यदि मनुष्य संग्रह करता है एवं उसी के लिए अपना लौकिक जीवन पूरी तरह नियोजित कर देता है तो वह तीन पाप करता है=एक है कल पर अविश्वास, दूसरा ईश्वर पर अश्रद्धा तथा तीसरा भविष्य की अवज्ञा। जब पिछला कल भलीभाँति निकल गया, हमें जीवित रहने के लिए जितना जरूरी था, उतना मिल गया तो कल क्यों नहीं मिलेगा? यदि जीवन सत्य है तो यह भी सत्य है कि जीवनोपयोगी पदार्थ अन्तिम साँस चलने तक मिलते रहेंगे। नियति के द्वारा उसकी श्रेष्ठतम व औचित्य की परिधि में व्यवस्था पहले से ही है। तृष्णा एक ऐसी ही बौद्धिक जड़ता है, जो निर्वाह के लिए आवश्यक साधन उपलब्ध रहने पर भी निरन्तर अतृप्तिजन्य उद्विग्नताओं में जलाती रहती है।
जो ईश्वर पर विश्वास रखते हैं, वे निजी जीवन में उदार बनकर जीते हैं। बादल बरस कर अपना कोष नहीं चुका देते। वे बार-बार खाली होते हैं, फिर भर जाते हैं। नदियाँ उदारतापूर्वक समुद्र को देती हैं वे समुद्र भाप बनाकर उन्हें बादलों को लौटा देता है, इस विश्वास के साथ कि यह प्रवाह चलता रहेगा। वृक्ष प्रसन्नतापूर्वक देते हैं व सोचते हैं कि वे ठूँठ बनकर नहीं रहेंगे। नियति का चक्र उन्हें सतत् हरा-भरा बनाए रखने की व्यवस्था करता ही रहेगा।
हवा की झोली में सौरभ भरने वाले खिलते पुष्पों से तथा दूध के बदले कोई प्रतिदान न माँगने वाली गायों से हम शिक्षण लें एवं उदारता को जीवित रख हँसते-हँसाते जीवन के दिन पूरे करें।
समूचे अजनाभ वर्ष में यह विख्यात था कि वे बड़े धर्म परायण व्यक्ति हैं। उनकी तप-तितिक्षा की कहानियों को लोग बड़े चाव से कहते सुनते थे, था भी कुछ ऐसा ही। प्रतिदिन राजमहल के प्राँगण में ही बनवाए गए भगवान विष्णु के मन्दिर में प्रातःकाल ऊषा बेला में पहुँचने, भगवान के विग्रह की पूजा, अर्चना करने, संख्या-उपासना, जप, ध्यान के साथ उनकी दिनचर्या आरंभ होती। इसके बाद वे अपने राज्य के दीन-दुखियों और अभाव ग्रस्तों को प्रतिदिन एक-एक स्वर्णमुद्रा बाँटते थे।
पूजा और दान के बाद आरंभ होता था स्वाध्याय। इसके उपरान्त वे राज्य की समस्याओं को सुलझाने के लिए मंत्री-परिषद के सदस्यों से परामर्श करते। अपनी समस्याओं को उनके पास सुलझाने के लिए आए नागरिकों से भेंट करते, उसके कष्ट सुनते और कठिनाइयों को हल करने के लिए हर संभव सहयोग करते थे। इन सभी कार्यों के निवृत्त होने तक सूर्यदेव अपना रथ लिए ऊपर आकाश के एकदम बीच में पहुँच। उनको यही समय मिलता था भोजन के लिए। कष्ट साध्य जीवन कार्यों में लगे रहने के कारण उन्हें एक प्रकार का सुख मिलता था और वे इस सुखानुभूति में अपनी कष्ट साध्य दिनचर्या की असुविधाओं को भूलकर उसके अभ्यस्त हो गए थे।
उसकी इस ख्याति से प्रभावित होकर अवन्ति नरेश उदयभानु ने अपनी कन्या उदयानी के विवाह का प्रस्ताव किया। प्रस्ताव के उत्तर में उनने स्पष्ट कह दिया कि वह कठोर दिनचर्या के अभ्यस्त है। उनके साथ विवाह होने पर उदयानी को कष्ट तथा असुविधाएँ ही मिलेगी।
परन्तु अवन्ति नरेश ने कहा कि उदयानी स्वयं भक्ति-सेवा तथा तप-तितिक्षा में विशेष रुचि रखती है। यह प्रस्ताव भी उसी का है।
लक्ष्य और मार्ग की एकात्मता को प्रगाढ़ जानकर उन्होंने प्रस्ताव स्वीकार कर लिया। विवाह के पश्चात प्रथम रात्रि के ऊषा काल में, उनके उठने से पहले ही उदयानी उठ गई। उसने विष्णु मन्दिर में जाकर पूजा-अर्चा संपन्न कर ली। जागरण के बाद स्नान आदि से निवृत्त होकर जब वह मन्दिर में गए तो यह देखकर बड़े खिन्न हुए कि उनसे पहले ही उदयानी पूजा-अर्चा से निवृत्त हो चुकी है और वह भी उन्हीं के मन्दिर में। प्रथम पूजा का श्रेय मुझे ही मिलना चाहिए, यह सोचकर उन्होंने उदयानी को निर्देश दे दिया कि वह उनके बाद में ही पूजा के लिए जाया करे। उदयानी ने सहर्ष निर्देशों को अंगीकार कर जाया करे।
कुछ समय बाद वे अनुभव करने लगे कि उदयानी उनकी अपेक्षा साधना मार्ग में अधिक प्रगति कर चुकी है। उसके मुखमण्डल पर अभूतपूर्व दीप्ति, दिव्य शान्ति और दैवीय आभा दिखाई देने लगी। पूछने पर मालूम हुआ कि वह भाव-समाधि की स्थिति में जा पहुँची है।
मैं इतने समय से पूजा, भक्ति और सेवा-साधना में लगा हुआ हूँ। मुझे तो यह सिद्धि मिली नहीं। यह जिसे मैंने अपने से पहले पूजा भी नहीं करने दी किस तरह इतनी जल्दी इस अवस्था में पहुंच गयी? यह विचार उन्हें और भी खिन्न व उदास करने लगा। धर्म-कर्म में उनकी रुचि कम होने लगी। इन्हीं दिनों उनके गुरु ब्रह्मर्षि वशिष्ठ राजमहल में पधारे। दिव्य अंतर्दृष्टि संपन्न ब्रह्मर्षि ने उनके मनोद्वेगों को ताड़ लिया और पूछा-”राजन! आजकल आप निराश और खिन्न क्यों दिखाई देते हैं।”
उन्होंने अपनी मनोव्यवस्था खोलकर सुना दी। सुनने के बाद एक क्षण तक ब्रह्मर्षि किसी अज्ञात लोक में खोए रहे, फिर उनकी गम्भीर वाणी गूँजी-”वत्स अम्बरीष! अध्यात्म मार्ग का उत्कर्ष किसी पूजा या दीर्घ अवधि का नहीं, भावनापूर्वक किये गए उपचारों का परिणाम है। तुम जो पूजा-साधना करते हो उसमें अहं की भावना होती है। जबकि महारानी समर्पण के भाव से अर्चना करती है। जिसने अपने को ईश्वर के प्रति पूर्णतया समर्पित कर दिया, उसके पास अहं कहाँ बचा? और जहाँ अहं मिट जाता है, वहाँ ईश्वर के अतिरिक्त और कोई नहीं रह जाता।”
इन वचनों ने अम्बरीष को साधना का सही और नया मार्ग प्रकाशित किया।
अनादिकाल से ही मनुष्य को जब से अपनी विशिष्टता, वरिष्ठता और पृथक अस्तित्व का बोध हुआ, विचार करता रहा है। विश्व के प्रायः सभी धर्मों में प्राणियों के आविर्भाव और मानव के उद्भव एवं विकास पर प्रकाश डालने वाली कथायें प्रचलित हैं। धर्मशास्त्रों में सामान्यतया यही प्रतिपादित किया गया है कि स्रष्टा ने सब प्राणियों की समकालीन, किन्तु अलग-अलग विकसित रूपों में सृष्टि की थी, बाद में उनकी ही वंशानुवंश परम्परा चलती रही। इस सिद्धान्त के अनुसार मनुष्य सभी प्राणियों से सर्वथा पृथक और श्रेष्ठ है। वेद, उपनिषदों ने ‘अमृतस्य पुत्राः’ कहकर उसे स्वयं अपने भाग्य का निर्माता बताया है। उद्भव काल से लेकर अब तक कार्य=संचालन में भले ही कुछ विशेष परिवर्तन दृष्टिगोचर न हुए हों, परन्तु चेतनात्मक दृष्टि से मनुष्य उत्तरोत्तर विकसित होता हुआ देवत्व की ओर अग्रसर है।
वैज्ञानिक मनीषी भी अब उक्त तथ्य की पुष्टि में अनुसंधानरत है। यद्यपि विज्ञान के क्षेत्र में अभी भी चार्ल्स डार्विन द्वारा प्रतिपादित विकासवाद का सिद्धान्त-”थ्योरी ऑफ इवोल्यूशन “ ही सर्वत्र मान्यता प्राप्त है, जो मनुष्य के आदि पूर्वज बन्दर को मानता है। विकासवाद का यह सिद्धान्त मानव के मूल गौरव, स्वरूप स्वभाव, स्तर और आधार पर जिस तरह चोट करता है, उससे मनुष्य प्रकृति के हाथ का एक खिलौना मात्र सिद्ध है। इसी तरह नृवंश-शास्त्रियों का मनुष्य, सुसंस्कृत, विकसित एवं अच्छी स्थिति में है। यह मान्यता हमें न केवल अहंकारी बनाती है, वरन् अपने पूर्वजों के प्रति अश्रद्धा एवं उपहास की भावना भी पैदा करती है।
रूस के सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक मनीषी प्रिंस क्रोपाटकिन ने डार्विन की विकासवादी मान्यताओं का गंभीरतापूर्वक अध्ययन किया है और उसकी खामियों को अपनी कृति “म्युचुअल एड” में विस्तारपूर्वक प्रकाशित किया है। उनके अनुसार डार्विन के विकासवाद के पाँच तत्व हैं। इनमें से पहला है-’परिवर्तनों की सर्वत्र विद्यमानता।’ अर्थात् हर जगह परिवर्तन गति से जारी है। प्रत्येक वस्तु का आयु के हिसाब से परिवर्तन हो रहा है, जिसे ह्रास-वृद्धि तो कह सकते हैं, किन्तु ऐसा परिवर्तन नहीं, जिसमें समुद्र धीरे-धीरे पुच्छल तारा बने, कबूतर भालू और घोड़ा साँप बन जाय। विकासवादी मान्यता के अनुसार अमीबा से क्रमशः स्पंज, हाइड्रा और फिर विभिन्न सीढ़ियाँ पार करता हुआ मछली, मेंढक, साँप, छिपकली, चिड़िया, हाथी, बन्दर आदि से विकसित होता हुआ अन्त में मनुष्य बना। अर्थात् एककोशीय इन्द्रिय चेतना से रहित जीवन क्रम उलट-पलट करते-करते मनुष्य जैसे विकसित प्राणी का प्रादुर्भाव हुआ। यह सिद्धान्त हमें बताता है कि जीव का मूल स्वरूप ही नहीं, उसका स्तर, स्वभाव और आधार भी परिवर्तित होता आया है। विकासवाद की यह व्याख्या बुद्धि संगत नहीं जान पड़ती। इसे यदि मान भी लिया जाय तो प्रश्न उठता है कि वर्तमान प्राणी जिस स्थिति में है, वह कब तक बनी रहेगी? विकासवादी सिद्धान्त के अनुसार उनमें परिवर्तन होते-होते अन्ततः वे किस स्थिति में पहुँच जायेंगे और प्रगति की अनन्त प्रक्रिया प्राणियों को कौन-सा स्वरूप प्रदान करेगी? कहने का तात्पर्य यह है कि प्रकृति में जो कुछ भी परिवर्तन होता है, वह नियमित और मर्यादित होता है। उससे एक जाति की दूसरी जाति नहीं बन जाती है न परस्पर का सम्बन्ध ही टूटता है।
दूसरी बात है अत्युत्पादन की। अत्युत्पादन और उत्पादन में बड़ा अंतर है। अत्युत्पादन नैमित्तिक अर्थात् मानुषीय है और उत्पादन नैसर्गिक। जब तक प्राणियों में अकाल मृत्यु नहीं होती, तब तक ईश्वरीय नियमित उत्पादन होता रहता है, पर जब हिंसा, भूख, युद्ध और प्राकृतिक आपदाओं से जीवों की अकाल मृत्यु होती है, तभी से अत्युत्पादन प्रारंभ होता है। जब से मनुष्यों ने स्वाभाविक जीवन निर्वाह करना छोड़ दिया है, तब से सृष्टि में वंशवृद्धि और अकारण मृत्यु का सिलसिला आरंभ हुआ है, अर्थात् मानव ने मनुष्य, पशु−पक्षी, कीट-पतंग, वृक्ष-वनस्पति आदि सभी को अस्वाभाविक स्थिति में डाल दिया, जिससे प्राणि मात्र अल्पायु हो गये।
विकासवाद का तीसरा तत्व है-”स्ट्रगकल फॉर एग्जिस्टेन्स,” अर्थात् अस्तित्व बनाये रखने के लिए सतत् संघर्ष। डार्विन जिसे प्रगति के लिए अनिवार्य बताते हैं, उसे ही उनके निकट अनुयायी सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक प्रो.केसलर इस नियम को अपवाद रूप में मानते हैं। उनके अनुसार जीवन संघर्ष का नियम तो प्रकृति में दिखाई देता है, किन्तु वह अपवाद है। उसका कहना है जीवन संघर्ष की व्याख्या ही गलत ढंग से की गयी है। पारस्परिक संघर्ष की तुलना में पारस्परिक सहयोग के द्वारा प्राणि जगत और मानव जाति का कहीं अधिक विकास होता है। अपनी कृति “ओरीजिन ऑफ स्पेशीज” में डार्विन ने स्वयं लिखा है कि प्राणियों का अस्तित्व एक दूसरे के सहयोग पर निर्भर है। अपनी दूसरी पुस्तक ‘द डीसेन्ट ऑफ मैन’ में उन्होंने बताया है कि असंख्य प्राणि समुदायों में पृथक-पृथक प्राणियों का आपसी संघर्ष समाप्त हो जाता है और संघर्ष का स्थान सहयोग ले लेता है। फलस्वरूप उनका बौद्धिक एवं नैतिक विकास होता है।
चौथा सिद्धान्त है-’नेचुरल सलेक्शन’ का अर्थात् प्रकृति योग्यतम का चुनावकर उनकी रक्षा करती है और अन्यों की उपेक्षा करती है, फलस्वरूप वे नष्ट हो जाते हैं। किन्तु गंभीरतापूर्वक सृष्टि में दृष्टिपात करने पर स्पष्ट हो जाता है कि योग्यों का चुनाव होता ही नहीं। अमीबा जीवों में सबसे छोटा और निर्बल है, पर है सबसे अधिक संख्या में जितने छोटे कीड़े हैं, वे सबके सब संख्या में जितने छोटे और निर्बल है, पर है सबसे सब संख्या में अधिक हैं। संख्या की दृष्टि से सर्वत्र बहुलता से छाये हुए हैं। मनुष्य को बलिष्ठता में हाथी, घोड़े, शेर आदि ने परास्त कर दिया है। दीर्घजीवन में कछुए बाजी मार ले गये और बुद्धि तथा कला-कौशल में चींटी सबसे आगे है। परिश्रम, संचय, व्यवस्था और कारीगरी में मधुमक्खी का प्रथम स्थान है। ये सभी प्राणी अपने उत्तरवर्ती योग्यों से जब अधिक समर्थ सिद्ध हो रहे हैं, तब कैसे कहा जा सकता है कि योग्यों का चुनाव होता है।
विकासवाद का पाँचवाँ सिद्धान्त है-कि उक्त योग्यता का संतति में संक्रमण होता है। विचारकों के अनुसार यह भी सही नहीं है, क्योंकि अयोग्यों की संख्या ही संसार में सबसे अधिक है। समूचे विश्व में निर्धन, निर्बल और निर्बुद्धि ही अधिक पाये जाते हैं। ज्ञानी-विद्वान के बच्चों में आप ही आप ज्ञान का संक्रमण नहीं हो जाता। मनुष्य यदि अपनी संतानों को अच्छा बनाने, सुसंस्कार डालने में सावधानी न बरते, तो उनमें अच्छे संस्कार उत्पन्न होना संभव नहीं। अतः यह कैसे कहा जा सकता कि योग्यों के चुनाव के साथ ही योग्यता का भी संतति में संक्रमण होता है।
प्रख्यात प्राणि विज्ञानी प्रोफेसर विलियम वाट्सन की अध्यक्षता में पिछले दिनों आस्ट्रेलिया में मूर्धन्य वैज्ञानिकों का एक सम्मेलन विकासवाद की सत्यता को परखने के लिए आयोजित किया गया। निष्कर्ष प्रस्तुत करते हुए विज्ञानवेत्ताओं ने कहा है डार्विन का विकासवाद तथ्यों से परे और विज्ञान के विरुद्ध है। वस्तुतः मनुष्य जैसा सृष्टि के आरंभिक काल में था, वैसा ही अब है। बन्दर और मनुष्य के बीच की आकृति का कुछ पता नहीं। अभी तक प्राप्त अस्थि अवशेषों से यह स्पष्ट हो गया है कि मनुष्य की रचना अपने पूर्वजों जैसी ही है। प्राणिवेत्ता सिडनी का स्रेट का तो यहाँ तक कहना है कि उन्नति करने के स्थान पर मनुष्य अब अवनति की ओर जा रहा है। उसकी आरंभिक दशा उन्नति थी और वह देवत्व के अधिक निकट था।
इस तथ्य की पुष्टि डॉ. वैलेस, प्रोफेसर सोलेस, डॉ. कीथशिम्पर, हेकल एवं डॉ. पर्थ जैसे सुविख्यात विज्ञानियों ने भी की है। इनका मत है कि ईश्वर ने हर प्राणी को अपनी स्वतंत्र सत्ता सृष्टि के आरंभ में ही दी है। अमीबा अभी भी अमीबा है, और बन्दर अभी भी बन्दर है जो परमशक्ति एक कोशीय अमीबा की रचना कर सकती है, वहीं शक्ति विविध प्रजाति के पशु-पक्षियों और मनुष्यों को अलग-अलग क्यों नहीं सृजित कर सकती? मनु की संतान मानव ने अपनी लम्बी यात्रा में कई उतार-चढ़ाव देखे होंगे, किन्तु वह और किसी रूप में इस धरती पर आया और आकृति में विकसित होता गया, यह असंभव है। मनुष्य की मूलसत्ता जिसे ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ कलाकृति कहा जाता है, आरंभ से ही अपनी मौलिक विशेषताओं को साथ लेकर जन्मी है और अपनी चेतना का क्रमशः विकास करते हुए पूर्णता की ओर अग्रसर है।
“द ह्यूमन साइकल” नामक अपनी कृति में महर्षि अरविन्द ने कहा है कि अपने विकासक्रम में मनुष्य देवत्व की ओर बढ़ रहा है। वह जीव चेतना से ऊपर उठकर अर्ध देवता बन चुका है। बौद्धिक विकास के बाद अब आत्मिक प्रगति का युग आ रहा है। मानव जाति समान हितों के बाहरी कारणों को छोड़कर आध्यात्मिक विकास के फलस्वरूप आन्तरिक एकता का अनुभव करने लगी है। आर्थिक और बौद्धिक दृष्टिकोण के स्थान पर आध्यात्मिक भावना बढ़ती जा रही है। देवत्व ही मनुष्य जीवन का लक्ष्य है और वह उसे प्राप्त होकर रहेगा। क्रमिक विकास का यही सही स्वरूप है।
रेलगाड़ी में अधिक महत्व इंजन का होता है। उसे अति सावधानी के साथ कुशल निर्माताओं द्वारा समुन्नत प्रतिभाओं द्वारा बनाया जाता है, कारण कि पूरी रेलगाड़ी का वजन खींचने और अभीष्ट गति से घसीटते ले चलने की जिम्मेदारी उसी की होती है। इंजन गड़बड़ाने लगे, तो समझना चाहिए कि रेलगाड़ी का नियत लक्ष्य तथा नियत समय में पहुँच सकना कठिन पड़ेगा। इसके विपरीत कमजोर डिब्बों को भी बलिष्ठ इंजन अपने बलबूते खींचता चला जाता है। ठीक यही उदाहरण प्रायः सभी सामूहिक क्रिया–कलापों पर लागू होता है।
जीवन का थोड़ा-सा अंश ही ऐसा होता है, जो नितान्त एकाकीपन के रहते हुए भी गुजर जाता है। ऐसे समय नित्यकर्म, शयन, विश्राम जैसे ही होते है, पर उनकी गणना महत्वपूर्ण कामों में नहीं होती। औसत व्यक्ति का अपना अधिकाँश जीवन अधिक मिल-जुल कर किये जाने वाले कार्यों का भागीदार रहते हुए ही व्यतीत करना पड़ता है। इसमें यों सभी घटकों को अपने-अपने जिम्मे के कार्य सही रीति से करने की आवश्यकता पड़ती है, फिर भी यह आवश्यकता तो बनी ही रहती है, कि सब का समन्वय करने, तालमेल बिठाने का कार्य कोई रेल के इंजन जैसी क्षमता संपन्नता करता रहे। इसकी योजनाएँ, निर्धारणायें यदि ठीक तरह चलती रहें, तो ही किसी सामूहिक कार्य के सुनियोजित रूप से संपन्न होने की आशा करती चाहिए। अनुभवहीन, अविकसित, मानस वाले व्यवस्थापक तो अपने साथी सहयोगियों के श्रम को भी अस्त−व्यस्त कर देते हैं। इसलिए लोक-नेतृत्व करने की क्षमता को अन्य बड़े महत्वपूर्ण कार्यों में सम्मिलित किया गया है। डॉक्टर, इंजीनियर, आर्कीटेक्ट, चार्टर्ड एकाउन्टेंट आदि का लम्बा शिक्षण काल इस आधार पर बनता है कि वे अपने दायित्वों के प्रति अधिक जागरूक, अधिक प्रवीण-परिष्कृत सिद्ध हो सकें। प्रबंधन का कार्य भी इससे कम महत्व का नहीं है। वह साधारण श्रमिकों की तरह ढर्रे का काम भारवाही पशुओं की तरह नहीं निपटता, वरन् सम्मिलित परिकर के हर छोटे-बड़े विभाग पर पैनी दृष्टि रखता है और जहाँ कहीं गड़बड़ी की आशंका लगती है, वह समय से पूर्व ही सतर्क होकर समाधान निकालता और दुर्घटना घटित होने से बचा लेता है।
गड़बड़ियों को न होने देने, पर उन्हें फुर्ती से सँभाल लेने का कौशल संचालक द्वारा प्रयुक्त होने की आशा की जाती है। इस प्रकार की सूझबूझ न होने पर किसी को कुशल प्रबन्धन का श्रेय नहीं मिल सकता, भले ही वह शिक्षा की दृष्टि से कितनी ही डिग्री हस्तगत क्यों न किये हुए हो।
व्यवस्था में एक और विशेषता भी सम्मिलित करनी चाहिए कि वर्तमान की गतिविधियाँ भविष्य को उज्ज्वल बनाने की दृष्टि से सही रीति-नीति अपनाये हुए है या नहीं। ध्यान आज का ही नहीं, अगले कल का भी रखना पड़ता है। बड़े व्यवसायों और कारखानों के मैनेजर यह ध्यान रखते है कि वर्तमान के विनिर्मित निर्माण की कल खपत कहाँ और कैसे होगी? कल जिन सामानों की आवश्यकता पड़ेगी, उनका संचय समय रहते कर लिया गया है या नहीं। पूँजी कहीं रुक तो नहीं रही है। यदि ऐसी कुछ आशंका हो, तो उसका विकल्प पहले से ही तैयार रखना पड़ता है, जिसमें इस प्रकार की सुविस्तृत सूझ-बूझ हो, वह व्यवस्थापक के पद को तो सार्थक बना ही सकता है। संपन्न तो कोई उत्तराधिकार में प्राप्त संपत्ति के आधार पर भी हो सकता है, किन्तु प्रबंध की क्षमता तो पूरी तरह अपने द्वारा ही अर्जित करनी पड़ती है।
विधाता को उतना श्रेय मिलता है, जितना कि नियामक की मनुहार की जाती है। बच्चे जनने की क्षमता तो हर वर्ग के मादा प्राणियों में होती है। उत्पादन तो अनायास भी हो सकता है, पर उसे सुनियोजित करना, समुन्नत करना विशेष प्रकार का कौशल है। उसके जानकारों को ही उत्पादकों की तुलना में अधिक श्रेय मिलता है। यही कारण है कि उद्योगपतियों की, स्वामित्व वाले लोगों की अपेक्षा प्रबंधकों को ही अधिक श्रेय जाता है। राजा की सफलता-असफलता बहुत कुछ उसके मंत्रियों पर ही निर्भर रहती है। स्कूल तो असंख्यों खुले होते हैं, पर उसमें से सफलता का श्रेय उन्हीं को मिलता है, जिनके संचालक अपनी प्रतिभा, लगन और सूझबूझ का बढ़-चढ़ कर परिचय देते हैं। सेना में अनेकों सैनिक होते हैं। वे अनुशासन भी पालते हैं और देशभक्ति तथा दक्षता का परिचय भी देते हैं, किन्तु मोर्चा जीतने-हारने का यश-अपयश सेनापति को ही जाता है। उसे तनिक-सी भूल कर बैठने पर अनर्थ करने वाले जैसा दण्ड तक भुगतना पड़ता है। सिपाही का प्रमाद छोटी प्रताड़ना से भी संभल जाता है, पर सेनापति को क्षमा कैसे किया जाय, जिसने संचालन जैसा भारी-भरकम उत्तरदायित्व स्वीकार करने पर भी गहरी सूझबूझ का परिचय देने में भूल की। ऐसी रणनीति न बना सका, जिसके सही होने पर पराजय की आशंका नहीं के बराबर ही रह जाती।
मजबूत इंजन तो टूटे डिब्बों को भी खींच ले जाता है। यह प्रतिपादन गलत नहीं है। उच्च अधिकारियों को अधिक वेतन और अधिक साधन इसी बात का मिलता है कि उन्हें सामान्य लोगों की अपेक्षा किसी भी समस्या के साथ जुड़े हुए असंख्य पहलुओं पर एक ही समय में विचार कर लेने और सही निष्कर्ष पर पहुँचने की क्षमता से संपन्न माना जाता है। प्रबंधक से सर्वज्ञ और सर्व समर्थ जैसी आशा की जाती है, पर किसी के कंधे पर यह भार आ पड़ा हो तो उसका कर्तव्य है उस पद के अनुरूप दक्षता में यदि कहीं कुछ कमी हो, तो उसे जल्दी-से-जल्दी पूरी कर लेने का प्रयत्न करे। “ग्रुप लीडर” होने का अर्थ ही यह है कि उसने भिन्न-भिन्न प्रवृत्ति के लोगों के बीच तालमेल बिठाए रखने की क्षमता से संबंधित ज्ञान को उपलब्ध किया है। यह एक ऐसा प्रमाण पत्र है, जिसके उपयुक्त सिद्ध होने के लिए अपनी समूची तत्परता और तन्मयता दांव पर लगाने की आवश्यकता पड़ती है। प्रहरी ही निद्राग्रस्त होकर रखवाली करने की जिम्मेदारी आती है कि साथियों को सही कार्य में सहमत होने की विशेषता का अभिवर्धन करें अन्यथा संयुक्त नेतृत्व के बीच अहमन्यता के दुर्गुणवश कुछ विशेष कारण न होने पर भी अपनी हेठी न होने देने की प्रमुखता को सबसे ऊपर मानने वाले परस्पर झगड़े बिना न रहेंगे और उस विग्रह का दुष्परिणाम समूचे कार्य तंत्र के लड़खड़ाने के रूप में सामने आयेगा।
हर किसी को प्रबंधक बनने की क्षमता का विकास करना चाहिए, भले ही उसे किसी मिल, कारखाने, पार्टी, फैक्टरी, स्कूल आदि में प्रबंधक के पद पर नियुक्ति होने का अवसर न आये, क्योंकि जीवन की अधिकाँश प्रक्रिया पारस्परिक आदान-प्रदान, सहयोग पर निर्भर है। सद्भाव अर्जित किये बिना, तालमेल बिठाये बिना प्रगति पथ पर एक कदम भी नहीं चला जा सकता। अपने छोटे से व्यवसाय में कर्मचारी बनकर रहने में पग-पग पर सहयोग की आवश्यकता पड़ती है। उपेक्षा की स्थिति बने रहने में भी घाटा-ही घाटा है। फिर यदि किसी से सहयोग की अपेक्षा हो, तो उस पर दबाव डालने की अपेक्षा यह अधिक सरल है कि अपनी योग्यता को इस रूप में प्रस्तुत करें कि संबंधित व्यक्तियों को यह आशा बँधे कि इनके साथ सद्भाव बनाये रहने में हमें ही लाभ है। यह कार्य मिथ्या शेखीखोरी के आधार पर बन नहीं पड़ते, क्योंकि बनावटी अत्युक्ति प्रकट करने वाला ऐसे अनेकों संदेह के क्षेत्र छोड़ता है, जिस पर झाँक कर किसी का बड़बोलापन आँका जा सके। कुछ समय बाद तो अत्युक्तियों में घुला झूठ प्रकट होकर ही रहता है। तब फिर प्रामाणिक संदिग्ध हो जाने लगता है। इसके बाद बचने, दूर रहने की बारी आ जाती है। इस झंझट में पड़ने की अपेक्षा यही उपयुक्त है कि अपनी कार्यशैली में व्यवस्था तत्व का समुचित समावेश होने की बात अपने क्रिया–कलापों से ही प्रकट होने दी जाय।
घर-परिवार भी एक पाठशाला, सहकारी समिति या फैक्टरी के समतुल्य है। उसमें भिन्न-भिन्न स्तर के सदस्य रहते हैं। उनमें से कुछ संस्कारवश उद्दंड या अनगढ़ भी हो सकते हैं। इनमें से किसी को भी घर से बाहर निकाल-बाहर नहीं किया जा सकता। बात तभी बनती है कि अन्यों का स्वभाव, दृष्टिकोण समझते हुए उनके साथ इस प्रकार तालमेल बिठाया जाय कि कम-से-कम व्यवधान पहुँचे और जितना कुछ बन पड़े, उनका सहयोग करते रहें, किसी प्रकार की समस्या न उठे। डराने-धमकाने की आवश्यकता तो विवशता की स्थिति सामने आ जाने पर ही अपनानी चाहिए। प्रयत्न यही रखना चाहिए कि जिनके साथ इच्छा या अनिच्छा से रहना ही पड़ेगा। उसके साथ मनोमालिन्य जैसी स्थिति न बनने दी जाय। दूसरी आरे से उपेक्षा बरती जा रही है, तो भी अपनी ओर से सज्जनता भरा व्यवहार करते रहने की नीति अपनाये रहने में ही लाभ है। सबको अपनी इच्छा के अनुरूप नहीं बनाया जा सकता, पर इतना तो हो ही सकता है कि विग्रह को टालते रहने और निरर्थक बातों में अपना समय और चिन्तन नष्ट होने देने की हानि से बचा जाता रहे।
किसी तंत्र में नियमित रूप से व्यवस्था का दायित्व न सौंपे जाने पर भी प्रतिभावान प्रतीक्षा करते नहीं बैठे रहते और न इस प्रकार की हीनता मन में आने देते हैं कि हम से आग्रह नहीं किया गया। अपनी विशिष्टता के परिचय देने की दृष्टि से ही नहीं अवसर पर छोटे कार्य सामने दीख पड़ने पर उनमें आत्मीयता का सेवा-भावना, सहयोग आरंभ कर देना चाहिए। छोटे कामों में सही ढंग से निपटने की योग्यता अपने स्तर पहचानने का अवसर मिलता है और फिर आग्रहपूर्वक अन्य कार्यों में हाथ बँटाये जाने की आशा करने लगती हैं। योग्यता अपने स्तर के अवसर भी देर-सबेर में प्राप्त कर लेती है। लोकनायकों को इसी प्रकार अपनी विशेषता का परिचय देने और क्रमशः अधिक ऊँचे काम कर दिखाने के अवसर मिलते रहें हैं। यदि यह नीति न अपनायी जाय, तो गुमसुम रहने वाले व्यक्ति को प्रायः अयोग्य ही माना जाने लगता है। यदि यह नीति न अपनायी जाय, तो गुमसुम रहने वाले व्यक्ति को प्रायः अयोग्य ही माना जाने लगता है। अपने व्यवहार एवं वाक कौशल से ही यह प्रकट किया जा सकता है कि अपने में बड़े दायित्व सँभालने की क्षमता है। ऐसे लोगों की सर्वत्र माँग है। वैसे लोग न मिलने पर अधिकाँश लोग अपने को किसी बड़ी कमी से घिरा अनुभव करते हैं, पर कभी यह पता चलता है कि संपर्क क्षेत्र में अमुक व्यक्ति स्वभावतः व्यवस्थित रहने और दूसरों के कार्यों में उत्साहपूर्वक रस लेने, सहायता करने के स्वभाव वाला है, तो उसे हर स्थिति में आमंत्रण मिलता है, एक के बाद दूसरा बड़ा काम सौंपा जाने लगता है। प्रगतिशीलता का यही क्रम है, जो सदा-सर्वदा बनता और चलता रहता है।
परिचय का प्रारंभ किसी की निकटता के उपरान्त ही होता है। पहली दृष्टि में व्यक्ति के शरीर, बचत, वस्त्र एवं शिष्टाचार के बरते जाने पर यह जानकारी मिलती है कि आगन्तुक का स्तर एवं महत्व क्या है। प्रत्युत्तर भी उसी के अनुकूल मिलने लगता है। गुम्बज की प्रतिध्वनि की तरह ही हमारे व्यक्तित्व की प्रतिक्रिया होती है और दूसरों पर छाप पड़ती है। सभ्यता के प्राथमिक सिद्धान्तों से परिचित व्यक्ति अपने स्वभाव को ऐसे ढांचे में ढालते हैं कि परखने वाले ही नहीं, देखने वाले तक प्रथम परिचय में सहानुभूति का प्रत्युत्तर देने लगें। इस संदर्भ में साफ-सुथरापन और वाणी में सज्जनता का समावेश अत्याधिक आवश्यक है। इन्हीं छोटी-मोटी आदतों का समन्वय शिष्टाचार बन जाता है और बरतने वालों का मूल्य बढ़ता है।
खर्चीली सज-धज किसी का मान बढ़ाती नहीं, वरन् उसे धारणा करने वाले को ओछा, बचकाना, एवं नट-अभिनेता स्तर का उपहासास्पद ही बनाती हैं। स्वच्छता और सादगी किसी का बड़प्पन प्रकट करने के लिए पर्याप्त है। दूसरों पर रौब जमाने के लिए अपना बड़प्पन प्रदर्शित करने की आवश्यकता पड़ती है। इसके लिए कई लोग अपनी सज-धज, ऐंठ-अकड़ दूसरों की अपेक्षा, अपनी व्यस्तता आदि के अनावश्यक आवरण ओढ़ते और आशा करते हैं कि अन्य लोग अपने प्रभाव में आकर दब जायेंगे और जैसा कहें, वैसा करने लगेंगे। यह मान्यता आदि से अन्त तक गलत है, कारण कि अपने अहंकार में दूसरों का अपमान जुड़ा होता है, जिसकी गंध किसी भी विचारशील मनःस्थिति वाले को सहज लग जाती है और उसकी प्रतिक्रिया विरोध तिरस्कार में होती है। अन्तर्विरोध बढ़ जाने या बने रहने पर खिन्नता बढ़ती है, खाई चौड़ी होती है और संघर्ष जैसी मनःस्थिति बन जाती है। ऐसे वातावरण में तालमेल बैठ नहीं पाता और दिशा-भिन्नता बन पड़ने से कटुता, प्रतिद्वंद्विता, प्रतिरोध जैसे तत्व उभर पड़ते हैं। गड़बड़ी के कारणों को समझना और समझाना कठिन हो जाता है। काम बनता नहीं बिगड़ता है। इसलिए अपनी मुद्रा परिधान से लेकर व्यवहार तक में नम्र ही रहना चाहिए सादगी और सज्जनता यह दो गुण ऐसे हैं, जिन्हें अपना कर कोई प्रबंधक घाटे में नहीं रहता, वरन् उलझनों को हँसते-हँसाते भाईचारे के वातावरण में ही संपन्न कर लेता है। अच्छा होता इस स्तर का स्वभाव ही बन जाता और अभ्यास में उतर जाता, परी यदि ऐसा स्तर इससे पूर्व नहीं बन पड़ता है तो समय की आवश्यकता और कार्य की सुव्यवस्था को ध्यान में रखते हुए उसे प्रयत्नपूर्वक अर्जित कर लेना चाहिए। स्मरण रहे बड़प्पन का रौब जमा कर जितना काम कराया जा सकता है उसकी तुलना, में सम्मान और सद्भाव का परिचय देकर कहीं अधिक और अच्छी तरह बात बनायी जा सकती है।
अनगढ़ व्यक्ति को सिर्फ समय का दबाव ही प्रेरणा का स्रोत बना सकता है। वे उतना ही करते हैं, जितना कि तात्कालिक आवश्यकता उन्हें बाधित करती है। ऐसी दशा में मानसिक विकास सीमाबद्ध हो जाता है। कुली, मजदूर उतना ही कर पाते हैं जितनी कि अनिवार्यता होती है। इससे आगे की पीछे की सोच करना और कार्य को अधिक सुचारु रूप से संपन्न करने की आवश्यकता बनी रहती है, उसके संबंध में उनका ध्यान ही नहीं जाता। ऐसी दशा में वह बन ही नहीं पड़ता जिसे देख कर संबंधित व्यक्तियों को उसकी विशेषता का भान हो और बदले में सहानुभूति-जन्य लाभ एवं गौरव प्राप्त हो। यथास्थिति बने रहने का प्रमुख कारण एक ही है, विषय से संबंधित अन्य अनेकानेक बातोँ की ओर ध्यान न जाना, एक सीमित परिधि में ही सोचते और करते रहना। यह मानसिकता किसी की भी उन्नति में बाधक हो सकती है और प्रबंधक स्तर प्राप्त करने की तो प्रमुख अड़चन समझी जाती है।
एक ही दृष्टि में तीक्ष्णबुद्धि वाले लोग प्रस्तुत खामियों को खोज लेते है। उसके क्या कारण हो सकते है, उसकी कल्पना बिना समय गँवाये कर लेते हैं, साथ ही यह उपाय भी सूझता रहता है कि खामियों को किस प्रकार जल्दी-से-जल्दी और अच्छी-से -अच्छी तरह कितनी जल्दी और सुविधापूर्वक ठीक करना, वरन् अधिक प्रगति एवं अधिक सफलता कि लिए जिन नये सुधारों-परिवर्तनों की आवश्यकता है, उसका ताना-बाना भी साथ ही बुनते रहते हैं। इस प्रकार मस्तिष्क एक होते हुए भी एक ही समय में अनेक प्रकार सोच सकने वाला सुव्यवस्था में बाधक सभी तथ्यों को सुधारने लग जाता है। प्रगति अनायास ही नहीं आती, उसके लिए प्रतिस्पर्धा के क्षेत्र में क्या हो रहा है, क्या होने वाला है-इसकी भी सुविस्तृत जानकारी संगृहीत की जाती है और इस निष्कर्ष पर पहुँचा जाता है कि हमारे लिए अधिक श्रेय प्राप्त करने के लिए क्या करना संभव और अनावश्यक है। मस्तिष्क में बेकार बातें सोचते रहने, काम में अनावश्यक विलम्ब लगाने वाले ही प्रायः पिछड़ते हैं। जागरूक, दूरदर्शी, व्युत्पन्नमति वाले, चुस्त-दुरुस्त रहने और दिखने वाले लोग ही इस योग्य समझे जाते हैं कि किसी तंत्र की सुव्यवस्था ठीक प्रकार चला सकेंगे। यदि इस प्रकार के मानसिक विकास में कुछ कमी पायी जाय, तो उसे तत्परतापूर्वक सुधार लेना ही उस पद की गरिमा के अनुरूप है।
आदमी चाहे तो थोड़े में गुजर कर सकता है। सुखी बन सकता है और महान कार्यों के लिए समय निकाल सकता है, पर आश्चर्य यह है कि अनीतिपूर्वक कमाता है दुष्प्रयोजनों में गँवाता है।
एक राजा बहुत प्रसिद्धि प्रिय था। वह आये दिन कुछ न कुछ ऐसे काम करता रहता जिससे उसके नाम की चर्चा होती रहे। सभी उसे दयालु मानते रहें।
एक पर्व पर उसने आदेश निकाला कि वह पकड़े हुए पक्षी खरीदेगा और उन्हें मुक्त करने का पुण्य लाभ करेगा। यह क्रम पूरे एक वर्ष चलेगा।
प्रजाजनों को एक सस्ता धंधा मिल गया उनने बहेलिये की चतुरता सीख ली। हर व्यक्ति रोज दर्जनों पक्षी जाल में फँसा लेता और राजा से उनकी अच्छी खासी कीमत वसूल कर ले जाता। सवेरे से शाम तक राजदरबार में हजारों पक्षी खरीदे और छोड़े जाते। कुछ ही महीने में सारा राजकोष खाली हो गया।
बुद्धिमान मंत्री ने राजा को समझाया कि इस सस्ती वाहवाही में राज्यकोष समाप्त हो रहा है।
जनसाधारण को बहेलिये का धंधा अपनाने का स्वभाव पड़ रहा है। पक्षी त्रास पा रहे है। ऐसी झूठी दयालुता के कोई लाभ नहीं जिसका परिणाम न सोचा जाय।
