संसार जैसा भी कुछ है, उसे उसी रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए और यथार्थता के अनुरूप अपने को ढालना चाहिए। संसार केवल हमारे लिए ही नहीं बना है और उसके समस्त पदार्थों व प्राणियों का हमारी मनमर्जी के अनुरूप बन या, बदल जाना शक्य नहीं हैं। तालमेल बिठाकर समन्वय की गति पर चलने से ही हम संतोषपूर्वक रह सकते हैं और अन्यों को शाँतिपूर्वक रहने दे सकते हैं।
इस दुनिया में रात भी होती है व नित्य दिन भी होता है। परिवार में जन्म का क्रम भी चलता है और मरण का भी। कभी किसी का मरण न हो व हमेशा दिन ही बना रहे ऐसी इच्छा किसी की पूर्ण नहीं हो सकती। रात को रात के ढंग से और दिन को दिन के ढंग से प्रयोग करके हम सुखी रह सकते हैं और दोनों स्थितियों के साथ जुड़े हुए लाभों का आनन्द ले सकते हैं। जीवन की अपनी उपयोगिता है और मरण की भी अपनी। दोनों का संतुलन मिलाकर चला जाय तो हर्ष एवं उद्वेग के उन्मत्त-विक्षिप्त बना देने वाले आवेशों से काफी कुछ बचा जा सकता है।
हर मनुष्य की आकृति भिन्न है। किसी की शक्ल दुनिया में किसी से नहीं मिलती। जुड़वों में भी थोड़ा बहुत अंतर होता है। इसी प्रकार प्रकृति में व्यापक स्तर पर भिन्नता संव्याप्त है। हर मनुष्य का अपने ढंग का व्यक्तित्व है। उसमें यत्किंचित् परिवर्तन की तो संभावना है, पर यह आग्रह कि हम उसे वैसा बनालेंगे जैसा हम चाहते हैं गलत है। इस संसार में तालमेल बिठाकर चलना ही व्यवहारिक व्यवहारिक है। हमारा जीवनक्रम इस कौशल को अपनाकर ही सुख-शान्तिमय हो सकता है।
एक दूसरे के मुख से निकलती हुई यह बात अनेक कानों में समा गई । भले कहने वालों के स्वर धीमे हों पर सभी के मनों में आश्चर्य तीव्र हो उठा । “क्या करते हैं सम्राट कहाँ जाते हैं ?” यद्यपि युद्ध प्रारम्भ होने के पूर्व ही उन्होंने इस तथ्य की स्पष्ट घोषणा कर दी थी शाम का समय उनकी व्यक्तिगत उपासना के लिए है । इस समय उन्हें कोई व्यवधान न पहुँचाएँ ।
“लेकिन वेष बदल कर जाना ?” अर्जुन के स्वर के पीछे चिन्ता की झलक थी । प्रश्न उनकी सुरक्षा का है । भीम कुछ अधिक ही उद्विग्न थे । इससे सहायक सेनाएँ विचलित हो सकती हैं । नकुल सहदेव प्रायः एक साथ बोले । महायुद्ध का वेगपूर्ण प्रवाह पिछले दस दिनों से धावमान था ऐसे में इन सबका सचिन्त होना स्वाभाविक था । इन भाइयों की भाँति अन्य प्रियजनों की भी यही मनोदशा थी । सत्य को जानने का उपाय है उद्वेगपूर्ण मानसिकता, चिन्ताकुल चित्त नहीं । एक ही समाधान-शान्त मन में शोधपूर्ण कोशिश । पार्थसारथी के शब्दों ने सभी के मनों में घुमड़ रहे प्रश्न का उत्तर साकार कर दिया ।
दिन छिपते ही युधिष्ठिर जैसे ही अपने कक्ष से बाहर निकले । अन्य पाण्डव भी उनके पीछे हो लिए । मद्धिम पड़ते जा रहे प्रकाश में इन्होंने देखा महाराज अपने हाथ में कुछ लिए उधर की ओर बढ़ रहे हैं , जिधर दिन में संग्राम हुआ । यह देखकर सभी की उत्सुकता और बढ़ गई । वे अपने को छिपाए उनका सावधानी से पीछा कर रहे थे ।
युद्धस्थल आ गया तो ये सब एक ओर छिपकर खड़े हो गए । तारों के मन्द प्रकाश में इन सब की आँखें पूर्ण सतर्कता से देख रही थीं आखिर अब ये करते क्या हैं ? इनकी ओर से अनजान युधिष्ठिर उन मृतकों में घूम-घूम कर देखने लगे कोई घायल तो नहीं है, कोई प्यासा तो नहीं है, कोई भूख से तड़प तो नहीं रहा किसी को घायलावस्था में अपने स्नेही स्वजनों की चिन्ता तो नहीं सता नहीं । वे घायलों को ढूंढ़ते उनसे पूछते और उन्हें अन्न जल खिलाते पिलाते बड़ी देर तक वहाँ घूमते रहे । कौरव पक्ष का रहा हो या पाण्डव पक्ष का, बिना किसी भेदभाव के वह सबकी सेवा करते रहे । किसी को घर की चिन्ता होती तो वे उसे दूर करने का आश्वासन देते । इस तरह उन्हें रात्रि के तीन प्रहर वहाँ बीत गए ।
ये सभी उनके लौटने की प्रतीक्षा में खड़े थे । समय हो गया । युधिष्ठिर लौटने लगे-तो ये सभी प्रकट होकर सामने आ गए । अर्जुन ने पूछा “आपको यों अपन आपको छिपाकर यहाँ आने की क्या जरूरत पड़ी?”
युधिष्ठिर सामने खड़े अपने बन्धुओं को सम्बोधित कर बोले “तात् ! इनमें से अनेकों कौरव दल के हैं , वे हमसे द्वेष रखते हैं यदि मैं प्रकट होकर उनके पास जाता तो वे अपने हृदय की बातें मुझसे न कह पाते और इस तरह मैं सेवा के सौभाग्य से वंचित रह जाता ।”
भीम तनिक नाराज होकर कहने लगे-”शत्रु की सेवा करना क्या अधर्म नहीं है ?”
“बन्धु ! शत्रु मनुष्य नहीं पाप और अधर्म हुआ करता है।” युधिष्ठिर का स्वर अपेक्षाकृत कोमल था । “अधर्म के विरुद्ध तो हम लड़ ही रहे हैं पर मनुष्य तो आखिर आत्मा है आत्मा का आत्मा से क्या द्वेष ?” भीम युधिष्ठिर की इस महान आदर्शवादिता के लिए नतमस्तक न हो पाए थे तब तक नकुल बोल पड़े- “लेकिन महाराज ! आपने तो सर्वत्र यह घोषित कर रखा है कि यह समय आपकी ईश्वरोपासना का है, इस तरह झूठ बोलने का पाप तो आपको लगेगा ही । “
“नहीं नकुल ।” युधिष्ठिर बोले “भगवान की उपासना जप-तप और ध्यान से ही नहीं होती कर्म भी उसका उत्कृष्ट माध्यम है । यह विराट जगत उन्हीं का प्रकट रूप है । जो दीन-दुःखी जन हैं उनकी सेवा करना , जो पिछड़े ओर दलित हैं उन्हें आत्मकल्याण का मार्ग दिखाया भी भगवान का ही भजन है । इस दृष्टि से मैंने जो किया वह ईश्वर की उपासना ही है अब और कुछ पूछने को शेष नहीं रह गया था।
सहदेव ने आगे बढ़कर उन्हें प्रणति निवेदन करते हुए कहा “लोग सत्य ही कहते हैं जहाँ सच्ची धर्मनिष्ठ होती है, विजय भी वहीं होती है । हमारी जीत का कारण इसीलिए सैन्यशक्ति नहीं, आपकी धर्मपरायणता की शक्ति है।”
विश्व की रचना निष्प्रयोजन नहीं, प्रयोजनयुक्त है । सर्वत्र सुव्यवस्था, सुगढ़ता का साम्राज्य है । मोटी दृष्टि जिसे अनगढ़ एवं निष्प्रयोजन मानती है, उन घटकों की भी अपनी महत्ता उपयोगिता है । विशालकाय समुद्र को देखकर यह प्रतीत हो सकता है कि उसने बेकार नें भूमण्डल का एक बहुत बड़ा भाग घेर रखा है । पर इकॉलाजी के विशेषज्ञ जानते हैं कि समुद्र का अस्तित्व न होता , तो समय पर वर्षा, मौसम आदि की प्रकृति सुविधाएँ नहीं उपलब्ध होतीं । इस विराट् सृष्टि में जो कुछ भी है, उपयोगी है । उन घटकों में एक अद्भुत तारतम्य, एवं सामंजस्य देखने को मिलता है । गहराई से पर्यवेक्षण-अध्ययन करने पर ऐसा लगता है कि जिसने भी सृष्टि बनायी, बहुत सोच-समझकर बनायी होगी ।
सृष्टि संरचना का सुनिश्चित प्रयोजन और सुव्यवस्था का प्रमाण है जीवजगत के लिए पृथ्वी पर अनुकूल वातावरण का होना । उन्हें देखकर लगता है कि किसी सर्वज्ञ द्वारा ही जीवन को परिपोषित करने के लिए हर तरह की अनुकूलताओं का सृजन किया गया है । न्यूयार्क विज्ञान अकादमी के मूर्धन्य वैज्ञानिक डॉ. ए. क्रेसी मोरिसन का कहना है कि “गणितशास्त्र के नियमों से यह प्रमाणित होता है कि संसार का नक्शा किसी कुशल तथा बुद्धिमान इंजीनियर द्वारा खींचा गया है ।” इस प्रतिपादन की पुष्टि हेतु उन्होंने गहन अध्ययन अन्वेषण किया है । उससे जो तथ्य सामने आये हैं, उनका अवलोकन करने पर ज्ञात होता है कि हमारी पृथ्वी जो अपनी धुरी पर एक हजार मील प्रति घंटे की रफ्तार से घूमती है, यदि उसकी गति एक सौ मील प्रति घंटा हो जाय तो दिन और रात अब की तुलना में दस गुने लम्बे हो जायेंगे । दिन के समय सूर्य की गर्मी इतनी अधिक होगी कि पृथ्वी की समस्त वनस्पतियाँ जल जायेंगी । रात्री को भयंकर ठंड पड़ेगी जिसके कारण अधिकाँश जीव मर जायेंगे ।
पृथ्वी की आकृति ओर प्रकृति को देखने से भी लगता है कि उसे सोच समझकर इस योग्य बनाया गया है कि जीवधारी निवास कर सकें । यदि पृथ्वी का आकार अब की तुलना में छोटा, चन्द्रमा जितना होता तो उसका व्यास भी एक चौथाई होता । वैज्ञानिकों के अनुसार पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति से चन्द्रमा की गुरुत्व शक्ति छः गुनी कम है । पृथ्वी का आकार चन्द्रमा जितना हो जाने पर उसकी गुरुत्वाकर्षण शक्ति भी अत्यन्त कम हो जाती । उल्लेखनीय बात है कि धरती के वायुमण्डल , जल एवं खनिज सम्पदा को संभालने , सुरक्षित रखने में गुरुत्वबल का विशेष सहयोग है । उसमें कमी होते ही अनेकों प्रकार के असन्तुलनों का सामना करना पड़ता है । वायुमंडल की रक्षापरतों में व्यतिरेक से ताप की मात्रा इतनी अधिक हो जाती कि जीवित रहना कठिन पड़ता । यदि पृथ्वी का व्यास वर्तमान व्यास से दुगना होता तो भी अनेकोँ प्रकार की समस्यायें उत्पन्न होतीं । व्यास दूना होने से धरातल चौगुना हो जाता तथा धरती की गुरुत्वाकर्षण शक्ति भी दुगुनी हो जाती । परिणामस्वरूप सोलह सौ किलोमीटर की ऊँचाई तक फैला वायुमंडल खतरनाक रूप से सिकुड़कर कम हो जाता । वायुमंडलीय गैसों का दबाव भी 15 से 20 पौण्ड प्रति वर्ग इंच तक बढ़ जाता , जिसका दुष्प्रभाव जीवन पर भी पड़ता । उत्तरी एवं दक्षिणी ध्रुव जैसी भीषण ठंडक विश्व के अधिकाँश क्षेत्रों में पड़ती । फलतः जीना दूभर हो जाता ।
“द एवीडेन्स आफ गॉड इन एक्सपैन्डिंग यूनीवर्स” नामक अपनी कृति में कनाडा विश्वविद्यालय के सुप्रसिद्ध जीव भौतिकीविद् डॉ. फ्रेंक एलेन ने उपरोक्त वैज्ञानिक तथ्यों पर प्रकाश डालते हुए लिखा है कि ‘यह पृथ्वी किसी समर्थ सत्ता द्वारा बड़ी सोच-समझकर सत्प्रयोजन के लिए बनायी गयी है, ताकि जीवधारियों एवं पादपों का निर्वाह होता रहे । यदि पृथ्वी का आकार सूरज जितना बड़ा होता तथा उसकी क्षमता यथावत् कायम रहती तो उसकी गुरुता 150 गुना अधिक बढ़ जाती । ऐसी स्थिति में वायुमण्डल की ऊँचाई घटकर मात्र चामी रह जाती । यदि ऐसा होता तो एक ऐसी स्थिति उत्पन्न होती जिसमें पानी का भाप बनकर उड़ना बन्द हो जाता । तब एक पौण्ड प्राणी का वजन बढ़कर 150 पौण्ड हो जाता तथा मनुष्य, हाथी , सेर आदि का आकार घटकर अत्यन्त कम हो जाता ।
आकार का ही नहीं पृथ्वी की अन्य ग्रहों से दूरी से भी धरती पर अनुकूल परिस्थितियों के निर्माण में घना तारतम्य एवं सम्बन्ध है । सूर्य को ही लें । उसकी दूरी पृथ्वी से इस समय जितनी है, उससे यदि बढ़ कर दूनी हो जय तो सूर्य से मिलने वाला ताप घटकर चौथाई हो जायेगा और सर्दियों के मौसम की अवधि दुगुनी हो जायगी । यह स्थिति हिमयुग को आमंत्रित करेगी । इसके विपरीत यदि सूर्य से पृथ्वी की दूरी वर्तमान दूरी से घटकर आधी हो जाय तो सूर्य से मिलने वाली गर्मी चार गुनी अधिक बढ़ जायेगी । फलतः ऋतुओं की लम्बाई आधी रह जायगी । साथ ही धरती इतनी अधिक गरम हो जायगी कि प्राणी, वृक्ष-पादप सभी जलकर खाक हो जायेंगे । इस समय पृथ्वी का जो आकार है, सूर्य से जितनी दूरी है, अयन में घूमने का उसका जो वर्तमान वेग है, वे सभी जीवन धारण करने के अनुकूल हैं ।
गंभीरतापूर्वक विचार किया जाय तो भौतिकविदों के वह प्रतिपादन तर्कपूर्ण नहीं लगते कि पृथ्वी सृष्टि के आदि में जलवा हुआ आग का एक गोला थी जो कालान्तर में अनेकानेक परिवर्तनों से गुजरने के बाद अपने आप इस योग्य बन गयी कि जीवधारी जीवनयापन कर सकें । जीवन धारण करने योग्य बनने के लिए पृथ्वी ने जितने रूप बदले हैं, वे इतने अधिक एवं सुव्यवस्थित हैं कि उन्हें आकस्मिक नहीं माना जा सकता । एक सुनिश्चित गति एवं कक्षा में पृथ्वी सतत् परिभ्रमणशील है । यह सतत् अपनी धुरी पर घूमती रहती है, जिससे एक के बाद एक दिन और रात बनते हैं । सूर्य के चारों ओर पृथ्वी का घूमना एक दूसरे प्रकार की गति है । गैलीलियो तथा ब्रूनो नामक वैज्ञानिकों ने इन्हीं दो गतियों की खोज की थी , पर भारत के महान ज्योतिर्विद् आर्यभट्ट ने सदियों पूर्व इन दोनों ही तरह की गतियों का वर्णन “आयंगौः पृश्निर क्रमीदसदन्मातरं पुरः” मन्त्र में किया है । इन दोनों गतियों के कारण ही पृथ्वी के परिभ्रमण में स्थिरता आती है । वह अपने ध्रुवीय अक्षों पर घूमते हुए साढ़े तेईस अंश पर झुकी हुई है । ऋतुओं की नियमितता का कारण यह झुकाव ही है । उल्लेखनीय है कि यदि झुकाव एवं गति की विशेषताएँ न होतीं तो पृथ्वी पर विविध प्रकार की वृक्ष-वनस्पतियों का अस्तित्व भी न होता । झुकाव न होता तो समुद्री भाप उत्तर से दक्षिण तक फैल जाती और सर्वत्र बर्फ के महाद्वीप बन जाते । पृथ्वी की स्थिरता जड़ता को जन्म देती और वह ‘शस्य श्यामला’ नहीं दिखायी पड़ती । ध्रुवीय अक्ष पर पृथ्वी के झुकाव में पड़ने वाले थोड़े अन्तर से गंभीर संकट उत्पन्न हो सकते हैं ।
सभी जीवधारियों एवं वृक्ष-वनस्पतियों का अस्तित्व जल, वायु और प्रकाश पर टिका हुआ है । ये तीनों ही जीवनदायी तत्व पृथ्वी पर केवल प्रचुर परिमाण में विद्यमान हैं, वरन् उनका एक सुनिश्चित चक्र एवं संतुलन है जिसके डगमगाते ही भारी संकट उत्पन्न हो सकता है । इसी तरह प्रगति की दिशा में अनवरत बढ़ते रहने के लिए उस दूरदर्शी सर्व समर्थ सत्ता ने वन संपदा, खनिज सम्पदा, पेट्रोलियम आदि पदार्थ दिये हैं । इनका मानवी सभ्यता के विकास में विशेष योगदान है । वे मनुष्य के हाथ न लगी होतीं तो उसकी बौद्धिक प्रखरता-युग की भाँति पत्थरों से खेलता होता । पर धन्यवाद उस स्रष्टा को, उस कलाकार को जिसने कि भूमण्डल की अनुकूलतायें देकर अपनी महानता का परिचय दिया ।
जड़ परमाणुओं के संघात से दृष्टि के अकस्मात् बनने जैसे निराधार तथ्यों का प्रतिपादन करने वाले तथाकथित बुद्धि सम्पन्नों के लिए सदियों पूर्व प्रख्यात दार्शनिक फ्राँसिस बेकन ने कहा था कि “थोड़ी वैज्ञानिक बुद्धि तथा दार्शनिकता आदमी को नास्तिकता की ओर ले जाती है, पर गंभीर शोध बुद्धि एवं गहन दार्शनिकता मनुष्य को आस्तिकता की ओर ले जाती है । अतएव सृष्टि के नियामक सत्ता के संदर्भ में इन्कार करने के पूर्व गंभीरता से विचार करना चाहिए ।”
सचमुच ही अन्वेषक दृष्टि विकसित हो जाय तथा गहराई से मनुष्य खोज-बीन करे तो अपने ही चारों ओर उसे समर्थ अदृश्य सत्ता के अनेकों प्रमाण मिल जायेंगे । तब वह चाहे वैज्ञानिक ही क्यों न हो, विख्यात रसायन शास्त्री थामस डेविड पार्क्स की भाँति अपनी भाषा में कह उठेगा कि-”मेरे चारों ओर जितना भी यह दृश्य जगत है, मैं उसमें नियम और प्रयोजन देखता हूँ । मुझे वह मान्यता निराधार जान पड़ती है कि सभी पदार्थ एवं पदार्थों से युक्त यह सृष्टि अकस्मात् मात्र परमाणुओं के संघात से विनिर्मित है । मैं तो सर्वत्र कण-कण में बुद्धि जो अचिन्त्य है, अगोचर है । उस महती बुद्धि जो अचिन्त्य है, अगोचर है । उस महती बुद्धि को ही मैं ‘परमात्मा’ कहता हूँ।”
जिनकी आँखों में खराबी होती है उन्हें बहुत पास का तो दीखता है, पर दूर की चीजें साफ नहीं आतीं । यही बात बुद्धिमत्ता पर भी लागू होती है । वह निर्मल और प्रखर होने पर दूरदर्शिता का परिचय देती है और धुँधली होने पर अदूरदर्शी बन जाती है । उसे क्या सोचना और क्या करना चाहिए, यह स्पष्ट रूप से सूझ नहीं पड़ता । नेत्र ज्योति क्षीण हो जाने पर प्रायः रास्ता चलते ठोकरें लगती हैं । काँटे चुभ जाने जैसे संकट भी आ खड़े होते हैं । साँप-बिच्छुओं से बच निकलने में भी चूक होती रहती है और उनका दर्शन सहना पड़ता है । विवेक दृष्टि के धूमिल हो जाने पर भी यही होता है ।
अदूरदर्शिता से तात्पर्य है दूरवर्ती परिणामों को न देख सकना । तात्कालिक लाभ पर आँखें मूँदकर टूट पड़ना । लालच इसी को कहते हैं । तुर्त-फुर्त अधिक मनोवाँछा पूरी करने की उतावली में प्रायः ऐसे अनर्थ बन पड़ते हैं जो पकने पर असाधारण कष्ट देते हैं । उस मक्खी का उदाहरण कितनों को ही विदित होगा, जो भरी कड़ाही की चासनी को एक बारगी उदरस्थ कर जाने के लालची में झपट पड़ी थी और पंख, पैर फँस जाने पर जान गँवाने के लिए विवश हुई थी, और भी ऐसे कितने ही प्राणी हैं । बहेलिये जरा सा दाना बिखेर कर चिड़ियों को जाल में फँसा लेते हैं । मछुए मछलियों को ऐसा ही लालच दिखा कर उन्हें बेमौत मरने के लिए सहमत करते हैं । ठगों का भी यह व्यवसाय है । वे मित्र बनाते हैं, लालच दिखाते हैं और भोले लोगों की बुरी तरह हजामत बनाते हैं । यदि इन फँसने वालों में भविष्य के खतरे समझने की अक्ल रही होती तो वे इतना भारी जोखिम उठाने से बच सकते थे।
उज्ज्वल भविष्य की संरचना के लिए दूरगामी परिणति को समझ सकने की पैनी सूझ-बूझ चाहिए । उसके अभाव में अनगढ़ लोग मात्र तात्कालिक लाभ को ही सब कुछ मान बैठते हैं और उसी के लिए आकुल-व्याकुल होकर कुछ भी कर बैठने की मूर्खता करने लगते हैं। वे भूल जाते हैं कि स्थायी और महत्वपूर्ण उपलब्धियोँ के लिए आरंभ में धैर्य बरतना और लम्बे समय तक धैर्यपूर्वक प्रयत्नरत रहना पड़ता है । बीज को वृक्ष बनने में देर लगती है । अखाड़े में प्रवेश करके कोई पहलवान नहीं बन जाता । स्कूल में भर्ती होने के दिन से लेकर स्नातक बनने की अवधि लम्बी होती है । इस बीच छात्रों को घण्टों मनोयोगपूर्वक पढ़ना पड़ता है और पुस्तकों का फीस का खर्च उठाना पड़ता है । अध्यापकों की खरी खोटी भी सुननी पड़ती है । इतना धैर्य जिसमें न हो, जो भावी परिणामों की कल्पना न कर सके, उसे व्यायामशाला में, पाठशाला में, उद्यान आरोपण में झंझट ही झंझट दिखाई पड़ेगा । तत्काल तो उनमें प्रत्यक्ष घाटा और श्रम ही है । सत्परिणाम तो इतना कर गुजरने के बाद ही सामने आते हैं ।
अदूरदर्शी अकृत्य करते हैं । इस समय अपनी प्राथमिक सफलता पर फूले नहीं समाते और चतुरता का दावा भी करते हैं, किन्तु यह भ्रम कुछ ही समय में तिरोहित हो जाता है । स्वादिष्ट व्यंजनों को लोलुपतावश अधिक मात्रा में खाया तो जा सकता है, पर इसके कुछ ही समय बाद उदरशूल, उलटी दस्त आदि की जो व्यथा सहनी पड़ती है । यदि प्रारंभ में ही यह परिणाम सोच लिया गया होता तो व्यंजन थोड़ी मात्रा में खाये गये होते । स्वाद भी मिलता और अपच का शिकार होकर पाचन तंत्र को विकृत भी न बनाया गया होता । सभी जानते हैं कि अपच की सड़न ही सभी रोगों का प्रधान कारण है । इस कुचक्र में अदूरदर्शी ही फँसते हैं ।
कामुकता के आवेश में व्याकुल होकर कितने ही व्यक्ति सभी मर्यादाओं को लाँघ जाते हैं और अपने तथा सहयोग के शरीर का सर्वनाश करते हैं । सृष्टि के सभी प्राणी गर्भ-स्थापना के हेतु एक बार यौनाचार करते हैं और इसके बाद मादा की कोई प्रबल माँग न होने तक उस कृत्य से विरत रहते हैं । प्रायः वह संयम की अवधि वर्षों की होती है । उत्तेजक क्षण तो कुछ मिनट के लिए ही आते हैं । यही नियम सृष्टि के समस्त प्राणियों की तरह मनुष्य पर भी लागू होते हैं । पर जो अपनी जुनून को सब कुछ समझते हैं और प्रकृति-अनुशासन का पग-पग पर उल्लंघन करते हैं, उनकी हेकड़ी कुछ दिन तक ही फलित होती है । बाद में तो अपना और पत्नी का शरीर, मस्तिष्क बुरी तरह खोखला होने लगता है । नस-नस में दुर्बलता का प्रकोप चढ़ दौड़ता है और साथ ही अनेकों छोटे-बड़े रोगों का ऐसा सिलसिला चल पड़ता है जो जीवन पर्यन्त दुःख देता रहे । सन्तानें भी अनुवांशिक विकृतियों को लेकर जन्मती हैं और शारीरिक , मानसिक स्वास्थ्य की दृष्टि से गये गुजरे स्तर की होती हैं । कुत्ता सूखी हड्डी चबाता है , उससे जबड़ा छिलने पर जो रक्त निकलता है उसे चाट-चाट कर उसे हड्डी की उपलब्धि मान बैठता है, पर वस्तुतः यह अपने ही पैरों में कुल्हाड़ी मारने जैसा है । पैसों को फुलझड़ी के रूप में जलाकर बच्चे मजा तो लूटते हैं , पर यह भूल जाते हैं कि जेब कितनी खाली हो गई । इसी को कहते हैं अदूरदर्शिता ।
छल, प्रपंच, अपहरण, शोषण, आक्रमण, चोरी, बेईमानी जैसे अपराधी कृत्यों में लगने वाले भी तात्कालिक लाभ पर खुशियाँ मनाते और अपनी चतुराई का ढिंढोरा पीटते देखे जाते हैं, पर जब प्रतिशोध का, सामाजिक , राजनीतिक दण्ड का अवसर आता है तो भूल अनुभव करते हैं । सर्वसाधारण की दृष्टि में इज्जत गिर जाने प्रामाणिकता पर विश्वास उठ जाने के पश्चात् कोई भी व्यक्ति किसी का महत्वपूर्ण सहयोग अर्जित नहीं कर सकता । असहयोग इतना बड़ा अभाव है कि उसकी पूर्ति अन्य किसी साधन से नहीं हो सकती । इज्जत गँवा बैठने के बाद आदमी के पास और कुछ ऐसा बच ही नहीं रहता जिसे महत्वपूर्ण कहा जा सके । ऐसे व्यक्ति सदा अपने को असुरक्षित और एकाकी अनुभव करते और प्रेत-पिशाच जैसी डरती-डराती जिन्दगी जीते हैं ।
मैला कपड़ा धुल जाता है । टूटे वर्तन दुबारा गल और नये साँचे में ढल जाते हैं, पर बिगड़े हुए मनुष्य का सुधरना मुश्किल पड़ता है । नशेबाजी की आदत यों तो हँसी खेल जैसे कौतूहल में पल्ले बँध जाती है ? पर पीछे उसका छूटना बहुत प्रयत्न करने पर भी संभव नहीं होता । लुच्चे-लफंगे , झूठे-प्रपंची इन आदतों को कुसंग में पड़कर सहज अपना लेते हैं, पर उनसे पीछा छुड़ाना कठिन पड़ता है । छोड़ भी दें तो उनका पुराना इतिहास ही लोगों के मन मस्तिष्क पर छाया रहता है और सुधर जाने पर भी बिगड़ी स्थिति की स्मृति और मान्यता बनी रहती है लोग नई अच्छाई को उतने गौर से को उतने गौर से नहीं देखते जितनी कि पुरानी बुराई का स्मरण रखते हैं । इस प्रकार व्यक्ति के एक बार बुराई के दल दल में फँस जाने पर वह उसमें से बहुत कुछ खोकर ही उबर पाता है । यह इतना बड़ा घाटा है जिसकी क्षति पूर्ति सहज ही नहीं हो सकती ।
यह सब क्या है ? इसे अदूरदर्शिता का प्रतिफल ही कहना चाहिए जिसमें बुरी आदतें अपना ली जाती हैं । यह नहीं सोचा जाता कि आँगन में बबूल विषवृक्ष बो लेने पर उसके कारण सदा खतरा ही बना रहेगा । साँप-बिच्छू पाल कर भी सतर्कतापूर्वक उनके दंशन से बचा जा सकता है, किन्तु कुटेवें तो पल-पल में काटती रहती हैं । वे दूसरों का जितना बिगाड़ करती हैं उससे कहीं अधिक अपने को हानि पहुँचाती हैं । आतुरतावश अनीति अपनाकर जो कुछ कमाया जाता है उससे हजार गुनी हानि अपनी निज की होती है । दूसरा तो एक बार चोट खाकर सँभल जाता है और फिर ऐसे दुरात्माओं के चंगुल में फँसने से सावधान हो जाता है । पर कुटेवें तो अपने को ही बदनाम करती , अप्रामाणिक घोषित करतीं और हर किसी को साथ न देने, दूर रहने के लिए सावधान करती रहती हैं । सहयोग और सम्मान से वंचित रहने वाला व्यक्ति अप्रामाणिक समझा जाता और उपेक्षित रहता है । ऐसे व्यक्तियों के लिए प्रगति का द्वारा एक प्रकार से बंद ही हो जाता है ।
जिन्हें भगवान ने दूरदर्शिता का वरदान प्रदान किया है, वे सदा भविष्य की बात सोचते हैं । उज्ज्वल भविष्य का निर्माण कर सकने योग्य वर्तमान का निर्धारण करते हैं । किसान अपने खेतों के साथ लम्बे समय तक पूरी तरह गुँथा रहता है । खाद पानी , बीज, रखवाली, आदि के लिए पूरी सतर्कता बरतता और जेब से खर्च करता है, क्योंकि उसे यह विश्वास रहता है कि समय आने पर इसका समुचित प्रतिफल हस्तगत होगा । आमतौर से होता भी है । अपवाद तो यदा कदा ही होते हैं । माली अपने बगीचे में पूरी लगन और मेहनत के साथ जुटता है । तत्काल उसे कुछ लाभ नहीं होता, पर समय आने पर फल-फूलों के अम्बार से उसका घर भर जाता है । व्यापारी को भी व्यवसाय में आरंभिक पूँजी फँसानी पड़ती है । सरंजाम जुटाने में काफी दौड़ धूप करनी पड़ती है । कारीगरों से लेकर ग्राहक जुटाने में पैनी दृष्टि से खोज बीन करनी पड़ती है। आरंभ में तो खर्च और हैरानी ही सहन की जाती है किन्तु यह श्रम निरर्थक नहीं जाता । उसका समुचित लाभ समयानुसार मिलकर रहता है ।
विद्यार्थी, व्यायाम करने वाले, कला-कौशलों के अभ्यासी आरंभ के दिनों में मौज मजा करने की बात मस्तिष्क में आने तक नहीं देते, इसी का परिणाम यह होता है कि वे अगले दिनों अपने विषय में प्रवीण पारंगत बनते हैं और आरंभ में किये गये परिश्रम का समुचित लाभ उठाते हैं। यदि इन सबने अदूरदर्शिता अपनाई होती और तत्काल का विनोद-मनोरंजन, आराम और तत्काल का लाभ देखा होता तो किसी को भी बीज बोने और सुविकसित वृक्ष की छाया में बैठकर शीतलता प्राप्त करने का अवसर न मिला होता । बया पक्षी मनोयोग और घोर परिश्रम के साथ शानदार घोंसला बनाता है और उसका प्रतिफल बच्चों समेत धूप-वर्षा से बचकर आराम के दिन काटता है ।
सेवाभावी , परमार्थपरायण इसी नीति को अपनाते हैं और कुछ ही समय में लोकनायक की उच्चस्तरीय प्रतिष्ठा प्राप्त करते हैं । जन सहयोग से ऊँचे पदों पर पहुँचते हैं । अपनी यशोगाथा अभिनंदनीय, अनुकरणीय बनाते हुए इतिहास के पृष्ठो अमर छाप छोड़ जाते हैं । इसके विपरीत जिन्हें आज का, इसी क्षण का मौज-मजा अभीष्ट है, जो तुर्त-फुर्त लम्बा लाभ कमाना चाहते हैं वे चोरी ठगी का रास्ता अपनाते हैं । बदनाम होने से जेल जाने तक की प्रताड़ना भुगतते हैं। आरंभ में दुर्व्यसनी दुराचारी अपनी चतुरता पर प्रसन्न हो सकते हैं, और बढ़-चढ़ कर डींगें हाँक सकते हैं किन्तु यह कुकल्पना देर तक नहीं ठहरती काठ की हाँडी बार-बार नहीं चढ़ती । पोल खुल जाने पर उनका बहिष्कार-तिरस्कार दूध में पड़ी मक्खी की तरह होता है ।
दूरदर्शी ही है, जो भौतिक और आध्यात्मिक क्षेत्र में समग्र एकाग्रता बरतते हैं । तन्मय, तत्पर होकर उज्ज्वल भविष्य को लक्ष्य मानकर उसकी साधना में एकनिष्ठ होकर जुटते हैं और अभीष्ट सफलता प्राप्त करके कृतकृत्य बनते हैं ।
महाभारत समाप्त हो जाने पर विज्ञजनों की गोष्ठी में यह विचार होने लगा कि कौरव 100 थे साथ ही उनकी सेना भी बड़ी तथा समर्थ भी । फिर भी पाँच पाण्डवों की छोटी सेना से क्यों हारे ?
उत्तर देते हुए संजय ने कहा कि कौरवों में से प्रत्येक महत्वाकाँक्षी था और उद्दंड था उनकी आपसी खींचतान में अधिकाँश शक्ति नष्ट होती रही । इसके विपरीत पाण्डव छोटी संख्या में होते हुए भी परस्पर सहयोग और अनुशासन की कड़ी में बँधे रहते थे । उनकी एकजुटता ने उन्हें सफल बनाया ।
सभी सुनने बालों का उचित समाधान हो गया ।
महर्षि मुदगल को उनके अन्त समय में स्वर्गलोक से विमान लेकर देवदूत आये ।
महर्षि ने चलने से पूर्व स्वर्ग की परिस्थितियों का विवरण पूछा । मालूम हुआ कि वहाँ भोग विलास की विविध विधि सामग्री का बाहुल्य है ।
वहाँ कोई सेवा करने योग्य सुयोग है क्या ? ऋषि के इस उत्तर में देवदूतों ने सिर हिला दिया । और कहा वहाँ तो सभी के पास सब कुछ है । कोई दुखी नहीं फिर सेवा को स्वीकार कौन करेगा ?
