नास्तिकता क्यों बढ़ रही हैं?

कभी -कभी मन सोचने पर विवश हो जाता है कि उपासनागृहों की संख्या व उनमें जाने वालों की तादाद बढ़ते चले जाने के बावजूद नास्तिकता क्यों तेजी से बढ़ रही है? क्यों व्यक्ति परमसत्ता के अनुशासन की उपेक्षा कर कर्मकाण्डों के आडम्बरों में उलझा निजी जीवन में अनैतिक आचरण करता देखा जाता है? क्यों वह यह समझ नहीं पता कि मात्र बाह्योपचार करते चलने से न उसकी आत्मिक प्रगति ही सध पाएगी न उसकी भौतिक महत्वाकांक्षाएँ ही पूरी होगी? संभवतः इसके मूल में नासमझी हो, गहराई तक घुसा अज्ञान हो, विचार संस्थान में संव्याप्त भ्रान्तियाँ हो, जिन से वह उबरना न चाहता हो।

आज की सबसे बड़ी आवश्यकता इन प्रच्छन्न नास्तिकों के चिन्तन में आमूलचूल हेरफेर की है। व्यक्ति बहिरंग जीवन में धार्मिक आचरण करे, न करे किन्तु उसके मानस का परिष्कार तो होना ही चाहिए। उसे यह समझना जरूरी है कि बिना भावनात्मक कायाकल्प के सारे बाह्योपचार निरर्थक है। यह तभी संभव हो सकेगा , जब अध्यात्मधर्म के संबंध में, उपासना सिद्धि के संबंध में छाई तमाम भ्रान्तियों का निवारण उसे विज्ञानसम्मत बना कर किया जाय । विज्ञानसम्मत से अर्थ है तर्क, तथ्य, प्रमाण लॉजिक की कसौटी पर कसते हुए । आज समाज में छाई अनास्था स्वयं को नास्तिक कहने वालों की वजह से नहीं है अपितु उन आस्तिकों की वजह से है जो स्वयं का वैसा कहते हैं, बाहर वैसा ही आडम्बर रचते हैं पर उनके जीवन में वह कहीं भी लेशमात्र भी नजर नहीं आता । प्रगतिशील अध्यात्म की जितनी आवश्यकता आज है, उतनी पहले कभी नहीं रही।


त्याग ही वरेण्य

“गुरुदेव, मेरा कर्तव्य मुझे पुकार रहा है राजन”

“विजय नगर ने क्या अपराध किया? आचार्य के एकान्त एवं त्याग में कब बाधा दी है इस सेवक ने? हम सब किसके चरणों में प्रणिपात करके प्रेरणा करेंगे?”

एक मात्र जगदीश्वर ही प्रणम्य एवं शरण्य है राजन आचार्य माधव जब कोई निश्चय कर लेते हैं हिमालय के समान स्थिर होता है उनका निश्चय । उन्होंने प्रव्रज्या के महाव्रत को स्वीकारने का निश्चय कर लिया है। विजयनगर राज्य के नागरिक हिन्दू और यवन सब अनाथ की भाँति रो रहे थे। महाराज हरिहर हाथ जोड़े खड़े थे। लेकिन जो त्रिलोकी के वैभव को त्याग देने का संकल्प कर चुका हो, उसे क्या मोह?

ब्राह्मण यदि ब्राह्मण हो तो उसे कहीं कोई विघ्न नहीं होता। आचार्य ही हैं जो इस क्रन्दन करती भीड़ के मध्य भी मुस्करा सकते हैं । विजयनगर का वैभव जिसके आशीर्वाद से एकत्र हुआ और जिसके संकेत पर चलता है, वह राजगुरु, महामंत्री , राज्य का सर्वेसर्वा लेकिन वह कच्ची दीवारों से घिरी तृणों से आच्छादित कुटीर में गोबर से लिपी वेदी पर कुशासन बिछा कर ग्रन्थों के अम्बार में निमग्न रहने वाला तपस्वी-भला ऐसे त्यागमय तपोमूर्ति कहीं कोई विघ्न हो कैसे सकता है?

हम सबका ही कोई अपराध? नरेश का स्वर व्यथा से विगलित था।

ब्राह्मण कृपा करना जानता है, अपराध देखना नहीं, आचार्य ने मस्तक पर अभय कर रखा-त्याग ब्राह्मण का सहज स्वरूप हैं। मेरे जैसा ब्राह्मण त्याग न करे तो समाज आदर्श किससे प्राप्त करेगा

“गुरुदेव न संग्रह तो कभी किया नहीं ।

तुम जिसे संग्रह कहते हो वह तो भोग है और अपनी संस्कृति में भोग तो सदा निषिद्ध है। आचार्य कह रहे थे राजन धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष समाज रूपी बगीचे को सींचने वाली चार नदिया हैं इन चारों धाराओं प्रवाहमान रखने की जिम्मेदारी समाज के ही चार वर्गों पर हैं धर्म अर्थात् विद्या और तप को ब्राह्मण प्रवाहित रखता है। यह समाज की जीवनी शक्ति है।”

आचार्य के शब्दों में स्वयं के जीवन का अनुभव प्रवाहित हो रहा था। उपस्थित जन मूक किन्तु एकाग्र थे। वह बता रहे थे अर्थ अर्थात् सम्पदा-इसे व्यापारी वर्ग प्रवाहित करता है। काम का तात्पर्य है उल्लास इसे जन जीवन में प्रवाहित करने का दायित्व शासन और राज कर्मचारियों पर है। ये तीनों धाराएँ रुकें नहीं ठीक-ठीक संचालित रहें इसी के लिए चौथी शक्ति धारा मोक्ष है जिसका अर्थ है त्याग। त्याग अहंता से तृष्णा से वासना से। यह त्यागवृत्ति प्रवाहित करने का महान दायित्व परिव्राजक पर है।”

“गुरुदेव!” कई कातर स्वर एक साथ फूटे।

“कातर मत बनो!” आचार्य कहते गए “मैंने अब तक गृहस्थ ब्राह्मणों के लिए शास्त्र का संकलन किया है किन्तु परमदान है ज्ञान का दान-त्याग की वृत्ति को जीवित रखने वाले मोक्ष की प्रतिष्ठ।”

“श्री चरणों ने अब तक ज्ञानदान ही किया है।”

नरेश ने चरण पकड़े-वह ज्ञान यज्ञ अखण्ड चलता रहे इस प्रकार की प्रत्येक सेवा......।”

विजयनगर सम्राट के इन शब्दों पर आचार्य उसी प्रकार हँस पड़े जैसे शिशु की बचकानी बात पर प्रौढ़ पिता हँसता है। वह हँसते हुए कहने लगे “त्याग वृत्ति के प्रतिपादन को सेवा सम्पत्ति या सहायता की आवश्यकता नहीं और इसका समाज में जीवित रहना ही नहीं सर्वोच्च होना भी आवश्यक है। अन्यथा शेष तीनों धाराएँ सूख जाएँगी-समाज निर्जीव निष्प्राण होने लगेगा। अपनी संस्कृति का प्रधान सूत्र है त्यागे नैकेव अमृतत्व मानशुः इसे जीना अब मेरा कर्तव्य बन चुका है।”

‘आशीर्वाद!’ बड़ी कातर याचना थी किसी में साहस नहीं था अधिक अनुरोध करने का।

“कर्तव्य पालन स्वयं आशीर्वाद है।” आचार्य ने निरपेक्ष भाव से कहा। प्रव्रज्या का निश्चय करके अब जैसे वे संसार से सर्वथा ऊपर उठ चुके थे।

“सफलता होगी या असफलता यह मत सोचो। शुभ के लिए प्रयत्न सफल हो या असफल, वह कर्ता को तो पवित्र करता ही है।”

इतिहास जानता है कि आचार्य माधव प्रव्रज्या लेकर स्वामी विद्यारण्य हुए और उन्होंने संसार को उससे भी अधिक महत्वपूर्ण ग्रन्थावली दी, जितनी पूर्वाश्रम में दे आए थे। विजय नगर को उनकी त्याग की प्रेरणा और कर्तव्य पालन करते रहने का आशीर्वाद सदा मिलता रहा।


“माया महाठगिनी, हम जानी”

प्रकृति और पुरुष का तात्त्विक निरीक्षण करने वाले ब्रह्मवेत्ताओं ने यह निष्कर्ष निकाला है कि यहाँ “सत्” अर्थात् स्थिर केवल आत्मा है और जो कुछ प्रकृति परिचय दृष्टिगोचर होता है वह सभी गतिशील, अस्थिर एवं भ्रामक है। इसीलिए जो इन्द्रियगम्य है, बोधगम्य है वह कौतुक कौतूहल के अतिरिक्त एक प्रकार से आकर्षणों से भरपूर भी है तथा इसमें हँसाने-रुलाने के अतिरिक्त और कोई सार नहीं है। निस्सार वस्तु के पीछे लग लेना और उसके विभिन्न जीवन जैसा सुयोग्य संयोग गँवा देना बुद्धिमत्तापूर्ण नहीं है। उसे अधिक महत्वपूर्ण कार्यों में नियोजित किया जाना चाहिए। भ्रम-भुलावे में पड़ने से अपने आपको यथासंभव बचाना चाहिए, यही संक्षेप में भारतीय तत्त्वज्ञान का सार है।

सद्ज्ञान की बहुत महिमा महत्ता बतायी गयी है। कहा गया है कि ज्ञान से बढ़कर श्रेष्ठ इस संसार में और कुछ पवित्र नहीं है। ज्ञान को प्राप्त कर लेने पर बन्धन मुक्ति निश्चित है। यहाँ ज्ञान का अर्थ स्कूली शिक्षा से नहीं लिया गया है, जो संबद्ध एवं दृश्यमान वस्तुओं के संबंध में विभिन्न प्रकार की जानकारी कराती है वह शिक्षा भी अपनी जगह उपयुक्त है। सभी धन सम्पदा की तरह ही शिक्षा अर्जित करने का प्रयत्न करते हैं और करना चाहिए ताकि जिस संसार में हमें रहना पड़ता है, उसके संबन्ध में व्यावहारिक कुशलता अर्जित कर सकें यह शिक्षा है। अध्यात्म क्षेत्र के तत्त्वज्ञान और व्यावहारिक अनुभव को विद्या कहते हैं। विद्या का महत्व ही है जिसकी उपलब्धि के संबंध में शास्त्रकार प्रशंसा करते-करते नहीं थकते और जिसे प्रकारान्तर से अमृत कहते हैं “विद्याया ऽमृतमश्नुते।”

“माया” को भारतीय तत्त्व चिन्तन निन्दापरक शब्दों में प्रयुक्त किया गया है। वह इसलिए कि जो वस्तु जैसी है उसे वैसी न दिखाकर वह कुछ को कुछ दर्शाती है और भ्रमित प्राणी उसके आकर्षण में उसी ओर खिंचता चला जाता है। इस मनोविनोद में समय और शक्तियों का अपव्यय तो बहुत होता है, इसमें रुचि भी रहती है पर जब निष्कर्ष और प्रतिफल पर दृष्टि डाली जाती है तो शून्य हाथ लगता दीख पड़ता है।

लगता है ईश्वर ने जहाँ अपनी अंशधारी जीव सत्ता को आत्मसत्ता के साथ जुड़ी हुई क्षमताएँ और विभूतियाँ मुक्तहस्त से प्रदान की है, वहाँ उसे बच्चा समझकर खिलौने भी इतने अधिक प्रकार के लाकर सामने पटक दिये हैं कि उन्हें छोड़ने का जी नहीं चाहता। बच्चों की रुचि कई दिनों तक खेलने पर पुराने खिलौनों से हट जाती और उन्हें एक कोने में पटक देते हैं, किन्तु मनुष्य है जो उनमें कुछ सातर न होने की बात देखते हुए भी समझ नहीं पाता।

प्रकृति का स्वरूप और उपयोग यों मोटी बुद्धि तथा इन्द्रियों से समझ में आता है किन्तु गंभीर विचार करने पर उसकी वास्तविकता उजागर हो जाती है और प्रतीत होता है कि व्यर्थ की भटक न में इतना बहुमूल्य समय ऐसे ही गँवा दिया गया। यदि इसी समय और श्रम का उपयोग सारगर्भित कार्यों में किया गया होता तो कितना बड़ा लाभ मिल सकता था और कितना बड़ा उद्देश्य पूरा हो सकता था।

ज्ञान अर्जित करने के मोटे साधन हमारे पास हैं। मस्तिष्क ही ज्ञानेन्द्रियों के माध्यम से जानकारियाँ एकत्रित करता है, पर कभी यह नहीं सोचा जाता कि

यह माध्यम उपयुक्त भी है या नहीं।

कुछ उदाहरणों के द्वारा यह समझा जाय। वर्षा ऋतु में आकाश में इन्द्रधनुष दिखाई देते हैं, वह सच मालूम पड़ते हैं पर किसी वायुयान पर चढ़कर वहाँ पहुँचा जाय तो प्रतीत होगा कि वैसी कोई वस्तु कहीं नहीं है। छोटे-छोटे वर्षा बिन्दुओं पर जो सूर्य के प्रकाशकण चमकते हैं, वही भ्रमवश आँखों को इन्द्रधनुष की आभा के रूप में दिखायी पड़ते हैं। जो देखा जा रहा है उसे झुठलाने की भी इच्छा नहीं होती और जब तथ्यों का अन्वेषण करते हैं तो प्रतीत होता है कि आँखों के माध्यम से मस्तिष्क ही देख रहा है।

जमीन पर खड़े होकर जब पृथ्वी और अन्तरिक्ष का मिलन स्थल देखते हैं तो वह प्रायः तीन मील का होता है पर जब वायुयान पर चढ़कर ऊँचे से देखते हैं तो क्षितिज का वह क्षेत्र चौड़ा हो जाता है और सौ मील की दूरी तक वह मिलन स्थल चला जाता है। सिनेमा में चलती फिरती तस्वीरें दीखती हैं पर वस्तुतः बात वैसी नहीं होती। होता इतना भर है कि आँखों की दृश्यावलोकन शक्ति एक सेकेण्ड में सोलह चित्र देख सकने तक ही सीमित है किन्तु फिल्म घुमाने की मशीन अपेक्षाकृत अधिक तेजी से चलती है। इसलिए चित्रों में काम करने वाले पात्र चलते बोलते दीखते हैं। लाखों व्यक्ति नित्य सिनेमा देखते हैं पर अपनी आँखों पर अविश्वास नहीं करते और चित्रों को ही चलता फिरता अपनी सहज बुद्धि से मान लेते हैं।

यह संसार क्या है? वैज्ञानिकों की दृष्टि में यह परमाणुओं की बिखरती सिकुड़ती धूलि भर है। पर इस आधार पर जो दृश्य आँखों को दीखते हैं उन्हीं को सच्चा माना जाता है। विभिन्न वस्तुएँ संसार में बनी और बिखरी दीखती हैं। यह सब अणुओं का संगठन और विघटन मात्र है। आँखों में उन्हें सही रूप में देख सकने की क्षमता नहीं है, इसलिए संसार को इसी रूप में दीखती हैं जैसा कि वह दिखाई पड़ता है। घास और पेड़-पौधों को हम हरा देखते हैं। पर वे वस्तुतः वैसे होते नहीं। पत्तियाँ सूर्य किरणों के अन्य रंगों को अपने में जब्त कर लेती हैं मात्र हरे रंग को हजम नहीं कर पातीं इसलिए वह बाहर रह जाता है। यह किरणों का चमत्कार नहीं है, पर हम पत्तियों की विशेषता ही हरेपन में भरी हुई अनुभव करते हैं।

स्वाद के संबंध में भी इन्द्रियाँ अधूरी जानकारी देती हैं। खाद्य पदार्थ और मुँह से निकलने वाले स्राव दोनों के मिलने में मस्तिष्क तक जो जानकारी पहुँचती है वही स्वाद है। नीम की पत्तियाँ कड़वी लगती है। पर ऊँट को नहीं। वह उन्हें बहुत रुचि पूर्वक खाता है। एक ही चीज की अनुभूति दोनों प्राणियों को दो तरह की होती हैं इसका कारण वस्तुतः स्वाद नहीं हमारे मुँह की संरचना भर है। यही बात गंध के सम्बन्ध में है। जिसे हम दुर्गन्ध कहते हैं, उसे उत्पन्न करने वाले सड़े पदार्थ कितने ही कृमि कीटकों के लिए जीवन निर्वाह के माध्यम होते हैं। फिर कैसे कहा जाय कि सुगन्ध या दुर्गन्ध की अनुभूति वास्तविक है। काम वासना शरीरगत हारमोन रासायनिक पदार्थों की न्यूनाधिकता पर निर्भर है। उनमें कमी बेसी होने पर स्थिति सर्वथा बदल जाती है। कोई अतृप्त कामुकता का शिकार होता है और किसी की मनःस्थिति नपुंसक जैसी होती है। किसी को वह प्रसंग बड़ा रुचिकर लगता है किसी को उन बातों की चर्चा से घृणा और अप्रसन्नता होती है। इसी प्रकार विभिन्न प्राणियों की गतिविधियाँ, रुचियाँ एवं आदतें भिन्न-भिन्न होती हैं। चह शरीर संरचना तथा मानसिक ढाँचे की भिन्नता पर निर्भर है, इस कारण जो मतभेद बनते पनपते हैं उनमें से किन्हें सच और किन्हें झूठ कहा जाय, यह बड़ा टेढ़ा प्रश्न हैं। इन्द्रियों के अपने-अपने स्वाद हैं। मन में वासना, तृष्णा, अहंता की ललक लिप्साएँ उठती रहती है। पर उन्हें प्राप्त कर लेने पर भी तृप्ति नहीं होती ।

उससे भी अच्छी, उससे भी अधिक वस्तु प्राप्त करने की नई ललक उठ खड़ी होती है और जो पाया था वह अपर्याप्त प्रतीत होने लगता है। कई बार तो नशेबाजी जैसी हर दृष्टि से अहितकर वस्तुओं को अपनी आदत में सम्मिलित कर लिया जाता है और उनके साथ इस प्रकार गुँथा जाता है कि छोड़ते नहीं बनता। इसी प्रकार अन्य अनेकों दुष्प्रवृत्तियाँ हैं जो तात्कालिक लाभ का प्रलोभन दिखाकर कुछ ही समय में अपने दुष्परिणामों से त्रास देने लगती हैं।

मनुष्य वस्तुओं को हस्तगत करता है और उन्हें अपनी निजी सम्पत्ति मानकर मनमाना उपयोग करने लगता है। जबकि वास्तविकता यह है कि हर वस्तु एक स्थान पर, एक स्वरूप में रहने की अपेक्षा निरन्तर आगे बढ़ती और स्वरूप बदलती रहती है। अभी जो रंग रूप सुहावना लगता है वह कुछ ही समय में जराजीर्ण हो जाता है और कुरूप ही नहीं लगता, मरण की स्थिति में भी जा पहुँचता है। धन उपलब्ध होने के साथ-साथ खर्च के माध्यम से अन्यत्र चले जाने की तैयारी करने लगता है। यह कुछ उदाहरण हैं, जिन्हें देखकर हम वस्तुस्थिति जानने के लिए इंद्रियों पर और मस्तिष्क पर निर्भर नहीं रह सकते यहाँ जादूगरी जैसा तमाशा हर घड़ी होता रहता है और हम सभी अपना काम हर्ज करके भी मनोविनोद करते और समय गँवाते रहते हैं। इसी स्थिति को “माया” कहा गया है, जिसमें कुछ का कुछ सूझ पड़ता है। कस्तूरी हिरन अपनी नाभि से उठने वाली सुगन्धि को कहीं अन्यत्र से आती हुई समझता है और उसे पाने के लिए भारी दौड़ धूप के उपरान्त थक कर निराश हो बैठता है। रात की चाँदनी में सफेद बालू को जलाशय समझकर प्यासे हिरन उस ओर दौड़ते हैं और अन्ततः अपने प्रयास की निरर्थकता अनुभव करते हैं। संक्षेप में यही “माया” है जिसे पस्त होकर मनुष्य क्षण-क्षण में दुख, सुख, अनुभव करता और हँसते, रोते जिन्दगी का बोझ ढोता है। प्राणि समुदाय अपनी इच्छाओं और क्रियाओं से बाधित होकर बार-बार जन्म लेता है। किन्हीं को स्वजन सम्बन्धी और किन्हीं को अपने पराये मिलते हैं। वे जब विलग होते हैं तो बिछोहजन्य पीड़ा से सिर धुनते देखा जाता है। जब कि मरना उनका स्वयं का भी निश्चित है।

तत्त्वज्ञान का निष्कर्ष ये है कि माया के प्रपंचों का क्रीड़ा-कौतुक तो देखो, पर उसमें इतने लिप्त न हो कि अपना लक्ष्य ही भुला दिया जाय और उसके बदले अज्ञान और अनाचार का बोझ सिर पर लाद लिया जाय।

मनुष्य ईश्वर का राजकुमार है और पिता की सम्पदा का अधिकारी। मनुष्य जन्म का एक अवसर ही ऐसा है, जिसमें अपनी विभूतियों का संवर्धन करके ईश्वर का मिलन, उसके समतुल्य स्वयं ही बनाने का सुयोग व्यर्थ किया जा सकता है। इसलिए दूरदर्शिता इसी में है कि बाल विनोद में समय न गँवाकर उन कर्तव्यों के परिपालन में लगा जाये जो आत्म विकास के लिए जीवन सुयोग को सार्थक बनाने के लिए आवश्यक हैं।

चाकू की धार भोंथर हो जाती है तो उसे पत्थर पर रगड़कर तेज करना पड़ता है। कर्तव्य पालन इसी प्रयोजन की पूर्ति करता है जीवन को सार्थक बनाने और भटकावों अनाचारों से बचने का एक ही तरीका है कि अपना निजी स्वरूप, जीवन का उद्देश्य एवं समय के साधनों का सदुपयोग समझा जाय, उन्हीं में निरत रहा जाय। कारण कि जो वस्तुएँ हमें प्रयोग करने के लिए दी गयी हैं, उन्हें अच्छी स्थिति में बढ़ाकर देने में ही प्रतिभा की परीक्षा है। जो किसान बीज को कई गुनी फसल में बदल देता है वह बुद्धिमान समझा जाता है। हमें जिस संसार में काम करने के लिए, जीवनयापन का उत्तरदायित्व संभालने के लिए भेजा गया है उसे अधिक सुन्दर समुन्नत एवं श्रेष्ठ बनाकर विदाई लेना ही बुद्धिमत्ता है। इसी को कर्मयोग या कर्तव्य पालन कहते हैं। यह एक ऐसी विद्या है, जिसे अपनाने पर हर समय संतोष और उत्साह रहता है। सफलता असफलता की बात परिस्थितियों पर छोड़ दें पर कर्मयोगी आजीवन स्वस्थ और प्रसन्न रहते हैं। श्रेय-सम्मान एवं सहयोग बदले में प्राप्त करते हैं।

कर्मयोग के अतिरिक्त तत्त्वज्ञान की दूसरी धारा है-आत्म विकास। यह अपना स्वरूप समझने पर ही बन पड़ता है। अपने को ईश्वर का परम पवित्र अंश प्रतिनिधि मानकर चलने पर हर समय इसी बात का ध्यान बना रहता है कि अपनी गरिमा को गिराने वाला कोई कदम तो नहीं उठ रहा है। हेय या हीन कर्म करने में आत्मा जैसी महान सत्ता का गौरव गिरता है। अपना अन्तःकरण जिन कामों के लिए धिक्कारे, वे सभी नर पशु या नर पिशाच स्तर के हैं। उन्हें किसी भी प्रलोभन या दबाव से अपनाने के लिए सहमत नहीं होना चाहिए।

सदाशयता से सम्पन्न अनुकरणीय और अभिनन्दनीय जीवन जिया जाय तो समझना चाहिए कि सूक्ष्म शरीर ने तत्त्वज्ञान हृदयंगम और कार्यान्वित किया। तीसरा स्थूल शरीर है। इसके द्वारा व्यवहार किया जाता है। हम दूसरों के साथ वह व्यवहार करें जो दूसरों से अपने लिए अपेक्षा करते हैं। इसी को बोल-चाल की भाषा में सज्जनता और सेवा परायणता, ईमानदारी, जिम्मेदारी, समझदारी कहते हैं। तत्त्वज्ञान का सौभाग्य ही है जो मनुष्य को माया से उबारता है। मनुष्य जन्म भगवान ने दिया। अब मनुष्य की बारी है कि अपने तीनों शरीरों का श्रेष्ठतम उपयोग करे। यह तभी संभव हो सकता है जब मायावी प्रपंचों से अपने को बचाए रखने के लिए निरन्तर सतर्क रहा जाय।


मोह के बन्धनों को समझा (Kahani)

एक सेठ की बड़ी दुकान थी। पड़ोसी का बकरा हर दिन उस पर चढ़ने का प्रयत्न करता, पर युवक मालिक उसे मार कर भगाता रहता।

एक सिद्ध पुरुष उधर से गुजरे। दिव्य दृष्टि से इस घटना को देखा। उनने दुकान मालिक को बुलाकर कहा। यह बकरा तुम्हारा मृत पिता है। मोहवश अपना कारोबार देखने और रखवाली करने की दृष्टि से बार-बार आता है। उसका मन दुकान को हानि पहुँचाने का नहीं है। सुनने वालों ने मोह के बन्धनों को समझा।


चतुर नहीं, बुद्धिमान बनें

जीवन क्या है? समय की कड़ियों से बनी हुई एक सुनहरी शृंखला। इसका प्रत्येक घटक बहुमूल्य है। इसका उपयोग किस प्रकार किया जाय और उसका कैसा प्रतिफल उपलब्ध किया जाय-यह पूरी तरह अपने हाथ की बात है।

जिसने उसे कूड़ा करकट समझा उसने उसे घूरे पर ले जा पटका। जिसने भार माना वह उसे ज्यों-त्यों करके ढोता रहा। जिसने उसे बहुमूल्य माना वह उसका सदुपयोग करता रहा, जिसने इसे ईश्वर का वरदान माना और उसका देवत्व अनुभव किया, उसने प्राणप्रिय समझा और हृदय के भीतरी कोने में बिठाकर सम्मानित किया। गेटे कहते थे “मैंने समय को बरबाद किया और अब समय मुझे बरबाद कर रहा है।”

मूल्य न समझ पाने पर कीमती चीजों की भी दुर्गति बन पड़ती है। जो-पहचानते नहीं वे हीरे को भी काँच का टुकड़ा समझकर फेंक देते हैं। अनजानों के लिए मकरध्वज जैसे रसायन भी भूरे रेत की तरह है। अयोग्य हाथ में पहुँचकर चन्दन को भी कोयला बना लिया जाता है। हममें से कितने हैं जो समय का मूल्य समझते और उसका उपयुक्त सम्मान सदुपयोग करते हैं?

औसत आदमी जिन्दगी को एक सपने की तरह देखता है और उसमें कड़ुए मीठे स्वादों का अनुभव करता है। अनगढ़ कहानी की तरह सुनता समझता और अन्त कर देता है। पर क्या वस्तुतः वह ऐसा ही है जिसे ज्यों-त्यों करते, फैलाने और बटोरने का खिलवाड़ करते रहा जाय?

कठिनाई यह है कि उसके एक अंग को ही हम देख पाते हैं-वर्तमान को। न भूत दिखाई पड़ता न भविष्य। चौरासी लाख योनियों में भ्रमण करने के बाद यह मिलता है। उस लम्बी अवधि में कितनी कष्टसाध्य परिस्थितियों से होकर गुजरना पड़ा होगा। इसकी भी स्मृति नहीं रहती और भविष्य की कल्पना भी नहीं उठती जिसमें आज की विडम्बनायें कल विभीषिकाएँ बन कर सामने आयेंगी और पश्चाताप भरे त्रास देने वाली हैं। उत्तरदायित्व वहन करने के अवसर जब तब ही आते हैं। वे उतावली में होते हैं, परीक्षक की तरह अपना काम जल्दी ही पूरा करके चलते बनते हैं। उसके आगमन पर सतर्कता और एकाग्रता बरतने की बात ध्यान में न रहे तो फिर चूक के लिए पश्चाताप के अतिरिक्त और कुछ हाथ नहीं रहता।

जीवन की अवधि लम्बी नहीं है, वह खिलवाड़ में भी बिताई जा सकती है। कोल्हू के बैल की तरह एक ढर्रे में चलते हुए भी बिताया जा सकता है। प्रतिकूल परिस्थितियों में रहना पड़े तो उसे रोते कराहते भी किसी प्रकार क्रियान्वित किया जा सकता है। किन्तु यदि इसे अनमोल रतन की तरह संजोकर रखा जा सके तो बदले में वह पाया जा सकता है जिस उपलब्धि के लिए अपने भाग्य को सराहते रहा जा सकता है।

दूरदर्शी विवेकशीलता की एक ही कसौटी है कि समय का वास्तविक मूल्य समझा क्या? और यदि समझा तो श्रेष्ठतम उपयोग किया या नहीं। सदुपयोग की कसौटी यह नहीं है कि पेट भरने और विनोद के साधन जुटाने में कितने क्षण बीते? इसमें मानवी बुद्धि की परीक्षा नहीं होती। इतना तो पशु-पक्षी और कृमि कीटक भी पूरा कर लेते हैं। पेट भरने की दौड़-धूप दीखने के अतिरिक्त बचे समय में मौज मस्ती करते हैं और जब तब अहंता जगती है तो अपनी बलिष्ठता सिद्ध करने के लिए लड़ने झगड़ने पर उतर आते हैं। ऐसी चाँदनी अंधेरी रातों की तरह बिताते गुजारते वह अवधि समाप्त हो जाती है जिसे किसी विशेष प्रयोजन के लिए सौभाग्य के रूप में नियति ने प्रदान किया था और जाँचा था कि बुद्धिमत्ता की डींग हाँकने वाला यह प्राणी वस्तुतः बुद्धिमान है भी या नहीं। इस जाँच पड़ताल के लिए उसने एक ही मापदण्ड रखा है कि जीवन की अवधि को किस निमित्त, किस प्रकार उपयोग किया जाय। जो इस तथ्य को नहीं समझते हैं और दिन को खाने में और रात को सोने में बिताते रहते हैं वो समय बीतने पर सोचते हैं कि जिसके बदले बहुत कुछ पाया जा सकता था उसे ‘कुछ नहीं’ के बदले बिता दिया गया।

निर्वाह भी एक समस्या है। अन्न, वस्त्र आच्छादन, विनोद सभी को चाहिए। यह सभी वस्तुएँ जुटाने में क्षुद्र प्राणियों को दौड़-धूप करनी पड़ सकती है। पर मनुष्य को जिस स्तर की शरीर संरचना और बुद्धिमत्ता मिली है, उसे देखते हुए वे साधन, स्वल्प श्रम और स्वल्प काल के परिश्रम में जुटाये जा सकते हैं। भूखा उठता है पर भूखा सोता नहीं। जन्म से पहले जिसने माता के स्तनों में दूध के कटोरे भर कर रख दिए थे और असमर्थ होते भी अभिभावकों का लाड़ प्यार भरा परिपोषण मिलता रहा, उसे अब बड़े होने पर निर्वाह के साधन जुटाने में हैरान होना पड़ेगा इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। अभावों द्वारा मनुष्य सताया नहीं जाता, उसकी तृष्णा, लिप्सा और अहंता ही ठाटबाट की वे मृग-तृष्णाएँ संजोती हैं और उसी के लिए मारी-मारी फिरती है। वैभव और विलास की आकांक्षाओं का कोई अन्त नहीं। श्रम के झंझट से बचकर ज्यों-त्यों दिन बिताने के लिए कुछ न कुछ काम खोज ही लिया जाता है। भले ही उसका प्रतिफल बालू से तेल निकालने की तरह कुछ भी हाथ न लगे।

यह नर−वानरों और नरपशुओं की बात हुई। वन-मानुष भी जिन कार्यों में समय बिता लेते हैं उन्हीं में यदि बुद्धिमान भी व्यतीत करे तो समय तो बीता ही रहता है पर वर्तमान में असंतोष और भविष्य में पश्चाताप के अतिरिक्त और कुछ हाथ नहीं लगता क्या मनुष्य जीवन इसी के लिए है? क्या इस बहुमूल्य सुयोग की परिणति यही है?

अपने को बुद्धिमान मानने वाला मनुष्य यदि सचमुच ही बुद्धियुक्त रहा होता तो उसने विचारा होता कि भूतकाल में चौरासी लाख योनियों का भ्रमण और भविष्य के प्रमाद के नारकीय प्रतिफलों का कुछ तो स्मरण रखा जाय और बार-बार उसी कुचक्र में परिभ्रमण करने की दुर्गतियों से बचा जाय? यह बचाव आज की दिशा धारा पर ही निर्भर है। भविष्य में कमी की बात सोचते रहने पर तो वह प्रतीक्षित और अपेक्षित दिन कभी आने वाला नहीं है।

स्रष्टा ने अद्भुत मानवी काया इसलिए प्रदान की है वह उसके रहते अपनी अपूर्णताएँ पूर्ण कर ले, मलिनताएँ धो ले, कुत्सा और कुण्ठाओं से त्राण पा ले। अपने को पहचानें और इस प्रकार दिन बिताये जिससे मानवी गरिमा अक्षुण्ण बनी रहें। इसी कलेवर में देवत्व के उदय की संभावना सार्थक होकर रह सकती है।

अन्य प्राणी अपने पुरुषार्थ से अपने बलबूते जीवन बिता लेते हैं पर मनुष्य जिस स्थिति तक आ पहुँचा है उसे असंख्यों का अविराम सहयोग चाहिए। अन्न, वस्त्र, बिस्तर, आच्छादन तक वह दूसरों के श्रम से उपार्जित को ही प्रयोग में लाता है। विद्या दूसरों के ही माध्यम से मिलती है। आजीविका उपार्जन किन्हीं समाज के घटकों के माध्यम से ही होता है। धर्मपत्नी किसी के अनुग्रह से ही मिलती है। जीवन की अनेकों सुविधायें, सरलताएँ, सफलताएँ दूसरों की कृपा पर निर्भर हैं। अतएव मनुष्य को समाज का जितना ऋणी बनना पड़ता है उतना अन्य किसी को नहीं। अस्तु इन ऋणों से उऋण होने के लिए उसे प्रयास करना ही चाहिए। ऋणों का बोझ सिर पर लादकर भगोड़े की तरह विदा नहीं होना चाहिए।

अच्छा होता इन सुविधा के दिनों में ऐसी कुछ कमाई कर ली होती जो अगले दिनों काम आती और प्रगति में सहायता करती। यह परमार्थ ही हो सकता है। अन्य प्राणी स्वेच्छा और उदारतापूर्वक परमार्थ नहीं कर पाते। उन्हें बाधित और विवश किया जाता है। वे शोषण के शिकार भर होते रहते हैं। पर स्वेच्छापूर्वक उदार सहयोग कर सकने जैसे अन्तःकरण के धनी नहीं होते। केवल मनुष्य ही इस स्थिति में है कि अपनी जीवनचर्या में उदार सहयोग समावेश कर सके। विश्ववाटिका को सुरम्य और सुविकसित बनाने वाले क्रियाकृत्यों में संलग्न होने की जिम्मेदारी भी उसे सौंपी गई है। यह मनुष्य जीवन का मूल्य है। स्वार्थ की दृष्टि से अपने व्यक्तित्व का निखार और प्रतिभा का उभार। उच्च प्रयोजनों के निमित्त इस प्रकार की परमार्थ परायणता ही उसके निज के गुण, कर्म, स्वभाव को परिष्कृत करने का निमित्त कारण बनती है। ऋण चुकाने की दृष्टि से विश्ववाटिका को सींचने के सौंपे हुए दायित्व को पूरा करने के लिए इस दिशा में कदम पूरा करने के लिए इस दिशा कदम बढ़ने ही चाहिए। बुद्धिमत्ता साथ दे तो हमें इसी प्रयास के लिए अग्रसर होना चाहिए।

आत्मशोधन की पवित्रता और परमार्थ के लिए जुटाये हुए साहस की प्रखरता ही वे दो अवलम्बन हैं जिन्हें अपनाने पर मनुष्य सच्चे अर्थों में मनुष्य बनता है और जीवन के वास्तविक प्रयोजन की पूर्ति में सफल होता है। इस दिशा में बरती गई उपेक्षा तत्काल तो चतुरता जैसी लगती है किन्तु समय निकल जाने पर प्रतीत होता है कि भटकाव कितना महंगा पड़ा। चयन की चूक कितना दुःखदायक सिद्ध हुई।

भौतिक जीवन में निर्वाह की समस्या किसी के सामने नहीं है। औसत भारतीय स्तर का निर्वाह जुटा लेना उतना कष्टसाध्य नहीं है कि उसी के निमित्त समूची जीवन अवधि खपा देनी पड़े। जो व्यस्तता और आकांक्षा से उबरने नहीं देती वह तृष्णा ही है, जो कुबेर का धन और इन्द्र का वैभव पाकर भी तृप्त नहीं हो सकती। जो असंभव है उसमें लगा रहता है और जो सरल संभव है उससे कतराता है, यही बुद्धिमान कहे जाने वाले मनुष्य की मूर्खता है। इसी को माया या अज्ञानान्धकार कहते हैं। यही अविद्या है।

कोई कितना ही पढ़ा लिखा हो सकता है। उपार्जन में कितनी ही चतुरता एवं बहुलता दिखा सकता है। बड़प्पन के अनन्त अलंकरणों से शोभित हो सकता है। दीर्घजीवी और साधन सम्पन्न हो सकता है पर इसमें उसकी चतुरता भर ही सिद्ध होती है, बुद्धिमत्ता नहीं। यदि उसने बुद्धिमत्ता का परिचय दिया होता हतो जीवन लक्ष्य के चयन और तद्नुरूप गतिविधियों के निर्धारण में चूक न की होती। तब वह दूसरे ही ढंग से सोचता। दूरदर्शिता के रहते मनुष्य यही सोच सकता है कि अपनी पवित्रता गरिमा और महानता की अभिवृद्धि करे। इसलिए अपने चिन्तन, चरित्र और व्यवहार का स्तर ऊँचा उठाये, सन्त, सज्जनों की तरह जीना सीखे। अपने को पार करने की कला सीखे। साथ ही यह भी करे कि अपने कंधों पर बिठाकर दूसरों को पार लगा सके।

परमार्थ ऊँचे दर्जे का स्वार्थ है उसमें मनुष्य कुछ खोता नहीं, पाता ही पाता है। बीज अपने को गलाता है पर इसका तात्पर्य यह नहीं कि वह नष्ट हो गया वह अंकुरित होता, बढ़ता, लहलहाता, फूलता और फलता है। जो खोया उससे अधिक पाता है। परमार्थ की बात यदि मन में सूझे तो समझना चाहिए कि ऊँचा उठने का, आगे बढ़ने का समय आ गया। मनुष्य स्वार्थी, संकीर्ण बने तो समझना चाहिए कि यह संचय और सड़न का श्रीगणेश है जिस स्वार्थ में अपना और दूसरों का हित सधे वह परमार्थ है। परमार्थ ही बुद्धिमत्ता है।


पक्ष विपक्ष (Kahani)

पिता की नजर नगर सेठ की दौलत पर थी। उसने कहा “बेटा लड़की का रंग काला है, तो क्या हुआ। दुनिया में दो ही तो रंग है,” “किन्तु पिताजी लड़की कुछ हकलाती-तुतलाती भी है।” पिता ने कहा “बेटा तुझे कौन-से शास्त्र पढ़ने है उससे।” बेटा फिर बोला “सुना है लड़की कम सुनती है।” पिता बोला “यह तो और अच्छा है। तू कुछ भी कहेगा भला-बुरा कभी झगड़ा होगा ही नहीं”। अब लड़का क्या करे? पिता जी शादी कराने पर तुला बैठे थे। आखिरी बार हिम्मत जुटाकर लड़का बोला “मगर पिता जी वह लड़की तो 20 साल बड़ी है उम्र में हमारी उसकी जोड़ी माँ बेटे जैसे लगेगी।” पिता ने कहा “बस इतनी छोटी-सी बात पर ऐसा सुयोग अवसर चूकता है। धन दौलत की बात तेरे दिमाग में क्यों नहीं आती?”

