सामाजिक क्षेत्र में धर्म की प्रतिष्ठापना के लिए धर्म प्रचार आवश्यक माना जाता है। उत्साह के साथ धर्मानुयायी प्रचार के लिए निकल भी पड़ते हैं। पर प्रायः देखा यही जाता है कि उपदेश देने भर से ही अभीष्ट सफलता नहीं मिल पाती हैं। इसका प्रमुख कारण है धर्म के मर्म को न समझ पाना। धर्म का अर्थ है धारण करना। धर्म प्रचार में धर्म पहले आता है। धर्म की रक्षा करने अर्थात् धारण करने से ही प्रचार की सफलता निर्भर है। धारण की पूँजी एकत्रित किये बिना जो सामाजिक उत्कृष्टता की बात सोचते हैं, उन्हें असफलता ही हाथ लगती है।
धार्मिक प्रतिष्ठापना की सामाजिक उपलब्धि तभी प्राप्त हो सकती हैं जब धार्मिक आदर्शों एवं सिद्धांतों की विचारणा ही नहीं, अपने जीवन क्रम की प्रत्येक गतिविधियों में समावेश भी किया जाए। भूल वहाँ होती है जब सिद्धांतों एवं आदर्शों को जीवन में उतारे बिना धर्म प्रचार की चेष्टा की जाती है। ण्से प्रचारक वस्तुतः धर्म को जीवन में उतारना ही दूर धकेलते जाते हैं। धर्म को निश्चित क्रिया कृत्यों की सीमा में कैद कर उसे सांप्रदायिक बना देते हैं। परिणाम यह होता है कि धर्म एक स्थान विशेष, प्रणाली विशेष का अंग बनकर रह जाता है। धर्म की व्यापकता सांप्रदायिक स्वरूप को ग्रहण कर लेती है साम्प्रदायिकता की लकीर में उलट फेर होते ही सारे सम्प्रदाय में उपद्रव सा खड़ा हो जाता है। धार्मिक लकीरों की रक्षा के लिए अनेकों प्रकार के विग्रह खड़े हो जाते हैं। लकीर की रक्षा को ही धर्मरक्षा समझ लेते हैं।
इतिहास साक्षी है कि विश्व के सभी साम्प्रदायिक दंगे धर्म के निष्प्राण लकीरों, क्रियाकृत्यों का वर्चस्व सिद्ध करने एवं उन्हें सर्वोपरि ठहराने के लिए हुए हैं। उसमें धार्मिक तत्त्वों की कामना कम, अविवेक का पुट अधिक रहा हैं। इसके कारण मानव समाज को कितनी ही बार अपार क्षति उठानी पड़ी है। धर्म के स्थान पर अधर्म पनपा एवं अनीति बढ़ी है।
धर्म का लक्ष्य है संसार के समस्त विषमताओं में एकता की स्थापना करना, मनुष्यत्व की प्रतिष्ठापना करना। यह तभी हो सकता है जब धर्म के तत्व को समझा जाय, जीवन में उतारा जाय। वस्तुतः यह स्थिति चिंतन प्रधान नहीं, अनुभूति प्रधान है। यह अनुभूति धार्मिक आदर्शों के धारण से ही संभव है।
महापुरुषों की यह विशेषता होती है कि वे चिर सनातन धार्मिक आदर्शों को मात्र जानते ही नहीं हैं, वरन् उनका समावेश भी अपने जीवन क्रम में रखते हैं तत्पश्चात धर्म को संकीर्णता की सीमा से बाहर निकल कर उसे सर्वभौम रूप प्रदान करते हैं। कालान्तर में यह स्वरूप भी उपयोगी नहीं रहता समय की नवीन माँग होती है। प्रायः अनुयायियों का दुराग्रह मात्र कलेवर के स्वरूप के प्रति होता है। फलस्वरूप संकीर्णता पनपती हैं जिन धार्मिक तत्वों की प्रतिष्ठा के लिए कलेवर प्रदान किया गया था, वे लुप्त हो जाते हैं। प्रधानता स्वरूप ही रह जाती है।
विश्व में फैले सभी धर्म सम्प्रदाओं का अध्ययन करने से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि दुराग्रह धार्मिक आदर्शों की सर्वोपरिता सिद्ध करने एवं अपनाने का होता तो बात समझ में भी आती किन्तु अपने प्रचलनों एवं विधि विधानों को श्रेष्ठ सिद्ध करने की चेष्टा की जाती है तो परिणाम दुखद होता है। ऐसा दुखद जिससे धर्म धारण को कलंकित होना पड़े।
धर्म प्रचार करने से पूर्व उसके लक्ष्य, सिद्धांतों एवं आदर्शों को जानना समझना तथा तद्नुरूप अपने जीवन में गढ़ना आवश्यक है। प्रचार की पृष्ठभूमि यही से बनती है। अभीष्ट सफलता प्राप्त करना तभी संभव होता है। धर्म धारण के बिना धर्म दुखद संभावनाओं का रसास्वादन संभव नहीं। भोजन करने से शक्ति मिलती है, यह बात सत्य है किंतु इसकी अनुभूति तभी होती है जब भोजन किया जाता है। अनुभूति स्तर पर उतरा यह सिद्धांत ही सत्य को प्रकट कर सकने में समर्थ होता है।
धर्म का यह सिद्धांत जब अनुभूति में उतर जाता है कि विभिन्न कलेवरों में एक ही परमात्मा क्रीड़ा कल्लोल कर रहा है। स्वरूप की भिन्नता देखते हुए भी मूल तत्त्व की एकता है, जो धार्मिक प्रचलनों के प्रति दुराग्रह का मोह स्वयमेव तिरोहित हो जाता है तब प्रचारक साधना प्रणालियों को नहीं आदर्शों एवं सिद्धांतों को महत्व देने लगता है। समाज में उसकी प्रतिष्ठापना ही उसका लक्ष्य होता है।
एकरूपता बनाये रखने के लिए किसी विशेष साधना प्रणाली का प्रचलन तो किया जा सकता है किन्तु उसके अपनाये जाने का आग्रह नहीं होता है। आग्रह यदि होता भी है तो धर्म के मूलभूत सिद्धांतों को अपनाये जाने का।
धारण के अभाव में सशक्त क्रिया प्रणाली भी उपयोगी सिद्ध नहीं हो सकती है। इस तथ्य को तो वर्तमान समय में ही स्पष्टतया ही देखा जा सकता है। इन दिनों अधर्म बढ़ा ही है, यह बात यथार्थ ही हैं किन्तु इसके साथ धर्म का कलेवर भी विस्तृत हुआ है।
गंभीरता पूर्वक निरिक्षण करने से पता लगता है कि विश्व में अनेकों नवीन धर्म सम्प्रदाय उभर कर सामने आये है। उसका कलेवर आकर्षक है और प्रतिपादन प्रणाली भी बुद्धि संगत है। फिर क्या कारण है कि वे मनुष्य समाज को प्रभावित नहीं कर पाते। जन जीवन का सुधार प्रसार कर सकने में असमर्थ सिद्ध होते हैं। कारणों की खोज की जाय तो स्पष्ट होगा कि प्रचार की सफलता के जो मूल आधार थे उसका ही अभाव रहा। धर्म धारण की कमी ही असफलता का कारण बनी। साधना प्रणाली में किस प्रकार की कमी नहीं है।
विचारशील वर्ग धार्मिक कृत्यों से अल्प काल के लिए प्रभावित तो होता है, किन्तु धर्म का ढिंढोरा पीटने वाले प्रचारकों के व्यक्तित्व में जब आदर्शवादी मान्यताओं का अभाव देखता है तो उसे उतनी घृणा भी हो जाती है। जिस तेजी से वह कुछ पाने के लिए आगे बढ़ता है, उसी तीव्रता से पीछे हट जाता है।
विश्व में नास्तिक का प्रादुर्भाव इसी प्रकार हुआ। धर्म तंत्र की विकृति ही प्रधानतया नास्तिकता का कारण बनी है। इस कटु सत्य से इनकार नहीं किया जा सकता। प्रच्छन्न नास्तिकता की दार्शनिक पृष्ठ भूमि तो बहुत ही दुर्बल है। वस्तुतः इसका परिपोषण धार्मिकता के उथले तथा छद्म रूप में होती है यह नास्तिकता वस्तुतः नकारात्मक धार्मिकता मात्र है।
धर्म सशक्त और उपयोगी भी है। भौतिक सम्पन्नता एवं आध्यात्मिकता उन्नति के दोनों ही प्रयोजन धर्म को अपनाने जीवन का अविच्छिन्न अंग बना लेने से पूर्ण होते हैं। आज आवश्यकता इस बात की है कि उनकी आदर्श वादी मान्यताओं का सदुपयोग मानव मात्र के परिष्कार से किया जाय। यह कार्य धर्म को सँप्रदाय की संकीर्ण सीमा से बाहर निकालने पर ही संभव हो सकता है। यह कार्य कठिन अवश्य है, किन्तु इसके बिना धर्म प्रचार प्रभावशाली सिद्ध नहीं हो सकता।
जिन्हें सच्चे अर्थों में धार्मिकता पसंद है, जो धर्म को जीवित जागृत देखना चाहता है, उन्हें धार्मिकता के सिद्धांत और स्वरूप का परिचय जन जन को कराना होगा। अभी तो अंध परम्परायें ही धर्म निष्ठ के स्थान पर विराज मान हो रही हैं और स्वयँ ही अश्रद्धा का वातावरण उत्पन्न कर रही हैं धर्म तत्व महान है उसकी संभावनाएँ और भी महान है, किन्तु यह सुखद परिणाम धर्म के कलेवर के नहीं धर्म धारण के है। इस तथ्य को जितना जल्दी समझा और हृदयंगम किया जा सकें उतना ही अच्छा है।। धर्म प्रचार के लिए लेखनी, वाणी से, धर्मानुष्ठानों और प्रशिक्षणों से यह धर्म प्रयोजन में बहुत सुविधा हो सकती हैं किन्तु साथ साथ ध्यान यह भी रखना होगा कि कि धर्म प्रचार का उत्तरदायित्व वहन करने वाले दूसरों को जो सिखाना चाहते हैं उस पर स्वयँ विश्वास करें। धर्म धारण को अपने जीवन में गहराई तक समाविष्ट करके ही व्यक्तित्व को उच्चस्तरीय बनाया जाता है। अनुगमन भी उसी का होता है जिसका कि व्यक्तित्व सौ टंच सोने की भाँति परीक्षण में खरा उतरता है।
रामकृष्ण परमहंस अक्सर कहा करते थे हम ईश्वर को उसी तरह देख सकते हो जैसे मुझे देखते हो और उसकी आवाज उसी तरह सुन सकते हो जैसे मेरी सुनते हो।
इसी बात को और बढ़ाते हुए योगी अरविन्द कहते थे भगवान को देखना चर्मचक्षुओं के लिए और भगवान को सुनना नस - नाड़ियों से बने कानों से संभव नहीं हो सकता। उसके लिए अंतः चेतना में प्रवेश करना होगा। आंखें केवल पंच भौतिक जगत को ही देख सकती है। भगवान उससे ऊपर हैं, उन्हें देखने सुनने के लिए शारीरिक उपकरण पर्याप्त नहीं है। उसके लिए अंतःचेतना जुड़े दिव्य चक्षुओं को खुलना चाहिए और दिव्य श्रवण शक्ति का जागरण होना चाहिए। ”
मालागासी गणराज्य के तानानारिव क्षेत्र में मुर्दों की हड्डियां जमीन से उखाड़कर दूसरे स्थान पर बार बार गाड़ते रहने का रिवाज है कारण यह बताया जाता है कि जब कब्र में कफ़न सड़ जाता है तो मृतक को ठंड लगने लगती है। फलतः वह अपने परिवार वालों को नया कपड़ा बदलने का सपना देता है। परिवार वाले मिल जुल कर इसके लिए पैसा बचाने लगते हैं और जब कपड़े और उत्सव के लिए धन एकत्रित हो जाता है तो वे उस गड़े मुर्दे को उखाड़ने की कहावत को पूरी करते हैं। गाजे बाजे के साथ यह कृत्य किया जाता है खोदने के बाद निकली अस्थियों को नये कपड़े में लपेटा जाता है। और फिर नयी स्थान पर बनायी गयी कब्र तक, उसे नृत्य, वाद्य करते हुए उसे ले जाया जाता है। प्रयत्न यह किया जाता है कि यदि पति पत्नी दोनों मर चुके हैं तो दोनों की अस्थियाँ एक साथ गाड़ी उखाड़ी जाती रहें। मरने के बाद भी उनका बिछोह न हो। इस गड़े मुर्दे उखाड़ने की प्रथा को उस समुदाय में फार्मादहागा नाम दिया जाता है।
प्रकृति के रहस्यों करो जितनी तत्परता सो खोजा जा रहा है, जितने अधिक प्रयास उस दिशा में नियोजित होते जा रहे है, उसमें एक से एक बड़े रहस्यों और शक्ति स्रोतों का पता लगाया जा रहा है। आदिम काल में सम्भवतः मनुष्य भी अन्य पशुओं की तरह मात्र अपनी शरीर चर्चा तक ही निर्भर था। तत्पर पूर्ण शोधों अग्नि, विद्युत अणु-ऊर्जा आदि अनेक शक्तियों को उसके वशवर्ती बना दिया ज्ञान विज्ञान की अभिन्न उपलब्धियां ही उसे सशक्त और सुसंपन्न बनाती चली जा रही है। यह सब तत्परता पूर्ण शोधों का ही परिणाम है। वैसा न कर पाने के कारण अन्य प्राणी असमर्थ एवं असहाय ही बने हुए है। यों प्रकृति का विशाल भाँडागार उनके समक्ष भी वैसा खुला पड़ा है, जैसा कि मनुष्य के सामने।
प्रकृति क्षेत्र में और भी अधिक महत्व पूर्ण व रहस्यपूर्ण चेतना का समुद्र है। वह सूक्ष्म जगत के रूप में इस समस्त ब्रह्मांड में हिलोरे ले रहा है। समुद्र को रत्नाकर, रत्नभंडार कहा जाता है। प्रकृति में तो उनकी कुछ तरंगें लहराती दिखती भर हैं। बीज रूप से वह ब्रह्मांडीय चेतना मनुष्य के कण-कण में भरी है जो सम्पदाओं और विभूतियों का स्रोत, कारण और आधार है। हमारे भीतर व बाहर इतना कुछ है, जिसकी कल्पना करना तक अशक्त है। न तो ब्रह्मांड के विस्तार की कल्पना हो सकती है और न चेतना के अंतरंग बहिरंग-स्तरों की गरिमा का मूल्याँकन कर सकना ही संभव है। वस्तुतः अनंत वैभव के भाँडागार के बीच ही निवास कर रहे है।
दारिद्रय व अतृप्ति मिटाने के लिए जिस वैभव की आवश्यकता है, उसकी उपलब्धि हेतु दो ही पुरुषार्थ जरूरी है- एक तत्परता पूर्ण शोध व दूसरा विज्ञान शक्तियों का पराक्रम पूर्ण उपयोग। जो यह चरण उठा सका, उसके लिए ऐश्वर्य और आनन्द की कोई कमी नहीं रह सकती। इस दिशा में अग्रगामी होने का राजमार्ग ही साधनापथ कहलाता है
उपासना के लिए एक अनिवार्य शर्त यह है सच्चे भाव से चित लगाकर कि जाय 1 आजकल जिस जिस प्रकार बहुसंख्यक कहलाने वाले व्यक्ति दुनिया का दिखाने के लिए अथवा एक रस्म पूरी करने के लिए मंदिर में जाकर पूरी कर लेते हैं और नियम को पुरा करने के लिए एकाध माला भी जप लेते हैं उससे किसी बड़े सुफल कि आशा नहीं की जा सकती उपासना और साधन तो तभी सच्ची मानी जा सकती है जब कि मनुष्य उस समय समस्त सांसारिक विषयों और आस पास की बातों को भूलकर प्रभु को के ध्यान में निमग्न हो जाए जब मनुष्य इस प्रकार की संलग्नता और एकाग्रता में अपने इष्टदेव की उपासना करता है तभी वह अध्यात्मिक मार्ग पर अग्रसर हो सकता है और तभी वह दैवी कृपा का लाभ प्राप्त कर सकता है इसी तथ्य को समझने के लिए वेदों में बतलाया गया है की जब मनुष्य हृदय और आत्मा से सोम का अभिसव (परमात्मा की उपासना) करता है तव उसे स्वयमेव ईश्वरीय तेज के दर्शन होने लगते हैं और परमात्मा की कृपा अपने चारों तरफ से मेह की तरह बरसती जान पड़ती है संसार में जीवन निर्वाह करते हुए एक साधारण मनुष्य को अनेक विघ्न बाधाओं का सामना करना पड़ता है विपरीत परिस्थितियों से होकर गुजरना पड़ता है विरोधियों के साथ संघर्ष करना पड़ता है और लोगों की भली बुरी सब प्रकार की आलोचना को सहन करना पड़ता है इससे उसके जीवन में स्वभावतः उद्वेग अशाँति भय क्रोध आदि के अवसर आते हैं ऐसा मनुष्य अपने कष्टों के निवारणार्थ और मन और आत्मा की शाँति के लिए परमात्मा का आश्रय ग्रहण करता है। मन, वचन और कर्म से उसकी उपासना में संलग्न रहता है। तो उसकी अनास्था में परिवर्तन होने लगता है। जब साधनों में अग्रसर होकर वह अपने चारों आरे परमात्मा शक्ति की क्रीड़ा अनुभव करता है और वह समझने लगता है कि संसार में जो कुछ हो रहा हैं वह उस प्रभू की प्रेरणा और इच्छा का फल हैं तथा वह जो कुछ करता है उसका अंतिम परिणाम जीव के लिए शुभ होता है, चाहे वह तत्काल उसे न समझ सके, तब उसकी व्याकुलता और अशाँति दूर होने लगती हैं और उसे ऐसा अनुभव होता है मानो ग्रीष्म ऋतु में व्यथित श्राँत क्लाँत व्यक्ति को शीतल और शाँति दायक वर्षा ऋतु प्राप्त हो गयी। मनुष्यों को अपनी भिन्न कामनाओं की पूर्ति के लिए तरह तरह की साधनाएँ निकाली हैं। धन, संतान, वैभव, सम्मान, प्रभाव, विद्या, बुद्धि आदि की प्राप्ति के लिए लोग भाँति भाँति के उपायों का सहारा लेते हैं, जिससे उनकी योग्यतानुसार कम या अधिक परिणाम में सफलता भी प्राप्त होती है। पर आध्यात्मिक शाँति प्राप्त करने, साँसारिक तापों से छुटकारा पाने का एक मात्र उपाय यही है कि मनुष्य भिन्न भिन्न कामनाओं का मोह त्यागकर सच्चे हृदय से परमात्मा का आश्रय ले और शुद्ध भाव से उसकी स्तुति और प्रार्थना करें। हमें स्मरण रखना चाहिए कि सब प्रकार की कामनाओं को वास्तव में पूरा करने वाला भगवान ही हैं। इसलिए अगर हम उसकी पूजा करके आत्मिक शाँति प्राप्त कर लेंगे तो हमारी अन्य उचित कामनायें और आवश्यकतायें अपने आप पूरी हो जायेंगी। कितने ही मनुष्य इस विवेचना से यह निष्कर्ष निकालेंगे कि परमात्मा के ध्यान में लीन होने से मनुष्य की कामनायें शाँत हो जायेंगी, उसमें संसार के प्रति विरक्तता के भाव का उदय हो जायेगा। इस प्रकार वह आत्मा संतोष का भाव प्राप्त कर लेगा। इस विचार में कुछ सच्चाई होने पर भी यह ख्याल करना कि परमात्मा की उपासना का साँसारिक कामनाओं से कोई संबंध नहीं, ठीक नहीं है। वेद में कहा गया हैं कि
“अपमिव प्रवणो यस्य “ दुँर्धरं राधो विश्वायु शवसे अपावतम्। “
भगवान का धन कभी न रुकने वाला है। वह उसके उपासकों को इस प्रकार प्राप्त होता है जिस प्रकार नीचे की ओर बहता हुआ जल। वस्तुमान समय में भी अनेकों ऐसे व्यक्ति हो चुके हैं जो बहुत साधारण विद्या बुद्धि के होते हुए भी परमात्मा के भरोसे सुख पूर्वक जीवन व्यतीत करते हैं और जो अपने और दूसरों के बड़े बड़े कार्यों को सहज ही पूरा कर देते हैं। हम अपने प्राचीन ग्रंथों में संतों, तपस्वियों ओर भक्तों के जिन चमत्कारों का वर्णन पढ़ते हैं उनसे तो यह बात स्पष्ट दिखलायी पड़ती है। कि ईश्वर की सच्चे हृदय से उपासना करने वालों को किसी साँसारिक संपदा का अभाव नहीं रहता।
मंत्र में यह भी कहा है कि परमात्मा के उपासक को उसके तेज के भी दर्शन होते हैं। विचार किया जाये तो वास्तव में यही उपासना के सत्य होने की कसौटी है। जो कोई भी एकाग्र चित्त से और तल्लीन होकर परमात्मा का ध्यान करेगा उसे कुछ समय उपराँत उसके तेज का अनुभव होना अवश्यम्भावी है। यह तेज ही साधक अंतर को प्रकाशित करके उसकी भ्रान्तियों को दूर कर देता है और उसे जीवन के सच्चे मार्ग को दिखलाता है। इसी प्रकार मनुष्य सच्चे ज्ञान का अधिकारी बनता है और सब प्रकार की भव बाधाओं को सहज में पार करने की सामर्थ्य प्राप्त करता हैं॥
हलवाई की दुकान पर अनेकानेक मिठाइयाँ रखी रहती हैं, पर विश्लेषण करने पर उसमें तीन ही वस्तुएँ घुली मिली दिखाई पड़ती है। एक हैं शक्कर, दूसरा दूध, तीसरा अन्न। यह उसके पास बनाने कीर कुशलता है कि उसे उलट पलट कर अनेकों रूपों और स्वादों वाली बना देता है। मिट्टी, चाक और आँवा की सहायता से कुम्हार अनेक प्रकार के बर्तन बनाता है, कागज, कलम, स्याही की सहायता से अनेकों लेख लिखे जाते रहते हैं। अध्यात्म विज्ञान का समूचा ढाँचा भी इसी प्रकार तीन आधारों पर खड़ा है। आस्तिकता, आध्यात्मिकता व धार्मिकता।
तत्वज्ञान की दार्शनिक विवेचनाओं में ईश्वर जीव, प्रकृति की विवेचना होती रहती है। मनीषियों द्वारा भक्ति योग, ज्ञान योग, कर्म योग को आध्यात्मिक प्रगति का आधार निरूपित किया जाता है। इन्हीं विभिन्न प्रतिपादनों शैलियों का यदि एकीकरण किया जाये तो तो वे प्रकाराँतर से उन्हीं मूल भूत प्रतिपादनों को समझाते हैं जो आध्यात्म के त्रिवर्ग प्रतिपादनों के आधार भूत माने जाते हैं। तत्व का ज्ञान रूप समुद्र मंथन के इस नवनीत को आस्तिकता आध्यात्मिकता, धार्मिकता कहते हैं। यह मानवीय सत्ता के तीन कलेवर है। स्थूल, सूक्ष्म और कारण। इन्हें काया, मानस और अंतःकरण भी कहते हैं। इन तीनों के अभ्युदय हेतु सम्मिलित प्रयत्न क्रम एक साथ करने पड़ते हैं। वे मिले जुले रूप में विकसित होते हैं। ऐसा नहीं होता कि एक को पूरा न करने पर दूसरे को लिया जाय। जीवन निर्वाह के लिए अन्न जल और वायु की व्यवस्था जुटानी पड़ती है॥ और वे साथ साथ प्रयुक्त होती रहती है। यही बात आत्मिक प्रगति के त्रिवर्गीय आधारों के संबंध में भी है।
आस्तिकता का अर्थ है ईश्वर विश्वास। इसे अंतराल की गहराई में जमाने के लिए भक्ति भाव का आश्रय लेना पड़ता है। यह विश्वास मनोकामना पूरी करने या प्रकट होकर दर्शन देन जैसे बचकाने बाल कौतुक के लिए नहीं वरन् सत्प्रवृत्तियों के समन्वित समुच्चय की सघन आस्थाओं के रूप में अपना लिए जाने पर संपन्न होता है। ईश्वर के प्रति समर्पण, विसर्जन मिलन का तात्पर्य है कि उत्कृष्टता के साथ अपने आपको सघन रूप से जोड़ लेना। कठपुतली की तरह अंतरात्मा बाजीगर के इशारे पर अपने अंतरंग और बहिरंग जीवन को ढालना। अपने ज्ञान कार्य को इसी निमित्त नियोजित किये रहना। ईश्वर व्यक्ति विशेष की तरह शरीर धारी नहीं है। जिसे उपहास मनुहार द्वारा अपनी ओर आकर्षित किया जा सके और उससे मन मर्जी के क्रिया कलापों को कराया जाय। समस्त सृष्टि नियम अनुशासन के परिवर्तन से ही गतिशील रहकर अपना आस्तित्व बनायें हुए है। यह अनुशासन ईश्वर ने अपने ऊपर भी स्वेच्छापूर्वक ओढ़ा हुआ है। वह अपनी मर्जी से या भक्त की मर्जी से स्वेच्छाचार बरतने लगे तो समझना चाहिए कि बेसमझ राजा की शासन परिधि अंधेर नगरी बने बिना न रहेगी। यहाँ सर्वत्र अराजकता ही दृष्टिगोचर होगी।
ईश्वर की सत्ता और महत्ता पर विश्वास करने का अर्थ है उत्कृष्टता के साथ जुड़ने पर सत्परिणामों पर, सद्गति पर, सर्वतोमुखी प्रगति पर विश्वास। आदर्शवादिता अपनाने पर इस प्रकार की परिणित सुनिश्चित रहती है। किन्तु कभी कभी उसकी उपलब्धियों में देर सवेर होती देखी जाती है। ऐसे अवसरों पर ईश्वर विश्वासी प्रचलित नहीं होता। धैर्य पूर्वक प्रतीक्षा करता है और विश्वास बनाये रखता है कि दिव्यसत्ता के साथ वह जितनी सघनता के साथ जुड़ेगा, उसके अनुशासन, अनुबंधों के जितनी ईमानदारी, गहराई के साथ पालन करेगा, उतना ही उसका कल्याण होगा। आस्तिक न तो याचना करता है और न जो अपनी पात्रता से अधिक है उसे पाने की अपेक्षा करता है उसकी कामना भावना के रूप में विकसित होती है। भाव संवेदना फलित होती हैं तो आदर्शों के प्रति आस्थावान बनाती है। तनिक सा दबाव या प्रलोभन आने पर फिसल जाने से रोकती है पवित्र अंतःकरण बना लेना ईश्वर के अवतरण के लिए अवरोध समाप्त कर देना है। दुष्प्रवृत्तियों को हटा देने पर उसका स्थान सत्प्रवृत्तियों का समुच्चय ले लेता है। इस स्थिति की परिपक्वता होने पर जो आनन्द आता है, संतोष होता है, उल्लास उमगता है, उसे ईश्वर प्राप्ति कहा जा सकता है।
विराट ब्रह्म और परमात्मसत्ता एक ही बात है। सर्वव्यापी परमेश्वर को किसी शरीर विशेष में अवस्थित नहीं देखा जा सकता है। वह नियम शक्ति और भाव चेतना के रूप में कण कण में समाहित है। पर ब्रह्म की यथार्थ सत्ता का यही रूप हैं किन्तु यदि उसे प्रत्यक्ष देखना हो तो अर्जुन, यशोदा, कौशल्या, काकभुसुण्डि की तरह सर्वव्यापी के रूप में देखना चाहिए उस मान्यता के परिपक्व होते ही आत्मवत् सर्वभूतेषु और वसुधैव कुटुंबकम् की श्रद्धा का उद्गम उभरता है। सेवा साधना और परमार्थ परायणता की दिशा में अग्रसर होना पड़ता है। आस्तिकता कोरी भावुकता नहीं है। किसी प्रतिमा की पूजा अर्चना करते भर रहने से वक प्रयोजन पूरा नहीं होता। भक्ति भावना भक्त जन के चिंतन चरित्र और व्यवहार में उच्चस्तरीय परिवर्तन प्रस्तुत करती है। यह मनुष्य को देवस्तर में बदलने वाला कायाकल्प ही भगवद्भक्ति का यथार्थ रूप है।
अध्यात्म का दूसरा रूप है आध्यात्मिकता। आध्यात्मिकता का अर्थ हैं आत्मावलंबन। बहिरंग परिस्थितियों का मूलभूत कारण अपनी मनः स्थिति को मानना। आत्म सत्ता की गरिमा, महिमा और क्षमता का अनुभव करना। दूसरों से संपर्क रखने, आदान प्रदान का क्रम चलाते रहने में हर्ज नहीं पर विश्वास यही रखना चाहिए कि उत्थान पतन की पूर्ण जिम्मेदारी अपनी ही है। अकेले ही आये थे और अकेले ही जाना है। इस तथ्य के साथ इतना ओर जोड़ना चाहिए कि एकाकी निश्चय करना और उस संकल्प को पूरा करने के लिए एकाकी ही कटिबद्ध एवं अग्रसर होना है। उत्कृष्टता का मार्ग ही ऐसा है जिस पर चलने के लिए प्रोत्साहन देने वाले, मार्ग दिखाने और सहयोग देने वाले प्रायः दूसरे लोग नहीं ही मिलते हैं। लोक मानस संकीर्ण स्वार्थ परता से भरा है। लोगों की मान्यता, विचारणा और क्रिया अधोगामी प्रवाह में ही बहती रहती है। उनका परामर्श मानने अनुकरण करने पर भी व्यामोह के जाल जंजाल में ही जकड़े रहा जा सकता है।
पक्षी अपने पंखों के सहारे आसमान में उड़ते हैं। उन्हें न तो कोई मार्ग दर्शन करता है और न सहयोग देता है। शालीनता, सज्जनता, उदारता और पुण्य परमार्थ का मार्ग भी ऐसा ही है जिस पर किसी प्रशिक्षक या सहयोगी को आशा नहीं रखनी चाहिए इनमें अपना विवेक, अपना संयम, अपना संकल्प एवं अपना साहस ही काम देता है। प्रामाणिकता और शालीनता की कसौटी पर कस लेने के उपराँत ही अन्य लोग आदर करते, समर्थन करते, और सहयोग देते देखे गये है। अन्यथा गिरते को अधिक जोर से धक्का देकर गहरे गर्त में गिराने वाले तथा कथित मित्रों को ही सर्वत्र भरमार पाई जाती हैं। गुरुत्वाकर्षण की तरह पतन का प्रभाव एवं वातावरण ही सब ओर छाया दिखता है। इस दबाव से उभरना और अंतरात्मा की उत्कृष्ट प्रेरणा का अनुगमन करना अपने बलबूते ही बन पड़ता है।
गीता के परामर्शानुसार अपना उद्धार अपन ही करना पड़ता है। अवसाद से अपने को बचा लेने के लिए प्रचंड साहस का परिचय स्वयँ ही देना पड़ता है। मनुष्य स्वयँ ही अपना शत्रु हैं और मित्र है। जिसने स्वावलंबन अपनाया और अपने पैरों के बलबूते अपने मार्ग पर एकाकी ही चल पड़ा वही मंजिल तक पहुँचता है। रास्ते के साथ तो चलने वाले हर मार्ग पर मिल जाते हैं। जब पतन मार्ग पर अनेकों साथी मिल जाते हैं तो कोई कारण नहीं कि ऊँचा उठने और आगे बढ़ने के प्रयास में कोई साथ न दें।
संसार में बहुत कुछ है पर उसे खींच बुलाने और हजम करने के लिए तो अपने निज की चुंबकीय क्षमता ही काम देती है। आँखें न हो तो संसार के समस्त दृश्य समाप्त। काम न हो तो संसार के शब्दों का अंत, अपना मस्तिष्क साथ न दें तो समस्त संसार पागल। अपना दृष्टिकोण रंगीन चश्मे की तरह किसी कि सनक में सना हुआ हो तो हर वस्तु उस रंग में रंगी दिखाई देगी। इसलिए आत्म निरिक्षण, आत्म सुधार, आत्म निर्माण और आत्म विकास की प्रक्रिया अपनाते हुए साधक को आत्मावलंबन अपनाना चाहिए। एकाकी चल सकने का साहस जुटाना चाहिए। यही आध्यात्मिकता है। जिसे चेतना विज्ञान का दूसरा चरण माना जाता है।
तीसरा चरण हैं धार्मिकता। धार्मिकता का अर्थ है कर्त्तव्य परायणता। नीतिनिष्ठ ओर उदार सेवा साधना के ईद गिर्द ही धर्म की धुरी पर घूमते हैं। उसके अविच्छिन्न अंग हैं आत्म संयम और परमार्थ के निमित्त बढ़े चढ़े संकल्प साहस का प्रदर्शन।
उच्छृंखलता पशु प्रवृत्ति की परिचायक है। स्वेच्छाचार कीट पतंगों को ही शोभा देता है। अपराधों, अनाचारों से संलग्न रहने वाले शैतान की औलाद कहे जाते हैं। मनुष्य का स्तर इससे कही ऊँचा है। उसकी गरिमा, नीतिनिष्ठ, और शालीनता पर टिकी है। इसी को कर्त्तव्य परायणता भी कहते हैं। जिम्मेदारियों का निर्वाह भी। शरीर को स्वस्थ रखना, मन को संतुलित बनाये रखना, उसे मनोविकारों से बचाये रखना, अर्थोपार्जन में ईमानदारी बरतना, मिल−बांट कर खाना, , हँसते हँसते जीना, गिरतों को उठाना, उठतों को बढ़ाना जैसे अनेक दायित्व निजी जीवन के साथ जुड़े हुए है।
सामाजिक उत्तरदायित्वों में सत्प्रवृत्ति संवर्धन एवं दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन प्रमुख है। इसके लिए अपने व्यक्तित्व को प्रामाणिकता और प्रखरता से सुसज्जित करना पड़ता है।
कर्त्तव्य पालन की महत्ता बताते हुए शास्त्रों में उसे प्रकारांतर से ईश्वर पूजा का ही एक स्वरूप बताया गया है। कर्मयोग का वास्तविक स्वरूप कर्मयोग समझा जाना चाहिए। जिसने अपने आपको आदर्शों के अनुशासन में बाँध लिया वही सच्चे अर्थों में कर्मयोगी है। उसी को धर्मात्मा भी कहना चाहिए। धर्म और कर्तव्य पालन एक ही तथ्य की द्विधा व्याख्या विवेचना है।
कित्रु हासः किमानन्दः नित्य प्रज्वलिते सति। अंधकारवनद्वा कि, प्रदीपं न गवेषय॥ - धम्मपद
अर्थात् यह हँसना कैसा और यह आनन्द कैसा?जबकि समूचा संसार अग्नि ज्वाला में जला जा रहा है। निविड़ अधिकार से घिरे हुए तुम प्रकाश को क्यों नहीं खोजते?
