सर्वम् अश्वमेधः

शत. 13/3/9/4

शतपथ ब्राह्मण में समस्त कामनाओं की पूर्ति के लिए “प्रजापति “ द्वारा अश्वमेध यज्ञानुष्ठान किए जाने का विवरण इस प्रकार है-

“प्रजापतिरकामयत। सर्वान्कामानाप्नुया 14 सर्वाव्यष्टीर्व्यश्नुवीयेति सऽएतमश्वमेध त्रिरातं यज्ञक्रतुमपश्चत्तमाहरत्तेनायजत तेनेष्ट्वा सवर्वानकामानाप्नोत्सर्वा व्यष्टीर्व्याश्नुत सर्वान्ह वै कामानाप्नोति सर्वाव्यष्टीर्व्यश्नुते योऽश्वमेधेन यजते।” -शत. 13/4/9/9

प्रजापति ने इच्छा की कि मेरी सभी कामनायें पूरी हो जायें, मुझे सभी पदार्थ मिले। उसने इस त्रिरात्र (जीन रात वाले) यज्ञक्रतु, अश्वमेध को देखा। उसको ले आया। उससे यज्ञ किया। इस यज्ञ को करके सब कामनाओं को पूरा किया। सब पदार्थों को प्राप्त किया। जो अश्वमेध यज्ञ करता है, उसकी सभी कामनाओं की पूर्ति होती है। वह सभी पदार्थों को प्राप्त किया। जो अश्वमेध यज्ञ करता है, उसकी सभी कामनाओं की पूर्ति होती है। वह सभी पदार्थों को प्राप्त कर लेता है।


अश्वमेध श्रृंखला-महाकाल की प्रतिज्ञा का उत्तरार्द्ध

अखण्ड-ज्योति का प्रकाशन गायत्री उपासना अंकों से प्रारम्भ हुआ था। तब प्रथम पृष्ठ पर छपने वाली गायत्री माता की छवि के नीचे एक पंक्ति छपा करती थी-”सन्देश स्वर्ग का नहीं धरा पर लाई, इस धरती को ही स्वर्ग बनाने आई।” तब शायद ही किसी का महाप्राण सत्ता की इस गर्वोक्ति पर विश्वास होता रहा हो, पर कालान्तर में महाकाल ने उस देव सत्ता को किस तरह घर-घर प्रतिष्ठित कर दिया यह सब के सामने है। गायत्री महाविज्ञान के तीन खण्डों के अब तक प्रायः तीस संस्करण छप चुके है ओर उनने इस दिव्य सत्ता के प्रति जन-जन को श्रद्धा से भर दिया है।

परम पूज्य गुरुदेव का प्रत्यक्ष शरीर पुरुष प्रधान था पर हृदय और अन्तः करण में माँ की सत्ता ओत-प्रोत थी। उनका रोम-रोम गायत्रीमय था। वे आद्य शक्ति के सजीव श्रीविग्रह थे। जीवन भर उन्हीं का लीलागान करने वाले उन देवपुरुष को अन्त में माँ ने अपनी ही गोद में समाहित कर लिया। महाप्रयाग से पूर्व उन्होंने घोषणा की थी जो कार्य स्थूल शरीर से संभव नहीं हुआ उससे लाखों गुना कार्य कारण सत्ता करेगी। अब तक जो हो चुका था वही क्या कुछ कम था? आगे की तो कल्पना कर सकना भी संभव नहीं था।

महाकाल किसी की प्रतीक्षा नहीं करता, वह केवल जगाने और साथ देने वालों पर प्रकट होता और अनुग्रह करता है। वह लाखों लोग इस तथ्य के साक्षी हैं, कि इस पटाक्षेप के पश्चात् एक वर्ष में ही सम्पन्न शक्ति साधना एवं उसकी पूर्णाहुति से कितनी जबर्दस्त शक्ति प्रस्फुटित हुई? देव संस्कृति को जन-जन तक पहुँचाने, असुर संस्कृति को मार भगाने के लिए एक जुट हुए देवत्व का शपथ समारोह कितना बृहत् ओर व्यापक था? जिस तरह प्राचीन काल में भगवती हारे हुए देवताओं की रक्षा का उद्घोष करती रही है, उसी तरह शपथ समारोह के अवसर पर ही देव संस्कृति दिग्विजय दशाश्वमेधों की घोषणा हुई। यहाँ से महाकाल के युग निर्माण संकल्प का उत्तरार्द्ध प्रारम्भ हुआ।

तब यह समझ में नहीं आ रहा था कि अश्वमेध स्तर के आयोजन सुने तो गये है महाकाल ने उँगली पकड़ कर जिस स्थिति तक पहुँचा दिया है, वह स्वतः में किसी अदृश्य सत्ता के चमत्कार से कम नहीं है। यह अश्वमेध अंक जब तक लोगों के हाथों में पहुँचेगा तब तक प्रथम अश्वमेध अपनी तैयारियों के अन्तिम चरण में होंगे इस समय वातावरण एक अव्यक्त आत्मविश्वास से भरा हुआ है। सर्वत्र एक ही स्वर, एक ही सृष्टि, एक ही सृजन गूँज रहा है,। जिसका नाम है --देव संस्कृति दिग्विजय”। सवालाख व्यक्तियों ने 6/7/8 जून 92 को एक स्थान पर एक स्वर से जो प्रतिज्ञा की थी-उसके पश्चात् गायत्री शक्तिपीठों के सम्मेलन तक भी इतने ही परिजनों ने खण्ड-खण्ड इस प्रतिज्ञा को दोहराया। यह तुमुल उद्घोष अब इतना विराट हो गया है कि धरती के कोने-कोने तक जा पहुँचा है। जिधर कान लगाओ उधर एक ही आवाज सुनाई देती हैं, युग परिवर्तन, देव संस्कृति दिग्विजय और अश्वमेध, अश्वमेध। प्राचीन काल के इतिहास की किस तरह पुनरावृत्ति होने जा रही है लोग यह स्पष्ट अपनी इन्हीं आँखों से देख सकेंगे।

अश्वमेध इस युग की असाधारण कृति है। उन्हें जन-जन तक पहुँचाने के लिए देव समुदाय को अब तत्काल तत्पर हो जाना चाहिए। यह पंक्तियाँ लिखे जाने तक प्रायः ढाई हजार सृजन सैनिक राजस्थान अश्वमेध के लिए क्षेत्रों में प्रविष्ट हो गए है। महाकाल के कदम से कदम मिलाकर कार्य करने का श्रेय अर्जित करना ही इस समय की सबसे बड़ी समझदारी है,विचारशील उसमें विलम्ब न करें।


देव संस्कृति दिग्विजय अभियान बनाम देवासुर संग्राम

मानवीय जीवन में पीड़ा, पाप और पतन की जो सर्वव्यापी परिस्थितियाँ आज दिखाई दे रही है, वे पहले न रही हो ऐसा नहीं है। पाप को कलियुग की नियति मान लेने से बढ़कर भ्रांति और कुछ हो नहीं सकती। वस्तुतः आज का दुराचरण पिछले युगों की पुनरावृत्ति मात्र है। आज का दिन कल की पुनरावृत्ति, अब की वर्षा ऋतु पिछले वर्ष की पुनरावृत्ति मात्र होती है। इसी तरह युगों का कालचक्र भी न्यूनाधिक एक जैसी धुरी पर चलता आया है दुष्प्रवृत्तियां सतयुग में भी शक्तिशाली-रूप में उभरी थीं द्वापर और त्रेता युग में भी, उन सबका निवारण भी एक ही तरह से हुआ। प्राचीनकाल में उसे देवासुर संग्राम कहा जाता रहा है। हर बार सशक्त असुरता को संगठित देव शक्तियों के सहारे परास्त किया जाता रहा है और देवत्व की स्थापना होती रही है।

मार्कंडेय पुराण के अध्याय 73 से लेकर अध्याय 85 तक इस तथ्य का बहुत भाव-पूर्ण और अलंकारिक वर्णन हुआ है। हर बार असुरों की पराजय का श्रेय “देवी” या भगवती दुर्गा को मिला हैं इसे “महाशक्ति” भी कहा गया है जिसका आविर्भाव देवताओं की की शक्तियों के एकीकरण से हुआ है। जिस प्रकार ऋषियों के रक्त की एक-एक बूँद से रावण के विनाश का कारण -भगवती सीता प्रादुर्भाव हुआ, उसी तरह महाशक्ति सदैव देवतत्व की संगठित शक्ति के रूप में उदित होती रही है। उसका एक अर्थ मूल मानवीय चेतना-प्राण सत्ता भी है उसे ही प्राणों की गंगोत्री -गायत्री अथवा देवत्व का बीज एवं अधिष्ठात्री वेदमाता भी कहा है। दर्शन और विस्तार दोनों ही पक्ष समानार्थी है।

इस महाशक्ति का प्रथम प्राकट्य सृष्टि के आविर्भाव काल में हुआ। तब भगवान विष्णु सो रहे थे। उनकी नाभि से ब्रह्मा जी की उत्पत्ति हुई। विष्णु के मान के मैल से मधु कैटभ नाम के दो राक्षस पैदा हो गये, वे ब्रह्मा जी को ही मारने को उतारू हो गये। असहाय ब्रह्मा ने परब्रह्म की आदिशक्ति महामाया की स्तुति की। उन्होंने विराट् पुरुष को जगाया। भगवान् विष्णु ने पाँच हजार वर्ष तक उन राक्षसों से युद्ध किया पर बड़े मायावी थे। जीत संभव नहीं हुई। तब महामाया ने उन असुरों को मोहित कर भगवान् विष्णु से वर माँगने को उकसाया। विष्णु ने सीधे-सीधे उनसे उन्हीं की मृत्यु का वरदान माँग कर उन्हें नष्ट किया।

स्पष्ट है- भगवान न कहीं सोता है और न किसी व्यक्ति के कान से कोई जन्म लेता है। परमात्मा को श्रद्धा और विश्वास की संज्ञा दी गई है। जब मनुष्य की श्रद्धा और विश्वास ध्वस्त हो जाते है तो सामाजिक जीवन में अनास्था पैदा होती है तो सामाजिक जीवन में अनास्था पैदा होता है। व्यक्ति उद्धत और अहंकारी होता चला जाता है। यहीं से अपराध बढ़ते है। भगवान् को अपनी सृष्टि प्यारी है वे उसे स्नेह से ठीक करना चाहते हैं, ज्ञान से ठीक करना चाहते हैं, ठीक करना चाहते हैं, ज्ञान से ठीक करना चाहते है, पर बच्चा जब बिगड़ जाता है तो उपदेश कम काम करते है। पिता पीछे हट जाता है, माँ थोड़ा पिटाई कर देती है, बच्चा सही रास्ते पर आ जाता है। यही परमात्मा की महामाया है। विजय के समय सभी ने उन महाशक्ति की परम ज्योति महाप्राण, आद्या शक्ति, सर्व कारण रूप आदि सम्बोधनों से अभ्यर्थना की है, यह सब भगवती गायत्री के ही विशेषण है। परमात्मा का नारी स्वरूप, माता स्वरूप उन्हें ही कहा जाता है।

दूसरी बार असुर महिष ने आक्रमण कर देवताओं के राजा इन्द्र को हराकर सम्पूर्ण देवलोक पर अधिकार कर लिया। दुःखी देवता ब्रह्मा जी को आगे लेकर भगवान विष्णु और महादेव ब्रह्मा जी को आगे लेकर भगवान विष्णु और महादेव के पास गये। अपनी व्यथा कही। दोनों क्रुद्ध हो उठे, उनके मुख से तेज फूटा सब देवताओं के शरीर से भी तेज निकला और उससे एक महाशक्ति का जन्म हुआ। उस महाशक्ति की हुँकार सुनकर तीनों लोक काँप गये। महिषासुर ने गर्जना सुनी तो पहले अपने सेनापतियों में से चिक्षुर (कीड़ों जैसा संकीर्ण जीवन जीने वाले ), चामर (चमड़ी शारीरिक सौंदर्य को महत्व देने वाले), उदग्र (उदर परायण) महाहनु (कुछ भी मारकर खा जाने वाले), असिलोमा (जिनके रोम-रोम में हिंसा भरी थी ) वाष्कल (दूसरों को तड़पता देखकर प्रसन्न होने वाले हृदय हीन) तथा विडालाक्ष (बिल्ली की सी चोर दृष्टि वाले ) को युद्ध में भेजा। वे सब मारे गये तब दुर्धर (आततायी) दुर्मुख (कुटिल) अपने समीपवर्ती अंग रक्षकों को भेजा। वे भी मारे गये तब महिषासुर (अर्थात् पृथ्वी आदि तत्वों से बना मन-जो संवेदनशील न होकर राक्षस बन गया हो) स्वयं गया। राक्षस बड़ा मायावी था। तरह-तरह के विकराल रूप धारण कर रहा था, तब क्रोध में भर कर देवी ने अपने वाहन शेर से उछलकर राक्षस को अपने पैरों से दबोच लिया और तलवार से उसका सिर काट डाला।

कथा यह बताती है, कि भौतिक लिप्सायें जब अत्यधिक और अनियंत्रित हो जाती है, तो मनुष्य कोई भी अपराध करने से डरना छोड़ देता है। इस युग में मिलावट, रिश्वत, चोर बाजारी, माँसाहार, जीव हिंसा, अपराधों की बाढ़ इसी तथ्य का पर्याय है। इस स्थिति में परमात्मा की कल्याणी सत्ता देवताओं को संगठित करती है। उनकी समवेत प्राण सत्ता जब निर्भय होकर युद्ध करने के लिए खड़ी हो जाती है, तो सारी आसुरी प्रवृत्तियों का एक-एक कर विनाश होने लगता है। देवताओं की विजय होती है और फिर सर्वत्र सुख शान्ति छा जाती है। यहाँ भी मन को सुसंस्कृत बनाने के लिए तेजस् शक्ति भगवती गायत्री को ही महामाया कहा गया है, उन्हीं की आराधना से कुसंस्कारों के असुरों से पीछा छूटता है। महिषासुर, देवी की दिव्य ज्योति में समा जाता है अर्थात् आत्मबोध की स्थिति तक पहुँचने के लिए मार्ग के सारे अवरोध ही उस सेना की तरह होते है, जिनसे अंतःकरण के देवत्व को युद्ध करना पड़ता है, पर यदि उन्हें साहस पूर्वक पछाड़ दिया जाये तो व्यक्ति अपने अलौकिक और आध्यात्मिक स्वरूप को स्वतः समझ लेता है, उस स्थिति में परिस्थितियाँ अनुकूल हो तो भी पाप से वैसे ही घृणा होगी जैसे गन्दगी से। उपरोक्त कथानक इस तथ्य का अलंकार मात्र है। इस युद्ध के बाद भी देवी की वही स्तुति देवताओं ने गाई है, जो पहली विजय के समय गाई थी।

देवताओं की स्तुति यहाँ भी बड़ी अर्थपूर्ण है।उसमें कहा है-”आपकी शक्ति ही समस्त विश्व में व्याप्त हो रही है। त्रिदेव भी आपके रहस्य को नहीं जान सकते। आप ही जगत की कारण, प्रकित, देवताओं और पितरों की स्वाहा और स्वधा है। वेदों की शब्दमयी मूर्ति, सम्पूर्ण जगत की रक्षक, ज्ञान और विवेक प्रदान करने वाली, उद्धारक दुर्गा, लक्ष्मी ओर गौरी आप ही हैं आपकी शक्ति और बल अपार है। “ यह समस्त अर्थ गायत्री में सन्निहित है।

तीसरी बार की कथा में शुभ-निशुंभ राक्षस आते है। उन्होंने समूचे देवत्व को परास्त करके रख दिया। देवता पुनः देवी की शरण में गए। उस समय भगवती पार्वती की देह से अम्बिका के रूप प्रकट होकर असुरों से युद्ध को तैयार हुई। उनका रूप बड़ा मनोभावन था। राक्षस शुभ ने प्रणय प्रस्ताव भेजा, तो भवानी ने कहा जो मुझे युद्ध में जीत सकता है, मैं उसी का वरण करती हूँ राक्षस ने पहले धूम्रलोचन फिर चण्डमुण्ड को भेजा। देवी काली ने उनका वध कर डाला। तब राक्षस रक्तबीज लड़ने उसका एक बूँद रक्त पृथ्वी में गिरता, तभी नया रक्तबीज पैदा हो जाता। तब भगवती ने काली से की मैं इस पर प्रहार करती हूँ तुम इसका रक्त भूमि पर मत गिरने देना ऊपर ही ऊपर पी जाना। तब रक्तबीज का वध हुआ।

रक्तबीज की मृत्यु का समाचार सुन कर शुँभ निशुँभ सेना लेकर रणक्षेत्र में उपस्थित हुए। पहले निशुँभ मारा गया फिर शुँभ सामने आया। उसने देवी की सहायक मातृका शक्तियों ब्रह्माणी, माहेश्वरी, कौमारी वैष्णवी, वाराही, नारसिंही और ऐन्द्री की ओर संकेत करके कहा तुम दूसरों का आश्रय लेकर युद्ध करती हो, अपने पराक्रम का झूठ-मूठ अभिमान करती हो। इस पर देवी ने अपनी शक्तियों को अपने अन्दर समेट लिया और कहा कि यह सब मेरी विभिन्न शक्तियाँ है जो मेरी इच्छा से प्रकट होती है, अब मैं अकेली ही तेरा वध करती हूँ। इस तरह असुरों और देवों का सबसे घोर संग्राम हुआ और राक्षस का वध हुआ। देवताओं ने आद्यशक्ति देवी की प्रार्थना की-

“हे महामाया! आप ही विपत्ति ग्रस्त लोगों की रक्षा करती हैं, आप ही इस संसार की जननी और ईश्वरी है। सम्पूर्ण विद्यायें और दैवी शक्तियाँ आपके ही रूप है। माँ के रूप में हम आपकी वंदना करते है।”

स्तुति से प्रसन्न होकर भगवती ने वरदान सहित आश्वासन दिया-”जब-जब पृथ्वी पर असुरों की उत्पत्ति बढ़ेगी मैं विभिन्न रूपों में जनम लेकर उनका विनाश और तुम्हारी रक्षा-करूंगी।”

दुर्गा सप्तशती नाम से विख्यात मार्कउय पुराण का यह उद्धरण इस तथ्य का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि आद्यशक्ति गायत्री ही विगत तीन कालों में देवत्व की स्थापना में समर्पित हुई है। उसी महाविद्या से इस ग की दुर्दम्य आसुरी प्रवृत्तियों की गाथा अब तक विप्रगण करोड़ों बार दोहरा चुके है, वह मिथ्या नहीं हो सकती।

अपनी परा प्रकृति के रूप में वह अदृश्य महासत्ता संकल्प श्रद्धाँजलि समारोह में देव पुत्रों की पीड़ा और पुकार सुनकर न प्रकट हुई। शपथ समारोह का दुर्ग स्वरूप उनके ही वरदान का प्रत्यक्ष प्रमाण था।उससे उल्लासित होकर ही देव समुदाय ने देवसंस्कृति दिग्विजय अभियान की घोषणा की। यह प्राचीन अश्वमेधों के परम्परा में प्रारम्भ किया गया ऐसा अथहयान है जो ताँत्रिक दृष्टि सूर्य चक्र में केन्द्रित है, उपासना की दृष्टि से भी सविता प्रधान है। रक्तबीज की तरह उसे जन-जन तक पहुँच कर उनके पापों को नष्ट करना है। अश्वमेध आयोजनों की समूची विधि व्यवस्था, संगठन, कर्मकाण्ड और विस्तार इस देवासुर संग्राम की परिधि में है। उसके प्रतिफल लोग प्रत्यक्ष आँखों से देख सकेंगे।

अश्वमेध वस्तुतः साँस्कृतिक अभियान हुआ करते थे, जो समूचे राष्ट्र को संगठित और एक सूत्र में बाँधें रखते थे। समूचा राष्ट्र इस दृष्टि से एक था राज्य और राजा तो तब भी अनेक हुआ करते थे। देव संस्कृति की अर्थ कोई धर्म विशेष नहीं अपितु सद्चिंतन, सत्कर्म और सद्व्यवहार (जो समस्त मानवीय प्रगति का मूलाधार है) का नाम ही देव-संस्कृति है। अश्वमेध आयोजनों की वर्तमान घोषणा प्राचीन देव संस्कृति दिग्विजय का ही अभिनव संस्करण है। इसमें देवतत्व की विजय सुनिश्चित है। महामाया ने उसके लिए समूचा सरंजाम एकत्र कर लिया है। कलियुग में पान की अनिवार्यता को अब ने केवल भूल जाना चाहिए, अपितु जहाँ भी देवत्व है उसे इस देव संस्कृति दिग्विजय के झंडे के नीचे आकर असुरता के विनाश में संलग्न हो जाना चाहिए।


यज्ञ-महत्व

यज्ञेन हि देवा दिवंगताः यज्ञेनासुरानपानुदन्तः। योन द्विषन्तों मित्रा भवन्ति यज्ञेन सर्वं प्रतिश्ठितम् तसमाद्यज्ञं परमं बदन्ति।

यज्ञ से देवताओं ने स्वर्ग ने स्वर्ग को प्राप्त किया ओर असुरों को परास्त किया। यज्ञ से शत्रु भी मित्र बन जाते है। यज्ञ में सब प्रकार के गुण है। अतः श्रेष्ठजन यज्ञ को श्रेष्ठ कर्म कहते है। -महानारायणीयोपनिषद्।

अग्नौ प्रास्ताहुतिः समयगादित्यमुपितिष्ठते। आदित्याज्जायते वृष्टिवृष्टेरन्नं ततः प्रजाः॥

अग्नि में विधि -विधानपूर्वक दी हुई आहुति सूर्यदेव को प्राप्त होती है। पश्चात् उससे वृष्टि होती है। वृष्टि से अन्न होता है और अन्न से प्रजा की उत्पत्ति होती है। -मनुसमृति 3/73

यज्ञों विश्वस्य भूवनस्य नाभिः।

यज्ञ ही समस्त ब्रह्माण्ड को बाँधने वाला नाभि स्थान है। -अथर्ववेद 9/10/14

यज्ञाः कल्याणहतवः।

यह कल्याण के हेतु हैं। -विष्णु पुराण 6/9/8

यज्ञैश्चदेवानाप्नोति।

यज्ञ से देवताओं का अनुदान प्राप्त होता है। -अग्नि पुराण 180/9

यज्ञभागभुजःसर्वे।

सभी या-भाग के भागीदार होते है। -दुर्गा सप्तशती 13/34


देव संस्कृति का मेरुदण्ड है-यज्ञ

साँस्कृतिक परम्पराओं का प्रचलन तत्वदर्शी ऋषियों ने बुद्धिमत्ता, सूक्ष्मदृष्टि, उपयोगिता एवं तथा स्थिति को ध्यान में रखकर ही किया है। ‘यज्ञ’ को देव संस्कृति का मेरुदण्ड स्वीकारने के पीछे उनकी यही समझ रही है। उपयोगिता रहित प्रचलन कर सकना उनके लिए सम्भव नहीं था। प्रमुखता देने के क्रम में भी उन्होंने किसी कृत्य की प्रतिक्रिया एवं उपलब्धि को ही ध्यान में रखा है। यज्ञ को धर्मकृत्यों में श्रेष्ठतम माने जाने में भी उसकी भौतिक एवं आत्मिक उपलब्धियाँ ही प्रधान रही है।

शास्त्रों में भगवान का एक नाम ‘यज्ञ पुरुष’ भी है। शतपथ ब्राह्मण की याो वै विष्णुः उक्ति में या को निश्चित रूप से विष्णु ही माना है। ‘वे’ शब्द में इस प्रतिपादन पर जोर दिया गया है और निश्चित कहा गया है। ऋग्वेद के आरम्भ में यज्ञ को मार्गदर्शक -पुरोहित, सद्गुरु बताया गया है। भजन करने वाले को ‘देव’ संज्ञा देते हुए उस कृत्य की प्रतिक्रिया को रत्नराशि की उपमा दी गई है। वेद वाङ्मय में जितना प्रकाश यज्ञ विद्या पर डाला गया है और यज्ञाग्नि का माहात्म्य बताया गया है उतना और किसी का नहीं। प्रसिद्ध ज्योतिष ग्रन्थ ‘सिद्धान्त शिरोमणि ‘ में कहा है- ‘वेदास्तावद् यज्ञकर्म प्रवृत्तः ‘ अर्थात् -वेदों की प्रवृत्ति यज्ञ कर्मार्थ बताई है। यही बात लगध ज्योतिष में भी आई है-’वेदाहि यज्ञार्थभिप्रवृत्ताः (7 खण्ड)। वेद का ग्राह्मण भाग भी यही बताता है- ‘चत्वारो वैवेदाः तैय।स्तायते’ (गोपथ ब्राह्मण 1/4/24)। केवल यही नहीं अन्यत्र भी यही बताया है ‘यज्ञोवेदेषु प्रतिष्ठितः’(गो. 1/1/38) प्रसिद्ध तार्किक दर्शन न्याय के वात्स्यायन भाष्य में भी यही सूचना मिलती है

‘यज्ञोमन्त्रः वेदस्य विषयः’ (4/1/62)।

सामान्य जीवन के परम्परागत धर्मकृत्यों में यज्ञ

अविच्छिन्न रूप से जुड़ा है। जन्म से लेकर मरण पर्यंत षोडश संस्कारों के रूप में इस प्रक्रिया का सोलह बार प्रयोग करके जीवन क्रम में से पशु प्रवृत्ति के निराकरण और देव प्रवृत्ति के अभिवर्धन की अपेक्षा की जाती रही है। प्रत्येक पर्व ओर शुभारम्भ में यज्ञ कृत्य की अनिवार्यता मानी गई है। होली वार्षिक यज्ञ है। पाँच आहुतियों का बलिवैश्व यज्ञ दैनिक नित्यकर्म में सम्मिलित रखा गया है। भारतीय धर्मानुयायी का विवाह विधान यज्ञ कृत्य के साथ ही सम्पन्न होता है। पार्थिव शरीर का पूर्णाहुति चिता जलाकर अन्त्येष्टि यज्ञ के रूप में सम्पन्न होती है। इन परम्पराओं पर दृष्टिपात करने से प्रतीत होता है कि जीवनचर्या में या को कितनी गहराई से घुला-मिलाकर रखा गया है। इसी पारस्परिक अविच्छिन्नता ने देव संस्कृति को यज्ञ संस्कृति की गरिमा प्रदान की है।

यज्ञ का भावार्थ-परमार्थ प्रयोजनों के लिए किया गया सत्कर्म। यज् धातु से निष्पन्न या शब्द के तीन अर्थ है (1) देवपूजन (2) संगति-करण (3) दान। इन तीनों ही प्रवृत्तियों को व्यक्ति और समाज के उत्कर्ष की दिव्य धाराएँ कहा जा सकता है। देवपूजन का अर्थ है- परिष्कृत व्यक्तित्व-दैवी सद्गुणों का अनुगमन। संगतिकरण अर्थात्-एकता सहकारिता-संघबद्धता। दान -अर्थात्-समाज परायणता विश्व कौटुम्बिकता-उदार सहृदयता। इन तीन प्रवृत्तियों का प्रतिनिधित्व ‘यज्ञ’ करता है। उसे इन त्रिविध प्रतिपादनों की ज्वलंत प्रतिमा-धवल ध्वजा कहा जा सकता है। ज्ञान-यज्ञ की लाल मशाल को इसी यज्ञाग्नि का प्रतिनिधि समझा जा सकता है इस प्रक्रिया में सद्भावनाओं को सत्कर्मों के रूप में परिणित करने की प्रेरणा है। ज्ञान और कर्म का समन्वय ही प्रगति के आधार खड़े करता है। सत्कर्म को तप और सद्ज्ञान को योग कहा गया है। आत्मिक प्रगति के यही आधार है। भौतिक प्रगति के लिए भी श्रम और शिक्षा को ही प्रधान साधन माना गया है। इनमें यज्ञीय सिद्धांतों को झाँकते हुए देखा जा सकता है।

यज्ञ विशुद्ध रूप में सामूहिक है। इसके एकाकी प्रयोग को निरुत्साहित किया गया है। कम से कम पति- पत्नी तो हो ही। एन. सी. वंद्योपाध्याय ने अपने ग्रन्थ “डेवलनमेण्ट ऑफ पाँलिटिकल थीअरीज” में इस तथ्य को स्वीकारते हुए ऋग्वेद के मण्डल 2 से 9 तक की अनेक ऋचाओं का हवाला दिया है। पश्चिमी मनीषी. ए. बार्थ ने “रिलीजंस आँव इण्डिया “ में यज्ञ को मानव-समाज और प्रकृति के बीच मधुर सम्बन्धों की व्यवस्था बताया है। उन्होंने “सजोश-स्त्ववादिवों नरो यज्ञस्यकेतुमिन्धते॥

मानुषोजनः सुम्नायुर्जुहवे अध्वरे। ऋग्वेद 6/2/3 है और मानव जाति (अग्नि ) को प्रदीप्त करते है और मानव जाति (मानुषों जनः) पवित्र अनुष्ठान में अग्नि का आमंत्रित करती है। मंत्र का हवाला देते हुए बताया हैं सचाई भी यही है-यज्ञीय प्रवृत्ति यह है कि उपयोगी पदार्थों को निज के लिए सार्वजनिक हित के लिए वायुभूत बनाकर बिखेर दिया जाय। वसोधरा में समष्टि में व्यष्टि के समर्पण की ही भावाभिव्यक्ति है।

यज्ञ कृत्य के प्रायः सभी क्रिया−कलाप ऐसे है। जिनमें अनेकों के सहयोग की आवश्यकता पड़ती है। पवित्र जलाशयों का जल, पवित्र वनस्पतियों का संग्रह कुण्ड, मण्डप निर्माण आदि में आरम्भ से अन्त तक होने वाले सभी क्रिया-कृत्यों में सामूहिकता-सहकारिता की आवश्यकता पड़ती है। मंत्रोच्चार से लेकर आहुतिदान, परिक्रमा जैसे सभी कृत्यों में एकरूपता समस्वरता का अनुशासन पालन होता है। सामूहिकता का यह तत्वदर्शन ही व्यक्ति को महान बनाता है। विराट् ब्रह्म की कल्पना के साथ-साथ यज्ञावशिष्ट हो खाने का निर्देश है। जो दिए बिना खाता है सो चोर है। देवताओं ने यज्ञ से देवतत्व प्राप्त किया जैसी सूक्तियाँ मिलती है। इन प्रतिपादनों में समाज परायणता की प्रेरणा है। संक्षेप में यज्ञ दर्शन व्यक्तिगत जीवन में चरित्रनिष्ठा और लोक व्यवहार में -समाज निष्ठा के आदर्श को अपनाए जाने की प्रेरणा देता है। व्यक्ति और समाज की सर्वतोमुखी प्रगति और सुख शांति का यही एक मार्ग है।

यज्ञ की प्रतीक प्रतिमा में सन्निहित सूक्ष्म प्रेरणाओं की व्याख्या करते हुए व्यक्ति को पवित्र और समाज को समर्थ बनाने का शिक्षण जितना इसमें है-उतना अन्यत्र कही नहीं। यज्ञाग्नि की कितनी ही विशेषताएँ है- (1) सदा गरम अर्थात्-सक्रिय रहना (2) ज्योतित अर्थात् -अनुकरणीय बनकर रहना (3) संपर्क में आने वाले को अपने जैसा बना लेना (4) उपलब्धियों का संग्रह न करके वितरित करते रहना (5) लौ-ऊँची रखना-चिंतन और स्वाभिमान को नीचे न गिरने देना। यज्ञाग्नि की यही सद्गुण सामर्थ्य ऋग्वेद-7/1/7-7/11/1, अथर्ववेद -5/12/2, शतपथ ब्राह्मण 3/7/4/10, शांखायन ब्राह्मण 3/7 महाभारत 7/7/10 में वन्दित की गई है। इसे देवमुख कहकर वर प्रदाता माना गया है। स्वर्ग तक आत्मा को पहुँचाने वाला वाहन क्या हो सकता है? इस प्रश्न को उत्तर देते हुए शास्त्रों ने कहा है-यज्ञाग्नि। अथर्व 18/4/2, ऐतरेय ब्राह्मण 1/2/10, शतपथ ब्राह्मण 12/4/1/7 में इसी कम का विस्तारपूर्वक प्रतिपादन किया गया है। हो भी क्यों न? इन पाँच विभूतियों का महत्व समझने और व्यवहार में उतारने की प्रक्रिया चल पड़े तो मानव-जीवन देवत्व-स्वर्ग अनुदानों-वरदानों से भरा-पुरा दिखने लगेगा।

शतपथ ब्राह्मण के 1/10/14 में कहा गया है-यज्ञों भुवस्य नाभि:− अर्थात्- यज्ञ संसार की धुरी है। उसी के सहारे विश्व ब्रह्माण्ड का गतिचक्र घूमता हैं यज्ञ का तत्वदर्शन उदारता, पवित्रता सहकारिता का त्रिवेणी पर केन्द्रित है। यही तीन तथ्य ऐसे है जो इस विश्व को सुखद, सुन्दर और समुन्नत बनाए हुए है। ग्रह नक्षत्र पारस्परिक आकर्षण में बँधे हुए ही नहीं हैं, एक दूसरे को महत्वपूर्ण आदान-प्रदान भी करते है। परमाणु और जीवाणु जगत भी इन्हीं सिद्धान्तों के सहारे अपनी गतिविधियाँ सुनियोजित रीति से चला रहे है। सृष्टि, संरचना, गतिशीलता और सुव्यवस्था में संतुलन - इकोलॉजी का सिद्धान्त ही, सर्वत्र काम करता हुआ दिखाई पड़ता है। हरियाली से प्राणि -पशु निर्वाह, प्राणि शरीर से खाद का उत्पादन, खाद उत्पादन से पृथ्वी को खाद-खाद से हरियाली यह सहकारिता चक्र घूमने से ही जीवधारियों की शरीर यात्रा चल रही है। समुद्र से बादल, बादलों से भूमि में आर्द्रता-आर्द्रता से नदियों का प्रवाह नदियों से समुद्र की क्षतिपूर्ति यह जलचक्र धरती और वरुण का संपर्क बनाता और प्राणियों के निर्वाह की उपयुक्त परिस्थितियाँ उत्पन्न करता है। शरीर के अवयव एक दूसरे की सहायता करके जीवनचक्र को घुमाते है। समाज संरचना के आधार पर अर्थतन्त्र, शासनतन्त्र तथा दूसरे प्रगतिक्रम चलते है। यह यज्ञीय परम्परा ही है, जिसके कारण जड़ और चेतन दोनों ही अपना सुव्यवस्थित रूप बनाए हुए है। इसी से यज्ञ तत्व को विश्व की नाभि-धुरी कहा गया है।

यज्ञ का भौतिक विज्ञान भी है। वायुशोधन की -दुर्गन्ध को दमन करने की यह प्रक्रिया मनुष्य की सबसे बड़ी खुराक प्राणवायु के परिशोधन में महत्वपूर्ण योगदान कराती है। आज जब पर्यावरण समस्या ने विश्व संकट का रूप धारण कर लिया है तो परिशोधन के प्रमुख अस्त्र यज्ञोपचार की ओर से प्रखर बनाना होगा। मनीषी एम. मोनियर के ग्रन्थ ‘एन्शिएन्ट हिस्ट्री आँव मोडिनि’ के अनुसार रोग कीटाणुओं को मारने की जितनी शक्ति यज्ञ ऊर्जा में है, उतनी सरल व्यापक और सस्ती पद्धति अभी तक नहीं खोजी जा सकी है। इसके द्वारा प्राचीनकाल में शारीरिक व्याधियों एवं मानसिक आधियों के शमन में सफलतापूर्वक प्रयोग किए जाने के प्रमाण अथर्व 12/31/31, 4/37, 1/18,19/38/12,5/29, 6/111 तथा ऋग्वेद 3 रु11, 20/96, 10/169 आदि स्थानों पर देखें जा सकते है। यज्ञ चिकित्सा के ये विस्मृत प्रयोग फिर से दुहराए जा सके, तो ऐसे सत्परिणामों की पूरी-पूरी सम्भावना है कि शारीरिक ही नहीं मानसिक रोगों को भी सफल उपचार किया जा सके।

भौतिक विज्ञान से कहीं अधिक सशक्त और समर्थ है-सूक्ष्म विज्ञान उसके तत्वज्ञान और विधि-विधान में ऐसे तत्व विद्यमान हैं जो सूक्ष्म जगत के अदृश्य वातावरण में देवत्व में देवत्व की मात्रा बढ़ाते है। उससे सर्वजनीन सुख-शान्ति में अदृश्य सहायता मिलती है। वायु शोधन की अपेक्षा वातावरण का निर्माण यज्ञों का प्रमुख प्रयोजन है। पवित्र वेद मंत्रों का सस्वर उच्चारण-विश्व चेतना में पवित्रता के तत्व भरने वाले दिव्य कम्पन उत्पन्न करता है। सामान्य आग को यज्ञाग्नि -देवाग्नि बनाने का कार्य अध्वर्यु, उद्गाता जैसे विशिष्ट याजकों की श्रद्धा-संकल्प-शक्ति करती है। पवित्र हवन-द्रव्यों के जलने से उत्पन्न हुई ऊर्जा से सूक्ष्म जगत में उपयोगी परिवर्तन होते है। एकरूपता, समस्वरता सहक्रिया की शक्ति सर्वत्र स्वीकारी जाती है। यज्ञ में ऐसे-ऐसे अनेकानेक आधारों का समन्वय है- जिनका सम्मिलित प्रभाव वातावरण में ऐसे उपयोगी तत्वों का समावेश करता है। जो अविज्ञात रूप से विश्वकल्याण की भूमिका सम्पन्न कर सके।

इस प्रक्रिया का समष्टिगत व्यापक प्रभाव पर्जन्य वर्षा के रूप में होता है। पर्जन्य का मोटा अर्थ होता है-बादल। सूक्ष्म अर्थ होता है-प्राण वर्षण। प्राचीनकाल के यज्ञ युग में सर्वत्र विपुल वर्षाएँ होती थी। इससे यज्ञकर्म और मेघवर्षा की परस्पर संगति बैठती है। जब-जब दुर्भिक्ष निवारण के लिए मेघ वर्षा के निमित्त विशिष्ट अग्निहोत्र प्रयोग हुए है और बहुत बार सफल भी हुए है, पर वस्तुतः पर्जन्य इससे आगे का प्राणतत्व है जो यज्ञ के माध्यम से आकाश में उत्पन्न होता है। तथा बादलों के माध्यम से धरती पर बरसता है। इस पर्जन्य प्राण वर्षा से सृष्टि के समस्त जड़-चेतन को नव जीवन एवं समर्थ उल्लास प्राप्त होता है। घास-पात औषधियाँ, जल, अन्न आदि इस पर्जन्य से विशिष्ट परिपोषण प्राप्त करते है। उनका सामर्थ्य स्तर कहीं और अधिक बढ़ जाता है। फलतः इन्हें जो भी पशु या मनुष्य प्रयोग करते है, उनकी प्रखरता कहीं अधिक बढ़ जाती है। यह उपलब्धि सर्वतोमुखी प्रगति में हर दृष्टि से महत्वपूर्ण सिद्ध होती है।

जितनी व्यापक मनुष्य की जिन्दगी, स्वयं में यह सृष्टि है, उतनी ही व्यापक यज्ञ का दर्शन और इस प्रक्रिया से होने वाली उपलब्धियाँ है। समूची मानव-जाति के जीवन से इसकी अभिन्नता सिद्ध करते हुए भगवान गीता में कहते है-

सह यज्ञाः प्रजाः सृष्टवा पुरोवाच प्रजापतिः। अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोऽसितवष्ट कामधुक्॥ देवान् भावयतानेन, तो देवाभावयन्तु वः॥ परस्पर भावयन्तः श्रेयः परमवाप्स्यथ॥ (3/10रु11)

अर्थात् प्रजापति ने मनुष्य और यज्ञ को साथ-साथ उत्पन्न किया और कहा इस यज्ञ के द्वारा तुम लोग उत्तरोत्तर वृद्धि को प्राप्त करो, यह यज्ञ तुम लोगों को मनोवाँछित फल प्रदान करे। इसके द्वारा तुम लोगों को मनोवाँछित फल प्रदान करे। इसके द्वारा तुम लोग देवताओं का संवर्धन करो, देवता तुम लोगों को संवर्धित करेंगे। इस प्रकार पारस्परिक संवर्धन से तुम लोग परम मंगल प्राप्त करोगे।

शास्त्रकारों का तो यहाँ तक कहना है-

यस्य राष्ट्रे पुरे चैव भगवान यज्ञ पुरुषः। ज्यतये स्वेन धर्मेण जनैः वर्णाश्रमन्वितैः। तस्य राजा महाीग गाय«यै परितुष्यति विश्वात्मा तिष्ठतो निज शसने। तस्मिंस्तुष्अ किमप्राप्यं जगतमीश्वरेश्वर।

अर्थात् -जिस देश या नगर के निवास धर्म का पालन करते हुए या पुरुष को प्रसन्न करते है वहाँ गायत्री माता का अनुग्रह बरसता है, और सुख, शान्ति बढ़ती है।

पद्य पुराण सृष्टि 3/124 में कहा गया है-

यज्ञेनाप्यायिता देवाँ वृष्ठयुत्यर्रोण मानवः। आप्यायनं वै कुर्वन्ति यज्ञाः कल्याण् हेतवः।

यज्ञ में प्रसन्न हुए देवता मनुष्यों, पर कल्याण की वर्षा करते है।

संक्षेप में यही कहा जा सकता है-यज्ञ प्रक्रिया के सत्परिणाम व्यापक और विपुल है। इन दिनों जो अश्वमेध महायज्ञ का उच्चस्तरीय प्रयास किया जा रहा है उसमें युगक्रान्ति के स्थूल और सूक्ष्म स्तर के उन सभी तत्वों का समावेश है, जो जनमानस को, व्यापक वातावरण को, परिष्कृत करके उज्ज्वल भविष्य की संरचना कर सकेंगे।


यज्ञों से कामनाओं की सिद्धि

कामनाएँ निन्दित नहीं है। निन्दित और त्याज्य है उनके स्वरूप और साधनों की निकृष्टता। कामनाओं की श्रेष्ठता तभी है- जब इनमें स्वयं के हित के साथ औरों का हित चिंतन जुड़ा हो। यदि इनकी पूर्ति के श्रेष्ठतम साधन की ढूँढ़ -खोज हो तो दिव्यदृष्टा ऋषिगणों की अनुभूतियों-प्रयोगशाला बने उनके जीवन की निष्कर्ष एक ही शब्द में मिल जायेगा-’यज्ञ’।

निःसन्देह काम्य यज्ञ मनुष्य की विविध कामनाओं को पूरा करने के लिए सहायक ही नहीं सर्व समर्थ है। उनके द्वारा सूक्ष्म ही नहीं सर्व सर्माि है। उनके द्वारा सूक्ष्म जगत में ऐसी प्रतिक्रिया एवं परिस्थितियों का निर्माण होता है।, जो अभीष्ट सफलताओं को समीप लाती है। अनेक बार तो तुरन्त और तत्काल अभीष्ट फल उपस्थित होता है। प्राचीनकाल में अनेक अग्निहोत्र, इस प्रकार के काम्य यज्ञों के विधानों को भली प्रकार जानते थे और उनके द्वारा भारी संकटों का निवारण एवं महान सफलताओं का उद्भव किया करते थे। आज काम्य यज्ञों की विधाओं का लोप हो गया है। आवश्यकता-इन युगीय रहस्यों की नए सिरे से ढूँढ़ -खोज की है। ताकि ऋषिगणों की अनुभूतियों का सतयुग प्रत्यक्ष किया जा सके।