आदमी धन के लालच में न जाने कितने विपरीत तर्क खोज लेता है। तर्क नंगी तलवार है। पक्ष विपक्ष दोनों को काट सकती है।

मनोवैज्ञानिकों ने परीक्षा भवन में एक ही कक्षा के विद्यार्थियों को दो भागों में विभक्त करके अलग-अलग बैठाया। आधे विद्यार्थियों को प्रश्न पत्र देने से पूर्व समझाया कि प्रश्नपत्र इतना सरल है कि तुम्हारे से नीची क्लास के विद्यार्थी भी हल कर सकते हैं, किन्तु तुम लोगों से इसलिए हल कराया जा रहा है ताकि यह ज्ञात हो सके कि क्या तुम में भी कोई ऐसा विद्यार्थी है, जो इसे हल नहीं कर सकता। वही प्रश्न पत्र दूसरे हॉल में विद्यार्थियों को दिया गया और उन्हें कहा गया कि प्रश्न पत्र जरा कठिन है। यह देखने के लिए दिया गया है कि क्या तुममें से कोई इसे हल भी कर पाता है या नहीं। बस धारणा बन गई और दिमागों पर छा गई । जिन्हें कहा गया था प्रश्न पत्र सरल है उन 15 विद्यार्थियों में से 14 ने प्रश्न पत्र हल कर दिये और जिन्हें कठिन बताया गया था, उन 15 में से मात्र एक विद्यार्थी ही प्रश्न पत्र हल कर पाया।

किसी बात को बिना जाँचे-परखे ही उससे संबंधित कोई दृढ़ धारणा अथवा मान्यता बना लेना नासमझी है।


शालीनता का ध्वजारोहण

तभी मन्दिर से उठ रही शंख की गहरी प्रतिध्वनि वातावरण को एक नए रंग में रँगने लगी और फिर हर-हर महादेव का प्रचण्ड स्वर उठा। सभी ने सुना अपने नायक छत्रपति का सिंह गर्जन उस समस्त ऊर्जास्विता निनाद में अग्रणी था वह अपने शौर्य के कारण हंता को जैसे दो टूक तोड़ गया था। छत्रपति दरबार की ओर जा रहे थे। आज पिछले दिनों हुई जीत के उपलक्ष में विशेष आयोजन था। सम्मान्य सभासदों के अलावा सामान्य नागरिक भी आमंत्रित थे।

पथ के दोनों ओर खड़ी जनता दरबार की ओर बढ़ रहे अपने नायक को एकटक निहार रही थी। उन्नत ललाट, लम्बी नाक, खिंची हुई भौहें चढ़ी हुई दर्प भरी मूँछें हलकी दाढ़ी चौड़ा वक्ष और प्रशस्त भुजदण्ड और फिर पतली कमर-जिसके बाद फिसलती हुई आँखें मजबूत पिंडलियों से होती हुई चरणों पर अटक जाती। उन्हीं चरणों पर जिनने अभी हाल में आलमगीर के गौरव को ठोकर मारकर चकनाचूर किया था।

क्षण और पल घड़ी में बदले इसके पूर्व छत्रपति अपने सभासदों-सामन्तों के साथ दरबार में उपस्थित हो चुके थे। राजपुरोहित द्वारा उच्चारित वैदिक ऋचाओं की अनुगूँज के साथ दरबार की विशेष कार्यवाही प्रारम्भ हो गई थी। तनाबा जी, पेशवा मोरोपन्त जीते गए कल्याण के किले का विवरण प्रस्तुत कर रहे थे। पाँच सौ हाथी तकरीबन एक हजार घोड़े, तलवारों और अन्य हथियारों का जखीरा। हीरे-जवाहरात कीमती वस्त्र भण्डार इनके सबके अलावा ऐसी अनेकों तरह की चीजें जिनकी गणना करना संभव नहीं हो पा रहा था। “सेनानायक आवाजी सोनदेव की वीरता इस जीत का प्रमुख कारण रही है।” तानाबा का स्वर सभा में गूँजा। छत्रपति की प्रशंसाभरी दृष्टि आवाजी की ओर उठी। फिर उन्होंने तानाबा की ओर देखते हुए कहा “यह जीत किसी एक की जीत नहीं, हम सबकी जीत है। महाराष्ट्र की इस भूमि को स्वतन्त्र करने के लिए हम सबने अपने रक्त से इसे तृप्त किया है। स्वतन्त्रता के जिस अदृश्य बीज के लिए इस वीर भूमि के पुरुषों ने केसरिया बाना पहनकर अपने अंगों की खाद दी है, जिसके लिए हमारी कुलवधुओं, पुत्रियों और माताओं ने आग की लपटों भस्म होकर अपने गौरव से एक अजेय बाड़ बनाई है हमने उसी फैल रहे ऋषि संस्कृति के महावत को अपनी अंजलि भरकर रक्त से सींचा है। आओ आज इस विजय के अवसर पर हम सब प्रतिज्ञा करें कि इसी तरह इस महावत को अपने प्राणों से सींचते रहेंगे।” सबने प्रतिज्ञा की। सभा हर-हर महादेव” “समर्थ गुरु रामदास की जय” “माता भवानी की जय” की गूँजों से भर गई।

सभी के हृदयों से भावों का ज्वार उमड़ कर समूचे वातावरण को तरंगित करने लगा। इन तरंगों को अपने स्वरों से पिरोते हुए छत्रपति ने कहा “पेशवा! हाथी घोड़ों और हथियारों से अपनी सेना को मजबूत किया जाय ताकि आक्रान्ता फिर कभी निरीहजनों को लूटने सताने का साहस न कर सके। प्राप्त हुआ धन राजकोष का है। इससे लोकजीवन के लिए अनेकों कल्याणकारी कार्य सम्पन्न हो सकेंगे।” इतना कहकर छत्रपति ने मोरोपन्त की ओर देखा।

“छत्रपति! कल्याण के किलेदार ने अपने तहखाने में बहुत सा सामान रख छोड़ा है उसमें खाने का बड़ा सामान भी है। आज्ञा दीजिए आज उत्सव मनाया जाय।”

मोरोपन्त के इन शब्दों के साथ छत्रपति के नेत्रों में आश्चर्य उभरा “उत्सव?” वीर के लिए शाश्वत उत्सव है उसका कर्तव्य। यह सब सामान हमारी ही प्रजा से लूट कर ले जाया गया माल है। उसे इन्हीं ग्रामवासियों को लौटा दो और जो हमें वे खुशी से दे दें हमारे लिए वही बहुत है।”

छत्रपति के इन शब्दों के साथ सभा की दर्शक दीर्घा में बैठे ग्रामीणजनों के मध्य से हल्की आवाजें आयीं “छत्रपति शिव है स्वयं कष्टों का जहर पीकर हम सबके लिए खुशियों का जीवन उड़ेलता है।” इन वाक्यों के स्पन्दन दूर तक फैलते जा रहे थे-तभी एक स्वर गूँजा “एक प्रार्थना है महाराज।” “कहो वीर।”

“जीत का एक विशिष्ट रत्न अभी बाकी है जिसे मैंने विशेष रूप से आपके लिए रख छोड़ा है।”

“विशेष रत्न! मेरे लिए!!” उनके स्वर में असमंजस था जैसे वह समझ नहीं पा रहे हों। फिर एक पल रुक कर बोले “कौन सा रत्न है स्पष्ट करो सोनदेव।” उत्तर था-गौहरबानू

इस एक शब्द में पता नहीं क्या था छत्रपति चौंक पड़े। उन्हें ऐसा लगा जैसे हजारों बिच्छुओं ने उनके सारे शरीर में अपने डंक चुभो दिये हों। वेदना की छाप उनके चेहरे पर घनीभूत हो गई।

“गौहरबानू तो स्त्री है।” स्वर कहीं दूर से आता प्रतीत हुआ। “हाँ कल्याण के किलेदार मुल्ला अहमद की पुत्रवधू “तब तुमको मेरी आज्ञा कैसे भूल गई, अपनी महान संस्कृति के पवित्र सूत्रों को कैसे भूल गए? तुम अपराधी हो नायक।” इस आवाज में दृढ़ता थी, शासक का तेज मुखर हो उठा था।

सोनदेव के पैर काँपने लगे। जैसे-तैसे उसने अपने साहस को समेटते हुए कहा “देव! विधर्मियों के किसी धर्मस्थल का अपमान नहीं किया गया। किसी भी बालक वृद्ध को सताया नहीं गया। इसे छोड़कर किसी अन्य स्त्री को अपमानित अथवा बन्दी नहीं किया गया। अपमानित यह भी नहीं हुई बस कैद कर लिया गया था”

“कैद लेकिन क्यों?” छत्रपति की गर्जना से सभी काँप उठी एक पल रुककर सन्नाटे को भंग करते हुए कहा जाओ उसे ससम्मान दरबार में लाओ।

थोड़ी देर में बुर्के में ढंकी हुई नारी सभा के रत्नजटित दीपकावलियों के चन्द्रिका मनोहर प्रकाश में आ खड़ी हुई । उसे सामने खड़ा देख-छत्रपति अपने सिंहासन से उठे। उन्हें उठते देख सामन्तों एवं सभा में उपस्थितजनों के हृदय काँप उठे। पर वह इन सबसे बेखबर धीर पदों से चलकर उसके पास पहुँचे घुटने मोड़कर बैठते हुए उन्होंने हाथ जोड़कर कहा “माँ! अपने सरदार द्वारा किये गए अपराध के लिए मैं आपके सामने क्षमा प्रार्थी हूँ।”

“मुझे शर्मिंदा न करें श्रीमन्त।” इन शब्दों के साथ “माँ” शब्द के जादू ने उसे बुर्के का आवरण उठाने के लिए विवश किया। सभा में बैठे जन स्तब्ध-मुग्ध और मूक थे। कोमल कदली के समान पैरों पर सुनहरी जरी की गाँठ से बाँधे हुए लहँगे के ऊपर चमकती मेखला में से किसी सुन्दर मन्दिर के निकले हुए अद्भुत शिखर की भाँति उसकी कमर और बालक के समान अत्यन्त मनोहर मुख बुर्के के बाहर प्रकट हुआ। उसके मुख पर पार्थिव सुन्दरी की अपूर्व रेखाएँ नहीं थीं, देवाँगनाओं की भव्यता नहीं थी, मात्र छोटी बालिका की सुकुमारता न थी, वह तो किसी सुन्दर स्वप्न में क्षण भर देखा हुआ एक निर्दोष बाल वसन्त का मुख था।

नीरवता को भंग कर रहे, छत्रपति के स्वर सभा ने सुने-वह कह रह थे “देवि! हमारी देव संस्कृति की पुण्य शपथ है नारी माँ है उसके अक्षुण्ण सम्मान को विस्मृत करना इस महान संस्कृति की संतति के लिए आत्मघात है। मैं आपके सम्मुख बार-बार क्षमाप्रार्थी हूँ।” उनके प्रत्येक शब्दों से भावों का अमृत झर रहा था। “धन्य है यह अमर संस्कृति। धन्य है यह पुण्य भूमि!! और धन्य उसके आपन सदृश रक्षक!!!” हृदय में अविराम उमड़ रही भावनाओं से मुश्किल से गौहरबानू अपने शब्द पूरे कर पाई। अपनी भरपूर कोशिश के बावजूद वह भाव बिन्दु को आँखों से लुढ़कने से रोक न पाई।

“सोनदेव!” छत्रपति ने उठकर पास में सहमे खड़े नायक को पास बुलाते हुए कहा “ये माँ है हम सब की वन्दनीय-इनसे क्षमा माँगो।”

सोनदेव को जैसे प्राणदान मिला वह घुटनों के बल बैठकर माफी माँगने लगा। इतने में शिवाजी ने पेशवा को सम्बोधित करते हुए कहा “इन्हें अभी बीजापुर गए मुल्ला अहमद के पास भेजने का प्रबन्ध किया जाय। सम्मान और सुरक्षा का पूरा ध्यान रहे।”

“जो आज्ञा श्रीमन्त।” पेशवा का स्वरभाव गदगद था। आज्ञा देकर ही वे सन्तुष्ट न हुए बाहर खड़ी शानदार बग्घी तक उसे छोड़ने आए। बग्घी के साथ पाँच सौ मराठों की टुकड़ी सुरक्षा के लिए जा रही थी। थोड़ी देर तक वह घोड़े के पाँवों से उड़ती धूल को देखते रहे फिर सामन्तों, सभासदों, नागरिकों की ओर देखकर कहने लगे “देख रहे हो किले के कगूँरे पर फहरा रही ध्वजा को श्री-समर्थ ने इस थमाते हुए मुझसे कहा था शिवा! इस ध्वज को झुकने न देना।” सभी जनों की आँखें ऊपर उठ गई। किले के ऊपर वह भगवा ध्वज ऐसे फहरा रहा था जैसे ऊपर जाकर सहस्रदल कमल खिल गया हो। आकाश के अनन्त विस्तार में उसकी फरफराहट देखकर सभी को ऐसा लगा जैसे अगाध समुद्र पर शेषशायी नारायण के नाभिकमल पर बैठे ब्रह्मा देवसंस्कृति का सनातन उद्घोष कर रहे हों। सचमुच संस्कृति के इस पुरोधा ने अपने गुरु के आदेशों को अक्षरशः निभाया था।


पेड़ पौधों के विलक्षण ज्ञान तन्तु

जगदीश चन्द्र बोस ने जब यह कहा था कि पेड़-पौधे भी हँसते-रोते हैं, तब उनकी खूब खिल्ली उड़ायी गई थी। कहा जाने लगा था कि जड़ पदार्थों पर अनुसन्धान करते-करते उनकी बुद्धि भी जड़ हो गयी है, पर बाद में जब उनकी बात सच साबित हुई तो लोगों ने अपनी गलती स्वीकार की और उनसे क्षमा-याचना की। उसी शृंखला की अगली कड़ी के रूप में अब यह कहा जाने लगा है कि पादप मनुष्यों की तरह सोचते भी हैं और अपनी प्रतिक्रिया भी व्यक्त करते हैं।

किसी के बारे में जब यह कहा जाता है कि वह चिन्तन कर रहा है, तो इसका अर्थ ही होता है-मौन-मानसिक मनन। विचारणा सदा मानसिक होती है। वह क्रिया के द्वारा मूर्तिमान् बनती और वाणी से अभिव्यक्ति पाती है। वनस्पतियों में क्रिया और वाणी दोनों का अभाव होता है, अस्तु वे जो कुछ भी सोचती हैं, उसे अपनी मूक वाणी द्वारा ही कहती रहती हैं। परिष्कृत यंत्र इसे पकड़ने में सफल हो जाते हैं। पिछले कई वर्षों में इस प्रकार के अनेकानेक प्रयोग परीक्षण हुए हैं जो यही सिद्ध करते हैं कि वृक्ष वनस्पतियों में अन्य प्राणियों की तरह एक विकसित चिन्तन प्रणाली कार्य करती है।

इसे प्रमाणित करने वाले प्रारंभिक प्रयोग न्यूयार्क में किये गये। वहाँ की एक फर्म में बैक्सटर नामक एक सामान्य-सा मशीन-मैन कार्यरत था। उसे जब जगदीश चन्द्र बोस के विलक्षण प्रयोग की जानकारी प्राप्त हुई, तो बड़ा अचम्भा हुआ। उत्सुकतावश उसने मानवी संवेदनाओं को परखने वाली एक छोटी सी पॉलीग्राफ मशीन खरीद ली। मकान का एक छोटा कमरा खाली किया और प्रयोगशाला खोल ली। उसमें मशीन और कई प्रकार के पौधे रख कर वह नित्य नये-नये कौतुक करता। एक दिन वह इन्हीं कौतुकों में मग्न था और दाढ़ी भी बनाता जा रहा था। अचानक उसकी ठुड्डी कट गई और खून की धार बह चली। बैक्सटर दर्द के मारे कराह उठा। सामने पॉलीग्राफ मशीन पौधे से संलग्न थी। उसकी सुई खड़खड़ाने लगी। पौधा गहन विषाद से भर गया और संवेदना अपने मूक वाणी से प्रकट करने लगा। बैक्सटर को यह देखकर अचरज हुआ सुनिश्चित निष्कर्ष पर पहुँचने के लिए उसने इस प्रकार के प्रयोग कई-कई बार दोहराएँ । हर बार पौधे के चिन्तन में वेदना झलकती रही।

एक बार बैक्सटर को मजाक सूझा। उसने गमले के पौधे को उलटा लटका कर उसे मशीन से संबद्ध कर दिया और यह जानना चाहा है कि इस स्थिति में वह क्या सोचता है, पर यह देख कर बैक्सटर को आश्चर्य हुआ कि मशीन की सुई स्थिर थी जो यह बताती थी कि पादप सर्वथा विचार-शून्य है। कदाचित् पौधे ने बैक्सटर के मनोभाव को पढ़ लिया हो कि यह मात्र उसकी विनोदवृत्ति है और हानि पहुँचाने जैसी कोई नीयत नहीं है। अब बैक्सटर ने एक चाकू उठाया और पौधे की शाखा में हलके दबा दिया। सुई में तीव्र हलचल हुई, जो इस बात का प्रतीक थी कि पौधे का चिन्तन तंत्र सक्रिय हो उठा है। उसने तीव्र पीड़ा का प्रदर्शन किया।

जब सामने कोई दुर्दान्त दस्यु अथवा हिंस्र पशु आ जाये तो मनुष्य भय से काँप उठता है और यह सोचने लगता है कि अब जान गई। कमजोर मन वाले तो कई बार अपना होश-हवास तक खो बैठते हैं और संज्ञाशून्य जैसी स्थिति में आ जाते हैं। तब न उनकी विचारणा काम कर पाती है न चेतना। वनस्पतियों की भी इन परिस्थितियों में ऐसी ही दशा होती है।

एक अवसर पर बैक्सटर की प्रयोगशाला में क्रिस्टिया नामक एक महिला वैज्ञानिक उनके वनस्पतियों के प्रयोग देखने आयी। क्रिस्टिया भी वनस्पतिशास्त्री थी। वह यह जानना चाहती थी कि पौधे सोचते किस भाँति हैं। अस्तु उसके आगमन पर बैक्सटर ने प्रसन्नता व्यक्त की और उसे अपनी अनुसंधानशाला में ले गया। वहाँ विभिन्न जातियों के दस पौधे थे। क्रिस्टिया को देखते ही दस में से आठ पौधे तत्काल बेहोश हो गये, किन्तु दो साहसी पादपों ने यह संकेत किया कि नवागन्तुक से उन्हें बेहद डर लग रहा है। आश्चर्य में पड़ कर बैक्सटर ने क्रिस्टिया से यह पूछा कि आप कोई ऐसा कार्य तो नहीं करतीं, जिससे वनस्पतियों को नुकसान पहुँचता हो? उत्तर में उसने सहमति प्रकट की और बताया कि वह प्रयोगों के दौरान उन्हें हानि पहुँचाती है। इसकी व्याख्या करते हुए बैक्सटर ने क्रिस्टिया को बताया कि आपकी इस हिंसक वृत्ति को भाँप कर ही आठ पौधे होश-हवास खो बैठे। उनकी चिन्तन-चेतना जाती रही और वे निष्क्रिय पड़ गये। मशीन ने इसकी पुष्टि कर दी। मजेदार बात यह रही कि महिला वैज्ञानिक के जाते ही सब की चेतना पुनः लौट आयी। वे चिंतन करने की स्थिति में दुबारा आ गये। उन्होंने क्रिस्टिया के प्रस्थान पर खुशी जाहिर की।

इसी प्रकार के कई रोचक प्रयोग रूस के मूर्धन्य मनोवैज्ञानिक बी. एन. पुश्किन ने भी किये। वे यह जानना चाहते थे कि झूठ बोल कर पादपों के स्थिर चिन्तन को प्रभावित किया जा सकता है क्या? इसके लिए उन्होंने एक विशेष प्रयोग किया। एक लड़के को बुलाकर उससे 1 से 15 तक की संख्या में से कोई एक चुन कर मन में रख लेने को कहा, साथ ही यह निर्देश भी दिया है कि सही संख्या पूछने पर भी नकारात्मक उत्तर ही दिया जाय।

प्रयोग आरंभ हुआ। एक पौधे को पॉलीग्राफ मशीन से सम्बद्ध कर दिया गया। अब लड़के से क्रमशः 1 से 15 तक की संख्या के बारे में बारी-बारी से पूछा जाने लगा। हर बार वह निर्दिष्ट जवाब ‘नहीं’ में देता। 9 की संख्या तक तो सब कुछ सामान्य रहा। जब 10 की संख्या के बारे में पूछा गया, तो उसका वही पुराना उत्तर ‘न’ में मिला, पर इस बार पौधे की सोच में बल पड़ा। जोर देकर ग्राफ में उसने सूचित किया कि सही संख्या यही है। बालक निश्चित रूप से झूठ बोल रहा है। बाद में लड़के ने स्वीकार किया कि वह मिथ्या बोल रहा था। सही अंक वस्तुतः 10 ही था।

इन प्रयोगों से स्पष्ट है कि वृक्ष वनस्पतियों में कोई चिन्तन तंत्र अवश्य है। वह कैसे कार्य करता है? अभी अविज्ञात है। मनुष्य के पास भी यह प्रणाली है। वह सोचता है और उसे क्रियान्वित भी करता रहता है, पर विडम्बना यह है कि अधिकांश समय वह गिरने गिराने,

मरने मारने का ही जाल-जंजाल बुनता रहता है। दूसरों की ज्यादा से ज्यादा हानि और अपना अधिकाधिक लाभ कैसे हो? इसी कुचक्र में उलझा रहता है। यह मानवी गरिमा के अनुकूल किसी भी प्रकार नहीं। यहाँ एक बात स्पष्ट होनी चाहिए कि अपने इस तंत्र का उद्देश्य न तो स्वार्थान्धता है, न चिन्तन की भ्रष्टता, वरन् सबका समान उत्कर्ष इसका एकमात्र लक्ष्य है। इस में संलग्न रह कर ही वह मनुष्य जैसे विकसित प्राणी के सुविकसित तंत्र का गौरव प्राप्त कर सकता है। मनुष्य की महानता भी इसी में है कि वह ऐसी ही सोच विकसित करे, अन्यथा शरीर भर मानव को मिल जाने से ही वह मनुष्य कहलाने का अधिकारी नहीं हो सकता।


काम कर गुजरने का दुहरा (Kahani)

लन्दन के प्रसिद्ध कवि बेन जान्सन जीवन भर मितव्ययी रहे। सम्पन्न होने के बाद भी गरीब बने रहे। आवश्यकता भर लेने एवं सामर्थ्य भर कार्य करने के हिमायती थे। मरने के कुछ दिन पहले उन्होंने एक कागज में लिख दिया था कि मेरे मरने पर मुझे सामान्य ढंग से न दफनाया जाय। इसमें जमीन अधिक घिरने से उसकी अधिक कीमत देनी पड़ेगी। अतः मेरे ताबूत को खड़ा हुआ दफनाया जाय, ताकि दफनाने में भूमि ज्यादा न घिरे व खर्च कम आएगा उनके लिये ऐसा ही किया गया।

महामानव मरणोपरान्त भी लोकहित का ध्यान रखते हैं।

बंगाल में उन दिनों के प्रचलन के हिसाब से स्त्रियों के विधवा होते ही सिर के बाल मुँड़ाने पड़ते, चूड़ी, सिंदूर, आभूषण जैसे सुहाग-चिन्ह सदा के लिए त्याग देने पड़ते थे।

श्रीरामकृष्ण परमहंस का मृत्यु-समय निकट आया। परिवार शारदामणि के परिधान बदलने की तैयारी करने लगा। परमहंस जी की चेतना यकायक जगी। कड़क कर बोले मैं कोई मर थोड़े ही रहा हूँ। काम बहुत बाकी है, सो उसे कौन करेगा?

उनने फिर कहा-शरीर बदलना मृत्यु नहीं है। तुम अपने को सदा सुहागिन मानना और जैसे वस्त्राभूषण पहनती थीं, वह पहनना। अन्तर मात्र इतना करना कि मेरे और अपने दोनों के काम कर गुजरने का दुहरा उत्तरदायित्व निबाहना। इतना कहकर उनने आँखें बन्द कर लीं।”

शारदामणि इसके बाद भी तीस वर्ष तक जीवित रहीं। उनने अपने पति के आदेश का अक्षरशः पालन किया।


उज्ज्वल भविष्य की झाँकी, मस्तिष्क के झरोखों से

“लोगों के आचार-व्यवहार में क्रान्तिकारी परिवर्तन आ रहा है। असुरता क्रमशः घटती जा रही है। शालीनता का साम्राज्य बढ़ रहा है। लोग अध्यात्म के पृष्ठ पोषक बनते दिखाई पड़ रहे हैं। देवत्व के प्रति उनकी अभिरुचि जगती और बढ़ती जा रही है। विज्ञान का विलय-विसर्जन अध्यात्म में हो रहा है। इससे एक समग्र और सर्वांगपूर्ण विज्ञान का उद्भव होता है। अन्ततः दुनिया इसी में प्रतिष्ठित होती है, जो लम्बे काल तक नव विकसित विज्ञान की बहुआयामी क्षमता और योग्यता के आधार पर विश्व को प्रकाश प्रेरणा देती रहती है।”

प्रस्तुत पंक्तियाँ मूर्धन्य भविष्य द्रष्ट जे. हिल्टन की हैं। उन्होंने अपनी पुस्तक “द् कमिंग मिलेनियम” में इसी शैली का प्रयोग करते हुए आने वाले समय के संबंध में भविष्यवाणी की है। उनकी पुस्तक को पढ़ने से ऐसा जान पड़ता है, मानों उनके नेत्रों के सम्मुख ही भविष्य का विहंगम दृश्य घूम गया, जिसे लिपिबद्ध कर उन्होंने पुस्तकाकार रूप दे दिया हो। इस संदर्भ में पूछे जाने पर उनने कहा-निश्चय ही ऐसा है मेरी उक्त पुस्तक न तो कोई अनुमान है, न संभावना, वरन् एक ऐसी भवितव्यता है, जिसका अटल निर्धारण असंदिग्ध है।”

इसी पुस्तक में वे आगे लिखते हैं-भौतिकता घटती-मिटती जा रही है। उसका स्थान अध्यात्मवादी मान्यताएँ ले रही हैं, किन्तु धर्म-अध्यात्म के नाम पर न आज जैसी कुरीतियाँ हैं, न अनगढ़ प्रथा-परम्पराएँ सब कुछ औचित्य पर आधारित है। अनौचित्य कुछ भी नहीं। नीतिमत्ता को जो स्वीकार्य है, विवेक-बुद्धि जिसका समर्थन करती है, जो सबके हित में है, वैसे ही प्रचलन अस्तित्व में रह गये हैं जिससे अनीति को प्रश्रय मिलता हो, अश्लीलता की वंश-वृद्धि होती हो, जो कुमार्ग की ओर बढ़ चलने की कुत्सित इच्छा उभारती हो, वैसी सभी वर्जनाओं पर नैतिकता का दृढ़ अंकुश लगा हुआ है। अपरिग्रही जीवन का सर्वमान्य सिद्धान्त प्रचलित है। इसी में सभी संतुष्ट हैं। न कोई सम्पदा जोड़ कर धनकुबेर बनने की इच्छा रखता है, न संतानों के लिए साधन सामग्री इकट्ठी करने में अभिरुचि दिखाता है। सबों के लिए रोज कुआँ खोदने और रोज पानी पीने का समान नियम लागू है। सामाजिक दृष्टि से न कोई बड़ा है न छोटा न ऊँच न नीच। समानता का समान अधिकार समाज की ओर से सब को उपलब्ध है।”

“इन सब परिवर्तनों की पृष्ठभूमि लम्बे समय से चली आ रही है। इन दिनों उसी का चरमोत्कर्ष अनेकानेक प्रकार की प्राकृतिक आपदाओं, बीमारियों, विग्रहों उत्पातों के रूप में दिखाई पड़ रहा है। इस सदी के अन्तिम दशक में इनका उफान और बढ़ता स्पष्ट परिलक्षित हो रहा है। इसके बाद आगामी सदी के आरंभिक दो दशाब्दियों में ये धीरे-धीरे शान्त होते प्रतीत हो रहे हैं। नव-निर्माण प्रक्रिया पहले भी जारी थी, पर अब इसकी गति अधिक तीव्र होती जान पड़ती है। परिवर्तन की स्पष्ट अनुभूति लोगों को इसी अन्तराल में मिलती है। सब हतप्रभ हो रहे हैं कि यह क्रान्तिकारी परिवर्तन क्योंकर व कैसे बन पड़ा?”

इस प्रकार हिल्टन ने आगामी स्वर्णयुग की रूप-रेखा ही खींच कर रख दी है। भविष्य का वर्णन वर्तमान काल में करने की उनकी इस अनूठी शैली से अनेकों को इसके यूटोपिया होने का विश्वास हो सकता है। कइयों ने पुस्तक में वर्णित तथ्यों और वर्तमान के प्रसंगों में कोई संगति न होने के कारण उसकी वास्तविकता पर संदेह प्रकट किया है और उसे कपोल-कल्पना कह कर टालने का प्रयास किया है। ज्ञातव्य है कि हिल्टन ने इसी आशंका को ध्यान में रखते हुए पुस्तक के प्रारंभ में ही इसे स्पष्ट कर दिया है कि यह कोई कल्पना जल्पना नहीं, अपितु नियति की एक सुनिश्चित वास्तविकता है।

इसी प्रकार की एक अन्य पुस्तक उनने लिखी है-द् एज ऑफ विज्डम।” वैसे तो यह पुस्तक कलेवर की दृष्टि से अत्यन्त छोटी है, पर आगामी समय के संबंध में इसमें जो प्रकाश डाला गया है, वह अतिशय महत्वपूर्ण है। वे लिखते हैं “अभी जिस पर्यावरण प्रदूषण से संसार त्रस्त है और जिसके कारण वर्तमान में अनेक संकट उठ खड़े हुए हैं, अगली शताब्दी के मध्य तक उसका नामोनिशान न रहेगा। तब मनुष्य में एक ऐसी परिष्कृत बुद्धि का विकास होगा जो कुछ भी करने से पूर्व उसकी फलश्रुति पर सर्वप्रथम विचार करेगी। इस क्रम में उन मानवी प्रयासों व गतिविधियों का लेखा-जोखा लिया जायेगा, जिसने इतने भयावह संकट पैदा किये। पुनर्मूल्यांकन के बाद उन प्रवृत्तियों पर नैतिकता का कठोर अंकुश लगा दिया जायेगा, जो प्रस्तुत सर्वग्राही समस्या का निमित्त बनी। वन-संरक्षण और वृक्षारोपण को प्राथमिकता मिलेगी और उस त्रुटि को अतिशीघ्र पूरा करने की कोशिश की जायेगी, जो पिछले दिनों स्वार्थवश बन पड़ी। पर्यावरण को सुधारने-सँवारने में मनुष्य को दैवी सहयोग भी प्राप्त होगा। नियति इसके लिए ऐसी व्यवस्था करेगी कि इससे संबंधित समस्या को उत्पन्न करने और प्रकृति के संतुलन को बिगाड़ने वाला दूसरा बड़ा कारण वाहन न रहे। इस हेतु प्रकृति-व्यवस्था के अंतर्गत पृथ्वी के गर्भ में जमा कच्चा तेल चुक जायेगा। भले ही तब इसका कारण वर्तमान का अतिशय दोहन माना जाय, पर यह सब होगा नियन्ता की निर्धारित व्यवस्था क्रम के अंतर्गत ही। इसी प्रकार इन्धन का अभाव स्वचालित गाड़ियों के अस्तित्व को समाप्त कर देगा। फिर वैसे ही वाहनों का अस्तित्व रहेगा, जिससे प्रकृति को कोई खतरा न हो। इससे पर्यावरण-संकट तीव्रता से दूर हो जायेगा, जिससे स्वास्थ्य संबंधी समस्या में भी कमी आयेगी। व्याधियाँ अब जितनी न दिखाई पड़ेंगी। वह होगी अवश्य पर तब उसका कारण प्रमाद न होकर परमात्म सत्ता की कर्मफल व्यवस्था होगा। अनेक दोषों के निमित्त कारण-स्वार्थ और स्वार्थियों के वंशधर न रहेंगे। इस अवगुण का सर्वथा लोप हो जायेगा। इसका स्थान इसका विपरीत गुण-धर्म और अध्यात्मवाद का चिर-सहचर-परमार्थ ले लेगा। लोग इसे अपना सर्वोपरि कर्तव्य मानेंगे और कर गुजरने में कोई कोताही न बरतेंगे। समय और समाज को अपरिमित हानि पहुँचाने वाले लोभ लालच भी अपनी मौत मरेंगे। मानवी व्यक्तित्व में अहंता एवं बड़प्पन का अवशेष न रहेगा। इन दो दुर्गुणों ने, लोभ-लालच के बाद वर्तमान समाज को सर्वाधिक हानि पहुँचायी है यह निश्चय कर इसे त्यागने व इससे बचे रहने में ही लोग अपनी भलाई समझेंगे। सादगी को सर्वोच्च प्राथमिकता मिलेगी। विलासिता का भौतिकता के साथ ही अन्त हो जायेगा सभी परिश्रमी एवं कर्मनिष्ठ जीवन पर विश्वास करेंगे। धर्म पूजा-पत्री और मन्दिर पूजागृहों तक सीमित न होकर अध्यात्म का अविच्छिन्न अंग बन जायेगा और दिनचर्या में काया-छाया की तरह सम्मिलित रहेगा। इससे सर्वत्र शान्ति व संतोष का साम्राज्य दृष्टिगोचर होगा, जो लम्बे काल तक बना रहेगा, किन्तु इसका सम्पूर्ण श्रेय उस सद्बुद्धि को मिलेगा, जो तब के लोगों में विवेक के रूप में विद्यमान होगी।”

हमें प्रस्तुत भविष्य कथन को सत्य सिद्ध करने और नियन्ता की परिवर्तन-प्रक्रिया में भागीदारी निभाने के लिए इन्हीं दिनों जुट पड़ना चाहिए। कालचक्र को परिवर्तित करने में परमसत्ता के साथ हमारी गिलहरी जितनी भूमिका भी स्वयं के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकती है। कहीं ऐसा न हो कि प्रस्तुत समय हम निद्राग्रस्तों की तरह खुमारी में बिता दें और उस श्रेय सौभाग्य से वंचित रह जायँ, जो हमें इतिहास पुरुष बनाने वाला है।


बुद्ध गम्भीर हो गये (Kahani)

प्रव्रज्या पर जाने से पूर्व तथागत ने शिष्यों को अपने पास बुलाकर पूछा-जिस नये प्रदेश में तुम प्रचार-प्रसार के लिए जा रहे हो, यदि वहाँ के निवासियों ने तुम्हारी बात नहीं सुनी, तो तुम क्या करोगे?

एक शिष्य ने कहा-भगवन् हम समझेंगे कि ये लोग बहुत अच्छे हैं। कम-से-कम गालियाँ और उपालम्भ तो नहीं दिये।”

तब फिर बुद्धदेव ने पूछा-यदि गालियाँ दीं, तो क्या करोगे?” तब दूसरा शिष्य बोल उठा “हम सोचेंगे, चलो मारा तो नहीं।”

तथागत ने पुनः प्रश्न किया-यदि मारा तो?” तब तीसरा शिष्य बोला-तब हम समझेंगे कि इनके अन्तःकरण में दया अब भी शेष है। कम-से-कम हमारे प्राण तो नहीं लिए इन्होंने।”

अब भगवान बुद्ध गम्भीर हो गये। अपने शिष्यों की कर्मठता, व लगन विनम्रता के प्रति विश्वास गहरा हो आया और अन्तिम आदेश दिया “जाओ वत्स! तुम कहीं भी संसार में चले जाओ, इन गुणों के रहते तुम सदैव सफलता और प्रतिष्ठा पाते रहोगे।”


प्रकृति के गर्भ में घटित हो रहे कुयोग व सुयोग

कुयोगों और सुयोगों के संबंध में कोई प्रत्यक्ष तर्क तो इतना लागू नहीं होता कि अमुक वस्तु, पल विशेष, या घटना को किस कारण शुभ या अशुभ होना चाहिए, क्यों उसके कारण दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएँ घटनी चाहिए और क्यों उसकी उपस्थिति से सुखद संभावनाओं की शृंखला चल पड़नी चाहिए। फिर भी देखा यह गया है कि कभी-कभी यह कुयोग-सुयोग के संयोग इस तरह वस्तुओं के साथ जुड़ जाते हैं, मानों व जड़ न होकर चेतन हो, मानों उनकी भी बुरी या भली प्रकृति हो।

‘मेरी सेलीस्टी’ नामक जलयान सदा ऐसे ही कुयोग से जुड़ा रहा। वह जब तक जिया, मालिकों, चालकों एवं यात्रियों को त्रास ही देता रहा। सन् 1861 में स्पेंसर द्वीप नोबा स्कोशिया में जब वह बना तो उसका नाम ‘आमेजन’ रखा गया। उसका कप्तान अपनी नियुक्ति के दो दिन पश्चात् ही एक दुर्घटना में मारा गया। क्षतिग्रस्त जहाज की मरम्मत कराते समय दूसरा कैप्टन आग से जल कर मर गया। जब तीसरे की नियुक्ति हुई तो जहाज लेकर वह चला और ‘डोवर की खाड़ी’ में एक अन्य जलयान से टकरा गया, स्वयं हानि उठायी और दूसरे जहाज को भी नुकसान पहुँचाया। अपनी चौथी यात्रा में वह ‘केप ब्रेटन द्वीप’ में जमीन में धँस गया, जिससे उसका निचला हिस्सा टूट गया। मरम्मत पुनः करायी गई। अब तक जेम्स इस्ट्रीच इससे काफी क्षति उठा चुके थे। उन्होंने उसे बेच दिया। जेराल्ड स्नुफर अब इसके स्वामी बने। जहाज से जुड़े दुर्भाग्य ने उनका भी पीछा न छोड़ा। अनेक दुर्घटनाओं में उन्हें भरी घाटा उठाना पड़ा, अस्तु उसे बेच देना ही उपयुक्त समझा गया। इस क्रय-विक्रय से होते हुए जलयान अन्ततः जेम्स विंचेस्टर के स्वामित्व में आया। उन्होंने जहाज को नयी शक्ल दी। पुराने यंत्र-उपकरण बदल दिये गये। नाम भी परिवर्तित कर दिया गया अब वह मेरी-सेलीस्टी था। 1872 के उत्तरार्ध में उसमें व्यापारिक सामान पुर्तगाल ले जाने के लिए लादा गया। कप्तान थे वेंजामिन स्नूपर। स्नूपर के अतिरिक्त जहाज में उनकी पत्नी, दो पुत्रियाँ एवं सात अन्य कर्मचारी सवार थे। नवम्बर के प्रथम सप्ताह में यात्रा आरंभ हुई। इसके दस दिन पश्चात ‘डीग्रेशिया’ नामक जहाज ने भी पुर्तगाल के लिए प्रस्थान किया। इसके कैप्टन थे एडवर्ड मोरहाउस कुछ दिन बाद जब ‘डीग्रेशिया’ पुर्तगाल से लगभग 500 मील दूर था, तो कप्तान ने एजोर्स और पुर्तगाल के मध्य एक जहाज को ऐसी स्थिति में देखा, जिससे यह सहज ही अनुमान लगाया जा सकता था कि जलयान नियंत्रण से बाहर है। कैप्टन मोरहाउस और कुछ साथी नाविक एक नाव में बैठ कर उस ओर चल पड़े, ताकि वस्तुस्थिति का पता लगाया जा सके। कई घंटे के प्रयास के बाद जब वे वहाँ पहुँचे, तो पता चला कि यह ‘मेरी सेलीस्टी’ है, किन्तु जब उन्होंने अन्दर कदम रखा, तो आश्चर्यचकित रह गये। वह सर्वथा खाली था। उसमें जीवित या मृत कोई भी व्यक्ति न था। सामान सभी ज्यों-के त्यों लदे पड़े थे। जहाज को देखने से किसी प्रकार की दुर्घटना की भी आशंका नहीं होती थी। फिर इसके नाविक कहाँ अन्तर्ध्यान हो गये? मोरहाउस और उसके साथियों के लिए यह रहस्यमय बन गया। निरीक्षण आरंभ किया, तो पता चला कि मेज पर अधखाया भोजन पड़ा हुआ था एवं कुछ पकने के लिए स्टोव पर रखा हुआ था।

कैप्टन के केबिन की तलाशी ली गई, तो उसमें लॉग, बुक पड़ी मिली जिसमें आठ बजे प्रातः 25 नवम्बर की की तिथि अंकित थी साथ ही यह नोट था-सान्तामेरिया द्वीप से हम आगे बढ़ गये।” डीग्रेशिया के कप्तान मोरहाउस ने जिस दिन यह देखा, उस दिन 5 दिसम्बर था, अर्थात् लॉग-बुक में अन्तिम प्रविष्टि के दस दिन बीत चुके थे और जलयान बिना किसी नाविक के 600 मील की यात्रा कर चुका था।

मोरहाउस उसे अपने साथ जिब्राल्टर ले आया। सुरक्षित जहाज और सामान को उसके मालिक तक पहुँचा देने के पारिश्रमिक के रूप में कप्तान को लदे सामान की कुल कीमत का पाँचवाँ हिस्सा विंचेस्टर की ओर से प्राप्त हुआ। न्यूयार्क पहुँचने पर विंचेस्टर ने ‘मेरी सेलीस्टी’ को तत्काल बेच दिया। उसे एक दूसरी व्यापारिक कम्पनी ने खरीद लिया पर बदकिस्मती का वहाँ भी अन्त न हुआ। कई कप्तान और कर्मचारियों की आकस्मिक मृत्यु हो जाने पर वर्तमान मालिक ने भी उसे अपने पास न रखा। इस प्रकार खरीद फरोख्त का यह सिलसिला अनेक वर्षों तक चलता रहा। इस क्रम में अन्ततः वह जलयान 1884 में गिलमैन पार्कर नामक व्यापारी के पास पहुँचा। जहाज के विगत इतिहास को ध्यान में रखते हुए उसने उसका बीमा करा लिया। इन्हीं दिनों एक बार जब वह वेस्ट इण्डीज की खाड़ी से होकर गुजर रहा था, तो दुर्घटनाग्रस्त हो गया। घटना के आठ माह बाद गिलमन की अचानक मृत्यु हो गई। कर्मचारी दल में से चार पागल हो गये और दो ने आत्महत्या कर ली।

‘मेरी सेलीस्ट’ के दुर्भाग्य का यह अन्तहीन सिलसिला तब तक चलता रहा, जब तक समुद्र में डूब कर उसका अस्तित्व समाप्त न हो गया। टाइटैनिक जलयान के बारे में कहा जाता है कि वह भी दुर्भाग्य का शिकार हुआ था होप डायमंड और कोहिनूर हीरे का भी ऐसा ही इतिहास है। व जब, जहाँ जिसके पास भी गये, वहीं विपत्ति का पहाड़ टूट पड़ा। न जाने कितनों को इनके कारण जान से हाथ धोना पड़ा कितने ही पागल हो गये। अनेकों ने आत्महत्या कर ली। फिर भी इनसे जुड़ी विपदा का अन्त न हुआ।

अभिशप्त वस्तुओं के अनगिनत घटनाक्रमों से यहाँ कुछ का जिक्र मात्र किया गया है। सौभाग्य या दुर्भाग्य कभी-कभी जड़ वस्तुओं के भी सिर पर चढ़कर बोलता है व ऐसे ऐसे क्रियाकलाप कर दिखाता है जिनसे दाँतों तले उँगली दबा कर रह जाना पड़ जाता है। जब नितान्त जड़ समझे जाने वाले पदार्थ भी कुयोगों के कुचक्र में चेतन जगत के जीवधारियों को इस प्रकार खींच-घसीट लेते हैं तो चेतना के समुच्चय मनुष्य का तो कहना ही क्या? वह चाहे तो कुयोग पैदाकर अपने ही पैरों कुल्हाड़ी मार ले अथवा सुयोग पैदाकर अपना भविष्य अपने हाथों विनिर्मित करले।

देखने में यह आता है कि मनुष्य अपने मनःस्थिति अभिशप्त बनाए हुए अपने लिए दुर्भाग्यपूर्ण परिस्थितियों का चयन स्वयं करता है। वस्तुतः अभागा कोई होता नहीं, बनता है स्वयं को बनाता है वातावरण भी सहधर्मी विचारों के एकत्र होते चले जाने के कारण वैसा ही बन जाता है। “द् रुट्स आफ कॉ-इन्सीडेन्स तथा “आर्ट आफ क्रिएशन” के विद्वान लेखक आर्थर कोसलर का मानना है कि हर संयोगों के मूल में प्रकृति का गणितीय क्रम चलता रहता है। कहीं न कहीं कोई मनुष्यकृत ऐसी विपत्ति इस परिस्थिति का मूल कारण होती है जो हमें बहिरंग में विभिन्न घटनाक्रमों के रूप में दिखाई देती है।” इस प्रकार उनके अनुसार यहाँ कुछ भी संयोग नहीं सुव्यवस्थित है व क्रिया की प्रतिक्रिया है। सर्वज्ञ के इस स्वरूप को समझते हुए यदि हम मनःस्थिति उत्कृष्ट बनाकर वैसे ही कृत्य करें तो निश्चित ही परिस्थितियाँ भी श्रेष्ठतर होगी। यह अध्यात्म का सनातन ध्रुवपक्ष है जो सदा से व्यक्ति को आत्मावलम्बन का पुरुषार्थ पढ़ाता चला आया है।


अविवेकी ही डरते हैं मृत्यु से (Kahani)

सन्त भी पानी के जहाज से यात्रा कर रहे थे। यात्रा लम्बी थी यात्री उनके सत्संग का लाभ उठाते। वे सत्संग में एक बात अवश्य याद दिलाते। याद रखो संसार नश्वर है। सदैव मृत्यु को याद रखो।  सन्त का सूत्र था-मृत्यु का सदैव ध्यान” किन्तु मुसाफिरों को सन्त की बात जँची नहीं और वे ढर्रे की बातों में, आदत के अनुसार निमग्न रहते। एक दिन समुद्र में भयंकर तूफान उठा। समूचे जहाज में कुहराम मच गया। त्राहि-त्राहि में कुछ सुनाई नहीं पड़ता था। सब प्राणों को बचाने की चिन्ता में थे, किन्तु असहाय करते क्या? सभी प्रार्थना में लीन हो गये। तभी देखा सन्त बड़े सहज स्वभाव से अनुद्विग्न और शान्त बैठे हैं। धीरे-धीरे समुद्र का तूफान शान्त हुआ तभी एक यात्री ने सन्त से जाकर पूछा आप को मृत्यु का डर नहीं लगा। आप बड़े शान्त बैठे रहे। सन्त ने कहा-मृत्यु का फन्दा समुद्र में ही नहीं, पृथ्वी पर भी सदैव इसी प्रकार झूलता रहता है। फिर डरना किस बात का। अज्ञानी- अविवेकी ही डरते हैं मृत्यु से। फिर भी डर कर व बचते नहीं।


परिवर्तन प्रक्रिया से गुजर रहे हम सब

अचरज इस बात का है कि जितने प्रश्न आज हमारे पास हैं, उससे कहीं ज्यादा उत्तर हैं। लेकिन इतने पर भी जिन्दगी समस्याओं से भरी और उलझनों से घिरी है। प्रत्येक समस्या के अंकुरित होते ही उस पर चारों ओर से समाधानों की बौछार होने लगती है। पर कुछ ही क्षणों में सारे समाधान मिट्टी में मिल जाते हैं और समस्या का वट-विटप जन जीवन को अपनी विषैली छाँव से घेरता दीख पड़ता है। जैसे इन समाधानों न ही इसे खाद बनकर पोषण दिया और फैलाया हो।

तत्त्ववेत्ता डी. एस. राबिन्सन के शब्दों में “बात सही है। मरे समाधान ज्यादा से ज्यादा खद का काम ही कर सकते हैं।” अपनी पुस्तक “एन्थेलॉजी आफ रीसेन्ट फिलॉसफी में उनने कहा कि समाधान बहुत हैं, लेकिन हैं सब मरे हुए। जैसे मरे हुए आदमी और जिन्दा आदमी के बीच कोई बात-चीत सम्भव नहीं। हर सवाल के साथ एक उलझन है कि वह नया है और उसे हमारी तनिक भी परवाह नहीं। समस्याएँ कभी हमसे पूछकर नहीं आतीं। उनके आ जाने पर भी हम पुराने समाधानों को मजबूती से पकड़े बैठे रहते हैं। हमें ऐसा लगता है कि समाधान हमारे पास है फिर भी समस्याएँ हल नहीं हो पा रहीं। शास्त्रों की पोथियों से हम घिरे बैठे हैं और जीवन है कि उलझता जा रहा है।

इसके पीछे बुनियादी भूल है-नयी खोज का बन्द हो जाना। जबकि नए प्रश्न नए उत्तर चाहते हैं। नयी समस्या नया समाधान माँगती है। नयी परिस्थितियाँ बदले स्वरों में नयी चेतना को चुनौती दे रही हैं। सच कहा जाय तो इनकी उपज ही इसलिए है कि मानवी चेतना अपने नित नए आयाम विकसित कर सके। मनोवैज्ञानिक बाल मन के सामने तरह-तरह की उलझन भरी पहेलियाँ रखने का सुझाव देते हैं। प्रत्यक्ष में इस तरह के कार्य का अर्थ समय और श्रम की बरबादी है। किन्तु जिन्हें मानव मन के गूढ़ रहस्यों का ज्ञान है उन्हें मालूम है कि इस तरह की पहेलियों को हल करने में लगी बुद्धि की विश्लेषण-विवेचन क्षमता अनेकों गुना बढ़ सकेगी। ठीक इसी तरह से सामूहिक और वैयक्तिक जीवन में उभरती समस्याएँ प्रकृति द्वारा प्रस्तुत की जा रही नयी-नयी पहेलियाँ हैं। इन्हें हल करने में संलग्न रहने के कारण ही मनुष्य अपने मन और बुद्धि के इस उत्कर्ष तक पहुँच सका है। ज्ञान की वही विध अपना सर्वाधिक विकास कर सकी, जिसने नए सवालों की चुनौती को स्वीकार कर नए जवाब खोजने में तत्परता बरती। विज्ञान की शाखा-प्रशाखाओं का रोज होता जा रहा विस्तार इसी का परिणाम है।

यदि यह विकास और विस्तार अवरुद्ध है तो तत्त्वदर्शन का, जीवन जीने की कलाओं और इसके विज्ञान का। जिन्दगी के व्यापक परिक्षेत्र में उठने वाली समस्याओं का हल खोजने के लिए अभी भी हम सहस्राब्दियों पुरानी सड़ी-गली पोथियों के बदरंग हो गए पन्ने थामे बैठे रहते हैं, परम्पराओं-प्रथाओं और रूढ़ियों के ढेर में इस कदर उलझ जाते हैं कि विवेक ही गुम हो जाता है। इनमें से किसी की तनिक सी अवहेलना हमें पूर्व पुरुषों का उपहास मालूम पड़ती है।

हमारे सामने इसलिए पहला जीता-जागता सवाल है कि इन मरे हुए उत्तरों को कब विदा किया जायगा क्या कारण है कि हमने नए उत्तर नहीं खोजे? अगर हमारे पास उत्तर हैं ही रेडीमेड, तो हम नए खोजने की तकलीफ क्यों उठाएँ? मन की तो सहज इच्छा होती है लीस्ट रेसिस्टेंस-की कम से कम तकलीफ उठानी पड़े।

उत्तर तैयार है तो उसी से काम चला लें। एक बारगी हमें पुराने उत्तरों से मुक्त और रिक्त हो जाना पड़ेगा, तभी हम उस बेचैनी में नयी समस्याओं के लिए समाधान खोजने में तत्पर हो पाएँगे।

भविष्य के भव्य महलों का निर्माण तभी सम्भव है जब पुराने खण्डहरों का मोह छूटे। इसका मतलब यह नहीं कि अतीत सर्वथा निरर्थक या हानिकर है। इसका उपयोग प्राचीनता की वास्तुकला को जानने में उन तकनीकी बारीकियों को पकड़ने में है जिनके आधार पर अतीत की इमारत अपने युग के जीवन को सुखद छाँव प्रदान कर सकी। लेकिन उपयोगिता की सीमा संकेतों को ग्रहण कर नई शोध करने तक सीमित है। नकल करने के फेर में पड़ने पर हमें सब कुछ गँवा बैठने के लिए विवश होना पड़ेगा।