कार्लाइल ने लिखा है- तत्वज्ञानियों को यह खोजते सदियाँ हो गयी कि “मैं कौन हूँ “ इस व्यर्थ की बात में सिर फोड़ी करने की अपेक्षा यह सोचा या बताया गया होता कि हमारा कर्तव्य क्या है और उसे कैसे निभाया जा सकता है- तो कही अच्छा होता।
मृत्यु को यदि हर क्षण याद रखा जाय तो पाप कर्मों से छुटकारा स्वतः ही मिल जाता है। संत एकनाथ की यही शिक्षा थी। एक बार एक साधक उनके पास पहुँचा। उनकी प्रशंसा और गुणगान करने लगा और अपने दुर्गुणों का प्रायश्चित पूछने लगा। संत एकनाथ ने उस साधक की बात सुनकर बड़े विनम्र शब्दों में कहा की आप मेरी चर्चा अधिक न करें। मुझे ऐसा आभास होता है कि मृत्यु आज से सात दिन पश्चात हो जायेगी। संतों की वाणी कभी मिथ्या नहीं हो सकती। घर पहुँचते पहुँचते वह साधक बीमार पड़ गया। 6 दिन इसी स्थिति में रहा। सातवें दिन संत एकनाथ उसके घर जा पहुँचें ॥ महाराज के दर्शन करते ही साधक भाव विभोर हो उठा। एकनाथ ने मुस्कुराते हुए कहा कि इन 6 दिनों में आप ने कितने पाप कर्म किये हैं? साधक ने उत्तर दिया कि कोई नहीं, क्योंकि मेरे ऊपर तो हर क्षण मरण रूपी शेर सवार रहा। जिसकी भय ग्रस्तता के परिणाम स्वरूप पापकर्मों का चिंतन मस्तिष्क में पनप नहीं पाया।
महाराजा भोग के इस सवाल पर सभासदों की अलग अलग राय थी कि सज्जनता बड़ी है या ईश्वर भक्ति। अनेकों दिन विचार मंथन चलता रहा परन्तु निर्णय के नाम पर शून्यता छाई रही।
कई दिन बीतने पर एक दिन महाराजा भोज वन भ्रमण के लिए निकलें। दुर्भाग्य से मार्ग में वन्य जातियों ने उन पर आक्रमण कर दिया। आक्रमण के कारण उनका शेष सहयोगियों से संबंध टूट गया। वे घने जंगल में भटक गए जंगल में प्यास के कारण उनका दम घुटने लगा। लेकिन दूर दूर तक कहीं पानी दिखाई नहीं दे रहा था। किसी तरह वह एक साधु की पर्ण कुटी तक पहुँचे। साधु ध्यानस्थ थे। पहुँचते पहुँचते महाराज मूर्छित होकर गिर पड़े। गिरते गिरते उन्होंने पानी के लिए पुकार लगाई।
कुछ समय बाद मूर्छा टूटने पर वही संत उनका मुंह धो रहे हैं पंखा झल रहे हैं और पानी पिला रहे है। आश्चर्य चकित होकर राजा ने पूछा आपने मेरे लिए अपना ध्यान क्यों भंग किया? परमात्मा की इच्छा है कि उनके संसार में कोई दीन दुःखी न हों। उनकी इच्छा पूर्ति का महत्व अधिक हैं। सेवा और सज्जनता ईश्वर भक्ति का का ही श्रेष्ठतम रूप है। भोज को समाधान मिल चुका था।
तब भारत परतंत्रता की बेड़ियों से जकड़ा हुआ था। उन दिनों पंजाब भर में उर्दू और फारसी का जोर था, हिंदी की ओर किसी का ध्यान भी न था। हिंदी की उपेक्षा गो. गणेशदत्त जी से सही न गई और उन्होंने हिंदी प्रचार वृत लिया कि - वे नियमित रूप से लोगों को मातृभाषा हिंदी पढ़ायेंगे।
यह काम जितना बड़ा था, उतना ही कठिन भी, कोई पढ़ने को तैयार न होता था। निदान उन्होंने एक टूटा कनस्तर हाथ में लेकर लायलपुर के सारे शहर में स्वयँ यह मुनादी की कि जो भी भाई हिंदी पढ़ना चाहे निःशुल्क पढ़ाई जायेगी। मुश्किल से कुछ छात्र मिले तो उनको पढ़ाने के लिए जगह का प्रबंध न हुआ। इस पर उन्होंने एक खुले स्थान पर बैठकर मिट्टी के तेल की कुप्पी के प्रकाश में अपनी हिंदी की पाठशाला आरंभ की। उनकी यह पाठशाला कुछ ही समय पश्चात हाईस्कूल बन गयी। संकल्प के धनी गोस्वामी जी ने भारत विभाजन होने से पूर्व पंजाब में 60 डिग्री कॉलेज, 150 इण्टर कॉलेज, 100 कन्या पाठशालाएँ, 100 मिडिल स्कूल और 4 ब्रह्मचर्य आश्रम स्थापित किये। आज उनकी अनेकों शाखाएँ देश भर में विद्यादान कर रही है।
स्रष्टा की महिमा इसलिए भूरि भूरि प्रशंसा के योग्य मानी जाती है कि उसमें व्यवस्था क्रम का आश्चर्यजनक सुनियोजन है। इसमें कमी या गड़बड़ी रहती, तो अनियंत्रित स्वेच्छाचार के कारण ग्रह गोलक आपस में टकराते और टूट फूट कर नष्ट हो ते रहते।
प्राणियों और वनस्पतियों के संबंध में भी यही बात है। वे इसलिए एक व्यवस्था के अनुरूप उगते, बढ़ते और सार गर्भित होते रहते हैं, यहाँ तक कि खुली आँखों से न दीख पड़ने वाले अणु परमाणु तक अपने छोटे कलेवर में विशाल सौर मण्डल जैसी गतिविधियों के अनुकरण का उदाहरण प्रस्तुत कर रहे है। यदि यह विशाल ब्रह्मांड व्यवस्था में कहीं भी असंतुलन रहा होता, तो यह समूचा पसारा कूड़े कबाड़े की तरह दीख पड़ता और उस अव्यवस्था के बीच टूट फूट का, अस्तव्यस्तता का परिचय मिलता रहता, किसी भी वस्तु को अपना काम कर सकना संभव हो जाता। स्रष्टा की अनेक महिमाओं में उनके सुनियोजन का कौशल नितान्त प्रत्यक्ष और सर्वत्र आश्चर्य भरा दीख पड़ता है। सृष्टि का सौंदर्य और उपयोग इसी व्यवस्था कौशल के आधार पर गतिशील हो रहा है।
शरीरों की संरचना ओर मनः संस्थान की बनावट में भी चकित करने वाला तालमेल देखा जाता है। जहाँ भी गड़बड़ी खड़ी हुई, वहाँ विग्रह विद्रोह खड़ा हो जाता है। और आधि व्याधियों का दौर लद पड़ता है। परिवार तंत्र जीवित प्राणियों का एक छोटा सा तंत्र है। यदि उसके सभी नियमोपनियम ठीक तरह पलते रहे, तो समझना चाहिए कि अपने छोटे घर घरौंदे के आँगन में स्वर्ग जैसा आनन्द मचलता इठलाता देखा जा सके गा। यदि परिपाटी व्यवहार, और क्रम व्यवस्था में अनियमितता घुस पड़े, तो समझना चाहिए कि वहाँ देवासुर संग्राम का उदय हुआ। एक दूसरे को संग खींचने का सिलसिला शुरू हुआ और वह समूचा परिकर नरक रूप में परिणीत हुआ। यह परस्पर विरोधी परिस्थितियों के उत्पन्न होने का एक मात्र कारण यह है कि व्यवस्था बुद्धि अपनी जगह पर से हट गई और मनमानी उच्छृंखलता से इसका स्थान ग्रहण कर लिया।
व्यवसाय पूरी तरह व्यवस्था बुद्धि की उपेक्षा करता है। उसमें गड़बड़ी रहे तो पड़ोसी जिस काम में अच्छा खासा लाभ उठाते हैं वहाँ लापरवाही और गैरजिम्मेदारी के बीच चलने वाले व्यवसाय घाटा उठाते और अंतः दिवालिया बनते देखे गये हैं। यही बात प्रगति के हर क्षेत्र पर लागू होती है। व्यवस्था की पल पल पर, पग पग पर आवश्यकता पड़ती हैं। उसमें जहाँ जितनी कमी या विदूषिता पाई गयी, वहाँ उतना ही असंतोष छाया मिलेगा। गड़बड़ियों का दोष साझेदार एक दूसरे पर मढ़ रहा है। कुल मिलाकर वह तंत्र लड़खड़ा जायेगा और उपहास, लाँछन, भर्त्सना का भाजन बनेगा।
जीवन क्रम में योजना बद्ध रीति से जी सकना अपने ढंग की अति महत्वपूर्ण कला कौशल हैं। जिन्हें यह आता है, वे गई गुजरी परिस्थितियों और कठिनाइयों के बीच रहते हुए भी प्रगति का मार्ग ढूँढ़ निकालते हैं और उस पर समझदारी के साथ चलते हुए उन्नति के उच्च शिखर तक जा पहुँचते हैं, जिसमें सफलता और प्रतिष्ठा का आनन्द भरा पूरा रहता है। बुद्धिमता की जाँच परख के अनेकों आधार हैं उनके आधार पर अपने अपने काम में सभी लोग सफलता पाते और लाभ उठाते हैं, किन्तु उन सभी संदर्भों में सबसे प्रमुख गिनी जाने योग्य विभूति सुव्यवस्था की ही है। जो इस संदर्भ में कुशल हैं, समझना चाहिए कि उसके लिए पग पग पर श्रेय प्राप्त करते चलना कुछ कठिन नहीं रह गया। इसके विपरीत जो जितना अस्त−व्यस्त, लापरवाह, गैर जिम्मेदार हैं, उसे उतना ही निकम्मा समझा जायेगा, भले ही उसके पास संपदा, शिक्षा सुन्दरता, जैसी विभूतियाँ कितनी ही क्यों न हों। अकेले सुव्यवस्था ही है, जो अनेक गुत्थियों को सुलझाती है और अवरोधों के भँवर से नाव को बाहर निकाल ले जाती है।
अधिकारी गणों में सभी की उपयोगिता और प्रतिभा है, किंतु यदि उन सब में सर्वोपरि दायित्व का पद देखा जाय, तो वह व्यवस्थापक का ही मिलेगा। सरकारी तंत्र में इसे मैनेजर, कण्ट्रोलर, सुपरवाइजर आदि नामों से जाना जाता है क्योंकि उसे ही समझदारी और नासमझी के आधार पर काम बनते बिगड़ते रहते है॥ जो मार्ग दर्शन कर सकता है, जिसमें किसी कार्य के साथ जुड़े अनेकानेक प्रश्नों को समय रहते समझ लेने की क्षमता हो, समझना चाहिए कि वही अपने उपक्रम का मेरुदण्ड हैं। ऐसे व्यक्ति जहाँ भी दायित्व संभालते हैं, वही सफलता के पर चाँद लगा देते हैं, साथियों की तुलना में दस कदम आगे ही रहते हैं। ऐसे ही लोगों को सेना का सेनापति और कारोबार का मैनेजर बनाया जाता है। यदि उनकी समझदारी अनुभवों पर सही आकलन कर सकने की क्षमता पर आधारित रही तो समझना चाहिए कि सफलता की आधी मंजिल पार हो गई। महत्वपूर्ण कार्य कर गुजरने वालों में से प्रत्येक को दूरदर्शिता, व्यवहार कुशलता और प्रबंध शक्ति का परिचय देना पड़ा है। इसके बिना भटकने, खीजने, घाटा उठाने और अपयश बटोरने के अतिरिक्त ओर कुछ हाथ नहीं आता। जिस भी सुसंचालन का सौभाग्य उपलब्ध नहीं हुआ, वह जिस प्रकार लंगड़ाते गिरते पड़ते चलता रहेगा। पर दबाव बढ़ जाने पर जो हाथ में हैं वह भी गंवा बैठेगा और सर्वसाधारण की दृष्टि में अयोग्य, अनाड़ी या उपहासास्पद ही बन कर रहेगा।
संस्थाएँ उसी आधार पर चलती है। कुशल संयोजन उन्हें उन्नति के शिखर पर पहुँचा देता है, जबकि अयोग्य के उस स्थान पर जा विराजने पर पतन का सिलसिला चल पड़ता है। और किये कराये को चौपट करके रख देता है। सद्गुणों में, यदि प्रमुखता देने योग्य किसी को गिना जाय तो प्रथम स्थान व्यवस्था बुद्धि को ही देना पड़ेगा।
वह विभिन्न प्राकृतिक लोगों को एक धागे में बाँध कर सफल होती हैं वही संकट की पूर्व सूचना देती है और साथ ही यह काम भी उसी का हैं कि समय रहते ऐसे उपाय खोजे, जिसमें आशंकाएँ निरस्त होती चलें, और सुसंभावना समय समय पर सामने आती रहै। सूत्र संचालन के कार्य व्यवस्था, बुद्धि वालों के हाथ जाकर ही श्रेय प्राप्त करते और दूसरों के लिए उदाहरण बनते हैं।
प्रश्न यह उठता है कि क्या हर किसी के लिए इस महान विभूति का संपादन करना संभव है? इसके उत्तर में एक ही बात कही जा सकती है। मानसिक संरचना की दृष्टि से प्रायः सभी मनुष्य समान स्थिति के होते हैं। जन्मजात रूप से विशेष प्रतिभा का चमत्कार तो जब कभी भी अपवाद रूप में देखा जाता है। प्रगति शीलता किसी भी स्तर की क्यों न हो, वह अपने ही लगन भरे प्रयत्नों से अर्जित करनी पड़ती है। जन्म से कोई डॉक्टर, वकील, प्रोफेसर, इंजीनियर आदि की विशेषता साथ लिए पैदा नहीं होता। इन्हें अर्जित करने के लिए सिखाने वाले विद्यालयों में भर्ती होना और व्यवहारिक अनुभव सिखाने वाले मार्गदर्शक से तब तक अनुभव अर्जित करना पड़ता है, जब तक कि उस विषय में कुशलता उपलब्ध न कर ली जाय। इसमें सिखाने वालों का जितना श्रेय हैं, उससे अधिक सीखने वालों की दिलचस्पी, लगन और मेहनत का है। यदि ऐसा न होता तो एक ही विद्यालय के, एक ही शिक्षण क्रम के अंतर्गत रहने वाले छात्रों में से कुछ उत्तीर्ण और कुछ अनुत्तीर्ण क्यों हो जाते हैं, जो निर्धारित विषय की परिपूर्ण तैयारी में जुटे रहते हैं, नकल, टीप के आधार पर, धमकी रिश्वत आदि के सहारे जो किसी प्रकार उत्तीर्ण भी हो जाते हैं, उन्हें तब भारी कठिनाई का सामना करना पड़ता है, जब सौंपे गये कार्य को ठीक तरह पूर्ण नहीं कर पाते और अनौचित्य के अपराध में पदोन्नति के दिशा में बढ़ ही नहीं पाते।
मस्तिष्क संरचना ऐसी है जिसे काम देने और उत्साह और साहस के आधार पर विकसित होने का अवसर दिया जाय, तो सीलन में पड़े रहने वाले चाकू की तरह उसकी धार मेथरी हो जाती है और जंग चढ़कर निकम्मे स्तर का बना देती है। इच्छा शक्ति की महिमा गाने वाले मनो वैज्ञानिक थकते नहीं। संकल्प को प्रगति का मूल भूत आधार माना गया है। दिलचस्पी लेने वाले संपर्क परिवार से ही इतना कुछ सीख लेते हैं, जितना कि उपेक्षा दृष्टि वाले हजार कोशिश करने पर भी नहीं सीख पाते।
संसार में असंख्यों व्यक्ति ऐसे हुए हैं। जिन्हें किसी प्रकार साँगोपाँग प्रशिक्षण प्राप्त करने का अवसर नहीं मिला, सहायता करने वालों का कोई सहयोग न बैठ सका, पर अपनी प्रबल उत्कंठा के बल पर उपलब्ध साधनों का टूटा फूटा आश्रय लेकर ही आगे बढ़ते रहै। उत्कंठा का चुम्बकत्व अभीष्ट स्तर का आकर्षण बनाये रहता है और जहाँ तहाँ से अपनी बिरादरी के बिखरे कणों को समेट बटोर कर अपने ज्ञान भण्डार को भर लेता है। वैज्ञानिक आविष्कारकों में से कितने ही ऐसे हुए है, जिनने अपनी लगन, मेहनत ओर दिलचस्पी के आधार पर अनेकों प्रयोगों को बार बार किया और अनेकों बार असफलताएँ प्राप्त करने के उपरान्त भी निराश न होने तथा सत्प्रयास करते करते अतंतः आविष्कार करने में सफलता पायी। जेल के एक कैदी से, परमपूज्य गुरुदेव को यह जानने का अवसर मिला कि उसने बचे हुए समय का उपयोग लोहे के तसले को सिलेट बनाकर केकड़ों से पेंसिल का काम लेते हुए साथियों में से जो कुछ जानते थे, वे उनसे पूछ पूछ कर अंग्रेजी पढ़ना लिखना सीख लिया। एक पुराना अखबार कहीं से हाथ लग जाने पर उसी से पाठ्य पुस्तक का प्रायोजन पूरा कर लिया। विदेश में दिन भर मजदूरी करने वाले श्रमिकों में से कितने ही होते हैं, जो रात्रि पाठशाला में दो घण्टे समय लगाते हुए धीरे धीरे इच्छित विषय के विद्वान पदवीधारी बन जाते हैं। कोई प्रयत्नशील प्रकृति का व्यक्ति यह शिकायत करते नहीं सुना गया कि उसे इसलिए पिछड़ना पड़ा कि परिस्थितियाँ अनुकूल नहीं थी। उदारचेताओं ने आगे बढ़कर उस पर अनुदान नहीं बरसायें। स्मरण रखने योग्य यह तथ्य है कि मनुष्य को परावलंबी स्तर का प्रकृति ने बनाया नहीं। उसके पास ऐसा व्यक्तित्व जन्मजात रूप से विद्यमान रहता है, जो यदि चाहे, तो अपने सामर्थ्य, साहस और श्रम के बलबूते ऐसे काम कर सकता है, जिनके संबंध में साधन संपन्नों को भी आश्चर्यचकित हो कर रह जाना पड़ता है। वर्ल्ड रिकार्ड की गिनीज बुक में ऐसे अनेकों उदाहरण अंकित हैं, जिनने सर्वदा विपरीत परिस्थितियों में भी अपने सीमित साधनों के सहारे चकित कर देने वाली सफलताएँ अर्जित कर दिखाई। छोटे से बड़े बनने वालों में से प्रायः प्रत्येक को ही अपनी प्रचण्ड इच्छा शक्ति के सहारे आगे बढ़ने का साहस उभारना पड़ा है। साहस ने शक्ति दी हैं और उसे सुनियोजित करके सामान्यों को असामान्य बनाने का अवसर मिला है।
प्रबंध कर लेने की क्षमता अर्जित कर लेना भी संभावित प्रगति क्रम से भिन्न नहीं है। सतर्कता पूर्वक ध्यान देने, बारीकी से समस्याओं को समझने और अवसर मिलते ही अभ्यास करने लगने से कितने ही व्यक्ति उन कामों को सफलता पूर्वक करने लगे, जिनके लिए वे आरंभ में नौकरी करते थे और परिश्रम के बदले सीमित पैसे प्राप्त करते थे। सभी जीवन भर मजदूरी करते रहे, पर जिन्होंने बारीकी से दृष्टि गड़ाई और सीखने की इच्छा शक्ति नियोजित की, उसकी क्षमता सहज ही बढ़ती चली गयी और एक दिन ऐसा आया कि वे उस रास्ते चलते सीखे हुए कार्य को कुशलता पूर्वक संपन्न करने में सक्षम हो गये। मजदूर स्तर के वे व्यक्ति फलता फूलता व्यवसाय चला सकने में सामर्थ्य हुए॥ पिछड़ेपन के साथ आजीवन लगे रहने वालों में से अधिकाँश ऐसे होते हैं, जो यथास्थिति में संतुष्ट रहते और आगे बढ़ने की उमंग को विकसित ही नहीं होने देते। प्रबंध शक्ति का विकास भी इसका अपवाद नहीं है। कोई यदि किसी संदर्भ में दिलचस्पी ही न ले उत्सुकता ही प्रकट न करे चिंतन मनन के तथ्य को प्रसुप्त स्थिति में ही पड़ा रहने दे, आस पास की परिस्थितियों पर नजर ही न डाले और उनसे कुछ अनुभव ही संचित न करें, तो मस्तिष्कीय क्षमता का विकास अपने आप कहाँ विकसित होने वाला है।
मनुष्यों में से अनेकों ऐसे होते हैं, जो देखने में चलते फिरते, काम करते और बोलते चालते दीखते हैं साधारणतया जागृत ही कहा जायेगा, पर वस्तुतः उनकी सूक्ष्म दृष्टि सोयी रहती है। वे घटनाओं को देखते तो हैं, पर उनके साथ जुड़े कारणों को समझने पर ध्यान नहीं देते। ऐसे लोग जिस तिस प्रकार जिंदगी के दिन ही पूरे कर पाते हैं। व्यक्तित्व का विकास न होने से सूक्ष्म दृष्टि का उभार न आने से वे नर वानरों की तरह पेट और प्रजनन के कोल्हू में ही पिलते रहते हैं, प्रगति उन्हें देखकर मुँह मोड़ लेती है।
ईद गिर्द के वातावरण का भी जनसाधारण पर असाधारण प्रभाव पड़ता है। अनुकरण प्रिय प्रवृत्ति होने के कारण मनुष्य वही सीखता है, जो उसके समीपवर्ती वातावरण में होता देखा जाता हैं बच्चे परिवार में बोली जाने वाली भाषा को अनायास ही सीख लेते हैं और आचार विचार की वही शैली अपना लेते हैं, जो उनके निकटवर्ती लोगों द्वारा प्रयुक्त की जाती हैं। क्योंकि लम्बे समय से हम लोग सामन्तशाही के उत्पीड़न में रहते रहते न केवल आर्थिक सामाजिक त्रास सहते हैं, वरन् चिंतन और चरित्र की उत्कृष्टता भी गवा बैठते हैं और फूहड़पन की रीति नीति अपनाये रहने के अभ्यस्त हो गये है। ण्सा कुछ प्रकाश पुँज समीप में उगता नहीं, जो शालीनता ओर जागरुकता के समानान्तर शिक्षा देकर प्रगति शीलता अपनाने के लिए प्रेरित कर सकें। ऐसी दशा में ऐसी पुस्तकों का सहारा ना अनिवार्य हैं जो मनुष्य को सुसंस्कृत बनाने की दिशा में आगे बढ़ा सके।
स्वाध्याय प्रयोजन के अतिरिक्त लोक शिक्षण की जो विधाएँ जहाँ उपलब्ध हैं वहाँ उनका प्रयोग करना चाहिए। लोगों को एकत्रित करने के लिए ऐसे आयोजन किये जा सकते हैं, जो चलती फिरती व्यक्तित्व विकास की आवश्यकता पूरी करती रह सकें। कुछ आयोजन परम्परागत रूप से भी संपन्न होते रहते हैं, जिनमें समुदाय अपनी मान्यताओं के अनुरूप स्वतः ही एकजुट हो स्थान विशेष पर अनायास ही पूर्व प्रचलन के अनुसार एकत्र होता रहता है। ऐसे अवसरों पर चूका नहीं जाना चाहिए ख्वरप् व्यक्तित्व विकास की अति महत्वपूर्ण आवश्यकता को पूरा कर सकने वाले लोक शिक्षण को चलाने के लिए नये सिरे से नया प्रयत्न करना चाहिए।
व्यक्ति को नहीं आदर्श को पूजो मेरे बलिदान को मेरे जीवन से मत तोलो, मेरे देश की परम्पराओं से तोलो, मेरे पूर्वजों के शौर्य, पराक्रम और कीर्ति से तोलो। मेरी माँ के दूध की पवित्रता से तोलो, मेरे धर्म की महानता से तोलो। अगर मैं अपने बलिदान में इनसे घटिया पड़ूँ तो मेरे लिए प्रार्थना करो कि मैं बार बार जन्म लूँ और अपने बलिदानों को अपने राष्ट्र की इस कीर्ति कसौटी पर खरा उतरने में समर्थ बनाऊँ।
मेरे प्राणों का इतना मूल्य मत लगाओ, मेरे मन के संकल्पों को इतने अतिरंजित आदर की दृष्टि से मत देखो। मेरे शरीर को पूजा के थाल में इतना दुर्लभ फूल मत घोषित करो यह दरअसल कुछ नहीं हैं तुच्छ हैं निरर्थक है उस मिट्टी के सामने जिसे मैं मातृ भूमि कहता हूँ, जिसके एक कण की तुलना में तीन लोक का एक छत्र साम्राज्य भी मेरे लिए बेहद छोटा है।
सुभाषचन्द्र बोस
साधारणतः मन काम काजी कल्पनायें किया करता है। आवेश तो कभी कभी ही भँवर चक्रवात की तरह उठते और छोटे बालक की तरह उसका मचलना देखते ही बनता है। ऐसा कभी कभी ही होता है। क्रोध में आदमी पागल हो जाता है और उस आवेश में ऐसा भी कुछ कर बैठता है जो अपने लिए या दूसरों के लिए घातक हों। क्रोध के अतिरिक्त दूसरा आवेश काम का है। कामुकता का उभार भी ऐसा हैं कि उचित अनुचित का ज्ञान नहीं रहता। व्यक्ति ऐसे आचरण करने, वचन बोलने लगता हैं जिनके कारण पीछे पश्चाताप करके लज्जित होने के अतिरिक्त कोई मार्ग शेष नहीं रहै।
मानसिक उद्वेग इसी स्तर के कई और भी है। जिनकी गति तो उन्माद जैसी नहीं होती पर जीवन क्रम को अस्त व्यस्त करने और उद्धत आचरण की प्रेरणा देने में वे भी कम नहीं है॥ लोभ, लिप्सा और अहमन्यता की ललक ऐसी है जिसका आवेश पूरा करने के लिए व्यक्ति अनेक प्रकार की अवांछनीय योजनाएँ बनाता और उन्हें पूरा करने के लिए जुट पड़ता है। पाप छिपाया जाता है। मुर्दे के ऊपर जिस प्रकार कफ़न डालते हैं उसी प्रकार मन की कुत्सित अभाषाओं को भी यथा संभव गोपनीय ही रखा जाता है। यह दूसरी बात है कि अपनी प्रकृति के अनुसार वे छिपी नहीं रहती। आज नहीं तो कल प्रकट हो जाती हैं। तब जिसके भी विरुद्ध षड्यंत्र रचा गया था, उस तक सूचना पहुँचने पर वह सतर्क हो जाता है और सहज हाथ नहीं आता।
दूसरे को हानि पहुँचा सकना संभव हो या न हो पर अपनी हानि तुरन्त होती है। मस्तिष्क गड़बड़ाने लगता है जिससे मस्तिष्कीय संतुलन पर तुरन्त आघात लगे और वह उस स्थिति में ऐसे कदम उठाने की सोचने लगे जिससे प्रतिपक्षी की तुलना में अपनी ही हानि अधिक होने लगे।
आवेशों में से ऐसे भी हैं कि धारण कर्ता का अहित किये बिना नहीं रहते। भले ही प्रतिपक्षी सोचे गये आक्रमण आघात से बच जाय। बंदूक चलाने पर उसका एक आघात पीछे की ओर भी लौटता है। यदि पहले से ही सीने से सटाकर नहीं रखा गया है तो यह हो सकता है कि वह उलटे ही अपनी हड्डी पसली तोड़ दे। भले ही गोली निशाने पर लगे या न लगे।
जीवन में भली बुरी घटनाएँ घटित होती रहती हैं। सदा अनुकूलता ही नहीं रहती। दिन के बाद रात आती है। मंद पवन ही सदा नहीं चलती, आँधियाँ भी आती रहती हैं इस प्रकार संसार की परिस्थिति और मनःस्थिति का ताल मेल सदा नहीं बैठता। दोनों में से कभी किसी का, तो कभी किसी का संतुलन बिगड़ता ही रहता है। मूलतः कारण ता आवेश ही होता है पर उस उत्तेजना से काम ऐसे नहीं पड़ते हैं जिससे व्यक्तित्व का स्वरूप ही हेय बन जाता है। जिसके साथ कुछ सीधी बात नहीं बैठती, वे कभी चौकन्ने हो जाते हैं, और सोचते हैं कि आज जो दूसरों के साथ घटित हो रहा है वह कल हमारे साथ भी बीत सकता है। बिन पति पत्नियों में अनबन खटपट बनी रहती है, उनके संबंध में छोटे बच्चे या घर के दूसरे सदस्य भी ऐसा ही सोचने लगते हैं कि यही आक्रामक विपत्ति ही कहीं कभी हमारे ऊपर ही न आ धमके। जिसके प्रति शंकाशील रहने की स्थिति रहती है। उसके प्रति स्नेह, सद्भाव और मैत्री देर तक नहीं टिक सकती।
विश्वास के उठ या जग जाने पर स्नेह सौजन्य की घटोत्तरी का होना स्वाभाविक है।
स्पष्ट है कि मनुष्य स्वभावतः सामूहिक सामाजिक प्राणी है। उसके अधिकाँश काम दूसरों के सहारे चलते हैं। बदले में स्वयँ भी दूसरों के काम आना पड़ता है न कोई हमारी सहायता करें न हम किसी के काम आयें तो ऐसा एकाकी जीवन काटना मुश्किल पड़ जायेगा। नीरसता छाने लगेगी। एकाकी प्रकृति के व्यक्ति अपनी आशाएं और उमंगे खो बैठते हैं। उन्हें एकाकी पन अंधेरे कोठे या टूटे खण्डहर की तरह वीरान लगता है। ऐसी बोझिल जिंदगी काटने पर भी सहज नहीं कटती। भारीपन के कारण खींच नहीं खिंचती। मित्र घटते और शत्रु बढ़ते जाते हैं।
दो कागजों को परस्पर चिपकाने के लिए गोंद की जरूरत पड़ती है। अन्यथा वे विलग ही बने रहते हैं। इसी प्रकार पारस्परिक सद्भाव का क्षेत्र बढ़ाना हो तो मानसिक स्नेह, सौजन्य आत्म भाव की अनिवार्य रूप से आवश्यकता है। यह सब मुफ्त नहीं मिलता। इसके लिए आकर्षक चुम्बक चाहिए। यह चुम्बक धातु निर्मित नहीं होता, वरन् गुण कर्म और स्वभाव की मिठास से उत्पन्न होता है।
इसके लिए वाक् का चातुर्य और शिष्टाचार कौशल सीख लेने मात्र से ही काम नहीं चल जात। ऐसा तो ठग और चापलूस भी कर लेते हैं। किन्तु परायों को अपना बनाने के लिए सच्ची और गहरी आत्मीयता का परिचय देना पड़ता है। इसकी कोई स्कूली शिक्षा नहीं होती। आत्मीयता की परिधि बढ़ानी पड़ती है। जिस प्रकार घर परिवार के लोगों को अपना माना जाता है। उसके हितों का ध्यान रखना पड़ता है वैसा ही व्यवहार आत्मीयजनों से भी रखना पड़ता है। दूसरों से सद्भाव, समर्थन सहयोग प्राप्त करने के लिए यह आवश्यक है कि पहले उत्तम आचरण स्वयँ करें बाद में वैसे ही प्रत्युत्तर की अपेक्षा दूसरों से करें।
इस विशेषता का न होना लौकिक एवं आध्यात्मिक दोनों दृष्टि से हानिकारक है। मित्र विहीन व्यक्ति को एकाकी पन ही दीखता ओर सूझता है। उसे विश्वास नहीं होता कि आड़े समय में कोई उसके काम आवेगा और प्रगति प्रयोजनों में स्वेच्छा, सहयोग प्रदान करेगा। पैसा देकर किसी को किसी प्रकार का रिश्तेदार बनाया जा सकता है और उससे झूठा सच्चा कुछ भी काम कराया जा सकता है पर वह क्षणिक व अस्थायी होता है। वैश्या की मित्रता, गिना प्रगाढ़ स्वार्थ की पूर्ति किये किसके साथ कितने दिन चलती है?