काम्य यज्ञों के सम्बन्ध में कुछ संकेत यत्र-तत्र प्राप्त होते है। पर ये केवल संकेत मात्र है। इनसे अपने पूर्व पुरुषों की क्षमताओं के बारे में भली प्रकार अवगत हुआ जाता है। जहाँ तो प्रयोग करने फलितार्थ प्रस्तुत करने का प्रश्न है, उसे अन्वेषकों द्वारा बताई गई गोपनीयता की शपथ को ध्यान में रख गुप्त रखा गया है। फिर भी ये संकेत-जिज्ञासुओं के लिए संकेत तो है ही।

लता वर्वसु विविद्दिद्य सोमस्य जुहुयातदिमा। सोमे सूर्पण संयुक्तो प्रयोक्ता क्षय शान्तये॥

अर्थ-अमावस्या के दिन साँप लता की डाली से हवन करने से क्षय रोग शान्त हो जाता है।

कुसमै शंख वृक्षस्य हुत्वा कुष्ठं विनाशयेत्। अपरमार विनाशसतदपामार्गस्य तण्डुले॥

अर्थ-शेख वृक्ष के पुष्पों से होम करने से कुष्ठ रोग में आराम हो जाता है। अपामार्ग के बीजों से हवन करने मृगी रोग विनष्ट हो जाता है।

चन्दनद्रयसंयुक्तं कर्पूरतण्डुलं यवम्। लव्रग सुफलं चाजयं सिता चाम्रस्य दारुके॥

अधं न्यून विधिः प्रोक्तों माय«याः प्रीतिकारक।

अर्थ-दोनों चन्दन (लाल और सफेद) कपूर, तन्दुल, यव, लबंग, नारियल, घी, मिसरी, तथा आम की समिधा, इनका हवन गायत्री तत्व के प्रति-प्रीति कराने वाला है।

क्षीरोदन तिलान्द्वा क्षीरदु्रम सापेद्वरान्।

पृथक सहस्र त्रितपं जुहुयान मन्त्र सिद्धके॥

अर्थ-प्रणव युक्त 24,00000 चौबीस गायत्री जप करने के बाद उसकी सुसिद्धि के लिए दूध, भात, तिल, दूर्वा तथा बरगद, पीपल आदि दूध वाले वृक्षों की समिधाओं से तीन हजार आहुति प्रदान करे।

सूर्य गायत्री मंत्र से जिन वस्तुओं का हवन करने से जो लाभ होता है, उसका वर्णन यों मिलता है-

सप्ररोहाभिरद्राभिर्हुत्वा पुत्रम समाप्नुयात्। सामेदिभक्षीर वुक्षस्यर्हुत्वा पुत्रम् वाप्नुयात॥

अर्थ-पलाश की समिधाओं से हवन करने आयु की वृद्धि होती है। क्षीरवृक्षों की समिधा से वहन करने से पुत्र की प्राप्ति होती है

ब्रीहीणाँध शतंहुत्वा दीर्घचावाप्नुयात्।

अर्थ-यवों की सौ आतियाँ प्रतिदिन देने से दीर्घ-जीवन मिलता है।

सुवर्ण कमलं हुत्वा शतयायुरवाप्नुयात्। इर्वाभिपयस्य वापि मधुना सार्पिपापिवा।

शतं शत। सप्ताहमपमृत्यु व्यपोहति। शमी सपिद्ीिरन्तने पयसा वा च सर्पिषा॥

अर्थ-स्वर्णिम कमल पुष्पों से हवन करने पा मनुष्य शतजीवी होता है। दूर्वा, दूध, मधु की सौ आहुतियाँ देते रहने से अकाल मृत्यु का भय नहीं रहता। शमी की समिधाओं से तथा दूध और धृत से हवन करने पर भी अपमृत्यु का भय जाता रहता।

होमत्तिलघृताद्यैश्च धर्म कार्माि मोक्षदः। पूजामन्त्रान्पठेद्यस्तु मुक्त भोगोदिवं व्रजेत॥ -आग्ने दृपु. अ. 21 श्लो.27

अर्थ -तिल घृतादि का हवन, धर्म, काम, अर्थ और मोक्ष देने वाला है। अपनी पूजा के मंत्रों का पठन यानि कि जप करने वाले इस विश्व के भोग पदार्थों का उपभोग कर दिव्य लोकों को जाते हैं।

कदम्ब कलिका होमाद्यक्षिणी सिध्यति धु्रवम। बन्धूक किंशुकादीनि वश्याकर्षाय होमयेत्।

विल्वं राजयाय लक्ष्मर्थ पाटला«वम्पकानपि। पद्मानि चक्रवर्तित्वे भक्ष्य भोज्यानि सम्पे॥

दूर्वाव्याधि विनाशय सर्व सतव वशी कृतेः। प्रियंगु पाटली पुष्पं चूतपत्रं ज्वरान्तकम्॥

मृत्युँजयों मृतयु जितस्याद वृद्धिस्यात्तिलहोमतः। रुद्रशान्तिः सर्पशान्तया अि प्रस्तुत मुच्यते॥ -अग्नि पु. अ. 89श्लो. 49/52

अर्थ -कदंब की कलियों का हवन करने से निश्चयपूर्वक यक्षिणी सिद्ध होती है। किसी को वश में करने के लिए बन्धूक किंसुकादि का हवन करना चाहिए। राज्य प्राप्ति के लिए विल्वफलों का हवन करना चाहिए। लक्ष्मी प्राप्ति के लिए पाटल और चम्पक का हवन करना चाहिए ीक्ष्य-ीोज्य, संपत्ति और चक्रवर्ती राज्य के लिए कमलों का हवन करना चाहिए। व्याधि नाश के लिए दूब का, सब जीवों को वश में करने के लिए पाटल पुष्पों का, ज्वर दूर करने के लिए आम के पत्तों का, अकालमृत्यु से बचने के लिए मृत्युंजय मंत्र से हवन, वृद्धि के लिए तिलों का हवन करना चाहिए। रुद्र की शान्ति करने से सब की शान्ति हो जाती है।

श्री गेहे विष्णु गेहे वा श्रियं पूज्यं धनं लभेत्। आज्याक्तैस्तण्डुलै लक्षि जुहुयात्खदिरानले

राजावश्यों भवेद्वृद्धि श्री«चवस्या दुत्त्रातरम्। सर्वपाम्भोऽभिषेकेण नश्यते सकला ग्रहाः॥

अर्थ-लक्ष्मी अथवा विष्णु के मन्दिर में लक्ष्मी जी की यज्ञ से पूजा करके धन को प्राप्त करे। घी से मिले चावलों से खैर की अग्नि में एक लाख हवन करने से राजा वश में होता है और उत्तरोत्तर लक्ष्मी की वृद्धि होती है। सरसों और पानी का अभिषेक करने से सब ग्रह नष्ट हो जाते है।

संसाध्येशान मन्त्रेण तिलहोमो वशीकरः। जयःपद्यैसतु र्द्वाभिः शान्तिकाम पलाशजैः।

पुष्टिस्यात्काक पक्षेण मृतिद्धैषादिकं भवेत्। ग्रहक्षुद्रीयापतिं सर्वमेव मनुर्भवेत्॥ -अग्नि पु. अ. 307 श्लो. 20-29

अर्थ- सिद्ध किए हुए ईशान मंत्र से तिलों का हवन करने से सब वश में होते है। कमलों के हवन से जय की प्राप्ति होती है। शांति की कामना वाला दूब का हवन करे। पलाश के फूलों का हवन करने से पुष्टि होती हैं काक पक्ष से सब दोषादाकों का अंत होता है। क्षुद्र ग्रह, भय, आपत्ति, मानों सब ही सब ही नष्ट हो जाती है।

इस प्रकार अगणित प्रयोगों के वर्णन-विवरण शास्त्रों में स्थान-स्थान पर बिखरे पड़े है। परन्तु अपनी सारी सार्थकता,उपादेयता, के बावजूद-इनसे सिर्फ व्यक्तिगत स्तर के लाभों से लाभान्वित हुआ जा सकना सम्भव है। लेकिन जब एक व्यक्ति नहीं-समूचे देश, अखिल विश्व में समायी मानवजाति को स्वस्थ समृद्ध, विचारशील सद्गुण सम्पन्न बनाने के लिए पुकार उठ खड़ी हो तब? ऐसी स्थिति में शास्त्रकार-तत्वेत्ता ऋषि-एक स्वर से कहते है-

अश्वमेघाप्यायिता देवाँ वृष्ठयुत्यर्गेण मानवः। आप्यायनं वैकुर्वन्ति यज्ञाः कल्याणहेतवः॥

अर्थ-अश्वमेध में प्रसन्न हुए देवता मनुष्यों पर कल्याण की वर्षा करते है।

कलि के प्रवाह को उलटकर सतयुगी वातावरण को विनिर्मित करने वाले इन महायज्ञों की श्रृंखला याजकों की विहित कामनाओं को पूरा करने की दृष्टि से भी अद्भुत और अलौकिक है। कभी पृथु-अम्बरीष आदि लोकनायकों एवं वशिष्ट देवल आदि पुरोधाओं ने इस महान प्रयोग को सम्पन्न कर मानवों की कामनाओं को तृप्त कर उन्हें पूर्णकाम बनाया था। आज वही प्रयोग-विराट पैमाने पर युगान्तकारी शक्तियों द्वारा संचालित हो रहा है। सम्मिलित होने वाले याजक स्वयं को धन्य, कृतकृत्य अनुभव कर सकेंगे। इस यज्ञ से उनके जीवन में होते आश्चर्यकारी परिणाम उन्हें चिरकाल तक गुदगुदाते-पुलकित करते रहेंगे।


यज्ञ मात्र श्रद्धा नहीं, अद्भुत विज्ञान भी

भौतिक ऊर्जा और प्राण ऊर्जा के समन्वय से एक तीसरी शक्ति के आविर्भाव में पुरातन वैज्ञानिकों ने एक अद्भुत सफलता प्राप्त की, उसे ‘यज्ञाग्नि’ नाम से पुकारा गया। इसकी वैज्ञानिकता को समझने के लिए पाँच क्रमों पर विचार किया जा सकता है। (1) यज्ञकुण्ड की आकृति की भिन्नता का कारण (2) समिधाओं का चुनाव और उनका विशेष दहन, (3) मंत्रों का शुद्ध उच्चारण (4) यज्ञ का समय विचार (5) सामग्री का कुण विश्लेषण।

भिन्न आकृतियों एवं परिणामों की वेदियों में समिधाओं एवं हवन सामग्री से जो ताप प्रकाश उत्पन्न होते हैं, इससे परिणाम के रूपों में भी विभिन्न परिवर्तन हो जाते है। यह बात आधुनिक प्रयोगों से भी सत्यापित की जा चुकी हैं। समा के चुनाव के कारण भी अग्नि के ताप की तीव्रता और गुणों में स्पष्ट भेद हो जाता है। उदाहरण के लिए पलाश और कीकर के काष्ठों में ताप गुण की मात्रा और भेद स्पष्ट किया जा सकता है।

यह सर्वविदित सत्य है कि ताप, पदार्थों में रासायनिक परिवर्तन किया करता है। इस परिवर्तन से मूल द्रव्यों के गुण धर्म भी बदल जाते है। द्रव्यों के ज्वलन से नए पदार्थों की उत्पत्ति का यही रहस्य है। हवन सामग्री में दो तरह के द्रव्य रहा करते है। एक वे जो प्रचण्ड ताप से भी नहीं चलते, यानि कि उनका प्रभावोत्पादक अंश नष्ट नहीं होता।

पदार्थों के रासायनिक गुण-धर्म, उनकी भौतिक अवस्था पर आश्रित है। पदार्थों की स्वाभाविक अवस्था में उनके पीछे रहने वाले मांत्रिक घटक-पदार्थों की मात्राओं के परस्पर सम्बन्ध द्वारा रासायनिक प्रभाव उत्पन्न करने की क्रियाओं में भाग लिया करते है। पदार्थों की ठोस अवस्था की अपेक्षा सूक्ष्म अवस्था में ये घटक अत्यधिक संख्या में परस्पर मिलते है। इसलिए पदार्थों की वाष्पीय अवस्था में इनका सम्बन्ध बढ़ जाता है।

यदि हम एक घन सेण्टीमीटर को सूक्ष्मकणों में विभक्त करें, जिनमें से प्रत्येक कण 1/10000 प्रणाम का हो तो उसका क्षेत्रफल छः लाख वर्ग सेण्टीमीटर हो जाता है। परंतु एक घन सेंटीमीटर जल में इतने कण होते है,जिनमें प्रत्येक का व्यास 1/108 दस करोड़वाँ भाग सेण्टीमीटर होता है। इसका पृष्ठफल इससे भी अधिक सूक्ष्म परिणाम वाला होता है। इस प्रकार हम उनकी पारस्परिक क्रिया बहुत अधिक बढ़ा सकते हैं, इस भाँति जो पदार्थ अपनी साधारण अवस्था में प्राण वायु से मिल सकने में असमर्थ होते है वही अपनी वाष्पीय अवस्था में मिलने के योग्य बन जाते है। लोहा सीसा आदि धातुओं को जब इस प्रकार सूक्ष्मता में परिणत कर वायु में छोड़ दिया जाता है, तो बड़ी चमक के साथ जल पड़ते है और सुन्दर, लाल चिनगारियाँ छूटती है। शक्कर, कोयला आदि जब बड़ी सूक्ष्म अवस्था में वायु से मिलते है तो बारूद के समान धड़ाके की आवाज पैदा करते है। इस भाँति यह स्पष्ट हो जाता है कि किसी पदार्थ को सूक्ष्म अवस्था में परिणत कर उसके रासायनिक गुणों को अत्यधिक बढ़ाया जा सकता है।

ध्यान रखने की बात है कि सूक्ष्म कणों में वक्रता होती है। यह वक्रता जितनी कम होती जाती है, उतना ही उसका रासायनिक प्रभाव बढ़ता जाता है ओर सूक्ष्मता के बढ़ने के साथ ही इनकी वक्रता घटती जाती है। ऐसे पदार्थों में जायफल, जावित्री, बड़ी इलायची आदि बड़ी ही उत्तम कोटि और प्रथम श्रेणी की सामग्री है। हवन सामग्री में जो सुगन्धित तेल होता है, यह जल्दी ही ज्वाला पकड़ लेता है ओर वाष्पीय रूप में परिणत होकर बहुत ज्यादा विस्तार करता है। तदनुरूप उसका प्रभाव भी व्यापक हो जाता है। वाष्प अवस्था में उड़नशील उन तेलों के सूक्ष्मकणों का व्यास एक लाखवें भाग से दस करोड़वें भाग तक पाया जाता है। उन हवन सामग्रियों से निकाला हुआ अर्क उतना असरकारक नहीं होता, जितना असर सामग्रियों के हवन करने से होता है।

हवन सामग्री को जलाने से उसमें अनेक पदार्थ पाये जाते हैं कि अल्डीक्लाइड, अमाइन्स, पिलोनिलिक, साइक्लिक टरयेनिक श्रेणी के पदार्थों की तो पहचान भी हो चुकी है। इस सामग्री में नमकीन पदार्थों का निषेध है। क्योंकि नमक (सोडियम क्लोराइड) फटकर क्लोरीन गैस पैदा करता है। जो रोग कीटाणुओं के लिए जैसा हानिकारक है वैसा ही मनुष्यों के लिए भी है। हवन में घी को विशेष परिणाम में उपयोग किया जाता है। इसके दो लाभ है- पहला यह अग्नि को प्रज्वलित करके उसके तापमान को विविध मात्राओं में मर्यादित कर देता है। यथा 1200, 2000, 3000, आदि। दूसरा यह वाष्प में परिणत होकर सामग्रियों के सूक्ष्मकणों को चारों ओर से घेर लेता है और उस पर विद्युत शक्ति का ऋणात्मक प्रभाव उत्पन्न करता है।

हवन का पहला लाभ वायु की परिशुद्धि है अग्नि के उत्ताप से यज्ञ स्थान की वायु गर्म ओर हल्की होकर ऊपर को उठती है इससे चारों ओर से शुद्ध वायु खाली जगह को भरने के लिए खिंची चली आती है। तथा अग्नि के ताप से रोगों के कीटाणु मर जाते है।

सूर्य की किरणें में ‘प्रकाशिनी रश्मि’ होती है। समुद्र पृष्ठों पर उन तरंगों की लम्बाई 2960 ए. यू. घटती है। 2960 ए.यू. से कम लम्बाई की तरंगों वाली रश्मियाँ रोग कीटाणुओं को नाश करने के लिए विशेष उपयोगी होती है। 2950 ए. यू. लम्बाई की तरंगों वाली रश्मियाँ, वायु को ऋण-धनात्मक रूप में बदल देती है। इससे वायु में जीवन और स्वास्थ्य प्रद तत्वों की बढ़ोत्तरी हो जाती है।

सूर्य की किरणों में भिन्न-भिन्न रंगों वाली रश्मियाँ होती है और उनकी लम्बाइयाँ भी अलग-अलग होती है तथा रोग-कीटाणुओं पर उसका प्रभाव भी भिन्न-भिन्न होता है। इसके प्रभाव को देखने के लिए बहुत से टीन के कनस्तरों को अन्दर से भिन्न-भिन्न रंगों से रंग दिया गया और उसे एक ऐसे कमरे में रखा गया जहाँ असंख्य मच्छरों का निवास था। सूर्योदय के समय सभी कनस्तरों का मुख ढक दिया गया। एक-एक करके ढक्कन हटाकर देखने से पता चला कि नारंगी रंग के कनस्तरों में मच्छरों की संख्या सबसे कम थी। अग्नि का रंग भी नारंगी है। इससे अग्निहोत्र की उपयोगिता और उसका प्रभाव स्पष्ट होता है।

पश्चिमी वैज्ञानिकों ने रोग-कीटाणुओं के नाश के लिए दो पदार्थ खोज निकाले है। एण्टीसेश्टिक (विष विरोधी ) (1) डिस इनफैकट्स (छूत के प्रभाव को रोकने वाले)। प्रथम श्रेणी के पदार्थ रोग-कीटाणुओं से मनुष्य की रक्षा करते है मारते नहीं। इस श्रेणी में फिनायल, क्रियोजोट आदि की गणना की जाती है। दूसरी श्रेणी के पदार्थ-रोगाणुओं को सीधे मार देते है। कुछ पदार्थों में दोनों गुण उनकी घनता और विरलता की स्थिति के अनुसार पाये जाते है। पर इन तत्वों का सही उपयोग एक कुशल वैज्ञानिक द्वारा ही सम्भव है। साधारण लोग उसकी मात्रा का सही परिणाम न जान सकने के कारण लाभ के स्थान पर हानि हो उठा सकते है।

हवन गैस इस दोष से रहित है। कदाचित् कुछ विषैला अंश रहे भी तो धृत का वाष्पीय प्रभाव उसे भी नष्ट करके लाभकारी बना देता है। इसमें स्थित क्रियोजोट, एल्डीहाइड, फेनायल और दूसरे उड़नशील सुगन्धित पदार्थ वैसा ही लाभ देते है। इससे निर्विघ्न रूप से लाभ उठा सकना सभी के लिए सम्भव है। वायु शुद्धि के अतिरिक्त हवन गैस से स्थान, जल आदि अनेक तत्वों की शुद्धि भी हो जाती है। जिसमें पर्जन्य के द्वारा अन्न और औषधियाँ भी निर्मल और परिपुष्ट हो जाती है। इससे मानव शरीर रोगाणु निरोधक और विनाशक अणुओं से भरपूर हो जाता है। फिर उसे पर रोगों का आक्रमण हो जाय और कदाचित सफल भी हो जाय तो भी उसके शरीर में स्थित शक्तिशाली रोग विध्वंसक अणु उसे अधिक समय तक जीवित नहीं रहने देता। उसका जल्दी ही विनाश कर देता है। खरगोशों और चूहों पर परीक्षण करके हवन गैस की रोग निरोधक और रोगविनाशक शक्तियों को भली प्रकार सत्य पाया गया हैं

परीक्षण के लिए रोग कीटाणुओं का घोल तैयार किया गया। उसे सबल-स्वस्थ जानवरों के देह में प्रवेश कराने से वह उस रोग से आक्रान्त हो जाता है। उसी को या दूसरे स्वस्थ जानवरों के शरीर में जब उस घोल में हवन गैस मिरित कर प्रवेश करवाया जाता है, तब वह रोगी नहीं होता। बारम्बार यह प्रयोग सफल पाया गया है।

कृषि में भी हवन गैस लाभदायक सिद्ध हुई है। मिट्टी में दो तरह के कीटाणु होते है एक उर्वराशक्ति को बढ़ाने वाले तथा दूसरे उसे नष्ट करने वाले। पाश्चात्य विज्ञान ने उर्वराशक्ति को नष्ट करने वाले कीटाणुओं को नष्ट करने के लिए जो घातक द्रव्य तैयार किया है, उसे मिट्टी में मिला देने से उर्वराशक्ति विनाशक कीटाणु की प्रवृद्धि होकर उसकी उर्वराशक्ति विनाशक कीटाणु नष्ट हो जाते है, जिससे पोषक कीटाणुओं की प्रवृद्धि होकर उसकी उर्वराशक्ति बड़ जाती है। पर उसमें दोष यह है कि उसे शीघ्र ही मिट्टी से अलग नहीं करने पर वह उर्वरा वर्द्धक कीटाणुओं का भी विनाश कर डालती है।

यज्ञ से पैदा होने वाली गैस को कुछ समय तक मिट्टी पर डालकर देखा गया है कि इससे उसकी उर्वराशक्ति बहुत बढ़ जाती है और पोषक अणुओं को बढ़ाने वाले आवश्यक तत्व उसमें भर जाते है। इन्हीं तत्वों के कारण यज्ञीय गैसों से प्रेरित पर्जन्य और बादल अन्न और औषधियों को निर्मलता और पुष्टि प्रदान करते है।

आकाश मण्डल में वायु की दो सतह होती है। एक तो धरती से छः मील की दूरी तक और दूसरी 625 मील ऊपर की ओर। वर्षा का सम्बन्ध केवल पहली सतह से ही है। बादलों के निर्माण में जो बातें सहायक है। वे है (1) वायु में जलकणों की उपस्थिति (2) तापमान (3) वायु का फैलाव (4) धूलकणों की संख्या उनका अनुपात और आकार (5) धुएँ के अणु।

बादलों को सात्विक गुणों वाले एवं निर्मल -पुष्ट बनाने में यज्ञ धूम्र के अणुओं का उसमें प्रविष्ट कराना सर्वश्रेष्ठ है। इसीलिए पुरातनकाल में जब देश में अधिक अग्निहोत्र और यज्ञ कर्म सम्पन्न होते थे-उस समय की वृष्टि सत्वगुणों से भरी होने के कारण अन्न और औषधियों में भी वे गुण ओत-प्रोत हो जाते थे। अन्न का सूक्ष्म अंश ही मन को पुष्ट करता है। अतः पुरातन युगीय संस्कृति के निवासियों का मन भी सात्विक निर्मलता से अनुप्राणित रहा हो तो आश्चर्य क्या? यज्ञ के लिए समर्पित इन देव मानवों ने जिस पद्धति से स्वयं को देवता और धरती को स्वर्ग भूमि में बदल डाला वह आज भी उनकी विरासत के रूप में हम सभी के पास है। आवश्यकता उसके व्यापक उपयोग की है।

आज जब पर्यावरण में विसंगतियाँ फैल रही है। प्रदूषण की चीख पुकार मची है, हर कहीं विष भर रहा है। ऐसे में इसकी उपयोगिता पहले की अपेक्षा कहीं बढ़-चढ़ कर है। प्रदूषित भावनाएँ ही है-जिन्होंने वनस्पति, प्राणी और मनुष्यों में अपना आधिपत्य जमा रखा है। फलतः सर्वत्र रोग-पीड़ा पर लगे प्रश्न चिन्ह का एक मात्र वैज्ञानिक हल ही अश्वमेध महायज्ञ के अनुष्ठानों के रूप में प्रकट हुआ है।

इसमें प्राण और पदार्थ की संयुक्त ऊर्जा से जिस यज्ञाग्नि का आविर्भाव होना है, वह प्रत्यक्षतः एक धर्मानुष्ठान मात्र प्रतीत होते हुए भी उसकी सामर्थ्य एवं परिणति असाधारण है। इसे उन निष्कर्षों के व्यापक और सफल प्रयोग के रूप में भी समझा जाना चाहिए जिनकी प्राप्ति में ब्रह्मवर्चस् शोध संस्थान के वैज्ञानिक मनीषी पिछले एक दशक से अनुसंधान तप करते रहे है। सृष्टि और समाज के बिगड़ते सन्तुलन को सँभालने के लिए पहले भी समय-समय परराजसूय, अश्वमेध होते रहे है। वर्तमान-अश्वमेधों की श्रृंखला-यज्ञ विज्ञान के उन्हीं प्राचीन सूत्रों का नवीन प्रयोग है।

इस पुण्य कर्म की श्रृंखला चलते रहने से क्रमशः रज और तम का विषाँश दूर होकर दिनों दिन सात्त्विकता बढ़ती जाएगी। यह महायज्ञ विश्वकल्याण की प्रारम्भिक भूमि का नींव और बीज है। भूलोक में जिस स्वर्ग को बसाने की हम कल्पना करते है यह उसी का क्रियात्मक स्वरूप है।

हम से जो भी विश्वशांति, समुन्नति और समृद्धि की बात कहते है वे इन अश्वमेध अनुष्ठानों को सम्पन्न होने और करने में किस भाँति अपना कर्तव्य पूरा कर रहे है। इसी से उसकी पहचान कर सकते है। अभी भी हममें उसमें सहयोग करके अपने कर्तव्य की कमियों को पूरा कर सकते है। स्मरण रहे कि हमारे जीवन में ही नहीं, बल्कि लिखित इतिहास में केवल यही वह अवसर है, जब कि ऐसा महान यज्ञ हो रहा है। अपने जीवन में प्राप्त ऐसे अपूर्व अवसर को हाथ से किसी भी तरह न जाने दें।


महायज्ञों से महाप्राण कुँडलिनी का अलोड़न

‘यज्ञ’ तत्व जितना व्यापक है, उतना ही सूक्ष्म। इसे समझने और अनुभव करने वाले तत्वदर्शी ऋषियों ने घोषित किया, कि यज्ञ प्रक्रिया न केवल यज्ञ वेउियों हर ब्रह्माण्ड में अबाध गति से संचालित देव अग्नि परमात्मा ही है। क्योंकि उसी से इस विश्व में रूप है,दर्शन है और प्रकाश है। इसी कारण ऋग्वेद का प्रथम मंत्र भी उसी प्रधान अग्रणी देव अग्नि की ही स्तुति से शुरू होता है। इतना ही नहीं वेद की सबसे अधिक ऋचाएँ इन्हीं अग्नि देव की ही स्तुति में है।

सामान्य दृष्टि भी अगिन को प्रकाश, ऊर्जा एवं ऊर्ध्वगमन आदि गुणों से भरा पूरा देख सकती है। इसी की स्थापना एवं विधिवत पूजा सेवा, विधिवत प्रयोग यजन से इस विश्व के कर्म सम्पादित हो रहे है। यज्ञ द्वारा अग्नि में द्रव्यों को डालकर ऊर्ध्वगामी बना दिया जाता है। अर्थात् उनको पूर्णावस्था में स्थापित कर दिया जाता है। जब यह कार्य सृष्टि के तत्वों तक ही सीमित रहता है या सृष्टि के तत्वों के लिए ही किया जाता है तो वे यज्ञ द्रव्य यज्ञ ही रह जाते है और जब इन द्रव्यों के यज्ञ के साथ अपनी उन्नति के लिए कर्म किए जाते है, तो उनके साथ हमें अपना संकल्प क्रिया का उद्देश्य एवं अभिप्राय भी खोलना जरूरी हो जाता है। उद्देश्य विहीन असंगत कर्मों का यज्ञ में कोई स्थान नहीं।

प्राचीन समय में शारीरिक, सामाजिक एवं आत्मिक उन्नति के लिए अनेक प्रकार के यज्ञ प्रचलित थे। जिस निमित्त जो यज्ञ होते थे, उनमें उसका चित्रण या रूपक रूप से आभास प्रकट किया जाता था भौतिक तत्वों में अग्नि देव आयु को विशेष क्रियाशील करके मनोकामना पूर्ण करने में सहायक होते है। उसी प्रकार आत्मिक यज्ञों में आत्मा रूपी अग्नि प्राण आदि शरीर में स्थिति वायुओं द्वारा अलौकिक अनुभूतियाँ विभूतियाँ प्रकट करने में समर्थ होती है। यही कारण है तत्ववेत्ता ऋषियों ने प्राणविद्या को समझ कर यज्ञ की उस सूक्ष्मता को अपनाने पर जोर दिया है।

प्राणविद्या की बारीकियाँ समझने के लिए जरूरी है कि जिज्ञासु, शरीर में नासिका द्वारा निकाले गए एवं ग्रहण किए गए वायु के बारे में ज्ञान प्राप्त करें। दाहिने और बायें नासा छिद्रों से जो वायु ग्रहण की एवं त्यागी जाती है, उनमें बायें नासाछिद्र की क्रिया इड़ा नाड़ी से और दाहिने नासाछिद्र की क्रिया पिंगला नाड़ी से होती है। इन दोनों नाड़ियों का सम्बन्ध अग्नि और सोमतत्वों से है। विश्व में इन दोनों तत्वों के प्रतिनिधि सूर्य चन्द्र नाड़ी भी कहते है। इसी रहस्य को बताने के लिए दर्श और पौर्णमास्येष्टियों का विधान है। जिसने ये इष्टियाँ नहीं की वह आगे के यज्ञ कैसे करेगा? यज्ञ की अग्नि को विधिवत् स्थापित-रक्षित एवं संवर्धित करने के लिए इन इष्टियों का करना आवश्यक माना जाता था। इसका तात्पर्य यह था कि साधक को सबसे पहले प्राणविद्या के अनिवार्य तत्वों को समझकर उन पर अभ्यास करना चाहिए। इसी सिद्धांत के प्रतिपादन के लिए यज्ञ के प्रारम्भ में ही दोनों दर्श और पौर्णमास इष्टियाँ है। यही पिंगला और इड़ा सूर्य एवं चन्द्र होने से विश्व में अग्नि और सोमरूप से तथा उष्ण एवं शीतरूप से सर्वत्र विद्यमान है।

उपरोक्त दोनों यज्ञों द्वारा विद्या का व्रत ले लेने पर पशुबन्ध यज्ञ किया जाता था। क्योंकि जब तक पाशविक वृत्तियों पर अंकुश नहीं लगेगा, साधक का अभ्यास आगे बढ़ेगा नहीं। पपशुबन्ध अपनी आसुरी प्रवृत्तियों को बाँधने का रूपक है। जब तक पंच ज्ञानेन्द्रिय एवं छठे मन-इस प्रकार इन छहों को बाँधा नहीं जाता, प्राणवि? की उन्नति, ब्रह्मवर्चस् काम, ऊर्ध्व रेतस् एवं अमृतत्व प्राप्ति कदापि सम्भव नहीं। इसी इन्द्रिय रूपी छः पशुओं के बन्धन का चित्रण पशुबन्ध यज्ञ है।

जब साधक प्राणों की अलग-अलग स्थिति जानकर उन पर इन्द्रियों के संयम द्वारा आधिपत्य स्थापित कर लेता है तभी वह अग्निष्टोम यज्ञ अर्थात् -सूर्य एवं चन्द्र नाड़ी इन दोनों से संयुक्त यज्ञ अग्नि-सोम यज्ञ कर सकेगा। इन्द्रियों का बाहरी संयम करने के बाद साधक की आन्तरिक वासनाएँ एवं प्रवृत्तियाँ बाधक न बनें इसके लिए उनका पूरी तरह से वध आवश्यक है। अग्नि-सोम यज्ञ, प्राणापानहुति यज्ञ इसी प्राण-अपान में समत्व बिठाने के लिए है। प्राण अपान के समत्व में अथवा इड़ा-पिंगला दोनों स्वरों के समभाव में चलने पर सुषुम्ना नाड़ी में प्राण का संचार होने से-साधक कहीं अधिक उन्नत स्थिति प्राप्त कर पाता हैं तभी उसके द्वारा सोमयोग और वाजपेय यज्ञ कर पाना सम्भव है।

प्राणों को सुषुम्नानाड़ी के मार्ग द्वारा ऊर्ध्वगामी करने पर उसके साथ शरीर में बल और ओज बढ़ाने वाले वीर्य को प्राणों की ऊष्मा के द्वारा सोमरूप शांत एवं सूक्ष्म तथा अदृश्य बनाकर उसको ऊपर उड़ा ले जाना या उनका हरण कर लेना ओर उसको शरीर के ‘द्यु’ स्थान अर्थात् -मूर्धा में ले जाकर इस स्थान के देवताओं-इन्द्रियों को उस सोम का पान कराना, बल से संपन्न कराना वाजपेय यज्ञ है। वाज का तात्पर्य बल और ओज ही है। इस प्रकार पुनः पुनः यज्ञ करने से शतक्रतु अर्थात् -इन्द्र पद प्राप्त कर लेता है। उसके आधीन सभी देव-इन्द्रियाँ हो जाती है। क्योंकि बार-बार वह उन्हें तृप्त करता है। यही साधक का राजसूय यज्ञ है। इस प्रकार राजसूय या के द्वारा जो राजा बन जाता है, वही अपने आत्मा रूपी राष्ट्र या विश्व की समृद्धि के लिए अश्वमेध रच पाता है।

आध्यात्मिक प्राणविद्या के ये यज्ञ अपने अलंकारिक रूप में है। समझाने हेतु उनका चित्रणपूर्वक प्रदर्शन करने के लिए कर्मकांड मय यज्ञों को किया जाता है। जिस कर्मकाण्ड के पीछे आध्यात्मिक उन्नति का पाठ नहीं है, उसे निष्प्राण ही कहा जाएगा। वैदिक श्रौत यज्ञों का आत्मिक उन्नति के लिए उत्तम क्रम था। कालांतर में रूढ़िवाद में पड़कर ये यज्ञ प्राणविद्या से शून्य हो गए और इन यज्ञों द्वारा उन्नति का क्रम गायब हो गया। इतना ही नहीं नचारियों ने सिर्फ शब्द पढ़कर स्वयं को ज्ञानी समझने वालों ने यज्ञ में अश्लील कार्यों, पशुवध, माँसाहार आदि हेय कर्मों को भी समाविष्ट कर दिया।

बाहरी तौर पर प्रचलित हुए ये यज्ञ वास्तव में आँतरिक स्थितियों के ही परिचायक होते थे। इनमें प्रयोग किए जाने वाले शटदों और कर्मों में अनेकों गूढ़ रहस्य छिपे होते थे। सामान्यतया इन यज्ञों में कुछ आधार भूत कर्म होते थे। उनमें से कुछ दक्षिणाग्नि में, कुछ गार्हपत्याग्नि में कुछ उत्तराग्नि में सम्पन्न होते थे। आहुति के लिए आज्य (घृत) तथा हवि प्रयोग में लाया जाता था। यज्ञशाला में एक स्तंभ जिसे यूप कहते है गाड़ा जाता था।इससे यजमान -पत्नी को बाँधा जाता था। दीक्षा ग्रहण करने वाले यजमान को व्रतशील रहना पड़ता था। इसमें पशु बन्धन भी होता था।

यज्ञों में होने वाले ये सभी कर्म आध्यात्मिक उन्नति के चित्रण के लिए ही थे। यजमान की श्रद्धा ही वास्तव में बाह्य या में पत्नी रूप से हैं इसी आधार पर श्रद्धा को मनु की पत्नी का रूप दिया गया। ‘पत्युर्नयज्ञ संयोगे’ पत्नी के बिना यज्ञ नहीं पाणिनि के इस सूत्र का अर्थ इतना ही है, श्रद्धा के बिना यज्ञ नहीं। यजमान का लक्ष्य ही यज्ञ स्तम्भ ‘यूप’ रूप में प्रकट किया जाता है। यूप से यजमान पत्नी को बाँधने का कतलब है श्रद्धा -लक्ष्य बँधी होनी चाहिए। ताकि श्रद्धा अविचलित रह सके और यज्ञ पूर्ण श्रद्धा से सम्पन्न हो।

इन यज्ञों द्वारा शरीर के आंतरिक स्थानों का चित्रण भी किया जाता हैं अनेक कार्यों का चित्रण एक ही रूपक में प्रकट कर देना यज्ञ की गम्भीर एवं विशद् विचार प्रणाली का द्योतक है। ‘यूप से बँधी हुई यजमान पत्नी का रहस्य है अड़ा और पिंगला के विधिवत् होम में मेरुदण्ड में सुषुम्ना नाड़ी के नीचे वाले भाग में साढ़े तीन फेरे लिए लिपटी कुण्डलिनी शक्ति-की प्रतीक यूप से बँधी यजमान पत्नी है।

यज्ञों में पशु बन्धन और वध का अर्थ-पाशविक वृत्तियों पर नियंत्रण और उनका समापन ही समझा जाना चाहिए। “अजैर्यष्टव्यम्’- आदि वाक्यों के वास्तविक अर्थ न समझने से यज्ञ का सौंदर्य नष्ट हो गयाँ मनुष्यों में जो कामवासना की प्रवृत्ति है, उसको संयमादि द्वारा नियंत्रित करना ही अज अर्थात् -काम का हनन हैं। इसी प्रकार ‘अविहनन से तात्पर्य भेड़ मारना नहीं समर्य मार्ग का भेदन करना है। रुति वाकयों के अनुसार ‘सूर्य द्वारेण तेविरजा प्रयानित’ मोक्ष की कामना करने वाले सूर्य द्वार-द्वारा जाते है। परंतु जब अध्यात्म विद्या से शून्य मनुष्यों के हाथ में कर्मकाण्ड आया, तो अजबध, अविवध का शब्दार्थ लेकर बकरे और भेड़ें मारी जाने लगीं।

उपरोक्त दोनों प्राणियों के अतिरिक्त यज्ञ में गौ और अश्व के वध प्रारम्भ हो गए। जब कि गौ का तात्पर्य वाणी ही कामधेनु है। इसी से संसार के इच्छित कर्म हो रहे हैं वेद में कहा गया है। ‘वाचो में विश्वभेषज’ अर्थात्-मेरी वाणी विश्व की औषधि हैं। औषधि बनने कि लिए उसे कूटा–पीसा तपाया भस्म किया जाता है। इतना ही नहीं उसमें अनेक रसों का पुट देने की बात भी विख्यात है। जब संसार को महौषधि तैयार करनी हो तब कितनी बार रगड़ना, मारना, तपना पड़ेगा? वाणी पर कठोर संयम एवं उसे मृदु भाषी बनाना गौमेध है।

यदि इस अर्थ को त्याग कर गोमेध से गो पशु का वध किया जाय तो ‘स्वर्ग कामोयजेत’ कभी चरितार्थ न होगा। जब कि जिह्वा में मधुमत्तमा’ के आदर्श पर चलने से इसी जीवन में स्वर्ग की प्राप्ति निश्चित है। इसी प्रकार राष्ट्र की प्रजा में से आसुरी प्रवृत्तियों का नाश करा ही अश्वमेध है।

सोमरस का विवरण भी कुछ इसी तरह आलंकारिक है। वेद में आता है ‘अथ वै सोमो वृष्णी अश्वसयरेतः’ अर्थात्- वर्षशील सूर्य की ऊष्मा से पृवी स्थिति जल का जो सूक्ष्म रूप होकर अंतरिक्ष में विचरता है -वहीं सोमवल्ली है। यही सूर्य का रेत है इसी प्रकार शरीर स्थित प्राण रूपी सूर्य की उष्मा ये अधोगामी रेत (वीर्य) को सूक्ष्म और ऊर्ध्वगामी बनाकर ऊर्ध्वरेता बनना सोमपान है। इस सोमपान के लिए इन्द्र को बुलाना पड़ता है। बिना इन्द्र के सोमपान को पान करके मृत्यु को पाकर अमृतत्व को पा लेता है। तभी ‘अथमृत्योऽमृतो ीवति, सार्थक होता है। आध्यात्मिक यज्ञों में सोमपान का महत्व होने से प्रतीकात्मक यज्ञों में उसका रूपक औषधियों के रस को ग्रहण करने से लिया गया है।

दक्षिणाग्नि तो देह की जठराग्नि का ही रूपक है। गार्हपत्याग्नि की स्थापना ओर उसमें हवि प्रदान करना हृदयस्थ अग्नि में प्राणदान की आहुति की रूपक है। इन दोनों के द्वारा शरीर रस रसयुक्त तथा प्राण से संयुक्त रहता है। आह्वनीयाग्नि एवं उत्त्राग्नि का सम्बन्ध रहता है। जो मूर्धा में है। जिसमें सप्त होता ज्ञानाग्नि से है, जो मूर्धा में है। जिसमें सप्त होता यजन करते है। अथवा देवरूपी इन्द्रियाँ अपना-अपना काम कर रही है। इन्हीं चारों अग्नियों से जरामर्य सत्र रूपी या हो रहा है। इस प्रकार के आध्यात्मिक यज्ञों में आत्मा का परमानन्द स्वरूप परमात्मा में जो बार-बार गोता लगाता है वहीं बाह्य यज्ञों में अवभृथ स्नान यज्ञ के अन्त में किया जाने वाला स्नान है। क्योंकि परमानन्द प्राप्ति ही आध्यात्म यज्ञों का लक्ष्य होता है। यही पर उसकी समाप्ति है। अतः यज्ञान्त स्नान को यह स्थान प्राप्त हुआ।

इस तरह सम्पूर्ण प्राण विद्या का चित्रण इन श्रोत यज्ञों में प्रकट हो रहा है। यों-तो ये सभी यज्ञ अपने आप में अनेकों रहस्य छुपाए हुए- अपने प्रक्रिया और परिणाम में मनुष्य के समक्ष उसके अन्तराल बहुमूल्य शक्तियों सिद्धियों को उजागर करने वाले हैं, पर अश्वमेध यज्ञ की बात ही निराली है, इसके रहस्य को जानने अनुभव करने वाले को त्रिभुवन विजयी कहना अतिशयोक्ति न होगी।

अश्वमेध यज्ञ की स्थिति में जब योगी होता है, तब वह अपने प्राण रूपी वस्त्र अश्व को शरीर की समस्त नाड़ियों में ध्यान की विजय के लिए भेजता है। शरीर रूपी राष्ट्र की नाड़ियाँ ही प्राण रूपी अश्व के विचरण का क्षेत्र है। इसमें यदि कहीं विकार होगा तो प्राणरूपी अश्व का मार्ग अवरुद्ध हो जाएगा। अथवा इस राष्ट्र में कहीं भी विकार रूपी शत्रु होगा वह तो प्राणरूपी अश्व को बाँध लेगा। ऐसी स्थिति में अश्वमेध कर्ता को उसके निवारणार्थ जो कोशिशें करनी पड़ेगी वे ही युद्ध है। इस युद्ध में यदि प्राणरूपी अश्व विकार रूपी शत्रुओं द्वारा बँधा रहे तो अश्वमेध की असफलता है। यदि विकारों को जीतकर निर्विघ्न प्राणों का संचार समस्त नाड़ियों में किया जा सके- तो ऐसी स्थिति में शरीर की नस नाड़ियों की पूर्ण शुद्धि प्राण को भली प्रकार अपने वश में करने के रूप में हो सकेगी। इसके परिणाम अतीन्द्रिय, क्षमताओं लोक-लोकान्तर में गमन आत्मबोध, तत्व विवेक के रूप में अनुभव किए जा सकते हैं।

जिस प्रकार बिना नक्शे के भवन नहीं बनता, उसी प्रकार बिना आध्यात्मिक पृष्ठभूमि के कोई यश नहीं हो सकता है। अश्वमेध की इस आध्यात्मिक पृष्ठभूमि का चित्रण्स-शान्तिकुँज द्वारा संचालित अश्वमेध महायज्ञों की भव्य श्रृंखला के रूप में हो रहा है। इसे साधकों-आत्मविद्या के पिपासुओं के समक्ष प्राण विद्या के रहस्योद्घाटन की प्रक्रिया के रूप में समझना चाहिए। जो क्रिया व्यक्ति रूपी राष्ट्र में है, वे ही समष्टि राष्ट्र में है। ‘राष्ट्र’ वा अश्वमेधः’ में यही रहस्य निहित है। अश्वमेध याजकों को अपनी इन्द्रियों पर और दुष्प्रवृत्तियों पर विजय पाना है। ऐसा करने पर ही-अश्वमेध के आध्यात्मिक फलितार्थ प्राणविद्या के रहस्यात्मक पक्ष उनके अपने जीवन में जगमगाते दीख पड़ेंगे।


