंच मकार के इन्हें जानकार किसे तंत्र शास्त्र पर श्रद्धा न होगी। पंच मकार की ही भाँति पशु भाव की बलि । महानिर्वाण तंत्र के अनुसार-
कामः क्रोधौ द्वौ पशु इमामेव मनसा बलि समर्पयेत। कामः क्रोधौ विघ्नकृतो बलि दत्वा जपं चरेत्॥
काम और क्रोध विघ्नकारी दो पशु हैं । इनकी बलि देकर जप में तन्मय हो जाय। एक अन्य स्थान पर कहा है-’इन्द्रियाणि पशूनहत्वा’-अर्थात्-इन्द्रिय रूप पशु का वध करें । इन्हीं भावों को ग्रहण करके अपने देश में महान तंत्र साधक होते हैं। निर्विशेष ब्रह्म का प्रतिपादन करने वाले आदि गुरु शंकराचार्य शक्तितत्त्व के रहस्यवेत्ता भी थे , उन्होंने तिब्बत के गुह्य स्थानों उरुंग मठ तवाँग मठ जाकर अनेकों तंत्र साधनाएँ सम्पन्न कीं। उनके द्वारा लिखा गया सौंदर्य लहरी नामक ग्रन्थ तंत्र ग्रन्थों में अपना अद्वितीय स्थान रखता है। इसकी पैंतीस टीकाएँ प्राप्त हैं जिसमें लक्ष्मीधर टीका उत्तम मानी गई है।
शंकर की ही भाँति कीनाराम, वामाखेपा, कमलाकान्त, रामप्रसाद, दक्षिणेश्वर के सन्त रामकृष्ण परमहंस तंत्र की गुह्य प्रक्रियाओं में निष्णात् थे। श्री रामकृष्ण देव ने इस संदर्भ में एक ऐसे रहस्य का उद्घाटन किया है जिसे विचित्र किन्तु सत्य कहा जा सके। उनके अनुसार तंत्र शक्ति का उपार्जन किए बगैर धर्म स्थापन का महान कार्य सम्भव नहीं । इस कथन के पीछे उनकी स्वयं की अनुभूति थी ।
जिसे आज की भाषा में तंत्र कहा जाता है वह कुछ छुट’-पुट टोना-टोटका भर है। कभी-कभी मृतात्माओं के आह्वान-आवेश को भी तंत्र की संबा दी जाती है। अपने को ताँत्रिक कहने समझने वाले ऐसे बाजीगरों-व्यापारियों की इन दिनों कमी नहीं है। उनके द्वारा किए जाने वाले प्रयोग कितने ही चमत्कारी क्यों न लगे गुह्य विद्या की प्रक्रिया और सीमाओं का भेद समझ लिया जाय। इन दोनों की शुरुआत प्राण प्रकृति से होती है इतने साम्य के बावजूद गुह्य विद्या की उच्चस्तरीय क्षेत्रों में गति नहीं। यह प्राण और भौतिक सत्ता पर अपने कुछ चमत्कार अधिकार का प्रदर्शन कर मौन साध लेती है। जब की तंत्र साधना की गति निम्न और उच्च दोनों स्तरों में अव्याप्त है। इसका उद्देश्य आत्मलाभ, परमशिव, चित् शक्ति की अवस्था की प्राप्ति है।
आधुनिक युग में धर्म स्थापना का युगाँतरीय कार्य करने वाले परम पूज्य गुरुदेव को श्रेष्ठतम तंत्र साधक अनुभव किया जा सकता है। इस क्षेत्र में किए गए उनके अलौकिक प्रयास गुह्य साधनाएँ अभी सर्व-सामान्य की जानकारी से अछूती हैं। निकट भविष्य में अखण्ड-ज्योति के पृष्ठ इन गुह्य और गहन पर्तों को खोलने वाले सिद्ध होंगे। लोक जीवन उनके तंत्र उद्धारक स्वरूप से परिचय प्राप्त कर सकेगा।
तन्त्र की गुह्यताओं के अन्वेषक युग ऋषि ने जहाँ अपने-जीवन में गुह्य विद्या के रहस्यों, शारदा तिलक, महानिर्वाण, कुलार्णव आदि ग्रन्थों में वर्णित साधना रहस्यों की अनुभूति की। वहीं कुछ ऐसे विशिष्ट प्रयोग किए जो ब्रह्मर्षि विश्वामित्र के बाद दुबारा कभी सम्पन्न नहीं हुए। सावित्री साधना के नाम से बताए गए इस प्रयोग का उद्देश्य मनुष्य मात्र की आन्तरिक प्रकृति और बाह्य प्रकृति की अस्त-व्यस्तता को सुधारना-सँवारना रहा है। इसे तंत्र का उत्कृष्टतम प्रयोग कहा जा सकता है। जिसकी परिणति विश्व राष्ट्र की कुण्डलिनी के रूप में सामने आयी।
सावित्री साधना क्या ? जिज्ञासुओं का यह प्रश्न अस्वाभाविक होने पर असाधारण तो है ही। इसका उत्तर संकेत में ही समझ कर सन्तुष्ट हो जाना चाहिए। पौराणिक आख्यान के अनुसार ब्रह्माजी की दो पत्नियाँ हैं गायत्री और सावित्री । इस अलंकारिक भाषा के तत्व अपरा प्रकृति समझा जाना चाहिए। परा प्रकृति के अंतर्गत मन-बुद्धि, चित्त, अहंकार चतुष्ट्य ऋतम्भरा प्रज्ञा आदि ज्ञान का क्षेत्र आता है। अपरा प्रकृति चेतना जड़ प्रकृति है। पदार्थों की समस्त हलचलें गतिविधियाँ उसी पर निर्भर हैं। परमाणुओं की भ्रमणशीलता रसायनों की प्रभाविकता, विद्युत, ताप, प्रकाश, चुम्बकत्व, ईथर आदि उसी के भाग हैं।
गुरुदेव ने गायत्री की विशिष्ट योग साधनाएँ सम्पन्न कर मानव मन के विक्षोभों के शान्त कर सुप्त देवत्व को जाग्रत करने की पृष्ठभूमि तैयार की है। लेकिन बाह्य प्रकृति के विक्षोभ जो प्रदूषण महामारी, खनिजों के घटने, सौर-कलंक, ओजोन की परतों के टूटने के रूप में प्रकट हो रहे हैं उनका क्या किया जाय ? समूची प्रकृति आज क्षुब्ध एवं क्रुद्ध है। उसी का क्रोध-अकाल, भूकम्प, अतिवृष्टि, अनावृष्टि बनकर बरस रहा है। मौसम का क्रम अस्त व्यस्त है। ऋतुओं को अपनी पहचान भूल चुकी है। इन्हें फिर से व्यवस्थित करना अब न तो वैज्ञानिकों के बूते की बात रही और न राजनेताओं की। अपने को मनीषी कहने का दम्भ भरने वालों की अकल सब देख सुनकर चकराई हुई है।
इस समस्या के समाधान के लिए उन्होंने तीन वर्ष एकान्त में रहकर सावित्री साधना के द्वारा विश्वराष्ट्र की कुण्डलिनी का जागरण सम्पन्न किया। सामान्यतया कुण्डलिनी के नाम पर व्यक्तिगत अर्जन की बात सोची समझी जाती है। परन्तु युगावतार के जीवन में तो व्यक्तिगत शब्द जैसी कभी रही ही नहीं। उनके द्वारा किया गया यह प्रयोग पुरातन काल में विश्वामित्र द्वारा सम्पन्न हुआ था उस बार भी विश्व वसुधा का कायाकल्प हुआ था। इस बार भी वैसा ही होने जा रहा है ।
इस तंत्र साधना का परिणाम उन्हीं के शब्दों में कहें तो विश्व की राष्ट्र की कुण्डलिनी जाग्रत होने का प्रभाव इस रूप में देखा जा सकेगा कि उससे पदार्थ, जीवधारी, मनुष्य एवं परिस्थितियों के प्रवाह प्रभावित होंगे। मृतिका की उर्वरता बढ़ेगी, खनिजों के भण्डार तथा , उत्खनन का अनुपात बढ़ेगा। धातुएँ मनुष्य की आवश्यकताओं से अधिक उत्पन्न होंगी। खनिज तेलों की कमी न पड़ेगी। रसायनें प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होंगी। वृक्ष-वनस्पति उगाने के लिए मनुष्य को अधिक प्रयास न करना पड़ेगा। जलाशयों की कमी न पड़ेगी। वनौषधियाँ प्राचीनकाल की भाँति गुण कारक होंगी। उपयोगी प्राणी बढ़ेंगे और दीर्घकाल तक जीवित रहेंगे। हानिकारिकों की वंशवृद्धि रुक जाएगी , वे जहाँ तहाँ अपना अस्तित्व बचाते दीख पड़ेंगे। जलवायु में पोषकतत्व बढ़ेंगे और वे प्रदूषण को परास्त करेंगे। मलिनता घटेगी शुद्धता अनायास बढ़ेगी। प्रकृति-प्रकोपों के समाचार यदा कदा ही सुनने को मिलेंगे। बाढ़-सूखा, अकाल महामारी, भूकम्प, ओलावृष्टि, टिड्डी, आदि हानिकारक उपद्रव प्रकृति के अनुकूलन से सहज ही समाप्त होते चले जाएँगे।
सावित्री साधना के इन प्रभावों की अनुभूति इस सदी के अन्त तक भली प्रकार की जा सकेगी। तंत्र का पुनरुद्धार करने वाले युग ऋषि साधकों का मार्गदर्शन करने के लिए भी प्रतिबद्ध हैं। उन्हीं के शब्दों में किसी सत्पात्र को यह अनुभव होने दिया जायेगा कि लिखने वाले के अभाव में आत्मिक प्रगति की उचित आवश्यकता कुण्डलिनी जागरण का विधान न मालूम होने के कारण इच्छा पूर्ति न हो सकी। बस आवश्यकता स्वयं में संयम, साहस, श्रद्धा, निष्ठा तथा लोकहित के लिए समर्पित भाव की हो । युगऋषि के मार्गदर्शन में ऐसे साधक ही साधना रहस्यों के निष्णात् होकर सुख-सन्तोष से भरी-पूरी परिस्थितियों को जन्म देंगे। ज्ञान की इस अनूठी विधा का गौरव पुनः प्रकट हो सकेगा।
संस्कृति और साधना-दोनों एक दूसरे से गहराइयों में जुड़ी आपस में घुली-मिली हैं। एक के बारे में सोचते ही, दूसरे का स्वरूप उभरने लगता है। साधना की प्रक्रिया अपने परिणाम में संस्कृति निखारने लगती है। जड़ वस्तुएँ हों, या चेतन प्राणी प्रकृतितः वे अनगढ़ होते हैं। उन्हें गढ़ने, सुघड़, सुन्दर, प्रकृष्ट, उत्कृष्ट बनाने के लिए प्रयास करने होते हैं। अनायास ही उनका संस्कार सम्पन्न सुसंस्कृत-समुन्नत हो सकना सम्भव नहीं होता । वस्तुएँ या धातुएँ पकाई गलाई ढाली खरीदी जाती हैं और संशोधन संस्कार की इस सुदीर्घ प्रक्रिया द्वारा ही वे सुन्दर उपयोगी बन पाती हैं। प्राणियों की स्थिति भी इससे भिन्न नहीं वन्य मुक्त पशुओं को पालतू बनाना यों ही सम्भव नहीं हुआ है। उनकी प्रकृति में प्रयास पूर्वक परिवर्तन लाना पड़ता है। तब वे मनुष्य के साथ सहज हो रहे सकने का स्थिति में आ पाए हैं। उनको सरकस जैसे विशेष प्रयोजनों के उपयुक्त बनाने के लिए तो और अधिक कठोर, सतर्क, सजग प्रशिक्षण-दक्ष-पशु पक्षी स्वयं भी श्रेय सम्मान के पात्र बनते हैं और पालने वाले को भी लाभ पहुँचाते हैं। मनीषी अनिर्वाण की पत्रावली के पृष्ठ उलटें तो पता लगता है- मानव को वर्तमान स्थिति तक आने के लिए स्वयं में असंख्य अगणित परिवर्तन करने पड़े हैं। उसके द्वारा अपनाई गयी परिष्कार-प्रशिक्षण संस्कार की प्रक्रिया अनगढ़ को गढ़ने की साधना ही सभ्यता और संस्कृति की पहचान बन सकी है।
स्वयं की असीम साधनात्मक सम्भावनाओं के कारण मानव संस्कृति सिरमौर, ईश्वर का राजकुमार है। निरन्तर अग्रगमन, आरोहण-उत्कर्ष ही तो उसके गौरव योग्य कार्य हैं। मानवीय गरिमा सतत् अभ्युदय में उत्थान में ही तो है। पशु प्रवृत्तियों में ही लिप्त रहना मनुष्य का कोई महिमानव लक्षण कैसे कहा जा सकता है ?
यदि मनुष्य की कोई विशेषता हो सकती है तो वह आत्म साधना की बलवती सामर्थ्य ही है। चिन्तन और चरित्र के क्षेत्र में उसी के द्वारा श्रेष्ठता की अभिव्यक्ति सम्भव है। दूसरे प्राणी न तो किन्हीं आदर्शों के प्रति समर्पित होना जानते न ही अन्तः प्रेरणा से स्वयं को मर्यादित अनुशासित करना । इन दायित्वों का बोध और निर्वाह ही इंसान की विशेषता हो सकती है। शील परमार्थ परायणता और कर्मठता से युक्त, चारित्रिक, भावनात्मक, वैचारिक, उत्कृष्टता का वरण ही मनुष्य संबा मानवी विशेषता को सार्थक करता है। मानव देह के साथ जो सौभाग्य विशेष रूप से जुड़ा है वह आदर्शवादिता के अवलम्बन के द्वारा अर्जित उपलब्धियों के रसास्वादन का सौभाग्य ही है। इस कोटि की रसानुभूति, मूल्यानिष्ठता आत्मपरायणता से उत्पन्न आनन्द की अनुभूति अन्य प्राणियों ने नहीं पायी जाती।
यह विशेषता ही मनुष्य शरीर में देवत्व का उन्मेष उत्कर्ष बनकर नजर आने लगती है। व्यक्तित्व के उच्चस्तरीय उन्नयन की स्थिति यही है। जिसमें प्रसुप्त देवत्व अधिकाधिक मात्रा में उभरता-उमगता चला जाय और महामान, सन्त, ऋषि, देवात्मा, अवतार के क्रमिक सोपानों पर वह चढ़ता चला जाय। जब गुण कर्म, स्वभाव में देवत्व का दिव्यता का अनुपात अनवरत बढ़ता ही जाय और उसके फल स्वरूप आत्मसन्तोष तथा ईश्वरीय अनुग्रह सहज ही प्राप्त होता रहे। शास्त्रों में इसी सौभाग्यपूर्ण स्थिति को आत्म साक्षात्कार ईश्वर दर्शन जीवन-मुक्ति स्वर्ग उपलब्धि अद्वैत सिद्धि के रूप में विस्तार से वर्णित किया गया है। साँस्कृतिक ज्ञान कोश का सृजन इसी हेतु हुआ। तत्व विवेचना साधना का विशाल कलेवर, सूक्ष्मदर्शी ऋषि-मनीषियों ने इसी उद्देश्य से तैयार किया ताकि वह प्रखर प्रकाश स्तम्भ बनकर मानवीय प्रगति का मार्गदर्शन करता रह सके। उस प्रकाश में मनुष्य अपनी चेतना का निरन्तर परिष्कार करता रहे व्यक्तित्व को लगातार विकसित करता रह और उसी केन्द्र से जुड़े वैयक्तिक सुख-सन्तोष तथा सामाजिक सुरक्षा-सुविधाओं का सम्पूर्ण आधार सुदृढ़ बना रहे यही मनीषी पूर्वजों का दृष्टिकोण था।
इतने व्यापक और चमत्कारी परिणामों वाली साधना को करने के लिए किसी का आतुर हो उठना सहज है। लोग होते भी हैं। भूखे रहने, एक गाँव के बल खड़े होने, कील-कीटों की शय्या पर लेटने, समाज को उपेक्षित-तिरस्कृत कर कही एकान्त में पलायन कर जाने जैसी अनेकानेक क्रियाएँ साधना के नाम पर होती देखी जा सकती हैं। तब क्या इन्हीं की बदौलत वैदिक ऋषि चमत्कारी सामर्थ्य हस्तगत करने देवोपम संस्कृति का निर्माण करने में सफल हुए ? मनीषी ओल्डेन वर्ग के चिन्तनकोश ‘वैदिक सेज एण्ड हिजे कल्चरे’ के पृष्ठों में इस प्रश्न का उत्तर एक शब्द में मिलता है-नहीं उनके अनुसार भभसाधना कर्म के तत्व का ज्ञान और उसकी सामर्थ्य का सही सुनियोजन है। गीता में भगवान श्रीकृष्ण इसी को योगः कर्मसु कौशलम्य कहकर सूत्र बद्ध करते हैं।
कर्म ? अपने आप में विलक्षण पहेली है। कब यह पाप बनता है-कब पुण्य? कब यह ताप और योग का बाना पहनकर स्वर्ग की सृष्टि करता है? कब इसके परिणाम यम के दण्ड विधान और नर्कवास के रूप में सामने आएंगे? इन प्रश्नों का सही उत्तर न खोज पाने के कारण हममें से अनेक क्या करें? क्या न करें? के चक्रव्यूह में फँसकर न जाने कितनी व्यथा-वेदना सहने के लिए विवश होते हैं। ऐसा भी नहीं कि कर्म करने से बचा जा सके। गीताकार के शब्दों में कहें तो नहि कष्चित्क्षणमति जातुः तिश्ठत्यकर्मकृत्य एक क्षण भी काम किए बिना नहीं रहा जा सकता। शरीर और मन की हरकतें सोते-जागते किसी न किसी रूप में हमेशा होती रहती हैं।
धर्म शास्त्री जान पेरी के ग्रन्थ एक्षनः इट्स एनालिसिसय के अनुसार सोचें तो किसी भी क्रिया के साथ दो चीजें अनिवार्य रूप से जुड़ी होती हैं-भाव और विचार। इनकी उत्कृष्टता और निकृष्टता अपने स्वरूप के आधार पर दो परिणाम प्रस्तुत करती हैं गौरव बुद्धि और आत्मग्लानि। एक में हमारा व्यक्तित्व समग्र बनता-ईश्वरीय सत्ता से अपना तादात्म्य बिठाता है। दूसरे में हमारा अस्तित्व टुकड़े-टुकड़े होकर पशुता के गर्त में गिर जाता है। मनुष्य शरीर धारण करने के बावजूद नरपशु नरपिशाच बनने के लिए विवश होते हैं।
दर्शनशास्त्री काष्ट की उलझन का समाधान यही है। लेकिन गौरव बुद्धि उन्हीं कामों में जाग्रत हो सकती है जो हमारी आत्म चेतना को समग्र बनाकर ईश्वरोन्मुख करने वाले हैं। जिन्हें सामाजिक स्वीकृति प्राप्त हो। उदाहरण के लिए कोई चोरी, डकैती, व्यभिचार, हत्या आदि नृशंस-बर्बर काम करके स्वयं को गौरवान्वित नहीं अनुभव कर सकता। दूसरों के सामने बाहरी तौर पर वह कितना ही कुछ क्यों न कहता फिरे पर अंतर्मन में उसे ग्लानि, कुण्ठा, हीनता की चोट सहनी पड़ेगी। क्योंकि प्रश्न समाज के सामूहिक मनका है-जिसका विरोध किसी भी एकाकी मन के द्वारा सम्भव नहीं।
यदा-कदा हमें इसके अपवाद देखने को मिलते हैं पर वे अपवाद दीखते भर हैं, होते नहीं। जैसे लड़ाई के मोर्चे पर किसी सिपाही द्वारा शत्रुओं से जूझने उन्हें पराजित करने का कार्य प्रत्यक्ष में नृशंस लगने पर भी यथार्थ में करुणा और सहृदयता से प्रेरित है। उसके पीछे अनेकों दुर्बलों की रक्षा करने, राश्ट्र की अस्मिता को बचाने का भाव है। यही गौरव बोध उसे पुण्यात्मा बनाता आत्मचेतना को विकसित करने में सहायक बनता है।
कौन सा काम गौरव बोध जाग्रत करेगा? इसका उत्तर है-जिसके पीछे स्वार्थ और अहं की प्रेरणा न हो। जो काम लोकादर्श की रक्षा करने के लिए, भगवान के प्रति समर्पित होकर किए जाते हैं। वे छोटे हों या बड़े उनमें से प्रत्येक का परिणाम-पुण्य जीवन में स्वर्ग की सृष्टि के रूप सामने आता है। स्वर्ग और कुछ नहीं हमारा परिमार्जित परिशोधित मन है। यह कथन सिर्फ अलंकारिक सत्य नहीं साधना जगत का गुह्य रहस्य है, जिसे कोई भी सुपात्र अनुभव कर सकता है। मनुष्य जहाँ व्यष्टि है वहीं विराट भी है। वह स्वयं में जब जैसा होता है, चेतना के उन्हीं स्तरों, शक्तियों की अनुभूति उसे होती रहती है। शरीर के स्तर पर की गई साधना उसे पार्थिव चेतना से एकत्व का आभास करा सकती है। यही भूतत्व की अनुमति है। भुव तत्व के निम्न उच्चास्तरों के अनुरूप प्रेत-पिशाचों की भयंकरता और यज्ञ आदि प्राणिक शक्तियों की सौम्यता के दर्शन के रूप में हो सकती है। दैनन्दिन क्रम में स्वप्न के माध्यम से इसे यत्किंचित् अनुभव करते हैं। जागरुकता का अभाव इसे स्पष्ट नहीं होने देता। स्वः तत्व जिसे मन कहेंगे। श्री अरविन्द के महाकाव्य सावित्री के अनुसार जहाँ अपनी अपरिमार्जित स्थिति में अन्धा रहकर पशु प्रवृत्तियों के दासत्व का नर्कवास भुगतता रहता है वहीं परिशोधित-संस्कारित होने पर उसके सामने देवलोक का राज्य खुल जाता है। देवी देवताओं की स्पष्ट अनुभूति होने लगती है।
मन के अन्धे होने, पशुप्रवृत्तियों के दासत्व भुगतने को हम स्वयं के औरों के जीवन में अनुभव कर सकते हैं। जिनकी मनःस्थिति ओछी है घटिया है, उन्हें दैन्य को दारिद्रय, दुःख, दुर्बलता, कुण्ठा क्लेश अवहेलना, अवमानना के पाप समूहों में जकड़े घिरे रहना पड़ता है। यम दण्ड और नर्कवास के इस काल में भौतिक सम्पदाएँ उन्हें मिल भी जायँ तो उनसे उन्हें सुख शांति नहीं मिल पाती उलटे उनकी दूषित प्रवृत्तियों का दारुण विस्फोट होने में ही बढ़ी हुई सम्पदा आधार बनती है और उनके व्यक्तित्व के अधिकाधिक क्षय के साथ ही वह सम्पदा भी क्षयीभूत होती है।
पाप से उबरने-नर्कवास से छूटने के लिए क्या करें? इस सवाल का जवाब देते हुए दक्षिण भारत के महान साधक रामलिंगम् स्वामी के अनुभूतिकोष पिरियर लाइट, के पृष्ठों का कहना है उन कामों को किसी भी स्थिति में न किया जाय जो स्वयं में कुण्ठा, ग्लानि उत्पन्न कर व्यक्तित्व को चूर-चूर करने वाले सिद्ध हों। हमारे कर्मशक्ति स्वयं में गौरव बोध जाग्रत करने, पुण्य उपार्जित करने में लगे-खपे। कर्म शक्ति का यही उपयोग सही अर्थों में साधना है।
सामान्य मानव में कर्म के प्रेरक तत्व अभिरुचि आदत जन्मान्तर की प्रवृत्तियाँ होती हैं। इन्हीं सबके अनुसार वह अपनी जीवन ऊर्जा को नष्ट करता बिखेरता रहता है। उसके लिए कर्म स्वातंत्र्य की बात एक अच्छा-खासा मजाक भर है। जबकि साधनारत व्यक्ति विधाता द्वारा दी गई कर्म की स्वतंत्रता का ठीक-ठीक उपयोग करने में समर्थ होता है। वह स्वयं की अभिरुचियों, आदतों, प्रवृत्तियों को नए सिरे से गढ़ता है। उसके अंतराल में नए संस्कार जन्म लेते हैं। कर्म के प्रेरक तत्व स्वार्थों का जखीरा जमा करने की लालसा, अहंकार का झण्डा ऊँचा करने की चाहत नहीं रह जाती। प्रत्येक काम लोक के प्रति करुणा आत्म विकास के सोपानों पर चढ़ने के उद्देश्य से होता है। ध्यान देने योग्य बात है-साधना कोई कर्म विशेष नहीं है और न इसके लिए कहीं आने-जाने दौड़ने-भागने की जरूरत है। यह तो स्वयं को सुसंस्कारित करने की पद्धति है। जिसके लिए सुबह से शाम तक होशो-हवासपूर्वक हर छोटे-बड़े काम को परमात्म समर्पित भाव से करना पड़ता है। फिर तो नामदेव की दर्जी गीरी, रैदास को जूता गाँठना, कबीरदास का कपड़ा बुनना सभी साधना बन जाते हैं। संत एकनाथ को रामेश्वर की तीर्थ यात्रा का पुण्य, प्यास से विकल गधे को गंगा जल पिलाने से मिल जाता है।
यह पूर्ण सुसंस्कृत साधक की स्थिति है। ऐसे व्यक्ति ही संस्कृति को न प्राण दे पाते हैं। प्राचीन काल के लोकनायक ऋषि मुनि इस तथ्य को भली-भाँति जानते थे। इसलिए वे दूसरों को उपदेश देने में जितना समय खर्च करते थे उससे कहीं अधिक समय स्वयं के जीवन को सँवारने, साधना के ढाँचे में ढालने के निमित्त करते थे। इसी से वह ऊर्जा मिलती है, जिसकी प्रेरणा से किसी के मन पर जमे बुराइयों के आकर्षक कुसंस्कारों को हटाकर अच्छाइयों के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दे सकें।
प्राचीन इतिहास की ही भाँति पिछले दो हजार वर्षों में भी इसी आधार पर जन मानस का सुधार एवं परिष्कार सम्भव होता रहा है। भगवान बुद्ध के मन में अपने तथा संसार के दुःखों के निवारण की लालसा जगी। इसके लिए उन्होंने पच्चीस वर्श की आयु से लगातार बीस वर्श तक आत्म निर्माण साधना की। भगवान महावीर ने अपनी आयु का तीन चौथाई भाग जीवन साधना में एक चौथाई जन नेतृत्व में लगाया। आदि गुरु शंकराचार्य ने बीस वर्षों की ऐसी ही गहन साधना के बूते लोकजीवन में स्वर्ग सृष्टि की। श्री रामकृष्ण परमहंस ने पचास वर्श की आयु में विशुद्ध तीस वर्श तप साधना में लगाए।
