श्रुति का एक वाक्य है।” माता भुमिः पुत्रोऽहं पृथिव्या।” (भूमि मेरी माता है, मैं पृथ्वी का पुत्र हूँ)। यह वाक्य व इसका विराट भावार्थ देखकर मन श्रद्धा से भर उठता है-उन ऋषियों की प्रज्ञा के प्रति जिनने अपना सारा जीवन तप-तितिक्षा में होम करके एक ही आकाँक्षा मन में रखी कि सारी धरित्री का कल्याण हो, क्योंकि हम सब उसके बेटे हैं। हम अकेले अपने बारे में, परिवार के बारे में सोचकर वहीं तक सीमित न रहें, अपितु वसुधा को कुटुम्ब मानते हुए समष्टि के हित की चिन्ता करें। भारत कभी जगद्गुरु था, तो इसी कारण । कभी देव संस्कृति का संदेश घर-घर, जन-जन तक पहुँचा था तो इसी कारण । तत्कालीन आर्य, श्रेष्ठ व्यक्ति उदार विचारधारा का एक श्रेष्ठ जीवन जीने वाला ब्राह्मण था।
क्या वह प्रक्रिया पुनः दुहराई नहीं जा सकती ? बीज वंश परम्परा में सदियों तक सुरक्षित रहते हैं। हम ऋषियों की संतान हैं, देवपुरुष हैं, यह गर्व हमें है। स्वाभाविक है, होना भी चाहिए किन्तु क्या हम अपने प्रसुप्त को जगाकर पुनः वह स्वर्णिम अतीत लौटा सकते हैं ? क्या पुनः भारत विश्व मानवता का मार्गदर्शन कर सकता है ? मोटी दृष्टि यहीं कहती हैं कि अभी तो हम आकण्ठ कर्जे में डूबे हैं, अभी सभ्यता के क्षेत्र में आगे बढ़ लें, यही बहुत है। किन्तु सूक्ष्म दृष्टि कहती है कि यदि साधना पुरुषार्थ द्वारा इस सोये दैत्य भारत की क्षमताओं को जगाया जा सके तो आने वाले कुछ वर्षों में ही आस्था संकट मिटता व चारों ओर ऋतम्भरा प्रज्ञा का साम्राज्य छाया दिखाई देने लगेगा। दुर्गम हिमालय की ऋषि सत्ताएँ यही सब करने को आतुर भी हैं, परोक्ष जगत के ऋषि प्रयासों के साथ निमित्त बनने हेतु हम सभी का पुरुषार्थ जुड़ जाए तो इक्कीसवीं सदी-उज्ज्वल भविष्य का, संस्कृति पुरुष का, कथन सार्थक-सत्य होता दिखाई पड़ेगा। यह युग साधना ही आज महाकाल को हम सबसे अभीष्ट है।
(परम पूज्य गुरुदेव से देव-संस्कृति व हिन्दुत्व संबंधी प्रश्नोत्तर माला का तीसरा पुष्प)
प्रश्न:-समग्र देव संस्कृति का ढाँचा मानव को अनगढ़ से सुगढ़ बनाने में नियोजित है। इसके लिए आर्ष वाङ्मय से लेकर अब तक अनेकानेक मार्ग सुझाए गये हैं, जिनमें साधना उपचारों का विशेष स्थान है। ऐसी क्या विशेषता देव-संस्कृति में है कि भारतीय साधना पद्धति को सर्व श्रेष्ठ कहा जाता है ?
उत्तर:- देव संस्कृति के प्रणेता ऋषि थे। ऋषि उन्हें कहते हैं जो देहात्मवादी जीवन न जीकर आत्मसत्ता करी प्रयोगशाला में सूक्ष्म चेतना के स्तर पर प्रयोग-परीक्षण कर प्रसुप्ति की स्थिति को जाग्रति में बदलते हैं। सर्व-प्रथम जन्में श्रेष्ठ पुरुष (आर्य) की सन्ततियाँ ऋषिगणों के रूप में प्रतिष्ठित हुई व उनने हर मनःस्थिति के व्यक्ति के लिए विभिन्न प्रकार की साधना पद्धतियों का प्रतिपादन कर उन्हें लोकप्रिय किया। अपने-अपने बौद्धिक व भावनात्मक विकास के अनुरूप हिन्दू संस्कृति में कोई भी सुगम पड़ने वाला कोई सा भी उपचार अपनाकर अगले सोपान पर बढ़ सकता है। “योगः कर्मसु कौशलम् “ कहकर जहाँ देव-संस्कृति कर्मयोग को महत्व देती है वहाँ “श्रद्धावान लभते ज्ञानम्” कहकर समर्पण व भक्ति तथा ज्ञानयोग को भी उतना ही श्रेष्ठ ठहराती है। अपनी सार्वभौमिकता के कारण ही, सर्वजनीन होने के कारण ही, इन साधना उपचारों के प्राण हैं व इनकी उपयोगिता लाखों वर्षों के बाद उतनी ही है। तंत्र व योग दोनों ही साधना पद्धतियों का अद्भुत समन्वित रूप देव-संस्कृति करती आयी है।
प्रश्न:-पंचोपचारों से लेकर षोडशोपचार तथा सर्व देव नमस्कार से लेकर गौरी, गणेश, कलश पूजन आदि अगणित कर्मकाण्डों की हमारी संस्कृति में महत्ता व प्रचलन है। क्या आपको नहीं लगता कि आज इनका स्वरूप बाह्योपचार व येन−केन प्रकारेण निपटाने तक सीमित होकर रह गया है। कार्य की गंभीरता नहीं देखी जाती व मंत्र अशुद्ध बोले जाते हैं। भाव विहीन होने के कारण मात्र उनके उच्चारण से क्या किसी को कोई लाभ मिलेगा ? ऐसे में वह मूल भावना नहीं समाप्त हो जाती, जिसके कारण इनका कभी प्रावधान रहा होगा?
उत्तर:- प्रश्न युगानुकूल है व वास्तविकता भी यही है । आज की नयी पीढ़ी का भी व अन्याय व्यक्तियों का भी विश्वास कर्मकाण्डों पर से इस कारण उठता जा रहा है कि वे मात्र बाह्य ढकोसले बनकर रह गए हैं। कोई कितना ही पूजन करे, मूर्ति को नहलाए, प्रसाद चढ़ाए किन्तु यदि भाव मात्र मनोकामना पूर्ति के हैं व आचरण निकृष्ट स्तर का है तो लाभ मिलना तो बहुत दूर की बात है, परिवर्तन नहीं दिखाई पड़ने से औरों की अनास्था भी बढ़ती है। आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है “धर्मतंत्र से लोकशिक्षण” की इस प्रक्रिया के पुनर्जीवन की धर्मतंत्र के धर्माचार्यों से अपेक्षा थी । वह पूरी न हुई। हमने शान्तिकुँज से पुरोहितों-परिव्राजकों, साधुओं का शिक्षण कर उन्हें कार्य क्षेत्र में भेजकर इस क्षेत्र में एक बड़ी क्रान्ति की है। नारियों को मंत्रोच्चार व यज्ञ सम्पादन से लेकर पौरोहित्य के संबंध में मध्यकाल में पीछे धकेल दिया गया था। उन्हें प्रशिक्षित कर उनकी तपः शक्ति तथा भाव संवेदना की सामर्थ्य के सहारे यह कार्य किया है। कर्मकाण्डों के भावार्थ व विज्ञान सम्मत व्याख्या लिखकर हमने जन-जन तक पहुँचाया है व बहुसंख्य के गले उतारा है। इस सदी के अंत तक हम विश्वभर तक पौरोहित्य के प्रगतिशील स्वरूप को पहुँचाने की अपेक्षा रखते हैं।
प्रश्न:-पंचोपचार का एक संक्षिप्त उपक्रम समझायें ताकि आज की युवा पीढ़ी को समझ में आए कि क्यों हम चित्र या मूर्ति के समक्ष स्थूल सामग्री निवेदित करते हैं?
उत्तर:- जल अर्पण करने से अर्थ है अपना समग्र श्रद्धा देवसत्ताओं, सत्प्रवृत्तियों, श्रेष्ठताओं के समुच्चय को समर्पित करना। गंध-अक्षत से तात्पर्य है- हमारा जीवन सद्गुणों की सुगंधि से भरा पूरा हो जैसा देव सत्ताओं का होता है तथा कर्म अक्षत हों। अक्षत अर्थात्- जो संकल्प लें, वे कभी क्षत न हों, टूटें नहीं। निष्ठा श्रेष्ठता के प्रति अटूट बनी रहे। पुष्प से अर्थ है- खिले हुए फूल का उल्लास अपने जीवन व्यवहार में सदैव समाहित रखेंगे। देवताओं के चरणों में खिला पुष्पित फूल ही भेंट चढ़ाया जाता है। कभी उदास न रह सदैव प्रसन्नता बिखरेंगे। धूप-दीप समर्पण से अर्थ है श्रेष्ठ कार्यों के लिए तिलतिल कर जलेंगे-सर्वत्र अपने सत्कार्यों की सुगंध का विस्तार करेंगे। नैवेद्य का भावार्थ है- अपने श्रम-साधनों का एक अंश देव-सत्ताओं को समर्पित करते हैं-समाज के हर पुण्य कार्य के लिए इसे नियमित रूप से अर्पित करते रहेंगे। हर कर्मकाण्ड के पीछे प्रेरणात्मक शिक्षण समाहित है, यह स्पष्ट देखा जा सकता है।
प्रश्न:-आपने प्रज्ञा परिजनों से साधारण पूजा उपासना से लेकर नैष्ठिक अनुष्ठान साधना, गायत्री की उच्चस्तरीय पंचकोशी साधना कुण्डलिनी व षट्चक्र जागरण तथा प्राण प्रत्यावर्तन से लेकर चाँद्रायण कल्प साधनाएँ भी संपन्न करालीं। क्या यह एक असाधारण व असंभव मानी जाने वाली उपलब्धि नहीं है?
उत्तर:- आज का समय बड़ा विषम है। हम सतयुग के द्वार पर खड़े हैं। (क्रमशः)
मानव जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि व्यक्तित्व का आदर्शवादी विकास है। चतुरता और धूर्तता की परिधि में तो अनेकों को एक दूसरे से बढ़-चढ़कर हरफन मौला देखा जा सकता है। अपराधकर्मी आमतौर से सामान्य लोगों की अपेक्षा अधिक धूर्त और अधिक दुस्साहसी होते हैं। उन का दिमाग भी एक से बढ़कर एक प्रपंच रचता है और उन्हें सफल बनाने के लिए ऐसे दावपेचों का प्रयोग करता है जिनकी जानकारी प्राप्त करने वाले आश्चर्यचकित रह जाते हैं। व्यावहारिक जीवन में कुशलता एवं सुव्यवस्था आवश्यक है। उसके आधार पर दैनिक जीवन में पल-पल पर आने वाली समस्याओं का सही प्रकार से समाधान किया जा सकता है और प्रगति पथ पर अग्रसर होने के लिए जो प्रयास करना, तालमेल बिठाना और सरंजाम जुटाना आवश्यक होता है उसका उपाय खोज निकाला जाता है। यही व्यवस्था बुद्धि है। सभी कार्यों को सुसम्पन्न कर सकना इसी आधार पर बन पड़ता है। महत्वपूर्ण कार्यों की सही योजना बनाना और उन्हें पूरा करने की रणनीति तैयार करना इसी आधार पर बन पड़ता है। सफल समझे जाने वाले व्यक्ति इसी कुशलता के आधार पर स्वल्प साधन, सीमित सहयोग और प्रतिकूल वातावरण में भी अपने लिए राह बनाते और उफनती नदी के प्रवाह चीरते हुए नदी नाव को इस किनारे से उस किनारे तक खींच ले जाते हैं। ऐसे लोग अपने कल्पना तन्त्र को इतना परिष्कृत कर लेते हैं कि सहयोगियों का अधिकाधिक समर्थन प्राप्त करते और ईर्ष्यालु प्रति-पक्षियों को उग्र होने देने से रोके रहें। संभावनाओं का सही अनुमान लगा सकें। अपनी सामर्थ्य का सही आकलन करते रहें और यह देखते रहें कि वर्तमान परिस्थितियों में कितना वजन उठ सकता है। व्यवहार कुशलता इसी को कहते हैं। यह बौद्धिक कुशाग्रता जिसमें जितनी अधिक विकसित होती है वह उतना ही सही सोच पाता है। जिसके कदम सही दिशा में सही गति से उठते रहते हैं फलतः वह ऐसा कुछ कर दिखाता है जो भटकाव वाली मनःस्थिति में अनेक अनुकूलताएँ होते हुए भी नहीं बन पड़ता। यह उपलब्धि एकाग्रता और यथार्थता के समन्वय से बन पड़ती है।
बेसिर पैर की कल्पनाएँ करने और बिना जड़ आधार की उड़ाने उड़ते रहने वाले तथाकथित शेखचिल्ली की तरह असफल रहते और उपहासास्पद बनते हैं। कुशलता की उपयोगिता तभी है जब वह यथार्थता और व्यावहारिकता के साथ जुड़ी है। साथ ही उसमें दूरदर्शिता का भी समुचित समावेश हो। इसका अनुमान लगा सकना बुद्धि की सूक्ष्म-दर्शिता है। निर्धारित योजना के मार्ग में कहाँ, कब, किस प्रकार की कठिनाई आ सकती है इसका अनुमान यथार्थवादी ही लगा सकते हैं। रंगीली कल्पनाओं की उड़ानें उड़ने वालों को तो अपनी ही सूझ सही तथा सब कुछ सही प्रतीत होती रहती है। वे उसी के पीछे उन्मादियों की तरह पड़ जाते हैं। आवेश एकाँगी होता है। क्रोधी और भयभीत मानसिक स्थिति के एक पक्षीय होने के कारण ऐसा कुछ कह डालते हैं तो परिणति उच्छृंखलता, उद्दण्डता जैसी ही बनकर रह जाती है। असफलता ऐसों के ही सिर चढ़ती है। उसे हास्यास्पद वे ही बनाते हैं । सनकी ऐसे ही लोगों को समझा जाता है।
उत्साह अच्छी बात है। साहस की जितनी प्रशंसा की जाय उतनी ही ठीक हैं। पुरुषार्थ की उपयोगिता से कोई क्यों इनकार करेगा? इन सबके समन्वय से क्रियाशीलता उत्पन्न होती है और हलचलों का सिलसिला चल पड़ता है, पर देखना यह भी पड़ता है कि तीर सही निशाना साधकर छोड़ा जा रहा है या ऐसे ही अन्धाधुँध मचाई जा रही है। सक्रियता की कमी होने पर आलसी प्रमाद का दोष लगता है। किन्तु उतावले, उद्धत-कर्मी आवश्यकता से अधिक सक्रिय होने पर भी ठोकरों पर ठोकरें खाते और हानि पर हानि उठाते रहते हैं, इस दृष्टि से जितनी अनुपयुक्तता-निष्क्रियता है उससे भी कई बार और अधिक वह आवेश हानिकारक सिद्ध होता है जिसके पीछे आगा पीछा सही रूप से सोच सकने की सूझबूझ जुड़ नहीं पाता।
व्यक्तित्व के विकास में अपनी समझदारी का प्रौढ़ परिपक्व होना आवश्यक है। उसमें यदि कुछ कमी हो तो इसकी पूर्ति के लिए दूरदर्शियों के संपर्क में रहने और उनकी गतिविधियों के पीछे जुड़े रहने वाले यथार्थवादी चिन्तन को समझने का प्रयत्न करना चाहिए । ऐसे लोगों को मानसिक बिखराव से बचना होता है। वे अपने लिए उचित कार्य निर्धारित करते हैं ऐसा जिसमें अनैतिकता का पुट न हो। ऐसा जिसे हेय और आदर्श रहित न समझा जाय। जिसे करते हुए आत्मा न धिक्कारे और समीपवर्ती लोगों को यह न कहना पड़े कि लालच के वशीभूत होकर नीति-नियमों का उल्लंघन किया गया। यह कुछ करने से पहले सोचने की बात है। इस निर्णय में कई विकल्प सामने रहने चाहिए और उनमें से जो उपयुक्त, उचित, व्यावहारिक एवं सरल हो उसी को अपनाने का मानस रहे। पूर्वाग्रह को स्थान न दिया जाय। किसी की सफलता को ही अपने लिए अनुकरणीय न मान लिया जाय। हर व्यक्ति के सामने अपने तरह की स्थिति होती है और उसे तद्नुरूप संयोग बन जाने पर ही सफलता मिली है। आवश्यक नहीं कि दूसरों जैसी परिस्थितियाँ अपने को भी उपलब्ध होती रहें, इन विभिन्नताओं में अपने लिए दिशा धारा एवं क्रियाकलाप का चुनाव अपने आपको तथा संसाधनों को ध्यान में रखते हुए ही करना चाहिए । इस चुनाव में जो लोग सफल हो जाते हैं और फिर उसे सम्पन्न करने के लिए अपनी तत्परता को, तन्मयता को पूरी तरह नियोजित कर लेते हैं उन्हें क्रमिक प्रगति के मार्ग में चल पड़ने के द्वार खुलते रहते हैं। जिनका मन एक दूसरे पर दूसरे से तीसरे पर बंदर की तरह उचकता मचकता रहता है। उन्हें बार-बार दिशा बदलती रहनी पड़ती है। उनके सभी कार्य प्रायः आधे अधूरे ही पड़े रहते हैं।
हर असफलता मनुष्य का मनोबल तोड़ती है। आत्मविश्वास घटाती और साहस भरे उत्साह में कमी लाती है। इसलिए यथा संभव भरे उत्साह में कमी लाती है। इसलिए यथा संभव ऐसी रीति नीति अपनानी चाहिए कि बार-बार असफलता का मुँह न देखना पड़े। इसके लिए यह नीति अपनानी चाहिए कि बहुत दिन में पूरी हो सकने वाली बड़ी योजनाएँ बनाने की अपेक्षा वर्तमान में सही प्रकार से बन पड़ने वाले कार्यों को ही प्रमुखता दी जाय। लक्ष्य बड़ा हो सकता है, पर उसे पूरा करने के लिए तद्विषयक भारी क्रियाकलाप एक साथ ही हाथ में लिये जायँ, यह आवश्यक नहीं। कक्षाएँ क्रमिक रीति से उत्तीर्ण की जाती हैं और विद्वता के शिखर पर अनवरत श्रम करते हुए धैर्यपूर्वक बढ़ते चलने की नीति अपनानी पड़ती है। फसल समय पर पकती है। वृक्ष विकसित होने में समय लेते हैं और अवधि पूरी कर लेने पर फलते फूलते हैं। इस आवश्यक श्रम और समय के संबंध में अधीर हो जाना और सब कुछ तुर्त फुर्त प्राप्त कर लेने की उतावली से ग्रसित रहना ऐसा स्वभाव है जिसमें प्रयोजन सिद्ध होने के स्थान पर अवरोध ही अधिक अड़ते हैं।
इच्छाओं, आवश्यकताओं, उत्कंठाओं का अपनी योग्यता के अनुरूप निर्धारण और प्रयासों का वस्तुस्थिति के अनुरूप संचालन ऐसी विशेषता है जो मनुष्य को अधिक अनुभवी बनाती है। उत्साह और साहस के साथ धैर्य का संतुलन भी बिठाती है। ऐसे ही दृढ़ निश्चयी और पुरुषार्थ-परायण बड़े कामों को भी यथाक्रम पूरा कर लेते हैं। जब कि उतावले और अनुभवहीन अपना श्रम समय तो गँवाते ही हैं साथ ही साथियों की दृष्टि में अविश्वस्त बनते जाते हैं। अच्छा हो कि इस स्थिति से बचने के लिए अपने चिन्तन तन्त्र को सुनियोजित बना लिया जाय। इसके लिए आत्म समीक्षा की पक्षपात रहित बुद्धि जगायी जाय। शरीर को स्नान कराने की तरह अपने व्यक्तित्वों की कमियों को समझने और उन्हें योजनाबद्ध रूप से सुधारते रहने का अभ्यास किया जाय। यह जब कभी भी कर लेना पर्याप्त नहीं आत्म-समीक्षा और स्वभाव में शालीनता का समावेश करते रहना ऐसा नित्यकर्म है जिसे करते रहने पर व्यक्तित्व की प्रखरता निरंतर बढ़ती रहती है। यही है वह बहुमूल्य सशक्त आयुध, जिसकी सहायता से हर मोर्चे पर सफलता पायी और विजय श्री वरण की जाती है।
यह सोचना सही नहीं कि परिस्थितियों की अनुकूलता और साधनों की विपुलता के आधार पर महत्वपूर्ण सफलताएँ प्राप्त की जा सकती हैं। ऐसा कदाचित ही होता है। विशेषतया तब, जब साधन सम्पन्नों को प्रतिभावान् व्यक्तित्व की भी प्राप्ति हो गई हो अन्यथा अनुभवहीन अनुपयुक्त स्वभाव वाले हाथ में आये अवसरों को भी गँवाते रहते हैं। कितने ही धनी और प्रतिष्ठित परिवारों के उत्तराधिकारी अपनी दुर्बुद्धि के कारण उस चलते व्यवसाय में गतिरोध उत्पन्न कर देते हैं और जमी हुई आजीविका तथा प्रतिष्ठा से हाथ धो बैठते हैं। इसका कारण दुर्भाग्य नहीं, वरन् दोष-दुर्गुणों से भरा हुआ व्यक्तित्व ही होता है। अपने नियत कार्य की ओर से उपेक्षा बरतने वाले और आवारागर्दी में जहाँ तहाँ भटकने वाले लोग प्रखर मानसिकता उपलब्ध नहीं कर पाते। कमजोर पशु पर भारी वजन नहीं लादा जा सकता। घटिया व्यक्तित्व वाले उस उत्तरदायित्व का वहन नहीं कर सकते, जो भारी और बड़े कार्यों के साथ अविच्छिन्न रूप से जुड़े होते हैं।
दुर्भाग्य नाम की कोई वस्तु इस संसार में नहीं है? विशेषतया मानवी संरचना में तो उसके लिए कोई स्थान है ही नहीं । आकस्मिक दुर्घटना जैसे कुछ अपवादों को छोड़कर प्रगति का सीधा संबंध मनुष्य की सूझबूझ और क्रिया कुशलता पर निर्भर रहता है। यही सद्गुण है जिसे दूसरे शब्दों में सौभाग्य भी कहा जा सकता है। सफलता, असफलता निर्धारित सिद्धान्तों के पालन करने और उनकी ओर उपेक्षा बरतने पर निर्भर है। यह मनुष्य का अपना उत्पादन एवं अपना प्रयास है। काम काज को जितना महत्व दिया जाता है, उतना ही यदि व्यक्तित्व निर्माण पर दिया जाने लगे तो समझना चाहिए कि अग्रगमन का मार्ग खुल गया है। सफल एवं प्रतिष्ठित जीवन जी सकने योग्य सुयोग-सौभाग्य का वरदान हाथ लग गया । यह किसी दूसरे का अनुदान नहीं, वरन् अपने निज के आत्म परिष्कार का ही प्रतिफल है। इसे इच्छानुसार उगाया, पाया और बढ़ाया जा सकता है। साथ ही यह भी हो सकता है कि अपने संबंध में बेखबर रह कर अनगढ़पन सिर पर लाद लिया जाय और दुर्भाग्य का रोना जन्म भर रोते रहा जाय।
सही चिन्तन, समुचित उत्साह और उपयुक्त परिश्रम की तीन विभूतियाँ अपने आप में अतिशय महत्वपूर्ण हैं। इनका संयोग जहाँ भी होगा वहाँ अग्रगमन का संयोग अनवरत रूप से सामने आता रहेगा। इन तीनों के साथ एक और सद्गुण की आवश्यकता होती है-वह है-सद्भाव भरा सहकार। दूसरों को अपना बना सकने का स्थायी आधार इस विशेषता के सहारे बन पड़ता है। चापलूसी के आधार पर मीठा बोलने वाले, अपने को हितैषी , प्रामाणिक होने की साक्षी देने वाले, कुछ समय तो किन्हीं पर अपनी छाप छोड़ सकते हैं, मित्र बन सकते हैं और सहयोग ले सकते हैं, पर वह आडम्बर देर तक नहीं चलता है। पोल खुलकर रहती है। सज्जनता का आडम्बर शिष्टाचार या उदार व्यवहार की झलक दिखाकर किन्हीं को चमत्कृत किया जा सकता है। प्रलोभन का आश्वासन देकर भी किसी को कुछ समय-तक सहयोगी बनाया जा सकता है, पर यह नीति वस्तुतः है सर्वथा अस्थिर। विश्वास अर्जित करने के लिए अपने को हर कसौटी पर विश्वास सिद्ध करना होता है। अपनी प्रामाणिकता असंदिग्ध हो तभी यह संभव है कि दूसरे लोगों की सघन श्रद्धा और सहकारिता हस्तगत हो । जिन पर संकीर्ण स्वार्थपरता छाई रहती है और निकटवर्ती, दूरवर्ती किसी में भी डंक चुभाये बिना नहीं मानते । घटियापन का परिचय मिलने पर किसी का भी विश्वास उठ सकता है और फिर सच्चे सहयोग का द्वार बन्द हो सकता है। सहयोग देकर ही सहयोग पाया जा सकता है। उदारता बरतने पर ही दूसरी ओर उदार व्यवहार की आशा की जा सकती है। प्रामाणिकता के बिना व्यक्तित्व सर्वथा अधूरा और अयोग्य है। प्रामाणिकता मात्र अपने संबंध में शेखी बघारने भर से प्राप्त नहीं हो सकती। उसके लिए व्यक्ति के चरित्र का पिछला लम्बा इतिहास होना चाहिए । इस संदर्भ में वे कसौटियाँ भी कम पड़ती हैं जिनमें कि किसी को इस प्रकार कसा गया हो कि प्रलोभन या भय के दबाव-से किसी ने अपना ईमान नहीं बेचा और उसे कठिन समय में स्वेच्छापूर्वक अक्षुण्ण बनाये रखा।
चुम्बक का अपना आकर्षण सजातियों को अपनी ओर खींच लेता है या अपने जैसी किसी समर्थ सत्ता के साथ जुड़ जाता है। यह चुम्बकत्व व्यक्तित्व में सद्गुणों के आधार पर विनिर्मित और विकसित होता है। इसके लिए संचित कुसंस्कारों का परिमार्जन और मानवोचित सत्प्रवृत्तियों के संवर्धन के साथ-साथ दुहरे प्रयत्न अपनाने के लिए कटिबद्ध होना पड़ता है।
मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है। समाज के परिवेश में ही वह व्यक्तित्व का विकास करता ओर जीवन के आवश्यक सरंजाम जुटाता है। जिस समाज पर उसका जीवन अवलम्बित है, वह समाज भी परस्पर स्नेह, सहयोग, सद्भावना और सहकारिता जैसे सद्गुणों पर आधारित है। सुव्यवस्थित समाज के मूल में इसी गुण को कार्यरत देखा जा सकता है। जहाँ लोगों में पन तो परस्पर सहयोग, स्नेह, न सद्भावना और न सद्विचार, वहाँ नित्य-प्रति कलह, ईर्ष्या-द्वेष , मारकाट, अशान्ति से भरा वातावरण होता है। ऐसे वातावरण में न तो जीवन की सुरक्षा हो पाती है और न विकास। उलटे व्यक्तित्व में अवाँछनीय तत्व प्रविष्ट होकर विकास की जड़ों को छिन्न-भिन्न कर देते हैं। इसके विपरीत सहयोग और सहकारिता भरे वातावरण में भय, आशंका, आतंक आदि के लिए स्थान ही नहीं बचता । सभी प्रसन्नता से रहित और निश्चितता से जीवन-यापन करते हुए प्रगति पथ आगे ही बढ़ते जाते हैं।
इतिहास के प्रत्येक पृष्ठ सहयोग पूर्ण विकास क्रम के प्रमाण प्रस्तुत करते हैं। मानवीय-संस्कृति और सभ्यता को आदि कालीन पाषाण-युग से वर्तमान में उन्नति के उच्च शिखर पर पहुँचाने का श्रेय परस्पर सहकारिता और सौजन्यपूर्ण सद्व्यवहार को ही है। प्रस्तुत समाज-व्यवस्था, कल-कारखाने, शासनतंत्र, कृषि, व्यवसाय, वैज्ञानिक आविष्कार आदि सभी आद्यावधि उपलब्ध प्रगति-सम्पदा इसी के सुपरिणाम हैं।
इकॉलाजी की मान्यता है कि सृष्टि संतुलन पर टिकी है। परावलम्बन-इन्टरडिपेन्डेस, मर्यादा-निर्वाह-लिमिटेशन और सम्मिश्रता-काम्प्लैक्सिटी- इन तीनों आधारों पर प्रगति व्यवस्था टिकी है इस तरह समूचा संसार परस्पर विश्वास, आत्मीयता और सहयोग के सिद्धान्त का पालन कर ही जीवित है। जब बुद्धिहीन समझे जाने वाले क्षुद्र जीव-जन्तुओं को इन गुणों का अनुगमन करते पाया जाता है, तो फिर मनुष्य तो स्रष्टा का वरिष्ठ राजकुमार है। उसे पारस्परिक स्नेह-सद्भाव का सहयोग-सहकार कास बढ़−चढ़ कर उदाहरण प्रस्तुत करना चाहिए। परस्पर मिलजुल कर रहने, खाने-खेलने प्रगति करने, ईर्ष्या-द्वेष न करने, किसी का भी बुरा न चाहने आदि विधि-निषेधों का पग-पग पर ऋषि-मनीषियों ने निर्देश दिया है। इस संदर्भ में शास्त्रवचनों की दूरदर्शिता तो देखते ही बनती है। ऋग्वेद 10/191/2-3 में उल्लेख है-
“संगच्छम्वं सं वदध्वं सं वो मनाँसि जानताम्। छेवा भागं यथापूर्वे सज्जनाना उपासते॥”
अर्थात्-हे मनुष्यों ! तुम मिलजुल कर रहो, मिलजुल कर वार्तालाप करो, तुम सब के मन में एक जैसे संकल्प-विकल्प हों। देवतागण इन्हीं गुणों के आधार पर पूजनीय और उपासनीय बने हुए हैं।
“समानो मन्त्रः समितिः समानी समानं मनः सहचित्त मेषाम्। स्मानं मंत्रमभि मन्त्रये वः समानेन वोहविषाजुहोमि।
अर्थात्- तुम सब के विचार समान हों, तुम्हारी सभा एक हो। तुम्हारे अंतःकरण एक हों, सभी के चित्त एक जैसे हों। मैं (परमेश्वर) तुम्हारे लिए एक से मंत्र-वेदज्ञान तथा एक समान आवश्यक वस्तुयें प्रदान करता हूँ।
सहजीविता का यह सिद्धान्त पारस्परिक स्नेह सद्भावना पर ही आधारित है। ‘जियो और जीने दो’-उसका आदर्श है। श्रुतियाँ इसी का प्रतिपादन करती हुई कहती हैं-”सम्प्रच्यध्वमुप सम्प्रयात्।” अर्थात् हे मनुष्यों। सभी लोग मिलजुल कर-आत्मोत्कर्ष एवं सत्प्रयोजनों के लिए प्रस्थान करो, ‘सं जीवास्थ’- एक साथ जियो और “पुमान पुनागूँग सं परिपातु विश्वतः” अर्थात्- एक मनुष्य दूसरे मनुष्य की सब प्रकार से रक्षा करे।
उदारचेता महामानवों, संतों ने मानव उत्कर्ष के लिए स्नेह-सद्भाव को जीवन का अभिन्न अंग बताया है। उनके अनुसार सहयोग-सहकार के बिना मनुष्य एक कदम भी आगे नहीं बढ़ सकता है। जन्म से लेकर मृत्युपर्यन्त उसे पारस्परिक सहकारिता की आवश्यकता पड़ती है। महान संत तिरुवल्लुवर ने अपने ग्रन्थ ‘तिरुक्कुल’ में कहा है- ‘स्नेह-सद्भाव के पथ में चलने वाला मनुष्य ही सजीव शरीर धारी है अन्यथा वह हाड़माँस वेष्टित सारहीन पदार्थ भर है।’ अपनी कृति “इन वुड्स आफ गॉड रियलाइजेशन” में स्वामी रामतीर्थ ने सहयोग-सहकार की इस भावना को ही प्रेम की सामान्य अभिव्यक्ति कहा है। संत तुकाराम कहते हैं-’आपस में हम लोग एक दूसरे की सहायता करें और सभी एक साथ सन्मार्ग पर चलें।
आत्मिक प्रगति और सामाजिक समृद्धि के मूल में कार्यरत इस सहयोग, स्नेह और सद्भावना को सर्वत्र देखा जा सकता है। आवश्यकता इस बात की है कि विकास के इस मूल मंत्र को समझकर जीवन में सुख-सुविधा के साधनों से लेकर शान्ति और सुव्यवस्था का समावेश हो पाना इसी साधना द्वारा संभव हो सकेगा। सामाजिक उन्नति और प्रगति का लक्ष्य इन्हीं माध्यमों से प्राप्त हो सकेगा। इसी से धरती पर स्वर्गीय वातावरण का सृजन हो सकेगा।
कठिनाइयाँ, प्रतिकूलताएँ हर किसी के सामने आती हैं। सुखद संभावनाओं की तरह दुखद-परिस्थितियां आ धमकने की आशंका भी हर किसी के सामने विद्यमान रहती है। जो घटित हो रहा है, संभावित है उसमें ऐसा कुछ भी सोचा जा सकता है जिसमें विपत्ति आने का अनुमान लगा लिया जाय। इतने पर भी यह निश्चित नहीं कि वैसा होगा ही। यह भी हो सकता है कि आशंका निर्मूल निकले । सामान्य क्रम ही चलता रहे अथवा जो अनिष्ट सोचा गया था उसके विपरीत सुखद संभावना सामने आ खड़ी हो। जिस व्यक्ति से आक्रमण करने की, हानि पहुँचाने की बात सोची गई है, हो सकता है उसके मन में वैसा कुछ हो ही नहीं। अपडर के कारण भी तिल का ताड़ बनते और झाड़ी से भूत निकलते देखा गया है। यह मात्र अपने ही निषेधात्मक चिन्तन की काली छाया होती है। भय की आशंकाओं में से बहुत ही न्यून परिणाम में चरितार्थ होती देखी गई हैं। अधिकाँश तो कुकल्पनाएँ ही होती हैं।
डरते रहने से मन दुर्बल होता है और अकारण ही उतना खून सूखता है जितना कि वास्तविक विपत्ति से जूझने पर भी न सूखता। भय से असंख्यों मनोरोग उठ खड़े होते हैं। साहस टूटता है और आशंका से बचने या जूझने के लिए जिस कौशल-संतुलन की आवश्यकता थी वह समय से पूर्व ही चुक कर समाप्त हो जाता है।
विपत्ति मनुष्य पर ही आती है। वे उससे जूझते भी हैं और कोई रास्ता न रहने पर धैर्यपूर्वक सहते भी हैं। इस समूची प्रक्रिया से गुजरने पर जितनी क्षति उठानी पड़ती है उसकी तुलना में डरपोक, भयभीत लोग बिना संकट का सामना किये भी कहीं अधिक घाटा उठा चुके होते हैं। ऐसे लोग बाह्य रूप से देखने पर स्वस्थ भले ही दिखाई दें, पर वे मानसिक रूप से परेशान रहते हैं। शरीर भीतर ही खोखला, निस्तेज और दुर्बल बनता जाता है। रोगी शरीर को औषधि-उपचार तथा अच्छे आहार-विहार से रोगमुक्त किया भी जा सकता है, पर यदि मनः संस्थान लड़खड़ाने लगे तो मनुष्य विक्षिप्तों की श्रेणी में जा पहुँचता है और मस्तिष्कीय विशेषताएँ खो बैठने पर पशुवत् निरर्थक जीवन जीने को विवश होना पड़ता है। भय की हानियाँ समझना चाहिए और उससे मुक्त रहने का प्रयास करना चाहिए।
न्यूयार्क की ‘एकेडमी आफ मेडिसिन’ के चिकित्सा विज्ञानियों ने भय के प्रभावों के बारे में गहरी खोजबीन की है। उनने निष्कर्ष निकाला है कि भयाक्रान्त होने अथवा चिन्तातुर बने रहने पर मस्तिष्क में एक विशेष प्रकार का रसायन उत्पन्न होता है जो रक्त प्रवाह में मिलकर शरीर के अंग-प्रत्यंगों में संकुचन पैदा करता है। यह भी देखा गया है कि भय मुक्त होते ही यह विचित्र रसायन स्वतः विलुप्त हो जाता है। विशेषज्ञों का कहना है कि रक्तचाप, हृदयरोग, उदरशूल, मधुमेह, दमा जैसी बीमारियाँ ज्यादा समय तक चिन्ताग्रस्त अथवा भयग्रस्त रहने के ही दुष्परिणाम हैं। इससे उत्पन्न मस्तिष्कीय रसायन शरीर के आन्तरिक अवयवों को प्रभावित कर उनकी सामान्य प्रक्रियाओं को तो बाधा पहुँचाता ही है-स्नायु संस्थान भी प्रभावित हुए बिना नहीं रहता।
हर वक्त भय की आशंका से घिरे रहने पर मस्तिष्कीय क्षमता पर घातक प्रभाव पड़ता है। सोचने विचारने की क्षमता का हास होने लगता है। सुप्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक जार्ज प्रेस्टन ने अपने विविध परीक्षणों के उपरान्त बताया है कि इससे व्यक्ति पागल तक हो सकता है। इतना ही नहीं ऐसे व्यक्ति समीपवर्ती लोगों को भी संक्रामक रोगों की तरह व्यथित कर देते हैं उन्होंने प्रयोगों द्वारा यह सिद्ध कर दिखाया है कि माता के भयाक्रान्त होने पर उसकी गोद में पड़ा शिशु भी रोने लगता है। इसी तरह के अध्ययन परीक्षण कैलीफोर्निया विश्वविद्यालय के अनुसंधान-कर्ताओं ने किये हैं और निष्कर्ष निकाला है कि डर छूत का रोग है।
डरपोक लोगों के साथ रहकर डरपोक और हिम्मत वाले लोगों के साथ रहकर आदमी बहादुर हो जाता है। इसकी पुष्टि में उन्होंने कई प्रमाण भी जुटायें हैं। उनके अनुसार आदिवासी कबीलों के बच्चे भेड़िये, शेर, चीते जैसे हिंस्र जानवरों को देखकर न तो भयभीत होते हैं और न ही रोते चिल्लाते अथवा भागकर छिपने का प्रयत्न करते हैं, किन्तु शहरी एवं ग्रामीण अंचलों के बच्चों को प्रायः देखा जाता है कि खूँखार, जंगली जानवरों के नाम लेते ही वे डरने लगते हैं। उक्त वैज्ञानिकों ने पाया है कि भयातुर व्यक्तियों की रिकार्ड की गई आवाज को सुनकर भी बहुत से लोग भयभीत हो जाते हैं। एक ऐसे ही प्रयोग-परीक्षण में जब उन्होंने मनोविज्ञान के विशेषज्ञों को डरे-सहमे लोगों की आवाज को टेप रिकॉर्डर के माध्यम से सुनाया तो उसके आश्चर्यचकित कर देने वाले परिणाम सामने आये। पहले जो मनोविज्ञान विशारद शान्त एवं प्रसन्न चित्त थे, रिकार्ड की हुई आवाज को सुनते ही उनकी प्रसन्नता न जाने कहाँ गायब हो गई। उनमें से कुछ को बेचैनी महसूस होने लगी, तो अन्य सशंकित हो एक दूसरे की ओर ताकने लगे। सबके चेहरों पर चिन्ता एवं शंका के भाव उभर आये। परीक्षणोंपरांत सभी ने स्वीकार किया वह सभी डर गये थे।
कोलम्बिया विश्वविद्यालय के नेत्र विशेषज्ञों ने अनुसंधान करके इस तथ्य को उजागर किया है कि भय का नेत्रों पर गहरा प्रभाव पड़ता है। सामान्य डर से दृष्टि क्षमता कम हो जाती है जबकि अधिक डरावने दृश्य उपस्थित हो जाने पर व्यक्ति बेहोश भी हो जाता है। कुछ वर्ष पूर्व इंग्लैण्ड में एक ऐसी फिल्म दिखाई जा रही थी जिसके अंतर्गत कुछ भयोत्पादक दृश्य थे, जिन्हें देख कर कई दर्शक बेहोश हो जाते थे और उन्हें अस्पताल पहुँचाना पड़ता था। बाद में उस अंश को निकाल दिया गया। मूर्धन्य चिकित्सा विशेषज्ञों ने इस तथ्य को भी स्वीकार किया है कि तीव्र डर और चिंता के कारण मनुष्य के बाल रातोंरात सफेद हो सकते हैं।
इलीनोयस इन्स्टीट्यूट आफ टेक्नोलॉजी के अनुसंधानकर्ता विशेषज्ञों का कहना है कि चिन्तातुर एवं डरपोक लोग कई तरह के मानसिक रोगों से ग्रस्त होते हैं, उनमें कई प्रकार की सनकें पाई जाती हैं। कुछ तो अपनी कल्पनाओं के प्रति इतने दृढ़ निश्चयी होते हैं कि दूसरों के सुझाव या सत्परामर्श मानने को तैयार भी नहीं होते। इनमें अधिकाँश व्यक्ति भविष्य की चिन्ता, व्यापार-व्यवसाय में घाटे की आशंका, घर-परिवार या बच्चों के भविष्य के प्रति आशंका से घिरे रहते हैं। तो कुछ आग, बिजली, हिंस्र पशुओं, दुर्घटनाओं जैसे ‘फोबिया’ के शिकार होते हैं। विद्यार्थी परीक्षाओं में परिणाम को लेकर चिंतातुर देखे जाते हैं। वस्तुतः यह सब मनोबल की कमी और अदूरदर्शिता का ही परिणाम है। कल्पनाओं के परिमार्जन और उन्हें विधेयात्मक दिशा में लगा देने भर से बहुत हदतक डर के जंजाल से छुटकारा मिल जाता है।
वैज्ञानिक अध्ययनों द्वारा यह तथ्य भी प्रकाश में आया है कि बुद्धिमानों एवं विवेकशीलों पर अपडर का प्रभाव नहीं पड़ता। अल्पबुद्धि के भावुक लोगों को ही इस महाव्याधि के शिकार बनते देखा जाता है। महापुरुषों, आत्मवेत्ताओं के जीवन में इसके लेशमात्र भी दर्शन नहीं होते। ऐसे आदर्शचरित्र सामने रखने पर हर कोई भय और आशंका से सहज ही छुटकारा पा सकता है। गाँधी, बुद्ध, टैगोर, बिनोवा, दयानन्द, रामतीर्थ, विवेकानन्द, महावीर आदि महामानवों के जीवन के अनेकानेक घटना प्रसंग ऐसे हैं जिनमें मृत्यु उपस्थित कर सकने वाली परिस्थितियों में भी वे निर्भय एवं निश्चिन्त रहे। वस्तुतः आस्तिक, आध्यात्मिक एवं धार्मिक व्यक्ति के जीवन में भय और चिन्तायें नहीं रहती।
