आदर्शों का अभिवर्धन ही सेवा-साधन

भजन के अपरिमित माहात्म्य बताये गये हैं। पर कई लोग यह नहीं जानते कि भजन है क्या? क्या यह संकीर्तन मात्र है? मात्र नाम का उच्चारण व रटन ही भजन है वस्तुतः इस शब्द की व्युत्पत्ति देखने के बाद समझ में आता है कि वैसा है नहीं। भज् सेवा या धातु से भजन शब्द बना है, जिसका सीधा सादा अर्थ है-सेवा। भजन अर्थात् सेवा। भजन के अंतर्गत पूजा, कर्मकाण्ड, कीर्तन भी आते हैं पर उन सबके मूल में एक ही अर्थ है।- सेवा। सेवा किसकी, पूजा किसकी? इसका एक ही उत्तर है-आदर्शों की। आदर्शों का-श्रेष्ठताओं का समुच्चय ही-सहायता की भी आवश्यकता पड़ती है। पर किसी का स्थायी दुःख मिटाना हो तो उसे अपने पैरों पर खड़े कर स्वावलम्बी बनाना होगा। इसका एक मात्र आधार है- आदर्शों के प्रति उसे निष्ठावान बनाना। यही है सही अर्थों में सेवा।

दुखी को सुखी और सुखी को सुसंस्कृत बनाने का आत्यन्तिक आधार एक ही है-आदर्शों को आत्मसात करना। आदर्शवादिता का अभिवर्धन ही सेवासाधना का एकमात्र व सच्चा स्वरूप है। सेवा के साथ साधना शब्द जोड़कर सेवा साधना उसे इसीलिए कहा गया है कि सेवा में कहीं आत्मा श्लाघा की प्रवंचना न जुड़ जाए, उदार आत्मीयता का विस्तार होने पर जो करुणा उमंगती है और दूसरों को ऊँचा उठाने आगे बढ़ाने के लिए जो साहस प्रखर होता है, उसकी तृप्ति अपनी क्षमताएँ सत्प्रयोजनों के लिए नियोजित किये बिना नहीं होती। इस परमार्थ परायणता को ही सेवा साधना कहते हैं।


अनासक्त कौन?

जिन दिनों भगवान बुद्ध श्रावस्ती में जैतवन में विचरण कर रहे थे, उन्हीं दिनों सुप्पारक तीर्थ में साधु बाहिय दारुचीरिय पर लोगों की श्रद्धा और सम्मान के सुमन चढ़ रहे थे। दारुचीरिय वासना पर विजय पा चुके थे। धन से कोई मोह नहीं रहा था। पर सम्मान को पचा सकना उनके लिए कठिन होता जा रहा था। लोकेषणा को प्रबलतम ऐषणा मानना वस्तुतः-शास्त्रकारों की सूक्ष्म दृष्टि का ही परिचायक है। मान और अपमान में समान भाव रख सकना सचमुच बहुत दुष्कर है, उसे कोई विरला योगी ही सिद्ध कर सकता है।

दारुचीरिय जहाँ भी जाते, लोग उनके चरणों पर धन, सम्पत्ति, वस्त्र उपादानों का ढेर लगा देते। यह देख कर उनके मन में वितर्क उठा-अब मेरा योग सिद्ध हो गया और मैं स्वर्ग एवं मुक्ति का अधिकारी हो गया।

इस प्रकार का अहंकार लिए वह आश्रम लौटे। वृद्ध गुरु की तेज आँखों से उनका यह अहं भाव छिपा नहीं रह सका। दारुचीरिय को पास बुलाकर उन्होंने कहा-वत्स! जाओ, समिधाएँ ले आओ। प्रातःकाल के यज्ञ की तैयारी कर लें।

दारुचीरिय ने उपेक्षा से कहा-भगवन्! अब मुझे कर्म करने की आवश्यकता नहीं रही। मैं अर्हत् मार्ग पर आरुढ़ हो चुका हूँ।

यह तो बड़ी प्रसन्नता की बात है -गुरु ने स्नेह-मीलित स्वर में कहा और पूछा तात! टाप गौतम बुद्ध को तो जानते हैं?

हाँ-हाँ महात्मन्! मैं उन्हें अच्छी तरह जानता हूँ। वे इन दिनों जैतवन में परिव्राजक हैं। उन्होंने भी अर्हत् मार्ग सिद्ध कर लिया है। मुझे इस बात का पता है।

तब तो एक बार उनके दर्शन अवश्य कर आयें तपस्वी ने धीरे से कहा-सम्भव है उनके सामीप्य से आपके ज्ञान-चक्षु कोई नवीन प्रकाश प्राप्त कर लें।

दारुचीरिय सुप्पारक से चल पड़े और थोड़े ही समय में श्रावस्ती जा पहुंचे। अनाथ पिण्डक के जैतवन में पहुँचने पर बुद्ध तो नहीं मिले, पर वहाँ उनके अनेक शिष्य-भिक्षुगण विचार कर रहे थे। दारुचीरिय ने पूछा-आप लोग बता सकते हैं कि गौतम बुद्ध कहाँ है? इस पर एक भिक्षु ने बताया-महानुभाव! वे भिक्षाटन के लिए गये हुए हैं-तीसरे पहर तक लौटेंगे। आप यहीं विश्राम करें।

दारुचीरिय आश्चर्य आश्चर्यचकित रह गए। इतने भिक्षुओं के होते हुए भी भगवान बुद्ध को भिक्षाटन की क्या-आवश्यकता पड़ी। अभी चलकर देखता हूँ बात क्या है? यह सोच कर वे श्रावस्ती की ओर चल पड़े। एक सद्गृहस्थ के घर भीख माँगते हुए उनकी भेंट भगवान बुद्ध से ही हो गई। दारुचीरिय ने देखा-उनके मन में न किसी प्रकार का हर्ष है न शोक। विशुद्ध शान्त मन से बैठे भगवान बुद्ध को उसने प्रणाम किया और कहा-भगवन्! मुझे बन्धन मुक्ति का उपदेश करें।

बुद्ध बोले-तात्! यह उचित समय नहीं है। तुम जैतवन चलो, वहीं आकर बात-चीत करेंगे।

किन्तु दारुचीरिय ने वही बात फिर दुहराई-भगवान मुझे अनासक्ति का तत्वज्ञान समझाएँ।

जब तक आप ऐसा नहीं करेंगे, मैं यहाँ से नहीं जाऊँगा।

तब तथागत बोले-तात! जो एक बार में केवल एक ही कर्म में इतना तल्लीन हो जाता है कि उसकी दूसरी इन्द्रियों का भाव ही शेष नहीं रह जाता, ऐसा कर्मयोगी ही सच्चा अनासक्त और अर्हत् आरुढ़ है। जिसकी चित्त-वृत्तियाँ एक ही समय में चारों ओर दौड़ती हैं वही आसक्ति में लीन एवं वही संसारे के दुःखों में भ्रमण करता है।

दारुचीरिय को तब अपनी भूल का पता चल गया वे वहाँ से लौट पड़े। उनकी समग्र भ्रान्तियाँ जाती रहीं और कर्म को पूर्ण तन्मयता तथा आत्म साधना मानकर करने की शिक्षा लेकर लौटे। यही तो बन्धन मुक्ति का राजमार्ग है, जो उन्हें बुद्ध के कर्मयोग का दर्शन कर स्वतः मिल गया।


प्रत्यक्ष से परे परोक्ष जगत का अस्तित्व

भौतिकी के मूर्धन्य प्रोफेसर एड्रियान इलिंगवर्थ अपने साथी प्राध्यापक जॉन एच. वाकर के साथ पदार्थ की प्लाज्मा अवस्था पर विचार कर रहे थे। इलिंगवर्थ का कहना था कि प्लाज्मा और पदार्थ के ऊर्जा में रूपांतरण के बीच एक अन्य अवस्था होनी चाहिए, जबकि वाकर इसका प्रतिवाद कर रहे थे। कह रहे थे यह संभव नहीं। चर्चा अभी चल ही रही थी कि प्रो. वाकर देखते-देखते न जाने अचानक कहाँ गायब हो गये। इलिंगवर्थ और उनकी पत्नी ने सारे कमरे छान मारे, बाहर देखा, कॉलेज और उनके घर में पता लगाया, पर कही पता न चला कि वे कहाँ अंतर्धान हो गये।

प्रस्तुत प्रसंग अब से पाँच वर्ष पूर्व घटी हॉलैण्ड (हेग) की एक सत्य घटना है। योग विज्ञान और रहस्यवाद के पास ऐसी घटनाओं का सुनिश्चित समाधान है, पर विज्ञान का प्रत्यक्षवाद अब भी स्थूल इन्द्रियों की क्षमता से परे के संसार में प्रवेश नहीं कर सका है, अस्तु इनका कारण भी नहीं ढूंढ़ सका है। यों धीरे-धीरे वह अब इस निश्चय पर पहुँच रहा है कि मनुष्य की इन्द्रिय चेतना के आधार पर विकसित बुद्धि जितना जान पाती है, दुनिया वस्तुतः उससे कहीं अधिक है। उसे न बुद्धि समझ पाती है और न मानव निर्मित यंत्र ही उसे पूरी, पकड़ पाते हैं, फिर भी कुछ विशेष सूक्ष्म संवेदना वाले यंत्र थोड़ी बहुत जानकारी कभी-कभी देते रहते हैं और यह सिद्ध करते हैं कि प्रत्यक्ष दर्शन न केवल अधूरा, वरन् भ्रामक भी है।

हम नित्य ही सूर्य की धूप को देखते हैं, पर सच्चाई यह है कि धूप कभी भी देखी नहीं जा सकती। उसके प्रभाव से प्रभावित पदार्थ विशेष स्तर पर चमकने लगते हैं। यह पदार्थों की चमक है। सूर्य की किरणें जो इस चमक का प्रधान कारण हैं, हमारी दृश्य शक्ति से सर्वथा परे हैं। अन्तरिक्ष में प्रायः पूरे सौरमंडल को प्रकाशित एवं प्रभावित करने वाली धूप वस्तुतः सोलर स्पेक्ट्रम-सौरमंडलीय वर्णक्रम है। उसे ऊर्जा की तरंगों एवं स्फुरणाओं की एक सुविस्तृत पट्टी कह सकते हैं। इस पट्टी में प्रायः 10 अरब प्रकार के रंग हैं। उनमें से हमारी आँखें लाल से लेकर बैंगनी तक के रंगों एवं उनके सम्मिश्रणों को ही देख पाती हैं। बाकी सारे रंग हमारे लिए सर्वथा अदृश्य और अपरिचित है।

अब हम कुछ एक सूक्ष्म किरणों को किन्हीं विशेष यंत्रों की सहायता से देख-समझ सकने में थोड़ा-थोड़ा समर्थ होते जाते हैं, जैसे धूप में इन्फ्रारेड तरंगें देखी तो नहीं जा सकती हैं। आजकल इसकी सहायता से दुनिया की विचित्र ही तस्वीर सामने आयी है। कुछ वर्ष पूर्व इन किरणों की मदद से अमेरिका ने क्यूबा में लगे रूसी प्रक्षेपास्त्रों के फोटो हवाई जहाज में खींचे थे। आश्चर्य यह कि उसमें वे उन जलती सिगरेटों के फोटो भी आ गये जो 24 घंटे पूर्व वहाँ के कर्मचारियों ने जलाई थीं और वे तभी बुझ भी गयी थीं। दृश्य जगत में पदार्थ समाप्त हो जाने पर भी वह अन्तरिक्ष में अपनी स्थिति बनाये रह सकता है। यह अजूबा हमें भूत और वर्तमान के बीच खिंची हुई लक्ष्मण रेखा से आगे बढ़ा ले जाता है। जो वस्तु अपने अनुभव के अनुसार समाप्त हो गई, वह भी अन्तरिक्ष में वर्तमान की तरह यथावत् मौजूद है, यह कैसी विचित्र है।

ट्रेवर जेम्स ने इन्फ्रारेड मूवी फिल्म के लिए प्रयुक्त होने वाले एक विशेष कैमरे आई.आर. 135 का उपयोग करके मोजावे रेगिस्तान के अन्तरिक्ष की स्थिति चित्रित की है। फिल्म में ऐसे पक्षी दिखाई पड़ते हैं, जो स्थूल चक्षुओं से कभी दिखाई नहीं पड़ते।

जीवाणुओं की अपनी अनोखी दुनिया है। वे मिट्टी घास-पात, आनी और प्राणियों के शरीरों में निवास करते और अपने ढर्रे की जिन्दगी जीते हैं, पर हम उनमें से कुछ को ही सूक्ष्मदर्शी यंत्रों से देख पाते हैं, बाकी तो इतने सूक्ष्म हैं कि किसी भी यंत्र की पकड़ में नहीं आते, किन्तु अपने क्रिया-कलाप वे बड़ी शान के साथ जारी रखते हैं।

शास्त्रकार ने उसे अणोरणीयान् महतोमहीयान् कहा है। परमाणु से भी गहरी उसकी संचालनकर्त्री सूक्षमता को देखा और जाना तो नहीं जा सकता, पर उसका आभास पा लिया गया है। महतोमहीयान् की बात भी ऐसी ही है। विशालकाय ग्रहपिण्ड और निहारिका समुच्चय अत्यन्त विशाल है-इतना जिसकी तुलना में अपना सौरमण्डल बाल बराबर भी नहीं है। फिर भी वह सब कुछ अधिक दूरी होने के कारण दीखता नहीं। रेडियो टेलिस्कोप जिन आकाशीय पिंडों का परिचय देते है वह आँखों से देखे जा सकने वाले सितारों की तुलना में अत्यधिक विस्तृत हैं, आश्चर्य यह है कि यह रेडियो दूरबीनें भी पूरी धोखेबाज हैं। वे अब से हजारों -लाखों वर्ष पुरानी उस स्थिति का दर्शन कराती हैं जो संभवतः अब आमूल-चूल ही बदल गई होगी। संभव है वे तारे बूढ़े होकर मर भी गये हों, तो हमारी दूरबीनों पर जगमगाते दीखते हैं।

