एक लोमड़ी पेड़ के नीचे बैठी थी। मुर्गा ऊपर की टहनी पर था। लोमड़ी उसे नीचे आने के लिए फुसलाने लगी। उसने कहा-मुर्गे भाई तुम्हें मालूम नहीं कि अभी दो दिन पहले जंगल में सभी जानवरों की पंचायत होकर चुकी है कि कोई जानवर किसी को सताएगा नहीं। सभी मिलजुल कर रहेंगे। सो तुम नीचे बेखटके आ सकते हो। हम लोग मिल–जुलकर हँसेंगे खेलेंगे।
मुर्गा लोमड़ी की चालाकी समझकर म नहीं मन मुसका रहा था। इतने में दो शिकारी कुत्ते दौड़े उधर आये। लोमड़ी भागी। मुर्गे ने कहा-दीदी भागती क्यों हो। अब तुम्हें कुत्तों से क्या खटका।
लोमड़ी यह कहती हुई चलती बनी कि शायद तुम्हारी ही तरह इन कुत्तों ने भी पंचायत का फैसला न सुना हो।
सब तरफ हा–हाकार चारों तरफ अन्धकार ही अंधकार। साधन बहुत शक्ति बहुत किन्तु अंधकार में उसका उपयोग कैसे हो? जिन्हें कुछ चाहिये कुछ का कुछ उठा ले रहे है।। कुछ लिया इसका सन्तोश क्षणिक पर उससे कार्य सिद्ध नहीं होता.........। इसकी खोज और बौखलाहट बेहिसाब। जिनके पास कुछ देने को है उन्हें पता नहीं किसे देना है। कुछ दिया इसका गौरव नगण्य और वह निरर्थक गया बल्कि पाने वालों का अहित हो गया, इसकी लानत बेहिसाब! हर कार्य और उसके लिये हर वस्तु पर इससे क्या सभी बेठिकाने अनर्थ तो होगा ही कारण अन्धकार.......।
इस अंधकार को दूर करो इसे निकाल बाहर करो चारों ओर यही चीख पुकार ..........। यह कमबख्त कहाँ से आ गया, हमें चारों ओर से घेरे है सब काम बिगड़ रहा है इससे दूर भागों यही उद्बोधन ...........। पर सब बेकार।
एक नन्हा सा दीपक मुस्काया.......। कहाँ है अन्धकार? चारों तरफ आवाजें उठीं, यहाँ यहाँ ........।
दीपक पहुँचा -पूछा कहाँ? उत्तर मिला चारों ओर। दीपक ने कहा पर अभी तो कहा जा रहा था। यहाँ ...... यहाँ तो वह नहीं है। लोगों ने चारों ओर देखा सारी स्थिति साफ-साफ दीख रही थी। हाँ अंधकार में खाई ठोकरों चोटों की कसक जरूर थी पर वह भी साफ स्पष्ट दीख रही थी।
लोग दीपक पर बिगड़ उठे तुम हमें झूठा सिद्ध करने आये हो। हमारी चोटें देखो हमारी हालत देखो यह क्या बिना अन्धकार के सम्भव है? दीपक शांत भाव से बोला तुम्हें झूठा सिद्ध करने नहीं अपना सत्य समझाने का विचार है पर जा समझे उसी को तो समझाऊं। तुमने अपनी चोटें देख ली उनमें मलहम लगाओ, मैं अन्य स्थान देखूं..........और वह आगे बढ़ गया।मलहम हाथ में लिये लोग अपने अंग टटोलते रहे............कहाँ उसे लगाएं?
दीपक हर आवाज पर गया, पर कहीं अंधकार नहीं मिला। सब जगह वही क्रम दोहराया गया। दीपक ने सबकी सुनी दीपक की किसी ने न सुनी। कोलाहल में सुने? दीपक ने सोचा.........। अचानक वह भी चिल्लाया यहाँ से अंधकार भाग गया, देखो यहाँ। लोगों ने देखा ..............अरे सचमुच। दौड़ पड़े उस ओर वह तो साफ दिखाई पड़ रहा था भाग दौड़ हड़बड़ी में कही कही हल्की खरोचें आ गयी पर उनकी चिन्ता नहीं। दीपक के चारों ओर भीड़ लग गई सब प्रसन्न चित्त अपना कार्य करने लगे।
एक ने पूछा अंधकार किसने भगाया? उत्तर मिला इस ज्योति ने। दूसरा बोलना.............तो ज्योति हमें दे दो अपने घर ले जाएंगे..........। किसी और ने कहा नहीं मुझे दो...........ओर मुझे मुझे का शोर मच गया।
दीपक ने कहा ज्योति सभी के साथ जा सकती है पर उसकी अपनी शर्त है कीमत है। लोग हर्ष से पुकार उठे हम कीमत देंगे- शर्त पूरी करेंगे -ज्योति लेंगे।
तो सुनो ज्योति वर्तिका पर ठहरती है ..........पर उसे एक साथ किये बगैर पूरी ज्योति नहीं........अपने साधन के अनुपात में अंश ही प्राप्त करना चाहते है।
कुछ ने साहस जुटाया,स्नेह का प्राण होमने,वर्तिका जीवन जलाने के लिये तैयार हुये। दीपक ने उन्हें छुआ ज्योति शिखा फरफराई स्वयं प्रकाशित होकर प्रकाश बिखेरते हुये चल पड़े। शेष शिकायत करते है यह हमें नहीं छूता.........हमें ज्योति नहीं देता। स्वयं उस पर कूदने को तैयार है.......... पर दीपक उनसे ऊंचा है।
आज हर व्यक्ति के लिये कुछ ऐसा ही अवसर है। युग ज्योति उसका आवाहन कर रही है। पर हममें से अनेक उसका लाभ उठाने की कोशिश कम, शिकायत करने के प्रयास में लगें है। जबकि हम कहीं भी क्यों न हों किन्हीं भी परिस्थितियों से क्यों न घिरे हो -युग ज्योति धारण कर सकते है। फिर अंधकार से संत्रस्त होने रोने बिलखने की क्या जरूरत? आओ ज्योति धारण करे। बीत रहे युग के डरावने अंधकार की जगह नवयुग का सुहावना प्रकाश फैलता नजर आने लगेगा।
दूसरों के अधिकारों का अतिक्रमण करने वाली शक्ति न तो चिरस्थायी होती है न शांति देती है। शक्ति वह है जो स्वयं बढ़े और दूसरों को बढ़ाये।
प्रत्येक प्राणी की आवश्यकतायें सीमित है। जीव धारियों की संरचना इस प्रकार हुई है कि इनका कौशल और स्वभाव स्थानीय परिस्थितियोँ और वस्तुओं के साथ ताल मेल बिठाकर तृप्त हो जाता है। अभाव जन्य असंतुष्टि के कारण उनकी मानसिक स्थिति उद्विग्नता ग्रस्त नहीं रहती। शरीरगत क्षुधाएं उचित सीमा तक सरलता पूर्वक पूरी होती रहे तो फिर उस हैरानी की जरूरत नहीं पड़ती, जो चैन से नहीं बैठने देती। मानसिक विकास हर प्राणी का इतना ही हुआ है कि वह साधन जुटाने और आत्मरक्षा की दृष्टि से प्रतिरक्षा की आवश्यक व्यवस्था बनाता रहे। अधिकांश प्राणी यह सब कर भी लेते हैं। यही कारण है कि बचे हुये समय में प्रसन्न मुद्रा में बने रहते हैं और शेष समय विनोद मनोरंजन में कुदकने-फुदकने में यात्रा पर निकलने में खर्च करते हैं। आमतौर से पेट प्रजनन में ही उनकी शारीरिक मानसिक आवश्यकताएं निहित रहती है। स्वार्थों की खींच तान में कभी कभी वे लड़ झगड़ भी बैठते हैं। इसी प्रकार उनका समय पूरा गुजरता है। असमर्थ हो जाने पर उस कचरा शरीर को हिंस्र प्राणी अपना आहार भी बना लेते है। यही है साधारण नियति अधिकांश जीवधारियों की।
मनुष्य की स्थिति कुछ विचित्र है। उसे औचित्य की सीमा में रहना, मर्यादाओं का अनुबंध पालना स्वीकार नहीं। चंचलता उद्विग्नता आपाधापी अहमन्यता दूसरों पर हावी हो जाना जैसा अनावश्यक किन्तु आकर्षक लगने वाले कार्यों में उसकी विशेष रुचि बढ़ी चढ़ी मात्रा में रहती है। यह अतिवाद ही उसे अमर्यादित एवं अनैतिक स्थिति अपनाने के लिये बाधित करता है। यही वह ललक -लिप्सा लालसा है जिसे इच्छित मात्रा में पूरा कर सकने के ले उसका चिन्तन उद्विग्न आकाँक्षाओं से भरा रहता है। जो चाहा गया है। उसका बहुत ही छोटा अंश पुरुषार्थ की सीमा और परिस्थितियों की अनुकूलता को देखते हुए कार्यान्वित हो पाता है। होना तो यह चाहिये कि उसे पूरी करने की सारी विधि व्यवस्थाएं ठीक प्रकार से सम्पन्न होती रह सके। तृष्णा के भड़क जाने पर व्यक्ति की स्थिति अतृप्त उन्मादी जैसी हो जाती है। वह मानसिक सन्तुलन खो बैठता है। धर्मोन्माद युद्धोन्माद के कारण अनेकानेक दुर्घटनाएं आए दिन घटित होती देखी गयी है। ठीक इसी प्रकार लिप्सा वासना तृष्णा प्रशंसा की पूर्ति के लिये भी लोग इस कदर बेतहाशा भाग दौड़ करते है कि उनका स्वस्थ चिन्तन ही अस्त व्यस्त हो जाता है। हविस के मारे लोग उन्मादियों की तरह स्वार्थ सिद्धि कि लिये उस सीमा तक आगे बढ़ जाते है जहाँ अनाचार के अतिरिक्त और कुछ शेष नहीं रहता। ऐसे व्यक्ति अनर्थ ही सोचते और अनर्थ ही करते है।
संसार में साधन इतने सीमित है कि उन्हें मिल बाँट कर खाते हुये सभी लोग सामान्य स्तर का गुजारा कर सकते है। इस समतावादी आचार पद्धति को अपनाकर सभी लोग चैन से रह सकते हैं। चैन से रहने दे सकते हैं। न आपस में प्रतिद्वंद्वित प्रतिस्पर्धा की आवश्यकता पड़ सकती है। नहीं ईर्ष्या द्वेष की जरूरत। कुछ आदमियों का बड़ा बनने का मतलब है शेष का गई गुजरी स्थिति में रहने के लिये विवश होना। दीवार उठाने के लिये कहीं मिट्टी खोदनी पड़ती है और गड्ढा बनाना पड़ता है। अमीरों की साधन सुविधा बढ़ी चढ़ी होने का परिणाम दुहरी हानि पहुंचाता है। एक यह कि वैभव का सरंजाम साधारण जनों को आकर्षित करता है। और उसको पाने के लिये वे भी लालायित हो उठते है। पुरुषार्थी पैसा परिस्थिति कौशल हर आदमी नहीं जुटा पाता इसलिये इतने बढ़े चढ़े साधन तो सहज नहीं मिल पाते पर ईर्ष्या द्वेष की आग सहज ही भड़कने लगती हैं जिसे शांत करने के लिये उसे कुछ उपद्रव खड़ा करने की नीचा दिखाने की सूझ सूझती है। इससे उभय पक्षीय आक्रोश उभरता है। इसके अतिरिक्त दूसरी कठिनाई यह है कि जिसे असाधारण सुविधायें मिलने लगती है उसमें अधिक पाने की लिप्सा असाधारण रूप से भड़कती है। जितना वैभव उसे मिल चुका है वह सर्व साधारण की तुलना में कहीं अधिक होने पर भी उसे प्रतीत होता है कि जितना चाहता था उसकी तुलना में कम मिल पाया है। उसे पाने के लिये वह आतुरता में अधिकाधिक पाने के लिये ऐसी क्रिया पद्धति अपनाता है जो समूचे वातावरण विक्षुब्ध कर देती है।
इसलिये वैयक्तिक और सामाजिक सुस्थिरता के लिये आवश्यक है कि हर किसी के मन में ऐसा चिन्तन बोया जाय जो भौतिक ...................अमीरी घटने के साथ गरीबी भी घटेगी। ज्वार उठता है तो समुद्र में उससे सटा हुआ जील का भाग नीचे जाता है जिन जलाशयों में पानी समतल रहता है। उछाल नहीं आता उनका पानी भी स्वच्छ रहता है और जल जन्तु भी प्रसन्नता भरा जीवन यापन करते हैं। यही स्थिति मानव समाज की भी होनी चाहिये। व्यवस्था भी इसी स्तर की बनानी चाहिये कि अमीरी बटोरने का अवसर किसी को न मिले। अन्यथा उनके संपर्क में आने वाले अपने को निर्धन अनुभव करेंगे और उसका कारण अमीरी को समझाते हुये किसी न किसी प्रकार आक्रोश व्यक्त करेंगे। यह आक्रोश कितने स्थानों पर कितने प्रकारों से फूटेगा यह कहा नहीं जा सकता। इसलिये दर्शन धर्म तर्क तथ्य उदाहरण प्रमाण एकत्रित करके लोक चिन्तन को इस प्रकार विनिर्मित किया जाना चाहिये कि किसी की महत्वाकाँक्षा न भड़के। धन की आकाँक्षा एक विशेष प्रकार की मानसिक स्थिति है जो आक्रान्ता को तो उद्वेलित करती है साथ ही अपने प्रभाव से उस संपर्क परिकर में रहने वालों को भी प्रभावित किये बिना नहीं रहती।
वित्तेषणा की तरह ही दूसरी महत्वाकाँक्षा है लोकेषणा। लोग अपेक्षाकृत अधिक सम्मान पाना चाहते है प्रतिष्ठा के अधिकाधिक भूखे रहते है। यदि व्यक्ति सद्गुणों और सेवा भावनाओं के आधार पर अपनी गरिमा का परिचय देता है बदलें में कृतज्ञता के रूप में सद्भाव पाता है तो वह उचित है। किन्तु यदि अपनी अमीरी चतुरता या आतंकवादिता -सुन्दरता ठाट बाट आदि दिखाकर ऐसी चेष्टा की गई है कि इस आडम्बर से दूसरों की आंखें चौंधिया जाये और वे तिल का ताड़ समझने लगें तो इस प्रयास के निमित्त रचे गये समस्त जाल जंजाल जादूगरी या बाजीगरी स्तर के होंगे। उनकी तात्कालिक प्रतिक्रिया कुछ भी क्यों न हो पर वास्तविकता जल्दी ही प्रकट हो जाता है कि वाहवाही लूटने के लिये ही यह सारा तान बाना बुना गया है। इससे क्षुद्रता प्रकट होती है। और व्यक्ति की सत्ता का अवमूल्यन होता है। प्रसिद्धि लूटने के लिये जो भी आडम्बर रचे जाते है। उन्हें रचनाकार की जादूगरी बाजीगरी कहकर विदूषक स्तर का ठहराया जाता है। क्योंकि ऐसे आडम्बर वही लोग रचते है। शरीर का चेहरे का सौंदर्य बढ़ा चढ़ाकर दिखने के लिये कई महिलाएं अनेकों श्रृंगार साधनों से अपने को अधिक आकर्षक दिखाने का प्रयत्न करती है। इससे कोई अजनबी भर चौंक सकता है। विचारशील आदमी को वस्तु स्थिति समझने में देर नहीं लगती। कलई जल्दी ही धुँधली पड़ जाती है। ढोल की पोल जल्दी ही खुल जाती है। बड़प्पन के लिये उछल कूद करने वाले बेढंग मेंढ़कों की चाल से हर कोई परिचित हो जाता है पदवी प्रतिष्ठा सम्मान पाने के लिये कोई व्यक्ति संस्थाओं के पदाधिकारी बनने के निमित्त लालायित फिरते हैं इसके लिये जोड़ तोड़ बिठाते रहते है। किन्तु इसके लिये जोड़ तोड़ बिठाते रहते है। किन्तु इतना हर किसी को विदित हो जाता है कि यह उथला आदमी है।गंभीरता के साथ विनयशीलता जुड़ी रहनी चाहिये। जो विनम्र विनयशील सुसंस्कृत शालीन नहीं है उसी का अहंकार नामवरी कमाने के लिये शेखी खोरी कराता है। कुछ रिश्वत उपहार देकर प्रलोभनों में बहकाकर अपना प्रयोजन पूरा कराता है। ऐसे लोग आमतौर से उपहासास्पद बनते है। उनकी उद्धतता पग-पग पर पकड़ में आती रहती है। कभी सामने कभी पीछे हंसी उड़ाती रहती है। इससे मुँह के सामने कुछ भी सुन ले सुनाले पर वस्तुतः उसकी यह मनोवृत्ति दर्पण की तरह नंगी हो जाती है। तब शांति के समय वह सोचता है कि यदि विनयशीलता, नम्रता, शालीनता अपनाई गई होती तो सम्मान भी अधिक मिलता और वह चिरस्थायी भी रहता। जिस प्रकार लूट पाट से उड़ाई हुई वस्तु को छिपाकर उपयोग करना पड़ता है, सब के सामने उपयोग करने से बात खुल जाने और पकड़े जाने का भय रहता है। इसी प्रकार प्रशंसा के लिये लालायित व्यक्ति द्वारा रचे गये षडयंत्र कुचक्र हाथों हाथ प्रकट होते जाते है और जो भी वस्तु स्थिति समझ पाते है उन सभी के मन में उनके प्रति तिरस्कार के भाव बढ़ते जाते है।
शास्त्रकारों ने वित्तेषणा लोकेषणा पुत्रेषणा को त्रिविध अनैतिक आवेश कहा है। वे ज्वर पीड़ित की तरह आवेश उन्माद उत्पन्न करते है। इन व्याधियों से ग्रसित व्यक्ति अपने चिन्तन चरित्र व्यवहार और क्रिया कलाप को सज्जनोचित नहीं कर पाता फलतः न उसे सन्तोश मिलता है और अभीष्ट उपलब्धियां सहकार प्राप्त करने का श्रेय सौभाग्य ही। वह अनेक गुने घाटे में जरूर रहता है। चिन्तन को कुचक्र रचकर दूषित करता है। मिथ्याचार की विडम्बना रचकर चरित्र बिगाड़ता है। और उल्लू सीधा करने की फिराक में रहकर व्यवहार को भी भौंड़ा बना लेता है। तीसरी ऐषणा है पुत्रेषणा जिसे बोलचाल की भाषा में कामांधता या परिवार के प्रति कर्तव्य की सीमा में रहकर उन्हीं के लिये विलास वैभव जुटाते रहने और मरते खटते रहने की लालसा भी कह सकते है। समय और सामर्थ्य हर मनुष्य के पास सीमित है। यदि कोई परिवार में अत्यधिक लिप्त हो जाता है उन्हीं के लिये अपनी सारी कमाई लगाता है समय को इसी में खपाता है। चिन्तन पर वह थोड़े लोग ही छाये रहते है तो समझना चाहिये कि जीवन का महत्वपूर्ण अंश इसी जंजाल में नियोजित हो गया। औचित्य की सीमा में रहकर कर्तव्य पालन मात्र से भी काम नहीं चलता।
ऐसी दशा में आत्मोत्कर्ष और लोक मंगल के लिये जिन उत्तरदायित्वों को हाथ में लेना चाहिये था उस संदर्भ में कुछ बन ही नहीं पड़ता। सादा जीवन उच्च विचार का परस्पर अन्योन्याश्रित सम्बंध है। उच्च विचारों को हृदयंगम और कार्यान्वित कर सकना मात्र उन्हीं के लिये संभव है जो अपने निजी जीवन में सादगी का सन्तोश का सद्भावना का समुचित समावेश कर पाते है। जिनके लिये अपने ऊपर इतना नियंत्रण करना कठिन है जो लिप्सा, तृष्णा, वासना, अहंता के उद्धत प्रदर्शन में अनावश्यक प्रयास में ही अपने को खपा देते हैं वे पीछे उसका दुःखद परिणाम सहते हैं।
तृप्ति, तुष्टि और शांति को जीवन की तीन बड़ी उपलब्धियाँ माना गया है। तृप्ति लिप्सा में होती है। लिप्सा का तात्पर्य है शरीर की आवश्यकताएं इन्द्रियजन्य वासनाएं। उनका समाधान औसत नागरिक के स्तर पर अपना काम चलाने वाले विवेक को अपनाने से होता है। अन्यथा चटोरने के कुचक्र में पड़कर लोभ और मोह की रटन्त हर घड़ी लगी रहती है। भलेही उन भोगों का दूरदर्शितापूर्ण उपयोग कर सकने की क्षमता अपने में नहीं ही हो।
तुष्टि सीमित परिवार को सद्गुणी शिष्ट एवं सुसंस्कारी बनाने में होती है। इसके लिये सर्व प्रथम अपने आप को अनुकरणीय उदाहरण बनाना पड़ता है। मर्यादाओं से बाहर का पक्षपात करने अनावश्यक लाड़ दिखाने उत्तराधिकार में विपुल सम्पत्ति छोड़कर मरने की आकाँक्षा अतृप्ति उत्पन्न करती है। इसलिये विश्व परिवार का दृष्टिकोण विकसित करते हुये समूचे समाज को कुटुम्ब मानकर चलना चाहिये। जो छोटा सा अपना परिवार है उसके प्रत्येक सदस्य को स्वावलंबी भर बनाने की बात सोचनी चाहियें। जिनसे इतना बन पड़ता है उन्हें तृप्ति की प्रसन्नता भी अनुभव होती हैं।
शांति उन्हें मिलती है, जिन्हें बड़प्पन बटोरने सस्ती वाहवाही कमाने बड़े पद पर आसीन होने या लोगों की आंखों में चकाचौंध उत्पन्न करके अपनी विशिष्टता की छाप छोड़ने की अभिलाषा शांत हो जाती है। नम्रता विनयशीलता सज्जनता का स्वभाव बना लेने से ही शांति का आभास होता हैं। अपने दृष्टिकोण स्वभाव और दैनन्दिन कार्य क्रमों को उच्चस्तरीय बना लेने पर कोई भी व्यक्ति प्रचुर परिमाण में तृप्ति,तुष्टि और शांति का अजस्र आनन्द लाभ करता रह सकता।
एक थी वेश्या। उसने सुना पितृ पक्ष में कर्मकाण्डी ब्राह्मण को भोजन कराने से मोक्ष मिलता है। सो वह कर्मकाण्डी ब्राह्मण तलाश करने के लिये दूर दूर तक फिरी। जो मिले उनने वेश्या के यहाँ भोजन करने से इनकार कर दिया बेचारी उदास मसोसे बैठी थी।
एक भौंड ने सारा माजरा सुना तो उसके मुँह में पानी भर आया। दूसरे दिन कर्मकाण्डी पंडित का बान पहन कर स्वयं ही वेश्या के घर जा पहुँचा। बोला तुम्हारी श्रद्धा मुझे यहाँ खींच लाई। मेरा जो भी हो पर तुम्हारा तो उद्धार हो ही जायेगा। मैं पूरे पन्द्रह दिन भोजन करने को तैयार हूँ। वेश्या प्रसन्न हो गई उसने पूरे पन्द्रह दिन पकवान मिष्ठान खिलाये। अन्त में दक्षिणी भी दी। साथ ही यह भी आग्रह किया कि अन्य कर्मकाण्डी ब्राह्मणी की तरह मुझे आर्षवचन भी सुनाये।
भौंड संस्कृत पढ़ा न था सो आर्षवचन कह सकना उसे न बन पड़ा। फिर भी यथार्थता तो प्रकट कर ही दे ताकि वह मिथ्या भ्रम में न रहे।
भौंड ने लोक कथा से तत्काल एक दोहा गढ़ लिया फिर वही कह सुनाया। पन्द्रह दिन पूरन भऐ, खाय खीर और खाँड। जैसा धन तेसे गया, तुम वेश्या हम भौंड॥
पृथ्वी पाँव जलाती थी, सूरज सिर झुलसाए दे रहा था। न पेट भर अन्न, और न रात काटने के लिये बिछावन। झरना मिला उसी का जल पी लिया और कहीं से कन्द मूल,फल-फूल मिल गये तो उन्हीं से पेट की ज्वाला शांत कर ली। रात एक गोल पत्थर पर सिर टिकाकर किसी वृक्ष की छाँव में बिता ली। ऐसा करते करते सात दिन बीत गये। स्नातक धन्वंतरि गुरुकुल की सीमा छोड़कर हिमालय की मध्यवर्ती उपत्यिकाओं तक जा पहुँचे, किंतु कोई ऐसी जड़ी बूटी न मिली जो अपनी पीठ पर हुये व्रण की उपयुक्त औषधि हो सकती।
धन्वंतरि का शरीर थक कर आधा हो गया था। पर वाह री लगन!धन्य रे ऐसा तप कि एक ऐसी जड़ी-बूटी की खोज जो किसी भी फोड़े से पीड़ित का अचूक उपचार सिद्ध हो सके,धन्वंतरि को उसके पीछे ही लगाये रखा।
व्ो भिशगाचार्य के अन्तिम वर्ष में शोध कर रहे थे। औषधि शास्त्र का उन्होंने ऐसा अध्ययन किया था कि स्वयं कुलाधिपति भी कई बार उनसे आवश्यक जानकारियाँ उपलब्ध किया करते थे। आयुर्वेद का ऐसा गहन अध्ययन इतिहास में शायद ही कोई और कर सका हो। एक एक ऋचा पर उन्होंने कितना कितना श्रम किया यह तो वह स्वयं जानते थे। पर आयुर्वेद का निष्णात् धन्वंतरि आज कई दिन से भ्रमण कर रहा है एक एक जड़ी एक एक बूटी का प्रयोग कर डाला है उन्होंने। पर एक भी तो ऐसी पत्ती नहीं निकली जो उनकी पीठ पर हो गये फोड़े के घाव को ठीक कर देती।
रात- दिन की लगातार खोज के उपरान्त भी सफलता हाथ न लगने पर निराशा स्वाभाविक थी। युद्ध में पराजित सैनिक की भाँति हारे थके धन्वंतरि पुनः गुरुकुल की ओर लौट पड़े। वहाँ तक पहुँचते पहुँचते भी हजारों बूटियों का प्रयोग करके देख लिया। किन्तु परिणाम असफलता। उनको न तो कोई बूटी मिली और न ही फोड़ा अच्छा हुआ। किसी को भी उनकी मुखाकृति पर चिन्ता निराशा की काली रेखाएं देखकर सहज करुणा आ जाती। पर उनकी खोज की जिज्ञासा शांत न हुई।
सूखा मुख रूखे मुरझाए बाल शिष्य की ऐसी विपन्न मुद्रा देखते ही गुरु की आँखें छलछला आयी। उन्होंने स्पष्ट ताड़ लिया कि धन्वंतरि को कोई उपयुक्त का औषधि नहीं मिल पायी।
तात! बड़ा कष्ट पाया तुमने! कहते हुये आचार्य प्रवर ने बड़ी करुणा बड़े ममत्व के साथ उनका उत्तरीय वस्त्र हटा कर देखा घाव घटा नहीं था कुछ बढ़ ही गया था। उत्तरीय वस्त्र को वैसे ही छोड़ कर आचार्य श्रेष्ठ ने कहा वत्स! आओ मेरे साथ चलो। तुम्हारा उपचार तो मेरे पास है। यह कहकर वे आश्रम से दक्षिण दिशा की ओर चल पड़े।
थोड़ी ही दूर पर एक औषधि का पौधा लगा था। गुरु ने उसे तोड़ा एक पत्थर पर रखकर पीसा और उसका लेप उनकी पीठ पर लगाते हुये कहा- वत्स चलो अब तुम्हारा घाव दो दिन में अच्छा हो जायेगा।
निराश और दुःखी धन्वंतरि ने लम्बी निःश्वास छोड़ते हुये कहा- गुरुदेव! बूटी विद्यालय के इतने समीप ही थी आप उसे जानते भी थे फिर मुझे व्यर्थ ही पन्द्रह मील तक क्यों दौड़ाया?इतना कष्ट देकर आपने क्या पा लिया? मौन हो ऋषि ने सकरुण नेत्रों से उनकी ओर देखा भर बस कहा कुछ नहीं। वह तो उनका अन्तःकरण था जिसने आप ही उत्तर दे दिया।
धन्वंतरि! इतनी कठिन साधना नहीं करता तो यह जो हजारों औषधियों का ज्ञान प्राप्त हुआ वह कहाँ से मिल पाता?
मकड़ी का जाला मकड़ी ने जाला ताना वह उसमें फंस गई निकलने की कोशिश करने लगीं पर असफल रही। छटपटाने लगी।
थोड़ी देर में उसकी समझ लौटी। सोचने लगी इसे मैंने ही तो ताना है उसे जिस मुँह से उगला है उसी से निगल भी तो सकती हूँ। उसने ऐसा ही किया। चाल बदल दी। धागा उगलने की बजाया उसे दूसरे सिरे से निगलने लगी। सारा जाला पेट में चला गया बाँधने वाले बंधन समाप्त हो गये।
मकड़ी स्वच्छंद विचरने लगी।
मनुष्य अपने लिये उलझाने स्वयं ही विनिर्मित करते है। यदि वे अपनी चाल उलट दे तो सारी गुत्थियों को सुलझाने में सहज समर्थ हो सकते है।
पातंजलि योग दर्शन का कथन है –
योगष्चित वृत्ति निरोध
अर्थात् चित्तवृत्तियों को रोकना ही योग है। यदि मनुष्य अपने मन में उठने वाली अनेक प्रकार की कामनाओं और वासनाओं को रोक लेता है और उनका प्रयोग इन्द्रियों की इच्छा से नहीं अपनी इच्छा से उस तरह कर सकता है जिस प्रकार सारथी रथ में जुते हुए घोड़ों को तो वह निश्चय ही अपनी शक्तियों का ऊर्ध्वगामी विकास करके परमात्मा की उपलब्धि कर सकता है।
साधारणतया चित्तवृत्तियों को समझा पाना भी सरल कार्य नहीं है। कारण सामान्य अवस्था में इनका न तो कोई स्वत्व दिखाई देता है और न मूल्य व महत्व पर जब इन्हीं को कुचला और नियन्त्रण में रखने का अभ्यास किया जाता है तब इनकी भयंकरता देखते ही बनती है। राक्षसों सुरसा की तरह अनेक रूप बनाने में पटु यह चित्त वृत्तियाँ मनुष्य को लुभाती ही नहीं वरन् डराती और धमकाती भी है। निर्बल मन और अस्थिर बुद्धि वाले व्यक्ति उनकी एक ही झपाक में ठण्डे होकर लम्बे समय की जा रही तप साधना एवं योगाभ्यास तक छोड़ बैठते हैं और इस तरह आत्मिक प्रगति की यात्रा उनकी अधूरी ही रह जाती है।
अर्जुन जैसे महारथी को भी यही कहना पड़ा था-
चंचल हि मनः कृष्ण प्रमाथि बलवद्न्दृढम्। तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुश्करम॥ गीता 6-34
अर्थात् है भगवान! यह मन बड़ा चंचल है॥ मस्तिष्क को मथ डालता है, यह बहुत दृढ़ और शक्तिशाली है। इसलिये इसको वश में करना वायु की तरह बहुत कठिन है।
किन्तु योग विद्या विशारदों का कहना है कि यह कठिनाइयों कुछ ही दिन की होती हैं यदि अभ्यास बन्द न किया जाय तो यही मन एक दिन सर्वोत्तम समीपस्थ मित्र की भांति अनुकूल आचरण करने वाला हो जाता है। भगवान कृष्ण ने अर्जुन! मन बड़ा चंचल है पर निरंतर अभ्यास से वह भी वश में आ जाता है। जो देर तक उसमें स्थिर रह सकता है वही अन्तिम सिद्धि तक पहुँच सकता है यह पहले ही मन में बिठा लेने की बात है।
मनीषी योगाचार्यों ने चित्त वृत्तियों के निरोध के दो उपाय बतायें है- 1 मनोवैज्ञानिक 2 वैज्ञानिक। प्रथम प्रकार के सभी उपाय मानसिक है। उनमें अपने मन को ही इस बात के लिये राजी किया जाता है कि वह अपने आप संसार की क्षणभंगुरता अनुभव करे और इस बात की जिज्ञासा जाग्रत करे कि हम वस्तुतः है क्या? इस काय पिंजर में हम किस तरह फंसे पड़े है? किस तरह उससे मुक्ति और पूर्ण आनन्द जिसके लिये हमारी चाह अनवरत है किस तरह प्राप्त हो सकती है?