अमेरिका के सुप्रसिद्ध मनःशास्त्री प्रो. डोलार्ड ने सर्पदंश के कई मृतकों का शवोच्छेदन किया तो पता चला कि उनमें से अधिकाँश व्यक्ति भय से ही मृत्यु को प्राप्त हो गये। कुछ को तो किसी कीड़े ने काटा था जिनमें कोई जहर ही नहीं होता, मात्र एक दो व्यक्ति ऐसे थे जिनकी मृत्यु सर्प के वास्तविक जहर के कारण हुई थी।
भय; बेमौत मरने और अकारण घाटा उठाने और काल्पनिक विपत्ति से स्वयं ही लद मरने का एक फूहड़ तरीका है। किसी विद्वान ने सच ही कहा है डरपोक पग-पग पर मृत्यु के झूले में झूलता है जबकि साहसी को समय आने पर एक बार ही मरना पड़ता है।
महाराणा कुछ कहें, इसके पहले ही महामंत्री उठ खड़े हुए “गोस्वामी जी! आप जानते ही हैं कि दाराशिकोह का पक्ष लेने के कारण औरंगजेब उदयपुर से चिढ़ गया है। फतेहाबाद की पराजय चाहे जिसके दोष से हुई हो, उसने हमारे वारों की एक बड़ी संख्या से हमें हीन कर दिया है।
“हमारा सौभाग्य होगा यदि हम श्रीनाथ जी की अपने यहाँ प्रतिष्ठापित कर सकें।” महाराणा राजसिंह ने महामंत्री की बात काटने की कोशिश की। पर वह कुछ अधिक कह पाते इसके पहले महामंत्री बोल पड़े’-”सिसौदिया कुल शैव है। भगवान एकलिंग हमारे आराध्य हैं।” उनकी राजनीति कहती थी कि बरदशाह से शत्रुता मोल लेना ठीक नहीं है। वे महाराणा को भरे दरबार में न रोक सकते थे, न समझा सकते थे। इसलिए उन्होंने अपना यह ब्रह्मास्त्र प्रयोग किया था।
“श्रीमान!” महाराणा ने देखा कि अन्तः पुर से राजमाता की निजी सेविका दोनों हाथ जोड़े सिंहासन के सामने आ खड़ी हुई है। उसे संकेत से बोलने की अनुमति मिल गई। कदाचित् ही राजमाता किसी राज कार्य में कोई हस्तक्षेप करती थीं, किन्तु यह तो मेवाड़ का बच्चा-बच्चा जानता था कि वे इस दिव्य भूमि की महेश्वरी हैं। उनका संकेत भगवती की अनुल्लंघनीय आज्ञा है मेवाड़ में। उसने केवल इतना कहा “माता जी स्वयं कुछ कहना चाहती हैं” और धीरे से मस्तक झुकाकर लौट गई।
“राजसिंह! तू देव-संस्कृति की रक्षा का प्रहरी मात्र है और तुझे भूलना नहीं चाहिए कि सिसौदियों का सिंहासन का पुरुषों के लिए नहीं है।” सुकोमल कण्ठ, किन्तु बड़ा सुदृढ़ स्पष्ट स्वर सिंहासन के पीछे यवनिका के भीतर से आया।
“माता!” गोस्वामी गोविन्दराय जी दोनों हाथ जोड़े खड़े हो गए यवनिका की ओर मुख करके।”
“गोस्वामी जी आप चिंतित न हों।” राजमाता बड़ी नम्रता से कह रही थीं-”नाथ जी की श्री मूर्ति भारत की उज्ज्वल संस्कृति की आभा है-और यह तब तक विलीन नहीं हो सकती-जब तक भारत माता की एक भी संतान जीवित है। राजसिंह! देखता क्या है? उठ अपने कर्तव्य का पालन कर।”
“माताजी!” महामंत्री कुछ कहने के लिए खड़े हो गए हाथ जोड़ कर।
“राजपूत को राजनीति नहीं चाहिए महामंत्री जी!” जैसे माता छोटे शिशु को झिड़क रही हो, उनके स्वर में वात्सल्य था-” हम में से प्रत्येक का दायित्व है कि वह संस्कृति की रक्षा और उसके विस्तार के लिए आत्माहुति देने के लिए तैयार रहे और संस्कृति की रक्षा का अर्थ है उसके प्रतीकों का सम्मान अक्षुण्ण रहे। देव मूर्तियाँ हमारी गरिमा संस्कृति की प्रतीक हैं- इसके उज्ज्वल विस्तार पर फहराने वाली ध्वजा है। देश की नारियाँ इसका हृदय हैं, जीवन के शाश्वत मूल्य इसका प्राण-इनका अपमानित तिरस्कृत करने वाले को दण्डित होना पड़ेगा, वह चाहे कोई भी क्यों न हो। इस महान संस्कृति की रक्षा में सन्नद्ध प्रहरी अपरिमित सौभाग्य के स्वामी बनेंगे।”
“धन्य हो माता!” गोस्वामी जी की आँखों से अश्रु बिन्दु टपकने लगे। सभी मौन थे। क्षण के पल में , पल के दिवस और मास में बदलने के साथ ही वह समय भी आ पहुँचा जब फाल्गुन कृष्ण 7 सं. 1728 में श्री नाथ जी की प्राण प्रतिष्ठा सम्पन्न होने लगी ।
प्राण प्रतिष्ठा सम्पन्न ही हो रही थी तभी महाराणा राजसिंह राजमाता के पास पहुँच कर कहने लगे-माँ रूपनगर से पत्र आया है। रूपनगर को दुर्बल राज्य समझकर बादशाह ने संदेश भेजा है-”अपनी कन्या को विवाह में दो या युद्ध के लिए प्रस्तुत रहो।” राजमाता ने पत्र पढ़कर लौटा दिया-”बेटा! इसमें पूछने की क्या बात है? एक पवित्र कुमारी अपनी रक्षा के लिए पुकारेगी तो सिसौदिया अस्वीकार कैसे करेगा। फिर तेरे लिए अब पूछने की क्या बात है-तू तो संस्कृति का रक्षक है। इसकी रक्षा में अपनी सामर्थ्य की आहुति दिए जा।”
कुछ कहने को है नहीं। रूपनगर की राजकुमारी को संरक्षण मिला। बेचारा दिल्ली का बादशाह वहीं कुढ़कर रह गया। उसे ऐंठते देख उसी के दो महान सेनापति जयसिंह और यशवन्त सिंह उठे थे-”सम्राट! मेवाड़ हमारे श्रद्धा का स्थान है। भगवान एकलिंग और श्रीनाथ जी हमारे आराध्य हैं। आप रूपनगर के साथ अन्याय कर रहे थे। अब हम राजपूतों को महाराणा के पीछे खड़े होना है।”
यहीं तक इति नहीं हुई। महाराणा राजसिंह का धिक्कारपूर्ण पत्र मिला-बादशाह को। वह हारकर बैठ जाने वाला नहीं था। जिसने अपने पिता और भाइयों के साथ कृतज्ञता नहीं दिखलाई, वह राजपूत सेनापतियों के प्रति कृतज्ञ हो सकता था? लेकिन जयपुर और जोधपुर को भी शत्रु बनाने का साहस उसमें नहीं था। महाराज जयसिंह को उसने महाराष्ट्र भेज दिया शिवाजी से संग्राम करने और महाराज यशवंत सिंह को अफ़गान युद्ध में काबुल भेजा उसने।
“माँ! जोधपुर की राजमाता शरण लेने आ रही हैं।” सचमुच महाराणा राजसिंह जैसे शरण देने के लिए ही पृथ्वी पर आए थे। भारत की ऋषि संस्कृति की सजगतापूर्वक रक्षा यही एक मात्र व्रत हो गया उनका। कृतघ्न बादशाह के लिए महाराज यशवन्त सिंह काबुल में मारे गए और वह उन्हीं के पुत्रों को बन्दी बनाने की धुन में लग गया। छोटे- छोटे बच्चों को लेकर विधवा महारानी मेवाड़ के महाराणा की शरण आ रही थी ।
“तू तो अपनी सनातन संस्कृति कर रक्षक हो गया है, बस-कर्तव्य पालन किए जा।” राजमाता ने
हाथ उठाकर आशीर्वाद दे दिया।
यहीं दिल्ली के सम्राट से युद्ध का सीधे श्री गणेश हुआ। क्या हुआ जो एक बार विशाल यवनवाहिनी के लिए राजधानी खाली करके महाराणा अरावली के वनों में चले गए। यह युद्ध नीति तो मेवाड़ को हिन्दू कुल सूर्य महाराणा प्रताप से उत्तराधिकार में मिली थी। अरावली की घाटी में राजकुमार जयसिंह और भीमसिंह शत्रु सेना इसलिए अधिकार कर सकी कि वह पर्वतीय मार्ग से नहीं आयी।
“राजसिंह से हम लोग बेकार डरते थे। यह काफिर डरपोक ही निकला ।” मुगल सेनापति उदयपुर को खाली पाकर निश्चिन्त हो गया था। उसके सैनिक आमोद-प्रमोद में लग गए थे। “बहुत माल है काँकरोली में । कल हम वहाँ कूच करेंगे।”
“काँकरोली की ओर उठने वाली आँखें तीरों से नहीं हमारे भालों से फोड़ दी जाएँगी।” पता नहीं कहाँ से राजकुमार जयसिंह आ धमके। उनका अश्व दो पैरों पर खड़ा था और भाला धमक ही दिया था उन्होंने सेनापति पर। वह तो अँगुल दो अँगुल के अन्तर से बच गया।
“जय एकलिंग।” राजपूत वीरों का विजय घोष गूँज रहा था। छपाछप खड्ग बज रहे थे और भयभीत भागते, गिरते पड़ते शत्रुओं के शवों से धरा ढकती जा रही थी।
“मैं आपकी शरण हूँ। महज मेरी जान छोड़ दें, निकल जाने का रास्ता दे दें मुझे !” मुगल सेनापति ही नहीं, मुगल शहजादे ने गिड़गिड़ा कर महाराणा से यह भीख माँगी । वह करता भी क्या, मेवाड़ की ओर राजपूत वीर पीछा दबाए बढ़े आ रहे थे और गोलकुण्डा का सामने का मार्ग महाराणा के अनुचर भीलों ने रोक रखा था। वे भील, जिनसे दया की आशा नहीं की जा सकती। एक मात्र महाराणा ही शरण दे सकते थे।
कल शहजादे की यह दशा नहीं थी, स्वयं सम्राट आया मेवाड़ के महापर्वत पर टक्कर मारने । उनका सेनापति दिलावर खाँ-राठौर वीर दुर्गादास और रूपनगर के सोलंकी महाराज की चपेट में आकर दुबक कर भाग गया बादशाह को दुर्गादास से प्राण बचाने कठिन हो गए। अजमेर जाकर उसे शरण लेनी पड़ी। दक्षिण के युद्ध को रोककर शाहजादा-मुअज्जम को उसने बुला लिया। लेकिन उस बेचारे के भाग्य में भी पराजय ही लिखी थी। एक ओर महाराणा राजसिंह-राजकुमार जयसिंह के साथ उसका सेना को स्थान-स्थान पर पराजित कर रहे थे। दूसरी ओर राजकुमार भीमसिंह गुजरात, इन्दौर, सिद्धपुर-एक के बाद दूसरे स्थानों पर विजय पताका फहरा रहे थे।
“सब काफिर एक हो गए।’ हाँफ गया दिल्ली का घमंडी सम्राट। ‘राजसिंह की बात छोड़ो , मेवाड़ का कोई-कोई दरबार का गुलाम भी सुलह चाहे तो मैं चित्तौड़ और मारवाड़ दोनों छोड़ दूँगा।
मुगल दरबार का दूत आया यह संदेश लेकर। मेवाड़ के सरदारों ने सन्धि स्वीकार की। ‘मुझे शरण दो, मेरी जान बख्शो। ‘ इसके अतिरिक्त सम्राट की यह सन्धि और क्या थी। यह गौरव किसने दिया राजसिंह को? निश्चय ही संस्कृति रक्षा के पावन कर्तव्य ने। आज वही पावन कर्तव्य देव-संस्कृति की रक्षा और प्रसार-विस्तार का दायित्व-पुनः सजग पहरुओं को आवाज दे रहा है। भविष्य उदय होने वाले सौभाग्य सूर्य की सुनहली रश्मियाँ-इन्हीं संस्कृति सेनानियों के जीवन को प्रकाशमय बनाने वाली साबित होंगी।
किसी भी व्यक्ति की गरिमा और उसके व्यक्तित्व की विशालता को सराहने के लिए प्रायः कहा जाता है, वह समुद्र जैसा गंभीर और विशाल हृदय है। समुद्र वास्तव में अपने भीतर विशालता और गौरव गरिमा की महान प्रेरणाएँ लिए रहता है। उसकी विशालता यद्यपि स्थूल जगत तक सीमाबद्ध होती है, फिर भी उसकी सूक्ष्म प्रेरणाएँ को भी वैसा ही बनने की दिशा देती हैं। उसके निर्माण से लेकर विस्तार तक के तथ्यों पर दृष्टिपात किया जाए तो प्रतीत होगा कि यह श्रेय प्राप्त करने के लिए उसे किन उथल’-पुथल से गुजरना पड़ा है।
पृथ्वी की आयु करोड़ों वर्ष पुरानी मानी जाती हैं। आरम्भ में यह सूर्य तरह ही जलती हुई गैसों का पिण्ड थी क्योंकि यह सूर्य से ही टूटकर अलग हुई थी। धीर -धीरे यह ठंडी होने लगी और जीवों के रहने लायक स्थिति में करीब 10 लाख वर्ष पूर्व आई। इस संदर्भ में मूर्धन्य जर्मन वैज्ञानिक एल्फ्रेड बैगनर ने विश्व के विभिन्न भागों में पाए जाने वाले प्राणि अवशेषों का विश्लेषणात्मक अध्ययन कर पता लगाया कि अब तक संसार की जलवायु में कई विशाल परिवर्तन होते रहे हैं। ध्रुव प्रदेशों में ऐसे प्राणियों के अवशेष मिले हैं जो केवल उष्ण प्रदेशों में ही पाए जाते हैं। इसी प्रकार किसी समय हिमाच्छादित रहे प्रदेश इन दिनों हरे भरे मैदान बने हुए हैं और किसी समय के मैदान अब इन दिनों बर्फ से ढके हुए हैं। इसी प्रकार जहाँ इन दिनों घनी आबादी है, वहाँ कभी समुद्र था और किसी समय प्राणधारियों, थलचरों का निवास स्थान रहा प्रदेश आजकल समुद्र बना हुआ है।
बैगनर का यह भी मत है कि सुदूर अतीत में पृथ्वी पर एक ही महाद्वीप था और एक ही सागर, धीरे-धीरे यदि परिवर्तनों से भू-भाग कटते-फटते टूटते-फूटते कई महाद्वीपों और समुद्रों में बदल गये। इस समय पृथ्वी के अधिकाँश भाग में समुद्र फैला हुआ है, संपूर्ण पृथ्वी 1970 लाख वर्गमील क्षेत्र में फैली हुई हैं इसमें भूमि का क्षेत्रफल कुल 570 लाख वर्गमील के करीब ही है जबकि लगभग 1400 लाख वर्गमील वर्ग क्षेत्र में पानी फैला हुआ है। समुद्र की सबसे अधिक गहराई 35400 फीट है।
समुद्र में असंख्य प्रकार के जीव रहते हैं और वहीं से अपना पोषण प्राप्त करते हैं। स्थूल बुद्धि से देखने पर धरती के जीवों की उत्पत्ति धरती के वातावरण पर होती दिखाई देती है। यह भी प्रतीत होता है कि आहार भी धरती से ही प्राप्त होता है। इस प्रकार धरती वाला क्षेत्र अधिक उर्वर प्रतीत होता है, किन्तु वास्तव में ऐसा है नहीं। धरती जितने जीवों का निर्वाह करती है, उससे कहीं अधिक जीवों को समुद्र प्रश्रय देता है। जीवन का आदितत्व प्रोटोप्लाज्म आरम्भ में समुद्रों से ही उत्पन्न हुआ था। विकासवाद के जनक डार्विन के अनुसार जीवों की उत्पत्ति सर्वप्रथम जल में ही हुई । भारतीय धर्म के मान्य दशावतारों की संगति विकासवाद से बिठाते हुए आधुनिक विद्वान कहते हैं कि मत्स्यावतार इसी बात का प्रतीक है कि सर्वप्रथम सागर में से ही जीवन प्रादुर्भाव हुआ।
जो भी हो यह मानने के पर्याप्त कारण हैं कि जल, सागर जीवन का आदि उद्गम स्थल है और सर्वप्रथम जल जीवों का अस्तित्व ही संसार में दृष्टिगोचर हुआ था। समुद्री जीवों को तीन भागों में विभक्त किया जाता है-पहला “ प्लैंकटन” जो स्वयं चल फिर नहीं सकते । लहरें-धाराएं और ज्वार-भाटा इन्हें इधर-उधर घुमाते-फिरते हैं। समुद्री पौधे और बहुत छोटे कीड़े इसी वर्ग में आते हैं । दूसरे प्रकार के जल जीवों में “नैक्टम” का स्थान आता है जो स्वतः चल फिर सकने में समर्थ है। समुद्र की गहराई में एक ही स्थान पर रहने वाले चित्र-विचित्र बनावट के जल-जीवों को तीसरे वर्ग में रखा जाता है इन्हें “बैन्थस” कहते हैं। इनमें कितने ही ऐसे हैं जिनकी विचित्र और विलक्षण बनावट स्तब्ध कर देती है। हाथी की सी सूंड़ वाला जलदैत्य, भीमकाय व्हेल, शार्क जैसी आक्रमणकारी मछली, मगरमच्छ अपने ढंग के अलग ही जीव जन्तु हैं जो बड़ी संख्या में सागर के गर्भ में वास करते करते हैं। इन विशालकाय जल-जन्तुओं के अतिरिक्त छोटे अमीबा और बैक्टीरिया सरीखे सहज ही न दिखाई देने वाले जन्तु भी कम नहीं हैं। संख्या की दृष्टि से थलचरों की तुलना में जलचरों की संख्या कई गुना अधिक है। मछलियों का तो समुद्रों में तो एक प्रकार से ऐसा ही साम्राज्य है जैसा धरती पर समुद्रों का। आँखों की जानकारी ही सब कुछ नहीं है। न दीखने वाली दुनिया की विशालता और सम्पदा दिखाई देने वाली सम्पदा की अपेक्षा कहीं अधिक है इतना ही नहीं इनकी विचित्रता और विलक्षणता भी आश्चर्यजनक है। समुद्री कीड़ों में प्रवाल एक अपने ढंग का अनोखा ही जीव है। इसने विशाल महासागरों में हजारों द्वीपों का निर्माण कर दिया। प्रायः ये 23 से 29 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान पर ही क्रियाशील रहते हैं। जल के भीतर डूबे रहना ही इन्हें पसन्द है। ज्वार की लहरें जितनी ऊपर उठती है, ये प्रवाल कीट पर्वत भी उतनी ही ऊँचाई तक उठते हैं। इनका सामान्य भोजन समुद्र में पाई जाने वाली चाक मिट्टी है। इनके शरीरों में से एक विशेष प्रकार का द्रव पदार्थ निकलता है जिससे एक कड़ा आवरण बन जाता है। प्रवाल कीट इसी आवरण के भीतर रहते हैं। यह आवरण भी विचित्र है। केले की जड़ों में से जिस प्रकार अपने आप नए अंकुर निकलते रहते हैं उसी प्रकार इन आवरणों में से भी नए-नए आवरण निकलते रहते हैं और फिर उन्हीं में से नए प्रवाल कीड़े भी उत्पन्न होते रहते हैं
इन आवरणों से समुद्र में नये’-नये द्वीप भी उभरते रहते हैं। दक्षिण-पश्चिम हिन्द महासागर में इस प्रकार प्रवाल निर्मित द्वीपों की एक बड़ी शृंखला की ऊँची चोटियों पर मालद्वीप, लक्षद्वीप, चागोज, सिचेलिज, फिलीपींस आर्कपेला, भोज द्वीप मालाएँ स्थित हैं। कितने ही व्यक्ति प्रवाल कीड़ों की तरह शाँतचित्त से दृढ़ निश्चयी कृत संकल्प भाव से अनवरत श्रम करते हुए अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए तन्मय भाव से लगे रहते हैं। हलचलों की उथल-पुथल देखने वाले उन्हें निष्क्रिय कह सकते हैं, पर समय बताता है कि कुछ क्षण उछल कूद करके फिर हाथ पैर ढीले कर बैठने वालों की अपेक्षा धैर्य के साथ निरंतर किया जाने वाला पुरुषार्थ समय पर कितने और कैसे चमत्कारी परिणाम प्रस्तुत करता है। चाक मिट्टी खाकर ही अपना जीवन गुजार देने वाले यह कीड़े मूँगा पैदा करते हैं और उन्हीं से विशालकाय द्वीपों का निर्माण होता है। इस क्षेत्र में ये मधुमक्खी को भी मात कर देते हैं जो फूलों के रस को शहद में बदल देने के लिए प्रसिद्ध हैं। संत, सज्जन, समाज से न्यूनतम अनुदान ही लेते हैं और उस न्यूनतम के सहारे ही अपना जीवन निर्वाह कर समाज के लिए एक से एक बढ़े-चढ़े सेवा कार्य सम्पन्न कर डालते हैं। उनकी प्रतिभा, बुद्धि, सामर्थ्य, सम्पदा, क्षमता सब कुछ शाखा-प्रशाखाओं की तरह प्रस्फुटित होती हुई समाज को अनुगृहीत करती है। प्रवाल कीड़े की यह विशेषता भी सज्जनों में पाई जाती है कि वे संकट के सागर में डूबे रहते हुए भी अपना मस्तिष्क विक्षुब्ध नहीं होने देते तथा अनवरत सेवा साधना में लगे रहते हैं।
प्रवाल कीड़ों को प्रश्रय देने और उन्हें उपयोगी
उत्पादन करने में सक्षम बनाने की विशेषता सागर में ही होती है। महामानव और देवपुरुष भी प्रवाल कीटों जैसे तुच्छ साधारण जनों को अपना संरक्षण जनों को अपना संरक्षण और प्रश्रय देकर उन्हें समाज के लिए उपयोगी बना देते हैं। समुद्र में मात्र यही विशेषता नहीं होती, बल्कि वह अनुपयोगी और कूड़े को पचाकर उसे उपयोगी सार्थक बनाने की महानता का भी परिचय देता है। नदियाँ धरती का नमक लेकर समुद्र में ही फेंकती हैं, समुद्र उसे पचा जाता है, अपने तक ही सीमित रखता है और बादलों को वह निर्मल स्वच्छ, मधुर जल ही प्रदान करता है।
सगर का जल खारा होता है। उसके एक किलोग्राम जल में 35 ग्राम नमक घुला रहता है। इसमें खाने योग्य 27 ग्राम और अखाद्य नमक की मात्रा 8 ग्राम होती है। यह नमक नदियों द्वारा भूखण्डों से लाए गए जल प्रवाह के समय समुद्र में जमा होता है और इस प्रकार उसकी मात्रा बढ़ती चली जाती है। इन लवणों में से कुछ तो समुद्री जीव अपनी शरीर रचना और आहार की पूर्ति, पोषण की प्राप्ति में खर्च कर लेते हैं, फिर भी नमक की मात्रा बढ़ती ही जाती है। यों समुद्र के पानी में पाया जाने वाला खारापन नदियों से ही आता है। यह समुद्र की ही विशेषता है कि वह उसको भी उपयोगी बनाकर वितरित कर देता है। समुद्री नमक से लोग कितने ही उपयोगी पदार्थ बनाते हैं और उनसे कितनी ही सम्पदा अर्जित करते हैं यह किसी से छिपा नहीं है। सज्जन भी समुद्र जैसी रीति-नीति अपनाकर अपनी सम्पत्ति को लोकोपयोगी बनाने में तत्पर रहते हैं और उपयोगी बन जाने पर उसे वितरित कर देते हैं।
समुद्र की गहराई में जितना नीचे तक उतरा जाता है, उसका तापमान उतना ही घटा हुआ मिलता है। 200 मीटर गहराई में समुद्र का तापमान 16 डिग्री सेंटीग्रेड होता है, पर वह 600 मीटर पर 7 डिग्री, 1200 पर 3 डिग्री 1800 पर 2 और 3000 मीटर पर 1.8 डिग्री सेंटीग्रेड रह जाता है। आर्कटिक महासागर दक्षिण में स्थित महासागरीय तलियों में समुद्र का तापमान शून्य सेंटीग्रेड जितना अर्थात्-पानी जमने जितना पाया जाता है, जबकि भूतल पर इतनी ही गहराई में गर्म लावा बहता रहता है। इसी प्रकार ऊँचा तापमान प्रशाँत महासागर के प्रवाल द्वीपों के समीप सागर तली में 21 सेंटीग्रेड होता है किन्तु वहाँ भी 5850 मीटर से नीचे तो शून्य तापमान ही रहता है।
भौतिक दृष्टि से समुद्र जो कुछ भी हो, आत्मिक दृष्टि से हमें बहुत कुछ प्रेरणा और शिक्षा दे सकने में समर्थ है। बाह्य जीवन की विभिन्नता एवं विक्षोभकारी परिस्थितियों के कारण हर किसी को उत्तेजना का यदि विवेकपूर्वक उपयोग किया जा सके तो उनमें समस्याओं के समाधान भी निकलते हैं। फिर भी वे महापुरुष जिनका व्यक्तित्व समुद्र जैसा विशाल है, अपने अंतःक्षेत्र की गहराई में बर्फ जैसी शीतलता भरे रहते हैं। वे न तो उद्विग्न होते हैं और न क्रुद्ध । क्रियाकलापों से, विपन्नता से निपटने वाला आवेश भले ही हो, पर वे मानसिक संतुलन की दृष्टि से सदा ही शान्त और शीतल ही पाए जाते हैं। समुद्र अपने भीतर जो प्रेरणाएँ लिए हुए हैं या उससे जो प्रेरणाएँ-शिक्षायें मिलती हैं यदि उन पर ध्यान दिया जाए तो कोई भी व्यक्ति निःसन्देह समुद्र जैसा ही गंभीर और महान बन सकता है।
अपना सुधार करो तो संपर्क में आने वाले दूसरे भी सुधर जायेंगे। जो अपने को नहीं सुधार सका उसका दूसरों को धर्मोपदेश देने का अधिकार कहाँ होता है?
संस्कृत के महाकवि माघ अपने घर पर ही काव्य सृजन किया करते थे। एक दिन वे अपनी काव्य कृति को अन्तिम रूप देने में निमग्न थे कि उसी समय अवंति का एक दरिद्र ब्राह्मण उनके पास आया और अपनी कन्या के विवाह के लिए आर्थिक सहायता की याचना करने लगा।
कविवर स्वयं आर्थिक कष्ट में थे, फिर भी उन्होंने चारों ओर दृष्टि दौड़ाई घर में भी कोई मूल्यवान वस्तु शेष नहीं थी। उनकी दृष्टि पत्नी के हाथों में पहने स्वर्ण कंगन पर पड़ी। पत्नी से उन्होंने एक कंगन माँगा ताकि ब्राह्मण की आवश्यकता पूरी की जा सके। माघ की पत्नी ने दूसरे हाथ का कंगन भी निकाल कर देते हुए कहा स्वामी! निर्धन ब्राह्मण का काम एक कंगन से नहीं चलेगा, इसलिए इसे भी सहर्ष दे दीजिए।
चौरासी लाख योनियों में से मनुष्य जीवन सर्वश्रेष्ठ व उत्कृष्ट है। जिसे यह अनुदान प्राप्त है, उसके बारे में कहा जाता है कि भगवान की उस पर महती कृपा है, पर जब इस दिव्य अनुदान का प्रतिपादन शोक-सनक एवं कौतुक-कौतूहल के चित्र-विचित्र प्रदर्शनों के रूप में चुकाया जाने लगता है तो इसे उसका दुर्भाग्यों का सिलसिला चल पड़ा है। सद्गुणों से अपने को परिपूर्ण बनाने के स्थान पर मनुष्य कूड़े-कबाड़े एकत्र करता और बहुमूल्य जीवन सम्पदा को यों ही व्यर्थ गँवाता रहता है।
स्पेन की एक विधवा महिला को कूड़े एकत्रित करने का विचित्र शौक है। पिछले चालीस वर्षों से वह इस कार्य में लगी हुई है और अब तक दो बड़े कमरों में उसने 15 टन कूड़ा इकट्ठा कर अपने साफ-सुथरे कमरे को कूड़ा घर बना लिया है। इसी तरह आस्ट्रिया का एक चौबीस वर्षीय युवक है-मोजेट। यद्यपि वह अभी अध्ययनरत है, पर पढ़ाई से बचे समय का उपयोग विभिन्न प्रकार के जन्तुओं, कीड़े’-मकोड़ों का संग्रह करने में करता है। उसकी इस सनक से घर वाले भी परेशान हैं, पर उसका शौक छूटने का नाम ही नहीं लेता। अधिकाँश समय उसके अजायब घर को देखने के लिए लोगों की भारी भीड़ जमी रहती है।
चुँग हुवा चीन के बीजिंग शहर का रहने वाला है। इन दिनों वहाँ के न्यायालय में उसके विरुद्ध एक मुकदमा चल रहा है। उस पर आरोप है कि अपने घर के लान में सैंकड़ों पालीथिन बैग इकट्ठा कर शहर को गंदा और प्रदूषित करने का प्रयास कर रहा है, जबकि उसका कहना है कि वह नगर को गंदा नहीं, वरन् विभिन्न स्थानों पर यत्र-तत्र पड़े बैगों को एकत्रित कर शहर को स्वच्छ रखने में सफाई कर्मचारियों का ही हाथ बँटाता है।
चीन का ही एक अन्य व्यक्ति है-लावो पेंग। इसे साँप पालने का शौक है। सन् 1980 से अब तक उसके साँपों की संख्या नौ सौ से ऊपर पहुँच चुकी है। उसका यह विचित्र शौक तब शुरू हुआ, जब एक सपेरे के पास प्रथम बार उसने कुछ रंग-बिरंगे सर्पों को देखा। इसी के बाद उसने काँच का एक बड़ा घर बनवाया और साँपों को पकड़-पकड़ का उसमें छोड़ने लगा। अपनी नौकरी से बचे शेष समय को वह इसी में नियोजित करता है।
यदि किसी व्यक्ति की, महिलाओं के वस्त्र चुराने की अजीबोगरीब रुचि हो, तो उसे क्या कहा जाय-पागल सनकी अथवा काम कुण्ठित मानसिक रोगी? कह कुछ भी लें, पर सैटियागों शहर में जॉन फ्रैजर नामक एक ऐसा ही व्यक्ति है, जिसके विरुद्ध इसी अपराध के संबंध में मामला दर्ज किया गया है।
जापान की महिला तोशिया को काँच खाने की सनक है। उसकी इस सनक की शुरुआत तक हुई, जब बचपन में उसने एक काँच का टुकड़ा निगल लिया था उसके बाद धीरे-धीरे उसका यह शौक बढ़ता गया और अब तो उसके लिए यह आम बात हो गई है। वह ट्यूब लाइट की नली, बल्ब, खिड़कियों के शीशे बिना किसी परेशानी के निगल सकती हैं।
इथोपिया के सम्राट हाइल सलामी की गणना एक क्रूर-सनकी के रूप में होती है। जब उसे इसका दौरा पड़ता , तो वह किशोरियों के खून से स्नान करने का विशेष समारोह आयोजित करता। इस हेतु राज महल से कुछ दूर एक सरोवर का निर्माण कराया गया था। हाइल सलामी प्रति वर्ष अपने जन्मदिन पर यहाँ स्नान करने आता। स्नान से पूर्व दो कबीली बालाओं की हत्या की जाती और उनके रक्त को तालाब जल में डाला जाता, फिर इस रक्त मिश्रित लाल जल में सम्राट देर तक स्नान करता रहता। इससे उसे यौन उत्तेजना मिलती थी।
शौक पालने में कोई हर्ज नहीं, पर ऐसा करते समय ध्यान इस बात का भी रखा जाना चाहिए कि हमारे इस कार्य से समय, श्रम और साधन का सुनियोजन मानवी हित में कितना हुआ। यदि इनका उपयोग सिर्फ कौतुक व सनकी प्रदर्शनों में होता है, तो हमारा मूल्य एक तमाशबीन व सर्कस वाले से अधिक नहीं हो सकता। ऐसे लोग तो शहर के नुक्कड़ और चौराहों पर अपनी बाजीगरी दिखाते ही रहते हैं, फिर हमने वैसा करके कौन-सा अचम्भा कर दिखाया? कौन-सा तीर मार लिया ? हमारी विवेकशीलता इस तथ्य को भलीभाँति समझने में ही है।
अध्यात्म विज्ञान कहता है कि यह शरीर जितना कुछ कर पाता है, उससे सैकड़ों गुनी अधिक संभावनाएँ सँजोये हुए हैं। व्यक्ति यदि चाहे, तो उन्हें करतलगत भी कर सकता है, पर ऐसा तभी संभव है, जब कौतुक व कौशल के बीच का अन्तर उसकी समझ में आये। समस्या तब खड़ी होती है, जब वह अपनी सामर्थ्य को इन कौतुक भरे प्रदर्शनों तक ही सीमित मान बैठता है, और चित्र-विचित्र सनकों को पूरा करने में ही जीवन सम्पदा की इति श्री कर लेता है। अन्तिम निर्णय मनुष्य को स्वयं करना है कि वह तमाशबीन बने अथवा कुछ श्रेष्ठ और अधिक गरिमामयी उपलब्धि के लिए मनुष्य शरीर के रूप में भगवान के इस दिव्य अनुदान का समझदारी पूर्वक उपयोग करे।
कहते हैं कि दवा सहायता प्रायः उन्हीं को मिलता है, जो उन्हें उपलब्ध करने की पात्रता अपनी ही साहसिकता के आधार पर सिद्ध कर सके। ऐसे ही लोग जन समर्थन अर्जित करते और सफलता प्राप्त करते हैं, जबकि भीरुता को तो पग-पग पर असहयोग और असफलता ही हाथ लगती है। इन्हें भगवद् सहायता तो क्या जनसहयोग भी हस्तगत नहीं हस्तगत नहीं होता, जबकि मोर्चे पर डटे सेनानायक का मनोबल कहर बरपाते देखा जाता है। इनका अद्भुत उत्साह न सिर्फ सैनिकों की चिनगारी से ज्वालमाल बनाता है, वरन् शत्रुओं के विशाल कुमुक को भी नाकों चने चबाता है। इस संदर्भ में यह कथन काफी सही है कि “ईश्वर केवल उन्हीं की सहायता करता है जो अपनी सहायता आप करने को तत्पर होते हैं”। इसमें ईश्वर -विश्वास दोनों तत्व इकट्ठे होते हैं, वहाँ चमत्कार उत्पन्न होता है। तब विवश होकर यह कहना पड़ता है कि मारने वाले से बचाने वाला बड़ा है।
चीन के बिजिंग शहर की एक महिला हुआँग के संबंध में यह तथ्य अक्षरशः लागू होता है। उसका जीवन आकस्मिक विपत्तियों और अप्रत्याशित सुरक्षा-संयोगों का ऐसा विचित्र प्रतिमान है जिसे देखकर आश्चर्य से चकित रह जाना पड़ता है। प्रतीत ऐसा होता है कि कोई आसुरी सत्ता उसकी जीवनलीला समाप्त करने पर सदा सन्नद्ध रही, पर दैवीसत्ता के संरक्षण के आगे उसकी एक न चली और उसके आक्रमण सुरक्षा कवच पर होने वाले आघात की भाँति सदा निष्फल होते रहे। हुआ के जीवन में सात जानलेवा दुर्घटनाएँ हुई, पर हर बार दैवयोग से वह बचती रही। इन दुर्घटनाओं में आश्चर्यजनक बात यह रही कि कइयों में सारे-के’-सारे यात्री मारे गये, जीवित एक मात्र वही बची।
एक बार जब वह किशोरावस्था में थी, तो स्कूल की ओर से अन्य बच्ची के साथ पिकनिक में जाने का कार्यक्रम बना। नियत समय पर सभी बस से रवाना हुए पर दुर्भाग्यवश पिकनिक स्थल पहुँचने से पूर्व ही रास्ते में बस की टक्कर विपरीत दिशा से आते एक ट्रक से हो गई। ट्रक की रफ्तार इतनी तेज थी, कि बस बगल के एक गहरे खड्डे में जा गिरी। जीवित सिर्फ चालक और हुआ ही बचे। अन्य सभी ने या तो घटना स्थल पर दम तोड़ दिया अथवा अस्पताल में।
इसी प्रकार सन् 1960 में एक बार वह बिजिंग से संघाई वायुयान से जा रही थी। बीच में उसमें कुछ खराबी आ गई। पायलट ने सभी यात्रियों को इसकी जानकारी दे दी। उसने उसने निकटवर्ती हवाई अड्डे में जहाज को उतारना भी चाहा पर सफल न हो सका। उतरने से पूर्व इंजन में आग लग गई। जलता विमान सड़क के किनारे एक खेत में जा गिरा। तुरंत आपातकालीन सेवाएँ दी गईं। दमकल से आग जल्द ही बुझा दी गई। यात्रियों को जब बाहर निकाला गया तो सभी दम घुटने से मर चुके थे। एक हुआँग ही बेहोश अवस्था में पड़ी मिली। कई दिनों के उपचार के बाद अस्पताल में वह ठीक हो गई।
सन् 1962 में वह मस्तिष्कीय शोध संबंधी कार्य के लिए रूस गई। एक दिन वह उक्रेन के काला सागर तट पर स्थित एक होटल में रात में सागर का आनन्द ले रही थी कि अचानक तूफान आ गया। उस भीषण तूफान में तटवर्ती होटलों के अधिकाँश लोग मारे गये। कुछ एक जो बचे, उनमें हुआँग भी सम्मिलित थी। उसका बचना भी बड़ा विलक्षण रहा। भयंकर तूफान में जब होटल पानी से भर गया और वह पानी में ऊपर-नीचे आने-जाने लगी, तभी न जाने कहाँ से उसके सामने लकड़ी का एक मोटा लट्ठा आ गया। वह उसी के सहारे तैरती हुई बड़ी कठिनाई से जिन्दा रह सकी। बाद में सेना की नाव ने उसे वहाँ से सुरक्षित स्थल तक पहुँचाया।
सन् 1964 में एक शाम वह अपनी एक सहेली के विवाह के उपलक्ष्य में एक प्रीतिभोज में सम्मिलित हुई। दावत में मछलियाँ परोसी गईं, पर दुर्दैव से वह किसी ऐसे जलाशय की थीं, जो विषाक्त हो चुका था। उसमें रहने वाली मछलियाँ भी उससे अप्रभावित न रहीं। उसे खाते ही सभी को उल्टियां होने लगीं। तुरंत सबको अस्पताल पहुँचाया गया। हुआ भी इनमें शामिल थी। लगभग आधों ने तो रास्ते में ही दम तोड़ दिए। कुछ अस्पताल पहुँचने पर और अनेक, उपचार मिलने के उपरान्त भी जीवित न रह सके। हुआ की स्थिति भी गंभीर हो गई थी। डॉक्टरों ने उससे भी आशा छोड़ दी थी, पर समय बीतने के साथ-साथ उसमें सुधार आता गया। चिकित्सकों को उसके ठीक होने पर हैरानी इस बात की हुई कि कई लोगों की अस्पताल पहुँचने पर स्थिति हुआ से कहीं अच्छी थी। उन्हें परिश्रमपूर्वक भी बचाया न जा सका, किन्तु उन्हीं दवाओं ने हुआ के लिए रामबाण औषधि का काम किया। यह कितने आश्चर्य की बात है।
एक बार वह कॉलेज से अन्य सहेलियों के साथ टैक्सी सड़क किनारे एक वृक्ष से जा टकरायी। चालक की तत्काल मृत्यु हो गई। तीनों सहेलियों के साथ टैक्सी सड़क किनारे एक वृक्ष से जा टकरायी। चालक की तत्काल मृत्यु हो गई। तीनों सहेलियाँ गंभीर रूप से घायल हुई। हुआँग के सिर्फ हाथ की हड्डी टूट कर रह गयी।
इन्हीं दिनों की बात है। एक दिन वह सड़क पार करती हुई कॉलेज में प्रवेश कर रही थी कि एक तीव्र गति की कार ने उसे जोर की टक्कर मारी। वह किनारे दूर जा गिरी। उपस्थित लोग दौड़।
वह किनारे दूर जा गिरी। उपस्थित लोग दौड़ । सोचा हुआ का बचना मुश्किल है। निकट पहुँचे, तो पता चला कि उसकी बायीं टाँग टूट गई है। इसके अतिरिक्त और कोई चोट नहीं आयी । दर्शकों ने जब इस पर हैरानी प्रकट की तो उसने कहा कि टक्कर लगने से ठीक पूर्व ऐसा लगा कि मुझे किसी ने झटके से किनारे खींच लिया हो। मेरी टाँग टूट गई है। इसके अतिरिक्त और कोई चोट नहीं आयी। दर्शकों ने जब इस पर हैरानी प्रकट की तो उसने कहा कि टक्कर लगने से ठीक पूर्व ऐसा लगा कि मुझे किसी ने झटके से किनारे खींच लिया हो। मेरी टाँग उसी झटके से टूटी है। धक्का तो मुझे लगा ही नहीं । ऐसा होता, तो मेरा बच पाना संभव न था।
उक्त घटनायें यह सिद्ध करती हैं कि सर्व समर्थ सत्ता की इच्छा के बिना कोई किसी का कुछ बिगाड़ नहीं सकता, मारने की बात तो दूर रही। यदि पात्र उसका प्रिय है, उसकी अहैतुकी सहायता का अधिकारी है, तो वह उसे अवश्य संरक्षण प्रदान करती है, पर अनुबन्ध एक ही है-साहसिकता । यदि हुआँग के जीवन में झाँका जाय, तो ज्ञात होगा कि जीवन में उसने साहस और सत्साहस के ऐसे करतब किये हैं, जो शायद किसी अन्य नारी द्वारा कम ही किये गये हों, इस आधार पर यही कहा जा सकता है कि जो प्रतिकूल परिस्थितियों में साहसपूर्वक अपनी और दूसरों की सहायता करने के लिए तत्पर होता है, संकट में ईश्वर उसकी अवश्य सहायता करता है। आस्तिकता इसे और असंदिग्ध बना देती है।
नाले का पानी सड़ रहा था। शिष्यों ने गुरु से पूछा-पिछली बार जब हम इधर से निकले थे तो न सड़न थी न बदबू। अब की बार यह कैसे उत्पन्न हो गई?