यज्ञों का राजा-अश्वमेध

जिस यज्ञ को “भुवनस्य नाभिः” ब्रह्मांड का नाभिक कहा गया है, वह श्रेष्ठतम कर्म-दिव्य पुरुषार्थ के रूप में प्रत्येक क्षेत्र में संव्याप्त है। प्रथम यज्ञीय पुरुषार्थ सृष्टि की रचना के समय ही हुआ था।

कथा सर्वविदित है-विष्णु की नाभि से कमलनाल निकली। उसके विकास से कमल खिला। उस कमल में सृष्टिकर्ता ब्रह्मा प्रकट हुए और सृष्टिक्रम चल पड़ा। यह एक आलंकारिक वर्णन है, जिसमें प्रथम यज्ञीय पुरुषार्थ का आभास कराया गया है।

“यज्ञों वै विष्णुः” -यज्ञ ही विष्णु है, एवं यज्ञ को ‘भुवनस्य’ नाभि’ कहने से स्पष्ट हो जाता है कि जिसमें से कमल एवं सृष्टिकर्ता ब्रह्मा की उत्पत्ति हुई, वह दिव्य नाभि यज्ञ ही है। यज्ञीय पुरुषार्थ की कर्मवल्लरी आगे बढ़ी,उसके अंगोपाँग कमल की पंखुड़ियों के रूप में विकसित हुए। उस विकास प्रक्रिया से जो कल्याणकारी-यज्ञीय सृजन शक्ति उभरी उसे सृष्टा-ब्रह्मा की संज्ञा दी गयी। इस प्रकार प्रकट हुई युगीय सृष्टि के संतुलन और विकास के लिए यज्ञीय अनुशासन एवं पुरुषार्थ की जाग्रत-विकसित बनाये रखने की बात कहीं गयी।

इस निर्देश का पालन हुआ। सूर्य, चन्द्र, वायु, अग्नि, जल, पृथ्वी सभी युगीय क्रम अपना कर सृष्टि का पोषण रक्षण एवं विकास करने लगे। समुद्र, मेघ, पर्वत नदियाँ, वनस्पतियाँ, वृक्षादि सभी यज्ञीय अनुशासन के अनुगामी हुए। पशु, पक्षी, कृमि-कीटक भी अपनी-अपनी क्षमतानुसार प्रकृति के सहयोग (संगतिकरण) रूप यज्ञीय क्रम में लग गये।

सर्वश्रेष्ठ प्राणी मनुष्य ने भी दिव्य अनुशासन का अनुगमन (देव पूजन रूप में ) किया। परस्पर प्रेम-सहयोगपूर्वक रहकर संगतिकरण को सिद्ध किया। अपने करुणामूलक प्रयासों से जीव दया-दानादि का क्रम चलाया। इस प्रकार यज्ञीय जीवन क्रम की फलश्रुति के रूप में सतयुगी वातावरण का दिव्य अनुदान उसे लम्बे समय तक मिलता रहा।

काल प्रवाह में मनुष्य युगीय अनुशासन से विचलित होने लगा, तो यज्ञीय अनुशासन के प्रशिक्षण एवं अभ्यास को बनाये रखने के लिए अनेक यज्ञीय कर्मकाण्डों का विकास हुआ। विचलित जनमानस एवं विश्रृंखलित समाज को पुनः यज्ञीय अनुशासन में लाने के अनेक सफल प्रयोग समयानुरूप होते रहे। जैसे-

देव-वृत्तियों के विकास के लिए देवयज्ञ, मनुष्यों अतिथियों को स्नेह-सम्मान देने के लिए ‘नृयज्ञ’, अगणित जीव-जंतुओं के पोषण के लिए यज्ञ-बलिवैश्व यज्ञादि का क्रम चला।

पोषक प्रवृत्तियों के विकास के लिए विष्णु यज्ञ, मन्यु जागरण के लिए रुद्रयज्ञ, अनाचार दमन के लिए ‘चण्डी यज्ञ’ आदि किए जाते रहे है।

उपयोगी पशुधन के संवर्धन के लिए गो मेध, अजमेध, आदि प्रयोग होते थे। बाद में मेध शब्द का कुटिलतापूर्ण दुरुपयोग किया जाने लगा। वैसे ‘मेध’ यज्ञ का ही पर्याय है। इस सम्बन्ध में विशेष स्पष्टीकरण अगले लेखों में दिए जा रहे है।

व्यापक रूप से यज्ञीय प्रयोगों में समाज में सत्प्रवृत्तियों के संवर्धन के लिए वाजपेय,राजनीतिक अनुशासन स्थापित करने के लिए -राजसूय यज्ञ’ तथा समग्र राष्ट्र को संगठित सशक्त एवं प्रगतिशील बनाने के लिए ‘अश्वमेध’ आदि यज्ञों का वर्णन मिलता है। अश्वमेध को इन यज्ञों में सर्वश्रेष्ठ-यज्ञों का राजा कहा गया है।

उक्त विवरण से स्पष्ट है कि यह अश्वमेध यज्ञानुष्ठान कोई सामान्य कर्मकाण्ड नहीं है। यह किसी राजा की राज्यलिप्सा की पूर्ति करने के लिए किया गया अहंकारी कृत्य भी नहीं हो सकता। इस महान यज्ञीय अनुष्ठान का स्वरूप तो ऋषियों की दृष्टि का अनुगमन करके ही समझा जा सकता है। यहाँ उस संदर्भ में एक-एक बिन्दु पर विचार किया जा रहा है।

अश्व की अवधारण

अश्व का प्रचलित अर्थ ‘घोड़ा’ ले लिया जाता है। साँसारिक अर्थों में यह ठीक भी है। किंतु यज्ञीय विशिष्ट संदर्भ में तो उसकी मौलिक व्याख्या तक जाना ही पड़ेगा

अश्व की शब्द व्युत्पत्ति पर ध्यान दें-अश् +ववन् अश्नुते, अध्वानम्, अश्नुते व्याप्नोति, अर्थात् -तीव्रगति वाला, मार्ग पर व्याप्त हो जाने वाला।

महाशनो भवति वा अश्वः बहु अश्नातीति इति अश्वः के अनुसार अधिक मात्रा में आहार करे वाला अश्व है।

उक्त गुणों के कारण घोड़े को अश्व संज्ञा दी गयी है। घोड़े के लिए प्रयुक्त अन्य संज्ञाओं में भी ऐसे ही अर्थ सन्निहित हैं, जैसे-अत्य-अतति गच्दति’गतिशल। हयः -हयति-गच्छति, अर्वा-गमनशील चंचल आदि।

‘अश्व’ को गुणवाचक संबोधन के रूप में ही शास्त्रों ने लिया है।, जाति वाचक संज्ञा तक उसे सीमित नहीं रखा है। नीचे दिये गये उद्धरणों से यह बात स्पष्ट हो जाती है।

‘इन्द्रो वै अश्वः’ कौषीतकि ब्रा. 15/4 के अनुसार इन्द्र ही अश्व है।

“सौर्य्यो वा अश्वः ‘ गोपथ ब्रा. 3-3/19 के अनुसार सूर्य का सूर्यत्व (तेज) ही अश्व है।

वेदों में अनेक स्थानों पर यज्ञाग्नि को अश्व कहा गया है। ऋग्वेद मंत्र 1/16/3/2 में कहा है-

‘गन्धर्वो अस्य रशनामगृभ्णात् सूरादश्वं बसवों निरतष्ट। अर्थात्-अश्व सूर्य का प्रतीक है वसुओं ने यज्ञीय अश्व (अग्नि को ) सूर्य से प्रकट किया है। वीर्य वै अश्वः’ शौर्य ही अश्व है, तथा श्रीर्वै अश्वः सम्पदा ही अश्व है। कहा है। ‘अग्निर्वा अश्वः आज्यंमेघः के अनुसार अग्नि ही अश्व एवं घृत ही मेध है।

शतपथ ब्राह्मण के ही 13/3/3/5 मंत्र की व्याख्या करते हुए ऋषि दयानन्द ने ईश्वर को अश्व माना है। -’अश्वतो यत ईश्वरी वा अश्वः, अश्नुते व्याप्नोति सर्वं जगत्सोऽश्व ईश्वरः। अर्थात् -सारे संसार में संचारित होकर संव्याप्त होने वाला अश्व ‘ईश्वर ‘ है।

उक्त शास्त्रीय उद्धरणों पर ध्यान देने से पता चलता है कि ‘अश्व’ शब्द का अर्थ केवल घोड़ा मान लेना अपने अज्ञान के कारण ही संभव होता है। इसी पूर्वाग्रहयुक्त मान्यता के कारण अनेक भ्रांतियां उत्पन्न होती है।

‘मेध भी समझे’

‘मेध शब्द यज्ञ का पर्यायवाची है। उसका एक अर्थ ‘वध’ भी होता तो है, किन्तु शास्त्रों ने उस अर्थ में उसका प्रयोग वर्जित किया है। अगले लेख में उस संदर्भ में पर्याप्त स्पष्टीकरण दिये गये है। यहाँ तो ‘अश्वमेध’ जैसे महान प्रयोग की गरिमा के अनुरूप उसके अर्थ प्रस्तुत किये जा रहे है। द्वेष, हिंसा, क्रूरता आदि को शास्त्रों ने अयाीय कहा है, अस्तु यज्ञीय संदर्भ में इनका प्रयोग नहीं किया जा सकता है।

राष्ट्र वा अश्वमेधः। परा वा एष सिच्यते॥ -तैत्तरीय ब्राह्मण 3/8/9

अर्थात् -अश्वमेध ही राष्ट्र है। जो सार्वभौम क्षमता सम्पन्न हो वही अश्वमेध सम्पन्न करें। निर्वीर्य व्यक्ति अश्वमेध यज्ञ न करे।

‘मेध’ का अर्थ ‘हिंसा ‘ अमान्य कर देने पर उसका यज्ञार्थ अर्थ संवर्धन तथा संगम-संगतिकरण ही रह जाता है।

‘मेध’ शब्द की व्युत्पत्ति में उसे मा्,ि मिद् मेथ्, मूद् आदि धातुओं से सम्बद्ध माना है। इनका अर्थ मिलना, जोड़ना जानना, प्रेम करना, पकड़ना आदि होता है। मेध का अर्थ बुद्धि, शक्ति, बल, बुद्धिबल, या आदि कहे गये है। इसे यज्ञ, अर्पण, रस, सार, पूज्य, पवित्र आदि अर्थों में भी प्रयुक्त किया जाता है।

वाजसनेयी संहिता के बत्तीसवें अध्याय ‘सर्वमेध’ प्रकरण में मेध का अर्थ उपर्युक्त संदर्भों में ही किये जाने का आग्रह भाष्यकारों ने किया है।

अय समझें ‘अश्वमेध’

ऊपर लिखे शास्त्रीय अर्थों को समझने के बाद ‘अश्वमेध ‘ का उसकी गरिमा के अनुरूप अर्थ आसानी से समझ में आ सकता है।

अश्व गतिशीलता का, शौर्य का, पराक्रम का और मेधाशक्ति, रेष्ठ बुद्धिमत्ता का प्रतीक होने से अश्वमेध का सहज अर्थ होता है। ‘शौर्य-पराक्रम तथा कल्याणकारी मेधाशक्ति का संयोग-संगम।

अश्व को क्षात्र शक्ति एवं मेध को ब्रह्म वृत्ति का प्रतीक मानने से उनका संयोग एक पवित्र एवं महान यज्ञ कर्म बनता है।

उत्कृष्ट विचार शक्ति एवं श्रेष्ठ प्रयोजनों के लिए समर्पित पुरुषार्थ के योग से ही आदर्श समाज एवं राष्ट्र की रचना हो सकती है। इसीलिए राष्ट्र निर्माण को अश्वमेध कहा गया है। देखें-

‘राष्टँ वा अश्वमेधः (शत. 13/1/6/3) अर्थात्-राष्ट्र (का गठन) ही अश्वमेध है।

इसी संदर्भ में आगे कहा गया है

राष्ट्रं वै अश्वमेधः, तस्माद्राप्ट्री अश्वमेधेन यजेत्। अर्थात्-राष्ट्र की अश्वमेध है, इसीलिए अश्वमेध के माध्यम से राष्ट्र का यजन (संगतिकरण संगठन) करें।

शतपथ ब्राह्मण में बार-बार अश्वमेध यजेत् वाक्य का प्रयोग किया गया हैं। जिसका अर्थ होता है अश्वमेध से यजन करे। यह गूढ़ार्थक प्रयोग है यथा-शौर्य एवं मेधाशक्ति के संयोग से यजन करे।

श्रेष्ठ यज्ञीय भाव से राष्ट्र का संगठन जागरण किया जाय। पुरुष सूक्त में कहा गया है “यज्ञेन याम् अयजनत देवाः “ देवताओं ने यज्ञ से यज्ञ का यजन किया। स्पष्ट है कि श्रेष्ठ कर्म के लिए उद्देश्य भी यज्ञीय होने चाहिए, साधन भी सुसंस्कारवान यज्ञीय होने चाहिए, उसकी क्रिया भी यज्ञीय अनुशासन में होनी चाहिए, तथा करने वाले का भाव-संकल्प भी यज्ञीय देवतुल्य होना चाहिए।

इसीलिए शतपथ ब्राह्मण 13/2/2/9 में यजमान को भी ‘अश्वमेध’ की संज्ञा ही है।

चेतना (मेधा) को ब्रह्माण्ड में गतिशील (अश्वानुरूप) बनाने के क्रम को लक्ष्य करके शतपथ ब्राह्मण के मंत्र 13/4/2/18 तथा 13/5/1/5 में सूर्य को ‘अश्वमेध ‘ कहा गया है। इसी प्रकार मंत्र क्र. 11/2/5/9 में चन्द्रमा को अश्वमेध कहा गया है।

इतना सब ध्यान में रखने पर यह बात समझ में आ सकती है कि अश्वमेध क्यों इतना महान एव। दुष्कर प्रयोग कहा गया है? इसे क्यों सब प्रकार के फल देने वाला, यज्ञों का राजा कहा गया है? इसका इतना अधिक महत्व होने पर भी इसे करने का साहस कोई विरले ही जुटा पाते है। दिव्य मेधा एवं दिव्य पुरुषार्थ को जाग्रत करके, उन्हें संयुक्त करके, राष्ट्रव्यापी स्तर पर यज्ञीय जीवनक्रम से जन-जन को जोड़ देना ऐसा भारी दायित्वपूर्ण कार्य है, जिसे कोई असामान्य रूप से प्रखर तंत्र ही उठा सकता है। ऐसा ही कुछ पहले होता रहा है, तथा ऐसा ही कुछ करने का निर्देश महाकाल ने पुनः दिया है। उनके अनुचर निष्ठापूर्वक उसे करने के लिए तत्पर हो गये है। गौरवमय इतिहास पुनः दुहराया जाना है।

अश्वमेध अनुष्ठान के अनुरूप सारी व्यवस्थाएँ जुट गयी है। युगऋषि का प्रखर तप इसी निमित्त हुआ है। यज्ञीय भावना से पराक्रम दिखाने के लिए सुख-सुविधायें छोड़कर चल पड़ने वाले त्यागी सृजन सैनिकों की विजय वाहिनियाँ तैयार हो गयी है। लम्बे समय की साधना से जाग्रत मेधा महाप्रज्ञा अब गतिशील पराक्रम को सही दिशा प्रदान करने के लिए संकल्पित है। गतिशील प्रतिभा अपना पराक्रम युग प्रज्ञा के निमित्त ऋषि चेतना के निर्देशानुसार नियोजित करने का तत्पर है। अस्तु आश्वमेधिक अनुष्ठान का सफल प्रयोग एक बार पुनः राष्ट्र को गरिमा प्रदान करने के लिए किया जा रहा है।


यज्ञ, महायज्ञ,अश्वमेध यज्ञ

यज्ञों को तीन चरणों में विभक्त किया गया है। व्यक्तिगत जीवन के उत्कर्ष में यज्ञों की भूमिका और सामाजिक जीवन में परिष्कार के लिए महायज्ञ सम्पन्न किए जाते रहे है। पर जब समूचे राष्ट्र और वातावरण के आमूल चूल परिवर्तन की आवश्यकता अनुभव होती थी तब सार्वभौम स्तर में अश्वमेधों की ही परम्परा रही है। उनका प्रतिफल भी उसी तरह क्रमशः बृहत्तर है।

श्रीमद्भागवत् में यज्ञ की महत्ता का विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है। अनेकों ऐसे प्रसंगों का भागवत में वर्णन है जिससे यज्ञ की महाशक्ति का पूरा परिचय मिलता है। सृष्टि का आरंभ यज्ञ से ही हुआ, इसका वर्णन इस प्रकार किया गया है।

जिज्ञासा के अनुसार उत्तर रूप में ब्रह्मा जी विराट् भगवान के स्वरूप का वर्णन करते हैं-

“यदास्य नाभ्याँ..................चतुर्होत्रं च सत्तम्॥’

भाग.-स्क-2, अ. 6, श्लो.-22,23, 24 अर्थात् -जिस समय व्यापक ब्रह्म की नाभि से मैं उत्पन्न हुआ, तब पुरुष के अवयव को छोड़कर यज्ञ की कुछ भी सामग्री नहीं देखी।

उनके यज्ञ के पशु, वनस्पति, कुशा और देवताओं के यज्ञ करने योग्य भूमि और जिसमें बहुत से गुझा भरे हों, ऐसे समय की रचना की। सब पात्रादि रच्, औषधि, घृतादि, मधुरादिक, स्वर्णादि धातु, मृत्तिका, जल, ऋक् यजु, साम एवं अथर्ववेद,चार ब्राह्मण और जिससे हवन किया जाय -ऐसे कर्मों की भी सृष्टि की।

ब्र. पु. पूर्वभाग- प्रक्रियावाद अ. 1, श्लोक 5-6-7 उल्लेख है कि कल्प के आरंभकाल में जिस समय सृष्टि की रचना की जा रही थी, उस समय अति पुण्यमय महायज्ञ का अनुष्ठान सहस्र संवत्सर के लिए हुआ था। इस महायज्ञ के अनुष्ठाता स्वयं ब्रह्मा जी थे और उनकी पत्नी इला वहीं उपस्थित थी। शमित्रका का काम स्वयं बुद्धिमान, तेजस्वी मृतयुदेव ने किया था।

राजा दक्ष ने अपने यज्ञ का विध्वंस होने तथा सुपुत्री सती के निधन के उपरान्त बहुत दुख माना और शिवजी से क्षमा माँगने के पश्चात् अपनी भूल के प्रायश्चित रूप में ही विशद यज्ञ को पूरा किया। इसका वर्णन भागवत् के चतुर्थ स्कंध के सातवें अध्याय श्लोक 16-18 में इस प्रकार है-

‘इस भाँति दक्ष ने अपना अपराध क्षमा कराया और ब्रह्माजी से सम्मति लेकर उपाध्याय, ऋतध्वज, अगिन सहित यज्ञकर्म आदि का सुन्दरता सहित विस्तार किया। तीन कपाल का पुरोडाश, विष्णु के निमित्त, यज्ञ सम्पूर्ण करने के हेतु प्रथमादिक वीरों की शुद्धि के लिए श्रेष्ठ ब्राह्मणों को दिया।

अध्वर्यु ने जब हवि हाथ में लेकर यजमान सहित विशुद्ध बुद्धिपूर्वक हवनकर भगवान का ध्यान किया उसी समय उसे विराट् पुरुष के दर्शन हुए।

ऋषभदेव जी भगवान के अवतार माने जाते है। उन्हीं के पुत्र भरत के नाम पर इस देश का नाम भारतवर्ष हुआ है। भरत ने महायज्ञों द्वारा ही इस देश को तपोभूमि बनाया था।

तीर्थों की स्थापना वहाँ-वहाँ ही हुई जहाँ-जहाँ बड़े महायज्ञ हुए। ‘प्रयोग’ शब्द में “प्र” उपसर्ग को हटा देने पर ‘याग’ शब्द रह जाता है। याग-यज्ञ को प्रचुरता रहने के कारण ही यह स्थान तीर्थराज बना। काशी, वाराणसी के दशाश्वमेध घाट-इस बात के साक्षी है कि इन स्थानों पर दस बड़े-बड़े यज्ञ हुए है। और उसी के प्रभाव से इन स्थानों को इतनी प्रमुखता मिली। स्कंद पुराण ख. 4, उ. सं. अ. 52 श्लोक 68-69 में कहा गया है कि काशी राज दिवोदास ने काशी नगरी में दस अश्वमेध नामक यज्ञों से महायोगेश्वर भगवान का यजन किया। उस दिन से दशाश्वमेध नाम से वह तीर्थ प्रख्यात हुआ। पहले उसका नाम रुद्रसरोवर था। दस अश्वमेध करने से ही उस काशी का नाम दशाश्वमेध तीर्थ हुआ।

ऋषियों ने सूत जी से प्रारंभिक महायज्ञ के स्थान, समय प्रकार आदि के सम्बन्ध प्रश्न किया। उसके उत्तर में सूत जी ने जो कहा वह वायु पुराण प्र.पा.द्वि. अध्यात में इस प्रकार वर्णित है।

जहां विश्व की सृष्टि की इच्छा से सृष्टि के आदिकाल में सृष्टाओं ने हजारों वर्ष पर्याप्त पवित्र यज्ञ किया था। जिस यज्ञ में स्वयं तप ही यजमान और ब्रह्मा ही ब्रह्मा बने थे। महान आत्माओं के इस दीर्घ एवं विशाल यज्ञ में धर्म की नेमि घूमते घूमते विदीर्ण हो गयी थी इसलिये ऋषि मुनि पूजित उस प्रदेश का नाम नैमिषारण्य पड़ गया। उसके उपरान्त-

‘नैमिशेड निनिशिक्षेत्रे ऋशयः षौनकादयः। स्त्र स्वर्गाय लोकाय सहस्रसमामासत॥ भाग दृ प्र.स्क.प्र.अ.श्लोक 4

अर्थात् एक बारी षैनक आदि 88000 ऋषियों ने स्वर्ग प्राप्ति हेतु नेमिशारण्य के पवित्र क्षेत्र में दस हजार वर्ष तक लगातार दीर्घ महायज्ञ करने का संकल्प किया। उन्हीं यज्ञादि के पवित्र प्रभावों से आज भी वह क्षेत्र पवित्र बना हुआ है।

अयोध्या के सम्बन्ध में उल्लेख है कि अयोध्यापुरी में सूर्यवंशी राजा वेवस्वत मनु चक्रवर्ती नरेश के पर पर प्रतिष्ठित थे। वे सदा महायज्ञ और दान में लगे रहते थे। इससे उनके शासनकाल में अयोध्यापुरी के भीतर मृत्यु रोग और वृद्धावस्था का कष्ट किसी को भी नहीं होता था।

अश्वमेध यज्ञों की फलश्रुतियों तो और भी अधिक विशद् है। मध्ययुग में अश्वमेध का नाम लेते ही युद्ध का सा बोध होने लगा था जब कि यह लोक कल्याण की दृष्टि से सम्पन्न किये गये विशिष्ट महायज्ञ हुआ करते थे। इन अश्वमेध यज्ञों की महिमा से वेद उपनिषद् दर्शन एवं पुराणों के पन्ने भरे पड़े है। प्राचीनकाल में वह प्रकृति संतुलन,देव अनुग्रह और राष्ट्र संगठन के रूप में सम्पन्न किये जाते रहे है। शास्त्रकार का कथन है। अश्वमेध यज्ञ में भाग लेने से गया जाने का पुण्यफल गंगा यमुना स्नान का पुण्यफल तथा कोटि होम कर पुण्यफल मिलता है। मत्स्य पुराण-

इमा नु कं भुवना सीशघामेन्द्रष्च विष्वे च देवाः। आदित्यैरिन्दः सगणो मरुद्भिरस्मभ्यं भेशजा करत्। यजु 24-46

अश्वमेध यज्ञ से यह सम्पूर्ण भुव निश्चय ही सुख प्राप्त करते है। गण के सहित इन्द्र और सम्पूर्ण देवता, बारह आदित्य उनचास मरुतों के साथ औषधि को हितकारी करते है। पर्यावरण संतुलन ऐश्वर्यवान इंद्रिययज्ञ शरीर और सन्तानों को श्रेष्ठ गुण सम्पन्न बनाते है- महीधर भाष्य

सर्वानह बैकामान आप्नोति। यो अष्वमेधेन यजते॥ शतपथ 13-4-9-9

जो अश्वमेध का यजन करते है उनकी सभी कामनायें पूर्ण होती है।

यज्ञेनाष्वेधेनायुः कल्पताम.......॥

अश्वमेध यज्ञ से आयु की वृद्धि होती है। महीधर भाश्य22-23

हे तात! जिस अश्वमेध यज्ञ के निमित्त पधारे ऋत्विजों के जूठे जल में लौटने से नकुल नेवले का शरीर स्वर्णमय हो गया, उसमें भाग लेने का पुण्यफल तो अतुलनीय हैं।

राश्ट्रं वा अष्वमेधः। वीर्य व अष्वः॥ शतपथ ब्राह्मण 13-1-6

देशवासियों के वीर्य व बल की वृद्धि करना और राष्ट्र को समर्थ बनाना ही अश्वमेध का उद्देश्य होता है।

महाराज वसु ने अश्वमेध सम्पन्न किया। बृहस्पति उपाध्याय उसके होता थे। प्रजापति के तीन पुत्र ऋषियों में श्रेष्ठ कपिल कठ तैत्तिरीय कणादि उसके ऋत्विक् थे। यह सर्वथा हिंसा रहित पवित्र यज्ञ था “ न तत्र पषुघातोड्भूत” उसमें किसी तरह की जीव हिंसा नहीं हुई। महाभारत शांतिपर्व 3-336

भागवत् महापुराण च. स्क. अ. 14 में उल्लेख है राज वेन ने अपने राज्य में यज्ञादि करने की मनाही कर दी। उसने कहा-राजा में सभी देवों का निवास होता है, अतः केवल मेरा ही भजन और पूजन करो। इस पर ऋषिगण राजा वेन को समझाते हुये कहते है -

हे राजन! सर्वलोक और देवता यज्ञ में निवास करते है। उन वेदत्रयीमय द्रव्यमय एवं तपोमय ईश्वर को विप्रगण आपके कल्याण तथा प्रजा की समृद्धि के लिये नाना विधि विधानों से चित्र विचित्र यज्ञों द्वारा यजन करते है और आप तो ऐसे यज्ञों में सहायता देने योग्य है। हे वीर! आपके राज्य में लोगों के यज्ञ करने से श्री नारायण के कलारूप सभी देवगण संतुष्ट होकर सभी को मनोवाँछित फल देंगे। इसलिये आपको इन यज्ञों की अवहेलना नहीं करनी चाहिये।”

जब उसने बहुत समझाने पर भी नहीं माना और यज्ञ बन्द करने के दुराग्रह पर अड़ा ही रहा तो ऋषियों ने शाप देकर राजा वेन को मृत्यु की गोद में सुला दिया। तदुपरान्त उनकी भुजाओं का मंथन किया, जिससे राजा पृथु का ज्रन्त हुआ।

अवादीक्षत राजा तु हयमेध षतेन सः। ब्रह्भावर्त मनः क्षेत्रं प्राची सरस्वती॥

अर्थात् फिर पृथु ने एक सौ अश्वमेध सरस्वती है ब्रह्मा और मनु ब्रह्मावर्त्त क्षेत्र है।वहीं अश्वमेध सम्पन्न हुये।

यह एक दुःखद प्रसंग है कि मध्य युग में कुछ तो विदेशी आक्रमणों के कारण तथा वैदिक संस्कृति षनैः षनैः विलुप्त होने के कारण इन यज्ञों में हिंसा होने का भ्रमपैदा कर दिया गया। इस सम्बन्ध से पं. बेनीराम जी की यज्ञ मीमाँसा तथा महामना सातवलेकर जी ने बहुत व्यापक अध्ययन किया और सही स्पष्टीकरण प्रस्तुत किया। अपनी पुस्तक में महाप्राज्ञ सातवलेकर जी ने लिखा है।

मनुष्य शरीर में सद्चिन्तन के देवता और दुष्प्रवृत्ति के दानव पशु दोनों विद्यमान होते है। मनुष्य शरीर में तो यह निराकार होते है। पर वे जब साकार हो जाते है तो ये बाहर दिखाई देने? वाले पशु बन जाते है। अर्थात् बाहर के पशु भाव ही जीव को साकार पशु योनि में ले जाते है। ष्येन बाज घमंड का रूप है। गिद्ध का प्रतिनिधि चापलूसी से कुत्ते की पशु योनि मिलती है, अज्ञानग्रस्त जीव उल्लू या गधे के रूप में जाना जाता है। पशु प्रवृत्तियाँ जब घोड़े जैसी शक्तिशाली और सर्वव्यापी हो जाती है तब अश्वमेध आयोजन किये जाते है। जिनमें इन पशु प्रवृत्तियों की बलि देने का विधान ही अश्वमेध है।”

अश्वमेधों की तैयारियों के जो संदर्भ ओर प्रकरण आर्षग्रंथों में मिलते है उनकी पवित्रता भी इस तथ्य को खंडित करती है कि इन यज्ञों में किसी तरह की जीव हिंसा होती थी।

हिन्दू धर्म कोष का कथन है- अश्वमेध का घोड़ा जिस दिन से चतुर्दिक भ्रमण के लिये छोड़ा जाता था, उसी दिन से प्रतिदिन प्रातः मध्याह्न एवं सायं सविता के लिये तीन इश्टियाँ की जाया करती थी। सविता को प्रातः सत्यप्रसव के नाम से मध्याह्न में प्रसविता के नाम से तथा सायंकाल में आसविता के नाम से पूजित किया जाता था। यह तथ्य आश्वलायन श्रोतसूत्रं के 10-6-8 में लाट्यायन श्रौतसूत्र के 9-9-90 में तथा कात्यायन श्रैतसूत्र के 20-2-6 में वर्णित है। अर्थात् गायत्री उपासना पूरे वर्ष भर तक चलती थी। उसके बाद तीन दिन तक अश्वमेध यज्ञ चलता था।

गन्धर्वी अस्य रषनामगृभ्णात् सूरादष्वं सववो निरतश्ट। ऋग्वेद 1-563-2

व्सुओं ने यज्ञीय अश्व को सूर्य से बनाया है अश्वमेध की सफलता के लिये सूर्य गायत्री उपासना अनिवार्य है।

इसी रूप में इन अश्वमेध आयोजनों में भाग लेना चाहिये और अपना जीवन कृतकृत्य करना चाहिये।


दो सहस्र वर्षों बाद एक अभूतपूर्व प्रयास

देवभूमि भारत के स्वर्णिम अतीत के निर्माण में जो प्रक्रियाएँ क्रियाशील रहीं हैं-अश्वमेध उनमें से विशिष्टतम है। इसी की उपलब्धियों-सत्परिणामों की गौरवानुभूति देशवासियों को जगतगुरु एवं ज्ञान-विज्ञान के चक्रवर्ती के रूप में हो सकी थी। देव संस्कृति के अध्ययन एवं अन्वेषण के लिए समर्पित पश्चिमी इतिहासकार ए-आर- बाशम के ग्रन्थ ‘द वन्डर दैट वाज इण्डिया’ (भार-जो आश्चर्य था) के पृष्ठ बताते हैं कि संसार के विभिन्न भू भागों के निवासियों में, यदि कहीं के लोगों ने अपने राष्ट्र को देवता और उपास्य माना है, तो वह देश भारत है। एमिल बेनवेनिस्ते के शोध अध्ययन “वैदिक इण्डिया” के अनुसार अश्वमेध राष्ट्रीय उपासना की वैदिक पद्धति के रूप में प्रचलित थी। इसे एक अनुष्ठान का रूप दिया गया था जिसे शासक श्रोत्रिय (मनीषी) और जन समूह सभी मिल-जुल कर सम्पन्न करते थे।

कतिपय इतिहासकारों ने अश्वमेध को-राजनीतिक एकीकरण की प्रक्रिया माना है। इतिहासविद् सी.ए. ब्रौंसके अपने अध्ययन “ए हिस्ट्री ऑफ हिस्टोरिकल राइटिंग” में इस मान्यता को इतिहासकार की उथली दृष्टि करार देते हैं। उनके मुताबिक राष्ट्र-और विश्व के राजनीतिक एकीकरण के प्रयास वर्तमान युग में भी किए गए हैं, किए जा रहे हैं। पर उनके उन सुखद परिणामों की वैसी अनुभूति कभी नहीं हुई जैसी वैदिक भारत के निवासी अश्वमेध अनुष्ठान में किया करते थे। यूनान और रोम के विजय अभियान राजनीतिक एकता की दौड़ के सिवा और क्या थे? ब्रह्म परायण चाणक्य से करारी मात खाने वाले सिकन्दर और सेल्यूकस के मन इन्हीं राजनीतिक कल्पनाओं में रँगें थे। ‘विश्व को एक करूंगा’ हिटलर ने इसी संकल्प की आड़ में अपना ताना-बाना बुना था। बीसवीं सदी के दूसरे दशक में मार्क्स के साम्यवाद का नारा देकर स्टालिन ने रूस में छोटे पैमाने पर यही करतब दिखाने की कोशिशें कीं। लेकिन ये ढेरों प्रयास पुरुषार्थ अपनी चरम परिणति में अश्वमेध से उतना ही दूर रहे जितना आकाश से धरती।

इतिहासविद् ब्रौंसके के अनुसार-अश्वमेध अनुष्ठान राजनीतिक दिग्विजय अभियान न होकर साँस्कृतिक दिग्विजय अभियान थे। इतिहासवेत्ता ए.बार्थ के अनुसार इनके साँस्कृतिक स्वरूप का सबसे बड़ा प्रमाण इन यज्ञों में पुरोहित द्वारा किया जाने वाला नेतृत्व है। मनीषी बार्थ के अनुसार शासक इन यज्ञों का व्यवस्थापक भर होता था जबकि पुरोहित की भूमिका-संचालक की थी। इन महान यज्ञों का उद्देश्य राष्ट्र देवता के प्रति, जीवनमूल्यों के प्रति विश्वास जाग्रत करना, जिन्दगी जीने की विधियों का शिक्षण देना था। ये साँस्कृतिक एकता के लिए किए गए प्रयास-राष्ट्र को राजनीतिक भौगोलिक एवं भावनात्मक स्तर पर समर्थ सशक्त और दृढ़तम बनाया करते थे। इन्हीं तथ्यों को स्वीकृत करते हुए शतपथ ब्राह्मण में राष्ट्र और अश्वमेध को परस्पर अभिन्न माना है-

श्रीवै राष्ट्रं। राष्ट्रं वै अश्वमेधः। तस्मात राष्ट्री अश्वमेधेन यजेत। सर्वा वै देवताः अश्वमेधे अन्वायत्ता। तस्मात् अश्वमेध याजी सर्व दिशो अभिजयति। -शतपथ ब्राह्मण 13/1/2/9/3

अर्थात्-समृद्धि ही राष्ट्र है। राष्ट्र ही अश्वमेध है। राष्ट्र परायण अश्वमेध करें। देवगण यज्ञ में सम्मिलित होते हैं। अश्वमेध का संयोजक सर्वजयी होता है।

प्राचीन भारत के इतिहास में ऐसे अनेक सर्वजयी नरेशों-लोकनायकों का विवरण प्राप्त होता है जिन्होंने अपने सत्प्रयत्नों द्वारा न केवल देव संस्कृति की गरिमा का विस्तार किया बल्कि राष्ट्रवासियों में देवत्व उदय करने में सफल हुए। महाभारत के आश्वमेधिक पर्व में सुवर्च्चा के पुत्र आविक्षित का विवरण मिलता है। धर्मानुरागी, धैर्यवान और जितेन्द्रिय नरेश आविक्षित-जिनका एक नाम कारंधम भी था, सौ अश्वमेध सम्पन्न किए। महाभारतकार उनके पराक्रम की-’ये इजेहयमेधानाँ शतेन विधिवत्प्रभः’ कहकर प्रशंसा करते हैं। आविक्षित की भाँति पुराणों में मरुत-मान्धता के अश्वमेधों की विस्तार से चर्चा की गई है।

श्रीमद्भागवत महापुराण में पृथ्वी को उपजाऊ बनाने की नवीन तकनीकों पर शोध करने वाले महाराज प्रथु के सौ अश्वमेधों के संकल्प और उसके सत्परिणामों का विवरण मिलता है। भागवत्कर के अनुसार- अथादीक्षित राजा तु हयमेध शतेन सः।

ब्रह्मावर्ते मनों क्षेत्रे यत्र प्राची सरस्वती॥ -भागवत च. स्क. अ. 29/1

फिर पृथु ने एक सौ अश्वमेध यज्ञ करने का संकल्प किया जहाँ पश्चिम वाहिनी सरस्वती है ब्रह्मा और मनु का ब्रह्मावर्त क्षेत्र है।

पृथु की भाँति ऋषभदेव के पुत्र भरत जिनके नाम पर इस देश का नाम भारतवर्ष पड़ा पूर्ण विधि के साथ सौ-सौ बार अश्वमेध सम्पन्न किए उनके वे सब यज्ञ साधारण नहीं हुए।

द्रव्य देश कालवय-श्शुद्धत्विग्विधोद्देशोपचितैः सर्वेरपि क्रतोभिर्यथोपदेशं शतकृत्व इयाज।

बल्कि द्रव्य देश-काल यौवन श्रद्धा ऋत्विक् इत्यादि द्वारा अतिशय बढ़-चढ़कर सम्पन्न हुए थे। -भागवत 5/4/16

राजा होकर भी अश्वमेध अनुष्ठान द्वारा ऋषित्व की उपलब्धि करने वाले-अम्बरीष का जिक्र करते हुए पुराणकार का कथन है-

ईजे ऽश्वमेर्धरधि या मीश्वरम् महाविभूत्यो पचिताँग दक्षिणैः। ततैर्वशिष्ठासित गौतमादिभिर्धन्वन्य मिस्त्रोतम सौ सरस्वतीम॥

यस्य क्रतुषु गीर्वाणैः सदस्या ऋत्विजों जनाः। तुल्य लूपाँचा निमिषा व्यदृश्यन्त सुवाससः॥

स्वर्गो न प्रार्धितो यस्य मनुजैरमर प्रियः। श्रष्वद्भि रुपगायद्भिरुत्तम श्लोक चष्टितम्॥ -भागवत् 9/22, 23, 24

अर्थ- राजर्षि और प्रसिद्ध भक्त अम्बरीष अनेक अश्वमेधादि महायज्ञों द्वारा यज्ञपति भगवान की आराधना किया करते थे। वे यज्ञ, यज्ञ के अंग और दक्षिणा आदि में सम्पत्ति व्यय करते थे। इनके यज्ञ के प्रधान ऋत्विक् वशिष्ठ, असित, गौतम आदि महर्षि गण थे। धन्वदेष जहाँ सरस्वती की धारा बहती है, उसी पुण्य क्षेत्र में अम्बरीष यज्ञ किया करते थे। उनके यज्ञ में ऋत्विज् और सदस्यों की कान्ति देवताओं के समान ही दिव्य होती थी। यज्ञाराधन में तल्लीन रहने के कारण उनके पलक भी नहीं गिरते थे। या द्वारा उत्पादित पवित्रता के प्रवाह से अम्बरीष की प्रजा में भी स्वर्ग सुख भोग की वासना नहीं रह गयी थी। सभी केवल निष्काम भाव से यज्ञ द्वारा यज्ञेश्वर भगवान की अर्चना, भक्ति में प्रवृत्त रहते थे।

राजा बलि के अश्वमेध अनुष्ठानों की चर्चा करते हुए श्री शुक्रदेव मुनि परीक्षित से कहते हैं-

देवेष्वथनिलीनेषु बलि वैराचनः पुरीम्। वेवधानीमधिष्ठाय वशं नित्ये जगत्रयम्॥

तं विश्वजयिनं शिष्यं भृगवः शिष्यवत्सलाः। शतेन ह्य मेधानाँ मनुव्रतमयाजयत्॥ -भागवत् 8/15/33-34

यज्ञोत्पन्न तेज से युक्त राजा बलि को देख जब सभी देव अन्तर्द्धान हो गए या पलायन कर गए तब विरोचन पुत्र राजा बलि स्वर्ग के सिंहासन पर विराजमान हुए। तीनों लोक उनके आधीन हो गए। इसके उपरान्त शिष्यों पर अति स्नेह करने वाले भृगुवंशी ब्राह्मणों ने विश्व विजयी राजा बलि के इन्द्रत्व को चिरस्थाई बनाने के लिए उनसे एक सौ अश्वमेध कराए। बलि के यज्ञ का वर्णन नारद पुराण में भी मिलता है-

वुभुजे व्याहतैर्श्वय पबृद्ध श्रीर्महाबलः। इयाज चाश्वमेधैः स प्रीणन् तत्परः॥

विश्वजित यज्ञ करके बलि अव्याहत ऐश्वर्य बढ़ी हुई लक्ष्मी और महान बल से सम्पन्न होकर त्रिभुवन का राज्य भोगने लगे। फिर उन्होंने भगवान की प्रीति के लिए तत्पर होकर अनेक अश्वमेध यज्ञ किए।

महाराज बाहु ने सातों द्वीपों में सात अश्वमेध यज्ञ किए। उनके राज्य काल में या की महिमा से पृथ्वी अन्न-फल-फूलों से भरी रहती थी। देवराज इन्द्र समयानुसार वर्षा करते थे। पापाचारियों का अन्त होने के कारण, वहाँ की प्रजा धर्म से रक्षित रहती थी।

रावण के आतंक को धूल−धूसरित कर धरती पर स्वर्ग का अवतरण करने वाले मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान् राम को अश्वमेध का यजन करने की सलाह देते हुए लक्ष्मण ने कहा-

अश्वमेधों महायज्ञ पावनः सर्व पावनाम्। पावनस्तव दुर्धर्षो रोचताँ रघुनन्दन॥ बा. रा. उत्तरकाण्ड 84/2,3

उस यज्ञ पुरुष के मन से चन्द्रमा तथा आँखों से सूर्य की उत्पत्ति हुई। और-

‘तस्माद्यज्ञात् सर्वहुतऽऋचः सामानि जज्ञिरे’। यजु. 31/7

उसी सर्वहुत यज्ञ के कारण श्रग्वेद सामवेदादि की उत्पत्ति हुई। इस प्रकार सृष्टि का क्रम आगे बढ़ता गया तीसरे चरण में इस विश्व की प्रकृति का विकास हुआ-

‘यत्पुरुषेणा हविषा देवा यज्ञमतन्तत। बसन्तोऽस्यासीदाज्यं ग्रीष्म इध्मः शरद्धतिः॥

अर्थात्- जब देवों ने विराट पुरुष की हवि से यज्ञ प्रारंभ किया, तो उस यज्ञ में बसन्तऋतु ने घी, ग्रीष्मऋतु ने समिधा-ईंधन तथा शरदऋतु ने हविष्यान्न की भूमिका निभायी। इसी अन्तरिक्षीय यज्ञ के प्रभाव से भूमण्डल पर प्राणियों की सृष्टि एवं उनके पोषण का क्रम चला।

चौथा चरण पृथ्वी पर चलता रहता है-

त्रिपादूर्ध्व उदैत्पुरुषः पादोऽस्येहाभवत् पुनः। ततो विषवड् व्यक्रामत्साशनानशने अभि॥

