संस्कृति की धवल धारा जीवन के कमल खिलते हैं, जिनकी सुवास से धरा स्वर्ग बनती है व उल्लासमय देवत्व विकसित हो उठता है। आज हम जीवन मुरझाया, धरा की सुवास मन्द पड़ी देखते हैं, देवत्व की साँसें रुकी पाते हैं तो उसका एक ही कारण है-संस्कृति की सुरसरि का अवरुद्ध होना आज की कुण्ठित प्रतिभाएँ, लुप्त आत्म विश्वास, धरती पुत्रों द्वारा अपनी ही माता की छाती चीरकर किया जा रहा रक्तपान इसी का परिणाम है। पतन को कँपकँपा देने वाले इस वीभत्स दृश्यों का मात्र एक ही कारण है-ऋषियों की अमर देन का विस्मरण।
विस्मृति से उबारने, अमृत पुत्रों को जीवन बोध कराने हेतु आप से प्रायः अस्सी वर्ष पूर्व ऐ गरिमामय व्यक्तित्व का उदय हुआ, जिन्हें आप हम सभी परम पूज्य गुरुदेव पं. श्रीराम शर्मा आचार्य के नाम से जानते हैं। विश्वामित्र, भागीरथ, दधीचि, और महाअथर्वण जैसी अगणित ऋषि सत्ताएँ उनमें एकाकार हो उठीं। गायत्री उनकी मेधा बनीं, यज्ञ ने प्रचण्ड पुरुषार्थ का रूप लिया। जीवन की प्रत्येक श्वास सोऽहम् नवोन्मेष के विजय ध्वज का ताना बाना बुनती रही। उनके उत्कट तप की हुंकार सुन अगणित बलिदानियों की संगठित वाहिनी वासन्ती वेश धारण कर देव संस्कृति के पुनरुद्धार हेतु आकुल हो उठी।
विचारक्रान्ति की लाल मशाल प्रज्वलित कर जिनने दुर्बलताओं से ग्रस्त, पतन के गर्त में समाज को विवश, असंख्य अनेक पाँवों को आदर्शों का हिमालय लाँघ जाने का बल दिया। जिनने सामूहिक मन पर गहन प्रयोग कर चेतना के रूपान्तरण द्वारा मनुष्य में देवत्व को जगाने की प्रक्रिया का शुभारंभ किया। सूक्ष्म चेतनलोक में स्पन्दित जिनका महिमामय व्यक्तित्व देवसंस्कृति की विजय और उज्ज्वल भविष्य की वापसी का गान गुँजायमान कर रहा है, ऐसे संस्कृति पुरुष परम पूज्य गुरुदेव के चरणों में उनकी द्वितीय महाप्रयाण तिथि पर उनकी अगणित सन्तानों द्वारा हृदय की असीम भक्ति व अनुरक्ति के साथ संस्कृति अंकों की यह शृंखला समर्पित है।
हमारी संस्कृति प्राचीनतम है, औरों की बाद में जन्मी, हम विश्व के आदि पुरुष हैं। हमारा धर्म सर्वश्रेष्ठ है तथा हमारा अतीत स्वर्णिम गौरव से भरपूर रहा है। इन सब प्रसंगों पर चर्चा करने से पूर्व इक्कीसवीं सदी के मुहाने पर खड़ा मानव एक प्रश्न का समाधान चाहता है। औद्योगिक, वैज्ञानिक व आर्थिक क्रान्ति से गुजर चुके आज के आधुनिक विश्व को क्या इन सब वाद-विवादों की, तत्त्वदर्शन पर टीका टिप्पणी की, अतीत की समीक्षा व पुनरावलोकन की आवश्यकता है? यदि है तो क्यों? इसका उत्तर दिए बिना संस्कृति पर व उसके बहुविधि पक्षों पर किया गया चिन्तन निरर्थक ही जाएगा। उत्तर मात्र यही है कि आज जितनी अधिक आवश्यकता मानव जाति को इस पक्ष पर चिन्तन करने की है, उतनी संभवतः पहले कभी नहीं, रही। क्यों? आज की परिस्थितियों की एक समीक्षा से यह बात स्पष्ट हो जाती है।
यह सही है कि मनुष्य ने साधनों की दृष्टि से प्रगति की है। आज जो कुछ भी हमारे पास है, संभवतः सुख-सुविधा प्रसन्नता प्रदान करने वाले ये सब साधन हमारे पूर्वजों के पास नहीं थे। विज्ञान का आज जो स्वरूप है, वह अतिविकसित है व इस “सुपर टेक्नोलॉजी से भरे जगत में वह सब कुछ पिछड़ा माना जाता है जो विज्ञान के साधनों उसके तर्कों-प्रमाणों तथ्यों पर आधारित नहीं होता। प्रत्यक्षवाद से भरे मनुष्य के इस विकास ने मनुष्य को कई गुना ऊँचाई पर क्षितिज के पार पहुँचाया है, किन्तु इसे न शान्ति मिली न सन्तोष। भ्रान्तियाँ, उद्वेग, संक्षोभ, बेचैनियाँ इस सीमा तक बढ़ते चले गए हैं कि आज सारी मानव जाति दुखी है, रुग्ण है। उसे आमूलचूल स्वास्थ्यवर्धक रसायन की आवश्यकता है, नहीं तो कभी भी इसके अस्तित्व के समाप्त हो जाने का खतरा सामने खड़ा हुआ है।
यदि सभ्यता का विकास ही सब कुछ है तो मनुष्य इतना सब पढ़ लिखकर, ज्ञान-कौशल की चरमसीमा पर पहुँच कर साधनों को एकत्र कर, संपन्नता का शिखर छू लेने पर भी सभ्य क्यों नहीं बना, अपितु एक बर्बर, असभ्य के रूप में उभरकर सामने आया। अभिनव मनुष्य नितान्त भोगवादी है। इतना संकीर्ण कि अपनी रोटी दूसरों के साथ मिल-बाँटकर भी नहीं खा सकता। उसका बस चले तो अपनी रोटी खाने के साथ वह औरों की भी छीन ले, उन्हें बेचकर उनसे प्राप्त धन से मद्य पी उन्मत्त हो जाए। क्या यही आज का विकसित, सभ्य, सुसंस्कृत मानव है? कैसे इससे सतयुगी उज्ज्वल भविष्य की आशा रखी जाय? आदि मानव अनगढ़-नर−वानर स्तर का था व आज का मानव प्रगति की चरमसीमा पर पहुँचा विकसित मानव है तो वह भोगवादी बनता हुआ चिंतन व आचरण से क्यों पशु को भी पीछे छोड़ता नजर आता है, इसका उत्तर किसी आधुनिक चिंतक-वैज्ञानिक के पास नहीं है। इसका उत्तर तो एक ऋषि ने आज से वर्षों-अगणित सहस्राब्दियों पूर्व उपनिषदों के आलोकपूर्ण काल में मानव की अतिभोगवादी मंत्रणाओं का पूर्वाभास करते हुए दे दिया था व कहा था-तेन त्यक्तेन भुंजीथाः अर्थात् “भोज भी त्याग के साथ करो”। यह है चिरपुरातन व आज की परिस्थितियों के लिए नितान्त सही समाधान जो भारतीय संस्कृति के माध्यम से मानवमात्र को उपलब्ध होता है, जो अध्यात्मवादी भौतिकता की बात कहती है व बताती है कि “साधनों का उपभोग करो पर भावना त्याग की रखो। स्वयं भी जियो, औरों को भी जीने दो।
“संस्कृति” जीवन जीने की एक पद्धति का नाम है जिसका विकास इस धरा पर सर्वप्रथम भारतवर्ष में हुआ, अतः वह भारतीय संस्कृति कहलाई। श्रुति कहती है “सा प्रथमा संस्कृति विश्ववारा”। आदि संस्कृति का जन्म इस परम पावन धरा पर हुआ व उसने विश्व मानवता का मार्गदर्शन तब से ही करना आरंभ कर दिया जब से यहाँ सृष्टि का प्रथम पुरुष जन्मा। सारे शास्त्रीय प्रमाण यही सिद्ध करते हैं कि आदि सृष्टि भारत के उत्तराखण्ड अर्थात् आर्यावर्त में हुई। जिन्हें आर्य कहा जाता है, वे पूर्ण सभ्य, संयमी व सशक्त कोटि के मनुष्य थे जो इस धरा पर जन्मे। अतः यह आर्यावर्त कहलाया। ‘मनु’ के वंशज होने से हम सब मनुष्य कहलाए। वही शब्द “जर्मन भाषा में अपभ्रंश होकर ‘मेनस’ तथा अँग्रेजी भाषा में मैन बन गया। इसी वैवस्वत मनु की कथा का अनुवाद यहूदी धर्मग्रन्थों में जलप्रलय-हजरत नूह की कथा प्रकरण के रूप में बाद में आया। बाइबिल और इस्लाम ग्रन्थों में नूह की सन्तानों हेमेटिक और सेमेटिक से सन्ततियों की उत्पत्ति बतलायी गयी है। हेमेटिक अर्थात् हिरण्यगर्भ यानी सूर्य तथा सेमेटिक यानी सोम-चन्द्र सूर्यवंशी और चन्द्रवंशी ही संततियाँ ये हैं, जिनका विवेचन हम पाश्चात्य नृपत्व शास्त्रियों की पुस्तकों में पढ़ते हैं। किन्तु यहाँ प्रतिपाद्य विषय है भारतीय संस्कृति जो मानव संस्कृति कहलाई। इसके अति प्राचीन से लेकर आज तक के रूप पर प्रतिपादन थोड़ा आगे होगा, अभी तो यह चर्चा प्रमुख है कि यह मानव संस्कृति कैसे बनी?
भारतीय चिन्तक पद्धति के अनुसार “मनु” शब्द से हम सब मानव कहलाये। मन शब्द भी मनु से बना है। मन अर्थात् इच्छाशक्ति, विचारशक्ति का सामंजस्य जिसमें हो ऐसे मनुष्य का आविर्भाव जब इस धरती पर हुआ तो मानवजाति की उत्पत्ति हुई। इच्छाशक्ति ने “एकोऽहं बहुस्यामि” की संकल्प प्रक्रिया द्वारा सृष्टि को जनम दिया तथा विचार शक्ति के साथ विकसित हुई विशिष्टता से अभिपूरित जीवन शैली संस्कृति कहलाई। सप्तद्वीपा वसुन्धरा में इसका जन्म भारत में हुआ। अतः यह भारतीय संस्कृति कहलाई। मानवी मूल्यों की प्रतिष्ठापना इसका मूल उद्देश्य था अतः यह मानव संस्कृति बनी। चूँकि मानव में देवत्व का उदय हमारी संस्कृति का मूल उद्देश्य था अतः यह देव संस्कृति नाम लेकर विकसित हुई। इसके प्रणेता थे ऋषि। ऋषि वे जो चेतना के सूत्र देते हैं अन्वेषक होते हैं तथा चेतना की काया व ब्रह्माण्ड रूपी प्रयोगशाला में प्रयोग करते रहते हैं। इनके नाम से यह संस्कृति ऋषि संस्कृति कहलाई। इस संस्कृति का केन्द्रीय तत्व था अध्यात्म-मानवी संवेदना। मन की शक्ति द्वारा परिस्थितियों का निर्माण। जीवन को सामंजस्यपूर्ण विधि से सही ढंग से जीना तथा औरों के आगे बढ़ने के लिए भी पथ प्रशस्त करना, अतः यह संस्कृति आध्यात्मिक संस्कृति कहलाई। स्थान विशेष की दृष्टि से यह सिंधुनद से लेकर सागर (कन्याकुमारी) पर्यन्त विस्तृत सिंधुदेश में जन्मी-वही शब्द “हिंदू” नाम से कालान्तर में बोला जाने लगा अतः यह हिन्दू संस्कृति कहलाई।
हिन्दू शब्द कितना असांप्रदायिक है, यह इससे स्पष्ट होता है।
“आसिन्धो सिन्धु पर्यन्ता यस्य भारत भूमिका पितृभः पुण्य भूश्चैव स वै हिंदुरिति स्मृतः।”
अर्थात् “जो इस सिंधुनद से लेकर सागर पर्यन्त विस्तृत भारत भूमि को अपनी पितृभूमि और पुण्य भूमि मानता है, वह हिन्दू है।”
यह सब स्पष्टीकरण इसलिये जरूरी है क्योंकि दुनिया भर की भ्रान्तियाँ इन सब के विषय में काल के प्रवाह के साथ जोड़ दी गयी हैं जबकि मानवतावादी संस्कृति होने के कारण भारतीय संस्कृति आज की समस्याओं का न केवल समाधान है वरन् उसमें अपने वैशिष्ट्य के कारण विश्व संस्कृति-मार्गदर्शक संस्कृति कहे जाने की पात्रता भी है। किसी देशकाल की “सभ्यता” किसी के लिए अहितकारी भी हो सकती है किन्तु “संस्कृति” सर्वदेश, सर्वकाल में सभी के लिए सर्वथा हितकारी होती है। इस परिभाषा की दृष्टि से भारतीय संस्कृति ही इस कसौटी पर खरी सिद्ध उतरती है। संस्कृति और सभ्यता दो अलग-अलग शब्द हैं। सामान्यतया सभी संस्कृति (कल्चर) शब्द को प्रयोग सभ्यता (सिविलाइजेशन) के पर्याय के रूप में करते हैं, जब कि दोनों में मौलिक अंतर है। सभ्यता बहिरंग का तत्व है तो संस्कृति आभ्यन्तरिक। सभ्यता वेशभूषा, रहन-सहन खान पान इत्यादि पक्षों तक ही सीमित है जबकि संस्कृति चिन्तन से लेकर जीवन व्यवहार एवं मानवी संवेदना से लेकर समष्टिगत एकता जैसे पक्षों को स्पर्श करती है। सभ्यता की आसानी से नकल की जा सकती है किन्तु संस्कृति को अपनाना समयसाध्य प्रक्रिया है। संस्कृति वह दृष्टिकोण है, जिससे कोई समुदाय विशेष जीवन की समस्याओं पर दृष्टि विक्षेप करता है। संस्कृति उस समयविशेष का लोक प्रचलन, धर्म, वांग्मय, चित्रकला, मूर्तिकला शाश्वत तत्व ऐसे हैं, जिससे बोध होता है अनगढ़ता को सुगढ़ता में बदलने का। यही आध्यात्म है। इतने बड़े व्यापक अर्थ के परिप्रेक्ष्य में जब चिन्तन किया जाता है तो स्पष्ट समझ में आता है कि जब हम भारतीय संस्कृति की बात करते हैं तो इसके सार्वभौम, सर्वकालीन, सामयिक गुणों के प्रसंग में चर्चा कर रहे हैं, न कि जाति, वर्ण, आश्रम, षोडश संस्कार आदि उसके विभिन्न विभाजनों की परिधि तक सीमित रह कर।
भारतीय संस्कृति देवसंस्कृति कही गयी है अर्थात्-मनुष्य में देवत्व की भावना का संचार करने वाले, उसे देवमानव बना देने वाले सारे तत्व उसमें विद्यमान हैं। तत्त्वदर्शन की प्रधानता होते हुए भी वह विशुद्धतः पारलौकिक नहीं है। उसमें जीवन को स्पर्श करने वाली हर उस दिशा-धारा का समावेश है जो जीवन निर्माण से संबंधित है। चेतनात्मक स्तर पर व्यक्तित्व को अनगढ़ से सुगढ़ बनाने के लिए क्या प्रयोग व प्रयास किये जायँ, इन सबका मार्गदर्शन उसमें विद्यमान है अतः यह अकारण नहीं कि भारत भूमि को "स्वर्गादपि गरीयसी” तथा यहाँ के निवासियों को संसार भर ने “देवमानवों” तैंतीस कोटि देवताओं की संज्ञा दी थी। वस्तुतः ज्ञान और विज्ञान के प्रत्येक क्षेत्र में अग्रणी होने के कारण ही राष्ट्र जगद्गुरु-चक्रवर्ती आदि नामों से सम्मानित हुआ।
एक मानसिक संताप की बात यह कि अतीत का गुणगान तो खूब होता रहता है किन्तु इससे निर्देश लेकर वर्तमान को बनाने के प्रयास नहीं होते। नया भारत आज नये विश्व को कुछ दे, इस योग्य नहीं रहा क्योंकि जो स्वयं पाश्चात्य संस्कृति का अंधानुकरण कर रहा हो, वह दूसरों को क्या देगा? बीसवीं सदी के अंतिम दशक में मानव जाति के अस्तित्व के लिए चिंतित हम सब यदि नये विश्व को सतयुगी जीवन दर्शन देना चाहते हैं तो प्राचीन भारत ही वह सब दे पाने में सक्षम है। सच तो यह है कि भारतीय ज्ञान की महत्वपूर्ण कड़ियाँ इस मणिमुक्तकों के हार की लड़ियाँ नये संसार में स्वतः बिखर चुकी हैं व चारों ओर पूर्वार्द्ध दर्शन-रहस्यवाद अध्यात्मवाद-भारतीय संस्कृति को समझने जानने का प्रयास किया जा रहा है किन्तु इसे विडम्बना ही कहा जाना चाहिए कि अपने देश में इस संबंध में जन-जाग्रति शून्य के बराबर है। संस्कृति के प्रतीक समाप्त होते जा रहे हैं। भारतीय संस्कृति के बताए मार्गदर्शन पर चलना पिछड़ापन माना जाता है। प्रायश्चित यही है कि आज के युग की पीड़ा के समाधान हेतु भारतीय संस्कृति के अग्रदूत आगे आयें व वह तत्त्वज्ञान जन-जन तक पहुँचाएँ, जो बिखराव, विखण्डन, संत्रास, संक्षोभग्रस्त मानवजाति के लिए संजीवनी का काम कर सके।
अगले दिनों सारा विश्व एक कुटुम्ब के रूप में आबद्ध हो, यह नियति है। स्रष्टा ऐसा ही चाहता है व इस पुण्य प्रयोजन के लिए देवसंस्कृति के धारणकर्ताओं को आगे आने देना चाहता है। यह सूक्ष्म जगत से संचालित दैवी सत्ताओं के क्रियाकलाप हैं जो कुछ प्रमाणों द्वारा मानव मात्र के एक सूत्र में आबद्ध होने का संकेत दे रहे हैं। अणु आयुधों के खिलाफ विश्वभर के राजनेताओं का एकजुट हो जाना, समष्टिगत दैवी विपत्तियों के लिए हर राष्ट्र का एक दूसरे की सहायता के लिए आगे आना तथा पृथ्वी के पर्यावरण का संतुलन बनाए रखने के लिए विश्व मनीषा द्वारा एक साथ बैठकर हल निकालने के प्रयास यह बताते हैं कि महर्षि अरविंद का 21 वीं सदी का अतिमानस निश्चित ही धरती पर उतरने को तत्पर हो चुका है। नोस्ट्राडेमस ने भी विश्व वसुधा के एक हो जाने व भारतीय संस्कृति द्वारा विश्व मानव के मार्गदर्शन की घोषणा अपने दिव्यचक्षुओं से की है। परम पूज्य गुरुदेव ने मानव में देवत्व के अवतरण-मानवी चेतना में आमूलचूल परिवर्तन तथा धरती पर अनुकूल स्वर्गोपम परिस्थितियों के विनिर्मित होने की घोषणा “सतयुग की वापसी” के रूप में इन्हीं दिनों आगामी दस-पन्द्रह वर्षों के भीतर सम्पन्न होने की है। अर्थात् यह सब सुनिश्चित रूप से होना ही है, हम सबको तो चिरपुरातन के गौरव को विज्ञान-सम्मत-तथ्य-सम्मत बनाते हुए उन्हें युगानुकूल ढंग से प्रस्तुत भर करना है।
जैसे भारत ने किसी भी मत-सम्प्रदाय का दमन किये बिना अपने यहाँ धार्मिक एकता स्थापित की सभी मत-मतांतरों को अपने गर्भ में पलने-विकसित होने दिया, जैसे भारत ने किसी भी जाति की विशिष्टता को नष्ट किए बिना उन सभी को एक सूत्र में आबद्ध कर दिया, जैसे भारत ने बिना किसी भाषा की गरिमा घटाए सबको विकसित होने का अवसर देकर संस्कृत को राष्ट्रीय संस्कृति की भाषा बनाकर देश की सभी भाषागत कठिनाइयों का समाधान निकाला, विविधता में भी एकता दर्शाने वाली एक अद्भुत सामाजिक संस्कृति विकसित की, वैसी ही लगभग कुछ उसी प्रकार आज संसार के विभिन्न मत-मतांतरों नस्लों-जातियों विचारणाओं, भाषाओं वाले सभी राष्ट्रों के मध्य एक सोऽहम् क्रान्ति यह राष्ट्र संपन्न करने में सक्षम है। गुस्से व तनाव से भरे विश्वमानव को शान्ति का संदेश देने की सामर्थ्य भारतीय संस्कृति में है, जो सहिष्णु है, उदार है, मानवतावादी है तथा पूर्णतः आध्यात्मिक है।
उनमें से एक ने हुंकार उठाई “देवसंस्कृति की!” जवाब में जन्मभूमि की माटी के लिए सर्वस्व न्यौछावर करने वालों की भीम गर्जना गूँजी “जय!”
यह स्वर पर्वतों से टकराया और हुभकते घोड़ों से जूझा पर घोड़े नहीं माने और एड़ी की चोट से उन्मत्त तुरंग हवा पर टूटे। वीरों को अपनी जाँघों से उनकी पीठ को दबाकर जमना पड़ा। इस प्रयास में उन सेनानियों के गर्व भरे भाल और भी ऊँचे उठ गए। पथरीली भूमि पर बजती टापों की धक-धक के पीछे देश-वासियों के हृदय के रक्त को तीव्र गति से भगाने वाले नगाड़ों का धकधकाता शब्द गूँजने लगा।
तब वहाँ समस्त अंतराल में एक हड़कंप सी मच उठी और अश्वारोहियों का वह समूह ऐसा लगा जैसे कोई पर्वत की तरह का भीमकाय प्रचण्ड मेघ अपने तेजस्वी मुख रूपी बिजलियों को चमकाता बढ़ता-उछलता चला आ रहा है।
तेजी से पैदल भागते भील काले-काले से मटमैले पर्वतों से ऐसे उतरने लगे जैसे सन्ध्या के आकाश में क्षितिज पर से काले-काले चपलाँग वेगवान गरुड़ बढ़ते चले आ रहे हों जो कभी मेघ में छिप जाते हों कभी निकल आते हों।
धीरे-धीरे अरावली की घाटी देश के इन बलिदानी सपूतों से भरने लगी। पुरुषों से महिलाओं की संख्या कम न थी। भील कन्याएँ, ग्राम-वासी महिलाओं-सामन्त पत्नियों में आज पूरा उत्साह था। इस उत्साह को शतगुणित करते हुए बारहट हूपा जी का गान सुनाई पड़ा “देश के वीरों और वीराँगनाओं! अँधेरी रात बीत गई है। आकाश में सूर्यनारायण का उदय हुआ है। उठो और सन्नद्ध हो जाओ। देखो-देखो प्रलय की प्रचण्ड लहरों ने इस पवित्र भूमि को ढक दिया था लेकिन आज वह जल उतरने लगा है। देखते हो अब फिर हिमालय का शिखर बाहर निकलने लगा है। हाथ उठाओ और उस शिखर का अभिनन्दन करो।”
हूपा जी के इन स्वरों के साथ सहस्र-सहस्र नेत्र लोकनायक महाराणा की ओर उठे। अपने-अपने स्थान पर रहते हुए सभी ने इस नर केशरी को सिर झुकाकर अभिवादन किया। लेकिन बारहट अभी अपने में मग्न था। वह गा रहा था।
“ऋषियों की संतानों! उठो और देखो कि आज यह बाप्पा रावल के पवित्र वंश का उत्तराधिकारी तुम्हारे सामने तपस्वी बनकर आया है। इसकी स्त्री आज स्वर्णविहीन बनकर खड़ी है जैसे अलंकार विहीना इस देश की धरती अपना खोया गौरव वापस माँग रही हो। वीरों । इसी कुल की महारानी मीरा ने एक दिन भारत की भूमि में भक्ति की स्रोतस्विनी बहाकर कुलीनता के दंभ को खण्ड-खण्ड कर दिया था। उसी के वंशधर आज तुम्हें महाव्रत में दीक्षित करने आए हैं।”
गीत समाप्त हो गया। एक पल के लिए चारों ओर निस्तब्धता छा गई। दूसरे ही पल चेतक की पीठ पर बैठे महाराणा प्रताप का गम्भीर स्वर उभरा-भारत माँ की अमर सन्तानों! आज हम सब सोऽहम् स्वतन्त्रता के लिए अपना सब कुछ लुटा देने की शपथ उठाने के लिए आए हैं। उसी देश की संस्कृति के लिए जो सोने की चिड़िया कहलाता था-समूचा विश्व जिसकी अथाह सम्पदा की ओर आश्चर्य भरी आँखों से ताकता था। आज उसी देश को सम्पदाविहीन होकर औरों की ओर याचक की दयनीयता से टकटकी लगाने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है-जानते हो क्यों? जगद्गुरु कहलाने वाले समस्त कलाओं और विद्याओं के एक राष्ट्र चक्रवर्ती का वैभव आज कहाँ विलीन हो गया? कहाँ खो गई उसकी बौद्धिक क्षमता और प्रतिभा जो उसे तकनीकी विशेषता के सभी क्षेत्रों में विदेशियों के सामने घुटने टेकने पड़ते हैं। ऋषित्व को आत्मसात् करने वाले, देवत्व की आराधना करने वाले आज विलासिता के चंगुल में कैसे जा फँसे? “यत्र नार्यस्त पूजयन्ते रमन्ते तत्र देवता” का प्रचण्ड घोष करने वाला देश आज बिलखती स्त्रियों की आहों उनके करुण क्रन्दन की गूँज से भर रहा है-जानते हो क्यों?”
सभी अवाक् थे जीवन के इन ज्वलन्त प्रश्नों के सामने। सभी के हृदयों में एक ही उद्वेलन था कौन हल करेगा इन्हें? उद्वेलन की इन तरंगों को तोड़ते हुए राणा की स्वर सरिता पुनः प्रवाहित हो उठी “ऋषियों की अमर संस्कृति जिसे हम भूल चुके हैं भूलते जा रहे हैं-धरित्री के जीवन में पुनः उसकी गौरवपूर्ण प्रतिष्ठ वसुन्धरा के सारे प्रश्नों का एक मात्र समाधान है और यह संस्कृति साम्प्रदायिक नहीं है। यह एक दूसरे को मारने-काटने का उन्माद नहीं एक दूसरे के लिए मर-मिटने की अविराम पुकार है। द्वेष की रक्तिम कीचड़ नहीं प्रेम की दुग्धोज्ज्वल धारा है। राणा हम्मीर क्या मुसलमान वीर की रक्षा के लिए नहीं मर मिटे? राणा संग्राम सिंह ने विदेशियों को खदेड़ भगाने के लिए क्या सिकन्दर लोदी से सन्धि नहीं की। ऋषियों की संस्कृति तो मानव जीवन में देवत्व के अमर वैभव-विपुल क्षमताओं को साकार करने वाली गहन प्रक्रिया है-तभी तो यह देव संस्कृति है।” कहते-कहते राणा का स्वर भर्रा गया उन्होंने एक ओर खड़े सालूमर के सरदार की ओर देखते हुए कहा “सरदार। आज देश और धरती के नाम पर तुम सब से एक भीख चाहता हूँ।”
सालूमर का सरदार समझा नहीं। सब चौंक उठे। “राणाजी ! आज क्या कहते हैं? आप आज्ञा देंगे और हम सब अपना सब कुछ लुटा देने के लिए आतुर न हो उठेंगे।”
नहीं सरदार! राणा ने कहा “मेरे ऊपर भी एक है। वह इस की हवा है जिसके कारण हम सब जीवित है, वह पानी है, जिसे हम सबने बचपन से पिया है इस धरती की धूल है, जिसमें खेलकर हम बड़े हुए हैं। उसी देश के नाम पर मैं आज तुम सबसे वचन माँगता हूँ कि हममें से कोई व्यक्तिगत शौर्य और प्रतिभा के नाम पर अपनी सृजन वाहिनी की शक्ति को क्षीण नहीं करेगा। आज अपने देश के गौरवहीन होने के कारण यहाँ के व्यक्तियों में प्रतिभा क्षमता का अभाव नहीं है बल्कि उस समर्पण के अहं को धूल-धूसरित कर फेंक देने के भाव की कमी है। बोलो तैयार हो अपने व्यक्तिगत भावनाओं क्षमताओं को उद्देश्य की समष्टि में घोल देने के लिए?”
सरदारों के गले भर आये उन सबने रुंधे गले से कहा “तैयार हैं राणाजी, हम सब तैयार हैं।” राणा से लेकर यहाँ का सामान्य भील, महारानी हो, या भील कन्याएँ आज सबकी भाषा एक है। भावनाएँ एक हैं। गति मति एक है। सब का एक स्वर है।
“तो उठाओ-जन्मभूमि की पवित्र माटी जिसके कण-कण का मिलन अपना जीवन है। इसे माथे पर लगाकर ग्रहण करो ऋषि संस्कृति के महायज्ञ में अपना सर्वस्व आहूत करने की शपथ।” कहते हुए राणा चेतक की पीठ से उतर आए। उन्होंने उपस्थित जनसमुदाय को पुनः झकझोरा “शपथ ग्रहण करना पर मेरे लिए नहीं। मेरे पास क्या है? मैं झोंपड़ी में रहता हूँ, पलंग पर नहीं सोता, पहनने को मेरे पास कपड़े नहीं बचे। बची हैं समर्पित कर्म की प्रतीक ये भुजाएँ और दिन रात देश-धर्म संस्कृति के गौरव को सोचने वाला मस्तिष्क यही मेरा सब कुछ है।” एक युवती चिल्लाई “हमें आपका माथा उठा हुआ दीखता रहे, महाराणा जी। हम कभी पीछे नहीं हटेंगे।”
उसकी वह तीखी आवाज गूँज उठी। पास खड़े शक्तिसिंह ने मुड़कर देखा। वह घूँघट हटाए धधकती ज्वाला सी खड़ी थी।
“बहन।” शक्तिसिंह ने गरजते हुए कहा “तू यों ही बोलती रह। महाराणा कभी अकेले नहीं रहेंगे। इनके साथ बलिदानियों की दीवारें खड़ी रहेंगी।”
कथन के साथ हुए भीषण जय-जयकार से वायुमण्डल प्रकम्पित हो उठा।
अपने हाथ में माटी का ढेर सबको वितरित करता हुआ वृद्ध बोल पड़ा “मैं कहता न था तुम से कि एक दिन तुम्हारी पुकारों में अपने आप आग भर जाएगी। देखो वह दिन आज आ गया। मैं कहता न था कि एक आएगा जब इस देश की बहू-बेटियों के बलिदानों की राख में से एक ज्योति सी निकलेगी जो इस तूफान के घेरे में, अँधेरे के थपेड़ों से लड़ेगी वह दिन आज आ गया।”
वृद्ध के स्वर ने राणा को विह्वल कर दिया। उन्होंने आकाश की ओर अपनी दृष्टि उठाते हुए कहा “मातृभूमि! तेरी सन्तान आज फिर उठ रही है। अब तेरे खेतों में अन्न के साथ, सद्विचारों की फसल भी उगने लगी है। आशीर्वाद दे कि हम तेरे गौरव को पुनः प्रतिष्ठित कर सकें।” महाराणा ने माटी बाँट रहे वृद्ध की ओर अपना हाथ बढ़ाया। बूढ़े ने अप्रतिम गौरव के साथ इस अनूठी सौगात को उनके हाथों में रखा। राणा ने उस माटी के सामने अपना गर्वोन्नत भाल झुकाया।
माटी के कण उनके माथे पर जा सके। उनके कण्ठ से गौरवमय स्वर फूट पड़े “जन्मभूमि की पावन माटी की शपथ! इस अनन्त आकाश और विपुल पृथ्वी के बीच में आज सौगंध खाता हूँ कि जब तक देव संस्कृति के गौरव को पुनः प्रतिष्ठित और दिग्दिगन्त तक विस्तृत न कर दूँगा तब तक इसी तरह फटे वस्त्र धारण करूँगा। जब तक इस देश के बालक और दलित भूखे हैं तब तक इसी भाँति पत्तों में अन्न ग्रहण करूँगा । जब तक इस देश के जन जीवन में तृप्ति की मुस्कान वापस नहीं आ जाती तब तक इसी भाँति चुल्लू भर-भरकर पानी पीऊँगा। जब तक यहाँ की नारियों का जीवन उल्लास भरी खिलखिलाहटों की मधुर गूँज से नहीं भर जाता तब तक मैं इसी तरह घास पर सोकर अपनी रातें बिताऊँगा। यह मेरी अटल और ध्रुव प्रतिज्ञा है।”
राणा के स्वरों में अगणित स्वर मिल उठे। सभी के माथे पर पावन माटी के कण चमक रहे थे। प्रचण्ड रव गूँज उठा “लोकनायक राणा प्रताप की जय।” इस जय ध्वनि को चीरते हुए महाराणा ने गर्जन किया “देवसंस्कृति के अमर प्रेरक ऋषि गण मानव जाति के आनन्दोछ्वास के लिए सर्वस्व अर्पित करने वाली पूर्व पुरुषों की हुतात्माएँ देखें आज इस देश के पुत्रों-पुत्रियों ने शपथ ग्रहण की है। वे एक दिन के लिए नहीं, सारे जीवन के लिए साफा और जौहर का व्रत ले रहे हैं।”
इस उद्घोष के साथ ही आकाश के वक्षस्थल में असंख्य उद्वेलन करता भारत की अमर संस्कृति का केसरिया ध्वज फरफरा उठा।
छान्दोग्योपनिषद् में एक कथा आती है। “इन्द्र तथा विरोचन दोनों ज्ञान प्राप्ति के लिए स्रष्टा के पास गए। दोनों आत्मतत्त्व जानना चाहते थे। ब्रह्माजी ने कहा दोनों सज-धजकर अपना प्रतिबिम्ब जल में देखो। जो जल में दिखाई पड़े, वही आत्मा है। विरोचन संतुष्ट होकर लौट आए। उनने शरीर को सजा-धजा व अपनी मुखाकृति देखी उसी से उन्हें संतोष मिल गया। किन्तु इन्द्र ने बारम्बार मनन किया-आत्म चिन्तन किया। पुनः बार-बार लौटकर प्रजा पिता ब्रह्मा से प्रश्न किया। उन्हें समाधान मिला कि शरीर नहीं यह स्थूल काया नहीं, वरन् आत्मसत्ता ही परमसत्य है। सजाना-सँवारना उसे चाहिए। उन्हें आत्मज्ञान की प्राप्ति हुई। विरोचन ने लौटकर देहात्मवाद का प्रचार किया। उनने प्रतिपादन किया कि देह ही आत्मा है। इसी की सेवा-शृंगार साधना की जानी चाहिए। मरने पर शरीर को सुरक्षित सुसज्जित किया जाना चाहिए। प्रलय तक आत्मा उसी में रहती है। जब अंततः सृष्टि प्रलय के समय नष्ट होगी तब कर्मों का निर्णय होगा। जबकि इन्द्र ने आत्मसत्ता के उत्कर्ष का प्रतिपादन किया व इसके लिए मानवधर्म का निर्धारण किया। साधना पद्धतियों बनीं जिनमें भोगों से त्याग की प्रधानता थी।” यह कथा कितनी सत्य है, यह ज्ञात नहीं पर इस अलंकारिक प्रतिपादन से एक सत्य उभर कर आता है कि दो प्रकार की जातियाँ उपनिषद् कालीन समाज में थीं। एक आर्य, जिसके प्रतिनिधि थे इन्द्र देवसत्ताओं के प्रतिनिधि, संस्कारी पुरुष। दूसरी दस्यु जातियाँ अथवा अनार्य जातियाँ। इन्हीं को सुर व असुर कहा गया। सुर वे जिनने भारत को अपनी कर्मभूमि बनाया तथा असुर वे जिनमें धर्मधारणा के प्रति प्रमाद था, देहसुख जिन्हें अधिक प्रिय था। विरोचन इन्हीं सत्ताओं का प्रतीक है व इन्हें देहात्मवाद के संस्कारों के साथ आर्यावर्त से बहिष्कृत कर दिया गया। इनने ही शवों को ‘ममी’ की तरह सुरक्षित रखने का प्रावधान बनाया जिसमें राजा-प्रजा सभी को एक साथ सजा-धजा कर दफना दिया जाता था।
यह कथा मनोरंजन हेतु नहीं, आदि संस्कृति भारतीय संस्कृति के विकास के विभिन्न आयामों को समझाने हेतु प्रस्तुत की गयी है। वस्तुतः प्रथम मानव इस क्षेत्र में भारतवर्ष में जन्मा व प्रचलित पाश्चात्य विकासवाद के विरुद्ध वह आदिम जाति का नहीं, अनगढ़ नरमानुष नहीं अपितु एक श्रेष्ठ मनुष्य था सभ्य था पूर्णतः संयमशील था तथा ज्ञानवान था, उसी से समग्र मानव जाति की उत्पत्ति व विकास का क्रम चला। महाभारत की एक आख्या के अनुसार।
अभगच्छत राजेन्द्र देविकाँ लोक विश्रुताम्। प्रसूर्तियत्र विप्राणाँ श्रूयते भरतर्षभ॥
अर्थात् “सप्तचरुतीर्थ के पास वितस्ता नदी की शाखा देविका नदी के तट पर मनुष्य जाति की उत्पत्ति हुई। प्रमाण यही बताते हैं कि आदि सृष्टि की उत्पत्ति भारत के उत्तराखण्ड अर्थात् इस आर्यावर्त क्षेत्र में ही हुई।
संसार भर में गोरे, पीले, लाल और श्याम (काले) ये चार रंगों के लोग विभिन्न क्षेत्रों में पाए जाते हैं। एक भारत ही ऐसा देश है जहाँ इन चार रंगों का भरपूर मिश्रण एक साथ देखने की मिलता है। वस्तुतः श्वेत-काकेशस पीले-मंगोलियन काले-नीग्रो तथा लाल रेड इंडियन इन चार प्रकार के रंग विभाजनों के बाद पाँचवीं मूल एवं मुख्य नस्ल है जो भारतीय कहलाती है। इस जाति में उपर्युक्त चारों का सम्मिश्रण है। ऐसा कहीं सिद्ध नहीं होता कि भारतीय मानव जाति उपर्युक्त चारों जातियों की वर्ण संकरता से उत्पन्न हुई उलटे नृपत्व विज्ञानी यह कहते हैं कि भारतीय सम्मिश्रित वर्ण ही यहाँ से विस्तारित होकर दीर्घकाल में जलवायु आदि के भेद से चार मुख्य रूप लेता चला गया।
न केवल रंग यहाँ चारों के सम्मिश्रित पाए जाते हैं, वरन् भारतीयों का शारीरिक गठन भी एक विलक्षणता लिए है। ऊँची दबी, गोल-लम्बी मस्तकाकृति उठी या चपटी नाक, लम्बी-ठिगनी पतली-मोटी शरीराकृति, एक्जो व एण्डोमॉर्फिक (एकहरी या दुहरी गठन वाली) आकृतियाँ भारत में पाई जाती हैं। यहाँ से अन्यत्र बस जाने पर इनके जो गुण सूत्र उस जलवायु में प्रभावी रहे, वे काकेशस, मंगोलियन, नीग्रॉइड व रेडइडियन्स के रूप में विकसित होते चले गए। अतः मूल आर्य जाति के उत्पत्ति स्थली भारत ही है, बाहर कहीं नहीं, यह स्पष्ट तथ्य एक हाथ लगता है। पाश्चात्य विद्वानों ने एक प्रकार किया कि आर्य भारत से कहीं बाहर विदेश से आकर यहाँ बसे थे। संभवतः इसके साथ दूसरी निम्न जातियों को जनजाति-आदिवासी वर्ग का बताकर वे उन्हें उच्च वर्ग के विरुद्ध उभारना चाहते थे। द्राविड़ तथा कोल, ये जो दो जातियाँ भारत में बाहर से आई बतायी जाती हैं, वस्तुतः आर्य जाति से ही उत्पन्न हुई थीं, इनकी एक शाखा जो बाहर गयी थी पुनः भारत वापस आकर यहाँ बस गयी।
भारतीय जातियों पर शोध करने वाले नृपत्व विज्ञानी श्रीनैसफील्ड लिखते हैं कि “भारत में बाहर से आए आर्य विजेता और मूल आदिम मानव (अरबोरिजिन) जैसे कोई विभाजन नहीं है। ये विभाग सर्वथा आधुनिक हैं। यहाँ तो समस्त भारतीयों में एक विलक्षण स्तर की एकता है। ब्राह्मणों से लेकर सड़क साफ करने वाले भंगियों तक की आकृति और रक्त समान है।”
मनुसंहिता (10/43-44) का एक उदाहरण है
शनकैस्तु क्रियालोपदिनाः क्षत्रिय जातयः। वृषलत्वं गता लोके ब्राह्मणा दर्शनेन च॥ पौण्ड्रकाशचौण्ड्रद्रविडाः काम्बोजाः भवनाः शकाः। पारदाः पहल्वाश्चीनाः किराताः दरदाः खशाः॥
अर्थात् “ब्राह्मणत्व की उपलब्धि को प्राप्त न होने के कारण उस क्रिया का लोप होने से पौण्ड्र, चौण्ड्र, द्राविड़ कम्बोज, भवन, शक पारद, पहल्व, चीना किरात, दरद व खश ये क्षत्रिय जातियाँ धीरे धीरे क्षुद्रत्व को प्राप्त हो गयी।” स्मरण रहे यहाँ ब्राह्मणत्व से तात्पर्य है श्रेष्ठ चिन्तन, ज्ञान का उपार्जन व श्रेष्ठ कर्म तथा क्षुद्रत्व से अर्थ है निकृष्ट चिंतन व निकृष्ट कर्म। क्षत्रिय वे जो पुरुषार्थी थे व बाहुबल से क्षेत्रों की विजय करके राज्य स्थापना हेतु बाहर जाते रहे।
मूल आर्य जाति ने उत्तराखण्ड से नीचे की भूमि में वनों को काटकर जलाकर उन्हें रहने योग्य बनाया। वहाँ नगर बसाए। इससे पूर्व वहाँ कोई निवास नहीं करता था। इस प्रकार मूल निवासी के रूप में एक ही उत्पत्ति आर्यों के रूप में हिमालय के उत्तराखण्ड क्षेत्र में हुई। वहीं से मनुष्य जाति का सारे विश्व में विस्तार हुआ। आदि मानव हिन्दू समाज था। इस प्रकार शेष सभी धर्म-मत-जातियाँ-रेस-वर्ण कालान्तर में समय प्रवाह के साथ विकसित होते चले गए भारतीय आर्षग्रन्थ ऋग्वेद केवल भारतीय आर्यों की ही नहीं, बल्कि विश्वभर के आर्यों (श्रेष्ठ मानवों) की सबसे प्राचीन पुस्तक है।
लेख के प्रारंभ में सुर असुर-अध्यात्मवादी के रूप में जो दो विभाजनों की चर्चा हमने की, वह यहाँ और स्पष्ट हो जाती है। “सुर” वे हैं जिनने ब्राह्मणत्व जिन्दा रखा व धर्मधारणा-संस्कारों आदि को जीवन में स्थान दिया। “असुर” वे जो किसी न किसी अपराध में शापित या दण्डित होकर बाहर निकाले गए व बाहर जाकर जो प्रदेश जिसे अनुकूल पड़ा उसे उनने अपना निवास बना लिया। उनकी संततियाँ होती चली गयीं व धीरे धीरे वह क्षेत्र आबाद होते चले गए। बाहर जाने वालों के साथ कोई कूलपुरोहित नहीं गया, फलतः उनके संस्कार लुप्त होते चले गए। भारत में ऋषियों ने अपौरुषेय वाणी के रूप में वेदों को जिन्दा रखा था। एक ही मंत्र के दो या तीन ऋषि मंत्रद्रष्टा बने। समय-समय पर शास्त्रों का, आर्षग्रन्थों का भाष्य होता रहा। वेदों की घनपाठ-जरापाठादि पद्धतियों के कारण ईश्वरीय ज्ञान मूल सूत्र रूप में न विस्मृत हुआ, न विकृत। किन्तु देश से बाहर जाने वाले या तो शापित आर्य थे या पुरुषार्थी योद्धा क्षत्रिय। धीरे धीरे शास्त्र व संस्कार विस्मृत होते चले जाने, धर्माचार लुप्त हो जाने से यही जातियाँ म्लेच्छ कही जाने लगीं। कभी ये भारत से बाहर सीमान्त देशों पर बसे किन्तु धीरे धीरे आर्य राजाओं द्वारा युद्ध तथा ब्राह्मणत्व प्रधान क्षत्रियों के शौर्य के कारण पराजित होते-होते ये पृथ्वी के विभिन्न क्षेत्रों में फैल गए व कालक्रम से उस जलवायु के अभ्यस्त होते हुए काले, श्वेत, लाल, पीले विकसित होते हुए विभिन्न नस्लों वाले कहलाए, मूलतः हैं सभी आर्य व सारी पृथ्वी भारत से निर्वासित क्षत्रिय कुमारों की सन्ततियों से ही भरी पूरी है, यह स्पष्ट होता है।
मनुसंहिता यही बात कहती है
एतद्देश प्रसूतस्य सकाशादग्रजन्मनः। स्वं स्वं चरित्रं शिक्षरेन पृथिव्याँ सर्वमानवः॥
किन्तु भारत से बाहर जाने के बावजूद अपने धर्म आचरण के प्रति अनुराग के कारण उनने अपने संबंध भारतवर्ष से बनाए रखे। महाभारत काल तक भारतीय नरेशों से उनके वैवाहित संबंध हुए। उनकी कन्याएँ भारत आयीं। सत्यभामा व शैब्या के प्रसंग यही बताते हैं। इस प्रकार यह सिद्ध होता है कि सारी धरती पर बसे विश्व के सारे मानव आज से पाँच सहस्र वर्ष पूर्व तक भारतीय संस्कृति के ही अनुयायी इसी की संतति थे। भारतीय दृष्टि से वे संस्कारच्यूत थे किन्तु बहुसंख्य सतत् प्रयत्नशील रहते थे कि वे भारतीय विचारधारा के संपर्क में रहें।
भारतीय नृतत्त्वविज्ञान के अन्वेषणकर्ता श्रीटेलर कहते हैं कि विश्व में ईरान की पारसी जाति और भारतवासी हिन्दू यही प्राचीनतम संस्कृतियों के उपासक मूलतः हैं। दोनों अपना निवास मूलतः हिमालय को मानते हैं। पारसी धर्म से ही क्रमशः यहूदी, ईसाई, मुसलमान धर्म विकसित हुए। बौद्धधर्म हिन्दू धर्म की ही एक शाखा है और जैन धर्म की भाँति हिन्दू धर्म से ही वह उत्पन्न हुआ है। इन सभी को मत-सम्प्रदाय कहा जाय तो उचित होगा। मूलधर्म एक ही है वैदिक धर्म-हिन्दू धर्म। पारसी धर्म इस वैदिक धर्म से ही निकला है, इस पर सभी अन्वेषक सहमत हैं। भारत से बाहर जाकर बसी एक आर्यों की शाखा पारस्य देश (फारस) में बस गयी व पारसी बनकर भारत व अन्यान्य-क्षेत्रों को गयी। फारसी में ‘स’ का उच्चारण ‘ह’ होता है अतः उन्होंने सिंधु देश को हिन्दू कहा, स्वयं को पश्चिमी हिन्दू तथा भारतीयों को पूर्वी हिन्दू कहा। अपनी नदी-नगरों के नाम भी उन्होंने संस्कृतनिष्ठ रखे। सरस्वती वहाँ हरहवती कहलाई, सरयू हरयू तथा भरत यूफरत (यूफ्रेटिस) भूपालन बेबिलोन तथा काशी कास्सी बन गए। अथर्ववेद की पैप्पलाद शाखा ही पारसी धर्म की मूल है इस तथ्य पर सभी वैदिक साहित्यकार व अन्वेषक एकमत हैं। गोपथ ब्राह्मण में शन्नों देवी इस मंत्र से अथर्ववेद पढ़ना चाहिए यह बात 1.19 मंत्र में बतायी गयी है। पारसी धर्मग्रन्थ होमयस्त के 1.24 मंत्र में यही बात कही गयी है। इस प्रकार ईसाई, इस्लाम सभी धर्म वैदिकधर्म से जन्मे, यह प्रमाणित होता है। यहाँ उद्देश्य किसी प्रकार का साम्प्रदायिक विद्वेष खड़ा करना व अपने धर्म की श्रेष्ठता बताने का नहीं, वरन् देवसंस्कृति के विराट सामाजिक रूप का परिचय देना है, जिसका मूल खोजने पर हुई शोध हमें “एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति” का संदेश देकर एक ही सत्ता को परमसत्ता मानने की प्रेरणा देती है।
नृपत्व विज्ञान से लेकर चिरपुरातन इतिहास का आमूलचूल सर्वेक्षण एक ही तथ्य प्रमाणित करता है कि आदिकालीन मानव आर्य था, वैदिकधर्म को मानता था व चिंतन चरित्र व व्यवहार की दृष्टि से श्रेष्ठ था। शक, हूण, मिस्री, यवन आदि सब हिन्दू ही थे। कालान्तर में संस्कार विहीन होने के कारण ये जातियाँ आर्यावर्त से बाहर जाती रहीं निर्वासित होती रहीं, पुनः मातृदेश लौटती रहीं। पुरातन काल में जातिच्यूत व्यक्ति को पुनः आर्य-मानव जाति का अंग बना लेना ही शुद्धि का प्रतीक था। जाति की मिथ्या परिभाषा, वर्ण जातिभेद की गलत व्याख्याएँ तथा व्यापक पैमाने पर बहिष्कार की परम्परा ने हिन्दू संस्कृति का कालान्तर में कितना नुकसान किया व आज भी विश्व मानवता के पथ पर एक अवरोध बनकर खड़ा है, इस पर सभी मानवतावादियों का मत एक है। परम पूज्य गुरुदेव ने हिन्दू संस्कृति को देवसंस्कृति कहकर उसके चिरपुरातन गौरव की ओर ध्यान दिए जाने को तो हम सबसे कहा पर साथ ही यह भी निर्देश दिया कि हमारी संस्कृति में कालक्रम के अनुसार कई विकृतियों का समावेश होता रहा है। हमें युगानुकूल संस्कृति विकसित करना है व इसे विज्ञान सम्मत, पुनः इसके शाश्वत सार्वजनीन रूप में लाकर इसके द्वारा विश्वमानवता का मार्गदर्शन करना है।
वस्तुतः समस्त भारतीय संस्कृति एक सर्वांगपूर्ण दर्शन है, उसका इतिहास एक शाश्वत जीवन दर्शन हम सबके समक्ष रखता है किन्तु यह विवेचन अध्यात्म के व्यावहारिक व युगानुकूल प्रतिपादन के रूप में जन-जन के समक्ष आए तो ही इस प्रतिपादन की सार्थकता है। हमें भारतीय संस्कृति के आदिकालीन रूप से लेकर चिरनवीन प्रसंगों तक सभी पर विवेचन करना चाहिए। यदि हम वेदों मात्र तक सीमित रह जाते हैं तो उन समृद्ध परम्पराओं की उपेक्षा करते हैं जो पिछले दो हजार वर्षों में पनपी हैं। आर्य जाति की कल्पना व आर्यावर्त की धारणा हमें उत्तर भारत (नर्मदा से ऊपर का क्षेत्र) तथा दक्षिणी भारत दो में अलग करती है जबकि दक्षिण में रहने वाली द्राविड़ जाति, जो बाद में हिन्दू संस्कृति के विकास का मुख्य केन्द्र रही मूलमानव से उपजी ही संतति थी जो दक्षिण में जाकर बस गयी। इस कथन पर कई विवाद भी खड़े हो सकते हैं व कई विद्वान अपने तर्क भिन्न-भिन्न रूपों में प्रस्तुत कर सकते हैं, पर एक सत्य शाश्वत है व हमेशा रहेगा कि जातियाँ रेस के सिद्धान्त हमारे यहाँ बाद में आए। मैथिल, गौड़, कान्यकुब्ज की तरह द्राविड़ शब्द भौगोलिक परिप्रेक्ष्य में ही समझा जाना चाहिए।
आग्नेय, द्राविड़, इन्डोयूरोपीय, किरात, आदिम मानव (अरबोरिजिन तथा आर्य इनकी परिकल्पना व प्रतिपादन शास्त्र चर्चा व मनोविलास के प्रसंग हो सकते हैं, किन्तु तथ्य यही है कि नृपत्व विज्ञान (एंथ्रापॉलाजी) एवं मानुषमिति (एंथ्रोपोमेट्री) भी अब इसी निष्कर्ष पर पहुँच रहे हैं कि प्रकृति ने भारत भूमि पर एक विलक्षण प्रयोग किया है। एक श्रेष्ठ आदिमानव व सामाजिक संस्कृति के रूप में भारतीय संस्कृति का जन्म आर्यावर्त में होना प्रमाणित हो चुका है व संस्कृति के शाश्वत तत्व जिनका आज हम प्रतिपादन करते हैं, सारी विश्वमानवता का मार्गदर्शन करने में आज भी सक्षम है।
भारतीय संस्कृति कितनी विशाल है व इस महासागर में कालक्रम से किस प्रकार भिन्न-भिन्न सभ्यताएँ व संस्कृतियाँ, मत-मतान्तर आते और समाते चले गए, इस संबंध में सभी इतिहासकार एकमत हो इसकी सहिष्णुता सामाजिकता, उदारता की भूरि भूरि प्रशंसा करते रहे हैं। कवीन्द्र रवीन्द्र ने आज से प्रायः 85 वर्ष पूर्व एक काव्य द्वारा इस भाव को अभिव्यक्त करते हुए लिखा था-
ए मोर चित्त पुण्यतीर्थ जागो रे धीरे, एई भारतेर महामानवेर सागर तीरे।
केह नहि जाने, कार आव्हाने, कत मानुषरे धारा, दुर्वार स्रोते एलो कोथाहते, समुद्रे हलो धारा।
हेथाय आर्य, हेथाय अनार्य हेथाय द्राविड़ चीन, शक हूण दल, पाठान मोगल एक देहेहलो लीन,
रणधारा वाहि जयगान गाहि, उन्माद कलरवे, भेद मरुपथ, गिरिपर्वत यारा ऐसे छिलो सबे।
तारा मोर माझे सवाई विराजे केहो नहे नहे दूर, आमार शोणिते रयेछे ध्वनित तारि विचित्र सूर।
इस बंगला कविता का भावानुवाद कविश्रेष्ठ साहित्यकार श्री रामधारी सिंह दिनकर ने हिन्दी में करते हुए अपनी पुस्तक “भारतीय संस्कृति के चार अध्याय” में लिखा है-भारत देश महा मानवता का पारावार है। ओ मेरे हृदय! इस पवित्र तीर्थ में श्रद्धा से अपनी आँखें खोलो, किसी को भी ज्ञात नहीं कि किसके आह्वान पर मनुष्यता की कितनी धाराएँ दुर्वारवेग से बहती हुई कहाँ-कहाँ से आई और इस महा समुद्र में मिलकर खो गयीं। यहाँ आर्य हैं, अनार्य हैं, यहाँ द्राविड़ और चीनी वंश के लोग हैं। शक, हूण, पठान और मुगल न जाने कितनी जाति के लोग इस देश में आये और सबके एक ही शरीर में समाकर एक हो गए। समय-समय पर जो लोग रक्त की धारा बहाते हुए एवं उन्माद-उत्साह में विजय के गीत गाते हुए रेगिस्तान को पार कर एवं पर्वतों को लाँघकर इस देश में आए थे, उनमें से किसी का भी अब अलग कोई अस्तित्व नहीं है। वे सब मेरे इस विराट शरीर में विद्यमान हैं। मुझ से कोई भी दूर नहीं है। मेरे रक्त में सबका स्वर ध्वनित-गुँजायमान हो रहा है।”
प्रस्तुत काव्य उस स्मृति व अनुभूति को ताजा बनाता आया है जो राष्ट्रीय एकात्मता के रूप में अनेकताओं में एकता वाली इस विलक्षण संस्कृति को अनेक संस्कृतियों के योग से बना हुआ मधु माना जाता है व चूँकि इसकी उत्पत्ति “आर्य” से हुई है, यह आर्य या वैदिक संस्कृति मानी जाती है। आर्य का अर्थ होता है श्रेष्ठ, यह कोई नस्ल या जाति विशेष का नाम नहीं है, जैसा कि पूर्व के दो अध्यायों में स्पष्ट किया जा चुका है। भारत वर्ष में यह भाव कभी पनपा ही नहीं कि रेस-थ्योरी या नृवंश-सिद्धान्त के अनुसार कौन हमारी जाति का है, कौन नहीं। जो इस पुण्यतोया भागीरथी के प्रवाह में जुड़ा वह गंदा नाला हो या पवित्र यमुना नदी, सभी इसमें आत्मसात् हो आर्य पुरुष कहलाये। जिसने भी भारतीय संस्कृति को अपनी संस्कृति तथा भारत को अपना देश मान लिया वह विदेशी होता हुआ भी भारतवासियों द्वारा अपने ही वंश के भटके पूर्वजों की संतति मानते हुए आत्मसात् कर लिया गया। इसीलिए भारत एक जाति का नाम नहीं है, वरन् एक विराट संस्कृति का नाम है। संस्कृति अर्थात् अनपढ़ को परिष्कृत कर उसे सुगढ़ बना देने वाली एक पद्धति।
विराट महासागर में मिलने वाले हर प्रकार का आत्मसात् हो उसी सागर की एक बूँद बन जाना, इस संस्कृति का ऐसा वैशिष्ट्यपूर्ण गुण है जो आज की विखण्डन भरी, विभिन्नताओं से भरी विश्वमानवता की विभिन्न समस्याओं का समाधान भी है, भारत में आकर जो लोग एक साथ कभी रहे उनके मत एक नहीं थे, धर्म एक नहीं थे, मान्यताएँ एक नहीं थीं भाषाएँ भी एक नहीं थीं, किन्तु कुछ बात ही ऐसी निराली है इस संस्कृति में कि विभिन्न विचारों मतों, धर्मों व संस्कृतियों में कि विभिन्न विचारों मतों, धर्मों व संस्कृतियों में पूरा सामंजस्य बैठता चला गया व विभिन्नताओं का सम्मिश्रित रूप विश्व एकता के वसुधैव कुटुम्बकम् के एक नमूने के रूप में हम सबके समक्ष है।
किसी भी संस्कृति सभ्यता, धर्म या समाज के ह्रास या पतन का एक ही कारण होता है उसमें विकृतियों का प्रवेश तथा इस कारण उसकी जीवनी शक्ति गिर जाना। जैसे किसी स्वस्थ व्यक्ति के शरीर में आहार-विहार व्यवहार के व्यतिक्रम के कारण विजातीय द्रव्य प्रविष्ट हो जायँ तो रुग्णावस्था आरंभ हो जाती है। इसी प्रकार कष्ट-पीड़ा अजीर्ण आहार ग्रहण की अक्षमता व क्रमशः स्वास्थ्य का गिरता चले जाना उसकी परिणतियाँ हैं, ठीक उसी प्रकार संस्कृति पर भी यह नियम लागू होता है। भारतीय संस्कृति के कालक्रम में क्रमशः पतन आने और विकृतियों का उसमें समावेश होने के कारण बताते हुए पाश्चात्य विद्वान व इतिहासकार यही लिखते हैं कि हिंदू समाज अच्छाइयाँ छोड़ता रहा व वर्ण-जाति भेद से लेकर अछूत समस्या नारी समस्या, शुद्धि समस्या जैसी कई समस्याओं को पैदा करके अपने लिए इसने पतन की राह चुन ली। औरों को स्वीकार करने की परम्परा जो देव संस्कृति में थी वह कालान्तर में नष्ट हो गयी तथा जाति बहिष्कार जैसी परम्परा से भी उसने काफी नुकसान उठाया ऐसा पाश्चात्यविदों का मत है। वे लिखते हैं कि यही कारण है कि आक्रान्ताओं ने प्राकृतिक विशेषताओं से भरे पूरे, धन-धान्य से भरे आदि सभ्यता व ज्ञान के केन्द्र इस राष्ट्र को भली-भाँति रौंदा। विगत दो हजार वर्षों की गुलामी का अंधकार भरा इतिहास वे साक्षी के रूप में सामने रखते हैं जिसमें भारतवर्ष राजनैतिक दृष्टि से ही नहीं, सोऽहम् दृष्टि से भी गुलाम होता चला गया व इसके आध्यात्मिक तत्त्वदर्शन में ऐसी विकृतियाँ समाहित होती चली गयीं जिनने जनमानस को दिग्भ्रमित ही किया। भाग्यवाद, ईश्वरेच्छा ही सर्वोपरि, पुरुषार्थहीनता, अकर्मण्यवाद पलायनवाद, मायावाद कर्म-संन्यास जैसे तत्वों ने जनमानस को मूर्च्छित और कायर बना दिया। कालान्तर में अंग्रेजी शिक्षा के साथ पाश्चात्य सभ्यता भी यहाँ आई व यहाँ के लोग अपने गौरवपूर्ण अतीत को भूलकर उस भोगपरायण दर्शन को अपनाने लगे जिससे आज सारा पश्चिम दुखी है। आलोचक तो यहाँ तक भी कहते हैं कि भारतीय संस्कृति की कमजोरियों ने ही भारत को दुर्बल बना दिया व इसी कारण विदेशी आक्रान्ता इस राष्ट्र पर आधिपत्य कर सके।
उत्थान-पतन-उत्थान क्रम के इस इतिहास में सभी मतों-आलोचनाओं का अध्ययन करने के उपरान्त हम निष्पक्ष चिन्तन करें तो कुछ निष्कर्ष सामने आते हैं। प्रागैतिहासिक काल से अब तक विचार करें तो हम पाते हैं कि आर्य संस्कृति से लेकर अब तक अनेकानेक उन्नत संस्कृतियाँ, सभ्यताएँ विकसित हुई, रोम, मिश्र, यूनान की संस्कृतियाँ कभी उन्नति के चरम शिखर तक जा पहुँची थीं किन्तु क्या कारण है कि उनका आज नाम भी शेष नहीं है और सबसे प्राचीन होते हुए भी भारतीय संस्कृति अब तक अपना अस्तित्व बनाए हुए है? विधर्मी विदेशी संस्कृतियों के संघर्ष में वह क्षीण-दुर्बल अवश्य हुई किन्तु उसकी भित्तियाँ, नींव दृढ़ बने रहे। क्या कारण है कि विदेशी संस्कृतियाँ एक ही थपेड़े में अस्त-व्यस्त हो गयीं तथा दूसरी ओर हिंदू संस्कृति अपनों को अपनी मूलसत्ता से पृथक कर पूरे विश्व भर में उनके अनुदान वितरित करती रही अनेकानेक आचारों-संस्कृतियों को जन्म देती रहीं किन्तु समूल नष्ट नहीं हुई जन बल घटता चला गया, फिर भी देव संस्कृति कोटि-कोटि वर्षों के संघर्षों के बाद भी जीवित है। इस विषमता के मूल में कौन सा नियम काम कर रहा है?
