ऐसा कहा जाता है कि भूत-प्रेत होते हैं, श्मशान में रहते हैं। उन्हें एकाकी खँडहर पसंद हैं। वे भूतकाल की विसंगतियों में ही उलझे-विपन्न बने क्षुब्ध होते रहते हैं-दूसरों को भी उसी आग में जलाते रहते हैं। स्वयं वे भूतकाल से डरते हैं व दूसरों को भी डराते हैं, जलते व जलाते हैं। चाहते बहुतों से हैं किन्तु दे किसी को कुछ नहीं पाते। क्या वास्तव में ऐसे भूत होते हैं ? हमें देखना होगा कि यह भूत की कल्पना कहीं हमारे अपने ऊपर-वर्तमान स्वरूप पर तो लागू नहीं हो रही। कहीं हम स्वयं ही भूतों में निरत रहते-रहते ही तो भूत नहीं बन गए हैं।
पंच तत्वों को भूत-पंचभूत कहा जाता है। हमारा शरीर इन्हीं पंचभूतों का बना है व इनकी सतत् क्रियाशीलता हेतु इन्हें पदार्थों के ईंधन की आवश्यकता पड़ती है। भोजन हेतु स्थूल आहार इन्हीं पंचभूतों के लिए लिया जाता है। शरीर का अंत होते ही यह माटी की काया इन्हीं पंचतत्वों में समा जाती है। किन्तु आत्मा शरीर नहीं है। उसको आहार व पोषण, विचारों की श्रेष्ठता, भावना की उत्कृष्टता से मिलता है। उसका भोजन देवों का भोजन है इसीलिए शरीर को-पंचभूतों की इस काया को भूत तथा चेतना को देव कहते हैं।
हम सबका मूलभूत स्वरूप देव प्रधान है। हमारा लक्ष्य भी देवत्व की पराकाष्ठा पर पहुँचना है। देवों की संपदा, विचारणा और भावना की उत्कृष्टता होती है। यह संपदा जहाँ भी अधिक होगी, वहीं स्वर्गीय वातावरण बनेगा। मनःस्थिति में देवत्व होगा तो परिस्थितियाँ भी स्वर्गोपम दृष्टिगोचर होने लगेंगी। जो देते रहते हैं, देना ही जिनका स्वभाव है उन्हें ‘देवता’ कहते हैं। देव सत्कर्मों में सहायता करने के निमित्त निरंतर दौड़ते रहते हैं-सबको बाँटते ही रहते हैं। इसी कारण वे सम्मान पाते और औरों को वरदान दे पाने के सुपात्र बनते हैं। अमृत पीते, अमरत्व का आनंद लेते और अमृत दिलाते हैं। आनंद पाते व चहुँ ओर उल्लास बिखेरते हैं।
हमें यह देखना है कि हम क्या बनना चाहते हैं-भूत या देव ? भूत योनि से निकल कर देव योनि में प्रवेश करना पूर्णतया अपनी इच्छा और पुरुषार्थ पर निर्भर है। उचित यही है कि हम संकल्प शक्ति जुटायें व अंदर का देवत्व जगायें। आत्मिक प्रगति का यही राजमार्ग एक समान सबके लिए एक जैसे अवसर लिए सामने खड़ा है।
उपनिषदों के ऋषि कहते हैं कि “भगवान ने हमारे मस्तिष्क में बाहर जाने वाली, बाहर देखने वाली बाहर की दुनिया का ध्यान रखने वाली, इन्द्रियाँ, कर दी हैं इसीलिए मनुष्य बाहर ही देखता है, अंतर्मुख नहीं होता, इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं। कोई बिरला मनुष्य ही अंतर्मुख होकर अपनी अंतरात्मा की ओर झाँकता है और बाहर की दुनिया की ओर से क्रमशः आँखें फेर लेता है, क्योंकि उसमें अमृत स्थिति की अभिलाषा रहती है।
यह अमृत स्थिति क्या है ? मृत्यु से बचना, दीर्घायु प्राप्त करना, बुढ़ापे की कमजोरी टालना, क्या यही है अमृतत्व ? यह तो देवों के राजा इन्द्र के यहाँ अमृत प्राशन करने से प्राप्त होता होगा। जीवन के उच्चतम तत्वज्ञान के साथ उसका कोई संबंध नहीं हो सकता। अनुभव यह कहता है कि इस संसार में जितने मनुष्य पैदा हुए हैं सब मरणाधीन हैं। पुराणों के अश्वत्थामा, बलि, व्यास, हनुमान, विभीषण, कृपाचार्य एवं परशुराम चिरंजीवी माने जाते हैं, पर वस्तुतः वे भी इस मृत्युलोक से चले गए। इसलिए मृत्यु को टालना या दीर्घायु प्राप्त करना यह कोई अमृतत्व की साधना नहीं है।
उपनिषदों के ऋषि कहते हैं कि “बाहरी दुनिया के पीछे पड़ना छोड़ दो अथवा कम करो और अंतर्मुख होकर जीवन के अनुभव का सार निकालो ऐसा करते हुए जो आत्म तत्व मिलेगा, उसको पूरी शक्ति लगाकर पकड़ लो। तब आज का निस्सार जीवन सारयुक्त होगा। जीवन का रहस्य पाने पर ही जीवन कृतार्थ होगा। वही है मुक्ति वही है अमृतत्व।” जीवन को कृतार्थ करने वाली ऐसी मोक्ष साधना का स्वरूप क्या होगा ?
अनुभव कहता है कि बाहरी दुनिया और आँतरिक दुनिया में से एक की भी उपेक्षा हम नहीं कर सकते। हम इस संसार में आये यह कोई भूल नहीं हुई है। इसे पहचानना ही है। लेकिन केवल बाहरी दुनिया का परिचय पर्याप्त नहीं है। शुरू में इंद्रियों की मदद से बाहरी दुनिया का यथार्थ परिचय पालेंगे। यह साधना अगर आधी-या एकाँगी न रही, तो वही साधना हमें आँतरिक जगत की खोज में ले जाएगी। फिर तो दोनों साधनाएँ एक साथ चलेंगी, एक दूसरे की मदद करेंगी । “पश्चिम जड़वादी है, हम अध्यात्मवादी हैं। ऐसी डींग हाँकना छोड़कर हम कबूल करें कि दोनों एकाँगी हैं और जीवन रहस्य तभी प्राप्त होगा, जब हम एकाँगिता छोड़कर सर्वांगी बनेंगे।
प्रकृति की रचना भी ऐसी है कि प्रथम मनुष्य की इंद्रियों का विकास होता है। साथ-साथ बुद्धि का, हृदय का, और संकल्प शक्ति का विकास भी होता जाता है। जब मनुष्य इस तरह अनुभव समृद्ध होता है तब उसका पुरुषार्थ दोनों दिशाओं में बढ़ता जाता है। केवल ज्ञान की खोज से, शास्त्र पठन से नहीं, अपितु-ज्ञान युक्त अनासक्त कर्म की सहायता से जब पुरुषार्थ बढ़ता है तभी मनुष्य जीवन रहस्य को समझ पाता है। उसी को सर्वांग संपूर्ण साक्षात्कार कहते हैं। ऐसे पुरुषार्थी जीवन को सफल करने के बाद जब जीवन संध्या उपस्थित होती है तब जीवन भर प्राप्त जीवन रहस्य को हजम करने के लिए जीवन की साधना बदलनी पड़ती है। “बाह्य प्रवृत्ति कम करना, अंतर्मुखी होकर चिंतन को बढ़ाना, जीवन साधना के द्वारा आत्मतत्व का जो परिचय अथवा साक्षात्कार हुआ हो, उसी को परिपक्व और दृढ़ करते जाना।” यह है जीवन के संध्याकाल की साधना।
इस साधना में बाहरी दुनिया का परिचय बढ़ाने की आवश्यकता कम होती है, जो अनुभव हो चुका है, उसकी जुगाली करना महत्वपूर्ण होता है। इसलिए प्रकृति माता की रचना है कि इस अवस्था में इंद्रियों की धारणा-शक्ति क्रमशः क्षीण होती जाती है और बुद्धि शक्ति और अनुभव का सार निकालने की दोहन शक्ति बढ़ती जाती है, जो कि स्वाभाविक है।
जिन लोगों ने इंद्रियों के वश होकर उन्हीं का अधिकार मान लिया, आयु का दुरुपयोग किया और जीवन को विकृत होने दिया-उनकी बुद्धि शक्ति शीघ्र क्षीण होगी यह बात स्पष्ट है। परन्तु यह प्रकृति द्वारा दिया जाने वाला दंड कह सकते हैं।
जिनका जीवन क्रम प्रकृति के अनुकूल है और जिनका समग्र जीवन, जीवन की सब ऋतुओं के प्रति निष्ठावान रहा है, उनके लिए इंद्रियों की शक्ति का यथा समय क्षीण होना उचित मालूम होता है। देखने का देख लिया, सुनने का सुन लिया, चखने का चख लिया, प्रवृत्तियों का विस्तार किया, सेवा ली और सेवा की तथा जीवन को क्रमशः समृद्ध होने दिया। अब सारे जीवन की जुगाली करने के लिए जीवन को काफी हद तक निवृत्त करना आवश्यक है। ऐसे समय इंद्रियों को यथोचित आराम देना ही अच्छा हैं इसलिए जब कान कम सुनते हैं, आँखों की शक्ति क्षीण हो जाती है, हाथ, पाँव काम करते-करते जल्दी थक जाते हैं, तब ऐसी अवस्था को शाप न समझकर निवृत्ति की अनुकूलता समझना चाहिए और शाँति-संतोष तथा प्रसन्नता को बढ़ाकर आत्म चिंतन करते-करते जीवन समस्या का रहस्य पाना चाहिए।
ध्यान, चिंतन, मनन, और दोहन के फल स्वरूप जो कुछ भी सार हम पा लेते हैं, उसी को भविष्य की दुनिया के लिए एकत्र करके दे देना यह सबसे बड़ा कर्तव्य, पुरुषार्थ हो जाता है। शांति, समाधान, संतोष, प्रसन्नता और सर्वतोभद्रता यही होना चाहिए उस अवस्था का वायु मंडल। ऐसी अवस्था प्राप्त होने पर जीवन स्वामी जगदीश्वर के प्रति कृतज्ञता का भाव हृदय में उदय होता है और ऐसी कृतज्ञता के कारण प्रसन्नता बढ़ती है तथा पाया हुआ जीवन का सार सर्वस्व घनिष्ठ होता है। इस संसार से बिदा होने की यह कितनी सुँदर तैयारी है।
संतुलन को समत्व भी कहते हैं। इस प्रकार मानसिक संतुलन प्रकाराँतर से गीता में बतलायी समत्व की ही भावना है साँसारिक पदार्थों में प्रवृत्ति की हममें जितनी शक्ति होती है, उतनी ही जब उनसे निवृत्त होने की भी शक्ति होती है, तो उस अवस्था को संतुलित और समत्व की अवस्था कह सकते हैं।
इस समत्व को आचरण में उतारने के लिए केवल विरागी अथवा रागहीन होने से ही कार्य न चलेगा। संतुलित अवस्था तो तब होगी, जब रागहीन होने के साथ-साथ द्वेषहीन भी हुआ जाय। अपने देश के तथाकथित साधुओं ने यहीं भूल की। वे होने के लिए तो विरागी हो गये, पर साथ-साथ अद्वेष्ट न हुए। राग से बचने की धुन में उन्होंने द्वेष को अपना लिया। संसार के सुख-दुख से संबद्ध न होने की चाह में उन्होंने संसार से अपना संबंध विच्छेद कर लिया और उसकी सेवाओं से अपना मुख मोड़ लिया।
जब दो गुण ऐसे होते हैं, जो परस्पर विपरीत दिशाओं में प्रवृत्त करते हैं, तो उनके पारस्परिक संयोग से चित्त की जो अवस्था होती है, उसे भी संतुलित अवस्था कहते हैं। दया मनुष्य को दूसरों का दुःख दूर कराने में प्रवृत्त कराती है, पर निर्मोह या निर्ममत्व मनुष्य को दूसरों के सुख-दुःख से संबंधित होने से पीछे हटाता है। अतएव दया और निर्ममत्व दोनों के एक बराबर होने से चित्त संतुलित होता है। जहाँ दया मनुष्य को अनुरक्त करती है, वहाँ निर्ममरा विरक्त। दया में प्रवृत्तात्मक और निर्ममता में निवृत्तात्मक शक्ति है। उसी तरह संतोष और श्रमशीलता एक-दूसरे को संतुलित करते हैं। परिश्रमशीलता में प्रवृत्तात्मक और संतोष में निवृत्तात्मक शक्ति है। उसी तरह सत्यता और मृदुभाषिता, सरलता और दृढ़ता, विनय और निर्भीकता, नम्रता और तेज, सेवा और अनासक्ति, शुचिता और घृणा, स्वतंत्रता और उत्तरदायित्व, तितिक्षा और आत्मरक्षा, दीर्घसूत्रता और आलस्यहीनता, अपरिग्रह और परिग्रह, शक्ति परस्पर एक दूसरे को संतुलित करते हैं। इन युग्मों में से यदि केवल एक का ही विकास हो और दूसरे के विकास की ओर ध्यान न दिया जाय, तो मनुष्य का व्यक्तित्व असंतुलित एवं एकाँगी हो जाएगा। श्रद्धालु व्यक्ति में श्रद्धेय के अनुगमन करने तथा उसके द्वारा निर्दिष्ट मार्ग पर चलने की प्रवृत्ति होती है। स्वतंत्रता प्राप्त व्यक्ति पर अंकुश न होने से उसमें निरंकुशता और उच्छृंखलता बढ़ सकती है। दृढ़ प्रकृति व्यक्ति में हठ करने की प्रवृत्ति हो सकती है। प्रभुत्वशाली व्यक्ति में अभिमान बढ़ सकता है, इत्यादि। अतः जब तक इन व्यक्तियों में क्रमशः आत्म निर्भरता, उत्तरदायित्व, हठहीनता और निरभिमानता का विकास न होगा, तब तक पूर्वोक्त गुण अपनी-अपनी सीमा के भीतर न रहेंगे। अस्तु उपरोक्त युग्मों में से प्रत्येक गुण एक-दूसरे को मर्यादित करते हैं और एक-दूसरे का पूरक है।
इसी बात को कवि दिनकर ने दूसरे ढंग से यों कहा है-
क्षमा शोभती उस भुजंग को, जिसके पास गरल हो। किंतु उसे क्या ? जो दंतहीन, विषहीन विनीत सरल हो।
परोक्ष रूप में उनने भी यही स्वीकार है कि दो विपरीत गुण साथ-साथ होने चाहिए। पराक्रम के साथ व्यक्ति में दयालुता, क्षमाशीलता के गुण न हों, तो वह अत्याचार ही बरतेगा। इसके विपरीत शालीन-सज्जनों में सहकारिता का अभाव हो, तो वह कायर कहलायेगा और बलवानों की यंत्रणा का शिकार बनेगा। पराक्रम सदा क्षमाशीलता के कारण शोभा पाता है जबकि साहसिकता की प्रशंसा शालीनता में निहित है।
जब मनुष्य में दंड की सामर्थ्य रहते हुए भी अपमान सहन करने की क्षमता होती है, जब वह अहिंसा व्रत पालते हुए भी अपराधियों को अधिकाधिक उच्छृंखल, उद्धत, अभिमानी और निष्ठुर नहीं बनने देता, जब वह सेवाव्रती होते हुए भी सेव्यजनों को आलसी, परमुखापेक्षी और अकर्मण्य नहीं होने देता, जब वह क्रोध में होते हुए भी अनुशासन और नियंत्रण बनाए रखना जानता है, जब उसमें भक्ति और उत्साह होते हुए भी दास-वृत्ति और उतावलापन नहीं होता, जब वह सफलता में विश्वास रखने हुए भी कार्य करने में लापरवाही नहीं करता, जब वह मान-सम्मान की परवाह न करते हुए भी लोक कल्याण करने वाले शुभ कर्मों के करने में पूर्ण उत्साही होता है, जब वह अपमान से दुखी न होते हुए भी अपमान जनक कार्य न करने का संयमी एवं आत्मनिग्रही होता है, जब वह किसी कार्य में प्रवृत्त होने के साथ-साथ उससे निवृत्त भी हो सकता है, तब उसके चरित्र और गुणावलियों में संतुलन आता है।
जब दो विचारधाराएँ मनुष्य से भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में कार्य कराती हैं, तब उनके समन्वय से जो स्थिति होती है, उसे संतुलित विचारधारा कहते हैं। आत्म सुख की भावना बहुधा मनुष्य को स्वार्थमय कर्मों में प्रवृत्त करती है और लोक सुख की भावना लोककल्याण के कार्यों में। अतएव आत्म सुख और लोक सुख दो विभिन्न दृष्टिकोण हुए। इनके समन्वय से जो मध्यम स्थिति उत्पन्न होती है, वही संतुलित विचार पद्धति है। उसी प्रकार जिसकी विचारधारा में पूर्व और पश्चिम के आदर्शों का समन्वय, भौतिकवाद और अध्यात्मवाद का समन्वय, आदर्श और यथार्थ का समन्वय हुआ है और जो मध्यम मार्ग को अपनाये हुए हैं, उसी की विचारधारा संतुलित है।
जब हम किसी एक ही कार्य के पीछे पड़ जाते हैं, अथवा जब हम किसी कार्य में अति करने के कारण दूसरे करणीय कार्यों को भूल जाते हैं, तब हमारी कार्य पद्धति असंतुलित होती हैं। यदि हम एकदम धन कमाने के पीछे पड़ जायँ अथवा यदि हम केवल पढ़ने-पढ़ाने में ही अपना सारा समय बिताने लगें, तो हमारी कार्य पद्धति असंतुलित होगी। यदि कोई विद्यार्थी अपने हस्तलेखन की केवल गति ही बढ़ाने पर ध्यान दे और अक्षरों की सुँदरता पर विचार न करें, तो उसके प्रयास पर तरस ही आयेगी। उसी प्रकार यदि किसी देश में कोई ऐसा आयोजन हो कि केवल शिक्षा की गुणवत्ता या उसकी उत्कृष्टता पर ही एकमात्र लक्ष्य हो और इस बात का ध्यान न हो कि शिक्षा अधिक-से-अधिक संख्या के लोगों को उपलब्ध हो सके, तो उस देश के शिक्षा-शास्त्रियों की कार्यपद्धति असंतुलित ही कही जायेगी। यही बात मानव जीवन पर भी घटित होती है। हमें केवल एक ही दिशा में घुड़दौड़ नहीं मचानी चाहिए, वरन् सब दिशाओं में समुचित विकास करते हुए मानसिक संतुलन को बनाए रखना चाहिए, तभी हम एक संतुलित दृष्टि से विकसित समाज का दिग्दर्शन कर सकेंगे।
हमारी प्राचीन-शास्त्रकारों तथा नीतिकारों ने जगह-जगह इस बात पर जोर दिया है कि किसी भी काम में ‘अति’ नहीं करनी चाहिए। यह नियम बुरी बातों पर ही नहीं अनेक अच्छी बातों पर भी लागू होता है। जैसे कहा गया है कि अति दानवृत्ति के कारण बलि को पाताल में बँधना पड़ा। संभव है कि कुछ विशिष्ट आत्माओं के लिए, जो किसी असाधारण उद्देश्य की पूर्ति के लिए पृथ्वी पर अवतीर्ण होती है, यह नियम आवश्यक न माना जाय, पर सर्वसाधारण के लिए सदैव मध्यम मार्ग-संतुलित जीवन का नियम ही उचित सिद्ध होता है।
भगवान बुद्ध ने “मंझम मग्न” का मध्यम मार्ग का आचरण करने के लिए सर्वसाधारण को उपदेश किया है। बहुत तेज दौड़ने वाले जल्दी थक जाते हैं। और बहुत धीरे चलने वाले अभीष्ट लक्ष्य तक पहुँचने में पिछड़ जाते हैं। जो मध्यम गति से चलता है, वह बिना थके, बिना पिछड़े उचित समय पर अपने गंतव्य स्थान तक पहुँच जाता है।
मन के संबंध में भी यही बात लागू होती है। उसमें भी मध्यम स्थिति-संतुलित-अवस्था का सदा ध्यान रखना पड़ता है, तभी व्यक्तित्व की साम्यावस्था प्राप्त की जा सकती है। मानसिक क्रियाओं को प्रायः तीन भागों में विभाजित किया गया है-(1) भावना (2) विचार (3) क्रिया। ऐसे बहुत कम व्यक्ति हैं, जिनमें उपरोक्त तीनों क्रियाओं का पूर्ण सामंजस्य, पूर्ण संतुलन हो। किसी में भावना का अंश अधिक है तो वह भावुकता से भरा है, आवेशों का विचार रहता है। उसकी कमजोरी अति संवेदनशीलता है। वह जरासी भावना को तिल का ताड़ बनाकर देखता है।
विचार प्रधान व्यक्ति दर्शन की गूढ़ गुत्थियों में ही डूबते-उतराते रहते हैं। नाना कल्पनाएँ उनके मानस क्षितिज पर उदित और अस्त होती रहती है, योजनाएँ बनाने का काम तो वे खूब करते हैं, पर असली काम के नाम पर वे शून्य हैं।
तीसरे प्रकार के व्यक्ति सोचते कम हैं, भावना में नहीं बहते, पर काम खूब करते रहते हैं। इन कार्यों में कुछ ऐसे भी काम वे कर डालते हैं, जिनकी आवश्यकता नहीं होती तथा जिनके बिना भी उनका काम चल सकता है।
पूर्ण संतुलित वही व्यक्ति है, जिसमें भावना, विचार, तथा कार्य-इन तीनों ही तत्वों का पूर्ण सामंजस्य हो। ऐसा व्यक्ति मानसिक दृष्टि से पूर्ण स्वस्थ माना जाता है।
हमें चाहिए कि हम ‘अति’ से अपनी रक्षा करें और इस प्रकार असंतुलन से बचे रहें। तात्पर्य यह कि अति भावुकता में आकार ऐसा कुछ न कह डालें, ऐसे वायदे न कर बैठें, जिन्हें बाद में पूर्ण न कर सकें। इतने विचार प्रधान भी न बन जायँ कि संपूर्ण समय सोचते-विचारते, चिंतन करते-करते ही व्यतीत हो जाय। विचार करना उचित है, किंतु विचारों ही में निरंतर डूबे रहना और कार्य न करना, हमें मानसिक रूप से आलसी बना डालेगा। इसी प्रकार दो विरोधी गुणों में से किसी एक को जीवन में इतना प्रश्रय न दिया जाय कि व्यक्तित्व एकमुखी और एकाँगी बन जाय। यह भी असंतुलन दर्शाता है। संतुलित अवस्था वह है, जिसमें दोनों गुणों का पूर्ण विकास हो।
श्रीराम कृष्ण परमहंस शिष्यों को उपदेश दे रहे थे। वे समझा रहे थे कि जीवन में आये अवसरों को व्यक्ति साहस तथा ज्ञान की कमी के कारण खो देते हैं। अज्ञान के कारण उस अवसर का महत्व नहीं समझ पाते। शिष्यों की समझ में यह बात ठीक ढंग से न आ सकी। तब श्रीरामकृष्ण परमहंस बोले अच्छा-नरेन्द्र कल्पना कर तू एक मक्खी है। सामने एक कटोरे में अमृत भरा है। तुझे पता है यह अमृत है, बता उसमें एकदम कूदेगा या किनारे बैठकर स्पर्श करने का प्रयास करेगा।
उत्तर मिला “किनारे बैठकर चखने का प्रयास करूंगा। बीच में कूद पड़ने से तो जीवन अस्तित्व ही संकट में पड़ जायेगा।” साथियों ने नरेन्द्र की विचार-शीलता को सराहा। किंतु परमहंस जी मुसकराये और बोले।”अरे मूर्ख ! जिसके स्पर्श से तू अमरता की बात करता है। उसके बीच में कूदकर भला मृत्यु भय कैसा” बात स्पष्ट हो गई।
अध्यात्म साधना में दिव्य-शक्तियों के उन्नयन के लिए विविध विधि तपश्चर्या को प्रमुखता दी गयी है। लौकिक जीवन हो या आध्यात्मिक-पुरुषार्थ, श्रम, साहस, मनोयोग ही प्रगतिशील बनाते हैं। तप ही संपूर्ण प्रगति का आधार है। देवताओं के वरदान तपस्वियों को ही सुलभ होते हैं। मनुष्य की अंतर्निहित शक्तियाँ तपस्या द्वारा ही प्रकाशित होती हैं। समुद्र में भरे रत्न गोताखोर ही ढूँढ़ पाते हैं। कठोर पुरुषार्थ द्वारा समुद्र मंथन किया गया, तभी अमूल्य चौदह रत्न प्राप्त हो सके। देवताओं को तपस्या द्वारा ही गौरवशाली पद प्राप्त हुए। भौतिक उन्नति के लिए प्रचंड पुरुषार्थ, अखंड मनोयोग, अनवरत श्रम और असीम साहस की आवश्यकता है। आध्यात्मिक प्रगति के लिए तो और भी अधिक मूल्य चुकाना ही पड़ता है। भारतीय धर्मशास्त्र एवं पुराणों में असंख्य आख्यान तप साधना की महत्ता के भरे पड़े हैं। ऐतिहासिक महामानवों, ऋषियों, तत्वदर्शियों, देवदूतों की प्रसिद्धि और सिद्धि का आधार तप का प्रकाश ही रहा है। तप द्वारा ही आध्यात्मिक शक्तियाँ और सिद्धियाँ आज तक उपलब्ध होती आई हैं और भविष्य में भी वही एकमेव मार्ग रहने वाला है।
पार्वती ने शिव को पति रूप में वरण करने के लिए कठोर तप किया था। सौर-मंडलों का केन्द्र बिंदु बनने के लिए ध्रुव द्वारा की गयी तपस्या प्रख्यात है। च्यवन पत्नी सुकन्या ने तप करके अश्विनी कुमारों को प्रसन्न किया था और उनने आकर उन्हें वृद्धावस्था तथा नेत्रान्धता से मुक्ति दिलाई थी। ऋषियों में से प्रत्येक को तपस्यारत रहना पड़ा है और उसी से उपलब्ध सामर्थ्य द्वारा लोकहित के अनेक प्रयोजनों को सफल बना सकना संभव किया है। इसी क्षेत्र में समुन्नत स्तर के लोग देवता बने हैं। इससे पूर्व वे भी सामान्य स्तर के मनुष्य ही थे।
दैत्यों की विकराल शक्तियों का स्रोत भी तप−साधना ही रहा है। वे अपने अंतराल को उत्कृष्ट न बना सके और भौतिक स्तर की महत्वाकांक्षाएं सँजोये रहे। उनके तद्नुरूप ही वरदान पाये और अपने पुरुषार्थों के निमित्त अभीष्ट वरदान पाये। इस वर्ग के रावण, कुँभकरण, हिरण्यकशिपु, वृत्रासुर, महिषासुर आदि के नाम प्रसिद्ध हैं। शक्तियाँ उनमें भी अकूत थीं, पर चूक दिशा निर्धारण में हुई। फलतः भस्मासुर जैसे दैत्य वरदान देने वाले शिव-पार्वती पर ही अपना जोर आजमाने लगे। दुर्वासा तपस्वियों में अग्रणी थे, परन्तु क्रोध पर संयम न रख पाने के कारण अंबरीष, शकुन्तला आदि को तनिक-तनिक सी बातों पर शाप देते फिर फलतः उनकी तपस्या निरर्थक ही नहीं गयी, किंतु बदनाम भी होती रही।
मानवी सत्ता में बीज रूप से सभी उच्चस्तरीय शक्ति स्रोतों का समावेश है। तपश्चर्या द्वारा उन्हीं को बीज से वृक्ष बनने जैसी सफलतायें उपलब्ध होती हैं। विद्युत उत्पादन के यंत्र-जनरेटर ही शक्ति का उत्पादन करते हैं। उन्हीं के द्वारा अनेक भले-बुरे प्रयोजन सिद्ध होते हैं। बिजली की शक्ति से ही ट्यूबवैल चलते और हजारों हेक्टेयर जमीन सींचते हैं। वहीं बिजली श्मशान घाटों में बने विद्युत शवदाहों द्वारा मुर्दों का भी मिनटों में दाह-संस्कार कर देती है। तार लीक करने लगे तो अग्निकाँड होने तथा छू जाने पर प्राण घातक झटका लगने का भी डर रहता है।
शक्ति स्रोत यों ब्रह्माँडव्यापी भी हैं, पर उनका निकटतम माध्यम अपने भीतर ही है। जिस दैवी या दानवी शक्ति को बलिष्ठ बनाना होता है, उसके लिए अन्यत्र भागने की जरूरत नहीं पड़ती। अपने ही खेत में उसे उगाना पड़ता है। दूरवर्ती कहीं अन्यत्र बीज बोने पर न तो उसकी देखभाल हो पाती है और न उस पर अपना पूर्ण अधिकार ही बनता है। अपने खेत में उगाई और अपने द्वारा सींची फसल ही अपने गोदाम भरती है। तपस्या का सीधा सा अर्थ इतना ही है कि ब्रह्माँडव्यापी महान क्षमताओं में से जिसे विकसित करना हो उसे अपने अंतराल में ढूँढ़ा, कुरेदा, और जगाया जाय। अपने ही अधिकार क्षेत्र को निकालते हैं, उन पर अपना अधिकार होता है। अन्यत्र भी वे खदानें हो सकती हैं, पर उन पर अपना अधिकार कहाँ बनता है ? अपने ही कुएँ के पानी से जिंदगी काटती है। बाहर की प्याऊ पर तो कभी-कभी ही प्यास बुझती है।
देखने में मानवी काया हाड़-माँस का मल मूत्र का पोटला मात्र है। उसके अवयवों का सारतत्व निकाला जाय तो कैल्शियम, पोटैशियम, लोहा, फास्फोरस, चर्बी, पानी आदि का मूल्य इस महंगाई के जमाने में चार-छः रुपये बैठता है। जबकि मरे जानवरों का ढाँचा ही सौ रुपये के लगभग का मसाला दे जाता है। प्रत्यक्षतः मनुष्य कोल्हू के बैल की तरह चलता, गधे की तरह लदता हुआ रोता-रुलाता मौत के दिन पूरे करता है। पेट की भूख और प्रजनन की सनक पूरी करते रहना ही मुश्किल से बन पाता है। इतना होते हुए भी यदि गहराई में उतरा जाय तो गाँधी जी जैसे 96 पौण्ड भारी और पाँच फुट दो इंच ऊँचे दुर्बलकाय व्यक्ति भी लाखों व्यक्ति उत्पन्न कर सकते हैं और ब्रिटिश गवर्नमेंट जैसे शक्तिशाली से टक्कर मारकर उसे पलायन करने के लिए विवश कर सकते हैं। विनोबा जैसा व्यक्ति भूदान से लाखों एकड़ भूमि उपलब्ध कर सकते हैं और सर्वोदय आँदोलन को कहीं से कहीं पहुँचा सकते हैं। यह उनकी अंतरंग क्षमताओं का प्रभाव है। शारीरिक या आर्थिक दृष्टि से तो वे गये-गुजरे लोगों की श्रेणी में ही आते हैं। उनने अंतराल में समाहित अभूत निर्झरों को खीजा और चरम सीमा के प्रभावशाली बन गये।
मानवी सत्ता इतनी रहस्यमयी है कि उसे भली-भाँति समझ पाना अति कठिन है। महाभारत में महर्षि व्यास ने एक अत्यंत गुप्त रहस्य प्रकट करते हुए लिखा है-गुह्यंबूत्यातददं ब्रवीमि। नहि श्रेष्ठतरं हि किंचित। अर्थात् एक गुप्त रहस्य बताता हूँ कि मनुष्य से बढ़कर इस संसार में और कुछ नहीं है। जिन देवताओं से मनुष्य तरह-तरह के वरदान पाने की मनुहार करता है, वे वस्तुतः ईश्वर का अविनाशी अंश होने के कारण उसकी आत्मा के इसी देव मंदिर में बीज रूप में विद्यमान हैं। शिव-संहिता 219-2 में उल्लेख है-’इसी शरीर में सप्त द्वीपों सहित सुमेरु पर्वत, नदियाँ, पर्वत शिखर, क्षेत्र, क्षेत्रपाल, ऋषि-मुनि, समस्त गृह-नक्षत्र, पुण्य तीर्थ, पीठ और उन पीठों के देवता सभी विद्यमान हैं। आत्म सत्ता में सन्निहित-विश्व ब्रह्माँड की इन समस्त विभूतियों को यदि योग और तप साधना द्वारा जगाया जा सके तो जीवात्मा को देवात्मा और परमात्मा बनने का अवसर मिल सकता है।
संसार के महामानवों ने अपने व्यक्तित्व का विज्ञान पक्ष विकसित किया है। प्रामाणिक और मनस्वी बने हैं और ऐसे कामों में हाथ डाला है जिनके साथ लोक मंगल की संभावना सुनिश्चित रूप से जुड़ी हुई रही है। इन्हीं कारणों से उनकी प्रतिभा का उत्कृष्ट स्तर उभरा और अगणित जनों का विश्वास, स्नेह, सहयोग प्राप्त करके इतने महत्वपूर्ण कार्य कर सके जिन्हें अति मानवी कहकर आश्चर्य किया जाता है।
यह जीवन साधना की बहिरंग और दृश्यमान तपश्चर्या हुई। इससे गहरी और अगली दूसरी है। इसमें अंतरंग के शक्ति स्रोतों को अंतर्मुखी होकर खोजना पड़ता है और उस क्षेत्र में दबे हुए देव वैभव को उसी प्रकार ढूँढ़ निकाला जाता है जैसे कोयला खदानों से हीरे, गहरे समुद्र से मोती एवं गहरी बोरिंग करके खनिज तेलों को ऊपर खींच निकाला जाता है। यह अपनी अनोखी वैज्ञानिक प्रक्रिया है। आत्म विज्ञान के इन स्रोतों को कोई बिरले ही जानते हैं कि अपने भीतर कितनी प्रचंड चेतन क्षमता भरी पड़ी है। उनकी चर्चा तो षट्चक्र बेधन, पंचकोश, अनावरण, कुँडलिनी, जागरण सहस्रार-विकिरण एवं ऋषियों के रूप में विवेचन होता रहता है। अतीन्द्रिय क्षमताओं और अलौकिक शाप-वरदान जैसे कृत्यों का ऊहापोह भी उसी संदर्भ में होता रहता है।
तपस्या का प्रसंग इससे भी ऊँचा है। उसमें अदृश्य शक्तियों को प्रत्यक्ष देव रूप में सामने प्रकट होने के लिए बाधित किया जाता है और उनके मुँह से वरदान माँगने के लिए कहलाया जाता है। मनोरथ प्रकट करने पर ‘तथास्तु’ ऐसा ही हो कहने के अतिरिक्त और कोई चारा नहीं रहता। उन्हें ऐसे वरदान भी देने पड़ते हैं जो उनकी इच्छा पर नहीं, साधक की कामना के अनुरूप होते हैं। तपस्या का यह प्रभाव इतिहास पुराणों के पन्ने-पन्ने पर अंकित देखा जा सकता है।
भगवान सबसे बड़े हैं, पर स्वयंभू मनु और शतरूपा रानी ने तप करके भगवान को अपनी गोदी में खेलने वाला बच्चा देखने की इच्छा की और उसे पूर्ण करने में सफलता पायी। ब्रह्मा जी ने तप करके गायत्री और सावित्री को आत्मिकी और भौतिकी को अपनी सहचरी बनाने में सफलता प्राप्त की और सृष्टि संरचना में समर्थ हुए। सूर्य तपता है और अपनी संपदा से प्राणि समुदाय को सौरमंडल के सदस्यों को चेतना एवं गति प्रदान करता है। शिव कैलाश शिखर पर बैठकर, विष्णु शेष शैय्या पर आसन जमाकर क्या करते रहते हैं ? इसे तत्वज्ञानी एक शब्द में कह सकते हैं कि- ’तप’। इसी आधार पर सृष्टि की उत्पादन, अभिवर्धन और परिवर्धन की कार्यपद्धति अपने क्रम से चलती है।
विश्वामित्र आजीवन तपस्यारत रहे। उनकी तपश्चर्या का एक प्रयोजन नयी दुनिया का निर्माण भी था। हरिश्चंद्र को उन्होंने उसी के लिए साधन जुटाने का आदेश दिया था। भगीरथ की तपस्या धरती की प्यास बुझाने और नरक में जलते पितरों का उद्धार करने के लिए थी। दधीचि ने अपने अस्थियों को वज्र बना सकने योग्य बनाने में समर्थ करने के लिए कठोर तप किया था। भगवान बुद्ध और भगवान महावीर के आँदोलन परक कार्यक्रम ही नहीं थे, उसे सफल बनाने के लिए उन्होंने व्यक्तिगत जीवन में कठोर तपश्चर्याएं भी की थीं।
तपश्चर्या निजी लाभ और ख्याति के लिए भी हो सकती है और उदात्त दृष्टिकोण को अपनाकर लोककल्याण एवं सामयिक समस्याओं के समाधान के लिए भी। इसका पुरातन इतिहास तो है ही, साथ ही आधुनिक सच्चे योगाभ्यासियों का भी एक बड़ा समुदाय अपनी इन्हीं आँखों के सामने से गुजरा है। पांडिचेरी के अरविंद घोष की तपश्चर्या ऐसी ही थी। वे देश को स्वतंत्र देखना चाहते थे। इसके लिए छात्रावस्था से लेकर राजाओं का दरवाजा खटखटाने और नेशनल कालेज में विद्यार्थी बुलाने से लेकर बम पार्टी गठित करने तक के कार्यों से जब कुछ बात बनती न दीखी तो वे एकाँत साधना में तल्लीन हो गये और वातावरण को इतना गरम कर दिया कि उन्हीं दिनों एक से बढ़कर एक महामानव प्रचंड चक्रवातों की तरह उत्पन्न हुए और उन्होंने वह कर दिखाया जो अद्भुत और अनुपम था। प्रसिद्ध नेताओं में अनेकों नाम हैं, पर वैसे न तो इसके पहले उत्पन्न हुए थे और न पीछे ही विनिर्मित खड़े हो पाये हैं। अरविंद की तरह ही महर्षि रमण की तपश्चर्या भी थी जिसने सारे देश के जन समुदाय को और विदेशी मूर्धन्यों को भी प्रभावित किया। चाणक्य, समर्थ गुरु रामदास, कबीर जैसे महामानवों के शिष्यों की कृतियाँ या उनके जीवन की घटनायें ही लोगों को मालूम हैं। यह बात विरलों को ही ज्ञात है कि देश का कायाकल्प करने के लिए निजी जीवन में उनने क्या-क्या कठिन तपस्यायें की थीं।
निश्चय ही तप की महिमा और महत्ता विलक्षण और अद्वितीय है। यही वह आधार है जिसका आश्रय लेकर मनुष्य नर से नारायण बनता है। पुरुष से पुरुषोत्तम और आत्मा से परमात्मा बनने का यही मार्ग है।
‘यह प्रयाग जाना चाहता है’ उस स्त्री से जो एक साथ महाराज के चरणों में मस्तक रखा। यह कुबड़ा, जो मेरी सहायता के बिना खाट से उठ भी नहीं पाता और मेरे दो छोटे बच्चे हैं। मैं उन्हें किस पर छोड़ जाऊँ ? कौन पालन करेगा उनका ? वह रो रही थी। हिचकियाँ बँध गई थी उसकी।
उस स्त्री का पति एक लाठी के सहारे दूर खड़ा था कमर झुकाए। उसके नेत्रों में जल था और थी अपार श्रद्धा। वह अपनी स्त्री की भाँति धृष्ट नहीं था, जो भक्त मंडली को चीरती महाराज तक चली गयी थी। उसने सबके पीछे बड़े कष्ट से बैठकर पृथ्वी पर सिर रखा था और फिर किसी प्रकार लाठी पर बल देकर खड़ा हो गया था।