बुद्धत्व को प्राप्त कर लेने के उपरान्त बुद्ध स्वयं भिक्षा के लिए जाने लगे। जन संपर्क से लोगों की उदारता जगाना और घर पहुँचे सद्ज्ञान का लाभ उठाना यह तीनों ही प्रयोजन भिक्षा से पूरे होते थे। लोकसेवा का निर्वाह भी इस माध्यम से चल जाता था।
भ्रमण प्रवास में बुद्ध एक दिन अपने जन्मभूमि वाले स्थान में पहुँच गये। अन्य घरों में भिक्षा माँगते हुए अपने घर भी पहुँचे। पत्नी यशोधरा दरवाजे पर प्रतीक्षा में खड़ी थी। बुद्ध ने उन्हें माता के शब्द से संबोधित किया और भिक्षा माँगी।
यशोधरा के एक ही संतान थी राहुल। उसे उन्होंने पति के चरणों में समर्पित कर दिया और कहा मेरे पास इतनी ही निजी संपदा है। इसे स्वीकार करें।
बुद्ध अपने पुत्र राहुल को ले गये और उसे भी धर्मचक्र प्रवर्तन के योग्य बनाकर जन मानस को जगाने के लिए प्रवास पर भेजा।
जड़ एवं चेतन का समन्वय ही यह संसार है। पंचतत्वों की अणुसंरचना का वैषम्य ही विभिन्न पदार्थों के रूप में दृश्यमान होता है। अभिवर्द्धन, परिवर्तन, उद्भव, विकास की प्रक्रिया का संचालन करने वाली सत्ता अनेक स्तर के चित-विचित्र स्पन्द उत्पन्न करती रहती है। गतिमान चक्र अपने विविध कौतुक-कौतूहल उत्पन्न करता रहता है। प्रकृति की क्षमता का कोई आकलन कर पाना असंभव प्रायः है। उसका एक-एक कण अपने में अजस्र ऊर्जा की पिटारी है। आणविक विस्फोट से निकलने वाली ऊर्जा का प्रायः शताँश प्रभाव ही अभिव्यक्त हो पाता है। शेष अंतरिक्ष में ही तिरोहित हो जाता है।
प्रकृति की विविध परतों का अन्वेषण वैज्ञानिक आधार पर किया जाता है। पृथ्वी से उपज, पानी से सींचने, अग्नि से गर्मी प्राप्त करने एवं पकाने की क्रिया से लोग सहस्राब्दियों से परिचित हैं। पिछले दिनों शब्द, प्रकाश, विद्युत, चुम्बकत्व आदि के आधारों पर प्राप्त किये गये आविष्कारों की चमत्कारी परिणति सामने आयी है। इस आधार पर सुविधा साधन भी बढ़े हैं। निकट भविष्य में प्रकृति के अन्य रहस्य और परतें भी खुलेंगी ऐसा सोचा जा सकता है।
चेतना का रूप संसार का दूसरा पक्ष है। इसका अर्थ है-ज्ञान, अनुभव, कल्पना, संवेदना, आस्था आदि के रूप में स्वयं का परिचय देने वाली वह शक्ति जो जड़ जगत को उपयोगी बनाती और उपभोग करती है। वनस्पति, कृमि-कीटक, पशु-पक्षी एवं मनुष्य ऊपर से तो प्रकृत पदार्थों से विनिर्मित काय आवरण ओढ़े रहते हैं? पर उनके भीतर एक स्वतंत्र चेतना रहती है। इसकी इच्छा, आवश्यकता एवं प्रेरणा से काया को विविध क्रिया−कलाप करने पड़ते हैं। परिवर्तन प्रवाह में पदार्थ को उत्पत्ति-विसर्जन चक्र में भ्रमण करना पड़ता है। अतएव काया समयानुसार जराजीर्ण, रुग्ण एवं अशक्त होकर विघटित हो जाती है। फिर भी चेतना का अस्तित्व किसी रूप में बना रहता है और फिर वह नये रूप में अपनी सत्ता का परिचय देती है।
जड़ पदार्थों की भी अपनी विचित्रता है। उनकी क्षमता और विविधता को बारीकी से देखा जाय तो सृजेता की कलाकारिता को देख कर आश्चर्य चकित होना पड़ता है। जड़ पदार्थों द्वारा प्राणियों को जीवनयापन की सुविधा मिलती है यह सही है। पर यह भी तथ्य है कि चेतना के द्वारा ही अनगढ़ पदार्थ को सुन्दर व्यवस्थित एवं उपयोगी बनाया जाता है। जड़ पदार्थों द्वारा प्राणियों को जीवनयापन की सुविधा मिलती है यह सही है। पर यह भी तथ्य है कि चेतना के द्वारा ही अनगढ़ पदार्थ को सुन्दर व्यवस्थित एवं उपयोगी बनाया जाता है। जड़ को प्रजा और चेतन को राजा कहा जाय तो अत्युक्ति न होगी।
प्राचीन काल की तुलना में संसार का स्वरूप बदल गया है। इसे चेतना के कर्त्तव्य का चमत्कार ही कहा जा सकता है। चेतना ने न केवल प्रकृति संपदा को सुन्दर सुव्यवस्थित बनाया है, वरन् स्वयं को अपने हाथों प्रगति के क्रमिक मार्ग पर चलते हुए इस स्थित तक पहुँचाया है। मूर्धन्य मनीषी पी.अलेक्जेन्ड्रोव ने अपनी कृति “द ओरिजिन ऑफ ह्यूमन रेस” में कहा है कि आदिम काल के मनुष्य की तुलना में आज जो समझ, सूझबूझ एवं सृजनात्मक गतिविधियाँ दीख पड़ती हैं उसे चेतनात्मक क्षेत्र का आविष्कार ही कहा जा सकता है।
भौतिक क्षेत्र में वैज्ञानिक प्रगति का चक्र तेजी से घूमा है। अग्नि का प्रज्ज्वलन,पहिए का परिभ्रमण, धार वाले उपकरणों का उपयोग आज भले ही साधारण लगे, पर किसी समय ऐसी ही उपलब्धियों ने मानवी प्रगति का द्वार खोला था। कृषि शिक्षा, चिकित्सा आज स्वाभाविक बन गये हैं, पर किसी समय इन उपलब्धियों ने मानव के भाग्य का निर्माण किया था। ये भौतिक उपलब्धियाँ भी प्रकारान्तर से चेतना की उभरती हुई स्थिति की प्रतिक्रिया हैं, कहा जा सकता है।
स्वामी रंगनाथनंद ने अपने ग्रंथ-”इटरनल वैल्यू इन चेंजिग सोसाइटी” में लिखा है कि “वैज्ञानिक प्रगति भौतिक जगत में बहुत हुई है, पर उसका क्षेत्र वस्तु जगत से लाभान्वित करने के क्षेत्र में सीमाबद्ध होकर रह गया है। चेतना की अपनी निज की स्थिति भिन्न है। विकास के लिए वह क्षेत्र भी असीम विस्तार की संभावनाओं से भरा है। इस दिशा में अन्यमनस्कता दिखाने का परिणाम यह हुआ है कि चेतना की आत्मिक प्रगति की प्रक्रिया एक प्रकार से रुक गई है।” जिस प्रकार कई प्रकार के यंत्र-उपकरण भौतिक पदार्थों एवं क्षमताओं को उपयोगी स्थिति में प्रस्तुत करते हैं लगभग वैसा ही कार्य मनुष्य भी कर पाता है। किन्तु अब मनुष्य यंत्र मानव बनता जा रहा है, पदार्थ के लिए वह और उसके लिए पदार्थ लगता है, इसी कुचक्र में चेतना फँस गई हो और उसने निजी सत्ता का स्तर बढ़ाने में अरुचि दिखानी प्रारंभ कर दी है। जबकि उसका काम इसी स्तर की अभिवृद्धि से जुड़ा हुआ है।
कला, सौंदर्य, संवेदना, शालीनता, करुणा, मैत्री और उत्कृष्टता के प्रति आस्था जैसी सद्भावनाओं के बढ़ जाने से चेतना का स्तर उस स्थिति में जा पहुँचना चाहिए जिसे देव मानव कहते हैं। उपभोक्ता को पशु और उद्धतता को पिशाच कहते हैं। पदार्थ के साथ प्राणी जितना घनिष्ठ रहता है उसी आधार पर उसकी जड़ता बढ़ जाती है और यंत्र मानव जैसी स्थिति में उसे जीवन-यापन करना पड़ता है। चेतना का भावपक्ष विकसित हो जाने पर दृष्टिकोण में उत्कृष्टता का समावेश होता है और स्थिति कुछ दूसरी ही होती है। चेतना का स्तर ऊँचा होने से व्यक्तित्व सुगठित बन पड़ता है। उस समय ऐसी रीति-नीति अपनाई जाती है कि सम्पदायें एवं विभूतियाँ उत्कृष्ट प्रयोजनों के लिए प्रयुक्त हों। चेतना की अविकसित स्थिति उसे माना जाता है जो भावना की दृष्टि से बौनी है, जो संकीर्ण स्वार्थपरता का ताना बाना बुनने में तो कुशलता का परिचय देती है पर व्यापक परमार्थ-शीलता और उदार आत्मीयता भी बनी रहनी चाहिए, इस तथ्य को प्रायः भुला ही बैठती है।
चेतना की विकासमान स्थिति उदार और आदर्शवादी परम्पराएँ स्नेह सद्भाव को बनाये रहती हैं। सद्भाव एवं सत्प्रवृत्तियाँ ही व्यक्ति, समाज, राष्ट्र और विश्व को मानवी महानता के अनुरूप बनाती हैं। सृजन और सहयोग का वातावरण इसी आधार पर बनता है। संकीर्ण दृष्टिकोण के लोग ही अपहरण और आक्रमण की नीति अपनाते हैं और उनकी क्रिया-प्रतिक्रिया से सर्वत्र विषाक्तता फैलती है।
कृमि कीटकों की अविकसित चेतना हमें उपहासास्पद लगती है। ठीक उसी प्रकार सुविकसित देवमानव के लिए हमारी नरपशु जैसी स्थिति निराशाजनक है। महर्षि अरविन्द ने इस तथ्य को स्पष्ट करते हुए कहा है कि अतिमानव के समक्ष मनुष्य बन्दर जैसा लगेगा क्योंकि दुर्बल काया और अभावग्रस्त परिस्थितियों में भी देवमानव अपनी गरिमा के सहारे स्वयं खिलते और दूसरों को प्रेरणा देते हैं इसके विपरीत क्षुद्र दृष्टिकोण रहने पर सुसंपन्न लोग भी कृपणता और तुच्छता की कीचड़ों में पड़े रहते हैं। संपत्ति की शक्ति से सभी परिचित हैं, पर विभूतिवानों की सामर्थ्य कितनी बढ़ चढ़ी होती हैं इसका अनुभव विरले ही करते हैं। विभूतिवान स्वयं उठते हैं और अपने साथ-साथ प्रबल झंझावात के द्वारा धूलिकणों को आसमान तक पहुँचा देने की तरह असंख्यों को ऊँचा उठाते हैं। अपनी प्रतिभा से अंधकार एवं अवसाद की गई गुजरी परिस्थितियों को आलोक और ऊर्जा देकर परिवर्तित कर देते हैं।
भौतिक क्षेत्र में चेतना का विकसित क्रिया−कलाप आदिमकाल से आज तक की प्रगति का पर्यवेक्षण करते हुए जाना जा सकता है। यदि आत्मिकी के परिक्षेत्र में अंतरंग की विभूतियों के विकसित करने में यहाँ तत्परता नियोजित की जा सके तो अनगढ़पन एवं अस्त−व्यस्त स्थिति में पड़ा मनुष्य सहज ही देवमानव जैसी स्थिति में पहुँच सकता है।
जब तक विषमता रहेगी तक तक दमन और विद्रोह का सिलसिला चलता रहेगा। चैन किसी को न मिलेगा। शान्ति के लिए आवश्यक है कि समता उत्पन्न वाली व्यवस्था बने।
शुक्राचार्य के गुरुकुल में एक प्रतिभावान बालक पढ़ता था-कच। साथ ही शुक्राचार्य की पुत्री भी साथ-साथ हो गयी।
देवयानी जब वयस्क हुई तो कच की प्रतिभा पर मुग्ध रहने लगी। उसकी इच्छा थी कि यदि इस युवक के साथ उसका विवाह हो जाय तो अच्छा रहे। इसके लिए उसने स्वयं भी प्रस्ताव किया और पिता से भी कहलवाया।
कच आरंभ से ही देवयानी को बहिन कहता रहा था।
उसे उसी भावना से श्रद्धा भी करता था। बहिन को पत्नी कैसे बनाये? इससे तो अनर्थ हो जायेगा। कच ने स्पष्ट इनकार कर दिया।
इस पर देवयानी और शुक्राचार्य दोनों ही रुष्ट हो गये। उसने शाप दिया कि इस गुरुकुल में पढ़ी विद्या तुम्हें विस्मृत हो जाये? शाप कच ने शिरोधार्य किया पर नैतिक मर्यादा को तोड़ने के लिए वह किसी प्रकार तैयार न हुआ।
पल-क्षण, रात्रि-दिवस, मास-आयन वर्ष के रूप में समय की आँख मिचौनी चलती रही। कभी साधनों का अभाव, कभी आजीविका का, कभी ज्ञान का अभाव, कभी विवेक का कभी शक्ति का अभाव, कभी सामर्थ्य का। सब मिलकर इतने जीवन में कण्व को न कहीं शान्ति मिली न सन्तोष। उन्हें मनुष्य जीवन में सर्वत्र अपूर्णता ही अपूर्णता दिखाई दी। शरीर भी न अपनी इच्छा से मिलता है, न स्वेच्छा से, अन्त होता है, न जाने किन बंधनों में बँधा पड़ा हूँ, ऐसी अशान्ति बार-बार उठती रही। अतएव उनने निश्चय किया वे पूर्णता की प्राप्ति करके रहेंगे।
प्रातः बेला में जब शीतल समीर के सुगंधित झोंकों में सारा नगर निद्रामग्न हो रहा था, कण्व उठे और एक ओर जंगल की तरफ चल पड़े। चलते ही गए, शाम होने को आयी। उन्होंने विशाल शैल श्रृंखला देखी जिसकी एक बाहु दक्षिण के हृदय में प्रवेश कर रही थी, दूसरी उत्तर के अन्तस्तल में। सूर्यदेव अपनी पीतवर्णी आभा के साथ इस अंचल में ही अस्त होते जा रहे थे। उनके लिए वह अलौकिक दृश्य था, आखिर अभी वे बालक ही तो थे। सोच अपनी गोद में भगवान सूर्य को शयन कराने वाले यह पर्वतराज ही पूर्ण हैं। वे वहीं टिक गए और पूर्णता के लिए पर्वत की उपासना करने लगे। इसी पर्वत पर एक और महात्मा रहा करते थे।
पारस्परिक वार्तालाप से पता चला कि इस बालक ने पर्वत की ऊँचाई में ही पूर्णता देखी सो उन्हें हँसी आ गई। उन्होंने हलके से मुसकराते हुए कहा-”रे कण्व! तूने समुद्र देखा होता तो पर्वत की ऊँचाई को कभी भी पूर्ण नहीं मानता।
गाय जिस तरह हरित तृण की खोज में वन-वन भटकती है, उसी तरह वह भी पूर्णता की खोज में भटकने लगे। उन्हें अपनी भूल पर विस्मय हुआ और ज्ञान की लघुता पर दुःख भी। किन्तु एक निश्चय “मुझे पूर्णता प्राप्त करनी चाहिए” का बल उनके साथ था। चल पड़े वह और कई दिनों की यात्रा के बाद वे समुद्र तट पर जा पहुँचे।
विशाल जल राशि अनन्त जीवों को अन्तस्तल में आश्रय दिए अनन्त दूरी तक फैले समुद्र को देखकर उनका मस्तक श्रद्धावनत हो गया। उन्होंने कहा-”धन्य हो प्रभु! तुम्हारी गहराई ही पूर्णता है। सूर्य पर्वत में डूबता दिखाई दिया, वह तो भ्रम मात्र था। अब मुझे पता चला पूर्व एवं पश्चिम दोनों तुम्हारे ही बाहु हैं, एक से सूर्य भगवान निकलते और दूसरे में समा जाते हैं। क्षमा करना प्रभु! हम मनुष्यों की दृष्टि और ज्ञान बहुत सीमित है, इसलिए यह भूल हुई। आगे ऐसी भूल नहीं होगी।”
बाल सुलभ वाणी सुनकर सिन्धुराज अपनी हँसी नहीं रोक सके। उन्होंने कण्व को अपने एक ज्वार की शीतलता का स्पर्श कराते हुए कहा-”वत्स! ऊँचाई और गहराई में पूर्णता नहीं होती। तुम मन्दराचल पर तप कर रहे-तपस्वी वेण के पास जाओ तुम देखोगे उनका तप हिमगिरि के समान उत्तुंग और साधना में मुझ सागर से भी बढ़कर गहराई है। निश्चय ही उनके पास जाकर तुम पूर्णता की प्राप्ति कर सकोगे।”
किसी तरह बीहड़ों-जंगलों को पार करते वे महात्मा वेण के पास पहुँचे और उनके चरणों में अपनी श्रद्धा समर्पित करते हुए भोले बालक ने अभ्यर्थना की-”भगवान्! पूर्णता के लिए भटक रहा हूँ, कहीं शान्ति नहीं मिलती, मुझे अपनी शरण में ले लें और मेरा उद्धार करें।”
बालक की अचल श्रद्धा व भक्ति देखकर तपस्वी का हृदय भर आया। उन्होंने आशीर्वाद दिया “वत्स! यश से आत्मा मुक्त थोड़े ही होती है।” कण्व ने कोमल किन्तु दृढ़ स्वर में प्रार्थना की।
तपस्वी ने एक क्षण बालक की ओर देखा और वे सहसा गम्भीर होते हुए, उन्होंने कहा-”तात! पूर्णता के लिए गहराई और ऊँचाई ही पर्याप्त नहीं, तप से भी कुछ काम नहीं चलता, उसके लिए गति चाहिए। मुझे भी मुक्ति की कामना है, इसलिए मैंने सामाजिक बन्धन तोड़ डाले है, अब मैं केवल अपने लिए स्थिर हूँ। तुम जो कुछ चाहते हो वह मेरे पास कहाँ है? अच्छा हो तुम शुद्धायतन के पास चले जाओ जो काम-क्रोध, लोभ, मोह और यश के प्रलोभनों के बीच भी अपने लक्ष्य के लिए पर्वत के समान अटल और अडिग हैं। उन्होंने गति को तपश्चर्या माना है। वे रात-दिन, बन्धु-बान्धवों पड़ोस और समाज के लिए राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय सुख-शान्ति के लिए घुला करते हैं। वे मुझ से श्रेष्ठ हैं, उनके पास जाने से तुम्हें अभीष्ट की प्राप्ति हो सकेगी।”
वह उनके पास भी हारे-थके पहुँचे। लगातार की भाग दौड़ में उनका मुख ग्लान हो गया था, होंठ सूख रहे थे। तपस्वी शुद्धायतन ने जल और भोजन से उनका सत्कार करते हुए अपने पास आने का कारण पूछा। कारण मालूम होने पर वह सौम्य स्वर में बोले-”कण्व! इस संसार में ऊँचाई-गहराई, तप और कर्मठता के साथ ज्ञान का होना भी आवश्यक है। तुमको मैं ऐसे ज्ञानी सद्गृहस्थ विरुध का परिचय देता हूँ। वहाँ चले जाने से तुम पूर्णता की प्राप्ति कर सकोगे।
कण्व का शरीर भले इस भटकन से थक गया हो, पर मन में अभीप्सा की ज्वाला धधक रही थी। बिना एक पल रुके वे चल पड़े और कुछ ही दिनों में विरुध के पास पहुँचकर उन्होंने विनीत भाव से अपने आने का उद्देश्य कह सुनाया। विरुध ने उत्तर दिया-”वत्स! मानता हूँ मुझे ज्ञान के कुछ कण मिले हैं। उसने मेरे व्यक्तित्व को सीमित कर दिया है। अहंकार मनुष्य के संसार को छोटा कर देता है। उसके रहते पूर्णता की कल्पना कहाँ की जा सकती है। जीवन का वास्तविक तत्व संवेदना है। भावुकता-संवेदनशीलता-भावना के क्रम में जिसने अपने अन्तःकरण को विकसित कर ईश्वरीय प्रेम को पा लिया है वही पूर्ण है। समर्पण और प्रेम के मर्म को जानने वाले भक्त देवदास के पास तुम चले जाओ। आशा है, तुम्हें अपने लक्ष्य की पूर्ति का साधन वहाँ मिल जाएगा।
अब तक वे बहुत थक चुके थे। इतने दिनों तक यदि वे किसी एकान्त में बैठकर तप करते तो शायद पूर्णता का प्रकाश पा लेते। पर यहाँ तो अभी तक भटकने के अतिरिक्त कुछ हाथ न लगा। पर यह तो हमारी सोच है। कण्व तो ब्रह्म जिज्ञासा की अनन्त प्यास लेकर भटक रहे थे। उसका बुझना तो लक्ष्य प्राप्ति के साथ ही सम्भव था।
उनके कदम आगे बढ़ते गए और भक्त देवदास की शरण में जा पहुँचे। उन्होंने कहा-”भगवन्! मुझे भक्ति के दर्शन कराइए। मैंने सुना है, भक्ति से पूर्णता की प्राप्ति होती है।”
भक्त देवदास मुस्कुराए और कहने लगे-”तात! मैंने अपने कर्ताभाव को भगवान के चरणों में समर्पित करने की कोशिश की। तो भी जब कभी मुझे मोक्ष की कल्पना उठती है। इन क्षणों में मुझे अनुभव होता है कि मेरा कर्तापन पूर्णतया नष्ट नहीं हुआ। जब तक मैं अपनी सीमा मर्यादा में बँधा हूँ और सृष्टि के अणु-अणु में व्याप्त आत्मा के साथ एकरस नहीं हो जाता तब तक पूर्णता कहाँ। तुम वशिष्ठ के पास जाओ, वहाँ सम्भव है तुम्हें कोई उचित मार्ग मिल सके।”
कण्व वशिष्ठ के आश्रम में पहुँचे। आश्रम परिसर से वेद मन्त्रों की मधुर गूँज उठ रही थी। प्रवेश करने पर पाया महर्षि कुछ छात्रों से घिरे बैठे हैं। वह भी जाकर एक कोने में चुपचाप बैठ गए। ऋषि व्यक्तित्व के मर्म को समझाते हुए कह रहे थे-”जीवन का तत्व संवेदना है। ईश्वरीय प्रेम के रूप में यह परिणत हो सका इसकी एक ही कसौटी है-सेवा। सेवा का अर्थ किसी की शारीरिक सहायता भर नहीं, वैचारिक सहायता भी है। उसके आत्मोत्कर्ष के प्रयास भी इसी में समाहित हैं। जिसने स्वयं को इसके लिए पूर्णतया समर्पित कर दिया वह पूर्ण हो गया।”
पाठ समाप्त ही होने को था इतने में एक अन्तेवासी किसी व्यक्ति को सहारा देकर लाए। उसके कपड़े पूरी तरह भीगे हुए थे। वह अर्ध बेहोशी जैसी स्थिति में था। महर्षि स्वयं उसकी सुश्रूषा में जुट गए। विद्यार्थी उनकी सहायता कर रहे थे। होश में आने पर उस व्यक्ति ने बताया कि जीवन से उकताकर उसने सरयू नदी में कूदकर आत्म हत्या की कोशिश की। परन्तु बचा लिए जाने के कारण वह अपने प्रयास में सफल नहीं हो पाया। महर्षि बड़े प्रेम से उसकी समस्याओं को पूछते और निराकरण सुझाते थे। इसे महर्षि का तप प्राण कहें या हृदय की प्रेम सामर्थ्य आगन्तुक में जीवन की उमंग जीवित हो उठी। सद्विचारों की जीवंतता लिए वह अपने घर की ओर लौट पड़ा। इस कार्य में शाम हो गयी थी। परिचर्या से निवृत्त होने पर ब्रह्मर्षि वशिष्ठ ने कण्व के कन्धे पर अपना स्नेह भरा हाथ रखते हुए कहा “किस कारण आए वत्स?” कण्व अपनी आँखों में भाव बिन्दु सँजोये बोले “भगवान्! पूर्णता के लिए भटक रहा था। आपके चरणों में आकर पूर्णता का मर्म पा लिया।”
साधना का उद्देश्य आत्मसत्ता को परिष्कृत करना है। जीव अपने आप में पूर्ण है। पूर्ण से उत्पन्न हुआ पूर्ण ही होना चाहिए। इसके लिये उपयुक्त बोध, साहस और कौशल प्राप्त करने के लिए विभिन्न अध्यात्म साधनाएँ की जाती हैं। प्रसुप्त को जाग्रत में परिणत करने के लिये आत्म साधना का पुरुषार्थ किया जाता है। इस मार्ग पर चलते हुए जो सफलताएँ मिलती हैं, उन्हें सिद्धियों के नाम से जाना जाता है। उन्हें अतीन्द्रिय क्षमताएँ भी कहा जाता है। उन्हें अतीन्द्रिय क्षमताएँ भी कहा जाता है। इन सामर्थ्य अथवा क्षमताओं का मूल आत्मबल एवं ब्रह्म तेज है, जिसका उपार्जन गायत्री मन्त्रों की साधना द्वारा किया जाता है। इस क्षमता के चमत्कारी क्रिया−कलाप भौतिक क्षेत्र में संपदाएँ, सफलताएँ और आत्मिक क्षेत्र का उत्पादन है। जाग्रत आत्माओं का पुरुषार्थ इसी दिशा में नियोजित होता है। ब्रह्मतेज या आत्मबल के उत्पादन उपार्जन में जिस साधना का अभ्यास किया जाता है उसमें पंचमुखी गायत्री की पंचकोशी अनावरण प्रक्रिया प्रमुख मानी जाती है।
पंचकोशों के अनावरण की साधना में पाँच योगों का समावेश है-
(1) त्राटक बिन्दुयोग (2) सूर्य धन प्राणायाम, प्राणयोग (3) शक्त चालिनी, कुण्डलिनी योग (4) खेचरीमुद्रा लययोग (5) सोऽहम् साधना, हंसयोग। इस समन्वय को यम द्वारा नचिकेता को सिखाई गई कठोपनिषद् वर्णित पंचाग्नि विद्या भी कह सकते हैं। इनमें से प्रथम तीन का सामान्य परिचय इस प्रकार है-
बिन्दुयोग-त्राटक-
भगवान शिव और भगवती दुर्गा के भूमध्य भाग में तीसरा ने चित्रित किया जाता है। यह तीसरा नेत्र है। दिव्य दृष्टि सामान्य तथा दूरदर्शिता और विवेकशीलता को कहते हैं। उच्चस्तरीय स्थिति में उसे दूरदर्शन जैसी अतीन्द्रिय क्षमता माना जाता है। वेधक दृष्टि सामान्य तथा दूरदर्शिता और विवेकशीलता को कहते हैं। उच्चस्तरीय स्थिति में उसे दूरदर्शन जैसी अतीन्द्रिय क्षमता माना जाता है। वेधक दृष्टि भी यही है। इस केन्द्र से प्रचण्ड विद्युत शक्ति निकलती है और उसके द्वारा दूसरों को कई प्रकार के अनुदान देना संभव हो जाता है। भगवान शिव ने इसी तीसरे नेत्र से निकलने वाली प्रचण्ड विद्युत शक्ति के सहारे आक्रमणकारी कामदेव को जला कर भस्म कर दिया था। संजय इसी केन्द्र का उपयोग टेलीविजन की तरह करते थे। उन्होंने धृतराष्ट्र के पास बैठ कर ही सुविस्तृत क्षेत्र में फैले हुए महाभारत का समाचार सुनाते रहने का काम अपने जिम्मे लिया था।
इस शक्ति को जाग्रत करने की साधना त्राटक है। त्राटक साधना में धृत दीप जलाकर सामने रखते हैं। त्राटक साधना में धृत दीप जलाकर सामने रखते हैं। उसे एक बार आँख खोलकर देखते हैं, फिर आँखें बंद कर लेते हैं। भूमध्य भाग में ध्यान करते हैं कि प्रकाशज्योति भीतर जल रही है और अंतःक्षेत्र में विद्यमान तृतीय नेत्र को ज्योतिर्मय बनाती हुई, दिव्य दृष्टि उत्पन्न कर रही है। संकल्प बल द्वारा आज्ञा चक्र में उसकी प्रतिष्ठापना होती है और अभ्यास से उसे इतना परिपक्व बनाया जाता है और अभ्यास से उसे इतना परिपक्व बनाया जाता है कि चर्मचक्षुओं की तरह से इसे विश्वव्यापी दिव्यता का भान होने लगे। जड़ के आवरण में छिपी हुई आत्मा की झाँकी होने लगे। इसे विवेक का जागरण भी कह सकते हैं। त्राटक साधना से जो दूरदर्शी तत्वदर्शी विवेक जाग्रत होता है, उसे ऋतम्भरा प्रज्ञा कहते हैं। वही गायत्री मंत्र का धियः तत्व है। इस जागरण को आत्म जागरण की संज्ञा दी जाती है तथा इसे भौतिक और आत्मिक जीवन की महान उपलब्धि भी कहा जा सकता है।
प्राणयोग सूर्यवेधन प्राणायाम-
इस निखिल ब्रह्मांड में वायु, ईथर, ऊर्जा आदि की तरह ही एक ऐसा दिव्य तत्व भी भरा पड़ा है जिसे जड़ चेतन की समन्वित शक्ति प्राण कहते हैं।
यह प्रचुर परिमाण में सर्वत्र भरा पड़ा है। इसकी अभीष्ट मात्रा को खींचना और आत्मसत्ता में धारण कर सकना प्रयत्नपूर्वक संभव हो सकता है। इस प्राण विनियोग की प्रक्रिया को प्राणायाम कहते हैं। इसमें विशिष्ट क्रिया-प्रक्रिया को प्राणायाम कहते हैं। इसमें विशिष्ट क्रिया-प्रक्रिया के साथ श्वास-प्रश्वास क्रियायें करनी पड़ती है। साथ ही प्रचण्ड संकल्प-बल का वैज्ञानिक चुम्बकत्व समुचित मात्रा में समन्वित किये रहना होता है। इसी साधना को प्राणयोग कहते हैं। इसे करने वाले को प्राणवान कहते हैं। “लय” और “ताल” की महान् शक्ति का ज्ञान सर्वसाधारण को तो नहीं होता, पर विज्ञान के विद्यार्थी जानते हैं कि सर्वविदित न होने पर भी यह सामर्थ्य कितनी प्रचण्ड है।
सूर्यवेधन प्राणायाम में लय और ताल के विशेष समन्वय है। इड़ा और पिंगला शरीरगत दो विद्युत प्रवाह है जो मेरुदंड के अंतराल में काम करते रहते हैं। इनका मिलन केन्द्र सुषुम्ना हकलाता है। पिंगला से संबंधित श्वास प्रवाह को उलट-पुलट कर चलाने की प्रक्रिया विशेष महत्वपूर्ण है। हृदय की धड़कन भी इसी उलट-पुलट का क्रम रक्त-संचार के सहारे जीवन धारण किये रहने का महान कार्य संपादन करती है।
इस लोम-विलोम क्रम से किया जाने वाला प्राणयोग सूर्यवेधन प्राणायाम कहलाता है। ब्रह्मवर्चस साधना में इसी का अभ्यास कराया जाता है। साधक अपने भीतर प्राणतत्व की अभिवृद्धि का अनुभव करता है। इस प्रक्रिया के द्वारा उपार्जित प्राण सम्पदा साधक की बहुमूल्य संपत्ति होती है। इस पूँजी को आवश्यकतानुसार विभिन्न प्रयोजनों के लिये प्रयुक्त किया जा सकता है। इसे बहिरंग और अंतरंग क्षेत्र का सामर्थ्य उत्पादक प्रयोग कह सकते हैं। कुण्डलिनी जागरण के लिये तो इसी क्षमता की विशेष रूप से आवश्यकता पड़ती है। विद्युत उत्पादन में जो कार्य जेनरेटर करते हैं, लगभग उसी प्रकार व्यक्तित्व के विकास में अनेक प्रयोजनों में काम आने वाली प्राणऊर्जा का संचय सूर्यवेधन प्राणायाम की साधना द्वारा किया जाता है।
कुण्डलिनी योग-शक्तिचालनी-
ब्रह्म शक्ति का केन्द्र ब्रह्मलोक और जीव शक्ति का आधार भू-लोक है। दोनों की काया के भीतर सूक्ष्म रूप से विद्यमान हैं। भूलोक-जीव संस्थान मूलाधार चक्र है। मूलाधार अर्थात् जननेंद्रिय मूल। प्राणी इसी स्थान की हलचलों और संचित सम्पदाओं के कारण जन्म लेते हैं। इसलिये सूक्ष्म शरीर में विद्यमान उस केन्द्र का उद्गम स्थान मूलाधार चक्र कहा गया है। कुण्डलिनी शक्ति इसी केन्द्र में नीचा मुँह किये मूर्छित स्थिति में पड़ी रहती है और विष उगलती रहती है। इस अलंकार विवेचन में यह बताया गया है कि जीवात्मा का भौतिक परिकर इसी केन्द्र में सन्निहित है। इस अलंकार विवेचन में यह बताया गया है कि जीवात्मा का भौतिक परिकर इसी केन्द्र में सन्निहित है। प्रजनन कर्म इसी की संवेदनशीलता की दृष्टि से अति सरस एवं उत्पादन की दृष्टि से आश्चर्यचकित करने वाला एक छोटा-सा किन्तु चमत्कारी अनुभव है। इसे कुण्डलिनी शक्ति का यह कुण्डलिनी केन्द्र, मूलाधार की भौतिक क्षमता का मानवी उद्गम कहा जा सकता है। जिस प्रकार ब्रह्म सत्ता का प्रत्यक्षीकरण ब्रह्मलोक में होता है, ठीक इसी प्रकार प्रकृति की प्रचण्ड शक्ति का अनुभव इस जननेन्द्रिय क्षेत्र के कुण्डलिनी केन्द्र में किया जा सकता है। शारीरिक समर्थता, मानसिक सज्जनता और संवेदनात्मक सरलता की तीनों उपलब्धियाँ इसी शक्ति केन्द्र के अनुदानों द्वारा प्राप्त की जा सकती हैं।
कुण्डलिनी जागरण की साधना में मूलाधार शक्ति को जगाने-उठाने और पूर्णता के केन्द्र से जोड़ देने का प्रयत्न किया जाता है। मूलाधार की प्रसुप्त कुण्डलिनी को जगाने तथा ऊर्ध्वगामी बनाने का प्रथम प्रयास शक्ति चालिनी मुद्रा के रूप में संपन्न किया जाता है। ऊर्ध्वमुखी कुण्डलिनी अग्नि शिखा की तरह मेरुदण्ड मार्ग से ब्रह्मलोक तक पहुँचती है तथा अपने अधिष्ठाता सहस्रार से मिलकर पूर्णता प्राप्त करती है।
शक्तिचालिनी मुद्रा गुदा संकुचन की एक विशेष पद्धति है जिसे सिद्धासन या मुद्रासन पर बैठकर विशिष्ट प्राण साधना के साथ संपन्न किया जाता है। इस प्रक्रिया का समूचे कुण्डलिनी क्षेत्र पर प्रभाव पड़ता है जिससे उस शक्ति स्रोत के जागरण और उर्ध्व गमन के दोनों उद्देश्य पूरे हो सकें। इस प्रयास से उत्पन्न हुई उत्तेजना का सदुपयोग करने वाले अनेक असाधारण काम संपन्न कर सकते हैं। इस प्रकार पंचकोशी साधना के तीन प्रमुख साधना उपचार ये हैं, जिन्हें विधिविधान से करने पर निश्चित ही फल मिलता है।
महत्वाकांक्षी जोशुआ लेवमेन भावी जीवन की रूपरेखा के संदर्भ में अनेकों योजनायें बना कर विद्वान युकाची के पास ले गया और उनसे पूछा-वह उन्हें पूरा करने के लिए क्या तैयारी करे।
युकाथी ने यह सूची ध्यानपूर्वक देखी और मुसकराते हुए उसे वापस लौटा दिया। उनने कहा-बच्चे! इन सब योजनाओं से पहली योजना का तो कहीं नाम भी नहीं है और उसके बिना तुम्हारा बढ़-चढ़कर सोचना व्यर्थ है।
जोशुआ ने चकित होकर पूछा-भला, वह क्या योजना होनी चाहिए? उन्होंने कहा-अपने स्वभाव और चरित्र का निर्माण, जिसके बिना कोई व्यक्ति न बड़ा बन सकता है और न बड़ा काम कर सकता है।
प्रकृति के हर कण में उपयोगिता भरी पड़ी है। उसमें विद्यमान क्षमताएं प्रत्यक्ष तो नहीं दीख पड़ती पर उनका बारीकी से पर्यवेक्षण किया जाय तो अनेकानेक क्षमताएँ ऐसी दीख पड़ती है जो अद्भुत और असाधारण प्रतीत होती हैं। भौतिक विज्ञान ने उन्हीं को असाधारण प्रतीत होती है। इसी आधार पर मनुष्य को प्रकृति शक्तियों का अधिष्ठाता बनने का अवसर मिला है। जितनी समर्थ प्रकृति है, उतना ही संपन्न मनुष्य भी हो गया है। यह बात दूसरी है कि इन क्षमताओं का सही तरीके से सही प्रयोजन के लिए सही रीति से उपयोग न बन पड़ा अन्यथा प्रकृति पुत्र अब तक उन शक्तियों का स्वामी बन गया होता जिन्हें देवोपम कह सकते थे।
प्रकृति की दूसरी विशिष्टता है उसकी सुन्दरता। नेत्रों का प्रत्यक्ष दर्शन और मनःसंस्थान का भाव संवेदन मिलकर उस सर्वत्र बिखरे पड़े सौंदर्य को मनोरम रूप में निखारते हैं। जमीन पर घास का बिछा हरा मखमली फर्श, वृक्षों की शोभा श्रृंखला, पुष्प उद्यानों का सौरभ, मेधमालाएँ प्रातः सांय की स्वर्णिम दशाएँ, निर्झर-सरोवर आदि एक से एक बढ़ कर अपनी सुन्दरता का दिग्दर्शन कराते हैं। मन का सौंदर्य से भर देता है और जिधर भी देखा जाय उधर ही गुदगुदाने वाली छटा का बिखराव दीख पड़ता है। नेत्र इसमें सहायक होते हैं यों उनके बिना भी कल्पना के सहारे बहुत कुछ काम चल जाता है। सूरदास जैसे अन्ध कवि विश्व में बिखरे सौंदर्य को इतनी गहराई से देख लेते हैं जितना कि कोई आँखों वाला मंदमति अनुभव न कर सके।
सौंदर्य में एक विलक्षण आकर्षण होता है। उसे पास रखने या उसके पास रहने को मन करता है। बच्चे चन्दा मामा के पास जाना चाहते हैं या उसे अपने पास बुलाना चाहते हैं। प्रभातकालीन ऊषा, मेघमाला का घटाटोप, जल प्रवाह, हरीतिमा आदि के भी निकट रहने को मन चलता है। अथवा उन्हें अपने घर, उद्यान, पार्क में किसी प्रकार स्थापित करके मन बहलाने का तरीका खोज निकाला जाता है। प्रकृति सौंदर्य की समीपता अतिशय लालायित करती है। देख कर आनन्द उठाने में तो कोई हर्ज नहीं पर खोट वहाँ से पैदा होती है जहाँ उन्हें बटोरने और अधिकार में रखने की चेष्टा आरंभ होती है।
लोग तोता-मैना आदि सुन्दर पक्षियों को उन्मुक्त आकाश में विचरण करते हुए देखने की अपेक्षा यह चाहते हैं कि उन्हें पिंजड़े में बन्द करके पास रखें। उनसे चाहे जो कहलावें। चाहे जिस मुद्रा में रहने करने के लिए विवश करें। यही सौंदर्य का दुरुपयोग है। बगीचे में खिले हुए फूलों को तोड़ कर टोकरी में भर लेना, गुलदस्ता या हार पहन लेना, इसी दुष्प्रवृत्ति का द्योतक है कि सौंदर्य को अपने स्थान पर रहकर सभी को प्रसन्नता प्रदान कराते रहने की स्थिति में न रखने दे कर उसे अपने अधिकार बंधन में बाँध लिया गया। इसका परिणाम यह होता है कि उद्यान की शोभा चली जाती है और फूल असमय ही कुम्हला जाते हैं। यह प्रकृति के साथ अनाचार है जिसमें आँखें लोलुप और मन चोर बन कर भ्रष्टता की संरचना रचते हैं।
मानवी काया भी सौंदर्य का प्रतीक है। उसे सौंदर्य बोध वाले मन से और कला पारखी मन से आत्मीयता के साथ देखा जाय तो कोई भी शरीर सुंदर लग सकता है। विशेषतया पुरुष को नारी का और नारी को पुरुष का। दोनों में अपनी-अपनी विशेषताएँ हैं। स्वाभाविक रूप से यह सहज सुगम भी है। माता और बच्चा दोनों विपरीत लिंग के होते हैं पर दोनों के बीच पटरी खूब बैठती है। बहन-भाई स्कूल साथ-साथ पढ़ने जाते हैं और हँसते बोलते भी जाते हैं। घर में चाची ताई, बुआ अपने-अपने ढंग से घर के छोटे बड़ों से व्यवहार वार्तालाप करती रहती हैं, देवर भावज की नोंक झोंक चलती रहती है। इस तरह नर-नारी की विभिन्नता का संपर्क सान्निध्य रहने से घर का वातावरण शोभा सुषमा से भर जाता है। यह प्रकृति का सौम्य अनुसरण है।
इसमें विकृति भरा अनौचित्य तब घुलता है, जब कामुकता की दृष्टि से सौंदर्य को निहारना आरंभ किया जाता है। इस आधार पर तो किसी भी पवित्रतम रिश्ते के उत्तेजक अंगों को लुक छिप कर देखा जा सकता है या उनकी कल्पना की जा सकती है। इतने भर से प्रदूषण आरंभ हो जाता है, और भोली–भाली सौम्य, सरल, महिला कामिनी, रमणी, नागिन, डाकिन बन जाती है। अनैतिक कल्पनाएँ उछाल भरने लगती हैं। इसके अनेकों दुष्परिणाम होते हैं। कुदृष्टि मनोरोग है। इसके कारण प्रत्यक्ष या परोक्ष व्यभिचार की योजना बनने लगती है। ऊर्ध्वगामी बुद्धि तंत्र, द्रवित होकर जननेन्द्रिय मार्ग से जाग्रत अथवा स्वप्न-प्रसुप्ति में गलित हो क्षरित होने लगता है। मानवी-गरिमा को अक्षुण्ण बनाए रखने वाली वर्जनाओं का निर्वाह जब टूटता है तो नहर के किनारे टूट जाने पर अमर्यादित रूप से खेतों में पानी बिखर जाने जैसी स्थिति बन जाती है। सौंदर्य अपने आप में आनन्द, उत्साह पुलकन का आधार है। पर इसके प्रति अनुपयुक्त दृष्टिकोण बना लेने का परिणाम ऐसा होता है, जिसे दुखदायक ही कह सकते हैं।