अर्थात्-ऊर्ध्वलोकों में तीनचरण वाले पुरुष का एक चरण यहाँ हुआ। यह (यज्ञीय प्रक्रिया) अन्नाहार करने वाले (पशु पक्षी आदि) तथा न करने वाले (वृक्ष वनस्पति आदि) सभी को चारों ओर से व्याप्त करने स्थित है। स्पष्ट है कि प्राण चेतना का संचार प्रकृति में सतत् हो रहा है, उसका ‘मेध’-हर क्षेत्र, हर घटक में चल रहा है। इस दिव्य प्राण संचरण प्रक्रिया रूप अश्वमेध पर ही यह सृष्टि का क्रम निर्भर करता है।

प्राण संचारक ‘सविता’

सविता चेतनशक्ति का आदि स्रोत माना गया है। द्युलोक एवं अन्तरिक्ष के लिए ‘सविता’ की भूमिका का प्रतिनिधित्व कोई और करता होगा किंतु भूमण्डल के लिए तो ‘सविता’ की भूमिका ‘सूर्य’ ही निभा रहा है। वही प्रकृति का अश्वमेध चला रहा है-

‘असौ वाऽदित्य ऽएकविछंशः सोऽश्वमेधः शतपथ-13/3/3/3

अर्थात्-यह आदित्य ही सर्वश्रेष्ठ है वही अश्वमेध है। पृथ्वी पर प्राणचेतना का संचार सूर्य द्वारा होने के तथ्य का प्रकटीकरण अनेक शास्त्रों ने स्पष्ट शब्दों में किया हैःट-

उद्यन्नु खलु ववा आदित्य सर्वाणि भूतानि, प्रणयति तस्मादेनं प्राण इत्याचक्षते। ऐत. ब्राह्मण 5/31

अर्थात्-निश्चित रूप से आदित्य देवता सूर्य उदित होते हुए सभी (प्राणियों) में नवचेतना का संचार करते हैं, इसलिए इन्हें प्राण स्वरूप कहा जाता है।

ऐतरेय ब्राह्मण मंत्र 1/19 में प्राणों वै सविता

अर्थात्-सविता ही प्राण है कहकर उक्त मान्यता की पुष्टि की गयी है। और भी-

आदित्यो हवै प्राणः –प्रश्नोपनिषद् 1/5

अर्थात्-आदित्य ही निश्चित रूप से प्राण है।

प्रश्नोपनिषद् के ही मंत्र 1/8 में इस बात को बहुत स्पष्ट करते हुए लिखा गया है:−

विष्वरुपं हरिणं जातवेदसं,परायणं ज्योतिरेकं तपन्तम्। सहस्ररश्मिः शतधा वर्तमानः, प्राणः प्रजानामुदयत्येष सूर्यः॥

अर्थात्- समस्त जगत का प्राणरूप सूर्य एक ही है। इस जगत में इसके समान कोई दूसरी जीवनी शक्ति नहीं है। संसार में उष्णता प्रकाश, जीवन प्रदान, ऋतु परिवर्तन आदि आवश्यकताओं को पूर्ण करता हुआ सम्पूर्ण सृष्टि का जीवनदाता प्राण ही सूर्य के रूप में उदित होता है।

सूर्य द्वारा इस प्रकार जगत में प्राण चेतना का संचार करते रहने के कारण उसे ‘सोऽश्वमेधः’ वही अश्वमेध है, ऐसा कहा गया। यही नहीं अश्वमेध या में सविता साधना तथा उसके प्रति आहुति प्रदान करने का भी विधान है। शतपथ ब्राह्मण का वह प्रकरण यहाँ दिया जा रहा है।

अथ सावित्रीमिष्टिं निर्वपति। सवित्रे प्रसवित्रे ........ सविता वै प्रसविता सविता मऽइमं यज्ञं प्रसुवादिति।”

“अब सविता की इष्टि (आहुति ) दी जाती है-सविता प्रसविता के लिए। सविता प्रेरक है-अर्थात्-सविता मेरे इस यज्ञ की प्रेरणा करें।”

“अथ द्वितीयाँ निर्वपति। सवित्रऽसवित्रे सविता वाऽआसविता सविता मऽइमं यज्ञमासुवाउदिति।” (13/4/2/9)

“अब दूसरी आहुति सविता आसविता के लिए दी जाती है। सविता आसविता है। इसलिए सविता देव, हमारे यज्ञ में प्रेरणा करें।”

“अथ तृतीयाँ निर्वपति। सवित्रे सत्यप्रसवाय ---

हर्वं सत्य प्रसवों यः सवितुः सत्येन में प्रसवेनेमं यज्ञं प्रसुवादिति।” (13/14/2/12)

“अब तीसरी आहुति सविता सत्य का प्रसव करता है, के लिए है। यह ‘सविता’ सत्य प्रसव है। वह सत्य-प्रसव शक्ति द्वारा इस यज्ञ की प्रेरणा करें।”

उक्त विवरण से स्पष्ट हो जाता है कि अश्वमेध

मूलतः प्राण प्रक्रिया के विस्तार का ही पर्याय रहा है और इस भूमंडल में सूर्य ही प्राण संचार का केन्द्र है। इसीलिए राष्ट्रीय प्रयोजन से किए जाने वाले अश्वमेध यज्ञ में भी सविता की साधना एवं उसके निमित्त आहुतियों को ही प्रधानता दी जाती है।

सविता और गायत्री

सर्वविदित है कि गायत्री महामंत्र का देवता सविता है। सविता शक्ति के विशिष्ट-वाँछित प्रयोग के लिए गायत्री साधना का ही उल्लेख शास्त्रों में मिलता है। सूर्य प्राण रूप है, तो गायत्री प्राणों का त्राण करने वाली दिव्य प्राण विधा है। शास्त्र मतानुसार गायत्री और सविता को परस्पर पूरक माना गया है।

सा हैषा गयाँस्तेत्रे। प्राणा वै गयास्तत्प्राणाँस्तत्रे तद् यद् गयाँस्तेत्रे तस्मात् गायत्री नाम स यामेवामूमन्वाहैषैव सा स यस्माऽअन्वाह तस्य प्राणंस्त्रायते। -शतपथ ब्रा.-14/8/15/7

गायत्री इसीलिये कहते हैं कि वह ‘गयों’ का त्राण (रक्षा) करती है। ‘गय’ कहते हैं प्राण को। वह प्राणों की रक्षा करती है। आचार्य जिस सावित्री का उपदेश करता है वह यही गायत्री है। यह उसके प्राणों की रक्षा करती है, जिसको सिखाई जाती है।

अथर्ववेद में गायत्री विद्या की स्तुति ‘स्तुता मया वरदा ------(19/71/1) प्रसिद्ध है। उसमें उसे ‘वेदमाता प्रचोदयंताम्’

अर्थात्-सही दिशा में प्रेरणा देने वाली कहा गया है। सविता को भी प्रसविता प्रेरणा-प्रदायक-उत्पत्तिकर्त्ता कहा गया है। सविता एवं गायत्री के लिए प्रयुक्त यह विशेषण भी समानार्थक ही है।

अथर्ववेद के उसी मंत्र में गायत्री को ब्रह्मवर्चस् प्रदायिनी कहा गया है। शतपथ ब्राह्मण ने सूर्य को भी ब्रह्मवर्चस् कहा है-

असौवाऽआदित्य ऽएकाकी चरत्येष ब्रहमवर्चसम् 13/2/6/10

यह सूर्य एकाकी चलता रहता है, यह ब्रह्मवर्चस है।

ऊपर के प्रमाणों से स्पष्ट होता है कि अश्वमेध भी मूलतः प्राणसंचार प्रक्रिया के रूप में प्रजापति द्वारा किया गया था। सूर्य विश्व में प्राण संचार करने वाला है तथा गायत्री भी प्राण विद्या ही है।

इसी प्रकार शतपथ ब्राह्मण के तेरहवें काण्ड के अलग-अलग मंत्रों (पूर्व पृष्ठों पर संदर्भ दिए जा चुके हैं) में अश्वमेध एवं सूर्य दोनों के लिए ब्रह्मवर्चस् संबोधनों का प्रयोग किया गया है। गायत्री महाविद्या भी ब्रह्मवर्चस् प्रदान करने वाली है।

इसीलिए अश्वमेध यज्ञ का प्रयोग जब राष्ट्र संगठन-उन्नयन के लिए किया जाता है, तो उसमें सूर्योपासना एवं गायत्री साधना को विशेष स्थान देना आवश्यक होता है। वर्तमान अश्वमेध श्रृंखला के अंतर्गत गाँव-गाँव, घर-घर जाकर जन-जन को उनकी क्षमतानुसार गायत्री उपासना करने के लिए प्रेरित किया जा रहा है। अश्वमेध यज्ञ के लिए अनिवार्य देव संस्कृति दिग्विजय अभियान के क्रम में करोड़ों व्यक्ति दिव्यचेतना के अवतरण की पृष्ठभूमि बनाने के लिए गायत्री उपासना में संलग्न हो रहे हैं।

हे रघुनन्दन! सम्पूर्ण पापों से पवित्र करने वाला अश्वमेध यज्ञ है। हे दुर्धर्ष! यदि आपकी इच्छा हो तो वही यज्ञ कीजिए।

जब भगवान राम ने अपने अश्वमेध यज्ञ के बारे में वामदेव-जाबाल-कश्यप आदि ऋषिगणों से चर्चा की तो-

तेपिरामस्य तच्छुत्वा नमस्कृत्वा बृषध्वज। अश्वमेधं द्विजाः सर्वे पूजयन्तिस्यसवशः॥ -बा. राम उत्तरकांड 94/7

वे ऋषि रामचन्द्र जी की वाणी का श्रवण कर भगवान शिव को प्रणाम कर, अश्वमेध यज्ञ की प्रशंसा करते करते हैं।

कुरु कुरु महाभाग धर्मारण्ये त्वमुत्तमम्। दिने-दिने कोटि गुणं यावर्द्वष शतं भवेत्। (स्क. पु. 3/35/14)

हे महाभाग रामचन्द्र जी! आप इस धर्मारण्य में उत्तम यज्ञानुष्ठान कीजिए। इस यज्ञ के प्रभाव से स्थल की पवित्रता सौ वर्ष तक बढ़ती चली जाएगी, जो मनुष्यों में कोटि-कोटि कोटि सद्गुणों का विकास और वृद्धि करती रहेगी।

काषिराज दिवोदास ने ब्रह्माजी के कथन को स्वीकार कर यज्ञ सामग्री इकट्ठी की। जिसकी सहायता से ब्रह्माजी ने अश्वमेध यज्ञ सम्पन्न किए-

तीर्थ दशाश्वमेधारण्तं प्रधितं जगती तले। तदाप्रभूति तत्रासीद्वाराणस्या शुभप्रदम्॥

पुरा रुद्र सरोनाम तीर्थ कलाशोद्भव। दशाश्वमेधकं पश्चाज्जातं विधि परिग्रहात्॥ -स्क. पु. 4/52/68/69

उस दिन से वाराणसी में दशाश्वमेध नाम से वह तीर्थ प्रख्यात हुआ। पहले उसका नाम रुद्र सरोवर था। दस अश्वमेध करने से ही उसका नाम दशाश्वमेध तीर्थ हुआ।

गर्ग संहिता अश्वमेध खण्ड 10/7 में भगवान् कृष्ण द्वारा उग्रसेन से अश्वमेध सम्पन्न कराने का वृत्तांत मिलता है। उन्हीं की प्रेरणा व व्यास के कथन के उपरान्त सम्राट युधिष्ठिर द्वारा अश्वमेध सम्पन्न किए जाने के विवरण महाभारत अश्वमेधिक पर्व 71/14 में मिलता है। इस विवरण के अनुसार युधिष्ठिर ने तीन अश्वमेध सम्पन्न किए। युधिष्ठिर की इस महान परम्परा का निर्वाह उनके उत्तराधिकारी परीक्षित (1/16/3) और जनमेजय ने किया।

जनमेजय द्वारा अश्वमेध सम्पन्न किये जाने के बाद से अश्वमेध की परम्परा अस्त व्यस्त हो गई। इसी अस्त-व्यस्तता के परिणाम राष्ट्र की राजनीतिक विश्रृंखलता, समृद्धि ह्रास, जीवन मूल्यों के पतन के रूप में दिखाई देने लगे। स्थिति की गम्भीरता समझ कर सेनानी पुष्यमित्र ने ईसा से 185 ई. पूर्व अश्वमेध अनुष्ठान सम्पन्न कर नए सिरे से राष्ट्र की समर्थता का आयोजन किया। उनके इस यज्ञ का वर्णन इपीग्राफिया इण्डिका में विस्तार से मिलता है।

पुष्यमित्र के बाद भारत की दृढ़ स्थिति अग्निमित्र वसुमित्र तक बनी रही। बाद में काल प्रवाह में इसकी कड़िया बिखरीं जिन्हें सँजोने सँवारने का अश्वमेध पराक्रम सम्राट चन्द्र गुप्त प्रथम के पुत्र तथा गुप्त वंश के द्वितीय सम्राट समुद्र गुप्त ने किया। उन्होंने अश्वमेध अनुष्ठान के द्वारा समतट, डुवाक, कामरुप, नैपाल, कर्तपुर, पूर्वी एवं मध्य पंजाब, मालवा तथा पश्चिमी भारत के गण राज्यों, कुषाणों और शकों को एकता का शिक्षण दिया। अश्वमेध के प्रभाव से समूचा दक्षिण एकता सूत्र में बँधे बिना न रह सका। उनके शौर्य से अभिभूत होकर पश्चिमी इतिहासकार उन्हें नैपोलियन की उपाधि से सम्बोधित करते हैं। उनके द्वारा किए अश्वमेध की स्मृति का नवीकरण कुमारगुप्त का विलसंद अभिलेख पढ़कर तथा इपीग्राफिया इण्डिका के पृष्ठों को उलट-पुलट कर किया जा सकता है।

समुद्रगुप्त के बाद जिन राजाओं द्वारा अश्वमेध सम्पन्न करने के विवरण मिलते हैं, वह वस्तुतः चिन्ह पूजा मात्र है। उनमें न तो साँस्कृतिक वैभव है न भावात्मक विस्तार और न जन-जीवन को जीवन बोध करा सकने की सामर्थ्य। अश्वमेध महायज्ञों की वर्तमान श्रृंखला सम्राट समुद्र गुप्त के बाद किया गया पहला वास्तविक और सफल प्रयास समझा जा सकता है। इन महायज्ञों के द्वारा न केवल अतीत भारत की ऐतिहासिक घटनाएँ स्वयं को दुहराएँगी बल्कि इनके सत्परिणामों के रूप में सतयुग का उदय, समृद्धि, ज्ञान, विज्ञान का विस्तार, विश्वराष्ट्र का उदय, वसुधैव कुटुम्बकम का भाव विस्तार जैसी चमत्कारी उपलब्धियों की प्रत्यक्ष अनुभूति हुए बिना न रहेगी।


अश्वमेध के संदर्भ में शतपथ ब्राह्मण का मत

वेद दिव्य अनुभूतियों के आधार पर प्रकट हुआ है, इसलिए इसे सर्वश्रेष्ठ एवं प्रामाणिक माना जाता है। वेद के चार विभाग कहे गये हैं (1) संहिता, (2) ब्राह्मण (3) आरण्यक एवं (4) उपनिषद्। यह चारों विभाग वेदों को प्रकट करते हैं। अश्वमेध के संबंध में शतपथ ब्राह्मण में जो लिखा है, वह भी वेद वचन ही है। उसे उसी प्रमाणिकता के साथ लिया जाना चाहिए।

शतपथ ब्राह्मण के तेरहवें काण्ड में अश्वमेध का बहुत महिमामय वर्णन किया गया है-

‘राजा वाऽएष यज्ञानाँ यदश्वमेधः।’

अर्थात्-इन यज्ञों का राजा यह अश्वमेध है। श. 13/2/2/1

मंत्र 13/1/9/9-10 इस यज्ञ का प्रभाव बतलाते हुए, में उल्लेख है-

निकामे-निकामे नः पर्जन्यो वर्षतु

अर्थात्-इस यज्ञ के प्रभाव से इच्छानुसार-आवश्यकता के अनुरूप पर्जन्य की वर्षा होती है। अश्वमेध बहुत व्यापक प्रयोग है। उसके प्रभाव से प्रकृति का अनुकूलन व्यापक स्तर पर होता है। ऋतुचक्र (इकॉलाजिकल साइकिल) व्यवस्थित रहने से वर्षा का समय पर होना स्वाभाविक है।

‘पर्जन्य-उत्पादकता (प्राँडक्टिविटी) को कहते है। ‘यज्ञात् भवतु पर्जन्यो के अनुसार यज्ञ से उत्पादकता में वृद्धि होती है।

शतपथ के उसी मंत्र में आगे कहा गया है-

“फलवत्यों नः ओषधयः पच्यनताम्।”

अर्थात्-यज्ञ के प्रभाव से हमारी औषधियाँ वनस्पतियाँ परिपक्व होकर फलवती होती हैं।

यज्ञ से पर्जन्य की वृद्धि और उसके कारण प्राकृतिक उत्पादन प्राणवान होते हैं-प्रभावपूर्ण होते हैं। आज प्राकृतिक उत्पादों में पोषक क्षमता की कमी पर्जन्य की कमी के कारण ही है।

उसी क्रम में आगे कहा गया है -

‘योग क्षेमों नः कल्पताम्’

अर्थात्-हम सब योग (अप्राप्त की प्राप्ति) तथा क्षेम (प्राप्त की स्थिरता) से संपन्न बनते हैं। यज्ञीय प्रभाव से प्रचुर साधन प्राप्त होते हैं तथा प्रजा यज्ञीय भाव से प्रेमपूर्वक सकुशल रहती है।

ऊपर की उक्तियों के अनुसार जिस क्षेत्र में अश्वमेध होता है। उस सारे क्षेत्र को प्राकृतिक स्तर पर लाभ प्राप्त होते हैं। आगे यजन करने वालों के लिए कुछ विशेष लाभ कहे गये हैं-

योऽश्वमेधेन यजते सर्वऽएव भवति सर्वस्य वाऽएषा प्रायश्चिन्तः सर्वस्य भेषजम्। -श.-13/2/1/1

अर्थात्- जो अश्वमेध का यजन करता है वह पूर्णांग (इन्द्रियों सहित स्वस्थ) हो जाता है। यह (यज्ञ) सबको प्रायश्चित रूप (भूलों को विरत करने वाला) एवं सबका उपचार भूलोँ के कारण जो रोग हो गये हों, उन्हें ठीक करने वाला भी है।

शारीरिक लाभ से भी आगे उसका फल बतलाते हुआ उल्लेख है-

‘सर्व पाप्मानं तरति यो अश्वमेधेन यजते’।

अर्थात्- अश्वमेध यजन करने वाला सभी प्रकार के पापों से पार हो जाता है।

पापों को दुर्धर्ष कहा गया है। किन्तु इस यज्ञानुष्ठान के प्रभाव से साधक पापों से अप्रभावित होकर लक्ष्य की ओर बढ़ने की क्षमता प्राप्त करता है।

आगे चलकर ऋषि उसे सर्वफलदायक घोषित करते है-

सर्वमश्वमेधः सर्वस्याप्त्यै सर्वस्यावरुद्ध्यै। -श. 13/3/1/6

सब कुछ प्राप्त करने के लिए एवं सब प्रकार के अवरोधों के निवारण के लिए अश्वमेध सब कुछ (सर्व समर्थ) है।

इससे सब कुछ प्राप्त होने का उल्लेख (इस अंक के प्रथम पृष्ठ पर शत. 13/4/1/1 के अंतर्गत) किया जा चुका है। इससे स्पष्ट होता है कि अश्वमेध मूलतः सृष्टि संचालन व्यवस्था रूप दिव्य यज्ञ का ही प्रारूप है। इस दिव्य पुरुषार्थ किसी दिव्य संकल्प के आधार पर दिव्य संरक्षण एवं मार्गदर्शन में ही किया जाना संभव है। यही कारण है कि यह यज्ञानुष्ठान सदैव से ही दुर्लभ दुःसाध्य माना गया है। ऋषिगण इसके अनुष्ठान के लिए अनुमति, संरक्षण एवं सहयोग का आश्वासन सहजता से नहीं देते थे।

शतपथ ब्राह्मण में आगे चलकर अश्वमेध के लिए प्रयुक्त अनेक संज्ञाओं-नामों का उल्लेख करते हुए उनके अनुरूप लाभ उस क्षेत्र में सभी को मिलने की बात कहते हैं, जहाँ यह यज्ञानुष्ठान सम्पन्न किया जाता है। 13/3/7/1 से लेकर 12 तक-बारह इष्टियों में यह महिमा गायी गयी है।

एष वै प्रभूर्नाम यज्ञः। यत्रैतेनयज्ञेनयजंते सर्वमेव प्रभूतं भवति॥1॥

इस यज्ञ का नाम प्रभू है। जहाँ यह यज्ञानुष्ठान सम्पन्न किया जाता है, वहाँ सब कुछ उत्पन्न हो जाता है, सब लोग प्रभुता सम्पन्न हो जाते हैं॥1॥

एष वै विभूर्नाम यज्ञः। यत्रैतेन यज्ञेन यजन्ते सर्वमेव विभूतं भवति॥2॥

-इस यज्ञ का नाम विभु है। जहाँ यह यज्ञानुष्ठान सम्पन्न किया जाता है, वहाँ सभी लोग विभूतिवान बनते हैं॥2॥

एष वै व्यष्टिर्नाम यज्ञः। यत्रैतेन यज्ञेन यजंते सर्वमेव व्यष्टं भवति॥3॥

-इस यज्ञ का नाम ‘व्यष्टि’ है। जहाँ इस यज्ञ का अनुष्ठान सम्पन्न किया जाता है, वहाँ सभी लोग (इष्ट उद्देश्यों में) सफलता प्राप्त करते हैं॥3॥

एष वै विधृतिर्नाम यज्ञः। यत्रैतेन यज्ञेन यजन्ते सर्वमेव विधृतं भवति॥4॥

-इस या का नाम ‘विधृति’ है। जहाँ यह

यज्ञानुष्ठान सम्पन्न किया जाता है, वहाँ सभी लोग कीर्तिमान होते हैं॥4॥

एष वै व्यावृत्तिर्नाम यज्ञः। यत्रैतेन यज्ञेन यजन्ते सर्वमेव व्यावृतं भवति॥5॥

-इस यज्ञ का नाम व्यावृत्ति है। जहाँ इस यज्ञ का अनुष्ठान सम्पन्न होता है, वहाँ सभी सुरक्षित हो जाते हैं॥5॥

एष वाऽऊर्जस्वान्नाम यज्ञः। यत्रैतेन यज्ञेन यजन्ते वर्स मेवोर्जस्वद्भवति॥6॥

-इस यज्ञ का नाम ऊर्जस्वान (दिव्य ऊर्जा प्रदान करने वाला) है, जहाँ यह यज्ञानुष्ठान सम्पन्न होता है, वहाँ सभी लोग ऊर्जस्वी (प्राणवान) हो जाते हैं॥6॥

एष वै पयस्वान्नाम यज्ञः। यत्रैतेन यज्ञेन यजन्ते सर्वमेव पयस्वद्भवति॥7॥

-इस यज्ञ का नाम ‘पयस्वान’ है। जहाँ यह यज्ञ सम्पन्न होता है, वहाँ सभी लोग ‘पयस्वी’-दिव्य रसों के भागीदार होते हैं॥7॥

एष वै ब्रह्मवर्चसी नाम यज्ञः। यत्रैतेन यज्ञेन यजन्तऽआ ब्राह्मणों ब्रह्मवर्चसी जायते॥8॥

-इस यज्ञ का नाम ‘ब्रह्मवर्चसी’ (ब्रह्मवर्चस प्रदायक) है। इस यज्ञानुष्ठान में भाग लेने वालों को ‘ब्रह्मवर्चस्’ की प्राप्ति होती है॥8॥

एष अतिव्याधी नाम यज्ञः। यत्रैतेन यज्ञेन यजन्तऽआ राजन्योऽति व्याधी जायते॥9॥

-इस यज्ञ का नाम ‘अतिव्याधी’ है। जहाँ यह या अनुष्ठान सम्पन्न किया जाता है, वहाँ क्षात्र धर्म का पालन करने वाले अपने लक्ष्यवेध में समर्थ होते हैं॥9॥

एष वै दीर्घो नाम यज्ञः। यत्रैतेन यज्ञेन यजन्तऽआ दीर्घारण्यं जायते॥10॥

-इस यज्ञ का नाम ‘दीर्घ’ है। जहाँ इस यज्ञ का अनुष्ठान होता है, वहाँ पुण्य बन-सम्पदा की वृद्धि होती है॥10॥

एष वै क्लृप्तिर्नाम यज्ञः। यत्रैतेन यज्ञेन यजन्ते सर्वमेव क्लृप्तं भवति॥11॥

-इस यज्ञ का नाम ‘क्लृप्ति’ है। जहाँ यह यज्ञानुष्ठान सम्पन्न किया जाता है, वहाँ सभी लोगों की कर्म-कुशलता में वृद्धि होती है॥11॥

एष वै प्रतिष्ठा नाम यज्ञः। यत्रैतेन यज्ञेन यजन्ते सर्वमेव प्रतिष्ठितं भवति॥12॥

-इस यज्ञ का नाम ‘प्रतिष्ठा’ हैं। जहाँ यह यज्ञानुष्ठान सम्पन्न होता है, वहाँ सभी को पावन प्रतिष्ठा प्राप्त होती है॥12॥

यह सब महत्व समझने के बाद एक बात सहज रूप से मस्तिष्क में आती है, कि जिसका इतना प्रमाण है, वह अश्वमेध कोई सामान्य कर्मकाण्ड नहीं कोई व्यापक अनुष्ठान ही हो सकता है। इस अनुमान की पुष्टि निम्नाँकित प्रसंग से होती है-

प्रजापति ने अन्य यज्ञों को तो दूसरे देवताओं को दे दिया था, परन्तु अश्वमेध को अपने लिये रख लिया था। इस पर अन्य देवताओं ने विरोध करके

अश्वमेध में भी अपनी भागीदारी को सुनिश्चित कराया था।

प्रजापतिः देवेभ्यो यज्ञान्व्यादिशत्। आत्मन्नश्वमेधमधत्त तो देवाः प्रजापति भाग इति ....................। शतपथ 13/2/1/1

उक्त उपाख्यान से स्पष्ट होता है कि अन्य यज्ञों की अपेक्षा अश्वमेध अधिक दुष्कर प्रयोग है प्रजापति ने यज्ञ सहित सृष्टि की रचना की यह श्रीमद्भागवतगीता का मत है। उन्होंने यज्ञ के विस्तार की प्रार्थना भी अपनी प्रजा से की। किन्तु अश्वमेध प्रयोग सबके लिए साध्य न समझकर उसे देवताओं को नहीं सौंपा। बाद में विशेष आश्वासन दिए जाने पर उसमें उनकी भागीदारी भी सुनिश्चित की।

आगे के पृष्ठों पर यह स्पष्ट हो जायेगा कि यह प्रयोग जितना प्रभावशाली है, उतना ही दुरूह भी है। इसीलिए इसके अनेक गुह्य भाग अलंकारिक ढंग से वर्णित किये गये हैं, प्रजापति (लोकरक्षक दिव्य सत्ता) की कृपा के बिना समझ में नहीं आते।


Quotation

या देवी सर्व भूतेषु विष्णुमायेति शब्दिता। नमस्तस्यै,नमस्तस्यै, नमस्तस्यै नमो नमः॥

जो देवी सब प्राणियों में विष्णुमाया के नाम से कही जाती हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारम्बार नमस्कार है।

या देवी सर्वभूतेषु चेतने त्याभिधीयते। नमस्तस्यै,नमस्तस्यै, नमस्तस्यै नमो नमः॥

जो देवी सब प्राणियों में चेतना कहलाती हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार। उनको बारम्बार नमस्कार है।

या देवी सर्वभूतेषु बुद्धिरूपेण संस्थिता। नमस्तस्यै,नमस्तस्यै, नमस्तस्यै नमो नमः॥

जो देवी सब प्राणियों में बुद्धि रूप से स्थित हैं, उनको नमस्कार, उनको नमस्कार, उनको बारम्बार नमस्कार है।


‘मेध’ सम्बन्धी भ्रान्तियों को निर्मूल बताते हैं−ये प्रतिपादन

यज्ञ प्रकरण में मेध−यज्ञों का स्थान महत्वपूर्ण है। समय−समय पर उनकी अलग−अलग ढंग से व्याख्या की जाती रही है। मध्यकाल में मेध की संगति बलि से जोड़कर अधर्मियों ने अपना स्वार्थ ही नहीं सिद्ध किया, वरन् यज्ञों पर भी कलंक की छाप डाली। वेद विद्या के मर्म को जान सकने में असमर्थ जन सामान्य का इन भ्रान्त व्याख्याओं से भ्रमित हो जाना स्वाभाविक है। विवेक प्रधान इस युग में अनिवार्य हो गया है, कि मेध यज्ञों के उस दर्शन और स्वरूप को स्पष्ट किया जाय−जो इनके अनुसंधानकर्ता ऋषियों को अभीष्ट रहा है।

इस क्रम में विचार करने पर पाते हैं कि ‘मेध’ शब्द उसके साथ जुड़ी संज्ञा से सन्दर्भित है। वैदिक वाङ्मय में चार प्रकार के मेध यज्ञ बहु प्रचलित हैं−सर्वमेध, नरमेध, अश्वमेध और गोमेध। इनमें से सर्वमेध का तात्पर्य है−निजी सम्पदा, प्रतिभा एवं आयुष्य को समष्टिगत सत्प्रयोजनों के लिए समर्पित कर देना। निजी सम्पत्ति के रूप में कुछ भी संग्रह, परिग्रह पास न रखना। वाजश्रवा, हरिश्चंद्र आदि ने अपने समय की माँग पूरा करने के लिए ऐसे ही सर्वमेध सम्पन्न किये हैं।

नर मेध का अर्थ है−तपस्वी जीवन। अभ्यस्त लोभ, मोह, अहंता के कुसंस्कारों का परित्याग। पुत्रेषणा, वित्तेषणा, लोकेषणा की कामना अभिलाषाओं से विमुख होना। गतिविधियाँ तपश्चर्या युक्त बनाना। चिन्तन में उदारता, आत्मीयता का अधिकाधिक समावेश करना। अन्तराल में सदाशयता के प्रति श्रद्धा को प्रगाढ़ परिपक्व करना।

अश्वमेध− सामर्थ्यों को राष्ट्र निर्माण के लिए हठपूर्वक नियोजित करने की प्रक्रिया है। संचित कुसंस्कारिता क्षुद्र प्रयोजनों में निरत रहने के लिए ललचाती रहती है। कुत्साओं से घिरा हुआ लोक प्रवाह तथा स्वजनों का आग्रह भी ऐसे ही दबाव डालता रहता है। इस समस्त अवरोधों को चीरते हुए उपलब्ध सामर्थ्य में से निर्वाह के लिए न्यूनतम रखने के उपरान्त शेष को राष्ट्रहित समाजहित में लगा देने की व्रतशीलता, अश्वमेध है।

गोमेध का अर्थ है प्रसुप्त सत्प्रवृत्तियों के जागरण में स्वाध्याय शिक्षण, कौशल आदि का विस्तार। देवी सम्पदाओं से व्यक्ति और समाज को सुसम्पन्न बनाना। समग्र यज्ञ प्रक्रिया इन दर्शन सिद्धान्तों पर ही अवलम्बित रही है। यजन प्रक्रिया तो उसका स्थूल दृश्यमान पक्ष भर है। उपरोक्त प्रयोजनों के लिए कई बार व्यक्ति विशेष द्वारा इन चार में से जिसका निश्चय किया हो, उसकी सार्वजनिक घोषणा के लिए यह आयोजन सम्पन्न किया जाता था। कई बार मूर्धन्य पुरोहितों द्वारा व्यापक समूह को इन महत्वपूर्ण प्रयोजनों की दीक्षा देने के लिए सार्वजनिक समारोह बुलाए जाते थे।

मनीषी, चार्ल्स ड्रेकमायर के ग्रन्थ “प्रि बुद्धिस्ट इण्डिया” के अनुसार अश्वमेध की एक विशेष प्रक्रिया राजसूय स्तर की भी संपन्न होती रही है। सामन्तवादी उच्छृंखलता के कारण शासकों के अनाचार प्रजा पीड़क न बनने पाएँ इसलिए उन्हें सर्वतन्त्र स्वतन्त्र नहीं रहने दिया जाता था। उन्हें किसी केन्द्रीय नियन्त्रण के अंतर्गत रखने के लिए समय−समय पर ऐसे आयोजन होते रहते थे। जो स्वेच्छाचारिता को आग्रह करते थे, उन्हें बलपूर्वक वैसा करने से रोका जाता था। डेकमायर के अनुसार इसका एक अन्य स्वरूप वाजपेय स्तर का भी सम्पन्न किया जाता रहा है। विचारों की स्वेच्छाचारिता को आदर्शवादी दिशाधारा के अंतर्गत रखने के लिए समर्थ आत्मवेत्ता ‘दिग्विजय’ के लिए निकलते थे। शास्त्रार्थ जैसे विचार युद्ध ऐसे ही प्रयोजनों के लिए होते थे। जो हारता था उसे पृथकतावादी आग्रह छोड़कर संयुक्त प्रवाह में बहने के लिए विवश किया जाता था।

मेध यज्ञों के प्रसंग में एक बड़ी विडम्बना न जाने कहाँ से आई और सरल सौम्य प्रक्रिया में एक अवाँछनीय झंझट खड़ा कर दिया। यजन कृत्य के हविष्य का निर्धारण करने वाले प्रसंग में कुछ शब्द ऐसे आ गए जिन्हें साहित्यकला की दृष्टि से जान बूझकर अथवा संयोगवश ऐसे ही प्रयुक्त कर दिया गया, जिनके दो अर्थ होते थे। ऐसे प्रसंगों में कौतूहल अथवा हास−विलास तो होता है, पर कोई भ्रमित नहीं होता। पहेली में शब्द तो अटपटे होते हैं, पर समझदार लोग उसका सही अर्थ बिना किसी कठिनाई के सामान्य बुद्धि से ही जान लेते हैं। शब्दों के अटपटेपन के कारण कोई अर्थ का अनर्थ नहीं करता। किन्तु इस प्रसंग में कुछ ऐसा अर्थ लगाया जाने लगा जो मूल तथ्यों के साथ किसी भी प्रकार संगति नहीं खाता।

यज्ञ विवेचना में अश्वमेध, गोमेध, नरमेध, यज्ञों की चर्चा हुई है। इनमें प्रयुक्त हुए दोनों शब्दों के अर्थ का अनर्थ किया गया है। मेध का अर्थ समर्पण या संगठन होता है, साथ ही एक अर्थ वध भी होता है। औचित्य कहाँ है? संगति कहाँ बैठती है, उस पर विचार करते ही तात्पर्य समझने वालों को समर्पण आदि−अर्थ करने चाहिए, न कि हत्याकाण्ड। इस पहेली में अश्व, गौ, नर नामक प्राणियों को मार−काट कर होम देने जैसे अर्थ निकाले जाने की गुंजाइश है, किन्तु अश्व−शक्ति वैभव को, गौ−इन्द्रियों को और नर अर्थात्−व्यक्तित्व को पवित्र बनाने संयमित एवं ईश्वरार्पण करना ही यहाँ इसका वास्तविक तात्पर्य है।

इसी प्रसंग में कहीं−कहीं एक और शब्द आ धमका ‘आलभन’। जिसका एक अर्थ होता है− स्पर्श, दूसरा अर्थ होता है मार डालना। देखना यह चाहिए जब यज्ञ का नाम ही अध्वर है। अध्वर अर्थात्−हिंसा रहित कर्म। जब उस प्रक्रिया में रक्तपात की कहीं गुँजाइश नहीं है। ऐसी दशा में पशुओं या मनुष्यों को मारकर अग्नि में होम देने की बात किस प्रकार बुद्धि .......... ठहराई जा सकती है।

किन्तु मध्यकाल में अनहोनी को होनी कर दिखाने में कुशल कुछ विदूषकों ने उपहासास्पद प्रयत्न किया और ‘उलटवासो’ का शब्दार्थ कुछ का कुछ करके यज्ञ के मत्थ्र ‘प्राणिबध’ का कलंक मढ़ने की कोशिश कर डाली। कुछ ऐसी ही घटनाओं को पनपते देखकर उन दिनों महात्मा बुद्ध और भगवान महावीर जैसी आत्माएँ सामने आई और विकृति को अंकुरित होते−होते ही पैरों तले कुचलकर फेंक दिया। फलतः यज्ञ विधा पर जिस ग्रहण की काली छाया पड़नी शुरू हुई थी, वह समय रहते अपनी थोड़ी सी करतूत दिखाकर ही पलायन कर गई।

यज्ञ में प्राणिहिंसा की बात किसी भी शास्त्रानुमोदित नहीं हो सकती। शास्त्रकार तो−अध्वर इति यज्ञनाम−ध्वरतिर्हिंसाकर्माः तत्प्रतिषेधः निरु क्त 2/7 श. अर्थात् −’अध्वर’ यह यज्ञ का नाम है जिसका अर्थ हिंसा रहित कर्म है का उद्घोष करते हैं। वैदिक वाड्.मय में इस तरह के अनगिनत कथन हैं। यथा− अग्ने ये यज्ञमध्वरं विश्वतःपरि भूरसि।

स इद् देवेषु गच्छति॥ (ऋक् 1/1/4)

अर्थात्− हे ज्ञान स्वरूप परमेश्वर! तू हिंसा सहित यज्ञों में ही व्याप्त होता है और ऐसे ही यज्ञों को सत्यनिष्ठ विद्वान लोग सदा स्वीकार करते हैं।

यजन्तमध्वराणाँ गोपाभृतस्य दीदिविम्। वर्धमान स्वेदमे॥ − (ऋक् 1/1/8)

यहाँ भी परमेश्वर को अध्वरों अर्थात्−हिंसा रहित सब कर्मों में विराजमान बताया गया है। ऋग्वेद में ही एक अन्य स्थान पर कहा गया है−

स सुक्रतुः पुरोहितो दमें दमेऽग्निर्यज्ञस्याध्वरस्य चेतति क्रत्वा यज्ञस्य चेतति (ऋक् 1/12/4)

अर्थात्−परमेश्वर और वेदविद पुरोहित हिंसा रहित यज्ञ का ही मनुष्यों को सदा उपदेश देते हैं। अत्रिस्मृति के अनुसार यज्ञ में अग्नि का उपयोग तो किया जाता है पर साथ ही पुरोहितों और याजकों में से प्रत्येक को यह भी ध्यान रखना पड़ता है कि कहीं समिधाओं या शाकल्प में कृमि कीटक तो नहीं है और उस गर्मी से किन्हीं चींटी जैसे प्राणियों की जीवन हानि तो नहीं हो रही। जहाँ इतनी सतर्कता का निर्देश हो वहाँ प्राणीवध की तो कल्पना तक नहीं की जा सकती।

दो अर्थ वाले शब्दों का प्रयोग जहाँ होता हो वहाँ बुद्धिमत्ता यह कहती है कि प्रसंग की पूर्वा पर संगति भी बिठाई जाय और यह ध्यान भी रखा जाय कि प्रस्तुत करने वालों का मन्तव्य या उद्देश्य क्या रहा है? औचित्य का ध्यान रखे बिना दो अर्थ वाले शब्दों का अर्थ कुछ से कुछ मूल मान्यता से सर्वथा विपरीत कर देना−अनर्थ ही कहा जाएगा। ऐसी ही दुर्भाग्य पूर्ण विडम्बना किसी−किसी उद्धत अर्थ करने वाले मेध शब्द का तात्पर्य एवं स्वरूप प्रस्तुत करने में की है। इतने पर भी मूल मन्तव्य को समझने वाले शास्त्रकारों, वेद मर्मज्ञों की कमी नहीं रही। वे वेदोक्त ‘मेध’ शब्द का सही अर्थ ही प्रस्तुत करते रहे हैं।

वेद मनीषी पं. दामोदर सातवलेकर ने यजुर्वेद भाष्य (अध्याय 30)के संदर्भ में मेध शब्द के अर्थ (1) मिलना (2) परस्पर मित्रता करना (3) ऐक्यकरना (4)एक दूसरे को जानना (5)जोड़ना (6)प्रेम करना (7)धारण बुद्धि का बल और तेज बढ़ाना (8)पवित्रता करना (9)सत्व−बल और उत्साह बढ़ाना, लिए हैं। धातु पाठ में ‘मेधृ’ धातु का अर्थ स्पष्ट करते हुए लिखा गया है−

“मेधृ−मेधासंगमनयोर्हिंसायाँ च, “

अर्थात्−’मेधृ’ धातु से निष्पन्न मेध शब्द के मेधा लोगों में एकता व प्रेम बढ़ाना तथा हिंसा ये तीन अर्थ होते हैं। जब मेध शब्द के अन्य अर्थ होते हैं तो हिंसा वाले अर्थ के प्रति इतना दुराग्रह क्यों किया जाय, जबकि उन−उन स्थलों में उनका हिंसा से भिन्न तात्पर्य ही अभीष्ट है। ये कुछ दृष्टांत द्रष्टव्य हैं−

पुरुष मेध, पुरुषयज्ञ और नृयज्ञ−ये तीनों शब्द प्रायः एक ही अर्थ में प्रयुक्त होते रहे हैं।

इनमें से नृयज्ञ का तात्पर्य बोध कराते हुए मनुस्मृतिकार ने लिखा है−

नृयज्ञोऽतथि पूजनम्।

अर्थात्−अतिथियों का स्वागत सत्कार ही नृयज्ञ है। अजमेध को बकरे की बलि यज्ञ से अर्थ लगाने वाले को ‘महाभारत’ में कड़ी चेतावनी दी गई है−

अजैर्यज्ञेषु यष्टव्यम् इतिवै वैदकी श्रुतिः। अज संज्ञानि बीजानि छागान्नो हन्तुमर्हथ। नैषाधर्म सताँ देवाः यत्र वध्यते पशु॥ शान्तिपर्व अ. 3/37

अर्थात्−वेद में अज से यज्ञ करना चाहिए ऐसा उल्लेख है। अज शब्द का तात्पर्य एक बीज विशेष से है न कि बकरे से अतः उसका तात्पर्य बकरे वध से नहीं लगाना चाहिए। पशुओं का वध करना अच्छे मनुष्यों का धर्म नहीं है।

इसी तरह अश्वमेध का तात्पर्य घोड़े की बलि देने वाला यज्ञ नहीं लगाया जाना चाहिए। शतपथ ब्राह्मण के अनुसार−

राष्ट्रं वा अश्वमेधः। बीर्यं वा अश्वः।’ शतपथ 13/9/6

अर्थात्−पराक्रम ही अश्व है, राष्ट्र का अच्छी प्रकार संचालन ही अश्वमेध है।

डहंसा तो किसी भी यज्ञ कर्म में निषिद्ध है, फिर अश्वमेध के प्रयोजन तो बहुत ही उच्चस्तरीय हैं। इस तथ्य को स्वीकारते हुए पंचतन्त्रकार का मत है−

‘एतेऽपिये याज्ञिका याकर्मणि पशून व्यापादयन्ति तो मूर्खाः परमार्थं श्रुतेर्न जानन्ति तत्र किलैतयुक्तम् अजैर्यज्ञेषु

यष्टव्यमिति अजास्तावद् ब्रीह्यःसाप्तवार्षिकाः कथ्यन्ते न पुनः पशु विशेषाः। उक्तं च−वृक्षान् छित्वा पशूनहत्वा कृत्वा रु धिर कर्दमम् यद्येवं गम्यते र्स्वगं, नरकं केन गम्यते॥’

अर्थात्−जो याज्ञिक, यज्ञ में पशुओं की हत्या करते हैं, वे मूर्ख हैं, वे वस्तुतः श्रुति के तात्पर्य को नहीं जानते। वहाँ जो अजों से यज्ञ करना चाहिए उसमें अज से तात्पर्य व्रीह (पुराना अनाज विशेष) से है। आप्त .......... भी है−’यदि पशुओं की हिंसा कर उनकी रुधिर की धारा बहाकर स्वर्ग में जाया जा सकता है, तो नरक में जाने का मार्ग कौन सा है?