अल्ट्रा वायलेट फोटोग्राफी से ऐसे प्राणियों के अस्तित्व का पता चलता है, जो हमारी समझ, परख और प्रामाणिकता के लिए काम में आने वाली सभी कसौटियों से ऊपर हैं। इन प्राणियों को प्रेत मानव अथवा प्रेत प्राणी कहा जाय, तो कुछ अत्युक्ति न होगी, अब हमारे परिवार में यह अदृश्य प्राणधारी भी सम्मिलित होने जा रहे हैं। सूक्ष्म जीवाणु की तरह उनकी हरकतें और हलचलें भी अपने अनुभव की सीमा में आ जायेंगी।

हर्बर्ट गोल्डस्टीन ने अपने शोध निबन्ध प्रोपगेशन ऑफ शार्ट रेडियो वेव्स में यह सिद्ध करने का प्रयत्न किया है कि वायुमंडल में संव्याप्त अपवर्तनांक प्रवणता के पर्दे से पीछे अदृश्य प्राणियों की दुनिया है। वह दुनिया हमारे साथ जुड़ी हुई है और दृश्यमान समदर्शी साधन अपर्याप्त हैं, तो भी हमें निराश न होकर ऐसे साधन विकसित करने चाहिए, जो इस अति महत्वपूर्ण अदृश्य संसार के साथ हमारी अनुभव-चेतना का संबंध जोड़ सकें।

साधारणतया हमारी जानकारी पदार्थ के तीन आयामों तक सीमित है-लम्बाई, चौड़ाई और ऊँचाई। अब इसमें काल को चौथे आयाम के रूप में सम्मिलित का लिया गया है। आइंस्टीन ने अपने सापेक्षवाद सिद्धान्त की विवेचना करते हुए यह समझाने का प्रयत्न किया है, कि यह भौतिक संसार वस्तुतः संयुक्त किया है, कि यह भौतिक संसार वस्तुतः संयुक्त चतुर्विस्तारीय दिक्−काल जगत है। वे देश और काल की वर्तमान मान्यताओं को एक प्रकार से सापेक्षवाद और दूसरे प्रकार से अपूर्ण-अवास्तविक मानते हैं।

कैलीफोर्निया विश्वविद्यालय के डॉ. राबर्ट सिरगी अपने दल के साथ ऐसे उपकरण बनाने में संलग्न हैं, जिनसे पदार्थ के चौथे आयाम को समझ सकना संभव हो सके। वे कहते हैं, जो हम जानते और देखते हैं, उनसे आगे की गतियाँ और दिशाएँ मौजूद हैं। हम केवल तीन आयामों की परिधि में आने वाले पदार्थों का ही अनुभव कर पाते हैं, जबकि इससे आगे भी एक विचित्र दुनिया मौजूद है। उस विचित्र को समझे बिना हमारी वर्तमान जानकारियाँ बाल-बुद्धि स्तर की ही बनी रहेगी।

दृश्य का अदृश्य बन जाना और अदृश्य का दिखाई देने लगना-मोटी-बुद्धि से बुद्धि-भ्रम अथवा कोई देवी चमत्कारी ही कहा जा सकता है। इतना होते हुए भी एक ऐसे सूक्ष्मजगत का अस्तित्व विद्यमान है, जो अपने इस ज्ञात जगत की तुलना में न केवल अधिक विस्तृत वरन् अधिक शक्तिशाली भी है। भूतकाल में उसे सूक्ष्मजगत एवं दिव्यलोक कहा जाता रहा है। उसमें पदार्थों का ही नहीं दिव्यलोक कहा जाता रहा है। उसमें पदार्थों का ही नहीं, प्राणियों का भी अस्तित्व मौजूद है। वे प्राणी मनुष्य की तुलना में बहुत छोटे भी हो सकते हैं, और बहुत बड़े भी। आवश्यकता और परिस्थितियाँ उनकी भी हो सकती हैं और जिस प्रकार हम उस सूक्ष्मजगत के साथ संबंध जोड़ने को उत्सुक हैं, उसी प्रकार वे भी हमारे सहचरत्व के लिए इच्छुक हो सकते हैं। प्राणियों और पदार्थ का लुप्त एवं प्रकट होते रहना इन स्थूल-सूक्ष्मजगत के बीच होते रहने वाले आदान-प्रदान का एक प्रमाण हो सकता है।

सुप्रसिद्ध विज्ञान कथा लेखक ए. पी. मेगरमोट ने अपनी पुस्तक दि इनविजिवल मैन में उन संभावनाओं पर प्रकाश डाला है, जिनके अनुसार कोई दृश्य पदार्थ या प्राणी अदृश्य हो सकता है और अदृश्य वस्तुएँ दृष्टिगोचर होने लग सकती हैं। इस विद्या का उन्होंने अपवर्तनाँक का विज्ञान-साइंस ऑफ रिफ्रेक्टिव इण्डेक्स नाम देकर उसके स्वरूप एवं क्षेत्र का विस्तृत वर्णन किया है।

हम ज्ञात को ही पर्याप्त न मानें प्रत्यक्ष को ही सब कुछ न कहें। प्रस्तुत मस्तिष्कीय क्षमता और यांत्रिक साधनों को सीमित मानकर न चलें और जो अविज्ञात है, उसकी शोध में बिना किसी पूर्वाग्रह के लगे रहें, तो इस अणोरणीयान् महतोमहीयान् जगत के वे रहस्य जानने की दिशा में अग्रसर हो सकते हैं, जो अभी तक नहीं जाने जा सके हैं। निश्चित ही सूक्ष्म जगत के लीला उपक्रम जो ज्ञात हैं उससे कहीं अधिक विलक्षण होंगे।


तन्मयता-तल्लीनता की उच्चस्तरीय उपलब्धियाँ

एकाग्रता एक उपयोगी सत्प्रवृत्ति है। मन की अनियंत्रित कल्पनाएँ अनावश्यक उड़ने, उस उपयोगी विचार शक्ति का अपव्यय करती हैं, जिसे यदि लक्ष्य विशेष पर केंद्रित किया गया होता तो गहराई में उतरने और महत्वपूर्ण उपलब्धियाँ प्राप्त करने का अवसर मिलता है। यह चित्त की चंचलता ही है जो मनः संस्थान की दिव्य क्षमता को ऐसे ही निरर्थक गँवाती और नष्ट-भ्रष्ट करती रहती है। संसार के वे महामानव जिन्होंने किसी विषय में पारंगत प्रवीणता-हासिल की है या महत्वपूर्ण सफलताएँ करने-उन्हें अनावश्यक चिन्तन से हटाकर उपयोगी दिशा में चलने की क्षमता प्राप्त रही है। इसके बिना चंचलता की वारन वृत्ति से ग्रसित व्यक्ति न किसी प्रसंग पर गहराई से सोच सकता है और न किसी कार्यक्रम पर देर तक स्थित रह सकता है। शिल्प, कला, साहित्य, शिक्षा, विज्ञान, व्यवस्था आदि महत्वपूर्ण सभी प्रयोजनों की सफलता में एकाग्रता की शक्ति ही प्रधान भूमिका निभाती है। चंचलता को तो असफलता की सगी बहिन माना जाता है। वयस्क होने पर भी यदि कोई चंचल ही बना रहे-विचारों की दिशाधारा बनाने और चिन्तन पर नियंत्रण स्थापित करने में सफल न हो सके तो समझना चाहिए कि आयु बढ़ जाने पर भी उसका मानसिक स्तर बालकों जैसा ही बना हुआ है। ऐसे लोगों का भविष्य उत्साह वर्धक नहीं हो सकता।

मनीषी डब्लू. आर. इन्ज के ग्रन्थ मिस्ठिसिज्म इन रिलीजन के शब्दों में सोचें तो आत्मिक प्रगति के लिए तो एकाग्रता की और अधिक उपयोगिता है। इसीलिए मेडीटेशन के नाम पर उसका अभ्यास विविध प्रयोगों द्वारा कराया जाता है। इस अभ्यास के लिए कोलाहल रहित ऐसे स्थान की आवश्यकता समझी जाती है जहाँ विक्षेपकारी आवागमन या कोलाहल न होता हो। एकान्त का तात्पर्य जनशून्य स्थान नहीं वरन् विक्षेप रहित वातावरण है। सामूहिकता हर क्षेत्र में उपयोगी मानी जाती है। उपासना भी सामूहिक हो तो उसमें हानि नहीं लाभ ही है। मस्जिदों में नमाज-गिरजा घरों में प्रेयर-मन्दिरों में आरती सामूहिक रूप से करने का रिवाज है। इसमें न तो एकान्त की अखरती है और न एकाग्रता में कोई बाधा पड़ती है।

एक दिशा धारा का चिन्तन हो रहा हो तो अनेक व्यक्तियों का समुदाय भी एक साथ मिल बैठकर एकाग्रता का अभ्यास भली प्रकार कर सकता है। नितान्त एकान्त में बैठना वैज्ञानिक, तात्विक शोध अन्वेषण के लिए आवश्यक हो सकता है, उपासना के सामान्य संदर्भ में एकान्त ढूंढ़ते फिरने की कोई खास आवश्यकता नहीं है। सामूहिकता के वातावरण में ध्यान-धारणा और भी अच्छी तरह बन पड़ती है। सेना का सामूहिक कार्य साथ-साथ कदम मिलाकर चलना-सैनिकों में से किसी का ध्यान नहीं बंटाता वरन् साथ-साथ चलने की पग ध्वनि के प्रवाह में हरेक के पैर और भी अच्छी तरह अपने आप नियतक्रम से उठने चले जाते हैं। सहगमन से पगक्रम को ठीक रखने में बाधा नहीं पड़ती वरन् सहायता ही मिलती है। सहगान की तरह सहध्यान तथा सहभजन भी अधिक सफल और तरह सहध्यान प्रखर बनता है।

अंतर्योग पुस्तक के लेखक महायोगी अनिवार्ण के अनुभव के अनुसार उपासना के लिए जिस एकाग्रता का प्रतिपादन है उसका लक्ष्य है-भौतिक जगत की कल्पनाओं से मन को विरत करना और उसे अंतर्जगत की क्रिया-प्रक्रिया में नियोजित कर देना। उपासना के समय यदि मन साँसारिक प्रयोजनों में न भटके और आत्मिक क्षेत्र की परिधि में परिभ्रमण करता रहे तो समझाना चाहिए कि एकाग्रता का प्रयोजन पूरा हो रहा है। विज्ञान के शोध कार्यों में-साहित्य के सृजन प्रयोजनों में वैज्ञानिक या मनीषी का चिन्तन अपनी निर्धारित दिशा धारा में ही सीमित रहता है। इतने भर में एकाग्रता का प्रयोजन पूरा हो जाता है। यद्यपि इस प्रकार के बौद्धिक पुरुषार्थों में मन और बुद्धि को असाधारण रूप से गतिशील रहना पड़ता है और कल्पनाओं को अत्यधिक सक्रिय करना पड़ता है तो भी उसे चंचलता नहीं कहा जा सकता।

अपनी निर्धारित परिधि में रहकर कितना ही द्रुतगामी चिन्तन क्यों न किया जाय, कितनी ही कल्पनाएँ, कितनी ही स्मृतियाँ, कितनी ही विवेचनाएँ क्यों न उभर रही हों वे एकाग्रता की स्थिति में तनिक भी विक्षेप

उत्पन्न नहीं करेगी। गड़बड़ तो अप्रासंगिकता में उत्पन्न होती है। बेतुका-बेसिलसिले का अप्रासंगिक अनावश्यक चिन्तन ही विक्षेप करता है। एक बेसुरा वादन पूरे आरकेस्ट्रा के ध्वनि प्रवाह को गड़बड़ा देता है, ठीक इसी प्रकार चिन्तन में अप्रासंगिक विक्षेपों का ही निषेध है। निर्धारित परिधि में कितनी ही, कितने प्रकार की कल्पनाएँ-विवेचनाएँ करते रहने की पूरी छूट है।

महात्मा नरहरि बोधसार में कहते हैं- कई व्यक्ति एकाग्रता का अर्थ मन की स्थिरता समझते है और शिकायत करते है कि उपासना के समय उनका मन भजन में एकाग्र-स्थिर नहीं रहता। ऐसे लोग एकाग्रता और स्थिरता का अन्तर न समझ पाने के कारण ही इस प्रकार की शिकायत करते हैं। मन की स्थिरता सर्वथा भिन्न बात है। उसे एकाग्रता से मिलती-जुलती स्थिति तो कहा जा सकता है, पर दोनों का सीधा सम्बन्ध नहीं है। जिसका मन स्थिर हो उसे एकाग्रता का लाभ मिल सके या जिसे एकाग्रता की सिद्धि है-उसे स्थिरता की स्थिति प्राप्त हो ही जाय यह आवश्यक नहीं है।

स्थिरता को निर्विकल्प समाधि कहा गया है। और एकाग्रता को सविकल्प कहा गया है। सविकल्प का तात्पर्य है उसे उदधि में आवश्यक विचारों को मनःक्षेत्र में अपना काम करते रहना। निर्विकल्प का अर्थ है एक केन्द्र बिंदु पर सारा चिन्तन सिमटकर स्थिरता की स्थिति उत्पन्न हो जाना।