पास में भले ही साधन न हो यदि सहयोग उपलब्ध है तो इतने भर से हँसते हँसते जिया जा सकता है। इस प्रकृति के अनुरूप अपने को ढाल लेने के उपरान्त प्रशंसकों और सहयोगियों की कमी नहीं पड़ती। परायापन, शून्यता, एकाकीपन, उपेक्षा, तिरस्कार की स्थिति तो तब बनती है जब मनुष्य रूपी प्रकृति अपने मतलब से मतलब रखने वाला हो। यदि हम किसी के काम नहीं आते तो यह भी अनुमान लगा लेना चाहिए कि अपने काम भी कोई आने वाला नहीं है।
मन को बस में करने की चर्चा तो बहुत चलती रहती हैं। मनोनिग्रह के अनेक उपाय और विधान बताये जाते हैं, पर उन सब पर शतप्रतिशत खरा उतरने वाला एक ही उपचार हैं कि एकाग्रता संपादन की अपेक्षा मन की कषाय कल्मषों को धोया, हटाया व सुधारा जाय। अपनी प्रकृति रूखी, स्वार्थी और चिड़चिड़ा न हो सबके साथ सहज सज्जनोचित संबंध बने रहेंगे और मित्रता का क्षेत्र सुविस्तृत बनता चला जायेगा। इस स्थिति को बनाये रहने या बढ़ाते चलने के लिए आवश्यक है कि सौजन्य का अनुपात बढ़ता रहे। माना कि सभी व्यक्ति सज्जन नहीं होते और उनके क्रिया कलाप में भी खोट होता रहता है। इस खोट को निकालने या घटाने के लिए यह आवश्यक है कि उन्हें सत्संग लाभ मिलता रहे। सत्संग से हेय प्रकृति भी सुधर जाती है।
सत्संग का बढ़ा चढ़ा माहात्म्य शास्त्रकारों ने बताया है। इसका कारण स्पष्ट है कि जिस प्रकार पत्ति लोगों की घनिष्ठता पतन पराभव की दिशा में चल पड़ने की प्रेरणा देता है, उसी प्रकार सत्संग भी व्यक्ति को सही दिशा में उसकी दिशाधारा अग्रगामी करने में कारगर सिद्ध होता है। यदि अपना मन कच्चा न हो तो बेधड़क ओछे लोगों को भी अपनी संपर्क परिधि में लिया जा सकता है और सौजन्य, शिष्टाचार एवं व्यवहार का अभ्यास कराया जा सकता है।
मेंहदी दूसरों के लिए पीसी जायें तो पीसने वाले के हाथ लाल हो जाते हैं। छात्रों को पढ़ाने वाले अध्यापक भी अपना ज्ञान परिपक्व कर लेते हैं। अनपढ़ लोगों को सुसंस्कारी बनाने का कार्य भी ऐसा ही है, जिसे करते रहने का स्वभाव बना लेने पर न केवल दूसरों का ही व्यक्तित्व निखरता है वरन् अपने आप भी दिनों दिन अधिक श्रेष्ठता की ओर बढ़ने लगता है। यह दुहरा पुण्य प्रायोजन हैं। इसमें अपनी और दूसरों की भलाई का सघन सहयोग समाविष्ट है। सत् शिक्षण वह उपाय है जिससे निज के मन का अनगढ़पन तेजी से सुधरता है।
एकाग्रता का अभ्यास भी अपने स्थान पर उपयोगी हैं। ध्यान−धारणा में सफलता प्राप्त करने के लिए मन की बेतुकी कल्पनाओं पर नियंत्रण स्थापित करना होता है। इसके लिए अपने कुसंस्कारों से भिन्न एवं विपरीत प्रकृति के विचारो का भण्डार अपने आप जमा करना पड़ता है। क्योंकि कुविचारों का आक्रमण होता है। दोनों प्रकार के विचारों की टक्कर होनी चाहिए। कुकर्म तत्कालिक लाभ की दृष्टि से लाभदायक भले ही प्रतीत हो पर विचार करने पर उसके दूरगामी परिणाम भयावह ही होते हैं। हमें अपने मन में उठने वाले त्वरित लाभ के प्रलोभनों के सम्मुख दूरगामी दुष्परिणामों की मण्डली खड़ी कर देनी चाहिए। इतना करने पर सद्बुद्धि का सही निर्णय करने का अवसर मिल जाता है। जबकि अभाव ग्रस्त मनःस्थिति में दूरदर्शी विवेकशीलता को अपना निर्णय प्रस्तुत कर सकने का अवसर ही नहीं मिलता।
कुविचारों ओर दुस्स्वभावों से पीछा छुड़ाने का तरीका यह है कि सद्विचारों के संपर्क में निरन्तर रहा जाय। उनका स्वाध्याय, सत्संग और चिंतन, मनन किया जाय। साथ ही अपने संपर्क क्षेत्र में सुधार कार्य जारी रखा जाय। सत्प्रवृत्ति संवर्धन का सेवा कार्य किसी न किसी रूप में कार्यान्वित ही करते रहा जाय। इतना करने पर ही मन को स्वच्छ, निर्मल व स्वयँ को प्रगति के पथ पर अग्रगामी बनाये रखा जा सकता है।
बात उन दिनों की है जब महाभारत युद्ध चल रहा था शाम हो चुकी थी। कृष्ण और अर्जुन शिविर में विश्राम कर रहे थे। मौन, अर्जुन ने भंग किया, पूछा -“महाराज। लोग मुझे बहुत बड़ा धनुर्धर और शास्त्रज्ञ समझते हैं, पर मुझे ऐसा लगता नहीं कि मैं इतना कुछ हूँ। ”
भगवान मुस्कुराते हुए बोले -“ वस्तु स्थिति तो कुछ ऐसी ही है, पर जब तुम मेरे काम के लिए उद्यत होते हो, तो वह संग कुछ संभव होता चला जाता है, जो सामान्य स्थिति व परिस्थिति में तुझ जैसे योद्धा के लिए असंभव बना रहता है। “
“ फिर उसमें अपना क्या भला हैं? “ अर्जुन ने दूसरा प्रश्न किया।
केशव बोले “इहलोक में यशस्वी बनोगे और परलोक में सद्गति मिलेगी, क्योंकि तुम भगवान के पुनीत कार्य में सहभागी रहें हो। ”
अर्जुन का समाधान हो चुका था।
संतरा रस से भरा हो तो कितना सुन्दर लगता है, पर यदि उसका रस निचोड़ लिया जाय तो खोखले छिलके को देखने तक का मन नहीं करता।
पेड़ के तने को गोद दिया जाये तो उस स्थान पर गोंद जैसे फफोले उठने लगेंगे। थोड़े गोंद पाने का तात्कालिक लाभ तो है पर साथ ही पेड़ की बढ़वार रुक जाने और सूखने लगने का खतरा भी स्पष्ट है।
खेत की मेंड़ बँधी रहे और पानी रुका रहे तो फसल अच्छी पैदा होगी, पर यदि मेंड़ जहाँ तहाँ से टूटी हो तो और वर्षा का पानी बिना रुके निकलता रहें तो नमी के अभाव में फसल चौपट होना निश्चित है।
किसी मकान के नल में ऊपर और नीचे टोंटी तो हो, पानी वाली खुली रखने से पानी नाली में बहता रहेगा और ऊपर वाले किरायेदारों को प्यास से मरना पड़ेगा मस्तिष्क और ज्ञानेन्द्रियाँ ऊपर के किरायेदार हैं, यदि यौनाचार से जीवन रस बेहिसाब बहाया जाय तो फिर आँख, कान आदि की क्षमता और मेधा का भण्डार असमय में ही चूक जायेगा।
अगली सदी जापानियों की होगी
छोटी, आकर्षक घड़ी को देखकर प्रसन्नता से छोटी बच्ची ने कहा मूल्य तो उपयुक्त है ठीक हैं। विक्रेता ने विश्वास दिलाया बिल्कुल नया मॉडल हैं, इसका हर एक कल पुर्जा जापान का बना हुआ है। आज जापान के बने हुए कैमरे, कारें, कैलकुलेटर, घड़ियाँ आदि विश्व के कोने कोने में छाई हुई है तथा अमेरिका और यूरोप की अपेक्षा अधिक अच्छी व सस्ती भी है। द्वितीय महायुद्ध के पूर्व जापान विश्व के औद्योगिक क्षेत्र में अग्रणी था। उसके द्वारा निर्मित वस्तुएँ सस्ती, आकर्षक व ज्यादा दिन तक चलने वाली होती हैं। इस कारण बच्ची ने पूछा।
उत्तर मिला जापानियों के मस्तिष्क में व्यक्तिगत स्वार्थ की भावना की अपेक्षा राष्ट्रीय हित की भावना कही अधिक होती है। यही उनकी सफलता का मूल कारण है। उन्हें यह खुशहाली अचानक ही प्राप्त नहीं हो गयी। उनकी समुचित शिक्षा, ज्ञान, कार्य तत्परता एवं लगन से यह उपलब्ध हुई है। हर जापानी श्रमिक एक सप्ताह में 40 घण्टे कार्यरत रहता है। उसकी आस्था, ईमानदारी के साथ दिन भर कार्य करके खरे पसीने की मजदूरी लेने की है। वे कुछ भी कमाते हैं उसमें व्यक्तिगत लाभ की अपेक्षा राष्ट्रीय हित तथा ग्राहक के स्वार्थ का समान ध्यान रखते हैं।
जापान ने विगत 30 -35 वर्षों में अपना खोया हुआ औद्योगिक वर्चस्व पुनः प्राप्त कर लिया है। विज्ञजनों द्वारा कहा जाता है कि अगली सदी जापानियों की होगी।
भारतीय संस्कृति में प्रतीक पूजा का प्रचलन है। मूर्तियों में, नदी, पर्वत, वृक्ष, पशु-पक्षियों में, यहाँ तक एक चूल्हे, चक्की, ऊखल, फसल जैसे उपकरणों की पूजा का प्रावधान है। स्थूल दृष्टि से हम सब जड़ पूजा का उपहासास्पद प्रयोग प्रतीत होता है। किन्तु वस्तुतः वैसा हैं नहीं। सूक्ष्म तक पहुँचने के लिए स्थूल तक का प्रयोग किया जा सकता है। सूक्ष्म जीवाणुओं और विषाणुओं को खुली आँखों से नहीं देख पाते हैं। तो इसलिए माइक्रोस्कोप का प्रयोग किया जाता है। मनुष्य की भाव संवेदना अति सूक्ष्म होती है। उनकी स्मृति और जाग्रति के लिए उपकरणों का प्रयोग किया जाता है। प्रतीक इसी की पूर्ति करते हैं। भाव संवेदनाओं के उभार एवं परिष्कार के लिए अध्यात्मवेत्ताओं ने इसे उचित एवं आवश्यक माना है।
ज्ञानवृद्धि के लिए पुस्तक की आवश्यकता पड़ती है। विचार अभिव्यक्ति के लिए लेखनी का उपयोग करना पड़ता है। विचार सूक्ष्म हैं इसकी कोई आकृति नहीं बन सकती, पर लेखनी से लिपि बद्ध करके उन्हें मूर्तिमान बना दिया जाता है। इन लिखे पृष्ठो को पढ़ने से उन्हीं भावों के साथ पाठक का संबंध स्थापित हो जाता है। जो लेखक के मन मस्तिष्क में थे इस प्रकार कागज पर लिखे अक्षर सर्वथा स्थूल होते हुए भी अभीष्ट चिंतन के आदान प्रदान का साधन बन जाते हैं। प्रतीक पूजा की प्रतीकवाद की उपयोगिता इस आधार पर सहज ही समझी जा सकती हैं
निराकार वादी भी कई प्रकार के प्रतीकों का उपयोग अपनी श्रद्धाभिव्यक्ति के लिए करते हैं। ईसाइयों में क्रूस के चिन्ह का सम्मान है। मुसलमान काबा की तरफ मुंह करके नमाज पढ़ते हैं और हज जाकर संगे अवसाद का बोसा लेकर अपनी यात्रा को सफल मानते हैं। ताजिये निकालने और मस्जिद को खुदा का घर मानने की मान्यता भी प्रतीक पूजा कही जा सकती हैं राष्ट्रीय झण्डे का सम्मान और अभिवादन किया जाता है। बुद्धिवादी लोग भी अपने पूर्वजों के चित्र टाँगते और उनका सम्मान करते हैं। आर्यसमाजी और पारसी धर्मावलंबी अग्नि पूजा करते हैं। बच्चों को क - कबूतर और ख -खरगोश पढ़ाया जाता है साथ ही गिनती सिखाने के लिए बाल फ्रेम की गोलियों का प्रयोग होता है। किन्डर गार्टन पद्धति में लकड़ी के टुकड़े जोड़कर अक्षरों की शक्ल बनाने की विधि शिक्षण प्रक्रिया में सम्मिलित रखी गयी। इन्हें भी कहने वाले प्रतीक पूजा कह सकते हैं, पर इससे किसी को कोई हानि नहीं होती, और न प्रयोगकर्ताओं को उपहासास्पद ठहराया जाता है।
भारतीय धर्म संस्कृति के प्रतीक पूजा के माध्यम से उपयोगी उपकारी पदार्थों शक्तियों एवं व्यक्तियों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की जाती है और उसमें जो श्रेष्ठता सन्निहित होती हैं, उसके प्रति सम्मान व्यक्त करने एवं अपनाने का भाव है। यह सोचना व्यर्थ है कि प्रतीक पूजा वाले इतने मूर्ख हैं जो प्रतिमाओं को ही देवता या परमेश्वर मान लेते हैं मूर्ति खण्डन हो जाने पर उसे जल प्रवाह कर देते हैं। और उसके स्थान पर नयी प्रतिमा स्थापित करते हैं। नवरात्रि में देवी की भाद्रपद में गणेश की प्रतिमायें स्थापित की जाती है ओर धूम धाम के साथ किसी जलाशय में विसर्जित कर दी जाती है। यदि उन प्रतीकों को भगवान या देवता माना जाता तो उन्हें इस प्रकार प्रवाहित करने की धृष्टता करने की बात कोई सोच नहीं सकता था। हर कोई जानता है कि प्रतीक प्रतीक है। उनके माध्यम से भावनाओं को उभारने का प्रयोजन सिद्ध किया जाता है। वेद, कुरान, गीता, बाइबिल, जेन्दाबस्ता, गुरु ग्रंथ साहिब आदि ग्रंथों के प्रति हर धर्म में श्रद्धा सम्मान भरी अभिव्यक्ति होती है। यह छपे कागजों का नहीं, उनके ग्रंथों के लिखे विचारों का ही सम्मान है। भारतीय संस्कृति में प्रतीक पूजा को इसी दृष्टि से स्थान दिया गया हैं उसमें न तो उपहास की कोई बात हैं और न जड़ पूजा पर आक्षेप करने की। यह उत्कृष्ट चिंतन को दिशा देने की सरल, सुबोध और सर्वोपयोगी प्रक्रिया है। भारतीय तत्त्ववेत्ताओं का प्रतीकवाद की स्थापना में यही प्रयोजन रहा कि ब्राह्मीय चेतना में सन्निहित मानवी गरिमा को समुन्नत करने वाली सत्प्रवृत्तियों की महत्ता मनुष्य को समझायी जाय और उसके प्रति असीम श्रद्धा रखने के लिए कहा जाय। देव प्रतिमाएँ भावात्मक उत्कृष्टता की प्रतीक है। देवत्व की परिधि में जो भी गुण, धर्म, स्वभाव आते हैं। उन सभी को आकृतियाँ देकर कल्पनात्मक रहस्यवाद का परिचय दिया गया है। महामनीषियों के इस उद्देश्य को समझा जा सके तो ही हम देव मान्यता और प्रतीक पूजन का समुचित लाभ उठा सकते हैं।
प्रतीक वाद या देववाद का एक पक्ष हैं -दिव्य भावनाओं को आलंकारिक आकृतियाँ देकर उनके प्रति जन साधारण में अगाध आस्था उत्पन्न करना उनकी स्थापना अंतःकरण में करना और व्यवहार में उतारने की चेष्टा को प्रदीप्त करना देव आराधना के लिए किये जानें वाले उपचारों का उद्देश्य है। प्रतीक उपासना से प्रेरणा पाकर मनुष्य दिव्य गुण संपन्न बन सके, ऋषिगणों का यही उद्देश्य इस पुण्य प्रयोजन के पीछे रहा है।
संयोगों की शृंखला में कई बार ऐसी घटनाएँ घट जाती है, जो परस्पर इतने आश्चर्यजनक साय संजाये होती है कि देख सुन कर अचम्भा होता है। इतने पर भी सच्चाई यह है कि यहाँ संयोग कुछ है नहीं। संयोग ओर वियोग के रूप में जो कुछ भासता है, उसके पीछे भी एक सुनियोजित तारतम्य है और परोक्ष की प्रेरणा भी है। यह बात और है कि उसे हमारी बुद्धि समझ और सुलझा नहीं पाती।
अपने सौर परिवार पर विचार करें, तो पृथ्वी जैसी स्थिति, परिस्थिति और वातावरण वाले कई ग्रह उपग्रह यहाँ विद्यमान है। इसके अतिरिक्त आकाश गंगा के दूसरे सौरमण्डलों में से अनेकों में ऐसी अनुकूलतायें हो सकती है जिनमें जीवन धारण करने योग्य वातावरण हो ऐसा वैज्ञानिकों का अनुमान है। इन सबके बावजूद वास्तविकता यह है कि विशेषज्ञ अपने लम्बे अनुसंधान अन्वेषण के उपराँत भी किसी में जीवन का कोई चिन्ह ढूंढ़ निकालने में अब तक विफल रहे है। तो फिर पृथ्वी में जीवन के विकास को आकस्मिक मान लिया जाय? नहीं ऐसा मानना भी अनुचित होगा। वस्तुतः इस संसार में ऐसा बहुत कुछ घटित होता रहता है, जिसे बुद्धि के स्तर पर जान समझ पाना संभव नहीं और जब घटनाएँ अनबूझ स्तर पर पहेली बन जाती हैं, तो उन्हें आश्चर्य -अचम्भा, संयोग - वियोग जैसे नामों से पुकारा जाने लगता है। पृथ्वी के संबंध में जब गहनतम जाँच पड़ताल की गयी तो विदित हुआ कि अपनी धुरी पर 231/2 डिग्री कोण से झुकी हुई है। इसके अतिरिक्त इसके चारों ओर ओजोन की सुरक्षा छतरी है। यह दोनों विशेषतायें ऐसी है, जो सूर्य से आने वाली ऊर्जा और ऊष्मा को नियंत्रित कर यहाँ के वनस्पतियों और जीवों की रक्षा करती है। यदि उक्त विशिष्टताएँ नहीं रही होती, तो अपना यह ग्रह पिण्ड आज आबाद नहीं होता। अन्यों में अनुकूल क्षमताओं का अभाव है। फलतः वे अपने प्रादुर्भाव काल से ही जीवनहीन दशा में पड़े हुए हैं। इससे ऐसा लगता है कि जीवन विकास के लिए महत्वपूर्ण ब्राह्वा स्तर की समानता ही नहीं हैं, महत्व इस बात का भी है कि जीवनदायी सूक्ष्म अनुकूलताएँ किस प्रकार की कितने अंशों में है। विधाता ग्रह गोलक के इस विभेद को भलीभाँति समझाते हैं और तद्नुसार जीवन धारण की प्रेरणा उभारते हैं। पृथ्वी जीवन युक्त है इसका एक ही कारण है कि यहाँ जीवन योग्य हर प्रकार की अनुकूलताएँ है। दूसरे पिण्डों में यह आधी अधूरी हैं इसीलिए वे जीवन शून्य हैं। यह एक वैज्ञानिक सत्य है कि दैनिक जीवन के प्रसंगों में हम उनके सूक्ष्म सत्यों से अनभिज्ञ रहते हैं, अतएव सत्यों के संयोगों की श्रेणी में रख देते हैं।
घटना इंग्लैंड की है सन् 1962 की एक प्रातः स्टारब्रिज शहर की एक सुनसान सड़क पर दो वाहन विपरीत दिशा में चले आ रहे थे। उनमें से एक मोटर साइकिल और एक कार थी। असावधानी वश दोनों में परस्पर टक्कर हो गई। दुर्घटना ऐसी नहीं थी जिसे गम्भीर कहा जा सकें। अंतिम क्षणों में दोनों ने अपने अपने वाहनों को काफी हद तक नियंत्रित कर लिया था, फलस्वरूप छोटी हानि होकर वह टल गयी। चालकों को कोई बहुत नुकसान नहीं पहुँचा। चोट भी इतनी नहीं थी जिसके कारण उनको अस्पताल में भर्ती कराया जाय। दोनों का परिचय पूछा बया, तो उनमें विचित्र साम्य था। दोनों का नाम फ्रेडरिक चार्ल्स था और वे एक ही शहर के रहने वाले थे पर एक दूसरे से सर्वथा अपरिचित थे। ऐसे ही एक विचित्र संयोग का उल्लेख ब्रिटिश अभिनेता एडवर्ड. एच.सर्दन ने अपनी पुस्तक “ दि मेलन्कोलिक टेल ऑफ भी” में किये है। वे लिखते हैं कि एक बार उनके पिता को वेल्स के राजकुमार ने एक सुँदर नक्काशी दार सोने की माचिस दी। आखेट के दौरान वह कहाँ खो गयी। पिता ने उसी की दूसरी अनुकृति बनवा ली और उसे अपने छोटे बेटे सैम को दे दी। सैम ने बाद में अपने आस्ट्रेलियाई मित्र लेबरटच को भेंट कर दी। इसके बीस वर्ष बाद एक दिन सैम शिकार खेलने गया, तो रास्ते में उसकी मुलाकात एक वृद्ध किसान से हो गयी।
प्रातः जब वह खेत जोत रहा था, तो अचानक उसके हाथ वही सोने की माचिस लग गयी, जो उसके पिता ने शिकार के दौरान खोई थी। वह इस घटना से इतना प्रभावित हुआ कि अपने बड़े भाई एडवर्ड को एक चिट्ठी लिखी जो तब अमेरिका की यात्रा पर था। एडवर्ड ने जब उसका पत्र खोला तो वह एक ट्रेन में सफर कर रहा था। संयोग की बात उस समय उसके बगल में एक अन्य अभिनेता आर्थर लारेन्स भी मौजूद था। जब उसने अपने भाई और मूल माचिस प्राप्ति की कथा उसे सुनाई तो हैरान लारेन्स ने उसकी दूसरी अनुकृति तुरन्त प्रस्तुत कर दी जो लेबरटच ने उसे कुछ वर्षों पूर्व उसे प्रदान की थी।
एक अन्य घटना बर्कले कैलीफोर्निया की है टीटा नामक एक महिला एक दिन खरीददारी करने बाजार गई। जब वह वापस लौटी तो, कमरे की चाबी रास्ते में खो चुकी थी। वह ताला खेलने का उपाय करने लगी, पर सफल न हो सकी। दस मिनट बीत गये, तभी डाकिया आया ओर उसके हाथ में एक लिफाफा थमा गया। चिट्ठी शीटल से आई थी और उसके भाई की थी। उसने पत्र खोला तो आश्चर्य चकित रह गयी। लिफाफे में चिट्ठी के साथ उसके कमरे की एक दूसरी चाबी भी पड़ी थी, जो वर्षों पहले सामान के साथ उसके भाई के पास पहुँच गयी थी पत्र के माध्यम से उसको ही उसने लौटाया था यह कुँजी भी तब मिली जब उसकी स्वयँ की खो चुकी थी। कैसी विचित्र बात है। इस सम्पूर्ण घटना का विवरण माइकल . एय.मैजेनिगा. ने अपने ग्रंथ सटल साइंस में दिया है।
उक्त घटनाएँ विस्मयकारी लग सकती है। पर यह साधारण संयोग हैं, ऐसा नहीं कहा जा सकता। इसी मत का समर्थन करते हुए मूर्धन्य मनावैज्ञानी डी.स्कार्ट . रोगों ने अपनी रचना पेरानामल फेनो मिना इन डे टू डे लाइफ में लिखते हैं। कि दैनिक जीवन में हम जिन्हें सहज संयोग कहकर हम टाल देते हैं। उनमें कई बार ऐसा असाधारणता नजर आती है, जो अलौकिक है। संभव है अनुसंधान द्वारा इस पर से पर्दा हटाया जा सके और यह जाना जा सके कि सामान्य स्थिति में संयोग जैसा प्रतीत होता है उसमें किसी असाधारण अलौकिक सत्ता का हाथ तो नहीं।
प्रख्यात दार्शनिक जुँग ने अपने जीवन काल में ऐसी घटनाओं का बहुत गहन अध्ययन किया और निष्कर्ष निकाला कि सब घटनाएँ मूलतः मनोवैज्ञानिक अभिव्यक्तियां है। अपने जीवन के अधिकाँश भाग में वे इसी विचार पर दृढ़ रहे किन्तु जिंदगी के अंतिम कुछ वर्षों में उन्हें अपनी यह अवधारण बदलनी पड़ी। इसका एक बड़ा कारण उनका मनःचिकित्सक होना था। इस नाते उनका कई बार ऐसे रोगियों से पाला पड़ जाता, जिनकी समस्याओं से वे स्वयँ उलझन में पड़ जाते और मान्यता बदलने के लिए विवश होते। एक ऐसे ही अवसर पर उनका सामना एक महिला रोगी से हो गया। जुँग के लिए सबसे बड़ी समस्या उस स्त्री का तर्कशील स्वभाव था। उसकी दलीलें इतनी सटीक होती कि कई बार जुँग को भी निरुत्तर हो जाना पड़ता। ऐसी स्थिति में वे उसका सही उपचार नहीं कर पा रहे थे और इसी बात का विश्वास दिला पा रहें थे कि मन का एक अवचेतन स्तर भी होता है। रोगों की जड़े उसी स्तर में जमी होती है। अभी वे कोई अन्य उपाय सोचते, कि बीच में एक घटना घट गयी। मरीज ने एक सपना देखा कि उसे कोई सुनहरा स्कैबर दे रहा है। वह अपने चिकित्सक से इसकी चर्चा कर रही थी कि जुँग को अपने पीछे खट खट की आवाज सुनाई पड़ी। पलटकर देखा तो एक सुनहरा गुबरैला अन्दर प्रवेश पाने के लिए काँच पर टक्कर मार रहा है। उनने खिड़की खोल दी, गुबरैला अंदर घुसा, तो उसे पकड़ लिया। उसका सुनहरा रंग काफी हद तक गोल्डन स्कैगर से मिलता जुलता था। जुँग ने रोगी की ओर यह कहते हुए गुबरैला बढ़ाया कि यह रहा तुम्हारा गोल्डन स्कैगर। घटना से महिला हतप्रभ रह गयी। उसका तर्कशील मस्तिष्क परिवर्तित हो गया। जुँग को सफलता मिली और स्त्री कुछ ही समय में ठीक हो गयी।
उक्त घटना ने जुँग के संयोग संबंधी अपनी मान्यता बदलने के लिए बाध्य कर दिया। वे लिखते हैं कि इसे संयोग नहीं माना जा सकता। इसमें निश्चित रूप से किसी सत्ता या व्यवस्था का सूक्ष्म हाथ है। , यदि ऐसा नहीं तो गुबरीले को वहाँ आने की प्रेरणा कहाँ से मिली अथवा महिला को स्वप्न संकेत किसने दिया?इन सब प्रश्नों के उत्तर दे पाना कठिन हो जायेगा। समाधान के लिए प्रख्यात भौतिक शास्त्री एवं नोबेल पुरस्कार विजेता उल्फगैं पाँली के साथ मिल कर सन् 1952 में उसने एक सिद्धांत प्रतिपादित किया और कहा कि ऐसे प्रसंगों में एक अज्ञात सिद्धांत कार्य करता है। उनका मानना था कि कार्य कारी सिद्धांत से परे कोई चीज इसके पीछे कारण भूत है। उनकी दृढ़ धारणा थी कि दिक्−काल में दूसरे प्रकार यदि सचमुच अस्तित्व हैं तो यह सुनिश्चित है कि संयोग जैसी लगने वाली घटनाएं एक दूसरे से अविज्ञात रूप से संबद्ध है। कुछ ऐसा ही मन्तव्य विख्यात विज्ञान वेत्ता एवं अंग्रेज गणितज्ञ आर्थर कोयेस्लर ने अपनी कृतियों दि रुटस ऑफ कोइन्सिडैन्स एवं जेनस में प्रकट किया है। इससे स्पष्ट है कि यहाँ से याँग जैसा कुछ नहीं। जो है वह यह है कि हम सब चेतना की एक अविच्छिन्न डोर से परस्पर बँधे हुए हैं। और परोक्ष रूप से एक दूसरे से जुड़े है। जिस प्रकार पारस्परिकता और अविच्छिन्नता समझ में आ जायेंगी, उस दिन संयोगों का रहस्य उद्घाटित हो जायेगा और यह भी कि एक संपर्क सूत्र को और अधिक प्रगाढ़ व प्रबल कैसे किया जाय?
मिट्टी ने कुम्हार से कहा कि मुझे एक ऐसा पात्र बना दीजिए, जो अपने में शीतल जल भर कर प्रियतम के होठों से लग सके। कुम्हार ने कहा यह तभी संभव है जब तुम फावड़े से खुदने, गधे पर चढ़ने, डंडे से पीटने, पैरों से रौंदे जाने, आग में तपने का साहस जुटा सको। इससे कम में किसी की महान आकाँक्षाएँ पूरी हुई ही नहीं है। यही है महानता को प्राप्त करने का एक मात्र रास्ता।
मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता है। निज का उत्थान पतन उसके बस की बात है। यह तथ्य जितना सत्य है उतना ही यह भी सही है कि वातावरण का प्रभाव अपने ऊपर भी पड़ता है और अपने व्यक्तित्व से परिवार एवं समाज का वातावरण भी प्रभावित होता है। बुरे वातावरण में रहकर कदाचित ही कोई अपनी विशिष्टता बना सका हो। साथ ही यह भी सच है कि वातावरण का प्रभाव भी पड़े बिना नहीं रहता।
अधिक लोगों के समर्थ लोगों के क्रिया-कलाप ही वातावरण बनाते हैं बहुसंख्यक होने पर और एक प्रकार की गतिविधियां क्रिया-कलाप ही वातावरण बनाते हैं बहुसंख्यक होने पर और एक प्रकार की गतिविधियां अपना लेने पर दुर्बल स्थिति के लोग भी अपना एक विशेष प्रकार का माहौल बना लेते हैं। व्यसनी अनाचारियों का समुदाय भी ऐसा प्रभाव उत्पन्न करता है जिससे जिससे सामान्य स्तर के लोग प्रभावित होने लगे। इसलिए अच्छे वातावरण में रहना और बुरे वातावरण से बचना भी उसी प्रकार आवश्यक है जैसे स्वच्छ हवा में रहने वाले और दुर्गन्ध से बचने का प्रयास किया जाता है। वह कहानी प्रसिद्ध हैं जिसमें एक ही घोंसले से पकड़े गये दो तोते के बच्चे दो भिन्न प्रकार के व्यवसाय वालों ने पाले। वे वहाँ की स्थिति के अनुसार ही बोलना सीख गये। सन्त के यहाँ वाला तोता ‘सीताराम “राधेश्याम ‘ कहता और चोर के यहाँ वाला तोता लूट खसोट भरी बातों की रट लगाता था। क्योंकि उन्हें यही दिन भर सुनने को मिलता था। मनुष्य के संबंध में भी यही बात है वह जैसे लोगों के साथ रहता है जैसी परिस्थितियों में रहता, जो कुछ समीपवर्ती लोगों को करते देखता है इसी के अनुरूप अपना स्वभाव भी ढाल लेता है। वह बंदर की तरह अनुकरण प्रिय जो है।
ऐसा भी देखा गया है कि मनस्वी लोग अपनी आदर्शवादिता पर सुदृढ़ रहकर अनेकों का ध्यान अपनी ओर खींचते हैं। कितनों को ही अनुकरण की प्रेरणा देते हैं। अपने औचित्य के कारण उस मार्ग पर चलने के लिए लोगों को आकर्षित करते हैं। आवश्यक नहीं कि वह मार्ग परम्परागत या सरल ही हो। नवीन विचार भी अपने औचित्य के कारण प्रतिभाशाली लोगों द्वारा अपनाये जानें पर एक मार्ग बन जाता है। सर्वसाधारण की तो परम्पराएँ ही सब कुछ प्रतीत होती है। पर विचारवान लोग औचित्य को देखते परखते हैं। उसे ही चुनते अपनाते हैं। काँच के मोती गरीब लोग भी खरीदते पहनते हैं। पर असली बहुमूल्य मोतियों का कोई परखी खरीददार न हो से ऐसी बात भी नहीं हैं। बुद्ध और गाँधी का मार्ग सर्वथा नया था पर उनके प्रामाणिक व्यक्तित्व और औचित्य भरे प्रतिपादन का परिणाम था कि असंख्यकों व्यक्ति उनके अनुयायी बनें और एक नवीन वातावरण बना देने में सफल हुए। पर ऐसा होता तभी है जब प्रतिभावान अग्रगामी बनकर किसी उपयुक्त मार्ग को अपनाएँ और अपनी बात को तर्क, तथ्य, प्रमाण उदाहरण समेत समझाएँ। स्वयं उस मार्ग पर सुदृढ़ रहकर अन्यायों में मनोबल उत्पन्न करें।
यह सही है कि मनुष्य बुद्धिमान प्राणी है। उसके पास समझने -सोचने की शक्ति है। दैनिक व्यवसाय वह इसी आधार पर चलता है। इतने पर भी वह परोक्ष रूप से प्रथा-परम्पराओं के अनुरूप अपने को भी उसी ढर्रे पर चलाता है जिस पर समीपवर्ती लोग चलते हैं। इसी को वातावरण कहते हैं यह बुरा भी होता है और भला भी। जिस भी प्रवाह में बहनें लगा जाय अपना व्यक्तित्व या स्तर भी प्रायः उसी ढाँचे में ढल जाता है। वातावरण बनाने वाले तो कोई विरले ही होते हैं। अधिकाँश ऐसे पाये जाते हैं जो प्रवाह में बहते हैं। और जो कुछ हो रहा है उसकी का अनुगमन करने लगते हैं। परिणति तो क्रिया के अनुरूप ही होती है। मूढ़ मान्यताओं और अवाँछनीयताओं के प्रवाह में बहकर मनुष्य ऐसी स्थिति में जा पहुँचता है जिसमें व्यस्त होने का उसका अपना कोई पूर्व निश्चय नहीं था। इसलिए जहाँ तक अपने भविष्य निर्माण का संबंध है। वहाँ अपने पुरुषार्थ और दिशा का निर्धारण का भी महत्व है। वहाँ यह भी कम प्रभावशाली तथ्य नहीं है कि किस समुदाय के साथ चल पड़ने का अवसर मिला है?किन लोगों की गतिविधियाँ उसे किस सीमा तक प्रभावित करती रहीं?
अपना समाज ऐसे लोगों से भरा है जिसमें भले लोगों की तरह बुरे भी भरे पड़े है। जहाँ आदर्शवादिता और सेवा भावना के अनेकों उदाहरण देखें जाते हैं। वहाँ दुर्व्यसनी, अपराधी और अनगढ़ स्तर के लोगों की भी कमी नहीं। दो प्रवृत्तियाँ पास-पास भी रहती है और घुली मिली रहती हैं। इसलिए वातावरण के बीच भी यह पाया जाता है कि दूरदर्शी विवेकवान अपनी रुचि के अनुरूप चयन कर लेते हैं। जिनका मनोबल या स्वतंत्र चिंतन काम नहीं करता, वे ही हवा के झोंके के साथ उड़ने वाले तिनके पत्ते का उदाहरण बनते हैं। सामान्यजनों को वातावरण ही घसीट-घसीटे फिरता है और उस प्रभाव से प्रभावित होकर वे अनिच्छित भवितव्यता के चंगुल में फंसते हैं। इसलिए वातावरण की प्रबलता को स्वीकार करते हुए भी यह मानना पड़ता है कि मानवी विवेक और मनोबल सर्वोपरि है। वह वातावरण के प्रभाव को ग्रहण तो करता है पर यह भी संभव है कि वह उसे अस्वीकार कर दे और जो उचित है उसे करे। यह स्वतंत्र चिंतन ही वस्तुतः भाग्य का निर्माता है अन्यथा जिस नियति को सामान्य जनों द्वारा अपनाया जाता है वही अपने गले भी बँधती है।
प्रथा परम्पराओं में से अधिकाँश आज की परिस्थितियों के अनुरूप नहीं रहीं भले ही वे किसी जमाने में अपने समय के अनुरूप भूमिका निभाती रहीं हों। समय गतिशील है। वह आगे बढ़ता है, पीछे नहीं लौटता। चरण सदा आगे बढ़ते हैं। यदि कोई पीछे की तरफ उलटी गति से चलना आरंभ करे तो विचित्र लगेगा। धीमे चलेगा। काँटे चुभने जैसे संकट में भी फँसेगा। फिर वापस लौटने वापस लौटने से हाथ भी क्या लगेगा? उसमें समय की बरबादी ही पल्ले पड़ेगी। आदिम काल में लोग जिस रहन सहन को अपनाने के लिए विवश थे वह उस समय की सही सूझबूझ हो सकती थी। पर अब न हम गुफाओं में घर बनाकर रह सकते हैं और न पत्ते लपेटकर ऋतु प्रभाव से बच सकते हैं। निर्वाह के लिए चिर पूर्वज जिन साधनों पर निर्भर थे उन्हें इस प्रगतिशील युग में कोई भी अपनाने के लिए तैयार न होगा। फिर भी फिर भी हम पुरातन की दुहाई देते हैं। और उन्हीं प्रचलनों की सराहना करते हैं जो कभी परिस्थितिवश अपनाए जाते हैं।
जिस प्रकार जराजीर्ण मनुष्य की आँखों में मोतियाबिन्द का परदा चढ़ जाता है और धुँधला दिखाई देता है उसी प्रकार पुरातन काल के प्रचलन आज की स्थित में अंध परम्परा या मूढ़ विश्वास भी बन सकते हैं। अस्तु पुरातन प्रचलनों को अपनाने का आग्रह करके हम अंधविश्वासी या दुराग्रही कहलाने का जोखिम सहन नहीं कर सकते। साथ ही यह भी सत्य है कि आ ज जो कुछ हो रहा है, जो बहुमत द्वारा अपनाया जा रहा है उसे भी यथावत् स्वीकार नहीं किया जा सकता। नशेबाजी जैसे कुप्रचलनों की इन दिनों भी कमी नहीं दूसरों की देखा-देखी उन्हीं व्यसनों को अपना लिया जाय तो इससे हित साधन न होगा। अपने भाग्य के निर्माता आप बनने के लिए हमें न प्रचलनों पर निर्भर रहना चाहिए और न हवा के झोंकों के साथ उड़ना चाहिए। अपना रास्ता आप ही चुनना चाहिए। चुनाव इसलिए करना पड़ता है कि एक ही जंक्शन से अनेक दिशाओं में गाड़ियां आती जाती हैं। स्टेशन पर उनकी पटरियाँ पास-पास होती हैं। पर कुछ ही आगे अनेक मोड़ होते हैं जिन पर तनिक सा हटते ही दिशा बदल जाती है और रेलगाड़ियों के गन्तव्य में सैकड़ों मील का अंतर पड़ जाता है। यदि पास पास स्टेशन पर खड़ी गाड़ियों में से बिना अपने अभीष्ट का चुनाव किये किसी भी डिब्बे में जा बैठें तो फिर कहीं भी पहुँचा जा सकता है। भाग्य निर्माण के लिए अपने चिंतन और चरित्र का स्तर ऊँचा उठाना पड़ता है। उन लोगों से बचना पड़ता है जो कुमार्ग अपना चुके हैं और किसी गर्त में गिरने जा रहें हैं। उचित और अनुचित भले और बुरे में जो अपने को अभीष्ट हो पहचानना और अपनाना होगा। ’मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप है। ‘इस कथन का अभिप्राय यह भी है कि अच्छे की तरह बुरा भविष्य भी बनाया जा सकता है। इसके लिए इच्छा या कल्पना करना मात्र ही पर्याप्त नहीं मार्ग निर्धारण करने से लेकर कार्य का निर्धारण और उसमें जुट जानें का साहस भी स्वयं ही करना होगा। जो इतना कर गुजरते हैं। उनके लिए यह तथ्य मूर्तिमान होकर प्रकट होता है कि मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता आप है।
संसार में ऐसे अनेकानेक उदाहरण मौजूद है जिनमें कितने ही लोग ऊँचे उठे, आगे बढ़े और महामानव स्तर तक जा पहुँचे हैं। इसके विपरीत ऐसे उदाहरणों की भी कमी नहीं है कि साधन और सुविधा हो ते हुए भी उनका सदुपयोग न कर सके। कुमार्ग पर चले। बुरे लोगों के साथ रहे। बुरे वातावरण में एवं फिर ऐसी परिस्थितियों में फँसे जिनका अंत खेदजनक एवं तिरस्कार भरा ही हुआ। दोनों में से किसका चयन किया जाय वह अपनी विवेक -बुद्धि के ऊपर अवलंबित है।
परमेश्वर की इस सृष्टि में हर प्रकार के अवसर मौजूद हैं। यहाँ पैरों में चुभने वाले काँटे भी बहुत हैं और सुषमा से भरे फूलों की भी कमी नहीं हम किनके निकट पहुँचे है निर्णय करने का संकल्प प्रयास और अधिकार पूरी तरह अपने हाथ हैं माना कि बुराइयां बहुत हैं। लोगों का भी बाहुल्य है पर उनमें से इतनी शक्ति किसी में भी नहीं कि जो इच्छा के विपरीत किसी को अपनी ओर खींच सके ओर बलात् बाधित या विवश कर सके। किसी के आमंत्रण को स्वीकार करना न करना अपने मन की बात है। परिस्थितियाँ लदती किसी के ऊपर भी नहीं उन्हें बुलाने और स्वीकार करने में अपनी ही प्रत्यक्ष या परोक्ष सहमति होती है। जिस दिशा में कदम बढ़ाते हैं उस गंतव्य तक देर सवेर में पहुँचा ही जाता है। जिसको अस्वीकार कर दिया जाता है वह खींच तान भले ही करता रहे पर यह संभव नहीं कि साहस पूर्वक विरोध करने वाले को कोई दबा या झुका सके।
कई व्यक्ति इस तलाश में रहते हैं। कि कोई दूसरा कंधे पर बिठाकर इच्छित स्थान तक पहुँचा दे। यह कठिन है। नदी पार करने में नाव का सहारा सहायक होता है पर साथ ही यह भी ठीक है कि घर से चलकर नाव तक पहुंचने का परिश्रम स्वयं ही करना पड़ेगा। समय पड़ने पर छोटे बच्चों या अपंगों को कंधे पर बिठाया, पीठ पर लादा भी जाता है पर यह सुविधा कुछ देर तक पाई जाती है। ऐसा नहीं हो सकता कि जिंदगी पूरी तरह दूसरों के सहारे ही चल जाये। सहायकों की सराहना की जा सकती है। पर यह नहीं हो सकता कि पूरी उन्हीं की कृपा पर निर्भर रहा जा सके। कोई भोजन भरी थाली परोस दे तो भी ग्रास को तोड़ने, चबाने का काम स्वयं ही करना पड़ेगा। पचावेगा उसे अपना पेट ही। दूसरों के खाए पचाए भोजन से अपनी आवश्यकता पूरी नहीं की जा सकती। मनुष्य जिस दिशा में जिस मार्ग पर आगे बढ़ता है उस पर आगे चलने वाले पथिक, साथी सहयोगी बनते रहते हैं।
वस्तुतः हम अपने संकल्प एवं व्यक्तित्व को एक शक्तिशाली चुम्बक की तरह प्रयुक्त करते हैं। अपने स्तर के लोगों को प्रत्यक्ष या परोक्ष आमंत्रण द्वारा अपने निकट खींच बुलाते हैं। भले और बुरे सर्वत्र मौजूद हैं। उनमें से किन्हें चुनें किनके साथ घनिष्ठता बनाएँ यह पूरी तरह अपनी मर्जी पर अवलंबित हैं।
किसी को भी यह नहीं सोचना चाहिए कि हमारी प्रगति या अवगति के लिए दूसरे उत्तरदायी है। किसी को भी यह नहीं कहना चाहिए कि हमें परिस्थितियों से, व्यक्तियों से, विवश होकर यह करना पड़ा। वातावरण का प्रभाव अवश्य पड़ता है। पर वह इतना प्रबल नहीं है कि साहसी को बाधित कर सके। आदर्शों को तोड़ने मोड़ने में समर्थ हो सके। अंततः यह निष्कर्ष अपनी यथार्थता सिद्ध करता है कि मनुष्य अपने भाग्य और भविष्य का निर्माता है।
‘एक व्यक्ति की मृत्यु हुई, तो उसे परलोक में धर्मराज के समक्ष प्रस्तुत किया गया। धर्मराज ने उसके संबंध में चित्रगुप्त से पूछताछ की, तो पता चला कि वह स्वर्ग में उच्च स्थान का अधिकारी है। धर्मराज के इशारे पर दूत उसे ले जानें लगे, तो उसने विनीत स्वर में पूछा-’राजन्। मैंने जीवन में ऐसा कोई पुण्य तो किया नहीं, फिर इस पुरस्कार का निमित्त जान सकता हूँ?’
