जीना जिसे आ गया, वही है सच्चा कलाकार

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मानव जीवन एक बहुमूल्य निधि है। यह हम सबका सौभाग्य है कि जो सुअवसर सृष्टि के किसी भी प्राणी को न मिला, वह हमें प्राप्त हुआ व हम मानव काया के रूप में जन्में। यह अनुपम अवसर कुत्साओं की कीचड़, कुण्ठाओं की दलदल में पड़े रह कर नारकीय यातनाएँ सहन करते हुए मौत के दिन किसी तरह गिनने के लिए नहीं मिला है,वरन् इसलिए है कि हम परमेश्वर की इस श्रेष्ठ संरचना, दुनिया के सौंदर्य का रसास्वादन करते हुए निज को धन्य बनाएँ और इस तरह जियें जिसमें पुष्प जैसी मृदुलता, चन्दन जैसी सुगन्ध और दीपक जैसी रोशनी भरी पड़ी हो।

जीवन को सही ढंग से जीना एक कला है, एक कौशल है। जिसे ठीक तरह जीना आ गया, वह इस धरती का सम्मानित कलाकार है। जो भी साधन-सामग्री उपलब्ध हैं, उनका उत्कृष्टतम उपयोग करते हुए जी सकना, यही तो कौशल की कसौटी है। साधनों की कमी व अवरोधों की चर्चा करके जो प्रस्तुत उपलब्धियों की महत्ता कम करता है व यह कहता है कि यदि मुझे अमुक साधन मिले होते तो मैं अमुक कर्तृत्व प्रस्तुत करता, उसे आत्म प्रवंचना में निरत एक असफल खिलाड़ी मानना चाहिए। जीवन कला जिसे आती है, वह कलाकार अपने पास के स्वल्प साधनों से ही महान अभिव्यंजना प्रस्तुत करते रहे हैं। जिसे जीना आ गया, उसे सब कुछ आ गया। वही सच्चा शिल्पी है, जीवन रूपी खेल का श्रेष्ठतम खिलाड़ी है, यह माना जाना चाहिए।


आत्मा की प्यास बुझेगी, श्रेष्ठता के निर्भर से

सत्ता केवल प्रकाश है। अन्धकार कोई पदार्थ नहीं प्रकाश के अभाव का नाम ही अन्धकार है। प्रकाश की नाप-तौल और व्याख्या-विवेचना हो सकती है, अन्धकार का कोई प्रमाण परिमाण नहीं। अभाव अपने आप में भयावना है, इसलिए अंधकार डरावना लगता है। अनिश्चित से, अविज्ञात से डर लगता है। वस्तुस्थिति जब समझ ली जाती है तो डर चला जाता है। मौत इसीलिए डरावनी लगती है क्योंकि उसके उदर में जाने के बाद क्या होता है इसका निश्चय नहीं। यदि वस्तुस्थिति का सुनिश्चित ज्ञान रहा होता तो कोई भी उससे डरता नहीं। शरीर छोड़कर अन्यत्र जाने का भी डर निरस्त हो सकता था-यदि गन्तव्य स्थान के सम्बन्ध में समाधान कारक जानकारी रही होती। जो नहीं है वही अविज्ञात है वही डरावना। इतना जान लेने के बाद हमें ज्ञान का प्रकाश खोजना पड़ता है, ताकि उस बहुमूल्य सत्ता से लाभान्वित हो सकें और अभाव जन्य अन्धकार द्वारा पग-पग पर मिलने वाले त्रास से छुटकारा पा सकें।

इस संसार में केवल श्रेष्ठ है-अश्रेष्ठ कुछ नहीं। मनुष्य श्रेष्ठ से बना है। विलक्षण बहुमूल्यताओं से भरी उसकी संरचना में अश्रेष्ठ का राई-रत्ती उपयोग नहीं हुआ है। होता तो तभी न जब इस विश्व में कहीं अश्रेष्ठ की सत्ता रही होती। अन्धकार की तरह अश्रेष्ठ भी एक अभाव की, अविज्ञात की, अनिश्चय की स्थिति है। यद्यपि उसका कोई अस्तित्व नहीं, तो भी अनस्तित्व की भयानक विभीषिका तो है ही।

श्रेष्ठ को जब अपना आहार नहीं मिलता तो वह भूख-प्यास से व्याकुल होकर निकृष्ट बन जाता है।क्षुधा और तृषा की आशा में वह भटकता है, तृप्ति के शुद्ध साधन मिलते नहीं, तो ऐसा खाने-पीने लगता है जो कृमि कीटकों के लिए योग्य था मनुष्य के लिए अयोग्य । इस अयोग्य को गले से नीचे उतारने की स्थिति में जब भी जहाँ भी मनुष्य पाया जाता है तब उस पर निकृष्टता का दोषारोपण किया जाता है।

श्रेष्ठ और निकृष्ट के बीच की एक और भी स्थिति है-भ्रमित। पतवार रहित-चालक रहित नौका लहरों के इशारे पर निरुद्देश्य भ्रमण करती रहती है। वह डूबती तो नहीं, पर कहाँ पहुँचेगी इसका भी कुछ निश्चय नहीं। अन्धड़ के साथ उड़ते तिनके नष्ट तो नहीं होते, पर वे किस लक्ष्य तक पहुँच पावेंगे इसका क्या भरोसा?

श्रेष्ठ वह है जो अपनी आन्तरिक सम्पन्नता को समझता है और उससे उदारतापूर्वक दूसरों की झोली भरकर अपने को संतुष्ट और दूसरों को सुखी बनाता है। मनुष्य की मूलसत्ता श्रेष्ठ है और उसका स्वभाव श्रेष्ठता से भरा-पूरा है। निरुद्देश्य घृणा का पात्र नहीं-दया का पात्र है। भटकाव ने उसे दिशा नहीं दी और वह पानी की लहरों के साथ हवा के झोंकों के साथ इधर-उधर भटकते रहकर बहुमूल्य अवसर से हाथ धो बैठा। तोतली भाषा में बोलते बच्चे किसी का अनिष्ट तो नहीं करते-लंगड़ा कर चलने वाले अपंग उलटे तो नहीं चलते उनके साथ गति तो है। अगति का दोष उन पर नहीं मढ़ा जा सकता।

हम प्रकाश को देखें और समझें, यही उचित है। अपने स्वरूप, बल और लक्ष्य को समझें, यही बुद्धिमता पूर्ण है। हमारी प्यास श्रेष्ठता के सेवन से बुझेगी। आत्मा की प्यास श्रेष्ठता के शीतल निर्झर के तल तक पहुँचकर ही बुझ सकती है।

मानवीय गौरव के नीचे गिर कर जिस महाशून्य में उतरते हैं। वही भयावह है-सर्वथा निकृष्ट है। यदि अपनी मूल सत्ता के गरिमा भरे अस्तित्व को समझना है और उसके उपयुक्त जीवन नीति अपनाना सम्भव हो सके तो समझना चाहिए कि अपने सुखद संसार का और समुज्ज्वल भविष्य का निर्माण हो गया। इस निर्माण के विश्वकर्मा हम स्वयं है। इतनी भर जानकारी करा देना ही आत्मोन्मुखी करने वाली योग साधनाओं का लक्ष्य होता है। ध्यान जब भी किया जाय, इस चिन्तन के साथ किया जाय तो सार्थक भी होता है व अन्तरंग- बहिरंग में अनेकानेक परिवर्तन भी लाता है। हम अपने भाग्यविधाता स्वयं हैं, यह बोध सतत् करते हुए अंतर्जगत का प्रबल पुरुषार्थ करते चलें तो हमारी वह यात्रा आरंभ होती है, जिसका लक्ष्य है देवतत्व श्रेष्ठता-उत्कृष्टता। यही तो हम सबका इष्ट भी है गंतव्य भी।


कौतुक से भरा-पूरा अपना आपा

अंधेरा होते ही आसमान में तारे खिल-खिलाकर हँस पड़ते हैं। तितली अपनी चित्रकला का प्रदर्शन करती हुई थिरकती रहती है। कोयल की मस्ती उसकी कूक में से प्रस्फुटित होती रहती है। मोर अपने सुन्दर पंख को जहाँ-तहाँ दिखाते फिरने के लिये नृत्य करते रहते हैं। भौंरों को गूँजे गुनगुनाये बिना चैन नहीं पड़ता है। प्रकृति ने जिसे जो उपहार प्रदान किया है, उन्हें पाकर वह स्वयं तो मोद मनाता ही है अपनी उपलब्धियों का प्रदर्शन करके दूसरों का मन बहलाने में भी नहीं चूकता।

चींटियाँ इस प्रकार पंक्तिबद्ध चलती हैं मानों किसी सैन्य शिक्षा कैम्प से अभी उत्तीर्ण होकर लौटी हों। दीमकें अपने वस्तु कौशल के प्रदर्शन में चूकती नहीं। दिखाती हैं कि वे अपने कलेवर की तुलना में कितने अच्छे किस्म का योजनाबद्ध घर बना सकती हैं। मधुमक्खियां रसायन वेत्ताओं की तरह निरत हुई निरत भाव से छत्ते बनाती हुई दीखती हैं कि ऐसा ही कुछ सृजन करके दिखाओ तो जानें? जिधर भी नजर उठा कर देखी जाय, उधर ही प्रतीत होता है कि हर किसी को उसकी हैसियत के अनुसार बहुत कुछ मिला है, इतना अधिक हैसियत के अनुसार बहुत कुछ मिला है, इतना अधिक कि उससे स्वयं तो प्रसन्न रह ही सके कि वह कितना सौभाग्यशाली और कृतकृत्य है। यही है सृष्टा की नियति और प्रकृति की वास्तविक कृति जिसे यदि उपेक्षा अवमानना का पर्दा हटाकर देखा जाय, तो यहाँ बहुत कुछ ऐसा देखा जा सकेगा, जिसमें न केवल उपलब्ध कर्ता को वरन् दर्शकों का मन भी उत्साह से भर चले। हिरनों का चौकड़ी भरना और खरगोशों का दौड़ लगाना किसी का भी मन मोहने के लिये पर्याप्त है।

मनुष्य को उसकी वरिष्ठता के अनुरूप कुछ अधिक ही मिला है। दर्पण सामने रखकर बैठा जाय और उसमें चेहरे के विभिन्न भाग उपभागों को देखा जाय, तो उसकी बनावट हर सौंदर्य पारखी को अद्भुत, असाधारण और मनमोहक प्रतीत होगी। क्या ऐसा सर्वथा सुन्दर चेहरा सृष्टि के किसी अन्य प्राणी को भी मिला है? इसका पता लगाने पर ‘नहीं’ में ही उत्तर मिलेगा। बालक, वृद्ध, नर, नारी, काले, गोरे, रूपवान, कुरूप सभी में अपनी-अपनी विशेषता पायी जाती है। यदि कलाकार की दृष्टि से देखा जाय तो हर किसी का चेहरा अपने ढंग का एक असाधारण सौंदर्य प्रकट करता हुआ दिखाई देगा।

हथेली और उँगलियों को देखा जाय तो प्रतीत होगा कि ऐसी लोचदार संरचना किसी असामान्य द्वारा ही बन पड़नी संभव है। फिर जिसे यह उपलब्ध, हस्तगत हुई है, वह कितना भाग्यवान है? इन्हीं के सहारे वह कैसे साहित्य का सृजन कर सकता है, चित्र बना सकता है, मूर्तियाँ गढ़ सकता है और न जाने कितने कला-कौशल दिखा सकता है, जिन्हें देखकर अजायबघरों को नमन करना पड़े। अपने हाथों को जितनी बाद देखा जाय उतने ही अधिक वे बहुमुखी कलपुर्जों के केन्द्र प्रतीत होते हैं, फिर अवसरों पर जो उनकी मुद्रायें बनती हैं उनसे प्रतीत होता है कि अभिव्यक्तियों का जितना प्रकटीकरण वाणी द्वारा नहीं बन पड़ा उसकी पूर्ति हाथों के सहारे बन पड़ने वाली मुद्रायें प्रकट कर देती हैं। वक्ता, अभिनेता, नर्तक, कलाकारों के हस्त कौशल को देखकर उन पर कुछ भी न्यौछावर करने को मन करता है। मैत्री की सघन अभिव्यक्तियों के साथ जब हाथ मिलते हैं, तो लगता है मानों दो-दो व्यक्तित्व मिलकर एकाकार होने जा रहे हैं।

नेत्रों पर ही ध्यान केन्द्रित किया जाय, तो उनकी तुलना पुतलियों में देखने वाला स्वयं अपने को विराजमान देखता है। आँखों के साथ मुखर होने वाली अभिव्यक्ति कितनी रहस्यमयी और कलापूर्ण है कि वाणी के द्वारा कहे गये शब्दों का वास्तविक भावार्थ नेत्रों की भाषा समझे बिना अधूरा ही रह जाता है। नाक है तो लम्बी मांसपेशी ही, पर उसके उतार-चढ़ावों के साथ सौंदर्य की असाधारण परतें जुड़ी होती हैं। एक प्रकार से व्यक्तित्व का अधिकाँश स्तर ही नाक की बनावट द्वारा प्रकट हो जाता है और फिर होंठ और दाँत, इनका तो कहना ही क्या? उनका हिलना, खुलना यह बताता है कि भावनाओं का उतार-चढ़ाव इनके माध्यम से किन रहस्यों को उजागर कर देता है। अन्य अंगों की भी ऐसी ही विशेषता है। प्रौढ़ जननेंद्रियों की झलक-झाँकी मिलने मात्र से मनुष्य विह्वल हो उठता है। सिनेमा वाले अंग प्रदर्शन की कुछ झलक-झाँकी दिखाकर ही दर्शकों को मोहित कर लेते हैं। उन्हें देखने के लिये बार-बार दौड़ते और साथियों को दिखाने के लिये आग्रहपूर्वक खींच-खींचकर लाते हैं। विज्ञापन करने वाले जानते हैं कि अपनी वस्तुओं की अधिक बिक्री बन पड़े, इस निमित्त सुन्दर चेहरे की छवि कितनी सफल सिद्ध होती है। यह है प्रकृति प्रदत्त मनुष्य के अंग-अवयवों की कुछ अकिंचन-सी झलक-झाँकी, जिसका सिनेमा, नाटक वाले पूरा-पूरा मूल्य सहज ही भुना लेते हैं। इन उपलब्धियों वाले तो उतने भर से न जाने किस-किस स्तर का कितना लाभ उठाते हैं।

मस्तिष्क के भीतर उमड़ती-घुमड़ती कल्पनाओं का यदि कोई चित्रकार अंकन कर सके, तो प्रतीत होगा कि वे कितनी शुभ-अशुभ विचित्रताओं से भरी-पूरी हैं। इसके आगे बुद्धि कौशल का क्षेत्र आता है। वहाँ ऐसे-ऐसे महत्वपूर्ण निर्णय सेकेंडों में होते हैं, जिनकी गंभीरता खोजने में उच्च न्यायालयों के न्यायाधीश वर्षों लगा देते हैं और न जाने कितनों का कितना श्रम नियोजित करा लेते हैं। मनुष्य की बुद्धि ही है, जिसने भाषा से लेकर दर्शन तक का सृजन किया है। ज्ञान और विज्ञान के अगणित पक्ष इसी गुहा से टिड्डी दलों की तरह सृष्टि के आदि से अन्त तक निकलते चलो की तरी सृष्टि के आदि से अन्त तक निकलते चले आये है और लगता है कि प्रलय और महाप्रलय के उपरान्त भी कल्प-कल्पान्तरों तक यह सिलसिला यथावत् चलता रहेगा। कहा जाता है कि इस सृष्टि को ईश्वर ने बनाया है किन्तु ईश्वर को किसने बनाया, इस प्रश्न का उत्तर यदि बिना पूर्वाग्रहों के अवरोध अटकाये विवेचनापूर्वक विचार किया जाय तो कहना पड़ता है कि ईश्वर की जिस में मान्यता है, वह मानवी बुद्धि का ही एक अनोखा निर्माण है। यदि ऐसा न होता तो अन्य प्राणियों को भी ईश्वर की मान्यता एवं अनुभूति हुई होती। केवल मनुष्यों का एक आस्तिक वर्ग ही है जो आप्तजनों द्वारा प्रतिपादित ईश्वर की मान्यता को स्वीकार करता है। नास्तिक तो अभी भी बुद्धि से बुद्धि गत उपादानों को काटते हैं और उसे अमान्य ठहराने वाले भूचाल तक पैदा करते हैं।

शासन, समाज, नीति, न्याय जैसी परम्परायें बुद्धि के क्षेत्र में समुद्र मंथन किये जाने पर ही उत्पन्न हुई हैं। मंद बुद्धि वाले वनवासी कबीले अभी भी इस प्रतिपादन से अन्य प्राणियों की तरह अपरिचित रह जाते हैं। धर्मों, सम्प्रदायों, भाषाओं, देशों में, संस्कृतियों में विश्व इन्हीं दिनों बँटा हुआ है। सभी अपने प्रिय प्रदेश, को सही मानते और उसके जिये लड़ने मरने तक को तैयार रहते हैं, पर भूल जाते हैं कि यह सारा पसारा उसी के द्वारा परिपोषित होकर विभिन्न कलेवर ओढ़कर अपने-अपने ढंग की अपनी-अपनी भूमिका निभा रहा है अन्यथा इस संसार में मनुष्यों की भी एक जाति है। एक ही प्रकार का उनका स्वभाव, रुख, रुझान और क्रिया-कलाप होना चाहिये, किन्तु देखा जाता है कि एक ही बिरादरी के लोग इतनी विचारधाराओं और दायरों में बँटे हुए हैं कि इन्हीं विभेदों के कारण मरने-मारने तक को उतावले हो उठते हैं। यह कुछ नहीं मात्र बुद्धि के भानुमती पिटारे से निकले हुए अजूबे मात्र हैं। एक दिन ऐसा भी आने वाला है कि मस्तिष्क की यह धारा अपना सारा पसारा समेट लेगी तो सारा मकड़जाल इकट्ठा होकर एक गोली की तरह मकड़ी के पेट में चला जायेगा और समूची मानव जाति एक परिवार की तरह हिल-मिलकर रहने लगेगी।

बुद्धि से आगे चेतना का, भाव, संस्थान है। इसमें भावनाएँ, मान्यताएँ , आस्थाएँ भरी पड़ी हैं। श्रद्धा, प्रज्ञा और निष्ठा का इसी में निवार है। उत्कृष्टता, आदर्शवादिता, करुणा, सहिष्णुता, संयम जैसे मनुष्य को देवता बना देने वाले सद्गुण इसी क्षेत्र में निवास करते हैं। इसी को परिष्कृत कर लेने पर मनुष्य स्वर्ग जैसे आनन्द में अहर्निशि डूबा रहता है। जीवन, मुक्ति और भाव समाधि जैसे परम लक्ष्य को इसी संस्थान के अंतर्गत प्राप्त कर लिया जाता है। महामानव पद प्राप्त करने से लेकर, ऋद्धि - सिद्धियों का अधिष्ठाता बना देने वाली संभावना इसी केंद्र पर केन्द्रीभूत है। ईश्वर का निवार इसी केन्द्र में है। आत्मा और परमात्मा का मिलन जब कभी होता है। तब इसी परम गुहा के कपाट खुलते हैं और क्षुद्र को महान बनाने का अवसर उपलब्ध हो जाता है।

हाड़ माँस का बना यह शरीर लम्बा अधिक चौड़ा-मोटा कम, देखने में अति सामान्य लगता है। ऊपर की चमड़ी उतार दी जाये तो फिर वह नितान्त घिनौना भर शेष रह जाता है। इतने पर भी उसके अन्तराल में ऐसी दिव्य चेतना भरी पड़ी है। जिसे स्रष्टा का अंशधर या प्रतिरूप कहा जा सकता है। कितना आश्चर्य है यह सब? कितना विचित्र, कितना अद्भुत, कितना असाधारण। इसके घटकों में से कुछ छोटे-छोटे जीवाणुओं और ऊतकों के रूप में ऐसी संरचना से विनिर्मित हैं, जिनमें कुछ पर ही ध्यान एकाग्रित करने पर हैरत में रह जाना पड़ता है। कितना मनोरंजक कितना कौतुक से भरा पूरा है यह- “अपना-आपा।”


समत्वं योग उच्यते

जीवन और द्वन्द्व आज इस कदर घुल मिल गए हैं कि दोनों को एक दूसरे का पर्याय कह लें तो कोई अत्युक्ति नहीं। हर कहीं अनिश्चय है। एक निर्णय हो पाए, तब तक दूसरा विचार आ टपकता है। एक स्थिति बन पाए इसके पहले दूसरी आ जाती है। गरीब हो या अमीर इसी अन्तर्द्वंद्व के झूले में उलझते रहते हैं। गरीब की समस्याएं छोटी लगती हैं अमीर की बड़ी। पर तह तक पहुँचने पर बात एक हो जाती है। अन्तर झोंपड़ी और महल का है। मन की संरचना प्रायः एक जैसी है। प्रवृत्तियों, अभिलाषाओं, आकाँक्षाओं में कोई अन्तर नहीं।

इस तत्व की समानता के कारण समाजशास्त्री मार्क्स ने इसे मनुष्य व्यापी समस्या के रूप में लिया। उसे अपनी रचनाओं में कहना पड़ा-पूरे समाज में द्वन्द्व व्याप्त है। समाज है ही डायलेक्टिकल। इसमें तब तक सुधार नहीं लाया जा सकता जब तक विषम स्थिति समाप्त न हो, साम्य न उपस्थित हो जाए। मार्क्स के चिन्तन में कमी नहीं। तत्वतः व्यक्ति के प्रसार का नाम समाज है। व्यक्ति की समस्याएं प्रकारान्तर से समाज की समस्याएं हैं। समस्याओं की जड़ को उनने नाम दिया द्वन्द्व। जब तक इसकी समाप्ति नहीं हो जाती तब तक सुख शान्ति कुछ भी वह जो श्रेयस्कर है उपलब्ध नहीं हो सकता।

साम्यावस्था की प्राप्ति के लिए उनके लिए प्रेरणा स्रोत था ‘अर्थ’। आर्थिक बँटवारा बराबर हो जाय तो शायद साम्य आ सके। इस सोच ने आधी दुनिया में क्रान्ति मचा दी। पर यह प्रयोग असफल रहा। इसे असफल होना था ही। धनी आदमी कम अनिश्चय में नहीं रहते। निरन्तर एक गहरी जलन-किंकर्तव्य-विमूढ़ता उन्हें झुलसाती रहती है।

मान लें यह प्रयोग सफल हो भी जाता, धन का बराबर वितरण हो भी जाता तो भी परेशानी जाने वाली नहीं थी अधिक से अधिक रूप बदल जाते। कल अगर साम्यता आ जाए तो भी कोई सुन्दर होगा कोई असुन्दर होगा और किसी के सुन्दर होने पर उतनी ही ईर्ष्या जगेगी जितनी किसी के धनवान होने पर जगती है। एक आदमी बुद्धिमान होगा-एक बुद्धिहीन होगा। बदले हुए रूपों में समस्याएं बनी रहेंगी क्योंकि मन द्वन्द्वात्मक है। टकराहट जीवन की आंतरिक शक्तियों में है।

प्रख्यात तत्वेत्ता ए. एन. व्हाइटहेड ने अपने ग्रन्थ “एडवेन्चर आँव आइडियाज” में इन टकराहट के कारणों का खुलासा करते हुए कहा है कि हमारे जीवन का सामान्य व्यवहार दो परस्पर पूरक शक्तियों से नियंत्रित होता है। पहली जीवन में अन्तर्निहित इच्छा शक्ति है। दूसरी परिवर्तनकारी शक्ति जो इस जीवन को लक्ष्य प्रणाली प्रदान करने के लिए मन के किसी कोने में यदा-कदा उमंगती रहती है। इनमें से पहली शक्ति का संचालन सहज प्रेरित है। पशु पर्यन्त अब मानव जीवन की सुख-सुविधा, सहज ज्ञान सन्तुष्टि का कारण सहज और स्वचालित प्रेरणा के प्रति उसका पूर्ण आज्ञा पालन है। इसी एक को सब कुछ मान लेने की कोशिश ने अनेकों विचार उपजाए-विचारकों को प्रेरित किया। इन सभी विचारों में सामान्य दोष यह है कि इसकी पैठ मनुष्य के सच्चे स्वभाव तक नहीं हो पाती।

वास्तव में मनुष्य दोहरी प्रकृति का प्राणी है। एक तो पशु प्रवृत्ति है। जो अपनी सहज प्रवृत्तियों आवेगों, इच्छाओं, स्वचालित प्रेरणाओं के अनुसार जीवनयापन करती है। दूसरी एक अतिजागरुक, बौद्धिक, नैतिक, सौन्दर्यात्मक विवेक पूर्ण और गतिशील प्रकृति है। एक ऐसा चिन्तनशील मन है जो निम्न प्रकृति का परिशोधन चाहता है। एक ऐसा संकल्प है जो देवत्व को जीवन में उतारने के लिए हुलसता रहता है।

मनीषी क्षामस कुन के ग्रंथ “द इसेन्शियल टेन्शन” के अनुसार द्वन्द्व का कारण इन्हीं दोनों प्रकृतियों का टकराव है। इस टकराव के कारण अभी तक उच्चतर जीवन एक ऐसी वस्तु माना जाता रहा है, जो निम्न जीवन पर ऊपर से लादी जाती है। उसे एक अनाधिकारी हमलावर समझा जाता है, जो सदा हमारे सामान्य जीवन में हस्तक्षेप करता रहता है। जिसका काम डाँटना और आदेश करना है। ये दोनों तत्व एक सतत् और पारस्परिक झमेले में निवास करते हैं और सदा ही एक दूसरे के द्वारा व्याकुल, दुखित और प्रभावहीन किए जाते हैं। ये दोनों उस बेमेल पति-पत्नी के समान हैं जो सदा ही झगड़ते रहते हैं । मानव मन की समस्त व्याकुलता, असन्तुष्टि, श्रान्ति, उदासी और निराशा का स्रोत इंसान की उस व्यावहारिक, असफलता में है जो उसे अपनी दोहरी प्रकृति की पहेली हल करने पर मिलती है।

विनोबा ने इस संकेत करते हुए अपनी पुस्तक साम्य सत्र में एक सत्र का प्रतिपादन किया है “अभिधेयं परम साम्यम्” । उनके अनुसार सर्वोदय या जीवन में साम्यावस्था का उदय इस पहेली का सही हल खोजने पर ही हो सकेगा। पश्चिमी तत्ववेत्ता मेस्टर एकहार्ट ने इस तथ्य को अधिक स्पष्ट करते हुए कहा है कि यद्यपि सभी किसी न किसी अंतर्द्वंद्व से ग्रसित हैं, पर उनके प्रकार अलग हैं। उन्होंने मोटे तौर पर तीन विभाजन किए हैं। एक वे जो इच्छाओं में जीते हैं। दूसरे जो विचारों में जीते हैं। इन दोनों के बीच एक पतला विभाजन है-जो भाव में जीते हैं।

बहुतायत इच्छाओं में जीने वालों की है। समुद्र की भाँति मन में इन्हीं के ज्वार-भाटे उठते रहते हैं। उच्च प्रकृति और निम्न प्रकृति परस्पर विरोधी इच्छाओं को उछालती रहती हैं, इनसे उबरने का रास्ता है-इच्छाओं के प्रति जागरुक होना। इच्छाओं के ढेर में किसी सद्इच्छा को चुनकर उसे संकल्प में बदल डालना। निरन्तर दिवास्वप्नों को देखने से उत्तम है, संकल्पबद्ध हो क्रियाशील हुआ जाय। संकल्प के क्रियाशील होते ही मन साम्यावस्था की ओर गतिशील होता लगेगा। इच्छाओं के बादल तिरोहित होने लगेंगे।

जो लोग इच्छाओं की जगह विचारों में जीते हैं, उनके लिए इस प्रक्रिया का ज्यादा अर्थ नहीं है। इनके लिए विचारों के प्रति सजग हो जाओ-इतना ही मूल्यवान है, लेकिन ऐसों की संख्या कम है। कोई एक आइन्स्टीन होता है विचार में जीने वाला। ऐसे आदमी इच्छा भी करते हैं तो विचार के लिए। जबकि औसत व्यक्ति विचार भी करता है तो इच्छा के लिए।

सामान्य व्यक्ति की चाहत होगी मकान हो जाए तब विचार होगा कैसे हो? क्या धन्धा करूं कहाँ से धन बटोरूं? लेकिन आइन्स्टीन जैसे व्यक्ति उन्हें मकान की खबर ही नहीं। कहते हैं एक बार वे एक मित्र के यहाँ भोजन करने गए। भोजन समाप्ति के बाद गप-शप होने लगी। रात बढ़ती देखकर वे घड़ी देखकर सिर खुजलाने लगते। आखिर मित्र को कहना पड़ा क्या आज आप सोयेंगे नहीं? वे बोल पड़े यही तो मैं सोच रहा हूँ। मित्र बोले अरे यह घर तो मेरा है। उनने कहा “माफ करना मुझे यह याद नहीं रहा कि घर किसका है?” अब ऐसा व्यक्ति घर बनाने की इच्छा नहीं कर सकता। यदि कभी घर का ख्याल आएगा भी तो इसलिए कि प्रयोगशाला छोटी पड़ गई है विचारों का ठीक से समायोजन हो इसलिए। इनके लिए आवश्यक है विचारों के प्रति सचेत रहना।

एक अलग प्रकार है-भाव में जीने का। वे जो भावना में जीतें हैं न तो इच्छा में जीतें हैं न विचारों में। उनके लिए न किसी प्रयोगशाला का कोई अर्थ है, न किसी गणित की खोज करनी है, न कोई दर्शन शास्त्र की पहेली हल करनी है। न कोई बड़ा राज्य बनाना है, न कहीं बड़े मकान खड़े करने हैं।

भाव है पारदर्शी ठीक काँच की तरह। जबकि इच्छाएँ पत्थर की तरह अपारदर्शी हैं। इनके आर पार कुछ नहीं दिखाई देता। ऐसे व्यक्ति को अंतर्द्वंद्व से उबरने के लिए महात्मा बुद्ध ने एक प्रक्रिया सुझाई है-

भाव है पारदर्शी ठीक काँच की तरह। जबकि इच्छाएँ पत्थर की तरह अपारदर्शी हैं। इनके आर पार कुछ नहीं दिखाई देता। ऐसे व्यक्ति को अंतर्द्वंद्व से उबरने के लिए महात्मा बुद्ध ने एक प्रक्रिया सुझाई है-


Quotation

पाप पहले आकर्षक लगता है। फिर आसान हो जाता है। इसके बाद आनन्द का आभास देने लगता है तथा अनिवार्य प्रतीत होता है। क्रमशः वह हठी और ढीठ बन जाता है। अन्ततः सर्वनाश करके हटता है।


एक माला के मनके हम सब

साधारण अर्थों में एकता को अपनेपन का पर्याय माना जा सकता है। शरीर एक है इस एकता में हाथ, पैर, आँख, नाक, कान आदि विभिन्न अंग अवयव सम्मिलित हैं। पाचन संस्थान, रक्तवाही संस्थान, श्वसन संस्थान जैसे अनेक तंत्र हैं। शारीरिक चेतना इनमें से हर एक में एक सही समायी है। वह सभी को जीवन दे रही है। इनमें से प्रत्येक का दुःख-कष्ट उसकी अपने तकलीफ है। किसी के प्रति तनिक भी उपेक्षा का भाव नहीं है।

इतने पर भी हर अंग अपने आप में पूर्ण है। पैर, हाथ आदि बाहरी अंग हों अथवा श्वसन तंत्र, पाचन तंत्र जैसे भीतरी संस्थान, सभी अपने आप में सक्षम हैं। पैर के लिए हाथ की जरूरत नहीं । वह अपना काम हाथ की सहायता के बगैर कर लेगा। दृष्टि संकीर्ण हो तो किसी एक को देखने-सुनने, उसके बारे में पढ़ने-लिखने से उसे दूसरे से भिन्न समझा जा सकता है। किसी अंग विशेष में रहने वाले परजीवी ऐसा समझते हों तो कोई आश्चर्य नहीं। परन्तु इस दृष्टि की संकीर्णता से असलियत बदलने से तो रही, वास्तविकता यही है कि शरीर एक है, सभी अंक अवयवों की भलाई एक दूसरे के साथ अपनापन बनाए रखने में है। जहाँ कहीं जिस किसी अंग में परायापन अथवा अलगाव आया वहीं सड़न शुरू हो जाती है। सही कहा जाय तो अपनापन या एकता स्वभाव है-प्रकृति है। परायापन अथवा अलगाव विकृति है।

यह सत्य न केवल शरीर पर, वरन् समूचे संसार पर लागू होता है। इसके सभी सदस्य परिवार के हितों में अपना भला मानते हैं। परिवार न तो कोई वस्तु है न व्यक्ति। यह कुछ लोगों के बीच पनपे अपनेपन का दूसरा रूप है। धीरे-धीरे पता चलता है कि सिर्फ परिवार अपने आप में सक्षम नहीं है, तो यह दायरा गाँव शहर से बढ़ते हुए देश तक जा पहुँचता है। इस स्तर पर आकर पता चलता है कि एक देश दूसरे से बिल्कुल कट कर अपना अस्तित्व बनाये रखने में मुश्किल महसूस करता है, तो विश्व एकता की बात चलने लगती है। ‘वसुधा ही कुटुम्ब है, इस बात को सत्य स्वीकारा जाने लगता है।

बात न केवल मनुष्य जाति की है वरन् यही तथ्य प्रकृति के अन्य घटकों के सम्बन्ध में भी है। प्रत्यक्ष में तो बड़ा विचित्र लगता है कि चलने फिरने बोलने वाला मनुष्य पेड़-पौधों अथवा किन्हीं जड़ वस्तुओं से अपनापन स्थापित करे। एकता अथवा अपनापन अपने जैसी ही किन्हीं चीजों में होना चाहिए। जब बाहर से सभी चीजें अपने जैसी न नजर होती हों तो फिर अपनापन क्यों?

आधुनिक समय में एकता के इस तथ्य की ढूंढ़-खोज की गई है। खोजने के दो मार्ग रहे हैं एक मनोवैज्ञानिक दूसरा भौतिक-शास्त्रीय। दोनों के नतीजे आश्चर्यजनक रूप से एकता को वैज्ञानिक कसौटी पर खरा साबित करने वाले सिद्ध हुए हैं।

मनोविज्ञान ने एकता को “कलेक्टिव अनकाँशस” अर्थात् सामूहिक अचेतन के आधार पर साबित किया है। यद्यपि दर्शन के क्षेत्र में यह बात लाइबिनित्ज, काण्ट आदि ने भी कही थी, पर बाद में मूर्धन्य मनीषी सी जी कारस ने अपने प्रयोगों की कसौटी पर इसे खरा साबित किया। इसके अनुसार हमारा मन उतना ही नहीं है। जितना हमें समझ में आता है। मन की गहराइयों में हम एक दूसरे से जुड़े हैं। सपनों में कभी-कभी दूसरे के जीवन की घटनाएं देखना इस का प्रमाण है। इसी के आधार पर दुनिया के अलग-अलग भागों में रहने वाले लोग एक सी बातें सोच लेते हैं। एक दूसरे के मन में प्रवेश सम्भव, हो जाता है। एडवर्ड वान हर्टमान आदि

मनोवेत्ताओं ने इस एकता के क्षेत्र को असीम माना है। n श्रोडिंकर बेल आदि प्रख्यात भौतिक शास्त्रियों ने इसी एकता की खोज दूसरे ढंग से की है। उनके अनुसार संसार की हर चीज चाहे वह सजीव हो या निर्जीव बाहरी तौर पर अणु-परमाणुओं से बनी है। मनुष्य का शरीर इसका अपवाद नहीं है। इनके स्वरूप में दिखाई पड़ने वाला अन्तर सिर्फ आणविक संरचना भर का है। वैज्ञानिक ने परमाणु के लगभग बीस हिस्से किए हैं। इस क्रम में आगे एक ऐसी दशा आती है, जिसमें उन्होंने स्वीकारा कि सही माने में कणों का अस्तित्व न होकर वैद्युत चुम्बकीय तरंगें ही इनकी मूलसत्ता है। एक कदम और आगे बढ़ने पर पता चलता है कि ये तरंगें न होकर सिर्फ ऊर्जा के प्रचंड प्रवाह हैं, जो यहाँ-वहाँ सभी जगह एक से हैं। बिना किसी भेद-भाव के सभी में समाए हुए हैं।

प्रसिद्ध वैज्ञानिक फ्रिटजोफ काप्रा ने अपनी पुस्तक “ताओ ऑफ फिजिक्स” में इस एक से ऊर्जा-प्रवाह की बात की संगति गीतकार के कथन “मयि सर्वमिदं प्रोतं सूत्रे मिणगणाइव” से बिठायी है। वैज्ञानिक अनुसंधानों की बहुत गहराई में न जाया जाय तो भी एक बात तो साबित हो ही जाती है कि बाहर और भीतर सभी कुछ एक-सा है। हम सभी एक बड़ी माला के मनके भर हैं, ऐसे मनके जिनके सभी जगह फैली एक चेतना ऊर्जा ने पिरो रखा है।

मनके की शोभा माला के कारण है। इसी में उसकी गरिमा है। सम्भव है यह बात ठीक-ठीक न संकुचित संकीर्ण होना है। यह संकीर्णता कुछ अपने को पूरी तरह से स्वतन्त्र मान ले और उससे टूटने का प्रयास करे। पर यह प्रयास पेड़ से मिलने वाले जीवन प्रवाह को अवरुद्ध कर देता है। इसे एक मानने के कारण जीवन को जो हरा-भरापन फूल-फलों की जो सम्पदा मिली हुई थी, टूटने के प्रयास में इस सभी से वंचित होना पड़ता है।

हमारे अपने जीवन के व्यवहारिक धरातल में बिल्कुल यही सत्य लागू होता है। जरूरत इसे अनुभव करने और व्यवहार में लाने की है। जैसे-जैसे अपनेपन का दायरा बढ़ता जायेगा सुख और शान्ति बढ़ती जाएगी। इसको बढ़ाने के लिए जरूरी है कि इस दायरे को समेटा न जाय। पारिवारिक एकता हमें सुविधा प्रदान करती है, तो सामाजिक एकता सुरक्षा और शान्ति।

बढ़ता हुआ अपनापन,डर-भय, अशान्ति सभी का नामों-निशान मिटा देता है, क्योंकि इसका एक मात्र कारण है अलगाव और परायापन। सामान्यतया घर में हमारी अनुभूति अपनेपन की रहती है। यही कारण है कि इसके सदस्य के बीच स्वयं को कहीं अधिक सुरक्षित और शाँत महसूस किया जाता है। जैसे ही इस अनुभूति में कमी आती है, अलगाव की दरार पनपती है, तो भाई को भाई से डर लगने लगता है, बाप-बेटे से भय खाता है, अड़ोसी-पड़ोसी एवं गाँव शहर अपने लगते हैं।

इससे हमें सुविधा, सहायता सहानुभूति सभी कुछ मिलती है। एकता अथवा अपनेपन के बारे में मनोवैज्ञानिकों ने एक महत्वपूर्ण तथ्य और जोड़ा है। उनके अनुसार इसकी लगातार बढ़ती अनुभूति भाव सम्वेदनाओं को, विशाल,चिन्तन चेतना को व्यापक और प्रखर बनाती है। इसके प्रमाण देश-विदेश के विभिन्न महापुरुषों के जीवन में देखे जा सकते हैं। महान दार्शनिक जान डेविड थोरो को विभिन्न जंगली जानवरों के बीच अपनापन दिखाई देता था। इसी कारण उन्हें सर्वत्र निर्भयता थी। स्वामी रामतीर्थ समूचे भारत को अपना शरीर और संसार को अपना घर कहा करते थे। स्वामी विवेकानंद कहा करते थे कि जब मैं “मैं” का उच्चारण करता हूँ तो इसमें मुझे समूचे विश्व का बोध होता है। विभिन्न महापुरुषों के ये भाव और कुछ नहीं सिर्फ बढ़ी हुई एकता अथवा अपनेपन की व्यापकता थी। हमारे अपने जीवन में एकत्व की भावना विकसित हो सके, इसके लिए शुरुआत घर, परिवार से करनी होगी। परिवार के हित में अपना हित और उसके अनहित में अपना अनहित समझा जाय। आज कल टूटते परिवार की समस्या के मूल में इसी का अभाव है। किन्तु ध्यान रखा जाय कि यह सिर्फ पहला कदम है जिसकी पूर्णता दूसरे के बिना किसी कीमत पर नहीं। दूसरा कदम होगा कि समाज के हितों में परिवार का हित समझा जाय। एक के बिना दूसरा अधूरा है।

इसका व्यावहारिक नीति-निर्धारण अपनी स्वयं की स्थिति तथा स्थान परिवेश को ध्यान में रख कर किया जा सकता है। इस ओर बढ़ाए गए कदम, क्रियाकलापों एवं व्यावहारिक गतिविधियों के रूप में एक ही होगा-एकता अपनत्व को क्रमशः बढ़ाते चलना, उसकी व्यापकता की ओर गतिशील होना। इस ओर बढ़ते प्रगतिक्रम के अनुरूप धीरे-धीरे समाज के प्रति वही भाव आने लगेगा जो अभी अपने दुःख सुख लगने लगेंगे। वस्तुतः यही जीवन की प्रकृति है। अलगाव के अलावा और कुछ नहीं। इसे हर कीमत पर दूर किया जाना चाहिए। इसी में अपनी गरिमा है और गतिशील भी।


भविष्य कथन : एक मृतात्मा द्वारा

भविष्यवाणियों की चर्चा जब की जाती है तो प्रायः लोगों की उत्कण्ठा यह सुनने, समझने और जानने की होने लगती है कि वर्तमान परिस्थितियों में जटिल समस्याओं से घिरा मनुष्य का भावी भविष्य कैसा होगा? क्या इन दिनों की सर्वग्राही विभीषिकाएँ पृथ्वी को अगले दिनों जनहीन बना देंगी? यदि नहीं तो यह क्यों व किस प्रकार सुरक्षित, आबाद बनी रह पायेगी? इस प्रकार के अगणित प्रश्न मानवी मन में ज्वार भाटे की तरह प्रस्तुत समय में उगते-डूबते रहते हैं, जिनका समाधान समय-समय पर अपने-अपने क्षेत्र के मूर्धन्य कहे जाने वाले अर्थशास्त्री, पर्यावरणविद्, वैज्ञानिक, ज्योतिर्विद् एवं भविष्य द्रष्टा अपने-अपने प्रकार से करते आये हैं। इन सभी ने अपने निष्कर्षों के आधार पर एक ही बात कही है कि प्रस्तुत समय में दिखाई पड़ने वाला भयावह घटाटोप देखते-देखते अगले ही दिनों छँट जायेगा और एक ऐसे उज्ज्वल भविष्य की संरचना होते लोग अपनी आंखों से देख सकेंगे, जैसा न कभी पूर्व में घटित हुआ है और न भविष्य में लम्बे समय तक इसकी पुनरावृत्ति होने की संभावना है।

इसी शृंखला में अमेरिका (मियामी)के महान परामनोविज्ञानी आर्थर फोर्ड की एक कड़ी और जुड़ जाती है। उन्होंने भी ठीक इसी प्रकार की भविष्यवाणी आगामी समय के संबंध में की है। अन्तर सिर्फ इतना है कि उनने अपनी बात मरणोपरान्त किसी अन्य माध्यम के सहारे कही है, जब कि उपरोक्त सभी ने अपने जीवन काल में ही परिस्थितियों के अध्ययन और परोक्ष-दर्शन की सामर्थ्य के आधार पर प्रस्तुति की थी। अमेरिकी परामनोविज्ञानी और प्रख्यात लेखिका रुथ मोण्टगोमरी ने एक पुस्तक लिखी है-”ए वर्ल्ड बियोण्ड”। पुस्तक का अधिकाँश भाग ऑटोमेटिक राइटिंग द्वारा आर्थर फोर्ड ने लिखवाया है, जिसमें कुछ ऐसी भविष्यवाणियों का उल्लेख है, जिन्हें हम इन्हीं दिनों अक्षरशः घटित होते हुए देख रहे हैं। इनमें सबसे अधिक महत्वपूर्ण समझा जाने वाला भविष्यकथन रूस से संबंध रखता है। आर्थर फोर्ड अपनी मूक वाणी में इस संदर्भ में कहते हैं कि बीसवीं सदी का अंत आते-आते रूस बड़ी द्रुत गति ये एक स्वतंत्र और लोकताँत्रिक समाज की ओर अग्रसर होता चला जायेगा। वर्षों का मजबूत साम्यवादी गढ़ वहाँ देखते-देखते इस प्रकार ध्वस्त हो जायेगा, जिसके भग्नावशेष के भी दर्शन बाद में किसी को नहीं हो पायेंगे, वहाँ के वैज्ञानिकों और प्रकृतिविदों में ईश्वर-विश्वास की भावना इतनी प्रगाढ़ होती चली जायेगी कि एक समय का नास्तिक समझा जाने वाला देश आस्तिकों की श्रेणी में अग्रणी माना जाने लगेगा। समस्त समाजवादी देशों की यही गति होगी। वे शनैः-शनैः भोगवादी समाज से योगवादी समाज की ओर रूपांतरित होते चले जायेंगे। यूरोप में साम्यवाद का अन्त हो जायेगा और एक ऐसे अभिनव समाज की उसके स्थान पर स्थापना होगी, जो आने वाले लम्बे काल तक सहअस्तित्व, प्रेम सौहार्द एवं एकता-समता की भावना से ओत-प्रोत होगा। उक्त देशों में बढ़ती आस्तिकता के कारण वहाँ के लोगों के मन-मस्तिष्क भी पूर्वाग्रही मान्यताओं से मुक्त होते चले जायेंगे, फलतः उनका आध्यात्मिक अभ्युदय निरन्तर प्रगति पथ पर बढ़ता रहेगा। चीन भी इन परिवर्तनों से अछूता न रह सकेगा, पर इससे पूर्व रूस और चीन में वैमनस्य पैदा होगा, किन्तु विश्वव्यापी आध्यात्मिक लहर के आगे देर तक वह टिक न सकेगा और स्वल्प काल में ही धराशायी हो अपनी मौत मरेगा। पश्चिम जर्मनी को कुछ आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा, किन्तु फिर भी वह शक्तिशाली राष्ट्र की पंक्ति में यथावत बना रहेगा। दोनों जर्मनियों में निकटता और घनिष्ठता बढ़ती चली जायेगी और अन्ततः उनका परस्पर विलय हो जायेगा। जापान औद्योगिक क्षेत्र में सर्वोपरि सिद्ध होगा, किन्तु वह कोई ऐसा अस्त्र शस्त्र विकसित न करेगा, जिससे युद्ध जैसी संभावना बलवती हो। अरब-इज़राइल समस्या का समझौता-वार्ताओं द्वारा हल हो जायेगा। लम्बे काल के विवाद के बाद इस सदी के अन्त तक इजरायलियों में यह सोच विकसित होगा कि इज़राइल सदा सही है और दूसरे हमेशा गलत, यह ठीक नहीं। यही चिन्तन उसे शान्ति की ओर प्रवृत्त करेगा। प्रत्यक्ष में उक्त विवाद के कारण युद्ध जैसी संभावना कई बार बन पड़ेगी पर युद्ध होगा नहीं।

इस सदी के अन्त तक मौसम में विलक्षण परिवर्तन आयेगा। अक्षों में भारी खिसकाव के परिणाम स्वरूप मौसम में इतना अद्भुत बदलाव दृष्टिगोचर होगा कि विभिन्न स्थानों पर वनस्पतियों की पहचान कठिन हो जायेगी। इस आकस्मिक और विस्मयकारी परिवर्तन को अधिकांश लोग झेल नहीं पायेंगे और कालकवलित हो जायेंगे, फिर भी पृथ्वी पूर्णतः जनशून्य नहीं हो पायेगी, क्योंकि मौसम में आया यह महापरिवर्तन थोड़े ही समय में रुक जायेगा, जिससे जनहानि बन्द हो जायेगी। यह सब कुछ सन् 2000 के आते आते घटित हो जायेगा।