यहाँ मनः संस्थान की संरचना को ध्यान में रखना होगा। एक वैज्ञानिक की दृष्टि रखकर साधना की गहराइयों में प्रवेश करने पर मन की बनावट एक प्रचण्ड विद्युत भंडार जैसी अनुभव की जा सकती है। उसके भीतरी और बाहरी क्षेत्र में विचार तरंगों के आँधी तूफान निरन्तर उठते रहते हैं। यह तरंग-तूफान जितने तीव्र-गति सम्पन्न होते हैं उसकी मानसिकता उतनी ही उर्वर और कुशाग्र बुद्धि मानी जाती है। जहाँ उतनी ही जड़ता, दीर्घसूत्रता, मूर्खता छाई रहेगी। हरे-थके मस्तिष्क को निद्रा घेर लेती है अर्थात् उसकी गतिशीलता शिथिल हो जाती है। यह कृत्रिम निद्रा नशीली शिथिल हो जाती है। यह कृत्रिम निद्रा नशीली दवाएँ पिलाकर, क्लोरोफार्म आदि सुँघाकर उत्पन्न की जा सकती है। मूर्छा की स्थिति में मस्तिष्क की बन्द होने की प्रदर्शन वाली जड़ समाधि में ऐसी ही स्थिरता होती है। मनस्वी लोग अपनी संकल्प शक्ति से हृदय की धड़कन और मानसिक सक्रियता को ठप्प कर देते हैं। स्थिरता जड़ समाधि के वर्ग में आती है। वह संकल्प शक्ति से उत्पन्न की जा सकती है। स्थिरता का लाभ विश्राम मिलना है। इससे आन्तरिक थकान दूर हो सकती है और जिस तरह निद्रा के उपरान्त जागने पर नई चेतना एवं स्फूर्ति का अनुभव होता है, वैसा ही मन की स्थिरता का लाभ मिल सकता है। सामान्य रूप से इस स्थिति को शिथिलीकरण मुद्रा का एक प्रकार कहा जा सकता है। उसमें भी शरीर और मन की स्थिरता शिथिलता का ही अभ्यास किया जाता है। मैस्मरेजम-हिप्नोटिज्म प्रयोगों में भी इसी प्रकार का अभ्यास काले गोले के माध्यम से करना पड़ता है। नेत्रों में बेधक दृष्टि उत्पन्न करने के लिए एकाग्र मनःशक्ति को एक ही स्थान पर केन्द्रित करते हैं। ऐसे ही सामान्य चमत्कार उस स्थिरता से उत्पन्न किए जा सकते हैं जिसके लिए आम तौर से अध्यात्म साधना के विद्यार्थी ललचाते रहते हैं और जिसके न मिलने पर अपने अभ्यास की असफलता अनुभव करके खिन्न होते हैं।

मन की स्थिरता अति कठिन है। तीन मिनट की स्थिरता मिल सके तो साधक शून्यावस्था में पहुँच जाता है। जिन्हें निर्विकल्प समाधि अभीष्ट हो उन्हें ही स्थिरता की अपेक्षा और चेष्टा करनी चाहिए। सविकल्प साधना में स्थिरता की नहीं एक दिशाधारा में मन को नियोजित किए रहने की आवश्यकता है। पर ब्रह्म में आत्म-समर्पण और उस पराशक्ति का आत्म सत्ता में अवतरण की ध्यान का मुख्य प्रयोजन है। उसके लिए कितने ही प्रकार की साकार-निराकार ध्यान-धारणाएँ विद्यमान है। उनमें से जो उपयोगी एवं रुचिकर लगे उसे अपनाया जा सकता है।

स्थिरता-स्तर की एकाग्रता हिप्नोटिज्म प्रयोगों में तो काम आती है। सरकस के अनेक खेलों में मानसिक सन्तुलन ही चमत्कार दिखा रहा होता है। स्मरण शक्ति के धनी भी प्रायः एकाग्रता के ही अभ्यासी होते हैं। शोधकर्ताओं की सफलता का आधार यही है। इतने पर भी इसे आत्मिक प्रगति की अनिवार्य शर्त नहीं माना जा सकता है। अधिक से अधिक इसे सहायता कहा जा सकता है। यदि ऐसा न हो तो ये सब एकाग्रता सम्पन्न लोग आत्मबल सम्वन्न हो गये होते। इनकी गणना सिद्ध योगियों में मीरा, चैतन्य, रामकृष्ण-परमहंस आदि इसी वर्ग के थे, जिन पर प्रायः भावावेश छाया रहता था।

आत्मसाधना में निमग्न साधक एवं मनीषी गोपीनाथ-कविराज अपने सम्पादित ग्रन्थ श्री श्री सद्गुरु प्रसंग में स्पष्ट करते है कि मन की स्थिरता एवं एकाग्रता का सार तत्व तन्मयता में आ जाता है। तन्मयता का अथ है इष्ट के साथ भाव संवेदनाओं को केंद्रीभूत कर देना। यह स्थिति तभी आ सकती है जब इष्ट के प्रति असीम श्रद्धा हो। श्रद्धा तब उत्पन्न होती है जब किसी की गरिमा पर परिपूर्ण विश्वास हो। साधक को अपनी मनोभूमि ऐसी बनानी चाहिए जिसमें इष्ट और मार्गदर्शक सद्गुरु की चरम उत्कृष्टता पर, असीम शक्ति सामर्थ्य पर संपर्क में आने वाले के उत्कर्ष होने पर गहरा विश्वास जमता चला जाय। यह कार्य शास्त्र वचनों का अनुभवियों द्वारा बताये गए सत्परिणामों का गहरा विश्वास जमता चला जाय। यह कार्य शास्त्र वचनों का अनुभवियों द्वारा बताये गए सत्परिणामों का, उपासना विज्ञान की प्रामाणिकता का, अधिकाधिक अध्ययन अवगाहन करने पर सम्पन्न होता है। आशंकाग्रस्त अविश्वासी मन, उपेक्षा भाव से आधे-अधूरे मन से उपासना में लगे तो स्वभावतः वहाँ उसकी रुचि नहीं होगी, मन जहाँ-तहाँ उड़ता फिरेगा। मन लगने के लिए आवश्यक है कि उस कार्य में समुचित आकर्षण उत्पन्न किया जाय। व्यवसाय उपार्जन में, इन्द्रिय भागों में, विनोद मनोरंजनों में, सुखद कल्पनाओं में, प्रियजनों के संपर्क सान्निध्य में मन सहज ही लग जाता है।

इसका कारण यह है कि इन प्रसंगों के द्वारा मिलने वाले सुख, लाभ एवं अनुभव के सम्बन्ध में पहले से ही विश्वास जमा होता है। प्रश्न यह नहीं है कि वे आकर्षण दूरदर्शिता की दृष्टि से लाभदायक हैं या नहीं। तथ्य इतना ही है कि उन विषयों के सम्बन्ध में अनुभव-अभ्यास के आधार पर मन में आकर्षण उत्पन्न हो गया है। उस आकर्षण के फल स्वरूप ही मन उसमें रमता है और भाग-भाग कर जहाँ-तहाँ घूम-फिर कर वहीं जा पहुँचता है। हटाने से हटता नहीं, भगाने से भागता नहीं।

मानसिक संरचना के इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए हमें उपासना के समय मन को इष्ट पर केन्द्रित रखने की आवश्यकता पूरी करने के पहले से ही मन को प्रशिक्षित करना चाहिए। गायत्री महाशक्ति के सम्बन्ध में सूर्य तत्व के संदर्भ में जितना अधिक ज्ञान विज्ञान संग्रह किया जा सके मनोयोगपूर्वक करना चाहिए। विज्ञ व्यक्तियों के साथ उसकी चर्चा करनी चाहिए। जिनने लाभ उठाए हों उनके अनुभव सुनना चाहिए। यह कार्य तद् विषयक स्वाध्याय एवं मनन चिन्तन के एकाकी प्रयत्न से भी सम्भव हो सकता है।

चेतना शक्ति के उत्थान परिष्कार में तन्मयता सबसे बड़ा आधार है। शरीर से किए जाने वाले कर्मकाण्डों का प्रयोजन इतना ही है कि उनके कारण अन्तःकरण को साथ-साथ चलने का आधार मिल जाय। चिन्तन का गहरा पुट लगने पर पर ही आत्मिक भूमिका में हलचलें होती हैं और प्रगति का सरंजाम जुटता है। यदि मन इष्ट पर जमे नहीं-मंत्र देने वाले गुरु पर श्रद्धा में कमी हो-ऐसी दशा में मंत्रोच्चारण का श्रम-जीभ की कसरत भर बनकर रह जाएगा।

तन्मयता की स्थिति उत्पन्न करने के लिए धैर्यपूर्वक देर तक प्रयत्न करना होता है। यह एक दिन में सम्पन्न होने वाले काम नहीं हैं। मन का पुराना अनुभव अभ्यास-भौतिक आकर्षणों के साथ खेल करते रहने का है। उसे इससे विरत करने के लिए यदि उससे अधिक नहीं तो कम से कम उतना बड़ा आकर्षण तो प्रस्तुत किया जाना ही चाहिए। अरुचिकर प्रयोजन पर जमने की उसको आदत है ही नहीं। आकर्षण के अभाव में उसे बुरी तरह ऊब आती है और वहाँ से उचटने भागने की ऐसी धमा-चौकड़ी मचाता है कि देर तक उस कार्य को चलाते रहना कठिन हो जाता है। तरह-तरह की बहानेबाजी बनाकर वहाँ से उठने के लिए अचेतन मन कितनी-कितनी तरकीबें खड़ी करता है। तरह-तरह की बहानेबाज़ी बनाकर वहाँ से उठने के लिए अचेतन मन कितनी-कितनी तरकीबें खड़ी करता है, यह सब देखते ही बनता है। खुजली उठना, जम्हाई आना, कोई साधारण-सा खटका होते ही उधर देखने लगना पालथी बदलना, कपड़े संभालना, जैसी चित्र-विचित्र क्रियाओं का होना यह प्रकट करता है कि मन यहाँ नहीं रहा। उसे उस काम को छोड़कर जल्दी-जल्दी भाग निकलने के लिए हड़बड़ी हो रही है।

इस स्थिति का सामना करने के लिए उपाय यही है कि श्रद्धा उत्पन्न करने वाले स्वाध्याय और सत्संग का मनन चिन्तन का ऐसा क्रम बनाया जाय, जिससे कि उस दिशा में चलने के सत्परिणामों के सम्बन्ध में तर्क, तथ्य, प्रमाण एवं उदाहरणों के आधार पर अपनी इष्ट निष्ठा और गुरुभक्ति को प्रगाढ़ किया जाय। यह प्रगाढ़ता ही साधक में-तन्मयता को जन्म देती है। शनैः शनैः इ तन्मयता का ही रूपांतरण ध्यान में होता है। फिर ध्यान की प्रगाढ़ गम्भीरता को सविकल्प समाधि-आत्म-बोध के क्षणों में बदलते भला कितनी देर है?


निर्भयता अपराजेय है

आप सब कहाँ जा रहे हैं, पंचनद के ये बहुमूल्य घोड़े हाथी खजाना किसकी भेंट के लिए जा रहा है? साधुओं में से एक ने सेनापति से पूछा। सैनिकों के बुझे चेहरे, सेनापति का मलिन मुख, सेना की यह मौन यात्रा सब कुछ विचित्र लगा। कहाँ तो पंचनद की विलय-वाहिनी रण-वाद्यों का घोष करते हुए निकला करती थी, चारों ओर विजय का उल्लास फलता दिखता था। और आज..................?

कोई आगे कुछ सोचे, इसके पहले-महासेनापति ने कातर स्वर से कहा- भगवान्! महाराज देवदर्शन की आज्ञा से हम सिकन्दर के लिए सन्धि प्रस्ताव लेकर जा रहे हैं। सैनिकों की इच्छा के विरोध में महाराज का असामयिक निर्णय जँचा नहीं पर हम विवश हैं, क्या करें?

साधुजन तड़प उठे, बोले-यह तुम आर्यावर्त के एक-सेनाधिपति बोल रहे हो। विवशता कायरों का शब्द है। उसे मुख पर लाने से पहले तुमने राजद्रोह कर दिया होता-तो तुम यशस्वी होते, सैनिक। संख्या नहीं समर्थता विजय पाती है। तुम यह न भूलों कि हमारे देश के नागरिक संयमित और सदाचारी जीवन यापन करते हैं। इसलिए उनकी शक्ति का लोहा लेना सिकन्दर के लिए भी कठिन है। पराधीन जीवन जीने से पहले तुम शहीद हो गए होते तो देश के मस्तक पर कलंक का टीका लगने का अवसर तो न आता। जाओ-जब तक इस देश का ब्राह्मण जीवित है, तब तक राज्य पराजय स्वीकार नहीं कर सकता। तुम यह उपहार लेकर लौट जाओ। सिकन्दर से सन्धि नहीं युद्ध होगा, और यह निमंत्रण हम लेकर जाएँगे।

सेनापति-सैनिकों की टुकड़ी के साथ लौट गए। सभी को जैसे मन माँगी मुराद मिली। उन सबका दमित शौर्य उल्लास बनकर चेहरों पर चमकने लगा। एक साधु सिकन्दर को युद्ध की चुनौती देने चला, शेष ने प्रजाशक्ति को जाग्रत करना-प्रारम्भ किया। देखते ही देखते जन शक्ति हथियार बाँधकर खड़ी हो गई। देवदर्शन को भी अब युद्ध के अतिरिक्त कोई मार्ग न-दिखा। सारे राज्य में रण-भेरी बजने लगी।

साधु सिकन्दर को सन्धि के स्थान पर युद्ध का निमन्त्रण दे इससे पूर्व गुप्तचर ने सारी बात उस तक पहुँचा दी। यूनान-सम्राट क्रोधित हो उठा। उसने साधु के वहाँ पहुँचने से पूर्व ही बन्दी बनाकर कारागार में डलवा दिया। उसके बाद अन्य तीन साधुओं को भी उसने छलपूर्वक पकड़वा मँगाया।

अगले दिन सिकन्दर का दरबार सजाया गया। ऐश्वर्य प्रदर्शन के सारे सरंजाम इकट्ठे थे। सर्वप्रथम बन्दी बनाए गए साधु की प्रशंसा करते हुए सम्राट ने कूटनीतिक दाँव फेंकते हुए कहा- आखर्य! आप इन सबमें वीर और विद्वान हैं। आप हमारे निर्णायक नियुक्त हुए। शेष तीन साधुजनों से हम तीन प्रश्न करेंगे, इनके उत्तर आप सुनें।

एक साधु की ओर संकेत करते हुए सिकन्दर ने प्रश्न किया-तुमने देवदर्शन की प्रजा को विद्रोह के लिए क्यों भड़काया? इसलिए कि हमारा धर्म, हमारी संस्कृति की सुरक्षा, हमारे स्वाभिमान से अनुबद्ध है। इस देश के नागरिक स्वाभिमान का परित्याग करने की अपेक्षा मर जाना अच्छा समझते हैं। देश की रक्षा हमारे धर्म है।

सिकन्दर ने दूसरा प्रश्न किया- जीवन और मृत्यु में अधिक श्रेष्ठ कौन है?