नई शोध-नया समाधान भारत भूमि की गौरवमयी परम्परा रही है। इसमें किसी तरह का प्रमाद यहाँ की संस्कृति में सर्वथा वर्जनीय माना गया है। जिसे हम वैदिक युग का स्वर्ण युग कहते हैं वह नए समाधानों की ढूँढ़ खोज का युग था। अर्थ और कर्म की अपेक्षा ज्ञान महत्वपूर्ण था। ज्ञान की खोज में तत्त्वदर्शन की मीमांसाओं में लगे ऋषि-मुनि समाज में सर्वोपरि सम्मानित पुरुष थे। धर्म सभाओं, यज्ञ आयोजनों का एकमेव उद्देश्य था नए समाधानों से जन सामान्य को अवगत कराना। जब कभी इसमें जड़ता आयी है, समाज और व्यक्ति के कदम पतन की ओर मुड़े हैं। महाभारत कालीन समाज की अव्यवस्थित स्थिति का एक मुख्य कारण यह भी था। उस युग के बौद्धिकवर्ग ने यह मान्यता बना ली थी कि हम सिर्फ प्राचीनता के पूजक होकर जिएँगे नयी शोध नहीं स्वीकारेंगे। वेद तीन हैं इनकी संख्या चार नहीं हो सकती। भगवान व्यास ने अपने पुरुषार्थ और नीति बल से इस मान्यता को ध्वस्त किया। महर्षि महाअथर्वण ने ऐसे ढेरों नए समाधान ढूँढ़े थे जिनकी प्रयोजनीयता को सत्य होने के बाद भी स्वीकारा जा रहा था। व्यास ने इसे लेकर अथर्ववेद की रचना की। नए तत्त्वदर्शन का विस्तार किया।

इन दिनों की स्थिति बहुत कुछ वैसी ही है, कारण कि दुनिया एक बहुत बड़ी क्रान्ति से गुजर रही है। इस क्रान्ति का काफी कुछ भाग सम्पन्न हो चुका है बहुत कुछ सम्पन्न होना बाकी है। अगर हम यह न समझ सके तो सवाल रोज बढ़ते जाएँगे और एक भी हल न निकाल सकेंगे। इस क्रान्ति की तीव्रता को समझाते हुए मूर्धन्य मनीषी जे. वाट्स कनिंघम ने अपने ग्रन्थ ह्यूमिनिटी इन इवॉल्युशन में कहा है कि ईसा के मरने के अठारह सौ पचास वर्षों में दुनिया का जितना ज्ञान बढ़ा, जितनी तेजी से बदलाव आया पिछले डेढ़ सौ सालों में उतना सम्पन्न हो गया और पिछले डेढ़ सौ सालों में जो कुछ हुआ उतना पिछले पन्द्रह वर्षों में हो सका। अब आगामी नौ सालों में जितना कुछ सम्पन्न होने जा रहा है, उसको देखते हुए इन सभी प्रतिमानों को टूटना पड़ेगा।

पुरानी दुनिया को एक सुविधा थी। उसमें बदलाव का फासला इतना लम्बा होता था जिसका कोई हिसाब नहीं। हजारों साल तक वही उत्तर काम देता था इतने पर भी यहाँ जीवन विद्या के तत्त्वदर्शी ऋषियों ने नए हल की खोज के लिए “माप्रमदितव्यं” का निर्देश दिया था। अब जबकि बदलाव बहुत तेज है, नौ सालों में दुनिया का नया स्वरूप गढ़ा जाना है। तब बदली हुई दुनिया के लिए नए समाधान की खोज सर्वोपरि आवश्यकता बन चुकी है। बाप-बेटे की उम्र का फासला यों तो बीस साल का दीखता है। लेकिन अगर गिनती ठीक से करें तो अन्तर अठारह सौ साल का मालूम पड़ने लगेगा। क्योंकि पुरानी दुनिया के अठारह सौ सालों में जो बदलाव आता था वह अब पन्द्रह सालों में आ जाता है। ऐसे में इस बदली हुई स्थिति में हल के लिए पुरानी पोथियाँ उलटे तो निराशा का हाथ लगना सहज है क्योंकि सारी परिस्थितियाँ बदली हुई हैं।

अब सारा विश्व एक गाँव हो गया है। जितनी देर एक गाँव से दूसरे गाँव पहुँचते थे, आज उतनी देर में हम दिल्ली से लन्दन पहुँच सकते हैं। इन दिनों न केवल मनुष्यता जुड़ गई है बल्कि उसके जुड़ने के तरीके बदले हुए । पहले एक जाति अथवा एक धर्म के अनुयायी ही एक स्थान में रहते थे। अब यह स्थिति नहीं है। वर्ग और आश्रम के मूल आधार बिखर चुके है। सामाजिक सम्बन्ध ही नहीं राजनीतिक खाँचा-ढाँचा बदला हुआ है। राजतन्त्र की परिपाटियों को लागू करने की सोच भी अप्रासंगिक बन चुकी है। ऐसे में अनिवार्य बन चुकी है नए तत्त्वदर्शन की खोज। बदले हुए परिवेश में मनुष्य के भौगोलिक और भावनात्मक सम्बन्धों की व्याख्या समीचीन है। प्रकृति और ईश्वर के साथ मधुर सम्बन्ध आज कैसे बन सके इसका स्पष्टीकरण अनिवार्य है।

महाकाल की अदृश्य शक्ति, दृश्य हलचलें भविष्य के इसी तत्त्वदर्शन का ताना-बाना बुनने में लगी हैं। पर इतना ही तो पर्याप्त नहीं। पूर्णता तो तभी आ सकेगी जब मनुष्य पुरातन परम्पराओं, प्रथाओं का मोह छोड़ सके। विचार क्रान्ति अभियान द्वारा प्रस्तुत किए जा रहें नए समाधानों से समस्याओं के चक्रव्यूह का बेधन शुरू कर दे। स्वयं चिन्तन के सागर में उतर कर विवेक के मोती बीनने लगे। ऐसा हो सके तो समझना चाहिए कि युग परिवर्तन के महान दायित्व में हमारी भागीदारी बन पड़ी। आज के भागीदार ही तो कल के युग संचालक का गौरव प्राप्त कर सकेंगे।


साधना से सिद्धि का अकाट्य सिद्धान्त

आत्मोत्कर्ष का लक्ष्य प्राप्त करने के लिये दो कार्य करने पड़ते हैं-एक उपासना दूसरा साधना। उपासना में भजन-पूजन के संदर्भ में किये जाने वाले जप, ध्यान, प्राणायाम, हवन, कीर्तन आदि क्रिया-कृत्यों को करते हैं । साधना जीवनयापन की चिन्तन एवं कर्मपरक पद्धति है। उपासना उच्चस्तरीय कक्ष का योगाभ्यास कहलाती है और साधना अपने परिष्कृत स्वरूप में तपश्चर्या कहलाती है दोनों के समन्वय से ही जीवन लक्ष्य को प्राप्त करने का, पूर्णता तक पहुँचने का लक्ष्य पूरा होता है, यही ईश्वर प्राप्ति है।

उपासना अंतरंग को परिष्कृत करने के लिये और साधना बहिरंग को सुव्यवस्थित कर बनाने के लिये है। लक्ष्य तक पहुँचने की यात्रा इन्हीं दो कदमों को अनवरत क्रम से उठाते रहने पर सम्पन्न होती है। उपासना का प्रतिफल है सुसंस्कारिता। साधना का प्रयोजन है-शालीनता इन्हीं दोनों को संस्कृति और सभ्यता कहते हैं। जीवन सम्पदा का स्तर उठाने और उसका श्रेष्ठतम सदुपयोग करने से ही मनुष्य व्यक्तित्ववान बनता है। इसी विकास क्रम पर चलते हुये मनुष्य सामान्य आत्मा से अगली सीढ़ियाँ प्राप्त करता है। महामानव, ऋषि, देवदूत एवं अवतार बनने का सौभाग्य इसी मार्ग की मंजिल है।

उपासना किसी के सामने गिड़गिड़ाना या वैभव सम्पत्ति का उपहार-अनुदान सहज ही प्राप्त करने का ताना-बाना नहीं है। देवता न चापलूसी से प्रसन्न होते हैं और न रिश्वत लेने में उन्हें कोई रुचि है। उनका अनुग्रह बादलों की तरह अनवरत बरसता है जिसके पास जितना पात्र है उसे उतना अनुदान मिलता है। आत्म परिष्कार ही साधना का उद्देश्य है। इस प्रयास में जिसे जितनी सफलता मिलती है, वह उतना ही बड़ा संत होता है। आत्मकल्याण और लोक-कल्याण में समर्थ अति महत्वपूर्ण क्षमता ऐसे ही लोगों को उपलब्ध होती है पेड़ों के आकर्षण से बादल बरसते हैं। चुम्बक के खिंचाव से लौह कण खिंचते चले जाते हैं। फूल खिलता है तो उस पर मधुमक्खियों, तितलियों और भ्रमरों के झुण्ड मँडराते हैं।

विकसित व्यक्ति को अंतरंग से संतोष बहिरंग से सहयोग और अंतरिक्ष से वरदान बरसने का लाभ मिलता है। दैवी अनुग्रह उपलब्ध करने का एक ही मार्ग है-आत्म परिष्कार। उपासना और साधना के दोनों ही प्रयोग मिलकर इसी एक उद्देश्य की पूर्ति करते हैं। ब्रह्मविद्या का तत्त्वदर्शन और धर्मानुष्ठानों का साधना प्रकरण इसी एक उद्देश्य की पूर्ति के लिये मनीषियों द्वारा सृजा गया है।

उपासना में गायत्री मंत्र का अवलम्बन सर्वश्रेष्ठ है। इस महामंत्र में सन्निहित 24 अक्षरों में उन सभी शिक्षाओं, प्रेरणाओं एवं सिद्धान्तों का समावेश है, जिनको अपनाकर व्यक्तिगत सुख-शांति और समाजगत प्रगति समृद्धि के द्वार खुल सकते हैं। इन अक्षरों का गुन्थन ऐसी विशेषताओं के साथ हुआ है कि उनके जप पाठ से व्यक्ति के अंतराल की प्रसुप्त विशेषताएँ जाग्रत होती हैं। उनके सामान्य जप-ध्यान और असामान्य अनुष्ठान पुरश्चरण प्रक्रिया से ऐसा आत्मबल जाग्रत होता है, जिसके द्वारा आत्मिक विभूतियों और सांसारिक सफलताओं को प्रचुर परिमाण में उपलब्ध कर सकना सम्भव होता है। उपासना का विधान अन्यत्र बताया गया है। उतना न बन पड़े तो रास्ता चलने या बिस्तर पर पड़े हुये मौन मानसिक जप एवं ध्यान हो सकता है। न्यूनतम बीस मंत्र जप लेने से भी आद्य शक्ति गायत्री के साथ उपासना सूत्र जुड़ा रह सकता है।

साधना का तात्पर्य है-अनगढ़ जीवन को सुगढ़ बनाना। जंगली जानवरों को उपयोगी एवं पालतू और जंगली झाड़ियों को सुरम्य उद्यान के रूप में विकसित करने के लिये जो उपाय अपनाने पड़ते हैं, लगभग वही कुसंस्कारी व्यक्तित्व को संस्कारवान, शालीन बनाने के लिये भी कार्यान्वित करने होते हैं, यही साधना है।

ईश्वर का अनुग्रह, पूर्णता का लक्ष्य प्राप्त करने के लिये एकमात्र उपाय साधना है। इसके परम पुरुषार्थ माना गया है। अपने कुसंस्कारों से निरन्तर लड़ते रहना, जीवन क्षेत्र में सत्प्रवृत्तियों की फसल उगाना, पशुता को देवत्व में परिणत कर देना यही है साधना का का स्वरूप। विभिन्न पूजा उपचारों के द्वारा मनन, चिन्तन, स्वाध्याय, सत्संग जैसे विचारमंथनों द्वारा आत्मशोधन की जो प्रक्रिया चलती है उसी को देखते हुये यह जाना जा सकता है कि साधना में कितनी प्रगति हुई। साधक को सिद्धि मिलती है, बिना आत्मशोधन का भजन निरर्थक जाता है। अपवाद रूप में किसी को कोई दैवी अनुग्रह मिल भी जाय तो उसका परिणाम अंततः भस्मासुर, रावण, कुँभकरण, मारीच, कंस, हिरण्यकश्यप, आदि की तरह घोर विपत्ति के रूप में सामने आता है। फलित तो विभीषण, हनुमान जैसे सद्भाव सम्पन्न लोगों की साधना ही होती है।

जीवन कल्पवृक्ष है उसकी साधना यदि सही रीति से की जा सके तो वही अपने अमृत फलों से साधक को कल्पवृक्ष बना देता है। ईश्वर ने श्रम, समय, बुद्धि, प्रतिभा जैसी दिव्य सम्पदायें हर व्यक्ति को प्रचुर परिमाण में हर व्यक्ति को प्रचुर परिमाण में दी हैं। इनका सदुपयोग ही उस बुद्धिमत्ता का परिचायक है जिसे शास्त्रकारों ने “ऋतम्भरा “प्रज्ञा या ब्रह्म विद्या गायत्री कहा है। मानवी निर्माण की आवश्यकता नितान्त स्वल्प है। उपार्जन की क्षमता असीम है। ऐसी दशा में किसी के अभावग्रस्त या पिछड़े रहने का कोई कारण नहीं। दरिद्रता और दुर्गति तो आंतरिक पिछड़ेपन की ही प्रतिक्रिया है। साधना द्वारा अपने दृष्टिकोण, स्वभाव और व्यवहार में सुधार किया जाता है।

मनःस्थिति में परिवर्तन आते ही परिस्थिति बदलने लगती है। आँख की पुतली ही दृश्य जगत का परिचय कराती है। कान की झिल्ली में भरी सामर्थ्य से ही संसार में संव्याप्त शब्द सम्पदा से लाभान्वित होने का अवसर मिलता है। अपना मस्तिष्क ही इस विश्व वसुधा में बिखरे हुये वैभव को पहचानने और चुनने का सौभाग्य प्रदान करता है इन्द्रिय शक्ति की प्रखरता से ही अनेकानेक रसास्वादनों का सुख मिलता है। अपने आँख, कान, मस्तिष्क एवं इन्द्रिय तंतु यदि विकृत हो उठें तो इस संसार में निराशा और निस्तब्धता के अतिरिक्त और कुछ भी शेष न रहेगा। आत्म सत्ता का स्तर ही संसार के पदार्थों या प्राणियों को उपयोगी अनुपयोगी बनाता रहता है। समस्याओं की उत्पत्ति भी भीतर से ही होती है और उनका समाधान भी अपनी ही अनुपयुक्तताओं के समाधान होने पर संभव होता है। जड़ें जमीन में रहती हैं, पेड़ ऊपर दीखता है। व्यक्ति की आंतरिक स्थिति ही बाह्य परिस्थितियों की संरचना करती है। बाहरी सुविधा, सफलता प्राप्त करने के लिये तद्नुरूप विशिष्टताएँ अपने ही व्यक्तित्व में उत्पन्न करनी पड़ती हैं, इसी दूरदर्शी पराक्रम को साधना कहते हैं। अपना प्रसुप्त अंतरंग ही सर्वसिद्धि-दाता देवता है। उसी को जगाने, प्रखर बनाने के लिये पूजा-उपचारों की विधि व्यवस्था शास्त्रकारों ने बनाई है। जो तथ्य को समझते हैं, भजन पूजन के साथ जुड़े रहस्यों को ढूँढ़ते हैं और अपनी कुसंस्कारिता को परास्त करने का पराक्रम करते हैं वे ही सच साधक हैं। साधनात्मक उपचारों में सन्निहित आत्म निर्माण के मर्म को जो जान लेते हैं

सत्र पूरा होने पर आचार्य ने शिष्यों की बुद्धि एवं धैर्य की परीक्षा लेनी चाही। सभी शिष्यों के हाथ में बाँस की टोकरियाँ थमाते हुए कहा कि इनमें नदी से जल भर कर लाना है और विद्यालय भवन की सफाई करना है। शिष्य चकराए कि भला बाँस की टोकरी में जल। यह कैसे सम्भव है। सभी ने टोकरियाँ उठाई, नदी पर गये, प्रयास किया, किन्तु बाँस की टोकरियों के छिद्रों से जल रिस जाता। हताश शिष्यों ने लौटकर गुरुदेव को वस्तुस्थिति बताई किन्तु एक छात्र जो कर्तव्य के प्रति गम्भीर और जिस में गुरु के प्रति पूर्ण निष्ठ और आस्था थी यह सोचकर बार-बार जल भरता कि गुरुदेव के वाक्य मिथ्या हो ही नहीं सकते। प्रातः से सायं तक जल में बाँस की टोकरी के रहने से बाँस की तीलियाँ फूल चुकी थीं और छिद्र बन्द हो चुके थे, अतः शाम को वह टोकरी में जल लेकर ही विद्यालय वापस लौटा। अब गुरु ने शिष्यों को इकट्ठा किया और परिश्रम का महत्व बतलाते हुए कहा-कार्य तो मैंने तुम्हें अकल्पनीय और दुरूह सौंपा था, किन्तु विवेक, धैर्य, लगन और निष्ठ तथा निरन्तर प्रयास से कठिन कार्य भी सम्भव हो सकता है।

उसके लिये बिना हारे संघर्ष और शिक्षण का अभ्यास करते हैं वे अपने आपको सरकस के सिंह की तरह मनस्वी और कमाऊ बना लेते हैं साधना उपक्रमों के साथ जुड़े हुये इस दिशा निर्धारण को जो समझते हैं और बिना हारे अनवरत प्रयास करते हैं उन्हें सिद्धि पुरुष होने का अवसर निश्चित रूप से मिलता है। साधना से सिद्धि का सिद्धान्त अकाट्य है। प्रयास के साथ जुड़ी हुई उपलब्धि का प्रमाण, परिचय हर साधक कभी भी, कहीं भी प्राप्त कर सकता है।


संस्कृति-पुरुष से मिले-मर्यादा पुरुषोत्तम

जो भाला चलाना न जाने, जो शिकार न करे और लूट-पाट में उत्साह न रखे, वह भी क्या भील है? बचपन से अल्हड़ ऐसा ही है। पता नहीं क्यों? उसने भी भाला और तीर चलाना सीखा था। बड़ा अच्छा निशाना था उसका। पेड़ के पत्ते और फूलों पर सधा हुआ हाथ पड़ता था। जब सच्चे निशाने का समय आया, उसके हाथ बँध गए। हिरन ठीक सामने से भाग गया पर धनुष पर खींचा हुआ बाण छूटा नहीं। उसने पहले ही शिकार के दिन बाण उतार लिया। न फिर धनुष पर डोरी चढ़ी और न भालों पर सान।

माँस खाना सीख ही नहीं सका। बचपन में जब भी उसे माता ने बलात् माँस का ग्रास दिया, उसे वमन हो गया उसे तो नमक रोटी प्रिय है। फल, कंद और पत्ते उसे रुचिकर हैं। खट्टे-मीठे चरपरे के प्रति उसका कोई रुझान नहीं।

नाच-गाने में तो सम्मिलित होता ही नहीं, उसने कल पिता से स्पष्ट यह कहकर कि मैं शादी नहीं करूँगा । भीलों को चकित कर दिया। उसने शादी की बात सुन ली थी और बिना संकोच के कह दिया। अपने इकलौते पुत्र के प्रति सरदार का बहुत स्नेह है। माता ने रो-रोकर आँखें लाल कर लीं पर वह डिगा नहीं। अन्ततः हार माननी पड़ी सबको।

आज बर्घोरे पर उत्सव है, चलोगे नहीं अल्हड़। एक मित्र ने उसकी तन्मयता को तोड़ते हुए पूछा।

बाबू बीमार हैं, उनके पास रहना है। मैं नहीं जाऊँगा । सरदार को कल से ज्वर आ रहा था।

‘हो आओ बेटा। मैं अच्छा हूँ। मुझे कुछ चाहिए नहीं।’

झोंपड़ी में से आवाज आई। लगता है वृद्ध ने बाहर की बात सुन ली थी।

‘मेरी इच्छा भी तो नहीं है बाबू!’ अल्हड़ भीतर चला गया। पिता जानते थे कि वह जायेगा नहीं। गाँव में दूसरों की बीमारी में वह रात रात भर जागकर सेवा करता है आधी रात को भी जंगल में जड़ी लेने भाग जाता है, फिर अपने पिता को बीमार छोड़कर वह उत्सव देखने जा सकेगा?

“तुम तनिक सो रहो!” रात्रि भर जगने वाले पुत्र से पिता आग्रह कर रहे थे। “मुझे न नींद आती है और न आलस्य।” झूठ तो वह बोलता ही नहीं। बीमार को देखकर उसकी नींद और भूख दोनों भग जाती हैं।

“कुछ खाया भी तो नहीं है! रोटी खा लो।” बीमार का आग्रह था। इच्छा न होने पर भी पिता की आज्ञा थी। आज तक उसने शादी, शिकार और लूट को छोड़कर पिता की कोई आज्ञा टाली नहीं। रोटी नमक लेकर बैठ गया। पानी के सहारे कुछ चीज गले के नीचे ठेल लिए। पिता की चिन्ता में वह भोजन कर नहीं सकता था। बीमारी बढ़ती जा रही थी। जड़ी-बूटियाँ काम नहीं कर रही थीं।

“मेरा तो समय हो गया।” बूढ़े सरदार के समीप सभी भील एकत्र हो गये थे। गाँव के स्त्री बच्चे भी साथ थे। झोंपड़ी भर गई थी। सभी की आँखें डबडबा आई। स्त्रियाँ चीख रही थीं और देखा-देखी बच्चे भी। वृद्ध रुक-रुक कर बोल रहा था “जो कुछ मुझ से कठोरता और भूल हुई हो उसे भूल जाना। यह अल्हड़.....।” वह आगे बोल नहीं सका।कुहराम मच गया। अल्हड़ पिता के पैरों को अब भी हाथ में लिए मूक बैठा था। उसके नेत्र शून्य में कुछ ढूँढ़ रहे थे। वह न रोया न चिल्लाया। चुपचाप ज्यों का त्यों बैठा रहा और जब भील पिता के शव को ले जाने लगे तो वह उनके साथ हो लिया।

सरदार पुत्र होने के कारण भील उसे ही सरदार बना रहे थे। यह बात कड़खू को सहन नहीं हुई। वह बलवान था, उसका हाथ शिकार में सधा हुआ था, निशाना पक्का था। उसके हृदय में स्वयं सरदार बनने की तीव्र इच्छा थी। इसी बलवती इच्छा के कारण वह अल्हड़ से द्वेष करता था। वही उसकी महत्वाकांक्षा में बाधक जो था।

कल बाघ ने दो-बकरियाँ गाँव में मारी थीं। रात्रि में सोते समय वह घुस आया होगा। आज उसे जंगल में ढूँढ़ना है, नहीं तो वह बार-बार आता रहेगा और आदमियों पर भी चोट करने लगेगा। कड़खू कल से ही सबको भड़का रहा था। पर कल तो दिवंगत सरदार के क्रिया कर्म में समय व्यतीत हो गया। आज वह अगुआ बनकर सरदार से साफ-साफ पूछने आया है।

“इस तरह कैसे चलेगा?”

आप ठीक कहते हैं। अल्हड़ ने उसकी महत्वाकांक्षा और द्वेष वृत्ति को समझते हुए प्रस्ताव रखा “आप स्वयं इस जिम्मेदारी को सम्हाल लें।” ऐसे विचित्र प्रस्ताव की किसी ने कल्पना तक नहीं की थी। सभी हतप्रभ थे कड़खू को तो जैसी मन माँगी मुराद मिली।

सरदार का झोंपड़ा, उनके बाण, धनुष और बाघ चर्म क्या होंगे? कड़खू ने पूछा। ये वस्तुएँ सरदार को उपहार मिलती थीं और दूसरों से श्रेष्ठ होती थीं। बीच का बड़ा झोंपड़ा सरदार का समझा जाता था। ‘मुझे कुछ नहीं चाहिए। मैं तो पेड़ की छाल लपेटने जा रहा हूँ। सचमुच अल्हड़ ने जब बाघ चर्म हटाया तो लोगों ने देखा कि वह नीचे भोजपत्र पहने है। मेरे लिए वह गुफा काफी है। पहाड़ी में एक सूनी गुफा थी। उसी की ओर उसका संकेत था।

कोई कुछ कहे, इससे पहले ही अल्हड़ ने उनके बीच से निकल कर गुफा का रास्ता ले लिया। एक-दो जनों ने पुकारा पर उसने ध्यान दिया नहीं। कड़खू ने रोक दिया। “उसे जाने दो! देर करने से काम नहीं होगा। आज बाघ को शाम से पहले ही मार डालना है।” वह ध्यान बटाना चाहता था।

“वह कुछ भी नहीं ले जा रहा है!। एक भील ने कहा। “उसे चाहिए क्या? फल, कंद जंगल से ले आएगा और शिकार करना नहीं जो हथियार ले जावे। कुछ ले जाना चाहेगा तो फिर आकर ले जाएगा।” कड़खू ने सब को जंगल में चलने को प्रस्तुत कर लिया।

इधर अल्हड़ सरदार पद छोड़कर अपने को बहुत सन्तुष्ट अनुभव कर रहा था। पर कर्तव्य और सेवाकर्म उसके अभिन्न अंग थे। रोगियों की सेवा, भूले भटके यात्रियों को आश्रय और चुपचाप एकान्त में किसी का चिन्तन-किसी अज्ञात का जिसे वह भी नहीं जानता। यही उसकी दिनचर्या बन गई। जंगल से लाए कंदों से पेट भर जाता था।

ऐसे आदमी से कौन शत्रुता करेगा? एक बाण सन् से आया और कानों के पास से गुफा की दीवार में जाकर गड़ गया, लगा कि यह तो उसे मारने का प्रयास था। वह डरा या घबराया नहीं गुफा के बाहर देखने लगा।” वह सोच ही रहा था कि सहसा एक चीख सुनाई पड़ी। दौड़ा वह गुफा के बाहर की ओर।

एक रीछ ने कड़खू को पकड़ लिया था। पास में बेर की झाड़ियाँ पड़ी थी उन्हीं में कटी कुछ टहनियाँ लिये अल्हड़ दौड़ा । रीछ के बालों में उसने जाकर उन्हें उलझा दिया और पीछे खड़े होकर रीछ के दोनों नेत्र दोनों हाथों से बन्द कर लिए। घबराकर उसने कड़खू को छोड़ दिया। वह भागा और अल्हड़ भी कूदकर अलग जा खड़ा हुआ। रीछ झपटा पर बड़े-बड़े बालों में जंगली बेर की टहनियाँ उलझी थी, वह उन्हें छुड़ाने में व्यस्त हो गया।

कड़खू दूर भाग नहीं सका था। रीछ के नखों ने बड़े घाव कर दिये थे। रक्त बह रहा था। अल्हड़ ने सहारा दिया। गुफा में लाकर लिटाया और घावों पर कुछ जड़ियाँ पीस कर लगा दीं। एक पखवाड़ा इसी प्रकार बीत गया।

“अल्हड़ उस दिन तुम्हारे हाथ में जो बाण लगा था, मैंने मारा था।” ज्वर और पश्चाताप ने उसे व्याकुल कर दिया था।

“जानता हूँ!” अल्हड़ ने छोटा उत्तर दिया। “कुछ भील मुझे अब भी सरदार बनाना चाहते हैं। वे बाबू के कृतज्ञ हैं और उनके लड़के को इस प्रकार गुफा में नहीं रहने देना चाहते। सरदार का झोंपड़ा और सामान तुम्हारे पास देखकर तुम से वे द्वेष करते हैं।”

“इस झंझट को दूर करने और अपनी सरदारी को निर्विघ्न करने का रास्ता मैंने सोचा था तुम्हें मार देना। उस दिन का गुफा में आया बाण भी मेरा था। अब मुझे मार दो।” वह रोने लगा। “रोओ मत। तुम्हें देखते ही मैं समझ गया था। चलो जो हुआ उसे भूल जाओ।” अल्हड़ में न रोष था और न क्रोध।

“तुमने सब जानकर मुझे बचाया क्यों?” रोगी की हिचकी बँध गई। पश्चाताप ने उसे मूर्छित सा कर दिया।

“वह मेरा कर्तव्य था। अब रो-रो कर अपनी तबियत बिगाड़ोगे तो मैं नाराज हो जाऊँगा।” सगे भाई के समान स्निग्ध स्वर में उसने कहा। जड़ी पिसी उसके हाथ में थी। रोगी ने उसके मुख की ओर भरे नेत्रों से देखा। दवा पीना अस्वीकार न कर सका। चुपचाप मुख खोल दिया।

उस दिन शाम को स्वस्थ प्रायः ठीक हो जाने पर कड़खू को उसके घर छोड़कर वह लौटा ही था अभी एक मधुर और चिर आत्मीय स्वर उसके कानों में पड़ा। “अल्हड़ हम आज तुम्हें गुफा में नहीं रहने देंगे। हमारे लिए इसे खाली कर दो।” भगवान राघवेन्द्र जानकी और लक्ष्मण के साथ खड़े मुस्करा रहे थे। जो प्रार्थना करने पर भी महर्षियों के आश्रमों में कदाचित् ही ठहरते हैं, बड़े-बड़े भील सरदारों के आग्रह पर जो पेड़ के नीचे एक घड़ी भी नहीं ठहरे वे अल्हड़ से स्वयं उसकी गुफा माँग रहे हैं। माँग कहाँ रहे हैं? अपनी समझ कर बिना माँगे ले लिया।

माता जानकी के साथ प्रभु उसी शय्या पर लेटे। वे पत्ते उन्होंने उठाने नहीं दिये। थोड़े किसलय उसने और बिछा दिये। लेटते हुए प्रभु भगवती सीता से कह रहे थे “देवि! आज इस देश के परम सुसंस्कृत व्यक्ति के आवास में रहने का सौभाग्य मिल रहा है।” “सुसंस्कृत?” जानकी के नेत्रों में आश्चर्य घना हो गया। उन्हें लगा अनेकानेक तपस्वी, ज्ञानी, ऋषियों, शक्तिशाली और वैभववान् राजाओं के रहते एक भील...। वह कुछ अधिक कह न सकीं।

मुसकराते हुए प्रभु का स्वर उभरा “देवि! संस्कृति की प्रतिष्ठा सदाचार में है और जिसमें सदाचार अपनी पूर्णता के साथ प्रतिष्ठित है वही सुसंस्कृत है, संस्कृति पुरुष है और अल्हड़ से अधिक...।” आगे के शब्द भाव में डूब गए। प्रभु की यह वाणी गुह्याद्वार पर लक्ष्मण के साथ बैठे उसके कानों में भी पड़ी। लक्ष्मण की स्नेहिल आँखें उसकी ओर उठीं। प्रातः जब प्रस्थान करने लगे वह उनके श्री चरणों में मस्तक रखने के लिए बढ़ा। पर पुरुषोत्तम ने इस संस्कृति पुरुष को उठाकर छाती से लगा लिया। यह लक्ष्य और मार्ग का मिलन था।


भाव संवेदना की चमत्कारी शक्ति

मानवी काया में अनेकों अंग-अवयव हैं। वे सभी अपनी हलचलों से शरीर यात्रा के साधन भर जुटाते और जड़तत्त्वों से विनिर्मित समझे जाते हैं। हृदय ही शरीर का एक ऐसा अवयव है जिसकी स्थिति सर्वथा भिन्न एवं उच्चस्तरीय है। इसका सम्बन्ध मात्र रक्ताभिसंचरण से ही नहीं वरन् करुणा की भावसंवेदनाओं के साथ अध्यात्म विभूतियों के साथ भी जुड़ा हुआ है। रक्त फेंकने वाली यह थैली यों तो सभी के सीने में विद्यमान है, पर जिस अर्थ में हृदय का उल्लेख होता है वह करुणा और मैत्री की भावसंवेदना ही है। इसके अभाव में मनुष्य को हृदयहीन कहा और आततायी माना जाता है। देवताओं का वैभव जिस आधार पर बना और बढ़ा है उसे सहृदयता ही कह सकते हैं। इस विश्व में जो कुछ अभिनन्दनीय और अनुकरणीय है, उस सबका उद्भव सहृदयता की पृष्ठभूमि पर ही संभव हुआ है।

अध्यात्मवेत्ताओं ने चेतना की उच्चस्तरीय विभूतियों में से मस्तिष्क को बुद्धि का और हृदय को भावना का केन्द्र माना है। जड़ शरीर के साथ चेतना का समीकरण करने वाले इन दो अवयवों का अपना विशेष स्थान है। इसलिए आत्मिक प्रगति के प्रयोजनों में समय-समय पर इनका विशेष उपयोग होता रहता है। ध्यान-धारणा की साधनायें प्रायः इन्हीं दो केन्द्रों के इर्द-गिर्द घूमती रहती हैं।

इतने पर भी सूक्ष्म संस्थानों में हृदय का महत्व सर्वोपरि है। सामान्य वैज्ञानिक विश्लेषण करने पर तो यह आकुंचन-प्राकुंचन या लप-डप करता हुआ रक्त से भरी थैली मात्र जान पड़ता है, जो शरीर के विभिन्न अंगों को रक्त भेजता, अशुद्ध रक्त को एकत्रित एवं परिशोधित करता मात्र प्रतीत होता है। जीवविज्ञानी इसी सीमा तक हृदय का महत्व स्वीकार करते रहे हैं और कहते रहे हैं कि यह संस्थान शरीर में रक्त संचार की भूमिका सम्पन्न करता है। पर यह तो इसका स्थूल पक्ष है। आध्यात्मिक प्रतिपादनों में इस संस्थान को सर्वाधिक महत्व दिया गया है। योगियों ने इस अंग को चेतना का केन्द्र माना है। गीताकार ने इसे ही आत्मा का निवास स्थल बताया है। तीन शरीरों से बनी मानवी काया में सबसे महत्वपूर्ण शरीर ‘कारण शरीर’ को बताया गया है। इसे जाग्रत एवं विकसित कर लेने पर मनुष्य ऋद्धि-सिद्धियों का स्वामी बन जाता है। अध्यात्मवेत्ताओं द्वारा इस क्षेत्र को विकसित करने के लिए अत्यधिक जोर दिया गया है जो अकारण नहीं है। इस आग्रह के पीछे ठोस वैज्ञानिक आधार हैं जिन्हें समझा और उनका लाभ उठाया जा सके तो मनुष्य का व्यक्तित्व एवं उसकी सामर्थ्य कई गुना अधिक प्रखर हो सकती है।

धड़कते हृदय एवं उससे निकलने वाली ध्वनि तरंगों में भाव संवेदनाओं की आत्मीयता की सघनता हो तो उसका चमत्कारी प्रभाव परिणाम दिखायी पड़ता है। दूसरों को प्रभावित करने, अनुकूल बनाने तथा श्रेष्ठ मार्ग पर बढ़ने के लिए प्रेरित करने में भाव संवेदनाओं की ही प्रमुख भूमिका होती है। ऋषि-मनीषियों संत, महात्माओं, महापुरुषों में यह विशेषता देखने को मिलती है कि वे अन्तःकरण की महानता द्वारा ही दूसरों को अनुवर्ती बनाते हैं। अन्यों को श्रेष्ठ जीवन जीने, परमार्थ प्रयोजनों में जुटने को बाध्य करते हैं। आध्यात्मिक क्षेत्र में हृदय की महत्ता, उसमें उठने वाली भाव संवेदनाओं की उपयोगिता को बहुत पहले से ही स्वीकार किया जाता रहा है।

इस तथ्य को अब वैज्ञानिक परीक्षणों द्वारा भी मान्यता मिल रही है। सामान्यतया माताएँ नवजात शिशुओं को अपने बायें वक्षस्थल कसे चिपकाए रहती हैं। इसका मारण दाहिने हाथ का कामों से व्यस्त रहना माना जा सकता है, पर वास्तविक कारण यह नहीं है। सर्वेक्षणकर्त्ता वैज्ञानिकों का कहना है कि बायें हाथ से काम करने वाली महिलायें भी अपने शिशुओं को बायीं गोद में ही लिये रहती हैं। पुरातत्त्व संग्रहालयों में संकलित मूर्तियों, प्राचीन तैल चित्रों में उन चित्रों, कलाकृतियों का अध्ययन किया गया जिनमें नवजात शिशु को माँ के साथ चित्रित किया गया है। निष्कर्षों में पाया गया कि अस्सी प्रतिशत महिलाएँ अपने शिशुओं को बायें सीने से चिपकाए हुए हैं। इसे चित्रकारी की परम्परागत विशेषता कहकर नहीं टाला जा सकता।

इस संदर्भ में कार्नेल विश्वविद्यालय, अमेरिका के मूर्धन्य वैज्ञानिकों ने नये तथ्यों का रहस्योद्घाटन किया है। सुप्रसिद्ध मानवशास्त्री डा. ली. साल्क ने अपने अनुसंधान निष्कर्ष में बताया है कि माताओं द्वारा अपने शिशुओं को बायीं ओर चिपकाए रहने के विशेष कारण है॥ हृदय बायीं ओर अवस्थित होता है। जाने-अनजाने माँ अपने बच्चे को उसका अधिक से अधिक सामीप्य देना चाहती है। मातृहृदय की धड़कन के साथ भावसंवेदनाएँ भी तरंगित होतीं और उभरती रहती हैं। उनके आदान-प्रदान से वे स्वयं तो संतोष की अनुभूति करती ही हैं, बच्चे के ऊपर भी अनुकूल प्रभाव पड़ता है। हृदय की ध्वनि तरंगों को सुनकर बच्चा एक अनिर्वचनीय आनन्द में डूबा रहता है। इस सम्बन्ध में डा. डिस्पाण्ड मॉरिस ने महत्वपूर्ण खोजें की हैं। अपनी अनुसंधानपूर्ण कृति “द् इन्टिमेट बिहेवियर एण्ड द् नेकेड एथ” में उनने कहा है कि हृदय की ध्वनि ही एक मात्र वह शाश्वत ध्वनि है जिसे शिशु गर्भावस्था में सुनता है। माँ के गर्भ से बाह्य संसार में आने पर वह विभिन्न प्रकार की ध्वनियाँ सुनकर परेशान रहता है और पूर्व परिचित ध्वनि की आस लगाये रहता है। माँ जब उसे गोदी में लेती है तो उसे सुखद अनुभूति होती है। देखा गया है कि रोते हुए बच्चों को सीने से चिपकाते ही वे चुप हो जाते हैं। माँ के धड़कते हुए संवेदनशील हृदय की ही यह प्रतिक्रिया है जिसकी सुखद ध्वनि तरंगों को सुनते ही बच्चे रोना बन्द कर देते हैं।

इस तथ्य को परीक्षण की कसौटी पर कसने के लिए अमेरिकी वैज्ञानिक डॉ. ली साल्क ने अपने सहयोगियों के साथ मिल कर कुछ अन्य प्रयोग किये जिसके आश्चर्यजनक परिणाम निकले। चह परिणाम मातृ हृदय के साथ जुड़ी संवेदनशीलता की महत्ता का प्रतिपादन करते हैं। वैज्ञानिकों ने इस प्रयोग में जब मातृ हृदय की धड़कन की ध्वनि को टेप करके रोते हुए नवजात शिशुओं को सुनाया तो उन्होंने रोना बन्द कर दिया। उनके मुख मंडल पर शान्ति एवं प्रसन्नता के भाव उभरने लगे। इससे निष्कर्ष निकाला गया कि माताओं के धड़कते हृदय के साथ उनकी सुकोमल वात्सल्य भावनायें भी जुड़ी रहती हैं। इस ध्वनि से पूर्व परिचित होने के कारण शिशु सहज ही आकर्षित हो जाते हैं। ध्वनि तरंगों में घुली भावसंवेदनाएँ बच्चे के हृदय को उद्वेलित करती और सुखद प्रभाव डालती हैं।

यह तो प्रकृति प्रदत्त मातृ हृदय के साथ जुड़ी भाव संवेदनाओं का सामान्य पक्ष रहा जिसका लाभ बच्चे सहज ही उठाते रहते हैं। असामान्य पक्ष की सामर्थ्य एवं संभावनाएँ अनन्त हैं। कारण शरीर में विद्यमान भावसंवेदनाओं को-आत्मीयता को उभारा उछाला जा सके, तो उससे न केवल मनुष्य जाति को एकता, स्नेह, सौहार्द्र के सूत्र में बाँधा जा सकता है, वरन् जीव-जन्तुओं पशु-पक्षियों एवं पेड़ पौधों को भी वाँछित दिशा में मोड़ा-मरोड़ा तथा वशवर्ती बनाया जा सकता है।

कैलीफोर्निया के विलक्षण संत लूथर बरबैक अपनी भाव साधना में इतने सिद्ध हस्त हो गये थे कि प्रकृति के कण-कण से वे प्यार करने लगे और प्यार बाँटने लगे। उनकी सहृदयता से प्रभावित होकर वनस्पतियों को भी अपने गुण, कम, स्वभाव में परिवर्तन लाने को मजबूर होना पड़ा। उनके बगीचे में जो भी वृक्ष-वनस्पति हैं, उनसे वे पुत्रवत् आत्मीयता रखते हैं। इससे उनके बगीचे में काँटे रहित गुलाब उगते हैं और दिन में कुमुदिनी खिलती है। अख़रोट के वृक्ष जो 32 वर्ष में फल देने योग्य होते हैं, 17 वर्ष में ही फलने फूलने लगते हैं। यह सब भावनाओं का, आत्मीयता का ही चमत्कार है।

इस दृष्टि से शरीर के अन्य अंगों की तुलना में हृदय का महत्व कहीं अधिक है। सामान्य बोलचाल के प्रसंगों में सबसे प्रिय वस्तु व्यक्ति का सम्बन्ध हृदय से जोड़ने के पीछे यही कारण है। प्रार्थना, उपासना, साधना में भावनाओं का महत्व प्रतिपादित करने, उन्हें विकसित करने पर जोर देने के पीछे यही मनोवैज्ञानिक आधार है कि परमात्मा द्वारा दिये गये भावसूत्रों में ही मनुष्य को बाँधा जा सकता है। भावसंवेदनाओं से भरपूर व्यक्ति असंख्यों को अपना बना लेते और सहयोग करने के लिए विवश कर देते हैं। वस्तुतः यह भावनाओं का ही खेल है। मनुष्य को एकता के सूत्र में बाँधने के अन्य प्रयत्नों की सफलता तब तक संदिग्ध ही बनी रहेगी जब तक कि भव संवेदनाओं की सहृदयता को विकसित करने की उपेक्षा होती रहेगी। मनुष्य जीवन का सौभाग्य और आनन्द सहृदयता-आत्मीयता के सहारे ही उपलब्ध होता है।


काल को पाटी से बाँधें, सफल बनें

रावण भी अन्यान्य साधारण मनुष्यों की तरह ही था, पर उसने कौशल इतने अधिक प्रकार के उपलब्ध कर लिए थे कि उसे दस सिर वाला कहा जाता था। दस सिर वाला कोई मनुष्य आज तक न जन्मा है और न भविष्य में जन्म सकेगा, यह मानवीकाय विज्ञान के विपरीत है। दशानन उसका अलंकारिक नाम था, जिससे एक ही संदेश समझा जा सकता है कि उसकी बौद्धिक क्षमता अन्यान्यजनों की तुलना में दस गुनी अधिक थी। उसी के आधार पर वह बलिष्ठता, सम्पदा, पराक्रम, कूटनीति आदि की अनेकानेक विशिष्टताएँ उपार्जित और व्यर्थ कर सका था। सर्व विदित है कि मानसिक विशिष्टता ही अनेकानेक शक्ति सम्पदाओं को अर्जित करने में समर्थ होती है। रावण का बुद्धि कौशल असाधारण रूप से बढ़ा चढ़ा था। इसी तथ्य का प्रतिपादन उसे दशानन नाम देकर किया गया है।

पुलस्त्य ऋषि के साधन रहित तपोवन में उत्पन्न होने पर भी रावण किस प्रकार इतने प्रकार की सिद्धि-सफलताएँ अर्जित कर सका, यह एक टेढ़ा प्रश्न है। आज के समय में तो सामाजिक ढाँचा भी ऐसा है कि उसमें एक दूसरे की सहायता से ही प्रगति पथ पर तेजी से आगे बढ़ सका जा सकता है। इन दिनों अर्थ तंत्र और विज्ञान विद्या भी पहले की अपेक्षा अनेक गुनी बढ़ी-चढ़ी है। ऐसी दशा में यदि कोई मनुष्य किन्हीं क्षेत्रों में असाधारण प्रगति कर सके, अधिक समर्थ-सम्पन्न बन सके तो इसमें कोई बड़े आश्चर्य की बात नहीं है। प्रगतिशीलों की विधि-व्यवस्था रीति नीति को बारीकी से समझने पर उसका अनुकरण भी किया जा सकता है, पर पुराने समय में तो ऐसा भी कुछ नहीं था। सुदूर क्षेत्रों में जहाँ तहाँ छोटे-छोटे गाँव बसे थे। यातायात के कार, वाहन के साधन भी नहीं थे। प्रेस पुस्तकों की अब जैसी सुविधा भी नहीं थी। विशेषज्ञता प्राप्त कराने वाले महाविद्यालय का भी थे? ऐसी परिस्थितियों में पूजा उपासना के क्षेत्र में तो कोई व्यक्ति अपनी गतिविधियाँ चलाता और आत्मिक प्रगति करता रह सकता था, पर भौतिक क्षेत्र में वैसी प्रगति कैसे संभव हो सकती थी जैसी कि रावण ने की। उन दिनों ऐसे उदाहरण भी जहाँ-तहाँ सुदूर क्षेत्रों में ही देखने को मिलते थे, जिनसे प्रेरणा और प्रकाश ग्रहण करके कोई अपने लिए विशेष मार्ग निर्धारित करता।

प्रश्न उठता है कि जब उन दिनों ऐसी ही परिस्थितियाँ थीं और भौतिक प्रगति के कोई बड़े आधार अवलम्बन सामने नहीं थे तो फिर तैसी चमत्कारी प्रगति रावण से कैसे बन पड़ी जिससे कि वह अपनी सुरक्षित राजधानी समुद्र के बीच घिरे हुए एक टापू पर बना सका। सोने के महल बना सका और इतनी साधन सामग्री जुटा सका जो उन दिनों की परिस्थितियों को देखते हुए अभूतपूर्व ही कही जा सकती है।