गुरु ने कहा-”प्रवाह रुक गया है। जो बहता नहीं वह सड़ेगा ही।तो फिर क्या उस विपन्नता से त्राण का कोई मार्ग नहीं है ?
शिष्यों का समाधान करते हुए गुरु देव बोले-प्रायश्चित्त की मूसला धार वर्षा होते ही यह सड़न आगे बढ़ेगी और दुर्गन्ध से त्राण मिलेगा।
गुरु का अभिप्राय था, कृपणता द्वारा उदारता का बहाव अवरुद्ध कर दिये जाने का दुष्परिणाम समझाना साथ ही यह बताना है कि उदारता के उफान द्वारा ही इस स्थिति का निराकरण होगा।
मनुष्य के भीतर अनन्त शक्तियों का भाण्डागार भरा पड़ा है। शारीरिक, मानसिक शक्तियों के अतिरिक्त आत्म चेतना की प्रचण्डता का तो कहना ही क्या, जो अपने सृजेता की समस्त शक्तियों, विभूतियों एवं सम्पदाओं से विभूषित है। परन्तु इनमें से निन्यानवे प्रतिशत शक्तियाँ प्रसुप्त अवस्था में पड़ी रहती हैं। इसी तरह जाग्रत शारीरिक-मानसिक क्षमता का अधिकाँश भाग व्यर्थ के कामों में नष्ट होता रहता है। बाहरी साधनों की ओर ही अधिक ध्यान आकृष्ट रहने के कारण स्वयं के लिए शक्ति और उसके व्यय की क्या स्थिति चल रही है, इस ओर कोई देखने की भी आवश्यकता अनुभव नहीं करता है। फलतः लगायी गयी शक्ति और किये गये प्रयत्नों के एक प्रतिशत भाग का ही परिणाम सफलता के रूप में दिखाई पड़ता है। शेष सब अव्यवस्थित, अनावश्यक और फूहड़ ढंग के कारण नष्ट हो जाते हैं। सफलता कौन नहीं चाहता? सब यह भी जानते हैं कि बिना प्रयत्न किये गये वाँछित परिणाम नहीं मिलते। इसलिए हर कोई प्रयत्न भी करता है, परन्तु फिर भी सफलता नहीं मिलती तो इसका कारण भाग्य या पुरुषार्थ का शिथिल होना मात्र ही नहीं है। सफलता या असफलता मात्र शक्ति-सामर्थ्य पर ही नहीं, वरन् बहुत कुछ हमारी कार्यपद्धति पर भी निर्भर करती हैं, जिसका नियोजित, व्यवस्थित और क्रमबद्ध होना आवश्यक है। एक बड़े पत्थर को उसके स्थान से हटाने के लिए दस व्यक्ति भी शायद पर्याप्त न हों, परन्तु उसे युक्तिपूर्ण तरीके से कोई एक समझदार व्यक्ति भी आसानी से हटा सकता है। दस व्यक्ति अयुक्तिपूर्ण तरीके से हटाने का प्रयास कर अपनी शक्ति का अपव्यय ही करते हैं, जबकि समझदार आदमी अपनी अकेली शक्ति का एक भाग लगाकर ही उस कार्य को सम्पन्न कर लेता है। मनुष्य की शक्ति के अपव्यय का यह एक प्रकार है।
यदि हम सूझबूझ और समझदारी से प्रत्येक कार्य को करने का संकल्प लें तो इस क्षति को रोक सकते हैं। शक्ति प्रयोग में बुद्धि का उपयोग न करने के साथ- साथ उन्माद और अभिज्ञान भी उनके अपव्यय का कारण है। भगिनी निवेदिता ने कहा है कि शक्तिवानों के पास शक्ति तो बहुत है, पर वस्तुतः उस शक्ति का सम्यक् प्रयोग वही कर सकता है जिसके पास शक्ति से परे का विचार है। शक्ति प्रयोग करने के लिए है, हमें अपनी बाढ़ में बहा ले जाने के लिए नहीं। उनने संयम को शक्ति का सबसे बड़ा स्रोत बताया है।
कोई नवयुवक जब अपने जीवन के कार्य क्षेत्र में उतरता है तो उसे विश्वास रहता है कि मेरे पास शक्ति का अगाध भण्डार है। अदम्य आत्मविश्वास और साहस से भरा हुआ यौवन अक्सर-युवकों को अतिवादी और अभिमानी बना देता है। इस अभिमान में वह अपनी शक्तियों को उच्छृंखल ढंग से नष्ट करने लगता है। इस संबंध में प्रख्यात मनीषी विलियम शेक्सपियर ने “मेजर फॉर मेजर” नामक अपनी कृति में लिखा है कि-”यह एक अच्छी बात है कि दैत्य स्तर की शक्ति हो, किन्तु यह अत्याचार पूर्ण है कि उसका दैत्य सदृश उपयोग किया जाय।” जहाँ कहीं भी, जब कभी, शक्ति अभिमान के कारण अनाचरण हुए हैं, वह निश्चित रूप से घातक और असफलता प्रदान करने वाले ही सिद्ध हुए हैं। जब अवसर निकल जाता है तो पश्चाताप के अतिरिक्त और कुछ हाथ नहीं लगता रावण, कंस हिरण्यकशिपु जैसे अति बलशाली दैत्य इसके इतिहास प्रसिद्ध उदाहरण हैं। अन्त समय में लक्ष्मण को उपदेश देते हुए महाबली रावण ने यही कहा था कि “मैं इस दुनिया में कई अच्छे काम करना चाहता था, परन्तु यही सोचता रहा कि मुझ में तो अपार शक्ति है, जब चाहूँगा कर लूँगा। इस तरह उन्हें कल पर टालते-टालते मेरा काल ही आ धमका, किन्तु वह कल नहीं आया जिस दिन मैं वे कार्य कर सकता था। अपरिमित शक्ति मात्र अत्याचार में ही लगी रही और उसके सदुपयोग का अवसर बीत गया।
शक्ति किसी कार्य में लगे या न लगे, उसका खर्च होना तो रोका नहीं जा सकता। उपयोगी कार्यों में न लगने पर वह आलस्य, प्रमाद या परपीड़न अत्याचार जैसे दोषों से व्यक्ति को पथभ्रष्ट करके ही रहेगी। वह सामर्थ्य, दूषित जीवन की ओर ही धकेलती है। अति विश्वास भी कभी-कभी आलस्य और अन्य बुराइयों को जन्म देता है। व्यक्ति सोचने लगता है कि हमारे पास तो शक्तियों का अतुल भण्डार है, इसको जब चाहेंगे, तब कर लेंगे। कल पर छोड़ा हुआ आज का काम अनिवार्य रूप से अधिक श्रम माँगेगा। परन्तु पहली बात तो यह है कि आलस्य और प्रमाद के कारण टाला गय काम कभी पूरा भी होगा, यह भी संदिग्ध है।
गुरु गोलवलकर ने शक्ति के उस स्वरूप की प्रशंसा की है जो सद्गुण, शील, पवित्रता, परोपकार की प्रेरणा तथा मानव मात्र के प्रेम से युक्त हो। प्रायः जिनके पास जितनी बड़ी शक्ति होती है, वह उतना ही अधिक उसका दुरुपयोग करते हैं, दूषित जीवन बिताने वालों की शक्तियों का उपयोग वृथा और अनावश्यक कार्यों में ही होता है। सुप्रसिद्ध विचारक स्वेट मार्डेन ने इस बात को और अधिक स्पष्ट करते हुए लिखा है कि-”हजारों दिन की एकत्र की हुई शक्ति को वृथा कार्यों में खर्च कर डालना क्या मूर्खता नहीं है? जिन शक्तियों को काम में लाने से शारीरिक और मानसिक कार्यों में सफलता प्राप्त हो सकती है, तो उन्हें नादानी में यों ही बरबाद कर देना कहाँ की बुद्धिमानी है।’
शक्तियों का अपव्यय अन्य दूसरे प्रकारों से भी होता है। अपनी आवश्यकता तथा सामर्थ्य से अधिक श्रम करने के कारण आई हुई थकान उस दिन के लिए मनुष्य को बेकार कर देती है। कोई व्यक्ति एक सप्ताह तक रातभर जागकर काम करता रहे, विश्राम न करे तो उसका जो प्रभाव स्वास्थ्य पर होगा उससे वह महीने डेढ़-महीने के लिए बेकार हो जायेगा। उस एक सप्ताह में काम भी उतना ठीक नहीं होगा जितना कि शक्ति-संतुलन को ध्यान में रखते हुए सात दिन में भी किया जा सकता था। हमें इस बात का पूरा ध्यान रखना चाहिए कि कहीं थक कर या आधे मन से तो कोई काम नहीं हो रहा है।
इस संतुलन को बनाये रखने के लिए यह आवश्यक है कि किसी भी कार्य में जरूरत के अनुसार ही शक्ति लगायी जाय। कितने ही व्यक्ति एक काम में दस गुना अधिक शक्ति लगाते हैं। कलम को तलवार की तरह पकड़ कर जोर देते हुए लिखने की कई छात्रों की आदत होती है। कलम पर पूरे हाथ का दबाव डालते हुए वे ऐसे लगते हैं जैसे हल चला रहे हों। जिस चीज को पकड़ने के लिए हाथ का थोड़ा सा कसाव ही काफी है, उसके लिए घोड़ों की लगाम समझकर पकड़ने वाले बहुत हैं। कितने ही व्यक्ति शक्ति से अधिक बोझ उठाते और असमय ही वृद्धावस्था या रुग्णता को निमंत्रण देते देखे जाते हैं। इस सम्बन्ध में वाल्मीकि रामायण के अरण्य काण्ड 50/89 में उपदिष्ट करते हुए कहा गया है-”स भारः सौम्य भर्तव्यो यो नरः नावसाद्येत्।” अर्थात्-हे सौम्य! मनुष्य को उतना ही बोझ उठाना चाहिए जो उसे शिथिल न कर दे ।
उत्तेजना और आवेश भी शारीरिक पुष्टि और मानसिक शक्तियों को आग की तरह जला डालते हैं। क्रोध और चिड़चिड़ेपन के छोटे-छोटे दौर, मन में किसी के प्रति ईर्ष्या-द्वेष, पिछली भूलों पर दीर्घकाल तक व्यर्थ पश्चाताप आदि कई मनोवेगों में मानवी शक्तियाँ बुरी तरह नष्ट होती रहती है। इन छिद्रों से अपनी शक्ति-सामर्थ्य बहा चुके व्यक्ति टूटे-फूटे मन और बल से कोई भी कार्य भली भाँति नहीं कर सकते। उत्साह-हीन और पस्त-हिम्मत न तो अपने मार्ग की बाधाओं को समझ पाते हैं और न ही उन्हें दूर करने का प्रयत्न कर सकते हैं।
हृदय की पवित्रता शक्ति का सबसे बड़ा स्रोत है। शक्ति आती ही हृदय से है, शरीर या बुद्धि से नहीं। इस तथ्य को सदा स्मरण रखा जाना चाहिए कि कोई दूसरा शक्ति नहीं देता, वरन् अपना अन्तराल ही इसका मूल है। स्वामी विवेकानन्द के शब्द में-’अपने भीतर ही वह शक्ति मौजूद है। यदि व्यक्ति कार्य करने में निरत हो जाय तो फिर देखेगा कि इतनी शक्ति आयेगी कि वह उसे संभाल न सकेगा दूसरों के लिए रत्तीभर काम करने से भीतर की शक्ति जाग्रत हो उठती है। दूसरों के लिए सोचने में धीरे-धीरे हृदय में सिंह के समान बल आता है इस शक्ति के समुचित सदुपयोग से कठिन से कठिन एवं बड़े से बड़े कार्य भी सरलतापूर्वक सम्पन्न हो जाते हैं।
सारे विश्व को अपना घर, मनुष्य मात्र को अपना स्वजन, नेकी को अपना धर्म, और ऊँचा बनकर रहने में अपना गौरव समझो।
कर्म का फल अनिवार्य है। यह सारी विश्व व्यवस्था कर्मफल की सुनिश्चितता के आधार पर खड़ी है। ईश्वर न्यायकारी कहा जाता है। अदालत का यही कर्तव्य है कि वह अपराधी को दंड दे और जिसकी क्षति हुई है उसकी पूर्ति कराये, ईश्वर भी यही करता। यदि वह पूजा-प्रार्थना करने वालों को बिना दंड के छोड़ दिया करे तो उसे न्यायशील कैसे कहा जायेगा? खुशामद करने वालों को छूट, न करने वालों को कैद-यह तो विशुद्ध पक्षपात हुआ। भाई भतीजावाद, यार दोस्तों का विशेष लाभ ऐसा अँधेर तो ओछे अधिकारी करते हैं। यदि ईश्वर भी वैसा ही करने लगे तो फिर न्याय का अस्तित्व ही क्या रह जायेगा। फिर कर्मफल का सिद्धान्त ही कहाँ रहा?
पापों को क्षमा कराने और कर्मफल के दंड से बच निकलने की तरकीबें ढूंढ़ने के हेर फेर में न पड़कर औचित्य, ईमानदारी और बहादुरी का रास्ता यही है कि प्रायश्चित के लिए तैयार हों, अगले जन्मों तक घोर कष्ट सहन और नरक की आग में बुरी तरह जलने की अपेक्षा-साहसपूर्वक प्रायश्चित करके स्वयं ही आगे बढ़ा जाय और स्वेच्छापूर्वक दंड भोगकर उस कर्मफल से इसी जन्म में निवृत्ति प्राप्त कर लें। ऐसी हिम्मत और ईमानदारी से अपना अन्तःकरण निर्मल होता है। चित्त पर चढ़ा हुआ भार हलका होता है। समाज में भी इस ईमानदारी की प्रशंसा होती है और खोया हुआ विश्वास तथा सम्मान करता है और दंड की कठोरता को हलकी कर देता है। न्यायालय में कोई अपराधी स्वयं उपस्थित होकर स्वेच्छापूर्वक अपनी गलतियाँ स्वीकार करे और क्षति पूर्ति करने एवं दंड पाने की सहमति प्रकट करे तो निश्चित ही न्यायाधीश उसकी बदली हुई भावना की कद्र करेगा और हलका दंड देकर उसका फैसला कर देगा। प्रायश्चित इसी प्रक्रिया का नाम है।
धर्म शास्त्रों ने पग-पग पर हर व्यक्ति को यह परामर्श दिया है कि वह अपने पाप कर्मों का फल प्राप्त करने के लिए साहस प्रदर्शित करे और भगवान से समाज के सामने अपने बदले हुए अन्तःकरण की वास्तविकता प्रमाणित करके अपना भविष्य अन्धकार में से निकाल कर उज्ज्वल बना लें। इस संदर्भ में शास्त्रों का पन्ना-पन्ना प्रमाणों से भरा पड़ा है:-
यावंतो जंतवः स्वर्गे तावंतो नरकौकसः। पपकृघाति नरकं प्रायश्चित्तपराड़्मुख॥
गुरुणि गुरुभिश्चैव लघूनि लघुभ्स्तिया। प्रायश्चित्तानि ह्यन्येच मनुः स्वायम्भुवोऽव्रवीत्। -शिवपुराण
जो मनुष्य अपने किये हुए दुष्कर्मों का कोई भी प्रायश्चित शास्त्रानुसार नहीं किया करते हैं वे ही पापात्मा प्राणी नरक में जाया करते हैं। स्वायम्भुव मनु ने तथा अन्य महर्षियों ने भी बड़े पापों के बड़े प्रायश्चित और छोटे-छोटे पाप कर्मों के छोटे प्रायश्चित बतलाये हैं।
पश्चातापः पापकृताँ निष्कृतिःपरा। सर्वेषाँ वर्णितं सद्भिः सर्वपापविशोधनम्॥
पश्चात्तापेनैव शुद्धिः प्रायश्चितं करोति सः। यथोपदिष्टं सदृभर्हि सर्वपापविशोधनम्॥
प्रायश्चितमधीकृत्य विधिवन्निर्भयः पुमान्। स याति सुगतिं प्रायः पश्चातापी न संशयः॥
-शिवपुराण
पश्चाताप ही पापों की परम निष्कृति है। विद्वज्जनों ने पश्चाताप से सब प्रकार के पापों की शुद्धि होना कथन किया है। पश्चाताप करने से जिसके पापों का शोधन न हो, उस प्रायश्चित करना चाहिए । विद्वानों ने इससे सब पापों का शोधन होना कहा है। विधिपूर्वक अनेक प्रकार के प्रायश्चित करने पर भी मनुष्य भय रहित नहीं हो पाता, परन्तु पश्चाताप करने वाले को सुगति की प्राप्ति होती है।
विकर्मणा तप्यमानः पापाद् विपरिमुच्यते। न तत् कुर्या पुनरिति द्वितीयात् परिमुच्यते॥
कर्मणायेन तेनेह पापाद् द्विजवरोत्तम्। एवं श्रुतिरियं ब्रह्मन् धर्मेषु प्रतिदृश्यते॥ -महाभारत वन पर्व
जो मनुष्य पापकर्म बन जाने पर सच्चे हृदय से पश्चाताप करता है, वह उस पाप से छूट जाता है, तथा ‘फिर कभी ऐसा कर्म नहीं करूंगा ‘ ऐसा दृढ़ निश्चय कर लेने पर वह भविष्य में होने वाले दूसरे पाप से भी बच जाता है।
विप्रवर ! शास्त्र विहित (जप, तप, यज्ञ, दान आदि ) किसी भी कर्म का निष्काम भाव से आचरण करने पर पाप से छुटकारा मिल सकता है। ब्रह्मन्! धर्म के विषय में ऐसी श्रुति देखी जाती है।
शातातपस्मृति में प्रायश्चित की आवश्यकता एवं अनिवार्यता का प्रतिपादन इस प्रकार किया है
प्रायश्चित विहीनानाँ महापातकिनाँ नृणाम। नरकान्ते भवेज्जन्म चिन्हाकिंतशरीरिणाम्। प्रति जन्म भवेत्तेषाँ कृते याति पश्चात्तापवताँ पुनः॥
महापातकजं चिन्हं सप्तजन्मनि जायते। उपपापोदृभवं पंच त्रीणि पापसमुद्भवम्॥
दुर्ष्कमजा नृणाँ रोगा यान्ति चोपक्रमैःशमम्। जपैः सुरार्चनेर्होमैर्दानैस्तेषाँ शमोभवेत्॥ पू
र्व जन्मकृतं पापं नरकस्य परिक्षये। बाधते व्याधिरुपेण तस्य जप्यादिभिः शमः॥
कुष्ठंच राजयक्ष्मा च प्रमेहो ग्रहणा तथा। मूत्रकृच्छ्राश्मरीकासा अतीसार भगन्दरौ॥
दुष्टब्रणंगण्डमाला पक्षाघातोऽक्षिनाशम् इत्येवमादयो रोगा महापापोदूभवाः स्मृताः॥
किये हुये पापों के प्रायश्चित न करने वाले, चिन्ह विशेष से अंकित शरीर वाले, महान पातक करने वाले मनुष्यों का जन्म नरकान्त में होता है। महान पातक का सूचक वह चिन्ह उनको प्रत्येक जन्म में रहता है। किये हुए पाप का पश्चाताप करने वालों का प्रायश्चित कर लेने पर वह चला जाता है। महापातक के कारण होने वाला चिन्ह सात जन्म तक रहता है। उस पाप से होने वाला पाँच जन्म तक तथा साधारण पाप से समुत्पन्न चिन्ह तीन जन्म तक रहता है। मनुष्यों के दुष्कर्म से होने वाले रोग उपक्रमों के द्वारा शान्त होते हैं। ऐसे उन रोगों की शान्ति जप, देवार्चन, होम और दानों के द्वारा होती है। पूर्व जन्म में किया हुआ पाप नरक के परिक्षय हो जाने पर मनुष्यों को किसी व्याधि के रूप में उत्पन्न होकर सताता है और उसका उपशमन जपादि द्वारा होता है। कुष्ठ, राजयक्ष्मा, प्रमेह, संग्रहणी मून्नकृच्छ, पथरी, कास अतिसार, भगन्दर, दुष्ट व्रण गण्डमाला, पक्षाघात और नेत्रहीनता इत्यादि रोग महापातक के कारण ही उत्पन्न होते हैं। इसी का समर्थन शातातपवस्मृति में अन्यत्र भी किया गया है और कहा गया है कि कुष्ठ, राजयक्ष्मा, पक्षाघात, अन्धता जैसे भयंकर रोग महापातकों के फलस्वरूप होते हैं, पर प्रायश्चित विधान कर लेने पर वे काफी कुछ घट-मिट जाते हैं।
जलोदरं यकृत प्लीहा शूलरोगव्रणानि च। सजीर्णज्वरच्छर्द्दिभ्रममोहगलग्रहासः। रक्तार्वुद विसर्पाधा उपपापोदृभवा गदाः॥
दण्डापतानकश्चित्रवपुः कम्पविचर्चिकाः। वल्मीकपवुण्डरीकाद्या रोगाः पापसमुद्भवाः ॥
अर्शआद्या नृणाँ रोगा अतिपापाद्भवन्ति हि। अन्ये च बहवो रोगा जायन्ते वर्णसंकराः॥
उच्यन्ते च निदानानि प्रायश्चितानि वै क्रमात्। -शातातपवस्मृति 1 से 10
प्रतिग्रह को भी पातकों की श्रेणी में गिना गया है। प्रतिग्रह का अर्थ है- मुफ्त का माल । जिसका बदला न चुकाया गया हो, ऐसे समस्त अनुदान प्रतिग्रह हैं। बाप-दादों के उत्तराधिकार से मिला धन-जुआ, सट्टा, लाटरी हरामखोरी, का उपार्जन इसी श्रेणी का है। चोरी , रिश्वत, मुनाफाखोरी, कर चोरी, बेईमानी आदि से कमाया हुआ भी प्रतिग्रह है। ईमानदारी, औचित्य और परिश्रम का समुचित समावेश करने पर जो कुछ मिलता है पुण्य बनकर वही फलता-फूलता है अन्यथा मुफ्त का पाप बनकर सिर पर छाया रहता है और व्यक्तित्व के परिष्कार एवं आत्मोत्कर्ष के मार्ग में भारी अवरोध उत्पन्न करता है। साधु ब्राह्मणों को मिलने वाली दान-दक्षिणा तभी उचित है जब वे लोग उसका प्रतिपादन लोकसेवा के रूप में-उपलब्धि की तुलना में अत्यधिक करते रहें । अन्यथा भजन करने के बहाने दान-दक्षिणा बटोरते रहना-मुफ्त में खाते रहना-पाप बनकर रहेगा और उस स्थिति में की गई साधना निष्फल चली जीयेगी। साथ ही अन्तरात्मा भी पाप भार से लदता, बोझिल होता चला जाएगा।
साधु-ब्राह्मणों में से किसी ने यदि मुफ्त का धन(प्रतिग्रह) लिया हो, बदले में समुचित सेवाश्रम न किया तो उसका भी प्रायश्चित किया जाना चाहिए।
प्रति ग्रहेण विप्राणाँ ब्रह्मतेजः प्रणस्यति। अत’ प्रतिग्रहे कृत्वा प्रायश्चिते समाचरेत्॥ -अरुण स्मृति
प्रतिग्रह लेने वाले का ब्रह्मतेज नष्ट हो जाता है। ऐसा ग्रहण करने वाले को प्रायश्चित करना चाहिए।
सद्वृत्तात्कारणाद् विप्राः प्रायश्चित भयात् खग। प्रतिग्रहे कृते चैव प्रायश्चितं समाचरेत्॥ -अरुण स्मृति
सद्वृत्तियों के उपार्जन में लगा हुआ व्यक्ति भी इस भय से प्रतिग्रह न ले कि उसका प्रायश्चित करना पड़ेगा। यदि कभी ले ही लिया गया हो तो उसका प्रायश्चित करना चाहिए।
यह बात मात्र ब्राह्मण, साधु के दान-दक्षिणा लेने तक सीमित नहीं है, वरन् उन सब पर लागू होती है जो बिना परिश्रम का धन ग्रहण करते हैं। न्यायपूर्वक समुचित परिश्रम के साथ कमाये हुए धन के अतिरिक्त अन्य सभी उपार्जनों को प्रतिग्रह माना गया है, भले ही वे उत्तराधिकार रूप में ही प्राप्त क्यों न हुए हों उन्हें उनका जितना सम्भव हो उतना लोकहित के लिए वापस लौटाने से अपनी सदाशयता का परिचय देना चाहिए। यही बात दूसरों से मिले स्नेह सहयोग आदि के सम्बन्ध में भी है। यह धन भले ही न हो पर अनुदान तो है ही। हर अनुदान ऋण रूप में मिलता है और सृष्टि क्रम के अनुसार उसे वापस लौटाने का स्मरण रखा जाना चाहिए। यह स्मृति उपकारी के प्रति मन में सघन कृतज्ञता भरे रहने के रूप में तो होनी चाहिए। प्रतिदान चुकाने की बात सोचते रहना भी आवश्यक है। शास्त्रकारों ने भी इसी का निर्देश किया है-
ग्रहीता हि गृहीतस्य दानाद्वै तपसा तथा। पापसंशोधनं कुर्यादन्यथा रौरवं ब्रजेत॥
जो धन अनीति पूर्वक लिया है उसे दान द्वारा लौटा देना चाहिए और तपश्चर्या द्वारा उस कुकर्म का प्रायश्चित करना चाहिए। ऐसा न करने पर वह संचित पाप रौरव नरक में धकेलता है।
प्रायश्चित की आवश्यकता पर बल देते हुए तत्वदर्शियों ने कहा है-
अकृत्वा विहित कर्म्म कृत्वा निन्दितमेव च। दोषमाप्नोतिः पुरुषः प्रायश्चितं विशोधनम् ॥
प्रायश्चित्तमकृत्वा तु न तिष्ठेद् ब्राह्मणः क्वचित्। यद्बयुर्ब्राह्मणाः शान्ताः विद्वाँसस्तत्समाचरेत्। -कूर्मपुराण
निन्दित हेय कुकर्म करने मनुष्य को पाप लगता है। उसका शोधन प्रायश्चित द्वारा करना चाहिए।
आसम्बत्सरं प्रायश्चित्ताकरणे पापद्वैगुण्यम्। (प्रायाश्चित्तेन्दु. शे.)