उसे कूबड़ है। सीधा खड़े होने में असमर्थ है। पैर के घुटनों और कमर में गठिया का भयंकर दर्द है। प्रातः जब पत्नी उसकी कमर और पैर कुछ देर तक दबाती है, तब कहीं घंटे, डेढ़ घंटे दिन चढ़े किसी प्रकार उठ पाता है। स्त्री जितनी ही वाणी की तेज है, उतनी ही सेवा परायण भी। हृदय स्वच्छ है उसका। जो मुँह में आवे, बड़बड़ाती रहती है, किंतु यदि किसी दिन दर्द बढ़ जाए, वह चीखने लगे तो रात दिन एक कर देती है। गाँव के सारे वैद्यों, वृद्धों, के घर दौड़ आती है। कभी तेल मलती है, कभी सेंकती है और जब कुछ वश नहीं चलता तो उसके पैरों पर सिर रखकर फूट-फूट कर रोती है। वह समझाती है, और उस समय भी खरी, खोटी सुनाने से बाज नहीं आती। ‘तूने ही तो दही खाली, तूने मना करने पर चोरी से मूली खायी होगी। जरूर कुछ खाया होगा। बड़ा चटोरा है तू ! तू मुझे मार डालेगा।’ वह रोती भी जाती है। पति की शपथों पर उसे विश्वास नहीं।
थोड़ी सी उसकी जमीन है। किसी न किसी मजदूर को लेकर स्त्री खेतों में लगी रहती है। मूली-गोभी, कुम्हड़े, लौकी कोई न कोई शाक-भाजी उसके खेत में बारहों महीने मिल जाती है। पति के बदन की मालिश करके चौँक बरतन, रसोई बच्चों की देखभाल और पति को स्नानादि कराके भी वह खेतों के लिए समय निकाल लेती है। मजदूरों को डाँट फटकार बकती है। वही एक ऐसी सब्जी वाली है जो शाम को नगर में सब्जी बेचने जाती है और चिराग जले लौटती है। बिक्री के पैसे उसने कभी अपने पास नहीं रखे। आते ही पति को गिना देती है। माँग लेती है उससे व्यय की आवश्यकता पड़ने पर। हिसाब माँगना उसे नहीं आता, वैसे पति के पास पैसे न होने से वह अस्वीकार करे माँगने पर तो झगड़ भी लेती है। उसे चटोरा कहकर डाँट भी देती है। गाँव में प्रसिद्ध झगड़ालू है। किसी ने उसके खेत में पैर रखा, किसी की गाय या बकरी बाड़ के समीप पहुँची, आसमान सिर पर उठा लेगी।
‘एक बार प्रयाग जी में गंगा-यमुना में गोता लगा लूँ।’ कुबड़े को बहुत दिनों से धुन है। वह जब इसकी चर्चा करती है, पत्नी रोते-रोते आँख लाल कर लेती है। खूब खरी-खोटी सुनाती है उसे ‘जीवन सफल हो जाय। फिर मर भी तो क्या हानि।’ उसने धीरे-धीरे पचास रुपये एकत्र कर लिए हैं। अब वह रुक नहीं सकता। गाँव का लल्लू नाई जा रहा है। झम्मन कहार जा रहा है। अलगू पाँडे जा रहे हैं। वह उनके साथ अवश्य जाएगा। उसने पत्नी को यहाँ तक कह दिया कि वह अपनी कमाई के रुपये न ले जाने देना चाहे तो ये पचास रुपये भी ले ले। वह माँगता चला जायेगा लेकिन इस साल तो वह जाकर रहेगा।
‘मर जायेगा यह रोगी कुबड़ा उसकी सेवा के बिना। वह अपने छोटे बच्चों, खेत-बारी को छोड़कर कैसे जाय ? कौन देखेगा, यह सब ? बच्चे बिलबिलायेंगे। खेत नष्ट हो जायेगा।’ जब कई दिन लगातार रोने और झगड़ने का भी पति पर प्रभाव न हुआ तो किसी प्रकार समझा बुझाकर वह उसे एकनाथ महाराज के पास लायी । ‘महाराज समर्थ योगी हैं। उन्होंने गंगोत्री से रामेश्वर पर चढ़ाने के लिए लाये जाने वाले जल को प्यासे गधे को पिला दिया। वहीं पर भगवान रामेश्वर प्रकट हो गये। हो सकता है वह दया करें तो इसे किसी प्रकार रोक दें। कुछ समझा दें या उसकी बुद्धि बदल दें।
‘एकनाथ महाराज को भी पता नहीं क्या सूझी उस दिन। वे महात्मा हैं, साधु हैं। उन्हें चाहिए तो था कि समझा-बुझाकर पति को तीर्थ भेजने पर इसको राजी कर देते। उन्होंने तो उसे अपने पास रख लिया। भला यह भी कोई आज्ञा है-एक मास तक यहाँ आना मत। उन्होंने सोचा होगा, अच्छा मजदूर मिला। एक महीने तो बिना मजदूरी दिए रोटी पर काम करा लो। वह नहीं मानेगी इस आज्ञा को। पता नहीं उसके रोगी पति को वहाँ क्या-क्या करना पड़ता होगा। कितना कष्ट होगा उसे। वह देख आये तो क्या हानि ? नित्य वह जाने का संकल्प करती है। जा नहीं पाती। ‘कहीं पति का कोई अकल्याण न हो।’
रात दिन सोचा करती है वह पति के विषय में । ‘पता नहीं क्या करता होगा ? कौन सबेरे उसकी टाँग’ और कमर मलता होगा ? कौन देता होगा उसे नहाने का गर्म जल ? पता नहीं उसे भर पेट भोजन भी मिलता होगा या नहीं बड़ा चटोरा है वह । बिना भाजी के रोटी नहीं उतरती उसके गले के नीचे। और से भी ज्यादा लजीला है। मुझसे ही कुछ नहीं माँगता था तो वहाँ किससे माँगेगा। सोने को खाट भी तो नहीं मिलती होगी उसे।’ रात में जब बच्चे सो जाते हैं, वह खाट पर पड़े-पड़े रोया करती है।
पता नहीं उसे क्या सूझा था कि एकनाथ महाराज के पास ले गयी थी उसे। वह प्रयाग ही तो जाना चाहता कोई बुरा काम तो नहीं करना चाहता। उसी के बहाने गोता लगाने को मिल जायेगा गंगा जी में। ठीक ही तो कहता है, वह जीवन का क्या ठिकाना। उसकी एक लालसा को भी पूरी नहीं कर सकती वह। व्यर्थ है उसका पत्नी होना।’ अपने दुःख का पार नहीं पाती वह आजकल।
वह पता लगाती रहती है कि गाँव से कौन कब पैठण जा रहा है। जाने से पहले वह खूब समझा देती है कि दया करके उसके पति का समाचार वह अवश्य लावे। जाने वाले के घर एक टोकरी बैंगन या सेम पहुँचा आती है। उमड़ पड़ती है उसकी उदारता। महाराज के लिए छाँट-छाँट कर फूल गोभी के भेजती है और प्रार्थना करने को बार-बार सचेत करती है जाने वाले को कि महाराज उसके रोगी पति पर दया रखें। ध्यान रखें उसका। बड़ा शर्मीला है उसका पति।
‘वह कहता ही नहीं। कष्ट उसे होगा ही। प्रत्येक लौटने वाले से संदेश-समाचार सुनते जाती है। उसे कभी इस बात पर विश्वास नहीं होता कि उसका पति बहुत प्रसन्न है। महाराज की उस पर बड़ी कृपा है। मोटा हो गया है वह पहले से। उसे लगता है यात्री उसका उपहास करते हैं या उसका पति उसे बहलाने के लिए अथवा संकोचवश झूठे समाचार भेजता है।
एक महीना जैसे एक युग की तरह बीता। एक महीना पूरा होने पर गोभी-मटर का बड़ा सा टोकरा लिए श्री एकनाथ महाराज के चरणों में लायी थी। टोकरा सामने रख महाराज के सामने पृथ्वी पर सिर रखा उसने। अब तू प्रयाग चला जाने दे इसे। आशीष के स्वरों में महाराज ने पास खड़े उसके पति की ओर देखकर हँसते हुए कहा।
मैं भी तो जाऊँगी प्रभु !’ कहने को तो कह दिया। किन्तु पति की ओर दृष्टि पड़ते ही हक्की-बक्की हो गयी। उसका कुबड़ा पति सीधे खड़ा है। कूबड़ का पता नहीं और बड़ा स्वस्थ प्रसन्न लगता है वह। वह मूर्ति की भाँति गुम-सुम देखती रही। नेत्रों के प्रवाह ही कहते थे कि वह आनंद के आवेग में मरी नहीं-जीवित है अभी।
उसके पति ने एकनाथ महाराज के चरणों पर मस्तक रखा और तब उसने भी अपने को सँभाल कर फिर सिर टेका पृथ्वी पर पति के साथ ही।
अच्छा तो है, अब तुम दोनोँ तीर्थ कर आओ ! ‘महाराज ने हँसते हुए आदेश दिया।’
‘मेरा प्रयाग तो गुरु चरणों में है। पुरुष ने दोनों पैर पकड़े संत के। जो सब समय और सब कहीं श्रद्धालु शिष्य को सुलभ हैं। मैं अब इन्हें ले जाकर एक अपने घर को पवित्र किये बिना नहीं मानता।’ बड़ा श्रद्धा भरा था यह निमंत्रण।
‘महाराज अपने घर पधारेंगे।’ वह जैसे आनंद से पागल हो जायेगी । बिना यह देखे कि वहाँ एक भीड़ में खड़ी है वह पति के कान के पास मुँह ले जाकर फुसफुसाने लगी ‘तुम्हारे पचास रुपये मैंने सँभाल कर रखे हैं और एक महीने में पचास और एकत्र कर लिए हैं। संकोच मत करो महाराज से आग्रह करने में।
‘तुमने जिस परिश्रम और आदर के साथ पूरे महीने भर मेरी सेवा की है, उसका पुरस्कार देना मेरी शक्ति के बाहर है। मैं तुम्हारा अनुरोध टाल नहीं सकता। तुम्हारी पत्नी ही बतावेगी कि मैं कब उसके द्वार पहुँचूँ।
जी चाहता था कि कह दे वह ‘महाराज चले ही चलें अभी साथ ! ‘लेकिन वह मूर्ख नहीं। महाराज का क्या, अभी उठकर चल देंगे। क्या करेगी वह। गेहूँ पीसना होगा, घी मँगाना होगा और आस-पास के गाँव में निमंत्रण देना होगा। वह बड़ी धूमधाम से महाराज का स्वागत करेगी। ‘एकादशी प्रभु वहीं करें और द्वादशी की जूठन से कृतार्थ करें हमें ! चतुरता पूर्वक दो दिन का समय माँगा उसने। दुस्साध्य दुस्साहस
कुबड़ा नाई पास खड़ा था वहीं।
ईर्ष्या से जला जा रहा था। ‘यह कुबड़ा महीने भर सेवा करके कूबड़ और गठिया से छुटकारा पा गया और महाराज उसके घर जाना स्वीकार कर चुके, किंतु वह नित्य महाराज के पैर दबाकर अपने कूबड़ से छुट्टी नहीं पा सका। अब कौन उसे बताये कि गुरु की सेवा आदर एवं श्रद्धा से करने से सब कुछ दे देती है। सारे क्लेशों का नाष कर देती है। वह तो उन्हें गुरु भी नहीं स्वीकार करता-पैर दबाता है तो इसलिए कि अन्न पाता है उसके बदले।
महर्षि रमण के आश्रम के समीपवर्ती गाँव में एक अध्यापक रहते थे। एक बार अपने कौटुँबिक जीवन से क्षुब्ध होकर वे आत्म-हत्या की बात सोचने लगे। किसी निर्णय पर पहुँचने से पहले उन्होंने महर्षि की सम्मति जाननी चाही। अतः एक दिन वे आश्रम पहुँचे। स्वामी जी आश्रम वासियों के भोजन के लिए पत्तलें बना रहे थे। स्वामीजी अध्यापक के आने का अभिप्राय समझ गये। अध्यापक महोदय उन्हें प्रणाम करते हुए बोले-”भगवन् ! आप इन पत्तलों को इतने परिश्रम से बना रहे हैं और आश्रमवासी इनमें खाना खाकर फेंक देंगे।” महर्षि सुनकर मुसकराते हुए बोले ‘सो तो ठीक है, वस्तु का पूर्ण उपयोग हो जाने पर उसे फेंक देना बुरा नहीं। बुरा तब है जब अच्छी अवस्था में ही फेंक दिया जाय।”
अध्यापक स्वामीजी का अभिप्राय समझ गये और आत्म-हत्या का इरादा छोड़ दिया।
अनुभूतियाँ क्या हैं ? मानसिक उपज ? भ्राँति ? या सच्चाई ? इन पर यदि गहराई से विचार किया जाय, तो ज्ञात होगा कि न तो यह मन की कल्पना है न भ्रम। ऐसा इसलिए प्रतीत होता है, क्योंकि तब घटित हमारे लिए अघटित स्तर के बने रहते हैं, किंतु जब घटना की स्फुरणा से सही-सही संगति बैठ जाती है, तब ज्ञात होता है कि उसमें कितनी सच्चाई थी और तभी यह भी विदित होता है कि कोई अलौकिक सत्ता हमारी चेतना से छेड़-छाड़ करती रहती है। इस प्रकार का प्रसंग जब कभी भी घटित होता है, तो मनुष्य में उसका परिणाम अघटित की अनुभूति के रूप में सामने आता एवं अनागम की महत्वपूर्ण जानकारी देता है।
घटना 28 जून 1954 की है। न्यूयार्क अमेरिका के डॉक्टर रेमर की पत्नी एल्सा विश्राम कर रही थी । उनकी पुत्री जेस्सी एक माह पूर्व ही कैलीफोर्निया जा चुकी थी। माँ-बेटी के बीच की भौगोलिक दूरी 3 हजार किलो मीटर थी। अकस्मात एल्सा चीख कर पलंग से उठ बैठी। रेमर ने जब इसका कारण जानना चाहा तो कहा कि अभी-अभी उसने जेस्सी की भयपूर्ण चीख सुनी, ऐसा लगा कि वह किसी विपदा में है। डॉक्टर ने अपनी पत्नी का शारीरिक परीक्षण किया। हृदय, नाड़ी, रक्तचाप सभी असामान्य थे। यह पूछे जाने पर कि उसने कोई भयंकर स्वप्न तो नहीं देखा, एल्सा ने कहा कि वह बिल्कुल जाग्रत अवस्था में थी और केवल जेस्सी की तीक्ष्ण चीख सुनी।
उस समय और कोई बात नहीं हुई। दो दिन बीत गये। इन दो दिनों तक घर का वातावरण बड़ा उदास बना रहा। तीसरे दिन वह उदासी पूर्ण विषाद में तब बदल गई, जब सचमुच जेस्सी के दुर्घटनाग्रस्त होने का तार मिला। आश्चर्य की बात यह थी कि एल्सा ने जिस समय यह चीख सुनी, ठीक उसी समय कैलीफोर्निया में कार दुर्घटना में उसका प्राणाँत हुआ।
एक अन्य घटना फ्राँस के रियर एडमिरल गैलरी की आत्मकथा से उद्धत है। “आठ घंटियाँ” (एट बेल्स) नामक उक्त आत्मकथा में गैलरी लिखते हैं कि उन्हें सोमवार को अपनी ड्यूटी पर जाना था। रविवार की रात जब वे सोये, तो एक स्वप्न देखा कि वे अपने जहाज पर बैठे हैं। जहाज चलने की तैयारी में है। यात्रीगण जल्दी-जल्दी ऊपर आ रहे हैं। इनमें दो युवक भी हैं। वे उन दोनों से नाम पूछते हैं। एक ने अपना नाम डिकग्रेन्स तथा दूसरे ने पॉप कनवे बताया। तभी जहाज में अचानक विस्फोट होता है। दोनों युवक घायल हो जाते हैं। बाद में पॉप की मृत्यु हो जाती है। शेष सभी यात्री सुरक्षित बच जाते हैं। वे लिखते हैं कि स्वप्न इतना स्पष्ट ओर गंभीर था कि सोकर उठने के उपराँत भी मानस पटल पर वह ज्यों-का-क्यों बना रहा।
आश्चर्य वहाँ से प्रारंभ हुआ, जब उनने आफिस जाकर जहाज के यात्रियों की सूची देखी। उन्हें यह देखकर भारी हैरानी हुई कि जो नाम उनने स्वप्न में देखे थे, वे सचमुच उस लिस्ट में सम्मिलित थे। उनके मन में एक अज्ञात भय समा गया, पर उन्हें ड्यूटी में तो हर हालत में जाना ही था, अतः बुझे मन से जहाज में सवार हुए। जलयान ने ठीक समय पर प्रस्थान किया, पर उसने अभी ठीक तरह बंदरगाह भी नहीं छोड़ा था कि एक इंजन में विस्फोट हुआ। निकट बैठे हुए वही दो युवक घायल हुए, जिनमें से पॉप कनवे की थोड़ी देर पश्चात् मौत हो गई।
एक तीसरी घटना डरहम की एक स्त्री से संबंधित है। क्रिस्टीना की लड़की लोला अपने छोटे भाई के साथ समुद्र स्नान के लिए एक दिन गई हुई थी। अभी दो घंटे भी नहीं बीते होंगे कि क्रिस्टीना ने चिल्लाना आरंभ कर दिया। पति ने जब कारण पूछा, तो बोली लोला डूब रही है, उसे बचालो। पति ने आरम्भ में इसे पत्नी की अति कल्पनाशीलता समझी, पर पत्नी के बार-बार के आग्रह पर पति को तथ्य का पता लगाने के लिए जाना ही पड़ा। जब वह समुद्री किनारे पर पहुँचा, तब सचमुच लोला डूब चुकी थी और उसका छोटा पुत्र डिकी बैठा विलाप कर रहा था।
ऊपर लगभग एक ही तरह की तीन घटनाओं का उल्लेख है। यह घटनाएँ न तो भाव-संप्रेषण (टेलीपैथी) हैं और न ही दूरदर्शन (क्लेयरवायेन्स), वरन् इन्हें एक सर्वथा पृथक श्रेणी में रखा जा सकता है, जिसे प्रायः ‘अनुभूति’ कहते हैं। टेलीपैथी यह इसलिए नहीं हो सकतीं, क्योंकि इसमें प्रयासपूर्वक ग्रहण और संप्रेषण की कार्यविधि अपनायी जाती है। दोनों पक्षों के बीच गहन भावनात्मक तादात्म्य होता है और उनके मध्य इसे संपन्न करने के लिए एक निश्चित समय निर्धारित किया जाता है। ऐसे ही भौगोलिक दूरी को किसी अतीन्द्रिय क्षमता के माध्यम से पार किसी प्रसंग का आभास प्राप्त कर लेना-संपूर्ण घटनाचक्र को दृश्यमान बना लेना, दूरदर्शन है। उपरोक्त घटनाओं में से एक वर्तमान से संबंधित है और शेष दो भविष्य से। जो हो रहा है, उसे देखा जा सकता है। जो हो चुका है, उसे भी जाना जा सकता है, किंतु जो अभी भविष्य के गर्भ में है, यदि उसकी जानकारी येन-केन प्रकारेण होती है, तो इसे न तो दूरसंचार कहा जायेगा, न दूर संप्रेषण। यह आध्यात्मिक अनुभूतियाँ हैं, जो यदा-कदा जीवन में प्रकट होती रहती हैं-माध्यम चाहे स्वप्न हो, जागृति या तुरीयावस्था हो।
वेदांत दर्शन के अनुसार सृष्टि में ब्राह्मी चेतना या परमात्मा ही एक ऐसा तत्व है, जो सर्वव्यापी है। इसे प्रकाराँतर से यों भी कह सकते हैं कि ब्रह्माँड उसी में अवस्थित है। वह काल की सीमा से परे है, अर्थात् भूत, भविष्य, वर्तमान तीनों ही उसमें समाहित हैं।
“एक्सप्लोरिंग साइकिक फेनामेना बियाँड मैटर” नामक कृति में डी॰ स्काँट रोगो इस संबंध में अपना विचार प्रकट करते हुए लिखते हैं कि विचारणाएँ तथा भावनाएँ प्राणशक्ति का उत्सर्जन (डिस्चार्ज ऑफ वाईटल फोर्स) हैं। यही उत्सर्जन अंतःकरण में यदा-कदा स्फुरणा बनकर प्रकट होते हैं। इस स्फुरणा की क्रिया-प्रणाली जब दो व्यक्तियों के मध्य संपन्न होती है, तब वह टेलीपैथी होती है, किंतु जब वह समय की सीमाओं का अतिक्रमण करते हुए सूचना सुदूर भविष्य की देती है, तो इसका आधारभूत कारण ब्राह्मीचेतना होती है। इस चेतना की कल्पना आइन्स्टीन ने भी सापेक्षवाद के सिद्धाँत में की है और लिखा है कि यदि प्रकाश की गति से भी तीव्र गति वाला कोई तत्व हो तो वहाँ समय रुक जायेगा। दूसरे शब्दों में वहाँ बीते कल, आज और आने वाले कल में कोई अंतर न रहेगा। भारतीय शास्त्र ब्राह्मी चेतना को ही ऐसा परम तत्व बताते हैं और मनुष्य व उसमें गहन संबंध होने का पग-पग पर उल्लेख करते हैं। उपरोक्त घटनाएँ इसी सत्या की पुष्टि करती हैं, साथ ही यह भी बताती हैं कि जब उस सत्ता का क्षणिक संपर्क इतना आश्चर्यजनक हो सकता है, तो संपूर्ण संपर्क कितनी सामर्थ्य प्रदान करने वाला होगा-यह विचारणीय है।
ऋग्वेद में एक ऋचा आती है-अग्निना अग्नि समिध्यते, अर्थात् अग्नि से अग्नि प्रदीप्त होती है। ब्रह्मानुभूति से ब्रह्म प्राप्ति इसी सिद्धाँत पर आधारित है कि हम अधिकाधिक अपने आप-को आत्मचेतना को उस ब्राह्मी चेतना के समीप लायें और फिर अंततः उसी में अपना विलय-विसर्जन कर दें। आत्म चेतना परमात्म चेतना बन जाय और परमात्म चेतना आत्मचेतना की अनुभूति कराये। यह एकात्म-अद्वैत की स्थिति है। सर्वसाधारण में यह स्तर विकसित नहीं हो पाने के कारण ही “काल” रहस्यमय बना रहता है। जहाँ जिस अनुपात में दो सत्ताओं का सम्मिलन होता है, वहाँ उसी अंश में अविज्ञात ज्ञात बनता चलता है। उपरोक्त घटनाएँ उसी शृंखला की कड़ियाँ हैं, और आत्मजाग्रति की क्षणिक अनुभूतियाँ भी। विस्तृत अनुभूति, ज्ञान प्राप्ति और ईश्वर साक्षात्कार के लिए तो आत्म परिष्कार की गहन साधना अपनानी पड़ती है, जिसके उपराँत ही अनुभूतियों के निमित्त कारण को भलीभाँति जाना और समझा जा सकता है।
शिष्य मंडली ने भगवान बुद्ध से पूछा-”मनुष्य कितने के वर्ग हैं ?” तथागत ने उत्तर दिया “एक वे, जो अपना ही लाभ देखते हैं, भले ही इससे दूसरों को कितनी ही हानि उठानी पड़ती हो। दूसरे वे, जो औरों का भला करता है। तीसरे वे, जो अपना भी भला करते हैं और दूसरों का भी। चौथे वे प्रमादी हैं, जो न स्वयं सुखी रहते हैं, न दूसरों को सुखी रहने देते हैं।
तथागत ने कहा-”मेरी समझ में वे श्रेष्ठ हैं जो अपना भी भला करते हैं और साथ-साथ दूसरों का भी।
एक रात को जब पुजारी मंदिर का द्वार बंद घर चला गया, तो देव मूर्ति बने बैठे पाषाण से, स्तंभ के पाषाण ने पूछा-”क्यों भाई हम सब एक ही पर्वत पर से चुनकर यहाँ लाये गये हैं। फिर तुम्हें ही यह पूज्य-पद क्यों मिला जबकि मैं यहाँ छत का बोझ सहने को स्तंभ बना हुआ हूँ ?” देवता के आसन पर प्रतिष्ठित पाषाण कुछ विचार कर बोला-”बंधु ! मैं स्वयं इस रहस्य को नहीं जानता। कल मंदिर के पुजारी से पूछूँगा।” अगले दिन जब पुजारी अर्चना के अंदर हाथ जोड़कर विनय-मुद्रा में खड़ा हो गया, तो देव पाषाण बोला-”विद्वान पुजारी ! मंदिर में जितने भी प्रस्तर हैं, वे सभी समान गुण-जाति के हैं, फिर मैं ही पूजा का पात्र कैसे बन गया ? क्या यह रहस्य समझा सकोगे ?”
“आपने बड़े महत्व की बात पूछी है, भगवन्, पुजारी बड़े ही विनम्र वचनों में बोला-”एक गुण-धर्म तथा जाति की सभी वस्तुओं का उपयोग एक पद पर ही हो, यह सर्वथा असंभव है। प्रकृति किसी को भी समान रूप से रहने देना नहीं चाहती। हम मनुष्यों में भी ऐसा ही होता है। बहुत से मनुष्य समान प्रतिभा तथा जाति-गुण के होते हैं, परंतु उनमें से अपने श्रेष्ठ कर्मों के कारण कोई एक ही वरिष्ठ स्थान पाता है शेष सभी उसके नीचे रहते हैं, किंतु जो नीचे हैं, उन्हें अपने आपको हेय नहीं मानना चाहिये, क्योंकि सृष्टि परिवर्तनशील है। इसमें अपने संस्कारों की परिणति के फलस्वरूप कौन, कब, कहाँ चला जायेगा, इसका कोई ठिकाना नहीं। इसलिए बुद्धिमान जन, पद की न्यूनाधिकता से विचलित नहीं होते।”
जिस प्रकार अविज्ञात कारणों से कभी-कभी मनुष्य पर अप्रत्याशित विपत्तियाँ टूट पड़ती हैं और प्रत्यक्ष कोई कारण न होने पर भी दुर्घटना स्तर का संकट सहना पड़ता है। उसी प्रकार कभी-कभी विपत्तियों से उबारने वाली ऐसी अदृश्य सहायताएँ भी अनायास ही मिलती देखी गई हैं जिनकी कभी न कोई आशा थी न संभावना।
इन घटनाक्रमों के पीछे सन्निहित अविज्ञात कारणों को आमतौर से प्रारब्ध संयोग आदि कहकर किसी प्रकार समाधान कर लिया जाता है, फिर भी आस्तिक जन विपत्तियों को अपना कर्मफल और सुविधा-सफलताओं में ईश्वर का अनुग्रह देखते हैं। इस संदर्भ में परोक्षवादी किन्हीं अदृश्य आत्माओं का भी हाथ देखते हैं जो पूर्वकाल की घटनाओं को ध्यान में रखकर प्रतिशोध लेतीं और कष्ट पहुँचाती हैं। साथ ही उच्चस्तरीय आत्माएँ अपने सम्बद्ध आत्मीयजनों को समय-समय पर अपनी सामर्थ्यानुसार लाभान्वित भी करती रहती हैं। इस तरह की अविज्ञात और सूक्ष्म शरीरधारी दिव्य आत्माओं द्वारा लोगों को अदृश्य या प्रत्यक्ष सहायता पहुँचाये जाने की कितनी ही घटनायें हर देश और काल में घटित होती रहती हैं जिसे निष्पक्ष प्रत्यक्षदर्शियों एवं अनुभवियों ने ही नहीं, वरन् अब विज्ञानवेत्ताओं ने भी स्वीकारा है। सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक मनीषी सर डब्ल्यू॰ एफ॰ बैरट ने अपनी पुस्तक “साइकिकल रिसर्च” में अमेरिका के एक सैनिक अधिकारी श्री गोवन और उनके दो पुत्रों का उल्लेख करते हुए बताया है कि उनकी प्राणरक्षा किस प्रकार हो सकी।
श्री मेक गोवन अपने दोनों पुत्रों को अवकाश के दिन नाट्य गृह में नाटक दिखाने जाना चाहते थे और इसके लिए उन्होंने उसके टिकट भी एक दिन पूर्व ही मँगा लिए थे। किंतु जिस दिन उन्हें नाटक देखने जाना था। उस दिन सुबह से उन्हें बार-बार एक ही आवाज सुनाई देती रही कि-’नाटक देखने मत जाओ और लड़कों को वापस घर ले जाओ।’ जब बार-बार वही आवाज आती रही तो उन्होंने नाटक देखने का विचार बदल दिया। दूसरे दिन ज्ञात हुआ कि पिछली रात नाट्य गृह में भयंकर आग लग गयी और 300 से अधिक लोग उस अग्निकाँड में भस्मसात् हो गये।
न्यूयार्क की एक वयोवृद्ध महिला कैथेलिन मैक्को को एक ओर कोई आसुरी शक्ति मिटाने पर तुली हुई थी, तो दूसरी ओर रक्षक सत्ता उसे बचाने को तत्पर थीं। इस प्रकार उस पर सात बार मौत के आक्रमण हुए, फिर भी वह जीवित रही।
जब कैथेलिन सात वर्ष की थीं तब एक दिन वह स्कूल के अन्य बच्चों के साथ हडसन नदी में स्टीमर से सैर करने गयी। स्टीमर में आग लग गयी। उसे छोड़कर सभी बच्चे भस्मसात् हो मृत्यु के मुँह में समा गये। लड़की को स्टीमर के कोने पर पड़ा लकड़ी का बड़ा सा तख्ता दीखा जिसे उसने छाती से चिपकाया और नदी में कूद गयी। उधर से गुजरती नाव ने उसे पकड़ लिया तथा उसे सुरक्षित घर पहुँचा दिया।
दूसरी बार सन् 1954 में वह जिस वायुयान से हवाई यात्रा कर रही थी उसमें खराबी आ गई। पायलट ने जहाज को नीचे उतारना चाहा, पर उसमें आग लग गयी जिससे सभी यात्री झुलस गये। केवल कैथेलिन ही झुलसी हुई स्थिति में जीवित रही। अस्पताल जाकर वह गहन उपचार के पश्चात् स्वस्थ हो गयी।
सन् 1956 में बस से यात्रा करते समय बस का टायर फटा। बस गहरी खाई में जा गिरी और उसमें आग लग गयी। सभी यात्री आग की लपटों में घिर कर काल-कवलित हो गये। शीशा तोड़कर बाहर निकलने वाली अकेली कैथेलिन ही थी।
इसी तरह सन् 1961 में वह जिस रेल से यात्रा कर रही थी, रात्रि में दूसरी रेल से उसकी टक्कर हो गयी। इंजन चकनाचूर हो गया। कई डिब्बों के भी परखच्चे उड़ गये। कैथेलिन के डिब्बे में केवल यही जीवित बची।
सन् 1962 में वह एक होटल में छुट्टियाँ बिताने गयी। अचानक पहाड़ से एक भारी चट्टान लुढ़क कर उसी कमरे पर आ पड़ी जिसमें कैथेलिन ठहरी थी। सभी व्यक्ति मारे गये, किंतु वह कुछ मिनट पहले ही किसी अज्ञात प्रेरणावश कमरे से बाहर आ गयी थीं।
उन्हीं दिनों टैक्सी से यात्रा करते समय टैक्सी एक मोटर से टकरा गयी जिसमें टैक्सी चालक सहित तीन व्यक्ति मारे गये, अकेले कैथेलिन ही जीवित बची।
सातवीं बार सन् 1967 में वह एक दावत में गयी जहाँ नयी जाति की मछलियाँ तलकर परोसी गयीं। भोज खाने वाले सभी व्यक्ति मछलियों के जहरीले प्रभाव के कारण मारे गये, अकेली कैथेलिन ही बच पायी और उस शाश्वत सत्य को सिद्ध कर दिखाया कि मारने वाले से बचाने वाला बड़ा है।
न्यायालयों में कई बार बेगुनाह व्यक्तियों को फाँसी तक की सजा दे दी जाती है और वे निरपराध मारे जाते हैं। लेकिन कई बार ऐसी घटनाएँ भी घटित होती देखी गयी हैं जब किसी अदृश्य सत्ता ने हस्तक्षेप करके व्यक्ति को फाँसी के फंदे से कसकर मरने से बचा लिया हो। “मिस्ट्रीज ऑफ अनएक्सप्लेन्ड” नामक ग्रंथ में इस तरह की अनेकों घटनाओं का विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है।
बहाई धर्म के संस्थापक महात्मा बाव को प्राचीन परंपराओं से भिन्न स्थापनाएं करने के आरोप में तत्कालीन शासक द्वारा मृत्यु दंड दिया गया।
19 जुलाई 1853 को प्रातः 10 बजे तक रीज के मैदान में उन्हें सरेआम गोली से उड़ाया जाना था। इस दृश्य को देखने के लिए वहाँ दस हजार से भी अधिक लोग उपस्थित थे। उपयुक्त समय पर महात्मा बाव और उनके एक अंतरंग शिष्य को रस्सों से बाँधकर खंभों के सहारे अधर में टाँग दिया गया। तत्पश्चात् ढाई-ढाई सौ सैनिकों की तीन टुकड़ियों ने उन दोनों पर एक साथ निशाना साधकर गोलियाँ चलायीं। परंतु यह दृश्य देखकर सभी आश्चर्य चकित रह गये कि 750 गोलियों में से एक भी महात्मा बाव और उनके शिष्य को नहीं लगी। दोनों साफ बच गये। इस घटना के बाद उन्हें निर्दोष एवं महान पवित्र आत्मा जानकर मुक्त कर दिया गया।
वस्तुतः ऐसा नहीं है कि दैवी सहायता के अधिकारी मात्र महान पवित्र आत्मायें ही होती हों, वरन् उसकी अहैतुकी कृपा के द्वार प्रत्येक सच्चे, चरित्रवान और ईमानदार व्यक्ति के लिए हर पल खुले हैं। इतिहास के पन्ने ऐसे अनेकों उदाहरणों से भरे पड़े हैं जिनमें निरपराध व्यक्तियों को अपराधी घोषित करके उन्हें फाँसी के फंदे में लटकाया गया, परंतु वे मरे नहीं।
उन्नीसवीं सदी के अंतिम दशक में इंग्लैंड के ‘जॉन ली’ नामक एक व्यक्ति को हत्या के अभियोग में मृत्युदंड की सजा सुनायी गयी। फाँसी देने से पहले ‘ली’ से उसकी अंतिम इच्छा पूछी गयी, तो उसने कहा-”मैं निरपराध हूँ।” परंतु उसके इस कथन को न्यायाधीश ने अनसुनी करते हुए फाँसी का फंदा गले में डालने का आदेश दिया। जल्लाद ने जैसे ही फाँसी लगाने के लिए बोल्ट खिसकाया कि रस्सा गर्दन से खुल गया। दूसरी बार अधिकारियों द्वारा अच्छी तरह फंदे और तख्ते का निरीक्षण करने के पश्चात् ‘ली’ को पुनः फाँसी के फंदे से लटकाया गया, परंतु इस बार रस्सा खिंचा ही नहीं उसकी गर्दन को कई बार फंदे से इसी प्रकार कसा जाता रहा, किंतु उसको मारने के प्रत्येक प्रयत्न निष्फल रहे।
तत्पश्चात् जॉन ली को फिर से कालकोठरी में डाल दिया गया और समस्त प्रकरण की बारीकी से जाँच-पड़ताल की गयी। जाँच में कहीं कोई गड़बड़ी नहीं पायी गयी। इस बार उसको हजारों लोगों की उपस्थिति में फाँसी के फंदे से लटकाया गया, पर फिर से वही पुनरावृत्ति हुई और रस्सा नहीं खुला। कई बार के प्रयास के बाद भी जब उसकी मृत्यु नहीं हुई, तो उसे मुक्त कर दिया गया। आश्चर्यचकित लोगों ने जब उससे इसका रहस्य पूछा तो उसने बताया कि-’मैं निर्दोष हूँ, मेरी पुकार परमात्मा ने सुन ली।’ बाद में असली हत्यारे का पता चल गया।
इसी प्रकार 7 फरवरी 1894 की सुबह को अमेरिका स्थित मिसी सिपी के 24 वर्षीय नवयुवक विल पर्विस को कोलंबिया के एक किसान की हत्या के आरोप में न्यायालय द्वारा प्राणदंड दिया गया। जल्लादों ने आदेश मिलते ही फाँसी का फंदा उसके गले में डाल दिया और नीचे के तख्ते को हटा लिया। पर जैसे ही तख्ता हटाया गया, विल के गले का रस्सा खुल गया और वह नीचे गिर पड़ा। हजारों दर्शक इस घटना को देखकर आश्चर्यचकित थे। कई बार के प्रयास से भी जब उसकी मृत्यु नहीं हुई तो उसे कारावास से मुक्त कर दिया गया।
वस्तुतः विलपर्विस निर्दोष था। उसे गलत फँसाया गया था। इस बात की सत्यता का पता लोगों को तब चला जब उपर्युक्त घटना के ठीक 19 वर्ष बाद जो सेफ बियर्ड नामक एक व्यक्ति ने उस किसान की हत्या करने का अपराध स्वयं स्वीकार कर लिया। अदृश्य एवं अप्रत्याशित सहायताओं से भरे इस समूचे घटनाक्रम का पूर्ण विवरण “नयुओरलियंस स्टेट मेगजीन” के 13 अप्रैल 1947 अंक में प्रकाशित हुआ था।
दैवी सत्तायें प्राणों की रक्षा ही नहीं करतीं, वरन् मनुष्य के कार्यों में अपना दिव्य सहयोग भी प्रदान करती हैं। उदाहरण के लिए प्रथम युद्ध में ब्रिटेन का टोही विमान मोर्चे का सर्वेक्षण कर रहा था। उसके चालक और सर्वेक्षणकर्ता शत्रु की मशीनगनों के शिकार हो गये। इतने पर भी वायुयान दुर्घटनाग्रस्त नहीं हुआ। वह घंटों आसमान में चक्कर काटता रहा और अंत में ईंधन चुक जाने पर शाँति के साथ समतल भूमि पर उतर आया।
इस संदर्भ में महर्षि अरविंद की सहयोगिनी श्री ‘माँ’ का कहना है कि दिव्य लोक की दैवी सत्तायें मानव मात्र को प्रेरणा देने, मार्गदर्शन करने एवं अपेक्षित या अनपेक्षित सहायता प्रदान करने के लिए सदैव तत्पर रहती हैं। किंतु हम हैं जो स्वयं उनके लिए अपने अंतराल के पट बंद रखते हैं। जैसे ही उनके प्रति हम अपने को उद्घाटित करते हैं तो न केवल उनकी सहायता मिलती है वरन् जीवन क्रम भी चमत्कारिक रूप से परिवर्तित होने लगता है। उन्होंने इस प्रकार की सहायता को स्पष्ट करते हुए कहा है कि इसी के बल पर साधारण किसान की बेटी जॉन आफ आर्क फ्राँस की जनक्राँति की अग्रदूत बनी और स्वतंत्रता की देवी नाम से प्रतिष्ठित हो सकी।
वे दिव्य आत्मायें जिन्होंने अपने जीवन को किसी महत्वपूर्ण कार्य में नियोजित किया है, शरीर त्याग देने पर भी उससे विरत नहीं होतीं, अपितु किसी सुयोग्य माध्यम को सहायता दे उसमें अपनी क्रियाशक्ति का स्थानाँतरण कर उद्देश्य की प्राप्ति करा लेती हैं। यह एक तथ्य है कि भारत को स्वतंत्रता दिलाने के उद्देश्य से स्वामी विवेकानंद की आत्मा, श्री अरविंद, सुभाषचंद्र बोस जैसे कितने ही देश भक्तों को मार्ग दर्शन देतीं और प्रेरणा प्रदान करती रहीं। सुप्रसिद्ध राजनीतिज्ञ कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी ने भारतीय विद्या भवन की पत्रिका में लिखा है कि श्री लोकमान्य तिलक की आत्मा ने उनसे संपर्क किया था और यह संदेश दिया था कि मातृभूमि की स्वाधीनता के लिए संघर्ष करने वालों को वह सहायता प्रदान करते रहेंगे। दैवी सत्तायें, ऋषि आत्मायें हमें पग-पग पर प्रेरणा प्रदान करने और सहायता देने को तत्पर हैं, परंतु वे मदद कर सकें, इसके लिए भावनात्मक अनुकूलता अपेक्षित है। आवश्यकता उनके प्रति कृतज्ञता और श्रद्धा का भाव रखने और जीवन को पवित्र बनाने की है।