रावण की प्रगति का केन्द्रबिन्दु था उसका समय के एक-एक क्षण का तत्परता और तन्मयता भरा उपयोग। इसी का पुराणों में इस प्रकार उल्लेख है कि उसने काल को पाटी से बाँध रखा था। स्थूल दृष्टि से यह कथन भी अविश्वस्त लगता है। “काल” अर्थात् समय तो एक प्रगति क्रम की विधा है, जिसे घड़ी जैसे यंत्रों के माध्यम से जाना जाता है। रस्सी से तो निकटवर्ती प्रत्यक्ष वस्तुएँ ही बाँधी जा सकती हैं। जानवरों को खूँटे से बाँधा जा सकता है पर काल, को समय को कोई किस प्रकार बाँधे? वह तो अनवरत क्रम से प्रवाहवान ही रहता है। उसे अवरुद्ध कर सकना किसी के वश की बात नहीं। हवा रोशनी को किसी प्रकार रोका भी जा सकता है, पर समय को अवरुद्ध कर सकना किसी के वश की बात नहीं। सूर्य, चन्द्र, पृथ्वी आदि की गति को कोई किस प्रकार रोक सकेगा? यदि यह संभव नहीं तो काल को रावण भी चारपाई की पाटी से कस कर बाँध सका होगा? यह बात समझ से बाहर की ही रहेगी? वस्तुतः काल को पाटी से बाँधे रखने का अभिप्राय है, समय के साथ जीवनक्रम का इस प्रकार तालमेल बिठाना जिसमें एक क्षण भी व्यतिरेक न होने देना। यही है विधा, जिसे काल को पाटी से बाँध कर रखना जैसा अलंकारिक प्रतिपादन करना कहा जा सकता है।

लोग दृश्यमान वस्तुओं का ही मूल्याँकन कर सकने में समर्थ होते हैं। सोना, चाँदी, वस्त्र, आभूषण, जमीन, घर, पशु आदि दृश्यमान वस्तुओं की ही कीमत आँकी जाती हैं प्रियजनों परिचितों के संबंध में भी चर्चा होती रहती हैं व्यवसाय निर्माण में चर्चा होती रहती हैं पर कोई यह नहीं सोचता कि उनकी अनमोल जीवन सम्पदा का किस प्रकार व्यतिरेक हो रहा है। जीवनीशक्ति किस प्रकार निरर्थक कामों के कुचक्र में पड़कर चुकती चली जा रही है।

न किसी को आत्म सम्पदा के उत्थान-पतन का ज्ञान है और न विचारों की प्रचंड शक्ति का आभास ये अप्रत्यक्ष करने वाली महान क्षमताएँ निरर्थक प्रयोजनों में उलझी रहती हैं और अपनी पूँजी समाप्त करती रहती हैं। फलतः लम्बे समय जीने वाला मनुष्य भी कोल्हू की बैल की तरह जिन्दगी के दिन ही किसी प्रकार पूरे कर पाता है। होश तब आता है जब जोश-आवेश समाप्त हो जाता है। मरणबेला के निकट पहुँचने पर जब पीछे की ओर मुड़कर देखा जाता है तब प्रतीत होता है कि बहुत कुछ कर सकने की सामर्थ्य हाथ में थी, पर वह उपेक्षित पड़ी रही। आलस्य प्रमाद में, लोभ मोह में वह सम्पदा झुक गई, जो परमेश्वर की सर्वश्रेष्ठ कलाकृति थी और जिसके सदुपयोग बन पड़ने पर कुछ से कुछ बन सकना संभव हो सकता था।

पुरुषार्थ की प्रायः सराहना होती रहती है, पर यह तथ्य विरलों को ही विदित है कि आखिर पुरुषार्थ है क्या? उसकी विवेचना इसी रूप में हो सकती है कि समय को योजनाबद्ध रूप से तन्मयता और तत्परतापूर्वक प्रयोग किया जाय। जिनने इस रहस्य को समझ लिया और अपनी क्षमताओं का अभीष्ट प्रयोजन के नियोजन सीख लिया, समझना चाहिए कि उसने काल को पाटी से बाँध लिया।

रावण ने जो असाधारण क्षमताएँ, कुशलताएँ अर्जित कीं उसके पीछे एक ही रहस्य था कि समय के हर क्षण का निर्धारित प्रयोजन के लिए नियोजित किये रहना। सम्पूर्ण विचार शक्ति और श्रमशक्ति को एक ही केन्द्र पर केन्द्रीभूत किये रहना। इतना कर सकने वाले हर व्यक्ति को अपना अभीष्ट प्राप्त कर सकने में असाधारण सफलता मिलकर रहती है।

संसार में कितने ही महापुरुष हुए हैं जो तीस वर्ष जितनी आयु में ही कूच कर गये। ऐसे लोगों में विवेकानंद, रामतीर्थ, मिल्टन, आद्यशंकराचार्य, ईसा आदि के नाम ही ऐसे हैं जो अधेड़ बनने से पहले ही इस संसार से चले गये। किन्तु इतने ही दिनों में उतने काम कर लिए जितने कि परिश्रमी लोग भी सौ वर्ष की अवधि में नहीं कर सकते। इसके विपरीत जो लम्बी जिन्दगी जिये वे भी कुछ न कर पाये और जिन्दगी गँवा बैठने की शिकायत करते रहे। इसका कारण एक ही है कि उनने समय का मूल्य नहीं समझा और उसे योजनाबद्ध रूप से अभीष्ट प्रयोजनों में निरत करते रहने का क्रम न बन पड़ा। समय की बरबादी प्रकारान्तर में जीवन की बरबादी ही है।

काम में मन न लगने की शिकायत वे ही लोग करते देखे गये हैं जो समय का दैनिक क्रम चक्र बनाने पर ध्यान नहीं देते। जिनने अपने दिनचर्या विवेकपूर्वक बनाई और उसे सतर्कतापूर्वक कार्यान्वित करने में तत्परता बरती, उनके लिए यह सरल संभव हो गया कि निर्धारित मार्ग पर अनवरत चलते रहने में मन लगे। रस आने लगे। कार्य की बारीकियों में प्रवेश करने और उसे सर्वोत्तम ढंग से कर सकने के लिए उत्साह उभरे। इतना बन पड़ने पर प्रगति का अवरुद्ध मार्ग खुल जाता है और सफलता की दिशा में द्रुत गति से आगे बढ़े सकना सहज संभव होता है।

विश्व इतिहास के चमकदार व्यक्तित्वों पर दृष्टिपात किया जाय और यह जाँचा जाय कि वे सामान्य एवं कठिन परिस्थितियों के बीच भी किस प्रकार अपने लिए अग्रगमन का मार्ग बना सके तो एक ही निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ेगा कि उनने समय का श्रेष्ठतम उपयोग किया है। एक क्षण भी निरर्थक बातों में नष्ट न होने दिया। नींद के घण्टों को छोड़कर वे अपनी नियत क्रिया पद्धति में तत्परतापूर्वक संलग्न रहे। हाथ में लिए काम को भली प्रकार पूरा करना उनने अपने प्रतिष्ठा का प्रश्न बनाया। उसमें इतना रस लिया कि समूची इच्छाशक्ति उसी पर केन्द्रीभूत हो गई। काम न रहने पर उन्हें ऐसा लगता रहा मानों जीवनाधार का कोई महत्वपूर्ण अंश हाथ से छिन गया।

मन न लगने का, चित्त उचटने का, आवारागर्दी में समय काटने का अवसर तब आता है जबकि कोई लक्ष्य सामने नहीं होता। किसी योजना के साथ अपने आप को कसकर बाँधा नहीं गया होता। महत्वाकांक्षाएँ तब बुरी होती हैं जब वे किसी निकृष्ट प्रयोजन के लिए मचले । यदि उपयोगिता की कसौटी पर खरे उतरने वाली गतिविधियों में संलग्न रहकर ऊँचा उठने, आगे बढ़ने और उच्चस्तरीय सफलता के शिखर पर पहुँचने की आकांक्षा हो तो उसे सराहा ही जायगा। ऐसे सराहे जाने योग्य व्यक्तियों ने सबसे पहला काम यह किया है कि समय का मूल्य समझा उसके सुनियोजन के प्रतिफल पर विचार किया और अन्ततः इसी निर्णय पर पहुँचे कि समय के एक-एक क्षण को मणि मुक्तकों से भी अधिक मूल्यवान समझकर उसका परिपूर्ण तत्परता के साथ श्रेष्ठतम सदुपयोग किया जाय।

चर्चा रावण की प्रगति से आरंभ हुई थी और बताया गया था कि उसने काल को पाटी से बाँध रखा था। इसी कारण उसे अभीष्ट मनोरथ पूरे करने का अवसर मिला। यह तथ्य हर किसी के लिए समझने योग्य है। साथ ही यह भी ध्यान रखने योग्य है कि हेय प्यारेजनों के साथ अपने आपको न जोड़ा जाय अन्यथा उपलब्ध हुई प्रगति विनाशकारी परिणाम उत्पन्न करेगी। रावण से यही भूल हुई कि वह शक्ति के मद में अपना होश गँवा बैठा और उस कुमार्ग पर चल-पड़ा जिस पर चलने वाले पतन के गहरे गर्त में गिरते और अपना पराया सर्वनाश करते हैं। यदि उसने यह भूल न की होती तो वह संसार के श्रेयाधिकारी महामानवों में से एक होता। क्षमता-गाँधी बुद्ध जैसे महामानवों में भी सामान्य ही थी, उनमें उसका श्रेष्ठतम सदुपयोग किया और वह कर दिखाया जिससे समूची मानवता कृतकृत्य हो गई। सम्राट अशोक ने अपने साधनों को, कौशलों को धर्म चक्र प्रवर्तन के निमित्त लगाया था। उसका प्रतिफल यह हुआ कि समूचे संसार में श्रेष्ठता की पक्षधर एक महाक्रान्ति प्रस्तुत हो गई। जो हैं, जिनने भी इस संसार में कुछ कहने योग्य कार्य किये हैं, उसने समय का श्रेष्ठतम सदुपयोग किया है। यही हमें भी करना चाहिए।


अवसर सबके लिए समान (Kahani)

एक मन्दिर बन रहा था। देश भर से आए शिल्पी स्तम्भों से लेकर मन्दिर के शिखर में लगने वाली मूर्तियों हेतु पत्थरों पर छेनी से काम कर रहे थे। एक पत्थर कारीगरों के मुखिया ने बेकार समझकर फेंक दिया। रास्ते में पड़ा वह पत्थर मजदूर राहगीरों की ठोकरें खाता इधर-उधर होता व उदास मन से देखता रहता कि और तो सँवारकर मूर्ति का रूप लेकर निखर रहे हैं व मैं अभागा पैरों के नीचे दबाया जा रहा हूँ।

एक दिन एक राजकलाकार उधर से गुजरा। उसने वह बेकार पड़ा पत्थर उठाया, छेनी चलानी आरंभ की व देखते-देखते कुछ ही घण्टों में एक सुन्दर सी मूर्ति तराशकर खड़ी कर दी। सब ने उसकी प्रशंसा की कि वह बड़ा प्रतिभाशाली है। एक राह के रोड़े को रूपान्तरित कर दिया। कलाकार बोला “मैं तो औरों की तरह ही हूँ। जो पत्थर में से प्रकट किया है, वह था पत्थर के अंदर ही। मैंने तो मात्र उसे पहचाना व उकेरा है।”

हम सब के भीतर महानतम श्रेष्ठतम बनने की संभावनाएँ हैं कभी-कभी जीवन को गढ़ने वाला कोई कलाकार गुरु मार्गदर्शक मिल जाता है तो हम क्या से क्या बन जाते हैं। सौभाग्य का यह अवसर सबके लिए समान रूप से है।

एक युवक ने बुद्ध से दीक्षा ली। इससे पूर्व वह भोगों में पला था व संगीत की सभी विधाओं में पारंगत भी था। किन्तु जब विरक्ति हुई तो ऐसी कि फिर अतिवाद पर उतर आया। भिक्षुगण मार्ग पर चलते, वह काँटों पर जानबूझ कर चलता। अन्य भिक्षु समय पर सोते, वह रात भर जागता। सब भोजन करते, वह उपवास करता। इस तितिक्षा ने छः माह में उसे सुखा डाला। पैरों में छाले पड़ गए, शरीर जीर्ण-शीर्ण हो चला। जिसे वह तप-तितिक्षा माने बैठा था, वह कोरा अतिवाद व भावुकता थी, पर समझे वह कैसे व माने किसकी?

एक दिन बुद्ध ने पास बुलाकर बिठाया व पूछा कि “तुम तो यहाँ आने से पहले संगीत के अच्छे ज्ञाता रहे हो न?” जवाब हाँ  में मिला। “वीणा से मधुर ध्वनि निकले इसके लिए क्या किया जाता है?” युवक ने उत्तर दिया “तारों को संतुलित रखा जाता है। न अधिक खींचा, न ढीला छोड़ा जाता है।” बुद्ध बोले “भन्ते यही साधना में भी किया जाता है। शरीर भी वीणा के समान है। यदि इसे समत्व स्थिति में रखोगे तो साधना सिद्धि में परिणत भी होगी। तुम कैसे नियम भूल गए?” युवक की समझ में मर्म आ गया।


चेतना का एक अति उच्च आयाम

आइंस्टीन ने समस्त संसार को सात आयामों में सीमाबद्ध बताया है। इसके प्रथम चार आयाम स्थूल जगत का प्रतिनिधित्व करते हैं, जबकि बाद के तीन आयाम सूक्ष्म जगत का। प्रथम को यदि विज्ञान कहें, तो दूसरे को अध्यात्म कहना पड़ेगा। आध्यात्मिक आयाम में व्यक्ति जैसे आत्मिक उन्नति करते हुए प्रवेश करता है, उसे तरह-तरह की विलक्षण अनुभूतियाँ होने लगती हैं। विज्ञान इसे ही चमत्कार कहकर पुकारता है।

वस्तुतः यहाँ चमत्कार जैसा कुछ है नहीं। जो चमत्कार दीखता है, वह अपनी सापेक्षिक दृष्टि होती है और यह परिवर्तित आयाम के कारण उपलब्ध होती है। यदा-कदा जब व्यक्ति इसके कारण किसी उच्च आयाम में कुछ क्षण के लिए पहुँच जाता है, तो उसे ऐसे-ऐसे दृश्य दिखाई पड़ने लगते हैं, जो स्थूल जगत के नियमों के हिसाब से आश्चर्यजनक होते हैं, पर इन्हें असंभव नहीं कहना चाहिए, क्योंकि एक आयाम में जो घटना भूत बन गई है, वह दूसरे में वर्तमान और भविष्य हो सकती है। आध्यात्मिक पुरुषों की अनुभूतियों से इसकी पुष्टि हो जाती है।

विवेकानन्द जब यौवन के प्रवेश द्वार पर थे, उन्हीं दिनों की बात है। एक दिन प्रातः जब वे अपने कमरे में ध्यान कर रहे थे, तो अचानक उनका ध्यान टूट गया। आँखें खुलीं तो सामने की दीवार पर दृष्टि पड़ी। दृश्य देखा तो वे हतप्रभ रह गये। वहाँ चीवरधारी बुद्ध की छवि हाथ में भिक्षा पात्र लिए दीवार छेदती हुई प्रकट हो रही थी। कुछ क्षण तक आकृति मौन खड़ी रही, तदुपरान्त अन्तर्ध्यान हो गई। ऐसे ही एक अन्य अवसर पर उन्हें भगवान नारद के दर्शन हुए थे, जो कुछ आवश्यक बातें बताने के उपरान्त तिरोहित हो गये।

स्वामी रामतीर्थ ने अपने संस्मरण में एक स्थान पर लिखा है कि जिन दिनों वे उत्तराखण्ड व हिमालय क्षेत्र की यात्रा पर थे, उन दिनों एक रोज उनका बड़ा विचित्र हाल हो रहा था। वे भाव की इतनी उच्च अवस्था में थे कि उन्हें यही होश न रहा कि जाना किधर है। वे अपनी कुटिया से विपरीत दिशा में सघन वन की ओर चल पड़े। करीब आधा मील चलने के उपरान्त घना जंगल आ गया। इतने पर भी उनकी भाव-भंगिमा वैसी ही बनी रही। वे लगातार चलते ही चले जा रहे थे । अचानक मार्ग में आदि गुरु शंकराचार्य का चिन्मय विग्रह दिखाई पड़ा जो हाथ के इशारे से उन्हें रुकने का संकेत कर रहा था। जब वे रुके, तो विग्रह ने वस्तुस्थिति समझायी और पीछे लौट जाने को कहा। इसके बाद वह छाया गायब हो गई।

रामकृष्ण परमहंस के एक प्रमुख शिष्य स्वामी शारदानन्द ने एक बार अपने गुरुभाइयों से इस बात का उल्लेख किया था कि जब वे स्वामी विवेकानन्द के आग्रह पर प्रचार कार्य हेतु इंग्लैण्ड आये, तो एक दिन अकस्मात् सामने सुदर्शन चक्र धारी भगवान श्री कृष्ण दिखाई पड़े। उनके चेहरे पर एक दिव्य मुस्कान थी। अभी शारदानन्द कुछ समझ पाते और विवेकानन्द से इसकी चर्चा करते, कि मूर्ति लुप्त हो गई।

इस प्रकार के कितने ही दिव्य दर्शन महापुरुषों के जीवन में घटते ही रहते हैं। इन्हें दृष्टि भ्रम अथवा अवास्तविक कहना ठीक नहीं, क्योंकि वास्तविक-अवास्तविक का सिद्धान्त हमारे द्वारा निर्मित है। जिन घटनाओं को हम स्थूल रूप में घटते देखते हैं, उन्हें वास्तविक और दूसरे को काल्पनिक कह देते हैं, पर चेतनात्मक संसार में इनका कोई अस्तित्व नहीं। वहाँ न तो कुछ वास्तविक है, न अवास्तविक, वरन् सब कुछ शाश्वत व चिरन्तन है। प्रत्यक्ष जगत में वास्तविकता-अवास्तविकता का पैमाना हम स्थूलता को मान लेते हैं। शरीर जब तक जिन्दा रहता है, उसकी सत्ता को स्वीकारते हैं और मरने के बाद सब समाप्त हो गया-ऐसी भ्रांतिपूर्ण धारणा बना लेते हैं।

यथार्थता यह है कि ऐसी घटनाओं के समय आयाम परिवर्तन के कारण हम सर्वथा चेतनात्मक संसार में पहुँच जाते हैं। वहाँ समय का कोई अस्तित्व नहीं। अतः पृथ्वी में जो घटनाएँ घट चुकी होती हैं, वह भी ज्यों-की-त्यों दिखाई पड़ती हैं। विवेकानन्द ने लिखा है कि सामान्य व्यक्तियों की फ्रीक्वेंसी सूक्ष्म सत्ताओं से भिन्न होती है, इसलिए वे उन्हें देखने में असमर्थ होते हैं। जब प्राणों का यही कम्पन दोनों में समतुल्य हो जाता है, तो दिव्य दर्शन प्राप्त होता है। यही आयाम-परिवर्तन है। भावना और चिन्तन चेतना में परिष्कृति द्वारा आयाम का यह बदलाव संभव है। योगीजन इसी प्रक्रिया द्वारा स्वयं को अध्यात्म के उच्च सोपानों में पहुँचाते और जो सामान्यजन देख-सुन नहीं पाते वैसी जानकारियाँ अर्जित करते हैं।


नैतिकता अविच्छिन्न रूप से जुड़ी है-आस्तिकता से

नीतिपरायणता और आस्तिकता दोनों एक दूसरे से घनिष्ठतापूर्वक सम्बन्धित हैं। इनको एक सिक्के के दो पहलू के रूप में जाना जा सकता है। एक को छोड़ देने पर दूसरे को समझना मुश्किल ही नहीं असम्भव प्राय है।

पश्चिम के अधिकांश नीतिशास्त्री इस तथ्य को भुला देने के कारण ही जीवन को सुव्यवस्थित स्वरूप नहीं प्रदान कर पाये। यद्यपि इसके लिए ढेरों प्रयत्न किये गये, प्रेम, भाईचारे की न जाने कितनी बातें सोचीं, लिखी गयीं और पोथियों में प्रकाशित भी हुई पर बालू के महल की तरह भोगवादी वृत्ति, तथा संकीर्ण स्वार्थपरक भावनाओं की लहरों ने इसे बिखरा दिया।

आस्तिकता के बिना नीति सम्बन्धी सवालों का जवाब देना बिल्कुल असम्भव है। एक दूसरे से प्रेम क्यों करें? भाईचारे की भावना को स्थान किसलिए दिया जाय? संयमित व सुव्यवस्थित जीवनक्रम की उपयोगिता क्यों है? ऐसा न करने पर किस प्रकार की हानि होगी? आदि। इन सवालों का समाधान नास्तिकता के धरातल पर किसी तरह नहीं किया जा सकता।

इसके लिए जरूरी है किसी ऐसी चीज की स्थापना जो समूची मनुष्य जाति और प्रकृति में सम्बन्ध सूत्र बताए। साथ ही इनका नियन्त्रण व पालन पोषण भी करे। नैतिक व अनैतिक जीवन की लाभ-हानियों की नियामक हो। ये सारी चीजें तभी सम्भव है जब नियामक तत्त्व जड़ न होकर चेतन हो।

आस्तिक दर्शन ने इसे ही ईश्वर, आत्मा, अमरता के रूप में समझाया है। ईश्वर एक ऐसी चेतन सत्ता है जो सब जगह एक सी व्याप्त है। हम सभी में उसी के एक तत्त्व के समाये होने के कारण एक दूसरे से प्रेम व भाईचारे का व्यवहार बन पड़ता है। इस घनिष्ठ सम्बन्ध के कारण पारस्परिक सहयोग का भाव अत्यन्त स्वाभाविक है। आत्मा इसी का अंश है जो व्यक्तिगत जीवन की संचालक सत्ता है प्रकृति से इसका सम्बन्ध ही जीवात्मा के रूप में जाना जाता है। इसी के द्वारा विभिन्न कर्म किए जाते हैं। जिनके नैतिक-अनैतिक रूपों के अनुसार अच्छे बुरे फल प्राप्त होते हैं। इन परिणामों की समाप्ति वर्तमान जीवन तक ही नहीं है। कभी ऐसा दिखाई देता है कि बुरे कामों को करने वाला सुखी है और अच्छे कामों को करने वाला दुखी। इसकी व्याख्या के लिए अमरता का एवं कर्मफल का सिद्धान्त पर्याप्त है। बुरे कामों को करने वाला इसके परिणाम कर्मों के परिपक्व हो जाने पर अवश्य पाएगा भले ही वह अगले जन्म में ही क्यों न मिलें। अच्छे कर्मों के सन्दर्भ में भी यही बात है। जन्म से लूले-लँगड़े प्रतिभावान इसी आधार पर होते हैं।

यही नहीं लगातार अनैतिक कर्मों का किया जाना जहाँ इसी जन्म में विकास की गति रोककर अधोगामी बनाता है। वहीं आदर्शपरायण सुसंयमित जीवन चेतनात्मक उत्कर्ष में सहायक बनता है। आत्मा की प्रखरता और पवित्रता जीवनक्रम को परम-पावन सक्रिय और सतेज बनाती है।

आस्तिकता के अभाव में मात्र बुद्धि के आधार पर बनाए गए नीति-नियमों को आदमी थोड़े दिनों तक तो पालन करता है। बाद में बुद्धि तरह-तरह के प्रश्न खड़े करती है जिनका कोई समाधान उसके पास नहीं होता। इस कारण उसे यही भ्रमवश उचित लगता है कि इस अंधी दौड़ में भागने से अच्छा है कि शौक मौज का जीवन जिएँ तरह-तरह के सुखों का भोग करें। इस तरह धीरे-धीरे सारे नीति-नियम बह जाते हैं। मनुष्य होने के कारण जहाँ उसे सचेतन और जागरूक होना चाहिए था, वहाँ वह पशु की भाँति मात्र चेतन और प्रकृति प्रेरणाओं पर निर्भर रहने लगता है।

मूर्धन्य मनीषी हाइटहेड ने इसी कारण आस्तिकता की अनिवार्यता सिद्ध करते हुए कहा है कि नैतिकता तभी टिक सकती है जब कि उसे आस्तिकता का ठोस आधार मिले। इसके आधार पर ही मनुष्य आन्तरिक सफाई करता, कषाय, कल्मषों से मुक्त होता, विविध सद्गुणों को अपनाता और नीतिवान बनता है। आस्था के अभाव में मनुष्य व्यक्तित्ववान नहीं बन सकता। सर्वव्यापक सत्ता पर बल देते हुए विख्यात दार्शनिक हरबर्ट स्पेन्सर ने कहा है कि ईश्वर विश्वास से ही अन्तः करण के विकास की महत्वपूर्ण प्रक्रिया की शुरुआत होती है। धीरे-धीरे वह विश्वासी व्यक्ति सारे के सारे नैतिक गुणों का घनीभूत पुँज बन जाता है। निश्चित ही नैतिकता का वास्तविक उद्देश्य आस्तिक बनने से पूरा हो जाता है।

स्वार्थपरता की संकीर्ण मनोभूमि में ही अनैतिकता फूलती फलती है। जब तक इस प्रकार की मनोभूमि बनी रहेगी, अनैतिकता के कम या दूर होने की बात तो दूर, उलटे इसे बढ़ावा मिलता रहेगा। सर्वव्यापी सत्ता पर विश्वास से आत्मीयता के विस्तार की प्रक्रिया शुरू होती है। मनुष्य संकीर्णता के दायरे से ऊपर उठ जाता है। उसका हृदय प्राणि मात्र के प्रति प्रेम से भर जाता है। फिर इसमें घृणा-विद्वेष का कोई स्थान नहीं रह जाता।

मनुष्य सही माने में नैतिक, चरित्रनिष्ठ, कर्तव्यपरायण बने, यह मात्र बौद्धिक तर्कों के सहारे सम्भव नहीं। इसके लिए भाव सम्वेदनाओं को उभारना होगा। इसके लिए आस्तिकता के उन तथ्यों को अपनाना जरूरी है जो मानवीय सम्वेदनाओं के मर्मस्थान को स्पर्श करते हैं। क्योंकि नीति सिद्धान्त अपनी समूची तार्किकता के बाद भी दिमाग को ही छू पाते हैं दिल तक उनकी किसी तरह पहुँच नहीं। नीतिशास्त्र का आधार तर्क है, जबकि आस्तिकता का विवेक। विवेक-भावना और तर्क का समन्वित रूप है। इसका संचालन बुद्धि के स्थान पर हृदय से होता है।

नीतिशास्त्र का वैचारिक मन्थन जीवनक्रम में आमूल-चूल परिवर्तन के लिए काफी नहीं है। विचारों से बुद्धि में परिपक्वता आती है जानकारी बढ़ती है। पर उसका प्रभाव अन्तस् पर नहीं के बराबर पड़ता है। आस्तिकता भावनाओं को छूती है। इसके अवलम्बन से जीवनक्रम में आमूल-चूल परिवर्तन लाकर आदर्शपरायण बनना सहज है। दर्शनशास्त्री देकार्त ने इसे बुद्धि का प्रकाश कहा है। जिससे तमाम तरह के संदेहों से छुटकारा मिलता है। जीवन के विकास की गति तेज हो जाती है।

पाश्चात्य दार्शनिक काण्ट के अनुसार-मनुष्य को नैतिक बनाने के लिए ईश्वर को मानना आवश्यक है। इसके बिना उसे नीतिपरायण नहीं बनाया जा सकता। ईश्वर सारी नैतिक विशेषताओं एवं उच्चस्तरीय आदर्शों का एकीकृत पुँज है। इस विश्वास के साथ अवलम्बनकर्त्ता भी धीरे-धीरे वैसा ही बनता जाता है। दैनिक जीवन में ऐसे तमाम उदाहरण मिलते हैं जिनसे पता चलता है कि ईश्वरपरायण व्यक्ति नैतिक दृष्टि से सामान्य लोगों से कहीं अधिक बढ़े-चढ़े होते हैं। वह कहीं अधिक शांति, सन्तोष की उपलब्धि करने में समर्थ होता है। महर्षि रवीन्द्रनाथ टैगोर के अनुसार ईश्वर विश्वास स्वयं में एक सृजनात्मक शक्ति है, जो हमेशा पारस्परिक सेवा व सहयोग के फूलों का चयन करती है। इससे आदमी खुद ही नीतिपरायण बनता और दूसरों को भी अपने अनुसरण की प्रेरणा प्रदान करता है। सामान्य व्यक्ति के लिए ईश्वर इस संसार का निर्माता, पोषक और संहारक बन सन्मार्ग अपनाने और उस पर बढ़ चलने के लिए प्रेरणा का स्रोत है। असामान्य व्यक्ति उस सत्ता को आदर्शों एवं सिद्धान्तों के प्रकाश पुँज के रूप में देखता है। उसी के अनुरूप स्वयं को ढालने का प्रयास करता है।

मनोवैज्ञानिक दृष्टि से विचार करने पर पता चलता है कि किसी न किसी रूप में हर आदमी की चाहत है कि उसका अपना कोई संरक्षक हो, जो समर्थ हो उसे मार्गदर्शन दे और सहयोग करे। ऐसी समर्थ सत्ता परमात्मा के सिवा और कौन हो सकती है? जो मनुष्य को हर समय सूक्ष्म संरक्षण प्रदान कर सके। इसी भाव की व्याख्या करते हुए मनोविज्ञानी कार्ल गुस्ताव युँग का मानना है कि आस्तिकता इसी तरह संरक्षण प्रदान करती है जैसे नन्हे-मुन्ने शिशु के लिए माँ की गोद। इसी के समग्र विकास से नैतिक सत्य का ज्ञान होता है। यह ठीक है कि हम बाद में उसके विचार विमर्श से विभिन्न कारण एवं तर्कों की खोज कर लें। जिसका जीवन इसके अनुसार संचालित होता है वह अपने जीवन को कवि या कलाकार की भाँति कविता या चित्रों में नहीं दर्शाता, वरन् एक उच्चतर किस्म के व्यवहार में अभिव्यक्त करता है।

बात भी सही है। आस्तिक बनने का मतलब ईश्वर-ईश्वर की रट लगना नहीं है। इसका सही अर्थ यही है कि हम ईश्वर को सर्व व्यापक मानकर सभी में उसी की अनुभूति करें। यह अनुभूति व्यावहारिक धरातल पर प्रेम स्नेह, भाईचारे के रूप में प्रकट होती है। आत्मा को ईश्वर का अंश मानकर उसे सद्गुणों के समुच्चय के रूप में माना जाय। इन्हीं सद्गुणों को एक-एक करके व्यवहार में लाना होगा। साथ ही इस तथ्य पर विश्वास करना होगा कि वर्तमान जीवन विकास यात्रा का एक कदम है न कि इसकी समाप्ति। धीरे-धीरे किन्तु लगातार विभिन्न गुणों के द्वारा अपने आधार व व्यवहार को सजाना होगा। आचरण व व्यवहार को इस तरह ढालना ही सही माने में आस्तिक बनना है। इस प्रयास में जुटे लोगों की नैतिकता तर्क-कुतर्क व पोथियों के पन्नों में कैद नहीं रहती। अपितु इसका उच्चतर स्वरूप अपनत्व के भाव तथा चिन्तन कर्तृत्व की उत्कृष्टता के रूप में प्रकट होता है। जीवन को सही ढंग से गढ़ कर सर्वांग सुन्दर बनाना इसी के द्वारा सम्भव है।


संघर्ष एक उच्चकोटि का मनोरंजन

जीवन के साथ जुड़ी हुई सच्चाइयों में एक ‘संघर्ष’ भी है। आत्मरक्षा भी इसके बिना नहीं हो सकती। मक्खी-मच्छरों से लेकर साँप-बिच्छुओं तक कीड़े-मकोड़े भी इस ताक में रहते हैं कि दाँव लगे तो आक्रमण का मजा चखाएँ। हवा और पानी में ऐसे विषाणु तैरते रहते हैं कि उन्हें जीवन के लिये चुनौती ही कह सकते हैं। खटमल, पिस्सू, जूँ आदि अपनी ही दुरभि-संधियाँ रचते रहते हैं। चोर-ठगों की कमी नहीं। आतंकवादी, अनाचारी इस फिराक में रहते हैं कि जहाँ रोकथाम में शिथिलता हो, वहाँ प्रवेश करके लाभ उठायें। परजीवियों की इस दुनिया में कमी नहीं। सिंह, व्याघ्र जैसे हिंसक जीव निरपराध शाकाहारियों का भक्षण करते रहते हैं। शोषण, अपहरण, उत्पीड़न कितना ही हेय क्यों न हो, पर उसके अस्तित्व से इंकार नहीं किया जा सकता। पूर्व संचित कुसंस्कार जब तब उभरते ही रहते हैं। प्रचलन में समाविष्ट अवांछनीयता इतनी समर्थ होती है कि भोले जनों को चपेट में लेते उसे देर नहीं लगती। इन सबसे संघर्ष किये बिना कोई चारा नहीं। समर्पण कर देने पर वे अपने-अपने जाल में फँसाये बिना रह ही नहीं सकती।

दया, करुणा, अहिंसा, क्षमा आदि उच्चस्तरीय सद्गुणों का भी महत्व है, पर देखा जाता है कि कैसे वे अपने सजातियों पर भी प्रभाव छोड़ने में समर्थ होते हैं। दानवी प्रकृति इतने भर से द्रवित नहीं होती वरन् उलटे कायर डरपोक, कमजोर समझकर दूने उत्साह से आक्रमण करती है। प्रतिरोध का खतरा कम देखने पर अनाचारियों के हौसले और भी अधिक बुलंद हो जाते हैं। इस वास्तविकता को समझते हुए प्राणियों ने यह सहज स्वाभाविक रीति अपना रखी है कि जहाँ गुंजाइश हो, आक्रामक के विरुद्ध लड़ाई ठान देना और जहाँ इसमें बात बनती न हो, वहाँ भाग खड़े होना। प्राणी जगत में यह नीति सर्वत्र अपनायी जाती देखी जाती है। इसलिये आत्म-रक्षा को जीवन्त प्रश्न मानते हुए हर समझदार को उसके लिये सन्नद्ध रहना चाहिए ।

संघर्ष में मात्र खतरा ही खतरा होता तो कोई भी उसके लिये तैयार न होता और आक्रान्ताओं का बोलबाला दिखाई पड़ता। यह संसार भले-बुरे दोनों तत्वों से मिलकर बना है। यहाँ काँटे भी हैं और फूल भी। निविड़ निशा का अंधकार भी है और दिनमान का प्रखर प्रकाश भी। उदार नीति की, सेवा सहायता में रस लेने वालों की भी कमी नहीं पर यदि आक्रान्ताओं को परास्त करने वाली सैन्य सज्जा न हो तो सीमा मर्यादा अक्षुण्ण न रहे। इसलिये अन्यान्य स्वाद के साथ भोजन में तीखेपन को स्थान दिया गया है और सब रसों में एक उसे भी गिना गया है।

गर्भाधान प्रक्रिया एक प्रकार का संघर्ष ही है। प्रसव काल में बच्चे को बलपूर्वक अपने बन्धन काटने पड़ते हैं। स्तनपान के समय भी उसकी चूसने की क्षमता ही क्षुधा निवारण करती है। धरती का पेट चीरकर हम अन्न उगाते हैं। पशुपालकों को कठोर, निर्दयी बर्ताव करना पड़ता है। गन्दगी हर क्षेत्र में निरन्तर उत्पन्न होती है। वह अपने आप आती है, पर चली नहीं जाती। सफाई के लिये अनेक सरंजाम जुटाने पड़ते हैं। अशिक्षा, दरिद्रता, मूढ़ता, प्रमाद के सहज प्रतिफल हैं। प्रगति के लिये पराक्रम, पुरुषार्थ और दुस्साहस को अपनाया न जाय, तो दुर्गति से उबरना कदाचित् ही किसी के लिये संभव हो। मनुष्य ने प्रगति के इस स्तर तक पहुँचने के लिये न जाने अवरोधों के कितने समुद्र और कितने पर्वतों पर चढ़ने के लिये असाधारण प्रयास किये हैं। इसे संघर्ष की प्रतिक्रिया ही कह सकते हैं। श्वास-प्रश्वास में, आकुंचन-प्राकुंचन में जीवित रखने की क्षमता है। चेतना जब भी इस पौरुष में अपनी असमर्थता व्यक्त कर देती है, तभी उसका प्राणान्त हो जाता है।

प्रगति की आकांक्षा के साथ ही संघर्ष का साहस जुड़ा हुआ है। दोनों एक-दूसरे के साथ अविच्छिन्न रूप से जुड़े हुए और साथ-साथ काम करते देखे जाते हैं। इंकार करने पर दुर्गतिकारी पराजय ही शेष रह जाती है। ईश्वर भी सिर्फ उनकी सहायता करता है, जो अपनी सहायता आप करने के लिये कटिबद्ध होते हैं, अन्यथा कचरे को बहार फेंकना ही इस सृष्टि का नियम है। मनुष्य आना-कानी करे तो घनघोर वर्षा और आँधी-तूफान अपनी ओर से अनुपयुक्त को हटाने के लिये जोर लगाते हैं।

मनोरंजन में हास्य, विनोद की सहज मनभावन प्रक्रिया से तो सभी परिचित हैं और खेल-खिलवाड़ कौतुक, कौतूहल हास-परिहास आदि के रूप में उसे जहाँ-तहाँ ढूँढ़ते और जाते रहते हैं। इतने पर भी वह छोटे दर्जे की बालक्रीड़ा ही बनीं रहती है। सम्पन्न, भावुक या आलसी ही उसका यत्किञ्चित् अनुभव कर पाते हैं। इसके अतिरिक्त प्रौढ़ता का परिचायक एक और पक्ष रह जाता है-शौर्य साहस का प्रदर्शन। संघर्ष के स्वयंवर में ‘विजयश्री’ का वरण इसके लिये अनौचित्य से दो-दो हाथ करना आवश्यक हो जाता है। उसे छोड़ कर भागने पर प्रगति नहीं। तब बहादुरों की तरह न सही कायरों की मौत तो मरना ही पड़ता है।

संघर्ष भी मनोरंजन का एक महत्वपूर्ण पक्ष है। पहलवान आपस में लड़ें नहीं, एक ने-दूसरे को पछाड़ा नहीं तो दर्शक दंगल देखने क्यों पहुँचे और विजेता को यश पुरस्कार का लाभ कैसे मिले? खेल आयोजनों में हार-जीत ही दर्शकों को दूर-दूर से घसीट लाती है। सैनिकों की दिनचर्या युद्ध काल न होने पर भी आक्रमणों और बचाव से जुड़ी हुई देखी जाती है। श्रमिक, विद्यार्थी, कृषक, व्यवसायी जो कुछ पाते हैं, उसके लिये उन्हें एक नहीं अनेकानेक श्रम संघर्षों के बीच होकर गुजरना पड़ता है। लोक नेतृत्व करने वाले महापुरुषों में प्रत्येक ने अवांछनीयता के साथ संघर्ष किया है। तभी उन्हें तपे सोने जैसी मान्यता मिली है। तपस्वियों का तो तितिक्षा ही प्रधान अवलम्बन होती है, उसी की प्रखरता के बल पर वे सिद्ध पुरुष का पद पाते हैं।

संघर्ष के अवसर ढूँढ़ निकालने के लिये समग्र मनोरंजन के इच्छुकों को कटिबद्ध होना पड़ता है। वे अनीति के विरुद्ध लड़ते हैं। अवांछनीयताओं से टक्कर लेते हैं। अनौचित्य से लड़ने के लिये उनकी भुजाएँ फड़कती रहती हैं। राम ने वनवास काल में ऋषियों के अस्थि समूह देखे तो उनने भुजा उठाकर “निशिचर ही करौं महि” की प्रतिज्ञा की थी और उसे पूरा करके भी दिखाया।

संघर्ष मनोरंजन में ठीक तरह खेलने की एक ही शर्त है कि मानसिक संतुलन हर स्थिति में अक्षुण्ण बनाये रखा जाय। नफा-नुकसान का बहीखाता न फैलाया जाय। कोई सेनापति अपने घनिष्ठ साथियों के मारे जाने पर यदि धैर्य खोने और विलाप करने लगे तो समझना चाहिए कि आगे का युद्ध संचालन कर सकने में वह असमर्थ हो गया। राणा साँगा के बारे में कहा जाता है कि उनके सारे शरीर में अस्सी गहरे घाव लगे थे, फिर भी मरते दम तक वे तलवार चलाते रहे। भीष्म पितामह ने पूरा शरीर बाणों से छिदा होने पर भी मौत को वापस लौट दिया था और कहा “मेरे इच्छित समय उत्तरायण काल आने पर तुम आना और खुशी-खुशी ले चलना।”

ईसा के लिये शूली एक मजाक थी। सुकरात ने जहर का प्याला हँसते-हँसते पिया। मंसूर को शूली पर चढ़ते समय तनिक भी गम नहीं था। भारतीय क्रान्तिकारियों में से कितनों ने ही फाँसी का फन्दा अपने हाथों बाँधा और गीता की पुस्तक हाथ में लिये हुए फाँसी के तख्ते पर झूल गये, यह उदाहरण हैं, जो बताते हैं कि अनीति के साथ संघर्ष करने में जीत की तरह हार के दृश्य भी देखने को मिल सकते हैं। पर इससे क्या? सटोरिये आये दिन लाखों का वारा न्यारा करते हैं, पर माथे पर शिकन नहीं आने देते। लंका युद्ध में लक्ष्मण को भी तो मूर्छित होना पड़ा था। पाण्डवों ने कितने लम्बे मुसीबत के दिन काटे थे। नल दमयंती के वनवास की कथा सभी को विदित है इतने पर भी इनमें से किसी ने न तो धर्म खोया और न पीछे पग हटाने की बात सोची। संघर्ष की चुनौती भी एक प्रकार का परीक्षाकाल है, जिसमें वे ही विद्यार्थी उत्तीर्ण होते हैं, जो मनोबल बनाये रहते हैं। हड़बड़ी में जीतने वाले भी अक्सर जीती बाजी हारते देखे गये हैं।

जीवन में पग-पग पर चुनौतियाँ भरी पड़ी हैं। अवांछनीयताओं से रहित भीतर और बाहर का कोई क्षेत्र खाली नहीं। परिस्थितिजन्य विपदाएँ आती रहती हैं। इनसे सर्वथा अछूते बचे रहना किसी के लिये भी संभव नहीं। अपने-अपने ढंग से हर किसी को जूझना पड़ता है। इसलिये तत्त्ववेत्ताओं ने जीवन को संघर्ष का प्रतीक माना है। इस मोर्चे को छोड़ भागने पर कोई गति नहीं। आगे कुआँ और पीछे खाई। इसलिये चैन के दिन गुजारने और शान्ति की खोज में भटकने वालों में से हर एक से कहा जाना चाहिए कि अशान्ति को परास्त करने के उपरान्त जो शान्ति मिलती है, वही सच्ची शान्ति है। संघर्ष को भी एक उच्चकोटि का मनोरंजन ही मानकर चलना चाहिए शौर्य, साहस और धैर्य की इसी कसौटी पर परीक्षा होती है।


सविता की उपासना हर दृष्टि से विज्ञान सम्मत

निरुक्त (2/2/8) में आदित्य का एक नाम ‘भरत’ बताया गया है। इस प्रकार भारत का अर्थ हुआ आदित्य की ज्योति एवं उसकी उपासना करने वाला। इसका दूसरा अर्थ हुआ वह देश जहाँ सविता की उपासना होती हो। इस प्रकार अपने देश का नाम भारत पड़ने का एक यह भी हेतु हो सकता है।

किन्तु यहाँ प्रतिपाद्य विषय न तो नामकरण संबंधी विवाद है और न इससे जुड़ा कोई अन्य प्रश्न वरन् मूल सवाल यह है कि आरंभ में जब अपना देश अध्यात्म सम्पन्न था और सम्पूर्ण विश्व को तत्संबंधी मार्गदर्शन करने का महत्वपूर्ण बीड़ा उठाया और उसे सफलतापूर्वक सम्पन्न कर दिखाया था, तो आज उसकी यह दुर्गति क्यों व कैसे हुई? वर्तमान में इसकी दुरावस्था के कारण इसकी संज्ञा चाहे कुछ भी दी जाय, किन्तु भूतकाल की इसकी आध्यात्मिक सम्पन्नता को देखते हुए इसे विश्व-शिरोमणि की उपमा दे देना कोई अत्युक्ति जैसी बात न होगी। इस संदर्भ में भारत-भारती खण्ड-काव्य में विश्व को इसके अजस्र अनुदान की एक बानगी दृष्टव्य है। मैथिलीशरण गुप्त लिखते हैं-भारत-गगन में उस समय फिर एक वह झंडा उड़ा, जिसके तले आनन्द से आधा जगत आकर जुड़ा।” यह क्रम आगे भी जारी रहा और एक ऐसा समय आया, जब भारत का अध्यात्म यहाँ के क्रान्ति-दूतों द्वारा विश्व के कोने कोने में फैला दिया गया। इसे भारतीय अध्यात्म जगत का मध्ययुगीन स्वर्णकाल कहा जा सकता है। फिर पश्चिमी देशों से पतन की शुरुआत हुई एवं शृंखला की कड़ी की तरह टूटती, बिखरती गौरव-गरिमा भारत भूमि तक आ पहुँची एवं तमिस्रा अमावस-निशा की तरह यहाँ भी गहराने लगी। आज उसी का परिणाम हम विभिन्न रूपों में भुगत रहे हैं किन्तु इतना सबके बावजूद भी यह नहीं कहा जा सकता कि अध्यात्म अपने देश में सर्वथा मर गया। हाँ, इतना अवश्य है कि उसमें समय के साथ-साथ संशोधन न होने के कारण विभिन्न प्रकार की कुरीतियों, मूढ़-मान्यताओं और अन्ध परम्पराओं के घुस पड़ने से उसकी छवि धूमिल और स्वरूप विकृत हुआ है, पर यह कहना एकदम समीचीन न होगा कि अपने यहाँ से अध्यात्म बिल्कुल उठ गया। यहाँ अभी भी प्रज्ञा, निष्ठ और आस्था की त्रिवेणी अक्षुण्ण बनी हुई है, जिसे अध्यात्म का हृदय-स्थल माना जाता है।

यहाँ यह प्रश्न उठ सकता है कि आखिर वे कारण क्या हैं, जिससे आध्यात्मिकता हर काल में इस भूमि में न्यूनाधिक बनी रहती है? गहन अध्ययन-अन्वेषण के उपरान्त जिस एक निष्कर्ष पर पहुँचा गया, वह है सविता-देव की कृपा-दृष्टि और भारत-भूमि की विशिष्ट भौगोलिक स्थिति। इन्हीं दो कारणों से यह भूखण्ड सदा-सर्वदा देव-तत्वों से परिपूरित रहता है। कभी भी सर्वथा इनसे छूँछ नहीं होता। मूर्धन्य मनीषी आचार्य चतुरसेन शास्त्री अपने संस्मरणात्मक ग्रन्थ “यादें” के शोधपूर्ण निबन्ध “ब्रॉडकास्ट” में लिखते हैं कि भारत के पास से होकर गुजरने वाली विशिष्ट भूचुम्बकीय रेखाएँ इसके कुरुक्षेत्र स्थान को बिल्कुल स्पर्श करती हुई गुजरती है जिससे प्राचीनकाल में दिनमान एवं सूर्योदय-सूर्यास्त की सही घटक गणना कुरुक्षेत्र के ही मध्यबिन्दु से होती थी तथा यही उन दिनों समस्त एशिया एवं विश्व का ‘ग्रीनविच’ था।