महर्षि ने स्वर्ग चलने से इनकार कर दिया । और कहा मुझे धरती पर ही जन्म दिया जाय ताकि दीन−दुःखियों की सेवा करने-पिछड़ों को उठाने का आत्मसंतोष प्राप्त कर सकूँ मुझे यही प्रिय है । उनकी इच्छानुसार उन्हें धरती पर ही रहने दिया गया ।
समूचा विश्व इन दिनों संक्रमणकाल से गुजर रहा है । जहाँ एक ओर मानवी दुष्कृत्यों से उत्पन्न प्रकृति प्रकोपों की विभीषिका नियामक सत्ता की दण्ड व्यवस्था के रूप में दृष्टिगोचर हो रही है, वहीं दूसरी ओर प्रत्यक्ष व परोक्ष रूप से विश्वशाँति के निमित्त किये जा रहे निर्माणात्मक प्रयास बताते हैं कि ध्वंस एवं सृजन की दोनों ही प्रक्रियायें एक साथ चल रही हैं । मनीषियों ने इसे “साँस्कृतिक परावर्तन” के रूप में विश्व इतिहास का एक युगान्तरकारी मोड़ बताया है । उनका कहना है कि इससे आशा बँधती है कि जो भी कुछ त्रास अभी झेला जा रहा है, उससे शीघ्र ही त्राण मिलेगा तथा शाँति के प्रयास और तीव्रगति से अग्रगामी बनेंगे । अगले ही दिनों सम्पूर्ण मानवजाति चिन्तन चेतना के एक नये युग में प्रवेश करेगी , तब न केवल उज्ज्वल भविष्य की सुखद संभावनायें साकार होंगी, वरन् मनुष्य के सारे क्रियाकलाप महानता के लक्ष्य को सामने रखते हुए संचालित होंगे । निश्चय ही वह समय मानव का गौरवपूर्ण काल होगा ।
इस संदर्भ में वैज्ञानिकों, मनीषियों एवं भविष्यदर्शियों ने अपने-अपने ढंग से अनुसंधान निष्कर्म व आकलन प्रस्तुत किये हैं । सुप्रसिद्ध विज्ञानवेत्ता फ्रिट्जाफ काप्रा कहते हैं कि इतिहास बताता है कि नया जमाना आने के पूर्व हमेशा दो-तीन दशक बड़े व्यापक उथल-पुथल भरे रहते हैं, वैसे ही जैसे कि आज दिखायी दे रहे हैं । नयी सभ्यता के अथवा नवयुग की आधार शिला रखे जाने के पूर्व ऐसी साँस्कृतिक प्रत्यावर्तन प्रक्रिया सदैव देखी जाती रही है, उनके अनुसार परिवर्तन की यह उथल-पुथल हर बार पूर्व से ही आरंभ हुई है तथा “स्टेटिक” से “डाइनैमिक” अर्थात् स्थिरता से सक्रियता की ओर उन्मुख हुई है । इसके लिए वे अर्नाल्ड टायनबी की बहुचर्चित पुस्तक “ए स्टडी ऑफ हिस्ट्री” का हवाला देते हैं जिसमें उन्होंने पूर्व इतिहास व भावी संभावनाओं की बड़ी गहन समीक्षा प्रस्तुत की है ।
चुनौतियाँ मनुष्य समाज की हों या पर्यावरण की समूचा विश्व उसमें प्रभावित हुए बिना नहीं रहता । क्षेत्र विशेष में उठी वैचारिक-क्रान्ति की लहरें वहीं तक सीमित नहीं रह जातीं , वरन् व्यापक क्षेत्र में परिवर्तन की गतिशीलता बड़ी तेजी से लाती हैं । इन दिनों यही प्रक्रिया द्रुतगामिता के साथ चल रही है और आगामी बारह पंद्रह वर्षों में सम्पूर्ण विश्वमानव को अपनी लपेट में ले लेगी, ऐसी डॉ.काप्रा की धारणा है । सही मायने में देखा जाय तो असंतुलन को मिटाने हेतु सक्रिय सृजन प्रयास गीताकार के “यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति” वाले उद्घोष की ओर ही संकेत करती है। इसी प्रक्रिया को विभिन्न पाश्चात्य दार्शनिकों, वैज्ञानिक मनीषियों ने अपने-अपने चिन्तन के अनुरूप प्रस्तुत किया है और कहा है कि नवसृजन में एक ओर जहाँ ध्वंसात्मक गतिविधियाँ तीव्र होती दिखाई देती हैं, वहीं दूसरी ओर निर्माण की प्रक्रिया भी स्थायी रूप से चल रही होती हैं। प्रख्यात दार्शनिक हर्बर्ट स्पेन्सर ने इसे विघटन एवं समन्वधी करण का मिला−जुला रूप कहा है, तो हेगल ने इसे ही यूनिटी एवं डिसयूनिटी का संयुक्तिकरण माना है । इस प्रकार नवनिर्माण की सभी परिभाषायें पूर्वात्य अध्यात्म के एक बिन्दु पर आकर मिल जाती हैं ।
इंटरनेशनल कल्चरल फाउण्डेशन के संस्थापक तथा “द प्लेन ट्रथ” पत्रिका के प्रधान संपादक हर्बर्ट डब्ल्यू आर्मस्ट्रांग अपने मानवतावादी दृष्टिकोण के लिए विख्यात हैं । अपने प्रसिद्ध ग्रंथ “द वंडरफुल वर्ल्ड टूमारो “में मनुष्य के उज्ज्वल भविष्य की उनने जो परिकल्पना की है, उसके अनुसार-इक्कीसवीं शताब्दी का आगमन ही नवयुग की सभ्यता का शुभारंभ माना जायेगा । अशिक्षा, गरीबी, और बेकारी की समस्याएं जो अभी मनुष्य की सबसे बड़ी समस्याओं में प्रमुख हैं, उनका समाधान खोज लिया जायगा । आक्रामक एवं अपराधी प्रवृत्तियों को उभारने के स्थान पर मनुष्य स्नेह-सद्भाव को जाग्रत कर दैवी गुणों से सम्पन्न बनने में ही अपनी शक्तियों का नियोजन करता हुआ दृष्टिगोचर होगा । तब अनीति, अनाचार एवं शोषण की आसुरी प्रवृत्तियाँ धरती पर से अपना पसारा समेट कर शून्य में विलीन हो जायेंगी । भाषाओं की भिन्नता के कारण मनुष्य को आज जिन समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है, अगले ही दिनों वह मिटकर एक विश्वभाषा का रूप ग्रहण करेगी । इस ‘गॉड्स लैंग्वेज’ के नाम से जाना जायगा । जिस भाषा के माध्यम से साहित्य , संगीत और कला को विधेयात्मक एवं सृजनात्मक दिशा-प्रवाह मिले, उसी को मानव जाति हृदयंगम करेगी ।
भविष्यवक्ताओं का मत है कि वह समय अब अधिक दूर नहीं है जिसमें पृथ्वी की समूची सत्ता सूर्य में विलीन हो जायगी अर्थात् मनुष्य सविता शक्ति से ओतप्रोत हो उत्कर्ष की ओर अग्रगामी होगा, क्योंकि यही वह प्रत्यक्ष सर्वव्यापी सत्ता है जिसका कार्य क्षेत्र समूचा विश्व ब्रह्माण्ड है । देवलोक की शक्तियों का पृथ्वी पर अवतरण इसी के माध्यम से होता है ।
वस्तुतः इन दिनों हम सब युगान्तरकारी परिवर्तन के मोड़ पर खड़े हुए हैं । विश्वकल्याण की भावना से ओतप्रोत विचारणा एवं कल्पना का विधेयात्मक सुनियोजन ही उज्ज्वल भविष्य का आधार स्तंभ है । इस तथ्य को जितना जल्दी समझा जा सके उतना ही अच्छा है ।
अब यह निर्विवाद रूप से सत्य सिद्ध हो चुका है कि विचार सिर्फ चेतना को ही नहीं, वरन् पदार्थ को भी समान रूप से प्रभावित करते हैं । उसे एक से दूसरे रूप में परिवर्तित कर देना-यह विचार शक्ति की ही सामर्थ्य है । उसकी इस अद्भुत क्षमता को ध्यान में रखते हुए हमें उसके अधिकाधिक सदुपयोग की बात सोचनी चाहिए ।
मानवी शरीर विचारों से प्रभावित होता है, अब यह कोई नया तथ्य नहीं रहा । सर्वविदित है कि अच्छे विचारों का शरीर पर अच्छा और बुरे का बुरा असर पड़ता है । इस आधार पर व्यक्ति का स्वस्थ-निरोग रहना अथवा रोगाक्रान्त हो जाना यह बहुत हद तक उत्कृष्ट निकृष्ट चिन्तन पर अवलम्बित होता है । चिकित्सा विज्ञान में मनःकायिक रोगों का आधार ही यही है । इसके विपरीत बीमार व्यक्ति को उदात्त चिन्तन द्वारा स्वस्थता प्रदान की जा सकती है । इसके अतिरिक्त अनेकानेक प्रसुप्त क्षमताओं का जागरण एवं विकास भी संभव है । यह सब ऑटोसजेशन और हेट्रोसजेशन की विभिन्न प्रक्रियाओं द्वारा सम्पन्न किया जाता है ।
पेड़-पौधे भी इससे सर्वथा अप्रभावित नहीं रहते-यह भी भलीभाँति ज्ञात हो चुका है । इसी तथ्य के आधार पर अब ऊसर और अनुपजाऊ जमीन में भी खेती करने की बात सोची जा रही है । इसका प्रथम प्रयोग अमेरिका के फाइण्डहोर्न नामक एक ऐसे स्थान पर किया गया जहाँ की भूमि बिल्कुल बलुआही थी । कृषि विशेषज्ञों का इसके संबंध में विचार था कि यहाँ मात्र जंगली खरपतवारों के कोई अनाज नहीं उपजाया जा सकता । विशेषज्ञों की इस मान्यता को विचार शक्ति पर विश्वास रखने वाले कैडीज एवं उनके मित्रों ने तब झुठला दिया जब कुछ वर्ष पूर्व वहाँ उन्होंने विचार शक्ति के माध्यम से असाधारण आकार-प्रकार की सब्जियाँ उपजायीं । वहाँ की कुछ बन्दगोभियाँ वजन में चालीस पौण्ड के आस-पास थीं । जो स्थान ऊसर-बंजर के कारण कभी उपेक्षित पड़ा था, आज उसे विचारों की अद्भुत क्षमता द्वारा उपजाऊ भूमि में परिवर्तित कर दिया गया है ।
यह विचारों का भूमि और उसकी प्रकृति पर प्रभाव हुआ । इसके अतिरिक्त इसके द्वारा पेड़-पौधों के बाह्य आकार-प्रकार और उसकी फलोत्पादक क्षमता को भी प्रभावित किया जा सकता है । किसी सामान्य नस्ल के पौधे में असामान्य प्रजाति के फल प्राप्त किये जा सकते हैं । बीमार पौधों को स्वस्थ और स्वस्थ को असाधारण आकृति-प्रकृति वाले रूपों में परिवर्तित किया जाना संभव है । इसी आशय का एक प्रयोग कैलीफोर्निया के एक कृषि विज्ञानी एलन फोर्ड द्वारा पिछले दिनों किया गया । उन्होंने अपने बाग में विभिन्न प्रकार के फल-फूल के अनेक पौधे लगा रखे थे एवं उनमें तरह-तरह के प्रयोग-परीक्षण किया करते थे । इसी बीच उन्हें विचारों की विलक्षण सामर्थ्य की जानकारी मिली । इसकी पुष्टि के लिए अपनी बगिया के पौधों पर कुछ प्रयोग करने का उनने निश्चय किया । इस संदर्भ में वे अपनी पुस्तक “मिरैकल्स ऑफ थॉट” में लिखते हैं कि जब उन्हें इसका पता चला , तो सबसे प्रथम प्रयोग उन्होंने एक काँटेदार सफेद गुलाब पर किया । वे हर दिन उस पौधे के पास पन्द्रह मिनट बैठ कर किसी पालतू जन्तु की तरह स्नेह करते और उससे मीठी-मीठी बातें करते हुए सर्वथा कंटकविहीन प्रजाति में बदल जाने का आग्रह करते । इस उपक्रम में तीन महीने बीत गये । चौथा महीना आरंभ होते ही उन्होंने देखा कि उसकी शाखाओं के काँटे स्वतः झड़ने लगे हैं । दो सप्ताह बीतते-बीतते पौधे के समस्त काँटे गिर गये । अब वह पौधे बिल्कुल शूलरहित हो गया था । इससे एलन का उत्साह बढ़ा उनने इसी प्रकार के और भी अनेक प्रयोग दूसरे पौधों पर किये । मिर्च पर किया, तो उसमें बीज रहित मिर्च फलने लगी । उसका आकार भी सामान्य से अनेक गुना बड़ा था नापने पन लम्बाई लगभग छः इंच पायी गई । इसकी प्रकार मटर, बैंगन, टमाटर आदि सब्जियोँ पर प्रयोग किये । प्रत्येक के साथ परिणाम आश्चर्यजनक पाये गये ।
इस लम्बे अनुभव व अध्ययन के उपरान्त ही उनने उक्त पुस्तक लिखी । इस मध्य अपने प्रयोग में विविध परिवर्तन भी किये और अलग-अलग परिवर्तनों के आधार पर प्राप्त परिणामों का सूक्ष्मतापूर्वक अवलोकन किया, यथा जब विचार उथले होते हैं, तो उन्होंने देखा कि या तो परिवर्तन संभव ही नहीं होते अथवा यदि होते भी हैं, तो प्रतिफल आशा के अनुरूप नहीं मिलते । इसके विपरीत विचारों में जब प्यारा-प्रेम का अधिकाधिक पुट होता है, तो नतीजा अप्रत्याशित प्राप्त होता है । इस प्रकार अपनी पुस्तक के अन्त में उन्होंने इस बात का स्पष्ट उल्लेख किया है कि यदि इस क्षेत्र में किसी को विफलता मिलती हो, जो कदाचित अप्रत्याशित भी नहीं है, तो इसे प्रयोगकर्ता की अपनी त्रुटि और विचारों की अशक्तता की परिणति भर माना जाना चाहिए न कि सच्चाई पर संदेह करना चाहिए, जो सौ टंच सोने की भाँति खरी साबित हो चुकी है ।
एक ऐसे ही प्रयोग का वर्णन रुथ मोण्टगोमरी ने अपनी पुस्तक “स्ट्रेंजर्स एमोंग अस” में किया है । वे लिखती हैं कि उनकी एक मित्र लॉरा ने जब विचारणा कि सामर्थ्य के बारे में सूना, तो सच्चाई जानने के लिए एक प्रयोग किया । एक दिन तीसरे प्रहर वह अपने लाँन में बैठ गयी । निरभ्र और नीले आकाश में सामने ही एक बादल का एक श्वेत टुकड़ा था । उसने विचारणा शक्ति का प्रभाव उसी पर आजमान शुरू किया । चार मिनट तक उस बादल के अदृश्य हो जाने की भावधारा के साथ विचार-संप्रेषण उसे लक्ष्य कर वह लगातार करती रही । उसने देखा कि धीरे-धीरे बादल की सघनता समाप्त होती जा रही है और चार मिनट पश्चात् वह आँखों से ओझल हो गया । उसने इस प्रयोग को कई बार दोहराया, तब इसकी सत्यता पर उसे विश्वास हो सका । मोंटगोमरी लिखती हैं कि इस प्रयोग को प्रख्यात प्रोफेसर एवं वैज्ञानिक पुस्तकों के लेखक एच. हैपगुड, जिनकी अनेक पुस्तकों की भूमिका आइंस्टीन ने लिखी है, ने भी कई बार दोहराया एवं सत्य पाया ।
अभी दो वर्ष पूर्व कीव यूनिवर्सिटी के मनोवैज्ञानिकों ने एक बड़ा विलक्षण प्रयोग किया । उनने यह जानना चाहा कि क्या समान चिन्तन का चेहरे-मोहरे पर भी असर पड़ता है? यदि हाँ तो कैसा ? इसके लिए मनोवैज्ञानिक दल ने समान विचारधारा वाले 20 विवाहित जोड़ों का चयन किया । उनके विवाह से पूर्व के और शादी के दस वर्ष पश्चात् के चित्र इकट्ठे किये गये इसके बाद निर्धारित लोगों को दोनों प्रकार की तस्वीरें बारी-बारी से दिखायी गई । शादी से पहले के चित्र को इकट्ठे रख कर उनमें से उनकी सही जोड़ियाँ तैयार करने को कहा गया । इसमें सफलता नगण्य जितनी ही मिली । सही चयन एक प्रतिशत ही किया जा सका । इसके बाद विवाह के पश्चात् के चित्र उनके सामने रखे गये और पुनः उसी क्रिया को दोहराने को कहा गया । आश्चर्य इस बात का है कि इस बार जोड़ी मिलाने में नब्बे प्रतिशत सफलता हाथ लगी । भिन्न लोगों और जोड़ियों के साथ उक्त प्रयोग को कई बार किया गया । थोड़े बहुत अन्तर के साथ परिणाम लगभग एक ही जैसे प्राप्त हुए । इसके आधार पर मनोविज्ञानियों ने यह निष्कर्ष निकाला कि एक ही प्रकार की विचारधारा शरीर-आकृति पर भी असर डाले बिना नहीं रहती और उसे सामान आकार-प्रकार प्रदान करने लगती है ।
सर्वथा इनकार नहीं किया जा सकता कि विचारणा में इतनी प्रचण्ड शक्ति है कि उससे जड़ एवं चेतन पदार्थों को भी समान रूप से प्रभावित किया जा सकता है । यदि उसका सुनियोजन कर आतिशी शीशे की भाँति किसी एक दिशा-एक लक्ष्य पर संधान किया जा सके , तो निश्चय ही उसका चमत्कारी परिणाम उपलब्ध हो कर रहेगा । इसकी दुर्धर्ष सामर्थ्य को देखते हुए हमें इसका लाभ उठाने और जीवन को उन्नतिशील-प्रगतिशील बनाने की बात सोचनी चाहिए । ध्यान में यही तो किया जाता है । वस्तुतः सार्थकता भी अध्यात्म अनुशासनों की इसी प्रक्रिया के अपनाने में है ।
एक धनी का बच्चा अभिभावकों द्वारा जेवरों से लादकर रखा जाता था चोरों की निगाह उस पर पड़ी । सो एक दिन मौका पाकर बच्चे को चुरा ले गये और उसके जेवर उतारकर कत्ल कर दिया ।
खोज लगाते हुए पुलिस ने इन चोरों को पकड़ लिया । राजाज्ञा में उन सभी को फाँसी की सजा सुनाई गई ।
साथ ही धनी की सारी सम्पत्ति भी शासन द्वारा जब्त कर ली गई । उससे कहा गया धन का उपयोग लोगों को रोजी देना या परमार्थ में लगाना है । आपने यह तो किया नहीं उलटे प्रदर्शन का अहंकार जताने लगे । आपकी समझदारी इस योग्य नहीं कि धन का सदुपयोग करके अपने बच्चों को सुरक्षित रख सके ।
गहरी मित्रता थी दोनों में । सगे भाइयों में भी ऐसा स्नेह कम ही देखने को मिलता है । यद्यपि दोनों की प्रकृति उनके शरीर की बनावट की भाँति बिल्कुल अलग थी, लेकिन यह विषमता उनके सम्बन्ध साम्य में दरारें नहीं डाल पाई ।
बिलीब्राण्ड मोटा था, मोटी और मजबूत थी उसकी उंगलियां उसका मुख्य गोल और चौड़े जबड़े वाला था । ब्राण्ड को न दाढ़ी रखना पसन्द था न मूंछें । था तो वह भी एक सामान्य किसान लेकिन उसके चिन्तन असामान्य थे । अरबपति बनने से कम की कल्पना में उसका मन न रमता ।
मेरे हल्के-फुल्के दोस्त! यदा-कदा वह हेंस से कहता ‘हम चूहे या गुबरैला नहीं हैं कि सदा मिट्टी खोदते रहेंगे । हमें आगे बढ़ना ही होगा । हाउस ऑफ लार्ड्स में भी हम तुम जैसे मनुष्य ही हैं ।’
‘आगे बढ़ने का अर्थ छीन झपटकर कुछ बटोर लेना नहीं होता ।’ हेंस मित्र को समझाने का प्रयास करता । मैंने हाउस ऑफ लार्ड्स के सदस्यों को देखा है वे पाइप या सिगार पीकर या डाक्टरों की गोलियाँ खाकर जीवन काटते हैं । गुस्से में भरी बिल्लियों के समान झगड़ते हैं । तकिए के नीचे रिवाल्वर रखकर भी उन्हें नींद लेने के लिए डाक्टर की दवा लेनी पड़ती है । अपनी पत्नी और बच्चों से भी सशंक रहते हैं और उनकी पत्नी तथा पुत्र भी उन्हें धोखा दे जाते हैं । वे ईश्वर से तो कोसों दूर हैं ही सुख सन्तोष शाँति ने भी उन्हें अछूत मान लिया हैं । ऊँचा-बड़ा मकान चमचमाते वाहन, अच्छे भड़कीले कपड़े और दर्जनों सैल्यूट ठोकने वाले अर्दली-इन पर खुश होने वाले वे भोले बालकों के समान हैं।
‘बन्द तो करो अपना लेक्चर ।’ ब्राण्ड की झल्लाहट हँसी में बदल जाती । हम अपने खेत पर खड़े हैं , गिरजाघर की वेदी पर नहीं ।
शायद वे दोनों-अपने जीवन शकट को इसी तरह चलाते रहते । किन्तु पूरे यूरोप में उन्हीं दिनों सांप्रदायिकता का उन्माद छा गया । मनुष्य पिशाच बन गया था । मनुष्य की हत्या करके वह स्वयं धर्मात्मा मानने लगा । पृथ्वी मानव रक्त से लाल और काली हो गई और आकाश चीत्कारों से सिर धुनने लगा था । ब्राण्ड पहले ही उत्सुक था दक्षिण अमेरिका जाकर सोने की खदान ढूँढ़ने के लिए । हेंस को इस मानव उन्माद ने मातृभूमि छोड़ने के लिए विवश किया ।
जिन दिनों वे अमेरिका पहुँचे वह आज का अमेरिका न था । अभी-अभी सभ्य समाज पता कर पाया था उस ‘नयी दुनिया’ का । ब्रिटेन ने उस अपना उपनिवेश बनाया था । पूरा देश वनों से भरा था-वन भी खूब सघन जिनमें वन्य पशुओं का आतंक था । पर शायद मानव आतंक से कम तभी तो लोग भाग-भाग कर यहाँ आ रहे थे । ढेरों यूरोपीय परिवार प्रतिदिन जहाजों से उतरते जा रहे थे ।
स्थानीय अधिकारियों को भी इसमें उत्सुकता थी कि उपनिवेश की आबादी बढ़े । भूमि खाली पड़ी थी और आगतों को आर्थिक सुविधा बना लें तथा जमीन को इस लायक बनावें कि वह वन्य जन्तुओं को आश्रय देने की जगह मानव को आहार दे सके ।
ब्राण्ट और हेंस भी औरों की तरह सपरिवार आए थे । दूसरों के समान ही इनके पास भी केवल अपने उद्योगशील शरीर की ही पूँजी थी ।
इन्हें भी औरों की तरह भूमि और आर्थिक सहायता प्राप्त हो गई । दोनों ने पड़ोस में भूमि ली- पास में घर बनाए थमा हुआ जीवन शकटिफर चल पड़ा ।
‘मैं केंचुओं की तरह जमीन खोदने यहाँ नहीं आया हूँ । ब्राण्ट बार-बार झुंझला उठता । उसे आश्चर्य होता अपने मित्र हेंस पर जो मेहनत के साथ खेती करता बचे समय में आबादी के बच्चों को लेकर पढ़ाता-लिखाता, उन्हें भाँति-भांति के शिक्षण देता । इन शिक्षणों को जब वह व्यक्तित्व विकास की तकनीक कहता तब ब्राण्ट को हँसी आ जाती ।
“मुझे तुम्हारी राह पसन्द नहीं । तुम मार्था की भली प्रकार देख-रेख कर सकते हो । मुझे इसी फसल की चिन्ता है । इसके बाद मैं दक्षिण चला जाऊंगा । फिर लौटने पर ता ़़़़डडडड” उसका मुख कल्पनाओं की सुनहरी आभा से चमक उठता ।
लेकिन उसे कई फसलों की प्रतीक्षा करनी पड़ी उस समय मशीनें थी नहीं । मजदूरों का अभाव था । जो गुलाम आते थे वे सोने की खानों में खप जाते थे । फिर मार्था अब अकेली कहाँ थी । नन्हे हेनरी की भी तो उसे सार सँभाल करनी थी ।
‘मेरा हेनरी बनेगा अमेरिका का सबसे बड़ा उद्योगपति’- ब्राण्ट की महत्वाकांक्षा की उद्दाम लहरें नन्हें शिशु को लपेट लेतीं ।
लेकिन इस बार फसल अनुकूल होते ही ब्राण्ट ने तैयारी कर ली । बहुत प्रतीक्षा के बाद आया था यह दिन । बोला-”मित्र हेंस । मार्था का ध्यान रखना । “ अपनी पत्नी से उसे प्यार है पर बड़प्पन से कम । दक्षिण के दुर्गम वनों में डाकुओं से भरी भूमि में इसी सुनहले बड़प्पन को ही खोजने तो जा रहा है ।
“ईश्वर तुम्हारी रक्षा करें । “ हेंस ने मित्र को विदा दी । एक मात्र वह था जिसे दक्षिण का सुवर्ण आकर्षित नहीं कर पाया था । अपनी खेती के अलावा उसने ढेरों नए-नए क्रियाकलाप चला रखे थे । मजाक में वह इन क्रियाकलापों को भी खेती कहता-महानता की खेती ।
काल के झकोरों में जीवन की किताब के अनेकों पृष्ठ उलटते गए । निस्संदेह अब जीवन का नया अध्याय सामने था । राजधानी के नगर में ब्राण्ट ने आलीशान कोठी बना ली । उसका बालक युनिवर्सिटी में पढ़ने लगा । उसकी अपनी कम्पनी खड़ी हो गई । अब वह अति विशिष्ट कहे जाने वाले व्यक्तियों में से एक था ।
हेंस ने भी अपने जीवन का विस्तार किया था । समूची आबादी उसकी अपनी थी । खेती के काम के अलावा वह बचे समय में लोगों को पढ़ाता-बाइबिल की कहानियाँ सुनाता । बच्चों के शिक्षण की व्यवस्था उसकी पत्नी एलन ने सम्भाली थी । कृषि उत्पादन से जुड़े हुए ढेरों छोटे-छोटे उद्योग उसने ढूँढ़ निकाले थे । पर इनमें से एक भी उसका अपना न था । वह तो सिर्फ शिक्षक और अन्वेषक था । उद्योग ग्रामवासी क्षेत्र में रहने वाले लोगों के थे । सभी का वह अपना था। सभी उसके थे । उसके जीवन से जैसे सहकार , प्रेम सदाशयता की नित नई रश्मियाँ फूटतीं । यदा-कदा नगर जाकर अपने मित्र ब्राण्ट से मिल आता ।
आज तो एकदम प्रातः ब्राण्ट की मोटर हेंस के दरवाजे पर आ खड़ी हुई । नगर का प्रख्यात उद्योगपति इस देहात में ।
“कितने स्वस्थ और प्रसन्न हो तुम हेंस।” ब्राण्ट के स्वर में ईर्ष्या न थी । “अब भी तुम दस साल पहले की भाँति लगते हो । तुम्हारी छोटी दाढ़ी के सब बाल पहले जैसे काले और सुन्दर हैं । कितना प्यार पाया है तुमने ।” ब्राण्ट ने बस्ती में घुसते ही जान लिया था कि हेंस सभी के दिलों में बस चुका था।
“तुम्हारे खिलौनों की क्या हालत है ?” हेंस पता नहीं क्यों बड़े भवनों, मोटरों, आभूषणों को खिलौने कहता है ।”
इन सालों में ब्राण्ट और भी मोटा हो गया था । उसकी तोंद निकल आयी है । उसका मुख शरीर के अनुपात में छोटा लगने लगा, और उसके गंजे सिर के बचे-खुचे केशों में आधे से अधिक सफेद हो चुके थे । उसकी उँगली की अँगूठी में बड़ा सा हीरा चमक रहा था ।
“वे सब ठीक हैं और बढ़ रहे हैं ।” शायद पहली बार ब्राण्ट ने हेंस की हँसी नहीं उड़ाई । “तुम ठीक कहते हो ये सब खिलौने हैं और ये खिलौने भी शैतान के दिये हुए । ये आदमी को अपने में बुरी तरह उलझा देते हैं ।”
“बात क्या है ?” हेंस चौंका । ब्राण्ट और ऐसी बातें करने लगे-आश्चर्य स्वाभाविक था ।
‘मैं तुम्हारे पास रहने आया हूं । पता नहीं क्यों तुम्हारे पास मुझे एक अजीब शान्ति मिलती है ।’
“तुम किसान बनोगे ?” हेंस को कुछ समझ में नहीं आ रहा था । “तुम्हारी महानता की फसल के बीच कुछ समय बिताऊँगा ।” ब्राण्ट ने शान्त स्वर में कहा “तुम देख नहीं रहे हो कि मेरा बड़प्पन मुझे खाए जा रहा है । मुझे अब तीसरे दिन डाक्टर बुलाना पड़ता है । कई बार नींद की दवा लेनी पड़ती है । मार्था तक अब मेरा विश्वास नहीं करती । मैंने सम्पत्ति के रूप में पाया है रोग, चिंता, आशंका, और स्वजनों का अविश्वास । “
“चलो! तुम तथ्य को अंततः समझ सके ।” दोनों के कदम एक ओर बढ़ चले । इस तथ्य को हम स्वयं कितना समझे हैं बड़प्पन या महानता ? स्वयं के जीवन पटल पर उभरने वाले इस गम्भीर प्रश्न का समुचित उत्तर हमारा प्रत्येक कर्म बने । हेंस किस्टेनसन् के जीवनीकार-हेरीहेनर ने अपनी रचना “कम्पेनियन ऑफ एनलाइटेन्ड हयूमेनिटी “ में यही विश्वास सँजोया है ।
मन सभी के पास है, पर कितने हैं जो उसका समुचित और सर्वांगीण प्रयोग कर पाते हैं । अधिकाँश व्यक्ति आयु की दृष्टि से बड़े हो जाने पर भी मन को वैसा ही बनाये रहते हैं जैसा कि बचपन में था और जैसा कि परिवार के वातावरण में उसका ढलाव हुआ था । यह परावलम्बी मन ही बड़े होने पर संपर्क क्षेत्र से प्रभावित होता रहता है जो लोगों को करते देखता ही वही करने लगता है । जो सुनता है, उसी को सच मानने लगता है ।
बच्चों की मानसिक संरचना ऐसी ही होती है । उसमें अनुकरण की लालसा का सबसे बड़ा अंश होता है । बड़ों को जिस प्रकार बोलते, चलते, करते, खाते, हँसते, झल्लाते देखते हैं उसी की नकल वे भी करने लगते हैं । गुण-दोष पर विचार नहीं करते । उन दिनों मन ही प्रधान होता है । मन का स्वभाव है दूसरों की विशेषतया बड़ों की नकल करना । वस्त्र, आभूषण, साज-सज्जा जिस प्रकार की सामने आती और आकर्षक लगती है उसी को अपनाने के लिए मन मचलता है । इसी को कहते हैं भेड़िया धसान । कीर्तन, डिस्को या गरबे में औरों को गाते, नाचते देखकर अपनी हरकतें भी अनायास वैसी ही होने लगती हैं इसी को कहते हैं वातावरण का प्रभाव । दुर्बल मन वाले उसी से प्रभावित होते तथा वैसी ही रीति नीति अपनाते हुए दिन गुजारते हैं ।
उचित और अनुचित की विवेचना कर पाना परिपक्व बुद्धि का काम है। यह परिपक्वता निजी प्रयासों से बढ़ती है । आरंभ में हर काम को शंका की दृष्टि से देखा जाय और निरखा-परखा जाय कि वह स्वयं कहीं गलत ही तो नहीं है । गलत साँचे में ढालने पर पुर्जे या खिलौने भी गलत ही ढलते हैं । इसके लिए जन समुदाय या वातावरण को औचित्य की कसौटी पर कसकर यह देखा जाना चाहिए कि वे अपने आप में सही हैं या नहीं । यदि संदेह हो तो तर्कों और तथ्यों की कसौटी पर कहकर यह देखा जाय कि जो प्रस्तुत है उसमें से किसे सीमा तक स्वीकार किया जाय ?
प्रस्तुत समाज में अवाँछनीयता की भरमार है । जिधर भी देखा जाय अनैतिक विचार और अन्धविश्वास-दुराग्रहों की भरमार है। इनमें ऐसे कम ही हैं जिन्हें मन मार कर अपनाया जा सके । अधिकाँश तो ऐसे हैं जिन्हें अमान्य ठहराया जाय और अस्वीकृत किया जाय । भले-बुरे के घुले मिले प्रचलन में हमें कसौटी बन कर रहना चाहिए और उस प्रकार जाँच-पड़ताल करनी चाहिए जिस प्रकार खरे-खोटे सिक्कों को कई प्रकार से जाँचने के उपरान्त स्वीकार किया जाता है । हर किसी की हाँ में हाँ मिलाने से, हर किसी बड़े कहलाने वाले व्यक्ति के कथन को मान्यता देने से हम भ्रम में पड़ते हैं । इस बात को ध्यान में रखते हुए हमें तर्क और तथ्य के आधार पर उसी को अँगीकार करना चाहिए जो मान्यता प्राप्त करने योग्य अपनी गुणवत्ता के आधार पर रही है ।
कोई समय था जब सतयुगी चलन थे । मानवों में देवत्व की मात्रा बढ़ी-चढ़ी थी । सम्मान मात्र श्रेष्ठता को ही मिलता था । उन दिनों यह उचित और-उपयुक्त था कि जिस राह पर बहुत जन चलते हैं, जिसे बड़े लोग कहते हैं उसे यथावत स्वीकार कर लिया जाय, किन्तु आज की स्थिति विपरीत है । आज लोग धूर्तता के बल पर बड़े बनते हैं और विडंबनाएं रचकर प्रचार माध्यमों से निजी जीवन में हेय होते हुए भी सम्माननीय पद पर जा पहुँचते हैं । तब अविचारवान वर्ग में उनके कथन और चरित्र को भी गले उतारा जाने लगता है । यह अन्धानुकरण पतन का मार्ग है । अन्धी भेड़ों के पीछे चल पड़ना किसी भी प्रकार बुद्धिमत्तापूर्ण नहीं हैं ।
किसी पर संदेह करते समय यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि उसमें छिद्रान्वेषण या दोषारोपण की प्रवृत्ति न घुस पड़े । संदेह का तात्पर्य इतना ही है कि वस्तुस्थिति जानने के लिए सभ्य ढंग से प्रयास किया जाय । ऐसा न हो कि किसी पर लाँछन लगाया जाय, अविश्वास किया जाय । इस प्रकार की जाँच-पड़ताल अविश्वास उत्पन्न करती और अपमान जनक लगती है जो जाँचा या पूछा जाय उसमें स्नेह, सद्भाव , और जिज्ञासा का समावेश होना चाहिए । समय को देखते हुए फूँक-फूँक कर कदम रखना आवश्यक है । लोगों ने आडम्बर के ऐसे जाल बिछा रखे हैं कि भावुक या विश्वासी प्रकृति कि व्यक्ति का सहज फँस जाना स्वाभाविक है । यह विपत्ति अपने ऊपर न टूटे इसके लिए आवश्यक सतर्कता बरती जानी आवश्यक है ।
संदेह के अन्वेषण का उद्देश्य इतना ही है कि यथार्थता को जाना जा सके । जहाँ सदाशयता है वहाँ विश्वास किया जाना चाहिए और सराहा जाना भी । इसके भी एक कदम आगे बढ़ कर सद्भावना, सदाशयता को समर्थन एवं सहयोग दिया जाना चाहिए ।
यह भी हो सकता है कि व्यक्ति चरित्रवान हो और शुद्ध हृदय भी । इतने पर भी यह नहीं कहा जा सकता कि वही व्यक्ति सही विचार भी रखता होगा । पिछले दिनों भक्ति और अहिंसा क्षमा का ऐसे जोर-शोर से प्रतिपादन हुआ कि उसे अनुपयुक्त ही नहीं अव्यावहारिक भी कहा जा सकता है । यों इन प्रतिपादनों का प्रचार भोले भाले लोगों द्वारा किया गया था । उन पर दुर्भावना का दोषारोपण नहीं किया जा सकता, पर इतना तो मानना ही पड़ेगा कि वे अतिवाद के शिकार हो गये । भावुकता के प्रवाह में बह गये और अनुयायियों पर ऐसा प्रभाव डालने लगे, जिसे उन्हें भटकाव से ग्रसित होकर उस राह पर चलाया गया जो किसी भी दृष्टि से उपयुक्त न था ।
क्षमा धर्म अपनाने से हृदय परिवर्तन की आशा की गई थी, पर हुआ उसका ठीक आतंकवाद को दूने उत्साह से अनीति पर आरुढ़ होने का प्रोत्साहन मिला । इसी प्रकार भक्ति का तात्पर्य परावलम्बन से जुड़ गया । अदृश्य सत्ता को भक्तवत्सल कहा गया और माना गया कि मनुहार-उपहार के सहारे उसे अपना पक्षधर बनाया जा सकता है और मनचाहा काम करवाया जा सकता है । वस्तुतः ऐसा होता नहीं । निराकार को किसी आकृति विशेष में अवरुद्ध करना और उसे दर्शन देने के लिए प्रकट होने का आग्रह करना सर्वथा अवैज्ञानिक है । दिवा स्वप्न कोई भी देख सकता है , पर पवन को किसी प्राणी विशेष का रूप धारण करके प्रकटाने के लिए मचलना उपहासास्पद है । ब्रह्म को शरीरधारी देखने में अपनी आस्था को तो श्रेय दिया जा सकता है पर वैसी वस्तुस्थिति नहीं हो सकती । चूँकि किन्हीं त्यागी तपस्वी ने ऐसी बातें कही या लिखी हैं इस कारण उसे मान्यता नहीं मिलनी चाहिए ।
वर्गीकरण-विश्लेषण की इन दिनों काफी सुविधा है । तर्क और तथ्य को अपनाने वाला प्रत्यक्षवाद भी बलिष्ठ हुआ है । इतने पर भी छद्म का विस्तार होता चला गया । प्रवंचना और विडंबना बढ़ी । साथ ही ऐसा भी हुआ कि नये किस्म का अन्धविश्वास पुराने की अपेक्षा नये कलेवर में प्रकट हुआ। कुछ समय पहले मिथ्यात्व को पकड़ एवं समझ सकना सरल था, पर अब सत्य के साथ असत्य इतना घुल−मिल गया है कि वस्तुस्थिति को समझ पाना सरल नहीं रह गया है ।
अनुकरण की स्वाभाविक प्रवृत्ति सजीव रहें, पर उससे पूर्व यह निश्चित होना चाहिए कि जिस पर श्रद्धा का आरोपण किया जा रहा है वह यथार्थ भी है या नहीं । कितनी ही अन्धपरम्पराएँ पूर्वजों से लेकर अब तक यथावत चली आती हैं । कुरीतियों को सनातन धर्म माना जाता है व यह कहा जाता है कि जो चल रहा है , उसे चलने देने में ही भलाई है । युगधर्म यह कहता है कि किसी वस्तु को ग्रहण करने या समर्थन देने से पूर्व उसकी उपयोगिता और यथार्थता को अनेक कसौटियों पर कस लिया जाय ।
एक बुढ़िया और उसकी सयानी लड़की कहीं लम्बी यात्रा पर गई थीं । लड़की को चलने का अभ्यास न था वह थक गई थी और पैरों में छाले पड़ गये थे ।
उसी रास्ते एक घुड़सवार निकला । बुढ़िया ने उससे कहा । कुछ दूर मेरी बेटी को घोड़े पर बिठाले । तब तक मैं भी पैदल पहुँच जाऊँगी । घुड़सवार ने व्यर्थ झंझट में न पड़ने की बात सोच कर स्पष्ट इनकार कर दिया ।
कुछ दूर चलने पर सवार के मन में बदी आई । सोचा लड़की को ले भगाने का यह अच्छा मौका है । इसे छोड़ना नहीं चाहिए ? उधर बुढ़िया के मन में भी यह विचार आया कि मैं क्यों भूल कर रही थी । अजनबी घोड़े वाला उसकी लड़की को ले भागता तो कैसी बुरी बात होती ।
घुड़सवार वापस लौट आया और बुढ़िया से बोला । इस लड़की को घोड़े पर बिठा दो । बुढ़िया ने भी इस बार स्पष्ट इनकार कर दिया और बोली जिसने तेरे मन में नई सूझ उगाई है उसी ने मेरे कान में सावधान होने की बात कह दी है। दोनों अपने-अपने रास्ते चले गये ।
इस सृष्टि में स्थिर कुछ भी नहीं है । जो स्थिर जैसे दिखाई पड़ते उनमें भी स्थिरता नहीं है । यहाँ सब कुछ गतिशील है । जड़ पदार्थ के अणु परमाणु के भीतर के कण सदा बन्द वृत्तों में गतिमान रहते हैं । चन्द्रमा, पृथ्वी की और पृथ्वी, सूर्य की परिक्रमा कर रहे हैं । सूर्य भी एक जगह टँगा नहीं रहता । वह अपने सौर-परिवार के सदस्यों समेत महा सूर्य की, और महासूर्य किसी विराट् सूर्य का परिभ्रमण करने दौड़ा चला जा रहा है । इस क्रम का अन्त नहीं और संभवतः यह तब तक बना रहेगा, जब तक यह सृष्टि रहेगी । गतिशीलता उसका प्रमुख लक्षण है ।
स्थिरता अन्दर भी नहीं है । शरीर के भीतर सम्पूर्ण अवयव एक स्वसंचालित प्रक्रिया द्वारा अपने-अपने कार्यों में निष्ठापूर्वक जुटे हैं । हृदय का आकुँचन-प्रकुँचन अहर्निशि चलता रहता है । धमनियों में रक्त-प्रवाह एक क्षण के लिए भी रुकता नहीं । पाचन−तंत्र खाद्यान्नों को पचाने और ऊर्जा पैदा करने में मुस्तैदी दिखाता रहता है । फेफड़े भी अपनी गतिविधियाँ कहाँ रोकते हैं ? वह रुक जायँ, तो मनुष्य का प्राणान्त देखते-देखते हो जाय । मस्तिष्क की अपनी क्रियाप्रणाली है । वह उसे अपने ढंग से निरन्तर जारी रखता है । वैसे, बाहर से यह सब शान्त और गतिहीन जान पड़ते हैं, पर शरीरशास्त्री जानते हैं कि यदि भीतर का गतिचक्र रुक गया ता शरीर को जीवित रख पाना मुश्किल ही नहीं, असंभव भी हो जायेगा ।
निश्चलता जड़ जैसे दीखने वो पहाड़-पर्वतों पत्थर-चट्टानों में भी नहीं । उनके भीतर के परमाणुओं में भी हलचल जारी है । इलेक्ट्रॉन जैसे सूक्ष्म कण उनमें निश्चित कक्षा में चक्कर काटते ही रहते हैं । उनमें से कोई अपने दायित्व का सर्वथा त्याग कर दे, कर्तव्य का निर्वाह न करें, तो पदार्थ सत्ता का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाय । पिंड हो अथवा ब्रह्माण्ड , जड़ हो या चेतन हलचल सब में हो रही है । गतिशील सभी हैं ।
गति ही जीवन है और विराम मृत्यु । इस संस्कृति में सुव्यवस्था , क्रमबद्धता एवं पदार्थ व जीवन सत्ता बने रहने के लिए गति आवश्यक है । गति स्वयं पृथ्वी में ही नहीं , उसके पृथक-पृथक टुकड़ों एवं प्लेटों में भी विद्यमान है । भूगर्भशास्त्रियों का मत है कि पृथ्वी के टुकड़े भी चलायमान हैं । उनके अनुसार वे अनेकों बार जुड़े । सात महाद्वीपों में पृथ्वी का विभाजित होना टेक्टोनिक प्लेटों की गतिशीलता का ही परिचायक है । अधुनातन शोधों के अनुसार ये महाद्वीप भी अपने-अपने स्थानोँ से खिसक रहे हैं । यह भी ज्ञात हुआ है कि पृथ्वी पूरी तरह ठोस नहीं है । इसके केन्द्र में अतिशय गाढ़ा तरल पदार्थ है, जिस पर 65 कि.मी. से 95 कि.मी. तक की मोटी परत के दस टुकड़े तैरते रहते हैं । इस विज्ञान के विशेषज्ञों का कथन है कि बीस करोड़ वर्ष पहले ये टुकड़े परस्पर मिले हुए थे । इनका पृथक अस्तित्व नहीं था, फलतः महाद्वीप भी एक ही था । गति के कारण कालक्रम में यह सात भागों में विभाजित हो गया, जिन्हें आज हम सात महाद्वीपों के रूप में जानते-मानते हैं । यह महाद्वीप भी स्थिर नहीं हैं । 1 सें. मी. से लेकर 15 सें. मी. प्रति वर्ष ये विभिन्न दिशाओं में खिसकते जा रहे हैं । यूरोप और उत्तरी अमेरिका एक-दूसरे से प्रति वर्ष 2.5 सें. मी. दूर होते जा रहे हैं । हर वर्ष अनेक स्थानों पर अनेक भूकम्पों, ज्वालामुखियों की विभीषिका का एक कारण यह भी बताया जाता है कि यदा-कदा तैरती टेक्टोनिक प्लेटें आपस में टकरा जाती हैं, जिससे पृथ्वी सतह पर तीव्र कंपन होता एवं कहीं-कहीं इस भीषण टक्कर से गर्म तरल पदार्थ (लावा) भी बाहर निकल आता है । यही भूकम्प आने व ज्वालामुखी फटने का एक प्रमुख कारण बताया जाता है । इस क्रम में कई बार कई जगहों पर नये पहाड़ निकल आते, तो अनेक स्थान समुद्र के गर्भ में समा जाते हैं । विशाल हिमालय पर्वत के उद्भव का यही रहस्य है । कहा जाता है कि अब वह जहाँ है, वहाँ कभी समुद्र हुआ करता था । दूसरी ओर विश्व के दो प्राचीनतम महाद्वीप लैमूरा एवं एटलाँटिस अब जलमग्न हो गये हैं ।
उत्तरी ऐंजिलिया यूनिवर्सिटी के भूगर्भ वैज्ञानिक एफ. जे. बिने एवं कैंब्रिज विश्वविद्यालय के डी. एच. मैथ्यू ने कुछ वर्ष पूर्व अपने अनुसंधानों के आधार पर घोषणा की कि पृथ्वी के ध्रुव खिसकते हुए अपना स्थान परिवर्तित करते जा रहे हैं । उनके अनुसार पिछले ध्रुव स्थानान्तरण के 7 लाख वर्ष बीत गये । अब पुनः उसी की पुनरावृत्ति की प्रक्रिया चल रही हैं । यह रहस्योद्घाटन शोध कार्य के निमित्त बनाये गये ग्लैमर चैलेन्जर जलयान द्वारा समुद्र की तलहटी का सर्वेक्षण करने के उपरान्त किया गया । तलहटी में करीब 300 गहरे छिद्र पाये गये । इससे एकत्रित मिट्टी 16 करोड़ वर्ष पुरानी बतायी जाती है । इस प्रकार की शोध के लिए अमेरिका में स्थापित पाँच संस्थानों में से प्रमुख स्क्रिप्स “इन्स्टीट्यूशन ऑफ ओशिनोग्राफी” द्वारा यह जानकारी उपलब्ध करायी गई है ।
मूर्धन्य भूगर्भ विज्ञानी राबर्टजीन एवं जान हौल्डन (अमेरिका) का कहना है कि 20 करोड़ वर्ष पूर्व जापान उत्तरी ध्रुव के समीप था और भारत दक्षिणी ध्रुव के निकट । स्थानान्तरण के क्रम में सर्वप्रथम आस्ट्रेलिया और भारत का दक्षिणी भाग दक्षिणी ध्रुव से अलग हुए और क्रमशः खिसकते हुए वर्तमान स्थिति में आ गये । वैज्ञानिकों के अनुसार यह प्रक्रिया 18 करोड़ वर्ष पूर्व प्रारंभ हुई, जिसमें सर्वाधिक यात्रा भारत के हिस्से पड़ी । इस भूभाग ने 8800 मील की दूरी इस कालखण्ड में तय की ।
उक्त वैज्ञानिकों के अनुसार आने वाले समय में उत्तरी दक्षिणी अमेरिका पश्चिम की ओर बढ़ेंगे तथा पनामा और मध्य अमेरिका उत्तर की ओर । पृथ्वी की भीतरी हलचलों के कारण भविष्य में हिमालय और ऊँचा उठेगा तथा भारत पूर्व की ओर बढ़ेगा । आस्ट्रेलिया उत्तर की ओर गति करता हुआ एशिया से मिल जायेगा । भूमध्य सागर में भी नये द्वीपों के उभरने की संभावना व्यक्त की जा रही है । ऐसी स्थिती में जैसे-जैसे अफ्रीका और यूरोप नजदीक आते जायेंगे, भूमध्य सागर का अस्तित्व क्रमशः घटता-मिटता जायेगा ।
यह गतिशीलता ग्रह-नक्षत्र, वृक्ष-वनस्पति, नदी-नाले सबमें समान रूप से दृष्टिगोचर होती है । गंगा को ही लें । कहा जाता है कि काशी में यह पवित्र नदी अब से दो सौ वर्ष पूर्व जहाँ बह रही थी, अब उससे काफी दूर चली गई है । हरिद्वार में उसकी सात धाराएँ वर्षों पूर्व जिधर से बहती थीं, वर्तमान में वे अपना वह स्थान त्याग चुकी हैं । समुद्र इसका अपवाद नहीं । उड़ीसा का कोणार्क मन्दिर इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि सदियों पूर्व वह सूर्य मन्दिर जब बना था, तब तटवर्ती समुद्र उसका पाद-प्रक्षालन करता था, किन्तु अब वह मीलों दूर हट गया है ।
गति एवं परिवर्तन सृष्टि की अनिवार्य प्रक्रिया है । मनुष्य एवं उसकी मान्यताएँ इससे अछूती नहीं हैं । देखने में मनुष्य तो स्वयं चलता-फिरता नजर आता है, पर अपनी जड़-मान्यताएँ बन्दरिया के मरे बच्चे की तरह अपनी से चिपकाए रहता और जड़ता का परिचय देता है । इस प्रकार इस संदर्भ में वह सृष्टि के नियमोँ का उल्लंघन करता है । देखा जाता है कि जो प्रचलन अब से सौ वर्ष पूर्व तत्कालीन परिस्थितियों के अनुरूप सही थे, किन्तु अब अनुकूल नहीं रहे, उन्हें भी वह छाती से लगाये रहने का दुराग्रह करता है, जबकि होना यह चाहिए कि वर्तमान परिवेश में बदली परिस्थितियों के अनुरूप वह नवीन और विवेकशील प्रथा-परम्पराओं का शुभारंभ-श्रीगणेश करे । जब त्वचा समय-समय पर अपनी कोशिकाएँ बदलती पुरानी को त्यागती और नवीन बनाती रहती है, साँप केंचुल छोड़ते, वृक्ष-वनस्पति पुराने पत्ते गिराकर नयी किसलयों को धारण करते रहते हैं, तो मनुष्य अपवाद क्यों ? उसे भी निर्धारित प्रवाह के अनुरूप चलना चाहिए , अन्यथा जड़ता-प्रतिगामिता अपना कर वह देर तक अपना अस्तित्व बनाये नहीं रह सकता । पृथ्वी यदि घूमना छोड़ दे, नदियाँ स्थिर बने रहने का हठ करने लगें तो या तो वह स्वयं अस्तित्व खो देती हैं अथवा प्रकृति यह कार्य कर देती है । मनुष्य का भी परिवर्तनशीलता धारण किये रहने में ही कल्याण है । यही सृष्टि का शाश्वत नियम है । इसी में गति और जीवन है
महर्षि स्वामी दयानंद ने समाज सुधार का महत्वपूर्ण कार्य किया । प्रतिगामी पंडित उनसे बहुत जलते थे । प्रत्यक्षतः कुछ कर तो नहीं सकते थे । पर एक दिन अपनी भड़ास निकालने के लिए एक भोंड़ा जुलूस निकाला ।
गधे के गले में एक तख्ती लगाई थी । जिस पर लिखा था “स्वामी दयानंद” । उस गधे को भीड़ तरह-तरह से तिरस्कृत भी करती जाती थी ।
इस समाचार को किसी ने स्वामी जी तक पहुँचाया उनने कहा नकली की तो ऐसी ही दुर्गति होती है । नकली दयानंद का उपहास होना ही था जो ठीक भी हुआ ।
दुःख संसार में बहुत है । जीवन में ऐसी अगणित समस्यायें हैं जो मनुष्य को खिन्न करती हैं । सुख और प्रसन्नता देने वाले अवसर तो कभी-कभी ही आते हैं । अन्यथा ऐसी उलझनें ही सामने खड़ी रहती हैं जो हैरानी अनुभव कराती रहती हैं । इस बहुसंख्यक कठिनाइयों से क्या किसी प्रकार बचा जा सकता है ? क्या कोई ऐसा भी उपाय है जिसके आधार पर प्रसन्नता बनी रहे ? खिन्नता से पीछा छूटा रहे ?