योग दर्शन पाद 1 सूत्र 12 में बताया है अभ्यास वैरागभ्यान्तत्रिरोधः। अर्थात् निरन्तर वैराग्य का अभ्यास करने से मन की पार्थिव वृत्ति बदल जाती है इसी बात को गीताकार ने अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृहयते कह कर समझाया है। अर्थात् निरन्तर वैराग्य का अभ्यास करने से मन की वृत्तियों धीरे धीरे वश में आने लगती है।
योगदर्शन 1-23 के अनुसार दूसरा उपाय -ईश्वर प्रणिधनद्धा अर्थात् अपने आप को परमात्मा में मिलाने का समर्पण का अभ्यास करने से मन की प्रवृत्तियाँ ऊर्ध्वगामी होने लगती है।
योग शास्त्री में अनेकानेक अभ्यास बताये गये हैं जिनसे मनोनिग्रह में सहायता मिल सकती है, पर मन उतने से ही वश में आ जाय यह कोई आवश्यक नहीं हम जिस स्थिति में हैं वह कई जन्मों का विकसित रूप हैं मनुष्य के पूर्व जन्मों के पाप और वासनाओं के संस्कार जो मन में कई परतों के रूप में जमे होते हैं बार बार उन्हीं वासनाओं की ओर घसीटते हैं इसलिये साधक की वृत्तियाँ कभी भी उद्दीप्त हो उठती है। उसके लिये वैज्ञानिक विधियाँ काम में लाई जाती है शरीर और मन की अंतरंग सफाई चित्त का परिशोधन परिष्कार यौगिक क्रियाओं से किया जाता है तब निर्मलता आती है। इसलिये आत्म साक्षात्कार की इच्छा रखने वाले किसी भी साधक के लिये आवश्यक हो जाता है कि वह अष्टांग योग का अभ्यास करता हुआ आत्मा का विकास परमात्मा की ओर करे। योग के यह आठ अंग है।
यम नियमासन प्राणायाम प्रत्याहार धारण ध्यान समाधयोडश्टावड् गानि। योग दर्शन 2-29
अर्थात् 1- यम 2- नियम 3- आसन 4- प्राणायाम 5- प्रत्याहार 6- धारणा 7- ध्यान और 8- समाधि।
इनका अभ्यास करने से मन और अंतःकरण की कठिन मलिनतायें भी नष्ट हो जाती हैं और निर्मल ज्ञान प्रकाश एवं विवेक बुद्धि की अभिवृद्धि भी इन्हीं आठ अंगों में उत्तरोत्तर अभ्यास और विकास द्वारा उपलब्ध होती है। परन्तु इनका वास्तविक लाभ आत्मा या ईश्वर की प्राप्ति ही है। इसलिये किसी को भी चमत्कार ओर सिद्धियों की ओर मन न लगाकर केवल आत्म कल्याण का ही विचार करना चाहियें। प्रायः अष्टांग योग की पूर्ण जानकारी हर किसी को नहीं होती और जिन्हें रहती भी है वे लम्बी अवधि तक उन कठोर से लगने वाले नियमोपनियमों का पालन नहीं कर पाते जिनसे चित्त की एकाग्रता सधती और कषाय कल्मषों से कुसंस्कारों से छुटकारा मिलता हैं फलतः योगाभ्यास का वह लाभ नहीं मिल पाता जिसकी महिमा महत्ता का वर्णन ऋषि मनीषियों एवं योगशास्त्रों ने पग पग पर किया है ऐसी स्थिति में मन को साधने के लिये मनोवैज्ञानिक प्रयोग सर्वाधिक सुविधाजनक जान पड़ते है। इस विधि से प्रतिदिन नियमित रूप से थोड़ी देर तक अभ्यास करने से कोई भी व्यक्ति अपना वैराग्य और ईश्वर प्राप्ति का अभ्यास दृढ़ कर सकता है। हानि रहित यह अभ्यास हर कोई कर सकता है। मनोवैज्ञानिक अभ्यास की सर्वोपयोगी दो विधियाँ है पहला अभ्यास सर्वप्रथम किसी समतल और कोलाहल रहित शांत स्थान में कोई वस्त्र बिछाकर सीधे चित्त लेट जाना चाहिये। ध्यान रहे दोनोँ पैर सीधे मिलाकर रखे जाय। साथ ही दोनों हाथ सीने के ऊपर हों। इसके पश्चात शरीर को निश्चेष्ट एवं बिलकुल शिथिल छोड़ दिया जाय और प्रगाढ़ भावना की जाय कि मानो प्राण शरीर में से निकलकर प्रकाश के एक गोले की तरह हवा में स्थिर हो गया है और शरीर मृत अवस्था में बेकार पड़ा है। अब यही बात प्रत्येक अंग अवयव के बारे में ध्यान पूर्वक सोची जाय कि कल तक यही आंखें अच्छी अच्छी वस्तुयें देखने का हठ करती थी। अब आज क्यों नहीं देखती और यह मुख जो बढ़िया बढ़िया स्वादिष्ट वस्तुयें खाने को माँगता था, कैसा बेकार पड़ा है।
नाक, आँख, मुंह, कंठ, छाती, हाथ, पैर सहित उन सभी अंगों को बार बार ध्यान पूर्वक देखा जाय जिनमें कफ, थूक, माँस-मज्जा मल-मूत्र के अतिरिक्त और कुछ भी तो नहीं रह गया है। यथार्थ वस्तु जो कि आत्म चेतना थी वह तो अभी भी मेरे ही साथ है क्या मैंने इस शरीर के लिये ही अपने इस प्रकाश शरीर को आत्मा को भुला दिया था? क्या अब तक इसी शरीर के लिये जो पाप कर रहा था, वह उचित था? आदि ऐसे अनेक प्रश्न मन में उठाये जा सकते जिससे साँसारिक भाव नष्ट हो और मन यह मानने को विवश हो जाय कि हम अब तक भूल में थे। वस्तुतः मनुष्य का यथार्थ जीवन शरीर नहीं आत्मा है।
दूसरा अभ्यास इसमें किसी शांत एकान्त स्थान में कुश आदि का कोई पवित्र आसन बिछाकर ध्यान मुद्रा में बैठना पड़ता है। आसन सदैव समतल स्थान पर बिछाया जाता है। ऊंचा नीचा होने पर शरीर को कष्ट होगा और ध्यान नहीं जमेगा। ध्यान मुद्रा का आरंभ शरीर, सिर एवं ग्रीवा को सीधा रखकर अध खुले नेत्रों से नासिका के अगले भाग को देखने से होता है। दृष्टि और मन कहीं दूसरी ओर न जाय इस ओर विशेष ध्यान रखना पड़ता है यदि जाता है तो उसे बार-बार अपने मूल अभ्यास की याद दिलाकर एकाग्र किया जाता है।
जब मन शांत हो जाय तब भावनापूर्वक ध्यान किया जाय कि मैं प्रकाश के एक कण तारा या जुगनूँ की तरह हूँ और नीले आकाश में घूम रहा हूं। सूर्य की तरह का इससे भी हजारों गुना बड़ा और तेज चमक वाला एक प्रकाश पिण्ड आकाश में दिखाई दे रहा है। उसी की प्रकाश किरणें फूटकर निखिल ब्रह्मांड में व्याप्त हो रही है। हजारों सूर्य उसके आस पास चक्कर काट रहे है। मैं जो अभी तक एक लघु प्रकाश कण के रूप में अशक्त अज्ञानग्रस्त और सीमाबद्ध पड़ा था अब धीरे धीरे उस परम प्रकाश पुँज में हवन हो रहा है। अब मैं रह ही नहीं गया या तो करोड़ों अरबों किलोमीटर के विस्तार वाला गहरा नीला आकाश है या फिर वही दिव्य प्रकाश जिसमें घुलकर मैं अपने आप को सर्वव्यापी सर्वदर्शी सर्वज्ञ और सर्व समर्थ अनुभव कर रहा है।
यह दोनों ही अभ्यास चित्तवृत्तियों को रोकने और वैराग्य तथा ईश्वर प्राप्ति की कामना को बढ़ाने में बहुत ही सहायक सिद्ध हो सकते है। भावप्रवणता की गहराई में प्रवेश करने पर थोड़े दिनों के अभ्यास से ही उसके प्रतिफल सामने आने लगते है। अपनी सुविधानुसार कोई भी व्यक्ति इन साधनाओं का अभ्यास कर सकता है और अध्यात्म साधना की दिशा में वाँछित प्रगति कर सकता है।
मानवीय क्षमता असीम और अप्रत्याशित है। चेतना के क्षेत्र में उसकी बराबरी अन्य कोई दूसरा प्राणी नहीं कर सकता। अन्यान्य प्राणी प्रकृति के नियमों में रहते हुये ही अपना जीवन क्रम चलाते है किन्तु मनुष्य प्रकृति के अनुशासन में रहे तो उससे लाभ भी उठा सकता है और उल्लंघन करता है तो उसे हानि भी उठानी पड़ती है। वह लाभ उठाये अथवा दण्ड सहे, यह उसकी अपनी इच्छा की बात है। यह छूट उसे अपनी चेतना का स्वतः विकास करने के लिये मिली है।यदि मनुष्य इस दिशा में कुछ साधनात्मक कदम उठाता है तो वह अपने प्रभाव से प्रकृति को अपने नियम बदलने के लिये बाध्य भी कर सकता है।
इस संभावना को मानव के लिये वरदान कहा जा सकता है कि वह अपनी चेतना की शक्ति को किसी दिशा विशेष में प्रयुक्त करने के लिये स्वतंत्र है। प्रख्यात मनःशास्त्री विक्टर ई. क्रोमर का इस संदर्भ में कहना है कि यदि व्यक्ति अपनी मानसिक चेतना को केन्द्रित या घनीभूत करने की कला में प्रवीण हो जाय तो न केवल व्यक्तित्व को उस प्रयोग से उच्चस्तरीय प्रबल और प्रखर बनाया जा सकता है वरन् प्रकृति के नियमों को भी बदला और उन्हें वशवर्ती बनाया जा सकता है।
इस तथ्य को प्रामाणित करने के लिये क्रोमर ने दक्षिण जापान के बौद्ध मंदिरों में किये जाने वाले एक विशिष्ट धर्मानुष्ठान का उदाहरण दिया है। जापान में बौद्ध धर्म की एक शाखा है जिसके अनुयायी जेन नामक ध्यानयोग पर बहुत आस्था रखते है। यह आस्था इस हद तक दृढ़ रहती है कि उन्हें कठिन तितिक्षाओं से होने वाले कष्टों का भी अनुभव नहीं होता। इतना ही नहीं उनके शरीर पर इन कष्टों का कोई प्रभाव भी नहीं पड़ता। यह तो हो सकता है कि मनुष्य का ध्यान किसी और दिशा में केन्द्रित हो और उसे अपने शरीर पर उसका प्रभाव तो पड़ता ही है। लेकिन इन मन्दिरों में होने वाले धर्मानुष्ठानों ऐसी कोई बात नहीं होती और प्रकृति के नियम अपवाद बन जाते है। उनके मन्दिरों में जब जेन साधक छह फुट लम्बी दहकते हुये कोयलों से सजायी गयी वेदी पर नंगे पैर नाचते हुये पार करते है तो आग से जलने का अनुभव तो दूर रहा उनके पैरों में झुलसन तक नहीं होती। दहकता हुआ अग्निकुण्ड जिसकी आँच आस पास खड़े लोगों को भी लगती है उन साधकों के लिये ठण्डी राख के समान हो जाती है।
क्रोमर के अनुसार मलेशिया के कई क्षेत्रों में भी इस प्रकार के धर्मानुष्ठान प्रचलित है। आग का स्वभाव है जलना फिर क्या कारण है कि वह इन धर्मानुष्ठानों में अपना नियम बदल देती है। और वह भी केवल उन व्यक्तियोँ के लिये जो चेतना के क्षेत्र में अन्य व्यक्तियों से उन्नत समझे जाते है।
भारतीय तत्वदर्शियों का कथन है कि जड़ प्रकृति ही गुणमयी है और इस कारण नियम विशेष के अंतर्गत अपना काम करती है। चेतना का जो अंश जहाँ जितना विकसित होगा, वहाँ इन जड़ नियमों के अपवाद देखे जा सकते है। पत्थर जड़ है अपने स्थान से बिना हटाये नहीं हटेगा, परन्तु प्राणी स्वेच्छा से कही भी आ जा सकते है। बर्फ शीतल है और तप्त बालू गर्मी से अपनी इच्छा से गरम या ठण्डी नहीं हो सकती पर मनुष्य के संपर्क में आते ही वह उन्हें इच्छानुसार पिघला सकता है या ठण्डा कर सकता है।
मनुष्येत्तर जीव जन्तु भी अपनी सीमा में रहते हुए स्थान परिवर्तन, परिस्थितियों के अनुरूप अपना परिवर्तन आदि सम्पन्न कर लेते है। परन्तु उनकी चेतना मनुष्य की अपेक्षा कम विकसित है इसलिये उन्हें भी कुछ मर्यादाओं का पालन करने के लिये बाध्य होना पड़ता है। यह छूट केवल मानव कोही मिली है कि वह इच्छित दिशा में विकास करने के लिये इन नियमों का अतिक्रमण कर दे और अपने व्यक्तित्व को परिष्कृत करता हुआ प्राप्त क्षमताओं का मनुष्य समाज के हित में अधिकाधिक सदुपयोग करें। उन्नत और परिष्कृत व्यक्तित्व न केवल अपने आस पास की प्रतिकूलताओं को निरस्त कर देते है वरन् ऐसे ऐसे कार्य भी कर दिखाते है जिन्हें चमत्कार कहा जा सकता है।
चमत्कार कोई करतब आदि नहीं वरन् व्यक्ति को अपनी आस्था संकल्प और निष्ठा के बल पर प्रकृति को अपने नियंत्रण में करने की ही फलश्रुति मात्र है।
प्राणि विज्ञानियों का कहना है कि विषधर सर्प महाक्रोधी और स्नेहशून्य होते हैं। वे छेड़ने वाले को डसने ओर उसका प्राणहरण करने में जरा भी विलम्ब नहीं करते परन्तु आस्था एवं संकल्प के बबील विषधर प्राणियों को भी अपना परम सहयोगी और विश्वस्त बनाया जा सकता है। सुप्रसिद्ध साहित्यकार डी.एच. लारेन्स ने अपनी मैक्सिको यात्रा का सचित्र विवरण प्रकाशित करते हुये उस देश के रेड इंडियनों के सर्प प्रेम की चर्चा की है और बताया है कि वहाँ के लोग किस प्रकार वर्ष में एक बार मिलकर सर्प पूजा का अनुष्ठान करते है।
यह सर्प अनुष्ठान मैक्सिको के नवाजों प्रान्त के कारिजोना से सत्तर मील दूर स्थित वार्स्य गाँव में होता है। निर्धारित तिथि पर एकत्रित होने के ले होपी कबीले के पुरोहित साँपों को निमंत्रण देने उनके बिलों पर जाते है और उनसे मंत्रोच्चार पूर्वक अनुरोध करते है। यह काम साल भर तक चलता है ओर आश्चर्य यह कि जिन साँपों को निमंत्रण दिया जाता है वे निमंत्रण स्वीकार कर निर्धारित तिथि पर उत्सव में आते भी है। इस कबीले के लोग साँप को सूर्य देवता का विशेष प्रतिनिधि मानते हैं और इस पूजा समारोह में आमंत्रित कर उनकी प्रसन्नता प्राप्ति की आशा करते हैं। पूजा का यह उत्सव नियत स्थान पर नियत तिथि को आयोजित होता है।
इस समारोह में प्रधान भूमिका निभाने वाले याचक नौ दिन पहल से ही उपवास करना आरंभ कर देते है। निर्धारित समय पर वे एकत्रित होकर अपनी विचित्र वेषभूषा में सर्पनृत्य करते हैं। पत्तों से ढके गड्ढे में न जाने कितने सर्प कब से छिपे बैठे रहते है। अनुष्ठानकर्ता मंत्रोच्चार करते हुये उन्हें पकड़ लाते हैं और गले में पहनकर या शरीर से लिपटाकर विभिन्न मुद्राओं में नृत्य करते हैं साथ ही सर्प भी अपने अंगों को हिलाते डुलाते हुये आयोजनों में भाग लेने वाले याजकों की तरह रुचि तथा प्रसन्नता व्यक्त करते हैं।
अनुष्ठान जब पूरा हो जाता है तो याजक आमंत्रित साँपों को स्वागत सत्कार के साथ विदा कर देते है तथा अगले आयोजन में फिर आने को निमंत्रण देते है। लारेन्स ने अपनी कृति में लिखा है कि मैंने इस तरह के कई सर्प अनुष्ठान देखे। विचित्र और अविश्वसनीय होने के कारण मैं उन्हें संदिग्ध दृष्टि से देखता रहा तथा यह जानने का पूरा प्रयास किया कि इसका रहस्य क्या है? लेकिन फ्रॉड या चालाकी जैसी कोई बात देखने नहीं आयी।
इस प्रश्न का उत्तर अध्यात्म विज्ञान के पास है कि मनुष्य चाहे तो अपनी संकल्पशक्ति एवं आत्मबल को इतना विकसित कर सकता है कि वह किसी भी भयंकर से भयंकर हिंस्र और विषैले से विषैले प्राणी के साथ सौहार्द्रपूर्ण सम्बन्ध स्थापित कर सकता है। आखिर उन प्राणियों से भी तो प्रेम सद्भाव होता है। प्रेम सद्भाव न सही वे उनके साथ सहजीवन तो व्यतीत करते ही है।
मनीषियों का कहना है कि रूप गुण आकृति और प्रकृति में भिन्न होते हुये भी सभी प्राणियों में एक ही चेतन सत्ता विद्यमान है। इस तथ्य को समझ लिया जाय तो सुनिश्चित आध्यात्मिक अभ्यासों यौगिक साधनाओँ द्वारा उस चेतना से सम्बन्ध स्थापित किये जा सकते है। अध्यात्म विज्ञान में जड़ को गौण और चेतना को प्रमुख स्थान इसलिये मिला है कि वह स्थूल प्रकृति की मर्यादाओं से बंधी हुई नहीं है और अपना स्वतंत्र विकास करने से सक्षम है।
मनुष्य की शारीरिक क्षमताओं के अतिरिक्त जिन शक्तियों की भौतिक विज्ञान द्वारा अभी तक जाना अथवा अनुभव किया जा सका है वे मस्तिष्कीय शक्तियां है जिनमें इच्छा ज्ञान अनुभव और बुद्धि आती है। परन्तु इन शारीरिक और मानसिक क्षमताओं की एक सीमा है। अध्यात्मदर्शन इन शक्तियों से भी अधिक समर्थ सक्षम आत्मिक शक्ति को महत्वपूर्ण मानता है जिसकी क्षमता का तो अभी अनुमान ही नहीं लगाया जा सका है। वह मानसिक शक्तियों से भी अधिक समर्थ संकल्प आस्था और विश्वास की शक्ति को मानता हैं। तत्वदर्शियों की मान्यता है कि इन शक्तियों को अर्जित विकसित करने में किन्हीं बाहरी योग्यताओं की आवश्यकता नहीं पड़ती। इनके विकास का अपना अलग ही विज्ञान है और उसके अलग ही नियम है जिनके अनुसार क्रमबद्ध विकास हो है। श्रद्धा और विश्वास के आधार पर परिपक्व हुआ अन्तःकरण मनुष्य में इस तरह की विशेषतायें उत्पन्न कर सकता है जिनके आधार पर वह जड़ प्रकृति को भी अपने अनुकूल ढाल लेता है तथा विपरीत स्वभाव के प्राणों से भी मित्रता स्थापित कर लेता है। यत्र−तत्र दिखायी देने वाले उदाहरण इसी क्षमता के साँकेतिक प्रमाण है।
कुछ समय पूर्व तक विज्ञान जगत में आत्मा और ईश्वर की गुत्थी बड़ी उलझाव भरी थी। उसके लिये सबसे बड़ी समस्या यह थी कि स्थूल यंत्रों द्वारा सूक्ष्म तत्व की पुष्टि कैसे की जाय? और बिना पुष्टि के प्रत्यक्षवादी विज्ञान उसे स्वीकार कैसे करे? प्रश्न गंभीर थे, पर पिछले दिनों विज्ञान ने उन्हें जड़ चेतन के समन्वय के रूप में स्वीकार कर लिया है। आत्मा को अर्ध चेतन और जड़ के रूप में मान्यता मिली और इसी अनुपात में परमात्मा को अर्ध ब्रह्म और अर्ध प्रकृति के रूप में स्वीकारा गया।
अध्यात्मवाद को यह स्थिति भी स्वीकार है। चेतना विज्ञान के विशेषज्ञों के अनुसार काम इतने से भी चल सकता है। वे कहते हैं कि अर्धनारी नरेश्वर की प्रतिमाओं में इस मान्यता की स्वीकृति है। वहाँ ब्रह्म और प्रकृति का युग्म ब्रह्मविद्या के तत्वदर्शन ने स्वीकार किया है। ब्रह्मा,विष्णु महेश अपनी अपनी पत्नियों को साथ लेकर ही चलते है। शक्ति के अभाव में परमसत्ता का कोई अस्तित्व नहीं माना जाता। प्रकृति और परमात्मा के समन्वय से ही जीवात्मा की उत्पत्ति हुई है, ऐसे प्रतिदिन ब्रह्मविद्या की अनेक व्याख्याओं में उपलब्ध है।
विज्ञान अपनी भाषा में परब्रह्म को, परमात्मा को ब्रह्माण्डीय चेतना के रूप में स्वीकार करने लगा है और उसका घनिष्ठ संबंध जीव चेतना के साथ जोड़ने में उसे अब विशेष संकोच नहीं रह गया है। यह मान्यता जीव ओर ब्रह्म को अंश और अंशों के रूप में मानने की वेदान्त व्याख्या से बहुत भिन्न नहीं है।
अभी पिछले ही दिनों विज्ञानवेत्ताओं ने एक ब्रह्माण्डीय ऊर्जा का अस्तित्व स्वीकार किया है। इससे पूर्व पृथ्वी पर चल रही भौतिकी को ही पदार्थ विज्ञान की सीमा माना जाता था पर अब एक ऐसी व्यापक सूक्ष्म सत्ता का अनुभव किया गया है जो अनेक ग्रह नक्षत्रों के बीच तालमेल बिठाती हैं पृथ्वी पर इकोलॉजी का सिद्धान्त प्रकृति की एक विशेष व्यवस्था है। वनस्पति, प्राणी भूमि वर्षा रासायनिक पदार्थ आदि के बीच परस्पर संतुलन काम कर रहा है। और वे सब एक दूसरे के पूरक दूसरे के पूरक बन कर रह रहे है। इतना तो उनकी समझा में आता था पर जड़ समझी जाने वाली प्रकृति की वह अति दूरदर्शितापूर्ण चेतन व्यवस्था उन भौतिक विज्ञानियों के लिये सिर दर्द थी जो पदार्थ के ऊपर किसी ईश्वर जैसी चेतना का अस्तित्व स्वीकार नहीं करते। अब ब्रह्माण्डीय ऊर्जा उससे भी बड़ी बात है। ग्रह पिण्डों के बीच एक दूसरों के साथ आदान प्रदान की सहयोग संतुलन की जो इकोलॉजी से भी अधिक बुद्धिमत्ता पूर्ण व्यवस्था दृष्टिगोचर हो रही है उसे क्या कहा जाय?
परामनोविज्ञान की नवीनतम शोधें भी इसी निष्कर्ष पर पहुँची है मनुष्य चेतना ब्रह्माण्ड चेतना की अविच्छिन्न इकाई हैं अस्तु प्राण शरीर में सीमित रहते हुए भी असीम के साथ अपना संबंध बनाये हुये है। व्यष्टि और समष्टि की मूल सत्ता में इतनी सघन एकता है कि एक व्यक्ति समूची ब्रह्म चेतना का प्रतिनिधित्व कर सकता है।
परमाणु सत्ता की सूक्ष्म प्रकृति का विश्लेषण करते हुये विज्ञान इस निष्कर्ष पर पहुँचा है कि दो इलेक्ट्रानों को पृथक दिशा में खदेड़ दिया जाय तो भी उनके बीच पूर्व संबंध बना रहता है। वे कितनी ही दूर रहें एक दूसरे की स्थिति का परिचय अपने में दर्पण की तरह प्रतिबिंबित कर प्राप्त करते रहते है। एक की स्थिति को देख कर दूसरे के बारे में बहुत कुछ पता मिल सकता है। एक को किसी प्रकार प्रभावित किया जाय, तो उसका साथी भी अनायास ही प्रभावित हो जाता है इस प्रतिदिन पर आइंस्टीनरोजेन पोटोल्स्की जैसे विश्व विख्यात विज्ञानवेत्ताओं की मुहर है। इस सिद्धान्त से एक व्यापक सत्ता और उसके सदस्य रूप में छोटे घटकों की सिद्धि तथा पृथक रहते हुये भी एकता का तारतम्य बने होने की पुष्टि होती है।
विज्ञान की मान्यता के अनुसार पूर्ण को जानने के लिये उसका अंश जानने की और अंश के अस्तित्व को समझने के लिये उसके पूर्ण रूप को समझाने की आवश्यकता पड़ती है। इसके बिना यथार्थता को पूरी
तरह नहीं समझा जा सकता। मूर्धन्य विज्ञानी फ्रिटजाँफ काप्रा ने अंश या अंशों के बीच अविच्छिन्न संबंध होने की बात का अपनी प्रसिद्ध पुस्तक ताओ ऑफ फिजिक्स में विस्तारपूर्वक प्रतिपादन किया है। इसी का समर्थन करते हुए ग्राण्ड यूनिफाइड सिद्धान्त के संयुक्त नोबबल पुरस्कार विजेता षेल्डन ग्लेषों ने अपनी पुस्तक वर्ल्ड अराउण्ड अस में कहा है कि परमाणु का प्रत्येक घटक विश्व ब्रह्माण्ड का परिपूर्ण सदस्य है। इस सदस्यता को किसी भी प्रकार निरस्त नहीं किया जा सकता। दोनों एक दूसरे के पूरक होकर ही आदिकाल से रहे हैं और अनन्तकाल तक अपने सघन संबंध यथावत बनाये रहेंगे।
कभी आइंस्टीन ने कहा था कि ब्रह्माण्डीय चेतना का अस्तित्व सिद्ध कर सकने योग्य ठोस आधार विज्ञान के पास मौजूद है। रुडोल्फ स्टीनर ने अपने ग्रन्थ गाँड एण्ड दि यूनिवर्स में आइंस्टीन के प्रतिपादन का और भी अच्छी तरह सिद्ध करने के आधार प्रस्तुत किये है।
जीव विज्ञानी मोर्गन ने ब्रह्माण्डीय चेतना के अस्तित्व और उसके कार्य क्षेत्र पर और भी अधिक प्रकाश डाला है। वे उसे जीवाणुओं में अपने ढंग से और परमाणुओं में अपने ढंग से काम करती हुई बताते है और भारतीय दर्शन की परा और अपना प्रकृति को ब्रह्म पत्नी के रूप में प्रस्तुत करने वाली मान्यता के समीप ही जा पहुंचते हैं इस संदर्भ में उन्होंने विस्तृत प्रकाश अपनी दि किगंडम ऑफ एनिमल एण्ड दि किगंडम ऑफ गॉड पुस्तक में डाला है।
विज्ञान को परमाणु संरचना के बारे में जब से जानकारी मिली है, वैज्ञानिक परमाणु की इलेक्ट्रॉन प्रक्रिया को समर्पण रूप से मात्र यंत्रों के सहारे ही नहीं जाना जा सकता। उसके अस्तित्व का दर्शन ओर निरूपण करने वाला सबसे सशक्त यंत्र है मानवी मस्तिष्क। अन्य उपकरण तो इस संदर्भ में थोड़ी सी सहायता मात्र करके रह जाते है। परमाणु की विवेचना नेत्र का नहीं गणित का विषय है। उसकी हलचलों से उत्पन्न प्रक्रिया के आधार पर गणित करके यह पता लगाया जाता है कि परमाणु और उसके उदर में हलचल कर रहे घटकों का स्वरूप स्तर एवं क्रिया कलाप क्या होना चाहिये। वानी लुडबिग ने इसे और भी स्पष्ट करते हुये अपनी पुस्तक “क्वाटंम मिकैनिज्म “ में कहा है कि क्वाँटम शास्त्र यंत्रों पर नहीं वैज्ञानिकों की मानसिक चेतना पर अवलम्बित है।
क्वाँटम थ्योरी के उक्त सिद्धान्त ने यह सिद्ध कर दिया है कि जड़ और चेतन की सत्ता एक दूसरे से भिन्न स्तर की दीखते हुये भी वस्तुतः उनके बीच सघन तादात्म्य मौजूद है। पदार्थ एक स्थिति में ठोस रहता है। फिर द्रव बन जाता है तत्पश्चात गैस और तापक्रम जब और उच्च हो जाता है तो वह अपनी चतुर्थ अवस्था “प्लाज्मा” में पहुँच जाता है।तापमान जब और उच्चतम होता है, तो पदार्थ सर्वथा अपदार्थ स्थिति में परिवर्तित हो जाता है।विज्ञान इसे ऊर्जा करी कर पुकारता है। अध्यात्म में इसे चेतना नाम दिया गया है। इस प्रकार जड़ चेतन में और चेतन जड़ में परिणत हो सकता है। मन की सत्ता शरीर रूप में, परार्थ रूप में प्रकट हो सकती और एक स्थिति में पहुँच कर पदार्थ भी बन सकती है।
विवेकानन्द ने अपनी पुस्तक राजयोग में लिखा है कि इस संसार में जितने प्राणी पदार्थ है सब सृष्टि के आरंभ में आकाश तत्व से उत्पन्न होते है। और अन्त में पुनः उसी में विलीन हो जाते है।
इसी प्रकार यहाँ जितनी भी भौतिक,अभौतिक शक्तियां काम कर रही है, सभी प्राण के रूपांतरण है उन्हीं की विभिन्न अभिव्यक्तियाँ है। सृष्टि के अन्त में यह सभी शक्तियां पुनः अपने मूल रूप प्राण में परिवर्तित हो जाती है। विज्ञान की ग्राण्ड यूनिफाइड थ्योरी इसी तथ्य की पुष्टि करती है और कहती है कि सृष्टि संरचना से पूर्व सभी शक्तियां एकरूप थी।
स्पष्ट है हर जड़ चेतन में भिन्न-भिन्न रूपों में एक ही शक्ति क्रीड़ा कल्लोल कर रही है। जब वह पिंड और प्राणियों में विभिन्न क्रियाओं के रूप में कार्य करती दिखाई पड़ती है, तो आत्म चेतना के नाम से जानी जाती है। वस्तुतः वह दोनों है एक ही। उन्हें न तो पृथक माना जा सकता है न क्रिया। यह बात धीरे-धीरे विज्ञान की समझ में अब आने लगी है।
मिष्ठान्न का नामोच्चारण करने भर से मुँह न मीठा होता है और न पेट भरता है। ईश्वर की रट लगाने और धर्म की दुहाई देने से भी हाथ कुछ नहीं आता।
समय का सदुपयोग तब बन पड़ता है जब उसके साथ उत्साह भरा विचार भी जुड़ा हुआ हो। देखा यह जाता है। क्रिया और विचारणा एक साथ धुल मिल कर नहीं चलती।काम हाथ में कुछ है और विचार प्रवाह किसी अन्य दिशा में बह रहा है, ऐसी दशा में काम और विचार परस्पर घुले हुये नहीं रहते। ऐसी दशा में समय जिस प्रयोजन के लिये लगाया जाना चाहिये था लग नहीं पाता। क्षमता दो भागों में बंट जाती है।। फलतः न चिन्तन सही दो भागों में बंट जाती है फलतः न चिन्तन सही हो पाता है और कार्य।समय का नियोजन भी वैसा नहीं हो पाता जैसा होना चाहियें। जब तक यह स्थिति बनी रहेगी तब तक समय के साथ काम करने वाली दोनों षक्याँ आपस में सामंजस्य न बिठा सकेंगी। यह अधूरापन रह जाने पर काम भार रूप अरुचिकर बना रहता है और उसमें लगाया गया समय सार्थक नहीं हो पाता।
समय का सदुपयोग किसी कार्य के साथ जुड़ने पर ही हो पाता है। निठल्ले बैठे रहने पर समय की बरबादी ही होती रहेगी। भले ही उस समय कल्पना की उड़ाने उड़ते या किसी मनोरंजन में दिल बहलाते रहा जाय। निठल्ले व्यक्ति आलसी प्रमादियों की तरह समय गुजारने के लिये कुछ न कुछ आधार तो ढूंढ़ लेते है फिर भी उसे वक्त की बरबादी ही कहा जायेगा। जिस काम के साथ कोई महत्वपूर्ण उद्देश्य न जुड़ा हो वह रुचिकर नहीं हो सकता। अरुचि के रहते शरीर द्वारा की जा रही हरकतें एक प्रकार से बेगार भुगतने जैसी ही होती है उनमें न काने कुबड़े काम ऐसी ही मनःस्थिति में बन पड़ते है। उनसे न अपने को संतोश होता है ओर न उस निर्माण का उपयोग करने वाले को। इस स्थिति प्रामाणिकता में चार चाँद लगते है। ऐसी दशा में यह नहीं माना जा सकता कि समय का सदुपयोग हुआ। भले ही वह अवधि किसी व्यस्तता के बीच ही क्यों न गुजर गई हो।
कई बार ढर्रे के कामों में ही लगे रहकर समय व्यतीत करना पड़ता है। प्रायः नित्य कर्म नाश्ता काम पर जाना रात घर लौटना और खाकर सो जाना। इसी बीच कुछ समय सुस्ताने और यत्किंचित् मनोरंजन की भी व्यवस्था कर ली जाती है घर खर्च चलाने के लिये भी इसी नियति में परिभ्रमण करना पड़ता है। नवीनता के इच्छित अभिरुचि के कार्य न बन पड़ने पर निजी योजनाओं और महत्वाकांक्षाओं का समावेश नहीं हो पाता। तब मौलिक स्तर पर सोचने योजन बनाने और कार्य करने की गुंजाइश नहीं रहती। देखा गया है कि इस स्थिति को बदलने की गुंजाइश दीखने पर भी इच्छानुसार कुछ कर गुजरने की मनः स्थिति नहीं बनती। अस्तु जैसा कुछ चल रहा है उसी को नियति समझकर स्थितियों के साथ तालमेल बिठा लेते है। आगे की बात सोचने और भविष्य को इच्छानुरूप ढालने की संभावना ने देखकर उस ओर से उदास हो जाते हैं ऐसी दशा में यह किया जाना चाहिये कि अपने निर्धारित कार्यों को ही रुचिकर बनाने के लिये स्थिति को तैयार करना चाहिये और जो कार्य हाथ में है उसे अधिक बारीकी से समझते हुये आधिक सुन्दर और अधिक सुव्यवस्थित बनाने का प्रयत्न करना चाहिये।
काम छोटा हो या बड़ा उसका स्वरूप कैसा बन पड़ा यह इस बात पर निर्भर करता है कि उसके साथ कितनी दिलचस्पी जुड़ी रही, उसमें त्रुटियाँ न रहने देने के लिये कितनी चेष्टा की गई। सर्वांगपूर्ण बनाने के लिये उसे हेतु कितनी तत्परता बरती गई। यदि काम मनोयोगपूर्वक किया गया होगा उसे प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाकर अधिकाधिक अच्छी तरह किया गया होगा तो निश्चय ही वह कृति अलग ही अपनी गौरव गरिमा का परिचय देगी। उसका सौंदर्य अलग से चमकेगा। साधारण होते हुये भी उसे विशेषता भरा देखा जायेगा।
घोंसला कबूतर भी बनाता है और बया पक्षी भी पर दोनों की कृतियाँ में जमीन आसमान जैसा अन्तर रहता है। कबूतर आड़ी टेड़ी लकड़ियाँ रखकर अपने बैठने आराम करने की जगह बना लेता है। उसी में अण्डे देता है। यह कमजोर बनावट हव का तेज झोंका आते ही नीचे गिर पड़ती है। घोंसला उजड़ जाता है और अण्डे जमीन पर गिरकर नष्ट हो जाते है। इसके विपरीत बया चिड़ियाँ शरीर से छोटी होते हुये भी मनोयोगपूर्वक अपना घोंसला बुनती है। साइज के तिनके बिनकर लाती ही और उन्हें सतर्कता पूर्वक एक दूसरे के साथ गूँथती है। आदि मध्य अन्त की बनावट कैसी हो उसमें क्या फर्क रहे इसका ध्यान रखती है फलतः वह निर्माण ऐसा बन पड़ता है मानों किसी कुशल कारीगर ने अपनी समूची कलाकारिता दाँव पर लगाकर उसे बनाया है। उसके भीतर आराम से रहती है। अण्डे बच्चों के लिये हर ऋतु में वहाँ रह सकने की सुविधा प्रदान करती है। कबूतर लापरवाही से किसी प्रकार लकड़ियाँ इकट्ठी करके घोँसले के नाम पर कुछ भी सुगढ़ अनगढ़ बना लेता है पर बया ही अपने घोंसले में संजोई गई कारीगरी की ओर दर्शकों का ध्यान आकर्षित करती है।
यही बात कंधे पर आये हुये सामान्य कार्यों के ऊपर भी लागू होती है। उनमें नवीनता न हो तो क्या?कोई महत्वाकांक्षी योजना न जुड़ी हुई हो तो क्या? साधारण और हलके काम भी ऐसी विशेषता से सम्पन्न बनाये जा सकते है कि उन्हें अन्यान्य सहकर्मियों की कृतियों के बीच अतिरिक्त श्रेय सम्मान मिल सके।
प्रकाश जिस वस्तु पर भी पड़ता है वह चमकने लगती है अंधेरे में हर वस्तु धुँधली या अदृश्य हो जाती है। आलस्य अपेक्षा अस्त–व्यस्तता ही अंधकार है जिसके कारण हर काम घटिया स्तर का धुँधले जैसा बन जाता है। किंतु उसे यदि प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाकर पूरे मनोयोग के साथ किया गया है तो उसकी सुघड़ता दूर से ही दिखाई पड़ेगी। इसे करने वाले के बारे पूछताछ की जायगी। आर अनुमान लगाया जायेगा कि यह कोई विचारशील या क्रिया कुशल होना चाहिये। इतनी भर मान्यता बन जाने पर उस व्यक्ति को ऊंचे दर्जे के काम सौंपे जाते है। लोग उसकी इज्जत करते है और चाहते है कि उसका सहयोग लें या अपना सहयोग उसे प्रदान करें। इसी आधार पर एक से दूसरी सीढ़ी पार कर ऊंचे चढ़ते जाना संभव होता रहता है। काम को किसी तरह निपटाने वालों के सम्बन्ध में यही समझा जाता है कि यह श्रमिक स्तर का प्राणी है। खेती में काम करने वाले बैल या बोझा ढोने वाले गधे की तरह किसी प्रकार अपनी बला टालता रहता है। उत्साह के अभाव में कोई काम न तो जल्दी हो पाता है और न उसमें विशेषता उभर पाती है सामान्य मनोयोग वाला व्यक्ति अपने स्तर और जीवन को घटिया ही बनाये रहता है। वह दिन तो किसी प्रकार गुजार लेता है पर ऐसा प्रकार गुजार लेता है पर ऐसा अवसर पाने से वंचित ही रहता है जिसमें प्रगति हो सके और प्रशंसा मिल सके।
जिन्हें स्वतंत्र बुद्धि से किये जाने योग्य स्वतंत्र व्यवसाय या व्यवस्था के काम हाथ लगते है वे अपने निर्मा में अधिक कुशलता का समावेश करके अन्यों की तुलना में बढ़चढ़ कर प्रतिस्पर्धा कर सकते है। उपभोक्ताओं का ध्यान अपनी ओर अधिक आकर्षित कर सकते है। जिस वस्तु को प्रामाणिक और सही पाया जायेगा। उसकी माँग अन्य सस्ती वस्तुओं की तुलना में कही अधिक रहेगा। यह नहीं सोचा जाना चाहिये कि मात्र वस्तु के सस्ते होने के कारण ही उसके अधिक ग्राहक होते है। उन लोगों की भी कमी नहीं जा अच्छी टिकाऊ और सुन्दर वस्तु चाहते है भले ही उसका मूल्य अधिक ही क्यों न देना पड़े। स्थायी ग्राहक इसी आधार पर मिलते है।
अच्छी वस्तुएं अच्छी सामान से बनती है यह ठीक है। पर इससे भी अधिक ठीक बात यह है कि उनके साथ कुशल कारीगरों का अनुभव और मनोयोग भी जुड़ा होता है। इन सबसे बड़ी बात है व्यवस्थापक की सूक्ष्म बुद्धि जिसके आधार पर कहीं कोई भूल नहीं रहने दी जाती और अपनी कृति के अधिकाधिक सुन्दर सुनियोजित सर्वांग सुन्दर बनाने की कोशिश की जाती है।
व्यक्तित्व के धनी ही अपने-अपने क्षेत्रों का नेतृत्व करते देखे जाते हैं। राजनीतिक सामाजिक आर्थिक पारिवारिक वैज्ञानिक कलाकारिता जैसे क्षेत्रों में बाजी वे मारते हैं जिनने अपनी प्रती को बढ़ाया और उसे सही अवसर सही काम में लगाया। किसी भी क्षेत्र के मूर्धन्य लोगों को देखा जाय वे सामान्य से असामान्य स्तर तक इसी आधार पर पहुँचे हैं कि उन्होंने निर्धारित प्रयोजनों में अधिकाधिक समय समूचे मनोयोग और पूरे उत्साह के साथ लगाया। यदि उनने बेगार भुगतने की तरह किसी प्रकार अपने कामों को निपटाया होता कुछ खुद किया कुछ दूसरों पर छोड़ा तो निश्चय ही प्रतिस्पर्धा में आगे निकल सकने का सुयोग कभी सामने न आता।
एक ही स्थिति में पैदा हुये एक जैसे साधनों वाले व्यक्तियों में से कुछ तेजी से आगे बढ़ते और ऊंचे उठते देखे जाते है जबकि उनके दूसरे साथी उसी गई गुजरी दशा में दिन बिताते रहते है। उठने वालों उठाने में सभी सहायता करते है जबकि यथा स्थिति यथा स्थिति में गुजर करने वालों को देखकर लोग मुंह मोड़ लेते है और उन्हें घटिया मान कर चल देते है। न कोई उन्हें साथ लेते है ओर न सहयोग देता है। सहयोग न मिलने की सुयोग हाथ न आने की शिकायतें तो कई लोग करते है पर यह भूल जाते है कि अपने व्यक्तित्व और कर्तव्य में कही कई ऐसी कमी रह रही है जिसके कारण बढ़ी सफलताओं के सुयोग हाथ नहीं आता। जब तक अपनी विशेषताओं को उभारा न जायेगा तब तक प्रतिस्पर्धा के आधार पर चल रहे इस संसार में किसी को भी महत्वपूर्ण प्रगति कर सकने का सुयोग हाथ नहीं लग सकता।
सद्गुणों की संख्या अनेकों में है वे सभी अपने अपने स्थान पर उपयोगी और चमत्कारी है। पर इन सब में समय का सदुपयोग सभी से बढ़ा चढ़ा है। उसे अपनाने पर मन को वश में रखने का लाभ मिलता है। कुमार्ग अपनाने के लिये अवसर अवकाश ही नहीं मिलता। यह बड़ा लाभ है। मन यदि भटके नहीं कुमार्ग पर कदम बढ़े नहीं तो समझना चाहिये कि श्रेय साधना का लक्ष्य हस्तगत हो गया।
इसका सीधा सा उपाय यह है कि अपने समय को सुनियोजित किसी काम में लगाये रहा जाय। साथ ही उसमें पूरा मनोयोग नियोजित रखा जाय। रुचि ली जाय तो वही कार्य जो पहले रूखा प्रतीत होता था पीछे मनोरंजक ज्ञानवर्धक और सर्वतोमुखी प्रगति में सहायक सिद्ध होगा।
रवीन्द्र नाथ टैगोर अपने कमरे में बैठे कविता लिखने में व्यस्त थे कि इतने में एक छुरा लिये हुये गुण्डे ने उनके कमरे में प्रवेश किया। उसे किराये पर हत्या करने के किसी ईर्ष्यालु ने भेजा था।
रवीन्द्र ने आँख उठा कर उसकी तरफ देखा। सारा मामला भाँप लिया। उनने उंगली का इशारा करके शांत भाव से चुपचाप एक कोने में पड़े स्टूल पर बैठ जाने को कहा। देखते नहीं मैं कितना जरूरी काम कर रहा हूँ।
हत्यारा सकपका गया। इतना निर्भीक और संतुलित व्यक्ति उसने अपने जीवन में पहले कभी नहीं देखा था। वह कुछ देर तो बैठा रहा पर पीछे उसे पैर उखड़ गये और उलटे पैरों भाग खड़ा हुआ।
राजा अश्वघोष वैराग्य लेकर ईश्वर दर्शन की लालसा से देश देशांतरों में भ्रमण करते रहे तीर्थ यात्रा से शांति मिली न देव दर्शन से। कथा प्रवचन सुनते रहे उससे भी कोई बात बनी नहीं। साधना में मन ही न लगा।
इस प्रयास परिभ्रमण में वे एक किसान के खलियान में जा पहुंचे, वह बहुत प्रसन्न और संतुष्ट दीख रहा था। उसे तृप्ति और शांति का रसास्वादन करते पाया मस्ती के गीत गा रहा था और हल चला रहा था।
अश्वघोष वहीं बैठ गये और किसान से वैसी ही तृप्ति उन्हें भी प्रदान करने की याचना करने लगे
किसान ने सभी बात जानी और कठिनाई समझी। वैरागी को पेड़ तले बैठा लिया। जो चावल पास में थे। वह परोसे और आधा आधा बाँट कर खाया। पेट भर गया तो दोनों को गहरी नींद आ गई और उसी छाँव में देर तक सोते रहे।
दोनों साथ साथ जागे। किसान ने कहा परिश्रम पूर्वक कमाया और मिल बाँट कर खाया जाय तो वैसी शांति मिल सकती है जैसी कि ज्ञानी वैरागी चाहते हैं।
राजा की आँख खुल गई और उनने वही रीति नीति अपनाई जैसी कि किसान ने प्रत्यक्ष दिखाई थी।
महाराष्ट्र के पेषव माधवराव के गुरु मंत्री एवं प्रधान न्यायाधीश जैसे उच्च पदों पर श्री राम शास्त्री नामक एक कुलीन ब्राह्मण थे। विद्वता एवं उच्च पदों से सम्पन्न होकर भी शास्त्री जी का जीवन सादगी का मूर्त रूप था।
एक दिन शास्त्री जी की धर्मपत्नी आवश्यक कार्यवश राजमहल में रानी के पास गयी। रानी ने गुरुपत्नी को जनसाधारण से भी सादा वस्त्रों में देखा तो बड़ा आश्चर्य हुआ उसे। गुरुपत्नी की यह स्थिति उसे अपने और स्वयं महाराज माधवराज के सम्मान में एक कमी मालूम हुई। उसने सोचा गुरुपत्नी की इस दशा से महाराज की निन्दा होना स्वाभाविक है। रानी ने गुरुपत्नी को सुन्दर सुन्दर बहुमूल्य वस्त्र आभूषण पहनाये और सम्मान के साथ कहारों द्वारा पालकी में बैठाकर घर भिजवाया।
कहारों ने द्वार पर जाकर किवाड़ खटखटाये। शास्त्री जी बाहर आये किवाड़ खोले किन्तु यह कह कर बन्द कर दिये। भाई यह बहुमूल्य वस्त्राभूषणों से अलंकृत देवी कोई और है आप लोग भूल से यहाँ आ गये इन्हें तो किसी भव्य महल या राज प्रसादों में ले जाओ।
शास्त्री जी की धर्मपत्नी उनके स्वभाव को भली प्रकार जानती थी। वह राजमहल में लौट गयी और वहाँ उन बहुमूल्य वस्त्राभूषणों को छोड़कर अपने पूर्व वस्त्र धारण किये और पैदल ही राजमहल से अपने घर तक आई। घर पर आई तो दरवाजा खटखटाना नहीं पड़ा दरवाजा खुला था।
शास्त्री जी ने कहा, भद्रे! बहुमूल्य वस्त्र आभूषण तो अविवेकी लोगों द्वारा अपनी अज्ञानता संकीर्णता क्षुद्रता को छिपाने के साधन हैं। इस पर भी हम तो ब्राह्मण हैं दूसरों को प्रगति और मर्यादाओं पर चलने का मार्ग दिखाने की संपत्ति सादगी ही होती है।
माँ गंगे अवतरित हो। तुम्हारे बिना कौन इस ताप को मिटाएगा? यह ताप तुम्हारे लाखों लाख पुत्रों को कब से जला रहा है और कब तक जलाता रहेगा? करुणा करो माँ!
भगीरथ प्रार्थना कर रहे थे, किन्तु उसका प्रभाव कुछ दीख नहीं रहा था। माँ के कान क्या बहरे हो गये? करुणा के स्रोत क्या सूख गये? अन्तःकरण से आवाज उठी- नहीं यह सम्भव नहीं। प्रार्थना के साथ प्रयास पुरुषार्थ का पुट चाहिये।
भागीरथ लग गये पुरुषार्थ की साधना में। प्रचण्ड तप की अगाध श्रृंखला चल पड़ी। तन सूख गया प्राण प्रवाह अवरुद्ध होता दिखा पर उसकी चिन्ता किसे .............अन्दर दिव्य करुणा का प्रवाह जो सतत् उफन उमंग रहा था और समय आया कि भगीरथ मौन साधना में रत थे- माँ बुला रही थी वत्स इधर देखो बोलो क्या चाहते हो?
भगीरथ का ध्यान टूटा तन्मयता के तार बिखरे देखा माँ गंगा के अन्तःसलिल में करुणा छलक उठी।..............माँ तुम आ गयी माँ बस.............और क्या चाहिये अब तुम आ गयी माँ बस .............और क्या चाहिये,अब तक कहाँ थी।
मैं तो कब से बुला रही हूँ वत्स! मेरे प्रवाहित होने की शीघ्र व्यवस्था करो।
भगीरथ ने शीश झुकाया, भगवान शंकर ने अनुग्रह किया और गंगा की धारा भूतल पर प्रवाहित हो उठी। शीतलता मृदुता का वेग फूट पड़ा। जन जीवन में आनन्द लहरा उठा। लोग दर्शन मज्जन पान द्वारा विविध दुखों से मुक्ति पा रहे थे। भगीरथ ने देखा दुखित - क्लान्त चेहरों पर उल्लास की आभा खिलने लगी। उनको परम सुख की अनुभूति हुई, रोम रोम पुलकित हो उठा। हर्षातिरेक में नेत्र बन्द हो गये जैसे समाधि लग गयी। लोगों ने उल्लास में भरकर जयघोष किया - बोलो पाप तापनाशिनी माँ भागीरथी की जय।
भागीरथ चौंक पड़े। विस्फोटित नेत्र से चारों ओर देखने लगे। यह कैसा सम्बोधन भागीरथी अर्थात् भगीरथ की पुत्री। माँ के प्रति ऐसा सम्बोधन करने की धृष्टता किसने की क्यों की? पर गंगा मन्द मृदुल मुस्करा रहा थी। भगीरथ के चेहरे पर विस्मय के साथ रोष उभर आया बोले - माँ क्षमा करो, जिसके मुँह से माँ को अपमानित करने वाला यह सम्बोधन निकला है उसे मैं दण्डित करूंगा शाप दे दूँगा। नहीं वत्स! मेरा अपमान कोई नहीं कर सकता न ही कर रहा। तुम शांत रहो। यह तो मेरा यथार्थ सम्मान हो रहा है मेरा अपमान तो अब तक हो रहा था। नासमझ लोग मेरी करुणा को लाँछित करते थे। उन्हें यह नहीं समझ थी कि उसके लिये भी कुछ सीमा मर्यादायें निर्धारित है। उनकी पूर्ति के बिना मेरी करुणा रुद्र भी ओर लोग मेरी भावना को दोष देते थे। आज उन्हें यथार्थ समझ में आया। भागीरथी सम्बोधन के पीछे उस मर्यादा पूर्ति की अनिवार्यता समझ लेने की स्वीकारोक्ति छिपी है। लोगों ने यह समझ इसे स्वीकार किया इससे मुझे सन्तोश है। मुझे यह सम्बोधन स्वीकार है।
भगीरथ कातर हो पुकार उठे माँ यह कैसा अनर्थ पुत्र को पिता सम्बोधन? मुझे तो तुम्हारा वात्सल्य चाहिये ममता चाहिये माँ मुझे यह सब कैसे सहन होगा?