इसी मध्य महान भौगोलिक परिवर्तन भी परिलक्षित होंगे। समुद्र के गर्भ में समाये एटलांटिक महाद्वीप का पुनः उदय होगा, जबकि विश्व के कई महत्वपूर्ण शहर जलमग्न हो जायेंगे। कैलीफोर्निया, मैनहट्टन जैसे तटवर्ती अमेरिकी नगरों का अस्तित्व संकट में पड़ जायेगा, जबकि मैक्सिको समुद्र का तटवर्ती क्षेत्र बन कर रह जायेगा।

आज के घृणा-द्वेष, संकीर्णता-स्वार्थपरता, अशान्ति-अराजकता का अन्त इस शताब्दी के अवसान के साथ ही साथ हो जायेगा। इसके उपरान्त शाश्वत शान्ति का एकछत्र राज्य इस पृथ्वी पर लम्बे काल तक कायम रहेगा। यह शान्तियुग मानवी आचार-विचार की दृष्टि से इतना उदात्त होगा, जिसे पूर्व के सभी युगों से हर प्रकार से श्रेष्ठ व उत्कृष्ट कहा जा सके। इस शान्ति साम्राज्य के अवतरण के साथ ही हर तरह के युद्ध की परिसमाप्ति हो जायेगी। इस सर्वश्रेष्ठ अहिंसक राज्य की संस्थापना किसी एक व्यक्ति के कारण संभव न हो सकेगी, वरन् एक ऐसी शक्ति और अहिंसावादी जाति का अभ्युदय होगा, जो देखते-देखते समस्त विश्व में मत्स्यावतार की तरह फैल कर सम्पूर्ण तंत्रों को अपने नियंत्रण में इस प्रकार कर लेगी कि तत्कालीन लोग “जियो और जीने दो” की नीतिमत्ता अपना कर ही चैन से रह सकेंगे। तब न आज जैसी “जिसकी लाठी तिसकी भैंस” वाली उक्ति चरितार्थ होती देखी जा सकेगी, न मत्स्यन्याय वाला जंगली कानून ही देखने को मिलेगा। सबल-निर्बल दोनों साथ-साथ एक-दूसरे के पूरक बन कर जीवन बितायेंगे। ऊँच-नीच का वर्तमान जातिवाद विलुप्त हो जायेगा। सभी ‘मानवमात्र एक समान’ की सिद्धान्तनिष्ठ को मूर्तिमान करेंगे और परस्पर सद्भावपूर्वक रहेंगे, यह युगान्तरकारी परिवर्तन उन देवात्माओं के अवतरण से और अधिक गतिशील व अग्रगामी बन सकेगा, जिन्हें अशान्ति, अन्याय, अत्याचार एवं शोषण उत्पीड़न अप्रिय हैं। ऐसी सदात्माएँ शरीर धारण कर धर्म संस्थापन के भगवद् कार्य में सहयोग करने के लिए कृतसंकल्प हैं और इन्हीं दिनों अपने अवतरण की तैयारी में जुटी हुई हैं।

इसके अतिरिक्त और भी बहुत सारी भविष्यवाणियाँ आर्थर फोर्ड की मृतात्मा ने की, जो प्रासंगिक न होने के कारण उनका उल्लेख यहाँ नहीं किया जा रहा है। आर्थर फोर्ड का उपरोक्त भविष्यकथन भी उन्हीं अनेकानेक भविष्यद्रष्टाओं के आशावादी कथनों की पुष्टि करता है, जिनने वर्तमान विपन्न परिस्थितियों के बावजूद भी 21 वीं सदी को मानवी उज्ज्वल भविष्य के रूप में देखा और संशयग्रस्त दुखी अन्तःकरण में उत्साह का संचार किया है।


Quotation

काम अधूरे मत छोड़ो या तो हाथ मत डालो या पूरे करके रहो। थोड़ा करो पर पूरे मन से करो जो बहुत समेटता है पर उन्हें सँभाल नहीं पाता, वह पछताता और हँसी कराता है।


बुरा पाप होता है, पापी नहीं (Kahani)

विवेकानन्द जयपुर के पास एक छोटी रियासत में मेहमान थे। जिस दिन विदा हो रहे थे उस दिन वहाँ के जागीरदार ने उनके विदाई समारोह में नाच गाने का कार्यक्रम रखवा दिया। एक वेश्या भी बुलाई गई। विवेकानन्द को मालूम पड़ा तो वे बड़े हैरान और गुस्से में भर कर तम्बू में बैठे रहे। किन्तु समारोह में बुलाने पर भी नहीं गये। वेश्या को ज्ञात हुआ कि स्वामी जी नहीं पधारे तो वह बड़ी दुखी हुई और उसने भजन गाया।

“एक लोहा पूजा में राखत-एक घर बधिक परयो, पारस गुन अवगुन नहिं चितवत कंचन करत खरो।

प्रभू जी मेरे अवगुन चितनधरो।”

अब तो विवेकानन्द और सचेत हुए। सोचने लगे। यदि मुझे पारस समझा जा रहा है। तब निश्चय ही मुझे भेद अभेद किये बिना समारोह में जाना चाहिए और समारोह में गये। उन्होंने अपने संस्मरण में लिखा कि उस दिन मुझे लगा कि आज वास्तविक संन्यास का जन्म हुआ है। क्योंकि वेश्या को देखकर मेरे मन में कोई आकर्षण, विकर्षण नहीं था। मेरा करुणाभाव ही जाग्रत हुआ उसे देखकर। बुरा पाप होता है, पापी नहीं।


निष्ठ की विजय

“मैं जलसेना के महासेनापति की कठिनाई समझता हूँ।” एक वृद्ध हाथी दाँत के आसन पर शान्त बैठे थे। उनका शरीर दुर्बल था। झुर्रियाँ पड़ गई थी। सिर के बाल ही नहीं शरीर के रोएँ तक श्वेत हो चुके थे। लेकिन भुजाओं के पुट्ठे मजबूत थे और आँखों में एक अद्भुत चमक थी। अपने सफेद कपड़ों में महाशिल्पी सोमकेतु किसी ऋषि के समान लग रहे थे। उनका गोरा रंग इतना उजला था मानो कला और प्रतिभा की हृदयस्थ अधिष्ठात्री का प्रकाश बाहर फूट पड़ा हो। उनके भाल पर न चिन्ता थी और न व्यग्रता। स्थिर शान्त मुद्रा में सामने खड़े जल सेनापति को वे समझा रहे थे “लेकिन महासेनापति को मेरी विवशता अनुभव करना चाहिए। सच्चे कलाकार का एकमेव उद्देश्य है दूर-दूर तक फैले अधिकतम लोगों के मनों में दिव्य भावों को उमगाना। इसकी उपेक्षा में नहीं कर सकता। किसी भी भय के वशीभूत होकर तो कदापि नहीं।”

“यदि दो दिन मुझे और दिए जाते। मैंने युद्ध पोतों को आज्ञा दे दी है।” सेनापति के माथे पर पसीने की बूंदें छलछला आयीं। वे अपनी व्यग्रता और चिन्ता छिपा नहीं पा रहे थे। ‘भाई सुवीर मुझ से सहमत है।’ सेनापति ने पीछे की ओर देखा। उनसे कुछ कम अवस्था का तरुण सैनिक पीछे से समीप आ गया।

“महासेनापति ठीक कह रहे हैं और यदि वायु ने बाधा न दी तो हम दो दिन बाद चलकर भी ठीक समय पहुँच सकेंगे।” सुवीर ने एक साथ बात पूरी कर ली और तब महाशिल्पी के मुख की ओर इस प्रकार देखने लगा जैसे आदेश की प्रतीक्षा हो।

“शिल्पी-तनिक हँसे। एक क्षण में ही उनकी आंखों में गम्भीरता आ गई। उन्होंने कहा, “आप मुझे क्षमा करें। प्रश्न मुहूर्त का है, मैंने अपनी कला को प्रभु सेवा का माध्यम माना है। जाने का निश्चय करके सोमकेतु भय के कारण यात्रा में विलम्ब करे तो कायर होगा सुवीर !” शिल्पी ने सेनापति की ओर शान्त दृष्टि से देखते हुए सुवीर से आदेश के स्वर में कहा-”राजहंस प्रस्थान करेगा। अवरोधक उठाने का आदेश दें और भगवान पर विश्वास करें।”

“जय सोमनाथ।” सेनापति ने मस्तक झुकाया। मस्तक झुकाए ही वे पोत के प्रधान कक्ष से बाहर हुए। महाशिल्पी के उज्ज्वल पोत ‘राजहंस’ ने लंगर उठाए और वह समुद्र की लहरों पर धीरे-धीरे बढ़ने लगा।

स्तम्बतीर्थ (खम्भात) का बन्दरगाह एक छोटे से जन समूह से भरा हुआ था। तट के लोगों ने जहाज को उच्च जयनाद से विदा दी ‘जय सोमनाथ’ पोत पर से जयनाद गूँजा ‘जय महाकाल’।

उन दिनों स्तम्बतीर्थ जलीय व्यापार का केन्द्र था। ढाका का मलमल, उज्जयिनी की कला के पात्र, पाट के वस्त्र काष्ठ की कलापूर्ण पेटिकाएँ, स्वर्ण आभूषण आदि यहीं से पश्चिमी देशों को जाते थे और उधर से पारस की उज्ज्वल मोती मूँगे आदि यहाँ उतरते। यहाँ का बन्दरगाह हमेशा जलयानों से भरा रहता।

उज्जयिनी का वैभव समाप्त हो गया था। शिल्पी सोमकेतु अपनी जन्म भूमि से यहाँ आ बसे थे और सौराष्ट्र ने उस महान कलाकार का हृदय से सत्कार किया था। यह सत्कार कला के प्रति एक निष्ठ साधक का सम्मान था। उन्हें कभी किसी क्षण में अपनी इस महान साधना से विरत नहीं देखा गया। आज वे ही मोहमयी (आज की बम्बई) के सम्मुख किसी सागरस्थ उपत्यिका तक जा रहे थे।

“क्यों सुवीर?” यान के कक्ष में सहसा यान के अध्यक्ष को आतुरता पूर्वक आते देख शिल्पी उठ खड़े हुए।

‘श्रीमान क्या कुछ क्षणों के लिए बाहर पधारेंगे? अध्यक्ष के स्वर में व्यग्रता थी। शिल्पी अध्यक्ष के सुपुष्ट कन्धे पर हाथ रख डेक पर पहुँच गए।

‘लगभग बीस नौकाएँ तेजी से पोत को चारों ओर से घेर रही थीं।’ शिल्पी ने गहरी श्वाँस ली। इतनी देर में नावें और नजदीक आ गई।

“ओह सोमकेतु। खुदा की मेहरबानी। हम लोग तुम्हें कोई तकलीफ नहीं देंगे।” दस्युओं का क्रूर सरदार महाशिल्पी के सम्मुख दैत्य के समान लगता था। उसके लाल रंग के केश ऐसे लगते थे, जैसे वह सचमुच खून पीने वाले पिशाच के हृदय को व्यक्त करते हों। अधिकाँश डाकू ऊपर आ गए थे। पोत के समस्त नाविक बन्दी हो गए। दस्यु सरदार बड़ा प्रसन्न था। शिल्पी सोमकेतु की ख्याति वह सुन चुका था।” तुम हमारे बादशाह के लिए हरम खास बना सकोगे उसके बाद बादशाह तुम्हें आजाद कर देंगे। हरम ऐसा बनाना, बस।” दस्यु सरगना की अश्लील हरकत पर शिल्पी को इस कठिन परिस्थिति में भी हँसी आ गई।

मैं कलाकार हूँ, विलासिता, अश्लीलता और कुत्सा भड़काने के लिए कला का उपयोग करना पड़े इससे मृत्यु का वरण कहीं अधिक श्रेष्ठ है।

“सोच लो सोमकेतु दस्यु सरदार की आंखों में क्रूरता और कुटिलता एक साथ चमक उठी। हम तुम्हें इज्जत देंगे। तुम्हें दौलत देंगे और तुम अपने मुल्क को लौटने के लिए आजाद कर दिये जाओगे। एक तरफ मौत है दूसरी ओर वह सब कुछ बल्कि उससे कहीं अधिक जो इंसान इस जिन्दगी में पाने की चाहत रखता है।”

“मैं बालक नहीं हूँ।” शिल्पी हँसा।

“तब इन काफिरों के साथ तुम भी जहन्नुम में जाओ।” क्रोध से होंठ काटता हुआ वह लौट पड़ा। द्वारा बन्द हो गया।

डाकुओं ने देख लिया था कि हवा की तेजी बढ़ती जा रही है। सागर अपनी उत्तम लहरों से प्रलयंकर स्वरूप धारण करता जा रहा है। छोटी नावों के देर तक रुकने का मतलब था जल समाधि लेना। एक-एक क्षण कीमती था। दस्यु सरकार को अपनी भूल पर पश्चाताप था, जो शिल्पी को सबके साथ बन्दी करके उसने की। अब इतना अवसर नहीं था कि बलात् शिल्पी को लाया जा सके। पोत की तली में से एक काष्ठ हटा कर उनने अपनी नावें दौड़ा दीं। सारा सामान तो वे पहले ही लूट चुके थे।

“सुवीर बाहर कोई गति नहीं जान पड़ती।” शिल्पी ने कहा “क्या द्वार टूट सकेगा?” अविलम्ब कक्षद्वार पर प्रहार होने लगे। वह टूट गया। सबने बाहर देखा-दस्यु नौकाओं का पता नहीं है। समुद्र में तूफान है। सुवीर ने जल्दी से जहाज का निरीक्षण किया। तल में काफी जल आ चुका था। इतने पर भी संतोष की बात थी कि जल अब बढ़ नहीं रहा था। जल निकालने की अपेक्षा इस अंधड़ में जहाज ले चलना ज्यादा ठीक था। नाविकों ने पतवार सम्भाल ली।

“महाशिल्पी को साधारणतया कल आ जाना चाहिए। उन्होंने मेरा अनुरोध स्वीकार कर लिया था और अब तक स्वीकार करके अनुपस्थित होने का प्रमाद उन्हें स्पर्श नहीं कर सका है।” इधर मोहमयी राज्य के अधिपति का मन अनेक आशंकाओं से आकुल था।

“नियति के अज्ञात हाथों का खेल कौन समझ सकता है।” आचार्य जैसे स्वयं से कह रहे हों। वास्तु पूजन, नवग्रह पूजन हो चुका था कभी का। कर्मान्त तक के लिए स्थापित दीपक निष्कम्प था। यज्ञकुण्ड में हव्यवाह ऊर्ध्वमुख प्रज्वलित होकर आहुतियाँ स्वीकार कर रहे थे। ऐसी दशा में यह महाविघ्न क्यों उपस्थित हो रहा है, यह समझ पाना आचार्य के लिए अतिकठिन था।

“मुहूर्त तो महाशिल्पी के हाथों से ही होगा।” महाराज ने अपना निश्चय प्रकट किया। आप यज्ञ को पूर्ण कर लें। यदि पूर्णाहुति तक भी वे न पधारें तो हम सागर में अवमृत स्नान कर लेंगे। मंत्रोच्चारण हो रहा था। आहुतियाँ पड़ रही थीं, सुगन्धित धुँआ अनंत कुण्डलियाँ भी बना रहा था। शंख और घण्टे भी बजते थे। लेकिन इतने पर भी लग रहा था जैसे वह स्थान जनहीन हो। निस्पन्द उदासीनता सबको घेरे थी।

‘आप पूर्णाहुति दें, समय हो गया’। आचार्य ने महाराज

के हाथों में घी से भरा नारियल दिया और स्वयं होता ने कुण्ड में घी की धारा छोड़नी प्रारम्भ की। नारियल की आहुति देकर सबने भूमि पर माथा टेका।

“जय महाकाल!” एक क्षीण कण्ठ ध्वनि के साथ कुछ पुष्ट पर थकी ध्वनियों ने प्रतिध्वनि सी की। जैसे साक्षात् यज्ञ पुरुष कह रहे हों ‘परं ब्रूहि’ महाराज में नवीन प्राण आ गए। समुद्र के खारे जल से सिर से पैर तक भीगे शिल्पी यज्ञ देव को प्रणाम कर रहे थे। उनके पीछे वैसे ही अन्य भीगे व्यक्ति थे। झपट कर महाराज ने शिल्पी को उठाकर गले से लगा लिया। यज्ञ परिषद में जैसे जीवन का संचार हो गया हो

‘सुवीर कहते हैं कि दस्यु पोत से एक काष्ठ हटा गए थे, जल के साथ कोई बहुत बड़ी मछली जहाज तल में प्रविष्ट हो गई और उसके शरीर से छिद्र अवरुद्ध हो गया। जब पोत उथले तट में प्रविष्ट हुआ तो मीनराज को जल का घनत्व कम अनुभव हुआ और वे बाहर निकल गए। हमारा पोत डूब गया।’ महाशिल्पी ने मार्ग

की सारी कहानी धीरे-धीरे कह सुनाई और वहाँ से हम

सभी तैर कर तट तक आ गए। सभी के मस्तक कलाकार की निष्ठ के सामने झुक गए। महाशिल्पी कह रहे थे “लोभ और भय के सामने अडिग रहते हुए यदि कोई अपनी साधना को निरालस्य अप्रमत्त भाव से करता रहे तो प्राकृतिक शक्तियों को भी विवश होकर उसकी मदद करनी पड़ती है। सभी विघ्नों के बावजूद अन्तिम परिणाम है, निष्ठ की विजय।”

आज उस कलापूर्ण मन्दिर को लोग एलिफैन्टा कहते हैं। सम्पूर्ण पर्वत को काटकर मूर्तियाँ, स्तम्भ, तोरण द्वार प्रकोष्ठ, प्रांगण सब एक ही पर्वत में बने हैं। महाशिल्पी की निष्ठ काल के ऊपर भी विजयिनी होकर आसीन है। उस अपार जल राशि में स्थित उपत्यिका के तटों पर विशाल तरंगों से ताल देते वरुण देव निरन्तर उद्घोष किया करते हैं। परिवर्तनों और नश्वरता से भरे संसार से घिरी रहने पर भी निष्ठ शाश्वत है और अपरिवर्तनीय। यह स्वयं में साधन है और सिद्धि भी।


उपासना सफल और सार्थक कैसे बने?

मंत्र उपासना के पीछे एक बहुत बड़ा मनोविज्ञान काम करता है। आज लोग उस विज्ञान को न समझ पाने के कारण ही उसकी उपेक्षा करते हैं अथवा सतही व्यक्ति की तरह उपासना पद्धति बदलने या एक मंत्र छोड़कर दूसरे को अपना लेने में विश्वास रखते हैं। जिन लोगों में इस प्रकार की प्रवृत्ति पायी जाती है, उनके संबंध में इतना ही कहना पर्याप्त है कि सिद्धान्तों को न समझ पाने की स्थिति में औंधे-सीधे कर्मकाँडों की विडम्बना रच कर फल की आशा करना दुराशा मात्र ही है ऐसे ही लोग सर्वथा खाली हाथ रहते और मंत्रों को मिथ्या-झूठा कह कर इन्हें भोले-भावुकों के मन का भ्रम बताने का प्रपंच करते हैं।

जिन्हें मनोविज्ञान का तनिक भी ज्ञान है, वे जानते हैं कि मन का शरीर पर प्रभाव पड़े बिना नहीं रहता। मन जिस प्रकार के भावों और विचारों में संलग्न रहता है, शरीर पर वैसे ही परिणाम थोड़े ही दिनों में परिलक्षित होने लगते हैं, आरोग्य शास्त्र के मनःकायिक रोग इसी सिद्धान्त पर आधारित हैं। सर्वविदित तथ्य यह भी है कि इन्द्रियों में ‘मन’ सर्वाधिक चलायमान है। वह कभी स्थिर नहीं रहता। अभी यहाँ तो दूसरे ही पल वहाँ हिरनों जैसी कुलांचे भरता रहता है। इसीलिए उसे ग्यारहवीं इन्द्रिय का नाम दिया गया है। उसकी गति को रोक पाना संभव नहीं। जिस प्रकार साइकिल सवार अपनी साइकिल को किसी एक स्थान पर बिल्कुल रोके रह कर गतिहीनता की स्थिति नहीं प्राप्त कर सकता, उसी प्रकार मन को पूर्णतः गतिशून्य नहीं बनाया जा सकता, किन्तु साइकिल को दूसरी दिशा में मोड़ कर उसकी गति को बनाये रखा जा सकता है, वैसे ही मन की दिशा मोड़ देना सर्वथा असंभव नहीं है। उपासना उपक्रमों द्वारा इसी कार्य की लक्ष्य-सिद्धि की जाती है। उसे अनावश्यक और अनुपयोगी धींगामुश्ती से हटा कर किसी उपयोगी कार्य में व्यस्त कर दिया जाता है। इस क्रिया को किसी मंत्र का अवलम्बन ले कर उपासना के माध्यम से सम्पन्न किया जाता है। इससे साधक का शरीर-मन न सिर्फ भावना के अनुरूप बनने ढलने लगता है, वरन् उसकी आत्मिक उन्नति भी सहज संभव हो जाती है। इसी बात का समर्थन करते हुए प्राकृतिक चिकित्सा के प्रसिद्ध विद्वान डॉ. हेनरी लिंडलहर अपनी पुस्तक “प्रैक्टिस ऑफ नेचुरल थेराप्यूटिक्स” में लिखते हैं कि मनोभावों में इतनी सामर्थ्य है कि उनके द्वारा कोई रोगी स्वयं को पूर्ण स्वस्थ बना सकता है, एवं कोई स्वस्थ व्यक्ति विकृत विचार आरोपण व निषेधात्मक चिन्तन द्वारा अपने को अशक्त असमर्थ तथा रुग्ण बना लेता है। वे कहते हैं कि यह सब चिन्तन व दृष्टिकोण के भले-बुरे प्रभाव की क्षमता है। इसी संदर्भ में वे आगे लिखते हैं कि संभवतः इसी कारण से भारतीय संस्कृति में प्रतीकोपासना पद्धति का विधान बनाया गया है और उसके माध्यम से श्रेष्ठ व उत्कृष्ट चिन्तन द्वारा न सिर्फ शारीरिक-मानसिक बीमारियों से मुक्ति पायी जाती है, वरन् उस काल में साधक की भावना इष्टदेव में समाये गुणों के अनुरूप उच्चस्तरीय होने के कारण उसमें कालान्तर में वैसे ही लक्षण उभरने और मूर्तिमान होने लगते हैं।

इस बात को न सिर्फ आधुनिक मनोविज्ञान स्वीकारता है, अपितु हमारे धार्मिक और आर्षग्रन्थों में भी यत्र-यत्र इसकी पुष्टि की गई है कि भावनाओं का प्रभाव सुनिश्चित है। इस संबंध में गीताकार का कथन है-

श्रद्धामयोऽयं पुरुषों या यच्छ्रद्ध स एव एः (17/3) अर्थात् जो जैसे श्रद्धा करता है, वैसा ही बनता चला जाता है। अन्यत्र उल्लेख मिलता है-

‘यादृशी भावना यस्य सिद्धिर्भवति तादृशी’ अर्थात् जैसी जिसकी भावना होती है, वैसी ही सिद्धि होती है।

रामायण की उक्ति है

‘जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन्ह तैसी’

भावनाओं के अनुरूप अनुभूति होने के अनेकानेक उदाहरण भी देखे जाते हैं। थूलेस ने अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ “साइकोलॉजी ऑफ रिलीजन” में इस संदर्भ में एक महत्वपूर्ण व रोचक उदाहरण प्रस्तुत किया है। वे लिखते हैं कि सेण्ट कैथेराइन एक विशेष अवसर पर, जबकि प्रभु ईशु को क्रास पर कीलों से जकड़ा गया था, बिल्कुल उसी प्रकार की पीड़ा की अनुभूति करती थी, जिस प्रकार शरीर में कील ठोकने से होती है। इस अवधि में उनकी देख-भाल के लिए सदा एक चिकित्सक उपस्थित रहता था। उसका कहना था कि कैथेराइन की पीड़ा बिल्कुल वास्तविक थी। उसमें बनावटीपन लेश मात्र भी नहीं था। मीरा जब कृष्णा प्रेम में डूब जाती थी, तो वह इष्ट रूप ही बन जाती थी और सर्वत्र श्रीकृष्ण नजर आने लगते थे। रामकृष्ण परमहंस के बारे में कहा जाता है कि दक्षिणेश्वर में गंगा में नाव पर सवार नाविकों में आपस में जब लड़ाई हो गई और एक ने दूसरे के गाल पर जोर का थप्पड़ मारा तो उसकी अनुभूति न सिर्फ उस नाविक तक सीमित रही, वरन् रामकृष्ण ने भी उस पीड़ा को अनुभव किया और एकबारगी तिलमिला उठे। इतना ही नहीं, गाल पर थप्पड़ के स्पष्ट निशान उभर आये।

यह सब भावना के अनुरूप अनुभूति के उद्धरण हैं। इसमें मन की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। वह जैसा चिन्तन करता है, शरीर को वैसा आभास होने लगता है। यह एक मनोवैज्ञानिक सच्चाई है। इसी कारण से आज के तथाकथित सुखी-सम्पन्न लोग ऊपरी तौर पर सुविधा-साधनों से युक्त और सुखी जान पड़ने पर भी वास्तव में उनका आन्तरिक जीवन अत्यन्त क्लेशमय होता है। दिन का चैन और रात की नींद एकदम गायब होती है। इसका एकमात्र कारण मन का असंतोष व भटकाव है। यदि बात ऐसी नहीं होती तो नितान्त साधनहीन स्थिति में पहाड़-पर्वतों कन्दराओं-गुफाओं जैसे निर्जन स्थलों में रहने वाले योगी-यती ही सबसे अधिक दुःखी दिखाई पड़ते, पर व्यावहारिक जीवन में ऐसा होता कहाँ दीखता है? यह इस बात का प्रमाण है कि मन ही वह तत्व है, जो हमें सम्पन्नता में भी विपन्न और साधनहीनता में सम्पन्न होने का एहसास करता है। यदि उसकी अनगढ़ता को सुगढ़ बना लिया जाय, तो कोई कारण नहीं कि हम सर्वथा साधनहीन स्थिति में बने रह कर भी सुख की प्रतीति न कर सकें। इसी मत का समर्थन करते हुए बरट्रैण्ड रसेल अपनी कृति “काँक्वेस्ट ऑफ हैपीनेस” में लिखते हैं कि अड़ियल घोड़े की तरह मन को यदि साधा और सुधार लिया जाय, तो हर व्यक्ति सुखी बन सकता है, पर दुर्भाग्य यह है कि वर्तमान सभ्यता और संस्कृति ने उसे अनगढ़ ही बनाया है, फलस्वरूप साधन-सुविधाओं की भरमार के बावजूद आज सर्वत्र दुःख-दर्द ही दिखाई पड़ते हैं और मनुष्य इनकी विकल वेदना से तड़फड़ाता नजर आता है। इसी बात की डॉ. राधाकमल मुकर्जी ने अपनी रचना “सिकनेस ऑफ सिविलाइजेशन” में और विस्तारपूर्वक व्याख्या की है। वे लिखते हैं कि वर्तमान बुद्धिवाद ने जहाँ मनुष्य को चतुर-चालाक बनाया, भौतिक सम्पन्नता से ओत-प्रोत किया है, वहीं उसे आध्यात्मिक दृष्टि से खोखला एवं आन्तरिक रूप से बौना बना दिया है। इसी का परिणाम आज अशान्ति और असंतोष के रूप में चहुं-ओर दृष्टिगोचर हो रहा है। उनका कथन है कि मूर्धन्य मनोविज्ञानी फ्रायड ने मनुष्य को इस दुर्गति से उबरने का कोई उपाय-उपचार तो सुझाया नहीं, उल्टे उसे विकसित सभ्यता की परिणति और मनुष्य की नियति बता कर संतोष कर लिया। वे लिखते हैं कि निश्चय ही समाज की वर्तमान दुरवस्था भौतिकवाद की देन है, पर साथ ही फ्रायड की निराशावादी मान्यता का खंडन करते हुए कहते हैं कि ऐसा हो ही नहीं सकता कि प्रस्तुत विपत्ति से उबरने का कोई मार्ग ही न हो। वे स्वयं सगुण ब्रह्म के अच्छे उपासक रहे हैं। इस नाते उपासना-साधना को वर्तमान दलदल से सुरक्षित बच निकलने का सर्वोत्तम और सर्वोपरि हल बताते हैं। उनके अनुसार हर व्यक्ति में वह तत्व विद्यमान है, जिसे यदि प्रयासपूर्वक उभारा जा सके, तो न सिर्फ कर्ता आनन्द की गंगोत्री में अहर्निशि निमज्जन करता रह सकेगा, वरन् संपर्क में आने वाले अन्य अनेकों को इससे लाभान्वित कर सकेगा।

वैसे तो मनोविज्ञान मन से संबंधित विज्ञान होने के नाते सुख की खोज कहाँ और कैसे की जाय, इसका अनुसंधान करने की इसमें पूरी-पूरी गुंजाइश है, पर अब तक ऐसे कम ही मनोवैज्ञानिक हुए हैं, जिनने इस विषय पर गंभीरतापूर्वक विचार किया और कुछ सारगर्भित तथ्य दिया हो। इन्हीं में एक हैं-विलियम जेम्स। इनने आनन्द की प्राप्ति व्यक्तिगत जीवन में कैसे की जाय, इस संबंध में एक मौलिक बात कही है, जो निश्चय ही विचारणीय है। अपनी बात को सूत्र के माध्यम से उन्होंने निम्न रूप में अभिव्यक्त किया है-

आनन्द = लाभ / तृष्णा

उपरोक्त सूत्र के अनुसार यदि किसी व्यक्ति का किसी क्षेत्र में लाभ अधिक हो और आशा (तृष्णा) कम हो, तो उसे आनन्द की अधिक अनुभूति होगी। इसी प्रकार उसकी तृष्णा अधिक और लाभ कम हो तो आनन्द भी कम मिलेगा। हम सुख की वृद्धि आशा को घटा कर अथवा लाभ को बढ़ा कर कर सकते हैं। यदि लाभ को इतना कम किया जा सके कि उसका मान शून्य जितना हो जाय, तो हमारी सुखानुभूति शून्य हो जायेगी, किन्तु यदि लाभ को यथावत् रखते हुए तृष्णा को शून्य कर दिया जाय, तो हमारा आनन्द अक्षुण्ण - अपरिमित ब्रह्मानन्द बन जायेगा। यद्यपि विलियम जेम्स महोदय स्वयं उपरोक्त निष्कर्ष पर नहीं पहुँच सके, किन्तु उनके द्वारा बताये गये मनोवैज्ञानिक सूत्र में गणित विज्ञान का पुट देते हुए हम इस निर्णय पर आसानी से पहुँच सकते हैं कि तृष्णा को घटा मिटा कर ही असंतोष का आत्यन्तिक हल ‘आनन्द’ प्राप्त किया जा सकता है। इस संबंध में गीता का भी यही कथन है-”संतुष्टो येन केनचित्” अर्थात् जो कुछ मिल जाय, उसी में संतोष कर लेने से ही अक्षय सुख की प्राप्ति संभव है।

यहाँ प्रश्न यह उठ खड़ा होता है कि तृष्णा को शून्य में कैसे परिवर्तित किया जाय अथवा स्वल्प में संतुष्टि कैसे मिले? उत्तर एक ही दिया जा सकता है-अभ्यास। इसके द्वारा तृष्णा की शून्यता प्राप्त करना संभव है। उपासना-विज्ञान के पीछे यही रहस्य छिपा है। इसके माध्यम से मन को किसी एक मंत्र के पीछे लगा कर उसे साधने और शोधने का प्रयास किया जाता है। सवाल पुनः प्रश्नचिह्न बन कर सामने आता है कि क्या ऐसा संभव है? जवाब सर्वथा “हाँ” में दिया जा सकता है। गीता भी यही कहती है-

“अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृहयते।”

शंका एकबार पुनः सिर उठाती और पूछती है कि अभ्यास के उपरोक्त आध्यात्मिक सत्य का कोई मनोवैज्ञानिक आधार भी है? इस संबंध में यही कहा जा सकता है कि जब शेर जैसे हिंस्र और जंगली जन्तु को अभ्यास द्वारा अहिंसक व हाथी को पालतू बनाया जा सकता है, तो कोई कारण नहीं कि सुख-दुःख के कारणभूत चंचल मन को अभ्यास द्वारा नियमित-नियंत्रित नहीं किया जा सके। देखा जा सके। देखा गया है कि वर्षों से पिंजड़े में बन्द पक्षी का दरवाजा खोज देने पर भी वह उसी में रहना पसंद करता है, उससे भागता नहीं। वह कैद में ही आनन्द अनुभव करने लगता है? जंगल में रहने वाले आदिवासी-वनवासियों को कभी यह भय नहीं सताता कि उन पर किसी हिंसक जन्तु का आक्रमण होने वाला है। मौत के बीच जीने वाले वायुयान चालकों व जीवित ज्वालामुखियों के आस-पास रहने वाले लोगों में भी ऐसी ही निर्भयता दिखाई पड़ती है। वे कभी इस बात की कोई चिन्ता नहीं करते कि उनका जीवन कब समाप्त हो जायेगा, यह सब अभ्यास से सीखा जाता है।

योगीजन कठिन अभ्यास द्वारा अपने मन को ऐसा बना लेते हैं कि निन्दा-स्तुति, भाव-अभाव में सदा समस्वर बने रहते हैं। उन पर इनका कोई प्रभाव नहीं पड़ता । अभ्यास द्वारा वे अपने कुसंस्कारी मन को सुसंस्कारी बना लेते हैं, तभी तो सिद्धावस्था को प्राप्त होते हैं। स्वामी रामतीर्थ के बारे में कहा जाता है कि उन्हें सेब बहुत पसंद थे। जब भी वे मन को ध्यान में लगाने की चेष्टा करते, तो ध्यान में भी उन्हें सेब ही दिखाई पड़ते । वे बहुत दुःखी थे। अचानक उन्हें एक युक्ति सूझी। एक दिन वे ढेर सारे सेब बाजार से खरीद लाये और ध्यान वाले कमरे में सामने रख दिया। वे ध्यान करने लगे। उनका मन बार-बार सेब की ओर आकृष्ट हो जाता। वे बार-बार उसे प्रयासपूर्वक खींच कर अपने इष्टदेव में लगाते। इस प्रकार सात दिन तक यह संघर्ष चलता रहा। जब सेब सड़ गये, तो उन्होंने फेंक दिया। पुनः कुछ सेब खरीद लाये और इसी प्रकार का अभ्यास करने लगे। अन्त में सेब के सड़ने पर उन्हें फेंक देते। इस प्रकार कई मास के प्रयास के बाद उनका मन शान्त हो गया। फिर कभी ध्यान में मन सेब की ओर नहीं गया। रामकृष्ण परमहंस ऐश्वर्य-लिप्सा को मन से मिटाने के लिए एक हाथ में पैसा और एक हाथ में मिट्टी लेकर “टाटा माटी” “माटी टाका” का समय-समय पर अभ्यास करते और फिर दोनों को फेंक देते। यूनान में एक प्रसिद्ध सन्त हुए है-डायोजिनीज। एक बार एक युवक ने उन्हें पत्थर की प्रतिमा के आगे भीख माँगते देखा। युवक को आश्चर्य हुआ, सोचा कितना मूर्ख है? कहीं पत्थर की मूर्ति भी भिक्षा दे सकती है! उसने सन्त को सम्बोधित किया और कहा “राहगीर देखेंगे तो समझेंगे कि सन्त पागल हो गया। आखिर यह क्या कौतुक कर रहे हैं आप? डायोजिनीज ने तनिक मुसकराते हुए उत्तर दिया-”मैं इस पाषाण-खण्ड से भीख माँग कर किसी के भीख न देने पर सर्वथा शांतचित्त, निर्विकार और निर्विकल्प रहने का अभ्यास कर रहा हूँ।

मंत्र उपासना के पीछे भी प्रयासपूर्वक उच्छृंखल मन को वशवर्ती बनाने का यही मनोविज्ञान निहित है। जो भलीभाँति इस विज्ञान को समझ कर निष्ठ और तन्मयतापूर्वक इसमें संलग्न रहते हैं, वे चतुर किसान की तरह बीज बोने और फसल पकने का उत्सुकतापूर्वक इन्तजार करते और धन-धान्यों से अपने कोठार भरते हैं, किन्तु जो उतावली मचाते और फल की आशा हथेली में सरसों जमाने की तरह तुरंत करने लगते हैं, वे इसके पीछे की प्रक्रिया और सिद्धान्त से नितान्त अनभिज्ञ होते हैं। ऐसे ही लोग उस व्यक्ति की तरह बिल्कुल छूँछ रह जाते हैं, जो छोटे-छोटे गड्ढे खोद कर पानी न निकलने पर बार-बार कुआं का स्थान परिवर्तित करने की अधीरता और नादानी बरतता है।


विज्ञान आत्म जगत की शोध करे

भूकम्प आने, ज्वालामुखी फटने जैसे प्राकृतिक आपदाओं के पूर्व-जीव-जन्तुओं के व्यवहार में विलक्षण परिवर्तन आते दिखाई पड़ते हैं-यह सर्वविदित तथ्य है, किन्तु इन विचित्र परिवर्तनों के आधार पर जीवशास्त्री अब यह पता लगाने की कोशिश कर रहे हैं कि जन्तु का कौन-सा व्यवहार किस विपत्ति का सूचक है।

गत दिनों सोवियत रूस के मास्को विश्वविद्यालय के शोधकर्मियों ने कई वर्षों के अथक परिश्रम के उपरान्त एक शोध-पत्र प्रकाशित किया है, जिसमें इसी आशय के निष्कर्ष हैं कि कौन सा पक्षी किस प्रकार का बरताव करें, तो प्राकृतिक विपदा के संदर्भ में उसका क्या अर्थ निकलता है। उनके अनुसार मरुस्थल में यात्रा करने वाले ऊँट यदि चलते-चलते अकस्मात बिना कारण के रुक जायँ, तो यह समझा जाना चाहिए कि तूफान कुछ ही समय में आने वाला है। बतखों में जब चरबी चढ़ने और मोटापा बढ़ने लगे, तो यह इस बात का संकेत हो सकता है कि आने वाली वसन्त ऋतु अधिक ठंडी और लम्बी अवधि की होगी। यदि नभचर अपने घोंसले धूप वाले स्थान में बनाने लगें। तो यह इस ओर इंगित करता है कि गरमी का मौसम ठंडक लिए हुए होगा। मधुमक्खियों के छत्ते बन्द हो तो ये इस बात को सूचित करते हैं कि जाड़े में शीत अधिक पड़ेगी। उनका खुला रहना सामान्य तापमान की सूचना देता है। शोधरत वैज्ञानिकों ने मकड़ियों के व्यवहार-परिवर्तन पर भी अध्ययन किया है। इसके आधार पर वे कहते हैं कि यदि उनके जाले पौधों में सिमटे-सिकुड़े दीख पड़ें तो यह समझ लेना चाहिए कि जाड़े का मौसम अधिक ठंडा नहीं होगा।

इस प्रकार के सैंकड़ों जीव-जन्तुओं पर उन्होंने अध्ययन किये हैं-यथा कौवे की भिन्न-भिन्न समय में भिन्न प्रकार की आवाजें, किसी एक स्थान पर चील-गिद्धों का इकट्ठा होना, शृंगालों का “हुआ-हुआ” करना, कुत्तों और बिल्लियों का रोना, हिरनों का अचानक भागना, शेरों का दहाड़ना आदि-आदि। इनके पृथक्-पृथक् निष्कर्ष भी उन्होंने निकाले हैं। प्राचीन भारत में इस संबंध में अनेक ऐसे ग्रन्थ भी उपलब्ध थे, जिनमें जीव-जन्तुओं की बोलियों की ही व्याख्या की गई थी। ‘भड्डरी’ एवं ‘घाघ’ नामक ज्योतिषी इस विषय के विशेषज्ञ माने जाते थे, और उन्होंने इस पर कई महत्वपूर्ण ग्रन्थ भी लिखे थे। अब वे सब तो उपलब्ध नहीं है, किन्तु उनके कुछ पृष्ठ अब भी मौजूद हैं, जिनके आधार पर ऐसी भविष्यवाणियाँ की जा सकती हैं, जो उनकी बोलियों में निहित हैं और शत-प्रतिशत सही साबित होती हैं। ‘उत्पात-सागर’ ऐसा ही एक ग्रन्थ था, पर अब वह दुष्प्राप्य है।

उपरोक्त विवरण से निष्कर्ष यह निकालता है कि जीव-जन्तुओं के व्यवहार से परोक्ष जगत में हो रहे परिवर्तनों को जाना जा सकता है। तथ्य यह भी सही है कि जितना पुरुषार्थ यह सब जानने को किया गया, उसका स्वल्प सा अंश भी आत्मजगत को टटोलने में किया जाय तो अगणित चमत्कारी सिद्धियों के स्रोत की जानकारी मानवी अन्तराल में हो सकती है। वस्तुतः विगत सौ वर्षों में मनुष्य ने स्वयं छोड़कर सभी पर विशद शोध की है। आत्मसत्ता की महत्ता प्रतिपादित करते हुए यदि यह वैज्ञानिक प्रयोग परीक्षण किये जा सकें कि सद्भावनाओं को अपना कर व्यक्ति किस प्रकार अपना कल्याण करता है, अपने चिन्तन को परिष्कृत कर वह स्वकेन्द्रित शक्ति प्रयोगों से कैसे प्रसुप्त को जगा सकता है तथा अदृश्य जगत से बरस रहे अनुदानों से स्वयं को किस प्रकार लाभान्वित कर सकता है, तो यह अनुसंधान मानवहित का होगा, विज्ञान की उपलब्धियाँ मानवी काया व मन की सूक्ष्म व और भी गहन परतों का रहस्योद्घाटन कर सकें, इस दिशा में उसके प्रयास अब मुड़ने ही चाहिए।


मछुआरे की कहानी

मछुआरे ने उस दिन भी जाल बिछाया पर मछली एक भी हाथ न आयी। जाल में केकड़े ही भर गये।

निराश मछुआरे ने केकड़ों को ही एक टोकरी में भर लिया। साथी ने पूछा टोकरी का ढक्कन क्यों नहीं बंद किया। यह तो निकल कर भाग जायेंगे।

मछुआरे ने कहा जब एक केकड़ा ऊपर उठना चाहता है तो दूसरा उसकी टाँग पकड़ कर नीचे खींच लेता है। इसलिए वह कभी बाहर नहीं निकल सकते। आपस में ही एक दूसरे को ऊपर नीचे खींचने की कोशिश में सभी दुर्गति में पड़े रहते हैं।


तनाव मुक्ति समय साध्य है, किन्तु संभव है।

तनाव उत्तेजना, उद्विग्नता जैसे शब्द व्यक्ति की कार्य क्षमता व दक्षता को घटाने वाले हैं। जीवनशक्ति रोग निरोधक क्षमता एवं परिस्थितियों से ताल मेल बिठाने वाली मानसिकता की बाह्य उद्दीपन तनावग्रस्त बना देते हैं। इसका आभास प्रथम चरण में नहीं होता बल्कि जब स्थिति नियंत्रण से बाहर हो जाती है और लक्षण हमारे स्वभाव, चिंतन, चरित्र, व्यवहार में परिलक्षित होने लगते हैं, घातक रोगों के रूप में परिणति निकलने लगती है, तब उस ओर ध्यान आकर्षित होता है।

जब तनाव रूपी बन्दूक का घोड़ा दब जाता है तब व्यक्ति समाधान ढूँढ़ने एवं पाने के लिए अधीर और बेचैन हो जाता है। कुछ लोग तनाव से मुक्त होने के लिए अत्यन्त बेचैन हो जाते हैं और वह विधा खोजने की कोशिश करते हैं जिससे उनको तत्काल समाधान मिले। भले ही कुछ समय के लिए अन्तराल को हानि ही क्यों न उठानी पड़े। ऐसे लोग नशीले पदार्थ का सेवन करने में कोताही नहीं बरतते। शराब, गाँजा, चरस, ट्रैंकुलाइजर्स, हेरोइन एवं ब्राउन सुगर के सेवनकर्ता ऐसे ही व्यक्ति बनते हैं। तनाव से समझौता स्थापित करने का यह सबसे निम्नतम स्तर का प्रयास है। आँकड़े बताते हैं कि इस नशेबाजों की तुलना में नशामुक्त व्यक्ति लम्बी आयु बिताते हैं।

मनोविज्ञान के प्राध्यापक डब्ल्यू. पी. वेल्स तनाव मुक्ति की ऐसी विधा को महत्वपूर्ण मानते हैं जिसमें किसी बाह्य साधन पर अवलम्बित न रहना पड़े। अपितु आत्म चेतना को जगाकर धीरे-धीरे शिथिल होने का प्रयास किया जाय। जब व्यक्ति तनाव की चपेट में होता है तो उसकी शिकायत रहती है कि कुछ विशेष कार्य करने के लिए वह अपने आपको अक्षम सा पाता है। परिणामतः वह बाह्य साधनों यथा टेलीविजन, फिल्म आदि का सहारा लेता है किन्तु अशाँति और भी बढ़ती देखी जाती है। तनाव रहित होने, थकान दूर करने वाले विभिन्न योगाभ्यास ऊर्जा खपत करने की अपेक्षा बचाते हैं। टहलने या तैरने जैसे कुछ शारीरिक व्यायाम शरीर की चयापचयिक दर (मेटाबॉलिक रेट) धीमी करते हैं फलस्वरूप शरीर तनावमुक्त अनुभव होता है। विभिन्न प्रकार के आसनों के बाद रोग निरोधक क्षमता एवं शिथिलीकरण की गति बढ़ती जाती है। कोई भी व्यक्ति बिना आराम किये लम्बे समय तक कार्य नहीं कर सकता, ठीक उसी प्रकार मानसिक शिथिलीकरण की भी नित्य आवश्यकता पड़ती है।

वैज्ञानिक दृष्टि से शिथिलीकरण का अर्थ है-त्वचा से जुड़े तन्तु समूहों को विश्रान्ति प्रदान करना। तनाव से इनमें सिकुड़न आ जाती है। यही कारण है कि तनावग्रस्त लोगों के चेहरे पर झुर्रियाँ जल्दी पड़ती देखी जाती हैं। यह शिथिलीकरण मात्र बैठने, सोने से पूरा नहीं होता अपितु इसके लिए अपने आपको शिथिलीकरण की मानसिकता से भी गुजरना पड़ता है। मधुर एवं रुचिकर संगीत का श्रवण भी माँसपेशियों को शिथिल करता है। इसका तात्पर्य है किसी भी स्थान पर कभी भी प्रयुक्त शिथिलीकरण की चेतनात्मक विधि विशेष लाभदायक है। यह ऐसी कला है जो आन्तरिक तनाव से हमको सतत् मुक्त रखती है।

आत्मसमीक्षा एवं आत्मावलोकन की कुछ विधायें भी उपयोगी हैं। किसी बाह्य ध्वनि संकेत शब्द या चित्र पर ध्यान केन्द्रित करना, तनाव पैदा करने वाले विचारों, भावनाओं एवं कल्पनाओं को अभ्यास द्वारा छोड़ते चले जाना, शरीर की आराममय स्थिति जिसमें शरीर शिथिल अनुभव करें, एवं बाह्य वातावरण से अपने आपको दूर रखने का अभ्यास, ये चार उपाय शिथिलीकरण के चार आयाम हैं। भारतीय शिथिलीकरण एवं योग पद्धति के आधार पर जर्मनी के चिकित्सक डॉ. राँनी विल्सन व उनके सहायकों ने ऑटोजेनिक ट्रेनिंग के नाम पर एक विधा विकसित की है। इसमें छह चरणों में शिथिलीकरण सम्पन्न किया जाता है। सर्वप्रथम यह भावना की जाती है कि “हमारे अंग अवयव क्रमशः हल्के हो रहे हैं। हमारे पैर हल्के हो रहे हैं, अंग अवयव धीरे-धीरे गरम हो रहे हैं” “हृदय की धड़कन गति कम होते-होते शाँत हो गई है” “श्वास-प्रश्वास की प्रक्रिया धीमी एवं गहरी हो गई है” “कमर का ऊपरी हिस्सा धीरे-धीरे गरम हो रहा है एवं मस्तिष्क का सामने वाला भाग शीतल एवं शान्त हो रहा है,” ये स्वसंकेत (ऑटोसजेशन) दिए जाते हैं।