आर्ष वांग्मय में इस बात का स्पष्ट उल्लेख है कि जिस सूर्य को आकाश में हम जलते हुए गोले व स्थूल पिण्ड के रूप में देखते हैं, वह तत्त्वतः वैसा है नहीं। वह चेतना और प्राण का केन्द्र है और समस्त संसार के जड़-चेतन वस्तुओं की उसे आत्मा कहा गया है। वैदिक ऋषि का स्पष्ट उद्घोष है-सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुश्च” (ऋ+तक 1/115/1, यजु 7/42)। यदि सूर्य का अस्तित्व न रहे, तो सारी दुनिया नष्ट हो जाय। आप्तवचन इस बात के भी प्रमाण हैं कि सूर्य में हजारों-हजार प्रकार की रश्मियाँ हैं। इस संदर्भ में उपनिषद् की ऋचा कहती है-सहस्ररश्मिः शतधा वर्तमानः प्राणः प्रजानामुदयत्वेष सूर्यः” प्रश्नोप-/ सूर्य गायत्री भी इसी की पुष्टि यह कहते हुए करती है- “आदित्याय विद्महे सहस्रकिरणाय धीमहि तन्नो सूर्यः प्रचोदयात्”। यह बात और है कि पदार्थ विज्ञान ने अब तक सूर्य के स्थूल सूक्ष्म सिर्फ नव किरणों का ही पता लगा पाया है। “बैनीआहपीनाला” के रूप में सात स्थूल किरणें एवं अल्ट्रा सायलेट (जिसे वेदों में ‘एतश’ अथवा ‘नीलग्रीव’ के नाम से पुकारा गया है) तथा इंफ्रारेड नामक दो सूक्ष्म स्तर की किरणें। यही कुल नव किरणें हैं, जिन्हें हम आज जानते-मानते हैं, किन्तु हमारे प्राचीन विकसित विज्ञान ने सूर्य की सहस्रों सूक्ष्म रश्मियों को ढूँढ़ निकाला था एवं पृथ्वी के पृथक्-पृथक् भूखण्डों पर पड़ने वाले इनके प्रभावों का पदार्थ एवं प्राणियों पर अध्ययन किया था। उसके अनुसार इन सौर शक्ति-किरणों के बाद में दा प्रवाह बन जाते हैं-दिति और अदिति। इनके साथ इनकी नायक शक्तियाँ भी विद्यमान होती हैं (यजु. अ. 25 मं. 23 ॥) अदिति प्रवाह पर मित्र और दिति पर वरुण का साम्राज्य होता है। मित्र प्राणवायु का पोषक और सात्विकता लिए होता है, जबकि वरुण प्राणवायु को नष्ट करने वाला और तामसिकता को धारण किये होता है। इसी कारण से वरुण को यम अथवा विष-प्राण की संज्ञा दी गई है।

उक्त दो प्रवाहों के दो सर्वथा विपरीत गुण के कारण ही दिति-अदिति प्रवाहों को क्रमशः असुर व देवप्रवाह से अभिहित किया गया है (यजु. अ. 8 मं. 61॥)। इस संदर्भ में श्रुति (यजु. अ. 17 मं. 40, यजुः अ. 8 मं. 37) कहती है कि देव प्रवाह से देव-सेना की देव-शक्तियाँ प्रकट होती हैं एवं असुर प्रवाह से तामसिक वृत्ति वाली असुर शक्तियाँ। यह दोनों शक्तियाँ अंतरिक्ष एवं पृथ्वी पर सदा प्रवाहमान होती हैं। आप्त ग्रन्थों के अनुसार दिति अर्थात् असुर प्रवाह आकाश में पूर्व से पश्चिम की ओर बहता है और पश्चिम से पृथ्वी पर आता है। इसी कारण से पश्चिमी देशों में तामसिक वृत्ति की अधिकता पायी जाती है, जबकि देव शक्तियों का अधिष्ठाता अदिति प्रवाह पश्चिम से पूर्व की ओर बहता है एवं पूर्व से पृथ्वी पर अवतरित होता है तथा भूमंडल पर प्राची से प्रतीची की ओर प्रवाहित होता रहता है। पृथ्वी पर जहाँ यह दोनों शक्तियाँ परस्पर मिलती हैं, वहीं से ऊपर की ओर उठ कर अपने-अपने आकाशस्थ प्रवाह में समाहित हो जाती हैं। पूर्वी देशों में इन देव शक्तियों के निरन्तर प्रवाह के कारण ही इनमें सात्विकता और आध्यात्मिकता पश्चिमी देशों की तुलना में अधिक और हर काल में न्यूनाधिक बनी रहती हैं।

आधुनिक अनुसंधान भी इस बात का प्रमाण प्रस्तुत करता है कि सौर मंडल से एक सूक्ष्म प्रवाह अनवरत भारत में कुरुक्षेत्र वाली भूमि के आस-पास से उतरता है और वहाँ से पूरे देश एवं अड़ोस-पड़ोस में फैल जाता है। संभवतः अधुनातन अन्वेषण का यह प्रवाह वही अदिति शक्ति हो, जिसे आर्षग्रन्थों में देव-प्रवाह के नाम से पुकारा गया है।

अब यहाँ एक प्रमुख प्रश्न यह उठ खड़ा होता है कि यदि उपरोक्त बातों में तनिक भी सच्चाई है और देव-शक्ति गुण-धर्म वाला कोई प्रवाह भारत-भूमि पर सूर्य किरणों के साथ उतरता है, तो फिर आज यहाँ के लोगों के चिन्तन, चरित्र व व्यवहार में वह सात्विकता क्यों नहीं दिखाई पड़ती जो पूर्वकाल में यहाँ की प्रधान विशिष्टता रही थी? आधुनिक शोधकर्मी इसके दो प्रधान कारण बताते हैं-प्रथम तो यह कि अब वायुमंडल इतना प्रदूषित हो चुका है और उसमें तरह-तरह के विषैले तत्त्वों व गैसों की इतनी भरमार हो चुकी है कि उस सूक्ष्म देव-प्रवाह के आवागमन में व्यतिरेक उत्पन्न होता है और अब वह उस परिमाण में नहीं आ पाता, जितना प्राचीन समय में इनकी अनुपस्थिति और वायुमंडल की शुद्धता की स्थिति में आता था। द्वितीय, जो इस देव-प्रवाह का उद्गम स्रोत है उसे हम जलता हुआ अग्नि पिण्ड मात्र मान कर उसकी अवमानना एवं उपेक्षा कर रहे हैं, जबकि वास्तविकता इससे सर्वथा विपरीत है, वह चेतना का पिण्ड है और समस्त संसार को जाग्रत-जीवन्त बनाये रखता है। इस संबंध में छान्दोग्य उपनिषद् (3/19/3) का कथन है-आदित्यो ब्रह्मेत्यादेशस्तस्योप व्याख्यानम् सदेवेदमग्र आसीत् “ अर्थात् भूः से द्यु तीनों लोकों को अपनी रश्मियों से जीवन देने साले सूर्य ही सबकी आत्मा हैं।

पूर्ववर्ती युगों में वर्तमान विपत्ति के उपरोक्त दोनों ही कारण अनुपस्थित थे, अस्तु आध्यात्मिकता समस्त भूखण्ड पर विद्यमान थी। भारत में तो फिर भी सूर्य सद्यः देवता के रूप में पूजित है। अतएव वायुमंडलीय प्रदूषण के बावजूद भी सविता देवता की कुछ देव-किरणें आ जाती हैं एवं कुछ हद तक सात्विकता को अब भी अक्षुण्ण बनायी हुई हैं, किन्तु पश्चिमी देशों में जहाँ दिनमान को मात्र आभा और ऊर्जा प्रदान करने वाला स्थूल पिण्ड भर माना जाता है, दिति (असुर) शक्ति-प्रवाह की घनघोर वर्षा से पैशाचिकता में ही अभिवृद्धि हो रही है। सूर्य विज्ञान रहस्य के मर्मज्ञ स्वामी विशुद्धानन्द का भी यही मत है कि यदि किसी क्षेत्र में पापाचार, व्यभिचार, अनाचार जैसे अनैतिक कृत्य पनपते-उभरते हैं, तो इसमें भी सूक्ष्म सूर्य किरणों का हाथ है और यदि किसी भूखण्ड विशेष में दया, ममता, करुणा, उदारता जैसी, सात्विक वृत्तियाँ दिखाई पड़ती हैं, तो इसके लिए भी उस स्तर की सूर्य रश्मियाँ कही जिम्मेदार हैं।

सूर्य वास्तव में देवता है क्या, जिसमें प्रसन्नता-अप्रसन्नता के भाव विद्यमान हों? हिन्दुओं के इस मत की विश्वसनीयता जानने के लिए सन् 1980 में कैलीफोर्निया यूनिवर्सिटी के विज्ञान के एक प्रोफेसर सर ए. के. जार्ज ने एक प्रयोग किया। वे जून की एक दुपहरी में नंगे शरीर पाँच मिनट तक चिलचिलाती धूप में बैठे रहे। तत्पश्चात् कमरे में शरीर का तापमान नापा, तो वह तीन डिग्री ज्वर बता रहा था। दूसरे दिन पूरी श्रद्धा-भावना के साथ सूर्य की पूजा की, धूप-दीप दिखाया, फल-फूल-नैवेद्य चढ़ाये, तदुपरान्त मध्याह्न के समय नंगे बदन ग्यारह मिनट तक सूर्य के समक्ष बैठे रहे। इसके पश्चात् पुनः कमरे में जाकर शरीर का तापमान नापा। उन्हें यह देख कर भारी अचम्भा हुआ कि इस बार सूर्य के सम्मुख अधिक देर तक बने रहने पर भी शरीर का तापक्रम सामान्य था। इससे उनकी यह भ्रान्ति समाप्त हो गई कि हिन्दू संस्कृति में यदि सूर्य को देवता माना गया है, तो इसमें कोई आश्चर्य जैसी बात नहीं है, यह सारा विवरण उनने तथ्यों और वैज्ञानिक प्रमाणों पर आधारित अपनी पुस्तक “सन द् हिन्दूज् डायटी” में प्रकाशित किया है। इस प्रकार अब धीरे-धीरे पश्चिमी लोग भी इस बात को स्वीकारने लगे हैं कि हिन्दू संस्कृति के सूर्य, चन्द्र स्थूल पिंड मात्र नहीं वरन् चैतन्य देव-शक्तियाँ हैं, और उनमें कुंजित होने और खुश होने के भाव विद्यमान हैं। इन्हीं वैज्ञानिक कारणों से प्राचीन समय में सर्वत्र विश्व में सूर्योपासना होती थी, जिसके प्रमाण आज के पुरातत्त्ववेत्ता उत्खनन के दौरान उपलब्ध सूर्य-मन्दिरों और मूर्तियों द्वारा प्रस्तुत कर रहे हैं।

पिछले दिनों कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी, लंदन में सूर्य पर एक व्याख्यान आयोजित किया गया था, जिसमें समस्त विश्व के वैज्ञानिक एवं पुरातत्त्ववेत्ता आमंत्रित थे। इस व्याख्यान में इस बात की पुष्टि हो गई कि पुराने समय में पूरी दुनिया में सूर्य की उपासना होती थी। पुरातत्त्ववेत्ताओं ने अनेक ऐसे साक्ष्य प्रस्तुत किये, जिसने उक्त कथन पर सच्चाई की मुहर लगा दी। इन्हीं में से एक अमेरिका के ग्रीनलैण्ड स्थित वह प्रदेश है, जहाँ कुछ वर्ष पूर्व खुदाई के दौरान सूर्य-प्रतिमा के समक्ष, उसकी फूल-फलों व सुगंधित द्रव्यों से उपासना करते हुए एक उपासक बैठा मिला था। यह सब पत्थरों पर खुदा हुआ था इसके अतिरिक्त संगोष्ठी में कितनी ही ऐसी साक्षियाँ सामने रखी गयीं, जो यह सिद्ध करती थीं कि ईसवी संवत् से छः हजार वर्ष पूर्व से 140 ईसवी तक समस्त संसार में सूर्योपासना होती थी। पर्सियन चर्चों के “मित्रा” ग्रीकों के “हेलियस,” रेड इंडियनों के “एतना” प्राचीन जापानियों के इज्ना-गी मिश्रियों के “रा” तातारियों के “फ्लोरस” पेरु के “फुलेस” चीनियों के “उ.ची.” अफ्रीकियों के “विले” नव सेण्टो ईजमके “एमिनो” “मिनाक” “नाची” आदि देवता प्रकारान्तर से सूर्य के रूप में ही पूजित-उपासित थे। भारत में मथुरा, मुल्तान, कश्मीर, कोणार्क, उज्जयिनी, गया, आदि स्थान सूर्योपासना के मुख्य केन्द्र थे, जिनमें से कुछ जगहों पर अब भी इनके भग्न पूजागृह विद्यमान देखे जा सकते हैं।

एक बार फिर से उस लुप्त परम्परा का पुनरुद्धार भारत से गायत्री और यज्ञ के द्विधा प्रचलन के शुभारंभ के रूप में किया जा रहा है। दोनों के माध्यम से उसी सविता देवता की उपासना द्वारा उसके उन्हीं सूक्ष्म किरणों को आकर्षित-अवशोषित करने का प्रयास किया जाता है जिसने हमें कभी धन धान्यों से परिपूर्ण और नैतिकता के उच्वच मानदण्डों से ओत-प्रोत बनाया था, जिसके कारण हम कभी विश्व का आध्यात्मिक मार्गदर्शन करने में सक्षम हुए थे। गायत्री प्रत्यक्षतः सूर्य की उपासना तो है ही, इसके युग्म यज्ञ द्वारा उसी क्रिया को परोक्ष रूप से सम्पन्न कर हम सविता देव की कृपा दृष्टि के भाजन बनते हैं, किन्तु प्रत्यक्षतः तो वह पर्यावरण परिशोधन का ही प्रमुख उपचार है। इस प्रकार प्राचीनकाल की दोनों क्रियाएँ वातावरण परिशोधन एवं सविता-अभिवन्दन साथ-साथ सम्पन्न होने से एक बार पुनः हम उस खोयी गौरव-गरिमा की पुनः प्राप्ति और विश्व को मार्गदर्शन करने की दिशा में दिव्य वरदान की तरह उभरते और तेजी से अग्रसर होते हुए बढ़ते चले जा रहे हैं। अस्तु अगले दिनों यदि इनके द्वारा भारत विश्व का मुकुटमणि बन जाय तो हमें आश्चर्य नहीं करना चाहिए, वरन् यही माना जाना चाहिए कि यह सब उस विस्मृत सविता-देवता की प्रसन्नता का सुखद सत्परिणाम है।


प्राणरक्षक, गाया जा सकने वाला गायत्री मंत्र

गायत्री मंत्र एक विज्ञान सम्मत गाया जाने वाला मंत्र है। भौतिक सुख-शक्ति की अभिवृद्धि, वातावरण संशोधन एवं सूक्ष्म चेतना को बलवती बनाने के लिए उसका प्रयोग प्राचीनकाल के ऋषियुग में भी होता रहा है। मंत्र को व्यापक बनाने के लिए उसके साथ ताप और प्रकाश को यज्ञ के रूप में जोड़ना पड़ता है, तभी वह अधिक शक्तिशाली और विश्वव्यापी बनता है।

यज्ञ एक बहुमुखी प्रक्रिया है। देखा गया है कि वनौषधियों को वायुभूत करके-हवन करके उसके समीप बैठने से गायत्री मंत्र का मध्यम स्वर से उच्चारण करते हुए यदि यज्ञ किया जाय तो पर्यावरण संशोधन से लेकर शारीरिक व मानसिक रोगनिवारण व स्वास्थ्य संरक्षण तक में उसकी महती भूमिका संपन्न होती देखी जाती है।

जिन्हें कुछ अधिक सार्थक उपलब्धि करनी हो अथवा जो इससे अधिक करने की स्थिति में हैं उनके लिए गायत्री मंत्र के ध्वनि गायन का अवलम्बन लेना चाहिए। जिस प्रकार शाकल्य में प्रयुक्त होने वाली वनौषधियों के अपने-अपने पृथक्-पृथक् गुण हैं, उसी प्रकार गायत्री मंत्र को जिन ध्वनियों में गायन करते हुए आहुतियाँ दी जाती हैं, उनका भी विशेष प्रभाव होता है। मंत्र की विशेषता उसके विशिष्ट रूप से किये गए गायन में है। उनमें शक्ति इसी आधार पर पैदा होती है। सामगान का समूचा शास्त्र ही इसी आधार पर बना है। मध्यम स्वर में तो किसी मंत्र का जप हो ही सकता है, दैनिक या सार्वजनिक यज्ञ में भी यह यज्ञ स्वर काम दे सकता है। वैज्ञानिक प्रयोजनों के लिये इस प्रकार की स्वर लहरियों का विशेष प्रभाव देखा गया है। संसार भर में संगीत के प्रभाव से फसलें अच्छी फलित करने, अण्डे देने वाले पक्षियों, एवं मछलियों को परिपुष्ट बनाने के प्रयोग हुए हैं। इसके अतिरिक्त मानसिक रोगों, स्नायुविक रोगों में भी संगीत विशेष की स्वर लहरियों के विशेष उपयोगी प्रभाव देखे गये हैं। अब संगीत चिकित्सा अपने आप में एक विशिष्ट शास्त्र बनता जा रहा है।

गायत्री महामंत्र की प्रभावशीलता असंदिग्ध है। स्वर विधा के आधार पर भी इसे चमत्कारी माना गया है। इसके आधार पर शारीरिक ही नहीं मानसिक और भावनात्मक क्षेत्र में भी उपयोगी परिवर्तन किये जा सकते हैं। यज्ञाग्नि के साथ मिलकर मंत्र विद्या का प्रभाव असंख्य गुना अधिक हो जाता है। अथर्ववेद 3/1॥1 के अनुसार इससे जहाँ अनेक रोगों से छुटकारा पाया जाता और दीर्घजीवन की उपलब्धि होती है, वहीं समिधाओं तथा औषधियों से परिपूरित यज्ञाग्नि के प्रभाव से उन्मादी और सनकी व्यक्ति भी रोग मुक्त हो जाते हैं। इसी में आगे कहा गया है-यदि क्षितायुर्यंदि परतो यदि मृत्योरन्ति के।” अर्थात् यदि रोगी मृत्यु के समीप तक पहुँच गया हो तो भी यज्ञाग्नि उसे मंत्र शक्ति के सहारे वापस लौटा सकती है। श्रुति कहती है “गयान प्रणान त्रायते सा गायत्री।” जो प्राणों की रक्षा करती है वह गायत्री है।

परीक्षणोंपरांत पाया गया है कि मानसिक रोगों के निवारण के लिए उस प्रयोजन में काम आने वाली वनौषधियों का हवन अधिक लाभदायक सिद्ध होता है। शारीरिक रोगों में मध्यम स्वर से गायत्री मंत्र का उच्चारण करते हुए हवन किया जाता है, किन्तु मानसिक रोगों के लिए सस्वर पाठ करते हुए हवन करना चाहिए। इसके लिए अभ्यास करना पड़ता है। यह एक प्रकार का संगीत है। संगीत का ‘न्यूरो हारमोनों’ पर प्रभाव पड़ता है और उससे मनोविकार दूर होते हैं। अकेले की अपेक्षा सामूहिक रूप से किया गया सस्वर मंत्रोच्चार अधिक प्रभावशाली होता है और प्रतिफल भी जल्दी प्रस्तुत करता है। इस प्रयोजन के लिए पहले से टेप किये हुए सस्वर मंत्रोच्चार के कैसेटों से अभ्यास किया जा सकता है। टेपरिकॉर्डर के साथ स्वर में स्वर मिला कर अपने मनोरोगों के लिए जिस स्वर में गायत्री मंत्र बोलना चाहिए, उसमें बोला जाय। नित्यकर्म प्रयोग में जिस तरह यजनकर्त्ता को अपनी सुविधानुसार सामग्री चयन कर हवन करने का नियम है, उसी तरह शारीरिक-मानसिक रोगों में भी प्रत्येक को अपने लिए उपयुक्त बीज मंत्र तथा सामग्री का चयन कर सस्वर या बिना स्वर के गायत्री महामंत्र का उच्चारण करते हुए हवन करना चाहिए। मंत्रों की आहुतियों की संख्या चौबीस भी हो सकती है और ज्यादा भी। यहाँ ध्यान यह रखा जाना चाहिए कि संख्या नहीं, आहुतियाँ नहीं वस्तुतः मंत्रोच्चार करने वाले साधक की तपःपूत वाणी से उच्चारित शब्द लहरियों में प्राण श्रद्धा की सामर्थ्य से ही पैदा किए जाते हैं। जब यह सब होने लगता है तो चमत्कारी परिवर्तन जड़ व चेतन में होता हुआ देखा जा सकता है। गायत्री मंत्र का बीज मंत्र या बिना बीज मंत्र के योग गायन करते हुए कितना विस्फोटकारी है, चह जानने के बाद किसी को संदेह तनिक भी नहीं रह जाता।


संस्कृति के सनातन कुल की लक्ष्मी; भारतीय नारी

रात गहराने लगी। बाहर शिकारी कुत्तों के भौंकने की आवाज आई। फिर सड़ाक-सड़ाक करके किसी ने चमड़े का चाबुक वहीं पर फटकारा जो हुप-हुप करके लचकने लगा औरत भी फिर एक ओर तलवारों और ढालों की खनखनाहट सुनाई दी तो दूसरी ओर घोड़ों के टापों की आवाज चट्टानी रास्तों पर बजने लगी।

“महारानी”

‘क्या है रे? भैसों के सामने से उठती हुई स्त्री ने कहा। ‘महारानी ! आ”.... आगे के शब्द जैसे बोलने वाली के गले में फँस गए। उसकी आँखों में आश्चर्य गहरा उठा।

‘महारानी उत्तर नहीं दे सकीं। ईसुरी की वह विस्मित आकृति उनमें स्नेह भर गई। ईसुरी हठात् पाँवों पर गिरकर रोने लगी। ‘क्या हुआ री?’ महारानी ने पूछा।

“महाराणा देश और संस्कृति की रक्षा के लिए झोंपड़ों में है और महारानी को भैंस की सेवा करनी पड़े। चम्पा ने पास आकर कहा ईसुरी आप पर नहीं अपने आप पर रोती है।’ चम्पा दोनों आँखें पोंछी।

‘तू रोती है?’ महारानी ने विस्मय से पूछा वह जिसका बेटा साका में केसरिया बाना पहन कर गया था, जिसकी गौने में आई नवेली वधू जौहर की लपटों में सो गई और जो तब न रोई वह आज रो रही है?

ईश्वरी फूट पड़ी, “हमारे हाथों में कीड़े पड़ गए हैं। क्या कहेंगे हमारे मर्द जब सुनेंगे कि ईसुरी के रहते महारानी ने भैंस का काम किया क्या कहेंगे हमारे बच्चे! घृणा से थूक न देंगे हमारे मुँह पर?”

ईसुरी को उठाते हुए महारानी ने कहा “अब आगे न कहना कुछ। तू क्या समझती है देश मेरा नहीं है? समझ ले अपने देश के वासी जब तक एक स्वर, एकलय होकर काम नहीं करेंगे तब तक कैसे काम चलेगा। तू बच्चे को दूध पिला रही थी। एक मेवाड़िन-एक होनहार योद्धा को पाल रही है दूध पिला रही है अपनी ममता से अपने लहू को दूध बना कर उसके मुँह में उतार रही है, उस वक्त मैं उसे टोकूँ! बता चम्पा तू ही उत्तर दे। उस वक्त मैं आराम से बैठूँ? लोक जीवन की आन-बान-शान के लिए लड़ने वाले वीर जब थक कर चूर होकर लौटते हैं तब यही भैंस उनके बुझते प्राणों के दीप को अपना दूध देकर जलाती है। वह भैंस भूखी खड़ी रहे और मैं बैठी रहूँ? स्वातन्त्र्य का शंख फूँकने वाले वीर जंगलों पहाड़ों में हथेली पर जान लिए घूमते रहें और उस वीर वंश की वधू में बैठी रहूँ। वीर बाप्पारावल की खुरासान तक अड़ने वाली भुजा क्या कहेंगी? वीर खुमान का काबुल तक गूँजने वाला गर्जन क्या कहेगा? वीर हम्मीर की शरणागत वत्सलता और वह प्रचण्ड हठ क्या कहेगा? चण्ड की प्रतिज्ञा क्या कहेगी? कुम्भा की तलवार क्या कहेगी? बोलो चम्पा तू ही बता ईसुरी मैंने अपराध किया है?”

“महारानी!” ईसुरी और चम्पा रोती हुई महारानी से लिपट गई। “अपनी संस्कृति का विजय अभियान कभी नहीं रुकेगा महारानी” दोनों के मुख से लगभग एक साथ स्वर फूटे।

“तुम ठीक कहती हो।” महारानी ने कहा “यह देश जब-जब पतन की ओर मुड़ा है कायरता अकर्मण्यता और स्वार्थ के कारण। इस देश की नारियाँ जिस दिन मनुष्यों की जगह दहकते हुए अंगारों को जन्म देने लगेंगी उस दिन इस देवभूमि की शृंखलाएं सदा के लिए खण्ड-खण्ड हो जाएँगी। पर यह तभी होगा-जब नारी स्वयं शौर्य और कर्मठता की जीवन्त मूर्ति बने।”

तभी कहीं प्रतिध्वनित होती शंखध्वनि सुनाई दी। वनप्रान्त की नीरवता और भी गहरी हो गई और दूर-दूर की पर्वत श्रेणी पर अब भी जोगी की छतरी आकाश की गहरी नीलिमा पर और भी काली सी होकर दिखाई दे रही थी।

“महाराणा! महाराणा!!” भील बालक चिल्लाए।

आ गए” ईसुरी ने कहा।

बीसल बाहर की ओर भागा।

“देवर।” महारानी ने पुकारा

“भाभी!” कुँवर शक्तिसिंह ने आगे आकर कहा “रोटी तैयार है?” “बस अभी लो।”

तभी महाराणा आगे आ गए और झाला ने फरफराती मशाल को आगे बढ़ाया। उस आलोक ने पहले महाराणा के मुख के गौरव को झलकाया। शक्तिसिंह की प्रचण्ड भुजाएँ चमकी और तभी महारानी की तनी हुई गम्भीर भवें दिखाई दीं।

थोड़ी देर में सब लोग भोजन के लिए बैठ गए। धीरे-धीरे खाना खत्म हुआ। महाराणा लेट गए। महारानी पास बैठ गई। कहा “थक गए महाराणा जी?” “नहीं सोच रहा था।” “क्या भला?”

“यही कि जब से तुम आई तब से तुम्हें कोई सुख नहीं मिला।”

“मुझे जो सुख मिला है स्वामी वह किसी को नहीं मिला। इस अनूठे सुख की प्राप्ति भारतीय संस्कृति की सनातन परम्परा है।”

महाराणा की धीरे-धीरे साँस लेने की ध्वनि सुनाई पड़ रही थी। वे कहती रहीं “भगवान राम के साथ क्या जानकी नहीं घूमी वन-वन में मारी-मारी नहीं फिरी। अपनी संस्कृति के गौरवपूर्ण राज्य में नारी को त्याग का सर्वोच्च सिंहासन मिला है।”

कुछ देर नीरवता छाई रही। फिर महाराणा ने कहा “सोचता हूँ तो मुझे याद आता है। जिस दिन मैंने पहली बार तुम्हें देखा था उस दिन ही मुझे कुछ अजीब-अजीब सा लगने लगा था। मैं बार-बार उस पहेली को सुलझाना चाहता था, और वह पहेली जिस दिन मेरे सामने सुलझी उस दिन तुम पहले से भी बड़ी उलझन बन चुकी थीं।”

“मैं समझी नहीं ।” महारानी ने हलकी सी जम्हाई ली। “तुम्हें नींद आ रही है।”

“आप कह देंगे तभी सोने जाऊँगी मैं।” महारानी के स्वर में मनुहार थी। “तो सुनो लक्ष्मी, जिस दिन तुम्हें देखा था मुझे लगा था मैं इस कठिन राह पर अधिक दिन नहीं चल सकूँगा क्योंकि तुम अत्यन्त कोमल थीं। परन्तु तुमने प्रमाणित किया तुम देखने में जितनी कोमल और निर्बल हो उतना ही तुम्हारे भीतर एक हठी और सबल मन भी है। फिर भी मेरे सामने यह उलझन बनी रह गई है कि तुम इतनी दृढ़ और कठोर होते हुए भी सबके लिए यह समान स्नेह कहाँ से दे पाती हो?” एकाग्र मन सुन रही महारानी का मन विभोर होकर एक अतीन्द्रिय आनन्द से स्निग्ध हो उठा कि उत्तर नहीं दे सकीं। सुनती रहीं। जी करता था महाराणा कहते जायँ वे यों ही सुना करें इस कथा का कहीं भी अन्त न हो। परन्तु महाराणा ने शृंखला झनझना दी। कहा बताओ लक्ष्मी!”

महारानी ने क्षण भर देखा और कहा “गुरुदेव कहते थे इस देश की संस्कृति सनातन है इसमें शाश्वत जीवन के बीज निहित हैं और कुछ कहते हुए महारानी रुक गई उनकी नजरें महाराणा के भव्यमुख पर केन्द्रित हो गई। राणा बोल पड़े “कहो। रुक क्यों गई?”

“देव! इसकी सुरक्षा सुव्यवस्था की सर्वोच्च जिम्मेदारी नारी पर है। दो अक्षरों के इस शब्द में दो ही तत्त्व समाए हैं त्याग और ममता। अपने विवाह के अवसर पर दिया गया कुल पुरोहित का आशीर्वाद अभी भी मेरे मन में गूँज रहा है। उन्होंने कहा था बेटी। तू भारतीय नारी बनना-संस्कृति की अमर ज्योति।” “तुम सच कहती हो लक्ष्मी। नारी का त्याग ही पुरुष के गतिशील संघर्ष की प्रेरणा है। देश और जाति तभी अपमानित हुई हैं जब उसने नारी की अवमानना की है। उसे कामिनी और रमणी माना है। यदि पुरुष ने उसे अपने अविराम संघर्ष की सहचरी माना होता। यदि उस अविरल बहते ममता के निर्झर की सच्ची पहचान हो सकी होती......।”

महाराणा का वाक्य पूरा हो पाता इसके पहले बाहर से आवाज आई

“महारानी!”

“कौन बुला रही है?” महाराणा ने कहा। चम्पा द्वार पर आ गई। कहा “अभी तक नहीं गई महारानी।” महाराणा ने पूछा “क्या है, चम्पा?”

“घणी खम्भा महाराणा जी। चम्पा ने कहा “माना जी और सालूमर के सरदार नहीं लौटे थे इसी से महारानी भूखी बैठी थीं। मैंने कहा तो कहने लगीं कि जब सब खा चुकेंगे तभी मैं खाऊँगी पहले नहीं। मैंने समझाया पर मेरी एक नहीं चलने दी।”

महाराणा ने महारानी की ओर देखा। उन आँखों में अपार स्नेह था और था वह सम्मान जो आश्चर्य की परिधियों को लाँघ जाने के आवेश में प्रारम्भ होकर स्थिरतम प्रज्ञा में मूर्तिमान् हो जाता है।

महारानी ने संकोच से सिर झुका लिया। कहा “तू रहने

दे चम्पा दे। देखती नहीं और जहाँ चाहे जो कुछ कह

उठती है।” महाराणा ने देखा और कहा “लक्ष्मी! तुम सचमुच इस संस्कृति के सनातन कुल की लक्ष्मी हो।” महारानी ने गर्व और गदगद विभा से विभोर होकर कहा “नहीं महाराणा जी मैं भारत की नारी हूँ और भारत की नारी माता होती है। क्या माँ कभी बच्चों से पहले अन्न ग्रहण करती है? राष्ट्र के गौरव के लिए प्राण दे डालने वाले ये वीर इसीलिए तो नहीं डटे हैं कि हम आनन्द भोगें और ये लोग भूखे रहें।”

अचानक ही दो व्यक्ति भीतर आए और माँ, माँ! कहकर महारानी के चरणों पर लोट गए। वे माना और सालूमर के सरदार थे जो बाहर खड़े सब सुन रहे थे।

महारानी के हृदय का आनन्द पिघल कर आँखों में आ भरा। उन्होंने दोनों को उठाते हुए कहा “माना जी! सालूमर जी! उठो। तुम यह न समझो कि मैंने कोई अहसान किया है। मेरे द्वारा जो कुछ हो रहा है वह अपने गौरव की रक्षा के लिए है।”

दोनों अवाक् से देखते रहे। महारानी उठ खड़ी हुई। जब वे चली गई उन्होंने देखा महाराणा अपने को भूले हुए शून्य दृष्टि से देख रहे हैं।

माना ने कहा “महाराणा जी!”

प्रताप चौंक उठे और उन्होंने उसी विभोर चिन्तन में ही डूबे हुए कहा “नहीं माना जी नहीं। भले ही रात भर जलकर यह दीपक बुझ जाए परन्तु प्रभात अवश्य आएगा। भले ही हम सब मर जायँ, किन्तु भारत माँ की संस्कृति का विजय ध्वज अवश्य फिर फहराएगा अवश्य आकाश के वक्षस्थल पर फिर नर्तन करेगा।”


विवेक ही बने हमारा मार्गदर्शक

जीवनक्रम को उचित दिशा में नियोजित करते हुए उपयोगी और औचित्यपूर्ण का चुनाव करना प्रत्येक मनुष्य का अपना कर्तव्य कर्म है। पतन और उत्थान में से किस मार्ग पर चलना है? यह फैसला करना पूरी तरह अपनी इच्छाशक्ति ज्ञानशक्ति एवं क्रियाशक्ति को किसी भी दिशा में किसी भी प्रयोजन के लिए उपयोग करे। इसमें किसी दूसरे का कोई हस्तक्षेप नहीं है।

प्रख्यात दार्शनिक पी.टी. राजू ने अपने एक शोध निबन्ध “डिसक्रिमिनेशन इन लाइफ” में कहा है कि मानवीय शक्तियों के नियोजन का आधार विवेक है। यह उच्चतम जीवन मूल्य है। बात भी सही है। कर्म करने में मनुष्य पूर्ण स्वतन्त्र है। पर परिणाम भुगतने के लिए वह नियोजक सत्ता के आधीन है। क्या करे, क्या न करे, इसके ठीक निर्णय के लिए ही विवेक की अमूल्य कसौटी मिली हुई है अन्यथा हम विष तो अपनी मर्जी से पी सकते हैं, पर मृत्यु का परिणाम भुगतने से बच पाना अपने हाथ में नहीं है। पढ़ना न पढ़ना विद्यार्थी के अपने हाथ में है, पर उत्तीर्ण होने न होने में उसे परीक्षकों के निर्णय पर आश्रित रहना पड़ता है। ऐसी स्थिति न रही होती तो फिर कोई सत्कर्म करने के झंझट में पड़ना स्वीकार ही न करता। दुष्कर्मों के दण्ड से बचना भी अपने हाथ में होता, तो फिर ज्यादा से ज्यादा लाभ लूटने से कोई भी अपना हाथ न रोकता।

डववेक का उपयोग न करने वाले इसी भूल भुलैया में भटकते देखे जाते हैं। वे तत्काल काली देखते हैं और दूरगामी परिणाम की ओर से आँखें बन्द किए रहते हैं। आलसी किसान और आवारा विद्यार्थी आरम्भ में मौज करते हैं, पर जब असफलताजन्य कष्ट भुगतना पड़ता है, तो पता चलता है कि विवेक हीनता कितनी महँगी पड़ी।

वस्तु स्थिति का सही मूल्याँकन कर सकना कर्म के प्रतिफल का गंभीरतापूर्वक निष्कर्ष निकालना उचित अनुचित के सम्मिश्रण में जो श्रेयस्कर है, उसी को अपनाना विवेकशीलता का काम है। इसको ताक पर रख देने से असफलता हाथ लगती है। अवांछनीयता में रहने वाला आकर्षण चिन्तन को ऐसे व्यामोह में डाल देता है कि उसे तात्कालिक लाभ को छोड़ने का साहस नहीं होता भले ही पीछे उसका प्रतिफल कुछ भी क्यों न भुगतना पड़े। इसी व्यामोह में ग्रस्त होकर अधिकांश जन आलस्य प्रमाद से लेकर व्यसन व्यभिचार तक और क्रूर कर्मों की परिधि तक पड़ते चले जाते हैं। इन्द्रिय लिप्सा में ग्रस्त होकर लोग अपना स्वास्थ्य चौपट करते हैं। वासना-तृष्णा की गुलामी में बहुमूल्य जीवन सम्पत्ति यों ही खपती रहती है। इस चक्रव्यूह में पड़कर व्यक्ति किस प्रकार खोखला होता चला जाता है, इसका प्रमाण आत्म समीक्षा करके हम स्वयं ही पा सकते हैं।

बहुधा लोग यह तर्क करते हैं कि यदि अनुपयोगी चीजों व्यर्थ हैं, तो स्रष्टा ने उसका सृजन ही क्यों किया? यह तर्क निज के जीवन की परिधि में रहकर तो युक्ति पूर्ण लगता है। किन्तु परिधि का दायरा बढ़ा लेने तथा सृजेता की दृष्टि से विचार करने पर इसकी निरर्थकता स्पष्ट हो जाती है। जो एक स्थान पर व्यक्ति विशेष के लिए उपयोगी है, वही दूसरी जगह अनुपयोगी और अनौचित्यपूर्ण साबित होता है। प्रत्येक की अपनी महत्ता एवं व्यक्ति विशेष के सापेक्ष है। इसका सही चुनाव तभी सम्भव है, जब विवेक का चश्मा इस्तेमाल किया जाय।

अनर्थमूलक भ्रम-जंजालों से निकलकर श्रेयस्कर दिशा देने की क्षमता सिर्फ इसी में होती है। इसके उपयोग की कला जो जानता है, समझना चाहिए कि उसी के लिए औचित्य अपनाना सम्भव होगा और वही कुछ महत्वपूर्ण कार्य कर सकने में समर्थ होगा। विवेकशीलता की कमी अन्य किसी गुण से पूरी नहीं की जा सकती। अन्य गुण कितनी ही बड़ी मात्रा में क्यों न हों पर यदि विवेक का अभाव है तो सही दिशा का चुनाव न हो सकेगा। दिग्भ्रान्त मनुष्य कितना ही श्रम क्यों न करे, अभीष्ट लक्ष्य तक पहुँच सकना उसके लिए सम्भव न होगा।

विवेकशीलता को ही सत्य की प्राप्ति का एक मात्र साधन कहा जा सकता है। यथार्थता तक पहुँचने का यही आधार है। हीरे पेड़ों पर फूल की तरह लटके नहीं मिलते। उसे कोयले की गहरी खदानें खोदकर निकालना पड़ता है। सत्य किसी को अनायास ही नहीं मिल जाता उसे विवेक की कुदाली से खोदकर निकालना पड़ता है। दूध और पानी को पृथक् कर देने की आदत हंस में पायी जाती है। यह कथन तो अलंकार मात्र है। पर यह सत्य है कि विवेक रूपी हंस वृत्ति उचित और अनुचित के चालू मिश्रण में से यथार्थता को ढूँढ़ निकालती है और उस पर चढ़े कलेवर को उतार फेंकती है।

शरीर की आन्तरिक स्थिति का पता ऊपरी जाँच पड़ताल से नहीं चलता। एक्सरे, शल्यक्रिया, मलमूत्र, रक्त आदि के परीक्षण से उसे जाना जा सकता है। सत्य और असत्य का विश्लेषण करने के लिए विवेक ही एक मात्र परीक्षा आधार है। मात्र मान्यताओं, परम्पराओं, शास्त्रीय आप्त वचनों से वस्तुस्थिति को जान सकना अशक्य है। धर्म क्षेत्र का ही सर्वेक्षण करें तो पता चलता है कि संसार में हजारों सम्प्रदाय, मत-मतान्तर प्रचलित हैं। उनकी मान्यताएँ एवं परम्पराएँ एक दूसरे के सर्वथा विपरीत हैं। नैतिकता के थोड़े से सिद्धान्तों पर आँशिक रूप से वे जरूर सहमत होते हैं, बाकी सृष्टि के इतिहास से लेकर ईश्वर की आकृति प्रकृति अन्त उपासना तक के सभी प्रतिपादनों में घोर मतभेद है। प्रथा परम्पराओं के सम्बन्ध में कोई ताल-मेल नहीं। ऐसी दशा में किसको सही माना जाय, यह निर्णय नहीं हो सकता।

प्रत्येक मत के अनुयायी अपने मार्गदर्शकों के प्रतिपादन पर इतना कट्टर विश्वास करते हैं कि उनमें से किसी को झुठलाना उनके अनुयायियों को मर्मान्तक पीड़ा पहुँचाने के बराबर है। सभी मतवादी अपनी मान्यताओं का अपने-अपने ढंग से ऐसा प्रतिपादन करते हैं मानों उनका विश्वास ही एक मात्र सत्य है। इसका अर्थ यह हुआ कि अन्य सभी झूठे हैं। अपने-अपने पक्ष की कट्टरता के कारण अब तक असंख्यों बार रक्त की नदियाँ बही हैं। समन्वय और सहिष्णुता की बात कह कर इस विद्वेष को सह्य बनाने का भी बुद्धिमानों ने प्रयत्न किया है पर उससे भी कुछ बात बनी नहीं। ऐसे सारे प्रयत्न एक प्रकार से निष्फल ही सिद्ध होते रहे हैं।

समाधान जब कभी निकलेगा तब विवेक की कसौटी का सहारा लेने पर ही निकलेगा। अन्य सभी क्षेत्रों की तरह इस क्षेत्र में भी औचित्य अनौचित्य का मिश्रण है। कहाँ कितना अंश उपयुक्त है, यह देखते हुए यदि खिले हुए फूल चुन लिए जायँ तो एक सुन्दर गुलदस्ता बन सकता है। बिना दुराग्रह के यदि सार संग्रह की दृष्टि लेकर चला जाय और प्राचीन नवीन का भेद न किया जाय तो जो आज की स्थिति के अनुरूप है उसे सर्व साधारण के लिए प्रस्तुत किया जा सकेगा। वह सामयिक एवं सर्वोपयोगी हो सकेगा। ऐसे सार संग्रह में विवेक की प्रमाणिकता ही माननी होगी।

औचित्य इसी में है कि विवेक को अपना मार्गदर्शक बनाया जाय। यही अपरिवर्तनशील शाश्वत सनातन और सुस्थिर है। विवेक के आधार पर और सब कुछ तो बदला जा सकता है पर वह स्वयं सदा सर्वदा एक रस यथा स्थान बना रहता है। इसीलिए इसे सर्वोच्च जीवन मूल्य मानते हुए जीवन क्रम के दिशा निर्धारक के रूप में स्वीकारा जाना चाहिए।


महान विभूतियाँ (Kahani)

अपने कर्मचारियों की सुस्ती पर मालिक बड़ा परेशान था। सभी आलसी। कारोबार बहुत बड़ा था।

बन्द भी नहीं किया जा सकता था। श्रम विशेषज्ञ, मानव संसाधन पर काम करने वाले व्यवहार वैज्ञानिक बुलवाए गये व पूछा गया कि आप ही रास्ता बताइए। उनकी राय एक स्वर से यही थी कि एक मछली सारे तालाब को गंदा कर देती है। उस महा आलसी को इनमें से निकालकर अलग कर दिया जाय जो सब में प्रमाद की दीर्घसूत्रता का घुन लगा रहा है।

विशेषज्ञों ने गोष्ठी ली। सबको संबोधित करके कहा कि “तुम में जो सबसे बड़ा आलसी हो, निकलकर बाहर आ जाए। उसे नौकरी से बाहर नहीं करेंगे, हलका काम दे देंगे। वेतन वही रहेगा। सारा वातावरण खराब न हो इसलिए तुम में से जो काम से सबसे ज्यादा जी चुराता हो, वह अलग होकर एक तरफ खड़ा हो जाए।” कोई नहीं आया। सब यथावत बैठे रहे। सब बड़े परेशान हुए। मालिक से बात करके शर्तें उदार कर दी गया व कहा गया कि जो स्वेच्छा से बाहर आएगा उसे एक तरक्की मिल जायगी। तरक्की व हलके काम का आश्वासन सुनकर एक को छोड़कर सब बाहर निकल आए। उस एक से पूछा गया कि “क्यों भाई तुम्हें शर्तें मंजूर नहीं है क्या?” उसका जवाब था-कौन उठकर खड़ा हो। हम तो यहीं ठीक है।” दो कदम चलने के लिए भी जो तैयार नहीं है ऐसी महान विभूतियाँ अपने समाज में अनगिनत है।


अति सामर्थ्यवान है, यह सूक्ष्मजगत

यदि किसी व्यक्ति के समक्ष किसी मृत की अनुकृति प्रकट हो जाय, तो वह भयभीत होकर भूत-भूत कहता भाग खड़ा होगा, किन्तु यदि कोई व्यक्ति अपने सामने अपनी ही प्रतिकृति को काम करता देखे तो इसे क्या कहा जाय? भ्रम? भय? या मस्तिष्कीय विकार? सामान्य बुद्धि कुछ भी समझ सकती है, पर आध्यात्मिक पुरुषों के लिए यह न तो भ्रम है, न भय की परिणति और न मानसिक दुर्बलता का परिणाम, वरन् एक सात्त्विकता है, जिसकी सत्ता से इंकार नहीं किया जा सकता। आये दिन ऐसी कितनी ही घटनाएँ घटती रहती हैं, जिनमें सूक्ष्म शरीर के मामले प्रकाश में आते रहते हैं।