संसार के अन्य महापुरुष जिनने लोगों की उच्च भूमिका को बढ़ाया संस्कृति के प्रेरक बने निश्चित रूप से साधक थे। महात्मा ईसा के जीवन के 36 वर्श स्वयं को बनाने में लगे। पैगम्बर मुहम्मद ने पच्चीसवें वर्श में साधना की ओर कदम बढ़ाया और चालीस वर्श तक उसी में लगे रहे। परम पूज्य गुरुदेव अपनी इसी विशिष्टता के कारण तपोनिष्ठ कहलाये। उनके अस्सी वर्श के जीवन का एक-एक दिन साधना के गहरे तत्वों से भरा है।
उन्होंने हम सब से अपने मानस पुत्रों से ऐसी ही आशा की है। देव संस्कृति को विश्व संस्कृति का रूप देने का दायित्व हमीं सब पर है और अब तक एक ही तथ्य समय-समय पर स्पष्ट हो रहा है कि स्वयं के जीवन को उत्कृष्टतम बनाने वाली आत्माएँ ही लोकजीवन को सच्चा नेतृत्व दे सकी हैं। नए समाज में ओछे-हल्के बचकाने व्यक्तियों का कोई स्थान न होगा। फिर साँस्कृतिक उन्नयन जैसे महान कार्य के लिए इन जैसों के बारे में सोचना ही ठीक नहीं । यह महान कार्य विशिष्ट पुण्यात्माएँ महान साधक ही कर सकेंगे।
ऋषि मनीषा का यह मत रहा है कि संचित दुष्कर्मों को यथा स्थान छोड़कर-आत्मिक प्रगति की साधना कर सकना-उस दिव्य स्तर तक जा पहुँच सकना-किसी के लिये भी सम्भव नहीं। कक्षाएँ उत्तीर्ण करके ही विद्यार्थी स्नातक की उपाधि पाते-उच्च पदाधिकारी बनते हैं। छलाँगें भौतिक जगत में कई क्षेत्रों में लगाई जाती हैं और सफल भी होती हैं, पर आत्मिक क्षेत्र में ऐसी सुविधा नहीं है। संचित दुष्कर्मों से विनिर्मित प्रारब्ध न केवल विपत्तियों-असफलताओं का त्रास देता है, वरन् उच्चस्तरीय प्रगति के पथ पर चलने में भी अनेकों विघ्न उपस्थित करता है। रास्ते में अड़ी इन चट्टानों को हटाने-सरकाने के लिए साहसपूर्ण पराक्रम करना होता है। यही है वह प्रायश्चित प्रक्रिया जिसे तप साधना में वरिष्ठता-प्रमुखता दी गयी है।
कर्म फल की सम्भावना सुनिश्चित है। उसे विश्व व्यवस्था का एक अनिवार्य एवं अविच्छिन्न अंग ही समझा जाना चाहिए। इन संचयों को स्वयं ही भुगतना होता है। देव-दर्शन, नदी स्नान, पूजा, उपचार, कथा-वार्ता एवं छुटपुट कर्मकाण्डों का प्रयोजन इतना ही है कि उनसे परिशोधन, परिमार्जन की ओर ध्यान, मुड़े, महत्व समझने का अवसर मिले और वह साहस उभरे जिससे कर्मफल भुगतने का दूसरा विकल्प प्रायश्चित स्वेच्छापूर्वक बन पड़े। प्रायश्चित के लिए किये जाने वाले व्रत उपन्यासों के सामयिक प्रतिफल भी होते हैं, किन्तु वास्तविक एवं चिरस्थाई लाभ देने वाला तथ्य यह है कि दुष्कृत्यों के प्रति घृणा उभरे, भविष्य में वैसा न करने का संकल्प मचले साथ ही जो किया गया हो उसकी क्षतिपूर्ति करने की सदाशयता की खाई पाटने के लिए उत्साह उत्पन्न करें।
आज का जमाया हुआ दूध-कल दही बनता है-आज का बोया बीज बहुत समय में वृक्ष बनता है। आज का अध्ययन, व्यायाम, व्यवसाय, आज ही कहाँ फल देता है? परिणाम में देर लगने पर बालक निराश हो सकते हैं, पर विचारशील लोग अपनी निष्ठा विचलित नहीं होने देते और आशा विश्वास के साथ काम करते रहते हैं। असंयम बरतने पर उसी दिन शरीर रुग्ण नहीं हो जाता जिस दिन चोरी की जाय, उसी दिन जेल भुगतनी पड़े ऐसा कहाँ होता हैं? तो भी समझदारी सुझाती है कि कल नहीं, परसों परिणाम मिलकर ही रहेगा। यही दूरदर्शिता सत्कर्मों-दुष्कर्मों के सुनिश्चित परिणाम को ध्यान में रखते हुए अपनाई जानी चाहिए। पर लोग भ्रमग्रस्त होकर-कर्मफल के सम्बन्ध में विश्वास छोड़ बैठते हैं। इसी इनकारी को वास्तविक नास्तिकता कहना चाहिए।
याद रखना चाहिए कि कपड़े को रंगने से पूर्व उसका धोना आवश्यक है। जप, भोजन, आरम्भ करने से पूर्व स्थान की जरूरत पड़ती है। भोजन से पूर्व हाथ मुँह धोने का औचित्य है। घाव पर मरहम चढ़ाने से पूर्व उसकी सफाई करनी पड़ती है। साधना’-उपासना करने से पूर्व सबसे प्रथम कदम इस जन्म में बन पड़े पाप कर्मों का प्रायश्चित किया जाना चाहिए। यों कुविचार भी हानिकारक हैं और कालान्तर में वे भी परिपक्व होकर दुर्गति के कारण बनते हैं। पर कुकर्म तो प्रत्यक्ष हैं, उनके तत्काल संस्कार बनते हैं और उनका ऐसा भला बुरा कर्मफल विनिर्मित होता है जिसे भुगते बिना और कोई मार्ग नहीं। कर्म की गति अति गहन है। श्रवण कुमार को तीर मारने के फलस्वरूप दशरथ को पुत्र शोक का शाप लगा था और उन्हें राम वनवास के अवसर पर बिलख-बिलख कर प्राण त्यागने पड़े थे। बालि को छिपकर बाण मारने का कर्मफल राम को कृष्णावतार के समय भुगतना पड़ा था और बालि ने बहेलिया बनकर कृष्ण के पैर में तीर मारकर उन्हें मृत्यु-मुख में पहुँचाया था। जब भगवान भी कर्मफल से नहीं बच सकते तो दूसरों की बात ही क्या है। पुण्यात्मा पुरुषों को भी पूर्वकृत पापों के फलस्वरूप दुस्सह-दुख सहने के लिए बाध्य होना पड़ता है।
आयुर्वेद के प्रख्यात ग्रन्थ माधव निदान के प्रणेता माधवाचार्य अपने साधना काल में वृन्दावन रहकर समग्र तन्मयता के साथ गायत्री महापुरश्चरणों में संलग्न थे, उन्होंने पूर्ण विधि-विज्ञान के साथ लगातार ग्यारह वर्षों तक अपनी साधना जारी रखी। इतने पर भी उन्हें सिद्धि का कोई लक्षण प्रकट होते दिखाई न पड़ा। इस असफलता से उन्हें निराशा भी हुई और खिन्नता भी। सो उसे आगे और चलाने का विचार छोड़कर काशी चले गये।
काशी के गंगा तट पर वे बड़ी दुःखी मनःस्थिति में बैठे हुए थे कि उधर से एक अघोरी कापालिक आ निकला। साधक की वेश भूषा और छाई हुई खिन्नता जानने के लिए वह रुक गया और कारण पूछने लगा। माधवाचार्य ने अपनी व्यथा कह सुनाई। कापालिक ने आश्वासन दिया कि उसे भैरव की सिद्धि का विधान आता है। एक वर्श तक उसे नियमित रूप से करते रहने से सिद्धि निश्चित है। माधवाचार्य सहमत हो गये और कापालिक के बताये हुए विधान के साथ मणिकर्णिका घाट-श्मशान भूमि की परिधि में रहकर साधना करने लगे। बीच-बीच में कई डरावनी, लुभावनी, परीक्षायें होती रहीं। उनका धैर्य और साहस सुदृढ़ बना रहा। एक वर्श पूरा होते-होते ही भैरव प्रकट हुए और वरदान माँगने की बात कहने लगे।
माधवाचार्य ने आँख खोलकर चारों ओर देखा पर बोलने वाला कहीं दिखाई न पड़ा। उन्होंने कहा-यहाँ आये दिन भूत-पलीत ऐसी ही छेड़-खानी करने आया करते हैं और ऐसी ही चित्र-विचित्र वाणियाँ बोलते हैं। यदि आप सचमुच ही भैरव हैं तो सामने प्रकट हों आपके दर्शन करके चित्त का समाधान कर लूँ तो वरदान माँगू।” इसका उत्तर इतना ही मिला। “आप गायत्री उपासक रहे हैं। आपके मुख मण्डल पर इतना ब्रह्म तेज छाया हुआ है कि सामने प्रकट होकर अपने को संकट में डालने की हिम्मत नहीं है। जो माँगना हो ऐसे ही माँग लो।” माधवाचार्य असमंजस में पड़ गये यदि गायत्री पुरश्चरणों से इतना ही ब्रह्मतेज उत्पन्न होता है तो उसकी कोई अनुभूति मुझे क्यों नहीं हुई? सिद्धि का आभास क्यों नहीं हुआ? यह प्रश्न बड़ा रहस्यमय था, जो भैरव के संवाद से ही उपजा था। उन्होंने समाधान भी उन्हीं से पूछा। कहा-”देव! यदि आप प्रकट नहीं हो सके और गायत्री उपासना को इतनी तेजस्वी पाते हैं तो कृपा कर यह बता दें कि मेरी इतनी निष्ठा भरी उपासना निष्फल कैसे हो गई? इतना समाधान करा देना ही आपका वरदान पर्याप्त होगा, जब आप गायत्री तेज के सम्मुख होने तक का साहस न कर सके तो आपसे अन्य वरदान क्या माँगू।
भैरव ने उनकी इच्छापूर्ति की और पिछले ग्यारह जन्मों के दृश्य दिखाये। जिसमें अनेकों पाप-कृत्यों का समावेश था। भैरव ने कहा-’आपके एक-एक वर्श के गायत्री पुरश्चरण से एक-एक जन्मों के पाप कर्मों का परिशोधन हुआ है। ग्यारह जन्मों के संचित पाप प्रारब्धों के दुष्परिणाम इन ग्यारह वर्षों की तप−साधना से नष्ट हुए हैं। अब आप नये सिरे से फिर उसी उपासना को करें। संचित प्रारब्ध की निवृत्ति हो जाने से आपको अब के प्रयास में सफलता मिलेगी।
माधवाचार्य फिर वृन्दावन लौटे और बारहवाँ पुरश्चरण करने लगे। अबकी बार उन्हें प्रारंभ से ही साधना की सफलता के लक्षण प्रकट होने लगे और बारहवाँ वर्श पूरा होने पर इष्टदेव का साक्षात्कार हुआ। उन्हीं के अनुग्रह से वह प्रज्ञा प्रकट हुई जिसके सहारे “माधव-निदान” जैसा महान ग्रन्थ लिखकर अपना यश अमर करने और असंख्यों का हितसाधन कर सकने की उपलब्धि उन्हें मिली और जीव का लक्ष्य पूरा कर सकने में सफल हुए।
इस गाथा से इस तथ्य पर प्रकाश पड़ता है कि साधना की सिद्धि में प्रधान बाधा क्या है? संचित दुष्कर्म ही उस मार्ग की सफलता में प्रधान रूप से बाधक होते हैं। यदि उनके निराकरण का उपाय सम्भव हो सके तो अभीष्ट सफलता सहज ही मिलती चली जायगी। प्रायश्चित्त का विधान इसी निमित्त निर्धारित किया गया है। इसकी प्रक्रिया इस प्रकार सम्पन्न होती है। (1) इस जन्म में अब तक बन पड़े पाप कर्मों की सूची बनाना। उसके लिए दुःख मनाना भविष्य में उनकी पुनरावृत्ति न करने की प्रतिज्ञा करना। (2) किसी ऐसी उदात्त और विश्वस्त व्यक्ति के सामने अपने पाप कर्मों का विस्तृत वर्णन करने और प्रायश्चित्त विधान के लिए परामर्श लेना। (3) इस प्रयोजन के लिए शास्त्रानुमोदित व्रत, तप, तितिक्षा मौन, एकान्त सेवन, आदि शारीरिक मानसिक कष्टों का दण्ड उपचार सम्पन्न करना (4) पाप कर्मों द्वारा व्यक्तियों की या समाज की जो हानि की है उनके क्षति पूर्ति के लिए शारीरिक, मानसिक, आर्थिक, अनुदान समाज को सुखी बनाने के लिए प्रस्तुत करना (5)अपने अनाचार से जिन लोगों को कष्ट सहना पड़ा उनसे सच्चे मन से क्षमा याचना करना।
यह पाँचों चरण मिला देने से ही प्रायश्चित का एक समग्र स्वरूप बनता है। इनमें से हलकी बातें पूरी कर लेना और भारी कन्नी काटना इस बात का प्रमाण नहीं है कि अपराधी को अपनी भूल पर वस्तुतः दुःख है और वह उसके निराकरण के लिए वस्तुतः इच्छुक है। चतुरता हर क्षेत्र में बरती जाती है । प्रायश्चित के नाम पर भी यत्किंचित् चिन्ह पूजा करके ऐसे ही बला टाली जा रही हो तो उतने भर से बात कुछ बनने वाली नहीं है। अन्तःकरण में दबे हुए अनौचित्य को उखाड़ने के लिए प्रायश्चित भी वजनदार होना चाहिए।
यहाँ यह नहीं सोचा जाना चाहिए कि पाप तो बहुत भारी किये हैं, उनके बदले में उतना पुण्य तो बन नहीं पड़ेगा। इसलिए थोड़ा करने से क्या लाभ ? तब न करना ही ठीक है। हमें सोचना चाहिए कि जितना चुक सके-उतना चुकाने के लिए तो पूरी ईमानदारी और पूरी शक्ति के साथ प्रयत्न किया ही जाय। यदि वस्तुतः विवशता ही होगी तो परमेश्वर परिस्थितियों को समझते हैं। वे भावना के अनुरूप निर्वाह भी कर सकते हैं। दिवालिये से एक अंश लेकर ही ऋण देने वाले उसका छुटकारा कर देते हैं। बैंकें भी अपनी पूँजी डूबती देखकर कर्जदार से समझौता करती हैं और कम लेकर भी झगड़ा समाप्त कर लेती हैं। साहूकार जब देखते थे कि आसामी के पास कुछ नहीं है तो जितना वह दे सके, लेकर छुटकारा लिख देते थे, ताकि भविष्य के लिए लेन देन फिर से शुरू हो सके। ऐसी व्यवस्था भगवान के यहाँ तथा समाज के विधान में भी है। यदि प्रायश्चित की क्षति पूर्ति के लिए सच्ची व्याकुलता है और ईमानदारी के साथ शक्ति भर प्रयास किया गया है तो उस सद्भावना की यथार्थता को परखते हुए विधि-विधान में भी इतनी लोच-लचक विद्यमान है कि उतने भर से पाप कृत्यों का समाधान हो सके और अन्तःकरण के परिमार्जन का वह लाभ मिल सके जो प्रायश्चित विधान का मूलभूत उद्देश्य है।
देव संस्कृति में पर्व प्रकरणों में श्रावणी पर्व को विशेष रूप से प्रायश्चित पर्व के रूप में मनाया जाता है। विगत एक वर्ष में जो भी कुछ अवाँछनीयताएँ स्वयं से बन पड़ी हों, उनका विधिवत् हेमाद्रि संकल्प के माध्यम से पूरा प्रायश्चित क्रम संपन्न करते हैं। यज्ञोपवीत का नवीनीकरण करने के पूर्व दस स्नान भस्म, मिट्टी गोबर गौमूत्र, गौ दुग्ध, गौ दधि , गौघृत सर्वोषधि कुश तथा मधु स्नान के माध्यम से लोक शिक्षण हेतु संपन्न होते हैं।
भस्म, स्नान का मर्म यह है कि शरीर एक दिन भस्मीभूत होना है। संभावित मृत्यु को हम स्मरण रखें मरणोत्तर जीवन की तैयारी शुभ कर्मों द्वारा करें। मिट्टी जब शरीर पर लगाते हैं तो मातृभूमि के ऋण को स्मरण कर राष्ट्र की सेवा का व्रत लेते हैं। गोबर खाद बनकर उपयोगी बनता है। हम भी इसके स्नान द्वारा शरीर को खाद बनाकर अपना जीवन आराधना प्रधान जियें। गौमूत्र कीटाणु नाशक है। हमारे चिंतन की दुष्प्रवृत्तियाँ इस प्रतीक स्नान द्वारा मिटें, यह भावना की जाती है। दुग्ध स्नान द्वारा जीवन को दुग्ध सा धवल, उज्ज्वल, निर्मल बनाने की तथा दधि स्नान पर अपना जीवन सुनियोजित , नियंत्रित व्यवस्थित बनाने की भावना करते हैं। घृत स्नान से भाव यह है कि जीवन में स्नेह-प्यार-शालीनता का समावेश करेंगे। सर्वोषधि (हरिद्रा) स्नान का अर्थ है। अवाँछनीयताओं , सामाजिक विभूतियों से संघर्ष कुशा स्पर्श करके भाव यह मन में आरोपित किया जाता कि अनीति के प्रति ऐसे ही तीक्ष्ण बने रहेंगे। मधु स्नान का अर्थ समग्र-मिठास सज्जनता, मधुर, भाषण। दसों स्नान वेद मंत्रों के साथ संपन्न किये जाते हैं। मंत्र के साथ जुड़ी प्रेरणाएँ व्यक्ति को नयी स्फूर्ति कर्म चेतना देती हैं। शाँतिकुँज में श्रावणी के अलावा वर्ष भर नौ दिवसीय संजीवनी मंत्रों में भी यह प्रक्रिया संपन्न होती है।
यह प्रक्रिया लोकोत्तर जीवन-कर्मों की गति से जुड़ी जीवन यात्रा में संभावित अवरोधों से जूझकर बंधनमुक्ति का मार्ग प्रशस्त करने वाली है व अपने आप में अद्वितीय है।
एक साधक ने किसी विद्वान से कहा मैंने क्रोध जीत लिया है। सौ गालियाँ सुनकर भी मैं क्रुद्ध नहीं होता। परीक्षा लें लें। और गालियाँ देकर देख लें।
विद्वान ने कहा महोदय आप परीक्षा में उत्तीर्ण हों
वैदिक संस्कृति संज्ञान सूक्तों के माध्यम से सबको सामूहिकता का -संघबद्ध रचनात्मक प्रयासों का संदेश देती आयी है। ऋषि कहते हैं “सं गच्छच्वं सं वदध्वं, सं वो मनाँसि जानताम्। देवाभागं यथा पूर्वे संजानाना उपासते।” अर्थात्-सभी धर्म में निरत व्यक्ति एक साथ रहें एक ही बात बोलें जिनका मन से अर्थ भी एक हो। सभी निज विरोध का त्याग कर वही कर्म करें जो देवों को शोभनीय है। “समानों मन्त्रः समितिः समानी, समानं मनः सह चिन्तमेषाम्” अर्थात्’-” हम सब के मंत्र एक समान हो, अंतःकरण, विचार व आकाँक्षाएँ भी समान हों” इस माध्यम से ऋषिगण एक ही तथ्य पर जोर देते हैं कि श्रेष्ठता की दिशा में प्रयासरत व्यक्तियों के मन, अंतःकरण वृत्तियों तथा बोले गए उच्चारित शुभेच्छा मंत्र भी एक रूप हों तो उसका अति व्यापक प्रभाव अदृश्य जगत पर पड़ता है।
यह भावना कि धर्म प्रधान कृत्यों की संघबद्धता द्वारा विश्व-चेतना तक को प्रभावित किया जा सकता है, आदि काल से ऋषिगणों की रही है। आज का पर्यावरण संकट व सूक्ष्म जगत की घुटन भरी प्रदूषण जन्य दैवी आपदाओं में देव संस्कृति एक महत्वपूर्ण सूत्र अदृश्य जगत के परिशोधन के निमित्त देती है। आदिकाल से ही हमारे पूर्वज ऋषिगणों की मान्यता रही है कि उसका सम्बन्ध प्राण-प्रवाह चलता था जिससे व्यक्तियों की भावना, मान्यता प्रभावित होती थी। इसी कारण उनके गुण,कर्म,स्वभाव में उत्कृष्टता भरी होती थी। चिन्तन,चरित्र और व्यवहार में आदर्शवादिता का समावेश रहता था। मानवी पुरुषार्थ का भी इस में योगदान रहता था, पर इस प्रयोजन को सफल बनाने में अदृश्य वातावरण की भूमिका-अनुकूलता का भी भारी योगदान रहता था। परिस्थितियाँ मनःस्थिति के आधार पर इतने बड़े करवट लेती है कि उसे भाग्य विधान, ईश्वरेच्छा जैसा नाम देना होता है। इसलिये अदृश्य जगत में संव्याप्त वायुमण्डल की तरह ही उसका दूसरा पक्ष वातावरण भी कम महत्वपूर्ण नहीं होता।
इन दिनों बढ़ती विषाक्तता एवं उससे वायुमण्डल तथा वातावरण दोनों के ही प्रभावित होने की चर्चा बड़े विस्तार से समाचार पत्रों पत्रिकाओं में आती रहती है कि इनका गम्भीर पर्यवेक्षण करें तो ज्ञात होता है कि इनका मूल कारण प्रचलन-प्रवाह तक ही नहीं है। इसकी जड़ें अदृश्य वातावरण में बड़ी गहराई तक दृष्टिगोचर होती हैं। दुश्चिन्तन की भरमार से विषाक्त अदृश्य वातावरण और इससे फिर लोक-मानस में असुरता-निकृष्टता का बढ़ना । यह एक ऐसा कुचक्र है जो एक बार चल पड़ने पर फिर टूटने का नाम नहीं लेता । लोक चिन्तन व प्रवाह का अदृश्य वातावरण से अन्योन्याश्रय सम्बन्ध है।
इस कुचक्र को संघबद्ध प्रयासों द्वारा तोड़ना ही होगा। परमात्मा की तरह आत्मा को भी अपना उत्तरदायित्व निभाना होगा। अवतार प्रकरण की सूक्ष्म प्रक्रिया अपने स्थान पर है लेकिन सुधार प्रयोजन का दूसरा पक्ष मनुष्यकृत है जिसे जाग्रत व्यक्ति आपत्ति धर्म की तरह अपनाते और स्रष्टा के प्रयोजन में हाथ बँटाते हैं। उन्हें अध्यात्म उपचारों का आश्रय लेना पड़ता है। विशालकाय सामूहिक धर्मानुष्ठान प्रायः इसी प्रयोजन के लिए किये जाते हैं। लंका विजय में असुरों का संहार तो हुआ पर अदृश्य वातावरण में विषाक्तता भरी होने के कारण लगा कि सामयिक समाधान भर पर्याप्त नहीं, अदृश्य का भी संशोधन होना चाहिए। श्रीराम ने दस अश्वमेधों का नियोजन इसी निमित्त किया। कुरुक्षेत्र में महाभारत विजय के उपरान्त कंस, दुर्योधन, जरासंध से तो पीछा छूटा पर अदृश्य की विषाक्तता यथावत् रहने से स्थायी समाधान न सूझा। अन्ततः अध्यात्म उपचार का आश्रय लिया गया एवं विशालकाय राजसूय यज्ञ की भी ऐसी ही अध्यात्मपरक योजना बनाई गई।
सामूहिक धर्मानुष्ठानों से अदृश्य वातावरण की संशुद्धि के और भी अगणित प्रमाण-उदाहरण इतिहास पुराणों से भरे पड़े हैं। आसुरी सत्ता से भयभीत देवगणों को रक्षा का आश्वासन ऋषि रक्त के संचय से बनी सीता के माध्यम से मिला था। इसी प्रकार देवता जब संयुक्त रूप से प्रजापति के पास पहुँचे एक स्वर से प्रार्थना की तो महाकाली प्रकट हुई जिन्होंने असुरों का संहार किया। संघ शक्ति की ही यह परिणति थी । जिस समय राम-रावण युद्ध हो रहा था, अगणित अयोध्यावासी मौन धर्मानुष्ठान थे ताकि अन्य परास्त हो, नीति की विजय हो। ये सभी उदाहरण सामूहिकता के माध्यम से वातावरण को संशोधित करने के घटनाक्रमों पर लागू होते हैं।
सामूहिकता में असाधारण शक्ति है। दो निर्जीव वस्तुएँ मिलकर एक +एक दो ही बनती हैं जबकि प्राणवानों की एकात्मकता कई गुना हो जाती है। तिनके-तिनके मिलकर रस्सा बँटने, धागों के बुन जाने से कपड़ा बनने, ईंटों से इमारत, बूँदों से समुद्र तथा सींकों से बुहारी बनने के उदाहरण यही बताते हैं कि मिलकर एक हो जाने की परिणति की सम्भावनाएँ दृश्यमान होने लगती हैं। तालबद्ध ढंग से परेड करती फौज ध्वनि-शक्ति द्वारा पुल तोड़ सकती है तथा एक छोटा-सा पेण्डुलम निरन्तर संघात से गार्डर तोड़कर भवन धराशायी कर सकता है। समूहबद्ध ढंग से की गयी प्रार्थना में वह प्रभाव है जो वातावरण के प्रवाह को बदल-उलटकर असम्भव को भी सम्भव बना सकता है। आज जो परिस्थितियाँ उभर सकें, जैसी दिव्यदर्शियों ने अपने भविष्य कथन में व्यक्त की हैं, तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए।
मानव निर्मित वातावरण की जहाँ चर्चा की जा रही है, वहाँ यह भी स्मरण रखना चाहिए कि अवसर आने पर इसकी भूमिका बड़ी विशिष्ट होती है। एक चिंतन एक प्रयास जब आँधी की तरह चलता है, सारे वातावरण को हिलाकर रख देता है। इसका एक उदाहरण ‘युद्धोन्माद’ , “ माँब मेन्टलिटी” के रूप में देखा जा सकता है। ऐसी स्थिति में दिमाग पर मात्र लड़ने का आवेश छाया होता है। हवा में तेजी और गर्मी कुछ ऐसी होती है जिसके कारण सामान्य व्यक्ति भी सम्मोहित होकर, असामान्य पुरुषार्थ करते देखे जाते हैं।
महात्मा गाँधी का सत्याग्रह आन्दोलन, दाण्डी यात्रा मानव निर्मित प्रवाह का एक स्वरूप है। अगणित व्यक्ति स्वेच्छा से जेल गए। मस्ती के इस जुग में अनेकों शहीद हो गए। स्वतन्त्रता इस आँधी प्रवाह की परिणति थी । द्वितीय विश्वयुद्ध के समय विंस्टन चर्चिल ने हाथ की उंगलियों से अँग्रेजी का ‘वी’ (अ) बनाते हुए एक नया नारा दिया था- ”वी फॉर विक्ट्री।” इस नारे ने जनसाधारण का आत्मबल ऐसा बढ़ाया कि अन्ततः जीत नाजीवाद से संघर्ष करने वाली समूह शक्ति की ही हुई।