वत्स! विकल मत हो। तुम्हारे लिये तो मैं वही हूँ और मेरा स्नेह उसी रूप में तुम्हें मिलता रहेगा। किन्तु संसार के लिये मैं भागीरथी ही बनकर रहूँगी। पुत्र तुम तपःसिद्ध हो तपोपूत हो। तुम्हारे नाम के साथ तप की भावना और पद्धति की उत्कृष्टता जुड़ी हुई है माँ की करुणा या शिव का अनुग्रह प्रवाहित करने के लिये यह भावनायुक्त तप आवश्यक है अनिवार्य है इस तथ्य को लोग सम्बोधन के सहारे समझेंगे। घटना को तो लोग भुला सकते हैं। ऐसा हुआ तो मेरे साथ पुनः अन्याय हो जायेगा। इस सम्बोधन के साथ जो सिद्धान्त बोलता है वह युगों युगों तक मेरे प्रति जन दृष्टिकोण को शुद्ध बनाये रखेगा और इससे मर्म समझने वालों का हित होता रहेगा।”
गंगा मौन हो गयी और भगीरथ नतमस्तक। न जाने माँ की भावना की महानता के स्मरण से या तप की अदम्य क्षमता देखकर।
जीवन का एक पक्ष संघर्ष भी है। भीतर के कुविचार और बाहर के अनाचार ऐसे हैं जिन्हें बिना लड़े निरस्त नहीं किया।
ईश्वर उपासना दो रूपों में प्रचलित है साकार तथा निराकार। निराकारवादी प्रायः साकार उपासना या मूर्ति पूजा का विरोध करते है पर वे यह भूल जाते है कि ऋषि मनीषियों ने दोनोँ उपासना पद्धतियों का निर्माण मनुष्य के बौद्धिक स्तर की अनुकूलता के अनुरूप किया है। जिस व्यक्ति का बौद्धिक स्तर जितना ऊंचा है उसे उसी ढंग की उपासना पद्धति का निर्देश गुरुजन देते है। जिस व्यक्ति का बौद्धिक विकास मध्य श्रेणी का है शास्त्रों के स्वाध्याय से भी वह वंचित है उसे यदि निराकार उपासना की दीक्षा दी जाय तो उसे उस उपासना से कोई लाभ न होगा, क्योंकि उसकी अन्तः चेतना का इतना विकास नहीं हुआ है कि ईश्वर के वास्तविक निराकार तत्व को समझ सके। यदि एक निर्बल बौद्धिक स्तर वाले व्यक्ति से यह कहा जाय कि ईश्वर सर्वव्यापक है परन्तु वह इन स्थूल नेत्रों से दृष्टिगोचर नहीं होता उसका कोई रंगरूप नहीं है तो निश्चित रूप से उसकी बुद्धि ईश्वर के अस्तित्व को ही मानने से इनकार कर देंगी।
चूँकि सामान्य बौद्धिक स्तर वाले व्यक्तियों के लिये अध्यात्म के सूक्ष्म तथ्यों पर ध्यानावस्थित होना कठिन होता है इसलिये मानव मनोविज्ञान के ज्ञाता ऋषियों ने प्रतीक
पूजा की मूर्ति पूजा की प्रथा चलाई ताकि उस मूर्ति को माध्यम बनाकर वह उस अनन्त को साकार रूप में अपने सामने देख सके। निराकार ब्रह्म का मानसचित्र बनाना सबके लिये संभव नहीं। यदि प्रतीकवाद या मूर्ति पूजा का आरंभ न होता। तो आज विश्व की अधिकांश जनसंख्या नास्तिक होती क्यों कि अशिक्षित और पिछड़े स्तर के जनमानस में ईश्वर के निराकार तत्व पर विश्वास ही न होता। केवल उपासना थोड़े से उच्चकोटि के विचारकों तत्ववेत्ताओं और योगियों तक ही सीमित रह जाती ओर मानव जाति का आत्मिक विकास रुक जाता धार्मिक सम्प्रदायों का निर्माण न होता और धर्म के व्यापक विस्तार के बिना समाज में घोर अनास्था और अव्यवस्था फैली होती।
देव प्रतिमा से प्रतीक से साधक को यह विश्वास हो जाता है कि जिन गुणों से सम्पन्न ईश्वर को वह पाना चाहता है, अथवा जिन गुणों को अपने में विकसित करना चाहता है वह मूर्ति उसके समक्ष उपस्थित है। ध्यान धारणा के माध्यम से वह उसे अपनी अन्तःचेतना में बिठाकर एकाकार हो जाता है। ध्यान की परिपक्वता में पहुँचने पर उसे सब ओर उसी की छाया दिखायी देती है वह अणु अणु में समाया हुआ मिलता है उसे अपने इष्ट के अतिरिक्त और कुछ दिखायी नहीं देता। यह वह अवस्था है जब प्रतीक पूजा के माध्यम से साधक का आत्मिक स्तर विकसित होने लगता है और वह सब प्राणियों में अपने प्रभु का ही दर्शन करता है और अपने में सबका उद्देश्य होता है। यहाँ आकर उसकी प्रारंभिक मूर्ति उपासना छूट जाती है और वह समस्त चलती फिरती प्रतिमाओं को अपने ईश्वर का ही रूप मानने लगता हैं। जब उपासना का स्तर स्थूल से सूक्ष्म हो जाता है तब वह निराकार तत्व की उपासना के योग्य होता है क्योंकि स्तर की अनुकूलता में ही शक्ति के विकास का रहस्य निहित है। स्तर की प्रतिकूलता में अच्छे परिणामों की आशा करना असंभव है। यह भी ठीक है कि प्रतिमा पूजा से अन्तिम लक्ष्य तक पहुँचना संभव नहीं क्योंकि ईश्वर सूक्ष्म है और सूक्ष्म को प्राप्त करने के लिये उससे एकाकार होने के लिये अपनी अन्तःचेतना का उतना ही सूक्ष्म बनाना होगा जितना कि वह है अन्यथा अपने लक्ष्य में निराशा ही होगी।
वस्तुतः मूर्ति पूजा ईश्वर उपासना का आरंभिक शिक्षा सत्र है। यह चित्त शुद्धि का मानसिक परिष्कार का सरल साधन है। इसमें अपने इष्टदेव का ध्यान सुविधाजनक होता है निराकार उपासना कष्टसाध्य है जैसा कि कृष्ण भगवान ने गीता 15-5-6 में निर्देश दिया है कि जो सबके मूल अचल अव्यक्त सर्वव्यापी अचिन्त्य ओर नित्य अक्षर ब्रह्म की उपासना सब इन्द्रियों को रोककर सर्वत्र सम बुद्धि रखते हुये करते है वे भी मुझे ही पाते है। परन्तु उनके चित्त अव्यक्त में आसक्त रहने के कारण उनको क्लेश अधिक होते है क्योंकि अव्यक्त उपासना का मार्ग कष्ट से सिद्ध होता है। इसका अभिप्राय यह है कि साधक सब इन्द्रियों को जीतकर और सभी प्राणियों के प्रति सम बुद्धि व्यावहारिक भावना बनाकर ही उस निराकार उपासना का अधिकारी बनता है। यदि आरंभिक साधक के लिए सूक्ष्म और असीम की उपासना निर्धारित कर दी जाय तो वह अंधकार में ही टटोलता रहेगा और भटक जायेगा। क्योंकि केनोपनिषद 1/3 के अनुसार वहाँ न तो चक्षु पहुँचता है, व वाणी पहुँचती है और न मन ही पहुँच सकता है। वह ज्ञात पदार्थों से भिन्न है और अज्ञात से भी परे है। ऐसी स्थिति में तत्ववेत्ता ऋषियों ने निश्चय किया कि सीमित बुद्धि वाले साधक सीधे असीम की उपासना करने से ही असीम तक पहुँच पायेंगे। ईश्वर या देवप्रतिमायें आस्था की, श्रद्धाभावना की उन्नायक मानी गयी हैं और वे साधक की पवित्र भावनाओं को तददेव तक पहुँचाती भी है। श्रद्धासिक्त भावना के उन्नयन से आत्मा का सम्बन्ध उस चैतन्य सत्ता से हो जाता है तो अणु-अणु में व्याप्त है।
इस तथ्य की पुष्टि पाश्चात्य मनोवैज्ञानिकों ने भी की है। अपने प्रसिद्ध ग्रंथ “दि रिलीजंस एटीच्यूड” में मूर्धन्य मनीशी वुडवर्न ने लिखा है, कि मूर्ति का यथार्थ महत्व प्रतीकात्मक होता है और इसका प्रभाव विषेशतः ऐसे व्यक्तियों की चेतना पर पड़ता है जिन्होंने मानसिक प्रतिमाओं का प्रयोग करना नहीं सीखा है। अर्थात् जिसका मानसिक स्तर पर्याप्त रूप से विकसित नहीं हुआ है। सुप्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक नाइट ने भी अपनी कृति “सिम्बाँलिकल लैंग्वेज ऑफ एनषियेण्ट आर्ट एण्ड माइथाँलाँजी” में कहा है कि मूर्ति पूजकों का यह विश्वास था कि दैवी-सत्य, प्रतीक में छिपा रहता है, पहेली और कल्पित आख्यायिकाओं में प्रच्छन्न रहता है। यह निर्बल मानवीयता को समयानुकूल रखता है बशर्ते कि यह ज्ञान और मूल दर्शन में प्रदर्शित हो।’ इससे स्पष्ट है कि आधुनिक मनोविज्ञान भी इस मूलभूत सिद्धान्त को स्वीकार करता है कि सामान्य मानसिक स्तर वाले व्यक्तियों के लिए प्रार्थना व पूजा के लिए कोई दृश्य चित्र या प्रतिमा की आवश्यकता अनिवार्य है।
मनोवेत्ताओं का कहना है कि जड़पूजा तो मनुष्य का प्रकृति प्रदत्त स्वभाव है। जल, वायु, पृथ्वी, सूर्य, चन्द्रमा को वेदों में देवता कहा है, क्योंकि वह निरन्तर अपनी शक्तियों से हमें लाभान्वित करते रहते हैं। उनके बिना हमारा जीवन असंभव है, इसलिए जड़ होते हुए भी हम उनकी पूजा, उपासना करते हैं। इन जड़ पदार्थों में स्वयमेव कोई शक्ति नहीं है। उस आद्यशक्ति के कारण ही इनमें प्राणप्रद गुणों का समावेश हो पाया है। ईश्वर निराकार है। वह स्थूल नेत्रों से दिखाई नहीं देता। उसके अनेकों दिव्य गुण हैं। वह गुणों का समुच्चय है और तदनुरूप ही उसकी अनन्त शक्तियां हैं। उन शक्तियों के अनुसार आचार्यों ने उसे साकार रूप में ढाल लिया है। मूर्ति पर फूल चढ़ाते हुए यह कोई नहीं सोचता कि वह पत्थर की पूजा कर रहा है, वरन् यह भाव रहता है कि इसमें व्याप्त जो चैतन्य शक्ति है, वह ही हमारी श्रद्धा की पात्र है। प्रतिमा की उपासना करने वाला जानता है कि वह उस सर्वव्यापी ईश्वर की ही उपासना कर रहा है।
श्रद्धाशक्ति इस पवित्र भावना से उसकी आत्मा का संबंध सर्वव्यापी चैतन्य सत्ता से हो जाता है। मूर्ति साधक के विश्वास को बढ़ाती है कि यही ईश्वर है। विश्वास की पूर्णता ही उसे आदि विद्युत धारा से मिला देती है। इस मिलन से साधक को जो अपार आनन्द की अनुभूति होती है, वही ईश्वर प्राप्ति की ओर बढ़ने का चिन्ह माना जाता है। सूक्ष्म तक स्थूल की सीधी पहुँच नहीं है। स्थूल को स्थूल का ही अवलम्बन लेना पड़ता है। अतः मूर्तिपूजा स्वाभाविक व प्राकृतिक है।
वेद स्वयं स्थूल उपासना का प्रतिपादन करते हैं। अग्नि उपासना से सम्बन्धित उनमें सैकड़ों मंत्र उपलब्ध हैं। ऋग्वेद के श्लोक 1/14/4 एवं 4/45/1 में उल्लेख है कि “अग्नि से परमात्मा प्रसन्न होते हैं। अग्नि उपासना के बिना मुक्ति की प्राप्ति असंभव है।” इसी तरह अथर्ववेद 6/65 में कहा गया है-”अग्नि उपासक के हृदय में परमात्मा का तेज प्रकाशित होता है। अन्य शास्त्रों में अग्नि को ब्रह्मरूप कहा गया है, परन्तु अग्नि तो जड़ है। उसके माध्यम से चैतन्य की प्रसन्नता प्राप्त करने में साधक कैसे सफल हो सकता है। अग्नि स्थूल पदार्थों को सूक्ष्म बनाकर देवताओं को अर्पण करती है। मूर्तिपूजा भी साधक की पवित्र भावनाओं को उदात्त बनाकर इष्टदेव तक पहुँचाती है। इन दोनों में कुछ भी अन्तर नहीं हैं। यदि अग्नि उपासना वैदिक है तो मूर्तिपूजा भी वैदिक माननी पड़ेगी। वेद स्वयं मूर्तिपूजा का प्रतीक दृष्टिगोचर होते हैं क्योंकि उन्हें ईश्वर प्रदत्त ज्ञान माना जाता है। अनेक वेद-मंत्र इसकी साक्षी देते है। अथर्ववेद 3/10/3 में उल्लेख है-
“संवत्सरस्य प्रतिमाँ याँ त्वा रात्र्युपास्महे। सा न आयुश्मतीं प्रजाँ रायस्पोशेण सं सृज॥”
अर्थात् “है रात्रे! संवत्सर की प्रतिमा! हम तुम्हारी उपासना करते हैं। तुम हमारे पुत्र-पौत्रादि को चिर आयुष्य बनाओ और पशुओं से हमको सम्पन्न करो।” अथर्ववेद 2/13/4 में प्रार्थना है “है भगवान! आइये और इस पत्थर की बनी मूर्ति में अधिष्ठित होइये। आपका यह शरीर पत्थर की बनी मूर्ति हो जाये।”
प्रतिमा में शक्ति का अधिष्ठान किया जाता है, प्राणप्रतिष्ठा की जाती है। सामवेद के 36 वें ब्राह्मण में उल्लेख है-
“देवतायतनानि कम्पन्ते दैवतप्रतिमा हसन्ति। रुदान्त नृत्यान्त स्फुटान्त स्विद्यन्त्युन्मालान्त निमीलन्ति॥
अर्थात्- देवस्थान काँपते हैं, देवमूर्ति हँसती, रोती और नृत्य करती हैं, किसी अंग में स्फुटित हो जाती है, वह पचीजती है, अपनी आँखों को खोलती और बन्द भी करती है।
“कपिल तंत्र” में इस भाव की पुष्टि करते हुए कहा गया है-”जिस तरह गाय के सारे शरीर में उत्पन्न होने वाला दुग्ध केवल उसके स्तनों के द्वारा ही बाहर निकलता है, इसी तरह परमात्मा की सर्वव्यापक शक्ति का अधिष्ठान मूर्ति में होता है। इस तरह से साधक यह विचार करता है कि वह उस पत्थर निर्मित मूर्ति की उपासना नहीं कर रहा है, वरन् वह उस अनन्त शक्ति की पूजा कर रहा है जो उस मूर्ति में विद्यमान है। बाह्य दृष्टि से दिखाई देता है कि वह प्रतिमा की पूजा कर रहा है परन्तु वास्तव में तो वह उस सर्वव्यापी शक्ति की उपासना कर रहा होता है।
आधुनिक विज्ञान भी इसका समर्थन करता है। साधक के भक्ति, विश्वास और पूजा की शक्ति को यदि विषम-शक्ति मानें और ईश्वर की शक्ति को सम तो निश्चय रूप से साधक की विषमशक्ति परमात्मा की समशक्ति को मूर्ति के माध्यम से आकर्षित कर लेती है। विषय और सम शक्तियों के मिलन से ही विद्युतधारा का प्रवाह दृष्टिगोचर होता है और प्रकाश की उत्पत्ति होती है। इसी तरह से साधक की अन्तःचेतना भी जगमगा उठती है।
मूर्तिपूजा-प्रतीक उपासना के पीछे एक सुदृढ़ मनोविज्ञान काम करता है। मनोविज्ञानी भी मूर्ति की आवश्यकता को अनुभव करते हैं और मानते हैं कि असीम ही सीमित होकर प्रदर्शित होता है। सुविख्यात मनोविज्ञानी कार्लाइल के अनुसार वास्तविक प्रतीक में जिसे ऐसा सम्बोधन किया जाता है, सदैव स्पष्ट और प्रत्यक्ष रूप से असीम का रहस्योद्घाटन होता है। इसमें निराकार का संयोजन साकार में होता है जिससे वह दृष्टिगत हो सके और प्राप्त हो सके। विद्वान अर्बन ने भी अपनी कृति-”लैग्वेज ऐण्ड रियलिटी” में प्रतिमा उपासना के लाभों का विवेचन करते हुए लिखा है कि धार्मिक प्रतीक या प्रतिमायें सीमित और अन्तरदृश्ट्यात्मक सम्बन्धों से उद्भूत की गयी है। इनसे ऐसे तथ्यों की अभिव्यक्ति होती है जो अधिक सार्वभौम और आदर्श सम्बन्धों के लिए है, जिनकी अभिव्यक्ति विस्तार अधिक होने से और आदर्शवादिता के कारण सीधे नहीं की जा सकती। अन्यान्य मनोवैज्ञानिकों ने इस तथ्य की पुष्टि करते हुए लिखा है-भारतीय मन्दिरों में शिव, विष्णु, बुद्ध, महावीर आदि की मूर्तियाँ आदर्श को स्थूल रूप देने के उद्देश्य से स्थापित की गयी है। सूक्ष्म रूप में बिना दृश्य वस्तु के, जो इनका प्रतिरूप है, कल्पना करने पर आदर्श अस्पष्ट रह जाता है। उदाहरण के लिए जैन धर्म में 24 तीर्थंकरों का पूजन मूर्ति रूप में इस कारण प्रचलित नहीं है कि यह मूर्तियाँ ईश्वर के रूप में है, क्योंकि जैनधर्म में ईश्वर का अस्तित्व ही स्वीकार नहीं किया है। वस्तुतः वे आदर्श की प्रतीक हैं, जहाँ पहुँचना व्यक्ति का लक्ष्य होता है। स्थूल प्रतीक की यही महत्ता होती है।
मनोवैज्ञानिकों का दृढ़ मत है कि मूर्ति पूजन की प्रथा इसलिए चली कि इनसे प्रेरणा मिलती है और उस प्रेरणा के साथ शक्ति और विश्वास मिलती है और उस प्रेरणा के साथ शक्ति और विश्वास छिपा रहता है। जिस किसी अवतार, देवता या महापुरुष की साधक पूजा करता है, उसके साथ उसके जीवन की महानताएँ या तत्सम्बन्धी कथायें अवश्य जुड़ी रहती हैं। प्रतिमा के सामने आते ही वह सभी दृश्य नेत्रों के सामने तैरने लगते हैं और साधक उस महान विभूति से अपने का संबंधित करके उसकी महानताओं और विशेषताओं से अपने मन मन्दिर को जगमगाता अनुभव करता है। तादात्म्य हो जाने पर अपनी अन्तरात्मा को वह परमात्म चेतना से एकाकार कर देता है। साधक का तद्रूप बनना उसकी भावना पर निर्भर करता है। मूर्तिपूजा से जीवन निर्माण की सूक्ष्म प्रक्रिया आरंभ होती है, जो साधक को उच्च कक्षा में ले जाती है। इस तरह प्रतीक पूजा लाभप्रद ही नहीं, बुद्धि सुलभ भी हैं।
कई बार कई चीजें दूर रहकर जितनी लाभकारी सिद्ध होती हैं, नजदीक आने पर उतनी ही हानिकारक भी बन जाती हैं। आग और गर्मी दोनों ही मनुष्य के लिए आवश्यक एवं उपयोगी हैं, इनसे ठंडक और नमी दूर भागती और शरीर को राहत पहुँचती है, पर इनकी समीपता एक निश्चित सीमा से अधिक हो जाय, तो उपयोगी होते हुए भी ये अनर्थ ही खड़े करेंगी। सूर्य पृथ्वी को जीवन धारण करने की क्षमता प्रदान करता है। इसकी गर्मी और रोशनी से ही पृथ्वी में जीवन संभव हो सका है। वृक्ष-वनस्पतियों से लेकर जीव-जन्तुओं तक को यदि इसकी ऊर्जा और ऊष्मा नहीं मिलती, तो अन्यग्रहों की तरह यह धरा भी जनशून्य होती। इस दृष्टि से सूर्य की उदारता और परोपकारिता तो है, पर उस दूरी को भी नहीं भुला दिया जाता चाहिए, जिसके कारण उसकी किरणें वसुन्धरा को अपनी मंगलमयी अनुदान वर्षा करती है। यदि यह दूरी कम रही होती, तो वही किरणें कहर बरपाना शुरू कर देतीं जो कभी अपनी अधिक दूरी के कारण सुन्दर और सुखद अनुभूतियों से भरती थीं। अतः हानि-लाभ के निर्णय में दूरी का प्रसंग भी कम महत्वपूर्ण नहीं है, अस्तु ऐसे प्रकरणों में सदा इसका ध्यान रखा जाना चाहिए।
ओजोन का रक्षा-कवच इस दृष्टि से महत्वपूर्ण एवं उल्लेखनीय है। वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि यह सुरक्षात्मक आवरण पृथ्वी के चारों ओर न होता, तो अन्तरिक्ष से आने वाली अनेकानेक प्रकार की विघातक विकिरणें यहाँ के जन-जीवन को विनष्ट करने में कोई कसर उठा न रखतीं। तब प्रतिक्षण एक्स एवं गामा स्तर की घातक बौछारों इस नयनाभिराम धरा को उसी तरह जीवनहीन कर देती, जिस प्रकार अन्तरिक्ष के अन्य ग्रह-गोलक हैं। ब्रह्माण्डीय विकिरणों तो दूर अकेले सूर्य से ही इतनी मात्रा में पराबैगनी किरणें आतीं कि उसके अपरिमित परिमाण को बर्दाश्त कर पाना यहाँ के जीव-जन्तुओं और वृक्ष-वनस्पतियों के सामर्थ्य से परे की बात होती। इस स्थिति में यहाँ की धरती वैसी ही ऊसर और अनउर्वर बन जाती, जैसी चन्द्रतल की है, जहाँ पर्यावरण की अनुपयुक्तता के कारण न तो कोई जीव जन्म पाता है, न वनस्पतियाँ पनप पाती हैं। ऐसे में उस अपरा प्रकृति को धन्यवाद देना चाहिए, जिसने जीवधारियों के संरक्षण के निमित्त धतर के चारों ओर एक ऐसी पर्त विनिर्मित की जिससे कि आज यह सुखद और सुन्दर बनी हुई है। यह उस सुरक्षा कवच के लाभ हुए, जिसे विज्ञान “ओजोन पर्त” के नाम से पुकारता है, पर इसकी हानियाँ भी कोई कम नहीं हैं।
जब यह गैस जन-जीवन के संपर्क में आती है तो अगणित प्रकार के उपद्रव खड़े करती है। कनाडा से प्रकाशित होने वाली पत्रिका “अल्टरनेटिव्स” में इस संबंध में विस्तृत जानकारी प्रकाशित हुई है। उसके अनुसार इस दिनों टेक्नोलॉजी के द्रुत विकास के कारण नित नये यंत्र-उपकरण तेजी से विकसित होते चले जा रहे हैं, जिसे स्वास्थ्य संबंधी खतरा दिन-दिन बढ़ता ही जा रहा है। इन आधुनिक मशीनों में से कई, घातक स्तर की गैसें निकलती हैं। इन सब में “ओजोन” प्रमुख है। पत्रिका के अनुसार जब इसकी मात्रा वायु में 0.1 पी.पी.एम. होती है, तो नाक, कान, गले एवं आँखें जैसे कोमल अंगों में जलन होने लगती है। यह परिमाण बढ़कर जब 0.55 पी.पी.एम. हो जाता है, तो मितली एवं सिरदर्द का कारण बनता है। विशेषज्ञों का कहना है कि अनुपात की दृष्टि से यह मात्रा नगण्य जितनी है, पर वायुमण्डल में इसका यह अत्यल्प स्तर भी कितना प्रभावी होता है, इसका अनुमान इसकी स्वल्प मात्रा से ही लग जाता है। यदि इसके परिमाण में आगे और वृद्धि हुई, तो यह कितनी खतरनाक सिद्ध हो सकती है, इसका अन्दाज लगाना मुश्किल है। अतः जो दूर रह कर लाभ देने वाला हो, उनसे दूरी बनाये रखना ही समझदारी और विकसित बुद्धि की निशानी है। ओजोन इसी स्तर की गैस है।
हिंस्र पशुओं में शेर, भालू, चीते एवं साँप अपनी रंग-बिरंगी छवि के कारण कितने लुभावने और आकर्षक होते हैं यह सर्वविदित है पर इसके कारण यदि कोई इनको पकड़ने और पालने का हठ करने लगे, तो यह उसके लिए आत्मघाती सिद्ध हो सकता है। ऐसे जन्तुओं के संपर्क में रहने वालों का इतिहास बताता है कि इनमें से अधिकांश अन्ततः इन्हीं के शिकार बने और जीवन गँवा बैठे। यह नासमझी है। यही नासमझी इन दिनों विज्ञान कर रहा है। विकास के दौरान उसे उस विनाश को भी ध्यान में रखना चाहिए, जो व्यक्ति को मौत के मुँह में धकेलता और असमय मरने के जिए बाधित करता है।
आत्मा की अमरता और शरीर की नश्वरता का एक प्रमाण पुनर्जन्म है। मरने के बाद दूसरा जन्म मिलने का तथ्य हिन्दू धर्म में सदा से माना जाता रहा है। पुराणों में इसका पग−पग पर वर्णन है। धर्मशास्त्रों, अगणित आप्त वचनों में आत्मा के पुनर्जन्म लेने की बात कही गयी है। अन्यान्य धर्मों ने भी उसे किसी न किसी रूप में स्वीकार किया है। ईसाई एवं मुस्लिम धर्मों में पुनर्जन्म की मान्यता तो नहीं है, पर उनके यहाँ भी आत्मा का अस्तित्व मरने के बाद भी बने रहने और ‘न्याय के दिन’ ईश्वर के सम्मुख उपस्थित होने की बात कही गई है। चौरासी लाख योनियों में भ्रमण करने के उपरान्त मनुष्य जन्म मिलने−पुण्य और पाप का फल भोगने के लिए फिर से जन्म मिलने की बात को धर्म ग्रन्थों में अनेकानेक उदाहरणों के साथ बताया गया है। भूत−प्रेतों का अस्तित्व एवं स्वर्ग−नरक की मान्यतायें भी इसी सिद्धान्त की पुष्टि करती हैं कि अशरीरी आत्मा को भी एक विशेष प्रकार का जीवनयापन करने का अवसर मिलता है।
पुनर्जन्म की मान्यता के साथ कर्मफल का सघन सम्बन्ध है। जिन्हें भले या बुरे कर्मों का फल इस जन्म में तत्काल न मिल सका, उन्हें अगले जन्म में भोगना पड़ेगा। इस सिद्धान्त को स्वीकार करने पर पाप−फल से डरने और पुण्य प्रतिक्रिया के सम्बन्ध में आश्वस्त रहने की मनःस्थिति बनी रहती है। फलतः पुनर्जन्मवादी को अपने कर्मों का स्तर सही रखने की आवश्यकता अनुभव होती है और तत्काल फल न मिलने स उद्विग्नता उत्पन्न नहीं होती। नीति, सदाचार और सामाजिक मर्यादाओं के पालन की उपेक्षा नहीं होती। आत्मा की अमरता, ईश्वर का अंकुश, कर्मफल की सुनिश्चितता से गुँथे हुए अध्यात्मवाद के सिद्धान्त जहाँ प्रामाणिकता की कसौटी पर खरे उतरते हैं वहाँ उनकी−प्रतिक्रिया भी व्यक्ति एवं समाज को आदर्शवादी मान्यताओं में जकड़े रहने की भी होती है। शालीनता और सुव्यवस्था बनाये रहने की दृष्टि से आस्था का बने रहना नितान्त आवश्यक है।
पुनर्जन्म के सिद्धान्त की पुष्टि में अनेकानेक प्रमाण सामने आते हैं। भारत में तो इस सम्बन्ध में चिरमान्यता होने के कारण यह भी कहा जा सकता है कि पुनर्जन्म की स्मृति बताने वाले यहाँ के वातावरण से प्रभावित रहे होंगे या किसी कल्पना की आधी−अधूरी पुष्टि हो जाने पर यह घोषित किया जाता होगा, कि यह बालक पिछले जन्म में अमुक था। यों इस आशंका को भी कठोर परीक्षा की दृष्टि से भली भाँति निरस्त किया जाता रहा है और बच्चे ऐसे प्रमाण देते रहे हैं कि जिनके कारण किसी झाँसापट्टी की आशंका नहीं रह जाती। पिछले जन्म के सम्बन्धियों के नाम तथा रिश्ते बताने लगने, ऐसी घटनाओं का जिक्र करना जिनकी दूरस्थ व्यक्तियों को जानकारी नहीं हो सकती, वस्तुओं के साथ जुड़े हुए इतिहास का विवरण बताना, जमीन में गड़ी−दबी चीजें उखाड़ कर देना, अपनी और परायी संपत्ति का विवरण बताना जैसे अनेक संदर्भ ऐसे हैं जिनके आधार पर पुनर्जन्म होने की प्रामाणिकता से इनकार नहीं किया जा सकता। फिर भारत से बाहर उन सम्प्रदाय के लोगों पर तो पूर्व मान्यता का भी आक्षेप नहीं लगाया जा सकता। पुनर्जन्म के प्रमाण तो वहाँ भी मिलते हैं। यह भी किंवदंतियों के आधार पर नहीं, वरन् परामनोविज्ञान के मूर्धन्य शोधकर्ताओं द्वारा की गयी है और यह पाया गया है कि यह घटनायें मनगढ़न्त या कपोलकल्पित नहीं है। इनसे पुनर्जन्म की मान्यता की ही पुष्टि होती है।
प्रख्यात दार्शनिक एफ. एच. विलिस का कहना है कि पुनर्जन्म व आत्मा के विकास का सिद्धान्त सही है। उत्कृष्ट आत्मायें अपूर्ण कार्य की पूर्ति हेतु दुबारा जन्म लेती हैं। उन्होंने ऐसे कई महापुरुषों के जीवन में साम्यता पायी है जिनके चिन्तन एवं कर्तृत्व समान थे। वे इन्हें पुनर्जन्म की घटनायें मानते हैं। उनके अनुसार ईसामसीह ने दुबारा अपोलोनिक्स ऑफ टिमाना के रूप में जन्म लिया। शोपेनहांवर बुद्ध के अवतार कहे जा सकते हैं। फिश्टे, हीगल एवं काण्ट जैसे विख्यात दार्शनिकों को भी भारतीय आत्मायें कहा जा सकता है। श्रीमती बेसेंट पहले जन्म में ब्रूनो थी। सिसरो ने ग्लैडस्टन के रूप में पुनर्जन्म लिया।
अमेरिका के सुप्रसिद्ध पादरी जिम विशप ने अपनी खोजपूर्ण कृति में कहा है कि पूर्व राष्ट्रपति अब्राहम लिंकन की आत्मा ने ही राष्ट्रपति जान. एफ. केनेडी के रूप में जन्म लिया था। उन्होंने दोनों के जीवन का तुलनात्मक अध्ययन कर इन तथ्यों की ओर लोगों का ध्यान खींचा है जिसके अनुसार दोनों में गहरी धार्मिक भावना थी और दोनों ही विश्वशान्ति के उपासक थे। चालीस वर्ष की आयु में दोनों में राष्ट्रपति बनने की इच्छा हुई। नीग्रो स्वतंत्रता के लिए दोनों ने निरन्तर प्रयास किये। पारिवारिक जीवन भी दोनों का समान था। दोनों की मृत्यु शुक्रवार के दिन गोली लगने से हुई। दोनों की मृत्यु के पश्चात् उनका पद सम्हालने वाले व्यक्तियों का नाम जान्सन था जो दक्षिण से आये उपराष्ट्रपति थे। क्या यह अद्भुत साम्य मात्र संयोग है? या इसके कोई सूक्ष्म आध्यात्मिक विधान निहित हैं?