दोनों- साधु ने उत्तर दिया। जब तक कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी भय न व्यापता हो, जीवन श्रेष्ठ है। किन्तु दुष्कर्म करने से पहले मृत्यु हो जाय तो वह जीवन से अच्छी।

संसार में जीवित मनुष्य अधिक हैं या मृतक?

सिकन्दर का तीसरा प्रश्न था।

जीवित तीसरे साधु ने उत्तर दिया। मृत्यु तो क्षणिक-दुर्घटना मात्र है। जिसके बाद या तो जीवन रहता ही नहीं या रहता है तो भी जीवित आत्माओं की संख्या में ही आता है।

इससे पूर्व सिकन्दर अपना कोई निर्णय दे साधुओं की निडरता देखकर सिकन्दर के सैनिकों ने युद्ध करने से इनकार कर दिया।

वातावरण में एक पल को घनीभूत हो गई स्तब्धता। पर आघात करते हुए प्रथम साधु दण्डायन ने निर्णय के स्वर में कहा-निर्भयता-अपराजेय है। वह और उसके तीनों शिष्य एक ओर चल पड़े। आपे सैनिकों के हठ भरे आग्रह के सामने झुककर सिकन्दर लौट चलने की व्यवस्था बना रहा था।


उज्ज्वल-भविष्य की ओर बढ़ती मानव-जाति

विकास क्रम में आज मनुष्य उस पर परम लक्ष्य की ओर गतिशील है जिसका प्रतिपादन अध्यात्मवेत्ता वैदिक ऋषि-मनीषियों से लेकर महर्षि अरविन्द तक ने किया है। चेतनात्मक उत्कर्ष की यह महान क्रान्ति अध्यात्म क्षेत्र के माध्यम से ही सम्पन्न हो सकेगी, जिसका शुभारंभ हो चुका है। जो धर्म, आचार, साधना, संस्कृति, शिक्षा कभी कुछ गिने-चुने लोगों तक सीमाबद्ध थी, उसका द्वार अब उसके लिए खोल दिया गया है। प्रत्यक्ष एवं परोक्ष-जगत में इसकी व्यापकता को विवेकवान सहज ही अनुभव करते हैं। अतीन्द्रिय क्षमता सम्पन्न दिव्यदर्शियों से लेकर मूर्धन्य चिन्तक, मनीषी, वैज्ञानिक तक सारी मानवजाति का भविष्य उज्ज्वल होने की बात पर जोर देते हुए अब चिन्तन चेतना में आमूल-चूल परिवर्तन की बात करते हैं।

इस संदर्भ में कैलीफोर्निया यूनिवर्सिटी के सुप्रसिद्ध मानव-विज्ञान डॉ. ऐषले मोन्टेगू ने गहनतापूर्वक अध्ययन किया है। मैन इन प्रोसेस नामक अपनी कृति के द फ्यूचर ऑफ मैन नामक अध्याय में उनने लिखा है कि मनुष्य का भविष्य उज्ज्वल है। निरन्तर प्रगतिशील रहते हुए वह देवत्व की ओर अग्रसर है। वर्तमान की स्थिति, परिस्थिति एवं विचारणाओं के अनुरूप ही भविष्य का निर्माण होता है। इस अवस्था को उनने कल्चर के नाम से सम्बोधित किया है और कहा है कि पिछले सौ वर्षों की स्थिति का अवलोकन करने से यह स्पष्ट हो जाता है कि विश्व की गति-प्रगति एवं मानवी चिंतन-चेतन में विशेष परिवर्तन हुआ है।

उनके मतानुसार संसार में दो प्रकार की विचारधाराओं वाले लोग पाये जाते हैं-एक-आशावादी और दूसरे निराशावादी। आशावादी दृष्टिकोण वाले व्यक्ति अपने उज्ज्वल भविष्य को ध्यान में रखते हुए वर्तमान को सब प्रकार से सुखी-समुन्नत बनाने के प्रयास में निरंतर जुटे रहते हैं जबकि निराशावादी व्यक्तियों के जीवन में अनिश्चितता का वातावरण ही बना रहता है। इसलिए वे भविष्य के संबंध में किसी भी प्रकार का शुभ चिन्तन नहीं कर पाते। मनःस्थिति के अनुरूप ही परिस्थितियों का निर्माण होता तथा भविष्य की रूपरेखा तैयार होती है। इस संबन्ध में उन्होंने दो बातों का उल्लेख प्रमुख रूप से किया है। पहली यह कि इस संसार में भली-बुरी दोनों ही प्रकार की परिस्थितियाँ क्रियाशील पायी जाती हैं, जिनके गतिक्रम को रोका नहीं जा सकता, किन्तु भविष्य को प्रकाशमय देखने वाले उनके साथ अपनी मनःस्थिति का तालमेल बिठाने की क्षमता रखते हैं, और अनिष्टकारक संभावनाओं को टाल सकने की भी।

दूसरी अतिमहत्वपूर्ण बात इस संबंध में यह है कि अपनी सुखद संभावनाओं पर विचार करने और तदनुरूप आचरण करने वाले सदैव अपनी ईमानदारी का कर्तव्यनिष्ठा का परिचय देते हुए अपनी जीवनचर्या का निर्धारण करते हैं। साथ ही साथ संभावनाओं को साकार करने में उसी स्तर का प्रयत्न-पुरुषार्थ भी नियोजित करते हैं। अधिसंख्य जनसमुदाय आज इसी स्तर की अपनी मानसिकता बनाता जा रहा है जो इस बात का स्पष्ट संकेत है कि मानवजाति का भविष्य सब प्रकार से सुन्दर और सुखद है।

स्मरण रखा जाने योग्य तथ्य यह है, कि मनुष्य का मूलभूत उद्देश्य देवत्व को प्राप्त करना है, जिसके लिए वह अनादिकाल से ही प्रयत्नशील है। यद्यपि इस उच्चस्तरीय उद्देश्य की उपलब्धि स्वल्पकाल में होती दिखायी नहीं देता अनवरत रूप से चेतनात्मक विकास की ओर उन्मुख है। भविष्य में सुखद संभावनाओं के न रहने पर तो जीवन में नीरसता और निष्क्रियता ही छा जाती है। अभिरुचि और उत्साह ठंडा पड़ जाता है। आशावादिता ही है जो असंभव को भी संभव बनाती और विभीषिकाओं के घटाटोप को भी विदीर्ण करने की क्षमता रखती है। मानव की मानसिकता चेतना अब विकास के एक ऐसे मोड़ पर आ गयी है जहाँ से उसे छलाँग लगाकर उच्चस्तरीय आयाम में प्रवेश करना है। विविध प्रकार के सामाजिक आर्थिक राजनीतिक, धार्मिक मतभेदों को सुलझाने का समय अब आ ही गया है। यह कार्य पारस्परिक विचार-विनिमय और साधनात्मक उपचारों से सहज ही पूरा किया जा सकता है। विश्व विख्यात दार्शनिक-प्लेटो इस तथ्य की पुष्टि बहुत पहले ही कर चुके हैं कि मानव सभ्यता की शक्ति इतनी प्रचण्ड है कि सैन्य बल तक को उसके समक्ष पराजित होना पड़ता है। आज लोगों की सांस्कृतिक चेतना जगी है और सभ्यता का विकास हुआ है।

डॉ. मोन्टेगू का कहना है कि सृष्टि के समस्त प्राणियों में मनुष्य ही एक ऐसा प्राणी है जो अपनी बुद्धि कस समुचित उपयोग करके संसार की परिस्थितियों को सुखद बना कसने की क्षमता रखता है। उसकी गणना भौतिक विकासवादियों के सहज-प्रवृत्ति के जीव-जन्तुओं और पशु-पक्षियों में नहीं की जा सकती। मानव जिज्ञासु है। उसकी सीखने की क्षमता उत्तरोत्तर बढ़ती ही चली जा रही है। उनने सीखने की इस प्रबल आकाँक्षा को दो वर्गों में विभक्त किया है। प्रथम है साउण्डथिंक्स दूसरी अनसाउण्ड थिंक्स। इसका अभिप्राय भौतिक और आत्मिक क्षेत्र से है। दोनों ही क्षेत्रों में मनुष्य समान रूप से प्रगति कर सकता है। समन्वय का मार्ग अपनाकर ही उज्ज्वल भविष्य की सही सार्थक आधारशिला रखी जाती है।

उनके अनुसार मनुष्य को होमोसेपियंस की वंशावली में कदापि नहीं जोड़ा जा सकता। इस तरह का सम्मिश्रण कर देने से तो साउड और अनासाण्ड के मध्य एक प्रकार की विसंगति खड़ी हो जायेगी। अब जब कि वैज्ञानिक मनीषियों ने मानवी मस्तिष्क की विलक्षण विद्युतीय क्षमता के आधार पर इस तथ्य की पुष्टि कर दी है कि मनुष्य के व्यवहार में उचित-अनुचित, भली-बुरी बातों को समझ सकने की विवेकपूर्ण सामर्थ्य विद्यमान रहती है, इसके विपरीत अन्य जीवधारियों में इसका सर्वथा अभाव रहता है। तब डार्विन एवं लाइनेयस जैसे विकासवादी वैज्ञानिकों का यह कहना गलत सिद्ध हो जाता है कि मनुष्य होमोसेपियंस जैसे नर-वानर का सुधरा हुआ रूप है। वस्तुतः मनुष्य ही एक मा. प्राणी है जिसमें सोचने, समझने, भविष्य में झाँकने और तदनुरूप योजनायें बनाने तथा उन्हें कार्यान्वित करने की क्षमता है। इसलिए वह अपने भावी-जीवन को सुखमय बनाने की योजनाओं में सदैव सफल भी होता आया है। विश्व-विख्यात विचारक लार्डबेकन ने कहा है कि मनुष्य गलतियाँ करते हुए भी न केवल उन्हें सँभालने-सुधारने की असीम सामर्थ्य से युक्त है, वरन् वह अपने अन्तराल को विकसित करता हुआ देवत्व के मार्ग पर सतत् अग्रसर है। अपनी इसी विशिष्टता के कारण वह समस्त प्राणियों से श्रेष्ठ है।

भारतीय संस्कृति में मनुष्य के विकासक्रम में शिक्षा से भी अधिक महत्वपूर्ण विद्या को माना गया है। यही एक ऐसा उपाय-उपचार है जिसके सहारे मनुष्य अपने कुसंस्कारों, पशु-प्रवृत्तियों को ग्रहण करने में सफल होता है। इसका मूलभूत उद्देश्य ही यह होता है कि मनुष्य अपने गुण, कर्म, स्वभाव को परिष्कृत परिमार्जित कर सच्चे अर्थों में मनुष्य बने, मानवी मर्यादाओं के अनुरूप स्वयं को ढाले। डॉ. मोन्टेगू ने इसे हूमेन डिसिप्लिन के नाम से सम्बोधित किया है। उनका कहना है कि मानवी-विकास में मनुष्य का स्वयं का पुरुषार्थ तो है ही, ईश्वरीय चेतना से सम्बन्धित होने के कारण उसे इस क्रम में दैवी सहायता भी निरन्तर मिलती रहती है।

इन दिनों तो सूक्ष्म वातावरण में विशेष प्रकार की हलचलें आरंभ हो गयी हैं, विशिष्ट प्रकार की ध्वनियाँ गुँजायमान हो उठी हैं, जिन्हें वे सुपरसोनिक लेयर्स ऑफ द एटमोस्फियर कहते हैं। इस पराध्वनि स्तर के सुविकसित होने से मनुष्य का बौद्धिक स्तर भी प्रभावित हुआ है। विधेयात्मक दिशाधारा मिली है और तदनुरूप ही प्रयत्न-पुरुषार्थ का वातावरण भी विनिर्मित होता चला जा रहा है। जिसे देखकर यह सुनिश्चित माना जाना चाहिए कि मनुष्य का भविष्य उज्ज्वल है और वह दिव्यता की ओर बढ़ रहा है।


वोरले की सूझबूझ (kahani)

नेपल्स नगर के बड़े गिरजे का पादरी था वोरले।

चर्च की आमदनी भी अच्छी खासी थी पर वहाँ पूजा पाठ के अतिरिक्त और कोई काम न होता था। पादरी इतने भर से संतुष्ट न था।

व्नवोरले ने नगर में घूमकर वहाँ की समस्याओं को समझाने का प्रयत्न किया। वहाँ आवारा लड़कों की संख्या तेजी से बढ़ती जा रही थी। उनके द्वारा अन्याय भी बहुत होते थे। वोरले ने विचार किया कि इन लड़कों को सुधारने का, स्वावलम्बी बनाने का काम किया जाना चाहिए। योजना की समग्र रूप रेखा उसने बनाई और उसे कार्यान्वित करने का दृढ़ निश्चय कर लिया।

इसका सुधार स्तर तेजी से बढ़ा हर वर्ष प्रायः पाँच हज़ार लड़के भरती होते रहे और सुयार का महत्वपूर्ण कार्य वे चलाते रहे। इस का फल यह हुआ कि नेपल्स नगर अपने समय में सुधरे हुए शहरों में अग्रगण्य हो गया। वोरले की सूझबूझ ने चमत्कारी परिमाण दिखाया।