प्रत्येक चरण के साथ गहरी श्वास लेकर अपने आपको निर्देश दिये जायँ कि शिथिलीकरण का स्तर और गहराता जा रहा है। जर्मनी के चिकित्सकों ने इस विधा का प्रयोग हृदयाघात के रोगियों पर किया जिनकी संख्या नौ सौ थी। इनमें से नब्बे प्रतिशत लोग व्यक्तित्व दृष्टि से ‘ए’ वर्ग में आते थे जो मूलतः क्रोधी, आतुर, आवेशग्रस्त महत्वाकाँक्षी एवं अनसुलझे मस्तिष्क वाले माने जाते हैं। इन पर सतत् चार वर्ष तक शिथिलीकरण ध्यान एवं प्रार्थना का प्रयोग होता रहा और मात्र तीन प्रतिशत लोग ही ऐसे रहे जिन्हें पुनः आगे हार्ट अटैक होने की संभावना बनी रही। शेष पूर्णतः स्वस्थ हो गये। अभ्यास सतत् जारी रहने से वे अक्षुण्ण स्वास्थ्य के स्वामी बने।

आत्म निरीक्षण के कुछ सूत्र भी शिथिलीकरण प्रक्रिया में सहायक सिद्ध होते हैं। तनाव उत्पन्न करने वाले विचारों, भावनाओं-कल्पनाओं एवं मान्यताओं की एक सूची बनाई जाय, जिन्हें “स्ट्रेस ट्रिगर” नाम उनने दिया है। पूरी एकाग्रता से यह निरीक्षण किया जाय कि वे कौन से क्षण हैं जिनमें तनावजन्य चिन्हों के दीखने के साथ-साथ हृदय गति बढ़ाने अथवा नशीले पदार्थ लेने, सिगरेट अथवा चाय पीने की ललक मन में से उठती है। ऐसे क्षणों एवं परिस्थितियों का निरीक्षण करने के बाद उस समय विधेयात्मक विचारों की सेना तैयार रखनी चाहिए। मन विधेयात्मक विचारों की सेना तैयार रखनी चाहिए। मन विधेयात्मक चिंतन से ही सही दिशा में चलता है। तनावजन्य स्थिति में भी यह भावना कि “मैं दिनों दिन तनाव से मुक्त हो रहा हूँ एवं उन सभी परिस्थितियों को समझ कर उनसे निपटने में सक्षम हूँ जो तनाव उत्पन्न करती हैं” व्यक्ति को भावनात्मक टॉनिक प्रदान करती हैं। मनोबल व आत्मबल बढ़ाती हैं।

परमसत्ता के प्रति समर्पण भाव से की गयी प्रार्थना एवं ध्यान योग की प्रक्रिया भी तनाव मुक्ति में अत्यन्त सहायक है। इससे शरीर में माँसपेशियों में ही नहीं स्नायु कोशाओं में भी शिथिलीकरण प्रक्रिया को बढ़ाने वाले रसायन रक्त में बढ़ने लगते हैं। इसके साथ विशिष्ट आवृत्ति वाले विशेष रूप से गायत्री मंत्र का उच्चारण एवं अनहत नाद का श्रवण शरीर के तनाव को बड़ी तेजी से तनाव रहित करता है। भारतीय चिंतन एवं दर्शन वस्तुतः सही अर्थों में शिथिलीकरण की ही प्रक्रिया को चिकित्सा बताता है।

शिथिलीकरण में बायोफीडबैक प्रक्रिया भी अत्यन्त सहायक सिद्ध होती है। बायोफीडबैक का तात्पर्य है व्यक्ति की भौतिक शरीर से संबंधित विभिन्न गतिविधियों को रिकार्ड करना एवं उसकी इन प्रक्रियाओं का “फीडबैक” तत्क्षण उसे देना ताकि ज्ञात हो कि उसके अन्दर क्या परिवर्तन हो रहे हैं। उदाहरण के लिए तनाव से उत्पन्न सिरदर्द के रोगी के मस्तिष्क में इलेक्ट्रोड लगाकर-मशीन पर ध्वनि या प्रकाश के सिग्नल द्वारा परिवर्तन का प्रदर्शन उसी रोगी के सामने करना जिससे वह ऐच्छिक मानसिकता बनाते हुए भावनात्मक संक्षोभ तनाव को क्रमशः कम करके सिर दर्द कम कर सकता है। जैसे-जैसे व्यक्ति तनावमुक्त होता जाता है “फीडबैक” मशीन में ध्वनि एवं प्रकाश पट्टियों में परिवर्तन आता जाता है। तनावजनित विचारों की जैसे ही बढ़ोत्तरी होती है, मशीन तनाव को भी प्रदर्शित करती है। क्रमशः की जाने वाली यह प्रक्रिया व्यक्ति को शिथिलीकरण की महत्ता व उसमें निज के पुरुषार्थ की भूमिका बताने, आत्मशक्ति के जागरण के प्रयासों के लिए प्रेरित करती है किन्तु सही अर्थों में व्यक्ति शिथिल (रिलेक्स) बिना मशीनी सहायता के भी स्वयं को कर सकता है ।

इसके अतिरिक्त शिथिलीकरण की अन्य विधाओं में प्राकृतिक दृश्यों का सान्निध्य, पेड़ पौधों के साथ सामीप्य द्वारा भावनात्मक पोषण की व्यवस्था, पशु-पक्षियों को पाल पोसकर बड़ा करने की हॉबी, समाज सेवा के विभिन्न योग जैसे कुछ उपक्रम आते हैं। व्यक्ति कितनी भी विपरीतता में हो लेकिन यदि वह मानसिक रूप से सुखद परिस्थितियाँ विनिर्मित कर ले तो सहज ही अपने आपको तनावमुक्त कर सकता है। तनावजन्य स्थिति में भी अपना विकास, संगीत, चित्रकारी, शिल्प, रचनात्मक क्रियाकलाप, कविता, लेख, भाषायी ज्ञान द्वारा करते हुए उस दिशा में सतत् सोचने-प्रवृत्त होने से सहज ही तनावमुक्त हुआ जा सकता है। पूर्वाग्रहों, मनोविकारों, पिछले जीवन में बीते अप्रिय घटना प्रसंगों को भुलाकर अपना भविष्य ऊँचा देखने, ऊँचा सोचने, एवं ऊँचा करने का अदम्य उत्साह उल्लास व सतत् मुसकराता चेहरा तनाव मुक्त करके व्यक्ति की प्रतिभा का जागरण करने में सहायक सिद्ध होता है।

शाँतिकुँज हरिद्वार के अंतर्गत कार्यरत-ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान में “तनाव प्रबंध” जैसे महत्वपूर्ण विषय पर विशिष्ट प्रकार के प्रयोग हो रहे हैं। विभिन्न बायोफीडबैक मशीनों, रक्त परीक्षणों, मनोवैज्ञानिक शोधों के निष्कर्ष बताते हैं कि यदि व्यक्ति अपने आपका निरीक्षण करने लग जाय, मनोविकारों के सिगनल्स को पहचानने लगे और विधेयात्मक विचारों के सेना खड़ी कर ले तो वह सहज ही तनावमुक्त रह सकता है। प्रार्थना, ध्यान, साधना व शिथिलीकरण के अभ्यास के साथ-साथ गायत्री मंत्र का ध्यान सहित मानसिक जप भी सोने में सुहागा सिद्ध होता है, ऐसे प्रयोग बताते हैं। प्रातः सायं जाग्रत प्राणमय वातावरण में चल रहे दैनन्दिन क्रम में सम्मिलित होना, श्रेष्ठता की प्रेरणा देने वाले गीतों का श्रवण भी तनावमुक्ति का एक श्रेष्ठतम उपाय है। इतना यदि नियमित रूप से किया जा सके तो समझना चाहिए कि व्यक्ति के जीवन में तनावजन्य परिस्थितियाँ कभी आएँगी ही नहीं । नवयुग के लिए आत्मबल सम्पन्न महामानव जन्में, इसके लिए तनाव जैसी युग व्याधि का उपचार इस प्रकार विचारना ही होगा।


आगामी नौ वर्ष अति महत्वपूर्ण

स्वाति की बूंदें सीप में मोती, केले में कपूर और बाँस में वंशलोचन पैदा करती हैं। वैसे बरसात तो अन्य नक्षत्रों में भी होती है, पर उनकी बूँदें इस प्रकार का परिणाम प्रस्तुत करने में सर्वथा अक्षम होती हैं। रबी की फसल यदि खरीफ के मौसम में बोयी जाय, तो खाद-पानी सब कुछ के होते हुए भी परिणति अकाल जैसी सामने आती है। भाँति-भाँति के फल-फूल अपनी-अपनी ऋतु में समय आने पर ही फलते-फूलते हैं, हथेली में सरसों जमाने की तरह वे तुरन्त उगते, पनपते और फल नहीं देने लग जाते, पर कई अवसरों पर ऐसा अचम्भा होते देखा जाता है, जिसमें कम समय व श्रम में आशातीत सफलता हस्तगत होती दृष्टिगोचर होती है। यह समय विशेष की महत्ता है। उपासना उपक्रमों में भी इसकी उपादेयता स्पष्ट परिलक्षित होती है।

सर्वविदित है कि इन दिनों हम युगसंधि वेला से गुजर रहे हैं, जिसमें एक युग-कलियुग की समाप्ति और दूसरे, प्रज्ञायुग का शुभारंभ होने जा रहा है। इन्हीं कारणों से प्रस्तुत समय को युगसंधि काल कहा गया है। संक्रान्ति काल को शास्त्रों में विशेष महत्व का माना गया है और कहा गया है कि इन अवसरों पर की जाने वाली उपासना तत्काल फलदायी होती है। अन्य मौकों पर जिनके सुखद सत्परिणाम के लिए वर्षा और जन्मों तक इन्तजार करना पड़ता है, वे उपरोक्त अवधि में अत्यन्त सरलतापूर्वक सहज ही उपलब्ध हो जाते हैं।

प्रायः दिन और रात्रि के मिलन काल को संध्याकाल कहते हैं। इस हिसाब से प्रतिदिन दो संध्याएँ होती हैं- एक प्रायः एवं दूसरे सायं की। एक में रात्रि का गहन अन्धकार छँटता और प्रकाश में बदलने लगता है, तो दूसरे में दिनमान का स्थान निशा की सघन तमिस्रा तीसरी संध्या भी बतायी है। पूर्वाह्न और अपराह्न की मिलन वेला होने के कारण ही उन्होंने इसे संध्या की मान्यता प्रदान की है। इस प्रकार संध्या का सामान्य अर्थ दो कालों को समन्वय हुआ किन्तु इस शब्द की व्युत्पत्ति की दृष्टि से विचार करें तो यह सम ध्यै अन् अप (स्त्री) से बना प्रतीत होता है। ‘ध्यै’ धातु का अर्थ होता है- ध्यान करना। इस तरह व्याकरण की दृष्टि से संध्या का तात्पर्य हुआ भगवद् सत्ता का स्मरण करना, उस पर चित्त को एकाग्र करना इसलिए इस अवधि को इतना महत्वपूर्ण माना गया है और उसे प्रमाद में न गुजार देने की सलाह दी गई है। अतएव इस दौरान भोजन करना, सोते रहना, मैथुन करना आदि कितने ही कार्य निषिद्ध घोषित किये गये हैं और उक्त समय को ईश्वराराधन, सन्ध्यावन्दन जैसे आत्मोन्नति के कार्यों, में लगाने का निर्देश किया गया है। क्योंकि वह समय जिन कार्यों के लिए सूक्ष्म दृष्टि से अधिक उपयोगी है, वही कार्य करने में थोड़े ही श्रम से अधिक व आश्चर्यजनक सहायता मिलती है। इसी तरह जो क्रियाएं वर्जित हैं, वे उस समय में अन्य समयों की अपेक्षा हानिकारक होती हैं। कोई विद्यार्थी ब्रह्ममुहूर्त काल में किसी विषय को जितनी अच्छी प्रकार याद व गहराई से हृदयंगम कर सकता है, वैसा अन्य वेला में सहज ही संभव नहीं हो पाता।

आरोग्य शास्त्र के मर्मज्ञ जानते हैं कि चैत्र और आश्विन मास में जो सूक्ष्म ऋतु परिवर्तन होता है, शरीर पर उसका प्रभाव पड़े बिना नहीं रहता। प्रत्यक्षतः तो इससे ऐसा जान पड़ता है, कि ये हारी-बीमारी और आधि-व्याधि को आमंत्रित कर व्यक्ति को अक्षम, अशक्त और रोगी बना रहे हैं, पर प्रकृति विज्ञान से परिचित व्यक्ति को यह बताने की तनिक भी आवश्यकता नहीं होती कि यह सब प्रकृति-व्यवस्था के अंतर्गत होने वाली सामान्य प्रक्रिया है। वे इसे भलीभाँति जानते हैं कि पिछले छः महीनों में व्यक्ति ने जो आहार-विहार में प्रमाद बरता है, अभक्ष्याभक्ष्य भक्षण किया है, संयम-नियम में जो व्यतिक्रम अपनाया है, उसी का परिमार्जन-परिशोधन इस रूप में सामने आ रहा है। इस प्रकार अन्नमयकोश का स्वतः शोधन आरंभ हो जाता है। ऐसे समय में उपासना के माध्यम से शेष कोषों के परिष्कार का उपक्रम अपनाया जाय, तो प्रतिफल दिव्य वरदान की तरह सामने आता है। इसी कारण से उक्त मासों में प्रतिपदा से लेकर नवमी तक के नव दिनों को विशेष महत्व का माना गया है और आर्ष ग्रन्थों में इसकी विरुदावली नवरात्रि के धर्मानुष्ठानों के रूप में गायी गई है तथा प्रत्येक व्यक्ति से इस अवसर पर उपासना-विधानों में संलग्न रहकर कम समय व श्रम में अधिक लाभ उठाने का परामर्श दिया गया है।

युगसन्धि के आने वाले नौ वर्ष ऐसे ही अतिशय महत्व के हैं, जिनमें की जाने वाली स्वल्प मात्रा की उपासना भी साधक को उस विभूति-अनुभूति से निहाल कर सकती है, जिसके लिए अन्य मौकों पर उपासक चातक पक्षी की तरह स्वाति-बूँद को पा लेने की आकाँक्षा लम्बे काल तक सँजोये रह कर उसे हस्तगत कर लेने की प्रतीक्षा उत्सुकतापूर्वक करता रहता है। संधिकाल के विगत वर्षों को चावल पकाने से पूर्व पानी गर्म करने की पूर्व भूमिका सम्पन्न करने जैसा माना जाना चाहिए। जब उबलते जल में चावल के दाने डाले जाते हैं, तो आधे घंटे जितनी स्वल्प अवधि में पक कर तैयार हो जाते हैं। प्रस्तुतः समय में बीते वर्षों को विभिन्न उपाय-उपचारों के माध्यम से वातावरण को गरम करने के समतुल्य समझा जाना चाहिए। सभी जानते हैं कि स्वाधीनता के दिनों में महर्षि अरविंद और रमण ने अपनी प्रचण्ड साधना पुरुषार्थ की परोक्ष भूमिका द्वारा वातावरण को इस कदर इतना गर्म किया कि एक साथ गाँधी, विनोबा, सुभाष चन्द्र बोस, भगतसिंह, आजाद प्रभृति इतने महामानवों का अवतरण हुआ जिनने गुलामी के पाश को एक झटके में तोड़ कर देश को स्वतंत्र बना दिया।

अब तक के शतकुण्डी सहस्रकुण्डी गायत्री यज्ञों दीपयज्ञों की शृंखला व सामूहिक एवं व्यक्तिगत गायत्री उपासना ऐसे ही अनुकूल वातावरण बनाने में रच-पच गई। अगले वर्ष से सन् 2000 तक का समय अत्यन्त महत्वपूर्ण है। इसे गर्भधारण और शिशु जन्म के नौ माह के मध्यान्तर के तुल्य समझा जात सकता है। इस काल में साधक यदि तनिक सा संयम-नियम का परिपालन करते हुए उपासना क्रम अनवरत जारी रख सके, तो प्रतिफल किसान के लहलहाते खेत की तरह प्राप्त किया जा सकता है।

यहाँ यह प्रश्न उठ सकता है कि संधिकाल के नव वर्ष ही महत्वपूर्ण क्यों? इसका उत्तर आप्त ग्रंथ यह कहकर देते हैं कि भारतीय संस्कृति में नौ की संख्या अत्यन्त महत्वपूर्ण मानी गई है। नवदुर्गाओं की ही पुण्य वेला में भगवती दुर्गा का अवतरण हुआ था। चैत्र नवरात्रि के अन्त में जन्म लेकर भगवान राम ने इस धरती को पवित्र किया था। इसके अतिरिक्त अन्य कितने ही कारण ऐसे हैं, जिसके कारण आने वाले नव वर्ष को श्रेष्ठ व निर्णायक भूमिका अदा करने वाला माना जा सकता है। नवग्रह, नवधाभक्ति, वीभत्सादि नवरस, नवरत्न, गीतादि ग्रन्थों को नवान्ह पारायण, नवरंग (बैनीआह्पीनाल-अल्ट्रावायलेट, इंफ्रारेड) नवरात्रि, यज्ञोपवीत के नवसूत्र, तीन चरणों वाली गायत्री के नवशब्द, नवदुर्गा (शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्माण्डा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी व सिद्धिदात्री), नवनिधि, नवपत्रिका (केला, अनार, हल्दी, मानकच्चू, कच्चू, धान, अशोक, बेल और जयन्ती पवित्र माने जाते हैं और पूजन के काम आते हैं), नवब्रह्मा भृगु, क्रतु, पुलस्त्य, पुलह, अंगिरा, मरीचि, दक्ष, अत्रि वशिष्ठ-वायु. 9/68/69), नववर्ष (भारतवर्ष, किंपुरुषवर्ष, हरिवर्ष, इलावृतवर्ष, रम्यकवर्ष, हिरण्मयवर्ष, कुरुवर्ष, भद्राश्ववर्ष, केतुमालवर्ष, वायु 34.9) नववीथी (ब्रह्माँ 3.3.33.59), नवशक्ति (प्रभा, माया, जया, विजया, सूक्ष्मा, विशुद्धा, नन्दिनी, सुप्रभा, सर्वसिद्धिदा), नवकुमारी अथवा नवदेवी (कुमारिका, त्रिमूर्ति, कल्याणी, रोहिणी, काली, चंडिका, शाँभवी, दुर्गा, सुभद्रा) आदि आर्ष वाङ्मय में ऐसे अगणित संदर्भ हैं, जो नौ की संख्या की महत्ता को उजागर करते हैं।

इस आधार पर आने वाले नव वर्ष को अतिमहत्वपूर्ण माना जाय, तो इसमें अत्युक्ति जैसी कोई बात नहीं है। वैसे भी संक्रमण काल होने के नाते उक्त समय की महत्ता बढ़ जाती है। इस बात को ध्यान में रखते हुए एवं यह विचारते हुए कि हर समय में उपासना उतनी फलदायी नहीं होती, जितनी किसी समय विशेष में की गई। यदि साधक अपनी उपासनाक्रम थोड़ी तत्परता और निष्ठापूर्वक जारी रख सकें, तो आगामी समय में वह न सिर्फ स्वयं धन्य बन सकेंगे, वरन् समय को भी अपने बहुमूल्य योगदान से ओतप्रोत कर देंगे। वैज्ञानिक जानते हैं कि सूर्य संबंधी प्रयोग-परीक्षण चाहे जब कभी नहीं किया जा सकता। जब पूर्ण सूर्यग्रहण का योग बनता है, तभी उनके यंत्र-उपकरण खनकने लगते हैं और ऐसे ही अवसर पर वे तत्संबंधी किसी सुनिश्चित निर्णय-निष्कर्ष पर पहुँचते हैं। आगामी समय को ऐसा ही महत्वपूर्ण माना जाना चाहिए और इसका समुचित लाभ थोड़े ही श्रम में पा लेने में साधकों को कोई कोर-कसर उठा न रखना चाहिए।


दैनिक जीवन का व्यावहारिक अध्यात्म

उपयुक्त साधनों या अवसरों को सौभाग्य का चिन्ह माना जाता है। समझा जाता है कि जिसे जितने सुविधा साधन उपलब्ध हो सकेंगे, जितनी अनुकूलता रहेगी उतना ही सुखी रहा जा सकेगा। प्रगति की दिशा में बढ़ सकना उतना ही अधिक संभव होगा। यह मान्यता आँशिक रूप से ही सत्य है। क्योंकि देखा यह गया है कि अनुकूलताओं की प्रचुरता रहने पर भी लोग खिन्न उद्विग्न बने रहते हैं। परेशान होते और हैरान करते रहते हैं। यह विपन्नता सदुपयोग-दुरुपयोग के कारण बन पड़ती है। साधन दुधारी तलवार हैं उनका सदुपयोग कर सकने वाली विवेक बुद्धि साथ में हो तो ही समझना चाहिए कि उपयोगी लाभ मिलेगा। अन्यथा दुरुपयोग बन पड़ने पर तो विपत्ति ही आ खड़ी होती है। निहत्था व्यक्ति स्वयं को और दूसरों को कम ही हानि पहुँचा सकता है पर यदि कोई आत्मरक्षा के लिए मिले अस्त्र-शस्त्रों का दुरुपयोग करने लगे तो उससे मात्र अपना और दूसरों का अनर्थ ही हो सकता है।

मनुष्य जीवन इतना बहुमूल्य है कि उसकी तुलना में संसार की समस्त सम्पदा भी कम पड़ती है। आँखें न हों तो संसार भर में मात्र अँधेरा ही अँधेरा रहेगा। कान सुनना बन्द कर दें तो वार्तालाप सुनने का आनन्द समाप्त हुआ ही समझा जाय। शरीर रोगी हो तो किसी भी इन्द्रिय से कोई भी आनंद लाभ प्राप्त करने का अवसर नहीं हो।मस्तिष्क पर उन्माद चढ़ दौड़े तो समझना चाहिए कि समूचे की गतिविधियां उलटी दिशा में चल पड़ी। मर जाने पर तो यही अनुभव होता है कि यह भूलोक अस्तित्वहीन हो गया। अपनी सुसंस्कारिता ही असंख्यों का सहयोग सम्मान अर्जित करती है। दुर्बुद्धि घेरे हुए हो अनगढ़ आदतें स्वभाव में घुसी हुई हों तो पग-पग पर ऐसे आचरण बन पड़ेंगे कि निराशा असफलता और खीज ही हाथ लगे। इसके विपरीत गुण, कर्म, स्वभाव में शालीनता का बाहुल्य हो तो अभावों और प्रतिकूलताओं के बीच भी किसी प्रकार शान्ति से रहने और चैन से रहने देने का अवसर मिल जायगा। साधनों का अनुकूलता का, महत्व यहाँ नकारा नहीं जा रहा है पर कहा यह जा रहा है कि व्यक्तित्व पर छाई हुई कुसंस्कारिता हर सुयोग का दुरुपयोग ही करती रहेगी और उसके बदले विपन्नता ही अर्जित करती रहेगी। इसलिए जीवन की महत्ता महिमा के साथ ही उपलब्धियों का सदुपयोग कर सकने का दूरदर्शी विवेक भी जुड़ा रहना आवश्यक है। उसके अभाव में ईश्वर की दी हुई यह अनुपम धरोहर भारभूत ही बनी रहेगी। पूर्णता प्राप्त करने का श्रेय प्राप्त करने के लिए इस धरती पर आया मनुष्य निरन्तर घुटन और जलन ही अनुभव करता रहेगा। दिन-दिन पतन के गर्त में उतरेगा और मरते समय पाप का पिटारा ही सिर पर लाद कर ईश्वर के दरबार में पहुँचेगा। इसे सौभाग्य को दुर्भाग्य में बदल देना ही कहा जायगा।

शारीरिक संरचना और बौद्धिक विशेषता के कारण मानवी सत्ता कुछ इस प्रकार की बन पड़ी है कि उसके द्वारा इस आनंद से भरे पूरे संसार का पग-पग पर असीम लाभ उठाया जा सके। मनः स्थिति का सही रखना पूरी तरह अपने हाथ की बात है। यदि वैसा बन पड़े तो किसी को भी परिस्थितियों की प्रतिकूलता का रोना न रोना पड़ेगा। अपनी शालीनता के चुम्बकत्व से अनुकूलताएँ खींच बुलाई जा सकती हैं। जो हाथ में है उसी का सदुपयोग बन पड़े तो समझना चाहिए कि सर्वतोमुखी प्रगति का द्वार खुल गया। पात्रता के अनुरूप ही किसी को कुछ मिलता है। घनघोर वर्षा होने पर भी अपने हिस्से में उतना ही पानी आता है जितना गहरा बर्तन पास में हो। यह गहराई कितनी हो, इसका चयन और निर्धारण पूरी तरह अपने हाथ की बात हैं। जो कमी दीख पड़ती है और उसकी पूर्ति पुरुषार्थ के सहारे अर्जित की जा सकती है । मनुष्य पराक्रम का पुँज है। उसका यदि वह सुनियोजित रीति

के साथ उच्चस्तरीय उद्देश्य के लिए जीने के लिए योजनाबद्ध विधा अपना ले तो निश्चय ही इस स्तर का जीवन जी सकता है जिसमें न तो निर्वाह के सुविधा साधन कम पड़े और न तृप्ति, तुष्टि और शान्ति से वंचित रहना पड़े।

मनुष्य जीवन इतना भारी नहीं है कि उसका वजन न ढोया जा सके। वह इतना उलझा हुआ भी नहीं है कि उसकी उलझनों को सुलझाया न जा सके। समस्याएं कई प्रकार की आती हैं पर वे सभी सुधारी जा सकने, हल किये जा सकने योग्य हैं।दुनिया में बेशक काँटे और कंकड़ पड़े हैं पर वे इतने नहीं कि मजबूत जूते पहनकर उन्हें रौंदते हुए न चला जा सके। पहाड़ों की चट्टानों के बीच में जरा सी मिट्टी और नमी पाकर बीज उगना आरंभ कर देता है और जगह बनाते हुए विशाल वृक्ष का रूप धारण करता है। इसके लिए उन्हें सतत् प्रयत्न करते रहना पड़ता है। जड़ें अपने लिए फैलने की जगह तलाश करती हैं और जिधर गुंजाइश देखती हैं उधर ही प्रवेश पाकर पेड़ को खुराक पहुँचाती हैं। पर्वत शिखरों पर उगे हुए अधिकाँश वृक्ष इसी रीति-नीति का अपनाकर समूचे वन प्रदेश को आच्छादित करते हैं। दूसरी ओर वे छुई मुई जैसे जीवट विहीन पौधे हैं जो तनिक सी सर्दी गर्मी पाकर अपना अस्तित्व गँवा बैठते हैं। मनुष्य जैसा कुछ है अपनी निज की विचारणा का प्रतिफल है। श्रमशील-तत्परता और संकल्प-निष्ठ-तन्मयता के आधार पर हर कोई अपने में इतनी शक्ति अर्जित कर लेता है जिसके अनवरत प्रयोग से क्रमिक प्रगति की दिशा में निरन्तर आगे बढ़ा जा सके। प्रगतिशील अनुकरणीय और अभिनंदनीय जीवन जिया जा सके।

आवश्यकता इस बात की है कि सृष्टि के समस्त प्राणियों की तुलना में असाधारण रूप से समुन्नत स्तर के इस जीवन का महत्व,स्वरूप और उद्देश्य समझा जाय। उसके सदुपयोग का सुनियोजित निर्धारण किया जाय। इतना बन पड़ने पर आगे की मंजिल अपने आप खुलती और मिलती जाती है। अड़चन एक ही है कि बाहर की वस्तुओं में रस लेते-लेते चेतना इतनी तद्रूप हो जाती है कि उसे अपने स्वरूप और उद्देश्य तक का स्मरण नहीं रहता। खेल की तन्मयता कई बार खिलाड़ी को भी एक प्रकार की गेंद होने जैसा अनुभव कराने लगती है। खेल की हार जीत ही मानस के हर कोने पर छाई रहती है। यह स्मरण नहीं रहता कि खेलने का मानस क्यों किस निमित्त बनाया था और उस उद्देश्य की पूर्ति किस सीमा तक बन पड़ रही है। इसी को आत्म विस्मृति कहते हैं। गहरा नशा पीकर आमतौर से लोग गहरी विस्मृति के शिकार बन जाते हैं। उन्हें अपनी हानि, निंदा अस्वस्थता, दरिद्रता और भविष्य की अँधेरी रात दीख नहीं पड़ती। आत्म विस्मृति भी एक प्रकार से नशेबाज की गहरी खुमारी जैसी स्थिति है। उसके रहते न अपने हित अनहित की भविष्य की बात सूझती है और न यह होश रहता है कि यह अलभ्य अवसर हाथ से निकल जाने के उपरान्त कुछ करने धरने की संभावना भी हाथ न रहेगी। मनुष्य जीवन के सुयोग को ऐसे ही उद्देश्यहीन

अस्त-व्यस्तता में गँवा देना अपने पैरों आप कुल्हाड़ी मारने के समान कुकृत्य है। दूसरों को हानि पहुँचाकर अपना लाभ अर्जित करने वालों को बुरा कहा और कोसा जाता है पर उन्हें क्या कहा जाय जो जीवन सम्पदा का दुरुपयोग करके अपना अहित तो प्रत्यक्षतः करते ही हैं साथ ही अपने परिवार को, संपर्क क्षेत्र को भी बुरी तरह बरबाद, बदनाम करते हैं। ऐसा एक ही कारण बन पड़ता है और वह है आत्म विस्मृति।

तत्वदर्शी पग-पग पर आत्मबोध की बात कहते रहते हैं। अपने को जानने, देखने, सोचने, ढूँढ़ने का उपदेश देते रहते हैं। यह कोई रहस्यवाद नहीं है, अपितु सीधे अर्थों में इतना भर समझना चाहिए कि मनुष्य जीवन की महत्ता और गरिमा असाधारण है। इसका उच्च प्रयोजनों में ही सदुपयोग होना चाहिए। किसी प्रकार मौत के दिन पूरे करते रहना अबोध पशु पक्षियों और कीट पतंगों के लिए तो क्षम्य हो सकता है पर मनुष्य द्वारा बरते जाने वाला यह प्रसाद अक्षम्य है। जो जीवन का लाभ न उठा सका समझना चाहिए कि उसने हाथ में आई विपुल सम्पदा की होली जलाकर अपना सर्वस्व अपने हाथों स्वाहा कर दिया।

अध्यात्म तत्वज्ञान का क्षेत्र बहुत विस्तृत है। अनेक शास्त्रों और तत्वदर्शियों ने उसके अनेकानेक पक्षों पर बहुत विस्तारपूर्वक प्रकाश डाला है। पर यदि उन सब का सार संक्षेप समझा जाय तो बात इतनी भर है कि मनुष्य जीवन अगणित विभूतियों से लदा है। उसके अन्तराल में इतना कुछ है कि यदि उसे प्रसुप्ति से जाग्रति में परिणत किया जा सके तो देवोपम आनंद का रसास्वाद हर घड़ी हस्तगत होता रह सकता है। जीवन का सदुपयोग ही धर्म है। उसी के निमित्त उपासना, साधना, आराधना का अवलम्बन अपनाया जा सकता है। ज्ञान, कर्म और भक्ति की त्रिवेणी का अवगाहन का पुण्य फल इतना ही है कि जीवन को परिष्कृत, समुन्नत, एवं सुसंस्कृत बनाया जा सके। इतना बन पड़े तो खिले हुए फूल पर मंडराने वाले भौरों की तरह अनेक दैवी अनुग्रह और वरदान अनायास ही अपनी समीपता का परिचय देने लगते हैं।

भव बंधनों की, नरक की, दुर्भाग्य की अनेकानेक विभीषिकाओं का वर्णन किया जाता है । यह सब और कुछ नहीं, जीवन सम्पदा के दुरुपयोग का दुष्परिणाम ही है । मौत को भूल जाने वाले, अपने कर्मों के आधार पर ईश्वर को प्रसन्न या अप्रसन्न करने की बात को भूल जाने वाले ही उस अन्धतम में प्रवेश करते हैं जहाँ पश्चाताप की आग निरन्तर जलती और जलाती रहती है । जिसने इतना समझ लिया उनने उस अमृत को प्राप्त कर लिया जिसे विद्या और प्रज्ञा कहा जाता है । जिसे हृदयंगम करने वाले मोक्ष प्राप्त करते और कृत-कृत्य होते हैं ।

स्वाध्याय सत्संग का सार इतना ही है । चिन्तन मनन से निष्कर्ष नवनीत इतना ही निकलता है । अनेकानेक साधनाओं की सिद्धि इतनी ही है कि मानवी चेतना को उस जाल जंजाल से परित्राण मिले जो लक्ष्य को विस्मृत करती और कुत्साओं के अनेकानेक प्रतिपादनों का एक मात्र उद्देश्य है कि व्यक्ति आत्मबोध की भूमिका से जाग पड़े । उस प्रसुप्ति से छुटकारा पाये जिसमें वासना, तृष्णा और अहंता का गुलाम बनकर नर वानर की तरह निरर्थक उचक मचक करते रहने की उसकी आदत पड़ जाती है । पेट और प्रजनन के लिए पशु जीते हैं । मनुष्यों में भी कितने ही नर पशु होते हैं जिन्हें लोभ और मोह के अतिरिक्त और कुछ सूझता ही नहीं । वह सत्य को उतने तक ही सीमित मान लेते हैं जो इन्द्रियों की ललक के सहारे अनुभव में आता है । कृमि कीटकों के लिए तात्कालिक लाभ ही सब कुछ होता है । दूर की बात उन्हें सूझ ही नहीं पड़ती है । परिणति का , संभावना की दूरी तक उनका सोच चलता ही नहीं । ऐसे लोग अहंता के वशीभूत होकर तृष्णाग्रस्त होते हैं और अनाचार पर उतरते हैं । नर पामरों नर पिशाचों का यही दृष्टिकोण होता है । उनकी क्रियाशीलता और चतुरता इसी कुचक्र के घेरे में परिभ्रमण करती रहती है ।

विवेक जागने पर वे कर्तव्य सूझते हैं जो मनुष्य के भीतर बैठा हुआ देवता इंगित करता है । विवेक का दीपक बुझ जाने पर मात्र अंधकार का साम्राज्य चारों ओर फैला दीख पड़ता है । अँधेरे में बुद्धि विभ्रम का साम्राज्य छाया रहता है । रस्सी का साँप और झाड़ी का भूत दीख पड़ता है । संकीर्ण स्वार्थपरता की परिधि में सड़ी नाली में कुलबुलाने वाले कृमि कीटकों की तरह दुर्गन्ध भरा जीवन जीना पड़ता है ।

प्रचलन ऐसा ही है । लोगों को इसी स्तर का जीवन जीते देखा जाता है । संबंधी , कुटुम्बी, मित्र , हितैषी ऐसा ही परामर्श देते और दबाव डालते हैं जिसमें वह किया जाय जिसे नर पामरों की भीड़ चरितार्थ करती है । उत्कृष्ट आदर्शवादिता उस स्थिति में उभरती है जब मनुष्य के गहन अन्तराल में प्रसुप्त पड़ा नरनारायण, जागे एवं उसे उच्च स्तरीय जीवन जीने के लिए प्रेरित एवं बाधित कर दे ।


Quotation

बन्दर नारियल लेकर उसे उछालता, एवं स्वयं उछलता है। किसी के सिर पर भी पटक सकता है पर उसके भीतर का स्वाद बेचारा कहाँ चख पाता है। सम्पत्ति पाकर ओछे मनुष्य भी यही करते हैं।


पूजा से कार्य बड़ा होता (Kahani)

एक राजा ने दो मालियों को दो बगीचे दिये और कहा इन्हें फला-फूला बनाकर दिखायें ।

एक माली सनकी था । उसने बगीचे में रुचि लेना बंद कर दिया और राजा के नाम की माला जपने लगा । उनकी प्रतिमा की आरती भी करता और परिक्रमा भी लगाता ।

दूसरा पैशों की सिंघाई-गुड़ाई आदि में लगा रहता । उसका बगीचा सुन्दर बन गया और फला-फूला भी । उस पूजा परायण के सभी पौधे  सूख, मुरझा कर नष्ट हो गये ।

राजा एक साल बाद आया बगीचे की स्थिति, भिन्न देखी और उनके विकास में प्रस्तुत अन्तर का कारण जाना ।

राजा ने भजनानंदी माली को बुरा कहा और नौकरी से निकाल दिया । जिसका बगीचा हरा-भरा था उसकी प्रशंसा कर दी और नियुक्ति स्थायी कर दी । पूजा से कार्य बड़ा है ।


सच्ची सिद्धि

भौतिक सिद्धियाँ तो उन जीव जन्तुओं में भी पाई जाती हैं जो चलते समय पैर के नीचे कुचले जाते हैं । मक्खी आकाश में उड़ सकती है, बतख पानी पर चल सकती है, मछली जल में रह सकती है, गीध दूर तक देख सकता है , मकड़ी को वर्षा का भविष्य ज्ञान रहता है, जुगनू का तेज चमकता है, सर्प दंश से क्षण भर में मृत्यु होती है, कहते हैं नीलकंठ पक्षी के दर्शन से लक्ष्मी मिलती है । गिरगिट कई तरह के रंग बदलता है । यदि इन्हीं सिद्धियों को प्राप्त करने के लिए साधना की जाय तो सफलता के अंतिम शिखर पर चढ़ते-चढ़ते वहाँ पहुँचा हुए हैं ।

लोगों को कौतूहल दिखाकर अपनी विशेषता सिद्धि करने की आत्मश्लाघा पूरी करने की ही यदि हविस हो तो इसके लिए इतनी कष्ट साध्य-गतिविधि अपनाने और सामान्य सुख-सुविधाएँ छोड़ने की तनिक भी आवश्यकता नहीं है । लोगों को अचम्भे में डालने का काम बाजीगर बड़ी अच्छी तरह करते हैं । वे इतनी अच्छी तरह प्रदर्शन करते हैं कि आश्चर्यचकित होना पड़ता है उन्हें करना भी मुश्किल नहीं है। हाथ की सफाई का अभ्यास थोड़े दिनों में हो जाता है और बाजीगरी सिखाने वाले उन रहस्यों को सिखा भी सकते हैं ।

देखना यह है कि इससे अपना क्या लाभ हुआ और क्या दूसरों का हित साधन हुआ ? दो रुपए नाव वाले को देकर नदी पार हो सकती है । रोज तो कोई पानी पर चलता नहीं हर जगह पुल हैं । नावें मौजूद हैं इस सिद्धि को कोई व्यक्ति बहुत कष्ट सहकर प्राप्त कर ले तो उसे दो रुपये नाव वाले को न देने भर की बचत हुई । बीमार को अच्छा करने में सिद्ध पुरुष जितना लाभ पहुँचाते हैं उससे हजारों गुने अधिक रोगी एक डाक्टर अच्छे करता है । योगी कितने अन्धों को आँखें देगा पर आँख के डाक्टर तो अपनी जिन्दगी में हजारों अन्धों को अच्छा करते हैं । योगी बनने की अपेक्षा डाक्टर बनना क्या बुरा है ? उसमें कष्ट भी कम और लाभ भी अधिक। भारत से इंग्लैंड उड़कर जाने की सिद्धि बहुत तप के बाद मिलेगी परन्तु हवाई जहाज में थोड़ा सा किराया देने पर यह कार्य आसानी से हो सकता है । दूर दर्शन दूर श्रवण के लिए अब रेडियो, टेलीफोन, टेलीविजन मौजूद हैं तो फिर उन सिद्धियों को प्राप्त करने की क्या जरूरत रह गई।

उपासना, तपश्चर्या और योगाभ्यास का मात्र एक ही प्रयोजन है अपने अन्तःकरण में प्रस्तुत अगणित सत्प्रवृत्तियों का जागरण, सद्भावनाओं का उन्नयन। दृष्टिकोण में परिष्कार। कर्तव्य में देवत्व के समावेश का अभ्यास। उपासना की उत्कृष्टता साधना की प्रखरता इसी कसौटी पर परखी जाती है। इसी से अपना भला होता है इसी से संसार का।

जीवात्मा को परमात्मा से जोड़ देना। अन्तःकरण को प्रेम से लबालब भर देना-निश्छल निर्मलता विकसित करना और लोकमंगल के लिए आत्मोत्सर्ग करना। ये सिद्धियाँ जिनके पास हैं असल में वे ही सच्चे उपासक और सिद्ध पुरुष हैं। जब भी कभी साधना से सिद्धि का प्रसंग आए तो हमें जानना चाहिए कि पात्रता का विकास आत्मशोधन, परोपकार के अर्जन से बड़ी कोई योग साधना नहीं। यह असंख्य सिद्धियों का द्वार खोलती है। रास्ता लम्बा जरूर है, श्रम साध्य एवं कष्ट साध्य भी। किन्तु इस मार्ग का अवलम्बन लेने वाले किस तरह श्रेयार्थी बनते प्रगति के उच्चतम सोपानों का पार करते चले जाते हैं, यह महामानवों के जीवन को देखकर भली भाँति जाना जा सकता है।

जन-जन में बहुत बड़ी भ्रान्ति सिद्धियों को लेकर संव्याप्त है। थोड़ा सा पुरुषार्थ करने से ही सब कुछ मिलने की बात न जाने कहाँ से लोगों के दिमागों में घर कर गयी है। यह भी मान्यता है कि इसके लिए आत्मशोधन जरूरी नहीं। वस्तुतः सारी सिद्धियाँ विकसित परिष्कृत व्यक्तित्व के चारों ओर मँडराती रहती हैं। आध्यात्मिक साधनाएँ यही सिखाती हैं कि कैसे अनगढ़ता से सुगढ़ता की यात्रा पूरी की जाय। चिंतन को कैसे परिष्कृत किया जाय तथा आत्मसत्ता को विराट सत्ता के प्रति समर्पित होने का शिक्षण कैसे दिया जाय? इतना भर करने से ऋद्धि-सिद्धियों का रहस्योद्घाटन अपने ही अंतराल से होने लगता है।


शब्द ब्रह्म की साधना के दो प्रमुख आधार

जीभ और हृदय का कोई सीधा तारतम्य शरीर शास्त्र की दृष्टि से नहीं मालूम पड़ता। यों तो सभी अंग एक दूसरे के साथ जुड़े हुए हैं। मस्तिष्क सभी अंगों में चेतना देता है, फेफड़े वायु और आमाशय रस, इस प्रकार ये सभी संस्थान अपने आप में महत्वपूर्ण हैं। इनमें आपस में पारस्परिक सम्बन्ध भी है। पर जहाँ तक अति निकटता और घनिष्ठता का सम्बन्ध है जीभ हृदय के बीच कोई असाधारण और अतिरिक्त घनिष्ठता नहीं, दिखाई देती।

पर मन्त्र विज्ञान की दृष्टि से इनमें अत्यधिक सघन सम्बन्ध है। शब्द विज्ञान की गहन शक्ति इन दोनों के समन्वय से ही पैदा होती है। यों जीभ स्वादेन्द्रिय है और शब्दोच्चारण का प्रयोजन भी पूरा करती है, पर उसमें एक विशेष क्षमता है शब्दों के साथ जुड़े हुए असामान्य प्रभाव की। यदि यह तत्व न हो तो फिर वह ग्रामोफोन के रिकार्ड की तरह केवल जानकारी देने का ही काम कर सकती है। उससे किसी व्यक्ति को अथवा व्यापक अन्तरिक्षीय वातावरण को प्रभावित नहीं किया जा सकता।

शरीर विज्ञान से यदि जीभ का परिचय पूछें तो वह उसे लम्ब पेशियाँ, जीनियों ग्लोसस पेशियाँ, जिव्हा ग्रन्थि, जिव्हावरण, लेपेक्स, तन्त्रिकाएँ स्वाद कलिकाएँ स्वाद, कोशिकाएँ स्पिन्डल कोशिकाओं का मिला-जुला रूप भर कहेगा। बात सही भी है इन्हीं सबका सहयोग इसे अपना काम ठीक तरह करते रह सकने लायक बनाता है।

जीभ का यह भौतिक परिचय हुआ। इस मोटी माँसल परिभाषा के अलावा तत्ववेत्ता उसका आत्मिक परिचय भगवती सरस्वती के प्रतीक के रूप में देते हैं। ऋग्वेद के दशम मण्डल के 16 वे सूक्त के 8 वें मन्त्र में कहा गया है “यावद् ब्रह्म विशिष्टतम् तावती वाक्” इस मन्त्र में वाक् को ब्रह्म की तरह विशिष्ट कहा गया है क्योंकि यह उसी परम चेतना का स्वतः स्फुट प्रकाश है। सही भी है जिव्हा शब्दोच्चारण करती है और उस उच्चारण के पीछे मनुष्य के मस्तिष्क और अन्तःकरण को ही नहीं शरीर को भी प्रभावित करने की सामर्थ्य रहती है। इससे भी आगे बढ़कर वह शक्ति वस्तुओं को प्रभावित करती है। इसी रहस्य शक्ति को चमत्कारी ढंग से प्रयुक्त करने के विधान का नाम मन्त्रशास्त्र है। सामान्य जानकारी का आदान-प्रदान तो वाणी से होता ही रहता है। पर जब वह एकाग्र समग्र और शब्द शास्त्र के अनुसार विशेष शब्दों का विशेष स्वर साधना के साथ उच्चारण करती है तो उस शब्द समूह को ‘मन्त्र’ कहते हैं। मन्त्रों की चमत्कारी शक्ति से अध्यात्म विज्ञान का पन्ना-पन्ना भरा पड़ा है। जप के बिना किसी धर्म सम्प्रदाय की कोई साधना नहीं हो सकती। इसे आत्मशक्ति सम्वर्धन का मूल स्रोत कहा गया है।

मन्त्र विद्या के पश्चिमी साधक जान वुडरफ के ग्रन्थ “गारलैण्ड आँव लेटर्स” के अनुसार जहाँ तक मन्त्रोच्चारण का सम्बन्ध है यह कह सकते हैं कि जिव्हा तन्तुओं का सम्बन्ध जिन चक्रों, उपत्यिकाओं, मातृकाओं से है वे इस उच्चारण के साथ वैसे ही प्रभावित होती है। जैसे टाइप राइटर की कुँजियाँ दबाने से उससे सम्बन्धित तीलियाँ उछलती हैं और कागज पर अक्षर छप जाते हैं । शरीर के विभिन्न स्थानों पर विभिन्न सूक्ष्म शक्तियों के भण्डार दबे पड़े हैं । वाणी का प्रभाव बाहर ही निकलता भीतर भी चलता है । मन्त्रोच्चारण के साथ जिव्हा की नस नाड़ियाँ और ध्वनि लहरियाँ उन प्रसुप्त स्थानों को जाग्रत करती हैं । क्रम विशेष सितार के तारों को बजाने से उनमें से विभिन्न स्वर लहरियाँ निकलती हैं, इसी प्रकार शब्दों का उच्चारण तथा स्वर क्रम मिलकर ऐसी गूँज उत्पन्न करते हैं जिससे शरीरगत सूक्ष्म संस्थान में हलचल मच जाती है । जो मन्त्र जिस प्रयोजन के लिए निर्धारित है उसके अनुकूल ध्वनि कम्पनों का ऊर्जा तरंगों का निर्माण होता है ।

