इस संसार में पाना कठिन नहीं है। पाने के बाद उपलब्धियों का सदुपयोग करना किसी-किसी को ही आता है। सम्पदा व साधन अनायास भी किसी को मिल सकते हैं व कमाए भी जा सकते हैं किन्तु उसका सदुपयोग करने के लिए अत्यन्त दूरदर्शी विवेकशीलता व संतुलित बुद्धि की आवश्यकता पड़ती है। श्रेष्ठ व्यक्तियों की समीपता पा लेना सहज सरल है किन्तु उससे अधिक कठिन है उस सान्निध्य का सदुपयोग करके समुचित लाभ उठा पाना।
मनुष्य ईश्वर का राजकुमार है। उसमें बीज रूप में वे सभी विशेषताएँ व संभावनाएँ विद्यमान हैं जो उसे श्रेष्ठतम विकास की ओर ले जाती हैं। प्रयत्न करने पर उन्हें जगाया व बढ़ाया जा सकता है। मनस्वी, लगनशील व्यक्ति इच्छित दिशा में सफलता प्राप्त करने की क्षमताएँ उत्पन्न करता है और फिर उनका सदुपयोग करके मनचाही सफलताएँ हस्तगत करता है।
जो नहीं है, उसे पाने को तो सभी लालायित देखे जाते हैं, पर विरले ही ऐसे होते हैं जो अपने आज की उपलब्धियों और क्षमताओं की गरिमा का मूल्याँकन कर सकें, उनके सदुपयोग की व्यवस्थित योजना बना सकें। जो प्राप्त है, वह इतना अधिक है कि उसका सही व संतुलित उपयोग करके प्रगतिपथ पर बहुत दूर तक आगे बढ़ा जा सकता है। अधिक पाने के लिए प्रयास तो किया जाना चाहिए पर इससे भी अधिक आवश्यक यह है कि जो उपलब्ध है, उसका श्रेष्ठतम सदुपयोग करने के लिए योजनाबद्ध-रूप से आगे बढ़ा जाय। जो ऐसा कर सकें, सफलता-श्री-समृद्धि उनके चरणों को चूमेगी, यह इस सृष्टि का नियम व स्रष्टा का आश्वासन है।
जेथसमेन में अनावृष्टि के कारण भीषण अकाल की छाया मँडरा रही थी। स्थान-स्थान पर सूखी देह वाले क्षुधा से त्रस्त नरकंकाल दुर्दैव के प्राप्त बन रहे थे। लोग मरने लगें। भूख से तड़पते जर्जर नागरिकों में इतनी भी शक्ति नहीं रह पाई थी कि वे मृत देहों को उनके स्थान से हटा सकें, अन्त्येष्टि करवा सकें।
महात्मा ईसा अपनी शिष्य मण्डली के साथ उन दिनों उसी क्षेत्र में भ्रमण कर रहे थे। जेथसमेन के समाचार सुनकर उन्होंने दुःखी और सन्तप्त मनुष्यों की सेवा सबसे बड़ा धर्म समझा और वहाँ गए।
नगर के बड़े-बड़े धनपति- कुबेरों ने ईसा के दर्शन और उपदेश श्रवण के पुण्य लाभ- लोभ से एक सभा आयोजित की। उन्होंने सुन रखा था कि इन धनाढ्यों पर इस दुःस्थिति का तनिक भी असर नहीं हुआ है। भूख से तड़पती और बिलखती अपने ही सामान्य अन्य दूसरी मानव आत्माओं की वेदना और पुकार से भी धनी मनुष्यों का कठोर हृदय रंच मात्र भी नहीं पसीजा है।
सभा के बीच बैठकर ईसा ने यही निरूपित किया-कि-मनुष्य की सेवा ही सबसे बड़ा आवश्यक धर्म और परम कर्तव्य है। पड़ोसी जब तक भूखा है तब तक हमारा कोई भी पुण्य आयोजन सफल और सार्थक नहीं हो सकता। जीसस ने कुछ रुक-रुक कर फिर कहा ”क्या आप लोगों में ऐसे कोई साहसी व्यक्ति हैं जो इन भूखे व्यक्तियों के लिए भोजन जुटा सकें।”
उनकी मर्मस्थल को छूने वाली वाणी से दुखी और अकाल संतप्त-क्षुधा त्रस्त लोगों को आशा की एक किरण दीख पड़ी। लगा अब कोई उठेगा और अपना सर्वस्व दरिद्र नारायण के चरणों में न्यौछावर कर देगा। उधर धनी और अभिजात कुल के लोगों में भी कुछ सेवा-सहायता की कसक पैदा हुई परन्तु धन और सम्पदा की अत्यधिक आसक्ति मानवीय आत्मा पर हावी हो रही थी। इतने में ही एक व्यक्ति ने उठ कर कहा “भगवान् मेरे पास पैसा तो है परन्तु पैसे से क्या होगा जबकि हमें दुर्भाग्य का अनावृष्टि के रूप में सामना करना पड़ रहा है। आपकी प्रेरणा ने हमारे अंतर्मन को जगा दिया है। परन्तु हम लोग कुछ भी कर सकने से विवश हैं। ”दूसरे धनपति ने उठकर कहा- “इस वर्ष तो पानी ही नहीं बरसा इसीलिए तो खेतों से इतनी उपज नहीं हुई कि राज्य का भूमि कर चुका सकूँ।”
एक धनाध्यक्ष ने उठकर कहा “इतने व्यक्तियों को खिलाने की व्यवस्था की जाय तो मेरी सम्पत्ति कम पड़ेगी
महात्मा ईसा आश्चर्यचकित थे। सभी ने अपनी सम्पत्ति के उचित सदुपयोग करने से बचाने के लिए कोई न कोई बहाना ढूँढ़ निकाला था। इस प्रकार साधन सम्पन्न व्यक्ति ही अपनी कृत्रिम असमर्थता व्यक्त करने लगे तो समस्या का कोई निदान नहीं निकाला जा सकता। वह गम्भीर विचार मुद्रा में लीन हो गए।
वहीं एक मछुआरे की कन्या मार्था बैठी हुई थी। वह उठ खड़ी हुई बोली-भगवन् अपनी शक्ति के अनुसार भूखे लोगों को भोजन देने का उत्तरदायित्व मैं लेती हूँ।
सब लोग आश्चर्य भरी आँख से फटे-पुराने कपड़े पहने मार्था की ओर देखने लगे। उन्हें पता था कि इसे अपने ही गुजारे के लिए भीख माँगने तक को विवश होना पड़ता है। आखिर एक ने पूछ ही लिया, “मार्था ! इस भारी भरकम दायित्व का निर्वाह कैसे कर सकोगी? “
‘मेरी सम्पत्ति और धन भण्डार आप सब लोगों के घरों में हैं। वहीं से माँग लाऊँगी और अकाल पीड़ितों को खिलाऊँगी।’ मार्था का उत्तर था। महात्मा ईसा ने डबडबाई आँखों से सुप्रिया की ओर देखते हुए कहा-’ ‘धनिक व्यक्तियों ! करुणा ही सबसे बड़ी शक्ति है। करुणा और प्रेम से आप्लावित हृदय वाले शूरो के लिए परिस्थितियाँ या सामर्थ्य हीनता सेवा-साधना में बाधक नहीं बन सकती “ और उस दिन जन्म हुआ एक और सुप्रिया का । एक सुप्रिया जो कभी बुद्ध के समय में अकाल पीड़ितों-क्षुधितों को तारने जन्मी थी, वह पुनः ईसा के साथ भी अवतरित हुई। सत्साहस हमेशा छोटों के संकल्प से ही उभरता है।
सच्ची बात अच्छी नहीं लगती और अच्छी लगने वाली बात सच्ची नहीं होती। अच्छाई कभी झगड़ा नहीं करती और झगड़ा कभी ज्यादा बकवाद नहीं करते और ज्यादा बकवाद करने वाले कभी बुद्धिमान नहीं होते।
आत्मा का सम्बन्ध परमात्मा से जुड़ता है और शरीर की निर्भरता पंचतत्वों से बने इस भौतिक संसार पर है दोनों ही पक्षों के मिलन से व्यक्ति का समग्र स्वरूप बनता है। साथ ही उसे दोनों क्षेत्रों से मार्गदर्शन एवं अनुदान मिलता है। इस समन्वय से ही समग्र सहयोग बन पड़ता है। हमें एक पक्षीय अवलम्ब नहीं अपनाना चाहिए। पक्षी दोनों पंखों से उड़ता है। गाड़ी दो पहियों से चलती है। हमें भी अपनी सुरक्षा और प्रगति के लिए दोनों ही क्षेत्रों से अवलम्बन ग्रहण करना चाहिए।
भौतिक जीवन में हमें पदार्थों की आवश्यकता पड़ती है। वस्तुओं की पग-पग पर आवश्यकता रहती है। शरीर, वस्त्र, आच्छादन जैसी अनिवार्य आवश्यकताओं के साधन प्रचुर परिमाण में इस संसार में भरे पड़े है, किन्तु वे अनायास ही दौड़कर शरीर से नहीं लिपट जाते उन्हें प्राप्त करने के लिए शारीरिक श्रम एवं बुद्धि कौशल का समुचित उपयोग करना पड़ता है। इसी को पुरुषार्थ कहते हैं। शारीरिक प्रयत्न कहते हैं, जिनके साथ ग्यारहवीं इन्द्रिय मन को भी जुड़ा रहना पड़ता है। अपनी तत्परता एवं श्रमशीलता के बलबूते उन पदार्थों को प्राप्त करते हैं जिनके शरीर की आवश्यकता रहती है अथवा विशेष आवश्यकता के भी, मन की तृष्णा या महत्त्वाकाँक्षा व्याकुल करती है। यह तो नहीं कहा जा सकता है कि हर किसी की बढ़ी-चढ़ी मनोकामनाओं की पूर्ति हो ही जाती है, पर इतना कहने में कोई संकोच नहीं होना चाहिये कि संसार के बाज़ार में हर वस्तु मौजूद है और उसे पुरुषार्थ का उचित मूल्य देकर सहज ही खरीदा जा सकता है। मनुष्य अपने बहिरंग भाग्य का निर्माता आप है। आलस्य-प्रमाद से ग्रसित होकर वह दरिद्रता और अभाव-ग्रस्तता के दल-दल में फँस सकता है और प्रयत्नरत रहकर अपनी प्रगति एवं समृद्धि को बढ़ाते चलने में समर्थ हो सकता है। शारीरिक संरचना प्रभु ने अनायास ही इस प्रकार की दी है कि उसे निर्वाह की किसी उचित सामग्री के लिए तरसना न पड़े
अर्थशास्त्र का एक सर्वोपरि नियम है- आदान-प्रदान किसान अपना गेहूँ तेली को देकर तेल खरीदता है। तेली अपने उत्पादन के बदले कपड़े खरीदता है। इसी प्रकार सामाजिक व्यवहार भी मिलजुल कर चलता है। हमारे घर में किसी की लड़की पत्नी बनकर प्रवेश करती है। यह उपलब्धि है, पर आगे चलकर वैसा ही हमें भी करना पड़ता है। अपनी पुत्री दूसरों का घर बसाने के लिए भेजनी पड़ती है। श्रम और समय का प्रतिफल पैसे के रूप में संग्रहित किया जाता है और फिर जब कभी किसी को श्रम या पदार्थ की आवश्यकता होती है तो उस पैसे को देकर आवश्यकतानुरूप पदार्थ या श्रम खरीद लेते हैं। इस प्रकार समूचा लोकजीवन आदान-प्रदान के आधार पर सहयोग, सहकारिता के भरोसे गतिशील है। इसकी आधारशिला तब बनती है जब लेने के लिए बदले में देने के लिए अपने पास कुछ हो। यह उपार्जन परिश्रम, कौशल एवं पुरुषार्थ के सहारे ही अर्जित किया जाता है। उसके लिए यदि आनाकानी की जाय-आलस्य प्रमाद बरता जाय तो खाली हाथ होने की दशा में बदले की कोई वस्तु हस्तगत न हो सकेगी और दरिद्रता, विपन्नता से घिरा रहना पड़ेगा। यही बात सहकार के संबंध में भी है। शरीर यात्रा के लिए जिन वस्तुओं कि आवश्यकता पड़ती है उनमें से अधिकाँश दूसरों द्वारा उत्पादित होती हैं। कोई ऐसा नहीं जो मात्र एकाकी प्रयास से अपनी आवश्यकता पूरी कर सके। अन्न, वस्त्र, पुस्तक, माचिस जैसी छोटी-छोटी वस्तुओं के लिए हमें दूसरों पर आश्रित रहना पड़ता है। मिलजुल कर ही सहयोगपूर्वक जीवनचर्या अधिक सुविधा सम्पन्न बनती है। यही प्रचलन है, यही व्यवहार है और यही है उत्कर्ष का विधि-विधान
शरीर हमारा दृश्य मात्र है। दूसरा चेतना अदृश्य पक्ष। इसे प्राण प्रवाह या जीव सत्ता भी कहते हैं। इसकी महिमा और गरिमा असाधारण है शरीर से भी कहीं अधिक। प्राणान्त हो जाने पर शरीर देखते-देखते सड़-गलकर समाप्त हो जाता है, किन्तु आत्मा, बिना स्थूल शरीर, सूक्ष्म और कारण शरीर के भी अपना अस्तित्व बनाये रह सकती है। वह लोक-लोकान्तरों में। भ्रमण करती हुई अपनी सत्ता का परिचय देती रह सकती है। शरीर का जन्म-मरण इसी जीव सत्ता के अधीन है, पर वह शरीर में निवास करती हुई भी उससे अलग है। सराय में मनुष्य ठहरता है फिर उसे छोड़कर आगे चल देता है। कपड़ा पुराना हो जाने पर, पसंद न आने पर उसे भी बदल लिया जाता है। इसी प्रकार आत्मा सीमित अवधि तक शरीर में टिकती है और वह समुह पूरा होने पर छोड़कर चली जाती है इससे प्रकट है कि आत्मा का उद्गम शरीर नहीं, वरन् परमात्मा है। परमात्मा से वह उन विभूतियों को प्राप्त करती है जिसके सहारे मात्र मनुष्य न रहकर महामानव, देवात्मा, सिद्ध पुरुष एवं अंश अवतारी बनता है। पुरुष से पुरुषोत्तम और नर से नारायण स्तर की सफलताएँ प्राप्त करने में सफल होता है। यह इस बात पर निर्भर है कि आत्मा ने परमात्मा के साथ कितनी घनिष्ठता जोड़ी और कितनी एकात्मता प्राप्त की।
आत्मा चेतन है। उसका सहधर्मी महाचेतन है, जो इस निखिल विश्व-ब्रह्माण्ड में समाया हुआ है। उसमें उच्चस्तरीय विभूतियाँ और दिव्य सिद्धि ही भरी पड़ी हैं। विकृतियाँ तो लोक जीवन की देन हैं। उसकी सड़न से पाप, दोष उत्पन्न होते हैं। परमात्मा तो सत्-आनंद स्वरूप है उन्हें निराकार, निर्विकार, न्यायकारी भी कहा जा सकता है। उसके साथ घनिष्ठता स्थापित करने के लिए हमारी पवित्रता एवं प्रामाणिकता बढ़ी-बढ़ी होनी चाहिए। दूध में शक्कर घुल सकती है, बालू नहीं। इस प्रकार परमात्मा के साथ तादात्म्य भाव वे ही स्थापित कर सकते हैं जिनमें बहिरंग में उत्कृष्टता, चिन्तन में आदर्श और चरित्र में सज्जनोचित व्यवहार का समावेश है।
ईश्वर का अंश इतनी सीमित मात्रा में सभी के अंदर है जिसके सहारे वह शरीरचर्या चला सके। उसके लिए आवश्यक साधन जुटा कर सुखपूर्वक रह सके, किन्तु यदि ऊँचा उठना, आगे बढ़ना है तो उसका एक ही उपाय है कि भावनात्मक दृष्टि से ईश्वर के प्रति अपना समर्पण किया जाय। द्वैत मिटाकर अद्वैत की स्थिति तक पहुँचा जाय। नाले का नदी में विसर्जित हो जाने की तरह अपनी चेतना को इस स्तर तक विकसित किया जाय कि भेदभाव की गुँजाइश ही न रहे। ईश्वर के आदेश ही अपने मनोरथ बन जाय । ईश्वर जैसा परमार्थ-परायण बनने में हमारी प्रवृत्ति हो। शरीर के साथ रहते-रहते लोक प्रचलनों में ढलते-ढलते जो दुष्प्रवृत्तियाँ अपने में समा गई हैं अनेकों निरस्त-परास्त किया जाय। इसके लिए संयम की, तपश्चर्या और उत्कृष्ट चिन्तन में निमग्न रहने की योग साधना का आश्रय लेना पड़ता है।
ईश्वर से क्या माँगें? क्या प्रार्थना करें? क्या चाहें? क्या आशा रखें? इस संदर्भ में अपनी मनोभूमि को सुनियोजित कर लेना चाहिये। दृष्टिकोण को ‘परिष्कृत कर लेना चाहिए। साँसारिक वस्तुएँ ,पुरुषार्थ और पात्रता पर निर्भर हैं। अपनी क्षमता- योग्यता बढ़ायें, तन्मयता-तत्परता बरतें और सत्प्रयोजनों के लिए प्रबल पुरुषार्थ करें? इतने भर से औसत नागरिक स्तर की सभी आवश्यकताएँ पूरी होती रहेंगी। तृष्णाओं, लिप्साओं की पूर्ति के लिए महत्त्वाकाँक्षाएँ गढ़ना और उनकी पूर्ति के लिए ईश्वर की मनुहार, उपहार से ललचाकर उन मनोरथों की पूर्ति के लिए आग्रह करना अनावश्यक है जिनकी वस्तुतः मनुष्य को जरूरत है नहीं। ईश्वर से पवित्रता और पात्रता ही माँगी जा सकती है, उससे उत्कृष्टता और आदर्शवादिता का अनुरोध ही किया जा सकता है, ऐसी ही प्रार्थनाएँ स्वीकृत भी होती हैं।
दार्शनिक सुकरात की पत्नी बड़े कर्कश स्वभाव की थी। घर पर विचार विमर्श के लिए आने वालों की भीड़ लगी रहती थी । यह उन्हें बुरा लगता था। स्वागत तो दूर अतिथियों का समय-समय पर अपमान किया करती थीं।
एक दिन सत्संग बड़ा था उनके घरेलू काम में हर्ज हो रहा था। बौखला गई और छत पर चढ़कर आँगन में बैठी आगन्तुकों को गालियाँ देने लगी और चले जाने का आदेश देने लगी सुकरात के इशारे पर वे लोग बैठे रहे सत्संग चलता रहा।
इस पर पत्नी ने बर्तन माँजने गंदा पानी उन लोगों पर फेंकना शुरू किया और गाली देना भी चालू रखा।
सुकरात ने अपना संतुलन नहीं खोया। सिर्फ हँसते हुए इतना ही कहा देखा आप लोगों ने बादल गरज भी रहे हैं और बरसात भी शुरू कर दी। दूसरे लोग भी हँस पड़े। झगड़े की बात विनोद में बदल गई
किसी भी देश की प्रगति एवं समृद्धि इस बात पर निर्भर करती है कि वहाँ के नागरिकों का स्तर कैसा है। राष्ट्रीय विकास के लिए बनने वाली योजनाओं की अपनी उपयोगिता है पर उनकी सफलता नागरिकों की चरित्र निष्ठ के ऊपर निर्भर करती है। योजनाएँ कितनी भी सशक्त एवं समर्थ क्यों न हों, उनकी सफलता तब तक संदिग्ध बनी रहेगी जब तक व्यक्तियों का नैतिक स्तर गिरा हुआ है। अतः व्यक्तित्व की, समाज एवं देश की स्थायी प्रगति एवं समृद्धि के लिए सर्व प्रथम नैतिक आधारों को सुदृढ़ बनाना आवश्यक हो जाता है। नैतिकता के अंतर्गत वे सारे तत्व समाहित हैं जो व्यक्ति, समाज एवं राष्ट्र के सर्वांगीण विकास में योगदान देते हैं। व्यक्तित्व विकास का मूल आधार यही है।
कोई व्यक्ति अपने काम के प्रति ईमानदार है, पर सामाजिक एवं राष्ट्रीय हितों की उपेक्षा कर रहा है तो उसे नीतिवान, चरित्रवान नहीं कहा जा सकता। नैतिकता समस्त समाज की बात सोचने, सबकी प्रगति के लिए तद्नुरूप आचरण करने का ही पर्याय है, जो व्यक्तिगत परिधि तक सीमित न रहकर सामाजिक एवं राष्ट्रीय प्रेम के रूप में प्रस्फुटित होती है, फलतः समग्र प्रगति का मार्ग प्रशस्त होता है। कर्मठता, सच्चरित्रता, नैतिकता-आदर्शवादिता के आधार पर ही मनुष्य अपनी विशिष्टता-वरिष्ठता सिद्ध करता है। औसत नागरिक की तरह सादगी भरा निर्वाह करना, उत्कृष्ट चिन्तन और आदर्श चरित्र की गौरव गरिमा बनाये रखना, पवित्रता एवं प्रखरता पर आधारित व्यक्तित्व को समर्थ बनाये रखना तथा ऐसी योजना बना कर चलना, जिसका अनुकरण करने वाले ऊँचे उठते आगे बढ़ते रहें यही है मनुष्य की नीति-मर्यादा का सार संक्षेप। इसका जो जितना परिपालन करता है वह उतना ही नीतिवान है।
इस मर्यादा को जो जितना तोड़ता है, काम के प्रति अवमानना बरतता है, सामाजिक दायित्वों की उपेक्षा करता है। कामचोरी-हरामखोरी की प्रवृत्ति एवं अहमन्यता-अन्यमनस्कता से ग्रस्त है। जिसे वासना-तृष्णा के अतिरिक्त कुछ सूझता ही नहीं जिसे संकीर्ण स्वार्थपरता से आगे की लोक मंगल के उत्तरदायित्व निभाने की बात सोचने की फुरसत ही नहीं उसे अनैतिक ही कहना चाहिए। उद्धत अपराधों की तरह संकीर्ण स्वार्थपरता भी तत्त्वदर्शियों द्वारा अनीति ही मानी गई है। अनैतिकता ने आज व्यक्तिगत रुझान एवं सामुदायिक प्रचलन में कितनी गहरी जड़ें जमाई हुई हैं यह तथ्य किसी से भी नहीं छुपा है। इसे उखाड़ने के लिए उतनी ही गहरी खुदाई करने की आवश्यकता पड़ेगी एवं उसके स्थान पर आदर्शवादी मान्यताओं की प्रतिष्ठापना करनी होगी। तभी व्यक्तिगत एवं सामाजिक जीवन में सुख समृद्धि का मार्ग प्रशस्त होगा, राष्ट्रीय चरित्र का विकास होगा।
नैतिकता मनुष्य के व्यक्तिगत आचरण का, राष्ट्रीय चरित्र का अभिन्न अंग कैसे बने? नैतिक अवमूल्यन की खाई कैसे पटे व इस संबंध में मनीषियों नीति शास्त्रियों ने अपने-अपने मत प्रकट किये हैं। “द गेन ऑफ पर्सनालिटी” नामक अपनी पुस्तक में प्रसिद्ध नीति शास्त्री डब्ल्यू .सी. लूसमोर ने लिखा है कि चिन्तन-मनन की उत्कृष्टता के बिना कोई मनुष्य अपने लिए स्थिर नैतिक सिद्धान्त का निर्धारण नहीं कर पाता और समाज की दिशाधारा के प्रवाह में बह जाता है। नैतिक सिद्धान्तों के निश्चय, निर्धारण के लिए ज्ञानार्जन अति आवश्यक है। ज्ञानार्जन के लिए व्यक्ति को चिंतनशील-विवेकशील होना चाहिए। परन्तु चिन्तन जीवन का मात्र सैद्धान्तिक पक्ष है उसका व्यावहारिक पक्ष है-श्रेष्ठ कार्यों के रूप में परिलक्षित होना। विचार मन्थन से जो सिद्धान्त निर्धारित हों उनको सत्यता की कसौटी के लिए व्यवहारिक क्षेत्र में उतारना होता है। उच्च आदर्शों एवं नैतिक सिद्धान्तों का व्यवहार में आना ही नैतिक जीवन है।
सिद्धान्तों के कार्यान्वयन के लिए क्रियाशीलता गतिशीलता नैतिक जीवन की एक अनिवार्य आवश्यकता है। क्रिया और विचार नैतिक जीवन के व्यायाम और संगीत है। संसार के सभी महापुरुष जीवनभर क्रियाशील रहे और अनवरत श्रम साधना करते रहे हैं। कर्मठता, चरित्र निष्ठ, देश प्रेम आदि की भावना उनके जीवन में कूट-कूट कर भरी थी। व्यक्तिवादी संकीर्ण स्वार्थपरतायुक्त एकांगी चिन्तन से सर्वथा ऊँचे उठकर समाज के लोगों से सहानुभूति रखने और उन्हें अपने उत्कृष्ट विचारों एवं श्रेष्ठ व्यवहारों से निरन्तर ऊँचा उठाने का प्रयास करने वाले महामानव ही अपने नैतिक जीवन और आदर्श चरित्र को चरितार्थ करते हैं।
प्रसिद्ध दार्शनिक इमेनुअल काण्ट ने नैतिकता का आधार अन्तः अनुभूति को माना है और इसे ‘अनिवार्य आज्ञा’ की संज्ञा दी है। यह व्यक्ति को उसकी अन्तरात्मा से प्राप्त होती है। अपनी पुस्तक “दि क्रिटिक आफ प्योर रीजन “ में उन्होंने लिखा है कि प्रत्येक व्यक्ति में सदाचरण के लिए तार्किक विचारों से नहीं, वरन् उसके अन्तस्तल से प्रेरणा मिलती है। त्याग-बलिदान के लिए भाव संवेदनाएँ अन्दर से उछलती हैं। मानव स्वभाव दो प्रकार के तत्वों से विनिर्मित है- एक स्वार्थ प्रधान रागात्मक, दूसरा विवेक परक, जो व्यक्ति को नैतिक एवं परमार्थी बनाता है। स्वार्थ प्रधान रागात्मक वृत्ति मनुष्य को विषय-भोगों की ओर ले जाती है, जो अनैतिक आचरण को जन्म देती है। विवेकात्मक तत्व न्यायप्रियता एवं आत्मविकास की ओर अग्रसर करता है। वस्तुतः अन्तरात्मा की ‘अनिवार्य आज्ञा’ अथवा ‘विवेक’ ही मनुष्य की नैतिक उन्नति कराता है। यही वह तत्व है जिससे अनुप्राणित होकर मनुष्य त्याग बलिदान भरे उच्चस्तरीय उदाहरण प्रस्तुत करता और न्याय रक्षा के लिए निजी स्वार्थ न होने पर भी कष्ट झेलने का साहस करता देखा गया है। अन्तरात्मा ही मनुष्य में विराजमान् परमात्मा का प्रतीक प्रतिनिधि है। नैतिक आचरण से उत्पन्न प्रखर मनोबल एवं संकल्प शक्ति के सहारे ही उसकी अनुभूति की जा सकती है। दार्शनिक काण्ट ने वैयक्तिक एवं सामुदायिक जीवन में नैतिक नियमों का, नीति मर्यादाओं का, पालन अनिवार्य माना है। उनके अनुसार नैतिक नियमों में तीन प्रकार की विशेषताएँ है-(1) स्वतंत्र इच्छा शक्ति जो अन्तरात्मा की आवाज पर निर्भर है (2) सभी के लिए समान रूप से उपयोगी सबके द्वारा आचरण में लाने योग्य व्यापक दर्शन एवं (3) मानव मात्र के हित का लक्ष्य। महानता इसी आधार पर अर्जित की जाती है। नैतिक नियमों का निर्धारण विवेकशीलता के आधार पर ही कर सकना संभव होता है उचित-अनुचित नीति-अनीति सत् असत् धर्म-अधर्म आदि का निर्णय कर सकना इसी आधार पर संभव होता है।
प्रायः व्यक्ति की अन्तरात्मा यही प्रेरणा देती है कि वह मात्र अपने हित के लिए ही नहीं, वरन् मानव मात्र के कल्याण के लिए कार्य करे। अतः प्रत्येक व्यक्ति के लिए सबसे प्रथम और बड़ी नैतिकता वही है, जिससे लोक-कल्याण और लोकमंगल सधे। बुद्ध, गाँधी, विवेकानन्द एवं अन्य भारतीय ऋषियों ने इसी को सर्वोत्तम नैतिक नियम बताया है और कहा है कि महानता का राजमार्ग यही है। इंग्लैण्ड के प्रख्यात नीतिशास्त्री ब्रेडले के शब्दों में-मनुष्य अपने उदात्त व्यक्तित्व को समाज में जितना अधिक घुला-मिला लेता है, उतना ही अधिक उसको नैतिक रूप से विकसित मानना चाहिए।” यथार्थ में सामाजिक एवं राष्ट्रीय हित से पृथक् मनुष्य की नैतिकता का मूल्य एवं उपयोगिता नगण्य है।
नाम था शेरसिंह। अपनी बहादुरी की डींगें भी बहुत हाँका करते थे। एक दिन उनके मन में विचार आया भुजा पर शेर का चित्र गुदा लेने का। गोदने वाले को बुलाया और हाथ आगे कर दिया।
गोदने वाले ने सुई चुभोना आरंभ किया तो दर्द से उनका बेहाल हो गया। बोले-अभी तो पूँछ बना रहे हो, इसे छोड़ दो बिना पूँछ के भी तो जानवर होता है। उसने कमर, गरदन, मुँह आदि बनाने के जैसे-जैसे क्रम चलाये, वैसे-वैसे हर स्थान पर वे पीड़ा अनुभव करते रहे और गोदने वाले को रोकते रहे।
जो गुद चुका था वह बेतुका था। उसमें अस्त-व्यस्त अंगों का उभार था। शेरसिंह ने उतने भर से संतोष कर लिया और काम समाप्त कराते हुए बोले-मेरा नाम और रौब ही बहुत है। उसी से काम चल जायेगा। जो थोड़े बहुत निशान बन गये हैं उनसे भी मेरे शेरपन की पुष्टि होती रहेगी।
दुर्बल मन वाले ऐसी ही डींगे हाँकते रहते हैं । समय आने पर किसी प्रकार जान छुड़ाते हैं।
प्रकृति की लीला कितनी विचित्र और विलक्षण है, इसे मानवी बुद्धि अभी पूर्णतः समझ नहीं पायी है। इस प्रकार की न जाने कितनी अनबूझ पहेलियाँ उसके गर्भ में छिपी पड़ी हैं, जिन्हें शायद अब तक पूरी तरह खोजा भी नहीं जा सका है। कदाचित् आगामी समय में इन्हें खोज भी लिया जाय, तो इनके रहस्यों का पता लगा पाना सामान्य बुद्धि के लिए कठिन ही नहीं, असंभव भी है, क्योंकि सामान्य बुद्धि सदा विज्ञान का सहारा लेती है और विज्ञान की पहुँच मात्र स्थूल जगत तक सीमित है, वह कार्य का स्थूल कारण ही बता सकता है, किन्तु जहाँ कारण सूक्ष्म हो, वहाँ विज्ञान का अवलम्बन निराशाजनक ही सिद्ध होगा । इसके लिए प्रज्ञा स्तर की बुद्धि चाहिए। वही उनका सही और समुचित कारण ढूँढ़ सकती है। आये दिन देखे जाने वाले अजीबोगरीब प्राकृतिक कारनामे अपने रहस्य अनावरण के लिए इसी स्तर की बुद्धि की माँग करते हैं और आशा रखते हैं कि अगले ही दिनों मनुष्य इन्हें समझने में सफल हो सकेगा।
काँगो नदी के पूर्वी तट पर, तट के 5 किलो मीटर दूर एक सघन वन है। उसमें एक छोटी सी गुफा है। गुफा का प्रवेश द्वार इतना छोटा है कि कोई व्यक्ति यदि उसके अन्दर जाना चाहे, तो खड़ा-खड़ा प्रविष्ट नहीं हो सकता। व्यक्ति के झुकने से भी काम नहीं चलता। भीतर जाने के लिए घुटने के बल पर हाथों का सहारा लेकर चलना पड़ता है, तभी उसमें प्रवेश पा सकना संभव है। अन्दर धीरे-धीरे कन्दरा चौड़ी और बड़ी होती चली गई है। कन्दरा के मुख से करीब 30 कदम अन्दर उसकी दायीं दीवार में एक पत्थर की कील जैसी संरचना उभरी हुई है। यदि कोई व्यक्ति उसे छू दे तो दीवार फटने जैसी आवाज अन्दर गूँजने लगती है। यह आवाज ठीक पाँच सेकेण्ड तक होती है, तदुपरान्त वह स्वतः बन्द हो जाती है, भले ही व्यक्ति पत्थर की कील दबाये ही क्यों न रहे। कई बार इस समय में। व्यतिरेक होता देखा गया है। अनेक बार ध्वनि 8-10 सेकेण्ड तक होती रहती है, पर अधिकाँश अवसरों पर यह ठीक पाँच सेकेण्ड बाद बन्द हो जाती है। दुबारा ध्वनि तभी उत्पन्न होती है, जब उसे छोड़ने के पश्चात् पुनः दबाया जाय। विश्व के अनेक वैज्ञानिक दल उस रहस्यमय ध्वनि को जानने समझने के लिए कई बार उस गुफा की यात्रा कर चुके हैं, पर गुत्थी को सुलझाने में वे अब तक विफल रहे हैं।
अमेरिका में “क्रेटर लेक” नामक एक विशाल झील है। इसके मध्य में “विजार्ड आइलैण्ड” नाम का एक छोटा सा टापू है, जो संभवतः कभी किसी ज्वालामुखी के फटने के कारण झील के मध्य उभर आया हो, विशेषज्ञों को इस संबंध में ऐसा ही अनुमान है। इस छोटे-से द्वीप में एक बड़ा ही अनूठा वृक्ष है। प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि अरुणोदय होते ही यह पेड़ पूरब की दिशा में सूर्य की ओर कुछ प्रणत हो जाता है, मानो नवविहान के आगमन पर सविता देव का अभिवादन कर रहा है। कहते हैं कि दोपहर होते-होते यह पुनः पूर्व स्थिति में ठीक उग्र रूप से खड़ा हो जाता है। वनस्पति-शास्त्रियों के लिए आज भी उक्त पेड़ का यह अनोखा करतब चुनौतीपूर्ण बना हुआ है।
प्रकृति का एक कौतुकपूर्ण दृश्य हमें तब देखने को मिलता है जब हम साइबेरिया में स्थित “वेली ऑफ” नामक तंग घाटी की यात्रा करते हैं। सन् 1941 तक इस फव्वारे की घाटी का किसी को पता ना था, किन्तु इसके उपरान्त यहाँ लगभग 20 ऐसे गीजरों का पता चला हैं, जो अपनी रंग-बिरंगी छटा से दर्शकों का मन मोह लेते हैं। इन फव्वारों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि ये 10 मिनट से लेकर 6 घंटे तक के नियमित अन्तराल में छूटते रहते हैं। इनकी नियमितता इतनी सुनियोजित और अटल है, जिसे देख दाँतों तले उँगली दबानी पड़ती है। जो गीजर 10 मिनट की अवधि में निःसृत होते हैं, वह सदा दस-दस मिनट पर छूटते ही रहते हैं। ऐसी ही नियमितता अन्यों के साथ भी देखी जा सकती है। वहाँ का सबसे बड़ा फव्वारा, जिसे “फर्स्ट बोर्न” का नाम दिया गया है, हर घंटे पर विभिन्न रंग के फुहारों के साथ जमीन से निकलता रहता है। यह जल के 40 फुट ऊँचे स्तम्भ का निर्माण करता है और इनसे छिटकने वाली फुहारों की ऊँचाई पाँच सौ फुट तक चली जाती है। पूरी घाटी में इन गीजरों के छूटने और मिटने का क्रम बड़े लयबद्ध ढंग से होता रहता है। पश्चिमी ईरान की जागरण पहाड़ियों में भूमिगत एक ऐसी विशाल गुफा है, जिसमें प्रवेश करने पर अनेक ऊँचे-ऊँचे व मोटे पाषाण स्तम्भ दिखाई पड़ते हैं। इन स्तम्भों को देखने के उपरान्त यह स्वीकार कर पाना मुश्किल हो जाता है, कि यह मानवीकृत न होकर प्रकृति की कुशल कारीगरी का नमूना है। इनकी सुगढ़ता किसी भी वास्तुकार को चुनौती देने के लिए पर्याप्त है। इस “धार पराऊ” कन्दरा में सबसे ऊँचे प्रस्तर स्तम्भ का नाम खोजी दल ने “शहंशाह” रखा। इसकी ऊँचाई 138 फुट है। इस प्रकार के और भी अनेक स्तम्भ वहाँ हैं, पर ऊँचाई में सब इससे कम हैं। संभवतः इसी कारण अन्वेषणकर्ताओं ने इसका नाम “शहंशाह” अथवा “सम्राट” रख दिया।
मनुष्य यदि वास्तुशिल्प का कोई आकर्षक और उत्कृष्ट नमूना प्रस्तुत करे, तो इसमें आश्चर्य जैसी कोई बात नहीं है, क्योंकि वह सृष्टि का सबसे बुद्धिमान और कार्यकुशल प्राणी है, किन्तु यदि प्रकृति ऐसे उदाहरण प्रस्तुत करती है, तो निश्चय ही यह अचम्भे की बात है। ऐसा ही एक अचम्भा उत्तरी आयरलैण्ड के काउण्टी एण्ट्री समुद्री तट पर स्थित है। इसे देखने से प्रथम दृष्टि में ऐसा प्रतीत होता है कि उक्त संरचना किसी प्राचीन सभ्यता द्वारा निर्मित वास्तुकला का सर्वोत्तम प्रतिमान है, पर पुरातत्व वक्ताओं का कहना है कि यह कोई मानवीकृत निर्माण नहीं है, वरन् निसर्ग की कुशल इंजीनियरिंग का एक अच्छा प्रमाण है। गवेषण करने वालों ने इसका नाम “जाइण्ट्स काउज वे” अर्थात् “दैत्यों का पक्का मार्ग” रखा है। यह 40 हजार बहुकोणीय पाषाण-स्तम्भों की एक विशाल और विस्तृत संरचना है। इस सीढ़ीनुमा संरचना के तीन खण्ड हैं-निम्न मध्य और ऊपरी। यह मध्य खण्ड ही है, जिसकी सुगढ़ता को देखकर खोजियों को आरंभ में इसे किसी सुविकसित प्राचीन सभ्यता की कोई संरचना का भग्नावशेष होने का भ्रम हुआ था, क्योंकि इस हिस्से के प्रस्तर स्तम्भों में इतने उच्चस्तर की शिल्प-कला का प्रदर्शन देखने को मिलता है, जिससे कुछ क्षण के लिए इसके प्रकृतिगत होने के विश्वास कर पाना मुश्किल हो जाता है। इस भाग के सारे स्तम्भ पूर्णतः षट्कोणीय हैं, अन्तर सिर्फ इतना है कि वे सभी एक ही व्यास के पाषाण-खण्ड न होकर उनका विस्तार 15-20 इंच व्यास तक है, किन्तु यहाँ भी बुद्धिमत्ता और सुगढ़ता की बानगी देखने योग्य है। मध्य का निचला हिस्सा 15 इंच व्यास वाले स्तम्भों से शुरू होकर धीरे-धीरे ऊपर की ओर व्यास बढ़ते-बढ़ते इस खण्ड के शीर्ष पर अधिकतम 20 इंच तक पहुँच गया है। इस प्रकार इस खण्ड को देखने से ऐसा मालूम होता है, जैसे कोई कुशल कलाकार ने बड़ी बारीकी से पत्थर के इन शैल-खण्डों को सुरुचिपूर्ण ढंग से परस्पर सटा-सटा कर फिट किया हो।
जब किसी घाटी पर किसी मनुष्य अथवा अन्य प्राणी के पहुँच जाने पर अचानक ही जोरदार धमाका हो उठे, तो इसे क्या कहा जाय? प्रकृति की कौतुकपूर्ण लीला? आश्चर्य? या कोई ऐसा अपकर्म, जिसके द्वारा वह मानव अथवा मानवेत्तर प्राणियों को अपने निकट न पहुँचाने देने की चेतावनी देती हो? कदाचित ऐसा ही हो, क्योंकि अब तक रियोडीला पाज की घाटी में घटने वाली इस अनूठी घटना का रहस्योद्घाटन करने में वैज्ञानिक और प्रकृतिवादी सर्वथा असमर्थ रहे हैं। वस्तुतः यह घाटी बोलिविया में लापाज नदी के तट पर हिमाच्छादित एण्डीस पर्वत के किनारे स्थित है और पूर्णतः मिट्टी की बनी विचित्र भूलभुलैया जैसी संरचना है। जब कभी कोई जीवधारी भूलवश इसके निकट आ पहुँचता है तो तोप जैसी धड़ाके के साथ भयंकर गर्जना होती है और इसी के साथ धूल का एक गुब्बारा वायुमंडल में छा जाता है, जिससे थोड़े समय तक वहाँ कुछ भी दिखाई नहीं पड़ता। आये दिन लोग प्रकृति के इस रहस्यमय करतब को छेड़ने और देखने के लिए घाटी के आस-पास आते ही रहते हैं। तोज जैसी इसकी गगनभेदी ध्वनि के कारण ही वह स्थानीय क्षेत्र में “ग्रेण्ड कैनन ऑफ दि ग्रेण्ड केनाइन” अर्थात् “भव्य घाटी का भव्य धमाका “ के नाम से लोकप्रिय हो गई है।
भगवान ने मनुष्य को जानने समझने की बुद्धि दी है। उसके द्वारा कई अवसरों पर वह ऐसी पहेलियों को सुलझा भी लेता है, जो आरंभ में जटिल गुत्थी जान पड़ती हैं, पर हर बार वह ऐसा कर ही लेगा, इसे दावे के साथ नहीं कहा जा सकता। अनेक मौकों पर स्थूल क्रिया के मूल में कारण स्थूल न होकर सूक्ष्म होते हैं। इन कारणों को सूक्ष्म बुद्धि द्वारा ही समझा जा सकता है। सूक्ष्म बुद्धि अध्यात्म-अवलम्बन के बिना संभव नहीं। अतः यदि मनुष्य को सृष्टि की इन रहस्यमय गुत्थियों का उत्तर पाना है, तो अध्यात्म का आश्रय लेना ही पड़ेगा। इससे कम में काम चलने वाला नहीं। यदि मनुष्य आगामी सदी में प्रज्ञा-बुद्धि विकसित कर ले और अब तक के अनुत्तरित प्रश्नों का उत्तर ढूँढ़ ले, तो हमें कोई आश्चर्य नहीं करना चाहिए।
बड़प्पन के शिखरों की मोहकता की ओर प्रायः सभी ललचाई नजरों से देखते हैं। सभी उस पर आसीन होना चाहते हैं, परन्तु कैसे? मार्ग नहीं सूझ पड़ता। विचारपूर्ण दृष्टि से देखें, तो अणु से विभु, लघु से महान बनने की चाहत बुरी नहीं है। अपूर्णता को हटाते हुए पूर्णता की ओर बढ़ते कदम अन्तरतम् की उच्चस्तर अभीप्सा के द्योतक हैं। बड़ा कहलाने, बड़ा बनने, विकसित होने, प्रगति करने की अभिलाषा से प्रेरित होकर व्यक्ति नाना विधि प्रयत्न करता है। शारीरिक क्षुधा की पूर्ति के अतिरिक्त अधिकाँश लोगों की शेष सभी क्रियाएँ प्रायः इसी को उपलब्ध करने के उद्देश्य से होती है।
किन्तु अभीप्सा के बाद भी अभीप्सित का न मिलना यह सिद्ध करता है कि क्रियापद्धति में कहीं न कहीं गड़बड़ी हुई, मार्ग तय करने में कहीं भटक गए कोई-न-कोई भूलभुलैया आ पड़ी, आमतौर से सोचा यह जाता है कि जिसका ठाट-बाट जितना बड़ा है, वह उसी अनुपात में बड़ा है। मोटर, कोठी, सोना, जायदाद, कारबार, सत्ता पद आदि के अनुसार किसी को बड़ा मानने का प्रायः सामान्य रिवाज चल पड़ा है। इससे प्रतीत होता है कि लोग मनुष्य के व्यक्तित्व को नहीं, उसकी दौलत को बड़ा माना जाना चाहिए, जिनके पास किसी बड़े किले से अधिक पत्थर होता है। धातुओं की खान भी बहुत अधिक मूल्यवान होती है, फिर उसे ही क्यों न महान मान लिया जाय? धनी होना कोई बुरी बात नहीं है। उससे कई सुविधाएँ मिलती हैं, प्रसन्नता देने वाली परिस्थितियाँ प्राप्त होती हैं, परन्तु बड़प्पन की प्रामाणिकता इतने भर से नहीं सिद्ध हो जाती। इसका वास्तविक संबंध व्यक्तित्व से है। गरीब घरों में उत्पन्न हुए लोग भी बड़े होते हैं। धन का अभाव किसी की महत्ता को कुण्ठित नहीं कर सकता। स्वेच्छापूर्वक गरीबी वरण करने वाले महावीर, पुरुषोत्तम टण्डन, महात्मा बुद्ध को क्या तुच्छ समझ जाएगा?