यजुर्वेद में आलभते शब्द प्रयोग में आया है। उसका अर्थ निकाला गया ‘वध’ करना चाहिए। जबकि यह अर्थ यहाँ किसी भी प्रकार युक्ति संगत नहीं। ‘आड्.’ पूर्वक, लभधातु से निष्पन्न इस शब्द का अर्थ ‘स्पर्श करना होता है। उदाहरण के लिए−

वत्सस्य समीप आनयनार्थम आलम्भः स्पर्शों भवतीति

सुवोधिनी टीका मीमाँसादर्शन−2/3/18 यहाँ ‘आलम्भ धातु का अर्थ स्पर्श करना ही किया गया है। अतएव यज्ञों में आलम्भ के प्रयोग से हिंसा का अर्थ लेना नितान्त भ्रान्तिपूर्ण है।

तथ्य का अध्ययन अन्वेषण की गहनता का स्पर्श करके यही कहा जा सकता है मेध यज्ञ सर्वथा निर्भ्रान्त है। इनके सम्बन्ध में किसी भ्रान्ति की राई−रत्ती भर गुँजाइश नहीं है। फिर अश्वमेध के प्रयोजन−तो और अधिक उच्चस्तरीय हैं। पश्चिमी मनीषी ब्लूमफील्ड ने अपने शोध अध्ययन “अर्ली हिस्ट्री आँव वैदिक इण्डिया” में इसे राष्ट्रीय उपासना की अनुकरणीय पद्धति कहा है। वेदों ने इसे महाक्रतु कहकर सराहा है। ऋग्वेद में इससे सम्बन्धित दो मंत्र है। शतपथ ब्राह्मण (13) में इसका विशद वर्णन प्राप्त होता है। तैत्तिरीय ब्राह्मण (3,8,9) कात्यायनी श्रौतसूत्र (20) आपस्तम्ब (20) आश्वलायन (10,6) शाँखायन (16) तथा दूसरे सम्मान्य ग्रन्थों में इसका वर्णन मिलता है। इन सुप्रसिद्ध−शास्त्रों के विवरण यही स्पष्ट करते हैं−कि अश्वमेध प्रक्रिया राष्ट्र को संगठित समर्थ बनाने, व्यक्ति में समझदारी पैदा करने मेधा वर्धन करने, तथा देवशक्तियों के अनुग्रह अवतरण हेतु आधार भूमि तैयार करने वाला विराट प्रयोग है। वर्तमान युग में इसके सम्पन्न होने को दैवी चेतन प्रवाह का एक अविच्छिन्न अंग माना जा सकता है।


वैदिकी हिंसा, हिंसा न भवति अर्थ निकालें, अनर्थ नहीं

इस उक्ति का अर्थ निहित स्वार्थ अथवा पूर्वाग्रह के कारण अटपटा निकाल लिया गया है। यज्ञों में पशुओं की हिंसा करते हुए कहा गया कि “यह हिंसा वेदोक्त है, इसलिए इसमें कोई दोष नहीं है।” यह अर्थ किसी भी प्रकार बुद्धि−विवेक संगत नहीं है। सही अर्थ समझने के लिए पूर्वाग्रहों से हटकर विचार करना आवश्यक है।

पहला विचारणीय शब्द है ‘वैदिकी’। भौतिकी का अर्थ होता है भौतिक पदार्थों से सम्बद्ध विज्ञान अथवा अनुशासन। नैतिकी का अर्थ होता है नीति विज्ञान या नीतिगत अनुशासन। इसी प्रकार आत्मिकी का अर्थ होता है आत्म विज्ञान अथवा आत्मचेतना से सम्बद्ध अनुशासन। इसी क्रम में वैदिकी का अर्थ होता है वेद विज्ञान अथवा वेद विहित अनुशासन।

वेद शब्द का अर्थ ज्ञान होता है। देव को ज्ञान का सर्वोच्च स्तर भी कहा गया है। यह कोई अतिशयोक्ति या पक्षपात पूर्ण उक्ति नहीं है। बहुत समझ बूझकर कही गयी प्रामाणिक बात है।

वेद वह ज्ञान है जिसे ऋषियों ने आत्मानुभूति के आधार पर अवतरित किया। अनुभूति जन्य−अनुभव जन्य ज्ञान सर्वश्रेष्ठ कहा भी जाता है। फिर यह अनुभूति भी बहुत उच्च स्तरीय है। आत्म चेतना ने ब्राह्मी चेतना की गहराइयों अथवा ऊँचाइयों तक पहुँचकर जिनसे मौलिक तथ्यों की अनुभूति की गई है उसे श्रेष्ठतम कहा जाना उचित ही है।

कोई भी सामान्य विचारशील व्यक्ति भी विवेक का उपयोग करे तो उसे जीव हिंसा अनुचित लगने लगती है। सामान्य संवेदना भी जिसमें है वह भावनाशील व्यक्ति भी किसी की हिंसा करना तो दूर उसे देखना भी पसन्द नहीं कर सकता। ऐसी स्थिति में बहुत स्वाभाविक रूप से प्रश्न उठता है कि सामान्य विचारशीलता एवं भावनाशीलता के रहते जो कर्म अनुचित लगता है, उसे उच्चतम विचार और उच्चतम भावना से सम्पन्न व्यक्ति कैसे उचित ठहरा सकता है? निश्चित रूप से उक्त वाक्य का अर्थ हिंसा के समर्थन में नहीं हो सकता।

सही अर्थ है, वैदिक संदर्भ में यदि कहीं ऐसे शब्दों का प्रयोग हुआ है जिसका एक अर्थ हिंसापरक भी होता है, तो उसे हिंसा के अर्थों में प्रयुक्त न किया जाय।

सभी जानते हैं, कि लगभग सभी भाषाओं में अनेकार्थी शब्द होते हैं। काव्य में उनका अलंकारिक प्रयोग भी किया जाता है और सहज स्वाभाविक रूप से भी वे भाषा में प्रयुक्त होते रहते हैं। उनका संदर्भ के अनुरूप कोई एक अर्थ ही निकाला जाता है। अन्य अर्थ निकालना अपने अज्ञान अथवा भाषा के प्रति अन्याय का प्रमाण होता है।

भाषा ज्ञान का अपमान न करें

भाषा भावनाओं एवं विचारणाओं को ठीक प्रकार व्यक्त करने के लिए होती है। उसका उपयोग मनोरंजन के स्तर पर हास−परिहास के रूप से किया जा सकता है, किन्तु उनका अनर्थ मूलक−उलटा−पुलटा उपयोग तो नहीं ही किया जाना चाहिए।

जैसे महिषी शब्द का अर्थ रानी भी होता है तथा भैंस भी। कोई सूचनार्थ कहे ‘महाराज राज्य सभा में जाने से पूर्व राजमहिषी से मिलकर जाते हैं। यहाँ राजमहिषी का अर्थ राजरानी ही किया जाना चाहिए। यदि राज्य द्वारा पोषित भैंस इसका अर्थ किया जाय तो अर्थ करने वाले की बुद्धि पर तरस ही आ सकता है।

वेदों में स्वाभाविक रूप से ‘मेध’ ‘बलि’ आलभन’ आदि शब्द बहुतायत से आये हैं। इनमें से प्रत्येक अनेक अर्थ हैं। उनमें एक अर्थ हिंसा परक भी होता है किन्तु युक्ति संगत अनेक अर्थों की उपेक्षा करके अविवेकपूर्ण एक अर्थ पर ही आग्रह टिका देना किसी भी विचारशील को शोभा नहीं देता। एक−एक शब्द के अर्थ एवं उनके प्रचलित उपयोग पर विचार करने से बात और अधिक स्पष्ट हो जायेगी।

मेध− व्याकरण के अनुसार सूत्र है−

मेधृ−मेधा, हिंसनयोः संगमे च।

अर्थात्−मेध के तीन अर्थ होते हैं (1)मेधा−बुद्धि का संवर्धन (2)हिंसा (3)संगम, संगतिकरण, एकीकरण−संगठन।

मेध, यज्ञ का भी पर्यायवाची है। यज्ञ के लिए भी इसका प्रयोग होता है। इसीलिए भ्रम वश लोग यज्ञ में हिंसा का औचित्य मानने लगे। किन्तु यज्ञ विज्ञान में हिंसा के लिए कोई गुंजाइश नहीं है। निघण्टु में यज्ञ के 15 नाम−सम्बोधन दिए हैं, उन पर उनके अर्थों पर एक दृष्टि डालें तो बात स्पष्ट होगी। वे नाम हैं−

(1) यज्ञ:−यह यज् धातु से बना है। यज् देवपूजा−संगतिकरण−दानेषु−यह सूत्र है।

(के) देवों का पूजन−अर्थात् श्रेष्ठ प्रवृत्ति वालों का सम्मान एवं अनुसरण करना, (ख) संगतिकरण अर्थात्−प्रेमपूर्वक हिलमिल कर, सहकारिता के भाव से रहना, (ग) दान अर्थात्−करुणा भाव से अतीव दूर करने तथा श्रेष्ठ प्रवृत्तियों के पोषण के लिए अनुदान देना। यह कर्म यज्ञ है।

(2) वेन:−वेन−गति−ज्ञान−चिन्ता−निशामन वादित्र−ग्रहणेषु, यह सूत्र है। अर्थात्−यह गति देने, जानने, चिंतन करने, देखने, वाद्य बजाने तथा ग्रहण करने के अर्थ में प्रयुक्त होता है।

(3) अध्वर:−का सूत्र है ‘ध्वरति वधकर्मा’ ‘नध्वरः इति अध्वरः’−अर्थात्−हिंसा का निषेध करने वाला। इस सम्बोधन से भी स्पष्ट होता है कि हिंसा का निषेध करने वाले कर्म के किसी अन्य नाम का अर्थ हिंसापरक नहीं हो सकता। सभी जानते हैं कि यज्ञ कर्म में भूल से कोई कृमि−कीटक भी अग्नि के संसर्ग से मर न जाये इसके लिए अनेक सावधानियाँ बरती जाती हैं।

(4) मेध:−इसके तीन अर्थ पहले ही दिए जा चुके हैं। यह अध्वर का पर्यायवाची संबोधन है इसलिए यज्ञीय संदर्भ में इसका अर्थ हिंसा परक नहीं, लिया जा सकता।

(5) विद्थ−विद्−ज्ञाने सत्तायाम्, लाभे, विचारणे, चेतना−आख्यान−निवासेषु, के अनुसार इसका प्रयोग ज्ञान, अस्तित्व, लाभ, विचार, चेतना, व्याख्यान एवं निवास के अर्थों में होता है।

(6) नार्य:−नारी−’नृ−नये’ मनुष्यों के नेतृत्व के लिए, उन्हें श्रेष्ठ मार्ग पर चलाने के अर्थ में इसका उपयोग होता है।

(7) सवनम् सु−प्रसव−एश्वर्यो:− इसका तात्पर्य हुआ प्रेरणा देना, उत्पन्न करना और प्रभुत्व प्राप्त करना।

(8) होत्रा−हु−दान−आदानयो:−अदने च सूत्र के अनुसार सहायता देना, आदान−प्रदान करना एवं भोजन करना इसके भाव हैं।

(9) इष्टि:−इसका अर्थ ‘यज्ञ’ जैसा ही है। इच्छा तथा अवस्था के अर्थों में भी यह प्रयुक्त होता है।

मह धातु से

(10) मख:−इसका अर्थ पूजा−सत्कार, वृद्धि करना तथा भाषा होता है। ‘मंखगतौ’ से इसका अर्थ पूज्य, सचेतन, चंचल, आनन्ददायक एवं तेजस्वी भी होता है।

(11) देव−ताता:−इसका अर्थ देवत्व का विस्तार करना, श्रेष्ठ प्रवृत्तियों का संवर्धन होता है।

(12) विष्णु:−विष्लृ व्याप्तौ’ −अर्थात्−व्यापक कर्म इसका भाव है। स्वार्थगत कर्म ‘संकीर्ण कर्म’ कहे जाते हैं। सर्व भूतहित से किए जाने वाले कार्य व्यापक कर्म कहे जाते हैं।

(13) इन्दु:−’उन्दी−क्लेदने’ धातु के अनुसार इसका अर्थ गीला करना, शान्त करना होता है। चन्द्र एवं सोम इसके शान्ति बोधक पर्याय हैं।

(14) प्रजापति:−अर्थात्−प्रजा, सारी जनता का पालन करने वाला।

(15) घर्म:−गर्मी, उष्णता, ऊर्जा इसके अर्थ होते हैं। उक्त सभी संबोधनों के अर्थ देखने से भी यही निष्कर्ष निकलता है कि यज्ञ में हिंसक प्रयोगों का समावेश नहीं होना चाहिए। किन्तु मेध जैसे शब्दों का एक अर्थ हिंसापरक भी निकलता है इसलिए वैदिकी संदर्भ में हिंसापरक शब्दों का प्रयोग हिंसा के लिए न करने का स्पष्ट निर्देश दिया गया।

यहाँ थोड़ा विचार आलभन एवं बलि शब्दों पर भी कर लेना उचित होगा।

आलंभन:−का अर्थ स्पर्श, प्राप्त करना तथा वध करना होता है। किन्तु वैदिक संदर्भ में इसका अर्थ वध के संदर्भ में नहीं किया जाना चाहिए, जैसे −

ब्राह्मणे ब्राह्मणं आलभेत।

क्षत्राय राजन्यं आलभेत॥

इसका सीधा सही अर्थ होता है ‘ब्राह्मणत्व के लिए ब्राह्मण को प्राप्त करे, उसकी संगति करे और शौर्य के लिए क्षत्रिय को प्राप्त करे−उसकी संगति करे।

अब यदि आलभेत का अर्थ वध लिया जाय तो बेतुका अर्थ बनता है,’ब्राह्मणत्व के लिए ब्राह्मण तथा शौर्य के लिए क्षत्रिय का वध करे। ऐसे अर्थों से बचने के लिए ही कहा गया कि वैदिक संदर्भ में शब्दों के हिंसापरक अर्थ न किए जायँ।

बलि:− इस शब्द का भी अर्थ वध के संदर्भ में निकाला

जाने लगा है। वास्तव में सूत्र है बलि−बल्+इन्। इसका अर्थ है (1) आहुति, भेंट, चढ़ावा तथा (2) भोज्य पदार्थ अर्पित करना।

प्राचीन प्रचलन को देखें तो गृहस्थ के नित्यकर्मों में ‘बलि वैश्व देवयज्ञ’ का भी विधान है। इसमें भोजन का एक अंश निकाल कर उसे अग्नि को अर्पित किया जाता है। कुछ अंश लेकर पशु−पक्षियों एवं क्रमियों के लिए भी डाला जाता है। बलि कहलाने वाली इस क्रिया में किसी जीव के वध का तो प्रश्न नहीं उठता, दुर्बल जीवों को पोषण देने का विधान ही है।

उदाहरणार्थ :−मृच्छकाटिकम् (महाकवि शूद्रक के नाटक) में एक पात्र आर्य चारु दत्त अपने मित्र से कहते हैं−

“यासाँ बलिः सपदि मद्गृहदेहलीनाँ हंसैश्च, सारस गणैश्य विलुप्त पूर्वः।

अर्थात्−मेरे घर की देहलियों पर समर्पित ‘बलि’ को हंस एवं सारस आदि पक्षीगण खा जाया करते थे।”

स्पष्ट है कि ‘बलि’ बलि वैश्व के रूप में अर्पित अन्नादि ही है।

बलि का अर्थ ‘कर’−’टैक्स’ भी होता है।

रघुवंश महाकाव्य में राजा दिलीप की शासन व्यवस्था का वर्णन करते हुए कहा गया है−

प्रजानामेव भूर्त्पथं स ताभ्यो बलिमग्रहीत्।

सहस्रगुणमुत्स्रष्ट आदत्ते हि रसं रविः॥

अर्थात्−वे प्रजा के कल्याण के लिए ‘बलि’ ‘कर’ ग्रहण करते थे, उसी प्रकार जैसे सूर्य पानी का शोषण करता है किन्तु उसे हजार गुना करके बरसा देता है।

यहाँ भी बलि का प्रचलित अर्थ किया जाय तो क्या बात बनेगी?

संस्कृत कोष (वामन शिवराम आप्टेकृत) में बलि के अर्थ इस प्रकार हैं−

(1)आहुति, भेंट, (2) दैनिक आहार प्रदान करना,

(3)पूजा−आराधना, (4)उच्छिष्ट, (5)देवमूर्ति पर चढ़ाया गया नैवेद्य, (6) शुल्क, कर, चुँगी, (7) चंवर का डंडा, (8)राजा ‘बलि’ (प्रहलाद के पौत्र)।

श्राद्धकर्म में गोबलि,कुक्कुर बलि, काकबलि, विवीलिकादि बलि आदि का विधान है, उसमें कोई गौ, कुत्ता, कौआ या चींटी आदि का वध नहीं करता, उनके लिए श्रद्धापूर्वक भोज्यपदार्थ अर्पित किया जाता है।

हिन्दू धर्म कोश (डॉ. राजबलि पाण्डेय) में बलि को एक कन्नड़ भाषा का शब्द कहा है। इसे तमिल में ‘बरि’ तथा तैलुगु में ‘बेदगु’ कहते हैं। यह एक जाति विशेष के लिए प्रयुक्त संबोधन है। उस वन्य जाति के लोग किसी पशु−पक्षी, अथवा जलचर का चिन्ह धारण किए रहते हैं। यह चिन्ह उनके समुदायों की पहचान कराता है। जो समुदाय जिस प्राणी की चिन्ह धारण करता है उसके संरक्षण को अपना विशेष दायित्व मानता है। यहाँ भी ‘बलि’ संबोधन रक्षा करने वालों के लिए प्रयुक्त होता है, वध कर्ता के लिए नहीं।

यज्ञ में पूर्णाहुति के समय देवताओं एवं यज्ञ भगवान को भोज्य पदार्थ भेंट करने का विधान है। उसे ‘बलि’ ही कहा जाता है। उसमें सात्विक भोजन ही दिए जाते हैं। माँसाहार प्रेमियों ने सामिष भोजन अर्पित करना प्रारंभ कर दिया होगा और बलि का हिंसक अर्थ प्रचलित कर दिया गया। किन्तु वस्तुतः वैदिकी−यज्ञीय संदर्भ में हिंसक प्रयोग वर्जित माने गये हैं।


राष्ट्र एवं दिग्विजय, राजनीतिक नहीं साँस्कृतिक शब्द हैं

अश्वमेध में राष्ट्र का संगठन तथा दिग्विजय यात्रा, यह दो कार्य अनिवार्य माने गये हैं। लम्बे समय तक हम यज्ञीय−साँस्कृतिक परिभाषाओं से अलग−थलग पड़ गये थे, इसलिए मस्तिष्क में उसके अनुरूप प्रवाह कठिनाई से उठते हैं। राजनीतिक संदर्भ में हम उक्त दोनों शब्दों को लेने लगते हैं तो अनेक शंका−.............. मन में उठने लगती हैं। अश्वमेध प्रयोजन के लिए उन्हें व उनके वास्तविक साँस्कृतिक संदर्भों में समझना एवं प्रयुक्त करना आवश्यक है।

क्या है राष्ट्र?

भारत में ‘राष्ट्र’ सदैव एक साँस्कृतिक शब्द रहा है, राजनीतिक नहीं। पश्चिमी देशों में राष्ट्र को राज्य ‘नेशन या स्टेट’ के रूपों में ही लिया गया है। वहाँ राष्ट्र एवं राज्य समानार्थी माने जाते हैं। उसका अस्तित्व राज्य सत्ता पर निर्भर करता है। अब उसे तकनीकी−आर्थिक (टैक्नो इकाँनाँमिकल) इकाई भी माना जाने लगा है। यही कारण है वहाँ सभी ओर स्वार्थपूर्ण स्पर्धा, संघर्ष वातावरण ही पनपता रहता है।

भारत में राष्ट्र सदैव से एक साँस्कृतिक इकाई है। राष्ट्र उपास्य है, इष्ट है। सैकड़ों राज्यों विभिन्न उपासना पद्धतियों, विभिन्न भाषाओं एवं विभिन्न वेषभूषाओं के होते हुए भी भारत ‘एक राष्ट्र’ रहा है। हमारे ऋषियों ने संसार की प्रकृति प्रदत्त विविधताओं को बहुत सहज भाव से स्वीकार किया। किन्तु मनुष्य के अंतःकरण में स्थित परिष्कृत चेतना को लक्ष्य करके साँस्कृतिक एकता के भाव भरे सूत्रों को विकसित एवं प्रतिष्ठित करने में सफलता पायी।

‘मानवीय चेतना विज्ञान के मर्मज्ञ ऋषियों ने अनुभव किया कि केवल भौतिक आधारों पर बनाये गये सम्बन्ध टिकाऊ−चिरंजीवी नहीं हो सकते। भौतिक आधारों को प्रधानता देकर चलने से स्वार्थ, प्रतिस्पर्धा, संघर्ष, शोषण आदि का समावेश देर−सबेर हो ही जाता है। इसीलिए उन्होंने राष्ट्रीय अवधारणा को कालजयी बनाने के लिए साँस्कृतिक आधारों को ही प्राथमिकता दी। साँस्कृतिक सूत्रों को उन्होंने जन−जन के भावनात्मक स्तर तक गहराई से बिठाने में सफलता पायी। यही कारण है कि हम गर्व से कह पाते हैं। कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी “भले ही सदियों तक ‘दौरे जमाँ’ (साँसारिक राजनीतिक चक्र) हमारा दुश्मन रहा है।

‘भारतभूमि’ निर्जीव भूखंड नहीं है, एक चेतन सत्ता है, स्वर्गादपि गरीयसी है। वह तप शक्ति एवं सद्भावनाओं को अपने अंदर धारण करने में, उन्हें बीजों की तरह फलित विकसित करने में समर्थ है। सन्तों के ऋषियों के तप को धारण करने के कारण इस भूमि में जगह−जगह तीर्थ बन गये हैं। उनके प्रति जन, श्रद्धा क्षेत्र एवं भाषा भेद से ऊपर उठकर, सतत् प्रवाहमान है। साँस्कृतिक अवधारणा हर भारतीय की रगों में रक्त की तरह सतत् प्रवाहित है।

अयोध्या में जन्मे राम कन्याकुमारी में रामेश्वरम् की स्थापना करते हैं। बृज के श्रीकृष्ण द्वारिका में अपना आवास बनाते हैं। बंगाल के चैतन्य बृज में आकर अपने इष्ट के लीला क्षेत्र को खोजते हैं। केरल में जन्मे शंकराचार्य चारों दिशाओं में चारधामों की स्थापना करके कश्मीर के सरस्वती मन्दिर के पट खोले बिना अपनी यात्रा पूर्ण नहीं मानते। वे अपना शरीर दक्षिण में नहीं उत्तराखण्ड में छोड़ना पसंद करते हैं। गंगोत्री का जल पिये बिना रामेश्वरम् की प्यास नहीं बुझती। उत्तराखण्ड के देवालयों के देवता दक्षिण के पुजारी माँगते हैं। भक्त को रामेश्वरम् केदारनाथ, सोमनाथ, विश्वनाथ, पशुपतिनाथ, महाकालेश्वर, अमरनाथ आदि सभी जगह एक ही इष्ट के दर्शन होते हैं। वैष्णोदेवी से कन्याकुमारी तथा अम्बाजी (गुजरात) से कामाख्या (आसाम) .............. एक ही मातृसत्ता को नमन किया जाता है।

यह भाव भरी साँस्कृतिक चेतना ही उस कालजयी राष्ट्र को बनाती है जो ‘भारत’ कहलाता है। इस राष्ट्र का संगठन राजनीतिक महत्वाकाँक्षाओं से न कभी किया जा सका है और न कभी किया जा सकेगा। किन्तु साँस्कृतिक सूत्रों में बँधकर यह राष्ट्र सदैव विश्व मुकुट बना है और पुनः बनकर रहेगा। इसलिए राष्ट्रीय एकत्व का लक्ष्य अश्वमेध जैसे विराट यज्ञीय अनुष्ठानों द्वारा ही प्राप्त किया जाता रहा है, पुनः किया जाना है।

अश्वमेध की दिग्विजय

अश्वमेध के साथ दिग्विजय यात्रा अविच्छिन्न रूप से जुड़ी हुई है। दिग्विजय यात्रा पूरी किये बिना अश्वमेध यज्ञ की आधार भूमि ही नहीं बनती है।

विजय शब्द सुनते ही किसी युद्ध में विजय की कल्पना उभरती है। यह भी इसलिए है कि हमारा चिन्तन देवसंस्कृति की धारा से काफी दूर हो गया है। हमारे यहाँ तो आत्म विजय−मनोजय को ही सबसे श्रेष्ठ विजय माना गया है। जीवन को एक समर का गया है। उसमें आसुरी−पाशविक प्रकृतियों को पराजित करके दैवी प्रवृत्तियों को विजयी बनाया जाता है।

अश्वमेध प्रकरण में साँस्कृतिक दिग्विजय का ही विधान है। समय के अनुरूप कुछ साँस्कृतिक अनुशासनों को अनिवार्य मानकर उनका विस्तार जन−जन तक किया जाता था। उन अनुशासनों−निर्धारणों को धातु की पट्टियों पर अंकित करके यज्ञाश्व पर स्थापित किया जाता था। अश्व सारे क्षेत्र में घूमता था। उस पर अंकित सूत्रों को पढ़कर लोग उस समय के लिए ऋषियों एवं शूरवीरों द्वारा घोषित अनिवार्य नियमों को जान लेते थे और उनका अनुसरण करने लगते थे। यह एक विशुद्ध साँस्कृतिक अभियान होता था। शक्ति के बल पर लोगों को पराधीन बनाने वाला व्यक्ति अश्वमेध करने के योग्य नहीं माना जाता था। निम्न पौराणिक आख्यानों से यह बात स्पष्ट हो जाती है−

स्कंद पुराण की कथा है−देवगुरु बृहस्पति इन्द्र से रुष्ट होकर अज्ञात स्थल पर जाकर तप करने लगे। इन्द्र दुखी होकर उन्हें खोजते फिरे। राज्य अस्त−व्यस्त होने लगा। अवसर का लाभ उठाकर पाताल के राजा बलि ने आक्रमण करके स्वर्गलोक को जीत लिया। वे स्वर्ग का वैभव अपने राज्य में ले गये किन्तु लक्ष्मी सहित सभी दिव्य पदार्थ लुप्त हो गये। स्वर्ग सुखों के लुप्त हो जाने से दुखी राजा बलि गुरु शुक्राचार्य के पास गये। उन्होंने कहा “बिना अश्वमेध यज्ञ किये तुम्हें स्वर्ग सुख प्राप्त नहीं हो सकते। एक सौ अश्वमेध अनुष्ठान पूर्ण करने पर तुम इन्द्र के समतुल्य होकर स्वर्गीय पदार्थों का भोग कर सकोगे।”

इस आख्यान से बात बहुत साफ हो जाती है। बलि स्वर्ग को जीत कर लौकिक अर्थों में दिग्विजय कर चुके थे। किन्तु यह विजय उनके किसी काम नहीं आयी। यज्ञीय सद्भाव प्रेरित साँस्कृतिक यात्रा ही उन देव वृत्तियों को जन्म दे सकती है जिनके आधार पर स्वर्गीय पदार्थों की पात्रता सिद्ध होती है।

महाभारत के आश्वमेधिक पर्व में भी ऐसी ही विवरण मिलता है। युधिष्ठिर ने यज्ञाश्व के साथ अर्जुन को भेजा और यह निर्देश दिया कि “यदि कोई राजा अश्वमेध की घोषणाओं को स्वीकार न करे तो भी झगड़ा मत करना, उससे समय पर यज्ञ में पहुँचने का आग्रह करना।” उन्हें इस बात का भरोसा था कि यदि कोई भ्रमवश असहमति प्रकट करता है, तो भी यज्ञीय वातावरण में, ऋषियों एवं वीर पुरुषों की सहमति के प्रभाव से वह भी सहमत हो जायेगा।

अश्वमेध के अनुरूप दिग्विजय यात्रा भगवान बुद्ध के धर्मचक्र प्रवर्तन एवं आदि शंकराचार्य की ‘शंकर दिग्विजय को कहा जा सकता है। आज की परिस्थितियों में मनुष्य मात्र को उन साँस्कृतिक सूत्रों की खोज है जिनके आधार पर विग्रह मिटें और स्वर्गीय परिस्थितियों का निर्माण किया जा सके। ऋषियों की धरोहर−देव संस्कृति के समय के अनुकूल व्यावहारिक सूत्रों को जन−जन तक पहुँचाना आज की अनिवार्यता है। उसी आधार पर व्यक्तियों में देवत्व का विकास एवं धरती पर स्वर्ग का अवतरण संभव होगा। इसीलिए यह आश्वमेधिक अनुष्ठान प्रारंभ किया गया है।


मेधा को जो जगाये, वह है−अश्वमेध

अथर्ववेद में एक मंत्र आता है−

अग्ने समिध महर्षि बृहते जातवेदसे स में श्रद्धाँ मेघाँ च जातवेदः प्रयच्छतु॥ (19/64/15)

अर्थात्− “हे यज्ञाग्ने! तू महान और सब उत्तम पदार्थों को प्राप्त कराने वाला है। अतः मैं मेरे अंदर श्रद्धापूर्वक समिधा प्रदान करता हूँ। तू कृपाकर मुझे श्रद्धा और मेधा प्रदान कर।” इसी प्रकार ऋग्वेद का ऋषि एक स्थान पर कहता है−

‘इमं यज्ञं मेधावन्तं कृधीः” (प्रभो! हमारे इस यज्ञ को मेधावान बना दो) तथा “जातवेदो मेधाँ अस्मासु धेहि (हे यज्ञाग्ने! तू हमारे अन्दर मेधा को धारण करा)।

उपरोक्त श्रुति वचनों के माध्यम से यह बताने का प्रयास किया जा रहा है कि विराट अश्वमेध स्तर के यज्ञों का एक महत्वपूर्ण प्रयोजन एक व्यापक स्तर पर प्रसुप्त पड़ी प्रतिभा के मेधा के जागरण के लिए भी होता है। यह मनुष्य की प्रतिभा ही है, जिसने उसे अन्य जीवधारियों से भिन्न बनाया है। इसी के बलबूते वह वैज्ञानिक के रूप में प्रकृति का रहस्योद्घाटन करने और प्राणी जगत का भाग्यविधाता होने का दावा करता है। अनेकानेक प्रकार के तत्वदर्शन के सिद्धान्त गढ़ने से लेकर शासन और समाज की संरचना तथा साहित्य का अक्षय भण्डार खड़ा कर देना एवं पृथ्वी को अनगढ़ता की स्थिति से सुगढ़ सुविकसित स्थिति में पहुँचा देने का पराक्रम मानवी मेधा प्रतिभा का ही चमत्कार है। संभवतः इसी कारण ऋषि कहते आये हैं−न मानुषात् हि श्रेष्ठतरं किंचित (मनुष्य से श्रेष्ठ इस दुनिया में कोई अन्य नहीं है)।

इतना सब होते हुए भी विडम्बना वही सामने आ कर खड़ी हो जाती है कि प्रतिभा का विपुल भण्डार अंतः सत्ता में भरा होते हुए भी उसे उभरने प्रकट होने का अवसर उन दबावों के कारण नहीं आ पाता जो कषाय कल्मषों के रूप में आत्मसत्ता के ऊपर स्वेच्छापूर्वक लाद लिए गये हैं। लकड़ी सामान्यतया पानी पर तैरती रहती है, किन्तु यदि उस पर भारी चट्टानें बाँध दी जायें तो वह अपना स्वाभाविक गुण तैरना भूलकर डूब जाती है। विभूतियों से अभिभूषित होने के बावजूद मनुष्य निकृष्टता की चट्टान सिर पर लाद लेने के उपरान्त अपना वास्तविक स्वरूप दिखा पाने की स्थिति में रह ही नहीं जाता। आज के समाज का जो भी स्वरूप हमारे समक्ष है, वह इसी विडम्बना के कारण ऐसा दृष्टिगोचर होता है। संव्याप्त अवाँछनीयताओं से जूझकर उन्हें परास्त करना तथा नवयुग की सृजन व्यवस्था को कार्यान्वित करने की समर्थता इस कारण नहीं संभव बन पर रही है कि ये दोनों ही कार्य तेजस्वी, मेधावान, जाग्रत, प्रतिभाशालियों के बलबूते ही संभव हो सकते हैं। आड़े समय में ऐसे ही व्यक्ति आगे आते व संस्कृति समाज की नौका को उफनते समुद्र में से खेते हुए ले जाते हैं। इस प्रतिभा को समाज, राष्ट्र ही नहीं विश्व के समष्टि से स्तर पर जगाने के लिए जिस पराक्रम की आवश्यकता है, वह भौतिक नहीं, अध्यात्म जगत से उपजने वाला तथा सुनियोजित ढंग से किया जाने वाला धर्मानुष्ठान स्तर का होने पर ही अभीष्ट उपलब्धियाँ संभव हैं।

परम पूज्य गुरु देव का जीवन तिल–तिलकर अपने जीवन का एक−एक क्षण संस्कृति की सेवा में होमकर देने वाले एक महायाज्ञिक का जीवन है। एक खुली किताब के रूप में उनके अस्सी वर्ष के जीवन के घटनाक्रम प्रमाण देते हैं कि किस तरह से वे प्रतिभा जागरण के उद्देश्य को लेकर सतत् पुरुषार्थरत रहे व संधिकाल की इस विषमवेला में, जहाँ महाविनाश का प्रलयंकारी तूफान अपनी प्रचण्डता का परिचय दे रहा है, उनने जन−जन के मन में सतयुगी नवसृजन की उमंगें जगा दीं। आज जब कोई भी उज्ज्वल भविष्य की बात करता नहीं दीखता, तब उनने .............. तमिस्रा के साम्राज्य में भी ब्रह्ममुहूर्त का आभास प्राची में उदीयमान होते दीख पड़ने तथा इक्कीसवीं सदी उज्ज्वल भविष्य का उद्घोष खुले रूप में सबके समक्ष किया।

सरस्वती उपनिषद् में एक स्थान पर आया है− ”यज्ञं दधे सरस्वती” (यज्ञ से ही सरस्वती प्रसन्न होती है) संभवतः उपनिषद् की इस उक्ति के वैज्ञानिक परीक्षण हेतु ही परम पूज्य गुरु देव ने जून 1955 में गायत्री तपोभूमि मथुरा में एक सरस्वती यज्ञ गायत्री जयंती के उपलक्ष्य में आयोजित किया था। अपने चौबीस महापुरश्चरणों की महापूर्णाहुति वे गायत्री तपोभूमि में चौबीस कुण्डीयज्ञ में अखण्ड अग्नि की स्थापना कर दो वर्ष पूर्व ही कर चुके थे। नवम्बर 1948 के सहस्रकुण्डी महायज्ञ से पूर्व यज्ञ संबंधी कई प्रयोग साधक स्तर के व्यक्तियों व जनसामान्य पर किये गये। इस सबका मूल उद्देश्य था प्रतिभा संवर्धन में यज्ञ प्रक्रिया किस प्रकार फलदायी होती है, यह जाना जाय। परम पूज्य गुरु देव के यह शोधप्रयास अनेक विस्मयकारी परिणाम लेकर आए। उनने इस सभी विवरणों को दो यज्ञाँकों के रूप में जुलाई−अगस्त 1955 की अखण्ड−ज्योति में प्रकाशित किया। उसमें वे विष्णु धर्मोत्तर पुराण की साक्षी देते हुए अश्वमेध के संबंध में लिखते हैं कि−”मनुष्य इस यज्ञ को करने से मेधा को प्राप्त होते हैं तथा उनके पापों का नाश होता है। वाँछित मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं तथा परमपद की प्राप्ति सत्याचरण के कारण निश्चित ही होती है।”

इसी यज्ञ के विषय में आगे वे लिखते हैं, कि एक वर्ष तक गायत्री महायज्ञ, रुद्रयज्ञ, महामृत्युँजययज्ञ विष्णुयज्ञ, शतचंडीयज्ञ, नवग्रहयज्ञ, यजुर्वेदयज्ञ, ऋग्वेदयज्ञ, अथर्ववेदयज्ञ, सामवेदयज्ञ, की निरन्तर श्रृंखला द्वारा वे अश्वमेध स्तर की महायज्ञ प्रक्रिया पूरी कर उन कार्यकर्त्ताओं का उत्पादन करेंगे जिन्हें सूर्य की अशाँत स्थिति वाले बुरे समय में सारे विश्व के कल्याण का संकल्प लेना है। क्रमशः ये यज्ञ संपन्न हुए भागीदारों से जप−अनुष्ठान संपन्न कराये गये। उनका पत्राचार पाठ्यक्रम से शिक्षण चला तथा प्रतिभा परिष्कार हेतु परम पूज्य गुरु देव ने व्यक्तिगत चर्चा द्वारा उन्हें ध्यान साधना से लेकर यज्ञ प्रक्रिया में भागीदारी का सुयोग्य प्रशिक्षण भी दिया। वे लिखते हैं कि यज्ञ में प्रयुक्त मंत्रोचार की प्रक्रिया ही अश्वमेध की सफलता का प्राण है।

पावका नः सरस्वती बातेभि, र्वाजिनीवती, यज्ञं वष्ट धिया वसुः।

अथर्ववेद के इस मंत्र द्वारा ऋषि कहते हैं कि “वाक् तप से पावन करती है, पुष्टि करती है तथा बुद्धि की प्रचोदना करती है।” शतपथ ब्राह्मण के काण्ड तेरहवें के अध्याय एक (ब्रह्म 18) में एक मंत्र आता है−”सरवतत्यै स्वाहा, सरस्वत्यै पावका यै स्वाहा, सरस्वत्यै बृहत्यै स्वाहा”(वाणी सरस्वती है, यज्ञ उसे उभारता है)। इस विशेषता के कारण ही अश्वमेध को यज्ञों का राजा कहा गया है−

राजा वाऽएष यज्ञानाँ श्दश्वमेधः। (1/2/2/13)

‘मेध’ शब्द जो अश्वमेध में प्रयुक्त होता आया है, उसका अर्थ वस्तुतः ‘अग्निहोत्र’ नहीं, विद्युत से है। इसी से ‘मेधा’ शब्द बना है। संसार में मेध अर्थात्−मेधा जिस परिमाण में मनुष्य में है, उतना और किसी वस्तु में नहीं है। मनुष्यों में भी जिसमें इसकी मात्रा सर्वाधिक देखी पायी जाती है, वे ‘मेधावी’ कहलाते हैं। यह मेधा ही है जो बिजली के रूप में नसों−माँसपेशियों में उछलती कूदती तथा मस्तिष्कीय प्रखरता के रूप में अनेकानेक गुत्थियों का समाधान निकालती देखी जाती है। ओजस्विता, मनस्विता, तेजस्विता के रूप में इसी का गुणगान होता है। होती तो यह सभी मनुष्यों में है पर व्यक्ति−व्यक्ति में इसका परिमाण भिन्न−भिन्न मात्रा में होता है। मस्तिष्कीय विद्युत आवेश का प्रायः 83 प्रतिशत निरर्थक ही पड़ा रह जाता है। दैनन्दिन जीवन के क्रिया–कलापों में उनका उपयोग न हो पाने के कारण बहुमूल्य क्षमताएँ, दैवी विभूतियाँ, ऋद्धि−सिद्धियाँ, प्रसुप्त स्थिति में ही किसी कोने में पड़ी रह जाती हैं। जो कुछ भी मेधावी−मनस्वी में उभरता−उफनता देखा जाता है। वह यही उफनकर ऊपर आया हुआ विद्युत प्रवाह ही होता है।

उच्चस्तरीय प्रतिभा ही ब्रह्मतेज है। यही ब्रह्मवर्चस् है। अश्वमेधों में इसी प्रतिभा को उभारा परिमार्जित किया जाता है, वह भी समष्टिगत स्तर पर। यज्ञ कैसे इस प्रक्रिया को संपन्न करता है, इस संबंध में शास्त्र विवेचन हमारा समाधान करते हैं। ऋषियों ने देखा कि मानवी मेधा तो स्थायी नहीं है क्योंकि मृत्यु पश्चात् यह तिरोहित हो जाती है और शरीर सड़ने लगता है। अस्तु पशुओं में अश्व का निरीक्षण किया गया। वह सबसे चंचल और द्रुतगामी भी है। उसमें भी वही त्रुटि पायी गयी। फिर गाय की जाँचा पड़ताल की गयी। यहाँ भी मेधा क्षण भंगुर पायी गयी। इस प्रकार ऋषियों ने अन्वेषण से पता लगाया कि मृत्यु पश्चात् सबसे पहले मानव शरीर में सड़न आरंभ होती है तत्पश्चात् घोड़े में, फिर गौ व उसके बाद बकरी में। ...................... का सड़ना गलना तब आरंभ होता है जब कार्यविद्युत निकल जाती है। यह मनुष्य की विशेषता है कि उसमें जितनी जल्दी जितनी बड़ी मात्रा में बिजली एकत्रित होती है, उतनी ही जल्दी मरणोपराँत पलायन भी कर जाती है। स्थायी मेधा किसी में भी नहीं है। तब ऋषियों ने मृत्तिका का निरीक्षण किया। पता चला कि उसमें मेधा तो है, पर सूक्ष्म व बिखरी हुई। तब विचार किया गया कि इससे जो वनस्पतियाँ एवं धान्य उत्पन्न होते हैं, वह मृत्तिका से ही मेधा प्राप्त करते रहे होंगे, जिन्हें खाकर हम मेधा संपन्न बनते हैं। इस प्रकार पादपों की जाँच−पड़ताल प्रारम्भ हुई। इस उपक्रम में जौ ही ऐसा धान्य साबित हुआ, जिसमें सर्वाधिक परिमाण में मेधा मिली। अस्तु यज्ञ में जौ का प्रयोग प्रारंभ हुआ। अश्वमेधों में जौ की आहुतियाँ द्वारा इसी मेधा को अन्.......... सूक्ष्म ऊर्जाओं समेत ग्रहण व धारण किया जाता है।

पद्मपुराण की उक्ति सही ही है−

‘हयमेसं’ चरित्वा समेधाँ समृद्धिं प्राप्नोति।

अर्थात्−”अश्वमेध करने वाले मेधा और समृद्धि को पाता है।”...........................................................

......................................................................................................................................................................................................................................................................................

बुद्धि तो भाँति−भाँति के तर्क−जंजाल बुनती हुई अपनी स्वार्थपूर्ति की राह पर ही मनुष्य को चलाती है। यदि सारी धरित्री का वातावरण बदलना है तो उस सूक्ष्म जगत में आमूल चूल परिवर्तन लाना होगा। जो समष्टिगत मन की चेतना के मिलने पर (कलेक्टिव कान्शसनेस) विनिर्मित होता है। यज्ञ जो अश्वमेध स्तर के होते हैं, यही कार्य करते हैं। यज्ञ वस्तुतः भौतिक ऊर्जा व प्राण ऊर्जा के सम्मिलित प्रयोगों के रूप में संपन्न होते हैं। इसकी प्रतिक्रिया स्वरूप लोगों के मनों में मनस्विता का− प्रतिशीलता का जागरण होता है। यह जाग्रत प्रतिभा सूक्ष्म में हलचल पैदा कर वातावरण को बदलती है तथा श्रेष्ठ चिंतन तरंगों को जन्म देती है।

इन दिनों अनौचित्य की बाढ़ रोकने और दलदल को मधुवन बनाने जैसी समय की चुनौती हम सबक समक्ष है। विनाश का ताण्डव रोकना और विकास का सरंजाम जुटाना ऐसा ही है, जैसे खाई को पाटना भर ही नहीं, वरन् उस स्थान पर ऊँची मीनार खड़ी करने जैसा दुहरा पराक्रम। इसे प्रवाह को उलटना ही नहीं, उलटे को उलटकर सीधा करने की प्रक्रिया कह सकते हैं। हमेशा ऐसा समय जब आया है, स्रष्टा की प्रेरणा से धरती पर ऐसे विलक्षण प्रयोग हुए हैं और व्यापक स्तर पर असंभव को संभव कर दिखाने वाली प्रतिभाएँ जन्मी हैं। युगपरिवर्तन की यह विषम वेला ऐसी है जो बड़ी प्रतीक्षा के बाद युग−युगान्तरों के बाद आयी है। इन दिनों ऐसा कुछ होने जा रहा है जो दुहरे प्रयोजन वाला असंभव माना जाने वाला इति और अथ के समन्वित सन्धिकाल के बाद नये युग का सूत्रपात करने जा रहा है। ऐसे में अश्वमेध या की प्रेरणा इसी निमित्त सूक्ष्म जगत से उभरी है कि संव्याप्त दुष्प्रवृत्तियों से जूझने हेतु एक विराट जनसमुदाय मनस्वी−प्रतिभा सम्पन्न समूह के रूप में जन्म ले। भारत व विश्व भर की भूमि पर संपन्न होने जा रहे अश्वमेधों की ..............................