न्यायाधिपति बोल पड़े-’तुमने तो जीवन भर औरों की पूजा की जो सेवा सहायता की है, उसी का पारितोषिक तुम्हें मिल रहा है। ’
इसके उपराँत दरबार में एक कुत्ते को पेश किया गया। न्यायकर्ता ने श्वान की ओर इशारा करते हुए उस व्यक्ति से पूछा-’इसे पहचानते हो?’ अस्वीकृति में उसका सिर हिल गया। अब धर्मराज बोले-’यह तुम्हारे ही गाँव का धनीराम बनिया है। आजीवन यह बेईमानी और मिलावट खोरी कर लोगों को ठगता रहा। इसी का दण्ड इसे इस रूप में मिला है। ‘
सचमुच, भगवान के घर देर है, अंधेर नहीं।
“तब अब्दुल्ला बिन मुबारक की ईराक में बड़ी प्रसिद्धि थी। पेशे से वह व्यापारी था, पर दीन-दुखियोँ के प्रति उसके दिल में बहुत दया थी।
एक बार वह हज करने जा रहा था। अभी शहर पार ही किया था कि सड़क किनारे बेसुध पड़ी एक जर्जर स्त्री की ओर ध्यान चला गया। नजदीक पहुँच कर नब्ज़ टटोली, तो जान अभी बाकी थी। पास की बावड़ी से अपना मुसल्ला भिगो लाया। स्त्री के चेहरे पर उनने राहगीर को दुआएँ दी, फिर कहने लगी-’चार दिनों की भूखी हूँ। घर पर तीन बच्चे है। नौकरी की तलाश में जा रही थी कि चक्कर आ गये। पेट पालने के लिए कुछ-न-कुछ तो करना ही पड़ेगा।
विधवा की बातों से अब्दुल्ला की दिल भर आया। उसने दीनारों की थैली उसके हाथोँ में थमा दी। साथ में खाने-पीने को जो कुछ था, उसे भी दे दिया, कहा-इस धन से कोई धंधा कर लेना। इसमें कोई कमी पड़े, तो घर आ जाना, शेष की पूर्ति कर दूँगा।
अब तक हज यात्रियों का काफिला काफी आगे बढ़ चुका था। अब्दुल्लाह उलटे पाँव घर लौट आया। मन ही मन सोचा, भला ऐसे ‘हज’ से क्या लाभ, जिसमें मात्र नाम और यश की कामना हो।
लगभग एक माह बाद हाजियों का दल वापस लौटा, तो सबसे पहले वे अब्दुल्लाह बिन मुबारक के पास पहुँचे, आश्चर्य व्यक्त कर कहने लगे-कमाल है? जाते वक्त आप रह तो पीछे गये थे, किन्तु मक्का में हमने हर समय आपको खुद से आगे ही पाया। ‘
अब्दुल्लाह मंद-मंद मुस्कुराते भर रहे।
अध्यात्म मार्ग में इन दिनों अज्ञान का माहौल संव्याप्त है। भौतिक क्षेत्र में मन की असाधारण लिप्तता के कारण प्रत्यक्ष ही सब कुछ दीखता है। शरीर और मन दोनों ही उसी उधेड़ बुन में अहिर्निश लगे रहते हैं। साधना प्रयोजनों में अज्ञान होने के कारण व्यस्तता जैसे बहाने गढ़ने पड़ते हैं। मन बार बार उचटता है। अज्ञान के रहते उस प्रसंग से बच निकलने का कोई न कोई बहाना ढूँढ़ ही लिया जाता है और यथार्थता की कितनी ही प्रबल माँग होते हुए भी टालमटोल का मन बना रहता है। ऐसी दशा में समय-साध्य, कष्ट साध्य, साधन साध्य साधनाओं के लिए दबाव डालना व्यर्थ है। न कुछ करने से कुछ करना अच्छा, की नीति अपनाई जानी चाहिए। इसलिए समय को देखते हुए सर्वसाधारण के लिए सुलभ और सर्वोपयोगी साधना विधि ‘प्रज्ञायोग‘ है मन लगने लगे तो इस साधना को क्रमशः आगे बढ़ाया जा सकता है। और उसे बड़ा, भारी और विस्तृत रूप दिया जा सकता है।
उपासना कृत्यों के आरंभ में षट्कर्म पूरे करने का विधान है
1-पवित्रीकरण-शरीर पर जल छिड़क कर कायिक पवित्रता की भावना।
2- तीन बार चम्मच से आचमन करके मन, बुद्धि और भावना की पवित्रता का उभार।
3-शिखा वंदन-जल से शिखा का स्पर्श मानसिक संतुलन और उदात्तीकरण का भाव निर्धारण।
4- प्राणायाम साँस को गहरी खींचना अर्थात् संव्याप्त प्राणतत्व का आकर्षण, साँस रोकते समय उसका काय सत्ता में संस्थापन, साँस छोड़ते समय दुरित दुर्गुणों-कुसंस्कारों का बहिष्कार।
5- न्याय पाँचों ज्ञानेन्द्रियों को जल से स्पर्श। उनमें पवित्रता के संस्थापन का भावभरा संकल्प।
6- पृथ्वी पूजन मातृभूमि को विश्व वसुँधरा को निकटवर्ती प्रत्यक्ष देव मानते हुए हाथ जोड़कर नमन वंदन। यह षट्कर्म कहलाते हैं।
सर्वतोमुखी पवित्रीकरण की भावना का उन्नयन इसका उद्देश्य है उपासना से पूर्व अथवा किसी भी शुभ कार्य धर्मकृत्य के आरंभ में इन्हें कर लेने का विधान है।
प्रज्ञायोग में उपासना का अगला चरण है-देवपूजन। देवत्व की प्रतीक कोई भी स्थापना की जा सकती है। गायत्री को माता के रूप में मान्यता देने वाले आद्यशक्ति की हंसारूढ़ छवियों का प्रयोग करते हैं। निराकारवादी सूर्य शक्ति में गायत्री मंत्र प्रतिध्वनित होने की भावना कर सकते हैं। जलती अगरबत्ती या दीपक की अग्नि को भी सूर्य का अग्निहोत्र का, प्रतीक माना जा सकता है। यह एक छोटी पूजा चौकी पर स्थापित किये जायें। उन पर धूप, दीप, पुष्प, चन्दन, अक्षत, नैवेध में से जो कुछ भी सरलतापूर्वक उपलब्ध हो उन्हें श्रद्धाँजलि के रूप में प्रतिष्ठापित देवत्व प्रतीक के सामने अर्पित किया जाये। इन उपचार पदार्थों के पीछे आत्मसत्ता को तद्नुरूप ढालने का भाव है। पुष्प जैसा सुगन्धित, सुँदर कोमल जीवनयापन। दीपक जैसा प्रकाशवान बनने और संपर्क क्षेत्र में आलोक वितरण का निश्चय। अक्षत से अर्थ है अपने जीवन को निष्ठावान बनाना। जो संकल्प किये जायें उन्हें कभी भी टूटने नहीं देना, क्षत न होने देना, रोली चंदन देवता को चढ़ाने का तात्पर्य है जीवन को वैसा ही बनाना जिससे सुगन्ध सुस्थिर बनी रहे। अपने समीपवर्तियोँ को भी सुगंध से भरपूर बनाते रहे। जल का अर्थ है श्रद्धा, शाँति शीतलता, नम्रता। इन गुणों को अपने में बढ़ाने के लिए देव प्रतीकों को जल चढ़ाया जाता है। इन भावनाओं के साथ देवपूजन से आत्मशिक्षण का उद्देश्य पूरा होता है। मात्र इन वस्तुओं की हेरा फेरी कर देना या यह मानना कि इन वस्तुओं की देवताओं को अभावजन्य आवश्यकता है, ठीक नहीं। देवपूजा का तात्पर्य अपने समीप देवता को अनुभव करना है योँ देवत्व सर्वव्यापी है पर मानसिक शिक्षण के लिए उसकी प्रत्यक्ष स्थापना तद्नुरूप अनुभूतियों को बल देते हैं।
षट्कर्मों एवं देवपूजन के बाद जब ध्यान का नंबर आता है। दोनों को पृथक-पृथक करने की अपेक्षा एक साथ करना अधिक उपयुक्त रहता है। मन एकाग्र रखने के लिए उस पर जप और ध्यान के दोनों बंधन साथ-साथ बांधने पड़ते हैं। ध्यान सविता के तेज का किया जाता है। प्रभातकाल के उदीयमान स्वर्णिम सूर्य को सविता कहते हैं। गायत्री महामंत्र का अधिष्ठाता सविता है। दोनों के सुयोग संयोग से पूर्णता बनती है। गायत्री जप मानसिक रूप से करते हुए ध्यान रखना चाहिए कि उदीयमान सूर्य के प्रकाश में साधक खुले बदन बैठा है। किरणें उसके कायकलेवर में प्रवेश कर रही हैं। उस प्रवेश से समूची कायसत्ता प्रभावित हो रही हैं।
काया के तीन पक्ष हैं-
1- स्थूल शरीर अर्थात् दृश्यमान शरीर जिसका केन्द्र नाभि है।
2- सूक्ष्म शरीर अर्थात् मन मस्तिष्क जिसका केंद्र भृकुटि है आज्ञाचक्र।
3- कारण शरीर हृदय स्थान में अवस्थित भाव संवेदना जिसका स्थान हृदय में अवस्थित है जिसे सूर्यचक्र भी कहते हैं। इन तीनों छिद्रों के माध्यम से सूर्य छिद्रों के माध्यम से सूर्य की किरणें अपने अपने क्षेत्र में प्रवेश करती हैं।
स्थूल शरीर में बल साहस भरी पुरुषार्थ परायणता।
2- सूक्ष्म शरीर में दूरदर्शी विवेकशीलता, नीतिनिष्ठ।
3- कारण शरीर में आत्मीयता, उदारता, सद्भावना, संयम शीलता। यह सभी सद्गुण लिए सविता की दिव्य किरणें काया के हर अंग अवयव तक पहुँचती हैं।
ऊर्जा और आभा का कण-कण में संचार करती है। ऊर्जा अर्थात् प्रतिभा आभा अर्थात् औचित्य की पक्षधर सदाशयता। यह सभी दिव्य अनुदान मनुष्य को सविता के ध्यान से मिलती है। यह भावना परिपक्व करनी चाहिए। उस अनुदान को श्रद्धापूर्वक धारण करने की मान्यता विश्वास रूप में परिपक्व करनी चाहिए। इस बीजारोपण को गायत्री जप द्वारा सींचा, उगाया और बढ़ाया जा रहा है, यह मान्यता जप, और ध्यान के साथ-साथ चलती रहनी चाहिए। उदीयमान सूर्य का ध्यान सार्वभौम है। इसमें सम्प्रदाय परक कोई भेद नहीं है। मंत्र के संबंध में मतभेद हो सकता है। जिन्हें गायत्री मंत्र न रुचे वे अपनी आस्था के अनुरूप अन्य मंत्र जप सकते हैं। इसमें कोई आग्रह नहीं है। सूर्य सबका है। इसलिए उसके ध्यान में हेरफेर करने की गुंजाइश नहीं हैं।
जप में शब्द शक्ति का प्रयोग होता है जो शरीर के जीवकोशों, ऊतकों तथा रसायनों को प्रभावित करती है। मौन जप अंतर्मुखी रहने पर भी अपना प्रभाव छोड़ता है। ध्यान में प्रकाश शक्ति का उभार है। इससे प्रसुप्त केन्द्रों में ऊर्जा का प्रवेश होता है और अतीन्द्रिय क्षमताएँ जाग्रत होती हैं। सद्ज्ञान को भी प्रकाश की संज्ञा दी गई है। अज्ञान ही अंधकार है। उससे निवृत्ति पाने का प्रयास परम पुरुषार्थ भी है और उच्चस्तरीय दैवी अनुदान भी।
शब्द, प्रकाश और ताप यह तीन ही शक्ति तरंगें इस संसार में काम करती हैं। प्रकाश और शब्द के मिश्रण से ताप बनता है। इस आधार पर प्रज्ञायोग का साधक इन तीनों उपलब्धियों को अपने में अधिक मात्रा में धारण करता है और अधिक पुरुषार्थी, अधिक विवेकवान और अधिक प्रतिभा संपन्न बनता जाता है। इसके पश्चात् चिंतन-मनन दर्शन या निदिध्यासन की बारी आती है।
निदिध्यासन के चार चरण हैं
1- आत्म समीक्षा 2- आत्म सुधार 3- आत्म निर्माण 4- आत्मविकास। चारों में ही अपने सुधार एवं विकास की बात सोची जाती है। देखना चाहिए कि अब तक के जीवन में विशेषतया पिछले कल के दिनों क्या ऐसी भूले होती रही जिन्हें अनुचित ठहराया जा सके। इनका पता अपनी निष्पक्ष कड़ी समीक्षा करने पर ही पता चलता है अन्यथा हर व्यक्ति अपने को सदा सही ओर निर्दोष ही ठहराता रहता है। भूलों का, कमियों का, उपेक्षाओं का पता चलने के उपरान्त ही यह सूझता है कि जो अनुपयुक्त बन पड़ा उसका परिमार्जन कैसे किया जाये। उन्हें छोड़ने का तो निश्चय किया ही जाये। साथ ही यह भी देखा जाये कि गलतियों के कारण समाज को जो क्षति हुई है उसकी भरपाई करने का तरीका क्या हो सकता है। अपने गुण-कर्म स्वभाव में सम्मिलित हो गई कुसंस्कारिता के परित्याग के लिए वर्जनाओं के परिपालन में कठोर होना आवश्यक है। सुधार के लिए जो योजना बनें उसे कार्यान्वित करने की क्रम व्यवस्था भी इसी समय सोचनी बनानी चाहिए। उपरोक्त दोनों प्रयोग मिलकर आत्म समीक्षा और आत्म सुधार का प्रयोजन पूरा करते हैं। यह पूर्वार्द्ध हुआ।
निदिध्यासन के उत्तरार्द्ध में आत्म निर्माण और आत्मविकास आते हैं। आत्म निर्माण में यह देखा जाता है कि महामानव स्तर का व्यक्तित्व विकसित करने के लिए किस संचय अभिवर्धन की आवश्यकता है। किन सद्गुणों की, किन प्रवृत्तियों की कमी है। उन्हें किस प्रकार बढ़ाया जाये और व्यक्तित्व को अधिकाधिक सुविकसित करने के लिए क्या पुरुषार्थ किये जानें चाहिए। जीवनचर्या में किन नये अभ्यासोँ को सम्मिलित किया जाना चाहिए यह अभिवर्धन सदाशयता की दिशा में निरंतर चलना चाहिए। आत्मनिर्माण का प्रयोजन इसी मार्ग पर चलते रहने से संपन्न होता है।
आत्मविकास का तात्पर्य है-आत्म विस्तार। आमतौर से लोग संकीर्ण स्वार्थपरता की परिधि में ही अपना चिंतन और प्रयास नियोजित किये रहते हैं। इस सीमित परिधि में जीवनचर्या को सीमित नहीं रखना चाहिए। अपने को समाज का अंग मानना चाहिए और समाज के एक अविच्छिन्न घटक के रूप में अपनी सत्ता की परिकल्पना करनी चाहिए। इसे स्वार्थ को परमार्थ में भी घुलना कह सकते हैं। समष्टि में व्यष्टि का विलयन भी ईश्वर को विराट् विश्व के रूप में मूर्तिमान देखा जाये। उसे समुन्नत सुविकसित करने में ही जीवन की सार्थकता का अनुभव करना चाहिए। आत्मवत् सर्व भूतेषु की धारणा को जितना अधिक संवेदनशील बनाया जा सके, बनाना चाहिए। यह चिंतन मनन न्यूनतम पंद्रह मिनट तो करना ही चाहिए।
इसी निदिध्यासन के साथ संयम साधना की दिशा में बढ़ने की योजना भी बनती रहनी चाहिए। शक्तियों को बढ़ाना ही पर्याप्त नहीं, उनके संचय का उपाय भी करना चाहिए ताकि सदुपयोग के लिए कुछ अतिरिक्त बचत हाथ में बनी रहे। घड़े में छेद हो तो भरा हुआ पानी उसमें होकर बिखर जाता है। असंयमी अपनी संचित क्षमताओं का लाभ उठाने के स्थान पर उन्हें अपव्यय में गँवा बैठता है और छूंछ रहने वाले की तरह खोखली स्थिति में पड़कर कुछ महत्वपूर्ण कार्य करने के योग्य नहीं रहता। इसलिए संयम को तप की संज्ञा दी गई है। संयमशील को ही व्यावहारिक जीवन का तपस्वी कहते हैं।
(1) इन्द्रिय संयम (2) अर्थसंयम(3) समय संयम(4) विचार संयम। यह चार संयम प्रमुख हैं। इन्द्रिय संयम में जिव्हा और ज्ञानेन्द्रिय का संयम प्रमुख है। जीभ के चटोरे व्यक्ति अधिक मात्रा में अनुपयुक्त वस्तुएँ खाते ओर आरोग्य को गँवा बैठते हैं। कटुवचन और निरर्थक वाचालता पर नियंत्रण रखना होता है तथा बोलते समय यह सोचना पड़ता है कि जो बोला जा रहा है वह यथार्थ और उपयुक्त है या नहीं। दसों इन्द्रियों में स्वादेन्द्रिय और जननेन्द्रिय यह दो ही प्रमुख हैं। इन दो का संयम साध लेने से अन्यान्य इन्द्रियों का निग्रह बिना किसी कठिनाई के हो जाता है।
अर्थसंयम का अर्थ है-ईमानदारी की, परिश्रम की कमाई ही स्वीकार करना, अपव्यय की पूरी तरह रोकथाम करना। विलास-व्यसनों में कुछ भी खर्च न होने देना। बचत को पुण्य प्रयोजनों में लगाते रहने की नीति अपनाना, ताकि अनावश्यक संग्रह होने और उसके कारण अनेक दुर्गुण उत्पन्न होने का अवसर ही न आवे।
समय संयम से अपनी जीवनचर्या में क्रमबद्धता का सुनियोजन करना पड़ता है। नित्यकर्म, उपार्जन, फुटकर काम, स्वाध्याय आदि के अतिरिक्त परमार्थ प्रयोजनों के लिए भी समय का एक अंश सुरक्षित रखने एवं नियोजित करने की आवश्यकता पड़ती है। इसका सुसंतुलन विवेकपूर्ण बिठाया जाय। समय को सर्वोपरि जीवन संपदा समझते हुए उसका एक क्षण भी बरबाद न होने दिया जाये।
चौथा विचार संयम है। आमतौर से मस्तिष्क में अनगढ़ अस्त−व्यस्त विचार घूमते रहते हैं और कुकल्पनाएँ उठती रहती हैं। इन्हें रोका जाये और विचार प्रवाह की उपयोगी दिशाधारा के साथ जोड़ते रहने का प्रयत्न किया जाये। यह संघर्ष निरंतर करना पड़ता है। कुविचारों को सद्विचारों से काटना पड़ता है। अनुपयुक्त प्रवाह को बदल कर उपयुक्त रचनात्मक प्रयोजनों के साथ-साथ विचारधारा बहनें लगे इसका अभ्यास करना पड़ता है। यह मनोनिग्रह है अर्थात् मन को वश में करना। मन को वश में कर लेने पर अनेक सिद्धियाँ मिलने की बात कही गयी है। इसका अर्थ यही है कि विचार शक्ति की एक भी लहर अस्त−व्यस्त, अनुपयुक्त प्रयोजनों में लगने न पाये। सदा सही रचनात्मक उच्च विचारों में ही अपनी चिंतन शक्ति नियोजित रखी जाये। मुनि, मनीषी, ज्ञानी, वैज्ञानिक, विद्वान, महामानव, इस विचार संयम साधना को अपना कर ही उत्कृष्टता के उच्च शिखर तक पहुँचते हैं।
तीसरे प्रहर की निदिध्यासन साधना में आत्मपरिष्कार और संयम साधना के दो पक्ष ऐसे हैं। जिन्हें कार्यान्वित करने की योजना बनाते रहना चाहिए। इस प्रकार प्रज्ञायोग की यह सरल साधना हर किसी को आत्मिक प्रगति का पथ भी दर्शाती है व सभी के लिए संभव भी है।
‘वह बरगद बहुत पुराना भी था और बहुत बड़ा भी। शाखायें बीघों जमीन घेरे हुए थीं। उसे एक छोर पर था सरोवर और दूसरे छोर पर था मरघट।
एक सिरे पर बाल-वृद्धों और तरुण-तरुणियों का मनोरम स्नान, सौंदर्य वह जी भर कर देखता और दूसरे छोर पर आये दिन जलने वाली चिताओं में अग्नि स्नान करते हुए दृश्य उसे मृदुल और करुण संवेदना प्रदान करते। दोनों को ही वह विरत वैरागी की भाँति शिरोधार्य करता। इसी उपक्रम में बरगद की लम्बी आयुष्य बढ़ती चली गयी।
एक दिन कोई भावुक पथिक उसकी छाया में विश्राम करने लगा। झपकी लेने के बाद दोनों सिरों पर दो विपरीत दृश्य देखे तो वह उद्विग्न हो उठा। संसार मृदुल है या वीभत्स। रमना सही है या भागना? सौंदर्य में यथार्थता है या शोक में? यहाँ अमृत है या विष?
भावुक पथिक जितना सोचता था उतना ही उलझता था। वह बाल बिखेर कर इधर-उधर टहलने लगा। कभी सरोवर तट पर जाता और मनोमुग्धकारी दृश्य देखता। कभी उठती उम्र की जलती लाशें देखकर सिर धुनता। इस संपन्नता और विपन्नता की विडम्बना को चीर कर वह यथार्थता का बोध पाना चाहता था, पर कुछ सूझ-समझ पड़ा नहीं। वह थककर जमीन पद बैठ गया और सर खुजलाने लगा।
वृक्ष की डाली पर से कुछ पके हुए फल टपके। पथिक का ध्यान भंग हुआ। भूख बहुत लगी थी, सो उसने इधर-उधर बिखरे अनेक फल समेटे। भर पेट खाये ओर संतोष पाया।
उद्वेग के क्षणों को समाधान में बदलने की कृपा किसने की? भावुक पथिक ने सोचा शायद कोई देवता इस वट वृक्ष पर रहते होंगे। वे कहाँ है?यह जानने के लिए उसने जिज्ञासा भरी दृष्टि पसारी और पल्लवों की सघनता को मर्म भरी जिज्ञासा के साथ निहारा।
बूढ़े बरगद की आत्मा पथिक की आकुलता को देर से देख रही थी। उसने साँत्वना भरे मंद और मृदुल शब्दों में कहा-तात। यहाँ सृजन और मरण की अविच्छिन्न संगति है। तथ्य के यह दोनों सिरे मधुर और कटु भले ही लगें, पर वे रहेंगे जहाँ के तहाँ ही। अच्छा यही है कि संवेदनाओं की लहरों में उतरने -उछलने की अपेक्षा का कर्तव्य का सारतत्व स्वीकारें। मुझे देखते नहीं दोनों सिरों पर घटित होने वाले दो विपरीत दृश्यों के बीच फल और छाया के उत्पादन में संलग्न रहकर किस प्रकार संतोष की साँस लेता हूँ। क्या अनुकरण तुम्हारे लिए समाधान कारक नहीं?
पथिक को समाधान मिल गया। उसने संतोष की साँस ली और सरोवर तथा श्मशान के मध्य खड़े समुन्नत मस्तक वाले बरगद को श्रद्धा वनत् नमन किया और गन्तव्य दिशा में चल पड़ा।
मंत्र की शक्ति सामर्थ्य सभी भौतिक शक्तियों से बढ़कर है। इस तथ्य की जानकारी भारतीय तत्त्वदर्शियों ने प्राचीनकाल में ही प्राप्त कर ली थी। यों तो हम जो कुछ भी बोलते या उच्चारण करते हैं। उसका प्रभाव व्यक्तिगत और समष्टिगत रूप से सारे ब्रह्मांड पर पड़ता है। तालाब में फेंके गये एक छोटे से कंकड़ से उत्पन्न जल तरंगें दूर तक जाती हैं। उसी तरह हमारे मुख से निकला हुआ प्रत्येक शब्द आकाश के सूक्ष्म परमाणुओं में कंपन उत्पन्न करता है। उसके कंपन से लोगों में अदृश्य प्रेरणायें जाग्रत होती है। शब्द की इस सामर्थ्य से स्थूल जगत में पदार्थ और आकाश स्थित पिण्डों में जबर्दस्त विस्फोट किया जा सकता है। यही नहीं ग्रह नक्षत्रोँ में पायी जानें वाली सूक्ष्म प्राण-विद्युत, प्रकाश, गर्मी आदि को भी आकर्षित किया जा सकता है। आवश्यकता मात्र उनकी जानकारी एवं सही प्रयोग की है। इसी आधार पर मंत्रों एवं वैदिक ऋचाओं का निर्माण हुआ है। देखने में शब्द और प्रार्थनायें लगने वाले मंत्र ओर ऋचायें एक प्रकार के यंत्र हैं जिनका विधिवत् प्रयोग यदि कोई कर सके तो वह सारे संसार का स्वामित्व प्राप्त कर सकता है।
ध्वनि विज्ञान की आधुनिकतम उपलब्धियाँ यह बताती हैं, कि क्रमबद्ध ध्वनि कंपनों की सामर्थ्य असामान्य है। अल्ट्रासाउंड जैसी सूक्ष्म कर्णातीत ध्वनि तरंगों को जब विद्युत आवेश प्रदान किया जाता है तो उनकी भेदन क्षमता इतनी बढ़ जाती है कि सघन से सघन वस्तु के परमाणुओं का भी भेदन करके उनकी रचना का स्पष्ट फोटोग्राफ प्रस्तुत कर देती है। इसी तरह चिकित्सा जगत में सूक्ष्म ध्वनि तरंगों के प्रयोगों से यह सिद्ध हो गया है कि सामान्य से ध्वनि कंपन में जब इतनी सामर्थ्य है, तो मंत्रों में, जिनका कि गुम्फन ही विशेष रूप से ऋषियों द्वारा हुआ, कितने शक्तिशाली होंगे। मंत्र शक्ति से कभी रोग निवारण, विष मनोगति द्वारा मारण, मोहन, उच्चाटन आदि प्रयोग सफलता पूर्वक संपन्न होते रहे हैं। रामायण एवं महाभारत में मंत्र प्रेरित शास्त्रों की मार होती थी। उससे परमाणु बमों से भी भयंकर ऊर्जा उत्पन्न होती थी, इसलिए उसका बड़ा सधा हुआ उपयोग संभव हो पाता था। उस शक्ति से सैनिकों के समूहों को भी नष्ट किया जा सकता था। और हजारों की भीड़ में छिपे केवल एक ही व्यक्ति को भी मारा जा सकता था। यह सब उस शब्द विज्ञान का ही चमत्कार था जिसकी हल्की सी जानकारी ही अभी तक भौतिक विज्ञान को मिल गई है।
मंत्रशक्ति से भौतिक और आध्यात्मिक सभी तरह के लाभ प्राप्त किये जा सकते हैं। प्राचीनकाल के योगी, ऋषि और तत्वदर्शी महापुरुषों ने मंत्र बल से पृथ्वी, देवलोक, और ब्रह्मांड की अनंत शक्तियों पर विजय पाई थी। मंत्रशक्ति के प्रभाव से वे इतने समर्थ बन गये थे कि इच्छानुसार किसी भी पदार्थ का हस्तांतरण, शक्ति को पदार्थ और पदार्थ को ऊर्जा में बदल देते थे। शाप और वरदान मंत्र का ही प्रभाव माना जाता है। एक क्षण में किसी का रोग दूर कर देना, पल भर में करोड़ों मील दूर की बात जान लेना, एक नक्षत्र से दूसरे नक्षत्र की जानकारी और शरीर की 72 हजार सूक्ष्म नाड़ियोँ के एक-एक जोड़ की जानकारी तक मंत्र की ही अलौकिक शक्ति थी। इसीलिए भारतीय तत्वदर्शन में मंत्र शक्ति पर जितनी अधिक शोधें हुई हैं। उतनी और किसी पर नहीं हुई है। मंत्रों के आविष्कारक होने के कारण ही ऋषि मंत्र दृष्ट कहलाते थे। वेद और कुछ नहीं एक प्रकार के मंत्र विज्ञान है जिसमें विराट् विश्व-ब्रह्मांड की उन अलौकिक सूक्ष्म और चेतन सत्ताओं तथा शक्तिओं तक से संबंध स्थापित करने के गूढ़ रहस्य दिये हुए हैं। भौतिक विज्ञानी अभी इस क्षेत्र की मामूली सी जानकारी ही प्राप्त कर सके हैं।
मंत्र का सीधा संबंध उच्चारण या ध्वनि से है, इसलिए इसे ‘ध्वनि विज्ञान’ भी कह सकते हैं। अब तक इस दिशा में जो अनुसंधान हुए हैं। और निष्कर्ष निकले है, वह बताते हैं कि बुद्धिवादी व्यक्ति मंत्र शक्ति पर भले ही विश्वास न करे, पर वैज्ञानिक अब उसी दिशा में अग्रसर हैं। न्यूयार्क-अमेरिका के मूर्धन्य अनुसंधानकर्ता वैज्ञानिक डॉ. लारेन्स क्रेर्स्टा ने स्पेक्टोग्राफ जैसे उपकरणों के माध्यम से विभिन्न आयु वर्ग के हजारों लोगों की आवाजों का ग्राफ खींचने और उनका विश्लेषण करने के बाद निष्कर्ष निकाला है कि प्रत्येक व्यक्ति के ध्वनि कंपन से जो रेखायें बनती हैं। वे अलग-अलग प्रकार की होती हैं। लेकिन किसी व्यक्ति द्वारा बोला गया एक ही वाक्य स्वस्थ-अस्वस्थ अधिक या कम ताप या दबाव आदि अवस्थाओं में सदैव अपरिवर्तित बना रहता है। इसका अर्थ यह हुआ कि ध्वनि तरंगों में इतनी सामर्थ्य होती है। कि प्राकृतिक परिवर्तनों यथा हवा-तूफान, वर्षा तापमान आदि का उन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता, प्रत्येक अवस्था में लकीरें एक व्यक्ति की एक ही तरफ होंगी। इसी तरह प्रत्येक मंत्र का तरंगों के रूप में विस्तार एक ही तरह का होता है। लकीरों ग्राफ की आकृति-प्रकृति भिन्न-भिन्न व्यक्तियों द्वारा भले ही भिन्न होँ, अर्थात् यदि एक व्यक्ति एक वाक्य या मंत्र बोलता है तो आगे बढ़ने या पीछे लौटने वाली लकीरें लम्बी या छोटी हो सकती हैं। पर उनकी आवृत्ति एक ही तरह की होगी।
सामान्य रूप से बोली जानें वाली ध्वनि तरंगें थोड़ी आगे बढ़कर समूचे विश्व ब्रह्मांड में फैल जाती हैं। और कुछ ही सेकेंडों में प्रतिक्रिया सहित वापस लौट आती हैं। परावर्तित कंपनों में उसी तरह के अनेक भाव और विचार भागे चले आते हैं। और उच्चारणता में वैसे ही तत्वों को और बढ़ा देते हैं। इसलिए कहा जाता है कि बोला हुआ प्रत्येक शब्द मंत्र है, मनुष्य को बहुत सँभल कर केवल मधुर और आशयपूर्ण ही शब्द बोलना चाहिए।
मंत्र का विज्ञान इससे भिन्न प्रकार का है। जिन शब्द तरंगों की उपरोक्त पंक्तियों में चर्चा की गयी है। उनका आकार-प्रकार विद्युत शक्ति द्वारा निश्चित और प्रयुक्त होता रहा है पर मंत्र में किसी प्रकार की बाह्य शक्ति शब्द तरंगों को रूपांतरित नहीं करती। योग पद्धति मंत्र के उच्चारण से उत्पन्न ध्वनि को शब्द शक्ति ही विद्युत शक्ति प्रदान करती है जब कि मानवीय इच्छा या संकल्पशक्ति उस पर नियंत्रण करके कोई भी कार्य करा सकने में समर्थ होती है। जप और ध्यान नाद आदि कंपन और बिन्दु साधना का सम्मिलित रूप है। उससे सृष्टि के विराट् से विराट् और सूक्ष्म कण का भेदन भी संभव हो जाता है। इसलिए मंत्र की शक्ति को अकूत माना जाता है और अनुमान किया जाता है कि इस शक्ति का उल्लंघन ब्रह्मा, विष्णु, महेश तथा कोई अन्य देवता भी नहीं कर सकते। तभी तो मानसकार ने कहा है-मंत्र परम् लघु जासुवश, विधि, हरिहर, सुर सर्व। “
भौतिक विज्ञानियों के अनुसार मनुष्य कम से कम 20 और अधिक से अधिक 20000 कंपन वाली ध्वनि सुन सकता है। कुछ व्यक्ति इसके अपवाद हो सकते हैं, अन्यथा इस सीमा से बाहर वाले कर्णातीत ध्वनि कंपन कानोँ से सुनी नहीं जा सकती इतने पर भी उनका अस्तित्व इतना शक्तिशाली होता है कि बादलों के गर्जन से जिस प्रकार सारे प्राकृतिक परमाणु काँप जाते हैं। उसी प्रकार यह ध्वनि कंपन जहां कानोँ से सुनी नहीं जा सकती इतने पर भी उनका अस्तित्व इतना शक्तिशाली होता है कि बादलों के गर्जन से जिस प्रकार सारे प्राकृतिक परमाणु काँप जाते हैं। उसी प्रकार यह ध्वनि कंपन जहाँ से भी गुजरते हैं- तीव्र हलचल उत्पन्न कर देते हैं। जीवों को नष्ट कर देना, परमाणुओं को उछालकर उड़ा ले जाना, उन्हें शक्ति में बदल देना-यह सब कर्णातीत ध्वनि तरंगों की तीव्रता पर निर्भर करता है। मंत्रों में भी इन्हीं सिद्धान्तों का समावेश है। मंत्रोच्चार से भी कर्णातीत ध्वनि तरंगें निकलती हैं। उसे भावनाओं की श्रद्धा समन्वित मनोगति की विद्युत शक्ति जितनी अधिक मात्रा में मिलती है उतनी ही तीव्रता से वह आकाश के परमाणुओं को कंपाती हुई ध्यान वाले स्थान तक दौड़ी चली आती है। यह एक तथ्य है कि आकाश भी शून्य नहीं हैं। अपने अरबों-खरबों परमाणु बाल्टी में भरे पानी की भाँति भरे और गतिशील हैं। साधारणतया ध्वनि चारों दिशाओं में फैलती है, पर मंत्रों में शब्द इस प्रकार गुंजित होते हैं। कि उसकी ध्वनि तरंगें विशेष प्रकार की हो जाती हैं। गायत्री महामंत्र की ध्वनि तरंगें तार के छल्ले जैसी ऊपर उठती हैं। और यह सूक्ष्म अंतराल के परमाणुओं के माध्यम से सूर्य तक पहुँचती है और जब यह ध्वनि सूर्य के अंतराल से प्रतिध्वनित होकर लौटती हैं तो अपने साथ प्रकाश अणुओं की गर्मी, प्रकाश व विद्युत जप करने वाले के शरीर में उतारती चली जाती हैं। साधक उन अणुओं से शरीर ही नहीं, मन और आत्मा की शक्तियों का भी विकास करता चला जाता है और कई बार वह लाभ प्राप्त करता है जो साँसारिक प्रयत्नों द्वारा कभी संभव नहीं होते।
वेदों में प्रयुक्त प्रत्येक मंत्र का कोई न कोई देवता होता है। गायत्री का देवता ‘सविता ‘है। अर्थात् गायत्री उपासना से जो भी लाभ यथा आरोग्य, प्राण बल, धन-संपत्ति, पुत्र और अपनी महत्वाकाँक्षाएँ आदि पूर्ण होती है। उसकी शक्ति अथवा प्रेरणा सूर्यमण्डल से आती है। किसी भी मंत्र का जब उच्चारण किया जाता है तब वह विशेष गति से आकाश के परमाणुओं ईथर आदि के बीच बढ़ता हुआ उस देवता या शक्ति केन्द्र तक पहुँचता है। जिसका संबंध उस मंत्र से होता है। मंत्र जप के समय आवश्यक ऊर्जा मनकी शक्ति के द्वारा प्राप्त होती है। इस शक्ति के द्वारा जप के समय की ध्वनि तरंगों को विद्युत तरंगों के रूप में प्रेक्षित किया जाता है। वह तेजी से बढ़ती हुई कुछ क्षणों में देवशक्ति से टकराती हैं। उससे अदृश्य सूक्ष्म परमाणु मंदगति से परिवर्तित हो रही है। उनकी दिशा ठीक उलटी होती है सूक्ष्म और स्थूल दोनों तरह के परमाणु दौड़ पड़ते हैं और साधक को शारीरिक लाभ तथा मानसिक प्रेरणायें देने लगते हैं। मंत्र की परावर्तित शक्ति एवं बहुगुणित शक्ति ही मनुष्य को क्रमशः भौतिक सिद्धियों एवं आत्मिक विभूतियों की ओर अग्रसर करती है।