मनःशास्त्री पिकानस जस्टिन “साइकोलॉजी ऑफ ह्युमन डेवलपमेण्ट” में इसे व्यक्तित्व विकास की एक अवस्था बतलाते हैं। उनके अनुसार उदारता और दूरदर्शिता का नाम ही बड़प्पन है। जो जितना उदार है, वह उतना ही बड़ा माना जाएगा। जिसकी भावना, आकांक्षा और विचारधारा ऊँची होगी, जो आदर्शवाद के प्रति जितनी गहरी आस्था रखता होगा, उसकी कृतियाँ श्रेष्ठ पुरुषों जैसी होंगी। सज्जन व्यक्ति ऊँचे काम करते और ऊँचे स्तर की बात सोचते हैं, जिससे मानवता कलंकित न हो। जिससे व्यक्तित्व का मूल्य घटे, ऐसे काम वे कितना ही कष्ट आने या दूसरों के द्वारा ही परेशान किए जाने पर भी करने को तैयार नहीं होते। यों सुविधा के समय हर कोई बड़ी-बड़ी बातें कर सकता है, पर परीक्षा की घड़ी आने पर ही यह पता चलता है कि कौन उदार, कौन अनुदार है- कौन छोटा, कौन बड़ा है।
मानव मन के मर्मज्ञ सी. जेम्स कोलमैन ने “पर्सनालिटी डायनमिक्स एण्ड इफेक्टिव बिहेवियर” में इसकी कसौटी प्रभावी व्यवहार को माना है। बच्चों का व्यवहार विचित्र अव्यवस्थित रहने पर प्रायः उपेक्षणीय ही रहता है। इसका कारण उनकी ना समझी को माना जाता है। उनके इस व्यवहार पर अभिभावक खिन्न होने, क्षोभ व्यक्त करने की जगह, उन्हें शिष्ट-शालीन व्यवहार के लिए प्रशिक्षित करते हैं। बड़े आदमी वे जिनके दिल और दिमाग दोनों बड़े हैं। ये ओछे लोगों की छोटी हरकतों से उद्विग्न नहीं होते। गलती को सुधारने का प्रयत्न करते हुए भी उनका मानसिक सन्तुलन नहीं बिगड़ता। ऐसों का प्रमुख चिन्ह यह है कि घटनाओं और व्यक्तियों में किसी से भी उद्विग्न न होना। धीरज उसके हाथ से छूटता नहीं। शोक संताप की घड़ियों में भी यह अविचलित बना रहता है।
व्यक्तित्व की इस अवस्था को पाने के लिए आवश्यक है अपने भीतर की हलचलों, बाहर की गतिविधियों को बारीकी से देखा जाय एवं उसका समुचित विवेचन-विश्लेषण किया जाय, पर ऐसा कर पाना तभी सम्भव है, जब हमारे बड़प्पन का मापदण्ड सस्ती वाहवाही पाना न हो, वरन् स्वयं ऊँचा उठना और दूसरों को आगे बढ़ाना हो । माप तोल के पैमाना, बाटों के गलत रहने पर किसी वस्तु की यथार्थता नहीं -जा सकती। कसौटी ही यदि त्रुटि पूर्ण हो तो - विकटता से अवगत हो सकना भला कैसे सम्भव हो पड़ेगा। ऐसी स्थिति में प्रथम और अनिवार्य आवश्यकता है कि तत्संबंधी मानकों को एक बार दिया जाय, गल्तियाँ सुधारी जाय । मन में यह बात गहराई से जमायी जाय कि बड़प्पन बाहर नहीं, भीतर की वस्तु है। इसकी प्राप्ति बाहरी ठाट-बाट से नहीं, वरन् दिल और दिमाग को थोड़ा उदार, सेवाभावी, परोपकारी बना कर ही की जा सकती है।
ऐसी समझ जग पड़ने पर स्वयं की कमियाँ न केवल दिखेंगी, वरन् खटकेंगी भी। बार-बार मन कचोटेगा कि इन्हें जल्दी-से-जल्दी कैसे दूर करें। फिर व्यक्तित्व का भोंड़ापन न प्रिय लगेगा न उपयुक्त। इस तरह आत्मविश्लेषण आत्मसुधार की सींकों से बनी बुहारी लेकर व्यक्तित्व के परिसर झाड़-पोंछ कर फेंकने में ही भलाई सूझेगी।
सामान्य स्थिति में इस तरह की सफाई का कार्य श्रमसाध्य और दुष्कर प्राय है। काफी कष्ट सहने के बाद भी अधूरापन बना है रहता है, पर मानवीय इतिहास में कभी-कभी ऐसे अद्भुत क्षण आते हैं जब सुधार की आँधी उमड़ पड़ती है और उड़ा ले जाती है, दुर्गुणों की दुर्गन्ध और बुराइयों के कूड़े कचरे को। इन क्षणों में करना सिर्फ इतना होता है कि स्वयं को उस आन्दोलन के तूफान में झोंक दे और कठपुतली की भाँति सब कुछ करते चले जाय, जिसकी प्रकाश-प्रेरणा दी जा रही है। इससे आगे का कार्य बाजीगर अथवा सूत्रधार का होता है वह अपनी जिम्मेदारी समझते हुए उसे वह सब कुछ प्रदान करता है, जिसके कारण नरेन्द्र नामक सामान्य सा युवक विवेकानन्द बन सका, मूलशंकर दयानन्द बन सका वास्तविक बड़प्पन इसी में है।
एक लम्बे अर्से के बाद मानव को आज इन्हीं सौभाग्यशाली क्षणों में जीने का अवसर मिला है। ठीक वही अलभ्य मौका, जिसे पहचान कर अनेकों सामान्यजन बुद्ध के साथ चलकर असामान्य, असाधारण महामानव बन सके थे। इस स्वर्णिम अवसर को यों ही न निकलने दें । स्वयं असमंजस अथवा ऊहापोह में न रख कर आ मिलें प्रस्तुत सृजन के तूफान में, जो मानवीय जीवन को, और युग को एक बार पुनः गरिमामयी बनाने के लिए प्रतिबद्ध है। यदि हम ऐसा करने के लिए कटिबद्ध हो सकें, तो बड़प्पन का सच्चा उपहार मिले बिना न रहेगा।
प्रभो मुझे प्रेम के बीज बोने दो। भगवान दया करके मुझे वह शक्ति दे कि किसी, को मेरी सांत्वना की आवश्यकता ही न पड़े। लोग मुझे समझें, इसके बजाय मैं ही उनको समझूँ। लोग मुझे प्यार करें, इसके पहले मैं ही उन्हें प्यार करने लग जाऊँ। हमें वही मिलता है जो दिया जाता है। क्षमा करने से ही मनुष्य क्षमा का पात्र बनता है। अपने को उत्सर्ग करने से ही नित्य जीवन मिलता है।
“मुझे प्रेम का बीज बोने दो-” शीर्षक से विख्यात सन्त फ्राँसीसी की इस प्रार्थना में न केवल ईसाई धर्म का, वरन् समग्र धर्म और अध्यात्म का सार निहित है। इसी ग्रंथ में एक और प्रार्थना इस प्रकार है-
हे प्रभु मुझे अपनी शान्ति का यंत्र बना। जहाँ घृणा है वहाँ मैं प्रेम ला सकूँ ॥
जहाँ आक्रमण है वहाँ मैं क्षमा ला सकूँ । जहाँ मतभेद है वहाँ मैं मिलाप ला सकूँ ॥
जहाँ भूल है वहाँ मैं सचाई ला सकूँ । जहाँ सन्देह है वहाँ मैं विश्वास ला सकूँ ॥
जहाँ निराशा है वहाँ मैं आशा ला सकूँ । जहाँ अन्धकार है वहाँ मैं प्रकाश ला सकूँ ॥
जहाँ उदासी है वहाँ मैं प्रस मैं प्रसन्नता ला सकूँ । यहाँ प्रभु से-ईश्वर से जो चाहा गया है वह
सच्चे समर्पण की कुँजी है। यही प्रार्थना आदर्शों के प्रति अपने को सच्चा भक्त बनाती है और अपनी जीवनचर्या से अन्य अनेकों का मार्गदर्शन करती है। हमारे अन्तराल में भी प्रार्थना के यही भाव गुँजायमान हों ।
किसी ग्रह नक्षत्र की उलटी पुलटी छाया पड़ने पर पृथ्वी के एक क्षेत्र की स्थिति अजीब हो जाती है। वहाँ दिन में अँधेरा छाया रहता है, जिससे अच्छी खासी आँखों से भी कुछ दिख सकना सम्भव नहीं होता।
उन्हीं आँखों से रात्रि में देखा जाय तो काम चलाऊ प्रकाश अपने आप उत्पन्न हो जाता है और लोग बिना दीपक के भी सामान्य काम काज भली प्रकार करने लगते है? प्रकाश तभी जलाते हैं जब तेज रोशनी के बिना कोई काम रुकता है।
“महेश्वर की जय” महामंत्री ने प्रवेश किया। किसी प्रकार मिहिरकुल का क्रोध शान्त न हुआ तो किसी भी दिन उसका मस्तक धड़ से अलग कर देने की आज्ञा दे बैठेगा। कोई उपाय होना चाहिए मिहिरकुल के मन की दिशा बदलने का। हूण-महामंत्री ने उपाय सोच लिया है, बड़े परिश्रम से साधन सफल करके वे स्वीकृति लेने आए हैं। हाथ जोड़कर बड़ी नम्रता से उन्होंने “कश्मीर विश्व की सौंदर्य भूमि है। श्रीमान की सेवा में इस सौंदर्य भूमि की सर्वश्रेष्ठ सुन्दरियाँ ”।
‘क्या बकते हो? वह चिल्लाया गन्दी नाली के कीड़ों के साथ तुम मिहिरकुल की गिनती करना चाहते हो? उसने इतने जोर से घूँसा पटक दिया कि सामने रखी हाथी-दाँत की रत्न-जटिल चौकी टूट गयी। ‘मैं’। महामंत्री थर-थर काँपने लगे। उनके मुख से शब्द नहीं निकल पा रहा था।
‘फूलों से खेलना बच्चों का काम है और फूलों को खाकर नष्ट कर देना गन्दे कीड़ों का काम।’ मिहिरकुल गम्भीर बना बोल रहा था-तुमने कभी मुझे विलासी देखा है? मैं महेश्वर का आराधक प्रलयंकर महारुद्र का दास। ध्वंस-विनाश मेरी उपासना है। भव्य नगरों के खण्डहर मेरा यशगान करते हैं। मैं महेश्वर के श्रीअंग में जनपदों को श्मशान करके उनकी विभूति अर्पित करने की महती कामना हृदय में सेवित करता हूँ। वीणा की पिन-पिन और छुई-मुई लड़कियों की चें, चें, पें, पें मेरा मनोरंजन करेंगी? मेरा मनोरंजन?”
“श्रीमान !” जैसे मन्त्र प्रेरित कोई कार्य हो रहा हो उसकी दैत्याकार भयंकर आकृति। उपसचिव हाथ जोड़े कक्ष में आ खड़ा हुआ। केवल नेत्रों के संकेत से ही उसे अपनी बात कह देने की आज्ञा मिल गई। उसने निवेदन किया-सामने के शिखर पर पूरे सत्ताईस महागज चढ़ाए जा चुके हैं। नीचे जनसमूह श्रीमान की प्रतीक्षा कर रहा है।”
ठीक। “मिहिरकुल उठ खड़ा हुआ।” मन्त्री श्रेष्ठ! मेरे मनोरंजन से यदि आपका मनोरंजन हो सके तो साथ चल सकते हैं।
उसका मनोरंजन-कदाचित ही संसार में कोई इतना क्रूर आयोजन कभी करें। एक पर्वत की एक दिशा मिट्टी एकत्र करके ढालू बना दी गयी है और उस ढाल के सहारे किसी प्रकार चलते-फिरते पर्वतों जैसे हाथी पर्वत के शिखर पर पहुँचा दिए गए हैं। शिखर पर पहुँचा कर उनकी सूँड़ और पैर जंजीरों से जकड़ दिये गए हैं। बेचारे हाथी हिल तक नहीं सकते।
हृण सैनिकों ने खड्ग उठाकर जयघोष किया और वह उनके मध्य होता हुआ आगे आ खड़ा हुआ। उसे तड़क-भड़क स्वीकार नहीं। साज-सज्जा वह सदा अनावश्यक मानता है। मैदान साधारण स्वच्छ भर किया गया था। दोनों पैर फैलाकर दोनों हाथ कमर पर रख कर वह खड़ा हो गया पर्वत शिखर की ओर मुख करके।
शिखर पर हृण सैनिकों ने मोटे-मोटे लट्ठों के सहारे एक हाथी को धक्का दिया। बेचारा हाथी गिरा और लुढ़क पड़ा। चिंघाड़ मारता पर्वत से गिरिश्रृंग के समान लुढ़क चला वह दीर्घकाल गज। उसकी क्षण-क्षण बढ़ती करुण चिंघाड़-माँस रक्त भेद का लुढ़कता लोथड़ा और हा-हा करके अट्टहास करके नीचे उसे देख-देख वह प्रसन्न हो रहा था।
एक, दो, तीन-एक के बाद एक हाथी लुढ़काना जा रहा है। नीचे सैनिकों तक के भाल पर पसीने की बूँदें छलछला आयीं, उनके पैर काँपने लगे। थक-घबराकर सबने आँखें बन्द कर लीं। किन्तु मिहिरकुल वह क्या मनुष्य है? वह तो पिशाच है पिशाच। चल रहा था उसका पैशाचिक मनोरंजन। उच्च स्वर से वह बार-बार पुकार रहा था-एक और एक और लुढ़कने दो।
“श्रीमान ! सहसा प्रधान सेनापति घोड़ा दौड़ता हुआ आया। पसीने से लथपथ हाँफते हुए अस्त-व्यस्त सेनापति ने मर्यादानुसार ‘महेश्वर की जय’ का जो जयघोष किया वह भी थके व्याकुल कण्ठ से और घोड़े से कूद कर उसके पास आ खड़ा हुआ।
रुको दो क्षण ! वह अपने मनोरंजन में बाधा नहीं देना चाहता था। उसने सेनापति की ओर देखा तक नहीं।
“श्रीमान समय नहीं!” “सेनापति ने आतुरता से कहा-यशोवर्मा की अपार सेना ने चारों ओर नगर घेर लिया है। अपने सैनिक गिरते जा रहे हैं।”
“यशोवर्मा! चौंककर वह घूम पड़ा “ “कहाँ है यशोवर्मा?” ठीक कहाँ है यह कैसे कहा जा सकता है? लगता है कि नगर के सभी मोर्चों पर वही है । हूण सेनापति ठीक कह रहा था । यशोवर्मा का अश्व इतनी त्वरा से अपनी सेना के समस्त अग्रिम मोर्चों पर घूम रहा था कि स्वयं उसके सैनिक समझते थे कि उनका प्रधान सेनापति उनकी टुकड़ी के साथ है । हूण सेनापति इससे और भी अस्त-व्यस्त हो उठा था । उसने कहा “बहुत सम्भव है-कुछ क्षणों में वह यहीं दिखाई पड़े । इस पर्वत पर होकर ही निकल जाने का मार्ग रहा है ।”
“जय महाकाल" दिशाएँ गूँज रही थीं । नगरद्वार लगता था टूट चुके थे । कोलाहल पास आता जा रहा था । उसके लिए भाग जाने को छोड़कर दूसरा कोई मार्ग नहीं रहा था ।
पर्वत के मार्ग से वन-वन भटकना जैसे उसकी नियति हो गई । उसके सैनिकों कि संख्या घटती जा रही थी । कोई भूखों मरता, कोई पर्वत से लुढ़ककर जान गँवा बैठता, किसी को कच्ची हिम में लुप्त हो जाना पड़ता । हूण सैनिक पर्वतीय युद्ध के अभ्यस्त भले हों, हिमालय की शीत-हिम में निरन्तर भटके रहना कहाँ तक सहन कर सकते हैं?
“यशोवर्मा आ रहा है ।” भटकन ने उसके दैत्याकार शरीर को भी दुर्बल बना दिया । वह जिधर भटकता निकला है, जिस दिशा से जनपदों के पास पहुँचना चाहता उसे एक ही समाचार मिलता है -”यशोवर्मा की असंख्य सेना चढ़ी आ रही है ।”
“यशोवर्मा । कश्मीर में, नेपाल में, असम में जिधर जाओ उधर यशोवर्मा और उसकी असंख्य सेना । मिहिरमुल को ठीक समझना मुश्किल था कि कितने यशोवर्मा हैं । कितनी सेना हैं उसकी । जादू के अतिरिक्त यह सब कैसे सम्भव है।
“महाकाल की जय ।” स्वप्न से चौंका मिहिरकुल और उठकर बैठ गया “मैं भी तो उसी महाकाल महेश्वर का उपासक हूँ । क्या अपराध किया है मैंने महाकाल का ? मैंने रुद्र की अर्चना के लिए ही इतने ध्वंस किए और वही प्रलयंकर मुझ से अप्रसन्न होता गया ?”
उसने उठकर हाथ-पैर धोए, आचमन किया और बैठ गया नेत्र बन्द करके महेश्वर । प्रलयंकर महारुद्र । तूने क्यों एक जादूगर मेरे पीछे लगा दिया है ? क्या दोष है मेरी आराधना में ? मैंने कहाँ अपना स्वार्थ सिद्ध किया है ? उस पाषाण जैसे दीखने वाले भीमकाय व्यक्ति की आँखों से भी धाराएँ चल रही थी उस दिन ।
‘जय महाकाल ।’ जब हिम-शिखर अरुणोदय की अरुणिमा लेकर सिंदूरारुढ़ हो रहे थे, ध्यानस्थ मिहिरमुल ने नेत्र खोल दिये । एक गौरवर्ण शस्त्र सज्ज कांतिवान पुरुष उसके सामने खड़ा था । उसने स्थिर भाव से पूछा- “कौन?”
“यशोवर्मा ?” बड़े शान्त स्वर में उत्तर मिला “यशोवर्मा ?” सहसा उसे अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हुआ । हाँ । बहुत छोटा उत्तर था ।
“यशोवर्मा । तब तू मेरे प्राण छोड़ दे ।” उसने दीनता से कहा मैं मानता हूँ “महेश्वर की तुझ पर कृपा है । महेश्वर को छोड़कर किसी के आगे न झुकने वाला सिर तेरे आगे झुकाने के लिए तैयार हूँ ।”
‘तुम महेश्वर को ही मस्तक झुकाओ भाई !’ यशोवर्मा ने उसे हृदय से लगा लिया- ‘मैं तुम्हारे प्राण लेने नहीं आया । तुम्हें महाकाल-महेश्वर का संदेश देने आया हूँ ।-
क्या ? फटे नेत्रों से देखता रह गया वह हूण सम्राट ।
“महेश्वर केवल प्रलय के समय प्रलयंकर होते हैं !” यशोवर्मा शान्त स्वर में कह रहे थे “देखते नहीं” उन महाकाल का सुविस्तृत श्वेत स्वरूप! वे महाकाल आशुतोष शिव हैं । क्रूरता नहीं बन्धु ! सात्विकता उनकी सच्ची सेवा है । ध्वंस नहीं सृजन उनकी अर्चना है । नव निर्माण के लिए प्राणपण से प्रयत्न उनकी उपासना है । उठो ! चीन-हिंद से पश्चिमोत्तर प्रदेश तक का तुम्हारा समस्त प्रदेश तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा है । तुम शक्तिशाली हो महान हो, विश्व को महेश्वर का यह पावन सन्देश दो।
“तुम सचमुच विजयी हो यशोवर्मा !” मिहिरकुल की आँखें भर आयीं । “सचमुच सात्विकता विजयी है । लेकिन मुझे अब राज्य नहीं चाहिए मैं तो महेश्वर की उस उत्तुंग विभु सात्विकता की उपासना करने जा रहा हूँ ।”
सैनिक उस छोटे से पर्वतीय शिविर को घेरे खड़े थे । जब यशोवर्मा बाहर आए-हूण सैनिक उनके पीछे चले आए । स्वयं यशोवर्मा ने मस्तक झुका रखा था । ध्वंस का परित्याग कर सृजन की अभिनव साधना में दीक्षित मिहिरकुल चला रहा था दूसरी ओर हिम श्रेणियों में दूर-दूर और उसकी वह धुँधली छाया नेत्रों में अदृश्य हो गयी।
छाया की प्रतिच्छाया, बिंब, का प्रतिबिंब, ध्वनि की प्रतिबिंब, ध्वनि की प्रतिध्वनि, मैटर का एण्टीमैटर एवं यूनिवर्सल का एण्टीमैटर एवं यूनीवर्स का एण्टीयूनीवर्स अस्तित्व में होते हैं- यह तो सर्वविदित तथ्य है, किन्तु अब ज्ञात हुआ है कि समुद्री जलों और वायु-प्रवाहों में पायी जाती है । यह निसर्ग का शाश्वत नियम है कि जहाँ देव हैं, वहाँ दानव भी रहेंगे-जहाँ विकास है, वहाँ विनाश का ताण्डव नर्तन भी रहेगा-जहाँ सीधा है, वहाँ उल्टा क्रम भी देखने को मिलेगा, इसमें आश्चर्य जैसी काई बात नहीं । परमाणुओं में एलेकट्रन और प्रोटान दो सर्वथा विपरीत प्रकृति के कण साथ होते हैं । ऋतुओं में सर्दी-गर्मी दोनों होती हैं । जहाँ दिन है, वहाँ रात भी होगी ही ।
समुद्री जलों और वायु-स्तरों में विपरीत प्रवाह इसी शृंखला की कड़ी हैं, जो इन्हीं दिनों प्रकाश में आये हैं । अभी कुछ वर्ष पूर्व पोन्स-डी लीयोन नामक स्पेनिश यात्री जहाज से अटलांटिक महासागर में दक्षिण दिशा की ओर यात्रा कर रहा था और हवा भी उसी दिशा में बह रही थी, जहाज में लगे पाल से यह स्पष्ट विदित हो रहा था, किन्तु लीयोन को अचम्भा तब हुआ, जब यह पता चला कि जहाज वास्तव में दक्षिण की ओर नहीं, वरन् उत्तर की दिशा में बढ़ रहा है । इस विलक्षणता की छानबीन करने पर मालूम हुआ कि समुद्र सतह और नीचे के जल-प्रवाह में आश्चर्यजनक विपरीतता है । जाँच-पड़ताल से पाया गया कि नीचे का जल-प्रवाह ऊपर की तुलना में अधिक तीव्र और प्रचण्ड था तथा वह उत्तर की ओर प्रवाहित हो रहा था । चूँकि जहाज का जल के नीचे का भाग इस प्रचण्ड प्रवाह के अंतर्गत आता था, अतः ऊपर का जल-प्रवाह दक्षिण दिशा की ओर बहने के बावजूद भी जहाज निरन्तर उत्तर की ओर बढ़ा जा रहा था । यह फ्लोरिडा-प्रवाह अटलांटिक महासागर में खाड़ी क्षेत्र से प्रारंभ होकर नार्वे तक करीब तीन हजार मील की परिधि में फैला हुआ है । खाड़ी प्रवेश से आरंभ होने के कारण यह “गल्फ स्ट्रीम” के नाम से भी जाना जाता है। इससे पूर्व भी अठारहवीं सदी में जब अमेरिका ब्रिटेन का उपनिवेश था, तब भी व्यापारियों एवं नाविकों को इस अद्भुत प्रवाह के बारे में जानकारी थी । क्योंकि व्यापार के संदर्भ में अथवा व्यापार हेतु जब उन्हें इंग्लैण्ड से अमेरिका की यात्रा करनी होती, तो वे सदा इस “गल्फ स्ट्रीम” नामक प्रवाह से बच कर निकलते, जिससे अमेरिका काफी समय पूर्व पहुँच जाते, जबकि अँग्रेजी सरकार के जहाजों को इसका पता न होने और “गल्फ स्ट्रीम” से होकर यात्रा करने से उन्हें वहाँ पहुँचने में कम-से-कम दो सप्ताह का विलम्ब हो जाता, कारण कि गल्फ स्ट्रीम में प्रचण्ड विपरीत प्रवाह होने के कारण जहाजों की गति वहाँ काफी धीमी हो जाती । बाद में जब इसका पता चला, तो वे भी उस प्रवाह से बच कर निकलने लगे, जिससे समय और ईंधन की काफी बचत होने लगी ।
सन् 1970 में मैक्सिको की खाड़ी से अमरीका के पूर्वी तट तक इस स्ट्रीम का लाभ उठाने से प्रति यात्रा दस हजार डालर ईंधन की बचत होती पायी गई, क्योंकि इस यात्रा में स्ट्रीम का प्रवाह अनुकूल होता था, जिससे जहाजों की गति काफी तेज हो जाती थी और वे निर्धारित समय से पूर्व गन्तव्य पर पहुँच जाते थे । इसी प्रकार मियामी विश्वविद्यालय के ओसनोग्राफी विभाग के विशेषज्ञों ने सन् 1963 में अटलांटिक महासागर में एक अन्य ऐसे ही प्रवाह की खोज की थी।
यह बात नहीं कि सिर्फ अटलांटिक महासागर में ही जल की दो विपरीत धाराएँ साथ-साथ बहती हैं ।
प्रशान्त महासागर में भी ऐसी अनेक धाराएँ देखी गई हैं। इसमें इस तरह की प्रथम घटना का पता सन् 1952 में तब चला, जब अमेरिकी सरकार के मत्स्य विभाग के एक अधिकारी टाउनसेण्ड क्रोमवेल मछलियों के अध्ययन हेतु एक जहाज में पश्चिम की ओर बढ़ रहे थे। मछलियाँ पकड़ने के लिए जब इस दौरान एक जाल समुद्र के गहरे जल में डाला गया, तो मछलियों समेत जाल पूर्व की ओर बलपूर्वक खिंचने लगा। यह देख अधिकारी को बहुत हैरानी हुई जाँच-पड़ताल करने के उपरान्त ही यह जाना जा सका कि भीतर का जल विपरीत दिशा में प्रवाहमान है और उसकी गति बाहरी प्रवाह की तुलना में कहीं अधिक तीव्र है। इसी के कारण यह विलक्षण दृश्य दृष्टिगोचर हो रहा था। बाद में इस स्ट्रीम का नाम “क्रोमवेल प्रवाह” रखा गया। उत्तरी प्रशान्त महासागर में भी एक ऐसा ही प्रवाह पाया जाता है, जिसे “कुरोसिओ प्रवाह” कहते हैं, जो जापान के द्वीप समूहों तक जाकर पूरब की ओर मुड़ जाता है। यहाँ इसे "कैलीफोर्निया प्रवाह” कहते हैं। अफ्रीका के पश्चिम तट के निकट बहने वाला उक्त प्रवाह “बेनेजुएला” और पेरु से आने वाला स्ट्रीम “हम्बोल्ट प्रवाह” कहलाता है। दोनों प्रवाह यहाँ परस्पर मिलते हैं।
जब ऊपर-नीचे बहने वाले विपरीत जल-प्रवाहों की चपेट में पड़ कर व्यापारियों का काफी समय बरबाद होने लगा, और व्यापार में उसका प्रतिकूल असर पड़ने लगा, तो विश्व के समस्त व्यापारिक संगठनों और मियामी विश्वविद्यालय के विशेषज्ञों ने मिलकर लम्बे समय के परिश्रम के पश्चात् समस्त सागर क्षेत्र का एक ऐसा नक्शा तैयार किया, जिसमें इस प्रकार के प्रवाहों को दर्शाया गया था। इससे व्यापारियों को काफी लाभ हुआ और इन प्रवाहों में पड़कर व्यापारिक जहाजों का जो अनावश्यक समय बरबाद होता था, उसे वे बचाने में इसके बाद सफल हो सके।
यह तो समुद्री प्रवाहों की चर्चा हुई, किन्तु इस प्रकार के विपरीत प्रवाह केवल जल तक ही सीमित होते हों, ऐसी बात नहीं है। ऐसे परस्पर विरोधी प्रवाह वायुमंडल की हवा में भी पाये जाते हैं। ऐसे वायु-प्रवाहों की ऊँचाई समुद्री सतह से 20 हजार से 35 हजार फुट तक होती है। इनमें वायु 400 मील प्रति घंटे की प्रचंड गति से बहती है, जिसका लाभ वायुयान के चालक ईंधन की बचत करने और गन्तव्य तक शीघ्रातिशीघ्र पहुँचने में उठाते हैं।
यह प्रकृति भी कितनी विचित्र और विलक्षण है। इसमें न जाने कैसे-कैसे प्रवाह निरन्तर बहते रहते हैं। स्थूल जगत को देखें, तो यहाँ भी दो प्रकार के लोग दिखाई पड़ते हैं एक जो सदा सन्मार्गगामी कार्यों में संलग्न प्रतीत होते हैं, तो दूसरे कुमार्गगामी प्रवृत्ति अपनाते देखे जाते हैं। ऐसे लोग निरंतर अपने स्वार्थ के लिए, औरों को, समाज को, राष्ट्र को, पतन के गर्त में धकेलने में तनिक भी संकोच अनुभव नहीं करते। यह भी प्रकारान्तर से दो विपरीत श्रेष्ठ और निकृष्ट चेतना-प्रवाह के प्रभाव-परिणाम हैं। यह दोनों प्रकार की धाराएँ हर काल में परोक्ष जगत में साथ-साथ बहती रहती हैं, अन्तर सिर्फ इतना होता है कि कभी निकृष्ट प्रवाह प्रबल हो उठता है, तो कभी श्रेष्ठ चिन्तन-चेतना प्रभावी होती दिखाई पड़ती है। इन दिनों दैवी सत्ता का उदात्त चेतन-प्रवाह बलवती हो उठने के कारण ही समस्त संसार में सर्वत्र विवेक-बुद्धि जाग्रत होती दिखाई पड़ने लगी है। इसका स्पष्ट प्रमाण-परिचय समूचे विश्व में होने वाले युगान्तरकारी परिवर्तनों से मिलने लगा है। अस्तु, अगले दिनों यदि आसुरी सत्ता लुक-छिप कर अपना अस्तित्व बचाने की फिराक में इधर-उधर भयभीत होकर भागती दिखाई पड़े, तो हमें आश्चर्य नहीं करना चाहिए, अपितु इसे नियन्ता का एक सुनिश्चित पूर्व निर्धारण मानना चाहिए।
शिकागो के प्रसिद्ध शिक्षा शास्त्री फ्रांसिस वे लेंण्ड पार्कर से एक महिला ने प्रश्न किया । “महाशय ! बच्चों की शिक्षा कब से प्रारम्भ करनी चाहिए” पार्कर ने पूछा-आपका बच्चा कब जन्म लेगा?" महिला ने कहा “वह तो पाँच वर्ष का हो गया है ।” इस पर पार्कर ने कहा । “मैडम !अब पूछने से क्या लाभ । बालकों का सर्वोत्तम समय तो पाँच वर्ष तक ही होता है जब इनमें सुसंस्कार डाले जा सकते हैं । गीली मिट्टी को उस समय तो सही साँचे में ढाला भी जा सकता है। आपने वह बहुमूल्य समय तो गवाँ दिया ।”
डॉक्टर जीवराज मेहता उन दिनों बम्बई प्राप्त में वित्त मंत्री और बापू के निजी चिकित्सक थे । किसी कार्यवश उन्हें ट्रेन से बड़ौदा जाना पड़ा । जब वे प्लेटफार्म पर उतरे, तो स्वागत के लिए आये अधिकारियों, कर्मचारियों ने उन्हें घेर लिया।
स्टेशन के बाहर जाने के लिए उन्हें पुल पार करके जाना था। तभी उनकी नजर आगे जाती महिला पर पड़ी। वह स्त्री एक हाथ में बक्सा, गोद में बालक, दूसरे हाथ में पोटली थामें थी,
डॉक्टर साहब ने उस महिला की परेशानी भाँप ली।
दौड़कर उसका बक्सा थामा। अपनापन दिखाते हुए बोले-बहिन जब तुम पुल के उस पार आ जाओ, तो बक्सा ले लेना।” यह देखकर साथी अफसर और दर्शक हैरान रह गये कि इतना बड़ा आदमी भी इतना सरल और सहानुभूति वाला हो सकता है। महामानवों की असामान्यता उनके दैनन्दिन व्यवहार से झलकती है।
ईसा से एक जगह पूछा गया कि क्या आपने ईश्वर देखा है ? उनने “हाँ” में उत्तर दिया । जब पूछा गया कि हमें भी दिखा सकते हैं ? इसका उत्तर भी उन्होंने हाँ में ही दिया । फिर शुभ कार्य में विलम्ब क्यों ? उपस्थितजनों की उत्सुकता बढ़ती गयी ।
ईसा ने एक माता की गोदी से छोटा-सा शिशु उठा लिया और उसे कंधे पर बिठाकर उपस्थिति जनों से कहा कि “यही ईश्वर है । जिसमें निकृष्टता ने प्रवेश न किया हो । जो सदय, सरल और निष्पाप है, उसे ईश्वर की ही अनुकृति मानना चाहिये । आनंद वस्तुतः बच्चों में ही निहित है ।” बालक हममें से हर किसी के इर्द-गिर्द पाये जाते हैं । कइयों के तो अपने ही बच्चे कई होते हैं । फिर परिवार के पड़ोसियों के, सम्बन्धी, परिचितों और अपरिचितों के बच्चे भी खेलते हुए समीप आ पहुँचते हैं या उनकी ओर तनिक-सी दुलार भरी दृष्टि से देखते हुए अपने पास बुलाया जाता है, उन्हें अपनी सद्भावना, उपेक्षा, अज्ञान, अपमान आदि का पहली दृष्टि से ही पता चल जाता है और वे तद्नुरूप प्रतिक्रिया व्यक्त करने लगते हैं ।
बच्चे आरंभ में जल्दी बोल नहीं पाते और कमजोर शरीर होने के कारण कोई बड़ा परिश्रम भी नहीं कर पाते । इतने पर भी उनकी समझ असाधारण स्तर की होती है । परिवार के लोगों द्वारा बोले जाने वाले शब्दों की नकल करना, उनका भावार्थ समझना तेजी से आरंभ करते हैं और तीन वर्ष के होते-होते वार्तालाप में समर्थ हो जाते हैं । यह बड़ों की तुलना में किसी प्रकार कम समझदारी का चिन्ह नहीं है ।
बच्चा जन्मजात सत्यवादी होता है, उसके पास कोई ऐसा दुराव नहीं होता, जिसे वह छिपाना चाहे । बच्चा अपरिग्रही होता है । पेट भर जाने पर वह शेष भोजन को जहाँ का तहाँ छोड़ देता है । उसे पीछे के लिए सुरक्षित रखने की बात नहीं सूझती चतुर-श्रमशील होता है । वह छोटी आयु में भी कुछ न कुछ हलचल किये बिना नहीं रह सकता । उसकी विभिन्न हलचलों के पीछे श्रमशीलता का उत्साह ही काम करता है । मात्र इतना नहीं समझ पाता कि क्या करने का क्या लाभ मिलता है ? फिर भी वह परिश्रम का अपने को अभ्यस्त बनाता है । वो जब तक जागता रहता है, तब तक कुछ न कुछ किये बिना रहता नहीं ।
बच्चा भेदभाव नहीं करता और न द्वेष को गाँठ बाँधता है । आपस में लड़ना और फिर दूसरे से एक हो जाना उसका स्वभाव है । जातिगत, धर्म आदि के कारण बच्चे किसी को विराना नहीं समझते बच्चा कुछ करना ही चाहता, समझना भी चाहता है । खिलौने आदि वह इसीलिये तोड़ता रहता है कि यह जान सके कि उनके भीतर क्या है ? जो काम दूसरे करते हैं उसकी नकल बनाने का प्रयत्न अपनी सामर्थ्यानुसार करता है । जानना और करना यह दोनों ही कार्य इसे इतने अधिक प्रिय हैं कि वह इसे लिये छोटी आयु में भी सामर्थ्य भर प्रयत्न करता रहता है । यह सभी गुण ऐसे हैं, जिन्हें बड़े भी बच्चों से सीख सकते हैं साथ ही उनकी कोमलता तथा निश्चलता से उत्पन्न प्रसन्नता का सान्निध्य लाभ कर सकते हैं ।
मनुष्यों के तथा अन्य जीवों, पशु-पक्षियों के बच्चे तक मनुष्य के लिये एक उच्चस्तरीय मनोरंजन का आहार बनते हैं । स्वयं भावना प्रधान होने से अपने संपर्क में आने वालों की भी भावना जगाते हैं । शाहजहाँ ने जेल में दिन गुजारते हुए भी अपने लिये इच्छित काम माँगा तो उसने “बच्चों” को पढ़ाने का श्रम सर्वोत्तम माना और वही माँगा । उस व्यवस्था के बीच दिन गुजारते हुए जेल का कठिन जीवन भी सरल बना लिया । आवश्यक नहीं कि बच्चे अपनी ही संतान हों । किन्हीं के भी बालकों को भी अच्छा लगता है । मनोरंजन का यह अच्छा-खासा माध्यम है, जिसे हर कहीं सहज ही प्राप्त किया जा सकता है ।
मित्रता के साथ जुड़ी आत्मीयता किसी को भी प्राणप्रिय बना देती है । दाम्पत्य जीवन को दो शरीर एक मन बना देने की क्षमता मात्र सघन मित्रता में ही है । यह परिवार के सदस्यों के बीच तो एक व्यवस्था के अंतर्गत रहने और एक दूसरे के साथ आदान-प्रदान होने से भी चलती रहती है, पर विचारों की समानता का और पारस्परिक आदान-प्रदान एवं सहयोग से भी उसका बड़ा सम्बन्ध है । मित्रों की समीपता कितना अधिक आकर्षक पैदा करती है, इसे सभी जानते हैं । इसी भावना को भड़काकर कई लफंगे तथाकथित मित्र का सर्वनाश तक करते देखे गये हैं, पर इतना तो निश्चित रूप से होता है कि मित्रता उस स्तर की घनिष्ठता बढ़ाती है, जिसके कारण निकटता का अवसर मिलने तक से चित्त प्रफुल्लित हो जाता है ।
कामुकता की दुष्प्रवृत्ति भी साथी को जाल में फँसाने के लिये मित्रता का ही लबादा ओढ़ती है अन्यथा उसका थोड़ा परिचय अश्लीलता की दुष्प्रवृत्ति के अतिरिक्त और कुछ रह ही नहीं जाता ।
संगीत भावनाओं को तरंगित करने वाला एक महत्वपूर्ण मनोरंजन है, किन्तु शर्त यही जुड़ी हुई है कि उसमें कुसंस्कारिता भड़काने वाला विष न घोला गया हो । भक्तिरस के आस्वादन में संगीत के साथ नृत्य भी जुड़ने से वह संकीर्तन बन जाता है । आदर्शवादिता का पक्षधर संगीत सहगान में सम्मिलित होने वाले को सरसता प्रदान करता है । यदि वाद्य यंत्रों का प्रबन्ध न हो, तो भी मात्र कण्ठ के सहारे संवेदनाओं का स्पर्श करने वाले गीत एकाकी भी गुनगुनाये जा सकते हैं ।
जिन क्षेत्रों में विकसित स्तर के मनोरंजनों की पहुँच नहीं हुई है । वहाँ भी लोकगीत और लोक नृत्य ही पुरातन परम्परा से इन प्रगति युग में भी नये-नये प्रकार के प्रयोग हो रहे हैं ।
जिस प्रकार अवसाद निराशा और खिन्नता का निमित्त कारण बनता है, उसी प्रकार उल्लास को उभारने से मनुष्य की चेतना को नवजीवन मिलता है । समुद्र में भाटा आने पर उसके जो क्षति प्रतीत होती है, उसकी पूर्ति उछलते हुए पानी के रूप में आने वाले ज्वार कर देते हैं । अस्त-व्यस्त जीवन में आने वाली खिन्नता की आपूर्ति करने में मनोरंजन का सहारा लेना पड़ता है । यह उचित ही है । कृष्ण पक्ष में बढ़ते हुए अन्धकार की भरपाई शुक्ल पक्ष में बढ़ती चन्द्र किरणों से ही होती है । रात्रि के अन्धकार में जिन कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है, उसका अन्त दिनमान के उदय होने पर हो जाता है । खिन्न, अप्रसन्न करने वाले दबावों की क्षतिपूर्ति के लिये मनोरंजन का सहारा लेना पड़ता है । उसे उपलब्ध करने में कहीं कठिनाई नहीं है । मात्र अड़चन एक ही रहती है-सहज स्वाभाविक सरसता की , जो प्रचुरता से सर्वत्र विद्यमान है । लोग उससे अपरिचित बने रहते हैं और किस प्रकार आनन्दमय परिस्थितियों में जीवनयापन किया जा सकता है, उसे भूल जाते हैं ।
परमात्मा के अनेक नामों में से एक अति महत्वपूर्ण है-सच्चिदानन्द ।” ‘सत’ अर्थात् यथार्थता । यथार्थता का बोध अर्थात् जो कुछ हमें आवश्यक है वह परिपूर्ण मात्रा में जन्मजात रूप से ही विद्यमान है । मानवी चुम्बक अपने सजातीय कणों को संसार भर में कहीं से भी अपने लिये प्रसन्नता का वातावरण बना लेने में समर्थ है । दूसरा नाम है- ‘चत्’ चेतन । मनुष्य अपने आप को जड़ शरीर मानता हो है, पर वस्तुतः वह वैसा है नहीं । चेतना ही उसका स्वरूप है और उसी के साथ कठिन और जटिल से जटिल उलझनों का उत्पादन एवं समाधान जुड़ा हुआ है । व्यक्ति अपने ऊपर लदी हुई अवांछनीयताओं से छुटकारा प्राप्त कर ले, तो मूर्छना की स्थिति में जो भूलें निरन्तर होती रहती हैं और जिसके कारण असंख्य त्रास सहने पड़ते हैं, उनमें से किसी की भी आवश्यकता न रहे ।
सत् चित्त के उपरान्त महाचेतना का तीसरा विशिष्ट गुण है - आनन्द । उसे आनन्द से रहना चाहिये और अपने संपर्क क्षेत्र को निरन्तर आनन्द से सराबोर रखना चाहिये । यह संभव भी है और सरल भी । इसके लिये खर्चीले साधन जुटाने की आवश्यकता नहीं है और न ऐसे अवलम्बन ढूँढ़ने हैं, जो क्षण भर के लिये बिजली की चमक दिखाकर घने काले बादलों के बीच विलीन हो जायेगा । खरीदे हुए उपकरण, अवलम्बन ऐसे हैं, जिनसे इतनी ही आशा की जा सकती है कि अपने को ही नहीं अपने संपर्क में आने वालों को भी प्रसन्नता से भरा दें । चन्दन जब संपर्क क्षेत्र को महका देता है, तो कोई कारण नहीं कि प्रज्ञावान मनुष्य निरन्तर आनन्द विभोर स्थिति को न बनाये रखे ।
अभाव का अन्त नहीं । इस पृथ्वी के समूचे साधन एक व्यक्ति की तृष्णा बुझाने के लिए भी अपर्याप्त है। यदि उन्हीं की ललक सँजोये रखी गयी तो समझना चाहिये कि अनाचार पर उतरना पड़ेगा और जो उपलब्ध है वह अपर्याप्त एवं नीरस लगेगा । चयन पूरी तरह अपने हाथ है । स्वयं दुखी रहना, दूसरों को दुख देना और संपर्क क्षेत्र में दुःख भरा वातावरण छोड़ जाना यह भी अपने हाथ की बात है । इस भीतरी जीवन को बाहर के स्वल्प साधनों से देर तक प्रसन्न नहीं बनाये रखा जा सकेगा । प्रसन्नता का अनन्त स्रोत तो अपने भीतर है । कस्तूरी के मृग की तरह भ्रम में नहीं पड़ना चाहिये, वरन् वह जहाँ है, वहीं उसे खोजना चाहिये । अपना दृष्टिकोण, चरित्र, चिन्तन,
व्यवहार यदि बदल जाय तो संसार की व्यथा और कुरूपता को पलायन करते देर न लगेगी ।
प्रसुप्त क्षमताएँ मनुष्य में असीम मात्रा में भरी पड़ी हैं। ऋषि स्तर के व्यक्ति प्रयास-पुरुषार्थ से इन्हें जगा लेते हैं । कुछ में पूर्व जन्मों की संचित सम्पदा का प्रभाव बलशाली होने से वे सहज ही उभर आती हैं । ऐसी क्षमताओं में पूर्वाभास, भविष्य कथन पूर्वानुमान जैसे घटनाक्रम अधिक देखने को मिलते हैं । टेनी हेल नामक एक अमरीकन महिला में इसी स्तर की उपलब्धियाँ पायी गयी हैं व उसके द्वारा बतायी गयी भविष्यवाणियों में से अधिकाँश को सच पाया गया है । एक धर्मनिष्ठ चर्च के पादरी की पुत्री हेल में ये क्षमताएँ एक दिन चर्च में उपदेश सुनने के तुरन्त बाद उभरीं व फिर यह क्रम सतत् चलता ही रहा है ।
कम उम्र में ही पहली भविष्यवाणी जो हेल ने की वह थी अमेरिकी क्षितिज में बहुचर्चित राजनीतिक घटना वाटरगेट काँड एवं तत्कालीन राष्ट्रपति रिचर्ड एम. निक्सन का राजनीतिक पतन । यह दोनों घटनाएँ बाद में शब्दशः सत्य सिद्ध हुई । इसके उपरान्त उनके द्वारा व्यक्ति विशेष से लेकर राजनीतिक, सामाजिक एवं धार्मिक परिवर्तनों के बारे में की गई घोषणाएँ अक्षरशः सत्य निकलती गई । उसने कहा था कि सन् 1976 वहाँ के प्रमुख राजनेता हार्वर्ड ह्यूज के लिए निराशा एवं विशेष सावधानी बरतने का वर्ष है, जो सत्य निकला और एक दुर्घटना में उनकी मृत्यु हो गई ।
दस वर्ष पहले उनकी घोषणा थी कि सन् 1976 में राष्ट्रीय चुनाव होंगे, इसमें रोनाल्ड रीगन को अपने राजनीतिक स्थिति को सुरक्षित रख पाना मुश्किल हो जायेगा । 1976 आने पद परिस्थितियाँ वैसी ही बन गई और उन्हें जेराल्ड फोर्ड से हारना पड़ा । उन्होंने विश्व संबंधी भविष्यवाणी करते हुए कहा था कि 1976 विश्व व्यवस्था के लिए एवं प्राकृतिक पर्यावरण के लिए अत्यन्त नाजुक समय है । इस अवधि में अतिवृष्टि, अनावृष्टि, अति शीत, तीव्र गर्मी से ऐसा असंतुलन बनेगा, जिसके कारण विश्व के अधिकाँश देशों में सूखे जैसी स्थिति उत्पन्न हो जायेगी, फलस्वरूप मृत्यु दर इस वर्ष अपनी चरम सीमा पर रहेगी । यह घटना मात्र अमेरिका के लिए ही नहीं, बल्कि समूचे विश्व के लिए एक संकट लेकर आयी ।
टेनी हेल को भविष्य की बातें स्वयमेव ही दीखतीं और उन्हें ऐसी लिखतीं जैसे घटनाओं को सामने घटित होती देख रहीं हों । आगे चलकर पैसिफिक उत्तर पश्चिम के मनोविज्ञान केन्द्र में लू जाली प्रोडक्शन के क्षेत्र में महत्वपूर्ण कार्य किया ।
उन्होंने 1980 से 2000 के समय को महत्वपूर्ण मानकर उसके बारे में भी काफी कुछ कहा है । वे लिखती हैं ।
आने वाले 20 वर्षों से दौरान हमें स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होता है कि वाह्य नियमों मान्यताओं एवं विभिन्न देशों के संविधानों में मानवहित को ध्यान में रखते हुए व्यापक स्तर पर परिवर्तन होंगे । अनेकों विनाशकारी क्षेत्रीय क्रान्तियाँ अनायास ही होंगी, जिनका सम्बन्ध विश्व व्यवस्था स्थापित करने से होगा, भले ही इसमें जनहानि हो, लेकिन इसके बाद की परिस्थितियाँ अत्यन्त सुखद होंगी ।
आणविक शक्ति को बढ़ाने की अपेक्षा सम्पूर्ण वैज्ञानिक समुदाय रोगों के निदान के लिए अपनी पूरी शक्ति झोंक देंगे । इस अवधि में चिकित्सा के क्षेत्र में अद्भुत क्राँति होगी, जिसका लक्ष्य रहेगा “अक्षुण्ण स्वास्थ्य ।”
(3) इस सदी के अन्त तक एड्स , कैंसर जैसे भयावह रोगों का जिससे सम्पूर्ण मनुष्य जाति डरी हुई है अस्तित्व ही नहीं रहेगा, लोगों के जीवन क्रम में आमूल चूल परिवर्तन हो से डायनोसौर जैसे ये रोग स्वतः अदृश्य हो जायेंगे । इस अवधि में प्राकृतिक एवं आयुर्वेदिक चिकित्सा ही अपनी चरमसीमा पर रहेगी । अथवा यों कहने मात्र इनका ही अस्तित्व रहेगा ।
(4) विभिन्न अखबारों एवं पुस्तकों की संख्या कम हो जायेगी, क्योंकि कागज बनाने के लिए लकड़ी एवं रसायन उपलब्ध नहीं होगे । अतः ऐसी व्यवस्था बनेगी, जिसमें केवल मानवीय मूल्यों से संबंधित मात्रा में ही पुस्तकें लिखी जायेंगी।
(5) युद्ध नहीं, बल्कि आणविक महाविपत्ति उन समस्त औद्योगिक केन्द्रों को बन्द करने पर विवश कर देगी जिनमें खतरनाक रसायनों का उत्पादन होता है, किन्तु संश्लेषित खाद्य पदार्थ एवं जीवन के लिए आवश्यक वस्तुओं के उत्पादन का क्रम बन्द नहीं होगा ।
(6) पुरातत्ववेत्ताओं को प्राचीनकाल के ऐसे हस्तलिखित ग्रंथ मिलेंगे, जिससे धार्मिक क्षेत्र में अद्भुत क्राँति होगी और सभी धर्मों में भेदभाव समाप्त हो जाएगा । एक लक्ष्य एवं दिशा रखकर सभी एक जुट होकर कार्य करेंगे एवं संकीर्ण बातों को लेकर होने वाले देंगे, फसाद का अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा । भाई चारा ही सबका धर्म होगा।
(7) भविष्य में मनोविश्लेषण एवं मनोविज्ञान का सर्वोपरि स्थान होगा । सम्पूर्ण विश्व की व्यवस्था में यह विशिष्ट योगदान देगा । यहाँ तक कि पुलिस एवं न्याय स्तर पर भी इसका उपयोग होगा । इससे अपराधियों की संख्या स्वयमेव घट जायेगी ।