..................................................................................................................................................................................................................................................... का सुयोग प्राप्त कर जीवन धन्य बनाया जाना चाहिए।


अश्वमेध सविता एवं गायत्री साधना

अश्वमेध का पहला यजन प्रयोग प्रजापति (समस्त प्रजाओं के स्वामी परमात्मा) ने किया था। शतपथ ब्राह्मण के तेरहवें काण्ड में वर्णित वह आलंकारिक प्रसंग इसी अंक के प्रथम पृष्ठ पर दिया भी गया है। उस संदर्भ से स्पष्ट हो जाता है कि सृष्टि की संरचना एवं व्यवस्था रूप यज्ञ को ऋषि ने ‘अश्वमेध यज्ञ’ कहा है।

वेदों में उस प्रथम यज्ञ का वर्णन ऋग्वेद के 10 वें मण्डल के 90 वें .....................................................

................... में मिलता है। प्रथम यज्ञ के अधिष्ठाता पुरुष (परमात्मा) को यज्ञ रूप होने के कारण उसे ‘यज्ञ पुरुष’ भी कहा गया है। उक्त यज्ञीय पुरुषार्थ का वर्णन .....................................................................

............................................................................................................................ सूक्त कहा गया है।

उस प्रथम यज्ञ में यज्ञकर्ता, यज्ञाग्नि, यज्ञहवि आदि सभी रूपों में उसी यज्ञपुरुष−परमात्मा की भूमिका रही। इसीलिए यजु. 31/16 में ‘यज्ञेन यज्ञम् अयजन्त देवा:−......................................................................

.................

अश्वमेध की प्राणप्रक्रिया−

सृष्टि रचना के संदर्भ में शास्त्रों में वर्णन है कि परमात्मा ने देखा कि सभी पदार्थ निश्चेष्ट हैं तो उन्हें सक्रिय बनाने के लिए उन्होंने स्वयं प्राणरूप होकर उनमें प्रवेश किया। सभी जगह संव्याप्त होने की सामर्थ्य के कारण इस प्राण रूप परमतत्व को ‘अश्व’ कहा गया। वह यज्ञीय भाव से हर पदार्थ में आहुति की तरह प्रविष्ट हुआ। इसलिए यह क्रिया ‘मेध’ कहलायी। यही प्रथम अश्वमेध था। इसी भाव को यजु. 31/15 में इस प्रकार व्यक्त किया गया है।

‘देवाँ यद्यज्ञं तन्वाना अवध्नन् पुरुषं पशुम्।

अर्थात्−’देव’ जिस यज्ञ का विस्तार कर रहे थे, उससे यज्ञ पुरुष ही पशुरूप में सम्बद्ध हुआ।

‘पशु’ का एक अर्थ होता है देखने वाला। परमात्मा सबको देखने वाला है। उसने सृष्टि को देखा तथा उसे सक्रिय करने के लिए स्वयं को प्राणरूप में प्रत्येक घटक के साथ आबद्ध किया। यही प्राण सर्वत्र व्याप्त हो उठा, इसलिए ‘अशु व्याप्नोति’ के अनुसार वह अश्व भी कहलाया। जिस प्रकार आहुति यज्ञाग्नि के साथ एकाकार हो जाती है, उसी प्रकार यह प्राणचेतना सृष्टि के विभिन्न घटकों के साथ एकरूप हो गयी, वह यज्ञीय प्रक्रिया ‘मेध’ कहलायी। इस प्रकार सृष्टि में प्राण संचार की प्रक्रिया को प्रजापति द्वारा किया गया प्रथम अश्वमेध कहा गया।

मेध का अर्थ क्रिया रूप में लिया जाय तो मेरे द्वारा धारण किया गया (मे−धा) भी होता है। परमात्म चेतना सर्वत्र अश्वरूप में संचरित हो रही है। इसे जब किसी पदार्थ अथवा प्राणी द्वारा धारण किया जाता है, तो वह क्रिया मेध कहलाती है। प्राणियों में सक्रिय मेधा शक्ति इसी दिव्य मेध प्रक्रिया की अभिव्यक्ति कही जा सकती है। इस प्रकार यह अश्वमेध प्रक्रिया सृष्टि के विकास की यज्ञीय प्रक्रिया बनी।

पुरुष सूक्त में कहा गया है कि यह तो सृष्टि है वह इसी यज्ञ पुरुष की महिमा से संचालित है−

‘पुरुषएवेदœसर्वं” यद्भतं यच्चभाव्यम्, उतामृतत्वस्येशानी यदन्नेनातिरोहति॥

अर्थात्−जो अब तक हो चुका है और जो आगे संभावित है, वह यह पुरुष ही है। यही पुरुष अमरता का नियंत्रक−स्वामी है तथा अन्य कर्तृत्ववानों के साथ रहता है।

इस प्राण प्रसारक यज्ञीय प्रक्रिया का विस्तार हुआ तो दूसरे चरण में दिव्य चेतना को धारण और उसका प्रसारण करने वाले सूर्य−चन्द्र आदि की उत्पत्ति हुई−

‘चन्द्रमा मनसोजातश्चक्षोः सूर्यो अजायत’। यजु. 31/12

आकर्षण समझा जाना चाहिए। इसी कारण से शास्त्रकारों ने इन्हें शिल्पियों द्वारा ठीक−ठीक तैयार करवाने का निर्देश दिया है।

आधुनिक प्रचलित क्रियाओं में चतुष्कोण, अर्धचन्द्र त्रिकोण, वृक्ष, विषमषडस्र विषमअष्टस्र, पद्म, समषडस्र समअष्टस्र और योनिकुण्ड का उपयोग होता है। इनके चित्र साथ के पृष्ठ पर देखे जा सकते हैं।

आयाम विस्तार की भाँति ही−कुण्ड सिद्धि, और शारदा तिलक में कुण्ड की गहराई का विवेचन प्राप्त होता है। इसके अनुरूप जितना कुण्ड का विस्तार और आयाम हो उतना गहरा प्रथम मेखला तक करना चाहिए। तथा गहराई चौबीसवें भाग में कुण्ड का निर्माण होना श्रेष्ठ है। ‘क्रियासार’ और लक्षण संग्रह के अनुसार एक मेखला वाला कुण्ड अधम, दो मेखला वाला मध्यम और तीन मेखला वाला उत्तम होता है। कुछ विद्वानों के अनुरूप पाँच मेखला वाला कुण्ड उत्तम है।

इन मेखलाओं में सत्त्व, रजस् और तमस् की भावना से तीनों रंग भरे जाते हैं। मेखलाएँ पाँच हों वहाँ पंचतत्व की भावना से रँगने का विधान है।

कुण्ड निर्माण का विषय ज्यामिति, भूमिति, क्षेत्रमिति और वास्तुशास्त्र से अधिक सम्बन्ध रखता है। इस सम्बन्ध में अधिक रुचि रखने वाले जिज्ञासुओं को कुण्डसिद्धि, भविष्य, पुराण, वायु पुराण, अनुष्ठान प्रकाश, पंचरात्र क्रियासार समुच्चय शारदातिलक आदि ग्रन्थों का अवलोकन−अध्ययन करना चाहिए।

कुण्डों की रचना में भिन्नता का उद्देश्य यह है कि काम्यकर्मों की प्रधानता के अनुसार, उद्देश्यों की भिन्नता के अनुरूप, अलग−अलग आकार वाले भिन्न−भिन्न दिशाओं में कुण्ड बनाने से फल सिद्धि शीघ्र होती है। बहवृच परिशिष्टदि ग्रन्थों में कहा है− भुक्तौ−मुक्तौ तथा पुष्टौ जीर्णोद्वारे विशेषतः। सदा होमे तथा शान्तोवृतँ वरु णादिग्मतम् अर्थात्−भुक्ति−मुक्ति पुष्टि, जीर्णोद्धार, नित्य हवन तथा शान्ति के लिए पश्चिम दिशा में वृत्ताकार कुण्ड का निर्माण करना चाहिए। इसी प्रकार दिशा भेद का विशेष स्पष्टीकरण करते हुए अन्य ग्रंथकारों ने लिखा है−स्तम्भन के लिए पूर्व दिशा में चतुरस भोग प्राप्ति के लिए अग्निकोण में योनि के आकार वाला, मारण के लिए दक्षिण दिशा में अर्धचन्द्र, अथवा नैऋत्य कोण में, त्रिकोण शान्ति के लिए पश्चिम में वृत्त, उच्चाटन के लिए वायव्यकोण में षडस्र, पौष्टिक कर्म के लिए उत्तर में पद्माकृति और मुक्ति के लिए ईशान में अष्टस्र कुण्ड प्रयुक्त होते हैं। इनमें से कुछ विशिष्ट कार्यों के लिए भी प्रयुक्त होते हैं−

पुत्र प्राप्ति के लिए योनिकुण्ड, भूत, प्रेत और ग्रहबाधा विनाश के लिए पंचास्र का प्रयोग होता है।

नित्य नैमित्तिक हवन में यदि हवनकुण्ड के निर्माण की सामर्थ्य न हो−तो शारदा तिलक के अनुसार “नित्यं नैमित्तिकं होमं स्थण्डिलें वासभाचरेत्” अर्थात्−चार अंगुल ऊँचा, एक हाथ लम्बा चौड़ा सुवर्णवर्ण पीली मिट्टी अथवा बालू रेती का स्थण्डिल बनाया जा सकता है। शास्त्रकारों के अनुसार कुण्डमेव विधानस्यात् स्थण्डिलेवा समाचरेत् स्थण्डिल (वेदिका) का वही स्थान है जो कुण्ड का है। शास्त्रों में यज्ञ के द्वारा बताए गए परिणामों को जीवन में चरितार्थ करने के लिए जरूरी है−यज्ञ विधान और उपकरणों की विशेषताएँ भी समझी और व्यवहार में लायी जायँ।

इस दृष्टि से वर्तमान समय में सम्पन्न की जा रही अश्वमेध महायज्ञों की श्रृंखला को अभूतपूर्व कहा जा सकता है। इसे अन्तरिक्ष और दृश्य जगत में नवयुग के अनुरूप वातावरण विनिर्मित करने वाले समर्थ प्रयोग के रूप में लिया जाना चाहिए। एक वैज्ञानिक प्रयोगकर्ता−जिस तरह अपने प्रयोग के सिद्धान्तों, विधानों, उपकरणों, की बारीकियों को समझता और व्यवहार में लाता है। कुछ वैसा ही यह अश्वमेध प्रयोग है। इसमें प्रयोग किए जाने वाले कुण्ड्र मण्डप, कर्मकाण्ड−सभी शास्त्र पद्धति के अनुसार होंगे। इसके परिणाम जहाँ आश्वमेधिक फलितार्थ को साकार करेंगे। वहीं भूल–बिसर चुकी वैदिक प्रक्रियाओं−परम्पराओं को सशक्त शिक्षण भी सम्पन्न होगा। इतना की क्यों−महायज्ञ, में भाग लेने वाले होता गण इस तत्व की जीवन्त अनुभूति कर सकेंगे कि वे वैदिक युग के महर्षिगणों में एक हैं। अनुभूति की यह निधि उन्हें जीवन पर्यन्त ऋषित्व के उदय और विकास के लिए प्रेरित करती रहेगी।

53−अश्वमेधेसर्वादेवता अन्वायत्ताः अश्वमेध में सभी देवता समुपस्थित रहते हैं।

61−राष्ट्रं वा अश्वमेधः − शतञ 13/1/6/3

राष्ट्र अश्वमेध है।


अश्वमेध यज्ञ सौर शक्ति के संदोहन की प्रक्रिया

अगर हम यह जानना चाहें कि सूर्य का मानव जीवन से क्या सम्बन्ध है? तो विज्ञान की भौतिक उपलब्धियों को ही देखकर संतुष्ट नहीं रह जाना होगा वरन् उस संदर्भ में भारतीय अध्यात्म पर भी विचार करना जरूरी है। पाश्चात्य देशों में उसे जलवायु वनस्पति और दृश्य जगत में परिवर्तनों के लिये प्रमुख उत्तरदायी माना जाता है। किन्तु साधना विज्ञान के आचार्यों का मत है कि मनुष्य की भावनाओं का भी सूर्य से घनिष्ठतम सम्बन्ध है। गैलीलियो ने इसी सूक्ष्म विज्ञान पर प्रकाश डालते हुये कहा था- दिखाई देने वाला सूर्य सम्पूर्ण है ही नहीं। वास्तविक सूर्य तो एक प्रकार की चेतना है जो सौर मण्डल के प्रत्येक परमाणु में प्रतिभासित हैं यही नहीं परमाणुओं पाये जाने वाले सौर बीज उतने ही शक्तिशाली और समर्थ है जितना स्वयं सूर्य। उस समय तो इन बातों की उपेक्षा की गई पर बाद में वैज्ञानिकों ने विस्तृत अध्ययन किया और अब तक जो कुछ जाना गया है उससे यह बात सिद्ध हो चुकी है कि मनुष्य पूर्णतया सूर्य पर आश्रित हैं उससे मानसिक सम्बन्ध स्थापित करके अनेक प्राकृतिक रहस्य और शक्तियां प्राप्त करने एवं आत्म विकास में प्रकाश पाने की विस्तृत खोज इस देश में गायत्री विद्या के नाम से हुई।

मनुष्य का शरीर सूर्य और पृथ्वी के तत्वों के सम्मिश्रण से बना है इसलिये शारीरिक ओर मानसिक दृष्टि से शरीर पृथ्वी से ही प्रभावित नहीं होते वरन् उन पर सूर्य का भी प्रचण्ड हस्तक्षेप रहता है हम यदि शरीर पर विचार करें तो प्रतीत होगा कि अन्न जल आदि पृथ्वी का रस सेवन करने से हमारे शरीर में ऑक्सीजन नाइट्रोजन कार्बन लोहा गन्धक आदि तत्व उत्पन्न होते है वहाँ उसमें इन तत्वों से भी सूक्ष्म प्राण शक्तियां क्रियाशील है। प्राण के द्वारा ही हमारे शरीर में स्पन्दन है। छींकना जम्हाई लेना निद्रा पलक झपकाना आदि क्रियायें प्राण के द्वारा ही सम्भव है। यह क्रियायें जड़तत्त्व नहीं कर सकते। प्राण इन सब तत्वों से अधिक सूक्ष्म है। इसलिये वह पहचान में नहीं आता पर गायत्री विज्ञान के द्वारा इसे आसानी से समझा जा सकता है।

खगोल शास्त्रियों के मतानुसार सूर्य में मूलतः दो ही तत्व है एक हाइड्रोजन दूसरा हीलियम। सूर्य हाइड्रोजन का आहार करके उसे हीलियम में बदल देता है। इसी से उसमें शक्ति आती है ताप व प्रकाश उत्पन्न होता है। यदि यह क्रिया न होती तो सूर्य दिखाई भी न देता, दिखाई केवल उतना हिस्सा देता है जहाँ क्रिया होती है। अन्यथा सूर्य सर्वव्यापी और सर्वान्तर्यामी तत्व है। अब चाहे उसे आत्मा कहें प्राण पुँज कह ले, या किसी को यह भ्रांति है कि सूर्य अध्ययन करना चाहिये। उससे पता चलेगा कि सूर्य में यज्ञ कुण्ड के समान लपटें ही नहीं फूटती वरन् उसमें से ऊर्जा भंवर जो कि प्रकाश गर्मी और विद्युत का सम्मिश्रण है। फूटता रहता है।

कुछ इसी तरह की क्रिया हमारे शरीरों में होती है। विचारों के रूप में इसी तरह की ऊर्जा हमारे शरीरों में विद्यमान है यह केवल स्पन्दन जैसी क्रिया है इसलिये दिखाई नहीं देती पर हमारे शरीर की अधिकांश शक्ति इसी तरह अभिव्यक्ति होती है।

यदि मनुष्य को विभिन्न स्थूल तत्वों वाला प्राणी कहें तो सूर्य को भी उन्हीं शक्तियों का सूक्ष्म गैसीय स्थिति का विचारशील प्राणी मानना पड़ेगा। उसकी शक्ति चूंकि अनन्त और विशाल है। वह निरन्तर देता रहता है इसलिये उन्हें देवता नामक आदर सूचक शब्द से सम्बोधन करने की परम्परा रही है। सूर्य को यदि इस अर्थ में भावनाओं और विचारों की केन्द्रीभूत शक्ति मानकर उसके संदोहन की प्रक्रिया अपनाई जा सके तो किसी के लिये भी उससे शारीरिक मानसिक सामाजिक औद्योगिक बौद्धिक और आध्यात्मिक वरदान प्राप्त कर सकना सम्भव है। गायत्री मंत्र द्वारा इसी विद्या का उद्घाटन पृथ्वी पर किया गया है।

इस महामंत्र के 24 अक्षरों के कम्पन समान तत्वों वाले मनुष्य और सूर्य में मानसिक सम्बन्ध स्थापित करने का काम करते है। सूर्य और मनुष्य में तात्विक एकता है। शास्त्रकार का कथन है। सूर्य आत्मा जगतस्तस्थुपष्च-

सूर्य जगत की आत्मा है। जबकि हमारी चेतना हमारे शरीर जगत की आत्मा है। इन दो चेतनाओं को प्रमाणित से कम्पित और संबंध स्थापित महामंत्र कहते है।

यही कारण है उपासना के तत्व को जानने वालों ने गायत्री माता का ध्यान सदा उदय कालीन सूर्य मण्डल के मध्य में करने की सलाह दी है। शास्त्र वचनों के अनुसार-

गायत्री भावयेद् देवी सूर्यासारकृताश्रयाम्। प्रातर्मध्याहने ध्यान कृत्वा जपेत्सुधी॥ षाकानन्द तरंगिणी 3-4-1

अर्थात् बुद्धिमान मनुष्य को सूर्य के रूप में स्थित गायत्री देवी का प्रातः मध्याह्न और सायं त्रिकाल ध्यान करके जप करना चाहिये।

सूर्य ओर गायत्री सर्वथा अभेद है। इनकी एकता उसी तरह है जैसे अग्नि ओर ऊष्मा की। इनकी इसी एकता को बताते हुये ऋषि कहते है

नमस्ते सूर्य संकारो सूर्य गायत्रिकेडमले।

ब्रह्मविद्ये महाविद्ये वेदमाता नमोडस्तुते॥

हे सूर्य के समान रूप वाली! हे गायत्री! हे अमले! आप ब्रह्मविद्या है आप महाविद्या है तथा वेद माता है आपको मेरा प्रणाम है।

इस महामंत्र की साधना करने वाले में सूर्य शक्ति का प्रवाह आने लगता है। विज्ञान का नियम है कि उच्चतर या अधिक शक्ति का प्रवाह निम्न स्तर अथवा कम शक्ति वाले केन्द्र की ओर तब तक बहता है जब तक दोनों समान न हो जायें। गायत्री से प्राप्त सिद्धियाँ इसी तादात्म्य की परिपक्व अवस्था ही हैं तब मनुष्य इसी भौतिक शरीर में सूर्य चेतना के समान सर्वव्यापी सर्वदर्शी और सर्व समर्थ हो जाता है। वह न केवल जलवायु लोगों के स्वास्थ्य मन की बातें जान लेने की सामर्थ्य पा लेता है बल्कि इससे भी अधिक सूक्ष्म से सूक्ष्म गतिविधियों ओर शक्तियों का स्वामी हो जाता हैं। इन सामर्थ्यों की व्यापकता इतनी अधिक है जिसका विवरण कुछ पंक्तियों में दे पाना सम्भव नहीं। उसमें उन्हीं सी करुणा सद्बुद्धि परार्थ उत्सर्ग की भावना विकसित होने लगती हैं। दूसरे शब्दों में गायत्री उपासक उपासना के साथ-साथ अपने सद्गुण सद् विचारों को अधिक सत्कर्मों में लगाने लगता है।

कोई व्यक्ति जब शांत और प्रसन्न हो उस समय उसके पास भावनापूर्वक निवेदन करने पर उससे आशातीत समर्थन पा सकना सहज सम्भव है। कोई तालाब स्वच्छ और शांत हो तो उस पर एक छोटा सा कंकड़ फेंककर ही तरंगों का उत्पादन किया जा सकता है। यह भाव और विज्ञान दोनों का मिला−जुला रूप है। भारतीय आचार्यों। ने जो आचार संहितायें और वैज्ञानिक प्रयोग किये है वह उक्त सिद्धान्त को दृष्टि में रखकर ही है। परम पूज्य गुरुदेव ने इसी सूक्ष्म दर्शन को दृष्टि में रख समय समय पर कुछ विलक्षण प्रयोग किये है। साधनातत्व के मर्मज्ञों के अनुसार कुछ विशिष्ट अवसरों पर विशिष्ट रीति से गायत्री उपासनाएं और यज्ञादि प्रक्रियाएं सम्पन्न की जाये तो उनसे सूर्य देव की आध्यात्मिक शक्तियों को विशेष रूप से प्रभावित एवं आकर्षित किया जा सकता है उनसे न केवल अपने लिये वरन् समर्पण समाज राष्ट्र और विश्व के लिये सुख समृद्धि और शांति का अनुदान उपलब्ध किया जा सकता है।

अक्टूबर 1958 का संग्रह कुण्डीय यज्ञ एक ऐसा ही प्रयोग था। पीछे मौसम वैज्ञानिकों ने भी इस मान्यता की पुष्टि कर दी। 1 जुलाई 1957 से 31 दिसम्बर 1958 तक खगोल शास्त्रियों ने अंतर्राष्ट्रीय शांत सूर्य वर्षों में सूर्य बिल्कुल शांत रहा और वैज्ञानिकों को उस पर अनेक प्रयोग और अध्ययन करने के अवसर मिले। इन्हीं दिनों पूज्य गुरुदेव के निर्देशन में साधकों ने गायत्री की विशेष साधनाएं सम्पन्न की ओर अक्टूबर 1958 में 4 दिन का यज्ञ कर शरदपूर्णिमा के दिन पूर्णाहुति दी। इस प्रयोग के बाद उनके प्रयोगों की श्रृंखला मन्द नहीं पड़ी। प्रज्ञा पुरश्चरण सूर्य ध्यान कल्प साधनाएं महायज्ञों की देशव्यापी श्रृंखला ऐसे ही अध्ययन और प्रयोग का परिणाम रहे हैं इनका उद्देश्य उन उपलब्धियों से सारे विश्व समाज को लाभान्वित कराना है जो ऐसे अवसरों पर देव शक्तियों से सुविधापूर्वक अर्जित की जा सकती है।

इन प्रयोगों के साथ ही विश्व गतिविधियों में भारी हेर फेर उथल पुथल हुई है। न केवल प्रकृति अपने विधान बदल रही है।बल्कि लोगों की भावनाएं और विचार भी बदल रहे हैं पश्चिम जगत की विलासिता प्रिय और भौतिकतावादी जनसमुदाय भी अध्यात्म का आश्रम पाने के लिये आतुर आकुल है। भारतवर्ष तो विश्व परिवर्तन की धुरी है। इसको केन्द्र बनाकर विश्व परिवर्तन की जो हलचलें सूक्ष्म जगत में चल रही है। उन्हें साधना शक्ति सम्पन्न सहज में देख समझ सकते है। इसका प्रत्यक्ष दर्शन 1999 के बाद सभी कर सकेंगे। अपने दैनिक जीवन में सूर्य की शांत स्थिति प्रातः और सन्ध्या के समय होती है। नवरात्रि भी इसी तथ्य को अपने में संजोए है। इन अवसरों पर साधना करने का विज्ञान सूर्य की भौतिक प्रकृति की खोज कर फल है जो पूर्णतया विज्ञान सम्मत है।

दीर्घकालीन कालचक्र के अनुसार इन दिनोँ महाक्रान्ति सम्पन्न होना है। अंतर्राष्ट्रीय शांत सूर्य वर्ष समिति ने 1 जनवरी 64 से दिसम्बर 65 तक दूसरा शांत सूर्य वर्ष मनाया है और यह बताया कि सूर्य में कुछ विशेष स्पन्दन फेक्यूले उत्पन्न हो रहे हैं।

उसके बाद ही सौर कलंक दिखाई देते है और उसके कारण पृथ्वी की जलवायु में विशेष हलचल उत्पन्न होती है। यों सारे कलंकों के कारण पृथ्वी में प्राकृतिक परिवर्तनों का क्रम 11 वर्ष बाद आता है। पर महाकाल की योजना के अनुरूप शीघ्रातिशीघ्र विश्व को परिवर्तित कर डालने के उद्देश्य से यह क्रम अस्त व्यस्त हो गया है। इस अस्त व्यस्तता के परिणाम अतिवृष्टि अनावृष्टि युद्ध महामारियों के रूप में आएंगे। इन प्रकोपों से उन्हीं की रक्षा होती है जो सूर्य शक्ति से सम्बन्ध जोड़े रहेंगे।

भारत वर्ष को गुलामी के बन्धन में लगभग 1500 वर्ष जकड़े रहना पड़ा इसके दुष्प्रभाव अभी भी है गायत्री तत्व के मर्मज्ञों के अनुसार इन दुष्प्रभावों का अन्त इसी सदी के साथ हो जायेगा। ग्रहगणित के अनुसार पृथ्वी को सूर्य की परिक्रमा करने में नौ करोड़ तीस लाख मील की यात्रा करनी पड़ती है। इस यात्रा को पृथ्वी लगभग 67 हजार मील प्रति घण्ट से चलकर 365.25 दिनों में पूरा करती है। प्रत्येक चक्कर में 1-4 दिन बढ़ जाता है। एक नया पूरा वर्ष होकर पृथ्वी को पुनः उसी कक्षा में आने के लिये ..................वर्ष लग जाते है।

ठन 1461 वर्षों का क्रम इसी शताब्दी के अन्त में पूरा होने को है। इस बीच सूर्य की प्रचण्ड शक्तियों का पृथ्वी पर आविर्भाव होगा ओर उनसे वह तमाम शक्तियां नष्ट भ्रष्ट हो जायेंगी जो मानसिक दृष्टि से अध्यात्मवादी न होगी। गायत्री उपासक इन परिवर्तनों को कौतूहलपूर्वक देखेंगे। और उन कठिनाइयों में भी स्थिर बुद्धि बने रहने का साहस उसी प्रकार प्राप्त करेंगे जिस प्रकार माँ का प्यारा बच्चा माता के कुद्ध होने पर भी उससे भयभीत नहीं होता वरन् अपनी प्रार्थना से उसे शांत कर लेता हैं।

ठन दिनों प्रारम्भ की गई भारत भूमि व पूरे विश्व में संपन्न होने वाली अश्वमेध महायज्ञ की योजना पूज्य गुरुदेव की प्रेरणा से प्रारम्भ किया गया विलक्षण प्रयोग है। इसे 1958 में हुये सहस्रकुण्डीय महायज्ञ का संशोधित परिवर्धित संस्करण कहा जा सकता है। अश्वमेध प्रक्रिया का गायत्री और सूर्य से गहरा सम्बन्ध है। शतपथ

ब्राह्मण के अनुसार-

स्विता वै प्रसैविता सविता मडइमं यज्ञं प्रसुवदिति।

अर्थात् सविता प्रेरक है सविता मेरे इस यज्ञ की प्रेरणा करे। इसी प्रकार गायत्रे जुहोति कहकर गायत्री महामंत्र से आहुति देने का विधान है। इस प्रक्रिया द्वारा निश्चित रूप से मानव जाति को सूर्य शक्ति से जोड़कर समूचे विश्व को अनेकानेक अनुदानों वरदानों से लाभान्वित किया जा सकेगा।

अन्तरिक्ष किरणों उत्तरी ज्योति, पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र आयनोस्फियर पर सूर्य के प्रभावों का अध्ययन करने के बाद वैज्ञानिकों ने यह बताया कि सूर्य अपने आप उत्तेजित होता रहता है। उत्तेजित सूर्य अपने सौरमण्डल का मन्थन करता है। उस समय उससे ज्वालायें फूटती और सूक्ष्मकणों की वर्षा होती हैं यह कण बाद में कही विलीन हो जाते हैं यह पता तो वैज्ञानिक नहीं लगा पायें पर आत्मविद्या के आचार्यों के अनुसार सृष्टि के प्रत्येक अणु अणु में यह उत्तेजित कण ही हलचल पैदा करते है। उससे स्थूल प्रकृति ही नहीं मनुष्य की सूक्ष्म प्रकृति भी प्रभावित होती है। विचार भावनायें संकल्प और विश्वास भी परिवर्तित होते है, इस परिवर्तन का आकलन यद्यपि वैज्ञानिकों के बूते का नहीं है लेकिन सामूहिक रूप से विश्व की राजनीति उद्योगों व्यापार श्रम रोजगार युद्ध और सामाजिक गतिविधियों पर उसके प्रभाव को देखकर वस्तुस्थिति को समझा जा सकता है।

साधनागम्य इन रहस्यों की जो अनुभूति कर सकेंगे उन्हें अश्वमेध प्रक्रिया के प्रयोजन और

सत्परिणाम अविदित नहीं रहेंगे। वे तेजी से गायत्री विद्या के अन्तराल में प्रविष्ट होंगे। साधना ज्ञानार्जन ओर संयम में उनकी वृत्ति बढ़ेगी ऐसे लोग ही आगे चलकर विश्व का मार्गदर्शन करेंगे।

गायत्री तत्व मर्मज्ञों के अनुसार विश्व रचना में दो ही तत्व है देव या प्रण भूत या पदार्थ। प्राण के बिना पदार्थ। प्राण के बिना पदार्थ गतिशील नहीं होता। पंचभूतों से बना मनुष्य का शरीर गायत्री के अक्षर वायु में विलीन हो जाते हैं। उसी तरह मनुष्य शरीर भीतर उत्पन्न होकर विलीन हो जाता है। उसका दूसरा चरण प्राण सविता का अधिष्ठान है। उसका दृश्य भाग भौतिक होने पर भी अदृश्य मनोमय है। इस रूप में सूर्य सर्वाधिक शक्तिशाली है। ऋषियों ने सूर्य को त्रयी विद्या कहा है। अर्थात् उसमें स्थूल तत्व जिसमें शरीर बनते है प्राण जिनसे चेतना आती है और मन जो चेष्टाएं करता है तीनों तत्व विद्यमान है। गायत्री मंत्र साधना के माध्यम से जब सूर्य के साथ स्वयं को जोड़ते है तो हमें उसके आध्यात्मिक लाभ स्वास्थ्य तेजस्विता मनस्विता के रूप में मिलते है। अश्वमेध प्रक्रिया का एक महान प्रयोजन मानव समाज को इस विद्या का ठीक ठीक ज्ञान देना है। ताकि धरती पर सुख शांति और समृद्धि का कोई अभाव न रहे। युग परिवर्तन की सन्धि और संक्रान्ति अवस्था में उन लोगों को अधिक श्रेय सम्मान मिलेगा, जो इस तत्व ज्ञान का अवगाहन कर सारे विश्व में इस आलोक को फैलाने का प्रयत्न करेंगे।


प्रयाज याज एवं अनुयाज

विशिष्ट प्रयोजनों लिये किये जाने वाले यज्ञों को तीन चरणों में बाँटा जाता है 1 प्रयाज 2 याज 3 अनुयाज

1 प्रयाज के अंतर्गत यज्ञ की घोषणा होने से लेकर यज्ञ प्रारंभ होने तक की सारी प्रक्रियायें आती है। यज्ञ स्थल का चुनाव उसके विभिन्न संस्कार यज्ञ की अनिवार्य व्यवस्थाएं जुटाना उसके लिये आवश्यक आध्यात्मिक ऊर्जा उत्पन्न करने के लिये जप तप के विधान यज्ञशाला निर्माण आदि सभी कार्यों का समावेश उसमें होता है।

2 याज-यज्ञीय कर्मकाण्ड को कहते है। इसमें आचार्य ब्रह्मा अध्वर्यु उद्गाता आदि की यज्ञ संसद की स्थापना से लेकर देवपूजन आहुतियाँ सामागान पूर्णाहुति आदि विभिन्न कर्म आते है प्रयोजनों के अनुरूप यज्ञ निर्धारित अवधि तक चलाये जाने का निर्देश शास्त्रों में है।

3-अनुयाज-यज्ञ पूर्णाहुति के बाद भागीदारी को संतुष्ट करना सभी वस्तुओं को यथा स्थान पहुंचाना यज्ञ से उत्पन्न ऊर्जा को लोक कल्याण के प्रयोजनों में नियोजित करना इस प्रक्रिया के अंतर्गत आते है। वर्तमान अश्वमेध यज्ञों के लिये भी इन तीनों चरणों को क्रियान्वित करने की रूपरेखा एवं व्यवस्था बनायी जा रही है। यज्ञ के स्थलों के चुनाव तथा वहाँ उपयुक्त वातावरण बनाने का क्रम चल पड़ा है।

अश्वमेध यज्ञ के लिये प्रयाज के रूप में दिग्विजय यात्रा की जाती है। जिन जिन क्षेत्रों के अश्वमेध घोषित किये गये है उन सभी क्षेत्रों में देवसंस्कृति दिग्विजय यात्राओं की व्यवस्था बना दी गयी है। यज्ञ की सफलता के लिये विशेष रूप से गायत्री उपासना साधना करने वाले व्यक्ति लाखों की संख्या में तैयार हो रहे हैं।

शास्त्रीय विधि से यज्ञशाला निर्माण से लेकर सुसंस्कारवान भावनाशीलों के सहयोग से साधन सामग्री जुटाने एवं व्यवस्था बनाने का क्रम चल पड़ा है।

यज्ञ के लिये आध्यात्मिक ऊर्जा तो परम पूज्य गुरुदेव एवं वन्दनीया माताजी द्वारा प्रचुर मात्रा में उत्पादित की ही जा रही है।

अनुयाज प्रक्रिया भी बहुत व्यापक है। यज्ञ के माध्यम से सूक्ष्म जगत तथा साधकों याजकों में दिव्य प्रवाह दिव्य ऊर्जा संचारित होगी। उसका उपयोग मनुष्य मात्र के लिये उज्ज्वल भविष्य के निर्माणार्थ किया जाना है जन जन के मनों में एवं स्वभाव में संव्याप्त कुसंस्कारों का उच्छेदन करना बेशरम बेल की तरह समाज में फैली कुरीतियों अनाचार आदि को निरस्त करके उनके स्थान पर श्रेष्ठ सतयुगी परम्पराओं की स्थापना करना आदि व्यापक लक्ष्य अनुयाज के निर्मित रखे गये है।

यह सब करने के लिये जिन संकल्पवान तेजस्वी व्यक्तित्वों की आवश्यकता पड़ेगी उनके निर्माण का कार्य दिव्य चेतना स्तर पर तो चल ही रहा है, मानवी पुरुषार्थ भी उस दिशा में नियोजित किया जाना है। व्यक्तित्वों को खोजने उभारने विकसित करने प्रयुक्त करने आदि में मानवी बुद्धि एवं परिश्रम को भी नियोजित करना होगा।

यह प्रक्रिया देशव्यापी स्तर पर तो चलानी ही होगी विश्वव्यापी स्तर तक भी जाना अनिवार्य हो गया है। अब सप्तद्वीप वसुँधरा पर रहने वाले मनुष्यों का भविष्य एक दूसरे के साथ जुड़ गया है। किसी एक क्षेत्र के लिये उज्ज्वल भविष्य तथा दूसरे के लिये पतन पराभव की रूपरेखा अब नहीं बन सकती। साँस्कृतिक चेतना का संचार सभी में करना होगा। संकीर्ण स्वार्थ भरी आपाधापी से सभी को विरत होना होगा।

उक्त सभी प्रयोजनों को ध्यान में रख कर इस अभूतपूर्व अश्वमेध श्रृंखला के लिये ऊपर वर्णित प्रयाज याज एवं अनुयाज आदि प्रक्रियाओं के योजनाबद्ध ताने बाने बुने जा रहे है।


साधना पुरुषार्थ एवं सूक्ष्मजगत का अनुकूलन

अश्वमेध यज्ञानुष्ठान एक दिव्य पुरुषार्थ है। कोई भी श्रेष्ठ पुरुषार्थ श्रेष्ठ भावना एवं श्रेष्ठ विचारणा के बिना सम्पन्न नहीं हो सकता। यज्ञीय पुरुषार्थ के लिये व्यापक स्तर पर यज्ञीय भावना का विकास विस्तार अनिवार्य होता है।

देव संस्कृति दिग्विजय अभियान भावभरी प्रेरणा है और देश के विभिन्न भागों में सम्पन्न होने वाले दशाश्वमेध यज्ञ उसके स्थूल कर्मकाण्ड मात्र है। यह भाव श्रद्धा महाकाल के प्रचण्ड संकल्प का प्रतीक है। विश्वास किया जाना चाहिये, उसके प्रतिफल भी अभूतपूर्व होंगे। इस श्रृंखला के संपन्न होने पर मिलने वाले देव अनुग्रह को लोग आश्चर्यचकित नेत्रों से देखेंगे, विश्वास नहीं कर पायेंगे कि प्रचण्ड राष्ट्रीय समर्थता का यह चमत्कार हो कैसे गया। राष्ट्रीय समर्थता का लाभ अन्ततः उसके नागरिकों को ही मिलता है साँसारिक सिद्धियों के रूप में भी अच्छी फसल प्राप्त करने के लिये खेत तैयार करने बीज बोने खाद−पानी एवं निराई गुड़ाई का पुरुषार्थ किया जाना भी अनिवार्य है किन्तु इन सबके साथ साथ ऋतु की अनुकूलता भी तो चाहिये। यदि वह न हो तो अकेला स्थूल पुरुषार्थ ही मनुष्य के अधिकार क्षेत्र में है। यों अगर यह पुरुषार्थ। इन दोनों से साधनात्मक पुरुषार्थ ही मनुष्य ही अधिकार क्षेत्र के अधिकार क्षेत्र में हैं यों अगर यह पुरुषार्थ व्यापक स्तर किया जाय तो देव अनुग्रह .....उसके साथ स्वभावतः जुड़ जाता है। इसलिये ..... प्रयोजनों के लिये स्थूल व्यवस्था से भी अधिक साधना पुरुषार्थ की आवश्यकता होती है।

महाकाल के संकल्प के फलस्वरूप देवसंस्कृति दिग्विजय अभियान के साथ साथ अश्वमेध यज्ञों की श्रृंखला बन गयी। उसमें क्रमशः और अधिक वृद्धि भी स्वाभाविक है। घोषणा के साथ ही उस दिशा में तत्परतापूर्वक कार्य चल पड़े है। यज्ञशाला के वेद सम्मत स्वरूप और अनुशासनों का निर्धारण भी हो गया है। यज्ञ और देव पूजन का भव्य स्वरूप भी सुनिश्चित हो गया है। समूचे राष्ट्र में एक अश्वमेधीय लहर जाग्रत हो गयी है। सूत्रधार की इस महाशक्ति को पहचानने वाले गद् गद् अन्तःकरण से दिग्विजय प्रव्रज्या और आयोजन की तैयारियों में जुट गये है। इसे सफलता का शुभ सुकून माना जा सकता है। किंतु इन सब सफलताओं के बीच साधनात्मक पुरुषार्थ पर से ध्यान हटने नहीं दिया जा सकता। यज्ञ को फलित करने के लिये सूक्ष्म जगत में अनुकूल शक्ति प्रवाह उत्पन्न करने के लिये साधनात्मक प्रयोगों को व्यापक ओर प्रखर बनाया जान आवश्यक है। यज्ञ के समस्त उपकरण उपलब्ध हो पर अरणि मंथन न किया जाये तो यज्ञाग्नि प्रकट कैसे हों? गाड़ी एम्बैसउरी दो ढाई लाख की पर उसमें दस रुपये लीटर वाला पेट्रोल ईंधन न डाला जाये तो ऊर्जा कैसे पैदा हो? इतने बड़े यज्ञ कृत्य के रक्षा कवच के लिये शास्त्रकारों ने जिस ऊष्मा की आवश्यकता अनुभव की उसके लिये व्यापक सावित्री अर्थात् गायत्री उपासना और विशेष अनुष्ठानों प्रावधान किया गया है। इस निर्धारण को ध्यान में रखकर अधिकाधिक व्यक्तियों को यज्ञ के निमित्त गायत्री उपासना सविता साधना के लिये प्रेरित किया जा रहा है।

यह सर्वविदित है कि यज्ञ के फल का अंश जप तप साधना के अनुपात में मिलता है। जो साधकगण दिग्विजय अभियान अथवा यज्ञीय व्यवस्था क्रम में श्रम कर रहे है उनको इस तप साधना का लाभ स्वाभाविक रूप से मिलेगा ही भले वे जप साधना कम कर पायें। जो इस तप साधना में भागीदारी नहीं ले पा रहे है उन्हें जप साधना का लाभ स्वाभाविक रूप से मिलेगा ही भले ही वे जप साधना कम कर पाये जो इस साधना भागीदारी नहीं ले पा रहे है उन्हें जप साधना में अधिकाधिक मनोयोग एवं समय लगाने का प्रयास करने के लिये प्रेरित किया जाना चाहिये। सूक्ष्म जगत के शोधन अनुकूलन के लिये शास्त्रों ने गायत्री मंत्र को अत्यधिक प्रभावकारी माना। थियोसोफिकल सोसाइटी के सर्वमान्य दिव्यदृष्टि सम्पन्न आँकल्टिस्ट पादरी लैउलिटर का भी मत भारतीय शास्त्रों के अनुरूप ही है। उन्होंने सूक्ष्म जगत में होने वाली हलचलों का अध्ययन करके इस मंत्र को सर्वाधिक प्रभावशाली माना हैं। पाश्चात्य विद्वान आर्थरकोयस्लर ने तो इसे परमाणु शक्ति से भी अधिक प्रबल एवं प्रभावकारी कहा है।

पदार्थ परक तकनीक के आधार पर अंतरिक्ष में विचरण कर रहे यानों को पदार्थगत सूक्ष्म तरंगों से नियंत्रित किया जाता है।। मंत्रशक्ति के माध्यम से यज्ञीय भावना एवं चिन्तन को अपने अनुकूल बनाया जा सकता है। यह विराट प्रकृति स्वयं यज्ञीय अनुशासन में रहकर प्राणिमात्र के कल्याण में संलग्न है उसी स्तर की यज्ञीय भावना एवं विचारणात्मक तरंगों से उसका तादात्म्य सहज ही हो जाता है। अभी भी लाखों नर नारी गायत्री उपासना में संलग्न है, इस अभियान से उनकी संख्या करोड़ों साधकों की एकनिष्ठ भावभरी साधना आसमान को हिला सकती है।

इस महान अनुष्ठान में भाग लेने से रोका किसी को नहीं जाना है प्रेरित हर भावनाशील को किया जा रहा हैं मानव मात्र के लिये उज्ज्वल भविष्य की कामना से परमात्मा से भावभरी प्रार्थना सभी को करनी चाहिये जो गायत्री मंत्र जप सकें वे कम से कम एक माला का जप नित्य करें उसे कम से कम अपने क्षेत्र में होने वाले अश्वमेध यज्ञ तो अवश्य चालू रखें। जो मंत्र जप न कर सके वे नित्य कम से कम 24 मंत्रों का लेखन करें वह भी न बन पड़े तो कम से कम गायत्री चालीसा का एक पाठ नित्य करें।