चर्चा इन्द्रिय-निग्रह प्रसंग में नेत्रों की कुमार्ग गामिता यानी कुदृष्टि पर हो रही है। दूसरों की वस्तुओं को हथिया लेने के लिए ईर्ष्या इसी आधार पर उपजती है। चोरी करने का अपहरण करने का मन इसी आधार पर चलता है असीम मात्रा में सुन्दर वस्तुएं भी कोई जमा नहीं कर सकता, उनका उपभोग संभव नहीं। ऐसी दशा में वह अनुचित संग्रह अपने आप में एक भार बनता है। कितने ही लोग सुन्दर वस्तुएँ भी कोई जमा करने के लिए घर का बड़ा भाग घेर लेते हैं। नई भूमि पर कब्जा करते हैं। नए मकान बनते हैं। सामंत अनेक पत्नियाँ, उपपत्नियाँ अन्तःपुरों में कैद कर रखते थे। इसके परिणाम स्वरूप उन कुकृत्यों से संबंधित सभी पक्ष रोष, आक्रोश से भरे रहते थे। और निरन्तर विद्वेष की ऐसी आग सुलगती थी जो कभी-कभी भयानक दुर्घटनाएँ देर सवेर में घटित कर देती थीं। अब भी वेश्यालयों से संबंध रखने वाले भड़ुए या दलाल चैन से नहीं बैठ पाते। इसी कुमार्ग पर चलते हुए उन्हें अनेकों दुर्व्यसन घेर लेते हैं। कुमार्गगामी की आँखें भी जलती रहती हैं और समय से पहले ही अपनी ज्योति एवं सूक्ष्म दर्शन विशेषता गवाँ बैठती हैं। शरीर तो खोखले हो ही जाते हैं। अनेकों को यौन रोगों का शिकार बनना पड़ता है। बदनामी फैलने से प्रमाणिकता चली जाती है। मन डावाँडोल रहने से हाथ के काम सही तरीके से बन नहीं पड़ते। इस जाल जंजाल में साज सज्जा-उपहार आदि में पैसा भी ढेरों ही खर्च होता है।
आँखों के सौंदर्य बोध का दुरुपयोग होने की तरह दूसरी प्रबल इन्द्रिय रसना की बारी आती है। भोजन में अनेक प्रकार के स्वादों के समावेश की आकाँक्षा विविध विधि व्यंजन उपलब्ध करने के लिए ललकती है। इसे जुटाने में ढेरों समय, पैसा खर्च होता है। चटोरी जीभ पेट का सत्यानाश कर देती है और अनेकानेक बीमारियों को जन्म देती है। व्यंजनों की अभिलाषा ललक-लोलुपता उत्पन्न करती है। ऐसी दशा में यह लोलुपता, साथियों की दृष्टि में मान-सम्मान गिराती है। खर्च बढ़ती है और कुछ न कुछ नया ढूँढ़ती है। हर समय मुँह चलाते रहने के लिए विवश करती है। जिह्वा को दो इन्द्रियों के बराबर माना गया है। एक खाने वाली-स्वादेन्द्रिय दूसरी बोलने वाली-वाणी। वाणी से ही व्यक्ति की शालीनता, सज्जनता, मान्यता, भावना, स्तर एवं प्रतिभा का पता चलता है। इसलिए जीभ को ही जहाँ चटोरी बनने से रोकना है वहाँ उसे इतनी सुसंस्कृत भी बनाना है कि वार्तालाप में दूसरों पर उत्कृष्टता भरा प्रभाव छोड़ सके। इन्द्रिय संयम तब बन पड़ता है जब नेत्र, जननेन्द्रिय और जिह्वा को नियंत्रण में रख उन्हें सुसंस्कृत बनाया जाता है।
संसार को आँसुओं से भरकर गमगीन मत बनाइए। बुद्धिमानी इसमें है कि आप हँसे, दूसरों को हंसायें और हँसी खुशी की दुनिया बनायें।
एक आलसी आम के पेड़ के नीच पड़ा था। ऊपर से टूटकर एक पका आम उसकी छाती पर गिरा पर इतनी मेहनत कौन करे कि उसे उठाये और चूसे। इस बात की प्रतीक्षा कर रहा था कि कोई आये और सहायता देकर आम मुँह में निचोड़ दे।
थोड़ी देर बाद एक घुड़सवार उदार से निकला उसने सहायता के लिए उसे पुकारा। घुड़सवार सज्जन था वह रुक गया और उस पुकारने वाले के पास पहुँचा जब सभी बात मालूम हुई तो वह आग-बबूला हो गया और उसमें दो लात जमाई। मूर्ख इतना भी नहीं कर सकता।
इतने में पास ही पड़े हुए दूसरे आलसी ने इस पर प्रसन्नता की और कहा दो लातें और लगा दें। दूसरे के मुँह को कुत्ता चाट रहा था। इसी प्रकार से वह कुत्ते को भगाने के लिए तैयार नहीं हुआ।
इन आलसियों को कोसता हुआ घुड़सवार आगे चला गया।
मंत्रजप एक प्रकार से शब्द विज्ञान की एक शाखा है तो भी भौतिक विज्ञान उसका उपयोग नहीं कर पाता। उसका कारण और कुछ नहीं श्रद्धा-संवेदना का वैज्ञानिक विश्लेषण न कर पाना है। अध्यात्म विज्ञान की बात करते समय इसी तथ्य को यह कहकर प्रकट किया जाता है कि साधक की श्रद्धा इष्ट में जितनी अधिक होगी, उपास्य के प्रति उसका विश्वास जितना अधिक होगी, उपास्य के प्रति उसका विश्वास जितना प्रगाढ़ होगा, परमात्मा से मिलन की छटपटाहट-भक्ति जितनी तीव्रतर होगी, मंत्र का प्रभाव-प्रतिफल उतनी ही जल्दी उपलब्ध होगा। कभी-कभी अनायास ही किसी के मुख से निकले शब्द सच हो जाते है, शाप, वरदान फलित हो जाते हैं। उसमें भी उस व्यक्ति की उस क्षण की भावसंवेदना ही प्रमुख होती है। जब भाव संवेदनायें अपनी चरम अवस्था में उमड़ रहीं हों, उस समय मंत्र सिद्धि द्वारा कभी भी किसी भी समय किसी को भी लाभ पहुँचाया और सहायता की जा सकती है।
साधारणतया शब्द की शक्ति बहुत धीमी होती है। आकाश में बिजली चमकती है तो ध्वनि पहले होती है। प्रकाश पीछे प्रस्फुटित होता है। किन्तु दूरस्थ व्यक्ति को पहले चमक दिखाई देती है और गरज पीछे सुनाई पड़ती है। इसका प्रमुख कारण यह है कि प्रकाश की गति एक सेकेंड में एक लाख 86 हजार मील या 3108 मीटर है। ध्वनि की गति मंद होती है और यह एक सेकेंड में 1120 फुट या 330 मीटर जितनी छोटी दूरी की तय कर पाती है। इतनी स्वल्प क्षमता वाली ध्वनि कोई चमत्कार कैसे पैदा कर सकती है? यह विचारणीय प्रश्न है।
रेडियो, टेलीविजन आज घर-घर पहुँच गये हैं। बी.बी.सी. लन्दन, वी.ओ.ए. न्यूयार्क, रूस, जापान आदि के प्रसारण एक सेकेंड में इतनी दूर बैठे भारतवासी सुन लेते हैं। ऐसा क्यों होता है, जबकि ध्वनि की गति मात्र 330 मीटर प्रति सेकेंड है।
भौतिक शास्त्र के विद्यार्थी जानते हैं कि रेडियो प्रसारण जिस स्टेशन से होता है वहाँ एक बड़ी क्षमता वाला विद्युत जेनरेटर जुड़ा रहता है। यह विद्युतशक्ति चुम्बकीय क्षेत्र से गुजारी जाती है। जिससे उसकी सामर्थ्य भी कई गुना अधिक तरंगित हो जाती है। इन विद्युत चुम्बकीय तरंगों के जहाज पर ही शब्दों के यात्री बैठा दिये जाने हैं जिससे उनकी गति 330 मीटर प्रति सेकेंड से बढ़कर 3+108 मीटर प्रति सेकेंड हो जाती है। इस क्रिया को ‘सुपर इम्पोज्ड रिकार्डेड साउण्ड’ कहते हैं। इस शक्ति से न केवल रेडियो प्रसारण ही संभव हुए हैं, वरन् अंतर्ग्रही राकेटों की उड़ान के समय उन्हें दिशा निर्देश देने, उनकी यान्त्रिक खराबी को दूर करने का भी कार्य इस शक्ति से किया जाने लगा है। सोनोग्राफी से लेकर साउण्ड थेरेपी तक के कितने ही चिकित्सकीय कार्य सम्पन्न होने लगे हैं।
अब शक्ति के एक नये स्रोत “लेसर” की जानकारी वैज्ञानिकों को हस्तगत हुई है जिसकी गति प्रकाश या विद्युत चुम्बकीय तरंगों की अपेक्षा बहुत अधिक है। अनुमान है कि यदि शब्द को इस शक्ति के ऊपर चढ़ा दिया जाय तो व्यक्ति ब्रह्मांड के दूसरे छोर से बैठ कर पृथ्वी के किसी घने जंगल में किसी गुफा के अन्दर बैठे हुए व्यक्ति से उसी प्रकार बात कर सकता है जैसे दो साथ बैठे व्यक्ति कर लेते हैं। यह किरणें इतनी शक्तिशाली होती है कि एक फुट मोटी इस्पात की चादर में सेकेंड के अरबवें हिस्से में ही छेद कर सकती हैं। आँख की पुतली में इसके लाखवें हिस्से में आपरेशन करना हो तो यह किरणें यह कार्य कुशलता पूर्वक संपन्न कर सकती हैं। लेसर किरणों को भविष्य की चिकित्सा का चमत्कार माना जा रहा है। एक दिन वह आ सकता है जब क्षय तथा कैंसर जैसे असाध्य रोगियों को एक पंक्ति में लगाकर रेल की टिकटें बेचने जितने समय में चंगा करके भेजा जाया करेगा। मंत्र से भी ऐसी ही अपेक्षायें की जाती हैं। मंत्र की शक्ति सामर्थ्य असीम है, वह लेसर किरणों से कम नहीं, वरन् अधिक ही है।
मंत्र जप-प्रक्रिया में भी इसी तरह की शक्ति तरंगों का उत्पादन और समन्वय होता है। पर उसका प्रभाव साधक की अस्त−व्यस्त मनःस्थिति के कारण दिखाई नहीं देता। “योगः चित्तवृत्तिश्चनिरोधाः” अर्थात् चित्त वृत्तियों को एकाग्र करना ही योग साधना का उद्देश्य है। पातंजलि योग दर्शन का एक सूत्र बताता है कि मंत्र जप के साथ मन की बिखरी हुई शक्तियों को समेटना आवश्यक है। इसी से जप ‘शक्तिशाली बनता हैं। यह शक्ति विद्युत चुम्बकीय क्षमता की तरह है और प्रारंभिक है। अन्तिम अवस्था तो मंत्र के साथ-साथ भाव संवेदना का ही जुड़ना है।
भावनाओं की शक्ति मन की शक्ति से अनेक गुना अधिक है। परामनोविज्ञान के अनुसंधानकर्ताओं को ऐसे अनेक उदाहरण मिले हैं जिन्हें ‘टेलीपैथी’ या दूर संप्रेषण के नाम से जाना जाता है। इस संदर्भ में ‘साइको काइनोसिस’ नामक एक स्वतंत्र विज्ञान ही विकसित कर लिया गया है जिसमें मनुष्य की भाव संवेदनाओं से लेकर अतीन्द्रिय क्षमताओं तक की विज्ञान सम्मत जानकारियाँ सम्मिलित हैं। पाया गया है कि अब अत्यधिक संवेदना की स्थिति में पृथ्वी के किसी वायरलैस-टेलीफोन के संदेश पहुँचाया जा सकता है। जबकि टेक्नोलॉजी में आज तक शब्द तरंगों को नियंत्रित किये बिना कभी भी यह संभव नहीं होता। यही कारण है कि रेडियो स्टेशन के प्रसारण रेडियो से तो सुने जा सकते हैं, पर रेडियो वाला स्वयं रेडियो स्टेशन वाले को कुछ नहीं कह सकता। मंत्र जप और भाव संवेदना की यह विशेषता उसे भौतिक उपार्जन से अधिक महत्वपूर्ण बनाती है। मन्त्रशक्ति केवल, वरन् साधक के व्यक्तित्व में भी प्रकंपन पैदा करती है। उससे उसका व्यक्तित्व भी प्रखर प्रकाशवान बनता चला जाता है।
मदन मोहन मालवीय जी के जीवन की एक घटना है। वे तब इलाहाबाद में थे और उनकी माँ वाराणसी में थी। माँ एक दिन दुर्घटनावश आग से बुरी तरह जल गयीं। उसी समय उन्होंने सम्पूर्ण हृदय से मालवीय जी को याद किया। उसकी प्रतिक्रिया तुरन्त मालवीय जी को तीव्र जलन के रूप में हुई। उनके अंतःकरण ने तुरन्त अनुभव किया कि माँ जल गई है। वे तत्काल बनारस पहुँचे और वस्तुस्थिति को सत्य पाया। जगत् गुरु आद्य शंकराचार्य के संबंध में भी ऐसा ही एक प्रसंग है। उन्होंने बचपन में अपनी माँ को उनका दाह संस्कार स्वयं अपने हाथों से करने का वचन दिया था। उनकी मृत्यु के समय वे उत्तर भारत की यात्रा में थे, जहाँ उन्हें माँ की अभ्यंतर वाणी सुनाई दी और वे मध्य यात्रा से ही घर लौट पड़े और ठीक समय पर पहुँच कर माँ का अन्तिम संस्कार संपन्न किया। संत ज्ञानेश्वर एवं रामकृष्ण परमहंस के बारे में प्रसिद्ध है कि उन्हें मानवेत्तर प्राणियों की भावसंवेदनाओं भी अपनी मर्मांतक पीड़ा से अवगत करा देती थी। निरीह प्राणियों के शरीरों पर पहुँचने वाले कष्ट स्वयं उनकी काया पर उभर आते थे।
भावनाओं का विज्ञान समझ में न आता हो, यह अलग बात है, पर उनके अस्तित्व से कोई इनकार नहीं कर सकता। वह किन प्रकाश परमाणुओं का उपादान है, संभव है भविष्य में उसका पता चल सके, पर उनकी शक्ति सामर्थ्य दैनिक जीवन-व्यापार में हर कोई देखता है। भावनाओं के आधार पर ही सृष्टि की क्रीड़ा चलती रहती है। भावविहीन वातावरण सुनसान मरघट की तरह जान पड़ता है।
मंत्र में यह भावनायें ही-श्रद्धा−विश्वास भक्ति माध्यम से ही कार्य करती है। उन्हें जितना अधिक प्रखर और पवित्र बनाया जाता है, मंत्रशक्ति उतनी ही शीघ्र फल देने लगती है। आधे-अधूरे मन से जपा गया मंत्र फल तो देता है, पर उसमें थोड़ी देर लगती है। मंत्रशक्ति को प्रभावशाली बनाने में अन्तःश्रद्धा की प्रगाढ़ता ही प्रमुख भूमिका निभाती है। यही वह शक्ति है जो मंत्र को जीवन्त और सद्यः फलदायी बनाती है।
गंगा यमुना का जल श्वेत हो या श्याम-उनमें से किसी में भी स्नान करने पर राजहंसों की धवलता यथावत् बनी रहती है। वे जल के रंगों से प्रभावित नहीं होते।
ओहियो के जंगल में एक महिला रहती थी। लकड़ी काटकर अपना गुजारा करती। भेड़ियों से भरे उस जंगल में माँ बेटे दो ही प्राणी रहते थे।
इन विकट परिस्थितियों में कुछ बड़ा होने पर कर्निंघम ने विद्या पढ़ने के लिए समीपवर्ती नगर में जाना शुरू किया। लगातार के परिश्रम से ऊँची शिक्षा प्राप्त कर ली। अच्छी नौकरियाँ मिलने लगी।
पर उसने कहा देश में असंख्य असहाय भरे पड़े है। उसे उनकी सेवा में अपनी जिन्दगी लगानी चाहिए।
उनने असहाय-अनाथ बालकों के लिए निर्वाह, भोजन एवं शिक्षा का प्रबंध करने के लिए एक आश्रम बनाया। बच्चे कुछ स्वावलंबनपूर्वक कमा लेते थे और कुछ उदार लोगों से सहायता के रूप में मिल जाता था।
इस समय उसमें दस हजार अनाथ निर्वाह कर शिक्षा प्राप्त करते है।
यों तो ‘गुस्सा’ आज के मनुष्य को बात-बात में आते देखा जाता है और वह उसकी दिनचर्या का एक अंग बन चुका है, किन्तु मनोविज्ञान और शरीर विज्ञान की दृष्टि से विचार किया जाय, तो निष्कर्ष यही सामने आता है कि यह उसका स्वभाव नहीं है, पर सभ्यता के विकासक्रम में किन्हीं कारणों से उसमें सम्मिलित हो गया है।
फिर वे कारण क्या है, जिनने कभी के सर्वथा शान्त प्राणी को इतना क्रोधी बना दिया है? मनोविज्ञान इसका उत्तर यह कहकर देता है कि यह उसके सीखने-सिखाने की अद्भुत विशेषता ही है, जो इसके लिए जिम्मेदार है। उसके अनुसार पिछली कुछ पीढ़ियों से यह दुर्गुण उसे विरासत में मिला और आज वही अभिन्न आदत के रूप में चला आ रहा है। पावलोव के कुत्ते वाले उदाहरण के माध्यम से इसे भलीभाँति समझा जा सकता है। उल्लेखनीय है कि इवान पावलोव एक सोवियत वैज्ञानिक थे और वे यह सिद्ध करना चाहते थे कि सीखने-सिखाने की प्रक्रिया द्वारा प्राणी कमी किसी भी प्रवृत्ति को नियंत्रित, परिवर्तित अथवा आदत में सम्मिलित किया जा सकता है। इस हेतु उन्होंने कुत्ते पर एक प्रयोग किया। उसे जब भी खाना देना होता, वे पहले घंटी बजाते, फिर भोजन देते। यह प्रक्रिया अनेक दिनों तक चलती रहीं। घंटी बजती। कुत्ता उपस्थित होता और भोजन पाकर चला जाता। इतने दिनों में उसके मस्तिष्क में यह बैठ चुका था कि घण्टी बजने का अर्थ भोजन दिया जाना है। अतएव दूसरे अवसरों पर वह भोजन देखता भी, तो उस ओर से निरपेक्ष ही बना रहता, क्योंकि वह जानता था कि वह उसके लिए नहीं है। दूसरा जो महत्वपूर्ण परिवर्तन पावलोव ने देखा, वह था कुत्ते के मुँह में पानी आना। पहले यह पानी भोजन को देखने मात्र से उसके मुँह में भर आता था, पर अब उसके स्वभाव में बदलाव आ चुका था। अब घण्टी सुनने के पश्चात् उसके मुँह में पानी आता।
इस प्रयोग के द्वारा पावलोव यह दर्शाना चाहते थे कि कोई भी आदत प्राणी तब तक आत्मसात् नहीं कर सकता, जब तक वह इस प्रकार की किसी प्रक्रिया से होकर न गुजरा हो, सामान्य जीव-जन्तुओं से लेकर अतिविकसित मनुष्य तक में वह सिद्धान्त समान रूप से लागू होता है। इनकी अधिकाँश क्रियाएँ ऐसी होती हैं, जिनमें उन्हें प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है। शेष तो वे अपनी अन्तःप्रेरणा के कारण स्वतः ही सीख लेते हैं, किन्तु ऐसी क्रियाएँ कम ही होती हैं। शेर-शावकों की स्थिति बकरी के बच्चों जैसे ही होते है। यह तो उनके माता-पिता होते हैं, जो शिकार का नियमित प्रशिक्षण देकर उन्हें अपने मूल स्वरूप में आक्रामक पशु के रूप में ढाल लेते हैं, अन्यथा अति आरंभ में यदि उन्हें अहिंसा पशुओं, बकरियों के झुण्ड में रख दिया जाय, तो वे उनके जैसे ही अहिंसक बनते देखे जाते हैं। भेड़िये के समुदाय में पलने वाले शेर की वह कथा प्रसिद्ध है, जिसमें वह भेड़िये जैसा ही व्यवहार करने लगा था। बाद में किसी सजातीय द्वारा आत्मबोध कराये जाने पर ही वह अपना वास्तविक स्वरूप जान सका और तदुपरान्त वैसा बन सका। बिल्ली, बन्दर से लेकर तमाम आक्रामक जीवों में लगभग ऐसी ही प्रक्रिया दिखाई पड़ती है। शावक अपने वरिष्ठों से शिक्षण-प्रक्रिया द्वारा ही अकर्मण्य-प्रत्याक्रमण के घात-प्रतिघात सीखते और तदनुरूप आदत की वंश-परम्परा बनाये रखते हैं।
मनुष्य भी इसका अपवाद नहीं। उसके चलने, बोलने से लेकर पढ़ने, सीखने और सुसभ्य बनने तक में यही विद्या काम आती है। देखा गया है कि शैशवावस्था में यदि अबोध बच्चे को मानवी समुदाय से पृथक कर दिया जाय, तो वह न सिर्फ अपने मानवोचित बाईपेडल लोकोमोशन (दो पैरों से चलने की विशेषता) को भूलकर चौपाये जैसा व्यवहार करने लगता है, वरन् अपने सुविकसित और सुसंस्कृत प्राणी के समस्त लक्षणों को भी भुला बैठता है। इस दशा में उसकी स्थिति किसी जंगली अहिंसक जीव से कोई बहुत अच्छी नहीं होती। रामू भेड़िये की वास्तविकता सर्वविदित है। ऐसे ही दो बालक पं. बंगाल के जंगलों में शिकारियों को कुछ वर्ष पूर्व मिले, जो भेड़िये के समूह में रहते थे। उनके हाव-भाव, चलने-फिरने का ढंग, आवाजें सब कुछ भेड़िए जैसे थे। शिकारियों ने उन्हें पकड़ कर सभ्य बनाने के, मानवी बोली सिखाने के बहुतेरे प्रयास किये, पर वे किसी प्रकार सफल न हो सके और अचानक अनभ्यस्त वातावरण में आ जाने एवं अभ्यस्त आदत से विपरीत आचरण किये जाने के लिए विवश होने के कारण वे जल्द ही दम तोड़ गये।
ऐसी स्थिति में यह कैसे कहा जाय कि मनुष्य स्वभाव से ही क्रोधी है गुस्सा करना उसकी मूल-प्रवृत्ति है। जो ऐसा मानते हैं, निश्चित रूप से वे मानवी-मन का विश्लेषण करने में यूक करते हैं। ऐसे लोग संभवतः इन दिनों दिखाई पड़ने वाली उसकी इस आदत को चारित्रिक विशिष्टता समझ बैठे हों और यह अनुमान लगाने की भूल करने लगे हों कि यही उसकी प्रकृति और प्रवृत्ति है। यदि यह उसकी मूल-प्रवृत्ति रही होती, तो सन्त और सज्जनों में, ऋषियों-महर्षियों में इसकी अनुपस्थिति की व्याख्या किस प्रकार कर सकना संभव होता? जबकि चोर-उचक्कों में, अनाचारी अत्याचारियों में यह उसका नैसर्गिक गुण भासता प्रतीत होता है। इस अंतर्विरोध की स्थिति में सम्पूर्ण मनोविज्ञान का ढाँचा ही लड़खड़ा गया हाता और मनोवैज्ञानिकों के लिए यह उत्तर दे पाना कठिन हो गया होता कि जो मूल-प्रवृत्ति है, उसका समाज के सन्त सरीखे पुरुषों में अचानक अभाव कैसे हो गया? क्योंकि मूल-प्रवृत्ति तो प्राणी की प्रकृति का अविच्छिन्न अंग होती है। फिर, कहीं अभाव, कहीं स्वभाव-इसकी विवेचना किस भाँति हो पाती? स्थिति तब और जटिल बन जाती, जब प्रताड़ित होने वाले सज्जनों के उदाहरणों में प्रताड़ना का प्रतिकार वे मुसकान बिखेर कर करते देखे जाते, जैसा कि यदा-कदा, यत्र-तत्र इन दिनों भी देखे जाते हैं, विरोधाभास की इस दशा में यह मानकर चलना ही बुद्धिमानी है कि मनुष्य एक कोरे कागज की तरह है। उसका मान सर्वथा निर्विकार है। उसमें सही-गलत, अच्छा बुरा चाहे जो भी अंकित कर दिया जाय, वही उसकी आदत बन जाता है। इस तर्क संगत आधार से उसके आज की अवस्था की सही-सही समीक्षा कर जाना भी सरल हो जाता है कि मनुष्य के इन दिनों की बुराइयाँ उसके बीते कल की कठिनाइयों की परिणति हैं। इस आधार पर इसकी व्याख्या भी आसान हो जाती है कि जब मानव स्वभावतः ऐसा नहीं है, तो वह आज जैसा क्रोधी और क्रूर किस कदर बन गया? स्पष्टतः इसका उत्तर यह कहकर दिया जा सकता है कि विकास-यात्रा के दौरान उसे जिन प्रतिकूलताओं का सामना करना पड़ा, उसकी प्रकृति का अंग बन गया। पीढ़ी दर पीढ़ी यही स्वभाव चलते हुए मनुष्य विकास के वर्तमान पड़ाव तक आ पहुँचा।
इसी प्रकार शरीर शास्त्र भी मनुष्य को शान्त प्राणी सिद्ध करता है। आस्ट्रियाई जीवविज्ञानी डॉ. ज्विग ने इसके लिए एक प्रयोग किया। उन्होंने बिल्ली के मस्तिष्क में हाइपोथैलमस वाले हिस्से को बिजली का झटका दिया। प्रतिक्रिया तुरंत सामने आयी। बिल्ली क्रोध में आकर गुर्राने और आक्रामक भाव-भंगिमा बनाने लगी, जैसे किसी ने उसके साथ छेड़खानी की हो। झटका समाप्त होते ही, वह पुनः सामान्य हो गई। इसका कारण बताते हुए वैज्ञानिक कहते हैं कि प्राइमेट (स्तन पायी जन्तु का वर्ग विशेष) में जन्तुओं का व्यवहार हाइपोथेलेमस के स्थान पर सेरेब्रल कोर्टेक्स द्वारा नियंत्रित होता है। इनमें कोई भी निर्णय मस्तिष्क के इसी हिस्से द्वारा लिया जाता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि इतना सब होने के बावजूद भी सेरेब्रल कोर्टेक्स किसी बाह्य कारक की उपस्थिति मात्र से ही कोई निर्णय नहीं ले लेता, वरन् वह उस समय की परिस्थिति एवं मस्तिष्क के इसी हिस्से द्वारा लिया जाता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि इतना सब होने के बावजूद भी सेरेब्रल कोर्टक्स किसी बाह्य कारक की उपस्थिति मात्र से ही कोई निर्णय नहीं ले लेता, वरन् वह उस समय की परिस्थिति एवं मस्तिष्क में अंकित विगत के अनुभवों का पूरा-पूरा अध्ययन-विश्लेषण करने के अनुसार यह प्राइमेटों की विशिष्ट मस्तिष्कीय संरचना ही है, जो उन्हें काफी सावधानी से कोई भी प्रतिक्रिया व्यक्त करने की छूट देती है।
मनोविज्ञान और शरीर विज्ञान के तर्क और तथ्य अपने-अपने स्थान पर सही है एवं अब लगभग यह सिद्ध हो चुका है कि मनुष्य नैसर्गिक रूप से क्रोधी नहीं है, पर नृतत्त्ववेत्ताओं और समाजशास्त्रियों की चिंता इस संदर्भ में अलग प्रकार की है। वे कहते हैं कि मनुष्य क्रोधी है अथवा शान्त, स्वभावतः आक्रामक है या अनाक्रामक-अब यह निर्णय करने का समय नहीं रहा। अब तो इस दिशा में सोच यह उभरनी चाहिए कि उसकी इन दिनों की विनाशक प्रवृत्ति पर काबू किस प्रकार पाया जाय? उसे एक विकसित, बुद्धिमान, विवेकशील प्राणी के अनुरूप विनिर्मित कैसे किया जाय? समाधान अध्यात्म विज्ञान प्रस्तुत करता है। वह कहता है कि अध्यात्म उपचारों द्वारा आज के चिड़चिड़े, तनावग्रस्त, तुनकमिजाजी व्यक्ति के मानस को बदला जा सकना संभव है। आज की सबसे बड़ी व्याधि “स्ट्रेटस” तनाव पैदा ही गुस्से से हुई है और उसकी चिकित्सा एक ही है-ध्यान। यदि व्यक्ति की चेतना को अन्तर्मुखी बना उसे प्रशिक्षित कर लिया जाय तो जनसमुदाय में छायी गुस्से की, आक्रोश की महामारी से जूझा जा सकता है।
शास्त्र की तीन प्रमुख अनुज्ञाएँ हैं। सत्यम् वद, धर्मचर तथा स्वाध्यायान्मा प्रमदः अर्थात्- सत्य बोलें धर्माचरण करें और स्वाध्याय में प्रसाद न करें। इस निर्धारण के अनुसार सत्य और धर्म के ही समकक्ष स्वाध्याय को भी प्रमुखता दी गई है।
एक दूसरी गणना पवित्रता क्रम की है। मन वचन और कर्म तीनों को अधिकाधिक पवित्र रखा जाना चाहिए इस निर्धारण में मन की पवित्रता को प्रमुख माना गया है। इसके बाद वचन की पवित्रता सत्य से और कर्म का वर्चस्व धर्म से निखरता है।
सत्य और धर्म की महत्ता के संबंध में सभी जानते हैं। भले ही उनका परिपालन न करते हों। किन्तु स्वाध्याय के संबंध में कम लोग ही यह अनुभव करते हैं कि उसकी महत्ता भी सत्य और धर्म के परिपालन से किसी भी प्रकार कम नहीं है। उसकी उपेक्षा करने पर इतनी बड़ी हानि होती है जितनी कि सत्य और धर्म के संबंध में उदासीन रहने पर।
जिन दिनों इस धरती पर देव मानवों का बाहुल्य था। उन दिनों सत्य और धर्म का तो ध्यान रखा ही जाता था। पर स्वाध्याय को भी कम महत्व का नहीं माना जाता था। उसके लिए प्रत्येक विचारशील अपनी तत्परता बनाए रहता था।
स्वाध्याय का शब्दार्थ है अपने आप का अध्ययन। यह कार्य शिक्षितों के लिए शास्त्रों के नियमित अध्ययन द्वारा संपन्न होता है। शास्त्र उन ग्रंथों को कहते हैं जो आत्मसत्ता और उसकी महत्ता का बोध कराएँ। कर्तव्य-पथ की जानकारी एवं प्रेरणा प्रदान करें। शास्त्रों के नाम पर आजकल उन कथा पुराणों को भी सम्मिलित कर लिया गया है जिनमें किसी काल की घटनाओं का विवरण है, अथवा मिथकों का समुच्चय भरा पड़ा है। यों प्रकारान्तर से किसी प्रकार उनकी व्याख्या विवेचना करते हुए ही आत्म विकास के संदर्भ में कुछ निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं। पर वह टेढ़ा मार्ग है। हर किसी के समझने समझाने का नहीं। कोई विलक्षण बुद्धि वाले ही उस विशाल समुद्र को मथकर रत्नों को निकाल सकते हैं और जिज्ञासाओं के लिए ग्रहण करने योग्य सामग्री प्रदान कर सकते हैं।
शास्त्र के अर्थ में श्रुति, स्मृति, उपनिषद् आरण्यक जैसे तत्व ज्ञान की विवेचना करने वाले ग्रंथ ही मूल प्रयोजन की पूर्ति कर सकते हैं। उन्हीं के आधार पर स्वाध्याय करने से उस विस्मृति को स्मृति के रूप में परिणत किया जा सकता है। जो आम तौर से उपेक्षित बनी रहती है। शरीर प्रत्यक्ष है। वही हमारे विभिन्न प्रयोजनों की पूर्ति करता है। इन्द्रिय संवेदनाओं के आधार पर रसास्वादन भी वही करता है। मानापमान, हानि लाभ भी उसी के अनुभव में आते हैं। रूप-सौंदर्य और श्रृंगार और श्रृंगार-सज्जा भी उसी की होती रहती है। नाम रूप भी उसी का देखने सुनने को मिलता रहता है। इसलिए सामान्य स्तर की चेतना यही स्वीकार कर लेती है कि वह शरीर मात्र है उसी की प्रसन्नता के लिए मर्यादाओं को तोड़ा भी जाता है और वर्जनाओं की अवहेलना भी होती रहती है। ऐसे अवसरों पर यह स्मरण ही नहीं रहता कि शरीर के पीछे कोई चेतना आत्मा भी है और उसकी भी कुछ आवश्यकताएँ है। उसे भी सन्तोष एवं उल्लास चाहिए। इस विस्मृति का परिणाम यह होता है कि आत्मसत्ता शरीर तक ही सीमित परिलक्षित होने लगी है। उसी के निमित्त स्वार्थ साधन के छोटे बड़े प्रयत्न चलते रहते हैं। समूची जीवनी शक्ति प्रायः उसी के लिए उत्सर्ग हो जाती है। यह एकाँगी दृष्टिकोण आत्म कल्याण के लिए, चेतनात्मक उत्कर्ष के लिए भी कुछ करना है। उसका स्मरण ही नहीं आने देता। यह एक बहुत बड़ा व्यवधान है और अनर्थ करता, दुःख भोगता और भविष्य को अंधकारमय बनाता रहता है।
इस विडम्बना से बचने का एक मात्र उपाय यही है कि स्वाध्याय के सहारे आत्मचेतना की स्वतंत्र महत्ता और उसके लिए प्रगति क्रम की समग्र जानकारी प्रतिदिन स्मृति पटल पर अंकित की जाती रहे। शरीर तो अपनी आवश्यकताएँ पूरी कराता रहता है। पर आत्मा के लिए कोई ऐसा क्रियात्मक व्यवहार सामने नहीं रहता जिसके आधार पर आत्म विस्मृति को सजग स्मृति में बदला जा सके। यह कार्य स्वाध्याय द्वारा ही संपन्न होता है। इसके अतिरिक्त और कोई उपाय है ही नहीं। मनुष्य की स्मृति क्षणिक है वह घटना क्रम बदलते ही विस्मृति में बदल जाती है। ऐसा आत्म क्षेत्र में न होने पाए इसलिए स्वाध्याय से हर दिन उसे सींचना और हरा भरा रखना पड़ता है।
आमतौर से शास्त्रों का पठन-पाठन ही स्वाध्याय में गिना जाता है। पर अब वह स्थिति नहीं रही जिसमें जीवन का सीमित और छोटा स्वरूप था और उसकी समस्याओं का समाधान श्रद्धालु जन शास्त्र वचनों के आधार पर पूरा कर लिया करते है। अब चिन्तन का क्षेत्र पहले की अपेक्षा कहीं बड़ा हो गया है। विश्व के अनेकानेक दर्शनों के आपस में गूंथने और आदान-प्रदान करने का अवसर मिला है। तर्क, तथ्य, प्रमाण और उदाहरण हर संदर्भ में माँगे जा रहे हैं। बढ़ते हुए भौतिकवाद की प्रतिक्रिया भी प्रत्यक्षवाद को सामने लाई है। ऐसी दशा में शास्त्र वचन श्रद्धालुओं के ही काम के रह गए हैं। बुद्धिवादी उतने भर से संतुष्ट नहीं होते। उनके लिए विशद और सशक्त समाधान चाहिए यह कार्य अपने युग की आत्म चेतना पर गहरा प्रकाश डालने वाले मनीषियों ने किसी सीमा तक पूरा किया है। इसका आश्रय लिए बिना जिज्ञासा की अतृप्ति मिटती नहीं। इसलिए आज के लिए शास्त्र शब्द की विस्तृत व्याख्या करते हुए उसमें वह सारा बौद्धिक प्रतिपादन सम्मिलित करना पड़ेगा। जो चेतना के लिए समाधान और मार्गदर्शन प्रस्तुत करें। आत्म क्षेत्र को तथ्यों के आधार पर विनिर्मित तत्व ज्ञान का सहारा मिल सके। अब ऐसे ही साहित्य को स्वाध्याय प्रयोजनों के लिए चयन करना समीचीन होगा।
एक और बड़ा प्रश्न है आकाँक्षा का। संसार भर में प्रायः एक चौथाई से भी कम संख्या तो निरक्षरों की है। जो साक्षर नहीं है वे शास्त्र या साहित्य कैसे पढ़े? यदि सुनने सुनाने की बात सोची जाय तो ऐसा सत्संग भी कहाँ उपलब्ध है जो सुनने वालों की मनोभूमि को देखते हैं। आत्मकल्याण के लिए आवश्यक दूरदर्शी विवेकशीलता का पथ प्रस्तुत कर सके। सत्संग के नाम पर तो आजकल जहाँ तहाँ मनोविनोद ही चलता रहता है। उसका श्रवण भ्रान्तियों को घटाता नहीं, उलटा बढ़ता है। सो भी इस व्यस्तता के समय में वह दुर्लभ ही है। सो भी इस व्यस्तता के समय में वह दुर्लभ ही है। ऐसे ज्ञानी जन कहाँ हैं जो परमार्थ भावना से उच्चस्तरीय तत्वज्ञान को सर्वसाधारण के लिए सुलभ बनाने में नियमित रूप से अपना समय लगाते रहें।
ऐसी दशा में स्वाध्याय की एकाकी आवश्यकता मनन और चिन्तन से पूरी हो सकती है। सुविधानुसार एकान्त में बैठकर एकाग्र चित्त से आत्मस्थिति की समीक्षा की जा सकती है। आदर्शवाद की निर्धारणाओं में अपना जीवन क्रम कितना पीछे है, इन त्रुटियों को निष्पक्ष भाव से पैनी दृष्टि से स्वयं खोज निकालना मनन है। इस आत्म समीक्षा के लिए हर कोई दिन भर में कोई न कोई समय निकाल ही सकता है। उस कमियों को खोज ही समता है जो उसे उत्कृष्टता की दृष्टि से पिछड़ा हुआ बनाए हुए हैं। त्रुटियाँ ध्यान आती रहें और उन्हें सुधारने का अनवरत प्रयत्न चलता रहे तो मनन को सार्थक स्तर का समझा जा सकता है।
मनन का दूसरा पक्ष है चिन्तन। चिन्तन अर्थात् दुष्प्रवृत्तियों के उन्मूलन एवं सत्प्रवृत्तियों के संवर्द्धन के लिए उपाय-उपचारों का निर्धारण। योजना इस प्रकार बनती रहनी चाहिए कि दिनचर्या में दोषों की कटौती और सद्गुणों की बढ़ोत्तरी का क्रम व्यावहारिक रूप में कार्यान्वित होता रहे। नित्य राई-राई भर दोष घटाने और नित्य तिल-तिल भर सद्गुणों के बढ़ाने से भी एक समय ऐसा आ सकता है जिसमें शरीर सेवा की तरह आत्म साधना भी भली प्रकार बन सके और स्वाध्याय का वास्तविक प्रयोजन पूरा हो सके।
कोई चालाक चोर था। वह बटमारी करता था। एक दिन अकेला ही गया। सामने से चार राहगीर आ रहे थे उसका मन उन्हें लूटने का हुआ पर था अकेला। चारों को कैसे लूटे? उसने “फूट डालो लूट खाओ” की नीति अपनाई।
पूछने पर मालूम हुआ कि चारों अलग-अलग वर्ण के हैं एक ब्राह्मण, एक क्षत्रिय, एक वैश्य, एक नाई। उस चोर ने अलग-अलग ढंग से बात करना शुरू किया।
चोर ने कहा ब्राह्मण हमारे पुरोहित क्षत्रिय हमारे भाई, वैश्य हमारे टेका नाई से क्या वास्ता? तीनों खड़े हो गये अकेला नाई लुटता रहा और इसके हाथ पैर बाँध कर अलग डाल दिया।
इस प्रकार लालजी को लूटा और बाँधा। इसके बाद क्षत्रिय को और अन्त में पण्डित जी की दुर्गति हुई। आपस में एकता न होने के कारण चारों राहगीर एक चोर से अपनी दुर्गति करा बैठे।
कोई स्वयं को कितना ही बड़ा क्यों न मान ले, उसके साधन कितने ही बढ़े-चढ़े क्यों न हों, उसका वह बड़प्पन अपने तक ही सीमित रहेगा। दूसरे अपने कामों में व्यस्त हैं। किसी का बड़प्पन नापने-तोलने और उससे प्रभावित होने की किसी को फुर्सत नहीं-इस तथ्य को यदि लोग समझ लें, तो कम-से-कम प्रदर्शन और ठाट-बाट के नाम पर जो धन, समय एवं चिन्तन नष्ट होता रहता है, उसकी सहज ही बचत हो सकती है और उस क्षमता को शान-शौकत की, बड़प्पन-प्रदर्शन की मूर्खता से बचा कर किसी उपयोगी काम में लगाया जा सकता है।
अपने सौरमण्डल के प्रायः सभी ग्रह हमें दिखाई देते हैं। सूर्य को छोड़ कर वे छोटे-छोटे खद्योत-से दीखते हैं। यद्यपि वे पृथ्वी से भी बहुत बड़े हैं। उनकी विशालता देखने को न तो हमारे पास समय है न अवकाश। वे अपनी कार्यों में व्यस्त रहें, अपनी समस्याओं को सुलझाते रहें, अपने कर्त्तव्यों को पालते रहें। उनके बड़प्पन को देखने, जानने पर भी हमें क्योंकर उससे प्रभावित होना चाहिए? क्योंकर उसका अनुकरण करना चाहिए?