इस संदर्भ में गीताकार ने एक नुस्खा बताया है उसे कोई भी परख सकता है । जो भी परखेगा वह उसे सही पावेगा । गीता कहती है-
प्रसादे सर्वदुःखानाँ हानिरस्योपजायते । प्रसन्न चेतसो ह्याशु ,बुद्धि पर्यवतिष्ठति । ।
अर्थात् प्रसन्न रहने से समस्त दुःखों का निवारण हो जाता है । चित्त को प्रसन्न रखने से बुद्धि स्थिर, स्थायी हो जाती है । वह डाँवाडोल नहीं होती ।
जहाँ प्रश्न उत्पन्न होता है कि प्रसन्न रखने वाली सुखद परिस्थितियां हों तब, न मन प्रसन्न रहेगा । अथवा मन को प्रसन्न रखने से दुःखों की हानि होगी । यह बात तो समक्ष में आती है कि प्रसन्नतादायक परिस्थितियाँ हों, सुखद, अनुकूल, श्रेय सफलता से भरे अवसर हों, तो चित्त प्रसन्न रहे । पर यह समझना कठिन पड़ता है कि चित्त को प्रसन्न रखने का स्वभाव बना लिया जाय तो दुःखों का समापन हो जाता है । प्रश्न कठिन है, और समझ में आने वाला भी, पर जो इसका प्रयोग परीक्षण करके देखेंगे उन्हें तथ्य की सचाई में कोई संदेह प्रतीत न होगा ।
स्वभाव बना लेना अपने हाथ की बात है । वह अभ्यास से बन जाता है । कितने ही व्यक्ति ऐसे होते हैं जो रूखे , नीरस, उदास स्वभाव के होते हैं । परिस्थितियाँ अनुकूल ही क्यों न हों, पर उनके चेहरे पर सदा उदासी ही छाई रहती है, गंभीर मुखमुद्रा बनाये रहते हैं, भंवें चढ़ी रहती हैं । मस्तक पर झुर्रियाँ खिंची रहती हैं । ऐसा लगता है कि यह किसी से लड़कर आये हैं अथवा इनसे कोई लड़ा है । इन्हें किसी बड़े घाटे का सामना करना पड़ा है । घाटा हो चुका है या होने वाला है । कारण पूछने पर वे ऐसा कुछ कारण बता नहीं पाते जिससे वे परेशानी में फँसे मालूम पड़ते हैं । यह स्वभाव ही है जो बहुत दिन के अभ्यास से पड़ जाता है ।
स्वभाव और आदत एक ही बात है । बहुत दिन किसी काम को करते रहने से उस काम की आदत पड़ जाती है । लुहार इतना भारी हथौड़ा दिन भर चलाते हैं, पर हाथ में दर्द नहीं होता । यदि वैसी आदत न हो, कोई व्यक्ति अनायास ही एक दिन उतना हथौड़ा चलावे तो हाथ में दर्द होने लगेगा । पहलवानी करने वाले ढेर सारे दण्ड बैठक करते हैं, पर उन पर कोई दबाव नहीं पड़ता, किन्तु कोई अजनबी आदमी अचानक एक दिन उतनी कसरत करे तो फिर सारे शरीर में दर्द होने लगेगा । दर्द के मारे उठना बैठना तक कठिन हो जायगा । यह आदत की बात है । इसी प्रकार नशे की आदत होती है । पीने वाले एक-एक बोतल चढ़ जाते हैं, पर नया आदमी एक दिन उतनी पी बैठे तो लेने के देने पड़ जायेंगे यह बात स्वभाव के संबंध में भी है । नाराजी , खीज, उदासी आदि की भी आदत होती है । आवश्यक नहीं कि कोई निमित्त कारण वैसा हो । अकारण ही स्वभाववश झल्लाहट का स्वभाव बन जाता है । कितने ही बच्चों को रोने की आदत पड़ जाती है । बिना किसी कष्ट के भी वे रोते रहते हैं । इसी प्रकार हँसने मुस्कराने का स्वभाव भी है जो अभ्यास करने से आदत में सम्मिलित हो जात है । चेहरे की माँसपेशियाँ इस प्रकार ढल जाती हैं कि साधारण रीति से बात चीत करने पर भी ऐसा लगता है मानो हँस या मुस्करा रहे हैं ।
हर आदत का अभ्यास करना पड़ता है । इसमें समय लगता है । आरंभ में उसका ध्यान रखना पड़ता है कि इच्छित आदत के अनुरूप मुखाकृति बन रही है या नहीं । इसके लिए दर्पण की सहायता ली जा सकती है । अकारण हँसने-मुस्कराने का अभ्यास शीशे के सामने खड़े होकर किया जा सकता है । कुछ समय उपरांत वैसी आदत पड़ जाती है और बिना किसी प्रयत्न के अनायास ही चेहरे की माँसपेशियाँ, होंठ, दाँत सब इस ढाँचे में ढल जाते हैं कि चेहरा हँसता मुसकराता दृष्टिगोचर हो ।
ऐसी आकृति का चेहरा सामने वाले को देखने में बहुत सुन्दर लगता है । उसे प्रतीत होता है कि इसे किसी लाभदायक परिस्थिति में रहने का अवसर मिला है । ऐसे आदमी के समीप रहने का , बात करने का, दोस्ती बढ़ाने का हर किसी का मन होता है । सामने वाले की प्रसन्नता देखकर अपनी प्रसन्नता बढ़ती है अपनी बढ़ने से सामने वाले की । इस प्रकार एक चक्र बन जाता है ।
इसके विपरीत यदि खीज, उदासी की आदत हो तो अपना चेहरा देखकर सामने वाले को उदासी आवेगी । सामने वाले से अपनी । यह भी एक चक्र बन जाता है । उदासी, असफलता का , खिन्नता का चिन्ह है जिसके बारे में ऐसा अनुमान होता है कि यह किसी हैरानी में फँसा हुआ है उससे हर आदमी बचने की कोशिश करता है उसे अभागा या मूर्ख मानता है । सोचता है कि इसकी मुसीबत में हमें भी हिस्सेदार बनना पड़ सकता है । ऐसा सोचकर हर आदमी उससे बचने की , दूर रहने की कोशिश करता है। ऐसी मुखमुद्रा नाराजी की सूचक है । जो अपने से नाराज है उससे अपनी भी नाराजी क्यों न हो । यह भी एक चक्र है जो समूचे वातावरण को बिगाड़ देता है । अकारण ही वातावरण में विषाक्तता भरती है । उसका परिणाम अपने लिए अनेक प्रकार से अहितकर ही होता है ।
सुख और दुःख परिस्थितियों पर उतना निर्भर नहीं, जितना मनःस्थिति पर । मनःस्थिति में यदि प्रसन्नता का पुट हो तो छोटी-छोटी विपत्तियों का पता भी नहीं चलता । वे ऐसे ही हँसी मजाक में हलकी फुलकी होकर उतर जाती हैं । बड़ी विपत्ति हो तो भी आधी रह जाती है । विपत्ति में भी जो मुसकराता रहता है उसे धैर्यवान, हिम्मतवाला, दूरदर्शी माना जाता है । उसका वजन हर किसी की आँखों में बढ़ जाता है । उसकी सहायता करने की, सहानुभूति प्रदर्शित करने की हर किसी की इच्छा होती है ।
मनोविज्ञानी और शरीरविज्ञानी कहते हैं कि हँसने मुस्कराने की आदत स्वास्थ्य को अच्छा रखने एवं सुधारने की दृष्टि से रामबाण औषधि के समान है । इससे हृदय, मस्तिष्क तो बलवान रहता ही है , पाचन तन्त्र, श्वासतन्त्र, आंतें आदि सभी ठीक रहते हैं । यदि कारणवश कोई मशीन खराब भी हो जाय तो उसे ठीक होने में देर नहीं लगती । न डॉक्टर की जरूरत पड़ती है, न हकीम की । न इंजेक्शन लगाने पड़ते हैं न कैप्सूल निगलने पड़ते हैं । रोग का कायदा यह है कि वह हँसने मुस्कराने वाले के पास या तो आता ही नहीं या फिर ठहरता नहीं ।
मनोविज्ञानी कहते हैं कि प्रसन्नचित्त व्यक्ति का मानसिक विक्षेप नहीं होता । बुद्धि का डाँवाडोल होना मनुष्य की सबसे बड़ी हानि है । अर्धविक्षिप्त आदमी सही निर्णय नहीं ले सकता । विचारतन्त्र ही जिसका गड़बड़ा गया है वह कभी सही निर्णय नहीं ले सकता । जिसके सही निर्णय नहीं है वह किसी गुत्थी को सुलझा नहीं सकता । कोई महत्वपूर्ण कदम सही रूप में नहीं उठा सकता । यदि सही कदम नहीं उठाया गया है तो सीधे सरल कामों में भी सफलता नहीं मिल सकती।
मनुष्य शरीर साढ़े पाँच फुट लम्बा तथा एक सौ तीस पाउण्ड भारी होता है । सबके हाथ पैर, नाक कान एक जैसे होते हैं । आदमी-आदमी में साधारणतया कोई फर्क नहीं होता । फर्क केवल अकल का होता है । उसी के कारण कोई बुद्धिमान कोई मूर्ख, कोई महान, कोई क्षुद्र, कोई धनी, कोई निर्धन, कोई सफल, कोई असफल होता है । इस बुद्धितन्त्र का सही गलत होना इस बात पर निर्भर है कि व्यक्ति
संतुलित है या नहीं । मानसिक संतुलन का एक ही चिह्न है कि चेहरे पर उदासी, निराशा, खीज चढ़ी हुई है या हर स्थिति में मन स्थिर और बुद्धि संतुलित है ।
बात घूम फिर कर वहाँ आती है कि सफलता-समृद्धि हस्तगत होने पर मनुष्य प्रसन्न रहे अथवा प्रसन्न रहने की आदत होने पर व्यक्ति हर दृष्टि से सही सुदृढ़ और सुनिश्चित रहे । दोनों में से कौन सी बात सही है ? इसका उत्तर देते हुए गीता में भगवान ने कहा है कि प्रसन्न रहने वाले के समस्त दुःखों का निवारण हो जाता है । उसकी बुद्धि स्थिर रहती है । इतना जिसे उपलब्ध है समझना चाहिए कि उसे सब कुछ उपलब्ध है । प्रसन्न रहने की आदत डालना अपने हाथ की बात है । इच्छित सफलतायें मिलने पर जो प्रसन्न रहने का इच्छुक है उसे सदा निराश ही रहना पड़ेगा । पर जो प्रसन्न रहने की आदत का अभ्यास कर लेगा उसे किसी बात की कमी न रहेगी । न उसे दुःख शोक हैरान करेंगे और न बुद्धिभ्रम का शिकार होना पड़ेगा ।
अपनी जगह रहकर भी मन स्वर्ग को नरक और नरक को स्वर्ग बना सकता है ।
पेंगल तब महर्षि नहीं बने थे । उसके लिए आत्म-सिद्धि आवश्यक थी, पर पेंगल साधना करते-करते पदार्थों की विविधता में ही उलझ कर रह गये । पशु-पक्षी, अन्य जन्तु, मछलियाँ, साँप, कीड़े, मकोड़ों में शरीरों और प्रवृत्तियों की भिन्नता होने पर भी शुद्ध अहंकार और चेतना की एकता तो समझ में आ गयी, पर विस्तृत पहाड़, टीले, जंगल, नदी, नाले, समुद्र, सूर्य, चन्द्रमा, तारे, प्रकाश, और पृथ्वी पर पाये जाने वाले विविध खनिज , धातुएँ, गैसें, ठोस आदि क्या हैं ? क्यों हैं ? और इनमें यह विविधता कहाँ से आयी है ? यह उनकी समझ में नहीं आया। इससे उनकी आत्मदर्शन की आकाँक्षा और बेचैन हो उठी ।
वे याज्ञवल्क्य के पास गये और उनकी बारह वर्ष तक सेवा-सुश्रूषा कर पदार्थ विद्या का ज्ञान प्राप्त किया । इस अध्ययन से पेंगल का मस्तिष्क साफ हो गया कि जड़ पदार्थ भी एक ही मूल सत्ता के अंश हैं । सब कुछ एक ही चेतन तत्व से उपजा है । ‘एकोअहं बहुस्यामः’ तथा ‘एक नूर से सब जग उपजिआ’ वाली बात उन्हें पदार्थ विज्ञान में भी अक्षरशः सत्य प्रतीत हुई । उन्होंने यह जान लिया कि वायु की लहरों के समान विभिन्न तत्व प्रतिभासित होते हुए भी सृष्टि के समस्त तत्व एक ही मूल तत्व से आविर्भूत हुए हैं । उसे महाशक्ति कहा जाय, आत्मा या परमात्मा सब एक ही सत्ता के अनेक नाम हैं ।
विज्ञान की आधुनिक जानकारियाँ भी उपरोक्त तथ्य का ही प्रतिपादन करती हैं । जड़ और चेतन के बीच की खाई अब पटने लगी है । द्वैत को अद्वैत में परिणत करने के प्रयास आरंभ हो गये हैं । विज्ञान क्रमशः इस दिशा में बढ़ रहा है कि वह जड़ को चेतन और चेतन को जड़ से सुसम्बद्ध करके दोनों को एक ही स्थान पर संयुक्त बनाकर खड़ा कर सके । जीवन रासायनिक पदार्थों से-पंचतत्वों से बना है, इस सिद्धान्त को सिद्ध करते-करते हम वहीं पहुँच जाते हैं जहाँ यह सिद्ध हो सकता है कि जीवन से पदार्थों की उत्पत्ति हुई ।
उपनिषद् का कहना है कि ईश्वर ने एक से बहुत बनने की इच्छा की, फलतः यह बहुसंख्यक प्राणी और पदार्थ बन गये । यह चेतन से जड़ पदार्थों की उत्पत्ति हुई । नर-नारी कामेच्छा से प्रेरित होकर रति कर्म में निरत होते हैं, फलतः रज शुक्र के संयोग से भ्रूण कलल का आरंभ होता है । यह भी मानवी चेतना से जड़ शरीर की उत्पत्ति है । जड़ से चेतन उत्पन्न होता है , इसे पानी में काई व सूक्ष्म जीवधारी तथा मिट्टी में घास उत्पन्न होते समय स्पष्ट देखा जा सकता है । गंदगी में मक्खी, मच्छरों का पैदा होना, सड़े हुए फलों में कीड़े उत्पन्न होना यह जड़ से चेतन की उत्पत्ति है ।
प्रकृति अपने आप में पूर्ण नहीं है, उसे चेतन सत्ता द्वारा प्रेरित प्रोत्साहित और फलवती किया जा रहा है । यद्यपि कुछ पदार्थ विज्ञानी अभी भी इस बात पर बहुत जोर देते हैं कि ‘जड़’ प्रमुख है । चेतन उसकी एक स्थिति है । ग्रामोफोन का रिकार्ड और उसकी सुई का घर्षण प्रारंभ होने पर आवाज आरंभ हो जाती है, उसी प्रकार अमुक स्थिति में, अमुक अनुपात में इकट्ठे होने से चेतन जीव की स्थिति में जड़ पदार्थ-विकसित हो जाते हैं, जीवविज्ञानी अपने प्रतिपादनों में इसी तथ्य को प्रमुखता देते हैं और यह सिद्ध करने का प्रयत्न करते हैं कि जीवन कुछ नहीं, जड़ पदार्थों का ही विकसित रूप है । प्रख्यात विज्ञानवेत्ता आइन्स्टीन एक ऐसे फार्मूले की खोज में थे, जिससे जड़ और चेतन की इस भिन्नता को एकता में निरस्त किया जा सके । उनका कहना था कि यह युग्म जब तक सिद्ध नहीं हो जाता तब तक विज्ञान के कदम लँगड़ाते हुए ही चलेंगे ।
रासायनिक दृष्टि से जीवकोश और अणु को एक ही तराजू में तोला जा सकता है । दोनों में प्रायः समान स्तर के प्राकृतिक नियम काम करते हैं एकाकी परमाणु की सूक्ष्म संरचना के बारे में अभी भी वैसी ही खोज जारी है जैसी कि पिछली तीन शताब्दियों से चलती रही है । विकिरण और गुरुत्वाकर्षण के अभी बहुत से स्पष्टीकरण होने बाकी हैं । जो समझा जा सका है वह अपर्याप्त ही नहीं, असंतोषजनक भी है । प्रायः यही स्थिति जीवन तत्व की खोज में किये गये वैज्ञानिक प्रयासों की है ।
यों कोशिकायें निरन्तर जन्मती मरती रहती हैं, पर उनमें एक के बाद दूसरी में जीवन तत्व का संचार अनवरत रूप से होता रहता है । मृत होने से पूर्व कोशिकायें अपना जीवन तत्व नवजात कोशिका को दे जाती हैं । इस प्रकार मरण के साथ ही जीवन की अविच्छिन्न परम्परा निरन्तर चलती रहती है । उन्हें मरणधर्मा होने के साथ-साथ अजर-अमर भी कह सकते हैं । वस्त्र बदलने जैसी प्रक्रिया चलते रहने पर भी उनकी अविनाशी सत्ता पर कोई आँच नहीं आती ।
नोबेल पुरस्कार विजेता विख्यात वैज्ञानिक डॉ. अलेक्सिस केरल उन दिनों न्यूयार्क के रॉकफेलर चिकित्सा अनुसंधान केन्द्र में काम कर रहे थे । एक दिन उन्होंने एक मुर्गी के बच्चे के हृदय के जीवित तन्तु का एक रेशा लेकर उसे रक्त एवं प्लाज्मा के घोल में रख दिया । वह रेशा अपने कोष्ठकों की वृद्धि करता हुआ विकास करने लगा । उसे यदि काटा छाँटा न जाता तो वह अपनी वृद्धि करते हुए वजनदार माँस पिण्ड बन जाता । इस प्रयोग से उन्होंने यह निष्कर्ष निकाला कि जीवन तत्वों से बना है, यह अभी जाना नहीं जा सका है । यदि इस पहेली को ठीक तरह से जाना जा सके और टूट-फूट को सुधारना संभव हो सके तो अनन्तकाल तक जीवित रह सकने की सभी संभावनायें विद्यमान हैं ।
प्रोटोप्लाज्मा जीवन का मूलतत्व है । यह तत्व अमरता की विशेषता से युक्त है । विज्ञानवेत्ता रासायनिक सम्मिश्रण से इसे उत्पन्न किये जाने के परीक्षणों में निरत हैं । छोटे जीवाणु बनाने में ऐसी कुछ सफलता उन्हें मिली भी है, पर उतने से ही यह दावा करने लगना उचित नहीं कि मनुष्य ने जीवन का सृजन करने में सफलता प्राप्त करली ।
जिन रसायनों से जीवन विनिर्मित किये जाने की चर्चा है, क्या उन्हें भी उनकी प्रकृतिगत विशिष्टताओं को भी मनुष्य द्वारा बनाया जाना संभव है ? इस प्रश्न पर वैज्ञानिकों को मौन ही साधे रहना पड़ रहा है । पदार्थ की जो मूल प्रकृति एवं विशेषता है, यदि उसे भी मनुष्यकृत प्रयत्नों से नहीं बनाया जा सकता तो इतना ही कहना पड़ेगा कि उसने ढले हुए पुर्जे जोड़कर मशीन खड़ी कर देने जैसा बाल-प्रयोजन ही पूरा किया है । ऐसा तो लकड़ी के टुकड़े जोड़कर अक्षर बनाने वाले किन्डर गार्डन कक्षाओं के छात्र भी कर लेते हैं । इतनी भर सफलता से जीव निर्माण जैसे दुस्साध्य कार्य को पूरा कर सकने का दावा करना उपहासास्पद गर्वोक्ति है ।
कुछ मशीनों बिजली पैदा करती हैं, कुछ तार बिजली बहाते हैं, पर वे सब बिजली तो नहीं हैं । अमुक रासायनिक पदार्थों के सम्मिश्रण से जीवन पैदा हो सकता है, सो ठीक है, पर उन पदार्थों में जो जीवन पैदा करने की शक्ति है वह अलौकिक एवं सूक्ष्म है । उस शक्ति को उत्पन्न करना जब तक संभव न हो तब तक जीवन का सृजेता कहला सकने का गौरव मनुष्य को नहीं मिल सकता ।
जीवविज्ञानियों ने जीव-कोष से सम्बन्धित अब तक जो जानकारियाँ उपलब्ध की हैं उसके अनुसार प्रत्येक कोशिका का नाभिक-न्यूक्लियस अविनाशी तत्व हैं । वह स्वयं नष्ट नहीं होता, पर वैसे ही अनेक सेल्स बना देने की क्षमता से परिपूर्ण है । एक कोशिकीय अमीबा निरन्तर अपने आपको विभक्त करते हुए वंशवृद्धि करता रहता है । कोई शत्रु उसकी सत्ता ही समाप्त कर दे, यह बात और है, अन्यथा वह अनन्त काल तक जीवित ही नहीं रहेगा, वरन् वंशवृद्धि करते रहने में भी समर्थ रहेगा । इस तरह कोशिका की चेतना को ही ब्रह्म की इकाई कह सकते हैं । चूँकि वह एक आवेश, शक्ति या सत्ता है, चेतन है, इसलिए वह अनेकों अणु-परमाणुओं में भी व्याप्त इकाई ही है । इस स्थिति को जीव भाव कह सकते हैं, पर तो भी उसमें पूर्ण ब्रह्म की समस्त क्षमतायें उसी प्रकार विद्यमान हैं जैसे समुद्र की एक बूँद में पानी के सब गुण विद्यमान होते हैं ।
उक्त तथ्य यह प्रमाणित करते हैं कि चेतन ही जड़ की उत्पत्ति का मूल कारण है । वैज्ञानिकों के समक्ष तो मुर्गी से अण्डा या अण्डे से मुर्गी , नर से नारी या नारी से नर, बीज से वृक्ष या वृक्ष से बीज जैसे प्रश्न, अभी भी अनिर्णीत पड़े हैं । उनका हल न मिलने पर भी किसी को कोई परेशानी नहीं । ठीक इसी प्रकार जड़ और चेतन में कौन प्रमुख है, इस बात पर जोर न देकर यही मानना उचित है कि दोनों एक ही ब्रह्म सत्ता की दो परिस्थितियाँ मात्र हैं । द्वैत दीखता भर है, वस्तुतः अद्वैत ही सर्वत्र बिखरा पड़ा है । सूक्ष्म यंत्रों से भी न देखी जा सकने वाली परमात्मा चेतना ही संसार के समस्त कार्य और कारण का आधारभूत, है । वही सब भूतों की प्राणियों की आत्मा है और मनुष्यों की भी । उपनिषद् के इस कथन में ही पाश्चात्य वैज्ञानिक मान्यताओं और पूर्वात्य दर्शन में सामंजस्य के सूत्र सन्निहित हैं ।
मनुष्य को सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ प्राणी होने का गौरव प्राप्त है । वह अपनी कुशलता , दक्षता, कलाकारिता, शिल्प आदि पर गर्व कर सकता है और यह मान सकता है कि अपनी वैज्ञानिक बुद्धि के सहारे वह गगनचुम्बी इमारतें बनाने से लेकर बड़े-बड़े पुल बाँधने-बाँध निर्माण करने तक में समर्थ है । पर वह यह भूल जाता है कि इसके लिए उसे शिक्षा, अनुकरण तथा उपकरणों पर निर्भर रहना पड़ता है, जबकि क्षुद्र समझे जाने वाले अन्य प्राणी अपनी अन्तःप्रेरणा के आधार पर वह सब कुछ सीख लेते हैं । न तो वे उसके लिए किसी के पास शिक्षा लेने जाते हैं और न उन्हें किन्हीं उपकरणों की आवश्यकता होती है । वे मनुष्य से भी बढ़ चढ़ कर अपनी कुशलता का परिचय देते हैं । बीवर जैसा चतुर और कुशल इंजीनियर तो बिना प्रशिक्षण प्राप्त किये ही अपनी क्षमता का जिस तरह परिचय देता है, वह हमारे लिए कहाँ संभव है? इसी तरह लोमड़ी, बिलाव तथा शृंगालों आदि के निवासकक्ष देखते ही बनते हैं । वे अपनी माँदों तथा बिवरों में सब प्रकार की सुविधाओं का समावेश रखते हैं । बया का सुन्दर घोंसला पक्षियोँ की निर्माण कला का श्रेष्ठतम जीवंत नमूना है । नगण्य-सी समझी जाने वाली चींटियों और मधुमक्खियोँ की कलाकारिता देखी जाय तो उनकी कुशलता देखकर यही कहना पड़ता है कि परमात्मा ने इस क्षुद्र समझे जाने वाले जीवों को गजब की निर्माण बुद्धि दी है । उनके सूक्ष्म शिल्प को देखकर मानव मन ईर्ष्या से भर उठता है ।
बाँध कैसे बनायें जायँ, यह कला मनुष्य ने संभवतः बीवर से सीखी है । बीवर खरगोश जाति का एक छोटा सा प्राणी है जिसकी लम्बाई पूँछ समेत चार फुट से कम ही होती है । यह अपने रहने के लिए नदी किनारे ऊँचे बाँध खड़े करता है और संरक्षित घर बनाकर उनमें सुखपूर्वक रहता है । यह बाँध लकड़ी के लट्ठों मोटी टहनियों, पत्थरों तथा कड़ी मिट्टी के सहारे बनाये गये होते हैं । बीवर यह रचना सामुदायिक सहयोग के आधार पर करते हैं । वे जिस पेड़ को उपयुक्त समझते हैं, उसे अपने पैने दाँतों से जड़ से काटकर धराशायी कर देते हैं । बाद में उसके टुकड़े-टुकड़े कर मिलजुल कर निर्माण स्थल पर घसीट ले जाते हैं और जमीन में गाढ़कर बाँध की इतनी मजबूत नींव रखते हैं जिस पर पत्थर, लकड़ी आदि जमाते हुए बाँध को नदी की सतह से बारह फुट ऊँचा तक ले जाया जा सके । यह बाँध पाँच सौ फुट तक लम्बे पाये गये हैं और इतने मजबूत देखे गये हैं कि नदी के पानी की लहरें उन्हें विनष्ट नहीं कर पातीं । एक बाँध में दर्जनों बीवर परिवार रहते हैं । मध्य योरोप में नदी तटों पर पाया जाने ताला यह छोटा सा जीव अपनी श्रमशीलता, सहकारिता, सूझबूझ एवं शिल्प के कारण मनुष्य के लिए एक आदर्श बन गया है ।
इसी तरह ऊदबिलाव भी अपनी शिल्पकला के लिए विख्यात है । जीवशास्त्रियों ने इसे कुशल इंजीनियर की पदवी तक दे डाली है, वह सुरंगी नहरें बनाने तथा मिट्टी के पुल निर्माण करने में बड़ा पटु होता है, हैम्पटन नगर में समुद्री किनारे पर रहने वाले लोग इस प्राणी के कारनामों से बहुत ही परेशान रहते हैं । यह नगर झील एवं समुद्र के बीच स्थित है । ऊदबिलावों ने वहाँ से नगर के भीड़भाड़ भरे इलाके तक में भीतर ही भीतर सुरंगें बना रखी हैं । बहुत प्रयत्न करने के पश्चात् भी आज तक न तो वे पकड़े जा सके हैं और न वह नहरें ही बन्द की जा सकी हैं जो इन्होंने अन्दर ही अन्दर बना रखी हैं ।
अभियाँत्रिकी दक्षता को आज का वैज्ञानिक मनुष्य अपनी महत्वपूर्ण उपलब्धि मानता है । विशालकाय भवनों, बाँधों के निर्माण से लेकर सेटेलाइट कम्प्यूटर आदि तक की डिजाइनिंग में उसने जो बुद्धि खर्च की है उसे देखकर लगता है कि वह दूसरा परमात्मा है । पर जब यही योग्यता चींटी, दीमक जैसे तुच्छ से प्राणियों में हो तो उसे भी परमात्मा आ अंश ही कहा जायगा । यों देखने पर चींटियाँ ढेर में बिलबिलाती दीखती भर हैं, पर बारीकी से देखने पर स्पष्ट हो जाता है कि उनका हर कार्य व्यवस्थित-नियंत्रित एवं कलाकारितापूर्ण होता है । मनुष्य की तरह पेट भरने और संतति उच्छृंखलता के लिए कोई स्थान नहीं होता इस सम्बन्ध में सुविख्यात जीवविज्ञानी डॉक्टर बोल्ट ने हिमालय की चार हजार फुट ऊँची एक चोटी पर चढ़ कर एक ऐसे चींटी परिवार का गंभीरतापूर्वक अध्ययन किया है जो गृह निर्माण का कार्य कर रहा था । उन्होंने लिखा है कि नदी के किनारे होने के कारण बिल से निकाली हुई मिट्टी नीचे गिर जाती थी और इस कारण मकान बनाने में श्रमिक चींटियों को सफलता नहीं मिल पा रही थी । अंततः इस स्थिति से निपटने का काम कुछ विशेषज्ञ चींटियों को सौंपा गया । उन्होंने उस स्थान का विधिवत् निरीक्षण करके एक योजना बनाई । उस योजना के अनुसार मजदूर चींटियों को हटा लिया गया और उन्हें पहले छोटी-छोटी कंकड़ियाँ बीनकर लाने का आदेश दिया गया । वे सभी कंकड़ एकत्र करके लाने लगीं और विशेषज्ञों के हवाले करती गयीं । इन कंकड़ों से पहले मजबूत पथ का निर्माण किया गया और तब आगे का कार्य आरंभ हुआ। अब मिट्टी के लुढ़कने की कोई गुंजाइश नहीं रही । इस संबंध में मूर्धन्य वैज्ञानिक डॉ. वैरन मैकुबला का कहना है कि निर्माण सम्बन्धी जो कार्य योजना चींटियाँ तैयार कर सकती हैं, वह मानव निर्मित कंप्यूटर द्वारा भी संभव नहीं ।
सुप्रसिद्ध जीवविज्ञानी कैथी कीलपैट्रिक ने जीव-जन्तुओं की स्थापत्य कला पर एक खोजपूर्ण पुस्तक लिखी है-”एनीमल आर्चीटेक्ट ।” यूरोप में पायी जाने वाली “वुडएन्ट्स” प्रजाति की चींटियों के बारे में उनने लिखा है कि वह अपनी सूक्ष्मबुद्धि का जिस तरह उपयोग करती है, वैसा अपनी बुद्धि का सदुपयोग कर पाना मनुष्य के लिए अभी तक संभव नहीं हुआ है । इन चींटियों के टीले दस से लेकर बीस फुट ऊँचे होते हैं और प्रायः उतने ही भूगर्भ में नीचे गहरे धँसे होते हैं । इनमें चींटियों की लाखों प्रजातियों के साथ अन्य जाति के जीव भी पाये जाते हैं । टीले की सबसे निचली सतह पर शंकुदुम की सुइयाँ, सूखी डालियाँ एवं पत्ते बिछे होते हैं । सभी टीले वातानुकूलित होते हैं जिनका निर्माण चींटियाँ मिट्टी के साथ अपने लार मिला कर करती हैं। ऊपर से देखने पर ये सीमेन्ट के बने मालूम पड़ते हैं , पर अंदर से उसे सतत् परिवर्तित किया जाता रहता है, ताकि हवा का प्रवेश अवरुद्ध न हो ।
अनुसंधानकर्ताओं का कहना है कि इस प्रकार टीले की मिट्टी बार-बार बदलते रहने से भूगर्भ में जहाँ मिट्टी ज्यादा ठंडी और नमी रहती है, वह ऊपर आ जाती है और उसे पर्याप्त मात्रा में रोशनी और धूप मिल जाती है । ऊपर की गरम मिट्टी नीचे पहुँच जाती है, फलतः अन्दर का भाग वातानुकूलित बना रहता है । इसके अतिरिक्त चींटियाँ धूप स्नान के लिए समूहों में बारी-बारी से ऊपर आती रहती हैं । टीलों का बाह्य आवरण सीमेण्ट जैसा कठोर होने से एक ओर जहाँ वातावरण अनुकूलन की सुविधा मिलती है, वहीं दूसरी ओर चींटियाँ दुश्मनों के आक्रमण से अपनी रक्षा करने में भी सफल होती हैं । आपत्ति का में निकल भागने के लिए भी टीले में समुचित व्यवस्था होती है ।
जीवविज्ञानियों के अनुसार दीमकों के महल तो और भी शानदार होते हैं । इनकी स्थापत्य कला अद्वितीय होती है जिसका केंद्रबिंदु शाही महल होता है जहाँ राजा-रानी निवास करते हैं । इनमें अनेक चैम्बर और दीर्घायें बनी होती हैं । टीलों का स्थापत्य ऐसा होता है कि उनके उत्तर और दक्षिण की बाजुएँ छोटी होती है जिससे अधिक धूप और गर्मी से आसानी से बचा जा सके । अन्य बाजुयें लम्बी रखी जाती हैं जिसके कारण प्रातः एवं सायंकाल के समय सरलतापूर्वक धूप मिलती रहे । इन प्रासादों में हर समय ताजी हवा ऊपर से अन्दर आती रहती है । विषैली गैसें निकलने का भी बढ़िया प्रबंध होता है दीमकों की बेहतरीन अभियाँत्रिकी कला को देखकर अपने को कुशल समझने वाले अभियंता भी हैरान रह जाते हैं ।
जीव−जंतुओं के इस तरह सुव्यवस्थित शिल्पज्ञान एवं विवेकपूर्ण सुविकसित जीवनक्रम का लम्बे समय तक अध्ययन करने के पश्चात् प्रख्यात जीवशास्त्री डा. हेनरी वेस्टन ने लिखा है कि प्रकृति से परे कृत्रिम जीवन जीने वाला मनुष्य अपने से इतर प्राणियों को क्षुद्र समझता है । वह उनकी अपूर्णता पर दया दिखाता और उनकी विवशता पर तरस खाता है, किन्तु यह उसकी जबरदस्त भूल है । वस्तुतः मनुष्य को अपने सर्वश्रेष्ठ होने का अहंकार त्याग देना चाहिए और अन्तःप्रेरणा के आधार पर चलने वाले अपने से छोटे इन प्रकृति पुत्रों से कुछ शिक्षा ग्रहण करनी चाहिए । समग्र प्रकृति एक पाठशाला है, व हम विद्यार्थी । यदि सतत् सीखते रहे तो जीवनभर इन प्रकृति पुत्रों से बहुत कुछ पा सकते हैं ।
नदी घड़ियालों से भरी थी, आकाश मच्छरों से, तटीय प्रदेश लम्बी घासों से, जिनमें विषैले सर्पों की गणना नहीं । वन में शेर, तेंदुए, चीते। पेड़ों पर भी शरण लेना मुश्किल था। वहाँ भी साँप और तेंदुए छलाँग लगा सकते थे।
उसने सोचा था नहीं था कि जर्मनी के इस इलाके में उसे रात बितानी पड़ेगी। सूरज डूबने के पहले वे लौट जाएँगे ऐसा उसका विचार था। लेकिन सूरज कबके पश्चिम में पहुँच चुके और अभी पता नहीं वह कहाँ है? कितनी दूर है यहाँ से उसका शिविर?
किसी भी नक्शे में इधर की नदी के मोड़ों एवं उसकी धाराओं का स्पष्ट अंकन नहीं है। दलदल से भरे इस इलाके में आने का साहस कितनों को है। जब सुबह वह चला था, सबने रोका था उसे। एक अनजाने प्रदेश में केवल अनुमान के भरोसे जाना ठीक नहीं, यह चेतावनी उसे न जाने कितनी बार मिली थी, पर वह शिकारी कैसा जो डर जाए।
सिर्फ एक मल्लाह तैयार हुआ था साथ चलने को वह मल्लाह इस ओर एक बार आ चुका था। आया वह भी था दुर्घटनावश ही, लेकिन रास्ता उसने देख लिया था। अन्य लोगों में सब हतोत्साह करने वाले ही थे।
‘नदी की कई धाराएँ हैं मुख्य धारा से चले तो दोपहर तक सागर के समीप जा पहुंचेंगे और जब समुद्र में ज्वार आएगा, नौका अपने आप ऊपर बह निकलेगी। हम दोनों शाम तक यहीं आ जाएँगे।’ चलते समय मल्लाह ने बताया था।
“शिकार के लिए मगर, शेर और दूसरे जानवर आसानी से मिल जाएँगे।” यह बात पक्की थी-नदी की इस धारा का नक्शा ठीक बनाया जा सकेगा। यही बड़ा प्रलोभन था, क्योंकि वह वन-विभाग का अधिकारी भी तो है। देश को ठीक मानचित्र देना उसके कर्तव्य में आता है।
इस ओर उसका पड़ाव आया था सात दिन पहले। वन का सर्वेक्षण चल रहा है। साथ में डॉक्टर है, दूसरे और कर्मचारी हैं, हैलिकॉप्टर यान भी है। दलदलीय इलाके में सर्वेक्षण का काम आकाश से ही करना पड़ता है। किन्तु इधर वन बहुत सघन हैं। पानी में भी सब जगह ऊँची घास खड़ी है। आकाश से नदी की धारा का पता ही नहीं लगता। ये सब तमाम कारण और शिकार का प्रलोभन उसे इधर खींच लाए। वह नदी के मार्ग का अंकन करने वाला माना जाएगा यह कम प्रतिष्ठा की बात न थी।
एक की जगह दो नावें पसन्द की उसने। दोनों में पीने का पानी दोपहर का भोजन दूरबीन तथा अन्य जरूरी सामान। लेकिन प्रस्थान करने के दो-ढाई घण्टे बाद ही दोनों ने समझ लिया कि उनके सब अनुमान ठीक नहीं है। नदी में मोड़ बहुत थे अनुमान से सोलह मोड़। धूप में तेजी आयी तो लगा शरीर का चमड़ा जैसे भस्म हो जाएगा। दोनों नावें एक में बाँध दी गई और उन्होंने बारी-बारी से खेना प्रारम्भ किया।
मच्छरों का आक्रमण चल रहा था। उनसे बचना कठिन था। घड़ियाल मिले अच्छे बड़े भी मिले। लेकिन मल्लाह ने सलाह दी अभी कारतूस उपयोग में न लाएँ। पता नहीं कब कैसी परिस्थिति आ पड़े। अब उसे भी अपने मार्ग ज्ञान पर भरोसा नहीं रह गया था। उसे जो कुछ स्मरण था वह बहुत धुँधला और अपूर्ण था। नदी आगे चलकर दो धाराओं में बंट गई थी और उसे यह मालूम नहीं था कि उनमें मुख्य धारा कौन सी है?
तुम एक धारा से जाओ और मैं दूसरी से। अन्त में उन्होंने निर्णय किया-’नदी की दोनों धाराएँ जरूर आगे मिल गई होंगी। हर दशा में हम तीसरे प्रहर लौट पड़ेंगे और यहाँ आकर दूसरे साथी की प्रतीक्षा करेंगे।’ दोनों नावें अलग-अलग चल पड़ीं। अब न मच्छरों को भगाने का अवकाश था और न हाथों को नौका खेने से विश्राम मिलता था। नदी से घास के सड़ने की गन्ध आ रही थी। ऊँची घास को चीरते हुए नौका को मार्ग बनाना था। साथ का भोजन समाप्त हो गया था और पानी भी। दोपहर ढलने लगी थी। प्रत्येक मोड़ पर लगता था कि अब आगे दूसरी धारा आ मिलेगी, किन्तु मोड़ बीतते ही दूसरा मोड़ दीखने लगता।
संयोग से किनारे सूखी भूमि दिखाई पड़ी। कुछ फल के पेड़ भी थे। पके मधुर फलों ने उदर की ज्वाला भड़का दी। उसने नौका तट से बाँधी एक घास के झुरमुट से और कूद पड़ा। रायफल भूमि में पटक दी वृक्ष पर चढ़ते समय। बड़े स्वादिष्ट फल भर पेट खाया। शाखा पर बैठकर शरीर को विश्राम दिया किन्तु जब उतरने की इच्छा की ‘अरे’ वह चौंक पड़ा।
नीचे रायफल की नाल पर सूर्य की किरणें चमक रही थी। और एक कद्दावर शेर उस पर पंजे रखकर गुर्रा रहा था। वह रायफल के सर्वेक्षण में लगा था। पेड़ पर भी कोई है इस ओर उसका ध्यान नहीं था।
‘अब क्या हो?’ उसे लगा कि शरीर का सारा खून जम रहा है। विपत्ति अकेले नहीं आती। तट की ओर नजर गई तो नौका नदारद। नदी का पानी अब पूरे वेग से नीचे बह रहा था। समुद्र में सम्भवतः भाटा आ चुका था। नदी उतर रही थी। पानी में प्रवाह आने के कारण नाव-नीचे बह गई थी। घास उसे रोकने में समर्थ नहीं हुई थी। आज जीवन में शायद पहली बार उसका साहस टूट रहा था। जिस “ईश्वर” की वह हमेशा खिल्ली उड़ाया करता था-आज मन के किसी कोने में उसकी याद उभरने लगी थी।
अपनी असहायता को अनुभव कर वह चीख पड़ा। शेर गुर्राया चीख सुनकर। उसने सिर उठाकर ऊपर देखा और उठ खड़ा हुआ। पता नहीं क्या सोचा उसने, किन्तु धीरपदों से वन में चला गया। उसकी जान में जान आई। वह उतरा वृक्ष से। नदी के किनारे-किनारे नौका ढूंढ़ने के अतिरिक्त कोई उपाय नहीं था। यही एक आशा थी कदाचित कहीं घास में या मोड़ पर वह अटक उलझ जाय।
कितनी दूर गया वह, स्वयं उसे पता नहीं। दिन छिपने को आ गया। नाव का पता न मिलना था, न मिला। अब अँधेरा होने से पहले उसे कोई ठीक स्थान रात बिताने के लिए ढूंढ़ लेना चाहिए। समुद्र में ज्वार आएगा-तब नाव स्वतः ऊपर लौट आएगी यही आशा थी।
उसने लकड़ियाँ जमा कीं। अँधेरा होने से पहले आग जला ली। अब आग के सहारे रात-बिता सकता है। लेकिन सूर्यास्त के बाद बादल छा गए। अँधेरा इतना घना कि अपना हाथ भी दिखाई न दे। अग्नि में बार-बार लकड़ियाँ डालता रहा। उसे लगा कि लकड़ियाँ थोड़ी हैं। आधी रात तक भी आग जल नहीं सकेगी। अग्नि के प्रकाश में उसने नजर दौड़ाई तो नदी के समीप एक बड़ा काला कुन्दा दीख पड़ा। वह गया और घसीटते हुए काले कुन्दे को ले ही आता पर कुन्दा उसके पास पहुँचने से पहले ही पानी में सरक गया। ‘घड़ियाल काँप गया उसका शरीर। आग स्वतः बुझने वाली थी। बरसात ऊपर से शुरू हो गई। रायफल का सहारा लिए वह वृक्ष के तने के समीप खड़ा हो गया। कुछ सोच पाता इसके पहले कोई भरी वनपशु और नदी में भारी ध्वनि हुई। तेंदुआ और घड़ियाल मौत ने अब झपट्टा मार दिया था उस पर। एक कड़ा झटका पीठ पर लगा और रायफल हाथ से छूटकर पानी में छपाक करती गिरी।
“हे ईश्वर।” प्राण जाते समय प्राणी के कण्ठ से जो आर्तनाद फूटता है बिना अनुभव के कोई उस स्वर को समझ नहीं सकता। कोई आशा, कोई युक्ति, कोई बल जब नहीं रह जाता दिखाई देता है मौत का कराल जबड़ा। धन्यभाग्य वह जो उस परम सहायक को पुकार सके। आज उसमें पहली बार प्रार्थना के स्वर फूटे थे। जगा था एक अनोखा विश्वास।
सर्वेश्वर से प्रार्थना करने वाले को निराश नहीं होना पड़ता । पर प्रार्थना शब्द नहीं है वह भाव है-समूचे अस्तित्व का सार जो विश्वास बन कर उमंग पड़ता है। सहसा आकाश की घटा में चन्द्रमा की किरणें निकल पड़ी। उसने उस ज्योत्सानाधौत जल में जो कुछ देखा-अद्भुत, रोमाँचकारी और चकित कर देना वाला दृश्य था वह। उसके ठीक पीछे तेंदुआ कूदा था और अब उससे घड़ियाल का युद्ध चल रहा था। सम्भवतः घड़ियाल ने जब स्वयं उसका पैर पकड़ना चाहा तेंदुआ वृक्ष पर से कूदा। घड़ियाल के मुख में तेंदुए का पैर आ गया था। घड़ियाल उसे खींच रहा था और एक पैर जल में डूबे किसी वृक्ष की जड़ में अड़ाए तेंदुआ दूसरे पैर का पंजा घड़ियाल पर फटकारे जा रहा था। घड़ियाल पूँछ फटकार रहा था जिससे तेंदुआ उसे मुख पर न मार सके और इस युद्ध में उछलते छींटे समीप खड़े उसे भिगो रहे थे।
उसने झुककर पानी में से अपनी रायफल उठाई। कण्ठ से फिर निकला दयामय प्रभु! और सिर उठाया तो दिखाई दिया कि एक काली लम्बी वस्तु नीचे से ऊपर नदी में ज्वार के वेग में बहती चली आ रही है। दो क्षण में स्पष्ट हो गया कि यह उसकी नौका है।
शब्द तो नहीं थे ‘इन क्षणों में उसके समूचे अस्तित्व से प्रार्थना झर रही थी। कब वह नाव को चलाते हुए वहाँ पहुँच गया जहाँ मल्लाह उसकी प्रतीक्षा कर रहा था उसे तो पता भी नहीं चलता। लेकिन जार्ज साहब मल्लाह के इन शब्दों ने उसे चौंकाया। उसने मल्लाह की ओर देखा वह कहे जा रहा था मैं सायंकाल यहाँ पहुँचा था। मल्लाह ठीक वहीं था जहाँ से वे पृथक हुए थे। नदी की मुख्य धारा वह है जिससे आप गए थे। किन्तु यह शाखा छोटी है। ज्वार ने मुझे जब यहाँ पहुँचाया अँधेरा घिर आया था। किसी प्रकार मैं रस्सी वृक्ष में उलझाकर यहाँ रात भर टिका रहा।
और मैं। कौन सा मैं? जैसे उन्होंने स्वयं से प्रश्न किया। कल वाला जार्ज मूलर तो मर गया जो नास्तिक था अविश्वासी था। उस रूप वाले मेरे सारे विचार, इच्छाएँ, स्वीकृति सम्बन्ध आदि प्राणहीन हो गए। नाविक उनकी ओर आश्चर्य से देखे जा रहा था। बार-बार पूछने पर उन्होंने रात्रि की सारी घटना कह सुनाई। वह भी श्रद्धानत था। बता रहे थे नदी के रास्ते की खोज और मेरी रक्षा उसने की जो सदा से असहाय की रक्षा करता आया है। जब मेरा बल थक गया, शस्त्र गिर गया वह दयाधाम आ पहुँचा। अरुणोदय का प्रकाश समूची सृष्टि को स्वर्णिम बनाने लगा था-उस दिन से इन नए जार्ज मूलर ने यूरोप और अमेरिका में घूम-घूम कर प्रार्थना का प्रचार करना शुरू किया। उनका सारा जीवन भगवतमय और दिव्य हो उठा। प्रार्थना मनुष्य को देवता बना देती है। उनके कथन को प्रमाण उनका जीवन था लोग उन्हें ‘प्रार्थना मानव’ के नाम से जानने लगे।
आंखें बाहर का देखते हैं। वे न अपना स्वरूप देख पाती हैं ओर न अपनी बनावट के सम्बन्ध में कुछ प्रत्यक्ष अनुभव करती हैं। इसी प्रकार कान बाहर के शब्द सुनते हैं। हृदय की धड़कन, फेफड़ों की श्वसनक्रिया तक उन्हें सुनाई नहीं पड़ती। तत्व से बाहर की वस्तुओं को छूकर उनके सम्बन्ध में अनुमान लगाया जा सकता है, पर इससे छोटी परिधि से बढ़कर बहुत दूर वाले पदार्थों की हलचलों की श्री ज्ञानेन्द्रियाँ जानकारी प्राप्त नहीं कर सकतीं। एक सीमित दूरी तक ही उनकी पहुँच और पकड़ है, न वे अति निकट को समझ पाती हैं और न अति दूर की। इन्द्रियाँ पंचतत्वों से ही बनी हैं, इसलिए उनका संपर्क और अनुभव भी मात्र पदार्थ जगत के साथ ही बन पाता है। धीरे-धीरे मान्यता भी यही बन जाती है कि पदार्थ जगत ही सब कुछ है। शरीर संपर्क चूँकि उन्हीं के साथ रहता है, इसलिए उन्हीं के साथ प्रिय-अप्रिय और उपेक्षा की प्रवृत्ति भी बनती और बढ़ती रहती है। इतने ही छोटे संसार में जीवन जिया जाता है। इतने को ही प्रभावित करने और प्रभावित होने का सिलसिला प्रायः चलता रहता है। इसी परिधि में घूमते हुए आम आदमी कोल्हू के बैल की तरह अपने जीवन वैभव को समापन कर लेता है।
यह एक प्राणिमात्र के साथ जुड़ा हुआ उपक्रम है। पदार्थों का उत्पादन व उपभोग करते हुए जीवधारी घाटे या नफे का समयक्षेप करते हैं। इस प्रकृति प्रेरणा से प्रचलित प्रक्रिया के साथ जीवधारी जुड़े रहते हैं, और कालक्षेप करते हैं। मनुष्य भी उन्हीं में से एक है।
स्थूल दृष्टि इतना ही समझ और समझा पाती है कि महत्वपूर्ण भाग वह है जो प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर नहीं होता। जिसे इन्द्रियाँ देख समझ नहीं पातीं। मन-मस्तिष्क को भी ग्यारहवीं इन्द्रिय माना गया है। इसलिये उसकी दौड़ धूप भी बहिरंग क्षेत्र तक ही सीमित रहती है। जो अप्रत्यक्ष है-अतिशय महत्वपूर्ण है, वह अविज्ञात-उपेक्षित स्थिति में ही पड़ा रहता है। ऐसी दशा में उसे परिष्कृत समुन्नत बनाने के लिए तो कुछ करते धरते बन ही कैसे पड़े?