नियाग्रा जल प्रपात के बारे में अमरीका की जन-जातियों में यह मान्यता संव्याप्त है कि जिस दिन यह झरना बन्द हो गया, प्रलय आ जायगी । योगवश इसी सदी में एक बार हिम ग्लेशियर के नदी के उद्गम स्रोत पर जम जाने से कुछ घण्टों के लिए झरने से पानी गिरना बन्द हो गया। विश्व के सबसे बड़े प्रपात के थम जाने से सारा अमरीकन समुदाय अनायास ही शंकित हो उठा। सारे राष्ट्र में चर्चों में घण्टियाँ बजने लगीं एवं सामूहिक प्रार्थनाएँ की जाने लगीं। कुछ ही घण्टों में वह प्रपात फिर बहने लगा। पर्यावरण विशेषज्ञों का कथन है कि सामान्यतः ऐसा होता नहीं (ग्लेशियर का जमना)। परन्तु होने पर इतना शीघ्र पूरे प्रवाह से नदी का शीत ऋतु में भी बह निकलना अपने आप में अविज्ञात रहस्य है। स्कायलैब के गिरने व सारे विश्व में उसके गिरने से होने वाली क्षति से आशंकित जनसाधारण द्वारा प्रार्थना व उसके समुद्र पर गिरकर नष्ट होने का वर्णन तो अभी-अभी का ही है।
मुस्लिमों की नमाज का एक सुनिश्चित समय होता है। अजान का समय होते ही जो व्यक्ति जहाँ भी है, तुरन्त अपनी उपासना का शुभारम्भ कर देता है। ईसाई रविवार प्रातः एकत्र होते हैं तथा चर्च में सामूहिक प्रार्थना करते हैं। मिलिट्री की ‘रिट्रीट’ जब भी होती है, जो व्यक्ति जहाँ होता है वहीं सावधान मुद्रा में खड़ा हो जाता है। ये सारे उदाहरण एक समय एवं सामूहिकता की शक्ति की ओर ध्यान आकर्षित करने के लिये बताए जा रहे हैं। प्रज्ञा अभियान द्वारा प्रणीत युगसंधि महापुरश्चरण कई विशेषताएँ लिए हुए है। अगणित व्यक्तियों की प्राण ऊर्जा, एक-सा चिन्तन, शब्द शक्ति की अपरिमित क्षमता एक समय-एक साथ जप ध्यान तथा महाप्रज्ञा की प्रेरणा का चिन्तन-इन सभी का प्रज्ञा पुरश्चरण में समावेश है। साधक पाँच मिनट तक सूर्योदय के साथ ही गायत्री मन्त्र का मौन जप करते हैं। अन्तरिक्ष में ही गायत्री मन्त्र का मौन जप करते हैं। अन्तरिक्ष में परिशोध हेतु आहुतियों का यह परोक्ष यज्ञ है। जितना अधिक उच्चारण इस मन्त्र का सृष्टि के आदि से अभी तक हुआ है उतना किसी का नहीं हुआ। शब्द शक्ति ओंकार गुँजन के रूप में समग्र अन्तरिक्ष में संव्याप्त है। ऐसी स्थिति में उच्चारित मन्त्र की शक्ति का प्रभाव द्विगुणीय हो जाता है। समधर्मी कम्पन परस्पर एक दूसरे को प्रभावित करते ही हैं।
शब्द शक्ति सूक्ष्म मानव शरीर तथा परोक्ष अन्तरिक्षीय संसार को प्रभावित करने वाली एक समर्थ ऊर्जा शक्ति है। यह जीभ से नहीं, मन व अन्तःकरण से निकलती है। लोक प्रवाह को निष्कृष्टता से उलटकर उत्कृष्टता की ओर मोड़ने के लिए उच्चस्तरीय शब्द सामर्थ्य चाहिए। साधक स्तर की उत्कृष्ट जीवनचर्या वाले माँत्रिक जब एक साथ पुरश्चरण सम्पादित करते हैं तो ऋषि कल्प महामानवों जैसी वातावरण को आमूलचूल बदल देने की सामर्थ्य विकसित होने लगती है तप-पूत उच्चारण ही मन्त्र जाप है। सदाशयता को संघबद्ध करने और एक दिशा में चल पड़ने की व्यवस्था बनाने के लिए जप का सामूहिक अनुष्ठान स्वरूप ही आदर्श है। श्रुति ने आदेश भी दिया है “सहस्र सा कर्मचत्” अर्थात्-”हे पुरुषों तुम सभी सहस्रों मिलकर देवार्चन करो”। वस्तुतः सामवेद और ऋग्वेद की समस्त ऋचाएँ सामूहिक गान ही तो हैं।
लोहे का लम्बा गार्डर, सीमेन्ट का एक बड़ा पिलर अकेला एक व्यक्ति नहीं उठ पाता। जब कई व्यक्ति मिलकर “हईशा” के निनाद के साथ जोर लगाते हैं तो वे उसे उठाकर खड़ा कर देते हैं। लेकिन जब यही शब्द शक्ति शुभ कामना का चिन्तन लिए एक साथ कई व्यक्तियों द्वारा उच्चारित होती हैं, एक सी तरंगें जन्म लेती हैं और बदले शुभ विचारों की वर्षा ऊपर से करती हैं। “धियो यो नः प्रचोदयात्” “अग्नेनय सुपथा राये अस्मान्” “आनो भद्रा, कृणवो यन्तु विश्वतः” इन सभी मन्त्रों में सारे समूह के लिए श्रेष्ठ विचारों की-सन्मार्ग पर चलने की भारी प्रार्थना की गयी है। एक सी भाव लहरें एक ही चित्त वृति को जन्म देती हैं। ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार एक फ्रीक्वेंसी पर तरंगें उत्पन्न होने पर वे अप्रत्याशित परिवर्तन लाती हैं। अल्ट्रासोनिक तरंगों से रोगों का निदान व चिकित्सा की जाने लगी है। माइक्रोवेव्स से न केवल संपर्क वरन् ऊर्जा उत्पन्न करने में भी सफलता मिली है। गायत्री मन्त्र की विशेषता उसे यह स्तर प्रदान करती है। जिससे वह सामूहिक उच्चारण के माध्यम से अन्तरिक्ष को मथने में समर्थ हो सके । “सिम्पेथेटिक वाइब्रेशन” के सिद्धान्त पर आधारित यह प्रक्रिया “लाइटनिंग (तड़ित विद्युत) जैसी सामर्थ्य रखती है।
वैज्ञानिकों का कथन है कि शब्द शक्ति से इलेक्ट्रोमैग्नेटिक लहरें उत्पन्न होती हैं जो स्नायु प्रवाह पर वाँछित प्रभाव डालकर उनकी सक्रियता ही नहीं बढ़ाती वरन् विकृत चिन्तन को रोकती व मनोविकार मिटाती हैं। एक अन्य निष्कर्ष के अनुसार संसार के पचास व्यक्ति यदि एक साथ एक शब्द का तीन घण्टे तक उच्चारण करें तो उससे छह हजार खरब वॉट विद्युत शक्ति पैदा होगी। सारे विश्व में इससे घण्टों तक प्रकाश किया जा सकता है।
ऋषियों ने शब्द शक्ति की शोध उच्चस्तर पर की थी और उनने पाया था कि सामर्थ्य के इस महान भाण्डागार को लोकहित के लिए बहुत ही उपयुक्त रीति से प्रयोग में लाया जा सकता है। अस्तु उन्होंने इस दिशा में लाखों वर्षों तक अथक श्रम किया और जा उपलब्धियाँ प्राप्त हुईं उनमें मानवजाति का महान हित साधा । आज हम उस महान विज्ञान को भुला बैठे और मणिहीन सर्प की तरह अधःपतित स्थिति में जा पहुँचे। नवजागरण की इस पुण्य बेला में हमें अपने वर्चस्व का मूल स्रोत पुनः खोजना और उपलब्ध करना होगा। वह स्रोत एक ही है-’शब्द’ । शास्त्रकार ने ‘शब्दों वै ब्रह्म’ शब्द को ब्रह्म कहा है।ब्रह्म में परमात्मा में, जो कला , जो विभूति, जो महत्ता विद्यमान हैं वे सभी शब्द शक्ति माध्यम से प्राप्त की जा सकती है। ‘मन्त्र’ शब्द का उच्चस्तरीय उपयोग है। इसका उपयोग यदि हम जान सकें तो निःसन्देह सच्चे ज्ञानी, सच्चे विज्ञानी बन सकते हैं।
गायत्री महामंत्र, समस्त मन्त्र शास्त्र का प्राण, बीज, उद्गम एवं मर्म है। आगम और निगम’-वेद और तन्त्र के अंतर्गत जितने भी ताँत्रिक प्रयोग हैं उन सब को गायत्री बीज शक्ति का पल्लव-परिकर ही मानना चाहिये। मन्त्र विद्या का भाण्डागार है-वेद और उनका उद्भव वेदमाता-विश्वमाता, गायत्री महाशक्ति के द्वारा हुआ है। इस अनुपम, अद्भुत-अनन्त और प्रमेय विभूति का सामूहिक धर्मानुष्ठान के रूप में विज्ञान सम्मत प्रयोग कर हम देव संस्कृति का स्वर्णिम अतीत वापस ला सकते हैं। वैदिक संस्कृति के प्रत्येक निर्धारण के मूल में विज्ञान सम्मत चिंतन है। यदि संघबद्ध आध्यात्मिक पुरुषार्थ इस माध्यम से संपन्न हो सके तो सतयुग की वापसी संभव है, इसमें संदेह नहीं।
आर्ष संस्कृति में शब्द व ताप की सर्वाधिक चर्चा है। चेतना जगत की हलचलें जिस ऊर्जा के माध्यम से गतिशील रहती हैं वह-है “शब्द।” पदार्थ जगत् की क्रियाशीलता के पीछे जिस ऊर्जा का उपयोग होता है वह है-”ताप।” धरती पर जिस स्तर का जीवन विद्यमान है और जिस प्रकार की हलचलें होती रहती हैं उनमें सूर्य ताप की प्रधान भूमिका है। सौर मण्डल के जिन ग्रह-उपग्रहों में सूर्य ताप की जहाँ असन्तुलित स्थिति है वहाँ आग के गोले जैसी या हिम खण्ड जैसी स्थिति बनी हुई है। धरती को जो सौभाग्य मिला है उसमें उसकी निजी संरचना का उतना महत्व नहीं जितना कि सौर ऊर्जा के सन्तुलित अनुदान का। इसलिए सूर्य को इस पदार्थ जगत की आत्मा कहा गया है-” सूर्य आत्मा जगतस्थुषश्च।”
यों पदार्थ जगत की संरचना में अन्य तत्वों का भी सम्मिश्रण है, पर जहाँ तक क्रियाशीलता का सम्बन्ध है वहाँ अग्नि को ही प्रधानता देनी पड़ेगी । ताप और क्रियाशीलता एक प्रकार से पर्यायवाची ही समझे जा सकते हैं। शरीर का तापमान समाप्त होते ही न कोई अंग अवयव काम करता है न उसमें जीवन के चिन्ह ही शेष रह जाते हैं। अन्य जीवधारियों के सम्बन्ध में भी यही बात कही जा सकती है। पदार्थ जगत की सबसे छोटी इकाई परमाणु मानी जाती है। अब उसके अंतर्गत विद्यमान इलेक्ट्रॉन , प्रोटीन आदि की उपस्थिति एवं मध्यवर्ती ‘न्यूक्लियस’ के सम्बन्ध में भी विस्तृत जानकारी प्राप्त कर ली गई है और अणु विस्फोट के माध्यम से प्रचण्ड ऊर्जा उभारने में सफलता प्राप्त कर ली गई है। अणु क्षेत्र से आगे तरंग जगत् है। पदार्थ की मूल प्रकृति अब परमाणु नहीं, तरंग है। तरंगों के कितने ही भेद-उपभेद हैं। इन में से चेतन क्षेत्र में जिस प्रकार शब्द की प्रमुखता है उसी प्रकार पदार्थ क्षेत्र में ताप को मूर्धन्य कहा जा सकता है। कहा जा चुका है कि ताप और हलचल उसी प्रकार आपस में सम्बद्ध हैं जिस प्रकार कि शब्द और चिन्तन परस्पर सम्बद्ध हैं। उसी प्रकार ताप और गति को भी अन्योन्याश्रित माना जा सकता है।
यह यहाँ पर इसलिए कहा गया कि आत्मिकी के प्रयोग प्रयोजनों में जहाँ चेतनात्मक उत्कर्ष के लिए शब्द शक्ति का-गायत्री विद्या का महत्व समझाया जा रहा है उसी प्रकार सूक्ष्म विज्ञान में जहाँ कहीं पदार्थ साधनों का उपयोग करना पड़े वहाँ उसके गति केन्द्र ‘ताप’ का महत्व भी ध्यान में रखा जा सके। शब्द शक्ति गायत्री विद्या के माध्यम से अनेक प्रयोजनों के लिए अनेक प्रकार से प्रयुक्त होती है। इसी प्रकार ताप शक्ति का दिव्य प्रयोजनों के लिए जब भी उपयोग करना पड़े तब उसके लिए क्या करना होगा? इस प्रसंग का पूर्व निर्धारण यही ध्यान में रख कर किया जाना चाहिए कि इसके लिए अग्निहोत्र का माध्यम अपनाना पड़ेगा। जिस प्रकार प्रत्यक्ष प्रयोजनों में आग, बिजली, भाप, तेल आदि माध्यमों से ताप उत्पन्न करके दीपक जलाने, रसोई पकाने से लेकर बिजली घर, मिल कारखाने, यान जैसे अगणित प्रयोजन पूरे किये जाते हैं उसी प्रकार अग्नि-होत्र के माध्यम से ऐसी दिव्य ऊर्जा उत्पन्न की जाती है जो अध्यात्म विज्ञान के आधार पर भौतिक उद्देश्यों के काम आ सके।
अध्यात्मवेत्ता साधना प्रयोजनों में अग्निहोत्र के अनेकानेक प्रयोगों का उपयोग एवं उल्लेख करते रहे हैं। उपासना-उपचार में दीपक, अगरबत्ती धूपबत्ती, अग्निहोत्र आदि के प्रयोग होते हैं। न केवल भारतीय धर्म में वरन् संसार भर के सभी धर्मों में अपने-अपने ढंग से यह प्रक्रिया काम में लाई जाती है। अगरबत्ती धूपबत्ती, लोबान, धूनी जैसे उपचार मन्दिर , गिरजाघर, गुरुद्वारे चैत्य आदि सभी जगह प्रयुक्त होते हैं। पारसी धर्म में तो यह मान्यता और भी अधिक है। उन्हें तो एक प्रकार से ‘अग्नि पूजक’ ही माना जाता है। ‘अग्यारी’ का उस धर्म में देवता जैसा सम्मान है।
भारतीय धर्म संस्कृति के साथ यज्ञ परम्परा अविच्छिन्न रूप से जुड़ी हुई है। जन्म से लेकर मरण पर्यन्त समय-समय पर होने वाले षोडश संस्कारों का विधान है। इन सभी में अग्निहोत्र अनिवार्य है।
विवाह का प्रधान संस्कार परिक्रमा है। यह उस अवसर पर किए जाने वाले यज्ञ की ही होती है। लाश को चिता में जलाने की प्रक्रिया मूलतः अग्निहोत्र का ही जल्दबाजी में किया गया औंधा-सीधा स्वरूप है। अन्यथा यदि उस कृत्य को विधिवत् किया जा सके तो फिर अन्त्येष्टि यज्ञ में ही भूत शरीर का समापन करना पड़ेगा। होली वार्षिक यज्ञ का ही ध्वंसावशेष है। अन्यान्य त्यौहारों में भी अग्निहोत्र आवश्यक है भले ही उसे महिलाएँ चूल्हे से अग्नि निकालकर चिन्ह पूजा के रूप में ही क्यों न करलें। देवी देवताओं में से एक भी ऐसा नहीं जिसकी पूजा प्रक्रिया में अग्निहोत्र का कोई न कोई छोटा-बड़ा रूप अपनाये बिना काम चल जाता हो। यहाँ तक कि भूत-पलीत, जादू-टोना, उच्चाटन- अभिचार में भी किसी न किसी रूप में अग्निहोत्र के रूप में पूर्णाहुति किये बिना सम्पन्न नहीं होती ।
गायत्री और यज्ञ को एक दूसरे का पूरक माना गया है। एक को भारतीय संस्कृति की माता और दूसरे को भारतीय धर्म का पिता कहा गया है। इस प्रतिपादन के आध्यात्मिक, नैतिक, दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक, सामाजिक पक्ष भी हैं और वे सभी विचारणा एवं भावना को उच्चस्तरीय बनाने की दृष्टि से अत्यन्त महत्वपूर्ण भी हैं। इतने पर भी उसका प्रत्यक्ष स्वरूप ‘अग्निहोत्र’ उपयोगिता की दृष्टि से अपनी अतिरिक्त गरिमा विशेष रूप से बनाए रहेगा। गायत्री को प्रज्ञादर्शन कहा जाय तो यज्ञ को उसका सहयोगी वर्चस् कहा जाएगा। इस आध्यात्मिक वर्चस् के अंतर्गत ही शारीरिक तेजस् और मानसिक ओजस् की ऊर्जा भी उभरती है। गायत्री अनुष्ठानों की पूर्णाहुति में ‘अग्निहोत्र’ को अनिवार्य माना गया है। प्रज्ञा को परमार्थ परायण बनाने का संकेत तो इस में है ही, साथ ही यह वैज्ञानिक रहस्य भी समाहित है कि आत्मिक और भौतिक प्रगति के दोनों पक्ष परस्पर गुँथे हुए हैं। एक के बिना दूसरे की न तो साधना बनती है और न प्रतिक्रिया उत्पन्न होती हैं । अतएव ‘शब्द के साथ ताप’ शक्ति का समावेश भी होना चाहिए। अर्थात् गायत्री उपासना में अग्निहोत्र को भी जुड़ा रहना चाहिए। होता भी यही है। अनुष्ठानों की पूर्णाहुति यज्ञ कृत्य के साथ ही सम्पन्न होती है। उन दिनों ज पके समय दीपक, धूपबत्ती जलाए रहते हैं। जहाँ श्रद्धा और सद्भावना है वहाँ अखण्ड अग्नि, अखण्ड धूनी; और अखण्ड दीपक की भी स्थापना रहती है। नित्यकर्म में पंचयज्ञ, बलिवैश्व की परम्परा है, जिनसे बनता है वे उसे निबाहते भी हैं।
अध्यात्म विज्ञान में पंचाग्नि विद्या का विशेष उल्लेख है। कठोपनिषद् के यम नचिकेता संवाद में इसकी सारगर्भित व्याख्या है। श्रोत्रिय अग्निहोत्री पाँच अग्नियों की स्थापना करके उनका विधिवत् यजन करते हैं। प्राण का अपान में यजन करने की रहस्यमय योगसाधना का संकेत गीता में है। जीवन रूपी समिधा को समाज रूपी यज्ञ में होम देने की कई स्तर की प्रेरणाएँ यज्ञ कृत्य के विभिन्न क्रिया-कृत्यों में कितने ही प्रकार से समाविष्ट हैं। ऋग्वेद के प्रथम मन्त्र में यज्ञाग्नि को पुरोहित की संज्ञा दी है और वरण करने वालों को देवत्व की, विभूतियों की रत्नराशि उपलब्ध होने का आश्वासन दिया गया है। अध्यात्मदर्शन और विज्ञान के दोनों ही पक्षों में यज्ञ की जितनी चर्चा हुई है, जितनी व्यवस्था बताई, महिमा गाई गयी है उतना ऊहापोह कदाचित् ही किसी अन्य प्रसंग पर हुआ हो। यजुर्वेद, शतपथ ब्राह्मण तथा सूत्रों-ग्रंथों में यज्ञ चर्चा की ही प्रमुखता है। मीमांसा दर्शन एवं कर्मकाण्ड ग्रन्थों पर दृष्टि डालने से उनमें यज्ञ ही सर्वोपरि महत्व का प्रतिपादन दीखता है। ब्राह्मणत्व की उपलब्धि किस प्रकार हो? जन्मजात रूप से तो सभी अनगढ़ शूद्र होते हैं, फिर मनुष्य शरीर में ब्राह्मण का उदय कैसे हो ? इसी काया में देवत्व का उदय किस प्रकार सम्भव हो? इन सभी प्रश्नों का उत्तर मनुस्मृति में एक ही दिया गया है “महायज्ञैश्च यज्ञैश्च ब्राह्मीयं कृयते तनुः” अर्थात् यज्ञों, महायज्ञों के माध्यम से इसी शरीर को ब्राह्मीय-ब्राह्मण स्तर का बनाया जा सकता है। इसका तात्पर्य यह हुआ कि अग्निहोत्र के माध्यम से उत्पन्न होने वाली ऊर्जा सम्बद्ध व्यक्ति सत्ता का स्तर बदल सकती है। यह एक प्रकार का आध्यात्मिक उपचार हुआ। शरीर के लिए औषधि उपचार , शल्य कर्म आदि का जो महत्व है वही प्रकारान्तर से विचारणा एवं भावना तन्त्रों में सुधार परिष्कार करने के लिए यज्ञ उपचार द्वारा सम्भव हो सकता है।
प्राणाग्नि को कुण्डलिनी के रूप में और योगाग्नि को ब्रह्मतेजस् के रूप में प्रतिपादित किया गया है। एक को भौतिक जगत की अधिष्ठात्री और दूसरी को चेतना परिसर की स्वामिनी कहा गया है। इन दोनों के उत्पादन में जो प्रयोग करने पड़ते हैं उनका स्वरूप यज्ञ स्तर का ही बनता है। सर्वतोन्मुखी ऊर्जा उत्पादन की इस प्रक्रिया के प्रत्यक्ष और परोक्ष, ज्वलनशील और ज्योतिर्मय दोनों ही पक्ष हैं। इतने पर भी उपरोक्त दोनों ही अग्नियों का प्रज्ज्वलन जिस प्रकार होता है उसमें यज्ञ प्रक्रिया किसी न किसी रूप में सम्मिलित ही रहती है। ऐसे-ऐसे अनेकों प्रसंग हैं जिन पर प्रकाश डाला जा सके तो वे तथ्य उभर कर ऊपर आ सकेंगे जिनके आधार पर इस निष्कर्ष पर पहुँचा जा सकेगा कि मनुष्यों के बीच देवात्मा की तरह रहने वाले प्रज्ञा पारंगत ऋषियों ने किन कारणों से ‘यज्ञ’ को आत्मविज्ञान के प्रतिपादन निर्धारण में क्या मूर्धन्य स्थान दिया? आर्ष ग्रन्थों और आप्त वचनों के पीछे कल्पनाओं की मनगढ़न्त उड़ानें नहीं चिरकाल के प्रत्यक्ष अनुभवों का सार निष्कर्ष ही प्रस्तुत करने की परम्परा रही है। ऐसी दशा में यह मानना होगा कि यज्ञ तत्व के सम्बन्ध में जो कहा गया है वह सारगर्भित ही होना चाहिए।
यज्ञ के ज्ञान-पक्ष की तरह उसका विज्ञान पक्ष और भी अधिक सामर्थ्यवान है। एक तरह से यह पक्ष विलुप्त ही हो गया है। जिसकी शोध की जाती है पर प्रत्यक्ष रूप में मन्त्र शक्ति के प्रभाव, विशिष्ट शाकल्यों से आहुति और रहस्यमय विधि-विधान की प्रतिक्रिया सत्प्रयत्नों की परिणति के रूप में देखी जा सकती है। गीता में इस विज्ञान पक्ष का एक संकेत इस प्रकार किया गया है।
स्हयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः। अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽ,स्त्विष्टकामधुक्॥
अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसंभवः। यज्ञाद्भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः॥
अर्थात्-ब्रह्मा ने कल्प के आदि में यज्ञ सहित प्रजा को रचकर कहा कि “इस यज्ञ द्वारा तुम लोग वृद्धि को प्राप्त होओ और यह यज्ञ तुम लोगों की इच्छित कामनाओं को देने वाला हो। सम्पूर्ण प्राणी अन्न से उत्पन्न होते हैं और अन्न की उत्पत्ति वृष्टि से होती है वृष्टि यज्ञ से होती है तथा यह यज्ञ कर्मों से उत्पन्न होता है।”
यज्ञ के ज्ञान और विज्ञान पक्ष के अपने लाभ हैं। यह अवश्य अच्छी तरह समझ लेना चाहिए कि सूक्ष्म जगत के परिशोधन में यज्ञों का असाधारण महत्व है और युगशक्ति के अवतरण में, उसके विस्तार .............. के ज्ञान तथा विज्ञान पक्ष का उपयोग अनिवार्य रूप से किया जाना चाहिए।
इन दिनों यज्ञ विद्या का एक प्रकार से लोप हो गया ही माना जा सकता है। मात्र आग जला देना और उसमें सुगन्धित सामग्री होम देना ही यज्ञ नहीं हो सकता। उसका प्रयोजन वायु को सुगन्धित करना भी नहीं है। यदि ऐसा ही होता तो उसमें मन्त्रोच्चार एवं अत्यन्त सतर्कतापूर्वक बरते जाने वाले विधि-विधानों एवं अनुबन्धों को उसके साथ न जोड़ा गया होता। आग में सभी सुगन्धित द्रव्य एक साथ ही झोंक देने से भी वह कार्य बिना किसी झंझट के अत्यन्त सरलतापूर्वक सम्भव हो सकता था। वस्तुतः ‘यज्ञ’ प्रक्रिया के अंतर्गत उन अनेकानेक संस्कार-उपचारों का समावेश है जो गर्मी, रोशनी भर देने वाली आग को दिव्य प्रयोजनों में काम आ सकने वाली उच्चस्तरीय ऊर्जा के रूप में परिणत कर सकें। यह संस्कार प्रकरण ही यज्ञ का प्राण है। उसे न अपनाया जा सके तो अग्नि समारोह के माध्यम से प्राचीनकाल के राजसूय, अश्वमेध आयोजनों की तरह राजनीतिक न सही सामाजिक कार्यों के लिए समारोह स्तर की आवश्यकता ही पूरी हो सकती है। यज्ञ के साथ जुड़े हुए दिव्य प्रयोजन पूरे नहीं हो सकते। यज्ञाग्नि को दिव्य ऊर्जा में परिणत करने की विधि-व्यवस्था एक प्रकार से विलुप्त ही हो गई। उसी परम्परा व व्यवस्था को संस्कृति पुरुष परम पूज्य गुरुदेव ने आज के युग में पुनर्जीवित किया है। यज्ञ का न केवल शास्त्र सम्मत स्वरूप उनने स्पष्ट सामने रखा अपितु उसकी विज्ञान सम्मत विवेचना भी की। यही कारण है कि लुप्त होती जा रही, अनास्था का कारण बन रही यज्ञीय परम्परा को नवजीवन मिला व आज देव भूमि यज्ञ धूमों से सुवासित होती व मंत्रोच्चार से गुँजायमान दिखाई पड़ती है। यज्ञ परम्परा का पुनर्जीवन ऋषि परम्परा का पुनर्जीवन है एवं देव संस्कृति पुनः अपने मूलभूत रूप में साकार होती, क्रियाशील होती देखी जा सकती है। भारतीय संस्कृति के पिता कहे जाने वाले यज्ञ को नूतन प्राण देकर सिसक रही मानवता का त्राण एक युग ऋषि ने किया है। इन शब्दों में कोई अत्युक्ति नहीं है।