गायत्री महामंत्र की उपासना से साधक सूर्य के अंतराल का वेधन करके वहाँ के परमाणुओं में हलचल उत्पन्न कर देता है फलस्वरूप प्रकाश ऊर्जा -प्राण चेतना एवं प्रेरणाओं की सघन तरंगें साधक पर बरसने लगती हैं। प्रारंभ में आदान प्रदान की आवर्तन परावर्तन की प्रक्रिया थोड़ी धीमी होती है पर जैसे-जैसे मानसिक एकाग्रता बढ़ती जाती है। प्रतिक्रिया भी तीव्र होती जाती है और सूक्ष्म आत्मसत्ता भी तेजी से प्रकाश परमाणुओं से सुसज्जित होने लगती हैं जो देवशक्ति से आकर्षित होते हैं। यह प्रकाश परमाणु, उपासक में जितने अधिक विकसित होते जाते हैं वह उतना ही अधिक स्पष्ट भविष्य दर्शी, सार्थक स्वप्न, दृष्ट और चमत्कारिक प्रेरणाओं को प्राप्त करने वाला होता जाता है। श्रद्धा और विश्वास प्रगाढ़ होने पर लाभ की द्रुतगामी होती है। पर यदि ऐसा न हो तो भी साधक मंत्र जप के चमत्कारी लाभ से कभी वंचित नहीं होता।
‘प्रचलन में सौभाग्य, संपदा एवं सफलता के कहते हैं, पर वस्तुतः वे महान अवसरों और व्यक्तियोँ के साथ जुड़ा रहता है। जो उसे पहचानने और अपनाने की दूरदर्शिता दिखा सके, वस्तुतः उन्हें ही सच्चे अर्थों में सौभाग्यशाली बनने का अवसर मिलता है। ”
श्वास प्रश्वास ही जीवन का आधार है। जो भी श्वास हम लेते हैं। उसमें हवा मात्र तन्मात्रा स्पर्श वाली प्रकृति की हलचल ही नहीं होती है, वरन् उसके भीतर कितने ही महत्वपूर्ण तत्व भरे पड़े है। जो जीवन संचालन के लिए आवश्यक है। वे भौतिक भी और चेतनात्मक भी। वायु तंत्र में घुले हुए इस चेतन शक्ति को प्राण कहते हैं। जिसे विशेष प्रयत्न द्वारा अलग से खींचा जा सकता है और अपने प्राण में सम्मिलित करके उसे और अधिक शक्तिशाली बनाया जा सकता है। इसे विधिवत उत्पन्न करने, अवशोषित और अवधारित करने की प्रक्रिया प्राणायाम कहलाती है। अधिक मात्रा में प्राणवायु प्रवेश करने से फेफड़े सुदृढ़ जीवन शक्ति में अभिवृद्धि होने जैसे शारीरिक आरोग्य के प्रत्यक्ष लाभ को मिलते ही है। विशिष्ट स्तर की प्राण ऊर्जा उत्पन्न करके महाप्राण भी बनाया जा सकता है। ऋषि सिद्धियों का स्वामी बना जा सकता है।
चिकित्सा क्षेत्र में प्राणायाम का उपयोग शारीरिक मानसिक रुग्णता निवारण एवं आरोग्य संवर्द्धन के उपाय उपचार के रूप में होता है। किन्तु अध्यात्म साधना में तो योगाभ्यास को एक महत्वपूर्ण अंग माना गया है। इस प्रक्रिया में श्वास प्रश्वास को क्रमबद्ध, तालबद्ध लयबद्ध किया जाता है और सांस लेने की अनवरत प्रक्रिया की अव्यवस्था को दूर कर व्यवस्था बंधनों को बाँधा जाता है। तदुपराँत ही निखिल ब्रह्मांड में संव्याप्त प्राणसत्ता की अभीष्ट मात्रा खींचने और धारण करने का सुयोग बनता है। प्राणायाम की सुयोग विधि को समझने से पूर्व श्वास प्रश्वास प्रक्रिया और उससे जुड़े तंत्र की बारीकियों को जटिलता से समझना और उससे सही लाभ उठाना संभव नहीं हो पाता।
भौतिक चिकित्सा विज्ञानियों के अनुसार सामान्यता एक प्रौढ़ व्यक्ति एक मिनट में 6-7 लीटर श्वास लेता है। जिसमें लगभग 250 मि.ली. आक्सीजन फेफड़ों द्वारा सोख ली जाती है और उतने ही समय में करीब 200 मि.ली. कार्बनडाइ आक्साइड बाहर निकाल दी जाती है। व्यायाम के समय यह आवश्यकता कई गुना अधिक बढ़ जाती है। और 70 लीटर प्रति मिनट तक पहुँच जाती है। परन्तु शरीर केवल 4 लीटर प्रति मिनट के हिसाब से ही आक्सीजन की आपूर्ति कर पाता है। जबकि आवश्यकता 6 लीटर प्रति मिनट की होती है। शरीर इस आवश्यकता की पूर्ति अपने ही आँतरिक संसाधनों जैसे माँसपेशियों से आक्सीजन सोख कर करता है। विश्राम के समय मनुष्य एक मिनट में 12 से 14 बार तक और महिलाएँ प्रायः 20 बार साँस लेती है। शिशुओं में यह दर 60 बार होती है। नाक द्वारा ली गयी साँस 20 प्रतिशत ताजी हवा होती है, लेकिन बाहर निकली हुई गैस में अधिकाँश मात्रा कार्बनडाइ आक्साइड की होती है।
साँस द्वारा जो वायु अंदर पहुँचती है, 20 प्रतिशत आक्सीजन होती है, जबकि प्रश्वास से बाहर निकली हवा में 70 प्रतिशत नाइट्रोजन 16 प्रतिशत आक्सीजन और 40 प्रतिशत कार्बनडाइ आक्साइड होती है। इस तरह हम सामान्य स्थिति में प्रतिदिन लगभग 10 कि.ग्रा. वायु ग्रहण करते जिसमें से फेफड़े 400 लीटर आक्सीजन ही सोख पाते हैं। मूर्धन्य चिकित्सा विज्ञानी डॉ जॉन आर कैमेरान के अनुसार आराम से बैठे रहने वालों की अपेक्षा कार्यरत रहने वाले सक्रिय व्यक्तियों की माँसपेशियाँ अधिक मात्रा में प्राण वायु आक्सीजन सोखती है। यही कारण है कि कर्मरत व्यक्तियों की अपेक्षा बैठे ठाले व्यक्ति अधिक बीमार और रुग्ण पाये जाते हैं। हमारे फेफड़ों की संरचना कुछ ऐसी जटिल है कि सामान्य श्वास प्रश्वास में उसके निचले भाग तक पूरी तरह वायु नहीं पहुंच पाती है, इसलिए फेफड़ों के कुल आयतन का कुछ भाग ही प्राणवायु और आक्सीजन का लाभ ले पाता है। शरीर क्रिया विज्ञान में फेफड़ों के संपूर्ण आयतन का टोटल लंग कैपेसिटि या टी. एल. सी. कहते हैं अर्थात् एक गहरी के बाद दोनों फेफड़ों में जितने आयतन की गैस समा जाती है वह टी. एल. सी. कहते हैं अर्थात् एक गहरी साँस के बाद दोनों फेफड़ों में जितने आयतन की गैस समा जाती हैं वह टी. एल. सी. मानी जाती है। इसी तरह साँस निकलने के बाद भी जितने आयतन की वायु फेफड़ों में बची रहती है उसे “एफ. आर. सी. अर्थात् फंक्शनल रिजिड्यूऑल कैपेसिटि कहते हैं इसके अलावा भी जब फेफड़ों को रिक्त कर दिया जाता है तब भी उसमें कुछ आयतन में वायु बची रहती है जिसे “ रिजिड्यूल वाल्यूम कहते है’ या आर. वी. कहते हैं।
प्रत्येक साँस में हम जो 400 घन से.मी. वायु ग्रहण करते हैं। वह विश्राम अवस्था में टाइडल वाल्यूम याटी वी कहलाता है। हर श्वास के आरंभ और अंत में कुछ न कुछ वायु फेफड़ों में शेष रह जाती है। इस मध्य में दोबारा साँस लेने की इच्छा होती है। जिससे फेफड़ों में वायु भर जाती है। इस अतिरिक्त श्वास को इन्सपाइरेटरी रिजर्व वाल्यूम कहते हैं। इसी तरह प्रश्वास के बाद भी अतिरिक्त वायु निकलने की स्वतः प्रक्रिया होती है जिससे इन्सपाइरेटरी रिजर्व कहते हैं। भारी व्यायामों में टाइडल वाल्यूम बढ़ जाता है। जब व्यक्ति गहरी से गहरी साँस लेता है और उसी गति से उसे बाहर निकाल देता है इस प्रक्रिया में बाहर छोड़ी गयी वायु के आयतन को वायटल केपेसिटि यावी सी कहते हैं। सामान्यता पुरुषों में यह आयतन 48 लीटर एवं महिलाओं में 3 2 लीटर होता है। एक मिनट में अंदर खींची गयी साँस की मात्रा को आर.एम.बी. अर्थात् रेस्पेरिटरी मिनट वाल्यूम कहते हैं। 15 सेकेण्ड में अधिक से अधिक खींची गयी श्वास की मात्रा एम.बी.बी या एम.बी.सी. मैक्सिमम ब्रीदिंग केपेसिटि कहलाती है। एक स्वस्थ युवा पुरुष में 124 से 170 लीटर प्रति मिनट एवं महिला में 100 से 120 लीटर प्रति मिनट एम.बी.सी. होती है। ज्यों ज्यों उम्र बढ़ती जाती है। एम.बी.सी. घटती जाती है।
हमारे फेफड़ों के भीतर असंख्य छोटे छोटे फुफ्फुसीय कोष होते हैं जिन्हें एलविओली कोष कहते हैं इन्हीं में गैस परिवर्तन की क्रिया होती है। विभिन्न व्यक्तियों में इनकी संख्या 20 से 60 करोड़ तक होती है। सामान्यता लोग जो साँस लेते हैं वह आधी अधमरी एवं उथली होती है।
उसे फेफड़ों के निचले भाग को ऐलविओली पूरी तरह से वायु से नहीं भर पाती और न ही उसमें आक्सीजन परिवर्तन की क्रिया होती है। यह क्षेत्र श्वसन क्रिया के लिए शून्य क्षेत्र है जिसे रेस्पिरेटिरी डेड स्पेस कहते हैं। पूरी तरह वायु संचार न हो पाने के कारण यह भाग क्रमशः सिकुड़ता ही जाता है। इस भाग में वायु दबाव कम होने से रक्त तो पहुँचता है, पर आक्सीजन नहीं पहुँचती है। प्राणायाम प्रक्रिया क्रमिक रूप से फेफड़ों का दबाव बढ़ाती है। जिससे प्राण वायु की ग्रहण सीमा भी अधिक बढ़ जाती है। और कम सक्रिय ऐलविओली फुफ्फुसीय कोष भी फिर से सक्रिय हो उठती है। आयु वृद्धि के साथ ही माँसपेशियों की कार्यक्षमता घटती जाती है, किन्तु प्राणायाम उनकी सक्रियता को कायम रखती है।
अनुसंधान कर्त्ताओं का कहना है कि प्राणायाम करने से व्यक्ति अपने फेफड़ों के आयतन का अधिकतम भाग उपयोग कर लेता है जिसे वायटल कैपेसिटि कहते हैं। प्राणायाम के निरंतर नियमित अभ्यास से फेफड़ों का रिजिड्यूल वाल्यूम घअता जाता है। और वायटल कैपेसिटि बढ़ती जाती है। इस प्रकार प्राणायाम द्वारा लगभग 24 प्रतिशत से 30 प्रतिशत तक फेफड़े के आयतन का अधिकतम उपयोग होता है। जिससे अधिक आक्सीजन और प्राण वायु मिलने से अधिक जीवनी शक्ति प्राप्त होती है। शारीरिक कार्यक्षमता और मस्तिष्कीय क्षमता की वृद्धि होती है। सुविख्यात चितिम्या विज्ञानी रोपार्ड ने अपने शोध में निष्कर्ष में बताया है कि प्राणायाम द्वारा मनुष्य अधिक मात्रा में वायु भीतर खींचता है जिससे फेफड़ों का आयतन बढ़ जाता है। इस आयतन के प्रति लीटर बढ़ जाने से दो प्रतिशत शून्य क्षेत्र भी बढ़ जाता है। अतः प्राणायाम ऐसी प्रक्रिया है जिससे लयबद्ध साँस अंदर खींचने पर न केवल फेफड़ों की क्षमता बढ़ती है, वरन् शरीर और मन बढ़ी हुई प्राणवायु से अधिकाधिक सक्रिय सबल और परिष्कृत बनते हैं।
उपासना क्षेत्र में संघर्ष के निर्मित कुछ विशेष उपक्रम अपनाने की आवश्यकता पड़ती है। सूक्ष्म शरीर को प्राण शक्ति के आधार पर समुन्नत किया जाता है। उसकी समस्त विधियाँ प्राणायाम परक है। प्राणायामों की अनेक सरल कठिन प्रक्रियायें और उनके प्रायोजन प्रतिफल भी अनेकानेक है, किन्तु चिकित्सा क्षेत्र में प्राणायाम का उद्देश्य फेफड़ों की निष्क्रियता समाप्त करके सक्रियता को जीवन शक्ति की मात्रा को बढ़ा देना होता है। देखा गया है कि विभिन्न प्रकार के प्राणायामों द्वारा एलविओलर वेन्टीलेशन की मात्रा दूनी से भी अधिक हो जाती है।
चिकित्सा विज्ञानी ए.एन. ने अपनी कृति “एप्लाइड रेस्पीरेटरी फिजियोलॉजी “ में कहा है कि प्राणायाम से फेफड़ों की क्षमता में असाधारण वृद्धि होती है। प्राणायाम न केवल आक्सीजन उपयोग की मात्रा एवं अवशोषण प्रतिशत बहुत अधिक बढ़ाया जा सकता है, वरन् प्राणवायु में अभिवृद्धि करके शारीरिक मानसिक क्षमता में कई गुनी अभिवृद्धि की जा सकती है। प्राणायाम का मुख्य तत्व कुंभक है। जिसमें श्वास को खींच कर रोका जाता है। यह प्रक्रिया रक्त में कार्बनडाइ आक्साइड का दबाव बढ़ा देती है जिसके कारण लम्बी और गहरी साँस लेना आवश्यक हो जाता है। जैसे जैसे श्वास प्रश्वास पर नियंत्रण सधता है श्वास संख्या बढ़ती है, किन्तु प्रति श्वास घटती जाती है। किन्तु प्रति श्वसन प्राणवायु का आयतन बढ़ता जाता है। बढ़ी हुई प्राणवायु की इस मात्रा को फेफड़ों की सूक्ष्म रचना, ऐलविओली के संपर्क में देर तक रखकर उसमें से आक्सीजन एवं प्राण ऊर्जा को अवशोषित किया और इच्छित दिशा में नियोजित किया जा सकता है।
चिकित्सा विज्ञानियों का कहना है कि रक्त में आक्सीजन की कमी या कार्बनडाइ आक्सीजन की वृद्धि करके श्वसन प्रक्रिया को बढ़ाया जा सकता है। फेफड़ों में प्रायः कार्बनडाइ आक्साइड की मात्रा स्थिर रहती है। किन्तु इसमें सुक्ष्म परिवर्तन होते हो श्वसन क्रिया पर प्रभाव पड़ता है। योग विद्या विशारद प्राचीन योगी, ऋषि, इस तथ्य से भली भाँति परिचित थे प्राणायाम की कुंभक प्रक्रिया द्वारा एलविओली कार्बनडाइ आक्साइड का दबाव धीरे धीरे अभ्यास क्रम से बढ़ाया जा सकता है। और उससे श्वसन द्वारा अधिक गहरी सांस लेकर अधिक मात्रा में प्राणवायु भरी और अवशोषित की जा सकती है। प्रयोग परीक्षण में भी देखा गया है कि प्राणायाम करते समय बाहर निकलने वाली कार्बनडाइ आक्साइड की मात्रा बढ़ जाती है, जबकि सामान्य श्वसन में बाहर फेंकी गयी वायु में इसका अनुपात 3.7 प्रतिशत होता है। उम्र बढ़ने के साथ साथ फेफड़े की आयतन घटने लगता है, किन्तु किशोरावस्था से ही प्राणायाम की नियमित अभ्यास आरंभ कर देने पर फेफड़े की क्षमता उत्तरोत्तर विकसित होती जाती है जिसका प्रतिफल बढ़ी हुई जीवनी शक्ति एवं स्वस्थ दीर्घायुष्य के रूप में सामने आता है।
पैमाने गलत हों, मूल्याँकन को कसौटियाँ विकृत हों तो अन्याय स्वभाव बन जाता है। आज समाज में अन्याय, अनीति तथा भ्रष्टाचार को कुंठित व्यूह रचाना दिखाई पड़ती है, उन बहुत कुछ उत्तरदायित्व उन गलत मानदण्डों पर है जिसके आधार पर मनुष्य को तोला व नापा जाता है। जो उसके व्यक्तित्व के मूल्याँकन की कसौटी पर बने हुए हैं।
लोगों ने देखा कि कितनी विशाल कोठी है। सोने की तरह दमक रही है। खिड़की दरवाजे व रोशनदान रंगीन काँच से जड़े है। रेशमी परदे झिलमिला रहें है। मूनलाइट बल्ब जल रहा है। स्टीरियो डेक से गायन वादन के स्वर गूँज रहें है। आंखें चकाचौंध हो गयी, कान लालायित हो उठे, मन कह उठा साक्षात् स्वर्ग का निवास है। बड़ा भाग्यवान है इसका मालिक। कितना बड़ा आदमी है? लाखों, करोड़ों होंगे इसके पास। अनायास श्रद्धा जागी उस अनजान धनवान की और झुक गया। उसका बड़े आदमी के रूप में मूल्याँकन हो गया। वह चर्चा और प्रतिष्ठा का पात्र बन गया ओर कोई अवसर आने पर पूजा प्रतिष्ठा के रूप में उसका मूल्य व्यक्त कर दिया जाता है।
धन प्रतिष्ठा का विषय रहा है। इसलिए कि वह परिश्रम और पुरुषार्थ का साक्षी होता था। प्राचीन समय में जब धन को प्रतिष्ठा के विषय में स्थान दिया गया था, लोग यह कल्पना तक भी नहीं कर सकते थे कि इसका अर्जन पार्जन अनीति के मार्ग से भी किया जा सकता है। अनुचित तथा अनीति के पैसे और पैसे वाले लोग ऐसे डरते और घृणा किया करते थे जैसे विषैले सर्प से। कोई किसी का अन्न खाने, दान या सहायता लेने हजार प्रकार से सोच विचार किया करते थे। उसी की सेवा अथवा सहायता की जाती थी जिसका कमाई के विषय में यह विश्वास रहता था कि प्रत्यक्ष तो क्या परोक्ष रूप से इसका पैसा अन्याय अथवा अनीति से दूषित नहीं हुआ है। यदि इस प्रकार का संदेह भी हो जाता था तो समाज का बच्चा बच्चा लक्षाधिपति होने पर भी उस धनवान को नीची नजर से देखा करता था। जिससे उसकी धनाढ्यता ही उसके लिए काल फाँस की तरह दुःखदायिनी हो जाती थी।
समाज द्वारा कठोर मूल्यों से अनुशासित तब के धनवान अपने व्यापार और व्यवसाय में पराकाष्ठा तक पवित्र एवं सत्य परायण रहकर विशुद्ध परिश्रम एवं पुरुषार्थ से उस स्थिति तक पहुँचकर प्रतिष्ठा के पात्र बनते थे। साथ ही वह विशुद्धता भी तब तक मान्यता नहीं पाती थी जब तक उसका पवित्र धन पवित्र एवं पुनीत कामों में नहीं व्यय होता था। इस प्रकार आय व्यय दोनों से ही समान पवित्रता से तुलकर ही कोई धनवान धन के आधार पर उसी प्रकार समाज में मान्यता एवं श्रद्धा के भाजन बन पाते थे जैसे जन सेवा के अन्य कार्य करके कोई सत्पुरुष।
पहले जहाँ धन की मात्रा का कोई मूल्य नहीं था, मूल्य था उसकी आय व्यय की रीति नीति का, वहाँ आय व्यय की रीति नीति का तो कोई मूल्य नहीं रहा। धन की मात्रा को ही श्रेष्ठता का मापदण्ड मान लिया गया है। स्थिति बिल्कुल विपरीत हो गयी है, इसलिए इसका प्रभाव एवं परिणाम भी उलटा हो गया है।
लोगों ने कोठी, कार, एयरकन्डीशन, टी.वी., वी.सी.आर, आदि विलास और आमोद प्रमोद की चहल पहल देखी नहीं कि बड़ा आदमी मान लिया और मान सम्मान देना शुरू कर दिया। मान सम्मान जैसी बहुमूल्य चीज और श्रद्धा जैसी दुर्लभ वस्तु को जो कि त्याग, तपस्या, साधना, सेवा, श्रम और पुरुषार्थ के आधार पर इतनी सस्ती और आसानी से मिल सकती है तब क्या किसी ने भाँग खाई है कि वह प्रतिष्ठा पूर्ण जीवन जीने के लिए संयम और साधना करता फिरे। सेवा और त्याग का परिमाण देता घूमें। क्यों न किसी प्रकार से धन बटोर कर उसे प्राप्त किया जाये? जनता द्वारा धन के प्रभाव में आकर दी जाने वाली इस सस्ती सामाजिक प्रतिष्ठा ने लोकप्रियता के प्यासे लोगों को अंध आर्थिकता में डुबो दिया है।
यही नहीं के लोग किसी का धन वैभव देखकर ही प्रभावित हो जाते हैं और उसे प्रतिष्ठा पूर्वक नजर से देखने लगते हैं फिर चाहे उसका धन उसके अथवा समाज के किसी हित में आता हो या न आता हो। प्रतिष्ठा का स्तर इतना गिर गया है, सम्मान इतना सस्ता हो गया है कि जन सामान्य धन के संचय को ही नहीं अपव्यय को श्रद्धा की दृष्टि से देखते हैं। नाच रंग में डूबा रहना, शराब खोरी और फैशन परस्ती में लगा रहना, बड़ी बड़ी दावतों और शहर में पैसा पानी की तरह बहाना तक लोगों के लिए श्रद्धास्पद बन गया है। लोग उसे उदार, बड़ा आदमी, शाह खर्च कह कर सम्मान करते और रास्ता देते हैं। जनता की इस सस्ती श्रद्धा और अस्तरीय मापदंड ने भी लोगों को अंध आर्थिकता बढ़ाने में बहुत कुछ योग दिया है।
हर विचारशील व्यक्ति का नैतिक कर्तव्य है कि वह किसी के वैभव विलास से प्रभावित होकर उसका मूल्याँकन करने से पहले यह अवश्य देख ले कि इस संपत्ति का आधार नीति रहा है या नहीं? उसे उसके सघन उपायों तथा युक्तियों की पवित्रता की खोज कर लेना आवश्यक है जिससे कि गलत कामों के त्रुटिपूर्ण मूल्याँकन का अपराध न हो जाय।
जब यह बात स्पष्ट दिखाई देती है कि अमुक व्यक्ति छल कपट, छीना झपटी, चोर गुजारी, मुनाफा खोरी और भ्रष्टाचार को आधार बनाकर कोठी पर कोठी बनाये जा रहा है, बैंक बैलेन्स और कारोबार बढ़ाता जा रहा है तब क्या उसे अधिकार है कि हम उसे यह सब कुछ दें? यदि हम दोनों में से कोई भी ऐसा करता है तो अनाधिकार चेष्टा करता है, समाज में अंध अर्थवाद को बढ़ावा देकर भ्रष्टाचार फैलाने में सहयोग देता है जो सामाजिक अपराध एवं आध्यात्मिक पाप है।
आज यदि लोग धनाढ्यता का मूल्याँकन करना छोड़कर साधनों और उसके उपायों पर ध्यान रखने लगे तो समाज में पैसों के लिए फैला हुआ भ्रष्टाचार बहुत कम हो सकता है। अनुचित साधनों के कारण यदि धनिकों का मूल्यांकन कम हो जाय उनका वह अन्याय उपार्जित वैभव घृणा एवं तिरस्कार का प्रसंग बन जाय तो निश्चय ही लोग आवश्यकता से अधिक धनवान बनने की लिप्सा छोड़कर सम्मान रक्षा के लिए कमाई के उचित एवं उपयुक्त उपाय अपनाने के लिए विवश हो जाय।
आर्थिक क्षेत्र की ही तरह धार्मिक अथवा आध्यात्मिक क्षेत्र में भी जनता के मूल्याँकन की कसौटी खोटी हो गयी।
जटी रखाये जिसे भी रंगे कपड़े पहने चंदन लगाये भस्म रमाये देख लिया उसी को महात्मा, संत व साधु समझ लिया और पूजा प्रसाद चढ़ाने लगे। सेवा करने और वरदान की आशा लगाने लगे। जिसकी भी धार्मिक शब्दावली में वाचालता करते सुन लिया। विद्वान, दार्शनिक, तत्ववेत्ता मान लिया। जिसे हाथ उठाये पैर गड़ाये शरीर तपाते पानी में खड़े सूर्य से आँख मिलाये देख लिया उसे ही सिद्ध चमत्कारी, मुक्त, वीतराग, गुणातीत, आदि न जाने क्या क्या समझकर पूजा प्रतिष्ठा करने लगे।
जनता की इस सस्ती श्रद्धा ने आध्यात्मिक क्षेत्र में रंगे स्यारों की बाढ़ लादी है। जब ढोंग आडम्बर तथा बहरूपियापन करके तपस्वियों तथा सिद्धों जैसी पूजा पाई जा सकती है स्थान पर बैठे बैठे पुजापा प्राप्त किया जा सकता है तब क्या जरूरत है त्याग तपस्या का असिधारा के सम्मान तीखा मार्ग अपनाया जाय।
पता नहीं श्रद्धा जैसी बहुमूल्य संपत्ति को लोग बिना परखे पहचाने ढोंगियों और आडम्बरियों पर क्यों लुटाते फिरते हैं? वे क्यों सोचने समझने की कोशिश नहीं करते कि अध्यात्म साधना और उनकी सिद्धियां यदि इतनी सरल और सस्ती होती तो प्राचीन ऋषि मुनि आत्म परिष्कार, चिंतन मनन, स्वाध्याय में अपना जीवन क्यों खपा देते?
आध्यात्मिक सिद्धियों के धनी क्या इस प्रकार गली गली पैसा और प्रतिष्ठा माँगते फिरते हैं। क्या यह शंका और संदेह का विषय नहीं है। कि जो दूसरों को धन वैभव संपत्ति, संतान का वरदान देने की क्षमता रखता है वह क्यों स्वयँ दरिद्र भिखारी तथा पैसे पैसे के लिए जान दे रहा है? क्या दूसरों को लाखों का वरदान देकर दस पैसा माँग ले जाने वाला सिद्ध हो सकता है। उसकी पूजा की जानी चाहिए? इस मान्यता में कौन सा तुक है यह बात समझ में नहीं आती।
अटपटे शब्दों का उच्चारण और विलक्षण क्रिया प्रतिक्रिया के साथ भूत भगाने वाले, रोग और दोष दूर करने वाले यदि पूजा प्रतिष्ठा के अधिकारी होते हैं तो क्या कारण है कि विचित्र और अनबूझ भाषा बोलने वाले और असंगत काम करने वाले पागल पूजा के अधिकारी नहीं है, ऐसा किस प्रकार कहा जा सकता है।
शब्द सुनकर भक्त हो जाने वाले और शब्द सुनकर ही विश्वास करने वाले की सर्वजनीय दुर्बलता समाज के नित्य नए वाक् वंचकों को जन्म देती और आगे बढ़ाती है। शब्द सुनकर ही किसी के प्रभाव में आ जाना वह प्रोत्साहन एवं प्रेरणा है। जिससे लोग व्यक्तिगत आचरण की उपेक्षा कर वाक्पटुता का अभ्यास करके सभी क्षेत्रों में प्रतिष्ठा पा लेते हैं जनता पर यदि महत्व का मापदण्ड होता तो निश्चय ही वाक् वञ्चकों की बुद्धि पर अंकुश लग जाता है और समाज परिणत प्रवृत्ति के धर्म ध्वजों तथा वञ्चकों से होने वाली हानियों से बच जाता और धार्मिकता ओर अध्यात्मिकता क्षेत्र में बढ़ रहे भ्रष्टाचार की बाढ़ पर रोक हो जाती है। किन्तु खेद है कि जनता की अंध श्रद्धा और अंधविश्वास और मूल्याँकन की खोटी कसौटी ही हित अनहित का निदर्शन नहीं करने देती।
यह बात बड़ी सीमा तक सत्य मानी जा सकती है कि यदि लोक जीवन में विवेक शीलता उभर सके और मूल्याँकन के विषय में अपनी श्रद्धा एवं प्रतिष्ठा का मापदण्ड ठीक करके सही कसौटी काम में लायी जाए तो जीवन के व्यापक दायरे में भ्रष्टता बहुत हद तक दूर हो सकती है। अर्थ और धर्म के क्षेत्र में देखने, परखने, मूल्यांकन करने का सही मापदण्ड साधन और सच्ची कसौटी व्यक्ति के कथन तथा आचरण की एकरूपता ही है। जिस दिन लोक मानस इस तथ्य को हृदयंगम कर तटस्थ आचरण पर उतारू हो जायेगा। उसी दिन सुधार शुभारंभ सुनिश्चित है।
शहरी इलाकों में व्यक्ति संपूर्ण सुविधा, समुचित साधन और उपयुक्त उपचार के बावजूद देरी से स्वस्थ होते देखे जाते हैं, जबकि सैनिटेरियमों में आवश्यक वस्तुओं के अभाव में भी स्वास्थ्य लाभ बहुत तीव्रता से होता है। ग्रामीण वातावरण में आरोग्यता शीघ्रता से प्राप्त होती है। जबकि औद्योगिक क्षेत्रों में इसमें विलंब होता दृष्टिगोचर होता है। इसका कारण क्या है?
विशेषज्ञों का इस विषय में सुनिश्चित मत है कि यह वातावरण ही है जो व्यक्ति को सबल स्वस्थ बनाता और निर्बल निरीह बनाकर बीमार कर देता है। यहाँ प्रश्न उठ सकता है कि आखिर वातावरण में ऐसी क्या विशेषता है कि कहीं वह स्वास्थ के लिए अनुकूल तो कहीं वह आरोग्य वर्धक साबित कर देता है। तो कहाँ प्रतिकूल है?
विज्ञान वेत्ता इसके लिए “ आयन “ को जिम्मेदार बताते हैं उल्लेखनीय है कि हम हवा है विशाल समुद्र में रहते हैं। सर्वसाधारण जिसे हवा के नाम से पुकारते हैं, वह वस्तुतः कई गैसों का सम्मिश्रण है। इन गैसों को जब कभी अत्यधिक ऊर्जा से आमना सामना होता है, तो उनके अणु परमाणु आयनीकृत हो जाते हैं और ऋण एवं धन कणों को जन्म देते हैं। यही कण अपनी संख्या एवं स्वभाव के आधार पर भली बुरी जलवायु का निमार्ण करते हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि धनायन स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होते हैं, जबकि ऋणायन लाभकारी। जहाँ धनायनों की संख्या किन्हीं कारणों से सामान्य से अधिक होती है, उन स्थानों पर रहने वाले लोगों का स्वास्थ्य प्रभावित होता है और लड़खड़ाने लगता है, अथवा दूसरे शब्दों में कहें तो वहाँ की आवोहवा स्वास्थ्य की दृष्टि से प्रतिकूल बन जाती है। विश्व में ऐसी कितनी ही हवायें अनेक स्थानों पर बहती पायी गयी हैं, जो अपने दुष्प्रभाव के लिए कुख्यात हैं। इनमें दक्षिणी कैलीफोर्निया की “ साँता एना विड्स” कनाडा की “चिनुक विड्स “ अर्जेन्टीना की “ जोण्डा विड्स “ इटली की “ सिरोको विड्स एवं इजराइल के आस पास के क्षेत्रों को “ शाराव “ अथवा चैमसिन विड्स” प्रमुख है। इन स्थानों पर जब वे हवाएँ चलती हैं, तो वहाँ के निवासियों का शारीरिक मानसिक स्वास्थ्य बुरी तरह बिगड़ने लगता है। उदाहरण के लिए इजराइल से होकर बहने वाली “ चैमसिन विड्स “ को लिया जा सकता हैं इस हवा के चलने से दो दिन पूर्व उस क्षेत्र के लोगों का, मूत्र में, सेरोटोनिन अचानक बहुत बढ़ जाता है। स्राव का अचानक बहुत बढ़ जाना इस बात का स्पष्ट संकेत है कि व्यक्ति मानसिक रूप से अत्यधिक तनाव से गुजर रहा है। इसके अतिरिक्त जो प्रकट लक्षण दिखाई देते हैं वे ही उन्माद, अनिद्रा, आधाशीशी, मिचली, उलटी, दृष्टि क्षीणता एवं सृजन। हवा बहने से पूर्व ही ऐसे प्रतिकूल शारीरिक, मानसिक लक्षण परिलक्षित होने लगते हैं। जब इस संदर्भ में वैज्ञानिकों ने अध्ययन किया, तो पता चला कि उस दौरान किन्हीं अज्ञात कारणों से उक्त क्षेत्र में धनायनों की संख्या असाधारण रूप से बढ़ जाती है। इसी की परिणीत शरीर मन की असमानता के रूप में सामने आती है।
परिणामों को और अधिक सुनिश्चित और परिपुष्ट करने के लिए मूर्धन्य विज्ञानी अल्बर्ट क्रूजर एवं सहयोगियों ने चूहों पर एक प्रयोग किया। उन्होंने जब उन्हें धनायन युक्त वातावरण में रखा, तो रक्त सैरोओनिन में स्पष्ट अभिवृद्धि देखी गयी। इसके विपरीत ऋणायनों की अधिकता वाले परिवेश में सैरोओनिन के स्तर में गिरावट आती पाई गई। इतना ही नहीं, इसमें घाव और दूसरी प्रकार की शारीरिक व्यथाओं से जल्दी छुटकारा पाते देखा गया। इस प्रकार आयनों के शारीरिक मानसिक प्रभाव ज्ञात हो जाने के उपरान्त इस प्रश्न पर भी संतोष जनक उत्तर ढूंढ़ लिया गया। कि क्यों जल प्रपातों, समुद्री किनारों एवं वन्य प्रांतों का वातावरण स्वास्थ्य की दृष्टि से लाभदायक होता है? शोध अनुसंधानों के अनुसार इन स्थानों पर ऋणायनों की संख्या सामान्य से कुछ अधिक पायी जाती है। इस प्रकार स्वास्थ्य संबंधी ऋणायनों के सत्परिणामों की सुनिश्चित पुष्टि हो जाने के पश्चात वैज्ञानिक अपनी प्रयोगशालाओं एवं घरों में ऐसी प्राकृतिक वातावरण विनिर्मित करने में सफल हो गये, जो उन्हें शरीर मन से शान्त और स्वस्थ बनाये रख सकें। ऐसे वैज्ञानिकों में अग्रणी हैं यूनिवर्सिटी आफ कैलीफोर्निया, बर्कले के डॉ अल्बर्ट क्रूजर। उनने अपनी यूनिवर्सिटी की अनुसंधान शाला में ऐसे अनेक फिल्टर लगा रखे है, जो हवा को धूल कणों और प्रदूषण कारक तत्वों से मुक्त करते हैं। इसके अतिरिक्त इसके जनरेटर भी हैं जो प्रयोगशाला के अंदर की हवा को आवश्यक परिणाम में ऋणायनों की पूर्ति करते रहे। इन विशेषताओं के कारण इनकी प्रयोगशाला में भीतर प्रवेश करते ही ऐसा महसूस होता है, जैसे व्यक्ति किसी वन्य प्रदेश के स्वच्छ शांतिदायक वातावरण में पहुँच गया हो।
यह आधुनिक विज्ञान के अभिनव प्रयोग हैं। उपलब्धियों की दृष्टि से इन्हें सराहनीय तो कहा जा सकता है, पर ऐसा नहीं जो बड़े प्रदेश की व्यापक स्तर पर प्रभावित परिष्कृत कर सकें।
वस्तुतः यह वैयक्तिक प्रयोग है। इसका असर घर परिवार के छोटे क्षेत्र तक सीमित रहता है और अर्थ दृष्टि से खर्चीला भी है। ऐसी स्थिति में आज के विश्व व्यापी प्रदूषण को दूर करने के लिए उपयोगिता न सिर्फ समाप्त हो चुकी है वरन् विवेक की दृष्टि से असंगत भी साबित होती है। रोग जब हिमालय जितना विशाल और व्यापक हो और उपचार किसी एक अवयव से किया जा रहा हो, तो इसे बुद्धि का दिवालियापन ही कहा जाना चाहिए जहाँ लक्ष्य सम्पूर्ण भूमण्डल के पर्यावरण को परिशोधित करना हो, वहाँ उपाय भी उस स्तर का विस्तृत विराट और प्रभाव कारी होना चाहिए, जिसे सस्ते में हर कोई सरलता पूर्वक संपन्न कर सके। ऐसे में ध्यान ऋषियों के जिस सूक्ष्म प्रयोग की ओर बरबस जाता है, वह है अग्निहोत्र अथवा यज्ञ।