इस तरह मन्त्र शक्ति अपना काम करती है । मंत्रोच्चारण के अवसर पर सारा संस्थान एक शक्ति स्रोत के रूप में बदल जाता है और अपने भीतर लक्ष्य किए हुए मनुष्य या देवता के ऊपर अनन्त आकाश में एक प्रभाव उत्पन्न करता है जिससे शास्त्रोक्त परिणाम उत्पन्न होने की सम्भावना बन जाय

लेकिन इतना भर काफी नहीं । इस मन्त्रोच्चार की शब्द शृंखला के पीछे हृदयगत ऊर्जा की प्रचण्ड शक्ति धाराओं का समावेश भी होना जरूरी है । हृदय का अर्थ दो प्रकार का होता है जिव्हा की तरह वह भी दो प्रयोजन पूरे करता है । एक तो रक्ताभिषरण का केन्द्र बिन्दु होने से वहाँ उत्पन्न होने वाली ऊर्जा का वह भण्डार होता है । दूसरे उसे भाव संस्थान का केन्द्र बिन्दु भी माना गया है । धड़कन से उत्पन्न ऊर्जा और श्रद्धा , निष्ठ, भक्ति एवं विश्वास की भाव-गरिमा । इन दोनों का समन्वय ही मन्त्र का प्राण है । उच्चारण को मन्त्र का काय-कलेवर और भावनाओं को प्राण समझना चाहिए । इस प्रकार जहाँ तक आत्म साधना का प्रश्न है जिव्हा और हृदय दोनों का सहयोगात्मक समन्वय अनिवार्य है ।

शरीर विज्ञान हृदय का परिचय-शरीर नगर की जल व्यवस्था को भली प्रकार व्यवस्थित रखने वाले ‘पम्पिंग स्टेशन’ के रूप में देता है । हृदय का फेंका हुआ रक्त सभी अंग-प्रत्यंगों में भ्रमण करता है । वायु पोषण से उन अंगों को पुष्ट करता हुआ वहाँ की विकृतियों को अपने साथ समेटता लाता है । फेफड़े उस इकट्ठा किए कूड़े-कचरे को साँस द्वारा बाहर फेंक कर उसमें प्राण वायु घोल देते हैं । सिलसिला फिर चल पड़ता है ।

इसे चलाए रखने के लिए उसे एक मिनट में 76 बार धड़कना पड़ता है । यों कहें साल में 3 करोड़ 70 लाख बार । यदि व्यक्ति 60 साल जीवित रहे तो उसका हृदय दो सौ बीस करोड़ बार धड़क चुका होगा । 18000 टन रक्त बहा चुका होगा । 62000 मील रक्त नलिकाओं की पगडण्डियों पर चल चुका होगा । यह लम्बाई सारी धरती की परिक्रमा से ढाई गुनी ज्यादा है । इस कार्य में उसे इतनी शक्ति खर्च करनी पड़ जाती है जितने से संसार के सबसे बड़े भारी जंगी जहाज को धरती से पाँच गज ऊँचा उठाकर अधर में लटकाया जा सके ।

साढ़े तीन इंच चौड़ी पाँच इंच लम्बी छोटी सी थैली के लिए यह काम नहीं है । पर जब उसमें समाई यह ऊर्जा मन्त्र शक्ति से मिल जाती है , तो परिणाम करोड़ों गुना चमत्कारी होती हैं । आकाशवाणी से बोले गए शब्द इसीलिए प्रखर हो उठते हैं क्योंकि उनमें विद्युत शक्ति का सम्मिश्रण किया जाता है । इसी के अभाव में हमारी आवाज को कोई हजार गज पर भी नहीं सुन पाता जब कि रेडियो की आवाज सारा संसार सुनता है । ठीक मन्त्रोच्चारण को प्रखर और व्यापक बनाने के लिए हृदय की विद्युत धारा का उपयोग करना पड़ता है । साथ ही श्रद्धा विश्वास और भक्ति का समन्वय करके उसकी जप शब्दावली को इतरा प्रखर बनाना पड़ता है कि वह साधारण उच्चारण न रहकर एक शक्ति प्रवाह के रूप में प्रादुर्भूत हो अपना प्रयोजन सिद्ध कर सके ।

आत्मवेत्ता हृदय का सूक्ष्म अर्थ सहृदयता लेते हैं । निष्ठुर प्रकृति के दुराचारियों को हृदययता कहा जाता है । इसका मतलब खून फेंकने वाली थैली का होना न होना नहीं है । वरन् यह है कि उच्चस्तरीय संयम सदाचार, निर्मलता निष्कपटता जैसी सद्भावनाओं का उद्गम केन्द्र है या नहीं । यदि वह परिप्लावित हो तो आत्मिक शक्तियाँ भी उगेंगी , फलेंगी । यदि श्मशान जैसी निष्ठुरता और प्रेत-पिशाचों की दुष्टता भर रही होगी तो उस मरघट की जली भूमि पर किसी आत्मिक विभूति के पल्लवित होने की कोई सम्भावना नहीं । इसके अतिरिक्त उच्च सत्त पर आत्मा की महत्ता तथा साधन प्रक्रिया और परिणाम पर गहन श्रद्धा-विश्वास का होना भी हृदयवान होने का चिह्न है । इन विशेषताओं से जो सम्पन्न हो उनकी हृदयगत भाव शक्ति जिव्हागत स्वर विनिर्मित करती है जिसे आश्चर्य और अद्भुत कहा जा सके ।

जप सूत्रम् नाम लोक विश्रुत बंगला ग्रन्थावली के रचनाकार प्रख्यात मन्त्रक्ता स्वामी प्रत्यगात्मानन्द के अनुसार हृदय “शिव” और जिव्हा “शक्ति” है । मन्त्रशास्त्रों ने हृदय को अग्नि और जिव्हा को सोम भी कहा है । दोनों का समन्वय धन और ऋण विद्युत वही मन्त्र के चमत्कार के रूप में प्रत्यक्ष होता है ।

जप साधक के रूप में हमने अपने शरीर मन्दिर में वाक् देवी और हृदय देवता की प्रतिष्ठा किस रूप में की है ? , मन्त्र साधना उसी रूप में अपने परिणाम प्रस्तुत करेगी । वाणी के संयम और भावों के परिशोधन के बिना जा मन्त्र जप की उपलब्धियाँ बटोरना चाहते हैं उन्हें निराश होना स्वाभाविक है । यदि सत्य प्रिय हितकारक वचनों के रूप में वाक् देवी की अर्चना की जा सके आत्मीयता, उदारता, गहन श्रद्धा आदि अनेकानेक सद्भावों के पुष्प हृदय देवता पर चढ़ाए जा सके सभी मन्त्र विद्या के महान विज्ञान की प्राप्ति के हम अधिकारी बन सकते हैं । ऐसी स्थिति में शब्द ब्रह्म की भावनापूर्वक साधना की जा सके तो अदृश्य और अप्रत्यक्ष विभूतियाँ हमारे जीवन में दृश्य और प्रत्यक्ष हो सकती हैं ।


गायत्री प्रत्यक्ष कल्पवृक्ष

सुख-शान्ति प्राप्त करने के लिए समूची मानव जाति लालायित है । वह किसी ऐसे कल्पवृक्ष की खोज में है जिसके द्वारा उसकी इच्छाएँ आकाँक्षायें आसानी से पूरी हो सकें । सुरलोक में अवस्थित एक ऐसे ही कल्पवृक्ष का वर्णन पुराणों में मिलता है जिसके नीचे बैठकर जिस भी वस्तु की कामना की जाय वहीं वस्तु तुरन्त सामने उपस्थित हो जाती है । जो भी इच्छा की जाय, तुरन्त पूर्ण हो जाती है ।

पृथ्वी पर भी एक ऐसा कल्पवृक्ष है , जिसमें सुरलोक के कल्पवृक्ष की सभी संभावनायें छिपी हुई हैं । अध्यात्म विद्या के अनुसंधानकर्ता मनीषी वैज्ञानिकों ने उस कल्पवृक्ष को ढूँढ़ निकाला है और प्रमाणित कर दिया है कि वह सर्वसुलभ है । उसे जो चाहे सो आसानी से पा सकता है और मनोवाँछित देवी सुख-सम्पदा का स्वामी बन सकता है । धरती के इस कल्पवृक्ष का नाम है-महाशक्ति गायत्री । गायत्री महामंत्र को स्थूल दृष्टि से देखा जाय तो चौबीस अक्षरों और नो पदों की एक शब्द-शृंखला मात्र है । परन्तु यदि गंभीरतापूर्वक अवलोकन किया जाय तो उसके प्रत्येक पद और अक्षर में ऐसे तत्वों का रहस्य छिपा हुआ मिलेगा, जिनके द्वारा कल्पवृक्ष के समान ही समस्त इच्छाओं की पूर्ति हो सकती है ।

शास्त्रों में गायत्री कल्पवृक्ष का वर्णन मिलता है । इसमें बताया गया है कि - “ॐ“ ईश्वर अर्थात् अर्थात् आस्तिकता ही भारतीय धर्म का मूल है । इससे आगे बढ़कर उसके तीन विभाग होते हैं भूः, भुवः , स्वः । भूः का अर्थ है - आत्मज्ञान । भुवः का अर्थ है- कर्मयोग स्वः का तात्पर्य है- स्थिरता , समाधि। इन तीन शाखाओं में से प्रत्येक में तीन-तीन टहनियाँ निकलती है , उनमें से प्रत्येक के भी अपने-अपने तात्पर्य हैं । तत्-जीवन विज्ञान । सवितु-शक्ति संचय वरेण्यं-श्रेष्ठता । भर्गो-निर्मलता । देवस्य-दिव्य दृष्टि । धीमहि-सद्गुण । धियो-विवेक । योनः-संयम प्रचोदयात्-सेवा । भौतिक नौ रत्नों की तुलना में इन गुणों की महिमा-महत्ता कहीं अधिक है । गायत्री महाशक्ति हमारी मनोभूमि में इन्हीं को बोती है, फलस्वरूप अन्तराल रूपी खेत में जो उगता है, वह कल्पवृक्ष से किसी भी प्रकार कम नहीं होता ।

इनमें से प्रथम-जीवन विज्ञान की जानकारी होने से मनुष्य जन्म-मरण के रहस्य को समझ जाता है । उसे मृत्यु का भय नहीं लगता, सदा निर्भय रहता है । उसे शरीर का तथा साँसारिक वस्तुओं का लोभ भी नहीं होता । फलस्वरूप जिन साधारण हानि-लाभों के लिए लोग बेतरह दुख के समुद्र में डूबते और हर्ष के मद में उछलते-फिरते हैं, उन उन्मादों से वह बच जाता है ।

गायत्री कल्पवृक्ष की दूसरी देन है-शक्ति संचय की प्रेरणा । शक्ति संचय की नीति अपनाने वाला दिन-दिन अधिक स्वस्थ, विद्वान, प्रतिभाशाली, धनी, सहयोग सम्पन्न प्रतिष्ठावान बनता जाता है । निर्बलों पर प्रकृति के बलवानों के तथा दुर्भाग्य के आये दिन जो आक्रमण होते रहते हैं, उनसे वह बचा रहता है और शक्ति सम्पादन के कारण जीवन के नाना-विधि आनन्दों को स्वयं भोगता तथा अपनी शक्ति द्वारा दुर्बलों की पीड़ितों की सहायता करके पुण्य का भागीदार बनता है । अनीति वहीं पनपती है जहाँ शक्ति का सन्तुलन नहीं होता । शक्ति संचय का स्वभाविक परिणाम है-अनीति का अंत जो कभी के लिए कल्याणकारी है ।

वरेण्यं-अर्थात् श्रेष्ठता गायत्री की तीसरी उपलब्धि है । श्रेष्ठता का अस्तित्व परिस्थितियों में नहीं विचारो में होता है । जो व्यक्ति साधन सम्पन्नता में बढ़े-चढ़े हुए हैं, परन्तु लक्ष्य, सिद्धान्त, आदर्श एवं अंतःकरण की दृष्टि से गिरे हुए हैं , उन्हें निकृष्ट ही कहा जायगा । ऐसे व्यक्ति अपनी आत्मा की दृष्टि में और दूसरे सभी विवेकवान व्यक्तियों की दृष्टि में, नीची श्रेणी के ठहरते हैं और अपनी नीचता के दण्ड स्वरूप आत्म-प्रताड़ना, ईश्वरीय दण्ड और बुद्धिभ्रम के कारण मानसिक अशान्ति में डूबते रहते हैं । इसके विपरीत गायत्री कल्पतरु का आश्रय लेने वाला साधक भले ही गरीब एवं साधनहीन क्यों न हो, उसका अन्तः करण उच्च तथा उदार बनता जाता है और वह श्रेष्ठता की श्रेणी में जा बैठता है । यही श्रेष्ठता उसके लिए इतने आनन्द का उद्भव करती रहती है जो बड़ी साँसारिक सम्पदा से भी संभव नहीं ।

निर्मलता-गायत्री कल्पतरु की चौथी उपलब्धि है- निर्मलता अर्थात् सौंदर्य, वह वस्तु है जिसे मनुष्य ही नहीं पशु-पक्षी एवं कीट-पतंग तक पसन्द करते हैं । कुरूपता एवं रुग्णता का कारण गन्दगी ही है, चाहे वह बाहरी हो अथवा आभ्यंतरिक । शारीरिक गन्दगी जब मनुष्य को अस्वस्थ, निकृष्ट एवं निन्दनीय बनाती है, तो यदि यही मलिनता मनमें, बुद्धि में, अन्तःकरण में भरी हुई हो तब कहना ही क्या । ऐसे व्यक्ति का स्वरूप हैवान और शैतान से भी बुरा हो जाता है । इन विकृतियों से बचने का एकमात्र उपाय सर्वतोमुखी ‘निर्मलता’ है । गायत्री का ‘भर्ग’ तत्व भीतर-बाहर सब ओर से अपने उपासक को निर्मल बनाता है । शरीर, मन एवं कर्म से जो शुद्ध है, निर्मल है, वह सब प्रकार सुन्दर, प्रसन्न , प्रफुल्ल, मृदुल एवं सन्तुष्ट दिखाई देगा ।

पांचवीं उपलब्धि है-दिव्य दृष्टि । दिव्य दृष्टि से देखने का अर्थ है संसार के दिव्य तत्वों के साथ अपना संबंध जोड़ना । हर पदार्थ अपने सजातीय पदार्थों को अपनी ओर खींचता है और उन्हीं की ओर खुद खिंचता है । जिनका दृष्टिकोण संसार की अच्छाइयों को देखने-समझने और अपनाने का है, वह चारों ओर अच्छे व्यक्तियों को देखते हैं । जिनकी दृष्टि दूषित है, उनके लिए प्रत्येक प्राणी बुरा है, पर जो दिव्य दृष्टि वाले हैं वे ईश्वर की इस परम-पुनीत फुलवारी में सर्वत्र आनन्द ही आनन्द बरसता देखते हैं ।

सद्गुणों-का उन्नयन एवं अवधारण इस कल्प वृक्ष की सबसे बड़ी देन है । गायत्री का अवलम्बन लेने वाले अपने में अच्छी आदतें , अच्छी योग्यतायें अच्छी विशेषतायें धारण करते और आनन्दमय जीवन व्यतीत करते हैं । विनयशीलता , नम्रता , शिष्टाचार, मधुरभाषण, उदार व्यवहार, सेवा-सहयोग, ईमानदारी, परिश्रमशीलता, समय की पाबन्दी, नियमितता , कर्तव्यपरायणता , जागरुकता, धैर्य, साहस, पराक्रम, पुरुषार्थ, आशा , उत्साह आदि सद्गुण हैं । इस प्रकार की सम्पदा जिसके पास है, वह आनन्दमय जीवन बितायेगा, इसकी कल्पना सहज ही की जा सकती है ।

धियो-विवेक एक प्रकार का वह आत्मिक प्रकाश है जिसके द्वारा सत्य-असत्य की , उचित-अनुचित की , आवश्यक-अनावश्यक की, हानि-लाभ की परीक्षा होती है । इस सम्बन्ध में देशकाल, परिस्थिति, उपयोगिता, जनहित आदि बातों को ध्यान में रखते हुए सद्बुद्धि से निर्णय किया जाता है, वही प्रामाणिक एवं ग्राहय होता है । जिसने उचित निर्णय कर लिया तो समझना चाहिए उसने सरलतापूर्वक सुख-शान्ति के लक्ष्य तक पहुँचने की सीधी राह पाली ।

संयम-अर्थात् तप स्वयं में कल्पवृक्ष के समान फलदायी है । गायत्री के यो नः अक्षर मानवी मनोभूमि को संयम की हर कसौटी पर कसने योग्य खरा बनाने की प्रेरणा देते हैं । जीवनी शक्ति का , विचार शक्ति का , अर्थ, समय एवं श्रम का, भोगेच्छा का सन्तुलन ठीक रखना ही संयम है । मानव शरीर आश्चर्यजनक शक्तियों का केन्द्र है । यदि उन शक्तियों का अपव्यय रोककर उपयोगी दिशा में लगाया जाय तो अनेक आश्चर्यजनक सफलतायें मिल सकती हैं और जीवन की प्रत्येक दिशा में उन्नति हो सकती है ।

गायत्री कल्पवृक्ष का नवाँ नवरत्न है-प्रचोदयात् सेवा। सहायता, सहयोग ,प्रेरणा, उन्नति की ओर, सुविधा की ओर किसी को बढ़ाना यह उसकी सबसे बड़ी सेवा है । इसी दिशा में हमारा शरीर और मन-मस्तिष्क सबसे अधिक हमारी सेवा का पात्र है क्योंकि वह हमारे सबसे अधिक निकट है । आमतौर से दान देगा , समय देना या बिना मूल्य अपनी शारीरिक मानसिक शक्ति किसी को देना सेवा कहा जाता है और यह अपेक्षा नहीं की जाती कि हमारे इस त्याग से दूसरों में कोई क्रिया शक्ति , आत्म निर्भरता, स्फूर्ति-प्रेरणा जाग्रत हुई या नहीं । दूसरों को आलसी , परावलम्बी और भाग्यवादी बनाने वाली हानिकारक सेवा भी एक प्रकार की सेवा है । सेवा वही उत्तम है जो दूसरों में उत्साह, आत्म-निर्भरता और क्रियाशीलता को सतेज करने में सहायक हो । सेवा का फल है-उन्नति । सेवा द्वारा अपने को तथा दूसरों को समुन्नत बनाना, संसार को अधिक आनन्दमय बनाना सबसे महान पुण्य कार्य है । इस प्रकार के सेवाभावी पुण्यात्मा साँसारिक और आत्मिक दृष्टि से सदा सुखी और सन्तुष्ट रहते हैं ।

यही है पृथ्वी का वह कल्पवृक्ष जो अपने उपासक को, आश्रित को भौतिक एवं आध्यात्मिक सम्पदाओं से भरा पूरा बनाता है । जिनके पास गायत्री के उक्त आध्यात्मिक नवरत्न हैं वे इस भूतल के कुबेर हैं । भले ही उनके पास धन-दौलत , जमीन-जायदाद न हो। यह नवरत्न मण्डित कल्पवृक्ष जिनके पास है वह विवेकयुक्त मनुष्य सदा सुरलोक की सुख, सम्पदा भोगता है । उसके लिए यह भूलोक ही स्वर्ग है । गायत्री को ‘सर्वकामधुक्’ अर्थात् समस्त कामनाओं को पूरा करने वाला कहा गया है । यही वह कल्पतरु है जो हमें चारों फल देता है । धर्म , अर्थ, काम , मोक्ष की चारों सम्पदाओं से स्थायी सुख-शान्ति से हमें परिपूर्ण कर देता है ।


समर्थता का आधार-यौन शुचिता

आधुनिकता और प्रगतिशीलता के नाम पर पनप रहे अनेकों फैशनों में यौन उच्छृंखलता आज सर्वोपरि बनी हुई है । पश्चिम में पैदा हुई यह व्याधि धरती की समस्त भौगोलिक सीमा-रेखाओं का तहस-नहस कर एक छोर से दूसरे छोर तक फैल चुकी है । अन्तर कम और ज्यादा का भले हो पर शायद ही कोई ऐसा भूखण्ड बचा हो जिसके निवासी इस महामारी के कीटाणुओं की ओर ललचाई नजरों से न देखने लगे हों । अमरीका एवं योरोप जैसे देशों में कच्ची उम्र के किशोर-किशोरियाँ तो इससे बुरी तरह तबाह हो रही हैं । इंडियाना पोलिस में किए गए सर्वेक्षण के अनुसार तकरीबन एक हजार में साठ प्रतिशत से अधिक ऐसे अनुभवों से गुजर चुके हैं । इंडियाना युनिवर्सिटी तथा इंडियाना पोलिस के मैरियन काउंटी द्वारा प्रस्तुत ये सर्वेक्षण रिपोर्टें नई पीढ़ी में फैल रहे इस खतरनाक रुझान को व्यक्त करती हैं । कैलीफोर्निया युनिवर्सिटी की सुप्रसिद्ध समाजशास्त्री डा. लिलियन रियूबिन का कहना है कि साठ से सत्तर के दशक में आए सामाजिक परिवर्तनों से अमेरिका के किशोर वर्ग में इस भावना ने जन्म लिया । अस्सी के दशक में इसके प्रगतिशीलता का पर्याय बना दिये जाने के बाद तो इसने सारे सामाजिक और क्षेत्रीय बन्धनों को तोड़ कर फेंक दिया ।

इस संदर्भ में अनुसंधान कर रहे मिनेसोटा विश्वविद्यालय में समाज शास्त्र की प्राध्यापक डा. इश-रीस का कहना है कि बात केवल नई पीढ़ी की नहीं है । उसका तो सिर्फ इतना दोष है जो वह पुरानी पीढ़ी द्वारा सौंपी गई विरासत का उपभोग कर रही है । ठीक भी है कोई जन्मतः प्रशिक्षित नहीं होता । अपने आचार, विचार, मान्यताओं चिन्तन जीवन शैली का ज्यादातर भाग उसे परिवेश से सीखने को मिलता है । सिखाने वाले प्रौढ़ जब स्वयं इस तरह के दूषित जीवन को अपने ऐश्वर्य का, प्रगति का पैमाना मानने लगें, तब उपचार दुष्कर हो जाता है । इस प्रक्रिया की घातक उपलब्धि जर्जर और निर्वीर्य समाज के रूप में होना स्वाभाविक है । जो आज सामने है । तथ्य सिर्फ पश्चिम के किसी एक या अनेक देशों तक सीमित नहीं है । भारत की महानगरीय जीवन दशा की लगभग वही स्थिति बनती जा रही है जो वहाँ की है यही कारण है कि परिवार का अस्तित्व ही खोता जा रहा है । इस आधार के टूटने पर न जाने कितने दम्पत्तियों को तनाव, मन मुटाव, कलह से लेकर विग्रह तक ढेरों दुष्परिणाम भुगतने पड़ रहे हैं । यही हाल किशोर तरुण छात्र-छात्राओं का है । उनके निस्तेज धँसे गाल वाले चेहरे हीन मनोबल, हताशा, निराशा, कुण्ठा भरे जीवन के पीछे कुछ इसी तरह के तथ्यों की खोज मनोवैज्ञानिक करते हैं ।

पीढ़ियों के अन्तर और सभ्यता की यात्रा के साथ इन विकृतियों को आज हम कुछ भी नाम क्यों न दे लें, पर किसी समय यौन पवित्रता और संयम को सारी पृथ्वी पर परिवार की, दाम्पत्य सम्बन्धों की और स्वस्थ जीवन की रीढ़ समझा जाता था । इनका उल्लंघन करने वाला कोई भी क्यों न हो दंडनीय माना जाता था । क्लियोपेट्रा की कहानी सभी जानते हैं , जिसने अपने भाई को उन्मुक्त जीवन में बाधा मान कर मौत के घाट उतार दिया । यहाँ तक कि रोमन सम्राट सीजर को अपने रूप का दास बना लिया । पचास साल के बूढ़े सीजर और बीस वर्ष की क्लियोपेट्रा की कोई संगीत न थी ? पर वासना और महत्वाकाँक्षा की अन्धी दौड़ में सीजर को जन रोष का शिकार होना पड़ा । तथा क्लियोपेट्रा मो सर्प दंश से आत्म हत्या करनी पड़ी । फिलिस्तीन में अतिथि बनकर आयी इथोपिया की महारानी शीषा की कामवासना भड़काकर वहाँ के सम्राट सोलोमन ने क्षणिक सन्तुष्टि भले पाली हो, पर इसके लिए अपने सहयोगियों के रोष और विरोध का भाजन बनकर अपराधियों के कटघरे में खड़े होना पड़ा।

यौन शुचिता के सम्बन्ध में लोक मर्यादाओं और आवश्यक नियमों का पालन सिर्फ सामाजिक मर्यादा बनाए रखने के लिए नहीं बल्कि स्वयं के व्यक्तित्व को समर्थ बनाने के लिए जरूरी है । इस मामले में ढीले और कमजोर व्यक्तियों को हर कहीं अप्रामाणिक और अविश्वसनीय माना जाता है । उन्हें कोई गम्भीर दायित्व नहीं सौंपे जाते । मनोविज्ञानियों के अनुसार स्त्री हो या पुरुष उच्छृंखल भावना जिनमें भी होगी, वे अस्थिर स्वभाव के होंगे। जहाँ उन्हें आकर्षक व्यक्तित्व दिखाई दिया सौंपे गए कार्यों का दायित्व अनुभव करने की जगह उनके चित्त में प्रतिपक्षी को प्राप्त करने की इच्छा उठने लगेगी। यहाँ उच्छृंखलता का मतलब इतना भर नहीं कि ऐसे वातावरण में रहकर स्त्री पुरुषों के संपर्क में आते ही व्यक्ति अपनी योजना को पूरा ही कर ले। वरन् सिनेमा देखने से लेकर रोमांटिक कथाओं या युवतियों के चित्रों के साथ प्रचारित विज्ञापनों पर नजरें गड़ाने का लगाव भी व्यक्ति की अनियंत्रित वासना का ही परिचय देता है। मानस शास्त्रियों के मुताबिक यह भी भोग ही है। भारतीय दर्शन में तो आठ प्रकार के मैथुनों में सात इसी तरह के माने गए हैं।

मनोविज्ञान के जानकार इस तथ्य को भली प्रकार जानते हैं कि व्यक्ति की भावनाएँ उसके शरीर स्वास्थ्य और क्रिया शक्ति को कितना प्रभावित करती हैं। जब मनोभूमि ही दूषित होगी तो कार्य और प्रवृत्तियाँ कहाँ स्वस्थ रह पाएँगी? इन प्रवृत्तियों को उभारने एवं पनपने के लिए समाज व्यवस्था और व्यवसाय तन्त्र भी कम जिम्मेदार नहीं है। व्यावसायिक प्रतिष्ठान तो एक तरह से मनुष्य की इस कमजोरी का लाभ उठाने पर उतारू दीखते हैं विज्ञापनों में मॉडलिंग का व्यवसाय इसी कमजोरी से लाभ उठाने का अंग है।

वस्तुतः मनुष्य इसके लिए स्वयं उत्तरदायी है क्योंकि वह खुद ही अपनी वासना को अनियन्त्रित विस्तार देता है। फ्रायडवादी कतिपय बुद्धिजीवियों द्वारा किये जाने वाला यह प्रचार कि मनुष्य को उन्मुक्त यौन जीवन की छूट मिलनी चाहिए, नितान्त उथली दृष्टि से किया गया चिन्तन है। यह उस निर्बल मन की उपज है-जिसे विषय की पर्याप्त जानकारी नहीं। मानवीय चेतना के जानकार मनीषी प्राण और उसके अनेक स्तरों को भली प्रकार जानते हैं। उनके अनुसार प्राण का एकमेव उद्देश्य है उर्ध्वगमन ताकि मनुष्य दिव्यता के चरम शिखर पर स्वयं को प्रतिष्ठित कर सके। इसका अधोगामी प्रवाह मनुष्य को पशुता की ओर बरबस घसीट ले जाता है। जहाँ पहुँचकर वासनाओं का उद्दीपन तो होता है, पर संतृप्ति नहीं। वासनाओं की अनियंत्रित आग में ईंधन की भाँति सुलगता प्राणतत्व अपने साथ समूचे जीवन को राख के ढेर में बदल देता है।

भारतीय संस्कृति में सुसंस्कारों के नैतिकता के स्थापित मूल्य प्रत्येक व्यक्ति के अन्तरंग में बिठाने का प्रयत्न किया जाता है और उच्छृंखल वासना की अवाँछनीयता पर कड़ा अनुशासन बरता जाता है। इस जीवन रेखा का उल्लंघन करने का मतलब है स्वयं को नष्ट करने पर उतारू हो जाना। ऐसा करने वाला सिर्फ अपने प्राण तत्व को नष्ट नहीं करता, बल्कि उसमें संस्कार गत जीवन मूल्यों को तोड़ने की एक अपराध भावना भी जन्म लेती है जो उसे कभी स्थिर एकाग्र नहीं होने देती। स्थिरता के अभाव में कार्य में असफलता तो मिलती ही है, समूचा अस्तित्व अपराध बोध की कालिमा से पुते बगैर नहीं रहता।

इन सबका परिणाम खंडित व्यक्तित्व के रूप में निराश और कुँठित व्यक्ति के रूप में चित्त की अस्थिरता और चंचलता के रूप में मिलता है। व्यक्तिगत दृष्टि से टुकड़े-टुकड़े कर टूटा व्यक्तित्व और सामाजिक दृष्टि से अविश्वसनीयता अप्रामाणिकता यही उद्वेलित वासना की उपलब्धि है। अतः आवश्यक है कि जीवन के श्रेष्ठतम उपयोग और सफलता की प्राप्ति के लिए वासनाओं को यौन भावनाओं को नियंत्रित किया जाय।

तथ्यों का विश्लेषण और उन पर विचारपूर्वक मनन किया जाय तो यह बोध हुए बिना न रहेगा कि प्रगतिशीलता विवेक के विकास की यात्रा है। आधुनिकता का सही मतलब है परिवेश और जीवन में सामंजस्य स्थापित करते हुए उच्चतर उद्देश्यों की ओर बढ़ना, यद्यपि स्वयं की अधोगामी प्रवृत्तियों को ऊर्ध्वमुखी बनाना सरल है। इसमें कठिनाई इतनी भर है कि विगत अभ्यास को छोड़कर नए अभ्यास का प्रारम्भ करना होता है संकल्प को प्रखर बनाना पड़ता है।

कुछ ही काल बाद कठिनाई सहजता में बदल जाती है और सहजता उस उपलब्धि में जीवन भर संघर्ष किया। अपनी भावनाओं को सृजनात्मक दिशा देने वाले

मोहनदास करोड़ों में प्राण फूँकने वाले महात्मा गाँधी हो गए। यौन भावना को ऊर्ध्वमुखी बनाकर संसार में आश्चर्यजनक सफलता पाने वाली ज्ञात अज्ञात विभूतियों का विवरण इकट्ठा किया जाय तो उनकी संख्या हजारों में नहीं लाखों में हो सकती है। यदि इतना संभव न बन पड़े तो कम से कम निज की अनियंत्रित वासनाओं को नियंत्रित तो किया ही जाना चाहिए। स्वयं की शक्तियों को अनेक छिद्रों से न बहाकर उन्हें एकाग्र कर शक्ति संचय कर जिस कार्य में भी जुटा जाय सफलता का राजमुकुट उसी क्षेत्र में प्रतीक्षारत मिलेगा। इसके विपरीत यदि दीपक की पेंदी में छेद हो, तेल की दिशा अधोमुखी हो तो न दिया जलेगा न तेल बचेगा। यह तथ्य प्रत्येक उम्र प्रत्येक परिवेश और प्रत्येक जीवन के लिए सत्य है।


ध्यान करें, तो किसका व कैसे?

ध्यान योग की साधना में अंतःकरण को प्रबल बनाना पड़ता है। वह मन पर अनुशासन स्थापित करने के लिये तत्पर होता है। उसके अनगढ़पन को- अल्हड़पन को उच्छृंखलता छोड़ने और व्यवस्था के अंतर्गत रहने के लिये सधाता है । यह कार्य लगभग वैसा ही है जैसा कि सरकस के लिये हिंस्र पशुओं को साधने सिखाने के लिये रिंग मास्टर द्वारा किया जाता है । ध्यान में न केवल मन की अनियंत्रित भाग-दौड़ को रोक कर किसी सीमित परिधि में चिन्तन करने के लिये विवश किया जाता है वरन् उसे सदुद्देश्य अपना कर उपयोगी मार्ग पर चलने के लिये भी सहमत किया जाता है । मानसिक क्षेत्र पर विवेकशील सुव्यवस्था का शासन स्थापित करने के लिये ध्यान योग का विज्ञान विनिर्मित किया गया है ।

ध्यान योग का प्रथम चरण यह है कि विचारों की एक विशेष परिधि में ही दौड़ने का अभ्यास कराया जाय। यह कार्य उपासना क्षेत्र में धर्म परायण साधकों द्वारा इष्टदेव की छवि का ध्यान करने के रूप में किया जाता है । इसके लिये किसी प्रतिमा को आधार बनाया जाता है । अवतारों की, देवताओं की छवियाँ, मूर्तियाँ एवं तस्वीरों के रूप में सामने रहती हैं । आरम्भ में उन्हें खुली आँखें बन्द करके सूक्ष्म नेत्रों में निहारने का अभ्यास किया जाता है । इन छवियों में देवताओं को विस्तृत कलेवर धारण किये हुए चित्रित किया जाता है । उन्हें चित्र विचित्र वस्त्र, आभूषण, शस्त्र वाहन, प्रिय पदार्थ आदि सहित सुसज्जित रखा जाता है ताकि मन को भगदड़ के लिये कितनी ही तरह की वस्तुएँ मिल सकें । देर तक एक जगह टिकने की आदत को इस प्रकार समाधान मिल जाता है कि इष्टदेव की छवि के साथ जिस सरंजाम को जुटाया गया है उन पर वह आसानी से उछलकूद करता रहे। यह प्रथम अभ्यास है, कहीं भी भाग दौड़ने की आदत को इस उपाय से एक सीमित परिधि में उछलकूद करते रहने का अवसर मिलता है। इस प्रकार मनोनिग्रह का प्रथम चरण सीमित भगदड़ का उद्देश्य कुछ समय में पूरा होने लगता है।

इस साकार उपासना में मन को अधिक रुचिपूर्वक लगाये रहने के लिए इष्टदेव की सामर्थ्य का माहात्म्य पहले से ही मन को समझा दिया जाता है। उनके अनुग्रह से क्या-क्या लाभ वरदान मिल सकते हैं, यह कल्पना पहले से ही रहती है। इसके अतिरिक्त इष्टदेव के प्रति गुरुजनों जैसी सघन श्रद्धा का भी आरोपण रखा जाता है। किसी घनिष्ठ सम्बन्धी के रूप में उन पर आत्मीयता का आरोपण करना आवश्यक होता है। भगवान को, इष्टदेव को किस रिश्ते में बाँध कर उनके साथ भावभरी आत्मीयता उत्पन्न की जाय यह साधक की अपनी इच्छा पर निर्भर है। इसके लिये रुचिपूर्वक चयन करने की पूरी छूट दी गई है। भगवान को “त्वमेव माता च पिता त्वमेव, त्वमेव भ्राता च सखा त्वमेव” आदि स्तवनों में माता पिता, गुरु जैसे पूज्य स्तर में भ्राता, सखा जैसे समान स्तर में से किस स्थापना को अपनाया जाय, यह साधक की अपनी इच्छा पर निर्भर है। स्त्रियाँ उन्हें पति रूप में भी रख सकती हैं। मीरा ने उन्हें इसी संबंध सूत्र में बाँधा था। अन्य साधक “पितु मातु, सहायक स्वामि, सखा तुम्हीं एक नाथ हमारे हो” के अनुसार चयन करते रहते हैं रिश्तेदारों के प्रति सहज आत्मीयता रहती है, इसलिये ध्यान योग के प्रथम चरण में इस प्रकार के लौकिक सम्बन्धों की स्थापना को मन को आकर्षित किये रहने के लिये आवश्यक माना गया है।

इमारतें बनाने से पूर्व नक्शे एवं मण्डल बनाये जाते हैं। उन्हीं को देख देखकर इमारत बनती है। साँचे पहले बनते हैं। पीछे खिलौने, आभूषण, पुर्जे आदि ढलते चले जाते हैं। इष्टदेव का निर्धारण एवं चयन एक साँचा है जिसमें साधक अपने व्यक्तित्व को ढालने का प्रयत्न करता है। ध्यान प्रतिमाएँ ऐसी ही होनी चाहियें। अन्यथा अर्थ का अनर्थ हो सकता है। यदि इष्टदेव पशु-पक्षी, मद्दयपायी क्रूरकर्मा, व्यभिचारी, छली, दंभी स्तर के चुने गये हों तो निश्चित ही भक्ति भावना के कारण उन दुर्गुणों को साधक की अंतः चेतना अपनाने लग जायगी। ऐसे ध्यान हानिकारक ही सिद्ध होते हैं। तंत्र साधनाओं के अंतर्गत प्रायः इष्टदेव की क्रूरकर्मा छवियों का आश्रय लिया जाता है।

इससे दुस्साहस तो जग सकता है पर चरित्र की दृष्टि से निकृष्टताएँ ही पल्ले बँधती है। वाम मार्गी साधकों की प्रकृति में क्रूरता की अभिवृद्धि किस तेजी से होती है इसे प्रत्यक्ष देखा जा सकता है।

सौम्य इष्टदेवों का चयन ही ध्यान योग की साकार कक्षाओं में चुना जाता चाहिए। उदाहरण के लिये शिव मस्तिष्क में प्रवाहित होने वाली सद्विचारों की ज्ञान गंगा, मस्तिष्क पर धारण किया हुआ संतुलन रूपी चन्द्रमा, विवेकशील दूरदर्शिता का प्रतिनिधि तृतीय नेत्र विश्व कल्याण के लिये गरल पान का बलिदानी नील कंठ सर्प जैसे दुष्टों को भी गले लगाकर सुधार प्रयास, गले में मुण्ड माला, मरण की स्मृति हृदयंगम किये रहने, कटि प्रदेश में व्याघ्र चर्म, सिंह जैसा पराक्रम, डमरू उद्बोधन, भूत प्रेतों की सेना, पिछड़े लोगों का उत्थान, इस प्रकार की अनेकों सत्प्रेरणा शिव की छवि में उभरती हैं। गंगावतरण में सहयोग जैसे अनेकों दिव्य चरित्रों में ध्यान कर्ता के लिये एक से एक बढ़ी चढ़ी प्रेरणाएँ विद्यमान हैं। किन्हीं ने कुछ अवाँछनीय तत्व इस चित्रण में जोड़ दिये हों तो उन्हें विवेक बुद्धि से उपेक्षित कर जोड़ दिये हों तो उन्हें विवेक बुद्धि से उपेक्षित कर देना, अमान्य ठहरा देना ही उचित है।

आत्मिक प्रगति की साधनाओं में ध्यान को प्रधानता दी गई है। इसके बिना इस क्षेत्र में बढ़ सकना संभव ही नहीं हो सकता। जिनकी अति चंचल प्रकृति है, जिन्हें अध्यात्म क्षेत्र का कुछ भी अनुभव नहीं है, उन्हें चिंतन को इस प्रयोजन के लिये एकाग्र करने तथा गहराई में उतरने के लिये आकर्षक उपचार खड़े करने पड़ते हैं। देव पूजा के लिये प्रतिमाओं का आधार बनाया जाता है और उनकी अर्चना के लिये कतिपय कर्मकाण्डों के विधान बनाये जाते हैं। देव प्रतिमाओं की आकृति यौवन से उत्फुल्ल नख-शिख तक आकर्षक होती है। उन पर वस्त्र आभूषणों की सुसज्जा की जाती है, सुगन्ध लेपन, पुष्प, उपकरण, चंवर, छत्र, वाहन आयुध आदि से प्रतिमा का समीपवर्ती क्षेत्र ऐसा बनाया जाता है जिससे आँखों का समुचित आकर्षण तथा देखने के लिये सुन्दर उपकरण मिल सकें। यह विश्रृंखलित ध्यान को उस प्रतिमा पर केन्द्रित एकाग्र करने की परिचर्या कही जा सकती है। आचमन, पाद्य, अर्घ्य, अक्षत, नैवेद्य-धूप, आरती जैसे उपचारों में भी नवीनता रहने में मन लगता है। मन्दिर की किवाड़ें छतें, फर्श आदि को भी सुन्दर रखने का विधान है। देवता की गरिमा का गुण गान होने से उसके महत्व को, प्रताप को, अनुग्रह को समझने और तद्नुरूप आत्मभाव उत्पन्न करने की प्रेरणा मिलती है। देव दर्शन एवं देव पूजन के जहाँ अन्य आध्यात्मिक लाभ हैं, वहाँ ध्यान एकाग्रता का अभ्यास भी बहुत हद तक पूरा होता है। देव पूजा की प्रक्रिया के दिव्य लाभ तो हैं ही साथ ही ध्यान रखने से उत्पन्न होने वाली मानसिक प्रखरता भी कम महत्वपूर्ण नहीं है।

देव पूजन, धर्मानुष्ठान, एवं शास्त्र पाठ, कीर्तन, जैसे धर्मोपचारों का वर्णित माहात्म्य अपनी जगह पर सही होने के अतिरिक्त एकाग्रता का अभ्यास भी कम महत्वपूर्ण नहीं है धर्मानुष्ठान के विविध प्रयोग बनाते समय तत्त्वदर्शियों ने जन साधारण का ध्यान धारण का अभ्यास कराने की बात को भी ध्यान में रखा है।

ध्यान योग से दो प्रयोजनों की पूर्ति होती है एक एकाग्रता दूसरी सतर्क गंभीरता। बिखरे विचारों को एक केन्द्र पर केन्द्रित कर सकने की कला यदि किसी को हस्तगत हो जाय तो वही अपनी प्रचण्ड मनःक्षमता को अभीष्ट प्रयोजन में लगाकर आशातीत सफलता प्राप्त कर सकता है। असफलताएँ प्रायः अन्यमनस्कता का ही दुष्परिणाम होती हैं। उपेक्षा की स्थिति में समुचित मनोयोग जुट नहीं पाता और हाथ में लिये हुए काम

आधे अधूरे रहकर असफलता का ही निमित्त बनते हैं।

यह कभी गंभीर दृष्टि का विकास होने से ही पूरी हो सकती है। ध्यान साधना में एकाग्रता का तथा मनोयोगपूर्वक गंभीर चिंतन का अभ्यास होता है। इसमें जिसे जितनी सफलता मिलेगी उसकी मानसिक प्रखरता उतनी ही तीक्ष्ण होती चली जायेगी। कहना न होगा कि इस उपलब्धि के कारण न केवल आत्मिक क्षेत्र में वरन् भौतिक क्षेत्र में विचित्र प्रकार की सफलताएँ प्राप्त होती हैं। ध्यान-धारणा के सहारे उपलब्ध होने वाली मानसिक प्रखरता जीवन के हर क्षेत्र में सहयोगी बनकर सफलताओं का द्वार खोलती है। आत्मिक प्रगति का उद्देश्य तो पूरा होता ही है।


अब्दुल गफफारखाँ (Kahani)

बात बंगाल के कुमिल्ला जिले की है। एक अतिथि के स्वागत में तरह-तरह के मिष्ठान व पकवान बनवाये गए। माननीय अतिथि भोजन के लिये बैठे और उतने प्रकार के तरह-तरह के भोजन देखते ही बोले “जिस देश में हजारों लोगों को एक समय भोजन मिलता हो वहाँ ऐसा भोजन करने का किसी को अधिकार नहीं।” अतिथि थे सीमान्त गाँधी खान अब्दुल गफफारखाँ।


विस्फोट की स्थिति आने ही क्यों दे?