(8) क्रोमोज़ोम के क्षेत्र में नई खोज, अनेकों को स्वास्थ्य लाभ प्रदान करेगी । एवं ऐसे जीवों को उत्पन्न करने का सूत्र हस्तगत होगा, जो प्राचीन ग्रंथ में वर्णित हैं और जो अपने आप में आश्चर्ययुक्त हैं ।
(9) मनुष्य का मस्तिष्क पूर्णतः उदात्त विचार चेतना से संचालित होगा । व्यक्तिगत अधिकार न होंगे । उस काल में लोग युग के सामूहिक अवचेतन स्तर पर ही नियंत्रित होगे, जिसका स्वरूप टेलीपैथी (दूरश्रवण) होगा । इस आधार पर स्वार्थी एवं संकुचित विचारों का प्रवाह ही प्रायः समाप्त सा हो जायेगा और विधेयात्मक विचार ही वातावरण में छाया रहने के कारण यही लोगों को आप्लावित करेगा ।
(10) जनसंख्या नियन्त्रण के लिए व्यक्तिगत स्तर पार अनुत्पादक चक्र के लिए नये तकनीक उभर कर आयेंगे । इसका संचालन भी वैचारिक प्रवाह से होगा । इसके बारे में हर व्यक्ति स्वयं ही जिम्मेदारी अनुभव करेगा इस और विवेकपूर्ण कदम बढ़ायेगा ।
(11) सन् 2000 आते ही भाई चारा ममता, समता से आप्लावित ऐसे मानवतावादी धर्म का स्वरूप दिखाई देगा, जिसके प्रभाव में रूप और चीन जैसे साम्यवादी राष्ट्र भी आ जायेंगे और ऐसी सुखद परिस्थितियाँ निर्मित करने का क्रम चल पड़ेगा , जो पिछले दो हजार वर्षों की कमी को सौ वर्ष में पूरा कर देगा । इस काल को एक शब्द में कहना हो ता ‘गोल्डन सेंचुरी’ के नाम से पुकार सकते हैं।
भविष्य के संबंध में यह उद्गार प्रख्यात भविष्यवक्ता टेरी हेल के हैं । हम आज उस कथित संधिकाल से गुजर रहें हैं, जिसके बाद आने वाले समय को उनने "गोल्डन एज- स्वर्णयुग“ नाम से सम्बोधित किया है । अतः इस स्वर्णयुग के नींव की जिम्मेदारी पूर्णतः हम पर है । हम जैसा स्वरूप उस नींव को देंगे वैसी ही आने वाले समय की इमारत उस पर खड़ी हो सकेगी । हम स्वयं उस इमारत की सुदृढ़ और उत्कृष्ट बन सकें, अतः परिवर्तन क्रम स्वयं से आरंभ करें, तभी उस स्वर्णयुग के प्रभात पर्व को हम इक्कीसवीं सदी उज्ज्वल भविष्य के रूप में देख सकेंगे ।
सुप्रसिद्ध क्राँतिकारी राम प्रसाद बिस्मिल को जिस दिन फाँसी लगनी थी उस दिन सवेरे जल्दी उठकर वे व्यायाम कर रहे थे । जेल वार्डन ने पूछा । आज तो आपकी एक घण्टे बाद फाँसी लगनी है फिर व्यायाम से क्या लाभ ? उनने उत्तर दिया । “जीवन आदर्शों और नियमों में बँधा हुआ है । जब तक शरीर में साँस चल रही है तब तक नियमों में व्यवधान आने देना कहाँ तक उचित है ? मैं अपना धर्म निभा रहा हूँ, आप अपना कर्तव्य पूरा कीजिए ।”
प्रख्यात मुंशी प्रेमचन्द्र को उ. प्र. गवर्नर ने संदेश भेजा कि वे उन्हें “रायसाहय “ का खिताब देना चाहते हैं और कुछ उपहार भी ।
मुंशी जी इसका अभिप्राय समझ गये कि उन्हें सरकार के पक्ष में लिखने के लिए रिश्वत की पेशकश की जा रही है ।
उन्हें सभ्य शब्दों में इंकार करते हुए उत्तर दिया कि “कितने ही मुझसे अधिक योग्य अपनी वरिष्ठता के कारण इस उपाधि के अधिकारी है तो मेरे जैसे नाचीज के लिए ऐसा सम्मान स्वीकार करने पर मैं धृष्ट कहा जाऊँगा ।” तात्पर्य स्पष्ट इंकार था । वे अपनी विचार स्वतंत्रता को किसी मूल्य पर बेचना नहीं चाहते थे ।
मानवी गरिमा के अनुरूप जिनकी अन्तःचेतना ढल चुकी होती है वे देव मानव अपनी महानता बढ़ाने और दूसरों को ऊँचा उठाने की बात सदा सोचते रहते हैं । इसी आधार पर वे अपना व्यवहार एवं क्रियाकलाप विनिर्मित करते हैं । शालीनता अपनाते और सज्जनता बरतते हैं । अधिकार की उपेक्षा करते और कर्तव्य पालन में जागरूक रहते हैं । ऐसों से किन्हीं का अनहित बन नहीं पड़ता । भ्रमवश ऐसा कुछ बन पड़े तो अपनी भूल सुधार लेते हैं । किसी की कुछ क्षति बन पड़ी हो तो उसकी प्रकारान्तर से भरपाई कर देते हैं । देवमानवों की यही रीति-नीति रहती है ।
किन्तु सभी लोग ऐसे नहीं होते । अधिकाँश लोग इससे भिन्न प्रकृति के होते हैं । कुछ तो ऐसे होते हैं जो संकीर्णता की मनोभूमि में अपने मतलब से मतलब रखते ही देखे जाते हैं । उन्हें किसी के सुख-सुख से कुछ लेना देना नहीं होता अपना स्वार्थ जहाँ से जिस प्रकार भी सिद्ध ही उनका इष्ट होता है । जिससे लाभ मिलता है उसी से मैत्री करते हैं और जब उसमें कमी पड़ने लगती है तो तोते की तरह आँखें फेर लेते हैं । इनका न कोई मित्र होता है न शत्रु । स्वार्थ के लिए शत्रु के सामने भी गिड़गिड़ाकर उस से मैत्री बनाने का स्वाँग रचते हैं । मित्र जब छूँछ हो जाता है और उससे लाभ की आशा नहीं रहती है तो फिर उसकी उपेक्षा ही नहीं करते गिरे में दो लात लगाने से भी नहीं चूकते । किसी समय के मित्र के साथ शत्रुता बरतने लगते हैं । इस श्रेणी के लोगों को नर पशुओं की गणना में गिना जा सकता है ।
ऐसे लोगों से सतर्क तो रहना चाहिए पर किसी बड़े अनिष्ट की आशंका नहीं करनी चाहिए । उन्हें लाभ का लालच दिखाकर कभी अनुकूल बनाया जा सकता है । विरोधी तो तभी बनते हैं। जब आक्रमण की, प्रतिद्वंद्विता की या अवरोध उत्पन्न करने की आशंका होती है । ऐसी लोगों से सतर्क तो रहना चाहिए, पर बहुत डरना नहीं चाहिए क्योंकि वे आगे बढ़कर आक्रमण करने की मनःस्थिति में नहीं होते । लड़ाई-झगड़े में वे झंझट भी सोचते हैं और घाटा भी देखते हैं, इसलिए जोंक की तरह जब जहाँ से और कुछ मिलने की संभावना नहीं रहती तो फिर पल्ला झाड़कर अलग हो जाते हैं, रुखाई दिखाने लगते हैं । जमाना ऐसे स्वार्थियों से ही भरा पड़ा है । उनके साथ फूँक-फूँक कर व्यवहार करना और सोच समझ कर मैत्री के लिए हाथ बढ़ाना चाहिए ।
सज्जनों के साथ मैत्री बढ़ानी चाहिए ताकि उनके सद्गुणों की ऊर्जा अपने को प्रभावित करे और ऊँचा उठाने में सहायक बनें । जो पिछड़े है असमर्थ हैं । साधनों की दृष्टि से अभावग्रस्त हैं, दूरदर्शिता जिनका साथ नहीं देती, उनके साथ करुणा बरती जाय और कठिन परिस्थितियों से उबारने के लिए यथासंभव सहायता की जाय । उदारचेता सहृदय होते हैं और सदा यह देखते रहते हैं कि निजी वैभव बढ़ाने की अपेक्षा जो गये गुजरे हैं उन्हें अपनी स्थिति तक लाने के लिए प्रयत्न किया जाय । अपना “स्व” यदि “पर” के साथ आत्मीयता के बंधन में बँधने लगे तो उसका परिणाम समता की स्थिति उत्पन्न करता है । ऊँचे धरातल वाला तालाब यदि नीचे धरातल वाले के साथ किसी नाली द्वारा मिला दिया जाय तो सहज ही ऊँचे वाले का पानी नीचे की ओर तब तक बहने लगता है जब तक कि दोनों की सतह बराबर नहीं हो जाती है । यही है जियो और जीने दो का सिद्धान्त ।”हिलमिल कर रहना और मिल बाँट कर खाना इसी को कहते हैं । सुविकसित, सुसंस्कृत लोगों की यही रीति-नीति रहती है । वे किसी को भी, किसी भी क्षेत्र में अपने से किसी प्रकार हीन देखते हैं तो उसे पूरा करने कि लिए परामर्श , सहयोग , आग्रह या अनुदान भी उदारतापूर्वक प्रदान करते हैं । यह सब बिना बदले की आशा से विशुद्ध कर्तव्य पालन मानकर किया जाता है । बालक अभिभावकों को उपकार का बदला चुकाने की स्थिति में कहाँ होता है ? उसका भरण-पोषण तो आत्मीयता जन्य उदारता के आधार पर ही होता है ।
सज्जन संसार में कम हैं तो भी सज्जनता का प्रकाश किसी न किसी रूप में हर जगह देखा पाया जाता है । उसे जहाँ भी जिस भी मात्रा में देखा पाया जाय, मोद मनाया जाय, प्रसन्न हुआ जाय । प्रशंसा की जाय और प्रोत्साहित करने के लिए उत्साह दिखाया जाय।
अब बारी तीसरे वर्ग की आती है जिनका अन्तराल प्रधान दुष्टता से सराबोर होता है । दया, धर्म उनके पास तक नहीं फटकते । हर समय शिकार ढूँढ़ते और घात चलाते रहते हैं । बगुला उस आकार की मछली पकड़ता है जो उसकी चोंच में समा सके और गले के नीचे उतर सके । जो इससे बड़ी होती है उसे वह नहीं छेड़ता दुरात्माओं की भी यही नीति होती है । वे अपने से कमजोर पड़ने वालों पर हमला बोलते हैं । सीधे आक्रमण महंगा पड़ता दीखे तो छल-छद्म की कुटिलता बरतते हैं । विरोधियों को आपस में लड़ाकर कमजोर करते हैं और फिर दोनों को ही एक-एक करके निगल लेते हैं ।
चोर-चोर आपस में लड़ते नहीं, वरन् मतलब की दोस्ती गाँठते और मौसेरे भाई बन जाते हैं । दुरात्माओं के गिरोह इसी आधार पर बनते हैं । अनाचारों में एक दूसरे का सहयोग देते और लाभ में हिस्सा बँटाते हैं । शिकार ढूँढ़ते समय वे इस बात का ध्यान रखते हैं कि दुर्बल या सज्जन पर ही हमला बोला जाय दुर्बल कमजोरी के कारण और सज्जनता-अहिंसा जैसे किसी सिद्धान्त की आड़ लेकर प्रतिरोध से जी चुराता है । इस प्रकार वे मन को समझाते रहते हैं और आये दिन एक के बाद दूसरे आक्रमण का शिकार होते रहते हैं । दुरात्मा दो ही प्रकार के शिकारों को बिना प्रतिरोध के दबोचते रहते हैं और अपनी सफलता पर मूँछें मरोड़ते रहते हैं साथ ही उनके अनाचार और भी तीव्र होते जाते हैं । सरल सफलता को देखकर ऐसे ही अन्य लोग भी इसी खल-मण्डली में शामिल होते जाते हैं । उन्हें यह व्यवसाय बिना घाटे का और प्रचुर नफे को दीख पड़ता है । इन्हें नर पिशाच वर्ग में गिना जा सकता है । उनकी संख्या तो बहुत नहीं होती, पर आतंक सारे समाज पर छाया रहता है । सरल लोग तो आसानी से समाज या शासन की पकड़ में भी आ जाते हैं, पर यह वर्ग आँखों में धूल झोंकने और हर पकड़ से बच निकलने में भी प्रवीणता प्राप्त कर लेता है । हथकंडों के बल पर अपने को हर पकड़ से बचा लेता है । इस प्रकार उनके हौसले बढ़ते ही जाते हैं । चोर से डाकू और उठाई गिरी से बढ़कर तस्कर ऐसे ही लोग बनते हैं । इनके साथ क्या व्यवहार किया जाय ? इसके उत्तर में एक ही शब्द कहा जा सकता है कि अनीति के आगे किसी भी कीमत पर सिर न झुकाया जाय । सहयोग विरोध से लेकर संघर्ष तक जिससे जितना जिस प्रकार का प्रतिरोध बन पड़े करते ही रहा जाय । साँप काटने की स्थिति में न हो तो भी उसे फुफकारना तो चाहिए ही । चुपचाप बैठे रहने, भाग्य को कोसते रहने या “भगवान देखेगा” जैसी बात कहकर मन समझा लेने से काम कुछ भी नहीं चलता । उलटे अपना मनोबल गिरता है और आक्रमणकारी का बढ़ता हुआ अहंकार दूने वेग से अनाचार करने पर उतारू होता है ।
यों शासन का , समाज का काम इन नर पिशाचों पर अंकुश लगाने का है, पर यदि वे झंझट में पड़ने से बचें तो भी सज्जनों को संगठित होकर इन तत्वों का प्रतिरोध करना ही चाहिए ।यह भी सज्जनता को सुरक्षित करने का एक कारगर कदम है ।
दो बिल्ली मिलकर किसी घर से एक रोटी चुरा लाई । बँटवारे का फैसला न हो रहा था ।
वे फैसला कराने बन्दर के पास पहुँची । बन्दर ने रोटी के दो टुकड़े किये दोनों को तराजू के दो पलड़ों में रखा । जो भारी था उसमें से एक बड़ा टुकड़ा तोड़ कर मुँह में रखा। अब दूसरा भारी हो गया तो उसमें से भी बड़ा टुकड़ा तोड़ लिया । इसी प्रकार दो तीन बार में सारी रोटी खाली । रोटियों का चूरा तराजू में पड़ा था । बिल्लियों ने कहा इसी को हमें दे दीजिए । बंदर ने कहा मेरी इतनी मेहनत का भी तो कुछ मेहनताना मिलना चाहिए । यह कहकर उसने बचे चूरे को भी खा लिया।
बिल्लियाँ इतना गँवाने के बाद समझी कि अपना झगड़ा आपस में ही निपटा लेना चाहिए था ।
मानवी काय सत्ता में शक्ति का अजस्र भाण्डागार बीज रूप में प्रसुप्त स्थिति में दबा भरा पड़ा है , जिसे योगाग्नि, प्राणऊर्जा, जीवनी शक्ति, कुण्डलिनी आदि नामों से जाना जाता है । परमाणु के नाभिक में प्रचण्ड शक्ति भरी पड़ी है, पर वह दिखाई पड़ती और उपयोग में तभी आती है जब एक सुनिश्चित वैज्ञानिक प्रक्रिया अपनाकर नाभिकीय विखण्डन कराया जाता है । यह प्रक्रिया अत्यन्त जटिल है और खर्चीली भी । कुण्डलिनी महाशक्ति भी हर मनुष्य में सुषुप्तावस्था में पड़ी रहती है । सामान्य मनुष्य कामोल्लास के अतिरिक्त उस भाण्डागार से और कोई विशेष लाभ नहीं उठा पाता । प्राणायाम की विशिष्ट प्रक्रिया उस महाशक्ति के जागरण ऊर्ध्वगमन में विशेष भूमिका निभाती है । कुण्डलिनी जागरण के लिए प्राणशक्ति का प्रचण्ड आघात आवश्यक होता है । इसके लिए निखिल ब्रह्माण्ड में संव्याप्त प्राणतत्त्व को आकर्षित करना तथा अपने भीतर भरता पड़ता है । सूर्यभेदन प्राणायाम इस प्रयोजन के लिए सर्वाधिक सहायक सिद्ध होता है । प्राणाग्नि का उद्दीपन, उन्नयन एवं सुनियोजन ही भौतिक सिद्धियों एवं आध्यात्मिक ऋद्धियों का मूलाधार है ।
प्राण के प्रहार से प्रसुप्त ऊर्जा के उद्दीपन, प्रज्ज्वलन का उल्लेख करते हुए साधना ग्रन्थों-योगशास्त्रों में कहा गया है कि कुण्डलिनी प्राणाग्नि है । उसमें सजातीय तत्वों का ईंधन डालने से ही उद्दीपन होता है । सूर्यभेदन प्राणायाम द्वारा सूर्य से प्राणशक्ति आकर्षित करके उसे इड़ा-पिंगला के माध्यम से मूलाधार में अवस्थित चिनगारी जैसी प्रसुप्त अग्नि तक पहुँचाया जाता है तो वह भभकती है और जाज्वल्यमान लपटों के रूप में सारी सत्ता को अग्निमय बनाती है । प्राण का मूलाधार स्थित जीवनी शक्ति पर प्रहार तथा उद्दीपन-यही है सूर्यभेदन प्राणायाम का लक्ष्य इसकी सफलता पूरी तरह इच्छा भावना एवं संकल्प की दृढ़ता के ऊपर निर्भर करती है । विधि इस प्रकार है ।
किसी शान्त एकान्त स्थान में प्रातःकाल पूर्व दिशा की ओर मुँह करके स्थिर चित्त होकर बैठना चाहिए । आसन सहज हो, मेरुदण्ड, सिर और ग्रीवा सीधी हों नेत्र अधखुले, घुटने पर दोनों हाथ । सूर्यभेदन प्राणायाम के लिए इसी मुद्रा में बैठना चाहिए ।
दाएँ नासिका का छिद्र बंद करके बाएँ से धीरे-धीरे साँस खींचना चाहिए । भावना यह हो कि वायु के साथ सूर्यस्थ प्राण ऊर्जा की प्रचुर मात्रा भी आकर्षित हो रही है । यह प्राण ऊर्जा सुषुम्ना मार्ग से ऋण विद्युत प्रवाह ‘इड़ा’ नाड़ी द्वारा मूलाधार तक पहुँचाती और वहाँ अवस्थित प्रसुप्त चिनगारी को झकझोरती, थपथपाती और जाग्रत करती है । यह सूर्यभेदन प्राणायाम का पूर्वार्द्ध-पूरक है । उत्तरार्ध में प्राण को सुषुम्ना स्थिति धनविद्युत प्रवाह वाली पिंगला नाड़ी में से होकर वापस लाया जाता है । प्रवेश करते समय अन्तरिक्ष स्थित प्राण शीतल होता है-ऋणधारी भी शीतल मानी जाती है । इसीलिए “इड़ा” को चन्द्रनाड़ी कहते हैं । श्वास को बायें नथुने से अन्तर्कुम्भक के बाद लौटाया जाता है । वापस लौटते समय अग्नि उद्दीपन-प्राण प्रहार की संघर्ष प्रक्रिया से ऊष्मा बढ़ती है और प्राण में सम्मिलित होती है । लौटने का पिंगल मार्ग धनविद्युत का क्षेत्र होने से उष्ण माना गया है । दोनों ही कारणों से प्राणवायु उष्ण बनी रहती है । इसलिए उसे सूर्य की उपमा दी गई । इड़ा चन्द्र और पिंगला सूर्य है ।
इस प्राणायाम की विशेषता यह है कि इसमें पुनः सूर्यनाड़ी (दायें नथुने) से पूरक एवं चन्दा नाड़ी (बायें नथुने) से रोचक किया जाता है । मूलाधार पर प्राण प्रहार तथा प्राणोद्दीपन की भावना सतत् करनी पड़ती है । इस प्रकार यह प्राणायाम यौगिक चक्रों को जगाने वाला एक सशक्त प्राणायाम है ।
योग साधना में क्रिया-कृत्यों कि तुलना में भावना आस्था एवं संकल्प का महत्व अधिक है । साधक को इसके अनुरूप ही लाभ मिलता है । श्वास द्वारा खींचे हुए प्राण को मेरुदण्ड मार्ग से मूलाधार तक पहुँचाने का संकल्प दृढ़तापूर्वक करता पड़ता है । यह मान्यता परिपक्व करनी पड़ती है कि निश्चित रूप से सूर्य मण्डल या अन्तरिक्ष से खींचा गया और श्वास द्वारा मेरुदण्ड-सुषुम्ना मार्ग से प्रेरित किया गया प्राण मूलाधार तक पहुँचता है और वहाँ प्रसुप्त कुण्डलिनी शक्ति को प्राणाग्नि को अपने प्रचण्ड आघातों से जगा रहा है ।
सूर्यभेदन प्राणायाम का योगशास्त्रों में असाधारण महत्व बताया गया है । कुण्डलिनी महाशक्ति के जागरण के लिए जिस प्राण ऊर्जा की प्रचुर परिमाण में आवश्यकता पड़ती है, वह प्रयोजन सूर्यभेदन द्वारा ही पूरा होता है । प्रक्रिया सामान्य है किन्तु परिणाम असाधारण एवं चमत्कारी हैं ।
“समस्त आर्यावर्त कबन्ध के कुत्सित कर्मों को धिक्कारता है तात ! आज तो उसने अपनी भी एक शत गौवें बलात् अपहरण कर लीं, उसका लक्ष्य अपनी कामधेनु को चराना था पर लगता है दस्यु उसे पहचान नहीं सके । इतना हो जाने पर भी आप कबन्ध की भर्त्सना नहीं करते । आर्यश्रेष्ठ ! आप तो मन्त्रज्ञ हैं । एक क्या एक हजार कबन्धों के प्राण आप एक क्षण में ले सकते हैं । मन्त्र न भी सही जनमत आपके आदेश की अवज्ञा नहीं करता, आप एक संकेत कर दें तो सारी प्रजा उठ खड़ी हो और दस्युराज कबन्ध के टुकड़े-टुकड़े कर डाले । फिर ऐसी क्या दया, क्या-सहिष्णुता यह तो निरी कायरता है । “ आचार्य पत्नी ने महर्षि व्यास को आज आड़े हाथों लिया ।
उन्होंने लेखनी को एक पल का विराम दिया । पास पड़े भूर्जपत्रों को एक ओर कर उसकी ओर देखा। पत्नी के चेहरे पर अभी भी खीज़ के चिन्ह थे । लेकिन वे स्वयं इस तीखेपन पर न खीझे न उत्तेजित हुए । शान्त-निर्मल मन और मधुर वाणी से बोले “भद्रे ! मनुष्य अपने अन्तःकरण से पापी है न बुरा । साँसारिक परिस्थितियाँ कभी किसी को बुरा बना दें तो उसका यह अर्थ नहीं कि उसे सिखाने समझाने की अपेक्षा मार डाला जाय । शरीर भगवान देता है , दण्ड तो दिया जा सकता है पर ईश्वर के दिए अधिकार को छीनना उचित नहीं ।
“किन्तु क्या आप जानते हैं कि आप जैसी उदारता ही बुराइयों को बढ़ावा देती हैं-सब में एक ही निर्मल आत्मा देखने के आपके दर्शन को बधाई । पर जिसके कारण सारी प्रजा त्रस्त हो रही है उसे बुरेपन को भी तो देखिए आर्यश्रेष्ठ ।” आचार्य पत्नी ने अपने शब्दों को थोड़ा कोमल बनाने का प्रयास किया । इस प्रयास के बावजूद स्वरों में उग्रता का काफी कुछ अंश था । यह उग्रता उन्हें अपने पिता महाअथर्वण से विरासत के रूप में मिली थी । महर्षि बोले “देवि ! कबन्ध जैसी वीरता क्या किसी सेनापति में है ? उसका स्वास्थ्य, आरोग्य, साहस स्फूर्ति और अपने काम में पूर्ण दत्तचित्तता जैसे गुणों की क्या सराहना नहीं हो सकती जो उसमें बुराइयाँ देखीं और निन्दा की जाए । तुम नहीं जानती प्रिय-व्यक्ति आत्मीयता, मान और प्यार का भूखा होता है । यदि कबन्ध को यह मिले होते तो वह दस्यु न होकर इस देश का वीरवर सेनानायक होता ।”
अपने सम्मुख शत्रु की प्रशंसा आर्य रमणी को किंचित् सहन न हुई वे कुद्ध हो उठीं और बोलीं “अति भावुकता राष्ट्र को पतन की ओर ले जाती है आर्य ! आप यह भी भूले मत ।” कहते-कहते उठ खड़ी हुई और वहाँ से चलने को समुद्यत हुई ही थीं कि चन्द्रद्युति के शीतल प्रकाश में एक सुडौल आकृति उन्हें अपनी ओर आती दिखाई दी । ध्यान बँटा ‘उन्होंने उस ओर दृष्टि गढ़ाकर देखा कुछ विस्मित कुछ भय से आक्रान्त महर्षि पत्नी कुछ कहें इससे पूर्व ही उस आकृति ने आगे आकर उनके चरणों का स्पर्श किया और फिर महर्षि के पैरों में गिरते हुए उसने कहा “तात ! वह पापी कबन्ध में ही हूँ जिसकी आप इतनी देर से प्रशंसा कर रहे थे । देव । आपकी कामधेनु चुराने मैं स्वयं आया था-हतबुद्धि में आपके प्राण हरण तक के लिए उतारू था किन्तु आज आपके आत्मीयता ने मुझे परास्त कर दिया और अधिक पाप के लिए अब मेरे हाथ नहीं उठते । जो चाहे दण्ड मुझे दें मैं पूरी तरह आपको आत्म समर्पण करता हूँ ।”
महर्षि ने एक स्नेह भरी दृष्टि अपनी धर्मपत्नी की ओर डाली फिर कबन्ध को अपनी भुजाओं में लेते हुए उन्होंने स्नेह विगलित स्वर में कहा- “उठो तात ! भूलें स्वभावतः मनुष्य से ही होती हैं पर उन्हें सुधारने वाला सराहनीय होता है । उठो ! अब तक के किए पापों का प्रायश्चित्त कर डालो तुम अब भी अपनी आत्मा का प्रकाश ग्रहण कर सकते हो , करोगे ?”
महर्षि पत्नी वाटिका पास खड़ी किंकर्तव्य विमूढ़ सारा दृश्य देख रही थी । उन्हें अनुभव हो रहा था कि सदाचार की शक्ति अनाचार से हजार गुना बढ़ कर है । जो कार्य राष्ट्राध्यक्ष और उनकी सेना नहीं कर सकी वह एक व्यक्ति के सदाचार ने कर दिखाया ।
बुरे दिनों की चपेट में आने से पहले आदमी अहंकारी हो चुका होता है । उद्धत मनुष्यों की दुर्मति ही उनकी दुर्गति कराती है ।
मानवी सत्ता की रहस्यमय पिटारी में एक से बढ़ कर एक अद्भुत संरचनाएँ भरी पड़ी हैं । विविध कर्मेन्द्रियों एवं ज्ञानेन्द्रियों की बनावट, कार्यपद्धति और उपलब्धियाँ असामान्य हैं । इसी तरह उनसे सम्बन्धित जीवकोषों, ज्ञानतंतुओं, गुच्छकों, रसस्रावों, गुण सूत्रों की अपनी-अपनी रहस्यमयी गतिविधियाँ हैं । वैज्ञानिकों ने जितना अधिक इस अद्भुत संरचना का अध्ययन किया है उससे यह तथ्य सामने आये हैं कि शारीरिक अंग अवयवों में जो गतिशीलता दिखाई पड़ती है, उनका संचालन न केवल प्राणचेतना से होता है, वरन् इस प्रक्रिया में हारमोन रसायनों की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है । मनुष्य की भावनाओं से इनका गहरा सम्बन्ध होता है । भावनाओं का विचारणाओं का स्तर जैसा भी अच्छा-बुरा या उत्कृष्ट होता है वैसे ही जीवन रस की उत्पत्ति भी होती है और तद्नुरूप ही व्यक्तित्व का स्तर भी गठित होता चला जाता है ।
अनुसंधानकर्ता वैज्ञानिकों ने अब हारमोन ग्रंथियों की विस्तृत जानकारी प्राप्त कर ली है । इसकी एक बूँद से भी कम मात्रा में स्राव शरीर में किस प्रकार अद्भुत परिवर्तन ला देता है, यह देखकर आश्चर्यचकित रह, जाना पड़ता है । इस संदर्भ में प्रख्यात मनःशास्त्री एडलर ने गहन खोजें की है । अपने विविध प्रयोग-परीक्षणों के आधार पर निकाले गये निष्कर्ष में उनने बताया है कि सुन्दर, आकर्षक और कमनीयता की मूर्ति होते हुए भी कितने ही नर-नारी पुरुष प्रवृत्ति तथा नारी सुलभ उमंगों से सर्वथा रहित पाये जाते हैं । कई दुर्बलकाय व्यक्ति सफल खिलाड़ी, लेखक, वैज्ञानिक आदि तथा बौनी महिलाओं ने कुशल कलाकार के रूप में ख्याति अर्जित की है । कई लोग महँगी पौष्टिक माल-मलाई खाकर भी जर्जरकाय बने रहते हैं, जबकि अनेकों रूखे-सूखे आहार पर जीवन व्यतीत करने वाले स्थूलकाय एवं बलिष्ठ होते हैं ।
मनुष्य शरीर में हारमोन बनाने वाली संरचनाओं को अंतःस्रावी ग्रन्थियाँ कहते हैं । इनकी संख्या सात हैं- पिट्यूटरी थाइराइड पैराथाइराइड थाइमस, एड्रीनल तथा गोवेड्स (जननग्रन्थियाँ) इनसे स्रवित रसायन सीधे रक्त में मिलते और शरीर की प्रत्येक क्रिया-प्रक्रिया एवं मनुष्य के पूरे व्यक्तित्व को प्रभावित करते हैं । शरीर पर जब रोगाणुओं का आक्रमण होना है तो इन ग्रन्थियों से उत्पन्न हुए रसायन रक्त कणों में रोगाणुओं से लड़ने की शक्ति उत्पन्न कर देते हैं और स्वयं भी उनसे संघर्ष करते हैं । इस संघर्ष के कारण ही रुग्णावस्था में बेचैनी, अशान्ति और क्षुब्धता उत्पन्न होती है । इसी प्रकार ये ग्रन्थियाँ भावनाओं से प्रभावित होकर ऐसे विशिष्ट प्रकार के रसायन भी उत्पन्न करती हैं जो हर्ष , उमंग, साहस , भीरुता, सक्रियता आदि के लिए उत्तरदायी होते हैं । यही कारण है कि हारमोन रसायनों के द्वारा अब यह वैज्ञानिक प्रयास किये जा रहे हैं कि इनके प्रयोग से मनुष्य की आदतों एवं व्यवहार को कैसे बदला जाय ? भावनाओं और रसायनों का सम्बन्ध खोजकर विशिष्ट रसायन की मात्रा को कैसे बढ़ाया और व्यक्ति को निरोग एवं व्यक्तित्ववान बनाया जाय इस क्षेत्र में वैज्ञानिकों को कुछ सफलता भी मिली है ।
स्नायु रसायनविदों का कहना है कि अंतःस्रावी ग्रन्थियों में सर्वाधिक महत्वपूर्ण पीनियल व पिट्यूटरी ग्रन्थियाँ हैं । कारण इनकी सक्रियता से स्रवित हारमोन मात्र यौन गतिविधियों का ही नियंत्रण नहीं करते, वरन् व्यक्ति के सोचने-विचारने निर्णय लेने की क्षमता एवं दिक्-काल सम्बन्धी उसकी धारण को भी संचालित और नियंत्रित करते हैं । यौवन लाने के लिए उत्तरदायी यह रसायन मनुष्य की बौद्धिक एवं ज्ञानार्जन क्षमता से भी गहरा सम्बन्ध रखती है । पाया गया है कि एण्ड्रोजन जो पिट्यूटरी के कारण स्रवित होता है, जैसे रसायन भी पुँसत्व के साथ ज्ञानार्जन क्षमता को भी प्रभावित करते हैं ।
शरीरशास्त्रियों के अनुसार पिट्यूटरी ग्रन्थि नाक की जड़ के पीछे अवस्थित होती है । इसका सम्बन्ध एक ओर जहाँ मनुष्य शरीर की लम्बाई की बढ़ोत्तरी या बौनेपन एवं यौवन के उतार-चढ़ाव तथा प्रजनन सम्बन्धी गतिविधियों से होता है , वही दूसरी ओर बौद्धिक प्रखरता आत्मनियंत्रण, उत्साह आदि से भी होता है । योगविद्या-विशारद इसका सम्बन्ध सहस्रार चक्र से जोड़ते हैं जहाँ से व्यष्टि चेतना ब्रह्माण्डव्यापी समष्टिगत परम चेतना से अपना सम्बन्ध स्थापित करती है । इसके विपरीत पीनियल ग्रन्थि को शरीर और मस्तिष्क मध्य की कड़ी बताया गया है । विख्यात फ्रेंच दार्शनिक रेने देसकार्ते के अनुसार यह ग्रन्थि मस्तिष्कीय चेतना और जड़ परार्थ के मध्य संपर्क सूत्र का काम करती है । इसी के माध्यम से दिव्य चेतना मनुष्य में अवतरित होकर अपना कार्य करती है ।
पीनियल ग्रन्थि मस्तिष्क के मध्य भाग में सेरीबेलम एवं थैलमस के बीच स्थित शंकुरुप में चने के आकार की संरचना वाली महत्वपूर्ण दूसरी अंतःस्रावी ग्रन्थि है । चिकित्सा विज्ञानी इसके समुचित कार्यप्रणाली को जानने के लिए निरन्तर अनुसंधानरत हैं । इससे उत्पन्न हार्मोन रसायन को ‘मिलैटोनिन’ कहते हैं । माना जाता है कि यह रसायन अँधेरे से प्रतिक्रिया करता है और दिन एवं रात के प्रत्यावर्तन से सम्बन्धित सरकैडियन बायोरिद्म के नियमन में सक्रिय भूमिका निभाता है । इसके अतिरिक्त यह तत्व निद्रा प्रक्रिया से सम्बन्धित स्नायु कोशिकाओं को भी प्रभावित करता है । प्रकाश के प्रक्रिया संवेदनशीलता इसका प्रमुख गुण है ।इसलिए इसका सम्बन्ध योगशास्त्रों में वर्णित तृतीय नेत्र से बिठाया जाता है । सुप्रसिद्ध ग्रीक शरीरशास्त्री हेरोफिलस ने पीनियल ग्रन्थि को बहुत पहले ही विचार प्रवाह का नियमन करने वाली अवरोधित शक्ति कहा था । गुह्यवेत्ताओं के अनुसार यहीं से तर्क एवं न्याय बुद्धि का नियमन होता है । आधुनिक मनीषी इसे दिव्य क्षमताओं का केन्द्र मानते हैं ।
पाया गया है कि वयस्कों की अपेक्षा शिशुओं में पीनियल ग्रन्थि आकार में अपेक्षाकृत अधिक बड़ी होती है । पुरुषों की तुलना में महिलायें अधिक भावनाशील होती हैं । यही कारण है कि महिलाओं में भी इस ग्रन्थि को अधिक विकसित पाया जाता है । मूर्धन्य वैज्ञानिक मनीषी वर अलेक्जेन्डर कैनन ने स्वयं के द्वारा किये गये अनेकों अन्त्य परीक्षणों का निष्कर्ष प्रस्तुत करते गये अनेकों अन्त्य परीक्षणों का निष्कर्ष प्रस्तुत करते हुए अपने अनुसंधानपूर्ण ग्रन्थ-द पावर विदिन” में कहा है कि भावनाशील एवं आध्यात्मिक दृष्टि से उन्नत महापुरुषों में पीनियल ग्रन्थि सामान्य मनुष्यों की तुलना में अधिक बड़ी एवं विकसित होती है । मनुष्य जब तक बाल्यावस्था में होता है तब तक दुनियादारी के तमाम मकड़जालों से दूर निर्मल मन एवं पवित्र अंतःकरण वाला होता है । बच्चों जैसा खिलखिलाता निश्छल जीवन बड़ी उम्र में विरले मनुष्य ही जी पाते हैं । यही कारण है कि आयुवृद्धि से साथ-साथ सामान्य जनों की पीनियल ग्रन्थि सिकुड़ती जाती है । भावनाओं का इस पर गहरा प्रभाव पड़ता है ।
यही तथ्य अन्यान्य जीवनदायी रस उत्पन्न करने वाली ग्रन्थियों पर भी लागू होता है । गले में स्थित थाइराइड ग्रन्थि मस्तिष्कीय संतुलन एवं स्वभाव निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान देती है । भावना तथा व्यक्तित्व का विकास बहुत कुछ इसी पर निर्भर करता है । आलस्य तथा उत्साह के लिए भी बहुत कुछ इसी पर निर्भर करता है । आलस्य तथा उत्साह के लिए भी बहुत कुछ यही केन्द्र उत्तरदायी है । इसी तरह स्नायु संस्थान से निकट का सम्बन्ध रखने वाले पैराथाइराइड ग्रन्थि अवांछनीयता से जूझने का साहस उभारती है । कोशिका निर्माण, स्नायुतंत्र का गठन, स्फूर्ति , रोग प्रतिरोधी क्षमता का भण्डार इसी केन्द्र में भरा होता है ।
थाइमस ग्रन्थि वक्षस्थल के ऊपरी भाग में होती है । इसे विकास ग्रन्थि भी कहते हैं । भ्रूणावस्था से लेकर किशोरावस्था तक के विकास में इसी का योगदान रहता है । आपत्ति के समय उचित समाधान ढूँढ़ने और साहसिक कदम बढ़ाने की प्रेरणा गुर्दे के ऊपर स्थित एड्रीनल ग्रन्थि से मिलती है । वीरता और कायरता का इससे घनिष्ठ सम्बन्ध हैं । लिंग परिवर्तन की जो घटनायें होती रहती हैं, उसमें इसी ग्रन्थि के स्रावों की उलटी-पुलटी करतूतें झाँकती रहती है । जननग्रंथियों का सम्बन्ध यौवन एवं प्रजनन से होता है ।
जब से हारमोन रसायनों के संबंध में गहराई से जानकारी मिली है , तब से यह समझा जाने लगा है कि हृदय , गुर्दे आदि तो शाखा, टहनी मात्र हैं, शरीर रूपी वृक्ष की जड़ें तो अन्तःस्रावी ग्रन्थियों में गहराई से घुसी बैठी हैं । विचारणाओं-भावनाओं का खाद-पानी देकर हर कोई अपने अंतःस्रावी हारमोन तंत्र को सक्रिय एवं जीवन्त बनाये रख सकता है और शारीरिक सुदृढ़ता सुन्दरता, स्फूर्ति, इन्द्रिय क्षमता, जीवनीशक्ति से लेकर मानसिक प्रखरता तथा चिरयौवन का लाभ जीवन पर्यन्त तक उठाता रह सकता है ।
दोषारोपण या प्रशंसा प्रतिष्ठा के लिए अपने उत्थान पतन का लाभ-हानि का निमित्त कारण किसी दूसरे को भी बताया जा सकता है । किन्तु यथार्थता यह है कि मनुष्य अपने ही पैरों उठता और आगे बढ़ता है । गिरने और घाटा उठाने का निमित्त कारण भी वह स्वयं ही है ।
गीताकार ने कहा है ।
उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत् । आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ॥
अर्थात् “मनुष्य को अपना उद्धार आप ही करना चाहिए । अपने आप को गिराना नहीं चाहिए । मनुष्य स्वयं ही अपना बन्धु और स्वयं ही अपना बैरी भी है ।”
दूसरों को इतनी फुरसत कहाँ जो किसी की उन्नति में सहायता करे । सभी अपने-अपने काम में लगे हैं । अपनी समस्यायें हल करने में ही हर कोई व्यस्त है फिर पराई उन्नति के लिए कोई हर घड़ी साथ लगा फिरे यह कैसे संभव है ? यही बात पतन के गर्त में गिराने के संबंध में है । कोई किसी के हर घड़ी साथ रहे व उसे गिराए यह भी संभव नहीं । निरन्तर साथ में रहने वाली तो अपनी आत्मसत्ता ही है । अपने गुण या दोषों के कारण ही कोई स्वयं ऊँचा उठता या नीचे गिरता है ।
आत्मा ही आत्मा का बन्धु, मित्र हैं और आत्मा ही आत्मा का शत्रु । यहाँ आत्मा का अर्थ अपने आप से है । अपने स्वर-चिन्तन या चरित्र से है । अपना व्यक्तित्व ही ऐसा है जिसकी क्रियाएँ निरन्तर अपने आपको , अपने जीवनक्रम को प्रभावित करती हैं । यदि वह श्रेष्ठ है तो क्रियाकलाप भी वैसे ही होंगे । गुण-कर्म स्वभाव वैसा ही बनेगा । यदि व्यक्ति गया गुजरा है । स्वभाव की दृष्टि से हीन है । जो सोचता और कहता है निकृष्ट स्तर का है तो फिर जीवनक्रम का पूरा ढाँचा ही उसी स्तर का बन पड़ेगा । मनःस्थिति के अनुरूप ही परिस्थितियाँ बनती हैं । इस तथ्य को झुठलाया नहीं जा सकता ।
एक ही परिस्थितियों में पैदा हुए दो व्यक्तियों में से एक उन्नति के चरम शिखर पर जा पहुँचता है और दूसरा गिरते-गिरते घटते-घटते इतना नीचे जा पहुँचता है कि दोनों के बीच का अन्तर जमीन आसमान जितना दिखाई पड़ता है । इसके लिए दूसरों को श्रेय या दोष किस सीमा तक दिया जाय । दूसरों का दूसरे के जीवनक्रम को उठाने गिराने में यदि कुछ योगदान होता भी है तो उसे नगण्य ही कह सकते हैं । फिर वह नगण्य भी ऐसा होता है जिसे कोई भी अपने व्यक्तित्व के सहारे सुधर या बदल सकता है।
शरीर पर मन का अधिकार है । मन मस्तिष्क की इच्छानुसार शरीर की समस्त गतिविधियों का संचालन होता है । मन बुद्धि पर आत्मा का अन्तःकरण का अधिकार है । इस प्रकार समस्त व्यक्तित्व पर आत्मा का ही अधिकार बन जाता है । आत्मा के तीन प्रयोजन हैं । आकांक्षा, भावना, विचार इनका स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है । आत्मा की हवा जिस दिशा में बहती है उसी दिशा में जीवनक्रम लुढ़कने लगता है । जिस दिशा में अपनी गतिविधियाँ चलेंगी, उसी दिशा में प्रकार उत्थान पतन में से जिसका भी चुनाव करना हो उसे कर लेना पूरी तरह निर्भर है ।
इतिहास में ऐसी अगणित घटनाएँ हैं, जिनमें मनुष्य परिस्थितियों के अनुरूप चलने के लिए विवश नहीं हुआ है वरन् प्रतिकूल परिस्थितियों को भी अनुकूलता में उसने ढाला है । उनसे टक्कर लेता हुआ , परिवर्तन सुधार करता हुआ वह निरंतर आगे बढ़ा है ।
यह कथन एक सीमा तक ही सही है कि परिस्थितियों के दबाव से मनुष्य को दिशा विशेष में चलने या ढलने के लिए विवश होना पड़ता है । किन्तु यह कथन दुर्बल मनःस्थिति वालों पर ही लागू होता है । पशु पक्षियों का जीवनक्रम परिस्थितियों पर ही निर्भर होता है । मौसम की अनुकूलता-प्रतिकूलता के अनुरूप वे जाते मरते-सुखी रहते हैं । उसी स्तर के जो लोग हैं उनके लिए परिस्थितियाँ ही सब कुछ हैं । स्वतन्त्र चिन्तन के अभाव में , तेजस्विता-मनस्विता के अभाव में निचले दर्जे के मनुष्य भी उसी हवा में बहते रहते हैं जिसमें कि समय या अवसर उन्हें बहा ले जाता है । गिरिवासी-वनवासी पिछड़े हुए लोग इसी प्रकार दिन काटते हैं । किन्तु जिनमें प्रतिभा है वे परिवर्तन के लिए कमर कसते हैं और वैसा ही कर गुजरते हैं । “मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप है ।” यह तथ्य भी है और सत्य भी है । संसार में अनेकों दिशाओं में जाने वाली अनेकों पगडंडियाँ हैं । इनमें से किसी को भी चुनना और किसी पर भी चल पड़ना पूरी तरह मनुष्य की अपनी इच्छा पर निर्भर है ।किसी पगडंडी पर चलने के लिए विवश नहीं है ।
जिधर चलने को मनुष्य की अपनी आकांक्षा होती है उसी के अनुरूप साधन बनने और सहायक मिलते जाते हैं । संसार में सभी प्रकार के साधन मौजूद हैं और सहायकों की कमी नहीं । अपना संकल्प बल जैसा भी काम करता है उसी के अनुरूप परिस्थितियाँ ढलती जाती हैं । सहायक मिलते जाते हैं और साधन मिलते हुए चले जाते हैं । मात्र दुर्बल मनोबल के लोग ही जड़ता अपनाये रहते हैं । परिवर्तन में कुछ कठिनाई तो अवश्य पड़ती है पर उनमें से प्रमुख है संकल्प बल का अभाव ।
उत्थान की तरह भी अपने ही चुनाव पर निर्भर है । दोनों में से जिसे अपनाने की अपनी तीव्र आकांक्षा होती है उसी राह पर पैर उठने लगते हैं । मनुष्य के पैर ऐसे हैं जो जिस भी दिशा में चलें उसमें रोकने वाला कोई है नहीं । प्रतिकूलताएँ तो मात्र परीक्षक की तरह आती है । उनके हाथ में यह घोषणा करना मात्र है कि अमुक कार्य के लिए जितना मनोबल चाहिये जितना प्रयत्न पुरुषार्थ होना चाहिए उतना हुआ या नहीं । यदि उसमें कमी रही है तो दुबारा उस भूल को सुधारने के पूरी-पूरी गुँजाइश है । मनुष्य भाग्य में बँधा हुआ नहीं है। वरन् उसे साहस और परिश्रम के आधार पर विनिर्मित करता है । इस तथ्य के अगणित प्रमाण मौजूद हैं जिनमें कोई व्यक्ति गई गुजरी परिस्थितियों में साधन रहित अथवा सहयोग रहित वातावरण में उत्पन्न हुआ किन्तु स्वेच्छापूर्वक भिन्न प्रकार का निर्णय करने के उपरान्त दिशा विशेष में चला और कंकड़ पत्थर रौंदता हुआ, चट्टानों पर चढ़ता हुआ , नदी नाले तैरता हुआ निरन्तर चलता रहा और दे सबेर में लक्ष्य तक जा पहुँचा ।
यह केवल उत्थान के सिद्धान्त पर ही लागू नहीं होता । पतन के सम्बन्ध में भी यही सिद्धान्त लागू होता है । ऐसे असंख्य व्यक्ति हुए है जिन्हें जन्मजात सुविधा उपलब्ध थे । किन्तु कुमार्ग अपनाया और वैसे ही निकृष्ट स्तर के साथी सहयोगी मिलते चले गये और उस मार्ग पर चलते-चलते अन्ततः वे सर्वनाश के गर्त में जा गिरे । जन्मजात परिस्थितियाँ उन्हें नीचे गिराने के साधनों के लिए ही प्रयुक्त होती गयीं ।
उत्थान और पतन में से किसी को भी चुनना मनुष्य के पूरी तरह अपने हाथ में ही ।
गाँव में बूढ़ा बैठा-बैठा अपनी चौपाल पर लोगों को समझाया करता कि यदि जीवन में सुखी, और सफल होना चाहो तो एक सूत्र याद रखना “कभी क्रोध मत करना “। एक दिन एक पास के गाँव का व्यक्ति उधर से गुजरा। उसने बूढ़े की शान्ति और सादगी की बात सुन रखी थी । उसे भी उससे मिलने की उत्सुकता थी
वह बूढ़े के पास जाकर बैठ गया और बोला कि “मुझे कोई ऐसा सरल सा सूत्र बताएँ कि जीवन सफल हो जाय।”
बूढ़ा बोला “बस एक काम करना । किसी पर क्रोध मत करना ।” राहगीर ने थोड़ा कम सुनने का नाटक किया । उसने कहा-क्या कहा, मैंने सुना नहीं । बूढ़ा थोड़ा जोर देकर बोला “क्रोध मत किया कर” राहगीर बोला थोड़ा ठीक से एक दफा और बता दें । बूढ़ा तमतमाता बोला “क्रोध मत किया कर।” राहगीर ने लगभग बहरे की तरह जैसे ही पुनः दुहराने को कहा-बूढ़े ने छड़ी उठाई और उसकी खोपड़ी पर दे मारी । हजार दफा कह दिया है कि क्रोध मत किया कर । पर समझता ही नहीं है ।” जो उपदेश दिया जाता है , उस पर यदि स्वयं अमल नहीं किया जाता तो निरर्थक है ।
रिचर्ड फ्रिचफील्ड एक अच्छे समीक्षक और विश्लेषक रहे हैं। कृषि क्षेत्र के मूर्धन्य विशेषज्ञों में उनकी गणना होती रही है। इस क्षेत्र के दीर्घकालीन अनुभव के आधार पर उनने एक पुस्तक लिखी-भुखमरी की ओर जाता विश्व”। इसमें उनने आगामी वर्षा में विशेषकर सन् 2000 के बाद आने वाले समय में भारतीय कृषि जगत में होने वाली असाधारण क्रान्ति की चर्चा की है।
वे लिखते हैं कि सम्पूर्ण भारत में, पर विशेष कर गाँगेय क्षेत्र में हरित क्रान्ति इतनी जोर पकड़ेगी कि आगामी समय में वह उत्पादन संबंधी ऐसा कीर्तिमान स्थापित करेगी, जैसा इस सदी में पहले कभी नहीं हुआ। इसी के बलबूते वह विश्व के समक्ष यह उद्घोषणा करने में समर्थ हो सकेगा कि वह 100 लाख टन अनाज रिआयती मूल्य पर संसार के विभिन्न देशों को निर्यात कर सकता है। वे कहते हैं कि सन् 90 से 95 की अवधि के बीच भारत के पास ऐसे श्रेष्ठतम विश्व स्तर के कृषि विशेषज्ञ उपलब्ध होंगे, जिसके कारण फसल उत्पादन में जो अभूतपूर्व वृद्धि होगी, उससे वह विभिन्न प्रकार के दलहन, तिलहन एवं अन्य अनेक तरह के धान्यों के निर्यात से विश्व के निर्धन देशों की सहायता करने की स्थिति में आ जायेगा एवं स्वयं खाद्य के मामले में आत्मनिर्भर बन जायेगा।