इनके अनुसार एक वर्ष तक पाप का प्रायश्चित्त न किया जाय तो पाप दुगुना हो जाता है। अतः पाप का प्रायश्चित यथा समय करना चाहिए।
तपसा कर्मणा चैव प्रदानेन भारत पुनाति पापं पुरुषं पुनश्चेत्र प्रवर्तते। -महाभारत शान्तिपर्व
भरतनन्दन ! मनुष्य तप से, यज्ञ आदि सत्कर्मों से, तथा दान के द्वारा पाप को धो बहाकर अपने आपको पवित्र कर लेता है।
पतकी च तदर्थेन शुध्यते वृत्तवान्यदि। उपपातकिनः सर्वे तदर्थेनैव सुव्रता॥ -लिंग पुराण
पातकी पुरुष उसकी आधी प्रायश्चित की विधि से भी शुद्ध हो जाता है अगर वह पुरुष चरित्रवान होता है। हे सुव्रतो! जो उपपातक करने वाले हैं वे उसके भी आधे प्रायश्चित से शुद्ध हो जाया करते हैं।
श्रम के द्वारा प्रायश्चित करना हर किसी के लिए सम्भव है। सत्प्रवृत्ति संवर्धन में लगाया हुआ समय इस आवश्यकता की पूर्ति करता है। साथ ही धन के रूप में भी जो लौटाया जा सकना सम्भव है उसके लिए पूरी ईमानदारी से प्रयत्न करना चाहिए।
इस दृष्टि से धर्म-प्रचार के लिए की गई पदयात्रा, तीर्थयात्रा का उद्देश्य रहा है। उसे महत्व
भी इसलिए मिला और माहात्म्य भी इसी आधार पर बताया गया। आज की स्थिति में सर्वत्र सद्भावनाओं का ही दुर्भिक्ष पड़ा हुआ है। उसी अभाव के कारण सम्पदा और शिक्षा, कुशलता एवं अन्यान्य क्षमताएँ भी सुख-शान्ति बढ़ाने के स्थान पर विपत्ति बढ़ा रही हैं। सद्भाव विस्तार के लिए जनमानस का परिष्कार आवश्यक है। यह कार्य धर्म-प्रचार के लिए नियोजित की जाने वाली तीर्थयात्रा, पदयात्रा के लिए निकलने वाली टोलियाँ मण्डलियाँ जितनी अच्छी तरह कर सकती हैं उतना और किसी प्रकार सम्भव नहीं। प्रायश्चित के ऋण विमोचन चरण को पूरा करने के लिए अन्यान्य सत्प्रवृत्ति संवर्धन प्रयत्नों के साथ-साथ तीर्थयात्रा पर निकलने की बात भी ध्यान में रखी जानी चाहिए।
मानव शरीर की वैद्युतीय क्षमता का पर्यावरण के विद्युतीय दबाव से घनिष्ठ अन्तः सम्बन्ध है। बाहरी अयन मण्डल में जब भी कोई गंभीर उथल-पुथल होती है, उसका प्रत्यक्ष प्रभाव काया की सामान्य जैव वैद्युतीय शक्ति पर पड़ता है और सामान्य क्रियाशीलता गड़बड़ा जाती है। उस उथल-पुथल को सन्तुलित करने के लिए शरीर में कई तरह की मानसिक एवं शारीरिक हलचलें उठ खड़ी होती हैं, जिनके अच्छे और बुरे दोनों ही प्रकार के परिणाम देखे जाते हैं। ऐसे ही कुछ प्रतिकूल अन्तर्ग्रही प्रभावों में ग्रहण , सौर लपटों एवं सूर्य धब्बों, पुच्छल तारों आदि की गणना होती है। इनका सर्वाधिक प्रभाव जीव-जन्तुओं पर पड़ता है साथ ही इन हलचलों की पूर्वानुभूती भी प्राणियों को पहले होती है। प्राकृतिक जीवन जीने वाले सामान्य से ये प्राणी अतीन्द्रिय क्षमता में मनुष्य से भी बढ़-चढ़ कर दृष्टिगोचर होते और स्रष्टा की न्याय-व्यवस्था को प्रमाणित करते हैं।
मनुष्य अपनी बौद्धिक प्रखरता के बल पर सूर्यग्रहण जैसे प्राकृतिक रहस्यों की जानकारी प्राप्त करने में वर्षों पूर्व भले ही समर्थ हो गया हो, किन्तु उसके प्रभावों को समझने में अभी तक असमर्थ रहा है। वन्य-प्राणियों, पशु-पक्षियों में वह क्षमता विद्यमान है जिससे वे न केवल सूर्य ग्रहण की जानकारी चौबीस घण्टे पूर्व ही प्राप्त कर लेते हैं, वरन् उसके दुष्प्रभाव से बचने के लिए शोरगुल बन्द करके सुरक्षित स्थानों पर चले जाते हैं। सबसे चंचल कहा जाने वाला बंदर सूर्य ग्रहण के पूर्व ही खाना-पीना त्याग कर एकान्तप्रिय संन्यासी की भूमिका अदा करने लगता है। इसी प्रकार भूकम्प आने से पहले ही जीव-जन्तुओं के व्यवहार में भारी परिवर्तन देखे गये हैं। जापान में पायी जाने वाली ‘चीवी’ नामक पक्षी भूकम्प आने के चौबीस घण्टे पूर्व ही अपना स्थान त्याग कर दूरस्थ उड़ जाती है। चीन के अनुसंधानकर्ता प्राणिविज्ञानियों ने इस संबंध में बताया है कि अनेकों भूकम्पों के पूर्व यह देखा गया है कि वहाँ के पालतू पशु अपने बंधन तोड़कर घरों के बाहर हो जाते हैं। कुत्ते-बिल्ली-चूहे आदि जीवों के व्यवहार असामान्य रूप से परिवर्तित हो जाते हैं और पारस्परिक वैमनस्य भूलकर वे साथ-साथ एकाँतप्रियता का प्रदर्शन करने लगते हैं।
बर्फ गिरने, आँधी-तूफान आने या भारी वर्षा होने की शत-प्रतिशत जानकारी उन्नत वैज्ञानिक उपकरणों के माध्यम से मनुष्य अभी तक प्राप्त नहीं कर पाया है। जबकि ऊँची पहाड़ियों पर बसने वाले पक्षी बर्फ पड़ने के ठीक एक माह पूर्व ही पहाड़ियाँ त्याग कर सुरक्षित स्थानों में चले जाते हैं। पर्यवेक्षकों ने अनेकों प्रयोगों के बाद पाया है कि आकस्मिक रूप से पड़ने वाली बर्फ के भी ठीक एक माह पहले पक्षी वह स्थान खाली कर दूर-दराज देशों में चले जाते हैं।
इसी तरह तिब्बत और दार्जलिंग में पायी जाने वाली पहाड़ी सारस वर्षा के दस’-पन्द्रह मिनट पर्व ही पर्वतों की गुफाओं अथवा चट्टानों की आड़ में चली जाती है जिसे देखकर तिब्बत के लोग अपना माल-असबाब बाँध कर वर्षा से बचने का प्रबन्ध करने लगते हैं। कभी-कभी तो यहाँ तक देखा गया है कि आकाश में एक भी बादल नहीं है और पानी बरसने के कोई आसार न होते हुए भी जब यह पक्षी छिपने लगे, तो उसके कुछ ही समय बाद संघटित हुए और वर्षा होने लगी।
मछलियों की भविष्य ज्ञान सम्बन्धी अतीन्द्रिय क्षमता विलक्षण होती है। जीव विज्ञानी मछलियों के इस भविष्य ज्ञान से हैरत में पड़ गये हैं कि यह समुद्र तट पर ठीक तभी अण्डे देती है, जब समुद्री लहरें उतर जाती हैं और दुबारा उठने की संभावना नहीं रहती। यदि मछलियों के इस भविष्यज्ञान में एक मिनट का भी अन्तर पड़ जाय तो उनके सारे अण्डे गहरे समुद्र में जाकर नष्ट हो जायँ। वैज्ञानिकों ने यह शोध-निष्कर्ष मछलियों को झील, तालाब और प्रयोगशालाओं में, एक्चेरियम में रखकर बनावटी प्रकाश अंधकार और कृत्रिम चन्द्रमा का आकर्षण देकर प्राप्त किये । किन्तु प्रकृति प्रेमी इन मछलियों को रंचमात्र भी भ्रम में न डाला जा सका । इन सभी स्थानों पर रखी गयी मछलियों ने ठीक उसी समय अण्डे दिये जब सागर में रहने वाली मछलियों ने दिये अर्थात् लहरों के उतरते ही मछलियों ने अपने भविष्य ज्ञान के आधार पर उक्त क्रिया की। इनकी इस विधा की जानकारी में लाखों-करोड़ों वर्षों आज तक रंच मात्र का अन्तर नहीं। आया अन्यथा इन जातियों का नामोनिशान कभी का समाप्त हो गया होता।
इस संदर्भ में मूर्धन्य जीवविज्ञानी डॉ विलशूल ने गंभीरतापूर्वक अध्ययन किया है और अपनी कृति “द साइकिक पॉवर आफ एनीमल्स” में मानवेत्तर प्राणियों अर्थात्-पशु-पक्षियों की विलक्षण अतीन्द्रिय क्षमताओं का वर्णन किया है। उनका कहना है कि स्रष्टा ने क्षुद्र समझे जाने वाले प्राणियों को उन शक्ति-सामर्थ्यों से युक्त बनाया है जिन्हें प्राप्त करने के लिए मनुष्य को वर्षों कष्ट साध्य साधनायें करनी पड़ती हैं। इतने पर भी वह प्रकृति संकेतों की बारीकियों को पूर्णतया समझ पाने में समर्थ नहीं हो पाता।
रक्ताल्पता की स्थिति में शरीर के अवयवों को समुचित पोषण नहीं मिलता इसलिए वे दुर्बल, निस्तेज, निष्क्रिय एवं बेढंगे हो जाते हैं। समुचित शारीरिक श्रम करने की क्षमता नहीं रहती। किसी प्रकार शरीर गाड़ी भार घसीटता रहता है। इसी प्रकार आहार में समुचित पोषक तत्व न होने की स्थिति में भी कुपोषण अपना दुष्परिणाम प्रदर्शित करता है। हाथ पैर टेढ़े हो जाते हैं। पेट बढ़ जाता है। पतले दस्त लग जाते हैं। जुकाम बना रहता है।
बीमारियों के लक्षण तो सर्वविदित हैं, पर रक्ताल्पता और कुपोषण जैसी व्यथाएँ ऐसी हैं जो न तो अपना वास्तविक कारण विदित होने देती हैं और न उपचार का ही कोई सुयोग बनता है। ऐसे लोग जिस तिस प्रकार मौत के दिन पूरे करते हैं। दूसरों की सहायता कर सकना तो दूर अपने आप का स्वावलम्बनपूर्वक निर्वाह नहीं कर पाते ।
इसी प्रकार का एक मानसिक रोग है- अवसाद। इसे उदासी भी कहते हैं। आवश्यक नहीं कि इसका प्रत्यक्षतः कोई बड़ा कारण हो। छोटी मोटी प्रतिकूलताएँ, कठिनाइयाँ, समस्याएँ तो हर किसी को सताती रहती हैं। इच्छित परिस्थितियां तो इस सृष्टि के कर्ता में विकृतियाँ उपद्रव मचाती दीखती रहती हैं। भगवान का प्रतिद्वन्द्वी शैतान है। संसार में निरन्तर चलने वाले अभाव, विग्रहों और अन्यायों की व्यथा विष्णु लोक तक अपनी पुकार पहुँचाती है तो नारद को पता लगाने और समाधान सुझाने के लिए नीचे से ऊपर, ऊपर से नीचे आना जाना पड़ता है। फिर सामान्य मनुष्यों का तो कहना ही क्या? उनमें से कदाचित् ही कोई ऐसा हो जो अपने को सर्वसुखी कह सके। जिसका कोई प्रतिद्वन्द्वी न हो। जिसे कोई व्यथा बेचैनी सताती न हो। ऐसी दशा में हर किसी जीवन संतुलन बनाये रहने वाले को धैर्य, साहस एवं पराक्रम से काम लेना पड़ता है। इन गुणों का मनुष्य के मानसिक धरातल को सुव्यवस्थित रखने वाला मानना चाहिए।
जिनमें इन गुणों की कमी होती है, उन्हें छुट-पुट बातें ही पहाड़ के समान भारी पड़ती हैं। वे तिल का ताड़ और राई का पर्वत बनाते हैं। समझते हैं कि आसमान हमारे ही ऊपर टूट कर गिरने वाला है। ऐसी स्थिति में रहने वाले प्रायः भयभीत रहते हैं। शंका शंकित बने रहते हैं। अविश्वास और आशंकाएँ घेरे रहती हैं। उन्हें अक्सर बेचैनी एवं उद्विग्नता का शिकार पाया जाता है। रक्तचाप, हृदय की धड़कन अनियमित अव्यवस्थित गति से चलने लगती है ऐसे व्यक्ति आत्मरक्षा की दृष्टि से ऐसे कृत्य कर बैठते हैं जिनकी तनिक भी आवश्यकता नहीं होती। भय ही उनसे अकरणीय कराता और हर घड़ी अधीरता के चंगुल में फँसाये रहता है।
यह बढ़ी हुई व्यथा की बात है। मानसिक संतुलन जब मध्यम स्थिति में रहता है तो मनुष्य उदास रहने लगता है। अपने को सब ओर से उपेक्षित समझता है। न हम किसी के , न कोई हमारा स्तर की नीरसता छाई रहती है। उत्साह किसी काम तथा व्यक्ति के प्रति नहीं रहता। सभी विराने और भारभूत प्रतीत होते हैं। काम करने को जी नहीं चाहता। यदि विवशता से कुछ किया भी जाय तो वह आधा अधूरा-लँगड़ा-लूला-काना कुबड़ा , बेढंगा, बेतरतीब होता है। न उससे अपने को संतोष होता है और न सम्बन्धित किसी और को। इस प्रकार बेगार भुगतने के रूप में किये गये काम से न अपने को संतोष होता है और न कराने वाले किसी और को।
ऐसे व्यक्ति अपने को निरर्थक मानते हैं और सोचते हैं धरती से उठ जाये तो अच्छा है। जब यह अवसाद गहरा हो जाता है तो कभी- कभी आत्महत्या तक कर बैठते हैं। जिनमें साहस नहीं होता वे उतना बड़ा कदम तो नहीं उठा पाते, पर चर्चा प्रसंग कहते अक्सर रहते हैं कि इस जीवन से मरण अच्छा पर्यवेक्षकों के अनुसार इस समय ‘डिप्रेशन’ रोग ग्रसित लोगों की संख्या असाधारण और आश्चर्यजनक है। अमेरिका जैसे साधन सम्पन्न देश में इस प्रकार के रोगियों की संख्या प्रायः डेढ़ करोड़ है। इन में तीस हजार के करीब लोग तो सचमुच आत्महत्या कर बैठते हैं। इस मनःस्थिति का शरीर पर बुरा प्रभाव पड़ता है। फलतः उनके दलदल जैसे मस्तिष्क में से रोगों के कीटाणु बनते और फैलते हैं। फलतः कोई न कोई छोटे बड़े शारीरिक रोग भी उन्हें घेर लेते हैं। यों चिकित्सा करने पर वे आसानी से अच्छे हो सकते थे, पर उस साधारण सी व्यथा को ही मृत्युदूत मानकर दिन’-दिन अपने आप में गलते और घिसते जाते हैं। यह अस्तव्यस्तता मस्तिष्क और शरीर को इस योग्य बना देती है कि वह अपंग जैसी स्थिति में पहुँच जाते हैं। ऐसी विचित्र हरकतें भी कभी-कभी करने लगते हैं जैसे कि भूत-प्रेतों के आवेशग्रस्त लोग करते हैं। मित्रों की सहानुभूति तथा सान्त्वना भी उनके काम नहीं आती।
ऐसे व्यक्ति का उपचार यह है कि उन्हें नई बदली हुई परिस्थितियों में रखा जाय। रचनात्मक विचारों की शक्ति से अवगत कराया जाय। अकेले न रहने दिया जाय और उज्ज्वल भविष्य की संभावनाओं का स्वप्न दिखाया जाय। इसमें बच्चों को बहलाने जैसी अत्युक्ति भी बरती जाय तो बरतनी चाहिए। ऐसी मनोदशा वाले व्यक्ति को किसी न किसी काम में लगाये रखा जाय। दूसरों को उनसे बात करने और सफलताएँ जिनने प्राप्त की हैं, उनके उदाहरणों का ऐसा चित्र खींचा जाय कि मनोबल के सहारे प्रतिकूल परिस्थितियों को भी कैसे अनुकूल बनाया जा सकता है।
सबसे अच्छा यह है कि रोगी स्वयं ही यह अनुभव करे कि निषेधात्मक चिन्तन के कारण मैं स्वयं ही विपत्ति में फँसता जा रहा हूँ। उससे उबरना और निकलना पूरी तरह मेरे बस की बात है।
कुछ रोग या कष्ट ऐसे होते हैं जिन्हें औषधि उपचार पर दूसरों के सहयोग से अच्छा किया जा सकता है। किन्तु कुछ ऐसे होते हैं जो अपने ही बुलाये होते हैं और उसे स्वयं ही सुधारा जा सकता है।
उदासी अपनी निज की भूल है अन्यथा संसार में उत्साहवर्धक बहुत हैं। सहयोगियों की भी कमी नहीं। प्रकृति की सुन्दरता और मनुष्य की कलात्मक संरचना में जिधर भी दृष्टि डाली जाय उधर ही उल्लास भरा वातावरण हो सकता है। उन की ओर नजर उठाकर देखा जाय और गंभीरता से चिन्तन किया जाय तो प्रतीत होगा कि उदासी का काल्पनिक लबादा अकारण ओढ़ रखा गया है। उसे आसानी से उतारा जा सकता है। जब वास्तविक कठिनाइयों से घिरे हुए व्यक्ति हँसते-हँसते उनका सामना कर सकते हैं तो कोई कारण नहीं कि जिनने निरर्थक का काल्पनिक जाल जंजाल बुन रखा है वे उसे मकड़ी के ताने की तरह तोड़कर न फेंक सकें॥ उदासी ऐसी व्यथा नहीं है जिससे मनुष्य स्वयं पीछा न छुड़ा सकें।
उदासी और प्रसन्नता के बीच की एक अस्त व्यस्त मनःस्थिति और भी है उसे अर्ध विक्षिप्तता कह सकते हैं। वह भी ऐसी है जो अपने ही चिन्तन के साथ जुड़ी हुई है। यदि मनोबल में एक करारा झटका लगा दिया जाय तो इस अर्धमृत अवस्था में ले पहुँचने वाली उदासी से सहज छुटकारा पाया जा सकता है।
विनोबा की माता के पास पड़ोसिन अपना लड़का छोड़कर कुछ दिन के लिए तीर्थ यात्रा गई थी। बिनोवा और पड़ोसी का लड़का समान स्नेह और सद्भाव के साथ एक ही घर में रहने लगे।
माता के व्यवहार में बिनोवा ने कुछ अन्तर पाया। पड़ोसी के लड़के को वे घी से चुपड़कर रोटी देती थीं और बिनोवा को रूखी। इस भेदी भाव का कारण एक दिन माता से वे पूछ ही बैठे।
माता ने स्नेह भरे शब्दों में कहा बेटा तू तो मेरा बच्चा है। पर दूसरा तो भगवान कहते हैं न? भगवान के और अपने बच्चे में कुछ तो अन्तर होना ही चाहिए।
माता की विशाल हृदयता पर विनोबा गदगद हो गये। इसके बाद फिर उन्होंने कभी वैसी शिकायत नहीं की।
ईश्वरोपासना-आराधना के लिए किसी मुहूर्त विशेष की प्रतीक्षा नहीं की जाती। सारा समय भगवान का है, सभी दिन पवित्र हैं। शुभ कर्म करने के लिए हर घड़ी शुभ मुहूर्त है, इतने पर भी प्रकृति जगत में कुछ विशिष्ट अवसर ऐसे आते हैं कि कालचक्र की उस प्रतिक्रिया से मनुष्य सहज ही लाभ उठा सकता है। उन दिनों किये गये साधनात्मक प्रयास संकल्प बल के सहारे शीघ्र ही गति पाते व साधक का वर्चस् बढ़ाते चले जाते हैं। ऐसे अवसरों पर बिना किसी अतिरिक्त पुरुषार्थ के अधिक लाभान्वित होने का अवसर मिल जाता है। उस काल विशेष में किया गया संकल्प, अनुष्ठान, जप, तप, योगाभ्यास आदि साधक को सफलता के अभीष्ट द्वार तक घसीट ले जाता है। कालचक्र के सूक्ष्म ज्ञाता ऋषियों ने प्रकृति के अन्तराल में चल रहे विशिष्ट उभारों को दृष्टिगत रखकर ही ऋतुओं के इस मिलन काल की संधिवेला को “नवरात्रियों” की संज्ञा दी है। नवरात्रि पर्वों का साधना विज्ञान में विशेष महत्व है।
इस प्रकार रात्रि और दिन का मिलन प्रातः कालीन और सायंकालीन ‘संध्या’ के नाम से प्रख्यात है और पूजा-उपासना के लिये महत्वपूर्ण माना गया है। शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष के परिवर्तन के दो दिन पूर्णिमा एवं अमावस्या के नाम से जाने जाते हैं तथा अधिकाँश महत्वपूर्ण पर्व जैसे दीपावली, होली, गुरुपूर्णिमा, श्रावणी, शरदपूर्णिमा आदि प्रधान पर्व इसी संधिवेला में मनाये जाते हैं। इसी प्रकार ऋतुओं का भी संधिकाल होता है। शीत और ग्रीष्म ऋतुओं के मिलन का यह संधिकाल वर्ष में दो बार आया करता है। चैत्र में मौसम ठण्डक से बदलकर गर्मी का रूप ले लेता है और आश्विन में गर्मी से ठण्डक का। आयुर्वेद के ज्ञाता शरीर शोधन-विरेचन एवं कायाकल्प जैसे विभिन्न प्रयोगों के लिए संधिकाल की इसी अवधि की प्रतीक्षा करते हैं। शरीर और मन के विकारों का निष्कासन-परिशोधन भी इस अवसर पर आसानी से हो सकता है। जिस प्रकार बीज बोने की एक विशेष अवधि होती है और चतुर किसान उन दिनों सतर्कतापूर्वक अपने खेतों में बीज बो देते हैं, उसी प्रकार इन नवरात्रियों में भी कुछ तपश्चर्या की जा सके तो उसके अधिक फलवती होने की संभावना रहती है। स्त्रियों को महीने में जिस प्रकार ऋतुकाल आता है, उसी प्रकार नवरात्रियाँ भी प्रकृति जगत में ऋतुओं का ऋतुकाल हैं। जो नौ-नौ दिन के होते हैं। उस समय उष्णता और शीत दोनों ही साम्यावस्था में होते हैं। पृथ्वी की गति मंद पड़ जाती है। इन दिनों यदि आध्यात्मिक बीजारोपण किये जाएँ तो उनके फलित होने की संभावना निश्चय ही अधिक रहेगी।
नवरात्रियों को देवत्व के धरती पर उतरने का, जागृतात्माओं में दैवी प्रेरणा फूँकने वाला समय माना गया है। इन नौ दिन विशेषों में प्रकृति का सूक्ष्म अन्तराल व मानवीकाया का सूक्ष्म कलेवर एक विशिष्ट परिवर्तन प्रक्रिया से गुजरता है। शरीर में ज्वार-भाटे जैसी हलचलें उत्पन्न होतीं हैं और जीवनी शक्ति पूरी प्रबलता से देह में जमी विषाक्तताओं एवं मानसिक विकृतियों को हटाने के लिए तूफानी संघर्ष करती हैं। मनुष्य की उमंगे भी इन दिनों अविज्ञात उभार के दौर के रूप में विशेषतः सक्रिय पायी जाती है। वातावरण कुछ इस प्रकार का बनता है कि आत्मिक प्रगति के लिए अन्तः प्रेरणा सहज ही उठने लगती है। इन दिनों सूक्ष्मजगत से दैवी प्रेरणायें अनुदान रूप में बरसती हैं और सुसंस्कारों आत्मायें अपने भीतर समुद्र मंथन जैसी हलचलें उभरते देखती हैं। इन उमंगों का सुनियोजन कर सकने वाली देव प्रकृति की साधना परायण आत्मायें अदृश्य प्रेरणाशक्ति से बरबस प्रेरित होकर आत्मकल्याण व लोक-मंगल के क्रियाकलापों में नियोजित होती और बहुमूल्य रत्न-राशि उपलब्ध कर कृतकृत्य बनता है। संधिकाल के इन अवसरों पर न केवल मानवी चेतना को प्रभावित करने वाली, वरन् अनुकूलन उत्पन्न करने वाली परिस्थितियाँ भी अनायास ही बन जाती हैं। मनुष्य का चिन्तन ही नहीं, कर्म भी ऐसी दिशा विशेष में तनिक से प्रयास-पुरुषार्थ से बढ़ने लगता है जिसकी किसी को कभी संभावना नहीं होती। जो इस अवसर के पहचानते हैं वे कभी चूकते नहीं। आत्मिक प्रगति की व्यवस्था बनाते और साधना-पुरुषार्थ के लिए कटिबद्ध होते हैं।
मध्यकाल में तंत्र प्रयोजनों की मान्यता अत्यधिक थी। अधिकाँश कर्मकाण्डों का, मंत्र सफल बनाने की साधनाओं के तंत्रवेत्ता इन नवरात्रियों में ही सम्पन्न करते थे। वाममार्गी साधक अभी भी अभीष्ट इच्छापूर्ति हेतु इस अवसर की ही प्रतीक्षा करते हैं। सतोगुणी साधनाओं को अपनाने वाले दक्षिणमार्गी साधक आत्मिक प्रगति हेतु इसे एक विशिष्ट अनुदान रूप में मानकर अपनी तथा साधना का सुयोग बिठाते हैं। मानवी चेतना के परिमार्जन-परिशोध हेतु योग साधना एवं तपश्चर्या की जाती है और इसके लिए संधिका की नवरात्रिबेला से श्रेष्ठ और कोई समय नहीं।
नवरात्रि-पर्व वर्ष में दो बार आता है। आश्विन सदी प्रतिपदा से लेकर नवमी तक और चैत्र सुदी प्रतिपदा से लेकर नवमी तक 9-9 दिन की दो नवरात्रियाँ होती हैं। आश्विन में दशमी को विजयादशमी पड़ती है, जबकि चैत्र नवमी को रामनवमी का पर्व आता है। एक तीसरी नवरात्रि ज्येष्ठ सुदी प्रतिपदा से नवमी तक भी होती है। दशमी को गंगा जयन्ती अथवा गायत्री जयन्ती होने के कारण यह नौ दिन का पर्व भी मानने योग्य है। पर यदि उसकी व्यवस्था न बन पड़े तो 6-6 महीने के अन्तर से आने वाली आश्विन और चैत्र मास की दो नवरात्रियाँ तो तपश्चर्या के लिए नियत रखनी ही चाहिए। तिथियाँ प्रायः घटती-बढ़ती रहती हैं। साधना उस झंझट में नहीं पड़ती। इस वर्ष आश्विन नवरात्रि 27 सितम्बर से 5 अक्टूबर 92 की तारीखों में है।
वैदिक साहित्य में नवरात्रियों का सुविस्तृत वर्णन है। ऋषियों ने उसकी व्याख्या विवेचना करते हुए कहा कि इसका शाब्दिक अर्थ तो नौ रातें हैं, पर इनका गूढ़ार्थ कुछ और ही है नवरात्रि का तात्पर्य यह है कि मानवी काया रूपी अयोध्या में नौ द्वार अर्थात् नौ इन्द्रियाँ हैं। अज्ञानतावश दुरुपयोग के कारण उनमें जो अन्धकार छा गया है उसे अनुष्ठान करते हुए एक-एक रात्रि में एक-एक इन्द्रिय के ऊपर विचारना, उनमें संयम साधना तथा सन्निहित क्षमताओं को उभारना ही वस्तुतः नवरात्रि की साधना कहलाती है। रात्रि का अर्थ ही है-अन्धकार । जो मनुष्य इन नौ द्वारों से-नौ इन्द्रियों के विषयों से जागरुक रहता है, वह उनमें लिप्त नहीं होता और न ही उनका दुरुपयोग करके अपने ओजस्-तेजस् और वर्चस् को गँवाता है। अज्ञानान्धकार से प्रकाश में लाने का नाम ही नवरात्रि जागरण है। अनुष्ठान भी इसी अन्धकार को-अज्ञानता को नष्ट करने के लिये किया जाता है। अनुष्ठान शब्द की परिभाषा यदि दी जाय तो वह इस प्रकार होगी-”अतिरिक्त आध्यात्मिक सामर्थ्य उत्पन्न करने के लिये संकल्पपूर्वक नियत संयम-प्रतिबंधों एवं तपश्चर्याओं के साथ विशिष्ट उपासना।” इन नवरात्रियों में सर्वसाधारण से लेकर योगी, यती, तपस्वी सभी अपने-अपने स्तर की संयम साधना एवं संकल्पित अनुष्ठान करते हैं। इस अवधि की प्रत्येक अहोरात्रि महत्वपूर्ण मानी जाती है और उन प्रत्येक क्षणों को साधक अपनी चेतना को परिष्कृत-परिशोधित करने-उत्कर्ष की दिशा में आगे बढ़ने में लगता है।
नवरात्रि साधना की विशिष्टता यह है कि यह संकल्पित साधना है। इसमें उपासना क्रम का निर्धारण कुछ ऐसा है जिसका पालन कर सकना सभी के लिए सुलभ है। इस अवधि में 24 हजार का लघु गायत्री अनुष्ठान भी सम्पन्न हो जाता है। इसमें वाममार्गी साधनाओं जैसे मंत्रोपचार के किन्हीं भी पेचीदे विधि-विधानों का झंझट भी नहीं रहता। पुरश्चरण कड़े होते हैं और उन्हीं के लिए उपयुक्त पड़ते हैं जो पूरा समय-पूरा मनोयोग उसी कार्य में नियोजित रखे रह सकते हों व कड़ी तपश्चर्या का पालन कर सकते हों। इसी तरह वाममार्गी ताँत्रिक विधान-प्रयोग भी कठिन है। यह विधान प्रयोग मनुष्य में तमोगुणी तत्वों को बढ़ा सकते हैं। इसीलिए ऋषियों ने श्रेय पंथ के पथिकों को 24 सहस्र जप की संकल्पित गायत्री साधना ही नवरात्रि के लिए सर्वश्रेष्ठ बतायी है। गायत्री परम सतोगुणी-शरीर और आत्मा में दिव्य तत्वों का-आध्यात्मिक विशेषताओं का अभिवर्धन करने वाली महाशक्ति है। यही आत्मकल्याण का मार्ग है। गायत्री साधकों को यही साधना इन दिनों करनी चाहिए।
यों तो नवरात्रि को नवदुर्गा की उपासना से भी जोड़कर रखा गया है। सर्वत्र दुर्गा की-महाकाली की पूजा होती है। दुर्गा कहते हैं-दोष दुर्गुणों’-कषाय-कल्मषों को नष्ट करने वाली महाशक्ति को। नौ रूपों में माँ दुर्गा की उपासना इसीलिए की जाती है कि वह हमारे इन्द्रिय चेतना में समाहित दुर्गुणों को नष्ट करती है। मनुष्य की पापमयी वृत्तियाँ ही महिषासुर हैं। नवरात्रियों में उन्हीं प्रवृत्तियों पर मानसिक संकल्प द्वारा अंकुश लगाया और संयम द्वारा दमन किया जाता है। संयमशील आत्मा को ही दुर्गा, महाकाली, गायत्री कहा गया है। प्राणचेतना के परिष्कृत होने पर यही शक्ति महिषासुर-मर्दिनी बन जाती है।
गायत्री को आद्यशक्ति कहा गया है। दुर्गा, महाकाली, महालक्ष्मी आदि उसी महाशक्ति के विविध रूप हैं। अतः नवरात्रि में गायत्री अनुष्ठान की महत्ता सर्वोपरि है। सामान्य दैनिक उपासनात्मक नित्यकर्म से लेकर विशिष्ट प्रयोजनों के लिए की जाने वाली तपश्चर्याओं तक में गायत्री को समान रूप से महत्व मिला है। इसी कारण 24 सहस्र की संकल्पित साधना को नवरात्रि में विशिष्ट महत्ता प्राप्त है। इसमें प्रतिदिन 27 माला जप करने से नौ दिनों में पूरी हो जाती है। अनुष्ठान काल में नियत जप संख्या तो पूरी करनी पड़ती है साथ ही कुछ विशेष तपश्चर्यायें भी इन दिनों करनी पड़ती हैं। ब्रह्मचर्य व्रत-पालन, भोजन में उपवास तत्व का समावेश, तपस्वी जैसी मनःस्थिति जिसमें अपनी शरीर सेवा दूसरों से कम से कम करायी जाय, भूशयन, कम वस्त्र, नशे का, चमड़े का परित्याग जैसी तितिक्षायें और अन्त में अनुष्ठान की पूर्णाहुति ये-अनुष्ठान की सामान्य मर्यादायें हैं। इस प्रकार नवरात्रियों में अनुष्ठानों की विशेष तपश्चर्या की व्यवस्था बनाना पड़ती है। इससे शरीर और मनमें भरे विकारों का परिशोधन करने में बड़ी सहायता मिलती है, कारण कि यह पर्व आत्मचेतना के परिष्कार-परिमार्जन का पर्व जो ठहरा।
अंतःकरण में उच्चस्तरीय तत्वों के बीज अवश्य हैं, पर हैं वे इतनी प्रसुप्त स्थिति में कि उनका प्रयोग सर्वसाधारण के लिए नहीं हो सकता उसे समाज संपर्क एवं नैतिक वातावरण के माध्यम से जगाना पड़ता है। यदि इसे प्रशिक्षण, जागरण का अवसर न मिले तो पूर्व जन्मों की पशु-प्रवृत्तियाँ ही काम करती रहती हैं और व्यक्तित्व हेय स्तर का ही बना रहता है।
अंतःकरण का उच्चस्तर जीवन्त हैं, इसका इतना ही प्रमाण मिलता है कि सभी अपने लिए न्याय चाहते हैं। सज्जनता बरते जाने की अपेक्षा करते हैं, बुराई से उसी सीमा तक घृणा करते हैं जिससे वह अपने ऊपर आक्रमण न करें। चोर भी अपने यहाँ चोर नौकर नहीं रखना चाहता। व्याभिचारी भी अपनी पत्नी को पतिव्रता देखना चाहता है। भगवान के दरबार में उसे दुख-दण्ड न भुगतना पड़े, उसका अनुग्रह अनुदान सहज ही मिलता रहे। मित्रों की मित्रता हर कसौटी पर खरी उतरे। जहाँ तक अपनेपन संबंध वहाँ तक सभी भले हैं, पर जब दूसरों के साथ व्यवहार करने का प्रसंग आता है तो स्थिति उलट जाती है। तब लोगों पर स्वार्थ सवार होता है और वह मनोभूमि नहीं रहती जो दूसरों से अपने लिए चाही गई थी। दूसरों के साथ ठगी, चोरी, बेईमानी आदि दुष्कृत्य करने और आक्रमण का शिकार बनाने में संकोच नहीं होता।
यह संकीर्णता की स्थिति है जिसमें दूसरों को अपना शिकार समझा जाता है। उसकी पीड़ा या कठिनाई को इस दृष्टि से नहीं देखा जाता कि वैसी ही विपत्ति अपने ऊपर टूटे तो कितनी कष्टकर हो। दूसरों की पीड़ा एक विनोद मालूम पड़ती है। कई बार तो दूसरों को छटपटाने की स्थिति में देखकर एक ऐसा मनोविनोद भी होता है जिसे नृशंस स्तर का कहा जा सकता है।
मेढ़ा, तीतर, मुर्गे, बटेर, हाथी आदि की लड़ाई देखने में कितनों को ही बड़ा मजा आता है और ऐसे आयोजनों को देखने के लिए ठट्ट के ठट्ट जा पहुँचते हैं। उन निरीह प्राणियों को उत्तेजित करने के लिए किस प्रकार आहत कराया जा रहा है, यह करुणा भरा दृश्य होता है, पर हृदयहीन आँखें उसमें भी मजा लूटती हैं। रोम का बादशाह नीरो नगर में आग लगवा देता था और उसके कारण होने वाली जान-माल की हानि से अपना विनोद करता था। चौराहों पर जब फाँसी लगा करती थी या सरेआम कैदियों के शत्रु सैनिकों के सर काटने का प्रचलन था तब भी लोग उस नृशंस कृत्य को देखने के लिए हज्जूम बाँधकर पहुँचते थे।
माँसाहारियों का समुदाय भी धीरे-धीरे अपनी मानवोचित दया भावना खो बैठता है। अपने शरीर में सुई चुभ जाये तो प्राण निकलते हैं, पर दूसरों की गर्दन इसलिये काटी और चमड़ी उधेड़ी जाती है कि वे बदला लेने की स्थिति में नहीं होते। सिंह-व्याघ्र आदि जो बदला ले सकते हैं, उन्हें माँस खाने के लिए मारने की कोई योजना नहीं बनाता। सबकी निगाह उन्हीं प्राणियों पर जाती है जो आसानी से हाथ आ जाते और काटते मारते समय-बधिक-के लिए कोई संकट खड़ा नहीं करते।
कभी’-कभी तो इस क्रूर कृत्य में धर्म भावना भी जोड़ ली जाती है। देवी-देवताओं को प्रसन्न करने के लिए पशुबलि चढ़ाना पुण्य माना जाता है और सोचा जाता है कि इस उपहार के बदले देवता से माँगी हुई मनौती पूरी होगी।
यह निर्दयता मात्र अन्य जीवधारियों तक ही सीमित नहीं रहतीं। जब मनुष्य स्वार्थ की चरमसीमा तक पहुँचता है और नृशंसता में अपने अहंकार की पूर्ति देखता है तो क्रूर कर्मों की झड़ी लगा देता है। तब उसे स्वजातियों और प्रियजनों का मोह नहीं रहता। मध्यकाल के सत्ताधारी मरने से पूर्व ऐसा प्रबंध करते थे कि उनके दफन होने के साथ ही उनके दास दासी स्त्री-बच्चे भी जीवित दफन कर दिए जायँ जिससे वे परलोक में उनकी उपस्थिति का लाभ उठाते रहे। किसने कितनों का वध किया इसकी चर्चा पिछले दिनों बड़े उत्साह के साथ हुआ करती थी।
पशुबलि में माँसाहार का लाभ और देवी देवताओं का अनुग्रह तथा बधिक के दुस्साहस, बल आतंक आदि में वृद्धि होती थी। इसलिये छोटी-छोटी बातों को लेकर युद्ध भी छिड़ जाते थे। सैनिक इसकी ताक में रहते थे कि उन्हें वेतन के अतिरिक्त लूटमार में से भी अच्छी कमाई हो जाती थी। भले घरों के युवक युवती उन्हें पकड़कर दास बनाते और पशुओं की तरह काम लेते थे। इनकार तो वह किसी से नहीं कर सकते थे। सिर हिलाते ही निर्दय उत्पीड़न चल पड़ता था और वह तब तक जारी रहता था जब तक कि उसके प्राण न निकल जायें। यह एक प्रकार का मान्यता प्राप्त प्रचलन था। राजदण्ड में कैदी बन्द करने की अपेक्षा उनके सिर उतार लेना ही सस्ता पड़ता था। कैदियों के लिए भोजन वस्त्र तथा चौकीदारी का प्रबंध करना पड़ता था जबकि उसको छोटे अवरोध के बदले मार डालने की सजा देकर सदा के लिए पीछा छुड़ा लिया जाता। माँत्रिक-ताँत्रिक बलि देकर देवताओं को बलि देकर देवताओं को प्रसन्न करने और उनसे मनौती माँगने पर पूरी होने की आशा करते थे।
उन दिनों धर्म रुचि, समाज के पंच अधिकारी, सामन्त, राजा एक कदम आगे बढ़कर नरबलि को महत्व देने लगे थे। सोचा जाने लगा था कि पशु से मनुष्य का मूल्य और महत्व अधिक है इसलिये उसकी बलि चढ़ाने पर लाभ भी अधिक मिलेगा। नरबलि का यह प्रचलन किसी जमाने में इतना अधिक रहा है कि दक्षिण अमेरिका के आदिवासी क्षेत्रों में पेड़ों के नीचे तथा कुएँ खड्डों में विशाल संख्या में नर मुण्ड पाये गए हैं।
यह क्रूरता के विदित और अविदित अनेक तरीके हैं जिससे प्रतीत होता है कि मानवीय अन्तःकरण की उत्कृष्टता उसके अपने लिए प्रयुक्त किए जाने की कामना तक ही सीमित है। जब दूसरों के संबंध में बात आती है तो वह हिंसक पशुओं की भूमिका निभाने लगता है। जंगल का कानून बरतता और ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’ पर विश्वास करता है।
सन् 1519 में ऐटेक साम्राज्य काल में देवी-देवताओं को प्रसन्न रखने हेतु नरबलि का प्रचलन था। कैलीफोर्निया यूनिवर्सिटी के जनसाँख्यिकी विभाग के प्रवक्ता डॉ. ‘शेरबर्न कुक’ द्वारा किए गए अनुसंधानों से जो निष्कर्ष सामने आयें हैं उनके अनुसार मैक्सिको के ऐटेक मन्दिर में प्रतिवर्ष एक प्रतिशत जनसंख्या को नरबलि का शिकार बनना पड़ता था। ऐटेक के राजा के बारे में यह भी कहा जाता है कि वह इतना क्रूर था कि स्वजातिओं का माँस खाने की भी उसकी आदत थी। इसी तरह की परम्परायें उसके सैनिकों ने भी अपनायी हुई थीं।
भूतकालीन तथ्यों को देखते हुए हमें यह मानकर चलना होगा कि मनुष्य में सुसंस्कारिता जगाने की जिम्मेदारी समाज की है, अन्यथा बालक जैसे भी वातावरण में पलेंगे, जिन लोगों के बीच रहेंगे, उन्हीं की रीति-नीति अपनालेंगे चाहे वे कितने भी घिनौने क्यों न हों। यह मान्यता एक सीमा में ही, चित है कि मनुष्य की अन्तरात्मा स्वभावतः पवित्र है। यदि ऐसा भी हो तो भी सामाजिक कर्तव्य है कि शालीनता, सज्जनता , दयालुता, नीतिमत्ता बढ़ाने-सँजोने के लिए योजनाबद्ध प्रयत्न किए जायें अन्यथा लोकप्रचलन में पड़कर अधिकाँश लोग निष्ठुर, उद्दण्ड और अपराधी प्रवृत्ति अपनाते चले जायेंगे।
आत्मबोध होने के बाद गौतम बुद्ध ने परिव्रज्या आरंभ की। विश्राम का नाम भी नहीं। सतत् चलते रहना व लोगों को जीवनमुक्ति का पाठ पढ़ाना । शिष्य आनन्द उनसे बोला-”प्रभु! टाप इतना चले, न थके-न उकताए।” बुद्ध बोले। “थके वह जो चले मैं चलता ही नहीं तो थकूँ क्यों।” आनन्द का कथन था “मैंने तो नित्य आपको अपनी इन आँखों से चलते देखा है, मैं भी आपके ही साथ चला हूँ।”
बुद्ध बोले-”मैं तुम्हारी आँखों पर भरोसा करूं या अपनी आँखों पर। भीतर देखता हूँ तो पाता हूँ वहाँ कोई चलता ही नहीं। तुम मुझे बाहर से ही देख पाते हो। बाहर जो चलता है, यह तो शरीर है। आत्मा की छाया मात्र है। जो नहीं चलता, वह मेरी आत्मा है। छाया के चलने से भी कोई थकता है?”