गुब्बारे की झिल्ली एक सीमा तक ही हवा का दबाव सहन कर सकती है। जब उसे अति मात्रा में फुलाया जाता है तो निश्चित परिणाम फट जाना ही होता है। स्टोव फटने, सिलेण्डर फटने, बायलर फटने जैसी दुर्घटनाओं को समाचार आये दिन सुनने को मिलते रहते हैं। इन सब में एक ही कारण होता है कि कलेवर में जितना धारण करने की क्षमता है उससे कहीं अधिक भर जाता है। भीतर का पदार्थ जब बाहर निकालने के लिए जोर लगाता है और खोल में उसे दबाये रहने की क्षमता नहीं होती, जब परिणाम वही होता है जो होना चाहिए।विस्फोट इसी स्थिति का नाम है।

मानव जीवन में अनेक बार ऐसा होता है कि गाड़ी चलते-चलते रुक जाती, वरन् उलटती,टकराती भी देखी गई है। सीमा से बाहर का दबाव सदा वैसी ही विकृत विभीषिकाएँ खड़ी करता है।

आहार-विहार में घुसी हुई असंयमशीलता बहुमूल्य अंग-अवयवों में विषाक्तता उत्पन्न करती रहती है। यह संचय धीरे-धीरे बढ़ता है और गहराई में उतरता जाता है। वह अवांछनीय बढ़ोत्तरी आरम्भ में तो सामान्य मालूम पड़ती,काम चलता रहता है, पर जब संग्रह असाधारण मात्रा में हो जाता है तो ऐसी परिणति उभरती है जो संभाले नहीं सँभलती। गले हुए अवयव इतने जर्जर हो जाते हैं तब भीतर से उफनने वाले उबाल को सहन नहीं कर पाते, फलतः कैन्सर,अल्सर, क्षय,रक्तचाप जैसे ऐसे रोग उबल पड़ते हैं जो दवा-दारु की रोकथाम स्वीकार नहीं करते और जो कुछ बचा-खुचा होता है उसे भी समेट ले जाते हैं। यह लूट-खसोट एक प्रकार का विस्फोट ही है। यह उस गलती का परिणाम है जिससे औचित्य की मर्यादा का ध्यान नहीं रखा जाता और अतिवाद अपनाया जाता है।

बुद्ध ने आरंभिक दिनों तपश्चर्या में अतिवाद अपनाया था। आशंका होने लगी थी कि कहीं शिरायें बिखर न जायँ तब देवी चेतना ने उन्हें सुझाया कि मध्य मार्ग अपनाने में हित है। अति सदा विग्रह खड़ी करती है, भले तप जैसा उच्च प्रयोजन ही क्यों न हो? औचित्य और मर्यादा का मध्य मार्ग ही उपयुक्त है। दूरदर्शिता ने उन्हें भूल सुधार लेने के लिए बाधित किया। फलस्वरूप वे आत्मकल्याण और लोक कल्याण के दोनों पक्ष साध कसने में समर्थ हुए।

सादगी में बुद्धिमता और दूरदर्शिता का समावेश है। औसत नागरिक का स्तर अपनाने में ही भलाई है। अतिवादी उछलकर चोटी पर जा पहुँचने की आतुरता दिखलाते हैं। फलतः वे लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने वाले उद्धव कर्म करते हैं। राजमार्ग को छोड़कर खाई-खंदकों को लाँघते हैं। अतिवादी कृत्य करते और ऐसे खतरे उठाते हैं जिनसे बचा जा सकता है। अतिवादी, महत्वाकाँक्षी सफलता तो एक सीमा तक ही पाते है, पर भर्त्सना व्यंग्य और उपहास असाधारण रूप से सहते हैं।

सामान्यजनों की तुलना में अधिक धनी,अधिक प्रख्यात, अधिक बलिष्ठ बनने की आतुरता जिन पर छाई रहती है, उन पर अधिकाधिक प्रगति का भूत छाया रहता है। वे सर्वोपरि, सर्वमान्य, सर्व समर्थ बनना चाहते हैं । यह उद्विग्नता सृष्टि व्यवस्था के प्रतिकूल है । मनुष्य समुदाय की समाज संरचना इस प्रकार हुई है जिसमें सभी साथी सहयोगी और सामान्य स्तर पर निर्वाह करते रहें । कोई न ऊँचा उठे न नीचा गिरे । मध्यवर्ती व्यवस्था-क्रम अपनाये रहने में ही सबकी भलाई है, किन्तु जो साधारण चाल नहीं चलते, कुदकते हैं, उन्हें छलाँगें लगाने में अक्सर ठोकर लगती , चोट पहुंचती और ऐसी मुसीबत आती है जो सँभाले नहीं सँभलती । समृद्धियाँ जितनी भी प्रकार की हैं उनका अपना-अपना नशा होता है। वह एक सीमित मात्रा में ही सहन हो सकता है । यदि वे असाधारण मात्रा में किसी पर चढ़ दौड़ें तो समझना चाहिए कि विकास नहीं विनाश का ही उपक्रम है ।

अधिक धनी बने व्यक्ति पगलाये, बौराये जैसे बनकर रहते हैं । उन्हें अनेकानेक दुर्व्यसन घेर लेते हैं । उद्धत अहंकार बढ़ता है । असाधारण सुन्दर नर-नारी अपनी साज-सज्जा को और भी अधिक बढ़ाते तथा मनचलों को आकर्षित करके उन्हें पतन के गर्त में गिराते हैं । सिद्धि, चमत्कार जिनको हस्तगत होते हैं वे उनका प्रदर्शन करके कितनों को ही लुभाते और उनको चंगुल में फँसाकर उलटे उस्तरे से हजामत बनाते हैं । कइयों को मारण , मोहन, वशीकरण, उच्चाटन आदि आक्रामक प्रहार करते देखा गया है । यह सब प्रकार का अपच है जो असामान्य क्षमताएँ हस्तगत होने पर संतुलित नहीं रह पाता । कुमार्ग एवं अनर्थ का मार्ग अपनाता है ।

उच्च पद एवं अधिकार प्राप्त अफसर अपनी सहज शालीनता गँवा कर उद्धत बनते, दर्प जताते और अकारण लोगों को हैरान करके अपनी शक्तिमत्ता को अभ्यास , अनुभव कराते हैं । यों वे अनुग्रह, सहयोग और न्याय करके सम्बद्ध व्यक्तियों का अधिक हित साधन भी कर सकते हैं, पर ऐसा करते कोई विरले ही देखे गये हैं । अधिक मात्रा में खा लेने पर जिस तरह पेट फूलता और दर्द करता है, उसी प्रकार पचा सकने की सामर्थ्य से अधिक उपलब्ध कर लेने वाले भी स्वयं हैरान होते तथा दूसरों को हैरान करते हैं ।

जिन्हें अधिक संचय की,अधिक बड़े उत्कर्ष की आकाँक्षा है उनके लिए यही उचित है कि अपना खोल मजबूत करें । इतना मजबूत कि जो भरा हुआ है वह उबलने उछलने न पाये । तेजाब अधिक मोटाई की बोतलों में मजबूत ढक्कन लगाते हुए भरा जाता है। अणु भट्टियों की दीवारों बहुत चौड़ी और मजबूत बनाई जाती हैं । समुद्र मन्थन के समय निकले विष को पीने, ले जाने की हिम्मत किसी भी उपस्थित पराक्रमी की नहीं पड़ी, उसे शिव ने गले में धारण किया । सम्पदा और विपदा दोनोँ की ही बढ़ी-चढ़ी मात्रा मनुष्य को विषम परिस्थितियों में धकेल देती हैं । इस विपन्नता से बचने के लिए तीन ही उपाय हैं । एक यह है कि निर्वाह के उपयुक्त सीमित साधन ही जुटाये जायँ । उन्हें कमाने में ईमानदारी तथा उपयोग में विनम्रता, उदारता भरी समझदारी का समावेश किया जाय । दूसरा यह है कि यदि अधिक वैभव अर्जित करने की महत्वाकाँक्षाएँ हैं तो उन्हें इस हाथ कमाते हुए दूसरे हाथ से सदुपयोग प्रयोजन के लिए खर्च करते रहा जाय । आहार उपलब्धि के साथ-साथ मल-मूत्र के त्याग का सिलसिला भी चलते रहना चाहिए। बादल

समुद्र से जल उठाते हैं, पर उसे अपने पास जमा नहीं रहने देते। जहाँ-तहाँ घूमकर, धरातल पर बरसते और हरीतिमा उगाने का निमित्त कारण बनते हैं। तीसरी स्थिति वह है जिसमें किसी महत्वपूर्ण प्रयोजन के लिए बड़ी मात्रा में साधन संग्रहित करने पड़ते हैं। इस संभावना के लिए समुद्यत होने के पूर्व यह आवश्यक है कि अपने कलेवर-आच्छादन को मजबूत तिजोरी जैसा बनाया जाय जिसका तात्पर्य होता है तपस्वियों, महामानवों जैसा व्यक्तित्व विकसित करना। विभूतियों की सुरक्षा और उपयोगिता इसी प्रकार बनती है।


Quotation

अहोकष्टयदस्माभिः पर्वराज्यमनुष्ठितम् इतिपख्यात्पयाज्ञातंयोगान्नारितपरंसुखम् निर्जितेन्द्रियवर्गस्तुत्यक्स्वासंगशेषतः मनोब्रह्मणि संघास्येतज्जयेपरमोजयः मार्कण्डेय पुराण

अब मैं जितेन्द्रिय होकर लोभ मोह को हटाकर केवल परब्रह्म में मन लगाऊंगा। जिसने ब्रह्म को प्राप्त कर लिया उसने सब कुछ प्राप्त कर लिया। हाय, कैसा खेद है? मैंने इतनी आयु ऐसे ही लोभ और अहंकार में गँवादी। अब मुझे पता चला है कि योग की अपेक्षा इस जीवन के और कोई परम सुख नहीं है।


नदी में रीछ (Kahani)

नदी में रीछ बहता जा रहा था । किनारे पर खड़े साधु ने समझा यह कंबल बहता आ रहा है । निकालने के लिए वह तैर कर उस तक पहुँचा और पकड़कर किनारे की तरफ खींचने लगा ।

रीछ जीवित था प्रवाह में बहता चला आया था । उसने साधु को जकड़ कर पकड़ लिया ताकि वह उस पर सवार होकर पार निकल सके । दोनों एक दूसरे साथ गुत्थमगुत्था कर रहे थे । कोई नीचे कोई ऊपर किनारे पर खड़े दूसरे साथी साधु ने पुकारा। कम्बल हाथ नहीं आता तो उसे छोड़ दो और वापस लौट आओ।

जवाब में उस फँसे हुए साधु ने कहा मैं तो कम्बल छोड़ना चाहता हूँ पर उसने तो मुझे ऐसा जकड़ लिया है कि छूटने की कोई तरकीब नहीं सूझती।

व्यसनों को लोग पकड़ते हैं पर कुछ ही दिन में वे उन्हें अपने शिकंजे में कस लेते हैं और छोड़ने पर भी छूटते नहीं।


धर्म धारण के चार चरण

प्रकृति और पुरुष के संयोग-समन्वय से इस निखिल विश्व-ब्रह्माण्ड की संरचना हुई है । जड़-चेतन के सम्मिश्रण से यह संसार बना है । पंच तत्वों में क्रियाशीलता तो है, पर विचारशीलता नहीं । चेतना निराकार होने से विवेचन निर्धारण तो करती है, पर कुछ करने के लिए उसे शरीर या पदार्थों का ही सहारा लेना पड़ता है । यह दोनों जब सही रूप में मिल जुलकर सुनियोजित क्रियाकलाप अपनाते हैं , तभी सुव्यवस्था एवं शान्ति-प्रगति की संभावना बन पड़ती है । बिजली के दोनों तार ठीक प्रकार मिल रहे हों , तभी करेंट चलता है । जड़ और चेतन के बीच सुनियोजित ताल-मेला बिठाये रहना ही सुखद संभावनाओं की संरचना करता है , अन्यथा विनाश और विग्रह के संकट आ धमकते हैं ।

पदार्थ सक्रिय नहीं , उसकी अपूर्णता इसलिए है कि वह संवेदनशील-विचारवान नहीं है । चेतना की अपूर्णता यह है कि वह बिना पदार्थों शरीरों की सहायता के जो उचित अभीष्ट है, उसे कर नहीं पाती । विसंगतियाँ विपन्नताएँ तो घुणाक्षर न्याय से अनायास भी बन जाती हैं । वस्तु स्थिति को समझने वाले तत्त्वदर्शियों ने दोनों की अपनी-अपनी मर्यादाएँ नियत की हैं । उदाहरण के लिए शरीर को कर्मनिष्ठ और चिन्तन को धर्मपरायण बनाना पड़ता है । यदि वे अपनी-अपनी मर्यादाओं को तोड़ने लगें, तो तटबंध टूट जाने पर जिस तरह नदियाँ बाढ़ का रूप धारण करके विनाश पर कटिबद्ध हो जाती हैं, उसी प्रकार कर्त्तव्यपरायणता और धर्मधारणा का व्यक्तिक्रम चल पड़ने पर वैसी ही विसंगतियाँ , विभीषिकाएँ उठ खड़ी होती हैं, जैसी कि वे इन दिनों घटाटोप बनकर सब कुछ उलट-पलट कर देने की चुनौतियाँ दे रही हैं । उपचार एक ही है कि दोनों पक्षों को अपनी मर्यादा में रहने के लिए बाधित किया जाय । न कर्म की उपेक्षा हो, और न धर्म की अवज्ञा भलाई इस अनुशासन के बने रहने में ही है ।

धर्म को समय समय पर आप्तजनों और शास्त्रकारों ने अपने-अपने ढंग से प्रतिपादित व निरूपित किया है, किन्तु समय के अनुकूल धर्म को आज चार चरणों के रूप में समझा जा सकता है । ये हैं- समझदारी, ईमानदारी, जिम्मेदारी और बहादुरी ।इन चारों के समन्वित रूप को यदि धर्म का सारतत्व कहा जाय तो कोई भी अत्युक्ति न होगी ।

“समझदारी” का तात्पर्य है-दूरदर्शी विवेकशीलता को अपनाना। इसी कसौटी पर कस कर खरे खोटे की पहिचान करना । नीर-क्षीर विवेक एवं औचित्य के निर्धारण की विद्या के रूप में भी इसे समझा जा सकता है । किन्तु देखा यह जाता है कि आम लोग तात्कालिक सुविधा-प्रसन्नता और सफलता को ही सब कुछ मान बैठते हैं और इसी संकीर्ण दृष्टिकोण को अपनाकर वह कर बैठते हैं जो तत्काल भर में ही स्वादिष्ट प्रतीत होती हो पर बाद में उसकी प्रतिक्रिया विषतुल्य बनकर ही सामने आती है । चासनी के कढ़ाव में आँख मूँदकर टूट पड़ने वाली मक्खी यही भूल करती है और उस जल्दबाजी में प्राण संकट जैसे अनर्थ में जान गँवा बैठती है । जाल के साथ गुँथे हुए चारे का लोभ संवरण न कर पाने पर चिड़ियाँ और मछलियाँ भी बेमौत करती हैं । जिन्हें आज का, अभी का लाभ ही सब कुछ प्रतीत होता है वे चटोरे कामुक लोगों की तरह शरीर को रुग्ण-दुर्बल बना लेते हैं और अकाल मृत्यु के मुँह में जा पहुँचते हैं । नशेबाज अपव्ययी , दुर्व्यसनी , अपराधी किस प्रकार अपनाई गई उतावली का दुष्परिणाम भुगतते हैं यह किसी से छिपा नहीं है । समझदारी-विवेकशीलता में ही है । नासमझ ही आज को सब कुछ मानते और दुर्बुद्धिजन्य दुष्प्रवृत्ति में फँसकर अपना और अपनों का सर्वनाश करते हैं ।

धर्मधारण का दूसरा चरण है ईमानदारी । नेकनीयती, शालीनता , सज्जनता , प्रामाणिकता आदि का समुच्चय । दूसरों के साथ वही व्यवहार करना चाहिए जा अन्यान्यों से अपने लिए वाँछित है । इसी रीति को ईमानदारी कहते हैं । बेईमान तत्काल भले ही किसी की गिरह काट लें , धोखेबाजी के उपार्जन पर मूँछ मरोड़ लें, पर बाद में जब कलई खुलती है तो उपेक्षा, भर्त्सना, प्रताड़ना के अतिरिक्त और कुछ हाथ नहीं रह जाता । काठ की हाँड़ी दूसरी बार नहीं चढ़ती । ढोल की पोल खुल कर रहती है । धूर्तता अपनाने वालों के लिए अपनी मूर्खता की प्रतिक्रिया का परिणाम सामने आता है तो पश्चाताप के अतिरिक्त और कुछ शेष नहीं रह जाता ।

प्रामाणिकता की कसौटी पर खरे उतरने वाले ही सर्वसाधारण के विश्वास पात्र बनते हैं । उन्हें ही सघन सहयोग और भव भरे सम्मान का लाभ मिलता है । इस प्रकार के लोग ही छोटे से बड़े बनते, ऊँचे पद पाते और अपने कार्यक्षेत्र में बढ़-चढ़ कर सफलता प्राप्त करते हैं । बेईमान व्यक्ति भी ईमानदार नौकर तलाशता है । शराबी भी अपनी बेटी का विवाह किसी ऐसे से करना चाहता है जिसे कोई व्यसन न हो । इससे प्रकट है कि प्रगति पथ पर लम्बा सफर करने वालों के लिए ईमानदारी अपनाने के अतिरिक्त कोई और विकल्प रहता नहीं । संसार में सम्मानित विभूतिवान बनने वालों में से प्रत्येक को अपनी ईमानदारी हर कसौटी पर खरी सिद्ध करनी पड़ी है ।

धर्मधारणा का तीसरा चारण है-जिम्मेदारी । मनुष्य यों स्वतंत्र भी दीखता है और स्वेच्छाचार बरतने में भी अपने को स्वतंत्र मान बैठता है । पर वस्तुतः बात ऐसी है नहीं । जो जितना प्रतिष्ठित और परिष्कृत हैं उसे उतना ही अधिक कर्तव्य पालन की जिम्मेदारियों में बँधकर रहना पड़ता है ।

भगवान ने मनुष्य को सृष्टि का शिरोमणि पद ता दिया है, पर साथ ही वैयक्तिक पारिवारिक और सामाजिक जिम्मेदारियों के साथ इस तरह कस दिया है कि स्वेच्छाचार बरतने की राई-रत्ती भी गुंजाइश नहीं रहती । ऊँचाई पर लहराने वाले झण्डों को गिर पड़ने का उपहास न सहना पड़े , इसलिए उन्हें कई जगह रस्सियों या तारों से बाँध दिया जाता है । बड़े तम्बू खड़े करने वाले भी इसी प्रकार उनकी सुरक्षा का प्रबन्ध करते हैं । गैर जिम्मेदारी भी प्रतिष्ठितों को एक बड़े अपराधी की तरह प्रताड़ित करती है । सेनापति का प्रमाद सहन नहीं किया जाता । उसे ड्यूटी पर से गैर हाजिर रहने पर कोर्ट मार्शल के सामने जवाबदेह होना पड़ता है ओर प्रमाद का परिणाम गोली से उड़ा देने के रूप में भुगतान पड़ता है । प्रहरी यदि अपनी जिम्मेदारी की उपेक्षा करके लम्बी नान कर कहीं जा सोये तो उस अवधि में हुई चोरियों के लिए उसी पर जिम्मेदारी लादी जाती और खिंचाई की जाती है ।

धर्मधारणा का चौथा चरण है-बहादुरी । गये गुजरे लोग कायरता धारण किये रहते हैं । अनीति सहते रहते हैं और गई गुजरी परिस्थिति के साथ समझौता करके किसी प्रकार आदर्श रहित जीवन जीते रहते हैं, पर यह स्थिति है सर्वथा मानवी गरिमा के प्रतिकूल ।

सृजन की तरह संघर्ष भी मानव जीवन का एक अनिवार्य पक्ष है । उसे सहयोग की नीति अपनानी पड़ती है और उदारता अपनाने के लिए भी कहा जाता है । इतने पर भी उस एकाँगी स्थिति से बात सर्वथा अधूरी रह जाती है । उसे अनौचित्य के प्रति असहयोग एवं विरोध का रुख अपनाना ही चाहिए । कायरतावश साहस के अभाव में जो शौर्य पराक्रम का परित्याग कर बैठते हैं उन्हें सज्जनता का आवरण ओढ़ने की बहानेबाजी से भी पीछा छुड़ाने का अवसर नहीं मिलता ।

आलस्य-प्रमाद दोष दुर्गुण अपने भीतर छिपे बैठे रहते हैं और चुपके-चुपके रोग-कीटकों की तरह व्यक्तित्व को खोखला करते रहते हैं । यदि उन्हें यथा स्थिति बने रहने दिया जाय, तो वह पौरुष प्रकट ही न हो सकेगा , जो दुष्प्रवृत्तियों को उखाड़ फेंकने के लिए नितान्त आवश्यक है । अपने को सुधारने सुविकसित करने के लिए संचित कुसंस्कार से जूझना ही पड़ता है और अवाँछनीय प्रचलन के प्रभाव से जो पतन-पराभव सिर पर चढ़ता चला जाता है , उसके विरुद्ध विद्रोही के रूप में अड़ना और लड़ना पड़ता है । गंदगी न जाने कहाँ से आकर अपने इर्द-गिर्द जमती रहती है । इसके विरुद्ध बुहारी , साबुन , फिनायल आदि को प्रस्तुत रखना पड़ता है । समाज में अनेकों अनैतिकताएं बढ़ती ओर विस्तार पकड़ती जाती हैं । यदि इनका उन्मूलन सोचते या करते न बन पड़े , तो फिर समझना चाहिए कि दुष्टताजन्य अराजकता का ही बोलबाला दीख पड़ेगा ।

विडम्बनाएँ समाज में धर्म के नाम पर चलती रही हैं , धर्म के कारण नहीं । उसकी मूल प्रवृत्ति संरक्षण और सम्वर्धन की है । जिसके नाम पर भाई-से भाई लड़ते रहें हैं, वह मनुष्यकृत कल्पना-मान्यता , प्रथा एवं प्रक्रिया हो सकती है । उसे सद्भावनाओं और सत्प्रवृत्तियों से भरापूरा होना चाहिए । उसी के चार लक्षणोँ का प्रतिपादन ऊपर की पंक्तियों में हुआ है ।


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“मूर्ख मन्त्रः खल प्रीतिः पध्यद्वेष प्रमादिता प्रभाविष्णोविरोधश्च विधि वैमुख्य लक्षणम्” -क्षेमेन्द्र

अपने जीवन पथ निर्धारण करने आदि के लिए यदि मूर्खों को गुरु बनाया जाकर उनसे मंत्रणा प्राप्त एवं तदनुसार व्यवहार करने, दुष्टों कुकर्मी-समाजविरोधी कार्य करने वालों से प्रीति-अर्थात् उनको सहयोग कर उनका समर्थन करना , सभ्य आहार को त्याग कर अभक्ष्य को भक्षण करना , समर्थ सद्विचार वाले, सद्कर्म में रत व्यक्ति के अनुकूल न चलना तथा सद्कार्य परोपकार परपीड़ाहरण के कार्य में आलस्य, उदासीनता अपनाना मनुष्य के भाग्य विहीन होने के लक्षण है।


संसारः प्रतिभा परिष्कार की प्रयोगशाला

सामान्यतया यह देखा जाता है कि अविकसित प्रतिभा वाले कठिनाइयों, परेशानियों का रोना रोते देखे जाते हैं । इनके अनुसार प्रतिभावान न बन पाने का कारण जीवन की जटिलताएँ रहीं । समूची अविकसित स्थिति का बोझ इन्हीं के मत्थे पर मढ़ कर छुट्टी पाने का प्रयास किया जाता है । ऐसे लोग हमेशा यही सोचा करते हैं कि अमुक परेशानी न होती तो हमारा इस तरह का विकास हो जाता ।

जबकि यथार्थता यह है कि इस तरह की सोच शत प्रतिशत भ्रामक है । विश्व के विभिन्न विचारक एक स्वर से स्वीकार करते हैं कि अवरोध और विकसित प्रतिभा दोनों ही एक दूसरे के घनिष्ठतम सहयोगी हैं । प्रसिद्ध भारतीय चिन्तक रामचन्द्र दत्तात्रेय रानाडे का मानना है कि हमारी क्षमताओं के द्वार इन्हीं के कारण खुलते हैं इसी वजह से निष्क्रिय पड़ी क्षमताएं सक्रिय होती हैं । विख्यात चीनी दार्शनिक जाँग त्जाँग के अनुसार मानवीय विकास का समूचा इतिहास कठिनाइयों द्वारा जगाई गई क्षमताओं से भरा पड़ा है ।

मनोवैज्ञानिकों ने इन्हें जीवन की सहज स्वाभाविक स्थिति का एक अनिवार्य अंग बताया है । इन्हें स्वीकार किए जाने पर इनका सुन्दर उपयोग किया जाना सम्भव है । वस्तुतः परेशानियाँ इतनी भयंकर और कष्टदायक नहीं है जितना बहुत से लोग समझते हैं । जिस स्थिति में कई लोग रोते हैं, उसी में दूसरी व्यक्ति नवीन प्रेरणा पाकर सफलता का वरण करते, प्रतिभाशाली बनते हैं । इस तरी ये अपने आप में कुछ नहीं , मनःस्थिति द्वारा इनका स्वरूप गढ़ा जाता है । निर्बल मन तो अपनी कल्पनाजन्य परेशानियों में ही अशाँत हो जाता है । सबल मन वाला व्यक्ति विकट से विकट स्थिति को स्वीकार करके स्वयं में निहित शक्तियों को जाग्रत करता है ।

जर्मन मनोवैज्ञानिक ‘वान दे गियर’ ने अपनी पुस्तक “साइकोलॉजिकल स्टडी ऑफ प्राब्लम साल्विगं एण्ड एडवेंचर’ ‘ में शारीरिक परेशानियों, मानसिक जटिलताओं एवं उलझनों को जीवन में अनिवार्य बताया है । उनके अनुसार जटिल उलझनों को सुलझाते समय हम परिपूर्ण एकाग्र होते हैं । यह मन की गहरी परतों को कुरेदने की विधि है । इससे इन गहरी सतहों में जमी क्षमताएँ उभरकर सामने आती हैं । इसी कारण छोटे बच्चों के बौद्धिक विकास के लिए गणितीय उलझनों को सुलझाने की प्रक्रिया बताई जाती है । यही बात जीवन के रोमाँचक क्षणों के विषय में है । भौतिक एवं मानसिक उलझनों के चरम बिंदु से जूझने पर हमारी समूची मानसिक शारीरिक क्षमताएँ उभरकर आती और नियोजित होती हैं । विभिन्न खेलों के पीछे यही मनोवैज्ञानिक सिद्धान्त है । कुश्ती, कबड्डी से जहाँ शारीरिक प्रतिभा विकसित होती है, वहीं शतरंज आदि खेलों से मानसिक विकास होते हैं ।

मनोविद् बी. घिसलिंग ने अपनी कृति “द क्रिएटिव प्राँसिस” में कहा है कि आजीवन कठिनाइयों से जूझते रहने वाला व्यक्ति तथाकथित सुखी जीवन व्यतीत करने वाले व्यक्तियों से अनेकों गुना अधिक प्रतिभाशाली होता है । उन्होंने अनेक स्कूली बच्चों, किशोरों , युवाओं पर अनेकानेक प्रयोग करके यह सिद्ध किया कि प्रतिभा के अधिकाधिक जागरण के लिए कठिनाइयाँ अनिवार्य हैं । जीवनक्रम में इनको अनिवार्य रूप से स्वीकार कर असाधारण रूप से प्रतिभाशाली बना जा सकता है । मिलिट्री में प्रशिक्षण देते समय सिपाहियों को बिना मतलब की परेशानियों में डाला जाता है । उन्हें तरह-तरह की कठोरताओं में धकेला जाता है । प्रत्यक्ष में इनका कोई मूल्य और महत्व नहीं किन्तु मनोवैज्ञानिक दृष्टि से देखने पर सारा तथ्य समझ में आ जाता है । इस तरह की जटिलताएँ उनकी शारीरिक और मानसिक शक्तियों को इस हद तक विकसित करती हैं कि मोर्चे पर उनके करतब देखकर दांतों तले उँगली दबानी पड़ती है । विश्वास ही नहीं होता कि एक व्यक्ति ऐसा भी कर सकता है ।

इसके बिना उत्कृष्टता का अर्जन हो नहीं सकता सोने की शुद्धता भीषण आग में तपने पर ही दिखाई देती है । इसे तपाया न जाय , तो मटमैला और गँदला बना रहेगा। मनुष्य भी कठिनाइयों में तप कर उत्कृष्ट, सौंदर्यपूर्ण, प्रभावशाली और महत्वपूर्ण बनता है । इनका मनुष्य के विकास में महत्वपूर्ण स्थान है। किन्तु इसके बाद भी ये दुधारी तलवार हैं । जो व्यक्ति इनसे घबड़ा कर गिर पड़ा वह हार बैठा । जबकि इनको खिलाड़ी की तरह अपनाने वाला व्यक्ति सफलता प्राप्त करता है । दोनों ही स्थितियों का उत्तरदायी मनुष्य स्वयं होता है । वह चाहे इन्हें वरदान बनाये-चाहे अभिशाप । जो व्यक्ति इनका खुले दिल से स्वागत करता उनके साथ खेलता है । वह न केवल उनसे मिलने वाला लाभ प्राप्त करता अपितु दूसरों के लिए प्रेरणा व आदर्श बन जाता है ।

संसार के किसी भी महापुरुष की प्रतिभा का रहस्य खोजने पर कठिनाइयों का पूरा इतिहास हाथ लग जाएगा । महापुरुषों में अधिकाँश कठिन परिस्थितियों में पैदा हुए । जिन्होंने सुख-सुविधाओं में जन्म भी लिया उन्होंने बुद्ध , महावीर की तरह राज सुख को तिलाँजलि देकर जटिलताओं को स्वेच्छा से स्वीकार किया क्योंकि इसके बिना प्रतिभा का विकास निताँत असम्भव था। इनसे गुजरे बिना कोई भी अपने लक्ष्य को पा नहीं सकता । इनके द्वारा ही मनुष्य का व्यक्तित्व अपना पूर्ण चमत्कार प्रदर्शित करता है । इन्हें एक खराद की तरह समझा जा सकता है जो मनुष्य को तराशकर चमका दिया करती है । इनका जीवन में वही महत्व हैं जो उद्योग में श्रम का और भोजन में रसों का है ।

साँसारिक जीवन में टाटा, फोर्ड, जमनालाल बजाज आदि समृद्ध व्यक्तियों के जो उदाहरण मिलते हैं उनके मूल में भी यही रहस्य है । उन्होंने अपने व्यक्तिगत जीवन में सुख-सुविधाओं की अपेक्षा परेशानियों को ही गले लगाया । जो धनिक और समृद्ध इस जीवन दर्शन को नहीं समझ पाते , वे अधिकाँशतया व्यसनी और विलासी होते देखे जा सकते हैं । जटिलताओं को अपनाकर प्रतिभा सम्वर्धन करते हुए व्यक्ति को संसार की फिजूल बातों के लिए अवकाश कहाँ ? इनका मूल्य बहुत गहरा हैं जिसे पुरुषार्थी, परिश्रमी और उत्साही लोग समझ कर अनेकानेक विभूतियों को उपलब्ध करते हैं किन्तु जो कायर क्लीव हैं तथा आत्मबल से हीन हैं वे परीक्षा बिंदु मात्र देखकर डर जाते हैं, फलस्वरूप “हाय-हाय” करते हुए किसी तरह जीवन के दिन पूरे करते हैं।

अवरोधों के बिना गति नहीं, विकास नहीं, का सिद्धान्त सुनने में विचित्र लग सकता है किन्तु सोचने पर इसकी महत्ता समझ में आ जाती है । यह एक वैज्ञानिक तथ्य है कि अवरोध के बिना हम एक तिल भी आगे नहीं बढ़ सकते । यदि जमीन के घर्षण को समाप्त कर इसे पूरी तरह चिकना कर दें तो फिसल कर गिर पड़ेंगे । अवरोध न होने के कारण रुई पर कील नहीं गाड़ी जा सकती ।

यह एक मनोवैज्ञानिक एवं व्यवहारिक रहस्य है कि जीवनक्रम में यथार्थ उपयोगिता कठिनाइयों की है न कि सुख साधनों की । खासकर प्रतिभा जागरण के अभ्यासियों को इसे अनिवार्य मानना होगा । छान्दोग्य उपनिषद् में प्रकृति परिवेश के लगातार परिवर्तित होने के पीछे यही कारण बताया गया है । इसके अनुसार परम-चेतना प्रत्येक प्राणी को सतत् विकसित कर पूर्ण बनाना चाहती है । यही कारण है कि प्रकृति लगातार अपने स्वरूप को परिवर्तित करती रहती है । इस स्वरूप परिवर्तन के कारण पहले ढूँढ़े गए हल व्यर्थ और अनुपयोगी हो जाते हैं । नए परिवर्तित-परिवेश में नई तरह की चुनौतियाँ उलझनें सामने आती हैं । मनुष्य को बाधित किया जाता है कि वह वर्तमान के संदर्भ में इनके समाधान सोचे ।

इसका एक ही उद्देश्य है कि मनुष्य की प्रतिभा का सम्वर्धन हो परिष्कार हो । महान चिन्तक इब्नसिना ने समूचे संसार को माँ प्रकृति द्वारा संचालित प्रतिभा विकास की प्रयोगशाला कहा है । उनके अनुसार प्रकृति अपनी गोद में हम सभी को लेकर तरह-तरह की परेशानियाँ, जटिलताएँ उत्पन्न कर हमें विकसित कर रही है । हमारे अपने प्रतिभाशाली बनने के लिए चित्र , विचित्र भयावह दीखने वाली स्थितियाँ प्रकृति द्वारा प्रदत्त उपकरण मात्र हैं । जिस तरह स्कूल में छोटे बच्चों का बौद्धिक विकास तरह-तरह के उपकरणोँ के सहारे करते हैं , ठीक उसी तरह प्रकृति भी रोज-रोज नयी परिस्थितियाँ पैदा कर मनुष्य की प्रतिभा को, सुप्त क्षमता को, जाग्रत करना चाहती है । उचित यही है कि हम इन्हें इसी रूप में स्वीकारें - अपनाएँ । इस ढंग से इन्हें अपनाकर हममें से प्रत्येक स्वयं में निहित शक्तियों को जाग्रत और विकसित कर सकता है ।


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आकाश को मुट्ठियों से न मारो, भूसा कूटकर तेल न निकालो, बालू के महल न बनाओ और पानी मथकर घी मिलने की आशा न करो । कुकर्मों के सहारे उन्नतिशील बनने की योजना न बनाओ ।


उपासना ही नहीं, साधना भी

उपासना और साधना आध्यात्मिक प्रगति के दो अविच्छिन्न पहलू हैं । जितना महत्व उपासना का है उतना ही साधना का भी है । हमें उपासना पर ही नहीं साधना पर भी ध्यान और जोर देना चाहिए । जीवन को पवित्र और परिष्कृत, संयत और संतुलित, उत्कृष्ट और आदर्श बनाने के लिए अपने गुण, कर्म, स्वभाव को उच्चस्तरीय बनाने के लिए निरन्तर प्रयत्न करना चाहिए । इस प्रयत्न का नाम ही जीवन-साधना अथवा साधना है । उपासना-पूजा को निर्धारित समय का क्रियाकलाप पूरा कर लेने पर समाप्त हो जाती है, पर साधना चौबीसों घंटे करनी पड़ती है । अपने हर विचार और कार्य पर एक चौकीदार की तरह कड़ी नजर रखनी पड़ती है कि कहीं कुछ अनुचित, अनुपयुक्त तो नहीं हो रहा है । जहाँ भूल दिखाई दी कि उसे तुरन्त सुधारा, जहाँ विकार पाया वहाँ तुरन्त उसकी चिकित्सा की, जहाँ अनीति देखी, तुरन्त उससे लड़ पड़े। यही साधना है ।

जिस प्रकार सीमा रक्षक प्रहरियों को हर घड़ी शत्रु की चालों और बातों का-गतिविधियों का पता लगाने और उनसे जूझने के लिए लैस रहना पड़ता है , वैसे ही जीवन संग्राम के हर मोर्चे पर साधक को सतर्क और तत्पर रहने की आवश्यकता पड़ती है । यही तत्परता साधना है । जबकि उपासना मनोभूमि में उगने वाला बीज है, जिसके फलने-फूलने की आशा तभी की जा सकती है जब मनोभूमि का उसी प्रकार परिष्कार किया जाय जिस प्रकार कृषक अपने खेतों का करता है । खेत में बीज डालने से पूर्व वह पहले उसे पानी से भर कर उसकी अच्छी तरह जुताई करता है । कूड़ा कचरा निकालता है । खाद डालता है तब भूमि इस योग्य हो पाती है कि उसमें बीज डालने और उसके उगने की संभावनायें सुनिश्चित होती हैं । इसी प्रकार मनोभूमि को शुद्ध किये बिना डाला गया उपासना का बीज झाड़-झंखाड़ युक्त खेत में पड़े बीज की तरह होगा, जो या तो स्वयं सड़गल कर नष्ट हो जाता है या जिसे चूहे, चिड़िया और जंगली जीव चुन ले जाते हैं

महर्षि दयानन्द सरस्वती ने अपने ग्रंथ ‘सत्यार्थ प्रकाश , में कहा है कि जिस प्रकार ईश्वर के गुण, कर्म, स्वभाव पवित्र हैं , वैसे ही अपने को बनाया तथा ईश्वर को सर्वव्यापी और अपने को व्याप्त जानकर उसके अधिकाधिक

सन्निकट पहुँचना ही उपासना कहलाती है । पर प्रायः लोग इस तथ्य की उपेक्षा-अवहेलना करते ओर यह मानते हैं कि भजन करने मात्र से पाप कट जायेंगे, अतएव जीवन को शुद्ध बनाने अर्थात् कुमार्गगामिता से अपने को बचाने की आवश्यकता नहीं । वस्तुतः इसी भ्रमपूर्ण मान्यता ने मनुष्य को अध्यात्म के लाभों से वंचित रखा है । यह भ्रम जितना शीघ्र हो सके दूर हटाना चाहिए । भारतीय अध्यात्म के तत्वज्ञान एवं ऋषि अनुभवों के आधार पर यही निष्कर्ष अपनाना चाहिए कि उपासना और साधना दोनों एक दूसरे के पूरक हैं । आध्यात्मिक प्रगति के लिए दोनों अवलम्बनों को साथ-साथ लेकर चलना अनिवार्य है । अन्यथा एक के बिना दूसरा अपूर्ण है । जिस तरह अन्न और जल, रात और दिन, शीत और ग्रीष्म, स्त्री और पुरुष का जोड़ा है उसी प्रकार उपासना और साधना भी अन्योन्याश्रित हैं । एक के बिना दूसरा अकेला असहाय एवं अपूर्ण ही बना रहेगा । इसलिए दोनों को साथ लेकर अध्यात्ममार्ग पर प्रगतिशील होना ही उचित और आवश्यक है ।

गायत्री सद्बुद्धि की प्रज्ञा की अधिष्ठात्री है, अतः उसके उपासक का जीवनक्रम तो उत्कृष्ट आदर्शवादी एवं परिष्कृत होना ही चाहिए । नशा पीने पर मस्ती आनी ही चाहिए । भक्ति का प्रभाव सज्जनता और प्रगतिशीलता के रूप में दीखना ही चाहिए । इसलिए हमारा उपासनाक्रम साँगोपाँग होना चाहिए और उसमें आत्म निरीक्षण, आत्मसुधार , आत्मनिर्माण , एवं आत्मविकास की परिपूर्ण प्रक्रिया जुड़ी ही रहनी चाहिए । उपासना और साधना परस्पर गुँथे हुए है । दोनों का स्वतंत्र अस्तित्व है एवं एक को कर लेने से दूसरे की पूर्ति हो जायगी, यह सोचना उचित नहीं ।

आत्मोत्कर्ष की दिशा में आगे बढ़ने के लिए पूजा उपासना के साथ जीवन साधना भी अनिवार्य है । गायत्री की भावनात्मक पूजा की तरह ही सद्आचरण द्वारा भी उपासना की जा सकती है । हम निष्पाप बनें इतना ही पर्याप्त नहीं, वरन् यह भी आवश्यक है कि अपने गुण , कर्म , एवं स्वभाव में सात्विकता का , पवित्रता प्रखरता का समुचित विकास करके जीवन को दिव्य बनावें और उसके द्वारा अपना और समस्त समाज का कल्याण करें । अभिन्न रूप से जुड़े उपासना-साधना के द्विविध मार्ग को अपनाकर व्यक्तित्व को परिष्कृत और विकसित करते हुए ही आत्मिक प्रगति के मार्ग पर आगे बढ़ा जा सकता है । पूर्णता प्राप्त करने ऋद्धि-सिद्धियों से भरापूरा सफल जीवन जीने का यही राजमार्ग है ।


ब्रह्मचर्यं परं तपः

भगवान धन्वन्तरि के शिष्यों ने एक बार उनसे प्रश्न किया-’भगवन् ! कोई ऐसा उपचार बताइये जिसे एक का पालन करने से मनुष्य सब रोगों का नाश कर सके तथा दीर्घायुष्य प्राप्त कर सके ।

भगवान् ने कहा “मैं सत्य कहता हूँ कि मृत्यु, रोग तथा जरावस्था का विनाश करने वाला , अमृतरूपी सबसे बड़ा उपचार ब्रह्मचर्य रूपी महापुरुषार्थ है । जो शान्ति, सुन्दरता, स्मृति, ज्ञान, आरोग्य और उत्तम स्वास्थ्य का आकाँक्षी है वह इस संसार में सर्वोत्तम धर्म ब्रह्मचर्य का पालन करे । यही परम ज्ञान और परम औषधि है। यह आत्मा निश्चय रूप से ब्रह्मचर्यमय है और इसकी स्थिति भी मनुष्य शरीर में ब्रह्मचर्य साधन सर्वोत्तम उपाय है ।”

ब्रह्मचर्य का अर्थ है- ब्रह्म में परमात्मतत्व में विचरण करना अर्थात् अपने संयम, निग्रह और पवित्र आचरण द्वारा मन, वचन ,कर्म से उसकी ओर अग्रसर होना । इसे एक प्रकार का महाव्रत कहा गया है जिसके द्वारा मनुष्य अपनी जीवनीशक्ति की रक्षा कर उच्चस्तरीय जीवन की साधना करता और तद्नुसार शारीरिक मानसिक एवं आध्यात्मिक शक्तियों का पूर्ण विकास करता है । शास्त्र कथन है कि जिस प्रकार समुद्र को पार करने का नौका एक उत्तम उपाय है , उसी प्रकार इस संसार से पार होने का उत्कृष्ट साधन ब्रह्मचर्य है ।

गीता में भगवान कृष्ण ने कहा है -” ब्रह्मचर्य परं तपः” अर्थात् ब्रह्मचर्य ही सबसे श्रेष्ठ तप है । सूत्रकृताँक 6/23 में भी इसे उत्तम तप बताया गया है । ब्राह्मण ग्रन्थों में इस संयम का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि इसका परिपालन करने से व्यक्ति को बलिष्ठता का, ओजस्-तेजस् का लाभ मिलता है । शतपथ ब्राह्मण के अनुसार -’बीर्यम् वे भर्गः’ अर्थात् वीर्य निश्चय ही ब्रह्मतेज है । इसे ऊर्ध्वगामी बना लेने वाला मनुष्य काल पर भी विजय प्राप्त कर लेता है । उसके लिए इस संसार में कुछ भी अप्राप्य नहीं रह जाता । शिव, हनुमान , लक्ष्मण, मेघनाद, शुकदेव, भीष्म जैसे महान ब्रह्मचारियों से पौराणिक कथा-गाथायें भरी पड़ी हैं । आधुनिक युग में भी बुद्ध , गाँधी , ईसा, सुकरात, शंकरचार्य , रामकृष्ण, विवेकानन्द, दयानन्द जैसे कितने ही महान संत-

तपस्वी हुए हैं जिन्होंने अपने प्रचण्ड शक्ति संयम एवं आत्मबल से सारी विश्व मानवता का हित साधन किया है । उनके बल, स्फूर्ति और पुरुषार्थ आज भी लोगों के लिए प्रेरणास्रोत बने हुए हैं ।

शास्त्रकारों ने जहाँ ब्रह्मचारी की मनोभूमि उच्चस्तरीय आदर्शों में इस प्रकार संलग्न रहनी चाहिए कि उसे कामुक आचरण तो दूर उस प्रकार के विचारों के लिए भी अवसर न मिले । प्रवाह को रोकने के लिए मजबूत बांध बाँधने चाहिये । यह मानसिक बाँध साधनात्मक मनोयोग का भी हो सकता है और परमार्थ परायण सेवा साधना के प्रति प्रबल उत्साह और प्रवाह के रूप में भी इसे मोड़ा जा सकता है । आदर्शवादी तत्परता ऐसी होनी चाहिए कि हर समय उच्चस्तरीय चिन्तन में ही मन रमा रहे । परमार्थ स्तर की योजनायें ही बनती रहें । इतना ही नहीं , वरन् क्रियाकलाप भी ऐसे होने चाहिए जिसमें शरीर का श्रम, समय और मन का एकाग्र भाव पूरी तरह नियोजित रहे ।

इस प्रकार ब्रह्मचारी ऊर्ध्वरेता बनता है । विपरीत लिंग के प्रति आयु के अनुसार पुत्री , भगिनी , माता जैसे पवित्र भावनाओं का समावेश होने पर उसकी कामुक ललक अधोगामी योजनाएँ बनाने की अपेक्षा आदर्शों में रमण करने लगती हैं । महानता से सम्बन्धित क्रियाकलापों को अपना प्रिय विषय बना लेने पर अधोगामी प्रवृत्तियाँ रुकती है और वे उच्चस्तरीय विचारणाओं , भावनाओं और योजनाओं में नियोजित रहती हैं । फलतः दिशा बदल जाने पर मानसिक ब्रह्मचर्य भी सध जाता है और शारीरिक एवं मानसिक दोनों प्रकार का पोषण उज्ज्वल योजना के आधार पर मिलने लगता है । वीर्य रक्षा से शारीरिक बलिष्ठता , मानसिक उत्कृष्टता तथा आत्मिक प्रखरता के जो लाभ बताये गये हैं, वह इस अनुबंध के आधार पर उपलब्ध होने लगते हैं । शास्त्र का यह कथन शत प्रतिशत सही है कि “मरणं बिन्दु पातेन जीवनं बिन्दु धारणात्” अर्थात् “ ब्रह्मचर्य ही जीवन है और उसका उल्लंघन मरण ।”


प्राणशक्ति संवर्धन के तीन प्रयोग उपचार

हृदय द्वारा रक्त संचार होता है । रक्त प्रत्यक्ष दीखता है, इसलिए उसकी उपयोगिता आवश्यकता सर्व साधारण की दृष्टि में रहती है । हृदय पर पड़ने वाले प्रभावों को बहुमूल्य माना जाता है और उन्हें महत्व भी अधिक मिलता है । इसके अतिरिक्त एक दूसरा क्षेत्र है जिसकी गरिमा लगभग इसी स्तर की है किन्तु उसे महत्व रहीं दिया जाता वह है- “श्वसन प्रक्रिया” । श्वास-प्रश्वास नाक से ली जाती है । फेफड़े में पहुँचती है, इसके बाद उसका प्रवाह शरीर की सभी कोशिकाओं तक पहुँचता है । इस पहुँचने के कारण ही तापमान सन्तुलित मिलता है । साथ ही हर क्षण शरीर के हर क्षेत्र में उत्पन्न होने वाली गंदगी का भी एक बड़ा भाग यही बुहारी कर लौटते समय अपनी टोकरी में समेट ले जाती है । यह क्रिया अदृश्य रूप में होती है । उसका प्रत्यक्ष दर्शन न होने से अनुभव भी नहीं होता इसलिये महत्व भी नहीं समझा जाता ।इतने पर भी उसका महत्व इतना ही है जितना हृदय द्वारा किए जाने वाले रक्त संचार का ।

अन्न , जल और वायु को जीवन का प्रमुख आधार माना जाता है । बिना भोजन किए मनुष्य प्रायः एक महीने जीवित रह सकता है । बिना पानी के भी एक सप्ताह जिया जा सकता है किन्तु बिना श्वास लिए तो एक मिनट से भी अधिक समय जीवित रह पाना कठिन है । फाँसी लगने पर प्रथम आघात श्वास प्रणाली का बन्द हो जाना ही होता है । गरदन की हड्डी टूटने पर भी कुछ समय जीवित रहा जा सकता है । पर दम घुटने पर तो प्राणान्त ही समझा जाना चाहिए । क्योंकि समस्त अवयवों को प्राणवायु की उपलब्धि रुक जाती है और जो गंदगी पैदा होती है उसे बाहर निकालने की व्यवस्था न रहने के कारण विपन्नता फैलती है और जीवन का अन्त हो जाता है । इससे प्रकट है कि शरीर में जो भी तत्व काम करते हैं उनका रक्त के अतिरिक्त दूसरा आधार श्वसन प्रक्रिया ही है । शरीर के समस्त छोटे-बड़े अवयवोँ का परिपोषण प्रायः उसी पर निर्भर है ।

साँस लेने का सही तरीका विरलों को ही मालूम होता है । आमतौर से लोग उथली साँस लेने के आदी होते हैं । बिना परिश्रम के समय बिताने पर झुक कर बैठने पर तो यह प्रवाह और भी अधिक मंद हो जाता है । उथली साँस में हवा की मात्रा प्रायः आधी ही शरीर में पहुँचती है । वह फेफड़े के मध्य भाग को ही प्रभावित करती है । शेष भाग निष्क्रिय पड़ा रहने के कारण अशक्त बनता चला जाता है । उसमें खाँसी टीबी, प्लुरिसी , दमा आदि रोग अपने लिए आसानी से जगह बना लेते हैं और घर बनाकर मजबूती के साथ अपने वंश की वृद्धि करते रहते हैं । इसके अतिरिक्त दूसरी हानि यह होती है कि शरीर के अंग प्रत्यंगों को पोषक आक्सीजन की मात्रा कम पहुँचती है । उस कमी के कारण उनकी समर्थता घटती जाती है । सफाई भी पूरी तरह नहीं हो पाती । इसलिए सभी जीवाणु अशक्त हो जाते हैं । क्रियाशीलता छंटती जाती है और गंदगी बढ़ने से रुग्णता मंदगति से बढ़ते-बढ़ते अदृश्य से दृश्य बन जाती है । बीमारियाँ भीतर से जन्म लेकर बढ़ते- बढ़ते बाहरी क्षेत्र में फूट पड़ती दीखने लगती हैं । कारण साधारण होते हुए भी उसकी विकृति असाधारण रूप से दृष्टिगोचर होने लगती है । अधूरी साँस लेना ऐसा ही है जैसा आधे पेट भोजन करना या पानी की प्यास को मार कर गला तर करने जितना पानी पीकर काम चलाना । उनके कारण जो क्षति हो सकती है उसका अनुमान लगाया जा सकना किसी के लिए भी कठिन नहीं होना चाहिए ।

इस भूल का आरंभ छोटी सी गलती से होता है और उसका निराकरण थोड़ी सी सावधानी से पूरा हो सकता है । सीने को आगे की ओर झुकाकर बैठना तथा काम चलाऊ आधी अधूरी साँस लेकर काम चलाते रहना गलत है । इस प्रकार की अधूरी साँस असावधान रहने के कारण चलती तो रहती है किन्तु इस असावधानी का ही अभिशाप कहना चाहिए जिसके कारण आधी स्वस्थता-सम्पदा, एक तिहाई आयु व्यक्ति की नष्ट हो जाती है । आहारों से पोषण, मिलता है, इस तथ्य को सभी जानते हैं । इसी प्रकार यह भी जाना जाना चाहिए कि साँस भी जीवन प्रदान करती है पर वह करती तभी है जब वह पूरी और गहरी ली जाय । फेफड़ों को पूरी तरह भर दे । शरीर की सभी कोशिकाओं का पोषण करे । रक्त को स्वच्छ एवं सशक्त बनाए रहने की क्षमता साँस के द्वारा मिलने वाली प्राणवायु द्वारा ही पूरी होती है ।