यों पिछले दिनों तक यज्ञ को धार्मिक कर्मकाण्ड तक माना जाता था, पर अब जैसे जैसे विज्ञान का ध्यान इस ओर जा रहा है इसकी वैज्ञानिकता स्पष्ट नजर आने लगी है। वैज्ञानिक ज्यों ज्यों इसकी गहराई में प्रवेश करने की कोशिश कर रहे हैं, त्यों त्यों नित नये तथ्यों का उद्घाटन होता जा रहा है। इन्हीं में से एक नवीन तथ्य है ऋणायनों का उत्पादन और संकेंद्रण। ज्ञातव्य है जहाँ नियमित रूप से बराबर यज्ञ होता है वहाँ ऋणायनों की संख्या उसी सीमा में पाई जाती है। जो समुद्र तटीय या वन्य प्रंतरों में रहते हैं अर्थात् 200 -400 आयन प्रति घन से.मी. हवा में उपरोक्त स्थलों में इसकी घनीभूत संख्या से संबंधित प्रक्रिया के बारे में में तो सही सही कुछ भी नहीं जाना जा सकता, पर यज्ञीय स्थलों में इनके निर्माण का समुचित कारण विद्यमान है।
जैसा कि पहले कहा जा चुका है आयनीकरण की क्रिया अत्यणिक ऊर्जा की उपस्थिति में संपन्न होती है। यह मुख्यतः दो प्रकार की है- रेडियोधर्मी पदार्थों से उत्सर्जित ऊर्जा और ब्रह्मांडीय विकिरण के रूप में होने वाली निरंतर बौछार। प्राकृतिक आयनीकरण में इन्हीं दो शक्तियों का प्रमुख हाथ है। किन्तु इसके अतिरिक्त भी एक ऊर्जा है, जो आयन निर्माण को संपन्न कर सकता है। यह है तापीय प्रभाव, यज्ञ के दौरान इसी प्रभाव से आयन उत्पादन निष्पन्न होता है और आस पास के इलाकों में घनीभूत होकर वहाँ के वातावरण में परिशोधित करता है एवं स्वास्थ्य वर्धक बनाता है। इसके अतिरिक्त यज्ञ प्रक्रिया से ऐसे सूक्ष्म तत्वों का निर्माण संपादित होता है, जो उक्त क्षेत्र में संव्याप्त विषैले कणों से प्रक्रिया कर उन्हें निरस्त करते हैं।
इसकी पुष्टि इस बात से सुनिश्चित हो जाती हैं कि ऐसे आवेशित कणों की रचना नैसर्गिक रूप से सदा सर्वत्र होती रहती हैं, किन्तु अन्य स्थानों में वे स्थानीय विषैले तत्वों से प्रतिक्रिया कर निष्क्रिय बड़े आयनों में परिवर्तित हो जाते हैं और आरोग्यकारी लघु आयन अत्यल्प संख्या में ही रह जाते हैं। प्रख्यात मौसम विज्ञानी बी.मैक्जिन्सकी ने सन 1971 में एक ऐसे ऑफिस का चौदह दिवसीय सर्वेक्षण किया, जिसमें मात्र चार कर्मचारी थे। जाँच से विदित हुआ कि दिन ढलने के साथ साथ छोटे आयनों की सघनता घटती जाती हैं चौदह दिनों में इनकी औसतन संख्या शाम के समय 34 धनायन एवं 20 ऋणायन प्रति घन से.मी. पाई गई। जे.पी. वेंकट द्वारा सेन फ्रांसिस्को के औद्योगिक द्वोत्र में अन्य पड़ताल के दौरान आवेशित लघु कणों की संख्या 80 आयन घन से. मी.से भी कम देखी गई। इन दिनों में अध्ययनों में निष्क्रिय एवं बड़े आयनों की तादाद असाधारण रूप से बढ़ी बढ़ी प्राप्त हुई, जबकि यज्ञीय वातावरण में तथ्य सर्वदा विपरीत दृष्टिगोचर होता है, वहाँ छोटे सक्रिय ऋणायनों की सघनता ही सर्वाधिक थी। इसके अतिरिक्त दोनों ही बातें प्रमाणित हो जाती है। प्रथम यह कि यज्ञ से आरोग्य वर्धक ऋणावेशित कणों का निश्चित निर्माण होता है, दूसरे इससे प्रदूषण का भी सत् शमन होता है।
इतना जान लेने के उपरान्त यज्ञ को वैज्ञानिकता में संदेह करने का कोई कारण शेष नहीं रह जाता। संभव है अगले दिनों इससे संबंधित और नवीन तथ्यों की जानकारी मिलें जड़ी बूटी का वजन अपने आप में महत्वपूर्ण है। इससे स्थानीय वातावरण औषधि युक्त बनता है और उसका अनायास लाभ वहाँ के निवासियों के सुगंधि, स्फूर्ति और शाँति के रूप में मिलता है। इतने पर भी लो इस सूक्ष्म विज्ञान के संबंध में यह आक्षेप लगाते हैं कि इससे प्रदूषण बढ़ता है, उनके लिए इतना ही कहना पर्याप्त होगा कि इससे अदृश्य परिशोधन कई गुना बड़ा होता है इतना बड़ा जिसे अतुलनीय कहा जा सके। शाँति कुँज के तत्वावधान में आयोजित होने वाली इन दिनों की आश्वमेधिक शृंखला इसी प्रयोजन की पूर्ति हेतु है। इसका एक उद्देश्य बड़े स्तर पर प्रदूषण निवारण और जन जागरण है। इसे किसी मत मतान्तर या संप्रदाय से नहीं जोड़ा जाना चाहिए। यह एक विशुद्ध वैज्ञानिक प्रयोग है, जिसे संप्रति अपनाया ही जाना चाहिए।
कल मैंने क्या कहा था इस बात पर संकोच किये बिना आज हमें यही कहना चाहिए जिस पर इस समय अपना विश्वास हो।
जीव जन्तुओं को प्रायः निरीह नासमझ माना जाता और समझा जाता है कि उनका सहचार्य मनुष्य को मात्र विनोद मनोरंजन ही दे सकता है, पर यह संपूर्ण सत्य नहीं है कुछ जन्तु ऐसे भी होते हैं, जो जो सहकारी वृति के होते और मन बहलाव करने के अतिरिक्त मनुष्य की तरह तरह की सहायता करते हैं। यदि किसी कार्य विशेष के लिए प्रशिक्षण किया जा सके, तो वे उस क्षेत्र में और भी अधिक बढ़ी बढ़ी योग्यता का प्रदर्शन करते हैं। इन्हीं में से एक है - डाल्फिन मछली। ये मछलियाँ इतनी परोपकारी होती है कि जल क्रीड़ा अथवा स्नान के मध्य यदि किसी व्यक्ति का जीवन संकट में पड़ जाये, इसका पता डाल्फिनों को चल जाये, तो वे तुरन्त संकट ग्रस्त की सहायता के लिए प्रस्तुत होती देखी जाती है।
घटना सन् 1943 की है फ्लोरिडा के समुद्र तट पर एक दिन मार्था नामक एक महिला स्नान कर रही थी, वहाँ पर तट कुछ ढलवा था कमर तक जल में पहुंचकर जैसे ही डुबकी लगाने लगी, उसके पैर अचानक फिसल के कारण वह गिर पड़ी और सारा जल फेफड़ों में जाने के कारण वह बेहोश हो गयी। दुर्भाग्यवश आस पास कोई नहीं था, फलतः उसे किसी की सहायता नहीं मिल सकी। उसी समय वहाँ से एक व्यक्ति गुजर रहा था। उसने देखा कि समुद्री जल में एक मानव का शरीर डूबता उतराता शनैःशनैः तीर की ओर अग्रसर हो रहा है। उत्सुकतावश उसे देखने और उसकी विलक्षण गति का रहस्य जानने के लिए वह रुक गया। शरीर पूर्ववत् किनारे की ओर बढ़ता चला आ रहा था। जब वह व्यक्ति तट के अत्यंत समीप आया, तो देखा कि एक बड़ी डाल्फिन मछली उस मानव शरीर को अपनी पीठ पर लादे प्रयत्न पूर्वक समुद्रतल की ओर ला रही है। जब वह किनारे पर बिल्कुल छिछले जल में पहुँच गया, उस शरीर को वही छोड़ कर विशाल जल राशि में कही अदृश्य हो गयी। यात्री ने जब अपना निरिक्षण किया, तो उसे अपने जीवन के कुछ लक्षण दिखाई पड़े। वह उसे पानी से बाहर लाया और फेफड़ों में घुसे पानी को प्रयास पूर्वक निकालने लगा। इस क्रिया में मार्था की चेतना धीरे धीरे वापस लौट आई, तब उसने उस व्यक्ति से अपने डूबने की घटना सुनायी और अजनबी से उसे डाल्फिन द्वारा बचा लिये जाने का आँखों देखा विवरण बताया। इसे सुनकर मार्था ने अपने भाग्य को सराहा और घर चली गयी पर वह व्यक्ति जन्तु विज्ञान कामूर्धन्य प्रोफेसर डॉ. बी. एरलैण्डसन था। उनके मन में जब यह जिज्ञासा उत्पन्न हुई कि डाल्फिन ने संयोग वश मार्था को बचाया अथवा अपनी सहयोगी प्रवृत्ति के कारण उसकी रक्षा की। इसे जानने के लिए उसने एक प्रयोग किया एक बड़े हौज में एक ऐसी अस्वस्थ मादा डाल्फिन को रखा, जिसे साँस लेने के लिए जल सतह तक आने में कठिनाई होती थी। उसकी मदद के लिए उसी में एक स्वस्थ और अपरिचित नर डाल्फिन को छोड़ा गया। नर मछली बार बार मादा को ऊपर उठा कर साँस लेने में सहयोग प्रदान कर रही थी। बाद में उसमें एक अन्य मादा डाल्फिन छोड़ी गयी। वह भी इस सेवा कार्य में जुट पड़ी। दोनों ने मिलकर 48 घण्टों तक अस्वस्थ मत्स्य की मदद की, तब कही जाकर वह योग्य हो सकी कि स्वयं जल सतह तक जा कर साँस ले सके। इस प्रयोग से डाल्फिन मछली की परोपकारी वृति असंदिग्ध साबित हो गयी और प्रोफेसर की यह दृढ़ धारणा बन गयी कि यह उसकी नैसर्गिक प्रवृत्ति है।
एक अन्य घटना न्यूजीलैण्ड की है वहाँ के होकोआँगा बंदरगाह में सन् 1950 के दशक में एक मानव प्रेमी डाल्फिन जील एक तेरह वर्षीय बालिका से इतना हिल मिल गयी थी कि वह उसे दूर तक अपने ऊपर बैठाकर सैर करा लाती थी। प्रायः वह मात्र निकटवर्ती “ओमोपीयर “ तट तक होती। यही तक बंदरगाह ला हुआ था। इसके बाद वह जील को वापस लौटा लाती थी अपनी उक्त प्रवृत्ति के कारण स्थानीय लोगों में “ओमो “ नाम से लोकप्रिय हो गयी थी। इस घटना से वह इतनी प्रसिद्ध हुई कि न्यूजीलैण्ड में उसके संरक्षण के लिए एक कानून बनाया गया। इस कानून के बाद लोग उसके कौतुकों से अपना मनोरंजन तो करते, पर उसे छोड़ने की कोशिश नहीं करते। ओमो भी अपने कर्तव्यों द्वारा स्नान करने वालों का खूब दिल बहलाती। उनमें जैसे कही जील दिखाई पड़ती, वह तुरन्त उसके पास पहुँच कर उसे जल विहार के लिए ले जाती। एक ऐसे ही अवसर पर असावधानीवश जील उसकी पीठ से लुढ़क पड़ी और गहरे जल में डूबने उतराने लगी। ओमो को ज्यों ही यह ज्ञात हुआ, उसने तत्काल डुबकी लगाकर लड़की को अपने ऊपर बैठा लिया। शायद घटना कि गंभीरता का उसने कुछ अनुमान कर लिया था, अतः वह और आगे न बढ़कर बैरंग पीछे लौट पड़ी। तट पर जील को छोड़कर गहरे जल में विलुप्त हो गयी। उस दिन के बाद फिर उसके दर्शन न हुए। संभव हो उसे इस घटना का त्रास पहुँचा हो। ऐसे ही पेलोरस जैक नामक एक अन्य डाल्फिन 40 की शताब्दी में वहाँ चर्चा का विषय बनी रही। अनेक वर्षों तक यह मछली नाविकों का मनोरंजन करती रही। कई बार उन्हें पीठ पर बैठा कर समुद्र की यात्रा भी कराती। जब बूढ़ी हुई तो एक बार पेरेविन जलयान से टकराकर बुरी तरह घायल हो गया। बाद में इसी दुर्घटना के कारण उसकी मृत्यु हो गयी। आज भी उसका चौदह फीट लम्बा कंकाल विलिंगटन के अजायबघर में रखा है। सन् 1971 में अमेरिका के फ्लोरिडा राज्य में ण्लिसबरी परिवार के पास एक पालतू डाल्फिन थी वह परिवार वालों के साथ वाटर पोलो खेला करती थी। यदा कदा जब छोटे बच्चों की गेंद खेलते समय जब पानी में गिर पड़ती जो वह उसे उठाकर बाहर फेंक देती। बच्चों के साथ वह खूब अठखेलियाँ किया करती थी। एक बार एलिसबरी परिवार का एक बालक खेलते समय अचानक पानी में गिर पड़ और डूबने उतराने लगा। जब तक परिवार के लोग उसकी सहायता के लिए प्रस्तुत होते उससे पूर्व ही उस मछली ने उसे सुरक्षित बाहर कर दिया था।
कई बार डाल्फिनें छोटी मोटी शरारतें भी करती है। ऐसी ही एक मछली ब्रिटेन के आम्यल ऑफ मेन के पोर्ट एरिन बंदरगाह में थी। उसमें लोगों की सहायता और मनोरंजन करने की दोनों प्रवृत्तियां भी थी, पर एक तीसरा स्वभाव भी था कि वह नाविकों से छेड़छाड़ भी किया करती थी। “डोनाल्ड “ नामक डाल्फिन जब मस्ती में आती, वह नावों का लंगर खोल देती थी। यदा कदा वह उन्हें धकेलकर दूर समुद्र में ले जाती और वहाँ उछल उछल कर तट पर खड़े नाविकों को यह बतलाने की कोशिश करती कि वह उसी की शरारत है।
डाल्फिनों को यदि प्रशिक्षित किया जा सके अथवा सेवा सहायता उन्हें किसी प्रकार समझायी जा सके, तो उन कार्यों को भी वह दक्षता पूर्वक वे करती देखी जाती है। स्पेन के दक्षिण पश्चिम में “ ला -कोरोना “ के समुद्र तट पर डाल्फिनें मछुआरों को मछली पकड़ने में मदद करती दृष्टिगोचर होती है। यहाँ पर मछुआरों को जब मछलियाँ पकड़नी होती हैं तब वे पानी में पैरों के माध्यम से एक विशेष प्रकार की लहर व मुँह से विशिष्ट प्रकार की ध्वनि उत्पन्न करते हैं इन संकेतों का अर्थ समझकर डाल्फिनें सहायता के लिए तत्काल प्रस्तुत होती है। उनका झुण्ड चारों ओर से मछलियों को घेर घेर कर उनकी ओर लाती है और मछुआरे उन्हें जाल फेंक कर फँसा लेते हैं। इस प्रकार मछली पकड़ने का कार्य अत्यंत सरल हो जाता है।
सेना में प्रतिरक्षा संबंधी कार्यों में कुत्तों, कबूतरों की मदद तो देखी सुनी जा रही हैं, पर यह कदाचित ही सुना गया है कि इस कार्य में मछलियाँ भी निष्णात् होंगी, किन्तु यह सत्य है कि इस क्षेत्र में जब डाल्फिनों की मदद ली जा रही है। जिसकी शुरुआत अमेरिका ने की है। प्रयोग के रूप में इस प्रकार के प्रशिक्षण का शुभारंभ सर्वप्रथम कैलीफोर्निया के चाइना लेक स्थित नेवल आर्डिनंन्स सेण्टर में किया गया।
वहाँ बारी बारी से तीन डाल्फिनों को प्रशिक्षित किया गया और बाद में खुले समुद्र में छोड़कर उनकी परीक्षा ली गयी यह जानने का प्रयास किया गया कि प्रशिक्षण के दौरान उन्हें जो सिखाया गया, वे उसे सचमुच सीख पाया या नहीं। परिणाम उत्साह वर्धक देखा गया। इस आरंभिक सफलता के उपरान्त यह प्रशिक्षण कार्य अमेरिका में अब कैलीफोर्निया के अतिरिक्त फ्लोरिडा एवं हवाई के दो अन्य नौसैनिक केंद्रों में चलाया जा रहा हैं। पिछले वर्षों में ऐसी प्रशिक्षित मछलियों ने फारस की खाड़ी में अमेरिकी जलपोतों की रक्षा कर अपनी महत्वपूर्ण। भूमिका का प्रमाण परिचय दिया है। ईरान ईराक युद्ध के कारण उक्त वर्ष जब इस क्षेत्र में तनाव बढ़ा और समुद्र में बारूदी सुरंगों का जाल बिछा, तो अमेरिकी नौसेना ने जहाजों की रक्षा के लिए डाल्फिनों की सहायता ली थी। तब कई प्रशिक्षित डाल्फिन खाड़ी में भेजी गयी थी, जो जल के भीतर छुपी सुरंगों का सही सही अनुसंधान कर उसकी सूचना जलयान में देती व संभाव्य दुर्घटना को टालने में मदद करती थी। आज अमेरिका के पास सौ से भी अधिक प्रशिक्षित मछलियाँ हैं, जो समय समय पर जल सेना को अपनी बहुमूल्य सेवा प्रदान करती रहती हैं।
संभवतः डाल्फिनों की इसी सेवा वृति ने महान अंग्रेज कथाकार शेक्सपियर को उन पर कथा सृजन की प्रेरणा दी। उनकी “ दि ट्वेल्व्स नाइट “ नामक कहानी में ऐसी ही परोपकारी मछलियों का वर्णन हैं जिन्होंने सरियन नामक एक यात्री को समुद्री दस्युओं द्वारा सागर में फेंक दिये जाने पर सुरक्षित ग्रीस तक पहुँचाकर उसकी प्राण रक्षा की थी। इस प्रकार डाल्फिनों की सहकारिता निश्चय ही सराहनीय है। विकास वादियों के अनुसार कशेरुकी मेरुदण्ड युक्त प्राणियों में मछलियाँ सबसे निम्न श्रेणी की है। उच्चकोटि में स्तनपाइयों को रखा गया है। उसमें भी मनुष्य को सर्वाधिक सर्वश्रेष्ठ व बुद्धिमान माना गया है डाल्फिन मछली है और अल्प विकसित है। वह मनुष्य की तुलना में अत्यंत अशक्त - असमर्थ है फिर भी अपनी सीमित क्षमता योग्यता का भरपूर उपयोग करती और सहकार वृत्ति का उत्कृष्ट नमूना प्रस्तुत करती है। मनुष्य उससे अनेक गुना विकसित ओर सामर्थ्यवान है। उसकी परोपकारिता भी अनेक गुना बढ़ी बढ़ी होनी चाहिए।
एकाकी प्रयत्न और पुरुषार्थ की भी महत्व है। और उसे सम्मानित, प्रोत्साहित किया ही जाना चाहिए। कई बार तो एकाकी प्रयत्न भी इतने प्रचण्ड होते हैं कि वे भी न केवल व्यष्टि सत्ता को, वरन् समष्टि सत्ता तक को प्रभावित करने और उलटने तक में बहुत हद तक सफल हो जाते हैं। यों ऐसा यदा कदा ही अपवाद रूप में होता है पर इससे यह पता चलता ही है कि ईश्वर अंश राजकुमार अपने पिता की समस्त विभूतियाँ साथ लेकर आता है और यदि वह चाहें तो अपनी प्रसूति को जाग्रति में बदलकर प्रखरता को अपनाकर सविष्ट क्षेत्र में भी कुछ कर सकता है जिसे चमत्कारी कहा जा सके। तेजस्वी, मनस्वी, तपस्वी स्तर के लोग ऐसा ही कुछ कर गुजरते हैं। ऐसी प्रतिभाएँ महामानवों के रूप में प्रतिष्ठा पाती है। और अपने असाधारण कर्तव्य से सामयिक समस्याओं का समा धान करती है। अवतारी आत्मायें इसी स्तर की होती है। युग नेतृत्व कर सकने की विलक्षणता ही उन्हें भगवान स्तर का श्रेय सम्मान प्रदान करती है। यह व्यक्ति के चरम उत्कर्ष का उल्लेख है।
इतने पर भी वातावरण की महत्ता अपने स्थान पर यथावत् ही बनी रहती है। और आवश्यकता यह भी बनी रहती हैं कि किस प्रकार समूचे वातावरण का अनुकूलन संभव बनाया जाय। इसके लिए सुनिश्चित उपहार सामूहिक साधना ही जाना और माना जाता रहा है कि इन दिनों इन प्रयत्नों को युग शक्ति के उदय उद्भव का उद्देश्य पूरा करने के लिए प्रयुक्त किया जा रहा है।
वातावरण के प्रभाव मनुष्यों की आकृति एवं प्रकृति में पाये जाने ले अंतर को देख कर जाना जाता है। काले, पीले, लाल रंगों की चमड़ी में वातावरण का प्रभाव ही मुख्य है। यह विशेषताएँ रक्त गत मानी जाती है, किन्तु यह भी स्पष्ट है कि चमड़ी को प्रभावित करने वाली रक्त गत विशेषता अंततः विभिन्न देशों एवं क्षेत्रों में पाई जाने वाली जलवायु की भिन्नता से ही संभव हैं मनुष्य के छोटे बड़े आकार देश और क्षेत्रों के हिसाब से होते हैं। पंजाबी और बंबाली के बीच शरीरों को सुदृढ़ता में जो कमी वेशी रहती है उसमें वातावरण के प्रभाव को देखा जा सकता है। रूस के उज़्बेकिस्तान प्राँत में अधिकाँश व्यक्ति शतायु होते हैं। उनके आहार विहार में सुविधा साधनों में कोई खास विशेषता नहीं होती। अन्यत्र रहने वाली की तरह वे भी मोटा छोटा खाते और औसत जिंदगी जीते हैं फिर सारे क्षेत्र में दीर्घायु की परम्परा किस कारण चली आ रही है। इसका उत्तर वातावरण की विशेषता को समझाने से ही मिल सकता है।
न केवल शरीर में, वरन् स्वभावों में भी विशेष अंतर देखा गया है। यह सूक्ष्म और स्थूल वातावरण का ही प्रभाव हैं संस्कृति सभ्यता आदि की विभिन्नतायें इसी आधार पर विभाजित होती है। कि किस क्षेत्र के लोगों को मान्यता अभिरुचि एवं आदत किस ढांचे में ढल गयी हैं और उन लोगों की विचारणा एवं गतिविधियाँ किस दिशा में प्रवाहित हो रही हैं यह प्रभाव सहज ही बदलते नहीं इस लिए उसे संस्कृति की भिन्नता के रूप में मान्यता दे दी जाती हैं। वे विशेषताएँ न केवल स्वभावों में वरन् चरित्रों और आदर्शों में छलकती दीख पड़ती है।
पशुओं, वनस्पतियों और खनिज पदार्थों तक में वातावरण की भिन्न ता के आधार पर उनके स्तर का परिचय मिलता है। यह देश के पशुओं का दूसरे देश वाले पशुओं की तुलना में न केवल आकृति में अंतर आता है, वरन् उसकी श्रमशक्ति, दूध देने आदि क्षमताओं में भी अंतर आता है।
भेड़ों की ऊन में पाई जाने वाली भिन्नताएँ उन क्षेत्रों के वातावरण से संबंधित होती है। पहाड़ी कुत्ते और देशी कुत्तों में काफी प्रकृति भिन्नता पायी जाती हैं ऋतु प्रभाव सहन करने की क्षमता भी उस क्षेत्र पर छाई रहने वाली सूक्ष्म विशेषताओं से ही संबंधित होती है। सर्दी वाले में जन्मे प्राणी सर्दी की और गर्म देशों के निवासी गर्मी की अधिकता को भी शाँतिपूर्वक सहन कर लेते हैं जबकि भिन्न परिस्थितियों में जन्म लेने वालों के लिए परिवर्तन के साथ तालमेल बिठाना कठिन होता है।
तेज वाहनों पर सफर करने वाले अक्सर स्वास्थ्य में गड़बड़ी पड़ने की शिकायत करते रहते हैं। इसका कारण वातावरण में परिवर्तन की तीव्रता का शरीर की सहन शक्ति के साथ ठीक तरह ताल मेल न बन सकना ही होता है।
जड़ी -बूटियाँ, घास -वनस्पतियाँ, फल फूल आदि के आकार गंध, स्वाद आदि में अंतर पाया जाता है। विभिन्न क्षेत्र में उत्पन्न औषधियों के नाम एक होने पर भी उनके रसायनों और गुणों में असाधारण अंतर दीख पड़ता है। पक्षियों से लेकर कीड़े मकोड़े तक की आकृति प्रकृति में अंतर देखा गया है। साँप, बिच्छू, छिपकली मकड़ी आदि के विषों में पाया जाने वाला अंतर यों दीखता तो जातिगत हैं पर वे जातिगत विशेषताएँ भी मूलतः वातावरण की ही प्रतिक्रिया होती है।
अनेक देशों की क्षेत्रों कि परिस्थितियाँ, प्रथाएँ एवं मान्यताएं रुचियाँ और संस्कृतियाँ भिन्न होती है। उसमें जो बालक उत्पन्न होते हैं वे वातावरण के प्रभाव से उसी प्रकार की मनोवृत्ति ओर प्रकृति अपनाते चले जाते हैं। उनके चिंतन स्वभाव एवं क्रिया कलाप लगभग वैसे ही होते हैं जैसे की उस प्रदेश में रहने वालों के। बहुमत का दबाव पड़ता है तो अल्प मत अनायास ही बहुतों का अनुकरण करने लगता है। समय का प्रभाव युग का प्रवाह इसी को कहते हैं। सर्दी गर्मी का मौसम बदलने पर प्राणियों के, वनस्पतियों के, पदार्थों के रंग ढंग ही बदल जाते हैं।
गतिविधियों में ऋतु के अनुकूल बहुत कुछ परिवर्तन होते हैं। विज्ञान वेत्ता जानते हैं कि पृथ्वी पर जो कुछ विद्यमान हैं और उत्पन्न, उपलब्ध होता है, वह सब अनायास ही नहीं और न उस सबको मानवीय उपार्जन कह सकते हैं। यहाँ ऐसा बहुत कुछ होता है जिसमें मनुष्य का नहीं, वरन् सूक्ष्म शक्तियों का हाथ होता है। सूर्य पर दीखने वाले धब्बे उसकी स्थिति के अनुसार बदलते रहते हैं। उस परिवर्तन का पृथ्वी पर भारी असर पड़ता है॥ उसमें पदार्थों की स्थिति एवं प्राणियों की परिस्थिति में आश्चर्य जनक हेर फेर होते हैं। विकिरण चुम्बकीय तूफान अंधड़ चक्रवात किस प्रकार सामान्य परिस्थितियों को असामान्य बनाते हैं, वह सभी जानते हैं। अंतरिक्षीय अदृश्य शक्ति वर्षा से कई बार धरती पर हिमयुग आयें है। जलप्लावन, समुद्री परिवर्तन आर्ष खण्ड प्रलय के दृश्य उपस्थित हुए हैं। भविष्य में पृथ्वी के पदार्थों अथवा प्राणियों की स्थिति में कोई असाधारण परिवर्तन हुआ तो उसका निमित्त कारण घटनाक्रमों में नहीं, वरन् अंतरिक्षीय अदृश्य हलचलों में ही पाया जायेगा। अतिवृष्टि अनावृष्टि, शीत आधिक्य महामारी आदि दैवीय विपत्तियों में मनुष्य अपने आप को निर्दोष एवं असहाय ही अनुभव करता है। व्यक्ति अपने निजी जीवन में सर्वथा स्वतंत्र और सशक्त है। इतना होते हुए भी विशाल ब्रह्मांड में गतिशील हलचलों और परिस्थितियों में उसका स्थान नगण्य है। सिर पर खड़े पानी से लदे बादल तक को वह बरसा नहीं सकता, मौत, बुढ़ापे तक को रोकने में भी असमर्थ हैं। परिस्थितियों पर उसका स्थान नगण्य है। प्रवाहों से वह अपना यत्किंचित् बचाव ही कर पाता है। सर्दी उसके बूते रुकती नहीं, कपड़े लादकर, आग ताप कर आत्म रक्षा भर में आँशिक सफलता पा लेता है।
स्पष्ट है कि वातावरण से मनुष्य प्रभावित होता है। अलग अलग देशों के निवासी अपनी अपनी परम्पराओं से प्रभावित होते हैं, प्रचलित ढर्रे के अंतर्गत सोचते और जीवन यापन करते हैं। उसमें उनकी भौतिक प्रतिभा का नहीं, वातावरण का प्रभाव ही प्रधान रूप से कार्य करता है। चेतना के संघात से उदाहरण में वाँछित परिवर्तन किये जाने संभव हैं। अदृश्य जगत में कई बार ऐसी प्रेरणाएँ उभरती हैं जिनके आँधी तूफानों में मनुष्यों के मस्तिष्क पत्तों और तिनकों की तरह उड़ने लगता है। ऐसा ही कुछ इन दिनों हो रहा है, अब युग परिवर्तन के अनुरूप वातावरण बन रहा है।
जीवन के अनेक पक्ष हैं। आवश्यक है कि उनके सभी पक्षों पर समुचित ध्यान दिया जायें और जो जिस दिशा में किया जाना आवश्यक है उसे परिपूर्ण उत्साह के साथ किया जाय।
जीवन एक सुयोग हैं, उसका परिपूर्ण लाभ उठाया जाय। जीवन एक स्थान हैं, जिसे साकार करके दिखाया जाय। जीवन एक आनन्द हैं, जिसका आनन्द उठाया और बाँटा जाय। जीवन एक खेल है जिसे एक खिलाड़ी की भाँति खेला जाय। जीवन एक गीत हैं, जिसे तन्मयता पूर्वक गाया और सुनाया जाय। जीवन एक वरदान है, जिसका उपयोग मिल जुल कर किया जाय। जीवन एक रहस्य हैं, जिसका उद्घाटन करके दिखाया जाय। जीवन एक पात्र हैं, जिसे अनवरत चला जाय और लक्ष्य तक पहुँचा जाय।
बहुमूल्य वर्तमान का सदुपयोग करना सीखें
मृत्यु और निर्माण के बीच में हम ठहरे हुए हैं। वर्तमान बड़ी तेजी से भूत की ओर दौड़ता है। भूत और मृत्यु एक ही बात हैं। कहते हैं कि मरने के बाद मनुष्य भूत बनता है। मनुष्य ही नहीं हर चीज मरती है और वह भूत बन जाती है। जब किसी वस् की सत्ता पूर्णतः समान होती हैं तो उसकी पूर्ण मृत्यु कही जाती है। पर आंशिक मृत्यु जन्म के साथ ही आरंभ हो जाती है। बालक जन्म के बाद बढ़ता है, विकास करता है और उसकी वह यात्रा मृत्यु की ओर भी है।
संसार की हर वस्तु का, मनुष्य शरीर का भी निर्माण उन्हीं तत्वों से हुआ हैं जो हर क्षण बदलते हैं। उनका चक्र भूत को पीछे छोड़ते हुए और भविष्य को पकड़ता हुआ बढ़ी तेजी के साथ आगे बढ़ रहा है। विश्व एक पल के लिए स्थिर नहीं रहता। अणु परमाणुओं से लेकर विशालकाय ग्रह पिण्ड तक अपनी यात्रा विश्राँत गति से कर रहे है।
हमारा जीवन भी हर घड़ी थोड़ा थोड़ा मर रहा हैं। भविष्य में हम चल रहें हैं और वर्तमान और भूत को हम गोदी में पटकते जाते हैं। यह सब देखते हुए भी हम नहीं सोचते कि क्या वर्तमान में हमारा सदुपयोग हो सकता है? जो बात गया सो गया, जो आने वाला है वह भविष्य के गर्भ में हैं। वर्तमान हमारे हाथ में है। यदि हम चाहे तो उसका सदुपयोग करके इस नश्वर जीवन में से कुछ अनश्वर लाभ प्राप्त हो सकते हैं।
प्रायः समझा जाता है कि हम जो भी शुभ अशुभ कार्य करते हैं, वह उस क्रिया के स्थूल परिणाम तक ही सीमित होता है। उसके बाद न तो उस कार्य का कोई अस्तित्व रह जाता है और न ही किसी प्रकार के पृथक फल की आशा की जाती है। ऐसे विचार करने वाले उसके समर्थन में यह तर्क, प्रस्तुत करते हैं कि यदि कोई चोर चोरी करता है, तो उसे या तो फल के रूप में धन की प्राप्ति होती है या पकड़े जाने पर अपराध की सजा मिलती है। कर्म तो यही समाप्त हो जाता है। इसका दण्ड भी उसे मिलता है। फिर परमसत्ता की ओर से अन्य किसी फल का क्या औचित्य रह जाता है? देने वाला उसे किस आधार पर बाद में वह फल देता है।
वस्तुतः ऐसा सोचने वाले भूल करते हैं। दृश्य परिणाम उपस्थित करने के बाद ही कोई क्रिया पूर्णतः समाप्त हो जाती हैं ऐसा नहीं कहा जा सकता है। गर्मियों के दिन में नदी, सरोवर सूख जाते हैं। उनका जल वाष्पीभूत होकर आँखों से ओझल हो जाता है इस रूपांतरण की प्रक्रिया से अनभिज्ञ व्यक्ति यह समझ सकता है कि जल समाप्त हो गया, पर विज्ञान के विद्यार्थी जानते हैं कि इस क्रिया के बाद भी जल का आस्तित्व ज्यों के त्यों बना रहता है। हाँ उसके स्वरूप में भिन्नता अवश्य आयी। पानी ने अपना स्थूल स्वरूप बदलकर वाष्प का सूक्ष्म रूप धारण कर लिया, पर क्रिया की समाप्ति ही नहीं हो गयी। यह तो इसका आरंभ हैं, क्रिया का एक भाग है। इसकी पूर्णता तभी होगी, जब चक्र पुनः होगा, अर्थात् वशीभूत जल पुनः बादल बनकर बरसेगा। बादल का बरसना इस क्रिया का फल हुआ। ऐसी ही प्रक्रिया कर्म के साथ भी घटित होती है। वस्तुतः हम जो कर्म करते हैं, उसका सूक्ष्म प्रभाव हमारी आत्मा पर पड़ता है। स्थूल रूप से क्रिया समाप्त हो जाती है पर उसका सूक्ष्मीकृत अंश इस स्थिति में भी विद्यमान रहता है। जिस प्रकार मिर्च को जलाने पर उसकी स्थूलता तो नष्ट हो जाती हैं मगर वह अपने वायुभूत अंश से वातावरण को प्रभावित किये रहती है। ऐसा ही कर्म के साथ भी होता हैं कर्म के यही सूक्ष्म भाग संस्कार कहलाते हैं। , जो हमारी आत्मा और सूक्ष्म शरीरों को अपने प्रकार से संस्कारित कर लेते हैं। वास्तव में हमारी आत्मा के चारों ओर स्थूल, सूक्ष्म और कारण शरीर के तीन आवरण है। हम जो भी कार्य करते उसका प्रभाव स्थूल शरीर तक ही नहीं सीमित होकर रह जाता है वरन् छन कर सूक्ष्म शरीरों तक चला जाता है। ऐसा इसलिए क्योंकि सूक्ष्म शरीर स्थूल प्रभाव को धारण नहीं कर सकते। संगीत रिकार्डिंग में कितने प्रकार के वाद्य यंत्रों का प्रयोग किया जाता हैं पर रिकार्ड में उसकी स्थूलता की आवश्यकता नहीं पड़ती। सार रूप में सभी की ध्वनियाँ अंकित हो जाती है। यही हाल हमारे कर्म प्रभाव एवं संस्कारों का है।
इसे दूसरे प्रकार से इस तरह समझा जा सकता है कि विद्यालय में जब विद्यार्थी गणित पढ़ते हैं तो आरंभ में उन्हें स्थूल प्रश्न हल करना बताया जाता है। किंतु वे ज्यों ज्यों वे आगे कक्षाओं में बढ़ते जाते हैं उनके साथ ऐसे उदाहरणों एवं नियमों की संख्या भी बढ़ती जाती है। ऐसी स्थिति में मस्तिष्क इतने उदाहरणों और स्थूल नियमों को कैसे याद रख सकता है? क्योंकि ह इसकी सामर्थ्य से परे की बात है। तब वह इसके सार रूप सूत्रों को याद कर लेता है। , जिसके सहारे बड़े बड़े सवाल भी सुगमता पूर्वक हल किये जा सकते हैं। जब सरल संक्षिप्त सूत्रों से काम चल सकता हैं तो बड़े और लम्बे सूत्रों का बोझ ढोने की क्या आवश्यकता है? एक अन्य प्रकार से इसे ऐसे भी समझा जा सकता है कि किसी व्यक्ति के पास जब भी पैसे इकट्ठा हो जाते हैं, वह उसकी जगह एक रुपये का नोट रखना पसंद करता है। जब उसके पास एक एक के सौ नोट इकट्ठा हो जाते हैं तो वह सौ रुपये का एक नोट रखना पसंद करता है। बात एक ही है वह सौ पैसे रखे या ऐ नोट, सौ नोट रखे अथवा सौ की एक नोट। किन्तु प्रश्न यह कि जब एक रुपये और सौ रुपये के नोट से वही काम हो सकता है
जो सौ पैसे एवं एक के सौ नोटों से, तो सुरक्षित जमा रखने की दृष्टि से कोई अनावश्यक स्थूलता का यह कष्ट क्यों उठायेगा?