धर्म के विकास का इतिहास मनुष्य की चेतना के साथ कदम से कदम मिला कर चलता आया है। भय और लोभ की व्यक्तिवादी आकाँक्षाओं से आगे बढ़कर मनुष्य अधिक समाज पर निर्भर होते चलने की स्थिति में यह समझने के लिए बाध्य हुआ कि समूहगत हलचलें मनुष्य को अत्यधिक प्रभावित करती हैं। सर्वविदित है कि विज्ञान ने केवल मानव मात्र की आवश्यकताओं की आपूर्ति में महत्वपूर्ण एवं उपयोगी भूमिका निभाई है, वरन् उसने मनुष्य के आचार-विचार, संस्कार, धारणा और चिन्तन पद्धति को भी प्रभावित परिवर्तित करके छोड़ा है। विज्ञान के क्षेत्र में अध्ययन और अनुसंधानों की महत्ता-उपयोगिता इस कदर बढ़ी है कि उसके आगे धर्म दर्शन , साहित्य संगीत, कला आदि के विषय महत्वहीन होते चले गये हैं। कभी जो गरिमा धर्म और अध्यात्म को प्राप्त थी आज विज्ञान ने वह स्थान ग्रहण कर लिया है। तर्क, तथ्य, प्रमाण आदि के अभाव में धर्म की बात को अब संदिग्ध और संदेहास्पद ढंग से देखा जाता है और प्रतिपादन भी उसी के अनुरूप किये जाने लगे हैं।
“ऐन ऐनालिटिकल फिलॉसफी आफ रिलीजन” के लेखक विलियम जुरडीग ने धर्म के विकृत एवं विस्मयकारक स्वरूप को देखते हुए कहा है कि आज के युग में धर्मानुसरण करना साँस्कृतिक पिछड़ेपन का प्रतीक माना जाने लगा है। कार्लमार्क्स और सिगमंड फ्राइड के दर्शन के कारण धर्म को अवज्ञा और अपमानजनक स्थिति का सामना करना पड़ा है। इनकी दृष्टि में धर्म का मनुष्य के जीवन में वही स्थान हैं जो सर्प के जीवन में केंचुए का। जिस प्रकार एक सीमा तक पहुँचने के बाद सर्प केंचुए को खाना बंद कर देता है, ठीक उसी प्रकार मनुष्य भी बौद्धिक विकास की चरम सीमा पर पहुँच कर धर्म को तिलाँजलि दे बैठता है। लेकिन अब इस तरह के धर्म विरोधी प्रतिपादन महत्वहीन होते जा रहे हैं। लोगों की धर्मपरायण प्रवृत्तियां दिन प्रति दिन बढ़ती जा रही हैं।
“ऐप्रोचेज टु दि फिलॉसफी आफ रिलीजन” नामक पुस्तक में बोन्सटीन ने जिन की गणना आशावादी एवं आस्थावान दार्शनिकों में की जाती है, कहा है कि वर्तमान में धर्म के प्रति अनास्थावादी दृष्टिकोण की उत्पत्ति अस्थाई है और धर्म का पुनरुत्थान निकट भविष्य में होना सुनिश्चित है। उनका विश्वास है कि ईश्वर स्वयं मानव शरीर धारण करके अधर्म का नाश और धर्म का पुनरुत्थान करेगा। गीता की ‘यदा-यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत मान्यता से वे पूर्णतः सहमत हैं। व्राँन्स्टीन ने इस तथ्य की पुष्टि परिगणनात्मक ढंग से की है और पाश्चात्य जगत की निराश एवं अनास्थावादी जनता के अन्तरंग में यह विश्वास जगाया है कि धार्मिक प्रवृत्तियों के विकास की जीवन में नितान्त आवश्यकता है जिनके अभाव से नीरस और निष्क्रिय बनता चला जाता है।
न्यूयार्क के प्रो. ल्यूवा ने ‘गॉड एण्ड मैन’ नामक अपनी पुस्तक में विज्ञान को एक साधन भर बताया है, जबकि धर्म मानव जीवन का साध्य है और उसी के धारण करने से जीवन सब प्रकार सुखी-समुन्नत बनता है। उनने फ्राइड की धर्म विषयक मान्यताओं का खण्डन करते हुए बताया है कि धर्म भ्रम में डालने वाला अथवा मनोरोग नहीं वरन् मनुष्य के जीवन को श्रेष्ठता की दिशा में मोड़ने वाली एक अलौकिक एवं अद्भुत शक्ति है। उनने धार्मिक समस्याओं और परिस्थितियों को समझने के लिए मनोवैज्ञानिक एवं समाज शास्त्रीय तत्वों का जानना भी जरूरी बताया है। जिसके आधार पर यह पता लग सकता है कि मानव जीवन में धर्म आरोपित है अथवा संस्कारगत। वस्तुतः धर्म कोई आरोपण अथवा ऊपर से थोपने जैसी चीज नहीं, अपितु व्यक्ति के अन्तःकरण से उत्पन्न होने वाली एक सद्प्रेरणा है जो उसे सन्मार्ग पर चलने के लिए सदैव अभिप्रेरित करती रहती है। मानव स्वभाव जिज्ञासु, मेधावी और समझदार होने के कारण प्रकृति या संसार के संबंध में एक दृष्टिकोण विनिर्मित करने की आवश्यकता सदैव अनुभव करता आया है, ताकि यह विश्व को सुविकसित और सुनियोजित करने वाली शक्ति का सदुपयोग करके सत्प्रयोजनों में नियोजित कर सके। एक सामाजिक प्राणी होने के नाते वह एक नैतिक-विधान और आचार-संहिता की आवश्यकता अनुभव करता है। धर्म-धारणा से उक्त दोनों उद्देश्यों की आपूर्ति बिना किसी कठिनाई के पूरी होती रहती है।
प्रख्यात मनोवेत्ता-युँग ने धर्म-धारणा को उदात्त और सहानुभूतिपूर्ण बताया है और मनुष्य के लिए कल्याणकारी भी। उनके अनुसार फ्राइड ने धर्म के बारे में जो परिकल्पना की है वह इम्पीरियोजैनिक की अपेक्षा मेथोजैनिक अधिक है यानी आत्मिकी के अनुभव का आधार न होकर मात्र बौद्धिक विश्लेषण भर ही कही जायगी।
जर्मनी के मैक्समूलर ने भी फ्रायड की धर्म विषयक मान्यताओं का खण्डन करते हुए बताया है कि धर्म तो विकास को हमेशा से परिपुष्ट करता आया है। उनके मतानुसार प्रगति मार्ग पर अग्रसर होने को विकास कहते हैं। धर्म सदा से प्रगतिशील जीवन जीने की रीति-नीति पर जोर देता चला आया है। उसने विकास की कई मंजिलें पार करली हैं, मानव जीवन की प्रगति के इतिहास में धर्म का स्थान सर्वोपरि रहा है। मनुष्य का सही इतिहास तो धर्म का इतिहास ही है। इसलिए धर्म को विकास हीन जड़ तत्व मान बैठना ना समझी ही कही जायेगी। मनुष्य की धर्म विषयक मान्यताएँ लगभग एक जैसी ही रही हैं और भविष्य में भी रहेंगी। प्रारंभिक काल में जादू-टोने पर विश्वास करने वाले ‘फेटिसिज्म’ अर्थात्-भाग्यवाद लेकर बहुदेववाद और एकेश्वरवाद तक के धार्मिक इतिहास पर दृष्टिपात करने से ज्ञात होता है कि धर्म विषयक धारणाएँ सदैव बदलती रही हैं। लोक मानस के अनुरूप धर्म के विकास का यह उपयुक्त समय है जिसमें हर वर्ग के लोगों को अपने देवी-देवता को पृथक् रूप से पूजने का अधिकार प्राप्त है। इस तरह की धार्मिक परम्परा को पाश्चात्य जगत में ‘होनोथेइज्म’ के नाम से जाना जाता है।
पाश्चात्य दार्शनिक हवाइटहेड ने अपनी पुस्तक “साइंस एण्ड द मॉडर्न वर्ल्ड” में लिखा है कि जब तक धर्म अपनी प्राचीनकाल की खोई गरिमा को पुनः प्राप्त नहीं कर लेता है तब तक उसको सार्वभौमिक स्तर प्राप्त नहीं हो सकता। सुप्रसिद्ध कवि टैनीसम ने भी अपनी रचना में यही प्रतिपादित किया है कि नैतिक एवं धार्मिक मूल्यों का अवमूल्यन करना नहीं, वरन् उन्हें सुविकसित करने का ही होना चाहिए।
जब महाभारत का अन्तिम श्लोक महर्षि वेदव्यास के मुखारविन्द से निःसृत हुआ, और गणेशजी के सुडौल, सुपाठ्य, अक्षरों में भुर्जपत्र पर अंकित हो चुका, तब गणेशजी से महर्षि ने कहा-”विघ्नेश्वर, धन्य है आपकी लेखनी! महाभारत का सृजन तो वस्तुतः उसी ने किया है, पर एक वस्तु आपकी लेखनी से भी अधिक विस्मयकारी है-वह है आपका मौन। सुदीर्घ काल तक आपका हमारा साथ रहा। इस अवधि में मैंने तो पन्द्रह-बीस लाख शब्द बोल डाले, परन्तु आपके मुख से मैंने एक भी शब्द नहीं सुना।”
इस पर गणेशजी ने मौन की व्याख्या करते हुए कहा-”बादरायण किसी दीपक में अधिक तेल होता है, किसी में कम, परन्तु तेल का अक्षय भण्डार किसी दीपक में नहीं होता। उसी प्रकार देव, मानव-दानव आदि जितने भी तनधारी है, सबकी प्राण-शक्ति सीमित है- किसी की कम है, किसी की कुछ अधिक परन्तु असीम किसी की नहीं। इस प्राण शक्ति का पूर्णतः लाभ वही पा सकता है जो संयम से उसका उपयोग करता है। संयम ही समस्त सिद्धियों का आधार है, और संयम का प्रथम सोपान है-वचोगुप्ति अर्थात्-वाक्-संयम। जो वाणी संयम नहीं रखता, उसकी जिह्वा बोलती रहती है। बहुत बोलने वाली जिह्वा अनावश्यक बोलती रहती है, और अनावश्यक शब्द प्रायः विग्रह और वैमनस्य पैदा करते हैं, जो हमारी प्राण-शक्ति को सोख डालते हैं। वचोगुप्ति से यह समस्त अनर्थ परम्परा दग्धबीज हो जाती है। इसलिये मैं मौन का उपासक हूँ।
सिद्धान्त चाहे किसी भी क्षेत्र का हो, यदि उसे भली भाँति नहीं समझा गया तो उसे मानने का लाख साक्ष्य देने पर भी आचरण उससे विपरीत ही बना रहता है। पुनर्जन्म-सिद्धान्त के साथ भी ऐसा ही हुआ। उसकी वैज्ञानिकता को न समझने वालों ने जहाँ इस जीवन के भौतिक सुविधा-साधनों को ही पूरी तरह विगत जीवन का पुण्यफल मान लिया, वहीं इस पुण्य कर्म का अर्थ पूजा-पत्री के कर्मकाण्ड तक ही सीमित माना जाने लगा। परिणाम यह हुआ कि न तो व्यक्ति की आदर्श परायणता के प्रति कोई वास्तविक सम्मान बचा न ही पुरुषार्थ को प्रगति का आधार समझा गया। इसके स्थान पर भौतिक सुख-सुविधाएँ अपने पुरुषार्थ की तुलना में कहीं अधिक जुटा पाना या अनायास मिल जाना ही चारिऋयक सौभाग्य अथवा श्रेष्ठता का प्रमाण माना जाने लगा और इस श्रेष्ठता को उपलब्ध करने का आसान तरीका टंट-घंट औंधे-सीधे कृत्यों को समझा जाने लगा।
इसे विडम्बना ही कहनी चाहिए कि पुनर्जन्म का जो सिद्धान्त पुरुषार्थ और कर्म की महत्ता का प्रतिपादक था, जटिल से जटिल परिस्थिति को भी प्रारब्ध भोग मानकर धैर्यपूर्वक सहने और आगे उत्कर्ष हेतु पूर्ण निष्ठा और विश्वास के साथ प्रयासरत रहने की प्रेरणा देता था, वही निष्क्रियता और अंधनियतिवाद का भ्राँत मतवाद बन कर रह गया है।
“मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप है” इस तथ्य को भुलाकर यह मनमर्जी करते हैं। इस संदर्भ में वे प्रायः यह तर्क प्रस्तुत करते हैं कि यदि उक्त कथन में सच्चाई नहीं होती तो वर्तमान में कितने ही सत्पुरुष असह्य दुःख भोगते नहीं देखे जाते, जबकि दूसरी ओर ऐसे उदाहरणों की भी कमी नहीं;
दुष्ट-दुराचारी मौज-मस्ती मनाते व सुख भोगते देखे जाते हैं। निस्संदेह ऐसे प्रतिमान देखे जा सकते हैं, पर इस संबंध में भगवान को दोषी ठहराने और अनैतिक कहने वालों के बारे में यही कहा जा सकता है कि उनने सारा निर्णय वर्तमान के आधार पर ही कर लिया, उनके पिछले जन्म पर विचार करने की कोशिश न की गई। यदि ऐसा होता, तो भगवान की नीतिमत्ता स्पष्ट उजागर हो जाती।
इन दिनों किसी भी व्यक्ति की अन्य कोई विशेषता न देखकर मात्र उसकी आर्थिक समृद्धि के आधार पर भाग्यवान और पुण्यात्मा मान लिया जाता है, अथवा आर्थिक विपन्नता देखकर अभागा और पिछले जन्म के पाप का फल भोगने वाला मान बैठा जाता है। इस प्रवृत्ति को पुण्यात्मा मान लिया जाता है, अथवा आर्थिक विपन्नता देखकर अभागा और पिछले जन्म के पाप का फल भोगने वाला मान बैठा जाता है। इस प्रवृत्ति को पुनर्जन्म पर आस्था का द्योतक नहीं, चिन्तन शक्ति एवं विवेक की दरिद्रता और व्यक्तित्व के उथलेपन का परिचायक मानना ही ठीक है। इस बौनेपन के कारण ही भाग्य को बदलने के लिए चमत्कारों का आश्रय खोजने में ही समय, श्रम एवं पुरुषार्थ खपाया जाता है।
पुनर्जन्म की वास्तविकता दार्शनिक मान्यता तो इससे भिन्न ही तथ्य एवं निष्कर्ष प्रस्तुत करती है। सफलताएँ-विफलताएँ व्यक्ति के निजी व्यक्तित्व भर से संबंधित नहीं होतीं। सामाजिक परिस्थितियाँ और समाज की प्रचलित मान्यताएँ भी इसमें निर्णायक भूमिका निभाती हैं। आदर्शवादी समाज में चरित्रवान का सम्मान होता है, तो भ्रष्ट समाज उसे पिछड़ा मूर्ख समझता है। कभी अपने देश में तपस्वी विद्वानों का लोकमानस पर गहरा प्रभाव होता था। आज आर्थिक सम्पन्नता अन्य सभी सामर्थ्यों पर हावी है। पैसे वालों को बुद्धिजीवियों कलाकारों तक का सहयोग सरलता से मिल जाता है। कभी यही कला और विवेक धर्म के लिए समर्पित होता था।
अतः किसी व्यक्ति के पिछले जन्म की प्रवृत्तियों संस्कारों का लेखा-जोखा यदि करना ही हो, तो ऐसा उसकी वर्तमान प्रवृत्तियों के आधार पर किया जाना ही उचित है, न कि सफलता के आधार पर क्योंकि सफलता के बारे में नहीं हो सकता। भगतसिंह और चन्द्रशेखर आजाद को कुछ अन्य उस दिशा में उन्हें विफल निरूपित करेंगे, किन्तु उनका जो भी आदर्श था, उसके प्रति वे निष्ठावान थे, यह सभी मानेंगे। इस प्रकार प्रवृत्तियों के मापदंड सर्वस्वीकृत हैं, जबकि उपलब्धियों के मापदंडों में भिन्नता है। अतः पिछले जन्म के पुण्य पाप को उपलब्धियों से नहीं प्रवृत्तियों से आँका जाना चाहिए।
यह मन, बुद्धि, अंतःकरण की प्रवृत्तियाँ और चेतना स्तर ही है, जो अगले जन्म में भी काम आता है। साधन सामग्रियाँ तो यहीं छूट जाती हैं।
दक्षिणी अफ्रीका में जोहान्सवर्ग शहर स्थित विट्टाटर स्ट्रैण्ड विश्वविद्यालय के प्रोफेसर आर्थर व्लेकस्ले द्वारा पुनर्जन्म च कर्मफल संबंधी शोध के दौरान अनेक विचित्र घटनाएँ प्रकाश में आयी हैं। प्रस्तुत घटना उन्हीं में से एक है।
उक्त शहर के एक दर्जी एडवर्ड माइकेल बार्वे एवं कैरोलिन फ्राँसिस के जोय बार्वे नामक एक संतान हुई। जब यह 13 वर्ष की हुई, तो अपने पूर्व जन्म की स्मृति के कारण कुछ ही समय में बहुचर्चित हो गई। एक बार वह अपने इतिहास प्राध्यापक के साथ जब क्रुगर हाउस नामक भवन देखने गयी, तो उसे देखते ही अचानक वह उस भवन से जुड़े प्राचीन ऐतिहासिक तथ्यों का रहस्योद्घाटन करने लगी, मानों उस समय वह उक्त घटनाओं की प्रत्यक्ष द्रष्टा रही हो। वहाँ से संबंधित उसने पाल नामक एक ऐसे व्यक्ति के बारे में बताया, जिसके संबंध में लोगों को कम ही विदित था। बाद में रिकार्डों को उलटने-पलटने से उसकी समस्त जानकारी सत्य साबित हुई।
उक्त बालिका का कहना था कि उसे अपने पिछले नौ जन्मों की स्मृति है। प्रथम जन्म के बारे में वह अक्सर कहती कि उसे इस संबंध में मात्र इतना ही याद है कि एकबार डायनोसौर नामक भीमकाय जन्तु ने उसका पीछा किया था और किसी प्रकार वह अपनी जान बचाने में सफल रही थी। यह पाषाण कालीन घटना है। दूसरे जन्म में वह एक दासी थी और मालिक द्वारा उसकी हत्या कर दी गई थी। उसका तीसरा जीवन भी दासी का था। चौथे जन्म में वह एक बुनकर के यहाँ रोम में पैदा हुई । उसे पाँचवाँ जीवन एक धर्मभीरु महिला के रूप में मिला। अपने छठे जन्म में वह पुनर्जागरण काल में इटली में पैदा हुई। 17वीं शताब्दी में गुडहोप के अन्तरीप में उसने सातवाँ जीवन धारण किया। उसका आठवाँ जन्म सन् 1883 में ट्रांसवाल गणराज्य में हुआ । वहाँ के राष्ट्रपति पाल के निवास भवन में उसका अक्सर आना जाना था। इसी से वह पाल के बारे में इतने तथ्यों की जानकारी रखती थी। उसका नवाँ जन्म वर्तमान जोय नामक बालिका के रूप में हुआ था।
जोय के समस्त जन्मों को मिला कर एक साथ रखा जाय और अध्ययन किया जाय ता ज्ञात होगा कि इन क्रमिक जन्मों में भी सातत्य का एक महत्वपूर्ण सिद्धान्त काम करता है और पिछले जन्म के अपरिपक्व संस्कार ही आगे के जीवन में और अधिक परिपक्व व प्रखर बनते देखे जाते हैं। यह क्रम जब तक जारी रहता है, जब तक जीव विकास की अपनी चरम अवस्था पर नहीं पहुँच जाता । महर्षि अरविंद की सहयोगिनी श्री माँ कहती थीं कि वह जब फ्राँस में मीरा रिचर्ड के रूप में थी, तो बाल्यावस्था से ही उन्हें दिव्य दर्शन होते थे, जो उनके पिछले जन्म के ही संस्कारों के परिणाम थे। श्री अरविंद के एक प्रमुख शिष्य अनिल वरण राय लिखते हैं कि किशोरावस्था में उन्हें एक बार श्री कृष्ण के विराट् रूप के दर्शन हुए थे। उस समय तक उन्होंने साधना आरंभ नहीं की थी । अतः यह पूर्व जन्म की ही साधना का फल है, यह बात स्वयं उन्होंने स्वीकारी है। आचार्य विनोबा कहा करते थे कि इससे पूर्व के जन्म में एक बंगाली परिवार में बंगाल में पैदा हुए थे। अपने सादा-सात्विक जीवन को वे इसी पिछले जन्म की कमाई मानते थे।
संस्कारों का यह अजस्र प्रवाह ही पुनर्जन्म सिद्धान्त का आधार है। भावसंवेदनाएं, आस्थाएँ, चिन्तन की दिशाएँ ही और स्वभाव ही अगले जन्म में संस्कार रूप में साथ रहते हैं। साधन-सामग्रियाँ नहीं। यही प्रवृत्तियां अपने अनुरूप साधन जुटाने का समर्थ आधार बन जाती हैं। व्यक्तित्व में ये विशेषताएँ न हुई, तो साधन- उपलब्धियों का विशाल भंडार खाली होते देर नहीं लगती।
यह सत्य है कि पुनर्जन्म सिद्धान्त में प्रारब्ध कर्म का अपना विशेष महत्व है। यही कारण है कि कई लोगों में जन्म से ही अनेक विलक्षण प्रतिभाएँ दिखाई पड़ने लगती हैं अथवा वे जीवन में लोक-प्रवाह से सर्वथा अप्रभावित रहते और अपनी प्रखरता से समाज को मोड़ते-मरोड़ते देखे जाते हैं। वस्तुतः यह किये गये अधूरे प्रयास-पुरुषार्थ का सफल, सत्परिणाम ही होता है।
यह जन्म-जन्मांतरों तक चलने वाली कर्मफल की इस व्यवस्था को समझा जा सके, तो पुनर्जन्म सिद्धान्त को समझने में तनिक भी कठिनाई नहीं होगी। इसे समझ कर ही जीवन की दिशाधारा निर्धारित करने और मोड़ने में सफलता मिल सकती है। अपने भीतर की दुर्बलताओं और विकृतियों को अपनी ही भूल के कारण चुभे काँटे समझकर धैर्यपूर्वक निकालने और घाव को भरने का प्रयास करना चाहिए। अपनी सत्प्रवृत्तियों को अमूल्य थाती समझ कर और अधिक विकसित करने की कोशिश करनी चाहिए। इस निमित्त किसी प्रकार के टंट-घंट में न उलझ कर सीधे-सच्चे मार्ग का अनुसरण करना ही विवेकशीलता है। विकास का सही और सुदृढ़ आधार तभी विनिर्मित हो सकता है। यही पुनर्जन्म सिद्धान्त की दार्शनिक पृष्ठभूमि और नैतिक प्रेरणा है।
हर विचारक को कुछ शरीरचर्या के लिए करना चाहिए और कुछ आत्म-कल्याण के लिए । दोनों की व्यवस्था समान रूप से करते रहने पर ही बात बनती है। अकेले शरीर पर उसके सुविधा साधनों पर ही ध्यान रखा जाय तो आत्मा भूखी मरेगी और लोक परलोक दोनों ही बिगड़ेंगे। आत्म-कल्याण की बात को प्रधानता देने पर भी रोटी, कपड़े का प्रबंध तो करना ही होता है। इसलिए समन्वित जीवन जीना ही श्रेयस्कर है। दोनों पक्षों पर समान रूप से ध्यान रखने की आवश्यकता है। प्रत्यक्ष शरीर को समुन्नत सुसंस्कृत, प्रगतिशील बनाया जाय और अन्तःकरण में श्रद्धा, प्रज्ञा, निष्ठा को समुचित स्थान दिया जाय। पुण्य परमार्थ के लिए तत्परता, तन्मयता अपनाने पर दोनों ही जीवन पक्ष सुविकसित स्तर अपनाये रहते हैं।
मनुष्य को दो सम्पदाएँ उपलब्ध हैं- एक समय, दूसरा साधन-धन-वैभव। इन दोनों में से न्यायतः जीवन के दोनों पक्षों के लिए आधा-आधा उपयोग करना चाहिए। पर वातावरण, प्रचलन और आदत से जकड़ा हुआ व्यक्ति प्रायः स्वास्थ्य साधना में ही लगा रहता है। आत्मिक आवश्यकताओं की बात भूल जाता है। व्यस्तता के दिनों में तो कुछ पता नहीं चलता, पर जब गंभीरतापूर्वक विचार किया जाता है कि आत्मा के साथ अन्याय बरता गया। यह भूल उस समय और भी अधिक स्पष्ट होती है जब मरण समय निकट आता है और परमात्मा के दरबार में जाने की तैयारी होती है। वहाँ मात्र एक ही प्रश्न पूछा जाता है कि विश्व का सबसे बड़ा अनुदान-मनुष्य जन्म, जिस प्रयोजन के लिए मिला था, उसका उपयोग सौंपे गये उत्तरदायित्वों के निर्वाह में हुआ या नहीं? न करने वाले दुर्गति के गर्त में पड़ते हैं और भविष्य में जो और भी अधिक अनुदान मिल सकने संभव थे उनसे वंचित रहते हैं। सृष्टि के समस्त प्राणी भगवान को समान रूप से प्रिय हैं। उसे किसी के साथ पक्षपात नहीं। मनुष्य के साथ भी नहीं। यह सुरदुर्लभ धरोहर इसलिए सौंपी गई है कि उसके व्यक्तित्व को परिष्कृत करते हुए पूर्णता का लक्ष्य प्राप्त किया जाय। साथ ही स्रष्टा के विश्व उद्यान को अधिकाधिक सुरम्य, समुन्नत, सुसंस्कृत बनाते हुए परमार्थरत रहा जाय। अनुकम्पा का प्रतिदान परमार्थ-परायण के रूप में प्रस्तुत किया जाय। सेवा साधना ही एक मात्र यह उपाय है जिससे आत्मकल्याण और लोक कल्याण की दोनों आवश्यकताएँ पूरी होती हैं। आत्मा और परमात्मा को समान रूप से तुष्टि, तृप्ति और शान्ति मिलती है। शरीर यात्रा तो जीवन रहने के लिए शान्ति मिलती है। शरीर यात्रा तो जीवन रहने के लिए अनिवार्य रूप से करनी पड़ती है। उपेक्षा, आत्मिक कर्त्तव्यों की ही होती रहती है। इस भूल का दण्ड ही पीड़ा और पतन के रूप में निरन्तर सताता रहता है। इस एक पक्षीय समर्थन की अनीति से जो बच सके, वे ही बुद्धिमान हैं। सद्गति उन्हीं के हिस्से में आती है।
जीवन सम्पदा के सदुपयोग की रूपरेखा बनानी चाहिए। समय और साधन की उपलब्धियों का किन प्रयोजनों में किस प्रकार नियोजन किया जाय, इसका मनन चिन्तन हर दूरदर्शी को अति गंभीरतापूर्वक करना चाहिए। शरीर यात्रा थोड़े से शारीरिक मानसिक प्रयत्न से चल सकती है। परिवार को स्वावलम्बी और सुसंस्कारी बनाने का प्रयास भी निर्वाह क्रम के साथ-साथ ही चलता रहता है। यह दोनों कार्य इतने भारी नहीं हैं उन्हीं के लिए सारी जीवन सम्पदा पूरी तरह खप जाय। आत्मा और परमात्मा के संतोष हेतु भी कुछ किया ही जाना चाहिए। इसी दिशा में समुचित प्रेरणा प्राप्त करने के लिए ही पूजा अर्चा के क्रियाकृत्य किये जाते हैं, अन्यथा उस समदर्शी को किसी से मनुहार, उपहार प्राप्त करने की और क्या अपेक्षा हो सकती है। भजन का सीधा सा शब्दार्थ सेवा साधना ही है। उसकी उपेक्षा करके न कोई भगवद् भक्त बन सकता ही है और न कर्तव्य, उत्तर दायित्वों के परिपालक का श्रेय अर्जित कर सकता है।
सत्प्रवृत्ति संवर्धन के लिए किया गया परोपकार उच्चकोटि का ब्रह्म यज्ञ है। इसके अतिरिक्त दुर्घटनाग्रस्तों, अपंग-असमर्थों की सेवा सहायता करते रहना भी पुण्य है। इन कार्यों के लिए हर उदारचेता को अपने समय, श्रम का बड़ा भाग सेवाधर्म के निर्वाह हेतु लगाते रहना चाहिए। कमाई गई आजीविका में से भी एक अंशदान इसके लिए लगाते रहना चाहिए। जो इस देय अंश को नहीं निकालता सारा समय स्वार्थ साधन के लिए सोचता रहता है। जिसकी कमाई अपने या अपनों के लिए खर्च होती रहती है, उसे शास्त्रकारों की भाषा में “चोर” कहा है। हमें मिल बाँट कर खाना चाहिए। अपने सुख बाँटने और दूसरों के दुःख बँटाने के लिए तत्पर रहना चाहिए। इससे कम में शालीनता से गौरव गरिमा का निर्वाह होता नहीं। कहा गया है कि सेवा धर्म के परिपालन में जो लगाया जाता है वह प्रकारान्तर से हजार गुना हो वापस लौटता है। इन दिनों अगणित कठिनाइयों, समस्याओं और विपदाओं में फँसी मानवता को उबारने के लिए हर भावनाशील का कर्तव्य है कि वह चुप न बैठे, कुछ न कुछ परमार्थ प्रयास किसी न किसी रूप में करता ही रहे। अशिक्षा, दरिद्रता, रुग्णता, पिछड़ेपन तथा बढ़ते अनाचार के माहौल में ऐसा कुछ किया ही जाना चाहिए, जिससे जनसाधारण को मानवी स्तर पर बने रहने का अवसर मिले।
व्यस्तता और दरिद्रता के रहते हुए भी कोई व्यक्ति आठ घण्टे परिश्रम में निर्वाह के लायक उपार्जन कर सकता है। सात घंटा विश्राम के लिए पर्याप्त हैं। पाँच घण्टे में नित्य कार्य तथा अन्य सामयिक कार्यों से निपटा जा सकता है। बीस घण्टे के परिश्रम से निर्वाह की आवश्यकताएँ पूरी हो सकती हैं। शेष चार घण्टे ऐसे बचते हैं जिन्हें आत्मा और परमात्मा को प्रसन्नता देने वाले परमार्थ प्रयोजनों में खर्च किया जा सकता है। उपार्जन का एक अंश भी इस निमित्त निकाला जाना चाहिए। महीने में एक दिन की कमाई निकालते रहने से किसी का कुछ घटेगा नहीं। इतनी उदारता न हो तो प्रतिदिन न्यूनतम बीस पैसे तो निकालने ही चाहिए। यह एक मुट्ठी अनाज का मूल्य है। इतना तो चूहे, कीड़े-खा जाते हैं। सतर्कतापूर्वक उसे बचाया जा सके तो किसी पर भी ऐसा आर्थिक भार न लदेगा, जिसे वहन न किया जा सके। समयदान और अंशदान का परमार्थ अनुदान यदि नियमित रूप से निकालता रहे तो उतने भर से एक व्यक्ति भी बहुत कुछ कर सकता है। फिर एक जैसे विचार वाले कई लोग मिलकर उस संयुक्त शक्ति का योजनाबद्ध रूप से नियोजन कर सकें तो उसका प्रतिफल आश्चर्यजनक स्तर का बन पड़ते देखा जा सकेगा। चार घण्टे प्रतिदिन का समय भारी पड़ता हो तो उसे कम से कम दो घण्टे भी किया जा सकता है। इतना समय तो हर कोई ऐसे ही मटरगस्ती में गँवाता रहता है।
यदि किसी छोटे क्षेत्र में ऐसे अंशदानी सौ भी संगठित हो जायँ तो उनका दैनिक अनुदान दो सौ घण्टे और बीस रुपये प्रतिदिन होता है। काम के घण्टे आठ होते हैं। दो सौ घण्टे का तात्पर्य है 200/8=25 पूरे दिन। एक महीने में इसे 25×30=750 दिन। इसे महीने की छुट्टी समेत 25 दिन का माना जाय तो 750/25=30 व्यक्तियों के मासिक रूप से लगातार काम करते रहने के बराबर हो जाते हैं। इस श्रमदान का सुनियोजन किसी की स्थानीय समस्या के समाधान में चमत्कारी परिणाम उत्पन्न कर सकता है।
बीस पैसे प्रतिदिन का अनुदान सौ व्यक्तियों का मिलता रहे तो वह राशि बीस रुपया प्रतिदिन अर्थात्-छह सौ रुपये मासिक होती है। इतने के आवश्यक साधन खरीदकर समयदानियों के रूप में , साधन के रूप में दिये जा सकें तो उस सामग्री का सदुपयोग इतना कुछ करता रह सकता है जिसे आश्चर्यजनक कहा जा सके। यह सौ व्यक्तियों का न्यूनतम अनुदान हुआ, अपने परिवार परिकर में प्रायः पाँच लाख स्थायी और पच्चीस लाख उनके क्षेत्र प्रभाव में रहने वाले लोग हैं। इतने ही लोग कुछ कर गुजरने को कटिबद्ध हों तो उनका संयुक्त श्रमदान और अंशदान देश को प्रगति पथ पर आगे धकेलने के लिए बहुत कुछ कर सकता है। यह समुदाय यदि अवाँछनीय प्रचलनों के विरुद्ध सीना तान कर खड़ा हो जाय तो समझना चाहिए कि नैतिक, बौद्धिक और सामाजिक क्षेत्र में एक महान क्रान्ति के सफल होने का सूत्रपात हो गया। यह मात्र प्रज्ञा परिवार की बात है। देश भर के उदारचेताओं को ढूँढ़, संगठित किया और उनके अनुदानों को युग परिवर्तन से सम्बन्धित क्रियाकलापों में लगाया जा सके तो यह संभव प्रयास उलटे प्रवाह को उलट कर सीधा करने में समर्थ हो सकता है।
व्यक्तिगत समस्याओं में कुछ दुर्घटनाओं को छोड़कर अधिकाँश मनुष्य की निजी अस्त व्यस्तताओं के कारण उत्पन्न होती हैं। चिन्तन, चरित्र और व्यवहार की अनगढ़ताएँ अनेकों विपत्तियाँ खड़ी करती हैं। असंयम और अनाचार ही की मनःस्थिति प्रतिकूल परिस्थितियाँ बनकर सामने आ खड़ी होती हैं। यदि व्यक्तित्व के परिष्कार की सही रीति नीति समझी और समझाई जा सके तो सफलतापूर्वक स्वस्थ, संतुलित और समुन्नत रहा जा सकता है। यह प्रशिक्षण आज की सबसे बड़ी आवश्यकता है। ज्ञानयज्ञ या विचार क्रान्ति अभियान की प्रक्रिया को इसी हेतु व्यापक बनाया जा रहा है। युग शिल्पी इसी कार्य को प्रधानता देते हुए लोकशिक्षण में प्रवृत्त हैं। यह प्रयास सही बन पड़े तो समझना चाहिए कि प्रगति योजनाओं की सफलता सुनिश्चित हो गई।
समाज में अनेकों विसंगतियाँ और विभीषिकाएँ एकता और समता का सिद्धान्त न अपनाये जाने के कारण उत्पन्न हुईं हैं। बहुप्रजनन ने हर क्षेत्र में विसंगतियों के आडम्बर लगा दिये हैं। अपव्यय की आदत, अनाचार अपनाने के लिए विवश करती है। सुव्यवस्था का अनुशासन न मानने से खाद्य संकट, ऊर्जा संकट, गरमी की अभिवृद्धि अपनी विकरालता प्रकट करती है। खर्चीली शादियाँ, दरिद्र और बेईमान बनने के लिए बाधित करती हैं। अनावश्यक महत्वाकाँक्षाओं से प्रेरित व्यक्ति अहंकार प्रदर्शन के साधन जुटाने में हैरान करते हैं। यदि औसत नागरिक स्तर का जीवनयापन करने की प्रथा चल पड़े तो नरक जैसा बना वातावरण स्वर्ग जैसी सुख शान्ति से भरा पूरा बन सकता है। गरीबी, अमीरी की खाई इसीलिए चौड़ी होती जाती है कि लिप्सा और अनुदारता सामान्यजनों का शोषण करने में लगे रहते हैं। अपराधों का प्रवाह भी इसी विवेकहीनता के उद्गम से उभरता है। यदि व्यक्ति को सुसंस्कृत और समाज को सुव्यवस्थित बनाने के लिए प्रबल प्रयत्न चल पड़े तो अगणित समस्याओं की जड़ें कट जायें और सद्भाव सहयोग के आधार पर सभी लोग मिल बाँट कर खा सकें और हँसती-हँसाती जिन्दगी जी सकें।
प्रदूषण से लेकर चित्र-विचित्र असंतुलनों का एक ही कारण है मनुष्य का दुश्चिन्तन और आचरण। अनेकों संकटों के अनेकों उपाय खोजने में परेशान होने की अपेक्षा एक ही उपाय से समस्त संकटों का निराकरण हो सकता है कि सर्वत्र शालीनता को मान्यता मिले और लोग आत्मवत् सर्वभूतेषु का आदर्श व्यावहारिक जीवन में उतारें। कड़ा परिश्रम करें और उत्पादन , अनुशासन, सदुपयोग के आधार पर जीवनचर्या अपनाने के लिए सहमत हों। अशिक्षा , अस्वस्थता, अभावग्रस्त, अव्यवस्था जैसे अनेकों कारणों को इसी आधार पर हल किया जा सकता है कि मानवी गरिमा के अनुरूप हर व्यक्ति अपने को टाले । जियो और जीने दो की नीति को अपनाने में आनाकानी न करें। विनाश नहीं विकास हर किसी की दृष्टि में रहे। जीवन जीने की कला को अपनाने और अनौचित्य का साहसपूर्वक परित्याग करने का पराक्रम अपनाया जाय। डरने और डराने का अवसर ही न आने दिया जाय। सहयोग के लिए हर किसी हाथ बढ़ें और संघर्ष उत्पन्न करने वाले गुत्थियों को सुलझाने के लिए मिलजुल कर प्रबल प्रयास करें।
कहा जाता है कि साधनों के अभाव से प्रगति का रथ रुकता है। उन्हें उपलब्ध करने के लिए टैक्स लगने, ऋण लेने जैसी सूझें ही सूझती हैं। पिछड़ों को अनुदान देने से काम चल जाएगा। ऐसी मान्यता योजना बनती और योजना चलती है। पर यह भुला दिया जाता है कि व्यक्ति अपने आप में अजस्र शक्तियों का भाण्डागार है। उसे उत्पादक और उपयोग में सदाशयता का समावेश सिखा दिया जाय तो इतने भर से साधनों के पर्वत खड़े हो सकते हैं या कम साधनों में मात्र सदाशयता के आधार पर बड़े काम संभव हो सकते हैं। यदि विलासिता और अहमन्यता के उद्धत अपव्यय पर अंकुश लग सके तो निर्वाह से बची हुई पूँजी तथा कुशलता इतनी अधिक मात्रा में शेष रह जाती है कि सभी उचित आवश्यकताओं की पूर्ति उतने भर से हो सके। संघर्ष का विकल्प सहयोग मान लिया जाय तो न अभाव का कोई कारण रह जायेगा और न संकटों से जूझने के लिए सामर्थ्य का अनावश्यक अपव्यय करना पड़ेगा। संपदा मनुष्य के श्रम और कौशल में से उपजती है। प्रसन्नता और प्रगति के लिए शालीनता और सुव्यवस्था का नियोजन पर्याप्त है। साधनों की ओर लालायित न रह कर यदि मानवी क्षमताओं का अभिवर्धन और सुनियोजन हो सके तो इतने पर भी युग की समस्याएँ सुलझ जायेंगी और आवश्यकताएँ पूरी होने के मार्ग में कहीं कोई बाधा न रहेगी।
गायत्री परिवार के अकिंचन प्रयत्न कितने अधिक सत्परिणाम उत्पन्न कर रहे हैं, इसे देखते हुए अनुमान लगाया जा सकता है कि यदि चेतनात्मक परिष्कार का प्रवाह बह चले तो वह सब कुछ हस्तगत हो सकेगा जिसकी सतयुग के नाम से चर्चा की जाती है।
दृश्यमान सूर्य प्राण ऊर्जा का भाण्डागार है। उसके बिना पृथ्वी पर जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती। सूर्य से निस्सृत गर्मी और रोशनी जीवन निर्वाह और सृष्टि व्यवस्था दोनों के लिए आवश्यक हैं। विज्ञानवेत्ता भी अब इस तथ्य को स्वीकारते हैं कि सूर्य की सत्ता ही जीवन सम्पदा का रूप धारण करती है। रोग-निवारण और स्वास्थ्य संवर्धन में निरन्तर काम आने वाली ‘जीवनी शक्ति’ शरीर का अपना उपार्जन नहीं, वरन् सूर्य का दिया हुआ अनुदान है। इस ऊर्जा का अधिकाधिक सान्निध्य प्राप्त कर स्वस्थ, समर्थ, दीर्घायुष्य का लाभ हर कोई उठा सकता है। महर्षि चरक ने कहा भी है-”आरोग्यं भास्करादिच्छेत्” अर्थात्-’अरोग्य की कामना सूर्य भगवान की सहायता से पूरी की जा सकती है। सूर्य ऊर्जा प्रत्यक्ष जीवनी शक्ति है।
अनुसंधानकर्ता वैज्ञानिकों का कहना है कि सूर्य किरणें मानव जीवन को सीधे प्रभावित करती हैं। वृक्ष-वनस्पतियों एवं जीव-जन्तुओं सभी का जीवन सूर्य पर ही अवलम्बित है। खाद्यान्नों एवं खनिज पदार्थों की उत्पत्ति सौर ऊर्जा से ही होती है। यही किरणें शरीर में प्रवेश करके समर्थता का संवर्धन करती हैं। अवयवों को रस, रक्त, माँस, मेद, स्नायु संस्थान आदि को बलिष्ठ बनता है जिसके आधार पर शरीर बलवान रहता है और दीर्घजीवी बनता है। इस गर्मी से स्वेद मल, मूल, श्वास आदि के माध्यम से अपवर्ज्य पदार्थों के विसर्जन में सुविधा होती है। अंतः और बाह्य सफाई का आधार मजबूत बनता है। विजातीय द्रव्य शरीर में ठहरने नहीं पाते, वे जिस-तिस मार्ग से बाहर निकलते रहते हैं। रोगकारक जीवाणु-विषाणु जहाँ कहीं भी शरीर में जड़ जमा लेते हैं, उन्हें नष्ट करने की अचूक औषधि सूर्य किरणें हैं।