जानने को तो सभी जानते हैं कि शरीर के भीतर कोई आत्मा भी है, पर यह ज्ञान कहने-सुनने और जानने अपनाने तक ही सीमाबद्ध होकर रह जाता है। यह अनुभव नहीं किया जाता है कि वस्तुतः ऐसा कुछ है भी क्या? यदि है तो उसकी कुछ क्षमता, उपयोगिता, समर्थता एवं भूमिका भी प्रत्यक्ष जीवन में कुछ है क्या? इसे कोई विरला ही अनुभव कर पाता है। यदि वह अनुभूति बन पड़ी होती तो प्रसुप्तता हटती, चेतना जगती और उस महत्वपूर्ण पक्ष की स्थिति का पर्यवेक्षण किया गया होता। उसे अवगति से उबारा गया होता और ऐसा कुछ प्रयास बन पड़ता जिसे आत्मोत्कर्ष के नाम से जाना जाता और उस क्षेत्र के विकसित होने का चमत्कारी प्रतिफल हाथोंहाथ दृष्टिगोचर हो सका होता। पर उस उपेक्षा को क्या कहा जाय जिसके कारण हीरा भी काँच के ढेर में पड़ा रहता है और उसी के साथ तोला बेचा जाता है।
स्मरण रखने योग्य तथ्य यह है कि शरीर कितना ही सुन्दर, समर्थ, कुशल क्यों न हो, उसकी सत्ता और महत्ता अदृश्य आत्म चेतना पर निर्भर रहती है। देखने में सभी का कायकलेवर प्रायः एक जैसा होता है। अन्तर एक सीमित मात्रा में ही पाया जाता है। इतने पर भी देखने में यह आता है कि एक व्यक्ति गये गुजरे स्तर का होता है, तो दूसरा सभ्य, समुन्नत और सुसंस्कृत स्तर का जीवनयापन करता है। एक उपेक्षा का भाजन बना रहता है, हेय समझा और भारभूत माना जाता है। इसके विपरीत दूसरे की प्रतिभा ऐसी होती है जिसके कारण उसकी सर्वत्र सराहना होती, उपयोगिता मानी जाती है। यह अन्तर किसी के शरीर या वैभव पर आधारित नहीं होता, वरन् उसकी उस विशिष्टता पर आधारित रहता है जिसे चेतना कहते हैं जो अदृश्य रहते हुए भी दृश्य का पूरी तरह सूत्र संचालन करती है।
यों समझा तो सब कुछ शरीर और साधनों को ही जाता है, पर वस्तुतः ऐसा है नहीं। कठपुतली का तमाशा बाजीगर की उँगलियों से बँधे हुए तार के सहारे होता है। चेतना ही शरीर से क्रियायें और मस्तिष्क से विचारणायें सम्पन्न कराती है। प्राणान्त हो जाने पर कायकलेवर के सभी घटक यथावत् रहने पर भी सारी हलचलें समाप्त हो जाती हैं। इतना ही नहीं, कुछ देर रखे रहने पर लाश अपने-अपने घटकों में सड़ने, गलने और बिखरने लगती है। तथ्य स्पष्ट है कि जीवधारियों का जीवन और कुछ नहीं, मात्र प्राण चेतना की उपस्थिति मात्र है। वही ‘स्व’ है। वही ‘ब्रह्म’ है वही ‘आत्मा’ है। उसका अस्तित्व जन्म लेने से पूर्व भी था और मरण के उपरान्त भी अनन्तकाल तक किसी न किसी रूप में बना रहता है। यही है वह तत्व जिसके स्तर के अनुरूप जीवन का उत्थान-पतन अवलम्बित रहता है।
आश्चर्य इस बात का है कि मनुष्य का चिन्तन और प्रयास मात्र शरीर के इर्द-गिर्द ही घूमता रहता है। उसे पदार्थों और प्राणियों की कायाभर से लगाव होता है। धन संचय ही लक्ष्य स्तर का बनकर आकाँक्षाओं पर छाया रहता है। इन्द्रियों में उठने वाली खुजली जैसी ललक ही अपनी अभिरुचि के अनुरूप साधन जुटाने के लिए मचलती रहती है। काँचन और कामिनी जैसे कुछ ही प्रसंग मनुष्य के प्रिय विषय रहते हैं। प्रदर्शन के लिए आतुर अहंकार ऐसे प्रपंच रचता रहता है जो समयसाध्य, कष्टसाध्य, व्ययसाध्य होते हैं। सोचा जाता है कि सजधज और ठाटबाट से दूसरों को प्रभावित, चमत्कृत किया जा सकेगा। इसी अहंता की आपूर्ति का भारीभरकम ढाँचा खड़ा किया जाता है। यश और मान पाने की लिप्सा उद्विग्न किये रहती है। फिर भी वास्तविकता यह है कि किसी को भी देर तक दूसरों की ओर ध्यान देने की फुरसत नहीं होती। हर व्यक्ति अपनी ही इच्छाओं, समस्याओं के फेर में इस कदर फँसा रहता है कि दूसरों के सम्बन्ध में नजर उठाकर देखकर लेने भर की यदाकदा फुरसत निकाल पाता है। अन्यथा अपने ही कामों में व्यस्त व्यक्ति दूसरों की शृंगार सज्जा और सम्पन्नता पर क्यों तो ध्यान देगा और क्यों चमत्कृत, प्रभावित होकर रहेगा?
इतने पर भी सामान्यजन यही आशा लगाये बैठे रहते हैं कि लोग उन्हें सराहें, बड़ा आदमी मानें। इस दुराशा में ही प्रायः आधी शक्ति खर्च हो जाती है। जिसे यदि उपयोगी दिशा में नियोजित किया गया होता तो चेतना को समुन्नत बनाने का अवसर भी मिलता ओर ऐसा कुछ पुण्य परमार्थ करते बन पड़ता जो लोक-कल्याण के क्षेत्र में अनुकरणीय भूमिका निभा सकना संभव बना देता। उस व्यामोह को क्या कहा जाय जो आत्मचिन्तन के लिये अन्तर्मुखी होने की स्थिति ही नहीं बनने देता।
वस्तुओं को सँभालने-सँजोने की व्यवस्था-बुद्धि सराहनीय मानी जाती है, पर न जाने क्यों वह शरीर और परिवार परिकर तक ही सीमित होकर रह जाती है, बाहर का बिखराव यदि समेटा जा सका होता तो आत्मनिरीक्षण का अवसर मिलता और शरीर के घटक अवयवों को सही स्थिति में रखने की सूझ सूझती। आमाशय, आँतें, हृदय, फेफड़े, गुर्दे, रक्त-माँस आदि में इतनी विकृतियाँ भरी रहती हैं कि यदि उन्हें संशोधित स्थिति में रखने की बात सोची गयी होती, तो संयम, अनुशासन साधने मात्र से दुर्बलता और रुग्णता से छुटकारा मिल जाता। जिस काया को अपना स्वरूप समझा जाता है उसे तो सही स्थिति में रहने का अवसर मिलता पर उस बहिर्बुद्धि को क्या कहा जाय जो मात्र सज्जा, लिप्सा और संपदा तक ही सीमित रहती है और जिसे अपना माना जाता है, उस काया की अन्तः व्यवस्था को उपेक्षित रखने के कारण रुग्ण रहना और अकाल मृत्यु मरना पड़ता है।
चेतना की स्वस्थता का स्वरूप है गुण, कर्म, स्वभाव में शालीनता का समुचित समावेश रहना। चिन्तन, चरित्र, व्यवहार में मानवोचित उत्कृष्टता का आभास मिलना। इसी उपलब्धि के आधार पर आत्मसंतोष का और लोक सम्मान का अर्जन बन पड़ता है इतना भर भी यदि हस्तगत न किया जा सके तो समझना चाहिए कि चेतना दलदल में फँसी रही, उसे स्वच्छ वातावरण में रहने का अवसर ही न मिला यह अभाव इसलिए सहन करना पड़ता है कि आत्मचिन्तन के लिए अन्तर्मुखी होना नहीं आता समीक्षा करने और आत्म सुधार के लिए प्रयत्नशील होने की बात एक प्रकार से विस्मृत ही रखी जाती रहती है।
बर्नार्डशा की एक रचना पर टिप्पणी करते हुए एक बार किसी महिला ने कहा-”आपकी यह रचना बड़ी खराब है मुझे बिलकुल पसन्द नहीं आई। बर्नार्डशा ने मुस्कराते हुए उत्तर दिया-”बहिन जी, मैं भी आपसे पूर्णतया सहमत हूँ पर संसार के लोग इतने कट्टर हैं कि हमारी, आपकी बात मानने को कोई तैयार नहीं बहुमत के आगे अल्पमत की कहाँ चलती है?”
“मैं स्पष्ट देख रही हूँ उत्तरी भारत का वह पवित्र स्थल, जहाँ एक प्रचण्ड पुरुषार्थ संत अपनी सतत् साधना में संलग्न रह कर ऐसे दिव्य आध्यात्मिक प्रवाह विकीर्ण कर रहे हैं, जो अगले दिनों समस्त संसार में युगान्तरकारी परिवर्तन लाने में समर्थ सिद्ध होंगे। उनके आध्यात्मिक विचार इतने क्रान्तिकारी होंगे कि उस चिनगारी के ज्वालमाल में बदलने और देखते-देखते पूरी दुनिया में फैल जाने का दृश्य लोगों को आश्चर्य में डाले बिना न रहेगा। लोग उनकी सशक्त, प्रगतिशील और वर्तमान समस्याओं का सर्वमान्य हल सुझाने वाली विचारधारा को अपनाने में ही अपनी एवं सम्पूर्ण विश्व की भलाई समझेंगे। इस प्रकार विश्व धीरे-धीरे अध्यात्म की ओर झुकता चला जायेगा और पूर्णतः अध्यात्मवादी बन जायेगा, जो लम्बे काल तक लोगों को इस धरित्री में ही स्वर्ग की सुखद अनुभूति कराता रहेगा।”
यह उद्गार हैं, न्यूजर्सी (अमेरिका) की मूर्धन्य भविष्यद्रष्टा फ्लोरेंस के अब से तीन दशक पूर्व देखे भविष्य को पुस्तकाकार रूप देते हुए “गोल्डन लाइट आफ न्यू एरा” में वे लिखती हैं-”जब मैं ध्यान की अतल गहराई में उतरती हूँ, तो मुझे हमेशा एक गौर वर्ण श्वेत केशों वाले दाढ़ी-मूंछ रहित ऐसे महापुरुष के दर्शन होते हैं, जिनका चेहरा दिव्य तेज से उद्भासित दिखाई पड़ता है। प्रतीत ऐसा होता है, मानों सैंकड़ों टिमटिमाते दीपकों के मध्य कोई अति प्रकाशवान महासूर्य विद्यमान हो, जो अपनी आभा और ऊर्जा से न सिर्फ आस-पास के दीपकों को अनुप्राणित कर रहे हों, वरन् समस्त संसार में अपनी किरणें बिखेर कर उसे प्रकाशित करने में संलग्न हों। इस प्राणदायी प्रकाश से लोग उस ओर ऐसे खिंचते दिखाई पड़ रहे हैं, जैसे पतंगे दीपक प्रकाश की ओर आकर्षित होते चले जाते हैं। इस प्रकाश-प्रेरणा से लोग स्वयं में एक असाधारण परिवर्तन अनुभव करेंगे, जिससे एक ऐसी महाक्रांति का उद्भव होगा, जिसे तत्कालीन लोग ‘विचार-क्राँति’ के नाम से अभिहित करेंगे।”
“इस क्रान्ति से भौतिकवादी मान्यताएँ बदलेंगी और बुद्धिजीवियों में ऐसी चिन्तन चेतना का विकास होगा, जिसे अध्यात्मवादी सोच कहने में किसी को कदाचित ही संकोच हों। इस नयी सोच के उन्नयन से अध्यात्मवाद एक बार पुनः सम्पूर्ण विश्व में प्रतिष्ठित होगा। तब सब एक धर्म (मानव धर्म) एक राष्ट्र (विश्व राष्ट्र) के पक्षधर होते दिखाई पड़ेंगे। पूरी दुनिया में उक्त संत की विचारधारा की धूम मच जायेगी। विभिन्न धर्मावलम्बी उन्हें अपने-अपने धर्म व जाति के मार्गदर्शक मानेंगे। मुसलमानों में उनकी प्रतिष्ठा पैगम्बर मुहम्मद के रूप में होगी। ईसाई लोग उन्हें प्रभु ईशु का ही दूसरा रूप मानेंगे, जबकि हिन्दुओं में वे भगवान के दशम अवतार के रूप में पूजित होंगे। उनकी शक्ति इतनी असाधारण और अद्भुत होगी कि जन-चेतना में नवीन प्रेरणा भरना और प्रकृति के बिगड़ते संतुलन को नियमित-नियंत्रित करना उनके लिए सामान्य सी बात होगी एवं देखते-देखते सम्पादित हो जायेगी। उनका बालसुलभ व्यवहार और धवल व्यक्तित्व लोगों को घसीटते हुए अपने निकट ऐसे इकट्ठा कर लेगा कि एक विशाल चतुरंगिणी सेना देखते-देखते गठित हो जायेगी तथा सृजन-सेनानियों की महत्वपूर्ण भूमिका निभाती नजर आयेगी।”
इसके अतिरिक्त फ्लोरेंस ने अन्य अनेक भविष्यवाणियाँ की हैं, जिनमें मध्यपूर्व एशिया, यूरोप एवं अमेरिका के विविध देश सम्मिलित हैं। इनमें से अधिकाँश सत्य सिद्ध हो चुकी हैं, किन्तु अनेक अभी भी ऐसी हैं, जिनकी सत्यता प्रमाणित होनी बाकी है। हमें आशा करनी चाहिए कि आगामी समय के संबंध में उनके द्वारा की गई भविष्यवाणी भी सही सिद्ध होकर रहेगी। इसी से संबंधित उनने एक दूसरी पुस्तक लिखी है, जिसमें सन् 2000 एवं इससे आगे आने वाले समय की चर्चा है। अपनी उक्त बेस्ट सेलर पुस्तक “दि फाल ऑफ सेंसेशनल कल्चर” में लिखतीं हैं-”सन 2000 के आस-पास प्राकृतिक विपदाओं का ऐसा क्रम चल पड़ेगा जिसे देखते हुए यह कह सकना कठिन हो जायेगा कि यह सृष्टि सुरक्षित बची रह जायेगी, किन्तु बाद में लोगों की यह आशंका निर्मूल साबित होगी। वे देखेंगे कि इन्हीं विभीषिकाओं के बीच सृजन की संभावना भी छिपी हुई है, जो धीरे-धीरे पूर्व के अरुणोदय की तरह निकलती हुई कालक्रम में प्रचण्ड दिनमान का रूप धारण कर अपनी ऊष्मा से पूरी धरती को ओतप्रोत कर देगी। फिर न कहीं अराजकता दिखाई पड़ेगी , न अशान्ति वरन् सर्वत्र शान्ति का साम्राज्य दृष्टिगोचर होगा। गरीब- अमीर और ऊँच नीच की भौतिकवादी दीवार ढह जायेगी तथा एकता-समता परक अध्यात्मवादी दृष्टिकोण का विकास होगा। लोग परस्पर सौहार्द्रपूर्वक रह सकेंगे। उनमें एक ऐसी भावना पनपेगी, जो एक वृहत्तर परिवार को जन्म देगी जिसमें रहते हुए लोग “आत्मवत् सर्वभूतेषु” एवं “वसुधैव कुटुँबकम्” का साकार स्वरूप मूर्तिमान होते देख सकेंगे, किन्तु यह दिन देखने से पूर्व मनुष्य को प्रसव-पीड़ा की असह्य वेदना भी झेलनी पड़ेगी, उसी के उपरान्त
उसके सौभाग्य-सूर्य का उदय होगा।”
सन् 2000 से पहले के कुछ दशक ऐसे ही संत्रासों एवं विक्षोभों से भरे होंगे। लोग एक-दूसरे की जान का ग्राहक बनते दिखाई पड़ेंगे। अराजकता अपनी चरमसीमा पर होगी। चहुँ ओर ईर्ष्या-द्वेष का बोलबाला होगा? अशान्ति इस कदर बढ़ेगी, जिसकी तुलना जल से बाहर तड़पती मछली से की जा सके। मत्स्य-न्याय के जंगली कानून के अंतर्गत लोग मरते-मारते नजर आयेंगे। नीतिमत्ता को ताक पर रख दिया जायेगा और ‘जिसकी लाठी तिसकी भैंस’ की अनीति बरतते किसी को संकोच न होगा। मनुष्य की दुर्बुद्धि से उपजा पर्यावरण-प्रदूषण इस संकट में आग में घी का काम करेगा व मनुष्य जाति को सामूहिक मरण के कगार पर ला खड़ा करेगा, किन्तु साथ-साथ चलने वाली निर्माण प्रक्रिया के अंतर्गत उत्तरी भारत से उठने वाली आध्यात्मिक चेतना की लहर 21 वीं सदी के प्रारंभ में इतनी तीव्र व प्रबल हो उठेगी, कि एक समय में काली घटा से गहराते संकट देखते-देखते तूफान में पड़े तिनके की भाँति अपना अस्तित्व गँवाते नजर आयेंगे। लोगों को एकता-समता का महत्व समझ में आने लगेगा तथा परस्पर भ्रातृभाव विकसित करने को उत्सुक प्रतीत होंगे। उस विचार-चेतना से मध्यम वर्ग सर्वाधिक प्रभावित होता दीख पड़ेगा किन्तु यह भी बात नहीं कि सम्पन्न वर्ग इससे अछूता रह जायेगा। धन के दुरुपयोग का दुष्परिणाम उसे स्पष्ट नजर आने लगेगा। तथाकथित बुद्धिजीवियों की तर्कबुद्धि विश्वास बुद्धि में परिणत हो जायेगी। उनमें श्रद्धा, आस्था और बुद्धि का सहज समन्वय भासने लगेगा। यह विचारधारा बुद्धिवादी नास्तिकों में भी यह विश्वास पैदा करने में समर्थ हो सकेगी कि धर्म और विज्ञान एक-दूसरे से पृथक नहीं, वरन् एक दूसरे के पूरक हैं। गाड़ी के दो पहिये की तरह इनका साथ-साथ रहना ही मानवी प्रगति में सहायक सिद्ध हो सकता है, अन्यथा एकाकी प्रगति मानवी अवगति का कारण बन सकती है। उपरोक्त चिन्तनधारा से लोगों को यह समझते देर न लगेगी कि उच्च आध्यात्मिकता के आगे भौतिकता की चमक-दमक न सिर्फ फीकी है, वरन् चमकीले साँप की भाँति आकर्षक लगते हुए भी घातक है। संत की यह विचारधारा उनके मत्स्यावतार की तरह बढ़ते शिष्य-समुदाय द्वारा विश्व के कोने-कोने तक में पहुँचायी जायेगी, और इक्कीसवीं सदी में उज्ज्वल भविष्य की संरचना करेगी।”
फ्लोरेंस ने कई ऐसी भविष्यवाणियाँ की हैं जो सामयिक हैं और प्रासंगिक भी, अस्तु उनका उल्लेख करना अप्रासंगिक न होगा। उन्होंने अपनी पुस्तकों में लिखा है कि सन् 88-89 के उपरान्त विश्व के अनेक हिस्से में ऐसे कितने ही भूकम्प आयेंगे, जिनमें जान-माल की व्यापक हानि होगी। द्रष्टव्य है कि इन्हीं दिनों उत्तराखंड क्षेत्र में इतना जबरदस्त भूचाल आया है, जिसमें हुई हानि का सही-सही अनुमान अब तक नहीं लगाया जा सका है। इससे पूर्व अगस्त 88 में उत्तरी बिहार और नेपाल में आये भूकम्प में हजार से भी अधिक लोगों की जानें गई। अक्टूबर 1990 में चीन में व फरवरी 91 में पाकिस्तान में आयी इस प्राकृतिक आपदा में पाँच सौ के करीब मौतें हुई। इससे फ्लोरेंस की भविष्यवाणी की सच्चाई प्रमाणित होती है।
उल्लेखनीय है कि फ्लोरेंस ने अपनी दोनों पुस्तकों में स्थान-स्थान पर उत्तर भारत के एक स्थल एवं ऐसे सन्त की चर्चा की है, जहाँ से व जिनके द्वारा आध्यात्मिक विचारक्रान्ति के सूत्रपात की बात कही गई है, किन्तु फ्लोरेंस ने दोनों में से किसी का भी नामोल्लेख नहीं किया है, परन्तु विज्ञ पाठकों को यह समझते कदाचित तनिक भी कठिनाई नहीं होनी चाहिए कि प्रस्तुत पंक्तियों में उनका संकेत किस ओर है? आने वाले समय में उत्कृष्टता के पक्षधर सृजन शिल्पी सौंपी गयी भूमिका सम्पन्न करते हुए अपना प्रयोजन पूरा कर दिखायें, तो किसी को भी आश्चर्य नहीं करना चाहिए, वरन् इसे नियन्ता का सुनिश्चित पूर्वनिर्धारण मानना चाहिए।
भगवान ने यह सृष्टि बड़ी बुद्धिमत्तापूर्ण ढंग से बनायी है । उसकी सभी संरचनाएँ सोद्देश्य हैं । उसने एक-से एक बढ़ कर न जाने कितने जीवधारियों का निर्माण किया है । हर एक के पीछे मनुष्य के लिए बहुमूल्य शिक्षाएँ निहित हैं । मानवी बुद्धि के लिए आज यही सबसे बड़ी चुनौती है, कि वह स्रष्टा की उस शिक्षा को अनावृत्त कर अपने जीवन को अधिक सुखी सम्पन्न एवं उन्नतिशील-प्रगतिशील बनाये, जिसे उसने हर प्रकार के प्राणियों में सँजोयी है । विज्ञान ने इससे कुछ हद तक लाभ भी उठाया है । उसने पक्षियों को आकाश में उड़ते देखा, तो वायुयान बना डाला, मछलियों को पानी में तैरते देखा तो उसी के आकार-प्रकार (स्ट्रीम लाइन) के जहाज पनडुब्बी बना डाले । इसी प्रकार उसने और अन्यान्य जन्तुओं पर आधारित अनेक यंत्र-उपकरण विकसित किये, किन्तु इतने पर भी यह नहीं कहा जा सकता कि उसने किसी पदार्थ, प्राणी के सम्पूर्ण अविज्ञात का उद्घाटन कर लिया । सच तो यह है कि इनके अतिरिक्त भी अन्य अनेकों संभावनाएँ उनमें विद्यमान हो सकती हैं, जिनका अनावरण होना शेष है ।
मनुष्य ने आँख की बनावट देखी तो फोटो खींचने वाले कैमरे का आविष्कार कर लिया । उसकी इसी क्षमता के कारण आज हम घर बैठे रंग-बिरंगी तस्वीरें देखने में समर्थ हो सके हैं । इसे निश्चय ही मनुष्य की अद्भुत क्षमता और योग्यता कहनी चाहिए , पर विकास की गति यहीं अवरुद्ध नहीं हो जानी चाहिए, वरन् उसमें छिपी अन्य अगणित संभावनाओं पर आगे भी विचार होता रहना चाहिए, तभी हम किसी के सम्पूर्ण तथ्य को सत्य के रूप में हस्तगत कर सकते हैं, अन्यथा किसी जीव अथवा पदार्थ के कुछ रहस्य ज्ञात कर लेने के उपरान्त ही शोध कार्य रोक देने से हम उस सत्य को प्राप्त नहीं कर सकते, जो हमारा चरम लक्ष्य है । हमारा उद्देश्य अर्ध सत्य से पूर्ण सत्य की ओर अग्रसर होना है, सम्पूर्णता को जानना है, किन्तु सम्प्रति विडम्बना यह है कि अर्थ को ही पूर्ण सत्य मान लेते एवं आगे उस पर विचार करना बन्द कर देते हैं जिससे हमारा हमारा ज्ञान एकाँगी व अधूरा बन कर रह जाता है जो निश्चय ही अपूर्णता से पूर्णता की ओर बढ़ने की दिशा में मानवी प्रयास में एक गहरा आघात है ।
पिछले दिनों विज्ञान ने आँख के आधार पर फोटोग्राफी वाले कैमरे का विकास तो कर लिया, यह निस्संदेह सराहनीय बात है , पर उसकी अन्य संभावनाओं की उपेक्षा कर दी , जो विकास मार्ग में उपस्थित अवरोध कर सूचक है । कैमरे का विकास जर्मन शरीरशास्त्री विलियम कुन्हे के प्रयोग-परीक्षणों की ही परिणति कहना चाहिए, जो वस्तुतः आँख के देखने की प्रक्रिया समझना चाहते थे, फलतः अनेक जन्तुओं पर अनेक प्रयोग किये । इसी क्रम में एक दिन वे एक खरगोश पर प्रयोग कर रहे थे। उसे एक अँधेरे कमरे में रखा । तत्पश्चात कमरे की जालीदार खिड़की खोल दी और खरगोश का ध्यान उससे आने वाले प्रकाश की ओर आकृष्ट किया । फिर दस मिनट के लिए उसकी आँखों को काले कपड़े से ढँक दिया । इसके बाद दो मिनट के लिए कपड़े को आँखों से अलग कर दिया अब खिड़की से आने वाला प्रकाश उसकी आँखों में पड़ने लगा । तत्पश्चात् आँखों पर काली पट्टी पुनः बाँध दी । इसके उपरान्त खरगोश का सिर धड़ से अलग कर दिया । इतना करने के बाद कुन्हे से उसकी आँख की रेटिना निकाल कर उसे फिटकरी और नमक के मिश्रण के घोल में तीन दिन तक छोड़ दिया । चौथे दिन रेटिना में खिड़की का प्रतिबिम्ब दिखाई पड़ा । इससे कुन्हे को बड़ा आश्चर्य हुआ । उनने प्रयोग की त्रुटिहीनता सुनिश्चित करने के लिए इस प्रकार और कई परीक्षण किये । बन्दर पर भी ऐसा ही प्रयोग किया और परिणाम पूर्ववत प्राप्त हुआ । अर्थात् बन्दर को जो अन्तिम दृश्य दिखाया गया था, उसी का प्रतिबिम्ब उसकी रेटिना पर दृष्टिगोचर हुआ । अपराध करते हुए एक अपराधी की मृत्यु हो गई तो कुन्हे को मनुष्य में यह प्रयोग करने का अच्छा अवसर उपलब्ध हुआ । उनने उपरोक्त प्रयोग की पुनरावृत्ति की परिणाम यहाँ भी पूर्ववत पाया गया । अब कुन्हे को यह विश्वास हो गया कि उसका प्रयोग दोषरहित है । खरगोश की रेटिना में खिड़की का दृश्य किसी संयोग की परिणति नहीं, वरन् एक सुनिश्चित परिणाम का द्योतक था यह विचार उनके मन में दृढ़ हो गया ।
अब उनने यह सोचना प्रारंभ किया कि क्या उक्त प्रक्रिया द्वारा अपराधियों को पकड़ पाने में मदद मिल सकती है ? अपनी बहुचर्चित पुस्तक “इज इट पोसिबल टू स्पाट दि कल्प्रिट ?” में ऐसी ही अनेक संभावनाओं पर विचार किया है । इस संदर्भ में एक संभावना उनने यह यह व्यक्त की है , यदि अभियुक्त के साथ संघर्ष करते हुए व्यक्ति की आँखों में संघर्ष के तुरन्त बाद काली पट्टी बाँध कर किसी अँधेरी कोठरी में उसे रखा जाय और उसकी रेटिना पर अपराधी की बनी तस्वीर को किसी भाँति उभारा जा सके , तो दोषी को पकड़ पाना सरल हो सकता है । एक अन्य बड़ी ही विलक्षण संभावना का प्रतिपादन करते हुए वे लिखते हैं कि मनुष्य के परोक्ष और अतींद्रिय क्षमता सम्पन्न तृतीय नेत्र की भाँति ही वृक्ष-वनस्पतियों में ऐसे अनेकानेक अदृश्य नेत्र होते हैं, जिनके सहारे वे अभियुक्त को देख व पहचान सकते हैं। यदि घटनास्थल के पेड़ पौधे को किसी “पॉलीग्राफ” से संलग्न कर संदिग्ध अपराधियों को उसके निकट से बारी-बारी से गुजारा जाय तो संभव हैं, वृक्ष उसे समीप आते देख अपने भय-प्रदर्शन द्वारा विशेष प्रकार के ग्राफों से उसके अपराधी होने की सूचना दे दें। ऐसी ही कई और संभावनाओं का उनने उल्लेख किया है।
कोई भी कल्पना आरंभ में संभावना ही होती है। साकार रूप तो वह बाद में ग्रहण करती है। उपरोक्त संभावनाओं पर विज्ञान को गंभीरतापूर्वक विचार करना चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि यह सत्य के कितना करीब है। यदि ऐसा हो सका तो विज्ञान को न सिर्फ एक नई विधा हाथ लग सकेंगी, अपितु समाज को कई आपराधिक समस्याओं का सरल हल मिल सकेगा।
विज्ञान के क्षेत्र में किसी सिद्धान्त को शाश्वत सत्य मान लेना उसके साथ अन्याय करना होगा। वह हमें विराम नहीं, अविराम की शिक्षा देता है, स्थिरता नहीं, निरन्तरता की प्रेरणा देता है। इसी कारण से कल हम जहाँ थे, विज्ञान के क्षेत्र में आज उससे कहीं ऊंचाई पर और सत्य के अधिक निकट खड़े हैं यदि ऐसा न होता तो सापेक्ष-निरपेक्ष का अन्तर रह नहीं जाता और जो कुछ ढूँढ़ा जाता उसे पूर्ण सत्य मान लिया जाता, जिससे अनेक समस्याएँ उठ खड़ी होतीं एवं इससे विज्ञान की प्रगति भी प्रभावित होती। कभी आइन्स्टीन ने बड़े जोर देकर कहा था कि दुनिया में प्रकाश से अधिक लेत संभव नहीं। इस आधार पर उनने जैसे सूत्र की स्थापना भी कर ली, जिस पर अनेक गणितीय गणनाएँ आधारित हैं। तब इसे स्वीकार भी लिया गया, किन्तु अनन्त संभावनाओं को ध्यान में रखते हुए प्रगति-यात्रा यहीं रुक नहीं गई, वरन् खोज आगे भी जारी रही। इसी के परिणाम स्वरूप हम “टैकियोन” जैसे प्रकाश से भी अति वेगवान कण ढूँढ़ सकने में सफल हुए और उपरोक्त सूत्रों पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता अनुभव की जाने लगी।
अनुसंधान मात्र स्थूल पदार्थ-प्राणियों तक ही सीमित न होना चाहिए, अपितु चेतना क्षेत्र में भी समान रूप से गतिमान रहना चाहिए, तभी हम विज्ञान के साथ-साथ ज्ञान अर्थात् अध्यात्म क्षेत्र में उन्नति-प्रगति करते रह सकते हैं, जो निरपेक्ष है। यही मनुष्य जीवन का चरम लक्ष्य और उद्देश्य है। हमें इसकी उपेक्षा नहीं करनी चाहिए।
कबीर का अंतिम समय आ पहुँचा। वे शिष्यों से बोले-”मेरी अंतिम साँस मगहर में ली जाय। मुझे तुरन्त वहाँ ले चलो।” सभी हैरान कि मरते समय तो लोग काशी आते हैं व यह मगहर जाना चाहते हैं। कबीर बोले- मरकर यदि मैं स्वर्ग भी चला गया तो फिर काशी की ही महिमा गायी जाती रहेगी। मेरे खुद के किये धरे का तो फिर कोई मतलब नहीं है। लोगों के मनों में बैठी भ्रान्तियों को निकालने के लिए मेरा मगहर में शरीर छोड़ना जरूरी है। लोग जाने कि कबीर ने ऐसी जगह शरीर त्यागा, जहाँ मरने पर अधोगति प्राप्त होती है किन्तु उसके कर्म इतने पवित्र थे कि परमपिता परमात्मा ने उसे सद्गति प्रदान की।
यह सारा जगत भ्रान्तियों का समुच्चय है। दुर्गति सद्गति स्थान विशेष पर नहीं, श्रेष्ठ कर्तव्य पर निर्भर है।
वत्स तुम यह श्रम प्रतिदिन क्यों करते हो? महर्षि शाकल्य जब से वन में आये और उन्होंने इस जल स्त्रोत के समीप गुहा को अपना साधना स्थल बनाया, यह वृद्ध वनवासी कोल उनके यहाँ सूखी समिधाएं, कन्द और फल प्रतिदिन रख जाता है। वह आता है, भूमि में मस्तक रखकर ऋषि को प्रणाम करता है, अपना गट्ठर एक ओर रखता है समिधाएँ एक ओर और फल तथा कुछ बड़े-बड़े पते एक ओर रखकर गुहा के आस-पास की भूमि बुहारने लगता है और यह काम पूरा करके फिर भूमि पर मस्तक रखकर चला जाता है।
वृद्ध कोल को इससे कुछ मतलब नहीं कि ऋषि ने उसे देखा या नहीं। वह न एक शब्द बोलता है और न इसकी अपेक्षा करता है कि ऋषि उसे आशीर्वाद दें। अनेक बार ऋषि उसे गुफा में नहीं दीखते। वह सदा एक ही समय नहीं आ पता। ऋषि स्नान करते होते हैं या वन में गए होते हैं। वह वैसे ही गुफा की ओर मुख करके ऋषि के आसन को प्रणाम करता है आने पर और जाते समय भी। उसने अपने आप एक सीमा मान ली है।
वर्षा-आँधी और शीत-वनवासी जातियों के लिए ये कोई बाधाएँ नहीं है। प्रकृति की उन्मुक्त गोद में खेलना उन्होंने जन्म से सीखा हैं प्रबल वर्षा में भी किसी दिन वह रुका नहीं। वह तो तब भी नहीं रुका था जब उसका देह ज्वर से तप रहा था। महीनों हो गए इस वृद्ध को लकड़ियाँ और कन्द लाते। महर्षि शाकल्य को यही पता नहीं लगा कि कोई उनकी सेवा कर रहा है। आज इधर ध्यान गया उनका, तो वृद्ध को देखते ही आसन से उठे और सीधे उसके सामने आ खड़े हुए।
“क्या चाहिए तुम्हें?” सब कुछ देने में समर्थ तपोनिष्ठ
ऋषि का क्या ठिकाना। वे इस काले-कलूटे लंगोटीधारी बूढ़े कोल को जो वरदान दे डाले तो सृष्टि में उनका प्रतिवाद करने वाली शक्ति कहाँ से आएगी?
“डरो मत हिचको मत तुम्हें जो कुछ माँगना हो माँगो। सुप्रसन्न तपस्वी के अभय स्वर निकल।
इस वन में कन्द और फल बहुत है। बूढ़े ने बड़ी नम्रता से कहा-आपकी कृपा से मेरे दोनों पुत्र स्वस्थ और बलवान है। वे मेरा आदर करते हैं। मुझे तो कुछ भी नहीं चाहिए।
‘तुम यह मेरी सेवा प्रतिदिन क्यों करते हो?’ महर्षि भी इस अशिक्षित असंस्कृत वन्य मानव की निष्कामता से चकित रह गए थे।
‘मेरा बाप मरने लगा था तो उसने मुझसे कहा था’ वृद्ध ने हाथ जोड़कर प्रार्थना की-’सेवा कर पाना बड़े सौभाग्य की बात है। कभी कोई ऋषि मुनि इस वन में आ जाय तो अपने बनते उनकी सेवा करना इससे भगवान प्रसन्न होता है।’
मैं और सेवा कर भी क्या सकता हूँ?’ वृद्ध कह रहा था लकड़ियाँ और ये कन्द तो वन के हैं। इनमें मेरा क्या है। लड़कों को मैंने कह दिया है कि एकल सुअर लागू पड़ने वाले बाघ आदि को वे यहाँ से दूर खदेड़ने में भूल न करें।
“भगवान प्रसन्न हो जायँ तो तुम उनसे क्या चाहोगे ?” महर्षि को लगा , यह वृद्ध समझता नहीं कि ईश्वरीय सृष्टि में जो कुछ भी मनुष्य प्राप्त कर सकता है , वह सब देने की क्षमता उनमें है ।
‘मुझे जो कुछ चाहिए वह श्रम ने पहले से दे रखा है । काम करते रहने से शरीर चुस्त-दुरुस्त निरोग रहता है । थके हारे पीड़ितों की मदद करने से उनका आशीर्वाद मिलता है । वृद्ध सरल भाव से कहे जा रहा था-आप जैसे ज्ञानी महात्माओं की सेवा करते हैं-तो आशीर्वाद मिला ही धरा है । बस एक ही चाहते हैं ?
क्या ? इस एक शब्द में महर्षि के सारे अस्तित्व की प्रसन्नता टपक पड़ी ।
‘भगवान सब संसार को बनाता है । सबका पालन करता है । वह सब करते-करते थक जाता होगा । ‘ वृद्ध कोल ने बड़ी सरलता से कहा वह प्रसन्न रहे तो उसे थकावट नहीं लगेगी मैं चाहता हूँ वह सदा प्रसन्न रहे । मैं जब आनन्द में रहता हूँ कितना भी ढेर सा काम करूं थकता नहीं हूँ ।
ऋषि चकित हो उसकी निष्काम श्रम निष्ठ पर सोचने लगे । उन्हें इस तरह सोचते देख उसने भूमि पर सिर रखा और लौट पड़ा अपने झोंपड़े की ओर ।
“तुम्हारी झोंपड़ी कहाँ है ?” दूसरे दिन जब वृद्ध लकड़ियाँ लेकर आया, उसे लगा कि महर्षि उसकी प्रतीक्षा कर रहे थे । उसने जैसे ही भूमि पर माथा रखा महर्षि आसने से उठ आए । उन्होंने क्या आशीर्वाद दिया वृद्ध समझ नहीं सका किन्तु ऋषि तो उसका निवास पूछ रहे थे ।
‘यहाँ से एक कोस दूर नाले के किनारे हम कोलों के झोंपड़े हैं।’ वृद्ध ने प्रार्थना की पर वहाँ आस-पास की भूमि बहुत अपवित्र है । आप वहाँ पधारें ऐसा स्थान वह नहीं है । उत्तर मिला वत्स ! भगवान श्री द्वारिकानाथ इन्द्रप्रस्थ आये थे धर्मराज युधिष्ठिर के समीप वे अर्जुन को साथ लेकर इधर वन भ्रमण हेतु निकले हैं । वे अभी भी इधर आ सकते हैं यद्यपि उनका शिविर यहाँ से पर्याप्त दूर है, किन्तु अर्जुन के रथ के लिए यह दूरी गणना करने योग्य नहीं है ।
‘मैंने अपने बाप से सुना है महाराज पाण्डु हमारे स्वामी थे । ‘ वृद्ध हर्षित हो गया था ‘उनके पुत्र इधर आवें तो उनकी पद वन्दना का भाग्य मिलेगा और भगवान तो
आप जैसे महात्मा के यहाँ आवेंगे ही ।
‘श्रीकृष्ण इस आश्रम पर आवें-इसकी मुझे सम्भावना नहीं है ।’ बूढ़ कोल ऋषि की बात सुनकर उनका मुख देखता रह गया । ऋषि सर्वज्ञ हैं अतः ठीक ही कहते होंगे । लेकिन जब ऋषि का दर्शन करने अर्जुन श्रीकृष्ण के आने की आशा नहीं है, उनके दर्शन होने की उसे भी क्या आशा ?
‘कल तुमने मुझसे कुछ माँगा नहीं ।’ महर्षि अद्भुत भरे-भरे स्वर में बोल रहे थे आज मैं तुमसे माँग रहा हूँ अस्वीकार मत करना ।
आज्ञा भगवान् । वह तो लगभग भय से काँपने लगा । ऋषि इस प्रकार क्यों बोल रहे हैं । ऐसी क्या बात है , जिसके लिए वे उसे सीधे आज्ञा नहीं दे सकते । ‘श्रीकृष्ण तुम्हारे झोंपड़े में आयें तो उनसे अनुरोध करना कि वे इस ओर से निकलें । महर्षि ने अत्यन्त विनम्र स्वर में यह बात कही ।
‘भगवान मेरे झोंपड़े में आवेंगे ?’ वृद्ध जैसे आकाश से नीचे गिरा हो, इस प्रकार चौंका । वह कुछ क्षण तक निष्कम्प खड़ा रहा । पर ऋषि की वाणी असत्य नहीं हो सकती । वह प्रणाम करके चल पड़ा । उसके कदमों की आहट दूर होती गयी पर किसी अन्य की वाणी पास आती जा रही थी ।
“अर्जुन । आज एक साधक के दर्शन करने चलना है ।” श्री कृष्ण ने रथ चलाते ही सहचारियों को निषेध कर दिया था कि वे अनुगमन न करें । शिविर में भी वे चलते-चलते कह आये हैं कि आज मध्याह्न में उनकी प्रतीक्षा न की जाय ।
‘ऐसा साधक इधर कौन है जिनके दर्शन करने को स्वयं जनार्दन उत्सुक हैं ?’ अर्जुन को आश्चर्य होना स्वभाविक है । पाण्डव इतने प्रमादी नहीं है कि आस पास के जंगलों में रहने वाले तपस्वियों की वे खोज-खबर न रखें । ‘महर्षि शाकल्य की गुहा पर चल रहें हैं
आज आप ?’
अर्जुन का आश्चर्य अकारण नहीं है । महर्षि शाकल्य तपस्वी हैं योगी हैं, किन्तु हैं महर्षि व्यास के प्रशिष्य और जब व्यास जी ही श्रीकृष्ण का दर्शन करने आते हैं, महर्षि शाकल्य को सन्देश भिजवा देते तो वे अपना अहोभाग्य मानते ।
‘मानव के समीप आध्यात्मिक साधन के तीन उपकरण हैं मस्तिष्क हृदय और देह।’ चलते रथ में माधव अपने सखा को समझा रहे थे- ‘मस्तिष्क के जो साधक हैं प्रतिभा का प्रसाद जिन्हें मिला है उन महर्षियों के दर्शन हम इन्द्रप्रस्थ में ही कर लेते हैं ।’
‘हृदय का धन जिनके पास है भक्ति देवी के जो अनुग्रह भाजन हैं नन्द नन्दन को उनके द्वार तक दौड़ना पड़ता है ।’ अर्जुन ने हँसकर अपने सखा की ओर देखा । से तो है ही । श्रीकृष्ण भी हँसे “लेकिन आज एक देह के साधक के द्वार पर हम चल रहे हैं । उसके पास न बुद्धि है और न भावुकता की शास्त्रीय बातें । किन्तु देह को उसने लगा दिया है श्रम-श्रम अनवरत श्रम यह एक मात्र साधना है उसकी । पीड़ितों की सेवा, असहायों की सहायता एकमेव ध्येय है उसका और तुत जानते हो कि देह सत्ता है । सत्ता का ठीक संयम होगा तो चित् और आनन्द उनसे भिन्न नहीं रहेंगे ।
‘सच्चिदानंद स्वयं दौड़ा जा रहा है ‘ यह तो देख रहा हूँ किन्तु वे महाभाग ?’ अर्जुन ने पूछा । रथ के वेग ने अब तक गन्तव्य तक पहुँचा दिया था । उन्हें और पार्थ को अद्भुत दृश्य देखने को मिला । बूढ़ा कोल एक घायल की सेवा करने में जुटा था । श्रीकृष्ण सहायक बन गए उसके झोंपड़े में आकर ।
बाबा महर्षि शाकल्य को कहना , हम उनके आश्रम के सम्मुख से जायेंगे । कार्य निवृत्त होने पर गीता के महान उपदेष्टा ने कहा । स्वरों में जैसे उसमें नवीन चेतना का संचार हुआ । वह सन्देश देने दौड़ा वह दैहिक साधक अपनी इस महान साधना के अतिरिक्त उसे और चाहिए भी था क्या ?