योग शास्त्र की तरह शरीर विज्ञान भी प्राणायाम की महत्ता स्वीकार करता है । उसकी आवश्यकता उपयोगिता का प्रतिपादन करता है । प्राणायाम के अनेक तरीके हैं । उनके अपने-अपने विधान लाभ भी हैं । योग सिद्धि से लेकर ध्यान धारणा एवं प्रसुप्त शक्ति केन्द्रों के जागरण में उनका अपना प्रभाव है । प्राण विद्या एक स्वतंत्र विद्या है । जिसके आधार पर सर्वतोमुखी सशक्तता का सम्पादन किया जाता है । उसके चमत्कारी लाभ भी दैनन्दिन जीवन में पाए जा सकते हैं । कहा गया है कि प्राण के वश में होने पर मन वश में हो जाता है । और जिसका मन नियंत्रित होता है, उसे योग पारंगत एक सिद्ध पुरुष कहा जाता है ।

इन पंक्तियों में विशेष प्राणायामों की चर्चा न करके केवल उन सर्वसुलभ विधियों पर प्रकाश डाला जा रहा है जिसे हर स्थिति का व्यक्ति हर परिस्थिति में कार्यान्वित करता रह सकता है ।

सरलतम और निरन्तर होते रहने वाला प्राणायाम यह है कि हमेशा गहरी साँस लेने की आदत डाली जाय । पूरी साँस खींची जाय ताकि हवा से पूरे फेफड़े भर जायँ । साँस को रोकना आवश्यक नहीं है । पुरानी प्राणायाम पद्धति में साँस को रोके रहने की कुँभक पद्धति को भी आवश्यक बताया गया है । पर आधुनिक शरीर विज्ञान उसका समर्थन नहीं करता है । ऐसी दशा में यही उचित है कि कुँभक पर विशेष जोर न दिया जाय । साँस को भरपूर मात्रा में खींचने की प्रक्रिया पूरक को भली प्रकार संपन्न किया जाय । इसके बाद साँस छोड़ने का क्रम भी धीमी गति से सम्पन्न किया जाय किन्तु फेफड़ों में भरी हुई साँस को पूरी तरह बाहर निकाल दिया जाय । यह एक प्राणायाम हुआ । इसे स्वाभाविक एवं उपयोगी श्वास-प्रश्वास प्रक्रिया नाम भी दे सकते हैं । इससे पर्याप्त मात्रा में प्रायः दूरी आक्सीजन मिलने लगती है और प्रायः दूना ही पोषण प्राप्त होता है । चेहरे पर लालिमा बढ़ती और शरीर में स्फूर्ति काम करती दिखाई पड़ती है। ऐसे प्राणायाम नित्य पंद्रह मिनट तो करना ही चाहिए ।

दूसरे प्रकार का एक शक्तिशाली अभ्यास यह है कि प्राण चेतना को एक सचेतन विद्युत शक्ति मानते हुए संकल्प शक्ति के सहारे उसे साँस द्वारा खींच कर समूची सत्ता में धारण किया जाय । साँस लेते समय भावना की जाय कि विश्वव्यापी प्राण शक्ति साँस के साथ ही खिंचती चली आ रही है । उसे काया के कण-कण द्वारा अवशोषित किया जा रहा है । इसकी अनुभूति फुर्ती और मस्ती के रूप में हो रही है । साहस उभर रहा है और पुरुषार्थ गतिशील हो रहा है । यह प्राणाकर्षक प्राणायाम है । जब भी समय खाली हो तभी मेरुदण्ड सीधा रखकर इसे करने लगना चाहिए । दस-दस मिनट के चार से छह खण्ड तक हर दिन प्रयुक्त किए जा सकें तो इससे शक्ति संवर्धन की अनुभूति हाथों हाथ होने लगेगी । कुछ दिन के अभ्यास से प्रयत्नकर्ता अपने में सचमुच असाधारण पुरुषार्थ प्रकट होते देखता है ।

सरल प्राणायामों में तीसरा है- सोऽहम् साधना । इसमें साँस लेते समय सो, बाहर निकालते समय “हम्” की ध्वनि प्रकट होने की कल्पना करनी चाहिए । सो अर्थात् वह परमेश्वर वह साँस के साथ अन्तराल में प्रवेश करता है और अन्तःचेतना के कण-कण में अपनी विशिष्टता भर देता है । साँस छोड़ते समय जो “हम “ की ध्वनि होती है उस समय सोचना चाहिए कि अपना अहंकार तिरस्कृत बहिष्कृत होकर चिन्तर और भाव क्षेत्र को छोड़कर बहिर्गत हो रहा है । अहंकार मिट जाने पर आत्म सत्ता का स्वरूप “तत्वमसि” “अयमात्मा ब्रह्म “ जैसा बन रहा है और आत्मा में परमात्मा का रूप ओतप्रोत दृष्टिगोचर हो रहा है यह भावना नियमित अभ्यास द्वारा परिपक्व बनायी जाती है । धीरे-धीरे श्वास-प्रश्वास पर ध्यान भी जमने लगता है व अजपा जप की स्थिति आ जाती है । यह आध्यात्मिक लाभों से भरा-पूरा प्राणयोग का उच्चस्तरीय सोपान है ।

उपरोक्त तीनों ही प्राणशक्ति संवर्धन के प्रयोगों को नियमित किया जा सके तो अपरिमित लाभ मिलते हैं ।


Quotation

पूर्णता का आनन्द प्राप्त कर लेने बालों का उत्साह उन्हें चैन से नहीं बैठने देता । वे हर किसी को जोर दे कर कहते हैं कि सत्य को अपनाओ और आनन्द में निमग्न रहो ।


अन्तर्मुखी हूजिए

गहरी और स्थायी प्रसन्नता के आधार दो हैं, सत्कर्मों द्वारा उत्पन्न होने वाला अपने भीतर का आत्म-सन्तोष और इससे आत्मीयजनों द्वारा किया हुआ अपने साथ सद्व्यवहार, आत्म सम्मान । यह मानसिक सुख है । मन का महत्व शरीर की अपेक्षा कहीं अधिक है, इसलिये इन सुखों की अनुभूति भी बहुत अधिक होती है । आत्मा की आकाँक्षा इन्हीं दो सुखों को प्राप्त करने की बनी रहती है और यदि उसकी पूर्ति नहीं होती तो उसे सब कुछ सूना-सूना लगता है और अंतःप्रदेश में असन्तोष एवं खिन्नता की स्थिति बनी रहती है । आज उसी खिन्नता और असन्तोष से सारा मानव-समाज खिन्न बना बैठा है । आत्म-सन्तोष के अभाव में जो अन्तर्द्वन्द्व चलते हैं और दूसरों के असद्व्यवहार के कारण जो विक्षोभ पैदा होते हैं वे इतने दुखदायी होते हैं कि कई बार तो उनका सहन करना कठिन हो जाता है । जो सहते हैं वे मर्मान्तक पीड़ा अनुभव करते हैं । आज ऐसी ही विपन्न मनोभूमि हम सब की बनी हुई है । हर कोई भीतर-ही भीतर खिन्न और असन्तुष्ट दिखाई पड़ता है । भौतिक उन्नति के लिये बहुत कुछ प्रयत्न किये जाने पर, सुख सुविधा के अनेक साधन उपलब्ध कर लिये गये हैं, पर यह दुर्भाग्य की ही बात है कि मानव को स्थायी सुख शान्ति प्राप्त हो सके इस दिशा में सर्वत्र उपेक्षा ही दृष्टिगोचर होती है ।

आत्म प्रताड़ना सबसे बड़ा दण्ड है जिस व्यक्ति की आत्मा भीतर ही भीतर उसके दुष्कर्मों एवं कुविचारों के लिये कचोटती रहती है , जिसे कुमार्ग पर चलने के कारण आत्मा धिक्कारती रहती है, वह अपनी दृष्टि में आप ही पतित होता है । पतित अन्तरात्मा वाला व्यक्ति उन शक्तियों को खो बैठता है जिनके आधार पर वास्तविक उत्थान का समारम्भ सम्भव होता है । हम ऊँचे उठ रहे हैं या नीचे गिर रहे हैं इसकी एक ही परीक्षा, कसौटी है कि अपनी आँखों में हमारा अपना मूल्य घट रहा है या बढ़ रहा है । आत्म-सन्तोष जिसे नहीं रहता , जो अपनी वर्तमान गतिविधियोँ पर खिन्न एवं असन्तुष्ट है उसे उन्नतिशील नहीं कहा जा सकता । जिसने अपनी आन्तरिक शान्ति गँवा दी उसे बाहर शान्ति कहाँ मिलने वाली है ? धन कमा लेने से , कोई ऊँचा पद प्राप्त कर लेने से , कई प्रकार के सुख साधन खरीदे जा सकते हैं पर उनसे आत्मसन्तोष कहाँ मिल पाता है ?

मनुष्य की महान विचार शक्ति का यदि थोड़ा सा ही भाग आत्मसंतोष के साधन ढूँढ़ने और आत्म-शान्ति के मार्ग को खोजने में लगे तो उसे वह रास्ता बड़ी आसानी से मिल सकता है जिस पर चलना आरम्भ करते ही उसका हर कदम आत्मिक-उल्लास का रसास्वादन कराने लगे । संसार की सम्पदा भी तो लोग सन्तोष प्राप्त करने के लिये ही कमाया करते हैं फिर उस क्षणिक एवं तुच्छ सन्तोष की अपेक्षा यदि चिरस्थाई आत्मशान्ति उपलब्ध करने का अवसर जिसे मिल रहा होगा वह उल्लास, उत्साह और प्रफुल्लता का अनुभव क्यों न करेगा ?

विचार शक्ति का दूसरा मोड़ इस दिशा में भी दिया जाना चाहिए कि मनुष्य-मनुष्य के बीच में स्नेह, सद्भाव और सौजन्य की मात्रा निरन्तर बढ़ती रहें । हम एकाकी जीवनयापन नहीं कर सकते , हमारी आवश्यकताएँ ऐसी हैं जिनके लिये विवश हो कर दूसरों से सम्बन्ध बनाना पड़ता है एकाँत गुफाओं में रहने वाले वैरागियों को भी आसन गुफाओं में रहने वाले वैरागियों को भी आसन, कमण्डल , ईंधन , दियासलाई, ताला , कोपीन, कम्बल , पुस्तक एवं भोजन की आवश्यकता पड़ती है, और इसके लिये उन्हें दूसरों की सहायता अपेक्षित होती है । हर व्यक्ति समाज के साथ किसी न किसी रूप में जुड़ा हुआ है , इसलिये उसे सामाजिक सद्भाव की आवश्यकता पड़ेगी ही । द्वेष, कलह, अपमान, प्रवंचना, अशिष्टता, उद्दण्डता के व्यवहार की आशा हम दूसरों से नहीं करते हैं । हर किसी की स्वाभाविक इच्छा यही रहती है कि उसके साथ दूसरे लोग प्रेम, सौजन्य, आदर, ईमानदारी, सम्मान, सज्जनता एवं उदारता का व्यवहार करें । प्रेम की भूख मानव-प्राणी की सबसे आकर्षक एवं आनन्द-दायक एक ही वस्तु है और वह है-प्रेम । जिसे किसी का सच्चा प्रेम नहीं मिला वह अभागा इस संसार में मरघट के ब्रह्म की तरह अशान्त, उद्विग्न, तृषित और असन्तुष्ट भ्रमण करता रहेगा । जिसे सच्चे प्रेम का एक कण भी मिल जाता है वह अपने भाग्य को सराहता है । अभाव और दरिद्रता के रहते हुए भी जिसे प्रेम के कुछ कण उपलब्ध हो जाते हैं वह अपने आपको किसी बड़े अमीर से कम सुखी नहीं मानता । माता का, पत्नी का , भाई का , मित्र का, जनता का प्रेम जिसे प्राप्त है उसे जीवन की सबसे बड़ी विभूति मिल गई यही मानना पड़ेगा ।

प्रेम के मूल में आत्मीयता रहती है । स्वार्थ, मोह , रूप यौवन, वासना, उपयोगिता, प्रतिभा, आदि के बाह्य आकर्षणों से भी कई बार प्रेम जैसी लगने वाली घनिष्ठता उत्पन्न हुई दिखाई देने लगती है, पर उसकी जड़ नहीं होती, इसलिये वे बाह्य कारण समाप्त होते ही वह तथाकथित प्रेम भी बालू की भीत की तरह ढह जाता है प्रेम में गहराई , स्थिरता एवं आत्मत्याग की स्थिति तभी रहेगी जब आत्मीयता की निष्ठ का समावेश हो । जो अपना है उसके साथ त्याग , सेवा, सौजन्य , स्नेह और उदारता के अतिरिक्त अन्य किसी प्रकार का व्यवहार नहीं किया जा सकता । जिस प्रकार ईश्वर को घट-घट वासी, सर्वव्यापी, निष्पक्ष और कर्मफल प्रदाता मानने वाला सच्चा आस्तिक मनुष्य कुविचारों और कुकर्मों से दूर ही रहेगा उसी प्रकार प्रेम की भावनाएँ जिसके उमड़ेंगी वह दूसरों के साथ सौजन्यपूर्ण सद्व्यवहार ही करेगा , उदारता बरतेगा और स्वयं कष्ट में रह कर दूसरों को सूखी बनाने का प्रयत्न करता रहेगा। आस्तिकता और प्रेम भावनायें जब भी विकसित होती हैं तब सदाचार और सद्व्यवहार ही उनका बाह्यरूप प्रकाश में आता है ।

आत्म-सन्तोष और आत्म-सम्मान यह दो ही आत्मा की प्रधान आवश्यकता, मुख्य क्षुधाएँ हैं । उनकी तृप्ति से-उनकी पूर्ति से ही आत्मा को सच्ची तृप्ति का अनुभव होता है और वह शान्ति तथा सन्तोष उपलब्ध करती है । इन दोनों की तृप्ति पूर्णतया अपने हाथ में है । शरीर से सत्कर्म करते हुए , मन में सद्भावनाओं की धारणा करते हुए जो कुछ भी काम मनुष्य करता है वे सब आत्मसन्तोष उत्पन्न करते हैं । सफलता की प्रसन्नता क्षणिक है, पर सन्मार्ग पर चलते हुए कर्तव्य पालन का जो आत्म-सन्तोष है उसकी सुखानुभूति शाश्वत एवं चिरस्थायी होती है । गरीबी और असफलता के बीच भी सन्मार्गगामी व्यक्ति गर्व और गौरव अनुभव करता है।

आत्म-सम्मान का आधार दूसरों को सम्मान देने में है। गुम्बज वाले मकानों में होने वाली प्रतिध्वनि की तरह हमें वही आवाज सुनने को मिली है जो हमने बोली थी । यदि गाली दें तो गाली और भजन गावें तो भजन वह गुम्बज वाले मकान प्रतिध्वनि के रूप में दुहरा देता है । दर्पण में हमें अपनी ही परछाई दिखाई देती है । अपना जैसा ही कुरूप या रूपवान चेहरा होता है वही लौटकर दिखाई पड़ता है । इस संसार का व्यवहार भी गुम्बजदार मकान या दर्पण जैसा ही होता है यदि हम दूसरों का सम्मान करते हैं तो बदले में हमें सम्मान मिलते हैं । अपने मन में यदि दूसरों के प्रति प्रेम एवं आत्मीयता भरी रहे तो बदले में दूसरी ओर से भी हमें यही सब मिलेगा ।

ईश्वर का एक नाम है प्रतिध्वनि । जैसी भी हम गहरी वादी में आवाज लगाते हैं वही लौट कर हमारे पास आती है । हम यदि कहते हैं “तुम बहुत अच्छे हो “ तो वही लौटकर हमें भी यही संदेश देती है कि हम बहुत अच्छे हैं । सम्मान जितना दूसरों को दिया जात है , उससे बढ़े चढ़े परिमाण में लौटकर आता है । स्मरण रखें ! सहयोग लिया जा सकता है पर सम्मान व श्रद्धा अर्जित की जाने वाली विभूतियाँ हैं। आत्मसन्तोष व आत्म सम्मान अन्तर्मुखी होने पर मनुष्य को सहज ही मिलने लगते हैं ।


ईर्ष्यास्पद से अधिक हानि (Kahani)

जंगल में गाय और घोड़ा घास चर रहे थे । घोड़े को ईर्ष्या हुई कि वह गाय के सींगों के डर से अच्छी घास नहीं खा पाता किसी तरह इस पर काबू पाया जाय। तभी वहाँ मनुष्य आ निकला और उसने दोनों को बेबस ललचायी दृष्टि से देखा । घोड़ा मनुष्य के पास आकर बोला देखते क्या हो गया का मीठा दूध पीकर अपनी भूख मिटाओ ।

मनुष्य ने विवशता सामने रखी वह बोला पर वह तो मुझसे तेज दौड़ सकती है, तब घोड़े ने कहा मेरी पीठ पर सवार हो जाओ। मैं गाय से तेज दौड़ सकता हूँ ।

मनुष्य घोड़े की पीठ पर सवार हो गया उसने पहिले घोड़े को गुलाम बनाया और फिर बाद में गाय को काबू में लिया । ईर्ष्या करने वाले पहले और ईर्ष्यास्पद से अधिक हानि तथा कष्ट उठाते हैं ।


मनःस्थिति तो सही ही बनी रहे

सामान्यजनों की मनः स्थिति में परिस्थितियों के अनुरूप उतार चढ़ाव आते रहते हैं। बच्चा भूख लगने पर रोने और खिलौना मिलने पर हँसने लगता है पर बड़े होने पर व्यक्ति अपने पर नियन्त्रण करना सीखता है और ऐसे भाव प्रकट नहीं होने देता जिससे अपना उथलापन प्रकट होता हो। बचकानी मनोवृत्ति बच्चों को ही शोभा देती है । समझदार व्यक्ति यह भी ध्यान रखते हैं कि उन्हें अशोभनीय भावभंगिमा का प्रकटीकरण नहीं होने देना चाहिए ।

तिनके हवा के साथ उड़ते हैं पत्ते पानी के प्रवाह के साथ-साथ बहते हैं पर मनुष्य को मात्र सुविधा ही नहीं देखनी पड़ती यह भी सोचना पड़ता है कि औचित्य कहाँ है ? प्रतिष्ठा की रक्षा किस प्रकार होती है । जो ऐसा कुछ विचार नहीं करते उन्हें परमहंस या पागल कहते हैं व्यवहारवादी नहीं ।

मनुष्य की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वह अपने मनोवेगों पर नियन्त्रण करने का प्रयत्न करता है । पशु ऐसा नहीं कर पाता । आवश्यकताएँ या उत्तेजनाएं उसे तत्काल तद्नुरूप अनाचरण करने के लिए विवश कर देती हैं । किन्तु मनुष्य को सभ्य शिष्टाचार का भी पालन करना पड़ता है । उसे आवेगों को दबाना पड़ता है । इतना ही नहीं कई बार शिष्टाचार निर्वाह के लिए ऐसा भी कुछ करना पड़ता है जिसे करने के लिए वस्तुतः मन नहीं होता ।

भूखा बन्दर किसी की भी टोकरी से खाद्य पदार्थ लेकर भाग सकता है । पर मनुष्य शिष्टाचार का ध्यान रखता है और जहाँ से स्वेच्छापूर्वक न दिया जा रहा हो वहाँ से भूखा होते हुए भी बिना अपनी आवश्यकता प्रकट किये हुए चला जाता है । इसी प्रकार क्रोध आने पर उसे सर्वथा कार्यान्वित नहीं किया जाता है । आक्रमण करने या आवेश प्रकट करने में अधीर नहीं हुआ जाता । मन को रोका जाता है और अवसर न होने पर किसी प्रकार चुप रहकर काम चलाया जाता है । दूसरों का धन देख कर उसे उठाकर चल देने की जल्दबाजी नहीं की जाती । ऐसा करने पर होने वाले परिणामों पर भी विचार किया जाता है और ललक को मन में उठने के साथ ही उसे दबोच लिया जाता है । किसी का सौंदर्य देखकर मन ललचाया हो तो भी उस ओर टकटकी लगाकर देखने की इच्छा पर काबू रखा जाता है । शिष्टता के नाते आंखें नीची करके ही रखी जाती है ।

जन्म जन्मान्तरों की संचित पशु प्रवृत्तियाँ आये दिन ऐसा कुछ करने की प्रेरणा देती रहती हैं जिससे उठती हुई आकाँक्षा को तत्काल पूरा किया जाय । किन्तु सभ्य समाज का सदस्य होने के नाते वैसा ही कुछ कर गुजरने पर नियन्त्रण किया जाता है और मन को समझाने से लेकर धिक्कारने तक के तरीके अपनाकर उस प्रकार रहा जाता है जिसमें प्रतिष्ठा बनी रहे । इसी प्रकार लोक-लाज का ध्यान रखते हुए ऐसा क्रियाकलाप अपनाया जाता है जिससे प्रतिष्ठा बनी रहे और उँगलियाँ उठने का-लाँछन लगने का प्रसंग न आये ।

परिस्थिति के अनुरूप अपनी भावभंगिमा प्रकट करना या आचरण करना हर किसी के लिए संभव नहीं है । उथली प्रकृति के लोग ही ऐसा करते रहते हैं पर जिन्हें मानवी गरिमा का बोध है स्वाभिमान का ध्यान है उन्हें मन के इशारे पर नहीं चलना पड़ता वरन् मन को पग-पग पर दबोचना पड़ता है । अनगढ़ पशु प्रवृत्तियों को उछलने न देने का प्रयत्न किया जाता है । यह द्वन्द्व अन्तःकरण में इस हद तक शमन किया जाता है कि वैसा कुछ आचरण बन पड़ने की नौबत न आये । इसी अभ्यास की सफलता का सुसंस्कारिता उद्विग्न, तृषित और असन्तुष्ट भ्रमण करता रहेगा । जिसे सच्चे प्रेम का एक कण भी मिल जाता है वह अपने भाग्य को सराहता है । अभाव और दरिद्रता के रहते हुए भी जिसे प्रेम के कुछ कण उपलब्ध हो जाते हैं वह अपने आपको किसी बड़े अमीर से कम सुखी नहीं मानता । माता का, पत्नी का , भाई का , मित्र का, जनता का प्रेम जिसे प्राप्त है उसे जीवन की सबसे बड़ी विभूति मिल गई यही मानना पड़ेगा ।

प्रेम के मूल में आत्मीयता रहती है । स्वार्थ, मोह , रूप यौवन, वासना, उपयोगिता, प्रतिभा, आदि के बाह्य आकर्षणों से भी कई बार प्रेम जैसी लगने वाली घनिष्ठता उत्पन्न हुई दिखाई देने लगती है, पर उसकी जड़ नहीं होती, इसलिये वे बाह्य कारण समाप्त होते ही वह तथाकथित प्रेम भी बालू की भीत की तरह ढह जाता है प्रेम में गहराई , स्थिरता एवं आत्मत्याग की स्थिति तभी रहेगी जब आत्मीयता की निष्ठ का समावेश हो । जो अपना है उसके साथ त्याग , सेवा, सौजन्य , स्नेह और उदारता के अतिरिक्त अन्य किसी प्रकार का व्यवहार नहीं किया जा सकता । जिस प्रकार ईश्वर को घट-घट वासी , सर्वव्यापी , निष्पक्ष और कर्मफल प्रदाता मानने वाला सच्चा आस्तिक मनुष्य कुविचारों और कुकर्मों से दूर ही रहेगा उसी प्रकार प्रेम की भावनाएँ जिसके उमड़ेंगी वह दूसरों के साथ सौजन्यपूर्ण सद्व्यवहार ही करेगा , उदारता बरतेगा और स्वयं कष्ट में रह कर दूसरों को सूखी बनाने का प्रयत्न करता रहेगा। आस्तिकता और प्रेम भावनायें जब भी विकसित होती हैं तब सदाचार और सद्व्यवहार ही उनका बाह्य रूप प्रकाश में आता है ।

आत्म-सन्तोष और आत्म-सम्मान यह दो ही आत्मा की प्रधान आवश्यकता, मुख्य क्षुधाएँ हैं । उनकी तृप्ति से-उनकी पूर्ति से ही आत्मा को सच्ची तृप्ति का अनुभव होता है और वह शान्ति तथा सन्तोष उपलब्ध करती है । इन दोनों की तृप्ति पूर्णतया अपने हाथ में है । शरीर से सत्कर्म करते हुए , मन में सद्भावनाओं की धारणा करते हुए जो कुछ भी काम मनुष्य करता है वे सब आत्मसन्तोष उत्पन्न करते हैं । सफलता की प्रसन्नता क्षणिक है, पर सन्मार्ग पर चलते हुए कर्तव्य पालन का जो आत्म-सन्तोष है उसकी सुखानुभूति शाश्वत एवं चिरस्थायी होती है । गरीबी और असफलता के बीच भी सन्मार्गगामी व्यक्ति गर्व और गौरव अनुभव करता है।

आत्म-सम्मान का आधार दूसरों को सम्मान देने में है। गुम्बज वाले मकानों में होने वाली प्रतिध्वनि की तरह हमें वही आवाज सुनने का मिली है जो हमने बोली थी । यदि गाली दें तो गली और भजन गावें तो भजन वह गुम्बज वाले मकान प्रतिध्वनि के रूप में दुहरा देता है । दर्पण में हमें अपनी ही परछाई दिखाई देती है । अपना जैसा ही कुरूप या रूपवान चेहरा होता है वही लौटकर दिखाई पड़ता है । इस संसार का व्यवहार भी गुम्बजदार मकान या दर्पण जैसा ही होता है यदि हम दूसरों का सम्मान करते हैं तो बदले में हमें सम्मान मिलते हैं । अपने मन में यदि दूसरों के प्रति प्रेम एवं आत्मीयता भरी रहे तो बदले में दूसरी ओर से भी हमें यही सब मिलेगा ।

ईश्वर का एक नाम है प्रतिध्वनि । जैसी भी हम गहरी वादी में आवाज लगाते हैं वही लौट कर हमारे पास आती है । हम यदि कहते हैं “तुम बहुत अच्छे हो “ तो वही लौटकर हमें भी यही संदेश देती है कि हम बहुत अच्छे हैं । सम्मान जितना दूसरों को दिया जात है , उससे बढ़े चढ़े परिमाण में लौटकर आता है । स्मरण रखें ! सहयोग लिया जा सकता है पर सम्मान व श्रद्धा अर्जित की जाने वाली विभूतियाँ हैं। आत्मसन्तोष व आत्म सम्मान अन्तर्मुखी होने पर मनुष्य को सहज ही मिलने लगते हैं । कहते हैं । सुसंस्कारी व्यक्तियों के मन में भी हीन और हेय विचारणाएँ उठती रहती हैं पर उनकी विशेषता यही है कि वे विवेक को हाथ से नहीं जाने देते प्रतिष्ठा पर आँच आने का प्रसंग उपस्थित करने की स्थिति नहीं बनने देते । इसी प्रयोजन को पूरा करते रहने में सहायता कर सकने के लिए धर्म-नीति सदाचार अध्यात्म के तत्वज्ञान का सृजन हुआ है । उन विधाओं में एक ही तथ्य हृदयंगम कराने का प्रयत्न किया गया है कि पशु प्रवृत्तियों को उभरने से पूर्व ही उस दार्शनिक पद्धति द्वारा समाधान कर दिया जाय । चरित्र को उज्ज्वल रखने के लिए आवश्यक चिन्तन को ही तत्वदर्शन कहते हैं । ईश्वर, कर्मफल, परलोक आदि का ढाँचा मनीषियों ने इसी प्रयोजन के लिए खड़ा किया है कि व्यक्ति का स्वभाव और व्यवहार शालीनता से सुसम्पन्न बना रहे । व्यक्ति की गरिमा इसी एक तथ्य पर निर्भर है कि वह कुत्साओं और कुण्ठाओं पर काबू पाने आन्तरिक महाभारत अर्जुन की तरह निरन्तर लड़ता रहे ।

मनोनिग्रह साधना विज्ञान का अनिवार्य पक्ष है । उसके लिए यही करना पड़ता है कि चिन्तन क्षेत्र में अवाँछनीयताएँ उद्दण्डतायें पनपने न पायें । जब उठें तो तत्काल उन्हें खेत के खरपतवार की तरह उखाड़ फेंका जाय । आँगन के कूड़ा करकट की तरह बुहार दिया जाय ।

मनोनिग्रह का दूसरा पक्ष है उसे सौजन्य-सद्भाव के ढाँचे में ढाल लेना । अनगढ़ वस्तुएँ इसी प्रकार सुगढ़ बनायी जाती हैं । खदान से मिट्टी मिला लोहा निकलता है । भट्टी में तपाकर उसे शुद्ध किया जाता है । इसके उपरान्त उसे उपयुक्त साँचे में ढालकर महत्वपूर्ण उपकरण के रूप में विनिर्मित किया जाता है । मन को भी इसी प्रकार कुसंस्कारी आवेगों से छुटकारा दिलाकर सुसंस्कारी बनाया जाता है ।

सुसंस्कारिता के अनेक प्रयोग और पक्ष हैं पर उनमें सबसे लाभदायक और सबसे सरल है प्रसन्नता की मुख मुद्रा । यदि यह अभ्यास बन पड़े तो व्यक्तित्व अनायास ही निखर पड़ता है और सौंदर्य से भरा पूरा आकर्षक दीख पड़ने लगता है । इस उपलब्धि से कुरूप भी सुन्दर लगने लगते हैं और अभावग्रस्त भी दूसरों को सफल सुसम्पन्न जैसे लगते हैं । दूसरों को प्रभावित करने में वे प्रकाश जैसे और आकर्षित करने में चुम्बक जैसे लगते हैं ।

मोटी परख यह है कि जो समर्थ और सफल हैं उनकी मुखाकृति प्रसन्नता भरी रहती है । दूसरे इसी आधार पर किसी की मनः स्थिति और परिस्थिति का अनुमान लगाते हैं । जिस प्रकार यौवन का सौंदर्य हर किसी की आँखों को सुहाता है उसी प्रकार प्रसन्नता का प्रकटीकरण यह बताता है कि इसने अभावों और विग्रहों पर विजय प्राप्त कर ली । ऐसे लोग पराक्रमी और भाग्यवान माने जाते हैं । उनकी निकटता सभी को प्रिय लगती है । खिले फूलों पर पर सभी की आँखें ललचाती हैं । मधुमक्खियों और तितलियों की तरह भीड़ उनसे कुछ पाने के लिए इर्द-गिर्द मँडराती रहती है । हँसता व्यक्ति ही दूसरे को हँसाते रहने में समर्थ होता


व्यक्तित्व की प्रखरता में चार चाँद (Kahani)

दो बाज एक ही पेड़ पर रहते थे । दोनों शिकार मार कर लाते और लौट कर उसी पेड़ पर बैठकर खाते ।

एक दिन बाज ने साँप पकड़ा दूसरे के हाथ चूहा लगा। दोनों अधमरे थे । दोनों ने सुस्ताकर खाने के लिए पंजों को ढीला छोड़ दिया ।

तनिक सा अवसर मिला तो साँप घायल चूहे को निगलने का पैंतरा दिखाने लगा । दोनों बहुत हँसे वे सोचने लगे कि देखो इन मूर्ख प्राणियों की हालत स्वयं मरने जा रहे हैं, पर फिर भी द्वेष का स्वभाव और पाने का लोभ छूटता नहीं है ।

गाँधी जी की बचपन की बात है । बुरी संगत में पड़ कर किसी से कर्ज ले लिया । जब कर्जदार तंग करने लगा तो घर से थोड़ा चुरा लिया और कर्ज चुका दिया।

कर्ज का भार तो हल्का हो गया पर गाँधी जी मन में चोरी के पश्चाताप से झुलसने लगे । सोचा पिता जी से बता दें । किन्तु सीधे जाकर कहने का साहस नहीं हो सका । फिर एक पत्र लिखा , जिसमें अपना दोष स्वीकार किया और भविष्य में वैसा न करने का दृढ़ संकल्प भी व्यक्त किया । पुत्र की सच्ची आत्मा ने पिता को हर्षित कर दिया । उन्होंने सच्चे दिल से उस अपराध को क्षमा कर दिया । गाँधी जी ने शिक्षा ली-सच्चे हृदय से अपराध स्वीकार कर लेने से मन का मैल धुल जाता है ।

सुगंधित वस्तुओं के समीपवर्ती वस्तुएँ भी सुगंधित हो जाती है । जिसके होठों पर सदैव मुसकान ही खिलती रहती है, उद्विग्नता , खीज, निराशा जैसे मानसिक असंतुलन उनके पास नहीं फटकते । ऐसे स्वभाव वाले सदा अधिक मात्रा में अधिक अच्छे स्तर का काम करने और सफलताएँ अर्जित करने में प्रथम रहते हैं ।

प्रसन्नता को सफलता का सूचक माना जाता है । हँसते-हँसाने का स्वभाव बना लेना उत्साह , संतुलन और साहस का अभ्यास बढ़ा लेने जैसा है । यह एक मानसिक टॉनिक है जिससे निरंतर नयी शक्ति उभरती रहती है । अच्छी आदत के रूप में स्वभाव का अंग बन जाने पर इससे व्यक्तित्व की प्रखरता में चार चाँद लग जाते हैं ।


व्यक्तित्व विकास का शुभारंभ आचरण से

मनुष्य की योग्यता, क्षमता और प्रतिभा का सही मूल्याँकन सामाजिक स्तर पर ही किया जा सकता है । कौन कितनी योग साधना जप-तप करता है यह सब कुछ उसके व्यक्तिगत जीवन तक ही सीमित है, पर सामाजिक जीवन को कितना शिष्ट, सुसंस्कृत एवं सुव्यवस्थित बनाया गया, इस आधार पर ही उसके व्यक्तित्व की प्रभाव परिधि और सुविकसित स्तर को आँका जा सकना संभव है ।

सुप्रसिद्ध समाज मनोविज्ञानी सी. एच. कूली ने “ह्यूमन, नेचर एण्ड द सोशल ऑर्डर” नामक ग्रन्थ में लिखा है कि जिस प्रकार कोई व्यक्ति अपने चेहरे और वेश विन्यास को दर्पण में देख कर सचेत हो उठता है और उसे सँजोने-संभालने में अनवरत लगा रहता है, उसी प्रकार उसकी इच्छा, आकाँक्षा विचारणा और भावनाओं को भी सामाजिक शिष्टाचार के आइने में परिलक्षितों को देखा जा सकता है । श्री कूली ने व्यक्ति की बाह्य एवं व्यावहारिक गतिविधियों के आधार पर ही व्यक्तित्व के आधार पर ही व्यक्तित्व के सर्वांगीण विकास की आशा अपेक्षा व्यक्त की है । मानवी व्यक्तित्व को प्रभावित करने वाली इन गतिविधियों को तीन वर्गों में बाँटा गया है- (1) वैल्यू (2) पोटेन्सी (3) ऐक्टिविटी ।वैल्यू का अभिप्राय व्यक्ति के शैक्षिक स्तर से होता है कि वह कितनी उच्च शिक्षा ग्रहण कर चुका है । ‘पोटेन्सी’ को प्रतिभा के नाम से जानना जाता है और ‘ऐक्टिविटी’ का अर्थ व्यक्ति के क्रिया-कलापों से होता है । उनके कथानुसार व्यक्ति ने भले ही कितनी ऊँची शिक्षा प्राप्त क्यों न की हो, किन्तु उसकी योग्यता-क्षमता गिरों को उठाने और उठों को आगे बढ़ाने वाली प्रतिभा के स्वरूप में विकसित न हो सकी तथा सामाजिक सद्व्यवहार में नहीं उतरी तो वह व्यर्थ-निरर्थक ही साबित होगी । अपने व्यावहारिक क्रिया-कलापोँ के माध्यम से दूसरों को प्रभावित करके सन्मार्ग पर प्रेरित कर सकने वाली प्रतिभा को उनने “सब्जेक्टिव पब्लिक आइडैन्टिटी” के नाम से संबोधित किया है । दूसरे शब्दों में इसी को लोक श्रद्धा अर्जित करने और जन सहयोग प्राप्त करने की शक्ति सामर्थ्य के नाम से भी निरूपित किया गया है । वस्तुतः यह सामाजिक शिष्टाचार की ही परिणति है जो मानवी व्यक्तित्व को सब प्रकार से प्रखर एवं परिष्कृत बनाती चली जाती है ।

अमेरिका के ख्याति लब्ध मनः चिकित्सक हैरी स्टैक सुलीवान ने बालकों की मनोदशा पर लम्बे समय से विशद् अध्ययन अनुसंधान किया है तदुपरान्त वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं के बच्चा जन्म से कोई बुराई लेकर नहीं आता बल्कि पारिवारिक एवं सामाजिक शिष्टता और अशिष्टता के माहौल को देखकर ही वह भला-बुरा बनता है । घर तथा स्कूल के संपर्क-व्यवहार में आकर हरी उसमें सुसंस्कारिता कुसंस्कारिता के बीज आरोपित होते चले जाते हैं, जो श्रेष्ठ अथवा निम्न स्तर के व्यक्तित्व की आधारशिला रखते हैं । उनने मानवी व्यक्तित्व के दो स्वरूप बताये हैं एक एक्सट्रोवर्ट और दूसरा इन्ट्रोवर्ट । अन्य शब्दों में इन्हीं को बहिर्मुखी और अंतर्मुखी व्यक्तित्व कहा जाता है । मनुष्य की बाह्य गतिविधियों को देख कर ही अन्दर की उत्कृष्टता-निकृष्टता का अनुमान आसानी से लग जाता है । उनने ‘ऐक्सट्रोवर्ट’ स्तर के व्यक्तित्व को ही सामाजिक का दर्जा दिया है । क्योंकि इसी के सहारे जन समूह के हित साधन का ध्यान में रखते हुए शिष्टता का अनुशासन निभता और व्यक्तित्व प्रभावशाली बनता है । ऐसा व्यक्ति सदैव आशा-उत्साह की जीवनचर्या बिताता है । इन्ट्रोवर्ट को उनने संकोची स्वार्थी और संकीर्ण स्तर का बताया है । जो सदैव अपनी ही प्रगति-उन्नति का ताना-बाना बुनता रहता है ।

मानवी प्रगति के इतिहास पर दृष्टिपात करने से प्रतीत होता है कि जहाँ अगणित व्यक्ति किसी प्रकार जीते करते रहते हैं वहीं कुछ ऐसे भी होते हैं, जो सामाजिक नियमानुशासनों का परिपालन करते हुए अपने व्यक्तित्व को निखारते और महामानव स्तर तक के कार्य कर दिखाते हैं । पिछड़े और प्रगतिशील लोगों का शारीरिक ढाँचा तो एक जैसा होता है, पर उनकी व्यावहारिक गतिविधियों में जमीन-आसमान जितना अंतर रहता है । यह अंतर ही यह बताता है कि कौन साधारण मानव है और कौन महामानव ।


मधु-संचय - देव दुर्लभ काया -खोज प्राणवानों की


भूमि (Kavita)

जैसे बिना भूमि के, बीज नहीं बोया जात। वैसे ही है प्रखर प्राण का, इस तन से नाता॥

जितनी सक्षम भूमि, बीज उतना ही फलता है। बंजर में तो श्रेष्ठ बीज भी, कहाँ अँकुरता है॥

श्रेष्ठ भूमि ही एक बीज के, कई बनाती है। अपनी उर्वरता द्वारा, फसलें लहराती है॥ वसुन्धरा की गोद प्राप्त कर, बीज श्रेय पाता॥

मानव-तन में ही प्रतिभा के बीज पनपते हैं। इस तन को पाकर देवों के प्राण पुलकते हैं॥

स्वस्थ शरीर, आत्मा की सामर्थ्य व्यक्त करता। राम-कृष्ण, गौतम-गाँधी का, रूप यही धरता॥ इसीलिये देवों को दुर्लभ, यह तन कहलाता॥

आत्म-स्वाति की बूँद, इसी में मोती बनती है। इसी दीप में दिव्य चेतना, की लौ जलती है॥

मानव-तन की गरिमा को , बदनाम न करना है । सुधा-पात्र से विषयों का, विषपान न करना है ॥ भोगों का उन्माद, इसे पशु जैसा मदमाता ॥

मानव-तन की धरती में , सद्गुण अँकुराना है । करें देव अवतरण , इसे वह स्वर्ग बनाना है ॥

इस नन्दन-वन में , समता-ममता के फूल खिलें । सद्भावों के पंछी कलरव करते गले मिलें ॥ जनमंगल के गीत साँस का सुआ रहे गाता ॥

-मंगल विजय


Kavita

दे सकें जो संतुलन युग-संधि में , खोज ऐसे प्राणवानों की करें ।

संतुलन बिगड़ा हुआ है होड़ में , ध्वंस हो अथवा नया निर्माण हो, सामने आएँ प्रखर प्रतिभा वही , राह की जिनको कुशल पहचान हो

हो सँभलने का जिन्हें अभ्यास भी, जो नहीं चिन्ता ढलानों की करें ।

यह समय बंजर घरा-सा है, यहाँ कल्पना अमराइयों की व्यर्थ है , जबकि नीवों में दरारें पड़ रही, कामना ऊँचाइयों की व्यर्थ है ,

वे बढ़ें, जो भूमि को उर्वर करें , ठीक जो नीवें मकानों की करें ।

हो न जिसमें धैर्य तपने का बहुत , काल को ऐसा न कुन्दन चाहिये, जो नहीं प्रतिपल समर्पित हो सके , एक भी ऐसा नहीं प्रण चाहिये ,

जो तराशे जा सकें युग के लिये , खोज हीरों की खदानों की करें ।

मात्र सुविधाएँ जुटाने के लिये , हम सभी ने श्रेष्ठ गुण सब खो दिये , और शोषण, लोभ, लिप्सा, द्वेष के , बीज हमने ही विषैले बो दिये ,

काल ने माँगे व्रती ऐसे कि जो , कोशिशें इनके निदानों की करें ?