एक विशेषता जो सबसे बड़ी हम पाते हैं, वह है अपने शब्द के भाव के अनुरूप संस्कृति के साथ परिष्कृति की भावना। ‘कल्चर’ शब्द सही मायने में मात्र भारतीय संस्कृति पर लागू होता है क्योंकि इसका अर्थ होता है निरन्तर परिष्कार-अनगढ़ता को सुगढ़ता में बदलने का प्रयास। शेष सभी कालान्तर में जन्मी तथाकथित संस्कृतियाँ तो सभ्यताएँ (सिविलाइजेशन) ही कही जानी चाहिए क्योंकि उनमें यह गुण नहीं था। इसी गुण के अभाव के कारण परिस्थितियों के संघर्ष में पाश्चात्य सभ्यताएँ रुग्ण-विकृत होकर नष्ट होती रहीं। स्वार्थों के संघर्ष में वे समाप्त हो गयीं। अपनी जीवनी शक्ति को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए भारतीय संस्कृति ने अनुयायियों की संख्या बढ़ाने की अपेक्षा, भीड़ बढ़ाने की अपेक्षा, परिष्कार पर अधिक ध्यान दिया। यही कारण है कि उसका अस्तित्व सुरक्षित रहा। विकृत तत्व बहिष्कृत होते रहे, संस्कारच्यूत होने के कारण बाहर जाते रहे किन्तु मूल चिंतन जो अध्यात्मवादी था, व्यक्ति की बहिर्मुखी नहीं अंतर्मुखी वृत्ति के विकास एवं आत्मसत्ता की सर्वांगपूर्ण प्रगति पर निर्भर था हिन्दू संस्कृति देवसंस्कृति का प्राण बना रहा। जब से यह चिन्तन बदला व यह माना जाने लगा कि भोगवाद ही प्रधान है, आध्यात्मिक नहीं। आधिभौतिक प्रगति ही सब कुछ है, तब से ही भारत की अंधकार-युग आरंभ हुआ मानना चाहिए। जो भारत अर्ध संस्कृत-हिंसक-आक्रान्ताओं द्वारा पराजित हुआ, वह विलासी भारत था। इतिहास के पृष्ठो का विवेचन यही बताता है।
आत्म समीक्षा तो करना चाहिए व यह भी देखना चाहिए कि कालक्रम में जो कमियाँ आयीं उनसे कैसे जूझा जाना चाहिए था? नहीं यह किया गया तो विकासक्रम कैसे अवरुद्ध हुआ? यहाँ तक तो ठीक है परन्तु संस्कृति के शाश्वत चिरन्तन सत्य की उपेक्षा कर यदि एक ही पक्ष पर दोष निरन्तर लगाया जाता रहे तो वह पक्षपातपूर्ण चिंतन होगा। कहा जाता है कि जाति से बहिष्कृत, समाज से बहिष्कृत, संस्कृति से बहिष्कृत, करने की आदिकालीन परम्परा ने आज हिन्दू संस्कृति का ह्रास किया है। यदि यह सच होता तो इतने मत-मतान्तर इतने संप्रदाय, परस्पर विरोधी दर्शन, धार्मिक मान्यताएँ, रीतिरिवाज, भाषाएँ यहाँ एक साथ नहीं पनपी होतीं, बहिष्कार किया गया था हीनवृति का, विकृत तत्वों का, न कि जाति का या व्यक्तियों का। जब तक संस्कृति धर्मपरायण रही आध्यात्मिक रही, वह हर विचारधारा को अपने अंदर समाहित करती रही, देव संस्कृति में युगधर्म, वर्णधर्म, आश्रमधर्म के साथ आपधर्म का भी विधान है। अवश्य ही इन निश्चित धर्मों का ठीक पालन न करने से भी संस्कृति में विकार आया है। वर्णाश्रम धर्म की व्याख्या भी वह नहीं है जो चिर-प्रचलित है वरन् बड़ी क्राँतिकारी व प्रगतिशील है। इसकी चर्चा उपयुक्त स्थान पर की जा रही है। यहाँ तो विवेचन संस्कृति की मात्रा का हो रहा है।
तो अब समस्या का समाधान क्या हो? एक ही समाधान है, वह है देवसंस्कृति के निर्धारणों से भारतभूमि में रहने वाले, इसके प्रभाव क्षेत्र में बसने वाले, तथा इस भूल से बाहर गए लोगों को भली-भाँति अवगत कराना तथा उनमें सोऽहम् गौरव-अभियान की भावना का संचार करना। कोई किसी भी धर्म को माने, मान्यता को माने, संप्रदाय के बताए पथ पर चले परन्तु सोऽहम् चिंतन सबका सार्वभौम सनातन एक ही होना चाहिए। आज संस्कृति के नाम पर समाज व शासन द्वारा मात्र नृत्य, संगीत अभिनय, उछलकूद, चित्रकला, मूर्तिकला, स्थापत्य व काव्यकला को ही उसका पर्याय मानकर उनकी चिन्ह पूजा होती रही है। जबकि संस्कृति का यह एक प्रतिशत से भी कम पक्ष है। संस्कृति इससे भी बड़ी विराट स्तर की वस्तु है, जिसे दैनन्दिन जीवन में, क्रियाकलापों में, हमारी आस्थाओं में स्थान मिलना चाहिए, विज्ञान व अध्यात्म हमारी संस्कृति के झण्डे तले एक साथ कदम से कदम मिलाकर चलते हैं। इससे बड़ी स्थापना देव संस्कृति की क्या हो सकती है कि वह प्रगतिशील विज्ञान सम्मत धर्म को विश्वधर्म बनाकर आज साम्प्रदायिकता व धार्मिक उन्मादभरी परिस्थितियों का हल सुझाने में पूर्णतः सक्षम है।
प्रागैतिहासिक या वैदिककाल से लेकर बुद्ध के समय तक, बुद्ध से लेकर आद्यशंकराचार्य तक, तथा आचार्य शंकर से लेकर आज तक भारतीय संस्कृति के तीन अध्याय भली भाँति तीन विकासक्रमों-सोपानों के रूप में देखे जा सकते हैं, प्रत्येक में देवसंस्कृति ने कुछ खोया व पाया है किन्तु मूलतत्त्व अक्षुण्ण बना हुआ है व वही उसके अस्तित्व का, सनातनता का मूल कारण है। परिव्राजक परम्परा का पुनर्जीवन कर, ब्राह्मणत्व के विस्तार द्वारा ब्रह्मनिष्ठ-समाज को समर्पित, लोकसेवी, आत्माओं का उत्पादन करने की प्रक्रिया एक संगठन ने इस शताब्दी में आरंभ की व उसके संस्थापक संस्कृति पुरुष परमपूज्य गुरुदेव का ही पुरुषार्थ है कि आज देव संस्कृति का संदेश भारतभूमि के कोने-कोने तथा विश्व मनीषा तक पहुँच रहा है। महात्मा बुद्ध से लेकर आद्यशंकर तथा परशुरामजी से लेकर स्वामी विवेकानन्द तक पुष्पित पल्लवित होती चली आ रही धर्मतंत्र से लोकशिक्षण की-समाज-राष्ट्र के पुनर्जीवन की तथा आस्था संकट की विभीषिका से मोर्चा लेने की यह पुण्य प्रक्रिया युग निर्माण योजना-प्रज्ञा अभियान शान्तिकुञ्ज की युगान्तरीय चेतना के माध्यम से अब विराट रूप ले रही है तथा सतयुग की वापसी का उज्ज्वल भविष्य का आश्वासन दे रही है तो इसके मूल में देव संस्कृति की शाश्वतता-सनातनता ही है। योगीराज अरविन्द ने जिस अतिमानस के अवतरण की व स्वर्ग के भूमि पर उतरने की बात कही है, वह समय यही है जब चारों ओर प्रतीक लताओं से अनास्था की विडम्बना से संघर्ष छिड़ा हुआ है व व्यक्ति उत्कृष्टता की ओर उन्मुख दिखाई दे रहा है। नवयुग आएगा तो उसकी आधार शिला देवसंस्कृति, श्रेष्ठ निर्धारणों पर ही रखी जाएगी यह सुनिश्चित है।
‘हम कहाँ जा रहे हैं? सभी के मन में यही प्रश्न था। उनके मुख सूख गए थे। वे दुर्दान्त, निसर्गतः क्रूर दस्यु जिन्होंने कभी किसी की करुण प्रार्थना एवं आर्त चीत्कार पर दया नहीं दिखाई, आज इस समय बार-बार पुकार रहे थे या खुदा या अल्लाह!
दस्युपोत था वह। उन्होंने रात्रि के अन्धकार में सौराष्ट्र के छोटे ग्राम पर आक्रमण किया। बड़ी निराशा हुई उन्हें। पता नहीं कैसे उनके आक्रमण का अनुमान गाँव वालों ने कर लिया था। पूरा गाँव जनशून्य मिला था उन्हें भवनों के द्वार खुले पड़े थे। न सामग्री हाथ लगी न पशु और न मनुष्य ही। अपनी असफलता के कारण वे चिढ़ उठे।
‘कोई बड़ा मगर आ रहा है!’ एक दस्यु जो पोत पर निरीक्षण के लिए था, दौड़ा आया। ‘मगर’ यह उनका सांकेतिक शब्द था। इसका अर्थ था कि उनके पोत को नष्ट करने में समर्थ कोई युद्ध पोत आ रहा है।
“मगर!” दस्युओं में भय फैला। बड़ी-बड़ी काली दाढ़ी भयंकर नेत्र, यमदूतों सी शकल-सूरत वाले वे किन्तु जो जितना क्रूर है उतना ही डरपोक होता है। समाचार इतना ही था ‘दूर लहरों में एक बड़ी रोशनी इधर आती लगती है।’ परन्तु वे भाग रहे थे।
“फूँक दो ये मकान।” एक ने मशाल उठाई।
‘बेवकूफी मत कर।’ सरदार ने डाँटा इनकी रोशनी समुंदर में दूर तक हम लोगों को रोशन करती रहेगी और जानता नहीं क्या, सोरठी मगर कितने खूँखार होते हैं?’
‘रणछोड़राय की जय! दस्यु जब भागे जा रहे थे, गाँव के बाहर एक झोपड़ी में से उन्हें यह ध्वनि सुनाई पड़ी। रात के अँधेरे में यह झोपड़ी उन्हें दीखी नहीं थी।
‘एक केकड़ा ही सही।’ दो चार एक साथ घुस पड़े झोपड़ी में। केवल एक अधेड़ साधु मिले उनको। साधु की झोंपड़ी में तूबा कौपीन छोड़कर और होना ही क्या था? दस्युओं ने ठोकर मारकर जल का घड़ा लुढ़का दिया पटककर तूँबा फोड़ दिया और साधु को घसीट ले चले। क्रोध के आवेग में और सच कहा जाय तो युद्ध पोत के आ धमकने के भय से वे सोच नहीं सके थे कि इस साधु को वे क्यों लिए जा रहे हैं और उसका क्या करेंगे? वे सबके सब डाँड सम्हाल कर बैठ गए थे। उन्हें युद्ध पोत के आने के पूर्व दूर निकल भागने की जल्दी पड़ी थी।
जलदस्यु समुद्र में मार्ग नहीं भूला करते। पर ‘आसमानी आफत’ का कोई रास्ता उनके पास नहीं था। वे तट से दूर समुद्र में पहुँचे और तूफान की भयंकर हरहराहट उनके कानों में पड़ी। किसी तरह तूफान गुजर जाए यही सबकी चिंता थी। घबराहट की इन धड़कनों के साथ ही रात का अँधेरा अरुणोदय के झुटपुटे में बदल गया। उन सबने देखा कि वे जिसे पकड़ लाए हैं, वह भारतीय साधु हिलते-डुलते पोत में एक तख्ते पर शान्त बैठा था। वह इतना स्थिर इतना शान्त था कि पोत में वह है यह बात ही दस्यु भूल चुके थे। अब वह हिला है और उठकर लहरों से एक चुल्लू पानी लेने की फिराक में है।
साधु को इसकी कोई चिन्ता नहीं जान पड़ती थी कि वह इन यमदूतों के बीच हैं पोत अब भी बुरी तरह उछल रहा है इसकी भी उसे फिक्र नहीं थी । उसके मुख पर न भय के चिन्ह थे और न खेद के। वह एक हाथ से पोत का किनारा पकड़कर दूसरे हाथ से उत्ताल तरंगों में से एक-एक चुल्लू जल लेकर मुख धो रहा था। साधु को समुद्र के जल से आचमन करते देख दस्युओं को कौतूहल हुआ।
साधु ने संध्या की और सागर की लहरों से उठते भगवान भास्कर को अर्घ्य अर्पित किया। पोत में खड़े होना सम्भव न होने के कारण वे बैठकर प्रार्थना करने लगे ‘विश्वानिदेव सवितुर्दुरितानि परासुव..........।’
“यह तो इबादत कर रहा है खुदा की इबादत!” सरदार ने साथियों की ओर देखा।
दूसरा दस्यु चिढ़ उठा “आफ़ताब है इसका खुदा!” और भाला उठाया उसने।
‘तुम मेरे सामने हथियार उठाने की जुर्रत करते हो?’ सरदार चिढ़ उठा, उसके नेत्र जलने लगे। अपनी भारी तलवार उसने खींची “रात को कहाँ था आफ़ताब? वह पूरी रात परस्तिश करता रहा है और कौन जानता है कि खुदा ने उसी की दुआ कुबूल करके हमें बचाया नहीं है?” सरदार आगे बोला, मैं नहीं चाहता कि वह कत्ल किया जाय।” सरदार ने स्वर को नरम करके कहा “कुल घण्टे भर में हम मौत के जजीरे के पास पहुँच रहे हैं। वहाँ इसे उतार देंगे।”
मौत का जजीरे महाद्वीप अफ्रीका के समीप का वह घने वनों से आच्छादित द्वीप। जलपोत उसके तट से दूर ही रहने की कोशिश करते थे। उस पर रहने वाले वन्य मानव इतने भयानक थे कि उनका दर्शन न होना ही ठीक, चुटकी बजाते वह बिल में से चींटियों के समान वन में से ढेर निकल पड़ते हैं। अपनी वृक्ष नौकाएँ वे पाँच-सात हाथों पर उठाए दौड़े आते हैं और समुद्र में एक बार उनकी नौका छूट गई तट के मील भर का क्षेत्र तो उनके लिए भूमि पर दौड़ने जैसा क्षेत्र है। उनके अचूक निशाने उनके हाथ के फेंके भाले लक्ष्य चूकना जानते ही नहीं । आरण्य सुपुष्ट दैत्याकार ये दस्यु भी इन कौपीनधारी, काले रंग के मोटे होठ और रूखे घुँघराले बालों वाले वन्यमानवों से दूर रहने में कुशल मानते हैं।
दस्युपोत महाद्वीप के पास नहीं गया। उपद्वीप से भी दूर घूमता रहा। वह जैसे कुछ प्रतीक्षा कर रहा था। सहसा उस उपद्वीप की हरियाली में हल चल हुई। कुछ आकृतियाँ रेंगती दिखाई पड़ी फिर तो चिचियारी का कोलाहल समुद्र की लहरों पर गूँजने लगा।
“जल्दी फेंक दो इसे। वे आ रहे हैं। पास आ गए तो समझो कयामत आ गई।” दस्यु सरदार ने लहरों के ऊपर दूर तैरती काली-काली नौकाएँ देख ली थी। जैसे बड़े-बड़े मगर मुख फाड़े बढ़े आ रहे हों।
मेहरबान! अब इन लोगों का मेहमान बनना है जनाब को।” दो दस्युओं ने पकड़कर उठाया साधु को और अट्टहास करके फेंक दिया समुद्र में।
‘या खुदा! सरदार ने सिर पर हाथ दे मारा। कई नौकाएँ एक बड़ी लहर के पीछे से ऊपर आयीं एक साथ। अब उन पर खड़े चीत्कार करते वन्यमानव स्पष्ट देखे जा रहे थे। चिल्लाया-सरदार “फुर्ती! उठाओ! मौत दौड़ी आ रही है! मौत!!”
एक दो चार-पचीसों नौकाएँ बढ़ी आ रही थीं। पोत इन नौकाओं के समान शीघ्रगामी कैसे हो सकता है और समुद्र अभी शान्त हुआ नहीं है। दस्यु प्राण पर खेलकर डाँड चला रहे थे।
‘ओह! सबसे आगे की नौका पर खड़े एक काले पुरुष ने हाथ उठाया। उस हाथ के साथ अनेकों हाथ उठे-खट-खट-खट बराबर भाले दस्युओं या पोत पर पड़ने लगे थे। दस्यु लुढ़कने लगे। पोत नौकाओं से घिर गया। भागने की चेष्टा व्यर्थ समझ दस्यु सरदार सागर में कूद पड़ा, इतने वन्य मानवों से युद्ध की बात तो सोची भी नहीं जा सकती।
सरदार जब सचेतन हुआ तब तक परिदृश्य बदल चुका था। उसने देखा कि वही साधु उसके ऊपर झुके कुछ पूछ रहे थे। परन्तु अभी वह कुछ बोल सके, ऐसी दशा में नहीं था। मस्तक में भयंकर पीड़ा हो रही थी, तनिक सिर घुमाकर वह उल्टी करने लगा। पेट में से समुद्र का पानी निकल आने पर उसे कुछ शान्ति मिली।
‘बहुत थोड़ी चोट लगी। सिर चट्टान से टकरा गया लगता है, परन्तु रक्त अब बन्द हो गया है।’ साधु पास बैठे उसका सिर सहला रहे थे।
‘हुजूर की मेहरबानी!’ वह अत्यन्त दीन स्वर में बोला आँखों से आँसू बह चले ‘मुझे हुजूर माफी दें। खुदा के बन्दे हैं हुजूर !” उसे साधु के आत्मीय बर्ताव को देखकर और अपने व्यवहार की याद कर आश्चर्य हो रहा था।
‘उसके आश्चर्य को भाँपते हुए साधु बोले “मेरी संस्कृति ने मुझे प्रेम करना सिखाया है, मुझे यह बताया है कि भगवान सभी में और सभी स्थानों पर है। प्रेम और सेवा उनकी आराधना है।” दस्यु सरदार हतप्रभ हो सुन रहा था। दोनों तट के समीप वृक्ष के पास जा कर बैठ गए। दूर से आवाजें आ रही थीं वन्य मानव अन्य दस्युओं के साथ क्या व्यवहार कर रहे होंगे-यह सोच कर ही सरदार काँप उठा।
“आइए भगवन्!” पेड़ का छाया में बैठे अभी आधा घण्टा भी नहीं हुआ था कि सामने की झाड़ी से दो नेत्र चमक उठे। दस्यु का चेहरा भय से पीला पड़ गया। पर साधु ने तो उसे ऐसे बुलाया जैसे किसी सामान्य अतिथि का बुला रहा हो।
सचमुच झाड़ी में से सिंह निकला और साधु के पास आकर बैठ गया। उसने अपना मुख उनके पैरों पर रख दिया। एक पालतू कुत्ते के समान अपनी पूँछ हिला रहा था और उसकी आँखें अधमुँदी हो रही थीं।
“हुजूर करिश्मा कर सकते हैं हुजूर आफ़ताब
की इबादत करते थे और अब शेर को खुदा कह रहे हैं।” दस्यु की समझ में कुछ नहीं आया था, पर उसका भय दूर हो गया था।
“तो आप समझते हैं कि खुदा हर जगह और हर वस्तु में नहीं है?” साधु ने देखा दस्यु की ओर।
‘वे आ गए उनमें भी खुदा।” दस्यु का स्वर भय से बन्द हो गया। झाड़ियों के पीछे कुछ काली आकृतियाँ उसने देख ली थीं जो इधर-उधर हिल रही थीं। पता नहीं क्या हुआ एक चिचियारी गूँजी और शान्ति फैल गई। कुछ क्षण ऐसा लगा कि वन्य मानवों को समूह घने वन में लताओं के पीछे जमा हो रहा है और तब तीन-चार व्यक्ति धीरे-धीरे एक ओर से बाहर आये।
कुछ पुकार कर कहा उन लोगों ने एक साथ पूरी भीड़ वन के पीछे से निकल आयी वन्य मानव भूमि पर लेटकर साधु को प्रणाम करते थे।
“वे कहते हैं कि आप वन के देवता हैं या उनके दूत?” दस्यु ने होंठ हिलाकर बिना शब्द किये एक वृद्ध से संकेत की भाषा में बातें प्रारम्भ कर दीं।
“देवताओं का आराधक!” साधु का उत्तर सुनकर वे वन्य मानव नृत्य करने लगे। सिंह की उपस्थिति वे भूल ही गए। उन्होंने साधु से प्रार्थना की कि वे उनके ग्राम को पधारकर पवित्र करें। साधु ने वहीं निश्चय किया कि वे वहीं रुककर इन्हें सुसंस्कृत बनाएँगे। दस्यु सरदार ने हतप्रभ होकर पूछा?” साधु हँसकर बोले “भारत की संस्कृति की यही विशेषता है इसका शिक्षण तलवार और अधिकार से नहीं प्रेम और आत्मीयता के भाव स्पन्दनों से होता है। व्यक्तित्व की समर्थ भाषा से ही इसकी अभिव्यक्ति सम्भव है।”
भगवान मनु के आदेश “स्वे स्वे आचरण शिक्षण को अपने जीवन काव्य से ध्वनित करने वाले मेधातिथि नामक इन साधु को जिक्र नृपत्व विज्ञानी डारेल हफ ने अपने ग्रन्थ ‘एन एन्थ्रोपोलिजकल अप्रोच टू काँगों में मेडागाफ्र नाम से किया है। श्री हफ के अनुसार काँगो कबीलों की सूर्य उपासना का अपभ्रंश स्वरूप भी इन्हीं भारतीय साधु की देन है।
मानव सृष्टि की गौरवमयी अभिव्यक्ति है तथा उसे ईश्वरीय सत्ता के प्रतिनिधि के रूप में देवसंस्कृति में वर्णित किया गया है। जीवधारी तो अनेक हैं, अनेकानेक प्रकार के हैं किन्तु उनमें भी मनुष्य का स्थान सर्वोपरि है। क्योंकि वही एक ऐसा प्राणी है जो विवेक बुद्धि से समन्वित है तथा ज्ञान-गरिमा का अधिकारी पात्र है। महाभारत के शांतिपर्व में ऋषि कहते हैं-
“गुह्यं ब्रह्म तदिदं ब्रवीमि, न मानुषात्श्रेष्ठतरं हि किंचित।” अर्थात् “ब्रह्म का रहस्य यही है कि सृष्टि में मानव ही सर्वश्रेष्ठ है।” (महा.शाँ. प. 180/12)
यह देव संस्कृति की एक महत्वपूर्ण स्थापना है, जो हमें अन्यान्य किसी मत-संस्कृति-धर्म संप्रदाय में देखने को नहीं मिलती। अन्य सभी मतावलम्बियों का यह मानना है कि मनुष्य का विकास एक सीमा तक ही संभव है, वह पैगम्बर देवदूत तो बन सकता है, पर भगवान नहीं बन सकता। किन्तु हमारी संस्कृति कहती है जीवों ब्रह्मैव नापरः” जीव की मनुष्य की सामर्थ्य अंतर्निहित शक्ति उसे ब्रह्म की परम सत्ता के समकक्ष बना देती है। कितना अद्भुत व विलक्षण यह चिन्तन है जो मनुष्य को सतत् पुरुषार्थ परायण बनाते हुए उसे लक्ष्य तक पहुँचने के लिए सदा प्रेरित करता रहता है।
श्रीमद्भागवत में एक आख्यायिका आती है जिसमें व्याख्या की गयी है कि जगतरचयिता परब्रह्म ने पुरुष शरीर को सर्वाधिक प्रिय मानते हुए अपने लिए बनाया है। कहा जाता है कि प्रजापति ब्रह्मा जब अपने को कृतकृत्य जैसा समझ कर बड़े ही प्रसन्न थे, तब सारी सृष्टि के निर्माण के अंत में, अपने श्रेष्ठतम युवराज के रूप में उन्होंने अपने मन की सत्ता से अर्थात् मनःशक्ति से विश्व की अभिवृद्धि करने वाले मनुओं को रचकर उन्हें अपना वह पुरुषाकार शरीर दे दिया (स्वीयं पुरं पुरुषं) । उनसे पहले उत्पन्न देव, गंधर्व आदि सभी ने मिलकर हर्षपूर्वक ब्रह्मदेव को नमन कर धन्यवाद दिया व कहा कि-देव आपकी यह रचना सर्वश्रेष्ठ है। इससे उत्कृष्ट रचना कोई और नहीं हो सकती। इस नर देह में प्राणियों के अभ्युदय (अभितः उदभ्-सब तरह से आगे बढ़ना) तथा निःश्रेयस (निश्चितं श्रेयं निः श्रेयसम अर्थात् जिससे बढ़ कर कोई उत्तम फल न हो) के समस्त साधन विद्यमान हैं। अतः इसकी सहायता से हम सब देवता भी अपनी सूक्ष्म हवि ग्रहण कर संतुष्ट होते रहेंगे।” इस कथा का भाव यह है कि देवों, गंधर्वों तक को मानव शरीर हुए उसके माध्यम से सिद्धि हस्तगत करते हैं। अतः “सुरदुर्लभ मानुस तन पावा” की उक्ति नितान्त सत्य है व हर मनुष्य के लिए मानव जन्म एक गौरव का विषय है।
“मनोः अपत्यं मानवः” इस व्युत्पत्ति के अनुसार हम सभी पुरुष मनुओं से जन्मे मानव या पुरुष कहलाते हैं, इसी मानव के संबंध में पास्कल का मत है कि मनुष्य ही इस संसार का सर्वश्रेष्ठ बौद्धिकजीव है। तो ऐतरेय उपनिषद् का रचयिता कहता है-यह पुरुष परमात्मा का प्रकाश स्थान है, इसमें परमात्मा प्रकाशित होता है। मानव शरीर में आत्मा का आविर्भाव इतर सभी प्राणियों से अधिक है। उसमें ज्ञान भी है और प्रज्ञान भी-पुरुषे चा विस्तरात्मा। सहि प्रज्ञानेन संपन्नतमः, विज्ञातं वदति विज्ञातं पश्यति।” वस्तुतः मनुष्य में ज्ञान के विकास की विलक्षणता व असीम संभावनाओं को देखकर ही परमात्मसत्ता पुरुष देह को सबसे अधिक प्रिय मानती है। इस तथ्य को भगवान कृष्ण ने इस तरह का है-
“बह्वः सन्ति पुरः स्रष्टस्तासाँ में पौरुषी प्रिया।” मैंने अनेक प्रकार के शरीरों का निर्माण किया किन्तु मुझे सबसे अधिक प्रिय यह मनुष्य शरीर है”। (श्रीमद्भाग.11−7−22) शतपथ ब्राह्मण एक और स्थान पर कहता है “पुरुषौ वै प्रजापतेन्नैदिष्ठम्” (2/5/1/1) अर्थात् “नर ही नारायण के सर्वाधिक समीप है।” बाइबिल में जेनेसिस अध्याय में स्थान-स्थान पर कहा गया है कि इस संसार में मनुष्य ही परमसत्ता का साकार रूप है (1/2,6/27, 5/1, 5/6) तथा कुरान की आयतें (सूरा 2 व 35/35 कहती हैं कि मनुष्य पृथ्वी पर अल्लाह का प्रतिनिधि है तथा उसे अल्लाह ने श्रेष्ठ आकार का बनाया है।
मनुष्य जन्म भारतीय संस्कृति के चिन्तन के अनुसार चौरासी लाख योनियों में भटकने के बाद मिलता है। वह भी प्राकृतिक विधान से व सौभाग्यवश। आचार्य शंकर कहते हैं कि तीन अतिदुर्लभ पदार्थों, मनुष्यत्व, मुमुक्षत्व रूस महापुरुसंश्रय में सर्वप्रथम मनुष्यत्व ही प्रधान है (सौंदर्य लहरी)।
मनुष्य जन्म मिला व प्रमाद में, भोग में गँवा दिया तो इससे बड़ी अदूरदर्शिता क्या कही जा सकती है? इसीलिए तीर्थंकर महावीर कहते हैं-गाढ़ा या विवाग कम्मुणो संयम गोयम मा पमाय ए” अर्थात् “कर्मों के फल बड़े प्रगाढ़ तीव्र होते हैं। इसलिए हे जीव, क्षणभर के लिए भी तू प्रमाद न कर” (उत्तराध्यन सूत्र 10-4)। इसी कारण देवी भागवत में ऋषि कहते हैं-
दुर्लभो मानुषो देहो देहिनाँ क्षण भंगुरः। तस्मिन प्राप्ते तु कर्तत्वयं सर्वथै वा ऽऽत्मसाधनम्॥
अर्थात्-
इस अस्थिर एवं अनित्य मानव देह को पा करके इसके द्वारा नित्य, शाश्वत सत्य तत्व को जानने का प्रयास कर आत्मकल्याण की प्राप्ति करना चाहिए। यह मनुष्य जन्म का प्रमुख कर्तव्य है।”
इस समग्र शास्त्र चर्चा का आशय यही है कि मनुष्य जन्म किन्हीं उद्देश्य विशेषों के लिए पुरुषार्थ करने के निमित्त मिला है तो मनुष्य को उनमें स्वयं को नियोजित कर अपनी जीवन यात्रा सफल बनानी चाहिए। श्रुति कहती है कि यदि यही मनुष्य अपना आपा मात्र देह ही मानता है, देह के अनुकूल ही उसकी खानपान में रुचि होती है, उसे ही पुरुषार्थ मानता है तो वह लौकिक जीवन जीकर बिना लक्ष्य सिद्धि के चला जाता है। दूसरी ओर जो आत्मसत्ता को देहादि से परे, नित्य सत्ता तथा परलोक में आने जाने वाली मानता है तो पारलौकिक पुरुषार्थ में उसकी रुचि बढ़ती है, वह तदनुसार जीवन बंधनों से मुक्ति पाता हुआ चरम लक्ष्य को प्राप्त होता है। अपने-अपने अभिमान चिंतन-लक्ष्य निर्धारण के अनुरूप ही मनुष्य अपना पुरुषार्थ चुनता है। मनुष्य का यह पुरुषार्थ पक्ष व तत्संबंधी मार्गदर्शन ही भारतीय संस्कृति का आधार स्तंभ है। पाश्चात्य भोगवाद देह को प्रमुख मानता है अतः वहाँ वह पुरुषार्थ प्रधान है व पूर्वार्त्य रहस्यवादी अध्यात्म पारलौकिक जीवन व उसके लिए की गयी प्रगति को वरीयता देता है, अतः उसके अनुवर्तियों का प्रधान पुरुषार्थ यह है। देखा जाय तो पूरी जगती पर बहुसंख्य व्यक्तियों का जीवन भर का पुरुषार्थ देहादि बंधनों से परे नहीं जा पाता। जो मुक्त होने का प्रयास करता है, वह मोक्ष को प्राप्त करता हुआ पुरुषार्थ चतुष्टय की सिद्धि करता है। क्या हैं ये पुरुषार्थ चतुष्टय? देव संस्कृति के ये चार प्रमुख आधार हैं, जिन पर सारा अध्यात्मदर्शन टिका हुआ है।
ये चार आधार स्तम्भ हैं धर्म, अर्थ, काम एवं
मोक्ष। ये चारों ही मानव की जीवन यात्रा की परमावश्यक अनिवार्यताएँ हैं। इनके बिना जीवन का प्रगति-रथ अपनी यात्रा पूरी नहीं कर पाता। पुरुषार्थ में ईश्वरीय सत्ता के प्रतिनिधि मनुष्य की प्रवृत्ति सुख के लिए होती है। जीवमात्र सुख की ही कामना करता है, वही उसे अभीष्ट है अतः यह सही भी है। सुख दो प्रकार के हैं-विषय-सुख ज्ञानेन्द्रियों, कर्मेन्द्रियों से संपर्क होने पर जो दुखमिश्रित अस्थायी सुख प्राप्त हो वह विषय सुख तथा इनसे थककर स्वयं को शरीर न मानकर सांसारिक विषय वासनाओं से रहित होकर आत्मिक उल्लास की स्थिति कहलाती है-ब्रह्मानन्द आत्मसुख। इस प्रकार व्यक्ति के द्वारा वाँछित चाहे गए दो ही मूल प्रयोजन या लक्ष्य हैं-(1) काम और (2) मोक्ष। इन दोनों ही पुरुषार्थों की प्राप्ति के लिए दो ही साधन हैं (1) अर्थ और (2) धर्म। दो साध्य व दो साधन रूपी जोड़ों को मिला देने से बनता है पुरुषार्थ चतुष्टय-हर व्यक्ति की जीवन यात्रा के वे महत्वपूर्ण अंग जिनसे वह लक्ष्य सिद्धि की ओर बढ़ता है। ये चारों ही मनुष्य जीवन के मुख्य उद्देश्य हैं। कोई मनुष्य ‘अर्थ’ अर्थात् धन प्राप्ति हेतु पुरुषार्थ करते हैं तो कोई काम को अर्थात् सुख को चाहते हैं और कोई इन दोनों के मूल अर्थात् धर्म को चाहते हैं। ‘धर्म’ की प्राप्ति के पश्चात् अर्थ व काम तो स्वतः सिद्ध हो जाते हैं। इन तीनों ही वर्गों का विधिवत् उपार्जन होने पर पुरुष अंतिम पुरुषार्थ ‘मोक्ष’ बंधनमुक्ति को अनायास ही प्राप्त कर लेता है। मानव जीवन की सफलता इस अंतिम लक्ष्य की प्राप्ति ही है।
मानव जीवन का मर्म, मनुष्यत्व की परिभाषा व मानवी पुरुषार्थ के इन चार वर्गों के विस्तार में जाने से पूर्व थोड़ा चिंतन यह करें कि धर्म, अर्थ, काम मोक्ष की युगानुकूल व्याख्या क्या हो सकती है? मानव जीवन का अंतिम लक्ष्य प्राप्त हो इसके लिए आज के समय के अनुकूल सही अर्थों में इन्हें कैसे समझा जाय तथा परम पूज्य गुरुदेव ने इन सभी के विषय में क्या-क्या परिभाषाएँ दी, कैसे स्वयं अपने जीवन व्यवहार में उन्हें लागू करते हुए लक्ष्य सिद्धि को प्राप्त हुए, यह चर्चा अधिक लोकोपयोगी व व्यावहारिक अध्यात्म की परिधि में होगी।
परम पूज्य गुरुदेव ने कहा कि इक्कीसवीं सदी का सतयुगी मानव सुसंस्कृत व सभ्य होगा। बिना धर्म के नीतिमत्ता व संवेदना को विकसित किए वह अर्थोपार्जन व उसका सुनियोजन नहीं कर सकता, न ही परिष्कृत काम, सुख की सिद्धि ही कर सकता है। अतः ‘अभ्युदय’ रूपी इस सिद्धि के तीन साधन हुए-काम अर्थ व धर्म। अभ्युदय अर्थात् मनुष्य की सर्वांगीण-आमूलचूल प्रगति-उन्नति इनमें भी काम पर उनने कम जोर देकर उसे परिष्कृत कर उल्लास में बदलने की बात कही है तथा उसके बाद अर्थ की बात कही है। अर्थ से भी बढ़कर है-धर्म इस अभ्युदय की प्राप्ति के बाद ‘धर्म’ की परिभाषा जो प्रारंभ में की गयी, के अनुसार अगली सिद्धि रह जाती है वह है “निःश्रेयस्” जिससे बढ़कर और कोई भी श्रेष्ठतम फल न हो, उसकी प्राप्ति को निःश्रेयस अथवा मोक्ष कहते हैं। मोक्ष चरम पुरुषार्थ है व हर मानव का अंतिम लक्ष्य भी। धर्म, अर्थ और काम का नाम त्रिवर्ग है। इस त्रिवर्ग के साथ चतुर्थ पुरुषार्थ मोक्ष को मिला देने से चतुर्वर्ग हो जाता है। अमरकोष के अनुसार-
त्रिवर्गोधर्म कामार्थः चतुर्वर्गः समोक्षकः॥
धर्म, अर्थ व काम तीनों ही हर मनुष्य के लिए अनिवार्य भी हैं, साधन सिद्धि में सहायक भी तथा निर्मल निर्दोष भी। इन तीनों का सही परिमार्जित सामंजस्यपूर्ण दैनन्दिन जीवन में व्यापार जीवन साधना की सफलता का हेतु बनता है किन्तु यदि इनमें दोष उत्पन्न हो जाएँ इनके अर्थ को न समझते हुए उनके विकृत रूप का जीवन में समावेश हो तो यह मनुष्य के लिए विपत्ति का कारण बन सकता है। कैसे?