इस संसार में अभी जितना कुछ जाना जा चुका है, उससे अनेक गुना ज्यादा अविज्ञात है। जो ज्ञात हो चुका, उसे लौकिक की श्रेणी में रख दिया गया और जिनके रहस्य अनावृत होने बाकी हैं, उन्हें आश्चर्य, अचंभा, अनबूझ, अज्ञात, अलौकिक जैसे नामों से पुकारा जाने लगा। ऐसे रहस्यों में प्रकृति और ब्रह्मांडगत पहेलियों से लेकर जड़ जगत के जड़ पिण्डों की अद्भुतताएँ सम्मिलित हैं। यही अद्भुतताएँ यदा-कदा प्रकट और प्रत्यक्ष और प्रत्यक्ष होकर लोगों को चमत्कृत करती रहती है।
घटना 6 अगस्त 1945 की हैं। पिट्स वर्ग के व्यापारी एलेन डेमेट्रियस की आर्ट गैलरी में अनेक पेंटिंग्स एवं प्रतिमाएँ रखी हुई थीं। इन्हीं प्रतिमाओं में जापानी लड़की की एक काँसे की मूर्ति भी थी। उक्त दिन वह विग्रह न जाने क्यों रोने लगा। डेमेट्रियस ने यह सुनिश्चित करने के लिए कि किसी प्रकार वहाँ पानी के छींटे तो नहीं पहुँच गये, उन्होंने उसे कपड़े से पोंछ दिया, पर तब वह आश्चर्यचकित रह गये, जब थोड़ी ही देर में आँखें पुनः सुखाया, किंतु कुछ क्षण पश्चात् वह फिर नम हो गईं। इस प्रकार के कई प्रयासों के बाद डेमेट्रियस को यह निश्चय हो गया कि आँखों से लुढ़कने वाला तरल असावधानी वश पड़ने वाला कोई जलबिंदु नहीं, वरन् यह मूर्ति के रुदन की परिणति है। नेत्रों से बहने वाला पानी आँसू ही है-इसकी पुष्टि के लिए उन्होंने स्थानीय रसायनवेत्ताओं को जाँच के लिए आमंत्रित किया। कई मूर्धन्य रसायनज्ञों ने इसकी अलग-अलग पड़ताल की, पर सभी का निष्कर्ष एक ही था कि चक्षु से बहने वाला तरल मानसी आँसू ही हैं। उल्लेखनीय है कि प्रतिमा ने उसी दिन से रोना आरंभ किया, जिस दिन हिरोशिमा में अणु बम गिराया गया था। विलाप के कारण का पता अब तक नहीं चल सका। संभव है अगणित दिवंगत लोगों की प्रतिमाएँ अपनी संवेदना प्रकट कर रही हों।
एक अन्य घटना आइलैंड पार्क, न्यूयार्क के कैटसोनिस दंपत्ति से संबद्ध है। गृहस्वामिनी पगोना धार्मिक प्रवृत्ति की महिला थी। वह प्रतिदिन सोने से पूर्व मरियम की मूर्ति के सामने प्रार्थना किया करती थीं। यह उसकी नियमित चर्या थी और लंबे समय से चली आ रही थी।
16 मार्च 1960 की रात भी वह अन्य दिनों की तरह प्रार्थना करने लगी। आँखें उसकी मरियम पर टिकी थीं। तभी अकस्मात् प्रतिमा की आँखें अश्रुपूरित हो गईं और कुछ ही पल में दोनों नेत्रों से दो बड़ी-बड़ी बूँदें कपोलों पर ढुलक पड़ीं। आरंभ में उसे अपने चक्षुओं पर विश्वास नहीं हुआ। उसने उन बिंदुओं को स्पर्श कर देखा। वे सचमुच अश्रु-बिंदु ही थे। इसके उपराँत उसने अपने पति पैगियोनाइटिस को आवाज दी और विग्रह-रुदन की बात बतायी। पैगियोनाइटिस स्वयं एक रसायनषास्त्री थे। उन्होंने नयनों से कुछ बूँदें इकट्ठी कीं और प्रयोगशाला में परीक्षण हेतु ले गये। जाँच के पश्चात् नयन-नीर में वहीं सारे गुण पाये गये, जो मानवी आँसू में पाये जाते हैं। मरियम पूरे एक सप्ताह तक रोती रहीं। इस बीच दर्शकों और श्रद्धालुओं का वहाँ लंबा ताँता लगा रहा। बाद में उसको गृह दंपत्ति और लोगों की सुविधा के लिए सैंट पॉल गिरजाघर में रखवा दिया गया।
सन् 50 के दशक में “रोने वाली मैडोना” के प्रसंग ने काफी प्रसिद्धि पायी थी। हुया यों कि सिराक्यूज (इटली) की एण्टोनियेटा की शादी 1953 के वसंत में एञजेलो इयानुसो से हो गई। विवाह में उपहार स्वरूप एण्टोनियोटा को अन्य सामानों के साथ मैडोना की एक मूर्ति भी मिली ! देवी मैडोना के विग्रह को उसने अपने शयन कक्ष में सिरहाने एक आले पर रख दिया। विवाह के कुछ महीने उसके सुखपूर्वक कटे, फिर अचानक एण्टोनियेटा बीमार पड़ गई। उसके सिर में भयंकर दर्द आरंभ हुआ। दर्द बर्दाश्त न कर पाने के कारण एण्टोनियेटा रोती रहती और मन-ही-मन देवी मैडोना से स्वास्थ्य लाभ के लिए प्रार्थना किया करती। एक सप्ताह बीत गया। एक दिन अचानक एण्टोनियेटा की दृष्टि मैडोना पर पड़ी, तो वह हतप्रभ रह गई। उसकी आँखों में आँसू भरे थे। बिस्तर से तनिक सिर उठा कर देखा, तो ज्ञात हुआ कि मूर्ति के नीचे का आधार भी आर्द्र है।
घटना आग की तरह फैल गई। पुलिस के कानों में भी बातें पड़ी। कुछ अधिकारी आये और विग्रह का सूक्ष्मतापूर्वक निरीक्षण किया। जाँच के दौरान ऐसा कुछ भी नहीं देखा गया, जिसे संदेहास्पद कहा जा सके। उन्होंने मैडोना के नेत्रों को बार-बार पोंछा, पर थोड़ी-थोड़ी देर में आँखें बार-बार भर आतीं। अन्ततः अधिकारीगण जल के रासायनिक विश्लेषण के लिए प्रतिमा को पुलिस स्टेशन उठा लाये। अश्रुप्रवाह इस बीच भी लगातार जारी रहा। वह इस कदर इतने परिमाण में बह रहा था कि उसे उठा कर ले जाने वाले कर्मचारी की कमीज भीग गई। नेत्र जल के विश्लेषण से ज्ञात हुआ कि वह आँसू के समस्त गुणों से संपन्न है। इस मध्य एक आश्चर्यजनक बात यह दृष्टिगोचर हुई कि जब से मैडोना ने रोना प्रारंभ किया था, एण्टोनियेटा का स्वास्थ्य उत्तरोत्तर सुधरने लगा। सिर दर्द भी अब असहनीय नहीं रहा। अंततः कुछ दिनों बाद प्रतिमा का विलाप बंद हो गया। इसके साथ ही गृहस्वामिनी भी पूर्णतः निरोग हो गई।
कई बार ऐसे मामलों में विग्रहों से रक्तस्राव भी होते देखा गया है। ऐसा ही एक दृश्य 1920 के उपद्रवों के दौरान आयरलैण्ड में दिखाई पड़ा। उक्त वर्ष ब्रिटिश सरकार ने वहाँ के राष्ट्रवादी आँदोलन सिन फिन को अवैध घोषित कर उस पर निषेध लगा दिया। इससे क्रुद्ध होकर आँदोलनकारियों ने वहाँ नियुक्त सैनिकों के विरुद्ध गुरिल्ला युद्ध छेड़ दिया। भयंकर मारकाट मची। सैकड़ों की जानें गईं और करोड़ों की संपत्ति बरबाद हो गई। अराजकता चरम सीमा पर थी। 15 अगस्त के दिन टेम्प्लीमोर के टाउनहाँल को जलाकर राख कर दिया गया। इसके साथ कई अन्य इमारतें भी भस्म कर दी गईं।
इस अग्निकाँड के ठीक एक सप्ताह बाद वहाँ के एक धार्मिक नेता टामस ड्वान के घर रखी महापुरुषों संतों और देवियों की सभी मूर्तियों से अचानक खून बहने लगा। रक्त-स्राव लगभग एक महीने तक सतत् जारी रहा, फिर स्वतः बंद हो गया। शरीरशास्त्री पत्थर की मूर्तियों से मानवी रक्त निकलने के रहस्य का किसी भी प्रकार उद्घाटन नहीं कर सके। उक्त प्रकरण का उल्लेख करते हुए चार्ल्स फोर्ट ने अपनी पुस्तक “दि कम्प्लीट बुक्स ऑफ चार्ल्स फोर्ट” में लिखा है कि जितने दिन ड्वान के घर की मूर्तियों में रक्त-स्राव जारी रहा, उतने दिन वहाँ एक अलौकिक शक्ति की अनुभूति निरंतर होती रही। वहाँ जो कोई बीमार आता, वह आश्चर्यजनक ढंग से स्वस्थ हो जाता। लोग इसे संत प्रतिमाओं का आशीर्वाद मानते और स्वास्थ्य लाभ कर फूले नहीं समाते।
इसी प्रकार की एक घटना ब्राजील के पोर्टो एलिगर गिरिजाघर में सन् 1968 में प्रकाश में करीब तान सौ वर्ष पुरानी ईसा मसीह की लकड़ी की एक क्रूस मूर्ति रखी हुई है। उक्त दिन अकस्मात् उससे रक्त बहने लगा। कुछ ही समय में ईसा के हाथ, पैर, कंधे रक्त रंजित हो उठे। खून की परीक्षा करने पर वह मानवी रक्त पाया गया। आशंका-निवारण के लिए विशेषज्ञों ने काष्ठ प्रतिमा की गहराई से छानबीन की, किंतु किसी तरह के संदेह की कोई गुंजाइश नहीं पायी गई। रहस्य अब तक अविज्ञात बना हुआ है।
इससे मिलता-जुलता प्रकरण लिम्पियास चर्च का है। उत्तरी स्पेन के सैनटैण्डर शहर के नजदीक इस गिरिजाघर में ईसामसीह की लकड़ी में उत्कीर्ण एक सुँदर क्रूस-प्रतिमा है। 30 मार्च 1919 को इस मूर्ति ने अद्भुत चेष्टाएँ करनी आरंभ कीं। कभी भगवान ईसा के नेत्र गोलक दांये से बांये घूमते प्रतीत होते, तो कभी विपरीत दिशा में। कभी गर्दन में हलचल होती तो यदा-कदा भौंहे गतिशील दिखाई पड़तीं। बीच-बीच में उनके चेहरे की भंगिमा बदलती रहती। कभी करुणा उमड़ पड़ती, तो कभी कठोरता का, गंभीरता का पुट विराजमान होता। कुछ पल पूर्व जिन अधरों पर मृदु हास्य खेलता होता, अगले ही क्षण उसमें एक अजीब भाव-शून्यता नाचने लगती।
यह सब वहाँ उपस्थित लोगों के अपने-अपने निजी अनुभव थे। जब से उस विग्रह के भाव-परिवर्तन की जनश्रुति फैली थी तब से वहाँ हजारों लोगों ने हजारों प्रकार की ऐसी अनुभूतियाँ प्राप्त की थीं। दर्शकों में एक चिकित्साशास्त्री डॉ॰ मैक्सीमिलियन ओर्ट्स भी वहाँ मौजूद थे। उनसे ईसा के चेहरे का सात गज दूर से एक बायनाकुलर्स के माध्यम से कई घंटे तक अध्ययन किया। जैसे ही चिकित्सक ने अपना यंत्र प्रतिमा के चेहरे पर केन्द्रित किया, एक ताजी रक्त बूँद दाहिने नेत्र से ढुलकते हुए कपोलों पर छलक गई। डॉक्टर ने उपकरण अपनी आँखों से हटाया, कुछ क्षण नेत्र मले और उस दृष्टिभ्रम पर पल भर विचार किया, जो अभी-अभी दिखाई पड़ा था। तनिक सोचने के उपराँत पुनः बायनाकुलर्स चक्षु से आ लगा। रक्त-स्राव अब भी यथावत् हो रहा था। उनने उसका गहराई से निरीक्षण किया, तो उन शोणित बिंदुओं में उन्हें जीवन प्रतीत हुआ। बाद में उन्होंने उपस्थित लोगों को बताया कि भले ही यह अनुभूतियाँ सूक्ष्म स्तर की हों, पर हैं एकदम जीवंत-स्थूल जैसी।
विलक्षणताएँ रहस्य की परिधि में तभी तक बँधी रहती हैं, जब तक उनका कारण न जाना गया हो। हेतु ज्ञात हो जाने के बाद फिर वह अनबूझ-अज्ञात नहीं रह जातीं। ज्ञात से अज्ञात एवं स्थूल से सूक्ष्म की ओर बढ़ने का क्रम हमारा लंबे काल से चला आ रहा है और अनंत काल तक चलता रहेगा, किंतु भौतिक स्तर पर होने वाले इन प्रयासों की भूमिका फिर भी स्थूल ही बनी रहेगी। बीस वर्ष पूर्व की तुलना में आज के विज्ञान ने निश्चय ही अधिक गहराई और अधिक सूक्ष्मता में प्रवेश किया है, इसके बावजूद उसका स्तर स्थूल बना हुआ है। प्रयास जब तक भौतिक स्तर पर जारी रहेंगे, रहस्यों को समझ पाना असंभव बना रहेगा। संभव और सुसाध्य वे तभी बन सकेंगे, जब अध्यात्म का अवलंबन लेकर चेतना को इतना पवित्र और परिष्कृत बना लिया जाय, कि आत्म चेतना एवं परमात्म चेतना में किसी प्रकार का कोई अंतर न रह जाय। स्थिति जब एकात्म-अद्वैत जैसी बन पड़ेगी, तो फिर सृष्टि और उसके पदार्थों का रहस्य समझते देर न लगेगी।
किसी काम के लिए उपयुक्त योग्यता, तद्विषयक दायित्व सँभालने से पहले ही अर्जित कर ली जानी चाहिए। काम करते हुए अनुभव बढ़ाना फिर उसे ठीक तरह सँभालने की तैयारी करना महंगा पड़ता है। अयोग्य व्यक्ति अनुभव के अभाव में कुछ तो करते ही रहते हैं, पर वे अधूरे और अस्त-व्यस्त रहते हैं, फलतः सस्ते दामों के कारण या निजी घनिष्ठता के कारण उसके कंधे पर भारी-भरकम दायित्व लाद देना पीछे पश्चाताप का कारण बनता है।
जिनसे जो कराना है, उसे उसके संबंध में सैद्धाँतिक और व्यावहारिक दोनों ही प्रकार की समग्र जानकारियाँ प्राप्त करना चाहिए। देखना चाहिए कि उतार-चढ़ाव की बदलती परिस्थितियों में वह तद्नुरूप तालमेल बिठा सकने की सूझ-बूझ विकसित कर सका या नहीं। समुचित योग्यता परखे बिना किसी को व्यवस्थापक जैसे संचालन-सूत्र सँभालने वाले व्यक्ति को नियुक्त नहीं किया जाना चाहिए, अन्यथा सूझबूझ और योग्यता की कमी के कारण वह अपना दायित्व ठीक तरह निभा न सकेगा, प्रगति का तारतम्य बिठाने की अपेक्षा अस्त-व्यस्तता का वातावरण खड़ा करेगा और असफलता का दोष समूचे तंत्र पर लगने देगा। सीखने के लिए छोटे-छोटे कामों के सहारे योग्यता संपादन करने का क्रमिक विकास चलने देना चाहिए। व्यक्ति को महत्व न देते हुए उस कौशल को प्रमुखता देनी चाहिए, जो सामूहिक प्रयत्नों के सहारे चलने वाले तंत्र के हर पक्ष पर समुचित ध्यान रख सके और समस्या उठते ही उसका समाधान कर सके। किसी व्यवसाय, कार्यालय आदि की इमारत, पूँजी, साधन-सुविधा कितनी ही बढ़ी-चढ़ी क्यों न हो सुयोग्य संचालक के अभाव में उसके द्वारा सराहनीय प्रगति संपादित न की जा सकेगी।
योग्यता का मापदंड किसी डिग्री को मान लेना भूल है। पुस्तकीय ज्ञान एक बात है और घाटे को रोकना तथा अभ्युदय का पथ प्रशस्त करने के लिए ऐसा अनुभव चाहिए, जिसमें सूझबूझ का ही गहरा पुट हो। उपयुक्त प्रबंधक की नियुक्ति किसी तंत्र की आधी सफलता मानना चाहिए। व्यक्ति विशेष के प्रति आग्रह भाव रखकर अयोग्य व्यक्ति के हाथों संचालन सौंप देना, खड़ा किया गया ढाँचा लड़खड़ा देने का प्रमुख कारण होता है। कार्यारंभ करते समय ही इस कसौटी पर खरे उतरने वाले व्यक्ति को ही जिम्मेदारी सौंपनी चाहिए। यदि इसमें कुछ भूल हो गई हो, तो उसे सुधारते हुए उपयुक्त व्यक्ति की तलाश एवं नियुक्ति करनी चाहिए, साथ ही यह भी ध्यान रखना चाहिए कि इस हेर-फेर में यथा संभव कटुता उत्पन्न न होने पाये।
इन दिनों लोग महत्वाकाँक्षाएँ पूरी करने में अत्यंत उतावली करते देखे जाते हैं। अपनी प्रशंसा के ऐसे पुल बाँधते हैं, मानो वे ही योग्य लोगों में ऊँचा स्थान प्राप्त कर चुके। जबकि बात ऐसी है कि छोटे काम करने के लिए भी संपर्क में आने वाले व्यक्तियों पर अपनी प्रामाणिकता की छाप डालना कम कला-कौशल नहीं, वरन् विकसित व्यक्तित्व का ऐसा प्रमाण है, जिसे कहीं भी चरितार्थ होते देखा जाता है। जिसे बड़े काम, बड़ी सफलता के साथ संपन्न करते हैं, उन्हें व्यक्तित्व विकास के हर पक्ष को परिपक्व करना चाहिए। इसमें देर लगती हो, तो छोटे सरल काम हाथ में लेने भर का साहस करना चाहिए। और अधिक योग्यों के सहायक रहते हुए अपनी अनुभव-संपदा में क्रमिक अभिवृद्धि करनी चाहिए। संस्थापक का भी कर्तृत्व बनता है कि अपने प्रमुख कर्मचारियों में से प्रत्येक का अधिक ज्ञान-संवर्धन के लिए उपाय करता और व्यवस्था बनाता रहे इस प्रतिस्पर्धा की दौड़ में व्युत्पन्न मति वाले लोग ही बाजी जीत पाते हैं। उन्हें खोजना अथवा अपने प्रयास से तैयार करना, यही दो उपाय सुसंचालक के हाथों कारोबार सौंपने के हैं। अयोग्य व्यक्तियों के घटियापन से किसी तंत्र को जितनी हानि और बरबादी सहनी पड़ती है, उतनी और किसी कारण नहीं।
संचालक का अपना स्वभाव ऐसे ढाँचे में ढलना चाहिए कि प्रतिकूलताओं के बीच भी अपना संतुलन बनाये रखे। होठों पर से मंद-मुसकान को किसी भी दशा में न जाने दें। भवें तरेरने, आँखें लाल करने की आदत ओछेपन की निशानी है। गंभीर लोग अपने ऊपर खीज सवार नहीं होने देते। गड़बड़ी बन रही हो, तो भी इतना आत्म-विश्वास बना रहना चाहिए कि वह साधारण बात है और उस पर निश्चय ही जल्दी ही काबू प्राप्त कर लिया जायेगा। आत्म विश्वास एक ऐसा गुण है, जिसे साहस एवं शौर्य, पराक्रम का प्रतीक माना जा सकता है। प्रतिकूलता उत्पन्न होते ही हड़बड़ा जाना और आपे से बाहर होने लगना कठिनाइयों को और दूना बढ़ा लेना है। उत्तेजित मस्तिष्क चढ़े हुए आवेश के कारण समाधान कारक निर्णय कर सकने की स्थिति में नहीं रहता। उस पर क्रोध, प्रतिशोध जैसे बुखार चढ़ बैठते और असमर्थ बनाकर छोड़ते हैं। असमर्थ को असफल होना ही है। आवेश तुरंत प्रतिक्रिया उत्पन्न करने वाला दुर्गुण है। किसी को उलटी होने लगे, तो निकटवर्ती दर्शकों का भी जी मिचलाने लगता है। जिस पर क्रोध किया गया है, वह दोष स्वीकार करने की अपेक्षा अपमान को प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लेता है और ऐसे उलटे व्यवहार पर उतर आता है, जिस से बात बनने की अपेक्षा और अधिक बिगड़े। पटरी बिठाने के लिए आवश्यक है कि विचार-विमर्श और आदान-प्रदान का रास्ता निकलने वाली मधुरता बनी रहे। जो सौम्य प्रकृति के, सौजन्य भरे स्वभाव के होते हैं, उनके प्रति सहज सहानुभूति उमड़ती है और पराये भी अपनों जैसा समर्थन सहयोग देने लगते हैं। खीज कोई समाधान नहीं ढूँढ़ पाती वह जलती आग में ईंधन डालने का काम देती है। इसलिए दुहरा अनर्थ न होने देने की दृष्टि से बुद्धिमत्ता इसी में है कि गुत्थियाँ उलझ जाने पर भी कम से कम अपना संतुलन तो बनाये ही रहा जाय। प्रबंधक के अन्य गुणों में यह स्वभाव भी बड़ा महत्व रखता है कि प्रसन्नता और आत्मविश्वास प्रगट करने वाली मुख मुद्रा बनाये रखी जाय।
मतभेद अक्सर उठते रहते हैं। स्वार्थ टकराते रहते हैं, अनुचित माँगे, पेश करते रहना अधिकांश लोगों के स्वभाव में सम्मिलित होता है। उस आदत को इच्छा मात्र से ही नहीं हटाया जा सकता। सही उपाय विचार विनिमय ही है। यदि एक पक्ष उत्तेजना ग्रस्त न हो, तो दूसरे उत्तेजित को भी विचार विनिमय के स्तर पर लाया जा सकता, तर्क, तथ्य, प्रमाण, उदाहरण प्रस्तुत करते हुए औचित्य को स्वीकार करने की स्थिति तक नरम बनाया जा सकता है। समझौता न भी हो सके, तो भी कम से कम ऐसी स्थिति तो बन ही सकती है कि अनुकूल स्थिति आने तक धैर्य बना रहे और तत्काल के लिए विग्रह टल जाय। इस स्थिति तक पहुँच जाने पर आधी बला टल जाने के समान है।
कई बार ऐसा भी होता है कि जड़ में कोई और कारण होता है और उसके कारण उत्पन्न हुए आक्रोश को व्यक्ति किसी दूसरे रूप में प्रकट करता है। ऐसी दशा में पत्तों को तोड़ने में समय खराब करने की अपेक्षा यह कहीं अच्छा है कि मूल कारण को तलाश किया जाय और समस्या जिस केन्द्र में उत्पन्न होती है, वहाँ तक परिवर्तन, प्रयासों को गहराई तक पहुँचाया जाय। कभी-कभी जड़ अन्यत्र होती है और उसके अंकुर कहीं और फूटते हैं। ऐसे छिपाव जहाँ भी अड़ रहे हों, वहाँ किसी विश्वासी मध्यवर्ती से ही उन दोनों क्षेत्रों को सुलझाने में मदद ले सकते हैं।
संक्षेप में काम की बात कर लेना अच्छा गुण है। इससे दोनों पक्षों का अनावश्यक समय बरबाद होने से बच जाता है, पर साथ ही यह भी आवश्यक है कि इतनी चुप्पी भी बुरी है कि अपनी बात को दूसरे के सामने सही ढंग से प्रस्तुत करते भी न बन पड़े, लोगों को संकोची, झेंपू, अबोध-कहने का अवसर मिले। अतिवाद की सीमा तक चलते रहने वाली वाचालता पर तो अंकुश रखा जाय, पर किसी भी सामाजिक व्यक्ति को अपने कहने और दूसरों की सुनने जैसी उत्सुकता तो होनी ही चाहिए अन्यथा उपेक्षा बरती जाने के संदेह में कोई दूसरे अपने मन की बात भी न कह सकेंगे और अपने को कितनी ही महत्वपूर्ण जानकारियों को प्राप्त करने से वंचित रहना पड़ेगा। मध्यवर्ती वार्तालाप कर सकने का गुण तो उस स्तर के लोगों में होना ही चाहिए, जिनका अनेक लोगों से वास्ता पड़ता है और गलतियों को सुधारने से लेकर अच्छाइयाँ बढ़ाते रहने तक के अनेक संदर्भों में वास्ता पड़ता रहता है।
जिन्हें कौशल अर्जित करना है और व्यक्तित्व को अधिक परिष्कृत, प्रभावशाली बनाना अपेक्षित है, उन्हें ऐसे अवसरों की भी प्रतीक्षा करते रहना चाहिए, जिसमें अधिक प्रतिष्ठित और क्रिया कुशल समझे जाने की मान्यता है। यदि उनसे कुछ पाने-सीखने का भाव हो तो उनके अनुकरणीय क्रिया-कलापों को गंभीरतापूर्वक देखते रहना चाहिए और प्रयत्न करना चाहिए कि वैसी ही उत्कृष्टता का अनुकरण करने के लिए अपने में आवश्यक परिवर्तन बन पड़े।
घटिया लोग जगह-जगह आसानी से मिल जाते हैं। उनसे वास्ता भी अकारण ही पड़ जाता है। छाप तो भले-बुरे सभी की पड़ती है। यहाँ सावधानी यही बरतने की है कि श्रेष्ठता का अभिग्रहण और दुर्जनों में पाई जाने वाली दुष्टता से आत्मरक्षा करते रहने की जागरुकता बनी रहे। इस प्रकार हर स्तर का व्यक्ति अपने संपर्क में आते रहने पर भी उनका उपयुक्त प्रभाव ही ग्रहण करते रहने का सुयोग बन जाता है। किसी की चापलूसी या उजड्डता अपने को प्रभावित न करने पाये, यह शालीनता का एक सुरक्षात्मक कवच है।
जीवन की घरेलू समस्याएँ हर किसी के सामने होती हैं। इनमें से कुछ तो प्रसन्नता भी देती हैं, पर अधिकांश ऐसी होती हैं जिनके लिए चिंता करनी पड़ती है और बेचैनी अनुभव होती है। ऐसे प्रसंगों को घर छोड़ते समय ही वापस लौटने पर विचार करने के लिए छोड़ देना चाहिए। दफ्तर की मेज तक उनमें से किसी को भी नहीं पहुँचने देना चाहिए। स्थान परिवर्तन करने से क्रियाकलापों में ही स्थिति के अनुरूप हेर-फेर करना पड़ता है। ऐसा ही परिवर्तन घर के और दफ्तर के वातावरण में क्रियाकलापों में अंतर समझते हुए मानसिक परिवर्तन कर लेना चाहिए। दो जगह की या कई प्रकार की समस्याएँ मस्तिष्क में घूमती रहें, तो उसका दुष्परिणाम यह होगा कि हाथ में लिए काम को पूरी समझ के पूरी दिलचस्पी के साथ न किया जा सकेगा। ऐसी दशा में वह वैसी अच्छी तरह न सध सकेगा, जैसा कि एकाग्रता के साथ ही दिलचस्पी भी बनाये रहने पर संभव हो सकता है। अन्यत्र की समस्या का हल दफ्तर में बैठकर नहीं हो सकता। उसके लिए अन्यों से परामर्श एवं संपर्क बनाना पड़ेगा। जो जिम्मेदारी भरे कार्यालय में बैठकर संभव नहीं हो सकता। ऐसी दशा में अनेक प्रकार की चिंताओं, समस्याओं, इच्छाओं से मस्तिष्क घिरा रखना किसी भी समय उपयुक्त नहीं, पर विशेषतया तब तो और भी अधिक घातक सिद्ध होता है, जब किसी महत्वपूर्ण तंत्र की जिम्मेदारियाँ वहन करने में समूचा मनोयोग लगाने की आवश्यकता पड़ रही हो। अच्छे प्रबंधक अपने को किसी व्यर्थ की खींचतान में नहीं पड़ने देते।
बढ़ी-चढ़ी भावुकता प्रायः अतिवाद की सीमा छूने लगती है। कल्पनाएँ, योजनाएँ भी ऐसी बनने लगती हैं, जो व्यवहार में आसानी से नहीं उतारी जा सकतीं। फिर हर महत्वपूर्ण कार्य में साथियों से, विशेषज्ञों से परामर्श करने की भी आवश्यकता होती है। कल्पना तो आकाश-पाताल की भी की जा सकती है, पर वहाँ तक पहुँचने के न तो साधन होते हैं, न समय न अनुभव। ऐसी दशा में असंभव स्तर की कल्पनाएँ प्रायः निरर्थक बनकर ही रह जाती हैं। इतने पर भी जब भावुकता की उड़ाने विवेक की मर्यादाएँ तोड़कर हवाई-अंधड़ के साथ उड़ने लगती हैं, तो फिर रंगीन चश्मा पहन लेने जैसी स्थिति हो जाती है। जिस रंग का चश्मा हो, उसी प्रकार की सभी वस्तुएँ दीखने लगती हैं। कभी-कभी ऐसी भली-बुरी, संभव-असंभव कल्पनाओं का भी दौर आता है। अपनी सोची हुई बात उचित एवं उपयुक्त लगने लगती है। बात यहाँ तक बढ़ जाती है कि उतावली में मनमर्जी के अनुरूप कदम भी उठा लेते हैं। ऐसी दुर्भावनाएँ युवक युवतियों के प्रेम-प्रसंगों में तो आये दिन होती और पश्चाताप का कारण बनती रहती हैं, पर आश्चर्य तब होता है, जब किसी तंत्र के संचालक में भी ऐसी ही घटनाएँ आये दिन होती देखी जाती हैं। सीमा से अधिक खर्च कर डालना, उधार बाँट देना, चुगली सुनकर अपनी धारणा तद्नुरूप बना लेना, वेतन संबंधी महत्वाकाँक्षाओं की चाहें जिस सीमा तक बढ़ने देना चिंता व बचकानेपन का कारण है। मित्रता, शत्रुता के संबंध में भी ऐसे ही व्यतिरेक होते रहते हैं, जो नहीं होने चाहिए। सामान्य की सीमा में बने रहना ही उचित है। संबंधी को अति घनिष्ठता का या अति उपेक्षा का बना लेना कवि-कलाकारों के लिए उपयुक्त हो सकता है, किंतु प्रबंधकों को तो व्यावहारिकता से ही वास्ता पड़ता है। इसलिए संबंधों में, स्वजनों में अतिवाद का समावेश नहीं होने देना चाहिए। इससे किसी कुचक्र की गंध भी सूँघी जा सकती है और उस असमानता को देखते सामान्य संबंध वालों में ईर्ष्या भी उभर सकती है, जो आगे चलकर अनुपयुक्त झंझट अकारण खड़े करे।
चिंतन, समय, श्रम, मनोयोग सृजन प्रयोजन में लगाना चाहिए और उस पक्ष पर अधिक ध्यान देना चाहिए, जिसमें हाथ में लिए कारोबार को सार्थक-समृद्ध अधिक सफल बनाने के लिए सहभागियों और सत्परामर्शदाताओं के साथ अधिक संपर्क रखना चाहिए। हमें किससे बदला लेना, कौन अपनी क्या क्षति पहुँचाने वाला है, इस विषय पर मोटी दृष्टि रखनी चाहिए, पर अधिक ध्यान नहीं देना चाहिए। हानि की आशंकाएं कभी-कभी ही सामने आती हैं किंतु सृजन संवर्धन के संबंध में किया गया चिंतन ऐसे द्वार खोलता है, जिससे अपना गौरव बढ़े और जो काम हाथ में लिया गया है, उसमें प्रगति होती रहे। चिंतन की धारा विधेयात्मक होनी चाहिए। निषेधात्मक पक्ष में सोचते रहने वाले ओछे व्यक्तियों के साथ संबंध बढ़ाने वाले पाते तो कुछ नहीं, हानि होने के सरंजाम जुटाते रहते हैं।
परिस्थितियाँ तेजी से बदलती रहती हैं। उसके साथ ही अपने चिंतन एवं क्रियाकलापों को भी बदलना पड़ता है। नई ढंग की, नई सुविधा देने वाली मशीनें बाजार में आ जाने से पुराने ढर्रे को अपनाये रहने वाले पिछड़ जाते हैं। इसलिए समय के साथ चलने में ही भलाई समझी जाती है। लोगों की सोच और आवश्यकताएं बदलती रहती हैं। ऐसी दशा में पुराने ढर्रे पर अड़े रहने की अपेक्षा भलाई है कि समय की माँग के अनुरूप आवश्यक परिवर्तन करते रहा जाय। ऐसे परिवर्तनों में तत्काल खर्चीली व्यवस्था करनी पड़ सकती है, पर उस संदर्भ में किया गया श्रम या खर्च अगले ही दिनों अधिक लाभ देने लगता है। प्रबंधक में इतनी प्रत्युत्पन्न मति तो होनी ही चाहिए कि चलने वाली प्रतिस्पर्धा में अपने कार्य को पिछड़ने न दें और जहाँ परिवर्तन आवश्यक है वहाँ उसे करते रहने के लिए साथियों को सहमत करते रहें। किसी भी प्रबंधक, व्यवस्थापक, संगठक में इतने गुण तो होना ही चाहिए।
ईरान के बादशाह ने नगर पर चढ़ाई कर दी । उसे चारों ओर से घेर लिया गया और आज्ञा प्रसारित करा दी गई कि “भोर होते-होते सभी स्त्रियाँ अपने कीमती आभूषण लेकर अमुक स्थान पर पहुँच जाय किंतु पुरुष एक भी नहीं निकलना चाहिए”
नगर में हल-चल मच गई प्रातः काल होते ही सभी स्त्रियाँ छोटे बड़े गट्ठर लिए उस स्थान पर एकत्रित हुई। बादशाह को संदेह हुआ कि गठरियों में आभूषण के अतिरिक्त कुछ और है। गट्ठर खुलवाये गये तो उनमें आदमी निकले। बादशाह ने कड़क कर पूछा क्या यही आभूषण हैं। उनमें एक वृद्धा बोली-”जी महाराज ! हमारे लिए पति और पुत्रों से बढ़कर और कोई संपत्ति नहीं है।”
बादशाह ने विचार किया जहाँ की महिलाएँ इतनी कर्तव्य परायण और पुरुष के प्रति इतनी समर्पित हों, वहाँ अधिकार नहीं जमाया जा सकता, वह चुपचाप सेना लेकर लौट गया।
प्रज्ञायोग साधना उपक्रम में नित्य सवेरे आँख खुलते ही बिस्तर पर पड़े-पड़े यह चिंतन करना चाहिए कि आज हमारा नया जन्म हुआ है। यह एक दिन के लिए ही है। इसका श्रेष्ठतम सदुपयोग करना चाहिए। इसके लिए सोते समय तक की ऐसी दिनचर्या बना लेनी चाहिए कि आवश्यक विश्राम को छोड़ कर सारा दिन व्यस्तता में बीते और उसमें शरीर यात्रा के साँसारिक कार्य ही नहीं आत्मोत्कर्ष के निमित्त परमार्थ प्रयोजनों के लिए भी स्थान रहे।
रात को बिस्तर पर जाते समय दूसरा मनन करना चाहिए कि आज की निर्धारित दिनचर्या पूरी हुई या नहीं ? यदि उसमें कुछ त्रुटियाँ रहीं हों तो भविष्य में कड़ाई के साथ ऐसी भूलों के परिमार्जन की बात सोचनी चाहिए।
“हर प्रभात नया जन्म और हर रात नयी मौत” का सिद्धाँत अपने चिंतन का प्रमुख विषय रहना चाहिए। हम मौत को भूले रहते हैं और बहुमूल्य जीवन संपदा को अनुपयुक्त ढंग से गँवा कर चलते समय पश्चाताप करते हैं और पापों का पोटला सिर पर बाँधकर उनका दुष्परिणाम भुगतने के लिए विवश होते हैं। यदि मृत्यु का ध्यान बना रहे तो मनुष्य नारकीय यंत्रणाएँ देने वाली दुष्प्रवृत्तियों से बचा रह सकता है। यह दो कृत्य नियमित रूप से चलें और उनमें गंभीरता रहे तो मनुष्य की जीवनचर्या ऐसी सुँदर और शानदार ढंग से चलती रह सकती है। जिसे सुँदर और शानदार बनाया जा सके। यह कार्य एक दिन का नहीं नित्य विचारने का है। उठते और सोते समय इसे किया ही जाना चाहिए।
इसके अतिरिक्त प्रज्ञायोग के उपक्रम में कम से कम आधा घंटा एकाँत समय ऐसा निकालना चाहिए जिसे आत्म-निरीक्षण कहा जा सके। इसके लिए कोई अतिरिक्त नियम नहीं।
भीड़ कोलाहल के कारण चित्त न बटे इतनी व्यवस्था बना लेना ही पर्याप्त है।
स्थूल जीवन का सूक्ष्म सत्ता द्वारा निरीक्षण-पर्यवेक्षण, यही है इस साधना का उद्देश्य। दूसरे लोगों की, किसी के भीतर की-अविज्ञात कर्मों की-मनःस्थिति की जानकारी नहीं रहती, पर अपने आप से तो अपनी कोई बात छिपी नहीं होती। इसलिए वहाँ के अपने असली-नंगे स्वरूप में ही प्रकट होना चाहिए।
इस पर्यवेक्षण के चार भाग है
(1) आत्म समीक्षा (2) आत्म सुधार (3) आत्म निर्माण (4) आत्म विकास
(1) आत्म समीक्षा में देखा यह जाना चाहिए कि कितनी सत्प्रवृत्तियाँ और कितनी दुष्प्रवृत्तियाँ अपनायी गयीं। गुण-कर्म-स्वभाव में कितनी श्रेष्ठता और कितनी निकृष्टता का समावेश रहा। इस तथ्य को अपने साथ पक्षपात बरतते हुए नहीं वरन् निष्पक्ष न्यायाधीश की तरह परखना चाहिए।
(2) आत्म सुधार दूसरा चरण है। जो दुष्प्रवृत्तियाँ अपने ऊपर लदी हों उन्हें मिटाने या घटाने की योजना बनाकर कार्यान्वित करनी चाहिए। अंतःक्षेत्र में एवं व्यावहारिक जीवन में जो कषाय-कल्मष पनपते हों। उनके दुष्परिणामों का आकलन करना चाहिए। उनके विरोधी तर्क, तथ्य, प्रमाण, उदाहरण इतने एकत्रित करने चाहिए कि उनकी टक्कर खाकर कुसंस्कारों को पलायन ही करना पड़े।
(3) आत्म निरीक्षण का तीसरा चरण है-आत्म सुधार। इतना ही पर्याप्त नहीं कि मात्र दोष दुर्गुणों से ही बचे रहा जाय। ऐसा तो वृक्ष भी कर लेते हैं और गाय बैल भी। देखना यह चाहिए कि मानवोचित सद्गुणों की कितनी कमी है और उसकी क्षति पूर्ति करने के लिए किस प्रकार का दैनिक कार्यक्रम बनाया गया।
(4) चौथा चरण है आत्म विस्तार आम
(4) चौथा चरण है आत्म विस्तार आम
वर्तमान हेय या सामान्य स्थिति को किस प्रकार श्रेष्ठजनों के अनुरूप अभिनंदनीय, अनुकरणीय बनाया जाय। इसकी समग्र रूपरेखा बनाना और उसे कार्यान्वित करने में जुट पड़ना यही है आत्म पर्यवेक्षण का उद्देश्य। प्रज्ञायोग का यह साधना उपचार निश्चित ही मनुष्य को महानता के पथ पर ले जाने वाला है।
विशेष सूचना
त्रैमासिक बंगला अखण्ड ज्योति जनवरी, 94 से मासिक होने जा रही है। इसका वार्षिक बंगला प्रकाशन संपर्क सूत्र-
युग निर्माण योजना 2, मल्लिक स्ट्रीट 1 तल्ला कलकत्ता-7
संसार वस्तुतः है क्या ? मिथ्या ? भ्रम , या सत्य ? यदि इसे सत्य माना जाय, तो वह तो निरपेक्ष और अपरिवर्तनशील है। उसका स्वरूप सदा एक-सा व स्थिर होता है, पर यहाँ जो कुछ दिखाई पड़ता है, वह न स्थिर है, न स्थायी। आज कुछ तो कल कुछ है। सब बदलता रहता है। फिर इसे सत् कैसे माना जाय ? असत् स्वीकारने की जब बारी आती है, तो असमंजस यह उठ खड़ा होता है कि आँखों को प्रत्यक्ष भासने वाला दृश्य मिथ्या कैसे हो सकता है ?