सूर्य किरणों की आरोग्य कारक क्षमता पर पाश्चात्य वैज्ञानिकों ने गहन अनुसंधान किया है। अमेरिका के सुप्रसिद्ध चिकित्सक डॉ. एडविन बैबिट ने उस संदर्भ में दीर्घकालीन शोध तथा प्रयोग करके निष्कर्ष निकाला है कि सूर्य चिकित्सा पद्धति विश्व की अन्य किसी भी उपचार प्रक्रिया से कम लाभदायक नहीं है, वरन् वह अन्य सभी पैथियों की तुलना में अधिक निर्दोष है । प्रकाश रश्मियों की ऐसी कोई प्रतिक्रिया नहीं होती जिससे रोगी को नयी व्यथाओं में फँस जाने की शिकायत करनी पड़े। इंग्लैण्ड की मूर्धन्य शरीर विज्ञानी डॉ. हैरियट चिक ने अपने अनुसंधान में सूर्य-रश्मियों के सेवन को मनुष्य के लिए अन्न तथा दूध की तरह उपयोगी पाया है। उनका कहना है कि सूर्य की खुली किरणों से जो जितना दूर रहेगा, उसी अनुपात से उसे अविकसित और दुर्बल रहना पड़ेगा। उनने रोगी और दुर्बलों को प्रातः कालीन धूप को खुले बदन पर पड़ने देने की सलाह दी है। इस प्रयोग को नियमित रूप से करने वाले व्यक्तियों की जीवनी शक्ति में असाधारण रूप से अभिवृद्धि आँकी गयी है।
प्रख्यात शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ. सी. डब्ल्यू. सेलिली का कहना है कि अभिभावकों को चाहिए कि वे अपने रुग्ण बच्चों को आधा घण्टा सूर्योदय काल में सूर्यताप का सेवन अवश्य कराया करें 1 सूर्य सेवन वस्तुतः औषधि उपचार से कहीं अधिक लाभदायक है। इस तथ्य की पुष्टि करते हुए मूर्धन्य चिकित्सा विज्ञानी डॉ.डब्ल्यू. टी. रसेल ने लिखा है कि प्रकाश किरणों से वंचित रहने वाले व्यक्ति अस्वस्थ बने रहते और असमय ही मृत्यु को प्राप्त होते हैं। उनके अनुसार सूर्य किरणें कई प्रकार की होती हैं। इनमें से कुछ ऐसी हैं जो गर्मी उत्पन्न करती हैं और कुछ ऐसी हैं जो शरीर का तापमान घटाती-बढ़ाती तथा शीतलता प्रदान करती है। सप्तवर्णी किरणों के अतिरिक्त उन्होंने एक ऐसी किरण को खोज निकाला है जिसके सेवन से प्रत्यक्ष रूप में गर्मी का आभास नहीं होता, किन्तु यदि 30 मिनट तक निरन्तर उसके संपर्क में रहा जाय तो यह रक्त के तापमान को बढ़ा देगी। यह किरणें शरीर के जिस भाग में प्रविष्ट नहीं हो पातीं, वहाँ रक्त प्रवाह शिथिल एवं निष्क्रिय पड़ जाता है। परिणाम स्वरूप अनेकानेक विकार उत्पन्न हो जाते हैं। इस कमी को प्रकाश किरणों द्वारा दूर किया और रक्त संचालन प्रक्रिया को तीव्र किया जा सकता है।
डॉ. रसेल अपने जीवन की एक घटना का वर्णन करते हुए लिखते हैं कि जब वे क्षय रोग से ग्रसित थे और चिकित्सकों ने उन्हें असाध्य रोगी घोषित कर स्वस्थ होने की उम्मीद खो दी थी, तब उन्होंने स्वयं सूर्य चिकित्सा का आश्रय लिया था और पूर्णतः निरोग हो गये। इसके पश्चात् तो सम्पूर्ण जीवन सूर्य किरणों के जीवनदायी रहस्य को समझने में ही व्यतीत हुआ। गहन खोजबीन के पश्चात् उनने निष्कर्ष निकाला कि रुग्णता दूर करने में अल्ट्रावायलेट किरणें ही नहीं, वरन् एक रहस्यमयी किरण भी कार्य करती है जिस में रोगाणुओं को नष्ट करने और शरीर को पोषण प्रदान करने की अभूतपूर्व क्षमता है। मनुष्य के शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य का सूर्य से घनिष्ठ सम्बन्ध है। सूर्य चिकित्सा ऐसा निरापद उपचार पद्धति है जिसमें बिना कुछ गँवाये बहुत कुछ उपलब्ध किया जा सकती है जो किसी भी पौष्टिक आहार की अपेक्षा अधिक उपयोगी सिद्ध हो सकती है। तत्वेत्ता भारतीय ऋषि सूर्य की इस रहस्यमयी क्षमता को ‘प्राणतत्व’ कहकर पुकारते रहे हैं और शारीरिक, मानसिक ही नहीं, आध्यात्मिक प्रगति का आधार भी बताते रहे हैं।
मनुष्य शरीर-शक्ति और आकार-प्रकार में चाहे कितना भी बढ़ा-चढ़ा क्यों न हो, यदि परस्पर स्नेह-सौजन्य, सहयोग-सहकार का अभाव रहा, तो वह लम्बे समय तक अपना अस्तित्व किसी भी प्रकार बनाये रखने में असफल ही रहेगा। इतिहास साक्षी है कि पिछले दिनों की दैत्याकार मानवी प्रजातियाँ सिर्फ इसलिए लुप्त हो गई कि उनने प्रेम-सद्भाव की जगह शरीर बल को अधिक महत्व दिया, फलतः वे एक-दूसरे को अपने अधीन बनाने में ही लड़-भिड़ कर खप गयीं और आज उनकी स्मृति मात्र शेष है। इतिहास में यदा-कदा उनकी चर्चा भर होती है। अविस्मरणीय तो वही बन पाते हैं, जो बुद्धिबल का प्रयोग करते और दूरदर्शिता अपनाते हैं। लम्बे समय तक अपनी सभ्यता को सुरक्षित ऐसे ही लोग रख पाते हैं। दूसरे तो स्वयं डूबते और साथ-साथ अन्यों को भी डुबा ले जाते हैं।
पिछले दिनों के पुरातात्त्विक गवेषणाओं एवं यात्रा-विवरणों से विश्व के अनेक हिस्सों में ऐसी मानवी प्रजातियों का पता चला है, जो कभी अपनी दैत्याकार आकृति के कारण प्रसिद्ध थीं पर विवेक-बुद्धि की कमी ने उन्हें समूल नष्ट कर दिया। ऐसा ही एक विशालकाय अस्थि-पिंजर सन् 1577 में स्विट्जरलैंड के ल्यूसर्न प्राँत के विलिसायू स्थान में उत्खनन के दौरान प्राप्त हुआ था। उसके मानव अस्थि होने के संबंध के तत्कालीन अस्थि विशेषज्ञ फेलिक्स प्लैटर से सलाह ली गई। उन्होंने गहन जाँच-पड़ताल के उपरान्त उसके मानव-अस्थि होने की पुष्टि कर दी। कंकाल के अध्ययन के आधार पर जीवित स्थिति में उसकी ऊँचाई नौ फुट के करीब बतायी गई। इसी प्रकार की एक अन्य कब्र खुदाई के दौरान सेण्ट एण्टोनी के निकट चाउमोण्ट किले के पास देखी गई। कब्र की लम्बाई चौड़ाई आश्चर्यजनक ढंग से विशाल थी, जिसमें लगभग 12 फुट लम्बा , 3 फुट चौड़ा तथा दो फुट ऊँचा कंकाल पड़ा था, जिसके मानवी होने में किसी भी प्रकार का सन्देह नहीं किया जा सकता था। कब्र के ऊपर पिंजर का नाम-”ट्यूटोबोक्ट्स रेक्स” खुदा था और आस-पास अनेक पदक, सिक्के आदि पड़े हुए थे। आज भी इसकी अस्थियाँ “म्यूजी डी पैलिओण्टोलोजी” नामक पेरिस के एक संग्रहालय में पड़ी हुई हैं। अन्वेषणकर्ताओं का कहना है कि एक युद्ध के दौरान सिम्ब्री के भीमकाय राजा ट्यूटोबोक्टस को बन्दी बना लिया गया और दूसरे विजयी सम्राट मेरियस द्वारा मार डाला गया, तत्पश्चात् उसे चाउमोण्ट किले के समीप एक कब्र में सुरक्षित दफना दिया गया।
इसी प्रकार के एक दैत्याकार मनुष्य का उल्लेख प्रसिद्ध इतिहासकार जैफरसन ने अपनी पुस्तक “हिस्ट्री एण्ड एण्टीक्विटीज ऑफ ओलरडेले एक्व उरवेण्ट” में किया है। वे लिखते हैं कि मूर्धन्य नृतत्वविज्ञानी ह्यूज हडसन का यह कथन गलत नहीं है कि प्राचीन समय में मनुष्य का आकार-प्रकार असाधारण रूप से बड़ा हुआ करता था। इस संदर्भ में प्रमाण प्रस्तुत करते हुए वे लिखते हैं कि सेण्ट बीज के समीप कुम्बरलैण्ड में प्राप्त मानवी अवशेष इस बात की पुष्टि करते हैं कि हमारे पूर्वज असंदिग्ध रूप से विशालकाय रहे होंगे। सेंट बीज के उक्त कंकाल की चर्चा करते हुए वे कहते हैं कि जहाँ यह अद्भुत कब्र मिली, इन दिनों वहाँ धान का खेत हैं । बीज बोते श्रमिकों को उसका कुछ हिस्सा एक दिन दिखाई पड़ा तो वे उत्सुकतावश उसे खोदने लगे, फलस्वरूप वहाँ उस कब्र के होने की जानकारी मिली। कब्र जमीन से 12 फुट नीचे थी, पर बरसात के कटाव से अब वह उतनी गहरी नहीं रह गई थी और उसका कुछ हिस्सा बाहर निकल आया था। उसे खोदने पर उसके भीतर साढ़े बारह फुट लम्बा मानवी पिंजर सुरक्षित प्राप्त हुआ। उसके मानवी न होने का भ्रम गड्ढे से प्राप्त वस्तुओं से जाता रहा। वहाँ कई विशाल कलेवर के आयुध पड़े थे। इनमें उसका स्वयं का लौह कवच और कुल्हाड़ा विशेष उल्लेखनीय है। कवच की लम्बाई 5 फुट थी, जो सिर और कमर तक शरीर के सम्पूर्ण भाग को ढकता था। शरीर के एक ओर उसका विलक्षण कुल्हाड़ा था तथा दूसरी ओर 6 फुट लम्बी तलवार। कुल्हाड़ा कितना विशाल था, इसका अनुमान उसके आकार से लगाया जा सकता है और इस आधार पर इसके प्रयोक्ता के आकृति की सहज कल्पना की जा सकती है कि वह कैसा पर्वताकार रहा होगा। कुल्हाड़े का सिर तीन फुट लम्बा था और इसका हत्था जो पूर्णतः लोहे का बना था, 6 फुट लम्बा था और मोटाई एक औसत मानवी जाँघ के बराबर थी।
यह तो कब्रों और अवशेषों के आधार पर मानवी आकार के संबंध में लगाये गये अनुमानों की चर्चा हुई, पर समय-समय पर सुदूर क्षेत्रों की यात्रा करने वाले यात्रियों के यात्रा-विवरणों से भी इस बात को बल मिलता है कि उन दिनों भीमकाय मनुष्य अस्तित्व में थे ऐसा ही एक साक्ष्य प्रस्तुत करते हुए “जाइण्ट्स ऑफ पैंटागोनिया” पुस्तक में मैगलेन लिखते हैं कि जब उनका बेड़ा कथित पैंटागोनिया ( चिली और अर्जेंटाइना) के पोर्ट सैन जुलियन के तटवर्ती क्षेत्र में खड़ा था, तो एक दैत्याकार मानव उनके जहाज के निकट समुद्र तट पर आया। उसकी लम्बाई इतनी अधिक थी कि नाविकों के सिर मुश्किल से उसकी कमर को छू पाते थे । उसकी आवाज साँड़ जैसी तेज और कर्कश थी। कुछ ही देर में उसी डील-डौल के कुछ और लोग वहाँ आ पहुँचे। मैगलेन और उनके साथी उनमें से दो को पकड़ने में सफल रहे। उन्हें लोहे के एक बड़े पिंजड़े में रखा गया और योरोप की ओर यात्रा प्रारंभ की गई, पर योरोप पहुँचने से पूर्व ही रास्ते में उनकी मृत्यु हो गई।
ड्रेक, पेड्रो सरमिएण्टों, एन्थोनी, नीवेंट एवं कैवेडिश आदि सभी यात्रियों ने पैंटागोनिया क्षेत्र में रहने वाले दानवाकार मानवों का अपने यात्रा-वृत्तांतों में उल्लेख किया है उनकी लम्बाई के संबंध में उनमें मतैक्य है। सभी ने उनकी ऊँचाई साढ़े दस फुट से बारह फुट के बीच बतायी है। कइयों ने उनके मृत शरीरों को मापा भी। ऊँचाई उपरोक्त सीमांतर्गत ही पायी गई । सीबाल्ड डी वीयर्ट, जोरिस स्पीलबर्जेन, जैकब ली मेयर एवं विल्हेल्म साउटेन जैसे बाद के भ्रमणकर्ताओं ने भी अपने पूर्व साथियों के विवरणों की सत्यता की पुष्टि की है।
यद्यपि आज के लोगों को ऐसे दानवाकार मनुष्यों के अस्तित्व पर सहज ही विश्वास नहीं हो सकता, पर इस प्रकार की संभावना से सर्वथा इनकार भी नहीं किया जा सकता। इस संबंध में कोम्मोडोर बोयरन के साक्ष्य और तथ्य सबसे अधिक प्रामाणिक और विश्वसनीय माने जाते हैं। वे अपने ग्रन्थ “ इक्सटिंक्ट पैंटागोनियन जाइण्ट” में लिखते हैं कि निस्संदेह पूर्व काल में पृथ्वी पर भीमकाय मनुष्य निवास करते थे। इसके प्रमाण न सिर्फ पैंटागोनियन क्षेत्र में मिलें हैं, वरन् विश्व के अनेक हिस्सों में असामान्य आकार-प्रकार के ऐसे नरपिंजर मिले हैं, जो यह साबित करते हैं कि प्राचीन समय में धरती पर कभी ऐसे मानव निश्चय ही रहते थे।
उनका लोप कैसे हो गया? इस संदर्भ में गहन अनुसंधान के उपरान्त वे कहते हैं तब के मनुष्यों में काया की स्थूलता जिस प्रकार बढ़ी-चढ़ी थी, बुद्धि भी वैसी ही स्थूल व मोटी थी। फलतः उनमें आये दिन इस बात की प्रतिद्वंद्विता छिड़ी रहती थी कि कौन किसे पराजित कर अपने अधीन बनाता है। जो सहजता से दूसरों की अधीनता स्वीकार लेते, उन्हें गुलामों जैसी जिन्दगी जीनी पड़ती। ऐसे लोग प्रायः कम ही होते, जो सहयोग सद्भावनापूर्वक रहने के लिए उद्यत होते। अधिकाँश लोग गुलामी की तुलना में लड़-भिड़ कर मर जाना पसंद करते। इस प्रकार शरीर-बल की अहंता और इसकी प्रतियोगिता तथा असहयोग के कारण धीरे-धीरे उनकी संख्या घटती गई। बाद में जब उनकी स्थूल बुद्धि को इसका दुष्परिणाम समझ में आया, तो एक जगह रह कर लड़ने-भिड़ने की तुलना में बिखर जाना रह कर लड़ने-भिड़ने की तुलना में बिखर जाना उन्होंने उपयुक्त समझा। उन्हीं बचे लोगों की आनुवाँशिकता लम्बी आनुवंशिक-यात्रा के उपरान्त यत्र-तत्र प्रकट होती और अपना प्रमाण-परिचय प्रस्तुत करती है। शारीरिक बलिष्ठता आवश्यक तो है, पर मानसिक प्रखरता के बिना उसका सुनियोजन बन पड़ना शक्य नहीं।
विश्व इन दिनों विषम परिस्थितियों से होकर गुजर रहा है। समूची मानव जाति प्राकृतिक एवं स्व निर्मित विभीषिकाओं के बीच जी रही है। प्रायः इस संबंध में चर्चाएँ होती ही रहती हैं कि आने वाला समय कैसा होगा। अपने-अपने ढंग से नये युग का आगामी युग के संबंध में आमतौर से सभी ने एक ही बात कही है कि सत्प्रति जो भी अवाँछनीयताएँ और विपरीतताएँ विनाशकारी घटा की तरह चारों ओर छायी दीख रही है, वे अपना अस्तित्व अगले ही दिनों तूफान में फँसे तिनके की भाँति गँवाती नजर आयेंगी और एक ऐसे नये युग का सूत्रपात होता दीख पड़ेगा, जिसमें सर्वत्र सुख-शान्ति का साम्राज्य होगा। पर नये शिशु के आगमन से पूर्व की प्रसव-पीड़ा तो सबको झेलनी ही पड़ेगी।
इसी आशय का मंतव्य प्रकट करती हुई मूर्धन्य मनीषी रुथ मोण्टागोमरी ने अपनी पुस्तक “स्ट्रैर्न्जस एमोन्ग अस” में अपने अदृश्य सहायकों के माध्यम से लिखा है कि आने वाले समय में जल्द ही एक विश्व राष्ट्र और विश्व-सरकार की मान्यता मूर्तिमान होती दृष्टिगोचर होगी। वर्तमान के पृथक्-पृथक् देश तब अलग-अलग राज्यों जैसी भूमिका सम्पन्न करेंगे और सब मिलकर विश्व राष्ट्र व विश्व सरकार के अभूतपूर्व दृश्य उपस्थित करेंगे। हर जगह एक ही प्रकार का सिक्का चलेगा। संपर्क सूत्र आज जैसा न रहेगा। एक सर्वथा नवीन प्रकार की विधा इस क्षेत्र में प्रयुक्त होती देखी जा सकेगी। वायुयान का स्थान स्पेसशीप ले लेंगे। जीवाश्म ईंधन की उपयोगी और महत्वपूर्ण स्थानापन्न सौर और चुम्बकीय ऊर्जा साबित होगी।
इक्कीसवीं सदी में स्वर्ग का अवतरण धरती पर होते हुए लोग देख और अनुभव कर सकेंगे। सभी मिलजुल कर काम करेंगे और विभिन्न प्रकार की आपदाओं से क्षतिग्रस्त धरती को पूर्व स्थिति में लाने, उसे उर्वर बनाने एवं अपना विकास करने में सहयोग व सहकार का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत करते देखे जायेंगे। ध्रुवों के स्थानान्तरण से जो अप्रत्याशित क्षति होगी, उसकी पूर्ति करने में 21 वीं सदी की नई मानव जाति महत्वपूर्ण योगदान करेगी।
वे लिखती हैं, कि तब युद्ध की संभावना समाप्त हो जायेगी। मानसिक शक्ति का तब इतना विकास हो जायेगा कि लोग विश्व के किसी कोने में रह कर भी परस्पर विचार-विनिमय करने में समर्थ होंगे। इसी प्रक्रिया से वे दूसरे के चिन्तन को भी प्रभावित कर सकेंगे। शस्त्रास्त्रों की विभीषिका पूर्णतः समाप्त हो जायेगी। लोग इन विनाशकारी हथियारों को लगभग भूल जायेंगे, जिससे उन्हें अधिक समय तक सुख और शान्ति की प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ेगी। तब निश्चय ही स्वर्णयुग की वापसी देखी जा सकेगी, जिसमें सभी लोग ईश्वरीय नियमों व अनुशासनों का परिपालन करते दिखाई पड़ेंगे। प्रायः संघर्ष की स्थिति तब पैदा होती है, जब लोगों के विचारों में भिन्नता हो, किन्तु जब सभी की विचारधारा समान हो, सब शासन , अनुशासन और पूजा-आराधना के संबंध में एकमत हों, तो फूट-फसाद का प्रश्न ही नहीं उठता। आने वाले समय में ऐसा ही होने वाला है। तब लोगों का रुझान आध्यात्मिक उन्नति को अधिक महत्व देंगे।
वर्तमान समय में यह परिवर्तन धीमी गति से होगा इसमें तेजी शताब्दी के अन्त में ध्रुवों में स्थानान्तरण के उपरान्त तभी आयेगी जब इसके कारण बड़े पैमाने पर धन-जन की हानि होगी। लोग इसके दुष्परिणाम को अपनी आँखों से देखेंगे और चिन्तन में परिवर्तन व परिष्कार की आवश्यकता अनुभव करेंगे। इस विभीषिका के पश्चात् मानवी चिन्तन, चरित्र व व्यवहार में इतना आमूल-चूल अन्तर दृष्टिगोचर होगा, जिसे देख कर लोग यही अनुभव करेंगे कि कोई नयी मानव प्रजाति का उद्भव हो गया है। वस्तुतः इसी के बाद लोग सही चिन्तन की शक्ति को पहचान सकेंगे।
अपनी इसी कृति में उनने आगे कहा है कि इन्हीं दिनों एक देवदूत का आगमन होगा, जो हेलेन किलर के उस भविष्य कथन की सार्थकता को समझाने की कोशिश करेगा, जिसमें कहा गया है कि मनुष्य की सफलता और खुशियाँ स्वयं उसी के अन्दर छिपी हुई है। उसे बाहर ढूंढ़ने का प्रयास करना मृगतृष्णा में भटकने के समान होगा। वह देवदूत स्वयं का उदाहरण प्रस्तुत कर लोगों को इसकी प्रेरणा देगा। यह बतायेगा कि मनुष्य के अन्दर इतनी अपार संभावनाएँ छिपी पड़ी हैं, कि यदि उन्हें हस्तगत करने की विधा वह करतलगत कर ले, तो वर्तमान अशान्ति और असंतोष की दयनीय स्थिति में आगे जीना न पड़ेगा इन संभावनाओं को मूर्तिमान करना किस भाँति बन पड़ेगा ? इसी की महत्वपूर्ण प्रक्रिया वह संसार को समझायेगा और यह बतलायेगा कि इसी के परिपालन में मनुष्य-जाति का कल्याण है। उसके उज्ज्वल भविष्य की संरचना इससे विच्छिन्न होकर नहीं हो सकेगी।
यह सतयुग 21वीं सदी के बाद हजारों वर्षों तक बना रहेगा। लोग तब अद्भुत वैचारिक एवं भावनात्मक समानता का प्रदर्शन करेंगे। यह समानता आडम्बर मात्र न होगी, वरन् सभी के व्यावहारिक जीवन में समान रूप से क्रियाशील होती देखी जा सकेगी।
यदि कोई बीमार पड़े तो अन्य लोग उसकी सेवा-सहायता सगे-संबंधियों की तरह करते देखे जायेंगे। इसमें मानसिक शक्ति का भी उपयोग होगा। लोग आरोग्यवर्धक मानसिक ऊर्जा रोगी तक पहुँचाना अपना परम कर्तव्य मानेंगे और इस पुनीत कार्य को तक तक जारी रखेंगे जब तक रोगग्रस्त पूर्णतः स्वस्थ न हो जाय। दुर्भावना का समूल नाश हो जायेगा, इसका स्थान सद्भावना ले लेगी। सब परमार्थ में स्वार्थ का अनुभव करेंगे। अशरीरधारी आत्माओं से संपर्क करना संभव हो जायेगा। इसी प्रकार सूक्ष्म सदात्माएँ सत्पुरुषों से संपर्क कर महत्वपूर्ण जानकारियाँ, प्रेरणा व प्रकाश देंगी, जिनसे लोग लाभ उठाते दिखाई पड़ेंगे।
आगामी सदी के संबंध में प्रस्तुत भविष्यवाणी सूक्ष्म शरीरधारी दिव्य आत्माओं द्वारा की गई है। उनकी एवं अन्य अनेकों भविष्य द्रष्टाओं की सतयुग की वापसी संबंधी भविष्यवाणी सत्य सिद्ध हो, इसके लिए हमें प्रयत्न अभी से आरंभ कर देना चाहिए। इसके लिए स्वयं के व्यक्तित्व को इतना परिमार्जित और परिष्कृत करना होगा कि उसकी सुदृढ़ नींव पर नवयुग का स्वर्णयुग का विशाल और भव्य भवन विनिर्मित हो सके। यही युगसन्धि की माँग है और समय की महती आवश्यकता भी। इसे कर गुजरने में हमें तनिक भी कृपणता नहीं बरतनी चाहिए।
वाजिश्रवा ने अपने पुत्र नचिकेता के लिए यज्ञ फल की कामना से विश्वजित् यज्ञ आयोजित किया। दक्षिणा देने के लिए जब वाजिश्रवा ने गौएं मँगाई तो नचिकेता ने देखा वे सब वृद्ध और दूध न देने वाली थीं तो उसने निरहंकार भाव से कहा-”पिताजी निरर्थक दान देने वाले को स्वर्ग की प्राप्ति नहीं होती।” इस पर वाजिश्रवा क्रुद्ध हो गये और उन्होंने अपने पुत्र नचिकेता को ही यमाचार्य को दान कर दिया।
यम ने कहा-”वत्स! मैं तुम्हें सौंदर्य, यौवन, अक्षय धन और अनेक भोग प्रदान करता हूँ।” किन्तु नचिकेता ने कहा जो सुख क्षणिक और शरीर को जीर्ण करने वाले हों उन्हें लेकर क्या करूंगा, मुझे आत्मा के दर्शन कराइये। जब तक स्वयं को न जान लूँ, वैभव विलास व्यर्थ है।
साधना के लिए आवश्यक प्रबल जिज्ञासा , सत्य निष्ठा और तपश्चर्या का भाव देखकर यम ने नचिकेता को पंचाग्नि विद्या ( कुण्डलिनी जागरण ) सिखाई , जिससे नचिकेता ने अमरत्व की शक्ति पाई।
प्राण को ‘अग्नि’ की संज्ञा दी गई है। शरीर के सारे क्रिया-व्यापार इसी से संचालित होते हैं। इस दृष्टि से यह काफी महत्वपूर्ण है। जब यह नियमित-नियंत्रित होती है, तो शरीर को चेतना व आवश्यक शक्ति प्रदान करती है, किन्तु इसकी विकृत अवस्था तरह-तरह के विग्रह खड़े करती है। क्रोध, कलह, दर्प, दुराचरण सब इसी के परिणाम हैं। यहाँ तक तो इसकी स्थिति सहज सामान्य कही जा सकती है, परन्तु जब इसमें कल्मष की अतिरिक्त पर्त चढ़ती और दिशाहीन बनती है, तो शरीर को ही जला कर खाक करने के लिए उद्यत हो जाती है।
इस प्राणाग्नि को विज्ञान-वेत्ताओं ने भी खोजा और स्वीकारा है। उनके अनुसार यह ऊर्जा न सिर्फ जीव-जन्तुओं, वरन् वृक्ष-वनस्पतियों में भी समान रूप से पायी जाती है। मानवी शरीर में इसकी मात्रा अधिक होती है। यह मात्रा इतनी होती है, जितनी से 20-60 वोल्ट तक का विद्युत बल्ब जलाया जा सके। यही बिजली आँखों के माध्यम से संसार दिखाती है, हृदय में अवस्थित होकर रक्त-संचरण का काम करती है और मस्तिष्क द्वारा विभिन्न प्रकार के शारीरिक क्रिया-कलापों का नियंत्रण करती है। पर जब यह असंतुलित होती है, तो शरीर-सत्ता का अस्तित्व ही खतरे में पड़ा प्रतीत होता है। आये दिन ऐसी घटनाएँ घटती ही रहती हैं।
पिछले दिनों की ही बात है। संसेक्स की एक अधेड़ महिला अपनी कुटिया में कुछ काम कर रही थी कि न जाने कैसे उसके शरीर से एक धधकता शोला प्रकट हुआ, जिसने देखते-देखते कुटिया समेत उसे भस्मसात् कर दिया। लंदन के “डेली टेलीग्राफ” अखबार ने सन् 1989 में एक खबर छापी थी कि लन्दन के एक मेकेनिक कार्य कर रहा था कि अचानक उसके वस्त्र में आग लग गई। बड़ी मुश्किल से तात्कालिक सक्रियता के कारण उसकी आग बुझ सकी, पर इस प्रयास में वह गंभीर रूप से जल गया। महीनों के उपचार के बाद जब उसकी स्थिति कुछ सुधरी , तो उससे अग्नि के बारे में पूछताछ की गई। उसका कहना था कि आग उसके शरीर से ही प्रकट हुई थी और कपड़ों में लग गई।
कुछ वर्ष पूर्व जापान के ‘टोकियो न्यूज’ नामक दैनिक में एक घटना छपी थी। उसके अनुसार ‘सैनियो’ कम्पनी का मालिक अपनी फैक्टरी के अग्निकाँड से परेशान था। उसके यहाँ पिछले दो वर्षों (सन् 1980-82) में दस बार आग लग चुकी थी, पर अग्निकाँड का कारण किसी प्रकार ज्ञात न होता था। अन्ततः उसने बुकलिन यूनिवर्सिटी के विज्ञान के प्रोफेसर तोसिको मासाचू से सहायता माँगी। प्रोफेसर ने फैक्टरी का सूक्ष्म निरीक्षण करने के उपरान्त एक दिन सभी कर्मचारियों को एक स्थल पर इकट्ठा किया। इसके बाद उनमें से प्रत्येक को वोल्टमीटर से जुड़ी एक धात्विक पट्टिका से होकर गुजरने को कहा। इस क्रम में प्रायः देखने में आता कि हर बार वोल्ट मीटर की सुई में थोड़ी हलचल मचती और वह पुनः अपने निर्धारित स्थान पर जा टिकती। काफी समय तक यही क्रम चलता रहा। वोल्टमीटर की सुई में कोई असामान्य हलचल न दिखाई पड़ी। मासाचू परीक्षण में जुटे रहे। उसी बीच एक महिला के पैर पट्टी पर पड़े । सुई में तीव्र हलचल हुई और वह वोल्टमीटर की उच्च बिन्दु पर जा टिकी। आग का रहस्य समझ में आ गया। उसकी अत्यधिक शरीर विद्युत ही इसके लिए जिम्मेदार थी। उसे फैक्टरी के ऐसे भाग में भेज दिया गया, जहाँ जलने व आग पकड़ने जैसी कोई वस्तु न थी। इसके बाद अग्निकाँड का सिलसिला बन्द हो गया।
आस्ट्रेलिया (होबार्ट) की एक घटना है। सन् 1985 की शाम मैकडोनल्ड नामक एक कार चालक अपनी गाड़ी को गैरेज में रख कर निकल ही रहा था कि अपने कपड़ों से निकलती लपटों को देख कर चौंक पड़ा। चीखा-चिल्लाया तो भीड़ एकत्रित हो गई। कपड़े सारे नोंच डाले गये, किन्तु आग शरीर को झुलसा चुकी थी। वह 70 प्रतिशत जल चुका था। अस्पताल में बचने का उसे हर संभव प्रयास किया गया, पर वह बच न सका। कारण ढूंढ़ने वाले सिगरेट-सिगार के टुकड़े भी घटनास्थल पर नहीं दिखाई पड़े, जिससे आग का कारण धूम्रपान को समझा जा सके। अन्ततः जाँचकर्ताओं ने इस घटना को भी शरीर विद्युत का ही परिणाम बताया।
मनुष्य के साथ घटने वाली ऐसी घटनाओं की पुष्टि तो वैज्ञानिक भी कर चुके हैं, पर वे अभी तक इसका कोई समाधान कारक हल नहीं ढूँढ़ पाये हैं। संभव है अगले दिनों इसका मूल कारण खोज पाना शक्य हो जाय। किन्तु अभी तो मात्र इतना ही कहा जा सकता है कि ऐसा अनियंत्रित प्राण-प्रवाह के कारण ही होता है। यद्यपि जल-मरने की ऐसी घटनाएँ यदा-कदा ही देखने को मिलती हैं, फिर भी प्राण की प्रचण्ड शक्ति को सिद्ध करने वाले ये प्रकरण काफी महत्वपूर्ण हैं इनसे यह अनुमान सरलतापूर्वक लगाया जा सकता है कि यदि प्राण ऊर्जा के प्रवाह को सुनियोजन द्वारा सही दिशाधारा दिया जा सके, तो कैसे विलक्षण करतब दिखाने में यह सफल समर्थ हो सकती है। मात्र इतना ही नहीं अतीन्द्रिय सामर्थ्य के नाम से जानी जाने वाली क्षमता का विकास भी संभव है, जैसा कि कभी-कभी दिखाई पड़ जाता है।
कनाडा के पीटर वान जोन्स के साथ 1979 में एक ऐसी ही घटना घटी। एक बार वे प्रातः टहलते हुए शहर से दूर सुनसान क्षेत्र में पहुँच गये। कँटीली झाड़ियों का वनखण्ड उन के दोनों ओर दूर-दूर तक मैदान में फैला हुआ था। एक धनी झाड़ी के नीचे विश्राम के लिए वे बैठ गये। जूते कुछ समय के लिए उतार दिये। शरीर को शिथिल करने के लिए आँखें बन्द कर लीं, तो जमीन के नीचे चमकीली धातुएँ दिखाई पड़ने लगीं। पहले तो उसे यह आँखों का भ्रम मालूम पड़ा, किन्तु बार-बार आँखों के आगे से वह झिलमिलाहट गई नहीं तो उसे संदेह हुआ। कुछ मजदूरों को लेकर स्थान की खुदाई की गई तो ज्ञात हुआ कि वहाँ स्वर्ण भण्डार है। इसके बाद तो यह उसका धन्धा बन गया। वह प्रायः नंगे पाँव चल करा धरती के नीचे का धात्विक खजाना पता लगाने में अपनी इस क्षमता का उपयोग करता। मनुष्य शरीर की यही बिजली जब विकासग्रस्त होती है तो ऐसा व्यक्ति स्वयं डूबता एवं औरों को भी पतन के मार्ग में घसीट ले चलता है।
मनुष्य जीवन इस प्राणाग्नि को शोधने, सुधारने और परिष्कृत स्तर तक पहुँचा ले जाने का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है। यदि इतना संभव हो सका, तो वह चेतना के उच्च आयामों में पहुँच कर उस सर्वोच्च स्तर में प्रतिष्ठित हो सकता है, जिसके लिए आये दिन लोग कितने ही कौतुक करते और टंट घंट रचते देखें जाते हैं, किन्तु फिर भी छूँछ ही रहते हैं। हम प्राण को परिष्कृत करें और सही अर्थों में प्राणवान बनें। इसकी सामर्थ्य इसी स्थिति में फलित होती और व्यक्ति को विलक्षण विभूतियों से ओतप्रोत करती हैं।
भगवान बुद्ध कौशांबी पहुँचे । वहाँ के धूर्तजनों ने मिलकर एक मंडली बनाई और तथागत का तिरस्कार करने की ठानी। उन्हें बहुत अपशब्द कहे। मारने तक पर उतारू हो गये।
आनन्द ने कहा-अन्यत्र चलना चाहिए। यहाँ के लोग बड़े अभद्र हैं। तथागत ने पूछा यदि वहाँ भी ऐसा ही दुर्व्यवहार हुआ तो? आनन्द बोले तब अन्यत्र चलेंगे। प्रश्नोत्तर की यह शृंखला बहुत देर चलती रही और आनंद अन्यत्र, अन्यत्र की रट लगाये रहे।
तथागत ने कहा-यह उचित नहीं। वस्तुस्थिति विदित होने की परिस्थिति आने तक हमें यही ठहरना चाहिए। चल पड़ने पर लोग इन्हीं का कथन ठीक मानेंगे और हमारा साहस टूटेगा।
नियत कार्यक्रम के अनुसार पड़ाव वहीं डाला गया और आक्षेप-कर्त्ताओं की हिम्मत टूट गई।
“भगवन्! यह जन अपने परम भट्टारक की ओर से श्री चरणों में प्रणत है। राजकवि ने साष्टाँग प्रणाम करके घुटनों के बल बैठकर प्रार्थना की । यों तो आपका आशीर्वाद भी काफी होगा उनके यज्ञ की सम्पूर्णता के लिए किन्तु हमारे महाराज अपने यज्ञीय आचार्य पीठ पर इन चरणों की अर्चा करने को अत्यन्त उत्कण्ठित हैं।”
वराणसी भगवान विश्वनाथ की प्रियपुरी तो है सरस्वती के वरद पुत्रों की सनातन क्रीड़ा भूमि भी है और विद्या तो वीतराग की विभूति है। अब भी सच्चे अर्थों में विद्वान विद्या को विक्रय की कम और वितरण की वस्तु अधिक मानते हैं। आज भी किसी विद्याभिलाषी विद्यार्थी को निराश करना विद्वान की गरिमा के विपरीत माना जाता है और यह जब की बात है, उस समय को बीते शताब्दियाँ हों गई। काशी विद्या का परम केन्द्र और उस पर वहाँ के आचार्य चंद्रमौलि-देश के सभी शासक उनके चरणों में माथा झुकाकर अपने को कृतार्थ ही मानते हैं।
चरणाद्रि (चुनार) वाराणसी का पाश्ववर्ती राज्य है। उसके नरेश प्रायः भगवान विश्वनाथ की वन्दना करने पधारते हैं। आचार्य को प्राणिपात किए बिना अपनी यात्रा तो कभी उन्होंने पूर्ण मानी नहीं, किन्तु यज्ञीय आमंत्रण देने के लिए स्वयं आने का साहस उन्हें नहीं हुआ। वीतराग तपोधन आचार्य का क्या भरोसा वे यदि अप्रसन्न हो जायँ उनके असन्तोष का प्रतिकार करने की बात तो दूर उसे सहन कर लेने की शक्ति भी शायद ही किसी में हो।
राजकवि ब्राह्मण होने के साथ आचार्य के स्नेह भाजन भी हैं। उन्हें सामने पाकर आचार्य का चित्त क्षुब्ध नहीं होगा। प्रार्थना की स्वीकृति की यदि कहीं थोड़ी भी संभावना है तो इसी प्रकार। यह सोचकर ही राजकवि को चरणाद्रि नरेश ने भेजा था। राजकवि ने अपनी प्रार्थना पुनः कह सुनाई यह अयोग्य ब्रह्मबन्धु श्री चरणों के स्नेह से धृष्ट हो गया है। अनुरोध है कि आप यज्ञ की अध्यक्षता करें।
“तुम्हारे यजमान का संकल्प क्या है? वे यज्ञ करके किस उद्देश्य की पूर्ति चाहते हैं?” आचार्य ने सीधे पूछ लिया।
“वे महाप्राण किसी लौकिक लोभ में नहीं हैं।” राजकवि ने कहा। “वे धर्मकाम हैं। यज्ञ सुरेश की सन्तुष्टि के संकल्प से ही होगा और वह पारलौकिक अभ्युदय की सिद्धि करेगा।”
‘अपाम सोममृताऽभमः, आचार्य ने एक श्रुति बोल दी और कहा- ‘यह पुष्तावाणी जिसे प्रलुब्ध करती है, उस बालोद्योग में मेरे जैसे वृद्ध की अभिरुचि सम्भव नहीं है।
“भगवन्!” राजकवि केवल सानुरोध सम्बोधन करके मौन रह गए।
‘धर्म कामनाओं को पूरा करने का साधन नहीं है।’ आचार्य ने शान्त स्वर में कहा। “इस लोक में धर्मानुष्ठान का फल भोग अनेक पुरुष चाहते हैं और स्वर्गोपलब्धि चाहते हैं किंचित उदारचेता। किन्तु दोनों कामनाओं से ग्रसित हैं-बालक हैं। धर्म स्थूल या सूक्ष्म देह की तृप्ति तुष्टि का साधन तो होता है, किन्तु है यह उसका दुरुपयोग ही और ऐसे किसी दुरुपयोग में सहयोग की सम्भावना तुम मुझ से नहीं कर सकते ।”
‘आचार्य।’ राजकवि कुछ कहते इसके लिए समय नहीं मिला। सम्पूर्ण शास्त्र-कवच एवं शिरस्त्राण दूर उतार कर कौशल के महासेनाध्यक्ष उसी समय आचार्य के सम्मुख दण्ड की भाँति भूमि पर गिरे “शरणागतोऽस्मि।”
“वत्स ! इस पुरी में प्रत्येक जन भगवान विश्वनाथ की शरण में है। दण्डपाणि काल भैरव यहाँ पुरीपाल हैं। तुम माता अन्नपूर्णा के आश्रय में
अभय हो।” उन्होंने स्वयं सेनापति को उठाया।
“आप यहाँ और इस प्रकार एकाकी ?” राजकवि ने आगत सेनापति की ओर देखा।
‘नहीं वत्स !’ आचार्य ने रोक दिया, विश्वनाथ के शरणागत के सम्बन्ध में कुछ पूछने का स्वत्व किसी को नहीं है। जगज्जननी अन्नपूर्णा केवल ममतामयी वात्सल्यमयी हैं।
प्रभु। महासेनाध्यक्ष ने स्वयं कुछ कहना चाहा।
‘नहीं-कोई आवश्यकता नहीं कुछ कहने की। तुम गंगास्नान करो और विश्वनाथ अन्नपूर्णा के दर्शन कर आओ। तुम्हारी व्यवस्था वे जग-माता कर देंगी।’ ‘गुरुदेव का संकेत पाकर एक विद्यार्थी आगन्तुक के साथ जाने को उठ खड़ा हुआ।
आगन्तुक के पीछे मुड़ने के कुछ ही देर बाद कौशल नरेश आते दिखाई पड़े । राजन् ! अब तुम्हारा सेनाध्यक्ष भगवान गंगाधर की शरण में है। आचार्य ने अपने पदों में प्रणत कौशल नरेश से कहा।
‘भगवन् ! आपका यह क्षुद्र सेवक इतना मूर्ख नहीं है कि यह कोई धृष्टता करने का साहस करेगा। नरेश ने हाथ जोड़कर मस्तक झुकाया। ‘उसका अपराध क्या है, यह प्रश्न यहाँ कहाँ उठता है? वैसे मैं उसके पीछे ही आया था लेकिन जब पुरी के बगल तक आ गया तो भगवन् विश्वनाथ और दर्शन का लोभ त्याग नहीं सका।
‘तुम विवेकवान हो। वृद्ध आचार्य मुस्कराए। ‘एक जिज्ञासा अनेक वर्षों से है, किन्तु साहस नहीं होता।’ नरेश ने सुअवसर देखकर ही कहा था।
‘तुम्हें ब्राह्मण से भी भय लगता है? आचार्य के अधरों पर स्मित झलका ।
‘रघुवंश की परम्परा ही है यह।’ नरेश का स्वर विनम्र था।
‘मर्यादा पुरुषोत्तम के तुम योग्य वंशधर हो। आचार्य ने सुप्रसन्न कहा। तुम्हारी जिज्ञासा क्या है?