सूक्ष्म लोक से जुड़ी अलौकिक स्तर की सिद्धियाँ

पुरुलिया (बंगाल) स्थित आश्रम में स्वामी विशुद्धानन्द एक दिन जिज्ञासुओं को सूर्य विज्ञान का रहस्य समझा रहे थे कि इस विद्या के माध्यम से किसी भी वस्तु का निर्माण संभव है। सभी मंत्रमुग्ध हो उन्हें सुन रहे थे, तभी अचानक न जाने वे कहाँ गायब हो गये। उपस्थित श्रद्धालु शिष्य अचकचाये। कहीं यह उनका भ्रम तो नहीं! सभी ने बार-बार आँखें मलीं, पर हर बार आसन खाली मिली। सब एक-दूसरे का मुंह ताकने लगे। अब उन्हें निश्चय हो चुका था कि भ्रान्ति किसी एक को हो सकती है, एक साथ सभी को नहीं। सचमुच परमहंस विशुद्धानन्द अंतर्धान हो गये थे। अभ्यागत बड़ी बेचैनी से उसका इन्तजार करने लगें। करीब एक घंटे बाद वे पुनः अपने आसन पर जिस आकस्मिक ढंग से अदृश्य हुए थे, वैसे ही प्रकट हो गये। उनके पुनरागमन से सभी प्रसन्न थे। उनने आते ही बताया कि सुदूर तिब्बत के दुर्गम हिमालय स्थित आश्रम ज्ञानगंज से अचानक एक अनिवार्य संदेश आ गया था, इसलिए उन्हें बिना बताये इस प्रकार जाना पड़ा।

यहाँ चर्चा किसी योगी विशेष की नहीं, वरन् उस विद्या की, की जा रही है, जो अक्सर सिद्ध-संतों के साथ जुड़ी होती है और उल्लेख का विषय बनती है कि अमुक में दृश्य-अदृश्य की अद्भुत सामर्थ्य है। यों योगी-यती आये दिन अपना यह दावा प्रस्तुत करते रहे हैं कि योग-विज्ञान में असंभव जैसा कोई शब्द है नहीं, पर पदार्थ विज्ञान बार-बार उनके दावों को अपनी कसौटी में कसता और असफल होने पर झुठलाने का प्रयास करता है। यह भौतिक विज्ञान का अपना तरीका है, किन्तु सामान्य लोगों और साधारण बुद्धि वालों के लिए असमंजस यह उठ खड़ा होता है कि वह सच या झूठ किसे मानें? दोनों ही स्तर के दो पृथक विज्ञान हैं, फिर उन पर उठायी जाय? उन्हें झूठा एवं अप्रामाणिक किस प्रकार ठहराया जाय? इस गुत्थी को सुलझाने के लिए बीच का कोई तीसरा रास्ता अपनाना ही श्रेयस्कर होगा, जिससे योग विज्ञान की असीमता और पदार्थ विज्ञान की ससीमता भलीभाँति साबित की जा सके और यह बताया जा सके कि ससीम पदार्थ असीम-अभौतिक अस्तित्व को किसी कदर सिद्ध नहीं कर सकता। यह बात समझ में आ जाये, तो समस्या का सरल हल संभव है।

पदार्थ विज्ञान की अपनी सीमा है। इसके अंतर्गत वह अपनी दृष्टि से जो कुछ देखता है, उतने भर को सही मान लेता है। मानना भी चाहिए। जो प्रत्यक्ष दृश्यमान है, उस पर अविश्वास कैसे किया जाय। योग-विज्ञान, पदार्थ-विज्ञान के उपरान्त आरंभ होता है और उससे आगे की दृष्टि रखता है। वह दूरदर्शी और अधिक व्यापक क्षमता वाला है। इसे दूसरे प्रकार से यों भी साधारण माइक्रोस्कोप से उपलब्ध जानकारी गलत नहीं कही जा सकती, क्योंकि उसने अपनी क्षमता और परिधि के हिसाब से सच्ची जानकारी दी है। इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोप की क्षमता उससे भी विस्तृत और सूक्ष्म है, अतएव वह और गहराई में उतर का आगे के तथ्य के बारे में बताता है। यदि दोनों के बीच इस मूलभूत अन्तर को न समझा गया होता, जो आज जीव-विज्ञान की नींव ही हिल गई होती और परस्पर इतना बड़ा विग्रह उठ खड़ा होता, जिसका कोई हिसाब नहीं। कोई हरे रंग का चश्मा पहन कर संसार को हरा देखता है, तो सिद्धान्त रूप में वह सही है, क्योंकि हरे रंग के काँच से लाल व विश्व हरा ही दीखेगा, लाल रंग के काँच से लाल व श्वेत रंग से सफेद। इतने पर भी सच्चाई यह है कि वसुधा न हरी है, न लाल, न श्वेत। यह सब कुछ क्षमता योग्यता एवं रंग आदि पर निर्भर है।

योग विज्ञान अभिव्यक्त संसार के मूल में अव्यक्त चेतना को प्रमुख मानता है और कहता है यह सब कुछ उसी का खेल है। अभेदानन्द एक स्थान पर लिखा है कि प्रत्येक कल्प के अन्त में प्रत्यक्ष-जगत में अन्तर्हित हो जाता है और पुनः कल्प के आरम्भ में उससे स्थल अभिव्यक्ति होती है। के प्रश्न ऋग्वेद संहिता (दशम मंडल) में किये गये हैं, यथा-

नासदासीन्नी सदासीतदानीम एवं मत आसीत प्रकेतम आदि, अर्थात् जब अस्ति और नास्ति कुछ भी न था, जब तम से तम अवगत था, तब क्या था? उत्तर आगे देते हुए कहा गया है कि यह आकाश ही गतिशून्य होकर अवस्थित था। अब प्रश्न उठता है कि यह आकाश तत्व हैं क्या? इसका कि बोलचाल की भाषा में इसे सर्वव्यापी चेतना तत्व समझा जा सकता है। इस प्रकार यह लगभग प्रमाणित हो गया कि जड़ पदार्थों की पृष्ठभूमि में चेतना ही कार्य करती है, वही इस संसार की सर्वोपरि नियामक सत्ता है। दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि चेतना निमित्त कारण है और जड़ जगत उसका उपादान कारण।

रेडियेस्थैसिया उपचार पद्धति वाले इसे भलीभाँति जानते हैं कि स्थूल सत्ता के पीछे सूक्ष्म कारण का कितना बड़ा हाथ होता है। उक्त चिकित्सा पद्धति का मूलभूत आधार ही प्राण-चेतना है-प्राण चेतना, जिसे ओरा आभामंडल जैसे कई नामों से जाना जाता है। जब कोई व्यक्ति बीमार पड़ता है, तो इसके निष्णात सर्वप्रथम यह जानने का प्रयास करते हैं कि रोगी का कौन-सा अंग अपने विशिष्ट रंग वाला प्रभामंडल खो चुका है और उसके स्थान पर ग्रहण किये हुए आभामंडल का वर्ण क्या है? इतना जान लेने के उपरान्त वे विशेष प्रकार की रत्न-राशि से अवयव पर उसके मौलिक वर्ण वाली किरणों की बौछार शुरू करते हैं। इससे धीरे-धीरे रुग्ण भाग अपने परिवर्तित ओरा-रंग का मूल वर्ण प्राप्त कर लेता है, जिससे व्याधिग्रस्त हिस्सा सही और व्यक्ति स्वस्थ हो जाता है। उल्लेखनीय है कि इस उपचार-प्रणाली द्वारा व्याधि के स्थूल अभिव्यक्ति के काफी समय पूर्व ही व्यक्ति को अस्वस्थता की भविष्यवाणी आभामंडल के रंग में आये बदलाव के आधार पर की जा सकती है। इस प्रकार यह भी यही सिद्ध करता है कि स्थूल का प्रमुख आधार सूक्ष्म चेतना ही है।

महत चेतना का एक अंश हममें से प्रत्येक में विद्यमान है। इसी से हमारा सारा क्रिया-व्यापार चलता है। जिस दिन इसका स्पन्दन रुक जाता है, उसी दिन प्राण-चेतना शरीर छोड़ कर महाप्राण में समाहित हो जाती है। यही मृत्यु है, अर्थात् प्राण के न रहने पर यह शरीर निष्क्रिय और निर्जीव हो जाता है। इतना ही नहीं थोड़े ही दिनों में सड़ने-गलने भी लगता है, जबकि प्राण की विद्यमानता अपनी पुस्तक राजयोग में प्रकट किया है। वे लिखते हैं कि जो व्यक्ति अपने प्राण के कम्पन को जिता बढ़ा लेता है, वह उतनी ही ऊंची भूमिका में पहुँच जाता है, किन्तु इसके साथ सत्य यह भी है कि वह निम्न भूमिका वाले लोगों के लिए अगोचर स्तर का हो जाता है। वे कहते है कि समान प्राण-कम्पन वाले व्यक्ति ही दूसरे पदार्थ-प्राणी को देख सकते हैं। दूसरे शब्दों में यह कहा जा सकता है कि मनुष्य के लिए इस दुनिया में जो कुछ दृश्य है, उन सब की प्राण-आवृत्ति एक समान है। यही कारण है कि सूक्ष्म शरीरधारी महापुरुष किसी को दर्शन देते हैं, तो वे मात्र कृपापात्र पर इतना अनुग्रह करते हैं कि उसकी प्राण की आवृत्ति को बढ़ा कर अति उच्च और अपने समान कर देते हैं, जिससे वह उसके लिए स्थूल एवं दृश्य बन जाते हैं, जबकि वहीं उपस्थित दूसरे लोगों के लिए वे सूक्ष्म स्तर के अगोचर बने रहते हैं। महापुरुषों के अचानक प्रकट-अप्रकट होने के पीछे यही मोटा सिद्धान्त है।

सिद्ध-महात्माओं के इतिहास में इस प्रकार के अगणित प्रसंग पाये जाते हैं, जिसमें देखते-देखते उनके विलुप्त होने का उल्लेख मिलता है। बंगाल के रामप्रसाद, डॉ. दुर्गाचरण, प्रभू जगतबन्धु, नन्दकिशोर मुखोपाध्याय, हरनाथ ठाकुर आदि ऐसे ही योगी थे। कश्मीर की विख्यात योगिनी लल्लेश्वरी के बारे में भी ऐसा ही सुना जाता है। कहा जाता है कि वह कश्मीर शहर की गलियों में पागलों की भाँति एकदम निर्वसना घूमा करती थी। एकबार ऐसे ही एक अवसर पर उनकी भेंट प्रसिद्ध सूफी सन्त शाह हमदान से हो गई। वह उन्हें देखते ही पुरुष-पुरुष चिल्लाती हुई भागी और सामने की दुकान में धधकती हुई बनिये की भट्टी में कूद पड़ी। बाद में शाह साहब के बहुत अनुनय-विनय करने के उपरान्त वह भव्य वस्त्राभूषण में सुसज्जित सामने प्रकट हो गई। बनिये ने सोचा था कि वह जल कर भस्म हो गई होगी, किन्तु सुरक्षित पुनः सामने उपस्थित पाकर उसके आश्चर्य का ठिकाना न रहा।

गजीपुर जिले के देवल ग्राम के बाबा दूधनराम औघड़ के संबंध में भी कुछ ऐसा ही प्रसिद्ध है। सुना जाता है कि एक बार वे घोड़े पर सवार होकर कहीं जा रहे थे, तो रास्ते में एक महात्मा ने उन्हें टोक दिया कि तुम साधु होकर घोड़े पर चढ़ते हो। अचानक दूधन बाबा घोड़े से उतर पड़े और कीर्तन करने लगे। घोड़ा देखते-देखते अदृश्य हो गया। कई बार तो वे स्वयं भी इस प्रकार अचानक विलुप्त होकर सामने वालों को सकते में डाल देते थे।

श्री नागा निरंकारी के बारे में कथा है कि एकबार वे हरिद्वार में गंगा में कूद कर अदृश्य हो गये थे। लोगों ने समझा कि जल-समाधि पाली (कानपुर) में पुनः दिखाई पड़े। इसी के बाद उनकी अलौकिक शक्ति का पता लोगों को ज्ञात हुआ।

इसे तो अब विज्ञान भी स्वीकारने लगा है कि कम्पन हमारी इन्द्रिय क्षमता को काफी हद तक प्रभावित करता है और इस वसुँधरा में जो कुछ दृश्य-श्रव्य है, वह सब इसी की परिणति है। हमारे कान उन्हीं शब्दों को सुन पाते हैं, जो 20-20 हज़ार हर्ट्ज के श्रवण सीमार्न्तगत आते हैं। इससे कम या अधिक आवृत्ति वाली ध्वनियों को सुनने में वे अक्षम होते हैं। यद्यपि दूसरे ऐसे कितने ही जन्तु हैं, जो इन ध्वनियों को सुनने-समझने की क्षमता रखते हैं। कुत्ता, चमगादड़ हाथी जैसे प्राणी उच्च आवृत्ति वाली सूक्ष्म आवाज को भी सरलतापूर्वक पकड़ लेते हैं। इसी प्रकार निम्न आवृत्ति वाली ध्वनियों को सुनने में कुछ जन्तु समर्थ होते हैं। ऐसे ही रंग और प्रकाश को पहचानने व देखने की भी हर प्राणी की अपनी पृथक सीमा है। मनुष्य की आँखें बैनीआहपीनाला के अंतर्गत आने वाली सप्तवर्णी किरणें को ही देख सकती हैं, क्योंकि उनकी बारंबारता मानव-दृष्टि की बारम्बारता से ठीक-ठीक मेल खाती है। इससे अधिक आवुत्ति (7.5 गुणे10 15 ऊपर ी्र) वाली पराबैगनी किरणों को देखने में वह असमर्थ होती हैं। इसी प्रकार दृष्टि-सीमा से कम बारम्बारता (4.28 गुणे10 13 ऊपर ी्र) वाली अवरक्त किरणों को वह पहचान नहीं पाती। ऐसी दशा में सूक्ष्मदर्शी अथवा दूरबीन प्रभृति यंत्र वही कार्य सम्पन्न करते हैं, जो सिद्ध स्तर के व्यक्ति, अर्थात् ये उपकरण प्राण-कम्पन को बढ़ा कर उस हद तक पहुँचा देते हैं, जिसमें अदृश्य, दृश्य बन जाता है, एवं अलौकिक, लौकिक जैसा लगने लगता है।