अंतर को अधिक स्पष्टता पूर्वक समझना हो, तो कोशिका-विज्ञान का सहारा लिया जा सकता है। विज्ञान कहता है कि प्राणी और पादप असंख्य कोशिकाओं के मिलने से बनते हैं, किंतु नंगी आँखें उन्हें कहाँ देख पाती हैं ? जो देखती हैं, वह वनस्पतियों में वल्कल और काष्ठ जैसी संरचना होती है एवं जंतुओं में अस्थि, माँस, मज्जा। मूल घटक हर हालत में अदृश्य ही बने रहते हैं, पर इन्हीं को जब सूक्ष्मदर्शी यंत्र के माध्यम से देखा जाता है, तो कोशिकाएं हस्तामलकवत् स्पष्ट हो जाती हैं। न सिर्फ कोशिकाएं, वरन् उसकी भीतरी संरचना भी प्रत्यक्ष दीखने लगती है। अब यदि इन्हें और अधिक शक्तिशाली इलेक्ट्रान माइक्रोस्कोप से देखा जाय, तो बनावट कुछ और ही दिखाई पड़ती है। यहाँ कम्पाउण्ड माइक्रोस्कोप में जो कुछ देखा गया, यहाँ वह सब बदला-बदला दिखाई पड़ता है। यदि इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप से भी अधिक अभिवर्धन-सामर्थ्य वाला कोई यंत्र बना लिया जाय तो संभव है कोशिका-रचना संबंधी वह कुछ भिन्न ही रहस्य उद्घाटित करे। इसी प्रकार जैसे-जैसे अधिक शक्तिशाली उपकरण विकसित होते जायेंगे, पिछले तथ्य बदलते जायेंगे। यह क्रम सतत् जारी रहेगा। इसका कोई अंत नहीं। ऐसी स्थिति में सत्य-असत्य का निर्णय कर पाना असंभव है। यदि प्रथम को सत्य माना जाय तो बाद वाले तथ्य के प्रकट होने पर उसे भ्रम कहना पड़ेगा। फिर और आगे के रहस्योद्घाटन होने पर एक समय का स्थापित सत्य भ्राँति सिद्ध हो जाता है। यह शृंखला कभी रुकने वाली नहीं।
वैज्ञानिकों ने पृथ्वी के अपनी धुरी पर एक संपूर्ण चक्कर के आधार पर रात-दिन को बारह-बारह घंटों में विभक्त किया और इन्हें बताने वाली 12 घंटे की घड़ियों का निर्माण किया, ताकि रात अथवा दिन में समय का अनुमान लगाया जा सके अथवा रात कितनी बाकी है और दिन कितना चढ़ गया, इसका अंदाज मिल सके। अपने यहाँ रात-दिन करीब-करीब बराबर अवधि के होते हैं। गर्मियों के दो-एक घंटे बड़े दिन और सर्दियों की करीब इतनी ही बड़ी रात के न्यून अंतराल को छोड़ दिया जाय, तो अवधि वर्ष भर दोनों की लगभग बराबर ही कही जायेगी, किंतु इंग्लैण्ड में गर्मियों में जब रात के ग्यारह बजते हैं, तब भी सूर्य आकाश में चमकता रहता है। नार्वे ओर फिनलैण्ड जैसे देशों में तो स्थिति और भी विलक्षण है। वहाँ के कुछ हिस्सों में तीन महीने की रात और रात तीन महीने के दिन होते हैं, अर्थात् जब घड़ियाँ दिन बताती हैं, तो भी वहाँ रात होती है और दिन की लंबी अवधि में जब रात आती है, तो भी वहाँ दिन का प्रकाश बना रहता है। अब सत्य किसे माना जाय ? प्रत्यक्ष दृश्य को ? या घड़ी को ? घड़ी को असत्य भी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि वह पृथ्वी की उस विशेषता पर आधारित है, जिसके कारण पृथ्वी 24 घंटे में एक बार पूरी तरह अपनी कील पर घूम जाती है, और जो रात-दिन के लिए जिम्मेदार होती है।
ऐसे ही कितने ही उदाहरण दिये जा सकते हैं, जिसमें सत्य-असत्य का निर्णय कठिन होता है। एक छोटी रेखा सीधी है या कुछ गोलाई लिए हुए यह कहना मुश्किल होता है, क्योंकि वह रेखा एक बड़े वृत्त का छोटा हिस्सा हो सकती है। इस स्थिति में वह गोलाई युक्त होगी, पर आँखों को वह सीधी ही दिखाई पड़ती है। पृथ्वी घूम रही है, किंतु वह हमें स्थिर प्रतीत होती है। जबकि सूर्य स्थिर है, परंतु इंद्रियों को वह घूमता नजर आता है। यह प्रत्यक्ष अनुभूतियाँ हैं। इन्हें असत्य कैसे माना जाय ? ऐसे ही सुख-दुःख, जीवन-मरण, भला-बुरा, धर्म-अधर्म, घृणा-प्रेम जैसे कितने ही प्रसंग हैं, जहाँ शुभ-अशुभ के निर्णय में बुद्धि धोखा खाती है। देखा जाता है कि एक बात या वस्तु किसी को सुख पहुँचाती है, तो दूसरे ही पल किसी दूसरे के लिए वह दुःख का कारण बन जाती है। फिर उसे सुखकारक कहना चाहिए या दुःखकारक बताना दुष्कर है। अग्नि व्यक्ति को जला देती है, पर वही भूख से तड़पते प्राण त्यागते व्यक्ति के लिए भोजन भी पका सकती है। एक स्थान पर वह मृत्युकारक बन जाती है, तो दूसरी जगह जीवन-रक्षक। उसकी वास्तविक सत्ता कैसी है-जीवनदायी ? या प्राणहारी ?
उत्तर वेदाँत देता है। वह कहता है कि यह संसार न तो दुःखदायी है न सुखदायी-न जीवनदायी न प्राणहारी-न शुभ है, न अशुभ, वरन् दोनों का सम्मिश्रण है। यहाँ शुभ भी है, अशुभ भी। दुःख भी है और सुख भी। दोनों के परिमाणों में न्यूनाधिकता हो सकती है, पर पूर्ण शुभ अथवा पूर्ण अशुभ-पूर्ण सत्य या पूर्ण असत्य की कल्पना नहीं की जा सकती। यह वास्तविकता से परे है। वेदाँत ने इसी को ‘माया’ अथवा ‘मिथ्या’ कहा है।
परस्पर विपरीत और विरोधी भाव ही माया है। इससे मुक्ति का एकमात्र मार्ग यही है कि हम अपनी दृष्टि सदा खुली रखें और बदली परिस्थितियों में उत्कृष्टतावादी उपयोगिता के आधार पर श्रेष्ठतम सत्य को अपना कर अपनी रीति-नीति, आचार-विचार में आवश्यक फेर-बदल के लिए तैयार रहें। निरपेक्ष सत्य की ओर अग्रसर होने का यही एक मात्र रास्ता है।
विशालकाय संरचनाएँ गढ़ने और अद्भुत इमारतें खड़ी करने का महत्व तब है, जब वह लाभदायक और उपयोगी सिद्ध हों, अन्यथा वे कौतुक कौतूहल मात्र बनकर रह जाती हैं। ऐसे आश्चर्य तो प्रकृति में ही असंख्यों भरे हैं, फिर बहुमूल्य साधन-सामग्री नियोजित कर इन अचम्भों को खड़ा करने की कोई तुक रह नहीं जाती। इतने पर भी न जाने क्यों मनुष्य ऐसे कृत्यों में संलग्न देखा जाता है।
यह प्रवृत्ति मात्र वर्तमान समाज की है, सो बात नहीं। सभ्यता के प्रारंभ से ही इस प्रकार की प्रवृत्तियाँ मनुष्य में पकने-पनपने लगी थीं, जो बाद में मूर्त रूप धारण कर ऐसे निर्माणों की शृंखला खड़ी करने में तत्पर हो गईं, जिस पर अंकुश अब तक नहीं लगाया जा सका है।
ऐसा ही एक निर्माण अपनी विलक्षणता की गाथा गाते लेबनान में देखा जा सकता है। बेरुत से 53 मील यह भव्य संरचनाएँ रोमन मंदिरों की हैं, जिनके निर्माण काल के बारे में पुरातत्त्ववेत्ताओं का अनुमान है कि यह प्रथम शताब्दी के आस-पास विनिर्मित हुए। मंदिर समूह एक ऊँचे प्लेटफार्म का विहंगावलोकन अत्यंत मनोहारी लगता है, किंतु उक्त निर्माण की यही एकमात्र विशिष्टता नहीं है। सबसे बड़ी विचित्रता वहाँ की वह विशाल दीवार है, जो मंदिर के चारों ओर बनी हुई है। यह दीवार आज भी विशेषज्ञों को अपनी विशालता के कारण स्तंभित किये हुए है। दीवार के पश्चिमी सिरे पर तीन भीमकाय चट्टानें काट कर तराशी हुई स्थिति में रखी गई हैं। यह शिलाखंड अपने विराट् आकार के कारण अजूबे और विश्व प्रसिद्ध बने हुए हैं। आधुनिक इंजीनियरों के लिए सर्वाधिक आश्चर्य की बात यह है कि इतने बड़े शिलाखंड खदान से उस स्थान तक लाये किस प्रकार गये ? और यदि किसी विशेष युक्ति से यह संभव हो सका, तो फिर उन्हें वर्तमान स्थान और स्थिति में रख पाना किस भाँति शक्य हो सका ? उनके लिए यही सबसे जटिल प्रश्न बना हुआ है, जिसका उत्तर दे पाना अभी शेष है, क्योंकि उनका मानना है कि आज के वैज्ञानिक युग में अत्याधुनिक परिष्कृत यंत्रों के माध्यम से भी यह कार्य संपादित कर पाना एक प्रकार से टेढ़ी खीर है, फिर भी रोमन साम्राज्य के दौरान इसे संपन्न किया गया और तब से लेकर अब तक की करीब दो हजार साल की अवधि तक में वे अपनी स्थिति यथावत् बनाये हुए हैं। यह और भी विस्मयकारी है।
चट्टानें “ट्रायलीथन” के नाम से प्रसिद्ध हैं। आकार-प्रकार में यह इतनी विस्तृत हैं कि यदि वे खड़ी की जा सकें, तो प्रत्येक प्रस्तर खण्ड आज की छः मंजिली इमारत जितने ऊँचे होंगे। सबसे बड़ा खण्ड 64 फुट ऊँचा, 12 फुट चौड़ा और 14 फुट लंबा है, इसका वजन करीब आठ सौ टन है। यह शिलाएं बारबेक स्थित मंदिर स्थल से लगभग एक मील दूर एक खदान से काट कर निकाली और निर्माण-स्थल तक लायी गई, जहाँ उन्हें 25 फुट ऊँचे छोटे पत्थरों से बने प्लेटफार्म पर रखा गया। इनके सिरों को इतनी दक्षता पूर्वक परस्पर मिलाया और जोड़ा गया है कि उनके बीच ब्लेड को भी घुसा पाना संभव नहीं। इससे तब की उच्चस्तरीय शिल्पकला का संकेत मिलता है। रहस्य तब और गहरा जाता है, जब यह ज्ञात होता है कि खदान में ट्रायलीथन से भी विराट आयतन वाला एक पाषाण-खण्ड अब भी पड़ा हुआ है, इसका वजन हजार टन जितना आँका गया है। इसके संबंध में कोई यह नहीं जानता कि इस अंतिम खण्ड का प्रयोग क्यों नहीं किया गया ? शायद आज के विशेषज्ञ इसका यह कह कर उत्तर दें कि तत्कालीय समय की वैज्ञानिक प्रगति के हिसाब से यह चट्टान इतनी भारी साबित हुई कि उसे स्थानाँतरित कर पाना असंभव बन गया हो, फलतः वह अनुपयोग दशा में अपने मूल स्थान में पड़ी रह गई हो।
कारण चाहे जो हो, रोमनों की इस प्रकार की विलक्षण निपुणता के बावजूद भी ऐसा कोई दूसरा उदाहरण रोमन साम्राज्य में अन्यत्र कहीं देखने को नहीं मिलता। इससे ऐसा प्रतीत होता है कि किसी सनकी सम्राट ने स्वयं को श्रेष्ठ व यशस्वी बनाने के लिए यह संरचना खड़ी की हो और यथास्थिति बनाये रखने के लिए बाद में निर्माताओं का वध कर दिया हो। इतने पर भी आज न तो उसके सृजेता का पता है और न ही उस अद्भुत सृजन को अक्षुण्ण रखने में वह सफल हो सका है। फिर इस अनुपयोगी श्रम का लाभ ? लगभग नगण्य जितना ही है। यदि इतना परिश्रम उसने अपने व्यक्तित्व को गढ़ने और खुद को उत्कृष्ट बनाने में किया होता, तो न सिर्फ वर्तमान में दूसरों के लिए प्रेरणा-स्रोत साबित होता, वरन् उच्चादर्शों के कारण इतिहास-पुरुष बन कर इन दिनों भी जी रहा होता, पर आडंबर के उलझाव ने उसे कहीं का नहीं रहने दिया। न तो जीवन का श्रेष्ठतम सदुपयोग बन पड़ा, न वही प्रयोजन सध सका, जिसमें वह प्रयोजन सध सका, जिसमें वह आजीवन संलग्न रहा। हम आकर्षक व्यक्तित्व की संरचना गढ़ें, अनावश्यक कौतुक खड़ा न करें-यही समाज की सर्वोपरि आवश्यकता और समय की माँग है।
सिर झुकाए अपनी भावना में मग्न वह चला आ रहा था। यदा-कदा उसकी आँखें सामने के अगणित-अद्भुत दृश्यों पर प्रकाश बिखेर देतीं। कितने ही प्राँत शस्य श्यामल कितने ही खेत, कितने ही वैभवशाली प्रसिद्ध नगर कितनी ही वरसि विक्षुब्ध नदियाँ, न जाने कितने विशाल सरोवर छूट गए। बालक के चित्त को ये सब अपनी सुहावनी सृष्टि की ओर न आकर्षित कर पाए। प्रभात की हिरण्य किरणों की चपल बाल-लीला, दोपहर की उग्रमूर्ति की कराल तपन, अस्तगामी सूर्य का अंतिम अभिवादन सब चुक गया। पर उसकी वृत्ति ज्यों की त्यों सुमेरु की तरह अटल, समुद्र सी गंभीर, अमावस की महानिशा सी गहन और धरित्री सी धीर बनी रही। लगन में कोई बाधा उसे पराजित न कर सकी। लक्ष्य में कोई प्रलोभन उसे च्युत नहीं कर पाया।
ध्येय की ओर अग्रसर उसकी दुर्वार गति सभी को पीछे छोड़ती जा रही थी। स्नेह की मूर्ति माता, साथ खेलने वाले मुनियों के बालक, प्रकृति की अनोखी मुसकान पर इतराती हुई हरी-भरी कितने ही प्रकार के सुरभित कुसुमों से लहलहाती लताओं और कोमल पल्लवों वाली अरण्य-भूमि-जहाँ उसका जन्म हुआ था, प्रभात की किरणों से नहाती हुई, सर्वस्व समर्पित करने के लिए पुष्पाँजलि लेकर परमात्मा को रोज अर्घ्य देने वाली वह विभूति पीछे पड़ी रह गई। उस ओर से उसके हृदय में तीव्र वैराग्य उमगा था। वह उससे भी बढ़कर एक दूसरे सत्य की खोज हेतु आकुल हो उठा था। ऐसा सत्य जो क्षण-क्षण बदलने वाली असीम प्रकृति से परे निस्सीम और शाश्वत था। आज अपनी लघु सीमा में जकड़कर संसार के सामने एक बहुत बड़े रहस्य पर पर्दा नहीं पड़े रहने देना चाहता था। उसकी चाहत है चिरकाल के लिए दुःख, अपमान, निरादर, असंतोष की राक्षसी वृत्ति और निर्मम क्रूरता के दौर, निर्दयता से बचने का उपाय मानवों को मालूम हो जाय।
जंगल की टेढ़ी-मेढ़ी पगडंडियों पर बढ़ रहे उसके कदम अनायास थम गए। पावों के रुकने का कारण यह वाणी थी जो उसके कानों में पड़ी-”बेटा तू कौन है ? कहाँ जा रहा है ?” उसने अपनी नजर उठाई माथे पर बिखरी अलकें, स्वेद बिंदुओं के कारण इधर-उधर चिपक गई थीं। दिखाई पड़ा बगल के एक विशाल वृक्ष के पीछे से कुछ ऋषि निकलते चले आ रहे हैं। ऋषियों की आँखों में दया और आश्चर्य के भावों का मिश्रण घनीभूत था। बालक ने गणना की-एक-दो-तीन-चार-पाँच-छः-सात यानि सप्त ऋषि। ऋषि आश्रमों के बीच पला-बढ़ा वह इनसे सर्वथा अपरिचित नहीं था। प्रत्यक्ष न सही परोक्ष परिचय तो था ही। ऋषिगण भी उसकी मनोहर शाँत-मूर्ति की ओर आकर्षित हुए। उसमें ऐसा ही अपनाव था। ऋषियों का सत्वगुण उसके महासत्व की ओर आप ही आप खिंच गया। तभी तो उनका मौन ध्यान ईश्वर से हटकर इस बालक की ओर आ मिला। संसार को भूले हुए इन ऋषियों ने संसार की एक अनमोल रचना देखी।
एकटक उसे निहार रहे इन ऋषियों को उसने भूमिष्ठ होकर प्रणाम किया। बारी-बारी से सभी ने उसके सिर पर अपना हाथ फिराया। आशीर्वचनों से भरे अनेकों शब्द-घट उस पर उड़ल पड़े। “भगवन् ! मैं महाराज उत्तानपाद का पुत्र हूँ। मेरा नाम ध्रुव है।” वह अपना परिचय बता रहा था। “मेरी माता को विमाता के आने पर पिता ने निर्वासित कर दिया। वहीं अरण्य में मेरी उत्पत्ति हुई। ऋषियों की कृपा से उन्हीं के सान्निध्य में मेरा पालन हुआ। एक दिन मैं पिता के यहाँ साथी ऋषिकुमारों के साथ पहुँच गया। उनने मुझे अपनी गोद में बिठा लिया। यह देखकर विमाता ने मेरी बाँह पकड़ी और घसीट कर गोद से नीचे उतार दिया।”
“साधारण सी इस घटना ने मेरे भीतर कुछ असाधारण घटा दिया। अनेकों सवाल मेरे मन पर विद्युत रेखाओं की तरह चमक उठे। क्यों मनुष्यों को इतना लाँछित होना पड़ता है ? भेदभाव की कुटिल धार से कटा इंसान ईर्ष्या के तुषानल में कब तक सुलगता रहेगा ? न जाने ऐसे कितने ही और सवाल जिनका जवाब मुझे समझ में नहीं आया। मैंने अपनी माता से पूछा तो उन्होंने बताया जब तक मनुष्य में देवत्व का उदय नहीं होता धरती इसी तरह बनी रहेगी और धरती का स्वर्ग बनना तब तक संभव नहीं जब तक भगवत् चेतना का अवतरण नहीं होता। व्यक्ति विशेष पर नहीं समूची मानव जाति पर। कैसे होगा यह अवतरण ? माँ से मेरा अगला सवाल था बेटा। इसके लिए पुकार चाहिए सच्ची अभीप्सा। समूची सत्ता को आकुल होकर उन परमदेव को पुकारना पड़ेगा। पुकारने वाले में ऐसी आकुलता हो कि समूची सृष्टि आकुल हो उठे।”
“मैं पुकारुँगा, आह्वान करूंगा-उस परम चेतना का। मैंने अपनी माँ को वचन दिया। माँ ने एक बार मेरी ओर संदिग्ध दृष्टि से देखते हुए कहा-वत्स ! बात अकेले की नहीं समूची वसुधा की हैं इसके लिए ऐसा व्यक्ति चाहिए जिसके मन में व्यक्तिगत स्वर्ग-मोक्ष, सिद्धि, चमत्कार की कोई कामना न हो। जो धरती का प्रतिनिधित्व कर सके। युगों से धरती अपने इस लाल को तलाश रही है। सच माँ-तेरे चरणों की सौगंध मैं बनूँगा धरती माता का लाल और मैं चल पड़ा हूँ-माँ का आशीर्वाद मेरे साथ है। चलते समय उसने कहा था बेटा। अपने निश्चय पर अटल रहना, इस कदर दृढ़ कि तेरा नाम दृढ़ और अटल होने का पर्याय बने।”
इतना कहकर वह चुप हो गया। आँखें नीचे कर लीं। सातों ऋषि एक दूसरे की ओर देखकर मुस्कराए। कहा-”पुत्र ! तुम से इस संसार को परम लाभ होगा। तुम पहले व्यक्ति हो जिसने समस्त पार्थिव चेतना में परम ज्योति के अवतरण का संकल्प लिया है। इस अविनश्वर आदर्श की स्थापना करो। प्रभु तुम्हें अपना यंत्र बनाकर धरती पर स्वर्ग राज्य लाना चाहते हैं। हमें दृढ़ विश्वास है, तुम भी दृढ़ रहो-तुम्हारा निश्चय सफल हो।”
आशीर्वाद देकर ऋषिगण एक ओर चले गए। वह अपने अंतराल में दुर्बलता पर विजय पाने वाली एक अज्ञात शक्ति अनुभव कर रहा था। चलते-चलते परम रमणीय प्राकृतिक दृश्य के एक अपूर्व वन में पहुँच गए। चारों ओर से स्वर्गीय स्वप्न की मनमोहनी माया में चिरकाल के लिए जीवों को लुभा रखने की शक्ति उस वन के पल्लव पर क्रीड़ा कर रही थी। उसको यह स्थान बड़ा हृदयग्राही लगा। इधर-उधर छोटी-छोटी पहाड़ियाँ, वनदेवी की शोभा का गौरव किरीट धारण किए थीं। छोटे-छोटे झरने हृदय के आनंदोच्छ्वास हो रहे थे। चिड़ियों की चहक आनंद की स्वागत रागिनी थी। इस सजीवता को ध्रुव आँखें खोले बड़ी तृप्ति के साथ निहारते रहे। दिन भर की थकावट क्षणभर की शक्ति से जाती रही। निराशा की अलस अँगड़ाइयाँ सकुचा कर कहीं दूर जा दुबकी। बाह्य सजीवता ने अंतर्मन को जीवित कर दिया। वह एक छोटी सी चिकनी शिला पर बैठकर स्वयं के भविष्य की कल्पना के सहारे देखने लगे।
दिन भर हारे-थके सूर्य अस्ताचल की ओर धीरे-धीरे प्रस्थान कर रहे थे। कनक किरणों के साथ प्राणियों की जाग्रति भी संसार की गोद से विलुप्त होती जा रही थी। थके-माँदे लोगों के शरीर निद्रा में प्रवेश करते जा रहे थे।
दिवस का अवसान हो गया। किरणों का राज्य उठ गया। सारी सृष्टि शिथिलता के जादू से मोहित हो गई। पर ध्रुव उसी वन में चुपचाप भविष्य की चिंता में डूबे विचार करने में लगे थे। उनके भविष्य में सृष्टि का अभाव था। आखिर वह उससे एक जो थे। इतनी दूर तो वे चले आए, पर अब क्या करें। चारों ओर से न जाने कितनी दूर मार्गों का प्रसार बढ़ता ही चला गया है। क्या वे चिरकाल तक मार्ग पाकर अपने उद्देश्य की सिद्धि तक पहुँच सकेंगे। अंतरात्मा इससे इंकार कर रहा था। पर और कोई उपाय भी नहीं। कहाँ जायें ? किस तरह पुकारें ?
सोचते-सोचते हृदय की विकलता सीमा को पार कर गई क्षण भर के लिए एक दुर्बलता सामने आ खड़ी हुई। साहस का बाँध चटकने लगा। आँखों पर निराशा की घटा गहरा उठी। शिथिलता की बूँदों से उनका सर्वांग नहा उठा-हाथ उठाने की ताकत भी जाती रही। थोड़ी देर मूर्छित पड़े रहे वह। दस साल का बालक अपना प्राण अपना अपमान अपना संकल्प स्नेह की मूर्ति अपनी माँ को भी भूल गया। मूर्छा के अंधकार ने पहर भर तक देह दशा की सुध न रहने दी।
हिंस्र जंतु जंगल में चारों ओर चक्कर लगा रहे थे। यहाँ उनका निष्कंटक राज्य जो ठहरा। अपने शिकार की तलाश में फेरी लगाते हुए मूर्छित बालक के पास भी आए तो, पर सूँघ कर लौट गए। इन हिंसकों की हिंसावृत्ति को बालक के अंदर अपना विरोधी भाव न मिला।
कुछ पल बाद ध्रुव ने आँखें खोलीं। देखा चारों ओर सन्नाटा था। पेड़ों के पत्ते भी नहीं हिलते थें जमीन और आसमान दोनों अंधेरे की काली चादर में अपने को लपेटे थे। तभी उन्हें याद आयी माँ की आज्ञा, उसे दिया गया अपना आश्वासन। याद आए ऋषियों के आशीर्वचन। हृदय एक बार फिर जोश की तरंगों की गर्जना से भर उठा। फिर निश्चय हुआ कि जीवन में मृत्यु का सामना एक बार ही तो करना है तब क्यों न मैं अपने महान संकल्प को सामने रखकर मौत के लिए तैयार रहूँ। विकल जीवन से मौत कहीं अधिक गौरवप्रद है।
इसी सोच विचार में रात्रि पार हो गई जागरण के तप्त चुँबन स्वरूप सूर्य भी धीरे-धीरे आ विराजे। प्रभाती की स्वर हिलोर फिर धरती के एक छोर से दूसरे छोर तक धावा मारने लगी। ध्रुव का मन इस दृश्य से विरक्त था॥ मानों उनकी प्रबल अभीप्सा शरीर छोड़कर अपने लक्ष्य में जा मिलना चाहती हो।
अभीप्सा की तीव्रता ने गुरु को आकर्षित किया। गुरु रूपी दर्पण ही तो परमात्मा को प्रतिबिंबित करता है। गुरु और परमात्मा अभेद हैं सर्वथा अद्वय। शास्त्रों के इस कथन के अनुरूप जैसे-जैसे उनकी विकलता बढ़ती जा रही थी-त्यों-त्यों गुरु निकटस्थ होते जा रहे थे। यथा समय वे सामने आकर खड़े हो गए। पूछा पुत्र तू कौन है ? इस बीहड़ आरण्य में तू क्यों आया ?
रात भर की चिंता ने उन्हें अवसन्न कर दिया था। पलकें झपकते हुये सामने खड़ी तेजोमूर्ति को प्रणाम करते हुए बोले-”मेरा नाम ध्रुव है। धरती पर परमात्म चेतना का अवतरण, यही है मेरा उद्देश्य।” अधिक कुछ बता सकने जैसी स्थिति उस समय की नहीं थी। दस साल के बालक का इतना महान संकल्प । सुन रहे देवर्षि नारद आश्चर्य से भर गए। मन ही मन उसकी प्रशंसा कर वाणी से परीक्षा लेने के स्वरों में बोले-बेटा ! तुम अभी बालक हो। तुम्हारा स्थान अभी माँ की गोद है-पिता का सुवास है, हिंस्र जंतुओं से भरा अरण्य नहीं। किसी कारण यदि घर से रूठ भागे हो, तो मेरे साथ लौट चलो। मैं तुम्हारे माता पिता को समझा दूँगा। तुमको किसी ने बहका दिया है। तुम जिस संकल्प की बात कर रहे हो वैसा संकल्प त्रैलोक्य में किसी ने नहीं लिया, शायद कोई पूरा कर भी नहीं सकता।
“तो आप मुझे डराने आए हैं। ध्रुव की आंखें एक तीव्र ज्योति स चमक उठीं। मैं बालक हूँ ठीक है। इसका मतलब यह तो नहीं कि बालक होना अपराध है मात्र इसके कारण धरती के कष्ट निवारण का कोई अधिकार नहीं। आप यहाँ से पधारें, मुझे किसी भी कीमत पर वापस नहीं लौटना। मेरे जीवन का मूल्य संकल्प है और संकल्प का मूल्य जीवन।”
प्रबल संकल्प निष्ठा और तीव्रतर अभीप्सा को देख नारद की करुणा पिघल उठी। उन्होंने अपने शिष्य को पहचाना। उसके महान भविष्य को याद करके उनके हृदय में आनंद की लहरें उठने लगीं। ध्रुव की ओर स्नेह भरी दृष्टि फेरते हुए कहा-”पुत्र ! बालक होना अपराध नहीं सौभाग्य है। ध्रुव ने अपनी कोमल बाहों से देवर्षि के पैर पकड़ लिए। साथ ही बड़ी देर से रुके वेदना के आँसू झरने की तरह बह-बह कर नारद के पैरों की धूल धोने लगे। उठो ध्रुव ! देवर्षि उसे स्नेहपूर्वक उठाते हुए बोले धरती पर स्वर्ग के अवतरण का महान कार्य बालकों द्वारा ही संभव है। उनका निश्छल और निर्मल अंतःकरण जितना शीघ्र परम ज्योति से ज्योतित हो सकता है, उतनी शीघ्रता प्रौढ़ पुरुषों के लिए संभव कहाँ ?
आकार पाकर पक चुके बर्तनों को नवयुग के अनुरूप स्वयं को ढालने के लिए पहले स्वयं धूलकण बनना पड़ेगा। तभी इन कणों को बटोर कर नया रूप दिया जा सकना संभव है। जो स्वयं की प्रौढ़ता का गर्व करते परिपक्वता के अहं में फूले नहीं समाते उनका यही हाल है। बच्चे तो सनी सनाई कच्ची मिट्टी के लोंदे हैं जिन्हें अपनाकर परमात्म चेतना अनेकों दीपक गढ़ लेगी। उसकी चेतना से ज्योतित ये दीपक संपूर्ण सृष्टि को प्रकाश से भर देंगे।
नारद के लंबे कथन को बालक ध्रुव मनोयोग पूर्वक सुनता रहा। आज उसे पहली बार बालक होने के महत्व का पता चला। साधना की प्रक्रिया समझाते हुए वह बोले सावधान ध्रुव ! माया के अनेकों प्रलोभन तुम्हारे सामने आवेंगे। स्वीकार न कर बैठना उन्हें। तुम्हारा महान संकल्प के आगे ब्रह्मा का पद भी तुच्छ है। मैं सब समय साथ रहूँगा। हृदय से आशीर्वाद देता हूँ तुम्हारा संकल्प पूर्ण हो।
ध्रुव के भूमिष्ठ हो प्रणाम करते ही नारद का ज्योति शरीर आकाश में ऊपर उठने लगा। ध्रुव की उस क्षीण होती जा रही प्रकाश रेखा को
हाथ जोड़े एकटक देख रहे थे। रेखा ने बिंदु का रूप लिया अंत में बिंदु विराट में विलोप हो गया।
अब दिन-पर-दिन उनकी साधना उच्च से उच्चतर सोपानों को पार करने लगी। क्रमशः वह उस अवस्था में जा पहुँचे जिसमें ईश्वर का नाम उनके रोम-रोम में व्याप्त हो गया।
साधना के प्रभाव से मुखमंडल पर स्वर्गीय ज्योति आ विराजी। वह पहला शरीर ही बदल गया। सिद्धि के लक्षण धीरे-धीरे प्रकट होने लगे। जब-जब निराशा अपना प्रभाव दिखाती गुरु की शक्ति उसे भगाकर मन को तत्काल ईश्वराभिमुख कर देती। यहाँ तक कि शरीर का भान भी जाने लगा। भूख, प्यास, सर्दी, गर्मी, आदि शरीर पर प्रभाव डालने वाले विषय छूटते गये। कहीं सप्ताह-दो-सप्ताह में यमुना का जल और पेड़ों से पककर गिर गए पत्तों को खाकर तृप्त हो लेते।
क्रमशः तपस्या के पीछे भूख और प्यास भी हट गई। उनकी पुकार में तीव्रता और तल्लीनता बढ़ती गई। तैल धारावत् ध्यान अबाध और अविराम था। सिद्धियाँ और शक्तियाँ आकर एक कोने में पड़ी रहीं। उनकी ओर देखने की फुरसत किसे थी। यही हाल प्राण मन की अधिष्ठात्री शक्तियों द्वारा उपस्थित की गई विघ्न बाधाओं का था। लोक-लोकाँतर के वैभव व्यर्थ होते गए। आरोहण का ऊर्ध्वमुखी वेग निरंतर वृद्धि पाता जा रहा था।
एक दिन परम लोक के अधीश्वर बरदम हिल उठे। इधर ध्रुव का हृदय अज्ञात प्रसन्नता से भरा था। प्राणों को समर्पण करने की भावना ज्यों-ज्यों बढ़ रही थी, त्यों-त्यों एक अद्भुत आनंद हृदय को व्याकुल करता जा रहा था।
एकाएक परावाणी गूँजी-ध्रुव ! तुम्हारा तप पूर्ण हुआ। तुम्हें क्या चाहिए ? उसने आँखें खोली देखा बाहर भगवत् चेतना, शंख, चक्र, गदा, पद्मधारी भगवान विष्णु के रूप में खड़ी है। हाथ
जोड़कर स्तुति करते हुए बोले-”प्रभु ! इस जन का संकल्प आपको अविदित नहीं है। मैं नहीं समूची पार्थिव चेतना-अखिल सृष्टि आप सर्व समर्थ से एकाकार होने के लिए आतुर हैं। समूची मानव ज्योति को केंद्र बनाकर आप धरती पर अवतरित हों। भारत की पुण्य भूमि अनेकों ध्रुव सृजित करती रहे।”
“एवमस्तु !” एक अपूर्व मधुर स्वर गूँजा। जो निश्चित ही इस सृष्टि की शब्द सामर्थ्य से परे थे। अभी भी चेतना की किन्हीं गहराइयों में वाक्देवी संगीत की स्वर लहरियों में प्रकट हो रही थी जब-जब ध्रुव जैसे किसी बाल मन की निर्मलता से पुकार की निश्छल तरंग उभरेगी मैं वहाँ अपने को प्रकट करूंगा।
दो, भूल जाने योग्य हैं एक वह नेकी है, जो अपने द्वारा किसी के साथ बन पड़ी और दूसरे वह बंदी, जो दूसरे ने अपने साथ की। दो याद रखने योग्य हैं एक कर्तव्य, दूसरा मरण।
आत्मतत्व का प्रकाश प्राप्त करने के लिए या किसी सूक्ष्म विषय को समझने के लिए एकाग्र-बुद्धि से उस पर ध्यानस्थ होना पड़ता है और यह कार्य जिस प्रक्रिया द्वारा संपन्न होता है, उसे उपासना और योग के नाम से जाना जाता है। इस उपचार, उपक्रम द्वारा परमात्मा के जितने ही समीप हम पहुँचते हैं उतनी ही श्रेष्ठतायें हमारे अंतःकरण में उपजती तथा बढ़ती हैं। उसी अनुपात से आँतरिक शाँति की भी उपलब्धि होती चलती है। जिस तरह हिमालय की ठंडी-हवायें उन लोगों को अधिक शीतलता प्रदान करती हैं जो उस क्षेत्र में रहते हैं। इसी प्रकार आग की भट्टियों के समीप काम करने वालों को अधिक गर्मी अनुभव होती है। जीव भी ज्यों-ज्यों परमात्मा के निकट पहुँचता जाता है उससे घनिष्ठता के साथ जुड़ता जाता है, त्यों-त्यों उसे उन विभूतियों का अपने में अनुभव होने लगता है जो उस परम प्रभु में ओत-प्रोत हैं।
उपासना का अर्थ है-पास बैठना निकट होना (उप=निकट, अस=होना, रहना) परमात्मा के पास बैठने से ही उपासना हो सकती है। साधारण वस्तुयें तक अपनी विशेषताओं की छाप दूसरों पर छोड़ती हैं, तो परमात्मा के समीप बैठने वालों पर उन दैवी विशेषताओं का प्रभाव क्यों न पड़ेगा ? जब पुष्पवाटिका में जाते ही फूलों की सुगंध से चित्त प्रसन्न हो उठता है। चंदन के वृक्ष अपने समीपवर्ती वृक्षों को सुगंधित बनाते हैं। सज्जनों के सत्संग से साधारण व्यक्तियों की मनोभावनाएँ सुधरती हैं, फिर परमात्मा अपनी महत्ता की छाप उन लोगों पर क्यों न छोड़ेगा जो उसकी समीपता के लिए प्रयत्नशील हैं।
आत्मा को परमात्मा के निकट पहुँचने पर वही बात बनती है जो गरम लोहे और ठंडे लोहे के एक साथ बाँधने पर होती है। गरम लोहे की गर्मी ठंडे में जाने लगती है और थोड़ी देर में दोनों का तापमान एक सरीखा हो जाता है। दो तालाब जब तक अलग-अलग रहते हैं तब तक उनके पानी का स्तर नीचा-ऊँचा बना रहता है। पर जब बीच में नाली निकालकर उन दोनों को आपस में संबंधित कर दिया जाता है तो अधिक भरे हुए तालाब का पानी दूसरे कम पानी वाले तालाब में चलने लगता है और यह क्रिया तब तक जारी रहती है जब तक कि दोनों का जल स्तर समान नहीं हो जाता।
दो जलाशयों का मिलना या गरम-ठंडे लोहे का परस्पर मिलना जिस प्रकार एकरूपता की स्थिति उत्पन्न करता है, उसी प्रकार उपासना या योग द्वारा आत्मा और परमात्मा का मिलन होने पर गुँथ जाने पर जीव में दैवी गुणों की तीव्रगति से अभिवृद्धि होने लगती है।
योग साधना का प्रयोजन भी अपनी समीपता को असीमता के साथ जोड़ देना है। इस प्रयोजन में जितनी ही सफलता मिलती जाती है, उतनी ही मात्रा में मनुष्य उस वैभव पर आधिपत्य जमाता जाता है जिसके प्रभाव को हम जड़-चेतन जगत में अपने चारों ओर फैला हुआ देखते हैं। सीमाबद्ध स्थिति में हम तुच्छ और दरिद्र होते हैं, पर असीम के साथ जुड़ जाने पर महानता प्राप्त करने में कोई कमी नहीं रह जाती है। सिद्ध पुरुषों में देखी गयी विशिष्ट क्षमतायें और कुछ नहीं, विराट के साथ उनकी घनिष्ठता का आरंभिक उपहार भर हैं। बढ़ी-चढ़ी स्थिति तो ऐसी बन जाती है जिसमें आत्मा और परमात्मा के बीच कोई बहुत बड़ा अंतर नहीं रह जाता, दोनों समतुल्य ही दीखते हैं।
योग एवं सच्ची उपासना दोनों का ही अर्थ है, आत्मा को परमात्मा से जोड़ देना। इससे परमात्मा की विशेषतायें मनुष्य में प्रवाहित होने लगती हैं, किंतु दोनों के बीच में यदि कोई व्यवधान रख दिया जाय तो प्रवाह रुक जायगा और मनुष्य को श्रेष्ठता प्राप्त नहीं होगी। जिस प्रकार आग के पास आने पर ठंडा लोहा ऊष्मा प्राप्त करता है, पर यदि आग और उसके बीच लकड़ी का एक पटला रख दिया जाय तो लोहा आग की गरमी से वंचित रह जायगा। उसी प्रकार जब उपासना की विधि में आत्मा और परमात्मा के बीच कामनाओं का व्यवधान डाल दिया जाता है तो साधक परमात्मा को ग्रहण करने से वंचित रह जाता है। जिन उपासकों में परमात्मा के लक्षण संकलित होते दिखाई न दें, समझ लेना चाहिए कि उसकी आत्मा और परमात्मा के बीच कामनाओं, वाँछनाओं का व्यवधान पड़ा हुआ है और जब तक यह व्यवधान हटाया नहीं जायगा, उपासना का वास्तविक फल प्राप्त होना संभव नहीं। अधिकांश पूजा पाठ तथा चंदन-वंदन करने वाले उपासना नहीं उपासना का आडंबर ही किया करते हैं। या तो उसके आधार पर उन्हें अपना महत्व प्रदर्शन करने का भाव घेरे रहता है अथवा उनकी उपासना का लक्ष्य किसी कामना की पूर्ति रहता है, परमात्मतत्त्व की प्राप्ति नहीं। यही कारण है कि एक पुजारी आजीवन तक मंदिर में पूजा आरती करता रहता है, किंतु उसे वह फल नहीं मिलता जो उपासना के परिणाम स्वरूप मिलना चाहिए।
उपासना का प्रतिफल है-श्रेष्ठताओं की वृद्धि। चूँकि परमात्मा समस्त श्रेष्ठताओं का केन्द्र है, उसका सान्निध्य आत्मा को दिन-दिन उत्कृष्ट बनाता चलता है। भक्त को अपना भगवान सब में दिखाई पड़ता है, इसलिए वह हर किसी की अच्छाइयाँ देखता है और उनकी चर्चा एवं विचारणा करते हुए अपने आनंद और दूसरों के सद्भाव को बढ़ाता है। निंदा और ईर्ष्या असुरता के दो प्रधान अस्त्र हैं। इनका प्रयोग उसी पर किया जा सकता है जिसके प्रति परायेपन का शत्रुता का भाव रहे। जब सब अपने हैं तो अपनों की निंदा कैसे ? अपनों से ईर्ष्या कैसे ?