संस्कारों के साथ भी ऐसी ही स्थिति सामने आती हैं। जिस प्रकार गणितीय सूत्रों एवं नोटों की क्रमशः सूक्ष्म अवस्थायें आती चली जाती हैं। वैसे ही संस्कारों की भी सूक्ष्म अवस्थायें होती है। सबसे सूक्ष्म संस्कार कारण शरीर पर अंकित होते हैं। जो मृत्यु के पश्चात जीवात्मा के साथ चले जाते हैं। यह कर्म के फल नहीं वरन् क्रिया के कारण रूप है। फल तो अब इसके आधार पर ईश्वरीय सत्ता से मिलता है। जिसने कर्म किया है, चाहे वह भला हो या बुरा, क्रिया के आधार पर उसे उसका फलितार्थ तो मिलना ही चाहिए। अब प्रश्न है कि चोर को चोरी की सजा न्यायाधीश द्वारा मिल जाती है, तो दैवी सत्ता का दण्ड उसी अपराध के लिए दुबारा क्यों भोगना पड़ता है? इसे समझाने के लिए उस व्यक्ति पर विचार करना होगा, जिसने कोई गम्भीर अपराध किया हो। जब वह इस दौरान जनता द्वारा पकड़ा जाता है, तो वह भी अपराध कर्म के लिए उसे अपने प्रकार की सजा देती है। सकी पिटाई करती हैं, अंग भाँग करती हैं और दूसरे प्रकार की यातनायें भी देती है। इस प्रकार कोई न्यायाधीश से यह जाकर कहें कि इसे किये का दण्ड मिल चुका हैं, अब आप इसे छोड़ दें, तो न्यायाधीश इन बातों का तनिक भी ध्यान न देगा। क्योंकि वह जानता है कि अपराधी ने कानून का उल्लंघन किया हैं, जिसकी एक उचित सजा एक मजिस्ट्रेट ही दे सकता है। जो न्याय और कानून से अनभिज्ञ हो, वह या तो अपराध की तुलना में कठोर दण्ड देगा या मृदु दण्ड। , दूसरे वह इस कार्य के लिए अनधिकृत होता है, अतः उसकी याचना की अपेक्षा कर दी जाती है। जुर्म कितना संगीन हैं एक अधिकारी व्यक्ति ही उचित निर्णय कर सकता हैं और तद्नुरूप दण्ड का निर्धारण भी। न्यायाधीश द्वारा सुनाया गया निर्णय दोषी को हर प्रकार से मानना व पालन करना पड़ता है। यही विधान भगवान के दरबार में भी लागू है। दोषी व्यक्ति जुर्म करके सृष्टि और सृष्टा दोनों को भंग करता है। अतः सजा का पात्र हैं, भले ही मुजरिम को लौकिक दृष्टि से दण्ड मिल चुका हो, पर वह दण्ड उसके दरबार में वैधानिक नहीं माना जाता है। किस जुर्म का कैसा दण्ड हो सकता है, इसका निर्धारण भी भाँति परमसत्ता ही कर सकती है, अतः हर अपराधी को उसकी सजा भोगनी ही पड़ती है॥भगवत् सत्ता की यह व्यवस्था इसलिए भी आवश्यक हो जाती हैं, कि मनुष्य अपने परम लक्ष्य की प्राप्ति कर सकें। इस आधार पर पाप कर्म का दण्ड दुःख दर्द कष्ट कठिनाई एवं पुण्य का पारितोषिक सुख संतोष के रूप में मिलना आवश्यक हो जाता है। यदि यह व्यवस्था न हो तो मनुष्य अपने पाप कर्म के रूप में हुई भूल में सुधार कर ही नहीं सकता और वह इस प्रकार लक्ष्य से भटक जायेगा
इस प्रकार ईश्वरीय सत्ता की दण्ड व्यवस्था का उद्देश्य बड़ा होता है। उसमें उसकी सुधार प्रक्रिया को ध्यान में रखते हुए मनुष्य को उसके परम लक्ष्य का ओर अग्रगामी बनाने का प्रयोजन मुख्य होता है जबकि भौतिक जगत की दण्ड व्यवस्था में यह उद्देश्य निहित होता है। यहाँ अपराध कर्मी को दण्ड सिर्फ इसलिए दिया जाता है, क्योंकि उसने अपराध किया। इस दण्ड से उसमें सुधार हो या न हो, सकी जिम्मेदारी मजिस्ट्रेट की नहीं होती, दैवी दण्ड की एक विशेषता यह भी है, कि इससे मनुष्य को सोचने के लिए विवश होना पड़ता है। कि आखिर यह दण्ड उसे क्यों मिला और यही से सुधार क्रम का सिलसिला भी आरंभ हो जाता है। वह अच्छे कर्म के लिए उद्यत होता है, जिसका परिणाम भी उसे हाथों हाथ मिलता है। सुख, संतोष, श्रद्धा, सम्मान इस लोक में और स्वर्ग मुक्ति जैसा आनन्द परलोक से प्राप्त होता है। इसके विपरीत दुष्कर्मों में संलिप्त रहने वालों की भौतिक संसार में तो दुर्गति होती ही है। , मृत्यु के बाद भी उसे नरक की पीड़ा सहनी पड़ती है। ऐसे लोगों को देखकर यह कहना पड़ता है कि यदि परिस्थितियाँ सही रही होती, तो उसे इतना कष्ट नहीं उठाना पड़ता, पर सच तो यह है कि शुभाशुभ कर्मों के आधार पर परिस्थितियों का बनना बिगड़ना भी उसी सत्ता के आधीन है और वही इसका अभियंता है, किन्तु इसके लिए उसे प्रकट होने की आवश्यकता नहीं पड़ती। यह सब उसकी स्वसंचालित प्रक्रिया के माध्यम से चलता रहता है। जिस प्रकार परीक्षा पास करने के बाद हर किसी को एक सर्टीफिकेट दिया जाता है, उसमें उसकी योग्यता का उल्लेख रहता है, और उसी के आधार पर उसे छोटी बड़ी नौकरी मिलती है, उसी प्रकार मानवीय सत्ता में सूक्ष्म संस्कारों की सत्ता रहती है। हर मनुष्य के लिए यह उसकी व्यक्तिगत योग्यता का प्रमाण पत्र रहता है, जिसमें उसके वर्तमान जीवन एवं पिछले जन्मों के संपूर्ण कर्मों का उल्लेख सार रूप में रहता है। इसी आधार पर जीवन में उसे सुख दुःख मिलते और उनकी अवगति प्रगति होती है।
कुछ लोग स्थूल क्रिया की समाप्ति को ही कर्म की समाप्ति मान लेते हैं, पर यह गलत हैं। कर्म की समाप्ति तब तक नहीं होती जब तक कारण शरीर में सूक्ष्म रूप में उसका अंकन होकर फल प्राप्ति नहीं हो जाती। चक्र पूरा होने के बाद क्रिया पूरी होती है। इस प्रकार न तो यह कहा जा सकता है कि स्थूल क्रिया के बाद कर्म की समाप्ति हो जाती है और न ईश्वर पर यह आक्षेप लगाया जा सकता है कि लौकिक दण्ड मिल जाने के बाद उसकी न्याय व्यवस्था का कोई महत्व नहीं रह जाता है। वस्तुतः भगवान की ओर से भी सजा मिलती है, वह हमारी भलाई के लिए ही होती है। जीव मात्र का इसी में कल्याण है और कल्याणकारी उसकी व्यवस्था है। कर्मों की गति वस्तुतः न्यारी है एवं भारतीय ऋषि प्रणीत कर्म व्यवस्था से श्रेष्ठ कोई सिद्धांत इसकी व्याख्या तर्क सम्मत रीति सं नहीं कर सकता। हमें इसे ही सही नीति सम्मत व औचित्य पूर्ण मानकर अपने कर्मों को सही बनाते रहने का पुरुषार्थ सतत् करना चाहिए।
साहस का मार्ग जोखिम भरा होता है, पर गरिमा उसी पर टिकी हुई है। जिन्हें जोखिम से भय लगता है, वे कीचड़ के कृमियों की तरह गई गुजरी परिस्थितियों में ही गुजर करते हैं।
अशांत रहने के कारणों में वे व्यवधान प्रधान होते हैं, जिन्हें प्रतिकूलता, कठिनाई, समस्या आदि के नाम से जाना जाता है। एक सीमा तक मनुष्य परिस्थितियों का गुलाम भी है। जैसे भले बुरे अवसर सामने आते हैं उनके अनुरूप प्रसन्न व खिन्न होना पड़ता है। संपदा की बहुलता में इच्छित वस्तुएँ खरीदी जा सकती हैं। इच्छित व्यक्तियों का सहयोग भी प्रायः कुछ ले दे कर हस्त गत हो जाता है इतने पर भी अशाँति से पीछा नहीं छूटता। अभावग्रस्त या विपन्न लोगों की चिंता परेशानी समझ में आती है, किन्तु इसके विपरीत देखा यह गया है कि जिनके पास विपुल साधन हैं वे भी चैन से नहीं रह पाते। अशांति उन्हें भी घेरे रहती है। बात तो आश्चर्य की लगती है, पर है सत्य और तथ्य से समन्वित।
अभाव ग्रस्त आहार, विहार, निवास, निर्वाह के साधनों की कमी से कठिनाई अनुभव करते हैं जिन्हें स्नेह सहयोग भी नहीं मिलता। श्रेय और सम्मान के अभाव में उन्हें अपने अपेक्षित तिरष्कृत रहने जैसी अनुभूति भी होती रहती है। यह स्वाभाविक हैं, क्योंकि जिनके पास न ज्ञान हैं, और न साधन उन्हें कष्टों और संकटों का सामना करना ही पड़ेगा। ऐसी दशा में आकुल व्याकुल रहना पड़े तो कोई आश्चर्य की बात नहीं। किन्तु ऐसे भी लोग कम नहीं जो शिक्षित भी हैं और साधन संपन्न भी। फिर भी उनकी मनः स्थिति अभाव ग्रस्तों से भी अधिक गयी गुजरी है, उन्हें अशांति, विकृति चिंतन के कारण त्रास देती है। धन निर्वाह के लिए चाहिएं सो कम साधनों में चला जाता है। मुट्ठी भर अन्न से पेट भरता है। उतनी कमाई कुछ घण्टे श्रम से हो सकती है, बहुमूल्य आहार से पोषण मिलता है। यह मान्यता भ्रम पूर्ण है। यदि ऐसा रहा होता तो सभी धनवान इच्छित भोजन मिलने के कारण मोटे तगड़े, परिपुष्ट निरोग और दीर्घ जीवी रहे होते, पर ऐसा कहाँ देखा जाता है उसमें तो कही अच्छी स्थिति कृषकों और मजदूरों की होती हैं जो मोटा झोटा खाते हैं और धूप वर्षा की परवाह न करते हुए कठोर श्रम में जुटे रहते हैं। संपन्न लोग खाते कम बिगाड़ते अधिक हैं। स्वादिष्ट पकवान बार बार अनावश्यक मात्रा में खाते रहते हैं, फलस्वरूप पेट खराब कर लेते हैं और अपचजन्य अनेकानेक रोगों के शिकार होते हैं। चिकित्सा और मरण की चिंता बनी रहती है।
देखा गया है कि मतिभ्रम अपने चंगुल में फँसे लोगों को अधिकाधिक मात्रा में धन कमाने की ललक उत्पन्न करते हैं। भले ही वह धन अनीति पूर्वक, अपराध का आश्रय लेते हुए ही क्यों न इकट्ठा किया गया हो। ऐसा धन आमतौर से शराब खानों में वेश्यावृत्ति में ओर अदालतों में, रिश्वतों में चला जाता है। अनेक ईर्ष्यालु उत्पन्न होते हैं। ठगने वाले चापलूसों की कमी नहीं रहती। तथाकथित मित्र कुसंग में घसीटते हैं और दुर्व्यसनों की लत। लगाते हैं। ठाठ बाट बनावट शृंगार, सज्जा आभूषण ढेरों पैसा माँगते हैं। इस प्रकार अपव्यय करने वाले साथियों का जब भी कमीशन लाभ घटता है तभी वे दुश्मन बन जाते हैं और भेद खोलकर बदनामी कराते हैं तथा जिस तिस मार्ग से दिखाने के लिए कुछ न कुछ षड्यंत्र रचते रहते हैं। यह सब कारण ऐसे हैं जिसके कारण अनावश्यक रूप से कमाया हुआ धन विपत्ति, चिंता, पाप का कारण बनता है।
उत्तराधिकारियों को वृद्धों की संपदा मुफ्त में मिलने की आशा रहती है। इसलिए वे स्वावलम्बी बनने का नाम नहीं लेते। उस संपदा को जल्दी प्राप्त करने की प्रतीक्षा करते और जिसके अधिकार में वह धन है उसके मरने की प्रतीक्षा करने लगते हैं।
बटवारे के प्रश्न को लेकर उत्तराधिकारियों में मुकदमें बाजी, फौजदारी की नौबत आ जाती हैं और वह मुफ्त का धन इसी जंजाल में खर्च हो जाता है।
कई बार तो उत्तराधिकारी अभिभावकों के मरने का प्रतीक्षा भी नहीं करते वरन् अपना हिस्सा अलग करवाने पर सब पर हावी होने का प्रयत्न करते हैं। इन परिस्थितियों में सोचना यही पड़ता है कि किसके फेर में अनावश्यक धन कमाया गया था उससे अधर्म को बढ़ाया गया था। जो कभी चतुरता प्रतीत होती थी वह परले सिरे की मूर्खता सिद्ध होती है। जो धन साथ जाने वाला नहीं, जिसमें कोई परमार्थ सधने वाला नहीं है। उसे एकत्र करने के लिए अनेकों मुसीबतें मोल लेना है। कही गड्ढा करके ही ऊंचा भवन बन सकता है। अन्यथा दौलत बढ़ते ही उसे जरूरतमंदों को बाँट देने का कर्त्तव्य उपेक्षित रहने पर टोंचता ही है और बेचैनी बढ़ाता रहता है।
गीतकार का कथन है कि -“ अशाँत को सुख कहाँ “ अशाँति दुर्भाग्य में तो यदा कदा ही होती है, इसका प्रकोप दुर्बुद्धि का कारण ही अधिक होता है। निर्धनता की तुलना में दुर्बुद्धि अधिक दुखदायी एवं दुष्परिणाम उत्पन्न करने वाली है।
कुछ लोग विलासिता में सुख देखते हैं। इन्द्रिय तृप्ति के लिए अपवाद की सीमा तोड़ने लगते हैं। इसका प्रतिफल यह होता है कि व्यक्ति खोखला हो जाता है। स्वास्थ, सौंदर्य, शौर्य पराक्रम सभी गवाँ बैठता है। न बुद्धि काम करती है न काया। ऐसे रोग घेर लेते हैं जो न मरने देते हैं और न जीने। कसक कराह में रोते चीखते दिन बीतते हैं। बौर अशाँति स्वयँ आमंत्रित उत्पादित की हुई होती है। जब तक बेढंगी चाल नहीं बदलती तब तक वह पीछा भी नहीं छोड़ती है।
यह परिस्थितिजन्य प्रत्यक्ष विपन्नताओं की चर्चा हुई। इसके अतिरिक्त कुछ ऐसी भी होती है जो सोचने का तरीका विकृत हो जाने के कारण उत्पन्न होती है। उनका वास्तविक कारण नगण्य जितना ही होता है। इसमें एक महत्वाकाँक्षा। लोग बड़े आदमी बनना चाहते हैं। अमीरों, विद्वानों या सिद्ध पुरुषों की पंक्ति में बैठना चाहते हैं। इसके लिए जितनी योग्यता श्रम शीलता अर्जित करनी चाहिए उसे करते नहीं। ओछे आधार अपना कर बड़प्पन हथियाना चाहते हैं। इस आधार पर आरंभ में कुछ कौतूहल खड़ा भी कर लिया जाय, पर वह देर तक नहीं टिकता। ढोल की पोल खुले बिना नहीं रहती। तब जो अयोग्यता के रहते बड़प्पन लूटने के लिए सरंजाम जुटाये गये थे वे उलटे उपहास तिरस्कार का कारण बनते हैं। मुखौटा बाँधकर रामलीला या नाट्य मंच पर प्रहसन तो किये जा सकते हैं, पर उन महत्वाकाँक्षाओं को पूरा नहीं किया जा सकता जो अध्यवसाय चाहती हैं और व्यक्तित्व की गहराई तक जड़ जमाये बिना स्थायी नहीं बनती। आतंकवाद का रौब दौब अधिक समय नहीं टिकता। टिके भी तो अपनी जान बचाने के लिए चूहे, खटमलों की तरह जहाँ तहाँ छिपते फिरना पड़ता है।
द्वेष, दुर्भाव, कुढ़न, खोज, आवेश, आक्रोश, अहंकार, आलस्य जैसे दुर्गुण भी ऐसे हैं जो उबल पड़ने के उपरान्त दूसरों की अपेक्षा अपने लिए अधिक हानिकारक सिद्ध होते हैं। जिन्हें चैन से रहना और रहने देना है, उन्हें इन दुर्बुद्धिजन्य दुर्गुणों से बचते ही रहना चाहिए।
सुकरात को जब मृत्यु दण्ड की सजा सुनाया गया, तो उसके कुछ विश्वस्त मित्रों ने उन्हें बंदी ग्रह से निकाल ले जाने का निश्चय किया। इसके लिए सारी योजना गुप्त रूप से तैयार का ली गई, किन्तु जब इसके बारे में उनको बताया गया, तो उन्होंने वैसा करने से इन्कार कर दिया। बहुत पूछने पर इतनी ही कहा, कि यदि मैं तुम्हारे साथ भाग गया तो सारी दुनिया मुझे यही कह कर कोसेगी कि सुकरात सचमुच देशद्रोही था ओर यदि मैं सत्य की खातिर बलिदान हो गया, तो उसके सत्य अनेक सत्य को एक सुकरात अगणित सुकरात को आने वाले समय में पैदा कर देगा, फिर कोई यह लाँछन नहीं लगा सकेगा कि सुकरात राजद्रोही था, अतः मेरा उत्सर्ग हो जाने दो।
इतना कह कर उन्होंने हँसते हँसते विषपान कर लिया। असत्य पर सदा सत्य और सिद्धांत की विजय होती है।
एक व्यक्ति ने एक जिन्न साधा और वशवर्ती कर लिया। छोड़ने की शर्त यह तय हुई, कि जिस दिन उसका सुखा कुंआ भर जायेगा, उसी क्षण उसे मुक्त कर दिया जायेगा। जिन्न ने अपनी शक्ति द्वारा जल्दी ही भर दिया।
व्यक्ति लालची था उसने हाथ आये अवसर का भरपूर लाभ उठाना चाहा, कहा हमारा कोठार अभी खाली है, जब अन्न से वह भर जायेगा तब छोड़ देंगे।
जिन्न अड़ गया, कहा बात सिर्फ कुएँ की थी, सो शर्त के अनुसार उसे पूरी कर दी। अब मैं स्वतंत्र हूँ, पर व्यक्ति नहीं माना, कहा मनोरथ पूर्ति से पहले मैं तुम्हें छोड़ूँगा नहीं।
जिन्न बोला मैं पहले भी स्वतंत्र था, अब भी स्वतंत्र हूँ। तुमने कभी अपने काबू में किया ही नहीं। वह तो मैं था कि तंत्र की गरिमा रखने के लिए स्वयं को तुम्हारे सुपुर्द कर दिया, पर अब तुम लोभ वश मेरा दुरुपयोग करना चाहते हो, अतः इसका दण्ड भी तुम्हें मिलकर रहेगा।
इतना कहकर उसने ताँत्रिक का गला दबोच लिया और तत्काल यमलोक पहुँचा दिया। जाते जाते जिन्न ने एक व्यंग भरा अट्टहास किया और उसकी आत्मा से कहा “ लालच बुरी बला है। “
निद्रा मनुष्य के लिए आवश्यक और उपयोगी है। इसका न होना अथवा उससे वंचित कर देना व्यक्ति को विक्षुब्ध जैसी स्थिति में ला खड़ा करता है। सूक्ष्म यातनाओं का महत्वपूर्ण आधार यही है। सामान्य मनुष्य के लिए सूक्ष्म जगत से संपर्क उसी स्थिति में बन पड़ता है। यही शारीरिक मानसिक थकान मिटाने का सर्वसुलभ साधन है।
मनो वैज्ञानिकों के अनुसार निद्रा में सचेतन भाग अवचेतन की स्थिति में सिर्फ इस लिए नहीं जाता है कि उससे थके अंगों को आराम मिलें, वरन् उस स्थिति में अंतरिक्ष में प्रवाह मान विद्युत धाराओं में भी उपयोगी अंश संगृहीत संपादित करने का अवसर भी मिलें, प्रयोजन यह भी होता है। एरियल और एंटीना विद्युत चुंबकीय तरंगों को पकड़ता है। निद्रा अवस्था में हमारा अचेतन मस्तिष्क उसी स्थिति में बन जाता हैं और आकाश से इतनी विद्युत खुराक प्राप्त कर लेता है, जिससे शारीरिक मानसिक क्रियाकलापों का का संचालन ठीक प्रकार संभव हो सकें। निद्रा की पूर्ति होने पर शारीरिक और मानसिक स्थिति में तो गड़बड़ी उत्पन्न होती है उसे मनोविज्ञान के अनुसार “चेतनात्मक मुमुक्षा “ कहते हैं। आवश्यक विद्युतीय खुराक न मिल पाने के कारण ही यह दशा पैदा होती हैं इसके बने रहने पर मनुष्य विक्षिप्तों या अर्धविक्षिप्तों जैसा व्यवहार करने लगता है। पागल पन का एक कारण अनिद्रा भी है। अनिद्रा में इस विद्युतीय आहार की ही कमी पड़ती है।
लम्बी अनिद्रा के कारण उक्त विद्युत की आपूर्ति में जब अवरोध उत्पन्न होता है, तो न सिर्फ शारीरिक मानसिक स्वास्थ गड़बड़ाता है, अपितु उस शक्ति का भी ह्रास होने लगता है। जो अतीन्द्रिय अनुभूति का महत्वपूर्ण आधार है। स्वस्थ मनुष्य में जैसे जैसे यह ऊर्जा बढ़ती हैं, इंद्रियातीत सामर्थ्य की संभावना भी तद्नुरूप बलवती होती जाती है। योगी यती इसी विद्युत को बढ़ाकर ऐसी क्षमताएँ अर्जित कर लेते हैं जिन्हें जन सामान्य ऋषि सिद्धि के नाम से जानते हैं। निद्रा संवर्धन और अनिद्रा अभिवर्धन में इसका कितना बड़ा हाथ हैं, उसे प्राणायाम का कोई भी अभ्यासी सहज ही अनुभव कर सकता है। देखा गया है कि अभ्यास ज्यों ज्यों बढ़ता है, बुद्धी तीक्ष्ण होती है और गहरी निद्रा आती है। गहन निद्रा का यह गुण शारीरिक हल्कापन भी है और दूसरा भव्य संबंधी स्वप्न का दिग्दर्शन भी है।
यों निद्रा संबंधी सामान्य सोच कि रात्रि में हम जितना समय सोते हैं, उतना खोते हैं, पर यह अवधारणा अब गलत साबित होती जा रही है। वैज्ञानिक शोध अब यह सिद्ध करने की स्थिति में आ गयी है, कि हमारा सोया हुआ समय भी उपयोगिता की दृष्टि से उतना ही महत्वपूर्ण हैं, जितना जागरण का, तो कदाचित कोई अत्युक्ति न होगी।
सीखने समझने के लिए कितने ही ऐसे कार्य इस दशा में सम्पन्न किये जा सकते हैं, जैसे जाग्रतावस्था में। मनो वैज्ञानिकों को इस कथन के पीछे सत्य अब सूर्य की तरह झाँकने और यह प्रमाणित करने लगा है कि नींद आना निरर्थक समयक्षेप जैसी प्रक्रिया न होकर ज्ञान संपादन की एक महत्वपूर्ण भूमिका है। ऐसा ही समाचार पूर्व सोवियत संघ के “ नेवेत्सो न्यूज एजेन्सी “ ने अब से कुछ वर्ष पूर्व वहाँ के अखबारों में छापा, तो लोग आश्चर्य चकित रह गये। शरीर शास्त्रियों ने इसे शेखचिल्लियों जैसी कल्पना बताया, तो रूस के अनेक महाविज्ञानियों ने उन मनः शक्तियों का उपहास उड़ाया, जिनने इस प्रकार का दावा किया था, पर कई दिन पश्चात जब वहाँ के परिणाम प्राप्त होने शुरू हुए तो उनका संदेह जाता रहा। यहाँ तक कि उनने स्वयं भी वहाँ जाकर परीक्षण का सूक्ष्म निरीक्षण किया और किसी प्रकार के संयम की गुँजाइश न रहने पर संतोष व्यक्त किया।
इस अनुसंधान के शुरुआत की भी अत्यन्त रोचक घटना है। हुआ यों कि कुछ वर्ष पूर्व मूर्धन्य मनःशास्त्री इगोर इवानोविच अपने साथी मनोवैज्ञानिकों के साथ नींद और स्वप्न की प्रक्रिया पर विचार कर रहे थे कि अचानक उनके दिमाग में स्वप्न की वह बात कौंधी, जिसके माध्यम से यदा कदा स्वप्न द्रष्टा को सही सूचना प्राप्त हो जाती है। बस, फिर क्या था उनके मस्तिष्क में इस संदर्भ में उधेड़ बुन आरंभ हो गयी। वे और उनके सहयोगी इस विषय पर गंभीरता पूर्वक वार करने लगे, कि जब स्वप्नों में दिमाग सत्य संदेश प्राप्त कर सकने में सक्षम है, तो क्या निद्रावस्था में उसे सूक्ष्म शिक्षण सम्प्रेषित कर प्रशिक्षित नहीं किया जा सकता?
इन्हीं संभावनाओं के बीच इस विलक्षण अन्वेषण कार्य का जन्म हुआ और मास्को के निकट दूबना नामक स्थान पर तत्संबंधी एक अनुसंधान शाला स्थापित की गयी। परीक्षण आरंभ करने से पूर्व मनोवैज्ञानिकों ने कुछ प्रतिमान बनायें, जिसके आधार पर प्रयोगार्थियों का चयन किया जाना था, पर इसका सबसे महत्वपूर्ण आधार गहरी नींद था। प्रयोग में उन्हीं व्यक्तियों को सम्मिलित किया गया, जिन्हें गहरी निद्रा आती थी। जो शेष प्रतिमानों के पूरे होने पर भी, गहरी नींद के अनुबंध पूरे नहीं करते थे, उन्हें उसमें शामिल नहीं किया गया। दूसरी ओर जिन्हें गहरी नींद तो आती थी, पर वे शेष शर्तों को पूरी नहीं कर पाये, उन्हें भी अयोग्य घोषित कर दिया गया। कुल मिलाकर परीक्षण के अनुकूल उन्हें ही ठहराया गया, जो निर्धारित सभी शर्तों की पूर्ति करते थे।
प्रयोग आरंभ किया गया। इसमें सूक्ष्म ध्वनि तरंगों के माध्यम से प्रयोगार्थियों को नींद के दौरान अंग्रेजी एवं अन्य भाषा शास्त्र के टेप रिकार्ड सुनाये गये और जागने पर तद्विषयक अनेक प्रश्न पूछे गये, जिसके कुछ ने सही और कुछ ने गलत जवाब दिये। सही उत्तर न दे सकने के कारणों का स्पष्टीकरण करते हुए मनःशास्त्रियों का कहना था संभवतः इसका कारण मस्तिष्कीय अनुकूलता का अभाव था। जिस मस्तिष्क ने जितनी जल्दी स्वयँ को परीक्षण के योग्य ढाल लिया, उसने उतनी ही जल्दी सूचनाओं और संदेशों को ग्रहण करना आरंभ कर दिया, पर इसकी कमी सूक्ष्म संकेतों को ग्रहण करने में बाधा उत्पन्न करती हैं, ऐसा मनोवेत्ताओं का अभिमत था। दूसरी ओर यह दृढ़ विश्वास भी कि जैसे जैसे मस्तिष्क की अनुकूलता विकसित होगी, वैसे वैसे उनकी ग्रहणशीलता में भी उत्तरोत्तर विकास होता चला जायेगा। मनोवैज्ञानिकों का मत है कि इस प्रक्रिया द्वारा लोग सोते में भी सारगर्भित जानकारी अर्जित कर उस समय का अतिरिक्त उपयोग कर सकेंगे, जिसे बोल चाल की भाषा में “ सोना अर्थात् खोना “ जैसे संबोधनों से अभिहित किया जाता है। प्रयोग अभी जारी है।
इसका परिणाम चाहे जो हो, इस तथ्य से सर्वदा इन्कार नहीं किया जा सकता है कि हम सोते होते हैं, तब भी प्रकारान्तर को जागते रहते हैं। अंतर सिर्फ इतना होता है कि इसमें चेतन का एक स्वल्प अंश अचेतन स्थिति में चला जाता है, पर उसका अधिकाँश भाग अपना कार्य यथावत् करता रहता है। हृदय का धड़कना, साँस का चलना, रक्त का दौड़ना उस अवस्था में भी ज्यों का त्यों जारी रहता है। ऐसी दशा में बाहरी शिक्षण किस प्रकार उतर जाय, तो इसे आश्चर्यजनक तो कहा जा सकता है, पर संभव नहीं। यह प्रक्रिया योगी स्तर के उन लोगों में स्पष्ट देखी जाती है, जिनकी चेतना तनिक परिकृष्ट हो गयी हो। फिर वह सोते हो, अथवा जागते हो, उनकी व्यष्टि चेतना समाविष्ट चेतना से इस प्रकार गुंथ जाती है कि अदृश्य के गर्भ में जो भी घटना पकती पनपती रहती है, उसकी महत्वपूर्ण जानकारी जागते ओर सोते हुए में समान रूप से प्रत्यक्ष मूर्तिमान होने लगती है। महापुरुषों स्वप्न प्रायः इसी स्तर के होते हैं। उनमें सामान्य जनों जैसे औंधे सीधे दृश्यों का जाल जंजाल नहीं होता, वरन् उसमें सोद्देश्य सूचनाओं का सारगर्भित समावेश होता है।
संक्षेप में नींद एक साथ अनेक प्रयोजन पूरे करती हैं। वह शरीर और मस्तिष्क की क्लाँति मिटा कर उन्हें नई स्फूर्ति से ओत प्रोत करती ओर उस ऊर्जा की भरपाई करती है जिसका की कार्य के क्षणों में क्षरण होता है। इसे अनिवार्य भी माना जा सकता है एवं जो इसके संबंध में सामान्यता भ्रांतियां संव्याप्त हैं, उन्हें पूर्णतः निर्मूल भी अब किया जा सकता है।
एक गरीब आदमी था, जिसकी सारी उम्र जंगलों में कट गयी। एक दिन उसने शहर में भाग्य आजमाने का निश्चय किया। वह शहर पहुँचा, तो इंसानों की भारी भीड़ देखकर दंग रह गया, सोचने लगा, “ चींटियों जैसी भीड़ की तो मैंने कल्पना तक नहीं की थी। कहीं इस भीड़ में खो न जाऊँ - मेरा आस्तित्व ही न मिट जाय। इससे तो जंगल एकान्त ही अच्छा था। कम से कम वहाँ मेरी पहचान तो बनी रहती। “
वह वापस जंगल लौट गया और उसी पुराने ढर्रे को अपना लिया।
सच हैं, मूर्ख गुबरीले को गोबर से सनने लिपटने में ही मजा आता है।
बलिष्ठ शुतुरमुर्ग की दुर्बलता
शुतुरमुर्ग के अंडों की बाहरी दीवार प्रायः चीनी मिट्टी के बर्तनों की दीवार की मोटाई के बराबर होती हैं और एक अंडे का वजन कभी कभी तीन पौण्ड से भी अधिक होता है। इस अंडे को तोड़ने का यदि बाहरी प्रयास किया जाय तो उसके लिए छेनी, हथौड़ी और आरी की आवश्यकता पड़ेगी और इन सब साधनों के बावजूद इस प्रयास में सफलता के लिए दो घण्टे का कठोर श्रम करना पड़ेगा। अब अंडा परिपक्व होने वाले बच्चे की तरह विकसित होता है। पूर्ण विकसित होने पर नर शुतुरमुर्ग की लम्बाई 10 फुट तक और वजन 330 पौण्ड तक हो सकता है। इस प्रकार आकार प्रकार और वजन के हिसाब से शुतुरमुर्ग वर्तमान में विमान पक्षियों में सबसे बड़ा है।
शुतुरमुर्ग घोड़े से अधिक तेज दौड़ सकता है। सशक्त जंगली जानवरों से अपने पंजों द्वारा लोहा ले सकता है। उसकी और ही कितनी ही विशेषताएँ हैं, किन्तु आत्म रक्षा के संबंध में मूर्ख होने के कारण अपना आस्तित्व धीरे धीरे गँवाता जा रहा है।
गायत्री मंत्र साथ साथ -
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यों नः प्रचोदयात्।
मित्रो हमारा सत्ता वर्ष का सम्पूर्ण जीवन सिर्फ एक काम में लगा है और वह है- भारतीय धर्म और संस्कृति की आत्मा का शोध। भारतीय धर्म एवं प्रकृति के बीज है- गायत्री मंत्र। इस छोटे से चौबीस अक्षरों के मंत्र में यह ज्ञान और विज्ञान भरा मुखों से चार चरण गायत्री का व्याख्यान चार वेदों के रूप में किया। वेदों से अन्यान्य धर्म ग्रंथ बने। जो कुछ भी हमारे पास हैं - इस सबका मूल जड़ हम चाहे तो गायत्री मंत्र के रूप में देख सकते हैं, इसलिए इसका नाम गुरुमंत्र रखा गया है, बीज मंत्र रखा गया है। बीज मंत्र के नाम से इसी एक मंत्र को माना जा सकता है। और गुरुमंत्र इसे कहा जा सकता है। हमने प्रयत्न किया कि सारे भारतीय धर्म और विज्ञान को समझाने की अपेक्षा यह अच्छा है कि इसके बीज समझ लिया जाय, जैसे कि विश्वामित्र ने तप करके इसके रहस्य और बीज को जानने का प्रयत्न किया। हमारा पूरा जीवन इसी एक क्रिया कलाप में लग गया। जो बचे हुए जीवन के दिन हैं, उसका भी हमारा प्रयत्न यही रहेगा कि हम इसी को शोध और इसी के अन्वेषण और परीक्षण में अपनी बची हुई जिंदगी को लगा दें। बहुत सारा समय व्यतीत हो गया। अब लोग जानना चाहते हैं कि आपने इस विषय में जो शोध की, जो जाना उसका सार निष्कर्ष हमें भी बता दिया जाय। बात ठीक है अब हमारे महा प्रयाण का समय नजदीक चला आ रहा है तो लोगों का यह पूछताछ करना सही है कि हर आदमी इतनी शोध नहीं कर सकता। हर आदमी के लिए इतनी जानकारी प्राप्त करना तो संभव नहीं है। हमारा सार और निष्कर्ष हर आदमी चाहता है कि बताया जाय। क्या करें? क्या समझा आपने? क्या जाना? अब हम आपको यह बताना चाहेंगे कि गायत्री मंत्र के ज्ञान और विज्ञान में जिसकी कि व्याख्या स्वरूप ऋषियों ने सारे को सारा तत्त्व ज्ञान खड़ा किया हैं, क्या हैं?
गायत्री को त्रिपदा कहते हैं। त्रिपदा का अर्थ हैं - तीन चरण वाली -तीन टाँगों वाली। तीन टुकड़े उसके हैं जिसको समझ करके हम गायत्री के ज्ञान और विज्ञान की आधार शिला को ठीक तरीके से जान सकते हैं। इसका एक भाग है विज्ञान वाला पहलू विज्ञान वाले पहलू में आते हैं तत्त्वदर्शन, तप, साधना, योगाभ्यास, अनुष्ठान, जप, ध्यान आदि। यह विज्ञान वाला पक्ष हैं। इससे शक्ति पैदा होती है। गायत्री मंत्र के जप करने से, उपासना और ध्यान करने से उसके जो महत्व बताये गये है कि इससे बह लाभ होता है, अमुक लाभ होते हैं, अमुक कामनायें पूरी होती है। अब यह देखा जाय कि कैसे पूरी होती है और कैसे पूरी नहीं होती। कब तक सफलता मिलती हैं और कब नहीं मिलती। किसी भी बीज को पैदा करने के लिए तीन चीजों की आवश्यकता होती है -भूमि उसके पास होनी चाहिए। भूमि के अलावा खाद पानी का इंतजाम होना चाहिए। अगर यह तीनों चीजें उसके पास होंगी तब फिर मुश्किल हैं। तब फिर वह बीज पल्लवित होगा कि नहीं, कहा नहीं जा सकता। गायत्री मंत्र के बारे में यही तीन बातें हैं कि यदि गायत्री मंत्र के साथ तीन चीजें मिला दी जाय या किसी भी आध्यात्मिक उपासना के साथ मिला दी जाय तो उसके ठीक परिणाम होना संभव है। अगर यह तीनों चीजें नहीं मिलायी जायेगी तब फिर यही कहना पड़ेगा कि इसमें सफलता की आशा कम है।
गायत्री उपासना के संबंध में हमारा लम्बे समय का जो अनुभव हैं कि जप करने की विधियाँ और कर्मकाण्ड तो वही हैं जो सामान्य पुस्तकों में लिखें है।
या बड़े से लेकर छोटे लोगों के लिए है। किसी को फलित होने और किसी को फलित न होने का मूल कारण यह है कि उन तीन तत्त्वों का समावेश करना लोग भूल जाते हैं। जो किसी भी उपासना का प्राण है। उपासना के साथ एक तथ्य यह जुड़ हुआ हैं कि अटूट श्रद्धा होनी चाहिए। श्रद्धा की एक अपने आप में शक्ति हैं। बहुत सारी शक्तियाँ हैं - जैसे बिजली की शक्ति, भाप की शक्ति हैं, आग की शक्ति हैं, उसी तरह श्रद्धा की एक शक्ति है। पत्थर में से देवता पैदा हो जाते हैं। झाड़ी में से भूत पैदा हो जाता है, रस्सी में से साँप हो जाता है। और न जाने क्या क्या हो जाता है। श्रद्धा के आधार पर। अगर हमारा और आप का किसी मंत्र के ऊपर जप, उपासना के ऊपर अटूट विश्वास हैं प्रगाढ़ निष्ठ और श्रद्धा हैं तो मेरा अब तक का अनुभव यह है कि उसको चमत्कार मिलना चाहिए ओर उसके लाभ सामने आने चाहिए। जिन लोगों ने श्रद्धा से विहीन उपासनाएँ की हैं, श्रद्धा से रहित मात्र कर्मकाण्ड सम्पन्न किये हैं, केवल जीभ की नोक से जप किये हैं और अँगुलियों की सहायता से मालायें घुमाई हैं, लेकिन मन में वह श्रद्धा न उत्पन्न कर सकें, विश्वास उत्पन्न न कर सकें, ऐसे लोग खाली रहेंगे। बहुत सारा जप करते हुए भी अगर अटूट श्रद्धा और विश्वास के साथ उपासनायें की जाय तो यह एक ही पहलू ऐसा हैं जिसके आधार पर हम सह आशा कर सकते हैं हमारे अच्छे परिणाम निकलने चाहिए, और उपासना का पूरा पूरा लाभ देना चाहिए। यह एक पक्ष हुआ।
दूसरा उपासना को सफल बनाने के लिए परिष्कृत व्यक्तित्व का होना निताँत आवश्यक है। परिष्कृत व्यक्तित्व का मतलब हैं कि आदमी चरित्र वान हों, लोकसेवी हो, सदाचारी हो, संयमी हो अपने व्यक्तिगत जीवन को श्रेष्ठ और समुन्नत बनाने वाला हों। अब तक ऐसे ही लोगों को सफलतायें मिली हैं। अध्यात्म का लाभ स्वयं पाने और दूसरों को दें सकने में केवल वही साधक सफल हुए है जिन्होंने जप, उपासना के कर्मकाण्डों के सिवाय अपने व्यक्तिगत जीवन को शालीन समुन्नत, श्रेष्ठ और परिष्कृत बनाने का प्रयत्न किया है। संयमी व्यक्ति, सदाचारी व्यक्ति जो भी जप करता है, उपासना करते हैं उनकी प्रत्येक उपासना सफल हो जाती है। दुराचारी आदमी, दुष्ट आदमी, नीच पापी और पत्ति आदमी भगवान का नाम लेकर यदि चाहे तो पार नहीं हो सकते। भगवान का नाम लेने का परिणाम यह होना चाहिए कि आदमी का व्यक्तित्व सही हो और वह शुद्ध बनें। अगर व्यक्ति को शुद्ध और समुन्नत बनने में राम नाम सफल नहीं हुआ तो तो जानना चाहिए कि उपासना कि विधि में बहुत भारी भूल रह गयी। और नाम के साथ काम करने वाली बात को भुला दिया गया। परिष्कृत व्यक्तित्व उपासना का दूसरा पहलू है। गायत्री उपासना के संबंध में अथवा अन्याय उपासनाओं के संबंध में।
तीसरा हमारा अब तक का अनुभव यह है कि उच्चस्तरीय जप और उपासनायें तब सफल होती हैं जब कि आदमी का दृष्टिकोण और महत्वाकांक्षाएं भी ऊंची हो। घटिया उद्देश्य लेकर के निकृष्ट कामनायें और वासनायें लेकर के अगर भगवान की उपासना की जाय तो देवता सबसे पहले कर्मकाण्डों की विधि एवं विधानों को देखने की अपेक्षा यह मालूम करने की कोशिश करते हैं कि उनकी उपासना का उद्देश्य क्या हैं? किस काम के लिए करना चाहता है? यदि उन्हीं कामों के लिए जिसमें आदमी को अपनी मेहनत और परिश्रम के द्वारा कमाई करनी चाहिए, उसको सरल और सस्ते तरीके से पूरा करने के लिए देवताओं का पल्ला खटखटाया हैं तो वे उसके व्यक्तित्व के बारे में समझ जाते हैं यह कोई घटिया आदमी हैं और घटिया काम के लिए हमारी सहायता चाहता है। देवता भी बहुत व्यस्त हैं। देवता सहायता तो करना चाहते हैं, लेकिन सहायता करने से पहले यह तलाश करना चाहते हैं कि हमारा उपयोग कहाँ किया जायेगा? किस काम के लिए किया जायेगा? यदि घटिया काम के लिए उनका उपयोग किया जाना हैं तो वे कदा चित ही कभी किसी के साथ सहायता करने को तैयार होते हैं। ऊंचे उद्देश्यों के लिए हमेशा देवताओं ने सहायता की हैं। मंत्र शक्ति और भगवान की शक्ति केवल उन्हीं लोगों के लिए सुरक्षित रही है जिनका दृष्टिकोण ऊंचा रहा है। ऊंचे काम करने के लिए भगवान की सेवा और सहायता चाही हैं। , उनको बराबर सेवा और सहायता मिली हैं। इन तीनों बातों का हमने प्राणपण से प्रयत्न किया ओर हमारी गायत्री उपासना में प्राण संचार होता चला गया। प्राण संचार अगर होता तो हर चीज प्राणवान और चमत्कारी होती चली जाती है और सफल होती जाती है। हमने अपने व्यक्तिगत जीवन में चौबीस लाख के चौबीस साल में चौबीस महापुरश्चरण किये। जप और अनुष्ठानों कि विधियों को संपन्न किया। सभी के साथ जो नियमोपनियम थे, उनका पालन किया यह भी सही हैं, लेकिन हर एक को यह ध्यान रखना चाहिए कि हमारी उपासना में कर्मकाण्डों का विधि विधानों का जितना ज्यादा स्थान हैं उससे कही ज्यादा स्थान इस बात के ऊपर हैं कि हमने उन तीन बातों को जो अध्यात्मिकता की प्राण समझी जाती हैं उन्हें पूरा करने की कोशिश की है। अटूट श्रद्धा और अडिग विश्वास गायत्री माता के प्रति रख करके और उसकी उपासना के संबंध में अपनी मान्यता और भावना रख करके प्रयत्न किया हैं और उसका परिणाम पाया हैं। व्यक्तित्व को भी जहाँ तक संभव हुआ हैं परिष्कृत करने की पूरी कोशिश की हैं। एक ब्राह्मण को और एक भगवान के भक्त को जैसा जीवन जीना चाहिए हमने भरसक प्रयत्न किया है कि उनमें किसी तरह की कमी न आने पायें। उनमें पूरी पूरी सावधानी हम बरतते रहें है। अपने आप को धोबी की तरह धोने और धुनिये की तरह धुनने में हमने आगा पीछा नहीं किया है। यह हमारी उपासना को चमत्कृत बनाने का एक बहुत बड़ा कारण है। उद्देश्य हमेशा से ऊंचा रहे। उपासना हम किस काम के लिए करते हैं, हमेशा यह ध्यान बना रहा। पीड़ित मानव के ऊंचा उठने के लिए, देश धर्म, समाज और संस्कृति को समुन्नत बनाने के लिए हम उपासना करते हैं, अनुष्ठान करते हैं। भगवान की प्रार्थना करते हैं। भगवान को देखा कि किस नियत से यह आदमी कर रहा हैं। भागीरथी की नियत को देख कर के गंगा जो स्वर्ग से पृथ्वी पर आने के लिए तैयार हो गयी थी और शंकर भगवान उनकी सहायता करने के लिए तैयार हो गये थे। हमारे संबंध में भी ऐसा हुआ। ऊंचे उद्देश्यों को सामने रख करके चले तो दैवी शक्ति की भरपूर सहायता मिलें। हमारा अनुरोध यह है कि जो आदमी यह चाहतें हों कि हमको अपनी उपासना को सार्थक बनाना है तो उन्हें इन तीन बातों का बराबर ध्यान में रखना चाहिए।
हम देखते हैं कि अकेला बीज बोना सार्थक नहीं हो सकता। उससे फसल नहीं आ सकती। फसल कमाने के लिए बीज एक, भूमि दो और खाद पानी इन तीन चीजों की जरूरत होती है। निशाना लगाने के लिए बंदूक एक, कारतूस दो, और निशाना लगाने वाले का अभ्यास तीन यह तीनों होगी तो बात बनेगी। मूर्ति बनाने के लिए पत्थर, एक, छेनी - हथौड़ी दो और मूर्ति बनाने की कलाकारिता तीन। लेखन कार्य के लिए कागज, स्याही और शिक्षा तीनों चीजों की जरूरत है। मोटर चलाने के लिए मोटर की मशीन, तेल तथा ड्राइवर तीनों चीजों की आवश्यकता होती है। इसी तरीके से उपासना के चमत्कार अगर किन्हीं को देखने हैं, उपासना की सार्थकता की परख करनी हो तो इन तीनों बातों को ध्यान में रखना पड़ेगा। जो हमने अभी निवेदन किया उच्चस्तरीय दृष्टिकोण, परिष्कृत व्यक्तित्व और अटूट श्रद्धा विश्वास। इन तीनों को मिला करके जो आदमी उपासना करेगा, निश्चयपूर्वक और विश्वासपूर्वक हम कह सकते हैं अध्यात्मिकता के तत्वज्ञान का जो कुछ भी महात्म्य बताया गया है - कि आदमी स्वयँ लाभान्वित होता है, सामर्थ्य बनता है, शक्तिशाली बनता है, शाँति पाता है। , स्वर्ग मुक्ति जैसा लाभ प्राप्त करता है और दूसरों की सेवा सहायता करने में समर्थ होता है सही है। गायत्री मंत्र के संबंध में हम आजीवन यही प्रयोग और परीक्षण करते रहें और पाया कि गायत्री मंत्र सही है, शक्ति मान है। सबकुछ उसके भीतर है, लेकिन यह तभी जब गायत्री मंत्र के बीज को तीनों चीजों से समन्वित किया जाय। उच्चस्तरीय दृष्टिकोण, अटूट श्रद्धा विश्वास ओर परिष्कृत व्यक्तित्व यह जो करेगा पूरी सफलता पायेगा। हमारे अब तक के गायत्री उपासना अनुभव यही हैं कि गायत्री मंत्र के बारे में जो तीन बातें कही जाती है पूर्णतः सही है। गायत्री को कामधेनु कहा जाता है यह सही है। गायत्री को कल्पवृक्ष कहा जाता है यह सही है। , गायत्री को पारस कहा जाता है, इसको छूकर के लोहा सोना बन जाता है यह सही है। गायत्री को अमृत कहा जाता है, जिसको पीकर के अजर अमर हो जाते हैं, यह भी सही है। यह सब कुछ सही उसी हालत में है जबकि गायत्री रूपी कामधेनु को चारा भी खिलाया जाय, पानी पिलाया जाय, रखवाली भी की जाय। गाय को चारा आप खिलायें नहीं और दूध पीना चाहें तो यह कैसे संभव होगा? पानी पिलाये नहीं ठंड से उसका बचाव करे नहीं, तो यह कैसे संभव होगा? गाय दूध देती हैं, यह सही हैं, लेकिन साथ साथ में यह भी सही है कि उसको परिपुष्ट करने के लिए दूध पाने के लिए उन तीन चीजों की जरूरत हैं जो कि मैंने अभी आप से निवेदन किया।
यह विज्ञान पक्ष की बात हुई। अब ज्ञान पक्ष की बात आती हैं। यह मरा 70 वर्ष का अनुभव है कि गायत्री के तीन पाद- तीन चरण में तीन शिक्षाएँ भरी है। और ये तीनों शिक्षाएँ ऐसी है कि अगर उन्हें मनुष्य अपने व्यक्तिगत जीवन में समाविष्ट कर सके तो धर्म और अध्यात्म का सारे के सारा रहस्य और तत्वज्ञान का उसके जीवन में समाविष्ट होना संभव है। तीन त्रिपद गायत्री हैं- (1) आस्तिकता (2) आध्यात्मिकता (3) धार्मिकता। इन तीनों को मिला करके त्रिवेणी संगम बन जाता है। ये क्या है तीनों?