महाभारतकार ने शांतिपर्व में (123-10) इसकी बड़ी सुंदर व्याख्या की है-
अपध्यानमलो धर्मों मलोऽ र्थस्य निगूहनम्। सम्प्रमोहमलः कामो भयस्तद्गुणवर्िितः॥
अर्थात्-धर्म में फल की अभिलाषा अर्थात् उसका सकाम हो जाना, अर्थ में निगूहन अर्थात् उसे छिपाना, न उसका दान में सुनियोजन करना, न उपभोग ही करना (परिग्रह) तथा काम में सम्प्रमोह, अधिकाधिक मोह-वासनाओं के जाल में फँसते चले जाना ये तीन मल अर्थात् दोष होते पाए जाते हैं।” इन्हीं को अहंता, तृष्णा व वासना क्रमशः कहा गया है। इन तीन भव-बन्धनों से मुक्ति को जीवनमुक्ति या मोक्ष बताया गया है।
हमारे ऋषि वैज्ञानिक थे व चेतना जगत के विलक्षण अनुसंधानकर्ता थे। उनने मानवमात्र को मार्गदर्शन प्रदान करते हुए कहा कि सकाम भाव से नहीं, निष्कामभाव से धर्म का अनुष्ठान करो। अर्थ का उपार्जन उपभोग हेतु नहीं त्याग के लिए करो। (त्यागाय संभृतार्थनाम्) तथा काम का सेवन “शरीरमाद्यं खलु धर्म साधनम्” के अनुसार शरीर के रक्षण मात्र के लिए करो। कितना सशक्त विज्ञान सम्मत व सर्वकालीन चिन्तन है। जिस भी समाज में मनुष्य जाति इन तीनों पुरुषार्थों का सम्पादन कर रही होगी, सही रीति-नीति से जीवन को जी रही होगी, वह कभी दुःखी, विक्षुब्ध हो ही नहीं सकती।
वस्तुतः मानवमात्र को इस सृष्टि पर अवतरण के बाद दो प्रकार के कर्म-मार्गों का सामना करना पड़ता है-एक है ‘प्रेय’ मार्ग दूसरा ‘श्रेय’ मार्ग। हर मानव का इन दोनों से पाला पड़ता हैं। सांसारिकता, भोगविलास-कामानुरक्त्ता वाला मार्ग प्रेय मार्ग है तथा ईश्वरीय सत्ता के प्रति अनुराग, मानवमात्र के अभ्युदय के प्रति अटूट निष्ठ, सब में समभाव देखते हुए सबका हित सोचने वाला मार्ग श्रेय मार्ग है। जहाँ प्रेय में व्यष्टिगत सुख कामना प्रधान होती है, वहाँ श्रेय में समष्टिगत सुख का भाव होता है। प्रेय मार्ग पर चलने वाला दो ही पुरुषार्थ प्रधान मानता है-अर्थ व काम तथा श्रेय मार्ग पर चलने वाला धर्म पर आरूढ़ होकर चलता है। धर्म से ही अर्थ और काम भी सिद्ध होते हैं एवं उसका वास्तविक फल मोक्ष है।
पाश्चात्य उपभोग प्रधान सभ्यता आज जहाँ अर्थ पर जोर देती है वहाँ ‘काम’ रूपी धुरी पर ही उनका समग्र चिन्तन चलता है। धर्म अर्थात् नीतिमत्ता, संवेदना, वर्जनाएँ, मर्यादाएँ जीवन को दिशा देने वाला तत्त्वज्ञान वहाँ न होने से भवबंधनों में जकड़ा मानव भोगों जन्य कष्टों को पाता दुःख नजर आता है। मात्र पश्चिम नहीं, यह हर सभ्यता-हर समाज व हर युग पर तथ्य लागू होता है कि जब तक मानवी पुरुषार्थ धर्म पर आश्रित नहीं होता, वह संतापों-दुःखों व विग्रहों-विद्वेषों का ही निमित्त कारण बनता है। ‘धर्म’ पर आमूलचूल जोर देते हुए सारे पुरुषार्थ की त्याग में प्रतिष्ठ कर हमारे ऋषियों ने मानवी जीवन के उदात्तीकरण का आदर्श प्रस्तुत किया है। वे इतने व्यावहारिक भी हैं कि धन संचय के लिए मना नहीं करते किन्तु उसका मुख्य फल धर्म हेतु (नश्वर विषय-सुख हेतु नहीं) करने को, संपदा के समुचित उपार्जन व वितरण की प्रक्रिया पर जोर देने को कहते हैं। आज का संकट ‘अपरिग्रह’ की परम्परा के लुप्त हो जाने से ही पैदा हुआ है। वे कामसेवन का मुख्य लाभ जीवन पुरुषार्थ हेतु दिये जाने की बात कहते हैं। भोग न करके धर्म हेतु ही उसका सुनियोजन उल्लास को जीवन में समाविष्ट करता है। जीवन निर्वाह ठीक से हो सके, इसके लिए देह का स्वस्थ होना जरूरी है अतः काम की इतनी भर आवश्यकता है। उसमें लिप्त होने की नहीं ।
श्रीमद्भागवत् में शुकदेव जी कहते हैं-
अधोन्द्रियार्थाभिध्यानं सर्वार्थापहवो नृणाम्। भ्रंशितो ज्ञान विज्ञानाद् येनाविशति मुख्यताम्॥ (4−22−33)
अर्थात् “धर्म और मोक्ष के लिए प्रयत्नशील न हो कर केवल अर्थ और काम की ही चिन्ता करना संपूर्ण पुरुषार्थों से ही हाथ धो बैठना है, क्योंकि इससे मनुष्य ज्ञान और विज्ञान दोनों से च्युत होकर स्थावर योनि को प्राप्त हो जाता है।”
इसीलिए ऋषि कहते हैं कि जिस धर्म के अनुष्ठान से अर्थ और काम का विरोध हो इन दोनों में बाधा पड़े, जिस अर्थ के अनुष्ठान से धर्म और काम का ह्रास हो जाय तथा जिस काम के सम्पादन करने से धर्म और अर्थ में बाधा पड़ न धर्माचरण हो, न अर्थोपार्जन-ऐसे परस्पर विरोधी द्विवर्गों का उपार्जन किसी को नहीं करना चाहिए। गृहस्थ जीवन जीते हुए मानव मात्र किस तरह इन पुरुषार्थों का संपादन करे, इस पर देव संस्कृति के निर्धारण अनुपम हैं।
यही नहीं भारतीय संस्कृति की वर्ण व्यवस्था का मूल आधार भी पुरुषार्थ चतुष्टय है। इसे समझें। ब्राह्मण, वैश्य, क्षत्रिय एवं शूद्र यह वर्ण विभाजन जिस कर्म पुरुषार्थ के आधार पर किया गया है, वह नितान्त वैज्ञानिक है। कालक्रम में वह जातिगत आधार बन गया, यह विडम्बना है। ब्राह्मण कौन? जो धर्माचरण करे वह ब्राह्मण। जिसके अर्थ व काम का सुनियोजन मोक्ष हेतु हो। जो विद्या रूपी तप द्वारा ब्राह्मणत्व की सिद्धि प्राप्त कर ज्ञान सम्पदा का वितरण करे। वर्जनाओं का महत्व सबको अपने जीवन द्वारा समझाए। वैश्य वह, जो अर्थ का सुनियोजन धर्म के आधार पर करे-शतहस्तं समाकर-सहस्र हस्तं संकिर” का तत्त्वदर्शन समझे एवं दान परम्परा द्वारा अर्थ का सुव्यवस्थित वितरण करे। क्षत्रिय वह जो ‘काम’ को उल्लास-स्फूर्ति के रूप में परिमार्जित कर प्रशासन की व्यवस्था का भार सँभाले। उपयोग में ऊर्जा का अपव्यय न कर समाज की सुरक्षा का दायित्व निभाना ही उसका एक मात्र धर्म है। स्वस्थ मनोरंजन की प्रक्रिया को जन्म देकर काम बीज परिष्कार जो कर सके, ऐसे धर्म पर आधारित काम ही उसका मूल पुरुषार्थ है। अब ‘शूद्र’ की परिभाषा समझ लेना यहाँ ठीक होगा। शूद्र वह जो धर्म पर नहीं चले तथा अर्थ व काम के वास्तविक रूप को विकृत कर दे। जो भोगवादी जीवन जीते हुए प्रजनन तक सीमित रहे, निरन्तर स्वयं को बंधनों में बाँधता चला जाए वह शूद्र है। जन्म से हम सब इसी स्थिति में होते हैं। क्रमशः जीवनयात्रा के लक्ष्य को पार करते हुए काम, अर्थ व धर्म की सिद्धि द्वारा अंततः मोक्ष को प्राप्त होते हैं, जो जीवन लक्ष्य है।
मनुष्य को अपौरुषेयवाणी के माध्यम से वेदों में अमृत-पुत्र (श्रण्वन्तु विश्वे अमृतस्य पुत्राः) कहकर सम्मानित किया गया है। देवताओं ने उसके शरीर व मन में प्रवेश कर उसे जीता जागता देवालय बनाने का प्रयास किया है। (देवा देवेभ्यः पुरा) तथा इस मानवी काया को नौ द्वारों वाली देवों की नगरी अयोध्या “अष्टचक्रा नव द्वारा देवानाँ पूरयोध्या” अथर्व-/-/ कहा गया है, तो फिर यह देवमानव पुरुषार्थ क्षेत्र में भटक क्यों जाता है? बंधनों से मुक्त क्यों नहीं हो पाता? भारतीय संस्कृति उसका मार्गदर्शन करते हुए कहती है-
सूरिरसि बर्धोया अस तनूपानोऽसि। आप्नुहि श्रेयाँसमति समं क्राम॥
छाक्रोऽसि भ्राजोऽसि, स्वरसि ज्योतिरसि। आप्नुहि श्रेयाँसमति समं क्राम॥ अथर्व-/-/
अर्थात् “हे नर। तू तो विद्वान है, शरीर रक्षक है। अपने को पहचान। श्रेष्ठों तक पहुँच बराबर वालों से आगे बढ़। हे नर! तू तो शुक्र है, तेजस्वी है, आनन्दमय है, ज्योतिष्मान है। अपने को पहचान, श्रेष्ठों तक पहुँच बराबर वालों से आगे बढ़।”
मानव को पुरुषार्थपरायण बनाने वाला यह जीवन दर्शन ही देवसंस्कृति का प्राण है व मानव मात्र के लिए प्रेरणा का अनन्त स्रोत भी।
पुरुषार्थ चतुष्टय में सर्वाधिक प्रधान पुरुषार्थ जो मोक्ष प्राप्ति का साधन बताया गया है, धर्म है। धर्म शब्द की व्याख्या कई प्रकार से की जा सकती है। पहले शास्त्रों का प्रसंग लें, फिर आधुनिक चिन्तन के परिप्रेक्ष्य में सोचें कि यह धर्म है क्या? क्या यह वही धर्म है जिसके नाम पर निष्ठुर लोग एक दूसरे को मारते-परस्पर विद्वेष फैलाते नजर आते हैं? क्या धर्म उसे कहते हैं जिसमें बहिरंग का कर्मकाण्ड, वेश, विन्यास ही प्रमुख होता है एवं आचरण-व्यक्तित्व परिष्कार की कोई आवश्यकता नहीं होती? क्या धर्म वह है जो व्यक्ति को अनैतिक आचरण की प्रेरणा देता है व इसके लिए साक्षियाँ भगवत् सत्ता की देता है? क्या विशिष्ट पूजागृह में जाकर वैसा व्यवहार करना व मुँह चला लेना, यही धर्म है? कर्म को प्रधानता न देते हुए समाज पर भारभूत बनकर अकर्मण्य बनते चले जाना ही क्या धर्म है? ये सारे प्रश्न, उत्तर माँगते हैं, क्योंकि धर्म शब्द को जितना अधिक तोड़ा मरोड़ा व उसका दुरुपयोग किया गया है, उतना संभवतः और किसी के साथ नहीं हुआ। यह समझ में नहीं आता कि धर्म जैसी शाश्वत अनित्य सत्ता कभी-कभी खतरे में कैसे पड़ जाती है व किसी की बलात् धर्म संबंधी मान्यताएँ बदल देने पर परलोक में किसी के लिए स्थान सुरक्षित कैसे हो जाता है? इन सबकी स्पष्टीकरण देने के लिए हमें ‘धर्म’ के वास्तविक स्वरूप को भारतीय संस्कृति के परिप्रेक्ष्य में समझना होगा।
गीताभाष्य में आद्यशंकराचार्य कहते हैं “जो इस जगत् की स्थिति का कारण एवं प्राणियों के अभ्युदय और मोक्ष का साक्षात हेतु है, श्रेय के अभिलाषी ब्राह्मणादि वर्ण और आश्रम वाले लोग जिसका आचरण करते हैं, उसका नाम धर्म है” (जगतः स्थिति कारणं प्राणिनां साक्षात अभ्युदय निःश्रेयस हेतुः यः सधर्मो ब्राह्मणाद्यै वर्णिभिराश्रमिभिश्च श्रेयोर्यिभिरनुष्ठीयमानः)। इसका भावार्थ यह हुआ कि जिस परमसत्ता के बनाये नियमों के अनुरूप इस जगत् का धारण-पोषण हो रहा है, उसके अनुशासनों के अंतर्गत अपनी जीवनचर्या का निर्धारण धर्माचरण है, जो मनुष्य की आमूलचूल प्रगति का-सर्वांगपूर्ण अभ्युदय तथा निःश्रेयस का निमित्त कारण है, वह धर्म है। प्रकृति के विश्व ब्रह्माण्ड के दायरे में रहकर सदाचरण द्वारा की गयी प्रगति अभ्युदय कहलाती है तथा ब्रह्म की निःसीम सुखानुभूति को, प्रकृति की सीमा से परे प्राप्त होने वाली आत्मिक प्रगति को निःश्रेयस (नास्ति श्रेयान् यस्तात् तत् निःश्रेयम्-जिससे बढ़कर और कोई उत्तम फल न हो) कहते हैं। श्रेय पथ पर चलने वाले-श्रेष्ठ चिन्तन कर तदनुसार आचरण करने वाले ब्रह्मनिष्ठों के बताए पथ पर चलना धर्म है। वस्तुतः आचरण में नीतिमत्ता को उतारने की प्रेरणा देने वाला कारक तत्व धर्म है।
धर्म की अगली व्याख्या महाभारतकार ने इस प्रकार की है-
धारणाद् धर्मामत्याहुर्धर्मो धारयति प्रजाः-महाभारत क.प. 69-59
अर्थात् जो व्यक्ति को, समाज को, जनसामान्य को धारण करे, उसे धर्म कहते हैं। धर्म शब्द के मुख्य अर्थ तीन हैं-धारण करने वाला, पालन पोषण करने वाला, अवलम्बन देने वाला। किन्हें धारण करने वाला? किन्हें संरक्षण देने वाला? संपूर्ण जगत को। यहाँ रहने वाले जीवधारियों को। इस प्रकार सारी विश्व मानवता के लिए धर्म एक ही हुआ। जिसके मार्गदर्शन संरक्षण में जिसके छाया तले सभी प्रकार की विचारधाराएँ समान रूप से पोषण पाती रहें, पारस्परिक कोई विग्रह न हो, वह धर्म शाश्वत है व एक ही है, देव संस्कृति इस संबंध में हमारा मार्गदर्शन आज की साम्प्रदायिक विद्वेषभरी परिस्थितियों में समुचित रीति-नीति से करती हुई कहती हैं कि वही धर्म कहलाने योग्य है जो सहिष्णु हो, जिसकी मर्यादा-अनुशासन का अवलम्बन सब लें, जो नीतिमत्ता पर आधारित हो तथा जो सबको समान संरक्षण प्रदान करता हो। इस प्रकार “धारयते लोकम् इति धर्मः” की उक्ति पर आज की परिस्थितियों में कौन सा ऐसा धर्म है, इसका निर्णय आसानी से किया जा सकता है व तदनुसार मानवधर्म का निर्धारण मानव मात्र के लिए किया जा सकता है।
धर्म की परिभाषा बड़े विराट व्यापक रूप में समझी जानी चाहिए क्योंकि इसी पर समग्र विश्वमानवता की आचार संहिता अवलम्बित है। धर्म व संप्रदाय में अंतर है। धर्म एक शाश्वत नीतिदर्शन का नाम है जो मूलतः संवेदना की धुरी पर जन्म लेता है जबकि सम्प्रदाय एक मान्यता विशेष का, एक मार्ग का नाम है जिसे मानते हुए जिसका अवलम्बन लेते हुए व्यक्ति एक चरम लक्ष्य को प्राप्त होता है। देव संस्कृति ने धर्म को इसी अर्थ में लिया। यही कारण है कि इसके गर्भ में सभी मत-सम्प्रदाय-मतान्तर-मान्यताएँ पनपते-विकसित होते चले गए।
धर्म का प्रथम अंग है नीति विज्ञान। नैतिकता पर आधारित एक ऐसा अनुशासन जो व्यक्ति की चेतना में संवेदना को जन्म दे, उसे अंकुरित-पोषित होने हेतु समुचित वातावरण प्रदान करें। सच्चा धर्म वही है जो व्यक्ति को नैतिकता के अनुशासन में बाँधता है। आर आस्बार्न अपनी पुस्तक “ह्यूमेनिज्य एण्ड मॉरल थ्योरी” में कहते हैं कि विभिन्न संप्रदायों में मान्यताओं संबंधी मतभेद हो सकते हैं किन्तु नैतिक विचारों के संबंध में सभी में एकता है। रैल्कपैरी “द् ह्यूमिनिटी आफ मैन” में कहते हैं कि धर्म की आवश्यकता मानव का गौरव व उसके आचरण की श्रेष्ठता बनाए रखने में है। नियमबद्ध, अनुशासित संयमपूर्ण जीवन ही समृद्ध व्यक्तित्व बनाता है व यह कार्य धर्माचरण से ही संभव होता है। संभवतः इसी कारण ऋषियों ने कहा-धर्मान्न प्रमदितव्यम्।” (अर्थात् धर्म में प्रमाद या असावधानी नहीं बरतनी चाहिए)। आधुनिक सभ्यताएँ नैतिक बंधनों से परे धर्म रहित अर्थ व काम की प्राप्ति-उपार्जन हेतु प्रेरित करती हैं, मन की पैशाचिक दासता को स्वीकारने की प्रेरणा देती हैं। परिणाम सामने है। प्रत्यक्षतः या लौकिक जीवन में जो रोग दुर्बलताएँ दुःख अशान्ति पारस्परिक विग्रह नजर आ रहे हैं, वह सब इसी कारण पनपे हैं। मनु कहते हैं “परिज्येदर्थकामौ यौ स्याताँ धर्म वर्जिताम्” अर्थात् “मनुष्य को ऐसे अर्थ और काम का सर्वथा परित्याग कर देना चाहिए जो कि धर्म से रहित हो।” इस प्रकार धर्म का अर्थ हुआ संवेदना मूलक नीतिमत्ता।
धर्म का द्वितीय अंग है-आस्तिकता प्रधान तत्त्वदर्शन। मानव-मानव में पारस्परिक सामंजस्य एवं अनिवार्य घनिष्ठता स्थापित करने वाला तर्क सम्मत विवेचन। आर अस्गोली ने अपनी पुस्तक “साइकोसिन्थेसिस” में धर्म के इस पहलू को मानवी अतिचेतन के एक अनिवार्य गुण के रूप में प्रतिपादित करते हुए कहा है कि “यहीं से मनुष्य को ऊँचा उठाने वाली, दुर्बलताओं से मुक्ति दिलाने वाली, श्रेष्ठ व उदात्त भावनाओं का उदय होता है। प्रतिभा जागरण का मूल केन्द्र यही है। आध्यात्मिक ऊर्जा जगाकर व्यक्ति को श्रेष्ठता के पथ पर पहुँचाने वाली विधा है यह।” वेदों का ऋषि धर्म के इस उदात्त व व्यापक रूप की व्याख्या करते हुए मानव मात्र के शुभ की कामना की अभिव्यक्ति इस प्रकार करता है।
ध्रुवाँ भूमि पृथिवी धर्मणाघृताम। शिवाँ स्थोनामनु चरेम विश्वहा-अथर्ववेद 12.1
अर्थात् “यह ध्रुव और अचल भूमि, यह पृथ्वी जो धर्म द्वारा धारण की गयी है, हम उस शिवसुखदायिनी भूमि पर विश्वान्त विचरण करें।” ऋग्वेद में ऋषि कहते हैं - “सुगाँ ऋतस्य पंथा” अर्थात् धर्म का मार्ग मानव को सुख देता है, दुख से मुक्त (ऋग्वेद 8/3/13) करता है।” कितनी व्यापक अर्थ वाली भावना वैदिक संस्कृति में धर्म के प्रति व्यक्त की गयी है। ऋग्वेद में ‘ऋतु’ ऐसी विश्व व्यवस्था संबंधी धारणा है जिसमें सार्वभौम प्रतिमानों द्वारा धर्म की परिपूर्ण व्याख्या तत्त्वदर्शन के परिप्रेक्ष्य में की गयी है।
धर्म का तृतीय अंग है अनगढ़ मानव को देवमानव बनाने वाला उसे सही दिशा देने वाला एक गहन विज्ञान, जिसे हम “अध्यात्म” नाम से जानते हैं, धर्म को अध्यात्म से “स्प्रिच्यूअलिटी” से कभी अलग नहीं किया जा सकता। जो प्रयास-प्रयत्न मनुष्य को अन्तर्मुखी होने की प्रेरणा दे वह धर्म है, जो बहिर्मुखी बनाए उसे भोगवादी बनाकर उसके व्यक्तित्व को विखण्डित कर दे, वह अधर्म है। बहिर्मुखता मनुष्य को व समग्र समाज को असंयम की ओर, विनाश की ओर ले जाती है तथा अंतर्मुखता संयम-शान्ति-प्रेम तथा इनरब्लिस व परम लक्ष्य की ओर। विभिन्न कर्मकाण्डों द्वारा देव संस्कृति में यही प्रयोग मनुष्य को सिखाया जाता है एकाग्रता के चरमलक्ष्य की ओर अंतर्मुखता की ओर बढ़ने का। जिस समाज में जितने अधिक अंतर्मुखी वृति के व्यक्ति होंगे वह समाज उनकी एकाग्रता से प्राप्त शक्ति से उतना ही लाभान्वित होगा। वह उतना ही अधिक टिकाऊ बनेगा। भारतीय संस्कृति इस कसौटी पर पूरी तरह खरी उतरती है।
वस्तुतः मानव की संवेदनशीलता का विकास ही धर्म है। एरिकफ्राँम वह पहला व्यक्ति था जिसने मन की गहन परतों की सामाजिक परिप्रेक्ष्य में व्याख्या कर धर्म को मानव मात्र के लिए अनिवार्य बताया। इसके लिए उसने धर्म की व्याख्या की, मानवी क्षमताओं के जागरण की उसके समुन्नत व्यक्तित्व परिष्कार की विधा के रूप में (मेन एण्ड सोसायटी इन एरिकफ्राँम-अदिति चौधुरी-पृष्ठ 183)। फ्राँम कहते हैं कि “वह धर्म झूठा है जो व्यक्ति की विकासोन्मुख मौलिक क्षमताओं को दबाने या कुन्द करने की उसे संवेदना हीन बनाने की कोशिश करता है।” स्वामी विवेकानन्द ने कहा था कि “धर्म के नाम पर आज हम सब “लिप सर्विस”। ओठों से बुदबुदाने वाले कर्मकाण्ड मात्र का प्रयोग करते हैं जब कि धर्म व्यक्तित्व के परिष्कार की व उस माध्यम से उसके सारे समाज पर पड़ने वाले प्रभाव की विधा का नाम है। एक सच्चा धार्मिक व्यक्ति चलती फिरती संस्था है।” स्वामी विवेकानन्द की यह उक्ति कितनी सही है।
तैत्तिरीय आरण्यक में धर्म को संपूर्ण जगत का आधार कहा गया है-धर्मों विश्वस्य जगतः प्रतिष्ठ।” इसी कारण आगे श्रुति कहती है-धर्म एवं हतो हन्ति धर्मोरक्षति रक्षितः” अर्थात् “धर्म का जो नाश करेगा, धर्म उसे विनष्ट कर देगा और जो धर्म की रक्षा करेगा, धर्म उसकी रक्षा करता है।” धर्म के नाश से अर्थ है उसकी उपेक्षा तथा धर्म की रक्षा से यहाँ तात्पर्य है धर्माचरण। सारा समाज इसी अनुशासन पर टिका हुआ है। समाज के मानक दण्ड मानवीय मूल्यों का पतन होने पर उसका विनाश सुनिश्चित है। धर्म प्रधान पुरुषार्थ व्यक्ति, समाज, राष्ट्र व संस्कृति के सर्वांगीण अभ्युदय का निमित्त कारण बनता है, इसमें किसी प्रकार का संशय किसी भी विचारक को नहीं है।
सारे विश्व के मनुष्यों की उत्पत्ति द्वारा मानव के रूप में एक प्राणी भगवान ने बनाया है। अतः उसके धर्म अनेक नहीं हो सकते। विश्व में दो या पाँच या दस धर्म है, यह एक भ्रान्ति है। अनादि सनातन वैदिक धर्म ही मानव धर्म है, यह प्रागैतिहासिक कालीन विश्वमान्य सत्य है। बाद में देश, काल, पात्र के अनुसार महापुरुषों ने धर्म के किसी विशेष अंग को कहीं प्रचलित किया और कालान्तर में वह मत धर्म कहा जाने लगा। धर्म के विभिन्न अंगों में पारस्परिक विग्रह या विद्वेष कैसा? सत्य, अहिंसा, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, त्याग आदि सार्वभौम धर्म हैं। किसी महामानव ने किसी पर बल दिया है, किसी ने दूसरे पर। तात्कालिक समाज की जो विकृतियाँ थी, उन्हें मिटाने हेतु जिस साधन पर बल देना आवश्यक माना गया उसे उन्होंने प्रमुखता दी। किसी ने यह नहीं कहा कि हम नूतन धर्म का सृजन कर रहे हैं। यह तो मानवी दंभ है जो शाश्वत धर्म को संप्रदायों का रूप देकर उन्हें परस्पर लड़वाकर समाज के पतन का कारण बनता है। इस संकट का निवारण तभी संभव है जब धर्म का शाश्वत स्वरूप सभी को हृदयंगम कराया जा सके।
मानवमात्र के लिए श्रेष्ठता के पथ पर बढ़ने में सहायक धर्मोत्पत्ति के दस साधन मनुमहाराज ने बताये हैं, उन्हें धर्म के दस लक्षण भी कहा जाता है।
घृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौधमिन्द्रिय निग्रहः। घीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्-मनुःस्मृति 6-92)
अर्थात् धृति (धैर्य, सन्तोष, आत्मावलम्बन), क्षमा (औचित्य के प्रति उदारता), दम (मनःसंयम), अस्तेय (न्यायपूर्ण जीवन) शौच (बहिरंग व अंतरंग की पवित्रता), इन्द्रिय निग्रह (विषयों के अधोगामी प्रवाह को रोकना), धी विवेक-बुद्धि विद्या (आत्मज्ञान पारलौकिक फल वाले सत्कर्मों में प्रवृत्ति), सत्य मन-वचन-कर्म से व्यक्ति का शुद्ध होना व प्रिया सत्य बोलना), अक्रोध (मानसिक समस्वरता, आत्म नियंत्रण, आवेश में न आना-ये दस लक्षण धर्म के बताये गए हैं। व्यावहारिक अध्यात्म की दृष्टि से कितने सही व परिष्कृत व्यक्तित्व हेतु अनिवार्य ये सद्गुण हैं। किसी भी सभ्यता-मान्यता को मानने वाले को इस संबंध में भ्रम नहीं होना चाहिए।
कुछ धर्म सामान्य धर्म होते हैं, कुछ विशेष। दान सामान्य धर्म है परन्तु रोगी ऐसे पदार्थ आकर माँगे-जो उसे नुकसान करेंगे तो उस समय इसे वह पदार्थ न देना विशेष धर्म है। इसी प्रकार आततायी को क्षमा कर देना अहिंसा नहीं कायरता है। फोड़े पर चीरा लगाना चिकित्सक का विशेष धर्म है हिंसा नहीं। इस प्रकार धर्म सदैव देश, काल, परिस्थिति व औचित्य के साथ देखकर उसका निर्धारण किया जाना चाहिए। आपधर्म केवल आपत्तिकाल तक के लिए होता है और वह भी उतने ही अंश जितने अंश में आपत्तिकाल चल रहा हो। मरणासन्न रोगी को वैद्य ने लहसुन दे दिया तो जरूरी नहीं कि अच्छा होने पर भी लहसुन उसका खाद्य हो जाय। युगधर्म वह है जो उस समय काल के लिए किया जाने योग्य कर्तव्य है। स्वतंत्रता संग्राम में देश के लिए लड़ना युगधर्म था तो आज देव संस्कृति का तत्त्वज्ञान घर-घर पहुँचाना, आस्था संकट से जूझना, पीड़ित मानवता की सेवा युगधर्म है।
वस्तुतः धर्म हमें कर्तव्य की प्रेरणा देता है, साथ ही फल की ओर से तटस्थ रहने का आदेश भी देता है। धर्म का एकमेव लक्ष्य अन्तर्मुखता है, त्याग है, संवेदना का जागरण है तथा पारस्परिक सद्भाव का विकास है। इस भावना का जितना विस्तार होगा, धर्म की उतनी ही रक्षा होगी, आस्था संकट की विभीषिका तभी मिटेगी तथा मानवी पुरुषार्थ अलसाई अवस्था से परिपूर्ण जागरण-मोक्ष की ओर अग्रसर होगा।
देव संस्कृति का एक-एक पक्ष इतना सर्वांगपूर्ण है कि देखकर आश्चर्य होता है कि वैदिककालीन ऋषिगणों ने मानव मात्र के अभ्युदय-लौकिक व पारलौकिक प्रगति के एक भी पहलू को अछूता नहीं छोड़ा है। पूर्व के लेख में मानवी पुरुषार्थ के मूल व प्राण ‘धर्म’ की चर्चा हो चुकी। धर्माचरण व उसके लिए व्यक्ति का अंतर्मुखी होकर परिष्कृत संवेदनशील जीवन जीना ऋषियों ने अनिवार्य बताया है। ब्राह्मणत्व की यह सिद्धि व्यक्ति को ब्रह्मनिष्ठ बनाती हुई उसकी निज की प्रगति के साथ-साथ सबके उत्थान का पथ प्रशस्त करती है। भारतीय संस्कृति के प्रणेता मनीषी कहते हैं कि अर्थ व काम दोनों का ही उपार्जन-उपयोग करो, पर प्रमाण से संभलकर , धर्म के साथ युक्त होकर। अध्यात्मवादी भौतिकता का समर्थन करने वाली भारतीय संस्कृति कहती है कि जिस ‘अर्थ’ के अनुष्ठान से ‘धर्म’ व ‘काम’ का ह्रास हो जाय व जिस ‘काम’ के सम्पादन से ‘धर्म’ व अर्थ में बाधा पड़े ऐसा पुरुषार्थ संपन्न न किया जाय। अर्थ व काम को ऋषियों ने दोनों ओर से धर्म और मोक्ष से बाँध दिया है। काम शास्त्र के उपदेष्टा महर्षि वात्स्यायन “कामसूत्र” में लिखते हैं-
“लोकयात्राया हस्तगतस्य च बीजस्य भविष्यतः सस्यस्यार्थे त्याग दर्शनाच्चरेद्धर्मान।” अर्थात् “जैसे हाथ में आए हुए अन्न (बीज) को भविष्य में होने वाले बहुत से अनाज के लोभ से त्याग दिया जाता है (अर्थात् जमीन में बो दिया जाता है) उसी प्रकार मोक्ष के लिए अर्थ और काम को भी संकुचित करके भी, धर्म का सेवन करना चाहिए”। कितना स्पष्ट विज्ञान सम्मत व्यावहारिक दृष्टिकोण है। वात्स्यायन का जिनके नाम व नीति वाक्यों का आज के भोगवादी मानव ने सबसे अधिक दुरुपयोग किया है।
सबसे पहले अर्थ के प्रसंग को लिया जाय। “अर्थ” से भावार्थ है सम्पदा के उत्पादन व वितरण की सुनियोजित प्रणाली ताकि समग्र समाज में सुख-शान्ति व धर्मनिष्ठ जीवन्त रहे। अर्थ के अभाव में प्रगति की अपेक्षा कैसे की जा सकती है। शुक्राचार्य नीति में महर्षि कहते हैं-
अर्थात् धर्मश्च कामश्च मोक्षश्चापि भवेत्रृणाम्। शास्त्रास्त्राभ्याँ बिना शौर्य गार्हस्थ्यं तु स्त्रियं बिना॥ (शुक्रा. नीति 1-84)
यानी “जैसे शस्त्रास्य के बिना शूरता नहीं सफल हो सकती, जैसे स्त्री के बिना गार्हस्थ्य नहीं निभ सकता, वैसे ही अर्थ के बिना धर्म और मोक्ष दोनों ही सिद्ध नहीं हो सकते।”
महर्षि चाणक्य ने कहा-अर्थात् प्रवत्तति लोकः “अर्थ से आशय है अभिलषित वस्तु। इस लोक (चा.सू. 7/28) की प्रगति अर्थ पर ही निर्भर है। जिसे प्राप्त करने की सब इच्छा करें, वह अर्थ है। क्यों? क्योंकि “सुखस्यमूलं धर्मः। धर्मस्य मूलम अर्थः” (चा.सू. 1-1,2)
धन-धान्य वस्त्र, गृह-भूमि सम्पत्ति, पशु विद्या कला, कृषि, गृहस्थी का सब सामान इन सबको ऋषियों ने अर्थ में गिना है व कहा है कि मानव मात्र अपरिग्रह का सिद्धान्त जीवन व्यवहार में लाए ताकि सम्पदा का समान वितरण हो सके। आदमी धनोपार्जन हेतु पुरुषार्थ तो करे परन्तु निज के लिए व्यवस्था ब्राह्मणोचित निर्वाह भर की रखे। अपने पास संग्रह न करे। थोड़ा विचार करें, आज की समस्याएँ जो पैदा हुई हैं, वह किसी कारण पैदा हुई। इस शताब्दी में उपनिवेशवाद के समापन के बाद नार्थ ब्लॉक-साउथ ब्लॉक विकसित देश व अविकसित विकासशील देशों के रूप में दो वर्गों में अर्थ सम्पदा का ध्रुवीकरण हुआ। कुछ देश धनी अत्यधिक धनी बने व कुछ निर्धन व अत्यन्त दीन-हीन स्थिति में। युद्ध लिप्सा से लेकर विश्व भर में फैली आर्थिक समस्याएँ जिनमें अन्यान्य राष्ट्रों की सम्पदा-व्यवस्था व प्रजा का मन चाहा शोषण भी आ जाता है, ‘अर्थ’ के धर्म प्रधान न होने से पैदा हुई है। जो अर्थशास्त्र किसी जाति विशेष, धर्म विशेष या राष्ट्र विशेष का ही विचार करता है, वह अर्थशास्त्र धर्म पर आधारित नहीं है। जमींदारों के रूप में शोषक वर्ग के उभरने से लेकर मुनाफ़ाखोरों-कालाबाजारियों दूसरों का शोषण करके धनी बनने वाले कारखानेदारों के पुरुषार्थ के मूल में पूर्व जन्म के पुण्य नहीं अपितु अधर्म पर आधारित अर्थशास्त्र है। किसी भी समाज में इस प्रकार की विषमता-सामाजिक विग्रह, हिंसक विद्रोह व क्रान्ति को जन्म देती है। सीधा सच्चा अहिंसक रास्ता है-सम्पदा का धर्म प्रधान सुनियोजन।
यदि हम विगत दो शताब्दियों पर दृष्टि डालें तो देखते है कि मार्क्स का अर्थशास्त्र एक संजीवनी के रूप में आया व मार्क्स गरीबों के मसीहा बनकर आए परन्तु साम्यवाद का यह प्रयोग असफल रहा क्योंकि मार्क्सवाद में केन्द्रीय तंत्र अर्थ प्रधान नहीं है। उसमें विनिमय की व्यवस्था मात्र है। मार्क्स ने मानव को अर्थमानव बना डाला जो बढ़ते औद्योगीकरण के साथ यंत्र मानव बनता चला गया। अभी तक व्यक्ति पूँजीवाद था, अब समाज पूँजीवाद बन गया। कहाँ आया समाजवाद-साम्यवाद ? इसी कारण पूर्वी ब्लॉक में सोवियत रूस में एक जबर्दस्त क्रान्ति हुई व देखते-देखते लेनिन व मार्क्स की स्थापनाएँ धूल-धूसरित हो गयीं।
जब तक मानव मात्र की समता व एकता की ‘अर्थ’ को धर्म प्रधान बनाते हुए व्यवस्था नहीं की जाती, सोऽहम् रूप से आदर्श समाज की स्थापना नहीं होती। मनुष्य की मौलिक क्षमताओं को विकसित करने की विधा है धर्म-अध्यात्म तथा उन क्षमताओं का उपार्जन-उपयोग हेतु सुनियोजन करने की विधा है ‘अर्थ’। दोनों का युग्म जब तक नहीं होगा, तब तक सही समाजवाद नहीं आ सकता। परमपूज्य गुरुदेव ने जिस आध्यात्मिक साम्यवाद की रूप रेखा हम सबके समक्ष रखी, उसका आधार है मनोसामाजिक क्रान्ति । व्यक्ति की सोयी प्रतिभा का परिष्कार-उन्नयन व उससे समाज की प्रगति के विभिन्न सोपानों का खुलना। आज की उपयोग प्रधान पूँजीवादी पाश्चात्य संस्कृति की सारी पीड़ाओं का समाधान यही क्रान्ति है जिसकी दिशा हमें भारतीय संस्कृति से मिलती हैं। सुप्रसिद्ध चिंतक अर्नाल्ड टायनबी श्री इकेडा के साथ अपनी वार्ता में कहते हैं-निकट भविष्य में विश्वस्तर पर आर्थिक समाजवाद अध्यात्म की पृष्ठ भूमि पर ही आयेगा एवं यही समष्टिगत विभीषिका का हल निकालेगा।” वे कहते हैं कि “उपभोगवादी संस्कृति ने साधन दिए किन्तु उनका सुनियोजन बताकर भोग को ही प्रधानता दी। इसका परिणाम यह हुआ कि व्यक्ति का विकास अवरुद्ध हो गया व अर्थ-सम्पदा भी कुछ क्षेत्रों में संचित होकर रह गयी इस आर्थिक वैषम्य का समाधान आध्यात्मिक धरातल पर ही निकल सकता है, जिसका मार्गदर्शन पूर्वात्य संस्कृति युगों से करती आयी है (“चूज लाइफ” आक्सफोर्ड यूनिव. प्रेस 1987 पुस्तक से उद्धृत)।
कठोपनिषद् में नचिकेता यमाचार्य से कहते हैं “न वित्तेन तर्पणीयों मनुष्यः” अर्थात् मनुष्य संसार भर की दौलत पाकर भी तृप्त नहीं हो सकता। इसीलिए वैदिक विचारधारा में वित्तैषणा को परिग्रह को निन्दनीय ठहराते हुए अर्थ को धर्म का आधार देकर उसकी त्याग में मोक्ष में प्रतिष्ठ करने की बात जोर देकर कही गयी है। इसके लिए समाज में एक तंत्र कभी था जो वैश्य रूप में जाना जाता था। कालान्तर में यह वर्ण व्यवस्था जाति में बदल गई व आज कुछ अलग ही रूप में हम सबके समक्ष है परन्तु अर्थ के सुनियोजन का दायित्व वैश्य तंत्र पर था। मनुस्मृति कहती है-
यथा नदी नदः सर्वे समुद्रे यान्ति संस्थितिम्। तथैवाश्रमिणः सर्वे गृहस्थे यान्ति संस्थितिम्॥ (मनु 6-90)
अर्थात् जैसे नदी नालों का पानी समुद्र में जा पड़ता है, वैसे ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थी, संन्यासी ये सब लोग-गृहस्थ वैश्य के द्वारा पालित पोषित होते हैं। गृहस्थ वैश्य जो धन कमाये, उसे समाज के काम में नियोजित कर दे, ऐसी व्यवस्था थी।
वस्तुतः परिग्रह करने वाला विलासी-सुख-साधनों में लिप्त व्यक्ति का बहिरंग धार्मिक रूप कुछ भी दिखाई पड़े, यदि वह अर्थ की वितरण प्रणाली को बलवती नहीं कर रहा तो धीरे-धीरे संवेदना की दृष्टि से वह कुन्द-निष्ठुर होता चला जाएगा व आत्मतत्त्व से धर्म से उतना ही दूर भी हो जाएगा। भारतीय संस्कृति का केन्द्रीयतत्त्व रहा है त्याग-दानवृत्ति संवेदनशीलता और संवेदनशील व्यक्ति कभी विलासी परिग्रही नहीं हो सकता। जब भी अर्थ की वितरण प्रणाली को अवरुद्ध कर दिया जाता है तो वह बाहर निकलने के लिए अनेकानेक मार्ग खोजता है राज्यकरों से लेकर व्यसनों में दुरुपयोग तथा ईर्ष्या से पैदा शत्रुता से प्राणहानि व धनहानि तक की बारी आ जाती है। समष्टिगत स्तर पर सामाजिक समता की मर्यादायें टूटती हैं तथा अराजकता प्रधान अव्यवस्थाओं का दौर चल पड़ता है।
भारतीय संस्कृति अर्थ संचय का समाधान बताती हुई कहती है-समाज में जहाँ कहीं भी दरिद्रता के गड्ढे हैं, उन्हें समर्थ व्यक्ति पाटें (“दरिद्रान भर कौन्तय-महाभारत धर्म प्रधान अर्थशास्त्र की स्थापना हेतु ऋषिगणों का कहना है-शतहस्तं समाहरं सहस्रहस्तं संकिर” (अथर्ववेद 3/24/5) अर्थात् सैकड़ों हाथों से कमाओ किन्तु हजार हाथों से बाँट दो। वितरण को, धन के प्रवाह की प्रक्रिया को अवरुद्ध मत करो। इसे विवेक सम्मत दान की पुण्य प्रक्रिया का आश्रय लेकर समाज को श्रेष्ठ बनाने वाले कार्यों में नियोजित कर दो। “सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामया” का दर्शन देने वाली भारतीय संस्कृति अर्थोपार्जन व उसकी सुरक्षा हेतु शील-संयम व उदारता को प्रमुख मानती है व इस प्रकार अर्थ का पुरुषार्थ धर्म के आधार पर करने की प्रेरणा देती है। अर्थ की सार्थकता कैसे हो, यह बताते हुए महर्षि शुक्राचार्य कहते हैं-
संरक्षयेत् कृपणवत् काले दद्याद् विरक्तवत्। (शुक्रा. नीति)
अर्थात् ‘अर्थ का उपार्जन व संरक्षण तो महान कृपण की तरह सावधानी पूर्वक किया जाय परन्तु जब उपयोग का समय आवे तो हृदय खोलकर विरक्त की तरह उदारता से उसे व्यय करना चाहिए।”
जिस प्रकार धर्ममय अर्थशास्त्र की ऊपर चर्चा की गयी, उसी प्रकार तीसरा पुरुषार्थ धर्ममय काम शास्त्र वैसा ही महत्वपूर्ण स्थान भारतीय संस्कृति में पाता है। श्रीमद्भगवद्गीता कहती है-धर्माऽविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभः!” अर्थात् “जिस ‘काम’ का धर्म से विरोध नहीं है, वह मर्यादित काम ही मेरा स्वरूप है।” भारतीय संस्कृति काम को भी धर्म के स्थान पर प्रतिष्ठित करती है व कहती है कि हमारे विषयभोग से सामाजिक व्यवस्था न बिगड़े, समाज में अशान्ति न पैदा हो, समाज में दुःख-दैन्य दरिद्रता न उत्पन्न हो। हमारा विषयोपभोग भी समाज के लिए सुखकर हो। काम आखिर है क्या?
“काम्यत इति कामः” इस व्युत्पत्ति के अनुसार विषय और इन्द्रियों के संपर्क से उत्पन्न होने वाला मानसिक आनन्द ही मुख्यतया ‘काम’ कहलाता है। जो भी शरीर व इन्द्रियों को सुख देने वाले ऐहलौकिक और पारलौकिक इच्छित पदार्थ हैं, उनको ‘काम’ की परिधि में गिना जाता है। ऋग्वेद का ऋषि कहता है-कामः मनसो रेतः (काम चित्त का, मन का, बीज है) एवं यह काम सुख का मुख्य साधन होने के कारण प्राणियों को अत्यन्त अभीष्ट है। वे यह भी कहते हैं कि इन सुखों को धर्मानुसार भोगने में कोई दोष नहीं है। काम का औचित्य की मर्यादा में रहकर यदि पुरुषार्थ सम्पादन किया जाय तो वह उल्लास, दीर्घायुष्य चिरयौवन तथा आत्मिक आनन्द देता है तथा धर्म प्रधान होने के कारण मोक्ष का निमित्त कारण बनता है, यह भारतीय संस्कृति के मनीषी बताते आए हैं। फिर भोग भोगने में काम का नियोजन होने के क्या परिणाम होते हैं, यह भी ऋषि हमें दिखाते हैं। ययाति की कथा सर्वविख्यात है जिसमें उसने लगातार पुत्रों की तरुणता लेकर, बार-बार भोग का प्रयोग करके देखा लेकिन अंत में बेचारा घबरा गया। एक सहस्रवर्ष पर्यन्त काम का अनुभव करके संसार भर के कामियों को सचेत वह कर गया। भागवतकार ययाति से कहलवाता है-
यत् पृथिथ्याँ ग्रीहियवं हिरण्यं पशवः स्त्रियः। न दुह्यन्ति मनः प्रीतिं पुँसः कामस्तस्य ते। (भाग. 8-19-13)
“पृथ्वी में जितने भी धन-धान्य सुवर्ण, पशु और स्त्रियाँ हैं, वे सब मिल करके भी उस पुरुष के मन को संतुष्ट नहीं कर सकते, जो कि कामनाओं के प्रहार से जर्जरित हो रहा है।” इसी तथ्य को मनु
महाराज ने मानवजाति के समक्ष रखा व कहा-न जातु कामः कामानामुपभोगेन शाम्यति।” (म.स्मृति)
अर्थात् यदि वर्षों तक काम का उपभोग किया जाय तो भी काम शांत नहीं होता। अग्नि में आहुति डालने से वह बुझती तो नहीं किन्तु अधिकाधिक प्रज्वलित ही होती है।
इन सभी उद्धरणों से मन का असमंजस स्वाभाविक है कि विषयों का उपभोग धर्ममय तथा मोक्ष प्राप्ति का साधन कब बनता है तथा कब वह मनुष्य के लिए अधोगामी बन जाता है? सामान्य व्यक्ति का शास्त्रवचनों तथा लौकिक जीवन में संव्याप्त मान्यताओं से भ्रमित हो जाना कोई आश्चर्य की बात नहीं। कहीं कोई महामंडलेश्वर ब्रह्मचर्य की महत्ता पर ढेरों वक्तृताएँ देते देखे जाते हैं किन्तु उनके जीवन में इन्द्रिय संयम सर्वाधिक दिखाई देता है। चूँकि काम को गोपनीय प्रसंग माना गया है अतः पारस्परिक चर्चा तक हमारे समाज में अश्लील मानी जाती है अतः काम संबंधी विकृतियाँ समाजगत व मनोगत दोनों ही क्षेत्रों में बड़े व्यापक स्तर पर फैली देखी जाती हैं। इसीलिए काम के परिष्कृत रूप की व्याख्या यहाँ अनिवार्य है।
‘काम’ प्रक्रिया जो सृष्टि के मूल कारण प्रकृति पुरुष के मिलन से लेकर दाम्पत्य जीवन बसाने तक चली आ रही है, विश्व की एक ऐसी अनिवार्यता है जिसे अस्वीकार नहीं किया जा सकता। काम मात्र कामसेवन ही नहीं है, अपितु विनोद उल्लास व आनन्द का नाम है जो व्यक्ति की प्राण विद्युत के माध्यम से उसके व्यक्तित्व से परिलक्षित होता है। यह पुरुषार्थी का प्राण व मानव मात्र का पौरुष रूपी वह गुण है जो व्यक्ति की दैनन्दिन जीवनचर्या में उत्साह स्फूर्ति, मानसिक समस्वरता, प्रशासकीय सुव्यवस्था व शौर्य जैसी अभिव्यक्तियों के रूप में परिलक्षित होता है। जब यही कामतत्व विकृत हो जाता है तो विषयोपभोग से लेकर जीवनीशक्ति क्षरण तक , रोगों-दुर्बलताओं के आक्रमण से लेकर समाजगत वासना के ताण्डव के रूप में देखा जाता है। कुदृष्टि-कामुकता कामतत्व की विकृति का प्रमुख निमित्त कारण है। स्वच्छन्द यौनाचार से लेकर अश्लील प्रदर्शन, कला के माध्यम से यौन कुण्ठाओं की व नारी के रमणी भोग्या रूप की अभिव्यक्ति तथा सामूहिक बलात्कारों से लेकर कुरुचिपूर्ण साहित्य का सृजन इसी विकृत रूप की अभिव्यक्तियाँ हैं।
सन्तति उत्पादन हेतु यौनाचार काम की एकाँगी व्याख्या है। भौतिकवादी प्रतिपादनों में फ्रायडवादी मनोवैज्ञानिकों ने तो काम को मानवी चेतना की मूल प्रवृत्ति ही ठहरा दिया है। कामुकता के धरातल पर ला पटकने के कारण ही काम का वह स्वरूप लुप्त हो चला है, जो मनुष्य को कभी श्रेष्ठ बनाता था। काम प्राणी के अंतराल में कार्य करने वाली एक ऐसी उल्लास भरी वृत्ति का नाम है जो सदा उसे आगे बढ़ने-ऊँचा उठने के लिए प्रेरित करती है। व्यक्ति की जिजीविषा, संकल्पशक्ति, असंभव दीख पड़ने वाली उपलब्धियाँ, साहसिक प्रयासों व प्रचण्ड पुरुषार्थ के रूप में वही उभरती दिखाई देती है। इसी शक्ति के कारण प्राणी उछलते, फुदकते तथा उमंग, उत्साह से भरे रहते हैं। इसी का एक छोटा रूप यौनाचार भी है। संतान, सतेज, और नीरोग किस प्रकार हो उसका ठीक-ठीक पोषण कैसे हो, यह सारे पक्ष धर्ममय काम के अंतर्गत आते हैं। यौनाचार के आकर्षण में प्रकृति प्रेरणा का एक मात्र लक्ष्य यही है कि सृष्टि का प्रजनन क्रम चलता रहे। किन्तु उसे यौनतृप्ति का आधार मान लेना एक भूल है। आज मनुष्य ही इस क्षेत्र में अन्य जीवधारियों की तुलना में अधिक स्वेच्छाचारी बन गया है, यह एक विडम्बना है।
काम भाव संवेदनाओं का परिष्कृत रूप है जो स्वस्थ मनोरंजन के रूप में तो, कभी भक्ति या प्रेम के रूप में, कभी कला की उच्चस्तरीय अभिव्यक्ति के रूप में, तो कभी प्रशासकीय व्यवस्था कुशलता के रूप में सामने आता है। समाज का क्षत्रिय कहा जाने वाला वर्ग काम रूपी पुरुषार्थ का उपार्जन ही करता था। लोकरंजन हेतु वही स्वस्थ प्रतिस्पर्धाओं, क्रीड़ा समागमों, शौर्य के प्रदर्शनी की व्यवस्था भी करता था। राज्य व्यवस्था भी ऐसे व्यक्ति सँभालते थे जिनका कामतत्व धर्ममय हो। कालान्तर में क्षत्रिय वर्ण-जाति बन गया व यौनाचार काम का विकृत रूप बनकर क्षत्रियों की सबसे बड़ी दुर्बलता बनकर सामने आया।
काम धर्ममय तब बनता है जब कामबीज का ज्ञान बीज के रूप में परिष्कार किया जाता है। इन्द्रिय संयम से उसका आरंभ तो होता है किन्तु अंत होता है ब्रह्म से एकाकार होकर-मोक्ष में। इन्द्रिय संयम भी दमन प्रधान नहीं, कामनाओं के परिष्कार व भावनाओं के ऊर्ध्वीकरण का मार्ग है। ब्रह्मचर्य का सुन्दरतम स्वरूप आदर्शों व सिद्धान्तों के प्रति प्रगाढ़ निष्ठ के रूप में दिखाई देता है। इस तथ्य से अवगत व इसकी अनुभूति हो जाने पर व्यक्ति यौन आकर्षणों को तुच्छ मानते हुए काम को मोक्ष में परिणत कर लेता है। वस्तुतः काम के स्थूल आकर्षण का आध्यात्मिक प्रेम में परिवर्तन ही उर्ध्वगमन है। प्रतिभा का जागरण, ओजस्विता का प्रकटीकरण, हृदय की विशालता का सौंदर्य के रूप में दिखाई पड़ना काम की सुन्दरतम अभिव्यक्ति है। मोक्ष की, जीवन-बंधनों से मुक्ति की, ईश्वरीय सान्निध्य के दिव्य रसास्वादन की भूमिका यहीं से बनती है। अध्यात्म सम्मत काम विज्ञान ही आज की भोगप्रधान संस्कृति का उत्तर हो सकता है, इसमें किसी को संशय नहीं होना चाहिए।
आज का आस्था संकट ‘अर्थ’ व ‘काम’ इन दोनों के धर्म से विलग हो जाने से पैदा हुआ है, यह निष्कर्ष सभी विचारकों का है। जब-जब भी जिस समाज में उपार्जन हेतु अर्थ तथा उपभोग हेतु काम का बिना किसी वर्जना के बिना मानव मात्र के प्रति संवेदना-करुणा को जगाए, नियोजन होगा तो वह समाज पतन के गर्त में गिरेगा। यदि हमें आज समाज को, व्यक्ति को सही दिशा में अग्रगामी बनाना है, सतयुगी दुनिया का प्रारूप विकसित करना है तो अर्थ व काम को धर्म के आधार पर प्रतिष्ठित करना होगा। सोऽहम् क्रान्ति अगले दिनों यही कार्य संपन्न करने जा रही है।
प्राच्यविद्या विशारद प्रो. मैक्समूलर ने अपनी पुस्तक इण्डिया-व्हाट कैन इट टीच अस?” (भारत हमें क्या सिखा सकता है?) में लिखा है-यदि मुझ से पूछा जाय कि अंतरिक्ष के नीचे कौन सा वह स्थल है जहाँ मानव के मानस ने अपने अन्तराल में निहित ईश्वर प्रदत्त अन्यतम सद्भावों को पूर्ण रूप से विकसित किया है, गहराई में उतरकर जीवन की कठिनतम समस्याओं पर विचार किया है उनमें से अनेकों को इस प्रकार सुलझाया है-जिनको जानकर प्लेटो तथा काण्ट का अध्ययन करने वाले मनीषी भी आश्चर्यचकित होकर रह जायँ तो मेरी उँगली भारत की ओर उठेगी।” वस्तुतः यह अभिव्यक्ति देव संस्कृति क उन महत्वपूर्ण निर्धारणों के प्रति अगाध श्रद्धा के भाव से एक पाश्चात्य मनीषी द्वारा व्यक्त की गयी है, जिनके कारण भारतीय आध्यात्म जीवन की हर समस्याओं का समाधान बताते हुए सार्वकालिक, सार्वभौम व व्यावहारिक कहलाया। वैदिक युग के ऋषियों की सबसे बड़ी देन है व्यक्ति को पुरुषार्थ-परायण बनाते हुए, उसे कर्म क्षेत्र से जोड़े रहते हुए उसके चिन्तन में ‘मोक्ष’ की भावना की प्रतिष्ठापना करना। जो मोह का क्षय करे, वह मोक्ष है। भारतीय संस्कृति की मान्यता है कि यह मोक्ष, मुक्ति, जीवनमुक्ति जरूरी नहीं कि मरने के बाद मिले, यह संदेह जीवन में कभी भी हर कोई प्राप्त कर सकता है। इसके लिए यहाँ के ऋषियों ने मोक्ष की लक्ष्य प्राप्ति के लिए समुचित मार्गदर्शन मानव मात्र को दिया है।
मोक्ष को धर्म के भी पार बताते हुए चेतना की उच्चतम स्थिति संबोधित करते हुए इसे ऋषि परिपूर्ण जागरण की स्थिति बताते हैं। मोक्ष का अर्थ है जीवन में त्याग की प्रतिष्ठ। वैदिक ऋषियों की मान्यता है कि यदि त्याग जीवित रहा तो मानवजाति व समग्र समाज प्रतिष्ठित रहेगा विकसित होता रहेगा। एक बड़ा सुन्दर संवाद बृहदारण्यकोपनिषद् में आता है जिसमें वानप्रस्थ लेकर वन को प्रस्थान करने से पूर्व याज्ञवल्क्य अपनी दोनों पत्नियों को धन सम्पत्ति का समान बँटवारा करते हुए सुख से जीवनोपभोग करने को कहते हैं। गार्गी और मैत्रेयी दोनों में से मैत्रेयी उनसे पूछती है-हे स्वामी! जो सांसारिक सम्पदा मुझे आप दे रहे है इनसे क्या मुझे अमरत्व की प्राप्ति हो जाएगी? तो याज्ञवल्क्य उत्तर देते हैं कि धन से मोक्ष की आशा नहीं की जा सकती। तुम्हारा जीवन तो इन सब साधनों से अन्यान्य व्यक्तियों की तरह ही व्यतीत होगा। तब मैत्रेयी अंतराल को स्पर्श करने वाला, हम सबके चक्षु खोल देने वाला प्रश्न पूछती है-येनाहं नामृता दयाम् किमहं तेन कुर्याम्?” (वृहदा. 2/4/3) “हे नाथ! जिस धन से मैं अमर नहीं हो सकती उस धन का मैं क्या करूँगी? अतः आप मुझे अमरत्व-मोक्ष प्राप्ति के साधन बताइए।” तत्पश्चात् याज्ञवल्क्य उसे चारों पुरुषार्थों की व्याख्या करते हुए मोक्ष के रूप में त्याग की प्रतिष्ठ, तृष्णा-वासना-अहंता से मुक्ति का उपदेश देते हुए उसे आत्मबल की ओर उन्मुख होकर मोक्ष प्राप्ति को स्वरूप व महत्व समझाते हैं।
मोक्ष के संबंध में उपर्युक्त आख्यायिका का वर्णन इसलिए किया गया कि इस संबंध में अनेकानेक भ्रामक मान्यताएँ हैं। ऋषि याज्ञवल्क्य समझाते हैं कि सुखप्राप्ति के लिए व्यक्ति पुरुषार्थ तो करे परन्तु चिन्तन “तेन त्यक्तेन भुंजीथाः का (भोग भी त्याग के साथ) रहे तो ही जीवन यात्रा सफल है, नहीं तो यह जन्म-मरण का चक्र चलता ही रहेगा व बार-बार मनुष्य को इस प्रक्रिया से गुजरना पड़ेगा। इस तरह भारतीय मनीषीगण कहते हैं कि अर्थ (आर्थिक मूल्य) तथा धर्म (नैतिक मूल्य) तो साधन हैं किन्तु काम (मानसिक मूल्य-जिनसे सांसारिक सुखों का उपभोग किया जाता है, तथा मोक्ष (आध्यात्मिक मूल्य-जो बंधनमुक्ति का द्वार खोलता है-कल्याण का पक्ष दिखाता है, साध्य है। काम तथा मोक्ष को ही कठोपनिषद् रचयिता प्रेय तथा श्रेय मार्ग कहता है व बताता है कि अर्थ व काम के उपभोग से व्यक्ति असंतुष्ट ही रहता है बेचैनियाँ, तनाव ही उसके पल्ले पड़ती हैं धर्म व्यक्ति की संवेदना-मूलक उस इकाई का नाम है जो चेतना को अलसाई अवस्था में डाले रहती है, किन्तु मोक्ष परिपूर्ण जागरण की अवस्था है। इसीलिए नचिकेता, यमराज द्वारा दिये जा रहे इहलौकिक, पारलौकिक सुखों के प्रलोभन में नहीं पड़ता तथा मैत्रेयी धन संपदा से परे अमरत्व की मोक्ष की प्राप्ति हेतु अपनी जिज्ञासा याज्ञवल्क्य के समक्ष प्रस्तुत करती है।
भारतीय दर्शन की सर्वश्रेष्ठ स्थापना यदि हम कहें तो वह मोक्ष संबंधी उसकी धारणा है, जिसके अनुसार मानवमात्र की जीवन के परम शुभ (सम्मत बोनस-मोक्ष की प्राप्ति की सतत् प्रेरणा दी जाती है। जहाँ पाश्चात्य दर्शन “ज्ञान के प्रति अनुराग“ के रूप में एक मानसिक व्यायाम है, वहाँ भारतीय दर्शन मानवमात्र के दुःखों के निवारण का उपाय बताने वाली विचार प्रणाली है। यह विचार प्रणाली कहीं पारलौकिक जगत में नहीं दैनन्दिन जीवन-व्यवहार में उसे सही चिंतन करना है। जीवन जीने की कला का शिक्षण करने का कार्य संपन्न करती है। इसे ऋषियों ने जीवन दर्शन कहा है, जिसे अपना कर व्यक्ति रोज के जीवन के संत्रासों से मुक्ति पाता हुआ मानव जन्म के सौभाग्यों को सार्थक करने वाला जीवन जी सकता है। यही मोक्ष है। मोक्ष-दायक ज्ञान का स्वरूप भारतीय दर्शन के विभिन्न संप्रदायों में भिन्न-भिन्न हो सकता है किन्तु लक्ष्य सभी का एक है-जीव को बंधनों से मुक्त करना।
प्रसिद्ध मनोविज्ञानी कार्लजुँग कहते हैं “पूर्वार्त्य अध्यात्म जो वैदिक युग की देन है, में सबसे विलक्षण अवधारणा मोक्ष की है। व्यक्ति की निज की चेतना के अनुभूतिपरक ज्ञान पर आधारित यह विधा पाश्चात्य चिन्तन से बिल्कुल उल्टी है। वे कहते हैं कि “मोक्ष” के माध्यम से एक हिंदू साधक बहिर्मुखी वृत्तियों से स्वयं को सिकोड़ता है व अपनी अंतःचेतना को परिष्कृत कर ऊर्ध्वमुखी कर लेता है। यह प्रक्रिया इतनी अद्भुत है कि वह एक हिंदू की जीवन पद्धति को ही बदल कर जीवन संबंधी उसकी दृष्टि को त्यागमय बना देती है। संभवतः यही पश्चिम के लिए भारत की सबसे बड़ी देन तथा आज के युग की पीड़ाओं का समाधान भी है। “(साइकोलॉजिकल टाइप्स-सी-जी-जुँग से उद्धृत) एल्डुअस हक्सले अपनी पुस्तक “पेरेनियल फिलॉसफी में कहते हैं कि “मोक्ष का अर्थ भारतीय तत्व दर्शन के अनुसार है अज्ञान, दुष्कर्म व दुःखों से मुक्ति दिलाकर आनन्द, सत्कर्म व ज्ञान प्रदान करने वाला तत्व। इसके लिए वैदिक ऋषि भौतिक साधनों का सहारा लेते, काम को उल्लास में बदलकर मोक्ष सिद्धि का साधन इस जगत द्वारा ही बताते हैं।
भ्रामक मान्यतायें मोक्ष के संबंध में कालान्तर में यह फैला दी गयीं कि “मरने के बाद ही मोक्ष मिलता है। देह धारण करना ही जीव का महान बंधन है। देहवान होते हुए जन्म-मरण की परतंत्रता से छुटकारा कोई भी नहीं पा सकता” इत्यादि। जब कि ऋषि-मनीषी मानव जन्म मिला ही इस कारण मानते हैं ताकि व्यक्ति इस परम पुरुषार्थ, जिसे निर्वाण, मुक्ति, अपवर्ग या निःश्रेयस नाम भी दिया है, इसके लिए कर्म करे व परमतत्त्व की प्राप्ति हेतु इस सुयोग को सार्थक बनाये। मोक्ष को कालान्तर में विकसित मान्यताओं ने परलोक के सुख के प्रलोभनों से जोड़ दिया जबकि वैदिक संस्कृति के प्रणेता के सभी क्षेत्रों में कर्तव्य पालन को धर्म बताते हुए उसी को जीवनमुक्ति-बंधनमुक्ति का मार्ग बताते हैं। उपनिषद्कार कहते हैं कि आत्मतत्त्व सर्वश्रेष्ठ प्राप्त की जा सकने वाली वस्तु है। वे कहते हैं-नाल्पे सुखम्ऽस्ति। यो वैभूमा तत्सुखम्।” सुख तो महानता की प्राप्ति में है जीव के ब्रह्म से साक्षात्कार करने में है वैसा बनने में है-साधनों में लिप्त होने में नहीं। अतः व्यक्ति को इस जीवन में ही आत्मतत्त्व के विकास हेतु प्रयासरत होना चाहिए।
'फिलॉसफी आफ उपनिषद्' पुस्तक में पाल डायसन लिखते हैं कि “जब उपनिषद्कार आत्मज्ञान मोक्ष की बात कहता है तो उसका आशय है उस सत्य की प्राप्ति जिसकी सत्ता अनादिकाल से है। मुक्त तो हम सभी हैं परन्तु सुषुप्ति की अवस्था में सतत् प्रवेश करते रहने के कारण हम बंधनों से मुक्त नहीं हो पाते।” उपनिषद्कार ब्रह्मज्ञान और शरीर यात्रा में कोई विरोध नहीं मानता। दोनों साथ चल सकते हैं। ब्रह्मविदः ब्रह्मैव भवति” कहते हुए ऋषि बताते हैं कि दूसरे लोग तो दुःख को प्राप्त होते है किन्तु जो ब्रह्म को जान लेता है वह स्वयं ब्रह्म हो जाता है।”
तृष्णाओं से मुक्ति ही बंधनमुक्ति अथवा मोक्ष है। मुक्त आत्मा सभी प्रकार के भयों से मुक्त होकर अभय हो जाती है। भय, सन्देह, घृणा, ईर्ष्या आदि के मूल में “अन्य” की भावना अनिवार्यतः विद्यमान रहती है। जब मुक्ति की दिशा में अग्रसर साधक इस “अन्य” की भावना से मुक्त हो जाता है ऊपर उठ जाता है तो भय, सन्देह, घृणा आदि विकार जो दुःखों के कारण हैं दूर हो जाते हैं। उपनिषद्कार कर्म करते हुए ही हमसे सौ वर्ष तक जीने की बात कहता है व यह भी कहता है कि उसमें लिप्त न हों (कुर्वन्नेवेहकर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः) एवं त्वयिनान्य थे तोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे। ईशोप-2)।