बृहस्पति सौरमंडल का सबसे बड़ा ग्रह है, इतना बड़ा कि सभी आठ ग्रह उस अकेले में समा जांय। वह पृथ्वी से 1600 गुना बड़ा ग्रह है, और उससे 60 करोड़ मील दूर है। इस दूरी की तुलना में बेचारा चन्द्रमा जो सिर्फ 2 लाख मील दूर है। पार्श्व में बैठा हुआ प्रतीत होगा।
बृहस्पति की आकर्षण शक्ति इतनी है कि धरती पर रहने वाला कोई डेढ़ मन वजन का मनुष्य वहाँ जाकर 4 मन भारी हो जाय। वह अपनी धुरी पर अत्यन्त द्रुतगति से घूमता है। यह चाल अन्य सब ग्रहों से अधिक है। वहाँ पाँच घंटे का दिन और पाँच घंटे की रात होती है। यदि अंतरिक्ष यानों के माध्यम से वहाँ अन्वेषण का क्रम कभी चल पड़ा तो सबसे पहले यान और यात्री उसके प्रमुख चन्द्रमा “सीरस” पर सवारी गाँठेंगे और वहीं से खोजबीन आरंभ करेंगे। जब आवश्यक जानकारियाँ उपलब्ध हो जायेंगी, तभी बृहस्पति पर उतरेंगे।
बृहस्पति का विस्तार अत्यन्त विशाल है, व्यास 88 हजार मील है। उस पर हजारों मील मोटी गैस के बादलों की पर्त छाई हुई है। सूर्य से 48 करोड़ 30 लाख मील दूर होने के कारण वहाँ गर्मी पहुँचाने वाली किरणें बहुत स्वल्प मात्रा में पहुँचती हैं, इसलिए वह अत्याधिक ठंडा है। अन्य ग्रह सूर्य के समीप हैं। हमारी पृथ्वी सवा नौ करोड़ मील दूर है। मंगल पौने 15 करोड़ मील, शुक्र पौने छः करोड़ मील और बुध साढ़े करोड़ मील है। अत्याधिक दूरी होने के कारण सूर्य-साम्राज्य में रहते हुए भी वह बहुत बातों में आत्म निर्भर है। उसे पूरा औपनिवेशिक स्वराज्य मिला हुआ है। सौर परिवार कॉमनवेल्थ का वह सम्मानित सदस्य होते हुए भी अपने बलबूते पर ही अपना क्रिया−कलाप चलाता है।
गैस बादलों की मोटी परत के नीचे बृहस्पति पर बर्फ की मोटी पर्त जमी है। उस पर कभी-कभी 30 हजार मील लम्बे और 7 हजार मील चौड़े लाल धब्बे दिखाई पड़ते हैं। अनुमान यह है कि यह उसमें ज्वालामुखी फटते रहने और उनके लावा उगलने के कारण दिखाई पड़ते हैं।
बृहस्पति के अनेक छोटे-बड़े चन्द्रमा हैं। इनमें से अभी 12 देखे-जाने जा सके हैं। सोचा जा रहा है कि जब सौर मण्डल की यात्रा पर निकला हुआ मनुष्य बृहस्पति की खोज पर जायेगा, तब पहले उसे इन्हीं में से किसी चन्द्रमा पर रुक कर अपनी खोज आरंभ करनी होगी और वस्तुस्थिति का पता लगाने के बाद उस धरती पर पैर रखने की हिम्मत करनी होगी। अन्य ग्रहों में से शनि के 9 यूरेनस के 5 नेपच्यून के 2 पृथ्वी का एक चन्द्रमा है। 20 खराब 729 करोड़ मील की यात्रा का साधन जुटा कर जब सौरमंडलीय यात्रा आरंभ होगी, तब ये चन्द्रमा ही मूलग्रहों पर उतरने के प्रथम सोपान होंगे। उस यात्रा का सबसे अन्तिम ग्रह प्लूटो होगा। वह आकार में तो पृथ्वी के ही बराबर है, पर सूर्य से इतनी अधिक दूर है कि वहाँ से उसका प्रकाश टिमटिमाती मोमबत्ती जितना ही दिखाई देगा। हमारी पृथ्वी का जीवन प्राण सूर्य, प्लूटो को अपने अस्तित्व भर की जानकारी देने वाला एक छोटा-सा दीपक भर लगेगा।
ऊपर की पंक्तियों में बृहस्पति की विशालता की लेशमात्र जानकारी भर है। यह जानकारी उसके विशाल कलेवर की दृष्टि से इतनी न्यून है, जिसे नारायण माना जा सके। उसके बारे में अभी और भी अनेकों गुनी बड़ी और विस्तृत जानकारी अर्जित करनी शेष है, जो उसके विस्तार-वैभव को सही-सही प्रकट कर सके।
यदि हमारी ही तरह ओछी बुद्धि का बृहस्पति ग्रह होगा, तो यह सोच कर गदगद हुआ करेगा कि सौर परिवार के सारे ग्रह उसकी धाक मानेंगे और पृथ्वी आदि पिंडों पर रहने वाले प्राणी निरन्तर उसका नमन-वन्दन करेंगे, पर ऐसा होता कहाँ हैं? हमें किसी के बड़प्पन से क्या लेना-देना। हमारी अपने बड़प्पन की समस्याएँ ही क्या कम हैं, जो अन्य अनेकों का लेखा-जोखा लेने में माथापच्ची करें। माथापच्ची सफल और सार्थक तभी मानी जा सकती है, जब इससे अपना अथवा और का हित-साधन होता हो, किन्तु जहाँ दोनों में से कुछ भी हाथ न लगे, वहाँ उसे समयक्षेप करने वाली नासमझी ही तो कही जायेगी।
कीट्स ने अपनी कविता “फ्राँम स्टेचर टु सब्लिमेशन” अर्थात् “महिमा से महानता की ओर” में ठीक ही कहा कि जब मनुष्य अपनी ही महिमा का गुणानुवाद अपने मुख से करने लगे, तो समझना चाहिए कि वह उस महानता से दूर हटता जा रहा है, जो उसे सहज में उपलब्ध हो सकती थी। क्षुद्र स्तर के लोग ऐसी ही चर्चा में संलग्न रहने और अपना एवं दूसरों का समय बरबाद करते हैं। महानता यत्र-तत्र उल्लेख कर देने भी रसे व्यक्तित्व में नहीं आ जाती, न ही यह विज्ञापन का विषय है। वस्तुतः यह एक ऐसी विभूति है, जो बिना कहे हुए भी सामने वाले को बहुत कुछ कहती-बताती रहती है। फूलों को अपने सुगंध की चर्चा करने की कहाँ आवश्यकता पड़ती है। वह काम तो उनकी अद्भुत सुवास ही अनायास करती रहती है और अनेकानेक भौंरों को मदमस्त करती हुई खींच बुलाती है। हिमालय अपने गुणों का बखान करने लगे, तो जिस दिन ऐसा हुआ, उसी दिन उसकी आध्यात्मिकता उसकी दिव्यता समाप्त हो जायेगी और लोग न सिर्फ उसका सान्निध्य-लाभ लेने से कतरायेंगे, वरन् उल्लेख करने में भी कोता ही बरतते पाये जायेंगे।
जॉन रोजवुड अपनी कृति “डिविनिटी ऑफ दि मैन” में लिखते हैं कि महानता बताने की वस्तु नहीं, वरन् करने योग्य कार्य है। वे कहते हैं कि यदि कोई व्यक्ति किसी नुक्कड़ पर दिन-रात यह चीखता रहे कि वह महान है, लोगों को उसका सम्मान करना चाहिए, तो उलटे वह अपमान और उपहास का पात्र साबित होगा। इसके विपरीत यदि लोगों की भलाई के लिए वह छोटा-सा भी कार्य कर दे, तो जनश्रद्धा उसके प्रति सहज ही उमड़ पड़ेगी। श्रद्धा से सम्मान और सम्मान से
महान बनने की ओर उसका मार्ग प्रशस्त हो जायेगा।
स्पष्ट है महानता बड़प्पन प्रदर्शन में नहीं, अपितु अपनी तुलना में अनेकों का अनेक गुना हित-साधन में है। इसके अभाव में वैभव विस्तार सिवाय विज्ञापनबाजी के और कुछ नहीं रह जाता। बृहस्पति का विशाल विस्तार जनमानस में थोड़े समय के लिए कौतूहल तो पैदा करता है, पर पानी के बबूले की तरह उसकी क्षणभंगुरता देर तक टिकती कहाँ है? उसे पसारे तो हम प्रतिदिन अनन्त आकाश में देखते ही रहते हैं, किन्तु उतने भर से समाज का भला क्या लाभ हो सकता है। ऐसे ही कोई व्यक्ति धन-वैभव का खर्चीला ठाट-बाट अपनाये और सोचे कि देखने वाले उसकी चकाचौंध देखकर अवाक् रह जायेंगे, तो इस प्रकार का चिन्तन ओछेपन और बचकानेपन का ही परिचायक होगा। लोग अपने कर्त्तव्यों में व्यस्त रहें और स्वयं हम अपनी शक्ति वैसे कार्यों में नियोजित करें, जो आडम्बर का प्रपंच कर लोगों को दिग्भ्रांत करने और साधन का अपव्यय करने में न लगती हो।
झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई बचपन में ही विधवा हो गई थीं। राजकाज उन्हें सँभालना पड़ा। उन्होंने उस क्षेत्र के डाकुओं का हृदय परिवर्तन किया। सभी को उस कुकर्म से छुड़ाया और सेना में अच्छे पदों पर नियुक्त करके देश भक्ति का अवसर दिया।
उन दिनों महिलाओं को घरेलू काम काज के उपयुक्त ही समझा जाता था। राजकाज या सेना में उसका प्रवेश तक ना था रानी ने महिलाओं की एक सशस्त्र सेना खड़ी की जो पुरुषों की तुलना में शौर्य पराक्रम की दृष्टि में किसी प्रकार पीछे न थी।
अँग्रेजी के संरक्षण में राज्य सौंपने की अपेक्षा स्वाभिमान की रक्षा करते हुए उनने मरना अच्छा समझा। लड़ते-लड़ते वे शहीद हुई।
अपराधी को दण्डित तो किया पर मन विक्षुब्ध हो उठा। मन-मन्थन से उठने वाली हर तरंग उनसे सवाल पूछने लगी-चोरी के अपराध में तूने दूसरे को तो पीड़ित किया-लेकिन स्वयं क्या तू चौर्य वृत्ति से मुक्त है? वे स्वयं को कोई जवाब नहीं दे पा रहे थे। मन पश्चाताप से भर गया। उनने विचार किया कि राजकोष के लोभ के कारण ही उन्हें किसी को पीड़ा पहुँचानी पड़ी। दूसरों को पीड़ा पहुँचाने वाले ऐसे राज्यकर्म का प्रयोजन और वह एक दिन चुपचाप तपश्चर्या के लिए घर से निकाल गए। उनके आगे बढ़ते हर कदम के साथ वैभव-राजकीय ऐश्वर्य पीछे छूटता जा रहा था। वे कैलाश पर्वत पर रहने वाली हेमजटा नामक जाति के प्रमुख थे। दयालुता न्यायप्रियता, उदारता के उनके स्वाभाविक गुणों के बावजूद राज्य में कुछ-न-कुछ दुष्ट और दुराचारी तो थे ही, जिनके साथ उन्हें कठोरता बरतनी पड़ती थी। उन्हें दण्डित करना पड़ता था। स्वभाव विरुद्ध होने के कारण इस कठोरता से उन्हें बड़ा क्लेश होता। अपराधी पर पड़ने वाला हर कशाघत जैसे उनके स्वयं की पीठ पर पड़ता।
इस क्लेश से मुक्त होने के लिए ही वे राज्य छोड़कर वन आ पहुँचे। शान्त तपोवन में आश्रम बनाया और तप करने लगे। तपश्चर्या के प्रभाव से चित्त वृत्तियाँ निर्मल होने लगीं। भगवान की भक्ति में उन्हें आनन्द आने लगा।
आश्रम में अनेक पक्षी भी निवास करते थे। उनमें से कुछ शान्त और मधुर प्रकृति के पक्षी थे कुछ का स्वभाव दुष्ट और हिंसक भी था। एक दिन जब वह प्रातःकाल अग्निहोत्र समाप्त कर उठे-देखा सामने वाले आम्रवृक्ष पर एक बाज एक तोते के बच्चे को पंजों में पकड़े बैठा उसे मारकर खा जाने के यत्न में था। बच्चा चीं-चीं करता हुआ तपोवन की शान्ति को अपनी करुण गूँज से भर रहा था। पर दुष्ट बाज में तो जैसे दया का नाम निशान भी न था।
उनके न्याय प्रिय हृदय में एक बार शक्ति का आक्रोश जागा। धनुष बाण तो था नहीं पास ही एक पत्थर पड़ा था। उसे ही निशाना साधकर जो मारा कि बाज घायल होकर भूमि पर गिरा। तोते का बच्चा मुक्ति पाकर अपनी माँ की गोद में जा लिपटा। दृश्य बदल गया। मृत्यु आयी थी शुक्रशावक को लेने पर हाथ में बाज लगा।
अपने हाथ बाज की मृत्यु को देखकर उनका हृदय फिर काँप उठा। तपोवन में भी प्राणि हिंसा-कैसे और क्यों हुई? सवाल यह नहीं था, हिंसा का अपराध तो हुआ ही। अन्तःकरण पीड़ा से विकल हो उठा। जिस कारण राज्य और वैभव का परित्याग किया वही फिर करना पड़ा। यह सोचकर उनका चित्त बेचैन हो उठा। आँखों से आँसू झरने लगे। वह सोचने लगे विधाता। कैसी है तेरी सृष्टि कि न चाहते हुए भी मनुष्य को क्या-क्या करना पड़ता है।
उनकी विचारमग्नता की कड़ियाँ उधर से घूमते चले आ रहे महामुनि माँडव्य की पदध्वनि के कारण अनायास बिखरने लगीं। उन्हें दुःखित देखकर मनोभावज्ञ मुनिवर सब बात समझ गए। राजा ने मुनि को प्रमाण किया और सविस्तार अपना दुःख प्रकट करके उनसे छुटकारा पाने का उपाय पूछा।
महामुनि माँडव्य बोले-”राजन् न्याय न किया जाये कठोरता न बरती जाये तो दुराचारी लोगों के हाथों सज्जन, धर्मनिष्ठ लोगों की दुर्गति होने लगती है। इसलिए व्यवस्था सँभालना भी निखिल सृष्टि के महाप्रबन्धक भगवान के काम में हाथ बँटाना है। मनुष्य स्वार्थ और अहं के लिए कुछ न चाहकर ईश्वर की इच्छा मानकर संसार की सेवा करे तो यह कठोरता भी पाप नहीं होती। इस स्थिति में भी आनन्द और शान्ति का अभाव नहीं होगा।”
मुनि के शब्द उनके अन्तःकरण की गहराइयों में उतरने चले गए। वे पुनः अपनी राजधानी लौट आये और प्रजा की सेवा और उसके विकास में इस तरह तल्लीन हो गए कि अपना हित भी उन्होंने भुला दिया। उनका मोक्ष-क्षेत्र भगवान स्वयं वहन करने लगे।
सेवा का सुख प्रजा का प्यार पाकर आत्मदर्शी सम्राट सुरधु की सब मानसिक विकलताएँ दूर हो गई। उन्हें सर्वत्र आनन्द की निर्झरिणी प्रवाहित अनुभव होने लगी।
उन्हीं दिनों पारसीक देश के नरेश परिध ने आर्यावर्त की यात्रा की। आत्मज्ञान और समाधि सुख की आकाँक्षा से परिध ने सारे भारतवर्ष के सन्त-तपस्वियों-ज्ञानियों की शरण ली। अनेक प्रकार की साधनाएँ उन्होंने संपन्न की। यम-नियम ध्यान, धारणा प्रत्याहार के द्वारा उनने इन्द्रियों पर नियन्त्रण करना भी सीख लिया। कई तरह की सिद्धियों का अर्जन भी किया। किन्तु न जाने क्यों उन्हें अपने अन्तःकरण में कुछ सूना-सूना सा लगता था। शान्ति के स्थान पर गहरा द्वन्द्व था। खोखलेपन से उपजी आकुलता उन्हें हमेशा घेरे रहती थी।
इसी अवस्था में परिभ्रमण करते हुए परिध की भेंट महर्षि माँडव्य से हो गई। माँडव्य ने नरेश को सम्राट सुरधु के पास जाने और योग विद्या सीखकर आत्मशांति पाने का परामर्श दिया। महान जिज्ञासु शीघ्र ही कैलाश की ओर चल पड़ा।
राजधानी पहुँचने पर प्रधान अमात्य ने बताया महाराज प्रतिदिन अपनी प्रजा के कष्ट-दुःख देखने स्वयं वेश बदल कर जाया करते हैं। एक सप्ताह हुए वे लौटे नहीं। राज्य संचालन महारानी करती है। आप चाहें तो उनसे भेंट कर लें।
परिध ने सुना और चुपचाप एक ओर चल पड़े। संध्या होने पर वे एक गाँव में रुके। जिस घर पर उन्होंने विश्राम करना निश्चित किया दैवयोग से उस घर में एक वृद्धा माता अतिरिक्त कोई न था। वृद्धा का पुत्र युद्ध में गया था वह आज एक सप्ताह से बीमार थी। कोई अपरिचित व्यक्ति उसकी सेवा सुश्रूषा कर रहे थे। परिध ने देखा अद्वितीय ओजस् का धनी वह व्यक्ति कोई साधारण मनुष्य नहीं था। वृद्धा की सेवा घर की सफाई जैसे साधारण कामों में भी उसकी तल्लीनता देखते ही बनती थी। जिसके कर्कश स्वभाव के कारण कोई पड़ोसी मकान के पास फटकने को तैयार न था। उसके मल-मूत्र की दुर्गन्ध, छूत की बीमारी के रोगाणुओं का भय किसी को भी दूर भगाने के लिए काफी था। उसकी इतनी आत्मभाव से सेवा? परिधि के मन में उन अपरिचित सज्जन का परिचय प्राप्त करने का कौतूहल जाग उठा।
वह महाराज सुरधु थे। अपने अंगरक्षक सैनिक की ओर इस तरह देखा जैसे उन्हें पता ही न चला हो कि राजधानी में उनकी अनुपस्थिति को पूरे सात दिन हो चुके हैं। उनके मुखमण्डल पर सेवा की अपूर्व शान्ति और आत्मदर्शन की गम्भीरता स्पष्ट झलक रही थी। उन्होंने सैनिक को सम्बोधित करते हुए कहा-”भद्र! मेरा प्रत्येक प्रजाजन मेरे धर्म से जुड़ा है यह भी तो मेरा ही कर्तव्य था कि मैं इस वृद्धा की देखभाल करता। तुम चलो और राजमहिषी को मेरा संदेश कहो- वे मेरे न पहुँचने तक वहाँ की व्यवस्था सँभाले रहें।”
सैनिक लौटा और दूसरे क्षण सम्राट परिध महाराज सुरधु के समीप थे। आज उन्होंने समाधि का मर्म जान लिया था। सेवा और प्रेम से लबालब भरा व्यक्तित्व ही आत्मद्रष्टा होने का गौरव पाता है। ऐसा आत्मदर्शन जिसमें हर प्राणी की पीड़ा अपनी पीड़ा, हर जीव का दुःख दर्द अपना दुःख दर्द। अनन्त आत्मा की अनुभूति और उसमें खो जाने के सुख से बढ़कर और कोई साधना क्या हो सकती है? परिध को यह जान लेने के बाद कुछ जनना शेष नहीं रह गया।
शिष्य भाव से उन्होंने सम्राट सुरधु को प्रणाम किया और वह अपने देश की ओर लौट पड़े। जो शान्ति उन्हें किसी योग साधना और साँसारिक वैभव से न मिल सकी, वह निष्काम कर्मयोग के प्रयोग से सहज मिलने लगी।
चौदह वर्षीय सेण्डो अत्यन्त कृशकाय था। जन्म से ही उसे जुकाम खाँसी की शिकायत थी। वह एक दिन अपने पिता के साथ पहलवानों का दंगल देखने गया। वहाँ योद्धाओं की पुष्ट काया को देखने वाली चित्र प्रदर्शनी भी लगी थी।
बालक ने ध्यानपूर्वक चित्र को देखा। ललचाई आँखों से पिता को देखा और पूछा कि क्या वह भी कभी ऐसा ही पुष्ट शरीर पहलवान बन सकता है।
पिता ने उसे विश्वास दिलाया कि यदि वह स्वास्थ के नियमों का पालन करें तो अवश्य की पुष्ट बन सकता है। बालक ने स्वास्थ के नियमों को गंभीरतापूर्वक पूछा और समझा। इतना ही नहीं दूसरे दिन से ही उनका प्रयोग भी आरंभ कर दिया।
सत्ताईस वर्ष की आयु में सेंडो संसार भर का मूर्धन्य पहलवान बन गया। उसका नाम पहलवानों के समुदाय में हर किसी की जबान पर था।
अभ्यस्त ढर्रा अचेतन की गहराई तक उतर कर स्वभाव का अंग बन जाता है। उसे बदलने या छोड़ने में असाधारण साहस और संकल्प के प्रयोग करने की आवश्यकता पड़ती है। सुधार परिष्कार का प्रयोजन पूरा करने के लिए इस प्रकार का साहस अपनाये बिना काम नहीं चलता। हलके-फुलके ढंग से कोई आदर्शवादी शिक्षा पढ़ी या सुनी तो जा सकती है, पर यह आवश्यक नहीं कि उतने भर से ही परिवर्तन बन पड़े। तर्क, तथ्य और प्रमाण प्रस्तुत करने पर अनौचित्य को बौद्धिक क्षेत्र में अस्वीकार तो किया जा सकता है, पर इतने भर से यह आशा नहीं की जा सकती कि सहमत हुआ व्यक्ति उस प्रकार का आचरण भी करने लगेगा। अभ्यस्त कुसंस्कार परित्याग करने में भी तत्पर हो जायेगा।
देखा गया है कि नशेबाजी के अभ्यस्त समझदारों को समझाने बुझाने पर निरुत्तर तो हो जाते हैं, पर जब भी संचित कुसंस्कार जोर मारते हैं, तभी उस पुरानी आदत के अनुसार जोर मारते हैं, तभी उस पुरानी आदत के अनुसार कार्य करने लगते हैं। जिन्दगी भर यही ढर्रा चलता है। मुँह से लगी आदत छूटती ही नहीं। हर आदर्शवादी परिवर्तन पर यही बात लागू होती है। अनौचित्य का समर्थन कोई खुल आम साहसपूर्वक नहीं करता, क्योंकि वह जानता है कि मर्यादाएँ उत्कृष्टता का ही समर्थन करेंगी। उसमें अपनी आदत और मान्यता का प्रभावशाली समर्थन करते न बन पड़ेगा। इतने पर भी बात जहाँ की तहाँ रहती है। पतनोन्मुख दुष्प्रवृत्तियाँ बड़ी हठीली होती हैं। उनकी जड़े भीतर तक चली जाती हैं। हलके, फुलके मन से उनकी रोकथाम करने पर भी कुछ समय में अपना प्रभाव फिर दिखाने लगती हैं। इस व्यथा से पूरी तरह छुटकारा पाने के लिए लगातार अभ्यास एवं प्रतिरोध की आवश्यकता पड़ती है। इसी सुधार को लक्ष्य मानता पड़ता है और प्रयास को संकल्पयुक्त बनाना पड़ता है, भले ही वह उपक्रम धीमी गति से ही क्यों न चले।
साधन क्षेत्र में आगे बढ़ने वालों को सप्ताह में एक दिन विशेष साधना के लिए इसीलिए रखना चाहिए। आम तौर से रविवार या गुरुवार का दिन इसके लिए अधिक उपयुक्त माना जाता है रविवार प्रखरता पाप नाशक वृत्ति के संवर्धन की दृष्टि से तथा गुरुवार पवित्रता संवर्धन, गुरुभक्ति के अभिवर्धन की दृष्टि से पर यदि असुविधा हो, तो कोई अन्य दिन भी नियत किया जा सकता है। गाँधी जी के मौन का दिवस मंगलवार था। कभी अनिवार्य व्यवधान आ जाता था, तो वे मंगल से पहले या बाद का दिन इस के लिए रख लेते थे। अनिवार्य कारण होने पर दूसरे और भी दिन नियत कर सकते हैं और उस दिन विशेष कठिनाई आ जाने पर उसकी पूर्ति जल्दी ही अगले दिन कर सकते हैं।
इस साप्ताहिक विशेष व्रत में उपवास, ब्रह्मचर्य, मौन स्वाध्याय-यह चार साधनाएँ प्रमुख मानी गई हैं। उपवास जिस स्तर का सध सके, उतना सधना चाहिए। अच्छा तो यह है कि पूरे दिन जल पीकर रहा जाय। आवश्यकतानुसार उसमें नीबू शहद जैसा कुछ मिला लिया जाय। इतना न बन पड़ने पर दूध छाछ, रस, रसा आदि प्रवाह पदार्थ लेकर काम लिया जा सकता है। उतना भी न बन पड़े तो अस्वाद व्रत तो रखना ही चाहिए। बिना नमक शकर का आहार लिया जाय। दोनों समय भोजन न करके एक समय से काम चलाया जाय। यह साप्ताहिक व्रतशीलता का प्रथम चरण है।
जिह्वा का संयम प्रथम संयम है। स्वास्थ के बिगड़ने का प्रमुख कारण यही है। स्वाद लोलुपता में मनुष्य महंगे और पकाने में बहुत झंझट वाले पदार्थ आवश्यकता से अधिक मात्रा में खाते रहते हैं। इसके अतिरिक्त “जैसा खाए अन्न वैसा बने मन” वाली उक्ति भी अक्षरशः चरितार्थ होती है। रजोगुणी तमोगुणी आहार चिंतन और चरित्र को प्रभावित करता है और व्यक्तित्व के स्तर को गिराता है। इसलिए अध्यात्म मार्ग पर पदार्पण करते हुए प्रथम प्रयास यह पूरा करना होता है कि इन्द्रियों में प्रधान मानी जाने वाली जिह्वा की ललक लिप्सा को नियोजित किया जाय। इतना बन पड़ने पर अन्य इन्द्रियाँ भी कुमार्ग अपनाना छोड़ती चली जाती हैं। सप्ताह में एक दिन स्वस्थता को सुरक्षित रखने वाला प्रथम नियम है। इससे मनोनिग्रह में भी सरलता बन पड़ता है।
जिह्वा का दूसरा संयम है-मौन। उसे सप्ताह में एक बार तो अपनाना ही चाहिए। भले ही वह अधिक समय न बन पड़ने पर न्यूनतम दो घण्टे जितनी ही क्यों न हो। उस समय संकेतों से वार्तालाप करना भी निषिद्ध है। प्रयत्न यह करना चाहिए कि मौन वाला समय एकान्त में ही बीते। पूर्ण एकान्त न बन पड़ने पर साथियों को यह बता देना चाहिए कि वे उस समय छेड़खानी न करें। शोर शराबा करके ध्यान न बटायें। इस मौन काल में अपने वार्तालाप में बन पड़ने वाली अशिष्टता की, अनैतिकता की समीक्षा की जाय और जो दोष बन पड़ते हैं उन्हें रोकने की योजना बननी चाहिए। सार्थक सही, सद्भावों की समर्थक चर्चा ही वाणी को मधुर परिवर्तन आवश्यक हो उसके लिए इस मौन काल में ही योजना बनाते रहा जाय।
इसी अवधि में अभक्ष्य भक्षण की आदत से उत्पन्न होने वाले दुष्परिणामों पर भी विचार करना चाहिए। साथ ही यह निश्चय भी करना चाहिए कि आहार में सात्विकता का समावेश करने के लिए किन नियमों निर्धारणों को बनाया-अपनाया जाना चाहिए। संयम के लाभ और उच्छृंखलता के दुष्परिणामों पर विस्तृत विचार करते रहा जाय। उसके कल्पना चित्रों को चेतना के सम्मुख लाया जाता रहे तो विचारों से विचार काटने के सिद्धान्त की पूर्ति बन पड़ती है।
उपाय यह है कि उनकी प्रतिरोधी विचारधारा को चिन्तन-क्षेत्र में उभारने और संयमशील अपनाने के लाभों पर गंभीरतापूर्वक देर तक विचार करते रहा जाय। इस प्रकार अनौचित्य की आदतों एवं मान्यताओं से छुटकारा पाने की पृष्ठभूमि बनती है। संयम को तप कहा गया है। सर्वप्रथम यह तपश्चर्या जिह्वा संयम से आरंभ होनी चाहिए। भक्षण और वचन दोनों में ही सात्विकता के अधिकाधिक समावेश की योजना बनानी और चेष्टा करनी चाहिए। उपवास और मौन वाला समय इसी प्रकार के चिन्तन की बहुलता से बिताना चाहिए।
तीसरा तप है-ब्रह्मचर्य। साप्ताहिक तपश्चर्या के दिन यौनाचार से सर्वथा विरत रहा जाय। साथ ही कामुक विचारणा और कुदृष्टि की चंचलता पर भी प्रतिबंध लगाना चाहिए। सभी जानते हैं कि ब्रह्मचर्य मानसिक सशक्तता और सद्भावना बढ़ाने के लिए अचूक उपाय है। जीवन रस को जो जितना अधिक निचोड़ता है वह उतना ही अधिक खोखला बनता है। दाम्पत्य जीवन का अर्थ एक दूसरे की स्वास्थ संतुलन पर आक्रमण करते रहने की छूट नहीं है। स्नेह, सद्भाव और सहकार के आधार पर दाम्पत्य जीवन को सहज ही सरस, सुदृढ़ और भाव संपन्न बनाया जा सकता है। इस तथ्य को गहराई तक हृदयंगम करते रहने के लिए शारीरिक ब्रह्मचर्य का पालन किया जाता है। क्रिया और विचारणा के बीच समुचित तालमेल रहना चाहिए।
यहाँ कामुक चिन्तन और कुदृष्टि की भयंकरता भी समझने ही योग्य है। मानसिक पाप भी आधे पाप होते हैं। अचिन्त्य चिन्तन से भी व्यक्ति अपराधी बनता है भले ही वह सरकारी कानूनों की पकड़ से बच जाता है। इसलिए माता-पुत्र की, बहिन-भाई की, पिता-पुत्री की, धर्मपत्नी और धर्मपति की भावना ही नर नारी एक दूसरे के प्रति विकसित करें। दृष्टि में भी इसी प्रकार की पवित्रता आती जाय तभी वास्तविक ब्रह्मचर्य सधता है अन्यथा “मुख में राम बगल में छुरी” रहने की तरह पाखंडी प्रवंचना ही बन पड़ती है। साप्ताहिक ब्रह्मचर्य में कायिक ही नहीं, मानसिक चिन्तन की पवित्रता का भी समावेश रहना चाहिए और उसे एक दिन की चिन्ह पूजा न मान कर भावी जीवन की एक सुरक्षित रीति-नीति बना लेने का प्रयास करना चाहिए। दाम्पत्य जीवन में भी यथा संभव इस व्रतशीलता का अधिकाधिक लम्बे समय का अनुबन्ध करना चाहिए। इस वर्जना के परित्याग से दोनों ही पक्षों की असाधारण हानि है। यह तथ्य गहराई से समझ लेने पर दृष्टि की भावना और शरीर की संयमशीलता निभाती रहने में सरलता पड़ती है। साप्ताहिक ब्रह्मचर्य वाले दिन मानसिक चिन्तन में भी अधिकाधिक सात्विकता के समावेश करने का विचार चलते रहना चाहिए।
चौथा सरल तप है-स्वाध्याय। स्वाध्याय अपने संबंध में निरीक्षण-परीक्षण करते रहने और सुधार परिष्कार की योजनायें बनाते रहने को भी कहते हैं। वह तप निजी चिन्तन-मनन से भी बन पड़ता है। वैसे मोटे तौर से जीवन समस्याओं के आदर्शवादी समाधान का पक्षधर अध्ययन विचार-विनिमय भी इसी प्रयोजन की पूर्ति करता है। सद्ग्रन्थों का पठन और मुनि मनीषियों के सत्संग से भी वह प्रयोजन पूरा होता है। इन में से जो भी जिससे जिस प्रकार बन पड़े, उसके लिए समय निकालना चाहिए।
स्वाध्याय को आत्मिक आहार माना गया है। उसकी भी पेट भरने के लिए भोजन के प्रबन्ध करने की तरह ही आवश्यकता है। साधना, स्वाध्याय, संयम और सेवा इन चारों को आध्यात्मिक जीवन का अविच्छिन्न अंग माना गया है। इनमें अधिक सरल और अधिक आवश्यक है-स्वाध्याय इसे बीजारोपण की संज्ञा दी गई है। जीवन को महामानव स्तर का कल्पवृक्ष बनाने में सफलता इसी आधार पर बनती है। इसलिए प्रयत्न तो यह चाहिए कि स्वाध्याय को भी योगाभ्यास का एक महत्वपूर्ण अंग मानते हुए उसे दिनचर्या का एक अंग माना जाय। कम से कम इतना तो अनिवार्य ही होना चाहिए कि सप्ताह में एक दिन इस प्रयोजन के लिए सुनिश्चित रखा जाय। उसमें जितना अधिक समय मनोयोगपूर्वक लगे उसे लगाने के लिए अधिकाधिक समय निकालना चाहिए।
साधना प्रसंग में अनेक तप तितिक्षाओं का वर्णन है। तपाने से धातुएँ शुद्ध होती हैं। कच्ची मिट्टी पक्की बनती है। तपाने से धातुओं की गलाई-ढलाई होती रहती है। गरम करने से ही भोजन पकता है। इन उदाहरणों की तरह जीवन सत्ता को संयम और सेवा की अग्नि में पकाया जाता है। सोने के खरे खोटे होने की जानकारी कसौटी पर कसने और आग पर तपाने से ही संभव होती है। ठीक इसी प्रकार व्यक्ति की बलिष्ठता, साहसिकता एवं उत्कृष्टता तप तितिक्षा का आश्रय लेने पर ही प्रखर होती है। तपस्वी, ओजस्वी, तेजस्वी, मनस्वी बनते हैं। इसलिए शारीरिक, मानसिक और आत्मिक तपों में से जिनसे जो बन पड़े, सध सके, उन्हें उनके लिए प्रयत्नरत रहना चाहिए। साधना, स्वाध्याय, संयम इसलिए नियमित किया गया है।
ऊपर शारीरिक और मानसिक तपश्चर्याओं का ही समावेश है। पांचवीं तितिक्षा सेवा-धर्म अपनाने की उदारता का, परमार्थ-परायणता का परिचय देने की है। उसे दानशीलता भी कह सकते हैं। श्रमदान-समयदान की तरह अंशदान भी पुण्य परमार्थ परायणों में गिने जाते हैं। होना तो यह चाहिए कि दैनिक आय का एक अंश नित्य सत्प्रवृत्ति सम्वर्धन के लिए निकालने के लिए सतत् प्रयत्नशील रहा जाय पर इतना न बन पड़े तो इतना तो करना ही चाहिए कि सप्ताह में एक दिन की आमदनी या जितना न्यूनाधिक बन पड़े उतना धन सद्ज्ञान सम्वर्धन के लिए निकालते रहना चाहिए। संकटग्रस्तों की सामयिक सहायता भी आवश्यक होती है, पर सब से बड़ा पुण्य परमार्थ ज्ञानयज्ञ ही माना गया है। उसका स्वरूप प्रत्यक्ष न दीख पड़ने और परिणाम तत्काल सामने न आने पर भी उसकी गरिमा हर दृष्टि से उच्चस्तरीय ही मानी जाती रही है। धनदान भी सेवा क्षेत्र में श्रमदान की तरह महत्वपूर्ण है। साप्ताहिक अंशदान को योग साधना का पांचवां व एक प्रमुख पक्ष माना जाता है। यह शारीरिक मानसिक के अतिरिक्त साधन क्षेत्र की पांचवीं तपश्चर्या है। इन सभी को समान महत्व मिलना चाहिए, तभी व्यक्ति की आत्मिक प्रगति का पथ प्रशस्त होता है।