हमारे पूर्वज ऋषिगणों ने गायत्री को देव संस्कृति की माता व यज्ञ को धर्म का पिता कहा है। दोनों का युग्म है। गायत्री अनुष्ठान जो संकल्प बद्ध होकर किया जाता है। उसकी पूर्ति यज्ञ का शताँश पूरा करने पर ही मानी जाती है। परम पूज्य गुरुदेव ने चौबीस लक्ष के चौबीस महापुरश्चरण संपन्न किए तथा उनकी विराट पूर्णाहुति पहले 1956 में 108 कुण्डी यज्ञ में तथा तत्पश्चात् 1958 के 1008 कुण्डी गायत्री महायज्ञ में संपन्न हुई है। गायत्री जहाँ सद्ज्ञान की, सद्बुद्धि की देवी है, वहाँ यज्ञ सत्कर्म का देवता है। परमार्थ प्रयोजन से किया गया सत्कर्म ही यज्ञ है। शतपथ ब्राह्मण के अनुसार “जो व्यष्टिगत एवं समष्टिगत जगत की व्यवस्था बिठाती व सामंजस्य स्थापित करती है, वही गायत्री है।” यज्ञ शब्द यज् धातु से बना है जिसका अर्थ पाणिनि धातु पाठ के अनुसार देव पूजन (व्यक्तित्व में देव शक्तियों का समावेश), संगति करण (संघबद्ध संगठनात्मक आदर्शवादी प्रयास) तथा दान (परमार्थ-परायणता, सदाशयता) के रूप में माना गया है।
भारतीय संस्कृति, वैदिक वाङ्मय में यज्ञ का विवरण इतना अधिक आता है कि ऐसा लगता है कि यज्ञ ही मानों वेदों का आर्ष वाङ्मय का पर्याय है। यज्ञ का व्यापक रूप समझने के लिए उसका मर्म समझना होगा। यज्ञ का दर्शन समझने के बाद यह समझना आसान होगा कि यज्ञ किया क्यों जाता है तथा वह मात्र अग्निहोत्र नहीं है। गीताकार ने तीसरे अध्याय के नौवें श्लोक में कहा है-
यज्ञार्थातकर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः तदर्थ कर्म कौन्तेय मुक्त संगः समाचर॥
अर्थात्-”यज्ञ के निमित्त किये जाने वाले कर्मों के अतिरिक्त दूसरे कर्मों में लगा हुआ यह मनुष्य समुदाय कर्म बंधन में बँधन में बँधता है। अतः हे अर्जुन! तू आसक्ति रहित होकर उस यज्ञ के निमित्त ही भली भाँति कर्तव्य कर्म कर।” इसका मतलब यह हुआ कि मनुष्य के सभी कर्म यज्ञ प्रयोजनों के निमित्त हों अर्थात्- परमार्थ-त्याग के उद्देश्य से किये गये हों। इसके अतिरिक्त सभी कर्म व्यक्ति को बंधन में बाँधते हैं व जन्म जन्मान्तरों तक प्रारब्ध बनकर व्यक्ति को उनका फल भोगना पड़ता है। आगे चलकर श्री कृष्ण यज्ञ का जो स्वरूप बताते हैं, उससे मन में भ्रान्ति हो सकती है कि संभवतः यज्ञ वैदिक धर्मानुष्ठान है। तीसरे अध्याय के दसवें से सोलहवें अध्याय में यही प्रकरण है।
सहयज्ञाः प्रजाः स्रष्टवा पुरोवाच प्रजापतिः । अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽस्त्विष्टकामधुक् ॥
देवान्भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः । परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ॥
इष्टान्भोगान्हि वो देवा दसस्यन्ते यज्ञीविताः । तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुड्क्ते स्तेन एव सः ॥
यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुचयन्ते सर्वकिल्विषैः । भुञजते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात्॥
अन्नाद्भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसंभवः। यज्ञाद्भवतिपर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः॥
कर्म ब्रह्मोद्भवं विद्धि ब्हमाक्षर समुद्भवम्॥ तस्मार्त्सवगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम्॥
एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः। अघायुरिन्द्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति॥
सृष्टि के आदि में प्रजापति ब्रह्मा ने यज्ञ के साथ प्रजा की सृष्टि की और कहा-इस यज्ञ के द्वारा तुम लोग उत्तरोत्तर वृद्धि को प्राप्त करो, यह यज्ञ तुम लोगों को मनोवाँछित फल प्रदान करे। इसके द्वारा तुम लोग देवताओं का संवर्धन करो और देवता तुम लोगों को संवर्धित करें, इस प्रकार पारस्परिक संवर्धन से तुम लोग परम मंगल प्राप्त करोगे। यज्ञ के द्वारा संवर्धित होकर देवता तुम लोगों को अभीष्ट भोग प्रदान करेंगे, इस देवदत्त भोग को प्राप्त करके जो व्यक्ति देवताओं को प्रदान न करके स्वयं भोग करता है वह चोर है। जो लोग यज्ञावशेष अन्न भोजन करते हैं वे सब पापों से मुक्त हो जाते हैं, किन्तु जो लोग केवल अपने लिये रसोई बनाते हैं, वे पापिष्ठ पाप ही भोजन करते हैं। अन्न से शरीर उत्पन्न होता है। मेघों से जल बरसने से अन्न पैदा होता है एवं यज्ञ से मेघ और कर्म से यज्ञ उत्पन्न होता है। कर्म को ब्रह्म से उत्पन्न जानो, ब्रह्म अक्षर से उत्पन्न है, अतएव सर्वव्यापी ब्रह्म, यज्ञ में प्रतिष्ठित है। इस लोक में, इस प्रकार प्रवर्तित चक्र का जो अनुसरण नहीं करता है, हे पार्थ! वह पापमय जीवन बिताने वाला व्यक्ति वृथा जीवित रहता है।’ इन श्लोकों के शब्दों को देखने से तो यही मालूम होता है कि यहाँ पर यज्ञ का अर्थ वेदानुमोदित धर्मानुष्ठान से शायद है। किन्तु बड़ा स्पष्ट हो जाता है चौथे अध्याय में जब श्री कृष्ण अर्जुन को यज्ञ का मर्म समझाते हैं। वे बताते हैं कि यज्ञ की क्रिया, यज्ञ की सामग्री, यज्ञ का कर्त्ता-ग्रहीता, यज्ञ का लक्ष्य और उद्देश्य सब वही एक ब्रह्म है। (गीता 4/24)। वे कहते हैं कि यज्ञ की अग्नि भौतिक अग्नि नहीं है, ब्रह्माग्नि है। संयम ही अग्नि है। शुद्ध इन्द्रिय क्रिया ही अग्नि है। प्राणायाम के द्वारा नियमित प्राण शक्ति ही अग्नि है तथा आत्मज्ञान ही श्रेष्ठ अग्नि है। यज्ञावशिष्ट अन्न अमृत है। इसे प्राप्त करने वाले सनातन ब्रह्म को पाते हैं। यज्ञ ही संसार की नीति है। जो यज्ञ नहीं करता उसके लिये यह लोक नहीं है, परलोक तो दूर की बात है। अतएव ये समस्त यज्ञ और अन्यान्य प्रकार के यज्ञ ब्रह्माग्नि में अर्पित होते हैं (4/32 गीता)।
यज्ञों के भी गीता में भिन्न-भिन्न स्तर बताये गये हैं। द्वव्य यज्ञ सबसे निम्न स्तर का है, ज्ञान यज्ञ सबसे उच्च स्तर का है। उच्चतम ज्ञान में-ब्रह्मज्ञान में ही सारे कर्मों की परिसमाप्ति है।
श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञाज्ज्ञानयज्ञः परंतप । सर्वंकर्माखिलं पार्थ ज्ञाने परिसमाप्यते ॥ 4/33 गीता।
वस्तुतः वासना का आधिपत्य कम कर उच्चस्तरीय शक्तियों को प्रतिष्ठित करके, यज्ञार्थ कर्म करके हम ज्ञान प्राप्त करते हैं और तत्काल ही भगवत्प्राप्ति रूप परम शान्ति व लक्ष्य को प्राप्त कर लेते हैं (ज्ञानं लब्ध्वा पराँ शान्तिमचिरेणाधिगच्छति) यही है यज्ञ का मर्म। सारे कर्मकाण्ड गौण हैं यदि यज्ञ का भावनात्मक पक्ष इस उद्देश्य से ओतप्रोत नहीं है।
गायत्री व यज्ञ एक दूसरे के पूरक हैं। गायत्री से जहाँ देवत्व मिलता है, वहाँ यज्ञ से द्विजत्व मिलता है। (महायज्ञैश्च यज्ञैश्च ब्राह्मी यं क्रियते तनुः)। द्विजत्व अर्थात् नया जन्म -व्यक्तित्व में आमूलचूल परिवर्तन। यज्ञ से व्यक्ति का एक प्रकार से कायाकल्प हो जाता है व यह प्रक्रिया सूक्ष्म चेतन ऊर्जा द्वारा संपन्न होती है।
ऋषियों के अनुसार गायत्री व यज्ञ दोनों सामवेद, ऋग्वेद, यजुर्वेद एवं अथर्ववेद के समन्वित रूप के कारण परस्पर अविच्छिन्न रूप से जुड़े हैं। सामवेद में याज्ञिक कर्मकाण्ड की नहीं, वरन् सूक्ष्मता की महत्ता है। यहाँ स्थूल हवि के स्थान पर भावनात्मक धरातल पर सूक्ष्म शब्द ऊर्जा से अभिपूरित मानसिक हवि का प्रयोग होता है। तैत्तिरीय ब्राह्मण में शास्त्रकारों ने इस सूक्ष्मीकरण की बड़ी महत्वपूर्ण फलश्रुतियाँ बतायी एवं गायत्री यज्ञ की महत्ता का प्रतिपादन इसी वैज्ञानिक रूप में किया है। यज्ञ अपने आप में एक सूक्ष्म स्तर का विज्ञान है। अध्यात्म-सूक्ष्म को-चेतना को, कहते हैं। इसलिए उसका विज्ञान भी चेतनात्मक ही होना चाहिए। जड़ पदार्थ विज्ञान से तो सभी परिचित हैं। भौतिक विज्ञान को आजकल पाँचवीं कक्षा में पढ़ाया जाता है। उसे आवश्यक विषय माना गया है। यदि किसी को अध्यात्म विज्ञान को जानना हो तो उसकी शुरुआत यज्ञ से करनी होगी। यज्ञ में भौतिक विज्ञान के साथ-साथ जड़ का सूक्ष्मीकरण भी सम्मिलित है।
यज्ञ की सूक्ष्म प्रक्रिया का प्रतिपादन
यजुर्वेद की इस ऋचा में देखा जा सकता है-”यजमानः स्वर्ग लोकं याति” अर्थात्-यज्ञ से यजमान (श्रेष्ठ आत्मा) स्वर्ग लोक को (अमरत्व को) प्राप्त होता है। वस्तुतः जीव के शुभाशुभ कर्म एवं गुण, कर्म, स्वभाव का परिष्कार ही आत्मा को फलोपभोग प्रदान करते हैं। अग्नि में यजन किया गया या नहीं, यह स्थल कर्मकाण्ड हुआ या नहीं, इस पर नहीं, अपितु यजनकर्त्ताओं का व्यक्तित्व एवं यज्ञ का प्रयोजन प्रयुक्त साधनों का संस्कारी करण एवं सामूहिकता द्वारा बहुलीकरण की भावना जब तक न हो, यज्ञ को सम्पन्न हुआ नहीं माना जाना चाहिए।
यही बात मन्त्रों के सम्बन्ध में है। मंत्र वही होते हैं जो प्रेस में कर्मचारियों द्वारा किताबों में छापे जाते हैं। उन छपे अक्षरों को कोई भी साक्षर संस्कृत समझने वाला व्यक्ति पढ़ता चला जा सकता है किन्तु यदि सिद्ध मन्त्र बोलना है तो सिद्ध व्यक्तित्व सम्पन्न उद्गाता होना चाहिए। तब ही वह प्रभाव उत्पन्न हो सकेगा, जिसके बारे में शास्त्रों में शाप’-वरदान इत्यादि सन्दर्भों के रूप में वर्णन मिलता है। न केवल उद्गाता वरन् ब्रह्मा, अध्वर्यु आचार्य, उद्गाता की पूरी टीम सामर्थ्य सम्पन्न होनी चाहिए ताकि सूक्ष्मीकृत प्रभावोत्पादकता उत्पन्न हो। शब्द शक्ति के परा, पश्यन्ति, मध्यमा, बैखरी के चार रूप प्रख्यात हैं किन्तु प्रवक्ता के लिये जो दो शर्तें जरूरी है, जिनसे सचमुच वाक् सिद्धि हुई मानी जाती है वे है कायकलेवर की तप संयम से परिष्कृत एवं व्यक्तित्व में निखारने योग्य शब्द ऊर्जा की उपलब्धि।
यज्ञ के सूत्र संचालकों में चार नाम ऊपर बताये गए। (1)ब्रह्मा (2) आर्ध्वयु (3)उद्गाता (4)होता। बड़े आयोजनों में प्रत्येक को अपने तीन-तीन सहायक नियुक्त करने की छूट दी गयी है। ब्रह्मा यज्ञ का प्रधान संरक्षक, अध्यक्ष व अधिष्ठाता है। कहीं कहीं उसे अथर्वा भी कहा गया है। इस श्रेणी के ‘अंगिरस’ नामक कुल के ब्रह्मागणों का कभी विशेष मान था। इनका निजी जीवन भी ब्रह्म-निष्ठ होता है व यज्ञ कृत्य संपूर्ण कराने में ये कुशल कहे जाते हैं। ब्रह्मा के सहायक ब्राह्मणच्चसि, आग्नीध्र, होता कहलाते थे। उद्गाता वे थे जो देवताओं के स्तुति मंत्रों को गाते थे। यज्ञ का प्रधान पुरोहित होता कहलाता था तथा उसके निर्देशानुसार यज्ञ कली क्रियाएँ संपन्न करने वाला अध्वर्यु कहलाता था। ब्रह्मा व उद्गाता प्रजापति के मुख से तथा होता व अध्वर्यु उनकी बाहुओं से उत्पन्न बताये गये हैं। आर्ध्वयु के सहायक प्रतिप्रस्थाता, नेष्टा व उन्नेता तीन थे तो उद्गाता के सहायक प्रस्तोता, प्रतिहर्त्ता व सुब्रह्मण्य। होता के भी तीन सहायक थे प्रशस्ता, अच्छावा ग्रावस्तोता। उद्गाता सामगान का विशेषज्ञ था तो होता ऋग्वेद वेत्ता कहलाता था। वस्तुतः यज्ञ प्रयोजनों में वाक् शक्ति का, मंत्रशक्ति के प्रखर प्रयोक्ताओं का अत्यधिक महत्व है।
यज्ञ में जो अग्नि प्रयुक्त होती है उसमें तथा सामान्य अग्नि में क्या अंतर है, यह भी समझ लेना चाहिए। यज्ञ चेतना जगत के विज्ञान अध्यात्म का एक अंग है। यह विज्ञान अन्यान्य विज्ञानों से वरिष्ठ स्तर का है। अग्नि पूजा यज्ञ का उपचार स्वरूप अवश्य है किन्तु वह यहीं तक सीमित नहीं है। यह अध्यात्म क्षेत्र की, चेतना जगत की, अति प्रभावशाली धुरी है, नाभिक है जिसके सहारे परोक्ष से संपर्क स्थापित किया जा सकता है। श्रुति में विश्व का नाभिक ध्रुव केन्द्र पूछे जाने पर ऋषि जवाब देते हैं “अयं यज्ञो भुवनस्य नाभिः” इस ब्रह्मांड की नाभि ध्रुव केन्द्र जैसी आधार भूत सत्ता यज्ञ में सन्निहित है। इस प्रकार यह सामान्य अग्नि वाली अग्निहोत्र प्रक्रिया भर नहीं है। ऋषियों ने तीन प्रकार की अग्नियाँ बतायी है। पहली पावक वह जो चूल्हा जलाने जैसे लौकिक प्रयोजनों में काम आती है। दूसरी पदमान वह जो मानवीकाया में निवास करती है तथा भोजन पचाने से लेकर गतिशीलता तक के अनेक क्रियाकलापों में काम आती है। तप-संयम से इसी को प्रखर किया जाता है। तीसरी शुचि वह जो अदृश्य जगत को अनुकूल बनाती है, वातावरण को प्रभावित कर विश्व व्यवस्था को ठीक करती है।
संक्षेप में अग्नि के तीन क्षेत्र ऊर्जा प्रखरता एवं विश्व नियामक शक्ति के रूप में जाने जाते हैं। यज्ञाग्नि का स्वरूप ऐसा बनाया जाता है कि उसके द्वारा पवमान और शुचि की भूमिका संपन्न की जा सके। ऋषियों के अनुसार अध्यात्म क्षेत्र की सभी गतिविधियाँ यज्ञतत्व की परिधि में आ जाती हैं जैसा कि श्रीमद्भगवद् गीता में (4/28) उल्लेख है-
द्रव्ययज्ञास्तपोयज्ञा योगयज्ञास्तथापरे । स्वाध्यायज्ञानयज्ञाश्च यतयः संशितव्रताः ॥
यज्ञों के कई प्रकार हैं-द्रव्य यज्ञ (अग्निहोत्र), तप यज्ञ, योगयज्ञ तथा स्वाध्याय रूप ज्ञान यज्ञ।
यज्ञ की अग्नि के प्रसंग में ऋषिगणों ने देवोपम अग्नि के तीन भेद और किए हैं। व्यक्तिगत प्रखरता के लिए आह्वनीय अग्नि की स्थापना, पारिवारिक उत्कृष्टता के लिए गार्हपत्य अग्नि तथा सर्वजनीन सारे विश्व व समाज की प्रगति के लिए दक्षिणाग्नि की स्थापना होती है। ये प्रेरणा प्रतीक हैं जो व्रतशीलता का संदेश देती हैं। मनुस्मृति ने गार्हपत्य को पिता, दक्षिणाग्नि को माता तथा आह्वनीय को आचार्य माना है। यज्ञ में अग्नि प्रज्ज्वलन प्रसंग जहाँ भी आया है, वहाँ यह समझा जाना चाहिए कि प्रत्यक्ष प्रक्रिया के साथ उच्च स्तरीय भावनाओं का समावेश है कि नहीं, यज्ञाग्नि पदार्थ जैसी दीखती भर है किन्तु उसमें उच्चस्तरीय प्राण ऊर्जा का समावेश ही चमत्कारी प्रभाविकता उत्पन्न कर पाता है। यज्ञ प्रसंग देव संस्कृति में जहाँ भी आया है, उसके भावनात्मक पहलू इतने सशक्त है कि उनके ही कारण यह प्रक्रिया हमारे आध्यात्मिक उपचारों का मेरुदण्ड बन गयी है। इसी परिप्रेक्ष्य में इन्हें समझा व हृदयंगम करना चाहिए।
“आपकी उपस्थिति भी यदि प्राणियों को अभय न दे सके तो फिर किसकी शरण में जाय हम, अशिक्षित, उपेक्षित, असहाय प्राणी।” कई ग्रामों के प्रमुख इकट्ठे होकर आए थे। उनमें जो सबको लेकर आये थे, वे प्रार्थना कर रहे थे।
राजधानी से दूर, घोर वन से लगभग घिरे हुए जो थोड़े से गाँव इन वनवासियों के हैं उनमें कुछ गिने चुने लोग पढ़े लिखे भी हैं, क्योंकि कश्मीर के विरक्त विद्वान ब्राह्मणों का परिवार इन ग्रामों में लम्बी अवधि से रहता आया है। उनके संपर्क ने विद्या-व्यसन दिया है।
पता नहीं किसके अपराध से, किस के अपकर्म का परिणाम है कि एक अश्रुतपूर्व उत्पात इन दिनों यहाँ प्रारम्भ हो गया है। वन का एक शेर आततायी बन गया है। किसी न किसी के पाप का ही यह परिणाम है। अन्यथा वन-पशु तो कभी मानव का शत्रु नहीं रहा इस पवित्र प्रदेश में। शेर अब इन जनपदों तक में आने लगा है। वह गोष्ठ से पशु ही नहीं उठा ले जाता-दो-तीन मानवों का भी आखेट कर चुका है।
शासक प्रमत्त नहीं है। समाचार पाकर शासकीय अधिकारी कई बार आ चुके हैं किन्तु शेर बहुत चतुर है। वह या तो मिलता नहीं, अथवा इतना अकल्पित आक्रमण करता है कि आखेटक, कुछ नहीं कर पाता। तीन अभियानों में चार राजकर्मचारी आहत हो चुके और उनमें एक तो मृत्यु का ग्रास बन गया।
‘कोई असुर आ गया है इस वन में।’ लोगों में अनेक प्रकार की बातें फैली हैं-वह प्रेताविष्ट पशु है। उसे कोई मार नहीं सकता।’
जब कोई दूसरा उपाय नहीं दीखा, वनवासी ग्रामों के लोग एकत्र हुए और उन्होंने महासिद्ध की शरण लेने का निश्चय किया। चौरासी सिद्धों में प्रथम सिद्ध सरहपा (श्री नागार्जुन ) इन दिनों कई महीनों से अपनी साधना के लिए समीप के वन में आ गए थे। वनवासियों का समुदाय उनके आश्रम पहुँचा।
“महापुरुषों की उपस्थिति ही सम्पूर्ण आतंकों का शमन कर देती है।” आगतों ने प्रार्थना की-”हम आर्त हैं और हमारे अपने उद्योग असफल हो चुके हैं।”
“अच्छा !” अपनी बड़ी-बड़ी पलकें उन परम प्रज्ञावान त्रिकालदर्शी, अमित शक्ति सम्पन्न महापुरुष ने उठाई
“लगता है कि कन्ह को इसका अनुमान हो गया था। वह आ रहा है।”
दृष्टि जिधर उठी थी लोगों ने उस ओर मुड़कर देखा। दूर वृक्षों के मध्य से निकलती एक आकृति उन्हें दीख पड़ी। कोई आ रहा था-कोई शेर की पीठ पर बैठा चला आ रहा था। आश्चर्य से लोग उधर देखने लगे।
चरवाहे बालक जैसे अपने भैंसे की पीठ पर स्वच्छंद बैठते हैं शेर की नंगी पीठ पर एक ही ओर दोनों पर पैर लटकाए जो अल्हड़, जटाजूट धारी युवक आ रहा था, वह इन ग्रामवासियों के लिए अपरिचित नहीं है। सबका प्रिय, सबका श्रद्धाभाजन किंचित संकोची महासिद्ध सरहपा का प्रिय शिष्य कन्हपा-उसे भला कौन नहीं जानेगा।
“मैं इसे पकड़ लाया हूँ” थोड़ी दूर पर कन्हपा शेर की पीठ पर से कूदे और उन्होंने आकर गुरुदेव के सम्मुख भूमि में मस्तक रखने के पश्चात् दोनों हाथ जोड़कर प्रार्थना की-”जो दण्ड विधान श्री चरण करेंगे, यह स्वीकार कर लेगा।”
शेर अब बैठ गया था। वह जैसे मस्तक झुकाए आया था, अब भी वैसे ही मस्तक झुकाए था। एक बड़े आकार के पालतू कुत्ते जैसा वह शान्त था। “कन्ह इसको अपना वाहन बना चुका।” महासिद्ध ने ग्रामवासियों की ओर देखा “अब यह उत्पात तो करने से रहा। इसे तो साधकत्व प्राप्त हो गया। वन पशु है-अपने स्वभाव दोष से हिंसा की है। आप सब इसे अब क्षमा कर दें, यही उचित होगा।”
दृष्टि फिर शेर पर गयी और वह उठा धीरे-धीरे चलकर समीप आया और महासिद्ध के चरणों पर सिर रखकर बैठ गया।
“महासिद्ध की जय !” आगतों ने उत्साहपूर्वक जयनाद किया। जयनाद के ये स्वर अभी मन्द नहीं पड़ने पाए थे-कि कुछ ही महीनों के बाद-
महासिद्ध की जय!’ कन्हपा की जय।’ जनसमूह उमड़ा पड़ रहा था। लोगों की श्रद्धा का आवेग भी एक नदी पूर है। जब वह उमड़ता है, उस पर अंकुश रखना सरल नहीं होता। राजकर्मचारी बड़ी कठिनाई से भीड़ को नियंत्रित कर रहे थे।
जनता का यह उत्साह श्रद्धा का यह आवेग सर्वथा उचित था। महासिद्ध के प्रिय शिष्य कन्हपा ने उन्हें जीवनदान दिया है। बहुत नीची है कश्मीर घाटी। पर्वतों से घिरी यह एक विशाल झील ही तो थी, जो महर्षि कश्यप की कृपा से जल निकल जाने के कारण आवास भूमि बन गई। यों भी इस घाटी में झीलों, कुण्डों, स्रोतों की बहुलता है, किन्तु जब कभी बड़ी वर्षा होती है-इस पुराण-वर्णित झील में नाग ने जो जल निकलने का मार्ग बनाया वह छोटा रह गया है। इसे वर्षा शीघ्र ही झील का रूप देने लगती है। इस बार तो तीन दिन-रात मेघ खुले ही नहीं थे। लगता था कि घाटी में प्रलय आ गयी है।
महासिद्ध अपने आश्रम में ध्यानस्थ थे। कुशल यही थी कि वे राजधानी के आश्रम में थे। जब जल आश्रम में प्रवेश करने लगा सहसा कन्हपा उठ खड़े हुए। अनेक लोगों का कहना है कि वे शरण लेने आश्रम गए उस समय। वे कहते हैं ‘कन्हपा के मुख की ओर देखना सम्भव नहीं था। लगता था कि सूर्य ही पृथ्वी पर उतर आया है।’
आश्रम से बाहर आकर एक नजर उन्होंने मेघों पर डाली। ‘हूँ’ एक धीमी हुँकार-और मेघ तो वायु के झकोरों में उड़ते ही चले गए। दो क्षणों में तो सुनहली धूप-पूरी घाटी पर चमकने लगी थी।
आकाश खुल गया था, किन्तु धरा तो जैसे प्रलय सागर में डूबती जा रही हो। जल में तैरते डकराते पशु, भवनों की छतों पर टँगे-रोते चिल्लाते शिशु और उनकी माताएँ! फूस के छप्पर, खपरैले-सब पर लोग घर का सामान लेकर चढ़ गए थे-या चढ़ रहे थे। नीचे पानी में कहाँ क्या डूबा है, क्या बह रहा है, कौन गणना करे ?