ज्ञान दो भागों में विभक्त है । एक को दर्शन और दूसरे को विज्ञान कहते हैं । विज्ञान में पंच तत्वों से विनिर्मित वस्तुओं की- विधियों की जानकारी और उनके उपयोग की विधा सम्मिलित है । दर्शन में चेतना को प्रभावित करने वाली भावनागत एवं पदार्थगत संवेदनाओं का विश्लेषण, विवेचन किया जाता है । नीति, धर्म, सदाचार, अध्यात्म इसी परिधि में आते हैं । विज्ञान की असंख्य धारायें हैं-शरीरविज्ञान, मनोविज्ञान, पदार्थविज्ञान, रसायन, भौतिकी, याँत्रिकी, तकनीकी आदि । सामान्यतया विज्ञान और दर्शन के यह दोनों ही क्षेत्र पृथक्-पृथक् और असम्बद्ध माने जाते हैं । कई बार इन्हें परस्पर विरोधी भी ठहराया जाता है, पर गंभीरता से देखने पर स्पष्ट होता है कि दोनों एक दूसरे के पूरक हैं । एक के बिना दूसरे का प्रयोजन पूरा नहीं हो सकता । फिर जहाँ तक सत्य के शोधन का प्रश्न है, वहाँ इन दोनों में कभी किसी प्रकार का विरोध हो ही नहीं सकता ।
वस्तुतः हमारा प्रगतिशील एवं सुख-सुविधा सम्पन्न जीवन रथ के दो पहियों की तरह विज्ञान और दर्शन के समन्वय से ही गतिशील हो रहा है । दर्शन अंतर्ज्ञान शक्ति इन्टरनल पावर, तर्क, भाव संवेदना और दूरदर्शी विवेक पर अवलम्बित है और विज्ञान बौद्धिक शक्ति पर, प्रयोगात्मक तथ्यों पर । इस प्रकार से उनके साधन तो पृथक्-पृथक् हैं, पर सत्य के समीप तक पहुँचाने का दोनों का मूलभूत उद्देश्य एक है ।
सुप्रसिद्ध मनीषी बिल डूरण्ट ने “द स्टोरी आफ फिलॉसफी” नामक अपने ग्रंथ में इसी से मिलते जुलते हुए विचार व्यक्त किये हैं । वे कहते हैं कि विज्ञान का आरंभ दर्शन में होता है और अन्त कला में । यदि विज्ञान में मानवी चेतना की सुसंवेदना उत्पन्न करने की क्षमता न होती तो उसके लिए कठोर श्रम करने में किसी को भी उत्साह न होता । केवल कौतूहलभर के लिए विज्ञान की शोध नहीं होती है। उसके पीछे मानवी सुख-शान्ति का जो उत्साह भरा लक्ष्य जुड़ा है, उसी ने विज्ञान की उन्नति का पथ प्रशस्त किया है। विज्ञानवेत्ता करनर हाईसवर्ग ने भी अपनी कृति “फिजिक्स एण्ड फिलॉसफी” में अनिश्चितता के नियमों पर प्रकाश डालते हुए लिखा है कि विज्ञान वस्तुतः दर्शन शास्त्र की स्थूल जाति का निरूपण करने की एक शैली मात्र है। सिद्धान्तों के हाथ में लगने के बाद ही वैज्ञानिक प्रयोगों में पूर्णता आती है।
विज्ञान और दर्शन आपस में अविच्छिन्न रूप से जुड़े हुए हैं, इस तथ्य को बुद्धिजीवियों ने अब बिना हिचक के स्वीकार कर लिया है। फलस्वरूप “वैज्ञानिक दर्शन” एक नया ही विचारणीय विषय सामने आया है। इस संबंध में ख्यातिलब्ध विद्वान केसरलिंग ने अपनी पुस्तक “क्रिएटिव अण्डरस्टैडिंग“ में कहा है कि ज्ञान की दो धारायें-विज्ञान और दर्शन अविच्छिन्न हैं। इन दोनों को मिलाकर एक शब्द “वैज्ञानिक दर्शन अथवा ‘दार्शनिक विज्ञान’ नाम दिया जाना इस युग के ज्ञान विस्तार को देखते हुए सब प्रकार उपयुक्त ही होगा। उनके अनुसार जिस प्रकार विज्ञान के अंतर्गत रसायनशास्त्र, शरीरशास्त्र, याँत्रिकी आदि धारायें आती हैं, उसी प्रकार ज्ञान मीमाँसा, प्रमाण मीमाँसा, मनोविज्ञान, तर्कशास्त्र और अध्यात्म जैसे दार्शनिक विषयों को भी सम्मिलित किया जाना चाहिए। दोनों के बीच परस्पर सहयोग से ही समग्र सत्य का दर्शन हो सकता है।
मूर्धन्य वैज्ञानिक एफ. सी. नार्थरोम का कहना है कि वैज्ञानिक सिद्धान्त को जितना वास्तविक माना जाता है, उससे अधिक वे काल्पनिक हैं कि प्रयोग का सही उतरना इस बात की गारंटी नहीं है कि प्रयोग की जो व्याख्या विवेचना की गई है, उसके जो आधार कारण बताये गये हैं, वे सही हैं। प्रायः ऐसा होता रहता है कि पुराने सिद्धान्त काटकर उनके स्थान पर नये सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया जाता है। भूतकाल के कितने ही सिद्धान्त, जो कभी पत्थर की लकीर समझे जाते थे, देखते-देखते निरस्त हो गये। यह क्रम आगे भी चलते ही रहने वाला है। इसी प्रकार अनेक सामाजिक एवं धार्मिक प्रथा-परम्परायें ऐसी हैं जिन्हें स्वभाव में सम्मिलित कर लिया गया है, पर आज के संदर्भ में यथार्थ से उनका कोई गहरा सम्बन्ध नहीं है। तर्क और तथ्य की कसौटी पर भी वे खरे नहीं उतरते। अतः भ्रान्तियों की गुंजाइश दोनों में समान रूप से है और इन्हें छोड़ा जा सकता है। इतने पर भी यह मानना ही पड़ेगा कि दोनों ने गिरते-पड़ते सत्य के अधिकाधिक निकट मनुष्य की ज्ञान चेतना को पहुँचाने में अतिमहत्वपूर्ण योगदान दिया है। आइन्स्टीन ने इस तथ्य को स्वीकारा है कि विज्ञानी भी दार्शनिकों की ही तरह अपने सिद्धान्त की स्थापना कल्पना के आधार पर करते हैं। प्रयोगों की कसौटी पर उस कल्पना का खरा खोटापन परखा जाता है। इस पर भी सत्य और असत्य का सम्मिलित घोटाला कहीं न कहीं रह ही जाता है और एक समय की स्थिर मान्यता को दूसरे समय में बहुत कुछ सुधारना पड़ता है। दर्शन को भी इसी मार्ग का अनुसरण करना होगा।
दार्शनिक लिनयुताँग के अनुसार वस्तुओं के परखच्चे उधेड़ते रहने पर जगत का न तो स्वरूप समझ में आ सकता है और न उसका प्रयोजन स्पष्ट होता है। इसके लिए दर्शन का सहारा लिये बिना काम नहीं चल सकता। दर्शन की परिभाषा करते हुए डॉ. राधाकृष्णन ने उस सत्य को समझने का बौद्धिक प्रयास कहा है। उनका कथन है कि विज्ञान के लिए बिना दर्शन की सहायता के विश्व का तात्विक स्वरूप समझ सकना आशक्त है। दार्शनिक जीन ड्यू प्लेसिस का मत है कि जगत का स्थूल स्वरूप ही विज्ञान हमें समझा सकता है और पदार्थों की प्रकृति पहचान कर उससे लाभ उठाना संभव कर सकता है। इसके आगे उसकी गति नहीं। जो है सो क्यों है। इसके आगे उसकी गति नहीं। जो है सो क्यों है? किस लिए है? कैसा है? इन प्रश्नों का उत्तर दर्शन के अतिरिक्त और किसी माध्यम से मिल ही नहीं सकता।
महर्षि कात्यायन ने ‘यथार्थता के मर्मस्थल तक पहुँच सकने वाली तीखी विवेक दृष्टि को दर्शन की संज्ञा दी है और कहा है कि अध्यात्म अन्धता का निराकरण मात्र दार्शनिक दृष्टि मिलने पर ही हो सकता है। “फिलॉसफी आफ फिजीकल साइन्स” के लेखक सर ए.एस. एडिंगटन ने इसी तथ्य का प्रतिपादन करते हुए कहा है कि विज्ञान के सिद्धान्तों का समझना और समझाना दर्शनशास्त्र के सिद्धान्तों के सहारे ही संभव हो सकता है। “फ्राम युक्लिड टू एडिंगटन” नामक अपनी कृति में सर एडमण्ड हृटेकार ने लिखा है कि प्राचीन दर्शनशास्त्र के विवादास्पद सिद्धान्तों को वैज्ञानिक प्रयोगों के आधार पर अधिक प्रामाणिक रीति से परखा और जाना जा सकता है। ‘दि फिलॉसफी आफ स्पेश एण्ड टाइम प्रिफेस” के लेखक हन्स राइशन वाच ने भी लिखा है कि वह जमाना अब लद गया, जब विज्ञान और दर्शन को एक दूसरे से सर्वथा पृथक कहा जाता था। अब हम इस निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि दर्शन और विज्ञान की जोड़ी में से एक को हटा देने पर दूसरा लड़खड़ाने लगा है। थ्योरी आफ रिलेटिविटी जैसे सिद्धान्तों की उपज दर्शन और विज्ञान को अन्योन्याश्रित मान कर ही हो सकती है।
ज्ञान का मूल आधार है-जिज्ञासा, जानने की इच्छा। इसी प्रवृत्ति ने भौतिक पदार्थों के स्वरूप, स्वभाव एवं उपयोग की विधि-व्यवस्था पर चढ़ते हुए आवरणों को हटाकर भौतिकी विद्या का विशालकाय भाण्डागार प्रस्तुत किया और उसका उपयोग-उपभोग करके मनुष्य ने अन्य प्राणियों की तुलना में असंख्य गुने सुविधा साधनों भरे जीवन का रसास्वादन किया है। जिज्ञासा का ही विस्तार चेतना को प्रभावित करने वाले तथ्यों की गूढ़ जानकारियों के रूप में हुआ है। समाज विज्ञान, शासन तंत्र, कला, नीति-न्याय, शिक्षा, अध्यात्म, भावसंवेदना, स्नेह, संयम आदि के अनेक उपयोगी तंत्र दार्शनिक चिन्तन के ही फलस्वरूप सामने आये हैं और मनुष्य क्रमबद्ध एवं परिष्कृत पद्धति से चिन्तन कर सकने योग्य बना है। भौतिक विज्ञान एवं दार्शनिक चिन्तन के सुसंतुलन का सम्मिश्रण ही मानव जीवन के
समग्र विकास की पृष्ठभूमि बन सकता है।
ग्रीक के शब्द कोशों में उल्लेख मिलता है कि यूनान के सुकरात से भी पुराने दार्शनिक दर्शन का अर्थ-’बहिर्जगत का अध्ययन’ करते रहे। इससे स्पष्ट है कि पाश्चात्य जगत में भी दर्शन और विज्ञान की गणना एक स्तर पर ही होती रही है। अन्यान्य प्राचीन मनीषियों ने भी लगभग इसी स्तर की व्याख्या की है। इन दोनों क्षेत्रों का जब अधिक विस्तार हुआ, तभी यह बटवारे की बात सामने आयी और अन्तरंग चिन्तन की धारा को दर्शन तथा बहिरंग हलचलों के ऊहापोह को विज्ञान कहा जाने लगा। इतना होते हुए भी यह एक स्पष्ट तथ्य है कि दोनों के मिलाये बिना न तो चिन्तन में स्पष्टता आती है और न वैज्ञानिक प्रगति का पथ प्रशस्त होता है। यथार्थता के मर्मस्थल तक पहुँचने के लिए दोनों में समन्वय का होना आज की अनिवार्य आवश्यकता है।
शरीर और मन का अन्योन्याश्रित संबंध है। दोनों सही स्थिति में रहते हैं और एक दूसरे की सुरक्षा में सहायक बन कर रहते हैं तभी काम चलता है। इनमें से एक के गड़बड़ा जाने पर दूसरा भी कंध डाल देता है। गाड़ी में दो बैल जुतते हैं। इसमें से एक बैल अपना कार्यभार उठाने में असमर्थ बन जाय तो दूसरे को दूना परिश्रम पड़ता है और वह भी डगमगाने लगता है। दो फेफड़े, दो गुर्दे मिलजुल कर अपना काम निपटाते हैं। पर जब उनमें से एक रुग्णता से घिर जाता है तो दूसरे को भी अपना काम ठीक तरह चलाने में असुविधा होती है। इसलिए दोनों की ही स्वस्थता का, स्वच्छता का निरन्तर ध्यान रखने की आवश्यकता है।
छोटी आयु के बच्चे ठीक तरह समझ सोच नहीं पाते, क्योंकि उनका मानसिक विकास तब तक हो नहीं पाता। बुद्धि अपना पूरी तरह काम करने की स्थिति में नहीं होती। परिपक्वता के अभाव में बालक ऐसा ही सोचता और करता है जिन्हें बचकाना कहा जाय।
यही बात बुढ़ापे में भी होती है। काया जीर्ण−शीर्ण हो जाती है। इन्द्रियाँ जवाब देने लगती हैं। पाचन सही नहीं होता और नींद पूरी नहीं आती। फलतः मस्तिष्क पर भी बुरा असर पड़ता है। बुद्धि सठिया जाती है। सरकारी नौकरियों से छुटकारा मिल जाता है। घर के लोग भी उनकी सलाह को कम महत्व देते हैं। चिड़चिड़ाना और भूल जाने की शिकायत शुरू हो जाती है, दुर्बल शरीर उपार्जन के उपयुक्त भी नहीं रहता। कड़ा परिश्रम करने से थकान आती है और खटते रहने पर दुर्बलता रुग्णता में बदलने लगती है। युवावस्था में जो जोश, साहस और बुद्धि का बल रहता है, आयु के ढलने पर वह भी घटता चला जाता है। बच्चों का सा दुराग्रह पनपने लगता है। यह शारीरिक दुर्बलता का मन पर पड़ने लगता है। यह शारीरिक दुर्बलता का मन पर पड़ने वाला प्रभाव है।
मन की स्थिति सन्तुलित न रहने पर शरीर का भी बुरा हाल है। उद्विग्न, विक्षिप्त, चिन्तित, आक्रोशग्रस्त व्यक्ति यदि शरीर से निरोग हो, तो भी उनका शरीर वैसा काम नहीं करता जैसा करना चाहिए। शोक समाचार सुनकर भूख भाग जाती है और सामने परोसी थाली पर हाथ डालने की इच्छा नहीं होती। भले ही पेट खाली हो। क्रोध के आवेश में भी ऐसा ही होता है। कहते हैं कि एक घण्टे का क्रोध चौबीस घण्टे के बुखार जितनी कमजोरी लाता है। चिन्तित और निराश रहने वाला नींद खो बैठता है और दिन-दिन क्षीण होता जाता है। यह मन का शरीर पर पड़ने वाला प्रभाव है।
शरीर स्वस्थ रहे तो मन शुद्ध भले ही न हो पावे, पर सन्तुलित और विचारशील तो बना रहता है।
योजनाएं क्रमबद्ध बनाता है और उन्हें परिश्रमपूर्वक पूरी कर लेता है। भले ही वह निर्धारण अनुचित स्तर का ही क्यों न हो। बीमार और कमजोर आदमी तो चोरी डकैती करने का मन होने पर भी कायिक असमर्थता के कारण वैसा नहीं कर पाता। यही बात पुण्य-परमार्थ के सम्बन्ध में है। उन्हें करने के लिए आत्मसंयम और उदार चेतना की आवश्यकता है। पर रोगी को अपनी ही व्यथा कोंचती रहती है। उस पर स्वार्थ ही छाया रहता है और हर बात के लिए पराश्रित रहने की स्थिति में आत्मग्लानि भी कम नहीं होती । जो उस स्थिति में भी कुछ तो किया ही जा सकता है, पर मानसिक असंतुलन उसे भी ठीक तरह करने नहीं देता ।
गाड़ी के दोनों पहिए सही रहने चाहिए । इसी प्रकार न केवल शरीर को स्वस्थ रखने में पूरी-पूरी सतर्कता बरती जाय, वरन् मन को संतुलित रखने में भी कुछ उठा न रखा जाय ।
शरीर की दुर्बलता एवं रुग्णता दैवी विपत्ति की तरह नहीं घटती वरन् मनुष्य की अपनी बुलाई हुई होती हैं । असंयम शरीर को खाता है । जीभ का चटोरापन और कामुक प्रसंगों में अतिवाद अपनाने से मनुष्य भीतर ही भीतर खोखला हो जाता है । उसका ऊपरी ढकोसला भले ही ज्यों का त्यों दीखे, पर भीतरी जीवनी शक्ति क्षीण होती जाती है । फलतः बाहरी विषाणुओं का आक्रमण आये दिन दबोचता रहता है । असंयम का पेट पर भी कुछ असर पड़ता है । चटोरे व्यक्ति बिना भूख लगे आवश्यकता से अधिक मात्रा में अंटसंट खाते रहते हैं । फलस्वरूप पेट की भट्टी में पूरी तरह परिपाक न होने की स्थिति में रक्तमाँस में अशुद्धता बढ़ती है और न्यूनता पड़ती है । चटोरा अपना पेट खराब करता है और साथ में अनेक बीमारियाँ की कोताही करने के संबंध में भी है । आलसी अकर्मण्य बैठेठाले आराम तलब लोग अपने अवयवों को जंग खाये लोहे की तरह निकम्मा बना लेते हैं । समय पर निर्धारित काम करने की जिनकी रीति-नीति नहीं होती समय का पालन नहीं करते, दिनचर्या बेतुकी-बेढंगी, अस्त-व्यस्त रखते हैं,उनके लिए स्वस्थ रह सकना कठिन पड़ता है । शरीर की प्रकृति ऐसी है कि नियत समय पर नियम कार्य की माँग करती है । यदि उसमें व्यवधान पड़ता है तो शरीर की क्रिया-प्रक्रिया में व्यवधान उत्पन्न होता है और शरीर पर रुग्णता छाने लगती है ।
इन साधारण सी बातों का सतर्कतापूर्वक ध्यान रखा जाय तो मनुष्य आसानी से निरोग रह सकता है और दीर्घजीवी भी बन सकता है । पर नशेबाजी जैसे दुर्व्यसन अपनाकर कोई अपने पैरों स्वयं ही कुल्हाड़ी मारे, तो उसे आघात से बचाने के लिए दूसरा कोई क्या कर सकता है ?
मन-मस्तिष्क को असंतुलित बनाने में सबसे बड़ा कारण है-आत्म-विश्वास की कमी । जिसमें साहस, स्वावलम्बन, मनोबल नहीं है, वह हितैषी व्यक्तियों पर भी संदेह करता है और आशंका अविश्वास से घिरा रहकर भीतर ही भीतर भयभीत बना रहता है । भले ही उस पर कोई विपत्ति न आये, पर भविष्य में कोई विग्रह खड़ा हो जाने के भय से सदा बेचैनी बनी रहती है । साहस के अभाव में इतना भी सोचते नहीं बन पड़ता कि जब कठिनाई सामने आवेगी तब उससे साहसपूर्वक निपट लिया जायेगा । डरपोक व्यक्ति को विपरीत परिस्थितियाँ त्रास देती हैं, उससे कहीं अधिक वह आशंकाओं से आतंकित बना रहता है ।
मानसिक उद्विग्नता का दूसरा कारण है, बढ़ी-चढ़ी महत्वाकाँक्षाओं के घटाटोप । लोकेषणा, वित्तेषणा और पुत्रेषणा को भी शान्ति खा जाने वाली डाकिनें माना गया है । बहुत धन होना चाहिए , बड़ा पद मिलना चाहिए । विलास के बढ़े-चढ़े ठाट-बाट हों । ख्याति और सम्मान से अहंकार का पोषण होता रहे, आदि-आदि इच्छायें जब-जब साधारण स्तर से ऊँची उठ जाती हैं तो वे लिप्सा-तृष्णा कहलाने लगती हैं। हर किसी की हर मनोकामना पूरी हो सकना संभव नहीं । वैभव बटोरने के लिए ललकों का उछलते रहना ही पर्याप्त नहीं, वरन् परिस्थितियाँ भी अनुकूल होनी चाहिए । सघन सहयोगी भी उपलब्ध होना चाहिए । यह सब इच्छामात्र से ही उपलब्ध होते रहें , यह आवश्यक नहीं । बढ़े-चढ़े अपने शेखचिल्ली की तरह असफल भी रह सकते हैं और अपमान भी करा सकते हैं । असंतोष की आग से बच सकना उन्हीं के लिए संभव है जो औसत नागरिक भर का निर्वाह पर्याप्त मानते हैं । उन्हीं के लिए यह संभव है कि तृष्णा द्वारा उत्तेजित की गई अनावश्यक महत्वाकाँक्षाओं को काबू में रखकर आय के अनुरूप व्यय का बजट बना सके और स्वल्प-संतोषियों की तरह हँसता-हँसाता जीवन जी सके । ऐसे ही लोग पाप , अनाचार से भी बचे रह सकते हैं और आजीवन शालीनता बनाये रह सकते हैं । अपने से बड़ों की अपेक्षा छोटों के साथ तुलना करते रहने का दृष्टिकोण बना लिया जाय, तो यही अनुभव होगा कि जो उपलब्ध है वह सौ से कम भले ही हो, पर हजार से अधिक भी है । ऐसी मनःस्थिति संतुलित कही जाती है और वह शरीर को स्वस्थ बनाने के लिए पौष्टिक टॉनिक एवं बचाव की दृष्टि से ढाल का काम करती है ।
शरीर और मन दोनों में से किसी की भी उपेक्षा न की जाय । बहुमूल्य जीवन तभी तक स्थिर है जब तक कि शरीर में प्राणों को धारण किए रहने की क्षमता रहे । जो भी पुरुषार्थ करना चाहते हैं वे स्वस्थ शरीर के सहारे ही बन पड़ते हैं । वह अपना निरन्तर साथ रहने वाला और सेवा निरत रहने में तत्पर सबसे स्वामिभक्त सेवक है । रूखा-सूखा खाकर काम चला लेता है और हर स्थिति में प्रसन्न रह लेता है । ऐसे सन्मित्र के साथ यदि सद्व्यवहार करते रहा जाय , उस पर अनाचार का अवाँछनीय भार न लादा जाय तो अन्य प्राणियों की तरह मानवी काया भी निरोग रह सकती है । स्वस्थ रहने के लिए किन्हीं बड़ी रहस्यों को ढूंढ़ने या रसायनों के सेवन करने की आवश्यकता नहीं है । यदि प्रकृति के संकेतों पर चला जाय, संयम, अनुशासन पाला जाय तो आरोग्य से बिछुड़ने की कभी नौबत न आवेगी, साथ ही मनोबल भी बढ़ेगा । पुरुषार्थ भी जगेगा और चित्त भी प्रसन्न रहेगा ।
मानसिक व्यथायें परिस्थिति जन्य नहीं होतीं । मनःस्थिति के विकृत होने पर ही मनुष्य उद्विग्न होता है और अनेकों दुष्प्रवृत्तियों से घिर जाता है । यदि हलकी-फुलकी जिन्दगी जी जाय और मिलजुल कर सुख बाँटते दुःख बटाते रहा जाय तो चित्त सदा हलका रहेगा ।
मन को इतना नहीं उछलने देना चाहिए कि शरीर को उसके पीछे घिसटना पड़े । शरीर पर असंयम के इतने चाबुक नहीं मारने चाहिए कि वह तिलमिला जाय और जीवन सुख के राजमार्ग पर चलने से इन्कार कर दे । शरीर और मन के बीच परायापन नहीं रहना चाहिए । दोनों एक दूसरे का ध्यान जीवन जिया जाय तो निरोग भी रहा जा सकता है और आनन्दित , उल्लसित भी ।
समुद्र को सूर्य का ताप खौलाने लगा तो डरी-सहमी जल की बूँदों ने विधाता से प्रार्थना की कि हमें कष्ट क्यों दिया जा रहा है। हमने ऐसा क्या बिगाड़ा है कि हमारा अस्तित्व तक संकट में डाल दिया गया है। विधाता ने समझाया- “बूंदों! इसके बाद तुम्हारी जो नियति होगी, वह महानतम होगी। तुम जहाँ बरसोगी, वहाँ हरियाली का साम्राज्य होगा। तुम अस्तित्व मिटा कर तो देखो”।
जिन्हें यह समझ में आ गया वे वाष्पीभूत बादल बनकर आकाश में गयी, धरती पर गिरी व बहते-बहते समुद्र में जा पहुँची। स्वातिनक्षत्र आते ही बूंदें एक बार फिर उमड़ी बिना किसी भय के हँसती खिलखिलाती आकाश से झरकर बाँस में गिरी तो वंशलोचन बन गई, कदली में गिरीं तो कपूर और सीपी के मुख गिरकर मोती बन गयीं।
विधाता सोचने लगे बूँदों की तरह मनुष्य भी संकटों से उद्विग्न न हो, स्वयं को विसर्जित करना, मिटाना सीख ले तो उसकी परिणति भी बूँदों के समान वंशलोचन, कपूर और मोती की तरह हो जाय।
मनोवैज्ञानिक जो एक सुप्रसिद्ध चित्रकार भी था, एक ऐसे निर्मम, क्रूर, अपराधी का चित्र बनाना चाहता था, जिसे देखते ही रोंगटे खड़े हो जायँ, चीख निकल पड़े । इसके लिए वह जेल के अन्दर गया और जघन्य हत्यारों में से एक को चित्र बनाने के लिए चुना । जब वह चित्र बनाने लगा , तो उसे चेहरा परिचित-सा जान पड़ा । अन्ततः उस चित्रकार से न रहा गया और अपराधी से पूछ ही लिया-क्या मैंने तुम्हें पहले भी कभी देखा है ? अपराधी की आँखों में से झर-झर आँसू झरने लगे । उसने पूछा-तुम रोते क्यों हो ? क्या मैंने तुम्हारा कोई घाव उभार दिया । उस आदमी ने कहा-मैं यही डर रहा था कि तुम यह बात जरूर पूछोगे । बीस वर्ष पहले भी तुमने मेरी तस्वीर बनाई थी, किन्तु तब दुनिया के श्रेष्ठतम और सरलतम आदमी के रूप में । तब मेरे चेहरे पर इंसानियत झलकती थी, किन्तु बीस वर्ष के अन्तराल में मेरे ही कुकृत्यों ने मेरी दुर्गति कर दी और तस्वीर भी बिगाड़ दी । अब चेहरे पर कुरूपता एवं निष्ठुरता उभर कर आ गई है । संयोग की बात आदमी वही है रोये न तो क्या करे ।
दोनों ही चित्र आदमी के भीतर हैं । यह उस पर निर्भर करता है कि वह अपनी विकृति को उभारे या सुकृति को ।
एक व्यक्ति रास्ता भटककर एक गाँव में पहुँचा । रात काफी हो गयी थी । एक दरवाजे पर दस्तक दी । द्वार खुलने पर रात्रि रुकने की इच्छा व्यक्त की । घर के लोगों ने उसका धर्म पूछा । व्यक्ति का धर्म पता चलने पर उनने कहा- “आपके धर्म से हमारा तालमेल नहीं बैठता । आप दूसरे धर्म के हैं । आप और दरवाजों को भी मत खटखटाइए क्योंकि सभी हमारे धर्म के हैं ।” अजनबी ने दरवाजा खोलने का धन्यवाद देकर बाहर निकल कर देखा । पूर्णिमा की चाँदनी रात थी। पास में मौलश्री का वृक्ष था । वह उसके ही नीचे सो गया । रातभर उस पर सुगंधित फूलों की वर्षा होती रही । प्रातः नींद खुली तो ताजगी थी ।
पुनः अजनबी ने उसी व्यक्ति के घर पर दस्तक दी । दरवाजा खुलने पर उसने रात अंदर न आने देने के लिए तीन बार धन्यवाद दिया । गृहस्वामी के असमंजस को मिटाते हुए वह बोला “यदि आपके छप्पर में शरण मिल गयी होती तो प्रकृति के अनुदानों से वंचित रह जाता व रातभर आपके धर्म की संकीर्णता के बोल सुनता रहता । मानव मात्र का धर्म बड़ा है । विराट प्रकृति का यह रूप व इसमें धर्म का मर्म मुझे समझ में न आया होता यदि आपने अंदर आने दिया होता । इन सब के लिए धन्यवाद ।” गृह स्वामी ही नहीं, पूरे गाँव को उस दिन धर्म की नयी परिभाषा समझ में आई ।
प्रख्यात मनोविज्ञानी नार्मन विन्सेन्ट पील का कहना है कि विश्व में आज अधिकाँश व्यक्ति मानसिक रुग्णता से ग्रस्त हैं । इन दिनों प्रमुख शारीरिक-मानसिक रोगों के अतिरिक्त मनुष्य में एक विचित्र रोग उपजा है-वहम। ऐसे वहमी आदमियों को अँग्रेजी में न्यूरोटिक कहते हैं, शंका के अतिरिक्त जिसका कोई प्रत्यक्ष कारण नहीं होता ।
ऐसे व्यक्ति कभी ज्वर की, कभी सिरदर्द की, कभी दिल की धड़कन तीव्र होने की, कभी दम फूलने या घुटने की शिकायत करते देखे जाते हैं और एक से दूसरे डॉक्टर के पास दौड़ते हैं । हर जगह उन्हें एक ही उत्तर मिलता है कि वहम के सिवा उनके शरीर या मस्तिष्क में कोई गड़बड़ी नहीं है । उपचार के नाम पर वे यही कहते हैं “वहम की दवा तो लुकमान हकीम के पास भी नहीं है, मात्र अपने मन को समझा लेने पर ही यह शिकायत दूर हो सकती है ।” पर समन तो मन ही जो ठहरा , वह कब किसकी मानता है ? उसको मनाने वाला तो कोई विरला सिद्धयोगी ही हो सकता है ।
सुप्रसिद्ध मनोचिकित्सा विज्ञानी रिचर्डनॉल ने अपनी पुस्तक “विचित्र दिमागी बीमारियाँ (स्ट्रेंज मेण्टल डिजीजेज) में कहा है कि वहम प्रायः किसी घटना के साथ जुड़ा होता है । श्मशान या कब्रिस्तान के समीप से निकलते हुए लोगों को भूत या चुड़ैलों की संभावना नजर आती हैं । उन्हें झाड़ी में प्रेत नजर आता है और ऐसा लगता है कि अब तब डराने या हमला करने वाला है । यद्यपि मन मजबूत हो तो ऐसा वहाँ कुछ नहीं होता और न ही कुछ दीखता है । किसानों के खेत मरघट के आसपास होते हैं । वे रात को हल जोतते, खेतों की रखवाली करते और अकेले ही वहाँ सोते हैं । रात के अँधेरे में उल्लू बोलते और सियार दौड़ते रहते हैं, पर भूत-प्रेतों का भय कभी उनके पास भी नहीं फटकता ।
विशेषज्ञों का कहना है कि वहमी व्यक्ति बहुधा किसी घटना के साथ किसी न किसी मुसीबत की संगति जोड़ लेते हैं । धूलभरी आँधी चलने पर उन्हें लगता है कि अँधड़ में दम घुट जायगा । बादल उमड़ने और गरजने पर लगता है कि कहीं बादल फट पड़े या बिजली गिर पड़ी तो उससे प्राणाँत न हो जाय । ऐसी घबराहट का एक ही इलाज है कि बन्द कमरे में बैठा जाय और आँधी या बादल को देखना बन्द कर दिया जाय । आँखें बन्द कर लेने पर भी कुछ राहत मिलती है।
कितने ही लोगों को वातानुकूलित गाड़ी के डिब्बे में बैठने पर लगता है कि हवा बन्द हो गयी और दम घुटने लगा । ऐसे व्यक्ति हवाई जहाज का सफर करते भी घबराते हैं । रेलगाड़ियों में सफर करते समय बाहर नजर दौड़ाते ही उन्हें बाहर की दुनिया दौड़ती हुई दृष्टिगोचर होती है, साथ ही लगता है कि सिर घूमने लगा और उलटी होने वाली है । कभी-कभी ऐसा हो भी जाता है । इसका भी एक ही इलाज है कि आँखों बंद करली जायँ और पीछे भागते पेड़ों का दृश्य अनदेखा कर दिया जाय ।
किन्हीं-किन्हीं को दिल का दौरा पड़ने या पेट का दर्द उठने की आशंका मन में बनी रहती है । इसमें चिकित्सकों का उपचार भी कुछ काम नहीं करता । ऐसे लोग प्रायः जादूगर, ओझाओं , पीरों के पास जाते झाड़-फूँक कराते-भभूत भाँकते देखे जाते हैं, जो कभी-कभी वहम की चिकित्सा का काम भी दे जाती है । वे समझते हैं की बीमारी भूत-प्रेतों के आक्रमण के कारण आरंभ हुई थी और जादू-मंत्र चला देने से वह दूर हो गई । दक्षिण अफ्रीका के मूर्धन्य अपराध कानून विशेषज्ञ जैकबस वानडेन होवर का कहना है कि इस तरह की मनोविकृति से ग्रस्त व्यक्ति सबसे अधिक उनके अपने देश में बसते हैं । छोटे मोटे काम बिगड़ने से लेकर अस्वाभाविक मृत्यु होने तक के लिए भूत-प्रेतों का प्रकोप माना जाता है और उसके शमन के लिए ओझाओं की शरण ली जाती है । दुर्भिक्ष को दैवी प्रकोप समझा जाता है ।
अपने देश के पिछड़े इलाकों में भी अन्धविश्वास बहुत अधिक है, साथ ही वहम की बीमारी भी बहुतों में पायी जाती है । यह छूत के रोग की तरह एक से दूसरे को लगती है और भूत-प्रेत के रूप में कइयों की जान का बवाल बन जाती है । इसका एक ही इलाज है कि वहमग्रस्त व्यक्ति को वहम की व्यथा का वास्तविक रूप समझाया जाय और उसे छोड़ने के लिए समझा बुझाकर सहमत किया जाय ।
सृष्टि का प्रत्येक घटक नियामक सत्ता के अनुशासन में बँधा निरन्तर गतिशील है। सूर्य, चन्द्रमा, पृथ्वी सहित समस्त ग्रह गोलक एक नियम व्यवस्था और विधान के अनुसार काम करते हैं। पेड़ों का उगना, फलना, फूलना, ऋतुओं का परिवर्तन, जीवों का जन्म-मरण आदि भी एक विशेष नियम की प्रेरणा से नियत विधान के अनुसार होता है। संसार की प्रत्येक छोटी से लेकर बड़ी घटनाओं के पीछे एक नियामक विधान ही काम करता है। समूचे विश्व-ब्रह्माण्ड का संचालन नियमन करने वाला विधान पिण्ड व अणु-परमाणु में भी करते देखा जा सकता है। हर अणु अपने में गतिशील है, उसके भी चारों ओर कई परमाणु चक्कर लगाते हैं। मनुष्य का जीवन भी इस विश्व नियम से अलग नहीं है, वरन् जीवन की प्रत्येक गतिविधि का नियमन भी इसी से होता रहता है।
प्रख्यात दार्शनिक इमैनुअल काण्ट ने अपने ग्रंथ में लिखा है कि आकाश के नक्षत्रों से लेकर अणु-परमाणु के कार्यकलाप एवं संसार की प्रत्येक घटना के पीछे-मनुष्य की प्रत्येक क्रिया के पीछे एक अमर चेतना का नियमित विधान काम कर रहा है। जिस तरह किसी ग्रह के पथ भ्रष्ट हो जाने पर सृष्टि में खलबली मच जाती है, उसी प्रकार विश्व-नियम नियति के विधान के विरुद्ध चलने पर मनुष्य के आँतरिक जीवन में भी भयंकर संघर्ष उत्पन्न हो जाता है। उसका परिणाम बाह्य जीवन में विनाश या हानि के रूप में ही प्राप्त होता है। इतिहास साक्षी है कि जब कभी किसी ने विश्वव्यापी नैतिक विधान को अनुशासन को तोड़ने का प्रयत्न किया है, तो उसकी प्रतिक्रिया कुछ ऐसी उत्पन्न हुई कि बड़े से बड़े दिग्गज को भी धराशायी होना पड़ा और यह सोचने का बाध्य होना पड़ा कि कोई नियामक सत्ता हमसे भी प्रबल है जो हमारे कर्मों का लेखा जोखा रखती है। वस्तुतः विश्व नियम, नियति चक्र, शान्ति और विकास का रास्ता है, जिसके अनुसार चलने पर मनुष्य के स्वास्थ्य एवं प्रतिभा का विकास होता है और जीवन में उत्कृष्टता प्राप्त होती है।
संसार में काम करने वाला नैतिक विधान एक विवेकपूर्ण तथ्य है जो विभिन्न शक्तियों, पदार्थों क्रियाओं में संतुलन पैदा करता है। प्रत्येक क्रिया और उसकी प्रतिक्रिया विश्व नियामक तथ्यों की प्रेरणा से ही होती है। मन के सूक्ष्म भाव, संकल्प-विकल्प, उतार-चढ़ाव उनमें संतुलन-असंतुलन भी इसी विश्व नियम की प्रतिक्रिया के अंग हैं। सुप्रसिद्ध मनीषी एडिंगटन का कथन है कि “जिस तरह मनुष्य के कार्य-कलापों के पीछे मन की शक्ति कार्य करती है, ठीक इसी तरह सृष्टि के मूल में भी एक चेतन सत्ता कार्य करती है, जो पूर्ण व्यवस्थित और नियामक है। सर्वप्रथम स्थूल दृष्टि से देखने पर जड़ जगत का कार्य भी एक मशीन की तरह दिखाई देता है, किन्तु गंभीर विचार चिन्तन द्वारा देखा जाय तो मालूम पड़ता है कि जगत और इसके प्रत्येक क्रियाकलाप के पीछे एक महान चेतन सत्ता काम कर रही है। भारतीय मनीषियों ने तो इस तथ्य की अनुभूति बहुत पहले प्राप्त करली थी, पाश्चात्य मनीषी उसकी पुष्टि कर रहे हैं।’
भारतीय दर्शन पग-पग पर इस विधायक सत्ता को स्वीकार करके ही आगे बढ़ता है। उसके अनुसार नियति चक्र, विश्व नियम, नैतिक विधान एक विवेकपूर्ण व्यवस्थित सुनियोजित तथ्य है, जिसका स्वभाव सत्यं शिवं सुन्दरम् की रचना, सर्जना करना है। यह उतना ही सत्य है जितना विश्व और मानवी काया में काम करने वाली अमर चेतना, साथ ही वह उतना ही सूक्ष्म और दुरूह भी है। इसे जानना समझना उसी तरह कठिन है जैसे शरीर में आत्मा को जानना। यही कारण है कि अधिकाँश लोग इसे समझ नहीं पाते, विशेषकर व्यक्ति अपने सीमित ज्ञान और तुच्छ दृष्टिकोण से इस असीमित सर्वव्यापी तथ्य को बहुधा समझ नहीं पाते।
मनीषियों का कहना है कि विश्व विधान, नियति चक्र की अनुभूति के लिए विवेकयुक्त निरपेक्ष बुद्धि की आवश्यकता है। अविवेकी मनुष्य अपने जीवन की समस्याओं के नियम, मूल विधान को समझने की बात तो और भी कठिन है। इसी तरह के अज्ञानी जन जीवन की बाह्य घटना और उसके अच्छे बुरे परिणामों से ही सुखी-दुखी होते रहते हैं। वे नहीं समझते कि उन्हें सुधारने के लिए ही दुख एवं कष्ट दण्ड रूप में किसी नियत की प्रेरणा से मिलते हैं। इसी तरह अच्छे कार्यों का परिणाम सुख-शान्ति प्रफुल्लता-प्रसन्नता, उल्लास, वरदान के रूप में मिलते हैं।
गंभीरतापूर्वक विचार करने पर भौतिक बाह्य जगत के प्रत्येक क्रियाकलाप के अंतर्गत एक शक्ति काम करती हुई मालूम पड़ेगी। एक नियत विधान के अनुसार संसार के कार्यों का नियमन, संचालन होता दिखाई देगा। आग छूने पर प्राण हरण कर लेती है। बर्फ ठंडी लगती है। कदाचित ग्रह-नक्षत्र आपस में टकरा जायं तो विश्व में खलबली मच जाय। इसी तरह कई नियम देखे जा सकते हैं। ये बाह्य जगत में काम करने वाले नियम भौतिक नियम कहलाते हैं। सूक्ष्म जगत में काम करने वाले नैतिक नियम कहलाते हैं। प्रत्यक्ष रूप में किसी इन्द्रिय के संयोग से इनको नहीं जाना जा सकता है, किन्तु सूक्ष्मदृष्टि से देखने पर इन्हें भी उसी तरह जाना जा सकता है जैसे किसी भौतिक नियम को।
नियति चक्र के विश्व विधान के अनुरूप चलने पर ही मनुष्य की उन्नति,विकास तथा समृद्धि का मार्ग प्रशस्त होता है। इसके विरुद्ध चलने पर ही किसी को असीम दुख, परेशानी, विपरीतताओं का सामना करना पड़ता है। नियंता के अनुशासन के विपरीत चलना, विश्व-नियम का उल्लंघन करना अपनी अवनति और पतन को निमंत्रण देना है। नियति चक्र किसी के सुख दुख का ध्यान नहीं रखता, वह एक नियम है जो सब पर समान रूप से लागू होता है। यह दुधारी तलवार है, सामने चलाकर जीवन के रण में विजय पायी जा सकती है और विपरीत दिशा में चलाकर अपना ही नाश किया जा सकता है। बुरे आचरण करना, बुरे कर्म करना, सामाजिक मर्यादाओं के विरुद्ध चलना, वर्जनाओं का उल्लंघन करना अपने लिए ही बुरा परिणाम पैदा करता है। ऐसी स्थिति में सुखमय, शुभ हितकर परिणामों की आशा करना व्यर्थ है। बुराई का परिणाम कालान्तर में बुरा ही होता है।
कहा भी गया है-”बोये बीज बबूल के आम कहाँ से होय”। अर्थात् बबूल के बीज बोने पर कांटेदार वृक्ष पैदा होना सुनिश्चित है। इसी प्रकार किसी भी तरह अनैतिक या बुरा कार्य करने पर शारीरिक अथवा मानसिक रोग या बाह्य दण्ड अथवा विपत्तियों का सामना करना भी एक सुनिश्चित तथ्य है। नैतिक मर्यादाओं के विरुद्ध, नियति चक्र के विपरीत आचरण करने पर मनुष्य का मनोबल क्षीण हो जाता है। कई तरह के कुविचार, कुकल्पनाएं मन में घुस जाती हैं जिनसे बाह्य जीवन भी प्रभावित होता है और उसके फलस्वरूप कई दुष्परिणाम भी भुगतने पड़ते हैं। मानसिक द्वन्द्वों में मनुष्य घुल-घुलकर विनाश को प्राप्त होने लगता है। अनैतिक आचरण से मनुष्य का विवेक, नैतिक बुद्धि प्रबल नहीं होती और उसे उचित-अनुचित का भी ध्यान नहीं रहता। फलस्वरूप गलत निर्णय होते हैं और इससे मनुष्य भयंकर दुखद परिस्थितियों में पड़ जाता है।
मनुष्य अपनी चालाकी, चतुराई, कूटनीति के द्वारा भौतिक जगत के सामाजिक राजनीतिक दंड से बच सकता है, किन्तु नियंता की निगाह से विश्व-विधायक के दंड से वह नहीं बच सकता। यह दंड उसे देर-सबेर भोगना ही पड़ता है। अनैतिक कार्यों के लिए अन्तर्द्वंद्व आत्म भर्त्सना होने लगती है। समय-समय पर उसका दुष्परिणाम तो मिलता ही है। असंयमी, दुराचारी, शरीर के साथ ज्यादती करने वाले इन कामों के लिए अपने को स्वतंत्र मान सकते हैं, किन्तु नियति के दंड स्वरूप अस्वस्थता, रोग, दुर्बलता का दंड उन्हें भोगना ही पड़ता है। संसार की कोई शक्ति उन्हें भोगना ही पड़ता है। संसार की कोई शक्ति उन्हें इससे नहीं बचा सकती। अत्याचार, अनाचार, स्वेच्छाचार का परिणाम विनाश, असफलता, हानि के रूप में ही मिलते हैं, तो अच्छे कार्य, सदाचार, पुण्य-परमार्थ के कार्यों के परिणाम सुख-शान्ति एवं जनसहयोग के रूप में मिलते हैं। बुरे कार्यों के परिणाम बुरे और अच्छे कार्यों के परिणाम अच्छे के रूप में ही मिलते हैं, यह एक निश्चित तथ्य है। दुनिया की खुली पुस्तक में यह सहज ही पढ़ा जा सकता है।
संसार का सबसे विकसित और उत्कृष्ट प्राणी होने के नाते मनुष्य को कार्य करने की पूर्ण स्वतंत्रता है। वह कुछ भी कर सकता है, किन्तु नैतिक तथ्य, नियति चक्र और विश्व-नियम के विरुद्ध करने की छूट उसे नहीं है। इस पर तो उसे दंड मिलना अवश्यम्भावी ही है, वह इससे बच नहीं सकता। मनुष्य जैसा कर्म करेगा, वैसा ही परिणाम उसे प्राप्त रहेगा, यह ध्रुवसत्य है। ईश्वरीय अनुशासन में रहने और तद्नुरूप मर्यादित जीवन जीने में ही हम सबका कल्याण सन्निहित है।-
स्मरण शक्ति की प्रखरता से मनुष्य अधिक विचारशील समझा जाता है और उसके ज्ञान की परिधि अधिक बड़ी होती है, जबकि भुलक्कड़ लोग महत्वपूर्ण ज्ञान-संचय से तो वंचित रहते ही हैं, साथ ही दैनिक काम-काज में भी जो आवश्यक था, उसे भी भूल जाते व समय-समय पर घाटा उठाते तथा ठोकर खाते हैं।
कइयों में प्रखर स्मृति जन्मजात रूप से भी पायी जाती है एवं वह इतनी तीक्ष्ण होती है कि दूसरे लोग चमत्कृत होते और अवाक् रहते देखे जाते हैं। ऐसा ही एक व्यक्ति ग्लोसीस्टरशायर इंग्लैण्ड में सन् 1901 से 60 के दशक के बीच था। जान फ्रेजर नामक यह व्यक्ति जन्मान्ध था, किन्तु उसे दस हजार व्यक्तियों के नाम व निवास स्थान मौखिक याद थे, इतना ही नहीं, वह आवाज सुनकर प्रत्येक का सही नाम एवं वास स्थान तुरंत बता देता। इसमें कभी भी कोई गलती नहीं हुई। ऐसी ही विलक्षणता एक आइरिस व्यक्ति में देखी गई। संयोग से वह भी अन्धा था और धन्धे से चिट्ठी बाँटने का काम करता था। उसकी अद्भुत स्मृति के कारण ही सरकार की ओर से उसे पोस्टमैन की यह नौकरी मिल सकी थी। फिलमण्ड नामक यह व्यक्ति दूसरों की सहायता से पत्रों को सिलसिले से लगाता, फिर उनका क्रम व नाम याद कर लेता। बस इतने भर से हर दिन सैकड़ों चिट्ठियां बाँटने में उसकी स्मरण शक्ति काम दे जाती । जब तक वह नौकरी में रहा, पत्र बाँटने में उसने कभी भी कोई गलती नहीं की और न औरों को किसी प्रकार की शिकायत का मौका ही दिया।
जर्मनी का नेबूर नामक व्यक्ति अपनी इसी प्रतिभा के कारण विश्व-विख्यात बन गया। उनकी यह प्रसिद्धि भी एक विचित्र संयोग का परिणाम थी। हुआ यों कि एक बार जिस ऑफिस में वे मुंशीगीरी का काम करते थे, वहाँ अचानक आग लग गई सारी फाइलें और जरूरी कागजात इसकी भेंट चढ़ गये। इस पर नेबूर ने सारे रजिस्टरों को दुबारा मात्र स्मरण-शक्ति के आधार पर तैयार कर लिया। इसके बाद वे इसके एक-से-एक बढ़ कर प्रमाण देते चले गये और प्रतिभाशाली लोगों में गिने जाने लगे।
इज़राइल का जान जैकब नामक व्यक्ति तो चलता-फिरता कम्प्यूटर के नाम से प्रसिद्ध था। यरुशलम के निवासी जैकब को एक लाख कहानियाँ, 20 हजार कविताएँ एवं 15 हजार व्यक्तियों के नाम उनके स्थान सहित कंठस्थ थे। एक बार उनके साथ एक बड़ी मजेदार घटना घटी। उसके एक पड़ोसी ने यह निश्चय करने के लिए कि वास्तव में उसकी स्मरण शक्ति तीव्र है अथवा वह यों ही डींगें हाँका करता है, उससे “स” अक्षर से प्रारंभ होने वाली कुछ कविताएँ सुनाने को कहा। जैकब ने सुनाना आरंभ किया और एक घंटे के अन्दर ही डेढ़ सौ के करीब कविताएँ सुना गया। वह सुनाता ही जा रहा था, किन्तु जब पड़ोसी को उसकी प्रतिभा का निश्चय हो गया, तो उसे रोक दिया।
चैतन्य महाप्रभु के बारे में कहा जाता है कि वे “एकश्रुतिधर” थे, अर्थात् एकबार में सुनकर याद करने वाले। एक बार एक पंडित ने उनका शास्त्रार्थ हो गया। इसी क्रम में उसने सौ पंक्तियों का एक श्लोक सुनाया और बीच की एक निर्दिष्ट पंक्ति को चैतन्य देव से सुनाने को कहा। वे न सिर्फ उक्त लाइन को अविकल सुना गये, वरन् आद्योपांत पूरा श्लोक भी सुना दिया। यह देख ब्राह्मण हतप्रभ रह गया और शास्त्रार्थ की इच्छा त्याग उनका शिष्यत्व ग्रहण कर लिया।
राजा भोज के दरबारियों में भी एक ऐसे ही विद्वान का उल्लेख मिलता है। उसके बारे में कहा जाता है कि वह एक घड़ी (24 मिनट) तक सुने प्रसंग को तत्काल वैसा ही दुहरा देता था।
इतने पर भी यह नहीं समझा जाना चाहिए कि स्मरण रखने की विशिष्ट क्षमता कोई दैवी वरदान या जन्मजात सौभाग्य होता है। हो सकता है किन्हीं विरलों को अनायास ही प्राप्त हो गयी हो परन्तु वह अन्य शारीरिक क्षमताओं के सदृश्य एक सामान्य सामर्थ्य ही है, जिसे प्रयत्नपूर्वक आसानी से बढ़ाया जा सकता है। जिस बात पर अधिक ध्यान दिया जाता है, वह संभवतः विकसित होने लगती है और जिसकी उपेक्षा की जाती है, उसका घटना भी सुनिश्चित है। किसी प्रकरण का वर्षों तक दिमाग में बना रहना और किसी का कुछ ही दिनों में धूमिल हो जाना प्रायः इसी तथ्य पर आधारित होता है। देखा गया है कि घटनाओं के प्रति यदि अन्यमनस्कता बरती जाय, उपेक्षा भाव रखा जाय, उन्हें महत्वहीन एवं निरर्थक समझा जाय, तो स्मृति-पटल पर वे देर तक टिकती नहीं। इसके विपरीत यदि उन्हें तन्मयता के साथ एकाग्र होकर देखने-समझने का प्रयत्न किया जाय, तो उनकी छवि देर तक मस्तिष्क में बनी रहती है। वे जल्दी धुलती नहीं। यही कारण है, कि अधिकाँश महत्वपूर्ण घटनाएँ व्यक्ति को आजीवन स्मरण रहती हैं, जबकि दूसरी विस्मृत हो जाती हैं।
मनोविज्ञानी कार्ल सीशोर का कथन है कि औसत व्यक्ति अपनी स्वाभाविक स्मरण शक्ति का मात्र दस प्रतिशत प्रयोग करता है, 90 प्रतिशत तो ऐसे ही मूर्छित और अस्त−व्यस्त स्थिति में पड़ी रहती है। फलतः मनुष्य मंदबुद्धि और मूर्ख स्तर का बना रहता है। यदि प्रयास में कमी न की जाय, तो ऐसे लोग भी नियमित अभ्यास द्वारा स्वयं को बौद्धिक दृष्टि से कहीं अधिक सक्षम बना सकते हैं।
मनोवैज्ञानिकों ने विस्मरण के प्रायः तीन कारण बताये हैं (1) किसी बात को स्मरण रखे रहने की पूर्व इच्छा का न होना। (2) प्रस्तुत विषयों को पूरे मनोयोगपूर्वक समझने का प्रयत्न न करना। (3) प्रसंगों में अरुचि और उपेक्षा का भाव रहना। उनके अनुसार यदि इन तीन कारणों को हटाया जा सके, तो विस्मरण संबंधी शिकायत भी काफी हद तक दूर हो सकती है। यह ठीक है कि कुछ एक में यह ईश्वर प्रदत्त प्रतिभा के रूप में मौजूद रहती है, पर न भूलने योग्य तथ्य यह भी है कि शरीर के कई निर्बल अंगों को व्यायाम द्वारा भी सबल समर्थ बनाया जाता है। स्मरण इस बात का भी रखा जाना चाहिए कि कई अवसरों पर जन्मजात विकलाँगता को कसरत के ही माध्यम से दूर करने में काफी सफलता मिलती है, और जो शिशु प्रसवकाल में अपंग नजर आता है, उसकी अपंगता उम्र के साथ घटती नजर आती है। अस्तु किसी को यह मान्यता नहीं बना लेनी चाहिए कि स्मरण शक्ति की मंदता स्थायित्व लिए आती और आजीवन साथ रहती है।
मनःशास्त्री जॉन इर्विन ने इस बात पर जोर दिया है कि जिन तथ्यों को भविष्य में याद रखने की आवश्यकता समझी जाय, उनमें गहरी रुचि उत्पन्न करनी चाहिए और यह विचार करना चाहिए कि स्मरण से क्या लाभ और विस्मरण से क्या हानि होने की संभावना है। वे प्रसंग कब याद करने की आवश्यकता पड़ेगी एवं संस्मरणों का किस प्रकार क्या उपयोग होगा। इतना सोच-विचार कर लेने के उपरान्त किन्हीं तथ्यों की परत मस्तिष्क में देर तक जमायी जा सकेगी और उन प्रसंगों को भूल जाने की कठिनाई प्रायः नहीं ही उत्पन्न होगी।
विद्वान प्रो. मैनिहन का कथन है कि घटनाओं को मात्र उनके कल्पना चित्र के रूप में ही नहीं, वरन् तात्पर्य और फलितार्थ को भी ध्यान में रखते हुए यदि मानस पटल पर जमाया जाय, तो जल्दी याद भी हो जायेंगे और देर तक टिकाऊ भी बने रहेंगे। फिर आवश्यकतानुसार उनको स्मरण करने में किसी को किसी प्रकार की कठिनाई न होगी।
देखा जाय कि कौन घटनाएँ स्मरण रखने योग्य हैं। किन बातों की उपयोगिता है। किन तथ्यों को चिरकाल तक स्मृति पटल में जमाये रहना आवश्यक है। जो उपयोगी जान पड़े, उन्हें गंभीरतापूर्वक समझने का प्रयत्न किया जाय, उन पर चित्त को एकाग्र किया जाय। कई-कई बार उन्हें मौन मानसिक रूप से एवं वाणी से दुहराया जाय। जरूरी लगे तो नोट करके रखा जाय। ऐसा करते रहने से न केवल उपयोगी व आवश्यक तथ्य स्मृति में बने रहेंगे, अपितु स्मरण शक्ति भी अनायास ही इस प्रक्रिया में बढ़ती चलेगी और व्यक्ति को प्रतिभा सम्पन्नों, विचारशीलों की श्रेणी में ला खड़ा करेगी।
सर टामसरी उन दिनों भारत के शासक थे साथ ही चिकित्सक भी।
उनने बादशाह शाहजहाँ की बेटी का इलाज किया। वह असाध्य बीमारियों से ग्रस्त थी। अच्छी हो जाने पर बादशाह ने कुछ इनाम माँगने के लिए कहा।
उनने व्यक्तिगत लाभ के लिए कुछ भी स्वीकार न किया वरन् इतना ही कहा कि मेरे देश से आने वाले माल पर भारत ही कहा कि मेरे देश से आने वाले माल पर भारत में चुँगी न लगे। बादशाह ने उसे स्वीकार कर लिया और उसका परिणाम यह हुआ कि विदेशों की सम्पन्नता उससे अनेक गुनी बढ़ गई।
पति-पत्नी दोनों अपने बच्चे की ओर अचरज से ताकने लगे। निशादेवी साँवले रंग की सितारों जड़ी चादर समूची धरती पर फैलाती जा रही थी। इस अनोखी चादर के फैलाव की तरह इनका आश्चर्य पता नहीं कब तक बढ़ता रहता पर अचानक सहकारी की आवाज ने उन्हें चौंका दिया। ‘डॉक्टर! इस एक शब्द ने जैसे जुड़ती चली जा रही विचारों की कड़ियों को एक बारगी बिखरा दिया। वे आगन्तुक की ओर देखने लगे। पाँच वर्ष का वह सलोना बालक इस सबसे बेखबर कुछ कहे जा रहा था।
यह कौन सी भाषा बोल रहा है? डॉक्टर ने अपने सहयोगी की ओर प्रश्नवाचक निगाहों से देखा। सहयोगी वैज्ञानिक होने के साथ कई भाषाओं का जानकार था। उनके कथन में अपने सहकारी के प्रति विश्वास था। मैं कुछ कुछ अधिक जानता समझता तो नहीं, पर इतना बता सकता हूँ यह शुद्ध संस्कृत बोल रहा है।
डॉक्टर ह्यूमवान एरिच के पूर्व पुरुष इटली से अमेरिका आये थे। उनकी पत्नी भी इटेलियन है। जहाँ तक डॉक्टर की जानकारी है दम्पत्ति में किसी की चार छः पीढ़ियों में से कोई संस्कृत का ज्ञान कहाँ से मिला? समस्या जटिल थी। इसके अतिरिक्त और क्या किया जा सकता था कि बच्चे की बात को टेप कर लें और उसका अनुवाद प्राप्त करने का प्रयत्न करें।
बच्चा स्वयं अपनी बात का अनुवाद अपने पिता को बतला रहा था और जब संस्कृत में बोली उसकी बातों का टेप अनुवाद के लिए भेजा गया, तब अनुवाद आने पर इस बात की पुष्टि हो गई कि बच्चा अपना अनुवाद ठीक करता है।
“मैं एक भारतीय योगी हूँ। मेरा नाम ज्ञाननाथ है। काँगड़ा (भारत) से थोड़ी दूर मेरी कुटी है। एक बार दो अमेरिकन यात्री मिले थे मुझे। उनके संग से मुझे अमेरिका देखने की इच्छा हुई। यह इच्छा बनी रही और शरीर छूट गया। मुझे यहाँ के दो-चार बड़े नगर दिखा दीजिए फिर मैं भारत जाकर अपनी साधना पूरी करूंगा।’ बच्चे की सब बातों का यही साराँश था।
बच्चे को वैज्ञानिकों-मनोवैज्ञानिकों तथा शरीर विशेषज्ञों की देख-रेख में रखा गया। संस्कृत के ज्ञाताओं ने उससे पूछ-ताछ की। बच्चा काँगड़ा के आस-पास के स्थानों, निवासियों रीति रस्मों का ठीक-ठीक वर्णन करता था। वह कहता था कि उसने काशी में संस्कृत पढ़ी है। उसके पिता के घर कोई नहीं है। नाथ मार्ग के किसी योगी से उसने दीक्षा ली थी। सबसे विचित्र बात यह कि वह अब बड़े सबेरे अँधेरा रहते ही स्नान करना चाहता था। स्नान करके फर्श पर बैठकर आंखें बन्द करके पता नहीं क्या करता रहता था देर तक और कभी-कभी जोर से चिल्लाकर बोलता था “अलख!”