इस सिद्धान्त की सत्यता का परीक्षण दैनिक जीवन में काम आने वाले बिजली के बिजली के पंखे से भी न्यूनाधिक परिमाण में किया जा सकता है। पंखे को जब एक नम्बर पर चलाया जाता है, तो उसकी सारी पंखुड़ियाँ अलग-अलग स्पष्ट भासती हैं, किन्तु जैसे-जैसे उसकी गति बढ़ायी जाती है, डैन का विलगाव और बीच की दूरी समाप्त होने लगती है। पाँच नम्बर पर पहुँचते-पहुँचते सभी पंखुड़ियाँ मिल कर एक हो जाती हैं और आँख को यह धोखा होने लगता है िकवे तीन नहीं, एक हैं। उसकी गति और बढ़ायी जाय तो एक ऐसी स्थिति पैदा हो जायेगी, जिसमें उसका दिखाई पड़ना ही बन्द हो जायेगा और पंखा स्थूल रूप से विद्यमान होते हुए भी अप्रकट स्तर का बना रहेगा।

इतना सब जान-समझ लेने के पश्चात योगियों एवं सिद्ध संतों द्वारा तिरोधान व प्रकटन की घटना को अविश्वसनीय स्तर का अचंभा नहीं माना जाना चाहिए, वरन् उसे एक विज्ञान सम्मत प्रक्रिया, जो हर किसी के लिए संभव है पर इसके पूर्व प्राण संबंधी नियमन-नियंत्रण आवश्यक है। जो शुद्ध जीवन एवं सरल आचरण द्वारा इसे सम्पन्न कर सकें, उनके लिए दृश्य-अदृश्य होने की शक्ति उपलब्ध कर लेना कोई कठिन कार्य नहीं, वरन् उतना ही आसान है, जितना गोताखोरों के लिए जल में बिना किसी कठिनाई के विचरण।


स्वभाव चिन्तन के अनुरूप (kahani)

बूढ़ा आदमी पेड़ के समीप आकर रुका और बोला-अरे! फल नहीं , फूल भी नहीं और पत्ते भी नहीं! क्या हो गया हर वसन्त में तुम्हारी बहार देखते ही बनती थी!

पेड़ ने लम्बी आहभरी काश! तुमने अपना झुर्री भरा चेहरा देख लिया होता। वसन्त ऋतु तो सदा आती और जाती रहेगी पर बूढ़ी पीढ़ी और प्रथा-परम्परा को अपना दायित्व पूरा करते हुए नयों के लिए भी तो स्थान खाली करना होता है, अन्यथा यह सृष्टि ही बूढ़ी होकर समाप्त हो जायेगी। बात बूढ़े की समझ में आ गयी।

चित्रकार ने बड़ी मेहनत से भूखे गरीब आदमी का बड़ा-सा चित्र बनाया। चित्र ऐसा प्राकृतिक लगता कि आदमी की पीड़ा उभरकर कैनवस पर रख दी हो। दर्द से कराहता, झुर्रियां पड़ी-हुई। कपड़े चिथड़े तार-तार दर्शाये गये थे। चित्र को देखकर लोगों के मन में दुःख के चिन्ह उभरते है। लोग अपनी-अपनी मनोवृत्ति के अनुसार अटकलें लगाते। चित्रकार के एक डॉक्टर मित्र ने चित्र को देखा और बड़ी देर तक देखता ही रहा। अन्त में उसकी प्रशंसा करते हुए बोला-लगता है इस आदमी के पेट में तकलीफ है। वही चित्र में आपने बतायी है दुनिया अपने स्वभाव चिन्तन के अनुरूप ही दिखाई देती है।


संत, राष्ट्र की आत्मा

सामान्य-जन हुआ तो क्या? अपमान किसी का भी नहीं होना चाहिए। मनुष्य का अधिकार किसी को सुधारने और सही पथ-प्रदर्शन करने में है, पर अपशब्द और अपमान तो एक बच्चे का भी असह्य है। सेनापति! जाओ युद्ध की तैयारी करो। सम्राट विश्वजित की आज्ञा टालना भला किसके लिए सम्भव था। महामन्त्री आचार्य दशमेध ने भी समझाया- महाराज! जिस प्रकार माताएँ बच्चे की छोटी-छोटी भूलें क्षमा कर देती हैं, उसी प्रकार कैवर्त सम्राट तोतराज की भूल भी साधारण है। अपने यहाँ के नागरिक अनंगपाल के पास यदि वहाँ की स्वर्णमुद्राएँ न होती तो उसे अपमानित न किया गया होता।

सम्राट ने जैसा महामंत्री के कथन को अनसुना कर दिया। अनंगपाल का अपमान उन्हें अपना अपमान लग रहा था। उसी दिन सेना सजा दी गई और कैवर्त राज्य पर आक्रमण हो गया। कई दिन के निरन्तर युद्ध के बाद भी कैवर्त को जीता न जा सका। युद्ध की अवधि बढ़ती गई। कैवर्त राज्य के प्रकांड पण्डित और सन्त देवलाश्व विश्वजित के सैनिक खेमों के पास से गुजरे। सैनिकों ने समझा यह कोई गुप्तचर हैं, सो उन्हें बन्दी बनाकर महाराज के सामने लाया गया। महाराज विश्वजित ने उन्हें प्राण-दण्ड की सजा सुना दी।

तेज आँधी की तरह यह खबर सारे कैवर्त देश में फैल गई कि सन्त देवलाश्व बन्दी बना लिये गए हैं और उन्हें शीघ्र मृत्युदण्ड दिया जाने वाला है। विश्वजित के आक्रमण से भी प्रजा को जो कष्ट न हुआ था, वह देवलाश्व के बन्दी बना लिए जाने से हो गया। कैवर्त-वासियों ने अपने प्रिय सन्त के लिए अन्न-जल का भी परित्याग कर दिया। सारे राज्य में शोक छा गया।

रात्रि के चतुर्थ प्रहर में जबकि विश्वजित की सेनाएँ युद्ध की तैयारी कर रहीं थीं-धुँधलके में से एक आकृति स्पष्ट हुई। उसने सैनिकों से निवेदन किया कि मैं कैवर्त का राजदूत हूँ मुझे विश्वजित के पास महाराज-तोमराज का संदेश पहुँचाना है। इस पर आगन्तुक को नरेश विश्वजित के पास पहुँचा दिया गया।

कहो! क्या संदेश लाए हो कैवर्त नरेश का? क्या उन्होंने पराजय स्वीकार कर ली? स्वाभिमान से अपनी मूछों पर ताव देते हुए विश्वजित ने प्रश्न किया। नहीं महाराज, कैवर्त नरेश इतने भीरु नहीं जो युद्ध सम्पन्न हुए बिना पराजय स्वीकार कर लें, पर यदि आप बन्दी सन्त देवलाश्व को मुक्त कर दें तो वे उनके बदले आपको दो करोड़ स्वर्णमुद्राएँ भेंट कर सकते हैं।

बस! एक साधारण गुप्तचर का मूल्य कुल दो करोड़ रुपए। बोलो दूत उन्हें इस बन्दी से इतना मोह क्यों है? विश्वजित ने उसी वीरता के अभिमान से सवाल किया।

आगन्तुक ने उत्तर दिया-महाराज! हव गुप्तचर नहीं यथार्थ में एक बड़े सन्त हैं। सन्त राष्ट्र की आत्मा है। वह न रहे तो कैवर्त अनाथ हो जाएगा। पथ भ्रष्ट होने से बचाने के लिए दो करोड़ स्वर्ण मुद्राएँ तो क्या सम्पूर्ण राज्य आपके भेंट कर सकते हैं।

इसका प्रमाण। विश्वजित ने फिर प्रश्न किया। शान और स्वाभिमान सब कुछ वही पहले जैसा था और उत्तर में आगन्तुक ने अपना दाहिना हाथ आगे बढ़ा दिया। अनामिका पर शोभित मुद्रिका में साफ लिखा था-सम्राट तोमराज।

विश्वजित एक पल को हतप्रभ रह गए। उन्होंने अपना राज्यासन छोड़ दिया। तोमरराज को हृदय से लगाते हुए बोले-आज हम आपसे पराजित हुए। सचमुच जिस राष्ट्र में सन्त को सम्मान नहीं मिलता वह पथभ्रष्ट और खोखला हो जाता है।

सन्त देवलाश्व मुक्त कर दिए गए। विश्वजित की सेनाएँ भी वापस लोट पड़ी।


देवात्मा हिमालय की पवित्रता अक्षुण्ण बनी रहे

पर्वत तो संसार में बहुत से ऐसे हैं जिन पर हिम का श्वेत आवरण छाया होता है, देखने में दृश्य नयनाभिराम होता है तथा वहाँ जाने वाले ठण्डक पाकर ग्रीष्म के आतप से मुक्ति पाते हैं। उत्तरी ध्रुव व दक्षिणी ध्रुव दोनों ही हिम शिलाखण्डों से भरे पड़े हैं तथा वर्ष में कभी कभार ऐसा समय आता है, जब वहाँ उस हिस्से में जाना मनुष्य को सुखद लग पाता है। कनाडा का तो उत्तरी भाग पूरा ही न्यू-फाउण्डलैण्ड से लेकर अलास्का तक बर्फ से ढका है तथा जो भी कुछ जनसंख्या उस देश की है-कुल 230 लाख, वह दक्षिण के उस हिस्से में रहती है, जिसे वनस्पति कवचयुक्त रहने योग्य भाग माना जाता है। जब हिम की ठिठुरन व्यक्ति को निष्क्रिय व जीवन को दूभर बनाती हो तब क्या कारण है कि हिमालय की सतत् बर्फ से ढकी श्वेत चोटियाँ अगणित व्यक्तियों को अपनी ओर आकर्षित करतीं व चेतना के प्रवाह से अनुप्राणित कर एक विशिष्ट ऊर्जा का उन में संचार करती हैं।

यहाँ हिमालय की तुलना अन्य हिमाच्छादित क्षेत्रों से करके यह प्रतिपादन करने का प्रयास किया जा रहा है कि देवतात्मा हिमालय में कुछ ऐसी विशिष्टता समाहित है जो उसे अन्य शिलाखंडों-भौगोलिक दृष्टि से महत्वपूर्ण पर्वतों से अलग ठहरती है। पर्यटकों, ट्रैकिंग करने वाले दुस्साहसी पर्वतारोहियों तथा स्केटिंग का आनन्द लेने वाले व्यक्तियों की बात एक तरफ रखकर यदि इसी पक्ष पर विचार करें कि क्या कारण है कि व्यक्ति भारत वर्ष की उत्तरी सीमा पर प्रहरी की तरह खड़े इस पर्वतराज के अंदर परमात्मा की सत्ता के दर्शन करता है तथा एक अलौकिक प्राणशक्ति का संचार इसमें विचरण करने, इसका दर्शन मात्र करने तथा ध्यान लगाने से पाता है। इसका उत्तर एक ही है कि हिमालय वस्तुतः देवताओं की क्रीड़ा-स्थली रहा है व पृथ्वी पर स्वर्ग की उपमा इसे सही ही दी गयी थी। सूक्ष्म शरीरधारी ऋषिगण अभी भी वहाँ ध्यान लगाने वाले एक पहली कक्षा के साधक का ध्यान भी तुरंत लग जाता है। अध्यात्म चेतना का ध्रुवकेंद्र हिमालय को इसी कारण सोद्देश्य ही कहा गया है।

मैडम ब्लाट्स्की ने हिमालय में दिव्यात्माओं की (मार्स्टस की-गुरुसत्ताओं की) पार्लियामेंट विद्यमान होने की बात अपने ग्रन्थों में लिखी है। समय-समय पर अदृश्य सहायकों के आते रहने व लोगों की जड़ व चेतना जगत की गुत्थियों को सुलझाने की बात वे सिक्रेट डॉक्ट्रीन में कहती हैं तो उनके शिष्य श्री लेडबीटर अपनी पुस्तक इनवाजीबल हेर्ल्पस में कहते हैं। पॉल ब्रण्टन से लेकर मैक्समूलर तक तथा स्वामी दयानंद व रामतीर्थ से लेकर स्वामी विवेकानन्द तक हिमालय आते व तपश्चर्या कर सूक्ष्म शरीरधारी ऋषियों से संपर्क स्थापित कर अपनी भावी क्रियापद्धति का निर्धारण करते रहे हैं। स्वामी दयानन्द ने जहाँ धरासू में परशुराम शिला पर तपकर पाखंड-खण्डिनी पताका फहराने व देशव्यापी दिग्विजय करने के निमित्त शक्ति अर्जित की, वहाँ स्वामी रामतीर्थ ने तो अपनी साधना का समापन ही हिमालय की छाया व भागीरथी की गोद में कर प्राणों का विसर्जन किया। स्वामी विवेकानन्द ने अल्मोड़ा में हिमालय के दर्शन कर स्वयं को कृतार्थ किया व बाद में विश्व की एक निराली स्थापना मायावती में अद्वैत आश्रम की स्थापना करके की। अल्मोड़ा में वे अपने अल्पकालीन जीवनावधि में तीन-तीन बार आए तथा यहीं से पर्वत श्रृंखलाओं में भ्रमण करते हुए वे पूरे उत्तराखण्ड में विचरण कर गए। निश्चित ही कोई विशेष कारण रहा होगा जो इन महापुरुषों ने