वर्जीनिया विश्वविद्यालय के ख्यातिलब्ध मनोवैज्ञानिक डॉक्टर इवान स्टीवेन्सन ने पुनर्जन्म की स्मृति सम्बन्धी तथ्यों के संकलन हेतु विश्व का दौरा किया और प्रामाणिक विवरण प्राप्त किये। उसी श्रृंखला में वे भारत भी आये। कन्नौज के निकट जन्मे एक बालक के शरीर पर गहरे घावों के पाँच निशान थे। उसने बताया कि पिछले जन्म उसकी हत्या शत्रुओं ने चाकू से की थी। जाँच करने पर उनने उस सही पाया। उनका कहना है कि भारत में इस तरह के उदाहरण सर्वाधिक पाये जाते हैं क्योंकि यहाँ की संस्कृति में पुनर्जन्म की मान्यता है। इस कारण पूर्व जन्म की बातें बताने वाले को डाँटा या रोका नहीं जाता है।
लेबनान और तुर्की के मुस्लिम परिवारों में भी पुनर्जन्म की अनूक घटनायें सामने आयी हैं, जिन्हें शोधकर्ता वैज्ञानिकों ने सत्य पाया है। इसी तरह कोलोराइडी प्यूएली नामक नगर में पिछले दिनों रुथ सीमेन्स नामक लड़की ने अपने पूर्व जन्म की घटनाओं को बताकर ईसाई धर्म के उन अनुयायियों को असमंजस में डाल दिया जो पुनर्जन्म के सिद्धान्त को सही नहीं मानते हैं। इस लड़की को मूर्धन्य आत्म विशारद मोरे वर्नस्टाइन ने सम्मोहन द्वारा अर्धमूर्छित करके उसके पूर्व जन्मों की अनेक घटनाओं का पता लगाया। वह एक सौ वर्ष पूर्व आयरलैण्ड के मार्क नामे नगर में पैदा हुई थी। उसका पूर्व नाम ब्राइडीमर्फी और पति का नाम मेकार्थी था।
मनोवैज्ञानिकों एवं परामनोवैज्ञानिकों ने गहन अनुसंधान के पश्चात् निष्कर्ष निकाला है कि पुनर्जन्म में पूर्व जन्म के संस्कारों के प्रभाव इस जन्म में भी सामने आते हैं। उदाहरण प्रस्तुत करते हुए उनने बताया हैं कि श्री लंका की एक बालिका ज्ञानतिकल दो वर्ष की आयु में अपने को पूर्व जन्म का बालक बताती थी, जिसका नाम तिलक रत्न था। पूर्व जन्म वाले स्थान से जग वह एक दिन गुजरी तो सहसा उसके दिमाग में कौंधा कि वह पहले जन्म में यहीं पर थी। जांच–कर्ताओं को उसने अपने पूर्व जन्म की कई बातें बतायीं जो परीक्षण करने पर सत्य निकलीं। शोधकर्ताओं का कहना है कि तिलक रत्न को लड़की होने की तीव्र इच्छा थी और पुनर्जन्म में वह लड़की ही बनी।
विलियम वाकर एवं केन्सन नामक मूर्धन्य वैज्ञानिकों ने अपनी कृति−”रिइनकार्नेशन” में ऐसी अनेक घटनाओं का विवरण दिया है जिनमें पुनर्जन्म की धार्मिक मान्यता न होने पर भी बच्चों द्वारा प्रस्तुत किये गये विवरणों से इस सिद्धान्त की पुष्टि होती है। बड़ी आयु हो जाने पर प्रायः ऐसी स्मृतियाँ नहीं रहतीं या धुँधली पड़ जाती हैं, पर बचपन में बहुतों को ऐसे स्मरण बन रहते हैं जिनके आधार पर उनके पूर्व जन्म के सम्बन्ध में काफी जानकारी मिलती है।
प्रायः जीवात्मा के योनि−परिभ्रमण का अर्थ यह समझा जाता है कि वह छोटे−बड़े, कृमि−कीटकों, पशु−पक्षियों की चौरासी लाख योनियों में जन्म लेने के उपरान्त मनुष्य जन्म पाता है। परन्तु पुनर्जन्म की घटनाओं से यह सिद्ध होता है कि मनुष्य को दूसरा जन्म मनुष्य जाति में ही मिलता है। इसके पीछे तर्क भी है। मनुष्य योनि में जीव चेतना का इतना अधिक विकास और विस्तार हो चुका होता है कि उतने फैलाव को निम्न प्राणियों के मस्तिष्क में समेटा नहीं जा सकता। बड़ी आयु का मनुष्य अपने बचपन के कपड़े पहनकर गुजारा नहीं कर सकता। यही बात मनुष्य योनि में जन्मने के उपरान्त पुनः छोटी योनियों में वापस लौटने के सम्बन्ध में भी लागू होती है। यह हो सकता है कि जीवन−क्रमिक विकास करते हुए मनुष्य स्तर तक पहुँचा हो। इसका प्रतिपादन तो डार्विन के विकासवादी सिद्धान्त में भी हो सकता है, पर एक बार मनुष्य जन्म लेने के बाद पीछे लौटने की बात समझ में नहीं आती। अच्छे−बुरे कर्मों का प्रतिफल मनुष्य योनि में रहकर ही भुगतना पड़ता है।
वस्तुतः पुनर्जन्म की मान्यता जितनी सत्य है उतनी ही लोकोपयोगी भी। भारतीय संस्कृति में यह व्यवस्था इसलिये की गयी है कि मनुष्य इन सबके द्वारा अपना जीवनलक्ष्य सुदृढ़ कर ले। आत्मा की अमरता और मरणोपरान्त फिर से शरीर धारण करके कार्यक्षेत्र में उतरने की आस्था बनी रहे तो व्यक्ति दूरदर्शी विवेक अपनाये रह सकते हैं और शालीनता तथा सामाजिकता के आदर्शों को सहज ही पालन करते रह सकते हैं।
इस विश्व में जो कुछ दृश्यमान होता है, वह अदृश्य की परिणति है। यहाँ जो कुछ अदृश्य−सूक्ष्म बिखरा पड़ा है, उसका लाख−करोड़वाँ हिस्सा भी दृश्यमान नहीं होता है, पर जो कुछ अनुभव में आता है, वह अनुभव से अगम्य−इन्द्रियातीत विराट् का एक नगण्य−सा अंश मात्र ही होता है।
ब्रह्मांड की छोटी अनुकृति पिण्ड−यह शरीर है। इसमें भी वही सब कुछ विद्यमान है, जो इस सम्पूर्ण सृष्टि में है। उदाहरण के लिए अग्नितत्व को लिया जा सकता है। विराट् ब्रह्मांड में जितना प्रचुर परिमाण में वह भरा पड़ा है, हमारा सूर्य उसका राई−रत्ती जितना अंश ही है। उस सूर्य की भी दसों दिशाओं में जितनी ऊष्मा फैलती है, उसका हम लोग पृथ्वी की ओर विकीर्ण होने वाली गर्मी में से भी एक तुच्छ अंश ही अनुभव कर पाते है। शरीर में प्रत्यक्ष उष्णता के रूप में दीख पड़ने वाला बुखार वस्तुतः उस ब्रह्मांडव्यापी ऊष्मा की ही झलक झाँकी है, जिसका पसारा सम्पूर्ण सृष्टि में फैला हुआ है−शारीरिक उपद्रवों की स्थिति में हम चमड़ी पर उभरने वाली स्वल्प गर्मी मात्र का ही अनुभव कर पाते हैं और उस बड़े हिस्से से अनभिज्ञ बने रहते हैं, जिससे इसका सम्पूर्ण क्रिया−व्यापार चलता है। वह अंश विदित ही कहाँ हो पाता है, जो शरीर के भीतर है। इतनी ही नहीं, यह विशाल काया एक सूक्ष्म शुक्राणु और उसके भीतर रहने वाले ‘जीन्स’ ‘क्रोमोसोम्स’ आदि अति सूक्ष्म तत्वों की परिणति मात्र है, फिर भी वह जितना कुछ दीखती है, उससे भी कई गुनी अधिक विशेषताएँ अनुभव में न आने पर भी विद्यमान रहती हैं। इस तथ्य को विज्ञान भी अब स्वीकारता है।
शरीरशास्त्री जितना ज्ञान अब तक देह के भीतरी और बाहरी अंगों के संबंध में प्राप्त कर चुके हैं, उससे कहीं अधिक गंभीर ज्ञान हमें अपने ‘सूक्ष्म’ और ‘कारण’ शरीर के संबंध में प्राप्त करना शेष है। जो शोधें प्राचीनकाल में हो चुकी हैं, उससे आगे का सारा क्रम ही अवरुद्ध हो गया, जबकि आवश्यकता उसे निरन्तर जारी रखे जाने की थी। ज्ञान का अन्त नहीं। जो प्राचीनकाल में जाना जा चुका वह समग्र नहीं। मानवीय सामर्थ्य और विराट् की अनन्तता की तुलना करते हुए यही उचित है कि उपलब्ध ज्ञान को पूर्ण न मानते हुए अन्वेषण कार्य जारी रखा जाय।
सूक्ष्म और कारण शरीरों की स्थिति, शक्ति, संभावना और उपयोग की प्रक्रिया समझने में भूत काल के साधना विज्ञानियों की जानकारियों से लाभ उठाया जाना चाहिए और अन्तरिक्ष के सूक्ष्म प्रवाह संचार में पिछले दिनों जो परिवर्तन हुए हैं, मानवी कलेवर के स्तर में जो भिन्नता आयी है, उसे ध्यान में रखते हुए हमें शोध कार्य को आगे बढ़ाना चाहिए।
स्थूल, दृश्य शरीर की गतिविधियाँ इस भूलोक तक सीमित हैं। सूक्ष्म शरीर भुवः लोक तक और कारण शरीर स्वः लोक तक अपनी सक्रियता फैलाये हुए हैं। इन भूः भुवः स्वः लोकों को ग्रह, उपग्रह, नक्षत्र आदि समझने की आमतौर से भूल की जाती है। लोक और ग्रह सर्वथा भिन्न हैं। ग्रह स्थूल हैं, लोक सूक्ष्म। इस दृश्यमान अनुभवगम्य भूलोक के भीतर अदृश्य स्थिति में दो अन्य लोक समाये हुए हैं भुवः लोक और स्वः लोक। वहाँ की स्थिति भूलोक से भिन्न हैं। यहाँ पदार्थ का प्राधान्य है। जो कुछ भी सुख−दुःख हमें मिलते हैं, वे सब अणु पदार्थों के माध्यम से मिलते हैं। यहाँ हम जो कुछ चाहते या उपलब्ध करते हैं, वह पदार्थ ही होता है। स्थूल शरीर चूँकि स्वयं पदार्थों का बना है, इसलिए उसकी दौड़ या पहुँच पदार्थों तक ही सीमित हो सकती है। भुवः लोक विचार प्रधान होने से उसकी अनुभूतियां, शक्तियाँ, क्षमताएँ, संभावनाएँ सब कुछ इस बात पर निर्भर करती हैं, कि व्यक्ति का बुद्धि संस्थान, विचार स्तर क्या था।
स्वःलोक भावना लोक है। यह भावना प्रधान है। भावनाओं में रस है। प्रेम का रस प्रख्यात है। माता और बच्चे के बीच, पति और पत्नी के बीच, मित्र और मित्र के बीच कितनी प्रगाढ़ता, घनिष्ठता, आत्मीयता होती है, यह हम प्रत्यक्ष देखते हैं। वे संयोग में कितना सुख और वियोग में कितना दुःख अनुभव करते हैं, इसे कोई सहृदय व्यक्ति अपनी अनुभूतियों की तथा उन स्थितियों के ज्वारभाटे से प्रभावित लोगों की अन्तःस्थिति का अनुमान लगा कर वस्तुस्थिति की गहराई जान सकता है। यह भाव−संवेदना इतनी सघन होती है कि शरीर और मन को किसी विशिष्ट दिशा में घसीटती हुई कहीं−से−कहीं ले पहुँचती है। श्रद्धा और विश्वास के उपकरणों से देवताओं को विनिर्मित करना और उन पर अपना भावारोपण करके अभीष्ट वरदान प्राप्त कर लेना−यह सब भाव संस्थान का चमत्कार है। देवता होते हैं यह नहीं उनमें वरदान देने की सामर्थ्य है यह नहीं−इस तथ्य को समझने के लिए हमें मनुष्य की भाव सामर्थ्य की प्रचण्डता को समझना पड़ेगा। उसकी श्रद्धा का बल असीम है। जिसकी जितनी श्रद्धा होगी, जिसका जितना गहरा विश्वास होगा, जिसने जितना प्रगाढ़ संकल्प कर रखा होगा, और जिसने जितनी गहरी भक्तिभावना को संवेदनात्मक बना रखा होगा, देवता उसकी मान्यता के अनुरूप वैसा ही बन कर खड़ा हो जायेगा। वह उतना ही शक्ति सम्पन्न होगा और उतने ही सच्चे वरदान देगा।
कहना न होगा कि हर चीज सूक्ष्म होने पर अधिक शक्तिशाली बनती चली जाती है। मिट्टी में वह बल नहीं, जो उसके अति सूक्ष्म अंश अणु में है। हवा में वह सामर्थ्य नहीं, जो विद्युत चुम्बकीय विकिरण में है। पानी में वह क्षमता नहीं, जो भाप में है। स्थूल शरीर के गुणधर्म से हम परिचित हैं। वह सीमित कार्य ही अन्य जीव−जन्तुओं की तरह पूरे कर सकता है। जो अतिरिक्त सामर्थ्य, अतिरिक्त प्रतिभा, अतिरिक्त प्रखरता मनुष्य के अन्दर देखी जाती है, वह उसके सूक्ष्म और कारण शरीरों की ही है बाहर से सब लोग एक−से दीखने पर भी भिन्न भीतरी स्थिति के कारण उनमें जमीन−आसमान जितना अन्तर पाया जाता है। यह रक्त−माँस का फर्क नहीं, वरन् सूक्ष्म शरीर की अन्तःचेतना में सन्निहित समर्थता और असमर्थता के कारण ही होता है। पंचभौतिक स्थूल काया को जिस प्रकार आहार, व्यायाम, चिकित्सा आदि उपायों से सामर्थ्यवान बनाया जाता है, उसी प्रकार सूक्ष्म शरीर तथा कारण शरीर को भी साधना और संयम के द्वारा परिपुष्ट बनाया जाता है। मनोबल और आत्मबल के कारण जो अद्भुत विशेषताएँ लोगों में देखी जाती हैं, उन्हें इन सूक्ष्म शरीरों की बलिष्ठता ही समझना चाहिए। साधना का उद्देश्य उसी बलिष्ठता को सम्पन्न करना है।
स्थूल शरीर की शोभा, तृप्ति, और उन्नति के लिए हमारे प्रयत्न निरन्तर चलते रहते हैं। यदि सूक्ष्म और कारण शरीरों को उपेक्षित और बुभुक्षित पड़े रहने देने की हानि को समझें, और उन्हें भी स्थूल शरीर की ही तरह समुन्नत करने का प्रयत्न करें, तो ऐसे असाधारण लाभ प्राप्त कर सकते हैं, जिनके द्वारा जीवन कृत−कृत्य हो सके। भूलोक में पदार्थ−सम्पदाओं से प्राप्त थोड़े−से सुख का हमें ज्ञान है, अस्तु उसी उधेड़बुन में लगे रहते हैं। भुवः और स्वः लोकों की विभूतियों को भी जान सकें, तो सच्चे अर्थों में सम्पन्न बन सकते हैं और यह कह सकते हैं कि ब्रह्मांड और पिण्ड की एकरूपता को हमने यथार्थ में पहचान लिया। योग−साधना का उद्देश्य मनुष्य को इसी एकरूपता, समग्रता और सम्पन्नता से अवगत कराना है।
लकड़हारे एक बड़े जंगल के मजबूत पेड़ों को काटने का इरादा करके आये थे। वे चारों ओर घूमे। पेड़ों ने भी उनका इरादा समझा। जब वे चले गये तो पेड़ हँसकर बोले इनकी क्या बिसात है जो हम लोगों को काट सकें। इनके हाथ में लोहे की कुल्हाड़ी भर ही तो है।
कुछ दिन बाद पेड़ काटने वाले फिर आये। उनके हाथ में लकड़ी के बैंट लगी हुई कुल्हाड़ियाँ थीं। इसे देखकर पेड़ घबराने लगे और कहने लगे जब शत्रु पक्ष में अपने ही लोगों का सहयोग जुड़ गया तो अनर्थ होने में कोई सन्देह नहीं रहा।
वस्तुतः हुआ भी वैसा ही। लकड़ी के बैंट वाली कुल्हाड़ियों ने सारा जंगल धराशायी कर दिया।
उपासना शरीर है−साधना प्राण। उपासना चिनगारी है−साधना ईंधन। उपासना संकल्प है−साधना साहस। उपासना ज्ञान है−साधना−कर्म। उपासना उपकरण है−साधना कौशल। उपासना बाण है−साधना धनुष। एक के बिना दूसरे को प्रखर और फलित होने का अवसर नहीं मिलता।
उपासना थोड़े श्रम और समय में सम्पन्न हो जाती है, किन्तु साधना के लिये चिन्तन और चरित्र के क्षेत्र में घुसी हुई दुष्प्रवृत्तियों से जूझने और हटाने का एक काम ही नहीं करना पड़ता, उनके स्थान पर सत्प्रवृत्तियों को जगाने का उससे भी अधिक कष्ट साध्य कार्य भी करना पड़ता है। इस उन्मूलन और आरोपण के दुहरे प्रयोजन को पूरा करना प्रायः वैसा ही है, जैसा भगवान परशुराम के फरसा और फावड़ा चलाने के दुहरे पराक्रम का परिचय देना। उन्होंने झंखाड़ काटे और उद्यान लगाये थे। इसी पराक्रम का परिचय हर साधक को अपने जीवन क्षेत्र में देना पड़ता है। इससे कम में काम चलता नहीं। लाखों पूजा−परायण इस तथ्य के साक्षी हैं कि साधना से विरत रहने के कारण उन्हें निराशा ही हाथ लगी है।
सिद्धियाँ सुनिश्चित हैं। वे साधकों के लिये सुरक्षित हैं। अनादिकाल से लेकर अब तक के सभी सच्चे साधकों द्वारा सिद्धियाँ पाने की सचाई का पर्यवेक्षण करने पर इसी निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ा हैं कि उपासनाओं का विधान और प्रकार भिन्न−भिन्न रहने पर भी सभी साधकों को अपने चिंतन को उदात्त और चरित्र को उदार बनाना पड़ा है। व्यक्तित्व के परिष्कार और उदार लोकमंगल को अपनी प्रधान आकाँक्षा मानकर चलने वाले और इसके लिये प्रबल पुरुषार्थ करने वाले ही अपनी पात्रता उस स्तर तक पहुँचा सके हैं, जिस पर अंतरिक्ष से अनायास ही दिव्य अनुदान बरसते हैं।
ऊँचे पर्वत−शिखरों पर बर्फ जमती है, खाई−खड्डों में नहीं। वर्षा का जल नदी−सरोवरों में भरता है, टीलों पर जमा होने का उपक्रम बनता ही नहीं। मंत्र सिद्धि के लिये योगी जैसी मनोभूमि और तपस्वी जैसी कार्यपद्धति अपनानी होती है। दुष्ट चिन्तन और भ्रष्ट चरित्र का भारी लदान लाद कर आत्मिक प्रगति की लम्बी छलाँग लगा सकना कठिन है। कौतूहल करना और जादू दिखाना ही अभीष्ट हो तो मूर्खों को बहकाने वाले धूर्तों की सर्वत्र भरमार पाई जा सकती है। छिट−पुट पूजा विधानों में लम्बे चौड़े चमत्कार बताने वालों की कमी नहीं। सस्ती लूट के लालची वहाँ भीड़ लगाये भी रहते हैं। जब तक संसार में सस्ते मोल में बहुत पाने की लिप्सा जीवित रहेगी, तब तक यह गोरखधन्धा भी चलता रहेगा, जो इन दिनों अध्यात्म क्षेत्र पर कुहासे की भाँति बेतरह छाया हुआ है। इस स्थिति में केवल विडम्बना ही पलती−पनपती रह सकेगी। कोई ठोस उपलब्धि किसी के हाथ लगेगी नहीं। फलतः अध्यात्म का क्षेत्र अप्रामाणिक और उपहासास्पद बनता चला जायगा।
इस दुःखद दलदल में से आस्तिकता को उबारने की आवश्यकता है। यह तथ्य उजागर किया जाना चाहिए कि तत्वज्ञान और साधना विधान का समन्वय ही उन सत्परिणामों को प्रस्तुत कर सकने में समर्थ हो सकता है, जिसमें अंतरंग को स्वर्ग मुक्ति का आनन्द और बहिरंग को ऋद्धि−सिद्धि का वैभव उपलब्ध होता है। बहुमूल्य उपलब्धियाँ प्राप्त करने के लिए उसका उचित मूल्य समझने और जुटाने का प्रयत्न करना ही होगा।
सस्ते शार्टकट का कोई तरीका न इस लोक में है न परलोक में। सस्तेपन की तलाश अनैतिक है। उचित से कम मूल्य में प्राप्त की गई वस्तुयें चोरी की समझी जाती हैं और पता चलने पर पुलिस खरीददार की खींच−कढ़ेर कर सकती है। जुआ इसलिये अपराध माना गया है कि उसमें कम देकर अधिक पाने की दुरभि−सन्धि को प्रश्रय मिलता है। अध्यात्म तत्वज्ञान का सुनियोजित विज्ञान किन्हें समुचित उपहार प्रदान करता है? इसे सिद्ध पुरुषों के द्वारा अपनाये ऋषि जीवन को देखकर भली प्रकार जाना जा सकता है। संत−भक्तों को जो दैवी अनुदान प्राप्त होते रहे हैं, उसमें उनकी औपचारिक भावुकता को स्वल्प परिणाम में ही श्रेय दिया जा सकता है। सफलता का मूल आधार तो उनका प्रखर व्यक्तित्व और परमार्थ परायण क्रिया−कलाप ही रहा है।
आत्मशक्ति का उपार्जन व्यक्ति के लिये भी श्रेयस्कर है और समाज के लिये भी मंगलमय है। सच्ची सम्पदा, आत्म शक्ति ही है। शरीर−शक्ति बुद्धि−शक्ति, धन−शक्ति, के प्रतिफल सीमित हैं, साथ ही क्षणिक भी। चिरस्थाई व्यापक और प्रचण्ड परिणाम आत्मशक्ति के ही हैं। इसलिये उसका उपार्जन चरम पुरुषार्थ कहा जाता है। छोटे व्यक्ति छोटी वस्तु ढूँढ़ते बड़े बड़ी छोटों की दृष्टि तात्कालिक लाभ पर केन्द्रित रहती है। बड़े दूर की सोचते हैं। आत्म विकास का यही लक्षण है कि उद्देश्य ऊँचा रखा जाय−इस दृष्टि से आत्मशक्ति का उपार्जन और उसका परमार्थ प्रयोजनों में उपयोग करना ही सर्वोत्तम बुद्धिमत्ता कही जा सकती है। विभूतियों का उपार्जन ही सच्चा वैभव है।
इन प्रयोजनों की पूर्ति के लिये उपासना के क्षेत्र में गायत्री की महत्ता अनुपम−अद्भुत और अद्वितीय है।
उसके महात्म्य से शास्त्रों का पन्ना−पन्ना भरा पड़ा है। ऋषियों ने अपने अनुभव से उसकी महिमा को ऐसा बताया है जिसकी तुलना में अन्य सभी उपार्जन हल्के बैठते हैं। जिन ने इस कल्पवृक्ष के नीचे आश्रय लिया है−जिनने इस कामधेनु का दूध पिया है, उस सभी ने अपना अनुभव यह बतलाया है कि इस अवलम्बन को पकड़ने से बढ़कर श्रेय−सौभाग्य का और कोई आधार नहीं हो सकता।
इतने पर भी एक दर्पण की तरह स्पष्ट है कि उपासना का साधना के साथ अविच्छिन्न सम्बन्ध है। साधना के बिना उपासना का कोई चमत्कार दृष्टिगोचर नहीं हो सकता। इसलिये अनुष्ठान उपचार का महत्व स्वीकार करते हुए भी इस आवश्यकता को भी समझा जाना चाहिए कि आत्मिक प्रगति के लिये उपासनात्मक उपचारों से भी अधिक महत्व साधक के चिन्तन और चरित्र में उत्कृष्टता का समावेश होने का है। साधना इसी को कहते हैं। जो साधक है, उसकी उपासना फलवती हुए बिना रह नहीं सकती। इसके विपरीत जिनके जीवनक्रम में निकृष्टता और दृष्टता भरी पड़ी है जिन्हें छल−छद्म ही रुचते हैं, जिन्हें लोभ−मोह से आगे की कोई बात सूझती ही नहीं, जिनके लिये वासना और तृष्णा ही सब कुछ है−इन्हीं प्रयोजनों के लिए अपना श्रम, समय और मनोयोग लगाये रहते हैं, इन्हीं के लिए पूजा−पाठ का ढोंग रचते हैं−ऐसे व्यक्ति निष्प्राण उपासना का प्रतिफल भी निराशा के रूप में ही पाते हैं। साधना से सिद्धि का सिद्धान्त समझने वाले जानते हैं कि आस्तिकता की सफलता के साथ आध्यात्मिकता और धार्मिकता का समावेश होने की शर्त भी जुड़ी हुई है।
एक लुहार बढ़िया बाण बनाने के लिए प्रसिद्ध था। अपनी प्रवीणता में उसे ख्याति प्राप्त थी।
एक दूसरा लुहार बालक वैसे ही बाण बनाने की विद्या सीखने के लिए उनके पास पहुँचा। कुछ दिन रहा भी।
एक दिन धूमधाम से बरात सामने से निकल रही थी। बाजे बज रहे थे। लुहार ने अपनी तन्मयता में तनिक भी अन्तर न आने दिया। पर वह सीखने वाला लड़का बरात देखने चला गया।
लौटने पर उसने पूछा! ताऊ जी आपने बरात देखी? कैसी सुन्दर थी उसकी सजावट। सिखाने वाले ने कहा मैंने बाण निर्माण के अतिरिक्त और किसी काम में रत्ती भर भी मन नहीं जाने दिया।
सीखने आये लड़के ने जाना कि किसी कार्य में प्रवीण−पारंगत होने का एक ही उपाय है−लक्ष्य में तन्मय हो जाना।
भारतीय संस्कृति में आस्तिकता को जितना महत्व मिला है प्रतीकों में सूत्र के साथ शिखा को (चोटी को) भी उतना ही महत्वपूर्ण माना गया है। धर्मशास्त्रों में शिखा को प्रत्येक व्यक्ति के लिए एक अत्यन्त पवित्र और अनिवार्य−प्रतीक बताया गया है। इतिहास इस बात का साक्षी है कि प्राण दिये जा सकते थे, पर शिखा नहीं। गुरु गोविन्द सिंह के पुत्रों ने अपनी जीवित बलि दे दी, पर चोटी नहीं कटाई। प्राण जैसी महत्वपूर्ण वस्तु हँसते−हँसते दे देना, पर संस्कृति की−हिन्दुत्व की प्रतीक चोटी को न कटवाना यह संकेत करना है कि शिखा रखने का कोई बड़ा भारी रहस्य भारतीय तत्वदर्शन में है, अन्यथा उस पर मनीषियों ने जोर न दिया होता।
आर्षग्रन्थों में उल्लेख है−
“चिद्रुपिणि महामाये दिव्य तेज समन्विंते। तिष्ठ देवि शिखा मध्ये तेजो वृद्धिं कुरु ष्व मे॥”
अर्थात्− चेतना स्वरूप महान महिमावाली तथा दिव्य तेज प्रदान करने वाली है शक्ति, तुम हमारी शिखा में आओ, बैठो और हमारे अन्दर तेजस्विता की अभिवृद्धि करो।
दीर्घायुष्य वाय बलाय वर्यसे। शक्तये शिखाये वषाट्॥
अर्थात्−”तुम दीर्घ जीवन, बल, ब्रह्मवर्चस् और शक्ति का संवर्धन करने वाली हो।”
इन मंत्रों में शिखा के सूक्ष्म रहस्यों और उसके महान महत्व का प्रतिपादन किया गया है। अध्यात्मवेत्ता मनीषियों का कहना है कि यही वह माध्यम है, जो सर्वप्रथम मानवीय चेतना का सम्बन्ध सृष्टि की अनादि चेतन शक्तियों से जोड़ती है। जिस तरह किसी रेडियो स्टेशन से संदेश प्रसारित करने हों तो उसे विद्युत तरंगों द्वारा किसी शक्तिशाली ट्रांसमीटर द्वारा निक्षेपित करना पड़ता है, ठीक वैसा ही कार्य शिखा द्वारा अन्तःकरण की भाव तरंगें किन्हीं देवशक्तियों तक पहुँचाने के रूप में होता है। बाहरी संदेश और रेडियो तरंगों को ग्रहण कर आवाज में बदलने के लिए प्रारंभिक आवश्यकता ‘एरियल’ या ‘एंटीना’ की होती है। मनुष्य शरीर जैसे दिव्य रेडियो और टेलीविजन सेट में यह कार्य शिखा से ही सम्पन्न होता है। इस तरह बाह्य और आन्तरिक शक्तियों का मूल बिन्दु शिखा को ही माना जाना चाहिए।
बरगद एवं पीपल की महान एवं रुद्र जटायें−एरियल रुट्स तथा पेड़−पौधों की पत्तियाँ अपने सूक्ष्म छिद्रों स्टोमेटा से हवा और प्रकाश के कण खींचती हैं जिससे उनमें ‘फोटोसिन्थेसिस’−प्रकाश संश्लेषण की क्रिया होती है और वे अपना विकास करते रहते हैं। मनुष्य के बाल भी देखने में अत्यन्त बारीक दिखायी देते हैं, पर वे भी छिद्रयुक्त होते हैं और त्वचा के अन्दर उनका सम्बन्ध तंत्रिका तंतुओं से होता है। शक्ति संरक्षण एवं पोषण में इनकी भूमिका महत्वपूर्ण होती है।
मनोवेत्ताओं के अनुसार शरीर के अन्य भागों के बाल जहाँ शरीर के विभिन्न अंगों को पोषण और प्रकृति के परिवर्तन से होने वाले तापमान की घट−बढ़ से सुरक्षा रखते हैं, वहाँ सिर के बाल विशेष कर शिखा क्षेत्र मस्तिष्क की शक्तियों को प्रबुद्ध और प्रखर बनाते−तेजस्विता प्रदान करते हैं। स्त्रियाँ लम्बे बाल मुखमंडल को तेजस्व की प्राप्ति होती रहती है और वे देखने में सुन्दर आकर्षक लगती हैं। अनिष्टकारी प्रभावों से रक्षा, अवसाद से रक्षा, मनोबल की वृद्धि, वासना की कमी तथा मानसिक शक्तियों के पोषण में यों सिर के सभी बालों का महत्व है, पर शिखा−स्थान का महत्व इन सबसे अधिक है। शक्तियों को खींचने और प्रेषण करने का सबसे संवेदनशील स्थान यही है। यहाँ के बाल बार−बार कटवाते रहने से बार−बार शक्ति खर्च होती रहती है, पर यदि शिखा रखाकर उस शक्ति के अपव्यय को रोक देते हैं तो उसी से मानसिक शक्तियों का पोषण होने लगता है। वही शक्ति मनुष्य की विवेक शक्ति, दूरदर्शिता, दृढ़ता, संयम और प्रेम की शक्ति के रूप में विकसित होकर मानव जीवन में शक्ति और सफलता, सुख और शान्ति के द्वार खोलने में मदद करती है।
शिखा रखना अब तक श्रद्धा और विश्वास का विषय था। हम भारतीय लोग हमेशा से उसी आधार पर चोटी रखते आये और उसके दिव्य लाभों से लाभान्वित होते रहे हैं। धर्म−ध्वजा की तरह उसकी रक्षा को जातीय गौरव और प्रतिष्ठा का चिन्ह मानते रहे हैं, पर आज जब कि लोगों में सूक्ष्म बौद्धिक क्षमता का − विवेकशीलता का अभाव हो चला है, लोगों की कल्पना और विचारशीलता स्थूल भौतिक जानकारियों तक सीमित हो गयी हैं। यह प्रश्न उठाया जाने लगा है कि आखिर शिखा रखने का−संस्कार परम्पराओं का वैज्ञानिक अर्थ क्या है? श्रद्धा−पोषित सीधे सादे पुरोहित उसका उत्तर भले ही न दे सकें, पर यह सच है कि आज विज्ञान भी मानने लगा है कि शिखा स्थान का मानव जीवन से महत्वपूर्ण सम्बन्ध है।
इस संदर्भ में हुई वैज्ञानिक शोधों ने शिखा स्थान की वही महत्ता प्रतिपादित की है जो हमारे प्राचीन मनीषियों ने उसे गहन अनुसंधान के पश्चात् प्रदान की थी। प्रख्यात वैज्ञानिक नेलसन ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक “ह्युमन मशीन” में ‘रेटीक्युलर फार्मेशन’−तंत्रिका जाल पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए बताया है कि शरीर में सतर्कता के सारे कार्यक्रमों का नियमन उसी स्थान से होता है। मस्तिष्क के पार्श्वभाग थर्डवेन्ट्रिकल की सतह मेडुला आब्लाँगेटा से लेकर हाइपोथैलेमस तक फैली यह संरचना अपने आस पास के वातावरण, जलवायु आदि में आने वाले तनिक से भी परिवर्तन को समझने, ग्रहण करने और परिवर्तन के अनुसार शरीर में समायोजन करने का कार्य करती है। यह नाड़ी जाल बहुत से मस्तिष्कीय नाड़ी तन्तुओं के समानान्तर रूप से एक ही केन्द्र की ओर जाने से विनिर्मित होता है। यह स्थान ठीक चोटी के नीचे स्थित पीनियल ग्रन्थि के अधोभाग में सेरिब्रम में बाह्य परिवर्तनों का संग्राहक और व्यवस्थापक ही नहीं अनेक विलक्षण अनुभूतियों का मार्ग भी यह चोटी वाला स्थान है, इसे ही सूक्ष्म ब्रह्मांडीय तरंगें प्रभावित करती हैं। अतीन्द्रिय ज्ञान, ध्यान द्वारा आकाश स्थित सूक्ष्म शक्तियों के आकर्षण का मूल बिन्दु यही है। यदि इस क्षेत्र की संवेदनशीलता को बढ़ा दिया जाय तो मनुष्य को सूक्ष्म अनुभूतियाँ सहज ही होने लग जाती हैं।
सुप्रसिद्ध अँग्रेजी वैज्ञानिक पत्रिका ‘नेचर’ के पिछले एक अंक में अमेरिकी अनुसंधानकर्ता वैज्ञानिकों का एक लेख छपा है जिसमें एक प्रयोग का हवाला देकर यह सिद्ध किया गया है कि यदि मस्तिष्क के शिखा वाले उस केन्द्र को अत्यधिक संवेदनशील बना लिया जाय, जो सभी ज्ञानेन्द्रियों की संवेदनाओं को ग्रहण करता और उनके अनुरूप अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करता है, तो जो कार्य आँखें, नाक, कान, त्वचा आदि करती हैं वह अपने आप अतीन्द्रिय रूप में किया जा सकता है। समाधि अवस्था का यथार्थ ज्ञान और स्वप्नों की सत्य अनुभूतियाँ इसी संवेदनशीलता का परिणाम होती हैं। महाराजा रणजीत सिंह और अँग्रेज जनरल वेन्टुरा की उपस्थिति में संत हदास ने एक माह की समाधि लगायी थी। जब वे बाहर निकले थे तब चिकित्सकों एवं वैज्ञानिकों ने उनकी जाँच करते समय पाया था कि उनकी चोटी वाले स्थान का तापमान इतना अधिक था कि उसे छुआ भी नहीं जा सकता था। इससे उन्होंने अनुमान लगाया था कि समाधि की स्थिति में श्वांस लेने और शरीर के कोषों की उत्सर्जन प्रक्रिया रोक कर उन्हें यथावत् स्थिति में रखने का काम तक इस संस्थान द्वारा किया जा सकता है। इस अवस्था में शरीर का सारा पोषण सूक्ष्म आकाश से होता है, साथ ही आत्मचेतना का बाह्य जगत से मुक्त सम्बन्ध तक जुड़ा रहता है। यह इस बात के प्रमाण हैं कि ब्रह्मांडव्यापी अनन्त शक्तियों से संपर्क और दूरानुभूति जैसी अतीन्द्रिय सामर्थ्यों का केन्द्र भी शिखा स्थान ही है। इस स्थान को भारतीय उपासना पद्धति में बहुत अधिक संवेदनशील बनाने का इसीलिए अनिवार्य विधान रखा गया है।
इन अमेरिकी वैज्ञानिकों ने ‘रेटीक्युलर फार्मेशन’ नामक मस्तिष्कीय केन्द्र पर किये गये विभिन्न प्रयोग−परीक्षणों के आधार पर निष्कर्ष निकाला है कि मस्तिष्क का यह स्थान सूक्ष्म आँख का काम करता है और विकिरण तरंगों तक को देख सकने में समर्थ है।
योगशास्त्रों में इसी केन्द्र को सहस्रार कमल कहा गया है जिसमें परमात्म सत्ता या−शिखा−शक्ति−आत्मा विराजमान रहती है। वही देखती, सुनती, चलती−फिरती और समस्त कर्मों का कर्माध्यक्ष है। इसलिए इस केन्द्र को जितना अधिक सुसंस्कारित, परिष्कृत एवं संवेदनशील बना सकते हैं, वह संसार के रहस्यों, आत्मा के रहस्यों, भूत और भविष्य में घटित होने वाली घटनाओं की सत्य जानकारियों को उतना ही अधिक स्पष्ट और सच−सच देख, सुन एवं अनुभव कर सकती है। शुद्ध हुए इस संस्थान की सहायता से ही योगी एवं ऋषि−मनीषी भविष्य में झाँक सकने में समर्थ होते हैं। चूँकि यह कार्य शिखा के बालों के माध्यम से ही होता है, ब्रह्मांड के लिए एरियल और ट्राँसमीटर वही है, इसलिये इसे आध्यात्मिकता का केन्द्र बिन्दु मानकर इतना महत्व दिया गया। आज जब इसके महत्व को भुला दिया गया है तब हमारी बौद्धिक क्षमतायें, अतीन्द्रिय सामर्थ्य कुंठित पड़ गयी हैं। शिखा−संस्थापन द्वारा शुभ संस्कारों का बीजारोपण कर हम पुनः अपने गौरवशाली अध्यात्म−परम्परा की पुनरावृत्ति कर सकते हैं शिखा ही व्यक्ति को व्यष्टि से समष्टि और अपनी सूक्ष्म सत्ताओं को अनन्त क्षमताओं से जोड़कर लाभान्वित होने का माध्यम है। उसकी जितनी महिमा गायी जाय कम है।
पिण्ड और ब्रह्मांड का अपना स्वतंत्र चुम्बकीय क्षेत्र होता है। हम जिस ग्रह गोलक में निवास करते हैं, उसका भी एक चुम्बकीय क्षेत्र है। इसमें रहने वाले समस्त जीव−जन्तुओं और वृक्ष−वनस्पतियों का भी आकार की न्यूनाधिकता के अनुरूप अपना विशिष्ट चुम्बकीय प्रभाव होता है। यहाँ तक कि धरती में भी स्थान भेद के आधार पर भूचुम्बकीय क्षेत्र में भिन्नता देखी जाती है। मनुष्य में जब यह प्रभाव कमजोर हो जाता है अथवा उसे किसी ऐसे भूभाग में रहने की विवशता आ पड़ती है, जहाँ का चुम्बकीय क्षेत्र निर्बल हो, तो वह उसे प्रभावित किये बिना नहीं रहता।
आमतौर से बोलचाल की भाषा में इस प्रभाव को जलवायु की संज्ञा दे दी जाती है और कहा यह जाने लगता है कि हमारे अथवा हमारे जैसे व्यक्तियों के लिए वहाँ की आबोहवा अनुकूल नहीं, पर सभी के स्वास्थ्य के लिए प्रतिकूल हो, ऐसी बात भी नहीं है। अन्य अनेक लोग उसी जलवायु और स्थान में स्वस्थ व सबल रहते देखे जाते हैं। फिर दूसरों के लिए यह अनुपयुक्तता क्यों? इसका उत्तर विज्ञान देता है।
विज्ञान की इन दिनों एक नितान्त नूतन शाखा बड़ी तेजी से फूलती, फलती और विकसित होती दिखाई पड़ रही है। इसे विज्ञान जगत में मैगनेटोबायोलॉजी के नाम से अभिहित किया गया है। इसके अग्रणी वैज्ञानिक पूर्व सोवियत संघ के डॉ. यूरी खोलोडोव हैं। जीव विज्ञानी डॉ. खोलोडोव ने जब एक प्रयोग के दौरान चूहों और कुछ विशेष किस्म के पौधों को न्यून चुम्बकीय क्षेत्र वाले भू−भाग में कुछ दिनों तक रखा, तो उनकी चयापचय क्रियाओं एवं अमीनो अम्ल निर्माण प्रक्रियाओं में स्पष्ट व्यवधान पड़ता देखा गया। अनेकों में ट्यूमर का विकास भी स्फुट परिलक्षित हुआ। किन्तु सबसे अधिक और स्पष्ट प्रभाव इसका तन्त्रिका तंत्र पर पड़ता देखा गया। परीक्षणों के दौरान इस बात का संकेत मिला कि न्यून चुम्बकीयता से स्मृति, धारण शक्ति और मनःसंस्थान भी सर्वथा अप्रभावित नहीं रह पाते हैं। स्मृति और एकाग्रता में इसके कारण ह्रास आता है, जबकि उत्तेजना को बल मिलता है।
अध्यात्म विज्ञान के अनुसार जिस व्यक्ति में जीवनी शक्ति, जिस अनुपात में घटती जाती है, वह उतना ही दीन−दुर्बल बनता जाता है। सबसे अधिक रोग−शोक ऐसे ही लोगों को सताते हैं। उत्तेजना और उन्माद इन्हीं में सर्वाधिक देखे जाते हैं। शरीर बाहर से फूला दीख पड़ने पर भी उस विद्युत का अभाव होता है, जिसे ‘जीवट’ कहा गया है। ऐसी दशा में उससे न तो कोई कहने लायक काम बन पड़ता है, न किसी में पूर्ण सफलता मिल पाती है। यदा−कदा मिलती भी है, तो वह ऐसी अधूरी और अधकचरी होती है, जिससे असंतोष ही बढ़ता है। आत्मबल और मनोबल इस कदर घट जाते हैं, कि कोई श्रेष्ठ कार्य करने का साहस नहीं जुट पाता और कर्ता निरन्तर पतनोन्मुख बनता जाता है।
इस दृष्टि से विचार करें, तो वर्तमान सामाजिक स्थिति बिल्कुल मिलती−जुलती दीखती है। इस दिनों बरसाती उद्भिजों की तरह जिस गति से व्याधियाँ पनपी हैं, वैसा पूर्व में कदाचित् ही कभी रहा हो। मनःसंस्थान की विकृतियाँ भी सम्प्रति जोर पर हैं। उन्माद, उत्तेजना और पागलपन इतने उग्र हो उठे हैं, जिन्हें देख कर आशंका यह होने लगती है कि संसार और समाज इनसे मुक्त हो पायेंगे क्या? पूरी तरह इनके चंगुल से छूट पायेंगे क्या? बुरे कृत्यों के प्रति लगाव व झुकाव तो इन दिनों आम बात है, पर समाज को उठाने व दिशा देने वाले सत्कार्यों के प्रति समर्पण और सत्साहस किन्हीं−किन्हीं में ही देखे जाते हैं। आज न अनीति के प्रति मन्यु प्रदर्शित करने एवं उन्हें घटाने−मिटाने के निमित्त गाण्डीव धारण करने वाले अर्जुन दृष्टिगोचर होते हैं, न अपने दुर्धर्ष व भीष्म संकल्प से मृत्यु तक को लौट जाने के लिए विवश करने वाले पितामह, न कर्ण, न उच्च आदर्शों के प्रति निष्ठावान हनुमान कहीं दीख पड़ते हैं। न्यूनाधिक मिलते और दीखते भी हैं, तो इतने थोड़े कि उतनी कम विभूतियों से काम किसी प्रकार चलने वाला नहीं। इनका तो पूरा−का−पूरा परिकर चाहिए, ताकि आज की प्रतिकूलता को उलट कर सीधा किया जा सके। उसे अनुकूल बनाया जा सके। आखिर इस वीर−प्रसूता भूमि को हो क्या गया है? जिससे यह निर्जीव−निष्प्राण−सी लगने लगी है।
अध्यात्म विज्ञानी इसका एक ही कारण बताते हैं−जीवनी शक्ति का अतिशय अभाव। यहाँ पदार्थ विज्ञान और अध्यात्म विज्ञान की परस्पर संगति बैठती दिखाई पड़ती है। विज्ञान की अधुनातन शोधें बताती हैं कि किसी स्थान की न्यून चुम्बकीयता व्यक्ति के मन−मस्तिष्क को प्रभावित किये बिना नहीं रहती। यही अध्यात्म विज्ञान की मान्यता है। उसके अनुसार जब जीवनी शक्ति घटती है, तो व्यक्ति का स्वास्थ्य और संकल्प लड़खड़ाने लगता है। उल्लेखनीय है कि अध्यात्म विज्ञान जिस ऊर्जा को जीवनी शक्ति के नाम से पुकारता है भौतिक विज्ञान उसे ही काय−विद्युत, काय चुम्बकत्व, एवं आभामंडल जैसे संबोधनों से संबोधित करता है। दोनों में नाम के अतिरिक्त कोई और अन्तर नहीं है।
यहाँ यह प्रश्न उठ सकता है कि वर्तमान में व्यक्ति की शरीर−ऊर्जा जब बेतरह जीर्ण और जर्जर हो गई है, तो एक ही स्थान में रहने वाले लोगों की स्वस्थता में भिन्नता क्यों नजर आती है? मानसिक विक्षोभों की यदि उपेक्षा कर दें, तो क्यों कोई व्यक्ति स्थान विशेष पर शारीरिक दृष्टि से निरोग नजर आता है? जब कि दूसरे कई यह शिकायत करते सुने जाते हैं, कि उक्त स्थान की जलवायु उनके अनुकूल नहीं। इतना ही नहीं, वहाँ वे लगातार रुग्ण रहते और अनेकानेक प्रकार की शारीरिक−मानसिक बीमारियों से पीड़ित दिखाई पड़ते हैं। इसका कारण बताते हुए विशेषज्ञ कहते हैं कि वर्तमान में शरीर−ऊर्जा, जिसे विज्ञान कायविद्युत अथवा चुम्बकीयता भी कहता है, मनुष्यों में अपेक्षाकृत घट गई है, जिससे उसके मन−मस्तिष्क पर हर वक्त बेचैनी और व्याकुलता सवार रहती है। कुछ हद तक तो इस कमी की परिपूर्ति उस स्थान की भू−चुम्बकीयता करती रहती है, किन्तु जब शरीर चुम्बकत्व में एक निश्चित सीमा से अधिक न्यूनता आ जाती है, तो उस क्षेत्र का भू−चुम्बकत्व भी उस क्षति की पूर्ति करने में अक्षत साबित होता है। ऐसे में विक्षोभों का विस्तार मानसिक स्तर तक सीमित न रह कर काय−ऊर्जा−की कमी विभिन्न प्रकार के शारीरिक लक्षणों के रूप में भी प्रकट होने लगती है और व्यक्ति को शरीर−मन से दीन−दुर्बल बना कर रोग−शैय्या पर ला पटकती है। इस स्थिति में चिकित्साशास्त्री उसे सैनिटोरियमों−हिल स्टेशनों में ले जाने की सलाह देते हैं। हिल स्टेशनों में वृक्ष वनस्पतियों की सघनता होने से उस स्थान विशेष में भौषजीय चुम्बकत्व की प्राणवायु ऑक्सीजन के अतिरिक्त स्वभावतः प्रचुरता होती है। इस प्रकार रोगी के शरीर चुम्बकत्व की कमी का संतुलन−समीकरण पादपीय चुम्बकत्व से बन जाने के कारण बीमार स्वाभाविक ढंग से स्वास्थ्य लाभ करने लगता है और कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है, पर यह उपचार अस्थायी होता है। इस मध्य मरीज की जीवनी शक्ति यदि नहीं बढ़ी, तो स्थान परिवर्तन के साथ उसके दुबारा रुग्ण बनने की पूरी संभावना रहती है, अस्तु इसे स्थायी इलाज नहीं कहा जा सकता। स्वास्थ्य का स्थायित्व तो काय−चुम्बकत्व के संरक्षण और संवर्धन पर ही आधारित है, अतः इस ऊर्जा को बढ़ा कर के ही स्वस्थ और सबल रहा जा सकता है।
इसके दो तरीके हैं−उपासना और साधना। उपासना के दौरान इष्ट से प्राण−ऊर्जा ग्रहण−धारण करने की प्रबल भावना और साधना के माध्यम से उन तत्वों को नष्ट−भ्रष्ट करना, जो प्राण−संचय में विघ्न−उपस्थित करते और उसके भण्डार को निरन्तर खाली करते रहते हैं। ईर्ष्या, द्वेष, असंयम आदि ऐसे ही अवाँछनीय तत्व हैं, जो हमारे शरीर चुम्बकत्व को−जीवनी शक्ति को लगातार घटाते रहते हैं। यदि इस ऊर्जा को बढ़ाया जा सके, तो कोई कारण नहीं कि हमारी शारीरिक−मानसिक स्वस्थता न बढ़ सके हम अक्षुण्ण स्वास्थ्य न प्राप्त कर सकें। इतना ही नहीं, फिर हम चाहे कितने ही न्यून भू−चुम्बकीय क्षेत्र में चले जायँ, उससे हमारा स्वास्थ्य सर्वथा अप्रभावित ही रहेगा और किसी प्रकार के अवाँछित असर उत्पन्न करने में वह एकदम विफल बन जायेगा। कहावत है कि निर्बल को सभी सताते हैं, पर सबल का सामना करने से कतराते हैं। बीमारियों, बाह्य कारकों के सम्बन्ध में भी सत्य यही है। कमजोर शरीर में ही उनका आक्रमण होता है। बलवान−वीर्यवान शरीर से वह कोसों दूर रहते हैं। हम हतवीर्य न बनें−इसके लिए आवश्यक है कि अपने चुम्बकत्व को अभीष्ट परिमाण में बढ़ायें, ताकि स्थान विशेष का चुम्बकत्व हमें प्रभावित न करे, वरन् हम उस स्थान को, वहाँ के निवासियों को अपने प्रबल चुम्बकत्व से प्रभावित कर सकने में समर्थ हो सकें। यह आरंभिक प्रयोग और पुरुषार्थ हममें से प्रत्येक को संपादित करना आना चाहिए।