श्रीमद्भागवतगीता में योगेश्वर कृष्ण जीवन जीने की कला का जो सुन्दर शिक्षण धनंजय को देते हैं वैसा मोक्ष संबंधी चिंतन भारतीय वांग्मय में कहीं देखने को नहीं मिलता, इसीलिए इस ग्रन्थ को उपनिषदों, रूपी गायों से दुहा गया दुग्धामृत कहा गया है। मोक्ष, गीताकार के अनुसार योग के रूप में जीवन का एक सकारात्मक पक्ष है। ससीम के बंधनों से मुक्त होकर जीवात्मा जब असीम सत्ता के साथ तादात्म्य स्थापित कर लेता है तो उसे योग या मोक्ष कहा जाता है। इसके लिए ज्ञानयोग कर्मयोग व भक्तियोग के तीन मार्ग बताए गए हैं ताकि मनुष्य इस देह के रहते ही अन्यान्य कर्मों में लिप्त होते हुए भी चरम लक्ष्य को प्राप्त करें। विचित्र बात यह है कि श्रीकृष्ण कहते हैं कि संसार में मनुष्य रचना ही कर्म करने के लिए हुई हैं। कर्म के लिए वह बाध्य है। फिर वे कहते हैं कि कर्म ही बंधन व मुक्ति के कारण भी हैं। तो फिर कर्म करते हुए मुक्ति के कारण भी हैं। तो फिर कर्म करते हुए मुक्ति कैसे मिले? उसके प्रत्युत्तर में वे कहते हैं “तू कर्मों के फल की वासना वाला मत बन तथा तेरी कर्म न करने में भी प्रीति न हो” (भगवद् गीता 2/47)। मात्र कर्म में अधिकार रख फल की कामना न करने की बात कहकर वे बंधनमुक्ति का पथ दिखाते हैं। कर्म का अपेक्षित फल हमारे लिए कर्म करने की प्रेरणा न बने। हम अनासक्त भाव से कर्म करें। कर्मयोग की बात कहते हुए श्रीकृष्ण कहते हैं कि जीवन क्षेत्र से भागों मत संन्यास की बात मत सोचो। कर्मों का नहीं काम्य कर्मों का त्याग करो, यह सारा जगत मोक्षमय बन जाए, ऐसे कर्म करते हुए व उन्हें मन से परमसत्ता में अर्पण करते हुए (मीये सन्यस्य मत्परः) यदि कोई पुरुषार्थ करे तो वह मोक्ष इस जीवन में ही पा लेता है।
महाभारतकार कहता है-कर्मणा बध्यते जन्तुर्विद्यया तु प्रमुच्यते।” अर्थात् जीव कर्मों से ही बँधता है और विद्या से मुक्त हो जाता है, कर्म कौन से? सकाम कर्म, जिनका स्रोत अज्ञान में है या निष्काम कर्म स्वयं ज्ञान या विद्या की अभिव्यक्ति है। श्रुति कहती है-ऋते ज्ञानान्न मुक्तिः” (आत्मज्ञान के बिना मोक्ष प्राप्त नहीं हो सकता)। इस तरह सभी ऋषि-मनीषी एक ही सत्य का उद्घाटन करते आए हैं कि मोक्ष के रूप में यदि इसी जीवन में त्याग की प्रतिष्ठापना व्यक्ति के जीवन में हो जाए, काम्य कर्मों व कर्मों के फल-त्याग की विधा वह जीवन में उतार ले तो इस जीवनकाल में ही वह बंधनों से मुक्त हो सकता है।
अब यह प्रश्न उठ सकता है कि ये बंधन क्या हैं व मुक्ति का मार्ग क्या है? परम पूज्य गुरुदेव ने इस संबंध में बड़ा स्पष्ट व व्यावहारिक चिन्तन प्रस्तुत करते हुए लिखा है कि “बंधन तीन ही हैं-लोभ मोह और अहंकार। इन्हीं को तृष्णा, वासना और अहंता कहते हैं। यही वास्तविक बंधन हैं। इन लिप्सा-लालसाओं से जो अपने को मुक्त कर लेता है, समाज का एक विनम्र घटक बनकर स्वयं को सेवा साधना में नियोजित कर देता है उसी के बारे में यह मानना चाहिए कि वह जीवनमुक्त है। बंधन सदा दुष्प्रवृत्तियों के होते हैं।”
मुक्ति के संबंध में परम पूज्य गुरुदेव लिखते हैं कि “यह किसी लोक विशेष में जा बसने जैसी उपलब्धि नहीं है। इसका सीधा सा अर्थ है-भवबंधनों से छुटकारा। संकीर्ण स्वार्थपरता के चक्रव्यूह से निकलकर समष्टि विराट के साथ एकात्मभाव स्थापित करना ही मोक्ष है। दूरदर्शी विवेकशीलता का जागरण ही आत्मज्ञान, आत्म बोध-ईश्वर दर्शन है तथा जिसे यह अनुदान मिल जाता है, वह जीवनमुक्त बनकर देवमानव बनता आत्मभाव का विस्तार करता नजर आता है।” इसी के लिए उपासना, साधना, आराधना की भक्तियोग, ज्ञानयोग, कर्मयोग की साधना, आराधना की भक्तियोग, ज्ञानयोग कर्मयोग की साधना की चर्चा परम पूज्य गुरुदेव ने की है जो गीता में बताए योगशास्त्र का व्यावहारिक प्रतिपादन है। अपनी क्रान्तिकारी लेखनी द्वारा वे हमें बताते हैं कि “तस्मात् योगी भावार्जुन” के द्वारा श्रीकृष्ण ने आसन, प्राणायाम, नेति, धौति वाला योगी बनने को नहीं कहा वरन् अर्जुन को जीवन में उतरने वाला व्यावहारिक योग समझाया है। जीवन आदर्शों के साथ जुड़ जाय यही योग है। योगी वे होते हैं जो स्वयं तो बंधनों से मुक्त होते ही हैं, औरों को भी वह पथ दिखाते हैं।”
भारतीय संस्कृति नर-मानव को देवमानव बनाने वाली प्रक्रिया का प्रशिक्षण अध्यात्म तत्त्वज्ञान के माध्यम से देती चली आयी है। पुरुषार्थों में परम पुरुषार्थ यही है आत्मसत्ता का विकास। लोग यही समझते आए हैं कि मोक्ष मरने के बाद मिलता है, किसी अन्य लोक में रहना पड़ता है। सालोक्य, सामीप्य सायुज्य, सारूप्य लाभों के नाम से चार मुक्तियों की चर्चा की जाती है, यह मनःस्थिति के विभिन्न आयामों का नाम है। वास्तविक मुक्ति तो उन बंधनों से है जिनका सामना दैनन्दिन जीवन में हम कहते हैं व मानवी गरिमा को भूलते हुए अदूरदर्शी जीवन व्यवहार करते देखे जाते हैं। सारा जीवन साधनों के संचय, वासना-उपभोग व अहंता की सिरफुटौवल में नियोजित कर देते हैं। जब इन सबसे अपना आपा ऊपर उठ जाता है तो यह बंधनमुक्ति या मोक्ष कहलाता है, ऐसी पूज्यवर की मान्यता है जो नितान्त व्यावहारिक है। जीवनमुक्त को फिर संसार में किसी भी वस्तु से कोई आसक्ति नहीं रहती। शरीर उसके लिए वैसा ही होता है, जैसे सर्प के लिए केंचुली। आचार्य शंकर ने तर्क, श्रुति और अनुभूति के आधार पर इसी प्रकार की मोक्ष की संभावना को निरूपित किया है। परम पूज्य गुरुदेव का मोक्ष के संबंध में चिन्तन हम आचार्य शंकर व योगीराज अरविन्द के बीच समन्वयात्मकता स्थापित करने वाला पाते हैं जिसमें जहाँ संपूर्ण धरित्री के मोक्ष की बात श्री अरविन्द अतिचेतन के माध्यम से करते हैं व अद्वैत वेदान्त के प्रतिपादन द्वारा आचार्य शंकर जीवनमुक्ति की आत्मा के उर्ध्वगमन की चर्चा करते हैं वहाँ संस्कृति पुरुष गुरुदेव मानव में देवत्व के उदय और धरती पर स्वर्ग के अवतरण की व्याख्या द्वारा पूरी समष्टि की बंधनमुक्ति का पथ हम दिखाते हैं, जो हर मुमुक्षु का परम लक्ष्य है।
“वेल मि. ह्यूमैन, तुम्हें इन किताबों से क्या कभी भी छुट्टी नहीं मिलती ?” “ओह डॉक्टर!” उठकर उस अमेरिकन ने मनीन्द्र बाबू से हाथ मिलाया । मैं आज बड़ी उलझन में पड़ गया हूँ । अच्छा, पहले चाय तो पी लो, खानसामा, दो कप चाय ।’
खानसामा उस दिन के वार्त्तालाप को याद कर रहा था । ढेरों पुस्तकें बिखरी पड़ी थीं । कुछ अँग्रेजी की थीं कुछ संस्कृत की, तथा कुछ अन्य भाषाओं की । मेज के खाली कोने पर खानसामा ने चाय के प्याले रख दिए । ‘आप तो प्रसिद्ध पशु-विशेषज्ञ हैं’! ह्यूमेन ने चाय पीते-पीते कहा “भारतीय गौ की नस्ल तो बेहद गिर गई है । यद्यपि वह यहीं का पशु है ।” मैंने प्रारंभ में ही कहा था” डॉक्टर ने वैसे ही कहा “आपको यहाँ कुछ नहीं मिलेगा । अमेरिकन गायों की तुलना यहाँ से नहीं की जा सकती ।”
ह्यूमैन साहब एक अमेरिकन पशु विशेषज्ञ थे और गायों की नस्ल सुधारने के संदर्भ में अनेक देशों में उन्होंने भ्रमण किया था । उनका कहना था कि गाय भारतीय पशु है और किसी न किसी प्रकार यहीं से संसार में फैला है । इसी विश्वास ने उन्हें भारत की ओर आकृष्ट किया था । यहाँ आकर एक भारतीय विशेषज्ञ से उन्होंने परिचय भी कर लिया।
‘लेकिन प्रारंभ में यहाँ की नस्ल ऐसी नहीं थी ।’ वह गम्भीर हो गए “अच्छा तुम्हारे किताबों में यह कामधेनु शब्द बार-बार आया है । इसे तुम जानते हो?” उनकी आँखें सामने बैठे व्यक्ति पर स्थिर हो गई ।
‘ओ।’ ‘तो यह है आपकी उलझन?’ हँसी के बीच जवाब उभरा । ‘आप पुरानी कहानियों के चक्कर में पड़ गए हैं । इनमें कोई तथ्य नहीं है ।’ आधुनिक विचारों के कारण ये भारतीय सज्जन ऐसी बातों पर ध्यान देना व्यर्थ समझते थे । ‘मैं इसे ऐसा नहीं समझता ‘ वह अमेरिकन विशेषज्ञ उनकी उपेक्षा से तनिक भी प्रभावित नहीं हुआ । उसका मुख और गम्भीर हो गया , चाय का प्याला मेज पर रखकर वह सीधा बैठ गया । “कामधेनु का शब्दार्थ तो हुआ चाहे जब और जितनी बार इच्छा हो उतनी बार दुही जा सकने वाली । लेकिन किताबों में तो दूसरा ही कुछ लिखा है ।” “आपका संस्कृत ज्ञान प्रशंसनीय है ।” भारतीय को इस अमेरिकन विशेषज्ञ पर हँसी आ रही थी । वह क्यों मूर्खतापूर्ण बातों पर विश्वास करने जा रहा है । ‘फिर भी मैं आपको ऐसी गप्पों में अपना अमूल्य समय नष्ट करने की सलाह नहीं दूँगा । “मैं प्रयोग करूँगा।” उसे पक्की धुन थी । “मैं ठीक तरह से तुम्हारी किताबों का अक्षर-अक्षर पालन करके प्रयोग करूँगा । मुझे एक अच्छी गाय ला दो । ऐसी गाय जो चाहे जब दुही जा सके और देखो वह कपिला हो बस !” और उसी दिन उन्हें गाय मिल गई ।
लम्बी रजतवर्ण दाढ़ी तथा श्वेत दीर्घ केश वाले खानसामा ने अपने अमेरिकन साहब की बातों को सुनाते हुए उनकी ओर कुछ इस तरह देखा जैसे अब वह किसी गम्भीर रहस्य पर से पर्दा उठाने थीं । स्वाभाविक भी था एक अमेरिकन पशु विशेषज्ञ भारत आकर यहाँ की शास्त्रोक्त बातों पर प्रयोग करे अपना जीवन खपाकर उनके सत्यापन में जुट जाए इसका विवरण कौन नहीं जानना चाहेगा ? उस बूढ़े मुसलमान खानसामा ने उनकी जिज्ञासा को भाँपकर कहना शुरू किया ।
तो अपने प्रयोग के दौरान एक-दो दिन में ही साहब को पता चल गया कि आगरे जैसे बड़े शहर में रहकर वे प्रयोग नहीं कर सकते । पन्द्रह मील दूर यमुना किनारे उन्होंने एक ढाक का जंगल खरीद लिया । वहीं एक छोटा बंगला बनवा लिया और उस गाय को लेकर आ गए ।
सिंचित जंगल घास से भर जाना ही था । चारों ओर काँटेदार तार लगा दिए गए थे । बंगले पर साहब गाय और उसकी बछड़ी और मुझ खानसामा को छोड़कर कोई प्राणी नहीं रहता था ।
पहले ही दिन मुझे आश्चर्य हुआ जब साहब एक छोटी लकड़ी में रूमाल बाँधकर सबेरे गाय चराने निकले । ‘यह मेज को झाड़ने के लिए तो ठीक था पर गाय चराने के लिए । फिर साहब एक चरवाहा क्यों नहीं रख लेते ? लेकिन मैं जानता था कि साहब झक्की है ।
दो महीने से हयूमैन अपने को तैयार कर रहे थे । अनेक उलट फेर उन्होंने अपने भोजन तथा रहन-सहन में किए थे । चाय वे छोड़ चुके थे और धूप में टहलने का अभ्यास भी कर चले थे ।
घिरे हुए जंगल में साहब अपने झाड़न से गाय के ऊपर बैठने वाले मक्खी मच्छर उड़ाते हुए उसके पीछे-पीछे घूमते रहे । कहीं रोकने की जरूरत नहीं थी । बड़ी नालियों में स्वच्छ जल भरा था। दोपहर में आदेश के अनुसार खानसामा वहीं भोजन दे गया । पहले दिन भूमि पर बैठ कर साहब ने भोजन किया । पतलून छूट गई । उससे जमीन पर बैठने में अड़चन होती थी । हाफ् पैण्ट और हाफ् कमीज बस । हैट धूप से बचाने को चाहिए ही । काँटा-चम्मच छोड़कर उन्होंने हाथ से भोजन करना प्रारम्भ किया । मैं शहर जाऊँ तो रोटी पहुँचावे कौन ? केक, बिस्किट के बदले टिक्कर ठोके जाने लगे ।
‘साहब क्या पागल हो गया है ?’ मैं कभी-कभी सोचता, वह सुबह गाय के पैर धोकर वह गन्दा पानी मुँह में डालता है । हिन्दुओं की तरह फूल-रोली से उसकी पूजा करता है । शाम को गाय के पास चिराग रात भर के लिए जलाता है । जैसे गाय कोई बच्चा है जो अँधेरे में डर जाएगी । रात को चटाई डालकर वहीं जमीन पर सो रहती है ।’ दिन भर अकेले रहते-रहते मैं ऊब जाता था ।
वैसे साहब मुझे बहुत भला लगता । ‘मैं जैसी रोटी बनाता वैसी खा लेता । गाय के पास झाडू खुद देता । कमरे में भी झाडू न दिया हो तो अपने आप देने लगता । कभी डाँटता नहीं तनख्वाह ठीक पहली को हाथ पर रख देता । सोचता खुदा उसका पागलपन दूर करे । कभी-कभी मुझे लगता जरूर इस गाय पर कोई जिद सवार है और उसी ने साहब को पागल बना दिया है । कई बार मैं साहब की आँख बचाकर कलमा पढ़कर गाय पर फूँक मार चुका था ।’
‘आज मैं देखूँगा कि जंगल में साहब दिन भर क्या करता है । लगभग छः महीने बाद मैंने एक दिन निश्चय किया और उस दिन साहब को रोटी देकर बंगले नहीं लौटा । झाड़ियों में छिपकर बैठा रहा । गाय आराम से एक ढाक के नीचे बैठी थी । उसकी बछड़ी इधर-उधर फुदक रही थी और साहब उसके सामने घुटनों के बल बैठा हुआ था । उसने हाथ जोड़ रखे थे, प्रार्थना कर रहा था , और बेतरह रो रहा था ।
‘मैं बुरी तरह चीख पड़ा । यह क्या ? गाय आदमी जैसी साफ अँग्रेजी बोल रही थी । मैं डर कर बेहोश हो गया । पता नहीं कब तक वहाँ पड़ा रहा । जब आँखें खुलीं तो बँगले में पलंग पर लेटा हुआ था और मेरा साहब सामने खड़ा मुस्करा रहा था ।’ अपनी बात समाप्त करते हुए वे मुसलमान सज्जन भाव से अभिभूत हो गए । पास के नीम के पेड़ के पास बैठी चागुर कर रही एक दुग्धोज्ज्वल हृष्ट-पुष्ट गौ की तरफ इशारा करके बोले यह उसी कामधेनु की बछड़ी है । जब से साहब का इन्तकाल हुआ तब से मैं इसकी सेवा कर रहा हूँ ।
एक ईसाई और दूसरा मुसलमान इनके द्वारा की गई गौ सेवा न उन्हें अनेकानेक विचारों और भावों की उन्मत्त तरंगों से घेर दिया । राजा दिलीप की गौ-सेवा के दृश्य उनकी आँखों के सामने उभरने लगे । थोड़ा हिचकते हुए उन्होंने सामने खड़े वृद्ध सज्जन से पूछा ‘आप तो मुसलमान हैं आपके धर्म में तो कुर्बानी .......।’
‘उस पाक परवरदिगार के लिए माफ करो’ बड़ी व्याकुलता से उन्होंने इन खादीधारी सज्जन को रोक दिया’ किसी को कोई हक नहीं कि कुरान शरीफ को बदनाम करे और हजरत साहब पर ऐसे दोष मढ़े ।’ वाक्य समाप्त करते-करते उनकी आँखें भर आयीं । वृद्ध सज्जन की भाव मुद्रा देखकर वे पश्चाताप के स्वर में बोले “माफ करना मेरा इरादा आपको कष्ट देने का नहीं था ।” ह्यूमैन साहब के प्रयोग-इन वृद्ध सज्जन की अनुभूतियाँ उन्हें मथने लगीं । वह सोचने लगे-जिनकी संस्कृति ने गौ को माँ कहकर पूजनीय माना उनमें से घरों में बाँधकर गाय को चारा-पानी के लिए तरसाने वाले कम नहीं हैं । दूध की आखिरी बूँद तक दुहकर-गाय के बच्चे को तड़प कर मरने के लिए छोड़ने वाले ग्वाले भी अपने को हिन्दू कहते हैं गायों के मूक अनु अभिशाप बनकर हिन्दू जाति को लग गए हैं और वह अपना कर्मफल भोग रही हैं । उनके मन में इसका प्रायश्चित्त स्वरूप कुछ करने की कसक उठी ।
वे वृद्ध सज्जन को प्रणाम करके चलने लगे । पर उन्होंने रोकते हुए कहा दूध तो पीते जाओ । वृद्ध उठ खड़े हुए । बाहर नन्हा सा ढाक था , जिसके पत्ते तोड़कर उन्होंने दोना बनाया , और बिना किसी उत्तर की प्रतीक्षा किए दोना उनके हाथ में रख दिया ।
गाय नीम के नीचे खड़ी हो गई थी । ‘तुम थनों के नीचे बैठ जाओ ।’ वे गाय के सामने घुटने टेक कर बैठ चुके थे , अम्मा, अपने घर ये मेहमान आये हैं । ‘ वह आश्चर्य चकित रह गए । गाय के चारों थनों से दूध की धारा बहने लगी थी । दोना बराबर भरता रहा और वह पीते रहे उतना स्वादिष्ट दूध उन्होंने जीवन में कभी नहीं पिया था ।
‘सचमुच कामधेनु पाई है आपने । पर क्या आपकी कामधेनु कहाँ है ? मैं वैसी सेवा कहाँ कर पाता हूँ । वह तो साहब ही थे थोड़ी देर रुककर वे बोले “उन्हें कामधेनु ने खुदा का जलता तक दिखाया और वह खुद उन्हें लेकर मालिक के दरबार में चली गयी ।” कहने वाले की आँखों में अनुभूति की गहरी चमक थी जो सुनने वाले के अंतर्गत को बेधती हुई चली गई ।
वृन्दावन की इस अनुभूति ने उनके जीवन में चमत्कारी परिवर्तन कर डाले । वहाँ से लौटकर उन्होंने अक्टूबर 1941 में वर्धा में गौ सेवा संघ की स्थापना की । देश ने इस गौ-सेवा के अग्रणी को जमना लाल-बजाज के नाम से जाना । लेकिन वह स्वयं इस नाम यश से दूर-अपने द्वारा स्थापित गौ-पुरी में निवास कर भारतीय संस्कृति में वर्णित गौ-महिमा का जीवन्त साक्षात्कार करते रहे । प्रयोगधर्मी और सत्य की उपासक देव संस्कृति के तत्व आज भी जीवन्त हैं । पर इनके साक्षात्कार के लिए सत्य का अन्वेषक चाहिए । सत्यान्वेषण में तत्पर परम प्रज्ञा आज भी भौतिक की परतों में छुपे दैनिक और आध्यात्मिक रहस्यों का जागरण करने में सक्षम है ।
युगों-युगों से एक ही प्रश्न मानव के जिज्ञासु मन को सोचने पर बाध्य करता रहा है कि वह कौन है ? क्यों इस धरती पर आया है ? यह सृष्टि जो दृश्यमान है, वह क्या है ?, इस सृष्टि का आदि कारण क्या है ? , जो दिखाई दे रहा है, वह सच है या भ्रान्ति मात्रा है ?, सृष्टि यदि किसी सृजेता ने बनाई है तो उसमें मानव का क्या प्रयोजन है-आदि -आदि । भारतीय संस्कृति की मनीषा की सबसे अनुपम देन यदि कोई विश्वमानवता को है तो वह यही है कि देव संस्कृति के रचयिताओं ने इस संबंध में मंथन-चिन्तन कर सृष्टि-ब्रह्म मनुष्य इन सबके विषय में बड़ा ही व्यावहारिक प्रतिपादन प्रस्तुत करते हुए व्यक्ति के धरती पर अवतरण को सोद्देश्य बताया है । सृष्टि के रहस्यों की व्याख्या करते हुए उनने उस विश्वउद्यान को, जो स्रष्टा ने विनिर्मित किया है, सजाते-सँवारते रहने का दायित्व भी मनुष्य को सौंपा है । यह आस्तिकतावादी दर्शन जो व्यक्ति को निरन्तर कर्म-परायण बने रख अंतर्मुखी बनाता है, भारतीय दर्शन की सबसे बड़ी विशेषता है ।
छान्दोग्योपनिषद् (694) में उपनिषद्कार बड़े सुन्दर ढंग से मानव व सृष्टि का संबंध बताते हुए एक चिरन्तन सत्य का उद्घाटन करता है-एतद् आत्म्यमिदं सर्वं, तत्सत्यं, स आत्मा, तत्त्वमसि श्वेतकेतो-” अर्थात् संपूर्ण व्यक्त जगत के लिए यह सत्य ही आत्मा है । वही सत्य है, वही आत्मा है और है श्वेतकेतु ! तू वही है ।” मानव तथा उसके साथ छिपी अनन्त संभावनाओं के बारे में तत्त्वमसि एक वैसा ही गूढ़तम सत्य है, जैसे कि आधुनिक भौतिकी में पदार्थ के एक कण के पीछे निहित अनंत ऊर्जा की संभावनाओं को Е=द्वष्2 सूत्र के माध्यम से व्यक्त किया जाता है ।
आस्तिकता पर टिकी देव संस्कृति सृष्टि के संबंध में मनुष्य का दृष्टिकोण स्पष्ट करती हुई उसे उसका कर्तव्य स्पष्ट रूप से समझाती है । सृष्टि संस्कृत का शब्द है वह इसका अर्थ है रची हुई चलती हुई वस्तु । यह परमाणुओं के समुच्चय से बनी है या प्रकृति रूपी मूल तत्व से इस संबंध में दार्शनिक मतभेद कई हो सकते हैं । चूँकि भारतीय दार्शनिक यह मानते हैं कि यह सृष्टि किसी ने बनाई है, वे आस्तिकतावादी कहलाते हैं । नास्तिकतावादी यह कहते हैं कि यह तो स्वभावतः बन गयी है व अनादिकाल से बनती बिगड़ती चली आई है । कोई कहते हैं, कि कुदरती रचना मात्र है यह व इसमें किसी बुद्धिमत्तापूर्ण सत्ता का बनाने में कोई योगदान नहीं है । कुछ इसे आकस्मिक एक विस्फोट से हुई मानते है, आस्तिकतावादी भारतीय दार्शनिक कहते हैं कि सृष्टि को रचने वाली एक ज्ञानमय सत्ता है जो किसी प्रयोजन विशेष की सिद्धि के लिए सृष्टि बनाती और बिगाड़ती है । ऋषि चिन्तन यह कहता है कि सृष्टि के अवलोकन से चार निष्कर्ष निकलते हैं - (1) सृष्टि नियमानुकूल है नियमों से बँधी हुई है (2) इन नियमों से अपार बुद्धि का परिचय मिलता है (3) यह नियम अटल हैं तथा (4) यह नियम सूक्ष्म से सूक्ष्मतम वस्तु पर भी शासन करते हैं व कोई भी वस्तु इन का उल्लंघन नहीं कर सकती । इस प्रकार वे सिद्ध करते हैं कि ईश्वर इस जगती का नियन्ता है, ज्ञानवान है अर्थात् सर्वज्ञ है, एक रस है तथा सूक्ष्म व सर्वशक्तिमान है ।
ईश्वर व सृष्टि संबंधी प्रारंभिक चिन्तन हमको एक ऐसी सत्ता की जानकारी देता है जो बुद्धिमत्तापूर्ण भी है व इच्छा शक्ति वाली भी । इसे यदि हम नियम व्यवस्था से रूप में इकोलाॅजी विधि व्यवस्था के रूप में समझ लें तो ठीक रहेगा । अलबर्ट आइंस्टीन ने कहा था कि स्रष्टा के यहाँ कुछ भी अव्यवस्थित नहीं है । यहाँ सब कुछ सुनियोजित है । भगवान कभी पासे नहीं खेलता” । इसी तरह जेम्स जीन्स कहते हैं कि स्रष्टा के रूप में एक ऐसे कलाकार की आकृति मेरे मन में आती है जिसने बड़े मन व लगन से एक कृति बनायी है जिसमें बहुत प्रकार के रंग अपनी तूलिका से सँजोए है । कोई चाहकर भी उनमें कोई कमी नहीं निकाल सकता ।” परम पूज्य गुरुदेव ने लिखा है कि “सृष्टि एक व्यवस्था के रूप में उस लीला पुरुष द्वारा अपने ज्येष्ठ पुत्र मनुष्य के लिए क्रीड़ाँगन के रूप में बनायी गयी है । यहाँ का हर क्रियाकलाप उसके द्वारा व्यवस्थित है, नियम द्वारा संचालित है तथा यह ईश्वरीय सत्ता पूर्णतः तर्क, तथा प्रमाण पर आधारित है ।”
वेद का ऋषि कहता है कि यह समस्त सृष्टि एक नियम के आधीन है, जिसे वेद में ‘ऋत्’ नाम से पुकारा गया है । यह ‘ऋत्’ एक है, ढेर सारे नहीं है । यह ऋत् उस अपार विराट बुद्धि में निवास करता है, जिसे आस्तिक लोग ईश्वर नाम से जानते हैं। अथर्ववेद में ऋषि कहते हैं-ऋतु के फैले हुए तंत्र को देखने के लिए मैं लोक-लोकान्तर में घूम आया (चारों ओर उसी का साम्राज्य है)।” “परि विश्वा भुवनान्यायम्। ऋतस्य तन्तुँ विततं दृशेकम्॥ (अथर्व 2/1/5) ऋग्वेद में भी कहा गया है ऋत् और सत्य उत्पन्न करने के लिए ईश्वर ने तप किया।” “ऋतं च सत्यं चाभीद्धात तपसोऽध्यजायत” (ऋग्वेद 10/190/1)।
इतना स्पष्ट चिंतन होते हुए भी मनुष्य भ्रान्तियों में उलझा जाता है व विभिन्न मत-मतान्तरों के हिचकोलों में इधर उधर झूलने लगता है। उदाहरण के लिए आचार्य शंकर का मायावाद। उनने कहा-ब्रह्मसत्यं जगत्मिथ्या”। यह परमात्मा सत्य है व संसार झूठ है। पर क्या-संसार से हटकर परमात्मा की परिकल्पना की जा सकती है? परमात्मा की ही कृति है यह सृष्टि अतः जगत की कल्पना उसके बिना, सृजेता के बिना कैसे की जा सकती है? उत्तर मीमांसा (वेदांत दर्शन) पर लिखे आद्यशंकर के भाष्य में जो माया का प्रसंग आया है वह नया नहीं है। वेद में आया है- “इन्द्रो मायाभिः पुरुरुप ईयते” (इन्द्र ने माया द्वारा नाना रूप ग्रहण किए)। यहाँ माया का अर्थ हैं इन्द्र जाल। बाद में श्वेताश्वेतरोपनिषद् में हम पढ़ते हैं-मायाँ तु प्रकृति विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम् अर्थात् “ माया को ही प्रकृति समझो और माली को माया रचने वाले को महेश्वर।” जगत मिथ्या व माया का रूप है इसके माध्यम से भारतीय संस्कृति के अध्येता मनीषी यह कहना चाहते थे कि “इसका निरपेक्ष अस्तित्व नहीं है। मेरे तुम्हारे और अन्य सबके मन के संबंध में इसका केवल सापेक्ष अस्तित्व है। यह सत् और असत् का मिश्रण है।” मृत्यु रूपी भयावह तथ्य सामने होते हुए भी यह जानते हुए भी कि सबको मृत्यु के मुख में जाना है, जीवन के प्रति व्यक्ति की विषम आसक्ति, भोगों के प्रति आसक्ति को व परित्याग न कर पाने की विवशता को आचार्य शंकर तथा स्वामी विवेकानन्द माया कहते हैं। परमपूज्य गुरुदेव ने यहीं अपना चिन्तन आज की परिस्थितियों के परिप्रेक्ष्य में यह दिया है कि संसार में दुःख है, हम उन्हें कर्मों द्वारा कम करना सीखें तथा पूर्णता की प्राप्ति हेतु त्याग करना भी सीखें। इस संसार को माया मानने से आशय है कि भवबंधनों के रूप में कृत्रिम आनन्द की मोह-माया में फँसाने वाले तृष्णा, वासना, अहंता विभिन्न रूपों में हमारे चारों ओर हैं। इन सबको माया का रूप, क्षणिक मात्र मानकर हम स्वयं को अंतर्मुखी बनाएँ मायावाद पूज्यवर के अनुसार जीवन से भागना नहीं सिखाता, पलायनवादी दर्शन नहीं है, अपितु व्यक्ति को वास्तविकता की अनुभूति करता है।
दूसरी ओर एक अन्य चिन्तन शून्यवाद के रूप में बौद्धों द्वारा प्रणीत हुआ। जिसके अनुसार सब कुछ दुःख ही दुःख से भरा हुआ है इस संसार में पाश्चात्य दार्शनिक लीबन्ब्जि ने तो चिद् बिन्दुविद्या (मोनोडालाजी) के रूप में संवाद के संबंध में यह सिद्धान्त दे दिया कि हरेक का अपना संसार अलग है और प्रत्येक में अपने विकास की सामर्थ्य है। सृष्टि क्यों है? यह कोई दार्शनिक बता नहीं पाया, विभिन्न वादों द्वार मनुष्य को भ्रम जंजालों में उलझाने का प्रयास और किया। वस्तुतः सृष्टि का प्रयोजन है-परमात्मा की बहुविध अभिव्यक्ति और इसके लिए उसने मनुष्य को चुना है। यह संसार मनुष्य की प्रशिक्षणशाला है तथा हर व्यक्ति यहाँ अपने को अपूर्ण से पूर्ण तथा समग्र बनाने आता है।
जहाँ फ्रायड ने मनुष्य को “कामनाशील प्राणी” माना वहाँ महात्मागाँधी ने उसे नैतिक प्राणी कहा है। किन्तु परम पूज्य गुरुदेव ने उसे “आध्यात्मिक प्राणी” कहा है। विकासवाद के सभी प्रचलित मतों का खण्डन करते हुए उनने मानव को सृष्टि की परम सृजेता की गौरवमयी अभिव्यक्ति बताया। प्रकृति के अनुसार नहीं, इंस्टीक्ट्रस के अनुसार नहीं वह परमेश्वर की इच्छा के अनुसार जीवन जीने आया है व उसका एक मात्र कर्तव्य है स्रष्टा के इस उद्यान को माली के रूप में सींचना, इसके सौंदर्य को निखारना। इसी में उसका निज का विकास भी छिपा हुआ है, जिस के लिए उपनिषद्कारों से लेकर गीताकार ने विस्तारपूर्वक वर्णन किया है। जो ब्रह्माण्ड में है उसी की छोटी अनुकृति पिण्ड में-मानव में हैं। पूज्य गुरुदेव लिखते हैं कि मृग-मरीचिका में न भटककर अपने आपे की महानता को पहचानते हुए यदि निज को आत्मिक स्तर पर ऊँचा उठा सकें तो वही महामानव, देवता, ऋषि मनीषी अवतार आदि बन सकता है, मानवी चेतना की प्रगति का अन्तिम एवं उच्चतम सोपान देवत्व है जिसके विषय में श्वेताश्वेतर उसे “अमृतस्य पुत्रा” कहकर संबोधित करता है। शरीर यात्रा में उसका जीवन न लग जाए। जो भी समय, बुद्धि वैभव, बल उसके पास है। उसका उपभोग भगवान के विश्व उद्यान को सुव्यवस्थित बनाने के लिए होना चाहिए। इसके लिए उसे सेवा साधना को जीवन में स्थान देना चाहिए। भारतीय संस्कृति के अध्येता पूज्यवर सृष्टि को सोद्देश्य बताते हैं, मानव के प्रयोजन की विशिष्टता भी समझाते हैं व आज की परिस्थितियों में उसे उसका कर्तव्य भी सुझाते हैं।
भारतीय संस्कृति का प्रधान केन्द्रीय तत्व है-भाव-संवेदना इस गुण की प्रचुरता जिसमें है, वह नारी शक्ति देव संस्कृति के विकासक्रम में एक धुरी की भूमिका निभाती आयी है। ऋषिगण आदि सत्ता महामाया, जिसके आधार पर सृष्टि की संरचना संभव हुई है, को विधाता भी कहते आये हैं व माता भी। प्राणियों का अस्तित्व ही यदि इस धरती पर है तो उसके मूल में मातृशक्ति की प्राणियों पर अनुकम्पा है। सृजनशक्ति के रूप में इस संसार में जो कुछ भी सशक्त, सम्पन्न, विज्ञ और सुन्दर है, उसकी उत्पत्ति में नारीतत्त्व की ही अहम् भूमिका है। देवसंस्कृति में सरस्वती, लक्ष्मी और काली के रूप में विज्ञान प्रधान और गायत्री-सावित्री के रूप में ज्ञानप्रधान चेतना के बहुमुखीय पक्षों का विवेचन अनादि काल से होता आया है।
परमपूज्य गुरुदेव ने नारी शक्ति के माध्यम से ही इक्कीसवीं सदी के आगमन की बात कही व घोषणा की है कि विश्व मानवता की भावी निर्धारण उन्हीं गुणों के आधार पर होने जा रहा है जो आदि सृजेता के रूप में नारीसत्ता के साथ अविच्छिन्न रूप से जुड़े हुए हैं। पूज्य गुरुदेव ने लिखा है-देवत्व के प्रतीकों में प्रथम स्थान नारी का और दूसरा नर का है। लक्ष्मी-नारायण उमा-महेश शची पुरंदर, सीता-राम राधे श्याम जैसे देव युग्मों में प्रथम नारी का और पश्चात् नर का उल्लेख होता है। वह मानुषी दीख पड़ते हुए भी वस्तुतः देवी है। श्रेष्ठ व वरिष्ठ उसी को मानना चाहिए। भाव संवेदना, धर्मधारणा और सेवा साधना के रूप में उसी की वरिष्ठता को चरितार्थ होते देखा जाता है।”
वैदिक मान्यताओं के अनुसार नारी बिना, शक्ति के बिना यह संपूर्ण विश्व सार-शून्य है। सृष्टि विस्तार की दृष्टि से भी निस्सन्देह पुरुष की अपेक्षा नारी की महत्ता अधिक है। वह पुरुषों की जननी है। उसकी सब कामना करें व उसके द्वारा पालित हों, ऐसा निर्देश वैदिक ऋषि देते आए हैं। ‘कन्या’ शब्द का अर्थ होता है “सबके द्वारा वाँछनीय” सब उसकी कामना करें। ऐतरेयोपनिषद् में स्पष्ट आता है-नारी हमारा पालन करती है, अतः उसकी पालना करना हमारा कर्तव्य है।” अथर्ववेद में उसे सत्याचरण की अर्थात् धर्म की प्रतीक कहा गया है (सत्येनोत्रभित भूमिः)। कोई भी धार्मिक कार्य उसके बिना अधूरा माना जाता रहा है। ऋग्वेद का ऋषि लिखता है-
“शुचिभ्राजा उषसो नवेद, यशस्वतीरपस्युवो नसत्याः।” (ऋग 1/79/1)
अर्थात्-श्रद्धा प्रेम, भक्ति, सेवा, समानता की प्रतीक नारी पवित्र, निष्कलंक, आचार के प्रकाश से सुशोभित, प्रातःकाल के समान हृदय को पवित्र करने वाली, लौकिक कुटिलताओं से अनभिज्ञ, निष्पाप, उत्तम यशयुक्त, नित्य उत्तम कर्म करने की इच्छा करने वाली, सकर्मण्य और सत्य व्यवहार करने वाली देवी है।”
एक भ्रान्तिपूर्ण मान्यता, कि कन्या का जन्म अमंगलकारी है, हमारे देश में मध्यकाल में पनपी व इसी कारण आदिजननी शक्ति दोयमदर्जे की मानी जाने लगी। नारीशक्ति की अवमानना, तिरस्कार, होने लगा। जबकि संस्कृति के स्वर आदि काल से कुछ और ही कहते आए हैं। ऋग्वेद (6/75/5) में कहा गया है कि “वह पुरुष धन्य है, जिसे कई पुत्रियाँ हों, “तथा” पुत्र से पिता को जो आनन्द मिलता है वही पुत्री से माता को बल्कि उससे भी अधिक (3/31-1-2)। उपनिषदों में भी यही बात स्पष्टतः सामने आई है। बृहदारण्यकोपनिषद् में विदुषी और आयुष्मती पुत्री पाने के लिए घी और तेल में चावल पकाकर खाने की विधि कही गयी है (6/4.17)। मनुस्मृति (9/130) में कहा गया है कि पुत्री को पुत्र के समान समझना चाहिए क्योंकि जिस प्रकार आत्मा पुत्र रूप से उत्पन्न होता है उसी प्रकार वह पुत्री के रूप में जन्म लेती है। महाभारत में संन्यास लेने की पात्रता उसी गृहस्थ को प्राप्त है जिसने अपने गृहस्थधर्म का पालन करते हुए सभी कर्तव्यों को पूरा कर लिया है। इन कर्तव्यों में अपनी पुत्रियों का विवाह कर देना प्रमुख है (महाभारत उद्योगपर्व 36-39)। मनुस्मृति में पिता के उत्तराधिकार का जो भाग पुत्री को देने का विधान है, उसका हेतु ध्यान देने योग्य है।
विवाह की चिन्ता और सामर्थ्य से बाहर दहेज के कारण लोकगीत मध्य काल में ऐसे रचे जाने लगे कि पुत्री जन्म ही अशुभ माना जाने लगा। पंचतंत्र के कुछ आख्यानों में भी यह बात आयी। कालान्तर में मध्यकाल में यह धारणा खूब फली-फूली व स्त्री-धन की उपेक्षा शास्त्र वचनों की दुहाई देकर अधिक से अधिक की जाने लगी। वस्तुतः यह कालक्रम के अनुसार पैदा हुई विकृति है। नहीं तो पिता के वात्सल्य का आदर्श तो हर युग की एकमान्य आस्था रही है। इसी आस्था के कारण रामायण में जनक कहते है “जिस सीता को मैं प्राणों से बढ़कर चाहता हूँ, उसे राम को सौंपकर मेरी वीर्य शुल्क की प्रतिज्ञा पूरी हो जाएगी” (वा.रा. बालकाण्ड 67/23)। यह भारतीय संस्कृति की ही चिर पुरातन मान्यता है कि जैसे पुत्र अपने पिता, पितामह इत्यादि पितरों को नरकों से तारता है, इसी प्रकार दौहित्र अपने नाना को।” महाभारतकाल में एक चक्रनगर का निर्धन, विचारशील ब्राह्मण बकासुर की भेंट चढ़ाए जाने से अपनी कन्या को रोकता है व स्वयं जाने को तत्पर हो जाता है, तब भीम उसके स्थान पर जाते हैं। कुन्ती को पुत्री रूप में शूरसेन तथा कुन्तिभोज ने पुत्र से अधिक प्यार देकर स्नेहपूर्वक पाला था। महर्षि कण्व शकुन्तला को दुष्यंत के पास विदाई हेतु भेजते समय भावार्द्र हो उठते हैं व कहते हैं “जब मुझ जैसे वनवासी का चित उग्र हो रहा है, तो फिर कन्या विछोह सामान्य गृहस्थों के लिए कितना असह्य होगा?” (शाकुन्तल 2/6)। इससे समाज की सही अवस्था का परिचय मिलता है।
कन्या के वंदनीय पूजनीय अंश के रूप में “उत्तर रामचरित” में महाकवि भवभूति ने अपनी मधुमयी वाणी में जनक जैसे ब्रह्मविद् कर्मयोगी से वनवासिनी स्वदुहिता सीता के लिए उत्तर रामचरित (4/11) में कहलवाया है कि “तुम मेरी कन्या हो या शिष्या यह ध्यान देने की बात नहीं है । तुम्हारा आचरण अपनी पूर्ण परिणति को पहुँचा हुआ है, जिसमें मुझे तुम्हारे प्रति विशेष श्रद्धा हो रही है। स्त्री रूपिणी अथवा अवस्था में कम होने पर भी तू जगद्वंद्य है क्योंकि गुणियों का आदर उनके गुणों से होता है, न कि जाति (लिंग) या अवस्था भेद से।” भारतीय संस्कृति में कन्या कितनी मान्य है, इसके लिए शास्त्रों के व्याख्याता वेदव्यास का एक वाक्य ही समुचित होगा, जिसके अनुसार “समग्र महाभारत सुनने का एक मधुर फल भाग्यशालिनी कन्या का जन्म” निर्दिष्ट किया गया है।
शंकराचार्य-मंडन मिश्र शास्त्रार्थ में भारती को मध्यस्थ नियुक्त करना, भास्कर द्वितीय द्वारा अपनी मेधाविनी कन्या लीलावती के नाम पर गणित के अमूल्य ग्रन्थ “लीलावती” की रचना तथा वेदांत के सर्वश्रेष्ठ प्रतिपादक वाचस्पति मिश्र द्वारा ब्रह्मसूत्र की शंकरभाष्य की टीका “भामती” अपनी पत्नी के नाम पर करना स्त्री सम्मान का अद्वितीय उदाहरण है। यदाकदा कहीं स्त्री निन्दा के स्वर शतपथ व ऋग्वेद में आए हैं तो उनका कारण मंत्र रचयिता के आचरणहीन स्त्रियों के व्यवहार के प्रति संकेत ही है। अपवादों को कभी नियम नहीं माना जाता। अच्छी स्त्रियों की प्रशंसा से वैदिक मंत्रों के स्वर गूँज रहे हैं। ‘ऊषा’ स्तवन जैसे इसके प्रमाण हैं। हमें यही अंश देखना चाहिए। बाल्मीकि रामायण में आदि कवि ने कैकेयी के स्वार्थपरायण स्वभाव का उल्लेख करते हुए स्पष्ट कर दिया है। कि वैसा स्वभाव सभी का हो, जरूरी नहीं (“न ब्रवीमि स्त्रियः सर्वा भरतस्यैव मातरः”) बा.रा. अयोध्या. 12/100। वराह मिहिर (505-597 ई.) ने स्त्री निंदकों की कड़ी भर्त्सना करते हुए कहा है कि “जिन लोगों को स्त्रियों के केवल दोष दिखाई देते हैं और गुण दिखाई नहीं देते, वे असाधु हैं और उनका कथन सद्भावनाद्योतक नहीं है।” (बृहत्संहिता 74/5)। एक चीनी ग्रन्थकार (लिन यू ताँक-इम्पोरटेन्स आँव लिविंग में) ने स्त्री निन्दा से बचने के लिए भारतवर्ष से प्रेरणादायक उक्ति ली है कि “जब हम यह सोच लेते हैं कि बिना माता के इस संसार में कोई नहीं हमारी धारणा अत्यन्त उदार हो जाती है और हम निन्दा करने का साहस नहीं करते।”
वस्तुतः नारी का रमणी, भोग्या, कामिनी रूप मनुष्य का सृजा हुआ है। ऐसी स्थिति में पूज्य भाव कुदृष्टि के रूप में बदल जाता है। तब उसे वासना की आग में झोंककर इस कल्प वृक्ष को काला कोयला बनाकर पुरुष राख कर देता है। अतिवाद का दूसरा रूप यह कि उसे पर्दे की, घूँघट की, कठोर जंजीरों में जकड़कर अपंग सदृश बना दिया गया। यही कारण है कि आज की भारतीय नारी आत्महीनता की ग्रन्थियों में जकड़ी पड़ी है। भारत में ही नहीं। नारी का यह भोग्या, रमणी, वेश्या वाला रूप पूरे विश्व में ही प्रकारान्तर से आज से पचास वर्ष पूर्व तक पाया जाता रहा है। पाश्चात्य जगत में तो विद्रोह की आग भड़की किन्तु दिशा न मिलने से, वह दाम्पत्य जीवन के विग्रह गृहस्थ संस्था के टूटने तथा नारी मात्र के मनो-शारीरिक रोगों से ग्रस्त होने के रूप में सामने आयी। बहुसंख्य देशों में तो अभी भी नारी पराधीन है। नारी मुक्ति के लिए हमें देवसंस्कृति के निर्धारण ही अपनाने होंगे, यह एक सत्य है।
नारी नरक की खान है, यह प्रतिपादन भारत के ही तथाकथित महापुरुषों-विरक्तों द्वारा अध्यात्म मंच से किया गया। जबकि शतपथ ब्राह्मण स्पष्ट लिखता है जब तक स्त्री की प्राप्ति नहीं होती तब तक पुरुष आधा ही है।” (शत. ब्रा. 5/2/1/10)। ऋग्वेद के अनुसार वे सूर्य और चन्द्र, दिन और रात्रि की तरह एक दूसरे से संबंधित हैं (ऋग्वेद 1/13/7)। वेदों में युवकों के समान ही युवती को भी कुदृष्टि का बहिष्कार करते हुए ब्रह्मचर्य धर्म का विवाह तक कठोर पालन करने का निर्देश है ताकि वे श्रेष्ठ दंपत्ति बन सकें। हमारी संस्कृति में हर भगवान, हर देवता सपत्नीक ही पूजा जाता है। सप्तर्षियों में सातों विवाहित थे। उनकी पत्नियों-ऋषिकाओं ने पतियों का साथ दिया, ऋचाएँ भी रचीं व तपस्वी ऋषि पुत्रों को जन्म दिया। वस्तुतः काम सेवन और नारी सान्निध्य एक बात नहीं है। इनका अंतर समझा जाना चाहिए। रामकृष्ण व शारदा माँ, योगीराज अरविन्द तथा फ्राँस से अरोविले आई श्री माताजी का सान्निध्य साधना की ऊँचाइयों की पराकाष्ठा के स्तर का था। नारी को इस रूप में जब-जब भी भावभरा सम्मान मिला है, वह समाज, वह युग, सुख-शान्ति से भरा रहा है। “यत्र नार्यस्तु पूज्यते, रमन्ते तत्र देवता।” की उक्ति अकारण नहीं है।
वेदों में स्थान-स्थान पर नारी के ज्ञानोर्जन, वेद-वेदादि अध्ययन संस्कार उपक्रम सम्पन्न कराने के विषय में कहा गया है कि “हे पत्नी। तू हमें ज्ञान का उपदेश देकर-त्वविदपमा वदासि” (अथर्व 14/1/20) तथा तू सब प्रकार के (वेदादि) कर्मों का ज्ञान रखती है-कुहं देवी सुकृतं विदमनापसम् (अथर्व 7/47/1)। मनु ने कन्या को वेदादि पढ़ने का आदेश दिया है। (वेदानधीत्य वेदौ वा वेदं यथाक्रमम्-मनु-/ “यज्ञंदधे सरस्वती” (ऋग् 1/3/11) कहकर नारी को सभी प्रकार के यज्ञादि संपन्न कराने की शिक्षा लेने का निर्देश है। इस प्रकार से भारतीय संस्कृति कन्या, नारी के सर्वांगीण विकास का प्रतिपादन करती आयी है। विवाह के संबंध में तो यहाँ तक कहा गया है कि विवाह तभी हो “जब वर-वधू को चाहने वाला हो और वधू पति को पसन्द करती हो” (सोमो वधू पुर भवदश्वि नास्तामुभा वरा। सूर्या यत्पत्ये शसन्ती मनसा सविताऽद्दात् अथर्व 14/1/9)। कितनी आधुनिकतम व व्यावहारिक दृष्टि वेदों के ऋषि की रही है, यह इस ऋचा से ज्ञात होता है।
विवाहोपरांत वैदिक ऋषि पति के मुँह से कहलवाता है- हे सरस्वती! तू पतिगृह में विष्णु की तरह है” (प्रति तिष्ठ विराडसि विष्णुरिवेहं सरस्वति अथर्व-/-/ अथर्ववेद में ही वधू की उपमा समुद्र से दी गयी है व कहा है कि “जिस प्रकार वर्षा करके समुद्र ने नदियों पर साम्राज्य प्राप्त कर लिया है, इसी प्रकार हे मित्र! तू पति के घर जाकर वहाँ की साम्राज्ञी बन” (14/1/43)। दुर्भाग्यवश मध्यकाल में सती प्रथा का प्रचलन रहा, यह कहा जाने लगा कि संस्कृति की रक्षा सती से ही होती है तथा सती प्रथा वेदानुमोदित है। वस्तुतः यह एक मिथ्या तथ्य है, जिसका कोई आधार नहीं। ऋग्वेद में एक स्थान पर आया है-नारी उठ! जीव लोक में आ। इस मृत पति के पास तू क्यों पड़ी है। हाथ ग्रहण करने वाले, भरण पोषण करने वाले नियुक्त वीर्यदाता पति के साथ संतान जनने के लिए मिलकर रह (उदीर्घ्व नार्यभि जीवलोकं गतासुमेतमुपशेष एहि) ऋग्. 10/18/8 । वस्तुतः अथर्व के 18/3/1 की ऋचा को आधार बनाकर यह कल्पना स्वार्थवश गढ़ ली गयी है। डॉ. प्रशांत कुमार “वैदिक साहित्य में नारी” ग्रन्थ में लिखते हैं कि अनुपालयन्ती शब्द का अपभ्रंश कर सती प्रथा को एक धर्मानुमोदित परम्परा बता कर मध्यकाल के इतिहास को काला किया गया है। वस्तुतः तस्यै प्रजाँ द्रविणं चेह धेहि (अथर्व 18/3/1) कहकर उसे मृत पति की संतानों व धन की स्वामिनी कहा है। उसे वही सम्मान दिया गया है, जो उसे पति के जीवन काल में प्राप्त थे।
भारतीय संस्कृति के ऋषि, नारी को अबला नहीं मानते वह वीर स्वामी की स्त्री और पुत्र पुत्रियों की माता है। विनय, शालीनता के साथ वह रण कौशल में भी निपुण है। ऋग्वेद में नारी के मुँह से कहलवाया गया है (ऋग्. 10/86/9) कि “यह पुरुष मुझे अबला कहता है, किन्तु मैं अपने को प्रेरणा देने वाले वीर को वरनेवाली स्त्री के तुल्य हूँ! मैं भी उसी ऐश्वर्यवान् परमात्मा को धारण करती हूँ और वायु के समान शक्ति संपन्न हूँ।” महाभारत में एक बड़ी ओजस्वी नारी विदुला का प्रसंग आता है, जिसकी कथा सुनने का माहात्म्य स्थान-स्थान पर आया है। कुन्ती ने मातृसत्ता के रूप में जो शक्तिशाली रूप महाभारत में ग्रहण किया है, उसकी मूल प्रेरणास्रोत विदुला है। अपने पुत्र संजय के युद्ध भूमि से भागने पर वह संजय में साहस व स्फूर्ति भरती है व अपनी ओजपूर्ण वाणी में कहती है-उत्थातव्यं जागृतव्यं योक्तव्यं भूति कर्मसु” (म.भा. उद्योगपर्व 135,29-30) अंततः किशोर संजय राज्य लेकर ही लौटता है। कुन्ती अपने धर्मप्राण पुत्र युधिष्ठिर को क्षात्रधर्म पर चलने की प्रेरणा “यदर्थे क्षत्रिया सूते तस्य कालोऽयमागतः” कहकर तब देती है जब दुर्योधन सुई की नोंक के बराबर भूमि देने के लिए भी मना कर देता है। वह कहती है कर्तव्यपालन हेतु प्राणों की आहुति देने को भी तैयार रही (म.भा. उद्योग 137/10)। ऋतुध्वज की रानी मदालसा अध्यात्म साधना की पराकाष्ठा व मातृत्व का आदर्श है। चारों संतानों को उसने अपने ही ढाँचे में ढाल दिया। घोड़े पर सवार होकर घर से निकलकर गर्भस्थ शिशु की रक्षा करने वाली जीजाबाई ने ही संस्कृति रक्षक छत्रपति शिवाजी को उस योग्य बनाया। विश्ववंद्य बापू के संस्कारों की निर्मात्री अक्षर ज्ञान की दृष्टि से अशिक्षित किन्तु ईश्वर-निष्ठ उनकी माता थी।
समाज में गृहस्वामिनी तथा माता के रूप में प्रतिष्ठ प्राप्त नारी ने जब-जब राष्ट्र को आवश्यकता पड़ी, घर से बाहर निकल कर मातृभूमि के लिए सेना का संचालन अपने हाथों में लिया। प्राचीन काल में वैदिक समाज में तीन संस्थाएँ लोकतंत्र की दृष्टि से थीं समिति, सभा और विदथ। समिति और सभा लोकसभा स्तर की राष्ट्रीय संस्थाएँ थीं, किन्तु विदथ में पूरा अधिकार नारी शक्ति का था। “वाशिनी त्वाँ विदथ भावदासि” (ऋग 10-85/26) के अनुसार “तुम साधिकार विदथ में वक्तृता दोगी” कहकर वर विवाह के अवसर पर वधू को समाज के संचालन में कार्य करने का अधिकार देता है। इस विदथ में स्त्रियाँ नारी विषयक-गृहस्थ संस्था संबंधी कर्तव्यों पर विचार विमर्श करती थीं। गार्गी, सुलभा, जयमती, नायनिका प्रभावती, विजय भट्टारिका, सुगंधा, मीणलदेवी राज्यश्री, दुर्गावती, अहिल्याबाई, लक्ष्मीबाई व सम्प्रति इंदिरा गाँधी जैसी नारियों की नेतृत्व क्षमता से नारी शक्ति के दायित्वों व महत्वपूर्ण कर्तव्यों का एक परिचय मिलता है। अस्तु!
इक्कीसवीं सदी महापरिवर्तनों की वेला है। ऋषि परम्पराएँ देवपरम्पराएँ और महामानवों द्वारा अपनाए दृष्टिकोण अगले ही दिनों क्रियान्वित होने जा रहे हैं। इस ऊषाकाल में , जहाँ बहुत कुछ बदलने जा रहा है, नारी का खोया वर्चस्व भी उसे मिलने जा रहा है। जितना गौरवमय इतिहास उसका रहा है, उसे वह देव संस्कृति के निर्धारणों के आधार पर पुनः पाने जा रही है। यह सब मानवी संवेदना के विकास से ही संभव होगा, नारी जिसकी अधिष्ठात्री है तथा देव संस्कृति का जो सर्वाधिक महत्वपूर्ण प्रेरक तत्व भी है। शान्तिकुञ्ज द्वारा चलाये गए नारी जागृति अभियान की इसमें महत्वपूर्ण भूमिका होगी, इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए।
“माँ!” बन्दा चौंक पड़े। उन्होंने बड़ी कठिनाई से वृद्धा को अपने पैरों पर से उठाया। वृद्धा ने रोते हुए कहा “मेरा बेटा मरणासन्न है, आप आशीर्वाद दें, वह अच्छा हो जाय। आपके आशीर्वाद से वह अवश्य रोगमुक्त हो जाएगा।”
“मैं क्या आशीर्वाद दूँगा। मेरे पास न तो कोई सिद्धि है, न तपस्या की शक्ति और न पुण्य।” बन्दा ने समझाने का प्रयत्न किया। कुछ मेरे द्वारा होता भी है तो वह परम पुरुष की कृपा और गुरु की प्रेरणा से। मैं कौन होता हूँ? जिसकी शक्ति कार्य करती है, कार्य के फल उसके।”
“आप एक चुटकी भस्म देदें।” बुढ़िया इस समय उपदेश सुनने समझने की स्थिति में नहीं थी। वह गिड़गिड़ा रही थी।
“जैसी जगदम्बा की आज्ञा!” बन्दा अत्यन्त गम्भीर हो उठे, उन्होंने बुढ़िया को मस्तक झुकाया “आप जगदम्बा ही तो हैं। बच्चे से जो कराना हो, करा लें।” एक साधु की गम्भीरता से बन्दा ने वृद्धा के पैरों के पास से ही एक चुटकी धूल उठाई, उसे मस्तक तक ले गए एक बार नजर आकाश की ओर गई और वह धूल उन्होंने वृद्धा के हाथ में रख दी।
“मेरा बेटा अब जी जायेगा!” बुढ़िया उल्लासपूर्वक उठ खड़ी हुई, उसने नहीं देखा कि बन्दा की आँखें भर आई हैं। भाव बिन्दुओं को रोकने की कोशिश में उन्होंने दूसरी ओर मुँह मोड़ा देखा उनका सहयोगी धीरसिंह खड़ा है। एक पल को अपने को सामान्य करते हुए उन्होंने उसके चेहरे पर नजर टिकाई। इस दृष्टि में प्रश्न की झलक थी। “सूबेदार की सेना आ रही है। बहुत बड़ी सेना है और हमारे साथ इस समय केवल पच्चीस सैनिक हैं।” बन्दा के समीप खड़े सुदृढ़काय, विशालदेह पुरुष ने बन्दा की ओर देखते हुए कहा-आप आज्ञा करें तो हम लोग अब भी पर्वत तक पहुँच सकते हैं।”
“छिः!” “बन्दा के नेत्रों में चमक आयी।” अपने प्राणों के मोह से बैरागी इन ग्रामीणों को भेड़ियों की कृपा पर छोड़कर भाग जायेगा?” बन्दा ने कवच धारण करते हुए कहा।” बन्दा अपने आश्रितों को आततायियों के हाथों छोड़ जाएगा ऐसी आशा तुम उससे नहीं कर सकते।”
सभी जानते थे बन्दा योगी है। गुरु ने अपना तेज दिया है। वे महापुरुष हैं। अकालपुरुष की ज्योति उनमें उतरी है। पर बन्दा अपने को दोनों दलितों का सेवक मानते थे, उनकी वज्रदेह के भीतर फूल सा कोमल हृदय था। जिसमें संवेदनाएँ लबालब भरी थीं, जो किसी की पीड़ा देखकर तड़प उठता था। न जाने कितनों की कराहें बन्दा को बेचैन बनाए रखती थीं।
“धीरसिंह।” अपने घोड़े पर बैठते-बैठते बन्दा ने सहचर को सम्बोधित किया-हमारे पास केवल पच्चीस सैनिक नहीं हैं।” “मैं आपके नाम का प्रताप समझता हूँ।” धीरसिंह ने देखा कि हल पकड़ने वाले हाथ अब भाला-तलवार उठाए हैं। ग्रामीण तरुणों की संख्या बढ़ती जा रही है। वृद्ध तक दौड़े आ रहे हैं।
“प्रताप तो सर्वत्र परमात्मा का!” बन्दा ने किसी अलक्ष्य के प्रति माथा झुकाया “कर्म का प्रयोजन अपनी समूची सामर्थ्य का आदर्श के लिए उत्सर्ग है। काम तो सभी करते हैं धीरसिंह! कोई लोभ या भय के वशीभूत होकर करता है-तो कोई अकाल पुरुष के प्रति भक्ति और अनुरक्ति से विभोर होकर। एक बँधता है दूसरा मुक्त होता है।” अपनी धुन में कहते-कहते कुछ सोचकर बोले “तुम इन नवीन सैनिकों को सँभाल लोगे?”
“जैसी आपकी आज्ञा।” धीरसिंह सभी को व्यूह बद्ध करने लगा। वृक्षों के शिखर ऊँचे टीले गहरे खड्ड सब कहीं वैरागी के सैनिक बैठ चुके थे। थोड़ी देर में दृश्य बदल गया-तीन घण्टे विकट संघर्ष के थे। सेना सूबेदार की ही थी, वे लोग आए थे गाँव के निरीह लोगों को लूटने काफिरों को कत्ल करके गाजी बनाने और हो सके-तो कोई सुन्दर सी लड़की ले जाने। सिर का सौदा करने को उनमें कोई तैयार न था बैरागी से सामना हो जाएगा, यह उन्हें पता होता तो इधर कदम रखने की भूल वे कर नहीं सकते थे।
“वैरागी आ गया।” कयामत उतर आयी उसके साथ! बहुत शीघ्र शत्रु के पैर उखड़ गए। अपने घायलों तक को कराहते छोड़कर वे भागे और भागते चले गए। उन्हें बन्दा नहीं बन्दा का भय खदेड़े जा रहा था। आततायियों को खदेड़ कर वे अपने सदा के नियम के अनुसार पास के घने जंगल में अकेले ध्यान के लिए जाना चाहते थे। धीरसिंह ने आग्रह किया “आपकी कृपा से हमने विजय प्राप्त की। शत्रु से छीनी सामग्री के वितरण का तो आप आदेश दे जायँ।” “आप साक्षात् भगवान है। आपने मेरे पुत्र को जीवित कर दिया।” सहसा वृद्धा गिरी वैरागी के चरणों पर। उसके साथ था उसका पुत्र। दुर्बल होने पर भी उसके चेहरे पर आरोग्य की चमक थी।
“माता परमात्मा को धन्यवाद दो। तुम्हारे पुत्र को दयामय ने अच्छा किया है।” बन्दा वैरागी ने धीरसिंह की ओर मुख किया-और भाई तुम भी। विजय उस प्रभु की हुई और उसी की शक्ति से हुई।”
“फल हुआ वह प्रभु की कृपा उनका प्रसाद।” वैरागी अश्व पर बैठते हुए बोले उसे अपने कर्म का फल मानकर पूरे कर्म का उत्तरदायित्व क्यों सिर पर लेते हो। अपने को कर्म फल का कारण कभी मत बताओ, फल को भगवान पर छोड़ दो। कोई कर्म तुम्हें बाँध नहीं सकेगा।”
वैरागी का अश्व उड़ चला। विजय में प्राप्त श्रेय यश तथा सम्पत्ति वे कभी न लेते थे। पद और प्रतिष्ठ उनके पास फटकने के नाम से काँप उठते थे। वे मुक्त पुरुष.........।
हिन्दू धर्म पर एक सबसे बड़ा आक्षेप यह लगाया जाता रहा है। कि इसमें अनगिनत देवी-देवता हैं। इतना पुराना धर्म होते हुए भी इनमें इस बात पर सहमति नहीं है कि किसे मानें, किसे न मानें? वैदिक काल से लेकर पुराणों तक तथा अवतारी लीला पुरुषों तक अनगिनत आराध्य इष्ट हिन्दुओं के हैं व इनका कोई एक सनातन धर्म नहीं है, कोई एक ईश्वर नहीं है। ऐसा दोषारोपण प्रायः वे लोग करते हैं जो तथ्यों से अवगत न होने के कारण देव संस्कृति का मात्र बहिरंग पक्ष ही देखकर अपना मत बना लेते हैं।
उपरोक्त आक्षेप के उत्तर से एकेश्वरवाद बहुदेववाद की व्याख्या से भ्रान्तियों का वह कुहासा मिटाने का हम प्रयास करेंगे जो सनातन धर्म पर छाया दिखाई पड़ता है, पर वैसा नहीं है। अपूर्ण जानकारी के कारण भारतीय संस्कृति के आधार पर ही जीवन वृत्ति चलाने वाले धर्मोपदेशक भी अन्यान्य मतावलम्बियों के साथ हाँ में हाँ मिलाते देखे गए हैं कि हिंदू धर्म में देवी-देवता तो बहुत हैं व यही एक इसकी बड़ी कमी है। इनके प्रत्युत्तर पर हँसी भी आती है व इस विडम्बना पर दुःख भी होता है। क्रान्तिदर्शी चिन्तक स्तर के ऋषिगण क्या इतने अदूरदर्शी थे कि वे भगवान का स्वरूप बनाते समय सही ढंग से चिंतन नहीं कर पाए? आखिर यह कल्पना हमारे मन में आई कैसे?