नैपोलियन तब बच्चा ही था। स्वभाव का नट-खट। सड़क पर एक गरीब लड़की सिर पर फलों का टोकरा लिये बेचने जा रही थी। नेपोलियन उससे टकरा गये और फलों का टोकरा गंदी कीचड़ में बिखर गया।
लकड़ी रोने लगी। उसके परिवार का पोषण उसी टोकरी की बिक्री से होने वाला था। लड़की को रोते देखकर नैपोलियन को अपनी शरारत पर बड़ा दुख हुआ। वह पैसा की भर पाई कर देने के लिए अपने साथ घर ले गया।
माता ने विवरण सुना तो लड़की को फलों की कीमत तो नैपोलियन की माता ने चुका दी पर साथ ही दंड भी दिया कि जब तक दिया हुआ पैसा पूरा न हो जायेगा तब तक उसे जेब खर्च के लिये मिलने वाले पैसे बंद रहेंगे।
बुद्धि एक महान ईश्वरीय विभूति है। उस विभूति का उपयोग करना उचित है और आवश्यक भी। किन्तु उसकी दशा बदली जानी चाहिए तभी वह कल्याणकारी सिद्ध होगी। परम्परापरक बुद्धिवाद को उत्कृष्टतापरक बनाना आवश्यक है।
बुद्धिवादियों की दिशा के अनुसार ही उनकी बुद्धि का उपयोग होने लगता है। रूसीवासियों के हृदय में रूढ़िग्रस्त धार्मिकता के प्रति विरोध की भावना भरी हुई थी। इस कारण उसके नेतागण कठमुल्लाओं को तलवार के घाट उतार देना चाहते थे। ऐसा कुछ रूस में हुआ था। पुराना बुद्धिवादी अपने को क्रान्तिकारी तो कहता है, किन्तु साथ ही अपना एक नया संप्रदाय किसी अन्य नाम से खड़ा कर लेता है। यह सब समाजोत्थान के लिए किया जा रहा है ऐसा कहते हुए भी ऐसी प्रतिक्रियाएँ समाज को पतन की ओर ले जाती है।
इसके विपरीत उत्कृष्ट बुद्धिवादी विकास पथ का यात्री है। वह घोषणा करता है कि विश्व में शान्ति का मार्ग भेद बुद्धि फैलाने में नहीं मेल कराने में है। हमने कभी भी बैठकर यह नहीं सोचा कि हममें समता अधिक बातों में है और भेद कम विषयों में, किन्तु हम भेदों पर ही सदा जोर देते रहे। उदाहरण के लिए स्त्री और पुरुष में समानताएँ बहुत हैं, अन्तर बहुत थोड़ी बातों में है। फिर भी हमने लाखों वर्षों से इसी भेद के कारण स्त्री जाति पर महान अत्याचार किए हैं, और कभी भी उनके समानाधिकार को स्वीकार नहीं किया। विभिन्न धर्मों में आपस में समानताएँ बहुत हैं भेद जरा-सा है। किन्तु उन्होंने इन नगण्य से भेदों के कारण ढेरों खून–खराबा किया है।
उत्कृष्ट बुद्धिवादी कहता है कि भेद को दूर भगाइये और परस्पर मेल के प्रसंग तलाश करिए। जिन सिद्धान्तों में हम प्रायः एक दूसरे से मिलते हैं उनमें मिलकर काम कीजिए और जिन विषयों में मतभेद हैं उसे दूर करने का प्रयास कीजिए। पुराना बुद्धिवादी पिछले पैगम्बरों और मसीहाओं को ढोंगी कहता था, परन्तु उत्कृष्ट बुद्धिवादी और मसीहाओं को ढोंगी कहता था, परन्तु उत्कृष्ट बुद्धिवादी उन्हें महापुरुष कहकर मानव समाज के प्रति उनकी सेवाओं को स्वीकार करता है। किन्तु वह उनका अन्धानुकरण करने की बात से लोगों को रोकता है। वह कहता है कि पुराने पैगम्बरों ने हमेशा उसी समय की परिस्थितियों के अनुकूल मार्गदर्शन दिया है। नवीन युग में नवीन समस्यायें खड़ी होती हैं, उनका हल भी नए ढंग से सोचना पड़ता है। नवीन युग के नवीन कर्तव्य हो जाते हैं और जो समाज के अनुकूल अपने को नहीं बना पता वह कष्ट पाता है, नष्ट हो जाता है।
उत्कृष्ट बुद्धिवादी अनन्त पथ का यात्री हो जाने के कारण सदा अपना हृदय प्रकाश के लिए खुला रखता है और कभी यह नहीं कहता है कि उनने सब कुछ जाने लिया। सन्त सुकरात और वैज्ञानिक सर आइजक न्यूटन की तरह ज्यों-ज्यों वह ज्ञान में आगे बढ़ता है त्यों-त्यों उसे अपने अज्ञान का बोध होता जाता है। कठोपनिषद् के शब्दों में वह बार-बार कहता है-’यस्यामतं तस्य मतं, यतं यस्य न वेद सः’ अर्थात् “जो कहता है मैं नहीं न सका वह ज्ञानी है और जो कहता है मैं जान चुका वह अनजान है।” ऐसे विनयशील स्वभाव युक्त उत्कृष्ट बुद्धिवादी अपने पीछे आने वाले हर यात्री के प्रति सहानुभूति रखता है। न उस रौब दिखाता है और न अपना अहंकार प्रकट करता है।
आज हम यदि उत्कृष्ट बुद्धिवाद अपनालें, तो हमें अपनी सब समस्याओं का हल मिल जाये, हमारा दृष्टिकोण उदार और विशाल हो जाय। उत्कृष्ट बुद्धिवादी का मतलब है अत्यन्त प्रगतिशील, सहानुभूति से भरा हुआ। वह विकास के सिद्धान्त को मानने वाला पवित्र जीवन का पुजारी और कर्तव्य-परायण व्यक्ति है-जो यह मानता है कि मानव जीवनादर्श सद्ज्ञान की प्राप्ति है। जो इस आदर्श में योग देते हैं, सहायता करते हैं, उन्हें ही जीने का अधिकार है, वे ही मानवता के सच्चे हितैषी कहलाते हैं। हमें इस उत्कृष्टता का वरण करना है, ऐसा प्रयास होना चाहिए।
दुःख और गतिरोध किसी अनौचित्य का प्रतिफल है भले ही वह अपना किया हो या किसी अन्य का। सन्मार्ग अपनाये जाने पर दुःख या तो मिलता ही नहीं अथवा वह असह्य नहीं होता।
शरीर में मन की चेतना पंचतत्वों के सम्मिलन की चेतना मानी जाती है। आत्मा में प्रकाश प्राप्त करते हुए भी वह आत्मा नहीं, शरीर का ही अंश माना जाता है। इसी प्रकार विश्वव्यापी पंचतत्वों की, महाभूतों की सम्मिलित चेतना का नाम प्राण है। प्राण को ही जीवनीशक्ति कहते हैं। वह वायु में, आकाश में घुला तो रहता है, पर इनसे भिन्न है। जिसे जड़ प्रकृति प्रकृति कहते हैं, वस्तुतः वह भी जड़ नहीं है। पूर्ण निष्प्राण वस्तु पूर्णतः निरुपयोगी ही नहीं होती, वरन् नष्ट भी हो जाती है। प्राण के अभाव में कोई वस्तु अपना स्वरूप धारण किये नहीं रह सकती। उसके गुण भी प्राणहीन स्थिति में स्थिर नहीं करते।
प्राण को एक प्रकार की सजीव विद्युत शक्ति कह सकते हैं, जो समस्त संसार में वायु, आकाश, सर्दी, गर्मी की तरह समायी हुई है। यह तत्व जिस प्राणी में जितना अधिक होता है, वह उतना ही स्फूर्तिवान, तेजस्वी, साहसी, एवं सुदृढ़ दिखाई देता है। शरीर में व्याप्त इसी तत्व को जीवनीशक्ति एवं ‘ओज’ कहते हैं और मन में व्यक्त होने पर भी, नख–शिख का ढाँचा सुन्दर दिखने पर भी मनुष्य निस्तेज, मुरझाया हुआ और लुँज-पुँज प्रतीत होता है। भीतरी तेजस्विता के अभाव में चमड़ी की सुन्दरता निर्जीव जैसी लगती है। मन को लुभाने वाले सौंदर्य में जो तेजस्विता एवं मृदुलता बिखरी होती है, वह और कुछ नहीं, प्राण का ही उभार है। वृक्ष-वनस्पतियों, पुष्पों से लेकर शिशु और शावकों, किशोर-किशोरियों में जो कुछ आह्लादपूर्ण दीख पड़ता है, वह सब प्राण का ही प्रताप है। यह शक्ति कहीं चेहरे सौंदर्य में, कहीं वाणी की मृदुलता में, कहीं प्रतिभा में, कहीं बुद्धिमत्ता में नहीं कला-कौशलता में, कहीं भक्ति में कहीं अन्य किसी रूप में देखी जाती है।
दुर्गा-काली के रूप में अध्यात्म जगत में इसी तत्व को पूजा जाता है। शक्ति यही है। दुर्गा सप्तशती में “या देवी सर्वभूतेषु शक्ति रूपेण संस्थिताः” आदि श्लोकों में अनेक रूप से उसी तत्व के लिए “नमस्तस्यै, नमस्तस्यै, नमस्तस्यै नमोनमः” कह कर अभिवन्दन किया गया है। विजयदशमी की शक्ति पूजा के रूप में हम इस प्राणतत्व का ही आह्वान और अभिनन्दन करते हैं। विश्व सृष्टि में समाया हुआ यह प्राण जब दुर्बल पड़ जाता है, तो हीनता का युग आ जाता है, जीव-जन्तु दुर्बलकाय, अल्पजीवी, मन्दबुद्धि और हीन भावनाओं वाले हो जाते हैं, किन्तु जब इसकी प्रौढ़ता और वृद्धता पर निर्भर है। जब सृष्टि में यह प्राण शनैः-शनैः मरण की परि समाप्ति की स्थिति में पहुँचता है, तो प्रलय की घड़ी प्रस्तुत हो जाती है। परमाणुओं को एक दूसरे के साथ सम्बद्ध रखने वाला चुम्बकत्व प्राण ही नहीं रहा, तो वे सब बिखर कर धूल की तरह छितरा जाते हैं। जितने स्वरूप बने हुए थे, वे सब नष्ट हो जाते हैं। जितने स्वरूप बने हुए थे, वे सब नष्ट हो जाते हैं। इसी का नाम प्रलय है। जब दीर्घकाल के पश्चात् यह प्राण चिरनिद्रा में से जागकर नवजीवन ग्रहण करता है, तो सृष्टि उत्पादन की प्रक्रिया पुनः आरंभ हो जाती है। जीवात्माओं को इस परा और अपरा प्रकृति का आवरण धारण करके कोई स्वरूप ग्रहण करने का अवसर मिलता है और वे पुनः जीव-जन्तुओं के रूप में चलते-फिरते दृष्टिगोचर होने लगते हैं।
यह प्राणतत्व किन्हीं प्राणियों को पूर्व संगृहीत संस्कार एवं पुण्यों के कारण जन्मजात रूप से अधिक मात्रा में उपलब्ध होता है। इसे उनका सौभाग्य ही करना चाहिए, पर जिन्हें वह न्यून मात्रा में प्राप्त है, उन्हें निराश होने की कुछ भी आवश्यकता नहीं है। प्रयत्नपूर्वक इस तत्व को कोई भी अभीष्ट आकाँक्षा के अनुरूप अपने अन्दर धारण कर सकता है। जिसमें कम है, वह उसकी पूर्ति इस विश्वव्यापी प्राण में से बिना किसी रोक-टोक के चाहे जितनी मात्रा में लेकर धारण कर सकता है। जिनमें इसकी पर्याप्त मात्रा है, वह और भी अधिक परिमाण में ग्रहण करके अपनी तेजस्विता और प्रतिभा में अभीष्ट अभिवृद्धि कर सकते हैं।
भारतीय योगियों ने इस संबंध में अद्भुत प्रयोग किये हैं। योग विज्ञान के सारे चमत्कार इसी प्राणतत्व के क्रिया−कलाप हैं। यह सृष्टि परा और अपरा प्रकृति के दो भागों में विभक्त है। एक को जड़ दूसरे को चेतन कहते हैं। जड़ के सूक्ष्म अंश, जिसके संयोग से स्थूल अवयवों का निर्माण होता है परमाणु कहते हैं, जबकि चेतन को, जिससे सूक्ष्म शरीर बनता है, प्राण कहा गया है। शरीर में यह प्राण ही सूक्ष्म शरीर के रूप में विद्यमान रहता है। इसी से उसमें गति और सक्रियता उत्पन्न होती है, जिससे प्राणि जगत हलचल करता हुआ दिखाई देता है। उसके अभाव में इस बौद्धिक चेतना के दर्शन नहीं हो सकते हैं। प्राण की प्रशस्ति में शास्त्रकारों ने तरह-तरह की व्याख्याएँ प्रस्तुत की हैं-
प्राणोस्मिप्रात्या। (शाँखायन)
मैं ही प्राणरूप प्रज्ञा हूँ।
दशये पुरुषे प्राणा आत्मैकादश। (वृहदारण्यक)
मनुष्य में रहने वाली दस इन्द्रियाँ और ग्यारहवाँ मन-यह सब प्राण हैं।
न वायु प्राणो नामि करण व्यापरः। (ब्रह्मसूत्र 2−4−9)
यह प्राण, वायु नहीं है और न वह इन्द्रियों का व्यापार ही है।
प्राणाय नमोयस्य सर्वमिदं वशे।
उस प्राण को नमस्कार, जिसके वश में यह सब कुछ है।
जड़ जगत में शक्ति तरंगों के रूप में, संव्याप्त सक्रियता के रूप में प्राण शक्ति का परिचय दिया जा सकता है। चेतन जगत में उसे विचारणा एवं संवेदना कहा जा सकता है। इच्छा, ज्ञान और क्रिया के रूप में यह जीवधारियों में काम करती है। जीवनी शक्ति यही है। इसकी जितनी मात्रा जिसे मिल जाती है। चेतना की विभु सत्ता समस्त विश्व ब्रह्माण्ड में संव्याप्त है। चेतना प्राण कहलाती है। उसी का अमुक अंश प्रयत्नपूर्वक अपने में धारण करने वाला प्राणी महाप्राण बनता है। यह प्राण जड़ पदार्थों में सक्रियता और चेतन प्राणियों में सजगता के रूप में दृष्टिगोचर होता है। जड़ चेतन जगत की सर्वोपरि शक्ति होने के कारण उसे ज्येष्ठ एवं श्रेष्ठ कहा गया है।
वैदिक विवेचना में प्राण के साथ ‘वायु’ का विशेषण भी लगा है। उसे कितने ही स्थानों पर प्राणवायु कहा गया है। इसका तात्पर्य आक्सीजन नाइट्रोजन आदि वायु विकारों से नहीं, वरन् उसे प्रवाह से है, जिसकी गतिशील विद्युत तरंगों के रूप में भौतिक विज्ञानी चर्चा करते रहते हैं। अणु विकिरण, ताप, ध्वनि आदि की शक्ति धाराओं के मूल में संव्याप्त सत्ता भी उसे कहा जा सकता है। यदि उसके अध्यात्म स्वरूप का विवेचन किया जाय तो अँग्रेजी के लेटेण्ट लाइट डिवायन लाइट आदि शब्दों से संगति बैठती है जिसमें उसके दिव्य प्रकाश के समतुल्य होने का संकेत मिलता है।
स्वामी विवेकानन्द ने प्राण की विवेचना साइकिक फोर्स के रूप में की है। इसका मोटा अर्थ। मानसिक शक्ति हुआ। मोटे रूप से तो यह कोई मस्तिष्कीय हलचल हुई, पर प्राण तो विश्वव्यापी है। यदि समष्टि को मन की शक्ति कहें या सर्वव्यापी चेतना शक्ति का नाम दें, तो ही यह अर्थ ठीक बैठ सकता है। व्यक्तिगत मस्तिष्कों की प्रथम मानसिक शक्ति की क्षमता प्राण के रूप में नहीं हो सकती। संभवतः उनका संकेत समष्टि मन की सर्वव्यापी क्षमता की ओर ही रहा होगा।
मानसिक एवं शारीरिक क्षमताओं के रूप में प्राणशक्ति के प्रकट होने का प्रखर होने का परिचय प्राप्त किया जा सकता है, पर वह मूलतः इन सब ज्ञात विवरणों से कहीं अधिक सूक्ष्म व सशक्त है। हम इस सूक्ष्मशक्ति को अधिकाधिक परिमाण में अवधारण कर उसी के अनुरूप सबल व सशक्त बनें तभी सही अर्थों में प्राण को धारण करने वाला ‘प्राणी’ और ‘प्राणवान’ कहला सकते हैं।
मरने के बाद तो कुत्ते भी समाधिस्थ हो जाते हैं। समझदारी इसमें है कि कठिनाइयों के बीच शान्त-सन्तुलित रहा जा सके। जब बछड़ा गले की रस्सी तुड़ा सकता है तो तुम भव-बन्धनों को क्यों काट नहीं सकते?
व्यक्ति और परिवेश दोनों ही परस्पर गहनता से जुड़े हुए हैं। प्रथम के क्रिया−कलाप द्वितीय को प्रभावित करते हैं, द्वितीय की हलचलें प्रथम में उद्वेलन उत्पन्न करने वाली होती हैं। मनीषियों ने व्यक्ति के क्रिया–कलापों को द्विविध रूपों में स्पष्ट किया है। प्रथम जिनका केन्द्र उसका स्व का अन्तःकरण होता है जब कि परिधि में समूचा परिवेश समाहित होता है ऐसे क्रिया–कलापों को व्यवहार में अंतर्गत परिभाषित किया गया है।
श्री अरविन्द इन द्विविध स्वत्त्रुपों का सम्मिलित स्पष्टीकरण करते हुए अपनी कृति “सिन्थेसिस ऑफ योग“ में कहते हैं कि “मानव वैयक्तिक और सामाजिक जगत तथा विश्व में आत्माभिव्यक्ति के लिए मन, जीवन और शरीर को प्रयोग करने वाली एक आत्मसत्ता है।” महर्षि अपनी प्रमुख दार्शनिक कृति “द लाइफ डिवाइन” के प्रथम भाग में व्यक्ति एवं परिवेश के संबंधों को समझाते हुए कहते हैं कि “सृष्टि के दृष्टिकोण से व्यक्ति चेतना शक्ति का केन्द्र बिन्दु है। वह समस्त विश्वमय चेतना का केन्द्र है।”
यह केन्द्र और परिधि दोनों ही परस्पर घनीभूत संबद्ध हैं। परिधि की विकृति केन्द्र च्युति का कारण बन सकती है एवं केन्द्र च्युति परिधि में गड़बड़ियों का। यदि इसी अवास्तविक स्थिति को वास्तविक मान लिया जाय तो गड़बड़ियों का सिलसिला लगातार चलता रहेगा। श्री अरविन्द बताते हैं कि शरीर मन व आत्मा के त्रिआयामी व्यक्तित्व में केन्द्रीय आयाम आत्मा है यही वास्तविक केन्द्र भी है। किन्तु आत्मा भी वास्तविक एवं प्रच्छन्न है। यह प्रच्छन्न आत्मा जिसे वह कामनामय आत्मा (Desore Soul) कहते हैं, हमारी प्रेरणात्मक वासनाओं, उद्वेगों सौंदर्य की अनुभूतियों के पीछे है। यह हमारी अहंकारात्मक सत्ता का आधार है जबकि यथार्थ आत्मा चैतन्य सत्ता है। केन्द्र च्युति की स्थिति में हमारा जीवन इसी उपरोक्त अहंकार सत्ता से संचालित होता है।
व्यक्ति का यह अन्तराल बड़ा गहन है। मन का भीतरी भाग जिसे फ्रायड अचेतन कहते हैं मानव में बर्बर बालक-पशु का प्रतिनिधि बताते हैं। जुंग की खोजों के अनुरूप यह व्यक्तिगत भी है और सामूहिक भी। व्यक्तिगत अचेतन में फ्रायड के अधोचेतन व अचेतन सम्मिलित हैं। उसमें वे अनुभव हैं जो भूले और दमित किये जा चुके हैं। सामूहिक अचेतन में भूल प्रवृत्तियाँ आदिम विचार और प्रतीक आते हैं।
फ्रायड व जुंग के इस अचेतन को श्री अरविन्द, अवचेतन कहते हैं। उनके अनुसार यह स्तर सभी परिवर्तनों का विरोध करने के साथ आलस्य, दुर्बलता, अस्पष्टता एवं अज्ञान को सतत् स्थिर रहना चाहता है। इसी के कारण यथार्थ वस्तुओं के आधार अतिचेतन का प्रवाह रुका रहता है।
व्यक्ति के व्यवहार, सामाजिक संरचना, परिवेश के प्रभाव के अध्ययन की दृष्टि से जुंग के सामूहिक अचेतन की खोज अत्यन्त उपादेय है। परिवेश से प्राप्त उद्दीपनों से व्यक्ति का मानस प्रभावित होता है। यदि ये उद्दीपन अवचेतन के पाशविक संस्कारों को उत्तेजित करते हैं तो व्यवहार भी तदनुरूप होना स्वाभाविक है। यदि इन उद्दीपनों ने अतिचेतन को उद्दीप्त किया है तो मानव जीवन की उच्चतर प्रक्रियाओं, कला, धर्म, साहित्य आदि के रूप में व्यवहार की अभिव्यक्ति होती है।
चिन्तन और व्यवहार की गति अपने आगोश में सबको समेटती जाती है। विगत इतिहास के उन कालों में जिन्हें स्वर्णिम युग कहा गया है, इन्हीं अतिचेतन की प्रक्रियाओं द्वारा जीवन का संचालन रहा है जबकि नरसंहार के काल में अवचेतन का पशु प्रतिनिधि प्रभावी रहा है। मनोविज्ञान की नवविद्या “हिस्टाँरिका साइकोलॉजी” में समूचे इतिहास की घटनाओं का अध्ययन करने के बाद प्रतिपादित किया गया है कि ये घटनाएँ कुछ व्यक्तियों के प्रभावी अवचेतन का ही परिणाम थी।
वर्तमान के परिप्रेक्ष्य में किया गया अध्ययन स्पष्ट करता है कि सामाजिक परिवेश से मिलने वाले उद्दीपन व्यक्ति में इन्हीं अवचेतन के संस्कारों को भड़काने वाले सिद्ध हो रहे हैं। सिनेमा में नग्न नर्तन की भरमार ब्लू फिल्मों का पकड़ता जोर अश्लील विज्ञापन व्यक्ति के अतिचेतन के प्रवाह को रोककर उसे मनुष्य से पुनः पशु में परिवर्तन कर रहे हैं। ‘मनुष्य रूपेण मृगाश्चरंति’ की उक्ति अपनी सार्थकता की अभिवृद्धि करती जा रही है।
मनुष्य अपनी स्वार्थ परता संकीर्णता की श्रृंखला से आबद्ध होता जा रहा है। इसी आबद्धता ने ही सब कुछ एक साथ प्राप्त कर लेने की प्रवृत्ति जाग्रत की है जो अपनी अभिव्यक्ति भारी भरकम उद्योगों-उत्खनन केन्द्रों, वनों के नाश आदि के रूप में कर रही है। स्वाभाविक ही इससे केन्द्रीकरण हुआ है। यह केन्द्रीकरण प्रत्येक क्षेत्र में है। मनुष्य शहरों में केन्द्रित हो रहे हैं। धन कुछ थोड़े से धनिकों की तिजोरियों में केन्द्रित हो रहा है।
केन्द्रीकरण की इस च्युति ने सामाजिक परिवेश की ध्वंसता के साथ पर्यावरण को भी ध्वस्त किया है। वायु, जल, ध्वनि, प्रदूषण की बात सर्वत्र सुनी जा रही है। सर्वत्र प्रदूषण की ही अभिवृद्धि है। प्रदूषण की वृद्धि व्यक्ति के चेतन मन में तनाव तथा अचेतन के अवशेषी संस्कारों में उद्दीपन उत्पन्न कर रही है। अचेतन के सामूहिक होने से यह महामारी सरलता से एक दूसरे में फैलती जा रही है। फलस्वरूप समाज में हिंसा, मानसिक स्थिति पर्यावरण को और भी अधिक विकृत कर रही है। इस तरह व्यक्ति, समाज और पर्यावरण के मध्य अभिक्रियाएँ अपनी गति पकड़ती जा रही हैं।
व्यक्ति समाज और परिवेश की पारस्परिक सम्बद्धता की उपेक्षा किये जाने के कारण किए जा रहे शान्ति प्रयास अस्थाई व कमजोर सिद्ध होते जा रहे हैं। जनमानस को परिवर्तित करने के लिए आवश्यक अवचेतन के उद्दीपनों को बहिष्कृत करना जरूरी है, जिसकी मानव समाज एक इकाई है। पर्यावरण की ईकाई मनुष्य परिकर है तथा इसकी इकाई व्यक्ति है।
इस संबद्धों की अभिन्नता को समझने तथा मानव मन की जटिलता को समझ अतिचेतन रुके प्रवाह को प्रवाहित करने से दिशा बदल सकती है। क्योंकि जिस प्रकार अचेतन सामूहिक है उसी तरह अतिचेतन भी। यह बदली हुई दिशा मनुष्य व समाज को अवगति से प्रगति की ओर ले जाने वाली होगी।
लक्ष्मण जी ने राम से पूछा आपने तो एक ही बाण मारा था। फिर इतने छिद्र कैसे हुए।
भगवान् ने कहा मेरे बाण से तो एक ही छिद्र हुआ। पर इसके अपने कुकर्म घाव बनकर अपने आप फूट रहे हैं और अपना रक्त स्वयं ही बहा रहे हैं।
समाज को सुयोग्य नागरिक देकर अपनी परम्परा चलाते रहने का विचार स्वयंभू मनु और उसकी पत्नी शतरूपा में मन में आया।
इसके लिए उनने उतावली नहीं की। पति पत्नी ने अपनी शाश्वतता को समुन्नत बनाने वाला तप किया। वह कार्य एक जन्म में पूरा न हो सका तो उसकी पूर्णता अगले जनम में करने की बात सोची। उत्तम परिणाम के लिए समुन्नत पृष्ठभूमि बनाने की आवश्यकता उनने समझी। दोनों का तप समयानुसार फलित हुआ। अगले जन्म में मनु दशरथ और शतरूपा कौशल्या के रूप में अवतरित हुए। उन्हीं के संयोग से राम जैसे मर्यादा पुरुषोत्तम जन्मे।
सुयोग्य संतान के लिए जन्मदाताओं को उत्कृष्टता अपनानी पड़ती है और बालकों को परिष्कृत वातावरण में पलने की सुविधा उत्पन्न करानी पड़ती है।
आये दिन धर्मतंत्र के धुरंधरों द्वारा स्वर्ग-मुक्ति की चर्चा होती ही रहती है और वे भोले-भावुकों को इसकी प्राप्ति हेतु एकान्त सेवन करने, अपने दायित्वों का सर्वथा त्याग करके गुफा-कन्दराओं में रहने एवं वन-उपवनों में निवास करने के लिए प्रेरित प्रोत्साहित करते व उकसाते देखे जाते हैं।
यहाँ कइयों के मन में यह प्रश्न उठ सकता है कि क्या यही मुक्ति है? उत्तर सर्वथा ‘ना’ में दिया जा सकता है। जिनमें तनिक भी विवेक बुद्धि है, वे यह सहज ही अनुमान लगा सकते हैं कि यदि ऐसी बात रही होती, तो भगवान न इतनी सुन्दर सृष्टि नहीं बनायी होती। यदि उनका ध्येय मनुष्य को मृत्यु की ओर ले जाना होता, तो फिर जीवन का उद्देश्य ही क्या रह जाता? फिर तो सभी को वे एक साथ काल के गाल में धकेल कर मुक्त कर देते, पर व्यावहारिक जीवन में ऐसा होता कहाँ दिखाई पड़ता है? जो कुछ दीखता है, वह सब इसके बिल्कुल विपरीत जान पड़ता है। एटमबम, अस्त्र-शस्त्र गरम-शीत विश्व युद्धों तथा गृह युद्धों के रूप में सर्वत्र चलते ही रहते हैं, पर दूसरी ओर स्रष्टा नया जीवन उत्पन्न करता ही चलता है। हम दुगुनी गति में विश्व के संहार का सरंजाम जुटा रहे हैं, तो वह नियामक सत्ता चौगुनी गति से जीवन को अक्षुण्ण बनाये रखने का प्रयत्न-पुरुषार्थ करती स्पष्ट प्रतीत होती है। इससे यही विदित होता है कि ईश्वर मृत्युपर्यंत मोक्ष का पक्षधर नहीं है, वरन् वह जीवन में ही मुक्ति जैसी स्थिति उत्पन्न करना चाहता है। वह जीवन का प्रेमी है, किन्तु उसके एजेण्ट तथाकथित धर्म के नाम पर उलटी पट्टी पढ़ाने वाले इसके घोर दुश्मन और आज की अधिसंख्यक आबादी इन्हीं के चंगुल में है, इसलिए वह उसे पलायनवाद की ओर, मृत्यु की ओर ले जा रहे हैं। उनका विश्वास शरीर को गलाने-जलाने में है, जीवन को संवारने-सुधारने में नहीं। इसी कारण आज का धर्म आत्मघाती होता जा रहा है, जीवन विरोधी लाइफ-निगेटिव बनता जा रहा है, जबकि होना चाहिए उसे लाइफ-अफरमेटिव, जीवनदाता।
धर्म, जीवन की परिपूर्ण का नाम है न कि पलायनवाद का पर्याय। इसी आशय का मन्तव्य प्रकट करते हुए मूर्धन्य मनीषी काँलिन विल्सन अपनी पुस्तक “सैल्वेन-दि अटमोस्ट गोल ऑफ दि ह्यूमन-लाइफ” में लिखते हैं कि इन दिनों हमारी स्थिति ऐसी है, जिसमें हम निस्सार में सार की तलाश करते हैं और जो सारयुक्त है, उसे मृगमरीचिका समझकर उसका परित्याग करते हैं। वस्तुतः धर्म जीवन का पर्याय है, वह हमें जीवन जीने की कला सिखाता है। उसका प्रयोजन जीवन जीने की कला सिखाता है। उसका प्रयोजन जीवन की पूर्ण अनुभूति कराना है, न कि स्वर्ग-मुक्ति का सब्जबाग दिखाना और जिस दिन मनुष्य को धर्म का यह मर्म समझ में आ जायेगा, उसी दिन से उसकी दिशा बदल जायेगी वे आगे लिखते हैं कि इस प्रकार धर्म की यह परिभाषा समझने के पश्चात जब मनुष्य की दिशा परिवर्तित होगी, तो फिर उसके जीवन का लक्ष्य स्वयं जीवन की पूर्ण अनुभूति करना हो जायेगा और जिस दिन जीवन की सम्पूर्ण अनुभूति होगी, उसी पल उसे स्वर्ग-मुक्ति का आनन्द उपलब्ध हो जायेगा।
“पाराडाँइज आँर इनफरनो-दि दू वेज ऑफ थिंकिंग“ नामक पुस्तक के लेखक एवं प्रसिद्ध दार्शनिक बर्नार्ड गिटल्सन अपनी उपरोक्त कृति में लिखते हैं कि स्वर्ग-मुक्ति वस्तुतः जीवन से परे की स्थिति नहीं है। लौकिक जीवन जीकर ही उसकी अनुभूति की जा सकती है। वास्तव में स्वर्ग-नरक जीवन की दो भिन्न चिन्तन धाराएँ हैं। जब हम स्वर्ग की किन्हीं अन्य लोकों में कल्पना कर उसकी प्राप्ति हेतु शरीर को बेतुके क्रिया-काण्डों में लगाकर इस बहुमूल्य जीवन को बरबाद करते और रीते हाथ रह जाते हैं, तो हमारी मनःस्थिति विक्षिप्तों जैसी हो जाती है। यही नरक है। धर्म इसी नरक से बचने बचाने का नाम है और व्यक्ति जब इससे बच जाता है, तो वही उसकी मुक्ति बन जाती है, वही उसका स्वर्ग है, किन्तु लेखक के अनुसार स्वर्ग-मुक्ति जीवन का लक्ष्य नहीं है। उसका चरम लक्ष्य तो जीवन की पूर्ण अनुभूति है। स्वर्ग-मुक्ति तो इस पथ में पड़ने वाली एक सराय के समान है, जो इस राह के सभी पथिकों को एक-न-एक दिन अवश्य मिलती है। जिस प्रकार तीर्थाटन करने वाले यात्रियों के लिए धर्मशाला उसका गन्तव्य नहीं होता, वह तो एक पड़ाव है, उसी प्रकार जीवन का लक्ष्य मुक्ति नहीं है। वह गौण है। प्रधान तो जीवन की पूर्ण अनुभूति करना है। जो इस राह पर निकल पड़ता है, मुक्ति का आनन्द अनायास उसे हस्तगत हो जाता है।
इस बिन्दु पर दोनों लेखकों के विचार मिलते प्रतीत होते हैं। दोनों ने ही इस बात को स्वीकारा है कि जीवन की पूर्ण अनुभूति का ही दूसरा नाम मोक्ष अथवा मुक्ति है और इस मुक्ति को सामाजिक जीवन से संसार से पलायन कर प्राप्त नहीं किया जा सकता, किन्तु आज सर्वत्र हो यही रहा है। हम मुक्ति को प्रमुख मान बैठे हैं, और जीवन जो सर्वाधिक महत्वपूर्ण और मूल है, उसे अप्रधान मानने लगे हैं। इस उलटबाँसी के फेर में व्यक्ति उसे भी गँवाता चलता है, जो उसके पास होता है, जिसके सहारे वह अपनी मनोवाँछा को प्राप्त कर सकता था, पर उस बुद्धि विपर्याय को क्या कहा जाय, जो चावल को गौण और भूसे को प्रमुख मानने लगे! किसान खेत में धान बोता है। धान होता है और उसके साथ भूसा भी मिल जाता है, किन्तु किसान का उद्देश्य भूसा पैदा करना कदापि नहीं होता। वह तो धान के साथ उत्पन्न हो जाता है। वह प्रमुख नहीं है। मुख्य तो चावल है। वर्तमान में लोग चावल को भूसा और भूसे को चावल मानने लगे हैं। यही समस्या की जड़ है। गड़बड़ी यहीं से पैदा होती है। बोया भूसे को जाता है और आशा चावल की की जाने लगती है। परिणाम यह होता है कि न भूसा पैदा होता है। तब वह धर्म को ढोंग-प्रपंच कहकर पुकारने लगता है। कहने लगता है धर्म बेकार की चीज है, वह मिथ्या है, झूठा है, जबकि यथार्थता इससे बिल्कुल भिन्न है।
लियो टॉलस्टाय की एक लघु कथा है कि एक आदमी से कहा गया कि एक दिन में तुम इस धरती की जितनी दूरी नाप सकोगे, वह सब तुम्हारी हो जायगी। बेचारा भूख-प्यास की परवा किये बिना दौड़ पड़ा। दौड़ता रहा। चिलचिलाती धूप में भी न रुका, भागता ही रहा, पर आखिर कब तक दौड़ता रह सकता था? एक स्थान पर गिरा और तड़पता हुआ शान्त हो गया। उसकी मृत्यु हो गई। एक समझदार आदमी उधर से गुजरा, तो उसकी मूर्खता पर हँस पड़ा। मन में विचारा कि इसे इतनी ही जमीन की तो आवश्यकता ही थी, अनावश्यक क्यों भागता फिरा?