पहला है आस्तिकता। आस्तिकता का अर्थ हैं ईश्वर का विश्वास। भजन पूजन तो कोई आदमी कर लेता है, पर ईश्वर विश्वास का अर्थ है कि सर्वत्र जो भगवान समाया हुआ है, उसके संबंध में यह दृष्टि रखें कि उसका न्याय का पक्ष कर्म फल देने वाला पक्ष इतना समर्थ है कि उसका कोई बीच बचाव नहीं कर सकता। भगवान सर्वव्यापी हैं, सर्वत्र हैं, सबको देखता है, अगर यह विश्वास हमारे भीतर हो तो, इसके लिए पाप कर्म करना संभव नहीं होगा। हम हर जगह भगवान को देखेंगे और समझेंगे कि उसकी न्याय, निष्पक्षता हमेशा अक्षुण्ण रही है। उससे हम अपने आप का बचाव नहीं कर सकते। इसलिए आस्तिक का ईश्वर विश्वासी का पहला क्रिया कलाप यह होना चाहिए कि हमको कर्म फल मिलेगा, इस लिए हम भगवान से डरें। जो भगवान से डरता है उसे संसार में किसी और से डरने की जरूरत नहीं होती। आस्तिकता चरित्रनिष्ठ और समाजनिष्ठ का मूल है। आदमी इतना धूर्त है कि वह सरकार को झुठला सकता है, कानूनों को झुठला सकता है, लेकिन यदि ईश्वर का विश्वास उसके अंतःकरण में जमा हुआ है तो वह बराबर ध्यान रखेगा। हाथी के ऊपर अंकुश जैसे लगा रहता है आस्तिकता का अंकुश हर आदमी को ईमानदार बनने के लिए, अच्छा बनने के लिए प्रेरणा करता है, प्रकाश देता है।
ईश्वर की उपासना का अर्थ हैं - जैसा ईश्वर महान है वैसे ही महान बनने की हम कोशिश करें। हम अपने आप को भगवान में मिलाये। यह विराट विश्व भगवान का ही रूप है, हम उसकी सेवा करें, सहायता करें और इस विश्व उद्यान को समुन्नत बनाने की कोशिश करें, क्योंकि हर जगह भगवान समाया हुआ है। सर्वत्र भगवान विद्यमान है। यह भावना रखने से ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु ‘ की भावना मन में पैदा होती है। गंगा जिस तरीके से अपना समर्पण करने के लिए समुद्र की ओर जल पड़ती है। आस्तिक व्यक्ति ईश्वर का विश्वासी व्यक्ति भी अपने आप को भगवान में समर्पित करने के लिए जल पड़ता है इसका अर्थ यह हुआ कि भगवान की इच्छाएँ मुख्य हो जाती है और सिखाती हैं, कि ईश्वर के संदेश, ईश्वर की आज्ञाएँ ही हमारे लिए सब कुछ होनी चाहिए। हमें अपनी इच्छा भगवान पर थोपने की अपेक्षा भगवान की इच्छा को अपने जीवन में धारण करना चाहिए। आस्तिकता के ये बीज हमारे अन्दर जमे हुए हों, तो जिस तरीके से पेड़ में लिपट कर बेल उतनी ही ऊंची हो जाती है जितना कि ऊंचा वृक्ष है। उसी प्रकार कह भगवान की ऊँचाई के बराबर ऊँचे चढ़ सकते हैं जिस प्रकार पतंग अपनी डोर बच्चे के हाथ में थमाकर आसमान में ऊँचे उड़ती चली जाती है। जिस प्रकार कठपुतली के धागे बाजीगर के हाथ में बंधे से कठपुतली अच्छे से अच्छा नाच तमाशा दिखाती है। उसी तरीके से ईश्वर का विश्वास, ईश्वर की आस्था अगर हम स्वीकार करें हृदयंगम करें और अपने जीवन की दिशा धारायें भगवान के हाथ में सौंप दें। अर्थात् भगवान के निर्देशों को ही अपनी आकाँक्षायें मान ले तो हमारा उच्चस्तरीय जीवन बन सकता है। और हम इस लोक में शाँति एवं परलोक में सद्गति प्राप्त करने के अधिकारी बन सकते हैं। आस्तिकता गायत्री मंत्र का पहला वाला चरण है- आध्यात्मिकता। आध्यात्मिकता का अर्थ होता है- आत्मावलंबन, अपने आप को जानना आत्म बोध। “आत्माऽवारे ज्ञातव्य “ अपने आप को जानना। अपने आपको जानने से हम बाहर बाहर भटकते रहते हैं। कई अच्छी आकाँक्षाओं को पूरा करने के लिए, अपने दुःखों का कारण बाहर तलाशे फिरते रहते हैं। जानते नहीं कि हमारी मनःस्थिति के कारण ही हमारी परिस्थितियाँ उत्पन्न होती है। अगर हम यह जान पायें तो फिर अपने आपको सुधारने की कोशिश करें। स्वर्ग और नरक हमारे ही भीतर है। हम अपने ही भीतर स्वर्ग दबायें हुए हैं- अपने ही भीतर नरक दबायें हुए है। हमारे मनःस्थिति के आधार पर ही परिस्थितियाँ बनती है। कस्तूरी का हिरण चारों तरफ तलाश करता फिरता था, लेकिन जब उसको पता चला कि वह तो उसकी नाभि में ही है, तब उसने इधर उधर भटकना त्याग दिया ओर अपने ही भीतर ढूंढ़ने लगा। फूल जब खिलता है तो भौंरे आते ही हैं। बादल तो बरसते तो हैं पर जिसके आँगन में जितना पात्र होता है, उतना ही पानी देकर जाते हैं। चट्टानों के ऊपर बादल बरसते हैं, लेकिन घास का ऐ किनका भी पैदा नहीं होता।
छात्रवृत्ति उन्हीं को मिलती है जो अच्छे नम्बर से पास होते हैं। संसार में सौंदर्य तो बहुत हैं, पर हमारी आँख न हो तो क्या मतलब। , संसार में संगीत गायन तो बहुत हैं पर हमारे कान न हो तो उन शब्दों का क्या मतलब। संसार में ज्ञान विज्ञान तो बहुत हैं, पर हमारा मस्तिष्क न हो तो उसका क्या मतलब। ईश्वर उन्हीं की सहायता करता है जो जो अपनी सहायता आप करते हैं। इसीलिए आध्यात्मिकता का संदेश यह है कि हर आदमी को अपने आपको देखना, समझना, सुधारने के लिए भरपूर प्रयत्न करना चाहिए। अपने आपको जितना सुधार लेते हैं, उतनी ही परिस्थितियाँ हमारे अनुकूल बनती चली जाती है। यह सिद्धांत गायत्री मंत्र का दूसरा वाला चरण है।
तीसरा वाला चरण गायत्री मंत्र का है- धार्मिकता। धार्मिकता का अर्थ होता है- कर्तव्य परायणता। कर्तव्यों का पालन। कर्तव्य, कर्म और धर्म लगभग एक ही चीज हैं। मनुष्य ओर पशु में सिर्फ इतना ही अंतर हैं कि पशु किसी मर्यादा में बँधा नहीं होता है। मनुष्य के ऊपर हजारों मर्यादायें और नैतिक नियमन बाँधे गये है और जिम्मेदारियाँ लादी गयी है॥ जिम्मेदारियाँ और कर्तव्यों को पूरा करना मनुष्य का कर्तव्य है। शरीर के प्रति हमारा कर्तव्य हैं कि इसको हम निरोग रखें। मस्तिष्क के प्रति हमारा कर्तव्य है कि अवाँछनीय विचारों को न आने दे। परिवार के प्रति हमारा कर्तव्य है कि उनको सद्गुणी बनायें। देश, धर्म, समाज और संस्कृति के प्रति हमारा कर्तव्य है कि हम समुन्नत बनाने के लिए हम भरपूर ध्यान रखें लोभ और मोह के पास से अपने आपको छुड़ा करके अपनी जीवात्मा का उद्धार करना यह भी हमारा कर्तव्य हैं और भगवान ने जिस कार्य के लिए हमको इस संसार में भेजा हैं, जिस काम के लिए मनुष्य योनि में जन्म दिया हैं, उस काम को पूरा करना भी हमारा कर्तव्य है। इन सारे के सारे कर्तव्यों को यदि ठीक तरह से हम पूरा न कर सके तो हम धार्मिक कैसे कहला सकेंगे। धार्मिकता का अर्थ हैं कर्तव्यों का पालन हमने सारे जीवन में गायत्री मंत्र के बारे में जितना भी विचार किया, शास्त्रों को पढ़ा, सत्संग किया, चिंतन मनन किया, उसका साराँश यह निकला कि बहुत सारा विस्तार ज्ञान हैं, बहुत सारा विस्तार धर्म और अध्यात्म है लेकिन इसके सार में तीन चीजें समान हुई है (1) आस्तिकता अर्थात् ईश्वर का विश्वास (2) आध्यात्मिकता अर्थात् स्वावलंबन, आत्म बोध, और अपने आपको परिष्कृत करना अपनी जिम्मेदारियों को स्वीकार करना और (3) धार्मिकता अर्थात् कर्तव्य परायणता। कर्तव्य परायणता, स्वावलंबी और ईश्वर परायण कोई भी व्यक्ति गायत्री मंत्र का उपासक कहा जा सकता है और गायत्री मंत्र के ज्ञान पक्ष के द्वारा जो शाँति और सद्गति मिलनी चाहिए उसका अधिकारी बन सकता है। हमारे जीवन का यही निष्कर्ष है विज्ञान पक्ष में तीन धारायें और ज्ञान पक्ष में तीन धारायें, इनको जो कोई प्राप्त का सकता हो गायत्री मंत्र की कृपा से निहाल बन सकता है और ऊँची से ऊँची से स्थिति प्राप्त करके इसी लोक में स्वर्ग और मुक्ति का अधिकारी बन सकता है। ऐसा हमारा अनुभव ऐसा हमारा विचार और ऐसा हमारा विश्वास है।
अब से 2200 वर्ष पूर्व कीन साम्राज्य चीन में ‘चुग क्यों ‘ नामक एक राजकुमार रहता था जो अपने को मृत्युँजयी मानता था। राज पद पर जब वह आसीन हुआ तो चीन के समस्त विरोधी राज्यों पर अपना आधिपत्य जमा लिया और अपने को न केवल उन राज्यों का, वरन् समूचे जगत का शासक घोषित कर दिया। उसने अपने नाम को दिव्य शासक तथा चीन का प्रथम सर्वशक्तिमान सम्राट के रूप में प्रतिपादित किया।
उस अतिवादी एवं महत्वाकाँक्षी सम्राट का विश्वास था कि मृत्योपराँत भी वह जीवित अवस्था की तरह ही विराट ब्रह्मांड का शासन संभालेगा। तदर्थ उसने 36 वर्ष तक अपने लिए कब्र के निर्माण में ही समय बिता दिया। जीवन भा वह स्वर्ग में अपने शानदार प्रवेश का ही ख्वाब देखता रहा। जीवन के अंतिम 11 वर्ष के दौरान उसने हजारों कलाकारों, शिल्पियों तथा युद्ध कैदियों को एक भव्य महल के निर्माण में लगाये रखा जो मरने के बाद उसके शव पेटिका का आश्रय स्थल बना।
सज्जनता का अर्थ है नम्रता। इसी को सभ्यता और शिष्टता भी कहते हैं। विद्या का वास्तविक प्रतिफल यह भी हैं।
“थोथा चना बाजे घना “ - इस युक्ति को अहंकारियों पर चरितार्थ होते देखा जाता है। वे वस्तुतः जैसे होते हैं, उससे कही बढ़ चढ़कर अपने को व्यक्त करते हैं। किसी को धमकाना, किसी को निहाल कराने का आश्वासन भी प्रायः ऐसे ही क्षुद्र लोग देते देखे गये हैं। इसमें व्यक्ति का घटियापन ही झलकता है। आत्म सम्मान की रक्षा करनी हो तो अहंकार से बचना ही चाहिए।
पेरिस से 80 मील दूर एक देहात में जन्में थे पेन्थिस। उनका पारिवारिक धंधा भेड़ पालन और ऊन कातना था। तनिक बड़े होते ही पेन्थिस को भी उसी धंधे में लगना पड़ा। पढ़ने का उनका मन था, पर साधन न थे। वे भेड़ चराते हुए अपने आप पढ़ने का प्रयत्न करते। एक दिन उनके मामा आये और इस अभिरुचि को देखकर उन्हें पढ़ाने के लिए साथ ले गये। बेपढ़े। छात्रवृत्ति पायी। उच्च शिक्षा संपन्न की और एक हतासर की नौकरी पर लग गये। विवाह प्रस्ताव आने लगे। उनने स्पष्ट इनकार कर दिया ओर कहा व्यर्थ का जंजाल सिर पर लादने की अपेक्षा मैं अपने श्रम और ज्ञान का उपयोग अपने जैसे निर्धन विद्यार्थियों के लिए करूंगा।
उनने निर्धन छात्रों के लिए एक प्राइवेट विद्यालय की स्थापना की। 100 में अपना खर्च चलाते ओर 200 रुपये उस विद्यालय को देते। छात्रों की प्रगति और विद्यालय की व्यवस्था देखकर अनेक लोग देखने आये और अत्यधिक प्रभावित हुए। कुछ संपन्न लोगों ने अच्छी सहायता दी। पेन्थिस ने नौकरी छोड़ दी और उसी वालय को संभालने लगे। आरंभ में केवल 20 छात्र थे, अब उस विद्यालय में 2000 निर्धन छात्र पढ़ते हैं।
भले हो दूर पर माँ के हृदय का, प्यार पाओगे, करोगे ध्यान जब भी तुम, हमें हर बार पाओगे,
कभी बेचैन हो मन तो, हमें तुम याद कर लेना, हृदय में एक पल को भी न तुम, अवसाद भर लेना,
हमारे तुम हृदय अंतःकरण के, पास हो हरदम, हमारी स्नेह क्षमता पर, तुम्हें विश्वास हो हरदम,
हरेक तूफान में अपना, सबल आधार पाओगे, करोगे ध्यान जब भी तुम, हमें हर बार पाओगे,
हमारे द्वार तुम सबके लिए, हरदम खुले होंगे, हमारे स्वर वहाँ भी, हवाओं में घुले होंगे,
हमारी शक्ति तुमको हर निमिष, साहस बँधायेगी, अगर आलस्य ने घेरा, तभी तुमको जगायेगी,
भँवर में नाव जब होगी, तभी पतवार पाओगे, करोगे ध्यान जब भी तुम, हमें हर बार पाओगे,
तुम्हारे भाव हम, आदर्श पथ की ओर खींचेंगे, हृदय के प्यार से, सूखे मनों को नित्य सीचोगे,
जगत में संगठित अब, सज्जनों की शक्तियाँ होगी, मनुजता के दामन की अब, न पुनरावृत्तियां होंगी,
समूचे विश्व में अपना सगा, परिवार पाओगे। करोगे ध्यान जब भी तुम, हमें हर बार पाओगे।
संदेशा साथ हम लेकर, यहाँ गुरुग्राम से आये, गुरु की ज्ञान गंगा हम लिए, सुरधाम से आये,
उसी भागीरथी का जल, धरित्री पर बहाना है, मनुज की सो गयी, संवेदना को फिर जगाना है,
सभी में चेतना भरती, मधुर रसधार पाओगे। करोगे ध्यान जब भी तुम, हमें हर बार पाओगे।
तुम्हें गुरु ज्ञान की, जलती मशालें थामनी होगी, न धरती पर मनुजता अब, दुखी या अनमानी होगी,
तुम्हीं की देवसंस्कृति की, ध्वजा ऋषि ने थमायी हैं, उठो फिर श्रेय पाने की घड़ी, अनमोल आई हैं,
बढ़ो आगे, नये युग में, सुखद संसार पाओगे। करोगे ध्यान जब भी तुम, हमें हर बार पाओगे।
वाँछित हो प्रभु मिलन अगर, तो बैठ जा उसके पास। अंतःकरण चतुष्टय में, भर ले उसकी ही स्नेह सुवास ॥
यही साधना, यह उपासना, यह ही सच्ची पूजा है। उसके गुण धारण करने से, हटकर मार्ग न दजा है॥ उसकी कला ओर लीला में, भी रखें पूरा विश्वास॥
नित्य नियम से यह सामीप्य करें, हम यदि निर्मल मन से। वह हम में आयेगा जैसे, बिजली लिपटी है घन से॥ बस उसकी ही मिलन लालसा, लेकर बहे हमारी साँस॥
एक टेक हो वह मिल जाये, अपनापन तक भूले प्राण। जम जाये अंतर में भाव, कि उसके बिना नहीं त्राण॥ और हमारी हृदय गुहा, बन जाये उसका चिर आभास॥
यही मुक्ति है मिट जायेगी, सांसारिकता से आसक्ति। यही स्वर्ग है रोम रोम में, बस जाये उसकी ही भक्ति॥ और हमारी हृदय गुहा, बन जाये उसका चिर आवास॥
बन जाये यह सबसे बड़ी जरूरत अपने जीवन की। पास गये बिन चैन न आये- यह गति जाये मन की॥ यह स्थिति अगर बना लो जीवन, लगने लगे मृदुल मधुमास॥
मानव जन्म हमें मिलता हैं- सिर्फ इसी आराधना को। कण कण में देखे उसको ही -पुष्ट करें इस चिंतन को॥ आस पास सद्गंध बखरे, अपने मन का वतास॥
अंतर का तम मिट जायेगा, दृष्प्रवृत्तियां भागेंगी। परहित ही मंगलमय, सुखद भावनायें ही जागेंगी॥ तव मुख मण्डल पर ही दमकेगा, उस विभु का दिव्य उजास॥
हमें अगले दिनों विश्व को यह बताना है कि नयी दुनिया कैसी होगी, जमाना कैसे बदलेगा तथा देखते देखते व्यक्तियों के सोचने का तरीका कैसे बदलता चला जायेगा? जैसे ब्रह्माजी ने इच्छा प्रकट की “ एकोऽहं बहुस्यामि “ व देखते देखते साकार हो गयी, उनकी कल्पना, उसी तरह प्रसंग तब तक का है, जब वैज्ञानिक आध्यात्म का सारा ढांचा नये सिरे से गढ़ा जा रहा था। 1966-67 में अखण्ड ज्योति पत्रिका में आरंभ किये गये इस उपक्रम को सभी ने सराहा और बुद्धिजीवियों के मिशन की पैठ बड़ी गहरी बनी थी। 1977-78 में उन सभी विषयों पर पुनर्मन्थन का सृजनात्मक लेखन व एक साधारण साहित्य लेखन में यही सबसे भारी अंतर है।
लेखक पत्रकार मनीषी के रूप में परमपूज्य गुरु देव के जीवन वृत्त पर जब हम एक विहंगम दृष्टि डालते हैं तो पाते हैं कि साहित्य लेखन उनकी साधना का एक अनिवार्य अंग था।
युग के व्यास, जिनकी लेखनी से छलकती हैं भाव संवेदना हमने भी इच्छा व्यक्त की है महाकाल के संकेतों पर कि हमें इस इस दुनिया को नयी बनाना है। इक्कीसवीं सदी का साहित्य हम इस लिए रच रहे है। तुम्हारे तथ्यों के संकलन हमारे अभी के लेखन तथा हमारे बाद कलम पकड़ने वाली उंगलियों के कलम पकड़ने के पीछे यही दैवीय प्रेरणा काम कर रही है। इस तथ्य को समझना, यह मानना कि तुम्हारे व्यक्तित्व का तिरस्कार कर तुम से एक गहन साधना कराना मेरा उद्देश्य है। यह समझ लोगे तो तुम लोग कभी लक्ष्य से भटकोगे नहीं। परमपूज्य गुरुदेव ने उपरोक्त भाव तब व्यक्त किये थे, जब हम सब उनके समक्ष गोष्ठी में बैठे उनका मार्गदर्शन ले रहे थे। इन दिनों कागज काले करने वाले ढेरों समाचार पत्र निकलते हैं। लाखों पत्रिकायें रोज प्रकाशित होती हैं किन्तु रचनात्मक लेखन, युग परिवर्तन साहित्य सर्जन कैसे किया, यह समझना हो तो हमें परम पूज्य गुरु देव की लेखन प्रक्रिया से जुड़े प्रसंगों व उन अंतरंग क्षणों की आपको झाँकी करनी होगी जिसे देखने समझने के बाद अखण्ड ज्योति का जाज्वल्यमान विराट रूप हमारे समक्ष होता चला जाता है। क्रम चला जिन्हें आध्यात्म और विज्ञान के समन्वयात्मक प्रतिपादनों की परिधि में लाना था, विशेषकर तब, जब प्रयोग परीक्षणों एक प्रयोग शाला व ग्रंथागार विनिर्मित होने जा रही था। कार्य की विशालता व उद्देश्य के विराट स्तर पर साहित्य सृजन हेतु राशि लेकर लिखने वाले साहित्यकारों से संपर्क करना चाहिए व उनके माध्यम से हिंदी भाषी ही नहीं, सभी भाषीय क्षेत्रों को पकड़ने की योजना बनानी चाहिए पूज्यवर बोले “ जो कार्य ऋषि मनीषियों के स्तर का हो इसे खरीदी हुई अक्ल नहीं कर सकती। हमेशा तपः पूत लेखनी के धनी मनीषी स्वयँ तैयार करने होंगे। वे ही नव सृजन का आधार खड़ा करेंगे। ” यही कारण हैं कि 3200 पुस्तकों के रूप में विराट परिणाम में साहित्य सृजन करने वाले पूज्य गुरु देव एक ऐसा ढांचा खड़ा कर सके कि बिना किसी बाहर के लौकिक स्तर के साहित्यकार के मदद के यह पत्रिका न केवल अनवरत चलती रह सकी, वरन् इसके भावी स्वरूप का प्रारूप भी निश्चित हो गया। मनीषा के विराट गायत्री परिवार का सृजन उनने इसी के माध्यम से किया केवल पत्रिका उच्चस्तरीय प्रेरणाओं व निर्देशों से युक्त रहती थी, अपितु उसके परिजनों को लिखे गये पत्र मनोबल बढ़ाने वाला मार्गदर्शन भी करते थे। प्रातः काल डेढ़ बजे उठ कर नित्य कर्म से निवृत्त हो चार घण्टे से छह घण्टे न्यूनतम लेखनी का साधना यह उनकी दिन चर्या का एक अनिवार्य अंग थी चाहें वे क्षेत्र के दौरे पर हो, राह में, ट्रेन में या सक्रिय कार्यक्रमों के केन्द्र में संलग्न, लेखनी कभी उनकी रुकी नहीं नियमित स्तर पर यह लेखन था जिसके माध्यम से चिंतन को उछालने वाले श्रेष्ठ स्तर के साहित्य का सृजन संभव हो सका। यही प्रेरणा उनने अपने पास कार्य करने वाले - सीखने वाले साधकों को भी दी। जिनने उस दिनचर्या को अपनाया, उनका निज का व्यक्तित्व तो परिष्कृत हुआ ही, उनके माध्यम से मार्ग दर्शन का एक तंत्र विकसित होता चला गया।
बड़ा आश्चर्य होता है जब हम देखते हैं कि बिना किसी उच्च स्तर की पढ़ाई शिक्षा के भारतीय संस्कृति, दर्शन, अध्यात्म, तत्त्व मीमाँसा आहार से लेकर चिकित्सा विज्ञान भौतिकी, समाज को नव निर्माण नैतिक, मनोवैज्ञानिक तथा राजनीति के दाँव पेंच भरे विषयों से लेकर मैनेजमेंट जैसी विद्या पर बहुमुखी एक्सपर्ट स्तर का लेखन किसी से कैसे बन पड़ा? उसका एक ही उत्तर है गहन स्वाध्याय। फकीरों की भाषा में कहें तो ऐसे कहेंगे “पढ़िबे की फल गुनब है” गुनबे का फल ज्ञान, ज्ञान का फल हरि नाम है, कहिश्रुति संत पुरान। अर्थात् पढ़ने का मर्म मनन चिंतन ज्ञानार्जन में है व ज्ञान की सार्थकता भगवद् भक्ति में है। जहाँ ये सभी मिल जायें व लेखनी इसकी सधी हुई दिशा में चले वहाँ जिस उच्चस्तरीय साहित्य का सृजन होगा, उसे पढ़कर कौन ऐसा होगा, जो प्रभावित न हों?
“कवयाः सत्य श्रुताः “ ऋषि कवि होता है व उसका काव्य फूट पड़ता है लेखनी से गद्य व पद्य के रूप में। गद्य भी उसका ऐसा सरस होता है कि पढ़कर लगता है कि शब्द कहाँ तक भीतर जा कर स्पर्श कर रहे हैं उनके मूल में संवेदना गहरे तक विराजमान है। जरा उनकी लेखनी का एक स्वरूप यहाँ देखे - “ भगवान किसी को धनी कुबेर भले ही न बनाये, पर उसकी करुणा बरसती ही हो तो उसे उस चिकित्सक की पदवी मिलें जिसने असंख्यों को अंध तमिस्रा से उबारा ओर आलोक की दुनिया में हाथ पकड़कर ला बिठाया। ” जहाँ ऊपर की पंक्तियों में गहरी संवेदना है तो अगले उद्धरण में प्रतिभाओं को दी गयी लताड़ भी ऐसी है जो गहरे तक चुभ कर दिखाने की दिशा में मचला देती है- “प्रतिभाएँ आगे बढ़ती है तो ही अनुगामियों की कतार पीछे चलती हैं। पतन और उत्थान का इतिहास इस एक ही पटरी पर आगे बढ़ता रहा है। प्रतिभाओं को दूसरे शब्दों में अंधड़ कहते हैं। इनका वेग जिस दिशा में तेजी से बढ़ता है, उसी अनुपात में तिनके पत्तों से लेकर छप्परों और वृक्षों तक को उड़ते लुढ़कते देखा गया है। गिरता उठता तो जमाना हैं पर उसके लिए वास्तविक पाप पुण्य का बोझ इस समय की अग्रगामी प्रतिभाओं के लिए सिर पर लदता है। अब केवल एक ही बात सोचनी चाहिए कि समय की जिस चुनौती ने जागृतात्माओं को कान पकड़ कर झकझोरा है, उसके उत्तर में उन्हें दाँत निपोरने हैं या सीना तानना है। ”
ऊपर पूज्यवर की लेखनी की एक साक्षी देकर यह बताने का प्रयास हम कर रहे हैं कि ऋषि स्तर के मनीषियों सूक्ष्म स्तर पर अपनी साधना की शक्ति से, अपनी सशक्त लेखनी व ओजस्वी वाणी से वह सब कुछ कर दिखाने की सामर्थ्य रखते हैं जिसे युग असंभव मानता रहा हैं। इसी परिप्रेक्ष्य में उनके द्वारा किये गये कुछ व्यवहारिक निर्देश दृष्टि पटल पर आ जाते हैं, जिन्हें समय समय पर डायरी में नोट किया जाता रहा। (1) अब हमें भारती य दर्शन में समग्रता लाती है इसे नया स्वरूप विज्ञान का पुट देकर देना है। तत्त्व दर्शन ही किसी समाज की संस्कृति बनाता है। हमारी संस्कृति के अनिवार्य अंग हैं। दूरदर्शी, विवेकशीलता, तथा पुण्य परमार्थ। कठिनाइयाँ यही है कि इस भारतीय मान्यता को पाश्चात्य दर्शन सामर्थ्य नहीं देता। हमें भागीरथी पुरुषार्थ करना है कि जन जन के मन में ये दो आदर्श समा जाएँ। (1-4-83)
(2) प्राचीन युग देवताओं का युग था। सतयुग की संस्कृति देव युग की संस्कृति थी। हम आदिम मानव से नहीं, श्रेष्ठ नर रत्नों, ऋषियों से जन्में हैं। यही अब तक तर्क, तथ्य, प्रमाण के साथ पूरे विश्व में पहुँचानी है। (11-4-83)
(3) आदमी के विचारों की शक्ति असाधारण हैं। जिजीविषा जीवट मनोबल में अपनी एक अलग ही सामर्थ्य व मनुष्य की सबसे बड़ी विशेषता है। हमारे अंतः की विद्युत ताकत पर खड़ा है विचारों का ढांचा। साधना उपचारों द्वारा जब तक इसे सशक्त किया जाता रहेगा, मनुष्य का आँतरिक वैभव सतत् बढ़ता ही रहेगा। (3-6-83)
(4) हमें व तुम्हें अब भ्रष्ट चिंतन से जूझना है। यही इस युग का सबसे बड़ा संग्राम है। आज दर्शन को प्रत्यक्षवाद के विषाक्त कर दिया है। यदि यह दर्शन प्रवाह उलटा न गया तो मनुष्य को यह पशु बनाकर रहेगा। इस युग संकट से जूझना ही मनीषा का काम है वह काम अखण्ड ज्योति को ही करना है। (11-4-1986)
अंधा होकर किसी विचार से चिपके रहने की अपेक्षा शंकालु होकर धार्मिक सत्यों का शोध करना उत्तम है। राधाकृष्णन
(5) सृजन की अपनी लहर होती है। कभी सतयुग में सृजन परक प्रभावोत्पादन मानसून छाया रहता था तो धरती स्वर्ग जैसी थी। वैसा ही वातावरण लाने के लिए हमें जन जन के मनो को मथकर यह सोचने पर मजबूर कर देना है कि परिवर्तन अवश्यंभावी हैं व तो श्रेष्ठता की दिशा में ही हैं इसी उद्देश्य की सफलता में तुम्हारे समर्पण की सफलता है। (20-10-1988)
उपरोक्त उद्धरण उन डायरियों से लेकर पाठकों की जानकारी के लिए दिये गये जिनमें समय समय पर पूज्य वर के मुखर बिन्दु से निकले हर निर्देश को नोट किया जाता रहा। 1940 से 1990 तक चली पचास वर्ष की साहित्यिक जीवन यात्रा पर हम जब दृष्टि डालते हैं तो पाते हैं कि अखण्ड ज्योति को एक पाती की तरह स्वजनों परिजनों तक भेजने वाले पूज्यवर गुरुदेव ने “ मैं क्या हूँ “
जैसी जटिल आत्म चिंतन प्रधान पुस्तक से आरंभ कर जीवन जीने की कला के व्यवहारिक अध्यात्म तथा धर्मतंत्र से लोक शिक्षण व लोक जन से लोक मंगल के स्वरूप से लेकर गायत्री के तत्वज्ञान के पुण्य परमार्थ प्रधान शिक्षण द्वारा एक व्यापक समुदाय को मथा जिसकी संख्या करोड़ों में आँकी जा सकती है। वे अखण्ड ज्योति के अपनी प्राण ऊर्जा का प्रवाह बताते रहें, मात्र तीन उँगलियों व कलम से लिखी जाने वाली एक पत्रिका मात्र नहीं। इस अखण्ड ज्योति का वस्तुतः मत्स्यावतार की तरह विस्तार न हुआ व संदेश नहीं मैं स्वर्ग लोक को लाओ वाला कैपशन लेकर प्रकाशित प्रारंभिक पत्रिका जो 250 मात्र थी बढ़ते बढ़ते आज चार लाख से अधिक हिंदी व इतनी ही अन्य भाषाओं में (गुजराती, उड़िया, बंगाली, मराठी, तमिल, तेलगू) प्रकाशित हो अस्सी लाख पाठकों तक पहुँच रही है। अध्यात्म प्रधान चिंतन में यदि इतने व्यक्ति आज के कलियुग माने जाने वाले युग में भी रुचि लेते हैं न उनका स्वाध्याय कर पाने पर कुछ अभाव सा महसूस करते हैं तो यह चिन्ह पूज्यवर के उस आशावादी दर्शन का द्योतक है। जिसमें वे कहते थे मूलतः मनुष्य आदर्शवादी हैं व उसे अंत में वही बना रहेगा। विचार की स्पष्टता, शैली में रोजमर्रा के प्रयोग किये जाने वाले शब्दों से लेकर शुद्ध संस्कृत के शब्द कई नयी संधियों के साथ नये शब्दों की संरचना, भावना का अविरल प्रवाह एक सुनियोजित उद्देश्य की और को मोड़ता प्रतिपादन यह पूज्यवर की जादू भरी लेखनी की विशेषता है। एक बार का प्रसंग है कि ब्रह्मवर्चस के कार्य कर रहे एक सज्जन अनगिनत तर्कों व प्रमाणों के साथ नास्तिक वाद का खण्डन करने वाला एक लेख पूज्यवर के पास लाए। उनकी दृष्टि ये यह उनका सर्वश्रेष्ठ लेख था। पूज्यवर ने पढ़ा व फिर कहा कि -बेटा तेरा मन रखने के लिये इसे पड़ता तो नहीं किन्तु एक बात बताता हूँ कि बिना संवेदना का समावेश किए बिना सही दिशा दिए लेखन नीरस बेजान है। हम खण्डनात्मक शास्त्रार्थ वादी परम्परा के नहीं हैं। हमें तर्क व तथ्यों के साथ संवेदना करुणा को ही उभारना है। इसे स्पष्टतः ध्यान में रखना।
“ सुनसान के सहचर “ जैसी छन्दात्मक भाव प्रधान शैली भाव प्रधान शैली का लेख करने वाले तथा प्रतिमाह अखण्ड ज्योति के अपनों से अपनी बात स्तम्भ द्वारा लाखों
व्यक्तियों के मर्मस्थल को हिला डालने वाले परमपूज्य गुरुदेव ने अपने मार्गदर्शन में जिस को रखा यदि उसने अलग से काम किया तो उसे उस विद्या में पारंगत बना दिया। उनने प्रमाणित किया कि बिना पैसे जीवन जियें बिना आदर्शवाद के जीवन में उतारें, बिना संवेदनशील बनें कोई भी व्यक्ति यदि लेखनी पकड़ता है तो वह मात्र कागज काले करता है, जनतप के विचारों का प्रदूषण बढ़ाता है, वह कुकुरमुत्ते की तरह बढ़ रही साहित्यकारों की फसल में एक और जुड़ जाता है।
पूज्यवर के 10 नवम्बर 1981 को नोट करायें निर्देशों का हवाला देकर अपने इस अपूर्ण प्रसंग को समाप्त करते हैं। हमें अब नयी दुनिया गढ़नी हैं। इसका सारा आधार संवेदना पर टिका हैं। लोगों का भाव संवेदनाओं को, अंतःकरण को बदल देना ही हमारा मूल लक्ष्य है। मार्क्स ने अर्थ व्यवस्था को मूल आधार बनाया तो रूसो ने प्रजाताँत्रिक व्यवस्था को। हमने मानवीय अंतःकरण से नियंत्रित मनोविज्ञान व व्यवहार को अपने चिंतन की मूल धुरी बनाया है। हम आशावादी है। भविष्य निश्चित ही उज्ज्वल है। 21 वीं सदी का मतलब है आदर्शवाद पर विश्वास, आशावादी साहस। औरों का यूटोपिया काल्पनिक रहा होगा, हमार नहीं हैं। भावना विज्ञान पर लिखा बहुतों ने हैं पर भावनाओं को व्यवहार में उतार कर कैसे आदर्श मानव बनाया जाय व आदर्श समाज गढ़ा जाय, यह किसी ने नहीं लिखा है। हमने इसी विषय में अपना चिंतन नियोजित किया है व इसी धुरी पर युगान्तर कारी साहित्य सृजा है। तुम उसी धुरी पर चलते रहना, बस देखते ही देखते दस वर्षों में जमाना बदल जायेगा।
पाठकों को पूज्यवर की भाषा यथावत् उद्धृत कर हमने उनके उस स्वरूप की झलक दिखाने का प्रयास किया है, जिसमें वह युग पुरुष लेखनी की अविराम साधना कर असाधारण पुरुषार्थ संपन्न किया। जब साहित्य जगत इस विराट साहित्य संजीवनी का मूल्याँकन कर पाने में सक्षम होगा, तब वह भी युग के यास को समय पर न पहचान पाने की विडम्बना पर स्वयँ अपना सिर धुन रहा होगा
गाली, असत्य, निन्दा, चुगली आदि विकार मुँह द्वारा मन से निकलते हैं और यही मनुष्य को अशुद्ध बनाते हैं। बिना हाथ धोये भोजन करना उतना अशुद्ध नहीं जितना की कि गंदी बात करना।
इसी लिए मैं तुमसे कहता हूँ कि वाह्य क्रियाओं से पूर्व अपने मन को शुद्ध करने का यत्न करो। क्योंकि पिता के स्वर्ग राज्य में तन को नहीं मन की शुद्धता पर विचार किया जाता है।
*समाप्त*