“पर दुःखभंजक महा सम्राट विक्रम का सुयश किस धर्म का सुफल है?” नरेश की स्पर्धा कहाँ है यह छिपाने का कोई प्रयास उन्होंने नहीं किया।
‘वत्स ! सुयश धर्म का फल अवश्य है, किन्तु धर्म का वही परम प्रयोजन नहीं है।’ आचार्य का स्वर ऐसा स्नेह स्निग्ध हो गया, जैसे अपने शिशु को वे समझा रहे हों। ‘सुयश शरीर के नाम का और नश्वर शरीर का नाम-क्या सचमुच तुम्हारा नाम है? राजन ! नाम का सुयश क्या अज्ञान नहीं है? इसका प्रलोभन तुम त्याग सकते हो ।
‘प्रभु नरेश ने सिर झुका लिया। वे गहन चिंतन में डूब जाते किन्तु इसका भी समय उन्हें मिलना नहीं था।
“भगवन् ! यह बेताल प्रणाम करता है।” दूर से घन-गम्भीर स्वर सुनाई पड़ा। “बेताल भट्ट।” आचार्य उठ खड़े हुए और उन्होंने आगे जाकर बलपूर्वक उज्जयिनी के महामंत्री को उठाया-”नीतिशास्त्र के प्रचण्ड पंडित को इस प्रकार प्रणिपात करने की जरूरत नहीं।”
“यह तो अधिकार है इस जन का।” बेताल ने कहा “पुत्र के अधिकार को पिता भी उससे छीन नहीं सकता।”
‘तुम से व्यवहार सम्बन्धी विवाद करके भला कोई विजयी हो सकता है ? आचार्य ने हाथ पकड़ कर बेताल भट्ट को समीप के आसन पर बैठाया।’ शकारि सकुशल तो हैं ?
‘श्री चरणों के दर्शन की उत्कण्ठा लिए वे अनुमति की प्रतीक्षा कर रहे हैं। इस बात ने कौशल नरेश को जितना चौंकाया आचार्य उतना नहीं चौंके।
‘शकारि के शील की समता नहीं है। आचार्य ने अपने छात्रों से कहा। उन्हें ले आओ।
‘भगवन् महाकाल का प्रतिहार विक्रम प्रणिपात कर रहा है। सम्राट भूमि पर गिरे और आचार्य उठाने उन्हें वेग से आगे बढ़े।
‘शकारि ! तुम बहुत समय से आये।’ कुशल प्रश्न समाप्त हो जाने पर आचार्य ने कहा इस बूढ़े ब्राह्मण को तुमने एक अनपेक्षित उत्तर देने से बचा लिया। कौशल नरेश जानना चाहते हैं तुम्हारा सुयश किस धर्माचरण का परिणाम हैं ?
‘मैं सम्राट का अनुचर हूँ । कौशल का राज्य ही नहीं राजधानी की प्रतिष्ठा भी जिनके पुण्य करों से हुई उन्हीं शकारि के सम्मुख अपनी स्पर्धा नरेश को लज्जा जनक लगी।
‘विक्रम धर्म कहाँ कर पाता है प्रभु ? सम्राट ने सरल श्रद्धाभरित स्वर में कहा। फिर सुयश तो भगवान महाकाल का है इसमें मेरा क्या ?
अपने सम्राट के उत्तर से बेताल भट्ट की आँखों में प्रसन्नता झलकी। किन्तु आचार्य ने कहा ‘शकारि । तब तुम धर्म का प्रयोजन क्या मानते हो।
धर्म का पथ तो पीतराग महापुरुषों के द्वारा प्रशस्त होता है। विक्रम गम्भीर स्वर में कह रहे थे। वैसे मैंने धर्म का एक ही प्रयोजन जाना है-अन्तःकरण अर्थ और काम के लोभ से कलुषित न हो और वह महाकाल के चरणों में अनुराग के योग्य बने।
“धर्म से जो सुयश मिलता है ?” कौशल नरेश ने पूछ लिया। ‘अज्ञजन सत्कार्य के परम प्रेरक को न देखकर देह की प्रशंसा करते हैं और उस प्रशंसा पर पुलकित भी अज्ञ ही होते हैं। सम्राट ने नरेश की ओर सस्नेह देखा।
यह चर्चा चल रही थी कि चरणाद्रि के राजकवि ने आतुरतापूर्वक प्रवेश किया। लेकिन एक पल में वे ठिठक गए। उन्हें इसकी कोई सम्भावना नहीं थीं कि आचार्य के समीप स्वयं सम्राट विक्रमादित्य अपने महामंत्री के साथ होंगे। केवल कौशल नरेश के आने का समाचार उन्हें मार्ग में मिला था।
वत्स! इतनी व्याकुलता किसलिए ?’ आचार्य ने पूछा।
‘अभी आपने जिनको भेजा है वे अन्न-जल का त्याग किए बैठे हैं। पता नहीं कब तक वे इस तरह रहेंगे।
“कौन हैं वे महाभाग ?” शकारि ने सहज ढंग से आचार्य की ओर देखते हुए प्रश्न किया।
“कौशल का सेनाध्यक्ष था वह ।” आचार्य ने बतलाया। “हम उसे देखेंगे।” आचार्य के साथ सभी उठ खड़े हुए।
थोड़ी ही देर बाद सभी कौशल के सेनापति के
पास पहुँच गए। उसने आचार्य के साथ सभी को प्रणाम किया। वह कह रहा था। ‘मेरे अपराध से ही मेरा सर्वस्व छीना गया । आज मैं कंगाल हूँ और अब किसी से कुछ नहीं लेना चाहता। जो औढरदानी है उसी से अर्थ लेना है।
‘उससे तुम्हें अर्थ लेना है ?’ आचार्य ने रोका इतने मूर्ख हो तुम कि उस मोक्षदाता से मिट्टी के डेले लेने के लिए मचल रहे हो ?
‘तब?’ मेरा यह उपवास रूप धर्म क्या मुझे श्रेष्ठ सम्पत्ति नहीं दे सकता ? सेनाध्यक्ष ने कहा, न दे। उपवास करके प्राण त्याग तो मैं कर ही सकता हूँ।
तुम्हारा कुछ नहीं छीना गया है। कौशल नरेश ने कहा। केवल तुम्हें राजसेवा से मुक्त किया गया है।
‘मेरा कुछ नहीं छीना गया ?’ वह चौंका। उसका आवेश शिथिल होने लगा। दुःख सर्वस्व चले जाने का दुःख गया तो उसके आवेश का वेग भी चला गया।
‘तुम यहाँ यथेच्छ दान-पुण्य कर सकते हो। तुम्हारी सम्पत्ति अब भी तुम्हारी है।’ नरेश ने आश्वासन दिया।
‘तब मैं उससे धर्म करूंगा। सेनाध्यक्ष शान्त हुआ। उसने आचार्य के चरण पकड़ लिए भगवन् आप .......!
‘तुम किसलिए धर्म करोगे ?’ आचार्य ने पूछा। ‘तुम देखते ही हो कि धर्म के संकल्प मात्र ने तुम्हारी समस्त सम्पत्ति दिला दी है, किन्तु दान-व्रत-यज्ञादि धर्म कार्य संकल्पपूर्वक ही होते हैं।
‘अक्षय सम्पत्ति की प्राप्त के लिए ।’ सेनापति का निश्चय दो क्षण में स्थिर हो गया।
‘समस्त पृथ्वी का सुवर्ण और सारी रत्नराशि तुम्हें मिल जाय कोई उपयोग है उसका तुम्हारे लिए ?’ आचार्य के नेत्र उसके मुख पर स्थिर हो गए।
‘नहीं है।’ सेनाध्यक्ष को निर्णय करने में कुछ क्षण लगे। किन्तु तब धर्म का प्रयोजन क्या है ?’
‘धर्म का प्रयोजन है-मनुष्य में देवत्व का उदय।
और यह तभी सम्भव है-जब मनुष्य वासना तृष्णा और अहंता से मुक्त हो जाय।’
धर्म से मोक्ष ? बेताल भट्ट चौंके।
धर्म का परम प्रयोजन है अन्तःकरण की शुद्धि।
आचार्य ने उनकी ओर देखा । अन्तःकरण के शुद्ध
होने पर ही ज्ञान अथवा भगवत्प्रेम का उदय होता है।
आचार्य के कथन पर सभी के चेहरों पर सन्तोष झलका उन सभी के कदम उनका अनुगमन करने लगे।
चलो गुरुदेव के सपने, सजाने की शपथ ले लें, सुखी सुरधाम-सी वसुधा, बनाने की शपथ ले लें।
उठाकर हाथ में माटी कि जैसे दक्षिणेश्वर की, शपथ ली देशभक्तों ने, न चिंता की कभी सिर की,
यहाँ गुरुदेव की हम जन्मभू की , रज लिये कर में, गहन दुष्वृत्तियाँ जग से मिटाने, की शपथ ले लें।
जहाँ पर रूढ़ियों , अज्ञान का गहरा अँधेरा हो, नहीं देखा जिन्होंने ज्ञान का, उज्ज्वल सवेरा हो,
हृदय में स्नेह भरकर, ज्योति लेकर ज्ञान की स्वर्णिम, स्वयं जलकर धरा को जगमगाने की, शपथ ले लें।
पताका देव-संस्कृति की, स्वयं हर देश में लेकर, छवि हर रोग की गुरु के, सहज सन्देश में लेकर,
नगर और गाँव में, घर में, डगर के बीच जाएँगे, अलख गुरुदेव का घर-घर जगाने, शपथ ले लें।
भयंकर आग फैली है, जरा सी देर घातक है, हवा बिलकुल विषैली है, जरा सी देर घातक है,
इसी से, लोक-सेवा में, लगाएँगे समय अपना, पुनः इस विश्व-वसुधा को, सजाने की शपथ ले लें।
धरा का हर सुमन महका करे, इतना समय देंगे, सृजन की भावना सब में भरे, इतना समय देंगे,
न दे पाये समय, तो लोक-मंगल के लिये अपने, स्वयं साधन, व धन-प्रतिभा लगाने की शपथ ले लें।
(शचीन्द्र भटनागर)
भौतिक जगत में शक्ति के आधार पर ही हलचलों की गति’-प्रगति दिखाई देती है और उसके सहारे अभीष्ट उपलब्धियाँ हस्तगत होती हैं। उसी प्रकार आत्मिक उपलब्धियाँ हस्तगत होती हैं। उसी प्रकार आत्मिक क्षेत्र में श्रद्धा की शक्ति अकूत है। सामान्य लोक व्यवहार में भी दृढ़ता, श्रद्धा-विश्वास के आधार पर ही आती है। व्यक्तित्व विकास का आधार श्रद्धा और विश्वास तो है ही, उसके अभाव में उत्कर्ष की दिशा में आग बढ़ना भी संभव नहीं।
श्रद्धा और विश्वास के बिना भौतिक जीवन में निर्वाह नहीं। अध्यात्म क्षेत्र में भी श्रद्धा और विश्वास को प्राण कहा गया है। आदर्श और सिद्धान्तों का परिपालन हानि होते हुए भी श्रद्धा और विश्वास व उच्चस्तरीय मान्यताओं के बल पर किया जाता है। ईश्वर और आत्मा भले ही दिखाई नहीं देते अथवा उनका अस्तित्व अभी तक किसी प्रयोगशाला में सिद्ध नहीं किया जा सका है, किन्तु फिर भी उनके प्रति श्रद्धा व आस्थाओं में कोई कमी नहीं है। मनुष्य की आदतें, मान्यताएँ, व्यक्तित्व और संस्कार श्रद्धा की परिपक्वता के अतिरिक्त और कुछ नहीं। भिन्न-भिन्न व्यक्तियों, सम्प्रदायों की मान्यताएँ रीति-रिवाज चिरकाल तक सोचे गये , माने गये, व्यवहार में लाए गये अभ्यासों की परिणति ही है।
गीता में मनुष्य के व्यक्तित्व का विकास उसकी श्रद्धानुरूप होना बताया गया है। रुचि, विश्वास और आस्थाओं के अनुरूप ही उसके गुणों का विकास होता है। स्वभाव में सम्मिलित हुई गतिविधियाँ जब आदतें बन जाती हैं और अचेतन की गहराई तक उतर जाती हैं, तब वे तर्क की सीमा लाँघ जाती हैं और कितनी ही बार हानिकारक सिद्ध होने पर वे छुड़ाए नहीं छूटतीं। मनोवैज्ञानिक का कथन सही है कि श्रद्धा की शक्ति बुद्धि से हजार गुनी अधिक है। यों सारा लोक व्यवहार तर्क के आधार पर चलता है और बुद्धि बल के सहारे विभिन्न प्रयोजन पूरे होते हैं, पर जहाँ सिद्धान्तों का और स्वार्थों का प्रश्न आता है वहाँ पूर्व मान्यताओं का पलड़ा भारी पड़ता है। वहाँ तर्क वितर्क की तिकड़म सफल नहीं हो पाती।
श्रद्धा जब सिद्धान्त एवं व्यवहार में उतरती है तो उसे निष्ठा कहते हैं। बलवती श्रद्धा के आरोपण अभिसिंचन से पत्थर से देवता का उदय होने की बात सत्य है। एकलव्य ने मिट्टी की द्रोण प्रतिमा में श्रद्धा व्यक्त कर उतनी धनुर्विद्या प्राप्त कर ली थी जितनी कौरव पाण्डव जीवन्त द्रोणाचार्य से न कर सके। मीरा, सूर, तुलसी गहन श्रद्धा के बल पर आध्यात्म क्षेत्र के प्रकाश स्तम्भ बनकर आज भी कोटि-कोटि जनसमुदाय का मार्गदर्शन करते हैं। साधना क्षेत्र में श्रद्धा अपरिमित शक्ति चमत्कारी परिणाम प्राप्त करता है। कर्मकाण्डों की भरमार रहते हुए भी श्रद्धा के अभाव में साधनाएँ निष्फल रह जाती हैं।
“द बेरायटीज आफ रिलीजियस एक्सपीरियन्सेस” पुस्तक के विद्वान लेखक श्री विलियम जेम्स ने लिखा है कि सन्त, सुधारक और शहीद अटूट श्रद्धा और दृढ़ विश्वास के बलबूते ही समाज सेवा, और त्याग, बलिदान के गुरुत्तर कार्य के लिए समर्पित होते हैं और अनेकों को इस ओर चल पड़ने की दिशा दे जाते हैं। आधुनिक युग में महात्मा गाँधी इसका प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। गाँधीजी की सघन आस्था ने आत्मिक शक्ति के उस चमत्कार को जन्म दिया जिसके सामने सहस्रों अणु बमों की शक्ति भी नगण्य है। इसके पूर्व समर्थ रामदास ने भी शिवाजी की उस आस्था को उभारकर देश को कठिन परिस्थितियों से उबारा था। संत और महामानव समय-समय पर आकर मनुष्य की इस सोई शक्ति को जगाकर जनकल्याण में लगाते रहते हैं। बुद्धि को यथा सम्भव समाधान मिलने पर ही श्रद्धा की स्थिरता बलवती और सुदृढ़ हो सकती है। जिस किसी से सुन समझकर भावावेश में उथले आधारों पर उठाई गई आस्था की दीवार का डांवाडोल होना सुनिश्चित है। श्रद्धा के परिपक्व अथवा चिरस्थाई बनाने का आधार है कि जिस तथ्य पर विश्वास बनाने का आधार है कि जिस तथ्य पर विश्वास जमाया जाय उसकी यथार्थता एवं सघन तथ्यों और तर्कों के आधार पर समझ सकने का अवसर दिया जाय। शंकाशील मन में श्रद्धा का स्थिर रहना सम्भव नहीं। अतः लक्ष्य के निर्धारण और उसके प्रतिनिष्ठा, आस्था, की सघनता, श्रद्धा को बलवती बनाने के लिए आवश्यक हैं।
सन्त इमर्सन के अनुसार श्रद्धा से बढ़कर कोई शक्ति नहीं। विश्वास से बढ़कर कोई साधना नहीं। सुप्रसिद्ध मनीषी डब्लू. बी. कोनार लिखते हैं कि युग की विशेष प्रेरणाएँ प्रायः श्रद्धावान, भावनाशील अंतःकरणों को छू सकने में समर्थ होते हैं। दास प्रथा की करुण कहानी हैरियट स्टो ही सुना सकने में सफल हो सकीं, जब कि उनके पूर्व और उपरान्त में अनेकों लेखक कहानीकार कलाकार हुए हैं। किन्तु उन सभी में दासों के प्रति बरते गये अमानवीय अत्याचारों के प्रति संवेदनाएँ, सहानुभूति और आत्मीयता उतनी नहीं थी जितनी कि श्रीमती स्टो के संवेदनशील हृदय में।
हनुमान, अर्जुन , बुद्ध, गाँधी, सूर , तुलसी, कबीर, मीरा साधनों में इतने बढ़े-चढ़े नहीं थे। किन्तु बुद्धिबल, धनबल और जनबल से परिपूर्ण लोगों की अपेक्षा वे इतना सब कुछ अटूट श्रद्धा के बल पर ही कर सकने में समर्थ हुए। श्रद्धा की सामर्थ्य इसी से आँकी जा सकती है।
एक था कृपण और एक थे सिद्ध पुरुष । कृपण बार-बार सिद्ध के पास जाता और कोई बड़ी धनराशि दिलाने के लिए गिड़गिड़ाया करता। सिद्ध पुरुष को मौज आ गई। उनने झोली से निकाला पारस पत्थर और उसे कृपण के हाथ में, पकड़ाते हुए कहा “यह पत्थर सात दिनों तक तुम्हारे काम आयेगा। लोहे से स्पर्श कराकर जितना चाहे सोना बना लेना।” कृपण बहुत प्रसन्न हुआ। एक ही दिन में करोड़पति बनने के सपने देखने लगा। पैर जमीन पर कहाँ पड़ते खुशी से फूला नहीं समा रहा था।
घर पहुँचने पर लोहा खरीदने की योजना बनाई। अधिक लोहा-सस्ता लोहा, यह दो प्रश्न ही प्रमुख बन गये। कृपणता पूरे जोर-शोर से उभर आई। खरीद के लिये कहाँ जाया जाय ? इस योजना में जुट गया।
दौड़−धूप चली। ज्यादा-सस्ता अधिक मात्रा की तलाश में एक बाजार से दूसरे में , दूसरे से तीसरे में दौड़ लगी , पर कोई सौदा पटा नहीं।
इतने में एक सप्ताह गुजर गया। होश तो तब आया, जब पारस का प्रभाव निष्फल हो गया था। मणि महात्मा को लौटाते हुए कृपण की उदासी देखते ही बनती थी।
त्रिकालदर्शी महात्मा ने कहा “मूर्ख यह जीवन भी पारस मणि ही है। इसका तत्काल श्रेष्ठतम उपयोग करने वाले महान होते हैं-अमूल्य स्वर्ण बन जाते हैं और जो लालच में निरन्तर निरत रहकर अवसर को चुका देते हैं, वे तेरी तरह खाली हाथ रहते हैं और निराश होते हैं।”
तीन माह के अंतराल के बाद, जिस अवधि में देव-संस्कृति संबंधी विशिष्ट सामग्री प्रस्तुत की गयी, अमृतवाणी प्रसंग पुनः आरंभ किया जा रहा है। प्रस्तुत अंक में 31 जनवरी 1979 को शाँतिकुँज परिसर में दिया गया प्रवचन अविकाल उसी रूप में दिया जा रहा है।
गायत्री मंत्र हमारे साथ-साथ बोलिए-
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।
देवियों और भाइयों ! देवताओं के अनुग्रह की बात आप सबने सुनी होगी। देवता नाम ही इसलिए रखा गया है कि वे दिया करते हैं। प्राप्त करने की इच्छा से कितने ही लोग उनकी पूजा किया करते हैं, उपासना करते हैं, भजन करते हैं कि देवता हमको कुछ देकर जायेंगे। क्या यह बात सही है या गलत है, आइये इस पर विचार करें।
देवता देते तो हैं, इसमें कोई शक नहीं है। अगर वे देते न होते तो उनका नाम देवता न रखा गया होता। देवता का अर्थ ही होता है-देने वाला। देने वाले से अगर-माँगने वाला कुछ माँगता है तो कोई वेजा की बात नहीं है। पर विचार करना पड़ेगा कि आखिर देवता देते क्या चीज हैं? देवता वही चीज देते हैं जो उनके पास है। जिसके पास जो चीज होगी, वही तो दे पायेगा। देवता के पास सिर्फ एक चीज है और उसका नाम है-देवत्व। देवत्व कहते हैं-गुण, कर्म और स्वभाव-तीनों की अच्छाई को-श्रेष्ठता को । इतना देने के बाद में देवता निश्चिन्त हो जाते हैं, निवृत्त हो जाते हैं और कहते हैं कि जो हम आपको दे सकते थे हमने वह दे दिया। अब आपका काम है कि जो चीज हमने दी है उसको जहाँ भी आप मुनासिब समझें, वहाँ इस्तेमाल करें उसी किस्म की सफलता पायें।
दुनिया में सफलता एक चीज के बदले में मिलती है और वह है-आदमी का उत्कृष्ट व्यक्तित्व। इससे कम में कोई चीज नहीं मिल सकती। अगर कहीं से किसी ने घटिया व्यक्तित्व की कीमत पर किसी तरीके से अपने सिक्के को भुनाये बिना अपनी योग्यता का सबूत दिये बिना, परिश्रम के बिना गुणों के अभाव में कोई चीज प्राप्त कर ली है तो वह उसके पास ठहरेगी नहीं । शरीर में हजम करने की ताकत न हो तो जो खुराक आपने खाई है वह आपको हैरान करेगी, परेशान करेगी। इसी तरह सम्पत्तियों को-सुविधाओं को हजम करने के लिए गुणों का माद्दा नहीं होगा तो वे आपको तंग करेंगी परेशान करेंगी। अगर गुण नहीं है तो जैसे-जैसे दौलत बढ़ती जायेगी वैसे-वैसे आपके अन्दर दोष, दुर्गुण, बढ़ते जायेंगे, व्यसन बढ़ते जायेंगे। अहंकार बढ़ता जायेगा और आपकी जिन्दगी को तबाह कर देगा।
देवता क्या देते हैं ? देवता हजम करने की ताकत देते हैं जो दुनियावी दौलत या जिन चीजों को आप माँगते हैं जो आपको खुशी का वायस मालुम पड़ती हैं। उन सारी चीजों को हजम करने के लिए विशेषता होनी चाहिए। इसी का नाम है-देवत्व। देवत्व अगर प्राप्त हो जाता है तो फिर आप दुनिया की हर चीज से थोड़ी से थोड़ी चीजों से लेकर फायदा उठा सकते हैं। अगर वे न भी हों तो भी अच्छा है, यदि न हों जायँ तो भी कोई हर्ज नहीं है। लेकिन अगर आप इस बात के लिए उतावले हैं कि जैसे भी हम पिछड़े हैं वैसे ही बने रहें, तो फिर कुछ कहना संभव नहीं है।मनुष्य के शरीर में ताकत होनी चाहिए, अकल होनी चाहिए पर उस पर समझदारी का नियंत्रण भी होना चाहिए। समझदारी का नियंत्रण न होने से वह आग में घी डालने, ईंधन डालने के तरीके से वह सिर्फ दुनिया में मुसीबतें ही पैदा करेगी। देवता किसी को दौलत देने की गलती नहीं कर सकते । अगर देते हैं तो इसका मतलब है कि तबाही कर रहे हैं। इनसान को अगर भगवान कुछ देते हैं विशेषतायें देते हैं, नयी उमंगे देते हैं। इनसानियत उस चीज का नाम है जिसमें आदमी का चिन्तन, दृष्टिकोण महत्वाकाँक्षाएँ और गतिविधियाँ ऊँचे स्तर की हो जाती हैं। इनसानियत एक बड़ी चीज है।
मनोकामनायें पूरी करना खराब बात नहीं है, पर शर्त एक ही है कि यह किस काम के लिए किस चीज के लिए माँगी गयी है ?
अगर साँसारिकता के लिए माँगी गयी हैं तो उससे पहले यह जानना जरूरी है कि उस दौलत को हजम कैसे कर सकते हैं । उसे खर्च कैसे कर सकते हैं ? मनुष्य भूल कर सकता है, पर देवता भूल नहीं कर सकते। देवता आपको चीजें नहीं दे सकते जैसा कि मेरा अपना ख्याल है। देवताओं के संपर्क में आने वाले को भौतिक वस्तुएँ नहीं मिली। क्या मिला है ? आदमी को गुण मिले हैं। देवत्व मिला है। सद्गुणों के आधार पर आदमी को विकास करने का मौका मिला है। गुणों के विकसित होने के पश्चात् उन्होंने वह काम किये हैं जिन्हें सामान्य बुद्धि से काम करते हुए भी उन्नति के ऊँचे शिखर पर जा पहुँच सकता है। चाहे वह साँसारिक हो अथवा आध्यात्मिक । संसार और अध्यात्म में कोई फर्क नहीं पड़ता। गुणों के इस्तेमाल करने का तरीका भर है। गुण अपने आप में शक्ति के पुँज हैं इन्हें कहाँ इस्तेमाल करना चाहते हैं यह आपकी इच्छा की बात है।
सफलता साहसिकता के आधार पर मिलती है। यह एक आध्यात्मिक गुण है। इसी आधार पर योगी को भी सफलता मिलती है, ताँत्रिक को भी और महापुरुषों को भी। हर एक को इसी साहसिकता के आधार पर सफलता मिलती है, वह डाकू ही क्यों न हो , आप योगी हैं तो अपनी हिम्मत के सहारे फायदा उठायेंगे, नेता है, महापुरुष हैं तो भी इसी आधार पर सफलता पायेंगे। यह एक दैवी गुण है। इसे आप अपनी इच्छा के अनुसार इस्तेमाल कर सकते हैं, यह आप पर निर्भर है। इनसान के भीतर जो विशेषता है वह गुणों की विशेषता है। देवता अगर किसी आदमी को देंगे तो गुणों की विशेषता देंगे-गुणों की सम्पदा देंगे। गायत्री माता, जिनकी आप उपासना करते हैं, अनुष्ठान करते हैं, अगर कभी कुछ देंगी तो गुणों की विशेषता देंगी। गुणों से क्या हो जायेगा ? गुणों से ही तो होता है सब कुछ। भौतिक अथवा आध्यात्मिक जहाँ कहीं भी आदमी को उन्नति मिली है, केवल गुणों के आधार पर मिली है। श्रेष्ठ गुण न हों तो न भौतिक उन्नति मिलने वाली है न आध्यात्मिक उन्नति मिलने वाली है।
आदमी जितना समझदार है। नासमझ उससे भी ज्यादा है। यह भ्रान्ति न जाने क्यों आध्यात्मिक क्षेत्र में घुस पड़ी हैं कि देवता मनोकामना पूरी करते हैं, पैसा देते हैं, दौलत देते हैं, बेटा देते हैं, नौकरी, देते हैं। इस एक भ्रान्ति ने इतना ज्यादा व्यापक नुकसान पहुँचाया है कि आध्यात्मिक का जितना बड़ा लाभ, जितना बड़ा उपयोग था, संभावनायें थीं उससे जो सुख होना संभव था, उस सारी की सारी संभावना को इसने तबाह कर दिया। देवता आदमी को एक ही चीज देंगे और उनने एक ही चीज हर एक को दी है, प्राचीन-काल के इतिहास में और भविष्य में भी। देवता अगर जिन्दा रहेंगे, भक्ति अगर जिन्दा रहेंगे, भक्ति अगर जिन्दा रहेगी, उपासना-क्रम यदि जिन्दा रहेगा तो एक ही चीज मिलेगी और वह है-देवत्व के गुण। देवत्व के गुण अगर आ जायँ तब आप जितनी सफलतायें चाहते हैं, उससे हजारों-लाखों गुनी सफलतायें आपके पास आ जायेंगी।
आप क्या चाहते हैं ? आपको देवत्व के स्थान पर तीन-चार सौ रुपये की नौकरी दिलवादें कोई देवता, संत या आशीर्वाद या कोई मंत्र तो वह ना चीज हो सकती है। लेकिन अगर देवता देवत्व प्रदान करते हैं, तो वह नौकरी आपके लिए इतनी कीमती की करवा देंगे कि आप निहाल हो जायेंगे। विवेकानन्द, रामकृष्ण परमहंस के पास नौकरी माँगने थे, पर मिला क्या-देवत्व, भक्ति, शक्ति और शान्ति । यह क्या चीज थे-गुण । मनुष्य के ऊपर कभी संत कृपा करते हैं। संतों ने कभी किसी को दिया है तो उनने एक ही चीज दी है-अंतरंग में उमंग, एक ऐसी उचंग जो आदमी को घसीट कर सिद्धान्तों की ओर ले जाती है। जब आदमी के ऊपर सिद्धान्तों का नशा छाता है, तब उसका मैग्नेट, उसका आकर्षण, उसकी प्रामाणिकता इस कदर सही हो जाती है कि हर आदमी खिंचता हुआ चला जाता है और हर कोई सहयोग दोनों मिला । यह किसने दी थी-काली ने। काली अगर किसी को कुछ देगी तो यही चीज देगी। अगर दुनिया में दुबारा कोई रामकृष्ण जिन्दा होंगे या पैदा होंगे, तो इसी प्रकार का आशीर्वाद देंगे जिससे आदमी के व्यक्तित्व विकसित होते चले जायँ। व्यक्तित्व अगर विकसित होगा तो जिसको आप चाहते हैं वह सहयोग बरसेगा। सहयोग माँगा नहीं जाता-बरसता है। आदमी फेंकता जाता है और सहयोग बरसता जाता है। देवत्व जब आता है तब सहयोग बरसता है। बाबा साहब आमटे का उदाहरण आपके सामने हैं जिन्होंने कुष्ठ रोगियों के लिए, अपंगों के लिए अपना सर्वस्व लगा दिया। यह क्या है? सिद्धान्त है, आदर्श है, और वरदान है इससे कम में किसी के वरदान मिला है और न इससे ज्यादा में किसी को मिलेगा। भीख माँगने से न किसी को मिली है और न भविष्य में किसी को मिलेगी। देवता एक काम करते रहते हैं। क्या करते हैं? फूल बरसाते हैं। रामायण में कोई पचास जगह किस्से आते हैं जब देवताओं ने फूल बरसाया। फूल बरसाया। फूल क्या बरसाते हैं’-सहयोग बरसाते हैं, फूल किसे कहते हैं? सहयोग को कहते हैं। कौन बरसाता है? देवत्व जो इस दुनिया में अभी जिन्दा है। देवत्व ही इस दुनिया में जिन्दा था और जिन्दा ही रहने वाला है। देवत्व मरेगा नहीं। यदि हैवान या शैतान नहीं मर सका तो भगवान क्यों मरेगा ? इनसान क्यों मरेगा ? इनसान- इनसान को देखकर आकर्षित होता है और भगवान- भगवान को देखकर । देवता’- देवता को देखकर आकर्षित होता है और श्रेष्ठता को देखकर सहयोग आकर्षित होता है। पहले भी यही होता रहा था, अभी भी होता है और आगे भी होता रहेगा।
यहाँ मैं देवता की प्रशंसा कर रहा हूँ। देवता कैसे होते हैं? देवता ऐसे होते हैं जो आदमी के ईमान में घुसे रहते हैं और उसके भीतर से एक ऐसी हूक, एक ऐसी उमंग और एक ऐसी तड़पन पैदा करते हैं जो सारे जाल-जंजालों को मकड़ी के जाले की तरीके से तोड़ती हुई सिद्धान्तों की ओर-आदर्शों की ओर बढ़ने के लिए आदमी को मजबूर कर देती हैं। इसे कहते हैं देवता का वरदान । इससे कम में देवता का वरदान नहीं हो सकता। आदमी के भीतर जब गुणों की, कर्मों की, स्वभाव की विशेषतायें पैदा हो जाती हैं तो विश्वास रखिये तब उसकी उन्नति के दरवाजे खुल जाते हैं। गुणों के हिसाब से दुनिया के इतिहास में जितने भी आदमी आज तक विकसित हुए हैं, वे प्रत्येक व्यक्ति गुणों के आधार पर बढ़े हैं। देवता का वरदान गुण और चिन्तन की उत्कृष्टता है। संसार के महापुरुषों में से हर एक सफल व्यक्ति का इतिहास यही रहा है। सभी छोटे-छोटे खानदानों में पैदा हुए थे। छोटे-छोटे घरों में परिस्थितियों में पैदा हुए थे, लेकिन उन्नति के ऊँचे से ऊँचे शिखर पर ऊँचे से ऊँचे स्थान पर जरूर पहुँचते चले गये। कौन जा पहुँचे? लालबहादुर शास्त्री को ले लीजिये जिनके ऊपर देवता का अनुग्रह था। देवता के अनुग्रह की परख क्या है कि वे अनुग्रह करते हैं या नहीं ? एक ही अनुग्रह की पहचान है-जिम्मेदारी और समझदारी का होना, भक्त और भगवान के बीच में यही सिलसिला चला है और देवता तथा उसके उपासकों के बीच भी यही सिलसिला चला है। इनसान के यहाँ और भगवान के यहाँ एक हरी तरीका है।
पूजा क्यों करते हैं ? पूजा का मतलब एक ही है और वह है-इनसानी गुणों का विकास, इनसानी कर्म का विकास, इनसानी स्वभाव का विकास। आपने जो समझ रखा है कि पूजा के आधार पर यह मिलेगा-वह मिलेगा, यह सारी गलतफहमी इसीलिए हुई है। पूजा के आधार पर वस्तुतः दयानतदारी मिलती है, ईमानदारी मिलती है। आदमी को ऊँचा दृष्टिकोण मिलता है। अगर आप ने गलत पूजा की होगी तब आप भटक रहे होंगे। पूजा आपको इस एक ही तरीके से करनी चाहिए कि जो पूजा के लाभ आज तक इतिहास में मनुष्यों को मिले हैं, हमको भी मिलने चाहिए । हमारे गुणों का विकास, कर्म का विकास, चरित्र का विकास और भावनाओं का विकास होना चाहिए। देवत्व इसी का नाम है। देवत्व अगर आपके पास आयेगा तो आपके पास सफलतायें आयेंगी। हिन्दुस्तान के इतिहास पर दृष्टि डालिए, उसके पन्ने पर जो बेहतरीन आदमी दिखायी पड़ते हैं वे अपनी योग्यता के आधार पर नहीं अपनी विशेषता के आधार पर महान बने हैं। महामना मालवीय जी का उदाहरण सुना है आपने-कैसे शानदार व्यक्ति थे वे । उन पर देवताओं का अनुग्रह बरसा था और छोटे से आदमी से वे महान हो गये।
मित्रों! भगवान जब प्रसन्न होते हैं तो वह चीज नहीं देते जो आप माँगते हैं। फिर क्या चीज देते हैं ? वह चीज देते हैं जिससे आदमी अपने बलबूते पर खड़ा हो जाता है और चारों ओर से उनको सफलतायें मिलती हुई चली जाती हैं। सारे के सारे महापुरुषों को आप देखते चले जाइये, कोई भी आदमी दुनिया के परदे पर आज तक ऐसा नहीं हुआ है जिसको दैवी सहयोग न मिला हो। जिसको जनता का सहयोग न मिला हो, जिसको भगवान का सहयोग न मिला हो। ऐसे एक भी आदमी का नाम आप बतलाइये जिसके अन्दर से विशेषताएँ पैदा न हुई हों जिनसे आप दूर रहना चाहते हैं। जिनसे आप बचना चाहते हैं। जिनके प्रति आपका कोई लगाव नहीं है। वे चीजें जिनको हम आदर्शवाद कहते हैं-सिद्धान्तवाद कहते हैं, दुनिया के हिस्से का हर आदमी जिसको श्रेय मिलेगा वहीं उसे वैभव भी मिले बिना रहेगा नहीं। संत गरीब नहीं होते । वे उदार होते हैं और जो पाते हैं खाते नहीं दूसरों को खिला देते हैं। देवत्व इसी को कहते हैं।
आदमी के भीतर का माद्दा जब विकसित होता है तो बाहरी दौलत उसके नजदीक बढ़ती चली जाती है। उदाहरण क्या बताऊँ-प्रत्येक महापुरुष का यही उदाहरण है। प्रत्येक ईश्वर भक्त का प्रत्येक सिद्धान्तवादी का यही उदाहरण है। उन्हीं को मैं देव भक्त कहता हूँ। देवोपासक उन्हीं को मैं कहता हूँ। उन्हीं की देवभक्ति को मैं सार्थक मानता हूँ जो अपने गुणों के आकर्षण में खींच सकने में समर्थ हुए। आपकी भाषा में कहूँ तो देवता जब प्रसन्न होते हैं तो आदमी को देवत्व के गुण देते हैं। देवत्व के कर्म देते हैं, देवत्व का चिन्तन देते हैं और देवत्व का स्वभाव देते हैं। यह मैंने आपकी भाषा में कहा है। हमारी परिभाषा इससे अलग है। मैं यह कह सकता हूँ कि आदमी अपने देवत्व के गुणों के आधार पर देवता को मजबूर करता है। देवता पर दबाव डालता है, उसे विवश करता है और यह कहता है कि आपको हमारी सहायता करनी चाहिए और सहायता करनी पड़ती है। भक्त इतना मजबूत होता है जो भगवान के ऊपर दबाव डालता है और कहता है कि हमारा ड्यू है। आप हमारी सहायता क्यों नहीं करते? वह भगवान से लड़ने को अमादा हो जाता है कि आपको हमारी सहायता करनी चाहिए।
कामना करने वाले कभी भक्त नहीं हो सकते भक्त शब्द के साथ में भगवान की इच्छायें पूरी करने की बात जुड़ी रहती है। कामना पूर्ति आपकी नहीं भगवान की। भक्त की रक्षा करने का भगवान व्रत लिए हैं- ’योग क्षेमं वहाम्यहम्।’ यह सही है भगवान ने योग क्षेम को पूरा करने का व्रत लिया हुआ है, पर हविस पूरी करने का जिम्मा नहीं लिया, आपका योग और क्षेम अर्थात् आपकी शारीरिक आवश्यकताएँ पूरी करना उनकी जिम्मेदारी है। आपकी बौद्धिक-मानसिक आवश्यकतायें पूरी करना भगवान की जिम्मेदारी है, पर आपकी हविस पूरी नहीं हो सकती । हविसों के लिए, तृष्णाओं के लिए भागिये मत। यह भगवान की शान में , भक्त की शान में, भजन की शान में गुस्ताखी है-सबकी शान में गुस्ताखी है। भक्त और भगवान का सिलसिला इसी तरह से चलता रहा है और इसी तरीके से चलता रहेगा। भक्त माँगते नहीं दिया करते हैं। भगवान वास्तव में सिद्धान्तों का नाम है, आदर्शों का नाम है, श्रेष्ठताओं के समुच्चय का नाम है। सिद्धान्तों के प्रति-आदर्शों के प्रति आदमी के जो त्याग और बलिदान हैं, वस्तुतः यही भगवान की भक्ति है। देवत्व इसी का नाम है।