भारत भूमि की प्रसुप्त अन्तरात्मा को जगाने के लिये ज्ञान और विज्ञान की प्रतिष्ठापना को करना सर्वप्रथम कार्य है। विज्ञान इन दोनों के बल पर ही कोई व्यक्ति या राष्ट्र उन्नति कर सकता है। जब इन दोनों में एक की भी कमी हो जाती है तो अधःपतन आरम्भ हो जाता है। ज्ञान का अर्थ है-विद्या, बुद्धिमत्ता, विवेक, दूरदर्शिता, सद्भावना, उदारता, न्यायप्रियता। विज्ञान का अर्थ है-बल, योग्यता, साधन शक्ति, सम्पन्नता, शीघ्र सफलता प्राप्त करने की सामर्थ्य। आत्मिक और भौतिक दोनों ही क्षेत्रों में जब संतुलित उन्नति होती है तभी उसे वास्तविक विकास माना जाता है। प्राचीन काल में जनता से लेकर राजपरिवारों तथा ऋषि आश्रमों ज्ञान और विज्ञान की समुचित प्रतिष्ठा थी। राजकुमार भी ऋषि आश्रमों में ज्ञान प्राप्त करते थे। दिव्य शस्त्रास्त्रों, दिव्य वाहनों, दिव्य सामर्थ्यों के आश्चर्यजनक वर्णन प्राचीन इतिहास पुराणों में भरे पड़े हैं। ऋषि लोग आत्म चिन्तन में परमार्थ साधनाओं में संलग्न रहते थे तो भी उनको अष्ट सिद्धि, नवनिधि सरीखी लोकोत्तर शक्तियां उपलब्ध रहती थीं। भारत प्राचीन काल में बुद्धिमान बनने के लिये ज्ञान की, और बलवान बनने के लिए विज्ञान की उपासना करने में सदैव संलग्न रहता था। योगी लोग जहाँ भक्ति भावना द्वारा भगवान में संलग्न होते थे, वहाँ कष्ट साध्य साधनाओं तथा तपश्चर्याओं द्वारा अपने में अनेक प्रकार की सामर्थ्य भी उत्पन्न करते थे। यह निर्विवाद है।
आज का ज्ञान प्रत्यक्ष दृश्यों, अनुभवों तथा विज्ञान मशीनों पर अवलम्बित है। भौतिक जानकारी तथा शक्तियां प्राप्त करने के लिए भौतिक उपकरण ही आज के वैज्ञानिक प्रयोग कर रहे है। यह तरीका बहुत खर्चीला, श्रमसाध्य, स्वल्प-फलदायक एवं अचिर अस्थायी है। जो ज्ञान बड़े-बड़े विद्वानों, प्रोफेसरों, रिसर्च स्कालरों द्वारा उत्पन्न किया जा रहा है वह भौतिक जानकारी तो काफी बढ़ा देता है, पर उससे अंतःकरण में आत्मिक महानता, उदार दृष्टि तथा लोकसेवा के लिये आत्मत्याग करने की भावना पैदा नहीं होती। आज का तथाकथित “ज्ञान” विज्ञान मनुष्य को अधिक स्वार्थी, धूर्त, खर्चीला एवं बनावटी बनाता जा रहा है। इसके विपरीत प्राचीनकाल में ज्ञान और विज्ञान के आधार आज से भिन्न थे। आज जिस प्रकार हर वस्तु जड़ जगत् में से, भौतिक परमाणुओं में से खोजी जाती और उपलब्ध की जाती है, उसी प्रकार प्राचीन काल में प्रत्येक बात, प्रत्येक वस्तु प्रत्येक शक्ति आत्मिक जगत में से ढूंढ़ी जाती थी। आज का आधार भौतिकता है, विज्ञान का यह सर्वविदित तथ्य है कि जितना कुछ पदार्थ प्रत्यक्ष रूप से दृष्टिगोचर हो रहा है हो रहा है-स्थूल है। उसकी अपेक्षा असंख्यों गुना वही पदार्थ अदृश्य-सूक्ष्म रूप से इस अखिल आकाश में भ्रमण माना जाय तो आकाश में करोड़ों टन पानी हर समय अदृश्य रूप से घूमता हुआ माना जायगा। हमारा विचार और संकल्प भी एक पदार्थ है। इस पदार्थ में एक प्रकार की चुम्बक शक्ति उत्पन्न की जा सकती है और उसकी सहायता से दृश्य जगत में भ्रमण करते रहने वाले किन्हीं विशेष पदार्थों के परमाणुओं को खींचकर अपनी ओर लाया जा सकता है। विज्ञान के इस आधार को पकड़कर ऋषियों ने यह देखा कि जब सृष्टि के सभी पदार्थों के अणु अपने शरीर तथा मनमें छिपी हुई नाना प्रकार की शक्तियों को विविध साधनाओं द्वारा जाग्रत किया। फलस्वरूप उनकी पकड़ने की शक्ति इतनी बलवान हो गई कि जिस प्रकार सारस अपनी लम्बी गर्दन पानी में डुबोकर चाहे जहाँ से मछली पकड़ लेता है, उसी प्रकार से वे आकाश क्षेत्र में से नाना प्रकार की
वस्तुएँ सामर्थ्य तथा शक्तियां पकड़ लेते थे।
ज्ञान और विज्ञान की हमारी प्राचीन शोध गायत्री और यज्ञ के आधार पर होती थी, क्योंकि यही दोनों आध्यात्म विद्या के माता-पिता हैं। गायत्री ज्ञान रूपिणी है, यज्ञ विज्ञान प्रतीक है। गायत्री मंत्र के 24 अक्षरों में मनुष्य जाति का ठीक प्रकार पथ प्रदर्शन करने वाली शिक्षायें भरी हुई हैं। इसके अतिरिक्त उन अक्षरों का गुन्थन रहस्यमयी विद्या के रहस्यमय आधार पर भी है। इन 24 अक्षरों का यदि शास्त्रोक्त उपासना विज्ञान के अनुसार उपयोग किया जाय तो शरीर और में भरी हुई अलौकिक शक्तियां अपने अपने ढंग से अपने-अपने समय पर स्वयमेव उद्भूत होती जाती हैं। आध्यात्मिक गुणों की तेजी से अभिवृद्धि होती हैं, बुद्धि तीव्र होती है तथा ऐसी दूरदर्शिता का विकास होता है जिसके आधार पर जीवन समस्या की अनेक गुत्थियों को सरल किया जा सके।
यज्ञ का विज्ञान अत्यन्त ही महत्वपूर्ण है। वेदमंत्रों की शब्द शक्ति को विशिष्ट कुण्डों, समिधाओं, हवियों, चरुओं के साथ उत्पन्न की हुई विशेष सामर्थ्यवान अग्नि में सम्मिश्रित कर देने पर रेडियो सक्रिय शक्ति तरंगों का आविर्भाव होता है। यह शक्ति तरंगें रैडार यंत्र की तरह संसार के किसी भी भाग में भेजी जा सकती हैं किसी व्यक्ति विशेष के शरीर में भरी जा सकती हैं। प्रकृति के गुह्य गह्वर में किसी विशेष प्रयोजन के लिये प्रविष्ट कराई जा सकती हैं। वर्षा, धान्य, दूध, ओज, आरोग्य, प्राण जीवन आदि की पृथ्वी पर अभिवृद्धि कराने के लिये उनका उपयोग किया
जा सकता है। भावनाओं, विचारधाराओं तथा परिस्थितियों के परिवर्तन के लिये यज्ञ से उत्पन्न शक्तियों का उपयोग हो सकता है। इस प्रकार के अगणित कारण और लाभ हैं जिनके कारण यज्ञ को एक अत्यन्त आवश्यक प्रक्रिया माना गया है। हिन्दू धर्म में प्रत्येक पर्व, उत्सव, पूजन, कर्मकाण्ड व्रत, संस्कार, त्यौहार, उपासना, साधना यज्ञ के साथ ही होता है। प्रसूति गृह से अखंड अग्नि की स्थापना के साथ हिन्दू बालक का जन्म होता है और जीवन लीला समाप्त होने पर यज्ञ भगवान को अन्त्येष्टि संस्कार के साथ शरीर सौंप दिया जाता है। यज्ञ को इतना महत्व ऋषियों ने इसलिये दिया था कि वह न केवल अनेकों भौतिक शक्तियों को देने वाला है, वरन् आत्मा का कल्याण करने वाला शरीर और मन को निर्मल, निर्विकार बनाकर शांतिदायक परिस्थितियाँ उत्पन्न करने वाला भी है।
साँस्कृतिक पुनरुत्थान के लिये हमें ज्ञान और विज्ञान की आवश्यकता होगी। इसके बिना वह महान कार्य सम्पन्न न हो सकेगा। भारतीय संस्कृति का बीज मंत्र गायत्री है । उसी की शिक्षाओं तथा शक्तियों के आधार पर हमारा सारा ढाँचा खड़ा हुआ है। अग्नि के समान तेजस्वी रहना, यही तो मानव जीवन का आदर्श है। भौतिक माता-पिता हमें शरीर, संपत्ति, शिक्षा, सुविधा, आश्रय, सहयोग, स्नेह आदि बहुत कुछ देते हैं। गायत्री माता और यज्ञ पिता की यदि हम प्रतिष्ठा और उपासना करें तो इसके द्वारा कर सकते हैं ऋद्धि-सिद्धियों के स्वामी बन सकते हैं।
गुरु शिष्य कहीं जा रहे थे। रास्ते में प्रश्नोत्तर का क्रम भी चलता रहता। शिष्य ने कहा-गुरुदेव, ज्ञान-विज्ञान में मन नहीं लगता। भजन भी बन नहीं पड़ता। कुछ उपाय करें।
गुरु ने दिव्य दृष्टि से वस्तुस्थिति समझी। शिष्य की पोटली में सौ रुपये थे। वह उनके सहारे कुछ करने की योजनायें बनाता रहता और सुनहरे सपने देखता रहता। कारण समझ में आ गया कि आसक्ति के रहते, विरक्ति के मार्ग पर चल सकना बन नहीं पड़ेगा।
अगले पड़ाव पर शिष्य शौच गया। पोटली वहीं रखी रही। गुरु ने रुपयों की थैली निकाली और कुएं में फेंक दी। धड़ाम की आवाज हुई। शिष्य भागा आया। पूछा क्या हुआ-किसकी आवाज हुई गुरुदेव! उत्तर मिला, लुभाने वाली, माया चली गई। अब मन एकनिष्ठ होकर परमार्थ में लगेगा। दो घोड़ों की सवारी में असमंजस ही रहता है।
द्वितीय विश्व युद्ध का एक प्रसंग है कि इटली का तानाशाह मुसोलिनी नाजीवाद की पराजय के साथ अपने देश में उभरी क्राँति के परिमाण स्वरूप जान बचाकर भागा। मिलान से वह स्विट्जरलैण्ड अपनी प्रेयसी क्लारा पैट्सी के साथ ट्रक में जा रहा था। गुप्त रूप से बनी इस योजना की जानकारी किसी को भी नहीं थी। अरबों रुपये की बहुमूल्य सम्पत्ति, सोने की छड़ें, हीरे-जवाहरात जो उसके द्वारा नृशंसतापूर्वक शासन करते हुए कमाये गये थे तथा विदेशी मुद्रा जो खरबों डालर्स के मूल्य की थी उसके पास थी। उसका पलायन सफल नहीं हुआ। वह रास्ते में पकड़ा गया व कम्युनिस्टों द्वारा गोली से उड़ा दिया गया। दानों की लाशों का सार्वजनिक प्रदर्शन किया गया। खजाना कब्जे में लिया गया।
आश्चर्य यह हुआ कि वह विपुल सम्पदा रहस्यमय ढंग से कहीं गायब हो गयी। गुप्तचर विभाग की सारी शक्ति उस धन को तलाश करने पर केन्द्रित कर दी गई। विभाग की जिन दो सुन्दरियों ने मुसोलिनी को पकड़वाने में सहायता की थी, वे भी मरी पाई गई।
इसी प्रकार जिन लोगों को खजाने के बारे में कुछ जानकारी हो सकती थी ऐसे 75 व्यक्ति एक-एक करके कुछ ही दिनों के भीतर मृत्यु के मुख में चले गये। जिस ट्रक में मुसोलिनी भाग रहा था उसके ड्राइवर गौरेवी लाश क्षत विक्षत स्थिति में एक सड़क पर पड़ी पाई गई उसके पास मुसोलिनी का फोटो मौजूद था।
खजाने से भी अधिक रहस्यमय यह था कि उस प्रसंग से सम्बन्ध रखने वाले सभी व्यक्ति एक-एक करके मरते चले जा रहे थे। सन्देह यह किया जा रहा था कि कोई संगठित गिरोह यह कार्य कर रहा होगा, पर यह बात इसलिए सही नहीं बैठ रही कि मरने वाले एकाध दिन पूर्व ही बेतरह आतंकित होते थे और मुसोलिनी की आत्मा द्वारा उन्हें चुनौती, चेतावनी दिये जाने की बात कहते थे। खोज-बीन में संलग्न एक अधिकारी भी उस खजाने की वाली झील के पास मरा पाया गया। दूसरे अधिकारी मोस्कोवी की लाश उसके स्नानागार में ही मिली जिसका सिर गायब था। लाश के पास ही एक पर्चा मिला जिस पर लिखा-’मुसोलिनी का शरीर मर गया पर उसकी आत्मा प्रतिशोध लेने के लिए मौजूद है।
इस कार्य के लिए अतिरिक्त रूप से नियुक्त वरिष्ठ खुफिया पुलिस के अधिकारी बूचर और स्मिथ नियुक्त किये गये। उनने खजाने का पता लगाने का बीड़ा उठाया। यह स्पष्ट था कि वह धन कोमो झील के आस-पास ही होना चाहिए क्योंकि वहीं मुसोलिनी पकड़ा गया था। पकड़े जाते समय उसके पास वह खजाना था। गायब तो वह इसके बाद ही हुआ। इसलिए उसका वहीं कहीं छिपा होना सम्भव है। कम्युनिस्टों ने भी उसे वहीं कब्जे में ले लिया था और एक के बाद उनके बड़े अफसर भी जल्दी ही एकत्रित हो गये थे, इतने समूह द्वारा चुरा लिये जाने की बात भी सम्भव नहीं थी। फिर वे पकड़ने वाले कम्युनिस्ट भी तो उसी कुचक्र में मर रहे थे।
अपने खोज कार्य में बूचर और स्मिथ अपने दल सहित कोमो झील के समीप ही डेरा डाले पड़े थे। अचानक एक रात उनने मुसोलिनी को सामने खड़ा देखा उसका पीछा करने के लिए वे दौड़े पर तब तक वह गायब हो चुका था हाँ उसके पैरों के ताजा निशान ज्यों के त्यों धूल पर अंकित थे। गुप्तचर विभाग ने प्रमाणित किया वे निशान सचमुच मुसोलिनी के पद चिन्हों से पूरी तरह मिलते हुए है। वे दो ही अधिकारी दूसरे दिन से गायब हो गये और फिर उनका
कहीं पता न चला। अब भी उस खजाने को अभिशप्त की संज्ञा प्राप्त है। अभी तक पचास वर्ष बाद भी उसे पाया नहीं जा सका है व जिसने भी यह प्रयास किया है, उसे मौत के मुँह में जाना पड़ा है। यह हश्र हर उस व्यक्ति का होता है जो ऐसी संपदा के लालच में अपनी दुर्गति स्वयं करने को तत्पर हो उठता है।
तख्त ताऊस (मयूर सिंहासन) ने, जिसे शाहजहां ने बनाया था, एक ऐसी ही अभिशप्त विरासत के रूप में प्रसिद्ध प्राप्त की, क्योंकि इसके साथ ही मुगल साम्राज्य का पतन आरीं होने लगा। उसमें 12 करोड़ रुपये के रत्न जड़े थे। उसके निर्माण में सात वर्ष लगे और तत्कालीन श्रेष्ठतम रत्न शिल्पियों ने उसे बनाने में अपना पूरा श्रम, समय एवं मनोयोग लगाया। इसमें पन्ने से बने पाँच खम्भों पर मीनाकारी का छत्र बना हुआ था। पाये ठोस सोने के बने थे। खम्भों पर दो-दो मोर नृत्य करते हुए बनाये गये थे। प्रत्येक जोड़ो के बीच में हीरे-लाल, मोती, पन्ने आदि रत्नों से जड़ा एक-एक पेड़ था। बैठने के स्थान तक पहुँचने के लिए तीन रत्न-जड़ित सीढ़ियाँ थीं। उसमें कुल मिलाकर ग्यारह चौखटें थीं। मीनाकारी का स्वर्ण छत्र देखते ही बनता था। तख्त-ताऊस को अपने समय की अद्भुत और बहुमूल्य कलाकृति माना जाता था।
जिन अरमानों के साथ शाहजहां ने उसे बनवाया था वे पूरे न हुए। वह कुछ ही दिन उस पर बैठ पाया था कि उसके बेटे औरंगजेब के आतंक भरे शासन के साथ ही मुगल साम्राज्य का पतन आरम्भ हो गया। मुहम्मदशाह राज्याधिकारी था। उस पर ईरान का नादिरशाह चढ़ दौड़ा और भारी लूट-खसोट के अतिरिक्त तख्त-ताऊस भी फारस उठा ले गया। उसी के कुटुम्बी कुर्दा ने नादिरशाह की हत्या कर दी और उसका सारा माल असबाब छीन लिया और जिसमें यह मयूर जड़ित सिंहासन भी सम्मिलित था। लुटेरों ने उसके टुकड़े-टुकड़े कर डाले और उन्हें आपस में बाँट दिया। बटवारे में उस शानदार शामियाने को भी कतरव्योंत कर लिया जो उस सिंहासन के ऊपर ताना जाता था और रत्नों की झिलमिलाहट से आकाश में चमकने वाले सितारों की बहार देता था। जहाँ-जहाँ भी-इसका एक हिस्सा भी गया, उसका पतन होता चला गया। कुछ समय बाद ईरान की सत्ता आगा मुहम्मद शाह ने सँभाली। उसने नादिरशाह के लुटेरे वंशजों को पकड़ कर भारी यातनाएँ दीं और लूट का सारा माल उगलवा लिया। इस वापसी में तख्त-ताऊस के टुकड़े भी शामिल थे। जौहरियों ने उन टुकड़ों को जोड़-तोड़ एक नया तख्त-ताऊस बनाया। इसके बाद भी वहाँ अराजकता और गृह-युद्ध का सिलसिला चलता रहा और उसे फिर लूट लिया गया। रत्नों को उखाड़ लिया और कीमती पत्थरों को भविष्य में फिर कभी काम में लाने की दृष्टि से समुद्र में किसी खास जगह छिपा दिया गया। छिपाने वाले उस स्थान को बता नहीं सके और वे अवशेष अभी भी ईरान के समुद्र तट के निकट उथली जल राशि में पड़े हैं। जो भी पता लगाने की कोशिश करता है, उसे मौत का मुँह देखना पड़ता है। शोषण कर उपार्जित की गयी संपदा को पाने का लालच जो भी करता है, उसे पतन को ही प्राप्त होना पड़ता है, यह स्रष्टा का नियम है। उपरोक्त प्रसंग इसी की साक्षी देते हैं।
जो उपलब्धियों पर प्रसन्न होना और सहयोग के लिए कृतज्ञता प्रकट करना नहीं जानता उसे इस संसार में अभाव और दोष ही दीखेंगे।
एक राजा किसी साधु को अपने रत्न भण्डार दिखाने ले गये। बहुमूल्य रत्नों का परिचय कराया गया। साथ ही यह भी बताया गया कि उसकी सुरक्षा के लिए कितने सशस्त्र सैनिकों का पहरा लगाया जाता है।
साधु ने उपेक्षा-पूर्वक उन्हें देखा और कहा-मैंने आपके इन सभी रत्नों से बड़ा रत्न देखा है। उस पर पहरा भी नहीं लगाया जाता साथ ही वह एक व्यक्ति के जीवन निर्वाह का साधन भी हर दिन जुटा देता है।
राजा आश्चर्य में पड़ गया और उस रत्न को देखने के लिए आतुरता प्रकट करने लगा। साधु उसे अपने साथ ले गया और एक झोंपड़ी में ले जाकर बुढ़िया की आटा पीसने की चक्की दिखाई और कहा- जैसे पत्थर है जो आटा पीसता है। पीसने वाले का पेट भरता है और चौकसी की जरूरत अनुभव नहीं करता। राजा लज्जित हो गया।
अपने बलबूते सामर्थ्य अर्जित करना किन्हीं बिरलों से ही बन पड़ता हैं। आत्म-संयम बिरलों से ही बन पड़ता है। आत्म-संयम और आत्म-उत्कर्ष के लिए निरन्तर साधना करनी पड़ती है। संचित दोष-दुर्गुणों से अनवरत संघर्ष करना होता है। गुण, कर्म, स्वभाव में घुसे हुए दोष दुर्गुण सहज ही पीछा नहीं छोड़ते। एक बार हटाने पर वे दूसरी बार दरवाजे से नहीं खिड़की खुली देखकर घुस आते हैं। यही बात सत्प्रवृत्तियों के बारे में है। युधिष्ठिर पहले ही पाठ को रटने में मुद्दतें लगा बैठे थे। जबकि अन्य साथी कई-कई पाठ याद कर चुके थे तब वे ‘सत्यं वद’ की ही रट लगाये रहे। बहुत समय बीत जाने पर जब गुरुदेव झल्लाये तो उन्होंने नम्रतापूर्वक एक ही उत्तर दिया। शब्द रटने से क्या होगा? मैं तो सत्यं वद को स्वभाव का ऐसा अंग बनाना चाहता हूँ कि वह फिर भूले नहीं-छूटे नहीं। सद्गुणों के बारे में यही कठिनाई है। दुर्गुण तो सहज ही स्वभाव में जम जाते हैं। पानी नीचे की ओर तो स्वभावतः ढलने लगता है, कठिनाई तो उसे ऊँचा उठाने में पड़ती है।
आत्म-निग्रह को सबसे बड़ा पराक्रम कहा गया है। सिंह, रीछ वानर, घोड़ा, हाथी आदि को सरकस में खेल दिखाने के लिए साथ लेना सरल है। पर मन को सत्प्रवृत्तियाँ अपनाये रहने के लिए अभ्यस्त करना कठिन है। योगियों को इसी आत्म साधना में सारा जीवन लगाना पड़ता है। जन्म जन्मान्तरों के संग्रहित कुसंस्कारों से पीछा छुड़ाना किसी भयंकर भूल से पल्ला छुड़ाने से कम नहीं है, फिर भी पराक्रमी लोग निरन्तर लगे रहते हैं तो सफलता पाकर ही रहते हैं। आत्मा पर विजय प्राप्त करने वालों की कमी नहीं रही है। प्रण करने वाले उसे पूरा करके भी रहते हैं।
इस प्रयास का एक सरल उपाय भी है-संगति सत्संग का बड़ा महत्व बताया गया है। उसमें मन रम जाय तो समझना चाहिए कि बाजी जीत ली। पारस को छूने से लोहे का सोना बन जाना एक उक्ति है जो सत्संग पर पूरी तरह लागू होती है।
एक दिन राजा वन विहार को गया। एक झोंपड़े के आगे एक तोता टँगा देखा। आते ही उसने रट लगायी----तलाशो छीनो।”वह चारों का घर था। कोई ---------जाय इसलिए वह आते ही शोर मचाता और सावधान करता। पूछने पर चारों ने तोते की रट का कारण समझा दिया। राजा आगे चला तो एक झोंपड़ी के आगे एक तोता और टँगा देखा। आते ही वह बोला-”विश्राम करें, जल पियें।” झोंपड़ी में से साधु निकले उनने अतिथि सत्कार किया। ठहराया, पानी पिलाया।
राजा ने साधुओं से भिन्न-भिन्न रट का कारण पूछा। साधु ने कहा-यह दोनों सगे भाई हैं। एक चोरों के यहाँ पला है एक हमारे यहाँ। जो चर्चा होती रहती है वही इन दोनों ने नकल करके सीख ली है। इसमें इनका दोष नहीं है। संगति का प्रतिफल है।
संगति में लोग जुआरी, चोर, व्यभिचारी, नशेबाज बन जाते हैं और ऐसा भी होता है कि, विद्या पढ़ें, सद्गुण अपनायें और श्रेष्ठ कर्मों में लग पड़ें। मनुष्य कोरे कागज की तरह है उस पर जो भी भला बुरा लिखा जाता है वही अंकित हो जाता है। मनुष्य दर्पण की तरह है जो भी सामने खड़ा होता है वैसी ही छवि दीखती है।
सत्संग का अर्थ केवल कथन-श्रवण नहीं है। ऐसा गोरखधंधा तो जगह जगह चलता है। पुराणों की कथा कहानियाँ जहाँ तहाँ होती रहती हैं। फालतू आदमी अपना समय काटने के लिए वहाँ जा पहुँचते हैं और मनोरंजन रूप में कुछ न कुछ गप शप होती रहती है। पर इससे समयक्षेप के अतिरिक्त और कुछ होता नहीं। सत्संग वाणी से कम और क्रिया से अधिक होता है। नकल क्रिया की, आचरण की होती है। प्रभाव उसी का पड़ता है। जिसको अपनी बात पर स्वयं विश्वास है वह क्रिया में भी उतारेगा। जिसका वचन और कर्म एक है उसका समीपवर्ती पर असर पड़े बिना नहीं रहेगा। नशेबाज पास बैठने वाले अनेकों को वह कुटेव सिखा लेते हैं। एक वेश्या ढेरों को व्यभिचार की आदत खा लेती है। किन्तु एक कथावाचक न स्वयं भक्त जैसे आचरण करता है और न पास बैठने वालों को वैसा कुछ सिखा पाता है कारण कि वहाँ मात्र कथनी काम करती है। करनी में सर्वथा भिन्नता होती है। जिनकी कथनी और करनी एक है उसका प्रभाव पड़े बिना नहीं रहेगा।
क्रियाशील व्यक्तित्व में एक जादुई प्रभाव होता है। मनुष्य एक चलता फिरता चुम्बक है। यदि वह प्रतिभा सम्पन्न है तो साथियों पर प्रभाव छोड़े बिना नहीं रह सकता। किन्तु यदि प्रतिभा-विहीन है तो निर्जीव, दुर्बल होने के कारण उलटा दुत्कारा जाता रहेगा। संसार में प्रतिभाशाली लोग अनेकों को अपना जैसा बनाने में समर्थ होते हैं। किसी को कुमार्गगामी बना लेना तो बहुत ही सरल है, पर प्रतिभावान, वचन और कर्म के धनी, समीपवर्तियों को सन्मार्ग पर चला सकने में भी समर्थ होते हैं।
अपने को किस मार्ग पर चलना है। किन विशेषताओं से सम्पन्न करना है। इस निश्चय के उपरान्त देखना यह चाहिए कि ऐसा वातावरण कहाँ है? उस मार्ग पर कौन लोग कितनी निष्ठापूर्वक चलते हैं। जहाँ उपयुक्त वातावरण दिखाई पड़े वहाँ बैठने का अवसर निकलना चाहिए। वहाँ क्या होता रहता है। क्या, कहाँ और क्या किया जाता रहता है, इसका मनोयोग-पूर्वक अवलोकन करना चाहिए। समय समय पर अपनी जिज्ञासाएँ और कठिनाइयाँ प्रस्तुत करते रहना चाहिए। उस विचार मंथन में से जितना समाधान निकलता हो उतना स्वीकारना और अपनाना चाहिए। कोई समय था जब गुरु-शिष्य की परम्परा चलती थी। छोटे पूछते थे और बड़े उसका उत्तर देते थे। पर इतने से ही काम चल जाता था। अब वह समय नहीं रहा। विचार विज्ञान का क्षेत्र बहुत बड़ा हो गया है। नित नये प्रसंग और आधार सामने आते हैं। हो सकता है कि बड़ों को उन उलझनों की जानकारी न हो और वे उनका समाधान पुराने ढंग से इस प्रकार करते हों जो आज के समयानुरूप न रह गया हो, ऐसी दशा में तर्कों का समीकरण आवश्यक है। आज की स्थिति में विचार मंथन ही सही तरीका है। एक व्यक्ति का समाधान गले न उतरते हों तो दूसरे, तीसरे और चौथे से उसकी पूछताछ करनी चाहिए।
सत्संग का अर्थ है आदर्शवादी चिन्तन और चरित्र के समन्वय का वातावरण तलाश करना और उसमें जितनी उपयुक्तता प्रतीत हो उसे अपने ढंग से अपनाने का प्रयत्न करना। अपने से तात्पर्य है अपनी परिस्थितियों के अनुरूप। पिछले समय में संत होने का एक ही प्रमाण था विरक्त होना। पारिवारिक जिम्मेदारियों की उपेक्षा करके भिक्षाटन पर निर्वाह करना। आज वह पद्धति करने तक की बात चले तो उसकी उपेक्षा कर देनी चाहिए। सत्संग से तात्पर्य उज्ज्वल चरित्र का अनुकरण माना जाय और ऐसे विचारों को हृदयंगम करना समझा जाय जो व्यक्ति, परिवार और समाज को प्रगतिशील दिशाधारा में अग्रसर करते हों। आयु की दृष्टि से किसी का बड़ा होना इस विवशता को उत्पन्न नहीं करता कि उनके द्वारा जो कहा गया है उसे माना ही जाना चाहिए। न मानने या तर्क करने पर उनकी बेइज्जती होगी। ऐसे जड़ता प्रतिबद्ध सत्संग से वह उद्देश्य पूरा नहीं होता, जिसके लिए इन पंक्तियों में जोर दिया गया है।
आज की परिस्थितियों में स्वाध्याय को सत्संग का माध्यम बनाया जाना ही सर्वश्रेष्ठ उपाय है। यह समय व्यस्तता का है जिसमें साथ में किसी के बैठकर जिज्ञासाओं का समाधान किया जाना हर जगह हर समय उपलब्ध नहीं हो सकता है। फिर जिन्हें पूछताछ करनी है वही सर्वथा खाली कहाँ हैं। पुराने जमाने में समय की इतनी अधिक कीमत नहीं थी। गुरु भी ढेरों मिल जाते थे और शिष्य भी। घंटों सत्संग चलते रहते थे पर अब तो काम के सभी आदमी व्यस्त हैं और संक्षेप में ही एक दो बातों का उत्तर देने से आगे सत्संग की अपनी उपयोगिता है पर उसके लिए समुचित अवसर मिले तब न?
आज की स्थिति में सत्संग का काम स्वाध्याय से चलना चाहिए। प्रमाणिक, सुयोग्य और पारंगत विद्वानों की अभी भी कमी नहीं है। उनने आवश्यक विषयों पर ऐसी पुस्तकें लिखी हैं जो अभीष्ट सत्संग की आवश्यकता पूरी करती हैं। सोचना चाहिए कि हमारी जिज्ञासाओं का विषय क्या है? उस विषय के अनुभवी विद्वान कौन हैं? और उनने तद्विषयक कौन कौन सी पुस्तकें लिखी हैं? उनकी सूची बना लेने से समस्या का बहुत कुछ समाधान हो जाता है। अब उन्हें उपलब्ध करने का प्रश्न शेष रह जाता है। उपयुक्त तो यही है कि उन्हें खरीदा जाय। जिस प्रकार पेट के लिए आहार-शरीर के लिए वस्त्र की आत्मा की भूख बुझाने के निमित्त जीवनोपयोगी साहित्य खरीदने के लिए भी एक निर्धारित बजट रखा जाय। मनुष्य जिस काम को आवश्यक समझता है उसके लिए पैसों का प्रबन्ध करता है। जिस काम को बेकार समझता है उसके लिए किफायत की बात सोचनी पड़ती है। जीवन की दिशाधारा निश्चित करने और समस्याओं के समाधान ढूँढ़ने के लिए कुछ खर्च किया जाय तो उसे निरर्थक नहीं वरन् पूर्णतया सार्थक समझना चाहिए।
इन दिनों पुस्तकालयों का क्रम इस संदर्भ में ऐसा बन पड़ा है जिसमें मासिक फीस चुकाते रहने पर वे पुस्तकें नियमित रूप से उपलब्ध हो सकती हैं जिनकी हमें आवश्यकता है। जहाँ पुस्तकालय की विधिवत व्यवस्था न हो सके वहाँ कई मित्र मिल जुलकर ऐसा प्रबन्ध कर सकते हैं कि एक की खरीदी दूसरी पढ़ ले। दूसरे की खरीदी तीसरा। इसलिए चार ही मित्रों की मंडली मिल जुलकर थोड़ा-थोड़ा खर्च करके सभी लोग समान लाभ उठा सकते हैं। जो संग्रह होता चले उसे अपनी जैसी अभिरुचि के अन्य नये लोगों को पढ़ने देने और वापस लेने का सिलसिला चलाया जा सकता है। यह सत्संग का अच्छा, सरल और सस्ता तरीका है। जिससे अपनी सुविधा के समय में उस विषय के प्रवीण, पारंगत लोगों के विचारों से समुचित लाभ उठाया जा सकता है।
वह समय चला गया जब समग्र जीवन में दस पाँच समस्याएँ ही हुआ करती थीं। अब समाज और जीवन का विचार क्षेत्र बहुत बहुत बड़ा हो गया है। उनके साथ समस्याएँ भी अगणित जुड़ गई हैं। तद्नुरूप उनके समाधान भी चाहिए। यह एक पुस्तक में से नहीं मिल सकते। अपनी आवश्यकता के विषयों को छाँटकर उनके समाधान वाले अध्याय कई पुस्तकों में से पढ़ने चाहिए। इस प्रकार अनेक जगह की ढूँढ़ खोज में से अपने काम का संकलन एकत्रित करके उलझनों को सुलझाया जा सकता है।
सत्संग में एक या कुछ व्यक्तियों के चिन्तन, चरित्र को ध्यानपूर्वक देखने के उपरान्त उनका अनुकरण किया जा सकता था। अब वैसा भी नहीं हो सकता। कितने ही श्रेष्ठ जनों की जीवन पद्धति का कुछ कुछ अंश एकत्रित करके ऐसा संकलन बन सकता है जो सब मिलकर अपनी आवश्यकता की पूर्ति कर सकें। इसके लिए अनेक जीवन चरित्रों को चुनना चाहिए। उन्हें पढ़ना चाहिए और जो अंश अपने काम में आने लायक हों उसे दुहराकर, तिहराकर पढ़ना चाहिए। जिस प्रकार अनेक पुस्तकों में हम काम काम के उपयोगी अंशों का चयन करके अपना विचार भंडार भरा जा सकता है, उसी प्रकार अनेक जीवन चरित्रों में से वे अध्याय विशेष रूप से पढ़ना चाहिए जो अपनी मनःस्थिति और परिस्थिति के अनुकूल पड़ते हों, जो गुत्थियाँ इन दिनों सामने हों उन्हें सुलझाती हों।
सत्संग में भी अनेक मनीषियों से मिलते जुलते रहना आवश्यक होता है। एक का मिलना ही सारे समाधान नहीं कर सकता। उसी प्रकार अनेकों विचार पुस्तकों से अपने अनुरूप चिन्तन और अनेक जीवन चरित्रों में से अपने साथ ताल-मेल खाते हुए चरित्र अध्यायों का मधु संचय करना चाहिए। इस प्रकार आज का सत्संग-संकलन पद्धति से ही पूर्ण हो सकता है। इसके बिना वह अधूरा ही बना रहेगा। प्राचीन काल में जिस प्रकार सत्संग बहुमुखी था।
आज के समय में उसी प्रकार स्वाध्याय भी बहुमुखी होना चाहिए। मनीषियों ने अपनी-अपनी स्थिति के अनुरूप चिन्तन किये हैं और समाधान ढूँढ़े हैं। आवश्यक नहीं कि आज की स्थिति में उन्हें ज्यों का त्यों अपनाया जा सके। यही बात चरित्रों के सम्बन्ध में भी है। महामानवों में से किसी का भी चरित्र ऐसा नहीं है, जिसकी आज ज्यों की त्यों नकल की जा सके। आदर्श स्थिर रहते हैं पर प्रयोग परिस्थितियों के अनुरूप किये जाते हैं।
सत्संग का महत्व प्राचीन काल की तरह अभी भी है पर उसे स्वाध्याय के सहारे कार्यान्वित करना होगा। उसी प्रकार अनेक चिन्तर और अनेक चरित्र मिल कर हमारी आज की अपेक्षा के अनुरूप हो सकते हैं। हम जैसा निज को ढालना चाहते हैं, श्रेष्ठ पुस्तकों के स्वाध्याय द्वारा हम वैसा संभव बना सकते हैं। ऐसी पुस्तकें भी उपलब्ध हैं व उनको पाने के साधन भी आज सुविकसित हैं। अपना ज्ञान सम्पदा बढ़ाते चलना सतत्-महामानवों का मार्ग दर्शन पाने के लिए स्वाध्याय से श्रेष्ठ कोई और साधना नहीं है। उसमें प्रमाद किसी को भी नहीं करना चाहिए।
देने वाला ही अनेक गुना पाता है। न देने वाला तो अपने को ही सड़ा कर गँवा बैठता है।
किसान अपने कृषि कार्य में भूमि-शोधन, बीजवपन, हरीतिमा-विस्तार, पुष्प की शोभा और फलों की सम्पदा का वैभव बढ़ाने जैसे अनेकों काम सम्मिलित रखता है। लेकिन इतने मात्र से कृषि के अभीष्ट परिणाम नहीं मिल जाते, न ही वह स्थिति निर्बाध गति से चलती और स्थिर रहती है। कीड़े-मकोड़े और पशु-पक्षी खेती को नुकसान पहुँचाते हैं। ऋतुएँ भी कई बार कृषि उत्पादन में रुकावट पैदा करती हैं। अन्ततः एक समय ऐसा आता है जब पकी फसल सूखती है और उसकी जीवन लीला समाप्त होती है। उत्पादन का चक्र निरन्तर चलता रहे, इसके लिए आवश्यक है कि उत्थान के बाद पतन और पतन के बाद उत्थान का क्रम जारी रहे।
कहना न होगा कि परमात्मा की इस सुन्दर सृष्टि की सुव्यवस्था और सुन्दरता अनुपम तथा अद्वितीय है। इसकी प्रगति प्रक्रिया का एक इतिहास है। जिसमें नये अध्याय जुड़ते ही जाते हैं। इस प्रगति प्रक्रिया के साथ अवगतिक्रम का भी अन्त नहीं। पतन और पराभव तत्व अपना काम करते हैं तथा प्राणियों को अधिक जागरूक हरने की प्रेरणा देते हैं। जन्म-जीवन प्रवाह का एक सिरा है तो मृत्यु दूसरा छोर, सृष्टि का गति चक्र इसी प्रकार चलता रहता है। विस्तार ही विस्तार होता जाय इतना स्थान ब्रह्माण्ड में नहीं है। इसीलिए वह चक्र गति से परिभ्रमण उठते हैं। सृष्टि क्रम में भी यही होता है। शैशव, कैशोर्य और यौवन काल पूरा होते ही जराजीर्णता का चलना आरम्भ हो जाता है और इस जराजीर्णता के बाद अन्त में मरण आ उपस्थिति होता है। यह मरण भी अन्तिम नहीं है। मृत्यु के दिन से ही नए जीवन की प्रक्रिया प्रारम्भ हो जाती है। मृतक को नया जन्म मिलता है। असमर्थ और रोगी-वृद्ध के सामने मृत्यु की निराशा भरी स्थिति रहती है तो मृत्यु के बाद अगले चरण के रूप में नए जन्म, से देखी व समझी जा सकती है। निराशा के घनीभूत अन्धकार में ऊषा की अरुणोदय आभा का आश्वासन हर आस्थावान व्यक्ति अनुभव करता है।
उत्थान और पतन के यह पन्ने समष्टि प्रवाह में भी उलटते पुलटते रहते हैं। इस प्रवाह में सृजन प्रधान है, उत्कर्ष प्रमुख है। व्यवस्था शालीनता के साथ जुड़ी हुई है और यही जीवन है तथा यही विस्तार है फिर भी पतन और पराभव से छुटकारा नहीं। चिनगारी यद्यपि छोटी होती है, घुन भी जरा सा होता है। इनकी सत्ता प्रायः नगण्य ही होती है, फिर भी वे चुपके-चुपके इतना अधिक कर गुजरते हैं कि मृत्यु या उसके समान संकट का सामना करना पड़ता है। विश्व के इतिहास में ऐसे संकट की घड़ियाँ अनेकों बार आई हैं, जब विनाश की ताँडव लीला अपनी पूरी गति से नर्तन करती रही है। सर्वनाश की आशंका ने उन घड़ियों में जन-जन को भयाक्रान्त भी किया है। यह सब होते हुए भी सृष्टा अपनी इस अद्भुत कलाकृति को, विश्व वसुधा को, मानवी सत्ता को सर्वनाश के गर्त में गिरने से पूर्व ही अपनी सजगता और सक्रियता का परिचय देते हुए परिस्थितियों को उलटने का चमत्कार प्रस्तुत करता है।
ऐसे अवसरों पर सृष्टा का वह आश्वासन पूरा होता है जिसमें उसने अपने सुरम्य उद्यान को विनाश के गर्त में गिरने से पूर्व ही उसे बचाते रहने का सुनिश्चित विश्वास दिलाया है। ‘यदा यदा हि धर्मस्य ......... वाली प्रतिज्ञा गीताकार ने अर्जुन के सम्मुख ही प्रकट नहीं की है वरन् शास्त्रों और आप्त वचनों में अनादि काल से इस आश्वासन का अनवरत उल्लेख होता रहा है। न केवल उल्लेख वरन् उसके प्रकट होने का प्रमाण समय-समय पर मिलता रहा है।
यही अवतार है। संकट की सामान्य परिस्थितियों से तो मनुष्य स्वयं ही निपट लेता है, पर जब असामान्य स्तर की संकटग्रस्त विपन्नताएँ उत्पन्न हो जाती हैं तो स्रष्टा को स्वयं सक्रिय होना पड़ता है। मनुष्य का पौरुष जहाँ लड़खड़ाता है, वहाँ गिरने से पूर्व ही सृजेता के लम्बे और समर्थ हाथ असन्तुलन को सन्तुलन में बदलने के लिए चमत्कार प्रस्तुत करते हैं। वैसे भी सर्वसामान्य के लिए उत्थान के साधन जुटाना कोई आसान काम नहीं है। फिर पतन के गर्त में गिरने वाले जनमानस को उलट देना तो और भी कठिन है। इस कठिनतम कार्य को सहज पूरा कर डालने के लिए ही स्रष्टा का लीला अवतरण-प्रकटीकरण हुआ है। इसी को अवतार प्रक्रिया कहा गया है। आज की विषम वेला में इस अवतार प्रक्रिया-को प्रस्तुत होते हुए कोई भी प्रज्ञावान प्रत्यक्ष देख सकता है।
समाज में अपने ऊपर सर्वत्र बरसने वाली घृणा एक भारी सजा है। भोजन, वस्त्र, ऐश, आराम, जमीन, जायदाद, भोग-विलास छोटे दर्जे की चीजें हैं। समाज का सम्मान, इन सबसे अधिक महत्वपूर्ण और आनन्द-दायक हैं। व्यक्ति गरीब रहकर यदि अपने चरित्र की रक्षा करता हुआ श्रद्धा और सम्मान का अनुकरणीय आदर्श जीवन व्यतीत करे तो उसे अपेक्षाकृत अधिक आनन्द मिलेगा। जिसके ऊपर सर्वत्र घृणा बरसती है, जिसे गुण्डा, उद्दण्ड, पापी और कुकर्मी माना जाता है कितनी ही कमाई कर ले, कितना ऐशो−आराम कर ले, एक निकृष्ट पतित और क्षुद्र व्यक्ति की तरह सदा नीची आँखें ही किये रहेगा। उसके लिए किसी स्वजन-परिजन की आँखों में सच्ची श्रद्धा और सच्ची सहानुभूति की एक बूँद भी न मिलेगी। ऐसा अतृप्त और असफल जीवन लेकर भी अनीतिवान व्यक्ति यदि अपने को सफल और बुद्धिमान मानें तो यह उसकी नासमझी ही कही जायेगी।
सब से बड़ा दंड आत्म-प्रताड़ना का है। अनीति के मार्ग पर चलने वाले को उसकी अन्तरात्मा निरन्तर धिक्कारती रहती है। मानव जीवन सत्कर्मों द्वारा स्वयं शांति पाने और दूसरों को सुख देने के लिए मिला है। इसी में उसकी सफलता भी है। पर यदि उसके द्वारा दूसरों का अहित होता है और अपने को आत्म-प्रताड़ना की अशांति भोगनी पड़ती है तो यही कहना होगा कि नर तन प्राप्त होने का एक अमूल्य अवसर व्यर्थ ही हाथ से चला गया।
संसार का इतिहास साक्षी है कि सन्मार्ग को छोड़कर जिसने कुमार्ग को अपनाया है, नीति को परित्याग कर अनीति को पसन्द किया है वह सदा क्षुद्र, पतित और घृणित ही रहा है। उसके द्वारा इस संसार में शोक सन्ताप, क्लेश और द्वेष ही बढ़ा है शूल-हुलते रहने वाले काँटे तो यहाँ पहले से ही बहुत थे। अपना जीवन भी यदि उन्हीं पतितों की संख्या बढ़ाने वाला सिद्ध हुआ तो इसमें क्या भलाई हुई क्या समझदारी? तृष्णा और वासना की क्षणिक पूर्ति करके यदि आत्मप्रताड़ना का, नारकीय यन्त्रणा का, लोकमत की लानत का अभिशाप पाया तो इसमें क्या अच्छाई समझी गई।
अनीति का मार्ग का मार्ग असफलता की कटीली झाड़ियों में फँसा कर हमारे जीवनोद्देश्य को ही नष्ट कर देता है। हम पगडंडियों पर न चलें। राजमार्ग को ही अपनावें। देर में सही, थोड़ी सही, पर जो सफलता मिलेगी वह स्थायी भी होगी और शांतिदायक भी। पाप का प्रलोभन आरम्भ में ही मधुर लगता है पर अन्त तो उसका हलाहल की भाँति कटु है। साँप और बिच्छू दूर से देखने में सुन्दर लगते हैं पर उनका दंशन प्राण घातक वेदना ही प्रदान करता है। पाप भी लगभग ऐसा ही है वह भले ही सुन्दर दीखे, लाभदायक प्रतीत हो, पर अन्ततः वह अनर्थ ही सिद्ध होगा। जीवन जीने की कला का एक महत्वपूर्ण आधार यह है कि हम पाप के प्रलोभनों से बचें और सन्मार्ग के राजपथ का कभी परित्याग न करें।
जीवन एक वन है साधारण नहीं सघन, सुरम्य ही नहीं, कँटीली झाड़ियों से भरा हुआ भी। इसे ठीक तरह पार करना काफी दूरदर्शिता और बुद्धिमत्ता द्वारा ही सम्भव है। सदाचार और धर्म की सीधी सड़क इसे पार करने के लिए बनी हुई है। उस पर चलते हुए लक्ष्य तक पहुँचना समय साध्य तो है पर जोखिम उसमें नहीं है। इतनी बात न समझ कर जल्दबाज लोग पगडंडियाँ ढूँढ़ते हैं, जहाँ-तहाँ उन्हें वे दीखती भी हैं। बेचारों को यह पता नहीं होता कि यह अन्त तक नहीं पहुँचती, बीच में ही विश्वासघाती मित्र की तरह रास्ता छोड़ देती है और जल्दी काम बनने का लालच दिखाकर ऐसे दलदल में फँसा देती है जहाँ से वापस लौटना भी आसान नहीं रहता।
अनीति पर चलकर जल्दी काम बना लेने और अधिक कमा लेने का लालच एक छोटी सीमा तक ही ठीक सिद्ध होता है। आगे चलकर तो उसमें भारी विपत्तियाँ आती हैं। आरम्भ में कई बात लाभ-दायक ही बुद्धिमान लोग उस आरम्भिक लालच को स्वीकार नहीं करते हैं। जहाँ अन्ततः जोखिम दीखती है, समझदार लोग उससे दूर ही रहते हैं। वे जानते हैं कि विनाश आरम्भ में आकर्षक ही लगता है। पाप के साथ आरम्भिक प्रलोभनों की एक लालच भरी गुदगुदी जुड़ी रहती है उसी से तो मूर्खों को जाल में फँसाया जाता है। शैतान का नुकीला पंजा रेशम की टोपी से ढँका रहता है। मछली को पकड़ने वाली डोरी पर जरा सा आटा लगा रहता है। चिड़ियों को पकड़ने वाले जाल के आस-पास अनाज के दाने फैले होते हैं इस आरम्भिक लालच की व्यर्थता न समझ पाने के कारण ही तो मछली और चिड़िया अपना जीवन संकट में डालती हैं।
पाप और अनीति का मार्ग ऐसा ही है जैसा सघन वन की पगडंडियों पर चलना। ऐसा ही है जैसा मछली का काँटे समेत आटा निगलना और जाल में पड़े हुए दानों के लिए चिड़ियों की तरह आगा-पीछा न सोचना। अभीष्ट कामनाओं की जल्दी से जल्दी, अधिक से अधिक मात्रा में पूर्ति हो जाये इस लालच से लोग वह काम करना चाहते हैं जो तुरन्त सफलता की मंजिल तक पहुँचा दे। जल्दी और अधिकता दोनों ही बातें अच्छी हैं पर यदि उनके लिए यात्रा उद्देश्य ही नष्ट होता हो तब उन्हें बुद्धिमत्ता नहीं माना जायगा।
चोरी, बेईमानी, झूठ, छल, विश्वासघात, अनीति, अपहरण, पाप, व्यभिचार आदि को आरम्भ करते समय यही सोचा जाता है कि एक बढ़िया लाभ तुरन्त प्राप्त होगा। ईमानदारी के राज मार्ग पर चलते हुए मंजिल देर में पूरी होती है, उसमें सीमा और मर्यादाओं का भी सीमा बन्धन है। पर पाप मार्ग में चलते हुए ऐसा लगता है कि मनमाना लोगों को ठगने से, कमजोरों को डराने से, सहज ही बड़ा लाभ कमाया जा सकता है। अशक्त से उनकी वस्तुएं छीन लेना थोड़ी सी चालाकी से ही सुगम हो जाता है। लोगों से भरपूर अनुचित लाभ उठाया जा सकता है। सोचने से यह प्रतीत होता है कि अनीति का मार्ग अपना लेने में कोई हर्ज नहीं। कितने ही ऐसे उदाहरण भी सामने आते हैं कि अमुक व्यक्तियों ने अनीति का मार्ग अपनाया और जल्दी ही बहुत लाभ कमा लिया। फिर हम भी ऐसा ही क्यों न करें?