इस संबंध में ऋग्वेद का एक मंत्र हमारा चिन्तन स्पष्ट करता है। ऋषि उसमें कहते हैं-
इन्द्र मित्रं वरुणमग्निमा हुथो दिव्यः स सुपर्णो गरुत्मान। एक सद्विप्रा बहुधा वदन्ति अग्निं यमं मातरिश्वान माहुः॥ (ऋग्वेद 1/164/46)
अर्थात् “एक सत्यस्वरूप परमेश्वर को बुद्धिमान ज्ञानी लोग अनेक प्रकारों से अनेक नामों से पुकारते हैं। उसी को वे अग्नि, यम, मातरिश्वा, इन्द्र, मित्र, वरुण, दिव्य, सुपर्ण, गरुत्मान इत्यादि नामों से याद करते हैं, सारा वैदिक वांग्मय इसी प्रकार की घोषणाओं से भरा है, जिसमें एक ही सद्घन, चिंतन और आनंदघन तत्व को मूलतः स्वीकार करके उसी के अनेक रूपों के रूप में ईश्वर को मान्यता दी गयी है। विश्व के समस्त नाना प्रकार के रूपों में उसी एक का साक्षात्कार किया गया है। एक प्रकार से एकत्व में अनेकत्व तथा अनेकत्व में एकत्व, यह एक निराले प्रकार का दर्शन भारतीय संस्कृति का है, जो कहीं और देखने को नहीं मिलता। जब अधिकार भेद से आराध्य रूप भी विविध हो जाते हैं तो दार्शनिक चकराकर हिन्दुओं को बहुदेववादी (पालीथीस्टीक) ठहरा देते हैं व कहते हैं कि संभवतः हिन्दू सभ्यता एक ईश्वर की सत्ता से अनभिज्ञ थी। जबकि एक ही सत्य, एक ही चिन्मय सत्ता की स्वीकृति” भारतीय अध्यात्म स्थान-स्थान पर देता आया है।
मैक्समूलर कहते हैं कि वैदिककाल के ऋषि बड़े विद्वान थे। विभिन्न देवताओं के रूप में ऋषियों ने परमेश्वर की विभिन्न शक्तिधाराओं की गुण रूप में चर्चा करके उनकी महिमा का बखान किया है। मैक्समूलर ने वेदों में हेनीथीइज्म या उपास्य श्रेष्ठतावाद का प्रतिपादन किया, जिसे बाद के अध्येताओं ने अलग-अलग ढंग से समझकर उसकी व्याख्या की। “एकं सद्विप्रा वहुधा वदन्ति” स्वर जितनी बार हमारे समक्ष गूँजता है, हर बार एक महान प्रेरणा व संजीवनी हमें मिलती है, उस एक ईश्वरीय सत्ता के बारे में जिसे विभिन्न संप्रदाय विभिन्न मत अलग-अलग नामों से जानते हैं पर वैदिक आधार पर वह एक ही है।
‘वैदिकएज’ ग्रन्थ में लेखक लिखते हैं कि “ऋग्वेद का धर्म प्रधानतया मूल रूप में अनेकेश्वरवादी है किन्तु क्रमशः व्याख्यान करते करते हुए अद्वैतवाद की दिशा धारा पकड़ लेता है। कुछ सूक्तों के अध्ययन से उस लम्बी यात्रा की जानकारी मिलती है जो प्रारम्भिक असभ्य अनेकेश्वरवाद से क्रमबद्ध तत्त्वज्ञान की ओर प्राकृतिक बहुदेववाद एकेश्वरवाद, अद्वैतवाद की मंजिलों से गुजर कर इस संस्कृति ने पार की है।” संभवतः लेखक महोदय अग्नि, वरुण, इन्द्र आदि सभी को भगवान मान बैठे तथा चिरपुरातन श्रेष्ठतम भागवत् संदेश के रूप में उतरी अपौरुषेयवाणी को उनने “असभ्य” तक कहने का दुस्साहस कर लिया जो मात्र अर्थ न समझने की नादानी की प्रतिक्रिया है।
आचार्य यास्क ने देव शब्द की निरुक्ति ‘दा’ द्युत, दीप, दिवु इन धातुओं से की है। इसके अनुसार ज्ञान, प्रकाश, शान्ति, आनन्द तथा सुख देने वाली सब वस्तुओं को देव कहा जाता है। यजुर्वेद में अग्नि, वायु, सूर्य, चन्द्र, वसु, रुद्र, आदित्य, इन्द्र इत्यादि को देव नाम से इसलिये पुकार गया है कि यह शब्द सत्यविद्या का प्रकाशन करने वाले ब्रह्मनिष्ठ-सत्यनिष्ठ विद्वानों के लिए प्रयुक्त होता है। ज्ञान दान करने वाले वे देवता वस्तुओं के यथार्थ स्वरूप को कुहासे निकाल कर उसे प्रकाशवान बनाते हैं अतः उन्हें देव कहा जाता है। ऋग्वेद में षष्ठ मण्डल में कहा गया है-
य एक एत् तमुष्टहि कृष्टीना विचर्षणिः। पतिर्जज्ञो वृषक्रतुः (ऋग्. 6/45/16)
अर्थात्-जो परमेश्वर एक है, तू उसी की स्तुति कर। वह परम पिता परमात्मा सब मनुष्यों की भली-भाँति देखभाल करने वाला है। वहीं सुखवर्षक ज्ञान और कर्म वाला सारे जगत का स्वामी है।” अथर्ववेद में तो साफ कह दिया गया है-वह सर्वव्यापक, तथा प्राणी-अप्राणी सबको विशेष रूप से पूर्णतया देखने वाला है।” (तमिदं विगतं सहः स एष एक एकवृद एक एव-अथर्व 13/4/20)। सामवेद के एक मंत्र में कहा गया है-हे मनुष्यों! तुम सब सरलभाव और आत्मिक बल से एक परमेश्वर की ओर उसका भजन करने के लिए आओ जो समस्त मनुष्यों में एक ही अतिथि की तरह पूजनीय है, सनातन है, नयों के अंदर भी वही व्याप्त रहा है। ज्ञान, कर्म, भक्ति आदि के सभी मार्ग उसी की ओर जाते हैं, वह निश्चय रूप से एक ही हैं”। साम. (4/3/3)
छान्दोग्योपनिषद् में ओंकार एवेदं सर्वम् (302/23/3) गायत्री वा इदं सर्वम् (3/12/1), प्राणोवा इदं सर्वभूतम् (3/14/4), तथा बृहदारण्यकोपनिषद् में एतत् ब्रह्म एतत् सर्वम् (4/3/1) इदं सर्वं यदयमात्मा (2/4/6), यही अभिव्यक्ति स्थान-स्थान पर आयी है। समग्र अध्ययन करने वाले विद्वानों ने एक स्वर से माना है कि हिन्दू अध्यात्म एक ही परमेश्वर की सत्ता का वर्णन करता आया है। यह मान्यता भ्रान्तिपूर्ण है कि आर्यों के बहुत से देवता थे सभी को चापलूसी से प्रसन्न करना ही उनका स्वभाव था। डब्ल्यू डी. ब्राउन ने “सुपिरीयारिटी आफ वैदिक रिलीजन” में लिखा है कि “वैदिक धर्म एक ही परमसत्ता को मान्यता देता है।” श्री चार्ल्स कोलमैन “माइथोलॉजी आफ हिन्दूज्” में लिखते हैं कि “आराध्यसत्ता की परिभाषा वेदों में विभिन्न रूपों में की गयी है। जो सब कुछ देखता है पर स्वयं नहीं दिखाई देता वह ब्रह्म है। उसके अनेकानेक गुण हैं पर इन गुणों को भिन्न-भिन्न परमात्मा मान लेना तो सरासर बेवकूफी होगी।” श्लेगेल सभी विवादों का एकमत से उत्तर देते हुए लिखते हैं कि “यह एक स्वर से कहा जा सकता है कि वैदिक काल के भारतीय उच्चकोटि के विद्वान थे व उनकी “मोनोथीज्म” की मान्यता ही सर्वोपरि है अर्थात् वे एकेश्वरवादी ही हैं।” (“विज्डम आफ एशिएण्ट इंडियन्स-वेद मात्र एक ही आराध्यसत्ता की शिक्षा हमें देते हैं यह तथ्य श्री डचान्जू “फिलॉसफी आफ जेरोएस्ट्रिएनिज्म एण्ड कम्पेरेटिव रिलीजन” पुस्तक में लिखते हैं। आर्षग्रन्थों में वस्तुतः यह घोषणा है कि सभी प्राकृतिक नियमों के मूल में जड़तत्त्व और शक्ति के प्रत्येक अणु परमाणु में ओतप्रोत वही एक सत्ता विराजमान है, जिसके आदेश से वायु चलती है, अग्नि दहकती है, बादल बरसते हैं, मृत्यु पृथ्वी पर नाचती है।
भयादस्याग्निस्तपति भयातपति सूर्यः। भयाद्रिन्द्रश्च वायुश्च मृत्युर्धावति पंचमः। (कठोप. 2/3/3)
और वह सत्ता क्या तथा कौन है, जिसके आदेश पर यह सब होता है।
“अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिवचस्थितम्” (गीता अध्याय 13/16)
अर्थात्-वह विभाग रहित एक रूप से आकाश के सदृश परिपूर्ण होने पर भी चराचर, संपूर्ण भूतों में विभक्त सास्थित प्रतीत होता है” एवं उसका-
ज्योतिषामपि तज्ज्यो तिस्तमसः परमुच्यते। ज्ञानं गेयं ज्ञानगम्यं हृदि सर्वस्य विष्ठितम्” गीता (13/17)
अर्थात्-वह परब्रह्म ज्योतियों का भी ज्योति एवं माया से अत्यन्त परे कहा जाता है। वह परमात्मा बोध स्वरूप, जानने के योग्य एवं तत्त्वज्ञान से प्राप्त करने योग्य है और सबके हृदय में विशेष रूप से स्थित है।”
वस्तुतः किसी ने गंभीरता से आर्ष साहित्य को पढ़कर ईश्वर के स्वरूप को समझने की कोशिश नहीं की है। ईश्वर एक ही है, उसकी शक्ति धारायें अनेकों हैं। ब्रह्मा, विष्णु, महेश, इन्द्र, अग्नि, यम, निऋति, वरुण, वायु कुबेर, ईशान, पृथ्वी, द्यौ का एक समुदाय देवगणों का है जो पूर्व से लेकर पूर्वोत्तर कोण तक की आठ दिशाओं व ऊपर नीचे के स्थानों में उस परमसत्ता के प्रतिनिधि के रूप में अपना कार्य करते बताये गए हैं। ब्रह्मा सृजन के, उत्पत्ति के देवता हैं, समस्त सृष्टि का पालन करने वाले नियन्ता, व्यवस्था बनाए रखने वाले विष्णु हैं तथा अनीति से मोर्चा, लेने वाले असंतुलन का संतुलन में बदलने वाले, सृष्टि का लय करने वाले देवता शिव हैं। इन तीनों को मिलाकर त्रिमूर्ति कहते हैं वह है यह एक ही परब्रह्म के तीन रूप।
विश्व के सभी धर्मों में सभी मनुष्यों के लिए एक ही साधन बतलाए गए हैं। एक ही मार्ग उनके मत में है। हिन्दू अध्यात्म मानवी बुद्धि की रुचि प्रधान वृत्ति को समझता है व अपने मनोवैज्ञानिक चिन्तन के आधार पर उसके प्रणेताओं ने उपास्य का रूप साधनादि चुनने का अधिकार सबको दे दिया। जो जिस मार्ग से चाहे, परमात्मा के रूप को माने उसका ध्यान करे। अंततः वह आस्तिकतावादी तो बनेगा यह चिन्तन ऋषियों का रहा है। गुरु अपने शिष्य की रुचि व अधिकार के अनुसार उसे विभिन्न साधनों में से एक बतलाते आए हैं। एक ही गुरु के विभिन्न शिष्यों में कोई योगी कोई ज्ञान मार्गी, कोई भक्त, कोई वैष्णव, कोई शैव तथा कोई शाक्त कुछ भी बन सकता है। रुचि भेद के अनुसार इष्ट की आकृति बदल दी जाय तो मनोवैज्ञानिक प्रयोग यह नहीं बताता कि परमेश्वर भी ढेरों हो गए। विश्वभुवन का एक ही स्वामी-एकोविश्वस्य भुवनस्य राजा” बताते हुए आर्ष-वांग्मय मूलतः बहुत्त्व में एकेश्वरवाद का ही प्रतिपादन करता आया है।
साकारोपसना से लेकर निराकारोपासना तथा प्रतीक पूजा आदि के मूल में एक ही तथ्य है कि परब्रह्म श्रेष्ठता का समुच्चय है। उसके विभिन्न सद्गुणों को, सत्प्रवृत्तियों को हम अपनी रुचि, विश्वास, मान्यता के अनुसार चुनते हुए एक ही लक्ष्य पर चलें स्वयं में श्रेष्ठताओं का समावेश करें परम पूज्य गुरुदेव ने परमेश्वर को सत्प्रवृत्तियों का समुच्चय, आदर्शों का समूह, सद्गुणों का एकाकार रूप “सम्मम बोनस आफ वरच्यूज” कहा है। हम चाहें वैदिक देवता को मानें चाहे सूर्योपासक हों, हम चाहे साकार विष्णु रूप कृष्ण को मानें, चाहे देवी रूप में दुर्गा को, भक्त शिरोमणि हनुमानजी को मानें अथवा उनके इष्ट श्रीराम को, हम एक ही कार्य अपनी उपासना द्वारा करते हैं-श्रेष्ठता का अपने अंदर अभिवर्धन करते हुए अपनी अपूर्णता को पूर्णता में बदलना। हमें यह सीखना ही होगा कि मात्र हिन्दू धर्म में ही नहीं सभी धर्मों में चाहे वह बौद्ध, मुस्लिम, पारसी, ताओ, ईसाई, शिण्टो, जैन कुछ भी क्यों न हो, सबका ईश्वर एक ही है। मत संप्रदाय बदलने से ईश्वर नहीं बदल जाते। जो इनमें से किसी के भी धर्म या ईश्वर की निन्दा करता है या हँसी उड़ाता है, वह वस्तुतः अपने ही ईश्वर का उपहास उड़ाकर पाप का भागीदार बनता है।
देव संस्कृति की यह महानता है कि यहाँ विचार स्वातंत्र्य को बौद्धिक प्रजातंत्र को, प्रधानता मिली। यहाँ आस्तिक भी पनपते हैं, तथाकथित नास्तिक भी। यहाँ चार्वाकवाद, जैनों का शून्यवाद भी वैसा ही सम्मान पाता है जैसा त्रेतवाद, द्वेतवाद तथा अद्वैतवाद। ईश्वर के स्वरूप व कल्पना के लिए पूरी छूट दे दी गयी है। माना यह गया है कि अंततः व्यक्ति नीतिमत्ता को मानेगा, परमसत्ता के अनुशासन को मानेगा व जीवन में ईश्वरीय तत्त्वदर्शन को उतारेगा। चाहे किसी का भी नाम ले, बनेगा तो वह ईश्वरपरायण। यही कारण है कि इस्लाम, ईसाई धर्म यहाँ की उर्वर भूमि में भली-भाँति पनपते गए जब कि अपनी जन्म भूमि छोड़कर अन्य स्थानों पर उन्हें संघर्ष हिंसा द्वारा, अपना प्रचार करना पड़ा।
आदि पुरुष की कल्पना जिन ऋषियों ने की, “कस्मै देवाय हविषा विधेम” का उत्तर जिनने एक ही विश्वाधार के विभिन्न रूपों के रूप में दिया, उनके निर्धारणों पर उँगली उठाना कुतर्की, विवादों में उलझने वाले नास्तिकों का काम है। बहुदेववाद में एकेश्वरवाद का अर्थ है परमसत्ता की विभिन्न रूप रश्मियों में उस एक ही सता का दर्शन करना। यदि यह हो सके तो आस्तिकवादी मान्यताओं का विस्तार हो आस्था संकट से मोर्चा भली−भाँति लिया जा सकता है। आज की धर्म संप्रदायगत विद्वेष की स्थिति में हिन्दू अध्यात्म व देव संस्कृति ही एकमात्र समाधान है, इसमें कोई संशय नहीं।
स्वर उसे किन्हीं गहराइयों में बेधता चला गया। नर्मदा के उछलते जल-कणों की तरह उसके हृदय में अगणित उद्वेलन उठ खड़े हुए। अभी वह अपने ध्यान से उठा ही था-नेत्र अभी भी अवाँल्मीलित थे। मन का एक कोना अभी तक हृदयाकाश में सविता देव से एक होने के लिए हुलस रहा था। पर नर्मदा की जल तरंगों से एक होती गूँज उसे कुछ सुनने समझने-सोचने के लिए विवश कर रही थी। उसने मुड़कर देखा-महिष्मती की राजकन्या अपनी सहेलियों के साथ स्नान करके वापस लौट रही है। उसे जो कुछ सुनाई दिया था इन्हीं कन्याओं के आपसी वार्तालाप का एक अंश था। राजकन्या के बारे में उसने बहुत कुछ सुन रखा था। उसकी विद्वता-शिष्टता-कोमलता के पर्चे सारी महिष्मती में विख्यात थे। लोक उसके प्रति श्रद्धा करता था उसमें लोक के प्रति करुणा थी। ये सब किशोरियाँ अपने वार्तालाप में निमग्न धीमे पदों से जा रही थीं। “लेकिन तुम्हीं को संसार की चिन्ता क्यों पीड़ित करती है?” यह स्वर राजकन्या के साथ चल रही किसी-बालिका का था।
“क्यों न करें?”
“तुम्हें कमी क्या है? राज्य-वैभव-सुख के वे सारे साधन जिनकी मनुष्य इस संसार में कामना करता है। सौंदर्य प्रतिभा सौभाग्य का वह ढेर भी है जिसके लिए उसे विधाता के सामने आँचल फैलाना पड़ता है।”
“तब तुझे स्वार्थ की भी समझ नहीं सुनामा। समूचा लोक जब दुर्भाग्य की आग में जल रहा हो तब यह मुट्ठी भर सौभाग्य उस महाज्वाला में कब तक टिकेगा? देख नहीं रही हिंसा विकराल होकर खड़ी है राज्य-राज्य की, शक्ति-शक्ति की, सहारकारिण प्रवृत्ति मनुष्य को मनुष्य से दूर कर रही है। यह सारा संसार एक कुटुम्ब है। किन्तु चारों ओर घृणा ही घृणा छा रही है। क्या उससे मनुष्य को कभी छूटना नहीं है? जानती है इसका सिर्फ एक कारण है अज्ञान, वैदिक संस्कृति का ह्रास उफ! क्या करूँ । कहाँ जाऊँगा!! कौन करेगा वेदों का उद्धार!!! हृदय से उमंगती वेदना ने एक बार पुनः वातावरण को झंकृत कर दिया।
ये सब अब खुले मैदान में आ चुकी थीं। दोनों तरफ पेड़ों को अच्छी हरियाली दिखाई दे रही थी। लेकिन राजकन्या का मन इन सभी से दूर किसी गहरी वेदना में सना था, वह भी इन सबसे कुछ ही कदम पीछे था। वार्तालाप के शब्दों को वह बड़े धैर्य और गम्भीरता से सुन रहा था। शब्दों का स्पर्श उसके अस्तित्व को मथे जा रहा था। “कौन करेगा वेदों का उद्धार?” वाक्य नहीं जैसे प्रबल विद्युत तरंग उसके अस्तित्व में समा गई। एक प्रचण्ड चुनौती उसके समक्ष आ खड़ी हुई। कौन करेगा? कौन करेगा? उसे ऐसा लगा जैसे अपने ही शरीर का रोम-रोम उससे जवाब माँग रहा हो। अब उससे रहा न गया, पाँवों की गति बढ़ गई। कुछ ही क्षणों में वह राजकन्या के सामने आ खड़ा हुआ। एक पल भी बिना रुके उसके कण्ठ से ध्वनि फूट पड़ी “बहिन मैं करूँगा वेदों का उद्धार।”
इन अकल्पनीय शब्दों को सुनकर राजकन्या ही नहीं समस्त बालिकाएँ चौंक पड़ी। “कौन हो? क्या है तुम्हारा नाम? परिस्थिति भी समझते हो?” इन प्रश्नों के साथ सभी की नजरें उस पर आ जमीं। सोलह-सत्रह साल की किशोर वय। कमर में लिपटी धोती कंधे पर दुपट्टा बगल में चटाई के साथ एक पोथी भी दबी थी। चेहरे का गौरवर्ण संकल्प की ऊर्जा से कुछ रक्तिम हो रहा था।
“वेदानुयायी हूँ। कुमारिल भट्ट मेरा नाम है।” दो प्रश्नों का उत्तर देने के बाद तीसरे प्रश्न का जवाब देने के पहले उसने अन्तरिक्ष की ओर ताका। परिस्थितियाँ जानता हूँ, आज करुणा को भूलकर भी स्वयं को तथागत का अनुयायी कहने वाले कुटिल कूटनीतिज्ञों का वर्चस्व है। साधना के नाम पर चलने वाली हिंस्र और घृणास्पद पद्धतियाँ किसी से छुपी नहीं है। जगदम्बा की जीवन्त मूर्ति नारी को भोग की वस्तु मानना तो जैसे सामान्य बात है।”
“सब जानकर भी ऐसा अकल्पनीय साहस।” राजकन्या को जैसे अभी भी अविश्वास था। “हाँ? क्योंकि ईश्वर की सामर्थ्य ही मेरा बल है। उसके लिए सर्वस्व उत्सर्ग कर देना मेरा कर्तव्य।”
“तुम तुम कर सकते हो मेरे भाई। तब तुम अवश्य करोगे।” राजकुमारी की आँखों में इस किशोर बालक के प्रति अपरिमित स्नेह उमड़ आया। एक दिव्य रागिणी के समान आकाश में उषा उदित हुई उस दिन नए आलोक ने नया ही जीवन देखा। “बस मुझे आशीर्वाद दो! मुझ पर विश्वास करो। बहिन का हृदय ही भाई को अपरिमित बल देता है। मेरा संकल्प है वेदों की पुनः प्रतिष्ठ होगी। ज्ञान के स्वर आचरण में फूटेंगे। आचरण का संगीत व्यवहार में उतरकर धरा को उसका गौरव देगा।”
“विश्वास है मुझे।” बड़ी मुश्किल शब्द निकले। राजकुमारी की चिर साध पूरी हुई, शब्द मूक हो गए असंख्य अगणित भावनाएँ अनन्त को स्पन्दित करने लगीं।
हल्के से प्रणाम करके कुमारिल चल पड़े, उनके पाँव धीर गंभीर गति उठने लगे। नंगे पाँव मानो पृथ्वी की धूलि में जीवन की पर्तों पर संस्कृति का जीवित संदेश लिखने के लिए बढ़ चले हों?
विज्ञान की प्रत्यक्षवादी दृष्टि तो यह कहती है कि यह ब्रह्माण्ड क्रमशः फूलता-फलता जा रहा है तथा एक दिन महाप्रलय के साथ यह नष्ट हो जाएगा। समसामयिक परिस्थितियों पर भी जैसा विज्ञान का चिन्तन रहा है, वह वही है जो उपकरणों द्वारा शिक्षण-विवेचन की परिधि में आता हो। आर्ष-वांग्मय व्यष्टिगत समष्टिगत जीवन पर एक परिपूर्ण दृष्टि काल से परे डालता है व हो रहे घटनाक्रमों, संभावित भवितव्यताओं का मूलकारण समझाने का प्रयास करता है। सृष्टि की उलट-पुलट से लेकर एक अप्रत्याशित परिवर्तन जिसमें सारा वर्तमान ढाँचा बदल जाने की बात कही जाती है, पूर्णतः तथ्यों पर आधारित है तथा यही देव संस्कृति का प्राण है। भारतीय संस्कृति कहती है कि विश्व इतिहास में संकट की घड़ियाँ अनेक बार आती रही हैं, जिनमें विश्वमानवता पर विनाश के घटाटोप बादल छाये ही नहीं, भयानक रूप से गरजे और सब कुछ डूबा देने की चुनौती देकर मूसलाधार बरसे हैं। यह सब होते हुए भी स्रष्टा की सृजन क्षमता व उसकी न्यायक्षमता पर मनुष्य को, जीवन को विश्वास है। वह जानता है कि स्रष्टा अपनी इस अद्भुत कलाकृति विश्ववसुधा को मानवी सत्ता को सुरम्य वाटिका को विनाश के गर्त में गिरने से पूर्व ही बचाने की सक्रियता दिखाता व परिस्थितियों को उलटने का चमत्कार उत्पन्न करता है। यही अवतार है। असामान्य स्तर की विश्व मानवता पर छाई विपन्नताओं से निपटना उसी के बस की बात है।
भारतीय संस्कृति की अवतार मूलक अवधारणा बड़ी वैशिष्ट्यपूर्ण है, साथ ही मनोविज्ञान की दृष्टि से निराश की स्थिति में प्रेरणा देने वाली आशा का संचार करने वाली। अन्यान्य धर्म-संप्रदाय संस्कृतियों में भी अवतार, पैगम्बर, फरिश्ते का आना, दैवी वाक्यों या निर्देशों का धरती पर उतरना आदि घटनाक्रमों का विवरण हैं पर यह सब है चमत्कारिक परिप्रेक्ष्य में। यदि अद्भुत चमत्कारों से ही अवतार काम करते हों तो इससे परमेश्वर की सत्ता के भूमि पर अवतरण का उद्देश्य पूरा नहीं होता। योगीराज अरविन्द कहते हैं कि “अवतार ऐंद्रजालिक जादूगर बनकर नहीं आते, प्रत्युत मनुष्य जाति के भागवत नेता और भागवत मनुष्य के एक दृष्टान्त बनकर आते है।”
अवतार का अवतरण प्रक्रिया देव संस्कृति में सृष्टि की एक व्यवस्था के उपक्रम के रूप में वर्णित की गयी है। सृष्टि में सृजन और उत्थान के तत्व प्रधान हैं। तब भी वह स्थिति न तो स्थिर है, न निर्वाधगति से चलने वाली है। उत्पादन चक्र चलते रहने के लिए आवश्यक है कि उत्थान के बाद पतन और पतन के बाद उत्थान का क्रम जारी रहे। सूर्य का उदय-अस्त होना, प्राणियों का जन्म−मरण इस सुनिश्चित तथ्य की सुनिश्चित साक्षी देते हैं। सृष्टि में पतन और पराभव के तत्व सुव्यवस्था और सुन्दरता के साथ काम करते रहते हैं और प्राणियों को अधिक जागरूक रहने की सतत् प्रेरणा देते रहते हैं। जीवन प्रवाह का एक सिरा है जन्म, दूसरा मरण। गतिचक्र इसी प्रकार बनता है। विस्तार सतत् चलता रहे उतना स्थान इस ब्रह्माण्ड में नहीं है। इसलिए वह चक्रगति से चलने के लिए परिभ्रमण हेतु बाधित किया गया है। पहिये पहले नीचे जाते हैं, फिर ऊपर उठते हैं। सृष्टिक्रम में भी यही होता है। शैशव, किशोरावस्था, यौवन का क्रम पूरा होते-होते जरा-जीर्णता का ढलान आरंभ हो जाता है और अंततः मरण के अतिरिक्त और कोई समाधान नहीं रह जाता। हिन्दू अध्यात्म की मान्यतानुसार यह मरण भी अंतिम नहीं है। समापन के दिन से ही नवजीवन की भूमिका आरंभ हो जाती है। कायसत्ता की तरह विश्वसत्ता में भी औचित्य की संवर्द्धन और अनौचित्य का उन्मूलन क्रम रथ के दो पहियों की तरह सहयोग पूर्वक चलता रहता है। असंतुलन जब उत्पन्न होता है, जब सृजन के तत्व दुर्बल पड़ जाते हैं, निकृष्टता की विनाशलीला जब स्वच्छन्द होती दिखाई पड़ती है, जब आतंक की तमिस्रा धनी होती दिखाई देती है और निराशा भरी परिस्थितियाँ मानवी पुरुषार्थ को हतप्रभ कर देती हैं, ऐसे ही अवसरों पर स्रष्टा का वह आश्वासन अवतरित होता है, जिससे उसने अपने सुरम्य उद्यान को विनाश के गर्त में गिरने से पूर्व ही बचाते रहने का सुनिश्चित विश्वास दिलाया है। यही अवतार का प्रादुर्भाव है।
यदा यदाहि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यह्म॥ 7 ॥
परित्राणाय साधूनाम् विनाशाय च दुष्कृताम्। धर्म संस्थापनार्थाय संभवामि युगे-युगे 8 ॥
गीताकार द्वारा चौथे अध्याय में की गयी यह प्रतिज्ञा भगवत्सत्ता की मात्र अर्जुन के समक्ष ही प्रकट की गयी है, यह बात नहीं, वरन् इस आश्वासन का शास्त्रों और आप्तवचनों में अनादिकाल से अनवरत उल्लेख होता रहा है। न केवल उल्लेख वरन् उसके प्रकटीकरण के प्रमाण भी समय-समय पर उपलब्ध होते रहे हैं। मानवी पौरुष जब भी जहाँ भी लड़खड़ाता है, वहाँ गिरने के पूर्व ही सृजेता के लम्बे हाथ असंतुलन का संतुलन में बदलने के लिए अपना चमत्कार प्रस्तुत करते दिखाई देते हैं, यही स्रष्टा का लीला अवतरण प्रकटीकरण। सभी अवसरों पर एक ही प्रयोजन रहा है उस परम सत्ता का, अधर्म का उन्मूलन और धर्म का संस्थापन।
गीता के इस श्लोक में बड़ा अद्भुत रहस्य छिपा पड़ा है जो चौथे अध्याय में परमसत्ता के भाव से श्रीकृष्ण द्वारा अपने ईश्वरभाव का उद्घाटन करते हुए प्रकट हुआ है। स्वयं अलौकिक होते हुए भी इस लौकिक भूमिका में अपने अवतरण का वे हेतु बताते हैं। उपरोक्त श्लोकों में एक शब्द आया है “संभवामि”। श्रीकृष्ण कहते हैं कि वे सृष्टि के आदि कारण हैं, स्वामी हैं, विश्व के प्रभु-स्वयं विश्वातीत हैं, विश्वमय हैं, सर्वेश्वर हैं तब भी वे अपनी प्रकृति को अधिष्ठान बनाकर, उसे अपने संकल्प के अधीन रखकर व्यक्ति भावापन्न हो जाते हैं। देखा जाय तो संपूर्ण सृष्टि प्रकृति की सभी घटनाएँ परमेश्वर की ही अभिव्यक्ति हैं किन्तु किसी को भी इस सत्य का जाग्रत अनुभव नहीं होता। यही प्रकृति जब विशेष भागवत संकल्प के अधीन सजग होकर सक्रिय हो जाती है, तब किसी विशेष देह-प्राण मन-बुद्धि संयुक्त व्यक्तित्व में भागवत अवतरण सचेतन होता है, आत्मचेतन होता है और यही पर्सोनीफाइड चेतना अवतार की संज्ञा पाती है।
योगीराज श्री अरविन्द ने अपने “गीता प्रबन्ध” में लिखा है कि “अवतार का प्रयोजन गीता की ही अपनी भाषा में तो है साधुजन का परित्राण, दुष्कर्मियों का विनाश तथा धर्म की संस्थापना, किन्तु यह मात्र इतना नहीं है। धर्म संस्थापन का कार्य तो कोई भी उच्चस्तरीय चेतनसत्ता कर सकती है। यह कोई इतना बड़ा और पर्याप्त कारण नहीं है कि राम, कृष्ण, बुद्ध या ईसा को उतरकर नीचे आना पड़े। अवतार का जन्म भी दिव्य होता है, कर्म भी दिव्य होता है, यह घोषणा स्वयं श्रीकृष्ण (जन्म कर्म च में दिव्यम्) गीता में करते हैं और इस तथ्य का असाधारण महत्व घोषित करते हैं कि जो कोई व्यक्ति उनके जन्म और कर्म की दिव्यता को तत्त्वतः जान लेता है, वह पुनर्जन्म की बाध्यता से मुक्त होकर भगवत् प्राप्ति की स्थिति को पहुँच जाता है। जब जन्म व कर्म दिव्य हैं तो वह प्रयोजन भी, जिसके लिये वह अवतरित होते हैं एक ऐसा दिव्य प्रयोजन होना चाहिए, जिसे पूरा करना मानवी सामर्थ्य के बाहर की बात हो।”
यहाँ यह बात ठीक से समझनी होगी। धर्म की स्थापना व अधर्म का विनाश तो विशुद्धतः एक समाज सुधार का कार्य है। मात्र इतने से के लिए भगवान इस धरती पर आएँ यह सर्वथा अनावश्यक प्रतीत होता है। भगवान मानवीय भूमिका में उतरते हैं दिव्य सामर्थ्य के साथ, दिव्य ज्योति और शक्ति के साथ, दिव्य प्रयोजन से दिव्य कार्य करने के लिए, ऐसा कुछ करने के लिए जिसे मनुष्य न कर पाए किन्तु जिससे मनुष्य एक दिव्य आदर्श और सत्प्रेरणा ग्रहण कर सके। (श्रीअरविन्द के आलोक में “गीता का दिव्य सन्देश” अरविन्द आश्रम पाण्डिचेरी से प्रकाशित से उद्धत)।
दिव्य जन्म जब भगवत्सत्ता का होता है तो उसके दो पहलू होते हैं-एक है अवतरण दूसरा आरोहण अवतरण अर्थात् मानवजाति में भगवान का जन्म लेना, मानव आकृति और प्रकृति में भगवान का प्रकटीकरण। यही सनातन अवतार है। दूसरा है आरोहण अर्थात् भगवान के भाव में मनुष्य का जन्म ग्रहण करना। भागवत प्रकृति और भगवत् चेतना की दिशा में उसका उत्थान। (मद्भावमागताः) यह जीव का नव जन्म है। द्वितीय जन्म है। भगवान का अवतार व धर्म की संस्थापना का कार्य इस नव जन्म के लिए होता है गीता अवतारवाद की बड़ी गहराई में जाकर हमें समझाती है कि कोई ऐतिहासिक पौराणिक अतिमानव मात्र कल्पना के जोर से भगवान नहीं बन जाता है। अवतार एक मत विशेष की प्रचलित मान्यता भर नहीं, अपितु इसके अवतरण व आरोहण वाले दो पहलू यह बताते हैं कि एक विराट उद्देश्य के लिए, भगवत् प्राप्ति को मनुष्य मात्र के लिए सुलभ बना देने के लिए, भागवत् जीवन के लिए मनुष्य को प्रेरित करने हेतु दिव्य ज्ञान व दिव्य कर्मों के आदर्शों को स्थापित करने के लिए दिव्य चेतना अवतरित होती है। उसका लक्ष्य है मानव में देवत्व का जागरण मानवी स्वभाव में निहित नित्य अभीप्सा का जागरण उसे दिव्य आदर्शों के प्रति उन्मुख बना देना। तमसो मा ज्योतिर्गमय, असतो मा सद्गमय, मृत्योर्माऽमृतं गमय के रूप में यह तीन लक्ष्य मानवमात्र के हैं। यही है मनुष्य का सनातन धर्म, जिसमें वैश्वप्राण वैश्वचेतना वैश्वप्रकृति संयोजिका और सहायिका बनी हुई है। इस नैसर्गिक प्रक्रिया में अवरोध अर्थात् धर्म की ग्लानि व अधर्म का उत्थान व इसलिए सर्वसमर्थ भगवत्सत्ता का आगमन, अवतार का इस तरह वास्तविक प्रयोजन हुआ मनुष्य में दिव्योन्मुखी प्रवृत्ति का पुनर्जागरण और यह आश्वासन कि भगवान की कृपामयी सहायता सबको सदैव उपलब्ध है और भागवत् जीवन की उपलब्धि नित्य सबके लिए सतत् संभव है।
अवतार हमें दिखाई क्यों नहीं देता, समझ में क्यों नहीं आता? भगवान इसे बड़ा स्पष्ट करते हुए अपने निष्काम कर्म का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि मानव शरीर में जो श्रीकृष्ण हैं और परमेश्वर रूपी श्री कृष्ण हैं ये दोनों उन्हीं भगवान् पुरुषोत्तम के ही प्रकाश हैं। वहाँ वे अपनी सत्ता में प्रकट हो रहे हैं, यहाँ मानवाकार में। किन्तु वे आगे कहते हैं-मेरे परमभाव को न जानने वाले मूढ़ लोग मनुष्य का शरीर धारण करने वाले मुझे तिरष्कृत करते हैं, क्योंकि वे मेरे सर्वलोक महेश्वर परमभाव को नहीं समझते (मुझ परमेश्वर को भी साधारण मनुष्य मात्र मानते हैं)” श्लोक 9 अध्याय 11 में यह बात स्पष्ट हुई है-अब जानन्ति माँ मूढ़ा मानुषीं तनुमाश्रितम्। परं भावम् जानन्तो मम भूतमहेश्वरम्॥ कितनी स्पष्ट “अवतार” की व्याख्या है। इस रहस्य को जाने बिना अवतार को पहचानना तो दूर उसके आगमन का हेतु व स्वयं की भूमिका भी व्यक्ति नहीं जान पाता। यही अद्वैत दर्शन की वेदान्त की व्याख्या है कि “सब कुछ ईश्वर में है और उसी में सब कुछ होता रहता है। प्रत्येक प्राणी में छद्मवेश में नारायण हैं।” बुद्धिवादी का कोई तर्क अवतारवाद के विरुद्ध टिक नहीं सकता इतना सशक्त देव संस्कृति का यह प्रतिपादन है। संस्कृति चिन्तन यह कहता है भगवान जब भी अवतार लेकर आते हैं तो मानव और अपने बीच के परदे को फाड़ने के लिए आते हैं। उस परदे को, जिस अपनी प्रकृति में सीमित मनुष्य उठा तक नहीं पाता।
‘अवतार’ शब्द का अर्थ है उतरना अवतरित होना। भगवान का उस विभाजन रेखा से नीचे उतर आना जो भगवान को मानव जगत या मानव अवस्था से पृथक् करती है। हम अपने सामान्य मानवता के अज्ञान और अविद्या से ऊपर उठ सीमा पार कर लें तो अवतार को जानने योग्य हो जाते हैं, यह भगवान का स्पष्ट संकेत है। इस तरह अवतार का आगमन एक प्रकार से मानवमात्र की सहायता के लिए, आस्था संकट की वेला में मानव जाति को एक साथ रखने के लिए, अधोगामी प्रवृत्तियों को चूर्ण विचूर्ण करने के लिए, मनुष्य के अंदर की भगवन्मुखी चेतना को जगाने के लिए व सत्प्रवृत्तियों की स्थापना के लिए तथा अशुभ सत्ताओं के विनाश के लिए होता है। यह क्रम अनादि काल से चलता चला आया है। भूतकाल में विश्व अनेक भागों में बिखरा हुआ था। एक दुनिया छोटी-छोटी कई दुनियाओं में बँटी थी। अतः विषमताएँ भी क्षेत्र विशेष की, स्थानीय परिस्थितियों की होती थीं क्षेत्रीय “अवतारों” के इसी कारण सीमित लक्ष्य रहते थे। भारतवर्ष में ही हिन्दूधर्म में 24 अवतार गिनाये जाते हैं। जैनधर्म में 24 तीर्थंकरों की चर्चा होती है। सिखधर्म में दस गुरुओं का वर्णन है ईसाई, मुस्लिम, पारसी, यहूदी आदि धर्मावलम्बी भी अपने अवतारों की गणना हिन्दूधर्म से अलग करते हैं। दर्शन विज्ञान के क्षेत्र में महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ अर्जित करने वालों को भी मसीहा-अवतार संज्ञा दी जाती रही है। अवतार वस्तुतः व्यक्ति का नहीं चेतना का होता है, यह बात अच्छी तरह समझनी होगी। अंशावतार, कलावतार, भक्तवतार, चेतनावतार सिद्धावतार, आवेशावतार, इस प्रकार कई-कई भेदों से विस्तृत व्याख्या कर मानव को अवतार सिद्ध की जाने की कोशिश की जाती है, उस पर परम पूज्य गुरुदेव ने बड़ा स्पष्ट चिंतन देते हुए कहा है कि यदि व्यक्ति को अवतार मानना हो तो मात्र धर्म क्षेत्र की विभूति नहीं सृष्टि के संतुलन में सहायक हर महान सत्ता को उसी क्षेत्र में गिनना पड़ेगा ।
ऐसे व्यक्तियों की, जो परब्रह्म की अवतार सत्ता के साथ युग संतुलन संभालने सुधारने इस धरती पर आते हैं। तीन श्रेणियाँ पूज्यवर ने बतायी हैं। संत, सुधारक और शहीद। इन्हें छोटे बड़े अवतार कहा जा सकता है। संत अपनी सज्जनता से मानव जीवन की गरिमा के अनुरूप जीवन जीते हुए आदर्शवादिता को जीवन में उतारते हुए जनमानस का मार्गदर्शन करते हैं। प्रतिकूलताओं के बीच भी जीवन निर्वाह संभव है, मनःस्थिति से परिस्थिति बदल जा सकती है, निराशा की अनास्था को उलटकर आस्था की ज्योति जलाना संभव है, यह शिक्षण संत अपनी जीवनचर्या से देते हैं। वे पृथ्वी के देवता कहलाते हैं।
संतों से ऊँचा स्तर है सुधारक का। सुधारक वह जो आत्मनिर्माण भी करे, व दूसरों का सुधार भी करें। ऐसे व्यक्ति में अधिक प्राणशक्ति की आवश्यकता पड़ती है। संत का ब्राह्मण होना पर्याप्त है किन्तु सुधारक को दो मोर्चे एक साथ सँभालने होते हैं उनके एक हाथ में शास्त्र और दूसरे में शस्त्र रहता है। व्यापक परिवर्तन इससे कम में संभव नहीं। परशुराम द्रोणाचार्य, बन्दा वैरागी, गुरुगोविन्द सिंह जैसों की गणना इनमें होती है। अवतार का तीसरा चरण है शहीद का। शहीद कौन? वह जो ‘स्व’ का अहंता ‘पे’ ‘पर’ के लिए सम्पूर्ण करके। यही समर्पण है शरणागति है। स्वार्थ को परमार्थ में उत्सर्ग है। जान गवाँ देने वाली शहादत एकाँगी परिभाषा बताती है। बलिदानियों की वहाँ अवमानना नहीं की जा रही है वरन् ‘शहीद’ शब्द का व्यापक अर्थ जो परम पूज्य गुरुदेव ने बताया है, वह है संकीर्ण स्वार्थ परता का अंत करके परमार्थ को ही महत्वाकांक्षाओं का केन्द्र बना लेना। यह मानसिक शहादत है। संस्कृति, राष्ट्र धर्म के प्रति समर्पित ऐसे व्यक्ति तत्कालीन समाज को ऊँचा उठाते हैं व धर्मधारणा जिंदा रखते हैं जीवनमुक्त ऋषि के रूप में शहीद शब्द की व्याख्या सही सही हो जाती है। शहीद तो मरने के उपरान्त उथल−पुथल पैदा करते हैं किन्तु ऋषियों की चेतना हर क्षण स्वर्गोपम श्रद्धा संवेदना का संचार जन-जन में करती रहती है।
ऊपर बताये तीनों स्तर जनसाधारण में तब अवतरित होने लगते हैं जब गीता में दिये अपने वचनानुसार परमसत्ता इस धरती पर आती है। रामकाल के रीछ वानर, कोल, भील, गिद्ध-गिलहरी तथा कृष्णकाल के पाण्डव, ग्वाल-बाल इसी तथ्य के परिचायक हैं कि अवतार के साथ-साथ चेतना के विकसित रूप भिन्न-भिन्न जीवों में आवेश के रूप में अवतरित होते हैं व उनके शरीर से परमसत्ता वह करा लेती है जो उसे अभीष्ट है। आर्ष वांग्मय के अनुसार पिछले सभी अवतारों पर दृष्टि डालें तो हमें ज्ञात होता है कि समय की आवश्यकता के अनुसार अपने स्वरूप व कार्य क्षेत्र को विनिर्मित करने अवतार आए हैं। जब-जब जिस प्रकार का असंतुलन पैदा हुआ है तब तब प्रभु का वैसा लीला उपक्रम बना है।
सृष्टि के आदि जल ही जल था व सभी जीव जलचर प्रधान थे, तब उस क्षेत्र की अव्यवस्था को मत्स्यावतार ने सँभाला था। मानव बीज की रक्षा कर सृष्टि को बनाए रखने का दायित्व इस अवतार ने संभाला। जल व थल पर जब छोटे प्राणियों की हलचलें बढ़ी तो कच्छप काया लेकर उन्हें आना पड़ा। समुद्र मंथन का पुरुषार्थ इन्हीं के माध्यम से संभव हुआ। हिरण्याक्ष द्वारा जल में पायी संपदा को ढूँढ़ निकालने के लिए वाराह रूप ही संभव हो सकता था। वहीं धारण किया गया नरसिंह की आवश्यकता तब पड़ी जब हिरण्यकश्यपु के रूप में उद्धत आचरण करने वाला असुर सामने आया भगवान ने उन दिनों की परिस्थितियों के अनुरूप नर और व्याघ्र का समन्वय आवश्यक समझते हुए सज्जनता का संरक्षण किया।
अनुदार बलि में सम्पदा का सदुपयोग करने की उदारता अपनाने की गुंजाइश देखकर ही प्रभु ने वामन रूप बनाया व समझा बुझाकर ही वह प्रयोजन पूर्ण कर लिया जो करने पर हो सकता था। सामन्तवादी आधिपत्य को परशुराम ने शत्रुबल से निरस्त किया। श्रीराम ने मर्यादा पालन, रावण व लंका के रूप में अनीति दमन, रामराज्य संस्थापन का कार्य किया श्रीकृष्ण ने छद्म से घिरी परिस्थितियों का शमन करने के लिए कूटनीतिक दूरदर्शिता को अपनाया तथा एक विशाल भारत बनाने की दूरगामी योजना बनायी। धर्म की आड़ में लोक व्यवस्था जब गड़बड़ाने लगी तो बुद्ध ने विवेक की सज्जनों के संगठन की आवश्यकता बताई तथा धर्म चक्र प्रवर्तन द्वारा देव संस्कृति का तत्त्वज्ञान घर-घर पहुँचाया। यह विगत नौ अवतारों की जो पौराणिक मान्यतानुसार हैं, संक्षिप्त चर्चा हुई।
आज का समय भी वैसा ही है, जो परशुराम से बुद्ध तक के समय में था। दशम अवतार कल्कि अवतार है। इसे परम पूज्य गुरुदेव ने प्रज्ञावतार कहा है व बुद्धावतार के उत्तरार्ध के रूप में निरूपित किया है। बुद्धि प्रधान युग की समस्याओं का निवारण विचार क्रान्ति द्वारा चेतना जगत में ही होगा, ऐसी सबकी मान्यता है। पूज्यवर कहते हैं कि आदर्शवादी दुस्साहस ही अवतार है। वह एक भावनात्मक प्रवाह के रूप में अगणित व्यक्तियों की चेतना में उभरता है और असंख्यों को अनुप्राणित करता है। गाँधी युग में सत्याग्रही थोड़े से थे किन्तु अवतार चेतना ने उनसे कार्य कराया। निहत्थे असहयोग करने वालों ने महाशक्ति से टक्कर ली व अनुकूलताएँ उपस्थित होती चली गयीं। व्यक्ति का पुरुषार्थ नहीं, इसमें सूक्ष्म जगत में कहने वाली प्रचण्ड शक्तिधारा का प्रवाह मुख्य था जिसका उद्गम ऋषि संस्कृति का अनादि केन्द्र हिमालय था। रामकृष्ण परमहंस से लेकर रमण महर्षि, विवेकानन्द, योगीराज श्री अरविन्द एवं परम पूज्य गुरुदेव जिसके माध्यम थे।
अब जो अवतार जन्म लेने जा रहा है वह दार्शनिक स्तर पर ऋतम्भरा प्रज्ञा की प्रसंग भरी हलचल के रूप में समझा जा सकता है। युग परिवर्तन यह दशमावतार कल्कि अवतार, प्रज्ञावतार ही करेगा, ऐसी ऋषियों की, द्रष्ट मनीषियों, की भविष्य वक्ताओं की मान्यता है व हम आप सभी इस प्रक्रिया में एक निमित्त बनकर श्रेयार्थी बनने जा रहे हैं, देव संस्कृति के निर्धारण उसका माध्यम बनने जा रहे हैं व भारतवर्ष उसकी धुरी बन रहा है, इससे बढ़कर सौभाग्य की बात और क्या हो सकती है?