प्रस्तुत प्रसंग आज के व्यक्तियों पर अक्षरशः लागू होता है। मुक्ति की खोज में हम जीवन से भाग रहे हैं, फलतः न मोक्ष मिल पाता है, न निश्चिन्तता का जीवन जी पाते हैं। सच्चाई तो यह है कि जीवन में ही मुक्ति दूध-पानी की तरह समायी हुई है। जब जीवन कर्तव्यों और उत्तरदायित्वों के साथ समग्र रूप में प्रकट होता है, तो सारी बाधाएँ सार कठिनाइयाँ समस्त बेड़ियाँ स्वतः टूट जाती हैं और आदमी मुक्त हो जाता है। अधूरा जीवन बन्धन है, पूर्ण जीवन मुक्ति हो जाता है। अधूरा जीवन ही मनुष्य का सदा से लक्ष्य रहा है। मुक्ति इसी से संभव है।
जो मुक्ति को जीवन का चरम लक्ष्य होने का नारा देते हैं, वे एक प्रकार से मनुष्य को मृत्यु की ओर धकेलते हैं। समाज को भ्रम-जंजालों में उलझाते और संसार को दिग्भ्रान्त करते हैं। इस प्रकार की मुक्ति निश्चय ही आत्मघाती है।
जो मुक्ति को जीवन का चरम लक्ष्य होने का नारा देते हैं, वे एक प्रकार से मनुष्य को मृत्यु की ओर धकेलते हैं। समाज को भ्रम-जंजालों में उलझाते और संसार को दिग्भ्रान्त करते हैं। इस प्रकार की मुक्ति निश्चय ही आत्मघाती है।
छोटी चिड़िया टिटहरी ने समुद्र किनारे की एक झाड़ी में अपने अंडे रखे थे। समुद्र की लहरें उसे बहा कर ले गई। टिटहरी अपने अण्डे समुद्र से वापस माँगने लगी। पर उसने कोई सुनवाई न की।
टिटहरी चुप बैठने वाली न थी उसने चोंच में बालू भर-भर कर समुद्र में डालना शुरू किया ताकि बालू से सूख जाय और उसके अण्डे वापस मिल जांय।
इस असाधारण संकल्प भरे प्रयास को महर्षि अगस्त्य ने दूर से देखा। उनका मन आया कि ऐसे साहसी का सहयोग करना चाहिए।
कहते हैं कि ऋषि अगस्त्य ने समुद्र का जल सोख लिया था और उससे टिटहरी के अण्डे वापस करवाये थे। यह भी कहा जाता है कि समुद्र के क्षमा माँगने पर उसे ऋषि ने पेट से पेशाब के रास्ते बाहर निकाल दिया था। इसी से वह खारी है।
शरीर शास्त्र और मनोविज्ञानवेत्ता यह बताते हैं कि नर-नर का सान्निध्य, नारी-नारी का सान्निध्य मानवीय प्रसुप्त शक्तियों के विकास की दृष्टि से इतना उपयोगी नहीं, जितना भिन्न वर्ग की समीपता। विवाहों के पीछे सहचरत्व की भावना ही प्रधान रूप से उपयोगी है। सच्चे सखा सहचर की दृष्टि से परस्पर हँसते-हँसाते जीवन बिताने वाले पति-पत्नी यदि आजीवन काम सेवन न करें, संयमपूर्वक रह सकें, तो भी एक-दूसरे की मानसिक एवं आत्मिक अपूर्णता को बहुत हद तक पूरा कर सकते हैं। मनुष्य में न जाने क्या ऐसी रहस्यमय अपूर्णता है कि वह भिन्न वर्ग के सहचरत्व से अकारण ही बड़ी तृप्ति और शान्ति अनुभव करता है, जबकि अविवाहित जीवन में कोई बार सब प्रकार की सुविधाएँ होते हुए भी एक अतृप्ति और अशाँति बनी रहती है, किन्तु विवाह के बाद एक निश्चिन्तता-सी अनुभव होती है।
वस्तुतः यह एक मनोवैज्ञानिक पहलू है, जिसका तत्वदर्शन यदि समझ लिया जाय, तो वह समझते देर न लगेगी कि वैवाहिक जीवन में लोग निश्चिन्तता महसूस क्यों करते हैं। विवाह का इन दिनों एक फूहड़ अर्थ काम सेवन से लगाया जाने लगा है, पर यदि तनिक इससे ऊपर के स्तर पर उठ कर विचार करें, तो ज्ञात होगा कि इसके मूल में वह अगाध विश्वास ही आधारभूत तत्व है, जो उसे आश्वस्त करता है कि पत्नी के रूप में एक ऐसी सहचरी उसको मिली है जो उसका साथ पग-पग पर हर पल देती रहेगी। बस व्यक्ति निश्चिन्त हो जाता है और अपनी समर्थता दूनी ही नहीं दस गुनी अनुभव करता है। एकान्त के जीवन में शून्यता थी, उसकी पूर्ति तब होती है, जब यह विश्वास बन जाता है कि हम अकेले नहीं, विश्वस्त साथी को लेकर चल रहे हैं, जो हर मुसीबत में सहायता करेगी और प्रगति के हर स्वप्न में रंग भरेगी। यह आस्था मन में उतरते ही मनोबल चौगुना बढ़ जाता है और उत्साह भरी कर्मठता एवं आशा भरी चमक से जीवनक्रम में एक अभिनव उल्लास दृष्टिगोचर होता है। वह विवाह का बहुत बड़ा लाभ व पक्ष हुआ, जिसका सद्गृहस्थ अधिकाधिक फायदा उठाते हैं। यों शादी का एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू भी है, जिसके द्वारा उभयपक्षीय सूक्ष्म शक्ति का अतिमहत्वपूर्ण प्रत्यावर्तन पति-पत्नी के बीच संभव है, पर यह विज्ञानपरक प्रक्रिया हर किसी के लिए शक्य नहीं। इसका लाभ तो इस विद्या का कोई निष्णात ही भली-भाँति उठा सकता है, अन्यथा इन दिनों तो यह, शक्ति की फुलझड़ी जला कर स्वयं को खोखला करने जैसा कौतुक बनकर रह गयी है।
महात्मा गाँधी कहा करते थे कि काम सेवन विवाहित जीवन में आवश्यकतानुसार मर्यादाओं के अंतर्गत होता रहे, तो उसमें कोई बड़ा अनर्थ नहीं है, पर उसे आवश्यक या अनिवार्य न माना जाय। इसमें कोई कठिनाई भी नहीं, हर एक के लिए सरल और सहज है, यदि वे अपनी मनःस्थिति को तनिक ऊँची भूमिका में ले जांय और परस्पर दो पुरुष या दो नारी की तरह घनिष्ठतापूर्वक व्यवहार करने लगें, तो कामना और वासना की वह कुदृष्टि पनप ही नहीं पायेगी, जो जनमानस में इन दिनों सन्निपात की तरह सवार देखी जाती है। उनने अपने उत्तरार्ध जीवन में इस प्रकार के कई प्रयोग भी किये और सफल रहे। अपनी इसी संरक्षित शक्ति के कारण वे चाहे जिस किसी को भी अपनी ओर आकर्षित करने में सदा समर्थ सिद्ध हुए। उनके इस विलक्षण शक्ति से ही डर कर अँग्रेजों ने उनके बारे में घोषणा करवा दी थी कि कोई भी अँग्रेज उनसे आंखें न मिलाये, अन्यथा वह उसे सम्मोहित कर लेगा। यह समर्थता तब पैदा होती है, जब शक्ति का संचय हो। अपव्यय तो व्यक्ति को अपंग और असमर्थ जैसी स्थिति में पहुँचा देता है।
आज यही हो रहा है। दृष्टि कुदृष्टि में बदल जाने के कारण विवाह, पवित्र पाणिग्रहण न होकर दोहाकर्षण बनकर रह गया है। यह विवाह घृणित ही नहीं, अगरिमामय भी है। इससे वैवाहिक जीवन अनेकों ऐसे संकट उठ खड़े होते हैं, जिससे जीवन-शकट का अविरल-तरल की तरह लुढ़कना असंभव हो जाता है। अतः विवेकवान पुरुष रूप-रंग, शोभा-सौंदर्य के आधार पर उत्पन्न हुए आकर्षण को क्षणभंगुर आवेश मात्र मानकर उससे स्वयं बचते और दूसरों को बचने की सलाह देते हैं। उनके इस तथ्य पद यदि गहराई से विचार किया जाय, तो इसके पीछे सक्रिय उद्दीपनों के माध्यम से ही ‘मस्तिष्क संदेश कोशिकाओं तक जा पहुँचते हैं। इस प्रकार समूचे कायिक ढाँचे को सुदृढ़ चिकित्सकीय गुणवत्ता प्रदान करने की प्रक्रिया स्वतः संचालित हो उठती है।
यद्यपि अमेरिकन मेडिकल साइंस के चिकित्सा विज्ञानियों ने सिमोंटोन जैसे ‘समग्रधर्मी चिकित्सक’ के प्रति अविश्वास प्रकट किया है और इसे चिकित्सा सिद्धान्त के विपरीत बताया है। उनका कहना है कि यदि यह चिकित्सा पद्धति लोकप्रिय बनती चली गयी तो चिकित्सा जगत की पारंपरिक मान्यताओं को गहरा आघात पहुँचेगा। फिर भी इस चिकित्सा पद्धति का प्रचार-प्रसार दिन प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है। डॉक्टरों के रंग-बिरंगे साइनबोर्डों को देखा जाय तो प्रतीत होता है कि साइको न्यूरो इम्यूनोलॉजी (पी.एन.आई.) बिहेवियर थेरेपी और न्यूरो इम्यूनो मोडयूलेशन जैसी मनःचिकित्सा विद्याओं का प्रचलन ही अब द्रुतगति से हो रहा है।
महान चिकित्सा विज्ञानी सिमोंटोन के मतानुसार इच्छा-शक्ति की सामर्थ्य के अनुरूप ही व्यक्ति के चिन्तन में विवेकशीलता और संयमशीलता का अभ्युदय हो उठता है। ऐसी स्थिति में मस्तिष्क रसायन न केवल प्रतिरक्षा तंत्र का ही नियंत्रण करते हैं वरन् उस तंत्र को अनुप्राणित कर सकने की क्षमता भी रखते हैं। इन रासायनिक संदेशों का मूलभूत प्रयोजन समूची काया को जीवाणु, विषाणु और संक्रामकता के बारे में सूचित करने का है। इन प्रतिरक्षा कोशिकाओं का सीधा स्थापित हो जाता है। रोगी का मानसिक संतुलन बढ़ता-उत्साह-उमंग को प्रादुर्भाव होता और आरोग्य लाभ मिलने लगता है। सिमोंटोन की इस नयी अवधारणा को “स्वायत्त चेतना प्रतिरक्षा तंत्र” के नाम से जाना गया है। चेतना का सहज स्वाभाविक गुण स्नेह-सद्भाव और संयम का होता है। ईर्ष्या, द्वेष और असंयम बरतने पर तो मस्तिष्क पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता और एक विशिष्ट प्रकार के हारमोन्स का स्राव होने लगता है जो रोगों की उत्पत्ति का कारण बन जाता है।
सन् 1973 में नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ मेंटल हैल्थ, अमेरिका के सुप्रसिद्ध न्यूरो फामोक्लोजिस्ट डॉ. केडेंसपर्ट ने लम्बे समय तक प्रयोग परीक्षण के उपरान्त एक ही निष्कर्ष निकाला है कि व्यक्ति की भाव-संवेदनाएँ कुंठित होने के कारण कुछ ऐसे “न्यूरोपेप्टाइडस” का शरीर में निर्माण होना आरंभ हो जाता है जिनसे मानसिक संतुलन गड़बड़ाता और विविध विधि रोगों की उत्पत्ति का कारण बनता है। पर्ट का कहना है कि व्यक्ति की संकल्पशीलता से चिन्तन को विधेयात्मक दशा मिलती और उक्त हारमोन्स के स्रवण पर काबू पाया जा सकता है। शरीर को स्वस्थ रखने के लिए मानसिक स्तर की स्वस्थता अति आवश्यक है। मनःसंस्थान को निरोग रखने के लिए उनने संवेग, अहं और तर्क जैसे तीन घटकों को अत्यधिक महत्वपूर्ण माना है। इच्छा-शक्ति के द्वारा इन पर नियंत्रण करके प्रतिरक्षा चेतना तंत्र को आवश्यकतानुसार सक्रिय और शिथिल बना सकना सरल भी है और संभव भी। अत्याधुनिक विज्ञान की भाषा में इस स्वायत्त प्रतिरक्षा चेतन तंत्र को दिव्य बोध अर्थात् छठी इन्द्रिय के नाम से भी संबोधित किया जाने लगा है। इसे सुविकसित एवं सुव्यवस्थित स्तर का बना लेने पर ही समग्र स्वास्थ्य संवर्धन का सत्प्रयोजन पूरा हो सकता है।
चिकित्सा विज्ञान की इन नवीनतम खोज को लोकोपयोगी बनाने के लिए जरूरी है कि जनमानस के भावनात्मक परिष्कार का उपक्रम बिठाया जाय। जिससे लोगों का प्रसुप्त संकल्प बल उभरे, मनोबल बढ़े और आरोग्यवर्धक परिस्थितियाँ विनिर्मित होती जांय। स्वास्थ समुन्नत जीवनी शक्ति संपन्न पीढ़ी ही नवयुग के महामानव तैयार करेगी।
एक चालाक भालू था। उसने एक बन्दर को अपना दोस्त बनाकर मतलब गाँठने का रास्ता निकाला। भालू पानी में घुसकर मछली पकड़ता था। इसमें उसे बहुत श्रम करना पड़ता और थोड़ा लाभ हाथ आता। नई तरकीब उसने यह निकाली कि बंदर की पूछ में आटा लिपटा देता। गंध पाकर मछलियाँ वहाँ आती। भालू पानी में ही छिप कर बैठा रहता। मछली पास आते ही उन्हें पकड़ लेता। जल्दी पेट भर लेता। बदले में भालू बंदर को बेर बीन कर दिया करता।
इस षड़यंत्र का पता एक मगर को लग गया। वह दूर बैठा यह दृश्य देखा करता। आटे की गंध उसे भी आकर्षित करती। एक दिन मगर ने बंदर को धर दबोचा और उसे हड़प लिया।
बदमाशी में साझीदार बनने का क्या नतीजा होता है यह बंदर ने तब अनुभव किया जब वह मगर की दाढ़ों में फँस गया।
वे पुण्य और पुरुषार्थ के प्रतीक माने जाते थे। कर्म-ज्ञान व गुणों की दृष्टि से ब्राह्मणत्व उनमें पूरी तरह प्रकाशित था। तपः तेज से दीप्त मुख मण्डल पर सदा-सर्वदा छायी रहने वाली प्रसन्नता संतोष और शान्ति का परिचय देने के लिए पर्याप्त थी। उनके धर्मशील जीवन में किसी तरह का कोई अभाव न था।
कठोर परिश्रम उनके यहाँ सौभाग्य लक्ष्मी बनकर विराजमान था। चरित्र उनके जीवन का आधार था इसलिए यश-लक्ष्मी भी उनके स्वभावतया आ गई थी। वह अपनी पत्नी कन्या-पुत्र-पुत्रवधू सबको भगवान के प्रतिबिंब मानकर उनका यथोचित आदर-सत्कार और सेवा करते थे। फलस्वरूप घर के सभी लोग भी नेक, ईमानदार और आकर्षित होकर कुल लक्ष्मी ने भी उनके यहाँ वास किया था। उनके जीवन का प्रवाह आनन्द की तरंगें बिखेरता बह रहा था।
पाप की विरोधी शक्तियों ने उनके दुर्भेद पुण्य दुर्ग को भेदने की अनेकों कोशिशें की। अपने सारे गुणों को लेकर इस सुखी परिवार के आस-पास चक्कर लगाता रहा। पर उसे घर में घुसने के लिए कोई छिद्र न मिला। एक-एक परिजन के मस्तिष्क इन्द्रियों, इच्छाओं को उसने उकसाया व भ्रमित करने की कोशिशें की। पर उसके प्रहार ऐसे नष्ट होते गए जैसे धधकती ज्वाला में सूखा काठ गिर कर जल जाता है। पाप सिर धुनता-पछताता घर वापस लौट गया।
उसे दुःखी देखकर एक दिन उसकी भार्या अलक्ष्मी ने कहा-स्वामी! कई दिन से कुछ दुःख दिख रहें हैं। क्या आपकी सहचरी आपका दुःख बँटा सकती है? कहा गया है-”जो स्त्री केवल सुख में ही पति के साथ दे और दुःख में उससे दूर रहे-वह हतभागिनी होती है। आप अपनी समस्या बतायें तो शायद उसका कुछ निराकरण हो सके।”
पाप और अलक्ष्मी (दरिद्रता) दोनों रात भर कूट मंत्रणा करते रहे। पाप ने अपने दुःख का कारण बताया और अलक्ष्मी ने वह योजना जिसके द्वारा उन्हें जीता जा सकता था। प्रातःकाल दोनों बहुत प्रसन्न थे। बढ़ी-चढ़ी सफलताओं के स्वप्न देखकर प्रसन्न होने वाले कुविचारी लोगों की तरह पाप और अलक्ष्मी भी उस दिन फूले नहीं समा रहे थे।
शाम होने तक दोनों उनके पास जा पहुँचे। पाप बूढ़े ब्राह्मण के वेश में और अलक्ष्मी सौंदर्य विभूषिता कन्या के रूप में। जो उन्हें पहचानते थे वे हँस रहे थे कि देखें पाप कितना चतुर है, लोगों को फँसाने के लिए वह कैसे-कैसे आकर्षक रूप रचता है। पाप के माया जाल से वे किस तरह बचते हैं यह देखने के लिए लोग चुप रहे। किसी ने इशारा तक नहीं किया कि तुम्हारे दरवाजे पर पाप और अलक्ष्मी छद्मवेश में आ गए हैं।
ब्राह्मण वेशधारी पाप ने उन्हें पुकारते हुए कहा-”तपस्वियों में श्रेष्ठ पुरन्ध्र। मुझे आज रात ही गाँव पहुँचाना है। राम होने को है ऐसे में मैं अपनी युवती कन्या को साथ नहीं ले जा सकता। मार्ग में चोर-डाकुओं का भय, नदी-नालों और हिंसक जानवरों से खतरा है। मेरे वापस लौटने तक आप इसे अपने घर में रख लें। मुझे मालूम है आप महान धर्म परायण है। आप पर अविश्वास करने का तो कोई कारण भी नहीं है।”
द्वार पर आए हुए अतिथि की बात न मानना भी धार्मिक मर्यादा के प्रतिकूल होगा। इस विचार से पुरन्ध्र ने ब्राह्मण कन्या के रूप में आयी हुई अलक्ष्मी को अपने घर में आश्रय दे दिया। पाप वहाँ से विदा हो गया। उसे प्रसन्नता था अब मुझे इस घर में प्रवेश मिल जाएगा।
ब्राह्मण कन्या के रूप में आयी हुई अलक्ष्मी ने उन्हें अपने साथ अटकाये रखना प्रारम्भ किया। वह सबसे पहले उठती। उनके लिए शौच के लिए जल से लेकर स्नान पूजन तक सब सामान स्वयं अपने हाथों चुनती। इनसे निवृत्त होते ही वह मीठी-मीठी बातें करने बैठ जाती। उनका बहुत-सा समय यों ही बातों में बीतने लगा। अब वे पहले की तरह श्रम नहीं कर पाते थे। उन्हें आलस्य घेरने लगा। स्वाभाविक था कि आय के स्रोत टूटते। संपन्नता निर्धनता में बदलने लगी।
एक दिन वह सो रहे थे। तभी किसी दिव्य ज्योति युक्त स्त्री ने उन्हें जगाया और कहा-”पुरन्ध्र! अब मैं तुम्हारे घर से जा रही हूँ।”“ लेकिन तुम कौन हो और क्यों जा रही हो?” कथन में विकलता टपक रही थी। देवी ने उसी गम्भीर भाव से बताया-”मैं तुम्हारी सौभाग्य लक्ष्मी हूँ। तुमने अलक्ष्मी को आश्रय दिया है सो तुम्हें छोड़कर जा रही हूँ। अब मैं यहाँ नहीं रह सकती।” यह कहकर सौभाग्य लक्ष्मी चल दी। वह बोले कुछ नहीं निर्निमेष नेत्रों से उसका जाना देखते रहे।
सौभाग्य छिन जाने से पास-पड़ोस से तरह-तरह की बातें चल पड़ी। कोई कहता पुरन्ध्र ने ब्राह्मण कन्या से अवैध सम्बन्ध जोड़ लिया है। कोई कहता पुरन्ध्र अब पापी हो गया है। जितने मुँह उतनी बातें। पर उन्हें मानों इन सबसे कोई प्रयोजन ही न था। वह अब भी संध्या और नैमित्तिक कर्म उसी प्रकार करते थे जैसे पहले। अलक्ष्मी के कूट जाल को वह समझते थे। पर वह उनकी कन्या की तरह धरोहर थी। उनके नेत्रों में एक क्षण के लिए भी दूषण उदय नहीं हुआ। लेकिन लोगों को समझाया तो नहीं जा सकता था क्योंकि अलक्ष्मी अब भी अधिक पास रहने लगी थी। उनकी पत्नी को भी उतना समय न मिलता था। अलक्ष्मी के पास रहते हुए उनके व्यवहार में पिता-पुत्र के निश्छल वात्सल्य से भरी पवित्रता थी।
एक रात उन्हें फिर एक ज्योति पुंज स्त्री ने दर्शन दिया। और कहा-”मैं तुम्हारी यश लक्ष्मी तुम्हें छोड़ कर जा रही हूँ।” यश लक्ष्मी चली गई। पुरंध्र के नेत्र नीर उमड़ पड़े। पर उनका खारी जल भीतर ही भीतर बह कर रह गया।
यश छिन गया तो घर में बेटे-बेटियाँ और पत्नी ने भी साथ छोड़ दिया। अपने-अपने घर बनाकर वे लोग अलग-अलग रहने लगे। उनके साथ अलक्ष्मी के अलावा अब कोई नहीं रह गया। कुल लक्ष्मी भी रूठ कर चली गई। वे ब्राह्मण की बाट जोहते रहे, पर वह नहीं आया। चली अलक्ष्मी की भी नहीं वह पुरन्ध्र की पुत्री ही बनी रही। लेकिन किसी के अन्तःकरण की सच्चाई को कौन देखता? सब लोग पुरन्ध्र और अलक्ष्मी को दिन−रात कोसने लगे।
उस रात घना अंधकार छाया हुआ था। हाथ को हाथ नहीं सूझता था। कभी-कभी बादलों की चमक में ही कुछ दिखाई दे जाता था और फिर उसके बाद डरा देने वाली बादलों की गर्जना उस वातावरण को और भी वीभत्स बना रही थी। अलक्ष्मी पास ही सोई हुई थी। पुरन्ध्र को नींद आ रही थी। यकायक उन्होंने देखा, एक दिव्य ज्योति फूटी और कोई देवपुरुष सम्मुख आ खड़ा हुआ।
वह उठ बैठे। उन्हें प्रणाम करते हुए कहा-”भगवान्! आप कौन हैं? क्या आपके आगमन का कारण जान सकता हूँ।”
इस प्रकार प्रश्न करने पर वह दिव्य देहधारी पुरुष कहने लगा-”मैं धर्म हूँ। तुम्हारे घर से सौभाग्य यश और कुल सब चले गये। अब मैं यहाँ रहकर क्या करूंगा? मैं भी जा रहा हूँ।
यह कहकर धर्म ने जैसे ही पीठ फेरी पुरन्ध्र ने उनका हाथ पकड़ लिया और पूछा-”देव। बुरा न माने मैंने आज तक जो कुछ भी किया वह आपकी ही मर्यादा के लिए-आपकी मर्यादा को निभाने के लिए मैंने अलक्ष्मी को अपने पास रखा फिर क्या आप भी मुझे पापी ठहरायेंगे? मैंने भावनाओं को पाला वासनाओं को नहीं। फिर क्या आपका यों ठुकराकर जाना अधर्म न होगा?”
धर्म राम कुछ उत्तर दे सकें- उनमें इतनी भी हिम्मत न थी। वह चुपचाप पीछे लौटे और पुरन्ध्र की देह में अन्तःलीन हो गए। धर्म को जाना न देख सौभाग्य, यश और कुल लक्ष्मी सब नई-नई प्रसन्नता लेकर लौट आई। इस हलचल में अलक्ष्मी की नींद टूट गई। उसने सोचा जहाँ धर्म में इतनी गहरी आस्था है। वहाँ मेरा रहना निरर्थक है। अपने कुचक्र को असफल हुआ देख पाप और अलक्ष्मी ने पलायन किया। दृढ़व्रती पुरन्ध्र पुनः पहले की तरह लक्ष्मी, कीर्ति, सौभाग्य की विभूतियों से विभूषित हो गए।
यों माता को संतान के निर्माण में प्रत्यक्ष और परोक्ष भूमिकाएँ विशेष रूप से निभानी पड़ती है किन्तु वस्तुस्थिति यह भी है कि पति अपने ढाँचे में पत्नी को ढालता है।
अज्ञातवास के समय भीम ने एक वनवासी महिला को अपनी पत्नी के रूप में रख लिया था। नाम था उसका हिडम्बा। वन्य जीवन जीने के कारण उसमें जन्मजात सुसंस्कारिता तो न थी पर उस कमी की पूर्ति भीम ने की। मैंने उसकी सेवाओं का लाभ ही नहीं उठाया।
हिडम्बा ने महाबली घटोत्कच को जन्म दिया। उसका बेटा बर्बरीक था। दोनों ने ही महाभारत के समय महाबली महारथी जैसी भूमिका निबाही। जब कि हिडम्बा के निजी वंश परम्परा में ऐसे उत्पादन का कोई उदाहरण न था।
पिता यदि चाहे तो पत्नी को बच्चों के उच्चकोटि के विकास में सक्षम बना सकता है।
श्रुति वचन है “विहायाऽमूत मश्नुते।” अर्थात् विद्या से अमृत की प्राप्ति होती है। अमृत अर्थात् वह तत्व जिसे पाकर मरना न पड़े। क्या ऐसी अद्भुत वस्तु का प्राप्त हो सकना संभव है। उसका उत्तर हाँ में दिया जा सकता है और कहा जा सकता है कि जिसे यह तत्व उपलब्ध करना हो उसे “विद्या” की प्राप्ति करनी चाहिए।
यहाँ विद्या का तात्पर्य साक्षरता पर अवलंबित भौतिक जानकारियों तक सीमित नहीं है। उसे संसार के स्वरूप और व्यवहार तक भी सीमित नहीं किया जा सकता। उस स्तर की पढ़ाई स्कूलों में चलती है और उसे जानकर अध्यापक अपने छात्रों को सिखाते भी रहते हैं। “विद्या” उस तत्वदर्शन से अवगत कराती है जो व्यक्ति की चेतना परतों का स्वरूप समझाती और उन्हें परिष्कृत करने में सहायता करती है। संक्षेप में इसे इसे दृष्टिकोण का परिष्कार भी कह सकते हैं और जीवनचर्या का सर्वतोमुखी सुनियोजन भी। यही संजीवनी विद्या है। अमृत की चर्चा भी इसी प्रसंग में होती है। जिसने जीवन के अन्तराल को- अंतःकरण को उत्कृष्टता के साथ जोड़ने में सफलता प्राप्त कर ली, समझना चाहिए कि अमृतत्व का अदृश्य स्वरूप चेतना में समाविष्ट करने का सुयोग-सुअवसर मिल गया। दैवी अनुग्रह का ईश्वर दर्शन का ब्रह्म निर्माण का स्वरूप भी यही है। इसी को तत्ववेत्ताओं ने अनेक प्रकार के अलंकारों से सुसज्जित करके वर्णन-विवेचन किया है।
शरीर को संसार के प्राणियों और पदार्थों के साथ किस प्रकार रखना चाहिए। इसकी जानकारी करना-कराना शिक्षा का काम है। अध्यापक और शिक्षालय इसी आवश्यकता की पूर्ति करते हैं। आरंभिक पुष्टि से उसकी आवश्यकता भी है और उपयोगिता भी। किन्तु समझा जाना चाहिए कि लौकिक जानकारियों की अभिवृद्धि करने वाली शिक्षा शरीर यात्रा में एक सीमा तक प्रशिक्षित करने के काम ही आती है। इसीलिए उसे एक पक्षीय या अधूरी माना जाता है। वह प्रायः बहुज्ञ और अधिक उपार्जन में समर्थ बनाकर ही अपनी सीमा पूर्ण कर लेती है।
विद्या प्राप्त करना इसीलिए आवश्यक है कि चेतना को सुसंस्कृत बनाने में उसकी अनिवार्य आवश्यकता होती है। व्यक्ति वस्तुतः आत्मा है। अन्तःकरण उसका क्षेत्र है। इसके उच्चस्तरीय बनाने पर ही चिन्तन, चरित्र और व्यवहार में शालीनता का समावेश होता है। चिन्तन, चरित्र और व्यवहार को देवोपम बनाने में विद्या का प्रभाव और दबाव ही काम आता है। यदि इस लाभ से लाभान्वित हुआ जा सके तो व्यक्तित्व का वह स्वरूप निखर कर सामने आता है जिसके प्रभाव से अन्तरंग और बहिरंग क्षेत्रों में आनन्द एवं उल्लास बखेरने वाले प्रकाश को प्रज्वलित हुआ देखा जा सके।
वैभव का अपना महत्व है। इसलिए उसका पथ प्रशस्त करने वाली शिक्षा को भी आवश्यक माना गया है पर इतने से ही यह संभव नहीं कि आत्मा के साथ जुड़ी हुई विभूतियों को भी उपलब्ध किया जा सके। उन्हें प्रसुप्त स्थिति से जगाकर जागरूक और पुरुषार्थ परायण बनाया जा सके। इसके लिए उस उच्चस्तरीय विवेक को जाग्रत करना होता है जिसे विद्या के नाम से जाना, सहारा और अमृतोपम कहकर उसके साथ जुड़ी संभावनाओं से अवगत कराया जाता है।
शिक्षा की तरह विद्या की प्राप्ति में भी शिक्षार्थी की उत्कंठा और आस्था तो आवश्यक है ही पर जरूरत इस बात की भी है कि उस प्रयोजन के लिए सही मार्गदर्शक मिल सके। उनका प्रायः अभाव ही पाया जाता है। कारण कि वह कार्य मात्र परामर्श से बन नहीं पड़ता। उसके लिए ऐसे प्रशिक्षक चाहिए जिनने उस प्रसंग का स्वयं अभ्यास किया हो जिसका दूसरों को हृदयंगम कराया जाना है। संगीत पढ़ाने वाला और स्वयं गाना-बजाना न जानता हो और मात्र उसका वर्णन विवेचन भर प्रस्तुत करें, संभव नहीं हो सकता। जानकारियों को तो अध्ययन-परामर्श के माध्यम से भी उपलब्ध किया जा सकता है पर जहाँ तक स्वभाव अभ्यास का सम्बन्ध है वहाँ तक उसके लिए अनुकरण की आवश्यकता पड़ती है। साँचे के अनुरूप ही उपकरण, औजार, खिलौने आदि ढाले जाते हैं। जीवनचर्या में उत्कृष्टता का समावेश ऐसा कार्य है जिसे उन्हीं के द्वारा सीखा जा सकता है। जो उस तरह का प्रयोग-परीक्षण अपने जीवनक्रम में सफलतापूर्वक उतार चुके हैं। अखाड़े में अभ्यास करने वाले युवकों को पहलवान बना सकना मात्र दांव-पेंच जानने वाले उस्ताद के लिए ही संभव होता है। अन्यान्य प्रकार के शिल्प–कौशल भी प्रवीण अध्यापक ही नये छात्रों को सिखा सकने में समर्थ होते हैं।
पतन का मार्ग सरल है। किसी वस्तु को ऊपर से नीचे घसीट लेने का कार्य पृथ्वी की गुरुत्वाकर्षण शक्ति ही निरन्तर करती रहती है। पानी ढलान की ओर सहज स्वाभाविक रूप से बहने लगता है। जन्म-जन्मान्तरों के संचित कुसंस्कार हर किसी को पाशविक प्रवृत्तियाँ अपनाने के लिए उकसाते रहते हैं। लोक प्रचलन भी ऐसा है जिसमें अवाँछनीयताओं का ही बाहुल्य पाया जाता है। उनका आकर्षण-उत्तेजन दुष्प्रवृत्तियों की दिशा में ही धकेलता है। यौन कर्म प्राणियों को प्रकृति प्रेरणा ही सिखा देती है। पर यदि आदर्शवादी सत्प्रवृत्तियों को स्वभाव में उतारना हो तो उसके लिए स्वाध्याय-सत्संग, चिन्तन-मनन ही नहीं उपयुक्त मार्गदर्शन और प्रत्यक्ष उदाहरण भी सामने होने चाहिए। इन्हें जुटा सकने वाले ही उत्कर्ष अभ्युदय की दिशा में बढ़ पाते हैं। चिरस्थाई, व्यापक और सर्वतोमुखी प्रगति के लिए इस सुयोग की व्यवस्था होनी ही चाहिए। इस प्रयास-अभ्यास को जीवन साधना के नाम से जाना जाता है। इसी समग्र मार्ग को अपना सकने पर व्यक्तित्व निखरता और प्रगति का पथ प्रशस्त होता है।
कठिनाई एक ही है कि इस प्रकार के अध्यापकों का इन दिनों बुरी तरह अभाव हो गया। जो उच्चस्तरीय सिद्धान्त और व्यवहार अपने आपे में समन्वित करने के उपरान्त दूसरों को भी अपने चुम्बकत्व से आकर्षित कर सकें। जलते हुए दीपक ही अपने निकटवर्ती बुझे दीपकों को प्रकाशवान बनाने में सफल-समर्थ हो सकते हैं।
दूसरों को ऊँची बातें कहना अति सरल है। पुस्तकों में से खोजबीन कर ऐसे प्रवचन आसानी से किये जा सकते हैं। किसी के कथन को नोट करके उसे दुहराते रहने का काम ऐसा है जिसे रटंत के अभ्यासी तोते भी कर सकते हैं। प्रवचनों की-भाषण-परामर्श की कला तो अब असंख्यों का व्यवसाय बन गई है। स्कूल-कालेजों में “लेक्चरारों” की नियुक्ति होती रही है। साइंस योग्यता के प्रशिक्षित अनेकों नौकरी की तलाश में रहते हैं। मजमा लगाकर अपने वाक्-चातुर्य के आधार पर भीड़ जमा कर लेने और घेरा बनाकर खड़े हुए लोगों की जेब से पैसा निकाल लेने वाले बाजीगर गली-चौराहों पर अपना कौशल दिखाते और आजीविका कमाते देख जाते हैं। वकालत के पेशे में तो वाचालता ही प्रमुख है। दलाली के धंधे में ऐसे ही लोग सफल होते हैं। दुकानों में काम करने वाले सेल्समेनों मैन को, बीमा एजेंटों को इस कुशलता के आधार पर अच्छे वेतन मिलते हैं। ऐसा ही कुछ धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक क्षेत्र में भी देखा जाता है। मुखर अभ्यस्त व्यक्ति भी अच्छे भाषणकर्ता-कथावाचक बन सकते हैं। इतने पर भी उनके द्वारा उस प्रयोजन की सिद्धि नहीं हो सकती जिसकी कि आशा-अपेक्षा की जाती है। वक्ताओं और लेखकों से यदि लोगों के व्यक्तित्व ऊँचे उठ गये होते और उनके द्वारा कब का उपयुक्त वातावरण बन सकना संभव हो गया होता, पर ऐसा होता कहाँ है?
आदर्शवादी प्रतिपादनों को सुनने और पढ़ने में भी आज लोग उपेक्षा दिखाने लगे हैं। कहते हैं- ‘‘थोथा चना बाजे घना।” जोर-जोर से बजने वाले ढोल भीतर से पोले होते हैं। “पर उपदेश कुशल होना” एक प्रकार का व्यंग है। मंच पर उचकते-मचकते रहने वाले नेताओं को “अभिनेताओं” की उपमा दी जाती है। इस प्रकार लेखनी और वाणी की अजस्र समझी जाने वाली शक्ति भी अब एक प्रकार से निरर्थक-निष्फल ही सिद्ध होती रहती है। उसे कौतुक-कौतूहल मान समझकर उपेक्षा करते और ऐसे समारोहों में अनुपस्थित रहते ही पाये जाते हैं। अब तो जुलूसों में, रैलियों में, प्रदर्शनों में, सभा-समारोहों में विचारशील जनता को एकत्रित कर सकना प्रायः अति कठिन होता जाता है। ठाली बैठे लोग ही प्रायः ऐसे आयोजनों में इकट्ठे होते-देखे जाते हैं। या फिर उन्हें सफल बनाने के लिए कोई बड़ा-सा कौतुक-कौतूहल खड़ा करने में प्रचुर धन व्यय करना पड़ता है। यही है आज के प्रवचन परामर्श क्षेत्र की वास्तविकता।
लेखन के संबंध में भी यही बात है। सिद्धान्त समर्थक पुस्तकों की बाजार में सबसे कम बिक्री है। इस प्रकार के साहित्य संदर्भ में जनसाधारण की उपेक्षा ही बढ़ती जाती है। कारण एक है कि लेखनी और वाणी के माध्यम से मार्गदर्शन करने वालों की नियत पर सर्वत्र संदेह किया जाता है। उसकी कथनी और करनी में अन्तर पाया जाता है। इस अन्तर को देखते ही सर्वसाधारण के मन में अश्रद्धा उत्पन्न होती है। वे अनुमान लगाते हैं कि यदि प्रतिपादन उपयोगी और व्यवहारिक रहा होता तो उसे यह प्रतिपादन कर्त्ता स्वयं अपने जीवनक्रम में क्यों न उतारते? यदि वह लाभदायक था तो इसे स्वयं कर देखने में चूक क्यों करते? यही एक कारण है जिसने संजीवनी विद्या के क्षेत्र में कारगर अध्यापन कर सकने वालों की एक प्रकार से शून्य स्तर की अभावग्रस्तता सामने आ खड़ी हुई है। उसके अभाव ने जनमानस में संकीर्ण स्वार्थपरता ने बुरी तरह अड्डा जमा लिया है। लोग चतुरता, चालाकी को ही सफलता का बड़ा आधार मानने लगे हैं। धर्मोपदेशकों को उपहासास्पद बनते और क्रिया–कुशलों को सफल संपन्न होते देखकर यही अनुमान लगाया जाता है कि स्वार्थ सिद्धि ही व्यावहारिक है। भले ही वह छल प्रपंच का आश्रय लेकर ही हस्तगत क्यों न की गई हो।
आज का सबसे बड़ा संकट यही आस्था संकट है। जिसके चक्रव्यूह में फँसकर जन समुदाय का स्तर क्रमशः नीचे की ओर ही गिरता-धंसकता जाता है। एक दूसरे को ठगने की प्रवृत्ति ने समूचा वातावरण ही नैतिक प्रदूषण से भर दिया है। नजर पसारने पर बौने और ओछे लोग ही सर्वत्र भरे दीखते हैं। इसका जो परिणाम होना चाहिए वह भी सामने है। फूटे घड़े में पानी भरने की तरह लोगों की बढ़ी-चढ़ी कमाई भी कुछ काम नहीं आ रही है। नीतिमत्ता का अभाव रहने के कारण बढ़ता वैभव दुर्व्यसनों की, दुर्गुणों की प्रदर्शनरत अहंकार की ही बाढ़ उत्पन्न करता है। संपन्नता की अभिवृद्धि के साथ-साथ लोग यदि सभ्य-सुसंस्कृत भी बन सके होते तो कम से कम लोगों का ध्यान वैभव उपार्जन में तो विश्वासपूर्वक लगा होता। पर यह भी बन नहीं पा रहा है। फिर अभावग्रस्तों का तो कहना ही क्या? भूखा यदि उठाईगिरी पर उतारू हो तो बात समझ में आती है। अशिक्षा को अज्ञान की जननी बताकर उसे कोसा भी जा सकता है। पर जब सुशिक्षित और सुसंपन्न भी हेय आचरण में संलग्न दीख पड़े तो आँखों के सामने अँधेरा छा जाता है। समाधान न सूझ पड़ने पर अवरोध अड़ जाता है और व्यक्ति कि किंकर्तव्य विमूढ़ होकर नास्तिक स्तर का अनास्थावादी बनने लगता है। निरंकुश, लक्ष्य रहित व्यक्ति अनुशासन की उपेक्षा करके जो मन आये वो करने लगे तो एक प्रकार की अराजकता का ही बोलबाला हो चलेगा, हो भी रहा है।
परिस्थितियों की विपन्नता पर जितनी गंभीरतापूर्वक विचार किया जाता है और कारण खोजा जाता है तो एक ही निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ता है कि चेतना का परिष्कृत कर सकने में समर्थ उस सद्ज्ञान की उपलब्धि का द्वार ही बंद हो गया है, जिसे विचाराधन एवं व्यक्तित्व का उच्चस्तरीय उत्कर्ष कहा जा सकता है। अवरोध इसीलिए अड़ा कि उसके लिए उपयुक्त अध्यापकों की कमी ही नहीं पड़ी समाप्त होने जैसी स्थिति भी आ गई। अपने समय का यही सबसे बड़ा संकट है। निवारण निराकरण इसी का होना चाहिए।
क्रीमिया के क्षेत्र में भयंकर युद्ध चला। युद्ध में ढेरों सिपाही नित्य मारे जाते और घायल होते। घायलों की बहुत दुर्दशा होती, क्योंकि उनकी साज सँभाल करने का कोई व्यवस्थित तंत्र न था। घायलों को बेमौत मरना पड़ता।
क्रीमिया की एक कुमारी इस अभाव की पूर्ति के लिए आगे आई। उसने अन्य अविवाहित युवतियों को इन घायलों की सेवा करने के लिए प्रोत्साहित और तत्पर किया। एक अच्छी खासी यूनिट बन गई। नाइटिंगेल इस संगठन का नेतृत्व कर रही हैं।
युद्ध के बाद भी इन सेवा भावी लड़कियों से अस्पताल के माध्यम से पीड़ितों की सेवा का कार्य जारी रखा। इस शुभारंभ का आरंभ देश-देशान्तरों में हुआ। सेवा कार्यों में संलग्न नर्स आज सब देशों के अस्पतालों में काम करती दिखाई देती है।
दो बहेलिया ने जाल बिछाया दाना देखकर बहुत से कबूतर उस पर चढ़ गये और सभी के पैर फँस गये। बहेलिया प्रसन्नता था।
पर थोड़ी ही देर में कबूतरों ने मिलकर जोर लगाया और जाल को उखाड़ कर ऊपर उड़ गये।
साथ वाले दूसरे बहेलिये ने कहा-यह बुरा हुआ। आई शिकार हाथ से निकल गई। पहले ने कहा चिन्ता की कोई बात नहीं है। इनमें अनुशासन नहीं है। कोई किसी की बात माने यह आदत इनमें नहीं है। अपनी-अपनी ओर खींचतान करेंगे और उलझ कर जमीन पर गिरेंगे।
ऐसा ही हुआ भी। ये जाल तो अपनी संघ शक्ति के सहारे ऊपर उखाड़ ले गये। पर अनुशासन के अभाव में अपनी-अपनी चलाते हुए नीचे गिरे और फिर बहेलियों के चंगुल में फंस गये।
भारत का भविष्य क्या है? यदि इस विषय पर विचार किया जाय तो पता चलेगा कि भिन्न-भिन्न विचारकों, समाज−शास्त्रियों, अर्थवेत्ताओं, मौसम विज्ञानियों,भविष्यवक्ताओं एवं अंतर्दृष्टाओं ने अपने-अपने ढंग से इसी एक तथ्य को भिन्न-भिन्न रूप में रखने का प्रयास किया है कि वर्तमान के संकटकालीन दौर के आधार पर भारत का भविष्य नहीं आँका जाना चाहिए, वरन् ऐसा कुछ निष्कर्ष निकालने से पूर्व उसके आध्यात्मिक विरासत और प्राचीन इतिहास को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए। वे कहते हैं कि कई बार आँखें जो कुछ देखती हैं, वह सच जान पड़ने पर भी सत्य नहीं होता। इसका कारण उस सूक्ष्म दृष्टि का अभाव होता है, जो सत्य और तथ्य को पहचान सके।
भारत के संदर्भ में तथ्यान्वेषियों के इस तर्क में काफी बल है। निश्चय ही अपना देश इन दिनों कठिन दौर से गुजर रहा है एवं आन्तरिक विद्वेषों, अन्तर्विग्रहों में इस कदर उलझा हुआ है जिसे देखते हुए दृश्य रूप में तो ऐसा लगता नहीं कि वह कभी आगामी समय से जल्द ही इनसे उबर कर ऊपर उठ सकेगा, पर इस बात को भी झुठलाया नहीं जा सकता कि घनघोर घटाटोप के आये बिना भी शरीर को झुलसा देने वाली गर्मी से राहत पायी जा सकती है। सुख से पहले दुःख और सफलता से पूर्व विफलता का आना सुनिश्चित है। इतने पर भी यह स्थिर मान्यता नहीं बनाली जानी चाहिए कि यह स्थायी स्थिति है, वरन् सोचा यह जाना चाहिए कि अब उत्कर्ष का समय निकट आने वाला है। प्रसव-पीड़ा को देख कर यदि कोई यह अनुमान लगा बैठे कि यह तो ऐसी व्यथा जान पड़ती है, जिसका शायद समाधान तुरंत आप्रेशन ही तो, तो उसकी बुद्धि पर तरस ही आयेगा। भारत के भविष्य को वर्तमान के आधार पर कोसने वाले लोगों की बुद्धि और चेतनात्मक स्तर को इससे ऊँचा नहीं ही माना जाता चाहिए।
दूसरी ओर ऐसे सूक्ष्म द्रष्टाओं की भी कमी नहीं, जिनने भविष्य के गर्भ में परिपाक हो रहे सूक्ष्म घटनाक्रमों को समय से पूर्व देखकर उसके उज्ज्वल भविष्य की भविष्यवाणी की है। ऐसे ही एक द्रष्टा हुए हैं मैक्जार्ज बण्डी। उन्होंने जॉन गुलर की पुस्तक “रिट्रीट फ्राँम डूम्सडे” की समीक्षा करते हुए अपना मन्तव्य प्रकट किया है कि “रोमन साम्राज्य के उपरान्त यही सबसे ऐसी लम्बी अवधि है, जब हम विश्वव्यापी तनाव शैथिल्स (देतान्ते) की स्थिति देख रहे हैं। वे लिखते हैं कि मानव जाति ने इस बात को भलीभांति समझ लिया है कि युद्ध ही सृष्टि और उसकी उन्नति का सबसे बड़ा शत्रु है, अतः अब विश्व को शान्ति की आवश्यकता है। वे बलपूर्वक अपनी बात को स्वीकारते हुए कहते हैं कि मेरी अंतर्दृष्टि यह स्पष्ट देख रही है कि संसार में अब कोई हिटलर, मुसोलिनी या अन्श्रय कोई एण्टी क्राइस्ट अथवा कोई साम्राज्यवादी एम्पायर जन्म नहीं लेगा। यदि जन्म लिया भी तो वह करुणा का सागर कोई एक महामानव होगा, जिसका लक्ष्य विनाश नहीं, विकास-घृणा नहीं, विश्व बन्धुत्व होगा और यह महामानव भारत ही पैदा कर सकता है, क्योंकि उसकी साँस्कृतिक विरासत और आध्यात्मिक दृष्टि इतनी व्यापक और गहराई लिये हुए है कि इससे कम में विश्व-शान्ति और उज्ज्वल भविष्य की बात करना आकाश कुसुम खिलाने जैसा सिद्ध होगा।”