आरम्भिक लाभ को ही सब कुछ समझने वाले लोग मछली, चिड़ियों और पगडंडी पर दौड़ पड़ने वाले की अपेक्षा अपने को अधिक बुद्धिमान मानते हैं और अपनी चतुरता पर गर्व भी करते हैं पर जल्द ही स्पष्ट हो जाता है कि जैसा सोचा गया था वस्तुतः वैसी बात नहीं है। पाप का दुष्परिणाम आज नहीं तो कल सामने आने ही वाला है। पारा खाकर उसे कोई हजम नहीं कर सकता, वह देर-सवेर में शरीर को फोड़कर बाहर ही निकलता है। इसी प्रकार पाप भी कभी पचता नहीं। हो सकता है कि आज फल न मिले पर कल तो वह मिलने ही वाला है। इस संसार में अनेकों यातनाओं से ग्रसित व्यक्ति देखे जाते हैं यदि उन पर ध्यान दिया जाय तो सहज ही जाना जा सकता है कि व्यथा और असफलता भी यहाँ कम नहीं हैं कुमार्ग पर चलते हुए सामयिक सफलता सदा ही मिलती रहे ऐसी कोई बात नहीं, दण्ड का यहाँ समुचित विधि-विधान मौजूद है।
वस्तुतः आत्म प्रताड़ना सबसे बड़ा दण्ड है। जिस व्यक्ति की आत्मा भीतर ही भीतर उसके दुष्कर्मों एवं कुविचारों के लिए कचोटती रहती है, जिसे कुमार्ग पर चलने के कारण आत्मा धिक्कारती रहती है, वह अपनी दृष्टि में आप ही पतित होता है। पतित अन्तरात्मा वाला व्यक्ति उन शक्तियों को खो बैठता है जिनके आधार पर वास्तविक उत्थान का समारम्भ सम्भव होता है। हम ऊँचे उठ रहे हैं या नीचे गिर रहे हैं इसकी एक ही परीक्षा, कसौटी है कि अपनी आँखों में हमारा अपना मूल्य घट रहा है या बढ़ रहा है। आत्म-संतोष जिसे नहीं रहता, जो अपनी वर्तमान गतिविधियों पर खिन्न एवं असंतुष्ट है उसे उन्नतिशील नहीं कहा जा सकता। जिसने अपनी आन्तरिक शांति कहाँ मिलने वाली है? धन कमा लेने से, कोई ऊँचा पद प्राप्त कर लेने से, कई प्रकार के सुख साधन खरीदे जा सकते हैं, पर उनसे आत्मसंतोष कहाँ मिल पाता है?
मनुष्य की महान विचार शक्ति का यदि थोड़ा सा ही भाग आत्मसन्तोष के साधन ढूँढ़ने, और आत्म-शांति के मार्ग खोजने में लगे तो उसे वह रास्ता बड़ी आसानी से मिल सकता है जिस पर चलना आरम्भ करते ही उसका हर कदम आत्मिक-उल्लास का रसास्वादन कराने लगे। संसार की सम्पदा भी तो लोग सन्तोष प्राप्त करने के लिए ही कमाया करते हैं फिर उस क्षणिक एवं तुच्छ सन्तोष की अपेक्षा यदि चिरस्थायी आत्मशांति उपलब्ध करने का अवसर जिसे मिल रहा होगा वह उल्लास, उत्साह और प्रफुल्लता का अनुभव क्यों न करेगा?
शरीर की निरोगता एवं बलिष्ठता के लिए मोटी दृष्टि पौष्टिक आहार या औषधि उपचार पर जाती है। बीमार होने पर लोग चिकित्सकों की शरण में दौड़ते हैं, मानो रोगों को बुलाने-भगाने की ठेकेदारी उन्हीं ने हथिया रखी हो। वे चिकित्सक और नुस्खे बदलते, अपना पैसा समय गँवाते रहते हैं पर बीमारी टस से मस नहीं होती। ऐसे जीर्ण रोगियों की भारी संख्या हम अपने इर्द गिर्द ही गिन सकते हैं। यही बात पौष्टिक आहार के स्वास्थ्य संवर्धन के सम्बन्ध में है। अमीर लोग आम तौर से ऐसा भोजन करते हैं जिसे असंदिग्ध रूप से पौष्टिक कहा जा सकता है कैमिस्टों की दुकानें टॉनिकों की बोतलों और पौष्टिक खाद्यों के डिब्बों से भरी रहती हैं। विटामिन, मिनिरल तथा दूसरी ताकत की गोलियाँ खूब बिकती खपती हैं। पर इन्हें सेवन करने वालों में से किसकी कितनी तंदुरुस्ती बढ़ी यह खोजने पर निराशा ही हाथ लगती है। यदि उनमें कोई तथ्य रहा होता तो उनका तथा उनके परिवार वालों का शरीर सर्वथा निरोग पाया जाता, यदि वे दूसरों के रोग भगा सकने में समर्थ हैं तो अपने तथा घर वालों के शरीरों को क्यों रुग्ण रहने देते?
इसी प्रकार यदि पौष्टिक खाद्यों से बलिष्ठता मिली होती तो गरीबों की बात छोड़ भी दी जाय तो कम से कम अमीर लोग तो पहलवान स्तर के रहे ही होते। उन्हें किस आहार की कमी है? वे पौष्टिक ही खाते हैं और खा सकते हैं। ऐसी दशा में उन्हें क्यों दुर्बल रहना चाहिए? पुष्टाई की दवा बेचने वाले कैमिस्ट एवं निर्माता तो बलवान रहने ही चाहिए थे। च्यवनप्राश, शिलाजीत,
मकरध्वज आदि बनाने वाले तथा उनका आकाश पाताल जैसा विज्ञापन करने वालों को जरा-जीर्णता का कष्ट क्यों भोगना पड़ता? यह लोग तो इन पौष्टिकों का उपयोग कर फिर यौवन का लाभ ले ही सकते थे। पर ऐसा होता कहाँ है? आरोग्य की आकाँक्षा के लिए कैमिस्टों और चिकित्सकों के पीछे दौड़ने में मृग तृष्णा जैसी भ्रान्ति के अतिरिक्त और कुसार नहीं है। मानवी मस्तिष्क पर छाये हुए अगणित अन्ध विश्वासों में अपने किस्म का यह एक बहुत ही भोंड़ा किन्तु अतीव व्यापक अन्ध विश्वास है कि स्वास्थ्य संवर्धन में पौष्टिक खाद्यों और रोग निवारण में औषधियों का आश्रय लेने से काम चल सकता है। इनका आपत्ति काल में उपयोग तो किया जाता है, और होता भी रहेगा किंतु इसका प्रभाव तात्कालिक एवं स्वल्प है। वह इतना नहीं है जिसके आधार पर दुर्बलता हटाने और रुग्णता मिटाने के लिए निश्चिंत रहा जा सके।
अव्यवस्था फैलाई जाती है उसी से ईश्वर प्रदत्त स्वास्थ्य सम्पदा को आघात पहुँचता है और दुर्बलता एवं रुग्णता घेरती है। जब वे विकृतियाँ पल्ले बँधी रहेंगी तब तक स्वास्थ्य समस्या के समाधान का कोई मार्ग नहीं मिल सकता। यदि असंयम पर-वासना और लिप्सा पर नियन्त्रण स्थापित किया जा सके, सुसंयत जीवन क्रम अपनाया जा सके तो उस परिवर्तन का प्रभाव सहज ही स्वास्थ्य सुधार के रूप में देखा जा सकता है। रुग्णता तो असंयम की प्रतिक्रिया भर है।
यदि दृढ़ता पूर्वक अपने आहार विहार का निर्धारण किया जा सके और उस पर आरुढ़ रहा जा सके तो रुग्णता की जड़ें अपने आप सूखती चली जायेंगी और बिना चिकित्सा उपचार के भी निरोग बना जा सकेगा।
हकीम लुकमान कहते थे कि मनुष्य समय से पहले मरने और गढ़ने के लिए अपनी कब्र अपनी जीभ से खुद खोदता है। इसका तात्पर्य यह था कि चटोरेपन के वशीभूत जिह्वा अनुपयोगी पदार्थों को अनावश्यक मात्रा में उदरस्थ कराती है और जीवन मरण का संकट उत्पन्न करती है।
कितने ही व्यक्ति आरम्भिक जीवन काल में दुर्बल और रुग्ण रहने लगे थे पर उनने जब जब अपने निर्वाहक्रम को नये सिरे से सुधरा हुआ निर्धारण किया तो स्थिति बदली और दुर्बलता सशक्तता में परिणत हो गई। हिन्द केशरी चन्दगीराम पहलवान उठती उम्र में क्षय ग्रसित हो गये थे और अकाल मृत्यु के मुख में जाने वाले थे। इस स्थिति से छूटने के लिए उन्होंने साहस-पूर्वक अपनी जीवन यापन प्रक्रिया में मौलिक अन्तर किया और उस परिवर्तन के प्रभाव से न केवल बीमारी से छूटे वरन् बलिष्ठ पहलवानों की पंक्ति में जा विराजे। विश्व विख्यात पहलवान सेन्डो भी आरम्भ में ऐसे ही दुर्बल थे। वे एक बार किसी प्रदर्शनी में गये और पुष्ट पहलवानों के सुदृढ़ शरीरों को देखा। उनने ललचाई आँखों से अपने पिता से पूछा- “क्या ऐसा ही शरीर बना सकना मेरे लिए सम्भव हो सकता है,” पिता ने सुनिश्चित उत्तर दिया आहार विहार की रीति नीति को सही बनाने वाला
हर व्यक्ति सुदृढ़ स्वास्थ्य और दीर्घ जीवन प्राप्त कर सकता है। सेन्डो ने क्या करना चाहिए यह पूछा और जो बताया गया था उसी दृढ़तापूर्वक क्रियान्वित करने में जुट गया। फलतः स्वास्थ्य सुधरा और वे विश्व विख्यात पहलवान बने।
गान्धी जी जिन दिनों दक्षिण अफ्रीका में थे उन दिनों उनका पेट बुरी तरह खराब रहता था। कब्ज निवारण के लिए एनीमा का सहारा लेना पड़ता था। लगता था वे बहुत दिन न जी सकेंगे। स्थिति को बदलने के लिए उन्होंने दृढ़तापूर्वक स्वास्थ्य के नियम अपनाये।प्राकृतिक जीवन - चर्या की राह अपनाई और लम्बा जीवन जिया।वे 120 वर्ष जीवित रहने की तैयारी कर रहे थे। दुर्घटना उन्हें उठा न ले गई होती तो संभवतः वे उतने दिनों जी भी लेते। 36 वर्ष की आयु में अखण्ड ब्रह्मचर्य का व्रत लेकर उन्होंने अपनी जीवनी शक्ति में अद्भुत अभिवृद्धि की ओर उस ओजस के बल पर उभर कर महामानवों की अग्रिम पंक्ति में पहुँच सके।
लोकमान्य तिलक भी बचपन में बहुत दुर्बल और बीमार रहते थे उनने भी अपना स्वास्थ्य सुधारने का उत्तरदायित्व स्वयं सम्भाला। आहार विहार में दृढ़ता पूर्वक सुव्यवस्था का समावेश किया और बलिष्ठता का उपहार प्राप्त किया, ऐसे असंख्य उदाहरण सर्वत्र मिल सकते हैं जिनमें नियमित और व्यवस्थित जीवन चर्या अपनाने वालों ने स्वास्थ्य संवर्धन में सफलता पाई और कायाकल्प जैसा उदाहरण प्रस्तुत किया है।
प्राचीन काल के हनुमान, भीष्म, जैसे ब्रह्मचर्य पालनकर्ताओं के उदाहरण मौजूद हैं, ऋषि मुनि वन प्रदेश में रहते थे और वहाँ की स्थिति में कष्ट साध्य अभाव-ग्रस्त जीवन यापन करते थे तो भी संयम के प्रभाव से उन्होंने सुदृढ़ दीर्घजीवन का सुख भोगा। स्वामी दयानन्द की बलिष्ठता प्रसिद्ध है। उन्होंने एक बार दो मजबूत सांडों को आपस में लड़ते हुए देख कर रोका था। दोनों के सींग पकड़ कर उन्हें बल पूर्वक हटाया और पीछे धकेल दिया। बग्घी को पकड़ कर घोड़ों के हजार प्रयत्न करने पर उसे आगे न बढ़ने देने का भी ऐसा ही घटना क्रम है। इसे ब्रह्मचर्य का प्रताप ही कह सकते हैं। वनवासी भील, कोल अभावग्रस्त जीवन यापन करते हैं किन्तु संयमशील रहकर आजीवन बलवान बने रहते है। यदि स्वास्थ्य मर्यादाओं का उल्लंघन न किया जाय तो ईश्वर प्रदत्त सुदृढ़ आरोग्य सहज ही आजीवन अक्षुण्ण बना रह सकता है।
सुकरात से किसी ने पूछा-काम सेवन कितने बार करना चाहिए? उत्तर में उसने कहा-जीवन में एक बार करके उसे जान लेना चाहिए कि इसमें बरबादी के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। प्रश्नकर्ता इतने संतुष्ट नहीं हुआ और अधिक छूट की बात करने लगा। इस पर सुकरात ने कहा-मन न माने तो वर्ष में एक बार उसे समझा-जाना जा सकता है। इस पर भी उसे संतोष न हुआ तो सुकरात ने कहा-अधिकतम एक महीने में एक बार की बात सोची जा सकती है। प्रश्नकर्ता अधिक के लिए आग्रह करता रहा। इस पर झल्लाकर सुकरात ने कहा-जो मर्जी से करो पर मरने के लिए सिर से कफ़न बाँध कर तैयार रहो। यह बात न केवल काम सेवन पर वरन् सभी इन्द्रिय भोगों पर लागू होती है। यदि उत्पादन से खर्च अधिक किया जाय तो उस अपव्यय के कारण संचित पूँजी चुकेगी और पूंजी चुकने पर दिवालिया बनने की तरह आरोग्य के क्षेत्र में भी खोखलापन सामने खड़ा दिखाई देगा।
किसी बुद्धिमान बाप ने मरते समय अपने बेटों को स्वस्थ और समुचित रहने के लिए तीन शिक्षाएं दीं (1) फूलों की सेज पर सोना (2) मोहन भोग खाना (3) बड़ों के हाथ पैर तोड़ देना। बच्चे इस पहले का कुछ अर्थ न समझ सके। गरीबी के रहते फूलों की सेज पर सोना, मोहन भोग खाना कैसे संभव हो सकता है तथा बड़ों के हाथ पैर तोड़ देने से क्या हाथ लगेगा?
पहेली का अर्थ समझाते हुए बच्चों से कहा। “फूलों की सेज” पर सोने का तात्पर्य यह है कि इतना कठोर परिश्रम किया जाय कि थकान से किसी भी स्थिति में गहरी नींद आ सके। “मोहन भोग” का तात्पर्य है ऐसी कड़ी भूख लगने पर ही कुछ खाया जाय जिसमें रूखी सूखी दाल रोटी मोहन भोग जैसी स्वादिष्ट लगे। “बड़ों के हाथ पैर तोड़ने” का मतलब है कि उनके कामों में हाथ बटाने का सतत् प्रयत्न किया जाय ताकि महत्वपूर्ण कार्यों का अनुभव हो सके और उनकी बारीकियाँ समझ में आ सकें। शारीरिक और मानसिक आरोग्य को अक्षुण्ण रखने तथा बढ़ाने के लिए यह स्वर्णिम सूत्र सदा सबके लिए समान रूप में उपयोगी सिद्ध होते रहेंगे।
दार्शनिक च्वाँगत्से को रात्रि के समय कब्रिस्तान से होकर गुजरते समय पैर में ठोकर लगी। टटोल कर देखा तो किसी मुर्दे की खोपड़ी थी। उठाकर उनने उसे झोली में रख लिया और सदा साथ रखने लगे।
शिष्य ने इस पर उनसे पूछा यह कितना गंदा और कुरूप है। उसे आप साथ क्यों रखते हो?
च्वाँगत्से ने उत्तर दिया-यह मेरे दिमाग का तनाव दूर करने की अच्छी दवा है। जब अहंकार का आवेश चढ़ता है-लालच सताता है, तो इस खोपड़ी की गौर से देखता हूँ। कल परसों अपनी भी ऐसी ही दुर्गति होगी तो अहंकार और और लालच किसका किया जाय?
वे मृत्यु को स्मरण रखने, अनुचित आवेशों के समय का उपयुक्त उपचार बताया करते थे और इसके लिये मुर्दे की खोपड़ी का ध्यान करने की सलाह दिया करते थे। खुद तो उसे साथ रखते ही थे।
ईसा एक गाँव से होकर गुजर रहे थे। उनने एक आदमी को वेश्या के पीछे भागते हुए देखा तो रुक गये और उसे अनुचित से रुकने की बात समझाने लगे।
गौर से चेहरा देखा तो वह पूर्ण परिचित सा लगा। स्मरण करने पर पुरानी घटना याद आई। उनने फिर कहा-अरे तू तो वह व्यक्ति है जिसने दो वर्ष पूर्व अंधेपन से छुटकारा पाने की याचना की थी और मैंने प्रभु से प्रार्थना करके ज्योति दिलाई थी।
उस व्यक्ति ने ईसा को पहचान लिया और बोला-”आप जो कहते हैं सो ही यथार्थ है। मैंने तुझे दृष्टि इसीलिए दिलाई थी कि उसका उपयोग ऐसे घिनौने काम के लिए करे।
व्यक्ति कुछ देर चुप बैठा रहा और अपनी भूल पर आँसू बहाता रहा, पर आगे पैर बढ़ाते हुए, महाप्रभु के चरण चूम उसने दबी जबान से इतना और कहा-आप में नेत्र दृष्टि दिलाने की सामर्थ्य थी यदि विवेक दृष्टि पहले दिलाई होती तो कितना अच्छा होता?
ईसा ने आज नया पाठ पढ़ा वे लोगों की सुविधा दिलवाने की अपेक्षा उनकी समझ सुधारने की बात को प्राथमिकता देने लगे।
एक पेड़ पर दो बाज प्रेम-पूर्वक रहते थे। दोनों शिकार की तलाश में निकलते और जो भी पकड़कर लाते शाम को मिल बाँटकर खाते। बहुत दिन से उनका यही क्रम चल रहा था।
एक दिन दोनों शिकार पकड़कर लौटे तो एक की चोंच में चूहा था और दूसरे की में साँप। शिकार दोनों ही तब तक जीवित थे। पेड़ पर बैठकर बाजों ने जब उनकी पकड़ ढीली की साँप ने चूहे को देखा और चूहे ने साँप को।
साँप चूहे का स्वादिष्ट भोजन पाने के लिए जीभ लपलपाने लगा और चूहा साँप के प्रयत्नों को देखकर अपने पकड़ने वाले बाज के डैनों में छिपने का उपक्रम करने लगा।
उस दृश्य को देखकर एक बाज गम्भीर हो गया और विचार मग्न दीखने लगा, दूसरे ने उससे पूछा-”दोस्त, दार्शनिकों की तरह किस चिन्तन में डूब गये?”
पहले बाज ने अपने पकड़े हुए सांप की ओर संकेत करते हुए कहा देखते नहीं यह कैसा मूर्ख प्राणी है। जीभ की लिप्सा के आगे इसे मौत भी एक प्रकार से विस्मरण हो रही है।
दूसरे बाज ने अपने चूहे की आलोचना करते हुए कहा-और इस नासमझ को भी देखो! भय इसे प्रत्यक्ष मौत से भी अधिक डरावना लगता है। पेड़ के नीचे एक मुसाफिर सुस्ता रहा था। उसने दोनों की बात सुनी और एक लम्बी साँस छोड़ते हुए बोला-हम मानव प्राणी भी साँप और चूहे की तरह स्वाद और भय को बड़ा समझते हैं, मौत तो हमें भी विस्मरण रहती है।
ईर्ष्या एक प्रकार की मनोविकृति है। इससे भौतिक क्षेत्र में विफलता और आध्यात्मिक क्षेत्र में अवगति प्राप्त होती है। जो इस मानसिक व्याधि से ग्रस्त हो गया, समझा जाना चाहिए कि उसने प्रगति के अपने सारे द्वारा बन्द कर लिये। इस तरह के लोग यदा-कदा उन्नत स्थिति में पहुँच गये, तो इसे उनका संयोग-सौभाग्य ही मानना चाहिए, अथवा किसी का कृपा-वरदान, अन्यथा ऐसी स्थिति प्राप्त कर पाना उनके स्वयं के बूते की बात नहीं होती। इसी प्रकार स्वयं के पुरुषार्थ से उन्नति के शिखर पर पहुँचे व्यक्ति में ईर्ष्या दिखाई दे तो वह उन्नति के उपरान्त औरों से सवंमित इस रोग के विषाणुओं का ही प्रभाव कहा जायगा, क्योंकि ईर्ष्या और सफलता आग और पानी की तरह साथ-साथ नहीं रह सकती। फिर यह भी सुनिश्चित है कि उच्च स्थिति में पहुँचने के बाद यदि किसी में ईर्ष्यालु-वृत्ति आ गई, तो वह उसके पतन का कारण बनेगी, इसमें संदेह नहीं।
मनोरोग विशेषज्ञ एच. ए. स्किनर ने अपने अध्ययन “ एबनार्मल पर्सनाँल्टि हिडन डायमेन्षन्स” में उन व्यक्तियों विश्लेषण प्रस्तुत किया है। उनके अनुसार एक व्यक्तित्व की प्रभाव-शक्ति समाप्त हो जाती है। वह सदा दूसरों की बुराई करता, छल छिद्र ढूँढ़ता देखा जा सकता है। दूसरों की उन्नति और सुख-शांति तो वह कभी सह ही नहीं पाता। झूठी आलोचनाएँ, मिथ्या दोषारोपण, और दूसरों के कार्यों का अवमूल्यन करना उसके स्वभाव के अंग बन जाते हैं इससे उसके व्यक्तित्व और प्रकृति में रुक्षता दूसरों की निगाहों से वह गिर जाता है। लोगों के मन में उसके प्रति सम्मान एवम् आदर का भाव नहीं रह जाता। उसके जीवन में करक्तता और अकेलापन बढ़ता जाता है। इतना ही नहीं, इसका एक सबसे बड़ा कुपरिणाम यह होता है कि उसका निज का व्यक्तित्व दो खंडों में बँटता जाता है। यह विखण्डन बड़ी विचित्र स्थिति है। स्वयं की ही शक्ति दो दिशाओं में प्रवाहित होती है जिससे एक आन्तरिक संघर्ष षुरु हो जाता है। ऐसी स्थिति में उत्पन्न द्वन्द्वात्मक स्थिति तब तक बनी रहती है, जब तक मूल कारण को मिटाया न जाय।
हर दिशा में इस दुष्प्रवृत्ति का एक ही परिणाम होता है-समाज में समृद्धियों-विभूतियों की कमी। दूसरों जैसा स्वयं भी गुण सम्पन्न बनने का प्रयास किया जाय, तो इसमें स्वयं का हित होने के साथ समाज भी सुखी समृद्ध होगा। किन्तु ईर्ष्या की प्रेरणा व प्रतिक्रिया तो सर्वथा इसके विपरीत होती है। अतः व्यक्ति और समाज का सभी तरह से अपघात करने वाले इस विषैले पादप को जड़-मूल से उखाड़ फेंका जाय इसी में भलाई है। सम्पूर्ण मानव समाज एक इकाई है, एक ही माला में बँधे मनके हैं, एक ही वृक्ष के फल हैं, एक ही समुद्र की तरंगें या एक ही विशाल नदी की लहरें हैं। यह सत्य अपने अनुभव क्षेत्र में और चिन्तन क्षेत्र में, मन मस्तिष्क में, अन्तःकरण में आत्मसात कर लेने पर ईर्ष्या क्षण भर नहीं ठहर सकती।
अपनी असफलता, निराशा और हीनल स्थिति के कारण इसको न पनपने दें, क्योंकि इससे ये दुर्स्थिति बढ़ने ही वाली है, घटेगी नहीं। पहली बात तो, यह जीवन में असफलता-सफलता दोनों ही पहलू आते हैं। विचार करें तो स्पष्ट होता है कि असफलता सफलता का ही पथ प्रशस्त करती हैं पूर्व की त्रुटियों का परिमार्जन कर, नए सिरे से प्रयास प्रारम्भ करें सफलता मिली कठिन नहीं। दूसरों की सफलता से ईर्ष्या करने की जगह यदि उन्हें बधाई दी जाय, प्रशंसा की जाय तो उनमें से अनेक मित्र, प्रियजन एवम् सहायक रूप में सामने आ सकते हैं। फिर हर व्यक्ति अपने आप में अनोखा, अद्वितीय है। दूसरे उसका स्थान नहीं ले सकते। उद्यान के प्रत्येक वृक्ष की अपनी शोभा है। खेत के प्रत्येक पौधे का अपना महत्व है। गगन में प्रत्येक नक्षत्र की अपनी भूमिका है। इसलिए परस्पर सहयोग से एक दूसरे को विकसित होने का अवसर दें, इसी में बुद्धिमत्ता है। अन्य सभी नष्ट हो जायं हम अकेले जीवित रहें, यह सोचना ओछेपन का चिन्ह है। एकाकी वृक्ष से भला उद्यान की शोभा कैसे बरकरार हर सकेगी। इन सब तथ्यों पर विचार करते हुए, मनन शक्ति के आधार पर ईर्ष्या को समाप्त कर दिया जाय, इसी में व्यक्ति का उत्कर्ष है और समाज का भी।
व्यक्तिगत जीवन को पवित्रता, प्रामाणिकता और प्रखरता से भरने को पुण्य कहते हैं। यही व्रत बंधन है, इसी को तप कहते हैं। इसके लिये निरन्तर ध्यान रखने और सतर्कता बरतने की आवश्यकता पड़ती है। संकल्प में दृढ़ता भरनी होती है अन्यथा थोड़ा भी चूकने पर पतनोन्मुखी प्रवाह में अपने चलने का अभिशाप पल्ले बँध सकता है।
पुण्य का दूसरा सहभागी सहचर है-परमार्थ। दोनों के समन्वय में ही समग्रता बनती है। मनुष्य स्वयं तो निरापद रहे, किन्तु विश्व उद्यान को सुविकसित करने की ईश्वरीय इच्छा पर ध्यान न दे तो एकाकी आत्म सुधार भी एक प्रकार का स्वार्थ साध नहीं बनकर रह जायेगा। पुण्य प्रयोजन में संयम साधना है। इससे स्वल्प साधनों में निर्वाह बनता है, किन्तु व्यक्ति की उपार्जन क्षमता तो असीम है। उसे जितना अधिक विकसित किया जा सके करना चाहिए। अधिक उपार्जन व स्वल्प उपभोग करने पर बड़ी बात का सिलसिला चल सकता है। इसे परमार्थ के लिए नियोजित किया जाना चाहिए। अनीतिपूर्वक उपार्जन और उसका अपव्यय में दुष्प्रयोजनों में समापन, यही है पाप-अनाचार का आधार भूत कारण। इस संदर्भ में भरपूर सतर्कता बरती जानी चाहिए। न आलस्य-प्रमाद के कारण उत्पादन घटे, न अपव्यय में उसे बरबाद किया जाय और परमार्थ में अनुदारता अपनाई जाय, तभी यह संभव हो सकता है कि पुण्य और परमार्थ का परस्पर तालमेल बना रहे और उसके फल स्वरूप आध्यात्मिक गरिमा की दिव्य सम्पदा निरन्तर बढ़ती रहे।
एक अंग्रेजी कहावत है “दान की षुरुवात घर से करनी चाहिए।” जो जितना समीप है उसके प्रति उतना ही अधिक हमारा दायित्व है। इस दृष्टि से शरीर के उपरान्त परिवार का ही नम्बर आता है। परिवार का तात्पर्य उस समुदाय से है जिसके साथ मिल जुल कर रहा जाता है, जो एक दूसरे की सहायता पर निर्भर रहते हैं,
इसे अपनी संस्कृति की श्रेष्ठता विशेषता ही कहना चाहिए कि यहाँ संयुक्त परिवार प्रणाली अभी भी किसी रूप में जीवित है। यह छोटा समुदाय अपने आप में एक सीमित राष्ट्र या समाज है। इस परिकर में सद्गुणों का बीजारोपण एवं अभिवर्धन जितना सरलतापूर्वक, व्यवस्थापूर्वक, नियमित रूप से किया जा सकता है वह अन्यत्र कदाचित ही कहीं बन पड़ता हो। सुसंस्कृत परिवारों को नररत्नों की खदान कहा गया है। इसे प्रगतिशील अथवा दुर्गति-ग्रस्त बनाना परिवार के सूत्र संचालकों-वरिष्ठ सदस्यों का काम है।
किसी भी प्रयोजन को पूरा करने के लिये उसमें मनोयोग श्रम-समय एवं साधनों को लगाना पड़ता है। यह वस्तुएं हर किसी के पास होती हैं। जिस ओर उपेक्षा बरती जाती है उस ओर कमी पड़ती जाती है और जिस और उत्साह होता है, उसे प्राथमिकता मिलती है और श्रम समय लगाया जाता है। साधन जुटाये जाते हैं। परिवार को अपना प्रथम कर्तव्य क्षेत्र माना जाय, उसे शरीर की तरह ही अपनी सुविधा एवं जिम्मेदारी का प्रमुख क्षेत्र माना जाय, तो इस परिधि में बहुत कुछ सोचने एवं करने की सुविधा मिल जाती है।
जिस प्रकार शरीर के हर अवयव की स्वस्थता-स्वच्छता पर ध्यान रखा जाता है उसमें कहीं भी कुछ भी खराबी आने पर तत्काल उपचार किया जाता है। हर अवयव को यथावत् सुसज्जित रखा जाता है उनमें से प्रत्येक को समुचित पोषण दिया जाता है उसी प्रकार यह भी होना चाहिए कि परिवार का हर सदस्य स्वावलम्बी-सुविकसित-सुसंस्कारी बने। यह हो सकता है कि उस परिवार के सदस्य आदर्शवादिता अपनाने में आनाकानी करें। यह भी हो सकता है कि असमर्थता दिखायें, उपेक्षा बरतें। तो भी अपना प्रयास शिथिल नहीं करना चाहिए। अनुरोध से लेकर आग्रह स्तर के दबाव डालने चाहिए और समझ पाने पर भी बार-बार समझाते रहने का प्रयत्न करना चाहिए।
आवश्यक नहीं कि अंश-वंश के लोगों को ही परिवार माना जाय। अनेक व्यक्ति अविवाहित रहते हैं। विधुर या विधवा होते हैं। जिनके परिजन बड़े होकर काम व्यवस्था के संबंध में अन्यत्र चले गये होते हैं। उन्हें एकाकी रहना पड़ता है। तो भी वे पड़ोसियों, सम्बन्धियों, सेवकों, सहायकों, साथियों का एक दो संपर्क वाला परिवार बना लेते हैं। यहाँ तक कि साधुओं तक की जमातें भी एक परिवार मानी जाती हैं। भिखारी तक साथ-साथ रहते हैं, श्रमिक मजदूर भी झोंपड़ी बना लेते हैं। इस प्रकार उन्हें परिवार का ही, कुटुम्ब तुल्य ही माना जा सकता है। समीपवर्ती सब लोगों को इसी श्रेणी में गिना जा सकता है।
अर्थ निर्वाह की अनिवार्य व्यवस्था किस प्रकार जुटाई जाती है। यह विभिन्न लोगों को अपनी-अपनी परिस्थितियों पर निर्भर है। पर एक आवश्यकता और व्यवस्था हर परिवार के छोटे बड़े सदस्यों की अभीष्ट होती है कि उसके सद्गुणों को विकसित किया जाय। वस्तुतः यही है सचेतन सम्पदा जिसके आधार पर व्यक्तित्व निखरता और प्रतिभा का उद्गम उभरता है। अभाव-ग्रस्त परिवारों की आर्थिक सुविधा बढ़ाने में भले ही अड़चन हो, पर यह तो सर्व सुलभ है कि घर में मानवी गरिमा का महत्व समझा जाय और सुसंस्कारिता को विकसित करने वाला क्रिया−कलाप चलता रहे। इसके लिये आवश्यक है कि परस्पर एक दूसरे के सामने अपनी मनःस्थिति और परिस्थिति कह सकने की मुखरता हो। इस प्रकार के तथ्य एक दूसरे से पूछकर अधिक घुलते मिलते रहने वालों से पूछकर ही जाने जा सकते हैं और जहाँ भी असंतोष, असंतुलन, कुसंस्कारिता पनप रहे हों वहाँ सम्हालने सुधारने के अविलम्ब प्रयास आरम्भ किये जा सकते हैं।
कुसंस्कार खर-पतवार की तरह कहीं भी उग पड़ते हैं किन्तु सुसंस्कारों का उद्यान बड़े प्रयत्न-पूर्वक लगाना और सूझबूझ के साथ बढ़ाना पड़ता है। गुण, कर्म स्वभाव क्षेत्र की श्रेष्ठताएँ अनेकों हैं, पर उनमें से कुछ तो ऐसी हैं जिन्हें प्रमुख ही नहीं अनिवार्य भी समझा जा सकता है। इन पर सर्वत्र सतर्कता-पूर्वक ध्यान दिया जाना चाहिए।
दार्शनिक बौद्धिक दृष्टि से चार प्रवृत्तियाँ ऐसी हैं जिन्हें वरीयता मिलनी चाहिए (1) समझदारी (2) ईमानदारी (3) जिम्मेदारी (4) बहादुरी इन चारों की सूखी व्याख्या विवेचना गले नहीं उतरती। रूखी और नीरस लगती है उसे सरस बनाने के लिये तर्क, तथ्य, प्रभाव ही नहीं उदाहरण की भी भरमार रहनी चाहिए। समीपवर्ती परिचित क्षेत्र के उदाहरण हो तो और भी अच्छा अन्यथा पौराणिक ऐतिहासिक घटनाओं का संदर्भ देते हुए यह बताया जाना चाहिए कि समान धर्मधारणा एवं मानवी गरिमा के अनुरूप तत्व चिन्तन का सार संक्षेप इन्हीं चार गुणों में समाविष्ट हो जाता है। इन्हें अपनाने पर उपलब्ध होने वाले लाभों की उपेक्षा बरतने पर होने वाली हानियों को यदि समझाते रहने का क्रम चलाया जाय तो उसका सत्परिणाम उत्पन्न हुए बिना नहीं रहता।
व्यावहारिक जीवन के पंचशील भी ऐसे हैं, जो व्यक्तित्व को और परिवार दोनों को समुन्नत बनाते हैं। यह पंचशील हैं। (1) श्रमशीलता (2) मितव्ययता (3) शिष्टता (4) सहकारिता (5) स्वच्छता-सुव्यवस्था। इन गुणों का निरूपण कर देना मात्र पर्याप्त नहीं। परिजनों को साथ लेकर घरेलू कामों में स्वयं इस प्रकार जुटने का क्रम बनाना चाहिए जिसमें घर के छोटे बड़े सभी को सम्मिलित रहने का अवसर मिले। घर के काम आमतौर से महिलाओं या नौकरों के ऊपर छोड़ दिये जाते हैं। बचा हुआ समय इधर उधर के कार्यों में बीतता है। इससे सबसे बड़ी हानि होती है कि क्रियाशीलता में सुव्यवस्था का समावेश नहीं हो पाता और न उस प्रकार का अभ्यास बन पड़ता है। होना यह चाहिए कि घर के सभी कामों का मिलजुल कर थोड़े समय में सहयोग-पूर्वक निपटाने का क्रम चल पड़े। इसमें हर सदस्य के स्वभाव में रचनात्मक प्रवृत्तियों का समावेश होता है। घरेलू शाक वाटिका और टूट−फूट की मरम्मत के दो उपक्रम ऐसे हैं जिनके आधार पर सृजनात्मक प्रवृत्तियाँ भी सजग होती है और हाथों हाथ आर्थिक लाभ भी मिलता है।
परिवार में आस्तिकता का बीजारोपण करने के लिए ऐसी व्यवस्था बनानी चाहिए कि प्रातःकाल घर का हर सदस्य पूजाकक्ष में जाकर प्रणाम करे। खड़ा होकर आँखें बन्द रखकर मानसिक रूप से गायत्री मंत्र का, या जो रुचिकर हो उस नाम का जप करे। साथ ही प्रातःकाल के उदीयमान स्वर्णिम सूर्य का ध्यान भी। इसके उपरान्त घर के बड़ों का अभिवादन करने आशीर्वाद लेने-बराबर वालों से नमस्कार करने का दैनिक शिष्टाचार चले। यह आस्तिकता की, भाव श्रद्धा की, अभिवृद्धि का सरल उपचार है। पर उस स्थापना की मनोभूमि में जड़ जम जाने से उसके दूरगामी परिणाम होते हैं। आस्तिकता के साथ आध्यात्मिकता एवं धार्मिकता के सूत्र जुड़े हुए हैं।
रात्रि को कथा कहानियाँ कहने की मनोरंजक एवं शिक्षाप्रद परम्परा को हर परिवार में पुनर्जीवित किया जाय। इसके लिये महामानवों की जीवनगाथाएं अप्रासंगिक कहानियों की तुलना में कहीं अधिक प्रेरणाप्रद होती हैं। इस निमित्त युग निर्माण योजना ने “प्रज्ञापुराण” के चार खण्ड छापे हैं, जिनमें प्रायः 4 हजार पौराणिक, ऐतिहासिक ऐसी कथाओं का संकलन है, जिनमें आदर्शवादी प्रेरणाएं भरी पड़ी हैं। उन कथाओं के साथ अपने परिवार की, अपने परिजनों की मनःस्थिति की गतिविधियों को आवश्यक मोड़-मरोड़ दिया जा सकता है। सुधार, परिष्कार का मार्ग सुझाया जा सकता है।
नम्रता, शिष्टता का हर सदस्य के स्वभाव में गहरा पुट रहे। कोई भी उच्छृंखलता न बरतने पाये। आवेश में आने की प्रवृत्ति किसी में भी न पनपने दी जाय। सादा जीवन उच्च विचार का मंत्र ऐसी गंभीरता-पूर्वक हृदयंगम कराया जाय कि उसे सुना समझा ही न जाय वरन् पूरी तरह व्यवहार में भी उतरे। आलस्य प्रमाद के दुर्व्यसन से कोई भी आक्रान्त न होने पाये। हर किसी को अस्वच्छता, अव्यवस्था अखरे। जहाँ कहीं भी घर की परिधि में ऐसा कुछ हो रहा हो उसे तुरन्त सुधारने के लिये हर किसी में भी उत्सुकता रहे और उस सम्हाल सुधार में दूसरों की प्रतीक्षा किए बिना हर कोई पहल करने की प्रतिस्पर्धा में उतरे। यही है पारिवारिक जीवन में परमार्थ के समावेश का उच्चस्तरीय निर्धारण जिसे गरीबी में रहने वाले परिवार भी बिना किसी कठिनाई के अपना सकते हैं और व्यक्तित्वों को समुन्नत करते हुए उज्ज्वल भविष्य का पथ प्रशस्त कर सकते हैं। परिवार की परिधि से आगे बढ़कर अपने प्रभाव, संपर्क परिचय क्षेत्र तक अपनी परमार्थ साधना को विकसित करना चाहिए। धन दान को पुण्य परमार्थ समझा जाता है। पर इसमें कुपात्रों के हाथों अपनी सहायता जाने पर उससे दुष्प्रवृत्तियों का परिपोषण भी हो सकता है। फिर हर किसी की स्थिति भी ऐसी नहीं होती जो आये दिन दान देते रहने की व्यवस्था कर सके। उतनी सम्पदा जुटा सके।
संपर्क क्षेत्र में प्रयुक्त की जा सकने वाली सर्व सुलभ सेवा साधना यही हो सकती है कि परिवार में सद्विचार की गरिमा बताने वाले साहित्य को पढ़ाया जाय। बिना पढ़ों के पढ़कर सुनाया जाय। इन प्रसंगों पर पारस्परिक चर्चा करते रहा जाय। इसके लिये झोला पुस्तकालय चलाने का एक काम ऐसा है जिसके लिये नियमित रूप से नित्य समयदान, अंशदान, देते रहा जा सकता है।
घर परिवार के लोगों के साथ निजी संपर्क किसी भी समय रह सकता है। रात्रि में तो सब लोग एक साथ रहते ही हैं। सोने से पूर्व एवं उसके पश्चात् भी इतना समय रहता है कि उसमें कुछ पूछते बताते रहा जा सके और घर के सभी लोगों के साथ संपर्क सधता रहे। उसमें सुसंस्कारिता का बीजारोपण, परिपोषण चलता रहे। पर घर से बाहर वाले संपर्क क्षेत्र में तो सत् साहित्य पढ़ाते सुनाते रहने की सेवा साधना कन्धों पर लेकर यह किया जा सकता है कि उनमें विवेकशीलता, शालीनता उभारी जाय और उन्हें अपने को परिष्कृत बनाने की दिशा अपनाने के लिये प्रभावी मार्गदर्शन किया जाय। यह कार्य झोला पुस्तकालय चलाने के लिए नियमित समय लगाकर जना-संपर्क साधते हुए आसानी से हो सकता है। प्रत्येक परमार्थ परायण को अपने परिवार में तथा संपर्क क्षेत्र में सत्प्रवृत्ति सम्वर्धन के रूप में इन प्रवृत्तियों को सम्पादित करते रहने के लिये समुचित उत्साह प्रदर्शित उत्साह प्रदर्शित करना चाहिए।
वैयाकरणी कैयट का स्वास्थ्य दिन-दिन खराब होता जा रहा था। उसका कारण था, दिन को तो वह आजीविका के लिए परिश्रम किया करते थे और रात में जाग-जाग कर महाभाष्य पर टीका लिखा करते थे। उनकी पत्नी उनके स्वास्थ्य के विषय में बहुत चिन्तित रहा करती थी। वे जब-तब पति से इतना परिश्रम न करने की प्रार्थना किया करती थीं। एक बार पत्नी ने जब बहुत कहा तो उन्होंने जवाब दिया-”देवि! इतना परिश्रम मेरे लिए अनिवार्य है, इसके बिना मेरा जीवन शून्य हो जायगा। तुम्हारे पोषण के लिए पति होने के नाते मुझे धनोपार्जन के लिए परिश्रम करना ही है और ब्राह्मण होने के नाते समाज के लिए ज्ञान का दान करना ही है। मैं अपने इन दोनों अनिवार्य कर्तव्यों में से किसी से एक से भी विरत नहीं हो सकता। “ पत्नी ने उत्तर दिया -”स्वामी समाज का महत्व मुझसे अधिक है और उसके लिए ज्ञान वृद्धि का जो महान कार्य आप कर रहे हैं वह आपको करना ही चाहिए, किन्तु जो परिश्रम आप मेरे लिए और घर चलाने के लिए कर रहे हैं उससे मुक्त हो जाइये।” कैयट पत्नी की बात सुनकर बोले-”तो फिर यह घर किस प्रकार चलेगा?” “यह उत्तरदायित्व आप मुझ पर छोड़ दीजिये” पत्नी ने कहा। “इसके लिए मेरे पास एक योजना है।”
पत्नी ने बतलाया कि आज से मैं अपने कुटीर के चारों ओर उगी हुई कुशा की रस्सियाँ बनाकर बेचा करूंगी और आप सर्वथा निश्चिन्त होकर सम्पूर्ण एकाग्रता से ज्ञान साधना में लग जाइये।
कैयट की आँखों में हर्षपूर्ण कृतज्ञता के आँसू आ गये और वे बोले जिसकी जीवन-संगिनी ज्ञान का महत्व समझकर इतना सहयोग करने को तत्पर हो उसकी साधना भला क्यों न पूरी होगी?