आनुवांशिकी के वैज्ञानिक हयूमवान अच्छी तरह जानते थे, माता-पिता के द्वारा जब प्रथम दिन बालक गर्भ में आता है, तब होता है एक निषेचित अण्डा। इस घेरे में बँधे केन्द्रक से घिरे होते हैं गुणसूत्र। इन गुणसूत्रों में जगह-जगह गाठें होती हैं। इन गाँठों को संस्कारकोश (जीन) कहते हैं। अरबों की संख्या में होते हैं संस्कारकोश।
एक संस्कारकोश में प्रकृति के एक अरब अक्षरों में यह लिखा होता है कि गर्भस्थ शिशु की आकृति, रंग, कद आदि कैसे होगा? प्रकृति के इन अक्षरों को वैज्ञानिक अमीनो एसिड कहते हैं जो विभिन्न क्रम से लगे होते हैं। डॉक्टर एरिच लम्बे समय से परमाणु विकिरण तथा विषाणु के द्वारा इन नैसर्गिक अक्षरों के क्रम में परिवर्तन की चेष्टा में लगे हैं। एक सीमा तक उन्हें सफलता भी मिली है।
सभी गुणसूत्रों के संस्कारकोशों में समान लिपि नहीं है। डॉक्टर एरिच ने यह नवीन खोज की है। ‘लगता है-शरीर के विभिन्न अंगों की बनावट के आदेश विभिन्न संस्कारकोशों में हैं।’ इनमें से अनेक आदेश कई-कई पीढ़ियों तक अक्रिय पड़े रहते हैं और कभी किसी समय सक्रिय हो सकते हैं। क्यों होता है ऐसा? सोचते-सोचते उन्होंने अपने सिर के बालों को हल्के से थपथपाया।
यह सब तो रही माता-पिता द्वारा प्राप्त आनुवंशिकता की बात। पर बच्चे का संस्कृत बोलना क्या है।?
यह उसका पुनर्जन्म? उनकी समझ में यह बात एकदम नहीं आ रही थी। साथ ही इसे आनुवंशिकता कह देने का भी कोई कारण नहीं दीखता।
वैज्ञानिक हठधर्मी नहीं होता। वह सत्य का शोधार्थी होता है। डॉक्टर एरिच को लगा कि उनके बच्चे के सम्बन्ध में शोध करने के लिए विज्ञान के वर्तमान साधन पर्याप्त नहीं है। परलोक विधा के विशेषज्ञों की सहायता उन्हें अपेक्षित है।
कैसे होता है पुनर्जन्म? दो-तीन दिनों के बाद एक दिन मध्याह्न में परलोक विद्या के एक ज्ञाता बच्चे से पूछ रहे थे। ‘इनमें से किसी टुकड़े को पकड़ो। बच्चे ने अपना प्लास्टिक के खिलौने का वह बॉक्स उलट दिया, जिसके टुकड़ों से वह अक्षर बताया करता था।
‘इस टुकड़े से जो टुकड़े जुड़ सके, उनसे एक अक्षर बनता है। झटपट बच्चे ने एक अक्षर बनाने वाले टुकड़े जोड़ दिए और बोला-अब ऐसे ढंग से इससे मिलाते अक्षर जोड़ते जाना है कि कम से कम अक्षर बनाकर हम ‘एम’ तक पहुँच सकें।
‘तुम खेल में लग गए। मेरे सवाल का जवाब तुमने दिया नहीं।’ प्रश्नकर्ता ने बच्चे को रोका।
‘मैं आपको उत्तर ही दे रहा हूँ। मैं एक भारतीय साधु हूँ। साधु खिलौनों से खेला नहीं करते। बच्चा तनिक अप्रसन्न हुआ ‘तुम क्या कुछ समझते नहीं हो?’
“हम सचमुच कुछ समझ नहीं सके। प्रश्नकर्ता ने स्वीकार किया। “मनुष्य मरते समय जो कामना करता है, वह उस टुकड़े के समान है जिसे तुमने जीवन और पहले के अनेक जन्मों के लाख-लाख संस्कार होते हैं। यहाँ तो ये थोड़े से टुकड़े हैं। बच्चे ने उन टुकड़ों को एक बार हाथ से उलट-पलट दिया।
‘मरने के समय की अन्तिम कामना से मेल करने वाले संस्कार भी अनेक प्रकार के प्रारब्ध बना सकते हैं, किन्तु ध्यान यह रखना पड़ता है कि ऐसा प्रारब्ध बने जिससे मेल खाते दूसरे प्रारब्ध बने और ‘एम’ तक पहुँचने के लिए प्रारब्धों की छोटी से छोटी जंजीर बनें। बच्चे ने इस भाव से देखा, जैसे वह अपनी पूरी बात समझ चुका हो।
‘एम’ तक पहुँचने की बात ही क्यों? प्रश्नकर्ता ने पूछा। ‘मनुष्य का प्रारब्ध ही अन्तिम प्रारब्ध होता है। केवल मनुष्य के मरने पर प्रारब्ध शृंखला बनती है और मनुष्य जन्म का प्रारब्ध बनाकर वह पूरी हो जाती है। बच्चे ने बताया ‘दूसरे प्राणी तो उस शृंखला के बीच के प्रारब्धों से उत्पन्न होते हैं। मनुष्य ही साधना करके पूर्ण हो सकता है।’
“यदि आप अपनी साधना को इस जीवन में भी पूर्ण न कर सके।” सवाल पूछने वाला बच्चे को आदरपूर्वक ही सम्बोधित कर रहा था, क्योंकि उसे मालूम था कि उपेक्षा इसे असन्तुष्ट कर सकती है।
“मैं इस बार अवश्य पूर्णत्व प्राप्त करूंगा।” बच्चा तनिक उत्तेजित हुआ पर तुरन्त शान्त हो गया। मानलो तुम्हारी बात ठीक निकले, ऐसा सम्भव नहीं हो तब भी
कुछ हानि नहीं है। मैं सावधान रहूँगा कि जीवन में साधना के विरोधी भाव न आवें। कुछ प्रमादवश आ गए तो वे अगले प्रारब्ध बनते समय संचित में चल जाएँगे और फिर मैं साधना में आगे बढूँगा। साधक का पतन नहीं होता। वह जितना चल चुका, अब उससे आगे ही उसे चलना रहता है।
‘संचित क्या ?’ प्रश्नकर्ता को यह बात समझ में नहीं आयी। ‘ये टुकड़े जिनका हमने उपयोग नहीं किया, संचित के समान हैं। बच्चे ने बताया जिन कर्म संस्कारों का उपयोग प्रारब्ध शृंखला के निर्माण में नहीं हुआ
उनकी राशि का नाम संचित है।
उनका उपयोग कब होगा?
‘अगली बार प्रारब्ध बनते समय। यदि मनुष्य जीवन में मुक्त न हो जाय। बच्चे ने कहा मुक्त पुरुष का संचित भस्म हो जाता है और यह याद रखो कि साधना के संस्कार संचित में कभी नहीं फेंके जाते। वे सदा प्रारब्ध बनाने के लिए चुने जाते हैं।
“यह सब व्यवस्था कौन करता है?”
प्रश्नकर्ता देर से वह बात पूछने को उत्सुक थे। ‘ईश्वर ही सम्पूर्ण व्यवस्था करता है?’
“ईश्वर करता है ऐसा कह सकते हैं।” बच्चा बहुत गम्भीर हो गया । वस्तुतः यह व्यवस्था ईश्वर का विधान करता है।
‘मृत्यु के पश्चात् और जन्म से पूर्व आपकी जो अवस्था थी, उसके सम्बन्ध में आप कुछ बताएँगे।’ प्रश्नकर्ता ने अपना अन्तिम प्रश्न किया।
‘नियामक सत्ता नहीं चाहती कि यह रहस्य प्रकट हो।’ बच्चे ने इस सम्बन्ध में बात करने की कोई उत्सुकता नहीं दिखाई। बड़ी कठिनाई से अनेक बार पूछने पर उसने कहा आपको इससे कोई लाभ नहीं होगा। देह त्याग के पश्चात् जीव केवल जीव नहीं होता। कारण शरीर और सूक्ष्म शरीर तो उसके यहाँ के होते हैं। एक अतिविहिक शरीर भी उसे मिल जाता है जिसकी आकृति प्रायः उसके भौतिक स्थूल शरीर जैसी होती है। वह भावलोक है जहाँ उसे अतिवाहिक देह में जाना पड़ता है। अतएव जिसकी जैसी भावना जीवन में होती है उस प्रकार ही उसे वह भावलोक दिखता है।”
बच्चा थक चुका था उस दिन का प्रश्न कार्य रोक देना पड़ा। ‘मुझे अमेरिका देखना है। पहले मुझे यहाँ के मुख्य स्थान दिखला दो। अगले दिन बालक ने हठ पकड़ लिया जब वह किसी प्रश्न का उत्तर देने के लिए राजी नहीं था। डॉक्टर एरिच को उसका हठ रखना पड़ा। प्रयोगशाला अपने सहयोगी को सौंप कर पत्नी और पुत्र के साथ वे यात्रा के लिए निकले।
डॉक्टर एरिच का पुत्र सामान्य बालकों से नितान्त भिन्न था। वह केवल फल मेवे खाता और दूध पीता था। अनेक बार संस्कृत बोलने लगता। किसी भी दृश्य के प्रति उसने कोई विशेष आकर्षण नहीं प्रकट किया।
यात्रा अधिक दिन चली भी नहीं। बच्चा बार-बार हटकर रहा था कि उसको भारत भेजने की व्यवस्था कर दी जाय। डॉ. एरिच देश से बाहर जाने को प्रस्तुत नहीं थे। उनका प्रयोग अधूरा पड़ा था। पत्नी ने अवश्य प्रस्ताव किया कि यदि डॉक्टर छः महीने बाद भारत आने का वचन दे तो वह पुत्र को लेकर जा सकती है और वहाँ पति की प्रतीक्षा करेगी।
यह सब कुछ करना नहीं पड़ा। अभी पासपोर्ट के लिए निवेदन भेजा ही गया था कि बच्चा एक दिन प्रातः स्नान करके आसन लगाकर बैठा और कुछ क्षण पीछे ‘अलख’ की उच्च ध्वनि के साथ उसने देह त्याग दिया, सम्भवतः उसका देह धारण पुनर्जन्म की प्रक्रिया को कर्मफल की अनिवार्यता एवं संस्कारों की महत्ता समझाने के लिए था। इसे समझने और जीवन लक्ष्य की दिशा में आगे बढ़ने के लिए सम्पूर्ण शक्ति से प्रयास करने का दायित्व हम सब पर है। मानव जीवन का हेतु और महत्व भी यही है।
रास्ते से जौहरी गुजरा। उसने देखा कि कुम्हार गधे के गले में हीरा बाँधकर चला जा रहा है। चकित होकर जौहरी ने कुम्हार से पूछा-कितने पैसे लेगा इस पत्थर के? कुम्हार ने कहा-एक रुपया मिल जाय तो बहुत है।जौहरी ने कहा-आठ आने लेगा। कुम्हार ने कहा-चलो बारह आने सही, किन्तु जौहरी का लोभ जागा, उसने सोचा मूर्ख हीरे का पत्थर समझ रहा है। अभी लौटेगा तो दे जायगा, किन्तु जौहरी बाजी चूक गया। किसी दूसरे ने वह हीरा पूरे एक रुपये में खरीद लिया। जौहरी को सदमा बैठ गया। कुम्हार से बोला-मूर्ख! तू कोरा गधा ही निकला। लाखों का हीरा कौड़ियों में बेच दिया तूने। कुम्हार बोला-यदि मैं गधा न होता, तो क्या हीरा गधे के गले में बाँधता, किन्तु आप को क्या कहा जाय। जब आपको पता था कि हीरा लाखों का है फिर भी कौड़ियों के दाम चुकाने में कोताही बरतते रहे।
हममें से कितने ही व्यक्ति कुम्हार और जौहरी की तरह है। कुछ तो अनजाने में ही इस हीरे की भाँति बहुमूल्य जीवन को गँवा देते हैं और कुछ जानते समझते हुए भी उसे बरबाद होते देखते रहते हैं।
भक्त की नित्य की प्रार्थना सुनकर आखिर एक दिन भगवान प्रकट हो ही गये और भक्त से बोले-मैं तुझसे प्रसन्न हूँ जो भी चाहे वरदान माँग ले। पर एक शर्त है कि तू जो माँगेगा उससे ठीक दूना पड़ोसी को मिलेगा भक्त सोचने लगा सब बात खराब कर दी। माँगने का उत्साह ही जाता रहा। सारी उमंगों पर पानी फेर दिया इस एक ही बात ने कि पड़ोसी को दूना मिलेगा। मैं तो इसीलिए माँगना चाहता था कि पड़ोसियों को प्रगति में पछाड़ दूँ। अब माँग में कोई रस नहीं रहा। यदि छः मंजिला मकान भगवान देते हैं, तो पड़ोसियों को बारह मंजिल यों ही हो जाता है। यदि एक लाख भक्त को मिलेगा तो दो लाख पड़ोसी को बिना माँगे मिल गले। व्यर्थ गई प्रार्थना।
इसी उधेड़बुन में पड़ा वह पछता रहा था, पर बुद्धि पर तनिक जोर डाला, तो उसे एक उपाय सूझा क्यों न अपनी एक आँख फूटने का आशीर्वाद माँग लिया जाय, ताकि पड़ोसियों की दोनों आंखें फूट जायें। अपने हिसाब से उसने पड़ोसियों के लाभ पहुँचाने की भगवान की शर्त विफल कर दी थी, पर इसका परिणाम क्या होगा? इस पर जरा भी विचार नहीं किया। आशीर्वाद फलित हुआ। प्रार्थी काना हो गया और पड़ोसी अन्धे। यहीं से उसकी परेशानी शुरू हुई। वह कहीं बाहर निकलता, तो मसखरे प्रवृत्ति को लड़के उसे “काना काना” कहकर चिढ़ाते, जबकि पड़ोसी अन्धों पर लोग तरस खाकर उसकी हर प्रकार से मदद करते।
उसकी समझदारी जगी, तो उसने विचार किया कि दूसरों के लिए गड्ढा खोदने वाला पहले स्वयं उसमें गिरता है, बाद में दूसरे।
सहानुभूति मनुष्य का सर्वोत्तम गुण है। इस एक विशिष्ट गुण का विकास करके मनुष्य देवत्व के पद पर पहुँच सकता है। प्रेम अथवा सहानुभूति में वह शक्ति तथा ऊष्मा है कि कठोर हृदय को भी नम्रता के साँचे में ढाल देती है। उसकी शीतल और मनोरंजक लहरें दुखी आत्माओं में प्रसन्नता की झलक ला देती हैं। इसी हमदर्दी और सम्वेदना के बल पर मनुष्य दूसरों को भी अपना बना लेता है। कठोर को कोमल निर्दयी को दयावान, शत्रु को मित्र बना लेना सहानुभूति-हृदयी व्यक्ति को अधिक सरल तथा सुगम है। जिस भी व्यक्ति के अन्दर यह प्रचुर मात्रा में विद्यमान है वही उन्नति के शिखर पर होगा।
जिसके हृदय में सच्ची सहानुभूति है, वह दूसरों को प्यार, आत्मीयता और ममता से देखेगा तो वह अपने ही दिखाई पड़ेंगे। अपने छोटे से कुटुम्ब को देखकर हर कोई आनन्दित होता है। यदि हम दूसरों को अपने परिवार परिकर से बाहर वालों को भी उसी सहानुभूति की दृष्टि से देखने लगें, तो वे भी अपने ही घनिष्ठ प्रतीत होंगे। हम अपने कुटुम्बियों के जब अनेक दोष, दुर्गुण बरदाश्त करते हैं, उन्हें भुलाते, छिपाते और क्षमा करते हैं, तो फिर बाहर वालों के प्रति वैसा क्यों नहीं किया जा सकता? ऐसी सहानुभूति प्रदर्शित करने वाला व्यक्ति ही उच्चकोटि की श्रेणी में गिना जायेगा।
आजकल की सभ्यता में सहानुभूति दिखाने का दूसरा ही ढंग चल पड़ा है। लोग पीड़ित अथवा दुखी व्यक्ति के पास जाकर उसकी वेदना, दुख अथवा दर्द के विषय में पूछताछ करते हैं। वाणी द्वारा इस प्रकार मात्र पूछ लेना ही वास्तविक सहानुभूति नहीं कही जा सकती। सच्चे सहानुभावक को किसी का दुख-दर्द पूछने की आवश्यकता नहीं होती, वरन् उसके हृदय से स्नेह का अजस्र स्रोत निकल कर चुपचाप पीड़ित को शाँति एवं सान्त्वना देने लगता है।
वस्तुतः कृत्रिम सहानुभूति दिखाना पीड़ित के प्रति कठोरता या निर्दयता का व्यवहार ही कहा जा सकता है। जो मनुष्य किसी के दुख-दर्द को सच्ची सहानुभूति के रूप में न पूछ कर केवल अपनी मौखिक हमदर्दी दिखाता है, उसके सम्बन्ध में निःसन्देह यही निश्चय कर लेना चाहिए कि वह अपने घड़ियाली आँसू बहाकर पीड़ित व्यक्ति की सद्भावना को ठगने में प्रयत्नशील है।
सच्ची सहानुभूति का प्रसार सीमित नहीं, वरन् विश्वव्यापी है। इसकी करुणा, कोमलता तथा दया का प्रवाह स्त्री-पुरुष, जड़-चेतन, राष्ट्र धर्म, काले-गोरे, ऊँच-नीच, निर्बल-सबल में किसी प्रकार का भेदभाव नहीं मानती। सभी के लिए समान रूप से बहती है। उदार और श्रेष्ठ आत्मायें तो शत्रु की विपत्ति से भी विचलित न होकर सहानुभूति के साथ सहायता करने के लिए उत्सुक हो उठती हैं। ऐसी ही सहानुभूति सराहनीय है।
ऐसी सहानुभूति सराहनीय नहीं जो केवल हृदय की भावुकता तक सीमित रहे। वह सजीव होते हुए भी जड़ ही मानी जायगी। किसी की पीड़ा को देखकर अवाक् रह जाना और खड़े-खड़े आहें भरना समझी जा सकती है जब दुखियों का दुख निवारण करने में यथासाध्य कुछ किया जावे। यही सहानुभूति सराहनीय है और श्रेष्ठ भी। यह विभूति जिसके भी पास होगी, वह मात्र भावमुद्रा प्रदर्शित करके निष्क्रिय न रह जायगा, वरन् सेवा-सहायता के लिये भी आगे बढ़ेगा। ऐसे श्रेष्ठ पुरुषों की ओर, जिनमें जीवन्त सहानुभूति की प्रधानता है, पीड़ित और निराश व्यक्ति सहज ही आकर्षित होते और आशा तथा उत्साह का प्रकाश पाकर दुखदायी परिस्थितियों से लोहा लेते हैं।
मनुष्य में सज्जनता, शालीनता, आत्मीयता, सद्भावना आदि आत्मिक विभूतियों की कमी नहीं। उन्हें जगाने के लिए समुचित प्रशिक्षण और अवसर दिया ही जाना चाहिए, पर भुला यह भी नहीं दिया जाना चाहिए कि संसार में पाप, अनाचार का आतंक भी कम नहीं है और उससे निपटने के लिए ऐसी समर्थता का उद्भव भी आवश्यक है जिसके प्रदर्शन मात्र से अनाचारियों के हौसले पस्त हो सकें। इस ओर इन दिनों एवं भविष्य में अनेकानेक दुष्परिणाम उत्पन्न किये बिना न रहेगी। वैयक्तिक एवं सामाजिक अनाचारों के विरुद्ध असहयोग, विरोध और संघर्ष करने की तैयारी को उतना ही महत्व मिलना चाहिए जितना कि सेवाधर्म के अनुरूप समृद्धि , शान्ति और सद्भावना के उन्नयन हेतु किया जाता है। खेती को खाद-पानी आवश्यक है, पर खर-पतवार उखाड़ने और कीटनाशक छिड़कने की आवश्यकता से इनकार नहीं किया सकता। रखवाली न की जाय तो न खेत बच सकते हैं न बगीचे, न देश सुरक्षित रह सकता है और न समाज में व्यवस्था कायम रह सकती है। अगले दिनों इस तथ्य को और भी अधिक उजागर, व्यवहारिक एवं कार्यान्वित करने की आवश्यकता पड़ेगी।
इन दिनों समाज में अनेकानेक प्रकार के कुप्रचलन अपराध, अनाचार गतिशील हैं। उनके ऊपरी रोकथाम के लिए पुलिस, अदालत आदि का राजकीय कानूनी नियंत्रण है, पर वह सफल नहीं के बराबर ही हो पाता है, अपराधी नगण्य अनुपात में पकड़े जाते हैं। जो पकड़े जाते हैं वे कानूनी कमजोरियों का लाभ उठाकर छूट निकलते हैं। जो जेल पहुँचते हैं वे वहाँ साथियों के परामर्श से और भी अधिक हरफन मौला होकर निकलते हैं ऐसी दशा में शासनतंत्र का सहयोग करते हुए भी पूर्णतया उस पर निर्भर नहीं रहा जा सकता है। हमें अपने पैरों खड़ा होना भी सीखना चाहिए। आत्मरक्षा के लिए इतनी सतर्कता, समर्थता और संगठन विनिर्मित करना चाहिए जिससे आक्रमणकारियों के हौसले पस्त होते रहें।
आक्रान्ताओं को अनाचार करने का साहस तभी पड़ता है जब कड़े प्रतिरोध के न होने के संबंध में वे निश्चिन्त हो जाते हैं। बकरे की बलि प्रायः सभी धर्म वाले चढ़ाते हैं, पर किसी का भी हौसला चीते एवं भेड़ियों को पड़कर बलिदान देने का नहीं होता। सिंह, व्याघ्र आमतौर से हाथी को नहीं छेड़ते। अतः दुर्बल स्तर के जन साधारण को संगठित होना चाहिए। परस्पर सघनता बढ़ानी और अनीति के विरुद्ध मिलजुल कर आवाज उठानी चाहिए। आन्दोलनों का रास्ता अपनाना चाहिए। आन्दोलनों का रास्ता अपनाना चाहिए। अनीति के आगे सिर न झुक ने की नीति अपनायी जाय तो इतने भर से आक्रमण की आधी आशंका समाप्त हो जाती है। असहयोग, विरोध और संघर्ष का वैध तरीका एकाकी भी अपनाया जा सकता है और मिलजुल कर भी। उसके लिए समुचित शौर्य पराक्रम सर्वसाधारण में उत्पन्न किया जाना चाहिए और यह मानस बनाना चाहिए कि किसी पर किया गया आक्रमण या अनाचार लोग अपने ऊपर किया गया आक्रमण या अनाचार लोग अपने ऊपर किया गया आक्रमण समझें और संत्रस्त की सहायता सुरक्षा में कोताही न रहने दें।
आज जब दूसरे पर हमला होता है तो अन्य लोग यह सोचकर चुप हो जाते हैं कि दूसरों की कटी में हम क्यों हाथ दें। लेकिन जब कल अपने ऊपर कुछ बीतती है तो आशा करते हैं कि दूसरे सहायता के लिए आगे आयें। यह दुहरी नीति कभी सफल नहीं हो सकती। अपनी निजी सुरक्षा के लिए भी दूसरों पर होने वाली अनीति में अपने को भागीदार होना चाहिए। इस आधार पर यदि अवाँछनीयता उन्मूलन के लिए आन्दोलनात्मक प्रयास चल पड़े तो उस आधार पर सभी की सुरक्षा के साथ-साथ अपनी सुरक्षा भी सुरक्षित हो सकती है। अग्निकाण्ड के फैलने से पहले ही सुलगती चिनगारी को बुझानी चाहिए। बाँध में बड़ा छेद होने पर बाढ़ आने तक उपेक्षा में नहीं बैठे रहना चाहिए वरन् छेद के देखते ही तत्परतापूर्वक उसे रोकने के लिए कटिबद्ध होना चाहिए। महामारी के व्यापक बन जाने पर उसके पीड़ितों को एक-एक करके सेवा करने की अपेक्षा यह अधिक कारगर है कि जिन कारणों से वह संकट उभरता है, उसके उद्गम स्थल पर ही काबू पाया जाय। बलिष्ठों की तुलना में दूसरा बलिष्ठ उसी स्तर का मिल सके, इस आशा में बैठे रहने पर काम चलने वाला नहीं है। जब हम अपनी समस्याओं से निपटने के लिए स्वयं ही साहस नहीं जुटा सकते, तो कैसे किसी से यह आशा की जाय कि वह पराई आग में कूदे?
समाज में एक ऐसा भावनाशील पराक्रमी वर्ग भी उभरना चाहिए जो पीड़ितों के लिए छतरी बन कर उन्हें दुष्प्रभावों से बचा सके। प्राचीन काल में क्षत्रिय इसी दायित्व को सँभालते थे। निजी विद्वेष प्रतिशोध के लिए तो कितनों को मोर्चा सँभालते देखा जाता है, पर आवश्यकता आज उनकी है जो सार्वजनिक हित को दृष्टि में रखते हुए अपने को दाँव पर लगाते हुए अनीति का प्रतिकार और न्याय का संस्थापन करने में समर्थ हो सकें। भगवान इन्हीं दो प्रयोजनों के लिए अवतार लेते रहे हैं। जिन मनुष्यों ने इस प्रकार का व्रत धारण किया और साहस दिखाया उन्हें भी अवतार का प्रतिनिधि कहा जा सकता है।
सत्प्रवृत्तियों के संवर्धन में अनेकों परोपकारी धर्मोपदेशक, सेवाभावी संलग्न देखे जा सकते हैं। क्योंकि वह सरल भी है और उसके साथ यश श्रेय भी मिलता है किन्तु उससे भी महत्वपूर्ण एक पक्ष प्रायः पूरी तरह छूटा हुआ है जिसमें अज्ञान, अंधकार, अभाव और अनाचार के विरुद्ध मुहिम खड़ी की जाती है। ऐसी दुष्प्रवृत्तियां एक नहीं अनेकों हैं। दहेज, जेवर, धूम-धाम, बाल विवाहों ने सर्वसाधारण की आर्थिक कमर ही तोड़कर रख दी है। नशेबाजी और रिश्वतखोरी के कारण कितनों को कितना त्रास सहना पड़ रहा है, इसे सभी जानते हैं। नारी अवमूल्यन जाति पाँति से जुड़ा हुआ पिछड़ापन, भिक्षा व्यवसाय, अन्धविश्वास, भाग्यवाद, खाद्य पदार्थों में मिलावट मुनाफाखोरी, कर-चोरी, आलस्य, प्रमाद जैसी बुराइयाँ भी प्रायः उसी स्तर के दुष्परिणाम उत्पन्न करते हैं जैसे कि चोरी, डकैती, लूट, हत्या आदि से उत्पन्न होते हैं। अनाचार का आक्रमण अपने ऊपर या अपनों के ऊपर हो तभी सजग हुआ जाय और लोहा लिया जाय उसकी अपेक्षा यह सोचा जाय कि विपत्ति को समय रहते ही रोका जाना है। आक्रमण करने पर भेड़िये से निपटने की अपेक्षा यह अच्छा है कि उसे माँद से निकलते समय ही धर दबोचा जाय।
व्यक्तिगत अहमन्यता अथवा प्रतिशोध के लिए तो आये दिन कड़े कदम उठते रहते हैं। उदारचेता व्यक्तिगत कारणों को सामान्य मानते हुए व्यापक अनाचारों से जूझने की योजनाबद्ध संगठित रूप से दूरगामी परिणाम उत्पन्न करने वाली रणनीति बनाते हैं।
अखाड़े व्यायामशालायें, स्काउटिंग आदि की आवश्यकता स्वास्थ्य संरक्षण से भी अधिक उस साहस को जगाने के लिए होती है जो सेवा धर्म अपनाने के अतिरिक्त अनाचार से लोहा लेने के लिए समुद्यत रहता है। संभवतः खेल-कूदों के पीछे भी प्रतिरोध की, प्रतिद्वन्द्वी को परास्त करने की भावना जगाने के लिए ही इतना बड़ा ताना बाना खड़ा किया जाता है। स्कूलों में प्रतियोगिताएं इसी निमित्त होती है। प्रतिस्पर्धाएँ जीतने में जिस प्रतिभा विकास का प्रत्यक्ष प्रोत्साहन है, उसमें परोक्ष रूप से यह भी समाहित है कि पिछड़ी स्थिति में रहने को अस्वीकार किया जाय। पिछड़ेपन में भीरुता, कायरता दीनता आदि की प्रधान भूमिका होती है। इन्हें दुर्गुणों में सम्मिलित किया जाय। भीरुता को दयालुता का आवरण ओढ़ने न दिया जाय तभी शान्ति का चिरस्थायी आधार बन सकेगा। अन्यथा कायरों द्वारा किया जाने वाला क्षमा प्रदर्शन अनेकानेक दुष्प्रवृत्तियों को खुला खेलने के लिए प्रोत्साहित करता रहेगा।
लोकमानस को भ्राँतियों से उबारने, न्याय के समर्थन में अड़ जाने और अनौचित्य के विरुद्ध सीना तानकर खड़े हो जाने का साहस यदि जगाया जा सके, तो इतने भर से वृत्रासुरों, हिरण्याक्षों, भस्मासुरों के सिंहासन हिल जाएंगे और वे जन समर्थन के अभाव में औंधे मुँह गिरने के लिए विवश होंगे। आक्रान्ताओं अपराधियों से भयभीत होकर न तो चुप बैठे रहने की नीति अपनायी जाय और न ही अनीति अवरोध के संदर्भ में अपने मतलब से मतलब रखने की स्वार्थपरता का ही परिचय दिया जाय। दूसरों पर बरती गयी अनीति कल अपने ऊपर भी उसी प्रकार हावी हो सकती है। इसीलिए अच्छा यही है कि अनाचार के उभरते ही उसको आरंभ में ही धर दबोचा जाय। जनशक्ति के सामने मुट्ठी भर आततायियों की शैतानी चालें निरस्त होकर रहेंगी, इस तथ्य पर सभी को विश्वास करना ही चाहिए।
साधना विज्ञान में विभिन्न प्रकार के साधना उपक्रमों के साथ-साथ आहार को भी महत्वपूर्ण माना गया है। आत्मिक प्रगति भलीभाँति होती रहे, इसके लिए साधना का ही नहीं, वरन् आहार का भी सही और सात्विक चयन आवश्यक है। अस्तु इस पथ के पथिकों को इसके निर्धारण में अतिरिक्त सावधानी बरतनी पड़ती है यह एक सुनिश्चित तथ्य है कि आहार से रक्त और माँस ही नहीं, मन भी बनता है तथा उसका मानसिक कार्यक्षमता पर अनिवार्य रूप से असर पड़ता है। चाय, काफी जैसे गरम व उत्तेजक पदार्थ मन पर उत्साहवर्धक प्रभाव डालते हैं। शीतल पेय पीने पर मुँह एवं पैर में ही ठंडक नहीं लगती, मन भी शान्त होता है। क्रोध से उद्विग्न व्यक्ति को ठंडे पेय पीने पर आवेश में कभी अनुभव होती है। आहार का मन पर क्या प्रभाव पड़ता है, उसे उष्ण व शीतल पेय पीकर तत्काल अनुभव किया जा सकता है।
आहार के प्रभाव को और भी प्रत्यक्ष देखना हो, तो नशे के रूप में देखा जा सकता है। ब्राउन सुगर, गाँजा, भाँग, चरस, अफीम, शराब, हेरोइन, एल.एस.डी. आदि के सेवन से मस्तिष्क की जो स्थिति हो जाती है, उससे भारी आश्चर्य होता है। नशा पीकर आदमी अपने स्तर को ही भूल जाता है और लोक-व्यवहार की सामान्य क्रिया-प्रक्रिया तक लड़खड़ा जाती है। उद्धत, अनर्गल, संभाषण और आचरण करते देखकर यह अनुमान लगता है कि कम से कम कुछ समय के लिए तो नशेबाज की स्थिति विक्षिप्त जैसी ही हो जाती है। नशे के आवेश में लोग दूसरों पर आक्रमण करते तथा अपनी दुर्गति बनाते देखे जाते हैं। शराब पीने से व्यक्ति का आक्रामक आवेश फूट पड़ता है और सहृदयता एवं विवेक को ताक पर रखकर व्यक्ति उचित अनुचित न जाने क्या-क्या कर गुजरता है। क्रूर कर्म करने वाले इसीलिए नशीली तथा उत्तेजक चीजों का सेवन करते हैं कि सहृदयता अथवा विवेकशीलता उभर कर उनकी क्रूरता को कम न करें, अपितु और अधिक उभारें व भड़कायें।
यह आहार का हानिकारक एवं निषिद्ध पक्ष हुआ। इसका दूसरा पक्ष यह है कि सात्विक आहार से बुद्धि सतोगुणी होती है। संसार में अनेक ऐसे खाद्य पदार्थ भी हैं, जिनसे मस्तिष्क की कार्यक्षमता बढ़ती है, बुद्धि-कौशल, मनोबल, दूरदर्शिता, यथार्थ चिन्तन एवं सही निर्णय लेने जैसी मानसिक क्षमताएँ बढ़ाने में भी खाद्य पदार्थ विशिष्ट भूमिका निभाते हैं ऐसे भोज्य पदार्थों की सहायता ली जा सकती है, जिनमें मानसिक परिपोषण के लिए उपयुक्त तत्व प्रचुर परिमाण में विद्यमान हों।
मस्तिष्क के विकास में ऐसे भोजन का बड़ा योगदान रहता है, जो सात्विक प्रकृति के और सुपाच्य माने जाते हैं। गरिष्ठ, चटपटे , तले-भुने, शक्कर, नमक की अनावश्यक मात्रा वाले, मसाले डालकर सुगंधित एवं रंग डालकर आकर्षक बनाये गये पदार्थ सात्विक प्रकृति के नहीं होते। उनमें उत्तेजना भरी रहती है और यह प्रायः तामसिक स्तर के होते हैं। ऐसे पदार्थों का सेवन अपच-अजीर्ण जैसी शिकायत एवं रक्त विकार जैसी विकृतियाँ उत्पन्न करता है और फिर उनसे तरह-तरह की बीमारियाँ उठ खड़ी होती हैं। स्वाच के लिए गरिष्ठ और उत्तेजक पदार्थों को खाने से न केवल सामान्य स्वास्थ्य को वरन् मस्तिष्कीय कोमलता एवं सक्षमता को भी हानि पहुँचती है।
सात्विक खाद्यों की श्रेणी में कौन-कौन से पदार्थ आते
हैं? इस संबंध में यही कहा जा सकता है कि कुछ एक को छोड़कर बिना भुने तले अपने प्राकृतिक रूप, रस, गंध और स्वाद से हमारी तृप्ति करने वाले उन सभी पदार्थों को अपनी शरीर रचना के हिसाब से अनुकूल एवं प्राकृतिक कहा जा सकता है, जो प्रायः आध्यात्मिक क्षेत्र के साधक मनोभूमि वाले लोग ग्रहण करते हैं। ऐसे आहार पर निर्भर रहने वाले अध्यात्मवेत्ता अपनी बौद्धिक व आत्मिक विशेषता बनाते और बढ़ाते रहते हैं।
कुछ विशेष पदार्थ ऐसे भी हैं जो सामान्य भोजन की तरह तो नहीं, औषधियों के-अतिरिक्त परिपोषण के रूप में लिये जा सकते हैं। इनमें कई उपयोगी जड़ी-बूटियों की गणना होती आयी है। आयुर्वेद में अमृत मधुयष्टि शतावरी, बच, शंखपुष्पी, ब्राह्मी, जटामाँसी आदि का उल्लेख बुद्धिवर्धक एवं शामक पदार्थों के रूप में हुआ है।
सन् 1989 में कनाडा के मेडिकल रिसर्च सेण्टर के शरीर शास्त्रियों ने जब भारतीय आयुर्वेद की बढ़ी-चढ़ी प्रशंसा सुनी, तो उन्होंने इसकी सत्यता परखने के लिए कुछ भारतीय जड़ी-बूटियों पर प्रयोग परीक्षण आरंभ किये। इनमें स्मरण शक्ति बढ़ाने वाली ब्राह्मी बूटी प्रमुख थी। हर्मेपोनिन मोनिए सानम नाम से जानी जाने वाली इस वनस्पति का सत्व इंजेक्शन द्वारा कुत्तों के मस्तिष्क में पहुँचाया गया, उससे कोर्टिकल भाग की क्रियाशीलता में अपेक्षाकृत अधिक तेजी पाई गई। इसके आधार पर उन्होंने यह निष्कर्ष निकाला कि ब्रेन की सक्रियता और क्षमता में बढ़ोत्तरी आ गई। इसी प्रकार अन्य बूटियों पर भी उनने परीक्षण किये। सभी को वैद्यक शास्त्र में वर्णित उनके गुणधर्म के अनुरूप ही पाया गया।
आत्मिक प्रगति के क्षेत्र में भी उपयुक्त आहार महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। आध्यात्मिक लक्ष्य की प्राप्ति के लिए अपने मन में जमे कषाय-कल्मषों के ही कारण सबसे ज्यादा अवरोध उत्पन्न होता है। सात्विक आहार इन कल्मषों के निवारण का प्रथमोपचार है। इस प्रकार के शोधन उपचारों में पंचगव्य प्राशन और हविष्यान्न सेवन की चिर परम्परा है। गोरस में समाविष्ट सतोगुणी संस्कारों का बाहुल्य सर्वविदित है। गोदुग्ध, गोदधि, गोघृत, गोबर, गौमूत्र की आयुर्वेद में भूरि-भूरि प्रशंसा की गई और उसे उदर रोगों तथा रक्त विकारों की अमोघ औषधि माना गया है। यही बात गोबर के संबंध में है। लीपने से स्थान शुद्धि और यज्ञाग्नि में प्रयुक्त होने के लिए उपलों की महत्ता बतायी गई है। उनका तनिक सा रस होम्योपैथी दवाओं की तरह कितने ही प्रकार के लाभ उत्पन्न करता है। पंचगव्य में यों गाय का दूध, दही, घृत ही प्रधान होता है। गौमूत्र और गोबर के रस की मात्रा अत्यन्त स्वल्प रहती है। इस सम्मिश्रण को यों आरोग्य की दृष्टि से भी बहुत उपयोगी माना जा सकता है, साथ ही भावनात्मक शोध-उपचार की दृष्टि से भी उसका महत्व कम नहीं है। प्रायश्चित विधानों में पंचगव्य प्राशन का पग-पग पर निर्देश है।
हविष्यान्न में तिल, जौ, चावल इन तीन अन्नों की गणना है। इन्हें भी परम सात्विक सुसंस्कारों से युक्त माना गया है। यज्ञ कार्य में आहुतियाँ देने के लिए इन तीनों का उपयोग होता है। सामयिक अन्न संकट के कारण इन दिनों उनकी मात्रा घटा दी गई है पर प्रतीक रूप में उन्हें कुछ तो रखा ही जाता है। इन तीनों धान्यों को यज्ञ सामग्री में प्रयुक्त होने वाली औषधियों की तरह ही प्रतिष्ठा दी गई है।
तपस्वियों के सामान्य आहार में इन्हीं को प्राथमिकता दी जाती है। कई तो गायत्री पुरश्चरण जैसी लम्बी तप साधनाएँ इनमें से किसी एक अथवा तीनों के सम्मिश्रण से पूर्ण करते हैं। सामान्य आहार में तीनों के सम्मिश्रण से पूर्ण करते हैं। सामान्य आहार में भी इनको आधार मानकर चला जाय तो उससे शरीर और मन में सात्विकता का अंश और बढ़ेगा, साधना-तपस्या में आशाजनक प्रगति होगी।
“जैसा खाये अन्न वैसा बने मन” वाला निष्कर्ष अक्षरशः सत्य है। कुधान्य खाकर अभक्ष्य अपनाकर किसी की तप-साधना ध्यान-धारण सफल नहीं हो सकती। ऐसा अन्न पेट में जाकर ऐसे उपद्रव खड़े करता है, जिनके कारण मन में न शाँति रहती है, न स्थिरता। इस विग्रह के निवारणार्थ साधक सबसे पहले अपने आहार में सात्विक तत्वों के समावेश का प्रयास करते हैं। इस प्रयोजन के लिए मिर्च-मसालों से रहित सात्विक अन्न सर्वाधिक उपयोगी है।
ब्राह्मणोपनिषद् में कहा गया है-”आहार शुद्धौ सत्वशुद्धौः ................” अर्थात् आहार पवित्र होने से अन्तःकरण पवित्र होता है। अन्तःकरण की शुद्धि से विवेक-बुद्धि प्रखर होती है। उस विवेक से अज्ञानजन्य निविड़ बन्धन खुलते हैं। अध्यात्म क्षेत्र के लोगों को यह तथ्य भलीभाँति ज्ञात होना चाहिए। आत्मिक उन्नति निर्विघ्न तभी जारी रह सकती है अस्तु साधकों को स्वविवेक अथवा अनुभवी मार्गदर्शक की सहायता से अपनी साधना के अनुरूप उपयुक्त सात्विक आहार का निर्णय और निर्धारण करना चाहिए। ऐसा आहार स्वास्थ्य की दृष्टि से तो महत्वपूर्ण होता ही है, उसका मुख्य लक्ष्य अन्तःकरण चतुष्ट्य का स्तर तमोगुणी, रजोगुणी भूमिका से ऊँचा उठाकर सतोगुणी स्तर तक पहुँचाना है इसीलिए साधना विज्ञान में आहार को इतना महत्वपूर्ण माना गया है और उसके चयन में पूर्ण सतर्कता बरतने की सलाह दी गई है।
कौन उसे नहीं पाना चाहता? लेकिन इस ‘उस’ का मतलब नृत्य संगीत की सुरम्यकला नहीं और न उसके वे समस्त सद्गुण जिनसे उसका विशाल हृदय सरोवर लबालब भरा है। सब ओर तो उसके शरीर को पाने के लिए कुचक्र रचे जा रहे थे। इन कुचक्र रचने वालों में बड़े-बड़े सामन्त, राज घराने के लोग स्वयं सम्राट भी हैं। इस विस्तृत गणना में हैं तो वे भी जिन्हें समाज के रूप में सम्मान करता धर्म के वे तथाकथित अधीश्वर भी जिनकी पुष्पित वाणी, चरित्र निष्ठ का गुणगान करती नहीं अघाती। बिस्तर में लेटी मुदाल यह सब सोचते-सोचते तड़प उठी जैसे बिस्तर से लाखों-लाख सुइयाँ निकलकर उसके बहुकोमल शरीर में चुभ गई हों।
देश के कर्णधार, मार्गदर्शक और प्रभावशाली लोग ही चरित्र भ्रष्ट हो गए तो फिर सामान्य प्रजा का क्या होगा? अभी वह इसी चिंता में डूबी थी कि किसी ने द्वार पर दस्तक दी। मुदाल न दरवाजा खोला तो सामने खड़े सम्राट बिन्दुसार को देखते ही स्तम्भित रह गई।
“इस प्रकार असमय आने का कारण महाराज?” न चाहते हुए भी मुदाल को प्रश्न करना पड़ा।
बड़ा विद्रूप उत्तर मिला-”मुदाल! तुम्हारे रूप और सौंदर्य पर सारा देश मुग्ध है। त्यागी, तपस्वी तुम्हारे लिए सर्वस्व न्यौछावर कर सकते हैं फिर मेरे ही यहाँ आने का कारण क्यों पूछती हो भद्रे?”