यह तो न्यूनतम साधना की बात हुई। नये जुड़ने

वाले नर नारियों के लिये इतना भी पर्याप्त है। किन्तु श्रद्धावान साधकों की भी इस इस देश में कमी नहीं है। जगह जगह नैष्ठिकों ने यज्ञार्थ छोटे बड़े गायत्री जप अनुष्ठान प्रारंभ कर दिये है। सवेरे से शाम तक अखण्ड जप के सामूहिक आयोजन गाँव गांव मुहल्ले मुहल्ले इसी निमित्त किये जाने लगे है। प्रत्येक अश्वमेध यज्ञ के लिये निर्धारित क्षेत्रों में प्राणवान परिजनों के द्वारा यह साधनात्मक लहर तीव्रतर की जा रही है।

शांतिकुंज में इस संदर्भ में विशेष अनुष्ठान सत्रों की श्रृंखला प्रारंभ की गयी है। इसे आश्वमेधिक अनुष्ठान श्रृंखला कहा गया है। जो इस श्रृंखला के किसी एक सत्र में अनुष्ठान संपन्न करेंगे, उन्हें अश्वमेध यज्ञ का प्रयोजक ऋत्विज् माना जायेगा। वे जिस अश्वमेध यज्ञ में यजन करना चाहेंगे उसके लिये उन्हें विशेष अनुमति पत्र दिया जायेगा। उनके लिये यज्ञशाला में विशिष्ट अभ्यागतों के अनुरूप ही विशेष स्थान सुरक्षित भी रखे जायेंगे।

प्राचीन काल में तो उस के लिये एक वर्ष का समय निर्धारित होता था। इस अनुष्ठान में पति पत्नि यदि है तो दोनों का भाग लेना आवश्यक था। वे एक वर्ष तक किन्हीं विशिष्ट तीर्थस्थलों में पर्णकुटीरों में रह कर ब्रह्मचर्यपूर्वक नियत अनुष्ठान सम्पन्न करते थे। आज लोगों में न तो वह मनोबल है और न शारीरिक क्षमता। व्यस्तता भी आज इस स्तर तक बढ़ गई है कि एक वर्ष या एक माह का समय निकाल पाना भी असंभव हो गया है। अतएव नौ नौ दिन के कुटी प्रवेश आश्वमेधिक अनुष्ठान की व्यवस्था की गयी है। यह पुरश्चरण आश्विन नवरात्रि से प्रारम्भ होंगे। और चैत्र नवरात्रि तक चलेंगे। इन साधकों को यहाँ से विधिवत् लघु प्रमाण पत्र दिया जायेगा, जिसे दिखाकर ही वे अपने यहाँ के अश्वमेध यज्ञ में प्रयोजक पद पर प्रतिष्ठित होकर आहुतियां प्रदान करेंगे। इस श्रृंखला को लगातार सन् 2000 तक इसी क्रम में आश्विन नवरात्रि से चैत्र नवरात्रि तक चलाया जाता रहेगा। इस वर्ष के सत्र इस प्रकार होंगे।

अश्विन नवरात्रि के बाद 11 अक्टूबर शरद पूर्णिमा से यह सत्र प्रारंभ होंगे। 11 से 19, 21 से 29 एवं 1 से 9 के क्रम से प्रतिमाह 19 मार्च तक लगातार चलेंगे।

ठन सत्रों में पहले से अनुमति लेकर ही शामिल हुआ जा सकता है। सीमित स्थान होने के कारण इच्छुक व्यक्तियों को क्रमशः स्थान देना ही संभव हो पाता है। जिन्हें भाग लेना हो वे सादा कागज पर अपना एवं अपने पति अथवा पत्नी का नाम शिक्षा योग्यता तथा पूरा पता लिखें। किस सत्र में आना चाहते है उसका उल्लेख करें यदि इच्छित सत्र पहले से भर चुका हो, तो विकल्प के रूप में किस सत्र की स्वीकृति चाहेंगे, यह भी लिखे। इस प्रकार आवेदन प्राप्त होने पर अनुमति भेज दी जाती है। अश्वमेध यज्ञ में भागीदारी के लिये जन जन को गायत्री साधना के लिये प्रेरित किया जा रहा है। उसी आधार पर याजक पंजीकृत भी किये जा रहे है सभी भावनाशीलों श्रद्धालुओं का इस हेतु सादर आमंत्रण है।


चार चरणों में सम्पन्न होगा अभिनव अश्वमेध

अश्वमेध आयोजन से प्रायः एक वर्ष पूर्व एक घोड़ा छोड़ा जाता था उसके माथे पर एक जयपत्र बाँधने की परम्परा थी। जिसका अर्थ होता था जो उन आदर्शों परम्पराओं से सहमत न हो जिनका अनुपालन एक सुसंस्कृत समाज करता है वे भी या तो बात मानें या युद्ध के लिए तैयार हों। यह एक प्रकार से दुष्प्रवृत्तियों के निवारण की शाक्त परम्परा थी। हिन्दू कुश से लेकर कन्याकुमारी तक और बंगाल की खाड़ी से उस छोर तक जहाँ इन दिनों पाकिस्तान का पश्चिमी भाग स्थित है समूचा देश एक जैसी साँस्कृतिक मान्यताओं में संगठित था। इतने विशाल भू भाग में एक सी संस्कृति विश्व में कहीं भी देखने को नहीं मिलती। यह एक प्रकार से सामाजिक शांति और सुव्यवस्था का उपक्रम था जो कालान्तर में लगभग पूरी तरह ध्वस्त हो गया।

इस युग की परिस्थितियाँ जहाँ एकदम उलटी-पुलटी हैं वहीं दो तथा बहुत अनुकूल और आशाजनक हैं (1) आज की अनियंत्रित भौतिक लिप्साओं ने जन जीवन को इतना अशांत और तनावग्रस्त कर दिया है जिससे हर कोई छुटकारा पाना चाहता है (2) आज और कुछ हो या न हो पर विचार करने की मानवीय सामर्थ्य सुनिश्चित रूप से विकसित हुई। देव संस्कृति के लिए यही दो परिस्थितियाँ सर्वथा पक्षधर है जिससे उसे घर-घर प्रतिष्ठित करने में कोई दिक्कत नहीं होगी। युग की परिस्थितियां उलटी हैं इसलिए व्यवस्था को भी उलट कर परिस्थितियों को सीधा करने का चार अध्यायों वाला कार्यक्रम निर्धारित किया गया है। पहले लोगों को आदर्शों पर चलने के लिए बलपूर्वक सहमत किया जाता था आज आने वाली पीढ़ी के उज्ज्वल भविष्य, पीड़ा और पतन के नाम पर वही कार्य करुणा जगाकर किया जाएगा।

(1) पहला कार्य लोगों का ध्यान व्यक्ति परिवार और सामाजिक जीवन में व्याप्त बुराइयाँ, पीड़ा और पतन की परिस्थितियों की ओर खींचकर उन्हें बुराइयाँ छोड़ने और सत्प्रवृत्तियाँ अपनाने के लिए सहमत करना है (2) सत्प्रवृत्तियों की फसल भविष्य में मुरझाने न पाए उसके लिए रचनात्मक उपायों का विस्तार करना (3) इन परिस्थितियों का नियमन नियंत्रण करने वाले समूचे तंत्र को जीवन्त बनाना (4) सत्प्रवृत्तियों पर औद्वत इस कारण जीतता है क्योंकि देवत्व संगठित वही होता इसलिए सुगढ़ और संगठित शक्ति का प्रदर्शन। इन चारों तथ्यों की पूर्ति के लिए समूचा अश्वमेध तंत्र चार भागों में पूर्ण होगा। इस समूची प्रक्रिया का नाम “देवसंस्कृति दिग्विजय अभियान है” अश्वमेध यज्ञ तो उसका मात्र चौथा प्रदर्शन पूरक भाग है

(1) ग्राम प्रदक्षिणा - सर्वप्रथम जहाँ अश्वमेध होना है वहाँ उस क्षेत्र या प्रदेश सभी मूर्धन्यों की गोष्ठी सम्पन्न की जाती है उन्हें ताल्लुका, सहसील स्तर अथवा पंचायत स्तक तक की क्षेत्रीय जिम्मेदारियाँ बाँटी जाती हैं। एक केन्द्रीय कार्यकारिणी बना दी जाती है जो समूची अश्वमेध व्यवस्था का संचालन करती है।

जिन तैंतीस हजार लोगों ने शपथ समारोह के समय समयदान दिया है उन सबका इस कार्यक्रम में नियोजन के पश्चात उन्हें इन क्षेत्रीय केन्द्रों पर आवश्यक विज्ञप्तियों तथा प्रचार सामग्री एवं उपकरणों सहित भेजा जाता है। स्थानीय लोग पहले से ही ग्राम प्रदक्षिणा केरुट और तिथियाँ निर्धारित कर लेते हैं, उसी के अनुसार यह परिव्राजक गाँव-गाँव पहुँचकर देवसंस्कृति की स्थापना का पावन कार्य सम्पन्न करते हैं।

स्थानीय समयदानी और शांतिकुंज से गये परिव्राजक चार-चार या पाँच-पाँच की टोलियों में विभक्त होकर साइकिलों से निकलते हैं। गीत गाते नारे लगाते हुये ये लोग एक दिन में एक दो या तीन गाँवों की प्रदक्षिणा करते है। पहले गाँव में गीत गाते हुये प्रदक्षिणा लोगों को सायंकाल पूर्व निर्धारित स्थान पर सम्मिलित होकर दीपयज्ञ में भाग लेने और अश्वमेध का संदेश सुनने के लिये आमन्त्रित किया जाता है फिर गाँव के किसी पवित्र स्थान पर मिट्टी पूजन करने का प्रावधान है। इसी स्थान से थोड़ी सी रज लेकर अश्वमेध यज्ञ के कुँड बनाने के लिये भेजी जाती है। इसी स्थान पर वृक्षारोपण होता है। गाँव वालों से यह प्रार्थना की जाती है। इसी स्थान पर वृक्षारोपण होता है। गाँव वालों से यह प्रार्थना की जाती है कि वे उस स्थान पर एक संस्कार चबूतरा या ग्राम देवता की स्थापना कर लें जहाँ पर्व त्योहार सार्वजनिक उत्सव ओर बच्चों के संस्कार सम्पन्न कराने का क्रम प्रारम्भ किया जाय इससे संस्कारों के प्रचलन की एक व्यवस्थित श्रृंखला प्रारंभ हो जायेगी। वहाँ प्रज्ञा मंडल भी स्थापित होंगे ताकि यह संस्कार मात्र उत्सव होकर न रह जायें अपितु उनके द्वारा व्यक्तित्व परिष्कार के उद्देश्य पूरे किये जा सके। आने वाली पीढ़ी को जीवन दर्शन का व्यावहारिक प्रशिक्षण मिलता रहे।

सायंकाल दीप यज्ञ होगा। उसमें उपस्थित जन समुदाय से देव दक्षिण माँगी जायेगी। देवदक्षिणा अर्थात् अपने जीवन की किसी एक बुराई का परित्याग और एक अच्छाई का वरण। यह संकल्प वे लिखित देंगे ताकि पीछे उन्हें सतत् अनुपालन की प्रेरणा भी दी जाती रहे। इसी सभा में अश्वमेध के आमंत्रण भी दिये जायेंगे।

ग्राम पूजन और दीपयज्ञ के बीच के खाली समय में देव स्थापनाएं संपन्न होगी। देव स्थापना का उद्देश्य घरों में उपासना के माध्यम से श्रद्धा का बीजारोपण है। अपेक्षा यह की जायेगी कि प्रत्येक गृहस्थ अपने घर में किसी पवित्र स्थान को उपासना स्थल बनावें वही सद्ज्ञान सद्विवेक की अधिष्ठात्री भगवती गायत्री का चित्र स्थापित करें। गायत्री उपासना व्यक्तिगत या सभी पारिवारिक जन सामूहिक रूप से करें। मंत्र जप करने की स्थिति न हो तो चालीसा का पाठ किया जा सकता है वह भी न बन पड़े तो हर सद्गृहस्थ स्नान के बाद उस स्थान पर अगरबत्ती लगाकर गायत्री माता का नमन वंदन भर कर लिया करें यह क्रिया प्रतिदिन घर के छोटे बच्चे देखेंगे तो उनमें श्रद्धा का बीजारोपण होगा। श्रद्धा सामाजिक सुव्यवस्था का मूलाधार है। व्यक्तित्व को दर्शन की गहराइयों तक ले जाने में भी श्रद्धा ही समर्थ है। अतएव आयोजन का प्राण है। उसके दूरगामी परिणाम सुनिश्चित समझे जाने चाहिये इसलिये समयदान का अधिकांश नियोजन इस प्रदक्षिणा कार्यक्रम में किया गया है।

2 संस्कार महोत्सव -इस देश में महापुरुषों की एक लम्बी श्रृंखला प्राचीन काल से चली आ रही है उसका एक मात्र कारण हमारी देवसंस्कृति में संस्कारों का प्रचलन रहा है। सूक्ष्मदर्शी ऋषियों ने देखा मनुष्य जीवन ने मनुष्य शरीर पर पी.एच.डी. की है मैं दि अननोन नाम से छपी इस उपाधि में मनुष्य शरीर को प्रकृति की सर्वोत्कृष्ट कृति निरूपित किया गया है। यह संभावना व्यक्त की गई है कि शरीर की समूची शक्तियों का जिस दिन पता चलेगा लोग यह देखेंगे, आश्चर्य करेंगे इस पिंड में किस तरह परमात्मा ने समूचा ब्रह्माण्ड उतार दिया है। अपने ही भीतर सुरक्षित शक्तियों के अपार सागर से अनभिज्ञ मनुष्य कीड़े मकोड़ों जैसा निरीह जीवन जीता है। यह जितना मनुष्य के लिये अपमान जनम है उससे अधिक परमात्मा के लिये।

उसकी कृति कलंकित न हो जाय इसलिये अपने ऋषियों ने मनुष्य जीवन पर गम्भीर दृष्टि डाली उसकी मनोवैज्ञानिक और तात्विक समीक्षा की तो पता चला माँ के पेट में रजवीर्य की स्थापन से लेकर मृत्युपर्यंत जीवन में कुछ बहुत विशिष्ट मोड़ आते है। उन अवसरों पर उचित मार्गदर्शन और व्यवहार न मिलने से बच्चे दिग्भ्रान्त होते और जीवन लक्ष्य से भटक जाते है। शास्त्रकारों ने ऐसे 40 मोड़ों को तलाश उनमें से 16 को प्रमुख मानकर षोडश संस्कारों का प्रचलन किया। जिस तरह उपवन के पौधों और जंगली पेड़ों में एक मूलभूत अंतर होता है। उद्यान के वृक्ष स्वस्थ, सुडौल और अधिक फल देते हैं, जब कि जंगली पेड़ों की डालें, तने सब अनगढ़ और अव्यवस्थित होते हैं। सह अंती देखभाल करने वाले माली के पुरुषार्थ की प्रतिफल होता है। वह न केवल समय पर खाद पानी देता है, अपितु काट छाँट भी करता रहता है। संस्कार परम्परा भी व्यक्तित्व को निखारने की ऐसी ही स्वस्थ कला है। जो चिन्ह पूजा के रूप में चल तो आज भी रही है, पर उनसे जुड़े लोकशिक्षण ने अब मात्र कर्मकाण्ड या खाने पीने मौज मनाकर संस्कार सम्पन्न करने की कुरुचि का रूप धारण कर लिया है, अतएव उनका कुछ प्रतिफल नहीं निकल पाता

परम पूज्य गुरु देव ने संस्कारों को अति व्यवस्थित स्वरूप प्रदान किया है। गर्भाधान और जातवेद जैसे आज की परिस्थितियों में प्रायः असंभव संस्कारों को तो छोड़ दिया है पर जन्मदिन, विवाह दिवसोत्सव, दीक्षा एवं श्राद्ध संस्कार जोड़ दिये हैं। इससे प्राचीन काल की सभी अपेक्षित आवश्यकतायें पूर्ण हो जाती हैं। पाँच माह की अवस्था में भ्रूण का मस्तिष्क भाग बनना प्रारम्भ होता है। यह एक तरह का शरीर का राज्याभिषेक पर्व है। पाँच माह में पुँसवन मनाने की परम्परा इसीलिए पड़ी। बीज को संस्कारित कर देने से पौधे स्वस्थ होते हैं। यही इनका उद्देश्य है। हिन्दू धर्म कोश के अनुसार गर्भाधान, पुँसवन, सीमांतोन्नयन, जातकर्म, नामकरण, निष्क्रमण, अन्नप्राशन, चूड़ाकर्म, कर्णवेध विद्यारम्भ, यज्ञोपवीत, वेदारम्भ, केशान्त, समावर्तन, विवाह संस्कार और अन्त्येष्टि किये हुए हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह सभी संस्कार उस आयु और अवस्था में सम्पन्न होते हैं जब उस तरह के विशेष मार्गदर्शन, प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है। उदाहरण के लिए बच्चे के शरीर का “हारमोनिक विकास 8 से 13 वर्ष की आयु में होता है। यह आयु जीवन का सबसे नाजुक मोड़ होती है। इसी आयु में अधिकाँश बच्चे बिगड़ते हैं अतएव इसी आयु में यज्ञोपवीत या व्रत−बंध रखा गया। दीक्षा, शिखा स्थापन, जन्मदिन संस्कार एवं विवाह दिवसोत्सव पूज्य गुरु देव ने इन्हें बहुत महत्व देने की दृष्टि से आज की परिस्थितियों में विशेष मार्गदर्शन के रूप में जोड़े। यह व्यक्तित्व को सशक्त, समर्थ और प्रखर बनाने के अभूतपूर्व प्रयोग हैं। इसी कारण इन्हें देवसंस्कृति दिग्विजय को एक प्रमुख रचनात्मक कदम के रूप में जोड़ा गया है।

जहाँ अश्वमेध होंगे वहीं दो−दो दिन के संस्कार महोत्सव होंगे। यह प्रचार प्रधान और अश्वमेध से जुड़े हुए होंगे। इन के अधिकाँश क्रिया कलाप ग्राम प्रदक्षिणा के समान ही होंगे अन्तर केवल इतना होगा कि यह कस्बों व नगरों में सम्पन्न होंगे। यहीं दोनों दिन प्रभात फेरी होगी। सत्प्रवृत्ति संवर्धन, दुष्प्रवृत्ति निवारण संकल्प, दीपयज्ञ यथावत होंगे। देवस्थापना थोड़ा भिन्न होगी। सामूहिक संस्कारों का प्रतिपादन प्रधान प्रदर्शन जुड़ा होने से इनका नाम संस्कार महोत्सव रखा गया है उद्देश्य यह रखा गया है कि संस्कारों की वैज्ञानिकता को लोग समझें भी अपनायें भी।

(3) तीर्थ परिक्रमा−प्राचीन काल में हमारे तीर्थ और देवालय मानवीय मेधा को धर्मपरायण बनाये रखने का दायित्व निवाहते थे। वहाँ न केवल उपासना, कथा−कीर्तन सत्संग के प्रावधान नियत थे अपितु आरण्यक परम्परा की अन्तर्मुखी योग साधनाएँ भी कराई जाती थीं। इनका संचालन सिद्धों, समर्थों एवं विद्वान तत्वदर्शियों के हाथ हुआ करता था। “अश्वमेध” की एक परिभाषा−मानवीय बौद्धिक क्षमता को शक्तिशाली बनाए रखना भी होता है वह अध्यात्म से ही संभव है। सभी जानते हैं कि सूर, मीरा, नानकदेव, कबीर बहुत पढ़े नहीं थे। कबीर तो अनपढ़ थे पर उनके बोधात्मक साहित्य सृजन की व्याख्या करने में आज का योग्यतम बुद्धि कौशल भी समर्थ नहीं है। यह उनके आध्यात्मिक चिन्तन का ही प्रभाव था। यह कार्य प्राचीन काल में तीर्थों देवालयों द्वारा सम्पन्न होते थे। पर आज तो उनका स्वरूप मात्र व्यावसायिक रह गया है। कहीं−कहीं तो पंडाओं का आतंक इतना अधिक है, कि वहाँ एक बार हो आने वाला फिर कभी दुबारा उधर मुड़कर नहीं देखता। इतना ही नहीं, वह उल्टा प्रचार भी करता है ताकि जिस संकट से वह गुजर कर आयु हैं उस चंगुल में दूसरे लोग न पड़े।

स्थिति चिन्ताजनक है तथादि तीर्थों की उपयोगिता अपने स्थान पर यथावत स्थिर है। उन्हें अपनी दिशा बदलने के लिए सहमत करने के उद्देश्य से तीर्थ परिक्रमा कार्यक्रम को अश्वमेध के तीसरे चरण के रूप में समाविष्ट किया गया है। इस के लिए एक स्थान से तीन चार गाड़ियाँ गाते बजाते नारे लगाते चलेंगी, तीर्थों में पहुँचेगी। उनका पूजन करेंगी। अश्वमेध के लिए जल रज संग्रह करेंगी। रात में जहाँ विश्राम होगा वहाँ दीपयज्ञ होगा, वहाँ उपस्थित लोगों को कथा कीर्तनों, प्रवचनों के माध्यम से तीर्थों का महत्व समझाया जायेगा उन्हें कुछ न कुछ रचनात्मक क्रिया−कलाप चलाकर जन श्रद्धा का सम्मान करने के लिए सहमत किया जाएगा। उल्लेखनीय है कि धर्मतंत्र आज भी साधनों की दृष्टि से इतना समर्थ है कि देशभर की शिक्षा, स्वास्थ्य की आवश्यकताओं को अकेले यही सम्पन्न कर सकता है स्कूलों, अस्पतालों की परिपूर्ण संख्या चलाने की क्षमता इनके पास है। यह प्रयास किया जाएगा कि देवालय अपनी गरिमा समझें और उसका निर्वाह भी करें।

(4) सहस्रवेदीय अश्वमेध यज्ञ − इतना सब सम्पन्न होने के पश्चात् अश्वमेध यज्ञ होगा। इन यज्ञों का अनुशासन, संचालन धार्मिक कर्मकाण्ड, स्थापनाएँ, सामग्री, संरचना कुँडों के आकार प्रकार सभी अन्य यज्ञों से भिन्न प्रकार के होते हैं। इनमें न केवल ग्रहविज्ञान, ज्योतिष अपितु तंत्र का भी गोपनीय समावेश रखा गया है। यह एक प्रकार से देवताओं की मिन्नत नहीं, उनसे माँगा जाने वाला कानूनी अधिकार है। उन्हें इसके लिए प्रसन्नतापूर्वक बाध्य करने का नाम अश्वमेध है। इन यज्ञों के सम्बन्ध में जितनी भी फलश्रुतियाँ गाई गई हैं वे अकाट्य है, पर ये कार्य उतने क्षमता एवं साधन साध्य भी हैं, इसलिए प्राचीन काल में यह आयोजन एक सौ राजा मिलकर करते थे। इस युग में प्रजा की संगठित शक्ति का नाम ही राजा है। यह संगठन शक्ति धर्म से जुड़कर सामर्थ्यवान् बन गई है। इसके कुछ विधान कहीं भी व्यक्त नहीं किए जा सकते इसलिए सम्पूर्ण नियंत्रण शान्तिकुँज के तत्वावधान में रखा गया है। इन दिनों एक “आश्वमेधिक विभाग“ ही स्थापित किया गया है जो प्राचीन काल से लेकर अब तक की समूची व्यवस्थाओं का संकलन भी कर रहा है। प्रशिक्षण भी दे रहा है और समूची विधि व्यवस्था का संचालन भी कर रहा है। यज्ञकुँड भिन्न प्रकार के होंगे। विशिष्ट, अतिथियों, विशिष्ट साधनाएं सम्पन्न करने वाले प्रयोजकों, इस समूचे अश्वमेध अभियान को सेवायें देने वाले परिजनों, उनके सम्बन्धियों तथा सामान्य महिला पुरुष याजकों, अनुयाजकों के लिए यज्ञकुंडों की प्रथक व्यवस्था रखी गई है। देवपूजन के यजमान विशिष्ट लोग होंगे। इस सबके लिए आवश्यक जानकारियाँ परिपत्र, प्रवेशपत्र आदि के लिए शान्तिकुँज हरिद्वार और अलग−अलग उन स्थानों से संपर्क साधा जा सकता है, अयं यज्ञों देवया अयं मियेध। − ऋग्वेद 1/188/4

‘यह यज्ञ देव (परमात्मा) तक ले जाने वाला है। यह पवित्र है और पवित्र करने वाला है।

‘अश्वमेधेन यजते सर्वान्कामानाप्नोती सर्वाव्युष्टीर्व्यश्नुते।’ − शाँखायन श्रौतसूत्र 6/1/1

अश्वमेध यज्ञ का अनुष्ठान या उसमें सम्मिलित होने का प्रतिफल सम्पूर्ण कामनाओं की पूर्ति के रूप में प्राप्त होता है। जहाँ यह अश्वमेध यज्ञ सम्पन्न होने जा रहे हैं। अभी वर्ष 94 तक के आयोजनों की घोषणा हुई है 5−6−7 नवम्बर 95 को परम पूज्य गुरु देव द्वारा पूर्व घोषित युग सन्धि महापुरश्चरण की प्रथम पूर्णाहुति उनकी जन्मभूमि आँवलखेड़ा में होगी। शेष अश्वमेधों का निर्धारण उसके बाद होगा। विश्वास किया जाना चाहिए चार चरणों में सम्पन्न होने वाला यह अश्वमेध अभियान धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष−जीवन के इन चारों

पुरुषार्थ से समूचे राष्ट्र को समर्थ बनाएगा। इनमें भाग लेने वाले स्वयं को गौरवान्वित अनुभव करेंगे।


यज्ञ बलि−देव दक्षिणा

यज्ञ के साथ ‘स्वाहा’ एवं स्वधा प्रयोगों का निर्देश शास्त्रों ने दिया है।

यज्ञ रूप परमात्मा की स्तुति में कहा गया है त्वमेकं शरण्यं एक मात्र (तुम्हीं शरण में जाने योग्य समर्पण योग्य) त्वमेकं वरेण्यँ (तुम ही एक मात्र वरण करने योग्य−धारण करने योग्य) हो।

यज्ञाराधना में ‘स्वाहा’ समर्पित होने की तथा ‘स्वधा’ स्वयं में धारण करने की विधा रूप है। स्वाहा के तीन अर्थ किये गये हैं−

(1) सुसुष्ठआह−सु−आह अर्थात्−सुन्दर कथन।

(2) स्व वाक् आह इति − अपनी वाणी, अपनी सहमति से कहा गया वाक्य।

(3) स्व आहुतं हविर्जुहोति वा। हवि की या अपनी क्षमता−प्रतिभा−भावना की आहुति देना।

स्वाहाकार तो यज्ञ के साथ−साथ चलता ही रहता है। यज्ञ संचालक याजकों की भावनाओं को उक्त नियमों के अनुकूल बनाये रखते हैं। किन्तु इतने मात्र से यज्ञ को पूरा नहीं माना जाता। उसके साथ स्वधा प्रयोग किया जाता है, तभी यज्ञ की पूर्णता मानी जाती है।

स्वधा के भी तीन प्रकार के अर्थ किये गये हैं− (1) अपना निजी स्वभाव या निश्चय−संकल्प धारण करना।

(2) स्वादपूर्वक−रुचिपूर्वक−प्रसन्नतापूर्वक ग्रहण करने की क्रिया।

(3) पितरों के निमित्त दी गयी भेंट−आहुति।

पितृकर्म में ‘स्वधा नमः’ वाक्य का प्रयोग बहुत होता है। इसका भाव है, कि पितृगण प्रसन्नतापूर्वक यह ग्रहण करें और तृप्त हों।

यज्ञ में यज्ञ भगवान को तृप्त करने, आहूत देवताओं को तुष्ट करने, यज्ञ में सहयोगी विशेषज्ञों को संतुष्ट करने का निर्देश है। इसके बिना यज्ञ को पूरा हुआ नहीं माना जाता। यह यज्ञ का स्वधा प्रयोग कहा जाता है।

इस प्रसंग में यज्ञ−बलि, एवं देवदक्षिणा प्रक्रिया की जाती है।

बलि के संदर्भ में पूर्व लेखों में स्पष्ट किया जा चुका है कि यज्ञ प्रयोजनों में उसका अर्थ हिंसापरक नहीं किया जा सकता। श्रद्धापूर्वक भोज्य पदार्थ−अन्नादि अर्पित करने को ही कर्मकाण्ड में बलि कहा जाता है, श्राद्धकर्म में देवबलि, गौबलि, काकबलि आदि एवं बलिवैश्वदेव का उल्लेख करके यह बात समझायी जा चुकी है।

अस्तु, यज्ञ में यज्ञ पुरुष तथा आहूत सभी देव शक्तियों को भोजन अर्पित करके तृप्त किया जाता है, उसे बलि कहा जाता है। कार्य समाप्त होने पर भी श्रद्धा की अभिव्यक्ति करने से देव शक्तियाँ तुष्ट होती हैं।

यज्ञ मीमाँसा में स्पष्ट लिखा हुआ है−

बलिस्तु त्रिविधो ज्ञेयस्तान्त्रिकः स्मार्त एव च। वैदिकश्चेति............॥

वैदिकं तु बलिं दद्यादोदनं स्विन्नमाषवत्। सरोचनमतिक्रूर दैवते वटकान्दितम्॥

‘बलि तीन प्रकार की होती है−तान्त्रिक, स्मार्त्त और वैदिक। पकाये हुए माष अर्थात्−उड़द से युक्त ओदन (भात) वैदिक बलि कही जाती है। अतिक्रूर देवता के लिए सिंदूर और वटक (बड़ा) से युक्त ओदन की बलि देनी चाहिये।’

स्पष्ट है कि आहार रूप में देवताओं को शुद्ध सात्विक पदार्थ ही प्रिय होते हैं।

किन्तु देवताओं को भोजन भेंट करके तृप्त करना भी प्रतीकात्मक ही है। पदार्थ तो सारे उन्हीं ने हमें दिये हैं, उन्हें कमी किस बात की है? किन्तु उनके दिए में से उनके निमित्त अंश निकालकर अपनी कृतज्ञता व्यक्त की जाती है। अर्पित सामग्री अपने लिए प्रयुक्त ने करके परमार्थ भाव से वितरित कर दी जाती है। इस परमार्थ वृत्ति युक्त कृत्य से देवता निश्चित रूप से बहुत तुष्ट होते हैं।

देवताओं को प्रसन्न करने तुष्ट करने के लिए देव दक्षिणा का विधान कहा गया है। देवता तब तुष्ट होते हैं, जब वे देखते हैं कि आवाहनकर्ता की श्रद्धा वास्तविक है। वास्तविक श्रद्धा में सम्मान के साथ अनुगमन की वृत्ति भी होती है।

गीता का कथन है−

योयच्छद्ध स एवसः

अर्थात्−जो जैसी श्रद्धा रखता है, वस्तुतः वह वैसा ही है।’ श्रद्धास्पद के अनुरूप बन जाना ही श्रद्धा की सचाई का प्रमाण है। देवताओं को अपनी श्रद्धा की सत्यता का प्रमाण देकर ही वास्तव में तुष्ट किया जा सकता है। अस्तु, उनको दक्षिणा रूप में ऐसे संकल्प−ऐसे व्रत देने चाहिए जिससे अपने अंदर देवत्व का विकास हो।

देवत्व के विकास के दो क्रम हैं (1) देवों के प्रतिकूल, दुष्प्रवृत्तियों, विकारों को घटाना तथा (2) देवों के अनुकूल सत्प्रवृत्तियों सत्कर्मों को जीवन में बढ़ाना।

सामान्य रूप से प्रत्येक विचारशील व्यक्ति अपने अंदर से विकारों को हटाने तथा संस्कारों को अपनाने के बारे में सोचता, प्रयास करता है। किन्तु आज के युग में अयज्ञीय प्रवृत्तियों का इतना जोर है कि सामान्य संकल्प तो उनके आगे टिक ही नहीं पाते। इसीलिए यज्ञीय वातावरण में देवशक्तियों के संरक्षण में आत्मपरिष्कार−आत्मनिर्माण−आत्मविकास के संकल्प करना अधिक कारगर होता है।

अश्वमेध प्रयोग देवसंस्कृति को जन जीवन में पुनः प्रतिष्ठित करने के निमित्त किये जा रहे हैं। उसी उद्देश्य से देवशक्तियों तथा ऋषि सत्ता का सहयोग माँगा जाता है। वे प्रसन्नतापूर्वक सहयोग के लिए प्रस्तुत भी होते हैं। अपनी क्षमता से अनुदानों−वरदानों की वर्षा का सुयोग रचते हैं। किन्तु एक प्रश्न सामने आ खड़ा होता है। वे किसे दें? क्यों दें? निश्चित निर्धारित उद्देश्य के लिए वे देंगे और प्रामाणिक व्यक्तियों को वे देंगे। श्रेष्ठ उद्देश्य की घोषणा तो यज्ञानुष्ठान के साथ ही हो जाती है। उसमें श्रद्धापूर्वक भाग लेने वाले व्यक्ति उसी उद्देश्य के लिए यजन करते हैं।

अब बात आती है, प्रामाणिकता की। वह व्यक्तिगत प्रश्न है। इनाम पाने के लिए सभी बालक−सभी विद्यार्थी आतुर होते हैं। वे अपने अभिभावक या शिक्षक को भरोसा दिलाने का प्रयास करते हैं वे उनके अनुग्रह के पात्र हैं। ऐसे अवसरों पर शब्दों को नहीं आचरण को ही कसौटी माना जाता है। कहा जाता है करके दिखलाओ।

देव दक्षिणा प्रसंग में भी देवशक्तियों को अपनी प्रामाणिकता का प्रमाण दिया जाता है। छोटे−छोटे ही सही किन्तु देवत्व की दिशा में बढ़ाने वाले सुनिश्चित संकल्प किए जाते हैं। अपने साथ जुड़े छोटे−छोटे दिखने वाले व्यसनों का त्याग−आलस्य प्रमाद, आदि दुर्गुणों का त्याग किया जाता है। इसी प्रकार अपने अंदर नये गुणों के विकास के संकल्प लिये जाते हैं। नियमित उपासना निमित्त स्वाध्याय एवं लोक मंगल आराधना के लिए अपने समय साधन प्रतिभा का एक अंश लगाते रहना−ऐसे नियम हैं जिन्हें रत्नों की खदान कहा जा सकता है। इन्हें अथवा सेवा−साधना के छोटे−छोटे लक्ष्य स्वीकार करने की नैष्ठिक घोषणा देव दक्षिणा के अंतर्गत आती है।

यज्ञ के बाद अनुयाज प्रक्रिया चलती है। यज्ञ से उत्पन्न ऊर्जा का सुनियोजन उसके अंतर्गत किया जाता है। यह यज्ञ देवसंस्कृति के उन्नयन, राष्ट्र संगठन के उद्देश्य से किये गये हैं। देवसंस्कृति के सूत्रों को अपने जीवन में गरिमापूर्वक स्वीकार करना तथा जन−जन के उन्हें अपनाने के लिए प्रेरित उत्साहित करना इस संदर्भ में देव दक्षिणा प्रक्रिया के अनुरूप पुरुषार्थ कहे जा सकते हैं।

यह अश्वमेध अत्यंत प्रखर ऊर्जा उत्पन्न करने वाले हैं। जो व्यक्ति संकल्पपूर्वक इस ऊर्जा के उपयोग के लिए आगे आयेंगे वे सुख, संतोष, श्रेय, सौभाग्य, यश सभी कुछ पायेंगे। उनके माध्यम से ऐसे कार्य ऊर्जा संपादित करा लेगी, जो वैसे असंभव लगते।

यज्ञीय ऊर्जा के विस्तार से ही यज्ञीय भावनाएँ जन−जन में पनपेगी। यज्ञीय विचार उठेंगे और यज्ञीय कर्म होंगे। संकल्पवानों का यज्ञीय पुरुषार्थ एक ऐसी आँधी उत्पन्न करेगा, कि विनाश के सरंजाम चूर−चूर होकर जने कहाँ जा पड़ेंगे। उज्ज्वल भविष्य की संभावनाएँ एक यथार्थ के रूप में सामने आ खड़ी होंगी।

अपेक्षा की जाती है कि मनुष्य मात्र को श्रेय−सौभाग्य प्रदान करने वाले इस प्रयोग में भावनाशील प्रतिभाएँ अपने शौर्य एवं कुशलता का परिचय देंगी और ऐतिहासिक भूमिका निभाने का श्रेय अर्जित करेंगी।


सूक्ष्म जगत का परिशोधन−पराप्रकृति का अवगाहन

अश्वमेध यज्ञ के समस्त क्रिया−कलापों का गम्भीर पर्यवेक्षण करने पर इसे सूक्ष्म−जगत के परिशोधन और जनमानस के परिष्कार का बहुमूल्य प्रयोग माना जा सकता है। यज्ञ के भौतिक विज्ञान की ही तरह इसका सूक्ष्म विज्ञान भी है। उसके तत्वज्ञान और विधि−विधान में ऐसे तत्व विद्यमान हैं, जो सूक्ष्म जगत के अदृश्य वातावरण में देवत्व की मात्रा बढ़ाते हैं। उससे सर्वजनीन सुख−शान्ति में अदृश्य सहायता मिलती है। इनसे वायुशोधन की उपयोगिता अपने स्थान पर है, पर वास्तविकता दूसरी ही है। वायुशोधन की अपेक्षा वातावरण का निर्माण इनका प्रमुख प्रयोजन है। पवित्र वेद मंत्रों का सस्वर उच्चारण−विश्वचेतना में पवित्रता के तत्व भरने वाले दिव्य कंपन करता है। सामान्य आग को यज्ञाग्नि−देवाग्नि बनाने का काम अध्वर्यु−उद्गाता जैसे विशिष्ट याजकों की श्रद्धा और संकल्पशक्ति करती है। पवित्र हवन द्रव्यों के जलने से उत्पन्न हुई ऊर्जा से सूक्ष्म−जगत में उपयोगी परिवर्तन होते हैं। अश्वमेध प्रयोग में ऐसे−ऐसे अनेक आधारों का समन्वय है जिनका सम्मिलित प्रभाव वातावरण में ऐसे उपयोगी तत्वों का समावेश करता है जो अविज्ञात रूप से विश्वकल्याण की भूमिका सम्पन्न कर सकें।

आज तो वायु प्रदूषण की ही विभीषिका पर चर्चा होती है। अणु विकिरण में विषाक्तता, कोलाहल की प्रतिक्रिया पर ही चिन्ता व्यक्ति की जाती है। तत्वदर्शी मनीषियों को सूक्ष्म वातावरण की चिन्ता इससे भी अधिक रहती है, वे जानते हैं कि वातावरण का प्रवाह मानवी तूफानों से भी अधिक सशक्त होता है। वातावरण के साँचे में व्यक्तियों का समूह खिलौने की तरह ढलता चला जाता है। अनेक देशों की क्षेत्रों की परिस्थितियाँ, प्रथाएँ और मान्यताएँ रुचियाँ और संस्कृतियाँ भिन्न−भिन्न हैं। उनमें जो बालक उत्पन्न होते हैं वे वातावरण के प्रभाव से उसी प्रकार की मनोवृत्ति प्रकृति अपनाते चले जाते हैं। उनके चिन्तन, स्वभाव और क्रिया−कलाप लगभग वैसे ही होते हैं, जैसे कि उस प्रदेश में रहने वाले लोगों के समय का प्रभाव युग का प्रवाह इसी को कहते हैं। सर्दी−गर्मी का मौसम बदलने पर प्राणियों के, वनस्पतियों के तथा पदार्थों के रंग−ढंग ही बदल जाते हैं। गतिविधियों में ऋतु के अनुकूल बहुत कुछ परिवर्तन होते हैं।

विज्ञानवेत्ता जानते हैं कि पृथ्वी पर जो कुछ विद्यमान है और उत्पन्न उपलब्ध होता है, वह सब अनायास नहीं है और न उन सबको मानवी उपार्जन कह सकते हैं। यहाँ ऐसा बहुत कुछ होता है, जिनमें मनुष्य का नहीं सूक्ष्म शक्तियों का हाथ होता है। सूर्य पर दीखने वाले धब्बे उसकी स्थिति के अनुसार बदलते रहते हैं। उस परिवर्तन का पृथ्वी पर भारी असर पड़ता है। उनसे पदार्थों की स्थिति और प्राणियों की परिस्थिति में आश्चर्यजनक हेर−फेर होते हैं। विकरण, चुम्बकीय तूफान अन्धड़, चक्रवात किस प्रकार सामान्य परिस्थितियों को असामान्य बनाते हैं, यह सभी जानते हैं। अन्तरिक्षीय अदृश्य शक्ति वर्षा से कई बार धरती पर हिमयुग आए है। जलप्लावन, समुद्री परिवर्तन और खण्ड प्रलय के दृश्य उपस्थित हुए हैं। भविष्य में जो पृथ्वी के पदार्थों अथवा प्राणियों, मनुष्यों की स्थिति में जो असाधारण परिवर्तन होने वाला है उसका निमित्त कारण सामान्य घटनाक्रमों में नहीं वरन् अन्तरिक्षीय अदृश्य हलचलों में ही पाया जा सकता है।

यों व्यक्ति अपने निजी जीवन में सर्वथा स्वतन्त्र और सशक्त है। इतना होता हुए भी विशाल ब्रह्मांड में गतिशील हलचलों और परिस्थितियों में उसका स्थान नगण्य है। सिर पर खड़े पानी से लदे बादल तक को वह बरसा नहीं सकता। मौत−बुढ़ापे को रोकने तक में असमर्थ है। परिस्थितियों पर उसका अधिकार नगण्य है। प्रवाहों में वह अपना यत्किंचित् बचाव ही कर पाता है। सर्दी उसके बूते रुकती नहीं, कपड़े लादकर, आग ताप कर आत्म रक्षा भर में आँशिक सफलता पा लेता है।

यहाँ एक प्रश्न यह उत्पन्न होता है−कि क्या मनुष्य वातावरण के सामने सर्वथा असहाय−असमर्थ है? इसके उत्तर में यह कहा जा सकता है कि सूक्ष्म प्रवाहों को प्रभावित करने−बदलने और अनुकूल करने की मानवी चेतना में समर्थता विद्यमान है। जीव ईश्वर का अंश है। मानवी चेतना, ब्रह्मांडव्यापी चेतना का एक भाग है। अंश में अंशी की सारी विशेषताएँ मूल रूप से विद्यमान रहती हैं और प्रयत्नपूर्वक वे मूलसत्ता के समान स्तर तक विकसित हो सकती हैं। बीज तुच्छ है किन्तु वह जिस पेड़ का अंश है उसी स्तर तक विकसित होने की सम्भावनाएँ उसमें पूरी तरह विद्यमान हैं। बीज को अवसर मिले तो वह अपनी मूलसत्ता वृक्ष के समान फिर विकसित हो सकता है। जीवात्मा की प्रखरता बढ़ती रहे तो उसकी विकास प्रक्रिया उसे महात्मा, देवात्मा एवं परमात्मा बनने की स्थिति तक पहुँचा सकती है।

जड़ प्रकृति का वैभव विस्तार बहुत है। फिर भी उस पर नियंत्रण चेतना का ही है। शरीर का अस्तित्व एवं क्रिया−कलाप तभी तक है जब तक कि उसमें प्राण सत्ता काम करती है। यह दृश्य−संसार ब्राह्मी चेतना का कलेवर है। प्रकृति ब्रह्म की छाया मात्र है। ब्रह्म जगत ही वास्तविक जगत है। प्रकृति जगत की जड़ता पर चेतना की ब्रह्मसत्ता का ही नियंत्रण है। विकसित जीवात्मा ब्रह्म−जगत से अपने का सम्बद्ध ही नहीं करती वरन् उसके साथ एकाकार होकर इतनी सक्षम भी बन जाती है, कि प्रकृति प्रवाह में आवश्यक हेर−फेर कर सके।