उनके अनुसार उनका यह निष्कर्ष पिछले 10 वर्षों में भारतीय कृषि में होने वाली वैज्ञानिक उन्नति के अध्ययन पर आधारित है । उनका कहना है कि वर्तमान समय में कृषि संबंधी वैज्ञानिक संस्थाओं (21 कृषि विश्वविद्यालय तथा 30 अनुसंधानशालाओं) ने भारतीय कृषि को आधुनिक बनाने में जो महत्वपूर्ण योगदान दिया है , उसके परिणाम अभी से ही परिलक्षित होने लगे हैं । आने वाले समय में यदि वे सब मिल कर इस क्षेत्र में एक नया आयाम स्थापित कर दें, तो इसे आश्चर्य नहीं माना जाना चाहिए । वे अपनी पुस्तक में आगे लिखते हैं कि जिन देशों और लोगों ने भारत को गरीब और कंगाल देश के रूप में निरूपित किया है, संभवतः उनने सबसे बड़ी गलती यह की है कि वे इस देश की खाद्य उत्पादन संबंधी मूलभूत क्षमता का सही आकलन करने में सर्वथा अक्षम रहे है। अन्यथा इतनी बड़ी भूल कदापि न करते । इसके पास कुल भूमि का 4/5 वाँ भाग खेती के लिए पूर्णतया उपयुक्त है, जो अमेरिका जितनी (400 से साढ़े 400 मिलियन एकड़ ) ही है । यहाँ की भूमि अपेक्षाकृत अधिक उर्वर एवं फसल पैदा करने वाली है । यहाँ के किसान यदि सही ढंग से इस दिशा में जुट पड़ें, तो मिट्टी से भी सोना पैदा करने की क्षमता का प्रदर्शन कर सकते हैं । उनमें इस दिशा में धीरे-धीरे जाग्रति आ भी रही है ।
उनके अनुसार अधिकाँश विकसित देशों का खाद्य क्षेत्र में स्वावलम्बन का एक ही रहस्य है कि वे प्रचुर परिमाण में रासायनिक खादों का प्रयोग करते हैं, किन्तु इससे जिस गति से उनके खेत अनुर्वर और अनुपजाऊ बनते जा रहे हैं , उससे वे सर्वथा अनभिज्ञ हैं अथवा भिज्ञ हैं तो जानबूझ कर अधिकाधिक उपज लेने के चक्कर में वही, गलती कर रहे हैं, जो भूल उस व्यक्ति ने की थी, जो प्रतिदिन सोने का एक अण्डा देने वाली मुर्गी का पेट चीर कर सारे अण्डे एक ही दिन में निकाल लेने की उतावली बरती थी और जीवन भर पछताता रहा । भारत इस क्षेत्र में सौभाग्यशाली है । वह अपनी कृषि योग्य भूमि में सीमित क्षेत्र में ही रासायनिक खाद का प्रयोग करता है । उसका रासायनिक खाद पर आधारित खेती योग्य भूमि का कुल क्षेत्रफल मात्र 3500 लाख एकड़ है, शेष में कम्पोस्ट एवं गोबर जैसी घरेलू खादों का प्रयोग किया जाता है । इस भूमि की तुलना में उपरोक्त कृत्रिम खाद वाली भूमि को नगण्य ही समझा जा सकता है । वे कहते हैं कि इस दृष्टि से देखा जाय तो इस देश की अधिकाँश कृषि योग्य जमीन अभी बंजर बनने से सुरक्षित बची हुई है ।
यदि इस तथ्य का तुलनात्मक अध्ययन किया जाय तो बात और भी स्पष्ट हो जाती है । उनका अध्ययन के अनुसार पिछले 10 हजार वर्षों तक खेती करने में विश्व भर में यहाँ न्यूनतम रासायनिक खादों का उपयोग हुआ है और अब भी वैसा ही हो रहा है । इस संदर्भ में एक आँकड़ा प्रस्तुत कर तथ्य को और भी अधिक स्पष्ट करने का उनने प्रयास किया है । रिचर्ड क्रिचफील्ड के अध्ययन के अनुसार भारत में धान के लिए 1.5 टन प्रति हेक्टेयर रासायनिक खाद का उपयोग होता है , जबकि जापान सहित अन्य देशों में यह मात्र 6 टन प्रति हेक्टेयर के करीब है । गेहूँ के लिए यहाँ यह 2.5 टन प्रति हेक्टेयर के अनुपात में प्रयुक्त होती है, जब कि हालैण्ड में इसकी दर 6 टन प्रति हेक्टेयर है । अपने देश में मक्का पर इसका खर्च 1.5 टन प्रति हेक्टेयर के हिसाब से होता है, जबकि मिश्र के साथ-साथ अन्य विकसित एवं विकासशील देशों में इसकी औसत खपत 13-14 टन प्रति हेक्टेयर है ।
सिंचाई के साधन भी अब तेजी से बढ़ रहे हैं और सुदूर देहातों में, जहाँ खेती के लिए एकमात्र वर्षों जल जैसे साधन पर निर्भर रहना पड़ता था, उन स्थानों में भी इसकी समुचित व्यवस्था की जा रही है । क्रीच फील्ड लिखते हैं के यदि वर्तमान दर से यह व्यवस्था जारी रही तो आगामी पाँच वर्षों में सिंचित भूमि का क्षेत्रफल 1125 लाख से बढ़ कर 1550 लाख एकड़ तक पहुँचने की संभावना है । यदि ऐसा संभव हुआ, तो यह चीन के बाद दूसरा बड़ा सिंचित क्षेत्र होगा । सिंचाई के बढ़ते साधन से अब 27 सौ लाख एकड़ भूमि में कई फसलें उपजायी जा सकेंगी । इससे पूर्व यह सुविधा उपलब्ध न होने से इतने बड़े भूभाग में केवल एक ही फसल उपजायी जाती रही थी , किन्तु कृषकों को यह साधन प्राप्त हो जाने से वे अब अपने खेतों में भिन्न-भिन्न मौसम में अलग-अलग प्रकार की एक हरी वर्ष में कई फसलें लेने लगें हैं , यहाँ का 620 लाख एकड़ क्षेत्र द्विफसली है । धान की खेती वाली कुल 100 लाख एकड़ भूमि में से 500 लाख में इस समय एक साथ कई-कई फसलें एक वर्ष में काटने की प्रक्रिया बड़ी तेजी से अग्रगामी हो रही है । वे अपनी उक्त पुस्तक में लिखते हैं कि इस तेजी से यदि भारतीय कृषि में प्रगति जारी रही तो अनुमान है कि आगामी वर्षों में द्विफसली भूमि में कई हजार टन खाद्यान्नों की उपज अधिक होने की संभावना है, जो प्रति व्यक्ति भोजन की वर्तमान दर को 150 किलों से बढ़ाकर 180 किलो प्रति वर्ष कर देगी । यद्यपि वर्तमान के आकलन के अनुसार 20-25 प्रतिशत भारतीय अर्थात् लगभग 63 हजार लाख व्यक्ति कुपोषण के शिकार हैं, किन्तु लेखक आशावादी दृष्टिकोण अपनाते हुए कहते हैं कि यदि आने वाले वर्षों में इस संख्या में आश्चर्यजनक कमी आय, तो किसी को विस्मय नहीं करना चाहिए ।
इस संदर्भ में अन्यान्य स्रोतों से भी भारतीय कृषि में इन्हीं दिनों हो रही असाधारण प्रगति के साक्ष्य सदैव मिलते रहे हैं । इसे देखते हुए यदि आने वाले समय में रिचर्ड क्रीचफील्ड की भविष्यवाणी सत्य सिद्ध हो जाय , तो इसे अचम्भा नहीं माना जाना चाहिए , वरन् उस सच्चाई का द्योतक समझा जाना चाहिए जिसे उन्होंने अपनी विलक्षण वैज्ञानिक दृष्टि से पहले ही देख लिया था ।
विद्वान लेखक जॉन सी. टेलर कहते हैं कि औद्योगीकरण हरीतिमा का उन्मूलन तथा प्रकृति के अंधाधुन्ध दोहन से पृथ्वी के वातावरण में ऊपर मीलों तक विषाक्त गैसें घनीभूत हो गयी हैं । कार्बनडाइ आक्साइड गर्मी को ट्रप करने जकड़ने में एक सफल गैस है, उसकी मात्रा तेजी से वायुमंडल में बढ़ती जा रही है । “नासा “ शोध संस्थान के विशेषज्ञों का मत ‘साइंस’ पत्रिका में प्रकाशित हुआ है कि 1986 के अंत तक वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा 365 भाग प्रति दस लाख कण तक पहुँच गयी थी । सन् 1987 के अंत तक वह बढ़कर डेढ़ गुनी हो गयी है । इससे पूरी धरती का तापक्रम साढ़े चार डिग्री से 8 डिग्री फारेनहाइट तक बढ़ गया है । ध्रुवों पर असामान्य परिस्थितियाँ पैदा करने में उस की महत्वपूर्ण भूमिका है ।
एक ही कैमरे से एक ही वस्तु के अनेक कोणों से फोटो खींचे जाय, तो वे सभी एक-दूसरे से भिन्न होंगे । किसी में पीठ आएगी, तो किसी में चेहरा, किसी में बगल । इनमें से जो जिसे पसन्द करेगा, वह उसे अंगीकार करेगा । धर्म के सम्बन्ध में यही बात है । उसका सही स्वरूप अध्यात्म है । इसी को उत्कृष्ट दृष्टिकोण कहते हैं । इस आधार पर जो देखा और जाना जाता है , उसी को सही कह सकते हैं, अन्यथा सम्प्रदायवाद के साथ जुड़े हुए प्रचलन परस्पर एक-दूसरे से अत्यधिक भिन्न हैं । कई बार तो सत्यान्वेषी विवेक बुद्धि से उनका निरीक्षण-परीक्षण किया जाता है कि यह सारा जंजाल कहीं अन्धविश्वासों का जमघट ही तो नहीं है ।
कभी यह मान्यता थी कि अमुक सम्प्रदाय लोगों को दी ईश्वर पसन्द करता है और अन्य सम्प्रदाय वालों के बारे में सोचता है कि जैसे भी बने उन्हें अपने मत में सम्मिलित किया जाय । सहमत न हों तो अपने सिर कलम कर दिये जाएँ । मध्यकाल के सामंतों को जहाँ लूट-खसोट राज्य बढ़ाने की हवस थी, वहाँ यह जुनून भी कम न था कि अपनी बात न मानने वाले काफिरों का कत्लेआम किया जाय । इस मान्यता ने कितने निरीहों का रक्तपात कराया । इसे इतिहास के विद्यार्थी भली प्रकार जान सकते हैं ।
सम्राटों-सामंतों को दफनाते समय उनके साथ कितनी औरतें, कितने नौकर, दौलत दफन की जाती थी ताकि परलोक में यह सभी वस्तुएँ उन्हें उपलब्ध हो सकें । सद्गृहस्थों को पकड़ कर दास दासी बना लिए जाते । उन्हें खरीदने बेचने और पशुओं जैसा काम करने के लिए विवश करना किसी जमाने में आम रिवाज था ।
अमेरिका के रेड इन्डियनों और अफ्रीका के हवशियों में पशुओं की ही नहीं मनुष्यों के भारी संख्या में बलिदान का भी भारी प्रचलन था । उसी कारण कितनी ही जातियाँ एक दूसरों को बलि चढ़ाते-चढ़ाते नाम मात्र के लिए शेष रह गई । इन कृत्यों को करने वाले अपने को धर्मात्मा मानते थे और सोचते थे की ईश्वर यही चाहते हैं और इसी से प्रसन्न होता है।
भारत में ही सतीप्रथा, विधवा, विवाह , बाल विवाह, अपहरण जैसे अत्याचार नारियों के साथ किए जाते थे, उन्हें पर्दे में कैद रखा जाता था । मनुष्यों में भी एक चौथाई को अछूत कह कर मनुष्योचित अधिकारों से वंचित किया जाता था । देवताओं को प्रसन्न करने के लिए उनकी प्रतिमाओं के सामने सहस्रों निरीह पशुओं का वध किया जाता था । आदि-आदि ऐसे अनेकों प्रचलन थे जिन्हें सही माना जाता था और वैसा करने में शास्त्रकारों की आज्ञा का हवाला दिया जाता है । पिरामिडों के निर्माण में लाखों को मेहनत कराते-कराते उसी में पीस दिया गया । एक पुरुष सैकड़ों हजारों स्त्रियाँ हरम में रखता था। कभी लड़कियाँ बिकती थीं, अब लड़के बिकते हैं ।
ऐसी-ऐसी अनेक बातें हैं जिन्हें धर्म परम्परा, शास्त्र आज्ञा, ईश्वर की अच्छा मानकर कहा जाता है और अनेकों भावुकों का शोषण किया जाता है । ऐसे धर्म व्यवसायी धन और सम्मान दोनों हाथों से बटोरते हैं और अपने को देवताओं का एजेण्ट कहकर उनका अनुग्रह दिलाने के लिए महँगी फीस वसूल करते हैं ।
मात्र हिन्दू समाज में ही नहीं अन्य सम्प्रदायों में भी ऐसे बेतुके प्रचलनों की भरमार है जिनका विवेक की कसौटी पर कोई औचित्य सिद्ध नहीं होता , फिर भी उन सम्प्रदायों के मानने वाले पुरातन मान्यताओं को ही सब कुछ मानते हैं और समीक्षा या सुधार की बात कहने तक को अधर्म मानते हैं ।
धर्म सबसे पुरानी परम्परा है । उनके साम्प्रदायिक खण्ड इतने अधिक हैं कि उनकी गणना करते कठिनाई होती है । फिर उनके प्रचलन ऐसे हैं जिनके स्वरूपों और सिद्धान्तों में जमीन आसमान जैसा अन्तर है । फिर भी आश्चर्य इस बात का है कि उन सभी के अनुयायी अपनी-अपनी परम्पराओं पर इतने कट्टर हैं कि उनकी यथार्थता पर पुनर्विचार करने की तनिक भी गुँजाइश नहीं । अभी भी आये दिन दहेज कम मिलने पर स्त्रियों को जला देने, देवता को प्रसन्न करने के, लिए बच्चे चुराकर बलि चढ़ा देने , जैसे नृशंस कृत्य आये दिन होते रहते हैं और उन्हें करने वाले अपने को अपराधी नहीं मानते, वरन् परम्परा के निर्वाह के लिए अपनाया गया औचित्य ही मानते हैं ।
यह धर्म चर्चा का विषय हुआ । अपराधियों की , दुराचारियों की , व्यसनियों की अपनी बिरादरी है और वे अपने कृत्यों को शान दिखाने का प्रसंग मानते हैं । न लज्जित होते हैं और न उन कुमार्गों को छोड़ने की बात सोचते हैं , यह दृष्टिकोण ही है जिसके कारण मनुष्य ऐसे ढाँचे में ढल जाते हैं कि जो किया अपनाया गया है उस पर नए सिरे से विचार करने और उचित अनुचित का विचार करने तथा ढर्रे में परिवर्तन करने तक की आवश्यकता नहीं समझते । वेश्याएँ अपनी सफलता और चतुरता की डींगें अपने समुदाय में बढ़-चढ़ कर मारती हैं ।
यहाँ एक और कठिनाई है कि जिसने जो ढर्रा अपना रखा है वह उसका औचित्य तर्कों के सहारे भी सिद्ध करने में पीछे नहीं रहता । यों तर्क से ही उचित अनुचित के निर्णय करने का रिवाज है , पर बुद्धि के विकास ने इस क्षेत्र को भी अप्रामाणिक बना दिया है और विश्व मानव की एकता-एक दिशा अपनाने में बाधक बन रही है । मतभिन्नता के रहते प्रगति की किसी योजना को कार्यान्वित करना और सफलता के स्तर तक पहुँचाना कभी भी संभव न हो सकेगा ।
भूतकाल के अनौचित्य, वर्तमान के दुराग्रह और भविष्य के अन्धकार को ध्यान में रखते हुए हमें ऐसे उपाय खोजने चाहिए जिनसे विग्रहों के आधार ढहें और एकता के औचित्य के द्वार खुलें। दार्शनिक क्षेत्र में यह आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है ।
आवश्यकता है कि न्याय , औचित्य विवेक का आश्रय लिया जाय और पूर्वाग्रहों से अपने दृष्टिकोण को मुक्त रखा जाया । अपने आग्रहों को ईश्वर, देवता, पैगम्बर आदि की उक्त बताने की दुहाई न दी जाय और न अपने मान्यताओं को चमत्कारी , दैव शक्तियों से सम्पन्न सर्वज्ञ ठहराया जाय । इन आधारों को अपनाने से औचित्य के प्रति अन्याय ही होगा । हमें स्वतंत्र चिन्तन का आश्रय लेना चाहिए और प्रचलित मतमतान्तरों में से कौन ज्येष्ठ और श्रेष्ठ के झंझट में न पड़ कर नई दृष्टि अपनानी चाहिए कि प्रस्तुत प्रचलनों को किसी विशेष समय की आवश्यकताओं के अनुरूप गढ़ा हुआ मानना चाहिए । ग्राह्य और अग्राह्य का निर्णय तर्कों के सहारे नहीं, वरन् मानवी गरिमा के अनुरूप भावनाओं के सहारे करना चाहिए ।
अर्थशास्त्र बताता है कि नई पीढ़ी को स्थान देने के लिए पुरानों को बूचड़खाना पहुँचाना चाहिए । यदि यह सिद्धान्त पशुओं के लिए सही है तो मनुष्यों के लिए प्रचलित क्यों हो समता ? फिर बूढ़े माँ-बापों को कसाईखाने भिजवाना पड़ेगा । “जिसकी लाठी उसकी भैंस” का जंगली कानून यदि सही ठहराया जाय तो ‘बड़ी मछली छोटी को निगल लेती है ‘ का सिद्धान्त मनुष्यों पर भी लागू करना होगा और इस संसार में सभी दुर्बलों का एक सिरे से सफाया करना होगा । देशभक्ति की दुहाई दी जाती रही तो क्षेत्र विशेष की सुविधा ही सब कुछ मानी जायगी और विदेशों के साथ अन्याय होने की बात पर विचार न हो सकेगा । इसलिए हमें वास्तविक न्याय का निर्णय करने के लिए स्वयं सृष्टि का स्रष्टा बन कर सभी को सन्तान मानते हुए उचित अवसर प्रदान करना पड़ेगा या फिर अगली शताब्दी की देहरी पर खड़े होकर आदि से अन्त तक नए कानूनों का इस आधार पर निर्धारण करना होगा जिससे भविष्य में किसी अनुचित विग्रह के लिए गुँजाइश न रहे । मनुष्यों में से प्रत्येक को मानवी मौलिक अधिकारों का संरक्षण मिले साथ ही सृष्टि के अन्य प्राणियों को भी इस धरती पर रह सकने की सुविधा मिले ।
दुर्जन मुट्ठी भर होते हैं, पर वे संगठित गिरोह बनाकर आक्रमण करते हैं और तथाकथित सज्जन मिलजुल कर उनका विरोध नहीं करते, फलतः संसार में अनीति और अपराधों की बाढ़ आती है । होना यह चाहिए कि अनाचारियों का सामूहिक बहिष्कार और विरोध हो, साथ ही मिलजुल कर सब उनके विरुद्ध संघर्ष करें । शासन को कहा जाय कि सुधार की आशा से दरगुजर करने वाले या हलका दण्ड देकर जमानत पर छुट्टा छोड़ देने की अपेक्षा अपराधी के साथ उतनी कड़ाई की जाय जिसे देखकर दूसरों को वैसा करने का हौसला न बढ़े । शासन को जहाँ सत्प्रवृत्तियों का समर्थन अभिवर्द्धन करना चाहिए वहाँ यह भी नितान्त आवश्यक है कि आततायी को प्रताड़ना सहनी पड़े और पश्चाताप करना पड़े ।
सम्प्रदायों की अनुपयुक्तता देखते हुए उनसे निरपेक्ष हो जाना और चाहे जिसको चाहे जो करने की छूट नहीं देनी चाहिए । ऐसी छूट प्रकारान्तर से अनीति का समर्थन एवं प्रोत्साहन है । हमें उपेक्षापूर्वक रिक्तता उत्पन्न नहीं करनी चाहिए , वरन् एक नवीन मानव धर्म की संरचना करनी चाहिए और उसमें परिपालन करने के लिए लोगों से अनुरोध करते रहने की अपेक्षा बाधित करने की कठोरता अपनानी चाहिए । राजनीतिकवाद भी मात्र शासन की अर्थव्यवस्था की देख-भाल करते हैं और मूर्खों के बहुमत का जिस-तिस प्रकार समर्थन प्राप्त करके अपनी मनमानी चलाते हैं । यह सब भी अपूर्ण है । हमें उतनी गहराई तक जाना होगा जिससे मानवी तत्त्वदर्शन का शिलान्यास हो । चिन्तन में उत्कृष्टता, चरित्र में आदर्शवादिता और व्यवहार में सज्जनता का समावेश हो। वस्तुतः इसी परिधि में मानव जीवन की समस्त समस्यायें आती है । जिससे इस सुविस्तृत क्षेत्र का समाधान निकले उसी को सच्चे अर्थों में तत्त्वदर्शन समाज विज्ञान या शासन तंत्र कहना चाहिए , फिर उसका नाम कुछ भी क्यों न रखा जाय । मनुष्य को सत्प्रयोजन अपनाने की पूरी छूट मिलनी चाहिए, पर उसकी धूर्तता को इतने कड़े शिकंजे में कसना चाहिए कि पीछे हटने या आगे बढ़ने की कोई गुँजाइश न रहे ।
बढ़ते हुए विज्ञान और बुद्धिवाद ने दुनिया का सिकोड़ कर एक बस्ती जैसी सीमित कर दिया है । इसमें एकता और समता की रीति-नीति ही चल सकती है । मनमौजी खींचतान चलाने और कलह के सर्वनाशी बीज बोने की छूट पिछले दिनों मिलती रही होगी, पर अब उसकी तनिक भी गुँजाइश नहीं है । हमें एक बिरादरी नहीं , एक परिवार बना कर रहना होगा और एक भाषा , एक देश , एक धर्म , एक दर्शन अपना कर ही शान्तिपूर्वक रहना होगा । इस प्रयास में प्रत्येक वर्ग को अपनी पूर्व मान्यताओं के प्रति दुराग्रह छोड़ना होगा और यह सोचना होगा कि अगले दिनों इस संसार का ऐसा सुन्दर सुसंस्कृत कैसे बनाया जा सकता है जिसमें अमीरी-गरीबी को सब लोग मिल बाँटकर खायें ।
शक्ति और बुद्धि के सत्परिणामों से सभी लोग मिलजुल कर लाभ उठाये और हँसती-हँसाती जिन्दगी जिये । इसके लिए समुचित साधन भी मौजूद हैं और पर्याप्त अवसर भी । आवश्यकता इस बात की है कि दूरदर्शी विवेकशीलता के धनी अपने चिन्तन को इस केन्द्र-बिन्दु पर एकाग्र करें कि मानवी गरिमा के अनुरूप चिन्तन क्या हो ? लोग उसे अपनाने और चरित्र में उतारने की प्रेरणा देने वाला शिक्षण किस प्रकार के विद्यालयों और कि स्तर के साहित्य सत्संग द्वारा प्राप्त करें ? शासन किस प्रकार चले ? अब तक यही सोचा जाता रहा है ।
नय युग की आवश्यकता है कि यह निर्धारण किया जाय कि समाज का स्वरूप क्या हो और उसकी आचार संहिता अपनाने के लिए जन-जन को किस प्रकार सहमत किया जाय । जिनकी नस-नस में धूर्तता भरी पड़ी है उन्हें कड़ी प्रताड़नायें सहने के लिए बाधित किया जाय । अब इतना समय शेष नहीं रह गया है कि फिर पीछे कभी के लिए बात टाली जा सके । हम जीवन मरण की विभीषिकाओं के बीच जूझ रहें हैं । उपाय एक ही शेष है -आध्यात्मिक दृष्टिकोण का स्वरूप निर्धारण और उसका अनुशासनपूर्वक परिपालन ।
पर्यवक भी शिक्षा बहुत उच्चकोटि की थी । वे ग्राम्य जीवन की अनेक समस्याओं की विशेषज्ञ भी थीं । उनकी विद्वता की धाक थी । चाहती तो कोई भी काम प्राप्त कर सकती और अच्छा वेतन कमा सकती थीं ।
पर उनसे ग्राम्य जीवन की समस्याओं को सुलझाना ही अपना लक्ष्य बनाया । वे देहात में एक छोटे खेत पर झोंपड़ी बनाकर आजीवन रहीं । ग्राम्य समस्याओं पर उनने प्रायः अस्सी पुस्तकें लिखी । वे उन विचारों का प्रचार करने ग्रामीणों के बीच जाया भी करती थीं चित्त को डुलाये बिना उनने अपना 75 वर्ष का पूरा जीवन इसी निमित्त लगा दिया । इन्हें एक मिशनरी के रूप में ही स्मरण किया जाता है ।
रामकृष्ण परमहंस के शिष्य मथुरा बाबू ने एक मन्दिर बनाया और उसमें विष्णु भगवान की मूर्ति स्थापित करा दी गई । मूर्ति बड़ी लुभावनी थी । वस्त्राभूषण से साज संवार की गई थी । कुछ ही दिन बीते होंगे कि चोर मूर्ति के कीमती आभूषणों को चुरा ले गये । प्रतिमा अब उतनी आकर्षक नहीं लगती थी । मथुरा बाबू उदास होकर बोले कि भगवान् आपके हाथ में गदा और चक्र दो-दो हथियार लगे रहे फिर भी-चोर चोरी कर ले गये । इससे तो हम मनुष्य अच्छे । कुछ तो प्रतिरोध करते ही है । पास खड़े रामकृष्ण भी यह वार्तालाप सुन रहे थे । वे बोले पड़े- “मथुरा बाबू ! भगवान को गहनों और जेवरों का तुम्हारी तरह लोभ और मोह नहीं है और फिर उनकी भण्डार में कमी किस बात की है जो रात भर जागते और तुच्छ गहनों की रख वाली करते । “
मनुष्य भगवान का ज्येष्ठ राजकुमार है और इस सृष्टि का मुकुटमणि भी । भगवान ने अपनी सृष्टि में उसकी संरचना सिर्फ इसलिए नहीं की, कि वह भी अन्य जीवों की तरह शिश्नोदरपरायण बना रहे और मानव जीवन के इस बहुमूल्य अनुदान को इसी तरह बरबाद कर दे, वरन् उसने उससे यह भी अपेक्षा रखी है कि वह स्वयं को अन्य प्राणियों की तुलना में श्रेष्ठ , वरिष्ठ व बुद्धिमान-विवेकवान सिद्ध करें, किन्तु विडम्बना यह है कि वह भगवद्-इच्छा और अपने दायित्वों को भुला कर उदरपूर्ति को ही अपना एक मात्र कर्तव्य मान बैठा है और इसी निमित्त तरह-तरह के कौतुक रचता रहता है । इन दिनों ऐसी ही घटनाएँ आये दिन देखने सुनने को मिलती रहती हैं ।
मेलबोर्न (आस्ट्रेलिया ) निवासी टील्फ डेविड हेलपर इन्हीं कौतुकियों में से एक हैं । हुआ यों की वह एक बेरोजगार युवक था । उसे पैसे की नितान्त आवश्यकता थी, किन्तु किसी स्रोत से किसी भी प्रकार धन कमाने में वह सर्वथा विफल रहा । इससे वह काफी चिन्तित और परेशान हुआ। एक दिन जब वह सो रहा था , तो एक स्वप्न देखा कि वह जमीन पर बिना किसी वस्त्र के लेटा हुआ है और उसके शरीर पर एवं इर्द-गिर्द भाँति-भाँति के कृमि-कीटक रेंग रहे हैं । इनसे वह तनिक भी भयभीत नहीं हो रहा है । जब वह उठा, तो उसके मन-मस्तक पर वह दृश्य ज्यों-का त्यों बना हुआ था । उसने उसी समय यह निश्चय किया , कि वह जीव-जन्तुओं के माध्यम से नये-नये करतब दिखा कर लोगों को चमत्कृत करेगा और धन कमाएगा । बस, फिर क्या था, उसने अपने निश्चय को व्यावहारिक रूप देना आरंभ किया । वह तरह-तरह के जीव-जन्तु पाल कर उन्हें प्रशिक्षित करने लगा एवं उनसे भाँति-भाँति के कौतुक दिखाकर पैसा कमाना आरंभ किया । वह जहाँ भी गया उसे ढेर सारे पैसे मिले । उसका सारा जीवन इसी में खप गया ।
धन कमाना बुरा नहीं है, इसे ही सब कुछ मान लिया जाय पर जहाँ ठगी और प्रवंचना जैसी युक्तियों का सहारा लिया जाय वहाँ वह निश्चय ही हेय और निन्दनीय है । यह बात दूसरी है कि बाद में इसे अनुचित मानकर राशि लौटा दी गई है ।
इंग्लैण्ड के विलसन बन्धुओं ने अपनी दीनता मिटाने के लिए ऐसे ही उपाय का अवलम्बन लिया । विभिन्न प्रकार के कार्यों में जब उन्हें सफलता नहीं मिली , तो वे इंग्लैण्ड से जमैका (वेस्टइंडीज) पहुँचे, वहाँ उन्होंने कोई काम ढूँढ़ना चाहा पर विफल रहे । कोई धन्धा आरंभ करने के लिए पैसों की आवश्यकता थी । पर पैसे कहाँ से आयें ? उनके पास तो फूटी कौड़ी भी नहीं भी । पेट भरने के लिए ही उन्हें जहाँ-तहाँ की खाक छाननी पड़ती । अन्ततः उन्होंने तत्कालीन दास-व्यापार-से लाभ उठाने का निश्चय किया । इसके लिए बड़े भाई जिम ने छोटे भाई जेड को ‘दास’ के रूप में प्रयुक्त किया । उसके बालों का मुण्डन कर काले रंग से पूरी तरह रंग कर उसे एक काले अफ्रीकी का रूप दे दिया और बाज़ार में बेच दिया । इसमें उसे एक बड़ी राशि प्राप्त हुई कुछ दिन मालिक के पास रहने के उपरान्त पूर्व निर्धारणानुसार जेड चकमा देकर भाग आया । इसके बाद उसने अपना रंग छुड़ाया और फिर से एक काले अफ्रीकी से बदल कर गोरा अँगरेज बन गया । इस राशि से दोनों भाइयों ने मिल कर व्यापार आरंभ किया, जिसमें उन्हें बड़ा मुनाफ़ा मिला । जब वे वापस इंग्लैण्ड लौटने लगे, तो उनके पास 32 हजार पौण्ड थे, पर जमैका से वापस जाने से पूर्व उन्होंने जिस व्यापारी को ठगा था, उसे वह सम्पूर्ण राशि लौटा दी ।
किसी ने ठीक ही कहा है-बँधी मुट्ठी लाख की , खुली तो खाक की “। मनुष्य जन्म निश्चय ही बँधी मुट्ठी की स्थिति में लेता है, किन्तु जब इस नश्वर संसार से कूच करता है, तो उसकी मुट्ठी सर्वथा खुली रहती है । धन-सम्पत्ति सब कुछ यहीं रह जाते हैं । उसके साथ जाता है, तो एकमेव उसका कर्म । फिर शुभाशुभ कर्म के हिसाब से उसे दूसरे जीवन में उसका फल शुभाशुभ कर्म के हिसाब से उसे दूसरे जीवन में उसका फल भोगना पड़ता है । अतः विवेकशील उसे ही कहा जा सकता है, जो धन जोड़ने के चक्कर में अपना सम्पूर्ण जीवन बरबाद करने की तुलना में समाज-सेवा संबंधी कोई ऐसा कार्य करे , जो न सिर्फ उसे धन्य बनाकर उसका लोक और परलोक सुधार दे , वरन् उस परमपिता को भी गौरवान्वित होने का अवसर प्रदान करे, जिसकी वह सन्तान है ।
अग्निपुराण में उल्लेख है-एहि कामुष्यिकं सर्व गायत्री जपतो भवेत।” अर्थात् गायत्री जप से सभी साँसारिक कामनायें पूर्ण होती हैं। अन्यत्र भी गायत्री को ‘सकल काम फल प्रदाम्’ सब कामनाओं को पूर्ण करने वाला कहा गया है। सभी साधना ग्रन्थों में गायत्री उपासना के सत्परिणामों की चर्चा की गयी है और कहा गया है कि जिनने भी इस महामंत्र का आश्रय लिया उन्होंने आशाजनक और उत्साहवर्धक फल पाया है। प्राचीनकाल से लेकर अब तक ऐसी अनेकों घटनायें घटित होती रही हैं जिनसे यह प्रमाणित होता है कि कभी भी किसी भी साधक की गायत्री उपासना निष्फल नहीं जाती। वह साधारण से साधारण और असाधारण से असाधारण समस्याओं को सुलझाने से लेकर सुख-सम्पदा ऋद्धि एवं स्वर्ग-मुक्ति तक के चमत्कारी सत्परिणाम उत्पन्न करती रही है।
प्राचीन युगों में प्रायः सभी ऋषि-मनीषियों ने इसी महामंत्र के आधार पर अपनी योग-साधनाओं एवं तपस्याओं की ओर आप्तकाम बने हैं। सप्तऋषियों को प्रधानता गायत्री द्वारा ही मिली। बृहस्पति इसी शक्ति को दक्षिणमार्गी साधना करके देवगुरु बने। शुक्राचार्य ने इस महामंत्र का वाममार्गी भाग अपनाया और वे असुरों के गुरु हुए। साधारण ऋषि, मुनि उन्नति करते हुए महर्षि, ब्रह्मर्षि एवं देवर्षि का पद प्राप्त करते थे। इन ऋषि-मुनियों ने अपने ग्रन्थों में गायत्री की मुक्त कण्ठ से एक स्वर से महिमा गायी है और बताया है कि गायत्री उपासना के लाभ असंदिग्ध है। यदि इसे नित्य नियमित रूप से किया जाता रहे तो उपासना के सत्परिणाम सुनिश्चित दिखाई देते हैं।
किन्तु कई बार नियमपूर्वक की गई साधना अनुष्ठान के
भी आशाजनक परिणाम नहीं दिखाई देते तो निराशा होती है और इस महाशक्ति से अविश्वास होने लगता है। पर ऐसी स्थिति के साधक को अधीर नहीं होना चाहिए। कई बार साधना का एक अंश पूर्व जन्मों के पाप निवारण में लग जाता है। श्रीमाध्वाचार्य एवं स्वामी विद्यारण्य जैसे महान साधकों के जीवन में इस घटनाक्रम को प्रत्यक्ष देखा जा सकता है।
आयुर्वेद के प्रसिद्ध ग्रन्थ ‘माधवनिदान’ के रचयिता श्रीमाध्वाचार्य वृन्दावन में कठोर गायत्री उपासना करने में संलग्न थे। लगातार तेरह वर्ष उन्हें विधिपूर्वक पुरश्चरण करते हुए बीत गये, पर कोई विशेषता उन्हें अपने में दिखाई न पड़ी। तप का कोई फल दृष्टिगोचर न हुआ तो वे खिन्न रहने लगे और अपनी असफलता से खीझकर वे वृन्दावन छोड़ काशी जा पहुँचे।
उदासी उन्हें घेरे हुए थी। मणिकर्णिका घाट पर बैठे हुए सोच-विचार में मग्न थे कि उसी श्मशान में रहने वाला एक कापालिक अघोरी उनके पास आया और उदासी एवं चिन्ता का कारण पूछने लगा। श्रीमाध्वाचार्य ने वस्तुस्थिति कह सुनाई। अघोरी ने कहा-योग की दक्षिणमार्गी वैदिक साधनायें देर में फल देती है। बरगद की तरह वे धीरे-धीरे बढ़ती हैं, समय पर परिपक्व होकर साधक का कल्याण करती हैं और चिरस्थायी फल देती हैं। इसमें धैर्यवान् साधक ही सफल होते हैं। पर तांत्रिक साधना में यह बात नहीं है। उसमें लाभ तो निम्न स्तर का ही मिलता है और वह ठहरता भी थोड़े दिन है, पर मिलता जल्दी है। जिन्हें धैर्य नहीं उन आतुर लोगों के लिए जल्दी लाभ दिखाने वाली तांत्रिक साधना लाभदायक हो सकती है। आपको चमत्कार देखने की जल्दी हो तो श्मशान साधना करो। विधि में बता दूँगा।’
श्रीमाध्वाचार्य सहमत हो गये और वे उसी स्थान पर रहकर कापालिक की बताई हुई अघोर क्रिया के अनुसार तंत्र साधना करने लगे। उन्हें नित्य डरावने और प्रलोभन भरे आकर्षण दिखाई देते, पर कापालिक के निर्देशानुसार वे उनसे तनिक भी विचलित हुए बिना साधना में संलग्न रहे। एक वर्ष बीत गया। एक दिन अदृश्य से आवाज आई कि तुम्हारा मंत्र सिद्ध हो गया, कुछ उपचार-वरदान माँगो। पहले तो उनका उधर ध्यान नहीं गया, पर जब बार-बार यही आवाज सुनाई दी तो उनने पूछा-आप कौन हैं? किस प्रकार का उपहार दे सकते हैं उत्तर मिला हम भैरव हैं। तुम्हारी सफल साधना से प्रसन्न होकर वरदान देने आये हैं। श्रीमाध्वाचार्य ने कहा विश्वास नहीं होता, इसलिए पहले कृपया सामने आइये और दर्शन दीजिये ताकि मैं वस्तु स्थिति समझ सकूँ।
भैरव ने कहा-गायत्री उपासना से तुम में इतना ब्रह्मतेज उत्पन्न हो गया है कि उसकी प्रखरता मैं सहन नहीं कर सकता अतः सामने भी नहीं आ सकता। जो कहूँगा पीछे से ही कहूँगा। इस पर श्रीमाध्वाचार्य को भारी आश्चर्य हुआ और उनने प्रश्न किया कि-यदि गायत्री उपासना का ऐसा ही महत्व है तो कृपया बताइये कि तेरह वर्ष तक कठोर तप करते रहने पर भी मुझे कोई अनुकूल अनुभव क्यों नहीं हुआ। आप इसका रहस्य बता सकें तो मेरे लिए इतना ही पर्याप्त होगा।
जिज्ञासा का समाधान करते हुए भैरव ने श्रीमाध्वाचार्य को नेत्र बंद करके ध्यान भूमिका में जाने को कहा। उन्हें तत्काल पूर्व जन्मों के दृश्य दिखाई पड़ने लगे। पिछले तेरह जन्मों के दृश्य दिखाई पड़ने लगे। पिछले तेरह जन्मों में उनने एक से एक भयंकर पाप किये थे। इस दृश्य को जब से देख चुके तब भैरव ने कहा-तुम्हारे तेरह वर्ष की साधना पिछले 13 जन्मों के पापों के शमन में लग गयी। जब तक दुष्कर्म जन्य कुसंस्कार दूर नहीं होते तब तक गायत्री उपासना उसी की सफाई में खर्च होती रहती है। तुम्हारी विगत साधना ने पूर्व संचित पापों का समाधान किया है और अब नये सिरे से पुनः उसी पुरश्चरण साधना को आरंभ करने से सफलता मिलेगी। समाधान पाकर प्रसन्न मन श्रीमाध्वाचार्य पुनः वृन्दावन लौट आये और गायत्री उपासना आरंभ की। फलस्वरूप उन्हें आशाजनक प्रतिफल प्राप्त हुआ। भगवती का साक्षात्कार हुआ और वे कृतकृत्य हुए।
श्रीमाध्वाचार्य से ही मिलता-जुलता कथा प्रसंग स्वामी विद्यारण्य जी के जीवन में परिलक्षित होता है। दक्षिण भारत के इस महान संत को नाम धार्मिक एवं संस्कृत साहित्य से परिचय रखने वाला कौन नहीं जानता कि जिसने वेद, उपनिषद् एवं ब्राह्मण ग्रन्थों के भाष्य से लेकर ब्रह्मगीता, सर्वदर्शन संग्रह, पंचदशी आदि अनेक कृतियों का निर्माण कर अपने को अमर तो किया ही साथ ही संस्कृत वांग्मय को भी धनी बना दिया। युवावस्था से ही विद्यारण्य ने गायत्री महामंत्र की उपासना आरंभ कर दी थी। उनकी यह तपस्या चौबीस महापुरश्चरणों तक चलती रही। तप करते हुए दीर्घकाल बीत गया, पुरश्चरण भी पूरे हो गये, फिर भी उन्हें गायत्री माता के दर्शन-साक्षात्कार नहीं हुआ। अपनी इस असफलता से वे बड़े खिन्न हुए ओर निराश होकर संन्यास ग्रहण कर लिया।
संन्यास हुए कुछ ही समय बीते थे कि एक दिन गायत्री माता ने उन्हें दर्शन दिया। इस पर उन्हें जीवन धन्य हो जाने की अत्यधिक प्रसन्नता भी हुई ओर आश्चर्य भी। माता से उनने पूछा-जब मैंने आपके दर्शनों की इच्छा से चौबीस पुरश्चरण किये तब आपने मुझे दर्शन नहीं दिया और अब मैं सब प्रकार की कामनाओं को छोड़कर जब संन्यासी हो गया हूँ, तब आप अनायास ही दर्शन देने चली आयी हैं? इसका क्या कारण है? इस पर माता ने उन्हें बताया कि मेरी उपासना कभी निष्फल नहीं जाती। सर्वप्रथम मैं साधक को पूर्वकृत पापों से छुटकारा दिलाती हूँ। जब तक पूर्व जन्मों के एवं इस जन्म के सब पाप नष्ट नहीं हो जाते तब तक उपासक के वे दिव्य नेत्र नहीं खुलते जिनसे मेरा दर्शन होता है। तुम्हारे पुरश्चरणों से पूर्व जन्मों के चौबीस महापातक नष्ट हुए हैं और अब तुम इस योग्य हुए हो कि मेरा दर्शन प्राप्त कर सको। मेरे अनुग्रह की बरसात तो तभी आरंभ हो गयी थी जब तुम मेरी ओर उन्मुख हुए थे, पर वात्सल्य का उभार अब आया जब तुम सच्ची भक्ति में प्रवृत्त हुए हो। इतना सुनकर विद्यारण्य के आनन्द का ठिकाना न रहा वे माता के चरणों में लिपटकर अपने प्रेमाश्रुओं से उन्हें धोने लगे। वरदान माँगने के लिए कहने पर भी वे जब कुछ नहीं माँग सके तो माता ने अपनी ओर से कहा-तुम संसार के कल्याण के लिए सद्ग्रन्थों की रचना करो। मैं तुम्हारी लेखनी पर विराजमान् रहूँगी।’ विद्यारण्य स्वामी ने माता का आदेश शिरोधार्य किया और वे सद्ग्रन्थों की रचना में लग गये।
शास्त्रों में कहा गया है कि गायत्री उपासना से क्या कुछ नहीं मिलता अर्थात् सब कुछ हस्तगत हो जाता है। पर उपासना करने वाले हममें से अनेकों की स्थिति ऐसी ही होती है कि कुछ दिन साधना करने के पश्चात् पूर्व जन्मों के और इस जन्म के पाप, कुसंस्कारों की अधिकता के कारण जब आध्यात्मिक प्रकाश नहीं पाते, अभीष्ट परिणाम नहीं देखते तो निराश हो उठते हैं। यदि धैर्यपूर्वक गायत्री उपासना को श्रद्धा विश्वासपूर्वक एक निष्ठ होकर अपनाते रहा जाय, तो गायत्री साधना के लाभों से सुनिश्चित रूप से लाभान्वित होते रहा जा सकता है, इसमें कोई संशय नहीं।
जीवन का उद्देश्य क्या है ? जिज्ञासा सच्ची हो तो वह कब अधूरी रही है । इस सृष्टि के सृजेता का विधान है कि जो भी अपने को जिसका अधिकारी बना लेता है, उसे पानी से वंचित नहीं रखा जाता है ।
आत्म साक्षात्कार या भगवत्प्राप्ति ? उत्तर तो एक ही है । यही उसे भी मिलना था और मिला और यह तो तुम्हारे अधिकार एवं रुचि पर निर्भर करता है कि तुम किसे चुनोगे । यदि तुम मस्तिष्क प्रधान हो तो प्रथम और हृदय प्रधान हो तो द्वितीय ।
वह सैनिक है सच्चा सैनिक और समझ लेना चाहिए कि सच्चा सैनिक लगन का सच्चा होता है । वह पीछे पैर रखना नहीं जानता किसी क्षेत्र में बढ़ने पर । सौभाग्य से पिता साधु सेवी थे और सत्संग ने उसे सिखा दिया है कि संसार के भोग तथ्यहीन हैं, उनमें सुख की खोज चावल के लिए भूसी कूटने जैसे है ।
‘परमार्थ का मार्ग तो वह दिखला सकता है, जिसने स्वयं उसे देखा हो ।’ आध्यात्म बौद्धिक विवाद का विषय नहीं, यह तो जीवनक्रम की संरचना में आमूल-चूल परिवर्तन का विज्ञान है और इसे वही दिखा बता सकता है जिसने स्वयं इस असम्भव का सम्भव किया हो । कालक मुनि की बातें , स्थविर कश्यप का मोहक वाक्जाल उसे इसी कारण नहीं आकर्षित कर सका । जिनकी वाणी और कर्म में विरोधाभास हो, उसे मार्गदर्शक बनाने का मतलब है, समूचे जीवन को नष्ट कर देना । उसने निश्चय किया महर्षि पतंजलि के श्रीचरण ही मेरे आश्रय हो सकते हैं ।
इस प्रेरणा के प्रबल प्रवाह में बहता हुआ वह बाल्हीक देश से विदिशा जा पहुँचा था । विदिशा से उज्जैन जो राजमार्ग जाता था, गोनर्द उसी पर एक छोटा सा नगर था । आचार्य पतंजलि का आश्रम उसी के समीप एक उद्यान में स्थित था । जब वह आश्रय में पहुँचा तो साँझ हो चुकी थी । सब आश्रमवासी यज्ञशाला में एकत्र थे । हवनकुण्ड में अग्नि प्रज्ज्वलित की जा चुकी थी और मन्त्रोच्चारण के साथ आहुतियाँ दी जा रही थीं । वह यज्ञशाला के एक कोने में जाकर बैठ गया । जब यज्ञ समाप्त हुआ , तो वह महर्षि के पास गया और चरण स्पर्श कर उन्हें प्रणाम निवेदन किया । “तुम ? “ आचार्य के सुदीर्घ स्नेह प्लावित नेत्रों में जिज्ञासा की चमक थी।
“मेरा नाम पुष्यमित्र है, आचार्य । मगध शासन की ओर से मेरी नियुक्ति बाल्हीक देश में थी । अब जब सम्राट सम्प्रति ने सेना समाप्त करने की घोषणा कर सैनिकों को बौद्ध भिक्षु बनने का आदेश दिया है, मुझे स्वाभाविक सेवानिवृत्ति मिल गई । मेरी श्रद्धा वैदिक मार्ग में है उसी पर चलकर मैं भी जीवन का उद्देश्य पाना चाहता हूँ ।” “ओह !” आचार्य किसी गहरे सोच में डूब गए । सोचने लगे कि पता नहीं कब तक अकर्मण्यता को आध्यात्मिकता समझा जाता रहेगा ? योगदर्शन के सूत्रकार अपने मन में उठी प्रश्न तरंग को अनुत्तरित छोड़ पुष्यमित्र की ओर देखते हुए बोले “अब तुम विश्राम करो वत्स ! बहुत दूर से आ रहे हो थक गए होगे ।”
“जो आज्ञा, आचार्य ।”
पतंजलि का आश्रम केवल दशार्ण में नहीं अपितु सम्पूर्ण भारत में प्रसिद्ध था । सुदूर देशों से विद्यार्थी वहाँ शिक्षा के लिए आया करते थे । वेद , दर्शन, दण्डनीति , व्याकरण , शिल्प कला , धनुर्वेद, आदि सब विद्याओं के अध्ययन की वहाँ व्यवस्था थी । तक्षशिला काशी, उज्जैन आदि के प्रधान विद्यापीठों में उन आश्रम इस युग में प्राचीन वैदिक अध्ययन का एक मात्र के केन्द्र था । आचार्य पतंजलि की विद्वता और उनकी यौगिक विभूतियों की ख्याति के कारण इसका महत्व और अधिक बढ़ गया था ।
प्रातःकाल जब महर्षि पतंजलि नित्यकर्मों और याज्ञिक अनुष्ठान से निवृत्त हो गए, तो उन्होंने पुण्यमित्र को अपनी पर्णकुटी में बुलाया । वहाँ सब ओर भोजपत्रों और तालपत्रों पर लिखे हुए ग्रन्थों के ढेर लगे हुए थे । स्वयं आचार्य अपने सूत्रों को लिखने में व्यस्त थे । वात्सल्य से पुष्यमित्र से पुष्यमित्र को अपने पास बिठाकर प्रश्न किया-तुम बहुत उद्विग्न दीखते हो वत्स, रात्रि कुशलता से तो बीती ।”
“आप विधि बताएँ तो एकान्त में कुछ प्रयत्न करूं “कौन सा प्रयत्न करोगे तुम ?” आचार्य के मुख पर स्मित आया अपार वात्सल्य पूर्ण स्मित ।
“मन की चंचलता को रोकने का प्रयत्न ?” युवक ने उत्तर दिया । “आपने ही आदेश दिया है कि चित्तवृत्ति विरोध ही आत्मदर्शन का उपाय है ।”
“किन्तु चित्तवृत्ति का निरोध कैसे करोगे ? कर्म का त्याग करके ?”