प्रेम, करुणा, आत्मीयता और सौजन्य की अजस्र धारायें परमात्मा से प्रवाहित होती हैं। प्राणि मात्र का पोषण-अभिवर्धन इन्हीं विशेषताओं के द्वारा तो वह करता है। ऐसे ईश्वर के समीप बैठने वाले में, उपासना या योग साधना करने वाले में यही विशेषतायें अवतरित होती हैं। अपने भाई-बहिनों के प्रति-प्राणिमात्र के प्रति अनंत करुणा और आत्मीयता की भावनायें उपासक के अंतःकरण में उद्भूत होती हैं। संपूर्ण विश्व ही उसे अपने आत्म स्वरूप में दिखाई देने लगता है। उनको चरितार्थ करके वह अपने जीवन को यशस्वी बनाता है और अपने अंतःकरण में धारण किये रहकर अनंत शाँति का अनुभव करता है। ऋद्धि-सिद्धियाँ भी उसकी अनुगामिनी बन कर रहती हैं।
जल स्रोत जब आगे की मिट्टी भुसभुसी होने के कारण आगे नहीं बढ़ पाते, तो रुका हुआ पानी अपनी परिधि में दलदल मात्र बनकर रह जाता है। दलदल किसी प्रयोजन की पूर्ति नहीं करता, उसमें कुछ पैदा होना तो दूर जो कोई जीव-जंतु वहाँ जा पहुँचता है, फँसकर मर जाता है। कोई चाहे, तो इसे एक प्रकार की अवगति या प्रतिगामिता भी कह सकता है। भीड़ आगे नहीं बढ़ती तो रास्ता जाम कर देती है। इसी बीच यदि पीछे वाले आतुरता दिखाने लगें, तो सैकड़ों पैरों तले कुचल कर बेमौत मर जाते हैं।
इसी प्रकार सभी बूढ़े मरणासन्न नहीं होते। वे चाहें तो वयोवृद्ध स्थिति में भी अपनी स्थिति के अनुरूप कोई सृजन कृत्य ढूँढ़ सकते हैं और उसमें रुचिपूर्वक व्यस्त रहकर प्रसन्न भी रह सकते हैं और कुछ-न-कुछ उपयोगी निर्माण करते रह सकते हैं। इससे उनका समय भी प्रसन्नतापूर्वक कटता रहेगा और कुछ न कुछ ऐसा उत्पादन भी होता रहेगा जो काम आये।
किंतु अनगढ़ बुद्धि ठीक विपरीत तरह की आदतें अपना लेती है लोग अपने बचपन और यौवन के दिनों वाली उत्साहवर्धक परिस्थितियों का स्मरण करते रहते हैं, साथ ही यह तुलना भी करते रहते हैं कि अब कैसी अवगति के दिन आ गये ? दोनों समयों की तुलना करके उन्हें क्षोभ बहुत होता है। भाग्य विधान को कोसते और वर्तमान स्थिति पर असंतोष व्यक्त करते हैं। इस विक्षोभ के कारण उनकी बची-खुची शक्तियाँ भी तेजी से बरबाद होती हैं। दिन बड़ी नीरसता के साथ काटते हैं और क्षुब्ध रहने पर मौत के दिन भी जल्दी आ धमकते हैं। बूढ़ों को असामयिक चिंतन उनके लिए जितना घातक होता है, उतना कदाचित् और कोई विघातक सिद्ध नहीं होता।
युवकों की स्थिति भिन्न होती है। वे अगले दिनों के उज्ज्वल सपने देखते हैं। खेलों में इनाम जीत लाने, बड़े बनकर अफसर बनने, अच्छा जीवन साथी उपलब्ध करने, कमाई करने, घर परिवार को सँभालने, वैज्ञानिक, कलाकार, व्यवसायी आदि बनने और भरे पूरे परिवार के साथ सुख-चैन की लंबी जिंदगी बिताने की बात सोचते हैं। इस उत्साह में मनोबल भी बढ़ता है और उठती आयु के रस-भक्त भी सहायक होकर प्रगति की गति को कई गुना बढ़ा देते हैं। यही कारण है कि बूढ़े जहाँ अपनी मानसिकता के कारण दिन-दिन क्षीण होते जाते हैं, वहीं जवानी की उमंगें नई-नई योजनाएँ चुनती अनुकूलता खींच बुलाती और जोश भरे आनंद को कई गुना अधिक बढ़ा देती है। मनोबल का अपना महत्व है। चिंतन की दिशाधारा मनुष्य के उत्कर्ष या अपकर्ष में महती भूमिका निभाती है। जो शक्तियों के उद्भव को प्रगति की दिशा में आगे नहीं बढ़ने देते, वे सड़े दलदल की तरह बदबू, काई, कीचड़ बन जाते हैं। भारतीयों पर जो अघटित घटित हुआ है। उसके संबंध में भी कुछ ऐसा ही सोचा जा सकता है। चिर पुरातन के सतयुगी वातावरण का अवगाहन करने पर प्रतीत होता है कि आज की तुलना में कहीं अधिक अभावग्रस्त स्थिति रहने पर भी स्वरूप साधनों से काम चलाते हुए लोग हंसी-खुशी के साथ उत्थान-अभ्युदय की ऐसी अवस्था प्राप्त कर लेते थे जिसकी प्रक्रिया देखते हुए उन्हें देवात्मा कहा जाता था, उन दिनों के वातावरण को सतयुगी कहा जाता है। उन प्रगतिशील प्रतिभाओं से भरी-पूरी धरती “स्वर्गादपि गरीयसी” कही जाती रही है।
उन दिनों की परिस्थितियों और अर्वाचीन माहौल में इतना जमीन-आसमान जैसा अंतर कैसे आया है ? यह आश्चर्यजनक लगता है। आज की जो परिस्थितियाँ हैं, उनमें हर व्यक्ति अपने को खिन्न-विपन्न अनुभव करता है। सामाजिक परिस्थितियाँ ऐसी हैं, जिनके पीछे अन्याय, आक्रमण, शोषण, उत्पीड़न ही प्रमुख हैं और छद्म, छल प्रपंच की काली छाया घिरी दीखती है। शरीर और समाज दोनों ही अस्वस्थ दीखते हैं। यूं तो तथाकथित प्रत्यक्षवादी प्रगति के कारण साधनों का उत्पादन बहुत बढ़ा है, पर उनका सही उपयोग कर पाने की क्षमता जिस-तिस में ही दीख पड़ती है।
एक ओर जहाँ जापान, इजराइल, क्यूबा जैसे छोटे-छोटे देश हर दृष्टि से उन्नति करते दीखते हैं, वहाँ अपने देश में प्राकृतिक साधन संपन्नता भरपूर होते हुए भी निर्धनता और पिछड़ेपन से ही घिरा देखा जाता है। प्रगति के नाम पर यत्किंचित् प्रयत्न चलते भी हैं, तो वे गुब्बारे में से हवा निकल जाने की तरह गई गुजरी स्थिति से ऊँचे नहीं उठ पाते।
इस असाधारण परिवर्तन का कारण आखिर हुआ क्या ? यह एक विचारणीय विषय है। पिछले दो हजार वर्षों में हम कहाँ-से-कहाँ आ गये, यह पर्यवेक्षण सुनने-सुनाने पर अविश्वसनीय जैसा लगता है। हम दो हजार वर्षों की लंबी गुलामी अभी-अभी भुगत कर निपटे हैं। उस अवधि में कितना उत्पीड़न कितना शोषण, कितना अपमान सहना पड़ा, इसे देखकर दिल दहल जाता है। रोमाँच हो आता है।
कहाँ तो कभी की इतनी समर्थ जनता जो संसार भर की व्यवस्था बनाने और सत्परंपरा चलाने में चक्रवर्ती शासक, का दायित्व निभाती रही कहाँ इतना ज्ञान भंडार का गौरव, जिसे सीखने-समझने के लिए विश्व भर की प्रतिभाएँ यहाँ के विश्वविद्यालयों में पढ़ने आती थीं और नये ढांचे में ढलकर व्यक्तित्व निखार कर वापस लौटती थीं, वहाँ आज की स्थिति जिसमें अपनी भाषा, अपनी संस्कृति अपनी विचारधारा नाम की कोई गौरवास्पद बात ही शेष नहीं रह गई।
ढूँढ़ने पर अनेक कारणों में से एक समर्थ कारण यह भी दीखता है कि हमने वर्तमान समस्याओं को जन्म देने के अतिरिक्त अगले दिनों उज्ज्वल भविष्य की संरचना करने वाले चिंतन एवं कार्यक्रम बनाने, संगठित प्रयत्नों का ढाँचा खड़ा करने के लिए एक प्रकार से कुछ किया ही नहीं ! जो किया गया वह मात्र बड़े आदमियों के काम का था। उन्हीं की क्षमता-सुविधा बढ़ाने वाला था। सर्व-साधारण की तो आवश्यकता की उपेक्षा ही बन पड़ी। हम सब विडंबनाओं के बीच ही अधर में झूलते रहे।
प्रगतिशील समुदायों का प्रमुख गुण यह होना चाहिए कि उनसे अधिक अच्छी स्थिति जिनकी नहीं है, उनके लिए कुछ कर दिखाने की परिस्थितियों के अनुरूप उमंगें उठनी चाहिए। संकल्प चेतना जगनी चाहिए। योजना बना सकने की समयानुरूप योग्यता होनी चाहिए, साथ ही इतना पुरुषार्थ भी होना चाहिए कि प्रगतिशीलों को संगठित करके उत्थान, प्रयत्नों को कार्य रूप में परिणत कर सकें। इतनी पृष्ठभूमि बन जाने पर ही समझना चाहिए कि संख्या में बड़े और साधनों की दृष्टि से कमजोर होते हुए भी कर्मनिष्ठ व्यक्तियों का समूह बहुत कुछ कर गुजरने में समर्थ हो सकेगा।
योरोप के छोटे-छोटे देशों में रहने वाले तनिक-तनिक सी जनसंख्या वाले राष्ट्र जब अपने विस्तार और उत्कर्ष के लिए आकुल-व्याकुल हुए तो देखते-देखते संसार भर की विशालकाय भूमि पर कब्जा जमा लिया। साथ ही उन पर अपना आधिपत्य जमा लिया। जो कुछ भौतिक और बौद्धिक संपदा हाथ लगी, उसे अपने-अपने देशों के लिए लूट-खसोट लाये। इस सफलता के पीछे और कोई नई बात नहीं थी। रहस्य इतना ही था, कि योजनाबद्ध रूप से उनसे संगठित प्रयत्न किये और वे कार्यरूप में परिणत करके दिखाये।
इस प्रगति पथ पर भारत बहुत पिछड़ गया। पड़ोसी लुटेरे मुट्ठी भर संख्या में होते हुए भी धावा बोलकर चढ़ दौड़ते रहे और लूट खसोट से ही नहीं, लंबी अवधि तक अपना आतंक भरा शासन जमाये रहने में भी सफल हुए। ऐसा क्यों हुआ ? मुट्ठी भर लुटेरों का आतंक इतने विशाल क्षेत्र और इतनी उत्कृष्टता-संपन्न जन समुदाय को पैरों तले रौंद डालने में क्यों कर सफल हुआ। इसका कारण एक ही उभर कर आया है कि आक्रमणकारियों की बलिष्ठता इसका कारण नहीं रहा, वरन् अर्ध प्रसुप्त स्थिति में पड़ा हुआ जनसमुदाय यह नहीं सोच सका कि संगठित प्रतिरोध का भी प्रयोग हो सकता है क्या ? कोई प्रयत्न बन बन सकता है क्या ? छिटपुट स्थानीय एवं व्यक्तिगत संघर्ष तो हुए, पर बड़ी समस्या के लिए बड़े समर्थन चाहिए यह किसी को भी नहीं सूझ पड़ा कि संगठित होने और मिलजुल कर परिस्थिति के अनुरूप रास्ता निकालने की भी आवश्यकता पड़ेगी, फलस्वरूप दैवी विपत्ति की तरह सिर पर सवार रही। यह स्थिति शरीर के बुढ़ापे से भी गई बीती है। बुढ़ापा शारीरिक असमर्थता का तो प्रतीक है ही पर उससे भी बड़ी बात यह है कि उन दिनों मनोबल भी टूटता है। कोई बड़े प्रयास करने के लिए उत्साह नहीं उभरता। उन दिनों मरने की बात ही सामने रहती है। मौत के दिन गिनते-गिनते आखिर वह सामने ही आ खड़ी होती है। बूढ़ों का मरण किसी को बहुत अखरता नहीं, क्योंकि वह पहले ही अपनी उपयोगिता गँवाकर क्रमशः दूसरों पर भार बनता जा रहा था।
शरीर का बूढ़ा होना तो समय साध्य है, पर मानसिक बुढ़ापा, बचपन, किशोरावस्था या जवानी में मर भी सकता है। ऐसे लोगों की एक ही पहचान है कि वे उज्ज्वल भविष्य के सपने नहीं देखते। मौत ही उन्हें आगे-पीछे घूमती दिखाई पड़ती है। घुना बीज उगता नहीं। जिसके सामने उज्ज्वल भविष्य की संकल्पना नहीं, उसे घुना बीज ही समझना चाहिए। आज का जन साधारण वास्तव में बुड्ढों जैसा मानस बना चुका है। बूढ़े लोग भी अपने भूतकालीन संस्मरण देखने, याद करने सुनने या बताने में रस लेते हैं। भविष्य के लिए मौत के अतिरिक्त और कुछ सोचते नहीं। लगभग अपना लोकमानस इसी प्रकार का हो गया है।
सामयिक उपचार की दृष्टि से हमें इन भ्राँतियों को उखाड़ना चाहिए कि जो कुछ पुराने लोग कर चुके हैं, वही अनुकरणीय है। समय बदलता है और नई समस्याओं के साथ नये समाधान भी साथ लेकर आता है। इसलिए पुराने कथा-कीर्तन कहने-सुनने का कोई तुक नहीं। जो चला गया, वह फिर कभी आने वाला नहीं है। इसलिए देखना यह होगा कि पुरानी कथा-गाथाओं को दुहराते रहने की अपेक्षा यह कहीं अधिक उत्तम है कि देश की न सही विदेश की सही ऐसी कथा-गाथाएँ जन-जन के सम्मुख लेखनी, वाणी, अभिनय आदि के माध्यम से प्रस्तुत की जायँ तो भविष्य निर्माण की दृष्टि से सामयिक एवं उपयोगी बैठती हैं।
दूसरे देवी-देवताओं के वरदान अभिशाप विधाता की पूर्व संरचना, ग्रहदशा, जैसी बेतुकी बातों के अंधविश्वास में फँसने और पौरुष को गँवाने की स्थिति न बने, इसलिए उनको निरस्त किया जाना भी आवश्यक है। कोई समय रहा होगा, जो सामंतों ने अपने अत्याचारों के विरुद्ध विद्रोह न उभरने देने और पीड़ितों को भाग्य का खेल मानकर चुप बैठे रहने के लिए इस प्रकार के मूढ़ मान्यताओं को कथा-कहानियों के सहारे प्रश्रय दिया होगा। पर आज के विचारशीलता वाले युग में भी जहाँ कहीं ऐसे प्रचलनों का बाहुल्य है, वहाँ से उन्हें उखाड़ने की आवश्यकता है।
हम बूढ़ों की तरह न सोचें। मरण को ही अंतिम नियति न कहें। पुरुषार्थ को, संकल्प को, संभावना को और प्रबल प्रयत्न को जिन आधारों पर प्रश्रय मिल सके, उन्हें ही अग्रगामी बनाया जाय।
असुर, मनुष्य और देवता देखने में एक ही आकृति के होते हैं, अंतर उनकी प्रकृति में होता है। असुर वे हैं जो अपना छोटा स्वार्थ साधने के लिए दूसरों का बड़े सा बड़ा अहित कर सकते हैं। मनुष्य वे हैं जो अपना स्वार्थ तो साधते हैं पर उचित अनुचित का ध्यान रखते हैं। पाप से डरते हैं और नियत मर्यादाओं का उल्लंघन नहीं करते। देव वे हैं जो अपने अधिकारों को भूलकर कर्तव्य पालन का ही स्मरण रखते हैं। अपनी शक्तियों को परमार्थ और परोपकार में अधिक व्यय करते हैं और इसी में सच्चा स्वार्थ साधन मानते हैं। असुरों के दृष्टिकोण में दुष्टता, मनुष्यों के में मर्यादा एवं देवताओं में उदारता भरी रहती है। दृष्टिकोण के इस अंतर के कारण ही उनके बुरे भले कार्यों की शृंखला सामने आती और उसी आधार पर वे निंदा प्रशंसा के पात्र बनते हैं। सद्गति और दुर्गति भी इन्हीं आधारों पर होती है।
आज असुरों का साम्राज्य चारों ओर फैला है। सोचने का तरीका यह बनता जाता है कि अपना लाभ बढ़ाने के लिए दूसरों का कितना ही बड़ा अहित क्यों न हो उसकी परवाह न करनी चाहिए और जैसे भी बने वैसे अपना स्वार्थ साध लेना चाहिए, असुर होने का यही लक्षण है। प्रस्तुत समय में जालसाजी और ठगविद्या एक प्रकार से चतुरता और बुद्धिमत्ता का अंग बनती चली जा रही है, व्यापार में धोखेबाजी का समन्वय अब एक आम बात बन रही है। कहना कुछ दिखाना कुछ देना कुछ यह तीन तरह का व्यवहार करना दुकानदार की एक आम नीति है। खाद्य पदार्थों और औषधियों तक में जो घृणित प्रकार की मिलावटें होती हैं उससे उपभोक्ताओं का स्वास्थ्य चौपट होता है तो इसकी परवाह किये बिना व्यापारी निधड़क अपना उल्लू सीधा करते रहते हैं। न्याय की रक्षा के लिए बने हुए न्यायालय के कर्मचारी किस प्रकार रिश्वत में अन्याय को प्रश्रय दिये हुये हैं, यह किससे छिपा है। मित्र-मित्र के बीच स्वार्थ साधन की शतरंजी चाल चली जाती रहती है। शत्रु और उदासीन को ठगना कठिन होता है, मित्र बनकर आसानी से विश्वासघात किया जा सकता है। इस दृष्टि से अब मित्रता विश्वासघात और धूर्तों की एक चाल बनती चली जा रही है। घर परिवार में भी यही नीति बरती जाती है। पिता-माता तभी तक अच्छे लगते हैं जब तक कि वे कमाते और खिलाते हैं जब वे असक्त हो जाते हैं, तो भार रूप लगते हैं उनके मरने की, खर्चे घटने की मनौती मानी जाती है।
दूसरों का धन, दूसरों का शील, सतीत्व हरण करने के लिए घात लगाये बैठे रहते हैं और जब जिसे जहाँ अवसर मिलता है अपना दाव चलाने में चूकता नहीं। दूसरे की कठिनाइयों और परिस्थितियों पर सहानुभूतिपूर्वक विचार करने की क्षमता घटती जा रही है। यह सोचना लोग छोड़ते चले जा रहे हैं, कि दूसरों की परिस्थितियों में निष्ठुरता पनपे और मनुष्य पापी अपराधी एवं दुष्ट बनता चला जाय, तो आश्चर्य की क्या बात है।
व्यापक बुराइयों की अधिक चर्चा करने से कुछ लाभ नहीं वस्तु स्थिति को हम सब जानते ही हैं। इस चर्चा से चित्त में क्षोभ और संताप ही उत्पन्न होता है। यों भले मनुष्यों का भी अभाव नहीं है वे प्रत्येक क्षेत्र में बदनाम क्षेत्रों में भी मौजूद रहते हैं पर उनकी संख्या नगण्य है। असुरता का व्यापक विस्तार अपने कैसे कड़ुए और विषैले प्रतिफल उत्पन्न कर रहा है सो सामने प्रस्तुत ही है। सर्वत्र अशांति, असंतोष, विक्षोभ, संताप, द्वेष, क्लेश, रोग, शोक, दैन्य, अभाव एवं संघर्ष का उद्वेग भरा वातावरण मौजूद है। कहीं भी शाँति नहीं, किधर भी चैन नहीं, जो प्रगति हम करते जाते हैं, वही विपत्ति बनकर गले में फाँसी के फंसे की तरह जकड़ती चली जाती है। विज्ञान की उन्नति ने एटम युग में लाकर हमें खड़ा कर दिया है जहाँ मानव सभ्यता सर्वनाश के आधार पर खड़ी-खड़ी त्राहि-त्राहि पुकार रही है।
प्रश्न यह है कि क्या इस बढ़ती हुई असुरता को इसी रूप में बढ़ने दिया जाय, और सर्वनाश की घड़ी के लिए निष्क्रिय रूप से प्रतीक्षा करते रहा जाय ? अथवा स्थिति को सुधारने के लिए कुछ प्रयत्न किया जाय ? विवेक कर्तव्य, धर्म और पुरुषार्थ की चुनौती यह है कि निष्क्रियता उचित नहीं। शाँति का संतुलन बनाये रखने के लिए धर्म और कल्याण की रक्षा के लिए हमें कुछ करना ही चाहिए।
असुरता का व्यापक साम्राज्यवाद अब इतना ही चाहिए। देवत्व की ओर बढ़ने के लिए हमें मानवता को तो अपनाना ही पड़ेगा। दृष्टिकोण में इतना परिवर्तन होना तो आवश्यक ही है कि हमारे स्वार्थों की सीमा अत्यंत संकुचित न रहकर उनका क्षेत्र कुछ बढ़े और विस्तृत हो। हम तृष्णा और वासना के, लोभ और मोह के, काम और क्रोध के ही बंधनों में जकड़े न पड़े रहें वरन् धर्म और कर्तव्य का, आध्यात्मिक स्वतंत्रता का भी कुछ आस्वादन करें। बंधन से मुक्ति की ओर बढ़ने का एक ही मार्ग तो है कि संकुचित स्वार्थों की संकीर्णता की कीचड़ से अपने आपको निकालने का प्रयत्न करें। मानवता की निर्मल सुरसरि में अपने मत आवरण और विक्षेपों को धोवें और उस दिशा में कदम बढ़ायें जिधर देवत्व का मंगलमयी मलय-मारुत प्रवाहित होता है। असुरता से मानवीय चेतना को विमुख करके देवत्व की ओर उन्मुख करना यही युग की आज महती आवश्यकता है, इसी को जीवन विद्या अथवा देवत्व की ओर बढ़ना कह सकते हैं।
दृष्टिकोण का परिवर्तन ही व्यक्ति परिवर्तन कहा जाता है। बाहरी कामों, व्यवस्थाओं, गतिविधियों को, परिस्थितियों को तो बलपूर्वक भी बदला जा सकता है। भय-दंड या प्रलोभन के वशीभूत होकर लोग वह कार्य करते हैं जो वस्तुतः उन्हें करने नहीं होते। दिखावट, ढोंग, लोक लाज या दबाव से कितने ही कार्य संसार में अनिच्छा पूर्वक भी होते रहते हैं पर उनमें कोई स्थायित्व नहीं होता। सरकारी कानून, सामाजिक प्रतिबंधों का, भावुकता को उभार कर जोश आवेश में बुराइयों की रोकथाम की जा सकती है। किंतु होती वह अस्थायी ही है। बाहरी-दबाव जैसे ही कम हुआ वे दुष्प्रवृत्तियाँ उसी या वैसे ही अन्य किसी रूप में पुनः उभर आती हैं। वास्तविक उन्मूलन तो तभी संभव है जब अंतःकरण बदले हुए हृदय परिवर्तन हो और दृष्टिकोण में सुधार हो। इसी में स्थिरता भी सन्निहित है और वास्तविकता भी।
आत्मा शुद्ध स्फटिक मणि के समान है, दर्पण के सामने जो भी वस्तु आती है उसमें वैसी ही छाया दिखने लगती है। स्फटिक मणि के सामने जिस रंग की वस्तुएँ रखी होंगी वह उसी रंग की दीखने लगेंगी। आज असुरता की परिस्थितियाँ फल-फूल रहीं हैं तो मानव का स्वरूप दुष्ट, दुराचारी अज्ञानी और असुर जैसा दीख रहा है। पर जैसे ही स्थिति में परिवर्तन होगा परिस्थितियाँ मानवता, नैतिकता, धार्मिकता एवं सज्जनता के अनुकूल बनती जायेंगी। दुष्कर्म का स्थान सत्कर्म ग्रहण करेंगे, दुर्भावनाओं के स्थान पर सद्भावनाओं की स्थिति दिखाई देगी। इन्हीं परिस्थितियों में वह मानव प्राणी जो आज असुर दिखाई देता है, मानवता के उच्च आदर्शों में ओत-प्रोत होकर देवत्व की ओर तेजी से बढ़ता हुआ दिखाई देगा।
दृष्टिकोण का परिवर्तन ही सबसे बड़ा परिवर्तन है। अपनी सीमा के संकीर्ण दायरे को बढ़ा कर विशाल क्षेत्र तक विकसित करने का नाम ही विकास है। वासना और तृष्णा की क्षुद्रता की मोह-निद्रा की उपेक्षा करते हुए कर्तव्य पालन और परमार्थ की आकाँक्षाएँ जाग्रत करना जागरण है। कुविचारों और दुर्भावनाओं के काम, क्रोध, लोभ, मोह के बंधनों को तोड़ डालना इसी का नाम मुक्ति है। संतोष संयम और सच्चाई सज्जनता और शाँति की संतुलित मनोभूमि बनाये रखना यही स्वर्ग है। यह अपनी धरती स्वर्ग से श्रेष्ठ है, यह अपना मानव शरीर देवताओं से उत्तम है। यह मनुष्य जन्म ईश्वर का हमें सबसे बड़ा अनुग्रह और वरदान है। इस अलभ्य अवसर का, इस परम सौभाग्य का समुचित सदुपयोग करते हुए, वह सोचना चाहिए, जो करने योग्य है, वह सोचना चाहिए, जो सोचने योग्य है, वह चाहना चाहिए, जो चाहने योग्य है, उस मार्ग पर चलना चाहिए, जो चलने योग्य है।
हमें अपनी असुरता को देवत्व में परिणत करने का प्रयत्न करना चाहिए ताकि नारकीय अंतर्द्वंद्वों और शोक संतापों से छुटकारा पाकर शाँति एवं संतोष का स्वर्गोपम सुख निरंतर उपलब्ध करते रह सकना संभव हो सके। दृष्टिकोण बदलने से जीवन बदल जाता है। असुरता देवत्व में बदल सकती है। नरक को स्वर्ग में परिणत किया जा सकता है, यदि हमारा दृष्टिकोण बदले।
लोगों को हाथ की उँगलियों के समान रहना चाहिए। ये सारी बराबर नहीं हैं लेकिन जब कोई काम करती है तो सारी इकट्ठी हो जाती हैं। ये हैं तो पाँच लेकिन काम हजारों कर देती हैं। --विनोबा भावे
उस जाति का भविष्य कितना अंधकार में है जो विभिन्न संप्रदायों में बँट कर वैमनस्य में पड़ गई है और हर संप्रदाय अपने को एक जाति समझने लगा है।
खलील जिब्रान
यद्यपि वायुमंडल समूची धरती पर जीवन बनाये रखने के लिए उत्तरदायी है। वायुमंडल से ही किसी-किसी रूप में समस्त जीवधारियों को पोषण प्राप्त होता है। लेकिन यहाँ उल्लेखनीय तथ्य यह है कि पूरी पृथ्वी के आकार मोटाई की तुलना में यह वायुमंडल एक बहुत पतले आवरण के रूप में है। पृथ्वी के आकार से आनुपातिक दृष्टि में वायुमंडल सेब के छिलके से भी पतला है। एवरेस्ट शिखर पर चढ़ने वाला कोई पर्वतारोही चोटी पर पहुँचने के पहले ही वायुमंडल की तीन-चौथाई मोटाई को पार कर लेता है।
ईश्वर समद्रष्टा, न्यायकारी, सत्ता है। अन्याय और अनीति को उसके राज्य में कोई स्थान नहीं। जो इनका आक्षेप करते हैं, वस्तुतः वह अपने पिछले पाप-कर्म ही भोगते रहते हैं, अन्यथा न्याय-निष्ठा में यहाँ राई-रत्ती भर भी अंतर आने वाला नहीं। दुर्जन उसके विधान में दंड पाते हैं और नीति मार्ग पर चलने वाले सज्जन-सत्पुरुष पुरस्कार के अधिकारी होते हैं। जब कभी दुष्टतापूर्वक, कुयोग वश या भ्रांतिवश इन्हें उलझाने की, फँसाने की अथवा मार डालने की कोशिश की जाती है, तो वह सत्ता बीच में हस्तक्षेप कर उन्हें बचाती और पग-पग पर उनकी सहायता कर उनके निर्दोष होने का प्रमाण-परिचय देती है।
फ्रैंक एडवार्ड्स के “स्ट्रेंज पीपुल” नामक ग्रंथ में एक ऐसी ही घटना का उल्लेख है। सन् 1803 में सिडनी, आस्ट्रेलिया में एक व्यक्ति की मृत्यु हो गई। मौत का कारण चोरों द्वारा प्राणघातक आक्रमण था। आक्रमण के उपराँत चोर उनके सोने के मोहरों से भरा बक्सा उठा ले गये। शीघ्र ही जोसेफ सैमुएल्स नामक एक व्यक्ति को गिरफ्तार कर लिया गया। उस पर आरोप था कि उसी ने चोरी की है। सैमुएल्स ने अपने निरपराध होने की लाख दलीलें और साक्षियाँ दीं, पर उसकी एक न सुनी गई और प्राण दंड घोषित कर दिया गया। जल्दी ही आइजक साइमण्ड्स नामक एक अन्य व्यक्ति को पकड़ा गया। उस पर भी अपराध में सम्मिलित होने का अभियोग था, पर वह इसे स्वीकार नहीं रहा था। सैनिक न्यायाधीश ने सोचा कि शायद सैमुएल्स की यातनापूर्ण फाँसी से डरे कर वह अपराध स्वीकार ले, इसीलिए उसके सार्वजनिक फाँसी के अवसर पर न्यायाधीश ने साइमण्ड्स को भी वहाँ उपस्थित रखने का आदेश दिया।
नियत दिन सैमुएल्स को दंड के लिए लाया गया। फाँसी का तख्ता एक घोड़े-गाड़ी से बँधा था और उसी के द्वारा खींचा जाना था। निर्धारित समय पर फँदा अपराधी के गले में डाला गया, उसमें झूलने से पूर्व वह उपस्थित लोगों के समक्ष कुछ बोलना चाहता था। अधिकारियों ने इसे उसकी अंतिम इच्छा समझ कर अनुमति दे दी। फाँसी कुछ देर के लिए रोक दी गई। उसने उपस्थित जन-समुदाय को संबोधित किया, कहा कि वह बिल्कुल निर्दोष है। आरोप एकदम निराधार है। यदि भगवान सचमुच ही सर्वोपरि न्यायनिष्ठ सत्ता है, तो आज यहाँ कोई-न-कोई चमत्कार होना ही चाहिए।
इतना कहकर वह मौन हो गया। फंदा एक बार पुनः उसके गले में झूलने लगा। तख्ते का निरीक्षण हुआ और साथ ही अधिकारी का संकेत भी। इशारे के साथ घोड़ों पर चाबुक पड़ी। घोड़े उछल कर आगे बढ़े। तख्ता खिंच चुका था और सैमुएल्स रस्से से लटकने लगा। अभी कुछ ही क्षण बीते थे कि मोटा सा रस्सा न जाने कैसे टूट गया और अभियुक्त संज्ञाहीन होकर नीचे लुढ़क पड़ा। उपस्थित गार्डों ने तुरंत उसे घेर लिया। अधिकारी दूसरे फंदे की तैयारी करने लगें अविलंब ही नया वलय अपराधी की गर्दन से लिपट गया। उसे एक कुर्सी पर बैठा कर तख्ते पर रखा गया, किंतु इस बार भी सैमुएल्स बच गया। इस बार रस्से से लटकते ही मजबूती से बँधा रस्सा धीरे-धीरे कर खुलने लगा, लंबाई बढ़ती गई और कुछ ही पल में दंड प्राप्त व्यक्ति के पैर जमीन को छूने लगे।
अधिकारी इतने पर भी रुके नहीं। निष्फलता को अपनी ही कमियाँ मानते रहे। तीसरा प्रयास आरंभ हुआ। इस बार रस्सा सैमुएल्स के सिर के ऊपर से टूट गया और प्राणदंड पूरा नहीं हो सका। इसके बाद वहाँ के गवर्नर ने फाँसी रुकवा दी और उसे अपराध-मुक्त घोषित कर दिया।
इस असफलता से उपस्थित न्यायाधीश को शंका हुई। उसने समझा कि रस्सों के साथ किसी-न-किसी प्रकार की छेड़छाड़ एवं गड़बड़ अवश्य ही की गई है, अस्तु उसने इनकी जाँच करने का निश्चय किया। निरीक्षण से जो निष्कर्ष प्राप्त हुआ, उससे न्यायाधीश आश्चर्यचकित रह गया। रस्सों के साथ किसी प्रकार की कोई छेड़खानी नहीं की गई थी, फिर भी वे टूट कैसे गये ? यही उसकी समझ में नहीं आ रहा था। तीसरा फंदा तो एकदम नये रस्से का बनाया गया था। अधिकारियों ने इसकी भार-वहन क्षमता की पुनः परीक्षा की। धीरे-धीरे कर चार सौ पाउण्ड वजन उससे लटकाया गया। वह यथावत् बना रहा। फिर उसमें की तीन बटी रस्सियों में से दो को काट दिया गया। उसकी एक लड़ भी उक्त भार ढोने के लिए पर्याप्त मजबूत साबित हुई, फिर अपेक्षाकृत कम भार वाले अपराधी के लटकने पर वह धागे के समान क्यों कर टूट गया ? यह किसी की समझ में नहीं आ सका।
बाद में इस अद्भुत मुकदमे की समीक्षा करते हुए एक गोष्ठी के दौरान न्यायाधीश ने इसमें किसी परोक्ष सत्ता का हाथ होने की बात स्वीकारते हुए टिप्पणी की थी “मारने वाले से बचाने वाला बड़ा होता है।” इस उक्ति की सत्यता सिद्ध होते तब देर नहीं लगती, यदि उस सत्ता के प्रति अगाध श्रद्धा, अटूट निष्ठा और अटल विश्वास पैदा किया जा सके, तो यह भी अनुभव किया जा सकेगा कि कोई अलौकिक शक्ति काया की छाया की तरह लिपटी रहकर हर प्रकार की समर्थ सहायता करने के लिए सदा तत्पर रहती है।
धन्य है जिंदगी यह हमारी, नाथ ! पाकर सहारा तुम्हारा, हे प्रभो ! हम समर्पित खड़े हैं, शेष जीवन है सार तुम्हारा।
हर तरफ था भयंकर समुँदर, जीर्ण थी नाथ ! जीवन की नैया, क्या पता, यह कहाँ डूब जाती, जो न मिलता किनारा तुम्हारा।
कामना है, तुम्हें जिंदगी में, सुन सकें जागते और सोते, हर निमिष बाँसुरी के सुरों-सा, पा सकें हम इशारा तुम्हारा।
तेज तूफान में, आँधियों में, पाँव ये जब कभी डगमगाएँ, बस तभी दौड़कर हम पकड़ लें, हाथ भगवन् ! दुबारा तुम्हारा।
पुत्र सा प्यार पाते रहें हम, पाँव निर्भय बढ़ाते रहें हम, जन्म-जन्माँतरों तक रहे ये, नाथ ! रिश्ता हमारा तुम्हारा।
हर तरफ जब अँधेरा घिरा हो, और कोई नहीं आसरा हो, रास्ता तब दिखाए गगन से, ध्रुव सरीखा सितारा तुम्हारा।
बुद्धि वह दो कि जो भी मिला है, लोकहित में उसे हम लगाएँ, ताकि भगवन् ! हमारे लिये ही, फिर खुला हो दुआरा तुम्हारा।
शचीन्द्र भटनागर
मेरे साथ जहाँ मेरा प्रभु, वही तपोवन मेरा। उसकी नमता लेकर ही, उर बना श्यामघन मेरा॥
यत्न किया जीवन भर लेकिन, जग आसक्ति न छूटी। जब उसकी स्मृति में जग भूले, वही मुक्ति क्षण मेरा॥
जग के हाहाकारों में, गुजरा है सारा जीवन। जहाँ मुरली स्वर स्नेही जन के, वह वृंदावन मेरा ॥
जब श्रद्धा से झुका माथ यह, प्रभुवर के चरणों में। तभी सार्थक लगा मुझे, धारण करना तन मेरा॥
केवल नाम सुना हिमगिरि का, पहुँच कहाँ संभव थी। जहाँ तेज बरसा सविता का, वह नंदन-वन मेरा॥
राजनीति, इतिहास, ज्ञान, विज्ञान, बुद्धि भोजन था। प्रभु चर्चा में चैन हृदय का, पाता है मन मेरा॥
माया वर्मा
उदासी अपने आप में एक रोग है। मनुष्य को सामान्य तथा हँसमुख, उत्साही एवं क्रियाशील होना चाहिए। छोटे बच्चों की तरह-जो स्वयं तो प्रसन्न रहते ही हैं, परिवारियों यहाँ तक कि परिचितों और अपरिचितों को भी प्रसन्न करते हैं। मानवी संरचना अपने आप में ऐसी है जो प्रकृति के साथ उपयुक्त तारतम्य बिठाकर सहज ही प्रसन्न रह सकती है।
शरीर और मन को निरोग रखा जा सके तो इतने भर से बहुत काम चल जाता है पेट में कम खायें, जो खायें सुपाच्य हो, इतनी सी बात ध्यान में रखने से पाचन तंत्र ठीक रहता है और उसके ठीक रहने पर शरीर के अन्य अवयव भी अपना काम सही रीति से अंजाम देते हैं। किसी अवयव के रोगी या गतिहीन होने का असर सिर पड़ता है और भारी रहने लगता है। कभी-कभी बढ़कर सिरदर्द के रूप में प्रकट होता है। आवश्यक नहीं कि इसका कारण मस्तिष्कीय कोई खराबी ही हो। शरीर के किसी भाग में अवरोध अड़ने पर उसकी प्रतिक्रिया समूचे शरीर पर होती है और उसका एक लक्षण उदासी के रूप में भी प्रकट होता है। अस्तु पेट को हल्का रखने के साथ-साथ उसे उत्साहवर्धक श्रम में लगाइए। व्यायाम इसी उद्देश्य के लिए किया जाता है कि निष्क्रियता-जन्य अवरोधों से पीछा छूटे और काम को भार मानने की अपेक्षा मनोरंजन मानने की प्रवृत्ति बढ़े।
आवश्यक नहीं पहलवानों की तरह दंड बैठक जैसे कड़े और थकान वाले व्यायाम किए जायँ। तेजी के साथ टहलने निकलने में नई-चीजों को देखने के अतिरिक्त मनोरंजक व्यायाम भी होता है। इसमें भी कोई मित्र, साथी, सहयोगी रह सके तो बीच-बीच में कुछ बातें करने या हँसने-हँसाने का सिलसिला भी चलता रहता है।
शारीरिक श्रम से नाड़ियों की गति तीव्र होती है साथ ही मानसिक उत्साह भी बढ़ता है। यदि व्यायाम की, टहलने की सुविधा न हो तो बिस्तर पर पड़े-पड़े ही अवयवों को धीरे-धीरे फैलाने और और धीरे-धीरे सिकोड़ने की धीमी गति देर तक अपनाई जा सकती है। दुर्बलों, वृद्धों, गर्भवती स्त्रियों बीमारों के लिए तो स्वास्थ्य विज्ञानी ऐसे ही अंग संचालनों की सलाह देते हैं।
शरीर के साथ ही उदासी में मानसिक विकृतियाँ भी एक बहुत बड़ा कारण होती हैं। अपने को एकाकी, सबसे अलग उपेक्षित समझना ऐसी भूल है जिसका परिणाम जीवन को निरानंद, नीरस बना देता है। अपने आप को समाज का अंग माना जाना चाहिए। परिवार को सुखी और समुन्नत बनाने में रुचि लेनी चाहिए। घर एक ऐसा उद्यान है जिसमें विभिन्न आयु और रिश्तों के व्यक्ति रहते हैं। उनकी अपनी-अपनी इच्छाएँ, आवश्यकताएं, समस्यायें और विशेषतायें होती हैं। उन्हें तभी समझा जा सकता है जब घनिष्ठता और आत्मीयता का भाव रहे। इस मनःस्थिति में वे सभी प्रिय लगते हैं और उनके भटकावों को घटाने और सुयोगों को बढ़ाने में यथासंभव रुचि लेना ऐसा काम है जो अपनी और पराई दृष्टि में व्यक्तित्व का मूल्य बढ़ाता है। फलतः प्रसन्नता का वातावरण बनना स्वाभाविक है।
गुमसुम एकाँत में बैठे रहने की आदत भी जिंदगी को बोझिल बनाती है। इसलिए घर के दफ्तर के, व्यवस्था के कामों में अपना योगदान करने का अवसर ढूँढ़ते रहना चाहिए। इससे सुव्यवस्था का आनंद मिलेगा और अपने कर्तव्य की उपयोगिता पर हर्ष भी होगा। गौरव भी अनुभव होगा।
आजीविका उपार्जन के कामों के अतिरिक्त बचा हुआ समय स्वाध्याय में लगाइए। जीवन को ऊँचा उठाने वाली, गुत्थियों को समझने और सुलझाने वाली पुस्तकें एक शानदार मित्र और परामर्श दाता की तरह हैं, जो अपने चिंतन को परिष्कृत करने में जितनी सहयोगी बनती है, उसकी तुलना में उन पर किये जाने वाला खर्च बहुत ही कम होता है। उपयोगी पुस्तकों के अध्ययन को आजीविका उपार्जन के समान ही महत्व देना चाहिए। उपयोगी से तात्पर्य यह है कि मात्र मनोरंजन करने वाली और कुत्साएँ भड़काने वाले साहित्य से। विषैले पदार्थों की तरह उनसे बचा ही जाना चाहिए, उन्हें पढ़ने की अपेक्षा न पढ़ना ही अच्छा। गंदे उपन्यास, कामुकता, भड़काने वाले साहित्य आजकल बहुत हैं। उनसे बचा भी जाना चाहिए और बचाया जाना भी।
कोई मनोरंजक कला, कौशल प्रयोग में लाने की गुंजाइश हो तो उसकी व्यवस्था बनानी चाहिए। संगीत रेडियो, टेलीविजन, बागवानी, पशुपालन जैसे कई ऐसे माध्यम हो सकते हैं जो ज्ञान भी बढ़ाते और एकाकी बैठे रहने की मनहूसियत से भी बचाते हैं। बच्चों के साथ खेलना, उन्हें कहानियाँ सुनाना, प्रश्नोत्तर के आधार पर अपना और उनका मनोरंजन करना भी एक उपयोगी स्वभाव है जिसे आदत में सम्मिलित करने का प्रयत्न भी करते ही रहना चाहिए।
प्रकृति को एक बहुमूल्य चित्र मानते हुए उसकी विशिष्टताओं को निरखते-परखते रहा जाय तो हर समय किसी कौतुक कौतूहल के साथ रिश्ता जुड़ा रह सकता है। समीप में रिश्ता जुड़ा रह सकता है। समीप में उड़ने, चहचहाने वाले पक्षी बिना पैसे के खिलौने हैं। बादल, टीले, जलाशय, वृक्ष, फल−फूल यदि रुचिपूर्वक देखे जा सकें तो यह समूचा संसार एक खिले हुए उद्यान की तरह आकर्षक प्रतीत होगा। किसी ऊँचे स्थान पर बैठकर चारों ओर नजर दौड़ाने से खेतों, बगीचों की सैर करने में ऐसा बहुत कुछ मिल सकता है जो उदासी को दूर करे।
कई बार चिंतन में विकृति घुस पड़ने पर भी खीज और उदासीनता का दौरा पड़ता है, भविष्य में क्या होने वाला है, किसी को पता नहीं, फिर उसे अनुपयुक्त मानकर अपने आपको चिंता, निराशा, भय, आशंका के गर्त में क्यों धकेला जाय ? अगले दिनों सफलतायें मिलने, सहयोग उपलब्ध होने और उन्नति के अवसर आने की विधेयात्मक कल्पनायें करते रहने में ही क्या हर्ज है। वे फलित होती हैं तब तो ठीक अन्यथा उनकी कल्पना तो तात्कालिक आनंद प्रदान करती ही है।
परिस्थितियों की तरह किन्हीं व्यक्तियों को अनुपयुक्त मानते रहने की अपेक्षा यह अच्छा है कि उसकी भूतकालीन तथा वर्तमान काल की जो अच्छाइयाँ दीख पड़ें उन पर संतोष व्यक्त करें, साथ ही स्थिति में सुधार करने की यथा संभव चेष्टा करते रहें कृतघ्नता जितनी कष्टदायक होती है वैमनस्य उत्पन्न करती है, उसकी तुलना में कृतज्ञता की प्रवृत्ति ऐसी है जो अपने को प्रसन्नता प्रदान करती है और शत्रु को मित्र बनाती है।
अपनी वर्तमान स्थिति को हेय वे ही मानते हैं जो अपने से अधिक सुखी या संपन्न लोगों के साथ तुलना करते और असंतुष्ट रहते हैं। यदि अपने से पिछड़े या अभावग्रस्त लोगों के साथ तुलना करें तो प्रतीत होगा कि अपनी वर्तमान स्थिति भी लाखों व करोड़ों से अच्छी है। अपनी असफलताओं और कमियों की सूची मस्तिष्क में लादे फिरने से वे बहुत भारी बन जाती है अच्छा यह है कि भूतकाल की सफलताओं और भविष्य की आशाओं को सुँदर गुलदस्ते की तरह सजाये और उसे देखकर अपनी प्रसन्नता में वृद्धि करें।
कर्मनिष्ठा में विश्वास रखने वाले आयु के बंधन में नहीं बँधते। वे सतत् उत्साह से भरे रह कर्तव्यपालन में लगे रहते हैं।
अमेरिका के प्रसिद्ध न्यायाधीश होम्स जब सेवा निवृत्त हुए, तो उस अवसर पर एक पार्टी का आयोजन किया गया। इस पार्टी में विभिन्न अधिकार, उनके मित्र, पत्रकार तथा संवाददाता सम्मिलित हुए थे। न्यायाधीश के पद से निवृत्त होने के बावजूद भी उनके चेहरे पर बुढ़ापा नहीं जवानी, झाँक रही थी। पार्टी के दौरान ही एक संवाददाता ने उनसे पूछा-”अब इस वृद्धावस्था में तो आप आराम करेंगे या कुछ और आपने भावी जीवन का क्या कार्यक्रम बनाया है ?”