सन् 1989 की “टाइम” मैगजीन में इसी आशय का मंतव्य प्रकट करते हुए एक निबन्ध प्रकाशित हुआ है, जिसका शीर्षक है-”सुपर इण्डिया”। इसके लेखक एस.एच.मुनरो लिखते हैं कि यों तो पश्चिम में भारत की छवि एक अन्धविश्वासी, रूढ़िवादी देश के रूप में है, पर अब इसे इस प्रकार की संज्ञाओं द्वारा देर तक उपेक्षित नहीं रखा जा सकता, क्योंकि इसी भारत से एक ऐसे महाभारत-विशाल भारत का उदय होने जा रहा है, जिसकी आध्यात्मिक शक्ति देखते-देखते समस्त विश्व को अपना अंकशायिनी बनाने जा रही है।
इसी प्रकार के अनेकानेक विचार द्रष्टा, मनीषी प्रकट करते रहे हैं, जिससे ऐसा स्पष्ट आभास मिलता है कि ग्रहण के मध्य से ही कोई ऐसा नवोदय होगा, जो सम्पूर्ण विश्व को आध्यात्मिक आभा और ऊर्जा से इस प्रकार परिपूर्ण कर देगा, जिसके ऐसी प्रतीत किसी कदर होगी ही नहीं कि यह वही भारत है, जो कभी ग्रहण युक्त था।
(चैत्र नवरात्रि 1990 की पूर्वबेला में लिखा गया एक अप्रकाशित लेख)
महाभारत युद्ध चल रहा था। आवश्यकता थी कि पाँचों पाण्डवों में सर्वश्रेष्ठ धनुर्धर अर्जुन ऐसे में अपना पराक्रम दिखाए। किन्तु उस पर तो व्यामोह सवार था। वह कर्त्तव्य युद्ध में कटिबद्ध होने से कतरा रहा था। नाना प्रकार के बहाने गढ़ रहा था। श्रीकृष्ण ने उसकी बहाने-बाजी के मूल में छिपे चोर को पकड़ा और कहा- हे समर्थ परंतप! कमर कस, आँतरिक दुर्बलता को छोड़ और युद्ध में प्रवृत्त हो। बहानेबाजी पर करारी चोट करते हुए कहा-अनाड़ियों जैसा मानस न बता। जो तुझे पतन के गर्त्त में धकेल रहा है। इस उद्बोधन ने अर्जुन की मूर्च्छना जगाई, उसे झकझोर डाला एवं वह गाण्डीव उठाकर नयी मानसिकता के साथ रथ में जा बैठा। कृष्ण उसके सारथी बने वह वह प्रयोजन पूरा हुआ जो श्रीकृष्ण अर्जुन को निमित्त बनाकर पूरा करना चाहते थे।
ऐसा ही कुछ त्रेता के अन्त में हुआ था। उस समय दो कार्य पूरे होने थे-एक अवांछनीयता का उन्मूलन, दूसरा सतयुग की वापसी वाले उच्चस्तरीय वातावरण की रामराज्य के रूप में स्थापना। इस प्रयोजन को राम की अवतारी समर्थसत्ता और लक्ष्मण की पुरुषार्थ-परायणता मिलजुल कर एकनिष्ठ भाव से पूरा कर रही थीं। राम-रावण युद्ध चल रहा था, इसी बीच एक व्यक्तिक्रम आ गया। लक्ष्मण को प्राणघातिनी शक्ति लगी, वे मरे तो नहीं पर मूर्च्छित होकर गिर पड़े।
लक्ष्मण के बिना एक पक्षीय अर्धांग के पक्षाघात जैसी स्थिति से उद्देश्य पूर्ति में व्यवधान उत्पन्न होने जा रहा था। लक्ष्मण के बिना राम सर्वसमर्थ होते हुए भी अपने को असहाय अनुभव कर रहे थे। आवश्यकता यह गुहार मचा रही थी कि लक्ष्मण की मूर्च्छा किसी प्रकार दूर हो। संजीवनी बूटी कहीं से भी तुरंत लाया जाना अनिवार्य था, पर हिमालय जाये कौन? प्रश्न जटिल था किन्तु हनुमान की साहसिकता उभरी, बीड़ा उठाया और वे राम का नाम लेकर चल पड़े। प्राण हथेली पर रखकर जैसे भी बने पड़ा। ढूँढ़-खोज करते हुए संजीवनी बूटी लेकर वापस लौटे। संकट टल गया। दोनों भाई वह करने में जुट गए जिसके लिए उनका अवतरण हुआ था। अवाँछनीयता से पीछा छूटा एवं वह बन पड़ा जो सतयुग की वापसी के लिए अभीष्ट था।
दोनों उदाहरण आज भी आधुनिक संस्करण के रूप में देखे जा सकते है। युगान्तरीय चेतना का दिव्य आलोक देवी आकाँक्षा की पूर्ति में जुटा है। प्रज्ञापुत्रों की सामूहिक संगठन शक्ति और निर्धारित क्रिया–कलापों में जुटी तत्परता को लक्ष्मण स्तर की प्रतिभा कहा जा सकता है। दोनों की समन्वित शक्ति यदि ठीक तरह काम कर रही होती तो युगसंधि के विगत कुछ ही वर्षों में ही महत्वपूर्ण कार्य संपन्न हो गया होता। फिर किसी को इक्कीसवीं सदी के गंगावतरण में किसी प्रकार का संदेह करने की गुँजाइश नहीं रहती।
पर उस दुर्भाग्य का क्या किया जाय जो लक्ष्मणी रूपी परिजनों की संगठित शक्ति की तत्परता में मूर्च्छना की स्थिति में ले जा पहुँची। उसे उस मेघनाद रूपी विग्रह का मायाजाल भी कहा जा सकता है जो आड़े समय में उदासीनता-उपेक्षा के रूप में सामने आ खड़ा हुआ है। आपत्तिकाल की चुनौती सामने हो और परिजनों के समक्ष यह व्यामोह हो कि वे युगधर्म से कन्नी काट लें तो इस विडम्बना को क्या कहा जायेगा? इसे उज्ज्वल भविष्य के मार्ग आड़े आने वाला दुर्भाग्य भी कह सकते हैं एवं असुरता का आक्रमण भी। लक्ष्मण की साँसें तो चल रही हैं पर उनका धनुषबाण इन दिनों वह चमत्कार नहीं दिखा पा रहा है जिसकी महाकाल ने अपेक्षा की थी। लक्ष्मण की यह विपन्नता तपस्वी राम को खल रहा है इसका आकलन जीवन्तों की प्राण चेतना ही कर सकती है। लिप्सा-तृष्णाएँ तो केवल मूकदर्शक भर बने रहने का परामर्श दे सकती है। ऐसे में सबसे बड़ी आवश्यकता उस हनुमान स्तर की भाव चेतना की है जो अभीष्ट पुरुषार्थ प्रदर्शित करके बिगड़े काम को बनाने में संलग्न होकर अपनी वरिष्ठता और यशोगाथा को चिरकाल तक जन-जन की चर्चा का विषय बनाने। अनुकरण और अभिनंदनीय स्तर का पौरुष प्रदर्शन करने का ठीक यही समय है।
मिशन के समस्त दायित्व युगसंधि के साथ जुड़े है। इक्कीसवीं सदी के गंगावतरण को इस भगीरथ की आवश्यकता है जो सूखे पड़े विशाल क्षेत्र की प्यास बुझाने के लिए भाव तरंगित हों और राजपाट का व्यामोह छोड़कर तप−साधना का मार्ग अपनाने का साहस दिखा सके।
जिनका साहस उभरे उन्हें करना इतना भर है कि युगधर्म के परिपालन में वरिष्ठों को क्या करने के लिए बाधित होना पड़ता है, इसका स्वरूप उन्हें समझाते हुए उन्हें नये सिरे से नयी उमंगों का धनी बना सकने की स्थिति उत्पन्न कर सकें। अपने समर्थ, प्रबुद्ध एवं पच्चीस लाख व्यक्तियों के परिकर के लोग ही नवसृजन में जुट सकें तो असंख्यों अनेकों को अपना सहयोगी बनाने में निश्चित रूप से सफल हो सकते हैं। संयोगवश दैवी प्रवाह भी इसी दिशा में बह रहा है। उसके साथ जुड़कर रज, कण और तिनके, पत्ते भी आकाश चूमने में समर्थ हो सकते हैं। नवसृजन की, औचित्य की प्राणप्रतिष्ठा के लिए आकुल-व्याकुल युगान्तरीय चेतना अब तक के सभी महान् परिवर्तनों की तुलना में अधिक शक्तिशाली सिद्ध होगी, अगले दिनों हम उन्हीं चर्मचक्षुओं से ऐसी संरचना को सामने खड़ी देखेंगे।
प्रयोजन की पूर्ति के लिए इसी नवरात्रि से लेकर आगामी आश्विन नवरात्रि तक के प्रायः छः महीनों के लिए एक छोटी योजना सामयिक दृष्टि से बताई गई है। जिनके मनों में अनुरोधजन्य स्फुरणा उठे, उन्हें इतना छोटा निर्धारण तो पूरा कर लेना चाहिए जो इस प्रकार है-
अपने संपर्क क्षेत्र के प्रज्ञा परिजनों के घरों तक पहुँचने का योजनाबद्ध कार्यक्रम बनायें और उनसे कहें कि यह समय शिथिलता, उपेक्षा का है नहीं। अपने समय में से दो घण्टे नित्य तो युगधर्म के निर्वाह में लगना ही चाहिए। घर-घर दीपयज्ञ जन्मदिवसोत्सव मनाते हुए धर्मतंत्र से लोकशिक्षण की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने का यह समय है।
समयदान को नियोजित करने के लिये दो कार्यक्रम चलाएँ (।) झोला पुस्तकालय-जिसके अंतर्गत अपने क्षेत्र के शिक्षितों से संपर्क साधकर उन्हें युगसाहित्य पढ़ने वापस लेने का सिलसिला जारी कर देना चाहिए। वह स्वाध्याय की प्रक्रिया है (॥) साप्ताहिक सत्संग-जिसमें सप्ताह में कम से कम एक दिन प्रस्तुत विचारधारा के समर्थक मिल बैठ लिया करें। सहगान कीर्तन, अभिनव संदेशों का प्रवचन तथा दीपयज्ञों का संक्षिप्त आयोजन कर लिया करें।
अखण्ड-ज्योति, युगनिर्माण योजना एवं युगशक्ति गायत्री पत्रिका के पाठकों की संख्या बढ़ाने के लिए प्रयत्नशील रहना। इसी के माध्यम से युग चेतना का संदेश जन-जन तक हर माह अपनी प्राण चेतना समेत जा पहुँचता है। जहाँ संभव हो वहाँ ज्ञानरथ स्वयं चलायें।
अपने समय की ज्ञानसत्ता को युगदेवता को गली-गली घुमाने घर-घर पहुँचाने का यह पुण्य उपक्रम है। अब तो इनमें टेपरिकार्डर, लाउडस्पीकर भी लगा दिये गये हैं जिनसे युगसंगीत भी सुनाया जा सकता है। यह कार्य नौकरों, फेरीवालों से न कराके स्वयं करें।
पुराने या नये प्रतिभावान परिजनों को शान्तिकुँज में निरन्तर चलने वाले शिक्षण सत्रों में से किन्हीं में इन्हीं दिनों सम्मिलित होने के लिए भेजना। यह बैटरीचार्ज कराने की प्रक्रिया है। युगनेतृत्व सँभालने के लिए उपयुक्त पात्रता इसी से उपलब्ध होगी। ये सत्र तारीख 1 से 9, 11 से 19, 21 से 30 में हर माह चलते हैं। किस सत्र में सम्मिलित होना है, इसका विवरण अपने विस्तृत परिचय के साथ भेजकर स्वीकृति की प्रतीक्षा करने को कहा जाय। जिनके लिये संभव हो, उन्हें हर वर्ष आने, नया संदेश, नया उत्साह प्राप्त करते रहने के लिये कहा जाय।
इन पाँचों कार्यों में किसने क्या प्रगति की, इसकी रिपोर्ट लेकर परिजन शरदपूर्णिमा किन्हीं सत्रों में शान्तिकुँज पहुँचे तथा मार्गदर्शन प्राप्त करें। इससे भावी नीति का निर्धारण करने में मदद मिलेगी।
सॉमर सेट माम मेज पर रखी हुई हर पुस्तक या कागज पर एक तिरछी आँख का चिन्ह बनाया करता था। संगीतकार एटिको ज्योतिषियों से पूछे बिना घर में बाहर तक नहीं निकालता था। पोलैंड का पियानो वादक अपने बैठने के स्टूल को कितनी ही बार इधर से उधर खिसकाया करता था। जर्मनी का कवि बर्फ में पैर डालकर तब कविता लिखता था। इंग्लैंड के कवि शैली राष्ट्राध्यक्ष के नाम पत्र लिखकर शीशी में बन्द करके समुद्र में बहा देते थे और सोचते थे कि यह उन तक पहुँच जायेगा।
बड़े समझे जाने वाले भी सनकों के शिकंजे में फँसते रहते हैं।
इस अंक में हम दे रहे हैं, परमपूज्य गुरुदेव का सूक्ष्मीकरण की अवधि में वीडियो पर रिकार्ड कराया गया एक व्याख्यान जो उनने गायत्री जयंती पर आए परिजनों के लिए जून 1985 में दिया था। ऋद्धियाँ और सिद्धियाँ कैसे साधना से उनके जीवन में आयी? भगवान के खेत में बोना व कई गुना काटना जैसे लाभदायक व्यवसाय को अपने जीवन के प्रसंगों से जोड़कर वे हमें समझाते हैं कि हम सबके लिए भी वही मार्ग खुला पड़ा है।
गायत्री मंत्र साथ-साथ-
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो योनः प्रचोदयात्।
भाइयो, लगभग साठ वर्ष हो गये जब हमारे गुरुदेव घर पर आये थे और उन्होंने कई बातें बतायीं। शुरू में तो डर जैसा कुछ लगा, पर पीछे मालूम पड़ा कि वे पिछले तीन जन्मों से हमारे साथ रहे हैं, तब भय दूर हो गया और बातचीत शुरू हो गयी। उन्होंने कहा-अपनी पात्रता को विकसित करने के लिए तुम्हें चौबीस लक्ष के 24 साल तक 24 पुरश्चरण करने चाहिए। मैंने उनकी वह आज्ञा शिरोधार्य की और सब नियम, विधि वगैरह मालूम कर लिया कि किस प्रकार जौ की रोटी और छाछ पर रह करके 24 पुरश्चरण पूरे करने पड़ेंगे। यह पूरी जानकारी देने के बाद उन्होंने एक और बात कही जो बड़ी महत्वपूर्ण है। आज उसी के बारे में मैं आपको बताऊँगा।
उन्होंने कहा-गायत्री मंत्र कइयों ने जपे हैं, कई लोग उपासना करते हैं, लेकिन ऋद्धियाँ और सिद्धियाँ किसी के पास नहीं आती। जप कर लेते हैं और लोगों से बता देते हैं कि हमने गायत्री का जप कर लिया है, लेकिन न ऋद्धि न सिद्धि। हम तो तुम्हें इस तरह की गायत्री बताना चाहते हैं जिसमें ऋद्धियाँ और सिद्धियाँ भी मिलें और इस जप से ब्राह्मण कुल में उत्पन्न होने का लाभ भी मिले। हमने कहा-यह तो बड़े सौभाग्य की बात है। आप इतनी अच्छी बात बतायेंगे-इससे अधिक अच्छा और सौभाग्य हमारे लिए क्या हो सकता है? तब उन्होंने गायत्री के 24 पुरश्चरणों की विधि बताने के बाद में एक और नयी बात बतायी-”उन्होंने कहा-तुम्हारे पास जो कुछ भी चीज है उसे भगवान के खेत में बोना शुरू करो, वह सौ गुना होकर फिर मिल जायेगा। ऋद्धि और सिद्धि का तरीका यही है, वे फोकट में कहीं नहीं मिलती। दुनिया में ऐसा कोई नहीं है जो ऋद्धियाँ-सिद्धियाँ बाँट रहा हो या कुछ कहीं से मिल रहा हो। इस तरह का कोई नियम नहीं है। बोने पर ही किसान काटता है। ठीक इसी तरीके से तुमको भी बोना और काटना पड़ेगा। कैसे? बताइये सब बातें। उन्होंने कहा-देखो शरीर तुम्हारे पास है। शरीर माने श्रम और समय। इन्हें भगवान के खेत में बोओ। कौन-सा भगवान? यह विराट भगवान जो चारों आरे समाज के रूप में विद्यमान है। इसके लिए तुम अपने श्रम, समय और शरीर को खर्च कर डालो, वह सौ गुना होकर तुमको सब मिल जायेगा नम्बर एक।
नंबर दो-बुद्धि तुम्हारे पास है। भगवान की दी हुई संपदाओं में अमल तुम्हारे पास है। इससे बजाय इस-उस बात का चिंतन करने, अहंकार का चिन्तन करने, वासनाओं का चिन्तन करने, बेकार की बातों का चिन्तन करने की अपेक्षा, अपने चिन्तन करने की जो सामर्थ्य है। उस सारी की सारी सामर्थ्य को भगवान के निमित्त लगा दो। उनकी खेती में बोओ, यह तुम्हारी बुद्धि सौ गुनी होकर तुमको मिल जायेगी।
तीसरी चीज है-भावनायें। मनुष्य के तीन शरीर हैं-स्थूल, सूक्ष्म और कारण। इसमें से स्थूल शरीर से श्रम होता है, सूक्ष्म शरीर में बुद्धि होती है और कारण शरीर में भावनायें होती हैं। भावनायें भी तुम्हारे पास हैं, इन्हें अपने घरेलू आदमियों के साथ में खर्च कर डालने की बजाय भगवान का जो सारा खेत है उद्यान है, उसमें बोओ और यह भावनायें तुम्हें सौ गुनी होकर के मिलेंगी। यह तीन चीजें-शरीर, बुद्धि और भावनायें भगवान ने दिये हैं किसी आदमी ने नहीं। एक और चीज है जो तुम्हारी कमाई हुई है, भले ही वह इस जन्म में कमाया हो या पिछले जन्म में। वह है-धन। धन भगवान किसी को नहीं देता। मनुष्य चाहे ईमानदारी से कमाले या बेईमानी से कमाले या मत कमाये, भगवान को इससे कोई लेना-देना नहीं है। धन जो तुम्हें मिला है-शायद तुम्हारा कमाया हुआ नहीं है। मैंने कहा-मेरा कमाया हुआ कहाँ से हो सकता है?14-15 वर्ष का बच्चा कहाँ से धन कमाकर लायेगा। “अच्छा पिताजी का दिया हुआ धन है। इस सारे के सारे धन को भगवान, के खेत में बो दो और यह सौ गुना होकर के मिल जायेगा।” बस मैंने गाँठ बाँध ली और 60 वर्ष से बँधी हुई वह गाँठ मेरे पास ज्यों की त्यों चली आ रही है। गायत्री उपासना के जब 24 साल से भी अधिक हो गये, उसके बाद भी बोने और काटने का यह सिलसिला बराबर चलता रहा। आप लोग भी अगर बोये तो आप भी सिद्धियाँ पायेंगे-ऋद्धियाँ पायेंगे जैसे कि मैंने पा ली। भगवान के नियम सबके लिए समान हैं। सूरज के लिए सब आदमी एक समान हैं। जो नियम हमारे ऊपर लागू हुए हैं वही आपके ऊपर भी लागू हो सकते हैं। आप भी ऋद्धि-सिद्धियाँ से सराबोर हो सकते हैं। यह चारों चीजें मेरे गुरु ने मुझे बतायी थी और मैं आप से निवेदन कर रहा हूँ। इन चारों चीजों को अगर आप बोना शुरू करें तो वह सौ गुनी होकर के आपको मिलेगी। मुझे तो मिल गया है और मैं अपनी गवाही देकर-साक्षी देकर आप में से हर एक-आदमी को बताना चाहता हूँ कि जो बोयेंगे-वे काटेंगे और किसान के तरीके से फायदे में रहेंगे।
भगवान को आप क्या समझते हैं कि वे बाँटते फिरते हैं? बाँटते तो है, पर उससे पहले वे माँगते फिरते हैं। भगवान की इच्छा माँगने की है। भगवान शबरी के दरवाजे पर गये थे और उससे कहा था कि हम तो भूखे हैं कुछ हो तो खाने को ले आओ। शबरी के पास बेर थे सो उन्होंने ला करके दे दिये और कहा-हमारे पास यही हैं आप खा लीजिए। केवट के पास भगवान गये थे और कहा था-भाई साहब हमको तैरना नहीं आता, मेहरबानी करके हमको, लक्षण और सीताजी को पार निकाल दीजिए। केवट ने निकाल दिया। भगवान माँगते फिरते है। वे सुग्रीव के पास भी गये है, उनका पता लगाने के लिए आप अपनी सेना-हमको दे दे और ऐसा कुछ इंतजार कर दे। जिससे हमारी धर्मपत्नी मिल जाँय तो बड़ी मेहरबानी होगी। सुग्रीव ने वही किया-अपना सर्वस्व दे दिया उनको। हनुमान जी का भी यही हुआ। हनुमान जी से भी वे माँगते फिरे कि हमारा भाई बीमार हो गया है-घायल हो गया है, उसके लिए आप दवा ले आइये। सीता जी को संदेश पहुँचा दीजिए, लंका से उनकी खबर ले आइये। राजा बलि की कहानी मालूम है आपको। वे बलि के पास गये थे और कहा था कि जो कुछ भी तुम्हारे पास है, हमको दे दो। बलि ने कहा-क्या है हमारे पास? तब उन्होंने कहा था कि तुम्हारे पास जमीन है, उसमें से साढ़े तीन कदम हमको दे दो। नाप लिया भगवान ने और जो कुछ भी मालटाल था सारा छीन लिया।
गोपियों से बड़ी मोहब्बत थी उनकी। उनसे कहा-तुम्हारा दही और मक्खन कहाँ रखा है। गोपियाँ समझती थी कि वे भगवान हैं तो सोने-चाँदी के जेवर लायें होगे, कोई उपहार लाये, होंगे पर वे तो कुछ नहीं लाये। उलटे, उन्होंने जो कुछ भी मक्खन तथा दही जमा किया हुआ था, वह भी छीन लिया। कर्ण जब घायल पड़े हुए थे तब अर्जुन को लेकर भगवान उनके मैदान में जा पहुँचे और कहा-अरे कर्ण, हमने सुना था कि तुम्हारे दरवाजे पर से कोई आदमी खाली हाथ नहीं जाता। हम तो कुछ माँगने आये थे, पर तुम कुछ देने की हालत में मालूम नहीं पड़ते। कर्ण ने कहा-नहीं महाराज! ऐसा मत कीजिए-खाली हाथ मत जाइये। मेरे दांतों में सोना लगा हुआ है जिसे उखाड़ कर मैं अभी देता हूँ आपको। उन्होंने एक पत्थर का टुकड़ा लिया और दोनों दाँत तोड़ करके एक अर्जुन के हाथ पर रखा और एक कृष्ण के। इसी तरह सुदामा जी की कहानी है। सुदामा जी की पत्नी ने उनको इसलिए भेजा था कि कृष्ण उनके मित्र है और वे उनसे कुछ माँगकर ले आयें तो गुजारा चले। सुदामा जी गये तो इसी ख्याल से थे, लेकिन भगवान ने उनसे पूछा कि लाये हो या कुछ माँगने आये हो। हमारे दरवाजे पर माँगने वाले तो भिखारी आते हैं, पर तुम लाये क्या हो? पहले यह बताओ। देखा सुदामा जी के बगल में चावल की पोटली दबी थी। उसे पोटली को भगवान ने उनसे माँग लिया और उस चावल को स्वयं खाया तथा अपने परिवार को खिलाया। जो कुछ भी सुदामा जी के पास था अपने परिवार को खिलाया- जो कुछ भी सुदामा जी के पास था सब खाली कर दिया। बाद में उन्हें कुछ दिया होगा जरूर। गोपियों को भी दिया होगा, कर्ण को भी दिया होगा, बालि को भी दिया होगा। हनुमान, केवट, सुग्रीव-सभी को दिया होगा, पर सबसे पहले उन्होंने लिया था।
भगवान जब कभी आते हैं तब माँगते हुए आते हैं। भगवान के साक्षात्कार जब कभी आपको होंगे तब यही मानकर चलना कि वह आप से माँगते हुए आयेंगे। संत नामदेव के पास भगवान कुत्ता का रूप बनाकर गये थे और सूखी रोटी लेकर के भागे थे, तब नामदेव ने कहा था-घी और लेते जाइये। देने के लिए उन्होंने अपना कलेजा चौड़ा किया। मेरे गुरु ने मुझ से यही कहा था। उसी वक्त से मैंने बात गिरह बाँध ली और लगातार जिंदगी के इन 60 वर्षों में देता ही चला आया हूँ जो कुछ भी संभव हुआ है। देने में कोई नुकसान नहीं है। अगर अच्छी जगह बोया जाय तब लाभ ही लाभ है, लेकिन कहीं खराब जगह पर पत्थर पर बो दिया गया तब मुश्किल है। अच्छा खेत भगवान का खेत है, उसमें बोने से ज्यादा होकर मिलेगा। आपने देखा होगा कि बादल समुद्र से लेते हैं और वर्षा कर जाते है पर क्या वे खाली रह जाते है? नहीं-समुद्र उन्हें दुबारा देता है। शरीर का चक्र भी इसी तरह का है। हाथ कमाता है और मुँह को दे देता है और मुँह पेट में पहुँच देता है और वह खून बन जाता है। हाथ खाली रहा है क्या? नहीं हाथ के पास फिर दुबारा माँस के रूप में, रक्त के रूप में, हड्डियों के रूप, स्फूर्ति के रूप में वह ताकत आ जाती है जो उसने कमायी थी। दुनिया का ऐसा ही चक्र है। हम किसी को जो कुछ देते हैं वह घूम फिरकर हमारे पास फिर से आ जाता है। वृक्ष अपने फल, फूल पत्ते सभी कुछ बाँटता रहता है और भगवान उसको दुबारा देते रहते हैं। भेड़ अपनी ऊन बाँटती रहती है। काटने के थोड़े दिन बाद ही शरीर पर ज्यों की त्यों दुबारा ऊन आ जाती है।
देना बहुत शानदार चीज है, हमारे गुरु ने यही बात सिखायी थी। तो आपको कुछ मिला क्या? यही तो मैं बताना चाहता हूँ कि मुझे मिला है और अगर आप हमारी बात पर विश्वास कर सकते हों तो अपने बारे में भी यह ख्याल कर सकते है कि आपको भी मिलेगा-आप भी खाली हाथ रहने वाले नहीं है। इस बात का हमने बराबर ध्यान दिया है। रात के वक्त भगवान का नाम लिया होगा और दिन के वक्त सूरज निकलने से लेकर के सूरज डूबने तक हमने सिर्फ भगवान की सेवायें की हैं। नाम जब कभी हमने लिया होगा तब रात के वक्त लिया होगा और दिन-समाज के रूप में फैले हुए भगवान के लिए खर्च करते रहे। हमारी 75 साल की उम्र होने को आई। इस उम्र में ढेरों के ढेरों आदमी मर जाते है और जो जिन्दा भी रहते है वे किसी काम के नहीं रहते। 60 वर्ष के बाद प्रायः आदमी नकारा हो जाता है, पर हमारे काम करने की ताकत ज्यों की त्यों बनी हुई है। हमारा शरीर लोहे का है। लोहे का क्यों है? इसलिए है कि हमने अपने शरीर को भगवान के काम में लगा दिया है। हमारा शरीर बहुत ठीक है और-अगर आप भी अपने शरीर को समाज के लिए खर्च करना शुरू करें तो ठीक रहेंगे। गाँधी, जवाहर, बिनोवा तीनों 80 वर्ष के होकर मरे थे-यकीन रखिये अगर आप भी अपने शरीर को भगवान के खेत में बोना शुरू करें तो आपके लिए बहुत फायदेमंद वाली बात होगा। यह शरीर की बात हुई।
नंबर दो-अपनी बुद्धि को हमने भगवान के खेत में बोया। बुद्धि हमारे दिमाग में रहती है। कहाँ तक पढ़े हैं आप? हमारे गाँव में प्राइमरी स्कूल है। उस जमाने में दर्जा जार तक प्राइमरी होते थे, अब तो पांचवीं तक होते हैं। वहीं तक हम पढ़े इसके बाद फिर कभी मौका नहीं मिला। जेल में लोहे के तसले के ऊपर कंकड़ों से अँग्रेजी पढ़ना शुरू किया संस्कृत पढ़ना शुरू किया, अमुक भाषा शुरू किया अमुक शुरू किया। हमारी बुद्धि बहुत पैनी है। आपने देखा नहीं-चारों वेदों के भाष्य हमने किये। 18 पुराण 6 दर्शन आदि सभी के भाष्य किये। व्यास जी ने एक महाभारत लिखा था और गणेश जी को मददगार बनाकर ले गये थे। हमने इतना साहित्य लिखा है जो सामान्य नहीं असामान्य बात है। हम प्लानिंग करते हैं। कोई आदमी अपनी खेती का प्लानिंग करता है और हम सारी दुनिया को सारे विश्व को नये सिरे से बनाने की प्लानिंग करते हैं। भारत सरकार की पंचवर्षीय योजनायें बनती हैं जिसके लिए कितना बड़ा स्टाफ, कितने मिनिस्टर और कौन-कौन लोग का करते हैं, लेकिन हम तो सारी दुनिया का नया नक्शा बनाने के लिए इसी अकल से काम कर लेते हैं। अपनी अकल की हम जितनी प्रशंसा करें उतनी ही कम है।
अकल के अलावा हमने अपनी भावनाओं भी भगवान को दे दिया। जो भी कोई आदमी हमारे नजदीक आया होगा तो हमारे मन में उसके प्रति दो ही बातें रही है कि हम अपने सुख को बाँट दें और उसके दुखों को बँटा लें। यदि हम बँटा सकते होंगे तो हमने जी-जान से कोशिश की है। अगर हमारे पास कोई सुख होगा-सामर्थ्य होगी तो हमने बाँटने के लिए बराबर कोशिश की है क्योंकि हमारी भावनायें हमको मजबूत करती हैं। वे कहती हैं कि तुम्हारे पास है और जिनको जरूरत है उनको दोगे नहीं? तो हम कहते हैं कि जरूर देंगे। जो मुसीबत हैं और कहते हैं कि हमारी मुसीबत में हिस्सा नहीं बंटायेंगे क्या? तब हम कहते हैं कि आपकी मुसीबत में हम जरूर हिस्सा बंटायेंगे। हमारी भावनायें इसी तरह की है। भावनायें-जिसे संवेदना कहते हैं-प्यार कहते है, हमने बोया है। फलतः सारी दुनिया हमको बेहद प्यार करती है। हमने प्यार दिया है, प्यार बोया है, इसलिए प्यार पाया है।
भगवान की चीजों को हमने अमानत के तरीके से रखा और उन्हीं के खेत में बोकर उनकी दुनिया के लिए खर्च कर डाला। हमारे पास पिता जी का कमाया हुआ जो भी धन था हमने सब उसी के लिए खर्च कर दिया। हमारे पास जो भी जमीन थी, जेवर थे-सब बेचकर के गायत्री तपोभूमि को बनाने में, भगवान का घर बनाने में खर्च कर दिया। जो पैसा पिता जी ने छोड़ा हुआ था-एक-एक पाई खर्च कर डाला। हमने किसी का दिया हुआ धन खाया नहीं। तो आप नुकसान में रहें होंगे? आप नुकसान की बात करते हैं-कभी आप हमारे गाँव जाइये, गायत्री तपोभूमि मथुरा, अखण्ड-ज्योति कार्यालय देखिये। आप यहाँ आइये शान्तिकुँज, गायत्री नगर देखिये-ब्रह्मवर्चस् देखिये, कितने शानदार हैं। 2400 गायत्री शक्ति पीठों को देखिये। इतनी तो बिल्डिंगें हैं और जो उनमें लोग रहते है, उन पर जो रुपया खर्च है वह कहाँ से आता है? जाने कहां से आ जाता है कि धन हमारे लिए कम नहीं पड़ता। भगवान की तरफ हम इशारा कर देते हैं और वह हमारे लिए जिन भी वस्तुओं की आवश्यकता होती है, वह सब ज्यों की त्यों भेज देता है। यह क्या हो गया? यह सिद्धियाँ हो गयी। सिद्धियों में हम चार चीजें शुमार करते हैं (1) धन (2) लोगों का प्यार (3) बुद्धि और (4) शारीरिक स्वास्थ्य हमारी सिद्धियाँ है। गायत्री का जप करने से किसी के पास सिद्धियाँ आयी हों या नहीं यह मालूम नहीं, लेकिन हमको जरूर मिली है। इन चारों चीजों की कोई भी परीक्षा ले सकता है।
एक और चीज है- ऋद्धि ऋद्धियाँ वह होती है जो दिखाई नहीं पड़ती। ऋद्धियाँ तीन हैं और सिद्धियाँ चार। पहली ऋद्धि है-आत्मसंतोष। हमारे भीतर इतना संतोष है जितना कि न किसी राजा को होगा, न बिड़ला जी को और न किसी मालदार को। उन्हें नींद नहीं आती है, पर हमको ऐसी नींद आती है कि ढोल बजते रहें, नगाड़े बजते रहें-और हम ऐसे सो जाते हैं। बिल्कुल निश्चिन्त मानों दुनिया की कोई समस्या ही हमारे सामने नहीं है। आत्म-संतोष के अलावा दूसरी ऋद्धि है-लोक सम्मान और जन सहयोग। हमें लोगों का सम्मान ही नहीं उनका सहयोग भी मिला है। माला पहना देना ही सम्मान करना नहीं है, वरन् जनता जिसका सहयोग कर रही हो तो मान लीजिये यह उस आदमी को सम्मान मिला है। माला तो खरीदी भी जा सकती है, लेकिन सम्मान उसमें होता है जिसमें जन सहयोग मिलता है। गाँधी जी का सहयोग किया था लोगों ने। बिनोवा का सम्मान किया था तो सहयोग भी दिया था। ढेरों की ढेरों जमीनें उनको दान में दे दी थीं। गाँधी जी के एक इशारे पर लोग जेल जाने के लिए और फाँसी के तख्तों पर झूलने के लिए-गोलियाँ खाने के लिए चले गये थे। यह उनका सम्मान था और सहयोग था। सम्मान कहते हैं सहयोग को। हमारा भगवान हमारे लिए बहुत सहयोग करती है।
तीसरी ऋद्धि है- दैवी अनुग्रह। दैवी अनुग्रह किसे कहते हैं? आपने रामायण में कई प्रसंग पढ़े होंगे कि जब देवता प्रसन्न होते हैं तब फूल बरसाते हैं और कुछ नहीं बरसाते। कई बार अमुक पर फूल बरसाये, अमुक पर फूल बरसाये। यह क्या है? भगवान की बिना माँगे की सहायता है। बिना माँगे की अकल, बिना माँगे के इशारे, बिना माँगे का सहयोग फूलों के तरीके से बरसाते रहे हैं हमारे ऊपर। अगर ऐसा न होता तो न जाने अब तक हमारा क्या हो गया होता। समय-समय पर जो रास्ते उसने बताये हैं, ऐसे शानदार रास्ते बताये हैं कि उन पर हम चलते गये और वह हमारे ऊपर फूल बरसाते रहे। हमको हमारे पिता की संपत्ति का अधिकार मिला है, कर्तव्य और अधिकार दोनों का जोड़ा मिला हुआ है। भगवान ने हमको अपना बच्चा माना है- बेटा माना है और अधिकार दिया है कि उसको नेक काम में खर्च कर डालना। हमने उसे पिताजी के काम में सब खर्च कर डाला, अपने लिए कुछ नहीं रखा, इसलिए कि पिताजी का वंश, पिताजी का कुल कलंकित न होने पावे। पिताजी माने भगवान-परमेश्वर। परमेश्वर का भक्त कहलाने के कारण हमारे ऊपर कोई यह अँगुली न उठाने पाये कि यह कैसा आदमी है। हमने उनके वंश को सुरक्षित रखा है।
भगवान ने हमको दिया तो है, पर हमने भी कुछ दिया है। पिता की मृत्यु हो जाती है और उनका कुटुम्ब रह जाता है। भाई, बहन, बच्चे-कच्चे, स्त्री सभी का पालन वह करता है जो परिवार में बड़ा होता है। अपने पिताजी के वरिष्ठ का ही नहीं, वरन् उनका जो इतना बड़ा विराट कुटुम्ब फैला हुआ है- इन सबका पालन करने में, उनकी निगरानी करने में, उनकी देखभाल करने में जो कुछ भी हमारे लिए संभव हुआ, हमने ईमानदारी से किया है। भगवान की दुकान, भगवान के कुटुम्ब का भी पालन किया है। भगवान की दुकान, भगवान का व्यवसाय, उद्योग अच्छे तरीके से चलता रहे, कोई यह न कहने पावे कि बाप इनके लिए खेत छोड़ कर मरा था- कारखाना-फैक्ट्री छोड़कर गया था और इन्होंने सब बिगाड़ डाला। व्यवसाय भगवान का-
दुकान भगवान की-आप तो समझते ही नहीं, यह सारा व्यवसाय तो उसी का है। दुनिया में जो कुछ भी हो रहा है-सब उसी का उद्योग है। उसको ठीक तरह से-बढ़िया ढंग से चलाने में हमने ईमानदारी से पूरी-पूरी कोशिश की है। पिता की संपदा लेकर, उनका अधिकार लेकर के हम चुपचाप बैठ नहीं गये-बल्कि अपने फर्ज और कर्तव्य का भी पालन किया है। पिता जी का व्यवसाय चलाने में, उनके परिवार का पालन करने में, उनके कुल और वंश की सुरक्षा रखने में हमने बराबर काम किया है। आप भी यह कीजिए और निहाल हो जाइये। रास्ता एक ही है। जो कानून हमारे ऊपर लागू होता है, वही कानून आपके ऊपर भी लागू होता है। सबके लिए एक कानून एक कायदा है। भगवान न हमारे साथ रियायत करने वाले है न आपके साथ में उनका कोई बैर-विरोध है। तरीके वही हैं जो हमारे जीवन में बताये गये। हमारे गुरु ने हमको तरीका बताया था और हमने स्वीकार कर लिया हम अपने गुरु को बहुत-बहुत धन्यवाद देते हैं कि आप भी उसी रास्ते पर चलिए जिस रास्ते पर हम चले हैं तो आप भी निहाल हो जायेंगे और धन्य हो जायेंगे और क्या कहें आपसे।
ओम् शान्तिः
“वैज्ञानिक अध्यात्मवाद के जन्मदाता उस एक श्रेष्ठ साधक के रूप में परिचय देने वाले चार विवरणों के बाद इस अंक में हम दे रहे हैं गुरुसत्ता के अंतःकरण की करुणामयी सत्ता के विवेचन का पूर्वार्ध। उन्हीं की विभिन्न उक्तियों के माध्यम से यह बताने का प्रयास किया गया है कि एक करुण-ममत्व लुटाने वाले-एक विराट परिवार के संरक्षक के रूप में उनका जीवन वृक्ष कैसे विकसित हुआ। एक एक पंक्ति प्राणवान है एवं इसमें साधना की पराकाष्ठा-अतः की संवेदना का मूल मर्म छिपा पड़ा है। अगले अंक में पढ़ेंगे उस करुणामयी सत्ता के जीवन से जुड़े कुछ व्यावहारिक प्रसंग जो हम सबके लिए प्रेरणा के स्रोत बन सकते हैं।”
कहते हैं-दो अंजलि में महर्षि अगस्त्य ने समूचा समुद्र पी डाला था। यदि हम-आप भी पू. गुरुदेव के व्यक्तित्व महासागर को दो शब्दों में समेटना-आत्मसात् करना चाहें, तो वे दो शब्द होंगे- प्रेम व करुणा। यही उनका वास्तविक परिचय है। करुणा, प्रेम, छलकती संवेदना, उफनती भावना ही उनके व्यक्तित्व के उपयुक्त पर्यायवाची शब्द हैं। इन्हीं के सहारे उनके जीवन का चित्राँकन कर सकना संभव है।
संसार उन्हें लेखक, मनीषी, समाज-सुधारक, ऋषि, तपस्वी, ज्ञानी योगी जैसे न जाने कितने रूपों में देखता पहचानता है। लेकिन वह स्वयं अपने को किस रूप में अनुभव करते थे? अच्छा हो इसे उन्हीं के शब्दों में पढ़े-”कोई अपनी चमड़ी उखाड़ कर भीतर का अंतरंग परखने लगे तो उसे माँस और हड्डियों में एक तत्व उफनता दृष्टिगोचर होगा, वह है असीम प्रेम। हमने जीवन में एक ही उपार्जन किया है प्रेम। एक ही संपदा कमाई है-प्रेम। एक ही रस हमने चखा है वह है प्रेम का।”
यह उपार्जन उतना सरल नहीं हैं, जितना देखने सुनने में समझ पड़ता है। बोल-चाल की भाषा में अपने को ‘प्रेम’ तत्व का जानकार कहने-समझने वाले हजारों लाखों की संख्या में मिल जायेंगे। पर जरा गहरी छान-बीन की हिम्मत जुटायें तो मिलने वाले तथ्यों से उजागर होता है कि उनमें से ज्यादातर मोह-वासना अथवा किसी न किसी आशक्ति के बंधनों में फँसे-बँधे हैं। इन्हीं बंधनों को भ्रमवश उन्होंने प्रेम का दर्जा दे रखा है। अपने भ्रम में वे काँच को हीरा समझकर सँजोने की भूल कर बैठे हैं।
प्रेम का स्वाद पाकर औरों को भी करा देना अपने में गहरी कठिन और दुःसाध्य साधना का अंतिम परिणाम है। सामान्य व्यक्तियों की बात तो बहुत दूर महामानवों में से भी बहुत कम ही इस अंतिम सीढ़ी पर चढ़ सकने में सफल होते हैं। अन्यथा बहुतों को बीच में ही कहीं न कहीं रुक जाना पड़ता है। सूक्ष्म व गहरी दृष्टि के अभाव में महामानवों के जीवन इतिहास के विद्यार्थी इस रहस्य को जानने से वंचित रह जाते हैं। प्रेम तत्व का बीच किस तरह से अंकुरित होता, फूलता-फलता और महावट का रूप धारण करता है इसे गुरुदेव के जीवनक्रम में अनुभव किया जा सकता है।
आमतौर पर देखने में आता है कि हर इंसान में थोड़ी बहुत भावुकता दबी-छुपी पड़ी रहती है। जो कभी-कभी आँसुओं का ज्वार बन कर उभरती, आवेग बनकर प्रकट होती और गायब हो जाती है। यह उभरना प्रकट होती और गायब हो जाती है। यह उभरना प्रकट होना और कुछ नहीं, मानवी आत्मा की चीत्कार है, जो लोभ-लिप्सा, वासना-तृष्णा के बंधनों को तोड़ फेंकने के लिए आतुर-आकुल है। यह प्रेम बीज का अंकुरण है, जो जड़ता के अँधेरे से उबरकर ईश्वरीय प्रकाश को पाना चाहता है। लेकिन इन कोशिशों को सामान्यक्रम में ज्यादातर निष्ठुरता के पत्थरों से दबाकर कुचल-मसल दिया जाता है।
पर गुरुदेव की समूची जिंदगी इसके विकास की दुष्कर तप-साधना बन गई। भावुकता का हर आवेग जीवात्मा के बंधनों को तोड़ता-फेंकता चला गया। भाव बीज का अंकुरण बचपन से ही उन्हें असहाय बूढ़ी, कुष्ठ रोग पीड़ित मेहतरानी की सेवा करने, कमाई के हाथ पड़ी गाय की जीवन रक्षा करने के लिए विवश करने लगा। धीरे-धीरे जीवन की हर चेष्टा, संवेदना की कसक बन गई। संवेदना-भावुकता की विकसित अवस्था है। भावुकता की दशा में आत्मा की कसक भरी पुकार उभरती और विलीन होती रहती है। लेकिन संवेदना बनकर इस स्थायित्व मिल जाता है। संवेदनशील अन्तःकरण हर किसी की पीर को अनुभव करता और प्रतिपल इसे दूर करने के लिए बेचैन रहता है।
अपनी चरम स्थिति में कैसी होगी यह बेचैनी? इसे गुरुदेव की अनुभूति में घुलकर अनुभव करें-”हमारी कितनी रातें सिसकते बीती हैं-कितनी बार हम बालकों की तरह बिलख-बिलख कर फूट-फूट कर रोये हैं इसे कोई कहाँ जानता है? लोग हमें संत, सिद्ध, ज्ञानी मानते हैं, कोई लेखक, विद्वान, वक्ता, नेता, समझते हैं पर किसने हमारा अन्तःकरण खोलकर पढ़ा समझा है। कोई उसे देख सका होता तो उसे मानवीय व्यथा वेदना की अनुभूतियों से करुण कराह से हाहाकार करती एक उद्विग्न आत्मा भर इस हड्डियों के ढाँचे में बैठी बिलखती दिखाई पड़ती।” (अखण्ड ज्योति मार्च 1971)
संवेदना उपजी, इसकी पहचान है संकीर्णता बिखरी। मैं-पन विलीन हुआ। अपनी ठाट-बाट की उमंगे-आवश्यकताएँ, जरूरतें भी गायब हुई। फिर तो गुरुदेव के स्वरों में अन्तरात्मा पुकार उठेगी- अपने को क्या कुछ इष्ट या अभाव है उसे सोचने को फुरसत ही कब मिली? अपने क्या सुख साधन चाहिए इसका ध्यान ही कब आया है। ध्यान आये भी कैसे? वे जिस अन्तःकरण को लेकर जिए हैं, वह सारे जीवन यही करता रहा-”अपने सुख साधन की फुरसत किसे है? विलासिता की सामग्री जहर-सी लगती है, विनोद और आराम के साधन जुटाने की बात कभी सामने आयी तो आत्मग्लानि से उस क्षुद्रता को धिक्कारा जो मरणासन्न रोगियों के प्राण बचा सकने में समर्थ पानी के एक गिलास को अपने पैर धोने की विडम्बना में बिखेरने के लिए ललचाती है। भूख से तड़प कर प्राण त्यागने की स्थिति में पड़े हुए बालकों के मुख में जाने वाला ग्रास छीनकर कैसे अपना भरा पेट और भरे? दर्द से कराहते बालक से मुँह मोड़ कर पिता कैसे शतरंज का साज सजाए?”