“यदि प्रभु आज्ञा दें । कार्यव्यग्रता में मन की चंचलता रोक पाना कठिन है ।”
“एकान्त” इस एक शब्द के उच्चारण ने जैसे युवक के अस्तित्व की अनेकों परतें भेद दीं । वह कह रहे थे “यवनराज एवुथिदिम अपनी सैन्य शक्ति की वृद्धि में तत्पर है । भारत के उत्तरी पश्चिमी सीमान्त पर एक भयंकर तूफान के चिन्ह प्रकट हो रहे हैं । वह समय दूर नहीं जबकि कपिश कान्धार के पश्चिम से उठती हुई यह आँधी भारत के शान्त-वातावरण में विष घोल देगी । मौर्य सम्राट सम्प्रति इस विपत्ति से निश्चिन्त अणुव्रतो के पालन में तत्पर है । भारत का धन धान्य विदेशों में जा रहा है और तुम गरीबों की चीख-पुकारों अबलाओं-शिशुओं के क्रन्दन के बीच एकान्त की खोज करना चाहते हो । “ आचार्य की वाणी में एक ऐसा दर्द था जिससे युवक का मन हिल गया ।
“एकान्त में जाकर तुम श्वास क्रिया बन्द कर दोगे?” महर्षि समझाने के स्वर में बोल रहे थे “आहार एवं जल भी तथा शरीरस्थं यन्त्रों की क्रियाओं को भी ? यदि यह कर भी लो तो उस पत्थर में और तुम में क्या अन्तर होगा ?”
“प्रभु !”युवक अपने मार्गदर्शक के चरणों में गिर पड़ा । उसे लगा कि कोई घने अन्धकार का पर्दा उसके सम्मुख पड़ा था और अब वह उठने जा रहा है ।
“अध्यात्म अकर्मण्यता का पर्याय नहीं है । दोनों एक दूसरे के विरोधी तत्व हैं ठीक दिवस और रात्रि कि भाँति । इन्हें एक समझ लेने के कारण ही देश-समाज और मनुष्य जाति पतन के गहरे गर्त में समाते गए और समाते जा रहे हैं।”
सहसा महर्षि रुक गए । उन्होंने देखा कि उनका यह अनुगत इस पद्धति को हृदयंगम नहीं कर पा रहा है । उन्होंने दिशा बदली-क्रिया के संचालक एवं उसके फल के दाता-भोक्ता सर्वेश्वर हैं । हम तुम सब उन समर्थ के हाथ के यन्त्र हैं । हमें उनके चरणों में अपने आप को पूरी तरह अर्पित कर देना है ।
आपके चरणों में समर्पण, यही मेरा निश्चय है । युवक के स्वर में विश्वास था ।
‘यन्त्र तो नित्य निष्क्रिय है । उसकी क्रिया तो संचालक की क्रिया है । आचार्य ने यह अज्ञान की अन्धयवनिका उठा दी । सचमुच तुमने अपने को अर्पित कर दिया है तो नैष्कर्म स्वतः प्राप्त है ।
‘यह अशान्ति उस आनन्द की अनुभूति जो नहीं कर पा रहा हूँ ।’ बात सच है । यदि आन्तरिक शान्ति और आनन्द नहीं मिलता तो अवश्य हमसे भूल हो रही है
हमारे साधन में कहीं त्रुटि है ।
‘अपने को कर्ता मानना छोड़ दिया होता तुमने ! वह त्रुटि जो स्वयं साधक नहीं पकड़ पाता, उसका मार्गदर्शक सहज पकड़ लेता है । कोई पीड़ित नहीं कोई संतप्त नहीं तुम न उद्धारक हो सहायक इन रूपों में सर्वेश्वर तुम्हारी सेवा लेना चाहते हैं । तुम पर कृपा करके । उनकी सेवा करके तुम्हें कृतार्थ होना है ।
पतंजलि के स्वर युवक के अस्तित्व में चेतनता प्रवाहित कर रहे थे । उसे समझ में आने लगा था कि आत्मतत्त्व की प्राप्ति का उपाय अकर्मण्यता नहीं है । आचार्य की वाणी अभी भी उसके अन्तरमन का स्पर्श कर रही थी । वह कह रहे थे- ‘अवश्य प्रत्येक को इसे समझने में कठिनाई होती है । किन्तु तुम्हें क्यों होनी चाहिए ? तुममें बल है, शौर्य है , शस्त्र चालन की निपुणता है । ये साधन तुम्हें ईश्वर ने दिए हैं । इस नवसृजन के समय में देश-धर्म समाज की पुकार तुम्हारा कर्तव्य निर्देश करती है ।
“कर्म करने के तुम्हें साधन मिले हैं अतः उनका उपयोग करो।” उपदेश का उपसंहार हुआ । “कर्म का त्याग अर्थात् अकर्म में आसक्ति करके तो तुम अपने को उस सर्वात्मा की सेवा से वंचित कर लोगे । “
उपदेश के अनन्तर अपने प्रचण्ड कर्म से सर्वात्मा की अर्चना करने वाले महर्षि के इस यशस्वी शिष्य ने एक नया भारत गढ़ा । लोक जीवन ने उसे अपना सम्राट माना सम्राट पुष्यमित्र । विश्वात्मा की अर्चना का क्रम अभी भी जारी है बारी हमारी अपनी है ।
भौतिक जगत में आर्थिक , जातीय, सामाजिक , राजनीतिक एवं बौद्धिक आधार पर ही समता-एकता स्थापित करने के प्रयत्न चलते रहते हैं । इससे एकता-समता तो आती नहीं, वरन् उलटे और भी अधिक गुत्थियाँ उलझती जाती हैं । मनुष्य-मनुष्य के बीच ऊँच-नीच नर-नारी , धनी-निर्धन योग्य-अयोग्य आदि कारणों से जो अगणित भेद-विभेद फैले हुए हैं उन्हें हटाने-मिटाने और सर्वजनीन एकता-सकता स्थापित करने के लिए हमें वेदान्त प्रतिपादित एकात्मवाद का अद्वैतवाद का ही आश्रय लेना और उसका विस्तार करना पड़ेगा । अद्वैतवाद को दूसरे शब्दों में ‘एक जीववाद’ या-मानवतावादी कहा जा सकता है जिसमें सभी प्रकार के भेद-भावों को मिटाकर एकता उत्पन्न करने की प्रेरणा सन्निहित है । उसमें ईश्वर और जीव के बीच का ही भेदभाव नहीं मिटाया गया है वरन् प्राणियों के बीच जो विभेद की दीवारें खड़ी हैं उन्हें भी गिराया गया है ।
अद्वैतवाद के-एकात्मवाद के व्याख्याता आद्यशंकराचार्य ने वेदान्त की संक्षिप्त व्याख्या इन शब्दों में की है-मनुष्य को सर्वप्रथम अपने में ब्रह्मचेतना की अनुभूति करनी चाहिए, तदुपरान्त जड़-चेतन जगत में अपनी ही आत्मा का विस्तार अनुभव करना चाहिए । एक ही आत्मा को सब में संव्याप्त की दृढ़ अनुभूति होने पर अपने पराये का भेद कहाँ संभव है ?
गीताकार ने कहा है-
यस्तु सर्वाणि भूतानि आत्मन्येवानुपश्यति । सर्वभूतेषु चात्मानं ततो न विजुगुप्सते । । यस्मिन सर्वाणि भूतानि आत्मैवाभूद्विजानतः। तत्रः को मोहः कः शोक एकत्वमनुपंश्यतः । ।
अर्थात् जो मनुष्य सब जीवों में अपनी ही आत्मा देखता है तथा सब जीवों में अपने ही स्वरूप को देखता है, उसके भीतर किसी भी जीव के प्रति जुगुप्सा, निन्दा , द्वेष आदि का भाव नहीं रह पाता । समस्त जीवों में एक ही आत्मा समाया हुआ है, ऐसा जानकर जिस ज्ञानी मनुष्य के लिये समस्त संसार अपना ही स्वरूप आत्मस्वरूप हो जाता है, उस एक आत्मतत्त्व का अनुभव करने वाले को किसका भय, किसका मोह, किसके लिए शोक होगा ?
गीता में ही आगे उल्लेख है-
विद्या विनय सम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि । शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः । ।
अर्थात् जो व्यक्ति ब्राह्मण, गौ, हाथी , कुत्ते, चाण्डाल आदि सभी जीवों में एक ही आत्मतत्त्व का दर्शन करता है, वही पण्डित है ।
वस्तुतः ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’ की यह वेदान्त आस्था ही मनुष्य में दया, करुणा, स्नेह, सद्भाव, सौजन्य का उदय कर सकती है । नागरिकता , सामाजिकता का विकास ममता और आत्मीयता के साथ जुड़ा हुआ है । इस भावना का जितना अधिक विकास होगा उतनी ही व्यक्ति की महानता बढ़ेगी और समाज की शान्ति, समृद्धि और सुस्थिरता में अभिवृद्धि होगी । अपने पास आत्मीयता का पारस हो, वो हर लोहे जैसी काली-कलूटी और अल्प मूल्य की वस्तु को, व्यक्ति, को सोने जैसा सुन्दर और बहुमूल्य स्तर का बनाया जा सकता है ।
एक व्यक्ति दूसरे व्यक्ति के साथ स्नेह-सौजन्य का व्यवहार वहीं तक कर सकता है जहाँ तक कि उसकी ममता का प्रकाश फैल रहा हो । “आत्मोपम्येन न सर्वत्र सम पश्यति योऽर्जुन” की मनःस्थिति वाला व्यक्ति ही दूसरों के दुख में अपने दुख की तरह दुखी हो सकता है ओर दूसरों के सुख में अपने सुख की अनुभूति कर सकता है । ऐसी मनोभूमि में ही कोई व्यक्ति सच्चे अर्थों में एकात्मवादी, लोकसेवी, परमार्थपरायण, उदार, सज्जन बन सकता है । संयम और त्याग की आकांक्षा ऐसी ही मनःस्थिति में बन पड़ेगी ।
उपनिषद् में कहा है- “द्वितीयं द्वै भयं भवति” अर्थात् दूसरे से ही भय होता है । संसार में परमेश्वर से यदि अपनी आत्मीयता समाविष्ट कर ली जाय तो जैसे ही परायापन मिटेगा वर्ग विभेद की ऊँच-नीच की दीवारें टूटेंगी वैसे ही ‘अभय’ का आनन्द मिलता बढ़ता चला जाएगा ।
प्रख्यात दार्शनिक सुकरात का कथन है कि-सबसे बड़ा ज्ञान है अपने को पहचानना और भयमुक्त होना। “ हम दूसरों के बारे में बहुत कुछ जानते हैं, पर अपने बारे में अनजान ही बने रहते हैं । अपने स्वरूप और लक्ष्य को भूलकर सचमुच हम अज्ञानग्रस्त रहते हैं और भवबन्धनों में बँधते हैं । हमें कि तरह सोचना, रहना और दूसरों से व्यवहार करना चाहिए , यदि इस तथ्य को भली प्रकार हृदयंगम कर लें ओर तद्नुरूप आचरण करें तो समझना चाहिए कि आत्मज्ञान प्राप्त कर लिया और जीवन को सार्थक बनाने वाला मार्ग अपना लिया ।
यूनान के स्टोइक दार्शनिक एपिकतेतु ने प्राणि मात्र में ईश्वर का प्रकृति अंश विद्यमान होने की बात कही है । उन्होंने विश्वबन्धुत्व पर जोर देते हुए मानव मात्र को एक पिता की सन्तान भाई-भाई के रूप में माना है । स्टोइक दर्शन के अनुसार ब्रह्म एवं जीवजगत दो भिन्न सत्ता नहीं हैं । यह संसार परमात्मा का सजीव शरीर है । सृष्टि में संव्याप्त शक्ति एवं चेतना का बीज यह सर्वव्यापक ब्रह्मसत्ता ही है । उसकी सभी सन्तानें समान हैं, फिर मनुष्य के बीच असमानता की विभेद की दीवारें कहाँ से आ गयी है ? मानव जीवन का सबसे बड़ा रस प्रेम हैं । विभिन्न व्यक्ति या पदार्थ तभी प्रिया लगते हैं जब उनसे प्रेम होता है, आत्मीयता होती है । उदासीनता या उपेक्षा जहाँ भी होगी , वहाँ सूनेपन का-निरर्थकता का अनुभव होगा । जिस वस्तु से भी आत्मीयता हट जाएगी वह नीरस, निष्प्राण लगने लगेंगी । प्रिय न कोई पदार्थ है न व्यक्ति, अपना आपा ही सबको प्रिया है । वह जहाँ कहीं, जिस किसी पर भी प्रतिबिम्बित होता है वही सुन्दर, सुखद और प्रिया लगने लगता है । यदि सर्वत्र प्रिय पात्रों से भरी पूरी दुनिया दीखती हो तो समझना चाहिए कि आत्मीयता का-प्रेम का विस्तार व्यापक बनता जा रहा है । यह आत्म विस्तार न केवल वैयक्तिक आनन्दानुभूति अभिवर्धन की दृष्टि, से वरन् लोकमंगल की-समाज की दृष्टि से भी आवश्यक है ।
“वसुधैव कुटुम्बकम्” का अन्तर्राष्ट्रीय शाँति , समृद्धि सिद्धान्त व्यक्तिगत प्रेम भावनाओं-आत्मीयता के विस्तार पर ही निर्भर है ।
मनीषियों के अनुसार मनुष्य के विकास की सर्वोच्च अवस्था वह है जहाँ “उसके सभी सन्देह तथा वासनाएँ, अहंताएँ सदैव के लिए नष्ट हो जाती हैं । हृदय की समस्त स्वार्थपूर्ण ग्रन्थियाँ खुल जाती हैं तथा कारण-कार्य का अनन्त क्रम उसके लिए समाप्त हो जाता है ।
मुंडकोपनिषद् 2 / 2 / 8 में ऋषि ने इसी स्थिति का दिग्दर्शन कराते हुए कहा है-
“भिद्यते हृदयग्रन्थिश्छिद्यन्ते सर्वसंशयाः । क्षीयन्ते चास्य कर्माणि तस्मिन दृष्ट परावरे ॥”
अर्थात् उस परब्रह्म को तत्व के द्वारा जानने पर हृदय ग्रन्थि खुल जाती है और सब संशय नष्ट हो जाते हैं । इसके साथ शुभ-अशुभ कर्म भी क्षीण हो जाते हैं ।
इस ब्रह्मचेतना से परिपूर्ण जीवनमुक्त स्थिति को प्राप्त करने में अस्तित्व के अन्त का भय करना निरर्थक है । वस्तुतः वह तो पूर्ण अभय की स्थिति है । डर तो दूसरे से होता है । जहाँ केवल अपना ही आपा बिखरा पड़ा हो वहाँ भयभीत होने-भेद बुद्धि उपजने, आशंका करने की कोई गुँजाइश नहीं है । वेदान्त प्रतिपादित एकात्मवाद के 'आत्मवत् सर्वभूतेषु’ की मान्यता ही आज के बिखराव को, मनोमालिन्य को मिटा सकती है और चहुँ ओर बहुमुखी सुख शान्ति का आधार खड़ा कर सकती है ।
गाँधी जी के राजनीतिक गुरु गोपाल कृष्ण गोखले उच्चकोटि के विद्वान थे, साथ ही असाधारण प्रतिभाशाली थे । इसके लिए उन्हें अनेक गैर सरकारी पदों पर काम करने के लिए अनेकों आमन्त्रण सदा मिलते रहते थे, पर उनने अपना जीवन समाज को ऊँचा उठाने वाले कार्यों के लिए उत्सर्ग करना उचित समझा । इस मार्ग पर चलने वाले को अपरिग्रही की आदर्शवादिता अपनानी चाहिए । इस मान्यता के अनुसार उन्होंने 35/- मासिक में परिवार निर्वाह चलाते रहने का व्रत लिया और उसे आजीवन निबाहा । राष्ट्रीय कार्यों के लिए उनके द्वारा लाखों की धनराशि एकत्रित की गई पर उनने कभी अपना निजी खर्च बढ़ाने और अधिक लेने की बात न सोची , न स्वीकारी । चरित्र निर्माण के आधार पर ही वे गाँधी जैसे शिष्य विनिर्मित कर सकने में समर्थ हो सके ।
मनीषियों का अनुभव भरा कथन है कि शक्ति के बल पर पाया ता कुछ भी जा सकता है, पर उसे भोगा नहीं जा सकता भोगने के लिए युक्ति की, औचित्य से अभिपूरित समझदारी की आवश्यकता है । जहाँ दोनों का समन्वय होगा वहाँ उपलब्धि भी हस्तगत होगी और सुख संवेदना की अनुभूति भी । दोनों का युग्म है । एक के बलबूते तो आधी बात ही बनती है । उसका स्वरूप आधा, औंधा, लँगड़ा, कुबड़ा ही रह जाता है । शक्ति की महत्ता सर्वविदित है । भाप की शक्ति से रेल इंजन दौड़ते, बिजली से कारखाने के यन्त्र चलते हैं । इतने पर भी उनको दिशा देने व्यवस्था करने के लिए बुद्धिमान संचालक की आवश्यकता पड़ती है । ड्राइवर न हो तो भाप की पर्याप्त मात्रा होने पर रेल चल भले ही पड़े , पर उसका अन्त किसी से जा टकराने के रूप में ही होगा । बिजली मोटर
घुमा सकती है और संबंधित मशीनों को गति दे सकती है, पर अभीष्ट उत्पादन नहीं दे सकती । उसके लिए उन कारीगरों की बुद्धिमत्ता अपेक्षित है जो यह जानते हैं कि किस प्रकार के उत्पादन के लिए क्या किया जाना चाहिए । उनका सहकार न मिलने पर बिजली खर्च होती रहेगी और मशीनों घिसती रहेंगी । हो सकता है कि ऐसी स्थिति में कुछ अनर्थ भी हो चले कोई पुर्जा टूट जाय, कोई बायलर फट जाय ।
मनुष्य शक्ति संचय के लिए प्रयत्नशील रहता है और प्रयत्नपूर्वक उसे उपार्जित संकलित भी कर लेता है । धन तो कई व्यक्ति कमाते हैं । इस संदर्भ में बेईमान बदमाश भी सज्जनों की अपेक्षा अधिक मात्रा में अधिक जल्दी धनाध्यक्ष बन जाता है कइयों को जुए, सट्टे, लाटरी में मिल जाता है, किन्हीं को बिना परिश्रम किए उत्तराधिकार में भी । धनाध्यक्ष होना कोई बड़ी बात नहीं है । यह चोरी , चालाकी में भी हो सकता है । बड़ी बात यह है कि उसका उपयोग किस प्रकार हुआ और उससे कितना लाभ उठाया गया ? कैसा सुख पाया गया ? क्या हित साधन हुआ ? यदि इस विषय में समझदारी न साथ न दिया तो दुर्व्यसनों में, कुकर्मों में, अपव्यय में, प्रदर्शन में उसका समापन हो सकता है । इस राह को अपनाने पर नशेबाजी , आराम तलबी, आवारागर्दी में स्वास्थ्य नष्ट हो सकता है । कुसंग में आदतें बिगड़ सकती हैं और अनीति अपनाने पर द्वेष, प्रतिशोध की आपत्ति आ सकती है, बदनामी हो सकती है । ईर्ष्यालुओं का, लुटेरों का एक बड़ा दल शत्रु बनकर घात लगा सकता है । बँटवारे के प्रश्न को लेकर परिवार में कलह हो सकती है । इस प्रकार कमाया हुआ धन उससे भी बुरा पड़ सकता है जैसा कि गरीबी के दिनों में चल रहा था । ऐसी अमीरी की तुलना में वे गरीब कहीं अच्छे रहते हैं जो रोज कमाते रोज खर्चते और समझदारी के साथ संतुलन बिठाकर अपनी गाड़ी हँसी खुशी के बीच चलाते रहते हैं ।
शारीरिक सौंदर्य तो प्रकृति प्रदत्त है, पर बलिष्ठता आहार-बिहार को उच्चस्तरीय बनाकर बढ़ाई जा सकती है । पहलवान और योद्धा बनना कठिन नहीं है । चंदगीराम और हरक्यूलिस जैसे अनेकों रोगी अपनी गतिविधियों में हेरफेर करके बलवान पहलवान बने हैं । पर प्रश्न यह है कि उस समर्थता का उपयोग किस निमित्त हुआ । डाकुओं और आतंकवादियों में अधिकाँश बलिष्ठ ही होते हैं । शिकारी, कसाई और क्रूरकर्मी वही हो सकता है जिसके शरीर में शक्ति हो, ऐसों को ही व्यभिचारी अनाचारी होते देखा गया है । शोषण, उत्पीड़न, अपहरण में भी बलिष्ठों का ही बाहुल्य होता है । यह अँधेरा पक्ष है । उजला पक्ष तब बनता है जब उस समर्थता का उपयोग अनीति रोकने और सत्प्रवृत्ति बढ़ाने में किया जाय । सेना में भरती होकर ऐसे ही योद्धा देश रक्षा का भार उठाते हैं । मुसीबत में फँसे हुओं को निकालने में बलिष्ठ ही बढ़-चढ़ कर स्वयं सेवी की भूमिका निभाते हैं । उनकी उपस्थिति में अनाचारियों की भी दाल नहीं गलती । किन्तु यदि वे स्वयं अनर्थ पर उतर आयें तो वातावरण में विक्षोभ खड़ा कर सकते हैं, विपन्नता खड़ी कर सकते हैं । बलिष्ठता सुन्दरता उत्तम है, पर उसका दुरुपयोग अनेकों के पतन पराभव का कारण भी बन सकता है ।
विद्या का, बुद्धि का अपना उपयोग है । शिक्षा को भी सराहा ही जा सकता है । इसे प्रयत्नशील व्यक्ति व्यस्त और अभावग्रस्त होते हुए भी तत्परतापूर्वक अर्जित कर सकते हैं । यह प्रशंसा की बात है, पर बड़ाई या भलाई की नहीं । यह इस बात पर निर्भर है कि अर्जित ज्ञान का उपयोग किस प्रकार किस कार्य में किया गया ?
अश्लील उत्तेजक, अनाचारी साहित्य सुशिक्षितों का ही लिखा हुआ है। दुष्प्रवृत्तियों को भड़काने वाली फिल्में सुशिक्षित ही बनाते हैं । छल, प्रपंच, पाखण्ड , अन्धविश्वास उत्पन्न करने वाला मायाजाल विद्वानों का ही रचा हुआ है । धर्म के नाम पर व्यापक जालसाजी का बखेड़ा उन्हीं धर्मगुरुओं द्वारा खड़ा किया है जो अपने को विद्वान और पंडित कहते हैं । ऊँचे पदों पर वे ही पहुँचते हैं और रिश्वत का अम्बार ऊपर से बादल की तरह बरसता है और नीचे पोखर जोहड़ तक आता है । उन्हीं के हाथ में समाज की-शासन की बागडोर पहुँचती है । जन-मानस को यही वर्ग कठपुतली की तरह नचाता है । अख़बार रेडियो, टेलीविजन, प्रचार, प्रोपेगैंडा जैसे साधन इन्हीं के हाथ में है । उलटे को सीधा-सीधे को उलटा वैज्ञानिक सुशिक्षित वर्ग के ही तो करते हैं । वे चाहें तो लोकोपयोगी वस्तुएँ भी आविष्कृत, विनिर्मित कर सकते हैं । वे चाहें तो ऐसे घातक अस्त्रों का भी सृजन कर सकते हैं जिससे महाविनाश का खतरा सामने आ खड़ा हो और आशंका असुरक्षा से हर किसी का दिल धड़कने लगे ?
कला की एक शक्ति है । उसमें जनमानस का दिशा देने की अद्भुत क्षमता है । भाषण, गायन, वादन, चित्र, प्रतिमा आदि उसी के अंतर्गत आते हैं । इसमें भगवद् भक्ति, देशभक्ति आदर्शों के अधिग्रहण की भी क्षमता है और ऐसी विषाक्तता भी है जो कामुकता, युद्धोन्माद जैसी पशु प्रवृत्तियों की भड़काने में भी अग्रणी रह सकती है, रह भी रही है ।
यदि उन्हीं क्षमताओं का विवेकपूर्वक उपयोग किया जाय तो उनके ऐसे सत्परिणाम सामने आ सकते हैं जिनसे सर्वसाधारण का हित साधन हो और कल्याणकारी परिणाम सामने आयें ।
कोई भी समर्थ नर-नारी विवाह कर सकते हैं, पर यह विरलों से ही बन पड़ता है कि परस्पर बँध जाने के उपरान्त उस समर्पण का स्वार्थ सिद्धि के लिए शोषण करने की अपेक्षा सहयोगी के प्रति कृतज्ञता का भाव भरे रहें और उसे अधिक सुयोग्य , समुन्नत, स्वावलम्बी, स्वस्थ, सुसंस्कारी बनाने के लिए अनवरत प्रयत्न करें । भले ही इसमें अपनी सुविधाओं में कटौती ही क्यों न होती हो । लेने की अपेक्षा देने का भाव प्रबल एवं सक्रिय रहने से ही वह स्थिति उत्पन्न होती है जिसमें पाणिग्रहण के उच्चस्तरीय परिणाम देखे जा सके । एक और एक मिलकर ग्यारह बनाने वाली उक्ति को चरितार्थ कर सकें ।
थोड़े से धन का भी सदुपयोग करके लोग भामाशाह के रूप में अमर हो गये । श्रम को परमार्थ में नियोजन करके हजारी किसान बिहार प्रान्त में जन-जन की चर्चा का विषय बन गया । सामान्य सी शिक्षा को सदुद्देश्य के लिए लगाकर कबीर, तुलसीदास जैसे कृतकृत्य हो गये । नगण्य सी सामर्थ्य को सही काम में, सही उपयोग करने पर जटायु जैसा पक्षी अपने पीछे ऐतिहासिक उदाहरण छाड़ गया । महामानवों में से प्रत्येक ने अपनी सामर्थ्य का श्रेष्ठतम उपयोग करने का प्रयास किया है । गाँधी, विनोबा जैसों का व्यक्तित्व और कर्तव्य ऐसा रहा जिसका स्मरण करने मात्र से लोग अपने आदर्शवादी अभ्युदय की बात सोचते हैं । यही है वह युक्ति जिसमें शक्ति का उपार्जन सार्थक होता है ।
दोष दृष्टि सत्प्रसंगों में से भी अपने अनुरूप दुष्प्रवृत्ति ढूँढ़ निकालती है । साँप दूध पीकर भी उसका विष बनाता है ।
एक उच्छृंखल युवक युवती मनोरंजन के लिए भगवत् कथा सुनने के लिए जाने लगे । युवक ने कृष्ण के अनेक रानियाँ, पटरानियाँ और 16 हजार उपरानियों की बात सुनी तो कहा-पत्नियों अनेक पत्नियों के संपर्क में कोई दोष नहीं है । यदि होता तो भगवान कृष्ण वैसा क्यों करते ?
युवती भी मनचली थी । उसके अपने मत की पुष्टि करने वाले कई प्रसंग मिल गये । कुन्ती ने कुमारी स्थिति में बालक जन्म दिया और द्रौपदी के पाँच पति थे । इसमें बुराई रही होती तो ऐसे महामानवों ने उस आचरण को क्यों अपनाया होता ?