“सम्राट! सामान्य प्रजा की बात आप छोड़ दीजिए। आप तो इस देश के कर्णधार हैं। सामान्य जनमार्ग भ्रष्ट हो जाए तो उन्हें सुधारा भी जा सकता है, पर यदि समाज के शीर्षस्थ लोग ही चरित्र भ्रष्ट हो जायँ तो वह देश खोखला हो जाता है, ऐसे देश, ऐसी जातियाँ, अपने अस्तित्व की रक्षा भी नहीं कर पातीं। इसलिए आपका इस समय यहाँ आना अशोभनीय ही नहीं सामाजिक अपराध भी है।”
अधिकार और अहंकार के तीव्र विष ने जिसके अन्तःकरण को मूर्छित कर दिया हो, उसे बोध के स्वर भी कहाँ जीवन दे पाते हैं। मुदाल की सीधी-सरल संवेदना से विगलित वाणी भी बिन्दुसार को विष बुझे तीर की तरह लगी। वे तड़प कर बोले “मुदाल। हम तुम्हारा उपदेश सुनने नहीं आये हैं। तुम राजनर्तकी हो तुम्हारा सर्वस्व हमारे आधीन है। धर्म क्या है अधर्म क्या है? यह सोचना तुम्हारा काम नहीं है।”
“नर्तकी भर होती तब तो आपका कथन सत्य था महाराज!” मुदाल की गम्भीरता अब दृढ़ता और स्वाभिमान में बदल रही थी “किन्तु मैं मनुष्य भी हूँ और मनुष्य होने के नाते समाज के हित-अहित की बातें सोचना भी मेरा धर्म है। मैं सत्ता को दलित करके अपने देश वासियों को मार्ग भ्रष्ट करने का पाप अपने सिर कदापि नहीं ले सकती।”
स्थिति बिगड़ते देखकर सम्राट बिन्दुसार ने बात का रुख बदल दिया। पर वे अब भी इस बात को तैयार न थे कि एक साधारण नर्तकी उनकी वासना का दमन कर जाए और मुदाल का कहना था कि विचारशील और सत्ता रूढ़ का पाप सारे समाज को पापी बना देता है। इसीलिए चरित्र को वैभव के सामने झुकाया नहीं जा सकता। मुदाल ने बहुतेरा समझाया पर सम्राट का रौद्र रूप कम न हुआ। स्थिति अनियन्त्रित होते देख वह बोली “यदि आप साधिकार चेष्टा करना ही चाहते हैं तो तीन दिन और रुकें मैं रजोदर्शन की स्थिति में हूँ। आज के चौथे दिन आप मुझे “चैत्य सरोवर” के समीप मिलें। आपको यह शरीर वहीं समर्पित होगा।”
तीन दिन बिन्दुसार ने कैसे बिताए यह वही जानते होंगे। चौथे दिन चन्द्रमा की स्निग्ध ज्योत्सना में अगणित उपहारों के साथ सम्राट बिन्दुसार चैत्य विहार जा पहुँचे। उनके मन में वासना की अगणित उद्दाम लहरों के बीच मनोभव क्रीड़ा कर रहा था। पास पहुँचते ही जैसे इस क्रीड़ा पर अकस्मात वज्राघात हुआ। कामुकता स्तब्ध रह कई। मुदाल का शरीर उपस्थित था पर उसमें जीवन नहीं था। पास में एक पत्र पड़ा हुआ था-अक्षर कह रहे थे “सौंदर्य राष्ट्र के चरित्र से बढ़कर नहीं, चरित्र की रक्षा के लिए यदि सौंदर्य का बलिदान किया जा सकता है तो उसके लिए मैं सहर्ष प्रस्तुत हूँ”। शव देखने से लगता था मुदाल ने विषपान किया है।
इस बलिदान ने बिन्दुसार के मूर्च्छित अन्तःकरण को झकझोर कर जगा दिया। उन्होंने अपने साथ लिए वे उपहार पास में ठहरे भगवान तथागत को समर्पित किए। अब वे आत्म सौंदर्य की साधना में लग चुके थे।
क्यों करता अभिमान देह का, यह माटी की ढेरी रे यह माटी की ढेरी।
दर्पण में हर समय देह की, तूने छटा निहारी, तन तो धोया, मगर न तूने मन की धूल बुहारी, जगा-रोग से घिरी देह ने, किसका साथ निभाया, सत्कर्मों की राह पकड़ ले, करता अब क्यों देरी रे! यह माटी की ढेरी।
पंचतत्व से बना हुआ तन, बड़े भाग्य से पाया, यह धन है अनमोल, कहाँ पर तूने इसे लगाया, पुण्यों का आलोक मिला, तो होगा सुखद सबेरा, दुष्कर्मों की रात, समझ ले, होगी बहुत अँधेरी रे! यह माटी की ढेरी।
कि या न जप-तप तूने मन से, केवल किया दिखावा, साधुवृत्ति न हुई, पहनकर संतों का पहनावा, तिलक लगाकर ऐंठा, निष्ठुर बनकर समय बिताया, अहंकार से भरकर तूने, माया बहुत बखेरी रे! यह माटी की ढेरी।
नगर-गाँव में नहीं निभाया, तूने भाई-चारा, असहायों को कभी किसी पल, तूने नहीं दुलारा, सही-गलत का बिल्कुल तुझको, ध्यान नहीं रह पाया, अपने हित में करीं हजारों, तूने हेरा-फेरी रे! यह माटी की ढेरी।
अपनी चिंता छोड़ सभी की खैर मनानी होगी, जन-मंगल की राह हमें, अब तो अपनानी होगी, गाँव घिरा लपटों में, तब कैसा सिंगार सजाना, झुलस रही सारी धरती है, क्या तेरी क्या मेरी रे! यह माटी की ढेरी।
-शचीन्द्र भटनागर
प्रस्तुत अंक में पाठकों के सम्मुख हम दे रहे हैं शांतिकुंज के गायत्री विद्यापीठ गुरुकुल के शुभारंभ के अवसर पर एक जून 1980 को परमपूज्य गुरुदेव द्वारा दिये गए उद्घाटन-उद्बोधन के महत्वपूर्ण अंश। विद्या व शिक्षा का स्पष्ट अंतर व सार्थक स्वरूप समझाने वाला यह सारगर्भित विवेचन आज देवसंस्कृति की ओर दिशा हेतु मुँह उठाकर ताक रही मानवजाति के लिए अत्यन्त प्रेरणादायी व सामयिक है। प्रस्तुत है पूज्यवर की अमृतवाणी।
गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ बोलिए-
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् ॥
देवियों एवं भाइयों! आज हम एक बहुत छोटी सी शुरुआत कर रहे हैं, जो बाहर से देखने में कोई खास, महत्व की नहीं मालूम होती। सरकारी स्कूल खुलते हैं बहुत से कॉलेज खुलते रहते हैं और शिक्षा के लिए जगह-जगह सरकारी-गैरसरकारी प्रयत्न चलते रहते हैं। ऐसा दशा में हम जिस कार्य का उद्घाटन कर रहे हैं, उसका यों प्रत्यक्ष कोई महत्व मालूम नहीं पड़ता। लगभग 35 से 40 बच्चों तथा 20 से 30 लड़कियों-महिलाओं की शिक्षा से हम यह एक छोटी से शुरुआत कर रहे हैं। नन्हा सा आरंभ है लेकिन आप सब जरा बारीकी से देखें तो यह मालूम पड़ेगा कि यह कोई बड़ा काम किया जा रहा है।
बीज बोते समय आपने देखा होगा कि नन्हा सा बीज खेत में डाल देते हैं, जरासी पौध लगा देते हैं तो प्रारंभ लगता तो छोटा सा ही है किन्तु जब हरी भरी फसल खड़ी होती है तो ढेरों अनाज पैदा होता दिखाई देता है। आपने मक्के का, धन का, गन्ने का पौधा लगते देखा है। काम जरा सा होता है किंतु परिणति बड़ी। बगीचा लगाते समय गुल्लियाँ बोई जाती हैं लेकिन जब हरा भरा बगीचा उगकर सामने आता है तो छोटा से काम जो किसी दिन प्रारंभ किया गया था, बड़ा परिणाम लेकर आता दिखाई देता है। हमने अपनी जिन्दगी में हमेशा ऐसे ही काम किए हैं। ऊँचे लक्ष्यों के लिए, ऊँचे उद्देश्यों के लिए, छोटी शुरुआत की है व परिणाम विराट परिमाण में सामने आया है। यहाँ जो शुभारंभ कर रहे हैं, वह बाहर के स्कूलों की तुलना में कोई खास महत्व का नहीं लगता किन्तु वास्तव में महत्व रखता है, यह मैं आपको स्मरण दिलाना चाहता हूँ।
स्वामी श्रद्धानन्द के मनमें एक बात आयी कि छोटी उमर के बच्चे ही वह आधार हैं, जिनपर संस्कारों का आरोपण किया जा सकता है, कच्ची लकड़ी को मोड़ा जा सकता है। छोटी उमर में यदि ध्यान दिया जाय तो बच्चों को महापुरुष बनाया जा सकता है। रामचंद्रजी और लक्ष्मण जी को विश्वमित्र जो छोटी उमर में ले गए थे और उनको बला-अतिबला विद्या सिखाकर महामानव बना दिया था। ऋषि संदीपनी के आश्रम में भी श्रीकृष्ण छोटी उमर में गए थे व महामानव बनकर आए थे। लव एवं कुश का शिक्षण बाल्मीकि के आश्रम में तब हुआ था जब वे बालक थे। छोटी उमर का बड़ा महत्व है। बड़ी उम्र होने पर आते तो शायद इतना बड़ा परिणाम न निकलता जितना ज्यादा ऊँचे स्तर का शिक्षण छोटी उम्र में सिखाया जा सकता है, बड़े होने पर उतना संभव नहीं है। स्वामी श्रद्धानंद ने यही प्रयास किया। एक छोटा से स्वयं का मकान था, उसे बेच दिया। मकान की कीमत मिली-हजार पाँच हजार रुपया। आज से लगभग अस्सी वर्ष पुरानी बात मैं कह रहा हूँ। घर बेचने के बाद हरिद्वार में गंगा के पार काँगड़ी गाँव में गुरुकुल के नाम पर छोटे-छोटे झोंपड़े बनाए और दस विद्यार्थियों से अपनी संस्था की शुरुआत की। जिनने भी देखा, सबने मखौल उड़ाया। दस बच्चों का भी कोई स्कूल होता है। स्कूलों की तो बड़ी शानदार इमारतें होती है। देहरादून, मंसूरी में पब्लिक स्कूलों का ठाटबाट तो देखिए। उसके मुकाबले फूस की झोपड़ियों का भला क्या मूल्य? किन्तु सिद्धान्तों के प्रति अडिग श्रद्धानन्द ऊँचे लक्ष्य को लेकर काम करते गए। गंगा में आई बाढ़ भी उनके उद्देश्य को डिगा नहीं सकी। एक शानदार संस्था के रूप में गुरुकुल काँगड़ी उभर कर आई। उसमें से बड़े शानदार आदमी निकले। इन्द्रसेन विद्यावाचस्पति, सत्यदेव विद्यालंकार रामगोपाल विद्यार्थी ऐसे कुछ गिनेचुने किन्तु तपे हुए आदमी जो उन दिनों इस गुरुकुल ने निकाले, किसी दूसरे स्कूल से नहीं निकले।
हमारे प्रत्येक काम को आप देखें तो आपको लगेगा कि वह प्रारंभ में भले ही छोटा हो किन्तु ऊँचे उद्देश्यों को लेकर आरंभ हुआ वह बड़े परिणाम तक पहुँचा। एक छोटा सा छापाखाना खोला था हमने आज से चालीस बयालीस साल पहले। जिसने देखा, हँसते हँसते लोटपोट हो गया। साढ़े तीन सौ रुपये की हाथ से चलने वाली मशीन से कोई जमाने को बदलने वाली पत्रिका भी छप सकती है क्या? सबने कहा क्यों पैसा नष्ट करते हो? कुल एक हजार का छापाखाना काम करने वाले तीन आदमी। हाथ से बना कागज। दीखने में छोटा सा छापाखाना पर हमारा मकसद बड़ा था, उद्देश्य बड़ा था तो परिणाम जो निकलकर सामने आए वे कैसे शानदार थे। छोटी मशीन में दुनिया को हिला देने वाला, ऊँचे मकसद व उद्देश्यों वाला साहित्य छपता था जबकि बड़ी-बड़ी मशीनों में आपको क्या-क्या बताएँ, ऐसे गंदे उपन्यास व गंदी किताबें छपती हैं। किन्तु हमारे छोटे से प्रेस ने दुनिया को झकझोर दिया। जिसके पीछे मकसद काम करते हैं, उद्देश्य काम करते हैं तो क्रियाकलाप छोटे हों या बड़े फलते व फूलते हैं।
एक और उदाहरण आपको दूँ। राजस्थान की वनस्थली नाम की एक जगह पर एक अध्यापक ने छोटा सा बालिका विद्यालय खोला। हीरालाल शास्त्री नाम के गाँव के उस छोटे से अध्यापक ने अपना सब कुछ न्यौछावर कर दिया तो वहाँ अब क्या है? करोड़ों रुपये की इमारत बनी है। लड़कियाँ हवाई जहाज चलाना सीखती हैं, सही अर्थों में आत्मनिर्भर बन नारी को जगाने की विधा में निष्णात् होती हैं, न जाने क्या क्या वहाँ पढ़ती हैं। यह सब इसलिए हुआ कि इस सबके पीछे ऊँचा उद्देश्य था। हमारा भी आज गुरुकुल आरंभ करने के पीछे ऐसा ही उद्देश्य है। जब यह साथ होता है तो जनता, इंसान व भगवान सब सहायता करने आ जाते हैं और उदाहरण सुनेंगे आप?
इटावा जिले का एक अँग्रेज इंस्पेक्टर। नाम था ह्यूम। अपने गाँव-गाँव जाकर आदमी एकत्र किए। हिंदुस्तान में युवाओं की, जनता की, एक समिति होनी चाहिए। उद्देश्य था पीछे तो पचास साठ आदमी इकट्ठे हुए और कांग्रेस का जन्म हो गया। तिलक, नेहरू, शास्त्री, सुभाषचंद्र बोस सब उसी की देन हैं। छोटे संगठन के पीछे ऊँचे उद्देश्य हों, ऊँचा मकसद हो तो वे दुनिया में सफल होते हैं। जिनके मकसद घटिया होते हैं तो वे बड़े काम करने वाले भी निंदा के पात्र बनते हैं व उन पर लानत बरसती है।
हम एक छोटी से पाठशाला शुरू करके एक शानदार शुरुआत करते हैं आज कि हम शिक्षा के साथ-साथ संस्कृति-विद्या भी पढ़ाना चाहते हैं। आज शिक्षा तो सब जगह है, संस्कृति नहीं है। हजारों रुपये एक बच्चे के ऊपर प्रतिदिन खर्च हों, ऐसे विद्यालय आज भी देहरादून, मंसूरी में हैं। आप जाइए देख आइए पर यह भी देखिए कि वहाँ संस्कृति है क्या? संस्कृति किसे कहते हैं? संस्कृति वह जिसे ग्रहण करने के बाद आदमी इंसान बन जाता है। इंसान के बाद महामानव फिर भगवान बन जाता है। किन्तु आज की शिक्षा, वह तो संस्कृतिविहीन है। आज के अनपढ़ आदमी की तुलना में पढ़े लिखे को देखकर मुझे डर लगता है। एक बिना पढ़े लिखे से निश्चिन्तता रहती है कि इसमें बदमाशी या चालाकी नहीं हो सकती। होगी तो एक सीमा के अन्दर ही। अंदर भलमनसाहत है अभी। यदि इसे थोड़ा पढ़ा लिखा कर जीवन जीना सिखा दिया जाय तो आदमी बन सकता है। किन्तु पढ़ा-लिखा? वह तो दिमाग की खिड़की बंद किए बैठा है, हददर्जे का बदमाश है व अहंकारी है। संस्कृति यही करती है कि आदमी को सही ढंग से आदमी बनकर जीना सिखाती है। कौन सिखाए संस्कृति को? सरकार कर सकती है? नहीं, सरकार का सभ्यता से, एटीकेट से, लिबास-पोशाक से तो ताल्लुक हो सकता है पर संस्कृति से नहीं। संस्कृति का मंत्रालय या विद्यालय, विश्वविद्यालय सरकार के पास हो सकता है पर उसमें संस्कृति व विद्या नाम की कोई चीजें नहीं हैं, मात्र नाम ही नाम है।
संस्कृति का शिक्षा में समावेश हर कोई नहीं कर सकता। केवल ऋषि ही कर सकते हैं। प्राचीन काल में शिक्षा के क्षेत्र में हर कोई हाथ नहीं डालता था। आप मकान बनाइए, उद्योग खड़ा कीजिए खेती बाड़ी कीजिए, राज कीजिए पर एक काम मत करिए। वह है शिक्षा से जुड़ी संस्कृति का शिक्षण जिसे मिला जुलाकर “विद्या” कहते हैं। हर कोई विद्या नहीं दे सकता। आज तो हर कोई विद्यालय खोले बैठा है, उसका मालिक बना हुआ है पर प्राचीन काल में यह कार्य विशुद्धतः ऋषियों के जिम्मे था व वे इसे बखूबी निभाते थे। संस्कृति तो वही सिखा पायेगा, जिसके पास हो संस्कृति। मास्टरों के पास कहाँ है संस्कृति? मास्टरों व मजूरों में आज कोई अंतर है? मास्टर कहते हैं गुरु को और गुरु वे होते हैं जो शिष्य को अनगढ़ता के अँधेरे से निकालकर सुगढ़ता का प्रकाश भरा रास्ता दिखाते हैं। मात्र जानकारी नहीं देते। वे आत्मीयता का पोषण देते हैं, संवेदना देते हैं। इसी को संस्कृति या विद्या कहते हैं।
हम प्राइमरी स्कूल में पढ़े थे गाँव के। उस जमाने में, आज से साठ साल पहले दो रुपये की छात्रवृत्ति हर प्रतिभावान बच्चे को मिलती थी। हमारे गाँव आँवलखेड़ा के स्कूल के एक तिहाई विद्यार्थी सारे आगरा जिले के वजीफे हड़प ले जाते थे। किस कारण? क्योंकि वहाँ गुरुजी थे, मास्टर साहब नहीं। हमारे गुरुजी ने स्कूल को गुरुकुल बना दिया था। बच्चे स्कूल में ही सोते थे। सबेरे उठाकर वे माँ की तरह कुल्ला कराते, नहलाते व फिर पढ़ाते। नींद आती तो धमकाते नहीं थे। कहते अच्छा सोजा, पर जल्दी उठ जाना, देर तक मत सोना। न केवल हम बल्कि जितने विद्यार्थी उस स्कूल में उस जमाने में पढ़े तीन साल तक बराबर सारे जिले की छात्रवृत्ति लेकर आए। हर वर्ष बीस-तीस बच्चे छात्रवृत्ति लेकर आते रहे क्योंकि वह नौकरी के लिए नहीं, संस्कृति के लिए शिक्षण देते थे। हर माँ-बाप को प्रसन्नता थी कि मास्टर साहब के पास बच्चा जितना ज्यादा रह जाएगा, उतना ही अच्छा है। सबेरे जल्दी उठेगा, नहाएगा, साफ रहेगा, आदमी बनेगा। पढ़ा लिखा बने चाहे नहीं, पर विनम्र बनेगा।
ऐसी गुरुकुल पद्धति मित्रो। समाप्त हो गयी। हमें अब क्वालिटी के सहयोगी मिले हैं तो हम इस आरंभ करते हैं। सारे गायत्री परिवार के चौबीस लाख परिवारों के बच्चों को पढ़ाने की हैसियत तो हमारी नहीं है पर हम एक “मॉडल” खड़ा करना चाहते हैं कि बच्चों का शिक्षण कैसा होना चाहिए? राम और लक्ष्मण को विश्वामित्र माँगकर लाए थे। हम भी गायत्री परिवार के विशाल परिकर के सदस्यों से उनके बच्चों को मांगेंगे कि हम इन्हें नवयुग के लिए तैयार करना चाहते हैं। आप हमें दीजिए। हम दो सौ बच्चों को अगले वर्ष से किण्डरगार्डन से लेकर दसवीं तक की शिक्षा देने का कार्य करेंगे पर इसकी विशेषता इसका सरकारी पाठ्यक्रम नहीं वरन् वह होगी जो प्राचीनकाल के गुरुकुलों में थी संस्कृति, शिष्टाचार जीवन जीने की कला, आत्मावलम्बन, स्वावलम्बन। यह एक बीजारोपण मात्र है, पर इसकी परिणति आप आने वाले बीस तीस वर्षों में देखेंगे, जब यह विश्वविद्यालय का रूप ले लेगा।
हम यहाँ चौबीस घंटे का शिक्षण देंगे। जिसमें खेलना-कूदना भी शामिल है, व्यायाम करना भी, हँसी मजाक भी तथा सोना भी। अपने पैरों पर खड़े होना भी तथा भयमुक्त होकर जीना भी और क्या करेंगे आप इस विद्यालय में? हम यहाँ परिवार निर्माण की शिक्षा आरंभ करने वाले हैं ताकि कुटुम्ब व्यवस्था ठीक हो सके। व्यक्ति को अच्छा बनाने के लिए कुटुम्ब को अच्छा बनाना होगा। आज के परिवार यह काम नहीं कर सकते। वे रात को खाना खाते हैं, रेडियो सुनते हैं, टीवी देखते हैं व सो जाते हैं। सुबह तब उठते हैं, जब बच्चे स्कूल चले जाते हैं। परिवारों को बनाने के लिए हमें नारियों का शिक्षण करना होगा। वे ही बच्चों में संस्कारों का आरोपण कर पाएँगी। नारियों के शिक्षण के बिना गुरुकुल में बच्चों का शिक्षण अधूरा है। मात्र बच्चों का गुरुकुल एक भवन तक सीमित नहीं, यह समग्र परिवार शिक्षण का आरण्यक गायत्री तीर्थ के रूप में हमने इसीलिए बनाया है।
आज नारी जाति की व उनके कारण परिवारों की जो दुर्गति है, उसे देखकर हमें दुख होता है। बच्चियाँ पढ़ती हैं, बी.ए. करती हैं, एम. ए. करती हैं। यह पढ़ाई किस काम आती है। नौकरियाँ कहाँ रखी हैं ? सबसे बड़ी बात है कुटुँब की संस्था का संचालन। कुटुम्ब एक समाज है, राज्य है, एक दुनिया है, जिसमें से महापुरुष निकाले जा सकते हैं। व्यक्ति को क्या से क्या बनाया जा सकता है। शादी और परिवार का कोई ताल्लुक नहीं है। पेट से बच्चा पैदा होता है, वही परिवार कहलाता है, यह सही नहीं है। शादी करने से ही परिवार बनता है, यह जरूरी नहीं है। परिवार है सहयोग सहकार का नाम। हिलमिल कर रहने की भावना का नाम गायत्री परिवार है, युग निर्माण परिवार है। परिवार की भावना यदि बन सके तो समाज बन सकता है। समाज की ढलाई का कारखाना है परिवार। इसमें ढलता है सुसंस्कारी व्यक्ति जो उसकी इकाई है। सुख और शाँति की दृष्टि से परिवार की महत्ता है, जिसके संचालन के लिए महिलाओं की जरूरत है। महिलाओं का, नारी जाति का शिक्षण आवश्यक है। परिवार निर्माण के लिए ऐसा कहीं कोई स्कूल नहीं है। वह हमने यहाँ गुरुकुल के रूप में बनाया है।
बच्चों की समस्याएँ समझकर उनका समाधान करने, उन्हें ही नहीं परिवार के हर सदस्य को ढाल देने की कला भगवान ने जितनी नारी को दी है, उतनी और किसी को नहीं। पुरुषों के हाथों धमकाने की कला दी है व नारी को जो कला दी है, उसे मोहब्बत कहते हैं, संवेदना कहते हैं, करुणा कहते हैं। मर्दों के पास ताकत तो है, समर्थता तो है पर मोहब्बत नहीं है। उन्हें बनाने बढ़ाने के लिए ढालने के लिए नारी को ही आगे बढ़ाना होगा। हम आप से कार्यकर्ताओं की बेटियों, धर्मपत्नियों से देवकन्याओं से जो यहाँ माताजी की गोदी में रहकर पत्नी उन सबसे इस स्कूल की परिवार निर्माण की प्रयोगशाला की शुरुआत करते हैं। गायत्री परिवार के लोगों से कहते हैं कि अपनी पत्नियाँ हमें सौंपिए। हम उन्हें संस्कारवान बनाएँगे। संस्कार किसी के पास नहीं है। सास के पास हैं? सास तो उससे भी ज्यादा फूहड़ है। अपनी बेटी बहू को कहाँ से देगी वह संस्कार। इसीलिए समय की आवश्यकता को देखते हुए हम संस्कारों के शिक्षण के लिए एक गुरुकुल आरंभ करते हैं विद्या, संस्कृति व ज्ञान द्वारा नयी पीढ़ी को बनाने के लिए।
हमारी तो इच्छा थी कि स्कूली पाठ्यक्रम भी इस शिक्षा से निकाल देते पर क्या करें? मजबूरी है। बच्चे, उनके अभिभावक कहेंगे कि हमें नौकरी के लायक भी नहीं बनने दिया। हम तो उन्हें जीवन जीने की कला, बड़ा आदमी-महामानव बनने की विधा सिखाना चाहते हैं पर समय को देखते हुए विद्यालयीन सरकारी पाठ्यक्रम भी साथ जोड़ दिया है। मैट्रिक एक तो सरकारी शिक्षण पद्धति से पढ़ायेंगे पर साथ में जीवन की दिशा का निर्धारण करना, अपना भविष्य स्वयं कैसे बनाया जाय, इस विधा का शिक्षण करेंगे। संस्कारवान बनाएँगे। सामान्य जानकारी मिले-वहाँ तक तो हम बर्दाश्त करते हैं पर कालेजों की पढ़ाई का जब प्रश्न आएगा तब हम अपना बनाएँगे। भारतीय संस्कृति का शिक्षण करने वाला एक विश्वविद्यालय स्तर का तंत्र हम खड़ा करेंगे। कब करेंगे? आप देखिएगा। हम हों न हों पर बीज बो रहे हैं। हमारे उत्तराधिकारी आने वाले दस-पंद्रह वर्षों में यह समग्र तंत्र तैयार कर देंगे। आपको इस संबंध में आशावादी होना चाहिए।
आज हमें आई.ए.एस. की नहीं समाज को सुधारने वाले लोकसेवियों की जरूरत है। समाज को शानदार मनुष्यों की जरूरत है। स्वस्थ चिंतन करने वाले युवारक्त की जरूरत है। इसीलिए स्कूलों की, कालेजों की शिक्षण पद्धति में व्यापक क्रान्ति पैदा करने के लिए यहीं से वातावरण बनाते हैं। ये बच्चे नहीं हैं। इनमें महामानवों के बीज हैं। न जाने इनमें से कौन गाँधी है, नेहरू है, सुभाष बोस है, खुदीराम है। प्रत्येक के अंदर की मौलिक क्षमता को निखारने का प्रयास हम करेंगे। चार घण्टों की सरकारी पढ़ाई व बीस घण्टों की हमारी संस्कारों वाली पढ़ाई।
उज्ज्वल भविष्य के लिए जरूरी है संस्कारवान बच्चे और सुसंस्कारी संवेदनशील-स्वावलम्बी शिक्षित नारी शक्ति। इन्हीं दो को बढ़ायेंगे हम। इस दिशा में हमारे कदम छोटे भले ही हों लेकिन परिणाम शानदार होंगे। आप देखना अगले दिनों सारी शक्तिपीठों में यही शिक्षण वृहत रूप में चलने लगेगा व देखते-देखते विद्या विस्तार की क्रान्ति होती चली जाएगी। अब अंत में एक अनुरोध उनसे जो इस काम के लिए समय देंगे। उन बुड्ढों को जिनने घर वालों की नाक में दम कर रखा है, रिटायर हो चुके हैं, ढेर सारा समय है पर समाज के नाम पर समय माँगते हैं तो ठेंगा दिखाते हैं, हम यहाँ बुलाते हैं ताकि उनका लोक-परलोक दोनों सुधार सकें। उन्हें हमें पहले पढ़ाना पड़ेगा ताकि वे शिक्षक बन सकें। वानप्रस्थ स्तर के रिटायर्ड सेवाभावी व्यक्ति चाहिए हमें। यदि ऐसे व्यक्ति युवा वर्ग में से मिल सकें तो फिर बात ही क्या है। घर में एक ही कमाने वाला है, उसे अभी हम नहीं बुलाते पर यह जरूर कहते हैं कि साल में वह एक बार नौ दिन का अनुष्ठान यहाँ आकर करे।अपने घर की महिलाओं व बच्चों का शिक्षण यहाँ देव परिवार में आकर करवाएँ। यह गुरुकुल एक समग्र, सर्वांगपूर्ण प्रयोगशाला है जिसमें हम नररत्नों को ढालेंगे, जिनसे व्यक्ति, परिवार व समाज बनेगा। हमें मौका दीजिए ताकि हम नया समाज बना सकें, नया जमाना ला सकें। इन बच्चों व महिलाओं का अब विद्यारंभ संस्कार होगा। हम अपनी बात समाप्त करते हैं। ॐ शाँतिः।
युगों-युगों से वैज्ञानिक इस दिशा में अनुसंधान कर रहे हैं कि क्या मनुष्य का कायाकल्प संभव है? क्या एजींग-वार्धक्य यानी बुढ़ापे की प्रक्रिया को रोका जा सकता है? चिरयौवन मनुष्य की अदम्य आकाँक्षा है, एक ऐसा स्वप्न है जिसको साकार करने के लिए वह न जाने क्या-क्या प्रयास-पुरुषार्थ करता है। इतने पर भी ऋषि प्रणीत सही पद्धति का आश्रय न लेने के कारण बहुसंख्य व्यक्ति भटकते ही देखे जाते हैं। आहार-विहार, यम−नियम के रूप में वे एक सुनियोजित क्रियापद्धति बना गए हैं, जिनका अनुपालन करते हुए कोई भी अक्षुण्ण स्वास्थ्य बनाए रख शतायु-दीर्घायु जीवन जीता रह सकता है। पर यह आकाँक्षा जब मनुष्य की अपनी यौनतृप्ति की पशु-प्रवृत्ति को बनाए रखने के रूप में “बीजाकरण” जैसे बलवर्धक रसायनों औषधियों की खोज के रूप में प्रकट होती है तो इससे बुढ़ापा दूर होना तो अलग, वह नीम-हकीमों के जंजाल में उलझकर और भी कष्टों को आमंत्रित करता देखा जाता है।
यहाँ यह इस संदर्भ में कहा जा रहा है कि चिरयौवन, वार्धक्य निवारण व यौनशक्ति संवर्धन को गलती से पर्यायवाची मानकर मध्यकाल के यूनानी हकीमों से लेकर मोदक-अवलेह बनाने वाले वैद्यों तथा आज के तथाकथित सेक्स स्पेशलिस्टों ने आयुर्वेद के साथ व विशेष रूप से “कायाकल्प” शब्द के साथ एक मखौल सा मचा रखा है व इसी कारण गुड़ गोबर हो गया प्रतीत होता है।
ब्रह्मवर्चस् की शोधप्रक्रिया का एक प्रमुख व सर्वप्रथम प्रयोजन था आहार-शुचिता। आहार की चिर पुरातन चली आ रही आदतों में परिवर्तन। न केवल पौष्टिकता वरन् सात्विकता का भी समावेश। आहार संयम द्वारा जीवनी शक्ति संवर्धन। सही आहार का चयन व इससे जुड़ी भ्रान्तियों का निवारण। विगत दो अंकों से पाठकगण इसी विषय-विशेष पर प्रतिपादनों व शोध परिणामों का अध्ययन कर रहे हैं। शोध अनुसंधान से कायाकल्प विषय पर हम आते हैं। यह इतना विज्ञानसम्मत व आज की परिस्थितियों के अनुरूप किया गया अनुसंधान है कि इससे निश्चित ही इक्कीसवीं सदी की ओर पग बढ़ाती मानवजाति द्वारा नये-नये विकास के आयामों की संभावनाओं के प्रकट होने की आशा की जा सकती है।
कायाकल्प इतना आसान नहीं है जितना कि उसकी चर्चा करते समय समझा जाता है। कभी च्यवन ऋषि जरा के यौवन में बदलने के प्रतीक रूप माने जाते थे व च्यवनप्राश के रूप में वह चिन्हपूजा आज भी होती है। परन्तु आहार एवं औषधि दोनों द्वारा किये जाने वाले कायाकल्प में यदि सही वातावरण का चयन कर सूक्ष्म स्तर की साधनाओं के साथ सही आहार व औषधि ली जाय तो वस्तुतः कल्प प्रक्रिया आज भी संभव है, यह ब्रह्मवर्चस् ने शोध द्वारा निर्धारण कर प्रतिपादित ही नहीं वरन् प्रयोग रूप में करके भी दिखाया है। कल्प एक साधना भी है एवं एक चिकित्सा भी। इसके लिए सबसे पहले शरीर शुद्धि की बात सोची जाती है। शरीर में मल एवं त्याज्य विजातीय द्रव्य यदि संचित हुए रखे हों तो न आहार प्रभाव डाल सकता है, न किसी प्रकार की विलक्षण जड़ी-बूटी। जिस प्रकार सोने के अयस्क को पहले शोधन प्रक्रिया से गुजारा जाता है, तपाया जाता है व फिर शुद्ध सोना निखरकर आता है लगभग उसी प्रकार पहले शरीर का समग्र शोधन किया जाना-तपाया जाना अनिवार्य है। आयुर्वेद में इसीलिए पंचकर्म पर अत्यधिक जोर दिया जाता है। स्नेहन, स्वेदन, वमन विरेचन वस्ति, आदि द्वारा शरीर में संचित दूषित मलों को बाहर निकाल फेंकने की प्रक्रिया पंचकर्म द्वारा संपन्न की जाती है। शारीरिक अंगों से चिपके मल को सुगमता से बाहर निकालने के लिए स्वेदन तथा स्नेहन का प्रयोग किया जाता है। यह ऐसी ही प्रक्रिया है जैसी कि मैले वस्त्रों का साफ करने के लिए साबुन लगाकर मैल को छुड़ाना। पहले शरीर के रोम कूप खोलकर मल निष्कासन तथा फिर वानस्पतिक स्रोतों से प्राप्त वसा पदार्थों-औषधीय तेलों द्वारा मुखमार्ग से वस्ति, नस्य मालिश आदि द्वारा स्नेहन प्रक्रिया-यह पंचकर्म की प्रारंभिक दो प्रक्रियाएँ हैं। वमन द्वारा कफ जो अंदर एकत्र होता रहता है, उसका निष्कासन किया जाता है। विरेचन भी विजातीय द्रव्यों की मुक्ति का एक दूसरा मार्ग है, जिसमें पित्ताशय की शुद्धि की जाती है। वस्ति से मलाशय, मूत्राशय में जड़ जमाकर बैठे विकारों का निष्कासन किया जाता है। डूश, एनीमा, सिट्ज बाथ इत्यादि इसी के आज प्रचलित भिन्न-भिन्न रूप हैं। यहाँ प्रत्येक प्रक्रिया के विस्तार में न जाकर उनकी परिभाषा की व्याख्या भर कर दी गयी है ताकि शरीर-शोधन की आवश्यकता कल्प प्रक्रिया के पूर्वाभ्यास हेतु समझी जा सके।
किन्तु मात्र शरीर शोधन ही पर्याप्त नहीं। मन का शोधन भी जरूरी है तब ही आध्यात्मिक कायाकल्प की प्रक्रिया संभव होती है। मन का परिशोधन करने हेतु चिन्तन पद्धति का पर्यवेक्षण, आत्मसमीक्षा प्रायश्चित उपचार से लेकर स्वयं के लिए स्वाध्याय हेतु सही विचार परक औषधि की सही मात्रा का चयन यह सब करना जरूरी है। मनः शक्ति संवर्धन किए बिना शरीर शोधन की प्रक्रिया तो बहिरंग की, कलपुर्जों की सफाई भर है। आहार शुचिता की साधना जो कल्प प्रक्रिया से जुड़ी है, इसीलिए अस्वादव्रत को प्रधानता देती आयी है क्योंकि इससे मनोबल की परीक्षा होती है-आत्मानुशासन का कड़ा अभ्यास होता है व मन के मजबूत बन पड़ने पर आगे वह पृष्ठभूमि बन जाती है, जिसके आधार पर और भी विशिष्ट प्रयोग आहार एवं औषधि के किये जा सकें। शाँतिकुँज में गायत्री तीर्थ के आरण्यक में इसी कारण अस्वाद का साप्ताहिक अभ्यास हर साधक को कराया जाता है ताकि वे इन्द्रियसंयम का अभ्यास करते चल सकें। अध्यात्म उपचार जो परम पूज्य गुरुदेव ने जन-जन के लिए सुलभ बनाये हैं, में उनने किसी प्रकार के अतिवाद से बचने व सरल-सूत्रों को हृदयंगम किये जाने पर विशेष जोर दिया है। यदि इतना भर होता चले तो व्यक्ति नीरोग व दीर्घायुष्य भरा जीवन जी सकता है।
कल्प प्रक्रिया में दो प्रकार के कल्प आते हैं। एक दुग्ध, मट्ठा, अन्न आदि का कल्प। दूसरा फल-शाक तथा वनौषधियों का कल्प। इन दोनों में से किसे चयन किया जाय, कौनसा श्रेष्ठ है, यह स्थूल तौर पर ऐसे ही नहीं बताया जा सकता। इसके लिए गहराई से प्रयोग परीक्षण कर निष्णात् चिकित्सक ही यह बता पाते हैं कि यह शरीर यह विशिष्ट कल्प सहन करने योग्य है, इसके लिए क्या-क्या स्टेप्स होने चाहिए तथा किस प्रकार उसे आगे बढ़ाकर क्रमशः कम करते करते सामान्य स्थिति में आना चाहिए। कल्प प्रक्रिया सदैव उन्हीं के द्वारा की जानी चाहिए जो स्वस्थ शरीर व स्वच्छ मन वाले साधक प्रकृति के हों, नहीं तो हानि-उपद्रवों की संभावना और हो सकती है। उपवास तो हर कोई कर सकता है किन्तु उसमें एक ही औषधि या आहार कब लिया जाय, कौनसा लिया जाय व कैसे उपवास तोड़ा जाय, इसका निर्धारण प्राकृतिक चिकित्सक या आयुर्वेद के वैद्य ही कर सकते हैं। इसीलिए शाँतिकुँज में निरापद ढंग से सबके लिए सुगम प्रक्रिया पद्धति का निर्धारण करते हुए विभिन्न कल्पों के प्रयोगों का प्रावधान किया गया है।
दूध एक संपूर्ण खाद्य है। इसे संतुलित भोजन माना गया है। इसमें प्रचुर परिमाण में प्रोटीन, शर्करा, वसा, विटामिन्स तथा बलवर्धक एन्जाइम्स विद्यमान हैं। गाय के दूध में प्रति 100 ग्राम 65 कैलोरी ऊर्जा देने वाले 3.3 ग्राम प्रोटीन, 3.6 ग्राम वसा तथा 4.8 ग्राम शर्करा होती है। इसमें विटामिन बी समूह कैल्शियम तथा फास्फोरस भी प्रचुर परिमाण में है। सतोगुणी धर्म का होने के कारण गौ दुग्ध साधक के लिए सर्वश्रेष्ठ माना गया है। अन्यान्य पौष्टिकता के तत्वों की दृष्टि से भैंस या बकरी के दूध में न्यूनाधिकता हो सकती है किन्तु सात्विकता की दृष्टि से गौ दुग्ध एक समग्र सर्वांगपूर्ण संतुलित खाद्य है-विशेष रूप से अध्यात्म क्षेत्र में प्रगति की ओर बढ़ रहे साधक के लिए। गौ दुग्ध में वे सभी आवश्यक पोषकतत्व विद्यमान हैं जिनकी कमी से शरीर में विभिन्न प्रकार के रोग होते देखे जाते हैं। ठोस भोजन एक दम बन्द करके तुरंत दुग्धाहार शुरू करना उतना ही गलत है जितना कि न पचे पाने वाले ठोस आहार को मात्रा का ध्यान किए बिना सतत् लेते रहना। जो भी व्यक्ति दुग्ध कल्प के इच्छुक हों, उन्हें बताया जाता है कि वे इसका औषधि की तरह नियत मात्रा में तब सेवन आरंभ करें जब शरीर तंत्र इसे ग्रहण करने के लिए तैयार हो चुका हो। सब कुछ छोड़कर जितना अधिक से अधिक दूध पिया जाएगा, उतना ही कायाकल्प होता चला जाएगा, यह विचार बचकानेपन का द्योतक है, सही नहीं है।
दूध कैसे व कौनसा लिया जाय कच्चा या पकाया हुआ, इस संबंध में भिन्न भिन्न मत हैं। यह धारोष्ण भी हो सकता है व धीमी आँच पर एक उफान कर गरम कर ठण्डा किया हुआ भी। यह पास्चराईज्ड भी हो सकता है, आज की आधुनिक तकनीकी के संदर्भ में तथा शास्त्रीय पद्धति के अनुसार मिट्टी के पात्र में गीले कपड़े से लपेटकर रेते में रखकर जीवाणु रहित किया हुआ भी हो सकता है। धारोष्ण अर्थात् तुरन्त निकला कच्चा दूध श्रेष्ठ माना गया है पर उनके लिए जिनकी आहार प्रणाली ठीक है, आदतें बिगड़ी हुई नहीं हैं। भाप से गरम किया हुआ दूध अधिक पोषक भी होता है तथा कब्ज नहीं करता। दुग्ध कल्प वालों के लिए ब्रह्मवर्चस् के अनुसंधानक्रम में इसी को वरीयता दी गयी है। मंद आँच पर धीरे-धीरे खौलाकर पकाया हुआ दूध स्वादिष्ट तो बन सकता है पर पौष्टिकता खोकर शरीर में विजातीय द्रव्यों की वृद्धि और करने लगता है। अतः इससे तो बचने को ही कहा जाता है। दुधकल्प आरंभ करने से पूर्व एक दिन उपवास अवश्य कर लिया जाय। उस दिन जल प्रधान पदार्थों पर रहा जाय। शुद्ध जल-हो सके तो गंगाजल तथा उबले शाकों के रसों को पीकर प्रारंभिक तैयारी करने को यहाँ कहा जाता है। इससे पाचन−तंत्र की शुद्धि होकर कल्प का पूरा लाभ मिलने की संभावनाएँ बढ़ जाती हैं। एक बार जब दुग्ध आरंभ कर दिया गया तो चौबीस घण्टों में कितनी मात्रा ली जाय, इसका निर्धारण किसी उचित मार्गदर्शक द्वारा कराया जाना चाहिए। अपनी प्रकृति, वजन तथा क्षमता के अनुरूप मात्रा का निर्धारण कर उसको चौबीस घण्टों में कब कब लिया जाय, यह विभाजन कर लिया जाता है। साधारणतया औसत 60 किलोग्राम वजन के व्यक्ति के लिए चौबीस घण्टों में तीन लीटर दूध की मात्रा ही सही मानी जाती है। यह अधिकतम है जो लिया जा सकता है। इस बीच पानी कम लिया जाय, दुग्ध में विद्यमान जल से ही काम चलाया जाय। जो भी पियें, वह चीनी या गुड़ मिला न हो, धीरे-धीरे चम्मच से स्वाद लेकर पिया जाय। किन्हीं-किन्हीं परिस्थितियों में मधु का समावेश भी किया जा सकता है पर यह निर्धारण व्यक्ति विशेष की पूरी जाँच पड़ताल करके ही किया जाता है।
दुग्ध कल्प में साधक को प्रारंभिक मात्रा न्यूनतम से आरंभ कर धीरे-धीरे बढ़ाने को कहा जाता है। प्रातः 5 बजे से सायं अधिकतम 7 बजे तक ही दुग्धाहार लेने की परम्परा है। रात्रि को मात्र कभी-कभी पानी ले लिया जाय। कभी कब्ज हो तो शुद्ध पानी का एनीमा लेने के लिए कहा जाता है। दुग्धकल्प करने से स्फूर्ति में साधक को शरीर में हल्कापन, चेहरे पर स्फूर्ति व चमक तथा धीरे-धीरे निद्रा से लेकर नित्यक्रम में नियमितता देखने को मिलती है। वैज्ञानिक दृष्टि से दुग्धकल्प शरीर की अम्लसाँद्रता को कम करता हुआ रक्त की ओषजन ग्रहण करने की क्षमता को बढ़ाता है। साधकों का कल्प के पूर्व यदि रक्त में ऑक्सीजन व कार्बनडाइ आक्साइड का पार्शियल प्रेशन (क्कश2 क्कष्श2) नापा जाय तो यह जानकारी मिलती है कि ऑक्सीजन का अनुपात बढ़ता है व कार्बनडाइ आक्साइड में कमी आ जाती है। रक्त में यूरिया तथा यूरिक एसिड की मात्रा भी कम होने लगती है जो स्वस्थता का चिन्ह है। सबसे महत्वपूर्ण जैव रासायनिक परिवर्तन यह कि “सिरम कार्टीसाँल” नामक हारमोन जो व्यग्रता-तनाव-बेचैनी व तेज गति से चल रहे “मेटाबोलिज्म” का प्रतीक है की मात्रा कम होकर नियमित हो जाती है तथा शरीर में प्रफुल्लता बढ़ाने वाले, तनाव शामक, स्नायु रसायनों तथा एन्डार्फिन्स, एन्केफेलीन्स सिरौटीनन की मात्रा बढ़कर इतनी हो जाती है, जितनी कि शरीर व मनके सुसंचालन के लिए जरूरी है। रक्त में लेक्टिक अम्ल व उसके साथ बढ़ने वाले पायरुवेट आदि ऐसे द्रव्य जो अधिक मात्रा में शरीर को हानि पहुँचा सकते हैं, क्रमशः कम होकर संतुलित हो जाते हैं। यह सारा प्रयोग परीक्षण ब्रह्मवर्चस् की अनुसंधान प्रक्रिया का सार है। शरीर की विद्युत, व्यक्ति के चिन्तन तथा मनोवैज्ञानिक प्रक्रियाओं में क्या-क्या परिवर्तन होता है तथा दुग्ध के साथ मट्ठा व शुद्ध मट्ठा (तक्र) का कल्प कैसे व क्यों किस किसको किस प्रकार लाभ पहुँचाता है, यह विशद विवेचन परिजन आगामी अंकों में पढ़ते रह सकते हैं। (क्रमशः)
ज्ञातव्य
इस शोध संदर्भ की धारावाहिक शृंखला के अंतर्गत
पाठकगण पत्रिका के दिसम्बर 91 के अंक से
ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान में विगत बारह वर्षों में संपन्न व सम्प्रति चल रहे अनुसंधान का वैज्ञानिक विवेचन पढ़ रहे है। प्रयास यह किया जाता है कि सर्वसाधारण समझ सके, ऐसी भाषा में यह प्रस्तुतीकरण हो। कहीं-कहीं विवश होकर वैज्ञानिक भाषा प्रयुक्त करनी पड़ रही है क्योंकि उनका हिन्दी विकल्प और भी क्लिष्ट है। किन्हीं को भी किन्हीं शब्दों के विषय में कोई शंका हो तो वे पत्राचार द्वारा पूछ सकते हैं। साथ ही शोध संदर्भ के अब तक प्रस्तुत विवेचन पर जिज्ञासाओं के साथ-साथ सुझाव भी आमंत्रित है। अगले अंकों में प्रयास किया जाएगा कि आंकड़ों के ग्राफ तथा फोटो भी हम दे सकें। पत्राचार का पता-निदेशक, ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान, शाँतिकुँज हरिद्वार 249411 (उ.प्र.)