“वृद्धावस्था” बड़े आश्चर्य से होम्स ने कहा-”क्या मैं वृद्ध दिखाई दे रहा हूँ। वस्तुतः मेरी जवानी तो अब आधी है, क्योंकि लंबे समय से जिन कार्यों को मैं टालता रहा था-उन्हें अब प्रारंभ करूंगा।” कौन से काम टाल रहे थे आप जिन्हें अब पूरे करेंगे ?” पहला काम तो यह कि बहुत समय से मैं बढ़ई का काम सीखना चाह रहा था, लेकिन अब तक इसका समय ही नहीं मिल पाया। अब बढ़ई का काम सीखने के साथ-साथ मैं विज्ञान का अध्ययन करूंगा, नये-नये खेल सीखूँगा और अपने मानसिक क्षितिज का विकास करूंगा। होम्स बोले-”और भले ही मैं बूढ़ा हो भी जाऊँ तो क्या। काम करना छोड़ूँगा थोड़े ही। काम करना छोड़ देने की अपेक्षा मैं मर जाना पसंद करूंगा।
श्रेणिक पुत्र मेघ ने भगवान बुद्ध से मंत्र दीक्षा ली और उनके साथ ही रहकर तपस्या में लग गये। विरक्त मन की उपासना से असीम शाँति मिलती है। कूड़े से जीवन में मणि-मुक्ता की-सी ज्योति झिलमिलाने लगती है, मन-वाणी-चित्त अलौकिक स्फूर्ति से भर जाते हैं। साधक को रस मिलने लगता है। तो मेघ भी अधिकांश समय उसी में लगाते। किंतु भगवान् बुद्ध की दृष्टि अत्यंत तीखी थी। वह जानते थे रस सब एक हैं-चाहे वह भौतिक हों या आध्यात्मिक। रस की आशा चिर नवीनता से बँधी है, इसीलिए जब तक नयापन है, तब तक उपासना में रस स्वाभाविक है,किंतु यदि आत्मोत्कर्ष की निष्ठा न रही, तो मेघ का मन उचट जायेगा, अतएव उसकी निष्ठा को सुदृढ़ कराने वाले तप की आवश्यकता है। सो वे मेघ को बार-बार उधर धकेलने लगे।
मेघ ने कभी रूखा भोजन नहीं किया था। अब उन्हें रूखा भोजन दिया जाने लगा, कोमल शैया के स्थान पर भूमि शयन, आकर्षक वेषभूषा के स्थान पर मोटे बल्कल वस्त्र और सुखद सामाजिक संपर्क के स्थान पर राजगृह आश्रम की स्वच्छता, सेवा-व्यवस्था एक-एक कर इन सबमें जितना अधिक मेघ को लगाया जाता, उनका मन उतना ही उत्तेजित होता, महत्वाकाँक्षाएँ सिर पीटतीं और अहंकार बार-बार आकर खड़ा होकर कहता-”ओ रे मूर्ख मेघ ! कहाँ गया वह रस ? जीवन के सुखोपभोग को छोड़कर कहाँ आ फँसा।” मन और आत्मा का द्वन्द्व निरंतर चलते-चलते एक दिन वह स्थिति आ गई, जब मेघ ने अपनी विरक्ति का अस्त्र उतार फेंका और कहने लगे ! “तात ! मुझे तो साधना कराइए, तप कराइए जिससे मेरा अंतःकरण पवित्र बने।”
तथागत मुसकराये और बोले-”तात ! यही तो तप है। विपरीत परिस्थितियों में भी मानसिक स्थिरता-यह गुण है। जिसमें आ गया, वही सच्चा तपस्वी-वही स्वर्ग विजेता है। उपासना तो उसका एक अंग मात्र है।” मेघ की आँखें खुल गई और वे एक सच्चे योद्धा की भाँति मन से लड़ने को चल पड़े।
वानप्रस्थ बिना मन के मल्लयुद्ध को जीत नहीं लिया जाना चाहिए। वेष वैसा रहे व मन कहीं और, तो वह जीवन तो भौतिक जीवन से भी गया बीता है।
मन की चंचलता प्रसिद्ध है। वह क्षण-क्षण में अस्त-व्यस्त बना इधर-उधर उड़ता रहता है। एक स्थान पर न टिक पाने से किसी महत्वपूर्ण दिशा में गंभीरतापूर्वक सोच सकना और तन्मयतापूर्वक प्रस्तुत कार्य कर सकना संभव नहीं हो पाता। एकाग्रता और तत्परता बिना किसी भी कार्य में सफलता नहीं मिल सकती। जीवन के सभी महत्वपूर्ण कार्य दत्तचित्त होकर करने से ही संपन्न होते हैं। चंचलता प्रगति पथ की सबसे बड़ी बाधा है। इसके रहते हुए सुयोग्य व्यक्ति भी पग-पग पर ठोकरें खाते और असफल रहते देखे जाते हैं। भौतिक क्षेत्र की भाँति आत्मिक क्षेत्र की सफलतायें भी चंचलता के चित्त-वृत्तियों के निरोध-परिष्कार पर निर्भर हैं। योग की परिभाषा करते हुए महर्षि पतंजलि ने उसे चित्त-वृत्तियों का निरोध बताया है। इस चित्तवृत्ति को दो रूपों में देखा जाता है-एक तो अस्थिर चंचलता, दूसरे पाशविक कुसंस्कारों की ओर रुझान। इन दोनों ही अवाँछनीयताओं पर नियंत्रण स्थापित करने से चित्तवृत्ति निरोध की योग साधना संभव होती है। दीर्घकाल से संग्रहित कुसंस्कारों-पशु प्रवृत्तियों को परिवर्तित कर उच्चस्तरीय दिव्य आस्थाओं का स्वरूप दे देने की प्रक्रिया योग है। इसके लिए प्रचंड पुरुषार्थ अपेक्षित है।
शरीर को सक्रिय और मन को संतुलित एवं एकाग्र रखने पर ही इतना प्रबल पुरुषार्थ संभव है। एकाग्रता मन-मस्तिष्क की एक व्यवस्थित चिंतन विधि है जिसके लिए आसन, प्राणायाम आदि की शारीरिक-मानसिक प्रक्रियायें अपनाई जाती हैं। ध्यान-धारणा से मस्तिष्कीय अस्तव्यस्तता और बिखराव पर नियंत्रण पाया जाता है साथ ही साथ अचेतन मन की गहन परतों में दबी पड़ी विभूतियों को उभारा जाता है। इस अभ्यास में तरह-तरह की आकर्षक प्रतिभायें सामने रखकर अथवा उन्हें भावना क्षेत्र में बिठाकर उनके साथ एकाग्रता जोड़ने का अभ्यास किया जाता है। अध्यात्म साधना की यह एकाग्रता संपादन प्रक्रिया मस्तिष्क को साधने की दिशा में एक अत्यंत छोटा सा प्रयास मात्र है। समग्र आध्यात्मिक प्रगति तभी संभव हैं जब अपनी चेतना को विश्व चेतना का घटक मानकर स्वार्थ को परमार्थ में विकसित किया जाय।
योग का लक्ष्य है-आत्मा को परमात्मा से जोड़ना। व्यष्टि सत्ता का समष्टि सत्ता में समर्पण ही योग है। यह भावोत्कर्ष की साधना द्वारा ही संभव है। व्यक्तिवादी अहंता और स्वार्थवादी महत्वाकाँक्षा में परिधिबद्ध मन को सार्वभौम चेतना से जोड़कर अपने चिंतन और कर्तृत्व को उत्कृष्ट बनाना ही आध्यात्मिक प्रगति है। इससे कम कुछ भी नहीं। सही दिशा में चलने पर मनुष्य में देवत्व के उदय की प्रक्रिया का प्रारंभ अनिवार्य है। योग वस्तुतः एक भाव विज्ञान है, जो जीव को ब्रह्म से चिर मिलन की भाव-भूमिका की ओर ले जाता है। लघु को महान बनाने की यह विद्या है। यह मूल लक्ष्य यदि विस्तृत-उपेक्षित रहा, तो फिर आसन, प्राणायाम, ध्यान, बंध मुद्रा आदि का अभ्यास-विस्तार एक सामान्य व संकीर्ण मनः क्रीड़ा के अतिरिक्त और कुछ नहीं कहा जा सकता।
योग की अनेकानेक शाखायें हैं। उनमें से किसी एक का आश्रय लेकर अतीन्द्रिय क्षमतायें विकसित की जा सकती हैं, परंतु वे चमत्कारी नहीं कही जा सकती। वस्तुतः वह आत्म विधा का ही एक अंग है। योग का उद्देश्य वस्तुतः अचेतन मन का परिष्कार एवं विकास है। व्यक्तित्व का निर्माण अचेतन मन की गहरी परतें ही संपन्न करती है। मनोविकार बुद्धि क्षेत्र में नहीं, वरन् स्वभाव के अंतर्गत आदतें बनकर घुस बैठते हैं। मनुष्य उनकी बुराइयाँ समझता है और छोड़ना भी चाहता है, किंतु संचित अभ्यासों का दबाव इतना अधिक होता है कि अपने ही निर्णय के विरुद्ध रास्ते पर चलने के लिए बाध्य होना पड़ता है। इन आदतों के पीछे अचेतन मन ही काम करता है।
शरीर की अनवरत गतिविधियों में सचेतन मन या जाग्रत मस्तिष्क का नगण्य जितना अधिकार होता है। संचालन अचेतन की अभ्यस्त प्रवृत्तियाँ ही करती हैं। मांसपेशियों का आकुंचन-प्रकुँचन, पलकों का निमेष-उन्मेष, भूख-प्यास, फेफड़ों का श्वास-प्रश्वास, निद्रा-जाग्रति आदि असंख्य शारीरिक-क्रिया-प्रक्रियायें अचेतन मन के नियंत्रण में ही चलती हैं। हारमोन ग्रंथियों से लेकर प्राणों के अवधारण तक पर अचेतन का ही प्रभाव है। मनोविकारों के कारण शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य चौपट हो जाना और सद्भावनाओं के आधार पर व्यक्तित्व के सभी पक्षों का समुन्नत होते चलना इसी संस्थान की संरचना के कारण संभव होता रहता है। उत्थान और पतन के बीच इसी क्षेत्र में उगते हैं। व्यक्तित्व की सुविस्तृत जड़ें इसी भूमि में घुसी होती हैं।
अचेतन को ही ‘चित्त’ कहते हैं। योग द्वारा इसी का निरोध और परिष्कार-परिशोधन किया जाता है। मस्तिष्क का प्रेरक केन्द्र यही है। वह गयी-गुजरी स्थिति में पड़ा रहे तो सचेतन की बुद्धिमत्ता का उपयोग धूर्तता-दुष्टता जैसे निकृष्ट प्रयोजनों के अतिरिक्त किसी रचनात्मक कार्य में संभव न हो सकेगा और बुद्धिमान कहलाने वाला मनुष्य भी उज्ज्वल भविष्य का सृजन न कर सकेगा। यों तो सचेतन मन और बुद्धि को विकसित करने के लिए शिक्षा, साहित्यिक संपर्क जन्य, अनुभव संपादन करने जैसी अनेक विधि-व्यवस्थायें प्रचलित हैं। किंतु अचेतन मन की चित्त की चिकित्सा करने में यौगिक उपाय-उपचारों को ही काम में लाया जाता है जिसे अध्यात्म की भाषा में मनोमय कोष की साधना भी कहते हैं। यद्यपि आज परामनोविज्ञान एवं मनोविज्ञान के अंतर्गत भी अचेतन की क्षमता को समझने और उसमें अभीष्ट परिवर्तन करने के उपाय खोजे तथा सोचे जा रहे हैं, किंतु तत्वदर्शियों की अनुभूति पद्धति योग साधना के अतिरिक्त और कोई कारगर मार्ग अभी तक करतलगत हुआ नहीं है।
प्रख्यात मनःशास्त्री सर अलेक्जेन्डर कैनन का कहना है कि मनुष्य इस विश्व की सबसे विलक्षण संरचना है। उसका सारतत्व मन-मस्तिष्क है और उसका नवनीत अचेतन संस्थान है। दुर्भाग्य से इसी केन्द्र की न्यूनतम जानकारी हमें उपलब्ध है। वैज्ञानिक अभी तक यह नहीं जान सके कि इस संस्थान को प्रभावित, परिवर्तित और परिष्कृत करने के लिए क्या किया जा सकता है। शरीर चिकित्सा में काम आने वाले उपचारों की पहुँच वहाँ तक है नहीं। लगता है स्वसंवेदन, स्वसम्मोहन और स्वनिर्देशन जैसे उन्हीं उपायों को काम में लाना पड़ेगा जिन्हें पुरातन योगीजन अपने ढंग से काम में लाते रहे हैं जो हो संसार की सुख-शांति और मानवी प्रगति के मर्म केन्द्र तक हमें पहुँचना ही होगा। किसी उपाय से अचेतन को नियंत्रित करने की विधि-व्यवस्था हस्तगत करनी ही होगी। इसके बिना समुन्नत व्यक्ति और समृद्ध विश्व की संभावना बन न सकेगी।
इस तथ्य को दूरदर्शी अध्यात्मवेत्ता ऋषि-मनीषियों ने चिरकाल पूर्व ही जान लिया था। उनने मानवी व्यक्तित्व का आधार केन्द्र मन के अचेतन भाग-चित्त को माना है और इस बात पर बहुत जोर दिया है कि समृद्धि के अन्याय आधारों पर जितना ध्यान दिया जाता है उससे कम नहीं, वरन् अधिक ही मानसिक परिष्कार पर दिया जाय। इस क्षेत्र के परिष्कार एवं विकास के बिना भौतिक एवं आत्मिक प्रगति की आशा पूरी नहीं हो सकेगी। उनके अनुसार चेतन मस्तिष्क की सक्रियता अचेतन की शक्ति तरंगों को काटती है। इसलिए जब चेतन मन अधिक सक्रिय होगा तो अचेतन स्वतः ही दबा और अविकसित ही पड़ा रहेगा। बौद्धिक संस्थान की सक्रियता को शिथिल करने पर अचेतन केंद्र जाग्रत होता है। प्रत्याहार, धारणा, ध्यान, समाधि जैसी साधनाओं द्वारा चेतन मन-मस्तिष्क को शिथिल, निष्क्रिय एवं शून्य स्थिति में ले जाया जाता है। तब ही दूरदर्शन दूर-दृष्टि, विचार-प्रेषण, भविष्य ज्ञान, अदृश्य का, परोक्ष का दर्शन, आदि अनेक अतीन्द्रिय क्षमतायें प्राप्त की जा सकती हैं। सचेतन बौद्धिक मस्तिष्क को शिथिल करके इच्छाशक्ति, प्राणशक्ति को अचेतन के विकास में प्रयुक्त करने पर शरीर में आश्चर्यजनक परिवर्तन संभव है। अति दीर्घजीवी होना, अति शक्तिशाली होना, अदृश्य जगत का ज्ञान प्राप्त करना आदि उसी स्थिति में संभव है।
छोटे-छोटे जीव-जन्तुओं से लेकर पशु-पक्षी तक बौद्धिक दृष्टि से मनुष्य से पिछड़े होते हैं। उनका चिंतन और सचेतन क्षेत्र शिथिल रहता है। इसी का लाभ उनके अचेतन को मिलता है। कुत्तों की घ्राण शक्ति अति सूक्ष्म होती है। चमगादड़ के ज्ञानतंतु राडार क्षमता से संपन्न होते हैं। ह्वेल मछली का अचेतन मस्तिष्क भी बहुत क्रियाशील होता है और उसके शरीर में पनडुब्बियों की सभी विशेषतायें पायी जाती हैं। समुद्री झींगे की शरीर प्रणाली जेट-विमान की प्रणाली जैसी होती है। उसका अचेतन मस्तिष्क ही इस तीव्र दौड़ में उसे समर्थ बनाता है। अनेक वन्य पशु एवं जीव-जन्तु मौसम सहित अन्यान्य प्राकृतिक आपदाओं जैसे वर्षा, भूकंप आदि की जानकारी समय पूर्व ही अपने अचेतन मस्तिष्क द्वारा प्राप्त कर लेने में समर्थ होते हैं। वर्षा ऋतु आने से पूर्व ही चींटियां तथा अन्य कीड़े अपना आहार इकट्ठा कर लेते हैं। ये सभी विशेषतायें इनके अचेतन मस्तिष्क का ही परिणाम हैं। मनुष्य के चेतन मस्तिष्क की अति सक्रियता से उत्पन्न ऊष्मा अचेतन को दबा देती है जिससे उसकी अलौकिक क्षमतायें प्रसुप्त ही पड़ी रहती हैं।
इसलिए योग में प्रथम चरण के रूप में मानसिक संतुलन पर बल दिया जाता है। अनुकूल प्रतिकूल परिस्थितियों में चित्त को अनुद्वेलित रखने का अभ्यास इसीलिए किया जाता है कि उसमें मानसिक ऊष्मा में अनावश्यक वृद्धि नहीं होती और अचेतन भी क्षीणता और बिखराव से बच जाता है। इस तरह मानसिक संतुलन का प्रथम चरण सध-जाने पर अगला चरण उठाया जाता है। चेतन मस्तिष्क की गतिविधियों को कुछ समय के लिए रोककर उस संस्थान में क्रियाशील विद्युत शक्ति को अचेतन क्षेत्र में नियोजित करने पर अतीन्द्रिय सामर्थ्य विकसित होती है।
सुप्रसिद्ध मनोविज्ञानी ड्रमण्ड एवं मैलोन के अनुसार मनुष्य का अचेतन मन एक तिजोरी है-समुद्र है जिसमें सभी तरह के रत्न भण्डार रस एवं विष भरे हैं, हम जिसे उभार लें, वे ही सचेतन पर अधिकार जमाये दीखेंगे। वस्तुतः अचेतन में सब कुछ दिव्य और भला ही नहीं है। पाशविक कुसंस्कार वहाँ भी विराजमान हैं जिनका परिष्कार-परिशोधन आवश्यक है। इसके लिए संतुलन और एकाग्रता को आगे बढ़ाते हुए चित्त को जाग्रत दिशा में ही लय कर देना पड़ता है जिसे अष्टाँग योग की चरमावस्था कहते हैं, जिसके लिए प्रत्याहार, धारणा और ध्यान की भूमिकाएं पार करनी पड़ती हैं। इस साधनाओं के द्वारा सचेतन मस्तिष्क की चिंतन शक्ति एवं संकल्प शक्ति को शिथिल करते हुए वहाँ लगे तेजस् को अचेतन में नियोजित किया जाता है, तभी अनुपम दिव्यताएं प्रकट होना शुरू होती हैं। योग और लय का आश्रय लेकर अचेतन को कुसंस्कारों से मुक्त कराने की दिशा में जो जितनी अधिक प्रगति करता है, वह उतना ही समर्थ सिद्ध पुरुष कहा जाता है। यही योग का उद्देश्य है।
समझ-बूझ कर उत्कृष्ट जीवन जीने की सोच का नाम ‘अध्यात्मदर्शन’ है। इस भाव को न समझ पाने के कारण ही इसके बारे में जन सामान्य के मन में तरह-तरह की भ्राँतियाँ घर कर गई हैं। इसे ठीक से न जानने और न समझ पाने के कारण बहुसंख्यक लोग बेतरतीब जिंदगी जीते हैं। क्या उचित है-क्या अनुचित इस पर विचार करने के लिए उनमें रुचि नहीं है। बस नशे की हालत में भीड़ के साथ दौड़े चले जा रहे हैं। जिंदगी सही और ठीक दिशा में चले, इसके लिए स्वयं की स्थिति तथा आस-पास की परिस्थिति के बारे में चिंतन कर अपने रास्ते को तय करना चाहिए।
पुराने समय से लेकर आज तक महान विचारकों न यही काम किया है। भारत की प्राचीन चिंतन संपदा में इन्हीं, की चर्चा है। मनुष्य और विश्व के बीच मनुष्य और प्रकृति के बीच क्या संबंध हैं ? इन्हें कैसे अच्छी तरह निभाया जाय ? जिंदगी का उद्देश्य क्या है ? इन्हीं सवालों पर अलग-अलग पहलुओं से विचार किया गया है। इनका महत्व जितना पहले था उससे कहीं अधिक आज है। आज चारों ओर विघटन बिखरने वैयक्तिक एवं सामाजिक जीवन में जो दरारें दिखायी पड़ रही हैं उनका कारण मनुष्य की विचारणा को ही माना जाना चाहिए।
कुछ लोगों की धारणा है कि अध्यात्म या दर्शन सिर्फ बुद्धि का कौतुक-कौतूहल मात्र है, इसमें यथार्थता की गुंजाइश नहीं के बराबर है। इसे एक तरह की भ्राँति ही कहना ठीक है। यह एक मनोवैज्ञानिक तथ्य है कि चिंतन हमारे व्यवहार का निर्माता है। यदि चिंतन ठीक न हो तो अच्छा-भला व्यवहार कर पाना संभव नहीं हो पाएगा। दर्शन न सिर्फ चिंतन को विकसित कर व्यवहार को उन्नत बनाता है बल्कि उसके आगे बढ़ने में भी सहायक है। मानव मन की एक विशेषता है कि वह वर्तमान में बँध कर नहीं रह सकता, स्थिति विशेष उसे संतोष नहीं देती। वह भविष्य को सोचना चाहता है, आगे बढ़ने में इसे सुख मिलता है। प्रगति की, विकास की यह लालसा उसकी प्रकृति में समाहित है। प्रसिद्ध चिंतक द्वय सतीश चन्द्र चटर्जी व धीरेन्द्र मोहन दत्त ने अपनी किताब “एन इन्ट्रोडक्षन टू इण्डियन फिलॉसफी” में इसी तथ्य को समझाते हुए कहा है कि ज्ञान का लक्ष्य सिर्फ बौद्धिक कौतूहल की तुष्टि नहीं है। इसका ध्येय मुख्यतः दूर दृष्टि, अग्रदृष्टि तथा अंतर्दृष्टि के साथ प्रबुद्ध जीवन व्यतीत करना व व्यवहार को निर्दोष बनाना है। जीवन लक्ष्य की प्राप्ति इसी में सन्निहित है।
भारतीय चिंतन के इस आदर्श को कतिपय पश्चिमी दार्शनिकों ने भी स्वीकारा है। जर्मन दार्शनिक इमानुएल काण्ट ने अपनी रचना “क्रिटिक देर रिनेन वरनुफ्ट” में कहा है कि समूचा दर्शन तीन सवालों के इर्द-गिर्द घूमता है। ये सवाल है ‘मैं क्या जान सकता हूँ ? मुझे क्या करना चाहिए ? मैं किसकी उम्मीद कर सकता हूँ ?’ इन्हीं के जवाबों को तरह-तरह से समझाने की चेष्टा की गई है। आज की परिस्थितियों में इन्हें समझना और भी आवश्यक है। इसे न समझ पाने का कारण है कि हम न जानने योग्य को जानने की कोशिश करते हैं ? जिसकी उम्मीद न करनी चाहिए उस ओर आगे बढ़ते हैं।
जीवन में उत्तरोत्तर उत्कृष्टता की अभिवृद्धि होती रहे, वह योजनाबद्ध रीति से संचालित हो सके, इसके लिए हमें समूची वस्तु स्थिति पर विचार करना होगा। प्राचीन ज्ञान-भंडार के दर्शनों के प्रकार भले छः हों, पर इसका मतलब यह नहीं कि सोचने-विचारने की समूची जिम्मेदारी कपिल, कणाद, जैमिनी, व्यास, गौतम, पतंजलि पर थी। ये तो सिर्फ चिंतन को दिशा देने वाले मनीषी थे। बाकी हर आदमी स्वयं अपना विश्लेषण कर जीवन को सही मार्ग में ले जाने के लिए खुद विचार करता है। सोच-समझ कर काम करने को श्रेष्ठता की मान्यता प्रदान की गई थी। यही कारण है यहाँ के वैभव, जिंदगी जीने की रीति-नीति, को आश्चर्य की दृष्टि से देखा जाता था। यूनानी इतिहासकारों ने भारतवासियों को “दार्शनिकों की जाति” कहकर संबोधित किया था। तौर-तरीकों पर ठीक तरह से विचार संयम मनुष्य को देव तुल्य बना देता है।
महावीर स्वामी
करने, उन पर आचरण करने का प्रतिफल इसे जगद्गुरु के रूप में प्राप्त हुआ था।
पर जब से हमने सोचने समझने को, चिंतन, मनन एवं स्वाध्याय को ताक पर रख दिया। अंधी भेड़ों की तरह जिस किसी तरह आड़ा तिरछा चलने में विश्वास करने लगे। ऐसी स्थिति में अवगति स्वाभाविक है। यदि किसी ने ठीक पगडंडी का चुनाव कर उस पर चलना शुरू कर दिया है तो उसे मंजिल जरूर मिलेगी। हो सकता है इसमें थोड़ी देर सबेर हो जाय, पर जिसकी कोई पगडंडी नहीं, बस यूँ ही घने जंगल में भटक रहा है, उसके पल्ले थकान के अलावा कुछ नहीं हाथ लगेगा, भले ही उसने कितनी ही भाग-दौड़ क्यों न की हो ? सोच-समझ रहित जिंदगी की ऐसी ही हालत है।
आज-कल की परिस्थितियों के संदर्भ में कतिपय चिंतकों ने इसका काफी महत्व बताया हैं। इनमें से एरिक फ्राँस एक हैं। इन्होंने अपनी किताबों ‘इस्केप फ्राँम फ्रीडम’ मैन फॉर हिमसेल्फ एनाटॉमी आफ ह्यूमन डिस्ट्रॉक्टवनेस’ आदि में इसकी विशद् चर्चा की है। उन्होंने नागरिकों की जिंदगी के प्रति सोच को आधार मानकर मानव समुदाय को तीन हिस्सों में बाँटा है। प्रथम है लाइफ अफरमेटिव सोसाइटी, द्वितीय-नॉन डिस्ट्रक्टिव अग्रेसिव सोसाइटी एवं तृतीय हैं-डिस्ट्रक्टिव सोसाइटी। पहले नंबर के समाज को आदर्श माना गया है। इसमें नागरिक जिंदगी के सभी पहलुओं पर विचार करते हैं। हर एक का जीवन कर्तव्यों के प्रति आस्था होती है। ऐसी दशा में उनका व्यवहार सरल सौम्य होता है। पारस्परिक स्नेह सौहार्द्र का सद्भाव उनमें उत्तम संपर्क सूत्र का काम करता है। श्री फ्रॉम के अनुसार समाज का यही आदर्श स्वरूप है जो उसकी दार्शनिक पद्धति से गढ़ा जाता है।
दूसरे नंबर के समाज में लोगों का व्यवहार विध्वंसक तो नहीं पर आक्रामक जरूर रहता है। इनमें सोचने-समझने की रुचि कम होती है। इसी कारण इनके व्यवहार में आक्रामकता ईर्ष्या-द्वेष की प्रवृत्तियाँ पनपती रहती हैं। जीवन में दुःख असंतोष व अतृप्ति का भाव उदय होता है तीसरी श्रेणी विध्वंसक समाज की है। इन्हें अफ्रीका के जंगली कबीलों में देखा जा सकता है। सोचने समझने से इनका दूर दराज तक कोई वास्ता नहीं। काट, हत्या, एक दूसरे को समूल नष्ट करने की प्रवृत्ति इनकी विशेषता मानी जा सकती है। सोचने समझने का कोई तौर-तरीका न होने के कारण मानव देहधारी होते हुए भी गई गुजरी पशुओं जैसी जिंदगी गुजारते हैं। किंतु आज यह तीसरी स्थिति सारे समाज में संव्याप्त दिखाई देती है, मात्र कबीलों तक सीमित नहीं रही।
हम ऐसी गई गुजरी स्थिति में न जा पड़ें। सही ढंग से विकास किया जा सके इसके लिए उचित यही है कि अध्यात्मवादी दृष्टिकोण को जीवन का अभिन्न अंग बनाया जाय। हमारा व्यक्तिगत व सामाजिक जीवन उन्नत बने इसके लिए दर्शन की इस केन्द्रीय धारणा को ठीक-ठीक धारण करना होगा कि हमारा मन वे चेतना संकल्प शक्ति से संपन्न है। इस सामर्थ्य के बल बूते अपने इर्द-गिर्द होने वाले सब कुछ को जाना-बूझा जा सकता है। आदमी सिर्फ पेशियों तंत्रिकाओं का ढेर भर नहीं है। वह शुद्ध घनीभूत चेतन सत्ता का दिव्य अंश अविनाशी आत्मा है।
दर्शन के इस केन्द्र बिन्दु को समझ लेने से फिर हम वही करेंगे जो इसकी गरिमा के अनुकूल है अपने यथार्थ विकास में सहायक है। कर्तव्य का पालन, न्याय की प्रक्रिया, सद्गुणों के अनुरूप व्यवहार में हमारी वास्तविक इज्जत प्रतिष्ठा, गरिमा, समायी हुई है।
इस तरह जो करने योग्य है उसे करने पर हमारे लिए असीम विकास की संभावनाओं का दरवाजा खुल जाता है। ज्यों-ज्यों हम इन्हें पाते जाते हैं-जीवन अधिकाधिक प्रकाशवान होता चला जाता है। हमारी अपनी स्थिति, इर्द-गिर्द की परिस्थितियों, समय की दिशा धारा देखते हुए सोचने समझने के रवैये में थोड़ा-बहुत अलगाव हो सकता है। पर उद्देश्य एक ही रहेगा-अंतराल के देवलोक का जागरण। मान-दण्ड भी वही होंगे-अर्थात् अपने को समूचे विश्व के साथ एक करना। इसके लिए दैवी सद्गुणों के अनुरूप जीवन जीने की योजना को क्रिया में उतारना होगा।
जैसे-जैसे हम इस दिशा में अग्रसर होते जायेंगे, सारी वस्तु स्थिति स्पष्ट होती जाएगी। साफ-साफ अनुभव हो सकेगा कि जिंदगी को सही ढंग से जीने की सोच-समझ अर्थात् दार्शनिक चिंतन अपना अंतरंग सखा, मित्र, सुहृद सभी कुछ है। जो हमें अपने प्रकाश के व्यावहारिक जीवन की अँधेरी और भू-भुलैयों से भरी राहों में मार्गदर्शन देता है और आगे बढ़ाता है। मनुष्य होने के नाते उचित यही है। कि तत्संबंधी सारी भ्राँतियों से उबर कर इसे स्वीकारा अपनाया और समझदारी का जीवन जिया जाय।
मृत्यु के समीप बेबीलोन की रानी माँटीक्रिस ने अपनी कब्र पर निम्न पंक्तियाँ लिखने का संकेत दिया। “यहाँ पर अपार धन गढ़ा हुआ है, कोई भी व्यक्ति जरूरत पड़ने पर खोदकर धन प्राप्त कर सकता है।”
लंबे समय के बाद ईरान के बादशाह डेरियस ने जब बेबीलोन को जीत लिया तो उसने इबारत पढ़ी और कब्र खुदवाने का आदेश दे दिया।
खोदते-खोदते उसे एक भी पैसा अथवा सोना चाँदी जवाहरात कुछ हाथ न लगा तो और गहरी खुदाई कराई गई। तब एक पत्थर मिला। जिस पर लिखा था।
“नादान इंसान इतना परिश्रम तूने मेरी कब्र खोदने में किया और अपनी इंसानियत पर नाहक लाँछन लगाया। अच्छा होता तू मेहनत मशक्कत करता तो तेरा ही नहीं तुझ जैसे कितनों का पेट भरता।”
वीतराग-सर्वत्यागी और निष्काम ऋषि भरत इतने निश्छल और निर्विकार रहते थे कि लोगों ने उपहास में जड़ कहना आरंभ कर दिया। जड़ शब्द उनके लिए लोक व्यवहार में इतना प्रचलित हुआ कि उनके मूल नाम से जुड़कर उन्हें जड़ भरत ही कहा जाने लगा। लोग उन्हें कुछ भी कहते मान करते या अपमान निंदा करते या प्रशंसा इसकी उन्हें न कोई अपेक्षा रहती और न ही किसी तरह की चिंता। सरल इतने कि लोग उन्हें मूर्ख समझ कर रोटी के बदले कोई भी बेगार करने को कहते तो वह भी अविचल भाव से कर लेते।
एक दिन की घटना है। सिंधु सौवीर प्रदेश के राजा रहूगण महिर्ष कपिल का सत्संग करने के लिए शिविका पर बैठ कर जा रहे थे, संयोग से उसी समय जड़ भरत विचरण करते हुए दिखाई दिए। वेष विन्यास देखकर उन्हें महर्षि तो क्या कोई भी ब्राह्मण भी नहीं समझ सकता था। शरीर से हृष्ट-पुष्ट और मुद्रा से प्रसन्न सरल भरत को भारवाहकों ने कोई चरवाहा समझा और उन्हें पकड़कर सौवीर नरेश की पालकी उठाने में बीमार साथी के स्थान पर लगा दिया। स्वभाव से ही न करना, नहीं जानने वाले महर्षि भरत ने सहर्ष इस कार्य को स्वीकार किया और रुग्ण व्यक्ति के स्थान पर स्वयं आ गए।
उन्हें इस कार्य का अभ्यास तो था नहीं, इसलिए वे अन्य भारवाहकों की तरह उनके साथ कदम से कदम मिलाकर नहीं चल पा रहे थे। इसके अलावा उन्हें इस बात का भी ध्यान रहता था कि धरती पर रेंगने या चलने वाला कोई जीव पैरों तले कुचल कर न मर जाये। इस सतर्कता एवं अनभ्यस्तता के कारण उनके पैर लड़खड़ा जाते। जब दो-तीन बार ऐसा हुआ और अन्य भारवाहकों की तरह पालकी को कंधा न दे पाने के कारण भरत रह-रह कर लड़खड़ा जाते तो भीतर बैठे सौवीर नरेश भी उछल पड़ते।
जब तीन-बार ऐसा हुआ तो राजा रहूगज ने बाहर देखा। उनकी दृष्टि से ही कहारों ने समझ लिया कि नरेश क्रुद्ध हैं। कहीं एक के किए का दंड सभी को न भुगतना पड़े, इसलिए उन्होंने भरत की गलती के बारे में बता दिया। इस पर सौवीर नरेश ने व्यंग किया, “ओह बंध ! तुम कितने दुर्बल हो गए हो, वृद्धावस्था ने तुम्हें कैसा बना दिया ? यह बुढ़ापा भी कितना बुरा है ? अच्छे भले मनुष्य को भी जीर्ण और दुर्बल बना देता है। शायद तुम थके हुए भी हो और प्रतीत होता है कि तुम्हारे साथी भी ठीक से तुम्हारी सहायता नहीं कर पा रहे हैं।”
भरत ने इस बात का कोई उत्तर नहीं दिया। वैसे भी कोई कुछ कहता रहे चुप रहना उनके स्वभाव में था। कुछ दूर आगे चलकर वे फिर लड़खड़ाए। अब तो राजा क्रोध से बिफर उठा “क्या बात है मूर्ख ? तुम्हें मेरी बात समझ में नहीं आ रही या तुम बहरे हो।”
मौन तोड़कर भरत ने कहा “राजन ! आपकी पिछली बात मैंने सुनी थी और उसका आशय भी समझा था। मुझे ज्ञात है कि बोझा ठीक से ढोने के लिए होता है और उसे ठीक से ढोना चाहिए। पर मुझे यह समझ में नहीं आता कि आदमी-आदमी के ऊपर बोझा क्यों बने ?”