एक घटना जर्मनी की है। म्यूनिख शहर का एक अभियंता जब दोपहर के भोजन के लिए कार्यालय से अपने निकटवर्ती मकान में आया, तो भोजन से पूर्व किसी कार्यवश अपने शयन कक्ष में प्रवेश किया, किन्तु वहाँ एक सर्वथा अपरिचित व्यक्ति को देख कर आश्चर्य में पड़ गया। वह व्यक्ति दीवार के सहारे कोई चित्र टाँगने में व्यस्त था। उसे क्रोध चढ़ आया। अभी वह कुछ बोल पाता, इससे पूर्व ही पदचाप सुनकर अजनबी उसकी ओर मुड़ा उसे देखते ही एडरिच का गुस्सा शान्त हो गया। सामने उसी का प्रतिरूप खड़ा था। आश्चर्य मिश्रित भय से उसके होठ बन्द हो गये। मुँह से कोई भी शब्द न निकल सका। एक पल तक दोनों आमने-सामने खड़े रहे, फिर प्रतिरूप अचानक गायब हो गया। अब एडरिच को होश आया। दीवार की ओर दृष्टि दौड़ाई ता वह यह देख कर हैरान रह गया, कि जो चित्र लगाया गया है, वह उसी की तस्वीर है। कमरे में सामने ही उसका ड्राईंग बोर्ड था। अकस्मात् ध्यान उस ओर गया, तो वह और विस्मय में पड़ गया। वह जिस नक्शे को महीनों के प्रयास से न बना सका था, वही कागज पर बना पड़ा था।

इसी से मिलती-जुलती घटना का वर्णन डॉ. ग्रिफन ने अपनी पुस्तक “साइकिक पावर” में किया है, वह पेशे से मनःचिकित्सक थे। प्रतिदिन सुबह से शाम तक अपने क्लीनिक में रोगियों को देखते और शाम को घर लौट आते। एक दिन क्लीनिक में अप्रत्याशित भीड़ हो गई। रोगियों को वे जल्दी-जल्दी देखने लगे। सोच रहे थे कि समस्त मरीज आज ही निपटा दिये जायँ। इस कारण उन्होंने दोपहर का भोजन भी नहीं लिया और सिर्फ चाय से संतोष कर लिया। चाय पीने के उपरान्त पुनः वे बीमारों को देखने में जुट पड़े। धीरे-धीरे शाम हो गई किन्तु अब भी 25 मरीज शेष थे। किसी भाँति 20 को निपटा दिया गया। अब तक रात के आठ बज चुके थे और डॉ. ग्रिफन बुरी तरह थक गये थे। आराम की नितान्त आवश्यकता महसूस हो रही थी। सोच रहे थे कि शेष 5 को कल बुला लिया जाय, पर इसी समय विचार आया कि इतनी देर बिठाये रखने के बाद लौटा देना ठीक नहीं। रोगियों को इससे मानसिक वेदना होगी। अस्तु उनने बचे हुओं को भी देख लेना उचित समझा और उनके जीवनवृत्तांत सुनने और सलाह देने में पुनः व्यस्त हो गये। तब सभी रोगी निपट चुके, तो रात के साढ़े नौ बज चुके थे। थककर उनका बुरा हाल था। उनने जैसे-तैसे क्लीनिक बन्द किया, गाड़ी स्टार्ट की और घर की ओर चल पड़े। आधे घंटे बाद गन्तव्य पर पहुँचे। कमरे के अन्दर प्रकाश हो रहा था। यह देख आरंभ में तो उनने सोचा कि संभवतः प्रातः जल्दबाजी में लाइट बुझाना भूल गये हों, इसलिए अब भी वह जल रही है। ताला खोलकर वे कमरे में प्रविष्ट हुए। नजर जैसे ही पलंग पर पड़ी, वे चौंक पड़े, सामने एक अन्य ग्रिफन महोदय लेटे पुस्तक पढ़ रहे थे। वे पलंग के और निकट आ गये और ध्यान से देखने लगे। पता चला दोनों में जरा भी अन्तर नहीं है। वे असमंजस में पड़ गये। आखिर यह हमशक्ल कौन हो सकता है? यहाँ क्यों आया और इतने साहस और सहजता से पुस्तक पढ़ने में तल्लीन कैसे है? इसी उधेड़बुन में वे पड़े थे कि देखा प्रतिरूप शनैः शनैः बिस्तर से ऊपर उठ रहा है और स्पष्टता मलिन होती जा रही है। कुछ क्षण पश्चात् आकृति तिरोहित हो गई। न वहाँ उसका कोई निशान था, न ही वह पुस्तक। अब सब कुछ सामान्य था।

लगभग ऐसी ही घटना इंग्लैण्ड के एक प्रशासनिक व्यक्ति से संबंधित है। बात बीसवीं सदी आरंभिक दशक की है। उन दिनों हाउस आफ लार्ड्स में बहस चल रही थी। विपक्षी दल तरह-तरह के अभियोग लगाकर सरकार को गिराने के लिए उतारू थे। संसद के एक महत्वपूर्ण व्यक्ति इन्हीं दिनों बीमार पड़ गये थे। उनकी अनुपस्थिति सरकार के लिए खतरनाक हो सकती थी। इलाज जारी था, पर वे स्वस्थ नहीं हों पा रहे थे। उधर सदन की बहस भी जारी थी। जिस दिन अविश्वास के प्रस्ताव पर विपक्षी सांसदों के मत लिए जा रहे थे, उस दिन सरकारी पार्टी के सांसदों ने जब सर कार्न रॉस को अपनी कुर्सी पर मौजूद पाया, तो उन्हें आश्चर्य भी हुआ और प्रसन्नता भी किन्तु तब लोगों ने यह समझ कर कुछ नहीं पूछा कि शायद वे स्वस्थ हो गये हों, पर वास्तविकता का पता तो बाद में ही चल पाया, जब उस दिन के उपरान्त वे दो सप्ताह तक सदन की गतिविधियों में हिस्सा नहीं ले सके। पता लगाने पर ज्ञात हुआ कि वे अब तक स्वस्थ नहीं हो सके हैं, अस्तु संसद में उपस्थित होने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता किन्तु उनकी उपस्थिति के साक्ष्य के रूप में उस दिन की सामूहिक तस्वीर आज भी सदन की दीवार पर लटकी देखी जा सकती है।

ब्रिटिश परामनोविज्ञानी रिचर्ड बुलकर ने अपने जीवन के महत्वपूर्ण संस्मरणों को “मेमोयर्स” नामक पुस्तक में प्रकाशित किया है। इसमें अनेक संस्मरण सूक्ष्म शरीर से संबंधित भी हैं। एक संस्मरण का उल्लेख करते हुए वे लिखते हैं कि एक बार उनकी माँ गंभीर रूप से बीमार पड़ी। घर से, तुरन्त चले आने संबंधी तार आया। जब तार प्राप्त हुआ, उस समय तक वहाँ जाने वाले सारी गाड़ियाँ जा चुकी थीं। अतः उनका जाना एक दिन बाद ही संभव हो सकता था, किन्तु समाचार से उनका मन इतना बेचैन हो उठा कि एक दिन रुक पाना भी भारी होने लगा। निदान उनने एक प्रयोग करने को सोचा। परामनोविज्ञानी होने के नाते सूक्ष्म शरीर से यात्रा के अनेक प्रसंग उनने सुन और पढ़ रखे थे, अतः उसी शरीर से वहाँ पहुँचने का निश्चय किया। वे एक एकान्त कमरे में जाकर मन को एकाग्र करने लगे। जब एकाग्रता प्राप्त हुई, तो दृढ़ इच्छा की कि वे अपने घर रोगग्रस्त माँ के पास अवश्य पहुँचेंगे। लगभग आधे घंटे के उपरान्त उन्हें माँ चारपाई पर पड़ी स्पष्ट दिखाई पड़ी। वह स्वस्थ तो नहीं हो सकी थीं, पर इतनी अस्वस्थ भी नहीं कि मामला गंभीर माना जाता। उनने माँ के शरीर का स्पर्श करने की कोशिश की, पर सफल न हो सके। इसके पश्चात् ही दृश्य दिखाई देना बन्द हो गया। दूसरे दिन जब वे घर पहुँचे तो माँ ने बड़े विस्मय भरे शब्दों में इस घटना का अक्षरशः वैसा ही उल्लेख किया जैसा उनने देखा था।

इन घटनाओं को विज्ञान भ्रम अथवा मन की काल्पनिक संरचना कहकर टाल सकता है, पर अध्यात्मवादी जानते हैं कि ऐसी घटनाएँ सर्वथा असंभव भी नहीं। योगी-यति ऐसी क्षमताएँ कठिन तपश्चर्याओं द्वारा स्वयं को साध और शोध कर अर्जित करते हैं, किंतु जहाँ मनोभूमि पहले से परिष्कृत होती है, वहाँ शोधन की कष्टसाध्य प्रक्रिया से नहीं गुजरना पड़ता और थोड़े से प्रयास-अभ्यास द्वारा इसे सम्पन्न किया जा सकता है। उपरोक्त प्रसंगों में यही हुआ ऐसी अध्यात्म-विज्ञान की मान्यता है।


अपना चेहरा देखकर याद आ जाएगा (Kahani)

कबाड़ी की दुकान में खरीददारी कर रहे एक सज्जन को दिशासूचक यंत्र कम्पास-कुतुबनुमा पसंद आ गया। उत्तर दक्षिण दिशा दिखाने वाला यह यंत्र बच्चों के लिए खरीदने का उनने निश्चय कर लिया। पर उन्हें एक बात समझ में नहीं आयी कि इस सुई के पीछे शीशा क्यों लगा है? कम्पास देखकर कोई साज-शृंगार थोड़े ही करेगा। कुछ गुत्थी समझ में नहीं आ रही थी। दुकानदार से पूछ बैठे कि “भाई। तुम्हीं बताओ यह शीशा किस लिए है? बच्चे पूछ बैठें तो हम क्या जवाब देंगे तो दुकानदार ने कहा “भाई साहब! सीधी सी बात है। आप कभी भटक जाएँ तो कम्पास से दिशा देख लें। यह जानना हो कि कौन भटक गया है, शीशा देख लेना। अपना चेहरा देखकर याद आ जाएगा।”

छोटी सी बात पर सबके लिए एक महत्वपूर्ण प्रेरक संदेश। हमेशा ध्यान रखा जाय कि हम कहीं भटक तो नहीं गए। हमारी दिशा सही है कि नहीं?


आत्मावलम्बन पर टिकी हैं -समस्त सिद्धियाँ

सहयोग का आदान-प्रदान मानवी स्वभाव भी है और सामाजिक प्रचलन भी। इस संदर्भ में कुशलता बरतना उचित है। किन्तु भूल तब होती है। जब किसी पर पूरी तरह आश्रित होकर यह आशा लगाई जाती है कि वह बिना किसी प्रत्युपकार के हमारे ऊपर अनुग्रह की वर्षा करेगा और उदारतापूर्वक निहाल कर देगा। ऐसी आशा देवताओं, सिद्धपुरुषों या धनी मानी लोगों से भी नहीं करनी चाहिए। वे भी अपनी विभूतियों को बहुत समझ बूझकर सोच समझ कर खर्च करते हैं और यह देखते हैं कि सदुपयोग होने पर दाता को जो श्रेय मिलना चाहिए वह उन्हें मिलेगा या नहीं। घाटे का सौदा कौन करता है? दान-अनुदान में भी इन तथ्यों का समावेश रहता है। हर कोई चाहता है कि उसकी सम्पत्ति किसी ऐसे काम आवे जो श्रेयस्कर परिणाम उत्पन्न करे।

सयानी कन्या को किसी सुयोग्य हाथों में सौंपने की हर पिता की इच्छा होती है उसके लिए सत्पात्र ढूँढ़ने में वह समुचित दौड़-धूप करता है। जब बात बन जाती है तो वह मात्र लड़की को ही नहीं, वरन् कुछ उपहार भी साथ देता है। देते हुए प्रसन्नता भी अनुभव करता है और लेने वाले का मन टटोलता है कि जो दिया गया है उसे उसने पर्याप्त माना या नहीं। यही है सत्पात्र की सहायता करने की प्रथा-प्रक्रिया

इसके विपरीत किसी कुपात्र द्वारा कन्या माँगने पर पिता न केवल असहमत ही होता है वरन् उसे भला बुरा भी कहता है। कारण कि वह सोचता है कि दान सम्पदा की यदि दुर्गति हुई तो सदा शोक-संताप करना पड़ेगा।

देने के बाद दाता की जिम्मेदारी पूरी तरह समाप्त

नहीं हो जाती वरन् तब तक प्रतीक्षा करनी पड़ती है जब तक कि उसका सदुपयोग नहीं होने लगता, सत्परिणाम दृष्टिगोचर नहीं होने लगता। कोई भी सर्वथा निस्पृह नहीं। सहायता भी एक प्रकार का कर्ज है। उसे देने के उपरान्त मात्र धन्यवाद, जय-जयकार से ही काम नहीं चलता वरन् यह भी देखना पड़ता है कि प्रतिफल क्या मिला। बदले में क्या मिलने की संभावना है। प्रत्यक्ष न सही तो वह परोक्ष तो होना ही चाहिए। पुण्य परमार्थ की पूर्ति तो उससे होनी ही चाहिए। यदि दोनों में से एक भी प्रयोजन न सधता दिखाई पड़े तो फिर कोई किसी को सहायता देने का साहस नहीं करेगा। कसाई का बूचड़खाना खोलने के लिए कोई सहायता दे तो उसके कारण जो पशुवध का व्यवसाय चलेगा उसमें पाप का भागी उस दानी को भी बनना पड़ेगा।

देने की समर्थता से भरी पूरी शक्तियों की कमी नहीं है। समुद्र में अथाह जल भरा है जो बादलों के माध्यम से भूमि पर उदारतापूर्वक बरसता रहता है। पर

उसमें ग्रहण उतना ही किया जाता है जितना कि अपने पास पात्र हो। जोहड़, सरोवर भी उतना ही जल एकत्रित कर पाते हैं जितनी कि उनमें गहराई होती है। सूर्य में प्रचंड ऊर्जा के भण्डार भरे पड़े हैं। पर उसे ग्रहण कर सकना उन्हीं के लिए संभव होता है जो खुली धूप में बैठते हैं। जिनने अपने मकान के दरवाजे खिड़कियाँ बन्द कर रखी हैं। उनके लिए यह कठिन है कि धूप या हवा उस बन्द कमरे में प्रवेश कर सके। प्रवेश पाना, उपलब्धियों को ग्रहण कर सकना सामान्य बात नहीं है।

जब कभी भूकम्प, बाढ़, महामारी, दुर्भिक्ष आदि संकट आते हैं तो संकटग्रस्तों की सहायता करने अनेकों उदारमना दौड़ पड़ते हैं और तन, मन, ध्यान से उनकी सहायता करते हैं। पर जो समर्थ होते हुए भिक्षा व्यवसाय अपनाते हैं उन्हें जहाँ तहाँ धक्के खाने और तिरस्कार के वचन सुनने पड़ते हैं। यह कुपात्रता का ही प्रतिफल है।

मोती हर सीप में पैदा नहीं होता। स्वाति बूँदों को धारणा कर सकने की क्षमता विशेष आकृति की सीपों में ही होती है। लोहा पारस को छूकर तभी सोना बनता है जब वह किसी आवरण में लिपटा हुआ न हो। महत्वपूर्ण घास, फल, या फूल अपने ढंग की भूमि में ही पैदा होते हैं। जिस भूमि में उर्वरता या अनुकूलता नहीं है, उसमें जो बोया गया है वह भी निरर्थक चला जाता है।

उदारमना समृद्ध व्यक्ति या योगी-तपस्वी अपनी विभूतियाँ हर किसी याचक पर नहीं उड़ेल देते। मुफ्तखोरों की कहीं कमी नहीं। वे बिना परिश्रम के बिना बदला चुकाये जहाँ तहाँ से मनमर्जी का चीज बटोरने की फिक्र में रहते हैं। देवी-देवता उन्हें सब से अधिक बेअकल प्रतीत होते हैं, जिनकी थोड़ी सी पूजा−पत्री या मनुहार करने से मनोकामना पूर्ति का वरदान हाथ लगे। यह एक प्रकार की जेब कटी का धंधा है, जिसकी सफलता सदा संदिग्ध रहती है।

सहायता पर निर्भर रहना न तो बुद्धि संगत है और न नैतिक । बिना मूल्य चुकाये किसी की कमाई हड़प लेना, बेईमानी या विश्वासघात में गिनी जाती है। इतना होने पर किसी समझदार को चकमा देना चूना लगाना सरल नहीं है। जो अपना खर्च चला लेता है किसी की सहायता नहीं माँगता साथ ही इतना बचा भी लेता है तो समझना चाहिए कि उनकी बुद्धिमानी में कमी नहीं है। जिनमें बुद्धि है वही कमाते हैं, चाहे आध्यात्मिक सम्पदा हो या भौतिक। जिनने गाढ़ी से कुछ संचय किया है वह इतनी अकल भी रखते हैं कि उसे मुफ्तखोरों पर न लुटाया जाय। उस कमाई को उस कार्य के लिए उस व्यक्ति को दिया जाय जा उपलब्ध सहायता से अपना ही नहीं दूसरों का भी कल्याण कर सके। जिसमें मनुहार करके झटकने और फिर उसे गुलछर्रे उड़ाने के लिए आँखें मूँद कर उड़ेल दें, यह नहीं हो सकता। जो अपनी पात्रता सिद्ध करेगा वही अधिकारी बनेगा। सरकारी ऑफिसर भी प्रतिस्पर्धा जीत कर ही नियुक्ति पत्र प्राप्त करते हैं। कोई अनपढ़ व्यक्ति उस प्रतिफल को प्राप्त करना चाहे तो उसके लिए लोमड़ी खट्टे अंगूरों की ही शिकायत करती रहेगी।

जिसके पास आत्म-क्षमता है, उसे दूसरे लोग भी सहायता करते हैं। फूलों की शोभा बढ़ाने के लिए तितलियाँ कहीं से भी दौड़ आती हैं। सोना खरा हो तो उसके आभूषण बना देने वाले कई स्वर्णकार मिल जाते हैं। पर जहाँ अपनी मूलसत्ता में ही खोट भरी हो, वहाँ इस प्रकार की उपलब्धियाँ हस्तगत नहीं होती।

जो सुयोग्य सत्पात्रों के लिए सुरक्षित है। जो लोकप्रिय नेता या व्यक्ति जन समर्थन प्राप्त करते और वोट पत्र पाते हैं उन्हें ही शासन तंत्र में प्रतिनिधि की हैसियत से चुने जाने का अवसर मिलता है।

अच्छा हो हम अपनी सहायता आप करें। अपने निर्माण में स्वयं जुटें। अपने पंखों पर खड़े हों और अपनी प्रतिभा का परिचय दें। योग्यता और पात्रता की अभिवृद्धि होने पर सहायता तो सारा संसार करेगा भगवान भी?


राजा से भी ढेरों पुरस्कार (Kahani)

एक व्यक्ति गृहस्थी के दायित्वों से निवृत्त हो चुका था। मन तो बार-बार कहता कि अब समाज के प्रति दायित्वों को भी निभाना चाहिए किन्तु पोते-नाती का मोह बारबार घर खींच लेता। एक दिन वह प्रातः भ्रमण के लिए जा रहा था। एक घर के करीब से निकलते ही एक माँ की आवाज आयी। बंद दरवाजे के पास वह आवाज सुनकर ठिठक कर खड़ा हो गया। अन्दर माँ बच्चे को जगा रही थी व कह रही थी “ज्ञानबाबू  उठो! सवेरा हो गया। अब क्या सोते ही रहोगे। उठो अब!” संयोग से उसका नाम भी यही था।

कान में शब्द निरन्तर गूँजने लगे-क्या सोते ही रहोगे? अब तो उठो।” सोचा अब तक सचमुच सोए ही थे। बूढ़ा जाग गया व फिर घर वापस नहीं लौटा। वानप्रस्थ लेकर लोकसेवा के कार्यों में जुट गया।

आत्मबोध जब भी हो, अंतः की पुकार पर फिर निर्णय ले ही लेना चाहिए। हर दृष्टि से वह नफे का सौदा है।

वाक्-कौशल भी एक सिद्धि है। इसके बलबूते कुछ भी अर्जित किया जा सकता है। एक राजदूत अपने देश को रवाना हो रहा था। जिस देश में इतने दिन कार्य किया उसके सम्राट से विदाई ली तो उन्हें उसने पूर्णिमा के चाँद की उपमा दी। उसे अनेकानेक पारितोषिक मिले। देश लौटने पर किसी ने राजा के कान भर दिए कि आपका दूत व दूसरे देश के राजा को पूर्णिमा का चाँद कहता है। राजा बातों में आ गए। दूत को बुलाकर उनने फटकार लगायी व कारागार में डालने की धमकी दे डाली। दूत ने धैर्यपूर्वक कहा-महाराज आप तो दूज के चाँद है। दूज का चाँद तो प्रगति कीसंभावनाओं से भरा हुआ है। किन्तु पूर्णिमा के बाद तो पतन-पराभव ही है महाराज! आपका यश तो दिन दूना रात चौगुना बढ़ना बढ़ता ही रहेगा। उन राजाजी की कीर्ति तो अब समाप्त ही समझें।” बात समझ में आ गयी। दूत ने अपने राजा से भी ढेरों पुरस्कार व धनराशि पायी।

ठीक भी है “वचन कि दरिद्रता?” अच्छे वचन बोलने में कंजूसी किस बात की? चतुर लोग वाक्-कौशल के ही धनी होते हैं।


महत्वाकांक्षाओं की भटकाव भरी पगडंडी

महत्वाकांक्षाएँ देखने में निर्दोष लगती हैं और प्रतीत होता है कि आगे बढ़ने तथा बढ़-चढ़ कर सफलता प्राप्त करने में क्या दोष है? तर्क सीधा-सा प्रतीत होता है और सही भी। किन्तु जब उनके फलितार्थों पर विचार किया जाता है तो उसके साथ अगणित दोष समाविष्ट प्रतीत होते हैं।

महानता से सम्बन्धित व्यक्तित्व की प्रामाणिकता और समाज सेवा की परमार्थ परायणता यदि उत्कर्ष का आधार बने तो उससे आन्तरिक उल्लास और संपर्क क्षेत्र के सहयोग, सम्मान का लाभ मिलता है। आदर्शवादिता के अभाव वाले इन दिनों में ऐसा अनुकरणीय उदाहरण बनता है जिसका अनुगमन कर के अनेकों को ऊँचा उठने का अवसर मिले। इस स्तर की महत्वाकांक्षाएँ सराही जा सकती हैं। उनसे सर्वजनीन हित साधन भी हो सकता है। इस दिशा में बढ़ने वाले यही पुरुष देवमानवों का स्थान प्राप्त करते हैं।

इससे विपरीत है भौतिक स्तर का वैभव संचित करने की महत्वाकांक्षा। इस अवलम्बन की प्रतिक्रिया स्पष्टतः व्यक्ति के संकीर्ण स्वार्थ परायण बनने में दृष्टिगोचर होती है। साथ ही अहंकार भी बढ़ाती हैं। अहंकार की तुष्टि दूसरों पर छाप छोड़ने में होती है। इसके लिए ठाठ-बाट रोपने पड़ते हैं। अपव्यय करने पड़ते हैं। सस्ती वाहवाही लूटने के लिए चाटुकारों की मंडली एकत्रित करनी पड़ती है। उस प्रकार का जुगाड़ बिठाने में चाटुकारों को भी पोषण देना पड़ता है जो कई बार बहुत महँगा पड़ता है। विज्ञापनबाजी की कला अपनाये बिना कोई अपने बड़प्पन को, वैभव को बहुचर्चित नहीं बना सकता। इस प्रकार के विज्ञापन भी समान स्तर के विज्ञापनों से कहीं अधिक महँगे हैं। इतने पर भी महत्वाकांक्षी को वे भुगतान करने पड़ते हैं, अन्यथा उसकी विशिष्टता का ढिंढोरा कैसे पीटे?

बड़प्पन का विज्ञापन करने के लिए कुछ आधार चाहिए। आडम्बर भी हवा में तो नहीं ठहरते। उनके लिए पैर जमाने जितनी जगह तो चाहिए। धर्मात्मा, पुण्यात्मा, भाग्यवान सुसम्पन्न, प्रतिभावान सिद्ध करने के लिए कुछ कृत्य तो उस स्तर के करने ही पड़ते हैं, भले ही उन्हें तिल का ताड़ बनाया गया हो। इस प्रकार का आधार खड़ा करने में भी समय, श्रम और धन लगता है भले ही वह छोटा ही क्यों न हो। मात्र प्रदर्शन के लिए ही क्यों न किया गया हो। यदि यह सब न किया जाय तो महत्वाकांक्षा की पूर्ति कर लेने पर भी उसकी चर्चा कुछ घनिष्ठ लोगों तक ही सीमित रहेगी। इतने भर से किसी महत्वाकांक्षी को संतोष नहीं होता, उसे मात्र दृश्य लाभ ही नहीं, यश भी चाहिए। चर्चा का विषय बने बिना अहंकार की तृप्ति कहाँ होती है?

धन की लिप्सा यदि बढ़े-चढ़े स्तर पर जा पहुँचती है तो वह एक प्रकार के उन्माद जैसी बन जाती है। उस ललक से ग्रसित व्यक्ति उचित-अनुचित का, नीति-अनीति का भेद भूल बैठता है और जिस प्रकार भी बने उस हवस को पूरा करने के लिए कृत्य-कुकृत्य करने में संलग्न हो जाता है। अनाचार, अत्याचार करने में नहीं हिचकता। अपराधी-दुष्प्रवृत्तियाँ अपनाने में भी उसे झिझक नहीं लगती। कामुक व्यक्ति की कुदृष्टि किसी को भी नहीं बख्शता । उसके मस्तिष्क में रिश्तों की पवित्रता का कोई महत्व नहीं रह जाता। नारी मात्र उसे वेश्या प्रतीत होने लगती है। रमणी, कामिनी के अतिरिक्त और कुछ किसी महिला को समझ ही नहीं पाता। ठीक इसी प्रकार वर्चस्व का उन्माद भी ऐसा है जिससे ग्रसित होने पर व्यक्ति सबसे बड़ा बनने के लिए आकुल-व्याकुल रहने लगता है।

महत्वाकांक्षी प्रकारान्तर से अहंकारी ही होता है। वैभव अर्जित करके सुख-सुविधाओं का उपभोग करने तक भी बात सीमित नहीं रहती। उसे यह भी सनक सवार रहती है कि सब उसे अपने से बड़ा मानें। प्रशंसा, प्रतिष्ठा के योग्य कोई काम नहीं बन पड़ते और यश पाने का द्वार बंद दीखता है तो फिर आतंक अनाचार पर उतर आता है और उत्पीड़न के सहारे यह अनुभव कराता है कि उसे सज्जनता की दृष्टि से नहीं, दुष्टता के क्षेत्र में तो बढ़ा-चढ़ा मानना ही पड़ेगा। दस्यु, ठग, पाखंडी, प्रपंची प्रायः इसी आधार पर मूँछें ऐंठते देखे गये हैं कि वे अन्यों की तुलना में अधिक चतुर अधिक प्रपंची और अधिक सफल हैं। इस आधार पर भी वे अपने अहंकार की पूर्ति कर लेते हैं। बदनाम होने में भी उन्हें प्रतीत होता है कि दूसरों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर सकें। अपनी कृतियों से अनेकों को चौंका सकें, भयभीत, आतंकित कर सकें। इस प्रकार और कितने ही नरपिशाच स्तर के दुरात्मा अपनी छाप छोड़ते और चर्चा का विषय बनते हैं। यह अहंकार की ही एक घिनौनी शाखा है। महत्वाकांक्षा इस स्थिति तक भी घसीट ले जाती है।

यही हैं वे लाभ जिनको पाने के लिए महत्वाकांक्षी चित्र-विचित्र कृत्य करता रहता है। उसकी मनःस्थिति प्रेत-पिशाच जैसी बनी रहती है वह यह भूल जाता है कि इस प्रकार अपने को संतोष देने की चेष्टा में अन्य प्रकार के कितने अनर्थ उसके साथ जुड़ जाते हैं। ईर्ष्या और प्रतिस्पर्धा का उसे पग-पग पर शिकार होना पड़ता है।

वस्तुतः नम्रता के आधार पर सद्भाव और सहकार मिलता है। साथ ही यह भी देखा गया है कि बड़प्पन की शेखी बघारने वाले उसका पाखण्ड रचने वाले दूसरों की आँखों में गिर भी जाते हैं। सम्मान देने में तो सोच विचार एवं विलम्ब भी किया जाता है, पर जब धूर्तता की गंध आने लगती है तो उतने भर से व्यक्ति को हेय, अधम, पतित माना जाने लगता है। सद्भावना अनायास ही विलीन हो जाती है। मनुष्य के स्वभाव में यह दोष भी सम्मिलित है कि वह अपने से छोटों को तो सहन करता है किन्तु जो बड़प्पन जताता है, उसके बारे में समझा जाता है कि इसके द्वारा हमारा अपमान हो रहा है। इस अनुभूति के होते ही ईर्ष्या जगती है और नीचा दिखाने की चेष्टा चल पड़ती है। कई बार तो ईर्ष्या शत्रुता से भी अधिक भयंकर रूप धारण कर लेती है। और परोक्ष रूप से ऐसे षड्यंत्र रचते हैं जिससे अहंकारी को आघात पहुँचे। इस स्थिति में फँसकर कितनों को ही भारी संकटों का सामना करना पड़ता है। इस अकारण के जंजाल का मूल कारण एक ही रहा होता है कि महत्वाकांक्षा अहंकार के रूप में प्रकट हुई और उसने सम्बन्धित लोगों की सोती हुई ईर्ष्या को अपने उद्धत आचरण से छेड़कर जगाया।

कभी बड़े आदमी भाग्यवान, पुण्यात्मा, क्रियाकुशल-संपन्न समझे जाते थे, पर समय बदल गया। अब हर बड़े आदमी के सम्बन्ध में तरह-तरह के लाँछन लगते हैं और सोचा जाता है कि इतनी प्रगति कर लेने के पीछे अवश्य ही कोई चालबाजी रही है। वैसा प्रमाण न मिलने पर भी अनुमान यही लगाया जाता है कि जब असंख्य लोग सामान्य स्थिति में रह रहे हैं तो उसे ही वैभव बटोरने के अवसर कैसे मिल गया? साम्यवादी विचार धारा में मालदारों को ही गरीबों को गिरी स्थिति में रखने का दोषी ठहराया जाता है। यह मान्यता उनके मन में भी जमी पाई जाती है जो साम्यवादी विचारधारा के नहीं है। अमीरों के नौकर सम्बन्धी, मित्र, कुटुम्बी प्रायः रुष्ट रहते हैं कि उनके बड़प्पन से उन्हें लाभ नहीं मिला। इस मनोमालिन्य के कारण कई प्रकार से जोखिम भी उठानी पड़ती है। ऐसी मुसीबतें प्रायः महत्वाकांक्षियों पर ही आती हैं। औसत नागरिक स्तर का निर्वाह करने में संतोष रखने वाले इन व्यर्थ जंजालों से बच जाते हैं और अपनी क्षमता को दूसरे उपयोगी कार्यों में लगाकर अपेक्षाकृत अधिक सुखी, संतुष्ट रहते हैं।

उत्कर्ष की अभिलाषा को पूर्ण करने का सी तरीका यह है कि अपनी विद्या, योग्यता, कुशलता को बढ़ाया जाय। प्रामाणिक एवं प्रतिभावान बना जाय। सद्गुणों की दृष्टि से दूसरों की तुलना में अधिक उत्कृष्ट बनकर दिखाया जाय। आदर्श अपनाने में अपने उत्साह और साहस का परिचय दिया जाय।

अनायास ही सराहना का अधिकारी बनने का सीधा मार्ग यह है कि लोकमंगल के लिए अपनी सेवाएँ समर्पित की जायँ। सत्प्रवृत्ति संवर्द्धन में अपने को अग्रिम पंक्ति में खड़ा किया जाय और अनेकों के लिए प्रेरणा स्रोत बना जाय। पुण्य परमार्थ के अनेकों अवसर हर किसी के साथ सर्वत्र विद्यमान रहते हैं। उन्हें अपना कर आत्मपरिष्कार और जनकल्याण का दुहरा लाभ अर्जित किया जा सकता है। सच्ची महत्वाकांक्षा वही हैं जिसमें व्यक्ति की गरिमा और महिमा बढ़े। भले ही भौतिक वैभव की दृष्टि से सामान्य स्तर का रहना पड़े।


Quotation

सितारे रोज चमकते हैं इसीलिए वे स्मृति में रहते हैं। पुच्छल तारे कभी-कभी निकलते हैं इसलिए यदा-कदा ही उनकी चर्चा होती है।


चिन्तन गढ़ता है, हमारा-आचरण

जीवन एक बहुमूल्य यन्त्र के सदृश है। इसे सुघड़ता के साथ इस्तेमाल करना एक महती कला है। जो इस कला में भिज्ञ हैं वे सुखपूर्वक रहते और अभीष्ट लक्ष्य को प्राप्त करते हैं। पर जिन्हें इसे इस्तेमाल करना नहीं आया वे उपकरण के बिगाड़ के साथ अपने भी हाथ-पैर तोड़ लेते हैं। स्वस्थ शरीर, उद्विग्न मन, पारिवारिक कलह, आर्थिक असन्तुलन, शत्रुओं के उपद्रव, लोकापवाद, एवं असफलताजन्य शोक-सन्ताप इस बात के चिन्ह हैं कि जीवन यंत्र के कल-पुर्जे दुर्घटनाग्रस्त होकर टूट-फूट गए हैं। जिसका सुस्पष्ट तात्पर्य है कि संचालक अनाड़ी है। वही इस प्रकार की दुर्भाग्यपूर्ण परिस्थितियाँ उत्पन्न कर सकता है। अन्यथा जीवन प्रत्येक प्राणी के लिए हर घड़ी आनन्द देते रहने वाला ईश्वरीय वरदान है। इसे अभिशाप में बदलने का दोष न तो इसके निर्माता, को है, नहीं वातावरण, को अपितु उस संचालक को है जिसने सही संचालन की कला नहीं सीखी।

बाह्य शरीर के विभिन्न अंग अवयव अपना काम करते दिखाई देते हैं किन्तु गहराई में झाँकने पर प्रतीत होता है कि उनका संचालन करने वाली प्राण चेतना है, व्यक्त मन शरीर की समस्त गतिविधियों का संचालक और नियामक है। प्राण के शरीर में न रहने पर काया के समस्त घटक एवं पदार्थ यथावत् बने रहने पर भी स्तब्ध हो जाते तथा सड़ने लगते हैं। हाथ, पैर चलाने, बोलने आदि की क्रियाएँ तो चेतन मन द्वारा संचालित होती हैं पर रक्त संवाहन, श्वास, प्रश्वास आकुंचन, प्राकुंचन आदि कार्य अचेतन की प्रेरणा से अनायास होते दीखते हैं, उनके पीछे अव्यक्त मन की स्वसंचालित प्रक्रिया ही है।

इस समूची प्रक्रिया का यदि ग्राफ बनाया जाय तो इसमें स्पष्टतया उतार-चढ़ाव के विविध स्वरूप दीख पड़ेंगे। मनोवैज्ञानिकों के अध्ययन स्पष्ट करते हैं कि यह स्वरूप की विधियाँ ठीक हमारे विचारों के अनुरूप होती हैं। भले ही हमारी पूर्व मान्यता में इनका कोई स्थान न रहा हो। किन्तु वास्तविकता यही है कि ये सर्वाधिक महत्वपूर्ण हैं।

सुप्रसिद्ध विद्वान प्राध्यापक एलीशाग्रे ने अपनी कृति “मिरैकिल्स आफ नेचर” में लिखा है कि प्रकाश की तुलना में विचार विद्युत की प्रवाह गति कहीं अधिक है। अभी यन्त्रों के द्वारा पूर्णतया नापा न जा सकने पर भी यह एक तथ्य है कि विचार मात्र कल्पनाओं का उभार न होकर एक शक्तिशाली पदार्थ है उसकी गति तथा क्षमता ज्ञात भौतिक शक्तियों में सबसे अधिक है कुछ विज्ञानविदों ने इसे सूक्ष्म भौतिक भी कहा है। वैज्ञानिकों के इस सूक्ष्म विज्ञान को श्रीअरविन्द अतिभौतिक (सुप्राफिजिकल) कहकर निरूपित करते हैं।

प्रख्यात अध्येता राबर्ट. जे. फ्लेमिंग ने भी अपने पुस्तक “आइडिया एण्ड इट्स प्रॉपर्टीज” में लिखा है कि ताप विद्युत आदि की ऊर्जा मात्र भौतिक पदार्थों को ही नरम-गरम करती है तथा उनके स्वरूप को परिवर्तित करती है। पर विचार विद्युत न केवल व्यक्ति विशेष, वरन् समूचे वातावरण को ही आश्चर्यजनक मात्रा में परिवर्तित कर सकती है। चेतना से सर्वाधिक घनिष्ठ तथा इसे प्रभावित कर सकने वाली क्षमताओं में विचारों को ही शीर्षस्थ माना गया है। वे अपने उद्गम स्थल-विचारक को सर्वाधिक प्रभावित करते और फिर अपने समीपवर्ती क्षेत्र पर असर डालते हुए निस्सीम दूरी तक बढ़ते चले जाते हैं। प्रेरक व्यक्तित्व की प्रतिभा के अनुरूप ही उसकी सामर्थ्य का स्तर रहता है तद्नुरूप अन्यान्य व्यक्तियों और प्राणियों पर उनका प्रभाव पड़ता है।

विचारणा को यदि सुगठित तथा उच्चस्तरीय उत्कृष्टता सम्पन्न बनाया जा सके तो जीवन भी उसी के अनुरूप परिचालित हो सकेगा। शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य को इसी विधा का अनुगमन कर रखा जा सकता है। पर इसके विपरीत यदि मानसिक क्षेत्र को अवांछनीय कूड़े-करकट से भर दिया गया हेय विचारों से परिपूरित कर लिया गया तो उसकी सड़न से जीवन के समूचे अणु-परमाणु विषाक्त हो जाएँगे और सामान्य दैनन्दिन जीवन की समस्याओं का हल ढूँढ़ निकालना भी सम्भव न बन पड़ेगा। मानसिक चेतना की यह विषाक्त स्थिति जीवन के लक्ष्य एवं स्वरूप दोनों पर कुठाराघात करती तथा स्वयं भी कुंठित हो जाती है।

जिस जीवन के द्वारा शिवत्व व सौंदर्य की अभिव्यक्ति होनी थी सत्ता के मूल सत् को पाना था, कुरूपता ही पल्ले बँध जाती है। इस कुरूपता को हटाने तथा सौंदर्य को प्रतिष्ठित करने के लिए आवश्यक है विचारों के स्वरूप को समझा जाय। विचार ही मनुष्य को ऊँचा उठाते अथवा पतन के गर्त में धकेलते हैं।

विचार तरंगों को दो भागों में विभक्त किया जा सकता है। प्रथम सृजनात्मक एवं द्वितीय विध्वंसात्मक। सृजनात्मक विचारणाएँ अपनी अभिव्यक्ति प्रसन्नता सन्तुष्टि, आशा, हिम्मत, करुणा, सहृदयता, सहानुभूति आदि भावों के रूप में करती है। ध्वंसात्मक विचारणाओं की अभिव्यक्ति क्रोध, घृणा, ईर्ष्या, आदि के रूप में होती है। विचारों के सृजनात्मक स्वरूप का शरीर पर पड़ने वाला प्रभाव उत्साहवर्धक होता है। इसके विपरीत ध्वंसात्मक चिन्तन मानसिक ऊर्जा का क्षय कर अपनी कार्यक्षमता नष्ट कर डालता है। ऐसी स्थिति में व्यक्ति किंकर्तव्य विमूढ़ हो जाता है और संकट से उबरने की राह पाने में अपंग असमर्थ बन जाता है। ऐसी स्थिति में उलटे विचारों की शृंखला नई उलझनें पैदा कर अधिकाधिक दल-दल में डुबोती जाती हैं।

सृजनात्मक चिन्तन हमारे आचरण व्यवहार को गढ़कर उसको सौंदर्यवान बनाने वाला होता है। इससे व्यक्तित्व में प्रभाविकता आती है विख्यात मनोविद् जे.जे. मैकडरमॉट ने अपने अध्ययन “द् रायटिंग्स आफ विलियम जेम्स "कम्प्रीहेन्सीव एडीसन" में कहा है कि विचारों से ही जीवन को गढ़ा जाता है। इसी के अनुरूप जीवन की अभिव्यक्ति तत्संबंधी क्रियाकलापों गतिविधियों के रूप में होती है उसकी उत्कृष्टता-निकृष्टता प्रेम, उदारता, सहानुभूति अथवा परपीड़न घृणा आदि के रूप में दृष्टिगत होती है।

इनको परिष्कृत करने तथा चेतना के उच्चतम आयामों को प्राप्त करने के लिए भारतीय मनीषियों ने विविध अध्यात्म उपचार ढूँढ़ निकाले थे। इसके लिए एक सर्वांगीण व्यवस्थित विचार-विज्ञान ही सृजित किया गया। जिसके अनुसार पहले उन्नत विचारों से मन में जमे गंदे विचारों को साफ किया जाता है। रामकृष्ण परमहंस इसे पहली और अनिवार्य आवश्यकता मानते हुए अपनी सरल भाषा में बताते हैं कि संसार में कहीं कष्ट नहीं है। अनुभूत होने वाला कष्ट हमारे अपने कुविचारों का है। कुविचारों का काँटा हमें चुभ गया है। उसी के कारण सारा कष्ट है। इसको दूर करने के लिए सुविचारों का एक दूसरा काँटा लेकर इससे चुभे एक काँटे को बाहर निकाल कर फेंक दिया जाता है। निकाल फेंकने की यह विधा-स्वाध्याय है यही वह बुहारी है जिससे मन की समस्त गंदगी को बुहारा जाता है। श्री अरविन्द “लेटर्स आन योग“ में स्वाध्याय की प्रभावोत्पादकता के बारे में कहते हैं कि इससे उच्च मन का परिक्षेत्र खुलता है। जिससे चेतना के उन्नत स्तरों से विचारों का अवतरण होता है। इसे विचारों के प्रकाश मान संसार का उदय कह सकते हैं।


जीवन का बहुआयामी विकास (Kahani)

जरथुस्त्र जब जन्मे तो हँसते हुए पैदा हुए। अन्य बालकों की तरह रोए नहीं। सभी आश्चर्य चकित कि यह रोए क्यों नहीं। भाँति-भाँति की अटकलें लगाई गयीं। जब जरथुस्त्र बड़े हुए तो लोगों ने जन्म के समय हँसने का वृत्तान्त उन्हें सुनाया व इसका रहस्य जानना चाहा। वे बोले-हम तो करा रहे थे तब भी हँस रहे थे। तब से ही पर्दे के पीछे से हँसते चले आ रहे हैं। हम जन्म के समय ही नहीं हँसे। हर परिवर्तन हँसकर ही झेला जाता है।” समझ में नहीं आया कि मरते समय क्यों हँसे। पूछा गया तो बोले कि “लोगों को रोते देखकर हँसी आ गयी कि कितने नादान हैं। हम मकान बदल रहे हैं तो इन्हें क्यों परेशानी हो रही है।”

यदि हम परिवर्तन इसी तरह मुस्कराकर स्वीकार कर लें तो जीवन जीने का मंत्र आ जाय।

महर्षि पतंजलि योगदर्शन के प्रथम पाठ के 17 वें सूत्र में इसके अन्य आयामों का उद्घाटन करते हुए कहते हैं कि “किसी पवित्र विचार पर लगातार निदिध्यासन करने पर विवेकपूर्ण तर्क प्रवणता से आनन्द मिलता और अहं के आभासी भाव से छुटकारा हो इन्द्रिय विषयों से अहं का तादात्म्य छू जाता है और संप्रज्ञात स्थिति की गति होती है।” महर्षि के उपरोक्त सूत्र से स्पष्ट है कि विचारों का सुगठन न केवल बाह्य जीवन को परिष्कृत, प्रखर और तेजस्वी बनाता है अपितु चेतना के उन्नत स्तरों के द्वार भी उन्मुक्त करने वाला है इसका अवलम्बन ग्रहण कर हममें से प्रत्येक अपने जीवन का बहुआयामी विकास सहजतापूर्वक कर सकता है।


संस्कृति का शाश्वत ज्वलन्त प्रश्न!