लीला प्रसंग प्रकरण के अंतर्गत परम पूज्य गुरुदेव से जुड़े “ऑकल्ट” विवरणों को उनकी सिद्धि के घटना क्रमों को पढ़कर किसी बुद्धिजीवी वर्ग के पाठक को लगे कि “अखण्ड-ज्योति” पत्रिका के प्रतिपाद्य विषय से कुछ हटकर यह विवेचना किस कारण प्रस्तुत की जा रही है तो उन्हें हम बताना चाहेंगे कि वस्तुतः यह स्तंभ भी पूरी तरह “अखण्ड ज्योति” के संकल्पों की परिधि के भीतर ही है। 1938 में हाथ से लिखा प्रथम अंक वसंत पंचमी पर निकलने वाले तथा 1940 की वसंतपंचमी से उसका अधिकृत छपा हुआ प्रथम संस्करण प्रकाशित करने वाले परम पूज्य गुरुदेव ने जीवन भर एक ही विषय को बहुविध रूप में संदर्भों के साथ प्रस्तुत किया। वह यह कि मानव में अनन्त संभावनाएँ छिपी पड़ी हैं व उन्हें विकसित कर वह देवमानव सिद्धि पुरुष-देवदूत स्तर तक पहुँच सकता है। हर व्यक्ति एक शक्तिपुँज है। यदि आत्महीनता से उबरा जा सके तो वस्तुतः असंभव दीख पड़ने वाला पुरुषार्थ भी संभव है, महामानवों के आप्तवचनों के द्वारा अभिव्यक्त इस संदेश को परम पूज्य गुरुदेव ने बड़े ही व्यावहारिक रूप में अपनी लेखनी के माध्यम से प्रकट किया।
आज जब चमत्कारों के नाम पर नाना प्रकार के जाल धर्मतंत्र के अंदर ही बुने जाते व उनमें अगणित भोले व्यक्ति फँसते देखे जाते हैं तो सर्वसाधारण के शिक्षण के लिए यह जरूरी है कि उन्हें बताया जाय कि सिद्धियाँ विकसित अतिचेतन का ही एक रूप हैं। उनका लक्ष्य व उद्देश्य हर पुरुषार्थपरायण व्यक्ति को लोकमंगल में नियोजित होते हुए आगे बढ़ते रहने की प्रेरणा देने के लिए होना चाहिए। अकारण हर किसी पर सिद्धि चमत्कारों की वर्षा व उनका खुला प्रदर्शन परमपूज्य गुरुदेव ने जीवन भर नहीं किया तथा वस्तुतः इसके विरुद्ध ही लिखते रहे। उनकी “साधना से सिद्धि” उक्ति का अर्थ था-”जीवन का परिष्कार” चिंतन का कायाकल्प व परिस्थितियों का अनुकूलन।” व्यक्ति यदि संकल्पबद्ध पुरुषार्थ करे तो सिद्धियाँ स्वयं उस पर आकर बरसती हैं, यह उनने जीवन भर प्रतिपादित किया। सर्वसाधारण को संभवतः इस तथ्य पर विश्वास न हो अतः हमने यही उचित समझा कि एक साक्षी के रूप में, जीती जागती चित्रकला के रूप में परमपूज्य गुरुदेव के जीवन से जुड़े उन प्रामाणिक प्रसंगों को ही सबके सम्मुख रख दिया जाय ताकि वे स्वयं निर्णय लें कि यह सब क्यों व कैसे हो पाना शक्य बन पड़ा?
स्थूल, सूक्ष्म व कारण शरीर की विवेचना कई बार ‘अखण्ड-ज्योति’ के पृष्ठो पर की जा चुकी है। फिर भी एक स्पष्टीकरण के नाते स्थूल शरीर तो वह है जो अभिव्यक्त है। जिसमें अन्नमयकोश व उसमें संव्याप्त प्राणसत्ता का अंश आता है। जीवनी शक्ति व विकसित शरीरबल के रूप में यह बहिरंग में दिखाई देता है। सूक्ष्मशरीर मन की प्रसुप्त सामर्थ्यों से संबंधित है जिनकी जाग्रति मनोमयकोश व विज्ञानमयकोश के अनावरण द्वारा अतीन्द्रिय क्षमताओं से लेकर त्रिकालज्ञ स्तर की सिद्धि के रूप में प्रकट होती है। संकल्पशक्ति, प्रखर जीवट भरा मनोबल तथा बंधक सामर्थ्य द्वारा दूसरों को पढ़कर सब कुछ जान लेना, यह सब इसी के अंतर्गत आता है। इसी शरीर की परिधि में यह भी स्पष्ट होता है कि व्यष्टिमन, समष्टिमन का एक अंग है व देश-काल से परे वह कहीं आ-जा सकता है। विलक्षण स्तर की दीख पड़ने वाली विचार संप्रेषण पूर्वाभास जैसी क्षमताएँ बौनी जान पड़ती है, जब हम सूक्ष्म शरीर के विकास का विराट रूप देखते हैं। तीसरा कारण शरीर है जो भावसंवेदनाओं से भरे सरस अंतःकरण का पर्याय है। रसानुभूति, आत्मवत् सर्वभूतेषु की भावना करुणा का मानव मात्र के लिए जागरण तथा परहितार्थाय अपना सब कुछ होम देने की आकाँक्षा का विकास इसी स्थिति में होता है। जीव-ब्रह्म मिलन से लेकर ईश्वर साक्षात्कार और बंधनमुक्ति से लेकर समाधि के चरम सोपान की स्थिति में जा पाना इसी शरीर के विकास द्वारा संभव बन पड़ता है। यह आनन्दमयकोश के जागरण का सहस्रारदल कमल के प्रस्फुटन व विकास का द्योतक है। संक्षेप में यह सिद्धियों का एक प्रकार से “एनाटॉमीकल” विश्लेषण हुआ।
जब हम परमपूज्य गुरुदेव श्रीराम शर्मा आचार्य जी के जीवन पर एक दृष्टि डालते हैं तो यह सारे प्रसंग उनके 80 वर्षीय लम्बे जीवन में चरितार्थ होते दिखाई देते हैं। नीरोग, दीर्घायुष्य भरा जीवन न केवल स्वयं उनने जिया वरन् अपने जीवनक्रम से अनेकों को प्रेरणा दी व रोगी स्तर के व्यक्तियों से लेकर मृत्यु के मुख में जा पहुँचे परिजनों को भी प्राणदान देकर उन्हें नया जीवन दिया। यह एक ऐसी सिद्धि है जो गिने चुने विकसित स्तर के देवमानवों से लेकर अवतारी स्तर की सत्ता में ही पायी जाती है।
परमपूज्य गुरुदेव का जीवन खुले पृष्ठो की एक किताब के रूप में हम सबके समक्ष रहा है। अर्थ से लेकर समय एवं जिव्हा से लेकर विचारों के संयम का जो भी समग्र आदर्श रूप हो सकता है वह उनके जीवन में देखने को मिला। प्रत्यक्ष जीवन से तो उनने प्रेरणा दी ही, लेखनी से भी यही शिक्षण दिया। उनका व्यावहारिक अध्यात्म यही था। उस स्थूल के साथ जुड़ा कुछ ‘ऑकल्ट’ भी है जो “लीलाप्रसंग“ संदर्भ के तहत हम बताना चाहेंगे। पूज्य गुरुदेव ने चौबीस वर्ष तक चौबीस महापुरश्चरण गौ दुग्ध से बनी छाछ व जौ की रोटी ग्रहण कर एक कड़ी तप तितिक्षा के रूप में खण्ड-खण्ड में संपन्न किए। यह निर्देश उन्हें 1926 में मिला था व पूर्णाहुति जब उनने अंतिम अनुष्ठान पूरा किया, 1953 में सम्पन्न की गयी। बीच-बीच में स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने के कारण व्यवधान पड़ने से यह सत्ताईस वर्ष में पूरा हुआ परंतु नियम कड़ाई से निभता रहा। इसी अवधि में दो वर्षों के लिए वे नैमिषारण्य तीर्थ जाकर रहे। उनके साथ हरिद्वार के ही कनखल स्थित एक आश्रम के महन्त भी वहाँ थे जो साक्षी देते हैं कि चूँकि वहाँ जौ जो गाय के गोबर से निकली ही उपलब्ध नहीं थी, चक्रतीर्थ सरोवर में भक्तों द्वारा चढ़ाए गए चावलों को बीनकर पूरे चौबीस घण्टों में मात्र एक बार मात्र डेढ़ छटाँक मात्रा में लेते थे व सतत् गायत्री जप में संलग्न रहते थे। बीच में तीन-तीन घण्टे तक सरोवर में कमर तक पानी में खड़े रह सतत् सूर्य की ओर मुख करके ध्यान करते थे। यह प्रसंग संभवतः हममें से बहुतों की जानकारी में नहीं है।
अपनी तपश्चर्या द्वारा जो सिद्धियाँ उनने अर्जित की उन्हें वितरित करने का क्रम जारी रखा। गुजरात की अहमदाबाद की तारा बहन के साथ रहने वाले परिजनों को अभी भी याद है कि किस प्रकार पूज्य गुरुदेव ने अपनी वरदान द्वारा उन्हें एक ऐसी व्याधि से मुक्त कराया जिसका निदान कोई नहीं कर पाया था। वे जो भी खातीं, तुरंत उलटी हो जाती। चिकित्सकों का कहना था कि बहुत कम मात्रा में बार-बार तरह द्रव्य लें। चूँकि आमाशय के आगे मार्ग सँकरा है। कभी भी ठोस या अर्धतरल द्रव्य उनके पेट में आगे नहीं बढ़ सकेगा, उसके हमेशा उलटी होने या फिर सर्जीकल इमरजेन्सी पैदा होने की संभावना अधिक है। अपने गुजरात प्रवास में वे भी परमपूज्य गुरुदेव के दर्शन को गयीं। चर्चा के दौरान ही मेजबान ने कहा कि “पूज्यवर! आप भोजन करलें। समय हो गया है” गुरुदेव भगवान ने अपने साथ उस बहन को भी लिया व उसके लिए भी एक थाली लगवायी। वह कहती रही मैं भोजन नहीं कर पाऊँगी। सारा भोजन उलटी में बाहर निकल जाएगा। परमपूज्य गुरुदेव ने जोर दे कर कहा कि “तू तो खा बेटा। हम यहाँ बैठे हैं। कोई दिक्कत हो तो हम देखलेंगे।” देखते-देखते वह बहन पूरा भोजन ग्रहण कर गयीं व आश्चर्य कि भोजन बाहर भी नहीं आया न ही वैसा कुछ आभास हुआ कि उलटी हो सकती है। वह दिन उनके कष्टों के समापन का दिन था। उस दिन के बाद से अब तक वे सहज रूप में भोजन करती रहीं हैं। एक “मेकेनिकल” तकलीफ कैसे दूर हो गयी इसका किसी चिकित्सक के पास कोई समाधान नहीं है। क्या कोई बता सकता है कि इस प्रक्रिया का विश्लेषण विज्ञान की किस पद्धति से किया जाय? यह मात्र इसी आशय से कहा जा रहा है कि परमार्थ हितार्थाय ही स्व उपार्जित सिद्धियों का सुनियोजन महामानव करते आए हैं। परमपूज्य गुरुदेव ने उसी परम्परा का निर्वाह किया।
पनवाड़ी हमीरपुर के श्री कुँजबिहारी लाल गुप्ता के पुत्र रामबिहारी गुप्ता 1982-83 में रुड़की यूनिवर्सिटी के केमिकल इंजीनियरिंग में एम. टेक. कर रहे थे। एक दिन एक वज्रपात सा हो गया। कमर की हड्डी में दर्द व सूजन आ जाने से तुरंत डॉक्टर को दिखाया। 4-5 दिन बिस्तर पर रहना पड़ा। एक्सरे रक्त आदि की जाँच से चिकित्सकों ने निष्कर्ष निकाला कि यह तो जोड़ो व अस्थियों की टी. बी. है एवं इसमें बड़ी तेज औषधियाँ डेढ़ वर्ष तक लेनी ही नहीं होंगी, चलना फिरना भी प्रभावित होगा। अपने माता-पिता को उनने सूचना दी। तकलीफ पता चलने के 10 दिन के अंदर ही श्रीरामबिहारी अपने माता-पिता सहित परमपूज्य गुरुदेव की शरण में आ गए व प्रार्थना की कि अब तकलीफ से मुक्ति दिलाएँ व पढ़ाई में किसी प्रकार का व्यवधान न आने दें। पूज्यवर ने स्थान को स्पर्श करके कहा कि “अरे बेटा। किसी ने गलत डायग्नोसिस कर दी है। तुझे टीबी जैसी कोई बीमारी नहीं है। जा हमारी जड़ी बूटी की दवा एक महीने ले ले व अच्छे नम्बरों से पास होकर विदेश से नाम कमाके आ।” आशीर्वचनों का प्रभाव यह पड़ा कि वे बिना किसी तकलीफ के तो तुरंत चलने लगे, एलोपैथिक औषधियाँ बंद कर दी तथा एक माह तक शाँतिकुँज के चिकित्सकों की बताई दवा ली। दवा तो निमित्त मात्र थी। रोग तो उसी दिन दूर हो गया था। श्रीराम बिहारी ने प्रथम स्थान लेकर अपनी पढ़ाई पूरी की तथा अपनी पत्नी दीप्तिशिखा (सुपुत्री शालिग्राम गुप्ता) के साथ अमेरिका में रहकर पी.एच.डी. कर रहे हैं। साथ ही असोशिएटेड प्रोफेसर की पोस्ट पर हैं व कई अमेरिका निवासी प्रवासी छात्रों के प्रिय अध्यापक हैं। दोनों पति-पत्नी गायत्री का खूब प्रचार करते हैं व स्वयं को उनकी कृपा का जीता जागता नमूना बताते हैं।
उत्तरप्रदेश शासन में इस समय सचिव पद पर कार्यरत एक गायत्री परिजन पूज्यवर की आज्ञा ले कर शासकीय कार्य से दो माह के लिए 1988 में अमेरिका गए। जाते समय की तैयारी पर उन्हें याद आया कि पूज्यवर तथा वंदनीया माताजी ने उन्हें निर्देश दिया था कि विदेश की यात्रा कभी अकेले नहीं सपत्नीक ही करें अतः पत्नी जो चिकित्सक थीं, उनका भी पासपोर्ट, वीसा टिकट आदि बनवाया गया। अमेरिका में पिट्सवर्ग (क्कद्बह्लह्लह्यड्ढह्वह्द्दद्ध) में उन्हें दो माह तक विशेष अध्ययन हेतु संगोष्ठी में भाग लेना था जो दिन भर चलती थी। एक दिन सहसा उन्हें लगा कि एयरपोर्ट पर उतरने पर थोड़ी जो साँस फूलने की शिकायत हुई थी व तुरंत ठीक हो गयी थी अब फिर से हो रही है व साँस लेना उनके लिए अब मुश्किल हो रहा है। साधारण सी तकलीफ मानकर खिड़की के पास जाकर खुली हवा में साँस लेकर फिर मीटिंग में बैठे पर कुछ ही देर में बेहोशी सी आने लगी। उन्हें होश अस्पताल में आया, जहाँ चिकित्सकों ने उन्हें बताया कि उन्हें बड़ा तेज स्तर का दिल का दौरा पड़ा था तुरंत उनकी पत्नी को सूचित कर उन्हें समीप के ही एक अस्पताल की “इन्टेन्सिव केयर यूनिट” में भर्ती किया गया। परीक्षण पर ज्ञात हुआ कि हृदय की धमनियों में प्रमुख में 99 ' ब्लाकेड था। उनने बैलून डालकर तुरंत उसे कम कर धमनियों के रक्तप्रवाह को ठीक कर दिया गया। एक सप्ताह में ही अस्पताल से छुट्टी मिल गयी। चूँकि उनकी चिकित्सक श्रीमती जी साथ थीं व वे तकनीकी दृष्टि से अतिविकसित अमेरिका में थे, उन्हें चिकित्सा सेवा तुरंत सुलभ हो गयी व देख−रेख भी उनकी पत्नी करती रहीं। उन्हें आश्चर्य था कि कभी भी भारत में ऐसी तकलीफ उन्हें नहीं हुई व जब पहली बार यह हुई तो ऐसे स्थान पर जहाँ कुछ ही दूरी पर कुशल चिकित्सा ही नहीं परिपूर्ण सघन देख−रेख संबंधी सुविधाएँ उपलब्ध थीं। वे सोच रहे थे कि यदि परम पूज्य गुरुदेव का आशीर्वाद न होता तथा वे अकेले होते तो अपने देश से 10 हजार किलोमीटर दूर इस स्थान पर कैसे यह सब हो पाता। वे आज पूर्ण स्वस्थ हैं व अपनी दीर्घायुष्य के लिए परमपूज्य गुरुदेव व वंदनीया माताजी का आशीर्वाद ही मूल में पाते हैं। उन्हीं की प्रेरणा से उन्हीं के निर्देशों के अनुरूप जीवन जीने को संकल्पित यह अधिकारी महोदय क्रमशः उच्चतम सोपानों पर बढ़ते ही चले जा रहे हैं। हाँ, पूर्णतः स्वस्थ तो है ही।
यह कुछ प्रसंग मात्र कौतुक-कौतूहल पैदा करने के लिए नहीं एक परोक्ष सत्ता का अस्तित्व प्रमाणित करने के लिए उद्धत किए गये हैं। एक ऐसी सत्ता जो समाज को समर्पित हर श्रेष्ठ संस्कारवान आत्मा के लिए एक सुरक्षा कवच का प्रावधान बनाए रखती हैं। तप से अर्जित यह पूँजी परमपूज्य गुरुदेव के महाप्रयाण के बाद भी उतनी ही नहीं, और भी सशक्त रूप में व व्यापक रूप में सक्रिय है। इस संबंध में अगणित प्रमाण अगले कुछ अंकों में परिजन पढ़ेंगे। (क्रमशः)
बुद्ध की मृत्यु के समय उपस्थित शिष्य-समुदाय विलाप कर रहा था। सांसें फिर लौटीं। वे बोले-मेरे प्रति-प्रीति दिखाने का यह तरीका नहीं। यदि तुम में से कोई सच्चा अनुयायी हो, तो मेरे साथ रहे, सदा जीवन भर वही काम करते रहना चाहिए जो मैंने किया। इससे कम में प्रेम की सार्थकता बनती नहीं।
भारतीय संस्कृति उस आदर्शवादी क्रियापद्धति का नाम है जो सामूहिक जीवन में आत्मीयता, उदारता, सेवा भावना सहकारिता का वातावरण उत्पन्न करने का शिक्षण देती है। यह क्रियाप्रणाली भारतभूमि में निवास करने वाले देवमानवों की रही, इसीलिये यह धरती स्वर्ग कहलायी व यहाँ रहने वाले महामानव-देवपुरुष कहलाये। संस्कृति शब्द का अर्थ होता है “परिष्कृति” कच्ची अनगढ़ वस्तुओं को कुशलतापूर्वक सुधारकर उनका परिष्कार कर उन्हें सुगढ़ आकर्षक व उपयोगी बनाने की प्रक्रिया को संस्कृति कहा जाता है। भारतीय संस्कृति मानवीचेतना पर जन्म जन्मांतरों से चढ़े पशु संस्कारों का निराकरण कर उन्हें देवत्व के पथपर चलना सिखाती है। यह विशेषता किसी और सभ्यता या संस्कृति में देखने में नहीं आती। मनुष्य को सच्चे अर्थों में मनुष्य बनाने की क्षमता से ओतप्रोत इस देवसंस्कृति को विश्वसंस्कृति नाम इसी कारण दिया गया क्योंकि यह प्रकाश कभी भारत तक सीमित
“देवसंस्कृति विस्तार”वर्ष में विश्वभर में महोत्सवों की धूम
न रहकर सारी विश्व वसुधा में फैला व सर्वजनीन बना।
सबसे बड़ी विशेषता जो हम भारतीय संस्कृति में देखते हैं, वह है विचार स्वातंत्र्य। हर किसी प्रकार की विचार पद्धति के विकास की ऋषि-मुनि गणों ने पूरी छूट देते हुए इसे एक उदार व विराट रूप दिया। सारे मत-मतान्तर वाले इस संस्कृति के झण्डे तले पनपे व पुष्पित पल्लवित हुए हैं। आस्तिकवाद व नास्तिकवाद दोनों को ही हमारी संस्कृति में स्थान प्राप्त है। भक्तिवाद भी यहाँ है, वेदान्त का “जीवों ब्रह्मेव नापर” वाला तत्वदर्शन भी तथा चार्वाकवाद भी। जैन धर्म -बौद्धधर्म ईश्वर को मान्यता नहीं देते परन्तु फिर भी वे सभी भारतीय संस्कृति के सम्मानित सदस्य हैं। साकार एवं निराकार ईश्वर की परिकल्पना की संस्कृति में पूरी छूट है। सगुण ईश्वर की कल्पना में इतनी छूट दी गयी कि हर व्यक्ति अपनी रुचि के अनुरूप अपनी कल्पना के अनुरूप अपना भगवान निर्धारित करता हुआ आस्तिक बना रह सकता है। हर मनुष्य का इष्टदेव भिन्न-भिन्न हो सकता है, यह मान्यता व इस कारण आस्तिकता की, परमतत्व में आस्था की, भावना न केवल भारतीय संस्कृति ने अपने यहाँ जिन्दा रखी, अन्यान्य दर्शनों को प्रभावित कर उनके यहाँ भी नास्तिकता को पनपने से रोका। विचार स्वातंत्र्य के कारण ही सत्य की शोध के विभिन्न प्रयोगों की भारत वर्ष में अनादिकाल से गुँजाइश रही। यही कारण था कि इतने धर्म-सम्प्रदाय मत मतान्तर पंथ हमारे यहाँ पनपते चले गए। अन्याय संस्कृतियों में उन्हें बलात् दबाया कुचलाया गया पर देवसंस्कृति की उदारता ही थी जिसने सभी को एक समान स्थान दिया।
भारतीय संस्कृति बुद्धि क्षेत्र के प्रज्ञा ताँत्रिक पक्ष को प्रधानता व प्रश्रय देती आयी है। जहाँ अन्य धर्म एक ही पैगम्बर, एक ही धर्मशास्त्र, एक ही विधान को मान्यता देते आए हैं एवं अधिनायकवाद-तानाशाही-धर्मान्धता को जन्म देते हैं, वहाँ भारतीय संस्कृति के मनीषी वैज्ञानिक ढंग से विचार कर जनमानस की प्रबुद्ध चेतना, विवेक बुद्धि पर यह निर्णय छोड़ देते हैं कि वह जिसे उपयुक्त समझे, अपनाये। इसी कारण नास्तिकवादी व्यक्तियों को भी भारतीय संस्कृति का अंग बनने की छूट है जबकि अन्य धर्मों में उनके लिए द्वार बन्द है।
एक सबसे महत्वपूर्ण विशेषता जो भारतीय संस्कृति व धर्म−दर्शन की सब एक स्वर से स्वीकार करते हैं, वह है जीवन की अखण्डता और निरन्तरता को मानते हुए उसे यहाँ के व्यक्तियों द्वारा दैनंदिन व्यवहार में परिलक्षित करना। जीवन की अखण्डता से तात्पर्य है पिण्ड व ब्रह्माण्ड में एक ही चेतन प्रवाह को स्वीकार करते हुए प्राणियों चर-अचर अप्राणियों को परस्पर संबद्ध मानना। अद्वैत को मान्यता देते हुए व्यष्टि व समष्टि प्रवाह का संबंध स्थापित कर आज की अनेकानेक समस्याओं का, जिनमें पर्यावरण संकट भी है, हल निकाला जा सकता है। जीवन की निरन्तरता स्वीकारने वाला इस संस्कृति का अनुयायी यह मानता है कि मृत्यु एक रूपांतरण प्रक्रिया मात्र है। वह अन्त नहीं है। कर्मफल की मान्यता व पुनर्जन्म का सिद्धान्त एक विज्ञानसम्मत चिन्तन है जो भारतीय संस्कृति से ही उपजा है। यही आज की नैतिक मूल्यों के ह्रास से पनपी आस्था संकट की समस्या का समाधान भी है। जीवन की निरन्तरता को मानने का अर्थ यह है कि हम जो भी कुछ करते हैं, सोचते हैं, वह कभी नष्ट नहीं होता। उसका फल निश्चय ही मिलता है।
अद्वैतवाद, जन्मान्तरवाद के बाद भारतीय संस्कृति कर्मवाद की प्रेरणा भी देती है। कर्म का सिद्धान्त जो हिन्दूदर्शन में प्रतिपादित है, उसमें नियतिवाद को कोई स्थान नहीं है। मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता स्वयं है व अपने संकल्प के द्वारा उसे जैसा चाहे बना सकता है यह दर्शन व व्यवहार देवसंस्कृति में ही देखने को मिलता है। मनुष्य को ऋषिगण यह भी बताते आए हैं कि कर्मवाद का अर्थ होता है अपने संकल्पों से कर्म करते हुए कर्म के फल को त्यागना व इस प्रकार उससे लिप्त न होना। कर्म के फल का विराट पुरुष को समर्पण किया जाय, यह अभ्यास देवसंस्कृति की विभिन्न शिक्षाओं के माध्यम से सतत् कराया जाता है व यही इसकी सर्वाधिक महत्वपूर्ण विशेषता है।
यजुर्वेद (714) में एक पद आता है-”सा प्रथमा संस्कृति विश्ववारा” अर्थात् यह प्रथम संस्कृति है जो विश्वव्यापी बनी। सृष्टि के आरंभ में संभव है छिटपुट संस्कृतियों का उद्भव हुआ हो जो वर्ग विशेष, काल विशेष या क्षेत्र विशेष के लिए उपयोगी रही हों। उन सभी को पीछे छोड़कर भारतीय संस्कृति ही प्रथम बार इस रूप में प्रस्तुत हुई कि उसे सारे विश्व की संस्कृति कहा जा सके। यही हुआ। सर्वसाधारण ने उसकी सर्वोच्चता-सर्वश्रेष्ठता को स्वीकारा। इतिहास न माने तो भी तथ्य एक ही है जिसे कोई नकार नहीं सकता। वह यह कि विश्व संस्कृति माने जाने योग्य समस्त विशेषताएँ भारतीय संस्कृति माने जाने योग्य समस्त विशेषताएँ भारतीय संस्कृति में समग्र रूप में विद्यमान हैं। अंग्रेजी में संस्कृति के लिए शब्द आता है “कल्चर”। उसका शब्दार्थ भी वही कहता है जो उसका संस्कृत में अभिप्राय है-अस्तव्यस्तता को अनगढ़ता को मिटाकर व्यवस्था के, सुगढ़ता के, निर्माण के लिए किये जाने वाले प्रयत्नों को कल्चर कहते हैं। संस्कृति शब्द का यही अर्थ भारतीय संस्कृति में चरितार्थ होता दीखता है जब वह बिना किसी पूर्वाग्रह के विचार क्षेत्र में छाई कुसंस्कारिता का विच्छेदन कर सुसंस्कारिता की संस्थापना की बात कहती है। विश्व संस्कृति होने के नाते उससे आज सबको अपेक्षा भी यही है।
यहाँ भारतीय संस्कृति के विवेचन से तात्पर्य विगत की महत्ता का गुणगान मात्र नहीं है जो समसामयिक संदर्भों में समस्या का समाधान दे व युगानुकूल हो, उसे पर्याप्त सम्मान दे अपनाया ही जाना चाहिए। किन्तु विडम्बना एक ही है कि जहाँ देवसंस्कृति जन्मी-पनपी पूरे विश्व में फैली वहीं पर भारतभूमि पर साँस्कृतिक दासता का निविड़ अंधकार ही चारों ओर दिखाई देता है। पाश्चात्य संस्कृति के अंधानुकरण की प्रवृत्ति ही समाज में छाई दिखाई देती है। मध्यकाल में जोड़ी गई विकृतियों से पनपी भ्रान्तियों के निवारण का तो कोई प्रयास नहीं किया जाता, उलटे उनकी विस्तार से चर्चा कर हिंदू धर्म दर्शन को, प्रतिगामी ठहराने की कोशिश की जाती है। विदेशी आक्रान्ताओं ने भाग्यवाद, ईश्वर इच्छा, पलायनवाद, मायावाद, कर्म-संन्यास जैसे पक्षों को मिलाकर जनमानस को मूर्च्छित व कायर बना दिया ताकि इन्हीं मान्यताओं में उलझा भारतीय चिन्तन कभी विकास पथ पर बढ़ने न पाए। शाश्वत चिन्तन सत्य पर छाए इन आवरणों को हटाने का प्रयास जो किया जाना चाहिए था, वह पूरी विश्व मान्यता के हित में था। किन्तु छिटपुट कोशिशों के अलावा यहाँ पाश्चात्य संस्कृति भोगवादी चिन्तन व पलायनवादी विचारधारा ही पनपती रही है व इसमें हममें से प्रत्येक का योगदान रहा है, यह कड़ुआ सत्य सबको स्वीकार करना चाहिए।
अँग्रेजों के भारत में प्रवेश के बाद से अबतक कोई समूहबद्ध प्रयास ऐसा नहीं हुआ, जिसमें उनके द्वारा फैलाये गए षड़यंत्र से मुक्ति दिलाने की कोशिश की गयी हो। शिक्षा क्षेत्र से लेकर नौकरी व नेतृत्व तक व संगीत कला से लेकर साहित्य तक सब ओर अंग्रेजियत का वर्चस्व छाया दिखाई देता है तो उसमें हम सभी का यत्किंचित् योगदान अवश्य है। अच्छाई हर संस्कृति से, सभ्यता से, ली जानी चाहिए पर अपनी मूल थाती को तो नहीं भुलाया जाना चाहिए। विगत दो हजार वर्षों में यही होता रहा है। अब प्रायश्चित का समय आया है।
परमपूज्य गुरुदेव को हम सभी “संस्कृति पुरुष” के रूप में मानते हैं। उनने अपना सारा जीवन देवसंस्कृति के निर्धारणों को जन-जन तक विस्तार करने में होम कर दिया। भारतीय संस्कृति उनके रोम रोम में श्वास-श्वास में विद्यमान थी। इसी के आधार पर उनने हम सभी को, पूरी विश्वमानवता को सतयुग की वापसी का स्वप्न दिखाया व सारे निर्धारण बनाकर वे सूक्ष्म शरीर को प्राप्त हो वातावरण बनाने हेतु चल गए। उनने ऋषि संस्कृति, देवसंस्कृति का मात्र दर्शन पक्ष ही प्रतिपादित नहीं किया, वरन् उसे व्यवहार में कैसे उतारा जाय यह अपने जीवन के साथ लाखों व्यक्तियों के जीवन में चरितार्थ कर दिखाया। यदि हमें नवयुग की आधारशिला इस बदलती संक्रमण वेला में रखनी है तो पुनः भारतीय संस्कृति को विश्वसंस्कृति बनाकर ही यह संभव हो सकेगा।
इसके लिए निर्धारण यह किया गया है कि एक विराट स्तर पर “शपथ समारोह” परमपूज्य गुरुदेव की द्वितीय पुण्यतिथि पर 8, 9, 10 जून की तारीखों में शाँतिकुँज में आयोजित होगा। जिस प्रकार रावी तट पर काँग्रेस के चुने हुए संकल्पवानों ने राष्ट्र को स्वतंत्रता दिलाने की शपथ ली थी, उसी प्रकार गंगातट पर सप्तर्षियों की तपःस्थली इस देवभूमि में युग के विश्वमित्र की कार्यस्थली में सभी संकल्पनिष्ठ प्रज्ञापरिजन शपथ लेंगे कि राष्ट्र को साँस्कृतिक दासता से मुक्ति दिलाकर भारतीय संस्कृति का प्रकाश आगामी नौ वर्षों में हम विश्व के कोने-कोने में पहुँचा देंगे। शक्ति−संचार साधना में भाग लेने वाले उन सभी संकल्पनिष्ठों को जो अपना समय समाज व संस्कृति के लिए निकालेंगे, इसी निमित्त जुटाया जाएगा व यह वर्ष विशेष रूप से देव संस्कृति विस्तार वर्ष के रूप में मनाया जाएगा।
इसके लिए कई प्रकार के निर्धारण किए गए हैं। पहला तो यह कि शाँतिकुँज में तीन मास का प्रखर प्रशिक्षण देवसंस्कृति के पाठ्यक्रम के आधार पर चलेगा, जिसमें देवसंस्कृति के उद्धार हेतु निष्ठावान परिजन भाग लेंगे। जो यहाँ न आ सकें, उन्हें पत्राचार द्वारा प्रशिक्षण दिया जा सके इसकी सुविधा दी जाएगी। दूसरा यह साँगोपाँग विवेचन जिसके आधार पर देवसंस्कृति कभी विश्व संस्कृति बनी थी व अगले दिनों बनेगी, अखण्ड-ज्योति के विशेषाँकों के रूप में जून माह से दिसम्बर 92 के अंकों में प्रकाशित होगा। कलेवर उनका यथावत ही रहेगा, परन्तु सामग्री साँस्कृतिक मार्गदर्शनपरक होगी।
तीसरा निर्धारण यह किया गया है कि भारत के सभी महानगरों व बड़े नगरों में विराट स्तर पर संस्कार महोत्सवों का आयोजन होगा, जिनमें देवसंस्कृति के सभी निर्धारणों का प्रदर्शनात्मक शिक्षण होगा व महत्वपूर्ण संस्कार उनमें संपन्न किये जायेंगे। विदेशों में भी इसी प्रकार महोत्सवों के आयोजन होंगे। भारत में तो ये आयोजन शारदेय नवरात्रि से आरंभ होंगे। विदेश के लिए शाँतिकुँज की टोली के मार्गदर्शन में ये आयोजन इस वर्ष एक मई से ही आरंभ हो जाएँगे व इनकी शृंखला आगामी वर्ष वसन्तपर्व तक चलेगी। प्रायः देशों में निर्धारित चौबीस इन आयोजनों द्वारा निश्चित ही पूर्व की ओर ताकती मानवजाति को समग्र विश्व की मनीषा को एक नया मार्गदर्शन मिलेगा, कराहती मानवता को एक नया जीवन मिलेगा।
भारत से बाहर आयोजित इन कार्यक्रमों की तिथियाँ इस प्रकार हैं-यू. एस.ए. में 9, 10 मई (लॉसएंजेल्स), 16, 17 मई (ह्यूस्टन टेक्सास), 30, 31 मई (न्यूयार्क), 4, 5 जुलाई (शिकागो), 18, 19 जुलाई (डेट्रायट), 25, 26 जुलाई ओकलाहोमा। कनाडा में 1, 2 अगस्त माँट्रियल तथा 8, 9 अगस्त टोरोण्टो। डेनमार्क में 13 अगस्त कोपेनहेगन। पुर्तगाल में 15, 16 अगस्त लिस्बन। नीदरलैंड में 22, 23 अगस्त में एम्स्टर्डम में।
यू.के. (इंग्लैण्ड) में 5, 6 सितम्बर-लन्दन, 18, 19, 20 सितम्बर कम्बी 25, 26, 27 सितम्बर लीस्टर तथा 3, 4 अक्टूबर मेनचेस्टर। मारीशस में 12, 13 दिसम्बर पोर्टलुई। साउथ अफ्रीका में 19, 20 दिसम्बर जोहान्सवर्ग तथा 26, 27 दिसम्बर डर्बन में। आगामी वर्ष 1993 में जिम्बाब्वे (हरारे) में 2, 3 जनवरी, जम्बिया (लुसाका) में 9, 10 जनवरी तंजानिया में दारएस्स्लाम में 16, 17 जनवरी तथा 23, 24 जनवरी अऊशा में केन्या में 30, 31 जनवरी नैरोबी तथा 6, 7 फरवरी को मोम्बासा में।
विश्वामित्र, वशिष्ठ, जमदग्नि, कश्यप, याज्ञवल्क्य, धौम्य, पिप्पलाद जैसे ऋषिगणों तथा आद्यशंकराचार्य, कुमारिल, नानक, ज्ञानेश्वर, तुकाराम, समर्थ, तुलसी, कबीर, मीरा, चैतन्य, दयानंद, जलाराम, नरसी मेहता व विवेकानन्द जैसे संतों ने जिस भारतभूमि में देवत्व की स्थापना कर उसे समय-समय पर जीवन दिया, वह आज जिस स्थिति में पहुँचने को नियति के द्वारा संकल्पबद्ध है, सतयुग की पुनः वापसी के प्रज्ञा परिवार के प्रयासों द्वारा अगले दिनों वह निश्चित रूप से उस लक्ष्य तक पहुँचेगी, उसमें किसी को सन्देह नहीं होना चाहिए।
*समाप्त*