ज्ञान-की सार्थकता-व्यापक बोध और समग्र दृष्टि पाने में है। मानवीय ज्ञान-विज्ञान के आदि स्रोत के रूप में ‘वेद’ ने यही तत्व जीवन में बिखेरे हैं। जिनको ग्रहण कर ऋषि भूमि की सोऽहम् सम्पदा अक्षुण्ण प्राण और शाश्वत जीवन पा सकी। सत्य अर्थों में वेद एक पोथी मात्र न होकर जीवन और सृष्टि के रहस्यों को खोलने वाला व्यापक विश्वकोश है। इसका सम्यक् विभाजन और सम्पादन करने वाले भगवान व्यास ने इसे चार वर्गों में विभक्त किया। ऋक् जिसका अर्थ है-प्रार्थना अथवा स्तुति, यजुः का तात्पर्य है यज्ञ-यज्ञादि का विधान, साम-शान्ति अथवा मंगल स्थापित करने वाला गान है और अथर्व में धर्म दर्शन के अतिरिक्त लोक-जीवन के सामान्यक्रम में काम आने वाली ढेरों-उपयोगी सामग्री भरी पड़ी है।
भाष्यकार महीधर के अनुसार-प्रत्येक ‘वेद’ से जो वांग्मय विकसित हुआ, अध्ययन की सुविधा के लिए उसे पुनः चार भागों में वर्गीकृत किया गया (1) संहिता (2) ब्राह्मण (3) आरण्यक और (4) उपनिषद्। संहिता में वैदिक स्तुतियाँ संग्रहित हैं। ब्राह्मण में मंत्रों की व्याख्या और उनके समर्थन में प्रवचन दिए हुए हैं, आरण्यक में वानप्रस्थियों के लिए उपयोगी आरण्यगान और विधि-विधान है। उपनिषदों में दार्शनिक व्याख्याओं का प्रस्तुतीकरण है। कालक्रम के प्रवाह में इस वर्गीकरण का लोप हो जाने के कारण इनमें से प्रत्येक को स्वतन्त्र मान लिया गया और आज स्थिति यह है कि ‘वेद’ शब्द सिर्फ संहिता के अर्थों में प्रयुक्त होता है।
जबकि वर्गीकरण-का तात्पर्य अस्तित्व का बिखराव नहीं उसका सुव्यवस्थित उपयोग है। जिसके क्रम में वैदिक अध्ययन कई शाखाओं में विकसित हुआ। ऋग्वेद की पाँच शाखाएँ थीं शाकल वाष्कल, आश्वलायन, शाँखायन और माँडूक्य। इनमें अब शाकल शाखा ही उपलब्ध है। शुक्ल यजुर्वेद की माध्यन्दिन और कात्य दो शाखाएँ। कृष्ण यजुर्वे की उपलब्ध शाखाएँ इस समय चार हैं तैत्तिरीय, मैत्रायणी, काठक, और कठ। सामवेद की दो शाखाएँ हैं कौथुमी और राणायनीय। अथर्ववेद की उपलब्ध शाखाओं के नाम पैप्पलाद तथा शोनक हैं।
संहिताओं के विवेचन क्रम में अध्ययन करने पर ऋग्वेद संहिता में दस मंडलों का पता लगता है। जिनमें 85 अनुवाद और अनुवाक समूह में 1028 सूक्त हैं। सूक्तों के बहुत से भेद किए गए हैं यथा-महासूक्त क्षुद्र, सूक्त, ऋषिसूक्त, छन्दसूक्त, और देवतासूक्त। वेदज्ञ मनीषियों के अनुसार ऋग्वेद के मंत्रों की संख्या 10,402 से 10,628 तक है। यजुर्वेद के दो भाग है-शुक्ल और कृष्ण इनमें कृष्ण यजुर्वेद संहिता को तैत्तिरीय संहिता भी कहते हैं।
मुक्तिकोपनिषद् के अनुसार इसको 109 शाखाएँ थीं, जिनमें मात्र 12 शाखाएँ और 14 उपशाखाएँ ही उपलब्ध हैं। इस संहिता में कुल सात अष्टक हैं 700 अनुवादों वाले इस ग्रन्थ में अश्वमेध, अग्निहोम, राजसूय अतिरात्र आदि यज्ञों का वर्ण है। इसमें 18000 मंत्र मिलते हैं। शुक्ल यजुर्वेद की संहिता के माध्यन्दिनी भी कहते हैं। इसमें 40 अध्याय 290 अनुवाक और अनेक काण्ड हैं। यहाँ दर्शपौर्णभास, वाजपेय आदि यज्ञों का वर्णन है।
सामवेद के पूर्व और उत्तर दो भाग हैं। पूर्व संहिता को छन्द, आर्चिक और सप्त साम नामों से भी अभिहित किया गया है। इसके छः प्रपाठक हैं। सामवेद की उत्तर संहिता को उत्तरार्धिक या आरण्यगान भी कहा गया है। अथर्ववेद की मंत्र संख्या 12,300 हैं। जिसका अति न्यून अंश आजकल प्राप्त है। इसकी नौ शाखाएँ पैप्पल, दान्त, प्रदान्त स्नात, रौत, ब्रह्मदत्त शौनक, दैवीदर्शनी और चरण विद्या में से केवल शौनक शाखा ही आज रह पाई है। इसमें 20 काण्ड हैं।
संहिताओं के पश्चात ब्राह्मणों का स्थान आता है । इनके विषय को चार भागों में बाँटा गया है। विधिश्माग, अर्थवादभाग, उपनिषदभाग और आख्यानभाग। विधिभाग में यज्ञों के विधान का वर्णन है। इसमें अर्थमीमाँसा और शब्दों की निष्पत्ति भी बतायी गयी है। अर्थवाद में यज्ञों में महात्म्य को समझाने के लिए प्ररोचनात्मक विषयों का वर्णन है। ब्राह्मणों के उपनिषद् भाग में ब्राह्मण के विषय में विचार किया गया है। आख्यान भाग में प्राचीन ऋषिवंशों, आचार्य वंशों और राजवंशों की कथाएँ वर्णित हैं।
प्रत्येक वैदिक संहिता के अलग-अलग ब्राह्मण ग्रन्थ हैं। ऋग्वेद के दो ब्राह्मण हैं ऐतरेय और कौषीतकि। यजुर्वेद के भी दो ब्राह्मण है कृष्ण यजुर्वेद का तैत्तिरीय ब्राह्मण और शुक्ल यजुर्वेद का शतपथ ब्राह्मण। सामवेद की कौथुमीय शाखा के ब्राह्मण ग्रन्थ चालीस अध्यायों में विभक्त हैं। इसकी जैमिनीय शाखा के दो ब्राह्मण ग्रन्थ हैं जैमिनीय ब्राह्मण और जैमिनीय उपनिषद् ब्राह्मण। इन्हें क्रमशः आर्षेय और छान्दोग्य ब्राह्मण भी कहते हैं। अथर्ववेद की भी शाखाएँ हैं किन्तु एक ही ब्राह्मण उपलब्ध है गोपथब्राह्मण।
आरण्यकों की विषय वस्तु सायणाचार्य के शब्दों में लोकसेवी वानप्रस्थों की प्रशिक्षण सामग्री है। मुख्य आरण्यक ग्रन्थों के क्रम में ऋग्वेद में ऐतरेय और कौषीतकि आरण्यक मिलते हैं। यजुर्वेद में कृष्ण यजुर्वेद का एक आरण्यक है तैत्तिरीय आरण्यक। जिसके दस काण्डों में आरणीय विधि का प्रतिपादन हुआ है बृहदारण्यशुक्ल यजुर्वेद का है। सामवेद में सिर्फ छान्दोग्य आरण्यक मिलता है। जो छः प्रपाठकों में विभाजित है।
‘वेद’ का चरमोत्कर्ष उपनिषदों में मिलता है। अन्तिम भाग होने के कारण इसे ‘वेदान्त’ की संज्ञा भी प्राप्त है। उपनिषदों ने ही स्वयं इस शब्द की व्याख्या सूचित की है “यदा वै बली भवति अथ उत्थाता भवति, उत्तिष्ठन परिचरिता भवति, परिचरन, उपसत्ता भवति, उपसीदन द्रष्ट भवति, श्रोता भवति, मन्ता भवति, बोद्धा भवति, कर्ता भवति, विज्ञाता भवति (छान्दोग्य 7/8/1) जब मनुष्य बलवान होता है तब वह उठकर खड़ा होता है। उठकर खड़ा होने पर गुरु की सेवा करता है। फिर वह गुरु के पास (उप) जाकर बैठता है। (सद) पास जाकर बैठने पर वह गुरु का जीवन ध्यान से देखता है। उसका व्याख्यान सुनता है उसे मनन करता है, समझ लेता है और उसके अनुसार आचरण करता है। उसमें उसे विज्ञान यानि अपरोक्ष अनुभूति का लाभ होता है ‘उप’ ‘नि’ ये दो उपसर्ग और ‘सद’ धातु से बने इस शब्द की इस व्याख्या में ‘नि’ अर्थात् निष्ठ से की व्याख्या छूट गई है जिसका उल्लेख एक दूसरी जगह हुआ है। “ब्रह्मचारी आचार्यकुलवासी अत्यन्तम् आत्मानम् आचार्यकुले अवसादयन्” (छान्दोग्य 2/23/1) ब्रह्मचर्यपूर्वक गुरु के पास रहकर (उप) गुरु सेवा में अपने आपको विशेष रूप से (नि) खपाने वाला (सद) जो रहस्यभूत विद्या प्राप्त करता है वह है उपनिषद् ।
इन दोनों पर्यायों के इकट्ठा करके देखें तो (1) आत्मबल (2) उत्थान (3) ब्रह्मचर्य (4) गुरु सेवा में शरीर को खपा देना (5) गुरु (हृदय) सान्निध्य (6) जीवन निरीक्षण (7) श्रवण (8) मनन (9) अवबोधन (10) आचरण (11) अनुभूति-इतना सारा भाव-इस छोटे शब्द में निहित है। इनकी संख्या कितनी है? इस संदर्भ में भिन्न-भिन्न स्थानों पर अलग-अलग विवरण प्राप्त होते हैं। मुक्तिकोपनिषद् में 108 उपनिषदों की सूची है। उपनिषद्वाक्य महाकोश में 223 उपनिषद् ग्रन्थों को नामोल्लेख हुआ है। इनकी वेदों से अभिन्नता और प्राचीनता को दृष्टि में रखकर विचार करें 108 उपनिषदों की सूची ही सार्थक लगती है। अन्य के सम्बन्ध में यही कहा जा सकता है कि मध्ययुग में विभिन्न सम्प्रदायों ने अपनी प्राचीनता सिद्ध करने के लिए इनकी रचना की गई इन 108 उपनिषदों में भी अपनी विशेष गहनता के कारण ईश, केन, कठ, प्रश्न, मुण्डक, माण्डूक्य, तैत्तिरीय, ऐतरेय, छांदोग्य, बृहदारण्यक और श्वेताश्वेतर कुछ अधिक ही महत्वपूर्ण हैं।
ज्ञान के विश्वकोश का यह व्यापक विस्तार-उपरोक्त पंक्तियों के अनुसार अब-आधे-अधूरे रूप में ही मिलता है। इतने पर भी चेतना की गहरी पर्तों को खोलने वाले यह मंत्र इतने मोहक और उदात्त हैं, जिन्हें पढ़कर विश्व-मनीषा को चकित होना पड़ता है। इतने पर भी उनकी संख्या भी कम नहीं है जो अपने ओछेपन, मूढ़ता और दुराग्रह के कारण वेदों की ऊल-जलूल व्याख्या करते रहते हैं। इसका एकमात्र कारण सस्ती लोकप्रियता को लूटना और विद्वान होने का सस्ता गौरव हासिल करना समझा जा सकता है। उनके पास न तो ‘संस्कृत’ भाषा की मर्मज्ञता है और न तप साधना की कुञ्जी । इसी अभाव के कारण आधुनिक मन इसे आदिम, जंगली और अत्याधिक बर्बर समाज की स्तोत्र संहिता मान बैठा है। यूरोपीय पाण्डित्य ने इसे जंगली शान्तिकरण सम्बन्धी यज्ञ बलिदानों का जखीरा मानकर अपनी समझ के बौने पन का ढिंढोरा पीट दिया। देव भाषा संस्कृत ज्ञान से अनभिज्ञ सामान्य जन का इन हल्के प्रयासों से भ्रमित होना अस्वाभाविक नहीं है।
सोऽहम् विवेचन का वर्तमान प्रयास जिस महान उद्देश्य को लेकर किया जा रहा है वह है इन प्रचलित भ्रान्तियों का निवारण और अपने पूर्व पुरुषों द्वारा सौंपी गई विरासत का गौरव बोध। जिसका जिक्र करते हुए महायोगी अनिर्वाण ने अपने ग्रन्थ वेद मीमांसा में कहा कि ‘वेद’ उन ऋषियों की कृति है जिन्होंने अपने मन द्वारा कुछ गढ़कर रचने की जगह, एक महान, व्यापक, शाश्वत तथा अपौरुषेय सत्य को अपने आलोकित मनों में ग्रहण किया था। सत्य को मंत्र में मूर्त करने वाले इन ऋषियों को एक नाम और दिया गया ‘कविः’। वेद इनके बारे में कहता है कवयः सत्यश्रुतः (ऋग्वेद 5/57/8) अर्थात् वे द्रष्ट जो दिव्य सत्य को सुनने वाले थे।
इस सत्य से अनभिज्ञ-शब्दार्थ में उलझ जाने वाले-वेदों में पशु बलि-हिंसा-जैसी न जाने कितनी बातें ढूँढ़ा करते हैं। जबकि वेद भगवान का स्पष्ट आदेश है पशुन पाहि माँ मा हिंसी, अजा मा हिंसी। अपि मा हिंसी, इमं या हिंसी द्विपाँद पशुँ॥ मा हिंसीरेक शकं पशुँ माँ हिस्यात सर्वाभुतानि (पूज्य गुरुदेव ऋग्वेद भूमिका पृष्ठ 24) पशुओं की रक्षा करो, गाय को मत मारो, बकरी को मत मारो, भेड़ को मत मारो दो पैर वाले (मनुष्य, पक्षी) को मत मारो। एक खुर वाले पशुओं (घोड़ा, गधा) को मत मारो, किसी भी प्राणी की हिंसा मत करो।
वेद के वचन उनके सच्चे अर्थों में केवल उसी के द्वारा जाने जा सकते हैं जो स्वयं ऋषि हो। अन्यों के प्रति मंत्र अपने गुह्यज्ञान को नहीं खोलते। बामदेव ऋषि अपने चतुर्थ मण्डल के एक मंत्र (4/3/16) में अपने आपका इस रूप में वर्णन करते हैं कि मैं अन्तः प्रकाश से युक्त विप्र अपने विचार (मतिभिः) तथा शब्दों (उक्थैः) के द्वारा पथ प्रदर्शक (नीथानि) और गुह्य वचनों को (निण्याक्चाँसि) व्यक्त कर रहा हूँ। ये दृष्ट ज्ञान के शब्द (काव्यानि) है जो ऋषि के लिए अपने आन्तर अर्थ को बोलने वाले (कवये निवचना) हैं। इसी तरह ऋषि दीर्घतमा ने ऋग्वेद में उन चार स्तरों का उल्लेख किया है जहाँ से वाणी निकलती है। इनमें से तीन तो गुहा में छिपे हुए हैं और चौथा स्तर मानवीय है। वहीं से मनुष्यों के साधारण शब्द आते हैं। परन्तु वेद के शब्द और विचार उच्चतर तीन स्तरों से सम्बन्ध रखते हैं।(ऋग्वेद 1/164/45)।
यही कारण है-वेदों का अध्ययन करने वालों के लिए श्रद्धा और साधना आवश्यक तत्व बताए गए हैं श्रद्धा की जरूरत इसलिए है कि अलंकारिक भाषा में कहे गए सत्यों को पढ़कर बुद्धि भ्रम में न पड़े। साधना-इस कारण आवश्यक है-जिससे समाधि के क्षणों में मंत्र के गुह्यार्थ को जाना जा सके। परन्तु वेदों में उन मंत्रों की संख्या भी कम नहीं है, जो सामान्य जीवनक्रम में मार्गदर्शन करते मधुर और उदात्त भावों को उमगाते हैं। उदाहरण के लिए अथर्ववेद का एक अंश जिव्हा अग्रे........ भूयासं मधुसध्शं (अथर्व 1/34) मेरी जिव्हा के अग्र भाग में मधु हो, जिव्हा का मूल मधुर हो। मेरा निकलना और दूर-दूर तक जाना अर्थात् मेरा आचरण और व्यवहार मधुर हों। मैं वाणी से मीठा बोलूँ और मधुर बन जाऊँ, एक अन्य स्थान पर ऋषि अन्दर बाहर से एक बनने का निर्देश देता है “यदन्तरं तद् वाह्यं यद् बाह्यं तदन्तरम्” (अथर्व 2/30/4)।
वैदिक ज्ञान के उन अंशों को जहाँ वे गुह्य, रहस्यात्मक और अलंकारिक हैं समझने के लिए किसी ऋषि की अनुभूति का प्रकाश जरूरी है। इस संदर्भ में श्री अरविन्द के ग्रन्थ ‘वेद रहस्य’ को अद्भुत और अनोखा कहा जा सकता है। उनके शब्दों में वेद में अनेक मंत्र हैं अनेक समूचे सूक्त तक हैं जो ऊपर से एक रहस्यवादी अर्थ को प्रकट करते हैं। स्पष्ट ही एक प्रकार के गुह्य वचन है, जो अपना आन्तरिक अर्थ रखते हैं। एक अन्य स्थान पर वे कहते हैं कि अपने आशय को प्रतीकों तथा प्रतीकात्मक शब्दों द्वारा ढकने की जरूरतवश क्योंकि गुप्तता रखनी जरूरी थी ऋषियों ने शब्दों को दोहरे अर्थ नियत करने की विधि को अपनाया। जैसे गौ शब्द गाय के अतिरिक्त प्रकाश का या प्रकाश की किरण का वाचक है। यह कई ऋषियों के नामों में प्रयुक्त हुआ दीखता है। उदाहरण के लिए गौतम-अर्थात्-प्रकाशितम गाविष्ठर अर्थात् प्रकाश में स्थिर। वेदोक्त गौवें सूर्य के गोयूथ हैं-जो ग्रीक गाथा शास्त्र तथा रहस्यवाद में भी सुपरिचित हैं, ये हैं सत्य, प्रकाश और ज्ञान के सूर्य की किरणें। इसी तरह ‘घृत’ का सामान्य अर्थ है घी, परन्तु घृत का अर्थ प्रकाश भी है, यह घृ क्षरणदीप्त्यों धातु से बना है। इस अर्थ को ही लेकर द्युलोक के अधिपति इन्द्र के घोड़ों के विषय में कहा गया है कि ये धृतस्नू हैं (ऋग्. 3/41/9) अर्थात् प्रकाश से सने हुए। इसी तरह दस्यु-अंधकार की शक्तियाँ हैं जो सत्य के उपासकों का विरोध करने वाली है (वेद रहस्य पूर्वार्द्ध पृ.-14-17)। अनुभूतियों को अभिव्यक्त करने की यह परम्परा संहिता-ब्राह्मण आरण्यक, उपनिषद्-सभी में एक सी व्याप्त है।
चरणव्यूह के अनुसार इस परम्परा का निर्वाह उपवेदों में भी हुआ है। ऋग्वेद का उपवेद आयुर्वेद, यजुर्वेद का धनुर्वेद सामवेद का गांधर्ववेद और अथर्ववेद का अर्थशास्त्र उपवेद है। परन्तु भाव प्रकाश में आयुर्वेद को अथर्ववेद का उपवेद माना गया है। इन चार उपवेदों के अलावा वेदों के छः अंग भी हैं। शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, ज्योतिष और छन्द। उच्चारण के सम्बन्ध में उपदेश शिक्षा है। यज्ञ यज्ञादि कर्म सम्बन्धी उपदेश कल्प हैं। शब्दों के सम्बन्ध में विचार व्याकरण है और उनकी व्युत्पत्ति और अर्थ के सम्बन्ध में विचार निरुक्त है। खगोलगणना अन्तर्ग्रही प्रभावों का ज्ञान ज्योतिष है और छन्दों (काव्य) के सम्बन्ध का ज्ञान छन्द है।
वैदिक ज्ञान के इन गहन तथ्यों को अधिक सुगमता से समझाया जा सके इस लक्ष्य को लेकर पुराणों की रचना हुई। ब्रह्मपुराण, पद्मपुराण, विष्णुपुराण, शिवपुराण, भागवतपुराण, वायुपुराण, नारदपुराण, अग्निपुराण, ब्रह्मवैवश्वतपुराण, वाराहपुराण, स्कन्दपुराण, मार्कंडेयपुराण, वामनपुराण, कूर्मपुराण, मत्स्यपुराण, गरुड़पुराण, ब्रह्माण्डपुराण और लिंगपुराण। इन अठारह पुराणों के अतिरिक्त उपपुराणों की भी लम्बी शृंखला है। जिनमें 28 की गणना सर्वप्रचलित है। इन उप-पुराणों में जिन्हें लोक ख्याति मिली है उनमें हरिवंश, कल्कि, देवी भागवत का नाम उल्लेखनीय है। पुराणों जैसी शैली और अपनी महती ख्याति बावजूद महाभारत रामायण की इस क्रम में गणना न करने का इतना ही तात्पर्य है कि ऋषियों ने इन्हें प्रामाणिक इतिहास माना है। इनके लेखन के पीछे इतिहास बोध के साथ जीवन बोध कराने की दृष्टि है। जबकि अन्य में जीवन बोध को तत्त्वबोध से एकीकृत करने का प्रयास है।
अनुभूति और अभिव्यक्ति में जो महत्व वेदों को प्राप्त हुआ। लोक-जीवन को शिक्षित करने के लिए पुराणों को ठीक वैसी ही श्रेयानुभूति मिली। डॉ. भण्डारकर के शब्दों में कहें तो भगवान व्यास ने वैदिक रहस्यानुभूति-जीवन विद्या को कथा शैली के सहारे जन-जन पहुँचा दिया। इस प्रयास की प्रामाणिकता और उत्कृष्टता सत्य को सुगम और बाल बोध बनाकर प्रस्तुत करने में रही। इनमें से किसी का विस्तार कम व्यापक नहीं है। महाभारत के विषय में तो व्यास देव ने यहाँ तक कह डाला जो समूचे विश्व में कहीं है वह यहाँ है। इसी के भीष्मपर्व का अनमोल रत्न गीता है जो अपने अस्तित्व के उदय से अब तक विश्व मनीषा को मुग्ध कर रही है। 18 अध्याय में गूँथे गए 700 श्लोकों में जीवन के सभी तत्व सँजोये है। इस ग्रन्थ की सबसे बड़ी विशेषता है विभिन्न दर्शनों का काव्यात्मक सामंजस्य। ‘समूचा जीवन योग है’ इस गान को भगवान कृष्ण ने कुरुक्षेत्र के जीवन संग्राम में पहली बार गाया।
इसके व्यावहारिक सूत्र-मानव भविष्य की स्वर्णिम आशा है। इसी विचार को ध्यान में रखकर परम पूज्य गुरुदेव ने गीता-विश्वकोष की बृहद् रूप−रेखा तैयार की। उन महत्वपूर्ण बिन्दुओं को स्पष्ट किया जो विश्व राष्ट्र के मानव धर्म का आधार बनेंगे । उन्होंने व्यक्ति और समाज के जीवन और चरित्र पर प्रकाश डालने वाले इसके उन अनेकों पक्षों को स्पष्ट किया है जो अभी तक गुह्य समझे जाते रहे हैं। विश्व चिन्तन के परिप्रेक्ष्य में उनके इस सहस्रों पृष्ठो में अंकित विचारों का निकट भविष्य में प्रकाशन निश्चित ही मानव की बौद्धिक-आध्यात्मिक क्षितिज पर एक नए प्रकाश के रूप में उदय होगा। गीता की तरह रामायण ने भी अपने उदयकाल से मनुष्य को देवत्व के प्रति आस्थाओं-मर्यादाओं के प्रति आस्था उमगाई है। रामायण के प्रथम लेखन का श्रेय आदि कवि महर्षि वाल्मीकि को है। परवर्तीकाल में इसकी भाव सम्पदा और मर्यादा-पुरुषोत्तम के उत्कृष्ट चरित्र से आकृष्ट होकर अन्य कवियों ने भी राम-कथा का गान कर संस्कृति की मन्दाकिनी बहाई। संस्कृत भाषा की अन्य रामायणों में आध्यात्म रामायण, चम्पू रामायण, देव रामायण, अगस्त्य रामायण का नाम उल्लेखनीय है। कालान्तर में इनकी अभिव्यक्ति क्षेत्रीय भाषाओं के रूप में बंगला में कृतिवास रामायण दक्षिण भारत में कम्बल रामायण और हिन्दी में रामचरित मानस का संवेदना सरोवर बन कर प्रकट हुई।
रामायणों के इस क्रम में ‘योग‘ ‘वशिष्ठ’ भी है। जिसे अपनी अद्वितीयता के बल पर ‘महारामायण’ की संज्ञा प्राप्त हुई। इन वुड्स आफ गॉड रियलाइजेशन खण्ड 7 में सँजोये स्वामी रामतीर्थ के शब्दों में कहें तो “मेरे मतानुसार तो संसार की सभी पुस्तकों से अद्भुततम पुस्तक योग-वशिष्ठ है। यह असम्भव है कि कोई इस ग्रन्थ का अध्ययन कर ले और उसको ब्रह्म भावना न हो और वह सबके साथ एकता न अनुभव करे।” इस ग्रन्थ का वैभव साधना के गुह्य प्रदेश की गहन अनुभूतियों का रोचक कथाओं में वर्णन है। ग्रन्थ की रोचकता इतनी अद्भुत है कि शायद ही कोई इसे एक बार हाथ में थामकर पूरा पढ़े बिना छोड़ सके। रानी चुडाला की कहानी, उद्दालक की कथा, सरघु की कथा, वीतहव्य का वृत्तांत, भास और विलास का संवाद विपश्चित की कथा पटधाना राजकुमारों की कथा जैसी ढेर की ढेर कथाओं में लुभावने ढंग से सृष्टि रहस्य मन की शक्तियाँ लोक-लोकान्तर के तत्व-गूढ़ दार्शनिकता का सरस निरूपण किया गया है।
विस्तार! विस्तार!! विस्तार!!! निरन्तर अपने इस ध्येय की ओर बढ़ती जा रही ऋषियों की ज्ञान सम्पदा को सूत्र संकेत के रूप में कहने की एक मौलिक कोशिश इस भूमि पर सम्पन्न हुई है। जिसे दर्शन का नाम मिला। ये ज्ञान सम्पदा के अपरिचित सागर में से भरे गए कुछ अमृत कलश है। जो पीने वाले के मन में सत् चित् आनन्द के अविरल प्रवाह से एक हो जाने की ललक पैदा करते हैं। भारत की दार्शनिकता में दर्शन का अर्थ पश्चिम की फिलॉसफी की तरह ज्ञान से प्रेम नहीं बल्कि ज्ञान से एकात्मता है। यही कारण है यहाँ दार्शनिक मात्र विचारक न होकर दृष्ट-ऋषि हुए।
यों इन दर्शनों की परम्परा और शृंखला काफी बड़ी है। जिसमें प्रत्यभिज्ञा, लकुलेश जैसे तंत्र दर्शन भी है। पर ये पंक्तियाँ वैदिक ज्ञान के जिस प्रवाह को प्रवाहित कर रही हैं उसमें षड्-दर्शन की बहुरंगी तरंगें ही उमंगती दिखाई देती हैं। इस क्रम में पहला स्थान ‘साँख्य’ का है जिसके छः अध्याय में सँजोये सूत्रों की संख्या 526 है। इस दर्शन में महासिद्ध कपिल ने पुरुष-प्रकृति के सम्बन्ध सब भूतों की स्थिति, उत्पत्ति और प्रलय पर विचार किया है। इसके बाद महर्षि पतंजलि का दार्शनिक सिद्धान्त है-क्रोध दर्शन के समाधिपाद, साधनपाद, विभूतिपाद और कैवल्यपाद अध्यायों में 194 सूत्र हैं। डॉ. दीवानचन्द्र ने अपने ग्रन्थ दर्शन संग्रह में इन दोनों का एक जोड़ा माना है। उनके मत में सांख्य और योग दोनों एक प्रकार के उद्योग हैं, साँख्य में यह उद्योग प्रकृति से ‘वियोग‘ रूप धारण करता है। योग में ईश्वर से संयोग रूप लेता है।
न्यायदर्शन के प्रवर्तक-महामुनि गौतम हैं। यह पाँच अध्यायों में बँटा है। इनमें प्रत्येक अध्याय के दो भाग हैं। इस दर्शन का प्रमुख विषय है-प्रमाण इसमें सत्य और असत्य में भेद करने की तकनीक सुझाई गयी है। विचार और उसकी शैली के स्वरूप की पूरी छाप यूनानी दर्शन में देखी जा सकती है। दार्शनिक दर्शन महर्षि कणाद का दार्शनिक सिद्धान्त हैं इसमें दल हैं और प्रत्येक अध्याय के दो भाग हैं। इस दर्शन में विशेषों की बाबत दार्शनिक विवेचन हुआ है। विशेष का क्या अर्थ है अपनी मौलिकता है। यही विशेषत्व का तत्व है। वैशेषिक दोनों का लक्ष्य निःश्रेयस है और दोनों ही प्राप्ति साधन तत्त्वज्ञान को मानते हैं।
पूर्व मीमाँसा दर्शन के रचनाकार-ऋषि जैमिनी हैं। इस दर्शन का पहला सूत्र है ‘अथातो धर्म जिज्ञासा’। इस दर्शन में कर्म के तत्व पर गहराई से विचार किया गया है। नीति-अनीति-पाप-पुण्य की समस्याओं के गहरे विवेचन के साथ सामान्य कर्म के धर्म में परिवर्तन की तकनीक सुझाई गई है। इस शृंखला की अंतिम कड़ी है उत्तर मीमांसा जिसके सूत्रकार है बह्मर्षि, वादरायण व्यास। इसका सर्वप्रचलित नाम वेदान्त है। जिसे ब्रह्मसूत्र भी कहा गया है। इसके सूत्रों पर शंकर, रामानुज, माध्व जैसे भारतीय अस्वार्थों से लेकर पालडायसन जैसे पश्चिमी विद्वान ने टीकाएँ की हैं, जैसा कि इसके प्रथम सूत्र ‘अथातो ब्रह्म जिज्ञासा’ से दर्शित होता है इसका प्रधान विषय ज्ञान और इसके साधनों का विवेचन है।
सोऽहम् ज्ञान के ये सभी देवदुर्लभ ग्रन्थ संस्कृत में हैं। और आज यह जनभाषा नहीं रह गई। इनमें सँजोये प्रेरणा के प्रवाह से अमृत पुत्र वंचित न रह जायँ इसी कसक ने परम पूज्य गुरुदेव को इन्हें लोक भाषा में अनूदित करने लिए विवश किया। इन तपोनिष्ठ ऋषि की लेखनी ने संहिता ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषद्, पुराण, दर्शन आदि समस्त ज्ञान सम्पदा में नई ऊर्जा और नए प्राण भरे। उनकी स्वानुभूति ने इसे युगानुकूल अर्थ गौरव दिया। ऋषियों की चेतना ने इस अमर ‘साधना’ पर विभोर होकर उन्हें मूर्ति का गौरव दिया। उनके द्वारा सौंपी ज्ञान की इस विरासत को हमारे हाथ लेने के लिए आतुर हो उठें, आँखें पढ़ने के लिए ललक उठें हृदय में उन सत्यों को स्वीकारने के लिए व्याकुलता, जग पड़े और समूचा जीवन इस सोऽहम् ज्ञान का महोत्सव बन जाय। हम सब को जो स्वयं को उनकी सन्तान मानते हैं यही कर्तव्य है।
इस संसार में सच पूछा जाय तो दो वस्तुएँ बड़ी अद्भुत व महत्वपूर्ण है। एक हमारा परमेश्वर सृजेता और एक हम स्वयं। इन दो से बढ़कर और खुद आश्चर्यजनक और सामर्थ्य संपन्न तत्व इस दुनिया में हमारे लिये हो ही नहीं सकते। यदि मनुष्य अपनी महिमा महत्ता व क्षमता को भली-भाँति समझ ले व उसका बुद्धिमत्ता एवं सुव्यवस्था के साथ उपयोग करे तो उसका परिणाम इतना बड़ा हो सकता है कि संसार के साथ हम स्वयं उसे देखकर दंग रह जाय! मनुष्य जितना तुच्छ व हेय लगता है, वस्तुतः वैसा है नहीं। उसकी संभावनाएँ अनन्त हैं। गड़बड़ इतनी भर पड़ जाती है कि वह अपने स्वरूप को समझ नहीं पाता और जितना कुछ वह अपने बारे में जानता है, उसका सदुपयोग करने के लिए प्रचलित ढर्रे से उठकर साहस एकत्र नहीं कर पाता। यदि इस छोटी सी त्रुटि को संभाल-सुधार लिया जाय तो मानव के अनन्त विकास की संभावनाएँ खुल जाती हैं, जिस दिशा में भी पुरुषार्थ परायण होना है उस पथ के समस्त अवरोध स्वयमेव हट जाते हैं।
भारतीय अध्यात्म-देव संस्कृति भावी विकास की संभावनाओं को देखते हुए ही मनुष्य को अपने समग्र व्यक्तित्व को विचार व कर्म के समन्वय से प्रचण्ड-महान बनाने की प्रेरणा देते आए हैं। भारतीय तत्त्वज्ञान की विश्वव्यापी गौरव-गरिमा एवं सफलता का मूल कारण ही उसके प्रणेताओं द्वारा उस ज्ञान को अपनी जीवन रूपी प्रयोगशाला में कर्म के रूप में उतारते हुए सार्थक सिद्ध करना रहा है। भारतीय दर्शन व्यक्ति को ज्ञानार्जन की प्रेरणा तो देता है, पर साथ-साथ कर्मोन्मुख होते हुए सतत् उद्योग करते रहने व आदर्शों को आचरण में लाने की व्यवहार में उतारने की बात सतत् करता रहा है। उस ज्ञान से कोई लाभ नहीं, जो कर्म को प्रभावित न करें।
जब भी कर्मों की कर्तव्य की, कर्मयोग की चर्चा होती है, तो कई प्रकार के विचार मन में आते हैं। क्या कर्म मनुष्य से स्वतः हो जाते हैं? कर्म के प्रेरक तत्व क्या हैं? यदि कर्म मनुष्य किसी और सत्ता, जो उससे बड़ी व महानतम है, की इच्छा व प्रेरणा से करता है तो फिर कर्मों का फल उसके पल्ले क्यों बँधता है? कर्म जिस किसी भी भाव से किया जाय मनुष्य को क्यों उसका दोषी ठहराया जाता है? इत्यादि। कर्म संबंध में देव संस्कृति बड़ा स्पष्ट चिन्तन देती हुई मानवी पुरुषार्थ को दिशा देती हुई उसे उद्योग परायण बनाती है।
आदि पुरुष मनु लिखते हैं कि प्रकृति के तमोगुण से चिपटकर मानव “कामी” बनता है, रजोगुण से लिपट कर “अर्थवान” तथा सतोगुण को आश्रय लेकर “धार्मिक” बनता है (मनु संहिता 12/38)। काम व अर्थ लोलुपता उसे निम्न योनियों में ली जाती है। जबकि उन पर संयम उसे मानव योनियों में ले आता है। मानव जीवन जीते हुए यदि व्यक्ति धर्माचरण करता है तो यह कर्म उसे देवमानव बनाते हैं, दिव्य योनियों में ले जाते हैं। इस प्रकार सात्विक कर्म ही व्यक्ति को ऊपर उठाते हैं व सतत् कर्म परायण होते रहने की प्रेरणा देते हैं, वेद वाणी कहती है-उद्यान ते पुरुष नावयानम्” अर्थात् जीव! तुझे ऊपर उठना है, नीचे नहीं गिरना है। मानव योनियों में आकर तो तू ‘स्व’ की गरिमा को पहचान व निज को ऊँचा उठा। “ इस प्रकार कर्म मनुष्य को उसके लक्ष्य की सिद्धि कराने वाले प्रेरक तत्व हैं, साध्य हैं व तप रूपी साधन भी।
श्रीमद्भागवतगीता में योगेश्वर कृष्ण कहते हैं कि हमें निरन्तर कर्म करते रहना चाहिए। कर्म स्वभावतः ही शुभ व अशुभ से विनिर्मित होता है। पूर्ण रूप से शुभ व अशुभ से विनिर्मित होता है। पूर्ण रूप से शुभ व अशुभ कोई भी कर्म नहीं है। प्रत्येक कर्म अनिवार्यतः गुण-दोष से मिश्रित रहता है, फिर भी ईश्वर का आदेश है कि हम निरन्तर कर्म करते रहें। श्रीकृष्ण कहते हैं-
न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत। कार्यते ह्यवंशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः॥ 5/अध्याय 3
अर्थात् “निस्सन्देह कोई भी मनुष्य किसी भी काल में क्षण मात्र भी बिना कर्म किए नहीं रहता, क्योंकि सारा मनुष्य समुदाय प्रकृति जनित गुणों द्वारा परवश हुआ कर्म करने के लिए बाध्य किया जाता है।
शुभ व अशुभ दोनों कर्मों के अपने अलग-अलग परिणाम होते हैं व दोनों ही आत्म सत्ता के लिए बंधन रूप हैं पर गीताकार कहता है कि यदि हम अपने कर्मों में आसक्त न हों तो हमारी आत्मा फिर किसी बंधन में नहीं पड़ती। सारी गीता का कर्मयोग एक ही केन्द्रीय भाव पर टिका है निरंतर कर्म करो परन्तु आसक्ति मत रखो। यहाँ तक कि भगवान स्वयं के विषय में भी यही विचार व्यक्त करते हुए कहते हैं-
“हे अर्जुन, यदि मैं करने से एक क्षण के लिए भी रुक जाऊँ तो सारा विश्व नष्ट हो जाय। मुझे कर्म से किसी भी प्रकार का लाभ नहीं, मैं ही जगत का एक मात्र प्रभु हूँ, फिर भी कर्मरत रहता हूँ। मैं सावधान होकर स्वयं को कर्मों में न निरत करूँ तो बड़ी हानि हो जाएगी क्योंकि मनुष्य सब प्रकार से मेरे ही मार्ग का अनुसरण करते हैं। मैं कर्म न करूँ तो समस्त प्रजा, सारा संसार का लोक व्यवहार नष्ट हो जाय।” (अध्याय 3-22-23-24)
परन्तु कर्म कौन से शुभ हैं, कौन से अशुभ? कर्म के निमित्त मूलक कारण क्या हैं? कर्म में आसक्ति कब पैदा होती है, कब निरासक्ति, कर्म के प्रेरक तत्त्व क्या हैं, इस संबंध में जनसामान्य शास्त्रों के मत सुनते-जानते-समझते हुए भी किंकर्तव्य विमूढ़ ही बना रहता है। वैयक्तिक जीवन तथा समाजनिष्ठ जीवन में साधारणतया बहुसंख्य व्यक्ति जानते हुए भी ऐसे कर्मों में लिप्त देखे जाते हैं, जिनका परिणाम दूरगामी दृष्टि से अशुभ होते हुए भी वे तुरन्त का लाभ उसी में देखते हुए निरत हैं। सामान्यतया व्यक्ति दो ही कारणों से कर्मों में प्रवृत्त होते देखे जाते हैं-वे व्यक्ति जिन्हें हम नर मानव कहते हैं, जो मानव योनि में जन्मे तो हैं परन्तु पेट-प्रजनन की सीमा से परे सोच पाने में असमर्थ है। ये दो कारण हैं-लोभ व भय। व्यक्ति अच्छे-बुरे कर्म लोभ के वश भी करता है व भय के वश भी। अच्छा कर्म स्वर्ग में स्थान सुरक्षित करने के लिए भी हो सकता व श्रेय अर्जित करने के लिए भी। लोभ प्रधान यह आकर्षण कर्मों को करने की प्रेरणा देता है। धर्मक्षेत्र से जुड़े-मन्दिरों में जाने वाले अधिकांश व्यक्ति या तो लोभ के वश होकर जाते हैं या भय के वशीभूत होकर। भय किसका? भय नरक का, पारलौकिक जीवन में कष्टों का अथवा इसी जन्म में उनके मिलने वाले बुरे प्रतिफलों का। देव संस्कृति में स्वर्ग-नरक परलोक की अवधारणा कर्मों के प्रेरक तत्त्वों को परिमार्जित मोड़ देने के लिए ही रखी गयी है। भारतीय संस्कृति अंतरात्मा के विकास हेतु कर्मोन्मुख होने की बात कहती है व बताती है कि इससे दुखों की निवृत्ति होती है व सुखों में अभिवृद्धि होती है। समय-समय पर महापुरुष आते हैं तथा सामान्य से व्यक्तियों में प्रसुप्त दैवीचेतना को जगाकर उनकी लोभ की वृति को-अहंता की महत्वाकांक्षा को महानता की श्रेय प्रधान वृति में बदलकर उनसे बड़े-बड़े काम करा लेते हैं। यह तो विशिष्ट अवसरों-सुयोगों की बात हुई पर सामान्य अवसरों पर सामान्य व्यक्ति कैसे पहचाने कि कौन सा कर्म करने योग्य है, कौन सा नहीं? कर्म, अकर्म, विकर्म क्या है? तथा कर्म कब सकाम, निष्काम बनते हैं? कब वे सत्कर्म कहलाते हैं, कब दुष्कर्म?
देव संस्कृति इस संबंध में पर्याप्त मार्गदर्शन करती है मनीषी कहते हैं, कर्म के तीन भेद हैं-कर्म अकर्म और विकर्म। जो कर्तव्य है, मानवी गरिमा की परिधि में आता है वह कर्म कहलाता है। इनके भी तीन भेद हैं। नित्य, नैमित्तिक व काम्य कर्म। ‘नित्य’ कर्म इत्यादि आत्मशोधन के उपक्रम तथा स्वर्ग आश्रम शक्ति के अनुसार करने योग्य कर्म कहलाते हैं जिनके न करने पर पाप का भोगी मनुष्य होता है पर पुण्य मिले यह जरूरी नहीं। ‘नैमित्तिक’ कर्म वे जो किसी निमित्त के उपस्थित होने पर किए जाते हैं जैसे अतिथि के आने पर, पर्वों पर ज्योतिर्विज्ञान की विशिष्ट युतियों-ग्रहण आदि पर। इन्हें न करने से पाप होता है व करने से पुण्य मिलता है। ‘काम्य’ कर्म वे हैं जो किसी कामना से किए जाते हैं। स्त्री, पुत्र धन आदि प्रिय वस्तुओं की प्राप्ति के लिए तथा रोग-संकटादि की निवृत्ति के लिए जो यज्ञ, दान, तप, उपासना कर्म किए जाते हैं (किन्हीं कामनाओं की पूर्ति के लिए) वे काम्य कर्म कहलाते हैं। काम्य कर्मों को न करने पर पाप नहीं लगता। करने पर पुण्य की प्राप्ति होती है, ऐसा शास्त्र कहते हैं
अकर्म उन्हें कहते हैं जिनके न करने से पुण्य नहीं होता परन्तु करने पर पाप लगता है। जो मानवी गरिमा की परिधि में नहीं आते, जिनकी उससे अपेक्षा नहीं की जाती। विकर्म वे हैं जो परिस्थिति के अनुसार वास्तविकता से बदल चुके हैं व कर्म या अकर्म बन गए हैं जैसे कुपात्र को दान देना, हिंसा करना गौ, ब्राह्मण या नारी सम्मान की रक्षा के लिए। कर्म, अकर्म और विकर्म का यह भेद बड़ा गूढ़ है व परिस्थिति विशेष पर भेद करने वाले की अन्तःप्रज्ञा पर निर्भर करता है। योगेश्वर कृष्ण कहते हैं-
“किंकर्म किमकर्मेति कवयोऽप्यत्र मोहिताः-कर्म क्या है, अकर्म क्या है इसका निर्णय करने में बुद्धिमान पुरुष भी भ्रम में पड़ जाते हैं तथा कर्मणो ह्यपि बोद्धव्यं बोद्धव्यंच विकर्मणः, अकर्मणश्च बोद्धव्यं गहना कमर्णो गतिः॥
(16-17) अध्याय 4 गीता) अर्थात् “कर्म का स्वरूप भी जानना चाहिए, अकर्म का भी, विकर्म का भी, क्योंकि कर्म की गति गहन है॥” यहाँ कर्मों के परिप्रेक्ष्य में मानवी प्रज्ञा की परीक्षा की कसौटी बतायी गयी है कि उसे पहचानना चाहिए कि कौन सा करणीय है, कौन सा नहीं? हर व्यक्ति यह नहीं कर सकता। अतः श्रीकृष्ण आगे कहते हैं- कर्मण्यकर्म यःपध्येद कर्माणि च कर्मयः॥ 18/4
“जो मनुष्य कर्म में अकर्म देखता है और जो अकर्म में कर्म देखता है, वह मनुष्यों में बुद्धिमान है वह सब कर्मों को करने वाला योगी है। वही पण्डित है।”
कर्म में अकर्म तथा अकर्म में कर्म देखते हुए नीर-क्षीर विवेक का प्रयोग करते हुए अपने करने योग्य कर्मों को चुन लेना व उनमें बिना आसक्त हुए बिना फल की कामना के निरत रहना ही कर्मयोग बताया गया है। निष्काम कर्म की महत्ता के साथ भगवान कहते हैं- ‘यद्धार्थार्त्कमणोऽ न्यत्र लोकोऽयं कर्मबंधनः । तदर्थ कर्म कौन्तेय मुक्तसंगः समाचार॥ ।9/ अध्याय 3
अर्थात् “यज्ञ के निमित्त किये जाने वाले कर्मों के अतिरिक्त दूसरे कर्मों में लगा हुआ मनुष्य समुदाय कर्मों से बँधता है, अतः हे अर्जुन ! तू आसक्ति से रहित होकर उस यज्ञ के निमित्त ही भली भाँति कर्तव्य कर्म कर।” यज्ञ अर्थात् सत्कर्म-परमार्थ प्रयोजन के लिए किया गया श्रेष्ठतम कर्म पुरुषार्थ। देवसत्ताओं को दी गयी श्रेष्ठ कर्मों की आहुति, अंतः की सदाशयता का जागरण तथा संघबद्ध होकर चलने की वृत्ति । इस भाव से जो कर्म किये जायँ , वे “यज्ञार्थाय” कहलाते हैं। इन्हीं को सत्कर्म कहते हैं।
कर्म के चार कारण स्थूल बताये गए हैं व एक कारण सूक्ष्म-परोक्ष है। अधिष्ठान, कर्त्ता, करण व चेष्टा ये चार स्थूल तथा प्रारब्ध अदृश्य उक्त परोक्ष कारण हैं। कई बार स्थूल दृष्टि से सभी अनुकूल होते हुए भी कार्य सिद्ध नहीं होती -अतः प्रारब्ध की महत्ता अपनी जगह माननी पड़ती है। प्रारब्ध कर्म की स्वतंत्रता का विरोधी नहीं है , अपितु जीव के पूर्वकृत कर्मों का परिणाम है किन्तु प्रारब्ध तो कर्म द्वारा काटा जा सकता है, इसीलिए कर्मयोग की महत्ता है।
जुँग ने पूर्वात्य मनोविज्ञान का अध्ययन कर निरासक्त कर्मयोग के दर्शन की विश्वमानवता की बहुत बड़ी देन बताया था। वे “मेमोरीज, डीम्स, रिफलक्शन्स” पुस्तक में लिखते हैं कि यह अच्छे जीवन के लिए अभिप्रेरणा (मोटीवेशन) का काम करता है। पुनर्जन्म की पूर्वजन्म की पूर्वार्त्य दर्शन की मान्यता को स्वीकार करते हुए वे लिखते है कि ज्ञान की उपलब्धि के लिए मेरे पूर्वजन्म के संस्कार भी निमित्त कारण हो सकते हैं वह यह भी समझ में आता है कि ज्ञान (आत्मज्ञान) द्वारा व्यक्ति पूर्व के संस्कारों से मुक्ति भी पा सकता है। यही भाव गीता के चौथे अध्याय के श्लोक 36 के उत्तरार्ध में है “ज्ञानाग्निगगः सर्वकर्माणि भस्मसात्केरुते तथा।”
संस्कार क्या है? यह चर्चा विस्तार से पुनर्जन्म प्रकरण में अगले अध्याय में करेंगे क्योंकि कर्मफल व पुनर्जन्म परलोक प्रकरण परस्पर जुड़े हैं परन्तु यहाँ इतना बता देना पर्याप्त होगा कि जीव का अहंकार (कर्म का) ही उसे संस्कार देता है। जहाँ पशुचित स्मृतिरूप संस्कार ग्रहण करता है वहाँ मानव चित्त प्रेरणात्मक संस्कारों को ग्रहण करता है। स्वामी विवेकानन्द इस तथ्य को “कर्म का रहस्य” में स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि “संस्कार प्रायः मनुष्य की जन्म जात प्रवृत्ति होता है। यदि मन को तालाब मान लिया जाए तो उसमें उठने वाली प्रत्येक लहर प्रत्येक तरंग जब शान्त हो जाती है तो वस्तुतः वह बिल्कुल नष्ट नहीं होती वरन् चित्त में एक प्रकार का चिन्ह छोड़ देती है तथा ऐसी संभावना का निर्माण कर जाती है जिससे वह फिर उठ सके। इस चिन्ह तथा लहर के फिर उठने की संभावना को मिलाकर हम संस्कार कह सकते हैं। “ संस्कार ही मिलकर व्यक्ति का चरित्र बनाते है। यदि शुभ संस्कार है तो अच्छा, अशुभ है तो बुरा। जब व्यक्ति के संस्कार चिंतन मनन-ज्ञानार्जन द्वारा इतने प्रबल हो जाते हैं कि दुष्कर्मों से उसे विरत कर सदैव पवित्र बनाए रखते हैं तो ऐसा व्यक्ति स्थिर चरित्र वाला कहलाता है।
जहाँ कर्म के माध्यम से व्यक्ति संस्कारों को प्रबल बनाता हुआ अपने पापों व अशुभ कर्मों को काट सकता है, वहाँ वह कर्मों के फल के प्रति आसक्ति त्यागकर तथा सिद्धि -असिद्धि में (पूर्ण होने न होने में) समाना बुद्धि वाला होकर योग में स्थित हुआ कर्त्तव्यरत होता है तो “समत्वयोगी” कहलाता है। श्रीकृष्ण गीता के दूसरे अध्याय में इसी को समत्वयोग को कुशल कर्म बताते हैं वह कर्म बंधन से छूटने का श्रेष्ठतम उपाय भी (तसमाद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम 2 /50 )। व्यावहारिकता की चरम पराकाष्ठा पर पहुँचा हुआ यह ज्ञान दैनन्दिन जीवन में अत्यन्त उपयोगी है। भारतीय संस्कृति कहती है-कर्म तो निरन्तर करते रहो, परन्तु अपने को बंधनों में मत उलझाओ बंधन भीषण हैं। संसार हमारी निवास भूमि नहीं है। पर्यटक की तरह रहे कर्मों में लिप्त मत होओ। स्वामी की तरह कार्य करो, दास की तरह नहीं । इस विश्व की सृजेता से सच्चा प्रेम करना सीखो। जब सारी विश्व वसुधा से प्रेम करने लगोगे तो स्वतः निरासक्त कर्मयोग के तुम अधिकारी विद्वान बन जाओगे।” अनासक्त कर्मयोग का वास्तविक तात्पर्य यही है कि किसी भी काम को पूरी कुशलता के साथ कर्त्तापन को अभिमान छोड़कर किया जाय और उसके फल से निर्लिप्त निस्पृह तथा अनासक्त रहा जाए, जिससे न तो सफलता का अभिमान हो, न असफलता में निराशा। इस संबंध में सारा तत्त्वज्ञान योगीराज कृष्ण अपने शिष्य को एक ही श्लोक में देते हुए कहते हैं-तेरा कर्म करने में ही अधिकार है, उसके फलों में कभी नहीं। अतः तू कर्मों के फल का हेतु मत बन तथा तेरी कर्म न करने में भी आसक्ति न हो (2 /40) (कर्मण्येवाधिकारस्तेमा फलेषु कदाचन )।
वस्तुतः मनुष्य जीवन भाव प्रधान हैं। इमैनुअल काण्ट ने कहा है कि पाश्चात्य संस्कृति कर्म को प्रधानता देती हैं परन्तु भाव को नहीं जबकि हिंदू संस्कृति कर्म के पीछे भाव को प्रधानता देती हुई उसे कर्मनिष्ठ बनाती है। जैसा भाव होता है वैसा ही कर्म का स्वरूप हो जाता है। सत्कर्म व दुष्कर्म भाव से ही तो भिन्न-भिन्न रूप ले लेते हैं। कर्म का स्वरूप परिस्थिति विशेष युग धर्म के अनुरूप भिन्न-भिन्न हो सकता है। कर्म को जब व्यक्ति साधना बना लेता है तो वह उसके व्यक्तित्व को पूर्णता की दिशा में ले चलते वाला एक साधन बन जाते हैं। हर आदमी की स्वाभाविक रुचि व दायित्व भिन्न-भिन्न होते है। कमल का फूल कमल का ही रहेगा। यदि उसे गमले में लगा दें तो गुलाब का नहीं बन सकता। इसी तरह गुलाब का फूल अपनी जगह अपनी विशिष्टता लिये हैं वह पानी में डालने पर अस्तित्व खो बैठेगा। भगवान ने हर आदमी को अपने आप में देवत्व से भरा पूरा एक विलक्षण प्राणी बनाया है जिसमें विकास की असीम संभावनाएँ हैं। यदि वह विराट को समर्पित हो कर्म साधना में निरत हो सके तो अन्यान्य महामानवों की तरह लक्ष्य सिद्धि कर पूर्णता को प्राप्त हो सकता है। मौलिकता की महत्ता को समझते हुए अपने भीतर छिपे शक्ति के बीज की महत्ता को अंकुरित करते हुए कर्मयोग द्वारा हम सभी अपना विकास कर सकते हैं, ऐसी देव संस्कृति की मान्यता है। किसी भी महामानव ने किसी की नकल नहीं की। हाँ आदर्शों से प्रेरणा अवश्य ली। समर्थ रामदास की अपनी मौलिकता है तो विवेकानन्द की अपनी, अरविन्द की अपनी विशिष्टता है तो गाँधी जी की अपनी। वैयक्तिक कर्म कैसा हो, यह निर्धारण कर कर्म साधना व्यक्ति यदि करे तो महामानव-देवमानव बनने की संभावनाएँ उसमें हैं वह बन सकता है। किन्तु कभी-कभी ऐसे समय आते हैं जब वैयक्तिक व सामूहिक कर्म एकाकार हो जाते हैं। अवतार का अवतरण जब भी होता है तो सामूहिक कर्म साधना की प्रेरणा हेतु ही होता है। ऐसी स्थिति में समष्टिगत कर्म-युगधर्म एक हो जाते हैं, उस समय विशेष की आवश्यकतानुसार स्वयं को समूह के साथ नियोजित करना। यही युगसाधना बन जाती है। संस्कृति पुरुष पूज्य गुरुदेव ने अपने महाप्रयाण से 2 वर्ष पूर्व अपनी लेखनी से इसी युगसाधना की बात क्रान्तिधर्मी साहित्य के माध्यम से कही व जन-जल के मन को मथा उनके अनुसार आज का हमारा कर्म सामूहिक हो संस्कारों के जागरण हेतु-भारतीय संस्कृति के पुनर्जीवन हेतु-दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन व सत्प्रवृत्ति संवर्द्धन हेतु हमारा समग्र पुरुषार्थ नियोजित हो। परमात्मा यदि प्रसन्न होगा तो उसी से। उनका कहा है कि नवयुग आने वाला है। प्रतिकूलताएँ निरस्त होने वाली हैं। ऐसे परिवर्तन के क्षणों में हमें एकाकी अपने तक सीमित बने रहकर समाजनिष्ठ बनना चाहिए व सामूहिक चेतना के जागरण की आवश्यकता को समझना चाहिए। विचारक्रान्ति अभियान, युगान्तरीय चेतना के सारे क्रियाकलाप इसी निमित्त नियोजित हैं व सारा विश्व आज सृष्टि के राजकुमार मनुष्य की “कलेक्टीव कांशसनेश (समष्टिगत चेतनसत्ता) से स्वर्ग के भूमिकरण की धरती पर स्वर्ग के अवतरण की आशा लगाए बैठा है। भारतीय संस्कृति का तत्त्वज्ञान वह सब कर पाने में, सतयुग वापस लौटाने में सक्षम है, इसमें किसी भी देव पुत्र को संदेह नहीं होना चाहिए।
भारतीय संस्कृति-हिन्दू अध्यात्म की एक-एक स्थापनाएँ व निर्धारण अपने में महत्वपूर्ण हैं किन्तु जो व्यक्ति की आत्मतत्त्व में आस्था बढ़ाती हुई सत्कर्म में निरत करने वाली प्रधानतम मान्यता है, वह है पुनर्जन्म संबंधी जो यहाँ से कालान्तर में विश्वभर में गयी। ऋषियों का यह सुनिश्चित विश्वास है कि इस मानव जीवन का उद्देश्य परमसत्ता से साक्षात्कार व मोक्ष प्राप्ति है। परन्तु एक ही जीवन में इस ध्येय की प्राप्ति सदैव नहीं होती, इसकी पूर्ति के लिए अनेक जन्म लेने पड़ सकते हैं। देहात्मवाद-भोगवाद यह सब नहीं मानता। “यावज्जीवेत सुखंजीवेत” वाला चार्वाक का सिद्धान्त तथा पश्चिम के लुक्रेशियस का “खाओ, पीओ, मौज करो” का सिद्धान्त यों कितने मानते हैं, यह नहीं कहा जा सकता परन्तु इस नीति पर चलते बहुसंख्य व्यक्ति देखे जाते हैं। काम तथा अर्थ में लिप्त भोगपरायण व्यक्तियों की प्रच्छन्न नास्तिकों की संख्या शरीर में बढ़ती दीख पड़ती है व आज की आस्था संकट की विभीषिका का मूलक रण भी यह प्रत्यक्षवाद, भोगवाद ही है, इसमें किसी को संदेह नहीं । निश्चित ही ऐसे में पुनर्जन्म संबंधी परलोकवादी चिन्तन व्यक्ति को अपने जीवन का उद्देश्य जानने व नैतिक आचरण में प्रवृत्त करेगा, अतः इस विचारधारा के व्यापक विस्तार की आवश्यकता आज सभी मनीषी समझते हैं।
मनुष्य इस धरती पर आता है परन्तु भोगेच्छा के वशीभूत हो कर्मों की गति के अनुसार भिन्न-भिन्न स्थितियों को प्राप्त होता है ऋग्वेद में एक मंत्र में यह बात अलंकारिक ढंग से बड़ी अच्छी तरह समझाई गयी है-
द्धा सुपर्णा सयुजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते। तयोरन्यः पिप्पलं स्वान्दत्यश्न्नन्यो अभिचाकशीति॥ (ऋ.. 1/164/20)
अर्थात् “जीवात्मा तथा परमात्मा दो साथ रहने वाले सखा एक ही संसाररूपी वृक्ष की डाली पर बैठे हैं। जीवात्मा इस वृक्ष के फल को खाता है तथा परमात्मा खाता नहीं, द्रष्ट मात्र बना बैठा है।” इस मंत्र में आत्मा के कर्मानुसार फल भोगने का स्पष्ट विधान बताया गया है। वृक्ष के फल में स्वाद लेना भोगेच्छा का द्योतक है। यही जीवात्मा की निर्बलता है। परमात्मा भोग से पृथक केवल द्रष्ट है। यह उसकी शक्ति है। पास में होने पर भी खाने की, रस लेने की आसक्ति प्रकट होते ही जीव का स्वत्व जाता रहता है, शक्तिहीन वह हो जाता है व पराधीन बनता, रोग-शोक का-पतन का भोगी बनता चला जाता है। “अवश्यमेय भोक्तव्यं कृतं कर्म शुभाशुभम्” की उक्ति के अनुसार जीव को अपने अच्छे-बुरे कर्मों का फल भोगना पड़ता है तथा यह कर्म फल, फल न रहकर स्वयं एक कर्म बन जाता है। ऐसा कर्म जिसका फल फिर आगे मिलता है यह एक चक्र है।
हम जैसे कर्म करते हैं, वैसे ही संस्कार बनते हैं और उन्हीं संस्कारों के अनुसार हमें आगामी शरीर मिलते हैं। ऋग्वेद में ऋषि कहते हैं-
ये ऊर्वांचरताँ उ पराच आहुर्य पराँचस्ताँ अर्वाध आहुः। इन्द्रश्च या चक्रधुः सोन तानि धुरा न युक्ता रजसो वहन्ति॥ (1/164/19)
अर्थात् जो नीचे थे, वे ऊपर पहुँच जाते हैं और जो ऊपर थे, वे नीचे आ जाते हैं। इन्द्र अर्थात् इन्द्रियों का स्वामी जीवात्मा जिन कर्मों को करता है, वे धुरे की भाँति युक्त होकर इस लोक-लोकान्तरों में एक योनि से दूसरी योनि में ले जाते हैं।”
कितना स्पष्ट चिन्तन है। इस जीवन में जो भोगाकांक्षी रहा हो, मन में कामनाएँ भोगों को भोगने की रही हों पर वैसे अवसर न मिल पाए हों तो इच्छा शक्ति उस अगले जन्म में भीगी-विलासी बनाती है चाहे वह पूर्व जन्म में धर्म परायण साधक रहा हो। ध्रुव पूर्व जन्म में मुनि कुमार थे किन्तु राजा के बच्चों के साथ खेलते-खेलते राजसी भोग जीने की कामना ने उन्हें दूसरा जन्म राज परिवार में दिलवाया, जहाँ वे अंततः नारद ऋषि के परामर्श को पाकर अन्तिम लक्ष्य पर पहुँचे। वासनाओं का ध्यान द्वारा यदि योगी शमन करता चले, उन्हें परिमार्जित करता चले तो कर्मों के बंधन से मुक्त हो जाता है।
महर्षि अरविंद ने अपनी पुस्तक “रिबर्थ एण्ड इवॉल्युशन” में लिखा है कि पूर्वकाल में यह सिद्धान्त (पुनर्जन्म का) यूरोप में “ट्रांस माइग्रेशन” के नाम से जाना जाता था। इसका दार्शनिक विकास यूनानी सभ्यता के उत्कर्ष के समय “मेटमसाइकोसिस” नाम से हुआ। अब यही नाम रिइनकार्वेशन नाम से जाना जाता है। मैं स्वयं “रिबर्थ” शब्द को सही पर्यायवाची पुनर्जन्म का मानता हूँ क्योंकि वह संस्कृत के विस्तीर्ण वर्णहीन परन्तु पर्याप्त अर्थ वाले शब्द पुनर्जन्म के अधिक समीप है। श्री अरविंद कहते थे कि प्रसिद्ध दार्शनिक-विज्ञानी पाइथागोरस महानतम वैदिककालीन मुनियों में से थे। इससे पूर्व जन्म में वे “बेरल आफ ट्राम” में एंटिनारिडनामक व्यक्ति के रूप में जन्मे थे व एमियस के कनिष्ठ पुत्र द्वारा मारे गए थे। हेक्टर का विजेता ‘एचिलिस’ ही बाद में मेसिडोनिया वासी फिलिप के पुत्र सिकन्दर (अलक्षेन्द्र) के रूप में जन्मा था, ऐसी महायोगी की मान्यता थी जो उनने अपनी दिव्य दृष्टि से बनायी ।
समय-समय पर पाश्चात्य विद्वानों ने भी पुनर्जन्म से अपनी सहमति जताई है। हक्सले कहते थे “केवल बिना सोचे समझे निर्णय लेने वाले विचारक ही पुनर्जन्म के सिद्धान्त को मूर्खता की बात कहकर उसका विरोध करेंगे।” वाल्ट विहटमैन ने लिखा है “जीवन! तुम मेरे अनेक अवसानों के अवशेष हो। इसमें कोई सन्देह नहीं कि मैं इसके पूर्व दस हजार मर चुका हूँ।” वर्ड्सवर्थ “इमिटेशन आफ इम्मॉट्रेलिटी” में लिखते हैं-हमारे साथ हमारे जीवन के नक्षत्र के साथ उदीयमान आत्मा का उद्भव अन्यत्र हुआ है, यह कहीं सुदूर से आई है।”
सुकरात कहते थे-मृत्यु स्वप्न विहीन निद्रा है और पुनर्जन्म द्वारा है।” प्लाटिनिस के अनुसार “नैतिक गुणों से जीवनयापन न करने पर मनुष्य मृत्यु के उपरांत वृक्ष तक बन सकता है।” पाइथागोरस का भी यही चिंतन था-साधुता का पालन करने पर आत्मा का जन्म उच्चतर लोकों में होता है और दुष्कृत्य आत्माएँ निम्न पशु आदि योनियों में जाती हैं।” प्लेटो कामना को ही पुनर्जन्म का निमित्त कारण मानते थे। लिबनित्य की यह मान्यता थी कि “पशुओं व मनुष्यों का उनके वर्तमान जीवन से पूर्व भी कोई अस्तित्व था तथा इस जीवन के बाद भी कोई अस्तित्व रहेगा, इसे स्वीकारना ही होगा।” हेगल के अनुसार “पूर्णता की ओर बढ़ती जीवात्माएँ यदाकदा निकृष्ट कर्मानुसार प्रेत-पिशाच जैसी योनियों में चली जाती हैं।” लेसिंग के विचार उपनिषदों से मिलते हैं। उनके अनुसार प्रत्येक आत्मा पूर्णता के लिए सचेष्ट है और इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए इस धरती पर उसे अनेक जन्म लेने पड़ते हैं।
श्वेताश्वेतर-उपनिषद्कार कहता है-
त्वं स्त्री त्वं पुमानासि त्वं कुमार उत वा कुमारी। त्वं जीर्णो दण्डेन वंचसि त्वं जातो भवसि विश्वतोमुखः॥(4/3)
अर्थात्-हे जीव! तू कभी स्त्री कभी पुरुष, कभी कुमार, कभी कुमारी होता है। कभी वृद्ध होकर लाठी के सहारे चलता है, इसलिये तू जन्म लेने वाला सर्वतोमुखी है, नहीं तो तू तो साक्षात् परमात्मा स्वरूप है।”
उपनिषदों में कठोपनिषद् बड़ा ही गूढ़ व सुविख्यात है। पंचाग्निविद्या जानने यमलोक के द्वार पर पहुँचने वाला नचिकेता कितना विलक्षण प्रतिभा व आत्मज्ञान संपन्न था कि पिता के यह कहने पर कि मृत्यु को तुझे देता हूँ व बाद में दुख करने पर वह कहता है-सस्यमिव मर्त्य पच्यते सस्यमिवाजायते पुनः” (कठ. 1/1-6) अर्थात् आप दुख क्यों करते हैं? यह शरीर तो धान्य की भाँति मरता है और उसी की तरह पुनः उग आता है।” बाद में यही जिज्ञासु साधक प्रेय व श्रेय में श्रेय को चुनता हुआ आत्मतत्त्व की व्याख्या यमराज से सुनकर अमरत्व को प्राप्त होकर आता है।
आर्यों को श्रेष्ठ चिन्तन वाला प्राणी माना जाता है। वे आत्मा की अमरता-गरिमा पर विश्वास रखते थे।
गीता कहती है-
नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः न चैनं क्लेयत्यापो न शोषयति मारुतः॥
अच्छेद्योऽ यमदाह्योऽ यमक्लेद्यौ शोष्यएवच। नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयंसनातनः॥ 2/23.24
(इस आत्मा को न शस्त्र काट सकते हैं न आग जला सकती है, जल इसे गीला नहीं कर सकता, वायु इसे सुखा नहीं सकती क्योंकि यह आत्मा अच्छेद्य है, अदाह्य, अक्लेद्य, व अशोष्य है। यह आत्मा नित्य, सर्वव्यापी, अचल, स्थिर रहने वाला और सनातन है।) गीताकार का यह शाश्वत चिन्तन आत्मसत्ता की महत्ता व पुनर्जन्म की अनिवार्यता बताता है मानवी चिन्तन व उसके कर्म पुरुषार्थ के परिप्रेक्ष्य में। योगेश्वर कृष्ण आगे कहते हैं-जातस्य हि ध्रुवो मृत्युध्रुँव जन्म मृतस्य च ।” (27/2 अ) अर्थात् “जन्में हुए की मृत्यु निश्चित है और मरे हुए का जन्म निश्चित है।” स्वयं वे अपने बारे में व अर्जुन के विषय में इस ध्रुव सत्य को लागू करते हुए कहते है-
वहूनि में व्यतीतानि जन्मानि तव चार्जुन। तान्यहं वेद सर्वाणि न त्वं वेत्थ परंतप॥ (4/5)
अर्थात्-हे परंतप अर्जुन! मेरे तेरे बहुत से जन्म हो चुके उन सबको तू नहीं जानता किन्तु मैं जानता हूँ।” शोक-क्लेश विशाद में डूबे अर्जुन को इस ज्ञान की आवश्यकता तुरन्त थी, वह भी योगेश्वर स्तर के अवतारी पुरुष द्वारा अतः वे उसे अपने आने का उद्देश्य व उसका प्रयोजन समझाते हैं, इतने सुन्दर ढंग से यह सब कह दिया गया है कि गीताकार की शैली पर पुनर्जन्म की कर्मफल की मान्यताओं पर बिना किसी पाश्चात्य चिंतक की मोहर के विश्वास हो जाता है।
आगे तेरहवें अध्याय में भगवान कृष्ण कहते हैं कि “प्रकृति में स्थित पुरुष प्रकृति से उत्पन्न तीनों गुणों से प्रभावित रहता है, उनको भोगता है और इन गुणों का संग ही उसके सत्-असत् (देव, पितर, प्रेत, मनुष्य, पशु) आदि योनियों में जन्म लेने का कारण बनता है” (अध्याय 13, श्लोक 21)