चेतना के संघात से वातावरण में वाँछित परिवर्तन किए जाने सम्भव हैं। अदृश्य जगत में कई बार ऐसी प्रेरणाएँ उभरती हैं जिनके आँधी−तूफानों में मनुष्यों के मस्तिष्क पत्तों और तिनकों की तरह उड़ने लगते हैं। युद्धोन्माद ऐसे ही उभरते हैं। उन दिनों अधिकाँश लोग लड़ने की आवश्यकता अनुभव करता और उसके लिए उतारू दिखते हैं। एक अजीब सा आवेश छाया रहता है। कहने की आवश्यकता पड़ती है न समझाने की। हवा में तेजी और गर्मी ही कुछ ऐसी होती है जिसके कारण सामान्य मस्तिष्क एक प्रकार से सम्मोहक स्थिति में रहता और प्रवाह में बहता दिखाई पड़ता है। बड़े युद्धोन्माद एवं स्थानीय दंगों, फिसादों में वातावरण किस प्रकार उत्तेजित आतंकित होता है, उसे जन−मनोवृत्ति शास्त्र के अध्येता भली प्रकार जानते हैं। कुछ इसी तरह समय−समय पर दूसरे सूक्ष्म प्रवाह भी अपने−अपने समय पर उभरते रहे हैं और असंख्य मस्तिष्कों को बहा ले जाने में आँधी−तूफान का काम करते रहे हैं।

प्रजातन्त्र की लहर एक समय चली और उसने राजतन्त्र को संसार भर से उखाड़ फेंकने और उसके स्थान पर जनवाद सरकार बनाने का चमत्कार उत्पन्न कर ही दिया। एक लहर साम्यवाद की उभरी, उठी−फैली और विलीन होने लगी। लहर लहर ही है। ज्वार−भाटा की भयंकरता, समुद्रतटवासी समय−समय पर देखते रहते हैं, कई तरह के विचार प्रवाह भी कई बार ऐसे आते हैं। जो अपने साथ असंख्यों को समेटते−घसीटकर कहीं से कहीं उठा कर उड़ाकर ले जाते हैं।

महात्मा बुद्ध का धर्मचक्र प्रवर्तन साधन प्रधान नहीं प्रवाह प्रधान था। साधनों से प्रवाह उत्पन्न नहीं किया गया था, प्रवाह ने साधन खड़े कर दिए थे। बुद्ध ने हवा गरम की और उसकी गर्मी से लाखों सुविज्ञ, सुयोग्य और सुसम्पन्न व्यक्ति अपनी आत्माहुति देते हुए धर्म सैनिकों की पंक्ति में अनायास ही आ खड़े हुए। धर्म प्रवर्तकों में से प्रत्येक ने अपने−अपने समय में अपने−अपने ढंग से वातावरण को गरम करने परिशोधित करने वाली भाव तरंगें उत्पन्न की हैं और उस प्रवाह में असंख्य व्यक्ति बहते चले गए। अदृश्य और सूक्ष्म वातावरण के तथ्य तथा रहस्य को जो लोग जानते हैं, वे समझते हैं कि इस प्रकार के प्रवाह कितने सामर्थ्यवान होते हैं। उनकी तूफानी शक्ति की तुलना संसार की किसी और शक्ति से नहीं हो सकती।

अश्वमेध महायज्ञों की श्रृंखला का एक पक्ष−व्यक्तित्व परिष्कार−समाजनिष्ठ के प्रशिक्षण का है। चरित्रनिष्ठ और समाजनिष्ठ की गरिमा और उपयोगिता को इन महायज्ञों के साथ जुड़े हुए विशिष्ट कर्मकाण्डों की व्याख्या और विवेचना में ढूँढ़ा−खोजा, सीखा−समझाया जा सकता है। इस कसौटी पर कसने पर इसे ऐसा श्रद्धासिक्त−उपचार कह सकते हैं जिसके माध्यम से उत्कृष्ट चिन्तन और आदर्श कर्तृत्व का धर्म शिक्षण सर्वसुलभ बनता है। अश्वमेध के इस ज्ञान पक्ष की उपयोगिता का जितना महात्म्य कहा जाय उतना ही कम है।

लेकिन इस पक्ष से कहीं अधिक महत्वपूर्ण और समर्थ इसका दूसरा पक्ष है। जिसके द्वारा सूक्ष्म वातावरण में आवश्यक गर्मी और तेजी पैदा की जाती है। साथ ही दृश्यजगत में वह आधार भूमि तैयार करनी है, जिस पर अदृश्य शक्तियाँ क्रियाशील हो सकें। सूक्ष्म प्रवाह के सहयोगी बनने से अभीष्ट प्रयोजन में सफलता प्राप्त करने की सम्भावना सुनिश्चित हो जाती है। हवा का रुख पीठ पीछे से हो तो जलयानों से लेकर पैदल चलने वाले को बहुत सुविधा हो जाती है और मार्ग जल्दी−जल्दी सरलता से पूरा हो जाता है। युग परिवर्तन के लिए हमें वातावरण के अनुकूलन के लिए कुछ ऐसे ही प्रचण्ड प्रयास करने हैं। अश्वमेध आयोजन इसी प्रयोजन के लिए सम्पन्न किया जा रहा दिव्य प्रयोग है।

विशिष्ट आध्यात्मिक उपचारों की प्रचण्ड ऊर्जा उत्पन्न करके वातावरण में व्यापक फेर−बदल की जानी है। प्रखर प्रतिभाएँ अपनी प्राण शक्ति से युग को बदलती हैं। अवतारी महामानव समय के प्रवाह को उलटते हैं। ठीक इसी प्रकार अश्वमेध प्रयोग से पैदा हुई चेतनात्मक प्रचण्ड ऊर्जा सूक्ष्म−जगत को परिष्कृत करके उसे इस योग्य बना दे कि सुख शान्ति की परिस्थितियाँ उत्पन्न होने लगें और उज्ज्वल भविष्य की सम्भावनाएँ दैवी अनुग्रह की तरह उमड़ती−उभरती चली आयें।

सूक्ष्म वातावरण का परिशोधन करने के लिए, पहले भी अध्यात्म विज्ञानियों द्वारा कतिपय दिव्य उपचार समय−समय पर किये गए हैं। इसके प्रमाण शास्त्रों में मिलते हैं। रावण काल में विक्षुब्ध वातावरण को समाहित करने का काम बाकी रह गया था। भगवान राम ने इसी हेतु दस अश्वमेधों की संकल्प श्रृंखला पूरी की। कंस, दुर्योधन−जरासन्ध जैसे असुरों के न रहने पर भी महाभारत काल के विक्षोभ, वातावरण में भरे रहे। भगवान कृष्ण ने उनका समाधान आवश्यक समझा और पाण्डवों ने अश्वमेध रचाया। महर्षि विश्वामित्र अपने समय की असुरता को दुर्बल बनाने के लिए जो बृहत् यज्ञ रच रहे थे, वह भी कुछ इसी स्तर का विशिष्ट यज्ञ प्रयोग था। उसका पता असुरों को चल गया और वे ताड़का, सुबाहु, मारीच के नेतृत्व में उसे नष्ट करने के लिए आक्रमण करने लगे। राम−लक्ष्मण को यज्ञ की रक्षा के लिए जाना पड़ा। प्रयोग सफल हुआ परिणाम में असुर विनाश की परम्परा चल पड़ी।

ये सभी अपने समय की बड़ी क्रान्तियाँ थीं। यों साधारण अर्थों में क्रान्तियाँ तोड़−फोड़ बदलाव परिवर्तन को कहते हैं। उसमें उखाड़−पछाड़ का ध्वंसात्मक पक्ष आगे रहता है। यह मौलिक पक्ष हुआ। आत्मिक पक्ष में सृजन को प्रधान रखना होता है, ताकि ध्वंस की स्थिति ही न आये। अन्धेरे को पीटने की अपेक्षा यह अधिक बुद्धिमत्तापूर्ण है कि प्रकाश की व्यवस्था बनाई जाय। अश्वमेध प्रयोग के द्वारा जो उच्चस्तरीय प्रयास इस दिनों किया जा रहा है उसमें प्रत्यक्षतः समावेश तो रचनात्मक कार्यक्रमों का रहेगा पर मूलतः उसे वातावरण परिशोधन की प्रक्रिया ही समझा जाना चाहिए। जिससे पराप्रकृति को द्रवित कर मनोवाँछित प्रतिफल प्राप्त किए जायेंगे।

इसे ऐतिहासिक प्रयत्नों के पुनरावर्तन के रूप में भी अनुभव किया जा सकता है। जिसके द्वारा अन्तरिक्ष में प्रदूषण क्रन्दन और विनाश की विषाक्तता परिशोधित हो सकेगी। सूक्ष्म−जगत को असाधारण रूप से प्रभावित − परिमार्जित करने वाले इस महाअभियान को वैदिक ऋषियों−सतयुग के महामनीषियों के मार्गदर्शन का अनुगमन ही कहा जाएगा। इसके द्वारा सत्प्रवृत्तियों का अनुपात जिस क्रम से बढ़ेगा−दुष्प्रवृत्तियाँ उसी क्रम से घटती चली जाएँगी। विघातक तत्वों का सहज निराकरण होता चला जाएगा और युगक्रांति का उद्देश्य सुगमतापूर्वक पूरा हो सकेगा।

इन यज्ञों की श्रृंखला में युगक्रान्ति के स्थूल और सूक्ष्म स्तर के उन सभी तत्वों का समावेश है−जो जनमानस को−व्यापक वातावरण को परिष्कार करके इक्कीसवीं सदी को उज्ज्वल भविष्य के रूप में बदल सकते हैं। इन्हीं तथ्यों को ध्यान में रखते हुए−व्यक्ति समाज−प्रकृति और विश्व को बदलने वाले सूक्ष्मधाराओं का अवतरण करा सकने में समर्थ−अश्वमेध यज्ञों की विशिष्ट योजना का क्रियान्वयन किया जा रहा है।


यज्ञ प्रक्रिया, दिव्य अनुशासन एवं यज्ञ−संसद

यज्ञ को भाव विज्ञान, मनोविज्ञान, मंत्र विज्ञान, पदार्थ विज्ञान, एवं क्रिया विज्ञान का एक अद्भुत संगम कहा जा सकता है। दिव्य चेतना, सृष्टिगत परमात्म चेतना के साथ आदान−प्रदान की क्षमता के कारण यज्ञ को दिव्य द्वार भी कहा गया है। इसीलिए इसकी हर क्रिया एवं भावना आदि के साथ दिव्य अनुशासन जोड़ कर रखे जाते हैं। उन दिव्य अनुशासनों का स्मरण बनाये रखने के लिए यज्ञशाला में उनके प्रतीक स्थापित किए जाते हैं, तथा अनुशासित क्रम से सारी प्रक्रिया के संचालनार्थ यज्ञ संसद भी नियुक्त की जाती है।

वर्तमान प्रसंग में अश्वमेध यज्ञों के साथ सभी आवश्यक दिव्यानुशासन जोड़े गये हैं। सूक्ष्म स्तर की व्यवस्था पर इस अंक में पूर्व पृष्ठों पर पर्याप्त प्रकाश डाला जा चुका है। दृश्य प्रतीकात्मक स्वरूप बनाने में भी देशकाल के अनुरूप शास्त्रीय प्रक्रिया अपनायी जा रही है।

प्रतीकों की स्थापना

अश्वमेध की सहस्रकुण्डीय यज्ञशाला को दिव्य, चिन्हों, चक्रों एवं देव विग्रहों से अलंकृत किया जा रहा है। कुछ महत्वपूर्ण स्थापनाएँ इस प्रकार हैं−

यज्ञशाला की चारों दिशाओं में चार दिव्य द्वार बनाये जाते हैं। यह केवल देव प्रयोजनों के लिए होते हैं, जनोपयोग, के लिए नहीं। इनमें तोरण, शूल एवं शंख चक्र, गदा, पदम आदि चिन्ह आँकित रहते हैं। पूर्व में लाल रंग में शंख, दक्षिण में काले रंग में चक्र, पश्चिम में सफेद रंग में गदा तथा उत्तर में पीले रंग में पद्म अंकित होता है। इन चारों द्वारों पर आठ देव प्रहरी, जय−विजय, भद्रक−सुभद्रक , आदन्द−विश्वरूप एवं ध्रुव−सुप्रसन्न अंकित होते हैं।

आठों दिशाओं में विभिन्न देवशक्तियों की प्रतीक पताकाएँ स्थापित की जाती हैं। उन पर सम्बन्धित देवशक्तियों के वाहन अंकित होते हैं।

− पूर्व में इन्द्र देवता का वाहन हाथी सफेद रंग से अंकित होता है। अग्नि कोण में अग्निदेव का वाहन अज सफेद रंग से अंकित होता है। दक्षिण में यम देवता का वाहन महिष लाल रंग में−नैऋत्य में दुर्गा का वाहन सिंह सफेद रंग में, पश्चिम में वसु का वाहन मकर धूम्र रंग में, वायव्य में चन्द्र का वाहन हरिण काले रंग में, उत्तर में सूर्य का वाहन अश्व स्वर्णिम रंग में तथा ईशान में शिव का वाहन वृषभ सफेद रंग में अंकित होता है।

− इसी प्रकार ईशान एवं पूर्व के मध्य में ब्रह्म का वाहन हंस और नैऋत्य एवं पश्चिम के बीच अनन्त देव का वाहन गरुड़ अंकित पताकाएँ स्थापित की जाती हैं।

* आठों दिशाओं में आठ दिग्पालों के प्रतीक हाथी स्थापित किये जाते हैं। आकाश एवं पाताल दिशा के दिग्पालोँ की स्थापना अदृश्य होती है।

* विभिन्न दिशाओं में विभिन्न आकृति वाले यज्ञ कुण्डों की रचना का विधान पूर्व लेखों में दिया जा चुका है।

* आठ दिशाओं में सप्त ऋषि तथा आठवीं अरुन्धती की मूर्तियों का निर्धारण है। उत्तर में गौतम, ईशान में भारद्वाज, पूर्व में विश्वामित्र, आग्नेय में कश्यप, दक्षिण में जमदग्नि, नैऋत्य में वशिष्ठ, पश्चिम में अत्रि तथा वायव्य में अरुन्धती की स्थापना की जाती है।

* यज्ञशाला में देव वेदियों की स्थापना का क्रम भी निर्धारित है। सर्वतोभद्र प्रमुख देवमं− के सामने पूर्व दिशा में। उसके दोनों ओर षोडश मातृका एवं द्वादश विनायक चक्र।

− तत्व वेदियों में आकाश तत्व का प्रतीक स्वास्तिक देवमंच के पास रखा जाता है। अग्नि कोण में अग्नितत्व, नैऋत्य में पृथ्वी तत्व, वासुतत्व, तथा ईशान में जल तत्व की वेदियों की स्थापना होती है।

− यज्ञशाला के मध्य में नवग्रह चक्र, ईशान में पंचोंकार वेदी, वायव्य में क्षेत्रपाल चक्र, अग्नि कोण में योगिनी चक्र, नैऋत्य में वास्तुवेदिका, की स्थापना की जाती है।

− यह सभी स्थापनाएँ मात्र श्रृंगार नहीं है, इनमें सन्निहित प्रेरणाओं एवं शक्तियों को यज्ञीय कर्मकाण्ड के बीच उभारा जाता है। यज्ञीय कर्म और याजकों के मनोभाव−विचार आदि उसी के अनुरूप गढ़े जाते हैं।

अनुशासन की धुरी यज्ञ संसद

यज्ञ का संचालन स्थूल एवं सूक्ष्म अनुशासनों का निर्वाह करते हुए हो, इसके लिए सक्षम विशेषज्ञ नियुक्त किए जाते हैं। उस व्यवस्था को यज्ञ संसद की संज्ञा दी जाती है। यज्ञ संसद के प्रमुख दायित्व इस प्रकार होते हैं।

यज्ञाचार्य− आचार्य को, रुद्रयामल में यज्ञ का सर्वाध्यक्ष कह गया है। किसी विशेष उद्देश्य की पूर्ति किये जाने वाले यज्ञ के लिए तदनुकूल क्षमता सम्पन्न आचार्य की खोज की जाती थी। आचार्य को यज्ञीय कर्मकाण्ड की सभी धाराओं का ज्ञान तो होता ही था, कार्य की गंभीरता के अनुरूप तप−शक्ति का भंडार भी होता था। तप शक्ति के आधार पर ही देव शक्तियों को आकर्षित−आवाहित करके उद्देश्य के अनुरूप सूक्ष्म प्रवाह पैदा करना संभव होता था।

राजा दशरथ के पुत्रेष्टि यज्ञ की कथा सर्व विदित है। महर्षि विशिष्ट उन दिनों ऋषियों में सर्वाधिक सम्माननीय थे, किन्तु उद्देश्य की पूर्ति के लिए उपयुक्त तपशक्ति सम्पन्न युवा ऋषि श्रृंग ऋषि को उन्होंने उस यज्ञ का आचार्य बनाया था। उनकी तपशक्ति के संयोग से ही वह यज्ञ इतना श्रेष्ठ फलदायी बन सका था।

आचार्य में ब्रह्मांडीय दिव्यधाराओं के साथ संगति बिठाने की क्षमता होती थी। वे जिस देवता का आवाहन करते थे, वे देवता यज्ञ में उपस्थित होते थे, जिनके लिए आहुति समर्पित करते थे, वह उन तक पहुँचती थी और स्वीकार होती थी। जनमेजय के सर्प यज्ञ में आत्मरक्षा के लिए तक्षक इन्द्रासन से जा लिपटा था। यह पता लगने पर इन्द्र सहित तक्षक की आहुतियाँ डाली गयीं। आहुतियों के प्रभाव से इन्द्रासन सहित तक्षक उस ओर खिंच चला। तब इन्द्र ने उसे अपने आसन से बलपूर्वक अलग किया था।

यज्ञ में आचार्य का वरण बहुत विचारपूर्वक का जाता रहा है। वर्तमान यज्ञ वशिष्ठ, अरुन्धती की तरह सक्षम ऋषियुग्म पूज्य गुरु देव एवं वन्दनीया माताजी के संरक्षण एवं मार्गदर्शन में होंगे।

ब्रह्म−यह आचार्य के बाद सर्वाधिक महत्वपूर्ण पद होता है। ऋत्विक् एवं यजमानादि के समस्त कार्यकलापों का निरीक्षण तथा उन्हें भली प्रकार चलाने का दायित्व ब्रह्म का होता है। उनके तीन सहायक होते हैं−

(1) ब्रह्मणाच्छाँसी (निर्देशों का पालन कराने वाला) (2) आग्नीध्र − यज्ञाग्नि तथा आहुति आदि का संयोजक (3) पोता (स्वच्छता−पवित्रता का दायित्व वहन करने वाला)

होता− देवताओं का आवाहन करने वाले प्रधान पुरोहित स्वागताध्यक्ष। इनके भी तीन सहायक प्रशास्ता, अच्छावाक एवं ग्रावस्तुत होते हैं।

अध्वर्यु− यज्ञीय क्रियाओं का सुसंचालन करने वाला, सम्पूर्ण यज्ञीय विधि−विधान का ज्ञाता। इनके तीन सहयोगी प्रतिप्रस्थाता, नेष्ट एवं उन्नेता कहे जाते हैं।

उद्गाता− यज्ञ में देव स्तुतियों, गेय मंत्रों के विशेषज्ञ।

इनके तीन सहयोगी प्रस्तोता, प्रतिहर्ता एवं सुब्रहमण्यम होते हैं।

सदस्य− विभिन्न वेदियों के निकट बैठकर यज्ञीय कार्य का निरीक्षण करते हुए याजकों द्वारा होने वाली चूकों का निवारण करने का दायित्व इनका होता है।

याजक− साधना द्वारा अंतःकरण में यज्ञीय भाव जाग्रत करने वाले भावनापूर्वक आहुतियाँ समर्पित करने वाले याजक होते हैं।

श्रद्धा की प्रमुखता

यज्ञ कर्म में श्रद्धा सहित ही हर कार्य किया जाने का निर्देश शास्त्रों ने दिया है उसके बिना यज्ञ−कर्म निष्प्राण हो जाता है।

‘श्रद्धया सत्यमाप्यते’ श्रद्धा से ही सत्य की प्राप्ति होती है, कहकर शास्त्रों ने श्रद्धा सहित कर्म का आदेश दिया है−

गीताकार का कथन है:−

अश्रद्धया हुतं द्रव्यं तपस्तप्तंकृतं चतत्। असदित्युच्यते पार्थ न च तत्प्रेत्य नोइह॥

अर्थात्−’अश्रद्धा से हवन, दान, तप, अथवा जो कुछ कर्म किया जाता है उसे ‘असत्’ कहते हैं। हे पार्थ! असत्कर्म का फल न तो परलोक में और न इह लोक में ही हितकर होता है।’

अत्रिस्मृति (146) में कहा गया है कि −

अश्रद्धया च यद् दन्तं विप्रेऽग्नौ दैविकेक्रतौ। न देवास्तृप्तिमायान्ति दातुर्भवति निष्फलम्॥

‘इष्ट देवता की प्रीति के लिये अनुष्ठित यज्ञ में ब्राह्मण रूपी अग्नि के लिये (ब्राह्मण और अग्नि के लिए) जो दक्षिणा आदि अश्रद्धा से अर्पण की जाती है उससे देवता को तृप्ति नहीं होती। दाता का वह दक्षिणा आदि द्रव्य निरर्थक ही जाता है।’

मत्स्यपुराण−के अनुसार श्रद्धाहीन यज्ञों से राजा और राष्ट्र दोनों की भयंकर क्षति होती है यथा −

शान्तिमंगल होमेषु नास्तिक्यं यत्र जायते। राजा वा म्रियते तत्र संदेशों वा विनश्यति॥ −(239-11)

शान्ति, मंगल तथा होम कार्यों में जहाँ पर श्रद्धाहीनता से उत्पन्न नास्तिकता का साम्राज्य रहता है, वहाँ के राजा ताकि उस देश का विनाश होता है। यही कारण है कि यज्ञ के पूर्व याजकों की श्रद्धा का परिष्कार एवं संवर्धन करने वाली साधनाएँ करायी जाती हैं। यज्ञ के समय उन प्रतीकों की स्थापना जगह−जगह की जाती है, जिसे देखकर याजकों की श्रद्धा उमड़े। यज्ञ संसद भी अनुशासन एवं संचालन में श्रद्धा को लक्ष्य करके ही सारे कार्यों का सम्पादन करते−कराते हैं।


यज्ञों के विविध विधान-कुण्ड विज्ञान

सूक्ष्म प्रकृति में हलचलें उत्पन्न कर, भौतिक जगत को प्रभावित करने में यज्ञ प्रक्रिया पूरी तरह समर्थ है। इस सामर्थ्य का विज्ञान काफी गहरा और विस्तृत है। प्रयोजन क्या है? इस हेतु चेतना जगत में किस तरह की तरंगें पैदा करनी है, इसी के अनुरूप यज्ञ के प्रकार हवनकुण्ड का स्वरूप, कर्मकाण्ड का निर्धारण तय करना पड़ता है। यही कारण है कि यज्ञवेत्ता महर्षियों ने अपने गहन शोध प्रयासों के बाद इस सम्बन्ध में अनेकानेक प्रयोग पव्तियों-तरह-तरह के कर्मकाण्ड विधानों का अन्वेषण किया। इसकी व्यापकता का स्पष्ट बोध कराने के लिए महाग्रन्थों के कलेवर भी बौनापन अनुभव करने लगेंगे। लेख की पंक्तियाँ तो सिर्फ झलक दर्शाने की कोशिश भर कर सकती हैं। यज्ञवेत्ताओं के अनुसार-विवाहोपरान्त विधिपूर्वक अग्नि स्थापना का निर्देश है। इसे स्मार्ताग्नि कहते हैं। जिसमें साँय, प्रातः, नित्य हवनादि सम्पन्न किए जाते हैं।

(2) गार्हपत्य, आह्वानीय और दक्षिणाग्नि के विधिपूर्वक स्थापन को ‘श्रौताधान’ कहते हैं। इन अग्नियों में किए जाने वाले यज्ञों का नाम श्रौतकर्म है।

(3) दर्ष पूर्ण मास याग- अमावस्या और पूर्णिमा का होने वाले यज्ञ को क्रमशः दर्ष और पौर्णमास यज्ञ कहते हैं।

(5) प्रतिवर्ष वर्षाऋतु में अथवा उत्तरायण और दक्षिणायन में संक्रान्ति के दिन एक बार जो यज्ञ किया जाता है, उसे “निरुढ़पषु-बन्ध” कहते हैं।

(6) आग्रयण यज्ञ- प्रति वर्ष वसन्त और शरदऋतु में नवीन यव और चावल से जो यज्ञ किया जाता है, उसे आग्रयण या नवान्न यज्ञ कहते हैं।

(7) सौत्रामणि यज्ञ:− इन्द्र के निमित्त जो यज्ञ

किया जाता है, उसे सौत्रामणि यज्ञ कहते हैं। यह

दो प्रकार का होता है-स्वतन्त्र और अंगभूत।

(8) सोमयाग- सोम लता द्वारा जो यज्ञ किया जाता है, उसे सोमयाग कहते हैं। इसके सोलह ऋत्विक् होते हैं। दक्षिणा लेकर यज्ञ करने वाले ऋत्विक् कहलाते हैं। सोमयाग के सोलह ऋत्विकों के भी चार प्रकार हैं’1-अध्वर्युगण 2-ब्रह्मगण 3-होतृगण 4-उद्गातगण सोमयाग के सात भेद हैं-

(1) अग्निष्टोम :- अग्निष्टोम साम में जिस यज्ञ की समाप्ति हो और उसके बाद अन्य साम न पढ़ा जाय, उसे अग्निष्टोम कहते हैं। इसी प्रकार (2) उक्थ्य साम (3) षोडशी साम (4) बाजपेय साम (5) अतिरात्र साम और (6) असोर्याम नामक साम पढ कर जिन यज्ञों की समाप्ति होती है, वे यज्ञक्रम से उक्थ्य आदि नामों से पुकारे जाते हैं। अग्निष्टोम साम के अननतर षोडशी साम जिस यज्ञ में पढ़ा जाता है, वह अत्यग्निष्टोम कहा जाता है।

(9) क्षदशाह यज्ञ :- यह सत्र और ‘अहीन’ भेद से दो प्रकार का होता है। जिनमें सोलहों ऋत्विक्, आहिताग्नि ब्राह्मण और बिना दक्षिणा वाले हों, उसे सत्र कहते हैं। दो सुत्या से ग्यारह सुत्याः (प्रातः सायं, मध्याह्न तीनों समय हवन को एक सुत्या कहते है) जिस यज्ञ में हों और आदि अन्त में ‘अतिरात्र’ नामक यज्ञ हो तथा अनेक यजमानकर्ता हों ऐसे सोमयाग को ‘अहीन’ कहते हैं।

(10) गवानयन यज्ञ- यह सत्र 385 दिनों का होता है। इसमें 12 दीक्षा, 12 उपसद तथा 361 सुत्या होती हैं।

(11) वाजपेय यज्ञ- इस यज्ञ के आदि और अन्त में अग्निष्टोम यज्ञ होता है। इसमें सत्रह-सत्रह हाथ के यूप होते हैं। यह चालीस दिन में सम्पन्न होता है।

(12) राजसूय यज्ञ- इसमें अनुमति आदि बहुत सी इष्टि और पवित्र आदि बहुत से यज्ञ होते हैं। यह यज्ञ 33 महीने में पूरा होता है। साँस्कृतिक दिग्विजय करने में समर्थ सार्वभौम लोकनायक ही इसे सम्पन्न करते है।

(13) चयन याग-जिस यज्ञ में ईंटों के द्वारा वेदी निर्माण हो, उसे चयनयाग कहते हैं। यह वेदी 10 हाथ लम्बी और चौड़ी होती है, जिसे आत्मा कहते है। इसके दक्षिण और उत्तर की ओर छ:−छः हाथ का चबूतरा बनता है जिसको दक्षिण पक्ष और उत्तर पक्ष कहते हैं। पश्चिम की ओर बने साढ़े पाँच चबूतरे को पुच्छ कहते हैं। इसकी ऊँचाई पाँच हाथ की होती है। अतः इसको पंचचितिक स्थण्डिल कहते हैं। इसे बनाने में चौदह तरह की ईंटें लगती हैं। चयन याग के चबूतरे में समस्त इष्टिकाएँ 11170 होती हैं।

(14) पुरुष मेध यज्ञ- इस यज्ञ में पुरुष आदि यूप में बाँधकर छोड़ दिए जाते हैं। इसमें 11 यूप होते हैं और चालीस दिन में समाप्त होता है। यज्ञ करने के बाद वानप्रस्थ आश्रम ग्रहण किया जा सकता है।

(15) सर्वमेध यज्ञ:− इस यज्ञ में सभी प्रकार की वनस्पतियों और अन्नों का हवन होता है। यह यज्ञ 34 दिन में समाप्त होता है।

(16) पितृमेध यज्ञ- इस यज्ञ में मृत्पित्रादि का अस्थिदाह होता है। इसमें ऋत्विक् केवल अध्यर्यु होता है।

(17) यकाह यज्ञ- एक दिन साध्य यज्ञ को एकाह यज्ञ कहते हैं। जिन यज्ञों में एक सुत्या होता है, ऐसे सोमयाग, विश्वजित, सर्वजित, भूष्टोमं आदि सौ से अधिक यज्ञ तत्तत्सूत्रों में विहित हैं।

(18) अहीन यज्ञ- दो सुत्या से लेकर ग्यारह सुत्या तक को ‘अहीन’ यज्ञ कहते हैं। ये भी विभिन्न नामों से शताधिक सूत्रों में विदित हैं।

(19) अश्वमेध यज्ञ- साँस्कृतिक-दिग्विजय करने वाले लोकनायक इस यज्ञ का अनुष्ठान करते हैं। इसे यज्ञों का राजा कहा गया है। इसके दृश्य और अदृश्य जगत में अनेकों चमत्कारी परिणाम उत्पन्न होते हैं। इस यज्ञ में दिग्विजय के लिए घोड़ा छोड़ा जाता है। इसमें 21 हाथ के 21 यूप होते हैं।

(20) बारह से सोलह तक अठारह से तैंतीस, पैंतीस से चालीस, उनचास, एक षत, तीन सौ आठ और 1000 सुत्या वाले जो अनेकों सोमयाग हैं उन्हें सत्र कहते हैं।

यज्ञों के स्वरूप और प्रकार भेद के अनुरूप कुण्ड के आकार-प्रकार की विशिष्टता का चुनाव करना पड़ता है। जिन्हें सूक्ष्म दृष्टि प्राप्त है, वे अनुभव कर सकते हैं कि हवन कुण्ड अन्तरिक्ष में संव्याप्त बृहत्सोम के अवतरण का आधार है। इसमें देवशक्तियों की अनुग्रह वर्षा उतर कर यज्ञ धूम के साथ-समूचे विश्व में फैल जाती है। उसका निर्माण भी आहुतियों के आधार पर प्रयोजनकर्ता के उद्देश्य पर निर्भर है।

‘कुण्डसिद्धि’-कार के अनुसार पचास से सौ आहुति देनी हो तो कुहनी से कनिष्ठिका के मान का एक हजार आहुति में हाथ भर का, दस हजार आहुति के लिए दो हाथ का, एक लाख आहुति हेतु चार हाथ का तथा दस लाख और एक करोड़ आहुति के लिए क्रमशः छः हाथ और सोलह हाथ का हवनकुण्ड बनाना चाहिए। भविष्योत्तर पुराण शारदातिलक, स्कन्द पुराण में भी कुछ इसी तरह के कथन देखने को मिलते हैं।

इनकी कुछ और विशेषताओं को स्पष्ट करते हुए कुण्डसिद्धि कार का मत है-

वेदाक्षीणि युगाग्नयः शशियुगान्यष्टाव्यय स्त्रीषवोऽष्टाक्षा याहृतरसा स्वाराँगकमिता नेर्त्रषयोऽक्षस्वराः।

अं्गुल्योऽथ यवाः खमभ्रमिषवः खं पंचषट् सागराः, समाभ्रंगु नयस्तवभोनिगदितावेदास्र के बाहवाः।

अर्थात्-एक हाथ के कुण्ड का आयास विस्तार 24 अंगुल का, दो हाथ का हो तो 34 अंगुल का, तीन हाथ का हो तो 41 अंगुल और 5 हाव का, चार हाथ का हो तो 48 अंगुल और 5 यव, व 6 हाथ का कुण्ड हो तो 49 अंगुल 7 यव, सात हाथ का कुण्ड हो तो 63 अंगुल और 4 यव, आठ हाथ का कुण्ड हो तो 66 अंगुल और 7 यव, नव हाथ का कुण्ड हो तो 72 अंगुल और दस हाथ का कुण्ड हो तो 76 अंगुल और 7 यव के प्रमाण से आयाम विस्तार होना चाहिए। इन्हें चतरस्र कुण्ड के भुज कहा गया है।

जिस प्रकार ताँत्रिक उपासनाओं में प्रयोग किए जाने वाले यंत्र-कागज अथवा धातु पत्र पर खिंची आड़ी तिरछी रेखाएँ भर नहीं है। इनकी देवशक्तियों की प्रतिकृति मानकर-तद्नुरूप शक्तियों का आकर्षित किया जाता है। उसी प्रकार कुण्ड निर्माण का आधार सौंदर्य को उत्कीर्ण करना भर नहीं हैं। इनकी विभिन्न आकृतियों के उद्देश्य अनेकानेक शक्तिधाराओं का आकर्षण समझा जाना चाहिए। इसी कारण से शास्त्रकारों ने इन्हें शिल्पियों द्वारा ठीक-ठाक तैयार करवाने का निर्देश दिया है। आधुनिक प्रचलित क्रियाओं में चतुष्कोण, अर्धचंद्र, समअष्टास्र, पद्य, समषडस्र इनके चित्र साथ को पृष्ठ पर देखे जा सकते हैं।

आयाम विस्तार की भाँति ही कुण्ड सिद्धि और शारदा तिलक में कुण्ड की गहराई का विवेचन प्राप्त होता है। इसके अनुरूप जितना कुण्ड का विस्तार और आयाम हो उतना गहरा प्रथम मेखला तक करना चाहिए। तथा गहराई चौबीसवें भाग में कुण्ड का निर्माण होना श्रेष्ठ है। “क्रियासार” और लक्षण संग्रह के अनुसार एक मेखला वाला कुण्ड अधम, दो मेखला वाला मध्यम और तीन मेखला वाला उत्तम होता है। कुछ विद्वानों के अनुसार पाँच मेखला वाला कुण्ड उत्तम है। इन मेखलाओं में सत्व, रजस और तमस् की भावना से तीनों रंग भरे जाते हैं। मेखलाएं पाँच हों वहाँ पंचतत्व की भावना से रंगने का विधान है। कुण्ड निर्माण का विषय ज्यामिति, भूमिति, क्षेत्रमिति और वास्तुशास्त्र से अधिक संबंध रखता है। इस संबंध में अधिक रुचि रखने वाले जिज्ञासुओं को कुण्डसिद्धि, भविष्य पुराण, वायु, पुराण, अनुष्ठान प्रकाश, पंचरात्र क्रियासार समुच्चय शारदातिलक आदि ग्रंथों का अवलोकन-अध्ययन करना चाहिए।

कुण्डों की रचना में भिन्नता का उद्देश्य यह है कि काम्यकर्मों की प्रधानता के अनुसार उद्देश्यों की भिन्नता के अनुरूप, अलग-अलग आकार वाले भिन्न-भिन्न दशाओं में कुण्ड बनाने से फल सिद्धि शीघ्र होती है। बहवृच परिशिष्टादि ग्रंथों में कहा है-

भुक्तौ-मुक्तौ तथा पुष्टौ जीर्णोद्धारे विशेषतः। सदा होमे तथा शान्तौ वृतं वरुणादिग्मतम्।

अर्थात्-भुक्ति-मुक्ति पुष्टि, जीर्णोद्धार, नित्य हवन तथा शाँति के लिए पश्चिम दिशा में वृत्ताकार कुण्ड का निर्माण करना चाहिए। इसी प्रकार दिशा भेद का विशेष स्पष्टीकरण करते हुए अन्य ग्रंथकारों ने लिखा है-स्तम्भन के लिए पूर्व दिशा में चतुरस, भोग प्राप्ति के लिए अग्निकोण में योनि के आकार वाला, मारण के लिए दक्षिण दिशा में अर्धचंद्र, अथवा नैऋत्य कोण में त्रिकोण शाँति के लिए पश्चिम में वृत, उच्चाटन के लिए वायव्यकोण में षडस्र, पौष्टिक कर्म के लिए उत्तर में पद्याकृति और मुक्ति के लिए ईशान में अष्टास्र कुण्ड प्रयुक्त होते हैं। इनमें से कुछ विशिष्ट कार्यों के लिए भी प्रयुक्त होते हैं-

पुत्र प्राप्ति के लिए योनिकुण्ड, भूत, प्रेत और ग्रहबाधा विनाश के लिए पंचास्र अथवा धनुर्ज्यावृत्ति, अभिचार दोष के लिए सप्तास्र का प्रयोग होता है।

नित्य नैमित्तिक हवन में यदि हवनकुण्ड के निर्माण की सामर्थ्य न हो-तो शारदा तिलक के अनुसार “नित्य नैमित्तिक होमं स्थण्डिलें वासभाचरेत” अर्थात् -चार अंगुल ऊँचा, एक हाथ लम्बा चौड़ा सुवर्णवर्ण पीली मिट्टी अथवा बालू रेती का स्थण्डिल बनाया जा सकता है। शास्त्रकारों के अनुसार कुण्डमेव विधानस्यात स्थण्डिलेवा समाचरेत स्थण्डिल (वेदिका) का वही स्थान है जो कुण्ड का है। शास्त्रों में यज्ञ के द्वारा बताए गये परिणामों को जीवन में चरितार्थ करने के लिए जरूरी है-यज्ञ विधान और उपकरणों की विशेषताएं और सूक्ष्मताएं भी समझी और व्यवहार में लायी जायँ।

इस दृष्टि से वर्तमान समय में सम्पन्न की जा रही अश्वमेध महायज्ञों की श्रृंखला को अभूतपूर्व कहा जा सकता है। इसे अंतरिक्ष और दृश्य जगत में नवयुग के अनुरूप वातावरण विनिर्मित करने वाले समर्थ प्रयोग के रूप में लिया जाना चाहिए। एक वैज्ञानिक प्रयोगकर्ता-जिस तरह अपने प्रयोग के सिद्धाँतों, विधानों, उपकरणों की बारीकियों को समझता और व्यवहार में लाता है। कुछ वैसा ही यह अश्वमेध प्रयोग है। इसमें प्रयोग किये जाने वाले कुण्ड, मण्डप, कर्मकाण्ड सभी शास्त्र पद्धति के अनुसार होंगे। इसके परिणाम जहाँ आश्वमेधिक फलितार्थ को साकार करेंगे। वहीं भूल–बिसर चुकी वैदिक प्रक्रियाओं-परंपराओं का सशक्त शिक्षण भी संपन्न होगा। इतना ही क्यों-महायज्ञ में भाग लेने वाले होता गण इस तत्व की जीवंत अनुभूति कर सकेंगे कि वे वैदिक युग के महर्षिगणों में से एक हैं। अनुभूति की यह निधि उन्हें जीवन पर्यन्त ऋषित्व के उदय और विकास के लिए प्रेरित करती रहेगी।


देव संस्कृति दिग्विजय का विदेशी मोर्चा

वर्ष 1994 तक के लिए भारतवर्ष में बारह अश्वमेधों की घोषणा हो चुकी है। इसी तरह लंदन (इंग्लैंड) लॉसएंजेल्स (अमेरिका) नैरोबी (केन्या-पूर्व अफ्रीका) तथा शिकागो (अमेरिका) इन चार स्थानों पर भी व्यक्तिगत संपर्क अथवा पत्राचार के माध्यम से अश्वमेध आयोजन निर्धारित हो चुके है।

दिनाँक 6 सितम्बर 92 रविवार को लिस्टर (यू.के.) में संपन्न 108 कुण्डीय गायत्री महायज्ञ में लंदन में संपन्न होने वाले अश्वमेध यज्ञ की घोषणा तुमुल हर्ष ध्वनि के साथ की गयी। इस अवसर पर उपस्थित दस हजार व्यक्तियों के समुदाय ने देव संस्कृति की रक्षा के नारे लगाये और भागीदारी संकल्प पत्र भरने का कार्य प्रारंभ कर दिया गया। बड़ी संख्या में गोरे लोग भी इस अवसर पर उपस्थित थे। देव संस्कृति की परिभाषा से वे सब न केवल उल्लास भरे थे अपितु उन्होंने उसके लिए अपनी सेवाएं प्रदान करने की विधिवत घोषणा भी की।

चौबीस-चौबीस हजार गायत्री महामंत्र जप के चार अनुष्ठान और 24 हजार गायत्री मंत्र लेखन करने वाले साधक गण इस अश्वमेध में भाग लेंगे। उसके लिए आवश्यक उत्तरदायित्वों का वितरण कर दिया गया है। गायत्री उपासना की व्यापक जानकारी और महत्व पर प्रकाश डालने वाली पुस्तकों के व्यापक प्रसार की व्यवस्था की जा रही है। हिंदी में प्रकाशित उपासना के दो चरण जप और ध्यान का अंग्रेजी अनुवाद “रिसाइटेशन एंड मेडीटेशन-दि टू स्टेजेज ऑफ वरशिप” तथा दि ग्रेट साइंस ऑफ गायत्री नामक पुस्तकें इस संबंध में सहायक और मार्गदर्शक सिद्ध हुई हैं उनकी भाग माँग को पूरा किया जा रहा है।

जिस समय डॉ. प्रणव पंड्या और शाँतिकुँज से गई टोली की उपस्थिति में लिस्टर में इस अश्वमेध की घोषणा हो रही थी ठीक उन्हीं क्षणों में इसी आशय का आयोजन अमेरिका के शिकागो नगर में हो रहा था। उन्हें फोन से सारे निर्देश दे दिये गये थे। उसी आधार पर वहीं उपस्थित जन समुदाय ने अपने यहाँ अश्वमेध आयोजन की घोषणा की। उपस्थित जन समूह इससे आह्लादित हो उठा। सभी ने हर्षध्वनि की ओर हाथ उठाकर इस कार्यक्रम का समर्थन किया।

यह एक मौन स्वीकृत है, कि जिस देव संस्कृति के विस्तार के लिए भारतवर्ष में प्रयास करना पड़ रहा है उसी के लिए अमेरिका और इंग्लैण्ड की धरती से वहाँ के मूल निवासियों द्वारा भूख जताई जा रही है। वे अब पदार्थवादी भौतिक संस्कृति से ऊब चुके हैं और भावना संपन्न श्रद्धा संस्कृति से जुड़कर परम शाँति और प्रसन्नता अनुभव कर रहे हैं। दवायें लेकर भी जिन्हें नींद नहीं आती उन्हें आत्मा देवता की गोद में सारी थकावट मिटा देने वाली नींद आ रही है उनकी साहित्यिक भूख मिटाने के लिए वहाँ की परिस्थितियों के अनुरूप साहित्य भेजने की व्यवस्था की जा रही है।

अश्वमेध साहित्य भेज दिया गया है। पर्चे, पोस्टर्स भी भेज दिये गये हैं, उससे भारतवर्ष की तरह ही वहाँ भी व्यापक प्रक्रिया प्रारंभ होने जा रही है। प्रारंभिक कदम जितना बुलंद है उसी से उसके प्रतिफल विश्वव्यापी होने की संभावना को सुनिश्चित समझा जा सकता है।


Quotation

सर्वान कामनाप्स्यन् सर्वा विजीतीर्विजिगीजमाणः। सर्वा व्युष्टीर्य्यशिवयन्नश्वमेधेन यजेत।

अश्वमेध यज्ञ करने से सभी कामनाओं की प्राप्ति होती है तथा सर्वत्र विजयी होती है’- आश्वलायन गृहसूत्र-10/6/1

*समाप्त*