सुना गया है कि महर्षि अगस्त्य ने कभी समुद्र पी लिया था, किन्तु देखने वाले भी कुछ समझ नहीं सके कि इस बार क्या हुआ। कन्हपा ने अपनी दांहिनी भुजा उठायी और कुछ संकेत किया सम्भवतः उनकी उँगलियों ने कोई मुद्रा बनायी। जल अकस्मात वाष्प बनकर उड़ता तो बादल या कुहरा उठता। इतना जल किसी मार्ग से बह जाता तो उसमें प्रबल प्रवाह उमड़ता और कन्हपा ने उसे पिया हो ऐसा तो प्रतीत नहीं हुआ। हुआ चाहे जो हो, जल बड़ी शीघ्रता से घटने लगा था।
कन्हपा स्थिर शान्त भुजा उठाए आश्रम से बाहर खड़े रहे और जल घटता गया, घटता चला गया। सायंकाल तक केवल भूमि गीली रह गयी थी। छोटे गड्ढों तक के जल को पृथ्वी ने सोख लिया था उस समय तक, जब कन्हपा ने अपनी भुजा नीचे की और आश्रम की ओर मुड़े।
राजकर्मचारी शीघ्र सावधान हो गए थे। समाचार फैला और जनसमूह श्रद्धा के आवेश में उमड़ पड़ा। स्वयं कश्मीर नरेश पधारे महासिद्ध और उनके महामहिम शिष्य की वन्दना करने। इस जय घोष के कोलाहल के कारण महासिद्ध समाधि से उठ गए थे।
“कन्ह”। रात्रि के द्वितीय प्रहर में जब जनता का कोलाहल शान्त हो चुका था और आने वाले लोग लौट चुके थे महासिद्ध ने अपने शिष्य को समीप बुलाया और स्थिर दृष्टि से उसकी ओर देखने लगे। “तुमने कोई अकार्य किया है, ऐसा मैं नहीं कहता, किन्तु साधना का स्वरूप और उसकी सफलता समष्टि के विधानों में परिवर्तन करने की शक्ति प्राप्त करना तथा ऐसे हस्तक्षेप करना नहीं है। तुम भटक गए हो अपने मार्ग से।”
कन्हपा-आज पूरा नगर जिन्हें महासिद्ध की दूसरी मूर्ति मान रहा था-वे मस्तक झुकाए अपराधी के समान खड़े थे। सभी गुरु भाई उनके इर्द-गिर्द खड़े थे। उन्हें समझ में नहीं आ रहा था-गुरुदेव अपने इस सर्व प्रिय शिष्य पर आज इतने निष्करुण क्यों हो गए हैं। कन्ह के किसी कार्य में स्वार्थ और अहं कभी नहीं रहा है उसने जो कुछ किया-लोक दया से प्रेरित होकर किया है।
तब-आज फिर महासिद्ध का यह व्यवहार? कन्ह आत्म ग्लानि से भर उठे। उनका अपराध आंसुओं में बह निकला। “देव ! दया दया !! दया !!” आर्तना करते गुरु सरहपा के चरणों में वे गिरे और बच्चों के समान क्रंदन करने लगे। उन्होंने औरों की ओर देखा तक नहीं था। “वत्स !” सरहपा का आक्रोश उनके इस रुदन में बह गया। उनका स्वर गदगद हो गया। उनके कर अपने प्रिय शिष्य की जटाओं और पीठ पर फिर रहे थे। वात्सल्य से सनी वाणी उमड़ पड़ी-”साधना का तत्व और उसकी सिद्धि ईश्वर से प्रेम है-चमत्कार-सिद्धि प्रदर्शन-उसके विधान में हेर-फेर करने का दुःसाहस-इसमें बाधक तत्व हैं। ईश्वर के प्रति प्रेम करने का अर्थ है लोक के प्रति करुणा से भर जाना और लोक के प्रति करुणावान होने का अर्थ है जन-जन में सद्भावों-सत्चिंतन-सत्कर्म-को उमगा देना। स्वयं में यदि आदर्शों के प्रति प्रेम उमड़ सका लोक हृदय में उनके प्रति श्रद्धा, निष्ठा उमगायी जा सकी तो समझो साधना बन सकी सिद्धि मिल सकी”।
महागुरु के इन स्वरों ने उनके अंतर्मन में सच्ची सिद्धि का स्वरूप प्रकाशित कर दिया। वह लोक-जीवन में आदर्शों की संवेदना सरिता को बहाने चल पड़े।
देव संस्कृति के निर्धारण मात्र आप्तवचन या ऋषि वाक्य ही नहीं हैं। हमारे ऋषि-मुनि उच्चकोटि के वैज्ञानिक थे। पदार्थ विज्ञान से लेकर चेतना जगत के विभिन्न घटकों की गहन शोध उनके द्वारा सम्पन्न होती रही व निष्कर्ष के रूप में उनके प्रतिपादन दर्शन, मनोविज्ञान, चिकित्सा, विज्ञान तथा पदार्थ जगत संबंधी महत्वपूर्ण निर्धारणों के रूप में सामने हैं। परम पूज्य गुरुदेव के बहुआयामीय व्यक्तित्व में एक सर्वाधिक महत्वपूर्ण एवं विलक्षण आयाम उनके वैज्ञानिक रूप का है, देव संस्कृति के हर पक्ष, प्रतीक-कर्मकाण्ड, मंत्रोच्चार-यजन प्रक्रिया, अग्निहोत्र तथा जीवन यज्ञ को उनने सूक्ष्म प्रज्ञा द्वारा गहराई से विज्ञान सम्मत आधार पर विवेचन कर प्रतिपादित किया। परिणाम ब्रह्म-वर्चस् शोध संस्थान की स्थापना के रूप में सामने आया। सन् 1979 की गायत्री जयंती पर विज्ञान व अध्यात्म की समन्वयात्मक शोध हेतु स्थापित यह संस्थान प्रायः चौदह वर्ष पूरे करने जा रहा है। इस अवधि में इसके द्वारा अन्वेषित, प्रतिपादन, अगले दिनों एक नये विज्ञान की विधा को जन्म देंगे, इसका बहुप्रतीक्षित आश्वासन इन पंक्तियों के माध्यम से दिया जा रहा है। चेतना की सत्ता एवं क्षमता, श्रद्धा की महत्ता व व्यावहारिक उपादेयता तथा अध्यात्म उपचारों की वैज्ञानिकता के तीन आधारों पर टिकी इस शोध को अब तक की सब शोधों से अलग प्रकार की एवं विलक्षण माना जाना चाहिए। अतीन्द्रिय क्षमताओं से लेकर परलोकवर्ती जीवन, योग साधनाओं से लेकर स्वप्न आदि के प्रयोगादि के क्रम तो विश्वभर में चले हैं किन्तु उनका आधार प्रत्यक्षवादी विज्ञान होने के कारण वे चेतना की गहराई तक नहीं पहुँच पाए। बस यहीं पर ब्रह्मवर्चस् अपनी अद्भुतता का प्रमाण देता है।
ब्रह्मवर्चस् की शोध में जिस एक पक्ष ने सबका सर्वाधिक ध्यान आकृष्ट किया है, वह है यज्ञ विज्ञान पर किया जा रहा अनुसंधान, जिसे परमपूज्य गुरुदेव ने एक सर्वांगपूर्ण उपचार पद्धति के रूप में यज्ञोपैथी नाम दिया था। मोटी दृष्टि से यह माना जा सकता है कि यज्ञ में बैठने मात्र से व्यक्ति निरोग हो जाता है, वह यज्ञोपैथी है, जब कि ऐसा नहीं है। यज्ञ चिकित्सा एक सर्वांगपूर्ण जीवन पद्धति से जन्मी एक उपचार प्रक्रिया है, जिसे जीवन का अंग बना लेने पर अभूतपूर्व भौतिक एवं आध्यात्मिक लाभ मिलते देखे जाते हैं। यज्ञ विज्ञान को अपने संपूर्ण रूप में समझा जाना चाहिए। आहार संयम से लेकर तप तितिक्षाएँ, ध्यान यज्ञ से लेकर मंत्रोच्चार की विधि-व्यवस्थाएँ वनौषधि यजन की विशिष्टता से लेकर यज्ञ करने कराने वाले का व्यक्तित्व सभी इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। शाँतिकुँज का ब्रह्मवर्चस् इस मायने में विलक्षण है कि यज्ञ प्रक्रिया के सर्वांगपूर्ण पक्षों पर शोध हेतु एक विज्ञान सम्मत विश्व में अकेली यहाँ ही है और कहीं ऐसी अवधारणा विकसित ही नहीं हुई। परम पूज्य गुरुदेव की युग ऋषि के रूप में यह एक सर्वाधिक महत्वपूर्ण देन देव संस्कृति को है। अब इसके व्यावहारिक प्रस्तुतीकरण पर आएँ।
यज्ञोपैथी में अनुसंधान का मूल स्थूल पक्ष है पदार्थ की वह सूक्ष्म सत्ता जो चेतना को प्रभावित करती है। आमतौर से यह समझा जाता है कि वस्तुएँ मात्र सुविधा-साधनों के रूप में प्रयुक्त होती हैं। यह उनका स्थूल उपयोग है, पर जाना यह भी चाहिए कि उनके भीतर सशक्त अदृश्य शक्ति भी हैं जिन्हें भाप, बिजली, रेडियो, दूरदर्शन आदि के रूप में काम करते हुए देखा जाता है। इन्हीं में से एक विशिष्ट क्षेत्र है गैस (वाष्प)। गैस मात्र चूल्हे का काम ही नहीं करती। उस में ऑक्सीजन जैसे प्राण धारक तत्व भी सम्मिलित रहते हैं। सर्वविदित है कि कोई पदार्थ नष्ट नहीं होता। वह ठोस द्रव और वाष्प के रूप में अदलता-बदलता रहता है। वनस्पतियों का आहार और औषधि की तरह तो उपयोग होता ही है। इसके अतिरिक्त उन्हें गैस रूप में परिणत करके शारीरिक स्वास्थ्य, मानसिक संतुलन एवं वातावरण परिशोधन के लिए भी काम में लाया जा सकता है। एक शब्द में इसे अग्निहोत्र प्रक्रिया कह सकते हैं। इतिहास साक्षी है कि इस आधार को अपनाकर अभीष्ट उपलब्धियों के प्राप्त करने के अतिरिक्त कारगर परिवर्तनों, अवतरणों उत्पादनों तक की आवश्यकता पूरी की जाती थी। दशरथ का पुत्रेष्टि यज्ञ, कृष्ण का सर्वमेध यज्ञ, राम का अश्वमेध यज्ञ किन्हीं महाप्रयोजनों की पूर्ति के लिए ही सम्पन्न हुए थे। विश्वामित्र का वह युग-परिवर्तन यज्ञ प्रख्यात है जिसकी सुरक्षा का दायित्व राम-लक्ष्मण ने स्वयं उठाया था।
उस महाविद्या का अब लोप जैसा हो गया है। मात्र कर्मकाण्डों की ही थोथी लकीर पिटती है। ब्रह्मवर्चस् ने उस महान विज्ञान का नये सिरे से शोध कार्य आरम्भ किया है और इस आशा का संचार किया है कि समय की अनेकानेक समस्याओं के निराकरण में भी अग्निहोत्र विज्ञान का प्रयोग किया जा सकता है।
अग्निहोत्र, द्वारा शरीरगत विकारों का शमन, मानसिक उत्कर्ष में योगदान, वातावरण परिशोधन का परोक्ष प्रयोजन जैसे अनेकों उपयोगी एवं महत्वपूर्ण कार्य इस विद्या के माध्यम से किस प्रकार बन पड़ते हैं इसे बहुमूल्य यंत्र-उपकरणों द्वारा यहाँ प्रत्यक्ष स्तर पर प्रस्तुत किया जाता है। पदार्थ की सूक्ष्म शक्ति का चेतना क्षेत्र में किस प्रकार प्रयोग किया जा सकता है और उससे क्या लाभ उठाया जा सकता है यह इस शोध धारा का उद्देश्य है।
अग्निहोत्र तब तक पूरा नहीं है, जब तक कि स्वर विज्ञान, मंत्र विज्ञान का उसमें समावेश नहीं है। उच्चारित मंत्रों की ध्वनि अग्नि की ज्वाला रूपी ऊर्जा समुच्चय से टकराकर वातावरण में कई गुना विस्तरित हो जाती है व तब पदार्थ की कारण शक्ति का जागरण होता है। शब्द शक्ति की प्रचण्डता को शास्त्रों में शब्द-ब्रह्म, नाद-ब्रह्म आदि नामों से इंगित किया गया है। शब्द’-बेधी बाणों की चर्चा रही है। स्वर शास्त्र इसी की एक शाखा है। सामगान से लेकर मंत्रोच्चार की विभिन्न शैलियाँ इसी के अंतर्गत आती हैं। मंत्र शक्ति की महिमा का बखान अध्यात्म तत्व ज्ञान में सुविस्तृत रूप में विवेचित है, विशेषतः यज्ञ विज्ञान के परिप्रेक्ष्य में।
शब्द आमतौर से जानकारियों के आदान-प्रदान में प्रयुक्त होता है। उसके द्वारा किसी को प्रसन्न रुष्ट भी किया जा सकता है। संगीत की मोहकता-मादकता अपने स्तर की है। मेघ-मल्हार दीपक राग आदि में उसका चमत्कार देखा गया है। यह इस सम्बन्ध में जाना गया सामान्य ज्ञान है। बीन की ध्वनि पर साँप लहराते देखे गये हैं। संगीत-प्रयोग से जीव-जंतुओं की प्रजनन शक्ति बढ़ाई गई है। दुधारू पशुओं ने अधिक दूध दिया है। पेड़ पौधे तेजी के साथ बढ़े हैं। स्नायविक और मानसिक रोगों के निवारण में संगीत का प्रयोग बहुत सफल हुआ है। वेद मंत्रों को जब शक्ति रूप में प्रयुक्त किया जाता है तो वे सामगान के रूप में सस्वर गाये जाते हैं। गायन का उद्गाता यजमान और श्रवण करने वालों पर दिव्य चेतना की वर्षा करता है जप, कीर्तन भजन आदि में स्वर शक्ति के माध्यम से ही विशिष्ट लाभ मिलता है। ताँत्रिक व वैदिक मंत्रों की अपनी-अपनी प्रयोजनानुसार विशिष्ट महत्ता है।
ताल-लय की रिद्म अपना प्रभाव अलग ही छोड़ती है। पुलों पर से गुजरते हुए सैनिक को कदम मिला कर चलने की मनाही कर दी जाती है, क्योंकि उस सामूहिक ताल की शक्ति से वह पुल टूट कर गिर भी सकता है। यह शब्द शक्ति का असाधारण प्रभाव है। धमाके की आवाज से हृदय की धड़कन बन्द हो सकती है। गर्भपात हो जाना सम्भव है। युद्ध के बिगुल बजने पर सैनिकों में जोश भर जाता है तथा शंख की ध्वनि से उस क्षेत्र के विषाणुओं का तेजी से विनाश होते देखा गया है। वस्तुतः शब्द भी बिजली, भाप-ऊर्जा स्तर की एक समर्थ शक्ति है। इसका किस प्रयोजन के लिए किस प्रकार क्या उपयोग किया जाय जिससे व्यक्तित्व के विकास और वातावरण के परिशोधन में अभीष्ट लाभ मिल सके तथा वाष्प ऊर्जा व शब्द ऊर्जा का समन्वित प्रभाव डालकर व्यक्ति को कैसे स्वस्थ-समर्थ बनाया जाय यह यज्ञोपैथी में आता है।
अग्निहोत्र के माध्यम से सूक्ष्मीकृत औषधि को प्रविष्ट कराने की प्रक्रिया को एक प्रकार से जीवनी शक्ति का अभिवर्धन भी कह सकते हैं। इस आधार पर उस मूल कारण की समाप्ति होती है, जिससे भीतरी बाहरी अंगों में शिथिलता छाई रहती है। आलस्य, भय, घबराहट धड़कन, अपच जैसे रोगों में अग्निहोत्र में सम्मिलित होना दूर दृष्टि से लाभदायक होता है। बल वर्धक औषधियाँ कई लोग सेवन करते हैं, पर उसमें एक कठिनाई रहती है,गरिष्ठता की बहुलता की। वे आसानी से पचती नहीं। पाचन न होने पर सामान्य अन्य सेवन को भी अपच में बदल देती है। आयुर्वेद में कितने ही पौष्टिक पाकों, अवलेहों, चूर्णों, गुटिकाओं का वर्णन है। उनमें प्रयुक्त होने वाली सभी औषधियाँ बलवर्धक होती हैं पर साथ ही गरिष्ठ भी। गरिष्ठता के कारण उनका पाचन ठीक तरह नहीं हो पाता। फलतः वह लाभ नहीं मिलता जो मिलना चाहिए।
अग्निहोत्र इस कठिनाई को दूर करता है। उसमें पाचन का प्रश्न ही नहीं। सूक्ष्मीभूत होकर जो साँस के माध्यम से रक्त में दौड़ जाय, जीव कोशाओं को प्रभावित करे उसकी गुणवत्ता असंदिग्ध है। वह युवकों की तरह बाल, वृद्ध, नर, नारी सभी का समान रूप से पोषण करता है।
अग्निहोत्र चिकित्सा में विभिन्न रोगों के लिए विभिन्न औषधियों का उपचार भी है। अच्छाई यह है कि उन्हें न मुँह से खाना और न पेट से पचाना पड़ता है। इंजेक्शन की तरह सुई चुभो कर रक्त में सम्मिश्रित करना पड़ता नहीं वरन् अति सरलता का एक ऐसा मार्ग मिल जाता है जिसमें रोगी को पता भी नहीं चलता और औषधि वायुभूत होकर शरीर में प्रवेश कर जाती है। अपना कारगर काम करती और असीमित प्रभाव उत्पन्न करती है।
भारतीय धर्मसंस्कृति में प्रत्येक घरेलू संस्कार और सामूहिक पर्व त्यौहार के अवसर पर अग्निहोत्र करने का निर्देशन दिया गया है। इसके तीन प्रयोजन हैं। एक तो यह कि किसी या किन्हीं के द्वारा किये गये प्रयास का उपस्थित सभी लोग लाभ उठायें। दूसरा यह है उसकी चर्च जहाँ तक पहुँचे वहाँ तक इस विज्ञान की उपयोगिता तथा जानकारी बढ़े। इसे सीमित को असीम बनाना भी कह सकते हैं। तीसरा यह कि प्रत्येक संस्कार पर्व में शरीर मन व आत्मसत्ता को प्रभावित करने वाले जीन्स तक पर प्रभाव डालने वाले वैज्ञानिक प्रयोग संपन्न हों।
सामान्यतः अग्निहोत्र शारीरिक और मानसिक आधि-व्याधियों को निवारक-निरोधक है। वह इन दोनों ही क्षेत्रों की क्षमता में अभिवृद्धि करता है फलतः आरोग्य और मानसिक बल बढ़ने का उभयपक्षीय सुयोग बनता है। इसे घरेलू उपचार भी कह सकते हैं। साथ ही रोग निवारक बलवर्धक सामयिक सूत्र भी। इतने कम खर्चे में इतने अधिक लोगों को लाभ पहुँचाने की दूसरी और कोई विधा बन पड़नी सम्भव नहीं।
अग्निहोत्र एक विज्ञान है उसमें अग्नि को विशेष साधनों से विशिष्ट विधिपूर्वक इस तरह प्रज्ज्वलित किया जाता है जिसमें वह मात्र चूल्हा जलाने की अग्नि न रहे। ऐसी विशिष्टता बने जो आरोग्य समस्या के समस्त पक्षों पर अपना चमत्कारी प्रभाव दिखा सके। इसलिए इसका लाभ देखने वालों को पन्सारी की दुकान से कूड़ा करकट खरीद कर उसे आग में देने वाली उतावली मात्र से किसी बड़े लाभ की आशा न करनी चाहिए। वरन् प्रयुक्त होने वाली वस्तुओं की उत्कृष्टता का समुचित ध्यान रखना चाहिए। यह कार्य जिस-तिस के हाथों न सौंप कर ऐसे लोगों द्वारा सम्पन्न किया जाना चाहिए जो तद्विषयक श्रद्धा और सतर्कता को भली प्रकार अपनाये रह सकें। इसमें उस कुशल चिकित्सक की दक्षता होनी चाहिए जो रस, भस्में रसायनें बनाने वालों द्वारा बरती जाती है। मोटे रूप में यह समझा जा सकता है कि अग्निहोत्र एक समग्र चिकित्सा विधान है जिसमें शारीरिक मानसिक सामूहिक रोगों का निराकरण और शक्तिमत्ता का अभिवर्धन हो सकता है। अग्निहोत्र के साथ-साथ स्वच्छता का बहुमुखी प्रयोजन जुड़ा हुआ है।
यज्ञ इससे आगे की बात है। उसकी अन्तःकरण और अंतर्मन तक सुपरमन तक, पहुँच है। वह व्यक्ति की विचारणा, आकाँक्षा, भावना श्रद्धा, निष्ठा, प्रज्ञा, को प्रभावित करता है उनका परिशोधन और अभिवर्धन भी यज्ञ के संबंध में उसकी “महायज्ञ” अवधारणा का विवेचन किया जा चुका है। यज्ञ वस्तुतः “डीप इकॉलाजी” की एक महत्वपूर्ण विधा मानी जा सकती है जिसमें मनःसत्ता से लेकर संपूर्ण व्यक्तित्व के विभिन्न घटकों को इस माध्यम से अनुप्राणित-प्रभावित किया जाता है कि व्यष्टिसत्ता व समष्टि सत्ता में तादात्म्य स्थापित हो सके। साथ ही व्यक्तित्व के परिष्कार, ग्रन्थियों के अनावरण व गहराई तक प्रवेश करने वाली आध्यात्मिक मनश्चिकित्सा का प्रभाव ऐसा कुछ पड़ सके कि आत्मबल संपन्न व्यक्ति तैयार किये जा सकें।
यज्ञोपैथी पर चल रही वैज्ञानिक शोध इस संबंध में ब्रह्मवर्चस् का एक अभिनव निर्धारण है कि इस संदर्भ में पहले कभी इस स्तर का चिंतन किया ही नहीं गया। मोटी दृष्टि से यज्ञ की भौतिकीय व रसायन विश्लेषण वाला पक्ष यहाँ आने वालों को प्रधान दिखाई देता है। शोध प्रयोगशाला में गैस, लिक्विड क्रोमोटोग्राफी से लेकर थिनलेयर क्रोमोटोग्राफी, ऊँची ऑप्टिकल क्षमता वाले स्टीरियो माइक्रोस्कोप से लेकर यज्ञ-धूम का शरीर, मन, वातावरण, जीवाणु पर प्रभाव दर्शाने वाले अनेक उपकरण हैं। किन्तु इनका उपयोग सीमित ही है। ये केवल यह बता पाते हैं कि यज्ञ का अवलम्बन लेने वाले की पूर्व में क्या स्थिति थी व बाद में क्या परिवर्तन हुए ? विश्लेषण इसी आधार पर किया जा सकना संभव है किन्तु यही समग्र नहीं है। अग्निहोत्र व यज्ञ करने से, यज्ञीय जीवन को व्यवहार में उतारने से क्या व्यक्तित्व का कायाकल्प संभव है। व्यक्ति के चिंतन आकाँक्षाओं एवं आस्थाओं में परिवर्तन लाना संभव है, यही शोध संस्थान का यज्ञोपैथी के माध्यम से लक्ष्य है। निश्चित ही भारतीय संस्कृति की यह महत्वपूर्ण स्थापना जो स्वयं एक विज्ञान है, प्रत्यक्षवाद की कसौटी पर भी प्रतिपादित की जा सकती है, चह इस केन्द्र ने प्रमाणित कर दिखाया है।
विगत दिनों पनपे बुद्धिवाद-ने इसकी उपादेयता-प्रामाणिकता पर प्रश्न चिन्ह लगा दिया है? आधुनिक युग में प्रामाणिकता की कसौटी विज्ञान की सीमा में सिकुड़ गई है। वही चीज स्वीकार्य है जिसे विज्ञान स्वीकारे जो विज्ञान सम्मत हो। इस जटिल समस्या के हल न हो पाने की वजह से मनुष्य को इस अलौकिक संस्कृति की विभूतियों से वंचित रहना पड़ा। समाज को इसके परिणाम-मूल्यनिष्ठता के अभाव, आदर्शवादिता की समाप्ति के रूप में भुगतने पड़े। परम पूज्य गुरुदेव, ने चिरकाल से अनुत्तरित इस समस्या का समाधान ‘ब्रह्मवर्चस् शोध-संस्थान के रूप में प्रस्तुत किया। प्राचीनता के ढहने-ढहाने के युग में उन्होंने बलपूर्वक यह कहने का साहस किया-ऋषि संस्कृति के तत्व-अध्यात्म विद्या का ढाँचा आज भी उपादेय प्रामाणिक और वैज्ञानिक है। चिरकाल तक इसके द्वारा मानवीय जीवन की समस्याएँ हल होती रहेंगी।
यहाँ हो रही शोध के बारे में परिजनों, बुद्धिजीवियों-जिज्ञासुओं की उत्सुकता सहज है। दीर्घकाल तक जो तत्व प्रक्रियाएँ, श्रद्धा और विश्वास बनकर माने अपनाए जाते रहे आज तर्क और प्रयोग की वैज्ञानिक कसौटी पर किस तरह खरे उतर रहे हैं? भारत ही नहीं समूचा विश्व इसे जानने की ललक सँजोए है। कई जगहों पर इस तरह के मिलते-जुलते छुट-पुट प्रयोग भी हुए लेकिन यहाँ की शोध प्रक्रिया अपनी समग्रता के कारण इन सबसे पर्याप्त भिन्न है।
अध्यात्म और विज्ञान के संदर्भ में अभी तक सभ्य समाज ने जो कुछ किया अथवा कर रहा है उसे बचकाना ही कहेंगे, क्योंकि उपनिषद् वेद अथवा अन्यान्य धार्मिक समझे जाने वाले किसी ग्रन्थ में प्रतिपादित सत्य की साम्यता, आधुनिक विज्ञान की किसी शाखा अथवा उपशाखा के किसी निष्कर्ष से मिला देना ही कर्तव्य की इति श्री मानी जाती रही है। इस प्रयास को संक्षेप में बताया जाय-तो आध्यात्म इसलिए वैज्ञानिक है, क्योंकि भौतिक शास्त्र अथवा रसायन शास्त्र की कोई शोध उसे प्रमाणित करती है।
पर यहाँ ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि न्यूटन के किसी नियम को इसलिए वैज्ञानिक नहीं माना जाता, क्योंकि रसायन शास्त्र के बायल अथवा चार्ल्स के नियम उसे प्रमाणित करते हैं। फ्रिटजोफ काप्रा के “ताओ आव फिजिक्स” गैरी जुकाव के “डान्सिंग वूली मार्स्टस” आदि ग्रन्थों में कुछ उपरोक्त स्तर जैसे प्रयास ही दिखाई देते हैं। जब कि सत्य और तथ्य यही है कि विज्ञान अध्ययन की एक प्रणाली है। इसे अपनाकर किया गया कोई भी अध्ययन पूर्णतया वैज्ञानिक होगा। इस संदर्भ में किए गए, प्रयासों का एक अन्य प्रकार भी है। जिसे कुछ योग अनुसंधान केन्द्रों ने अपनाया है। वह यह कि प्राणायाम आसन अथवा ध्यान से शरीर के रोगों का निवारण-निराकरण कैसे होता है? ये प्रयास और प्रक्रियाएँ असंदिग्ध रूप से वैज्ञानिक हैं। लेकिन यदि योग की विभिन्न प्रक्रियाओं की सीमा शारीरिक व्याधियों के उपचार तक ही मान ली जाय तो चिकित्सा की वर्तमान प्रणालियाँ ही क्या कम हैं?