राजा को इस उत्तर की आशा नहीं थी। एक साधारण सा भारवाहक या सामान्य सा व्यक्ति राजपद पर आसीन व्यक्ति को प्रत्युत्तर दे, एक तो इसी की आशा नहीं थी, उस पर से इतना कड़ा उत्तर राजा को आग-बबूला कर देने के लिए पर्याप्त था। सौवीर नरेश तुरंत पालकी से उतर पड़े। पालकी से उतरते-उतरते ही उन्होंने अपनी तलवार निकाल ली थी। अन्य भारवाहक भय के कारण काफी दूर जाकर खड़े हो गए। राजा रहूगण ने कहा “ रे दुष्ट ! तेरी यह धृष्टता। किस से किस तरह व्यवहार करना चाहिए यह भी तुझे नहीं आता। ठहर मैं अभी तुझे मारकर किए का मजा चखाता हूँ।”
इस पर भी जड़ भरत अविचलित भाव से खड़े राजा की क्रोधित मुद्रा को सदय भाव से देख रहे थे। उनके चेहरे पर रोष, भय, चिंता का कोई नामोनिशान न था। राजा ने खड्ग तानते हुए कहा “तुझे अपनी भूल का क्या कोई पछतावा नहीं ? “ “भूल” भरत ने कहा “भूल तो राजन् मैंने भी की है और आपने भी। इस भूल के कारण ही तो हमें इस संसार में पुनः आना पड़ा। पर मेरी भूल बड़ी थी कि मैं जान-बूझ कर मोह में पड़ा।”
राजा ने समझा-शायद यह पागल है और ऐसे ही कुछ प्रलाप कर रहा है। उन्होंने अन्य कहारों की ओर क्रोधित नजर से देखा, जिन्होंने भरत को पकड़कर पालकी में जोत दिया था, साथ ही कहा-”तुम लोग हो सही में दंड के भागी। तुमने इस पागल को क्यों पकड़ लिया।”
भारवाहक थर-थर काँपने लगे। क्रोध के कारण लाल अँगारे हुई आँखों को देखकर भरत और भी दयार्द हो उठे, “राजन् ! इन लोगों का कोई दोष नहीं है। आप दंड तो मुझे देने वाले थे। मुझे ही दीजिए न।”
अब राजा रहूगण फिर चौंका। कुछ समय पहले पहेलियाँ बुझाने वाला यह व्यक्ति अब कितनी विनम्रता पूर्वक बात कर रहा है। राजा की कुछ समझ में नहीं आ रहा था, तभी भरत ने कहा-”दीजिए न राज दंड ! आप किसे दंड देने वाले थे। आपने मेरे इस स्थूल शरीर को देखकर ही व्यंग किया था न लेकिन इसे काटकर तो आप मुझे मार नहीं सकते। जिस तरह आप इस सिर से धड़ को काटकर अलग गिरा हुआ, छटपटाता देखेंगे, उसी प्रकार मैं भी देखूँगा।”
कहते-कहते भरत के मुख-मंडल पर सौवीर नरेश को एक तेजस्विता दिखाई देने लगी। जड़ भरत कहे जा रहे थे, “शरीर से आत्मा का क्या वास्ता ? भूख-प्यास, क्रोध, अभिमान, क्षीणता, हीनता उनके लिए है जो इंद्रियों के स्वाद में लीन हैं। मैं भी कभी देहासक्ति में डूबा हुआ था और आसक्ति का दंश मुझे एक बार हो चुका है इसलिए आप निःशंक निःसंकोच हो मुझे दंड दीजिए।”
ब्रह्मविद्या के इन गूढ़ रहस्यों को सुनकर क्रोधाविष्ट राजा का क्रोध शाँत हो गया। वे इतने विस्मित तथा पश्चाताप से दग्ध होने लगे कि उनके सामने धरती, आसमान सब घूमने लगे। महर्षि भरत के तत्वज्ञान ने उनको पूरी तरह पराभूत कर दिया और वे पैरों में गिर कर क्षमा माँगने लगे। पूर्णतः अविचल भाव से भरत सौवीर नरेश के क्षण-क्षण बदलते हुए रूप को देख रहे थे और करुणार्द्र हो रहे थे। इधर सौवीर नरेश कहे जा रहे थे “भगवन्” मैं आपको पहचान न सका। अवश्य ही आप उच्च कुल के योगी हैं। मुझ से जो अपराध हुआ है उसके लिए मैं क्या प्रायश्चित करूं।”
“अपराध तो तब होता राजन् ! जब आपके किए से मुझे वेदना या पीड़ा होती। मुझे तो ऐसा कुछ भी आभास नहीं हुआ फिर मैं आपको कैसे दोषी मानूँ और प्रायश्चित या क्षमा का विधान करने वाला मैं कौन होता हूँ।”
सौवीर नरेश ने अपनी यात्रा वहीं स्थगित कर दी और महर्षि जड़ भरत के चरणों में बैठकर ब्रह्मविद्या का ज्ञान प्राप्त किया। महर्षि भरत ने कहा-”राजन् ! आसक्ति ही सब दुखों की जननी है यहाँ तक कि वही पुनः जन्म जन्म लेने के लिए बाध्य करती है। इसके पूर्व मैं मृगयोनि में था और मृगयोनि प्राप्त करने से पहले भी मैं शालिग्राम क्षेत्र में योग साधना करता था। आसक्ति वश ही मुझे मृगयोनि में जन्म लेना पड़ा।”
“यह आसक्ति ही मनुष्य को तरह-तरह से दुख देती और बंधनों से बाँधती है। इसलिए मनुष्य को चाहिए कि कुल, वंश-पद तो क्या इस शरीर से भी आसक्ति न करे। अनासक्त रहकर कर्तव्य कर्म का आचरण करने से मनुष्य जीवन के परम लक्ष्य को प्राप्त करता है।”
महर्षि भरत के इन शब्दों को सुनकर सौवीर नरेश को जैसे अंधकार भर पथ में सूर्य का आलोक मिल गया। उन्होंने अपना सारा राज्य गुरु चरणों में दक्षिणा स्वरूप समर्पित कर दिया। महर्षि भरत ने यह कहकर राज्य संचालन का दायित्व राजा रहूगण को सौंप दिया कि “कर्तव्य समझ कर कर्म करो। इसे अपना प्रायश्चित भी समझ सकते हो।”
कोई आवश्यक नहीं कि नई संतान हर गृहस्थ के यहाँ आना ही चाहिए। जब परिवार संस्था का उद्देश्य समझ में आ जाए, तो कहीं असमंजस नहीं रहता। सारा विश्व अपना परिवार प्रतीत होता है।
जान एड्रिन के घर विकलाँग पक्षाघात से पीड़ित एक बच्ची थी। उसी को दंपत्ति ने पाला-पोसा और शिक्षित किया। दिमागी पक्षाघात से पीड़ित वही बच्ची अपने परिश्रम तथा माँ-बाप की जी तोड़ मेहनत और लगन के परिणाम स्वरूप एम॰ ए॰ तक पढ़ सकी।
एक बार गृहस्थाश्रम में सहचर बनने पर दोनों साथियों का धर्म है कि परस्पर एक दूसरे के साथ निर्वाह करें। आज जो अग्नि की वेदी पर शपथ ली गयी है, उसे कल नकार दिया जाय, यह तो धर्म की अवहेलना है। इन दिनों ऐसे प्रसंग जब ढेरों मिलते हैं, कुछ आदर्श हमें प्रेरणा देते हैं।
पुत्र का विवाह परंपरा के अनुसार कुछ कम वय में कर दिया गया। कन्या भी छोटी ही थी माता की देख−रेख में ही लड़की का चुनाव किया गया था। किंतु कुछ दिन पश्चात् माता को अनुभव हुआ कि मैंने कन्या का चुनाव ठीक नहीं किया है। अतः उसने विचार किया कि दूसरी उत्तम गुणों वाली कन्या खोजकर दूसरा विवाह कर देना चाहिए पुत्र का।
पर तब तक पुत्र कुछ समझदार हो चला था। माता ने अपना मंतव्य प्रकट किया। पुत्र ने कहा-”दूसरा विवाह नहीं हो सकेगा माँ।” माँ नाराज हुई कहने लगीं “यह मेरे निर्णय का विषय है, तुम्हारा नहीं। तुम अभी बच्चे हो। इसमें मेरे मान-अपमान का प्रश्न है। मैं कन्या पक्ष वालों को आश्वस्ति दे चुकीं हूँ। क्या तुम्हें इसलिये पाल-पोस कर बड़ा किया था, कि तुम्हारे कारण यों लज्जित होना पड़े।
पुत्र ने समझाया-”आपका मान मुझे प्राणों से भी प्यारा है। उस पर अपनी जीवन आहुति दे सकता हूँ। दूसरा विवाह करने से पत्नी का जीवन नष्ट हो जायेगा।”
माता फिर भी न मानी। तब पुत्र ने कहा-”अच्छा एक बात बात बताइये। यदि मैं ही अयोग्य होता, तो क्या आप उस कन्या को दूसरा विवाह करने की अनुमति देतीं ?”
इस प्रश्न का माँ के पास कोई उत्तर न था। उन्होंने बेटे के ब्याह की बात बंद कर दी। वह साहसी बालक थे दादा भाई नौरोजी ! काँग्रेस के प्राणदाता, भारत के सच्चे समाज सेवक।
आँखों की ज्योति जब अतिशय क्षीण हो जाती है, तो मात्र निकटवर्ती चीजें ही दीख पड़ती हैं। दूर पर तो कुहासा ही छाया प्रतीत होता है। न कुछ सूझ पड़ता है न दीखता है मोतियाबिंद पड़ जाने पर भी यही स्थिति हो जाती है। लाठी के सहारे निकटवर्ती स्थिति का कुछ अनुमान लगाकर ही किसी तरह काम चलाया जाता है। छोटे बच्चों की समझ भी निकटवर्ती चमकीली वस्तुओं पर ही ललचाती और टिकती है। वे जैसे ही रेंगना शुरू करते हैं, सामने पड़ी चमकदार वस्तुओं को ही पकड़ते हैं और उनका उपयोग मुँह में डाल लेना भर समझते हैं। खिलौने, सिक्के मिर्च कीड़ा कुछ भी क्यों न हो, जो भी हाथ आता है, उसे पकड़ते और मुँह में रखते हैं। पीछे चाहे उसका परिणाम कुछ भी क्यों न भुगतना पड़े। भविष्य भी कुछ होता है और उसको ध्यान में रखा जाना चाहिए, इतनी समझ उन्हें होती भी कहाँ है ? मानसिक दृष्टि से अविकसित पगले भी तात्कालिक चंचलता भर से प्रेरित रहते हैं। आगा-पीछा उन्हें भी कुछ नहीं सूझता।
चिड़ीमार के जाल में चिड़िया एक जगह कुछ दाने पड़े देखकर ही दौड़ पड़ती हैं और जान जोखिम उठाती है। मछलियों की भी सामने का चारा देखकर टूट पड़ने पर यही दुर्गति होती है। चासनी के कढ़ाव में कूदकर मक्खियाँ भी कम नहीं पछताती। उस भूल का प्रायश्चित वे जान गँवाकर ही कर पाती हैं। यह सब अबोध स्थिति की चर्चा है। पर उन्हें क्या कहा जाय जो समझदारी का दावा करते हुए भी उसी प्रकार के आचरण करते हैं।
यदि सैनिकों के पास दूरबीन न हो, तो वे छिपे हुए शत्रु, छापामारों के हमले के शिकार बन सकते हैं। जलयानों को दूरबीन के बिना अपनी यात्रा में भारी कठिनाई का सामना करना पड़ता है। आकाश में ऊँचे उड़ने वाले पक्षी भी तेज दृष्टि होने के कारण ही जमीन पर अपनी खुराक खोज पाते हैं। पैनी दृष्टि जिसे समझदारों की भाषा में दूरदर्शिता भी कहते हैं, मनुष्य के लिए एक वरदान है। यह दूरदर्शिता ही हर मानव के लिए अभीष्ट है।
दूसरी ओर मात्र वर्तमान में ही जीती है। वह न भूतकाल के अनुभवों से कुछ शिक्षा लेती है और न उसमें भविष्य का अनुमान लगा सकने की क्षमता होती है, फलतः उनके लिए कोई उपयोगी लक्ष्य बना पाना संभव नहीं होता कि वे समय और श्रम को सुनियोजित करके कोई बड़ी उपलब्धि प्राप्त कर सकें, वह तो बन ही कैसे पड़े। हवा के साथ उड़ने वाले पत्तों की तरह वे भली-बुरी परिस्थितियों के साथ उठते-गिरते, उड़ते-बिछुड़ते रहते हैं। इसे संयोग के विदूषक का एक भौंड़ा मजाक ही कहना चाहिए।
किसी जमाने में दूरदर्शिता मनुष्य की समझदारी के साथ अविच्छिन्न रूप से गुँथी हुई थी, फलतः वे सोच पाते थे कि जीवन क्षणों की बहुमूल्य संपदा के बदले कुछ ऐसा खरीदना चाहिए, जिस पर अपने को संतोष और दूसरों को प्रकाश का लाभ मिले। इस स्तर के लोगों को ही दूरदर्शी, प्रज्ञावान कहा जाता है। वे ही कुछ ऐसा कर पाते हैं जिसके लिए उन्हें चिरकाल तक सराहा जा सके।
बहुमूल्य सफलताएँ अर्जित करने वालों में से प्रत्येक को दूरदर्शिता अपनानी पड़ी है। सोचना पड़ा है कि आज के विचार और कृत्य, कल के लिए क्या परिणित-परिस्थिति उत्पन्न करेंगे, यह समझ जिन्हें होती है वे आरंभ में कष्ट सहकर भी भविष्य को उज्ज्वल बनाने वाला आवश्यक मूल्य चुकाते हैं। विद्यार्थी स्नातकोत्तर कक्षा उत्तीर्ण करने तक सोलह वर्ष की एकाग्र भाव से तप-साधना करते हैं और प्रतियोगिता में बाजी मार कर ऊँचे अफसर का पद पाते हैं। किसान एक वर्ष तक खेत की मिट्टी को पसीने से सींच कर कोठे भर फसल काटता है और साथियों में सिर ऊँचा उठाकर चलता है। व्यवसायी शिल्पी, कलाकार लंबे समय तक साधनारत रहते हैं और उपयुक्त समय पर श्रेयाधिकारी बनते हैं। लंबे समय तक अखाड़े की साधना करने पर ही पहलवान को मिलने वाले पुरस्कार पाने का अवसर हाथ आता है। से प्रकाराँतर से साधना कह सकते हैं। योगीजन इसी मार्ग का अवलंबन करते और सिद्ध पुरुष बनते हैं। आध्यात्मिक अथवा भौतिक स्तर की बड़ी सफलताएँ पाने वाले मनमौजी नहीं रहे हैं, उनने भविष्य पर दृष्टि दौड़ाई है, तद्नुरूप योजना बनाई है और एकनिष्ठ भाव से अनवरत यात्रा करते हुए ऊँचे लक्ष्य तक पहुँचने की सफलता पाई है। जिन्हें सिर्फ आज ही सूझा, कल पर दृष्टि ही नहीं गई, वे घाटे में रहे हैं और उपहासास्पद बने हैं।
स्वाद-स्वाद में चटोरे लोग गरिष्ठ वस्तु अति मात्रा में खा जाते हैं और कुछ ही समय में पेट दर्द, उल्टी, दस्त आदि के शिकार बनते हैं। इन्द्रिय लिप्सा के अनेक प्रसंग सामने आते रहते हैं, उन पर आतुरता-पूर्वक आँखें मीच कर टूट पड़ने वाले शरीर और मस्तिष्क को बुरी तरह खोखला कर लेते हैं और अकाल मृत्यु के मुँह में जा घुसते हैं। चोर, लबार, ठग, अपराधी प्रवृत्ति के व्यक्ति तात्कालिक लाभ देखते हैं और यह भूल जाते हैं कि इन कुकर्मों का देर-सबेर में इतना महंगा मूल्य चुकाना पड़ेगा, जिसे वहन करना अतिशय कष्ट साध्य होगा। अनाचारी अपनी आँखों में तो पतित होता ही है, भेद खुलते-खुलते वह हर किसी की आँख में अविश्वस्त और घृणास्पद बन जाता है। दंड व्यवस्था तक पहुँचना पड़े तो प्रताड़ना और भर्त्सना का कहर बरसता है, ऐसे व्यक्ति की योग्यताएँ भी अप्रामाणिक बन जाने पर एक कोने में धरी रह जाती हैं। एक से एक क्रिया कुशल और चतुर लोग प्रायः जेलखानों में बंद पाये जाते हैं उनके लिए भविष्य में कहीं कोई स्थान रह नहीं जाता। किसी प्रकार पेट भर लेने के अतिरिक्त और कोई नियति उनकी रह नहीं जाती। पीछे के लिए अपयश का पिटारा ही छोड़ मरते हैं। चातुर्य, कौशल और साहस भरपूर होते हुए भी दुर्गति का निमित्त कारण एक ही होता है दूरदर्शिता का अभाव। कृत्यों के परिणामों का अनुमान न लगा पाना, प्रकृति के उस नियम को भूल जाना, जिसमें जो बोया है वही काटना पड़े की कर्मफल प्रक्रिया का सुनियोजित विधान है। इस तथ्य को सही रूप में समझकर अपने लिए लक्ष्य का, दिशा का सुनियोजित निर्धारण करने वाले ही सफल जीवन बिताते हैं। भटकने वाले झाड़-झंखाड़ों में उलझते और ठोकरें खाते दिन बिताते हैं। न आत्म संतोष ही मिल पाता है न गर्व गौरव की अनुभूति ही हाथ लगती है। सच्चे मित्रों, प्रशंसकों और सहयोगियों का तो प्रायः अभाव ही बना रहता है। इस क्षति की पूर्ति हो सकना कदाचित ही किसी अन्य उपाय से संभव हो सके।
दुर्व्यसनी, अनाचारी, अंधविश्वासी वर्ग के लोगों का प्रधान दुर्गुण एक ही होता है कि सिर्फ आज की अभी की बात सोचते हैं और यह अनुमान लगा नहीं पाते कि यह विष बीज जब भयंकर विषवृक्षों के रूप में फलित होंगे तो इनकी कितनी भयावह प्रतिक्रिया का वास सहना पड़ेगा।
कर्म का फल यदि तत्काल मिल जाने का विधान ईश्वर ने रखा होता तो संभव है लोग अनाचार पर न उतरते। झूठ बोलने पर मुँह में छाले हो जाते। चोरी करने पर हाथ में लकवा मार जाता, ठगों की आकृति बिगड़ जाती तो कदाचित् कोई भी अनीति अपनाने पर उतारू न होता । पर कर्म फल तो बीज बोने पर वृक्ष बनने में समय लगने की तरह देर में मिलता है। इसी से भ्रम में भूलें हो जाती हैं और लोग ऐसे काम करने लगते हैं जिन्हें दूसरों के द्वारा अपने साथ किये जाने की कल्पना नहीं करते। सामाजिक कुरीतियाँ इसी कारण उपजीं और फैली हैं। धूमधाम की शादियाँ इसका प्रमाण हैं उस खाई को पाटने में दरिद्र और बेईमान बनने के अतिरिक्त और कोई चारा शेष नहीं रहता, फिर भी लोग मूर्खतापूर्ण होने पर भी प्रचलित परंपरा को पत्थर की लकीर मानकर अपनाये रहते हैं और अपने लिए तथा देखा-देखी अनुकरण करने वालों के लिए भारी विपत्ति खड़ी करते हैं। जाति-पाँति के आधार पर चल रही ऊँच-नीच की मनमानी ऐसी है कि जिसके कारण समाज के टुकड़े-टुकड़े होते हैं और हर टुकड़ा हर प्रकार घाटे में रहता है भिक्षा व्यवसाय भी ऐसे हैं जिसमें तथाकथित दानी के मिथ्या अहंकार और ग्रहणकर्ता की आत्महीनता से लेकर प्रपंच रहने तक की विडंबना के अतिरिक्त और कुछ हाथ नहीं लगता ।
मनुष्य कभी विचारशील, दूरदर्शी रहा है तब उसने सुख,शांति और प्रगति का सतयुगी वातावरण भी देखा है। अब जबकि वह हर क्षेत्र में अनीति अपनाकर सर्वनाश के बीज बो रहा है और अगणित समस्याओं, विपत्तियों को न्यौता बुला रहा है। इस ना समझी को किस प्रकार प्रगति का नाम दिया जाय। कैसे माना जाय कि पहले की अपेक्षा मनुष्य अधिक संपन्न, शिक्षित, विज्ञानी, कलाकार आदि बनकर उत्कर्ष की दिशा में आगे बढ़ा है।
इन दिनों सबसे बड़ी सामयिक आवश्यकता एक ही है कि दिग्भ्रांत चिंतन को उलट कर सीधा किया जाय। दिशा भूल को एक ने नहीं अपने-अपने ढंग से, अपने-अपने क्षेत्र में अधिकांश ने अपनाया है। इसके लिए व्यापक विचार क्राँति की आवश्यकता है। हर हाथ में यह कसौटी देनी होगी कि वह औचित्य अनौचित्य की कसौटी पर खरा उतरे, उसी को अपनाये। हर मनुष्य को ऐसी टार्च चाहिए ताकि इस घोर अंधियारी की अमावस्या में वह सही वस्तु को सही रूप से देख और अपना सके।
प्रस्तुत अगणित विपत्तियों अवांछनीयताओं के निराकरण का इन दिनों एक ही उपाय है-व्यापक विचार क्राँति का नियोजन यदि इसे संपन्न किया जा सका तो समझना चाहिए कि युग परिवर्तन का सुनिश्चित आधार बना और उज्ज्वल भविष्य निकट आया।
स्वामी राम कृष्ण परमहंस अपने शिष्यों को समझा रहे थे। तुम सब प्रार्थना करते हो ? ऐसा लगता नहीं। यदि तुम प्रार्थना करते हो तो ठीक-ठीक बतलाओ कि क्या प्रार्थना के समय जगत और जगत की हलचलें विस्मृत हो जाती हैं ? क्या तुम्हारे मन के द्वंद्व शाँत हो जाते हैं ? बैर और घृणा के भाव तिरोहित हो जाते हैं ?
यदि ऐसा नहीं होता तो तुम प्रार्थना नहीं करते। तुम्हारा प्रार्थना में खड़ा होना या बैठना ठीक वैसा ही है जैसे ग्वाले के डंडे से घेरी हुई भेड़ें बाड़े में खड़ी हो जाती हैं।
प्रकृति रहस्यमय है। उसकी पहेलियों को समझ पाना सामान्य बुद्धि के लिए संभव नहीं। कई बार स्थूल बुद्धि उसकी अपने ढंग से व्याख्या तो कर देती है, पर यह बता पाने में समर्थ नहीं हो पाती कि प्रकृति-नियमों की सर्वथा अवहेलना करते हुए यह विचित्रताएँ यत्र-तत्र क्यों कर पैदा हुई ? वास्तविकता तो यह है कि जब तक सृष्टि के मूल को न समझा जाय उसके रहस्यों को समझ पाना कठिन ही नहीं, असंभव भी है। इसी बात की उद्घोषणा करते हुए निसर्ग में ऐसी कितनी ही अद्भुतताएँ अब भी अस्तित्व में हैं, जो अविज्ञात स्तर की आश्चर्य बनी हुई है।
इन्हीं विलक्षणताओं में से एक है-क्रोय ब्राई, आयर-स्ट्रेथक्लाइड, स्काटलैंड का दृष्टि भ्रम। जब कोई मोटर गाड़ी इस रास्ते से होकर गुजरती है, तो उसका चालक बहुत उलझन में पड़ जाता है ओर गाड़ी को वहाँ से सुरक्षित निकाल ले जाने में मुसीबतों का सामना करना पड़ता है। इस स्थान पर जब उत्तर की दिशा से कोई मोटर आती है, तो उसके चालक को बड़ी अद्भुत अनुभूति होती है। वह संभ्रम में पड़ जाता है। रोड वहाँ ढलवाँ दिखाई पड़ती है। चालक जब उसकी गति धीमी करता है, तो गाड़ी ढलान में तेजी से लुढ़कने की बजाय धीरे-धीरे कर रुक जाती है और फिर पीछे की ओर लुढ़कने लगती है।
इसी प्रकार जब गाड़ी दक्षिण की दिशा से आती है, तो चालक रास्ते की चढ़ाई को देखकर गति तीव्र कर लेता है, पर यह क्या ! गति जितनी बढ़ायी गयी थी, उससे भी तेज रफ्तार से गाड़ी दौड़ने लगती है और चालक विस्मय-विमूढ़ बना रहता है।
इस तरह की अद्भुतता मात्र आयर की की एक मात्र घटना नहीं है। विश्व के कई स्थानों में ऐसी विचित्रता देखी गई है। एक ऐसी ही स्थान कनाडा के न्यूब्रून्सविक, मोंक्टन नामक स्थल पर “मैगनेटिक हिल” है। जनश्रुति के अनुसार इस जगह की विलक्षणता का पता पहली बार सन् 1930 में तब चला, जब एक दूध बेचने वाला गाड़ीवान उक्त पहाड़ी की तलहटी में गाड़ी खड़ी कर ग्राहकों को दूध देने गया। वापस लौटा, तो आश्चर्यचकित रह गया। गाड़ी आधी चढ़ाई चढ़ कर दूर जा चुकी थी, जबकि घोड़ा लगभग उसी स्थान पर अब भी चर रहा था, जहाँ वह छोड़ गया था। पहले तो इसे उसने किसी की शरारत समझी, अतः उस ओर विशेष ध्यान न दिया, पर जब प्रायः प्रतिदिन ऐसा होने लगा, तो उसे चिंता हुई। उसने शरारती का पता लगाने का निश्चय किया।
एक दिन उक्त स्थान पर गाड़ी खड़ी करके उसने घोड़े को खोल दिया और स्वयं एक झाड़ी के पीछे छिप गया। अभी कुछ ही क्षण बीते होंगे, हल्की हवा चली और इसी के साथ गाड़ी चढ़ाई पर तेजी से चढ़ने लगी। वह स्तब्ध रह गया। उसने बहुत माथा-पच्ची की, पर उसकी एवं अन्य स्थानीय लोगों की समझ मं कुछ न आया। अंततः उसे स्थान का रहस्य मानकर उसने संतोष कर लिया।
इसी प्रकार का एक उल्लेख कई वर्ष पूर्व प्रसिद्ध “द टाइम्स” में छपा था। संपादक के नाम पत्र में एक ब्रिटिश नागरिक हेनरी आर॰ बेक ने अपनी उस अनुभूति की चर्चा की थी, जो उसे कनाडा यात्रा के दौरान वैंकुवर के एक निकटवर्ती स्थान में हुई थी। वे लिखते हैं कि उक्त स्थल के भ्रमण के दौरान एक जगह गाड़ी खड़ी कर दी गई। गाड़ी रोड पर जहाँ पार्क की गई थी, वहीं से चढ़ाई की शुरुआत होती थी। कार में कुल आठ यात्री थे। ड्राइवर ने गाड़ी बंद कर दी। इससे पूर्व कि लोग उससे बाहर निकल पाते, कार बंद स्थिति में ही तेजी से चढ़ाई चढ़ने लगी। एक यात्री ने जल्दी से कार के बाहर छलाँग लगायी, थोड़ी ही दूर पर स्थित एक नल से पानी लाया और उसे कार के सामने रोड पर यह सोच कर उड़ेल दिया कि शायद इससे पहिए फिसलने लगें और वह ऊपर न चढ़ पायें, पर इसके उपराँत जो कुछ हुआ, उससे सभी अचंभे में पड़ गये। पानी स्वयं भी ऊपर चढ़ने लगा। लोगों को अपनी आँखों पर विश्वास नहीं हुआ। उन्होंने बार-बार आँखें मलीं, किंतु दृश्य यथावत् बना रहा। गाड़ी और जल दोनों ही ऊपर चढ़ते अब भी दृष्टिगोचर हो रहे थे। इस अलौकिक पहेली को उनमें से कोई सुलझा न सका।
यरुशलम जाने वाली सड़क पर जबल मुकाबर गाँव के समीप इसराइल में भी दृष्टिभ्रम पैदा करने वाला एक ऐसा ही क्षेत्र है।
कुल मिलाकर इन सब स्थलों में स्थिति महाभारत के “जल में थल एवं थल में जल” जैसी ही है, जहाँ दुर्योधन को काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ा था। विशेषज्ञ बताते हैं कि जहाँ हमारी आँखें चढ़ायी पर गाड़ी चढ़ती देखती हैं, वस्तुतः वह चढ़ाई न होकर ढलवाँ सड़क होती है, किंतु किसी कारणवश हमारी इन्द्रियाँ वहाँ चढ़ाई को ढलाव और ढलाव को चढ़ाई देखने व अनुभव करने लगती हैं, इसी कारण प्रत्यक्ष और परोक्ष में यह विरोधाभास पैदा होता है। वैज्ञानिक इस नैसर्गिक कौतुक की विज्ञान सम्मत व्याख्या कर पाने में अब तक विफल रहे हैं। हाँ, उसने इस संबंध में तरह-तरह के अनुमान अवश्य लगाये हैं। एक अनुमान के अनुसार ऐसा उन क्षेत्रों की स्थानीय चुँबकीयता में विविधता के कारण है। यह भू-चुँबकीय भिन्नता संभवतः हमारी इन्द्रियों को प्रभावित करती हो, फलतः उन-उन भागों में हमारी दृष्टि और अनुभूति परिवर्तित हो जाती है। दूसरी संभाव्यता के बारे में विशेषज्ञ वहाँ की विशिष्ट टोपोग्राफी (स्थानाकृति-विज्ञान) को जिम्मेदार ठहराते हैं, किंतु सब संभावना मात्र हैः यथार्थ रहस्य का उद्घाटन तो तभी हो सकेगा, जब प्रकृति के गर्भ में प्रवेश कर सकने की सामर्थ्य हम में हो।
समुद्र के तट पर बसा वह प्रदेश धरती का स्वर्ग कहा जाता था। उस प्रदेश के पूत चरित्र सुचारु नरेश विषय-वासना, भोग-विलास शोषण से सर्वत्र विरत आत्मोपार्जित आजीविका में ही विश्वास करते थे। राजकोष का एक पैसा भी अपने पर खर्च करना पाप मानते थे और महामात्य वह तो सामान्यजन से भी अधिक परिश्रम करते और साधारण स्थिति में रहते थे। प्रजा की सेवा करने का वह कोई पारिश्रमिक न लेते थे। स्वयं खेती करते और संतुष्ट रहते। ऐसे शुभ संस्कार और पूत चरित्र के रक्षक और शिक्षक पाकर क्यों न प्रजाजन वैसे बनते-क्यों न वह प्रदेश स्वर्ग का उपमान बनकर सर्व साधनों से सुसंपन्न होकर सुखी रहता।
एक बाँम झंझावात से विक्षुब्ध वह समुद्र भयंकर हो उठा। ऊँची-ऊँची तरंगों के अंक में फँसकर एक व्यापारी का बहुमूल्य सामग्री से भरा जहाज समुद्र में डूब गया। किसी प्रकार वह व्यापारी एक सहायक नौका के सहारे तट पर आकर लग गया। किंतु उसने उस जीवन को व्यर्थ समझा वह धन कुबेर से भिखारी बन चुका था। उसका सर्वस्व उस समुद्र के जल में समा चुका था। समुद्र तट पर बैठा वह विलाप करता हुआ, भाग्य को कोस रहा था। तभी एक व्यक्ति आया और उसने दुख का कारण पूछा। उस व्यापारी न रोते हुए अपना दुर्भाग्य कह सुनाया, उस व्यक्ति ने उस दुखी व्यापारी को ढाढ़स बँधाया और राजा के पास जाकर सहायता की प्रार्थना करने को कहा ?