“वह मेरा नौकर था पर कभी उसने मुझसे वेतन के सम्बन्ध में कुछ कहा नहीं। जो कुछ उसे मिल जाता, वही बहुत था। पहली तारीख को मैं ही उसे बुलाकर वेतन देता। एक बार परीक्षा के लिए मैंने नहीं बुलाया। पूरे महीने नहीं बुलाया। न माँगने आया वह। दूसरे महीने स्वयं बुलाकर दोनों महीने का वेतन देना पड़ा।” साहब अपने एक नौकर की आत्मकथा सुना रहे थे।

नैनीताल सेऊ पर रानीखेत के पास मिस्टर विलियम जोन्स ने अपना बंगला बना लिया था। वहाँ के झरनों में गन्धक बताया जाता है। उसके गरम जल से पेट के समस्त रोग ठीक हो जाते हैं। सम्भवतः इसी लालच से वे वहाँ रहने लगे थे। अपनी काव्य क्षमता से राष्ट्रीय चेतना को झकझोरने वाले मैथिलीशरण गुप्त भी इसी उद्देश्य से लगभग एक महीने से वहाँ रुके थे। साहब बँगले में अकेले ही रह रहे थे। मेम साहब उनके है नहीं। एक माली, एक खानसामा, और एक टॉमी (कुत्ता) बस यही उनका परिवार है।

यहाँ कोई और मिलने-मिलाने वाला न होने से गुप्त जी इन साहब के साथ अवसर मिलते ही जा बैठते थे। एक दिन एक पहाड़ी पर टहलते हुए इन दोनों का परिचय हुआ और फिर इनकी घनिष्ठता हो गई। अँग्रेज सज्जन में वह औद्धत्य तनिक भी नहीं था-जो उन दिनों ब्रिटिश भारत में रहने वाले किसी भी अँग्रेज में होना सामान्य बात थी। घंटों दोनों साथ बैठकर भारतीय संस्कृति, हिन्दी साहित्य पर चर्चा करते। बड़ी शुद्ध हिन्दी थी उनकी, उनका अध्ययन गाम्भीर्य देखकर गुप्त जी हतप्रभ रह गए।

उस दिन भारतीय संस्कृति पर चर्चा आरम्भ ही हुई थी। उसी बीच उन्होंने कहा मि. गुप्त भारत की और पश्चिम की संस्कृति में एक मौलिक भेद है। थोड़ी देर चुप रह कर उनके चेहरे की ओर ताकते हुए बोले भारतीय संस्कृति में श्रेष्ठता का मानदण्ड है “तुम क्या हो?” जबकि पश्चिमी संस्कृति में श्रेष्ठता का मापन “तुम्हारे पास क्या है?” का उत्तर मिलने पर होता है। “उसका मिलना, साथ रहना मेरे जीवन की स्थाई अनुभूति बन गई है।” अँग्रेज सज्जन किन्हीं भावों में निमग्न होने लगे। “तभी मैं समझ सका कि यहाँ की संस्कृति रैदास-कबीर जैसे गरीबों, बेपढ़ों को श्रेष्ठ क्यों मानती है? राज्य छोड़ देने के बाद बुद्ध महावीर श्रेष्ठतम कैसे बन गए? यहाँ के सांस्कृतिक आदर्श को ठीक-ठीक घटित होते मैंने उसके जीवन में देखा है। आज समझता हूँ। सचमुच कोई ऐसा परम तत्त्व है जिसे पा लेने पर मनुष्य आप्तकाम हो जाता है। वह श्रेष्ठता से कहीं अधिक श्रेष्ठ बन जाता है। फिर विश्व का श्रेष्ठतम धनिक, संसार का सर्वोत्कृष्ट विद्वान, सब कनिष्ठ हो जाते हैं। यहाँ की संस्कृति के इस अद्भुत रहस्य को मैं समझ सका हूँ। लेकिन उस समय मैं मोहान्ध था।” दोनों की चर्चा मि. जोन्स की स्मृतियों के टेढ़े-मेढ़े गलियारों से गुजरने लगी।

“अफ्रीका के बोअर युद्ध में मैं एक कर्नल था। सही मानव को नृशंसता का नंगा चित्र देखने को मिला। घृणा हो गई । भारत के सम्बन्ध में बहुत कुछ पढ़ रखा था। यहाँ आ गया और आगरे में कर ली प्रोफेसरी। यहाँ आने से पहले तक मैं वहीं था।” साहब ने अपना संक्षिप्त परिचय दिया ।

“मेरे बँगले के सामने फूलों का छोटा बगीचा था। जैसा कि तुम यहाँ देख रहे हो। फूलों से सदा मुझे प्रेम रहा है। उन्हीं के लिए एक माली रहता था। वह बुड्ढा था और अकेला ही था। बंगले के कोने में उसकी कोठरी थी, ,खुरपी, फावड़ा, फुहारा, बाल्टियाँ, बड़ी कैंची आदि बगीचे का समान उसी में रहता था। बुड्ढ़े ने एक कोना खाली कर लिया था । वहीं वह अपनी रोटियाँ बना लेती और अपनी चटाई डालकर सो जाता।” उस बुड्ढ़े के स्मरण से साहब की आँखें भर आयीं ।

“एक कम्बल, फटी हुई दो धोतियाँ, दो अँगोछे और एक मिर्जई इतने ही कपड़े थे। एक तवा, एक लोटा, एक बटलोई और एक थाली-बर्तनों के नाम पर और कुछ नहीं था। एक चटाई उसकी गृहस्थी में और बढ़ गई थी। बड़े सबेरे स्नान करके बंगले के सामने मन्दिर में दर्शन कर आता और फिर जुट जाता बगीचे के काम में। दिन में एक ही बार दो बजे के लगभग रोटियाँ बनाता। उजाला रहने तक उसकी खुरपी काम करती रहती और शाम होते ही लालटेन जलाकर फटक पर बैठ जाता और वहीं से सामने मन्दिर की रामायण सुनता। मेरे पास दरबान नहीं था, अतः मैंने उसे शाम को कहीं न जाने के लिए कह दिया था।” साहब यह वाक्य कहते-कहते किन्हीं गहराइयों में खोने लगे।

चिन्तन से क्रमशः उबरते हुए उन्होंने अपनी चर्चा आगे बढ़ाई। “बेल ! तुम पौधों को ठीक सींचता नहीं ! हमारे पौधे सूख गए।” मैं एक दिन उस अप्रसन्न हुआ।

“सींचता तो हूँ हुजूर परसों ओले पड़े थे उन्हीं से शायद ऐसा लग रहा है।” उसने सहज नम्रता से कहा था।

“हम कुछ सुनने नहीं माँगता जुर्माना करेगा तुमको !” मैंने नोट बुक खोली और पेन उठाया “चार रुपया जुर्माना !”

“जो हुजूर की मर्जी!” वह बुड्ढा सलाम करके चला गया। मैं स्तम्भित रह गया। उस झुर्री पड़े सफेद बाल वाले माली ने मुझे चकित कर दिया। एक रुपया जुर्माने पर खानसामा दिन भर रोता रहता है। महीने भर माफी माँगता है। उसकी तनख्वाह पच्चीस है जबकि उस बुड्ढे की सिर्फ आठ। न रोया न प्रार्थना की और न दुःखी हुआ। चार रुपये में क्या खाएगा वह? सामने मन्दिर में जो वह हर महीने पूजा करता है कैसे करेगा? ऐसा नौकर मैंने पहले कभी नहीं देखा था।

“मिली!” दूसरे दिन मैंने पुकारा

“हुजूर!” पौधों की निराई छोड़कर पास आया वह। “हम तुमको माफ करता है! अच्छा काम करने पर तुमको इनाम मिलेगा!” मैंने उस पर दया करते हुए कहा।

“हुजूर की मर्जी” चला गया वह सलाम करके। न खुश हुआ और न कृतज्ञता प्रकट की! कैसा मनहूस आदमी है। मुझे अपने आप पर गुस्सा आया क्यों इसे क्षमा किया। उस दिन मैंने उसे अच्छी तरह तंग करने का निश्चय किया।

जब मनुष्य क्रोध करता है तो अन्धा हो जाता है। उसकी सहज वृत्तियाँ अन्धकार में पड़ जाती हैं। वह नीचता के गढ्ढे में गिरता है और गिरता चला जाता है। मैं नीचता पर उतर आया था मि. गुप्त । मि. जोन्स ने मैथलीशरण की ओर देखते हुए अपने अतीत को कुरेदा।

मैंने खानसामा से कहा चुपके से बुड्ढे का कम्बल उठा लाओ! माघ की रात्रि एक दिन पहले ओले पड़ चुके थे। उस दिन भी बदली थी । बुड्ढा शाम को खूब चिल्लायेगा कोई दूसरी बात मेरे मन में नहीं थी ।

दस बजे रात को मैं चौंक कर उठा । खानसामा बुलाने आया था उसने रिपोर्ट दी माली न तो बड़बड़ाया न तो गालियाँ दी! केवल इतना ही कहा किसी बेचारे की ठंडी रात सुख से कटेगी! अच्छा हुआ। अब वह सूखी घास बगीचे से ले आया है उसी की ढेर बनाकर उसमें पड़ा है!

“कम्बल दे आओ! मेरा नाम मत लेना। “ “मैंने दया तो अवश्य दिखलाई पर पराजय स्वीकार नहीं की। इस जिद के मारे मैं उस वर्ष गर्मियों की छुट्टी में नैनीताल नहीं गया। ज्येष्ठ की कड़ी दुपहरी में बगीचे की सघन छाया में बैठकर बुड्ढे से ठीक निर्जला एकादशी को पूरे दिन घास छीलवाई मैंने। वह एक बार भी असमर्थता बताता, गिड़गिड़ाकर छुट्टी माँगता तो मैं प्रसन्न हो जाता, पर वह चुपचाप काम करता रहा।”

खानसामे ने शाम को बुड्ढे से कहा “साहब पूरा जल्लाद है। व्रत के दिन भी.....।” मैं सुन रहा था। “छिः मालिक की निन्दा करते हो? काम नहीं लेंगे तो क्या मुख देखने को रखा है। वैसे बड़े दयालु हैं।” मैं अधिक सुन नहीं सका। बंगले में आकर आराम कुर्सी पर धम्म से बैठ गया।

“लेकिन अभी मेरा अहंकार हारा नहीं था, मैंने दूसरे दिन खानसामा को कुछ इधर-उधर की समझा कर भेज दिया। मुझ से पूछ कर ही वह मालियों की पंचायत में गया था। पंचायत का चौधरी था वह। भरी पंचायत में जाकर खानसामा ने उसे गालियाँ दी और थप्पड़ लगाया चोर कहकर खानसामा उसे पकड़कर मेरे पास ले आया। मेरे पूछने पर उसने कहा मुझे कोई शिकायत नहीं है! हुकुम हो तो पंचायत का काम पूरा कर आऊँ । सुना मालियों में बड़ी उत्तेजना थी। वे खानसामा की खूब मरम्मत करना चाहते थे। बुड्ढे ने उन्हें समझाकर शान्त किया बेचारे के पैसे खो गए ! मुझ पर सन्देह न होता तो वह ऐसा क्यों करता? हानि से दुखी है भूल हो गई। मैं सुनकर ठक् रह गया। सोचने लगा कि ईर्ष्या मनुष्य को कितना नीच बना सकता है।”

“मैंने दूसरा माली रख लिया। बुड्ढे को केवल निगरानी का काम दे दिया और वेतन दुगुना कर दिया। कोई खुशी नहीं दिखाई दी उसके चेहरे पर। दूसरे दिन वह ज्यों का त्यों काम करने में जुटा था और नया माली जो उसका असिस्टेंट था, बैठा हुआ चिलम पी रहा था। अन्ततः एक महीने में नये माली को मुझे निकालना पड़ा । बुड्ढे ने कभी उसकी शिकायत नहीं की । न उसे निकालने की प्रार्थना करने आया। वह वही आठ रुपये लेने को तैयार था, पर मैंने किसी तरह स्वीकार नहीं किया। वह अब प्रत्येक पूर्णिमा को सत्यनारायण की कथा सुनने लगा था। मैं जानता था कि वेतन के बढ़े रुपये प्रसाद और दक्षिणा में दे आता है। मुझ से पूछ कर पूर्णिमा को सामने के मन्दिर में कथा की व्यवस्था करके सुनने चला जाता था।”

“लेकिन एक दिन ! ओफ !! उस दिन !!!” साहब का कण्ठ स्वर भर्रा गया। गुप्त जी उनकी भाव-भंगिमा में आये परिवर्तन से चौंक गए। मि. जोन्स कह रहे थे-पता नहीं मुझे क्या हो गया था। मुझे कौन सा शैतान दबाए बैठा था। मैंने उसे आज्ञा नहीं दी। तुम्हारी रामनवमी । उसे दो दिन से ज्वार आ रहा था। बगीचे का काम वह दरबार करता था। आज का काम उसने निबटा दिया था पौधे सींच दिये थे और उखड़ने योग्य क्यारियाँ गाड़ दी थीं। रामजन्म के समय मन्दिर में जाना चाहता था वह। आधे घण्टे के लिए जाएगा। आरती हो जाने पर लौट आएगा।” साहब ने सूनी दृष्टि ऊपर उठाई।

“सबेरे बिल्ली ने दूध गिरा दिया था। चाय देर से मिली थी। सुबह का अख़बार नहीं आया था। पैर में सीढ़ी से उतरते समय बूट फिसलने से मोच आ गई थी । झल्लाहट थी ही। कह दिया-फाटक से बाहर नहीं जा सकते! चुपचाप काम करो! साहब ने आँखें पोंछी।

बन्दूक का शब्द हुआ। मैं बंगले से बाहर आ गया! कहाँ फायर हुआ? पूछते ही मन में आ गया कि मन्दिर में जन्म के समय धड़का किया गया है माली! अपने सामने फाटक के पास स्टूल पर उसका बैठना मुझे बुरा लगा। उत्तर न पाकर मैं झपटा। उसे ढकेल कर ठोकर लगाना चाहता था। हाथ लगाते ही मैं चौंक की दो कदम पीछे हट गया। धक्के से बुड्ढा लुढ़क गया था। वह माली कहाँ था? वह तो उसका शरीर भर था ।” मैं चीख पड़ा।

“और मैं “? साहब जैसे कुछ खोजने लगे। सामने बैठे मैथिलीशरण गुप्त को ऐसा ताका जैसे अपनी खोई वस्तु उन्हीं के अन्दर ढूँढ़ रहे हों, कुछ क्षण चुपचाप रह कर वह कहने लगे “वह सुख-दुःख से ऊपर था । हानि लाभ उसे छू नहीं सकते थे। छूते भी कैसे वह महानता के सर्वोच्च शिखर पर जो था। मानापमान के सिर पर उसने पैर दिया था। दोष देखना तो जैसे उसे मालूम ही नहीं था। किसी निन्दा के नाम पर कह उठता दूसरों के दोष देखने से व्यक्ति आत्म विमुख हो जाता है। भारत में ही सम्भव हैं ऐसे व्यक्ति । सचमुच यहाँ की संस्कृति महान है

महानतम है। इस देश के पास, इसी देश के पास वे विचार हैं जो मनुष्य को देवता बना देते हैं। यहीं जीवन जीने की उस कला का विकास हुआ है जिसे अपनाने पर श्रेष्ठता के सारे मानदण्ड बौने हो जाते हैं।”

“इस देश की संस्कृति का शाश्वत प्रश्न “तुम क्या हो?” मुझे बेचैन किए है। इस प्रश्न का हल ही मेरा प्रायश्चित है उस परम सन्त को सताने का।” कहते हुए मि. जोन्स मौन हो गए। महाकवि मैथिलीशरण अवाक् हो पश्चिमी गौरव को नतमस्तक होते देख रहे थे। अपनी संस्कृति का शाश्वत प्रश्न उन्हें भी मथने लगा था।


VigyapanSuchana

-सूचना-

बंगला भाषा में अखण्ड-ज्योति पत्रिका का अनुवाद चुने हुए लेखों के माध्यम से एक त्रैमासिक पत्रिका के रूप में कलकत्ता से प्रकाशित होता है। इसका नाम अभी “युग निर्माण-योजना “ है। नये नाम

बाँग्ला अखण्ड-ज्योति “ से प्रतिमास प्रकाशन की योजना अगले वर्ष के प्रारंभ से है। इस त्रैमासिक पत्रिका का चन्दा अभी 20 रुपये वार्षिक है । जो भी परिजन इस संबंध में जानकारी चाहते हों , वे “युग निर्माण योजना” बड़ा बाज़ार शाखा 2 मल्लिक स्ट्रीट, तल्ला-1 कलकत्ता-7” पर पत्राचार करें।


चेतना के अनुसंधान में निरत विज्ञान

सृष्टि का मूल कारण चेतना को माना गया है। जड़ पदार्थ भी अपना स्वरूप व अस्तित्व इसी से प्राप्त करते हैं। पिण्ड में यह जीव चेतना और ब्रह्माण्ड में ब्राह्मी चेतना-परमात्मा चेतना के रूप में क्रियाशील है। वैज्ञानिक तथ्यों से भी स्पष्ट है कि जड़ की उत्पत्ति हुई है।

इस संसार में उत्पत्ति एवं विकास की कोई जड़ प्रक्रिया नहीं है, जैसी कि शून्यवाद मान्यता है। ध्वंस और सृजन विकास और उत्थान और पतन भी इसका स्वभाव नहीं। यदि यह क्रियाएँ देखने में आती हैं, तो इसके पीछे भी किसी नियामक चेतन सत्ता की इच्छा काम करती है। उपनिषद्कार का कथन है-ईशावास्यमिदं सर्व” अर्थात् उस परम चेतना का वास सर्वत्र है। अपनी माया द्वारा वह संसार के रूप में सामने आती है। गीता में सृष्टि संरचना के संबंध में भगवान कृष्ण कहते हैं “मैं अजन्मा, अविनाशी एवं सभी का स्वामी हूँ, प्रकृति में अधिष्ठित होकर अपनी योगमाया से जीवन धारण करता हूँ।” स्पष्ट है कि अदृश्य चेतना ही दृश्य पिंड के रूप में प्रकट होती है।

पाश्चात्य वैज्ञानिकों में डार्विन, स्पेन्सर जैसे विकासवादियों ने मनुष्य को एक विकसित प्राणी के रूप में माना है। उनका कहना है कि विकास की प्रक्रिया प्रकृति में एक स्वसंचालित रीति से चल रही है। मनुष्य जीवों के क्रमबद्ध विकास की चरम सीढ़ी है, जिसका उद्गम स्रोत पदार्थ है। किसी अन्य कारण सत्ता को अमान्य करते हुए वे कहते हैं कि जड़ तत्त्व से ही यह सृष्टि बनी है। उनके प्रतिपादनों में इस बात का कहीं भी उल्लेख नहीं है कि जड़ का भी कोई आदि स्रोत है या नहीं? उसकी उत्पत्ति किस प्रकार व क्यों

कर हुई ?

एक बार हक्सले ने भाषण देते हुए कहा था कि जो, मनुष्य एवं अन्य जीवों को जीवविज्ञान का ही भाग मानते हैं एवं उन्हें वहीं तक सीमित रखते हैं, वस्तुतः वे भारी भूल करते हैं। मनुष्य जन्म के पीछे एक बड़ा दर्शन और मनोविज्ञान काम करता है। इसी के आधार पर वह एक जीवन के बाद दूसरा एवं दूसरे के पश्चात् तीसरा जन्मधारण करता चलता है तथा इस क्रम में उपार्जित विशेषज्ञता के आधार वर वह आगे की उन्नति-प्रगति करता हुआ, अन्ततः अपने चरम लक्ष्य को प्राप्त कराता है। वे कहते हैं कि यदि इसके मूल में कोई चिन्मय नियामक सत्ता काम नहीं कर रही होती, तो जन्म-मरण ही मनुष्य का स्वभाव बन जाता, इस क्रम में उपार्जित ज्ञान से उसका कोई सरोकार रह नहीं जाता, पर दिखाई इसके ठीक विपरीत पड़ता है। देखा जाता है कि पिछले जीवन में उसकी प्रगति-यात्रा जहाँ रुकी थी, अगले जीवन में उसके ठीक आगे से प्रारंभ होती है और इसी प्रकार वह अन्तिम लक्ष्य तक पहुँच जाती है। इससे प्रतीत होता है कि निश्चय ही मनुष्य की इस प्रगति-यात्रा को कोई अदृश्य सत्ता नियंत्रित करती है। यह सत्ता कोई और नहीं, वरन् स्वयं स्रष्टा ही है। इस प्रकार उन्होंने भगवद् सत्ता के अस्तित्व को स्वीकारते हुए स्पष्ट कहा है कि यहाँ जो कुछ दिखाई पड़ता है, सब उसी का खेल है। इस संयोग स्वभाव कह कर टाला नहीं जा सकता।

विकासवादी मान्यताओं की त्रुटि यह रही कि वह प्राणियों की उत्पत्ति का कारण मैटर को मानकर संतुष्ट हो गयीं। तथ्य और प्रमाण को सर्वोपरि मानने वाले विज्ञान की इस मान्यता को उपहासास्पद ही कहा जायेगा। विभिन्न प्रकार के रसायनों के सम्मिश्रण से चेतन जीव की उत्पत्ति की साक्षी वह अब तक नहीं दे सका है। इस आधार पर यह कहना अत्युक्तिपूर्ण न होगा कि विकासवादी पूर्वाग्रही मान्यताओं से ग्रसित रहे हैं। उन्होंने कभी यह सोचने का कष्ट नहीं किया कि कारण के बिना कार्य किस भाँति संभव है? उनकी मूलभूत कमी यही रही । यदि उनकी दृष्टि कभी इस प्रश्न पर केन्द्रित हुई होती, तो संभव था, आज वे इस भ्रान्ति से बचे रह कर सत्य और तथ्य के काफी करीब होते, किन्तु ऐसा न हो सका। यही उनके भटकाव का कारण बना।

सम्प्रति अब उन्हें अपनी गलती का भान होने लगा है और अपनी पूर्ववर्ती मान्यता को नकारने की स्थिति में आ गये हैं। विज्ञान ने भी इस दिशा में उल्लेखनीय प्रगति की है। वह अपने सिद्धान्त द्वारा प्रकारान्तर से पदार्थों में विद्यमान चेतना को ही सिद्ध करता है। इस प्रकार अगले दिनों यदि विज्ञान की विभिन्न शाखा-प्रशाखाएँ चेतना द्वारा पदार्थ की उत्पत्ति के सिद्धान्त को स्वीकार लें तो इसे आश्चर्य नहीं मानना चाहिए।


नगद धर्म का पालन करने वाला देवता

देवताओं से अनेकों से अनेक प्रकार की कामनायें, प्रार्थनाएँ की जाती हैं पर वे मूकवत् ही बने रहते हैं। उनका अनुग्रह मिलने का भी कोई निश्चय नहीं रहता पूजा उपचार में लगे पैसे का उलाहना भी मन ही मन दिया जा सकता है। क्योंकि उनका न तो कुछ पता ठिकाना है और न दृश्य शरीर । ऐसी दशा में कुछ मिलने-न मिलने का भी निश्चय नहीं बँधता । संदेह बना रहता है कि कहीं कोरी कल्पनाओं का भटकाव मात्र ही न हो। इच्छा फलित होने पर भी देवता की कृपा हुई निश्चित नहीं माना जाता, अपना पुरुषार्थ, भाग्य, समय का सुयोग, अमुक का सहयोग जैसी बातें भी ध्यान में आती हैं। इसलिए असफलता में देवता को कोसा तो जाता है पर सफलता का पूरा श्रेय उसे नहीं मिलता । अँधेरे में ढेला फेंकने जैसी मनःस्थिति रहती है।

तब क्या इस संदर्भ में सोची जाने वाली बातें सभी अनिश्चित है? इस संदर्भ में एक बात निश्चित रूप से कही जा सकती है कि एक देवता ऐसा है जो प्रत्यक्ष दीखता भी है साथ ही रहता भी और आवश्यकताओं की पूर्ति में पूरी तरह समर्थ भी है। उसकी रीति-नीति भी मर्यादित सुव्यवस्थित है। ऐसी दशा में उसकी श्रद्धापूर्वक की गई पूजा-अर्चा के निरर्थक जाने जैसा असमंजस भी नहीं रहता। उसके दरबार में इस हाथ दे उस हाथ ले का अनुशासन चलता और नकद धर्म का पालन होता है।

उस देवता का नाम है “ जीवन” । उसका सदुपयोग करने वाला निहाल हो जाता है, साथ ही यह भी निश्चित है कि उपेक्षा अवमानना करने वाले खाली हाथ रहते हैं और जिनने भी दुरुपयोग करने का दुःसाहस किया वे क्रोध के भाजन भी बनते हैं अभिशापजन्य कष्ट सहते हैं। जीवन देवता का तिरस्कार करने वाले पतन के गर्त में गिरने, पिछड़ेपन का त्रास उपहास सहे बिना बचते नहीं।

मनुष्य भगवान का राजकुमार है युवराज। पर सच्चा युवराज वह है जिसके पास तद्नुरूप साधन या अधिकार भी हो। ईश्वर ने इसमें भी कोताही नहीं रखी है। जीवनरूपी ऐसा वैभव प्रदान किया है, जिसे अक्षय भण्डार भी कह सकते हैं।

पुरातन इतिहास और वर्तमान का प्रचलन इस बात की साक्षी है कि जिनने भी सच्चे मन से उसे सँभाला सँजोया है वह निहाल होकर रहा है। पतन पराभव उन्हीं के हिस्से में आया है जो उसका तिरस्कार करते हैं। जिनने उसका महत्व समझा और सदुपयोग किया उनमें से किसी को भी शिकायत करने या कोसने की आवश्यकता नहीं पड़ी है।

इस संसार में सब कुछ प्रत्यक्ष है। परोक्ष की प्रेरणा भर रहती है। पर जो कुछ करना होता है जो किया जाता है वह सब कुछ स्पष्ट दीखता है। बुद्धि का थोड़ा सा उपयोग कर लेने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि पुराने लोगों की यह मान्यता शत प्रतिशत सही है कि मनुष्य अपने भाग्य का विधाता आप है।

जीवन समय के टुकड़ों से मिलकर बना है। इसमें से प्रत्येक घटक ऐसा है जिसकी बहुमूल्यता असाधारण है। उसकी बरबादी करना हाथ में आये हुए मणिमुक्तकों को बखेर देना है। उनका दुरुपयोग करना तो एक प्रकार से आत्मघात है। उसके लगाये हुए घाव ऐसे हैं जो कालान्तर में बड़ी कठिनाई से ही भरते हैं। जिसे सफल और श्रेयाधिकारी बनना हो उसे जीवन का महत्व समझना चाहिए और उसके सदुपयोग में निरन्तर संलग्न रहना चाहिए। इस तत्परता का प्रत्यक्ष फल उन सभी के जीवन में देखना चाहिए जिनने अपने आपको सँभाला और समय का सतर्कतापूर्वक उपयुक्त कार्यों में सदुपयोग किया और उसका कल्पवृक्ष की साधना जैसा प्रतिफल प्राप्त करके धन्य हो गये।

जीवन साधना के अनुष्ठान का शुभारंभ कब से किस प्रकार किया जाय? इसका तरीका भी बहुत सुलभ है और मुहूर्त निकालना हो तो आज का दिन ही श्रेष्ठतम शुभारंभ है। विधान ऐसा है जिसमें कुछ खर्च करना नहीं पड़ता और किन्हीं ऐसे साधनों को जुटाना नहीं पड़ता जो कष्टसाध्य हों जिन्हें तलाशने कहीं अन्यत्र जाना पड़े ।

प्रातःकाल जब भी नींद खुले बिस्तर पर पड़े-पड़े ही यह मान्यता विकसित करनी चाहिए कि आज ही जन्म हुआ है, अभी अभी । इसकी अवधि एक दिन लम्बी ही है। इसलिए ऐसा प्रयास करना चाहिए जिसमें एक घड़ी भी निठल्ले बैठने निरुद्देश्य काम करने या न करने योग्य करने में उसका अपव्यय होने लगे। इसके लिए यही उपयुक्त है कि उठने से लेकर सोने तक की ऐसी दिनचर्या बना ली जाय जिसमें समय के प्रत्येक क्षण का मस्तिष्क प्रत्येक विचार तरंग का श्रेष्ठतम उपयोग होता रहे।

इसके बाद बिस्तर छोड़ना चाहिए और घड़ी की सहायता से प्रत्येक क्षण को इस प्रकार व्यतीत करना चाहिए कि वह रबड़ की तरह खिंचकर अपेक्षाकृत अधिक लम्बा हो जाय। आलसी का दिन सिकुड़ जाता है। ऐसे वैसे उलट-पुलट करते ही समाप्त हो जाता है। अब का काम फिर टालने की आदत ऐसी बेहूदी है कि उसके कारण ढेरों महत्वपूर्ण काम पीछे कभी के लिए जमा होते रहते हैं और कचरे की तरह उनका ढेर जमा हो जाता है। किन्तु यदि मुस्तैदी बरती जाय, शरीर में स्फूर्ति और मन में उत्साह रहे तो एक काम के साथ-साथ चार काम और भी अनायास ही होने लगते हैं। इस रीति से जिया गया थोड़ा जीवन भी इतना महत्वपूर्ण होता है जिसमें हजारों शतायुओं को निछावर किया जा सके।

रात को सोने के लिए बिस्तर पर जाते समय दिन भर के कार्यों का लेखा-जोखा लेना चाहिए। बैंक का दफ्तर तब बंद होता है जब एक-एक पैसे का हिसाब ठीक मिल जाता है। जहाँ प्रमाद बरता गया हो, वह प्रसंग नोट कर लेना चाहिए और दूसरे दिन उसका प्रायश्चित करने की ऐसी योजना बनानी चाहिए जिससे आज के छूटे या बिगड़े काम कल सुधारे एवं पूरे किए जा सकें। प्रायश्चित इसी को कहते हैं कि भूल को समझा और सुधारा जाय। इतना ही नहीं जो क्षति बन पड़ी है उसे जल्दी ही पूरा किया जाय। इस चिन्तन के साथ “हर रात नई मौत” की भावना लेकर शान्तिपूर्वक सो जाना चाहिए।

“हर दिन नया जन्म और हर रात नई मौत” का चिन्तन करते हुए ही प्रातःकाल जगना और रात्रि को सोना चाहिए । यह क्रम नित्य नियमित रूप से चलता रहे। कल की अपनी सुव्यवस्थित जीवनचर्या को सफलता मानना चाहिए और प्रसन्न होना चाहिए। साथ ही यह भी ध्यान रखने योग्य है कि जो भूलें रहीं हों उस पर दुःख मनाते हुए उनकी क्षतिपूर्ति जल्दी से जल्दी कर ली जाय। यह सिलसिला नियमित रूप से चलता रहे। समय सम्पदा को श्रेष्ठतम क्रियाकलाप में नियोजित किया जाय। यह क्रम ऐसा है जिसे तत्परतापूर्वक चलाते रहा जाय तो समय सम्पदा का श्रेष्ठतम सदुपयोग हो सकता है।

समय, श्रम, मनोरोग ऐसी धन−सम्पदा है, जिसके बदले संसार की हर भली बुरी वस्तु खरीदी जा सकती है। यह अपनी बुद्धिमत्ता पर निर्भर है कि हीरे को काँच का टुकड़ा समझ कर उसे उपेक्षापूर्वक फेंक देते हैं या जौहरी बाज़ार में जाकर उसका पूरा मूल्य उठाते हैं। अपनी बुद्धिमानी इस कसौटी पर खरी उतरे, इसके लिए निरन्तर प्रयत्नशील रहना चाहिए।


VigyapanSuchana

सूचना

प्रतिमाह हर पखवाड़े प्रकाशित होने वाला “प्रज्ञा अभियान “ पाक्षिक अब 10 पृष्ठो का होगा व एक जुलाई से प्रकाशित होने वाले अंक से उसका चन्दा बढ़कर बीस रुपया किया जा रहा है।


राज्यपाल से क्या लेना देना (Kahani)

जापान के सन्त मेहजी अपने समय के प्रख्यात तपस्वी और दार्शनिक थे। उनसे प्रेरणाएँ प्राप्त करने दूर-दूर से सम्पन्न व्यक्ति आया करते थे ।

एक बार राज्यपाल उनसे मिलने आये अपना कार्ड भिजवाया जिसमें उनके राज्य तथा शासनाध्यक्ष होने का उल्लेख था।

मेहजी ने उसे पढ़ा और लाने वालों के हाथों उसे वापस करते हुए कहा यहाँ राज्य शासन संबंधी किसी विषय पर चर्चा नहीं होती । इसलिए यदि वे वापस जाना चाहें तो जा सकते हैं।

राज्यपाल अपनी गलती समझ गये दूसरे कार्ड में उनने अपना नाम भर लिखा। सन्त ने यह कहकर उन्हें तुरन्त बुला लिया। ”यहाँ हर व्यक्ति को जिज्ञासु होने के नाते प्रवेश मिलता है। राज्यपाल को हमसे या हमें राज्यपाल से क्या लेना देना।”


परमपूज्य गुरुदेव : लीला प्रसंग

अवतारों की भूमि है भारतवर्ष। वे विशिष्ट चेतनसत्ता को समाहित कर अवतरित होते हैं व मानवमात्र का मार्गदर्शन करने के लिए शाश्वत तत्त्वदर्शन सूत्र रूप में दे जाते हैं । आज हम जिन क्षणों में यह चर्चा कर रहे हैं, यह बड़ा वैशिष्ट्पूर्ण समय है, जितनी आवश्यकता धरा को इस समय है, उतनी संभवतः पहले कभी नहीं रही । अवतार कौन सा? श्रुति के अनुसार ईश्वरीयसत्ता के अवतार कई रूपों में होते हैं ............. , चेतनावतार , सिद्धावतार इत्यादि ऐसे भिन्न भिन्न रूपों में हमारे समक्ष विगत डेढ़ सौ दो सौ वर्षों में कई सत्ताएँ आयीं व अपने लीला संदोह द्वारा अनेकों को अपना सखा अनुचर बनाकर उनको गढ़ती हुई उनसे असंभव सा दीख पड़ने वाला पुरुषार्थ भी संपन्न करा गयीं। बुद्ध से लेकर आद्यशंकराचार्य तक तथा चैतन्य व कबीर से लेकर ज्ञानेश्वर, समर्थ रामदास, छत्रपति, एवं रामकृष्ण परमहंस से लेकर विवेकानन्द योगीराज अरविन्द तक ये सभी अवतारी सत्ताएँ ही थीं जिनके लाला सहचर बनकर देवतत्व अंशधारी आत्माएँ निहाल हुई व जगती को धन्य बना गयी।

परमपूज्य गुरुदेव के लीला प्रसंग के संदर्भ में जब हम चर्चा करते हैं तो सहज ही किसी को लग सकता है कि क्या किसी की बीमारी दूर होने, नौकरी लग जाने, असंभव काम होते चले जाने से ही उसके लाला पुरुष होने की पहचान की जा रही है? तार्किक यह भी सोच सकता है कि क्या कर्म का कोई महत्व नहीं है? यह कैसे पहचान की जाय कि जिसे कुछ मिला, वह इस योग्य था भी कि नहीं? वस्तुतः इन लीलाप्रसंगों के माध्यम से एक बात समझाने का प्रयास किया जाता है कि हम सब जो उस सत्ता से जुड़े, प्रत्यक्ष अथवा परोक्ष रूप से असाधारण रूप से सौभाग्यशाली हैं। किसी को प्रलोभन टॉफी मिल जाय व फिर भी वह काम न करे तो उस बच्चे पर नाराज नहीं हुआ जाता। क्षमाशील, उदारचेता, वह सत्ता एक विराट हृदय वाले पिता की तरह है तथा बहिरंग के अलौकिक प्रसंगों के मूल में उसका एक ही उद्देश्य होता है व्यक्ति विशेष की चेतना में आमूल चूल हेरफेर-परिपूर्ण बदलाव। यह काम वह सतत् करती रहती है। राम के, कृष्ण के जमाने में भी यही हुआ व आगे भी यही होता रहेगा।

जिन दिनों यह लाला प्रसंग आप हम सब पढ़ रहे हैं, उन दिनों सृष्टि पर एक अभूतपूर्व प्रयोग संपन्न होने जा रहा है। ऐसा विश्व के इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ। ऐसा विश्व के इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ। वह है सामूहिक मन पर एक ऐसी प्रक्रिया सूक्ष्म जगत से, जिसके माध्यम से व्यक्ति की चेतना का रूपान्तरण किया जा सके। परमपूज्य गुरुदेव के अभी तक के सभी चमत्कार इसी क्षेत्र में हुए हैं व आगामी दस से लेकर पंद्रह वर्षों में बड़ी संख्या में संपन्न होते हम सब देखेंगे। व्यक्ति का एक विराट स्तर पर चेतना जगत के धरातल पर पुनर्निर्माण हो, यह एक विलक्षण घटना है। महर्षि अरविंद कह गए हैं कि “अतिमानसिक दिव्यता नीचे आकर मानवी प्रकृति का सामूहिक रूपान्तरण करना चाहती है।” यही बात परमपूज्य गुरुदेव ने अपने शब्दों में इस प्रकार कही है-इन दिनों मनुष्य का भाग्य और भविष्य नये सिरे से लिखा और गढ़ा जा रहा है। ऐसा विलक्षण समय कभी हजारों-लाखों वर्षों बाद आता है। इन्हें चूक जाने वाले सदा पछताते ही रहते हैं और जो उसका सदुपयोग कर लेते हैं वे अपने आपको सदा−सर्वदा के लिए

अजर-अमर बना लेते हैं।”

(प्रज्ञावतार की विस्तार प्रक्रिया पेज 27)

विभिन्न प्रसंगों के माध्यम से इस स्तम्भ द्वारा एक ही तथ्य का प्रतिपादन किया जाता है कि यह परोक्ष जगत में छाई चेतना है जो भिन्न-भिन्न रूपों में अपने प्रभाव दर्शा रही है, जिन्हें हम चमत्कार के रूप में जानते हैं। एक चमत्कार यह भी हो सकता है कि अगणित व्यक्तियों की प्रतिभा उस क्षेत्र में कार्य करने के लिए प्रेरित कर दी गयी, जिसके विषय में न उनकी योग्यता थी, न उनने स्वयं कभी चिन्तन किया था कि ऐसा भी कुछ हो सकेगा। एक चमत्कार यह भी है कि एक बहुत बड़ा वर्ग औरों की तरह भौतिक जगत के प्रवाह में न बहकर श्रेष्ठता की ओर ले चलने वाले प्रवाह से जुड़ने की सोचने लगा, न केवल सोचने वरन् छोटे-छोटे दीपयज्ञों-यज्ञायोजनों द्वारा सत्प्रवृत्ति-संवर्द्धन के कार्यक्रमों में जुट गया। एक चमत्कार यह है कि नये जन्म लेने वाले बालक-बालिकाओं का एक बड़ा वर्ग भारतीय संस्कृति के विभिन्न पक्षों को जीवन में उतारने लगा और बौद्धिक व भावनात्मक दोनों ही क्षेत्रों में बहुमुखी प्रतिभा उसकी दृष्टिगोचर होने लगी, क्या यह सभी चमत्कार नहीं हैं? संभवतः इन सबका मूल्याँकन अभी न होकर बाद में हो, अतः फिलहाल उन प्रसंगों की चर्चा हम यहाँ कर रहे हैं, जिनसे स्थूल बहिरंग जगत में दृष्टिगोचर प्रसंगों का ऊहापोह किया जाता है।

जो अवतारी सत्ता के काम में स्वयं को नियोजित कराता है, उसका वह सदा सर्वदा ध्यान रखती है योग क्षेत्र को वहन करने का दायित्व वह पूरी तरह निभाती है। कर्मक्षेत्र में अग्रसर होने की प्रेरणा भी सतत् देती रहती है। सीकर (राजस्थान ) के श्री बंशीनारायण साधक 26 फरवरी 92 को भेजी अपनी अनुभूति में लिखते हैं कि वे 7 से 11 जनवरी 1974 की अवधि में चलने वाले प्राण-प्रत्यावर्तन सत्र में भागीदारी करने शान्तिकुञ्ज आए तो विदा के समय पूज्यवर ने एक ही पंक्ति में अपनी बात कही “बेटा मौत को याद रखना ।” उस समय उनने यही अर्थ लगाया कि जीवन में जो दोष दुर्गुण हैं उनको समाप्त करने का ही निर्देश दिया गया है। शान्तिकुञ्ज से आते ही डेढ़ मास पश्चात् उनके सिर में भयंकर दर्द शुरू हो गया। दर्द इतना असहाय कि वे फूट- फूट का बच्चों की तरह रोते थे। खूब दवाई की कोई आराम नहीं। उन्हें लगा कि गुरुदेव की बात सही होने जा रही है उनने कहा था “मौत को याद रखना”। अतः अब सत्य का योग आ गया है। पहले से उनने सावधान कर दिया था। यह मृत्यु होनी ही है तो गुरु के चरणों में शान्तिकुञ्ज में ही हो, यह सोचकर शान्तिकुञ्ज रहने के इरादे से ही सब सामान आदि लेकर 17 अप्रैल 1974 को प्रातः हरिद्वार पहुँच गए। पहुँचते ही ऊपर से बुलावा आ गया। कुंभ का पर्व था। खूब भीड़ थी । गुरुदेव ने पूछा-बेटा कैसे आये?” “दर्शन के लिए।” अच्छा दर्शन के लिए तो अब वापस लौट जा।” इनने अब असली बात कही कि वे तो सामान व बच्ची सहित शान्तिकुञ्ज रहने की दृष्टि से आए हैं तो पूज्य गुरुदेव गर्म होकर कहने लगे कि “तू सारी मर्यादाएँ तोड़कर बिना कुछ काम किए यहाँ रहना चाहता है। जा । रहना है तो काली-कमली वाले के यहाँ जा। यहाँ कोई जगह नहीं है।” पूज्यवर के श्रीचरण उनने पकड़ लिए व कहा कि इन्हें छोड़कर कहीं जाना नहीं हैं।

पूज्य गुरुदेव लीला पुरुष हैं। वे तो देखकर ही समझ गए थे कि क्यों इन सज्जन का आगमन हुआ है? वह भी जीवनदानी बनकर। उनने बंशीनारायण जी की धर्मपत्नी से पूछा-यह-यह तो कुछ बताता नहीं तू बता।” उनकी पत्नी ने सिर की पीड़ा वाली बीमारी व मौत के भय का पूरा विवरण सुनाया। बताया कि कहीं आराम नहीं मिला । आपको पत्र लिखा तो जवाब नहीं मिला । आपको पत्र लिखा तो जवाब नहीं मिला। फिर यही सोचा कि अब यहीं शरण मिलेगी तो पेंशन की कार्यवाही करके रहने आए हैं। कहते हैं कि जीवनदान मिल गया तो यहीं रहकर सेवा करेंगे नहीं तो यहीं मृत्यु वरण करेंगे। इतना कहकर वे रोने लगीं। गुरुदेव ने कहा कि “नौकरी के अभी काफी वर्ष बाकी हैं। पेंशन लेने की क्या जरूरत है। बच्ची छोटी है। नौकरी भी करो व समाज का काम करो । उम्र तुम्हारा हम बढ़ा देंगे। बच्चों व बहू को घर छोड़ आओ। एक माह का प्रशिक्षण सत्र अटेंड कर लो व नौकरी फिर कर लो। प्रशिक्षण के बाद जाकर जहाँ हम भेजें कार्यक्रम करने जाना पर नौकरी मत छोड़ना। जिम्मेदारियाँ पूरी करके फिर समाज का पूरे समय काम करना।” इतना कहकर उनने आशीर्वाद देकर विदा किया । नीचे उतरते सिरदर्द तो समाप्त हो गया था, एक विलक्षण प्रकार की हल्केपन की अनुभूति हो रही थी। उसके बाद वह सिर दर्द पुनः कभी नहीं हुआ। 18 वर्ष पूरे बीत चुके हैं। उनके दायित्व सब निभते चले गए। सारा परिवार प्रसन्नचित्त मिशन के कार्यों में लगा है। वे स्वयं एक समर्पित कार्यकर्ता है।

“तुम्हारी पत्नी की बीमारी एक रहस्य है और जिन्दगी भर रहस्य ही बनी रहेगी। माँ पर विश्वास रखो। बहू की तबियत ठीक रहेगी” यह पत्र परम वंदनीया माताजी के हस्ताक्षर से श्री अश्विनी कुमार शर्मा, जो बी. एच. ई. एल. भोपाल में कार्यरत हैं, को प्राप्त हुआ तो उनके समक्ष विगत दो वर्षों की अपनी पत्नी की बीमारी का पूरा दृश्य घूम गया । साथ ही पूज्यवर के कक्ष में उनके द्वारा बोला गया एक ही वाक्य पुनः मन मस्तिष्क में गूँजने लगा-रोता क्यों है बेटे-मैंने उसे जीवनदान दिया है।” यह उनने 29 जून 1983 को शान्तिकुञ्ज में अपने कक्ष में ब्रह्ममुहूर्त में कहा था जब वे दर्शनार्थ पत्नी सहित शान्तिकुञ्ज आए थे। वस्तुतः स्थिति ऐसी ही थी। 7 मई 1982 को पहली बार जब उन्हें मिर्गी के दौरों के साथ बेहोशी की स्थिति में कस्तूरबा अस्पताल में भर्ती किया गया तो स्थिति गंभीर ही थी, बेहोशी टूटती तो दौरे तेजी से आने लगते व दौरे समाप्त होते तो गहरी बेहोशी चीफ मेडिकल ऑफिसर डॉ. के. व्ही. पाण्ड्या सहित कुशल चिकित्सकों की एक पूरी टीम जाँच-पड़ताल करने में लगी थी व अभी कोई सुनिश्चित निष्कर्ष पर नहीं पहुँच पायी थी कि कारण क्या है। उसी दिन रात्रि ढाई बजे साँस उल्टी चलने लगी व लगा कि अब अंतिम समय आ गया है। उसी क्षण स्वयं डा. पण्डाल जी ने टेलीग्राम बनाकर विवरण पूज्यवर को भेज दिया। इधर पोस्ट-आफिस से टेलीग्राम किया गया व उधर साँस नॉरमल हुई। धीरे-धीरे वे गहरी बेहोशी में चलीं गयीं । 4 दिन बाद वंदनीया माताजी का पत्र आ गया कि “हम माँ से प्रार्थना कर रहे हैं।’ श्रीमती शर्मा की जान बच गयी। रोग क्या था, कोई जान न पाया , बम्बई जाने तक व कैटस्कैन से लेकर सभी जाँच पड़तालें हुई पर बीमारी रहस्य ही बनी रही। अढ़ाई तीन वर्ष बाद दौरे स्वतः बन्द हो गए व अब वे पूर्णतः ठीक हैं। कोई नहीं कह सकता कि कभी ब्रेन ट्यूमर जैसी डाइग्नोसिस इनकी की गयी होगी॥ आश्चर्य यही है कि गंभीर बेहोशी की स्थिति में वे न किसी को पहचान पाती थीं न जवाब दे पाती थीं पर गायत्री मंत्र का स्पष्ट उच्चारण स्वयमेव करती थीं। श्री अश्विनी कुमार जी व उनकी पत्नी नैष्ठिक कार्यकर्ता है, व उनका रोम रोम गुरुसत्ता के प्रति कृतज्ञ है जिनने उनके घर को बिखरने से रोका। सबका उसी तरह ध्यान रखा जैसा आकाश में उड़ती चिड़िया को घोंसले में बैठे बच्चों का होता है।

वस्तुतः महापुरुष जिस लोक में रहते हैं उसमें वे स्थूलजगत में कहीं और विचरण कर रहे होते हैं व अपने भक्त को कष्ट हरने सूक्ष्म रूप में पहुँच जाते हैं। एक ही समय में एक ही सत्ता विभिन्न स्थानों पर कहीं भी हो सकता है।

स्थूल शरीर से न रहने पर वह मार्गदर्शन करेगी कि नहीं हमारी विपदाओं को हरेगी कि नहीं यह असमंजस किसी के भी मन में आ सकता है। किन्तु यदि हम उनके आश्वासन पर दृष्टि डालें तो वस्तुतः सूक्ष्म व कारण रूप में उनकी सत्ता और भी अधिक व्यापक क्षेत्र में गतिशील है व अपना प्रभाव सतत् दिखा रही है। एक छोटा सा घटना प्रसंग बताकर इस चर्चा का समापन करेंगे। रतलाम नगर के कार्यकर्ता रुद्र कुमार कृष्णात्रे 6 से 8 फरवरी 1992 की अवधि में सामूहिक शक्ति साधना कार्यक्रम की तैयारी में जुटे थे । संयोग से वसंत पंचमी भी साथ में होने से परमपूज्य गुरुदेव का आध्यात्मिक जन्म दिवस भी साथ ही मनाया जा रहा था।

श्री कृष्णात्रे जी कार्यक्रम को सफल बनाने के लिए दिन रात लगे हुए थे। 6 फरवरी का प्रसंग है। कलश यात्रा रवाना करने के बाद वे देवस्थापना के लिए कुछ परिजनों को तैयार रहने का संदेश देने के लिए अपनी मोपेड पर रवाना हुए। नगर के एक व्यस्त मार्ग से