अच्छे प्रसंग कठिन थे और नैतिक प्रसंग न तो उनने कथा में सुने और न उन्हें सुनने समझने का प्रयत्न किया , दोष दृष्टि जो छाई थी ।
ईश्वर निष्ठ का प्रत्यक्ष स्वरूप तो पूजा अर्चा है, पर उसका दार्शनिक रूप यह है कि ईश्वर की सत्ता पर पूर्ण विश्वास किया जाय । उसकी नियम व्यवस्था को अटूट एवं अकाट्य माना जाय । उसका सर्वव्यापी और न्यायनिष्ठ होना यदि हमारी भावनाओं की गहराई तक पहुँच सके तो उसका परिणाम यह होगा कि कोई स्वेच्छाचार अनाचार न बरत सकेगा । इससे यह विश्वास बना रहेगा कि सत्कर्मों का सत्परिणाम और दुष्कर्मों का दुःखद प्रतिफल मिल कर रहेगा ।
किसान और माली जानते हैं कि जो बोया जाता है सो काटा जाता है । करनी अपना प्रतिफल देकर रहती है । लोगों की आस्था प्रायः इसलिए डगमगा मिलता । उसमें विलम्ब हो जाता है । अधीर व्यक्ति समझने लगते हैं कि यह तो अबूझ राजा की अँधेर नगरी है । कर्मफल से विश्वास उठ जाने का यही कारण है कि लोग अनाचार में प्रवृत्त होते, कुकर्म करते पाए जाते हैं । यदि यह विश्वास दृढ़तर हो कि नियन्ता विधान सुनिश्चित है तो लोग पाप करम करते हुए डरें । पुण्य के सत्परिणामों को समझें, सन्मार्ग पर चलें और पुण्य परमार्थ की दिशा अपनाएँ । क्रिया की प्रतिक्रिया उत्पन्न होने में कुछ देर अवश्य लगती है । खाया हुआ अन्न का रक्त बनने में कुछ समय लगता है । किसान की कोई फसल पकने में कई महीने लगते हैं । आज का जमाया दूध कल दही बनता है । बरगद के अंकुर की सामर्थ्य वृक्ष बनने में लम्बा समय लग जाता है । इतने पर भी कोई अविश्वास नहीं करता कि जो किया है उसका प्रतिफल न मिलेगा । यदि ऐसा होता तो कोई भी किसान कृषि न करता कोई माली बगीचा न लगता , कोई विद्यार्थी कालेज की पढ़ाई तक पढ़ने में न लगा रहता क्योंकि इन कृत्यों का तत्काल फल तो मिलता नहीं । उनकी परिणति उत्पन्न होने में देर लग जाती है ।
इस अधीरताजन्य अंधविश्वास को दूर करने के लिए ईश्वर की न्यायशीलता पर गहरा विश्वास होना आवश्यक है । जीवन , मरने के साथ ही समाप्त नहीं हो जाता । वह बाद में भी विद्यमान रहता है ।कर्मफल परलोक में भी भुगते जा सकते हैं और पुनर्जन्म के रूप में भी । इसलिए ईश्वर की सर्वव्यापकता न्यायनिष्ठ , कर्मफल प्रक्रिया तीनों ही ऐसे हैं, जिन्हें हर आस्तिक को मानना चाहिए । मानना ही नहीं उन पर विश्वास भी करना चाहिए । इतने भर से व्यक्ति के निजी जीवन में तथा समाज की सत्परम्पराओं में नीति और न्याय का प्रचलन बना रहता है । इसके फलस्वरूप यह हो सकता है कि लोग कुकर्मों से डरें और सन्मार्ग पर चलने में ही अपना हित अनुभव करें ।
एक अनर्थमूलक मान्यता ईश्वर के संबंध में यह बन चली है कि जो उसका स्तवन करता है , पूजा के साथ-साथ भोग-प्रसाद अर्पण करता है उससे ईश्वर प्रसन्न होता है और उसकी मनोकामनाएँ पूर्ण करता है । यह एक प्रकार से ईश्वर को बदनाम करना है । उसे प्रशंसा की मनुहार और भेंट पूजा के उपहारों से अहंकारियों, रिश्वतखोरों की तरह प्रसन्न किया जा सकता है तथा प्रलोभनों और दबावों के आधार पर उसे कठपुतली की तरह नचाया जा सकता है, इन दिनों ऐसे ही प्रशंसा के भूखे और उपहारों के प्यासे भगवानों का बोल बाला है इस मान्यता से तो लोग और भी अधिक ढीठ बनते हैं । सोचते हैं देव दर्शन करने भर से भोगों से निवृत्ति मिल सकती है और छुटपुट कर्म काण्डों के बल बूते स्वर्ग में रहने के लिए स्थान निश्चित कराया जा सकता है । पर वस्तुतः ईश्वर ऐसा तुच्छ नहीं कि कोई भी कार्यकुशल व्यक्ति उसे अपनी उँगलियों पर नचा सके ।
गुप्त रूप से किए गए कार्य , चिन्तन क्षेत्र में विचरण करने वाले संकल्प भी , परमेश्वर से छिपे नहीं रहते । घट-घटवासी सब जानता है । बाहर के लोगों को तो किसी चतुरता के सहारे धोखे में रखा जा सकता है । वस्तु स्थिति उनसे छिपाई जा सकती है ।सरकार की, समाज की, दण्ड व्यवस्था से तो बचा भी जा सकता है पर जो घट-घट का वासी है सर्वत्र समाया हुआ । है उसकी जानकारी में सब कुछ है । ऐसी दशा में यह कैसे संभव हो सकेगा कि गुप्त कुकर्मों या अज्ञात विचारों की हीनता उसकी दृष्टि से बची रहे और उस प्रमाद के घपले में अपने पाप कर्मों को गया-आया कर सके या पाप चुकाते हो जायें ।
ईश्वर मान्यता से व्यक्तिगत चरित्र को पवित्र बनाया जाता है, साथ ही समाज में भी सुव्यवस्था बनी रहती है । चरित्रनिष्ठ और समाज निष्ठ के उभय पक्षीय सत्परिणाम व्यापक रूप से मिलते रह सकते हैं । उसका इतना लाभ मिल सकता है जिसे देखते हुए शासकीय दण्ड व्यवस्था भी हलकी पड़ती है जो शक का प्रमाण मिलने पर ही किसी को अपराधी ठहराती और दण्ड व्यवस्था करती है । पर ईश्वर की नजर तो सर्वत्र है । उससे किसी के कार्य और विचार छिपे नहीं रहते । साथ ही उसकी परिवार व्यवस्था में भी किसी के साथ राग द्वेष बरते जाने की गुँजाइश नहीं है । इसी रूप में ईश्वर पर विश्वास किया जा सके तो व्यक्ति और समाज को सुसंस्कृत-सुव्यवस्थित रखे जाने के समस्त अवरोध दूर हो सकते हैं ।
स्वर्ग और नरक की, मरणोत्तर जीवन में कर्मों का प्रतिफल मिलने की, पुनर्जन्म वर्तमान के कृत्यों के अनुरूप मिलने की आस्था को जितना सुनिश्चित और जितना परिपक्व बनाया जा सकेगा , उसी सीमा तक सर्व साधारण को नीतिवान-चरित्रवान बनाया जा सकेगा यह सर्व साधारण के लिए इतना अधिक महत्वपूर्ण है कि उस आधार पर विश्व शान्ति के लिए सार्वजनीन सुख शान्ति और प्रगति के लिए बहुत कुछ किया जा सकता है । भूतकाल में जिस प्रकार आस्तिकता ने भारत भूमि को स्वर्गादपि गरीयसी बनाया था, उसकी पुनरावृत्ति फिर से हो सकती है , यदि ईश्वर का वास्तविक स्वरूप और उसका अनुशासन सर्वसाधारण के अन्तराल में गहराई तक जमाया जा सकें ।
ईश्वर ने मनुष्य जीवन अपने कोष के सर्वोपरि उपहार के रूप में प्रदान किया है । इस अनुग्रह के साथ-साथ उसने यह भी आशा की है कि इस अनुदान का उपयोग मात्र सत्प्रयोजनों में किया जाएगा । सत्प्रयोजन मुख्यतः दो गिनाए गए है , एक आत्मोत्कर्ष-दूसरा लोकमंगल । आत्मोत्कर्ष का प्रमुख साधन है संयम । संयमों , में इन्द्रिय, संयम, समय संयम, अर्थ संयम और विचार संयम , इन चारों की गणना होती है । लोग मंगल में संसार की समुन्नत और सुसंस्कृत बनाने की प्रक्रिया आती है । इन्हीं दोनों को पुण्य परमार्थ भी कहा गया है । ईश्वर भक्ति इसी भक्ति इसी ढाँचे में अपने को ढालने से बन पड़ती है । इसी पर उसकी प्रसन्नता एवं अनुकम्पा अवलम्बित है । मनुष्य पद से ऊँचा उठ कर महामानव , देवात्मा, अवतार स्तर तक मनुष्य अपने स्तर के अनुरूप प्रगति कर सकता है ।
उपासना का उद्देश्य परमात्मा और आत्मा की पारस्परिक एकता और आदान-प्रदान की व्यवस्था का स्मरण करना हैं । स्मरण का प्रयोजन है तथ्य को निरन्तर हृदयंगम करते रहना और जीवन के सभी पक्षों को उच्चतर बनाते चलना, सभी गतिविधियों को उत्कृष्टतम बनाकर रहना ।
जीवन को अवांछनीयताओं से बचाए रहना और औचित्य की अधिकाधिक अवधारणा करना, यही है ईश्वर की उपलब्धि एवं समीपता का सुनिश्चित सोपान। माता बच्चे को तभी गोदी में उठाती है जब उसे मलमूत्र से सना होने पर नहला धुला कर स्वच्छ कर लेती है । मलीनता से सने होने पर उसे तब दूर ही रखती है जब तक उसकी स्वच्छता ठीक प्रकार संभव नहीं हो जाती । पवित्रता और प्रामाणिकता ही वे आधार हैं ,जिन्हें अपनाकर ईश्वर तक पहुँचा जा सकता है । जीव
की तुच्छता ब्रह्म की महानता के साथ समाहित होकर तद्नुरूप बन जाती है । इसी को ब्राह्मी स्थिति कहते हैं ।
एक-एक दिन को आदर्श बनाकर सम्पूर्ण जीवन को आदर्शमय बनाया जा सकता है । एक एक कदम बढ़ाने पर ही लम्बी मंजिल पूरी होती है । प्रातः सोकर उठते ही यह भावना करनी चाहिए कि आज एक दिन का नया जन्म मिला । इसका श्रेष्ठतम सदुपयोग करना है । रात्रि को इस एक दिन का लेखा जोखा लिया जाय कि उसमें क्या अच्छा बन पड़ा और क्या कमी रही ।
इस समीक्षा के आधार पर दूसरे दिन का अधिक सतर्क कार्यक्रम बनाया जाय । उपासना का यह सर्वसुलभ मार्ग है । इसके अतिरिक्त भगवान के साथ आत्म संबंध को प्रगाढ़ बनाने के लिए नित्य प्रति स्मरण भी करना चाहिए । प्रातः स्मरण के अपने-अपने अनेक ढंग के अनेक विधि-विधान एवं क्रियाकलाप हैं । जिनका आशय अपनी प्रकृति के अनुरूप भिन्न-भिन्न रूपों में लिया जा सकते हैं ।
महापुरुषों की विशिष्टताओं से अपरिचित रहना-बालपन का जीवन बिताना ही है ।
काफी समय से अपने देश में फलित ज्योतिष, कुण्डली, ग्रह नक्षत्रों के आधार पर मनुष्य के भाग्य निर्धारण की परम्परा चलती रही है । भाग्यवाद की धारणा ने भारतीय समाज का जितना अहित किया है उतना सभी सामाजिक कुरीतियों ने मिलकर भी नहीं किया । कुरीतियों ने तो आम जनता की समृद्धि ही छीनी, पर भाग्यवाद ने उसे अकर्मण्य, आलसी और कायर ही बना डाला ।
इन दिनों भाग्यवाद को पोषण देने के लिये हस्तरेखा, अंक ज्योतिष जैसी विधायें भी, जो पश्चिम में विकसित हुई हैं, चल पड़ी हैं । लोग अंकों को जोड़ बाकी और गुणा भाग कर अपनी सफलता या असफलता का पूर्व ज्ञान करना चाहते हैं । जबकि प्रयत्न करने से पहले सफलता या असफलता का ज्ञान होना असंभव ही है । विश्व प्रयत्न और पुरुषार्थ प्रधान है न कि भाग्य प्रधान है । भाग्य की न तो कोई सत्त है और न महत्ता है । दुर्भाग्य या बुरी किस्मत उन्हीं के लिये है जो प्रयत्न पुरुषार्थ को छोड़कर उसमें विश्वास करते हैं ।
किन्हीं सितारों , शरीर पर बनने वाले चिह्नों या अन्य बातों को जो अपने भवितव्य का निर्णायक मानेगा, यह कहना नितान्त भ्रामक है कि वह सुखी रहेगा । भाग्य या फलित ज्योतिष की आधारभूत मान्यता यह है कि व्यक्ति भविष्य में आने वाली प्रतिकूल परिस्थितियों को जान ले, और समय रहते उनसे बचने का प्रयत्न करे । मनुष्य अब तक तो भविष्य के गर्भ में झाँक नहीं सका है और किन्हीं अंशों में वह भविष्य को जानने में सफल भी हुआ है तो आम जनता पर उसका विपरीत प्रभाव ही हुआ है । यह बजाय आने वाली प्रतिकूलताओं को झुठलानी की चेष्टा करने के , जो कुछ करता है वह भी छोड़ बैठता है और स्वयं को अभागा मान लेता है ।
अभागा वह नहीं है जिसका आने वाला कल संघर्षपूर्ण है, वरन् अभागा वह है जो भावी संघर्षों का यत्किंचित् पूर्वाभास पा कर या कि यों ही दुर्भाग्य की कल्पनायें करता हुआ स्वयं को दीन हीन बना लेता है । अपने प्रति रखे गये विश्वास के अनुसार ही मनुष्य का जीवन घटित होता है । तत्त्वदर्शन का यह सुनिश्चित सिद्धान्त है कि मनुष्य अपना जितना मूल्याँकन करता है , उससे राई रत्ती भी अधिक नहीं प्राप्त कर सकता । व्यक्ति स्वयं ही अपने लिये जिस मूल्य का दावा करेगा, न केवल समाज बल्कि अदृश्य शक्तियाँ भी उसके साथ वैसा ही व्यवहार करेंगी । इस प्रकार स्वयं को अभागा या हेय हीन समझने वाला व्यक्ति कभी प्रगति नहीं कर सकता ।
इसका एक मनोवैज्ञानिक कारण भी है । हीनता का भाव आदमी के मनोबल को तोड़ता है । फिर उसके प्रयत्न या तो दुर्बल हो जाते हैं अथवा समाप्त । उसका पुरुषार्थ टूट जाता है, संघर्ष क्षमता शिथिल हो जाती है और मनोबल भी गिर जाता है । जबकि संघर्ष, पुरुषार्थ और मनोबल के आधार पर ही व्यक्ति सफल या असफल होता है ।
भाग्य निर्धारण में जिन भारतीय और पश्चिमी विधाओं की सर्वाधिक चर्चा की जाती है उनमें से कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं । कुण्डली दर्शन, राशिफल, हस्तरेखा, अंक-ज्योतिष सामुद्रिक ज्ञान और ग्रह दशा । मुख्यतः भविष्य ज्ञान के लिये इन्हीं जाल जंजालों के चतुर्दिक् चक्कर काटा जाता है।
इनमें से सर्वप्रथम कुण्डली को लें । जन्म के समय पर ज्योतिष विज्ञान के कुछ नक्षत्रों की कल्पित गतियों और प्रभावों के आधार पर इसकी रचना की जाती है और फलित ज्योतिष की कुछ मान्यताओं के आधार पर इनका निष्कर्ष निकाला जाता है । कुण्डली का आधार ग्रह नक्षत्रों की स्थिति ही है । यहाँ इस संदर्भ में यह जान लेना चाहिये कि कई ग्रह नक्षत्रों का तो प्रकाश भी धरती पर नहीं पहुँचता । मंगल जो पृथ्वी के सर्वाधिक निकट ग्रह है । उसकी पृथ्वी से दूरी 40 करोड़ मील है और अब तक सबसे ज्यादा तेज गति से उड़ने वाले अंतरिक्ष यान को भी वहाँ तक पहुँचने में लगभग एक वर्ष का समय लगा। यह निर्जीव ग्रह इतना दूर स्थित है कि पृथ्वी पर यह भी पता नहीं चल पाता कि वहाँ क्या हो रहा है, तो पृथ्वी पर बसने वाले लगभग 6 अरब मनुष्यों में से प्रत्येक पर यह क्या असर डालेगा और कोई असर हो तो भी इतना क्षीण होगा कि सर्वशक्तिमान परमात्मा के अंश मनुष्य का उससे प्रभावित होना असंभव ही लगता है । यही बात राशियों के संबंध में भी हैं ।
राशि फल के बाद हस्त रेखाओं द्वारा भविष्य जानने की सर्वाधिक चेष्टा की जाती है । हाथ की रेखायें निश्चित ही प्रत्येक व्यक्ति की अलग-अलग है पर उनके आधार पर भी भविष्यवाणी नहीं की जा सकती । क्योंकि प्रत्येक व्यक्ति की रेखायें एक निश्चित अवधि में बदलती रहती हैं । इसका कारण एक रेखा की स्थिति के आधार पर किया भविष्य का विश्लेषण कुछ ही समय बाद अलग अर्थ धारण कर लेता है । अव्वल तो भविष्य के संदर्भ में हस्तरेखाओं की कोई अर्थवत्ता ही नहीं है । आधुनिक मनोविज्ञान इस संदर्भ में जिस तह तक पहुँच सका है वह के वल व्यक्तित्व की पहचान तक ही सीमित है न कि भविष्य के ज्ञान का कोई आधार सिद्ध हुआ है । सामुद्रिक ज्ञान अर्थात् शरीर के चिह्नों के संदर्भ में भी यही तथ्य हैं ।
अंक ज्योतिष के आधार पर भी भविष्य का विश्लेषण संभव नहीं है । इस विद्या की आधारभूत मान्यता यह है कि प्रत्येक अंक का अपना विशिष्ट गुण है । जन्म दिन या नाम के आधार पर व्यक्ति का भाग्याँक निकाला जाता है और फिर उन गुणों के आधार पर उसका भविष्यफल तैयार किया जाता है ।
विचारशील व्यक्ति इसके स्वरूप को देखकर ही यह निष्कर्ष निकाल लेते हैं कि इसकी वास्तविकता क्या है ।
भविष्य को जानने के जितने प्रयत्न होते हैं उन सबमें प्रायः अटकलबाजियाँ ही लगायी जाती हैं । अन्यथा यदि कोई व्यक्ति अपना भाग्य जान सका होता तो वह आने वाली कठिनाइयों और संघर्षों से इतना विकल हो जाता कि सुखद वर्तमान का आनन्द भी मिट्टी में मिल जाता । यह बात अलग है कि पुरुषार्थ एवं परिश्रम से जी चुराने वाले व्यक्ति ही भाग्य की दुहाई दिया करते हैं । वर्तमान विचारधारा इस भाग्यवाद को भी शोषण चक्र का ही एक रूप मानती है । अच्छा हो हम भाग्यवाद के कुचक्र से निकलें , पुरुषार्थपरायण बनें और पराक्रम कर अपना भाग्य अपने हाथों लिखें ।
जब पाण्डवों का अन्त समय आया तो वे हिमालय पर स्वर्गारोहण क्षेत्र में गलने के लिये चले गये ।
एक-एक करके सभी गलते चले गये । अन्त में युधिष्ठिर बच गये । उन्हें सशरीर स्वर्ग ले जाने के लिए देवताओं का विमान आया ।
युधिष्ठिर के साथ उनका पालतू कुत्ता भी था । उनने देवदूतों से कहा । मुझे स्वर्ग जाना है तो यह कुत्ता भी साथ चलेगा । स्वर्ग में कुत्तों के लिए स्थान नहीं था । सो देवदूतों ने मना कर दिया । खाली विमान वापस लौटा ले गये ।
देव गुरु बृहस्पति ने कहा जो कुत्ता युधिष्ठिर का प्रिय बन सका वह साधारण आत्मदानी नहीं हो सकता उसे भी सशरीर उनके साथ में ले आया जाय ।
विमान फिर से लौटकर आया और युधिष्ठिर को कुत्ते समेत स्वर्गलोक ले गया । इसे कहते हैं मैत्री का निर्वाह।
दैव और दानव दोनों अपने को बड़ा कह रहे थे । वस्तुस्थिति का फैसला कराने वे प्रजापति के पास पहुँचे ।
प्रजापति ने दूसरे दिन प्रातः दोनों पक्षों को बुलाया । दोनों को दो जगह भोजन करने बिठाया । व्यंजनों को देखकर दोनों का मन जल्दी खाने के लिए मचल रहा था ।
इसी बीच ब्रह्माजी ने मंत्र पढ़कर दोनों के हाथ कोहनी पर से मुड़ने बंद कर दिये । अब खाया जाय तो कैसे ? दानव खड़ा हाथ ऊपर ले जाते । ग्रास छोड़ते वह चेहरे के इर्द-गिर्द गिरता मुँह और कपड़े सभी खराब हो गये । पानी भी न पी सके । उन्हें भूखा प्यास उठना पड़ा ।
देवताओं ने अपने स्वभाव के अनुरूप एक ने दूसरे को अपने हाथ से खिलाया । इस प्रकार सभी का पेट भर गया । पानी भी एक ने दूसरे को पिल या । इस प्रकार देव समुदाय ने भोजन का पूरा आनन्द उठाया ।
ब्रह्माजी ने कहा जो अपने ही पेट का ध्यान रखते हैं वे छोटे है । जिन्हें दूसरों की चिन्ता रहती है वे बड़े भी बोले जाते और नफे में भी रहते हैं ।
मूर्धन्य मनोवैज्ञानिक कारेन हार्नी अपनी कृति “न्यूरोटिक पर्सनालिटी ऑफ आवर टाइम्स “ में कहते हैं कि आज जितने अधिक पुरुष एवं महिलाएँ मनोवैज्ञानिक रूप से असामान्य हैं, उतने इस वैज्ञानिक युग से पहले कभी नहीं थे । यूनेस्को द्वारा प्रकाशित “कोरियर” नामक पत्रिका के एक विशेषांक में मानसिक रोगों के बारे में आँकड़ों सहित दी गई जानकारी से स्पष्ट होता है कि समस्त संसार के व्यक्तियों की मानसिक स्थिति बड़ी दुःखद है । लगभग इसी तरह का मत “बर्ल्ड फेडरेशन ऑफ मेण्टल हेल्थ “ जैसी संस्थाओं ने भी प्रकट किया है कि इस सुविधा सम्पन्न युग में भी आज मानसिक विखण्डन किसी भी तरह कम न होकर सतत् बढ़ता ही जा रहा है ।
इस समस्या के समाधान का किसी देश की शासन प्रणाली से भी कोई सम्बन्ध नहीं है । यह प्रणाली चाहे साम्यवादी हो या प्रजातांत्रिक अथवा समाजवादी इसमें हेर-फेर से समस्या का समाधान संभव हो जायेगा, ऐसी आशा करना दुराशा मात्र ही होगी । इस परेशानी का निवारण तभी सम्भव है , जब उसके सही कारण की खोज की जाय ।
भारतीय मनोवैज्ञानिक डॉ. आई. पी. सचदेव ने अपने शोधग्रंथ “ योग एण्ड साइको एनालिसिस “में इस समस्या के मूल कारणों के विषय में विशद विचार किया है । उन्होंने बताया है कि विज्ञान युग के पूर्व व्यक्ति में जो धार्मिक आस्थाएँ तथा वैयक्तिक मान्यताएँ थी, उन पर विज्ञान के प्रत्यक्षवाद ने भरपूर कुठाराघात किया है जिसका परिणाम आज हम मानसिक रोगों के रूप में भुगत रहे हैं । अरटुर आइसेनवर्ग ने भी अपनी कृति “रिफ्लेक्शन्स ऑफ साइकोलॉजिकल इनसेक्यूरिटी इन मॉडर्न मैन” में भी इसी मत का समर्थन किया है ।
निःसन्देह समस्या के उपर्युक्त कारण में विषय में इन मनोवैज्ञानिकों के मतों को यथार्थ समझा जा सकता है । विज्ञान के नित नूतन होने वाले आविष्कारों से सुविधा संवर्धन तो खूब हुआ है , पर साथ ही धार्मिक एवं नैतिक अवमूल्यन में भी कोई कोर-कसर नहीं , छोड़ी गयी । इस तरह के अवमूल्यन ने एक राष्ट्र से दूसरे राष्ट्र के प्रति , एक जाति से दूसरी जाति के प्रति , एक परिवार से दूसरे परिवार के प्रति भरपूर नफरत पैदा कर दी है । यहीं नहीं, इस बीमारी से पति, पत्नी पिता-पुत्र के भी आपसी सम्बन्ध प्रभावित हुए हैं । यहाँ तक कि स्वयं व्यक्ति अपने प्रति भी इसी भाव से भर गया है । यही कारण है कि जहाँ पति-पत्नी की पारस्परिक नफरत एक दूसरे से तलाक लेने की नौबत पैदा करती है , वहीं पिता पुत्र आपसी स्वार्थों के लिए एक-दूसरे को मार देते हैं । व्यक्ति स्वयं अपने प्रति नफरत एवं घृणा रखकर आत्महत्या कर लेता है । इन सारे बिखरावों का एक मात्र कारण है जीवन के उद्देश्य तथा पारस्परिक सम्बन्धों की समुचित व्याख्या तथा प्रतिपादन के परिपालन का अभाव । कारण कि विज्ञान और उसके अध्येता वैज्ञानिक चाहे कितने भी सक्षम एवं सामर्थ्यवान क्यों न हों, पर उनके द्वारा की गई शरीर क्रिया एवं संरचना संबंधी मीमांसा अभी तक मानवीय सम्बन्धों की मधुरता का कोई समुचित आधार नहीं प्रस्तुत कर सकी हैं । विज्ञान ने यह भले ही सिखाया हो कि चन्द्रमा, मंगल या बुध पर कैसे पहुँचा जाय, अंतरिक्ष में बस्तियाँ बनाकर कैसे रहा जाय, पर धरती पर सही ढंग से रहना वह आज तक नहीं सिखा पाया ।
यहाँ उद्देश्य विज्ञान की निन्दा करने जैसा न होकर मानव के स्वयं के तथा आपसी बिखराव के कारण की विवेचना करना ही है । यह बिखराव दूर भी तभी हो सकता है, जब धार्मिक एवं नैतिक मूल्यों की पुनः स्थापना हो ।
वर्तमान समय में इस प्रतिष्ठापना में एक मौलिक कठिनाई यह है कि आज का समाज पूर्व की तरह आस्थापरायण विश्वासी न होकर बुद्धिवादी व तर्क-परायण है । यह उन्हीं तथ्यों को स्वीकार करने के लिए तैयार है जो उसकी बुद्धि को सन्तुष्ट करें तथा तर्कों की कसौटी पर सत्यापित किये जा सकें । क्या ? क्यों ? एवं कैसे ? का जवाब पाए बगैर उसे कोई बात भाती नहीं है, ईश्वर क्या है ? पड़ोसी से क्यों स्नेह किया जाय ? इन सब सवालों का ठीक-ठीक जवाब पाए बिना व्यक्ति आस्तिक बनने की जगह नास्तिक बनने में ही कहीं अधिक भलाई मानेगा । इसी तरह जो धर्म यह कहता है कि अमुक किताब में जो लिखा है उसे मानना ही पड़ेगा । हमारी बातें मानो नहीं तो तुम काफिर हो, उसकी भी बातों का आज मखौल ही उड़ाया जाएगा । इन धार्मिक मतवादों की असफलता के बाद बिखराव कैसे दूर हो?
इस बिखराव को दूर करने के लिए आवश्यकता एक सशक्त मनोवैज्ञानिक प्रणाल की है, किन्तु फ्रायड जैसे मनो अध्येताओं के सिद्धान्तों से भी काम नहीं चलने का, क्योंकि आज व्याप्त रहे चिन्ता उद्वेग के कारण मात्र कामुक वासनाओं का पूरा न होना नहीं है, इस तथ्य को वर्तमान मनोवैज्ञानिकों ने भी एक स्वर से स्वीकारा है । इसी कारण डॉ. सी. जी. युँग सरीखे अध्येताओं ने आध्यात्मिक तथा नैतिक मूल्यों की प्रतिष्ठापना के लिए प्रयास किए हैं । इस विषय में उनकी कृति “मॉर्डन मैन इन सर्च ऑफ सोल” काफी उल्लेखनीय है । युँग के अतिरिक्त इस दिशा में फ्रैकल, राबर्टो, असागिओली व गार्डनर मर्फी के प्रयास भी सराहनीय हैं ।
वर्तमान समय में आज के बुद्धिवादी वैज्ञानिक मन की सारी व्यथाओं को दूर करने तथा एक सर्वांगपूर्ण मनोवैज्ञानिक प्रणाली प्रदान करने का साहस अभी भी भारतीय ऋषियों द्वारा प्रणीत आध्यात्म विज्ञान करता है । यह तथ्य चौंकाने वाला भले लगे, पर है सर्वथा सत्य।
निः सन्देह विश्व के इतिहास में पहली बार धर्म , आध्यात्म एवं दर्शन तीनों एक साथ एक बिन्दु पर आ मिले हैं और उनने अपनी वैज्ञानिकता सिद्ध की है । इस वैज्ञानिकता से परिपूर्ण पद्धति ही एक सर्वांगपूर्ण मनोवैज्ञानिक प्रणाली के रूप में पल्लवित हुई, जिसे योगदर्शन , योग मनोविज्ञान या अध्यात्म मनोविज्ञान कहा गया । महर्षि पतंजलि के ये सुसम्बद्ध सूत्र यद्यपि अपने मूल भावों में उससे भी पहले उपनिषदों, वेदों में विद्यमान हैं फिर भी इन्हें सुव्यवस्थित कर मनोवैज्ञानिक स्वरूप देने का श्रेय उन्हीं को प्राप्त है । इसकी सराहना , मनोवैज्ञानिक युँग परामनोवैज्ञानिक व मर्फी सभी कर चुके हैं । पूर्णतया प्रयोग परीक्षण पर आधारित यह पद्धति निश्चित ही आज के व्यक्ति विशेष तथा समूह रूप समाज के बिखराव को दूर करने में पूर्णतया सक्षम है । इसमें सभी पक्षों की तर्क सम्मत व्याख्या करते हुए समाधि अर्थात् समधी (बुद्धि के समत्व में प्रतिष्ठित होने) तथा मन से अतिमन की ओर आरोहण करने का सहज सुगम राजमार्ग बताया गया है । इसी कारण स्वामी विवेकानन्द प्रभृति मनीषियों ने इसे “राजयोग“ भी कहा है । इसी प्रणाली को साधारण किसान से उच्चस्तर के बुद्धिवादी वैज्ञानिक तक सभी इसकी मूल मान्यताओं को व्यवहार में लाकर सभी प्रकार की मनोव्यथाओं से मुक्ति पा आनन्द में प्रतिष्ठित हो सकते हैं ।
ईरान का बादशाह कैकौस था । उसने बहुत से युद्ध लड़े और जीते । वह पराजित देशों को लूटकर अत्यन्त धनी बन गया । बाद में उसने अलबर्ज नामक पहाड़ी पर दो नए महल बनवाएँ । वहाँ इतने हीरे-जवाहरात भरे थे कि रात्रि को भी दिन की तरह प्रकाश रहता था ।
कैकौस गर्व से भर गया कि वह सम्पूर्ण धरती में सबसे बड़ा बादशाह है ।
जब इबलीस (शैतान )ने बादशाह के हृदय में भरे अहंकार को देखा तो उसे अपने जाल में फँसाने का निश्चय कर लिया । उसने एक जिन्न को नौकर के वेश में बादशाह को एक खूबसूरत गुलदस्ता भेंट करने के लिए भेजा ।
नौकर ने कदमबोसी करके बादशाह से कहा । “शाह ए आलम ! संसार भर में आप से बड़ा कोई बादशाह नहीं है, किन्तु अब भी एक ऐसी दुनिया है जहाँ आपका हुक्म नहीं चलता वह है , सूरज चाँद सितारों की दुनिया । हे मालिक !आप चिड़ियों के पीछे उड़ें और आकाश में जा पहुँचे ।”
यह तो आपके वजीर और आदिम बता सकेंगे ।
बादशाह ने सब विद्वानों को बुलाया और उनसे आसमान में उड़ने का उपाय पूछा । उन्होंने एक योजना बनाई ।
उन सबने गिद्ध के चार बच्चे पकड़वाए और उन्हें अच्छा खिला कर खूब मजबूत बनाया
अब एक लकड़ी का चौखटा बनाया गया चारों खूँटे पर एक-एक गिद्ध को बाँध दिया गया । इस चौखट, पर बादशाह का सिंहासन रखा गया । शराब की सुराही के साथ बादशाह उस पर आ विराजे । गिद्ध माँस को पाने के उपाय में ऊपर उड़ें । लोगों के आश्चर्य का ठिकाना न रहा । जब उन्होंने देखा कि उनके शहंशाह सचमुच ऊपर उड़ रहे है । ऊपर और ऊपर माँस के टुकड़े , गिद्ध और बादशाह ऊपर उठते ही जा रहे थे । आखिर गिद्ध थक गए उन्होंने पंख मारना छोड़ दिया और बादशाह अपनी सुराही सिंहासन समेत चीन की पहाड़ियों में जा गिरे ।
अहंकारी का अन्त ऐसा ही होता है । इस सृष्टि में बड़बोलों का पराभव आँख झपकते होता देखा जाता है । तब भी हम अपनी छोटी सी दुनिया के वैभव पर इतराते देखे जाते हैं ।
शुद्धोधन का बनवाया हुआ राजप्रासाद सूना पड़ा अपनी नीरवता पर शोकमग्न दीख पड़ता था। युवराज सिद्धार्थ के चक्रवर्ती सम्राट अथवा महायोगी होने की भविष्यवाणी सुनकर महाराज ने अपने एक मात्र पुत्र को राज्याधिकारी घोषित कर महल को सभी प्रकार की सुख-सुविधाओं से पाट दिया था। ऋतु अनुकूल राग-रंग साज सज्जा और आमोद-प्रमोद के किसी साधन की कमी न थी।
परन्तु फिर भी सिद्धार्थ ने सब-कुछ विलास के साधनों को तिलाञ्जलि देकर भिक्षु वेश धारण किया। आज शुद्धोधन शोकाकुल थे। जिस पुत्र से सिंहासन पर बैठकर राज संचालन की अपेक्षा की थी, वही सुबह से कपिलवस्तु में घर-घर भिक्षाटन कर रहा था।
नियमानुसार भिक्षाटन के लिए अमिताभ गौतम शुद्धोधन के गृह द्वार पर भी आए। खेद-पूर्वक पिता ने कहा-क्या यही हमारे कुल की परिपाटी है। अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है सिद्धार्थ तुम इस वेश का त्याग कर दो।”
“राजन् यह आपके कुल की नहीं, बुद्ध कुल की परिपाटी है। मैं अब राज-परिवार का सदस्य नहीं आत्मकल्याण और लोक मंगल की साधना में लगे भिक्षु संघ का परिजन हूँ।”
“तो भिक्षु ! क्या तुम मेरा आतिथ्य स्वीकार करोगे।” ‘हाँ’ बुद्ध ने कहा-अपने भिक्षु संघ सहित मैं मध्याह्न पुनः आऊँगा।” इतना कह वे चले गए।
स्वागत सत्कार की बड़ी जोर-शोर से तैयारियाँ की गई। विश्व मानव की सेवा साधना में निरत साधक का आतिथ्य करने के लिए सारा महल और सभा-कक्ष विशेष रूप से सजाया गया।
पति के चिर वियोग का विषपान किए निराश और विह्वल यशोधरा को भी तथागत के आगमन का समाचार मिला तो हृदय प्रसन्नता से छलक उठा। सामीप्य नहीं तो क्या? लोक कल्याण के लिए उन्होंने मेरा त्याग भले ही कर दिया हो? अर्धांगिनी के रूप में न सही एक मानव पुत्री जीवित प्राण के रूप में तो मैं अभी भी उनकी प्रिया पात्र हूँ।
तथागत ने माता-पिता पत्नी, पुत्र, भ्राता-भगिनी की संकीर्ण परिधि को तोड़कर समूचे विश्व तक अपना आत्म-भाव विस्तृत कर लिया है। पति रूप में उन्हें पाकर तो धन्य थी ही। आज उनके मार्ग से हटकर उनकी साधना का मार्ग निष्कंटक किया तो और भी धन्य हूँ।
भगवान पधारे। वस्तुतः तथागत ने यशोधरा के त्याग को उपेक्षित नहीं किया था। वे उसके पास आए। अनायास वाणी प्रस्फुटित हुई “यशोधरे ! कुशल तो हो।”
“हाँ स्वामी !” चिर प्रतीक्षित अपने आराध्य को खड़ा देख हृदय गदगद हो उठा।
“स्वामी नहीं भिक्षु। मैं अपना धर्म निभाने आया हूँ। बोलो तुम कुछ भिक्षा दे सकोगी।”
यशोधरा विचारमग्न हो गई। अब क्या बचा है देने के लिए? अपने दाम्पत्य सुख और मिलन के क्षणों की स्मृति को छोड़कर क्या शेष है। परन्तु तत्क्षण ही उसके चेहरे पर निश्चय के भाव उभरे।
अपने पुत्र राहुल को पुकारा और तथागत की ओर उन्मुख होकर कहा “भन्ते। अपने पूर्व सम्बन्धों को ही दृष्टिगत रखकर आप भी कुछ प्रतिदान दे सकेंगे।”
“कहो” “तो राहुल को अपनी पितृ परम्परा निभाने देकर उसे अपना अधिकार पाने दीजिए।” जाओ राहुल बुद्ध की शरण में धर्म की संघ की शरण में जाओ। राहुल के साथ सभी के समवेत स्वरों से आकाश गूँज उठा-बुद्धं शरणं गच्छामि...। वह महीयसी अपने महात्याग का एक और परिचय देकर पीछे मुड़ चुकी थी।
बुद्ध का त्याग अधिक श्रेष्ठ था या यशोधरा का राहुल का त्याग, किन्तु भारतीय संस्कृति का गौरव अक्षुण्ण रखने वाली नारी शक्ति ने पुनः अपना वर्चस्व स्थापित कर दिया।
एक पण्डित किसी के घर में मृत्यु होने के समय शोक संवेदना प्रकट करने और सांत्वना देने जाया करते। कितने ही कथा प्रवचन और दृष्टांत सुनाया करते थे उन्हें उस क्षेत्र का ज्ञानी माना जाता था।
एक दिन पण्डित जी की अपनी बकरी मर गई। वे बुरी तरह रोने लगे। भीड़ इकट्ठी हो गई। ज्ञानी को इस प्रकार शोक करने पर आश्चर्य व्यक्त किया।
पण्डित जी की इस बार तो आपकी बकरी मरी थी।
उसकी तुलना दूसरे घरों के हजारों मृतकों से कैसे हो सकती है।
जब ‘आत्महत्या’ शब्द लिखा या बोला जाता है, तो उसका अभिप्राय होता है मनुष्य द्वारा किया गया आत्मघात। पिछले दिनों तो इस संबंध में समझा यही जाता रहा था कि यह विशुद्ध मानवी प्रवृत्ति है, और सिर्फ मनुष्यों में ही पायी जाती है, किन्तु अब ज्ञात हुआ है कि यह प्रवृत्ति नभचरों और जलचरों में भी समान रूप से पायी जाती है, वह भी सामूहिक, अर्थात् जब उन्हें आत्महत्या करनी होती है, तो वह मनुष्य की तरह सर्वथा एकाकी रहकर नहीं करते, वरन् सम्पूर्ण जाती ही मृत्यु का वरण करना पसन्द करती है।
जटिंडा (आसाम) के संबंध में सभी जानते हैं कि उस क्षेत्र में निवास करने वाले एक विशेष जाति के पक्षी रात के समय बिजली के प्रकाश स्तम्भों और जलती मशालों में एक विशिष्ट मौसम में स्वयं को झोंक-झोंक कर बड़े पैमाने पर प्राण त्यागते देखे गये हैं। यह गुत्थी अभी सुलझ भी नहीं पायी है कि दूसरा ऐसा ही प्रसंग जलचरों में देखने में आया है। हुआ यों कि अमेरिकी समुद्रों में ‘टाइल्स’ नामक एक विशेष प्रजाति की मछलियाँ प्रचुर संख्या में पायी जाती थीं, किन्तु अब से कुछ समय पूर्व वे न जाने क्यों सामूहिक आत्महत्या पर उतारू हो गई और देखते ही देखते पूरा समुद्र इनसे पट गया। समुद्र तटों पर निवास करने वाले मछुआरों और जलयानों में यात्रा करने वाले प्रत्यक्षदर्शियों का कहना था कि ‘टाइल्स’ जाति की मछलियों ने इतनी बड़ी संख्या में आत्मघात किया था कि सम्पूर्ण जलराशि पूरी तरह ढक गई थी और जल-सतह का स्थान मृत मछलियों ने ले लिया था। इस प्रकरण में एक विलक्षण बात यह देखने में आयी कि उक्त प्रजाति को छोड़कर और किसी जाति की मछलियाँ मृत नहीं पायी गई, यद्यपि उनमें विभिन्न प्रजातियों की ढेरों मछलियाँ निवास करती थी। विशेषज्ञों का कहना था कि मृत मछलियों की संख्या गिन पाना तक संभव नहीं था।
इस घटना के कुछ दिन पश्चात् आस्ट्रेलिया के समुद्र तटीय सिडनी शहर के दक्षिण में इवान्स हेड से इलका तक के 190 मील के दायरे में मामला इसके विपरीत ही नजर आया। उपरोक्त घटना में मछलियों ने पानी में रह कर प्राण त्यागना उचित समझा था, जबकि यहाँ करोड़ों की संख्या में वे जल से उछल-उछल कर बाहर निकलतीं और गर्म बालू में तड़पती हुई प्राणोत्सर्ग कर देतीं । कई बार तटवर्ती लोग यह दृश्य देख कर उन्हें बार-बार समुद्री जल में डाल देते, ताकि उनके प्राण बच सकें, पर पुनः-पुनः वे जल से बाहर निकल कर छटपटाती हुई अपनी जीवन लीला समाप्त कर देतीं। अनेक मत्स्य विशेषज्ञों ने जब यह दृश्य देखा तो उनके मन में विचार आया कि संभवतः समुद्री जल में किसी प्रकार का विष फैल गया है, जिससे बचने के लिए ये मछलियाँ जल से बाहर निकल आती हैं । जैसे ही यह बात दिमाग में कौंधी अधिकारियों ने बड़े पैमाने पर मछलियों को वहाँ से हटा कर निकटवर्ती जलाशयों में छोड़ा किन्तु उनके आश्चर्य का तब कोई ठिकाना न रहा जब उन्होंने देखा कि यहाँ भी वे जल से बाहर निकल कर तड़प-तड़प कर जान देने लगीं। उल्लेखनीय बात यह थी कि इस बात भी एक विशेष प्रजाति की मछलियों में ही यह विलक्षण व्यवहार देखा गया। अन्य अनेक समुद्री जीवों एवं दूसरी जाति की मछलियों में इस तरह का कोई असामान्य लक्षण नहीं दिखाई पड़ा।
स्थानीय मत्स्य सहकारी बोर्ड के अध्यक्ष लेस्टर क्लीब
ने वहाँ के समुद्री जल और मृत मछलियों को अध्ययन-परीक्षण हेतु कई विश्वविद्यालयों में भेजा, पर उनमें कोई असामान्यता नहीं देखी गई। उनका कहना था कि चालीस वर्षों के उनके इस व्यवसाय में यह अपने प्रकार की पहली घटना थी। उससे पूर्व आस्ट्रेलिया में उनने ऐसा दृश्य न कभी देखा था, न सुना था।
मनुष्य भी इन दिनों महामरण के ऐसे ही सरंजाम जुटाते देखा जा रहा है। उसके सामने अब दो ही विकल्प हैं-विकास और विनाश के। यदि वह विकास के रास्ते का चयन करता है, तो इसमें कोई संदेह नहीं कि सम्पूर्ण मनुष्य जाति सुरक्षित बच जायेगी और आने वाला समय निश्चय ही उसके लिए उज्ज्वल भविष्य की संरचना करेगा, किन्तु इसकी उपेक्षा कर यदि वह विनाश का मार्ग अपनाता है, तो इसमें आश्चर्य नहीं कि अगले दिनों हमें जलचरों, नभचरों की तरह सामूहिक मरण की तैयारी करनी पड़े।