संवेदना का जागरण-दो शक्तियों-विभूतियों का वरदान मनुष्य को दे डालता है। पहली विभूति और शक्ति है-
सर्वस्व उत्सर्ग का साहस। सामान्यतया आदमी निष्ठुर जोंक की तरह दूसरों का खून चूस-चूस कर साधन संपत्ति बटोरते और क्रुद्ध नाग की तरह उनकी रक्षा करने में जिंदगी खपा देता है। त्याग, उत्सर्ग, बलिदान की सामर्थ्य उसमें कहाँ? यह तो उसी संवेदनशील हृदय से संभव है- जिसमें उत्सर्ग का साहस उभरा है। फिर तो उसमें भी गुरुदेव के शब्द सक्रिय हो उठेंगे “जो पाया उसका एक-एक कण हमने उसी प्रयोजन के लिए खर्चा किया जिससे शोक संताप की व्यापकता हटाने और संतोष की साँस ले सकने की स्थिति में थोड़ा योगदान मिल सके।” यही क्यों वह तो अपना उदाहरण सामने रखते हुए हम- आपको भी निर्देश देते हैं-”नव निर्माण की लाल मशाल में हमने अपने सर्वस्व का तेल टपका कर उसे प्रकाशमान रखा है अब परिजनों की जिम्मेदारी है कि वे उसे जलती रखने के लिए अपने अस्तित्व के सार तत्व को टपकाएँ।”
दूसरी विभूति के रूप में मिलती है सहिष्णुता। उपद्रवों, व्यंग–कटाक्षों को मुसकराते हुए सुन लेना-सहलेना और अपने लक्ष्य में निरत रहना। सुनें अपनी अनुभूति-”वृक्ष जैसा उदार, सहिष्णु और शाँत जीवन जीने की शिक्षा हमपे वसश्ी। उन्हीं जैसा जीवनक्रम लोग अपना सके तो बहुत है। हमारी प्रवृत्ति, जीवन विद्या और मनोभूमि का परिचय वृक्षों से अधिक और कोई नहीं दे सकता।” संवेदना और क्रोधोन्माद का कोई संबंध है भी नहीं। क्रोध की फुफकार तो अहं पर चोट लगने से उठती है। अहं विसर्जन में तत्पर, संवेदनशील, क्रोधी बनने से रहा। वह तो सतत् अपने लक्ष्य की पूर्ति में, आदर्शों को साकार करने में स्वयं को खपाता रहता है।
संवेदनशीलता अपने विकसित रूप में भावना बन जाती है। कसक के स्थायित्व के साथ इसमें एक नयी चीज आती है- की संबंधों का शारीरिक धरातल से ऊपर उठकर जीवात्मा के स्तर पर विकसित हो जाना। भौतिक दूरियों का कोई मूल्य नहीं रह जाता। ऐसी स्थिति में माँ की ममता जन्म लेती है। दुलार करते अघाती नहीं। आशीर्वाद देते जिसका जी नहीं भरता। कोशिशें सिर्फ पीड़ा निवारण तक सीमित नहीं रहती हैं। आत्मिक उत्कर्ष के लिए प्रयत्न शुरू हो जाते हैं। माँ का ममत्व स्नेहित ज्वार हृदय में निरन्तर घुमड़ता रहता है। क्या दे? क्या करें? सोचते-सोचते मन नहीं भरता।
इसे अनुभव करने के लिए हम अपने हृदय में संपादित अपने आराध्य के दिल की धड़कनों को सुन सकते हैं-”पुरुष की तरह हमारी आकृति ही बनायी है। कोई चमड़ी उघाड़ कर देखे तो भीतर माता का हृदय मिलेगा। जो करुणा ममता, स्नेह और आत्मीयता से हिमालय की तरह निरंतर गलते रहकर गंगा-यमुना बहाता रहता है।” उनके अस्तित्व में हमारे, आपके लिए कैसी भावनाएँ घुमड़ती रहती थी? इसे जानने के लिए जैसे ही हम अपने हृदय के द्वार खेलेंगे उनके शब्द प्रवेश करने लगेंगे-”कोई माता विवशता से अकेली जाती है तो चलते-समय अपने बच्चों को दुलार करती बार-बार चूमती, लौट-लौट कर देखती और ममता से भरी गीली आंखें आँचल से पोछती आगे बढ़ती है। ऐसा ही कुछ उपक्रम अपना भी बन रहा है। सोचते है जिन्हें अधूरा प्यार किया है अब उन्हें भरपूर प्यार कर लें। जिन्हें छाती से नहीं लगाया जिन्हें गोदी में नहीं खिलाया, जिन्हें पुचकारा-दुलारा नहीं उस कमी को पूरी कर लें।” (जून 1971 विदाई से पूर्व)
इन भावनाओं को काल-पाश बाँध नहीं सकता। मौत इनकी छाया तक को छिपाने में असहाय है। अमृत पुत्रो! वे भावनाएँ ही कैसी जिन्हें दूरी थका डाले, मृत्यु डरा दे शरीर बाँध ले समय समेट ले। आज भी अपना और अपने आराध्य के बीच भावनात्मक प्रवाह यथावत है और तब तक बना रहेगा जब तक कालजयी आत्मचेतना का अस्तित्व है। विश्वास न हो रहा हो तो सुनें उनकी वाणी-”लोगों की आँखों से हम दूर हो सकते हैं पर हमारी आँखों से कोई दूर न होगा। जिनकी आँखों में हमारे प्रति स्नेह और हृदय में भावनाएँ हैं उन सबकी तस्वीरें हम अपने कलेजे में छिपाकर ले जायेंगे और उन देव प्रतिमाओं पर निरंतर आँसुओं का अर्घ्य चढ़ाया करेंगे। कह नहीं सकते उऋण होने के लिए प्रत्युपकार का कुछ अवसर मिलेगा या नहीं। पर यदि मिला तो अपनी इन देवप्रतिमाओं को अलंकृत और सुसज्जित करने में कुछ उठा न रखेंगे। लोग हमें भूल सकते हैं, पर हम अपने किसी स्नेही को भूलेंगे नहीं।
ऐसा क्यों न हो? भावना ममता बनकर पनपती और कृतज्ञता बनकर उफनती रहती है। जिसके अन्तःकरण में भावना जितनी विकसित होगी, ममता उतना ही सर्वस्व लुटा डालने को आतुर हो उठेगी। सब कुछ लुटा डालने के बावजूद उसका कृतज्ञ अंतर्मन नतमस्तक बना रहेगा। इन क्षणोँ में भी उनके अस्तित्व में कैसे उफान उठ रहा है सुनना चाहें तो कानों में उनकी अमृतवाणी जाने दें-”जिनने समय-समय पर ममता भरा प्यार हमें दिया है। हमारी तुच्छता को भुलाकर जो आदर, सम्मान श्रद्धा सद्भाव स्नेह एवं अपनत्व प्रदान किया है उनके लिए क्या कुछ किया जाय समझ में नहीं आता। इच्छा प्रबल है कि अपना हृदय कोई बादल जैसा बना दे और उसमें प्यार का इतना जल भर दे कि जहाँ से एक बूँद स्नेह की मिली हो वहाँ एक प्रहर की वर्षा कर सकने का सुअवसर मिल जाय। यदि संभव हो सके तो हमारी अभिव्यक्ति उन सभी तक पहुँचे जिनकी सद्भावना किसी रूप में प्राप्त हुई हो। वे उदार सज्जन अनुभव करें कि उनके प्यार को भुलाया नहीं गया। बदला न चुकाया जा सका तो भी अपरिमित कृतज्ञता की भावना लेकर विदा हो रहे हैं। यह कृतज्ञता की भावना लेकर विदा हो रहे हैं। यह कृतज्ञता का ऋणभार तब तक सिर पर उठाए रहेंगे जब तक हमारी सत्ता कहीं बनी रहेगी। प्रत्युपकार प्रतिदान न बन सका हो तो प्रेमी परिजन समझें कि उनकी उदारता को कृतघ्नतापूर्वक भुलाया नहीं गया। हमारा कृतज्ञ मस्तक उनके चरणों में सदा विनम्र और विनयावत रहेगा जिन्होंने हमारे दोष-दुर्गुणों के प्रति घृणा न करके केवल हमारे सद्गुण देखे और सद्भावनापूर्ण स्नेह सम्मान प्रदान किया।”
भावना का विस्तार जब समष्टि में हो जाता है तब वह करुणा में बदल जाती है। करुणा किसी व्यक्ति विशेष, समूह विशेष के प्रति नहीं, सबके प्रति होती है की नहीं जाती, होती है। इसे ऐसे समझा जा सकता हो या भिखारी वही उसकी खुशबू प्रेमिल मुसकान से विभोर होता चला जाता है। कोई ने आए तो भी वह अपनी सुरभि को अनंत में फैलाता रहता है। सुरभि बिखेरना, मुसकान लुटाना उसकी स्वाभाविक अवस्था है। ऐसे ही करुणा उस व्यक्ति के अन्तःकरण की स्वाभाविक अवस्था है जो बुद्ध बन गया है। इसके नीचे यह विकसित नहीं होती। यह ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’ की भावना का प्रकाश है।
युगऋषि अपनी इस उपलब्धि का शब्दांकन करते हैं-”आत्मवत् सर्वभूतेषु की भावना जैसे ही प्रखर हुई, निष्ठुरता उसी में गलकर नष्ट हो गई। जी में केवल करुणा शेष रह गई। वही अब तक जीवन के अंतिम अध्याय तक यथावत बनी हुई है। उसमें कमी रत्ती भर भी नहीं हुई वरन् दिन-दिन बढ़ोत्तरी ही होती गई।” इस उपलब्धि को सँजोये उनका अन्तःकरण पुकार उठा “जब तक व्यथा-वेदना का अस्तित्व इस जगती में बना रहे, जब तक प्राणियों को क्लेश और कष्ट की आग में जलना पड़े, तब तक इसमें भी चैन से बैठने की इच्छा न हो। जब भी प्रार्थना का समय आया तब भगवान से यही निवेदन किया। हमें चैन नहीं वह करुणा चाहिए जो पीड़ितों की व्यथा को अपनी व्यथा समझने की अनुभूति करा सके। हमें समृद्धि नहीं वह शक्ति चाहिए जो आँखों के आँसू पोछ सकने की अपनी सार्थकता सिद्ध कर सके। बस इतना ही अनुदान-वरदान भगवान से माँग और लगा कि द्रौपदी को वस्त्र की अनन्त संवेदनाओं से ओत-प्रोत करते चले जाते हैं।”
यह अवस्था जब अपनी व्यापकता में सघन शाँति, अविराम प्रसन्नता, गहरी एकात्मकता, जो जन्म देती है तब उसे “प्रेम” कहते हैं प्रेम का विकास भाव विकास का चरमोत्कर्ष है। रामकृष्ण कहा करते थे सबको इसकी उपलब्धि नहीं होती। उनके अनुसार तीन अतिमानव ही इसके रस को चख पाए। इनमें प्रथम है राधा-दूसरे चैतन्य-तीसरे स्वयं श्रीरामकृष्ण। वर्तमान युग में पुनः श्री रामकृष्ण ने स्वयं ‘श्रीराम’ के रूप में आकर पुनः एक बार घोषित किया “हमने एक ही रस चखा है वह है प्रेम का।”
प्रेम आन्तरिक सद्गुणों के विकास का केन्द्र है। इसकी हलचलें समस्त गुणों को प्रभावित करती रहती है। गुरुदेव के शब्दों में-”आन्तरिक सद्गुण किसी अभ्यास प्रयोग से पाये बढ़ाये नहीं जा सकते वरन् प्रेम तत्व की स्थिति के जुड़े होने के कारण उसी अनुपात में घटते-बढ़ते हैं, जैसे कि प्रेम भावना का उत्कर्ष अपकर्ष होता है। प्रेम तत्व अन्तःकरण में जितना होगा, उसी अनुपात में सद्गुणों का विकास होगा और इसी विकास से आत्मबल की मात्रा नापी जा सकती है।”
कहना न होगा इन शब्दों में उनकी आत्मानुभूति है। जिसे और अधिक स्पष्ट करते हैं-”प्रेम ही परमात्मा है। किसी व्यक्ति के कलेवर में परमात्मा ने कितने अंशों में प्रवेश किया, उसकी परख करनी हो तो यह देखना होगा कि उसके अन्तःकरण में प्रेम तत्व की
मात्रा के अनुरूप समझा जाता है।”
तनिक आगे बढ़ चलें तो पाते हैं उनकी आत्माभिव्यक्ति-”एक प्रेमी अनेक प्रेमिकायें यह आश्चर्य अध्यात्म जगत में ही संभव है। प्रेम से भरी आत्मा को अगणित सत्प्रवृत्तियाँ असीम प्यार करती हैं। उत्कृष्ट प्रेम और उसके आधार पर एकत्रित सत्प्रवृत्तियाँ जीवन को आनन्द-उल्लास से भरा पूरा बना देती हैं। द्वैत की अद्वैत में परिणति, अहंता का समर्पण में विलय, इसी का नाम मुक्ति है। सच्चिदानन्द की उपलब्धि का यही मर्म स्थल है। हमारी अनुभूति और उपलब्धियों का यही निष्कर्ष है।”
प्रेममय हो संव्याप्त परमात्मा कहीं किसी लोक का वासी नहीं बल्कि कण-कण में समाया है। पर सबसे अधिक जहाँ उन्होंने परमात्मा की घनिष्ठता अनुभव की इसे उन्हीं के शब्दों में कहें तो-”परिजन हमारे लिए भगवान की प्रतिकृति हैं और उनसे अधिकाधिक गहरा प्रेम प्रसंग बनाए रखने की उत्कंठा उमड़ती रहती है। इस वेदना के पीछे भी एक ऐसा दिव्य आनन्द झाँकता है इसे भक्तियोग के मर्मज्ञ ही जान सकते हैं।”
हो सकता है इस मर्म को कोई और भी जानना चाहे। शायद किसी के मन में हुलस उठे, काश! हम भी चख सकते प्रेम-रस। तो अधीर न हों द्वार अभी भी खुला है बस प्रवेश करने के लिए वैसा ही कुछ करना होगा, जो उन्होंने किया। क्या? तो सुनिए उन्हीं के भावों में-”ईश्वर भक्ति का अभ्यास हमने गुरु भक्ति की प्रयोगशाला में व्यायामशाला में आरंभ किया और क्रमिक विकास करते हुए प्रभु प्रेम के दंगल में जा पहुँचे। गुरुदेव पर आरोपित हमारी प्रेम साधना प्रकारांतर से चमत्कारी वरदान बनकर लौटी है।” इस चमत्कारी वरदान को पाने के अवसर हमारे आपके सामने भी हैं। बस करुणा व प्रेम से लबालब भरा अंतःकरण चाहिए तथा गुरु के प्रति अनन्य भक्ति।
प्राकृतिक चिकित्सालय चलाना अन्य विकल्पों से आयुर्वेद से महंगा पड़ता था। लोग खर्च की अधिकता से उसमें सम्मिलित होने को तैयार न होते।
डॉक्टर भारत के कैलाश मैत्रा ने एक अनोखा प्रयोग किया। उनने रोगियों को थोड़ा-थोड़ा श्रम करते रहने के लिये सहमत कर लिया। इस पुण्य कार्य के लिए जमीन भी मिल गई। मरीजों ने थोड़ा-थोड़ा श्रम देकर झोंपड़े खड़े कर लिये।
उसी भूमि में शाक सब्जी लगाये। गायें पाली। इसी से रोगियों का निर्वाह चल जाता था। जो अच्छे होकर लौटते वे प्रायः एक गौदान आश्रम को दे जाते थे,
इससे उनकी संख्या और पर्याप्त हो गई थी। संचालक की उदारता से प्रेरित होकर भाव चिकित्सा के आधार पर रोगी भी अधिक अच्छे होते थे।
पृथ्वी और सूर्य आदर्श माता-पिता हैं। माँ-संतानों को जन्म देती, प्यार-दुलार देकर अपनी गोद में पाल-पोस का बड़ा करती है। पिता अपनी संतानों व संतानों की माँ के लिए संरक्षण-साधन, ऊर्जा जुटाता रहता है। पृथ्वी व सूर्य के संबंध कुछ ऐसे ही हैं। दोनों आपस में मिल-जुल कर इस व्यापक विश्व गृह की गृहस्थी चला रहें हैं। पृथ्वी सूर्य की परिक्रमा करती, उससे प्रकाश ग्रहण करती और जीवित रहती है। आदर्श पत्नी की तरह उसकी सत्ता सूर्य के गहरे आकर्षण से सघन एकात्मकता में बँधी है। सूर्य भी अपने उत्तरदायित्वों की उपेक्षा नहीं करता। अपनी समग्र संपदा का अजस्र अनुदान उसे खुले हाथों से प्रदान करता है और उसके रोम-रोम में जीवन संचार करने में अपने साथ हुए ग्रन्थि बंधन को पाणिग्रहण को सार्थक बनाता है।
कभी सूर्य और पृथ्वी एक ही गोलक में संयुक्त थे। जैसे सृष्टि के प्रारंभ में नर और नारी एक थे। पीछे परिस्थितियों ने दोनों को अलग कर दिया फिर भी उनकी महानता में कोई अंतर नहीं आया। परमात्मा का एक अंश ही जीव है। कभी दोनों एक थे अब वे अलग हो गए, फिर भी मूलसत्ता की विशेषता दोनों पक्षों में यथावत-विद्यमान है। पृथ्वी सूर्य से दूर है तो भी अपने मूल केन्द्र के विशेष वैभव बीच रूप से आत्मा में मौजूद है। पृथ्वी का ठोस पिण्ड थोड़ी-सी परिधि में सीमित है, पर उसका शक्ति क्षेत्र, वायुमंडल बहुत बड़े क्षेत्र में संव्याप्त है।
पृथ्वी कितनी बड़ी है? इसका जवाब छोटी कक्षा के विद्यार्थी तुरंत आठ हजार मील व्यास बताकर दे सकते हैं। पर चूँकि वायु मंडल भी पृथ्वी का ही एक अंग है, धरती की वायुभूत संपदा जिस क्षेत्र में उड़ती फिरती है, उसे भी उसी का एक अंग क्यों न माना जाय। इस प्रश्न के अनुसार पृथ्वी का विस्तार और अधिक बढ़ जाता है। अब से 60-70 साल पहले यह वायुमंडल 7−8 मील माना जाता था। पीछे पाया गया कि वह 100−150 मील तक फैला हुआ है। रेडियो संचार की खोज ने उसे 250−300 मील तक पहुँचा दिया। पर अंत यहाँ भी नहीं होता। प्रकृति की दिव्य रंग बिरंगी-झूमती-लहराती हुई ज्योतियाँ आँरिओला लाइट्स के रूप में दिखाई पड़ती रहती हैं। वे भी बिना वायुमंडल के कैसे चमकती होंगी। यह सोचकर अब वायुमण्डल का विस्तार 700 मील की ऊँचाई से भी अधिक मानना पड़ेगा।
अंतरिक्ष में सैर करने वाले उपग्रहों ने नए समाचार यह लाकर दिये हैं कि वायुमण्डल बहुत आगे तक फैला हुआ है। पृथ्वी की भूमध्य रेखा के चारों ओर दो मोटे-मोटे कवच हैं मानों उसने अपनी कमर में मजबूत मेखलाएँ किसी चीज की बनी है, इसके उत्तर में उस स्थिति को ‘प्लाज्मा’ कहा जाता है। पिछले दिनों तक पदार्थ के तीन स्वरूप बताए जाते रहे हैं-(1) ठोस (2) तरल (3) वायवीय। अब एक चौथा तथ्य और सामने आया है-प्लाज्मा। यह गैसीय स्थिति से भी विरल स्थिति है, इतनी विरल कि उसमें परमाणुओं का विघटन हो जाता है। असल में ठोस धरती का वायवीय विस्तार इतने बड़े क्षेत्र को घेरे हुए है यही मानकर चलना चाहिए। धरती का असली कलेवर इतना ही सुविस्तृत है।
पिछले दिनों यह माना जाता रहा है कि ग्रह नक्षत्रों के बीच आंतरिक क्षेत्र नितान्त शून्य है। अब यह माना गया है कि शून्य नाम की कोई चीज नहीं। सब जगह किसी न किसी रूप में पदार्थ की सत्ता मौजूद है। उसमें ये स्पंदन मौजूद है और प्लाज्मा अथवा अन्य रूपों में पदार्थ की सत्ता विद्यमान है। पृथ्वी की ठोस परिधि समाप्त होते ही वायुमंडल की परत आरंभ होती है। वायु मण्डल के समाप्त होते ही प्लाज्मा की परत आरंभ हो जाती है। तो फिर प्लाज्मा को भी पृथ्वी की ही परिधि क्यों न गिन लिया जाय? पृथ्वी का यह चुम्बकीय क्षेत्र है। प्लाज्मा की हलचलों को सूर्य से गति मिलती है। अतएव सूर्य और पृथ्वी के बीच का सारा क्षेत्र चुम्बक मण्डल बन जाता है। उसी से सूरज और धरती के बीच अति महत्वपूर्ण आदान-प्रदान चलते रहते हैं।
पति-पत्नी के स्थूल क्रिया−कलाप घर-परिवार की छोटी सीमा में सिमटे दिखते हैं। पर वस्तुतः उनका कर्तव्य और उत्तरदायित्व समाज, राष्ट्र और विश्व की सुविस्तृत सीमाओं का स्पर्श करता है। सूर्य पृथ्वी का पोषण करता है पर उतने तक सीमित नहीं है। वह अन्य ग्रहों-उपग्रहों को भी अपने अनुदान देता है। और अनन्त आकाश को अपनी सामर्थ्य से प्रभावित-प्रकाशित करता है। यही बात पृथ्वी की भी है वह सूर्य की अनुचरी तो है। पर अपने ज्येष्ठ बालक चन्द्रमा सहित सुविस्तृत प्रभाव क्षेत्र में अपने अनुदान बिखेर कर ब्रह्मांडव्यापी आदान-प्रदान के निर्वाह का पूरी तरह ध्यान रखती है, न सूर्य न पृथ्वी, कोई किसी के लिए सीमित नहीं होते। कर्तव्य पालन में भी किसी तरह की त्रुटि नहीं रहने देते।
जिस तरह धरती का वायुमंडल सैकड़ों मील तक फैला हुआ है। उसी तरह सूर्य का वायवीय कवच लाखोँ मील तक फैला हुआ हैं। सूर्य का पीलापन लिए जो प्रभामण्डल दूरबीनों से दीख पड़ता है वह उसके इर्द-गिर्द का 6000 मील का आवरण मण्डल है। इसके बाद एक और क्षीण आलोक है। यह एक लाख मील विस्तार का है, उसे सूर्य किरीट कहते हैं। इस किरीट आवरण की हलचलें और आगे बढ़कर लाखों मील तक देखी गई हैं।
सूर्य के वर्ण मण्डल से अलग स्वतंत्र रूप से उड़ती और शून्य में विलीन होती देखी जाती हैं। वे जिधर भी जाती होगी उधर अन्य ग्रहों से संबंधित प्लाज्मा को प्रभावित करती होंगी।
विकरण मेखलाओं का क्षेत्र इतना विशाल है कि उसकी व्याख्या मीलों की परिधि में नहीं की जा सकती और न उन्हें किसी ग्रह विशेष की संपदा माना जा सकता है। यह समस्त ब्रह्मांड का संयुक्त वैभव है, जिसमें सभी ग्रह-उपग्रह सम्मिलित हैं। सूर्य-मंडल का “कॉमनवेल्थ” तो निश्चित रूप से इस श्रृंखला में मजबूती के साथ बँधा हुआ है ही।
सूर्य को प्रसन्नता होती होगी कि उसकी संतानों की माँ निखिल ब्रह्मांड को अपनी सत्ता से प्रभावित करती है और स्वतंत्र-स्वावलम्बी बनाकर अपने प्रखर एवं परिपक्व अस्तित्व का परिचय देती है। पिता को इतना ही उदार होना चाहिए। अपनी पोषित संतानों और संतानों की माँ को अपने उपभोग के लिए ही सीमाबद्ध नहीं करना चाहिए। क्षेत्र की व्यापकता होने से भी उनके परस्पर प्रेम और आकर्षण में किसी प्रकार की कमी नहीं आती।
पति अपना सारा उपार्जन-अनुदान पत्नी को ही दे और अन्यान्य कर्तव्यों का पालन करने के लिए कुछ भी शेष न रखे यह आवश्यक नहीं। आवश्यकता के अनुरूप आदान-प्रदान कही उचित है। समूचा आधिपत्य-अधिकार तो संकीर्ण होना और संकीर्ण बनाना ही कहा जाएगा। पृथ्वी और सूर्य में से कोई भी ऐसा अनुदार नहीं है।
सूर्य की गर्मी और रोशनी जो ब्रह्मांड में चारों ओर बिखरती रहती है। उसका दो करोड़वाँ भाग ही पृथ्वी को मिलता है। यह थोड़ी-सी संपदा ही पृथ्वी को जीवन प्रदान करती है। यदि इस थोड़ी-सी संपदा में थोड़ी-सी भी कमीवेशी पड़ जाय तो लेने के देने पड़ जांय। गर्मी बढ़ते ही धरती की परत झुलस जाय और थोड़ी कमी पड़ जाय तो सब कुछ शीत से अकड़ कर ठंडा हो जाय। ग्रहण और प्रदान में औचित्य का ध्यान रखा ही जाता है।
पृथ्वी के पास एक से एक बड़ी-चढ़ी शक्तियाँ हैं। उनमें एक अति महत्वपूर्ण है-गुरुत्वाकर्षण। इसी के आधार पर वह सौर परिवार के साथ अपना संबंध-संतुलन बनाए हुए है। इसी के कारण उस पर रखे पदार्थ और प्राणी उछल कर अनंत आकाश में उड़ जाने से बचे रह सकते हैं। यह गुरुत्वाकर्षण पृथ्वी को सूर्य से मिला स्नेह, सौजन्य, सद्भाव ही कहा जाएगा। परमात्मा से आत्मा को भी ऐसी ही संपत्ति मिली है यदि वह उसका सही उपभोग कर सके तो पृथ्वी के समान ही अपने सुविस्तृत संपर्क क्षेत्र को संतुलित बनाए रह सकता है।
न्यूटन द्वारा प्रतिपादित आकर्षण नियम की अभी ठीक व्याख्या नहीं हो सकी है। उसका एक अंश ही जाना जा सका है। गुरुत्वाकर्षण क्यों है? क्या है? किस तरह है? जैसे सवालों का जवाब देने में न्यूटन ने अपनी अनभिज्ञता प्रकट की और अभी वे प्रश्न जहाँ के तहाँ हैं। इस बीच कुछ नयी खोजें जमा हुई हैं। समान आवेश वाले कणों का परस्पर धकेला जाना और विपरीत आवेश वाले कणों का आपस में खिंचना यह विद्युत चुम्बकीय बल है। आइन्स्टीन ने इस बल को “फोटान” नामक अणु अंश द्वारा निस्सृत सिद्ध किया है। जर्मन खगोल वेत्ता मिलिगेट और अँग्रेज विज्ञानी पाँल डिराँफ ने यह संभावना व्यक्त की कि हो न हो, गुरुत्वाकर्षण इसी विद्युत चुम्बकीय बल का स्थूल रूप हो। इन्हीं चालीस वर्षों में परमाणु की भीतर एक सौ से भी अधिक सूक्ष्मकण खोजे जा चुके हैं। उन्हें परस्पर बाँधे रहने की क्षमता संपन्न एक नया नाभिकीय बल खोजा गया है। अनुमान यह लगाया गया है कि विद्युत चुम्बकीय बल का केन्द्र यह नाभिकीय सत्ता है जो विकसित एवं विस्तृत होकर गुरुत्वाकर्षण का रूप धारण करती है।
अनेक शोध निष्कर्षों का निर्णय यह कि गुरुत्वाकर्षण पृथ्वी का अपना उपार्जन नहीं है। यह सूर्य का ही अजस्र अनुदान है। जो पृथ्वी ने अपने भीतर मजबूती के साथ गहराई तक जकड़ पकड़ लिया है।
ऐसी और भी अनेक शक्तियाँ हैं। धरती पर बिखरा पड़ा जीवन भी सूर्य का ही अनुदान है। अदृश्य आकाश में वायु, विद्युत, रेडियो, विकिरण आदि न जाने क्या-क्या भरा पड़ा है। चुम्बकत्व और प्रकाश को भी इसी प्रकार के सूर्य द्वारा पृथ्वी को दिए गए उपहार कहा जा सकता है।
इस संसार में तीन प्रकार की चुम्बकीय शक्तियाँ काम कर रही हैं (1) प्राणि चुम्बक (2) धातु चुम्बक (3) पृथ्वी चुम्बक। इन तीनों की त्रिविध शक्तियाँ इस संसार में विभिन्न प्रकार की हलचलों को जन्म देतीं और उनमें रूपांतरण प्रस्तुत करती हैं।
प्राणि चुम्बक वह है जिसके आधार पर प्राणी अपनी भौतिक एवं आत्मिक विशेषताओं का एक दूसरे के साथ आदान-प्रदान करता है। संगति प्रभाव से लेकर प्रजनन प्रक्रिया तक में इसका चमत्कार देखा जा सकता है। इसके अंतर्गत मनोबल, साहस, शौर्य, पराक्रम, तेजस्विता, ओजस, आत्मबल जैसी विशेषताएँ आती हैं। रूप-सौंदर्य के आकर्षण भी इससे जुड़े हुए हैं। एक दूसरे के निकट आने और दूर हटने की अविज्ञात हलचलें भी इसी आधार पर होती रहती हैं। शाप वरदान सिद्धि, चमत्कार और अतीन्द्रिय चेतना को भी इसी परिधि में लिया जा सकता है।
उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव चुम्बक के केन्द्र माने जाते हैं। वहाँ से निकलने वाली विद्युत धाराएँ धातुओं को प्रभावित करती है। उस प्रभाव का शक्ति रूप में प्रयोग होता है। यह शक्ति रासायनिक पदार्थों के रूप में परस्पर सम्मिश्रण के द्वारा नवीन यौगिकों का सृजन करती है। अणुओं को उनके अवयवों के साथ सटाये रहती है। अणुओं को उनके अवयवों के साथ सटाये रहती है। बिजली की उत्पत्ति का केन्द्र भी यही है। खदानें इसी आधार पर जमा होती हैं और भी बहुत कुछ इसके द्वारा होता है। कपास की सुई का सिरा सदा उत्तर की ओर रखने में यही धातु चुम्बक ही काम करता है।
धरती को सूर्य से मिलने वाला एक उपहार है प्रकाश। इसकी अनेकों धाराएँ हैं-जो धरती को ऊर्जा का भरपूर अनुदान देती रहती हैं। इन धाराओं में एक का नाम है ‘लेजर’। इसकी खोज कुछ ही समय पहले हुई है। वैज्ञानिक इसके आधार पर बड़ी-बड़ी आशाएँ लगा रहे हैं और उसे अणु शक्ति हाइड्रोजन शक्ति से भी बड़ी मानकर करतलगत करने की कोशिश में जुटे हैं।
‘लेसर’ अपने ढंग का अनोखा प्रकाश है। उसकी सभी तरंग एक ही आवृत्ति की होती हैं। प्रत्येक तरंग एक ही आवृत्ति की होती है। प्रत्येक तरंग एक दूसरे के समानान्तर चलती है। उनमें तनिक भी कालान्तर नहीं रहता। साधारण प्रकाश चारों ओर फैलाता है। किन्तु लेसर एक दिशा में चलती है। यही वह विशेषता है जिसके कारण वह अन्य प्रकाशों की तुलना में अत्याधिक शक्तिशाली सिद्ध हो सका।
लेसर की सभी किरणें एक दूसरे का साथ देती हैं। फलस्वरूप उनकी शक्ति भी उसी अनुपात से बढ़ती जाती है। एक सेण्टीमीटर के दस हजारवें भाग जितनी छोटी जगह पर लेसर किरणें इकट्ठी की गई तो उनकी गर्मी एवं चमक सूर्य को भी मात देने वाली बन गई। कई सालों पहले धरती से ढाई लाख मील दूरी पर घूमने वाले चन्द्रमा पर लेसर प्रकाश की टार्च फेंकी गई थी। उसने एक सेकेण्ड में इतनी लम्बी यात्रा पूरी कर ली और दो मील क्षेत्र को प्रकाश से भर दिया। इसकी सहायता से घने अहंकार में आवश्यक चित्र लिए जा सकते हैं और अधिक से अधिक छोटी दूरी तक उसे भेजा जा सकता है। देखते-देखते एक फुट मोटी लोहे की चद्दर में छेद किया जा सकता है।
ये तो धरती और सूर्य के भावात्मक आदान-प्रदान की यत्किंचित् चर्चा हुई। सूर्य से धरती के लिए आने वाले उपहारों की संख्या और श्रृंखला इतनी लम्बी है-जो देखते-देखते अनन्तता की सीमा छू ले। तभी तो सूर्य को नारायण कहा गया, सृष्टि का पिता माना गया। धरती सृष्टि की माँ है ही। आज धरती का लाड़ला बेटा मनुष्य अपने प्रयास- पुरुषार्थ से उपार्जित ऊर्जा को आवश्यकता से कम अनुभव कर रहा है। उसे नए शक्ति स्रोतों की जरूरत पड़ रही है। इसके लिए उसे पिता सूर्य के आगे हाथ पसारना पड़ेगा। वह अपनी संतानों और संतानों की माँ का पोषण-संरक्षण करने में उपेक्षा बरतने वाला नहीं। सूर्य की साधना का उद्देश्य भी यही है कि हम उस अजस्र शक्ति के भांडागार से अनुदान लेकर उन अभावों को पूरा करें, जिनके माध्यम से प्रगतिशील, संपन्न, प्रतिभाशाली बना जा सकता है।
एक बार द्रोणाचार्य से किसी ने पूछा-महाराज आप तो ब्राह्मण हैं। ब्राह्मण का धर्म ज्ञान अर्जित करना, ज्ञान देकर समाज को सुव्यवस्थित रखना है सो तो आप करते ही हैं पर जो ज्ञान से नहीं मानता उसे कैसे ठीक करते हैं। द्रोणाचार्य ने उत्तर दिया-
अग्रता चतुरो वेदा पृष्ठता सशरं धनुः। इदं ब्राह्मणम् इदं क्षात्रं शास्त्रादपि शरादपि॥
अर्थात्-”आगे मैं ब्राह्मण हूँ, मुँह से ज्ञान देता हूँ। किन्तु पीठ में मैंने धनुष बाण धारण किया है अर्थात् जो लोग ज्ञान से मानते है उन्हें ज्ञान से ठीक करता हूँ। जो ज्ञान से नहीं मानते उनके प्रति क्षात्र धर्म का पालन करता हूँ। उन्हें फिर शस्त्र से ठिकाने लगता हूँ।”
जून का अंक सूर्योपासना विशेषाँक
हर वर्ष की तरह परमपूज्य गुरुदेव की स्मृति में, सविता स्वरूप गुरुसत्ता के निर्देशों पर एक विशेषाँक जून माह की अखण्ड ज्योति के रूप में प्रकाशित किया जा रहा है। इसमें सूर्य के वैज्ञानिक, आध्यात्मिक, आधि-दैविक रूपों की व्याख्या से लेकर सूर्य साधना के मर्म, गुह्यतम पक्षों का विवेचन सरल सुगम भाषा में देने का प्रयास किया जायेगा। अधिक से अधिक व्यक्ति इस का लाभ लें, इसका पाठकगण प्रयास करें।
संपादक मंडल
किसी शहर के लोगों ने हसीदाी धर्मगुरु बाल शेम से आग्रह किया कि आप अपने शिष्य एल मिखाल को हमारे यहाँ रम्बी (गुरु) का पद स्वीकार करने को कहिए, जिसके लिए हम उनसे कई बार कह चुके हैं। बाल शेम ने इस पर डाँट बतायी-”अगर तुम मेरी बात न सुनोगे तो तुम इहलोक भी गँवाओगे, परलोक भी।” उत्तर मिला-”चाहे दानों लोक चले जायें पर जिस चीज के योग्य मैं नहीं हूँ, उसे, स्वीकार नहीं करूंगा।” बाल शेम बोले-”तो बेटे मेरा आशीर्वाद लो। तुमने प्रलोभन को जीत लिया है।”
जर्जर महान आये दिन गिरते रहते हैं पर भवन कितने ही विशालकाय हो यदि आधार स्तम्भ सुदृढ़ हो तो वे भयंकर भूचालों में भी अविचलित खड़े रहते हैं। तूफान हो झंझावात हों, समुद्र गहरा हो तो भी कुशल माँझी नाव किनारे पहुँचा देते हैं। युद्ध कितना ही भीषण हो, अनेक मोर्चों पर लड़ा जा रहा हो तो भी साहसी और सूझबूझ वाले सेनापति जियी होते हैं, यश प्राप्त करते हैं। कुल चौदह किन्तु मूर्धन्य व्यक्तियों से बनी निहत्थी काँग्रेस ने ब्रिटिश हुकूमत से सत्ता छीन ली थी। अपने शाँति कुँज को इन दिनों एक सौ वैसे ही सुदृढ़ आधार स्तम्भों की, कुशल नाविकों की, साहसी सेनापतियों और मूर्धन्यों की आवश्यकता है। जागृत आत्मायें इस पुकार को सुने-समझे और युग धर्म निर्वाह के लिए आगे आयें। माँ की कोख कलंकित करने वाली कायरता तो न दिखायें।
जिनके मन में राष्ट्रीयहित, सेवा भावना और जातीय स्वाभिमान हो, शिथिल हों किन्तु जिनके पारिवारिक उत्तरदायित्व बहुत बड़े न हों वे शांतिकुंज से पत्र व्यवहार करें, यहीं निवास की बात सोचें। लिप्सायें तो न रावण की पूरी हुई न सिकन्दर की पर औसत भारतीय नागरिक की ब्राह्मणोचित आजीविका में कोई दिक्कत किसी को नहीं आने पायेगी इसे हमारा आश्वासन मानें।
भगवती देवी शर्मा
*समाप्त*