गुजरते समय सामने से तेज गति से आ रही एक साइकिल से उनकी टक्कर हुई, दोनों को उठाकर खड़ा कर दिया। जिस समय इधर टक्कर लगी थी, उसी समय शोभा यात्रा का समापन हो रहा था। काफी तेज हवा चल रही थी व गुरुजी व माताजी के चित्र उसी समय वेग से गिर कर उनके काँच टूट गए थे। परिजनों ने तुरंत चित्रों को काँच मढ़वाने के लिए भेज दिया था । संयोग ही था कि ऐक्सीडेंट व चित्र गिरने का समय एक ही था। जब वे अपनी मामूली सी खरोंच व साइकिल चालक की ऊपरी चोट का प्राथमिक उपचार कराके कार्यक्रम स्थल पहुँचे तो सारी जानकारी उन्हें मिली।

जिन्हें लगता है कि स्थूल शरीर से पूज्यवर नहीं हैं, अब उन्हें कौन देखेगा, कौन उनका कष्ट निवारण करेगा, उनके लिए सतत् आश्वासन है उस सत्ता का कि मेरा काम करते रहने वाले हर परिजन की देख−रेख मेरी सूक्ष्मसत्ता व वंदनीया माताजी की स्थूल शक्ति सतत् करती रहेगी। कभी भी उस संरक्षण में कोई कमी नहीं आने वाली।


युग-अनुष्ठान


युग-अनुष्ठान (Kavita)

सामूहिक तप-शक्ति चाहिए, नवयुग के निर्माण को। हर युग ने स्वीकार किया है, तप के इसी विधान को॥

त्रेता से कम नहीं भयंकर, इस युग का परिवेश है। फिर अनीति अत्याचारों में, द्वापर-सा आवेश है॥

पुनः राम वनवासी जैसी, होनी है युग-साधना-और पाण्डवों जैसी युग-परिवर्तन की आराधना॥

करें नहीं अनसुनी, तपस्वी , युग-ऋषि के आह्वान को॥

रागों का रावण हावी है, सदाचार की सीता पर-कुत्सा-कौरव की कुदृष्टि है, सत्-द्रौपदी पुनीता पर॥

लोभ-मोह की लंका में अंधा है, स्वार्थ-अहं रावण। सद्भावों में जहर घोलता, राग-द्वेष का दुर्योधन॥

लिप्सा ने शैतान बनाया, इस युग के इनसान को॥ आगे पुरश्चरण चलना है, अग्रिम वर्षों के लिये।

जन-जन में जीवट भरना है, युग-संघर्षों के लिये ॥ विकसित करनी होगी तप के द्वारा, आत्म-शक्ति अब तो।

और आत्मबल ऊँचा रखना होगा, सैनिक-सब को रीछ-वानरों ग्वालों-बालों अर्जुन को हनुमान को॥

सविता है आधार सृष्टि का, सुर-संस्कृति का प्राण है। उनके ही ओजस्-तेजस्-वर्चस् का करना ध्यान है॥

प्रज्ञा के प्रकाश में, आलोकित करनी है चेतना। और लोक-मंगल की करनी है, मिलकर के साधना॥

आध्यात्मिक सामर्थ्य जगाकर, चलो उछालें प्राण को॥

-मंगल विजय


परमपूज्य गुरुदेव की अमृतवाणी

इस अंक में प्रस्तुत है परम पूज्य गुरुदेव द्वारा शान्तिकुञ्ज परिसर में 26 फरवरी 1976 को दिया गया एक ऐतिहासिक उद्बोधन । प्रस्तुत उद्बोधन में साधना स्वर्ण जयन्ती वर्ष के परिप्रेक्ष्य में युगशक्ति गायत्री के अवतरण की उज्ज्वल भविष्य की संभावनाओं की एवं मानव मात्र के कल्याण हेतु गायत्री के तत्त्वदर्शन की महत्ता का प्रतिपादन है। भारतीय संस्कृति का आधार स्तम्भ है-गायत्री आज हम ज्यों ज्यों बीसवीं सदी के अंतिम दशक में कदम दर कदम आगे बढ़ रहे हैं, यह समग्र तत्त्वदर्शन उतना ही सामयिक और युगानुकूल होता चला जा रहा है, प्रस्तुत है-परमपूज्य गुरुदेव की अमृतवाणी।

देवियों एवं भाइयों! ये जमीन जिस दिन भगवान ने बनायी उसी दिन प्राणियों को भी बनाया उसी दिन सूरज को भी बनाया। मुद्दतें हो गयीं किसी का किसी से कोई खास संबंध नहीं हो सका। जब मनुष्य की बुद्धि का विकास हुआ तो उसने सूरज की धूप को, रोशनी को, अपने कब्जे में करने की कोशिश की । सबसे पहले मिली उसे आग । जिस दिन उसे अग्नि प्राप्त हो गयी, मनुष्य और जानवर के बीच फर्क पड़ना शुरू हो गया। आग ने मनुष्य का कायाकल्प कर दिया। आदमी की भौतिक जिन्दगी में प्रगति की एक क्रान्ति खड़ी हो गयी। मुद्दतें बीत गई । मुद्दतों के बाद एक और आग मनुष्य के हाथ लगी जिसका नाम है विद्युत-बिजली आज से पाँच सौ-चार सौ साल पहले बिजली आदमी के हाथ में आयी व इसने आदमी की दुनिया ही बदल दी। पाँच सौ साल पहले के आदमी की और आज के आदमी की तुलना आप नहीं कर सकते। आज बिजली के कारण इतनी सुविधायें हैं। तब की कल्पना कीजिए जब आदमी आज से पाँच सौ साल पहले बिना बिजली के अँधेरे में बिना यंत्रों के काम करता होगा। टार्च की रोशनी से लेकर अनेक कामों तक व टेलीफोन से लेकर कितने ही कामों तक बड़ी- बड़ी फैक्ट्रियाँ चलाने तक आदमी के काम बिजली ही आयी व इसने मानव जीवन को एक क्रान्ति ला दी । ताप की एक तीसरी और शक्ति मनुष्य के हाथ में आयी। तीसरे ताप का नाम क्या है, “एटम” । “एटम” की, अणु की शक्ति आदमी के हाथ न आयी होती तो अब तक इतनी लड़ाइयाँ लड़ी गयीं होतीं कि दुनिया से तीन चौथाई आदमी खत्म हो गए होते। फर्स्ट वर्ल्ड वार हुआ, सेकेण्ड वर्ल्ड वार हुआ लेकिन उसके बाद माहौल में गरमी इतनी अधिक बढ़ी-चढ़ी थी स्वार्थ इतने बढ़े हुए थे कि अगर ये एटॉमिक हथियार हाथ में न आये होते तो आज तक न जाने कितनी लड़ाइयाँ हो चुकी होती और हर जगह न जाने क्या-क्या मुसीबतें आ गयी होतीं । ताप ने, ‘एटम’ की शक्ति ने रोक दिया मनुष्य को कि लड़ना मत। जो कोई भी लड़ेगा-मारा जाएगा। छोटे मोटे हमले आप लोग कर सकते हैं पर बड़ा युद्ध तो हमला करने वाले को भी तहस नहस कर देगा। बड़ी तादाद में आपने कदम बढ़ाए तो यह एटॉमिक एनर्जी आपको खत्म करके रख देगी।

ताप की इन तीन शक्तियों ने मनुष्य के हाथों में साधन दिए, उसकी भौतिक उन्नति कर उसे न जाने कहाँ से कहाँ पहुँचा दिया लेकिन एक शक्ति ऐसी है ताप की जो पहले से मौजूद थी व जिसने आदमी का कायाकल्प किया है। वह है ज्ञान की शक्ति । एक ज्ञान वह है जो शिक्षा के रूप में, उसकी भौतिक शक्ति के रूप में, हमारे समक्ष है। जिससे हम डॉक्टर बन जाते हैं, मास्टर, वकील बन जाते हैं, शिल्पी बन जाते हैं, कलाकार बन जाते हैं । हथियार, पैसे की तरह यह भी भौतिक शक्ति है। आदमी की खुशहाली के काम आती है लेकिन यह वह नहीं है जिससे आदमी-आदमी बनता है जीवन को ऊँचा उठाना सीखता है। वह शक्ति जो आदमी को खुशी देती है शांति देती है, उसके जीवन में संवेदना का रस पैदा करती है, मानव-मानव के मध्य सहयोग की भाषा सिखाती है, परस्पर स्नेह और दुलार पैदा करती है, सहकारिता की आधार शक्ति है वह विद्या है। यह थी तो पहले से लेकिन आदमी के हाथ में जब से आयी, आदमी न जाने क्या से क्या होता चला गया। जानवर से आगे बढ़कर सही अर्थों में मानव बन गया। यह ज्ञान की शक्ति, विद्या की शक्ति, अवतरण कब धरती पर हुआ? यह हम देखते हैं तो पाते हैं कि सृष्टि के प्रारंभ में आकाशवाणी हुई थी व ब्रह्माजी को यह कहा गया था कि आपको तप से ज्ञान प्राप्त करना चाहिए। तब उनके हाथ गायत्री मंत्र आया । ब्रह्माजी ने गायत्री मंत्र के चार चरणों को चार व्याख्यानों में विभाजित कर उसको प्रतिपादित करना आरंभ कर दिया। इन चार व्याख्यानों का नाम पड़ गया चार वेद। कब की बात है यह? यह बड़ी पुरानी बात है। वेदों की उस सभ्यता व संस्कृति का आगमन क्या हुआ, आदमी-आदमी नहीं रह गया, देवता बन गया। इस देश में रहने वाले सभी जीवधारी जिनका नर तन था, तैंतीस कोटि देवताओं में गिने जाने लगे।

आदमी नहीं। आदमी तो मामूली होते हैं, पेट भरते हैं और जिन्दा रहते हैं किसी तरह देवता वे होते हैं जो खुश रखा करते हैं। खीज़ उनके पास कभी आ नहीं सकती क्योंकि शैतान उनके पास नहीं आता। हैरानी, बीमारी, खीज़, चिन्ता, दुख, क्लेश ये सब पाप की-शैतान की देन है। जब आदमी देवता बन गया तो ये सब संताप चले गये ।देवता दिव्य होता है, खूबसूरत होता है, जवान होता है, हर आदमी की जरूरतें पूरी करता है। देवता बड़ा जबर्दस्त होता है और हर भारतीय नागरिक किसी जमाने में देवता था। कब से था? जब से वह ताप हाथ में आया, जिसे मैं ज्ञान का ताप कहता हूँ, विद्या का ताप कहता हूँ और दूसरे शब्दों में गायत्री का ताप कहता हूँ । इसके आते ही आदमी देवता बन गया, निहाल हो गया। उस समय धन दौलत तो कम थी पर प्रसन्नता-संतोष ज्यादा था और वही सबसे बड़ी सम्पत्ति है। तब अपेक्षाकृत गरीबी थी लेकिन गरीब होते हुए भी मनुष्य कितना सुखी , कितना मोहब्बत-दुलार सहयोग-खुशी से भरा था मैं आपको क्या बताऊँ मित्रों! सौ वर्ष तक जिन्दा रहते थे लोग क्योंकि मजेदार जिन्दगी थी। आज हमारी आत्मा इंकार करती है, कहती है हम जिन्दा नहीं रहना चाहते । आत्मा जब कभी नाखुश होती है तो शरीर कहता है कि ठीक है आप जाइए जैसी आपकी मरजी हो। आत्मा चली जाती है, जल्दी मर जाती है, शरीर किसी तरह जिन्दा रहता है। आत्मा विहीन जिन्दगी-यह बड़ी घिनौनी जिन्दगी है जो जी रहा है, आज का आदमी । इसमें भीतर सब कुछ जलता रहता है- रोम रोम, नस-नस अंतःकरण जलते रहते हैं। कोई भी ठण्डी चीज इस आग को मिटा नहीं सकती। मित्रों पुराने जमाने की मैं याद करता हूँ तो यह बात सही मालूम पड़ती है “स्वर्गादपि गरीयसी” स्वर्ग से श्रेष्ठ यह भूमि किसी जमाने में रही होगी, मैं यह विश्वास करता हूँ। न बस थी न टेलीफोन थे किन्तु फिर भी स्वर्गादपि गरीयसी थी । स्वर्ग किसे कहते हैं जहाँ आदमी रहते हैं और आदमी-आदमी के बीच वे रिश्ते होते हैं जिन्हें देखकर आदमी की हिम्मत बँध जाती है धीरज बँध जाता है। मेहमान को “अतिथि देवोभव” कहकर घर में सम्मान सहित बिठाया जाता था। आज तो यदि अतिथि आ जाय तो आप सावधान रहना । उसे ठहरने मत देना । सारी आफत मचा देगा वह। होशियार रहना उससे कहना “भाई साहब! आप होटल में ठहरिए “। अतिथि आपके घर ठहरने लगा तो आपकी बहन बेटियों का कोई ठिकाना नहीं। मित्रों ! आज जीवन नरक बन गया है क्योंकि सामान बहुत है, पैसा बहुत पर उसका उपयोग करने की अकल देनी वाली विद्या कहीं नहीं। वह विद्या, वह ज्ञान जिससे खुशहाली आती थी । जिसे संक्षेप में गायत्री मंत्र कहते हैं।

ब्रह्माजी को दिया हुआ यह हथियार गायत्री मंत्र जिस दिन से मनुष्य जाति को मिला, उसी समय से उसे ज्ञान, चैन, संतोष नैतिकता, प्रेम, सहयोग मिलने का सिलसिला चालू हो गया। यह इनसान की जिन्दगी में सौभाग्य का दिन था। उसी ने आपको-हमको सबको एक धागे से जोड़ रखा है। हमको सबको एक धागे में पिरो दिया। ब्रह्माजी ने वेदों के ज्ञान रूप में ऋषियों को यह विभूति दी है और वही गायत्री अब युगशक्ति बनने जा रही है। इसी गायत्री का एक छोटा वाला रूप है “प्रतीक पूजा”। क्या होती है प्रतीक पूजा? बेटा। प्रतीक उसे कहते हैं जिसमें किसी चीज का छोटा सा रूप सामने रख देते हैं, यह प्रतीक कहलाता है। प्रतीक नमूने को कहते हैं। जैसे आप हमारा फोटो ले जायँ। फोटो को आप माला चढ़ा दें । क्या है यह? यह प्रतीक पूजन है। वस्तुतः कागज में कुछ भी नहीं है। कागज के पीछे जो व्यक्ति है, उसमें आपकी गहन श्रद्धा है- गहरी जान पहचान है। उसके प्रति आप अपनी मोहब्बत को, श्रद्धा को कायम रखने के लिए प्रतीक पूजन करते हैं। गायत्री की प्रतीक पूजा वह है जो हमने आपको आज से तीस साल पहले सिखायी थी । हमने यह बताया था कि कैसे पंचपात्र हाथ में लेकर आचमन करना चाहिए चोटी गाँठ लगानी चाहिए। चौकी पर एक तस्वीर रखकर धूप, दीप , रोली , अक्षत चढ़ाना चाहिए। माला जपनी चाहिए। यह क्या यह प्रतीक था। यह आपने क्यों कराया प्रतीक इसलिए कराया कि आपको उसकी बारीकियाँ, गहराइयाँ समझने का मौका मिले। हमें जानकारी बनी रहे कि गायत्री मंत्र क्या है कितना महान है? घड़ी हमें अपने कर्तव्यों को भान कराने के लिए घण्टे बजाता है इसी तरह हम आप से कहते थे कि रोजाना पूजन करना चाहिए आपकी भौतिक व आध्यात्मिक प्रगति इस पर टिकी हुई है इसीलिए हमने आपसे नियमित गायत्री करने को कहा । किन्तु यदि आपने गायत्री मंत्र की क्षमताएँ व उसके भीतर छिपे रहस्य नहीं जाने तो क्या कहेंगे- मैं उसे नित्यकर्म कहूँगा। नित्यकर्म उन बहुत कामों को कहते हैं जो रोज करना जरूरी है। यदि आप रोज नहाएँ तो क्या बाल बच्चे हो जायेंगे, रुपया मिल जायेगा । नहीं बेटे। हम वायदा नहीं कर सकते । आपकी मर्जी है आप रोज नहाएँ चाहें न नहाएँ। नहीं नहाएँगे तो बीमार पड़ेंगे। पर नहाने से कोई पुण्य मिलेगा। यह भी जरूरी नहीं है। इसे नित्य कर्म कहते हैं। रोज मन पर छाने वाली धूल को गन्दगी को साफ करने के लिए गायत्री मंत्र के उस स्वरूप की जरूरत है, जिसे हम प्रतीक पूजा कहते हैं। वो काफी है और उसका महत्व फिर शुरू होता है। उसी की आज सबसे बड़ी जरूरत है। ऐसा साहस देने वाला है यह गायत्री का अगला वाला स्वरूप, जो आदमी को व्यक्तित्ववान बनाता है महापुरुष बनाता है, ज्ञानवान बनाता है, तपस्वी बनता है। गायत्री मंत्र जिसे हम याद करते हैं बार-बार कहते हैं हमें बताता है कि गय का त्राण करने वाली गायत्री । मनुष्य के जीवन में प्रवेश करती है, उसके अंदर प्राण भर देती है जीवट भर देती है। जीवट वह जो अंदर से कुछ कर गुजरने की उमंग पैदा करती है। गायत्री व्यक्तिगत जीवन को समुन्नत बनाती है खुशहाल बनाती है, समृद्ध बनाती है, दीर्घजीवी तथा मजबूत बनाती है। ऐसी गायत्री सिखाती है कि दौलतमंद तो बनो पर अंदर की हिम्मत भी इकट्ठी करो तभी दौलत का सही उपयोग कर सकोगे। पैसा कभी भी ताकत नहीं बन सकता। ताकत कौन सी? वह जो आदमी का व्यक्तित्व है, उसके भीतर का दृष्टिकोण है वह ताकत । आज जो आदमी कमजोर होता चला जा रहा है ज्ञान के हिसाब से समृद्धि के हिसाब से, व्यक्तित्व के हिसाब से, तो एक ही चीज की जरूरत थी वह थी हमारे भीतर की प्राण शक्ति की। प्राणों का विस्तार करते हैं, आप से गायत्री का जप करने को कहते हैं।

गायत्री एक साइंस है। एटम की साइंस से भी बड़ी ताकत है। ऐसी शक्ति है जो सारी मनुष्य जाति ही नहीं, प्राणी मात्र ही नहीं सारे प्राणी मात्र ही नहीं सारे ब्रह्माण्ड से संबंध रखती है। ऐसी ताकत है जो आदमी के भीतर उमंगों के रूप में, आदर्शों के रूप में, श्रेष्ठताओं के रूप में आती है व जीवन का कायाकल्प करती चली जाती है। इसी गायत्री के अवतार की बात हम आप से कह रहे थे। कह रहे थे, युगशक्ति का अवतार होने जा रहा है। कैसे होगा? यह होगा छोटे-छोटे मनुष्यों की चेतना के विकास के रूप में। चेतना का विकास अगले दिनों होकर रहेगा। इनसान के अंदर का फिर देवता पैदा होगा, भगवान पैदा होगा। मानव में देवत्व आएगा और धरती पर स्वर्ग आएगा। हर व्यक्ति अपने सामाजिक जीवन में हिस्सा बँटाएगा।

इनसान अपने आप तक सीमित नहीं रह सकता अब। इनसान सामाजिक प्राणी है इसलिए उसे समाज के प्रति अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए। पीड़ा और पतन में दो कसौटियाँ भगवान ने दी हैं इनसान की परख करने के लिए । व्यवहार की पीड़ा और बौद्धिक पतन मनुष्य का कम करने में हम क्या मदद कर सकते हैं? यह भगवान हमसे पूछता है। आप कर सकते हैं तो आप अच्छे इनसान हैं और खरे सोने के समान हैं। यही खुशहाली लाने वाला मानव मात्र को एक बनाने वाला तीसरा चरण है जिसके ऊपर नवयुग की आधार शिला रखी जाने वाली है।

मित्रों । इस समय मनुष्य जाति के भाग्य का उदय होने वाला है। इनसान फिर सिर उठाकर चलेगा। इनसान का गर्दन झुकाकर चलना मुझे नापसन्द है। आदमी की कमर झुकी हो तो कोई बात नहीं किन्तु सिर झुका हुआ नहीं रहना चाहिए। आग की लौ की तरह से, अग्नि देव की लपटों के तरीके से, आदमी को सिर उठाकर ऊँचा करके चलना चाहिए । यही गायत्री मंत्र का चमत्कार होगा-युग शक्ति का चमत्कार होगा कि कमजोर से आदमी में इतनी हिम्मत, इतनी ताकत आ जाएगी कि वह सिर उठाकर चलना सीख लेगा। युगशक्ति का अवतार अर्थात् एक ऐसी जीवट का पैदा होना जिसमें सिद्धान्तों को और आदर्शों के परिपालन की बहादुरी आदमी में पैदा हो सके। दूसरा चमत्कार होने जा रहा है धरती पर स्वर्ग के अवतरण का । धरती स्वर्ग बनने जा रही है। जिसमें आदमी-आदमी से प्यार करना सीखेगा। प्यार के साथ सहयोग भी करेगा। सहयोग और प्यार जब साथ-साथ रहें तो मैं समझता हूँ कि धरती पर स्वर्ग आ गया खुशहाली आ गयी। गरीबी रहेगी तो रहे, कोई हर्ज की बात नहीं है किन्तु कृपणता नहीं रहना चाहिए। संतों में से हर एक के पास गरीबी थी, पर वे कृपण नहीं थे। गरीबी से आदमी दुखी नहीं होता। दुखी कृपणता से होता है। कृपण कौन? तंग दिल, प्यार-मोहब्बत न बाँटकर संकीर्णता फैलाने वाला दरिद्र व्यक्ति जो बाहर से न सही, चिंतन की दृष्टि से दरिद्र है।

आप प्यार बाँटेंगे तो बदले में प्यार मिलेगा। आप बच्चों

को प्यार नहीं दे सके इसीलिए आप बच्चों के प्यार से महरुम हैं, आपने बाप को प्यार दिया नहीं इसलिए आप उनके आशीर्वाद से महरुम रह गए। आपने समाज के कर्तव्यों का पालन किया नहीं इसलिए आपकी समाज ने उपेक्षा की, कोई सहायता नहीं की। प्यार से ही सहयोग मिलता है, सम्मान मिलता है। ऐसी धरती की कल्पना, मित्रों मैं करता हूँ जिसमें सब एक दूसरे के साथ प्यार व सहकार करेंगे। कब? जब जन-जन तक गायत्री का संदेश पहुँचेगा तब ! लेकिन गायत्री एकाकी नहीं है। गायत्री ज्ञान पक्ष है और यज्ञ उसका कर्म पक्ष है। ज्ञान एकाकी नहीं हो सकता। एकाकी ज्ञान में कोई दम नहीं है। एकाकी ज्ञान पण्डितों के पास होता है, फिलॉसफरों के पास होता है । ज्ञान और कर्म का समन्वय होना चाहिए। इसलिए आपके समक्ष इस साधना स्वर्ण जयन्ती वर्ष में हमने एक कार्यक्रम सुपुर्द किया है कि इस तत्त्वज्ञान को घर-घर पहुँचाने का जिम्मा उठाइए। हम आपको बदले में इनाम देंगे । दौड़ लगा के दिखाइये, इनाम पाइए । नहीं साहब, वैसे ही दे दीजिए । नहीं मित्रों ! भगवान इस युग में जितनी भी देवात्माएँ हैं, उन्हें कुछ उपहार देना चाहता है। इतिहास की भूमिका में आपके लिए यह एक सुनहरा मौका है। इसके बाद युगों-युगों तक ऐसा मौका नहीं आने वाला। गाँधी फिल्म आयी थी उसमें नमक सत्याग्रह वालों को जाते हुए हम देखते रहे । यह महादेव भाई जा रहे हैं, यह प्यारे लाल जा रहे हैं, यह हरिभाऊ उपाध्याय जा रहे हैं । हम नाबालिग थे अतः नहीं जा पाए। हम पछताते रह गए। आए हुए समय को चूकने वाला पछताता ही रहता है। अब आप जेल जाएँगे तो स्वतंत्रता सेनानी की न पेंशन मिलेगी न मिनिस्टर का पद। वो जो समय आया था न वह चूक गए। अब कुछ नहीं हो सकता।

मैंने आपको इस समय इसलिए बुलाया कि यह चूकने

का समय नहीं है। खाने-कमाने के लिए पूरी जिन्दगी आपकी है। सारी जिन्दगी थी व जो आपकी बची हुई है वह भी उसी में लगने वाली है। गायत्री माता की कृपा आपके भीतर नहीं होने वाली और कभी। यह एक महत्वपूर्ण समय है-युगपरिवर्तन का समय है। इसमें आपका सहयोग बन सके तो उन कार्यों को करिए जो भगवान ने हमारे गुरुदेव के सुपुर्द किए और हमारे गुरुदेव ने हमें सुपुर्द किए। हम आपके सुपुर्द करना चाहते हैं ताकि सारे संसार में गायत्री मंत्र का विस्तार हो। यह मात्र हिन्दुओं तक सीमित न रहे। यह ब्राह्मणों का मंत्र मात्र बनकर न रह जाए बल्कि विश्व मानव का मंत्र बने। कभी यह गायत्री वेदमाता थी। कब थी जब वह ज्ञान के रूप में आग के रूप में ताप के रूप में अवतरित हुई थी। अब क्या हो गयीं? अब यह नाम बदल गया। अब वह वेदमाता हो गयीं -देवत्व जिनके रोम रोम में उतर जाए उनकी माता और अब बनने जा रही हैं विश्वमाता। विश्वमाता से क्या मतलब है सारा विश्व एक नये आधार पर बनने जा रहा है। एक नयी संस्कृति आ रही है। एक नया सार्वभौम धर्म आ रहा है । सारी दुनिया इस एक ही केन्द्र के ऊपर इकट्ठी होने जा रही है, बँधने जा रहे इस विश्व के निर्माण में आपकी भागीदारी हो, इसके लिए आपको मैं इस महापुरश्चरण में, धर्मानुष्ठान में भागीदारी करने के लिए आमंत्रित करता हूँ।

मैंने उज्ज्वल भविष्य के सपने देखे हैं और सबको दिखाए हैं। मैं उन लोगों में से नहीं हूँ जो सतत् डराते रहते हैं । सूरज की तबाही कभी नहीं आएगी। आएगा तो अब उज्ज्वल भविष्य धरती पर स्वर्ग व आधार बनेगा मानव में देवत्व । कैसे? गायत्री के तत्त्वज्ञान से, भारतीय संस्कृति के अनुगमन से आप समय रहते उससे जुड़ सकें, औरों को जोड़ सकें, इससे बड़ी समझदारी और क्या हो सकती है?

मेरी बात समाप्त। ॐ शांतिः शांतिः शांतिः।


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आवश्यक-सूचना

शपथ समारोह में आने वाले परिजन आने से पूर्व जून की अखण्ड-ज्योति प्राप्त करने की व्यवस्था बनाकर आयें। जिन दिनों शपथ समारोह चल रहा होगा। लगभग उन्हीं दिनों जून की अखण्ड-ज्योति पहुँचेगी। डाकघर से मिलकर इस सम्बन्ध में आवश्यक कार्यवाही कर लेनी चाहिए।


अपनों से अपनी बात - संस्कृति पुरुष पूज्य गुरुदेव के संकल्प निश्चित ही पूरे होंगे

विराट स्तर पर आयोजित शपथ समारोह की तैयारियाँ अंतिम चरणों में

स्थान-दक्षिणेश्वर का वह कक्ष जहाँ रामकृष्ण परमहंस मृत्यु शैया पर लेटे थे। चारों ओर उनके शिष्य बैठे थे। एकाएक ठाकुर बोल उठे-मैं जा रहा हूँ, पर देखना। मेरे जाने के बाद एक विलक्षण चमत्कार होगा। अनजान, अनगिनत साधारण लोगों को भी मेरी चेतना के प्रभाव से मात्र तीन दिन में सिद्धियाँ मिल जाएँगी। ऐसे ऐसों को जिनकी तुम कल्पना भी नहीं कर सकते। बहुत बड़ा ज्वार आयेगा। गंगा में बल्ली-बल्ली पानी चढ़ जाएगा।” वास्तव में ऐसा ही हुआ वह युग था अँग्रेजी दासता के पाश में जकड़े भारत का। पंद्रह-बीस वर्ष के युवा स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े थे। जो जेल में थे उनसे लेकर वे जो गुप्त रूप से सक्रिय थे, कहने लगे थे कि हमें हमारी मौत स्पष्ट दिखाई दे रही है। उसके बाद जब अरविन्द जेल में थे तब की एक घटना है। आनन्दी बोस नामक एक सामान्य सा युवा जो उनके साथ ही जेल में था, कहने लगे कि “हमें स्पष्ट दीख रहा है कि हम भागने का प्रयास करेंगे, पकड़े जाएँगे, गोली लगेगी, अस्पताल भेजे जाएँगे व वहाँ हम शहीद हो जाएँगे।” जो घटा नहीं था, वह कैसे दीख पड़ने लगा, इसका खुलासा करते हुए अरविंद कहते हैं कि यह वही सिद्धि थी जिसकी चर्चा ठाकुर ने की थी। अपने अंदर देश के लिए ऐसी भावना विकसित होना कि कुर्बानी सामने दिखाई होते हुए भी कूद पड़ना यह सिद्ध स्तर की देवात्माओं के बस की ही बात है व बंगाल से उपजे इस आंदोलन का ज्वार ही था जिसकी चरम परिणति भगत सिंह, खुदीराम बोस से लेकर गाँधी-सुभाष नेहरू व पटेल के आंदोलन में हुई। दक्षिणेश्वर की माटी की शपथ खाकर लोग कुर्बानी देने मचल उठे व देखते-देखते यह आँधी सारे देश में छा गयी । यदि आजादी की लड़ाई का इतिहास नये सिरे से लिखा जाय तो यह स्पष्ट हो जायेगा कि दक्षिणेश्वर के ठाकुर व युवा क्राँतिकारी संन्यासी विवेकानन्द ने ऊर्जा उत्पन्न कर धर्मतंत्र मंच से राजनीतिक पाश से मुक्ति के क्षेत्र में कितनी बड़ी भूमिका निभाई। सांस्कृतिक गुलामी की मुक्ति तब भी नहीं हुई उसकी अब बारी आयी है।

यह घटनाक्रम 1887 के बाद पुनः अब इस सदी में इस शताब्दी के अंतिम दशक में दुहराया जा रहा है। परम पूज्य गुरुदेव ने स्थूल शरीर से जिये गए अपने अंतिम दो वर्षों 1989−90 में महत्वपूर्ण क्रान्तिधर्मी साहित्य का सृजन किया व अपनी काया के बंधनों से मुक्त होने से पूर्व यह कहा कि हमारे जाने के बाद प्रतिभा जागरण की प्रक्रिया एक विराट स्तर पर संपन्न होगी। प्रसुप्त प्रतिभाएँ जागेंगी व हमारी सूक्ष्मसत्ता उनको झकझोर कर नवयुग की तैयारी के कार्य में उन्हें जुटा देगी, विवश कर देगी काम करने के लिए। इसके लिए परम पूज्य गुरुदेव ने एक ही बात कही थी कि वे अपना काम करेंगे, परिजन मात्र पूज्य गुरुदेव की चिंतन धारा से जुड़े रहे शेष काम दैवीचेतना उनसे करा लेगी। चिंतनधारा से तात्पर्य है वह सब कुछ जो भारतीय संस्कृति के पुनर्जीवन द्वारा मानव में देवत्व तथा धरित्री पर स्वर्ग के अवतरण की व्याख्या करते हुए परम पूज्य गुरुदेव अखण्ड-ज्योति पत्रिका रूपी प्राण प्रवाह के माध्यम से जो अपनी विरासत छोड़ गए हैं, उसे घर-घर पहुँचाने का संकल्प लिया जाना। शपथ समारोह जो जून माह में संपन्न होने जा रहा है, इसी संदर्भ में आयोजित है।

हम सभी दक्षिणेश्वर की माटी की तरह परम पूज्य गुरुदेव की जन्म स्थली व प्रारंभिक जीवन की कार्यस्थली आँवलखेड़ा की रज को हाथ में लेकर सप्त-सरोवर शान्तिकुञ्ज हरिद्वार में गंगा जल की साक्षी में वंदनीया माताजी के समक्ष 10 जून (गायत्री जयंती-गंगा दशहरा-पूज्यवर की द्वितीय पुण्य तिथि) की पावन प्रातः वेला में शपथ लेंगे कि संस्कृति पुरुष पूज्य गुरुदेव के तत्त्वदर्शन को घर-घर पहुँचाने का दायित्व हम लेते हैं। हम सभी एक साथ घोषणा करेंगे कि हमारा विश्वास है कि इस युग की व्यक्तिगत समस्याओं, पारिवारिक जीवन में बढ़ रहे विग्रह-विद्वेष तथा सामाजिक जीवन में मानवीय मूल्यों के पतन पराभव का एक मात्र समाधान देवसंस्कृति के विस्तार में सन्निहित है। देव संस्कृति में सांस्कृतिक मूल्यों आदर्शवादी परम्पराओं और संवेदनात्मक समाज के समर्थक सभी तत्त्व विद्यमान हैं। राष्ट्रीय एकता, अखण्डता अक्षुण्ण बनी रहे इसके लिए हम सभी संकल्प लेते हैं कि अपने पितामह ऋषियों द्वारा प्रणीत-महापुरुषों द्वारा सेवित देवसंस्कृति की घर घर प्राण प्रतिष्ठा के लिए निष्ठापूर्वक कार्य करेंगे। इसके लिए तीन माह के समय तथा ब्राह्मणोचित आजीविका के दान न्यूनतम अंशदान, बौद्धिक सम्मेलनों तथा संस्कार महोत्सवों में भागीदारी की हर व्यक्ति घोषणा करेगा तथा उस रज को अपने उपासना स्थल पर पूजित प्रतिष्ठित करने का आश्वासन देगा ताकि वह सेवा साधना के निमित्त ली गयी इस शपथ को पूरा करने की प्रेरणा व शक्ति देती रहे।

इसे एक असाधारण संकल्प माना जाना चाहिए जो विराट शपथ समारोह के माध्यम से एक लाख से भी अधिक परिजनों द्वारा लिया जा रहा है। विराट स्तर पर प्रतिभा जागरण की प्रक्रिया आरंभ हो चुकी है। नवयुग का मत्स्यावतार अँगड़ाई लेता हुआ अब विराट रूप लेता चला जा रहा है। परिवर्तन की प्रक्रिया हर ओर सक्रिय होती दृष्टिगोचर होने लगी है। संकल्प समारोहों का आयोजन भारत व विश्व के कोने-कोने में करने के पत्रों से लेकर देवसंस्कृति का संदेश घर घर पहुँचाने व बुद्धिजीवी वर्गों के मानस को मथने की प्रक्रिया विगत दो माह में जितनी गतिशील हुई है वह एक ही तथ्य की परिचायक है कि चेतन जगत सक्रिय है, इक्कीसवीं सदी, उज्ज्वल भविष्य के रूप में युग ऋषि का उद्घोष निश्चित ही साकार होने जा रहा है। हमें तो बस उस चेतन प्रवाह में स्वयं को जोड़ देना है।

विगत वसंतपर्व से आरंभ हुई शक्ति संचार साधना के व्यापक परिणाम देखने में आ रहे हैं। जन-जन का उत्साह जागा है एवं एक विराट स्तर पर देवसंस्कृति बनाने की ललक जागी है। वस्तुतः शपथ समारोह परम पूज्य गुरुदेव द्वारा निर्दिष्ट आगामी दस वर्षों की कार्य प्रणाली के अंतर्गत श्रद्धाञ्जलि समारोह के बाद दूसरा मील का पत्थर है, जिसके द्वारा मानव मात्र, जो इस मिशन से जुड़ा है, की सदस्यता की थाह लेने का प्रयास किया जाएगा। मेले- समागम तो बहुत से होते हैं किन्तु उद्देश्यों की अस्पष्टता या उनके न होने से वे मात्र तमाशे बन कर रह जाते हैं, अपना समागम तमाशबीनों का हो हल्ला नहीं है अपितु विराट पुरुष को भारत-भूमि से उदित हो रही नूतन चेतना द्वारा दिया जा रहा आश्वासन है कि भारतीय संस्कृति-हिंदू संस्कृति विश्व मात्र का मार्गदर्शन आने वाली कई सदियों तक करेगी। इसी के लिए हम सब एक जुट होकर यह संकल्प ले रहे हैं।

परमपूज्य गुरुदेव ने “ प्रतिभा परिष्कार” को एक अवश्यम्भावी प्रक्रिया कहा व यह भी लिखा कि ऋषि चेतना परोक्ष जगत में आकुल-व्याकुल है प्रतिभाओं को जगाने को। यह कार्य आगामी नौ-दस वर्षों में होने जा रहा है, यह महर्षि अरविन्द से लेकर स्वामी विवेकानन्द तथा नोस्ट्राडेमस से लेकर परम पूज्य गुरुदेव स्पष्ट कह गए हैं। पूज्य गुरुदेव ने लिखा है कि मनुष्यों के कई वर्ग हैं जिनमें सबसे अधिक संख्या उनकी है जो परावलम्बी हैं, अनुकरण और आश्रय ही उनके स्वभाव का अंग है। सम्पदा आसपास होते हुए भी यह हीन वर्ग है चिन्तन की दृष्टि से सबसे हीन इससे अगला वर्ग उनने उनका बताया जो निर्वाह भर में समर्थ प्रयोजनों मात्र हैं ।वे जिस तिस प्रकार जी तो लेते हैं पर श्रेय सम्मान जैसी कोई मानवोचित उपलब्धि उनके साथ नहीं जुड़ी। इससे श्रेष्ठवर्ग प्रतिभाशाली व्यक्तियों का है जो सही अर्थों में युगनेतृत्व कर सकने वाले व्यवस्थापक स्तर के श्रेष्ठ व्यक्ति होते हैं। वे अपनी नाव अपने बलबूते खेते हैं और उसमें बिठाकर अन्यों को भी पार लगाते हैं। संस्कृति व देश व समाज व विश्व की प्रगति व सुव्यवस्था इन्हीं प्रतिभावानों पर निर्भर है। चौथा वर्ग देवमानवों का पूज्यवर ने बताया जो महापुरुष स्तर की प्रतिभाएँ हैं व आत्म परिष्कार लोक मंगल में निरत रहना ही जिनका चुना हुआ धर्म है। उनका आवाहन इन चारों वर्गों में से उभर कर आने वाले उन व्यक्तियों के प्रति है जिनके मन में देश, समाज, संस्कृति के लिए दर्द है, कुछ करने की ललक है, प्रसुप्त प्रतिभा है पर उभर कर आ पाने की सामर्थ्य में आत्मबल में कमी है। इसी प्रतिभा को जगाने व उसका संवर्द्धन करने की प्रक्रिया पूज्यवर की सूक्ष्म व कारण सत्ता संपन्न कर रही है, इन दिनों।

प्रतिभाएँ ही किसी समाज-राष्ट्र या समूह की वास्तविक सम्पदा हैं । उनके द्वारा न केवल प्रतिभाशाली स्वयं भरपूर श्रेय अर्जित करते हैं वरन् अपने क्षेत्र समुदाय और देश की अति-विकट उलझनों को भी सुलझाने में सफल होते हैं। संवेदना प्रधान ये देवमानव अधिक से अधिक इस धरित्री पर उपजे तो आस्था संकट की विभीषिका देखते-देखते मिटती देखी जाएगी। इन्हीं प्रतिभावानों को विभिन्न वर्गों-शिक्षकों चिकित्सकों, समाज सेवियों, प्रशासकों, कलाकारों, वैज्ञानिकों, अधिकारीगणों , जन प्रतिनिधियों, युवाशक्ति तथा नारीशक्ति रूपी क्षीरसागर से निकालने के लिए व्यापक स्तर पर बौद्धिक सम्मेलनों की रूप-रेखा संस्कार महोत्सवों के साथ-साथ शपथ समारोह के बाद बनायी गयी है। कहना न होगा कि खराद पर चढ़कर आने वाली प्रतिभायें समुचित मार्गदर्शन मिलने पर समाज व राष्ट्र का कायाकल्प कर देंगी। इस दृष्टि से आगामी वर्ष के निर्धारणों में बुद्धिजीवी वर्ग के इन सम्मेलनों को अति महत्वपूर्ण माना जाना व इनमें भागीदारी हेतु अधिक से अधिक व्यक्तियों को प्रेरित किया जाना हर परिजन से अपेक्षित है। हर वर्ग के लिए अलग-अलग परिपत्र तैयार कर उनसे जो जो अपेक्षाएँ हैं, उन्हें बतायी जा रही हैं ताकि इन सम्मेलनों के निष्कर्षों का सुनियोजन हो सके।

संस्कार महोत्सवों, जो विश्वभर में अट्ठाइस स्थानों पर तथा पूरे भारत भर में जनपद स्तर के कुल एक हजार स्थानों पर आगामी एक वर्ष में शपथ समारोह के बाद आयोजित होने की विशद रूप-रेखा बन चुकी है। इनका मूल उद्देश्य होगा संस्कारों के माध्यम से जन-जन का शिक्षण । न केवल शिक्षण बल्कि एक व्यापक समुदाय की सुसंस्कारिता का जागरण, व्यक्तित्व के निखार, प्रतिभा के उभार तथा मानवी गरिमा के स्तर को ऊँचा करने के लिए संस्कार पद्धति की उपयोगिता को विज्ञान सम्मत ढंग से प्रतिपादित व संपन्न करना , इन संस्कार महोत्सवों का उद्देश्य होगा । भारतीय संस्कृति के मूल निर्धारणों को जो विलुप्त प्रायः से हो गए थे, मानवमात्र के समक्ष प्रस्तुत करना देवसंस्कृति की सबसे बड़ी सेवा कही जानी चाहिए। वही करने को यह मिशन संकल्पित है व विराट स्तर पर प्रदर्शन द्वारा प्रतिपादन-शिक्षण कर यह जन जिज्ञासा की पूर्ति तो करेंगे। हर संस्कार महोत्सव में निःशुल्क जाति पथ धर्म सम्प्रदाय-लिंग के भेद के परे न केवल सभी संस्कार संपन्न होंगे, उनके शिक्षण की विभिन्न माध्यमों से व्यवस्था भी की जाएगी। प्रत्येक स्थान पर भारतीय संस्कृति संबंधी एक प्रदर्शनी इसी निमित्त लगायी जाएगी। वीडियो द्वारा तथा एक्शन साँग-नुक्कड़ नाटकों द्वारा भी देवसंस्कृति के विभिन्न प्रसंगों का ही चित्रण का प्रशिक्षण करने का प्रयास किया जाएगा। जन-जन यह जानेगा कि ऋषियों द्वारा आविष्कृत यह संस्कार प्रणाली कितनी विज्ञानसम्मत तथा समयानुकूल है।

शपथ समारोह में तीन माह का समयदान देने वाले परिजनों के शिक्षण हेतु एक अभिनव पाठ्यक्रम देवसंस्कृति प्रधान आरंभ किया जा रहा है। यह पाठ्यक्रम देवसंस्कृति प्रधान आरंभ किया जा रहा है। यह पाठ्यक्रम जून 92 के अखण्ड-ज्योति अंक से आरंभ हो रहा है। समूचा अंक संस्कृति प्रधान होगा तथा इसी प्रकार आगामी इस पत्रिका के अंक प्रकाशित होते रहेंगे। अभी कुल चार विशेषांक सितम्बर माह तक निकाले जाने की योजना बनी है जिनको मूल आधार बनाकर समयदानी परिजन अपनी मिशनरी की योग्यता बढ़ाने का शिक्षण लेंगे। भारतवर्ष में स्थान-स्थान पर संस्कारशालाएँ बालकों के नव जागरण हेतु खुल जाएँ, हर प्रज्ञा संस्थान पर संस्कार संपन्न होने लगें व सभी इससे लाभ उठा सकें, मूल लक्ष्य यह है। धीरे- धीरे इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाते हुए शान्तिकुञ्ज को एक विराट विश्वविद्यालय का रूप देने का मन है, जहाँ भारतीय संस्कृति का साँगोपाँग प्रशिक्षक स्तर का शिक्षण दिया जा सकेगा। वस्तुतः जीवन जीने की शैली ही भारतीय संस्कृति का पर्याय है। वह शिक्षण बहुविधि रूपों में अब से और भी बढ़े-चढ़े रूप में परिजनों को दिए जाने की व्यवस्था की जा रही है। इस विश्व विद्यालय का अपना पाठ्यक्रम व शाखा प्रशाखाओं में चलने वाले उपक्रम का समग्र निर्धारण इस एक वर्ष में हो जाएगा जिसे देवसंस्कृति विस्तार वर्ष घोषित किया गया है।

शपथ समारोह की सभी तैयारियाँ इन पंक्तियों के लिखें जाने तक पूरी होने जा रही हैं। समारोह में उन्हीं को आमंत्रित किया जा रहा है जो पंजीकृत हो चुकें होंगे व सुनिश्चित निर्धारणों को मन में लेकर शपथ लेने आ रहे हैं। साथ में घूमने फिरने के लिए चलने वाले तीर्थ यात्रियों पर्यटकों के लिए साफ मनाही कर दी गई है। जून माह का पूर्वार्द्ध उन्हीं के लिए रखा गया है जो इसी निमित्त आयेंगे। शिक्षकों से लेकर अन्यान्य बुद्धिजीवियों को अपने वर्ग के लिए निर्धारित सम्मेलनों में भागीदारी करने को कहा गया है। शपथ समारोह के शुभारंभ हेतु निर्धारित जुलूस यातायात की अव्यवस्था की संभावनाओं को देखते हुए फिलहाल रद्द कर दिया गया है। जो भी वाहन अपने-अपने मार्गों से आयेंगे उन्हें 5 से लेकर 10 के समूह-जत्थों में कॉनवाय बनाकर आने को कहा गया है ताकि सभी व्यवस्थित ढंग से पहुँच सकें आँवलखेड़ा की रज लेकर एक वाहन अब सीधे वहाँ से शान्तिकुञ्ज निर्धारित दिन आएगा। साथ आने वाले वाहनों को सीधे सूचना दे दी गई है।

यह माना जाना चाहिए कि विराट में सक्रिय “संस्कृति पुरुष” के अनुचर विराट स्तर की उपलब्धियों वाला काम ही करेंगे, उससे छोटा नहीं । इस अपेक्षा के साथ जुड़ा होने से इस मिशन-संस्था की जवाबदारी अनेक गुना बढ़ जाती है। वह निश्चित ही पूरी निष्ठ के साथ निभेगी, यह आशा-विश्वास दिन-दिन बढ़ता ही जाता है।

*समाप्त*