निश्चित रूप से ये सभी प्रयास अपनी सीमाओं में एकाँगी व अपूर्ण हैं प्रश्न नए विज्ञान के विकास का है। इसके लिए जरूरी है पहले अध्ययन की विषय वस्तु को देखें। पूज्य गुरुदेव ने प्राचीन ऋषियों द्वारा अन्वेषित सूत्रों के वैज्ञानिक अध्ययन की रूप-रेखा तैयार की है। इन सूत्रों को यदि धर्म के एक शब्द में समेट लें तो अतिशयोक्ति न होगी। इस तत्व की शोध करने वालों को इसकी आवश्यकता क्यों प्रतीत हुई? एक मात्र उत्तर होगा -मानव में एक नयी चेतना के जन्म व विकास के लिए।
धर्म और उसकी प्रणालियाँ कहीं भी क्यों न विकसित हुई हों उनका केन्द्र मनुष्य रहा है। जो कुछ इतर व सम्बन्धित विवरण है उनके सारे धागे यहीं जुड़ते हैं। दूसरे शब्दों में इसे मानव प्रकृति के विशद अध्ययन व रूपांतरण की प्रणाली कह सकते हैं। जिस तरह से शरीर शास्त्रियों को पता है कि शरीर की प्रकृति को जाने बिना विकृति का ज्ञान प्राप्त नहीं किया जा सकता। ठीक यही बात समूचे मानव के बारे में है। तो यहाँ की शोध की विषय वस्तु-मानव प्रकृति का अध्ययन है। अर्थात् शरीर नहीं, प्राण नहीं, मन नहीं, समूचे मानव का अध्ययन है। शोध के इस स्वरूप का उद्देश्य है मानव में एक नयी चेतना का जन्म और विकास।
इस क्रम में धर्म के .त्रिविध अंगों के अनुरूप अध्ययन क्षेत्र का विस्तार भी तीन भागों में बँट जाता है। प्रथम नीतिशास्त्र देश-काल की मर्यादा व स्थिति के अनुरूप इसका स्वरूप विभिन्न स्थानों में अलग-अलग मिलता है। पर उद्देश्य की दृष्टि से देखें तो वह है व्यवहार में अधिक से अधिक सामंजस्य की स्थापना। सूक्ष्म दृष्टि इसमें मानव के आत्म विकास की ओर मुड़ चलने की प्रवृत्ति के जागरण को खोज सकती है। यों इस पक्ष का यत्किंचित् स्पर्श मनोविज्ञान की नवीन शाखा विहैवियरल साइन्सेज में मिलता है। एरिक फ्राम जैसे मनोविद अपने ग्रन्थ “मैन फॉर हिम सैल्फ” में स्वीकारने लगे हैं कि अच्छा व्यवहार औरों पर उपकार नहीं लेकिन ब्रह्मवर्चस् में इस संदर्भ में जो शोध प्रयास हो रहे हैं, उनमें कुछ और गम्भीर उद्देश्य निहित हैं। इसके अंतर्गत संस्कृति की प्रथाओं-परम्पराओं-प्रचलनों-नीतियों का नये सिरे से अध्ययन किया जा रहा है। यहाँ के शोधार्थी अपने-देश व्यापी विश्वव्यापी सर्वेक्षण में इस बात को गहराई से जानने की कोशिश में लगे हैं वर्तमान के और भविष्य के मनुष्यों को किन-किन नीतियों की जरूरत है और होगी। प्राचीन परम्पराएँ ऋषियों के गौरवपूर्ण उद्देश्य को पूरा कर सकें इसके लिए उनमें किस संशोधन अथवा परिवर्धन की आवश्यकता है। इनके मनुष्य के व्यक्तित्व और समाज पर क्या प्रभाव हैं? इस समाज के मनोवैज्ञानिक प्रयोगों, शोध निष्कर्षों के अनुसार धर्मतन्त्र से लोक शिक्षण का नया सरंजाम जुटाया जा रहा है। जो मानव शक्तियों के क्षरण को रोके उसे एकत्रित करके सही दिशा में सुनियोजित करे।
इसका दूसरा तत्व है तत्व मीमाँसा। आचरण एवं व्यवहार की उत्कृष्टता तब तक सम्भव नहीं जब तक उच्च जीवन के प्रति अभीप्सा न जगे, औरों के प्रति अपनत्व बोध न हो। इसके बिना संवेदना का अंकुरण संभव नहीं और संवेदना के अंकुरण के बिना अच्छे जीवन और समाज की कल्पना बेकार होगी। अतएव इसके अंतर्गत मानव + प्रकृति + ईश्वर के पारस्परिक सम्बन्धों को स्पष्ट करने वाले प्रयोग सम्पन्न हो रहे हैं। इन सम्बन्धों को भुला बैठने के कारण ही मनुष्य स्वार्थी, निष्ठुर, और विलासप्रिय बन गया है। आज का विज्ञान और वैज्ञानिक मनुष्य की इन्हीं दूषित प्रवृत्तियों को बढ़ावा देने के साधन जुटाते जा रहे हैं। प्रकृति से अपने सम्बन्धों को भुला बैठने की दुर्बलता ही प्रदूषण, महामारी, शारीरिक, मानसिक व्याधियों, अकाल, भूकम्प आदि आपत्तियों-विपत्तियों के रूप में प्रकट हो रही हैं। इस संदर्भ में यहाँ जो गम्भीर प्रयोग सम्पन्न हो रहे हैं उनके निष्कर्ष निकट भविष्य में आधुनिक विज्ञान को मूल्यनिष्ठता का शिक्षण मार्गदर्शन देने में समर्थ होंगे। मनुष्य को उसकी विस्मृत संवेदना फिर से याद आ सकेगी। प्रत्येक विचारशील को ऐसा विश्वास रखना चाहिए।
आधुनिक विज्ञान आज इस सत्य को भुला बैठा है कि जीवन का एक पक्ष अन्य दूसरे पक्षों से अभिन्नतापूर्वक जुड़ा है। अतएव किसी एक पक्ष की विवेचना सम्पूर्ण व्यवस्था के एक अंग के रूप में ही कर सकते हैं। उसे समग्र मान बैठना गहरी भ्रान्ति के सिवा क्या है? वैदिक युगीन जीवन में भौतिक विज्ञान का महत्व पूर्ण तो था, किन्तु मूल्य निरपेक्ष नहीं। इसी कारण इसे धर्म की व्यापक परिधि के अंतर्गत रहना पड़ता था। इसी वजह से विज्ञान की गतिविधियों का, मूल्याँकन अच्छा जीवन, अच्छा समाज, अच्छी व्यवस्था, आदि आधारों पर किया जाता था। जहाँ आज इसका स्वरूप, प्रकृति के तत्वों का विश्लेषण और प्रकृति पर विजय हो गया है। वहीं पहले विज्ञान प्रकृति की शक्तियों से सामंजस्य और उनके सदुपयोग की प्रणाली थी। जीवन मूल्यों में सम्बन्ध विच्छेद करने के कारण ही वर्तमान की वैज्ञानिक उपलब्धियाँ जीवन में लालच, ईर्ष्या, जोड़-तोड़ व विघटन उभारने वाली सिद्ध हो रही हैं।
इस असामंजस्य पूर्ण स्थिति से बचने के लिए वैदिक संस्कृति का ताना-बाना बुनने वालों ने समस्त विधाओं को आस्तिकता के सूत्र में पिरोया था। इसी से आग्रह करते हुए अरस्तू ने कहा था कि विज्ञान और तकनीक को यदि जीवन मूल्यों से मुक्त किया गया तो परिणाम खतरनाक होंगे। स्थिति स्पष्ट है। इससे उबरने इसे सँवारने का काम मानव-मानव मानव ईश्वर, मानव प्रकृति और ईश्वर के अंतर्संबंधों के बारे में जागरुक होकर ही सम्भव है। इस संदर्भ में सम्पन्न हो रहा ब्रह्मवर्चस् का शोध अध्ययन यदि इक्कीसवीं सदी के विज्ञान को आस्तिक बना डाले तो किसी को आश्चर्य नहीं करना चाहिए।
शोध का तीसरा पक्ष अध्यात्म है। इसे समूची शोध प्रक्रिया का केन्द्र माना जाना चाहिए। सही कहा जाय तो वर्तमान मनुष्य ‘मेन्टल एनीमल’ है। उसमें समुचित बदलाव लाए बिना उसके द्वारा हो सकने की कल्पना बेकार है। जिसको हम अच्छा होना अच्छा करना कहते हैं उसकी चरम परिणति क्या है? स्थिति प्रज्ञता। दूसरे शब्दों में मानव की प्रत्येक हलचल से ब्रह्मतत्त्व चेतना झरने लगे। सर्वसामान्य के मन में सवाल उठता है कि परमात्मा ने सृष्टि की रचना क्यों की? यदि अध्यात्म का उद्देश्य यहाँ से छुट्टी लेकर हमेशा के लिए भाग जाना है तो फिर इस विश्व को रचने की जरूरत क्यों पड़ी?
सच कहा जाय तो अध्यात्म को उद्देश्य भागना नहीं और न मरने के बाद कुछ पाना है। यदि मरने के बाद कुछ मिलता भी होगा तो वह निश्चित रूप से अध्यात्म नहीं। आध्यात्म इसी जीवन में भागवत सौंदर्य की स्थापना है। अपने इसी उद्देश्य को लेकर अध्यात्म में ऐसी तकनीकें खोजी हैं ऐसी नयी-नयी प्रणालियाँ आविष्कृत की है जो मनुष्य में इस उद्देश्य को साकार कर सकें।
यों ये प्रणालियाँ चिरन्तन काल से अपनाई जाती रही हैं। मनुष्य ने इसके आनुपातिक क्रम में लाभ भी उठाए हैं। परन्तु आज श्रद्धातत्व के अभाव और बुद्धि के अतिरेक के कारण इनके नए सिरे से अध्ययन की आवश्यकता है। इनमें से प्रत्येक तकनीक का हमारे व्यक्तित्व पर क्या और कैसे प्रभाव है? जिसे हम व्यक्तित्व कहते हैं वह यथार्थ में शरीर क्रियाशक्ति (प्राण) और चिन्तनशक्ति (मन) का समुच्चय है। इन तीनों के स्वरूप और इनके अंतर्संबंध क्या हैं? इस प्रश्न के उत्तर में शरीर व प्राण के स्वरूप और अंतर्संबंध के लिए आधुनिक प्राचीन चिकित्सा शास्त्र का हवाला दिया जा सकता है। मन का स्वरूप व अन्य से संबंध, प्राच्य पाश्चात्य दर्शन योग की विभिन्न प्रणालियों मनोवैज्ञानिक प्रक्रियाओं द्वारा समझे जा सकते हैं।
किन्तु इतना कह देना भर पर्याप्त नहीं है। इसकी प्रयोग धर्मिता को सिद्ध करने के लिए व्यापक सरंजाम जुटाने पड़े हैं। इस क्रम में शान्तिकुँज को प्रयोगशाला, ब्रह्मवर्चस को परीक्षणशाला समझा जा सकता है। शान्तिकुँज की नौ दिवसीय, एक मासीय शिविर व्यवस्था यहाँ की प्रातः तीन से रात्रि 8 तक की दिनचर्या अनुसंधान के गम्भीर उद्देश्यों को लेकर की गई है। इन्हीं गम्भीर उद्देश्यों के कारण पूज्य गुरुदेव ने शान्तिकुँज को आध्यात्मिक सेनीटोरियम की संज्ञा दी थी। इसे अगर व्यक्तित्व की रसायनशाला कहें तो अतिशयोक्ति न होगी।
शोध के इस व्यवस्था क्रम में जप, ध्यान, प्राणायाम, आसन आदि विभिन्न आध्यात्मिक प्रक्रियाओं के प्रभावों के परीक्षण हेतु नयी एक्सपेरिमेन्टल डिजाइनों, परीक्षण तकनीकों का अन्वेषण करना पड़ा है। इस तत्व से अनभिज्ञ होने के कारण यहाँ आने वाले विद्वान आगन्तुक भी ई.सी.जी, ई.ई.जी, बायोफीडबैक, एक्सापायरोग्राफ, मेडस्पायरर, जैव रसायन के सरंजाम को देखकर बहुधा भूल कर बैठते हैं कि यह प्रचलित चिकित्सा शास्त्र अथवा मनोरोग चिकित्सा के लिए जुटाया गया इन्तजाम है जब उन्हें शान्तिकुँज में घटित हो रहे प्रयोगों, अध्यात्म द्वारा व्यक्तित्व में नयी चेतना के उद्भव के प्रयास को समझाया जाता है। तो ऋषि संस्कृति को नवजीवन मिलने की सुखद अनुभूति उन्हें विस्मय विमुग्ध कर देती है।
इस सम्बन्ध में किए जा रहें अनुसंधान के बारे में जानने योग्य तथ्य यह है कि प्रथम चरण में अपने विषयों में निष्णात् शोध वैज्ञानिकों द्वारा शिविर में आए व्यक्तियों के व्यक्तित्व का गहराई से परीक्षण किया जाता है। इसके परिणाम के मुताबिक उन्हें विभिन्न वर्गों में विभाजित साधना की प्रक्रियाएँ आहार-विहार के प्रयोग वनौषधि कल्प यथा उचित क्रम में शुद्धाई जाती हैं। जिन्हें शान्तिकुँज के दिव्य वातावरण में सुनिश्चित वैज्ञानिक क्रम में सम्पन्न करना पड़ता है। इसमें किसी मनमानी की गुँजाइश नहीं है। साधना की प्रक्रियाएँ जहाँ ऋषियों के अनुभूतिकोश, योगशास्त्रों से ली जाती हैं। वहीं परीक्षण के आधुनिकतम बहुमूल्य यंत्रों की व्यवस्था है। पूज्य गुरुदेव देश-काल परिस्थितियों के मुताबिक साधनाक्रम में कहीं-कहीं व्यापक परिवर्तन भी निर्देशित किए हैं। जिनके प्रभावों की जाँच करने के लिए उन्हीं के निर्देश में नई-नई तकनीकें विकसित की गई हैं।
इस क्रम में मंत्र शक्ति, ध्यान के प्राणायाम, आसन आदि के विस्मयकारी प्रभाव आने वाले व्यक्तियों पर देखे गए हैं कुण्ठा, अवसाद, दैन्य, दुर्बलता, से ग्रसित व्यक्ति जहाँ स्वयं में प्रचण्ड आत्मबल की अनुभूति करते हैं। वहीं बीसियों साल पुराने शारीरिक रोगों का छोड़कर भाग जाना यह स्पष्ट करता है कि रोग का वास्तविक कारण कहीं गहराइयों में छुपा है। इन साधना प्रयोगों में स्वस्थ व्यक्तियों (साधकों) ने स्वयं नई क्षमता, अतीन्द्रिय अनुभूतियाँ भी हासिल की हैं। चेतना के ऐसे नए क्षितिज प्रकाश में आए हैं जिनके स्वरूप के बारे में आधुनिकतम मनोविज्ञान अभी अनजान बना हुआ है। ये तथ्य जहाँ ऋषियों द्वारा सौंपी विरासत की प्रामाणिकता सिद्ध करते हैं वहीं इनका अपनाया जाना मनुष्य में नयी चेतना के विकास का विश्वास भी दिलाता है।
इन पंक्तियों में सिर्फ ब्रह्मवर्चस् शोध अनुसंधान की एक झलक भर है। इसका व्यापक दिग्दर्शन,-प्रयोगों-परिणामों का वैज्ञानिक विश्लेषण अखण्ड-ज्योति के आगामी पृष्ठों में प्रस्तुत होता रहेगा। जिन्हें स्वयं में देवत्व जगाने की अकुलाहट है उन्हें विशिष्ट साधनात्मक प्रयोगों से गुजरने के लिए शिविरों में उत्साहपूर्वक सम्मिलित होना चाहिए। जो मनीषी वैज्ञानिक, युग ऋषि के इस शोध प्रयोजन के लिए समर्पित होना चाहते हैं। शोध में भागीदारी के लिए उन्हें भावपूर्ण आमंत्रण है। उनके द्वारा वर्तमान में किया गया समर्पित योगदान-कल के साँस्कृतिक गौरव बोध के रूप में स्वर्णाक्षरों में अंकित होगा।
आर्ष वाङ्मय में उपनिषदों को विशिष्ट स्थान प्राप्त है। वेदों के ही ज्ञान भाग का आख्यान ये हैं। उपनिषद् शब्द का अर्थ है निकट बैठकर दिया गया ज्ञान। तात्विक विवेचन के विषयों पर किया गया रहस्य भरा प्रतिपादन जिस समय गुरु अपने पास शिष्य को बिठाकर समझाते थे, तब वह ज्ञान उपनिषदों के रूप में क्रमबद्ध होकर आया एवं एक विलक्षण सम्पदा बन गया। गुरुसत्ता के रूप में यम एवं शिष्य के रूप में बैठे नचिकेता का पारस्परिक संवाद कठोपनिषद् की वल्लियों में पंचाग्नि विद्या के रूप में हमारे समक्ष आता है तो आरुणी का अपने पुत्र श्वेतकेतु को दिया गया ब्रह्म विद्या संबंधी वह आख्यान भी जिसमें वह “तत्व मसि श्वेतकेतोः” “तू ही वह चिदानंद ब्रह्म है” कहकर उस पर पड़ा अज्ञान का आवरण हटाते हैं। यही औपनिषदिक परम्परा, जिसमें जिज्ञासु शिष्य की तत्वज्ञान संबंधी जिज्ञासा का समाधान एक ऐसी गुरुसत्ता करती है जिसने स्वयं उसका अपने जीवन में साक्षात्कार कर लिया हो, हमारी संस्कृति की आदि परम्परा रही है।
गुरु-शिष्य परम्परा ही आदिकाल से ज्ञानसंपदा का संरक्षण कर उसे श्रुति के रूप में क्रमबद्ध करती आयी है। इसका वर्णन किए बिना साधना प्रसंग तथा संस्कृति का प्रकरण अधूरा रह जाता है। स्वयं भारत को जगद्गुरु की उपमा इस कारण दी जाती रही है कि उसने विश्व-मानवता का न केवल मार्गदर्शन किया ब्राह्मणत्व के आदर्शों को जीवन में उतार कर औरों के लिए वह प्रेरणा स्रोत बना। गुरु व शिष्य के परस्पर महान संबंधों एवं समर्पण भाव द्वारा अपने अहंकार को गला कर ज्ञान प्राप्ति की महत्ता का विवरण शास्त्रों में स्थान-स्थान पर मिलता है। सुकरात व उनके शिष्य प्लेटो तथा प्लेटो के शिष्य अलक्षेन्द्र एवं गुरजिएफ व आस्पेन्स्की की परम्पराएँ तो बाद के विकास की हैं, जैसा कि ऊपर कहा गया। आदिकाल से ही भारतवर्ष में यह परम्परा चली आयी है कि गुरु अपने ज्ञान द्वारा उचित पात्र समझे गए शिष्य पर पड़े अविद्या-अज्ञान के पर्दे को हटाएँ व उसका उँगली पकड़ कर मार्ग दर्शन करें।
गुरु कौन व कैसा हो, इस विषय में श्रुति कहती है-”विशारदं ब्रह्मनिष्ठं श्रोत्रियं गुरुकाश्रयेत्” “श्रोत्रिय”अर्थात् जो ज्ञान से श्रुतियों का शब्द ब्रह्म का ज्ञाता हो, उनका तत्व समझता हो, “ब्रह्मनिष्ठ” अर्थात् आचरण से श्रेष्ठ ब्राह्मण जैसा ब्रह्म में निवास करने वाला हो, परोक्ष साक्षात्कार जो कर चुका हो तथा “विशारद” अर्थात् जो अपने आश्रय में शिष्य को लेकर उस पर शक्तिपात करने की सामर्थ्य रखता हो, आद्य शंकराचार्य के शतश्लोकी के पहले श्लोक में सद्गुरु की बड़ी सुन्दर परिभाषा इस वृत्तान्त में की है।
दृष्टान्तो नैव दृष्टस्त्रिभुवनजठरे सद्गुरोर्ज्ञानदातुः
र्स्पशश्चैत्तत्र कल्प्यः स नयति यदहो र्स्वणतामश्मसारम्। न र्स्पशत्वं तथापिश्रित चरणयुगे सद्गुरुः स्वीयशिष्ये स्वीयं साम्यं विधत्ते भवति निरुपमस्तेन वा लौकिकोऽपि॥
अर्थात् “इस त्रिभुवन में ज्ञानदाता सद्गुरु के लिए देने योग्य कोई दृष्टान्त ही नहीं दीखता। उन्हें पारसमणि की उपमा दें तो वह भी ठीक नहीं जँचती। कारण पारस लोहे को सोना तो बना देता है पर पारस नहीं बना पाता। परन्तु सद्गुरु चरण युगल का आश्रय करने वाले शिष्य को सद्गुरु निज साम्य ही दे डालते हैं स्वयं अपने जैसा बना देते हैं। इसलिये सद्गुरु की कोई उपमा नहीं।” संत ज्ञानेश्वर ने गीता की भावार्थ दीपिका में लिखा है कि “यह दृष्टि (गुरु की दृष्टि) जिस पर चमकती है अथवा यह करार विन्दु जिसे स्पर्श करता है वह होने को तो चाहे जीव हो, पर बराबरी करता है महेश्वर-श्रीशंकर की”। ज्ञानेश्वरी में उनने योगीराज श्री कृष्ण द्वारा अपने शिष्य अर्जुन पर बरसाई अनुकम्पा का वर्णन करते हुए गुरु का स्तर स्वरूप बता दिया है। वे लिखते हैं “तब शरणागत भक्त शिरोमणि अर्जुन को उन्होंने अपना सुवर्ण कंकण विभूषित दक्षिण बाहु फैलाकर अपने हृदय से लगा लिया। हृदय-हृदय एक हो गए इस हृदय में जो था, वह उस हृदय में डाल दिया। द्वैत का नाता तोड़े बिना अर्जुन को अपने जैसा बना लिया।”
वस्तुतः गुरु-शिष्य संबंध इसी स्तर के आध्यात्मिक होते हैं जिनमें उच्चस्तरीय आदान-प्रदान होता है। शिष्य अपनी सत्ता को-अहं को गुरु के चरणों में समर्पित करता है। गुरु शक्तिपात द्वारा-अपनी अनुकम्पा द्वारा उसे ज्ञान प्राप्ति का अधिकारी बनाता व जीवन मुक्त कर देता है। संबंधों में शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक, आत्मिक चार प्रकार के वर्णित किये गए हैं। लोकाचार में प्रथम तीन प्रकार के संबंध तो किसी से भी स्थापित हो सकते हैं किन्तु सिर्फ गुरु से ही आत्मिक स्तर के संबंधों की संभावना है।
गुरु के विषय में ऊपर बताया गया। शिष्य के संबंध में उपनिषद्कार कहता है “समित्पाणिः श्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठं” हाथ में समिधा लेकर शिष्ट विनम्रभाव से श्रोत्रिय-ब्रह्मनिष्ठ गुरु के पास जाए। समिधा क्यों? समिधा अग्नि पकड़ती है। गुरु ज्ञान की ज्योति के रूप में जीती-जागती ज्वाला है। यदि साधक समिधा जैसी पात्रता लेकर जायेगा व स्वयं को उस अग्नि को स्पर्श कर देगा तो ज्ञान की अग्नि में तपकर वह भी ज्ञान का प्रकाश विस्तार करने वाले तंत्र के रूप में विकसित होगा। भीगी लकड़ी अग्नि में जाकर तो धुआँ ही देती है। ऐसा शिष्य न हो। जिसने अपनी अहंकार रूपी सीलन मिटा दी-स्वयं को तप द्वारा सुखा लिया हो, वही समिधा बन सकता है।
आध्यात्मिक प्रगति के क्षेत्र में भारतीय संस्कृति का यह मानना है कि बिना गुरु के अवलम्बन के यह संभव ही नहीं है। आत्मिक प्रगति का क्षेत्र एक जीवन समर-महाभारत के सदृश है। इसे एक प्रकार से प्रवाह विरुद्ध उपक्रम कहना चाहिए। जनसमुदाय की प्रवृत्तियाँ विचारणाएँ, इच्छाएँ, आदतें, गतिविधियाँ प्रायः पेट-प्रजनन में निरत स्वार्थी कुसंस्कारी जैसी ही होती हैं। इस प्रवाह में सामान्य स्तर के व्यक्तित्व नदी में बढ़ने वाले पत्ते, आँधी में उड़ने वाले तिनके सदृश होते हैं। जैसा अधिकाँश सोचते व करते हैं, उसी का अनुकरण सामान्य स्तर के लोगों से भी बन पड़ता है। आत्मिक प्रगति के लिए भिन्न स्तर का चिंतन क्रम अपनाना पड़ता है। इसके लिए कोई न कोई अवलम्बन चाहिए। बिना किसी समर्थ आदर्शवादी व्यक्तित्व के साथ घनिष्ठता स्थापित किये ऊपर चढ़ पाना संभव नहीं। बेल अपने बलबूते पर नहीं पनपती रह सकती यूँ ही धरती पर फैलकर वह अनगढ़ बन जाती है किन्तु समर्थ वृक्ष का सहारा मिलते ही वह चढ़ती चली जाती है है व आकाश चूमने लगती है। ऊँचा उठना एक बड़ा काम है। गुरुत्वाकर्षण के विरुद्ध जाने के लिए बड़ी ताकत की जरूरत पड़ती है। समर्थ गुरु का वरण या गुरु दीक्षा इसी कारण जरूरी बतायी गयी है। बिना किसी अवलम्बन के अपने बलबूते, पूर्व संचित संस्कारों के सहारे कोई ऊँचा उठ सके, यह असंभव तो नहीं पर अपवाद रूप ही देखा या कहा जाएगा। सामान्यतः आत्मिक उत्कर्ष का प्रसंग आते ही यह कहा जाता है कि उसके लिए ऐसे समर्थ व्यक्ति के साथ घनिष्ठता स्थापित की जाय जो उस प्रयोजन को संपन्न कर पाने में सक्षम हो, स्वयं उतना तप जिसने किया हो। यही गुरु-वरण है। गुरु-वरण की महिमा शास्त्रों में इतनी बतायी गयी है कि बिना गुरु वाले व्यक्ति को “निगुरा” नामक निंदक उपाधि देकर अपमानित किया गया है।