मानवी सत्त असीम सामर्थ्यों से युक्त है। संभावनाएँ अनन्त हैं, पर जब तक यह आत्मबोध न हो जाय, अन्तःशक्ति सम्पन्नता का लाभ मनुष्य को नहीं मिल पाता। अन्तः क्षेत्र में प्रतिष्ठित हुई दुर्बुद्धि और दुष्प्रवृत्ति का समन्वय कुसंस्कार ही वह परत है जो न साधना को सिद्ध होने देती है और न उस निमित्त श्रद्धा जमने-मन लगने देती है। कुसंस्कार ही हैं जो यमदूतों की तरह पग-पग पर त्रास देते रहते हैं, व्यक्तित्व को हेय बनाते हैं। आत्मबल सम्पन्न गुरु का वरण इसीलिये किया जाता है। अपने आत्मबल द्वारा वह शिष्य में ऐसी प्रेरणाएँ भरते हैं जिससे वह सदमार्ग पर चल सके। साधनामार्ग के अवरोधों एवं विक्षोभों के निवारण में गुरु का असाधारण योगदान होता है वह शिष्य को अन्तः शक्ति से परिचित ही नहीं कराते, वरन् उसे जाग्रत एवं विकसित करने के हर संभव उपाय बताते और प्रयास करते हैं। उनके यह अनुदान शिष्य अपनी आँतरिक श्रद्धा के रूप में उठाता है। जिस शिष्य में आदर्शों एवं सिद्धान्तों के प्रति जितनी अधिक निष्ठ होगी, वह गुरु के अनुदानों से उतना ही अधिक लाभान्वित होगा।
आत्मचेतना के उत्कर्ष में सहयोग देने एवं पूर्णता प्राप्ति की दिशा में अग्रसर करने के कारण गुरु की महान महिमा महत्ता से समूचा आर्ष वांग्मय भरा पड़ा है। “जिन सद्गुरु ने मुझे इस संसार सागर से पार उतार, वे मेरे अंतःकरण में विराजमान् हैं। इसी कारण विवेक के प्रति मेरे मन में विशेष अति आदर है। जिस प्रकार नेत्रों में अंजन लगाने से दृष्टि को अपूर्व बल प्राप्त होता है और तब मनुष्य भूमि के अन्दर दबी पड़ी महानिधियों को देखने में सक्षम होता है, अथवा जिस प्रकार चिंतामणि हाथ में आने पर सभी प्रकार के मनोरथ सिद्ध हो जाते हैं, उसी प्रकार मैं ज्ञानदेव कहता हूँ कि गुरुदेव श्री निवृत्तिनाथ जी की कृपा से मैं पूर्णकाम हो गया हूँ। इसीलिये कहता हूँ कि गुरु भक्ति करनी चाहिए। क्योंकि जिस प्रकार वृक्ष की जड़ में पानी सींचने से शाखायें और पल्लव अपने आप हरे हो जाते हैं अथवा जिस प्रकार अमृत-रस का पान करने से समस्त रसों का आनन्द मिल जाता है, उसी प्रकार सद्गुरु वरण से साधक के समस्त इष्ट मनोरथ सिद्ध होते हैं।”
गुरु का अर्थ है अंधकार से प्रकाश की ओर, असत् से सत् की ओर ले जाने वाला मार्गदर्शक। स्कन्दपुराण-गुरुगीता प्रकरण में गुरु शब्द की व्याख्या करते हुए कहा गया है।
गुकारस्त्वन्धकारः स्याद् रुकारस्तेत उच्यते। अज्ञान ग्रासकं ब्रह्म गुरुरेव न संशयः॥
अर्थात् ‘गु’ शब्द का अर्थ है-अंधकार और ‘र’ का अर्थ है-तेज अज्ञान का नाश करने वाला तेज रूप ब्रह्म गुरु ही है, इसमें संशय नहीं। उपनिषद् आदि ग्रन्थों में धर्मशास्त्रों में गुरु गरिमा का वर्णन करते हुए गुरु को अज्ञान से छुड़ाने वाला, मुक्ति प्रदाता, सन्मार्ग एवं श्रेय पथ की ओर ले जाने वाला पथ-प्रदर्शक बताया गया है। गुरु ही ब्रह्मा, विष्णु और महेश्वर है। वही परब्रह्म है। गुरुकृपा के अभाव में साधना की सफलता संदिग्ध ही बनी रहेगी।
विभिन्न शास्त्रों में सद्गुरु की महिमा-महत्ता असाधारण बताई गयी है। गुरुवरण की परम्परा वैदिककाल से लेकर अद्यावधि चलती रही है। जैन और बौद्धों ने हिन्दुओं की तरह गुरु परम्परा को भी स्वीकार किया। अद्वैतवादियों एवं बौद्ध मार्ग के अनुयायियों का कहना है कि मनुष्य को अपने आप पर निर्भर होना होगा, कोई दूसरा सहायता नहीं कर सकता। परन्तु यह निर्विवाद सत्य है कि विशुद्ध अद्वैतवादी भी वास्तव में गुरु पर निर्भर करते हैं और बौद्धधर्म का प्रधान मंत्र तो बुद्ध के शरणागत होने पर जोर देता है। दूसरे साधना मार्गों के लिए-विशेषकर उन मार्गों के लिए जो गीता की तरह भगवान के सनातन अंश के रूप में व्यक्तिगत जीवन के सत्य को स्वीकार करते हैं अथवा जो यह विश्वास करते हैं कि भगवान और भक्त दोनों सत्य हैं, गुरु की सहायता पर उसे एक अनिवार्य साधन समझकर निर्भर किया गया है, ऐसा महर्षि अरविन्द का मत है।
प्राचीनकाल में भारतीय परम्परा में गुरु प्रायः ब्राह्मण हुआ करते थे। मनु एवं चाणक्य ने उन्हें ही गुरु पद प्रदान किया है जो ब्राह्मण हों। ब्राह्मण अर्थात् ब्रह्मपरायण एक ऐसी सत्त जो उत्कृष्टताओं का, सत्प्रवृत्तियों का समुच्चय हो। जिसके पदचिह्नों पर चलकर, जिसके द्वारा प्रदत्त मार्गदर्शन को अपनाकर साधक या शिष्य अपना जीवन भी वैसा ही बना सके। ब्राह्मण परम्परा में इस प्रकार के सद्गुरु प्रायः गृहस्थ ही हुआ करते थे। गौतम, भारद्वाज, वशिष्ठ, अत्रि आदि सप्तऋषियों से लेकर मध्यकाल एवं आधुनिक काल तक यह परंपरा अनवरत रूप से चली आई है। यद्यपि इस वर्ग में वानप्रस्थियों एवं संन्यासियों का भी अभाव न था। जैन और बौद्ध गुरु तो सभी संन्यासी थे। यद्यपि बुद्ध के सभी प्रमुख शिष्य प्रव्रज्या धर्म अपनाने से पूर्व ब्राह्मण थे, जैसे-सारिपुत्र मौदगलायन, पुष्कर, कश्यप आदि। इसी परम्परा में आगे नागार्जुन और अश्वघोष आदि हुए। मध्यकाल में गुरु को भगवान के समतुल्य माना जाता था। कारण था उनका उत्कृष्ट आदर्श चरित्र, उच्चस्तरीय व्यक्तित्व एवं परमार्थपरायण जीवन।
मनुस्मृति 2/142 में उल्लेख है कि यह गुरु ही है जो शिष्यों में सुसंस्कार डालता और आत्मोन्नति के पथ पर अग्रसर करता है। उनके चरित्र और समग्र व्यक्तित्व का निर्माण करता है। चेतना का स्तर ऊँचा उठाने और प्रतिभा, प्रखरता को आगे बढ़ाने की आवश्यकता गुरुवरण से ही पूरी होती है। गुरु केवल मार्गदर्शन ही नहीं करते, वरन् अपनी तपश्चर्या, पुण्य सम्पदा एवं प्राणऊर्जा का एक अंश देकर शिष्य की पात्रता और क्षमता बढ़ाने में योगदान करते हैं। वह समय की दीर्घा को भी कम करते हैं और उसे बहुत ही कम समय में अभीष्ट लाभ की सिद्धि में सहायक होते हैं। अंतःप्रज्ञा को जाग्रत करने एवं पूर्णता प्राप्ति के लक्ष्य तक पहुँचाने में सतगुरु की असाधारण भूमिका होती है। श्रेय पथ के निर्धारण के साथ ही असमंजसों का द्विविधाओं का निराकरण वही करते हैं। आत्मिक क्षेत्र का परिशोधन-परिष्कार कर सकने वाली गुरु गरिमा की जितनी महिमा गायी जाय, कम है।
महर्षि अरविन्द का कहना है कि सच्चे सद्गुरु भगवान की प्रतिमूर्ति हैं। जब भगवान को पथ प्रदर्शक के रूप में स्वीकार किया जाता है तब उन्हें गुरु रूप में स्वीकार किया जाता है। श्रद्धा-विश्वास की प्रगाढ़ता ही मनुष्य का सही पथ-प्रदर्शन करती और पूर्णता के लक्ष्य तक पहुँचाती है। अपने बारे में उल्लेख करते हुए वे लिखते हैं कि-मैं अपने आँतरिक जीवन की ओर अपने पहले निर्णायक मोड़ के लिए एक ऐसे व्यक्ति का ऋणी हूँ जो बुद्धि, शिक्षा और क्षमता में मुझसे कम थे और किसी भी प्रकार आध्यात्मिक दृष्टि से पूर्ण और श्रेष्ठ नहीं थे। परन्तु जब मैंने उनके पीछे एक शक्ति देखी और सहायता के लिए उनकी ओर मुड़ने का निर्णय किया तो मैंने संपूर्णतः अपने को उनके हाथों में छोड़ दिया और सहज स्वाभाविक निष्क्रियता के साथ उनके मार्गदर्शन का अनुसरण किया।” इस समर्पण से वे स्वयं आश्चर्यचकित थे। “इसका परिणाम हुआ कि अनेकानेक मौलिक प्रकार के रूपांतरकारी अनुभवों का ताँता बँध गया मुझ से कहा गया कि मैं भविष्य में समर्पण भाव की उसी पूर्णता के साथ अपने आपको अन्तस्थ गुरु के हाथों छोड़ दूँ जिस पूर्णता के साथ मैंने मानव प्रणाली के हाथों छोड़ा था।” आत्मिक प्रगति के लिए समर्पण वस्तुतः प्रधान तत्व है।
श्रेष्ठ गुरु के प्रति समर्पण सभी प्रकार के समर्पणों से श्रेष्ठ है। क्योंकि इसके द्वारा मनुष्य केवल निराकार को ही नहीं, वरन् साकार को, केवल अपने अन्दर विद्यमान भगवान को ही नहीं, बाहर विद्यमान विराट परमात्म चेतना को समर्पण करता है। इससे साधक को अपने आत्मा में पीछे हटकर ही नहीं जहाँ कि अहंभाव बैठा है, वरन् अपनी व्यक्तिगत प्रकृति में भी जहाँ कि वह शासन करता है, अहं का अतिक्रमण करने का सुयोग प्राप्त होता है। वह समग्र भगवान के प्रति गीतोक्तक्त “समग्रं माम् मानुषी तनुँ आश्रितम्” के प्रति भी पूर्ण समर्पण के संकल्प कर चिन्ह है। यथार्थ आध्यात्मिक समर्पण तभी संभव हो पाता है जब गुरु को सब भावों परात्पर, निर्व्यक्तिक, सव्यक्तिक में स्वीकार किया जाय। गुरु-शिष्य का गठबंधन वह श्रेष्ठतम गठबंधन है जिसके द्वारा मनुष्य भगवान से जुड़ता और सम्बन्ध स्थापित करता है। गुरु या भगवत्कृपा दोनों एक ही हैं और यह तभी चिरस्थायी बनती हैं जब शिष्य कृपा प्राप्ति की स्थिति में हो। श्रद्धासिक्त समर्पण ही इसका मूल है। इस रहस्य को समझने के लिए शास्त्रकारों ने प्रबल प्रयत्न किये हैं। यहाँ तक कि गुरु को गोविन्द से बढ़कर बताया है। उन्हें ब्रह्मा, विष्णु, महेश की उपमा दी है और उनकी कृपा को मुक्ति का कारण बताया है।
बौद्ध ग्रन्थ “विशुद्धि मग्ग“ 17-119 में कहा गया है कि - “जिस प्रकार जन्मान्ध व्यक्ति हाथ पकड़ कर ले जाने वाले व्यक्ति के अभाव में कभी सही मार्ग से जाता है तो कभी कुमार्ग से। उसी प्रकार संसार में संचरण करते हुए अज्ञानी मनुष्य पथ-प्रदर्शक सद्गुरु के अभाव में कभी पुण्य करता है तो कभी पाप। गुरु गरिमा से जुड़कर ही वस्तुतः मनुष्य द्विजत्व धारण करता है और सामान्य मानव से ऊँचा उठकर महामानव, देवमानव बनता है।”
गुरुतत्त्व के सान्निध्य-अवलम्बन से कितने ही सामान्य व्यक्तियों को असाधारण महापुरुषों की श्रेणी में जा पहुँचने का अवसर मिला है, इन प्रसंगों से पुराण, इतिहास के पन्ने भरे पड़े हैं महात्मा बुद्ध के अनुग्रह से अनाथ पिण्डक, विशाखा, गौतमी, आनन्द बिंबिसार, अशोक, हर्षवर्धन, कुमारजीव, नागार्जुन जैसे कितने ही महानता के उच्च शिखर पर पहुँच गये। अंगुलिमाल, अंबपाली जैसे कितने ही दलित मानव कायाकल्प कर महामानव बन गये। ईसा का सान्निध्य पाकर एण्ड्रयू, पीटर, जेम्स, जॉन, मैथ्यू, साइमन, सेंटपाल जैसे नगण्य से व्यक्तित्व ईसाई धर्म के महान प्रकाश स्तम्भ बन गये। आद्यशंकराचार्य से जुड़ने पर पद्यपाद, हस्तामलक, भारती, मण्डनमिश्र जैसे व्यक्तित्व कहाँ से कहाँ जा पहुँचे, इतिहासवेत्ता इसे भली-भाँति जानते हैं। समर्थ एवं शिवाजी, प्राणनाथ और छत्रसाल, चाणक्य और चन्द्रगुप्त, चैतन्यदेव एवं जगाई-मधाई रामकृष्ण-विवेकानन्द तथा विरजानन्द एवं दयानन्द आदि की आत्मिक घनिष्ठता यदि न बन पड़ी होती, तो यह सहज की अनुमान लगाया जा सकता है कि कौन सा पक्ष घाटे में रहता। बेल, वृक्ष से लिपटकर, नाला गंगा में मिलकर, बूँद समुद्र में घुलकर क्या से क्या हो जाते हैं, इस तथ्य को प्रायः सभी जानते हैं। शिष्य का गुरु के प्रति श्रद्धा व समर्पण भाव उसे आत्मिक प्रगति के पथ पर तो प्रशस्त करता ही है, दैवी अनुदानों की वर्षा भी होने लगती है।
गुरु वरण का श्रद्धासिक्त अभ्यास ही अध्यात्म क्षेत्र में आगे बढ़ने का प्रथम सोपान है। जो गुरुतत्त्व के प्रति जितनी श्रद्धा जिस मात्रा में जगा सका, समझना चाहिए, उसके लिए आत्मिक विभूतियाँ उपलब्ध करने का स्वनिर्मित राजमार्ग मिल गया। मार्गदर्शक सत्ता गुरु ही है जो साधना संग्राम में शिष्य की सहायता करते और कृष्ण की तरह अर्जुन को महाभारत लड़ने को आग्रह करते हैं। जब वह तैयार हो जाता है, समग्र रूप से समर्पण कर देता है, तो वह उसका रथ चलाने, घोड़ा हाँकने, रास्ता बताने और विजय दिलाने के लिए वचनबद्ध हो जाते हैं। इसके लिए साधक को ही अग्रगामी बनना पड़ता है। गाण्डीव उठाने और “करिष्ये वचनं तव” का संकल्प लेने के उपरान्त ही सामान्य सा पाण्डु पुत्र भगवान का अनन्य सहचर अर्जुन बनता है। यही है गुरु के अनुदानों से लाभान्वित होने और साधना से सिद्धि की पृष्ठभूमि । चरित्र की उत्कृष्टता एवं व्यक्तित्व की समग्रता ही गुरु अनुग्रह की वास्तविक उपलब्धि है। यह जिस भी साधक में जितनी अधिक मात्रा में दीख पड़े, समझा जाना चाहिए गुरु की उतनी ही अधिक कृपा बरसी, अनुदान-वरदान मिला। स्पष्ट है कि मानव जीवन के सर्वांगीण विकास हेतु गुरुतत्त्व कितना जरूरी है। शास्त्रों में उल्लेख है कि-यदि कोई सद्गुरु न मिले तो आत्मतत्त्व को गुरु मानकर उसके माध्यम से अपनी समीक्षा करनी चाहिए व मार्गदर्शन लेना चाहिए।” प्रस्तुत वसन्तपर्व जो इस माह की 8 तारीख को आ रहा है, हमें सद्गुरु के प्रति समर्पण का स्मरण कराता है। यह परमपूज्य गुरुदेव का आध्यात्मिक जन्मदिवस माना जाता है व मिशन का वार्षिकोत्सव मनाया जाने वाला पर्व है। हर्ष व उल्लास के प्रतीक के साथ यह द्योतक है समर्पण की श्रेष्ठतम परिणति के । वही अनुदान जो हमारी गुरुसत्ता ने आजीवन पाए, हर सुपात्र के लिए सुगमतापूर्वक सुलभ हैं।
संगीतकार विथोपियन प्रायः राजकुमारों को संगीत विद्या सिखाया करता था। विद्यालय की धूम थी। छात्रों से उसका विद्यालय भरा रहता। छात्र अपनी-अपनी प्रतिभा के अनुरूप प्रवीणता भी प्राप्त करते, पर उनमें से कोई भी ऐसा न बन सका जो गुरु का स्थान ग्रहण कर सके।
अध्यापक से इसका कारण पूछा गया तो उसने बताया कि मैंने समूचा मनोयोग लगाकर लक्ष्य प्राप्ति की तरह अपने विषय में तन्मयता नियोजित की है और जीवन भर अधिक योग्यता बढ़ाने की चेष्टा की है जब कि प्रस्तुत छात्रगण मनोविनोद के लिए किसी प्रकार चिन्ह पूजा करने में समय बिताते हैं।
तन्मयता के अभाव में उनका स्तर पिछड़े जैसा रह जाता है।
स्वाभिमान और अहंकार देखने में एक जैसे लगते हैं, पर उसकी प्रकृति और परिणति में जमीन आसमान जैसा अन्तर है। अहंकार भौतिक पदार्थों या परिस्थितियों का होता है। धनबल, सौंदर्यबल, साधन, शिक्षा, कला-कौशल आदि के बलबूते अपने को दूसरों से बड़ा मान बैठना, दर्प दिखाना और पिछड़ों का तिरस्कार-उपहास करना अहंकार है।
स्वाभिमान आत्मगौरव के संरक्षण एवं अभ्युदय का प्रयास है। इसमें आन्तरिक उत्कृष्टता को अक्षुण्ण रखने का साहस होता है। दबाव या प्रलोभन पर फिसल न जाना और औचित्य से विचलित न होना स्वाभिमान है। इसकी रक्षा करने में बहुधा कष्ट कठिनाइयों का भी सामना करना पड़ता है और दुर्जनों का विरोध भी सहना पड़ता है।
मनीषियों का कहना है कि अहंकार मनुष्य को गिराता है। उसे उद्दण्ड और परपीड़क बनाता है। उसे साथियों को पीछे धकेलने, किसी के अनुग्रह की चर्चा न करने, दूसरों के प्रयासों को हड़प जाने के लिए अहंकार ही प्रेरित करता है ताकि जिस श्रेय की स्वयं कीमत नहीं चुकाई गई है उसका भी लाभ उठा लिया जाय। ऐसे लोग आमतौर से कृतघ्न होते हैं और अपनी विशेषताओं और सफलताओं का उल्लेख बढ़-चढ़ कर बार-बार करते हैं। नम्रता, विनयशीलता का अभाव होता जाता है और अन्यों को छोटा गिनाने की प्रवृत्ति बढ़ती जाती है। इस कारण ऐसा व्यक्ति दूसरों की नजरों में निरन्तर गिरता जाता है। घृणास्पद बनता है और इसी कारण कई बार ईर्ष्या, विद्वेष आदि का शिकार बनता है। शत्रुओं की संख्या बढ़ाता है और अन्ततः घाटे में रहता है। आत्म सम्मान की रक्षा करनी हो तो
अहंकार से बचना ही चाहिए।
जब अहंकार बढ़ने लगता है तो व्यक्ति की संवेदनशीलता, सरसता, सरलता जैसे सद्गुणों का ह्रास होने लगता है। इस मनोविकृति के भार से ही मनुष्य बोझिल बनता है और उसका विकास अवरुद्ध होता है। शास्त्रों का कथन है कि 'अहंकार' ने ही आत्मा को पृथ्वी की खूँटी से बाँध रखा है। आत्मा इसी विकार के कारण व्यर्थ के देहानुशासन से आबद्ध है और इसीलिए वह परमतत्व से वंचित है।
तत्त्ववेत्ता मनीषियों का कहना है कि प्रायः घरद्वार छोड़ने और वैराग्य की चादर ओढ़ लेने पर भी अहंकार नहीं छूटता, वरन् और भी बढ़ता है कि मैंने बहुत बड़ा त्याग किया है। इसी तरह धन छोड़ देने या दान कर देने की भी अहंवृत्ति बनी रहती है। तथाकथित मोहमुक्तों का भी स्त्री-बच्चों के प्रति लगाव कहाँ छूटता है? बड़े-बड़े ओहदे, पद-प्रतिष्ठा को छोड़ देने वाले भी इस अहंभाव से ग्रस्त पाये जाते हैं कि हमने अमुक पद को ठोकर मार दी। वस्त्र छोड़ने पर नग्नता का-वैराग्य का अहंकार बना रहता है।
अध्यात्मवेत्ताओं के अनुसार अहंकार से बचने का केवल एक ही उपाय है कि उसे खोजा जाय कि वह अन्तर की किन गहराइयों में डेरा डाले पड़ा है। उनने अहं को गलाने और स्वाभिमान को जगाने का सर्वोत्तम उपाय लोक आराधना को बताया है और कहा है कि यह पूजा-उपासना से कम महत्व की साधना नहीं है। साधना-उपासना से जो प्रगति मनुष्य के व्यक्तित्व में होनी चाहिए वह सच्चे लोकसेवी में भी विकसित होती देखी जा सकती है। उसका भी अहंकार नष्ट होकर भावनाएँ उदात्त हो जाती हैं। उसकी अपनी कोई आकांक्षा नहीं होती। वह मात्र विश्वमानव के कल्याण की बातें सोचता और ईर्ष्या, द्वेष, ऊँच-नीच के भेदभाव से रहित जीवन जीता है। धीरे-धीरे वह प्राणि मात्र की सेवा के लिए अपने को समर्पित करता जाता है। वसुधैव कुटुम्बकम् की भावनाओं से ओतप्रोत जाति-वंश आदि की संकीर्ण वृत्तियों से परे उसका चिन्तन रहता है। उसकी दृष्टि में मानव मात्र एक समान है। ‘सर्वे भवंतु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः की भावना ही उसके जीवन का मूल उद्देश्य बन जाती है। कालान्तर में ऐसे व्यक्ति का व्यवहार मधुर एवं संतुलित हो जाता है। क्रोध व घृणा से उसका दूर का भी वास्ता नहीं रह जाता है।
उपरोक्त गुणों के संवर्धन के साथ ही आत्मबल का
संवर्धन भी होने लगता है और वह लोकसेवी ढोंग-ढकोसले से भी मुक्ति पा लेता है उदात्त चिंतन से परिचालित एवं परहित कामना से कर्मरत व्यक्ति का अहंभाव क्रमशः विनष्ट होता जाता है और विराट् सत्ता से सम्बन्धित हो जाता है। विराट परमात्म सत्ता ही तब उसका मार्गदर्शन करने लगती है। साधना-उपासना का, भजन-पूजन का भी यही उद्देश्य है कि सद्गुणों में दैवी सम्पदा में अभिवृद्धि हो, सत्कर्मरत् रहा जाय और अन्ततोगत्वा शुद्र अहं का विराट सत्ता में विलीन होकर सबकुछ उसका हो जाय। जड़ चेतन में समायी परमसत्ता ही मार्गदर्शिका बन जाय। अहं विसर्जन की फलश्रुति भी यही है।
बसंती बहार बिखराता आया देखो प्रिय वसंत। प्रगति पर्व बन जिसने अनुपम रंग बिखेरे दिग-दिगंत ........आया।
कुम्हलाई मानवता इस दिन पा बहार फिर डोल उठी, ऋषि संस्कृति भी मौन तोड़ कर सृजन स्वरों में बोल उठी,
महाप्राण को इसी दिवस तो दिव्य प्राण अनुदान मिला, विश्वधरा को महकाने ज्यों ब्रह्म कमल ही स्वयं खिला,
हुई दिशाएँ सुरभित सारी पाकर इसकी मधु सुगंध, आया वह अनुपम वसंत ................................।
ब्रह्मकमल के अस्सी पुष्पों से महकी यह फुलवारी, सृजन सूर्य के आगे मानो काँप उठी खुद अँधियारी,
सविता साधक तपा अनवरत जीवन दीप अखंड जला, वसुंधरा लहलहा उठे इसलिए बीज बन स्वयं गला,
फिर से जग उपवन पा चहका नंदनवन की मधुर गंध, आया वह प्यारा वसंत ........................................।
आज हमारी है बारी संकल्प अटल यह लेने की, फैले ही थे हाथ आज तक वेला है अब देने की,
देखे जो तुमने सपने उनको साकार बनायें हम, युग के महायज्ञ में पावन आहुति बन जल जायें हम,
करें पूर्ण दिखला दें हम भी जन्म-जन्म के सब अनुबंध, लाएँ हम ऐसा वसंत...........................................।
केसरिया बाने में रंग कर जीवन हो यह बलिदानी, ले आयें मधुमास पुनः कर सतयुग की हम अगवानी,
झूम उठें आदर्श और अंकुर फूटे सद्भावों के, नाम मिटा दें इस धरती से पतझड़ और अभावों के,
छा जाये चहुँ ओर बसंती छटा सुहानी बन अनंत,
आएगा ऐसा वसंत ......................................।
“सुरभि”
विगत माह से आरंभ हुआ यह स्थायी स्तम्भ परमपूज्य गुरुदेव के जीवन से जुड़े दृश्य व परोक्ष उन घटनाक्रमों पर आधारित है, जिनने अगणित व्यक्तियों के जीवन को नया मोड़ दिया। प्रतिपाद्य विषय चमत्कार नहीं, वरन् उस दैवी सत्ता का वह रूप है जिस पर उनके रहते पर्दा पड़ा रहा । अब वह प्रतिबंध हट जाने से जन-जन को लाभान्वित करने के लिए यह क्रम आरंभ किया गया। वसंत की पावन वेला में परिजन इन्हें पढ़कर अपनी श्रद्धा भी निखारेंगे व औरों की निष्ठ को भी पोषण देंगे, ऐसी आशा है।
वसन्तपर्व का दिन था। उस दिन ब्रह्म मुहूर्त्त में कोठरी के सामने ही प्रकाशपुँज के दर्शन हुए। आँखें मल कर देखा कि कहीं भ्रम तो नहीं है। प्रकाश प्रत्यक्ष था। सोचा कोई भूत-प्रेत या देव दानव का विग्रह तो नहीं है। ध्यान से देखने पर भी वैसा कुछ लगा नहीं। विस्मय भी हो रहा था और डर भी लग रहा था। स्तब्ध था...............।”
“प्रकाश के मध्य में से एक योगी को सूक्ष्म शरीर उभरा। सूक्ष्म इसलिए कि छवि तो दीख पड़ी पर वह प्रकाशपुँज के मध्य अधर लटकी हुई थी। यह कौन है? आश्चर्य!
उस छवि ने बोलना आरंभ किया व कहा हम तुम्हारे साथ कई जन्मों से जुड़े हैं। अब तुम्हारा बचपन छूटते ही आवश्यक मार्गदर्शन करने आए हैं। संभवतः तुम्हें पूर्वजन्मों की स्मृति नहीं है। इसी से भय और आश्चर्य हो रहा है। पिछले जन्मों का विवरण देखो और अपना सन्देह निवारण करो। उनकी अनुकम्पा हुई और योगनिद्रा सी झपकी आने लगी। तन्द्रा सी आने लगी..........।”
“आज याद आता है कि जिस सिद्ध पुरुष अंशधर ने हमारी पंद्रह वर्ष की आयु में घर पधार कर पूजा की कोठरी में प्रकाश रूप में दर्शन दिया था, उनका दर्शन करते ही मन ही मन तत्काल अनेकों प्रश्न सहसा उठ खड़े हुए थे।...........॥”
उपरोक्त विवरण परमपूज्य गुरुदेव की आत्मकथा “हमारी वसीयत और विरासत” तथा अप्रैल 1985 की अखण्ड-ज्योति से लिया गया है। औपन्यासिक शैली में चित्रित यह प्रसंग उनका अपनी अदृश्य शरीरधारी सत्त में प्रथम साक्षात्कार का है व बताता है कि कैसे सतगुरु की अनुकम्पा उनके जीवन पर वसन्तपर्व 1926 के उस पावन दिन ब्राह्ममुहूर्त में उतरी। किन्तु जब हम उसी सत्ता के दिव्य अलौकिक प्रसंगों पर दृष्टिपात करते हैं तो पाते हैं कि ऐसे दर्शन उनने अगणित भक्तों को कराये हैं कभी कष्टों से त्राण हेतु पुकारने पर, कभी मार्गदर्शन देने हेतु, कभी अपनी सत्त का आभास दिलाने हेतु ताकि भक्त की श्रद्धा को बल मिले। आज हम उसी वसन्तपर्व की मंगलमयी वेला में उनके जीवन के लीला प्रसंगों पर चर्चा कर रहे हैं तो अगणित घटनाक्रम आँखों के समक्ष घूम जाते हैं।
एक शाँतिकुँज वासी स्थायी कार्यकर्ता बताते हैं कि जब वे विद्यार्थी जीवन में चिकित्साशास्त्र की पढ़ाई पढ़ रहे थे, तब एक दिन घर में प्रवेश करने के बाद उनको एक साधु महात्मा की आवाज सुनाई दी। चूँकि वह अकेले ही रहते थे। उनने कहा-बाबा ! यहाँ भिक्षा नहीं मिलेगी। यह तो छात्रों का निवास स्थान है।” पर देखते-देखते वह बाबा जी घर में प्रवेश कर गए। पाँच फीट ऊँचे दरवाजे में से आठ फुट ऊँचाई के हट्टे कट्टे एक संन्यासी ने प्रवेश किया। चेहरे पर अलौकिक तेज था। उनने कहा “बेटा। हम लेने नहीं, तुम्हें कुछ बताने आए हैं।” सोचा हाथ वाथ देखने का कोई चक्कर होगा। इनने कहा कि “हम इन सब में विश्वास नहीं करते। हम तो पुरुषार्थ के धनी हैं व पढ़ाई मन लगाकर करते हैं।” अलौकिक रूपधारी उस बाबा ने कहा कि “बेटा! शीघ्र ही तुम्हारे जीवन में एक दैवी सत्ता का अवतरण होगा जो तुम्हारे जीवन की दिशाधारा बदल देगी। तुम्हारा उनसे शीघ्र ही गहन संपर्क होगा।” इतना कहकर वे बाहर निकल गए। एकाध मिनट बाद इन्हें होश आया कि यह बाबाजी कौन थे? इनसे शिष्टाचार के नाते बात तो करते, कम से कम बिठाकर पानी पिलाते। बाहर जाकर पता लगाया कि एक बाबाजी इधर आए थे, किसी ने देखे क्या? वहाँ खड़े एक तिपहिया चालक ने कहा-काफी देर से वह सवारी तलाश रहा है। वहाँ तो कोई नहीं है। निराश उनने पूरी कालोनी का एक-एक घर देख डाला व चक्कर लगा लिया। तब लगा कि कुछ अलौकिक घटा है। कोई दैवी सत्ता ही थी वह तुरन्त पत्र अपने पिता को लिखा जिनने पूज्य गुरुदेव के पास उसे भेज दिया। वहाँ से एक पत्र आया कि महत्वपूर्ण घटनाओं के पूर्व ऐसे प्रसंग कभी-कभी होते हैं। घटना को नहीं उसके पीछे छिपी प्रेरणा को महत्व दें। कुछ वर्ष बाद जब स्वयं परमपूज्य गुरुदेव ने शाँतिकुँज आकर काम करने का आमंत्रण उन्हें एक उलाहने के रूप में दिया तो उन कार्यकर्ता महोदय को एकाएक कुछ सेकेण्डों के लिए वही महात्माजी आठ फुट के गुरुदेव के स्थान पर खड़े दिखाई दिए व तुरन्त ही अंतर्ध्यान भी हो गए।
उन्हें पिछली घटना व इसकी संगति समझ में आ गयी व यह सोचकर ही रोम-रोम पुलकित हो उठा कि स्वयं उन्हें प्रेरणा देने, पिछले, कुसंस्कारों को मिटाने तथा वातावरण बनाने स्वयं साक्षात् गुरुसत्ता उनके द्वार पर आयी थी। उसी दिन से वे शाँतिकुँज में स्थायी रूप से आ गए। उनका नाम यहाँ जानबूझ कर नहीं दिया है।
समय-समय पर परमपूज्य गुरुदेव अपने पत्रों में भी प्रत्यक्ष यह सब लिख दिया करते थे। 20−1−67 को केशर बहन (अंजार कच्छ) को लिखे एक पत्र में वे उन्हें संबोधन करते हुए कहते हैं-तुमने स्वप्न में हमें देखा, सो वह स्वप्न नहीं था जाग्रति थी। हमारा प्राण शरीर में से निकलकर निष्ठावान् साधकों के पास जाया करता है और उन्हें प्रकाश प्रदान करता है। जब हम उधर जाते हैं तभी तुम इस प्रकार का अनुभव करती हो।” कितना प्रेरणा भरा दैवी संरक्षण उनने आजीवन अपने अनुयायी साधकों को दिया इसका वर्णन किया नहीं जा सकता क्योंकि इनकी संख्या गिनी जा सकनी संभव नहीं है। लगभग सभी के पास अनुभूतियाँ हैं, हस्त लिखित पत्र हैं या अपने जीवन के कायाकल्प सर्वांगपूर्ण प्रगति रूपी प्रमाण हैं।
श्री शिवशंकर गुप्त (दिल्ली) जिनकी प्राण रक्षा का प्रसंग विगत अंक में दिया गया था, को 13 मई 1955 की तारीख में परमपूज्य गुरुदेव की हस्तलिपि में लिखा पत्र मिला। “विवाह का विस्तृत समाचार जाना। यह सब समाचार पूर्ण रूप से हमें मालूम है। क्योंकि हमारा सूक्ष्म शरीर उस समय चौकीदार की तरह वहीं अड़ रहा है और विघ्नों को टालने के लिए, शत्रुओं को नरम करने के लिए, आपत्तियों को हल्का करने के लिए, जो कुछ बन पड़ा है सो बराबर करते रहे हैं। फिर भी आपके पत्र से सब बातें भली प्रकार विदित हो गयीं।” पत्र से स्पष्ट है कि उनका दिव्य संरक्षण सतत् सबके साथ रहता था। मात्र स्मरण करने या पत्र लिखने भर की देर थी व उनका दैवी सुरक्षा कवच सक्रिय हो जाता था। पत्र लिखने से भक्त का मन तो हल्का होता ही था, यह भी लगता था कि अपना कष्ट पूज्यवर तक पहुँचा दिया। अब रक्षा वे ही करेंगे। पर यह बेतार का तार पत्र रवाना होने से पहले ही पहुँच चुका होता था।
श्रीरामचन्द्र सिंह अभी भी शाँतिकुँज में रहते हैं व उन्हें तीस वर्ष तक परमपूज्य गुरुदेव के श्रीचरणों में रहने का सौभाग्य मिला है। इस अवधि में उनने हजारों अलौकिक चमत्कारी घटनाएँ अपनी आँखों से देखी हैं। असाध्य रोग से पीड़ित व्यक्ति जिन्हें चिकित्सकों ने बचने की संभावना नाम मात्र की बताकर जवाब दे दिया था, जो पारिवारिक विग्रह-ग्रह कलह से व्यथित थे, जिन्हें मुकदमों के कारण अत्यधिक परेशानी उठानी पड़ रही थी, जिन्हें शत्रुओं से अपनी जान का खतरा था, जिन्हें व्यवसाय में लगातार घाटा आ रहा था, जो नौकरी में पदोन्नति या तबादले की समस्याओं से ग्रसित थे, जिन दम्पत्तियों के विवाह के वर्षों बाद तक संतान नहीं हुई थी, ऐसों के बारे में मात्र पत्र द्वारा सूचित करने पर उनकी समस्याओं का निराकरण व मनोवाँछित इच्छा पूरी हो जाना उनने अपनी आँखों से देखा है।
रामचन्द्र सिंह के पास के ही एक गाँव हरना की एक महिला शाँतिकुँज बड़े दुखी मन से आयी। उसकी पुत्री गीता को एक लड़का हुआ था, जो जन्म लेने के दस दिन बाद ही मर गया। श्रीरामचन्द्र ने उसे गुरुदेव से मिलाया। मुख से ब्रह्मवाक्य निकला कि वही लड़का गीता की गोद में पुनः लौटाएँगे। 1989 में शाँतिकुँज की टोली उसी ग्राम में गयी थी। 1000 वेदी दीपयज्ञ हो रहा था। उसी दिन गीता को उसी शकल का एक पुत्र पैदा हुआ। ये सारे घटनाक्रम प्रत्यक्षदर्शियों द्वारा देखे हुए हैं वे बताते हैं कि अगणित व्यक्तियों पर परमपूज्य गुरुदेव की कृपा किस प्रकार सहज ही बरसती रही है। यही नहीं अपने सामीप्य के क्षणों में उनने रामचन्द्र सिंह से यह भी कहा है कि जब भी कोई सच्चे मन से आकर यहाँ गायत्री तीर्थ में पुकारेगा, मेरी सत्ता उसकी सहायता करेगी। मैं स्थूल शरीर से रहूँ किन्तु मेरी अनुकम्पा सदैव उन पर बरसती रहेगी, जो सदाशयता संपन्न होंगे, समाज के लिए कुछ करने का दर्द जिनके मन में होगा। यह आश्वासन वे लिखित रूप में महाकाल के वसन्तपर्व के संदेश के रूप में अपने महाप्राण से पूर्व ही सबको दे भी गए हैं।
जब कभी किसी ने किसी तरह का अनहित करने की बात उनके समक्ष कही तो उनका रौद्र रूप देखते ही बनता था। 2 मार्च 1976 की एक घटना है। ग्राम दरियापुर जिला छपरा के एक व्यक्ति शाँतिकुँज आए। अपने साथ स्टील की थाली में ढेर सारे फल लेकर पूज्यवर को उनने भेंट किए। गुरुदेव के सिद्धि संपन्न होने की बात उनने सुन रखी थी। गुरुदेव के पूछने पर वे बोल उठे-गुरुदेव मेरी पत्नी दुश्चरित्र है। दूसरे पुरुष से प्रेम करती है। उसे मारण मंत्र से मार दीजिए। इतना सुनते ही पूज्यवर का आक्रोश सीमा को पार कर गया। वे बोले “आज तक हमने एक चुहिया नहीं मारी व तेरे कहने से तेरी पत्नी को मार देंगे? चल उठा सामान व भाग यहाँ से।” उनके क्षमा माँगने पर बोले-हम किसी को मारते नहीं है। मारते हैं तो दुर्बुद्धि। जाओ तुम्हारे घर जाकर देखो। तुम्हारी पत्नी को हम सद्बुद्धि देंगे। वह तुम्हारे साथ वैसे ही पहले की तरह रहने लगेगी वे सज्जन वापस लौट गए। जाते ही परिवार में पारस्परिक सामंजस्य, स्नेह-सौहार्द्र की स्थापना हो गयी। पति-पत्नी दोनों प्रेम से रहते हैं व मिशन का काम करते हैं। जान बूझकर यहाँ उनका नाम नहीं दिया गया है। घटना के प्रत्यक्षदर्शी शाँतिकुँज में ही रहते हैं।
लखनऊ आय.टी.आय. के प्रिंसिपल श्री सिन्हा जी सेवानिवृत्ति के बाद अब शाँतिकुँज की वाहन सेवा में ही अपना अधिकतम समय देते हैं, वे 1970 से मिशन से जुड़े हैं, उन दिनों वे गोरखपुर में आय.टी.आय. में प्रशिक्षक थे। लखनऊ के उनके निजी घर को उनके ही परिचय के एक व्यक्ति के माध्यम से एक पुलिस विभाग के अधिकारी को उनने किराये पर उठा दिया था। छह माह तक किराया न आने पर उनकी पत्नी शकुन्तला देवी लखनऊ किसी काम से गयी थीं, तो उनके पास भी पहुँची। उसने धमकी भरे शब्दों में कहा कि “न मैं किराया दूँगा, न मकान से निकलूँगा। अब इसकी एक-एक ईंट बेचकर ही निकलूँगा। चाहे आप जो कर लें। इस पूरे क्षेत्र में चलती मेरी ही है।” शकुन्तला जी घर आते ही इस शॉक से ऐसी बीमार पड़ीं कि उठ ही नहीं सकीं। घर में बड़ा दुख भरा वातावरण छा गया। पड़ोस में ही एक गायत्री परिवार के परिजन रहते थे। उनने यह स्थिति देखी तो गोंडा में हो रहे 108 कुण्डीय गायत्री महायज्ञ में चलने को कहा जहाँ स्वयं पूज्य गुरुदेव आ रहे थे।
वैज्ञानिक व विदेश यात्रा से लौटे सिन्हाजी अविश्वास भरे मन से गए तो पर यही भाव लेकर कि कोई ढोंग ढकोसला दिखा तो लौट आएँगे। न जाने क्या प्रेरणा मिली कि दीक्षा भी उनने यज्ञ में ले ली व जब प्रणाम करने पूज्यवर के पास पहुँचे तो अश्रुपात ऐसा होने लगा कि रुका नहीं। आँखों-आँखों में गुरु ने शिष्य की वेदना पढ़ ली। पास बुलाया व पूरी कहानी सुनी मात्र इतना कहा कि “जा बेटा ! सब ठीक हो जाएगा।” श्री सिन्हाजी के यज्ञ से लौटने के एक सप्ताह के अंदर ही उस किरायेदार पुलिस अफ़सर का पत्र आया कि “सिन्हा साहब आप कृपया लखनऊ आकर अपना घर संभालिए। पिछला सारा किराया आपकी सेवा में भेज रहा हूँ। अब मैं इस मकान में एक दिन भी नहीं रह सकता। रात दिन मुझे एक अजीब बेचैनी रहती है। कोई मुझे बराबर यह कहता है कि तुमने एक सज्जन दम्पत्ति को तंग किया है। तुम्हें प्रायश्चित करना चाहिए। आपका मकान छोड़ कर ही मुझे शान्ति मिलेगी।”
न केवल मकान वापस मिला, पिछला किराया भी तथा श्रीमती सिन्हा को स्वास्थ्य लाभ इतना शीघ्र हुआ कि देखते ही बनता था। न केवल उनका विश्वास दिव्यसत्ता पर मजबूत हुआ वे गायत्री के अनन्य साधक व मिशन के एक महत्वपूर्ण स्तम्भ बन गए। अगणित व्यक्ति श्री सिन्हा जी की श्रेणी में आते हैं, जिनके प्रथम विश्वास को बल ही किसी चमत्कार से मिला। कई व्यक्ति ऐसे हो सकते हैं जो अखण्ड ज्योति पाठकों में हो व कहें कि हमारे साथ भी ऐसा घटा तो इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं है। यह तो उस हिमखण्ड के बहिरंग पक्ष के कुछ हिस्से पर ही रोशनी डालने का एक छोटा सा प्रयास किया गया है जिसका एक बहुत बड़ा हिस्सा जलराशि के भीतर रहा व अभी भी अपनी शक्ति से अगणित चमत्कार नित्य दिखा रहा है। (अगले अंक में जारी)।
(गतांक से जारी)
आहार संयम को भारतीय साधना विज्ञान व दर्शन के अनुसार एक तप-तितिक्षा माना गया है। जहाँ चिन्तन का परिष्कार करने वाली विधा का नाम ‘योग‘ है, वहाँ चरित्र में निखार लाने वाली प्रक्रिया ‘तप’ कहलाती है। आत्मिक प्रगति व व्यक्तित्व परिष्कार के ये दो महत्वपूर्ण आधार हैं। इसीलिए साधना प्रक्रिया में ध्यान-धारणा इत्यादि महत्वपूर्ण सोपानों की सफलता तभी मानी जाती है, जब तप-तितिक्षा द्वारा व्यक्ति ने अपने को अग्निपरीक्षा से गुजर जाने दिया हो। तप यों कई प्रकार के हैं, पर ब्रह्मवर्चस् की शोध प्रक्रिया में उसके आहार पक्ष को प्रमुखता देते हुए साधकों पर प्रयोग परीक्षण किये गये कि किस प्रकार आहार का अंतःकरण मन व शरीर पर प्रभाव पड़ता है तथा उस माध्यम से आँतरिक परिशोधन कैसे संभव हो पाता है?