-शचीन्द्र भटनागर


व्यक्तित्व रूपी सिक्के के दो पहलू

निजी स्वभाव, स्तर और पराक्रम में , उत्कृष्टता का समावेश अभिवर्धन करना आवश्यक हैं, क्योंकि निजी व्यक्तित्व ही वह चुम्बकत्व है, जिससे आकर्षित होकर दूसरों का सहयोग मिलता है और अनुकूल वातावरण विनिर्मित होता है । अपना स्वभाव क्रोधी हो तो प्रतिक्रिया ऐसी ही बनती रहेगी कि दूसरे भी दुर्व्यवहार करें और प्रतिशोध लें । आवेशग्रस्त व्यक्ति का स्वभाव, व्यवहार सज्जनों को भी खिन्न-विपन्न बना देता है । वे उसका बदला न भी लें तो भी उपेक्षा अवश्य अपनाते हैं । बचकर रहने एवं रखने का प्रयास करते हैं । ऐसी दशा में सहयोग, परामर्श , स्नेह तो मिल ही नहीं पाता और उस आधार पर किसी प्रकार का लाभ उठा सकने का सुयोग तो बनता ही नहीं । इसके विपरीत आदर्शवादी चिन्तन, चरित्र और व्यवहार ऐसी परिणति उत्पन्न करते हैं कि पराये भी अपनों जैसा बरताव करने लगें । सज्जनता की सद्भावना अनेकों को अनायास ही आकर्षित करती है और सम्मान सहयोग को अनायास ही आकर्षित करती है और सम्मान सहयोग के व्यवहार में अपनी प्रतिक्रिया प्रकट करती है ।

महामानवों में यह विशेषता रही है कि वे अपने चरित्र को, स्वभाव को ऐसा बनाते हैं, जिसके प्रति सहज सद्भाव उपजे । अपने व्यक्तित्व का चुम्बकत्व उसी स्तर के लोगों को खींच बुलाता है और स्वभावतः ऐसा सहयोगी मंडल बन जाता है जो सत्प्रवृत्तियों में संलग्न रहता दिखाई पड़े, एक दूसरे को ऊँचा उठावे आगे बढ़ावे , सत्परामर्श दे, प्रशंसा करे और ऊँचा उठाने वाले प्रयासों का सुयोग बिठाये । इस प्रकार अपनी उत्कृष्टता दूसरों की श्रेष्ठता को उभारती है, निकट लाती है और उस समन्वय का प्रभाव यह होता है कि उस मंडली का प्रत्येक सदस्य लाभ में रहता है । अधिक नफे में वह रहता है, जिसने श्रेष्ठता सँजोने में पहल की थी । कारण यह कि उसकी व्रतशीलता संकल्प रूप में परिणत होती और सुस्थिर रहती है । जिस दिशा में तेज हवा प्रवाहित होती है, उसी ओर उस क्षेत्र में बिखरे हुए तिनके पत्ते भी उड़ने लगते हैं । स्वभाव की विशिष्टता अपने लिए सहयोग की बहुलता अनायास ही एकत्रित करती रहती है । महापुरुषों का सफल जीवन मूलतः इसी तथ्य पर आधारित रहा है । उनके विकास , परिष्कार में यही निमित्त कारण आधारभूत रहे हैं । उत्कर्ष के अनेक कारणों में जहाँ अपना पराक्रम, पुरुषार्थ महती भूमिका निभाता रहा है , वहाँ यह भी बड़ा कारण रहा है कि संभ्रांत सहयोगियों के प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से उस उत्थान में येन-केन प्रकारेण सहकार मिलते रहे हैं ।

व्यक्तित्व की उत्कृष्टता का प्रथम प्रतिफल आंतरिक संतोष है । संतोषी सुखी भी रहता है और प्रसन्न-उल्लसित भी । जिसे आन्तरिक संतोष है , उसे भीतर से शक्ति मिलती है और वह एकाकी चलकर अपने बलबूते भी बहुत कुछ कर सकता है । आदर्शों का अवलम्बन करने से उसका चिन्तन सही रहता है और कार्य करने की दिशाधारा में सोमनस्य बना रहता है । गलत मार्ग पर उसके कदम प्रायः उठते ही नहीं । उठते भी हैं तो तुरन्त वापस लौट आते हैं । गलती को सुधारने में देर नहीं लगती । इसमें झिझकने, संकोच या विलम्ब करने की आवश्यकता नहीं पड़ती । भूल करना मनुष्य की अपूर्णता के कारण होता ही रहता है पर महानता इसमें है कि भूल को देर तक अपनाये न रहा जाय । उसे समझ लेने के साथ-साथ सुधार भी लिया जाय । भूल करने पर जो अप्रतिष्ठा होती है, वह स्वीकार करने या सुधारने पर धुल भी जल्दी ही जाती है । सज्जनों की तरह भूल सुधारने वाले उदारचेता भी सम्मान पाते हैं और उनकी नीयत पर ईमानदारी पर जो संदेह उठने की बात उभरती थी , उसका सफाया हो जाता है । अकर्म करने और फिर उसे प्रतिष्ठा का प्रश्न बना कर हठपूर्वक अड़ जाने से व्यक्ति गिरता है । उसकी सद्भावना पर हर किसी को अविश्वास उठने लगता है । भूल करना बुरी बात है , पर उससे भी बुरी बात यह है कि अपनी गलती को दूसरे पर थोपते हुए स्वयं को निर्दोष सिद्ध करने के लिए दुराग्रही के सामने पड़कर कोई झगड़ा भले ही मोल न ले, किन्तु उसकी अविश्वसनीयता सुनिश्चित हो जाती है । हठवादी अपने पक्ष को अनुचित होते हुए भी उचित सिद्ध करने का प्रयत्न करते हैं, पर वे उसमें सफल नहीं हो पाते । यथार्थता को देर तक नहीं छिपाया जा सकता । प्रशंसा तो छिप भी सकती है , पर निन्दा हजार छिद्रों से होकर प्रकट होती है । उसे कोई पचा नहीं सकता । हींग की गन्ध कपूर लपेटने पर भी छिपती नहीं ।

मनुष्य को गिराने वाले वस्तुतः उसके दुर्गुण ही होते हैं । इन दुर्गुणों में कुछ तो अनुपयुक्त वातावरण में रहने के कारण देखा-देखी उपजते हैं । संगति का प्रभाव पड़ना सुनिश्चित है । प्रतिभावान व्यक्तित्व चाहे भले हों या बुरे , संपर्क क्षेत्र पर अपना प्रभाव छोड़ते हैं , नशेबाज , जुआरी , शेखीखोर, लफंगे , बचकाने, कामुक प्रकृति के व्यक्ति संपर्क में आने वालों में से अधिकाँश को अपने जैसा बना लेते हैं । यही बात सुसंगति के बारे में भी है । सज्जनों के संपर्क में रहने से अनायास ही सत्प्रवृत्तियों की छाप पड़ती है और वे धीरे-धीरे साथियों को भी अपने जैसा बना लेती हैं । जिस वातावरण में दुष्प्रवृत्तियों का बोलबाला है उसके साथ यदि मनोयोगपूर्वक जुड़े रहा जाय तो उन दोषों की छाप पड़े बिना नहीं रह सकती । यही बात सत्यप्रवृत्तियों के संबंध में भी लागू होती है । छोटे बच्चों पर पारिवारिक वातावरण का गहरा असर पड़ता है । इसे सभी जानते हैं , पर यह भी भुला नहीं दिया जाना चाहिये कि बड़ी आयु में भी प्रभावशाली लोग दुर्बल मन वालों को अपनी चपेट में ले लेते हैं । इस संबंध में किशोर अवस्था भी बहुत संवेदनशील होती है ।

संगति के अतिरिक्त व्यक्तित्व को अपने ढाँचे में ढालने वाली दूसरी स्थिति है - उदारता या संकीर्णता की । उदार व्यक्ति दूसरे के प्रति आत्मीयता , ममता सद्भावना , सहकारिता का भाव रखता है । उनके गुणों को देखता है और प्रशंसापरक अभिव्यक्ति ही प्रकट करता है । यह उदारता अपने साथ श्रम, समय मनोयोग तो ले जाती है, पर बदले में जो लेकर लौटती है वह अपेक्षाकृत कहीं अधिक मूल्य का होता है । उदारचेता घाटे में नहीं रहते । वे अपनी सेवा सद्भावना को बीज की तरह बोते और फसल की तरह काटते हैं ।

अनुदार व्यक्ति संकीर्ण स्वार्थपरता में निमग्न रहते हैं । हर समय यही सोचते हैं कि दूसरों से किस प्रकार किस स्तर का , कितना लाभ उठाया जाय इसके लिए वे अनैतिक आधार अपनाने में भी नहीं चूकते । इस प्रसंग में छल प्रपंच रचते भी उन्हें देर नहीं लगती । मायाचार से तात्कालिक लाभ तो मिल जात हैं, क्योंकि दूसरे लोग उसे समझ नहीं पाते, धोखे में रहते हैं, इसलिए आसानी से ठगी में आ जाते हैं, पर एक सोने का अंडा रोज देने वाली मुर्गी का पेट चीरने वाले की तरह अपनी विश्वसनीयता खो बैठने के उपरान्त सदा के लिए अपनी साख गँवा बैठते हैं । फिर साधारण काम में साधारण बात में भी उनका कोई विश्वास नहीं करता । जिसे ठगा गया है उसकी चर्चा दूर-दूर तक फैलती है और अन्य लोग जिसका सीधा वास्ता नहीं पड़ा था, वे भी सावधान हो जाते हैं । एक को ठगकर हजारों की दृष्टि में अपनी साख गँवा बैठते हैं । ऐसी दशा में सहयोग मिलना तो दूर, कोई बात सुनने तक के लिए तैयार नहीं होता । यह स्थिति ऐसी है जिसमें आत्मधिक्कार और आत्मप्रताड़ना की दुहरी मार अपने को सहनी पड़ती है । प्रपंचकों की यह आन्तरिक दुर्दशा ही उनके बहिरंग जीवन को ऐसा बना देती है कि कोई उनका सच्चा मित्र नहीं रह जाता । जो भी संपर्क बनाता है, वह यही सोचता रहता है कि मेरे साथ भी कोई घात तो घटित नहीं हो जायेगी । यह स्थिति ऐसी है, जिसमें बार-बार आदमी को अपने स्थान और व्यवसाय बदलने पड़ते हैं । ऐसे व्यक्ति कोई महत्वपूर्ण सफलता तो पा ही नहीं सकते । संकीर्ण स्वार्थपरता हर किसी के भविष्य को अंधकारमय बनाती है । व्यक्तित्व के ये दो पहलू हैं । यह मानव पर है कि उत्कृष्टता का वह अवलम्बन लेता है यह चिर संस्कारजन्य निकृष्टता का।


Quotation

जो व्यक्ति समाज से जितना ले यदि उतना ही उसे लौटा दे तो वह एक मामूली भद्र व्यक्ति माना जायेगा ।

जो समाज से जितना ले उससे कहीं अधिक उसे लौटा दे तो उसे एक विशिष्ट भद्र व्यक्ति कहा जावेगा और जो अपने जीवनपर्यन्त समाज की सेवा में लगा रहे और प्रत्युपकार में समाज से कुछ भी लेने की इच्छा न रखे वह एक असाधारण भद्र पुरुष कहलावेगा ।

परन्तु जो व्यक्ति समाज का सिर्फ शोषण ही करता रहे व समाज को देने की बात भूल जाय उसे क्या ‘जेन्टिलमेन’ माना जायेगा ?

-जार्ज बर्नार्डशा


मन जड़ है व शरीर कलेवर

शरीर मन का आज्ञाकारी सेवक है । दोनों आपस में अविच्छिन्न रूप से गूँथे हुए हैं । शरीर रोगी होता है तो मस्तिष्क बेचैन, अशान्त पाया जाता है । नींद नहीं आती और सिर पर भारीपन छा जाता है । यही बात पन पर विपत्ति आने पर शरीर की दुर्दशा होने के सम्बन्ध में है । क्रोध में आँखें लाल हो जाती हैं । होंठ काँपने लगते हैं । शरीर आवेश से भर जाता है । भय की स्थिति में गला सूखता है, पैर काँपते हैं । भय की स्थिति में गला सूखता है, पैर काँपते हैं, रोएँ खड़े हो जाते हैं और गहरी साँसें चलने लगती हैं ।

कहते हैं कि स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन का निवास होता है । यह कथन आरोग्य का महत्व समझाने की दृष्टि से कहा गया है पर वास्तविकता इससे भिन्न है । विशेषज्ञ कहते हैं कि मन के स्वस्थ रहने पर ही शरीर स्वस्थ रह सकता है ।

शरीर का सामान्य कार्य भोजन से चलता दीखता है, पर उसके साथ यह शर्त जुड़ी हुई है कि वह पच सके तो, अन्यथा अपच रहने की स्थिति में खाया हुआ भोजन विष तुल्य हो जाता है । वह सड़ता है । गैसें बनाता है और वे रक्त में मिलकर समूचे शरीर में घूमती हैं और जहाँ कहीं भी उन्हें अवसर दीखता है वहाँ रुक कर रोग खड़ा कर देती हैं ।

अपच का एक कारण अधिक मात्रा में अभक्ष्य भोजन करना है । किन्तु कारण है-मुख आमाशय , जिगर , आँत आदि से उचित स्तर का, उचित मात्रा में पाचक रसों का स्राव न होना। इस स्थिति में सात्विक और स्वल्प मात्रा में खाया हुआ भोजन भी नहीं पचता । अपच का कोई भी कारण क्यों न हो वह दुर्बलता और रुग्णता का निमित्त कारण बनता है । यह स्राव मानसिक स्थिति अस्त-व्यस्त होने की दशा में, मात्रा में स्वल्प और स्तर के हिसाब से घटिया निकलते हैं । इनके कारण आहार पोषक न रहकर शोषक बन जाता है ।

शरीर पोषण में शुद्ध रक्त की जितनी भूमिका है उससे भी अधिक उस विद्युत प्रवाह की है जो नाड़ी तन्तुओं में निरन्तर दौड़ता रहता है । जिसका उद्गम केन्द्र मस्तिष्क है । यह नाड़ी तन्तु जीव कोशिकाओं को गति भी देते हैं और पोषण भी । इसमें कमी पड़ जाने से भीतर अवयवों की गतिशीलता शिथिल पड़ जाती है । भीतर खोखलापन बाहर भी आता है । शरीर की क्रियाशक्ति घट जाती है और स्वास्थ्य संतुलन लड़खड़ाने लगता है । इतने पर भी काम तो करना ही पड़ता है । नित्यकर्म से निपटने, भोजन करने आदि तक में श्रम पड़ता है । न्यूनाधिक मात्रा में चलना फिरना तो पड़ता ही है । हाथ भी चलते ही हैं । श्रम के बिना शरीर की पाचन और मल विसर्जन प्रक्रिया काम कैसे करें ? यह तो सामान्य दिनचर्या की बात हुई । काम इतने से भी नहीं चलाता । आजीविका उपार्जन के लिए भी काम करना पड़ता है और उसमें शारीरिक एवं मानसिक क्षमता लगती है । इस खर्च का संतुलन यदि उत्पादन के साथ न बैठे तो शरीर गलता और घिसता जायेगा । फलतः रोग दबोच लेंगे और अकाल मृत्यु असमय ही आ धमकेगी ।

रक्त पेट में भोजन पचने पर पैदा होता है । गुर्दों, आँतों और फेफड़ों द्वारा उसका परिशोधन होता है । हृदय द्वारा नाड़ियों के माध्यम से उसे अंग-अवयवों तक पहुँचाया जाता है । हृदय देखने भर में स्वसंचालित प्रतीत होता है । पर वास्तविकता यह है कि अन्य अवयवों की भाँति हृदय को भी जिस क्षमता की आवश्यकता होती है वह मस्तिष्क रूपी बिजलीघर में उत्पन्न होती है एवं मेरुदंड के साथ जुड़े हुए अनेक नाड़ी तन्तुओं और मुच्छकों द्वारा पहुँचती है ।

यह विद्युत प्रभाव कितना अद्भुत और आश्चर्यजनक है । इसकी जानकारी अंतःस्रावी ग्रंथियों और उनके द्वारा उत्पन्न किये जाने वाले हारमोनों का निरीक्षण-परीक्षण करने पर पता चलता है ।प्रजनन माध्यम से वंशवृद्धि और तात्कालिक सरस संवेदनाओं में जिन ‘जीन्स’ का हस्तक्षेप होता है उनकी संरचना एवं क्रियापद्धति और भी अद्भुत है । इन्हें अपने प्रयोजन के अनुरूप जो मस्तिष्क द्वारा प्रेरित होती है । जिस प्रकार मशीन के पुर्जों को द्वारा जलने-घिसने से बचाने के लिए उनमें मोबिलआइल की चिकनाई डालते रहना पड़ता है । उसी प्रकार रक्त, माँस मज्जा आदि द्वारा एक सामान्य प्रयोजन की पूर्ति भर होती है । कारखानों में लगी मशीनों में चलाने के लिए जिस शक्ति की आवश्यकता होती है वह तो जनरेटर या इंजन से प्राप्त होती है ।यह जनरेटर मस्तिष्क ही है । वही है जो सोचने-विचारने के अतिरिक्त विद्युत उत्पादन का भी केन्द्र है । यह ऊर्जा उसे ब्रह्मांड व्यापी ऊर्जा से प्राप्त होती रहती है । इसीलिए मस्तिष्क को ब्रह्माण्डीय शक्ति खींचते रहने वाले पृथ्वी के ध्रुव केन्द्र के समतुल्य माना जाता है ।

बात पुरानी हो गयी जब रोगों का कारण वात, पित्त, कफ से, आदी , बादी , खादी , से , लवणों या रसायनों के कम पड़ जाने से तथा विषाणुओं के आक्रमण पर निर्भर माना जाता था और तद्नुसार उपचार साधनों के रूप में औषधियों का निर्माण और उपयोग किया जाता था । नवीनतम वैज्ञानिक खोजों ने यह माना है कि रोगों की जड़ मनोविकारों में है । मानसिक असंतुलन ही चित्र-विचित्र आकार प्रकार वाली बीमारियों का प्रमुख कारण है अन्य कारण तो सहायक मात्र है । मानसिक तनाव या विक्षेप ही रोगों के मूल उत्पादक हैं । इसलिए आधुनिक चिकित्सक आहार विहार की सामान्य खामियों के अतिरिक्त रोगी की मनोदशा का विवेचन-विश्लेषण करते हैं और उस क्षेत्र की विकृतियों को सुधारने पर ध्यान केन्द्रित करते हैं । आवश्यक नहीं कि रोगी होने से पूर्व मनुष्य पागल ही हो जाता हो । पागलपन की हलकी-फुलकी इतनी शाखा-प्रशाखाएँ हैं जिनसे पूरी तरह विरले ही बच पाते हैं । चिन्ता , भय , निराश, क्रोध , घृणा , आवेश, उद्विग्नता जैसी सनकें भी विक्षिप्तता की ही छोटी बहिनें या सहेलियाँ हैं । अनैतिक चिन्तन या आचरण मनःक्षेत्र को मथ डालते हैं । आत्मिक प्रेरणा उनसे दूर रहने की प्रेरणा देती है, किन्तु उद्धत चिन्तन अनाचार ही नहीं दुराचार और अत्याचार करने तक पर उतारू हो जाता है । फलतः अंतराल में अंतर्द्वंद्व उठ खड़े होते हैं । दुहरा व्यक्तित्व उभरता है । इस असंतुलन के कारण अविवेकी व्यक्ति की मनःस्थिति सनकी एवं उद्धत , अभिमानी जैसी हो जाती है उस आवेश से सारा शरीर तन जाता है । यह तनाव जिस भी अंग-अवयव का दुर्बल पाता है उसी के ऊपर अपना अधिकार जमा लेता है । उत्तेजित तनावों की भाँति हीनता, दीनता , भीरुता, आशंका आदि का भी ऐसा प्रभाव होता है जिसे अवसाद कह सकते हैं । मानसिक स्थिति में किसी पर आवेश छाये रहते हैं किन्हीं पर अवसाद । इन्हीं ज्वार-भाटों से अस्थिरता उत्पन्न होती है और रोग उभरने की भूमिका बन जाती है ।

बात पुरानी हो गयी जब रोगों का कारण वात, पित्त, कफ से, आदी , बादी , खादी , से , लवणों या रसायनों के कम पड़ जाने से तथा विषाणुओं के आक्रमण पर निर्भर माना जाता था और तद्नुसार उपचार साधनों के रूप में औषधियों का निर्माण और उपयोग किया जाता था । नवीनतम वैज्ञानिक खोजों ने यह माना है कि रोगों की जड़ मनोविकारों में है । मानसिक असंतुलन ही चित्र-विचित्र आकार प्रकार वाली बीमारियों का प्रमुख कारण है अन्य कारण तो सहायक मात्र है । मानसिक तनाव या विक्षेप ही रोगों के मूल उत्पादक हैं । इसलिए आधुनिक चिकित्सक आहार विहार की सामान्य खामियों के अतिरिक्त रोगी की मनोदशा का विवेचन-विश्लेषण करते हैं और उस क्षेत्र की विकृतियों को सुधारने पर ध्यान केन्द्रित करते हैं । आवश्यक नहीं कि रोगी होने से पूर्व मनुष्य पागल ही हो जाता हो । पागलपन की हलकी-फुलकी इतनी शाखा-प्रशाखाएँ हैं जिनसे पूरी तरह विरले ही बच पाते हैं । चिन्ता , भय , निराश, क्रोध , घृणा , आवेश, उद्विग्नता जैसी सनकें भी विक्षिप्तता की ही छोटी बहिनें या सहेलियाँ हैं । अनैतिक चिन्तन या आचरण मनःक्षेत्र को मथ डालते हैं । आत्मिक प्रेरणा उनसे दूर रहने की प्रेरणा देती है, किन्तु उद्धत चिन्तन अनाचार ही नहीं दुराचार और अत्याचार करने तक पर उतारू हो जाता है । फलतः अंतराल में अंतर्द्वंद्व उठ खड़े होते हैं । दुहरा व्यक्तित्व उभरता है । इस असंतुलन के कारण अविवेकी व्यक्ति की मनःस्थिति सनकी एवं उद्धत , अभिमानी जैसी हो जाती है उस आवेश से सारा शरीर तन जाता है । यह तनाव जिस भी अंग-अवयव का दुर्बल पाता है उसी के ऊपर अपना अधिकार जमा लेता है । उत्तेजित तनावों की भाँति हीनता, दीनता , भीरुता, आशंका आदि का भी ऐसा प्रभाव होता है जिसे अवसाद कह सकते हैं । मानसिक स्थिति में किसी पर आवेश छाये रहते हैं किन्हीं पर अवसाद । इन्हीं ज्वार-भाटों से अस्थिरता उत्पन्न होती है और रोग उभरने की भूमिका बन जाती है ।


कीड़ों का दृष्टिकोण (Kahani)

एक बगीचे में दो कीड़े रहते उनके घर पास-पास ही थे । एक का नाम था गुबरीला । दूसरे का भौंरा ।

दोनों दिन भर अपने-अपने कामों में जुटे रहते । शाम को इकट्ठा होते । अपने-अपने अनुभव सुनाते ।

गुबरीला कहता । वहाँ हर पेड़ की जड़ में गोबर ही पड़ा मिलता है । जिस पेड़ के भी नीचे जाता हूँ उसी की जड़ में दुर्गन्ध ही सूँघने को मिलती

भौंरे ने अपना अनुभव सुनाया कि हर पेड़ के ऊपर फूल खिले हैं वे सभी सुन्दर भी है और सुगंधित भी । जिस भी पेड़ के पास जाता हूँ सुगंध में विभोर हो जाता हूँ ।

एक ही बगीचे में दो प्रकार की अनुभूतियाँ मिलने का कारण उन कीड़ों का दृष्टिकोण और कार्यक्षेत्र भर था ।


परमपूज्य गुरुदेव : लीला प्रसंग

परमपूज्य गुरुदेव की प्रथम पुण्यतिथि पर प्रकाशित जून 1991 के विशेषाँक में “लीला प्रसंग“ शीर्षक से कुछ सामग्री से कुछ सामग्री दी गयी थी। परिजनों के अत्यधिक आग्रह से इस अंक से वह स्तम्भ जब पुनः आरंभ किया जा रहा है। इन पृष्ठो पर पूज्यवर के जीवन से जुड़े अभिव्यक्त एवं अलौकिक घटना प्रसंग दिए जाते रहेंगे। इससे उन अन्य अनेकों को भी लाभान्वित होने का मौका मिलेगा, जो बाद में मिशन से जुड़े व सूत्र संचालक के बारे में और अधिक जानने की जिनकी जिज्ञासा बनी हुई है। इस स्तम्भ के लिए उन सभी की अनुभूतियाँ भी आमंत्रित हैं, जिन्हें भिन्न-भिन्न रूपों में उस महाशक्ति के अनुदान विगत साठ वर्षों में मिले हैं।

चेतना स्तर पर मानवीसत्ता ब्रह्म के समतुल्य है। मूल अस्तित्व की दृष्टि से दोनों में अद्भुत साम्य है। जिन कारणों से विभेद की स्थिति उत्पन्न होती है, महापुरुष उन आवरणों को हटा देते हैं और अपनी सत्ता का विकास नर से नारायण, पुरुष से पुरुषोत्तम के रूप में कर लेते हैं। सुविकसित आत्मा ही परमात्मा है व प्रगति का, विकास का यह मार्ग सब के लिए खुला पड़ा है, ऐसा हमारे ऋषि-मुनि, उपनिषद्कार कहते आए हैं। सिद्धपुरुष, देवदूत, अवतार, माया के आवरण से परे सच्चिदानंदोऽहम् की स्थिति से देखने वाले सामान्य जीवनक्रम में उलझे व्यक्ति उन्हें उनके रहते पहचान नहीं पाते। कभी-कभी घटने वाले घटनाक्रमों की गहराई तक जाने पर उनकी अन्वेषण बुद्धि प्रत्यक्षवाद के तर्कों में उलझकर असमंजसता उत्पन्न कर देती है। किंतु जो विवेकशील हैं, वे दृश्य घटनाक्रम के मूल में छिपे प्रसंग को समझ लेते हैं। सिद्धपुरुषों, महामानवों की परख कर पाना इस संसार का सबसे दुष्कर कार्य है। जिन्हें यह चक्षु प्राप्त हो जायँ व अपनी श्रद्धा का अभिसिंचन वे इससे करना आरंभ कर दें, समझना चाहिए कि उनकी आत्मा का विकास आरंभ हो गया, इनिशिएशन की प्रक्रिया चल पड़ी है।

यह भूमिका इस संदर्भ में प्रस्तुत की जा रही है कि परम पूज्य गुरुदेव के दृश्य जीवन को जिनने देखा है, वे उन अनेकानेक सिद्धि पराक्रमों से अभी भी अपरिचित हैं, जो संपन्न होते रहे किन्तु वे समझ नहीं पाए। प्रायः उनके स्तर के संत अपने अंतरंग स्वरूप को प्रत्यक्ष परिलक्षित नहीं होने देते यही कारण है कि हम ऐसे महामानवों के साधारण समझने की भूल कर जाते हैं। हमारे घरों में जैसे हमारे पिता, दादाजी, नानाजी, होते हैं, कुछ ऐसा ही स्वरूप पूज्यवर का था। खादी की धोती व एक सामान्य मोटे कपड़े का खादी का कुरता उनकी वेशभूषा थी। न दाढ़ी न जटाजूट न गले में माला, जो महामण्डलेश्वर अक्सर धारण किए रहते हैं। बोलचाल से लेकर सामान्य व्यवहार ऐसा कि कहीं भी विशिष्टता का आभास तक न हो। ऐसा कुछ उनका बहिरंग रूप था पर उस सबके पीछे जो “ऑकल्ट” था वह बहुत विलक्षण था एवं कई घटना प्रसंगों में इसकी झलक देखने को मिलती है।

नयी दिल्ली का एक परिवार है श्री बशेशरनाथ एण्ड सन्स। लाला बशेशर नाथ 1943-44 की अवधि में पूज्य गुरुदेव से जुड़े। उनके बेटे थे श्री शिवशंकर गुप्ता। अब वे तो नहीं है। उनके भाई, पुत्र आदि फर्म का काम संभाल रहे हैं। इन सभी के जीवनक्रम में बड़े अन्तरंग तक जुड़े रहे हैं-गुरुदेव। यह परिवार काफी बड़ा है पर प्रत्येक को ढेरों अनुदान ऐसे मिले हैं जिनके यह सभी जीती जागती साक्षी हैं। सबसे विलक्षण मामला तो स्वयं शिवशंकर जी का हैं। वे एल.एल.एम. थे व प्रखर प्रतिभा संपन्न। पूज्य गुरुदेव के निर्देशानुसार 1948, 49 से ही गायत्री व सविता का ध्यान नियमित करने लगे थे, फलतः व्यापार भी प्रगति पथ पर बढ़ता रहा। प्रति सप्ताह दिल्ली से मथुरा व बाद में हरिद्वार आना व उसी दिन पूज्य गुरुदेव से

मिलकर दर्शन कर वापस चले जाना, यही उनकी दिनचर्या थी। कुछ ऐसा कांट्रेक्ट था गुरु व शिष्य के बीच कि सप्ताह में एक दिन सबसे मिलना होता रहे।

प्रस्तुत प्रसंग 1981 का है। जब वे नहीं आए उनके स्थान पर उनके भाई व भतीजे ने आकर सूचना दी कि उन्हें ब्रेन हेमरेज (मस्तिष्कीय रक्त स्राव) हो गया है व वे अचेतावस्था में पड़े हैं। पूज्य गुरुदेव तत्काल साधना कक्ष में चले गए व एक घण्टे बाद निकल कर बोले कि कोई भी शिवशंकर का बाल नहीं बांका कर सकता, उनने अपने समीपस्थ एक चिकित्सक कार्यकर्ता को उनके साथ दिल्ली रवाना किया व घरवालों को आश्वस्त करने को कहा। उनकी पत्नी के लिए कहलवाया कि तेरा सुहाग हम अभी जिन्दा रखेंगे, अभी उसका समय नहीं आया है। सभी इस निष्कर्ष पर पहुँच चुके थे कि मस्तिष्क में बढ़ रहे रक्त के दबाव को कम नहीं किया गया तो वाइटल सेर्ण्टस पर प्रभाव पड़ने से कभी भी जान जा सकती है व यह निर्णय तुरन्त लिया जाना चाहिए। दिल्ली से हरिद्वार फोन करने पर यही कहा गया कि ऑपरेशन नहीं कराना है। बेहोशी माँ गायत्री की कृपा से टूटेगी। चिकित्सकों के आग्रह को विनम्रतापूर्वक ठुकरा दिया गया व धीरे-धीरे न केवल बेहोशी मिटी, धीरे-धीरे वे बोलने, सबको पहचानने लगे। प्रायः तीन माह से अधिक की अवधि में रिकवरी भी हो गयी व धीरे-धीरे चलने फिरने लगे। बिना किसी औषधि के यह परिवर्तन कैसे हुआ कोई समझ नहीं पाया। उन्हें बराबर रट लगी थी कि हरिद्वार जाना है। प्रायः चार माह के अंतराल पर वे हरिद्वार आए। पूज्यवर ने उनसे कहा कि डेढ़-दो वर्ष में बच्ची की शादी व अन्यान्य सारी व्यवस्था कर लो। इससे अधिक हम तुम्हें नहीं रोकेंगे। वे समझ गए।

जो एक्सटेंशन की अवधि मिली थी उसमें उनने व्यवस्था−क्रम बिठाना आरंभ किया। फर्म की इनकम-टैक्स रिटर्न की सारी सूचनाएँ उनके ही पास थी। किसी मिलने वाले न विभाग को गलत सूचना देकर उनके हिसाब-किताब की इनक्वायरी चालू करवा दी। सब कुछ ठीक पाया गया किन्तु तीस वर्ष पूर्व के आँकड़े किस को याद रहते । जिस मस्तिष्क में रक्तस्राव हुआ था, उसी मस्तिष्क ने 1950 से अब तक के हर वर्ष के रिटर्न व फाइलों के नंबर बोलना चालू किए तथा अधिकारी हतप्रभ हो अपना रिकार्ड उनके बोले हुए से मिलाते चले गए। वे हक्का बक्का रह गए ऐसी विलक्षण स्मरण शक्ति देखकर वह भी इतनी लम्बी बेहोशी के बाद। उनके दिमाग की कैटस्कैनिंग फिल्में न्यूरोलॉजी की कान्फ्रेन्स में सर्जन्स के समक्ष रखी गयीं व सबने यही कहा कि ऐसे व्यक्ति को तो मर जाना चाहिए था। किन्तु उनके चिकित्सक ने बताया कि अपने “भगवान” की कृपा से वह व्यक्ति जिन्दा है व वे सभी उसे चेक कर सकते हैं। सब आश्चर्यचकित थे कि विज्ञान जिसकी व्याख्या नहीं कर सकता, वह चमत्कार क्यों व कैसे संभव हुआ? बाद में सारे दायित्व निभते ही ढाई वर्ष बाद दूसरी बार की तकलीफ में उनका देहान्त हो गया पर वे अपने बाद की सारी व्यवस्था कर गए थे अपने गुरु के निर्देशानुसार। मृत्यु को भी टालने की यह कौन सी नियन्ता के स्तर की व्यवस्था है? इसे तर्क बुद्धि से नहीं समझा जा सकता।

ऐसी ही एक घटना शाँतिकुँज में अभी रह रहे शोध संस्थान में कार्यरत एक कार्यकर्ता से संबंधित है। किन्हीं कारणोंवश हम यहाँ उनका नाम नहीं दे रहे। उसकी बड़ी इच्छा थी कि डाक्टरी की पढ़ाई तो कर ली व अब बाहर विदेश जाना चाहिए। पूज्य गुरुदेव से पूछ कर ही हर निर्देश लिए जाते थे। उनने कहा कि घूमने के लिए जाना है तो भले ही चले जायँ पर नौकरी या अध्ययन की दृष्टि से जाना अब ठीक नहीं है क्योंकि परिस्थितियाँ बाहर धीरे-धीरे विषम होंगी, वापस लौटने की स्थिति बनेगी नहीं तथा भारत में रहकर काम करने के अवसर अधिक बेहतर हैं। यह बात तो उसे शायद समझ में भी नहीं आ पाती किन्तु उनने कहा कि एक संकट इस वर्ष संभावित है, जिसे तुम्हारे भारत में बने रहने पर ही टाला जा सकता है। कुछ सोचकर जाने का कार्यक्रम स्थगित कर दिया यहीं भारत में ही एक नौकरी मिल गयी। उसी वर्ष एक भयंकर एक्सीडेण्ट में उसके हाथ व खोपड़ी के 5-6 फ्रैक्चर हो गए। यह दुर्घटना संयोग से हुई भी हरिद्वार में उस स्थान पर जिस पर से पूज्य गुरुदेव एवं वंदनीया माताजी कुछ देर पूर्व होकर गुजरे थे। संभवतः वे आए ही थे कोई आसन्न विपत्ति को टालने। एक्सीडेण्ट के बाद की सारी व्यवस्था किसी भले आदमी द्वारा उसे शाँतिकुँज लाना, अस्पताल पहुँचाना व फिर दिल्ली व फिर भोपाल में आपरेशन की सारी व्यवस्था बन जाना, दो माह में स्वस्थ होकर पुनः नौकरी पर आ जाना एक चमत्कारी सिक्वेन्स थी जिसका तारतम्य किसी भी बुद्धि से सोचने वाले के दिमाग में शायद न बैठ पाए।

उपचार के बाद पुनः पूज्य गुरुदेव के पास लौटने पर उस कार्यकर्ता को बताया गया कि अकालमृत्यु का संकट उस पर आया था जो इस दैवी दुर्घटना के माध्यम से टाल दिया गया। इसकी पुष्टि उसके पिता द्वारा भी की गयी जिनके पास दृश्य गणित के आधार पर बनी उसकी जन्म कुण्डली थी। पूज्यवर ने प्रेरणा दी कि अब इस नयी जिन्दगी का उपयोग समाज के लिए करना चाहिए। धीरे-धीरे स्पष्ट संकेत देते हुए उनने मिशन के लिए समर्पित जीवन जीने व पूरी तरह यहीं आकर कार्य करने का मन बनाने की बात कही व तब से वह कार्यकर्ता पूरी तरह से यहीं जुटा हुआ मिशन में सक्रिय है। चर्चा चलने पर वह बताता है कि सतत् मन से यही पुकार आती रही कि अब यह जीवन पूर्णतः समाज को अर्पित करना है। ढर्रे का जीवन न जीकर इसे नयी जिन्दगी मानते हुए लोकहित के कार्यों का करना है, यही उमंग खींचकर उसे सपरिवार यहाँ ले आयी। यह समझा जाना चाहिए कि महामृत्युँजय स्तर की सिद्धि प्राप्त महापुरुष ही व्यक्ति को देखकर उसकी भवितव्यता पर चिंतन कर मृत्यु भी टाल सकता है व छोटे स्तर पर टली विपदा द्वारा नया जीवन जीने की प्रेरणा दे सकता है। गायत्री की सिद्धि जिन्हें सर्वोच्च स्तर की प्राप्त हो, ऐसे परमपूज्य गुरुदेव ने अगणित व्यक्तियों को मौत के मुँह से लौटाकर उन्हें सृजन कार्यों से जोड़ा। यहाँ तो मात्र दो ही उदाहरण दिए हैं किन्तु ऐसे उदाहरण ढेरों है, अगणित परिजन जिसके साक्षी हैं।

हृदय रोगी हों अथवा अतिघातक व कष्टदायी कैंसर “माँ गायत्री से प्रार्थना करेंगे” मात्र इतना कहकर जिसे आशीर्वाद दे दिया, वह स्वस्थ हो गया। यही सिद्धि उनने वंदनीया माताजी की शक्ति में समाहित कर हरिद्वार आने पर पीछे से संचालन का दायित्व संभाल लिया तथा प्रत्यक्ष भूमिका संगठन से लेकर परिजनों तक की वन्दनीया माताजी को दे दी। सैकड़ों व्यक्ति अभी भी साक्षी दे देंगे इस बात की कि जो बात ऊपर पूज्य गुरुदेव किसी को कहते थे, शब्दशः वंदनीया माताजी के मुखारविंद से भी उसे निकलता देखा जाता था। जो शिव व शक्ति में भेद करते हैं उनके लिए यह एक जीता-जागता नमूना सामने है।

सबसे बड़ी बात जो पूज्यवर के जीवन प्रसंगों एवं घटनाक्रमों पर दृष्टि डालने पर समझ में आती है, वह यह कि वे असाधारण रूप से शिष्य का, परिजन का, भक्त का मनोबल बढ़ाकर उस पर एक ऐसा शक्तिपात करते थे कि वह जीवन संग्राम में अपने को लड़कर सफल होता पाता था। वे स्वयं कभी जीवन समर से भागे नहीं, संघर्ष किया। सतत् कार्य करते रहने की , पुरुषार्थपरायण बनने की सबको प्रेरणा देते रहे। अनेकों व्यक्तियों को अपनी जीवन-यात्रा में जो अवरोधों से जूझने की सामर्थ्य मिली उसके लिए वे विकसित आत्मबल को ही श्रेय देते हैं। मात्र एक पत्र परमपूज्य गुरुदेव को लिखकर भक्त निश्चिन्त हो जाता था कि अब विपत्ति मेरी नहीं, आपकी है। आप संभालिए वे संभाल लेते थे। ऐसे कई पत्रों के हवाले पाठक परिजन अगले अंकों में पढ़ेंगे।

कहीं-कहीं उनके पत्रों पर दृष्टि डालने पर उनके उस रूप के दर्शन होते हैं, जिसे अलौकिक कहा जाता है, “ऑकल्ट” या “सुपरनेचुरल” माना जाता है। केशर बहिन विश्राम भाई ठक्कर (अंजार कच्छ) को 29 दिसम्बर 1967 के एक पत्र में वे लिखते हैं-”प्रिय पुत्री तुम्हारा पत्र पढ़ते समय लगा कि तुम हमारे सामने ही बैठी हो हमारी गोदी में खेल रही हो। शरीर से तुम दूर हो किन्तु आत्मा की दृष्टि से हमारे अतिनिकट हो। हमारा प्रकाश तुम्हारी आत्मा में निरन्तर प्रवेश करता रहेगा और इसी जीवन में तुम्हें पूर्णता के लक्ष्य तक पहुँचा देगा। हम अपनी तपस्या का एक अंश तुम्हें देंगे और तुम्हें पूर्णता तक पहुँचा देंगे। हमारा सूक्ष्म शरीर तीन वर्ष बाद इतना प्रबल हो जाएगा कि बिना किसी कठिनाई के कहीं भी पहुँच सके और दर्शन दे सके।”

इससे बड़ा और क्या आश्वासन कोई राम अपनी शबरी को दे सकता है। जो केशर बहिन को जानते हैं, उन्हें उनकी भावसमाधि की स्थिति भी ज्ञात है व किस प्रकार अंत तक उन पर उनके इष्ट की कृपा निरन्तर बरसती रही, यह भी जानकारी है। ऐसी केशन बहित एक नहीं, पूरे भारत व विश्व में सहस्रों हैं जिनसे परम पूज्य गुरुदेव अपने जीवनकाल में जुड़े रहे व अनुदान बाँटते रहे। ऐसे अगणित शिवशंकरजी गायत्री परिवार में व समाज में हैं, जिन्हें उनने नवजीवन दिया। हम ही ऐसे सिद्ध स्तर के पुरुषों को समझने में भूल कर जाते हैं, उसे हमारी नादानी नहीं तो और क्या कहा जाय? (क्रमशः)


ब्रह्मवर्चस् की शोध प्रक्रिया

ब्रह्मवर्चस् की शोध प्रक्रिया के अंतर्गत विगत बारह वर्षों में किस आधार पर अध्यात्म उपचारों को विज्ञान सम्मत ठहराने का प्रयास किया गया इसका प्रारंभिक विवेचन विगत अंक में परिजन पढ़ चुके हैं। शरीर, मन व अंतःकरण संबंधी विभिन्न घटकों का विश्लेषण उसमें हो चुका है। इस अंक में उसी कड़ी को आगे बढ़ाते हुए अध्यात्म उपचारों का विवरण प्रस्तुत है जिन्हें “इनपुट” के रूप में प्रयोग प्रक्रिया का अंग बनाया गया।

अध्यात्म उपचारों के माध्यम से शरीर, मन व अंतःकरण किस प्रकार प्रभावित होता है तथा इन प्रभावों का मापन किस रीति से संभव है, ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान ने चिरपुरातन भारतीय संस्कृति के निर्धारणों को आधार बनाकर अपने अनुसंधान का इसे विषय बनाने का प्रयास किया है। विभिन्न उपचार जो भिन्न-भिन्न रूपों में सूक्ष्म शरीर संरचना को प्रभावित करते हैं अपनी क्षमता की दृष्टि से विलक्षण-अद्भुत हैं। यह हमारे ऋषिगणों के अपनी काया में किये गए अष्टगयोग से लेकर हठयोग की जटिल प्रक्रियाओं तक तथा ग्रंथिभेदन से लेकर कुण्डलिनी जागरण के विविध प्रयोग ही हैं जिन्हें आधार बनाकर हम प्रतिपादित कर सकते हैं कि मानव जीवन को स्वस्थ, नीरोग, दीर्घजीवी सुख शाँतिमय बनाने के लिए इनका प्रावधान हमारी संस्कृति में रहा है व इनकी महत्ता आप्तवचनों में गाई जाती रही है।

मानवी काया व मन की संरचना इतनी विलक्षण है कि स्रष्टा की इस रचना को देखकर आश्चर्य से दांतों तले उँगली दबा लेनी पड़ती है। शरीर की अनुकूलन क्षमता भी अपरिमित है। वातावरण के विपरीत प्रभाव वाले प्रतिरोधों व दबावों के विरुद्ध भी इस में कार्य करते रहने की व परिस्थितियों के अनुरूप स्वयं को ढाल लेने की क्षमता प्रचुर परिमाण में विद्यमान है। यही स्थिति मन की है। मनः शक्ति के रूप में एक ऊर्जा का जखीरा, विराट भाण्डागार हमारे मस्तिष्क रूपी पिण्ड में भरा होता है। जिसे हम “माइण्ड स्टाफ” कहते हैं, वही स्थान हमारी आकाँक्षाओं, विचारणाओं, आदतों अभ्यासों, संस्कारों का केन्द्रस्थल है। यह सीधे अंतःकरण से उभरने वाली भाव संवेदनाओं द्वारा प्रभावित होता है व बुद्धि को तत्संबंधी निर्देश सतत् देता रहता है। भावसंवेदना रहित अंतःकरण से उभरी बुद्धि उच्छृंखल, उद्धत महत्वाकाँक्षाओं को जन्म देती है तथा मनुष्य के दुष्कृत्य व दुर्मतिजन्य दुर्गति के लिए जिम्मेदार होती है। इसके विपरीत अंदर से उभरी मानव मात्र के प्रति संवेदना, त्याग-बलिदान की भावना श्रेष्ठता के प्रति संवेदना, त्याग-बलिदान की भावना श्रेष्ठता के प्रति समर्पण की प्रेरणा व्यक्ति की उच्चस्तरीय महत्वाकाँक्षाओं व तदनुसार व्यक्तित्व की उत्कृष्ट ढलाई तथा सत्कर्मों के रूप में दिखाई देती है।

विभिन्न अध्यात्म उपचार वस्तुतः इस मनःशक्ति के माध्यम से ही शरीर की स्वचालित एवं नियंत्रित प्रक्रिया पर अपना प्रभाव डालते हैं। इन अध्यात्म उपचारों में प्रमुखता जिन्हें दी गयी, वे इस प्रकार हैं-(1) आहार में परिवर्तन न केवल पौष्टिकता वरन् सात्विकता का भी समावेश।

(2) नियमित योग व्यायामों का दैनन्दिन जीवन में समावेश। शरीर को चुस्त व मन को प्रफुल्लित रखने हेतु आसन, प्राणायाम प्रज्ञा व्यायाम गतियोग आदि उपचारों का प्रयोग।

(3) ध्यान साधना द्वारा बिखराव का एकीकरण मनःशक्ति का सुनियोजन कर मनोविकारों एवं भ्रान्तियों का शमन तथा शरीर को स्वस्थता प्रदान करने वाले विचारों, बहिरंग के उद्दीपनों का प्रयोग। शिथिलीकरण के अभ्यास द्वारा शारीरिक व मानसिक तनाव का प्रबन्ध।

(4) मंत्रशक्ति को चेतना का ईंधन मानते हुए उसके विभिन्न रागों में प्रयोग द्वारा अतः शक्ति संवर्धन। विभिन्न रागों में गाए गए मंत्रों द्वारा दिनचर्या के भिन्न-भिन्न समयों पर शरीर मन तथा अंतःकरण पर उनका प्रयोग।

(5) यज्ञ विज्ञान के अंतर्गत पदार्थ की कारण शक्ति को उभारने वाली अग्नि होत्र प्रक्रिया द्वारा सूक्ष्मीकृत वनौषधि धूम्र से आत्मबल संवर्धन तथा जीवनी शक्ति संवर्धन। रोगोपचारों में यज्ञ की चिकित्सा के रूप में उपयोगिता। जड़ी बूटियों की प्रामाणिकता को स्थापित कर उनके सूक्ष्म चूर्ण रूप कल्क व क्वाथ रूप में प्रयोगों द्वारा स्वास्थ्य संवर्धन व रोगनिवारण।इस प्रकार एक वैकल्पिक चिकित्सा पति का प्रतिपादन

उपरोक्त पाँचों अध्यात्म उपचारों के भिन्न-भिन्न साधकों व प्रयोगार्थी व्यक्तियों पर प्रयोग करने से जो जानकारियां मिली है, वे बताती हैं कि सही विज्ञान सम्मत प्रक्रिया अपनाकर न केवल शरीर मन दोनों को स्वस्थ,सशक्त,सबल बनाया जा सकता है अपितु इससे जन-जन के मन में इन उपचारों के संबंध में छाई भ्रान्तियों का निराकरण भी होता है। आने वाले समय में जब आत्मबल सम्पन्न लोकसेवियों की समाज को प्रचुर परिणाम में आवश्यकता पड़ेगी ऐसे निरापद अपरिमित लाभ देने वाले उपचारों का रहस्योद्घाटन एवं तर्क-प्रमाणसम्मत प्रस्तुतीकरण समय की आवश्यकता है। परमपूज्य गुरुदेव विशुद्धतः एक वैज्ञानिक थे उनकी यह मान्यता थी कि भारतीय संस्कृति पूर्णतः विज्ञान सम्मत है। यदि आज पुनः बदले परिप्रेक्ष्य में उन सभी स्थापनाओं का प्रस्तुतीकरण सही तरीके से किया जा सके तो कोई कारण नहीं कि बुद्धिजीवी वर्ग से लेकर तर्क करने वाला संदेश रखने वाला युवावर्ग भी अगले दिनों इन अनुशासनों को स्वीकार न करे। ब्रह्मवर्चस् की शोध ने इस प्रकार वह प्रयोजन पूरा करने का प्रयास किया है, जिसे सामने रखते हुए परमपूज्य गुरुदेव ने यह महान स्थापना की थी।

सभी यह बात अच्छी तरह जानते हैं कि आहार का मन से गहरा संबंध है। कहा गया है ”अन्नौ वै मनः” अर्थात् अन्न मन को बनाता है। जो भी आहार हम ग्रहण करते हैं वह न केवल शरीर के अंग अवयवों घटकों को प्रदान करता है, अपितु हमारे चिन्तन को भी प्रभावित करता है। कई पदार्थ ऐसे हैं जो सीधे हमारे मस्तिष्क के स्नायु संस्थान सूक्ष्म रसस्रावों को जन्म देने वाले स्नायु-तन्तु जाल को प्रभावित कर विचार संस्थान पर गहरा प्रभाव डालते हैं। क्रोध, चिन्ता, बेचैनी, चिड़चिड़ाहट, तनाव जैसे मनोविकार अखाद्य पदार्थों को ग्रहण करने से होते देखे जाते हैं। व्यक्ति उनकी चिकित्सा हेतु बहिरंग को टटोलता है, चिकित्सकों की शरण में जाता है, जबकि कारण व निवारण उसके अपनी ही समीप है । माँसाहारी भोजन व अण्डों का सेवन मानवी काया व मन को कतई स्वीकार नहीं है, न ये उसकी शरीर संरचना के अनुकूल है । कुछ चिकित्सकों की तथाकथित वैज्ञानिक टिप्पणियों को आधार बनाकर बहुसंख्य व्यक्तियों ने अपनी स्वादेन्द्रियों की संतुष्टि के लिए यह मायाजाल रचा है । इसके लिए पाश्चात्य उपभोगवादी चिन्तन जिम्मेदार है, जो यह बताता है कि डेरी पदार्थों के लिए पशुओं का उपयोग करने के साथ उन्हें काटते चले जाना चाहिए व शरीर को स्वस्थ बनाने के लिए पशुओं का दुहरा उपयोग किया जाना चाहिए । क्या यह एक विडम्बना नहीं कि ऐसा कहने वाले पाश्चात्य चिकित्साविद् ही अब पूरी तरह माँसाहार का समर्थन न कर अपने यहाँ तो शाकाहार के प्रचलन पर जोर दे रहे हैं व तृतीय विश्व व अविकसित देशों में माँसाहार समर्थक प्रतिपादन प्रस्तुत करते हैं । इससे भी बड़ी विडम्बना यह कि हमारे देश में उनके कथन को ब्रह्म-वाक्य मानकर पूजा जाता है तथा हम अपनी संस्कृति के स्वरूप को भूलकर अब अण्डा-माँस कल्चर की पूरी नकल पर उतर आए हैं । कितना व्यापक यह प्रचलन हो गया है , यह यात्रा करते समय दैनन्दिन जीवन में जनसाधारण द्वारा इनका उपयोग करते हुए नित्य देखा जा सकता है। होटल , ढाबों व ठेलों पर इनका अब खुला प्रदर्शन होता है व नई पीढ़ी से लेकर नव धनाढ्य सब इनकी शरण में जाते हैं। पत्र-पत्रिकाएं इस प्रचलन का खुला समर्थन करती देखी जाती हैं ।

ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान ने अपने प्रयोग निष्कर्षों द्वारा यह सत्यापित करने का प्रयास किया है कि सामिषाहार न केवल मन की उत्तेजना, तमोगुणी चिन्तन व अन्य विकारों के लिए बल्कि शरीर संबंध गठिया से लेकर कैन्सर तथा हृदयरोग से लेकर आज की नयी बीमारी “क्रॉनिक फटीग सिण्ड्रोम” व डिजेनरेटीव डिसआर्डर्स के लिए उत्तरदायी है यह अब एक स्थापित तथ्य है कि रक्त में कॉलस्ट्राल की सान्द्रता बढ़ाने से लेकर उत्तेजना के लिए उत्तरदायी सिरम कार्टीसाँल जैसे हारमोन्स की वृद्धि इस तमोगुणी आहार के कारण होती है । मिर्च-मसालों की अधिकता, भोजन को तल-भूनकर उन्हें अखाद्य बना देता भी इसी प्रक्रिया को जन्म देता है । जन-जन को उनकी आहार संबंधी आदतों को सुधारकर पौष्टिक , सुपाच्य व सात्विक आहार ही ग्रहण करने की प्रेरणा इस संस्थान ने दी है व यह सत्यापित किया है कि इनसे आनन्द-उल्लास व स्फूर्ति के लिए जिम्मेदार हारमोन रसस्रावों की उत्सर्जन क्रिया बढ़ती है। एन्केफेलीन वर्ग के अन्दर स्रवित होने वाले स्नायु रसायनों की मात्रा शरीर में बढ़ने लगती है व इससे न केवल अनावश्यक चर्बी घटती है, शरीर में स्फूर्ति सतत् तनाव शैथिल्य तथा काम करने की उमंग बढ़ती है।