हिमालय के इस भाग को विशिष्ट महत्व दिया।

हिमालय यों तो गिलगित-कराकोरम व क-2 नामक विश्व की नम्बर दो की चोटी से आरंभ होकर वर्मा के जंगलों तक फैला हुआ है पर इसकी विशिष्टता इसके इस भाग में है जो धौलाधार-बंदरपूछ चोटियों के भाग से लेकर बद्रीनाथ के पूर्व में स्थित नन्दाकोट-पंचचूली-त्रिशूल व कैलाश पर्वत तक फैला हुआ है। भौगोलिक दृष्टि से भी यह समग्र हिमालय का मध्यभाग है तथा आध्यात्मिक दृष्टि से इसे हिमालय का हृदय कह सकते हैं। उत्तराखण्ड को अपने अंक में समेटे यह समूचा हिमक्षेत्र अति विशिष्ट ऊर्जा संपन्न क्षेत्र है, यह वहाँ जाकर उसके सामीप्य का लाभ लेकर समझा व आत्मसात किया जा सकता है।

परमपूज्य गुरुदेव ने अपने जीवन काल में चार बार अपनी सूक्ष्म-शरीरधारी सत्ता के संकेतों पर हिमालय की यात्रा की। बाल्यकाल में तो वे एक बार घर से हिमालय भाग ही खड़े हुए थे व हल्द्वानी काठगोदाम जाने वाली रेल में बैठ भी चुके थे, जब संबंधीगण उन्हें समझा बुझाकर वापस लाए। हिमालय को पूज्यवर कहते थे व अपना पिता-संरक्षक मानते थे। नंदनवन के मखमली पठार से लेकर दुर्गम हिमालय के गंगोत्री से लेकर नर-नारायण पर्वत-नीलकण्ठ पर्वत तक के देवयान मार्ग को एक बार नहीं, तीन बार उनने मात्र अपने तपोबल-योगशक्ति के सहारे पार किया था। आर्षग्रन्थों का भाष्य उनके क्षरा हिमालय प्रवासों के संस्मरणों दस्तावेज सुनसान के सहचर पुस्तक के रूप में एक अलौकिक स्तर की मानवी चेतना को उच्चतर लोकों में ले जाने वली कृति है। तीर्थों की चेतन सत्ता जिन्दा हो, उनमें प्राण आए व पर्यटन करने आए तीर्थ यात्री वास्तव में हिमालय की प्राणऊर्जा से लाभान्वित होकर जाएँ, यह वेदना संस्कृति पुरुष पूज्य गुरुदेव के अंतस्तल में सतत् बनी रही।

वस्तुतः हिमालय का हृदय कहा जाने वाला यह

क्षेत्र न केवल आध्यात्मिक प्रगति के पिपासु, जिज्ञासु साधकों के लिए एक महत्वपूर्ण साधन स्थली है, वरन् आत्मबल उपार्जन हेतु एक श्रेष्ठ कर्मशाला भी। आज भी इस क्षेत्र में वे कम्पन विद्यमान हैं जो किसी भी व्यक्ति में पवित्रता के संचार-प्राणाग्नि के उद्दीपन तथा सूक्ष्म शरीर में ऊर्जा संचालन में सक्षम हैं। यही कारण है कि विश्वभर से आध्यात्मिक क्षेत्र में कुछ उत्थान करने, उच्चतर स्तर की साधनाएं करने वाले व्यक्ति यहाँ आते व अपना साधना पुरुषार्थ संपन्न करते हैं। तिब्बत जिसे रुफ ऑफ द वर्ल्ड कहा जाता है में कभी संपन्न होने वाले विशिष्ट स्तर के मंत्रशक्ति व तंत्रशक्ति के प्रयोग इसी क्षेत्र में अभी भी कई साधक संपन्न करते देखे जाते हैं। कैलाश-मानसरोवर का क्षेत्र इसी से जुड़ा हुआ है तथा परमपूज्य गुरुदेव ने तो शिवलिंग-भगीरथ पर्वत-गोमुख -गंगोत्री ग्लेशियर जैसे क्षेत्र को ही वास्तविक कैलाश मानसरोवर कहा है। बर्फ की श्वेत चादर से ढके इन पर्वतों को सूक्ष्म दृष्टि से देखने वाले साधक वास्तव में जाग्रत जीवन्त पाते हैं। हिमवान् पर्वतराज हिमालय की पुत्री जो प्रलयंकर शंकर के परिणय बंधन में बंधी ने भी यहीं तपकर अपनी पात्रता का संवर्धन किया। संत एक नाथ, आद्य शंकराचार्य, सहजानन्द स्वामी नारायण महाप्रभु, महाप्रभु ईसा, जैन तीर्थंकर ऋषभेदेवजी तथा सिक्खों के गुरु श्री गोविन्दसिंह जी ने भी यहीं आकर तप किया था। पुराणों के तो सारे आख्यान हिमालय क्षेत्र में ही होते संपन्न बताए गए हैं। इस प्रकार यह तो प्रामाणित ही है कि देवात्मा हिमालय की प्रचण्ड प्राणचेतना अपने चुम्बकीय आकर्षण से जन-जन के मन-मन को प्रभावित करती रही है।

हमारा यह कर्तव्य बनता है कि इस संक्रान्ति काल की वेला में जब हमें आध्यात्मिक बल सर्वाधिक अभीष्ट है, अपनी ऊर्जा के ध्रुवकेन्द्र हिमालय की पवित्रता को अक्षुण्ण बनाए रखें। इसका हरीतिमा कवच नष्ट न करें। पर्यटन के नाम पर-पर्वतारोहण के नाम पर वर्जनाओं का उल्लंघन कर तामसिक वस्तुओं का माँस-शराब आदि का वहाँ प्रयोग वर्जित करें। अधिक भीड़ उस क्षेत्र में एकत्र हो-तीर्थाटन के नाम पर प्रदूषण पैदा करे, इसके स्थान पर इसके चप्पे-चप्पे को तीर्थ बनाते हुए उससे प्रेरणा लेने का प्रयास करें। साधना-स्थलियाँ अपने प्राकृतिक रूप में यहाँ बने तथा इससे सुपात्र व्यक्ति लाभ उठायें। स्वयं को गलाकर भागीरथी, मंदाकिनी, अलकनन्दा को जन्म देने वाले इस हिमालय में कृत्रिम बाँध बनाकर देवी प्रकोपों को आमंत्रित न करें। यदि हम हिमालय को सुरक्षित रख सके तो हमारा साँस्कृतिक गौरव भी अक्षुण्ण बना रहेगा तथा हम इक्कीसवीं सदी के लिए प्राणवान पीढ़ी भी समाज के लिए छोड़कर जा सकेंगे।


कृषि-प्रधान (kahani)

थाईलैण्ड वर्मा का पड़ोसी देश है। कुछ समय पूर्व तक वह संसार का एक मात्र बुद्ध देश था। थाईलैण्ड में अनेक बौद्ध विहार थे। उस देश में प्रथा थी कि हर व्यक्ति एक वर्ष के लिए बिहार में रहे। साधारण करे और देशवासियों से मिलता रहे।

इस प्रचालन से सभी बौद्धबिहार भरे रहते उनके लिए सभी सद्गृहस्थ साधन जुटाते। प्रातः काल स्व-कार्य से निपटकर सभी साधक अपनी योजनानुसार कार्यों पर चले जाते। इस प्रकार छोटे-बड़े सभी शासकीय और सामाजिक कार्यों के लिए सहयोग कार्यकर्ता भोजन मात्र का निर्वाह लेकर कार्यरत रहते।

जब तक यह प्रथा प्रचलित रही तब तक वह कृषि-प्रधान देश संसार के समुन्नत देशों में अग्रणी गिना जाता रहा। उसकी सम्पन्नता,शान्ति और प्रगति देखने योग्य ही बनी रही।


बलि-वैश्व की पाँच आहुतियों से जुड़े पंचशील

बलि-वैश्व की पाँच आहुतियों को पंच महायज्ञ कहा गया है। बोलचाल की भाषा में किसी शब्द के साथ महा लगा देने पर उसका अर्थ बड़ा-बहुत बड़ा हो जाता है। यज्ञ शब्द से भी सामूहिक अग्निहोत्र को बोध होता है। इसके पहले महा शब्द जोड़ देने का अर्थ हुआ कि विशालकाय यज्ञायोजन होना चाहिए। फिर आहार में से छोटे पाँच कण निकल कर आहुति दे देने मात्र की, दो मिनट में हो जाने वाली क्रिया में महायज्ञ नाम क्यों दिया गया? इतना ही नहीं हर आहुति को महायज्ञ की संज्ञा दी गई ऐसा क्यों? इसका तात्पर्य किसी अत्यधिक विशालकाय धर्मानुष्ठान जैसी व्यवस्था होने जैसा ही कुछ निकलता है। कुछ भी हो इतने छोटे कृत्य का इतना बड़ा नाम अनबूझ पहेली जैसी लगता है।

वस्तु स्थिति का पर्यवेक्षण करने से तथ्य सामने आ जाते हैं। स्पष्ट हो जाता है कि यहाँ कृत्य के स्थान पर तथ्य को प्रमुखता दी गयी है। दृश्य के स्थान पर रहस्य को-प्रेरणा प्रकाश को-ध्यान में रखा गया है। साधारणतया दृश्य को कृत्य की प्रमुखता देते हुए नामकरण किया जाता है। किन्तु बलि-वैश्व की पाँच आहुतियों के पीछे जो प्रतिपादन जुड़े हुए हैं, इन पाँचों को एक स्वतन्त्र यज्ञ नहीं-महायज्ञ माना गया है। स्पष्टीकरण के लिए हर आहुति का एक-एक स्वतन्त्र नाम भी दे दिया है।

पाँच आहुतियों को जिन पाँच यज्ञों का नाम दिया गया है उनमें शास्त्री मतभेद पाया जाता है। एक ग्रन्थ में जो पाँच नाम गिनाए गए हैं दूसरे में उससे कुछ भिन्नता है। इन मतभेदों के मध्य अधिकाँश की सहमति को ध्यान में रखा जाय तो इनके अधिकाँश की सहमति को ध्यान में रखा जाय तो इनके नाम-(1) ब्रह्म यज्ञ (2) देव यज्ञ (3) ऋषि यज्ञ (4) नर यज्ञ (5) भूत यज्ञ ही प्रमुख रह जाते हैं। मोटी मान्यता यह है कि जिस देव के नाम पर आहुति दी जाती है, वे उसे मिलती हैं। फलतः वह प्रसन्न होकर यजनकर्ता को सुख-शान्ति के लिए वरदान प्रदान करते हैं।

देवता शब्द का तात्पर्य समझने में प्रायः भूल होती रही है। देवता किसी अदृश्य व्यक्ति जैसी सत्ता माना जाता है पर वस्तुतः बात वैसी है नहीं। देवों का तात्पर्य किन्हीं भाव शक्तियों से है जो चेतना तरंगों की तरह इस संसार में एवं प्राणियों के अन्तराल में संव्याप्त रहती है। साधारणतया वे प्रसुप्त पड़ी रहती हैं और मनुष्य सत्शक्तियों-सद्भावनाओं से-और सत्प्रवृत्तियों से रहित दिखाई पड़ती है। इस प्रसुप्ति को जाग्रति में परिणत करने पाले प्रयासों को देवाराधना कहा जाता है। देव वृत्तियों के विकसित होने का अनुदान ही साधक को ऋद्धियों-सिद्धियों, सफलताओं, सुख-सम्पदाओं जैसी विभूतियों से सुसंपन्न करता है।

पंच महायज्ञों में जिन ब्रह्म, देव, ऋषि आदि का उल्लेख है उनके निमित्त आहुति देने का अर्थ इन्हें अदृश्य व्यक्ति मानकर भोजन कराना नहीं, वरन् यह है कि इन शब्दों के पीछे जिन देव-वृत्तियों का सत्प्रवृत्तियों का संकेत है उनके अभिवर्धन के लिए अंशदान करने की तत्परता अपनाई जाय।

(1) ब्रह्म यज्ञ का अर्थ है-बहा-ज्ञान, आत्म-ज्ञान की प्रेरणा। ईश्वर और जीवन के बीच चलने वाला आदान-प्रदान।

(2) देव यज्ञ का उद्देश्य है-पशु से मनुष्य तक पहुँचाने वाले प्रगतिक्रम को आगे बढ़ाना। देवत्व के अनुरूप गुण कर्म स्वभाव का विकास-विस्तार। पवित्रता और उदारता का अधिकाधिक सम्वर्धन।

(3) ऋषि यज्ञ का तात्पर्य है-पिछड़ों को उठाने में संलग्न करुणार्द्र जीवन नीति। सदाशयता के सम्वर्धन की तपश्चर्या।

(4) नर यज्ञ की प्रेरणा है-मानवीय गरिमा के अनुरूप वातावरण एवं समाज व्यवस्था का निर्माण। मानवीय गरिमा का संरक्षण। नीति और व्यवस्था का परिपालन। विश्व मानव का श्रेय साधन।

(5) भूत यज्ञ की भावना है-प्राणि मात्र तक आत्मीयता का विस्तार। अन्यान्य जीव धारियों तक के विकास का प्रयास।

इन पाँचों प्रवृत्तियों में व्यक्ति और समाज की सर्वतोमुखी प्रगति, पवित्रता और सुव्यवस्था के सिद्धान्त

जुड़े हुए हैं। उन्हें उदात्त जीवन नीति के सूत्र कह सकते हैं। जीवन-चर्या और समाज व्यवस्था में इन सिद्धान्तों का जिस अनुपात से समावेश होता जाएगा,