किये मंत्र-जप, माला फेरी, पूजन आठों याम का, रहे भाव संकीर्ण अगर तो, यह पूजन किस काम का?
हर पूनो, हर पर्व नहाए, गंगा जी के नीर में, पर मन डूब न पाया बिल्कुल, किसी दुखी की पीर में,
करते रहे सफर हम निष्ठुर, मन से चारों धाम का ईश्वर ने जो दिया, लगाया केवल अपने वास्ते,
स्वार्थ-पूर्ति हो जिनमें, हमने चुने वही सब रास्ते, किया यत्नह र पल-छिन हमने, अपने सुख-आराम का,
प्रगति देखकर औरों की हम, भरे द्वेष में, लोभ में, पूर्ण न हो पायी इच्छा तो, भरे तीव्र विक्षोभ में,
ध्यान रहा हर समय हमें तो, अपने ही धन-धाम का, व्यर्थ ऐंठना अहंकार में, भरकर झूठी शान से,
किन्तु माँगते रहना, खुद के लिये सदा भगवान से, द्वार-द्वार दौड़ना व्यर्थ में, यहाँ सुबह और शाम का,
जितना गड्ढा किया कि उतनी, मिट्टी डालो खेत में, प्रायश्चित का सूत्र दिया, यह गुरुवर ने संकेत में,
ध्यान न रह पाया यदि हमको, पापों के परिणाम का,
-शचीन्द्र भटनागर
शरीर और मन के अन्योन्याश्रित संबंध में एक के स्वस्थ रहने पर दूसरा भी स्वस्थ रहता है। एक के बीमार पड़ने पर दूसरा भी रुग्णता रहता का शिकार हो जाता है। इन दोनों में मन की प्रधानता है। मन की इच्छा या आज्ञा के अनुरूप शरीर विभिन्न प्रकार के क्रिया-कलाप पूरे करता रहता है। यहाँ तक कि अनायास ही अनवरत रूप से होते रहने वाली जीवन-चर्या को वहन करने वाली अनेकानेक गतिविधियों का सूत्र-संचालन भी अचेतन मन ही करता है। रक्त-संचार, शयन-जागरण, आकुँचन-प्रकुँचन, निमेष-उन्मेष, चयापचय जैसी अनेक क्रिया-प्रक्रियाएँ शरीर के अंतर्गत होती रहती हैं। यह अनायास ही नहीं होता, उनका सूत्र-संचालन अचेतन मन अपनी रहस्यमयी सामर्थ्य के आधार पर करता रहता है। मनःशक्ति के समाप्त हो जाने पर मनुष्य मर जाता है। उसमें शिथिलता आ जाए, तो फिर मूर्छित या निष्क्रिय स्थिति में चला जाना पड़ता है। मन को ही चेतना का केन्द्र माना गया है। शरीर तो उसका पंच भौतिक आवरण मात्र है।
मन का स्वस्थ एवं सही रहना, शारीरिक स्वस्थता की तरह ही आवश्यक है। यदि वह विकृत, उन्मत्त, भ्रम-ग्रस्त अथवा अस्वस्थ हो, फिर शरीरगत क्रिया-कलाप भी ठीक तरह न बन पड़ेंगे। विक्षिप्तों की भौंड़ी हरकतें देखते ही बनती हैं उन्हें न फिर सभ्यता का बोध रहता है और न उपयोगिता-आवश्यकता की बात सूझ पड़ती है। शरीर हरकतें तो करता है, पर वे सभी ऐसी होती हैं, जिनमें उपहासास्पद बनना पड़े और कोई लाभदायक प्रयोजन न सध सके। नशे की खुमारी में बन पड़ने वाली चित्र-विचित्र घटनाओं को देखकर इसका परिचय भली-भाँति पाया जाता है। विक्षिप्त या अर्ध विक्षिप्त स्थिति में मानसिक दृष्टि से असंतुलित व्यक्ति ऐसी हरकतें करते हैं, जिनके कारण साथी-संबंधियों की तथा स्वयं अपनी परेशानी में और भी अधिक वृद्धि होती रहे।
इन दिनों मनोविकारों की बाढ़ आई हुई है। शारीरिक रोगों की तुलना में मानसिक रोगों से ग्रसित व्यक्ति और भी अधिक संख्या में पाये जाते हैं। अन्तर इतना ही है कि शारीरिक पीड़ा प्रत्यक्ष होती है और देखने-जानने पर उसका पता आसानी से लग जाता है, किन्तु मनोरोगी देखने में सही होते हुए भी भीतर से गलत है। वह जो कुछ सोचता है, वह अवास्तविकताओं पर आधारित होता है। चटोरापन इसी का एक लक्षण है। जिह्वा, इन्द्रिय और जननेन्द्रिय का असंयम आधी शक्ति और आधी जिन्दगी को बरबाद करके रख देता है। फिर भी वह सामान्य जनों जैसी आदत होने के कारण अखरता नहीं और न उसके सुधार के लिए ज्वर-खाँसी रोगों जैसा उपाय-उपचार करते ही बन पड़ता है। निषेधात्मक दृष्टिकोण अपना लेने पर भीतर से ही भय, आशंका, चिन्ता, आवेश, अविश्वास जैसे भूत उगते, उछलते हैं। झाड़ी में भूत रहते नहीं; पर आशंकाग्रस्त जब मानसिक संतुलन खो बैठते हैं, तो वह झुरमुट ही दाँत निकालते, आँखें फाड़ते भूत प्रेतों की तरह दृष्टिगोचर होते हैं। कई बार तो वह डरे हुए व्यक्ति के लिए प्राणघातक तक बन जाते हैं। तिल का ताड़ ऐसे ही लोग बनाया करते हैं। शेख चिल्ली जैसी योजनाओं का जाल-जंजाल बुनते ऐसे ही लोग देखे जाते हैं। काला चश्मा पहन लेने पर हर वस्तु काली प्रतीत होती है। भले ही वह मूलतः किसी भी रंग की क्यों न हो। सही स्थिति देख समझ पाना तभी संभव होता है, जब रंगीन चश्मा उतार दिया जाय। पर अर्धविक्षिप्तता की स्थिति में वह भी तो नहीं बन पड़ता है। ऐसे लोगों को सभी में खोट प्रतीत होता है। भले ही स्वभाव या चरित्र का कोई दिखाई नहीं पड़ता। लगता है सभी उसके शत्रु हैं। सभी ने मिल−जुलकर षडयंत्र बनाने में ही निरंतर लगे रहते हैं। ऐसी मान्यता बना लेने पर व्यक्ति भयभीत, आक्रोशग्रस्त एवं कई बार तो आक्रामक तक बन जाता है। किसी का समझाना-बुझाना, और वास्तविकता की सफाई देना भी ऐसों के गले नहीं उतरता। उसे वे बहकावा भर मानते हैं या फिर समझाने वाले को विरोधी माने गये लोगों का एजेन्ट भर करार देते हैं।
इस मनःस्थिति के रहते किसी व्यक्ति को अपने समय, श्रम, चिन्तन एवं साधन को सही कामों में नियोजित कर सकते बन ही नहीं पड़ता। इसके स्थान पर दूसरों को हैरान करते चलने का उलटा उपक्रम आगे भी अधिक चल पड़ता है। फलतः दूसरे तो किसी प्रकार उपेक्षा करके पीछा भी छुड़ा लेते हैं, पर अपनी बहुमूल्य मानसिक क्षमता का ऐसा दुरुपयोग होता है, जिसे अपने आप कुल्हाड़ी मारना कहा जा सके। ऐसे व्यक्ति स्वयं ही अतिशय घाटे में रहते हैं, सनकी समझे जाते हैं और स्वजन-संबंधियों के सहयोग तक से वंचित हो जाते हैं। इस परिस्थिति में न तो कोई प्रगति कर सकता है, न सुखी रह सकता है। यहाँ तक कि वह स्वास्थ्य को भी अकारण बिगाड़ता और रोगियों से भी अधिक गई गुजरी स्थिति में रहकर निरन्तर हानि ही हानि उठाता है। ऐसे सनकी लोगों की बढ़ती हुई संख्या एक बहुत बड़ी समस्या बनती जा रही है। इस कारण व्यक्ति और समाज को असाधारण हानि उठानी पड़ रही है। शारीरिक स्वास्थ्य तो चौपट हो ही रहा है। विक्षिप्तों को, अपंगों से, अभावग्रस्तों से भी अधिक बोझिल माना जाता है। वे अपने समेत सबका मात्र अनहित ही अनहित करते हैं। इस संदर्भ में भारी कठिनाई यह है कि इस मानसिक रुग्णता को घनिष्ठ साथियों के अतिरिक्त और कोई समझ तक नहीं सकता। साधारण रीति से खाते, बोलते, चलते, फिरते देखकर किसी को अनुमान तक नहीं होता कि, यह सनकी अर्ध विक्षिप्तता की स्थिति में रहकर ऐसी विसंगतियाँ उत्पन्न कर रहा है, जिसमें किसी के लिए कुछ कर सकना तक संभव नहीं होता। समझाना, बुझाना इसलिए कारगर नहीं होता कि अनगढ़ मान्यताओं को ही सही मान बैठने का दुराग्रह स्वयं कुछ सही सोचने नहीं देता और किसी दूसरे को समझाने का द्वार बंद कर देने के कारण और कुछ करते धरते नहीं बनता। ऐसे लोगों की कोई चिकित्सा भी नहीं बन पड़ती। क्योंकि वे अपने को रोगी मानते तक नहीं, फिर किसी की चिकित्सा को स्वीकृत क्यों करें। मानसिक विकृतियों में उपरोक्त संशय सनक के अतिरिक्त और भी कई हैं, जिनमें एक आवेश भी है। मतभेदों को सुलझाने के लिए धैर्य और सहनशीलता चाहिए। अपनी गलती समझने और दूसरों को समझाने के लिए निष्पक्षता और विवेकशीलता अनिवार्य रूप से आवश्यक है। उसी के सहारे गुत्थियां सुलझती हैं, पर जब आवेश की उत्तेजना चढ़ी हो, असहिष्णुता स्वभाव बन गई हो, तो इस बात की गुँजाइश नहीं रहती कि धैर्य-पूर्वक वस्तु-स्थिति समझी जाय और दोनों पक्षों के लिए इसके लिए समान रूप से अवसर दिया जाय कि मतभेदों के मूल कारण समझें और उनके समाधान में किसकी क्या भूमिका होनी चाहिए, इस निष्कर्ष पर पहुँचे। यही है एक मात्र वह मार्ग, जिससे गुत्थियाँ सुलझती हैं। आवेश की स्थिति में तो गालियाँ और धमकियाँ ही देते बन पड़ती हैं, जिससे समझने-समझाने का द्वार ही बुरी तरह बन्द हो जाता है। सुलझाने के हर प्रयत्न को आवेशग्रस्त बेकार कर देते हैं। कुछ बन नहीं पड़ता, तो अपना ही सिर पीटते हैं। घुटन में घुटते और शरीर के जीवन तत्वों को अपने द्वारा जलाई गई आग में ही स्वाहा कर लेते हैं। ऐसे लोगों को कोई पथ्य, कोई उपचार कारगर सिद्ध नहीं होता। उनकी अस्वस्थता क्रमशः बढ़ती ही जाती है। बात बढ़ने पर दुर्बलता और रुग्णता के लक्षण और भी अधिक स्पष्ट रूप से उभरने लगते हैं।
कामुक-चिन्तन भी इसी किस्म का एक ठंडा रोग है, जो दृष्टिकोण को तो दूषित करता ही है, चरित्र में दुष्टता और भ्रष्टता की मात्रा बढ़ाता ही है। इस सबसे भी बड़ी बात है कि व्यथा कल्पना क्षेत्र को बुरी तरह अपने चंगुल में जकड़ लेती है। सोते-जागते अश्लील कल्पना चित्र ही मस्तिष्क में उमड़ते-घुमड़ते रहते हैं ऐसे असंख्य कल्पना चित्र रंगीली तस्वीरों की तरह दीखते रहते हैं, जिनका व्यवहार रूप में उतर सकना कदाचित ही कभी किसी के लिए संभव होता है। जिस मस्तिष्क को कामुकता की गठिया ने जकड़ रखा है, वह कोई उपयोगी चिन्तन प्राप्त कर ही नहीं पाता। अश्लील ललक ही क्षमताओं को अपने जाल में कस कर बाँध लेती है और शिकार को तड़पते, खीजते रहने के अतिरिक्त और कुछ उपयोगी काम कर सकने योग्य रहने नहीं देती। ऐसे लोगों को कुटेवों और यौन रोगों से ग्रस्त होते हुए भी देखा जाता है। उन्माद को हल्का करने के फेर में वे अपने शरीर का ही सत्यानाश करते रहते हैं। नर-नारियों में गुप्त रोगों का बढ़ता जाना एड्स जैसे रोग का आगमन इस कामुकता के मंद विष को ढोते रहने के कारण ही संभव हुआ है। विवाहेत्तर संबंध, गर्भपात, व्यभिचार आदि जीवन को असंतुलित बना देने वाली घटनाएँ कामुक-चिन्तन की ही कष्टकारक परिणति हैं।
यह ठीक है कि शरीर के रोगी होने पर मानसिक स्वस्थता भी खतरे में पड़ जाती है। पर इससे भी ज्यादा सही यह है कि मनोविकारों का गंभीर प्रभाव शरीर पर पड़ता है और आहार-विहार में कोई व्यतिरेक न होने पर भी व्यक्ति चिन्ता की परिधि में आने वाले अनेकानेक मनोरोगों का उपज पड़ना बरसाती उद्भिजों की तरह उभरता है। इन परिस्थितियों में कोई भी शरीर को निरोगी बनाये नहीं रह सकता।
शरीर के ऊपर पूरी तरह मन का आधिपत्य है। मात्र आहार, रक्त, माँस आदि के सहारे ही शरीर यात्रा की गाड़ी नहीं चलती। हर अंग अवयव पर मनोदशा का परिपूर्ण प्रभाव रहता है। हाथों का उठना, पैरों का चलना तभी होता है, जब मन वैसा करने की आज्ञा दे। स्वस्थ मन ही शरीर का समुचित निर्देशन करता है और सदा उसे सही स्वस्थ स्थिति में बने रहने की सुविधा उत्पन्न करता है। निराश व्यक्ति की सभी गति-विधियाँ मंद पड़ जाती हैं। निराश व्यक्ति की सभी गतिविधियाँ मंद पड़ जाती हैं क्रोधी व्यक्ति की आँखें लाल हो जाती हैं। भयभीत का हृदय धड़कने लगता हैं। शक से भूख मारी जाती है। अनिष्ट की आशंका से नींद उड़ जाती है। इतना ही नहीं, इन विकृतियों के कारण रक्त-संचार, पाचन-क्रम, गहरी नींद आदि सभी आवश्यक गतिविधियों में भारी व्यतिरेक उत्पन्न हो जाता है। जिसे अनेक मनोरोग घेरे रहें, उनकी स्थिति तो उबलते दूध वाली कढ़ाई जैसी हो जाती है। स्थिरता, एकाग्रता, समस्वरता जैसी स्थिति न बना पड़ने पर शारीरिक शक्ति पक्षाघात पीड़ित स्तर की बन जाती है। प्रत्यक्षतः कोई बड़ा कारण न होते हुए भी मनोरोग शरीर रोगों करी शक्ल धारण करने लगते हैं। ‘मानसिक-आधि’ ‘शारीरिक व्याधि’ के रूप में आमतौर से परिणत होती देखी जाती है। इसलिए तत्वदर्शी सदा से सही कहते आये हैं, जिन्हें शरीर को निरोग रखना हो, उन्हें मनोविकारों के भयंकर दबाव से छुटकारा पाने का प्रयत्न करना चाहिए। ब्रह्म अर्थात् मानसिक विक्षेप की दवा तो लुकमान के पास भी नहीं थी। वे यही कहा करते थे कि, शारीरिक-रुग्णता ही दवा दारु से अच्छी हो सकती है, पर मनोविकृतियों का इलाज तो अपनी सूझ-बूझ के आधार पर हर किसी को स्वयं ही करना होता है। जो इसका समाधान किन्हीं दूसरों के सहारे करना चाहते हैं, उन्हें निराश ही रहना पड़ता है। संसार में प्रतिकूलताओं की कमी नहीं। उन सभी को अनुकूल बना सकना संभव नहीं। सभी हमारी मर्जी के अनुरूप ढल जायें और हमारा कहना मानने लगें, यह आशा रखना व्यर्थ है। संसार में बिखरे सभी काँटे और कंकड़ नहीं बीने जा सकते। संभव इतना ही है कि अपने पैरों में जूते पहन लिये जायँ और बिना काँटों की परवाह किये आगे बढ़ते रहा जाय।
मनोरोगी अक्सर दूसरों को दोष देते पाये जाते हैं। अपने को निर्दोष ठहराते रहते हैं। यह दोनों ही उनकी ऐसी भूलें हैं, जो हर किसी को स्वयं ही अपना चिन्तन बदलते हुए ही सुधारनी पड़ती हैं। विक्षोभ अपना निजी उत्पादन है। अपने खेत में कोई दूसरा बीजारोपण करे और फसल काटे, यह संभव नहीं। अधिकार तो अपना है, फिर जैसा भी कुछ चाहा जाएगा, उसी का बीजारोपण होगा और उसकी प्रतिक्रिया फसल भर कर अपने कोठे भरेगी। खेत में खर-पतवार उगते तो हैं; पर चतुर किसान उन्हें आसानी से उखाड़ फेंकते हैं। मानसिक-स्वस्थता की सुरक्षा भी उतनी ही आवश्यक है, जितनी कि शरीर को स्वस्थ रखने की आकाँक्षा सँजोकर रखी जाती है। दोनों के लिए समान रूप से चेष्टा करने की आवश्यकता पड़ती है।
मानसिक दृष्टि से स्वस्थ रहने वाला व्यक्ति शरीर से थोड़ा बहुत अस्वस्थ रहने पर भी अपनी गति विधियाँ किसी प्रकार चलाता और उत्तरदायित्वों को पूरा करता रहता है, इसलिए उसकी हर दृष्टि से प्रधानता है। शरीर का रोगी मानसिक दूरदर्शिता के सहारे शरीर रोगों से निपट लेता है; किन्तु जिसका मन गड़बड़ा जाता है उसे आहार-विहार की समुचित सुविधाएँ रहने पर भी अनगढ़ चिन्तन रहने के कारण अनेकानेक बीमारियों से ही नहीं, समस्याओं-कठिनाइयों एवं विपत्तियों से भी ग्रसित रहना पड़ता है। इस तथ्य को समझते हुए हर किसी को स्वास्थ्य रक्षा की तरह मानसिक प्रखरता भी सम्पादित करनी चाहिए।
एक कसाई की वधशाला से छूट कर गाय भाग गई। कसाई पकड़ने के लिए पीछे-पीछे दौड़ा।
गाय एक सन्त आश्रम के पीछे घनी झाड़ियों में घास चर रही थी और कसाई की आँखों से ओझल थी।
कसाई ने सन्त से पूछा-”इधर से गाय निकली है क्या? आपने उसे देखा है क्या?” सन्त सोचने लगे सच बोलने से गाय के प्राण जायेगा। इसलिए परिणाम को देखते हुए शब्द छल करने में कोई हर्ज नहीं।
बार-बार पूछने पर उनने उत्तर दिया-”जिसने देखा है बोलता नहीं, जो बोलता है उसने देखा नहीं।” कसाई इस ब्रह्मज्ञान की भाषा का अर्थ न समझ सका और आगे चला गया।
ऋषि पत्नी ने इस रहस्य वचन का कारण पूछा तो उनने कहा-”गाय का प्राण बचाने के लिए शब्द छल किया गया। सो जो कहा गया वह असल भी नहीं था। नेत्रों ने गाय देखी थी। वे बोलते नहीं। जीभ बोलती है वह देखती नहीं। इस प्रकार सत्य वचन की चिन्ह पूजा भी हो गई और नग्न सत्य के कारण होने वाला अनर्थ भी हल हो गया।”
“यह केवल हठ की बात नहीं है काका सा! आप यह क्यों नहीं सोचते कि हम भारतीयों के घरों में नारी की स्थिति पहले ही कैसी दयनीय है? राजकुमारी वसुमती का वैधव्य मेरे लिए अमंगल हो सकता है तो यह सारे भारतीयों के मस्तक पर भी कलंक क्यों न होना चाहिए? विधवाओं की सबसे ज्यादा संख्या इसी देश में है और उसके उत्तरदायी सामाजिक कारण भी पुरुषों द्वारा ही तैयार किए गए हैं। क्या अपने किए का प्रायश्चित पुरुषों को नहीं करना चाहिए?”
राणा हम्मीर इतना कहते-कहते कुछ आवेश में आ गए थे पर अपने काका सा-अजयसिंह और अन्य सभासदों का वे पूर्ण सम्मान करते थे। इसीलिए फिर अपनी वाणी को संयत और विनीत बनाते हुए बोले-”काका सा! श्राजकुमारी के कोई सन्तान नहीं है, वे छोटी आयु में ही विधवा हो गई। राज परिवार संन्यासी का सा जीवन नहीं जी सकता फिर क्या यह राजकुमारी की कोमल भावनाओं पर आघात न होगा कि उन्हें हँसते-खिलखिलाते जीने की इस आयु में रीति रिवाजों के बन्दीगृह में डाल दिया जाय? सम्बन्ध मुझे करना है और मैं तैयार हूँ, आप लोग किसी अमंगल की बात अपने मन से निकाल दें।”
“किन्तु हम्मीर! तुम नहीं जानते चित्तौड़ नरेश भालदेव ने हमारे साथ छल किया है। उसने जान-बूझ कर विधवा कन्या का सम्बन्ध भेजा है। तुम्हारे जैसे वीर और प्रतिष्ठित राजकुमार के लिए विधवा से संबंध करना शोभा नहीं देता-हम्मीर! युद्ध ही करना है तो हम तैयार हैं, पर हम इस पक्ष में कभी नहीं कि तुम्हारा सम्बन्ध एक ऐसी कन्या से हो जो पहले कभी किसी का वरण कर अपवित्र हो चुकी हो।” अजयसिंह ने दृढ़ शब्दों में कहा और सामन्तों ने उसका अनुमोदन किया।
पर हम्मीर उस धातु के बने नहीं थे जो किसी भी समय कैसे भी मोड़े और झुकाए जा सकते? हम्मीर किसी सिद्धान्त को देर से स्वीकार करते थे। लेकिन एक बार उसमें सत्य और आदर्श कर रक्षा देख लेते तो उसके लिए ऐसा हठ करते कि फिर सारा संसार एक तरफ हो जाता तो भी वचन से पीछे न हटते। “हम्मीर हठ” उन दिनों जन साधारण के लिए दैनिक बोल बन गए थे।
हम्मीरदेव ने कहा-”काका सा! पुरुष जब चार-चार रानियाँ लाकर राजमहलों में डाल देता है तब अपवित्र नहीं होता, फिर नारी एक ऐसी अवस्था में जबकि उसे सहारे की आवश्यकता होती है और दूसरा विवाह कर दिया जाता है तो वही अपवित्र क्यों हो जायेगी। मान्यताएँ मनुष्य ने बनाई हैं, पर उनमें केवल वही बातें मान्य हो सकती हैं जिनका कुछ विवेक-जन्य औचित्य भी हो? विधवा अपवित्र और अमंगल होती है- यह कोई तर्क नहीं, सच बात तो यह है-यदि वह निःसन्तान है तो सबसे पहले सहारे की अधिकारिणी भी वही है।” हम्मीर के हठ के आगे किसी की एक न चली। वह लगन मण्डप पर जा पहुँचे और सम्बन्ध कर ही लिया। सैनिक जो मेवाड़ से युद्ध करने गए थे, वह बाराती बनकर लौटे। वसुमती ने उस दिन पूर्ण श्रृंगार किया था, पर उसे ऐसा लग रहा था जैसे महाराणा हम्मीर उसके साथ
कहीं छल तो नहीं कर रहे। समाज ने विधवा के जीवन में जो आत्महीनता लाद दी है, वसुमती उसी के कारण कुछ भयभीत-संकुचित सी लग रही थी। लेकिन शीघ्र ही उसके भ्रम कर निवारण हो गया। महाराणा के प्रेमिल व्यवहार से उसे जल्दी ही मालूम हो गया कि हम्मीर ने यह कार्य सिर्फ हठ के कारण नहीं-मानवीय करुणा और रूढ़ियों को तोड़-फेंकने के शौर्य के रूप में किया है।
उसने हम्मीर देव को शासन व्यवस्था में ऐसा सहयोग प्रदान किया कि एक दिन राणा हम्मीर बिना किसी द्वन्द्व रक्तपात के ही मेवाड़ के शासक बन गए। पहले जो लोग कहा करते थे कि विधवा से विवाह हम्मीर के अमंगल नहीं होती। उसे मानवीय सम्मान मिले तो वह किसी भी योग्य जीवन साथी के कर्तव्यों का पालन कर सकती है।
परमपूज्य गुरुदेव के जीवन के बहुमुखी व्यक्तित्व के अनेकानेक पक्ष ऐसे हैं, जिन पर विस्तार से यदि प्रकाश डाल पाना संभव हो तो एक-एक पक्ष पर विशाल ग्रंथ विनिर्मित हो सकता है। समय समय पर उनके लीला प्रसंगों से लेकर तीर्थ चेतना के उन्नायक व संस्कृति पुरुष आदि रूपों की झलक हम पाठकों को देते आए हैं। एक वैज्ञानिक के रूप में, ऋषि-चिन्तक-मनीषी के रूप में उनका परिचय बहुत कम करी जानकारी में है। सही अर्थों में बहुत कम व्यक्ति जानते हैं कि “वैज्ञानिक अध्यात्मवाद” का स्वरूप लिए जो “अखंड-ज्योति” पत्रिका विगत कई वर्षों से निकलती रही है व जिसका व्यवहारिक रूप ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान की शोध-अनुसंधान प्रक्रिया के रूप में परिलक्षित होता है, वह इस महान ऋषि-वैज्ञानिक का मौलिक चिन्तन है। प्रस्तुत अंक में हम परमपूज्य गुरुदेव के बहु-आयामी व्यक्तित्व पर एक धारावाहिक लेखमाला आरंभ कर रहें हैं। इसका प्रथम पुष्प”वैज्ञानिक अध्यात्मवाद” के जन्मदाता के रूप में इस संबंध में पूज्यवर के विषय में दार्शनिक सोच पर प्रस्तुत है। इसी पक्ष के व्यावहारिक पहलू व शोध संस्थान के जन्म लेकर विगत चौदह वर्षों की प्रगति यात्रा से जुड़े अन्तरंग संस्मरणों को अगले अंक में प्रस्तुत किया जाएगा। विगत दिनों अमेरिका, कनाडा व यू. के. की शाँतिकुँज दल की प्रवास यात्रा पर इन प्रतिपादनों के प्रस्तुतीकरण पर जो उन्हें सफलता मिली, उसकी भी झलक आगे पाठक पढ़ सकेंगे। क्रमशः इसी प्रकार पूज्यवर के व्यक्तित्व के विभिन्न पक्षों पर यह धारावाहिक लेखमाला प्रकाशित होती रहेगी।
गायत्री का निवास बुद्धि में माना जाता है। वह स्वयं को विचारों के रूप में प्रकट करती है। मानव जाति समय-समय पर इसकी अनेकों रूपों में प्रत्यक्ष करती आयी है। समय-परिस्थितियों-परिवेश के अनुसार इसकी इसकी अभिव्यक्तियों के ढंग भले अनेक हों, पर वह अपने मूल तत्व में एक है। योगेश्वर कृष्ण की वाणी “बुद्धे परतस्तु सः” बुद्धि के परे वह है जो स्वयं की झलक बुद्धि के माध्यम से दिखायी है। जिसकी झाँकी मन की संकल्पनाओं में उभरती है। जो स्वयं को शरीर के विभिन्न क्रिया-कलापों के रूप में दर्शाती है। जिसका मूर्त रूप कर्म है-जिसका विस्तार जीवन।
जीवन और विचार एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। एक के बिना दूसरे के अस्तित्व की कल्पना नहीं कर सकते। मनोवैज्ञानिक एस. टाक्स के ग्रंथ “माइन्ड कल्चर एण्ड सोसाइटी” के अनुसार सामान्य व्यक्ति ही नहीं पागल तक इस नियम से बंधे हैं। लोक मान्यता भले यह समझे कि पागल की हरकतें सर्वथा अयाचित-अप्रत्याशित अथवा स्वयमेव घटती हैं-भ्रम मात्र है। मनोवैज्ञानिक उपलब्धियों का ढेर लगा देने वाले वर्तमान में- यह तथ्य सुस्पष्ट है कि पागल की हरकतें भी किन्हीं विचारों का परिणाम हैं। भले विचार अचेतन मन के संस्कारों से उपजे हों। मन के ऊपरी हिस्से के निठल्ले- निकम्मे पड़े रहने के कारण सीधे कर्म का बाना पहन लिये हों पर हैं-विचार ही। आज के नहीं तो कभी किसी समय की बटोरी-समेटी गई थाती।
विचार और जीवन की ऐसी सघनता और एकात्मता के कारण ही इतिहास वेत्ता अर्नाल्ड टायनबी मानव जाति के इतिहास को उसके विचारों का इतिहास कहता है। उसके अनुसार तथ्यों को समझने के लिए घटना-क्रमों के पर्यवेक्षण की कम-उसके पीछे क्रियाशील मन के सर्वेक्षण की कहीं अधिक जरूरत है। मानव ने अपने अस्तित्व के उदय से लेकर अब तक जो भी उतार चढ़ाव देखे हैं- जो भी उसकी जीवन यात्रा में घटा है-उसका यदि ग्राफ बनाया जाय तो स्थिति उसके विचारों के अनुरूप होगी। बाहरी जाय तो स्थिति उसके विचारों के अनुरूप होगी। बाहरी घटना-क्रमों को यदि फोटो की उपमा दें तो विचारों को निगेटिव कहे बिना न रहेंगे।
इस तथ्य को गहरे समझकर ही आधुनिक समय में ज्ञान की नयी शाखा “साइको हिस्ट्री” ने जन्म पाया है। इस विधा के विद्वान जे.लुडविग “साइकोलॉजिकल मीनिंग आँव हिस्ट्री” में कहते हैं कि विगत की उपलब्धियाँ-अनुपलब्धियां, गति -अवगति, विकास-विनाश के घटनाचक्रों ने कुछ सशक्त विचारों वाले व्यक्तियों की मनोभूमि में ही जन्म पाया है। परम पूज्य गुरुदेव के शब्दों में “यदि नैपोलियन, चर्चिल, विस्मार्क, वेलिंगटन जैसे व्यक्तियों के नामों को निकाल दे तो यूरोप की कथा रसहीन हो जायगी। यही बात भारत के बारे में भी है। कृष्ण, चाणक्य, बुद्ध, गाँधी आदि के विचारों की आड़ी-तिरछी लकीरों ने ही यहाँ के इतिहास का चित्र बनाया है।” सशक्त मनोभूमि से विकसित विचार श्रृंखला अपने समानधर्मी अनेकों को उसमें जकड़ लेती है। विचारों की पतली धारा अपने समान गुण वाले अनेक जलकणों से मिलकर स्वयं को प्रबल वेगवती नदी, नद में बदलती महासागर का रूप ले लेती है। घटनाएँ परिस्थितियाँ परिवेश इसका अनुगमन करते हैं।
आज विचारों की समग्रता नष्ट प्रायः है। “धर्म और विज्ञान विरोधी नहीं पूरक” नामक पुस्तक में परम पूज्य गुरुदेव लिखते हैं-”मनुष्य के खण्ड-खण्ड का चिन्तन विश्लेषण चल रहा है। उसके अस्तित्व के एक भाग को समग्र शास्त्र का रूप दे दिया गया है। ...................... ये सब हैं तो उपयोगी पर समग्र मानव को समझे बिना उसकी मूल प्रकृति और प्रवृत्ति पर ध्यान दिये बिना एकाँगी आंशिक समाधानों से कुछ बनेगा नहीं। एक छेद सीते-सीते दूसरे और नए फट पड़े तो उस मरम्मत से कब तक काम चलेगा?”......................उस महाविद्या की ओर से क्यों उदासी है? जिसे समग्र मानव का विज्ञान कहा जा सके।” बड़ा गहरा प्रश्न है-युग द्रष्टा का। इसमें युगों की तत्वालोचना समायी है। तीनों काल खण्ड एक होकर अपनी समस्याओं के बारे में मुखर हैं।
पिछले दो सौ वर्षों में इतने अधिक शास्त्र-ज्ञान विज्ञान की धाराएँ ढूँढ़ निकाली गई हैं-जितनी पहले कभी न थीं। इस सबके बाद भी उदासी के बादल छँटे नहीं घहराते ही गए, कारण उपर्युक्त सवाल के समाधान में बरती गई उदासीनता है। ज्ञान के खोजियों, जीवन के सीमाँसकों और अन्वेषित प्रणालियों का पर्यावलोचन करें तो पाएंगे- इनके मुख्यतः तीन वर्ग हैं। एक जिनने जीवन का बाह्य परिवेश देखा-केन्द्र से दूर रहकर परिधि की ओर उन्मुख रहे। बस फिर क्या- इस निष्कर्ष को केन्द्र बनाकर रच डाले्र नए नए शास्त्र। क्रियाशीलता क्यों? सक्रियता किसलिए? इनका जवाब पाने की कोई जरूरत नहीं समझी गई। उलटे कह दिया गया-यह तो दिवा स्वप्नदर्शियों का काम है। इस परम्परा ने व्यक्ति को आत्म-गरिमा से हीन भारवाहक श्रमिक बना दिया। आज जिसे विज्ञान कहते हैं-वह इसी परम्परा का अनुयायी है। इसकी उपलब्धियों पर हम कितना ही गर्व क्यों न यकर लें पर “इंट्रोडक्षन आँव फिलोसॉफी” के लेखक जी0टी0डब्लू पेट्रिक के शब्दों में “विज्ञान मूल्यों, जीवन तथा मानवीय आचरण जैसे अनिवार्य प्रश्नों के समाधान की चेष्टा नहीं कातस जो हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण है.............। भौतिक क्षेत्र से परे जो कुछ है, यह उसके बारे में अनिश्चित है। चट्टानों की आकृति, तारों की दूरी, हड्डियों अथवा पेशियों के विषय में अधिकांश लोगों को कम रुचि है-जो सम्भवतः वैज्ञानिक कौतूहल मात्र है। किन्तु मानवीय, सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक तथा धार्मिक विषयों को जाने बिना हमारा काम नहीं चलता।
पूज्य गुरुदेव के शब्दों में कहें तो “इन बातों की उपेक्षा करके चिन्तन और भावना से हीन विज्ञान की प्रक्रिया और उपलब्धियों ने मनुष्यता को बारूद के ढेर में बिठा दिया है। उन्मादी अट्टहासों के बीच वह स्वयं के अस्तित्व में आग लगाने पर उतारू है। कारण उसने सोचने की जरूरत नहीं समझी-उपलब्धियाँ किसलिए?”