गुरु मानवी चेतना का मर्मज्ञ माना गया है। वह शिष्य की चेतना में उलट फेर करने में समर्थ होता है। गुरु का हर आघात शिष्य के अहंकार पर होता है तथा वह यह प्रयास करता है कि किसी भी प्रकार से डाँट से, पुचकार से, विभिन्न शिक्षणों द्वारा वह अपने समर्पित शिष्य के अहंकार को धोकर साफ कर उसे निर्मल बना दे। प्रयास दोनों ओर से होता है तो यह कार्य जल्दी हो जाता है नहीं तो कई बार अधीरतावश शिष्य गुरु को समझ पाने में असमर्थ हो भाग खड़े होते हैं। हमारी आध्यात्मिक परम्परा गुरु प्रधान ही रही है। इसी परम्परा के कारण साधना पद्धतियाँ भी सफल सिद्ध हुईं। सदा से गुरुजनों ने अपने जीवन में प्रयोग किया है तथा सफल पाने पर सुपात्र साधकों के ऊपर रिसर्च लैबोरेटरी की तरह परीक्षण किया है। उन्हें श्रेष्ठ देवमानव बनाने का प्रयास किया है। गुरु-शिष्य परंपरा ने ही इतने नररत्न इस देश को दिए हैं, जिससे हम सब स्वयं को गौरवान्वित अनुभव करते हैं।
जनार्दन पंत के शिष्य एकनाथ, गहिनीनाथ के शिष्य निवृत्तिनाथ, निवृत्ति नाथ के शिष्य ज्ञानेश्वर, स्वामी निगमानन्द के शिष्य योगी अनिर्वाण, गोविन्द पाद के शिष्य शंकराचार्य, शंकरानन्द के शिष्य विद्यारण्य, कालूराम के शिष्य कीनाराम, भगीरथ स्वामी के शिष्य तैलंग स्वामी, ईश्वरपुरी के शिष्य महाप्रभु चैतन्य, पूर्णानन्द के शिष्य विरजानन्द, विरजानन्द के शिष्य दयानंद, रामकृष्ण परमहंस के शिष्य विवोनन्द व उनकी शिष्या निवेदिता, प्राणनाथ महाप्रभु के शिष्य छत्रसाल, समर्थ रामदास के शिष्य शिवाजी, चाणक्य के शिष्य चंद्रगुप्त, कबीर के शिष्य रैदास, दादू के शिष्य रज्ज्ब, विशुद्धानन्द के शिष्य गोपीनाथ कविराज, पतंजलि के शिष्य पुष्यमित्र तथा बंधुदत्त के शिष्य कुमारजीव कुछ नाम हैं जो इस परम्परा में देव संस्कृति के पन्नों में पढ़े जा सकते हैं व जिनका जीवन उनके समर्पण भाव से लेकर गुरु के आत्मभाव के प्रसंग अपने आप में अद्भुत हैं। युगों-युगों तक ये प्रसंग आत्मिक प्रगति के इच्छुक साधकों को प्रेरणा देते रहेंगे, ऐसी माहात्म्य भरी यह पुनीत परम्परा रही है।
भारतीय संस्कृति में श्रद्धा, जो शिष्य में गुरु के प्रति होनी चाहिए की बड़ी तर्क सम्मत वैज्ञानिक व्याख्या स्थान-स्थान पर की गयी है। सामान्यतया व्यक्ति का मन बिखराव लिए होता है। चित्त वृत्तियाँ बहिरंग में रुचि लेने के कारण बिखरी होती हैं। बिखराव को समेट कर मन को समग्र बना लेना-महानता की ओर मोड़ लेना ही श्रद्धा है। इस मन को “इन्टीग्रेटेड माइण्ड” कहा गया है। इतना होने पर संशय नहीं रहता, पूर्ण समर्पण-विसर्जन-विलय-तादात्म्य हो जाता है। समग्रता का गुरु की चेतना में गीताकार ने कहा है-
मय्ये व मन आघत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय । निवसिष्यसि भय्येव, अत ऊर्ध्व न संशयः ॥8/12
“हे अर्जुन ! तू मुझ में मन को लगा और मुझ में ही बुद्धि को लगा। इसके उपरान्त तू मुझ में ही निवास करेगा, इसमें कुछ संशय नहीं है।” किसी को गुरु से कितना मिला, किसी को अधिक किसी को कम क्यों मिला, इसके मूल में यही कारण है कि जिसने गुरुसत्ता के आदर्शों में मन व बुद्धि को लगा दिया, संशय मन से निकाल दिया, श्रेष्ठता के प्रति समर्पण कर दिया, उसका सारा जीवन ही बदल गया। श्री अरविन्द कहते थे “डू नथिंग ट्राइ टू थिंक नथिंग विह्च इज अनवर्थी टू डिवाइन” (जो देवत्वधारी सत्ता के योग्य न हो, ऐसा न सोचो, न करो)। श्री रामकृष्ण परमहंस ने सतत् यही कहा कि कामिनी काँचन से दूर परमात्म सत्ता में मन-बुद्धि को लगाने पर स्वयं ईश्वर गुरु के रूप में आकर मार्गदर्शन करते हैं। वे कहा करते थे कि आज की स्थिति बड़ी विषम है। चारों ओर नकली गुरु हैं। उनकी उपमा श्रीरामकृष्ण ने अपनी शैली में पनेले सांप से दी है जो मेंढक को निगलने की कोशिश में मुँह में तो उसे जकड़ चुका है पर वह भी परेशान है तथा मेंढक भी। साँप छोड़ सकता नहीं, मेंढक निगला जा सकता नहीं। आज गुरु व शिष्य दोनों की स्थिति ऐसी है।
वस्तुतः समर्पण एक ऐसी प्रक्रिया है जो व्यक्ति का रूपांतरण कर देती है व जब श्रेष्ठ गुरु के प्रति यह समर्पण होता है तो व्यक्ति तत्सम हो जाता है। तप संसिद्धि मिल सकती है, किन्तु भगवान नहीं मिल सकता, किन्तु समर्पण से गुरु व भगवान दोनों एक साथ मिल जाते हैं। श्री रामकृष्ण कहते थे-”सामान्य गुरु कन फूँकते हैं, अवतारी महापुरुष-सद्गुरु प्राण फूँकते हैं।” ऐसे सद्गुरु का स्पर्श व कृपा दृष्टि ही पर्याप्त है परम पूज्य गुरुदेव एक ऐसी ही सत्ता के रूप में हम सबके बीच आए। अनेकों व्यक्तियों ने उनका स्नेह पाया, सामीप्य पाया, पास बैठकर मार्गदर्शन पाया, अनेक प्रकार से उनकी सेवा करने का उन्हें अवसर मिला पर जो उनके दक्षिणा मूर्ति स्वरूप को समझ कर उनके निर्देशों के अनुरूप चलता रहा, उसे यह सब न भी मिला हो तो भी आत्मिक प्रगति के पथ पर चल पड़ने का मार्गदर्शन मिला। ऐसे व्यक्ति साधना क्षेत्र में ऊँचाइयों को प्राप्त हुए। गुरु जो कहे बिना कोई विकल्प प्रस्तुत किए, बिना कोई तर्क किए उसे करना ही साधना है।
रामचरितमानस में गोस्वामी तुलसी दास जी कहते हैं-
गुरु के वचन प्रतीत न जेहिं , सपनेहुँ सुख सुलभ न तेहिं ।
वास्तविकता यही है कि समर्पण भाव से गुरु के निर्देशों का परिपालन करने वालों को जी भर कर गुरु के अनुदान मिले हैं। श्रद्धा की परिपक्वता समर्पण की पूर्णता शिष्य में अनन्त संभावनाओं के द्वार खोल देती है। उसके सामने देहधारी गुरु की चेतना की रहस्यमयी परतें खुलने लगती हैं। इनका ठीक-ठीक खुलना शास्त्रीय भाषा में उनके गुरु के दक्षिणा मूर्ति रूप का प्राकट्य है। जो यह रूप समझ सका, परावाणी को सुन सका उसे स्थूल का अभाव भी अभाव नहीं प्रतीत होता। गुरु का यह रूप जान लेने पर मौन व्याख्या शुरू हो जाती है। हृदय में निःशब्द शक्ति का प्रस्फुटन होने लगता है। प्रश्न जन्म लेने से पूर्व ही उत्तरित हो जाते हैं। महाशून्य से उत्सर्जित चित्तशक्ति का निर्झर खुल जाता है। स्वामी विवेकानन्द की दो शिष्याएँ थीं एक नोबुल (निवेदिता), दूसरी क्रिस्टीन (कृष्ण प्रिया)। स्वामी जी से निवेदिता तो तरह तरह के सवाल पूछतीं परन्तु कृष्ण प्रिया चुप रहतीं। स्वामी जी ने उनसे पूछा-”तेरे मन में जिज्ञासाएँ नहीं उठतीं?” उनने कहा-”उठती हैं पर आपके जाज्वल्य समान रूप के समक्ष वे विगलित हो जाती हैं।” (म्अमतलजीपदह उमसजे इमवितम जींज मजमतदंस तंकपंदबम) “मेरी जिज्ञासाओं का मुझे अंतःकरण में समाधान मिल जाता है।” लगभग यही स्थिति हम सबकी हो, यदि हम अपनी गुरुसत्ता के शाश्वत रूप, उनके दक्षिणामूर्ति स्वरूप को समझ उनके आश्वासन व हर गुरुसत्ता के संस्कृति सत्य को ध्यान में रखें कि “जब तक एक भी शिष्य पूर्णता प्राप्ति से वंचित है, गुरु की चेतना का विसर्जन परमात्मा में नहीं हो सकता।” सूक्ष्म शरीरधारी वह सत्ता अपने शिष्यों, आदर्शोन्मुख संस्कृति साधकों की मुक्ति हेतु सतत् प्रयत्नशील है व रहेगी जब तक कि अंतिम व्यक्ति भी इस धरा पर मुक्त नहीं हो जाता ।
साधना के लिए सदैव उपयुक्त वातावरण की अपेक्षा रहती है। साधक की आन्तरिक मनःस्थिति एवं बाह्य परिस्थिति का अपना प्रभाव होता है, उससे वातावरण बनता है और प्रवाह-प्रभाव उत्पन्न होता है। आत्मोत्कर्ष के लिए की जाने वाली साधनाओं में तो उपयुक्त वातावरण की अत्यधिक आवश्यकता रहती है। वैज्ञानिक, साहित्यकार, कवि, कलाकार, शोधकर्त्ता, विद्यार्थी आदि बुद्धि कर्मियों के लिए एकाग्रता-पूर्वक अपने काम करने पड़ते हैं इसके लिए उन्हें विक्षोभ रहित एकान्त चाहिए। ठीक इसी स्तर का अति महत्वपूर्ण कार्य आत्म-निर्माण एवं आत्म-परिष्कार का भी है। इसके लिए वातावरण की अनुकूलता चाहिए। विक्षोभकारी वातावरण में कर्मकाण्ड तो हो सकते हैं। एक निष्ठा नहीं मिल पाती। क्षण-क्षण में सामने आने वाली समस्याएँ, आवश्यकताएँ एवं हलचलें एकाग्रता में विक्षेप उत्पन्न करती हैं और आधे-अधूरे मन से किये हुए साधनाकृत अभीष्ट प्रतिफल उत्पन्न कर सकने में सफल हो नहीं पाते। अस्तु यह आवश्यकता सदा से अनुभव की जाती रहीं है कि आत्मोत्कर्ष की-साधनाओं की क्रिया-प्रक्रिया पूर्ण करने के लिए उपयुक्त वातावरण भी तलाश किया जाय। इस दृष्टि से देव संस्कृति में हिमालय की महत्ता का आदिकाल से गुणगान होता आया है।
सफल साधकों ने जहाँ उपयोगी विधि-विधान अपनाये हैं-उपयुक्त मार्ग-दर्शन प्राप्त किये हैं वहाँ उनने इसके लिए उपयुक्त वातावरण भी तलाश किया है। साधना विज्ञान के इतिहास पर दृष्टि डालते हैं तो पता चलता है कि सफल साधकों में से अधिकाँश ने हिमालय में डेरा डाला और वहाँ अपना निर्माण कार्य सम्पन्न किया है। इसके कितने ही कारण रहे हैं। सामान्य धरातल से ऊंचे स्थानों का वायुमण्डल शीतल रहता है। सर्वविदित है कि नीचे स्थानों में गर्मी भी अधिक रहती है और ऊपर से गिरने वाले अवाँछनीय रज-कण भी अधिक जमते हैं। इस धूलि के साथ धुआँ जैसे प्रदूषण और विक्षोभकारी विचार भी उतरते बरसते हैं। गर्मी में फैलाव की शक्ति रहती है। उसके संपर्क में जो भी आवेगा फैलेगा। नलीचे और गरम स्थानों की अपेक्षा ऊँचे और शीतल स्थान न केवल स्वास्थ्य संवर्धन के लिए उपयुक्त माने जाते हैं वरन् उनमें मानसिक स्वास्थ्य सन्तुलन बढ़ाने की क्षमता भी रहती है। गर्मी के दिनों साधन सम्पन्न लोग ऐसे लाभ पाने के लिए नैनीताल, मंसूरी, काश्मीर आदि स्थानों में अपने रहने की व्यवस्था बनाते हैं।
साधना के लिए भी ऐसे स्थान तलाश किये जाते हैं। आत्मिक स्वास्थ्य संवर्धन के लिए भी उपयोगी वातावरण मिल सके तो उसका विशेष लाभ होता है। तपस्वी पर्वतों की गुफाओं में निवास करने, कंदमूल जुटाने, वल्कल वस्त्र पहनने जैसे निर्वाह के साधन ढूँढ़ लेते हैं। धूनी जलाकर शीत निवारण की-लौकी, नारियल आदि के वर्तनों की-घास की चटाई बनाने की जैसी सुविधाएँ वहाँ मिल जाती हैं। तप-साधना के इतिहास में हिमालय की ऊँचाई और गंगातट की पवित्रता का लाभ उठाने वाले साधकों की संख्या अत्यधिक है। ऐतिहासिक तीर्थ तो अन्यत्र भी हैं, पर आत्म-साधना के तीर्थों की संख्या जितनी इस क्षेत्र में है उतनी अन्यत्र कहीं नहीं।
जहाँ जिस स्तर के व्यक्ति रहते हैं-जहाँ जिस प्रकार की हलचलें होती रहती हैं वहाँ के सूक्ष्म संस्कार भी वैसी ही बन जाते हैं और वे बहुत समय तक अपना प्रभाव बनाये रहते हैं। तपस्वियों का प्राण उनके निवास स्थान के इर्द-गिर्द छाया रहता है। सिंह और गाय एक साथ ऋषि आश्रमों में प्रेमपूर्वक रहते थे। हिरन तथा दूसरे पशु-पक्षी वहाँ निर्भयतापूर्वक पालतू बन जाते थे। ऐसे वातावरण में सहज ही मानसिक विक्षोभ शान्त होते हैं और साधना के उपयुक्त मनःस्थिति स्वतः बन जाती है। इस दृष्टि से हिमालय की महत्ता असंदिग्ध है।
यह सब भली-भाँति जानते हैं कि देव संस्कृति ऋषि संस्कृति का उद्भव इसी ब्रह्मावर्त्त में हुआ जो हिमालय क्षेत्र में स्थित है। संस्कृति का प्रकाश यहीं से सारे विश्व में पहुँचा। श्रीमद्भागवत के बारहवें स्कन्ध में दूसरे अध्याय के तीसरे श्लोक में हिमालय में दिव्य सिद्ध पुरुषों का निवास बताया गया है और उनके समवेत होने के केन्द्र को कलाप कहा गया है। 10 वें स्कन्ध के 87 वें अध्याय के 5, 6, 7 श्लोकों में भी ऐसा ही वर्णन है। थियोसॉफी सम्प्रदाय के क्षेत्र में सिद्ध पुरुषों की पार्लियामेण्ट वहाँ होने और अध्यात्म क्षेत्र के महत्वपूर्ण फैसले होते रहने की बात कही गई है। “ओटोबायो ग्राफी आफ योगी” ग्रन्थ में ऐसे अनेक प्रसंगों का उल्लेख है जिसमें हिमालय के सिद्ध योगियों के विलक्षण कर्तृत्वों का विवरण है। पाल ब्रिंटन और रम्पा जैसे शोधकर्त्ताओं ने इस क्षेत्र में समर्थ सिद्ध पुरुषों का अस्तित्व पाया है। दो सो वर्ष जीवित रहने वाले स्वामी कृष्णाश्रय ने हिन्दू विश्व विद्यालय की आधार शिला रखी थी। वे नग्न अवधूत की तरह हिम प्रदेश में निवास निर्वाह करते थे। जिन लोगों को भी ऐसी शरीरधारी और अशरीरी सिद्ध पुरुषों के साक्षात्कार यहाँ होते रहते हैं, जिनके उनके साथ संपर्क सधे हैं उनमें परम पूज्य गुरुदेव को सब भली प्रकार जानते हैं।
हिमालय में छोटे-बड़े जितने देवस्थान हैं उतने अन्यत्र मिलने कठिन हैं। अमरनाथ, ज्वालामुखी, हरिद्वार, केदारनाथ, बद्रीनाथ, गंगोत्री, पशुपतिनाथ तो प्रख्यात हैं हीं। इनके समीपवर्ती क्षेत्रों में छोटे-छोटे तीर्थों की तो शृंखला ही बिखरी पड़ी है। ऋषिकेश से बद्रीनाथ जाने के मार्ग में ही देव प्रयाग, नन्द प्रयाग, कर्ण प्रयाग आदि कितने ही प्रयाग तथा उत्तरकाशी, गुप्त काशी दिव्य काशी आदि कितने ही तीर्थ मिलते हैं। शिव और शक्ति के विभिन्न काम रूपों के देवस्थान थोड़ी-थोड़ी दूर पर ग्रामों के समीप एवं पर्वतीय घाटियों में सर्वत्र पाये जाते हैं सती के आत्म-विसर्जन का-पार्वती की तप साधना का यही स्थान है। शिव ताण्डव भी यहीं हुआ था। उस अवसर पर प्रयुक्त हुआ त्रिशूल उत्तरकाशी के एक प्राचीन स्थान में स्थापित बताया जाता है। जमदग्नि और परशुराम की तप-साधना उत्तरकाशी में सम्पन्न हुई थी।
आयुर्वेद, रसायन विद्या, अस्त्र संचालन, साहित्य सृजन, योगानुसंधान जैसे महत्वपूर्ण प्रयोग हिमालय क्षेत्र की सुविस्तृत प्रयोगशाला में होते रहे हैं। सप्त ऋषियों के महामनीषी देव मानवों के कार्यक्षेत्र इसी भूमि में रहे हैं। छात्रों के लिए गुरुकुल और श्रेयार्थियों के लिए आरण्यक यहीं थे। राजतंत्रों के सूत्र संचालक वशिष्ठ जैसे धर्माध्यक्षों के निवास इसी भूति में थे। प्रायः सभी महत्वपूर्ण ऋषिकल्प देवात्माओं की विविध-विधि गतिविधियाँ हिमालय की सुरम्य घाटियों और कन्दराओं में सुविकसित होती रही हैं। उन प्रयोगों से लाभान्वित होकर विशाल भारत के 33 करोड़ निवासी तेतीस कोटि देवता कहलाते रहे हैं। भौतिक और आत्मिक प्रगति की उच्चस्तरीय वीतियों से भरी-पूरी होने के कारण भारत भूमि स्वर्गादपि गरीयसी कहलाती रही है। गरीयसी न सही स्वर्ग तो वह रही ही है। यह अनुदान हिमालय क्षेत्र से ही अवतरित होता रहा है। जलधार वाली भागीरथी ही नहीं देव लोक की ज्ञान-गंगा का अवतरण एवं प्रवाह भी इसी क्षेत्र से आरम्भ होता रहा है।
दिव्यदर्शियों का कथन है कि ब्रह्माण्ड की सघन अध्यात्म चेतना का धरती पर विशिष्ट अवतरण इसी क्षेत्र में होता है। भौतिक शक्तियों के धरती पर अवतरण का केन्द्रबिन्दु विज्ञान जगत में ध्रुव प्रदेश को माना जाता है। अध्यात्म जगत में वैसी ही मान्यता इस हिमालय के हृदय के सम्बन्ध में है। यह स्वर्ग क्षेत्र ब्रह्माण्ड-व्यापी दिव्य-चेतनाओं का अवतरण केन्द्र है जहाँ शोध करते हुए, तप करते हुए, महामनीषी अपने को देव शक्तियों से सुसज्जित करते थे। अभी भी उस क्षेत्र में स्थूल और सूक्ष्म शरीरधारी दिव्य सत्ताओं के अस्तित्व पाये जाते हैं। वे अपने क्रिया-कलाप से समस्त भूमण्डल को प्रभावित करते रहे हैं।
इन्द्र देवता की सहायता के लिए दशरथ जी अपना रथ लेकर गये थे। पहिया गड़बड़ाने लगा तो कैकेयी ने अपनी उँगली लगाकर उस विपत्ति का समाधान किया था। ठीक इसी प्रकार का एक और वर्णन यह मिलता है कि अर्जुन इन्द्र की सहायता करने गये थे, प्रसन्न होकर इन्द्र ने अर्जुन को रूपसी, उर्वशी का उपहार दिया था जिसे उसने अस्वीकार कर दिया था। जहाँ मनुष्यों का आवागमन सम्भव हो सके ऐसा स्वर्ग धरती पर ही हो सकता है। इन्द्र और चन्द्र देवताओं का गौतम ऋषि की पत्नी अहिल्या से छल करना धरती पर ही सम्भव है। दधीचि ने अपनी अस्थियाँ याचक देवताओं को प्रदान की थीं आदि-आदि अगणित उपाख्यान ऐसे हैं जिसमें देवताओं और मनुष्यों के पारस्परिक घनिष्ठ सहयोग की चर्चा है। इन पर विवेचनात्मक दृष्टि से विचार करें तो उसी निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि स्वर्ग कहीं भूमि पर ही होना चाहिए और “देवता” मनुष्यों का कोई वर्ग विशेष ही होना चाहिए। यह क्षेत्र उत्तराखण्ड देवात्मा हिमालय का हृदय क्षेत्र ही है।
प्राचीन काल में देव-मानव इसी क्षेत्र में निवास करते रहे हैं। भौतिक और आध्यात्मिक वातावरण उन्हें हर दृष्टि से उपयुक्त लगा होगा और वे यहीं निवास करने लगे होंगे। यहाँ रहकर वे शान्त चित्त से धर्म-तन्त्र की उपलब्धियों से समस्त विश्व को लाभान्वित बनाने की विविध-विधि योजनाएँ बनाते थे, तैयारियाँ करते थे और साधन जुटाते थे। इन कष्टसाध्य महाप्रयासों का नाम ही तप था। तपस्वी देवता एक प्रकार के अध्यात्म विज्ञान के शोधकर्त्ता और विभूति उत्पादक कहे जा सकते हैं। यह क्षेत्र ऐसी वैज्ञानिक प्रयोगशालाओं से भरा पड़ा था जिनमें शरीर यन्त्र और मन तन्त्र के भीतर छिपे हुए शक्तिशाली रहस्यों का अधिकाधिक अनावरण सम्भव हो सके। शास्त्रों का सृजन, योगाभ्यास की उपलब्धियाँ, अध्यात्म दर्शन का विकास, स्वास्थ्य, चिकित्सा, शिक्षा शास्त्र, रसायन, शिल्पकला आदि की भौतिक और आध्यात्मिक उपलब्धियाँ इसी क्षेत्र से निकल कर आती थीं और उनसे लाभान्वित होने वाले उसे स्वर्ग निवासी देवताओं का वरदान कहकर अपनी श्रद्धा व्यक्त करते थे।
देवार्चन हर मनुष्य का कर्तव्य था ताकि उस क्षेत्र में किसी प्रकार का अभाव अनुभव न हो। गीता में यज्ञ से देवताओं की पुष्टि की बात कही गई है, इसे सर्वसाधारण द्वारा देव प्रयोजनों के लिए विविध-विधि अनुदान प्रस्तुत करना ही समझा जाना चाहिए। यज्ञ का सीधा अर्थ दान, त्याग, एवं बलिदान है। देव प्रयोजनों के लिए श्रम, समय, मन, धन आदि से सहयोग करते रहना है। “यज्ञ से पूजित देवतागण मनुष्यों पर सुख-शान्ति बरसाते हैं और यज्ञ न करने वाले विपत्ति में फँसते हैं”। इस गीता वचन में सामान्य प्रजाजनों को, देव वर्ग को, देव कर्म को, समुचित सहयोग प्रदान करते रहने की अनिवार्य आवश्यकता का उद्बोधन कराता है। यह देवता और कोई नहीं-उस समय स्वर्ग क्षेत्र में निवास करके धर्म प्रेरणा के भावनात्मक परिष्कार के विविध-विधि आधारों का निर्माण करने वाले महामानव ही थे। समस्त धरती पर स्वर्गीय परिस्थितियों का निर्माण करने के लिए उनका महाप्रयास, जन-साधारण को देव वन्दन एवं देव पूजन के लिए अनायास ही प्रेरित करता था।