अंत में भगवान कृष्ण कहते हैं देवताओं को पूजने वाले देवताओं को, पितरों को पूजने वाले पितरों को, भूतों को पूजने वाले भूतों को प्राप्त होते हैं और मेरा पूजन करने वाले भक्त मुझ को ही प्राप्त होते हैं। अर्थात्-वे किसी अन्य लोक में नहीं जाते और न उनका मर्त्यलोक में पुनर्जन्म ही होता है) अध्याय 9/24
इसका कारण बताते हुए श्री कृष्ण कहते हैं-क्योंकि मैं कालातीत हूँ और ये सब ब्रह्मादि के लोक काल द्वारा सीमित होने से अनित्य है” (गामुपेत्व तु कौन्तेय पुनर्जन्म न विद्यते) अध्याय 8/16। इसके लिए वे कृष्ण अर्थात् परमसत्ता का वरधा में जाने का मार्ग बताते हुए अपनी ही शरण में जाने को कहते हैं, अपने कर्तव्यों को परमसत्ता के प्रति समर्पित होने की बात कहते हैं (“मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी माँ नमस्कुरु” तथा “सर्वधर्मान्परित्वज्य मामेकं शरणं व्रज)”। 18/65/66
अन्याय संप्रदायों में मरणोत्तर जीवन संबंधी मान्यताएँ भिन्न-भिन्न हैं। सोमेटिक लोग (ईसाई, मुस्लिम, यहूदी) मृत शरीर को अधिक से अधिक समय तक मकबरे में सुरक्षित रखते हैं व उनका मत हैं कि आत्मा ताबूत में सोयी रहती है किन्तु निर्णय के दिन उठ बैठती है। मिस्र के देहात्मवादी तो शरीर को ही आत्मा मानते थे व ममी बनाने की प्रक्रिया द्वारा शरीर को अधिकाधिक सुरक्षित रखने का प्रयत्न करते थे। किन्तु अब क्रमशः चिन्तन सभी ओर भारतीय दर्शन प्रधान हो रहा है। थियोसॉफीस्ट्स का कहना है कि मनुष्य मरकर मनुष्य जन्म ही पाएगा, और किसी योनि में नहीं जाएगा। भारतीय संस्कृति कहती है कि जीवन का कोई स्त्री पुरुष लिंग नहीं मनुष्य पशु-पक्षी आदि कोई जाति नहीं। वह तो अपने कर्मानुसार शरीर प्राप्त करता है और निश्चित कर्मों का उपभोग करके शरीर छोड़ देता है, फिर दूसरा शरीर प्राप्त करता है, जब तक कि वह बंधनों से मुक्त नहीं हो जाता।
“यो यच्छ्राद्ध स एवसः” । इस सूत्र के द्वारा जीव की गति होती है, ऐसा गीताकार ने कहा है। जिसकी जैसी श्रद्धा है, वह वहाँ जाएगा उसी का स्वरूप प्राप्त करेगा। कर्म में श्रद्धा वाले कर्म विधान की गति पाएँगे, योगी योग गति को प्राप्त करेगा, ज्ञानी ज्ञान स्वरूप से एकाकार होगा तथा भक्त भगवान को प्राप्त करेगा। जीव की गति कर्मों से बँधी बतायी गयी है। कर्मों की गति बड़ी गहन बतायी गयी है। वैयक्तिक रूप में कर्मों के संस्कार चित्त पर स्मृति रूप में या वासना रूप में पड़ते हैं, स्मृति दूसरे जन्म में बनी भी रह सकती है, नहीं भी होती किन्तु वासनात्मक संस्कारों में प्रबल प्रेरणा शक्ति होती है तथा यही विभिन्न योनियों के कारण बनते हैं। रागद्वेष-युक्त होकर, तृष्णा-वासनावश संचित संस्कार साथ जाते हैं चाहे वे शरीर से कर्म रूप में हुए हों या मन से। इच्छा कोई नष्ट नहीं होती, वह कभी न कभी पूरी अवश्य ही होती है इसीलिए दुख पैदा करने वाली भोगेच्छा से व्यक्ति को विरत रहने की शास्त्रज्ञ है। जो माँस खाना चाहता है वह कालान्तर में कुत्ते, गीध, व्याघ्र, कृमि किसी भी योनि में जन्म ले सकता हैं। यह एक उदाहरण मात्र है।
सामूहिक कर्मों के प्रतिफल भी बड़े व्यापक होते हैं। हिंसक उन्माद अनैतिकता, अत्याचार आदि कर्मों के फल सामूहिक रूप में भोगने पड़ते हैं। संकट की प्रतिक्रिया युद्धोन्माद, भूकम्प, बाढ़ के सामूहिक दण्ड महामारी के रूप में निकल सकती है। विचारों की दिशा का प्रवाह जिस दिशा में होता है, वैसी ही प्रतिक्रिया अदृश्य जगत से होती बतायी गयी है। न्यूटन का तीसरा नियम (धर्मोडायनेमिक्स) हर क्रिया की समान व विपरीत प्रतिक्रिया सुनिश्चित होती है। एक अटल सिद्धान्त के रूप में परलोकवाद, मरणोत्तर जीवन, कर्मफल के प्रतिपादनों से जुड़ा हुआ है । प्रायश्चित कर्म का सिद्धान्त हिन्दू संस्कृति का प्राण है जिसके माध्यम से पापकर्मों के कुपरिणाम नष्ट हो सकते है। हमारी संकल्प आदि की व्यवस्था इसीलिए हिन्दू धर्म में रही है।
एक सिद्धान्त अब पश्चिम जगत में भी जब पकड़ता जा रहा है कि आप पाए जाने वाले अधिकांश रोगों के मूल में व्यक्ति के अशुभ चिंतन में पापपूर्ण कृत्य हैं, स्ट्रेस नामक व्याधि को पाप, अनीति जन्य माना जाने लगा है तथा संक्षोभ-विक्षोभ गन्ध शरीर रोगों में संत्रासों को व्यक्ति को मिलने वाले ग्रन्थ के रूप में जाना जाता है। कन्फेशन का प्रावधान पश्चिम में भी है तथा अब ट्रांजेक्शनल एनालिसिस व साइकोइवेल्युएशन काउन्सिलिंग द्वारा मनुष्य को जरूरी है व पूर्व के विभिन्न कर्मों की जानकारी-अनुभूति कराते हुए उसे सही चिंतन-जीवनक्रम की सलाह दी जाने की बात बड़े जोरों से की जा रही है। हिप्नोथेरेपी अब खूब प्रचलित है। पुनर्जन्म व पितर विद्या के क्षेत्र में अनेक पाश्चात्य विशारद उतरे हैं व आत्माओं का आह्वान प्लेनचिट पद्धति से करने का प्रचलन 1885 से चला आ रहा है। सर आलीवरलॉज, सरकुम्स तथा विलियम जेम्स ने इस संबंध में काफी शोध कार्य किया है। वी-वी श्रेनेक ने अपनी पुस्तक “फिनामिना आफ मेटेरियलाइजिंग “ तथा स्वामी अभेदानन्द ने “लाइफ बियॉण्ड डेथ” में मृतात्माओं के चित्र देकर प्रमाण तक प्रस्तुत किये हैं।
पुनर्जन्म की अनेकानेक घटनाएँ परलोक विधा के मरणोत्तर जीवन के प्रतिपादनों के प्रमाण स्वरूप प्रस्तुत की जाती रही हैं परम पूज्य गुरुदेव ने इस विषय पर विस्तार से विवेचन किया है। यहाँ उनकी ही एक पुस्तक से एक घटना दी जा रही है, जो इसकी साक्षी देती है। कर्नल डिरोचाज जो एक फ्रेंच गुह्यविज्ञानी थे, मैस्मेरिज्म व हिप्नोटिज्म में निष्णात् थे। वे पुनर्जन्म के संबंध में भारतीय चिन्तन को मानते थे। एक फ्रेंच इंजीनियर की पुत्री मेरी मेव को सम्मोहन द्वारा अचेत कर उनने पहले उसे उसकी आत्मा को दर्शन कराया व क्रमशः धीरे-धीरे वर्तमान आयु से कम आयु की ओर चलने छोटी होने की न केवल अनुभूति करने सबको बताने को कहा। वह क्रमशः रंगीन प्रकाश की दिव्यज्योति के रूप में आत्मा को तथा फिर अपनी हर आयु के घटनाक्रमों को बताने लगी। क्रमशः उन्होंने उसे पूर्व जन्म के शरीर में पहुँचा दिया। उस बालिका ने बताया कि पूर्व जन्म में वह ब्रिटेन के पूर्वी तट पर रहने वाली मछुआरे की लड़की लीना थी व विवाहोपरांत समुद्री तूफान में डूबकर वह मर गयी थी। इससे पूर्व के जन्म में जाने का निर्देश मिलने पर जैसे कि किसी वीडियो कैसेट को रिवाइंड किया जाता है वह बताने लगी कि “बड़ा सघन अंधकार है। मुझे बड़ी तकलीफ हो रही है। मैं हूँ फ्राँस में ही, पर यह समय लुई 18 वें का है। पर मैं तो पुरुष हूँ । मेरा नाम मावील है। मैंने क्रान्ति में भाग लिया कई व्यक्तियों को मारा। सारा दृश्य मुझे दिखाई दे रहा है। मेरे दुष्कर्मों का दण्ड मुझे भयंकर पीड़ादायक बीमारी के रूप में मिला। इससे तो अच्छा है कि मैं लड़की होती और फिर वही मृत्यु-घना अंधकार।” इतना कहकर वह गहरी बेहोशी में चली गयी। इससे पूर्व के जन्मों में जा पाना संभव नहीं था। इस घटना द्वारा कर्नल डिरोचाज ने यह प्रमाणित किया कि आत्म चेतना का प्रवाह अनन्त है एवं वह लिंग से परे-देशकाल से परे वासनाओं से बंधा कहीं भी जन्म ले सकता है। यह मान्यता व यह घटनाक्रम योगवशिष्ठ (3/54/67) के माध्यम से बड़े स्पष्ट रूप से परिलक्षित होती है-
न जायते म्रियते चेतनः पुरुष क्वचित। स्वप्न संभ्रमवद्भान्तते तत्पश्यति केवलम्॥
पुरुषश्चेतनामात्रं सकदा ग्वेव नश्यति। चेतन व्यक्तिरिक्तत्वे वदान्यत्किं पुमान्भवेत
को ऽद्य यावन्मृतं ब्रहि चेतनं कस्य किं कथम्। प्रियन्ते देहलक्षाणि चेतनं स्थित भक्षयम्॥
अर्थात्-हे राम। मनुष्य के भीतर जो चेतना है (आत्मा) वह न जन्म लेता है, न मरता है, भ्रमवश संसार की परिस्थितियों का स्वप्न की भाँति अनुभव मात्र करता है। मनुष्य में चेतना के अतिरिक्त है ही क्या? वह नष्ट कहाँ होता है? यह शरीर तो मरते जीते रहते हैं, आत्मा तो अक्षयस्थित होता है।
यह एक ही चिन्तन एक ही तत्त्वदर्शन आत्मा की शाश्वतता, चिरन्तनता, अखण्डता का आप व्यक्ति का दिग्दर्शन करने में सक्षम है। जीवन का प्रवाह अनादि से अनन्त तक प्रतिपादित करने वाला देव संस्कृति का यह मार्ग दर्शन इतना अनुपम-अद्भुत ह कि अर्नाल्ड टायनवी जैसे विद्वान ने दायसाकू इकेड़ा (सुप्रसिद्ध जापानी चिंतक मनीषी) से चर्चा के दौरान कहा है कि यह विश्वास व्यक्ति को आशावादी व कर्मपरायण
श्राद्ध-तर्पण
श्राद्ध शब्द परलोकवाद-मरणोत्तर जीवन के विवेचन से जुड़ा हुआ है। यह शब्द ‘श्रद्धा’ से बना है। सत्कर्मों के लिए, सत्पुरुषों के लिए आदर की, कृतज्ञता की भावना रखना श्राद्ध कहलाता है। पितरलोक एक ऐसा प्रतीक्षा लोक है, जहाँ संभव है हमारे औरों के राष्ट्र-धर्म-संस्कृति के नाम पर बलि चढ़ने वाले महामानवों की आत्माएँ विश्रामरत हों इन सबके प्रति कृतज्ञता भाव से हम तर्पण पिण्डदान आदि करके अपने ऋण से मुक्त होते हैं। उनने जो भी हम पर व इस राष्ट्र पर संस्कृति पर उपकार किया उसका प्रत्युत्तर हम उन्हीं के पद चिन्हों पर चलकर दे सकते है। इसके लिए हम व्रत लेते हैं व कुछ सत्प्रवृत्तियों का शुभारंभ करते है। मृतकभोज आदि मान्यताएँ मध्यकाल में विकृतियों वश पण्डों-पुजारियों ने जोड़ी। स्वर्गीय पितरों को हम सूक्ष्म श्रद्धा भावना से ही अपनी कृतज्ञता की आहुति व तर्पण के जल द्वारा पवित्रता का भाव प्रेषित करते है। यह पूरा कर्मकाण्ड पूर्णतः विज्ञान सम्मत है। इसका विस्तृत विवेचन संस्कारों संबंधी विवेचन वाले आगामी अंक में दिया गया है।
तो बनाता ही है, साथ ही नैतिकता के मूल्यों की रक्षा भी करता है। वे कहते हैं कि ट्रांसमारग्रेशन के रूप में बौद्ध व हिन्दू जिस विश्वास को मानते हैं, उसे अब पश्चिम के धर्म भी आत्मा के अमरत्व के रूप में स्वीकारने लगे हैं। मैं यह मानता हूँ कि मनुष्य की शाश्वत आध्यात्मिक सत्ता उसके कर्मों से निश्चित ही प्रभावित होती है व हमें सभी को शुभकर्मों की प्रेरणा देनी चाहिए। (चूज लाइफः ए डाएलॉग-आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी प्रेस 1987 से उद्धृत)।
क्रान्तियों के अविराम दौर को देखने और समझने वाले कल के महापरिवर्तन के बारे में विश्वस्त हैं। इस विश्वसनीयता ने सोच-विचार में रुचि रखने वालों के मन में जिस जिज्ञासा को जन्म दिया है, वह है कल के जीवन की रूप रेखा उसका स्वरूप और संस्कृति। एक तरफ तर्कों और प्रयोगों की कसौटी पर तथ्यों को परखने वाला विज्ञान हैं। दूसरी ओर विश्वासों की बैसाखी पर टिके हुए विभिन्न धर्मों और सम्प्रदायों का समूह है। संवेदनशील हो सोचने वाले मानववादियों, दार्शनिकों का अपना वर्ग है उनकी अपनी चिन्तन प्रणालियाँ है। कल की जिन्दगी इनमें से किसे चुनेंगी? अथवा किसमें वह सामर्थ्य है जो स्वयं को भावी-समाज के योग्य ठहरा सके। कुछ भी हो सवाल नवयुग की नयी संस्कृति की खोज का है।
शुरुआत से ‘खोज’ जीवन की मूलवृत्ति रही है। ‘आवश्यकता आविष्कार की जननी है ‘ के सर्व प्रचलित सिद्धान्त ने समय-समय पर अनेकों उभार लिए हैं। आवश्यकता सभी को होती है-पशु हो या मनुष्य पर इनके स्वरूप में भेद है। पशुओं ने अपनी जिन्दगी की जरूरतों को पूरा करने स्वयं की वंशावली को बचाए रखने के लिए कम खोजें नहीं कीं। प्राणिशास्त्र इसी के अध्ययन का इतिहास है। प्रकृति की सूक्ष्म हलचलों को पढ़ने में सूक्ष्म-चींटी कुत्ते, संगठन करने वाली दीमक मधुमक्खी आदि के प्रयासों को देखकर दंग रहना पड़ता है। उनमें से अनेकों की अतीन्द्रिय सामर्थ्य का लोहा मानने के लिए सभी विवश हैं। पर इतने पर भी पशु भी किसी संस्कृति का निर्माण नहीं कर पाए। क्योंकि उन्होंने स्वयं की प्रकृति और प्रवृत्ति में परिवर्तन करने की न जरूरत महसूस की और न स्वयं में इसे कर सकने की सामर्थ्य का ही अनुभव किया। खोजी मनुष्य ने अपनी इसी विशेषता के कारण सभ्यताएँ निर्मित कीं संस्कृतियाँ रची और जीवन को अनूठा सौंदर्य प्रदान किया।
मनीषी स्टिच-स्टीफ न के “ग्रन्थ रिसर्च एण्ड प्रोसेस” के शब्दों में कहें तो “इस विराट ब्रह्माण्ड में शक्ति-चेतनता की अनेकों धाराएँ अनेकों स्तर हैं। इनमें से प्रत्येक स्वर का अपना वैभव अपनी उपलब्धियाँ हैं, खोज का अर्थ इनमें से किसी स्तर से अपना गहरा सामंजस्य बिठाना उसे मूर्त रूप देना है।”
प्रत्येक खोज का जन्म आवश्यकता से उत्पन्न इच्छा में होता है। इच्छा अपनी परिपक्व दशा में विचार और जिज्ञासा का रूप लेती है। जिज्ञासा के उपलब्धि की ओर बढ़ते कदम प्रक्रिया को जन्म देते हैं। प्रक्रिया की परिपूर्णता में सपना साकार हो उठता है। समय के प्रवाह में मनुष्य की अंतः प्रकृति और बाह्य प्रकृति में अनेकों परिवर्तन घटित होते रहते हैं। संसार का स्वरूप भी अपने में व्यापक फेर बदल करता रहता है। इन सारी उलट फेर में फँसकर प्रक्रियाओं में परिवर्तन आना स्वाभाविक है। लेकिन उपलब्धि का सिलसिला वही रहता है। उदाहरण के लिए आग को लें अग्नि तत्व सृष्टि के उदय काल से विद्यमान है। शुरुआत के दिनों इसकी जरूरत पड़ने पर मानव ने पत्थर रगड़कर इसे हासिल किया। तब से आज तक अग्नि उत्पादक प्रक्रियाओं में भारी अन्तर आ चुका है पर अग्नि वही है।
नेतृत्व विज्ञानियों के अनुसार आज से हजारों साल पहले भी आदमी ने अपनी सभ्यता के गौरवपूर्ण शिखरों को छुआ है। जिन्दगी के व्यापक दायरे के हर बिन्दु पर उसने तरह-तरह के शोध अध्ययन किए। समग्र जीवन पद्धति को रचने वाली संस्कृति के निर्माण में सफल हुआ। महायोगी अनिर्वाण के ग्रन्थ ‘वेद मीमांसा के अनुसार उसने अन्तः और बाह्य प्रकृति पर अनूठे प्रयोग किए। ऐसे प्रयोग जिनसे मनुष्य देवता बन गया और धरती स्वर्ग। समय के थपेड़ों और नई पीढ़ी की उत्तर दायित्वहीनता के कारण ढेर की ढेर प्रक्रियाएँ खो गई। उन प्रक्रियाओं के खोने का परिणाम है कि मनुष्य आज न जाने कितनी उपलब्धियों से वंचित है। वर्तमान परिस्थितियाँ इतनी बदली हुई हैं-कि वेदों के आख्यान-पुराणों के विवरण, शास्त्रों के वचन सुनने वालों को नानी की कहानी मालूम पड़ते हैं, जब कभी कोई ऋषि दयानन्द परमहंस विशुद्धानन्द, उन तथ्यों को अपने जीवन में प्रमाणित कर लोक जीवन को झकझोरता है सभी थोड़े समय उसे कौतुक और आश्चर्य से देखते हैं। फिर उस व्यक्ति विशेष को अतिमानव का सम्मान दे अपने लिए असम्भव बता किसी गहरी नींद में खोने लगते हैं।
इस ‘असम्भव और आश्चर्यजनक’ के पीछे झाँकने वाले तथ्यों को परखें तो प्रक्रियाओं का मौलिक अन्तर समझ पड़ता है। प्राच्य विद्या के विशेषज्ञ डा. गोपीनाथ कविराज के अध्ययन “भारतीय संस्कृति और साधना” के शब्दों में आज की शोध प्रक्रियाएँ जिन्हें विज्ञान की विभिन्न शाखा-उपशाखाओं का समूह कह लें विश्लेषण करने में समर्थ बुद्धि की उपज है। देव संस्कृति के विभिन्न पक्षों की खोज के पीछे अन्तर्ज्ञान सम्पन्न संवेदनशील मन को ढूँढ़ा जा सकता है। आज के जीवन में यदा-कदा ऐसे अवसर आ जाते हैं जब पुरानी शोध को नवीन मूल्याँकन से गुजरना पड़ता है। परिणति आश्चर्यजनक ढंग से सुखद होती है। लेकिन पुरानी प्रक्रियाओं के खो जाने के कारण आधुनिक प्रयोगकर्ताओं को इस विवशता का सामना करना पड़ता है, कि ऋषि मुनि कहे जाने वाले शोध विज्ञानी यन्त्रों और बहुमूल्य प्रयोगशालाओं के अभाव में इन निष्कर्षों तक कैसे पहुँच सकें समस्या को सुलझा सकने में अक्षम बुद्धि को एक ही बात समझ में आती है कि इन सब तथ्यों को संयोग कहकर चुप्पी साध ले। पर संयोग एक-आध हो सकते हैं। मानवीय ज्ञान के विविध क्षेत्रों में इनका भरा-पूरा सिलसिला इस बात को प्रमाणित करता है कि कहीं न कहीं तथ्यांकन की कोई प्रणाली अवश्य रही है। जो पुनर्मूल्यांकन के अपने मौलिक अधिकार के लिए गुहार लगा रही है।
चरक का आयुर्विज्ञान, वाराहमिहिर, आर्यभट्ट की खगोल गणनाएँ, पतंजलि का मानसशास्त्र, गोरक्षनाथ की हठयोग प्रणाली, विभिन्न दार्शनिक पद्धतियों के सृष्टि और मनुष्य सम्बन्धी गहरे सर्वेक्षण प्रयोगों की कसौटी पर करने पर यह मानने के लिए विवश करते हैं कि यह सब कल्पना लोक की उड़ाने नहीं हैं। तब क्या इन सबके पास आज सी सुसज्जित प्रयोगशालाएँ थीं जिनका न तो उल्लेख मिलता है न अवशेष? इस प्रश्न का सुसंगत उत्तर इतना ही है कि प्रयोगों की प्रणाली तो थी पर आज से भिन्न। उन दिनों प्रारम्भ से ही अपनी अन्तः प्रकृति को तरह-तरह के गम्भीर प्रयोगों द्वारा इस लायक बना दिया जाता था कि वह सृष्टि के विभिन्न रचनाक्रमों और इसकी उपादेयता का सम्यक् ज्ञान अर्जित कर सकें। ऐसे शोधार्थी के रूप में चरक और उनके बहुयोगी किसी पौधे के प्राण स्पंदनों से अपने अन्तर्बोध सम्पन्न मन को एकाकार करके पौधे की गुणवत्ता, उसके भाग विशेष की रोगनिवारण की विभिन्न क्षमताओं का ज्ञान अर्जित कर लेते थे। परीक्षणों का व्यापक सिलसिला प्रयोगों की गुणवत्ता को शतप्रतिशत ठीक ठहराता था। यही कारण है कि आयुर्वेद के प्राचीन ग्रन्थों में पौधों के गुण-स्वभाव उनके विभिन्न की रोगनिवारक सामर्थ्य-प्रयोग विधि का ब्योरेवार विवरण तो मिलता है, पर पौधे के रासायनिक संगठन और सूक्ष्म विश्लेषण का अभाव है।
यही बात ज्ञान की अन्य धाराओं में संदर्भ में है। प्राचीन ज्ञान की प्रायः सभी शाखाओं-उपशाखाओं की उपलब्धि में प्रक्रिया का यही स्वरूप दिखाई देता है। इसका एक ही कारण है इसकी सर्वतोजयी प्रामाणिकता प्राचीन शास्त्रों में ज्ञान की चार विधियों का उल्लेख मिलता है इन्द्रियानुभूति द्वारा अन्तर्बोध सम्पन्न मन से, विश्लेषण क्षमता सम्पन्न बुद्धि से, और गहरे आत्मिक तादात्म्य द्वारा। आधुनिक समय में ऋषि अरविंद ने ‘लाइफ डिवाइन’ में इसी अन्तिम विधि को श्रेष्ठ बताया है। देव संस्कृति को जन्म देने वाले इस विधि में निष्णात थे यही कारण है उन्होंने इस उत्कृष्ट विधि के रहते निम्न विधियों का कम ही प्रयोग किया है।
आज का विज्ञान और वैज्ञानिक ज्ञान की जिस विधि का प्रयोग करते हैं वह है बौद्धिक विश्लेषण प्रणाली। जिसका सहायक तत्व उनकी प्रयोगशाला में प्राप्त होने वाला इन्द्रिय अनुभव होता है। इतने पर भी अन्तर्ज्ञान सम्पन्न मन की सहायता जरूरी होती है। हाँ उसका प्रायोगिक विश्लेषण की कसौटी पर खरा उतरना जरूरी समझा जाता है। सहज है किसी के मन में सवाल उठ खड़ा हो क्या देव संस्कृति की चिन्तन सम्पदा आज के विज्ञान सम्मत प्रयोगों और तर्क प्रवण वैज्ञानिक मन को प्रभावित करने अपने को प्रमाणित ठहरा सकने में समर्थ है। इस सवाल के जवाब में आधुनिक विज्ञान-सर्वश्रेष्ठ विज्ञानियों की अनुभूतियों का उल्लेख कहीं अधिक समीचीन होगा।
ऋषियों की चिन्तन सम्पदा के वेदान्त दर्शन ने क्वाण्टम भौतिकी के वैज्ञानिक पारनर हाइज़ेनबर्ग की सोच में व्यापक उलट-फेर कर दी। क्या यह दार्शनिक चिन्तन किन्हीं अनुभूतियों पर आधारित है? क्या इनको आधुनिक विज्ञान के द्वारा परख सकना संभव है? इन महत्वपूर्ण सवालों को लेकर हाइज़ेनबर्ग सन् 1929 में भारत आए। विश्वकवि रवीन्द्रनाथ टैगोर से इस चिन्तन के विशेष बिन्दुओं पर गम्भीर चर्चा की और वापस लौट कर अपने प्रयोगों में जुट गए। कुछ ही समय बाद उन्होंने भौतिकी जगत को “अनिश्चितता का सिद्धान्त” दिया। जो और कुछ नहीं वेदान्त के इस तत्व की व्याख्या है कि पदार्थ का स्वरूप प्रतिक्षण अनिश्चित है। उन्होंने अपने ग्रन्थ ‘फिजिक्स एण्ड फिलॉसफी में यहाँ के चिन्तन से स्वयं के प्रभावित होने का मार्मिक वर्णन किया है। नोल्सवोर और इरविन श्रोडिंजर के स्वरों में भी यही गूँज सुनाई देती है। श्रोडिंजर वेदान्त में वर्णित प्रकृति के अनिश्चित स्वरूप की व्याख्या के आधार पर अपना आणविक अध्ययन करने में लगे थे। प्रयोगों से प्राप्त निष्कर्ष में उन्हें हतप्रभ हो कहना पड़ा “अरे। सचमुच नाम रूप से अजूबा लगने वाला संसार कुछ तरंगों की हलचल भर है।” उनके प्रयोगों के इस निष्कर्ष ने वेंक्स मेकनिक्स का रूप लिया।
विज्ञान के क्षेत्र में आइंस्टीन और हाइज़ेनबर्ग के प्रतिमानों को पार करने वाले जियोफेरी च्यू ने बूट स्ट्रैप का अनोखा सिद्धान्त दिया है। इसमें हाइज़ेनबर्ग की क्वाण्टम मैकेपिक्स और आइंस्टीन की सापेक्षता दोनों के तत्व समाएँ हैं। इसके अनुसार प्रकृति के मौलिक तत्व को विघटित नहीं किया जा सकता। वस्तुओं का अस्तित्व उनके गुणों और अन्यों के साथ उनके गहरे ताल-मेल के कारण हैं । यह तालमेल जहाँ विभिन्न शक्तियों के आपसी सहयोग का बोध कराता है वहीं इनकी अभिन्नता और एकता का ज्ञान देता है।
विज्ञानी च्यू से जब भौतिकविद् काप्रा ने इस प्रयोग के संदर्भ में चर्चा की। तो उन्होंने हँसते हुए कहा जब वह सन् 1969 में सपरिवार भारत आने की तैयारी कर रहे थे। इस तैयारी के दौरान उनके लड़के ने बौद्ध महायान का एक ग्रन्थ उनके हाथ में दिया। इस ग्रन्थ में वे सारी बातें कही गई थी जिन पर वे विचार कर रहे थे। उन्हें स्वीकार करना पड़ा कि उनके प्रयोग भारत की सोऽहम् ज्ञान का सत्यापन भर हैं।
च्यू की भाँति डेविड बोम के प्रयोगों का निष्कर्ष-अखण्डित पूर्णता वेदान्त का एक रूप है। इसे स्वीकार करते हुए उन्होंने बताया कि सन् 1974 में उनकी मुलाकात भारतीय दार्शनिक जे. कृष्णमूर्ति से हुई। कृष्णमूर्ति के विचारों ने उन्हें पूर्वी तत्त्वचिंतन को वैज्ञानिक कसौटी पर करने के लिए प्रेरित किया। इस प्रेरणा और प्रभाव ने ही भौतिक विज्ञान को ‘अनब्रोकेन होलनेस’ का अभिनव सिद्धान्त दिया।
ऋषियों के चिन्तन के प्रभाव विज्ञान की किसी शाखा विशेष तक सीमित नहीं हैं। अन्य शाखाएँ और उनके अध्येता इसकी प्रेरणा और प्रभाव को ग्रहण कर विज्ञान के क्षेत्र में कुछ नया दे सके हैं। “स्टेप्सट्एन इकॉलाजी आँव माइन्ड” की रचना करने वाले ग्रेगरी बैटसन अपने प्रयोगों में मन को एक नए रूप में जान सके। उन्हीं के शब्दों में ‘माइन्ड विदआउट नर्वस सिस्टम’ की धारणा पूर्वी चिन्तन से प्राप्त हुई। इसी प्रकार मनोविज्ञान के क्षेत्र में क्रान्ति लाने वाले आर.डी. लेंग से फ्रिटजोफ काप्रा ने लन्दन में मुलाकात कर उन्हें अवगत कराया कि वह पूर्वी तत्त्वचिंतन और आधुनिक विज्ञान का समन्वय कर रहे हैं। लेंग ने हल्की मुसकराहट के साथ कहा समन्वय की बात नहीं पूर्वी चिन्तन पूर्णतया वैज्ञानिक है। वह स्वयं योग और ध्यान का अभ्यास करते हैं। इसी तत्व चिन्तन की प्रेरणा से वह ह्यूमिनिस्टिक साइकोलॉजी की धारणा दे सके हैं।
आर.डी.लेंग की तरह स्टेनग्रोफ की रीलय आँव ह्यूमन कांशसनेश में कार्ल गुस्ताव जुँग के प्रयोगों राबर्टो असमोली की साइकोसिन्थेसिस में भारत की सोऽहम् चिन्तन के प्रभाव स्पष्ट दिखाई देते हैं । इन प्रभावों का विस्तृत अध्ययन इतना व्यापक होगा जिसके लिए अनेकानेक शोध ग्रन्थों के कलेवर छोटे पड़ जायँ। बात इन कतिपय उदाहरणों और छुटपुट प्रयोगों की नहीं समस्त संस्कृति की है जो आज भी समीचीन और सम-सामयिक है।
इसे ऋषि सन्तानों का हतभाग्य ही कहें कि उन्होंने अपना यह वैभव भुला दिया। इस विस्मृति का ही परिणाम है अपनी प्रतिभा से विश्व मनीषा को चमत्कृत कर देने वाला देश आज ज्ञान सम्पदा के लिए याचक है। क्योंकि उसमें उस सत्यनिष्ठ शैली और लगनशीलता का अभाव है जो ज्ञान को अपना अनुगमन करने के लिए बाध्य करती है। इसे आश्चर्य ही कहेंगे कि समूचे देश के सिर पर शोध प्रबन्धों के गट्ठरों का बोझ प्रतिवर्ष बढ़ते जाने के बावजूद जीवन की समस्याएँ उलझी हैं समाज के प्रश्न अनुत्तरित हैं। फिर शोध क्या और किसकी?
विज्ञान जिस कारण अपने को लोक विख्यात बना सका है वह है उसकी सत्यनिष्ठ। इतने पर भी वह संस्कृति नहीं रच सका और ने भविष्य में रच पाने में समर्थ है। क्योंकि उसकी अपनी सीमाएँ हैं, उसने जीवन के अधूरेपन को छुआ है। अर्थ और काम के यत्किंचित् पहलू ही उसकी समझ और पकड़ में आए हैं। व्यक्ति और समाज की गहराइयों को छूने वाली धर्म और मोक्ष की पद्धतियाँ उसके बौने हाथों से दूर हैं। क्रियापरायणता के बावजूद संवेदनाओं का मृदुल स्पर्श उसे नहीं मिल सका। यही कारण है कि आइंस्टीन जैसे विज्ञान विदों को संवेदनाओं की इस अनुभूति के लिए धर्म की आवश्यकता और पूर्वी चिन्तन की उपादेयता पर बल देना पड़ा।
सत्य है जीवन जितना व्यापक है संस्कृति को उतना व्यापक और समग्र होना पड़ेगा और यह व्यापकता और समप्रता देव संस्कृति का सहज धर्म है, आवश्यकता इसकी युगानुकूल प्रक्रियाओं के अध्ययन और निर्माण की है। जिसके लिए युग ऋषि की पराचेतना से संचालित ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान कृतसंकल्प है। यहाँ देव संस्कृति के विभिन्न पक्षों का गम्भीर शोध अध्ययन सम्पन्न किया जा रहा है। जिसके निष्कर्ष-नवयुग के नए मानव को जीवन का नया विधान दे सकेंगे। उसे अपनी देव संस्कृति का ऐसा युगानुकूल वैभव प्राप्त हो सकेगा। जिसकी वह चिरकाल से खोज कर रहा है।
आज की विपन्नताओं का क्या हल है ? यह सवाल दुनिया के न जाने कितने प्रतिभा सम्पन्न मस्तिष्कों में उधेड़ बुन मचाए है । उन्हें समझ नहीं पड़ रहा कि सुविधाओं से भरे-पूरे युग में वह अभाव ग्रस्तता कहाँ से उपज पड़ी जिसके कारण हर कोई उचित-अनुचित कर गुजरने के लिए आकुल-व्याकुल है । समस्याएँ-उलझने और विपत्तियाँ अपने-अपने ढंग से सभी को हैरान-परेशान कर रही हैं । चिन्ताएँ आशंकाएँ जन-जन के मन को आतंकित किए हुए हैं । देश और दुनिया में आज जो कुछ हो रहा है-उसे बताने के लिए दो ही शब्द काफी है-अशुभ और अनुचित ।
मोटी दृष्टि से जिन्दगी की बहरूपिये समस्याओं के अनेक कारण और उनके भिन्न-भिन्न हल समझ पड़ते हैं । पर एरिक फ्राम के ग्रन्थ “मैन फॉर हिमसेल्फ” के शब्दों में गहरे उतरने पर एक ही अति स्पष्ट और निर्विवाद कारण उभरता है-विचारों की टकराहट । जिसके कारण इनसानी जिन्दगी चिथड़े होने के लिए मजबूर है । इसी वजह से मानव-जाति पर अर्ध-विक्षिप्तता का दुर्भाग्य टूट पड़ा है । जिसके चंगुल में फँस जाने के कारण छोटे से लेकर बड़े तक के सिर पर अपने-अपने ढंग की सनकें सवार हैं । हर एक के अपने मत-मान्यताएँ और आग्रह हैं । अपनी ढपली-अपने राग का भोंड़ा प्रदर्शन करने में जुटे समाज के लिए एक मात्र समाधान है-सामंजस्य का शिक्षण। राष्ट्र हो या व्यक्ति प्रत्येक के मूल स्वर की रक्षा करते हुए उसे विश्व मानवता के पुष्पहार में पिरो देना ।
उद्देश्य कितना भी श्रेष्ठ हो-पर कार्य दुष्कर है । जब कभी पहले मनुष्य ने संस्कृति का निर्माण किया था-वसुधा को कुटुम्ब बनाने के सपने सँजोए थे उस समय बुद्धिवाद का बोल-बाला न था । इनसान भाव प्रवण था । हर किसी को एक दूसरे से सामंजस्य बिठाने की धुन थी । पहले हर पाँव एकता की ओर उठता था । आज उसकी गति अलगाव बिखराव की ओर है । लेकिन पाल ओपेन हाइमर की पुस्तक “द् बर्थ आफ मॉडर्न माइण्ड" के विचारों के साथ सोचें-तो “बिखराव कितना ही व्यापक और समर्थ क्यों न हो उसे किसी न किसी एकता से ही उपजना पड़ता है । इतना भर नहीं उसके चरमोत्कर्ष का अन्तिम परिणाम भी एकता में विलय है ।”
एकता की यह डोर काफी उलझी हुई जरूर है । लेकिन अगर इसे पूरे मनोयोग से सुलझाने की कोशिश की जाय तो परेशानी के बावजूद सफलता के चिन्ह दिखाई पड़ते हैं । यह सच है कि संसार में अनेक नृवंशों के लोग हैं । जो आपस में एक-दूसरे से नहीं मिलते । जिनके धर्म अलग-अलग हैं । जिनकी आदतों और आचारों में कोई समानता नहीं है । लेकिन दुनिया के मतों विचारों का गहराइयों से किया गया सर्वेक्षण उससे बड़े सच को प्रकट करता है । ये सभी मिलकर किसी एक जगह ऐसी भी है जहाँ सभी विचार अपने सारे विरोध छोड़कर एक होने के लिए लालायित हैं ।
यह एक जगह कौन सी है ? इस बारे में यदि हम प्रो. मैक्समूलर से सवाल करें तो उन्हीं के शब्दों में उनका जवाब है “मैं सीधा संकेत भारत की ओर करूँगा ......। क्योंकि नीले आसमान के नीचे यही वह भू-भाग है जहाँ विचार समग्र रूप से विकसित हुए हैं । “ सैयद महमूद ने इस एक स्थान की खोज में मुहम्मद पैगम्बर के शब्दों का उल्लेख “हिन्दू मुस्लिम कल्चरल एकार्ड” में किया है । पैगम्बर के शब्द हैं “मैं हिन्द की तरफ से आती हुई ठण्डी हवाओं को महसूस करता हूँ।” यह शीतलता विचारों के सामंजस्य की है जिसका स्पर्श मानव मन की समस्त स्नायविक उत्तेजनाओं को शान्त करता हैं । सहीहू मुस्लिम में अबू होरैरा ने कहा है कि पैगम्बर ने कुछ स्वर्ग की नदियों का जिक्र किया है जिनमें से एक भारतीय नदी का नाम है । इब्ने हातिम ने अली का प्रमाण देते हुए कहा है कि हिन्द की घाटी में आदम बहिश्त से उतरा था । चौथे खलीफा का कहना था कि भारत में सबसे पहले किताबें लिखी गई और बुद्धि ज्ञान का प्रसार भी यहीं से हुआ।
इस देवभूमि में उपजे विचार सभी का इतने अपने और लुभावने लगे कि किसी को इन्हें अपनाने में कभी संकोच नहीं करना पड़ा । स्वयं मुहम्मद साहब ने तोबा, सुन्दास और अबलाइ जैसे संस्कृत शब्दों का प्रयोग किया है । शब्दों की तरह विचारों और सिद्धान्तों की ग्रहण-शीलता इस्लामी दर्शन में प्रचुर मात्रा में बिखरी पड़ी है । जाग्रत स्वप्न सुषुप्ति ओर तुरीय कठोपनिषद् में निरूपित ये चार अवस्थाएँ यहाँ चार मंजिलों के नाम से प्रसिद्ध हैं । जाग्रत अवस्था को इस्लामी चिन्तन में नासूत स्वप्नावस्था को मलकूत सुषुप्ति को जबरुत और तुरीय को लाहूत कहा गया है तुरीयावस्था की सोअहमस्मि का अनुभव चतुर्थ मंजिल लाहूत का अनलहक का अनुभव है ।
इसी प्रकार भारत के सोऽहम् चिन्तन और इस्लामी दर्शन के अनेकों सिद्धांतों में केवल नाम का ही अंतर है उदाहरण के लिए यहाँ के दार्शनिक चिन्तन का अद्वैत, इस्लाम में तोहीद, परम सत्य-इस्लाम का ‘मुतलक’ ‘सत्यस्य सत्यम्’ इस्लाम में ‘हकीकत उल हकाहक’ और ज्योति को इस्लाम में नूर-उल-नूरिन कहा है । जिस प्रकार यहाँ के आर्षग्रन्थों में ईश्वर को सर्वव्यापी और अन्तर्यामी कहा है, उस प्रकार इस्लामी चिन्तन में ईश्वर को ‘बातिन’ और ‘जाहिर तथा मुदत’ और ‘सादी’ बतलाया है । विचारों की घनिष्ठता और पारस्परिक साम्य कहीं गहरे में मधुर सम्बन्धों को और भविष्य की किसी उज्ज्वल सम्भावना को व्यक्त करती है । ब्राउन मैक्सहार्टिल, और गोल्ड जीहर आदि अनेकों पाश्चात्य विद्वानों ने अपने गहरे अध्ययन के बाद विश्वास जताया है इस्लाम विचारधारा के प्रमुख तत्व भारतवर्ष से लिए गए हैं (हिस्ट्री आँव फिलॉसफी इस्टर्न एण्ड वेस्टर्न खण्ड-1 / 5 /502) अरब युग में बहुत से प्रमुख भारतीय ग्रन्थों का फारसी और अरबी में अनुवाद हुआ । अलकिण्डी ने भारतीय धर्मों पर एक पुस्तक लिखी, सुलेमान और अलमसूदी ने भारत के विषय में सूचनाएँ इकट्ठी कर लिपिबद्ध किया तथा अलनदीय, अलशरी, अलबरूनी एवं अन्य लोगों ने अपने यात्रा विवरणों में भारत के दार्शनिक विचारों का विस्तार से वर्णन कि या है । साहित्य-विज्ञान और दार्शनिक चिन्तन इन तीनों ही क्षेत्रों में इस्लामी जगत भारतीय जीवन और विचारधारा से प्रभावित हुआ है । मुंडकोपनिषद् ने इस तथ्य का रहस्योद्घाटन करते हुए सही ही लिखा है-
यथा नद्यः स्यदमानाः समुद्रोऽस्तं गच्छन्ति नामरुपेविहाय । तथा विद्वान नाम रुपाद्विमुक्तः परात्परं पुरुषमुपैतिदिव्यम् ।। -मु .उप . 3 /2 /8
अर्थात् “जिस प्रकार नदियाँ अनेक मार्गों से बहती हुई समुद्र में जाकर विलीन हो जाती है और उनके नाम रूप के भेद मिट जाते हैं, उसी प्रकार विद्वान अपनी-अपनी रुचि और अधिकार के अनुसार क्रमशः नाम रूप रहित एक ही सत्य-रूप परमात्मा में लीन होते है ।”
बात किसी एक मत या पंथ की नहीं है । जिसने भी यहाँ की वैचारिक संवेदना का स्पर्श पाया-वही इससे एक होता गया । सर चार्ल्स इलियट के ग्रन्थ “ हिन्दुइज्म एण्ड बुद्धिज्म” के पन्ने पलटें तो पता चलता है भारत के रहस्यवादी विचार सूफी मत के माध्यम से यहूदी रहस्यवाद में पहुँच गए जो-कब्बाला कहलाते हैं । यह कब्बाला मिश्र और पश्चिम एशिया में विकसित होकर यूरोप में भी जा पहुँचा। कब्बाला के बहुत से लक्षण जैसे-देवताओं की दशाएँ और निर्गमन, पिण्ड और ब्रह्माण्ड के सम्बन्ध सिद्धान्त आश्चर्यजनक रीति से-भारतीय तंत्र दर्शन से प्रभावित हैं । इस प्रभाव का निश्चित पता तो पुनर्जन्म और सर्वेश्वर वादी सिद्धान्तों से चलता है। सर्वोच्च-देवत्व अथवा ईश्वर एन-साफ कहलाता है-जिसका अर्थ अनन्त अज्ञेय और वर्णनातीत है । इसके बारे में जो कुछ कहा गया है वह इलियट के शब्दों में उपनिषदों के सार वाक्य है।
उपनिषदों का भाव संदेश-किस प्रकार दुनिया के हर कोने तक पहुँचता-फैलता गया ? इसके विषय में आधुनिक पीढ़ियों को शायद कल्पना भी न उभरे । इसके व्यापक प्रसार को साधन भाषण देने वालों की कुशलता, मिशनरी लोगों द्वारा किए जा रहे प्रलोभन के भाँति-भाँति के प्रयोगों जैसी कुछ न होकर अपनत्व का बोध कराना रही है । विचारों की प्रामाणिकता, उत्कृष्टता, इनकी जीवन में सार्थकता स्वयं अपनी व्यापकता कारण बनी है । व्यक्ति अथवा समूह की बैसाखियाँ इसने कभी नहीं स्वीकारी । इसी आश्चर्य से अभिभूत होकर ए . ए . मैकडोनल “ए हिस्ट्री आँव संस्कृत लिटरेचर” में कह उठा “विश्व के सोऽहम् मंच पर यदि कोई सबसे महत्वपूर्ण घटना मानी जा सकती है तो वह है संस्कृत साहित्य की जानकारी ।” एन.ए. नोटोविक ने अपनी पुस्तक “अननोन लाइफ आँव जीससक्राइस्ट” में इस तथ्य का सत्यापन किया है कि “भारत भूमि के विचारों और साधना पद्धतियों ने इस ईश्वर पुत्र के हृदय में इतना गहरा आकर्षण उत्पन्न किया कि वे सोलह वर्षों तक यहाँ के ब्राह्मणों और साधुओं के साथ रहे ।” नोट विक ने जिस गहरे सत्य की शोध की है उसका निष्कर्ष बहुतों को आश्चर्यजनक लग सकता है । पर संस्कृत साहित्य में संजोई विचार सम्पदा ने न जाने कितने यूरोपीय विद्वानों को इसके अध्ययन के लिए अपना जीवन समर्पित करने को विवश किया है । इस सर्वप्रचलित और बहुपरीक्षित तथ्य से सभी सहमत हैं ।
चार्ल्स विल्किस इस परम्परा का पहला व्यक्ति था । जिसकी प्रशंसा करते हुए संस्कृत पाण्डित्य के जन्मदाता एच. टी. कोलब्रुक ने कहा है कि पाइथागोरस से लेकर उस समय तक ऐसा कोई विदेशी विद्वान नहीं रहा जिसने विल्किस की तरह यहाँ के विचारों को आत्मसात् न किया हो । विल्किस ने हितोपदेश, भगवद्गीता, महाभारत के शकुन्तलोपाख्यान सहित अन्य कई रचनाओं का भावपूर्ण अनुवाद किया । विल्किस की परम्परा में विलियम जोन्स, बर्क, गिबन, शेरीडाँन, गैरिक और जॉनसन जैसे अनगिनत विचारों के उपासक दीक्षित होते चले गए । यूजीबरनाफ ने अपनी गहन शोध के द्वारा अवेस्ता के नियमों पर भारत के सोऽहम् बोध की छाप प्रभावित की । अध्ययन की इस परम्परा में उसने एक शिष्य को गढ़ा । मैक्समूलर के नाम से विख्यात इस शिष्य ने अपने गुरु की भावनाओं का कितना सम्मान किया यह किसी से छुपा नहीं है।
जर्मनी के विचारक तो भारतीय विचारशीलता की गहरी अनुभूति कर स्वयं के जीवन की सार्थकता पर विभोर हो उठे जार्जफास्टर ने जब लोक विख्यात मनीषी हर्डर को, शाकुन्तल का जर्मन अनुवाद भेजा तो वह कह उठा “मानव मस्तिष्क की इससे अधिक आनन्दप्रद और कोई कल्पना मुझे नहीं मिली .......पूर्व का एक विकसित पुष्प, सुन्दरता में बेजोड़ ! उसने शाकुन्तल का विश्लेषण करते हुए दावा किया कि इस कृति से यह प्रचलित विश्वास अमान्य हो जाता है कि नाटक का आविष्कार प्राचीन ग्रीकों ने किया है । जर्मन कवि गेटे ने शाकुन्तल के बारे में अपनी अनुभूत लिखी यह मेरे जीवन के एक अति महत्वपूर्ण युग का प्रतीक है ।
अठारहवीं सदी में जर्मनी में भारतीय साहित्य को पढ़ने-समझने की ऐसी ललक पैदा हुई कि चिन्तकों के समूह जैसे सामान्य जन तक यहाँ तक कि समयाभाव से ग्रसित राजनीतिज्ञ भी इसे पढ़ने और जीवन में अपनाने की आतुरता न रोक सके । विटरनित्ज की ‘ए हिस्ट्री आँव इण्डियन लिटरेचर’ के पृष्ठो से पता चलता है कि फान , थीलमान, रोजन साल्फ और विल्हेनवान आदि राजनीतिज्ञ अवकाश मिलते ही देव संस्कृति के चिन्तन सूत्रों में अपने को खोने लगते थे । हम बोल्ट ने भगवद्गीता को पढ़ने के बाद अपनी अनुभूति व्यक्त करते हुए कहा कि वह परमात्मा को जीवन प्रदान करने के लिए धन्यवाद देता है क्योंकि इस कारण ही उसे भगवद्गीता जैसा उत्कृष्टतम विचारकोश अध्ययन के लिए मिल सका ।
प्राच्य विद्याविदों, सामान्य अध्येताओं की ही भाँति पश्चिम के दार्शनिकों ने भी ऋषि संस्कृति के चिन्तन के प्रति स्वयं को ऋणी माना है । शोपेनहार, विक्टर कजिन, पालडायसन , श्लेगिल आदि पश्चिमी तत्व वक्ताओं ने अपने तत्व अभिव्यक्त किया है । कई जगह तो सिर्फ शब्दों की फेर बदल भर दिखाई देती है । मनीषी टामलिन इसे स्वीकारते हुए कहते हैं “शाँकर दर्शन की दिशा लगभग वही थी जिसे बाद में जाकर काण्ट ने अपनाया । मैक्समूलर के ग्रन्थ “थ्री लेर्क्चस आन द् वेदान्त फिलॉसफी पढ़ें तो पता चलता है कि उपनिषदों ने जिस ब्रह्म का प्रतिपादन किया है उसी को स्पिनोजा ने “सबस्टेशिआ” ‘स्वतन्त्र तत्व’ नाम दिया है । इसी तरह शंकराचार्य की ‘माया ‘ को लाइबिनज ने ‘मैटेरिया प्राइम’ कहकर स्वीकार किया है । फिक्ते ने इसी को अपने चिन्तन में ‘अंसटास’ नाम दिया है । इसी तत्व को शेलिंग ने अपने दर्शन में ‘डार्कग्राउण्ड’ कहकर उल्लेख किया है । शोपेनहावर का संकल्पवाद-छान्दोग्य के 7 /4 /2 अंश की व्याख्या भर है । छान्दोग्य उपनिषद् के इस अंश में संकल्प को ब्रह्म रूप देते हुए कहा है कि जो इस संकल्प ब्रह्म की उपासना करता है, वह भगवान के रूप को प्राप्त करता है ।
विभिन्न रूपों में- विभिन्न पद्धतियों में-विभिन्न देशों में देव संस्कृति के ये सभी चिन्तन स्वर जिस एक बात का उद्घोष करते हैं वह है उसका अपनत्व और यही वह पृष्ठ भूमि है जो इसे विश्व संस्कृति का गौरव प्रदान करेगी संस्कृति का उद्देश्य हृदय पर अधिकार पाना है और हृदय की राह समरभूमि की लाल कीच नहीं सहिष्णुता का शीतल प्रदेश है, उदारता का उज्ज्वल क्षीर समुद्र है । ऋषि चिन्तन की वही उर्जस्विता विश्व मानव को वैचारिक संघर्ष से मुक्ति देगी । कल का भविष्य जिस महानतम आश्चर्य को साकार करेगा वह है संसार की सभी विचारधाराओं का अपने मूल स्वर से सामंजस्य । इसी घटना के साथ विश्व संस्कृति के चिन्तन स्वर गूँज उठेंगे “सभानोमत्रः समितिः सभानी, सभानो मनः सह चित्तभेषाम्” सब लोग एक विचार वाले हो जाएँ सभी के मन एक समान हो जाएँ सभी के चित्त में एक से संवेदन उठने लगें । यही वैदिक दर्शन की मान्यता रही है व यही अगले दिनों साकार रूप लेने जा रही है।
भौगोलिक रूप से इनसान एक दूसरे के इतना नजदीक कभी नहीं रहा-जितना आज है । आधुनिक सुविधाओं के सरंजाम ने दुनिया को एक गाँव में तब्दील कर दिया है । इतनी देर में हम एक गाँव से दूसरे गाँव में पहुँचते थे आज उतनी देर में दिल्ली से अमेरिका पहुँच सकते हैं। एक जमाना था जिसका जिक्र करते हुए कन्फ्यूशियस ने अपनी एक किताब में लिखा है-कि मेरे पूर्वज कहते थे-कि गाँव के पास नहीं बहती थी । नदी के उस पार रात को कुत्ते भौंकते थे-तो हमें आवाज सुनाई पड़ती थी । लेकिन यह पता नहीं था-कि नदी के पार कौन रहता है ? नदी बड़ी थी और नाव ईजाद न हुई थी, नदी के पार कोई रहता है-कोई गाँव है । यह तभी पता चलता था जब सन्नाटे को चीरती कुत्तों के भौंकने की आवाज कान में पड़ती थी वह गाँव उनकी अपनी दुनिया थी । इस गाँव की अपनी दुनिया थी ।
अलासदेर मैकईन्तिरे की पुस्तक “ ए हिस्टोरियन अप्रोच टू सोसाइटी “ में सँजोये भावों के साथ विचार करें तो उस समय की दुनिया में और आज की दुनिया में बुनियादी फर्क है । उस जमाने में जो विचार पैदा हुए भाव उमड़े-उन पर आज भी मुग्ध होना पड़ता है । कन्फ्यूशियस की बातें पढ़ें, या लाओत्से के गोल्डनरूप ईसा के उपदेश सुने-या वैदिक ऋचाओं की मधुर गूँज-हर कहीं प्रेम का ज्वार उफनता है । अतिथि देवो भव ! यत्र नार्यस्तु पूज्यंते.......। आदि वाक्य पढ़कर-यदि कोई आज की परिस्थितियों को निहारें तो उसे विश्वास ही नहीं होगा कि कभी ऐसे भावों के आलिंगन में जिन्दगी बँधी थी । घर परिवार प्रदेश-राष्ट्र-विश्व तक हर कहीं हर कोने में दरारें , टूटन बिखराव फैला पड़ा है । सभी की दौड़ अलगाव की ओर है । प्रत्येक स्वयं में आतंक से सहमा है औरों को आतंकित कर रहा है । शरीर की सुन्दरता तभी तक है जब तक उसका हर अवयव एक दूसरे से जुड़ा रहे। यदि विभिन्न अंग अवयव एक दूसरे से दूर छितरा जायँ तो परिणाम में बदसूरती और सड़न ही मिलती है । भौगोलिक समीपता के बावजूद भावनात्मक स्तर पर विश्व की यही दशा है । दार्शनिकों से लेकर राजनीतिज्ञों तक सभी इसी उधेड़-बुन में हैं कि बिखरती जा रही मनुष्य जाति को कैसे समेट-बटोर कर एक सूत्र में बाँधा जाय
सी . ए ब्रौसके ग्रन्थ “ए हिस्ट्री आँव हिस्टोरिकल राइटिंग“ के पृष्ठों पर गौर करें तो पाएँगे एकता की ये कोशिशें नितान्त आधुनिक नहीं है । यूनान और रोम के विजय अभियान रचने वालों ने भी अपना यही मकसद बनाया था । सिकन्दर का मन विश्व राष्ट्र की सुखद कल्पनाओं में रंगा था । अँग्रेजों ने यही उद्देश्य प्रचारित कर विश्व की महत्वपूर्ण जगहों पर अपने उपनिवेश स्थापित किए । “विश्व को एक करूँगा” हिटलर ने इसी संकल्प की आड़ में अपना ताना-बाना बुना था । बीसवीं सदी के दूसरे दशक में-मार्क्स के साम्यवाद का नारा देकर-स्टालिन ने रूस में छोटे पैमाने पर-यही करतब दिखाने की कोशिशें की। लेकिन ये ढेरों प्रयास पुरुषार्थ अपनी चरम परिणति में एकता से उतना ही दूर रहे जैसे आकाश से धरती ।
इन दिनों हर किसी की आँख-विश्व को बिखराव के तूफानों से घिरा देख रही है । इस आँधी में एकता के तिनके समेटे जा सकेंगे किसी को कल्पना तक नहीं उठती । भारत को ही लें-पंजाब-कश्मीर आसाम-आँधी के इन्हीं हिचकोले में झूल रहे हैं । दुनिया का सबसे बड़ा भू-भाग अपने में समेटे रूस-देखते-देखते टुकड़े-टुकड़े होकर छितर गया । अमेरिका में अश्वेतों द्वारा अपने अधिकार की माँग जोर पकड़ती जा रही है । चीन इन चिनगायों से अछूता नहीं है । लंका में उठ रहें बिखराव के शोलों की चमक विश्व के हर व्यक्ति की आँखों को चौंधिया देने के लिए काफी है । अलगाव में तत्पर, आतंक फैलाने में जुटे संगठनों की फेहरिश्त बनाई जाय तो एक पुस्तक के पृष्ठो का कलेवर छोटा पड़ जायगा ।
हलचलों की यह तेजी इस कदर है कि क्रान्तियाँ आम बात हो गई हैं । जहाँ पहले इनके लिए सौ-सौ सालों तक इंतजार करना पड़ता था, वहीं अब सौ दिनों में इनके उदय और उफान देखे जा सकते हैं । और आज क्रान्ति की विस्तृत परिधि जिस एक छोटे से संकरे गलियारे में फँस कर रह गई है , उसका नाम है-प्रशासनिक फेर-बदल सरकारों की उठा-पटक लोग जीवन ने इसे रोज−मर्रा के घटनाक्रम का एक अंग मान लिया है । उसकी नजर में व्यवस्था कोई भी हो इसका एक ही दायित्व रह गया है, नित नए कानून बनाना-जन जीवन को इनके लौहपाश में फँसने-फँसाने और सिसकने के लिए मजबूर करना ।
तब क्रान्ति का स्वरूप और एकता की उलझन ? इसे-सुलझाने के लिए ‘ए फ्यूचर नामक ग्रन्थ में सँजोये मनीषी उलरिच के शब्दों पर विचार करे-तो पता चलता है कि इतिहास के इन विगत घटनाक्रमों का कहीं अधिक बारीकी से सर्वेक्षण करने की जरूरत है । उनके अनुसार-सम्भव है विगत घटनाक्रमों के कर्णधारों में से किसी का उद्देश्य ठीक रहा हो पर प्रयासों की दिशा-निश्चित रूप से सही नहीं रही । एकता के नाम पर ज्यादातर कोशिशें आधिपत्य स्थापना की रहीं हैं । इनके पीछे प्रायः सभी ने विश्व राष्ट्र के सम्राट होने के सपने सँजोये थे । यही कारण है छः सौ करोड़ मनुष्य की जमात में ऐसों की संख्या-दो-चार मुट्ठी से अधिक नहीं होगी जिनका एकता की ओर झुकाव हो ।
क्योंकि सभी को अपने पूर्व अनुभवों से एकता का एक ही अर्थ मालूम हो सका है- स्वतन्त्रता का अपहरण मौलिकता का छिन जाना । प्रीतम ए . सोरोकिन के शब्दों में कहें तो जन-जीवन ने इन दोनों तत्वों को ऐसे दो विरोधी ध्रुव मान लिया है-जो कभी एक नहीं हो सकते । अब तक हुए प्रयासों के संदर्भ में यह तथ्य औचित्य पूर्ण है, क्योंकि आधिपत्य की शैली को न तो मानवीय व्यक्तित्व की बारीकियों का पता है, और न मौलिकता के रक्षण की जानकारी है ।
धरती ने अभी तक बहुतायत में सिर्फ राजनीतिक क्रान्तियाँ और तत्सम्बन्धी एकरूपता के प्रयासों का अनुभव किया है । इस सम्बन्ध में रोम साम्राज्य एक ऐतिहासिक उदाहरण है जो राष्ट्र की सीमाओं को लाँघ चुका था । इसके गुणों में जहाँ इसकी व्यापक सुरक्षा सुप्रबन्ध को सराहनीय कहा जा सकता है । वहीं व्यक्ति नगर और प्रदेश को अपने स्वाधीन जीवन का बलिदान करके मशीन के कल पुर्जे बनकर रहना पड़ा , इसके परिणाम में जीवन ने अपनी श्री समृद्धि स्वतन्त्रता तथा सहज सृजन की विजयशील प्रेरणा गँवा दी। अंत में व्यक्ति की तुच्छता और दुर्बलता के कारण इसे नष्ट होने को विवश होना पड़ा। रूस में हुए सभ्यता के प्रयासों को इसी का एक बदला हुआ रूप कहा जा सकता है। मार्क्स की नजर में मनुष्य एक आर्थिक प्राणी भर था। कल्पना स्वतन्त्र इच्छा मौलिक क्षमताओं का विकास जैसी चेष्टाएँ भी इनसान के अन्दर समायी है शायद इसे सोचने की उसे फुरसत नहीं मिली और यही कारण है कि समाजवाद के नाम पर ऐसा शिकंजा तैयार हुआ जिसे तोड़ फेंकने के लिए वहाँ का जन जीवन शुरू से कोशिश में जुटा रहा। और जब तक तोड़ नहीं फेंका चैन नहीं लिया।
लेकिन राजनीतिक क्रान्तियों की अपनी सीमाएँ हैं । मानवीय भावनाओं को एक-दूसरे में घोल देना, क्षत-विक्षत हो रहे समाज को पुनः सौंदर्य मण्डित करने का प्रयास जिस तकनीक से सम्भव है उसका नाम है सोऽहम् क्रान्ति । “ए हिस्टोरियन अप्रोच टू रिलीजन” के रचनाकार अर्नाल्ड टायनबी के शब्दों में कहें तो यहीं एकता को उसका वास्तविक अर्थ होता है । राजनीतिक एकता तो एकता के नाम एकरूपता के स्थापना की चेष्टा है ।
जबकि देव संस्कृति के तत्व दर्शन में इसे पारस्परिक सम्बन्धों की घनिष्ठतम अवस्था कहाँ है । ऋषि चिन्तन के व्याख्याता सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने अपने चिन्तन कोश ‘रिकवरी आँव फेथ’ में इसका उदात्त स्वरूप प्रस्तुत किया है । उनके अनुसार सम्बन्ध वहीं जन्म लेते हैं जहाँ संवेदना का निर्भर फूट रहा हो । विश्व में संवेदनाओं के ये रस स्रोत भिन्न रूपों में देखे जा सकते हैं । उदाहरण के लिए जातीय संवेदना-पारिवारिक संवेदना और राष्ट्रीय संवेदना । अपने वास्तविक स्वरूप में पवित्र होते हुए भी सीमा बन्धन की अनुभूति के लिए विवश हैं । जातीय संवेदना का उत्कर्ष अपने जाति भाइयों से बाहर नहीं फैल सकता । उसे हिन्दू मुसलमान, सिख-ईसाई के दायरे में बँधना ही पड़ेगा । इस तरह के सम्बन्धों की मधुरता भी यही तक सीमित है । यही हाल परिवार की धारणा से उपजी संवेदनशीलता का है-इसका फैलाव मुट्ठी भर कुटुम्बीजनों के बाहर नहीं निकल सकता । राष्ट्र का दायरा व्यापक और विस्तृत जरूर है पर उसमें विषयानुभूति नहीं है ।
विषयानुभूति के लिए-सोऽहम् संवेदना का उफान चाहिए । इसी का एक नाम आध्यात्मिक संवेदना भी है । जिसका बोध श्वेताश्वेतर-उपनिषद् के शब्दों में एकोदेवा सर्वभूतेषु गुढः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा (वे एक ही परमदेव परमेश्वर समस्त प्राणियों के हृदय रूप गुहा में छुपे हुए हैं । वे सर्वव्यापी और समस्त प्राणियों के अन्तर्वामी परमात्मा हैं । (श्वेता 6/11) संवेदनाओं की यह व्यापक अनुभूति जब सम्बन्ध बनकर प्रकट होती है-तब विश्व मानवता के प्रति प्रेम का उफान अस्वाभाविक नहीं रह जाता । “इन वुड्स आफ गॉड नियलाइजेशन” के खण्ड दो में स्वामी रामतीर्थ की अनुभूति का स्पर्श करें तो पाते हैं कि सम्बन्धों का जन्म ही वहीं होता है जहाँ भावनाएँ स्पन्दित होती है । निष्ठुरता में कभी किसी तरह के रिश्ते नहीं उपजते । उनके शब्दों में इसकी व्याख्या करें तो यह सामंजस्य की वह परम स्थिति है जहाँ से प्रेम झरने लगे ।
यह बोध जितना व्यापक और सघन होगा । एकत्व उतना ही विस्तृत होता जाएगा । लेकिन यह अपने अर्थ और तत्व में राजनीतिक और भौगोलिक भूमिकाओं से नितान्त दूर होते हुए भी मानव हृदय के सबसे नजदीक है । इस तरह के प्रयास और परिणति में मानव की स्वतन्त्रता का हरण न तो किया जाता है और न होता है । हाँ वह स्वयं अपनी अन्तर्भावनाओं की कसक और हुलस के कारण-आकुल-व्याकुल होकर अपने स्वार्थों का उत्सर्ग का डालता हैं ।
‘स्वतन्त्रता’ तो मानव की सबसे अमूल्य निधि है । किसी भी कीमत पर इसके त्याग के लिए उसे विवश नहीं किया जाना चाहिए । विश्व राष्ट्र की स्थापना और मानवीय में से किसी एक को चुनना पड़े तो निश्चित रूप से मानवीय स्वतंत्रता को चुनना ज्यादा श्रेयस्कर होगा । क्योंकि यह मानव व्यक्तित्व में समाई विशिष्टताओं के विकास के लिए सर्वोत्कृष्ट और अनिवार्य अवस्था है । पिछले दिनों मानव जाति को कुण्ठाओं खण्डित व्यक्तित्व और अर्ध विक्षिप्तता की जो गहरी पीड़ा भोगनी पड़ी है उसका एक मात्र कारण उसका स्वातंत्र्य हनन रहा है ।
विश्व के जीवन में सोऽहम् क्रान्ति ही एक मात्र वह प्रक्रिया है जो अपनी चरम परिणति में उसे एकता और स्वतन्त्रता दोनों अलभ्य उपलब्धियाँ एक साथ सौंपने में समर्थ है । संस्कृति के चार अध्याय ग्रन्थ के लेखक रामधारी सिंह दिनकर के शब्दों को उद्धृत करें “विश्व की भावी एकता की भूमिका भारत की सामाजिक संस्कृति में है । जैसे भारत ने किसी भी धर्म का दलन किए बिना अपने यहाँ धार्मिक एकता स्थापित की । जैसे इसने किसी भी जाति की विशेषता को नष्ट किए बगैर सभी जातियों को एक सोऽहम् सूत्र में आबद्ध किया । कुछ उसी प्रकार हम संसार के सभी जातियों एवं सभी विचारों के बीच एकता स्थापित कर सकते है ।”
सोऽहम् क्रान्ति के ये प्रयत्न मनुष्य के जीवन सम्बन्धी विचार कोशिशें कर भावनाओं की ऐसी प्रवृत्ति के रूप में उभरेंगे जो सामूहिक मन को वशीभूत कर लेगा, इसका परिणाम होगा मानव जीवन के समस्त क्षेत्र में गम्भीर और अद्भुत परिवर्तन । भावलोक में इसका दिव्य दर्शन कर जर्मन दार्शनिक शोपेनलक ने भविष्यवाणी की थी । जिसका जिक्र करते हुए स्वामी विवेकानन्द ने 16 जनवरी 1890 के अपने व्याख्यान में कहा था “वे जर्मन ऋषि कह गए है शीघ्र ही विश्व-विचार जगत में सर्वाधिक शक्तिशाली और दिगंतव्यापी सोऽहम् क्रान्ति का साक्षी होने वाला है । विचारों का यह तूफान-उपनिषदों के देश से उठेगा ।” इस दैवी विधान की चरम परिणति को स्वीकारते हुए श्री अरविन्द का “द् आयडियल आँव ह्यूमन यूनिटी” में कहना है कि यह प्रत्यक्ष है कि मनुष्य जाति की एकता प्रकृति की आन्तरिक योजना का अंग है और यह सिद्ध होकर रहेगी।
यह योजना अपने प्रारम्भ से ही विश्व को एक नया रंग और वातावरण , एक उच्चतर भावना , एक महत्तर उद्देश्य प्रदान करेगी । इस प्रारम्भ का अन्तिम परिणाम होगा विश्व राष्ट्र का नया युग व्यवस्थाओं , प्रणालियों, नीतियों की दृष्टि से अद्भुत होने के साथ व्यक्तित्व संरचना की दृष्टि से भी अभूतपूर्व होगा ।
अपने इन्हीं भावों को काव्य के माध्यम से बँगला कवि नज़रूल ने इस तरह व्यक्त किया है । मा भैः !