मन को ग्यारहवीं इन्द्रिय माना गया व शरीर का ही एक अंग भारतीय दर्शन ने माना है। अंतःकरण इससे गहरी परत है जहाँ से आस्थाएँ, संवेदनाएँ जन्म लेती हैं। प्रकारान्तर से आहार का स्तर ही व्यक्ति के भावनात्मक मानसिक व शारीरिक स्वास्थ्य का निर्धारण करता है। आहार में सात्विकता का समावेश हो व आहार निग्रह करने में साधक सफल हो तो मनोनिग्रह कठिन नहीं रह जाता। अन्न, फल, शाक दूध जो भी कुछ आहार में लिया जाता है, शरीर को तो प्रभावित करता ही है, साथ ही व्यक्ति की चिंतन प्रक्रिया व इसकी मूलभूत आस्थाओं तक के निर्माण के लिए वह उत्तरदायी है। इस दृष्टि से आहार निग्रह की साधना पद्धतियों में बड़ी प्रमुख भूमिका मानी जाती है।
आहार नियमन की एक प्रक्रिया चांद्रायण कल्प है, जिससे एक माह की अवधि में नियमित समय पर नियमित रूप से पूर्णिमा से क्रमशः ग्रास घटाते चलना व अमावस्या से क्रमशः बढ़ाते चलकर पूर्व आहार की स्थिति में पहुँचना, यह प्रक्रिया संपन्न होती है। यह एक माह का अनुष्ठान बड़ा ही सटीक व विज्ञान सम्मत है व साधक के धैर्य-अनुशासन-आत्मबल की कड़ी परीक्षा यह ले लेता है। जितना साधक नियमित रूप से भोजन लेते हैं या जहाँ से आरंभ करना चाहते हैं, वह पूर्ण आहार पूर्णिमा के दिन ले लेते हैं। क्रमशः एक-एक ग्रास उसमें से कम करते जाते हैं, जैसे-जैसे चन्द्रमा की कलाएँ घटकर अमावस्या आती है। हो सकता है दो या तीन दिन निराहार की भी स्थिति रहे। तत्पश्चात् क्रमशः बढ़ाते हुए पूर्णिमा तक उसे पूर्व स्थिति में पहुँचा देते हैं। इस अवधि में तरल प्रवाही द्रव्य व गंगाजल लेते रह सकते हैं पर इनका भी बारम्बार लेना वर्जित बताया गया है। चूँकि यह प्रक्रिया क्रमशः संपन्न होती है शरीर को शोधन को व फिर निर्माण का पर्याप्त समय मिल जाता है। मनोबल व आत्मबल बढ़ता है तथा अनेकानेक रोग जिनने पूर्व में घर कर रखा था, जाने कहाँ गायब हो जाते हैं। गीताकार की उक्ति “विषया विनिवतन्ते निराहारस्य देहिनः” (2/59) अर्थात् “उपवास करने से विषय विकारों की निवृत्ति होती है,” बिल्कुल सही बैठती है।
व्रत-उपवास का वर्तमान क्रम जिसमें पेट को आराम देने के स्थान पर फलाहारी सामग्री ठूँस-ठूँस कर खायी जाती है, तो और भी बीमार कर देने वाला है। सामान्य तथा जनसामान्य में यही भ्रान्तियाँ संव्याप्त हैं। प्रदोष, एकादशी विभिन्न पूर्णिमाओं के व्रत व मान्यता मानने के कारण रखे गए उपवास कई स्त्री पुरुष निभाते देखे जाते हैं, पर उसका वाँछित प्रतिफल मिलता नहीं देखा जाता। अतिवाद ही देखा जाता है। या तो कुछ भी नहीं ग्रहण करेंगे या करेंगे तो नियमित क्रम से भी अधिक लेकर अपना हाजमा और बिगाड़ लेंगे। एक दिन न लेने व दूसरे दिन सामान्य रूटीन पर आने से आँतों पर प्रतिकूल दबाव पड़ता है अतः व्रत-उपवास किये तो जायें पर विज्ञान सम्मत तरीके से ताकि शरीर की क्रिया पद्धति पर अन्यथा प्रभाव न पड़े। यह समझना अत्यावश्यक है क्योंकि इस संबंध में अत्यधिक भ्रान्तियाँ संव्याप्त हैं।
कल्प प्रक्रिया के साथ अस्वाद व्रत भी जुड़ा हुआ है। बिना मिर्च-मसाले का नमक का, भोजन खाने का सबको अभ्यास भी नहीं होता। किन्तु यदि प्रकृति में विद्यमान लौकी, तोरी, गाजर, परवल, जैसे शाक तथा खरबूजा, अमरूद, पपीता जैसे फलों पर ही निर्वाह एक माह तक बिना किसी मसाले व नमक इत्यादि के प्रयोग के किया जा सके तो मानना चाहिए कि बहुत बड़ा तप निभ गया, नमक न खाने पर भोजन लगता तो बेस्वाद है पर धीरे-धीरे कुछ ही दिनों में अभ्यास पड़ने पर नमक वाला भोजन बेस्वाद कड़ुआ लगने लगता है। नमक जो अतिरिक्त मात्रा में लिया जाता है तथा मिर्च मसाले चित्त की उत्तेजना बढ़ते, मन को अस्थिर करते व शारीरिक स्वास्थ्य को बेतहाशा नुकसान पहुँचाते देखे गए हैं। जितना आवश्यक है उतना नमक प्राकृतिक रूप से शाकों-फलों में विद्यमान है। किन्तु अतिरिक्त मात्रा जितनी डाली जाती है वह रक्तवाहिनी नलिकाओं से लेकर गुर्दे तक तथा काया के ऊतकों से लेकर मस्तिष्क की कोषाओं तक सबको हानि पहुँचाती है। यदि शाकाहार या दुग्ध आहार का कल्प करके रहा जा सके तो उत्तम है। यदि यह संभव न हो तो एक विकल्प के रूप में शाँतिकुँज में व्यवस्था बनायी गयी कि भाप से अन्न, शाक की खिचड़ी पकाकर अमृताशन रूपी इस आहार को साधक ग्रहण करें। औषधि के रूप में थोड़ी सी हल्दी उसमें पहले ही डाल दी जाती थी। खुराक का नियंत्रण साधक के हाथों सौंपा गया था ताकि वे स्वयं आत्मानुशासन द्वारा स्वयं को प्रशिक्षित कर सकें।
इस आहार कल्प साधना में दुग्ध, मट्ठा फलाहार सबकी छूट रखी गयी। शाकाहार अर्थात् कच्चे रूप में सलाद-पालक-टमाटर गाजर, मूली आदि लेने वालों का अनुपात अधिक रहा। बल्क बन जाने से व रेशे की समुचित मात्रा होने से पेट में दर्द-अपच-कब्ज आदि की परेशानी भी किसी को नहीं हुई। साथ ही सुसंस्कारिता का भी समुचित ध्यान रखा गया। कहा गया है “अन्नौ वै मनः” जैसा खाये अन्न, वैसा बने मन”। यदि अन्नादि ग्रहण किये गये आहार में सात्विकता नहीं है तो साधना प्रयोजन में सफलता संदिग्ध ही रहेगी।
आहार पर चढ़े हुए कुसंस्कारों का परिशोधन करने के लिए गौमूत्र की महत्ता मनीषी-शास्त्रीगण कहते आए हैं। वह आज और भी सही है क्योंकि रासायनिक खादों, सीवर लाइनों की गन्दगी व ट्रेचिंग ग्राउण्ड में पनपी फसलें मात्रा की दृष्टि से भले ही नफे का सौदा हों, गुणवत्ता व संस्कारों की दृष्टि से उन्हें घटिया ही माना जाएगा। कीड़े मारने वालों की दवाएँ (इन्सेक्टीसाइड्य) जिनका खूब विज्ञापन दूरदर्शन-अख़बार करते रहते हैं फसलों पर गोदामों पर छिड़काई जाती रहती है व खाद्यपदार्थों में उनका अंश मिल जाता है। बोने वालों से लेकर काटने वालों तथा भंडार करने वालों से लेकर विक्रय करने वाले सभी के संस्कार भी उस अन्न-शाक-फल में आ जाते हैं। गौमूत्र मिश्रित गंगाजल से साफ किये गए अन्नादि आहार को ही ग्रहण किया जाना साधक के लिए उत्तम माना गया है। यही नहीं स्वयं पका सकें, इसलिये सारी व्यवस्था भी यहाँ जुटायी गयी ताकि व्यक्ति के निज के बदलते उत्कृष्ट संस्कारों का आरोपण आहार पर हो। किसी और के पकाने पर उसके संस्कारों का प्रभाव पड़ता है, यह तथ्य सभी जानते हैं। जिनसे यह संभव न ही था, उनकी व्यवस्था वंदनीया माताजी के चौके में की गयी जिसमें परिशोधन-परिपाक की व्यवस्था स्वयं उनके द्वारा देखी जाती रही। स्वयं माताजी अपने हाथों से प्रज्ञापेय, पंचगव्य औषधि कल्क, हविष्यान्न की एक छोटी रोटी व चटनी सभी साधकों को देती थीं तथा पकाए एक अमृताशन में गंगाजल व हल्दी स्वयं डालती थीं।
फलों-शाकों-अन्नों के सम्मिश्रित रूप के अतिरिक्त अँकुरित मूँगे, मूँगफली, चना व गेहूँ के भी प्रयोग कुछ साधकों ने साथ-साथ किए। तुलसी, शंखपुष्पी, ब्राह्मी, शतावरी, गिलोय, अश्वगंधा, आमलकी जैसे रसायन परक-मेधा-बलवर्धक औषधियों का कल्प भी साधकों को कराया गया। इनका क्वाथ-कल्क या अर्क बनाकर पिलाने का क्रम रखा गया था। किस औषधि का किसके लिए निर्धारण किया जाय, इसके लिए साधक का परिपूर्ण परीक्षण कर प्राप्त निष्कर्षों के अनुरूप ही देने का क्रम रखा गया। औषधि कल्प में फलाहार शाकाहार भी औषधियों का सजातीय चुना जाता है। इस प्रकार सम्मिश्रित प्रभाव कल्प प्रक्रिया को अति प्रभावी बना देता है।
सब मिलाकर परिणाम क्या रहे व क्या कायाकल्प जैसी प्रक्रिया संभव है, यह जानने को उत्सुक साधकों की जिज्ञासा का समाधान क्रमशः ही हो पाएगा। वस्तुतः आहार साधना का यह उपक्रम व्यक्ति का एक माह में सर्वांगपूर्ण कायाकल्प कर सकने में संभव है, यदि व्रतशील साधक सारे व्रतों का निर्वाह करते हुए अपनी पूर्णता तक पहुँच सके। पुराने अभ्यस्त ढर्रे से छुटकारा पाना व नवीन जीवनक्रम आरंभ कर पाना एक प्रकार से नये जन्म के समान हैं। शरीर में हलकापन लगने से लेकर स्फूर्ति में वृद्धि, मनन एकाग्र होने से लेकर नीरोग-दीर्घायुष्य होने जैसे लाभ सभी को अभीष्ट हैं व ये सभी आहार साधना से मिलते हैं। -क्रमशः
इस अंक में प्रस्तुत है परमपूज्य गुरुदेव का 12 फरवरी 1978 को शाँतिकुँज में वसन्तपर्व पर दिया गया ऐतिहासिक उद्बोधन। अभूतपूर्व व ऐतिहासिक इस संदर्भ में कि यह मात्र शब्दों का उच्चारण व संबोधन नहीं था, एक प्रकार की सामूहिक शक्तिपात प्रक्रिया थी। शाँतिकुँज हरिद्वार तथा ब्रह्मवर्चस में सक्रिय अधिकाँश कार्यकर्ता इस उद्बोधन को सुनने के बाद ही पूर्ण समयदानी कार्यकर्ता बने थे। ऐसी शाश्वत तपःपूत ऋषि चेतना आपके अंदर भी बसंती उल्लास लाए, उसी भाव के साथ प्रस्तुत है-अमृतवाणी
गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ बोलिए।
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् ॥
मित्रों। वसंत पंचमी उमंगों का दिन है, प्रेरणा का दिन है, प्रकाश का दिन है। वसंत के दिनों में उमंग आती है, उछाल आता है। समर्थ गुरु रामदास के जीवन में इन्हीं दिनों एक उछाल आया-क्या हम अपनी जिंदगी का बेहतरीन इस्तेमाल नहीं कर सकते? क्या हमारी जिन्दगी अच्छी तरह से खर्च नहीं हो सकती? एक तरफ उनके विवाह की तैयारियाँ चल रहीं थी। समर्थ गुरु रामदास को शकल दिखाई पड़ी औरत-औरत के बच्चे, बच्चों के बच्चे, शादियाँ, ब्याह आदि की बड़ी शृंखला दिखाई पड़ी। दूसरी तरफ आत्मा ने संकेत दिया, परमात्मा ने संकेत दिया और कहा-अगर आपको जिन्दगी इतने कम कीमत की नहीं जान पड़ती है, अगर आपको महँगी मालूम पड़ती है मूल्यवान मालूम पड़ती है तो आइये दूसरा वाला रास्ता आपके लिए खुला पड़ा है। महानता का रास्ता खुला हुआ पड़ा है। समर्थ गुरु ने विचार किया। उछाल आया, उमंग आई और ऐसी उमंग आई कि रोकने वालों से रुकी नहीं। वह उछलते ही चले गये। मुकुट को फेंका अलग और कंगन को तोड़ा अलग। ये गया, वो गया लड़का भाग गया। दूल्हा कौन हो गया? समर्थ गुरु रामदास हो गया। कौन? मामूली सा आदमी छोटा-सा लड़का छलाँग मारता चला गया और समर्थ गुरु रामदास होता चला गया।
यहाँ मैं उमंग की बात कह रहा था। उमंग जब भीतर से आती है तो रुकती नहीं है। उमंग आती है वसंत के दिनों । इन्हीं दिनों का किस्सा है बुद्ध भगवान का। उनका भी ऐसा ही किस्सा हुआ था। एक तरफ औरत सो रही थी और एक तरफ बच्चा सो रहा था। सारे संसार में फैले हुए हाहाकार ने पुकारा और कहा कि आप समझदार आदमी हैं। आप विचारशील आदमी हैं और आप जबरदस्त आदमी हैं। क्या आप दो लोगों के लिए जियेंगे? औरत और बच्चे के लिए जिएँगे? यह काम तो कोई भी कर सकता है। बुद्ध भगवान के भीतर किसी ने पुकार और वे छलाँग मारते हुए-उछलते हुए कहीं के मारे कहीं चले गये। बुद्ध भगवान हो गये।
शंकराचार्य की उमंग भी इन्हीं दिनों की है। शंकराचार्य की मम्मी कहती थी कि मेरा बेटा बड़ा होगा, पढ़ लिखकर गजटेड ऑफिसर बनेगा। बेटे की बहू आयेगी, गोद में बच्चा खिलाऊँगी। मम्मी बार-बार यही कहती कि मेरा कहना नहीं मानेगा तो नरक में जाएगा । शंकर कहता-अच्छा मम्मी कहना नहीं मानूँगा तो नरक जाऊँगा। हमको जाना है तो अवश्य जाएँगे महानरक में अच्छे काम के लिए। मेरे संकल्प में रुकावट लगाती हो तो आत्मा और परमात्मा का कहना न मानकर तुम कहाँ जाओगी? विचार करता रहा, कौन? शंकराचार्य।
शंकराचार्य ने फैसला कर लिया कि मम्मी का कहना नहीं मानना है। एक दिन वह पानी में घुस गया और चिल्लाने लगा मम्मी क्या करूं, अब मेरे मरने का समय आ गया। मुझे शंकर भगवान दिखाई पड़ते हैं और कहते हैं कि अगर इस बच्चे को मेरे सुपुर्द कर दोगी तो हम मगर से इसे बचा सकते हैं। मम्मी चिल्लाई-अच्छा बेटे जिंदा तो रहेगा, मुझे मंजूर है और मैंने तुझे भगवान को दे दिया। बस शंकराचार्य ने उछाल मारी और किनारे आ गये। वे बोले देखो मगर ने छोड़ दिया, अब मैं शंकर भगवान का हूँ।
बहुत सी शृंखला मैंने देखी हैं उसी शृंखला में एक और कड़ी शामिल हो जाती है वसंत पंचमी की। यही दिन थे, पचपन वर्ष पहले एक आय? कौन आया? मेरा सौभाग्य आया? वसंत पंचमी के दिन हर एक का सौभाग्य आता है, एक उमंग आती है, तरंग आती है। मेरे ऊपर भी एक तरंग आयी सौभाग्य के दिन मेरे गुरु के रूप में मास्टर के रूप में। मेरा गुरु प्रकाश के रूप में आया। जब कोई महापुरुष आता है तो कुछ लेकर के आता है। कोई महाशक्ति आती है तो कुछ लेकर के आती है, बिना लिए नहीं आती। मेरा भी गुरु, मेरा भी बाँस, मेरा भी मास्टर और मेरा भी सौभाग्य इसी वसंत पंचमी के दिन आया था जिसमें कि हम और आप मिल रहे हैं। मैं चाहता हूँ कि जो सौभाग्य की धारा और लहर मेरे पास आयी थी, काश! आपके पास भी आ जाती तो आप धन्य हो जाते।
जब आती है हूक, जब आती है उमंग तो फिर क्या हो जाता है? रोकना मुश्किल हो जाता है और जो आग उठती है, ऐसी तेजी से उठती है कि इंतजार नहीं करना पड़ता। जब वक्त आता है तो आँधी-तूफान के तरीके से आता है। मेरी जिंदगी में भी आँधी तूफान के तरीके से वक्त आया। मेरे गुरु आये और आकर के उनने आत्मसाक्षात्कार कराया, पूर्वजन्मों का हाल दिखाया और जाते वक्त कहा कि हम दो चीजें देकर जाते हैं। दोनों चीजें जिनको हम शक्तिपात और कुण्डलिनी जागरण कहते हैं, दोनों की दोनों सेकेण्डों में पूरी हो गयीं और मैं कुछ से कुछ हो गया मेरी आँखों में कुछ और चीज दिखाई पड़ने लगी। नशा पीकर आदमी को कुछ का कुछ दिखाई पड़ता है। ऐसे ही मुझे दुनिया किसी और तरीके से दिखायी पड़ने लगी।
शक्तिपात कैसे कर दिया? शक्तिपात क्या होता है? शक्तिपात को मामूली समझते हैं कि गुरु की आँखों में से शरीर में से बिजली का करेंट आता है और चेले में बिजली छू जाती है और चेला काँप जाता है। वस्तुतः यह कोई शक्तिपात नहीं है और शारीरिक शक्तिपात से कोई बनता भी नहीं। शक्तिपात कहते हैं चेतना का शक्तिपात, चेतना में शक्ति उत्पन्न करने वाला। चेतना की शक्ति भावनाओं के रूप में संवेदनाओं के रूप में दिखायी पड़ती है, शरीर में झटके नहीं मारती। इसका सम्बन्ध चेतना से है-हिम्मत से है। चेतना की उस शक्ति का ही नाम हिम्मत है जो सिद्धान्तों को, आदर्शों को पकड़ने के लिए जीवन में काम आती है। इसके लिए ऐसी ताकत चाहिए जैसे कि मछली में होती है। मछली पानी की धारा को चीरती हुई-लहरों को फाड़ती हुई उलटी दिशा में छलछलाती हुई बढ़ती जाती है। यही चेतना की शक्ति है, यही ताकत है। आदर्शों को जीवन में उतारने में इतनी कमजोरियाँ आड़े आती हैं जिन्हें गिनाया नहीं जा सकता। लोभ की कमजोरी, मोह की कमजोरी, वातावरण की कमजोरी, पड़ोसी की कमजोरी, मित्रों की कमजोरी-इतनी लाखों कमजोरियाँ व्यक्ति के ऊपर छायी रहती हैं। इन सारी की सारी कमजोरियाँ को मछली के तरीके से चीरता हुआ जो आदमी आगे बढ़ सकता है, उसे मैं अध्यात्म की दृष्टि से शक्तिवान कह सकता हूँ। मेरे गुरु ने मुझे इसी तरीके से शक्तिवान बनाया। बीस वर्ष की उम्र में तमाम प्रतिबंधों के बावजूद मैं घर से निकल गया और काँग्रेस में भर्ती हो गया। थोड़े दिनों तक उसी का काम करता रहा फिर जेल चला गया। इसे कहते हैं हिम्मत और जुर्रत, जो सिद्धान्तों के लिए, आदर्शों के लिए आदमी के अन्दर एक जुनून पैदा करती है-सामर्थ्य पैदा करती है कि हम आदर्शवादी होकर जियेंगे । इसी का नाम शक्तिपात है।
शक्तिपात कैसे होता है, इसका एक उदाहरण मीरा का है। वह घर में बैठी रोती रहती थी। घर वाले कहा करते थे कि तुम्हें हमारे खानदान की बात माननी पड़ेगी और तुम घर से बाहर नहीं जा सकतीं। मीरा ने गोस्वामी तुलसी दास को एक चिट्ठी लिखी कि इन परिस्थितियों में हम क्या कर सकते हैं? गोस्वामी जी ने कहा-परिस्थितियाँ तो ऐसी ही रहती हैं। दुनिया में परिस्थितियाँ किसी की नहीं बदलती आदमी की मनःस्थिति बदल दें तो परिस्थिति बदल जाएँगी । चिट्ठी तो क्या उनने एक कविता लिखी मीरा को-
‘जाके प्रिय न राम वैदेही। तजिय ताहि कोटि बैरी सम यद्यपि परम सनेही।’
यह कविता नहीं शक्तिपात था। शक्तिपात के सिद्धान्तों को पक्का करने के लिए यह मुझे बहुत पसंद आती है और जब तक मेरा मन होता है, उसे याद करता रहता हूँ और हिम्मत से ताकत से भर जाता हूँ। मुझ में असीम शक्ति भरी हुई है। सिद्धान्तों को पालने के लिए हमने सामने वाले विरोधियों शंकराचार्यों, महामण्डलेश्वरों और अपने नजदीक वाले मित्रों-सभी का मुकाबला किया है। सोने की जंजीरों से टक्कर मारी है। जीवन पर्यन्त अपने लिए ,आपके लिए, समाज के लिए, सारे विश्व के लिए, महिलाओं के अधिकारों के लिए मैं अकेला ही टक्कर मारता चला गया। अनीति से संघर्ष करने के लिए युग निर्माण का विचारक्रांति का सूत्रपात किया। इस मामले में हम राजपूत हैं। हमारे भीतर परशुराम की तरीके से रोम-रोम में शौर्य और साहस भर दिया गया है। हम महामानव हैं। कौन-कौन हैं? बता नहीं सकते हम कौन हैं? ये सारी की सारी चीजें वहाँ से हुई जो मुझे गुरु ने शक्तिपात के रूप में दी-हिम्मत के रूप में दी।
कुण्डलिनी क्या होती है? कुण्डलिनी हम करुणा को कहते हैं-विवेकशीलता को कहते हैं। करुणा उसे कहते हैं जिसमें दूसरों के दुख-दर्द को देखकर के आदमी रो पड़ता है। विवेक यह कहता है कि फैसला करने के लिए हमको ऊँचे आदमी होना चाहिए। कैसा विवेकशील होना चाहिए जैसे कि जापान का गाँधी कागावा हुआ। उसने अपना सम्पूर्ण जीवन बीमार लोगों, पिछड़े लोगों, दरिद्रों और कोढ़ियों की सेवा में लगा दिया। चौबीसों घंटे उन्हीं लोगों के बीच वह काम में रहता। कौन कराता था उससे यह सब? करुणा कराती थी। इसी को हम कुण्डलिनी कहते हैं जो आदमी के भीतर हलचल पैदा कर देती है-रोमांच पैदा कर देती है-एक दर्द पैदा कर देती है। भगवान जब किसी इंसान के भीतर आता है तो एक दर्द के रूप में आता है, करुणा के रूप में आता है। भगवान मिट्टी का बना हुआ जड़ नहीं है-वह चेतन है और चेतना का कोई रूप नहीं हो सकता, कोई शकल नहीं हो सकती। ब्रह्मचेतन है और चेतन केवल संवेदना हो सकती है और संवेदना कैसी हो सकती है? विवेक शीलता के रूप में और करुणा के रूप में आदर्श हमारे पास हों और वास्तविक हों तो उनके अन्दर एक ऐसा मैगनेट है जो इंसान की सहानुभूति, जनता का समर्थन और भगवान की सहायता तीनों चीजें खींच कर लाता हुआ चला जाता है। कागावा के साथ यही हुआ। जब उसने दुखियारों की सेवा करनी शुरू कर दी तो उसको यह तीनों चीजें मिलती चली गयीं। आदमी के भीतर जब करुणा जाग्रत होती है तो वह संत बन जाता है, ऋषि बना जाता है। हिन्दुस्तान के ऋषियों का इतिहास ठीक ऐसा ही रहा है।
जिस किसी का कुण्डलिनी जागरण जब होता है तो ऋद्धियाँ आती हैं सिद्धियाँ आती हैं, चमत्कार आते हैं। उससे वह अपना भला करता है और दूसरों का भला करता है। मेरा गुरु आया मेरी कुण्डलिनी जाग्रत करता चला गया। हम जो भी प्राप्त करते हैं अपनी करुणा को पूरा करने के लिए-विवेकशीलता का पूरा करने के लिए खर्च कर देते हैं और उसके बदले मिलता है असीम संतोष, शाँति और प्रसन्नता। दुखी और पीड़ित आदमी जब यहाँ आँखों में आँसू भरकर आते हैं तो साँसारिक दृष्टि से उनकी सहायता कर देने पर मुझे बड़ी प्रसन्नता होती है। शारीरिक से लेकर गिरे हुए आदमी तक जो पहले कैसा घिनौना जीवन जीते थे, उनके जीवन में जो हेर फेर हुए हैं, उनको देखकर बेहद खुशी होती है जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता। यह कुण्डलिनी का चमत्कार है।
आज के दिन मेरे मन में एक ही विचार आता है कि यहाँ जो भी लोग आते हैं उनको मेरे कीमती सौभाग्य का एक हिस्सा मिल जाता तो उनका नाम, यश अजर-अमर हो जाता। इतिहास के पन्नों पर उनका नाम रहता। अभी आपको जैसा घिनौना, मुसीबतों से भरा-समस्याओं से भरा-जीवन जीवन पड़ता है-तब जीना न पड़े। आप अपनी समस्याओं का समाधान करने के साथ-साथ हजारों की समस्याओं का समाधान करने में समर्थ बनें। फिर आपको न कहना पड़े कि गुरु जी हमारी मुसीबत दूर कर दीजिए। फिर क्या करना पड़े? गुरुजी को ही आपके पास आना पड़े और कहना पड़े कि हमारी मुसीबत दूर कर सकते हो तो कर दीजिए। विवेकानन्द के पास रामकृष्ण परमहंस जाते थे और कहते थे कि हमारी मुसीबत दूर कर दीजिए और हमारे पास भी हमारा गुरु आया था यह कहने कि हमारी मुसीबत दूर कर दीजिये। उनने कहा-हम चाहते हैं कि दुनिया का रूप बदल जाय, नक्शा बदल जाय, दुनिया का कायाकल्प हो जाय। हम जिस काम को कर रहे हैं, उस काम में हम जनता के सम्पर्क में नहीं जा सकते। जीभ माइक का काम नहीं कर सकती और माइक जीभ का काम नहीं कर सकता। जीभ और माइक दोनों के सम्पर्क से कितनी दूर तक आवाज फैलती है। हमारा मुख जीभ है और हम माइक हैं, उनके विचारों को फैलाते हैं। हम चाहते हैं कि आप भी “लायक” हो जाइये। अगर आपके भीतर ‘लायकी’ पैदा हो जाय तो मजा आ जाय। तब दोनों चीजें शक्तिपात और कुण्डलिनी जो भगवान के दोनों हाथों में रखी हुई हैं, आपको मिल जाएँगी । शर्त केवल एक ही है कि अपने आपको ‘लायक’ बना लें पात्र बना लें। यदि लायक नहीं बने तो मुश्किल पड़ जायगी। कुण्डलिनी जागरण के लिए पात्रता और श्रद्धा को होना पहली शर्त है।
आज का दिन ऊँचे उद्देश्यों से भरा पड़ा है। हमारे जीवन का इतिहास पढ़ते हुए चले जाइये, हर कदम वसंत पंचमी के दिन ही उठे हैं। हर वसंत पंचमी पर हमारे भीतर एक हूक उठती है, एक उमंग उठती है। उस उमंग ने कुछ ऐसा कान नहीं कराया जिससे हमारा व्यक्तिगत फायदा होता हो। समाज के लिए, लोकमंगल के लिए, धर्म और संस्कृति के लिए, सेवा के लिए ही हमने प्रत्येक वसंत पंचमी पर कदम उठाये हैं। आज फिर इसी पर्व पर तीन कदम उठाते हैं। पहला कदम-सारे विश्व में आस्तिकता का वातावरण बनाने का है। आस्तिकता के वातावरण का अर्थ है-नैतिकता धार्मिकता, कर्तव्यपरायणता के वातावरण का विस्तार। ईश्वर की मान्यता के साथ बहुत सारी समस्यायें जुड़ी हुई हैं । ईश्वर एक अंकुश है। उस अंकुश को हम स्वीकार करें, कर्मफल के सिद्धान्त को स्वीकार करें और अनुभव करें कि एक ऐसी सत्ता दुनिया में काम कर रही है जो सुपीरियर है अच्छी है-नेक है-पवित्र है। उसी का अंकुश है और उसी के साथ चलने में भलाई है। यह आस्तिकता का सिद्धान्त है। इसी को अग्रगामी बनाने के लिए हमने गायत्री माता के मन्दिर बनाये हैं। गायत्री माता का अर्थ है विवेकशीलता, करुणा, पवित्रता, श्रद्धा। इन्हीं सब चीजों का विस्तार करने के लिए आप से भी कहा गया है कि आप अपने घरों में, पड़ोस के घरों में गायत्री माता का एक चित्र अवश्य रखें। घर-परिवार में आस्तिकता का वातावरण बनायें।
यज्ञ और गायत्री की परम्परा को हम जिन्दा रखना चाहतें हैं। इसके विस्तार के लिए चल पुस्तकालय चलाने से लेकर धकेल गाड़ी-ज्ञानरथ चलाने के लिए दो घंटे का समय प्रत्येक परिजन को निकालना चाहिए। यही दो घंटे भगवान का भजन है। भगवान के भजन का अर्थ है-भगवान की विचारणा को व्यापक रूप में फैलाना। हमने यही सीखा है और चाहते हैं कि आप का भी कुछ समय गायत्री माता की पूजा में लगे। जैसे हमारे गुरुजी ने हम से समय माँगा था और हमें निहाल किया था, वही बात आज आपसे भी कही जा रही है कि अपने समय का कुछ अंश आप हमें भी दीजिए आस्तिकता को फैलाने के लिए। पाने के लिए कुछ न कुछ तो देना ही पड़ता है। पाने की उम्मीद करते हैं तो त्याग करना भी सीखना होगा।
आज के दिन-हमने आपसे ब्रह्मवर्चस् का उद्घाटन कराया था। ब्रह्मवर्चस एक सिद्धान्त है कि मनुष्य के भीतर अनन्त शक्तियों का जखीरा सोया हुआ है जिसे जगाना है। जगाने के लिए तप करना पड़ता है। तप करके हम अपने भीतर सोये हुए स्रोतों को जगा सकते हैं, उभार सकते हैं। तप करने का सिद्धान्त यह है जिससे खाने-पीने से लेकर ब्रह्मचर्य के नियम पालने तक के बहिरंग तप आते हैं और भीतर वाले तप में हम अपनी अन्तरात्मा और चेतना को तपा डालते हैं। तप करने से शक्तियाँ आती हैं, मनुष्य में देवत्व का उदय होता है। मनुष्य में देवत्व का उदय करने के लिए सामान्य जीवन में आस्तिकता अपनानी और बहिरंग जीवन में तपश्चर्या करनी पड़ती है। आस्तिकता का अर्थ नेक जीवन और तपश्चर्या करनी पड़ती है। आस्तिकता का अर्थ नेक जीवन और तपश्चर्या का अर्थ लोकहित के लिए-सिद्धान्तों के लिए मुसीबतें सहने से है। तप करने की शिक्षा ब्रह्मवर्चस द्वारा सिखाते हैं। यह एक प्रतीक है-सिम्बल है एक स्थान है। मनुष्य के भीतर देवत्व का उदय और धरती पर स्वर्ग का अवतरण यही हमारे दो सपने हैं। हमारी कुण्डलिनी और शक्तिपात इन्हीं दो प्रयोजनों में काम आती हैं, तीसरे किसी प्रयोजन में नहीं। तप परायण और लोकोपयोगी जीवन-यही मनुष्य में देवत्व का उदय है।
धरती पर स्वर्ग के वातावरण का क्या मतलब है? अच्छे वातावरण को स्वर्ग कहते हैं। स्वर्ग बैकुण्ठ में ही नहीं होता, वरन् जमीन पर भी हो सकता है। जहाँ अच्छे आदमी, शरीफ आदमी, अच्छी नीयत के आदमी ठीक परम्परा को अपनाकर भले आदमियों के तरीके से रहते हैं वहीं स्वर्ग पैदा हो जाता है। सन्त इमर्सन कहते थे ‘मुझे कहीं भी भेज दो हम उसको स्वर्ग बनाकर रख देंगे।’ हम चाहते थे कि धरती पर स्वर्ग बनाने के लिए कोई एक ऐसा मुहल्ला बना दें-एक ऐसा ग्राम बसा दें, जिसमें त्याग करने वाले सेवा करने वाले लोग आयें और वहाँ पर सिद्धान्तों के आधार पर जिये । हलकी-फुलकी हँसती-हँसाती शाँति की जिंदगी जिये-मोहब्बत की जिंदगी जिये और यह दिखा सकें कि लोकोपयोगी जिन्दगी भी जियी जा सकती है क्या? धरती पर इसका एक नमूना बनाने के लिए हमने गायत्री नगर बसाया है और आपको दावत देते हैं कि यदि आप अपने बच्चे को संस्कारवान नहीं बना सकते तो उसको हमारे सुपुर्द कर दीजिये आप कौन हैं? हम बाल्मीकि ऋषि है और बाल्मीकि ऋषि के तरीके से आपके बच्चों को लव-कुश बना सकते हैं। आपकी औरत को तपस्विनी सीता बना सकते हैं। दोनों संस्थाओं की वसंत पंचमी के दिन इसीलिए स्थापना की गई है। आस्तिकता के लिए ज्ञान यज्ञ के लिए विचारक्रांति के लिए यह एक नमूना है।
तपश्चर्या के सिद्धान्तों को प्राणवान बनाने के लिए ज्ञान-विज्ञान के लिए, ब्रह्मवर्चस् और आस्तिकता को जीवित करने के लिए-धरती पर स्वर्ग पैदा करने के लिए हिलमिल कर रहने और त्याग, बलिदान, सेवा की जिन्दगी जीने के लिए गायत्री नगर बसाया गया है। लोग यहाँ हमारा प्यार पीने के लिए, संस्कार पाने के लिए, आदर्श पाने के लिए, प्रेरणा पाने के लिए, प्रकाश पाने के लिए आते हैं। नैमिषारण्य क्षेत्र में शौनक और सूत का संवाद होता था। सारे ब्राह्मण बैठते थे, ज्ञान ध्यान की बातें करते थे और लोकोपयोगी जीवन जीते थे। मेरा भी मन था कि एकदानैमिषारण्ये की तरीके से स्नेहवश लोग यहाँ आयें और हिलमिल कर काम करें, प्यार की बातें करें, समाज सेवा की बातें करें, दूसरों को उठाने की बातें करें। हम एक ऐसी दुनिया बसाना चाहते हैं, ऐसा नगर बसाना चाहते हैं जिससे दुनिया को दिखा सकें कि भावी जीवन-भावी संसार अगर होगा तो स्वर्ग जैसा कैसे बनाया जा सकेगा? स्वर्ग में शान्ति का-परमार्थ का जीवन जीने के लिए क्या-क्या तकलीफें आ सकती हैं? ऐसा हम गायत्री नगर का उद्घाटन करते हैं। चूँकि - हमारे गुरु ने यही दिया और उसके लिये वायदा किया कि तेरा ऊँचा उद्देश्य है तो तेरे लिए कमी नहीं पड़ेगी। मैं भी आपको विश्वास दिलाता हूँ कि अगर आपके जीवन में उद्देश्य ऊँचे हों तो आपको कमी नहीं रहेगी, कोई अभाव नहीं रहेगा।
मेरी एक ही इच्छा और एक ही कामना रही है कि वसंत पर्व के दिन आपको बुलाऊँ और अपने भीतर जो पक्ष है, उस पिटारी को खोलकर दिखाऊ कि मेरे अन्दर कितना दर्द है, कितनी करुणा है, जीवन को पवित्र बनाने की कितनी संवेदना है, कितना देवत्व है। यही खोलकर आपको दिखाना चाहता था। अगर आपको ये चीजें पसंद हों तो मैं चाहता हूँ कि आप इन चीजों को देखें, इनको परखें, छुए और अगर हिम्मत हो तो इनको खरीद ही ले जाय । अपने गुरु का अनुग्रह मैंने खरीद कर लिया है और चाहता हूँ कि आप भी अपने गुरु का अनुग्रह खरीद कर ले जाय, शाँति खरीद कर ले जाय, महानता खरीद कर ले जाएँ, और जो कुछ भी दुनिया में श्रेष्ठ है, वह सब खरीद कर ले जाएँ तो आप धन्य हो जाएँ । खरीदने के लिए कहाँ जाएँ? हम देंगे आप को, जैसे हमारे गुरु ने दिया शक्तिपात के रूप में और कुण्डलिनी के रूप में यही है हमारी आकांक्षा और अभिलाषा। ॐ शान्तिः
एक दार्शनिक बगीचे में सो गये। सोते समय चारों ओर फूलों पर तितलियाँ उड़ती नजर आ रही थी। सपने में भी पूरे समय वे यह अनुभव करते रहे कि स्वयं ही तितली हो गये है और फूलों पर बैठने का रस ले रहे थे। वे बड़े प्रसन्न थे।
देर तक सोने के बाद जब वे उठे तो भौंचक्के थे। साथी दार्शनिक ने इस प्रकार हैरान होने का कारण पूछा तो उनने कहा कि समझ में नहीं आता कि मैं आदमी था और तितली का स्वप्न देख रहा था अब भी मैं तितली हूँ आदमी बन जाने का सपना देख रहा हूँ।
दूसरे दार्शनिक ने समाधान किया कि दोनों ही परिस्थितियों में अपने-अपने ढंग में दोनों ही बातें सही मानी जा सकती है।
मनुष्य की बहिरंग सत्ता को कई प्रकार की सामर्थ्यं उपलब्ध हैं । इन शक्तियों में सम्पत्ति, बलिष्ठता, शिक्षा-कौशल , प्रतिभा , अधिकार क्षमता जैसे साधनों की बहुधा गिनती की जाती है और इन्हीं के सहारे बहिरंग जगत में, इस मायावी संसार में सफलता संपादित करने की कामना की जाती है । फिर भी प्राप्त सामर्थ्य-वैभव सीमित ही होता है व अस्थिर भी । फिर इन भौतिक सफलताओं के लिए मात्र पुरुषार्थ व साधन ही प्रमुख नहीं , दूसरों की सहायता और परिस्थितियों की अनुकूलता भी देखनी होती है । सहायता न मिले व परिस्थितियाँ प्रतिकूल हों तो साधन, कौशल , प्रतिभा एक ओर, कई बार असफलता का मुँह भी देखना पड़ता है ।
उसके विपरीत मनुष्य की अंतरंग सत्ता-आत्मसत्ता की सामर्थ्य में न तो सीमा का कोई बंधन है और नहीं स्वल्पता का असंतोष । उस क्षेत्र में असीम एवं प्रचुर शक्ति स्रोत छिपे पड़े हैं । चूँकि आत्मसत्ता सीधे परमात्मसत्ता से जुड़ी है, आवश्यकतानुसार उस मूल स्रोत से चाहे जब , बहुत प्राप्त किया जा सकता है, नदी की धारा में जल तो एक सीमा तक ही होता है किन्तु हिमालय जैसे विशाल जलस्रोत से तारतम्य जुड़ा होने के कारण सरिता अविच्छिन्न रूप से प्रवाहित ही बनी रहती है । जबकि एक पोखर का, जलाशय का पानी उपयोग कर्ताओं के दबाव, धूप-हवा के प्रभाव को सहन नहीं कर पाता व जल्दी सूखकर समाप्त हो जाता है । भौतिक स्तर की बहिरंग जगत की सामर्थ्यों की तुलना पोखर के जलाशय के पानी से की जा सकती है और आत्मिक स्तर की-अंतर्जगत् की शक्ति की-वर्चस् की उपमा हिमालय से निकलने वाली नदियों के रूप में समझी जा सकती है ।
यहाँ भौतिक साधनों के लिए किये जाने वाले पुरुषार्थ एवं प्राप्य साधनों की अवमानना नहीं की जा रही । उन्हें जुटाना व निरन्तर पुरुषार्थरत रहना जरूरी है। किन्तु मूलभूत लक्ष्य मनुष्य का अंतरंग की वर्चस् की सामर्थ्य को उभारने का हो तो बहिरंग जगत की उपलब्धियाँ भी सार्थक होने लगती है ।आत्मशक्ति का उपार्जन न होने पर बहिरंग का वैभव तनावजन्य-असंतोष , उद्विग्नता, संक्षोभ-विक्षोभ व पारस्परिक विद्वेष के साथ समाज में विषमता तथा विग्रह की स्थिति लाता है । आज सारे विश्व की स्थिति का आकलन करने पर निष्कर्ष यही निकलता है कि बहिर्जगत का पुरुषार्थ हुआ तो है पर वह एकांगी होने के कारण अपने साथ आस्था संकट की अतिकष्टकारी विभीषिका साथ लेकर आया है । यदि आज की समस्याओं का समाधान होना है , आस्थाओं-आकांक्षाओं का प्रवाह मोड़ा जाना है, व्यक्ति के अंतराल को परिष्कृत का उसका आत्मगौरव जगाना है तो वह अंतर्जगत के पुरुषार्थ द्वारा ही शक्य हो सकेगा । युग निर्माण की प्रक्रिया इसी आत्म-ऊर्जा के उत्पादन व सुनियोजन के लिए परम पूज्य गुरुदेव द्वारा आरंभ की गयी व उसी की परिणति स्वरूप आज बड़े व्यापक स्तर पर युगांतरीय चेतना के प्रवाह को उमड़ता उफनता देखा जा सकता है ।
आत्मशक्ति का उत्पादन जिस यंत्र या फैक्टरी में किया जाता है, उसे व्यक्ति की चेतना नाम से जाना जा सकता है । मानवी अंतःकरण को अणु-ऊर्जा उत्पादन केन्द्र जैसा बहुमूल्य संपन्न माना जा सकता है । शरीरबल, बुद्धि वैभव आदि तो आवरण, उपकरण मात्र हैं । अनन्त संभावनाओं से भरा अंतर्जगत ही मनुष्य का भाग्यविधाता है । मानवी अंतराल ऋद्धि सिद्धियों का भाण्डागार है । परमात्मसत्ता का एक अंश होने के कारण आत्मा में परब्रह्म की सारी क्षमताएँ व विशेषताएँ बीज रूप में विद्यमान हैं । आत्ममूर्छना को जगाकर जब अंतर्जगत का पुरुषार्थ साधना प्रक्रिया द्वारा किया जाता है तो व्यक्ति के निजी जीवन में मनोनुकूल परिस्थितियों के निर्माण से लेकर समष्टिगत अनुकूलन व नवसृजन की प्रक्रिया आरंभ होने लगती है । यही है युगऋषि द्वारा आरंभ किये गए युगपरिवर्तन की प्रक्रिया का सुनिश्चित आधार ।
संधिकाल की संक्रमण वेला से गुजर रही मनुष्य जाति के लिए अब सबसे बड़ी आवश्यकता है मनुष्य की निज की आत्मशक्ति का , आत्मबल का, वर्चस का जागरण। उसके लिए प्रतिकूलताओं के बीज भी अनुकूल प्रवाह विनिर्मित करने का कार्य सृष्टि संतुलन के लिए प्रतिज्ञाबद्ध नियति ने, अवतार चेतना ने आरंभ कर दिया है । हम को तो मात्र आत्मशक्ति को प्रसुप्ति से जागरण की स्थिति में लाकर स्वयं को उस प्रवाह से जोड़ देना भर है शेष कार्य वह युगान्तरीय चेतना स्वयं कर लेगी । शक्ति संचार की प्रक्रिया इसी निमित्त आरंभ की गयी है ताकि व्यक्ति-व्यक्ति के अंदर की शक्ति जगे व वह शक्ति के मूलस्रोत से जुड़कर अनन्त सामर्थ्य का अधिकारी बन । विगत दिनों शक्ति साधना के उपक्रम में पूरे भारत व विश्वभर में संपन्न अखण्ड गायत्री जप आयोजनों ने जो सबसे बड़ा कार्य किया है, वह है जन-जन की प्रसुप्ति को मिटाना तथा सूक्ष्मजगत में अनुकूल प्रवाह विनिर्मित करना । यह कार्य बड़ी सफलतापूर्वक संपन्न हुआ है व आगामी नौ वर्षों तक यह इसी प्रकार पलता रहेगा ।
प्रस्तुत वसन्तपर्व (8 फरवरी 92) से शक्ति साधना प्रक्रिया में एक सम्पुट और जोड़ते हुए अब शक्ति संचार की प्रक्रिया की सम्मिलित किया जाना है । यह और कुछ नहीं, जिनकी आत्मशक्ति के संवर्धन हेतु स्वयं को दैवी प्रवाह से जोड़ने की प्रक्रिया है । युगशक्ति गायत्री कार्यक्षेत्र सारा विश्व है , यह समग्र सृष्टि है । वह अनुकूल प्रवाह विनिर्मित कर अपना पुरुषार्थ आरंभ कर चुकी है । अब परिवर्तन के लिए तत्पर साधक को स्वयं को , उस बहती धारा से जोड़ा भर देना है । इसके लिए इस वसंत से शक्ति-संचार साधना” के रूप में एक उपक्रम का शुभारंभ किया जा रहा है व सभी को बिना किसी जाति , लिंग , वर्ण , धर्म , संप्रदाय के भेद के इस में भागीदारी करने के लिए आमंत्रित किया जा रहा है ।
हिमालय के ध्रुव केन्द्र से निःसृत दिव्य प्रवाह जो इक्कीसवीं सदी के रूप, में , सतयुग , लाने को संकल्पित है का उद्गम केन्द्र गंगोत्री शाँतिकुँज को माना जाता है । गंगा यों निकलती तो गोमुख से है, पर उससे पूर्व ही कैलाश पर्वत के समीपस्थ मान सरोवर से वह ग्लेशियर के रूप में जन्म लेती है व अंततः धरती पर गोमुख में आकर प्रकट होती है । महाकाल की युगांतरीय चेतना का उत्पादन स्थल तो दुर्गम हिमालय है , पर इसका दृश्य रूप में गोमुख है शाँतिकुँज-गायत्री तीर्थ । प्रत्येक साधक को यही भावना करते हुए नित्य प्रातः शाँतिकुँज की ओर मुख करते हुए सूर्योदय से एक घण्टा पूर्व से लेकर एक घण्टा बाद तक के किसी भी समय में न्यूनतम आधा घण्टे नित्य शक्ति-संचार प्रक्रिया में अपनी भागीदारी करना चाहिए । इसके लिए आत्मशोधन के उपक्रम कर सुखासन की मुद्रा में शाँतिकुँज की ओर मुँह करके बैठा जाय । प्रारंभिक घटनाक्रम के बाद तीन विशिष्ट प्राणायाम लोमविलोम सूर्यभेदन के संपन्न किये जाएँ । सूर्य गायत्री महाशक्ति का देवता है । शक्ति का पुँज सविता ही आत्मशक्ति के जागरण की प्रक्रिया को अगले दिनों संपन्न करेगा । इसके उपरांत पंद्रह मिनट भावनात्मक रूप से शाँतिकुँज पहुँचकर अखण्ड दीपक का दर्शन करने ,गंगा की गोद , हिमालय की छाया व दैवी संरक्षण में पहुँचकर शक्ति स्रोत से जुड़ने तथा तीनों शरीरों में शक्ति के संचार की ओजस्-तेजस्-वर्चस की वृद्धि की तथा हिमालय की दैवी चेतन प्राण धारा से अनुप्राणित होने की ध्यान-धारणा संपन्न की जाय । पाँच मिनट प्रारंभिक उपचार , दस मिनट तीन प्राणायाम तथा पंद्रह मिनट की ध्यान-धारणा इस प्रकार आधे घण्टे का यह उपक्रम नियमित रूप से निभाया जाय ।
आत्मशोधन की ब्रह्मसंध्या हेतु पवित्रीकरण आचमन शिखाबंधन , प्राणायाम व न्यास का उपक्रम संपन्न किया जाय। इसका विस्तृत विवेचन अक्टूबर 91 के उपासना विशेषांक (पृष्ठ 30-32) तथा गायत्री साहित्य के साथ भेजी जाने वाली विवरणिका में है । इसके पश्चात् कमर सीधी रख पालती मारकर, अधखुले नेत्रों व घुटने पर दोनों हाथ इस प्राणमुद्रा में बैठकर प्रातः के उदीयमान सूर्य का ध्यान करते हुए तीन लोम विलोम सूर्य भेदन प्राणायाम संपन्न किये जाएँ । बायें नासिका के छिद्र को बन्द कर दाहिने नासिका के छिद्र में अवस्थित पिंगला नाड़ी के प्रवाह से सूर्य की किरणों के प्रकाश व ऊष्मा के साथ दिव्य प्रवाह के अंदर प्रवेश करने की प्रक्रिया साँस खींचने के साथ संपन्न की जाय । नासिका के दोनों छिद्र बंद कर यह भावना की जाय कि सूर्यचक्र जो चिरकाल से प्रसुप्त था, इस आगत प्रकाशवान प्राणवायु से जाग रहा है व रोम रोम में, कण-कण में ऊर्जा का संचार हो रहा है । अब दाहिनी नासिका के छिद्र को बंद कर साँस को धीरे-धीरे बाएँ नथुने से बाहर निकाला जाय व ध्यान किया जाय कि अंतः के कल्मष जो सूर्यचक्र को नाभिचक्र को मूलाधार को धुँधला बनाए हुए थे , थोड़ी साँस के साथ इड़ा नाड़ी के प्रवाह के साथ बहार निकल रहे हैं । अब दोनों नथुने बंद कर भावना की जाय कि नाभिचक्र से तेज पुँज की तरह अग्निशिखा की लपटें ऊपर उठकर अंतर्जगत् को ज्योतिर्मान-प्रकाशवान बना रही हैं । अब दाहिना नासिका छिद्र बंद कर बाएँ नथुने से साँस खींचते समय इड़ा नाड़ी द्वारा सूर्य प्रकाश जैसा प्राणतत्त्व साँस के साथ मिलकर प्रविष्ट होने व सूर्यचक्र में जाकर उसे और तेजस्वी बनाने की भावना की जाय । अंतर्कुम्भक के दौरान सुषुम्ना नाड़ी के परिपुष्ट होने की व रेचक में पूर्व की प्रक्रिया से विलोम अर्थात् दाहिने नथुने से साँस बाहर निकालते हुए कषाय-कल्मषों के बाहर जाने व अंतःकरण के निर्मल बनने की भावना करें । पुनः फेफड़ों को पूरी तरह खाली रख एक बार बहिर्कुम्भक प्रक्रिया संपन्न की जाय व इस प्रकार एक लोमविलोम प्राणायाम संपूर्ण हुआ माना जाय । यह पूरी प्रक्रिया तीन बार संपन्न की जानी है । दायें से खींचना, बायें से निकालना व पुनः बायें से खींचना व दायें से निकालना यह उलटा सीधा चक्र प्राणायाम कर रहने से इसे “लोमविलोम” व सूर्य का ध्यान कर सूर्यचक्र को जाग्रत करने की धारणा के कारण इसे "सूर्यभेदन" प्राणायाम कहते हैं । इसके पश्चात् शाँतचित्त , स्थिर शरीर, सीधी कमर, दोनों हाथ गोदी में व आँखें बन्द कर मौन गायत्री जप कर मन ही मन शाँतिकुँज पहुँचकर गायत्री तीर्थ गुरुसत्ता एवं अखण्ड दीपक का दर्शन करने, ज्योति किरणों के स्थूल शरीर-मूलाधार चक्र में, सूक्ष्मशरीर आज्ञाचक्र में तथा कारण शरीर हृदय चक्र में संचार होने व साधक के ओजवान , तेजवान , प्रकाशवान बनने व उपलब्ध अमृत वर्षा से पुलकित होकर रस विभोर होने की परिकल्पना की जाय । पंद्रह मिनट बाद पाँच बार ओंकार का गुँजन करते हुए असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय मृत्योः मा अमृतंगमय की प्रार्थना करते हुए शाँति पाठ किया जाय । तत्पश्चात् दोनों हथेलियों को आपस में रगड़ कर मुख पर तथा हृदय , पीठ , हाथ आदि पर स्पर्श करते हुए भावना की जाय कि साधना के पूर्व जो स्थिति थी उससे अब श्रेष्ठतर है व क्रमशः आत्मबल की वृद्धि हो रही हैं । सूर्य को अर्घ्य देकर अपनी शक्ति-संचार की प्रक्रिया का समापन किया जाय ।
यह सुनिश्चित माना जाना चाहिए कि आत्मशक्ति का उपार्जन करने वाले साधक ही अगले दिनों व्यष्टि परक, समष्टिपरक प्रतिकूलताओं को निरस्त कर सकने व अपनी जीवन यात्रा आगे बढ़ा पाने में सफल होंगे । ऐसे में शक्ति संचार की इस प्रक्रिया में जितने अधिक भागीदार बनाए जा सकें , बनाना व प्रत्येक को मिशन की पत्रिकाएँ अखण्ड-ज्योति , युग निर्माण योजना व युग शक्ति गायत्री के द्वारा युग प्रवाह से जोड़ना इस संधिकाल का सबसे बड़ा पुण्य है। दस सहयोगी साधक बनाकर उन्हें गायत्री चालीसा पाठ हेतु प्रेरित करने से लेकर शक्ति संचार प्रक्रिया से जुड़ने हेतु सहमत करना व शाँतिकुँज का आमंत्रण देना भी इस साधना का ही एक अंग है। सप्ताह में एक बार अग्निहोत्र भी संपन्न किया जाय। यह पारिवारिक स्तर पर घर पर भी हो सकता है व समूह स्तर पर प्रज्ञा संस्थानों-शक्ति पीठों अथवा ऐसे स्थानों पर जहाँ सभी परिजन एक साथ सप्ताह या पखवाड़े में एक साथ एकत्रित होते हों। 10 फरवरी से 8 जून कुल चार माह तक यह क्रम चलेगा। व इसकी पूर्णाहुति 8−9−10 जून की अवधि में आयोजित त्रिदिवसीय विशिष्ट शिविर में भागीदारी करके शाँतिकुँज में संपन्न की जाएगी। 10 जून का गायत्री जयंती है, परम पूज्य गुरुदेव की द्वितीय पुण्यतिथि है। शक्ति-संचार साधना हेतु पंजीकरण का क्रम आरंभ हो चुका है। वंदनीया माताजी द्वारा अभिमंत्रित संकल्प सूत्र (कलाव) सभी भागीदारों को यहाँ से भेजा जा रहा है। इच्छुक साधकों से नाम, पूरा पता तथा जन्मतिथि लिखकर शाँतिकुँज हरिद्वार 249411 (उ. प्र.) के पते पर भेजने को कहा जा रहा है। पत्र पर ऊपर एक कोने में लिख दिया जाय “शक्ति संचार साधना” ताकि डाक की सुव्यवस्था करने में यहाँ कोई कठिनाई न हो। सभी साधकों को संकल्प सूत्र के साथ विस्तृत मार्गदर्शन करने वाली एक छोटी पुस्तिका भी भेजी जाएगी, जिसमें शक्ति संचार साधना की आवश्यकता व प्रक्रिया का विवरण होगा। समय कम है। सभी परिजनों से शीघ्र संपर्क करने का अनुरोध इन पंक्तियों के माध्यम से किया जा रहा है।
दक्षिण भाषाओं में युग साहित्य अब दक्षिण भारत की भाषाओं में भी प्रकाशित हो रहा है। परिजन अपने सत्र के इन भाषा भाषियों तक उक्त साहित्य का लाभ प्रयत्नपूर्वक पहुँचा सके, इसलिए उनके ज्ञातव्य दिये जा रहे है।
तेलगू-पूज्य गुरुदेव की आत्मकथा (हमारी वसीयत विरासत) षोडश संस्कार, साधना से सिद्धि आदि पुस्तकों सहित 32 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। गायत्री परिवार मासिक पत्रिका भी नियमित निकल रही है।
प्राप्ति स्थान-श्रीश्यामराव भूपैया अग्रहारम मु.पो.अमलापुर जि. ईस्ट गोदावरी (आ. प्र.)
तमिल- हमारी वसीयत विरासत का अनुवाद प्रकाशित हो चुका है। अन्य कई पुस्तकों का क्रम चालू है।
पता :- युग निर्माण योजना तमिल पब्लिशिंग ट्रस्ट 242/18 रोहिणी फ्लैट्स अन्नानगर (पश्चिम) मद्रास।
कन्नड़ एवं मलयालम- दोनों में अभी एक-एक पुस्तक, कन्नड़ में गायत्री आरती एवं मंत्रार्थ की पुस्तक तथा मलयालम में बिजनेइल सहचरीकल (सुनसान के सहचर) प्रकाशित हो चुकी है। आगे का क्रम चालू है।
प्राप्ति स्थान-साहित्य केन्द्र, शाँतिकुँज हरिद्वार 249411
*समाप्त*