हिमालय की शोभा का वर्णन करते हुए तत्वज्ञानी कवि कहता है-
देव सेव्यं च तत्स्थानं दैवतानाँ च दुर्लभम् । महा पुण्य महोपुण्य पूरषैरव लौकितम् ॥
नैतत् केवल मक्षाणाँ सदैवल्हादकं मुने । सर्व पुण्य महातीर्थ मूर्द्ध भूषेति विद्धितम्1 ॥
यह स्थान देवताओं द्वारा सेवनीय, परम दुर्लभ और महान् पुण्यप्रद है। इसका पुण्यात्मा लोग ही अवलोकन करते हैं। हे नारद! यह स्थान केवल इंद्रियों को सुख प्रदान करने वाला ही नहीं, किन्तु उसे समस्त महान् तीर्थों का शिरोमणि जानो।”
हिमालय की छाया-गंगा की गोद और वहाँ का भाव भरा वातावरण-साथ ही यदि शक्तिशाली संरक्षण मार्ग दर्शन मिलता हो तो उसे साधना का सुअवसर एवं साधक का सौभाग्य ही माना जाना चाहिए। ऐसे ही वातावरण में निवास करने का स्वर्गीय दिव्य आनन्द प्राप्त करने के लिए राजा भर्तृहरि बेचैन थे। इसके लिए उन्होंने राजपाट का सारा जंजाल त्यागा और योगी का देव जीवन अपना कर उच्चस्तरीय मनोरथ पूरा करने में सफल हुए। जब तक यह स्थिति न आई तब तक वे उसी के मनोरम सपने देखते रहे। साधना की दृष्टि से गंगा सान्निध्य का महत्व शास्त्रकारों ने इस प्रकार बताया है कूर्मपुराण में ऋषि कहते हैं।
यत्र गंगा महाभागा स देशस्ततपोवनम् सिद्धक्षेत्रन्तु तज्ज्ञेय गंगातीरं समाश्रितम् ॥
अर्थात्- “जहाँ पर यह महाभागा गंगा है वह देश उसका तपोवन होता है। उसको सिद्ध क्षेत्र जानना चाहिए।”
स्नातानाँ तत्र पयसि गाँगे ये नियतात्मनाम् । तुष्टीवति या पुँसाँ न सा क्रतुशतैरपि ॥
अर्थात्-”गंगा के जल में स्नान किये हुए नियत आत्मा वाले पुरुषों को जो तुष्टि होती है वह सौ वसन्त ऋतुओं से भी नहीं होती है।” (पद्म पुराण)
हिमालय को भारतीय संस्कृति का प्रत्यक्ष उद्गम स्रोत कहा जाय, तो इसमें कुछ भी अत्युक्ति न होगी। इतिहासकारों के अनुसार आर्य लोग मध्य एशिया में इसी क्षेत्र में हिमालय क्षेत्र में पहले बसे और इसके उपरान्त भारत के मैदानी प्रदेश में उतरे थे।
स्वर्ग का वर्णन पुराणों में आता है। उसकी प्रायः सूक्ष्म व्याख्या में उदात्त दृष्टिकोण और उत्कृष्ट भाव अभिव्यंजना के रूप में व्याख्या होती है, जो उचित भी है। पर यदि उसका भौगोलिक स्वरूप ढूँढ़ना हो, और सौंदर्य वातावरण को परखना हो तो वह किसी ग्रह नक्षत्र में नहीं वरन् अपनी धरती पर ही परिलक्षित होता है। उपाख्यानों के आधार पर हिमालय को धरती का स्वर्ग कहा जा सकता है, देवताओं, ऋषियों, तपस्वियों का यह क्रीड़ा प्राँगण है। इसी से भगवान ने गीता में हिमालय को अपना प्रतीक बताया है-”स्थावरणाँ हिमालयोहम्” अर्थात् “स्थविरों में हिमालय मैं ही हूँ।”
हिमालय देखने भर में निर्जीव पाषाण खण्ड प्रतीत होता है, तात्विक दृष्टि से पर्ववेक्षण्पा करने पर वह एक प्रत्यक्ष देव है। जीवन उसके कण-कण में है। हिम की शीतलता अपने दिव्य प्रभाव से उस क्षेत्र में जा पहुँचने ताले प्राणियों के अन्तरंग में प्रवेश करके शान्ति ही प्रदान करती है। आत्म साधना की दृष्टि से इस क्षेत्र का सर्वोपरि महत्व प्राचीन काल की तरह अभी भी बना हुआ है और सम्भवतः सदा ही बना रहेगा। ब्रह्मवर्चस् शाँतिकुँज की स्थापना हिमालय की छाया में उपयुक्त वातावरण को ध्यान में रख कर ही की गई है। यहाँ आकर रहना ही एक उच्चस्तरीय तप है। यदि साधना की जाय तो निश्चित ही अभीष्ट की प्राप्ति होती है, यह एक अनुभूत सत्य है।
एक ऋषि का आध्यात्मिक जीवन कैसा होना चाहिए, इसकी जीती-जागती मिसाल संस्कृति पुरुष पूज्य गुरुदेव का जीवन है। संस्कृति चिंतन के विशेषाँकों की शृंखला में हम उनके इक्कीसवीं सदी-उज्ज्वल भविष्य के द्रष्टा एक ब्राह्मण तथा तीर्थ चेतना के उन्नायक के रूप में देव संस्कृति को समर्पित एक साधक के रूप में उनके जीवन व कर्तृत्व संबंधी विभिन्न पक्षों पर विस्तार से विवेचन कर चुके हैं। युगऋषि के रूप में मानव मात्र को ऊँचा उठाने की आकाँक्षा लेकर अवतरित हुए परम पूज्य गुरुदेव के जीवन का सर्वाधिक महत्वपूर्ण पक्ष है। ऋषि वह जो काल व परम्पराओं से न बँधे। ऋषि वह जो साधना पद्धति से लेकर समाज व्यवस्था में युगानुकूल नूतन निर्धारण कर डाले व एक विराट समुदाय को उनका पालन करने को विवश कर दे। ऋषि वह जो आत्मसत्ता रूपी प्रयोगशाला में गहन अनुसंधान कर मानवमात्र के लिए चेतना जगत संबंधी कुछ ऐसे सूत्र दे जिनसे तत्कालीन समाज की मनःस्थिति चमत्कारी ढंग से बदलती देखी जा सके।
“ऋषि” शब्द ‘ऋ‘ से बना है। “ऋ“ का अर्थ है ‘गति’। जो गतिशील परमार्थ की ओर अग्रसर होता हो, वह है ऋषि। जो निर्मल बुद्धि सम्पन्न मंत्र रहस्य द्रष्टा पुरुष हो, वह है ऋषि। जो नरकीटक-नरपामर स्तर के क्षुद्र से प्रतीत होने वाले जनसमुदाय की लौकिक आकाँक्षाओं का परिष्कार कर उन्हें उच्चस्तरीय परमार्थ प्रयोजन में निरत कर दे, वह है ऋषि। लगभग यही आदि-कालीन ऋषियों जैसा स्वरूप हम अपने गुरुदेव के व्यक्तित्व एवं कर्तृत्व में पाते हैं।
अंतरंग क्षणों का एक प्रसंग है। इन पंक्तियों के लेखक सहित ब्रह्मवर्चस के कुछ कार्यकर्त्ता शोध प्रसंग संबंधी चर्चा हेतु उनके पास बैठे थे। चर्चा चित्तवृत्तियों के निरोध की तथा तन्मात्राओं की साधना की चल रही थी। साधना का प्रसंग चलने पन लौकिक जीवन में कभी भी गहराई तक उसका विवेचन न करने वाले परम पूज्य गुरुदेव ने उस चर्चा के दौरान गुह्य प्रसंगों पर पड़े आवरण को हटा दिया। विगत हजारों वर्षों से चली आ रही साधना पद्धतियों की एक समीक्षा कर उनने प्रायः डेढ़ घण्टे तक ध्यान प्राणायाम से लेकर पंच तन्मात्राओं की साधना तथा सूर्य के ध्यान की फलश्रुतियों से लेकर अष्टाँग योग के विभिन्न सूत्रों को विस्तार से समझाया। फिर अचानक चुप होकर लेट गए व बोले कि “अभी वातावरण बनना है तब तुम लोग चह सब साधनाएँ करना। सूर्य का ध्यान व गायत्री जप, नित्य शक्ति संचार हेतु प्राणायाम बस इतना भर तुम करते रहो व सबको बताते रहो। समय आने पर ग्रन्थि’-बेधन से लेकर चक्र जागरण, पंचकोशी साधना से लेकर कुण्डलिनी जागरण आदि पहले बतायी गयी मेरी समस्त साधनाएँ तुम्हारे लिए सरल होती चली जायेंगी। वैसे मैं यह सब लिखकर जा रहा हूँ सारी साधना पद्धतियों को मैंने समय के अनुसार बदलकर लिख दिया है किन्तु लोग इन्हें कर तभी पायेंगे जब सूक्ष्म जगत की ऋषि-सत्ताएँ ऐ सा चाहेंगी।”
जो करना नहीं था, वह बताया क्यों व कभी भी इस संबंध में चर्चा चलने पर समाज सेवा, विराट ब्रह्म की साधना का माहात्म्य समझाने वाले ‘परम पूज्य गुरुदेव’ ने वह रूप क्यों दिखाया यह किसी के मन में भी असमंजस हो सकता है। वस्तुतः लीला पुरुषों के जीवनक्रम बड़े अद्भुत होते हैं। परम पूज्य गुरुदेव का जीवन तो बहुआयामी व्यक्तित्व लिये था। एक साधारण प्यार बाँटने वाले पिता से लेकर समाज की पीड़ा मन में लिए उसके उद्धार को कृतसंकल्प एक सुधारक स्तर के मनीषी, जीवन विधा के अंतरंग पहलुओं को खोलने वाले एक मनः विश्लेषक से लेकर कुशल संगठनकर्त्ता वाले स्वरूप को हमने देखा है। किन्तु चौबीस चौबीस लक्ष के चौबीस महापुरश्चरण कठोर तप−तितिक्षा द्वारा सम्पन्न कर जिसने अपना जीवन क्रम आरंभ किया हो, उसके लिए तो मूलतः एक विराट समुदाय के लिए साधना पद्धतियों के विभिन्न सूत्रों, खोई कड़ियों को ढूँढ़कर गूँथना एक सबसे जरूरी काम था। वह उनने किया। जब तक उस स्तर की पात्रता न बने एक ऐसी युगसाधना में उनने अपने सहचरों को अनुयायियों को नियोजित कर दिया जिससे उनका अचेतन, जन्म-जन्मान्तरों से संचित प्रारब्धों की शृंखला का क्रम परिष्कृत व्यवस्थित होता चले। इतना बन पड़ने पर पवित्र मन वालों का समष्टिगत आधार विकसित होगा तो चेतना जगत में इनकी सामूहिक साधना निश्चित ही व्यापक परिवर्तन लाएगी ऐसा उनका विश्वास था। प्रज्ञा पुरश्चरण प्रातःकाल का सामूहिक तीन शरीरों का महाकाल के घोंसले के रूप में शाँतिकुँज को मानते हुए नित्य वहाँ पहुँचने की ध्यान-धारणा, स्वर्ण जयन्ती साधना, शक्ति−संचार साधनादि उपक्रम उसी कड़ी के अंग हैं।
इतिहास के पृष्ठों पर एक दृष्टि डालें तो पाते हैं कि कभी साधना उपक्रमों का स्वरूप ऐसा था कि सभी अपने योग्य साधनाएँ उचित मार्गदर्शक को माध्यम बनाकर सम्पन्न कर लिया करते थे। वैदिक युग की इस व्यवस्था में नर-नारी, ब्रह्मचारी, गृहस्थ-वानप्रस्थ-संन्यासी सभी अपने-अपने लिए साधना उपक्रम चुनकर देवोपम जीवन जीते थे। कालान्तर में विभिन्न साधना-पद्धतियों को उनके प्रणेताओं ने जन्म दिया। सबका उद्देश्य एक ही-रहा है-मुक्ति, कैवल्य, विदेह मुक्ति, फुलफिलमेण्ट या सेल्फ एक्चुअलाइजेशन। चाहे वेदान्तिक हों, यौगिक हों अथवा ताँत्रिक गीता के परमभाव के रूप में परमसत्ता के भावातीत रूप को समझना ही साधना पद्धतियों का लक्ष्य रहा है। व्यावहारिक जीवन में साधक के व्यक्तित्व के संपूर्ण घटकों में परिपूर्णता को लाना-बौद्धिक, नैतिक, धार्मिक एवं कलात्मक हर पहलू को परिष्कृत करना, एक सर्वांगपूर्ण मानव को अव्यवस्था से व्यवस्था में बदलकर विनिर्मित करना ही हर साधना पद्धति का उद्देश्य रहा है।
इतिहास के पृष्ठों पर निगाह डालने पर पाते हैं जिन दिनों शक-हूणों के आक्रमण इस धरती पर हो रहे थे, हमारी धरती पर वज्रयानियों की साधनाओं का आतंक था। हठयोग के माध्यम से सिद्धियाँ प्राप्त करके वे उनका जन-जन में प्रदर्शन करते थे। तंत्रयोग के इस विकृत स्वरूप ने नारी शक्ति के गौरव को अतिक्षीण कर दिया था क्योंकि उसका दुरुपयोग ताँत्रिकों द्वारा वज्रोली प्रक्रिया द्वारा निज की भौतिक शक्ति-वर्चस् उपार्जन हेतु किया जाने लगा था। शव साधना से लेकर अघोरी स्तर की अन्यान्य साधनाओं ने अध्यात्म तंत्र को विकृत कर दिया था। तब गुरु मत्स्येंद्रनाथ के शिष्य अनंग वज्र आगे आये जो बाद में गोरक्षनाथ कहलाए। उनने इस सारे अनाचार का विरोध कर नाथ सम्प्रदाय की योगसाधना पद्धति का सुनियोजित निर्धारण किया। साधना द्वारा परमतत्व की प्राप्ति का मार्ग बताकर योग−साधकों को योगामृत संजीवनी प्रदान की। नाथ सिद्धों की वाणियाँ सीधे सरल शब्दों में लिखी गयीं व उनसे इस साधना के परिष्कृत रूप को जन्म लेने में मदद मिली। घेरण्ड संहिता व गोरक्ष संहिता आदि प्रसिद्ध ग्रन्थ इसी समय के हैं।
मंत्रयोग, भक्तियोग, राजयोग, क्रियायोग, शब्द पूर्वयोग, आर्स्पशयोग (गौडपनाद), लययोग ऋजुयोग इत्यादि नामों से न जाने कितनी योग ‘पद्धतियाँ’ हमारे अध्यात्म में प्रचलित रही हैं। बुद्ध के जन्म के प्रायः पाँच सौ वर्ष आद्य शंकराचार्य का जन्म हमारे देश के इतिहास की एक और विलक्षण घटना है। इस साधक ने अल्पायु में ही आत्म ज्ञान प्राप्त कर पूरे राष्ट्र की दिग्विजय यात्रा की। बौद्धों के समय में जो अध्यात्म तंत्र में भ्रष्टता छा गयी थी, तंत्र के नाम पर भ्रष्टाचरण ही एक नियम बन गया था, उस समय आद्यशंकर ने इस साधना का अपने सशक्त प्रतिपादनों द्वारा खण्डन किया स्वयं उनने जीवन में तंत्र से लेकर अन्यान्य सभी साधनाएँ कीं, सौंदर्य लहरी जैसा अभिनव विलक्षण काव्य रचा किन्तु जन-जन के लिए निराकार उपासना के साथ-साथ पंचदेव उपासना का प्रचलन किया। उनका आगमन व मात्र 32 वर्ष की आयु में कार्य कर सारी महत्वपूर्ण स्थापनाएँ कर जाना हमारी संस्कृति की एक ऐतिहासिक घटना है।
आद्यशंकर के पश्चात् मध्यकाल का विकृति युग आया मार्गदर्शक के अभाव में ढेरों प्रकार की साधना पद्धतियाँ प्रचलित हो गयीं। इस्लाम संप्रदाय आया तो ईसाई संप्रदाय भी अपनी रहस्यवाद सिद्धान्त लेकर आया। रीतिकाल में भक्ति योग का वर्चस्व रहा। इस सदी के प्रारंभ से कुछ दशक पूर्व रामकृष्ण परमहंस का इस धरती पर अवतरण हुआ जिनने विवेकानन्द जैसे सुयोग्य शिष्य के माध्यम से अध्यात्म तंत्र के परिशोधन तथा पूरे विश्व के मार्गदर्शन की बात कही। स्वयं विवेकानन्द निर्विकल्प समाधि चाहते थे किन्तु श्री रामकृष्ण ने उन्हें ऐसी स्थिति में जाकर समाज के लिए अनुपयोगी होने के बजाय साधना का परमार्थ में आराधना में नियोजन करने की बात कही। इस सदी के प्रारंभ तक रामकृष्ण मिशन के वेदान्तिक प्रतिपादनों से लेकर, महर्षि रमण व महर्षि अरविन्द व श्री माँ के भागवत चेतना अवतरण से लेकर अधिमानस व अतिमानस के अवतरण के प्रसंगों का साहित्य व जन प्रचलन में बाहुल्य हम देखते हैं। साथ ही विदेश व भारत में श्री कृष्ण भक्ति के माध्यम से प्रभुपाद स्वामी का हरेकृष्ण (इस्कॉन) संप्रदाय महर्षि महेशयोगी का भावातीत ध्यान तथा ओशो रजनीश का नव संन्यास व प्रचलन से हट कर एक अलग ढंग की एण्टी थीसिस साधना पद्धति में जन्म लेती दिखाई पड़ती है।
इन सब के बीच चौथे दशक के अंत में “मैं क्या हूं नामक आत्मोपनिषद् से आरंभ कर गायत्री महाविद्या के छोटे-छोटे सूत्रों का उद्घाटन करने वाले, गायत्री व यज्ञ को जीवन व्यवहार में हर किसी के द्वारा अपनाये जाने का प्रतिपादन करने वाले परम पूज्य गुरुदेव का आविर्भाव हुआ। देखते-देखते “अखण्ड-ज्योति” पत्रिका का गायत्री चर्चा प्रसंग ऐसा विस्तृत होता चला गया कि उसने योग व तंत्र के सारे विशिष्ट को आत्मसात कर जन-जन के लिए सुलभ बना दिया। 1008 कुण्डी गायत्री महायज्ञ द्वारा एक विशाल गायत्री परिवार का संगठन करने वाले परम पूज्य गुरुदेव ने बिना अधिक स्वयं को प्रकाश में लाए, वर्ष की उच्चस्तरीय ताँत्रिक स्तर की साधना हिमालय में पुनः 1960-61 में की (जो उनकी चौबीस लक्ष की चौबीस महापुरश्चरणों के बाद की साधना है) तथा तुरंत आते ही युग निर्माण योजना को जन्म देकर जन-जन को पंचकोशी साधना द्वारा साधना पथ पर एक ऊँचे सोपान पर चल पड़ने को प्रेरित किया। सामान्यतया नारी शक्ति से तप के स्थान पर भाव प्रधान अपेक्षाएँ की जाती रही हैं किन्तु युगऋषि ने एक विराट नारी समुदाय को भी इस कठोर साधना का भागीदार बनाया, पंचकोशी साधना हेतु सुनियोजित पाठ्यक्रम चलाया, सूर्य की साधना सबके द्वारा इन प्रतिकूल परिस्थितियों में किए जाने की महत्ता प्रतिपादित की तथा महाकाल की युग प्रत्यावर्तन क्रिया का उद्घाटन करते हुए कठिन से कठिन साधनाओं को सरल रूप देते हुए एक विशाल समुदाय को गायत्री-सावित्री महाशक्ति की साधना से जोड़ दिया।
हम संभवतः अपनी गुरुसत्ता की साधना क्षेत्र की उपलब्धियों का विश्लेषण कर उनकी युग ऋषि के रूप में अपरिमित उपलब्धियों का विश्लेषण कर उनकी युग ऋषि के रूप में अपरिमित उपलब्धियों के विषय में पूरा न्याय न कर पाएँ किन्तु इतना अवश्य बताना चाहेंगे कि जो साधना पद्धतियाँ कभी भिन्न-भिन्न समूहों में बँटकर कुछ पंथों तक सीमित रह गयी थीं, उन्हें जनसाधारण के नित्यकर्म का एक अंग बना देना, षट्चक्र जागरण-कुण्डलिनी जागरण ग्रन्थिभेदन जैसी प्रक्रियाओं को अति सरल रूप में एक गायत्री साधना रूपी वटवृक्ष के नीचे लाकर खड़ाकर प्रतिपादित कर देना एक ऋषि स्तर के व्यक्ति का काम है। चौथी बार की हिमालय यात्रा (1971-1972) के बाद आने पर प्राण प्रत्यावर्तन साधना के द्वारा प्राण का महाप्राण के साथ आदान-प्रदान जैसी प्रक्रिया आरंभ करना जिसमें खेचरी मुद्रा, सोऽहम् साधना, ज्योति अवतरण की बिन्दु साधना, नादयोग की साधना, आत्मबोध-तत्वबोध की दर्पण साधना, पंचकोशों की पंचदेव सिद्धि आदि उपचारों का समावेश था, जो एक विलक्षण स्थापना है। उस पर भी परम पूज्य गुरुदेव यह कहते थे कि “यह तो मात्र खिलौने-झुनझुने मैंने पकड़ा दिए हैं। समय आने पर एक करोड़ से अधिक व्यक्तियों से इन से भी कठोर स्तर की साधनाएँ सूक्ष्म शरीर से कराते हुए उन्हें नवयुग का आधार, आत्मबल संपन्न महामानव मुझे बनाना है।” जो कभी अति कठोर, दुर्लभ समझी जाने वाली साधनाएँ थीं, उन्हें उनने इतना सरल कर दिया तथा उपाधि दी झुनझुनों की। कहीं ऐसा वर्णन साधना पद्धतियों का साधना के इतिहास में नहीं मिलता जिसका प्रणयन परम पूज्य गुरुदेव ने किया। पर यहीं तो उनका ऋषि पक्ष उद्घाटित होता है। जो नये सूत्र चेतना जगत के क्षेत्र को दे, वह युग ऋषि नहीं तो और क्या है?
प्राण प्रत्यावर्तन के उपरान्त स्वर्ण जयंती साधना (1976), विशिष्ट ब्रह्मवर्चस् साधन (1977-78), युग सन्धि महापुरश्चरण (1980) आध्यात्मिक कायाकल्प की चाँद्रायण स्तर की कल्पसाधना (1981-82) अति प्रचण्ड सूक्ष्मीकरण साधना (1984-85) पंचवीर भद्रों के जागरण की सावित्री साधना (1986) तथा राष्ट्र की देवात्म-शक्ति का कुण्डलिनी जागरण (1987) क्रमशः चले आने वाले वे विशिष्ट उपादान हैं, जिनसे इस साधक की महायात्रा का आभास मिलता है। अति कठिन शास्त्रोक्त साधना पद्धतियों को अति सरल बनाकर यज्ञ प्रक्रिया में आमूल चूल परिवर्तन कर उसे प्रगतिशील मोड़ देना एक असाधारण साधक स्तर के युगऋषि का ही कार्य हो सकता है।
एक असमंजस सबके मन में हो सकता है कि अब जब गुरुदेव की स्थूल उपस्थिति हमारे बीच नहीं है तो हमारा क्या होगा? तो हम सबको बताना चाहेंगे एक वार्तालाप के बारे में जो कभी उनके साथ हुआ था। उनसे यह पूछा जाने पर कि “गुरुदेव जब हम आपके सामने नहीं होते, कहीं दूर कार्य क्षेत्र में काम कर रहे होते हैं अथवा अपने अपने घरों में सो रहे होते हैं, तब भी आपको हमारा ध्यान रहता है?” उनने आँख में आँसू लाकर कहा था-”बेटा । जब तुम सोते हो या मेरा-गायत्री माता का ध्यान करते हो तब मैं तुम्हारी चेतना में प्रवेश कर तुम्हें सुधारता हूँ। तुम्हारी चेतना के कण-कण को बदलता हूँ। शरीर से न रहने पर तो यह काम और अधिक व्यापक क्षेत्र में करूंगा क्योंकि मुझे एक करोड़ साधक तैयार करने हैं। मुझे अपने एक-एक शिष्य व जागृतात्मा का ध्यान है।” यह आश्वासन है इस दैवीसत्ता का। यदि हम साधना द्वारा उनसे जुड़े रहें, उनकी दैवीसत्ता को सूर्य मण्डल के मध्य स्थितमान ध्यान करें तो पायेंगे कि पवित्रता सतत् बढ़ रही है व शक्ति की निरन्तर वर्षा हो रही है। जब तक अंतिम आदमी उनसे जुड़ा मुक्त नहीं हो जाता, उनकी सत्ता सक्रिय है युगऋषि के रूप में, कृतसंकल्प है हमें बदलने को तथा सतयुग लाने को। फिर मन में कैसा असमंजस, कैसा ऊहापोह ?
*समाप्त*