मा भैः एतोदिने बुझि जागिलों भारत प्राण, सजीब होइया उठिया छे आज श्मशान गोर स्थान । जेगेछे भारत, उठि वे अमृत , देरी नाई आर, उठियाछे हलाहल । ।
अर्थात् “डरो मत ! डरो मत । बहुत दिनों के बाद भारत में प्राण आया है श्मशान और कब्र स्थान दोनों सजीव हो उठे हैं । भारत जग उठा है । अमृत भी आएगा अब विलम्ब नहीं है । हलाहल तो ऊपर आ ही चुका है ।
सोऽहम् क्रान्ति के स्वर सुदूर पूर्व से पश्चिम के दूरवर्ती राष्ट्रों तक गूँजते अगले दिनों सब देखेंगे । शुरुआत भारत से होगी । सभी धर्म संप्रदाय यहाँ एक साथ रहते आए हैं तो पुनः हमारा बृहत्तर भारत एक क्यों नहीं हो सकता ? सारे विश्व का मार्ग दर्शन क्यों नहीं कर सकता ? यही नियति है, यही भवितव्यता है ।
“भगवान तीनों पर नाराज होते हैं-अन्याय करने वाले, अन्याय सहने वाले तथा उस पर भी, जो सब समझते हुए भी दूर से देखता रहता है, प्रतिरोध का प्रयास नहीं करता। बिगड़ते को बिगड़ने देना-यह मूकदर्शकों का गैर जिम्मेदारों का काम है। भगवान ऐसा नहीं है । लोग भले ही बिगाड़ करते हों पर भगवान अन्ततः सबको सँभाल लेते हैं । बूढ़ा होने पर शरीर मर जाता है । घर वाले कुटुम्बी उसे जला देते हैं पर भगवान उसे नया जन्म देता है और फिर हँसने-खेलने की स्थिति में पहुँचा देता है । पिछले दिनों बिगाड़ बहुत हुआ । प्रताड़ना का समय बीत चुका । जो शेष रहा है, वह सन् 90 से लेकर 2000 के बीच दस वर्षों में बीत जाएगा । उन दस वर्षों में महाकाल की दुहरी भूमिका संपन्न होगी । प्रसव जैसी स्थित होगी । प्रसवकाल में एक ओर जहाँ प्रसूता को असह्य कष्ट सहना पड़ता है, वहाँ दूसरी ओर संतान प्राप्ति की सुन्दर संभावना भी मन ही मन पुलकन उत्पन्न करती रहती है ।”(पृष्ठ 11)
प्रस्तुत पंक्तियाँ परम पूज्य गुरुदेव के अन्तिम दो वर्षों में रचित क्रान्तिधर्मी साहित्य, “नवसृजन निमित्त महाकाल की तैयारी” से ली गयी हैं । संस्कृति पुरुष का लिखा एक-एक वाक्य संभावित महाक्रान्ति का भविष्य कथन करता दिखाई पड़ता है । द्रष्ट महामानव भविष्य के गर्भ में झाँकने की क्षमता रखते हैं व उस नाते वह सब , जो उनकी सूक्ष्म जगत में भूमिका संपन्न करने वाली है, पहले ही से देख लेते हैं, संबंधित देवमानवों को इन परिस्थितियों के संबंध में सचेत कर जाते हैं ।
महर्षि अरविंद ने इसी तथ्य का विज्ञापन करते हुए “ह्यूमन साइकिल” में लिखा है- “संसार का वर्तमान युग है महान रूपान्तरणों की अवस्था का युग । मानवता के मन में एक नहीं, बहुत से मूलभूत भाव क्रियाशील हैं और उसके जीवन में उग्र चपेट और चेष्टा के साथ परिवर्तन ले आने को छटपटा रहे हैं । यद्यपि इस आंदोलन का प्रगतिशील केन्द्र अभी यूरोप है, फिर भी विचारों के समुद्र मंथन में पुराने भावों और संस्थाओं के इस तोड़-मरोड़ क्रम में पूरब भी अधिकाधिक खिंचता चला आ रहा है ।”.......-”सबसे अधिक मानवजाति का भविष्य उस उत्तर पर निर्भर करता है जो पूर्व रहस्यरमणी (स्फिंक्स) की आधुनिक पहेली को देगा, विशेषतः भारत जो एशियाई भाव का, इसके गंभीर आध्यात्मिक रहस्यों का पूज्य संरक्षक है ।” (पृष्ठ 369) वस्तुतः सन्धिकाल की महत्ता, विशिष्टता का हर महामानव ने सबके समक्ष स्पष्ट कर इक्कीसवीं सदी में सतयुगी समाज के अवतरण की, वह भी भारतवर्ष-देव संस्कृति के उद्गम स्थल से पूर्वार्त्य अध्यात्म के माध्यम से उभर कर आने की खुली भविष्यवाणी की हैं ।
परम पूज्य गुरुदेव ने ऊपर उद्धृत पुस्तक “नवसृजन के निमित्त महाकाल की तैयारी “ में लिखा है “युगसन्धि के यह दस वर्ष दुहरी भूमिकाओं से भरे हुए हैं । पिछले दो हजार वर्षों में जो अनीति चलती रही है, उसकी प्रताड़ना स्वरूप अनेकों कठिनाईयाँ भी इन्हीं दिनों व्यक्ति के जीवन में समाज की व्यवस्था में तथा प्रकृति के अवांछनीय माहौल में दृष्टिगोचर होंगी । .....साथ ही यह भी स्मरण रखने योग्य है कि माता एक आँख जहाँ सुधार के लिए टेढ़ी रखती है, वहाँ उसकी दूसरी आँख में दुलार भी भरा होता है । उसकी प्रताड़ना में भी यही हित कामना रहती है कि सुधरा हुआ बालक अगले दिनों गलतियाँ न करे और सीधे रास्ते को अपनाता हुआ सुख-सुविधा भरा जीवन जिये । वर्तमान युग सन्धिकाल इसी दुहरी प्रक्रिया का सम्मिश्रण है ।” (पृष्ठ 12)
महाप्रयाण से छह-आठ माह पूर्व की बात है । शिशिर ऋतु में पूज्य गुरुदेव अपने कक्ष से बाहर धूप में बैठते थे । लेखशोध से संबंधित कार्यकर्ताओं को वहीं बुलाकर चर्चा करते थे । वहीं निर्देश देते-देते एकाएक एक दिन वे गंभीर हो उठे बोले लड़कों! कहीं तुम्हें अविश्वास नहीं होता मेरे कथन पर कि सतयुग वास्तव में आने वाला है । मैंने जो कुछ भी पिछले दिनों लिखा है महाकाल के आदेश से लिखा है । मेरी नब्बे प्रतिशत से अधिक चेतना अब सूक्ष्मजगत में सक्रिय है व ऋषिसत्ताओं के साथ नये युग का सरंजाम जुटा रही है । तुम देखना कि मेरे कहे गए ये वाक्य लिखी हुई एक-एक पंक्ति बम का धमाका करेगी व देखते-देखते विचारक्रान्ति का स्वरूप तुम्हें दस-पन्द्रह वर्ष में ही दिखाई देने लगेगा । विश्व का सारा ढाँचा बदल जाएगा । मेरी बात पर विश्वास रखना कि भारतीय संस्कृति का ही अलख अब चारों दिशाओं में गूँजने जा रहा है ।” जो भी कुछ पूज्यवर ने अपनी मंद वाणी में स्फुट वचन कहे थे, उन्हें हमने डायरी से निकाल कर ज्यों का त्यों पाठकों के समझ रख दिया है , यह बताने के लिए कि संस्कृति पुरुष प्रयोजन विशेषों के लिए हम सबके बीच आया एवं हमें सौभाग्यशाली भी बना गया ।
वास्तव में इसकी भूमिका आज से 66 वर्ष पूर्व ही बन गयी थी जब पंद्रह वर्षीय किशोर श्रीराम के पास उनकी गुरु सत्ता आकर उन्हें उनके वास्तविक स्वरूप का बोध करा गयी थी । पूज्यवर अपनी आत्मकथा “हमारी वसीयत और विरासत” में लिखते हैं “प्रकाश के मध्य से एक योगी का सूक्ष्म शरीर उभरा- उस छवि ने बोलना आरंभ किया “हम तुम्हारे साथ कई जन्मों जुड़े हैं, मार्ग दर्शन करते रहे हैं......यह विषम समय है । इसमें मनुष्य का अहित होने की अधिक संभावनाएँ हैं । उन्हीं का समाधान करने के निमित्त तुम्हें माध्यम बनाना है.... यह तुम्हारा दिव्य जन्म है । तुम्हारे इस जन्म में हम सहायक रहेंगे और इस शरीर से वह कराएँगे, जो समय की दृष्टि से आवश्यक है । प्रथम मिलन के दिन समर्पण संपन्न हुआ । वसंतपर्व का यह दिन गुरु अनुशासन का अवधारण ही हमारे लिए नया जन्म बन गया ।” (पृष्ठ 14-22) आगे चलकर उनकी गुरुसत्ता उन्हें हिमालय बुलाती रही व समय-समय पर मार्गदर्शन देती रही । अखण्ड दीपक का प्रज्ज्वलन, 24 वर्षों तक 24 लक्ष के गायत्री के महापुरश्चरण, अखण्ड-ज्योति पत्रिका के माध्यम से विचार क्रान्ति का, मानव में देवत्व, धरती पर स्वर्ग की प्रक्रिया का बीजारोपण, गायत्री महाविद्या का जन-जन तक विस्तार , यज्ञीय परम्परा का दिक्-दिगन्त में प्रचलन, आर्षसाहित्य का पुनर्जीवन, जीवन जीने की कला संबंधी साहित्य लेखन, धर्मतंत्र से लोकशिक्षण की प्रक्रिया का मार्ग दर्शन, परिव्रज्या परम्परा का पुनर्जीवन, पूर्ण समयदानी लोकसेवियों का उत्पादन हेतु एक टकसाल की स्थापना, सिद्ध तीर्थ-गायत्री तीर्थ का शिलान्यास, विज्ञान व अध्यात्म के समन्वय की शोध हेतु ब्रह्मवर्चस् की शोध प्रक्रिया का शुभारंभ प्रज्ञा संस्थानों के रूप में संस्कार केन्द्रों की चार हजार से अधिक संख्या में भारत भर में स्थापना, विश्वभर में हिन्दू संस्कृति का तत्त्वज्ञान पहुँचाने की प्रक्रिया का शुभारंभ यह सब निर्धारण परोक्ष महाकाल की सत्ता द्वारा किये गए जो समय-समय पर परम पूज्य गुरुदेव को निर्देश रूप में दिये जाते रहे , तदनुसार ही उनके जीवनक्रम का एक-एक मील का पत्थर स्थापित होता चला गया । सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण निर्धारण जो धरती के स्वर्ग-ऋषियों की कार्यस्थली दुर्गम हिमालय में गुरु-शिष्य द्वारा किया गया , वह था ऋषि परम्परा का पुनरुद्धार-पुनर्जीवन ।
इसका मार्मिक विवेचन पूज्यवर ने अपनी स्मृति पटल से ऋषियों द्वारा दिये गए निर्देश को पाठकों के समझ “हमारी वसीयत और विरासत” में रखते हुए किया हैं । “जब अपना सूक्ष्म शरीर सही हो गया तो उन ऋषियों का सतयुग वाला शरीर भी यथावत् दीखने लगा । ऋषियों के शरीर की जैसी संसारी लोग कल्पना किया करते हैं , वे लगभग वैसे ही थे ।... बात काम की चली । हर एक ने परावाणी में कहा कि हम स्थूल शरीर से जो गतिविधियाँ चलाते थे, वे अब पूरी तरह समाप्त हो गयीं । फूटे हुए खण्डहरों के अवशेष भर शेष हैं ।..... सभी की आँखें डबडबाई सी दीखी । लगा कि सभी व्यथित हैं ..... उन सब का भारी मन देखकर अपना चित्त भी द्रवित हो उठा , स्तब्ध अपने ऊपर भी छा गई व आँखें प्रवाहित होने लगी “। अपनी परोक्षसत्ता का आदेश मिलने पर परम पूज्य गुरुदेव ने ऋषि सत्ताओं को आश्वासन दिया कि ऋषि परम्परा जो सतयुग का आधार थी, का बीजारोपण दे सप्तसरोवर हरिद्वार में गंगातट तर रह कर करेंगे ,
पूज्यवर लिखते हैं कि ‘निराशा गई, आशा बँधी व आगे का कार्यक्रम बना कि जो हम सब करते रहे है, उसका बीज एक खेत में बोया जाय और पौधशाला में एक पौध तैयार की जाय । उसके पौधे सर्वत्र लगेंगे और उद्यान लहलहाने लगेगा । यह शान्तिकुञ्ज बनाने की योजना थी ।”
शान्तिकुञ्ज व यहाँ से आरंभ हुआ विश्वव्यापी युगान्तरीय चेतना का आन्दोलन, उसी निर्धारण का एक व्यापक रूप है जिसका समापन अगले दिनों विश्वमानवता के लिए उज्ज्वल भविष्य की वापसी के रूप में होना है । पूज्य गुरुदेव अक्सर अंतरंग चर्चा में कहा करते थे “ऋषि चाणक्य देव संस्कृति के दिक्-दिगन्त तक विस्तार का काम करने आए थे, यह काम पूरा नहीं हो पाया, उसी शृंखला में बाद में विवेकानन्द व अरविंद आए । हम उसी काम को अब पूरा रूप देने के लिए महाकाल द्वारा भेजे गए है ।” इसी बात को महर्षि अरविन्द ने “ह्यूमन साइकिल” में इस तरह लिखा है-दक्षिणेश्वर में जो काम शुरू हुआ था , वह पूरा होने में अभी कोसों दूर है । वह समझा तक नहीं गया है । विवेकानन्द ने जो कुछ प्राप्त किया और जिसे अभिवर्धित करने का प्रयत्न किया, वह अभी तक मूर्त नहीं हुआ है .... अब अधिक उन्मुक्त ईश्वरीय प्रकाश की तैयारी हो रही है, अधिक ठोस शक्ति प्रकट होने को है, परन्तु यह सब कहाँ होगा, कब होगा यह कोई नहीं जानता ।” वस्तुतः दक्षिणेश्वर की माटी से जो तूफान एक वेग से उठा था, उसे सही समय पर सही प्रक्रिया से सही व्यक्तियों द्वारा नियंत्रित कर उससे नयी सदी के लिए ऊर्जा की उत्पत्ति होनी थी । संभवतः वह समय, वह वेला अब आ गयी है । स्वामी विवेकानन्द के शब्दों में-
“भारत का पुनरुत्थान होगा, जड़ की शक्ति से नहीं, चेतना की शक्ति से । विनाश की विजयध्वजा लेकर नहीं, बल्कि शान्ति और प्रकाश के ध्वज फैलाकर-संन्यासियों के गेरुआ वस्त्र का सहारा लेकर अर्थशक्ति से नहीं, बल्कि भिक्षापात्र की शक्ति से सम्पादित होगा..... मैं मानों अपनी दिव्य दृष्टि से देख रहा हूँ । हमारी मातृभक्ति जाग उठी है-नव जीवन लाभ करके पहले से भी अधिक गौरवमय मूर्त्तिधारण कर अपने सिंहासन पर आरूढ़ । इस बार का केन्द्र भारतवर्ष ही है । “ इसके लिए वे “भारत का भविष्य “ नामक अपने उद्बोधन में कहते हैं- “महाभारत के अनुसार सत्ययुग के आरंभ में एक ही जाति थी-ब्राह्मण और फिर पेशे के भेद से वह भिन्न-भिन्न जातियों में बँटती चली गयी । बस यह एक मात्र व्याख्या सच और युक्तिपूर्ण है । भविष्य में जो सत्ययुग आ रहा है, उसमें ब्राह्मणेत्तर सभी जातियाँ फिर ब्राह्मण रूप में परिणत होंगी । “ ब्राह्मण से यहाँ अर्थ है ब्रह्मयज्ञ , ब्रह्मनिष्ठ , आदर्श चरित्र वाले पुरुष । विवेकानन्द का एक एक शब्द पूज्यवर के लिखे वाक्यों में गुँजित होता देखा जा सकता है । आखिर थे तो ये सभी महाकाल की सत्ता के प्रतिनिधि ही । सभी यह कह गए हैं कि परिवर्तन की वेला आ पहुँची । महाकाल इस प्रक्रिया को परोक्ष जगत से अंजाम दे रहा है । सतयुग की वापसी की ही पृष्ठ भूमि इन दिनों बन रही है । मानवी प्रयास इसमें अनिवार्य अवश्य हैं, पर पर्याप्त नहीं । देवी शक्ति की ही सबसे बड़ी भूमिका होगी ।
महायोगी अरविन्द की भविष्यवाणियों के आधार पर अरविन्द आश्रम पाण्डिचेरी से एकवार्त्ता प्रकाशित हुई है-इनटू द् ट्वेण्टीफर्स्ट सेंचुरी (इक्कीसवीं सदी की ओर) । इसमें आज की परिस्थितियों का आकलन भी है व आने वाले समय के अप्रत्याशित परिवर्तनों का दिग्दर्शन भी । इस वार्ता में जो 14 अगस्त 1991 को आश्रम के प्राँगण में संपन्न हुई, यह बताया गया कि योगीराज अरविन्द के अनुसार कलियुग का समापन हो चुका है व सतयुग की स्थापना का समय आ गया है । दो युगों के बीच 180 वर्ष की अवधि ट्रांजिशनल पीरियड ( संक्रान्ति काल या दो युगों की मिलन वेला ) की सामान्यतया होती है । महर्षि ने अपनी काल गणना के अनुसार इस अवधि के आरंभ होने का समय 1840 बताया है । यह समय वही है जब राम कृष्ण परमहंस जन्म ले चुके थे (1836 में) व हमारा राष्ट्र अलसाई स्थिति से उठने की कोशिश कर रहा था । योगीराज कहते हैं कि तब से परिवर्तन प्रक्रिया इतनी तीव्रगति से बढ़ी है, उच्चस्तरीय योगी स्तर की आत्माएँ इतनी अधिक जन्मी हैं कि वह समय सन् 2020 तक सुनिश्चित रूप से आने जा रहा है जब सारे विश्व का नेतृत्व भारत के हाथों में होगा तथा भारतीय संस्कृति विश्व संस्कृति बन चुकी होगी । इसे वे भारत की आध्यात्मिक भवितव्यता (स्प्रिचुअल डेस्टीनी) नाम देते हैं । उनका कहना है कि “परमात्मसत्ता अपने लिए हमेशा एक ऐसा राष्ट्र-संस्कृति चुनकर रखती है, जहाँ उच्चतम देवी ज्ञान कुछ व्यक्तियों-ग्रन्थों के माध्यम से सुरक्षित बना रहता है । वहीं से फिर नये युग का आविर्भाव होता रहता है । वहीं से फिर नये युग का आविर्भाव होता है । इस चतुर्युग में कम से कम यह तो सुनिश्चित है कि वह देश भारतवर्ष है व वह ज्ञान हिन्दू आध्यात्म भारतीय संस्कृति के रूप में है । “ कलियुग के प्रभाव के समापन का समय श्री अरविन्द 1908 बताते हैं व कहते हैं कि “तब से विश्व की नियति महाकाल के हाथ में है-विश्वयुद्धों की शृंखला, शीतयुद्ध, बड़े स्तर की औद्योगिक आर्थिक राजनीतिक क्रांतियाँ उसी प्रक्रिया का एक अंग हैं ।
अब से आगे के बारे में महर्षि का मत है कि 1993 के मध्य तक एक आर्थिक क्रान्ति भारत से आरंभ होगी व यह विश्वव्यापी बन जाएगी । इसके पीछे-पीछे सोऽहम् व शैक्षणिक स्तर की क्रान्तियाँ चलेंगी , जिनका नेतृत्व भारत करेगा । ग्लोबल स्तर पर आर्थिक महाशक्ति के रूप में भारतवर्ष 1995 तक तेजी से उभर कर आयेगा तथा सन् 2000 में भारत पुनः 1947 से पूर्व के बृहत्तर भारतवर्ष के रूप में विश्व के समक्ष होगा । कृत्रिम विभाजन जो भारत व पाकिस्तान बंगलादेश के रूप में हुआ , उसका प्रायश्चित्त पुनः एक विशाल राष्ट्र बनाकर किया जाएगा । यह कार्य सन् 2000 तक पूरा हो चुकेगा । अधिक और अधिक बुद्धिजीवी-प्रतिभाशाली विश्व स्तर की समस्याओं के समाधान के लिए भारत से अपेक्षा रखोगे व ऋषि संस्कृति का यह तत्त्वज्ञान विश्व के प्रत्येक मानव द्वारा स्वीकार किया जाएगा । अधिकाधिक व्यक्ति साधक बनने का प्रयास करेंगे व भारतीय अध्यात्म को जीवन में उतारेंगे । भारत की विशाल जनसंख्या अभी उसके लिए बोझ है, किन्तु यही बोझ एक सम्पदा के (उसेट के ) रूप में बदल जाएगा । अभी किसी मार्ग दर्शन व सुनियोजन के अभाव में उस कारण हम आर्थिक कर्जे में दबे हुए है । क्रमशः यह जनशक्ति विश्व की सबसे बड़ी प्रशिक्षित-कुशल लेबर फोर्स की बैंक के रूप में उभर कर आएगी । फिर भारत की विश्व विजय को कोई भी रोक नहीं पाएगा ।”
पाठकों को यह यूटोपिया लग सकता है, दिवा स्वप्न भी किन्तु यह भवितव्यता है, इसमें किसी को संदेह नहीं होना चाहिए । पश्चिम का भोगवाद जिस अग्नि में-तेजाबी तालाब में जलता कजपता, निष्ठुर स्वार्थपरता की कीचड़ में डूबा विकल, संत्रस्त दृष्टिगोचर हो रहा है, उसे भारतीय अध्यात्म ही भाव संवेदना की गंगोत्री में स्नान कराके मुक्ति दिलाएगा । परम पूज्य गुरुदेव ने “सतयुग की वापसी “ पुस्तक में लिखा है कि “इक्कीसवीं सदी भाव संवेदनाओं के उभरने-उभारने की अवधि है । हमें इस उपेक्षित क्षेत्र को ही हरा-भरा बनाने में निष्ठावान् माली की भूमिका निभानी चाहिए ।” (पृष्ठ 28)
कैसे होगा इतना शीघ्र यह सब ? किसी के भी मन में वर्तमान स्थिति को देखकर असमंजस हो सकता है । क्या इसमें किसी एक व्यक्ति की महत्ता होगी ? कौन यह करेगा ? स्वामी विवेकानन्द इसका उत्तर देते हुए कहते हैं- “उपयुक्त समय पर एक आश्चर्यजनक व्यक्ति आएगा और तब सभी चूहे साहसी बन जाएँगे ।” (विवेकानन्द साहित्य प्रथम खण्ड-पृष्ठ 296) । चूहों के साहसी होने व बिल्ली के गले में घंटी बाँधने की उक्ति द्वारा स्वामी जी बताते हैं कि सामान्य नर समुदाय में से ही असाधारण शक्ति जागेगी व देखते-देखते उनका ब्रह्मवर्चस् उनसे ऐसे काम करा लेगा जिनसे युग परिवर्तन जैसा असंभव नहीं है । आश्चर्यजनक व्यक्ति से स्वामी जी का तात्पर्य है चेतना का अवतार । एक ऐसी सत्ता जो महाकाल का प्रतिनिधि बनकर आएगी व जिसके बताए पद चिन्हों पर सारी मानव जाति चलेगी । हम परम पूज्य गुरुदेव को संस्कृति पुरुष के रूप में चेतना का अवतार मानते हैं, उनके मौलिक चिन्तन ने ही राष्ट्र की सोई कुण्डलिनी जगाई है व वह काम परोक्षसत्ता के निर्देशों द्वारा किया जिसे करने महर्षि चाणक्य, आद्यशंकराचार्य , राम कृष्ण परमहंस, महर्षि रमण, स्वामी विवेकानन्द व योगीराज अरविन्द इस धरती पर आए थे । कोई आश्चर्य नहीं कि उनके ये छोटे-छोटे चूहे-प्रज्ञा परिजन अगले दिनों इतने शक्तिशाली रूप में सामने आएँ कि जन-जन के मनों को मथकर रख दे । स्वयं पूज्यवर अपने क्रान्तिधर्मी साहित्य में लिखते हैं- “नरपशु , नर कीटक, नर पिशाच स्तर के जीवनयापन करने वालों में से ही बड़ी संख्या में ऐसे इन्हीं दिनों निकल पड़ेंगे , जिन्हें नररत्न कहा जा सके । इन्हीं को दूसरा नाम दिव्य प्रतिभा सम्पन्न भी दिया जा सकता है । इनका चिन्तन, चरित्र और व्यवहार ऐसा होगा, जिसका प्रभाव असंख्यों को प्रभावित करेगा । इसका शुभारंभ शान्तिकुञ्ज से हुआ है । “ (पृष्ठ 26 “नवसृजन के निमित्त महाकाल की तैयारी “ से ) । स्पष्ट है कि दुर्गम हिमालय वासी ऋषि सत्ताओं ने अपनी कार्य स्थली अब शान्तिकुञ्ज को बनाया है व यहाँ से उद्भूत चेतना देव संस्कृति का आलोक अब दिक्-दिगन्त तक विस्तार की प्रतीक्षा कर रहा है शपथ समारोह में एक लाख व्यक्तियों द्वारा इसी निमित्त ली जा रही प्रतिज्ञा इस घोषणा को सही कर रही है कि चूहे साहसी होने जा रहे है
योगीराज अरविन्द अपनी कृति “मानवचक्र” में महाकाल का स्वरूप बड़ा स्पष्ट ढंग से समझाते हुए हमारी दृष्टि खोलते हैं, वे लिखते हैं कि “सभी आंदोलनों में मानव समाज के बृहत् कार्य में काल की आत्मा ही, जिसे यूरोप ट्साइटगाइस्ट और भारत ‘महाकाल’ के नाम से पुकारता है , अपने आपको प्रकट करती है । .....महाकाल वह अंतःस्थित आत्मा है, जिसकी शक्ति महाकाली में सर्वत्र संचारित है और विश्व की प्रगति तथा राष्ट्रों की नियति का निर्माण करती है । ..... चाहे मनुष्य सहायता दे, चाहे प्रतिरोध करे, किन्तु ‘काल’ अपना काम करता है, निर्माण करता है, दबाव डालता है , निर्माण को दृढ़ कर देता है ।”
क्या आपको नहीं लगता कि इस सदी के , विशेषकर पिछले एक दशक के सभी अप्रत्याशित परिवर्तन व्यक्ति के द्वारा नहीं, परोक्ष महाकाल की सत्ता द्वारा संपन्न हुए हैं । वैयक्तिक पुरुषार्थ जो नहीं कर सकता था, वह सब उलट पुलट सूक्ष्म स्तर पर समष्टि सत्ता कर रही है । श्री कृष्ण का गीता वाला स्वर जोरों से उद्घोष करते हुए कह रहा है “कालोऽस्मि लोकक्षयकृ त प्रवृद्धो , लोकान् समाहर्तुमिव प्रवृत्तः । (मैं काल हूँ , लोकों को उजाड़ता और नष्ट करता हूँ । मैं अपनी पूरी शक्ति के साथ उठ खड़ा हुआ हूँ) अतएव हम सब उठें व केवल श्रेय अर्जित करने वाले निमित्त मात्र बन जाएँ (तस्मात्त्वमुतिष्ठ यशोलभस्व.... निमित्त मात्रं भव सव्यसाचिन) 33/11 वाँ अध्याय ।
संस्कृति पुरुष ने व्यापक स्तर पर सामूहिक मनों पर प्रयोग करके उनके भीतर का देवत्व जगाने की प्रक्रिया आरंभ कर दी है व सामान्य को असामान्य, क्षुद्र हृदय वाले दुर्बल को महा साहसी तथा रोग , शोक , लोभ-मोह अहंता में डूबे नरकीटकों को भी देवमानव बनाने हेतु वे संकल्पित हैं । देव संस्कृति का तत्त्वज्ञान ही यह सब संपन्न कराएगा । निश्चित ही समय बदल रहा है । रात्रि का पलायन व प्रभात का उदय हो रहा है । सतयुग अब निकट से निकटतम आता जा रहा है ।
अन्तरंग चर्चा के प्रसंगों में कई बार परम पूज्य गुरुदेव कहते थे कि “ यह समय ऐसा है , जब महाकाल मानवी चेतना में आमूलचूल हेरफेर करना चाहता है । ऐसे समय इतिहास में बार-बार नहीं आते । मानवी चेतना-मनःस्थिति व्यक्ति के सोचने का तरीका यदि बद गया तो धरती पर स्वर्ग स्वतः ही आ जाएगा । हमारे जितने भी निर्धारण हैं, इसी एक लक्ष्य पर केन्द्रित रहे हैं । धर्मतंत्र से लोक-शिक्षण से लेकर शान्तिकुञ्ज की स्थापना तथा तीर्थों की प्रसुप्त चेतना जगाने से लेकर भारतभूमि की देवात्मशक्ति की-कुण्डलिनी जागरण की प्रक्रिया इसी उद्देश्य विशेष को लेकर संपन्न की गयी है । “
उपरोक्त बात को थोड़ा गहराई से समझने का प्रयास करे । इस धरती पर मानव जाति के मसीहा , नई मानवता के अग्रदूत कितने ही एक के बाद एक आए , कई आध्यात्मिक व सामाजिक संगठन विकसित हुए-मत बने-पंथ बने किन्तु चूँकि मानवी प्रकृति को मूलतः बदला नहीं गया था , प्रयत्न असफल रहे। देखा गया कि मनुष्य लगभग इसी स्थान पर खड़ा है, जहाँ से वह इतनी आशा और उत्साह के साथ कदम बढ़ाते हुए चला था । वस्तुतः मानवी चेतना को बदले बिना परिस्थितियों को बदलने की इच्छा करना एक कोरे स्वप्न के समान है । कोई भी मानवजाति या विराट संगठन तब तक मूलतः बदला नहीं जा सकता जब तक कि मानव चेतना में स्वतः परिवर्तन न आए अथवा कोई बाहरी अपौरुषेय शक्ति यह बदलाव क्रिया रूप में न परिणत करे । महामानवों का आगमन इसीलिए होता है । वे व्यक्ति की मनःस्थिति को स्पर्श कर उसकी भाव संवेदना के प्रसुप्त बीजांकुरों को अंकुरित कर आत्म जाग्रति व तदुपरान्त स्रष्टा के क्रिया व्यापार में उसकी संलग्नता, समर्पण तथा तादात्म्य भाव बढ़ाते हैं । लगभग “माइक्रो न्यूरो सर्जरी” स्तर की यह चीरफाड़ प्रक्रिया मानव की चेतना के धरातल पर संपन्न होती है तथा ऐसी जाग्रत चेतना अपने आस पास के परिवेश से लेकर प्रक्रिया हलचलों को प्रभावित करती हुई सामूहिक चेतना को जगाती देखी जाती है । क्रमशः यही जाग्रत समष्टि चेतना उस आँधी का रूप ले लेती है जिसे अवतार कहा जाता है व देखते-देखते धरा का रूपान्तरण होता देखा जाता है ।
योगीराज श्री अरविन्द ने रूपकों का प्रयोग करते हुए परमात्म-चेतना के प्रतीक के रूप में विष्णु को पति तथा पार्थिव चेतना के प्रतीक के रूप में पृथ्वी को पत्नी बताते हुए इस धरती की संतान मनुष्य को भौमासुर कहा है तथा उसे पिशाच संबोधित किया है । जब-जब भी पार्थिव चेतना का परमात्मा चेतना से मिलन होता है तब युग बदलता है, भौमासुर की मृत्यु होती है तथा सतयुगी ऋषिगण जन्म लेने लगते हैं । श्री अरविन्द के अनुसार भौमासुर अर्थात् पशु प्रवृत्तियों के पलायन व देव संतति अर्थात् मानव में देवत्व के अतिचेतन के अवतरण का ठीक यही समय है । परम पूज्य गुरुदेव ने संस्कृति के प्रतीकों का तथा तीर्थ चेतना का पुनर्जागरण कर इस अतिचेतन के उतरने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया । श्री अरविन्द से आगे हटकर पूज्यवर कहते हैं कि “मेरा अतिमानस मेरा सुपरमैन किसी नयी मनुष्य पांति में नहीं, इन्हीं छोटे-छोटे साधारण से दीखने वाले प्रज्ञापरिजनों में आ उतरेगा , इनको आदर्शवादी सत्प्रवृत्तियों को जीवन में उतारकर श्रेष्ठता के पथ पर बढ़ते शीघ्र ही देखा जा सकेगा और नवयुग इन्हीं के द्वारा आकर रहेगा । मानव में देवत्व जितना सही है, उतना ही धरती पर स्वर्ग का अवतरण भी ।”
कितना आशावादी व आस्तिकतावादी चिंतन है यह जो हमें हमारी चेतना को गढ़ने वाला यह महापुरुष दे गया है । उनके जीवन के सभी पक्ष अद्भुत हैं अलौकिकताओं से भरे पूरे हैं किन्तु कुछ घटनाक्रमों के द्वारा हमें पता चलता है कि किस तरह से उनका जीवन मात्र एक लक्ष्य के लिए ही नियोजित हुआ , वह था मानवी चेतना का उत्थान व उसके लिए देव संस्कृति को माध्यम बनाकर उसके विभिन्न उपादानों द्वारा उनने चेतना को उसी तरह गढ़ा जिस तरह मूर्तिकार एक शिला को तराशकर उसे अभिनन्दनीय मूर्ति का रूप दे देता है।
वर्तमान मानव की दुर्दशा का कारण पूज्यवर ने आस्था संकट बताया । उनका मत था कि संस्कारच्यूत हो जाने के कारण ही आज की सारी समस्याएँ पनपी हैं । बढ़ते हुए मनोरोगों से लेकर सामूहिक विपत्तियों का एक ही कारण है कि व्यक्ति देव संस्कृति के निर्धारणों के प्रति अपनी आस्था खो बैठा है । यदि आस्था संकट का उपचार करना है, तो न के वल मानवी मन परिपूर्ण शिक्षण करना होगा , उसके अचेतन को गढ़ना होगा अपितु संचित कुसंस्कारों की धुलाई कर बिल्कुल नये संस्कार रचने होंगे । मनुष्य की आस्था वर्णाश्रम धर्म से लेकर षोडश संस्कारों पर तथा संस्कृति चेतना के ज्योति स्तम्भ कहे जाने वाले तीर्थों से लेकर आश्रम-देवालय-आरण्यक इन विद्या विस्तार के तंत्रों पर बिठानी होगी साथ ही उसके शिक्षण का एक व्यापक तंत्र चलाना होगा । धर्मतंत्र से लोक-शिक्षण हेतु एक व्यापक सुनियोजित तंत्र से लेकर चौबीस सौ गायत्री शक्ति पीठों के निर्माण तक तथा संस्कारों से जुड़े यज्ञों के संचालन से लेकर उनकी भारत भर की प्रव्रज्या तक सही सब घटक काम करते दिखाई पड़ते हैं । संस्कृति पुरुष के इस स्वरूप को समझने के बाद देव संस्कृति के उद्धार की शपथ लेने वालों को उज्ज्वल भविष्य का स्वरूप समझने में कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए ।
शान्तिकुञ्ज, जो नवयुग की गंगोत्री के रूप में महाकाल के घोंसले के रूप में क्रान्तिदर्शी ऋषि की सूक्ष्म चेतना का घनीभूत केन्द्र बना बैठा है, की स्थापना का प्रसंग जानने के बाद तीर्थ चेतना का महत्व अधिकांश की समझ में आ सकेगा । शान्तिकुञ्ज जिस स्थान पर वर्तमान में स्थापित है, वह कभी सप्तर्षि आश्रम में विश्वामित्र ऋषि की तपस्थली रही है । यह बात संभवतः उस जमीन विक्रेता की जानकारी में नहीं थी, नहीं उसके लिए महत्व की थी, जो आज से पच्चीस वर्ष पूर्व परम पूज्य गुरुदेव को बिक्री हेतु विभिन्न भूखण्ड दिखाते-दिखाते यहाँ से गुजर रहा था । उन्हें तो भूमि के संस्कारों की तलाश थी । वे जहाँ सघन हो, वहीं प्रज्ञावतार का ऋतम्भरा प्रज्ञा के भावी क्रियाकलापों का निर्धारण होना था । वहीं से देव संस्कृति के नवजागरण का अलख जगना था । शान्तिकुञ्ज जहाँ आज है, उसका वह वाला भाग जिसमें परम वंदनीया माताजी स्वयं साधनारत रहती हैं, वहीं सप्तर्षि मार्ग के पास आकर परम पूज्य गुरुदेव ने रुककर कहा कि इस भूमि के दाम बताइये । हम तो यही जमीन लेंगे । दलाल ने बहुत कहा कि “आप को और बहुत सो अच्छी जमीनें दिखाई हैं, उनमें से चुन लीजिए । यह तो ऐसी जमीन है जिसमें सतत् पानी चूता है । यहाँ धान भी मुश्किल से उगता है । आपका कुँज बनना तो दूर यहाँ खड़े रहना भी मुश्किल हो जाएगा । एक हजार ट्रक मिट्टी डालने पर भी यह जमीन सूखने वाली नहीं है । यह है भी शहर से 5-6 मील दूर । आप दूसरी अच्छी जमीन देख लीजिए आप ही के हित की बात बता रहा हूँ ।”
परम पूज्य गुरुदेव ने, जमीन के उस दलाल की तथा शुभचिंतक उनके साथ आए अपने संबंधी की, एक भी दलील नहीं सुनी व सौदा करके ही लौटे । वर्ष में 4-5 बार वहाँ जाने का क्रम बना रहा । 1968 से 1971 की जनवरी-फरवरी तक निर्माण कार्य इतना हो गया कि वंदनीया माताजी के साथ तीन-चार कार्यकर्ता वहाँ उनके पास रहकर उनके साधनादि उपक्रम में मदद करते रहें । कितने ट्रक मिट्टी डाली गयी , इसकी कोई गिनती नहीं है । दायीं और शिवालिक बायीं ओर गढ़वाल हिमालय तथा बीच में गंगा नहीं के किनारे स्थित यह स्थान अपने रमणीक नैसर्गिक सौंदर्य के कारण नहीं अपितु इस स्थान की उस विशेषता के कारण चुना गया, जिसकी चर्चा कभी उनने अंतरंग क्षणों में इन पंक्तियों के लेखक से की थी । उनका कहना था कि “मैं ऐसा स्थान चाहता था, जहाँ की भूमि में तपस्या के संस्कार हों । ऐसी जगह आश्रम बनाना चाहता था जहाँ इतनी अधिक संख्या में पहले ही गायत्री मंत्र शक्ति की साधना संपन्न हो चुकी हो कि थोड़ा सा मानवी पुरुषार्थ और लगा देने पर वह जाग्रत-जीवन्त सिद्ध पीठ बन जाए । तुम जानते नहीं हो, इसीलिए शान्तिकुञ्ज की यह जगह चुनी है मैंने । यहाँ आकर एक बार यहाँ की हवा में भी जो श्वास ले लेगा, उसके कुसंस्कार नष्ट होंगे व वह धन्य हो जाएगा । जो यहाँ रहकर थोड़ी भी साधना कर लेगा, वह आत्मिक क्षेत्र में तो प्रगति करेगा ही मानव मात्र के लिए एक श्रेष्ठ लोकसेवी बनने की प्रेरणा भी प्राप्त करेगा , मैंने यह आश्रम नहीं, चेतना जगत में हेरा-फेरी हेतु एक लैबोरेटरी बनायी है । तुम कभी आगे रिसर्च करो तो इसी विषय पर करना ।”
यह प्रसंग तीर्थ चेतना के उन्नायक के प्रतीक परम पूज्य गुरुदेव की-संस्कृति पुरुष के रूप में व्याख्या करते हुए प्रतिपादित किया जा रहा है । उनने अपनी कार्यस्थली जो भी चुनी, वह संस्कारित तपःस्थली थी । गायत्री तपोभूमि जो मथुरा-वृन्दावन मार्ग पर यमुना किनारे स्थित है, महर्षि दुर्वासा की तपःस्थली रही है । वहाँ उनने प्रायः पच्चीस वर्ष न केवल तप किया वरन् अखण्ड-अग्नि स्थापित कर गायत्री तपोभूमि की नींव डालकर एक ऐसे तंत्र का प्रवर्तन किया जिसे अगले दिनों धर्मतंत्र से लोकशिक्षण के क्षेत्र में महत्वपूर्ण भूमिका निभानी थी । जब 1979 में वसंत पंचमी पर पूज्य गुरुदेव