व्यापारी को आशा बँध गई और वह नगर की ओर चल दिया।
नागरिकों द्वारा निर्दिष्ट किए संकेतों के अनुसार वह राजा के निवास पर पहुँचा। किंतु उसे विश्वास न हुआ यह भला राज निवास कैसे हो सकता है ? उस निवास और नगर में देखे अन्य निवासों में कोई विशेष अंतर न था। उसने विश्वास न कर पास ही जाते हुए एक व्यक्ति से पूछा-क्या राज निवास यही है ? ‘हाँ भद्र’ उत्तर सुनकर व्यापारी झिझकता हुआ अंदर बढ़ा। उसे कोई द्वारपाल अथवा प्रहरी रोकने नहीं आया और वह आगे बढ़कर एक सुँदर उद्यान से घिरे एक विशाल प्राँगण के द्वार पर आकर रुक गया। तभी सुना-”आइये भद्र !” निस्संकोच चले आइये, व्यापारी ने पास जाकर देखा कि एक स्फटिक वेदिका पर अमराई की सघन छाया में एक अत्यंत सुँदर, स्वस्थ और तेजस्वी युवा बैठा हुआ सनकात रहा है।
उसने क्षण भर अपना काम रोककर आगंतुक को पास ही बनी हुई उपवेदिका पर बैठने को कहकर कहा “यात्री मालूम होते हैं” कहिए कैसे कष्ट किया। युवक का काम पुनः शुरू हो गया था। व्यापारी ने कहा-”भद्र मैं मुसीबत का मारा एक व्यापारी हूँ इस प्रदेश के राजा से मिलकर कुछ निवेदन करना चाहता हूँ। आप मुझे उनके दर्शन करा दें। बड़ी कृपा होगी।”
युवक ने बड़े सौम्य भाव में बतलाया, मैं ही इस प्रदेश का राजा कहा जाता हूँ। कहिए आपको क्या कहना है। व्यापारी श्रद्धा से आत्म विभोर होकर चरणों में गिरकर रो उठा। राजा ने अपना चरण एक ओर हटाकर व्यापारी को ढाढ़स दिया और अपनी व्यथा बतलाने को कहा।
व्यापारी ने रुँधे हुए कंठ और भरी हुई आँखों से अपनी दुख कथा कह सुनाई। राजा ने उसे विश्वास दिलाया कि उसकी खोई हुई संपत्ति वापस मिलेगी और एक चिट्ठी के साथ महामात्य के पास भेज दिया।
व्यापारी महामात्य के निवास पर पहुँचा और यह देखकर चकित रह गया कि प्रदेश महामात्य बाहर से जल भर कर ला रहे हैं। व्यापारी ने नमस्कार करके पत्र सेवा में प्रस्तुत किया। महामात्य ने पत्र पढ़ा और वे तुरंत व्यापारी को साथ लेकर कार्यालय आये। वहाँ उन्होंने समुद्र के नाम एक पत्र लिखा कि इस व्यापारी का जहाज तुरंत वापस कर दिया जाय। “समुद्र के नाम पत्र” व्यापारी एक पल चौंक उठा वह हतप्रभ था। पर उसने विवशतावश महामात्य के कथनानुसार पत्र समुद्र में फेंक दिया। आश्चर्य ! महा-आश्चर्य !! कुछ ही देर बाद उसका विशाल व्यापार पोत समुद्र के बाहर सकुशल आकर किनारे लग गया।
व्यापारी इस अलौकिकता पर अभिभूत होता हुआ पुनः राजा के पास आया। राजा ने उसका आश्चर्य निवारण करते हुए कहा-”श्रेष्ठी ! इस विराट ब्रह्माँड में कहीं जड़ता नहीं है-अखिल चेतन तत्व ही व्याप्त है। जब मानव प्रकृति एवं परमेश्वर के अनुरूप जीवन जीता है तो इनकी अनंत-अनंत शक्तियों से प्रतिपल उसका संपर्क रहता है। वह देवशक्तियों का आराधक होता है देव शक्तियाँ उसकी सहायक होती हैं।”
शास्त्र वचन आज व्यापारी के समक्ष प्रत्यक्ष थे। उसने एक पल ठिठकते हुए निवेदन किया-”महाराज अब इस जहाज को आप उपहार रूप में स्वीकार करें।” राजा ने मुसकराते हुए पूछा-”श्रेष्ठी ! क्या तुम्हारे देश में किसी आपत्तिग्रस्त की सहायता करने का उपहार भी लिया जाता है ? ऐसा है तब तो निश्चय ही तुम्हारे देश में जल नहीं बरसना चाहिए।” “नहीं महाराज ! पानी खूब बरसता है।” व्यापारी ने उत्तर दिया। ‘तब वह पानी अवश्य ही उन पशु-पक्षियों के पुण्य प्रताप से बरसता है जो अपनी सेवा और उपकार के बदले कोई उपहार नहीं लेते। आपकी विपत्ति निवारण ही मेरा उपहार है जाओ और आनंद पूर्वक अपनी मातृ-भूमि के दर्शन करो।’
आज स्थान-स्थान पर भारत व विश्व में अश्वमेध यज्ञ हो रहे हैं। भारत वर्ष में ज्ञान यज्ञों व अश्वमेध यज्ञों की परंपरा रही है। यह क्यों व किस लिए होते थे, इसकी जानकारी देने वाला एक सामयिक उद्बोधन परम पूज्य गुरुदेव का इस अंक में प्रस्तुत है जो उनने 29 सितम्बर 1978 को शाँतिकुँज प्राँगण में उपस्थित शिविरार्थी समुदाय के समक्ष दिया था। पढ़ें, मनन करें, अमृतवाणी का।
गायत्री मंत्र साथ-साथ-
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो
देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।
मनुष्य के सामने अनेकों समस्यायें हैं। आइये विचार विनिमय करने के पश्चात् उनका समाधान करें। प्राचीन काल से यही तरीका रहा है। तब सरकारें भी अपना काम करती थीं, पर समाज सरकारों पर आश्रित नहीं था। सरकार का अपना एक दायरा है छोटा सा, कि चोर उचक्कों को पकड़ना चाहिए। देश की सुरक्षा के लिए अगर खतरा पैदा हो, तो सामना करना चाहिए और जो टैक्स वसूल होता है, उसे प्रजा की उन्नति में खर्च करना चाहिए। बस यही दायरा है सरकार का, इससे ज्यादा नहीं। मनुष्यों के विचारों पर, भावनाओं पर सरकार का कोई असर नहीं होता। पैसे का असर होता है, पैसा आपको देना पड़ेगा, लेकिन अगर यह कहा जाय कि आप ब्रह्मचर्य से रहिये, तो कहेंगे कि नहीं। आप हमें पकड़ कर गिरफ्तार कर लीजिए, फेमिली प्लानिंग तो आप जबरदस्ती भी कर सकते हैं, पर आपके कहने से नहीं हो सकता। आप कौन होते हैं कहने वाले ? विचारों के ऊपर भावनाओं के ऊपर सरकार का कोई नियंत्रण नहीं होता तब इन पर किसका नियंत्रण नहीं होता जब इन पर किसका नियंत्रण नहीं होता तब इन पर किसका नियंत्रण होता है-समाज का नियंत्रण होता है, विचारशीलों का नियंत्रण होता है। विचार तैयार करना, समाज की परंपराओं को तैयार करना और उनको दिशा देना विचारशीलों का काम है।
हमारी समाज व्यवस्था ऐसी है कि उसमें बार-बार उनका समाधान ढूंढ़ने की आवश्यकता पड़ती है। इसलिए बार-बार हम विचारशील लोगों को एकत्रित होना पड़ता है। प्राचीन काल में विचारशीलों के एकत्रित होने की पद्धति विचार विनिमय की पद्धति समस्याओं के समाधान करने की पद्धति का नाम था यज्ञ। दो तरह के यज्ञ होते थे। प्राचीन काल के यज्ञों का जब हम इतिहास देखते हैं तो दो तरह के बड़े यज्ञों का वर्णन मिलता है। एक इतिहास मिलता है राजसूय यज्ञों का। राजसूय यज्ञ कैसे होते थे ? जैसा युधिष्ठिर ने किया था। अश्वमेध कैसे होते थे ? जैसा कि रामचंद्र जी के जमाने में हुआ था। अश्वमेध का घोड़ा छोड़ करके उन्होंने उसके द्वारा विचारशीलों को निमंत्रण भेजा था और यह कहा था कि आप लोग एक स्थान पर एकत्रित हों-संघबद्ध हों। एक दूसरे का कहना मानें मिलजुल कर चलें। राजसूय यज्ञ इसी प्रकार राजनीतिक दिग्विजय के लिए होते थे। इस तरह के बड़े-बड़े यज्ञ होते थे, जहाँ सब लोग जमा होते थे और राजनीतिक समस्याओं के ऊपर विचार विनिमय होते थे और जो फैसले होते थे, वे सर्वमान्य होते थे। इनमें सामूहिक हवन भी होता था। तब प्रत्येक आदमी के दैनिक जीवन के क्रिया-कृत्य में भी हवन होता था, पर सामूहिक यज्ञों में ऐसा नहीं होता था, कि दस ग्यारह हजार आदमी आ गये और कहने लगें कि लाइये 10-11 हजार हवन कुँड खोदिये। 10 हजार चौके चलाइये। 10 हजार चिमटे और तवे लाइये। जब एक स्थल पर खाना पक सकता है, मिलजुल कर सामूहिक दावत खाई जा सकती है तो एक ही स्थल पर हवन क्यों नहीं हो सकता ? सामूहिक हवन कैसे हो सकता है ? ऐसे ही जैसे हम और आप एक सौ कुँडीय यज्ञों के बड़े आयोजनों में करते हैं। लोग पारी-पारी से आते जाते हैं। उनसे यही कहा जाता है कि अपनी पारी से आते जाइये, परिक्रमा एक साथ लगाते जाइये और जयकारा एक साथ बोलते जाइये, सामूहिकता का मजा भी आयेगा और सुविधा व्यवस्था भी रहेगी। राजसूय यज्ञ, अश्वमेध यज्ञ सामूहिक होते थे, जिनमें हवन मुख्य होता है।
उस जमाने में हवन किये बिना कोई रोटी भी नहीं खाता था। अग्निहोत्र हमारा स्वाभाविक दैनिक कृत्य है। जिस प्रकार स्नान, भजन, भोजन दैनिक कृत्य है, उसी प्रकार गायत्री उपासना और यज्ञ हमारा आध्यात्मिक नित्य कर्म है और होना ही चाहिए। बड़े यज्ञ कभी-कभी होते थे। उनमें बड़ी समस्याओं का समाधान करने के लिए राजनीतिक समस्याओं का समाधान करने के लिए, बड़ी जन-गोष्ठियाँ होती थीं। इनमें राजनीतिज्ञ, समाज विज्ञानी, तथा समाज पर अधिकार प्रभाव रखने वाले श्रेष्ठजन जमा होते थे और सामाजिक समस्याओं, आर्थिक समस्याओं एवं अन्यान्य समस्याओं का मिलजुल कर समाधान खोजते थे। इसमें सरकार का कोई हस्तक्षेप नहीं होता था, वरन् उसे कहा जाता था कि आपको ऐसा मानना चाहिए और कानून बनाना चाहिए। इसीलिए प्राचीनकाल में राजनीतिक क्षेत्र के लोग राष्ट्रीय विद्रोह के नाम पर जगह-जगह जमा होते थे और स्थानीय समस्याओं तथा सामाजिक के समाधान किये जाते थे। बीच-बीच में कभी-कभी राजनीतिक असेम्बलियों की धार्मिक असेम्बलियों की अलग-अलग मीटिंग होती थी। इसका एक और पक्ष था जिसका नाम था-वाजपेय यज्ञ। वाजपेय यज्ञ में मोक्ष की भावनात्मक और चिंतन-परक, नैतिक, आध्यात्मिक जो भी समस्यायें होती थीं, उनका समाधान करने के लिए वे लोग एकत्र होते थे जिन्हें हम धार्मिक कह सकते हैं। उनके भी आयोजन होते थे। उन आयोजनों का ही नाम था वाजपेय यज्ञ। (एक लाइन मिसिंग है)डडडडडडडडडडडडडडड किया था और उसमें चार लाख आदमी आये थे और पाँच दिन ठहरे थे। पाँच दिन में 40 लाख आदमियों को भोजन कराया 50 लाख रुपये खर्च हुए थे-40 लाख भोजन में और 10 लाख अन्यान्य व्यवस्थाओं में। कहाँ से आया था ? बस यही नहीं बता सकता आपको कि कहाँ से आया था, लेकिन हम आपको यह बताते हैं कि यह जो आयोजन है, यह जो इतनी बड़ी व्यवस्था है-यह प्रज्ञावतार की व्यवस्था है और यह फैलती हुई चली जायेगी। आप लोग भाग्यवान हैं कि जिन लोगों ने आगे आ करके इस संकल्प को अपने जिम्मे लिए हैं। जिनने अपने जिम्मे लिये हैं वे क्या पूरे हो जायेंगे ? हाँ पूरे हो जायेंगे, यदि आपका शौर्य, साहस और पराक्रम घटिया दर्जे का होगा, तभी यज्ञ असफल होगा और आपके योग्यता की घोषणा करने की जरूरत नहीं पड़ेगी। तब आपको अयोग्य ठहराना पड़ेगा। यज्ञ तो हमारे लिए पूरे हो जायेंगे, कोई भी चिंता मत करना, लेकिन आपको यहाँ से जाना है तो अपने पुरुषार्थ और पराक्रम की तैयारियाँ करके जाना चाहिए। यह काम बड़ा है और श्रेय भी आपको खूब मिलेगा। आप समय पर जाग गये, यह बहुत अच्छी बात है। समय पर न जागते तो काम तो हो जाता, पर आपको जो श्रेय मिल रहा था, वह नहीं मिल सकता था। स्वतंत्रता आँदोलन में जिनको तीन-तीन महीने की सजा हो गयी, उनको अब 300 रुपये पेंशन मिलती है और वे स्वतंत्रता सेनानी मा ताम्रपत्र लिए फिरते हैं। यह वक्त भी ऐसा है कि अगर आप नहीं चूकते हैं तो अच्छा है। अगर आप इस समय को पहचान लें, समय की प्रधानता को देख लें, भगवान की इच्छा और भगवान की महानता को समझ लें तो ज्यादा अच्छा है। फिर आपका भी नंबर उसी तरीके से आ जाता है जैसे कि हम बार-बार गिलहरी को और जटायु गिद्ध को याद करते रहते हैं। गिद्ध और गिलहरी ने समय को पहचान लिया था। उसने अपनी जुर्रत दिखाई-हिम्मत दिखाई कि किस समय पर क्या करना चाहिए। उनमें हिम्मत थी हौसला था भावना थी और वे अजर-अमर हो गये। गिलहरी वाला वक्त, गिद्ध वाला वक्त, जेल जाने वाला वक्त, फिर से आ गया है। आज आप चाहें तो प्रज्ञावतार का हाथ बँटा सकते हैं। आप चाहें तो युग परिवर्तन की बेला में आगे वाली पंक्ति में, चलने वाली सेना में अपना नाम लिखा सकते हैं।
तो क्या यह यज्ञ आगे फैलेगा ? हाँ यह यज्ञ आगे बहुत फैलेगा और गायत्री माता सुनिश्चित रूप से विश्वव्यापी बनेंगी आप देख लेना। हम तो रहेंगे नहीं और आप भी शायद न रहें, पर आपकी औलाद जरूर रहेगी। आप देखना सारे विश्व का जो यह नवीनीकरण हो रहा है, उस नवीनीकरण में गायत्री की फिलॉसफी और यज्ञ की कार्य पद्धति की मुख्य भूमिका रहेगी। आदमी का व्यवहार कैसा होगा यह प्रेरणा हमको यज्ञ से मिलेगी और मनुष्य का चिंतन कैसा होगा, व्यक्ति का, समाज का, राष्ट्र का और विश्व का चिंतन कैसा होगा ? यह सारी की सारी प्रेरणायें गायत्री के उस बीज मंत्र से मिलेंगी जो चिरपुरातन और चिरनवीन है। चिरपुरातन और चिरनवीन का ऐसा संयोग कदाचित ही कहीं मिलेगा। नवीनतम युग और प्राचीनतम संस्कृति दोनों का समन्वय करने के लिए हम बहुत महत्वपूर्ण प्रयत्न कर रहे हैं। आप उसमें सम्मिलित हो रहे हैं, यह अधिक खुशी की बात है।
अब क्या करना चाहिए ? अब आप एक काम करना कि पहले वाले यज्ञों और इन यज्ञों में क्या मौलिक फर्क है, यह समझ कर जाना। इसी के लिए आपको यहाँ बुलाया है। पहले वाले यज्ञों में पैसा प्रमुख था। पैसा हमको दे दीजिए और जो भी आप कहेंगे हम लाकर के आपको दे देंगे। आप चाहे 100 कुँडीय यज्ञ करा लें, चाहे हजार कुँडीय सब व्यवस्था घर बैठे हो जायेगी। लेकिन इन यज्ञों में पैसा नहीं जन शक्ति मुख्य है। जनशक्ति का वह अंश जो धर्म-श्रद्धा से जुड़ा हुआ है। उसका संग्रह करना बहुत बड़ा काम है। इसके लिए हम यहाँ से कलावा बाँध कर आपको भेज देंगे और अपने घर जाकर हमारी ‘टीम’ के साथ काम करना। हमें कमेटी नहीं, ‘टीम’ चाहिए। खिलाड़ियों की एक टीम होती है जो जीने-मरने और हंसने-खेलने में एक साथ रहती है। दस आदमियों की एक टीम हम यहाँ से भेज देंगे, आप उसके साथ काम करना। आपका काम सफल हो जायेगा। सफल न होगा तो हम सफल कर देंगे। सफलता-असफलता की आप चिंता मत करना। आपको जो हमने काम सौंपे हैं उसे एक निष्ठ हो करके एक भाव से तत्पर हो करके करें। इसमें परीक्षा आपकी सफलता की नहीं वरन् इस बात की है कि आपने कितनी मेहनत की भाग दौड़ करने में कितना समय लगाया। अगर आप यह काम कर सकेंगे, जो अत्यधिक महत्वपूर्ण आयोजन जिसको हम ‘वाजपेय यज्ञ’ कहते हैं, नवयुग के आगमन की पुनीत वेला का शुभ आयोजन कहते हैं। प्रभात-कालीन नवयुग आने की आरती कहते हैं, धर्मानुष्ठान कहते हैं,आप धन्य हो जायेंगे। यह इतना महत्वपूर्ण कार्य है जो देखने-सुनने में छोटा मालूम होता है। गाँधी जी के नमक सत्याग्रह का लोग मखौल उड़ाते थे कि नमक बना करके स्वराज्य ले लेंगे। नमक से स्वराज्य आता है कहीं ? आज हम देखते हैं कि नमक सत्याग्रह कैसे सफल हुआ।
25 कुण्डीय यज्ञों का आयोजन भी गायत्री महापुरश्चरण की शृंखला मिला करके मालूम पड़ता है कि यह कोई साधारण कृत्य है, धर्मानुष्ठान है, पूजा पाठ है। देखने में इसका रूप जो भी हो, इसकी संभावना बहुत बड़ी है। इसके आधार पर मनुष्य के तीनों शरीरों के स्वास्थ्य संवर्धन का, मनुष्य समाज को नये ढंग से शिक्षित करने का शालीन बनाने का विश्वव्यापी आँदोलन का यह हमारा शुभारंभ है। आप यह मानकर चलना कि विश्व का नया निर्माण करने के लिए हमारा यह अनुष्ठान उसी तरह का आयोजन है जिसमें कि मनुष्य के उज्ज्वल भविष्य के निर्माण के लिए जो दैवी शक्तियाँ काम कर रही हैं जिसके शुभारंभ और श्रीगणेश के दिन यह हमारा गायत्री महापुरश्चरण संपन्न होता है। इसमें सहयोग देने के लिए, इस अवसर का लाभ उठाने के लिए आप लोग हमारे साथ आइये। गोवर्धन उठाया जा रहा है आप उसमें हिस्सा बँटाने के लिए अपनी लाठी लेकर खड़े हो जाइये। हमें प्रसन्नता है कि आप जरूर लाठी लेकर खड़े होंगे और गोवर्धन उठाने में सहायता करेंगे। सेतु बाँधा जा रहा है, हमें खुशी है कि आप लोग भी अपने पत्थर और लकड़ी लेकर के इसमें सहयोग देने के लिए आ गये। आपका यह सहयोग जितना सराहनीय है, उतना ही मानव जाति के नये निर्माण में सहायक सिद्ध होगा। यह आपका सौभाग्य है जो आप लोगों को यहाँ खींच करके ले आया। यह सौभाग्य आप लोगों को बहुत कुछ प्रदान करे, ऐसी परब्रह्म परमात्मा से प्रार्थना है। ॥ ॐ शांति॥
भारतीय संस्कृति ही सर्वप्रथम वह संस्कृति है, जिसने विश्व-मात्र को जीवन जीने की कला का शिक्षण ही नहीं दिया, भौतिकवाद एवं अध्यात्मवाद-सभ्यता एवं संस्कृति के समन्वय का तत्वदर्शन भी सिखाया। हमारे ऋषियों ने ही “तेन त्यक्त्वा भुञजीया” का उपदेश देकर आज भोगवाद से ग्रसित मानवजाति के लिए संदेश दिया कि भोग तो किया जाना चाहिए साधनों का सुख सुविधाओं का, किंतु निर्लिप्त भाव से तथा त्याग को जीवन में प्रतिष्ठित करके।” वर्ल्ड पार्लियामेण्ट ऑफ रिलीजन (विश्व धर्म संसद) जो प्रथम शताब्दी वर्षगाँठ के रूप में इस वर्ष शिकागो में 28 अगस्त से 4 सितंबर 1993 की तारीखों में मनायी गयी, संस्कृति का यही स्वर चारों ओर से मुखरित हो रहा था। सर्वविदित है कि आज से प्रायः सौ वर्ष पूर्व 11 सितंबर 1893 से लेकर सत्रह दिन तक शिकागो (इलीनाँय) संयुक्त राज्य अमेरिका में पहली बार सभी धर्मों के प्रतिनिधि-गणों ने मिलकर धर्म की परिभाषा करते हुए उसकी विश्व मानवता के लिए उपादेयता पर तथा विभिन्न संप्रदायों के मूल में छिपे एक ही शाश्वत संदेश पर गहन चिंतन किया था। हिंदुत्व-हिंदू धर्म-देवसंस्कृति पर अपने विचार रखने वाले स्वामी विवेकानंद को सारे विश्व ने इस धर्म संसद के बाद ही पहचाना व जाना था उनके माध्यम से इस संस्कृति के मूल तत्वों व महानतम आदर्शों को।
शाँतिकुँज को आज से सवा वर्ष पूर्व ही “वर्ल्ड पार्लियामेण्ट ऑफ रिलीजन” के आयोजक मंडल की ओर से भागीदारी का आमंत्रण मिल चुका था। तब सारे अमेरिका में संपन्न गायत्री परिवार के विभिन्न कार्यक्रमों ने जन-जन में व्यापक हलचल मचायी थी। वेदाँत सोसायटी में हुए चर्चा परामर्श व मिशिगन लेक के समीप स्थित आश्रम ‘गैन्जेज’ (गंगा) में स्वामी चिदानंद जी से विगत वर्ष हुए परामर्श के बाद सुनियोजित रूप से इस धर्म संसद में प्रतिनिधित्व करने का परामर्श परस्पर किया गया। इस बीच डेनमार्क, नार्वे, इंग्लैण्ड, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैण्ड, फिजी, जिम्बाब्वे, दक्षिण अफ्रीका तथा पूर्वी अफ्रीका में संपन्न कार्यक्रमों के बाद तीन अश्वमेध यज्ञ भी भारत की धरती से बाहर लेस्टर (यू॰ के), टोरोण्टो (कैनेडा) तथा लॉस एंजेल्स (यू॰ एस॰ ए॰) में संपन्न हो गए तथा जन-जन तक देव संस्कृति दिग्विजय अभियान की जानकारी पहुँच गयी। ‘विजन-2000’ (वाशिंगटन) में संपन्न कार्यक्रम से भी सारे अमेरिका में हिंदू संस्कृति का स्वर मुखरित हुआ। इसी कारण वर्ल्ड पार्लियामेण्ट में इस मिशन की भूमिका अत्यधिक महत्वपूर्ण थी।
इस अपने ही तरह की निराली अशासकीय स्तर की किंतु विश्वस्तरीय संसद की तैयारी विगत पाँच वर्षों से चल रही थी। समापन दिवस की पूर्व वेला में जिमकेनी जो ट्रस्टी मंडल के प्रमुख कर्ताधर्ता थे, ने जब अपनी इस तैयारी के विविध चरणों व आने वाले अवरोधों से लेकर दैवी अनुकंपाओं की तरह मिलती रहने वाली सहायताओं का वर्णन किया तो लगा कि यह नियति का विधान ही है कि अगले दिनों ऐसा ही कुछ मिलन-परामर्श की प्रक्रियाओं द्वारा सर्वधर्म समभाव का स्वरूप निखरकर आएगा, विज्ञान व धर्म परस्पर मिलेंगे तथा प्रगतिशील अध्यात्म जन-जन का मार्गदर्शन कर समग्र मानवजाति को इक्कीसवीं सदी के सुनहरे सूर्योदय की ओर अग्रसर करेगा। जिमकेनी ने अपने प्रयासों की चर्चा करते हुए बुद्ध के धर्म चक्र प्रवर्तन का जिक्र किया व कहा कि हम सभी संप्रदायों को यदि एक चक्र (व्हील) के तानों (स्पोक्स) के रूप में देखें तो पाते हैं कि वे जैसे जैसे केन्द्र की ओर आते हैं, एक दूसरे के समीप आकर एक धुरी पर मिल जाते हैं। जब तक वे एक-दूसरे से दूर हैं, तब तक उन्हें यह नजर आ रहा है कि यह नहीं, वह धर्म संप्रदाय उससे भिन्न दूर या कनिष्ठ है।
उद्घाटन 28 सितंबर 1993 के दिवस था व उस दिन सभी संप्रदायों के प्रमुखों का प्रोसेशन-एक जुलूस या शोभायात्रा आयोजित थी। चित्र-विचित्र वेषभूषा वाले व्यक्तियों ने कैमरा मैनों व प्रेस को अधिक आकर्षित किया। जहाँ प्रथम धर्म संसद “आर्ट इंस्टीट्यूट ऑफ शिकागो” जो मिशिगन एवेन्यू पर स्थित है, आयोजित थी, वहाँ यह द्वितीय धर्म संसद होटल हिल्टन में आयोजित थी। शिकागो डाऊनटाऊन का यह 12 मंजिला होटल व इसकी एनेक्सीज पुराने स्थल से प्रायः 2 मील दूर स्थित था। जहाँ पुरानी संसद में भागीदारों की संख्या अधिक से अधिक सात सौ थी तथा एक ही केन्द्रीय हॉल में सारी गतिविधियाँ संपन्न हुईं थीं, वहाँ इसमें भाग लेने वालों की संख्या साढ़े सात हजार से अधिक थी, एक ही समय में प्रायः साठ से अधिक स्थानों पर मेजर प्रजेण्टेसन, वर्कशाप, सेमीनार, सिम्पोजियम, साँस्कृतिक गतिविधियाँ, वीडियो फिल्म शो, ध्यान शिक्षण, स्लाइड शो आदि संपन्न हो रहे थे। एक व्यक्ति अधिक से अधिक पाँच या छह गतिविधि में एक दिन में भाग ले सकता था। साथ में एक शानदार प्रदर्शनी भी लगायी गयी थी जिसमें विभिन्न धर्म, संप्रदायों की ओर से स्टाल्स लगाए गए थे। क्रिश्चियन व उनके विभिन्न संप्रदाय, मुस्लिम धर्म व उनके विभिन्न मतों, बुद्ध धर्म, शिन्तों, जैन योग, जैन धर्म, सिक्ख पंथ तथा हिंदू धर्म की ओर से विभिन्न स्टाल्स लगे थे। इनमें से हिंदू धर्म की ओर से हिंदू होस्ट कमेटी शिकागो व गायत्री परिवार शाँतिकुँज यह दो ही स्टाल्स थे, शेष प्रायः अस्सी से अधिक स्टाल्स धर्म-संप्रदायों के वैविध्यपूर्ण रूप की झाँकी करा रहे थे भारी संख्या में सभी वक्ताओं श्रोताओं तथा भिन्न-भिन्न रूपों में भागीदारी करने वाले अमेरिकन, ब्रिटिश, फ्रेंच, स्पेनिश, बौद्ध कोरियन-जापानी-तैवानी तथा मध्यपूर्व से व अफ्रीका से प्रतिनिधित्व करने वाले मुस्लिम वर्ग के व्यक्तियों ने इन प्रदर्शनियों को देखा परम पूज्य गुरुदेव के कर्तृत्व व व्यक्तित्व पर, ब्रह्मवर्चस् के विज्ञान व अध्यात्म के समन्वयात्मक स्वरूप पर तथा देव संस्कृति के विज्ञान सम्मत विवेचन पर शाँतिकुँज स्टाल पर एक प्रदर्शनी लगायी गयी थी जिसे देखने के लिए सतत् भीड़ लगी रहती थी। मिशन का अंग्रेजी, हिंदी, गुजराती व अन्य भाषाओं का साहित्य भी वहाँ उपलब्ध था। शाँतिकुँज से गयी टोली के कार्यकर्ता सर्वश्री प्रताप, शाँतिलाल, ओंकार राजकुमार तथा टोली के लिए अपना पूरा समय दे रहे शिकागो के कार्यकर्ता कुसुम पटेल, डा॰ किशोर व शुला राणा तथा हंसमुख पटेल सतत् सबके समाधान हेतु उपलब्ध थे। समय समय पर अपनी वर्कशाप व वक्तव्यों-परामर्शों के बीच से लौटकर डा॰ प्रणव पण्ड्या ने भी बीच-बीच में आकर सबसे मुलाकात की व उन्हें मिशन के उद्देश्यों के विषय में विस्तार से बताया। एक टेलीविजन भी उस प्रदर्शनी में लगाया गया था, जिसमें परमवंदनीया माताजी एवं पूज्यवर के प्रवचन (इंग्लिश टाइटल्स के साथ) तथा मिशन की गतिविधियाँ सतत् दिखाई जाती रहती थीं।
प्रमुख वक्तव्य के रूप में 31 अगस्त के दिन शाम पाँच से छह के बीच होटल हिल्टन की छठी मंजिल पर पारलट एच में “इन्टरकम्युनीयन ऑफ साइंस विथ रिलीजन” विषय पर डा॰ प्रणव पण्ड्या की वक्तृता रखी गयी थी। 45 मिनट के लेक्चर के बाद स्लाइड्स प्रजेण्टेशन तथा प्रश्नोत्तरी का क्रम था। प्रबंध मंडल ने साढ़े सात सौ की उपस्थिति वाले उस हाल को ना काफी बताते हुए बड़ा प्रयास किया कि
उस समय कोई बड़ा कक्ष उपलब्ध हो जाय किंतु वक्ताओं की बढ़ती संख्या, प्रायः साढ़े चार सौ से अधिक धर्म संप्रदाय के प्रमुखों की उपस्थिति व प्रत्येक को मौका दिये जाने की विवषता में वहीं पर आयोजन किये जाने की प्रार्थना की। भारी संख्या में अमेरिकन, नागरिक, क्रिश्चियन धर्म गुरु, जैन व मुस्लिम पंथ के पक्षधर श्रोतागण इस अपने अनूठे विषय का लाभ लेने आए। स्थान पूरा भरा होने के कारण कई खड़े रहे। स्वतंत्र रूप से कई टेलीविजन रिकार्डिंग एजेन्सीज पूरा वक्तव्य रिकार्ड करने आयीं। युग ऋषि के तर्क सम्मत प्रतिपादन को सभी ने सराहा तथा व्याख्यान समापन के बाद भी वहीं रुके रहकर अपनी-अपनी शंकाओं का समाधान किया। प्रबंध मंडल के प्रतिनिधि ने भी अपनी उपस्थिति जतायी तथा यह अनुशंसा की कि एक बड़े हॉल में यह व्याख्यान समग्र रूप से पुनः होना चाहिए किंतु स्थानाभाव व जैसा कि ऊपर बताया गया अधिकाधिक वक्ताओं की संख्या के कारण यह संभव न हो सका । किंतु जिस कार्य के लिए दल गया था, वह हो गया, चर्चा विद्युत की तरह सब ओर फैल गयी। प्रबंध तंत्र ने अगले दिन ही वह आडियो कैसेट सबको उपलब्ध करा दिया एवं तुरंत प्रायः पाँच सौ प्रतियाँ (प्रत्येक 9 डालर में) बिक गयीं। मेजबानों के स्टाल पर बड़े-बड़े अक्षरों में भाषण कर्ता व प्रवचन विषय लिखे थे, उनमें अधिकाधिक व्यक्ति “विज्ञान व अध्यात्म का समन्वय” विषय वाला प्रवचन ही खरीदते दीखे व यह सब ओर चर्चा का विषय बन गया।
31 अगस्त से चार सितंबर तक लोगों के शाँतिकुँज के स्टाल पर आने व सतत् परामर्श करते रहने का क्रम चलता रहा। पूज्यवर की वाजपेय यज्ञ परंपरा के अंतर्गत ज्ञान-यज्ञ प्रक्रिया को आगे बढ़ाते हुए टोली के सदस्य सतत् अन्यान्य व्याख्यानों में व मिलते-जुलते विषयों पर भागीदारी हेतु जाते रहें ताकि सभी क्या कह रहे हैं, इसकी जानकारी मिले। भागीदारी करने वाले प्रमुख व्यक्तियों में जो थे उनके नाम हैं-रिचर्ड डेली, जिमएडगर, डेनियल, गोमेज, दादी प्रकाशमणि, स्वामी चिदानंद सरस्वती (डिवाइन लाइफ सोसायटी), भाई मोहिंदर सिंह, विषप शेल्डन ड्यूकर, डॉ॰ इरफान खान, अल्फ्रेड याजी, श्री चिन्मय, डॉ॰ एल॰ एम॰ सिंधवी, पालोस ग्रेगोरियोस, डॉ॰ विल्भा एलीस, वाँग, दस्तूर डॉ॰ केर्सी एण्टिया, डॉ॰ जेरॉल्ड बार्नी, रब्बी एलन ब्रेगमेन, डॉ॰ सी॰ कबील सिंधा, जिमकेनी, बाबा विरसासिंह, श्री दलाई लामा, रायना ऐजलर, एर्जा सर्गुमान, आत्मानंदजी, श्री सुशील मुनि, स्वा॰ मित्रानंद, सी॰ फंगचाम, स्वा॰ घनानंद, केरी ब्राऊन, डॉ॰ लक्ष्मी कुमारी, परिव्राजिका अमलप्राण, माँ जयभगवती, राधा बर्नियर, शिवमूर्ति शिवाचार्य, स्वा॰ दयानंद सरस्वती, सद्गुरुसंत केशवदास, माँ अमृतानंदमयी, बहन जयंती, डॉ॰ कर्णसिंह, स्वा॰ शिवाया सुब्रह्यणियम (हिंदुइज्म टुडे), साधु वास्वानी, थॉमस बेरी, जेम्सफोर्ब्स आदि।
4 सितंबर को श्री दलाई लामा के समापन उद्बोधन के साथ ही धर्म संसद को समाप्त घोषित किया गया। हर तरह से उपलब्धियों से भरी इस संसद ने निश्चित ही सभी धर्मों व संस्कृतियों के समन्वय का पथ प्रशस्त किया है, जो कि भवितव्यता है। टोली के सदस्य शिकागो में 151 कुँडी यज्ञ संपन्न कर, शिकागो अश्वमेध (29, 30, 31 जुलाई 1994) की प्रयाज प्रक्रिया हेतु प्रायः स्थानों पर नयी शाखाएँ स्थापित कर अटलाण्टा में एक सौ आठ कुँडी तथा मियामी (फ्लोरिडा) में 51 कुँडी गायत्री यज्ञों के साथ विभिन्न सेमीनार्स संपन्न कर 17 सितंबर को भारत अपनी अनेकानेक उपलब्धियों के साथ लौट आयी। अगला वर्ष कितना युगाँतरकारी होगा, इसका आभास इस वर्ष की गतिविधियों से किसी को भी हो सकता है।
अपनों से अपनी बात-
अखण्ड ज्योति पत्रिका मात्र छपे अक्षरों के पृष्ठों से बना एक जड़ पुलिंदा मात्र नहीं है, अपितु प्रचंड प्राण-प्रवाह से युक्त एक चेतना का पुँज है। यह एक ऐसा प्रवाह है जो स्रोतों को जगाता है एवं बागों को खड़ा कर चलना व जीवन क्षेत्र में उछाल दे कर प्रगति पथ पर बढ़ने की प्रेरणा देता है। विज्ञापन बाजी से सर्वथा दूर अपने ही स्तर पर युगपुरुष पूज्य गुरुदेव के एकाकी पुरुषार्थ के बलबूते इसने विगत 56 वर्षों में समाज व विश्व मानवता के लिए जो भी कुछ किया है, वह अभूतपूर्व है। भविष्य को उज्ज्वल बताते हुए सतत् नया प्रेरणादायी मार्गदर्शन इस पत्रिका का प्राण है। इसे अंदर तक आत्मसात करने वाले भी अब इस पुलकन को अनुभव करने व विश्वास करने लगे हैं कि नवयुग का अवतरण एक तथ्यपूर्ण यथार्थता है।
जो उपयोगी है, उसे घर-घर पहुँचना चाहिए। आज के इस साँस्कृतिक प्रदूषणों के युग में जब हर ओर से भारतीय संस्कृति पर तेजी से भाँति-भाँति के हमले हो रहे हैं, इस प्रकाश प्रेरणा को अग्रगामी होने का अवसर मिलना चाहिए जो जीवन संचार करती हो, लोगों के मनोबल को उछाल देती हो। घर-परिवार के सभी सदस्य ही उसे पढ़ें-सुनें नहीं अपितु एक कदम और आगे बढ़कर मित्रों संबंधियों तक परिचितों-मित्रों तक इस प्रयास को पहुँचाया व गतिशील किया जा सकता है। गंगा का पानी बाँध में बँधकर जलाशय में बदले, इसके बजाय उसे नहरों में बदल कर जन-जन तक पहुँचाना ज्यादा हितकारी है। यदि प्रत्येक पाठक-वर्तमान सदस्य यह धारणा बना ले कि इसे अपने प्रभाव क्षेत्र में निश्चित ही नये न्यूनतम पाँच से लेकर दस सदस्य बनाने ही हैं तो निश्चित ही यह प्राण-प्रवाह जन-जन तक पहुँच कर रहेगा।
पिछले दिनों अश्वमेध यज्ञों की एक शृंखला चली। देवसंस्कृति के विशेषांकों के माध्यम से नवीनतम शोध सामग्री से लेकर देवसंस्कृति दिग्विजय अंक तथा सूर्योपासना अंक तक आते-आते जन-जन को यह विश्वास हो गया है कि शाँतिकुँज की युगाँतरीय चेतना ही संस्कृति के नवोन्मेष का वह उपक्रम संपन्न करने जा रही है, जो सतयुगी संभावनाओं के रूप में परिलक्षित होने में तनिक भी देरी नहीं करेगा। प्रत्येक अश्वमेध के साथ हस्तगत हो रही अपरिमित उपलब्धियाँ मिशन के तीव्रतम विस्तार व सत्प्रवृत्तियों की ओर बढ़ते रुझान को बताती हैं। यदि इस कार्य में लगे हजारों सृजन सैनिकों के साथ पत्रिका के पाठक भी एक न्यूनतम अणु व्रत धारण कर स्वल्प सहयोग के रूप में पाठकों-सदस्यों की संख्या बढ़ाने का संकल्प ले लें तो वह परिणाम की दृष्टि से इतना प्रभावी सिद्ध हो सकता है कि कल्पना मात्र से ही रोमाँच होने लगता है।
अखण्ड ज्योति पत्रिका अब बदले हुए कलेवर में प्रायः साढ़े चार लाख की संख्या में छपकर चौबीस लाख पाठकों तक पहुँचती है। यदि एक लंबी छलाँग लगाकर इस वर्ष के अंत में एक बजरंगी पुरुषार्थ किया जाय तो इसे अढ़ाई करोड़ बनाया जा सकता है। गायत्री परिवार-युग निर्माण योजना का परिकर-देव परिवार-उज्ज्वल भविष्य के स्वप्न द्रष्टा जो भी जन्में हैं, इस अखण्ड ज्योति परिवार से ही जन्मे हैं। समाज के नव निर्माण की दिशा में जो भी कुछ बन पड़ा है, उसमें अखण्ड ज्योति में सन्निहित प्रेरणाओं को तो श्रेय है ही, हजार गुना श्रेय उनका भी है, जो इस परिकर से जुड़े हैं व अपने श्रम सहयोग से अपनी रुचि व सामर्थ्य के अनुसार नवसृजन के इन प्रयासों में लगे हैं। यदि अखण्ड ज्योति मस्तिष्क है, प्राण है तो उसका परिकर समर्थता संपन्न कायकलेवर के समान है। शरीर के बिना प्राण का अस्तित्व ही क्या है ?
उज्ज्वल भविष्य सुनिश्चित है। नव निर्माण की दिशा में किये जा रहे प्रयासों की संभावनाएँ विशाल वटवृक्ष के समान असीम अनंत हैं, पर यह फलितार्थ तब ही होगा जब प्रत्येक की ओर से खाद-पानी उस बीजाँकुर में लगे जो युग ऋषि ने लगाया है। यदि आज से ही प्रत्येक पाठक अपनी ओर से प्रयास कर पाँच से दस नये सदस्य जोड़ने का पुरुषार्थ संपन्न करना आरंभ कर दे तो यह कार्य देखते-देखते पूरा हो सकता है। पूज्यवर के विचारों को परम वंदनीया माताजी की भावनाओं को हमें घर-घर में पहुँचाना है। चालीस रुपये वार्षिक चन्दा तो आज की महँगाई की स्थिति में न्यूनतम राशि है जो पंद्रह पैसा नित्य बचाकर भी निकाली जा सकती है। इंडिया टुडे, धर्मयुग, कादम्बिनी, रीडर्स डाइजेस्ट जैसी पत्रिकाओं में ढेरों राशि खर्चने वाले यदि उसका शतांश भी इस आध्यात्मिक पत्रिका के विस्तार में लगा सकें तो इसका वह घाटा तो पूरा हो ही सकता है जो विज्ञापन न निकालने की इसकी नीति के कारण इसे प्रतिवर्ष झेलना पड़ता है। हम सबका भाव भरा अनुरोध सभी से है कि प्रत्येक पाठक अपनी सदस्यता को तो आजीवन बनाए ही, कम से कम पाँच से लेकर दस नये परिजन इन दिनों और बढ़ाएँ।
*समाप्त*