आहार ग्रहण करने की इस संशोधित प्रक्रिया में इस शोध संस्थान ने अंकुरित अन्नों का भी प्रयोग बड़ी सफलता के साथ किया है। अनाज यथा मूँग, चना, मूँगफली व गेहूँ अंकुरित करने के बाद ग्रहण करने पर शरीर में ‘ट्रिप्टोफेन” नामक अमीनो अम्ल की मात्रा बढ़ाते हैं व इससे न केवल शरीर की प्रतिरोधी सामर्थ्य बढ़ती है वरन् सतत् स्वस्थ-तनावमुक्त बनाए रखने वाले रसस्राव भी प्रचुर परिमाण में निकलते रहते हैं। इनको चौबीस घण्ट पहले पानी में गलाकर अंकुरित किया जाता व बिना तले-भुने अपने प्राकृतिक रूप में नाम मात्र के नमक के साथ लेने को कहा जाता है। कच्चा खाने की कला विज्ञान सम्मत है तथा इसका प्रभाव शरीर की जैव-रासायनिक तथा अन्यान्य चयापचयिक जैविक गतिविधियों पर निस्सन्देह पड़ता है, यह अब आहार विज्ञानी माने लगे हैं। गेहूँ की घास (जवारे ) पर हुआ हमारा अनुसंधान यह बताता है कि नियमित रूप से यदि इसको पीसकर हरा रस लिया जाय तो इससे श्रेष्ठ जीवनीशक्ति वर्धक, बल्य रसायन तथा वार्धक्य निवारक (एजींग बुढ़ापा लाने वाली प्रक्रिया को रोकने वाला)कोई और नहीं । यहाँ तक कि कैंसर की विभिन्न प्रारंभिक स्थितियों में इसका प्रयोग अन्यान्य पाश्चात्य पद्धतियों से हुए दुष्परिणामों को रोककर उसकी वृद्धि को रोकने तक में सक्षम बताया गया है। वस्तुतः यह “सेलमीडिएडेड” इम्युनिटी (जीवनशक्ति प्रतिरोधी सामर्थ्य) को अप्रत्याशित रूप से बढ़ाता है।

नियमित रूप से यदि आहार की समीक्षा करते रहा जाय व हम नित्य आहार में जो लेते हैं, उन्हें वैज्ञानिक व आध्यात्मिक दोनों ही दृष्टियों से परखे रहा जाता रहे तो कोई कारण नहीं कि मात्र इतने ही परिवर्तन रक्तशोधन से व्यक्ति स्वस्थ न हो सके। यह पाया गया है कि जिन घरों में नित्य बलिवैश्व यज्ञ (अग्निहोत्र जिसमें भोजन के प्रारंभिक पाँच ग्रास गायत्री मंत्राहुति के साथ यज्ञ भगवान को समर्पित किए जाते हैं)संपन्न होता है, उनके घरों में रोगों का आक्रमण कम ही होता है। इस प्रक्रिया के बाद भोजन प्रसाद बन जाता है एवं जो भी उसे ग्रहण करता है, उसके संस्कारों को बल मिलता है। यह मात्र एक पौराणिक मान्यता नहीं, इस संस्थान द्वारा व्यापक स्तर पर जाँचा परखा गया एक ऐसा तथ्य है, जिसे नकारा नहीं जा सकता। बलिवैश्व करने वाला व्यक्ति कभी भी परमसत्ता को अखाद्य नहीं खिलाता अतः क्रमशः उसकी आदतें धीरे-धीरे ठीक होती चली जाती हैं व उसी अनुपात में स्वस्थता व चिन्तन में सतोगुणी प्रवृत्तियों की अभिवृद्धि होती चली है।

आहार वस्तुतः एक ऐसा पदार्थ है जिसे नित्य ग्रहण कर हम अपने स्थूल शरीर की दैनन्दिन प्रक्रियाओं का संचालन करते हैं। अन्न ही हमारे मन को बनाता है व जैसा हमारा मन प्रभावित होगा वैसा ही हमारा चिन्तन होगा। संस्कारों के रूप में पदार्थ की कारण सता भी हमारी भावनाओं को प्रभावित करती है। अतः अध्यात्म उपचारों द्वारा सर्वांगपूर्ण प्रगति की दिशा में अपना विकास करने वाले मुमुक्षु साधकों को अपने आहार पर विशेष ध्यान देना चाहिए ,ऐसी इस संस्थान की मान्यता है। परम पूज्य गुरुदेव ने अपने 24 वर्ष के चौबीस गायत्री महापुरश्चरण गौदुग्ध की छाछ तथा जौ से बनी रोटी पर संपन्न किए, इसके मूल में यही भावना थी कि तप किये बिना, वह भी स्वादेंद्रियों को साधे बिना जप में गति संभव नहीं,अभीष्ट की प्राप्ति शक्त नहीं। महर्षि पिप्पलाद ने पीपल के फलों व पत्तों पर जीवन भर रहकर अन्नमयकोश की शुद्धि की। हम हम इतना कठोर तो नहीं पर कुछ तो उस दिशा में प्रगति कर सकते हैं। आहार का परिवर्तन किस प्रकार व्यक्ति कर व्यक्ति का आमूलचूल कायाकल्प कर देता है। नीरोग-दीर्घजीवी होने के इच्छुक हर व्यक्ति के लिए यह सभी निष्कर्ष एक आशा भरी प्रेरणा देते हैं। (क्रमशः)


ठग कर लाभ उठा लिया (Kahani)

एक बुढ़िया सूत कातकर हाट में बेचने ले जाया करती थी। वजन उसका अधिक बैठे इसके लिए यह चतुरता करती कि उसमें पानी छिड़क ले जाती।

खरीदार बनिया भी बहुत चतुर था। उसके तराजू में बाट वाले पलड़े में वजनदार गाँठ बाँध रखी थी कि उस उपाय से अधिक माल लिया जा सके।

कोई अपने में प्रसन्न हो ले और सोच ले कि दूसरे को ठग कर लाभ उठा लिया गया। पर वैसा कोई भी नहीं  कर पाता था।


परमपूज्य गुरुदेव की अमृतवाणी।

प्रस्तुत अंक में ब्रह्मवर्चस् शोध सत्रों के अवसर पर परमपूज्य गुरुदेव द्वारा 23 नवम्बर 1979 को दिया गया उद्बोधन यथासंभव अविकल रूप में दिया जा रहा है। इस उद्बोधन में पूज्यवर ने मनीषा का आह्वान करते हुए उनसे युगानुकूल दायित्व निर्वाह हेतु उसे झकझोरा है। यह निमंत्रण आज तो और भी प्रासंगिक है, जब हम विश्वमानवता की कराहें सुन रहे हैं पर कान बन्द किए बैठे हैं । विशेष रूप से बुद्धिजीवियों के प्रति, जो उनकी जिम्मेदारियाँ हैं। उनका मर्मस्पर्शी चित्रण इस में है। प्रस्तुत है अमृतवाणी। गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ बोलिए

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।

देवियों, भाइयों। मनुष्य को भगवान के अनुदान अन्यान्य प्राणियों से भिन्न मिले हैं। सामान्य प्राणी दो काम कर पाते हैं। एक तो अपना पेट भर पाते हैं,दूसरा सन्तान पैदा कर पाते हैं। किन्तु दूसरी ओर। दूसरी ओर मनुष्य के जिम्मे कैसे-कैसे शानदार अनुदान मिले है। अन्य प्राणी तो एक छोटी सी कल्पना रखते हैं जो ख्वाब के रूप में दिमाग में केवल एक सीमा तक ही काम आती है जो शरीर की जरूरतों को पूरा करती है। उससे आगे उन्हें कोई चिन्ता नहीं होती। चिन्तन की परिधि इन प्राणियों में उतनी ही है जिससे कि शरीर की जरूरतें पूरा कर सकें। चारा इकट्ठा कर सकें, घास खा सकें, दौड़ सकें, बच्चे पैदा कर सकें। बस इससे ज्यादा चेतना नहीं है।

आदमी को अन्य प्राणियों की तुलना में क्या-क्या मिला? शरीर ऐसा शानदार मिला कि कलाकार ने अपनी सारी की सारी कला एक ही केन्द्र पर खत्म कर दी, ऐसा मालूम पड़ता है। हाथ हमारा इतना शानदार है कि कि मालूम प्रकृति ने इसे बड़ा सोच समझकर मन लगाकर बनाया है। इतनी जगह से मुड़ने वाला, इतनी जगह से घूमने वाला इतने तरह के काम करने वाला हाथ किसी अन्य प्राणी के हिस्से में नहीं आया। दिमाग के बारे में हम क्या कहें। आँखों के लिए क्या कहें? हर इन्द्रिय के लिए क्या कहें? अनोखा प्राणी है मनुष्य। भगवान ने इस हाड़-माँस में जखीरे में एक ऐसी चेतना भर दी है जो अनोखी मालूम पड़ती है? बड़े सौभाग्यशाली है हम व आप जो ऐसा शरीर धारण करने में समर्थ हो चुके, सौभाग्यशाली सिद्ध हो सके। भगवान का अनुग्रह हम सब पर कि हम मनुष्य शरीर प्राप्त कर सके।

अगली वाली बात-और थोड़ी सुरक्षित रखी है, जिसे पात्रता के अनुरूप भगवान दिया करते हैं । सब प्राणियों को नहीं , किसी-किसी को देते हैं, जिसे सुपात्र पाते हैं । पात्रता आपकी बढ़ेगी तो भगवान की चार नियामतें , चार विभूतियाँ आपको मिलती चली जाएँगी । एक विभूति का नाम है । ऋत क्या है ? ऋत उसे विभूति का नाम है ऋत क्या है ? ऋत उसे कहते हैं जिसमें कई कीमती चीजें जुड़ी हुई हैं साजो सुरक्षा-शालीनता-अंतःप्रेरणा । ऋत जिस किसी के हिस्से में आता है , वह अपना कल्याण करता है और अपना कल्याण करके वह सीमित नहीं रह जात समाज का उत्तरदायित्व सँभालता है, सारी मनुष्य जाति का मार्गदर्शन करता है और इस पृथ्वी पर खुशहाली लाता है , ऋत उस वेग के हिस्से में आता है, जिसको हम सभी ब्राह्मण कहते हैं । ऋत उसे कहते हैं, जिसमें आदमी का चिन्तन और जीवन देवोपम बन जाता है । वह अपने लिए कर्तव्यों का निर्धारण करता है । क्या निर्धारण करता है ? “वयं राष्ट्रेजागृयाम पुरोहिताः “ । हम पुरोहित अर्थात् हम ब्राह्मण हम संत हम ऋषि यह उत्तरदायित्व ग्रहण करते हैं और यह घोषणा करते हैं कि “वयं” अर्थात् हम सब, “राष्ट्रे” सारे राष्ट्र को नागरिकों को विश्व मानवता को “जागृयाम” जीवन्त और जाग्रत रखे रहेंगे, जीवन्त और जाग्रत रखने की जिम्मेदारी केवल एक ही वर्ग के लोगों की है, जिनका नाम है ब्राह्मण। देवता और ब्राह्मण एक ही बात है। देवता आसमान में रहते हैं। देवता वे भी हैं, जिनके दिमाग आसमान में हैं। बाकी लोगों के दिमाग जमीन पर गड्ढे में-खड्डे-खंदक में रहते हैं। ब्राह्मण का दिमाग आसमान में रहता है। वह ऊँचा सोचता व ऊँचा ही चिन्तन करता है ऊँचा ही उसका लक्ष्य होता है। ऊँची ही उनकी विचारणा होती है। वैसे ही देव होते हैं। देव ऋत का पा करके-भगवान का अनुग्रह पाकर के अपना कल्याण करते हैं और समाज का हित भी साधते हैं।

“ऋतं च सत्यं च विद्धा तपसो द्विजायता” ऋत से सत्य की सत्य से तप की उत्पत्ति होती है और तप से गर्मी की उत्पत्ति होती है, जिससे दिन और रात पैदा होते हैं, जिससे संसार की व्यवस्था पैदा होती है। यह भगवान का अनुग्रह आप में से किन-किन के हिस्से में आया पता नहीं। पर यह जिस किसी के भी हिस्से में आया होगा, उसे ही बुद्धिजीवी कहेंगे। जो भी सुशिक्षित है-बुद्धिजीवी है, उनको अगर भगवान का प्यार मिल जाता है तो पहले मिलता है ऋत। ऋत से वे पहले अपना उद्धार करते हैं और फिर सारे विश्व का उद्धार करते हैं।

दूसरा वाला अनुदान दूसरी श्रेणी के लोगों को मिलता है। उसका नाम है शौर्य और साहस। तीसरा अनुदान है साधन और चौथे का नाम है श्रम। वर्णाश्रम व्यवस्था के हिसाब से यही चार प्रकार के वर्गीकरण हैं। भगवान के अनुदान एक के बाद एक मिलते हैं। जिनके हिस्से में पराक्रम है शौर्य है, साहस है हिम्मत है, वे दुनिया में अपने तरीके से काम करते हैं। कोलम्बस के तरीके से, नेपोलियन के तरीके से, सिकन्दर के तरीके से भौतिक दुनिया में बहुत काम कर जाते हैं और आध्यात्मिक जगत में फरहाद से लेकर मीरा तक वे विवेकानन्द से लेकर दयानन्द तक जाने क्या से क्या कर डालते हैं। ये गजब कर देने वाले प्राणी साहसी कहलाते हैं। साहसी को क्षत्रिय कहते हैं। तीसरे वर्ग के पास संपदाएँ रहती हैं और चौथा वर्ग है श्रमिक जो अपने पसीने से अपनी मेहनत-मशक्कत से दुनिया को खुशहाल बना देते हैं।

आदिकाल में दुनिया कैसी रही होगी? आरंभ में शायद वह ऊबड़−खाबड़ रही होगी, जैसी कि चन्द्रमा की खबर लेकर वैज्ञानिक आए हैं। एक इंसान ही रहा होगा, जिसने अपनी मशक्कत से अपनी मेहनत से इस जमीन को समतल किया होगा। इसी तरह से जानवरों को जो उच्छृंखलों के तरीके से, अस्त-व्यस्तों के तरीकों से हानि पहुँचाते हैं-प्यार से सहकारिता से डरा धमका करके मनुष्य का सहयोगी बनाया होगा। उसकी मशक्कत ने ही दुनिया में तरह-तरह की नई चीजें लाकर खड़ी कर दीं। इमारतें बनाने से लेकर घर, कपड़ा बनाने से लेकर अन्न उपजाने तक यह आदमी का श्रम है। श्रम का अनुदान मिलने से आदमी निहाल हो गया।

ताकत दूसरे प्राणियों में भी है, पर वे श्रम नहीं कर सकते। नियोजित श्रम उनके पास नहीं है।हाथी के पास घोड़े के पास ताकत है पर वह उस ताकत का उपयोग नहीं कर पाता। पर इंसान अपनी ताकत का जानकार है, उसका उपयोग कर सकता है और यह भगवान का अनुदान है और इसी से वह साधन पाता है।

आदमी की बुद्धि का श्रेष्ठतम भाग है ऋत। यह ऋत यदि आदमी को मिल जाय तो बुद्धि सार्थक हो जाती है। विद्या सार्थक हो जाती है। प्रज्ञा सार्थक हो जाती है और मनुष्य की जिन्दगी सार्थक हो जाती है। जिनमें से कुछ को भगवान ने शिक्षा दी है, वे आप मेरे समक्ष बैठे हैं। अब कमी एक ही रह जाती है कि इस सीप में कहीं से स्वाति की बूंदें टपक जायँ, जिनके पास दिमाग है शिक्षा है उनके अन्दर श्रद्धा की-स्वाति की बूंदें गिर जायँ तो आप ऋषि हो सकते हैं, महामानव हो सकते हैं। यह अक्ल का दुर्भाग्य है कि वह पेट भरने के काम आज आती है। उससे भी अधिक दुर्भाग्य आदमी का यह कि यह अक्ल जाल बुनने के काम आती है, वाक्पटुता के काम आती है व दूसरों को धोखा देने का कुचक्र रचने के काम आती है। अक्ल से जो हम कमाते हैं तो क्या बतायें आपको कि हम उसे कहाँ खर्च करते हैं? अक्ल की कीमत बाजार में ज्यादा मिलनी चाहिए। मिलती भी है। लेकिन उस मिलने के बाद हम करते क्या हैं? न जाने कहाँ उसे खर्च कर देते हैं। ऐसे में ईश्वरचन्द्र विद्यासागर हमारे सामने आकर खड़े हो जाते हैं और बताते हैं कि अक्ल की कमाई कहाँ खर्च होनी चाहिए।

ईश्वरचन्द्र विद्यासागर को उन दिनों जो वेतन मिलता था, उनने कहा उसमें से हमें औसत नागरिक के गुजारे की हैसियत से पचास रुपये से अधिक नहीं चाहिए, उनने अपने खानदान वालों को बुलाया और यह कहा कि हिंदुस्तान में जिस मुल्क में हम पैदा हुए हैं उस स्तर के मुताबिक हमें अपने पर व कुटुम्ब पर इससे अधिक खर्च नहीं करना चाहिए बाकी जो वेतन बचेगा उसे हम अन्य कामों में खर्च करेंगे जैसा कि भावनाशीलों-विचारशीलों को करना चाहिए। आपकी अक्ल भी उसी तरह खर्च होनी चाहिए जिस तरह से ईश्वरचन्द्र विद्यासागर की हुई। उनके दिल में दर्द था। उनके भीतर था ऋत। ऋत उसे कहते हैं जिसमें शिक्षा की सार्थकता छिपी होती है। आप कौन हैं। आप वकील हैं तो अच्छा, करते क्या हैं? सबेरे से शाम तक झूठ बोलते हैं व बुलवाते हैं। फरेब करते हैं और करवाते हैं। इसी अक्ल से पेट भरते हैं। ऐसे पेट के ऊपर लानत है। ऐसे पेट को फट जाना चाहिए। जो पेट आदमी की अक्ल की कमाई से देश के लिए, धर्म के लिए, इंसानियत के लिए, भगवान के लिए गुनाह करता हो ऐसे पेट को आग लग जानी चाहिए।

मित्रो! यह ब्राह्मण के लिए लानत की बात है, शर्म की बात है। भगवान के दिये अनुदानों का सबको इस्तेमाल करना चाहिए। दूसरे लोग यदि अपनी अक्ल का इस्तेमाल न कर सकें तो कम से कम ब्राह्मण को तो करना ही चाहिए। दिमाग अगर खराब हो जाएगा, अक्ल अगर खराब हो जाएगी तो शरीर का क्या होगा? जिस समाज में, जिस देश में, जिस युग में, दिमाग ब्राह्मण अस्त−व्यस्त हो जाता है, तब उस देश की मुसीबत आती है। दूसरे लोग जब गड़बड़ा जाते हैं तो डाकू या उठाईगीरे बन जाते हैं और क्या करेंगे? गुण्डे की सामर्थ्य बस सामान उठाने, मारपीट करने, हत्या करने तक की है किन्तु जब ब्राह्मण बागी हो जाता है तो वह ब्रह्मराक्षस बन जाता है। अतः ब्रह्मराक्षस होने की लानत अपने सिर पर ओढ़ने से हमें इंकार करना आना चाहिए और समय रहते चेत जाना चाहिए।

युग की पुकार है कि ब्राह्मण जगे। आप कौन हैं? हम तो कायस्थ हैं। भई यहाँ वंश परम्परा का जिक्र नहीं हो रहा, विचार परम्परा की दृष्टि से आप जहाँ बुद्धिजीवी हैं, वहाँ आप एक ऐसी परम्परा के अनुयायी भी हैं जो आदमी को उसके कर्तव्यों-उत्तरदायित्वों की जानकारी कराती है। यदि ऐसा न होता तो आप हम से क्यों जुड़ते। मैं सोचता हूँ कि आप के भीतर कहीं न कहीं ऋत है। ऋत जो भगवान का सबसे बड़ा अनुदान है हमारे व आपके लिए एक बहुत काम करने को पड़ा है। काम यह है कि जो कुछ भी विचार का क्षेत्र हमारे सामने फैला पड़ा है, इसके भीतर से इसके आध्यात्म को हम निचोड़े। हमको साइंस की साइंस ढूँढ़ना है जिन सिद्धान्तों को लेकर के आदमी ने साइंस बनाने व बढ़ाने के लिए कदम बढ़ाया। यह दोनों काम किए बिना इतने बड़े वृद्धि का जंजाल-बुद्धि का भ्रम इतना बढ़ गया है कि क्या कहूँ मैं आप से। बुद्धि के ऊपर से पड़े आवरण इतने ज्यादा कँटीले इतने ज्यादा गहरे, इतने ज्यादा विषैले हैं कि इनकी काट छाँट करने के लिए हमको बड़े ऑपरेशन की जरूरत पड़ेगी। कैंसर का ऑपरेशन करने के लिए मामूली चाकू काम नहीं आते। अंदर लेसर किरणों से लेकर रेडियो आयसोटोप तक का इस्तेमाल करना पड़ता है और फूँक-फूँक कर कदम रखना होता है। फिलॉसफी की फिलॉसफी, नीतिशास्त्र का नीतिशास्त्र, मनोविज्ञान का विज्ञान हम गढ़ना चाहते हैं, पर यह कठिन काम है। ऑपरेशन जितना कठिन।

अगला हमारा काम है धर्मों का धर्म ढूँढ़ना। वह जो चार सौ करोड़ मनुष्यों में से अधिकाँश के सिर पर हावी है। मैं सोचता हूँ कि तीन सौ करोड़ के ऊपर धर्म है। सौ करोड़ मनुष्य ऐसे हो सकते हैं जो धर्म की लापरवाही करते हैं और बाद में परवाह नहीं करते। जो धर्म से नाखुशी जाहिर करते हैं उनको मैं मानता हूँ कि उन्हें धर्म की अहमियत समझ में आ गयी है। वे धर्म को समझते हैं । धर्म हेतु-विश्व धर्म की व्याख्या हेतु हमें आस्तिकता का-ईमान का प्रतिपादन करना होगा-धार्मिकता का-धर्मनिष्ठ-कर्तव्य परायणता का प्रतिपादन करना होगा। इसके लिए बुद्धिवाद का सहारा लेना होगा। तर्क और दलीलों को हम रोक नहीं सकते। बुद्धिवाद को हम सीमित नहीं कर सकते। आदमी के भीतर से जब तर्क का माद्दा उत्पन्न होता है तो अंकुश लगाना कठिन हो जाता है।

तर्क-दलील आज के जमाने की सबसे अच्छी व सबसे वाहियात चीज है। अच्छी क्यों? क्योंकि उसमें सत्य को ढूँढ़ निकालने की सामर्थ्य है-सम्भावना है। वाहियात क्यों? क्योंकि दलील के पीछे अगर अंकुश न हो, नियंत्रण न हो तो यह सब कुछ कर सकती है। दलील आप किसी भी पक्ष में दे सकते हैं। संस्कृत की एक पुस्तक है जो एम.ए. में पढ़ाई जाती है “न्यायकुसुमाँजलि” । उसमें यह बताया गया है कि दलील कैसे दी जाती है, बहस कैसे की जाती है! बहस में यह भी किया जा सकता है और यह भी। उनने दो टॉपिक लिए हैं एक ईश्वर है दूसरा ईश्वर नहीं है। दोनों पक्षों में जोरदार बहस होती है। अंत में दलील देने के बाद यह लिखा है कि हमने तो बहस करने का तरीका सिखाया है। आप यह विचार मत करना कि पुस्तक का लेखक नास्तिक है या आस्तिक।

दलील कुछ भी दी जा सकती है। उल्टी भी हो सकती है, सीधी भी हो सकती है निकम्मी से निकम्मी, बेहूदी से बेहूदी, पाजी से पाजी बातों के पक्ष में दलील पेश की जा सकती है। दलील ने ही स्वच्छन्द यौनाचार का पक्ष लिया है। दलील इतनी स्वेच्छाचारी है कि वह कभी फ्रायड का समर्थ करती है तो कभी अस्तित्ववाद के लिए कामुक और नीत्से के तरीके से नास्तिकवाद का। यह अक्ल, यह दलील निरंकुश होने पर न जाने क्या कर सकती है। मित्रों हमें यहां चार सौ करोड़ व्यक्तियों का भाग्य बनाना है, नया युग गढ़ना है तो हमें दलील की माँ को पकड़ना होगा। अकेले दलील से काम नहीं चलेगा। चोर की मौसी को गिरफ्तार करना होगा। अक्ल का दिमाग का बहरूपिया न जाने कैसे-कैसे वेश बदल कर हमें परेशान कर रहा है। हमें इस बहरूपिये की जन्मदात्री को पकड़ना होगा। तभी यह ठीक हो सकती है।

शोध प्रसंग में दो बातों के बारे में हमें गंभीर होना पड़ेगा। आये दिन हमें जहाँ कहीं दो बोर्ड दिखाई देते हैं। एक बोर्ड है “योगा” एवं दूसरा है-”शोध-रिसर्च”। “योगा” सबसे बेहूदा मखौल है आध्यात्म का। गली-गली में योगा के नाम पर आश्रम खुले हुए हैं। इनसे पूछो कि योग का क्या मतलब है तो दाँत निकाल देंगे। क्या योग मात्र सर्वांगासन होता है, डीप ब्रिदिंग होता है, हाथ पैर चला लेना होता है, मेडीटेशन होता है? बंदूक चलाने वाले मैस्मेरिज्म करने वाले चिड़िया मारने वालों में सबमें मेडीटेशन होता है, यदि मेडीटेशन अक्ल इकट्ठी करने का नाम है। खबरदार! योगा अलग है और मेडीटेशन अलग है। योगा-योगा जहाँ देखो मखौल के लिए इन्हें और चीज नहीं मिली जो योग को बना दिया। दूसरे हर किसी को रिसर्च करते देख सकते हैं शोध करते देख सकते हैं आप। गली-गली में रिसर्च करने वाले-शोध संस्थान गली-गली में। शोध से कम में कोई बात ही नहीं करना चाहता। भाई साहब हमारे दिमाग में बड़ी चीजें है। हम शोध का मजाक नहीं बनाना चाहते। बड़ी चीज के लिए बड़ा सामान इकट्ठा करने की कोशिश कर रहे हैं।

फिलहाल आपको एक छोटा सा काम सुपुर्द करते हैं। इन्टेलिजेंशिया जिस काम के लिए अभी बदनाम हैं, आप उस बदनामी को मिटायें। हर व्यक्ति जो इंटेलिजेंशिया से जुड़ा है, कहता है हम तो व्यस्त हैं। कुछ दो घण्टे स्कूल या कॉलेज में पढ़ा कर आते हैं व कहते हैं कि हम बिजी हैं? गप्पे हाँकते रहते हैं व कहते हैं कि हम व्यस्त हैं। यह झूठी बहानेबाजी की बातें हैं।

आप यह देखें कि ऋत के धारणकर्ता होने के नाते प्रज्ञा के विस्तार की आप पर जो जिम्मेदारी है, उसको निभाकर ही आप समाज के आप पर चढ़े ऋण को उतार सकते हैं। भगवान का-विश्वमानव का आप पर ऋण। इसके लिए पहली बात समय से चलती है। समय के साथ काम में तन्मय होने की कला। व्यस्तता इसे कहते हैं कि आदमी इस कदर लक्ष्य में तन्मय हो जाता है कि उसे समय का कोई ख्याल नहीं रहता। आप युग अनुसंधान, मानव धर्म की खोज, विज्ञान, अध्यात्म की शोध के विषय में गंभीर हैं तो आप बात वहाँ से शुरू कीजिए जहाँ से आपको टाइम देना पड़ेगा। यदि दे सकें तो समुद्र मंथन कीजिए। कभी देवता व असुरों ने मंथन किया था। देवता कौन? विचारणा, श्रद्धा, सद्भावना आदर्श तथा दैत्य कौन? दैत्य कहते हैं “जाइण्ट” को, शक्तियों को, पुरुषार्थ को, वैभव को, पदार्थ विज्ञान की शक्ति को। दोनों ने परस्पर लड़ाई झगड़ा करने की अपेक्षा समुद्र को मथना आरंभ किया। भगवान मदद के लिए आ गए व कच्छपावतार के रूप में मंदराचल के नीचे उनने स्वयं को लगा दिया। मथने के लिए शेषनाग आ गए व फिर विष निकला जिसे नीलकण्ठ-प्रलयंकर महादेव ने धारण किया। तत्पश्चात् चौदह रत्न निकलते चले गए जिसमें लक्ष्मी व अमृत भी थे।जो काम हम और आप करने चले हैं, उसकी उपमा समुद्र मंथन से दें तो कोई गजब की बात नहीं है।

समुद्र बहुत विशाल है। हमारा विचार परिकर बहुत विस्तृत है समुद्र के तरीके से। यदि हम इसमें गोते लगा सके तो बहुमूल्य मणि माणिक्य इसमें से निकल सकेंगे। आप अपनी बुद्धि का सही उपयोग करके, समय देकर अपने सही अर्थों में बुद्धिजीवी होने का प्रमाण दीजिए। आप पर सारे समाज का, युग का एक ऋण चढ़ा है, महती दायित्व है। उसे निभाइए। बताइए विज्ञान का विज्ञान व अध्यात्म का अध्यात्म। तभी तो दोनों मिल सकेंगे। अगली पीढ़ी का महामानव बनाने के लिए इससे कम स्तर के पुरुषार्थ से काम नहीं चलने वाला। हम बड़ा काम ही सोचते हैं, व करते हैं। क्या करना है हमें? हमें सूरज को, चन्द्रमा को धरती पर लाना है, जिससे इंसान निहाल हो जाय। आपने वैभव-विलास की जेल में बहुत जीवन बिता लिया। आप समय दीजिए व अपनी अक्लमन्दी का सही प्रमाण देकर युगशोध में खपिए, अपने को पूरी तरह लगा दीजिए। ज्ञान की जो धारा है उसे अपने साथ ले जाइए व पूरे समाज में प्रवाहित कीजिए बस अब यही करना है आप सब को।

मेरी बात समाप्त । ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।


अपनों से अपनी बात - प्रस्तुत वसंत से शक्ति-संचार उपक्रम का शुभारंभ!

शक्ति साधना वर्ष की पूर्णाहुति हेतु संकल्पित भागीदारी का आह्वान

प्रस्तुत समय अति विशिष्ट है । यह दो परस्पर विरोधी युगों का मिलन काल है । इस अवधि में विचित्र प्रकार की विसंगतियाँ दिखाई पड़ती हैं और दर्शाती हैं कि संधिकाल की इस संक्रमण वेला में कुछ अप्रत्याशित होने जा रहा है । ब्रह्ममुहूर्त का समय समीप आते ही तारे बुझने लगते हैं और तमिस्रा घनीभूत हो जाती है । तिरोहित होने से पूर्व अंधकार इतना गहन हो जाता है , जितना रात्रि के अन्य प्रहरों में नहीं होता । किन्तु साथ ही साथ ऊषाकाल का अरुणोदय प्राची दिशा में से धीमे उजाले व लालिमा के साथ मुस्काना भी आरंभ कर देता है । अंधकार का घटना व प्रकाश का धीरे-धीरे बढ़ना परस्पर विरोधी कार्य होते हुए भी एक साथ संपन्न होते हैं व इस प्रकार प्रातःकाल का आगमन होता है । बुझ रहा दीपक उद्दीप्त लौ के साथ तेजी से जलने लगता है तथा मृतक अपनी सांसें अंतिम क्षणों में परिपूर्ण तेजी के साथ चलाता है । बीज गलता है व साथ-साथ नवाँकुरों का उत्पादन भी करता जाता है । शिशु का जन्म अति कष्टकारी प्रसव-वेदना के साथ होता है किन्तु उसे दबाया नहीं जाता, झेला जाता है ताकि कुल का दीपक जन्मे व परिवार का सहारा बने ।

यहाँ दो परस्पर विरोधी घटनाक्रमों की चर्चा इन दिनों समग्र विश्व में चल रहे एक विराट परिवर्तन चक्र को दृष्टिगत रख कर की जा रही है । पाठकगण इन पंक्तियों को वसंत की पूर्ववेला में पढ़ रहे हैं । सभी इस तथ्य को जानते हैं कि वासंती शोभा सुषमा के आगमन के पूर्व अतिशीतल हेमन्त का साम्राज्य ही चारों ओर छाया होता है । पेड़ों से पत्ते गिरते व उन्हें कुरूप ठूँठ बनाकर रख देते हैं । घोर दिखाई पड़ती है । किन्तु क्रमशः कोपलों और फूलों का सिलसिला आरंभ होता है । वातावरण उल्लासमय बनता है व मधुर सुगंध चारों ओर फैलने लगती है । यह ऋतु परिवर्तन जिस वेला में होता है, वह वाँसतीवेला हलचलों से भरा दिखाई देने लगता है जिसमें निष्क्रियता उत्साह भरी सक्रियता में बदल जाती है । तपते ग्रीष्म व बरसते सावन की तुलना करने पर जमीन आसमान जैसा अंतर दिखाई देने लगता है जिसमें निष्क्रियता उत्साह भरी सक्रियता में बदल जाती है। तपते ग्रीष्म व बरसते सावन की तुलना करने पर जमीन आसमान जैसा अंतर दिखाई पड़ता है व प्रकृति की यह लीला बड़ी विचित्र-विलक्षण जान पड़ती है पर है यह सभी सुनिश्चित व आवश्यक उपक्रम । यदि ऐसा न होता तो इस सृष्टि में सर्वत्र स्थिरता जड़ता , नीरवता का साम्राज्य दृष्टिगोचर होता । परिवर्तन का मोहक नृत्य स्रष्टा का अतिप्रिय है एवं वह निरन्तर इसे संपन्न करता रहता है । इसके लिए वह चुनता है अपने ज्येष्ठ पुत्र व सर्वश्रेष्ठ कृति मनुष्य को ही ।

परमपिता परमात्मा जो परब्रह्म के रूप में आद्यशक्ति महामाया गायत्री के रूप में इस धरित्री की शोभा सुव्यवस्था बनाये रखने का आश्वासन हमें देता है , जब-जब भी पतन के प्रवाह को द्रुतगामी होते देखता है रोकथाम करने और साज सँभाल का जुगाड़ बिठाने के लिए अवतार चेतना के प्रवाह के रूप में जन्म लेता है । आत्मशक्ति का जागरण होता है व छोटे-छोटे से तुच्छ से प्रतीत होने वाले मनुष्य भी युगपरिवर्तन का सरंजाम जुटाते दीख पड़ते हैं । मनुष्य अपनी मर्यादा व गरिमा को तिलाँजलि देकर जब जब भी अदृश्य वातावरण को विक्षुब्ध विषाक्त बनाता है , विनाश की विश्व विभीषिका जैसा संकट खड़ा करता है , जैसा कि आज है, तब-तब सृजन की पक्षधर सत्ता उसी ईश्वर अंशधारी जीवसत्ता मानव की देवात्मशक्ति के जागरण के रूप में अवतारी प्रवाह को जन्म देती व मानव में देवत्व जगाकर धरती पर स्वर्ग जैसा वातावरण लाती है । ऐसा ही कुछ विलक्षण समय यह चल रहा है ।

यह दैवी चेतना का प्रवाह ही है जो विगत वर्ष शक्ति साधना की प्रेरणा के रूप में जन्मा व अखण्ड जप प्रधान कार्यक्रमों द्वारा विगत गायत्री जयन्ती से पूरे राष्ट्र व विश्व की देवात्मशक्ति को मथने का कार्य शाँतिकुँज तंत्र द्वारा संपन्न किया गया । साधनात्मक पराक्रम का महत्व सभी की समझ में आया एवं सामूहिक तप साधना की एक शृंखला विश्वस्तर की समस्याओं के समाधान के लिए पूरे विश्व भर में संपन्न हुई । तज ही वस्तुतः शक्ति का मूलस्रोत है जिसके आधार पर सूक्ष्म जगत की प्रतिकूलताओं से मोर्चा लिया जा सकता है । गंगा को धरती पर लाने जैसा पुरुषार्थ करने के लिए भगीरथ को प्रचण्ड स्तर का तप करना पड़ा था । भगवान को अपनी गोदी में खिला सकें , इसके लिए स्वयंभू मनु और रानी शतरूपा को कठिन तपस्या करनी पड़ी थी । सृष्टि की संरचना में हाथ डालने से पूर्व ब्रह्माजी को भी उग्र तपस्या संपन्न करनी पड़ी थी । भारतभूमि व समग्र वसुँधरा को अनाचार से मुक्त करने के लिए पिछले दिनों महर्षि रमण तथा योगिराज अरविन्द जैसे महापुरुषों ने तपश्चर्या का मार्ग अपनाया व अनेकानेक महामानवों के एक साथ उत्पादन का कार्य संपन्न हुआ । परमपूज्य गुरुदेव के चौबीस-चौबीस लक्ष के चौबीस गायत्री महापुरश्चरण जनकल्याण के निमित्त ही संपन्न योजना रूपी आँदोलन का विचार का जन्म हुआ जो आज ढाई करोड़ से अधिक व्यक्तियों के सामूहिक पुरुषार्थ के रूप में नजर आता है ।

2 जून 1990 गायत्री जयंती को महाप्रयाण के पूर्व परमपूज्य गुरुदेव का वंदनीया माताजी को एक ही संदेश था कि वे तप साधना द्वारा शक्ति का उपार्जन करें व आने वाले युग परिवर्तन के लिए जनमानस को साधना पुरुषार्थ में प्रवृत्त होने का मार्गदर्शन करें । उसी के निमित्त एक विराट श्रद्धाँजलि समारोह अक्टूबर 1990 में संपन्न हुआ तथा तब से परमपूज्य गुरुदेव की सूक्ष्म व कारण सत्ता के सतत् संरक्षण व परम वंदनीया माताजी के मार्ग दर्शन में इस विराट मिशन ने अपनी यात्रा तय करते-करते एक मंजिल पूरी की है । इसी क्रम में विगत गायत्री जयंती पर प्रथम पुण्यतिथि के अवसर पर पाँच दिवसीय अखण्ड जप प्रधान कार्यक्रम का आयोजन शाँतिकुँज में किया गया तथा पाँच दिन में दस हजार से अधिक व्यक्तियों द्वारा चौबीस करोड़ गायत्री मंत्रों का जाप एक ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान के रूप में संपन्न हुआ । शक्ति साधना वर्ष की घोषणा तभी हुई व सारे भारत व विश्व भर में तीन दिवसीय अखण्ड जप आयोजनों की घोषणा हुई व दो सौ चालीस टोलियों द्वारा यह कार्य संपन्न किया जाने लगा । प्रथम पुण्यतिथि पर संपन्न अखण्ड जप व शाँतिकुँज की दैवी चेतना का एक अंश इस प्रकार सारे देश ही नहीं विश्व के कोने-कोने में यहाँ से भेजे गए अग्रदूतों के माध्यम से पहुँचा है व इसने प्रसुप्त देवात्म शक्ति को जागने व जन-जन में देवत्व का उभारने का एक महत्वपूर्ण कार्य पूरा किया है ।

जिस दैवी संचालन तंत्र के मार्ग दर्शन में शक्ति-अनुग्रह अनुदान के साधना आयोजनों की शृंखला चली है, उसके सारे अब तक के महत्वपूर्ण निर्धारण चली है, वसन्तपर्व पर होते रहे है । वसंत पंचमी परमपूज्य गुरुदेव का आध्यात्मिक जन्म दिवस है । अपनी परोक्ष मार्गदर्शक सत्ता से बाल्यकाल में साक्षात्कार उनका इसी दिन हुआ था । अखण्ड दीपक का प्रज्ज्वलन से लेकर चौबीस महापुरश्चरणोँ का शुभारम्भ, “अखण्ड-ज्योति “ पत्रिका से लेकर गायत्री परिवार की स्थापना, आर्षग्रन्थों के भाष्य से लेकर वैज्ञानिक अध्यात्मवाद की परिकल्पना तथा युग निर्माण योजना के सूत्रपात से लेकर देश भर में चौबीस सौ प्रज्ञा संस्थानों के निर्माण के संकल्प इसी पावन वेला में लिये गये । ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान व गायत्री नगर की स्थापना इसी पावन दिन हुई । महाकाल की युग प्रत्यावर्तन प्रक्रिया के अंतर्गत क्राँतिधर्मी साहित्य की सृजन शृंखला इसी दिन आरंभ हुई । मिशन की समस्त स्थापनाओं की प्रेरणा का मूलस्रोत वसंतपर्व ही रहा है।

अब सूक्ष्मजगत से यह प्रेरणा उभरी है कि शक्ति साधना वर्ष की समापन अवधि के अंतिम चार माह “शक्ति संचार” प्रक्रिया के हों, शक्ति साधना के अखण्ड जप आयोजनों का उद्देश्य था कि शक्ति का बीजारोपण विश्व मात्र में कण-कण में हो । सामूहिक शक्ति के , देवात्मशक्ति के जागरण की प्रक्रिया का यह पूर्वार्ध था । अब उत्तरार्ध है व्यक्ति की निज की आत्मशक्ति का जागरण । इसके लिए शक्ति उन्हें केन्द्र से मिलेगी न्यूनतम व्यक्तिगत साधना वे करेंगे तथा चार माह बाद इसकी पूर्णाहुति शाँतिकुँज आकर गायत्री जयंती , जो परमपूज्य गुरुदेव की पुण्यतिथि है, पर 8-9-10 जून 1992 की तारीखों में आयोजित तीन दिवसीय सत्र में करेंगे। यह विशिष्ट सत्र एक विशिष्ट समारोह में रूप में मनाया जाएगा जिसमें देव संस्कृति के उद्धार एवं विश्वव्यापी विस्तार की शपथ सभी उपस्थित मूर्धन्य साधकों द्वारा ली जाएगी। युगसंधि की विषम वेला में एक विराट अभियान की शुरुआत का यह प्रारंभिक चरण होगा जिसकी फलश्रुतियाँ परिजन अगले दिनों साकार होती देखेंगे।

देव स्थापना अभियान के साथ चले अखण्ड जप के शक्साधना आयोजनों की एक अभूतपूर्व व महत्वपूर्ण फलश्रुति है-जन-जन में आत्मबल का संचार, प्रतिकूलताओं से लड़ने हेतु साहस का अभिवर्धन तथा सूक्ष्मजगत में संव्याप्त विषाक्तता का शमन। प्रत्येक के मन में आशावादी उत्साह का संचार हुआ है व उसे लगा है कि आत्मशक्ति के उपार्जन-गायत्री महाशक्ति के आश्रम में की गयी साधना द्वारा भविष्य को उज्ज्वल बनाया जा सकता है। गायत्री उपासना की सार्वभौम सत्ता को सबने एक स्वर से सादर स्वीकारा है व सामूहिक आध्यात्मिक पुरुषार्थ की दिशा में संघबद्ध प्रयास गतिशील हुए हैं। अब इस वसंतपर्व से एक कदम और इस दिशा में आगे बढ़ाया जाना चाहिए। वह है ब्राह्मीचेतना से और अधिक तादात्म्य जोड़ने-शक्ति स्रोत से स्वयं को संबंधित करने के लिए व्यक्तिगत उपासना का स्तर बढ़ा देना। निजी स्तर पर शाँतिकुँज की दैवीचेतना के ध्यान के साथ न्यूनतम आधा घण्टा गायत्री जप अब अभी संकल्पित साधकों द्वारा किया जाना चाहिए।

इस शक्ति−संचार साधना के उपक्रम में हर परिजन को ब्राह्ममुहूर्त में सूर्योदय से 1/2 घण्टे पूर्व से 1/2 घण्टे बाद तक की अवधि में कोई समय निकालकर उपासना विशेषाँक (अक्टूबर 91) में बताए गए विधि-विज्ञान द्वारा न्यूनतम 1/2 घण्टे जप की व्यवस्था बनानी चाहिए। इस अवधि में शाँतिकुँज पहुँचने, प्रखर-प्रज्ञा-सजल श्रद्धा का दर्शन कर अखण्ड दीपक का दर्शन तथा वंदनीया माताजी के आशीर्वाद से तीनों शरीरों में शक्ति−संचार का ध्यान करना है। सप्ताह में एक बार अग्निहोत्र की भी व्यवस्था बनायी जाय। गायत्री चालीसा का पारायण जितना संभव हो सके, स्वयं भी करें व दस सहयोगी परिजनों को करायें, प्रेरित करें। आत्मशक्ति का उपार्जन हर साधक कर सके इसके लिए यह न्यूनतम उपाय-उपचार हैं कहना न होगा कि दैवी विभूतियाँ बरसने से लेकर सम्मान-सहयोग की प्राप्ति तथा मनोकामनाओं की पूर्ति से लेकर वातावरण अपनी इच्छानुकूल बनने जैसे चमत्कार इसी उपासनापरक पुरुषार्थ की ही फलश्रुति है। शक्ति की उपासना ही इस संधिकाल में अभीष्ट है एवं विशिष्ट अवसर पर किये गए इस साधना पराक्रम का प्रतिफल भी अति विशिष्ट होगा, इसमें किसी को संदेह नहीं होना चाहिए।

जो भी परिजन “शक्ति संचार” के इस उपक्रम में भाग लेना चाहते हों, वे अपना नाम, पूरा पता तथा जन्मतिथि लिखकर शाँतिकुँज हरिद्वार के पते पर पत्र व्यवहार करें। उन्हें यहाँ से अतिमहत्वपूर्ण कलावा (संकल्प सूत्र) वंदनीया माताजी के आशीर्वाद सहित भेजा जाएगा। जन्मतिथि के माध्यम से वंदनीया माताजी अपने दिव्य चक्षुओं से परोक्ष जगत के अंतर्ग्रही प्रभावों का पर्यवेक्षण कर उसका उपाय उपचार यहाँ से करेंगी तथा संकल्प सहित की गयी इस साधना से निश्चित ही सिद्धि की दिशा में पथ प्रशस्त होगा। जो भी संकल्प सूत्रों से बँधेंगे, उन्हें पूर्णाहुति यहीं आकर गायत्री जयंती (8,9,10 जून 1992) पर करनी होगी। स्मरण रखा जाना चाहिए कि आहुतियाँ यज्ञ में किसी की व्यक्तिगत भी हो सकती हैं पर पूर्णाहुति सभी एक साथ एक स्थान पर ही करते हैं।

संधिकाल के इस अतिमहत्वपूर्ण वर्ष में आयोजित शक्ति−संचार साधना में हर भावनाशील को अपनी भागीदार सुनिश्चित करनी चाहिए। यह अवसर कभी-कभी ही आते हैं, ऐसा मानते हुए फरवरी माह के प्रथम सप्ताह तक सभी पत्राचार द्वारा अपना पंजीकरण शाँतिकुँज में करा लें।


अपनी कमाई पर गुजारा (Kahani)

जापानी लड़कों को लेकर एक बस उन्हें पहाड़ी दृश्य दिखाने ले गई। पहाड़ी तीन मील ऊँची थी। बस नीचे ही छोड़नी पड़ी। चढ़ाई पैदल कर दी।

बस को नीचे ही छोड़ दिया गया ड्राइवर मार्गदर्शक के रूप में लड़कों के साथ था। बिना रखवाली बस सामान समेत एकाकी खड़ी थी।

किसी दूसरे यात्री ने यह दृश्य देखा लड़के लौटे तो उनसे पूछा-बस को सूना क्यों छोड़ दिया गया। इसमें खुले पड़े सामान की चोरी हो सकती थी।

लड़कों ने कहा। हमारे देश में चोरी नहीं होती। सभी अपनी कमाई पर गुजारा करने का सिद्धान्त अपना चुके है।

*समाप्त*