इसके विपरीत जिन्होंने सोचा उन्होंने क्रिया की निःसारता मान ली। मनोसंकल्पनाओं से घिरे रहने के कारण वस्तु जगत को झुठलाने के प्रयास में ही अपने कर्तव्य और पुरुषार्थ की इतिश्री समझ ली। मन का संकल्प वस्तुओं का सृजन करता है। इस दावे के बाद फिर क्या जरूरत कि वस्तु जगत पर ध्यान दिया जाय। अर्ध सत्य विचार को पूर्ण सत्य मान लेने के कारण मनुष्यता फिर एक कठघरे में फँस कर रह गयी। ठीक वैसा ही कठघरा जैसा क्रियाशीलता को सब कुछ समझने वालों का है। बेकन की भाषा में”स्वयं को दार्शनिक समझने वाला जीव अपने ही बुने तन्तु जाल में फँसता-उलझता फँसाता-उलझाता रहता है। क्योंकि उसने मान रखा है-दर्शन सोचने की पद्धति है करने की नहीं। भावना और क्रिया से विलग रहकर वह स्वयं को मानवता का कितना ही हित साधक कहे। पर उसने स्वयं। का भी कितना हित साधन किया है- इस पर भी समय ने अमिट प्रश्न चिन्ह लगा दिया है।”
इस प्रश्न का हल ढूँढ़ने वालों ने मानवी अस्तित्व के एक नए केन्द्र का स्पर्श किया। उसी को सब कुछ मान जीवन की प्रश्नावली के नए समाधान खोजने शुरू किए। उनका कार्य स्तुत्य होते हुए भी समग्रता के अभाव में मनुष्य का कुछ अधिक हित नहीं कर सका। भावनाएँ उत्तम हैं, पर क्रिया का अभाव इन्हें पंगु बना देता है। चिन्तन न होने पर ये कोरी भावुकता होकर रह जाती हैं। इनकी श्रेष्ठता हम कितनी ही तरह से क्यों न सिद्ध करें- किन्तु यदि एक मात्र भावना ही सत्य है- तो मनुष्य के बौद्धिक विकास उसके शरीर धर्म का क्या अर्थ रहा? सर्वथा अनुत्तरित प्रश्न है। बौद्धिक विवेचना से पल्ला छुड़ा बैठने के कारण ही इस पथ के अनुयायी रहस्यवादी कहलाए। इस उपाधि धारण करने का एक मात्र कारण-वह अयोग्यता कही जाएगी, जिसके कारण ये अपने अनुभवों को बुद्धि की भाषा में नहीं कह पाए।
क्रिया, चिन्तन और संवेदना-जीवन के तीन पक्ष अपने एकाकीपन में मनुष्य जाति को जीवन का अर्थ नहीं दे सकते। वह कला नहीं सिखा सकते जिससे अनगढ़ता-भद्दापन मिट सके। इस कला का अभाव ही है-जिसके कारण समृद्धियों के ढेर में दबा-बौद्धिक भार से लदा मनुष्य करुण विलाप कर रहा है।
परमपूज्य गुरुदेव का सारा कर्तृत्व उस विचार सृष्टि के रूप में है जो आज के मनुष्य को सोचने का ढंग सिखाती है। उसके जीवन की गुत्थियों को सुलझाकर जीने की कला सिखाती है। उन्होंने अपनाने कर्तृत्व के रूप उस अनूठी चिन्तन शैली का विकास किया है- जो उनके निजी व्यक्तित्व के कारखाने में बनी-ढली और सँवारी गई है। वर्तमान के मनुष्य की मार्ग-दर्शक और भविष्य के मानव के लिए विरासत के रूप में सौंपी गई इस चिन्तन पद्धति को ही उन्होंने “वैज्ञानिक अध्यात्मवाद” का नाम दिया है।
“वैज्ञानिक अध्यात्मवाद” वादों के ढेर में एक नए प्रकार की सर्जना नहीं, बल्कि ऐसा कुछ है जहाँ सभी वाद समा जाते हैं। जहाँ सबको उसका निश्चित स्थान मिल जाता है। “समुद्र मायः प्रतिषन्ति यद्वत्-समुद्र नदी नहीं है, परन्तु सभी नदियाँ समुद्र में अपना स्थान ग्रहण करती हैं।” इसी भाँति इस चिन्तन प्रणाली से जीवन के सभी अंग-उपाँग अपने चरम विकास की कला सीखते हैं।
परमपूज्य गुरुदेव के शब्दों में- “यह उलटे को उलटकर सीधा करने की विधि है। जहाँ अभी तक हम अखण्ड को खण्ड-खण्ड करने की कल्पना करने की पीड़ा भोगते रहे। वहीं यह तत्वदर्शन सिखाता है- खण्ड-खण्ड अविभाज्यता कैसे पायें?” इस चिन्तन पद्धति के आविष्कर्ता भले वह हैं, किन्तु इसकी तीव्र आवश्यकता पिछले कुछ समय से सभी मनीषी अनुभव कर रहे थे। “साइन्स एण्ड फर्स्ट प्रिंसिपल्स” के रचनाकार वैज्ञानिक एफ0एस0सी0नार्थ्राय की भाषा में- यही कारण है कि एडिनल आइन्सटाइन तथ व्हास्टहेड जैसे भौतिक शास्त्री ट्रीष, हाल्डेन जैसे शरीर-क्रियाविद् ब्रोबर, हिलवर्ट जैसे गणितज्ञों का भ्री इस ओर उन्मुख होना-यह बताता है-जगत में एक नवीन स्फूर्ति तथा स्वभाव का वातावरण बन रहा है।
धर्म-दर्शन और विज्ञान-मानवीय अस्तित्व से उपजी-तीन प्रबल विचार शक्तियाँ हैं। किन्तु इनका अलगाव-आपसी टकराव मानव जीवन में वरदानों की सृष्टि न कर सका। जब संवेदना-चिन्तन और कर्म ही आपस में टकराते रहेंगे-तब परिणाम संहार के सिवा और क्या होगा? उज्ज्वल भविष्य की संसिद्धि का सिर्फ एक उपाय है-इनका सामंजस्य। वैज्ञानिक अध्यात्मवाद के रूप में यही है। इस नए तत्व दर्शन के अनुसार क्रिया और चिन्तन दोनों जहाँ मिल सकते हैं वह स्थान संवेदना है। जाने-अनजाने ये दोनों यहीं अपना जन्म पाते हैं। इस मिलन बिंदु को अपने मूल स्रोत के रूप में पहचानना-स्वीकारना ही वह उपाय है-जिससे मनुष्य अब तक के अपने विकास को बरकरार रख सम्भावनाओं के नए द्वार खोल सकता है।
यह उन्मुक्त द्वार संकीर्ण विचारों की कोठरियों में हैरान-परेशान मनुष्य को खुले आकाश, प्राणवर्धक वायु के बीच ले जाएगा। संवेदना से उपजी क्रिया-भारभूत श्रम नहीं- जीवन साधना बनेगी। संवेदना से उपजा चिन्तन उसका मार्ग दर्शक बनेगा। चिन्तन की यह नयी प्रणाली मानव की नियति है। इसे स्वीकारे बिना अन्य कोई उपाय नहीं। किन्तु किसी को यह नहीं सोचना चाहिए विज्ञान कैसे जीवित रहेगा? “परिवर्तन के महान क्षण” पुस्तक में निहित अस्तित्व भेदी अपने विचारों में परमपूज्य गुरुदेव स्पष्ट करते हैं- “विज्ञान जीवित रहेगा, पर उसका नाम भौतिक विज्ञान न रहकर अध्यात्म विज्ञान रहेगा। उस आधार को अपनाते ही वे सभी समस्याएँ सुलझ जाएँगी, जो इन दिनों भयावह दीख पड़ती हैं। उन आवश्यकताओं को प्रकृति ही पूरा करने लगेगी, जिनके अभाव में मनुष्य अतिशय उद्विग्न, आशंकित, आतंकित दीख पड़ता है।”
यह विचार प्रणाली हम सब के मन स्वीकार कर सकें, हमारे निम्नगामी मन उर्ध्वनत हो सकें, इसी के सफल प्रयास के विचारों की अधिदेवी के उपासक-उसके अवतरणकर्ता परमपूज्य गुरुदेव पं0 श्रीराम शर्मा आचार्य- इस अवतरण दिवस (गायत्री जयंती 1990) को ही- पंच भौतिक आवरण को छोड़ कर- विचारमय - संवेदनामय हो गए थे। पिछले पूरे अढ़ाई वर्षों का लेखा-जोखा हमें देना है, कि हम उनकी चिन्तन प्रणाली को- उनकी भावमय संवेदना को किस हद तक स्वीकार कर सके? इस प्रश्न का उत्तर जिस भाषा में देना है - वह क्रिया है। ऐसी क्रिया जो संवेदनाओं से उपजी है, युग ऋषि का चिन्तन जिसका मार्गदर्शक हो।
अपने अन्दर विद्यमान प्रकाश के अनुसार जीवन बिताने से इनकार करना वास्तविक पाप है। अपने आस-पास के जन-समुदाय के विचारों के अनुकूल जीवन बिताने को अस्वीकार करना रूढ़ पाप है। हम रूढ़ से डरते हैं, इसलिए वास्तविक पाप करते हैं। मनुष्य का कर्तव्य यह है कि वह अपने अन्दर विद्यमान प्रकाश को प्रमाण माने और यदि आवश्यक हो तो रूढ़ियों का विरोध करे।
मनुष्य स्वाभाविक तौर पर एक नैतिक प्राणी है। वह चाहता है कि नैतिक कार्य ही करे। युद्ध और क्रूरता जैसे कार्य भी वह तब तक नहीं करना चाहता जब तक उसे किसी प्रकार नैतिक आधारों पर उचित न ठहरा ले। उसके लिए भी वह स्तुत्य उद्देश्यों की बातें करता है जैसे संसार को प्रजातन्त्र के लिए सुरक्षित बनाना, घर-बार और आश्रितों की रक्षा, सन्धि सद्भावनाओं को अविकल बनाए रखना, इत्यादि ऐसे कार्यों को कराने के लिए उत्तरदायी मन में जो भय-अभिमान, धन की लालसा और सत्ता की इच्छा होती है, उन्हें छिपाया जाता है। कारण यही है कि अनैतिक कहलाना मनुष्य को पसन्द नहीं।
प्रारम्भ से ही इन्सान के ज्यादातर कष्टों का कारण उसकी दुष्टता उतनी नहीं रही-जितनी कि मूर्खता। यूरोप में कथित जादूगरनियों को भयंकर यन्त्रणा इसलिए दी जाती थी, क्योंकि समझदारों से यह अपेक्षा की जाती थी कि वे उन्हें शैतान के चंगुल से बचाएँ। ईसाईयत में विश्वास न करने वालों को इसलिए जिन्दा जला दिया जाता था, क्योंकि उन्हें अनन्त काल तक नर्क की यातना से बचाने का यही एक मात्र उपाय समझा जाता था। हम बहुत बड़े पैमाने पर हत्या आयोजन करने वाले लोगों का अनुगमन इसलिए करते है, क्योंकि हमें समझा दिया जाता है न्याय और स्वतन्त्रता की रक्षा का एक मात्र उपाय यही है। हमारी घोरतम क्रूरताएँ भी दयालुता के भ्रम के कारण होती हैं।
इसलिए मानवीय स्तर पर शान्ति सद्भाव किसी एक व्यक्ति या संघ के जिम्मे नहीं छोड़ा जा सकता। उसके लिए तो मानव जाति को नैतिक जड़ता पर विजय पानी होगी। जन समूह को अत्याचार का विरोध करने की सामर्थ्य सरलता से प्राप्त नहीं होती। उसके लिए विचार को दृढ़ विश्वास में बदलना होगा और उसके अनुसार जीवन यापन करने का साहस प्राप्त करना होगा। दूसरे शब्दों में केवल बुद्धि को ही नहीं बल्कि हमारी सम्पूर्ण चेतना को उस कार्य में खपना चाहिए।
यदि हम विश्व में शान्ति सद्भाव की स्थापना करना चाहते हैं तो सिर्फ बुद्धि से सोचना काफी न होगा। हो सकता है कि विग्रह, विद्वेष, विलासिता, अनीति को हमारी बुद्धि घृणा-जनक और मानवता से असंगत समझती हो। पर इतना कहाँ पर्याप्त है? आवश्यकता इस बात की है कि हमारी सम्पूर्ण प्रकृति उसे त्याज्य समझे और वह भी इस स्तर तक कि अत्याचार अनीति के सहयोगी बनने की अपेक्षा कष्ट और अकेलापन सहने को उद्यत रहे। इसका अर्थ केवल अपने दृष्टिकोण को बदलना नहीं अपितु अपने मनोबलों का पुनर्गठन है। हमें संसार के सम्बन्ध में मानचित्रों-भवनों बाजारों की दृष्टि से नहीं, बल्कि नर-नारियों के संवेदनशील जीवन्त समूह की दृष्टि से सोचना शुरू करना होगा। भले ही हम अन्य व्यक्तियों की भावनाओं को अंगीकार करने को तैयार न भी हों, तो भी हमें अन्य व्यक्तियों के दृष्टिकोण समझने, वस्तुओं, तथ्यों को दूसरे व्यक्ति की दृष्टि से देखने की कल्पना के श्रम से बचना नहीं चाहिए।
गाल्सवर्दी के एक नाटक में एक पात्र कहता है यदि मुझे केवल एक ही प्रार्थना करनी हो तो वह होगी “है प्रभु मुझे समझने की शक्ति प्रदान करो।” गायत्री मंत्र के “धियो यो नः प्रचोदयात्”- पद में यही भाव अन्तर्निहित है।
अन्य व्यक्तियों और जातियों को भी, भले ही वे कितने ही पिछड़े हुए क्यों न हों, समान रूप से पनपने का अधिकार है, शाश्वतता में उनका भी अधिकार है। वे आगे की ओर यात्रा में हमारे साथी तीर्थ यात्री हैं। हममें से प्रत्येक मानवता के स्वास्थ्य और सुख का न्यासघर (ट्रस्टी) है। इस न्यास के महत्व के सम्बन्ध में जितना कहा जाय, कम है और यह न्यास हमारे ऊपर जिम्मेदारी डाल देता है कि हम अन्य लोगों की दुर्बलताओं को सहन करें, कठिनाइयों पर विजय पाने और संसार में शाँति स्थापना करने में एक दूसरे की सहायता करें। इक्कीसवीं सदी समझदारी का यही संदेश सुनाती आ रही है।
अन्य बालकों के साथ युधिष्ठिर को भी पाठ पढ़ाये गये और उन्हें याद कर लाने के लिए कहा गया।
अन्य बालकों ने तो पाठ याद कर लिये पर युधिष्ठिर बहुत दिनों तक यही कहते रहे कि पाठ कठिन है। याद होता नहीं।
पाठ था ‘सत्यंवद्’ अर्थात् सत्य बोलो। यह चार अक्षर याद करने में तो कठिन नहीं थे पर युधिष्ठिर याद करना उसे मानते थे जो व्यावहारिक जीवन में उतर जाय।
युधिष्ठिर ने जीवन भर में वह एक ही गुरु मंत्र व्यावहारिक जीवन में पूरा कर पाया। वे पढ़ने लिखने में तो साथियों से आगे ही रहते थे।
‘अमृतवाणी’ प्रसंग में इस अंक में हम दे रहे हैं गायत्री महाविद्या पर शाँतिकुँज प्राँगण में 9 फरवरी 1978 को परम पूज्य गुरुदेव द्वारा दिया गया उद्बोधन। वसंत पंचमी के विशेष सत्र के पहले दिन उनने उपस्थित पाँच हजार व्यक्तियों को विशेष दावत दी-युग देवता की व कहा कि गायत्री मंत्र हमारे जीवन में फलित हुआ, आपके जीवन को भी वह इन विभूतियों से निहाल कर सकता है, यदि आप सही विधा को सही तरीके से समझ सकें। तो पढ़ें, अमृतवाणी-गायत्री महाशक्ति की फल श्रुतियों पर प्रकाश डालने वाली, चेतना में उथल-पुथल मचा देना वाली उनकी वक्तृता शैली के माध्यम से। आगामी अंक में वसंत पर्व के परिपेक्ष में ऐतिहासिक वसंत पर्व 12/2/78 को दिया गया उनका क्राँतिकारी उद्बोधन परिजन अमृतवाणी प्रसंग में पढ़ेंगे।
गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ बोलिए -
(( भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य
धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।
देवियो! भाइयो! मेरे पिताजी गायत्री मंत्र की दीक्षा दिलाने के लिए मुझे बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में महामना मालवीय जी के पास ले गये। महामना मालवीय जी और हमारे पिता जी सहपाठी थे। उनका विचार था कि लड़के का यज्ञोपवीत संस्कार और गायत्री मंत्र की दीक्षा महामना मालवीय जी से करायी जाय। पिता जी मुझे वहीं ले गये, तब मैं दस-ग्यारह वर्ष का रहा होऊँगा। मालवीय जी के मुँह से जो वाणी सुनी, वह अभी तक मेरे कानों में गूँजती है। हृदय के पटल और मस्तिष्क पर वह जैसे लोहे के अक्षरों से लिख दी गयी है जो कभी मिट नहीं सकेगी। उनके वह शब्द मुझे ज्यों के त्यों याद हैं जिसमें उन्होंने कहा था- “भारतीय संस्कृति की जननी गायत्री है। यज्ञ भारतीय धर्म का पिता है। इन माता-पिता को हम सभी को श्रवण कुमार की तरह से कन्धे पर रख कर सेवा करनी चाहिए।”
गायत्री मंत्र बीज है और इसी के वृक्ष के रूप में सारा का सारा भारतीय धर्म विकसित हुआ है। बीज छोटा सा होता है बरगद का और उसके ऊपर वृक्ष इतना बड़ा विशाल होता हुआ चला जाता है। गायत्री मंत्र से चारों वेद बने। वेदों के व्याख्यान स्वरूप ब्रह्मा जी ने, ऋषियों ने और ग्रंथ बनाये, उपनिषद् बनाये, स्मृतियाँ बनायीं, ब्राह्मण, आरण्यक बनाये। इस तरह हिन्दू धर्म का विशालकाय वांग्मय बनता चला गया। हिन्दू धर्म की जो कुछ भी विशेषता दिखायी पड़ती है- साधना परक, ज्ञान परक अथवा विज्ञान परक, वह सब गायत्री के बीज से ही विकसित हुई है। सारे का सारा विस्तार गायत्री बीज से ही हुआ है। बीज वही है, टहनियाँ बहुत सारी हैं। हिन्दूधर्म में चौबीस अवतार हैं। ये चौबीस अवतार क्या हैं? एक-एक अक्षर गायत्री का एक-एक अवतार के रूप में, उनके जीवन की विशेषताओं के रूप में, उनकी शिक्षाओं के रूप में है। हर अवतार एक अक्षर है गायत्री का, जिसमें क्रियायें और लीलायें करके दिखायी गयी हैं। उनके जीवन का जो सार है वही एक-एक अक्षर गायत्री का है।
हिन्दू धर्म के दो अवतार मुख्य हैं-एक का नाम राम और दूसरे का कृष्ण है। रामचरित का वर्णन करने के लिए बाल्मीकि रामायण लिखी गयी जिसमें 24000 श्लोक हैं और प्रति 1000 श्लोक के पीछे सम्पुट लगा हुआ है गायत्री मंत्र के एक अक्षर का। श्री कृष्णचरित भागवत् में लिखा है। श्रीमद् भागवत में भी चौबीस हजार श्लोक हैं और एक हजार श्लोक के पीछे गायत्री मंत्र के एक अक्षर का सम्पुट लगा हुआ है अर्थात् गायत्री मंत्र के एक अक्षर की व्याख्या एक हजार श्लोकों में। रामचरित हो अथवा कृष्णचरित-दोनों का वर्णन इस रूप में मालवीय जी ने किया कि मेरे मन में बैठ गया कि यदि ऐसी विशाल गायत्री है, तो मैं खोज करूंगा उसकी और अनुसंधान करके लोगों को यह बताकर रहूँगा कि ऋषियों की बातें, शास्त्रों की बातें सही हैं- क्या? स्तुता, मया, वरदा......... कामधेनु, पारस, कल्पवृक्ष आदि जो लाभ गायत्री उपासना के बताये गये हैं, उसके लिए मुझे जिन्दगी का जुआ खेलना ही पड़ेगा और खेलना ही चाहिए। मित्रो! चार-पाँच वर्ष में ही मेरी इच्छा भगवान ने पूरी कर दी। मेरे गुरु मेरे पास आये और उनने जो बातें बतायीं उससे जिन्दगी का मूल्य मेरी समझ में आ गया। जिन्दगी का मूल्य और महत्व समझकर मैं चौंक पड़ा कि चौरासी लाख योनियों में घूमने के बाद मिलने वाली यह जिन्दगी मखौल है क्या? इसके पीछे महान उद्देश्य छिपे हुए हैं। भगवान ने यह मौका दिया है एक, इनसानी जिन्दगी हमारे हाथ में देकर के। पर क्या हम और आप इसका इस्तेमाल कर पाते हैं?
मालवीय जी ने मुझे सबसे कीमती एक ही बात बतायी थी कि गायत्री मंत्र का सम्बल आप पकड़ लें तो पार हो सकते हैं। वे मेरे दीक्षा गुरु हैं और आध्यात्मिक गुरु वे हैं जो हिमालय पर रहते हैं। उन्होंने बताया कि जिन्दगी की कीमत समझ, जिन्दगी का ठीक इस्तेमाल करना सीख। जिन्दगी की कीमत मैंने पूरी तरीके से वसूल कर ली है। एक-एक साँस को इस तरीके से खर्च किया है कि कोई यह इल्जाम मुझ पर नहीं लगा सकता कि आपने जिन्दगी के साथ मखौल किया है-दिल्लगीबाजी की है। जीवन देवता पारस है-अमृत है और कल्पवृक्ष है। इसका ठीक से इस्तेमाल करता हुआ मैं चला गया और वहाँ से चलते-चलते अभी पचपन साल की मंजिल पूरी करने में समर्थ हो गया। क्या-क्या किया? क्या-क्या पाया? कैसे पाया? मैं चाहता हूँ कि चलते-चलाते आपको अपने भेद और रहस्य बताता जाऊँ कि गायत्री मंत्र कितना सामर्थ्यवान है। यह इतना कीमती है कि मात्र माला घुमाने की कीमत पर इसके लाभ नहीं प्राप्त किये जा सकते। इसके लिए कुछ ज्यादा ही कीमत चुकानी पड़ेगी।
ऋषि, गायत्री मंत्र के बारे में क्या कहते हैं? शास्त्रकारों ने क्या कहा है? यह जानने के लिए मित्रों, मैंने पढ़ना शुरू किया और पढ़ते-पढ़ते सारी उम्र निकाल दी। पढ़ने में क्या-क्या पढ़ा? भारतीय धर्म और संस्कृति में जो कुछ भी है वह सब पढ़ा। वेद पढ़े, आरण्यक पढ़ीं, उपनिषदें पढ़ीं, दर्शन पढ़ीं और दूसरे ग्रन्थ पढ़ डाले-देखूँ तो सही गायत्री के बारे में ग्रंथ क्या कहते हैं। खोजते-खोजते सारे ग्रंथों में जो पाया, उसे नोट करता चला गया। पीछे मन में यह आया कि जैसे मैंने फायदा उठाया है, दूसरे भी फायदा उठा लें तो क्या नुकसान है। उसे छपा भी डाला। लोग उससे फायदा भी उठाते हैं। असल में मैंने ग्रंथों को, ऋषियों की मान्यताओं को जानने के लिए पढ़ा और पढ़ने के साथ-साथ में यह प्रयत्न भी किया कि जो कोई गायत्री के जानकार हैं, उनसे जानूँ कि गायत्री क्या है? और प्रयत्न करूं कि जिस तरीके से खोज और शोध उनने की थी, उसी तरीके से मैं भी खोज और शोध करने का प्रयत्न करूं।
मैंने पढ़ा है कि एक आदमी बहुत पहले हुआ था जिसने गायत्री में पी0एच0डी0 और डी0लिट्0 किया था? कौन था? उसका नाम था-विश्वामित्र। विश्वामित्र उस व्यक्ति का नाम है जिसको जब हम संकल्प बोलते हैं तो हाथ में जल लेकर गायत्री मंत्र से पहले विनियोग बोलना पड़ता है। आपको तो हमने नहीं बताया। जब आप आगे-आगे चलेंगे-ब्रह्मवर्चस् की उपासना में चलेंगे, तब हम गायत्री के रहस्यों को भी बतायेंगे। अभी तो आपको सामान्य बालबोध नियम भर बतायें हैं जो गायत्री महाविज्ञान में छपे हैं। बालबोध नियम जो सर्व साधारण के लिए हैं, उतना ही छापा है, लेकिन जो जप हम करते हैं, उसमें एक संकल्प भी बोलते हैं जिसका नाम है “विनियोग”। प्रत्येक बीज मंत्र के पूर्व एक विनियोग लगा रहता है। विनियोग में हम तीन बातें बोलते हैं-”गायत्री छन्दः सविता देवता विश्वामित्र ऋषि गायत्री जपे विनियोगः”। संकल्प जल छोड़ करके तब हम जप करते हैं। यह क्या हो गया? इसमें यह बात बतायी गयी है कि गायत्री का पारंगत कौन आदमी था। गायत्री का अध्ययन किसने किया था, गायत्री की जानकारियाँ किसने प्राप्त की-गायत्री की उपासना किसने की। वह आदमी जो कि प्रमाणिक है गायत्री के सम्बन्ध में-उसका नाम विश्वामित्र है। मेरे मन में आया कि क्या मेरे लिए ऐसा संभव नहीं कि विश्वामित्र के तरीके से प्रयास करूं। मित्रों मैं उसी काम में लग गया। पन्द्रह वर्ष की उम्र से उनतालीस तक चौबीस वर्ष बराबर एक ही काम में लगा रहा, लोग पूछते रहे कि यह आप क्या किया करते हैं हमें भी कुछ बताइये। हमने कहा-प्रयोग कर रहे हैं- रिसर्च कर रहे हैं और रिसर्च करने के बाद में कोई चीज काम की होगी तो लोगों को बतायेंगे कि आप भी गायत्री की उपासना कीजिये, नहीं होगी तो मना कर देंगे।
मित्रो! 24 साल की उपासना के पश्चात् संशोधन के पश्चात् तीस साल और हो गये जब से गायत्री के प्रचार का कार्य हमने लिया और जब हमको हमारी जीवात्मा ने यह आज्ञा दी कि यह काम की चीज है, उपयोगी चीज है- लाभदायक चीज है इसको लोगों को बताया जाना चाहिए और समझाया जाना चाहिए। जो जितना अधिकारी हो उसे उतनी ही खुराक दी जानी चाहिए। हम उपासना सिखाते रहे हैं, छोटी खुराक वालों को छोटी मात्रा देते रहे हैं, बड़ों को बड़ी मात्रा। हमने छोटे बच्चों को दूध में पानी मिले हुए से लेकर के बड़ों को घी और शक्कर मिली हुई खुराक तक विभिन्न लोगों को दी है तीस सालों में। इन तीस सालों में हमारा विश्वास अटूट होता चला गया है, श्रद्धा मजबूत होती चली गयी है। यह वह सम्बल है- वह आधार है कि अगर ठीक तरीके से कोई पकड़ सकने में समर्थ हो सकता हो तो उसके लिए नफा ही नफा है- लाभ ही लाभ है।
गायत्री के जो सात लाभ बताये गये हैं- “स्तुता मया वरदा वेदमाता प्रचोदयंताम् आयु प्राणं प्रजाँ पशुं कीर्तिं द्रविणं ब्रह्मवर्चसम्. . . .।” इन्हें हमने सौ फीसदी पाया कि ये सातों के सातों लाभ एक-एक अक्षर करके इसमें सही हैं। यह हमने अपने जीवन की प्रयोगशाला में साबित किया है- अपनी जिन्दगी में परीक्षण किया है कि सातों लाभ जो गायत्री के बताये गये हैं सही हैं। इससे मनुष्य की आयु बहुत बड़ी हो जाती है। कितनी बड़ी हो जाती है? बेटे हम कुछ कह नहीं सकते, पर हमारे गुरु के बारे में अपना विश्वास है कि उनकी आयु 600 वर्ष से कम नहीं हो सकती। गायत्री मंत्र का जप करने वाले की आयु बहुत बड़ी हो सकती है, यह तो आप अपने गुरु की बता रहे हैं। तो फिर आपकी उम्र कहाँ रही? बेटे, हमारी उम्र बहुत बड़ी है। 70 वर्ष उम्र होने को आयी, पर सही बात यह है कि 70 साल हमारी उम्र नहीं है। हम 350 वर्ष के हैं-70 ग 5 = 350। आप 350 वर्ष के कैसे हो सकते है? हम इसलिए हुए कि पाँच आदमी मिलकर के जितना काम करते है, उतना काम हमने अपनी जिन्दगी में किया। ग्रन्थ हमने जितने लिखे हैं, अगर एक आदमी जिन्दगी में लिखने के अलावा दूसरा कोई काम नहीं करे तो भी नहीं कर सकता और हमने क्या किया? सारी जिन्दगी भर एक आदमी तप करता रहा है। जिन्दगी के अधिकांश समय में हमारा 6 घण्टे रोज दैनिक उपासना में चला गया। इस तरह एक आदमी ने पूरा का पूरा श्रम गायत्री उपासना में किया।
एक आदमी ने संगठन किया है। हमने देश भर का संगठन किया है। हिन्दुस्तान में और सारे संसार में जो लोग हमको गुरुजी कहते हैं और जिन्होंने हमें देखा है, जो हमारी बात को सुनते हैं-मानते हैं, जिन्होंने दीक्षा ली है, वे करोड़ों की तादाद में हो सकते हैं। एक आदमी ने इतना संगठन 30 साल में खड़ा किया हो, मैं समझता हूँ हिस्ट्री में ऐसी उदाहरण कभी नहीं मिला होगा। मरने के बाद तो लोगों ने किये हैं। ईसा के मरने के बाद सेंटपाल ने ईसाई धर्म का विस्तार किया था तब फैला था वह धर्म। बुद्ध भगवान का मिशन उनकी जिन्दगी में नहीं फैल सका बहुत थोड़ा सा था। सम्राट अशोक ने अपना सारा राज्य बुद्ध मिशन के लिए लगाया तब कहीं उसका विस्तार हुआ। 30 साल में हमने विस्तार की व्यवस्था बनायी है, और कोई एक आदमी रह गया है जो हमेशा कहीं और दुनिया में रहता है। संतों के पास रहता है, नियाँ के पास रहता है, तपस्वियों के पास रहता है। उनसे हम गर्मी प्राप्त करते रहते हैं, शक्ति प्राप्त करते रहते हैं। पूछताछ करते रहते हैं। एक और भी है हमारा है जो जगह-जगह जाता रहता है। अक्सर लोग कहते हैं कि क्यों साहब हमने सुना है कि आप वहाँ के यज्ञ में गये थे और लोगों ने देखा था। यह भी तो हो सकता है। स्थूल ही नहीं शरीर सूक्ष्म भी होते हैं। सूक्ष्म शरीर से हमको जगह-जगह काम करने पड़ते हैं। पाँच व्यक्तियों की हमने बराबर जिन्दगी जियी और 350 वर्ष की उम्र हो गयी। यह है हमारी आयु।
प्राण। प्राण माने साहस-हिम्मत। हममें बहुत हिम्मत है। कितनी हिम्मत है-सारे के सारे पण्डित और पुरातनवादी लोग यह कहते थे कि महिलाओं को गायत्री का जप नहीं करना चाहिए और ब्राह्मण के अलावा किसी को नहीं करना चाहिए। हम अकेले ने कहा कि हर बिरादरी के लोग कर सकते हैं और महिलायें भी कर सकती हैं। पण्डितों, शंकराचार्यों-सभी से हमने लोहा लिया। सारी दुनिया में उलटी हवायें बह रही हैं, प्रवाह बह रहे हैं उनको मोड़ देने के लिए हममें बहुत ताकत है। इतनी ताकत है हममें कि जिस तरीके से मछली बहती हुई धारा को छल–छलाती हुई चीरती हुई चली जाती है उसी तरीके से हम अकेले निकल जाते हैं।
कहां से आता है यह प्राण? गायत्री में से आता है। गायत्री ने और क्या-क्या दिया? हमको दीर्घ जीवन दिया-लम्बी आयु दी, प्राण दिया, हिम्मत दे दी, बहादुरी और साहस दे दिया, शक्ति दे दी। प्राण, प्रजाँ, और सन्तानें दे दी। कितनी सन्तानें दी-हम कह नहीं सकते। हमारी सन्तानें जहाँ पैदा होती हैं तो मूछों समेत पैदा होती हैं और लड़कियाँ पैदा होती हैं तो मैट्रिक पास करके पैदा होती हैं। कीर्ति-यश- यश के बारे में हमारे मुँह से शोभा नहीं देता पर हम एक ही बात कहते हैं कि संसार में-संसार के पढ़े लिखे लोगों में से कभी किसी से यह पूछें कि आचार्य जी नाम के कोई व्यक्ति थे, तो वह छूटते ही कहेगा हम जानते हैं उन्हें। हिन्दुस्तान ही नहीं, संसार की प्रत्येक लायब्रेरी में जाइये और जाकर पूछिये कि चारों वेदों के भाष्य आपके यहाँ हैं क्या? उत्तर हाँ में मिलेगा। नास्तिक देशों की बात मैं कहता हूँ-आप पूछिये क्यों साहब इस नाम के व्यक्ति को आप जानते हैं? हमारा यश किसी सीमा में बँध नहीं है-सम्प्रदाय में नहीं हैं, केवल हिन्दू धर्म में नहीं है, वरन् सारे विश्व में है। यह यश कहाँ से आ गया। यह बेटे गायत्री माता का दिया हुआ है।
कीर्तिम् द्रविणं- धन। यही मत पूछिये कि हमारे पास कितना है। अभी पीछे वाली जमीन खरीदी है और जब अगली बार वसंत पंचमी पर आप आवेंगे तो यहाँ नगर बसा हुआ मिलेगा, महल दिखायी पड़ेगा। महाराज जी कहाँ से लायेंगे? आप हमसे माँगेंगे। नहीं बेटे, मैं तेरे सामने हाथ नहीं फैलाऊँगा मैंने इनसान के सामने हाथ नहीं पसारा तो तुझसे क्या मांगूंगा। कहाँ से आयेगा? बेटे कहीं से आयेगा-जमीन फटेगी, आसमान से आयेगा। कौन देगा? वही देगा जिसके बारे में अथर्ववेद ने साक्षी देते हुए कहा है कीर्तिं-द्रविणं-धन देने वाली और आखिर में क्या देती है सातवाँ फल-ब्रह्मवर्चसम्। ब्रह्मवर्चस् कौन सा है? “ब्रह्मवर्चस्” कहते हैं तेज को। ब्रह्मतेज कैसा होता है? ब्रह्मतेज उसे कहते हैं-जब विश्वामित्र और वशिष्ठ में संघर्ष हुआ तब विश्वामित्र हार गये और अपना राज्य छोड़कर यह कहने लगे कि वशिष्ठ जितने शक्तिशाली हैं उतना ही शक्तिशाली बनकर मैं भी दिखाऊँगा। उनने एक श्लोक कहा-”धिक् बलं क्षत्रिय बलं ब्रह्मतेजो बलं बलम्।” अर्थात् ब्रह्मतेज ही बल है। ब्रह्मवर्चस माने ब्रह्मतेज। इसे ब्राह्मणत्व का तेज कहते हैं, आध्यात्मिक तेज कहते हैं, आत्मा की शक्ति का तेज कहते हैं। गायत्री का आखिरी फल - सातवाँ फल ब्रह्मवर्चस होता है।
गायत्री मंत्र के बारे में हम सारे जीवन भर प्रयत्न करते रहे और सफलता पाली। आज मैं यह कहने की स्थिति में हूँ कि ऋषियों ने जो कुछ बताया था कि गायत्री भारतीय संस्कृति का बीज है, तो वह सही है। जो शास्त्रकारों ने लिखा है, अन्यान्य उपासकों ने लिखा है, हम आज यह कहने की स्थिति में हैं कि वह सही है। आप कहते हैं या कोई गवाही भी है? हाँ बेटे हमारी जिन्दगी गवाही है और प्रारम्भिक पन्द्रह वर्ष के बाद के 55 साल के 55 पन्ने गवाही हैं। हमारी जिन्दगी के प्रत्येक पन्ने को खोलते चले जाइये वह एक गवाह के रूप में अपना बयान देगा और अपनी हिस्ट्री बतायेगा। वह यह बतायेगा कि गायत्री की उपासना करते हुए 55 साल में हमने यह पाया और यह किया। तो महाराज हमें भी मिल सकती है? इसीलिए तो तुम्हें बुलाया है। जो हमारे लिए संभव है वह आपके लिए भी है। गायत्री आपके ऊपर भी कृपा कर सकती है। सूरज के हम रिश्तेदार नहीं हैं और आपसे कोई बैर नहीं है। आप धूप में खड़े हो जाइये सूरज की रोशनी आप को भी मिल सकती है और हमको भी। चन्द्रमा की छाया में आप भी बैठ सकते हैं और हम भी।
तो आपने कौन सी विधि से जप किया? कौन सी विधि से उपासना की? बेटे हम यही बताने के लिए आज आपके सामने बैठे हैं कि किस विधि से किया। विधि नहीं एक और बात पूछी जाय। क्या? विधा। विधि तो उसे कहते हैं जो शरीर से और वस्तुओं की सहायता से हेराफेरी से की जाती है। विधि में हाथ यों जोड़िये, चावल ऐसा नहीं यों रखिये। माला लकड़ी की हो या रुद्राक्ष की। दीपक कैसे रखें। यह सब क्या है विधि है। कलेवर का नाम विधि है। जिस विधि को आप पूजते हैं वह आवरण है। आवरण की भी जरूरत पड़ती है, उसके बिना काम नहीं चलता। अगर हमारे पास कलम न हो तो हम चिट्ठी लिख नहीं सकेंगे। बन्दूक और तलवार हाथ में हो पर चलाने की विधि न आती हो तो लड़ाई नहीं लड़ी जा सकती। अतः विधि की भी जरूरत है। लेकिन मैं यह कहता हूँ कि विधि तक सीमित रहिये मत। विधि आपको मकसद तक नहीं पहुँचा सकेगी। विधि के सहारे आप जीवन लक्ष प्राप्त नहीं कर सकेंगे। विधि आपको भगवान तक नहीं पहुँचा सकेगी। विधि के सहारे आप भगवान की कृपा के अधिकारी नहीं बन सकते। तब क्या करना पड़ेगा? विधि के साथ विधा को जानना होगा। विधा मीन्स- रीति, कायदा-कानून, नियम और मर्यादा। इसके बिना सफलता नहीं मिल सकती।
ऋषियों ने गायत्री को त्रिपदा कहा है। इसके तीन आधार हैं- श्रद्धा, चरित्र निष्ठा ओर उदारता जिसे संकीर्णता या कृपणता का त्याग भी कहते हैं। यह तीन आधार आप पकड़ लें तो मैं यकीन दिलाता हूँ कि मेरे तरीके से आपको भी सफलता मिला सकती है। आप भी गायत्री के वैसे ही सिद्ध पुरुष बन सकते हैं जैसे कि महर्षि विश्वामित्र थे और जैसा बनने के लिए मैंने छोटे बच्चे की तरह खुद को समर्पित किया। आपके लिए भी द्वार खुला है मगर त्रिपदा की तीन शर्तें पूरी कर लें तब। इन तीनों के आधार पर हमारी जिन्दगी टिकी हुई है। अगर आप गायत्री मंत्र का वह चमत्कार, जो कि ऋषियों को मिला था, उपासकों, ब्राह्मणों और हमको मिला है तो इसके लिए आपन अपनी श्रद्धा को विकसित कीजिये। चरित्र के बारे में ध्यान रखिये। दोष-दुर्गुणों का त्याग कीजिए और सेवावृत्ति के लिए उदारता से तैयार हो जाइये और यह देखिये कि जनमानस के परिष्कार के लिए आप क्या कर सकते हैं। समय का, श्रम का, धन का, अपनी बुद्धि का कोई हिस्सा लगाने के लिए आप तैयार हैं क्या? कोशिश कीजिये-हिम्मत कीजिये। बीज के तरीके से गलिये और वृक्ष के तरीके से फलिये।
हमने तीन शर्तों पर अपने गुरु से सारी की सारी दौलत-सारे के सारे धन पाये हैं- श्रद्धा की कीमत पर, चरित्र की कीमत पर और उदार दृष्टिकोण की कीमत पर। पी0एम0टी0 की मेडिकल परीक्षा की तरह यह तीन पर्चे हैं कि उदारता की दृष्टि से कितने पवित्र साबित होते हैं। जितने आप नम्बर लाते जायेंगे उतने परीक्षा में पास होते जायेंगे। उसी हिसाब से-उसी अनुपात से उसी मात्रा में आपके लिए सफलतायें, सिद्धियाँ, चमत्कार, अनुदान-वरदान सुरक्षित रखे हुए हैं। टिकट लीजिए- ‘गिव एण्ड टेक’-दीजिये और लीजिये। मेरे जीवन के सारे के सारे निष्कर्ष और निचोड़ यही हैं। मैं चाहता हूँ इनसे आप भी लाभ उठायें और गायत्री मंत्र की महिमा और गरिमा को बढ़ाये। उपासना के बारे में ऋषियों ने-शास्त्रों ने जो कुछ कहा है, वह साबित करके दिखायें। हमने यही साबित करके दिखाने की कोशिश की और आपसे भी यही अपेक्षा करेंगे कि आप जब यहाँ से विदा हों तो वैसा ही साहस, हिम्मत और दृष्टिकोण लेकर जायँ जिससे वे तीनों आधार जो गायत्री मंत्र को-त्रिपदा को सफल और सार्थक बनाने में समर्थ रहे हैं, वही आपके जीवन में भी आयें और आप वे लाभ उठायें जो प्राचीन काल के उपासकों ने उठाया था और हमने भी। आज की बात समाप्त। (( शान्तिः
जिस समय समाज में चारों ओर आपाधापी, अनैतिकताओं, दुष्प्रवृत्तियों, राग विद्वेष-विग्रह का बोलबाला हो, उस समय मूर्धन्य-प्रतिभावानों का क्या दायित्व होना चाहिए, यह प्रश्न ऐसा जटिल नहीं है कि इसके लिए वार्त्ता समितियाँ बनाकर वक्तृताएं दी जायँ, महीनों मात्र मात्र परस्पर चर्चा में बिता दिए जायँ। आस्था संकट जब रोजमर्रा के जीवन को इस कदर प्रभावित कर रहा हो कि व्यक्ति का घर से बाहर निकलना तक दुश्वार हो रहा हो, रोज भूखे सोने वालों की संख्या बढ़ती चली जा रही हो तथा बेरोजगारी, दुर्व्यसनी व्यक्ति समाज में ठलुआगिरी करते चक्रवृद्धि ब्याज की दर से अभिवृद्धि करते जा रहे हों, तब भाषणों-लेखों, सेमिनारों का कोई औचित्य नहीं रह जाता। एपेण्डीक्स में सूजन आ जाने से पेट में भयंकर पीड़ा हो रहीं हो, बुखार व उल्टी से उसके विषाक्त हो पेट में ही फटने के अवसर बढ़ते दीख पड़ते हों तो एक ही तरीका शेष बचता है कि तुरंत रोगी को आपरेशन थियेटर में ले जाकर उस अंग को बाहर निकाल दिया जाय।
आज राष्ट्र में जो परिस्थितियाँ बन रहीं हैं, वे प्रायः उसी स्तर का उपचार माँगती हैं, जोः”एक्यूट एब्डाँमन” के उक्त रोगी के लिए अनिवार्य हो जाता है। विग्रह-विद्वेष, मार-काट, सामूहिक बलात्कार, दहेज-उत्पीड़न, नशे-दुर्व्यसन, कुदृष्टि-कामुकता से पनपी विषाक्तता धर्मतंत्र से उसी उपचार की माँग करती है, जो आपातकाल में दिया जाता है। आज कुछ ऐसा ही समय है। समाज को मूर्धन्यों प्रतिभावानों की जितनी अधिक आवश्यकता अग्रगामी होने की इस समय पड़ रहीं है, उतनी पहले संभवतः कभी नहीं रही। मनुष्य तो हमेशा ही दुःख कष्टों में भगवान को याद करता रहता है किंतु ऐसे समय विरे ही आते हैं, जब भगवान मनुष्य को याद करता है। उच्चस्तरीय उमंगें, आदर्शवादी साहस उभारने के माध्यम से महाकाल यह प्रेरणा देता है कि यह विशिष्ट समय हाथ पर हाथ धरे बैठने का नहीं है। इस समय विशेष में कुछ पराक्रम ऐसा कर गुजरना ही होगा जो मानव को आसन्न विभीषिकाओं के घटाटोप से उबार सके।
प्रस्तुत पंक्तियाँ विशेष रूप से विश्वव्यापी गायत्री परिवार द्वारा पिछले दिनों आरंभ किये गये देव संस्कृति दिग्विजय अभियान के परिप्रेक्ष्य में लिखी जा रहीं हैं। इसी के अंतर्गत भारत व विश्व में चौबीस अश्वमेध यज्ञों को अगले तीन वर्षों में प्रथम महापूर्णाहुति के पूर्व संपन्न करने की योजना अदृश्य संचालन सत्ता के निर्देशों पर बनी है। जयपुर, नागपुर, भिलाई गुना, बड़ौदा वह लखनऊ की प्रारंभिक गोष्ठियों के निष्कर्ष यह बताते है कि जनमानस परिवर्तन के लिए किस उत्साह से संघबद्ध होता चला जा रहा है। इन पंक्तियों के लिखे जाने तक जयपुर का अश्वमेध महायज्ञ प्रारंभिक सभी तैयारियाँ पूरी हो, एक भव्य आयोजन संपन्न होने के रूप में सामने आ रहा है। प्रायः तीन से चार लाख व्यक्तियों की इसमें भागीदारी की संभावना है। शाँतिकुँज के सौ से अधिक कार्यकर्ता, राजस्थान व अन्य प्रान्तों के पाँच हजार से अधिक कर्मठ परिजन विगत पंद्रह दिनों से सघन स्तर पर तैयारियों में जुटे हैं। समाज के नवनिर्माण को संकल्पित संस्कृति-पुरुष परम पूज्य गुरुदेव द्वारा दिये गए मर्मस्पर्शी सूत्रों की व्याख्या समझने के बाद अब मिशन से अपरिचित व्यक्ति भी अपनी किसी न किसी रूप में भागीदारी सुनिश्चित करना चाह रहा है।
जिस देश में राष्ट्रदेवता की उपासना होती रही हो, सभी मनीषी-प्रतिभाशाली मिल−जुलकर जिसको अखण्ड-समर्थ-सशक्त बनाने का नियमित अनुष्ठान करते रहते हों, उसके निवासी शतपथ ब्राह्मण के “श्री वै राष्ट्रः।” “राष्ट्रं वै अष्वमेधः।” “तस्मात् राष्ट्री अष्वमेधेन यजेत्” की वर्चस्व जागरण की भावना के अनुरूप यदि अश्वमेध करने का संकल्प ले चुके हैं तो यह मान लेना चाहिए कि सतयुग की वापसी की प्रक्रिया का क्रियान्वयन अदृश्य जगत के
बाजीगर द्वारा आरंभ कर दिया गया। अश्वमेध यज्ञ का सबसे बड़ा फलितार्थ है- प्रसुप्त पड़ी प्रतिभा का जागरण। यह एक सुनिश्चित तथ्य है कि प्रतिभाएँ ही युगों को बदलती व जनमानस का काया कल्प करती हैं। जब प्रतिभाएँ सो जाती हैं तो देश-समाज-संस्कृति का पतन पराभव आरंभ हो जाता है। जब वे जाग उठती हैं तो प्रवाह को उलट कर घनघोर तमिस्रा में से भी अरुणोदय का सा प्रकाश उदित कर दिखाती हैं। अश्वमेध यज्ञों, जो गायत्री परिवार-प्रज्ञा अभियान-युग निर्माण योजना द्वारा विश्व भर में संपन्न किए जा रहे हैं, के मूल में एक ही तथ्य है देव संस्कृति को विश्व संस्कृति बनाना। विश्व राष्ट्र की कल्पना को साकार रूप देना। प्रस्तुत धर्मानुष्ठान व उनके मूल में छिपे तत्वज्ञान से, इस प्रक्रिया की विज्ञान सम्मत विवेचन ही नहीं, प्रस्तुतीकरण से निश्चित ही वह आधार भूमि तैयार होगी जिस पर इक्कीसवीं सदी रूपी भवन की स्थापना संभव हो सकेगी।
विदेश में पाँच अश्वमेध यज्ञ आगामी दो वर्षों में परम वंदनीय माताजी ने पाँच विराट अश्वमेध महायज्ञों को विदेश की धरती पर संपन्न करने की अनुमति देदी है। ये हैं- 1993 में लंदन (यू0के0), 2, 3, 4 जुलाई, टोरोण्टो (कैनेडा), 16, 17, 18 जुलाई तथा लाँसएंजेल्स (यू0एस0ए0), 20, 21, 22 अगस्त। 1994 में अभी दो यज्ञ घोषित हैं- नैरोबी (केन्या) में 4, 5, 6 मार्च तथा शिकागो (यू0एस0ए0) 22, 23, 24 जुलाई।
*समाप्त*