प्रामाणिकता आदमी की इतनी बड़ी दौलत है कि जनता का उस पर सहयोग बरसता है, स्नेह बरसता है, समर्थन बरसता है। जहाँ स्नेह समर्थन और सहयोग बरसता है , वहाँ आदमी के पास किसी चीज की कमी नहीं रह सकती । बुद्ध की प्रामाणिकता के लिए, सद्भावना के लिए, उदारता के लिए लोगों ने उनके ऊपर पैसा बखेर दिये। गाँधी जी की प्रामाणिकता और सद्भावना, श्रेष्ठ कामों के लिए उनकी लगन, उदारता लोकहित के तई थी व्यक्तिगत जीवन में श्रेष्ठता और प्रामाणिकता को लेकर चलने के बाद में वे भक्तों की श्रेणी में सम्मिलित होते चले गये। सारे समाज ने उनको सहयोग दिया, दान दिया और उनकी आज्ञा का पालन किया। लाखों लोग उनके कहने पर जेल चले गये, लाखों लोगों ने अपने सीने पर गोलियाँ खाईं। क्या यह हो सकता है? हाँ शर्त एक ही है कि आप प्रकाश की ओर चलें छाया आपके पीछे-पीछे चलेगी। आप तो छाया के पीछे-पीछे भागते हैं, छाया ही आप पर हावी हो गई है। छाया का अर्थ है माया। आप प्रकाश की ओर चलिए, भगवान की ओर चलिए, सिद्धान्तों की ओर चलिए। आदर्श और सिद्धान्त-इन्हीं का नाम हनुमान है, इन्हीं का नाम भगवान है।
मित्रों, जो हविस आपके ऊपर हावी हो गयी है उससे पीछे हटिये, तृष्णाओं से पीछे हटिए, तृष्णाओं से पीछे हटिये और उपासना के उस स्तर पर पहुँचने की कोशिश कीजिए जहाँ कि आपके भीतर से, व्यक्तित्व में से श्रेष्ठता का विकास होता है। भक्ति यही है। अगर आपके भीतर से श्रेष्ठता का विकास हुआ हो मैं आपको विश्वास दिलाता हूँ कि आपको जनता का वरदान मिलेगा, आपको अपनी आत्मा का वरदान मिलेगा-भगवान का वरदान मिलेगा। चारों ओर से इतने वरदान मिलेंगे कि जिसको पा करके आप निहाल हो जायेंगे। भक्ति का यही इतिहास है-भक्त का यही इतिहास है । भगवान के अनुग्रह का-गायत्री माता के अनुग्रह का यही इतिहास है यही इतिहास था और यही इतिहास रहेगा।अगर इस रहस्य को-सार को आप समझ लें, तो आपका यहाँ आना सार्थक हो जाय। आपका गायत्री अनुष्ठान सार्थक हो जाय, अगर आप इस सिद्धान्त को समझकर जायँ कि हमको सद्गुणों के विकास करने के लिए तपश्चर्या करायी जा रही है और अगर हमारी यह तपश्चर्या सही साबित हुई तो भगवान हमको यहाँ से विदा करते समय गुण, कर्म और स्वभाव की विशेषता देंगे और हमको चरित्रवान व्यक्ति के तरीके से विकसित करेंगे। चरित्रवान व्यक्ति जब विकसित होता है तब उदार हो जाता है, परमार्थ-परायण हो जाता है-लोकसेवी हो जाता है, जनहितकारी हो जाता है और वह अपनी क्षुद्र , स्वार्थ-संकीर्णताओं को कम करके लोकहित में-परमार्थ हित में अपने स्वार्थ को देखना शुरू कर देता है। आपकी अगर ऐसी मनःस्थिति हो जाय तो मैं कहूँगा कि आपने सच्ची उपासना की और भगवान का सच्चा वरदान पाया।
आप सच्चा वरदान पा करके निहाल हो सकते हैं जिससे कि आज तक के सारे के सारे भक्त निहाल होते रहे हैं। मैंने इसी रातें पर चलने की कोशिश की और अपने जीवन में प्रत्यक्ष रूप से भगवान के वरदानों को देखा और पाया। मैं चाहता था कि आप लोग जो इस शिविर में आये हैं जो वसंत के निकट जा पहुँचा है यह प्रेरणा लेकर जायँ कि हम पर भगवान कृपा करें कि हमको श्रेष्ठता के लिए, आदर्शों के लिए कुछ त्याग और बलिदान करने की चरित्र को श्रेष्ठ और उज्ज्वल बनाने के लिए प्रेरणा भीतर से मिले और बाहर से मिले । अगर ऐसी कुछ प्रेरणा आपको मिले तो उसके फलस्वरूप आप जो कुछ भी प्राप्त करेंगे , वह इतना शानदार होगा कि जिससे आप निहाल हो जायँ। आपका देश निहाल हो जाय, गायत्री माता निहाल हो जायँ, हम निहाल हो जायँ और यह शिविर निहाल हो जाय अगर आप इस तरह की कुछ प्राप्ति और उपलब्धि कर सके । आज की बात समाप्त॥ ॐ शान्ति॥
दुर्बुद्धि तथा दुष्प्रवृत्तियों से लोहा लेने के लिए सृजन-सेना कमर कसकर तैयार हो
महाकाल की परिवर्तन प्रक्रिया-जागरुकों के सिर पर चढ़ कर बोलती और उन्हीं के हाथों से अपना प्रयोजन पूरा करा लेती है। भूतकाल में यह तथ्य किस तरह क्रियान्वित होता रहा, इसकी कथा-गाथा अवतार लीला के नाम से इतिहास-पुराणों में अंकित है। जिन्हें इस परिवर्तन-प्रयास का प्रत्यक्ष अनुभव करना हो, वह पिछले दिनों शाँतिकुँज में सम्पन्न हुए ‘शपथ समारोह’ में शपथ ग्रहण करने वाले व्रतशील बलिदानियों के अन्दर उभरे-उमड़े उत्साह शौर्य का सूक्ष्म निरीक्षण करके जान सकते हैं। इनमें से एक बड़ा वर्ग वह है-जो तीन माह के लिए बाहर जाकर काम करने के लिए तैयार हुआ। यह ऐतिहासिक उपलब्धि युगावतार के संकल्प की प्रतीक है।
देव मानवों को जन्म देने वाली यह वीर भूमि हमेशा से कर्म योद्धा पैदा करती रही है। भटकाव के बावजूद देवत्व के पर्याप्त-संस्कार यहाँ अभी भी मौजूद हैं। भटकाव के कारण उद्बोधन का अभाव समझा जा सकता है। देव पुत्र पाण्डव तब तक वन-वन भटकते घूमते रहे, जब तक माता’-कुन्ती ने प्रेम और फटकार से सना विदुलोपख्यान नहीं सुनाया। धर्म की व्यापकता को पूजा-पत्री तक सीमित रखने वाले युधिष्ठिर को झकझोरते हुए कहा’-युधिष्ठिर ! धर्मात्मा होकर तुम कायरों जैसी बाते करते हो। तुम्हें सिर्फ अपनी चिन्ता है। सोचो इस देश की क्या दशा है ? यही रहा तो एक दिन समूची दुनिया पर श्मशान की नीरसता छा जाएगी। अनीति को सामने देखकर भी यदि उससे जूझने के लिए भुजाएँ नहीं फड़कती तो किस काम का वह पराक्रम-वह शौर्य। फिर क्या गाण्डीव की टंकार-अनीति के माथे पर महाबली भीम के गदाघात के सामने कौरवों के सरंजाम धरे रह गए। उत्पीड़कों का उन्मूलन उत्पीड़ितों को संरक्षण-इस महाव्रत को निभाने के लिए तत्पर पाण्डव अश्वमेध के यजन में संलग्न हो गए।
कुछ इसी प्रकार इन दिनों अपने आत्मीय परिजनों की समर्थ चतुरंगिणी सेना को “देव संस्कृति दिग्विजय” अभियान रचाने वाले दस दशाश्वमेध यज्ञों को सम्पन्न करने की जिम्मेदारी सौंपी जा रही है। जिसमें पहला अश्वमेध आयोजन वीर भूमि राजस्थान में 8-9-10 नवम्बर 92 को सम्पन्न होगा। दूसरे और तीसरे आयोजन नागपुर (महाराष्ट्र) व गुना (म.प्र.) में क्रमशः 6-7-8 जनवरी एवं 4-5-76 अप्रैल 93 को सम्पन्न किए जाएँगे। अन्य स्थानों के लिए तिथियाँ अभी निश्चित की जानी हैं। राजसूय, वाजपेय, नरमेध, सर्वमेध यज्ञों की तरह अपने देश में अश्वमेध यज्ञों की गौरवपूर्ण परम्परा रही है। जितने भी अवतार पुरुष हुए हैं, उन सभी ने अपनी-अपनी तरह के अश्वमेध किए हैं।
‘मेध’ शब्द ‘मेधा संगमनयोर्हि सायाँ च’ एकता परस्पर मिलन के अर्थों में प्रयोग किया जाता रहा है। ‘अश्व’ को शक्ति का मानदण्ड मानने की परम्परा आज भी है। इन अर्थों के अनुरूप अपनी शुरुआत के दिनों से ही अश्वमेध-ब्राह्मशक्ति और क्षात्रशक्ति के सम्मिलित प्रयोगों के रूप में आयोजित होते रहे हैं। विचारणा-क्रिया के बिना पंगु है। भावना-शौर्य के अभाव में निरी भावुकता बनकर रह जाती है। आतंक और अनीति सहते-सहते मरने वालों की संख्या तो हर युग में ढेरों होती है। पर प्रवाह को उलटने वाले बहादुर विरले होते हैं। अश्वमेध की इस महान शृंखला का प्रयोजन भावना और शौर्य से भरे-पूरे नर रत्नों का आह्वान है। इसके द्वारा जन-मानस में करुणा के दैवी प्रकाश के साथ महाकाल की हुँकार से उपजे प्रबल मन्यु को पैदा करना है जिससे कि बुद्धि और हृदय के क्षेत्र में घुसपैठ करने वाली दूषित वृत्तियों को उखाड़ कर सत्प्रवृत्तियों की रोपाई की जा सके। इसके अलावा इस विराट प्रयोग के माध्यम से पूज्य गुरुदेव की कारण सत्ता कुछ ऐसी अलौकिक प्रक्रियाएँ सम्पन्न कर रही है, जिसके परिणाम जीवन के सभी क्षेत्रों में तरह-तरह के अनुदानों-वरदानों के रूप में अनुभव किए जा सकेंगे। इस धर्मानुष्ठान में भाग लेने का पुण्य असाधारण है। ऐसे यज्ञों का दर्शन, उनकी परिक्रमा के लिए साधना करने, साधन प्रदान करने से ऋग्वेद के अनुसार दुर्लभ रत्नों(धन, धान्य, संतति, सद्गति) की प्राप्ति होती है। ऐसा सुयोग महाभारत के बाद पहली बार बन सका है।
दिग्विजय चक्रवर्ती-होती है। इन अश्वमेधों को सम्पन्न करने वाले सृजन सैनिकों की वाहिनी, अपने इस अभियान में इंच-इंच भूमि नाप लेगी। इसके माध्यम से ही घर-घर देव-संस्कृति की स्थापना सम्भव होगी। मनुष्य में देवत्व की झलक दिखाई पड़ने लगेगी। इस अभियान का प्रत्येक चरण अपने आप में शक्ति सामर्थ्य का स्रोत है।
1-उपासना-श्रद्धा सुसंस्कारिता की जननी है। उसका विकास उपासना से होता है। अन्तः चेतना जब विराट ब्रह्माण्ड से तादात्म्य करती है तो उसे सर्व शक्तिमान नियन्ता के दर्शन होते हैं। यहीं से आत्मानुशासन पैदा होता है। अपने आस-पास के वातावरण में भी श्रद्धा उपजती है। अतएव घरों में उपासना का वातावरण बनाया जाना युग-परिवर्तन की पहली आवश्यकता उसके लिए 2400 करोड़ मंत्र जप का एक ब्रह्मास्त्र अनुष्ठान भी इस अश्वमेध से जुड़ा हुआ रहेगा। लोग उसमें भावनापूर्वक भाग लें।
इसके लिए चौकी पर गायत्री माता का चित्र, जलपात्र, अगरबत्ती, पूजा उपकरण रखें जायँ। शरीर के पंच पवित्र संस्कार-पवित्रीकरण, आचमन, प्राणायाम, शिखाबन्धन न्यास सम्पन्न कर जप आरम्भ किया जाय। नियत संख्या पूरी होने पर सूर्य भगवान को जलपात्र से अर्घ्य चढ़ा दिया जाय। स्वयं को सूर्य शक्ति से जोड़ने-सविता देव को उपहार अर्पित करने का यह भावभरा प्रयोग है। शास्त्रकारों ने अश्वमेध योजकों के लिए से अनिवार्य ठहराया है। यह प्रयोजन देवस्थापना द्वारा पूर्ण किया जायेगा।
2-ग्राम प्रदक्षिणा-सूर्य की तरह ऊर्जा, हवा की तरह प्राण वायु बिखेरने वाले समयदानी परिव्राजकों की कई-कई टोलियाँ आयोजन करने वाले प्रान्त में तीन माह पहले से भेजी जा रही हैं। जो अपनी शक्तिपीठों-प्रज्ञा संस्थानों को केन्द्र बनाकर गाँव-गाँव साइकिलों से प्रव्रज्या करेंगी। साइकिल टोली जिस गाँव में पहुँचेगी वहाँ दिन में देवस्थापना-एवं सायंकाल-दीप यज्ञ सम्पन्न करेंगी। दीपयज्ञ के साथ देवदक्षिणा अनिवार्य रूप से जुड़ी है। उपस्थित जन एक बुराई छोड़ने एक अच्छाई ग्रहण करने की प्रतिज्ञा करेंगे। देवस्थापना कार्यक्रम में व्यक्तिगत मुलाकात-पारस्परिक चर्चा, प्रत्येक घर में श्रद्धा का बीज बोने जैसे तत्व समाए हैं। जिनके परिणाम-परिवारों में सुसंस्कारिता, आपसी सहयोग की बढ़ोतरी के साथ, प्रतिभाओं की ढूंढ़-खोज उन्हें तराशने खरीदने जैसे व्यापक प्रयोजन सिद्ध करने वाले होंगे।
अगली प्रातः युग संकीर्तन करते हुए टोली सदस्य और ग्रामवासी ग्राम प्रदक्षिणा (प्रभात फेरी) सम्पन्न करेंगे। बीच-बीच में नवयुग का सन्देश देने वाले नारों का उद्घोष होगा। ग्राम देवता की स्थापना का भूमि पूजन संस्कार होगा। इस पूजित स्थान से अश्वमेध यज्ञ के लिए मिट्टी जाएगी। इस तरह सारे प्रान्त के गाँवों से आई मिट्टी अश्वमेध यज्ञ के यज्ञ कुण्ड बनाने में प्रयुक्त होगी। हर गाँव में प्रज्ञामण्डल स्थापित होगा और गाँव वालों ने चाहा तो इस पूजित स्थान को पीछे संस्कार चबूतरे के रूप में बना दिया जाएगा। जहाँ भविष्य में बाल-संस्कार होते रहेंगे। ग्राम-वासियों को अश्वमेध का आमंत्रण देने के साथ उस एक गाँव के कार्यक्रम का समापन होगा। इस तरह प्रान्त का कोई गाँव न बचेगा-जहाँ देव-संस्कृति का आलोक न पहुँचा हो।
3-तीर्थ परिक्रमा- कार्यक्रम आयोजन प्रान्त के ही परिजन करेंगे। सारे प्रान्त में जितने भी तीर्थ हैं, उनकी एक परिक्रमा अंकित कर वहाँ की शाखाओं के लोग नारे लगाते हुए चलेंगे। पुराने व्यक्ति वापस होते जाएँगे-नए जुड़ते जाएँगे। इस तरह सभी तीर्थों का जल-रज संग्रह कर यज्ञ स्थल पर लाकर प्रतिष्ठित किया जाएगा।
4-संस्कार महोत्सव-अक्टूबर मास में शाँतिकुँज से निकल रही टोलियाँ प्रारम्भ में राजस्थान ही पहुँचेंगी और प्रान्त के सभी नगरों कस्बों में संस्कार महोत्सव के माध्यम से इस अश्वमेध यज्ञ में भाग लेने के लिए जन आमंत्रण देंगी। देवस्थापना-देव दक्षिणा कार्यक्रम यह टोलियाँ भी सम्पन्न करेंगी। इस तरह कोई नगर, कोई कस्बा बाकी न रहेगा, जहाँ देव-संस्कृति का उद्घोष न पहुँचा हो। 6 नवम्बर को तीर्थ परिक्रमा के साथ ये टोलियाँ भी यज्ञ स्थल पहुँच जाएंगी। कार्यक्रम सम्पन्न होने के बाद उनके अन्य प्रान्तों के लिए विदाई होगी। यही क्रम सभी प्रान्तों में अश्वमेध आयोजन से पूर्व रहा करेगा।
5-सहस्र कुण्डीय अश्वमेध- प्रथम आयोजन जयपुर में है। सवालाख याजक इस महायज्ञ में गायत्री मंत्र से 24 करोड़ आहुतियाँ देवताओं तक पहुँचाने वाले पुरोहित की संज्ञा दी गई है। वेद का कथन है, इस महायज्ञ से इतनी बड़ी ऊर्जा उत्पन्न होगी, जिसे कौरवी अनीति से जूझने वाले गाण्डीव, वृत्तासुर के आक्रामक प्रयासों को तहस-नहस करने वाले वज्र की उपमा दी जा सके। इससे न केवल आयोजन क्षेत्र में व्याप्त अनास्थाओं का जड़-मूल से विनाश होगा, बल्कि सत्प्रवृत्तियों का व्यापक विस्तार होगा। जहाँ सुमति तहं संपत्ति नाना की उक्ति से जा परिचित हैं वे इस महायज्ञ के पुण्य फल की सहज कल्पना कर सकते हैं। ऐसा आयोजन किसी ने देखा क्या सुना भी नहीं होगा।
6-समयदान-अंशदान- आयोजन जितना विराट है समय और साधनों का नियोजन भी उतने ही बड़े स्तर का चाहिए। इनसान अपनी हल्की-ओछी माँगों को पूरा करवाने के लिए भगवान का दरवाजा हर समय खटखटाता ही रहता है। पर भगवान ने आज धरती का भाग्य विधान नए सिरे से लिखने के लिए समर्थ हाथों और कागज-कलम स्याही-जुटाने वाले उदारचेताओं को गुहार लगाई है। समय-समय पर दैवी प्रयोजनों के लिए अपने जीवन के पल-पल की आहुति देने वाले शंकराचार्य उनके लिए साधनों की कमी न पड़ने देने का संकल्प करने वाले राजा माँधाता, महात्मा बुद्ध और बिम्बसार, राणाप्रताप और भामाशाह, महात्मा गाँधी तथा जमनालाल बजाज-जैसे समयदानियों-अंशदानियों के युग्म इस वीर भूमि में पैदा होते रहे हैं। आज भी ऐसे ही युग्मों की जरूरत है।
अश्वमेध प्रयोजन के लिए की जा रही समयदान और अंशदान की माँग को-युग की चुनौती के रूप में लिया जाना चाहिए। कौन कितना देगा ? प्रश्न इसका नहीं है। परन्तु जो जितनी समय आर साधन की आहुतियाँ इस महायज्ञ में अर्पित कर सकता है उन्हें अर्पित करने में कृपण न बनें। हरेक को अपनी श्रद्धा के फूल युगदेवता के चरणों में चढ़ाना ही चाहिए। इस आयोजन में सम्मिलित होने की भाव-भरी अपेक्षा सभी से है। अश्वमेध प्रयोजन में लगने वाले ‘राम काज कीन्हें बिना, मोहि कहाँ विश्राम का, सामयिक संस्करण प्रस्तुत करेंगे ऐसा विश्वास है।
इन दिनों हर किसी की आँख-राष्ट्र को बिखराव के तूफानों से घिरा देख रही हैं। इस आँधी में एकता के तिनके समेटे जा सकेंगे-किसी को कल्पना तक नहीं उठती। पंजाब-कश्मीर आसाम आँधी के इन्हीं हिचकोलों में झूल रहे हैं। अलगाव में तत्पर आतंक फैलाने में जुटे संगठनों की फेहरिस्त बनाई जाय तो एक पुस्तक के पृष्ठों का कलेवर शायद छोटा पड़ जाय। इन विपन्नताओं-विषमताओं का कारण एक ही है-राष्ट्रीय भावना का अभाव। इसके विकसित हुए बिना नागरिकों में संवेदना और साहस कदापि नहीं पैदा हो सकता, जिसके वशीभूत हो वे अपने स्वार्थों को “इदं राष्ट्रीय इदं न मम्” कहते हुए राष्ट्र देवता के लिए न्यौछावर कर सकें।
देश की प्राचीन स्वर्णयुगीन परिस्थितियों के पीछे नागरिकों की यही भावना थी। विख्यात इतिहासकार ए.एल.बाशम अपनी पुस्तक “द वन्डर देट वाज इण्डिया” (भारत जो आश्चर्य था) में लिखा है-यदि कहीं के निवासियों ने अपने राष्ट्र को जीवन्त जाग्रत और उपास्य माना है-तो वह भारत है। उनके अनुसार ‘अश्वमेध’ राष्ट्र उपासना की सर्वाधिक प्रचलित प्रक्रिया थी। जिसका अनुष्ठान शासक श्रोत्रिय (मनीषी) एवं जन समूह सभी मिलजुलकर करते थे। इसी के द्वारा न केवल राजनीतिक क्षितिज पर बल्कि आर्थिक बौद्धिक और सामाजिक दायरों में विकास के मापदण्ड स्थापित किए गए।
शतपथ ब्राह्मण 12/1/2/9/3 में अश्वमेध के इसी स्वरूप को स्पष्ट करते हुए कहा गया है-
“श्री वै राष्ट्रं । राष्ट्रं वै अश्वमेधः तस्मात् राष्ट्री अश्वमेधेन् यजेत् । सर्षाः वै देवताः ।अश्वमेधे अवयताः । तस्मात् अश्वमेधे थाजी सर्व दिशों अभिजयन्ति।”
अर्थात् वर्चस्व ही राष्ट्र है। राष्ट्र ही अश्वमेध है। राष्ट्र-परायण अश्वमेध का संयोजक सर्व विजयी होता है।
यजुर्वेद संहिता के 18 वें अध्याय के 22 वें मण्डल के मंत्र-अग्निश्चमे ....................... अश्वेंधश्चमे ..................... यज्ञेन कल्पन्ताम्॥ में राष्ट्र को अखण्डित होकर रहने की बात कही गई है। इसके अनुसार अश्वमेध यज्ञ का अनुष्ठान राष्ट्र की अखण्डता के लिये किया जाता था।
इतिहास के पन्ने इस बात की हामी भरते हैं कि जब-जब राष्ट्र परायण लोकहित में समर्पित शूरवीरों, भावनाशीलों के मन में राष्ट्र को संगठित समर्थ बनाने की ललक जगी- अश्वमेध यज्ञ सम्पन्न किए जाते रहे। पृथु, अम्बरीष, नहुष, दिलीप, रघु आदि शासकों वशिष्ठ-याज्ञवल्क्य, देवल आदि श्रोत्रियों द्वारा अश्वमेध सम्पन्न करने के विवरण इतिहास पुराणों में मिलते हैं। रावण के आतंक को समाप्त करने वाले भगवान राम द्वारा अश्वमेध रचाने के वर्णन से वाल्मीकीय रामायण के उत्तर काण्ड के 91 और 92 सर्ग भरे हैं। युधिष्ठिर-जनमेजय आदि के अश्वमेध पराक्रम का विवरण महाभारत में देखा जा सकता है। इन सभी प्रयासों में ‘राष्ट्रं वा अश्वमेधः। वीर्यवा अश्वः (शतपथ ब्राह्मण 13/1/6 अर्थात्-पराक्रम ही अश्व है, राष्ट्र को संगठित-समर्थ बनाना ही अश्वमेध है। उक्ति चरितार्थ होती दिखती है।
महाभारत काल के बाद अश्वमेध की प्रक्रिया उतनी सघन और व्यापक नहीं रही। परिणाम में राष्ट्र भी बिखरता टूटता-बँटता चला गया। ईसा के 185 वर्ष पहले राष्ट्र की इस दुर्दशा ने महर्षि पतंजलि को व्याकुल किया। उनके निर्देश से पुष्यमित्र का शौर्य जगा। संगठित राष्ट्र ने अश्वमेध का यजन किया पुष्यमित्र शुँग के बाद गुप्त वंश के द्वितीय सम्राट समुद्र गुप्त द्वारा 330 ईसवी में अश्वमेध में सम्पन्न करने का उल्लेख इतिहास में मिलता है। अश्वमेध यज्ञ का पूर्णाहुति के अवसर पर यशस्वी सम्राट ने ऋग्वेद के मंत्र
अहं राष्ट्री संगमनी वसूनाँ चिकितुषी प्रथमा यज्ञियानाम् ताँ माँ देवा व्यदधुः पुरुत्राभूरिस्थानाँ भूर्यावेशयम्न्तीम (ऋग्वेद 10/10/125)
“मैं राष्ट्र की अधीश्वरी (भारत माता) समृद्धियों का संगम परब्रह्म से अभिन्न तथा सभी देवताओं में प्रधान हूँ। पूरे परिवेश में मैं ही स्थित हूँ। नाना स्थानों में रहने वाले देवता-जो भी करते हैं मुझे जानकार करते हैं” को राष्ट्र मंत्र घोषित किया।
हिन्दू धर्म कोश के लेखक डा. राजवली पाण्डेय ने अपने ग्रन्थ के अश्वमेध प्रकरण में इसके स्वरूप और महत्व पर प्रकाश डालने वाले ढेरों शास्त्र प्रमाणों को उद्धृत किया है। आप स्तम्ब स्मृति के अनुसार साँस्कृतिक दिग्विजय के लिए लगभग चार सौ वीरों का वाहिनी निकलती थी। इसकी पूर्णाहुति के रूप में तीन दिन चलने वाला अश्वमेध यज्ञ सम्पन्न होता था। यज्ञ में सम्मिलित होने वाले याजक सविता देव को अपनी भावांज्जलि समर्पित करने वाले सूर्योपासक होते थे। ऐतरेय ब्राह्मण 8-20 में भी इस यज्ञ को सम्पन्न करने वाले महापुरुषों का विवरण मिलता है।
मध्ययुगीन अन्धकार और परतंत्रता की त्रासदी के दिनों में न केवल वैदिक प्रक्रियाएँ विलुप्त हुई बल्कि उनके अर्थ के अनर्थ निकाले गए। इन्हीं में से एक मेध का अर्थ हत्या या हिंसा किया जा सकता है। जबकि वेद के मर्मज्ञ विद्वान पं. दामोदर सातवलेकर ने मेध को मेधृ धातु से निष्पक्ष ‘मेध’ शब्द के लोगों में मेधा, एकता और प्रेम बढ़ाने के अर्थों में प्रयुक्त किया है। भाष्यकार महीधर ने यजुर्वेद 2 दामोदर सातवलेकर ने मेध को मेधृ धातु से निष्पक्ष ‘मेध’ शब्द के लोगों में मेधा, एकता और प्रेम बढ़ाने के अर्थों में प्रयुक्त किया है। भाष्यकार महीधर ने यजुर्वेद 23-40 का भाष्य करते हुए कहा है-तेष्वारण्याः सर्वे उत्स्रष्टव्या न तु हिंसया “अर्थात्-याज्ञिक क्रियाओं को सम्पादित कर पशुओं को जंगल छोड़ दिया जाता था उनकी हिंसा नहीं की जाती। यज्ञ का एक नाम है ‘अध्वर’ जिसका अर्थ होता है हिंसा रहित कृत्य। उसमें अग्नि का उपयोग तो होता है पर साथ ही पुरोहितों और याजकों में से प्रत्येक को यह भी ध्यान रखना पड़ता है कहीं समिधाओं या शाकल्य में कृमि-कीटक तो नहीं है और उस गर्मी से चींटी आदि प्राणियों की जीवन हानि तो नहीं हो रही। जहाँ इतनी सतर्कता के निर्देश हों वहाँ प्राणिवध की तो कल्पना सम्भव नहीं। वेद भगवान का तो स्पष्ट आदेश है-”पशुन पाहि गाँ मा हिंसी, अजा मा हिंसी। अपिमा हिंसी, इमं मा हिंसी द्विपाद पशुँ॥ माँ हिंसी रेकशंक पशुँ माँ हिंस्यात सर्वभूतानि। अर्थात् पशुओं की रक्षा करो, गाय को मत मारो, बकरी को मत मारो, भेड़ को मत मारो, दो पैर वाले (मनुष्य , पक्षी) को मत मारो। एक खुर वाले पशुओं (घोड़ा, गधा) को मत मारो, किसी भी प्राणी की हिंसा मत करो। पशुओं की हिंसा करना अच्छे मनुष्य का लक्षण नहीं है। इसी तथ्य को पंचतंत्रकार ने स्वीकार किया है-
एतेऽपि ये याज्ञिका यज्ञकर्मणि पशून व्ययापादयन्ति ते मूर्खाः परमार्थं श्रुतेर्न जानन्ति। तत्र किलैतयुक्तम् अजैर्यज्ञेषु यष्टव्यमिति अजास्तावद् ब्रीह्यः साप्तवार्षिकाः कथ्यनते न पुनः पशु विशेषाः। उक्तंच ‘वृक्षान् क्षित्वा पशूनहत्वा कृत्वारुधिर कर्दमम्। यद्येवं गम्यते स्वर्ग, नरकं केन् गम्यते॥”
अर्थात्-जो याज्ञिक यज्ञ में पशुओं की हत्या करते हैं, वे मूर्ख हैं। वे वस्तुतः श्रुति (वेद) के तात्पर्य को नहीं जानते। वहाँ जो यज्ञ करना चाहिए, उसमें अज से तात्पर्य व्रीह या पुराने अनाज विशेष से हैं न कि बकरों से।’ आप्तकथन भी है यदि पशुओं की हिंसा करके उनकी रुधिर की धारा बहा कर स्वर्ग में जाया जा सकता है तो नरक में जाने का मार्ग कौन सा है?
अश्वमेध के हिंसा रहित होने का प्रमाण महाभारत शान्तिपर्व के अध्याय-3-336 में देखा जा सकता है। इसमें वसु महाराज द्वारा अश्वमेध करने का रोचक वृत्तांत इसमें आचार्य बृहस्पति के अतिरिक्त कपिल, कठ, कण्व, तैत्तिरीय आदि ऋत्विक् थे। महाभारतकार के अनुसार यहाँ “न तत्र पशुघातोऽभूत” पशुओं की किसी तरह की हत्या नहीं की गई। यों तो यज्ञ में किसी तरह की हिंसा वर्जित है, फिर अश्वमेध के अश्व को तो-स्तुत्य ठहराया गया है। आचार्य महीधर के शब्दों में हे अश्व यस्त्वमभिधा असि। अभिधीयते स्त्यत् इत्याभिधाः । अर्थात्-हे अश्वमेध के अश्व आप स्तुत्य है (महीधरयजुर्वेद 22-3)
वैदिक यज्ञों में अश्वमेध का महत्वपूर्ण स्थान है। इसे महाक्रतु कहा गया है। इसकी ऐतिहासिक सर्वथा असंदिग्ध है। राष्ट्रहित के लिए-दैवी शक्तियों के आह्वान और मानवीय सामर्थ्य को नियोजन करने वाली इस प्रक्रिया में किसी भ्रान्ति की रत्तीभर गुँजाइश नहीं। ऋग्वेद में इससे सम्बन्धित दो मंत्र हैं। यजुर्वेद में 22 से 25 अध्याय में इसका विधि-विधान दिया गया है।शतपथ ब्राह्मण (13 काण्ड) में इसका विशद वर्णन है। तैत्तिरीय ब्राह्मण (3-8-9) कात्यानीय श्रौतसूत्र (20) आपस्तम्ब (20) आश्वलायन (10,6) शखाँयन (16) आदि में इसके स्वरूप और महात्म्य के विस्तृत विवरण मिलते हैं।
इन सबका गहराई से अध्ययन करने वाले डा. ब्लूमफील्ड ने न केवल इसे राष्ट्रीय उपासना की संज्ञा दी बल्कि अपने ग्रन्थ “आइडियाज एण्ड इंस्ट्टूयशन्स् इन वैदिक इण्डिया” में यह भी कहा-क्या ही सुखद हो यदि विश्व के सभी राष्ट्र, राष्ट्र उपासना की इस पद्धति को अपना कर अपनी संगठन सामर्थ्य और चरित्रबल की वृद्धि करें। अश्वमेध आयोजनों की वर्तमान शृंखला पर विचार करके यही कहा जा सकता है कि मनीषी ब्लूमफील्ड की आकाँक्षा पूर्ति का समय आ गया । राष्ट्रीय और मानवीय भावनाओं को विकसित करने वाली यह योजना न केवल भारत वरन् समूचे विश्व को नया रंग, वातावरण , एक उच्चतर भावना, एक बड़ा उद्देश्य प्रदान करेगी। इसके परिणाम में यदि’राष्ट्र’ शब्द विश्व राष्ट्र का व्यापक बोध कराने लगे तो किसी को आश्चर्यचकित नहीं होना चाहिए।
शास्त्रकारों ने अश्वमेध को परम पुरुषार्थ कहा है। सामान्य पुरुषार्थ का दायरा भौतिक स्तर तक सीमित है। इसे नियंत्रित करने वाली दैवी शक्तियाँ प्रारब्ध विधान यदि अनुकूल न हो तो सारे प्रयास मिट्टी में मिल जाते हैं। परिणाम में निराशा असफलता-उद्विग्नता ही पल्ले पड़ती है। यही कारण है सूक्ष्मदर्शी ऋषियों ने पुरुषार्थ जैसी अमोध दैवी शक्तियों को अनुकूल बनाने में सक्षम तप-साधनाओं, नय भाग्य विधान गढ़ने में समर्थ आध्यात्मिक प्रक्रियाओं की रचना की और उन्हें उच्चतर पुरुषार्थ कहा।
अश्वमेध की प्रक्रिया कुछ ऐसी ही अलौकिक और अनुपम है? इसमें अगणित पुण्यकाल भरे हैं। जिनकी प्रभाव सामर्थ्य जहाँ सामूहिक स्तर पर अशुभ प्रभावों का निवारण करती है, वहीं भागीदारी लेने वाले याजकों के व्यक्तिगत जीवन में ढेर के ढेर अनुदान वरदान उड़ेलने वाली सिद्ध होती है। अत्रि स्मृति में इसी कारण अश्वमेध को ‘सर्व कामधुक्’-अर्थात्-सभी कामनाओं को पूर्ण करने वाला कहा गया है। इसका कारण बताते हुए स्मृतिकार का कहना है-
अश्वमेधेन हविषा तृप्ति मायान्ति देवताः । तस्तृप्ता र्स्पथत्येन नरस्तृप्तः समृद्धिभिः॥
अर्थात्- अश्वमेध में हवि का हवन करने से देवताओं की तृप्ति होती है। तृप्त होकर देवता मनुष्य को इच्छित समृद्धि प्रदान कर संतुष्ट करते हैं।
विष्णु धर्मोत्तर पुराण के अनुसार अश्वमेध यज्ञ में अग्नि को संस्कारित कर उसमें श्रद्धा, भावना के साथ जो भी आहुति दी जाती है। उसे देवता ग्रहण करते हैं। देवताओं का मुख अग्नि है, इसीलिए देवता यज्ञ से प्रसन्न होकर यज्ञकर्ता की कामनाओं की पूर्ति करते हैं। विष्णु धर्मोत्तर पुराण में हंस जी हवन विधि का वर्णन करते हुए
ऋषियों से कहते हैं-
अग्निर्मुख देवतानाँ सर्वभूत परायणम्। तस्यशुश्रुणादेव सर्वाकामान्समश्नुते॥
अर्थात्-सर्वभूत परायण देवताओं का मुख अग्नि है। देवताओं की सेवा-शुश्रूषा करने से ही सब कामनाओं की प्राप्ति होती है।
आपस्तम्ब स्मृति के अनुसार जिस स्थान पर अश्वमेध यज्ञ सम्पन्न होता है, वहाँ समस्त देवता सारे तीर्थों की चेतना पूँजीभूत होती है। इसलिए वहाँ जाने मात्र से गंगा, यमुना, कावेरी, कृष्णा,गोदावरी आदि नदियों के स्नान का पुण्य, और गया, काशी, द्वारका आदि तीर्थों में जाने का प्रतिफल प्राप्त होता है। महाभारत में व्यास जी युधिष्ठिर को इसका माहात्म्य समझाते हुए कहते है-
अश्वमेधों हि राजेन्द्र पावनः सर्व पाप्यनाम्। तेनेष्ट्य त्वं विपाणा वै भविता मात्र संशय॥ अश्वमेध वर्ष (61) 16
हे राजन्-अश्वमेध यज्ञ समस्त पापों का नाश करके यजमानों को पवित्र बनाने वाला है उसका अनुष्ठान करके तुम पाप मुक्त हो जाओगे।
आश्वलायन (16/61) के अनुसार सभी पदार्थों के इच्छुकों सभी विजयों के अभिलाषियों तथा अतुल समृद्धि के आकाँक्षियों को अश्वमेध का यजन अवश्य करना चाहिए। ऋषि गोभिल ने ‘श्री वै अश्वमेधः कहकर अश्वमेध यज्ञ में हवन की जाने वाली दिव्य औषधियों, दिव्य मंत्रों के सम्मिलित प्रभाव से याजकों में मेधा-प्रतिभा का जागरण होता है। रोगों का नाश होकर आयु बढ़ती है। पुराणकार के अनुसार उन्नत प्रतिभा और उत्तम स्वास्थ्य के आकाँक्षियों को इसका यजन अवश्य करना चाहिए। महर्षि कात्यायान न प्रदान करने वाले के साथ स्वर्ग तक आत्मा को पहुँचाने वाला वाहन कहा है। इसका महात्म्य बताते हुए पद्मपुराण सृष्टि खण्ड में कहा गया है-
अश्वमेधाप्यायिता देवाँ वृष्ठयुत्यर्गेण मानवः। आप्यायनं वै कुर्वन्ति यज्ञाः कल्याण हेतवः॥
अर्थात्-अश्वमेध में प्रसन्न हुए देवता मनुष्यों पर कल्याण की वर्षा करते हैं।
इस विराट प्रयोग से मिलने वाले पुण्य फलों के बारे में दो ही शब्द कहना पर्याप्त होगा अनगिनत और अपार शास्त्रकार तत्वदर्शी ऋषि इसकी प्रशंसा करते नहीं अघाते। जिस क्षेत्र में अश्वमेध यज्ञ सम्पन्न हो रहे हैं, वहाँ के निवासियों को यही समझना चाहिए कि उनके जन्म-जन्मांतर के पुण्य देवताओं का आग्रह इस रूप में प्राप्त हो रहा है। इस यज्ञ में भाग लेना, यज्ञ स्थान की परिक्रमा करना किसी भी तरह यज्ञायोजन में अपने समय और श्रम को नियोजित करना उपरोक्त शास्त्रवर्णित इन महान पुण्य फलों का प्रदाता सिद्ध होगा ऐसा दृढ़ विश्वास रखना चाहिए। इसी विश्वास और लोक कल्याण की भावना के साथ सभी जाल-जंजालों को एक किनारे करके अपने क्षेत्र में होने वाले अश्वमेध आयोजन में पूरे उत्साह और उमंग के साथ बढ़-चढ़ कर भा लिया जाय।
*समाप्त*