उसी क्रम से सुखद परिस्थितियों का निर्माण, निर्धारण होता चला जाएगा। बीज छोटा होता है किन्तु उसका फलितार्थ विशाल वृक्ष बनकर सामने आता है। चिनगारी छोटी होती है अनुकूल अवसर मिलने पर वही दावानल का रूप ले लेती है। गणित के सूत्र छोटे से होते हैं, पर उससे जटिलताएँ सरल होती चली जाती हैं।

बलि-वैश्व की पाँच आहुतियों का दृश्य स्वरूप तो तनिक-सा है पर उनमें जिन पाँच प्रेरणा सूत्रों का समावेश है उन्हें व्यक्ति और समाज की सर्वतोमुखी प्रगति के आधार भूत सिद्धान्त कहा जा सकता है। इनकी स्मृति हर रोज ताजा होती रहे इसके लिए पाँच आहुतियाँ देकर पाँच आदर्शों को कहते हैं। प्रस्तुत पाँच महायज्ञों के पाँच अधिष्ठाता देवता माने गए हैं। ब्रह्म यज्ञ के ब्रह्म, देव यज्ञ के विष्णु ऋषि यज्ञ के महेश, नर यज्ञ के अग्नि और भूत यज्ञ के वरुण देवता अधिपति हैं। पाँच आहुतियाँ इन्हीं पाँचों के लिए दी जाती हैं।

इस प्रक्रिया में इन पाँच देवों का पूजन-अनुकूलन का भाव है। यज्ञ कर्ता बलि वैश्व कर्म करते हुए इन पाँचों के अनुग्रह वरदान की अपेक्षा करता है। यह आशा तब निःसन्देह पूरी हो सकी है जब आहुतियों के पीछे जो उद्देश्य निहित है उसे व्यवहार में उतारा जाय। इन्हीं उत्कृष्टताओं का व्यापक प्रचलन अवलम्बन इस पंच महायज्ञ प्रक्रिया का मूलभूत प्रयोजन है। बलि-वैश्व को इन्हीं देव-प्रेरणाओं का प्रतिपादन पाँच महायज्ञों के रूप में किया गया है उन्हें मानवी गरिमा को समुन्नत बनाने वाले पंचशील कह सकते हैं। बौद्ध धर्म में पंचशीलों का बहुत ही विस्तार पूर्वक वर्णन विवेचन किया गया है। इन पंचशीलों को जीवनचर्या एवं समाज व्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों में विभिन्न रूपों में वर्गीकृत किया गया है। इस प्रकार पंचशीलों के वर्ग उपवर्ग प्रकारान्तर से व्यक्ति एवं विश्व की समस्त समस्याओं को सुलझाने में महत्वपूर्ण भूमिका संपन्न करते हैं।

शरीर रक्षा के पंचशील हैं- (1) सीमित एवं सात्विक आहार (2) स्वच्छ जल का पर्याप्त उपयोग (3) खुली वायु में गहरी साँस (4) समुचित श्रम (5) चिन्ता रहित रात्रि विश्राम।

मानसिक स्वास्थ्य के पंचशील हैं- (1) खिलाड़ी जैसा दृष्टिकोण (2) अनवरत मुस्कान (3) इन्द्रिय निग्रह (4) काम में मनोयोग एवं गौरव (5) उपलब्धि में सन्तोष-प्रगति में उत्साह।

सामाजिक पंचशील हैं-(1) ईमानदारी (2) नागरिकता की जिम्मेदारी (3) नम्र, शिष्ट एवं मधुर व्यवहार (4) वचन का पालन (5) उदार सहयोग।

पारिवारिक पंचशील हैं- (1) अभिभावकों के प्रति सहयोग, कृतज्ञता, सेवाभावना (2) छोटों को दुलार, सहयोग (3) दाम्पत्य सम्बन्धों में साधन मैत्री (4) सत्प्रवृत्तियों को सम्पन्नता मानना और उन्हें बढ़ाना (5) सन्तान संख्या न्यूनतम।

धार्मिक पंचशील हैं- (1) सत्प्रवृत्तियों का समर्थन संवर्धन (2) दुष्प्रवृत्तियों से असहयोग, संघर्ष (3) पीड़ा और पतन के निवारण में बढ़-चढ़कर समय, श्रम, सम्पदा का नियोजन (4) उच्च स्तरीय आस्थाओं को दृढ़तापूर्वक अपनाना (5) कर्तव्य पालन में तत्परता, अधिकार पाने में उदासीनता।

अध्यात्मिक पंचशील हैं-(12 ईश्वर की कर्मफल व्यवस्था पर अटूट विश्वास (2) आत्मावलम्बन (3) औसत भारतीय स्तर का जीवन सत्प्रयोजनों में उपयोग (4) जीवन साधना में प्रखर तत्परता (5) आत्मीयता का चरम विस्तार।

उपरोक्त वर्ग विभाजनों में जिन पंचशीलों की चर्चा की गई है। वे देखने में जिन पंचशीलों की की गई है वे देखने में एक दूसरे से पृथक लगते हैं और उन्हें स्वतन्त्र आदर्श गिनने का मन करता है। पर गहराई से देखने पर प्रतीत होगा कि उनमें बलि वैश्व में प्रतिपादित ब्रह्मयज्ञ, देवयज्ञ, ऋषियज्ञ, नरयज्ञ और भूतयज्ञ में सन्निहित सद्भावनाओं और उत्कृष्ट मान्यताओं का परिस्थितियों के अनुरूप विवेचन दिग्दर्शन मात्र है। मानवी प्रगति, सुव्यवस्था, सुरक्षा एवं सुख, शान्ति के समस्त तत्व इस पंचशील प्रक्रिया में पूरी तरह जुड़े है जिन्हें पंचशील प्रक्रिया में पूरी तरह जुड़े है जिन्हें पंच महायज्ञों के नाम से पाँच आहुतियों के साथ जोड़कर रखा गया हैं। कहना न होगा कि ये आदर्श जिस अनुपात में अपनाये जायेंगे, उसी के अनुरूप व्यक्ति में देवत्व की मनः स्थिति और संसार में स्वर्गीय परिस्थिति का मंगलमय वातावरण दृष्टिगोचर होगा। बलि-विश्व की प्रेरणाएँ प्रकारान्तर से नवयुग की सुखद सम्भावनाओं का बीजारोपण करती है।, शेष उपलब्धियों का


Quotation

व्यक्ति की महत्ता देखकर ही उसका कथन अंगीकार न करो। हो सकता है कोई सुन्दर व्यक्ति कोई चित्र बनाये और यह भी संभव है कि किसी कुरूप ने सुन्दर चित्र विनिर्मित किये हों।


देह रूपी देवालय की पूजा उपासना-सोऽहम् साधना द्वारा

गायत्री का एक स्वरूप जप परक है, जिसके आधार पर नित्य जप, अनुष्ठान, पुरश्चरण आदि के विधान सम्पन्न किये जाते है। इसका दूसरा स्वरूप है-’अजपा’ अर्थात् वह जप जो बिना प्रयत्न के अनायास ही होता रहता हो। योगविद्या विशारदों का मत है कि जीवात्मा अचेतन अवस्था में अनायास ही इस जप प्रक्रिया में निरत रहता है। यह अजपा गायत्री है-’सोऽहम्’ की ध्वनि, जो श्वास-प्रश्वास के साथ-साथ स्वयमेव होती रहती है। इसी की प्रयत्न पूर्वक विधि-विधान सहित किया जाय तो वह प्रयास ‘हंस-योग’ कहलाता है। हंसयोग के अभ्यास का असाधारण महत्व है। गायत्री महाविद्या के अंतर्गत इसे कुण्डलिनी जागरण साधना का तो एक अंग ही माना गया हैं ईश्वर सामीप्य-सान्निध्य का इससे बढ़कर सरल साधन और कोई नहीं है।

‘सोऽहम्’ साधना का महत्व बताते हुए प्रपंच तन्त्र में कहा गया है कि “देह देवालय है। इससे जीव रूप में शिव विराजमान है। इसकी पूजा वस्तुओं ने सही ‘सोऽहम्’ साधना से करनी चाहिए।” अंतःकरण में हंस-वृत्ति की स्थापना की यह साधना ही अजपा गायत्री कही जाती है। अग्नि-पुराण, शिव-स्वरोदय, गोरक्ष-संहिता, तंत्र-सार आदि में इसे समस्त पापों से छुटकारा दिलाने वाली एवं मोक्ष प्रदाता कहा गया है।

श्वास लेते समय “सो” ध्वनि का छोड़ते समय ‘हम’ ध्यान के प्रवाह को सूक्ष्म श्रवण शक्ति के सहारे अन्तःभूमिका में अनुभव करना यही है संक्षेप में ‘सोऽहम्’ साधना।

वायु जब छोटे छिद्र में होकर वेगपूर्वक निकलती है तो घर्षण के कारण ध्वनि प्रवाह उत्पन्न होता है। बाँसुरी से स्वर लहरी निकलने का यही आधार है। नासिका छिद्र भी बाँसुरी के छिद्रों की तरह है। उनकी सीमित परिधि में होकर जब वायु भीतर प्रवेश करेगी तो वहाँ स्वभावतः ध्वनि उत्पन्न होगी। साधारण श्वास-प्रश्वास के समय भी वह उत्पन्न होती है, पर इतनी धीमी रहती है कि कानों के छिद्र इन्हें सरलता पूर्वक नहीं सुन सकते। प्राणयोग की साधना में गहरे श्वासोच्छवास लेने पड़ते है।

इसके लिए चित्त को श्वसन क्रिया पर एकाग्र करना पड़ता है साथ ही भावना को इस गहराई तक उभारना होता है कि उससे श्वास लेते समय ‘सो’ शब्द के ध्वनि प्रवाह की मन्द अनुभूति होने लगे। उसी प्रकार जब साँस छोड़ना पड़े तो यह मान्यता परिपक्व होनी चाहिए कि ‘हम’ ध्वनि प्रवाह विनिर्मित हो रहा है। आरम्भ में कुछ समय यह अनुभूति उतनी ही समय उपरान्त इस प्रकार का ध्वनि प्रवाह अनुभव से आने लगता है और उसे सुनने में न केवल चित्त एकाग्र होता है, वरन् आनन्द का अनुभव भी होता है।

‘सो’ का तात्पर्य परमात्मा से और ‘हम’ का जीव चेतना से है। निखिल विश्व -ब्रह्मांड में संव्याप्त महाप्राण नासिका द्वारा हमारे शरीर में प्रवेश करता है और अंग-प्रत्यंग में-जीवकोश तथा नाड़ी तन्तु में प्रवेश करके उसको अपने संपर्क-संसर्ग का लाभ प्रदान कराती है। यह अनुभूति ‘सो’ शब्द ध्वनि के साथ अनुभूति भूमिका में उतारनी पड़ती है और ‘हम’ शब्द के साथ जीव भाव द्वारा इस काय-कलेवर से अपना कब्जा छोड़कर चले जाने की मान्यता प्रगाढ़ करनी पड़ती है।

प्रकारांतर से परमात्मा सत्ता का अपने शरीर और मनः क्षेत्र पर आधिपत्य स्थापित हो जाने की यह धारण है। जीवभाव अर्थात् स्वार्थवादी संकीर्णता, काम, क्रोध, लोभ मोह भरी मद-मत्सरता-अपने को शरीर या मन के रूप में अनुभव करते रहने वाली आत्मा की दिग्भ्रान्त स्थिति का नाम ही जीव भूमिका है। इस भ्रम जंजाल भरे जीव भाव को हटा दिया जाय तो फिर अपना विशुद्ध अस्तित्व ईश्वर के अविनाशी अंश आत्मा के रूप में ही शेष रह जाता है। काय कलेवर के कण-कण पर परमात्मा के शासन की स्थापना और जीव धारणा की बेदखली, यही है ‘सोऽहम्’ साधना का तत्वज्ञान। श्वास-प्रश्वास क्रिया के माध्यम से ‘सो’ और ‘हम’ ध्वनि के सहारे इसी भाव चेतना को जाग्रत किया जाता है कि अपना स्वरूप बदल रहा है। अब शरीर और मन पर से लोभ-मोह का, वासना-तृष्णा का आधिपत्य समाप्त हो रहा है और उसके स्थान पर उत्कृष्ट चिंतन एवं आदर्श कर्तृत्व के रूप में ब्रह्मसत्ता की स्थापना हो रही है। शासन परिवर्तन जैसी, राज्यक्रांति जैसी यह भाव भूमिका है जिसमें अनाधिकारी-अनाचारी शासन सत्ता का तख्ता पलट कर उस स्थान पर सत्य, न्याय और प्रेम-संविधान वाली धर्मसत्ता का राज्याभिषेक किया जाता है। ‘सोऽहम्’ साधना इसी अनुभूति स्तर को क्रमशः प्रगाढ़ करती चली जाती है और अंतःकरण यह अनुभव करने लगता है कि अब उस पर असुरता का नियंत्रण नहीं रहा, उसका समग्र संचालन देवसत्ता द्वारा किया जा रहा है।

‘सोऽहम्’ साधना के आरम्भिक चरण में श्वास खींचते समय ‘सो’ और निकालते समय ‘हम’ की धारणा की जाती है। प्रयत्न यह किया जाता है कि इन शब्दों के प्रारंभ में अति मंद स्तर की होने वाली अनुभूति में क्रमशः प्रखरता आती चली जाय। चिन्तन का स्वरूप यह बनाना पड़ता है कि साँस में घुले हुए भगवान अपनी समस्त विभूतियों और विशेषताओं के साथ काय-कलेवर में भीतर प्रवेश कर रहे है। यह प्रवेश मात्र आवागमन नहीं है, वरन् प्रत्येक अवयव पर सघन आधिपत्य बन रहा है। इस तरह एक-एक करके शरीर के भीतरी प्रमुख अंगों के चित्र की कल्पना की जाती है और अनुभव करना पड़ता है कि उसमें भगवान की सत्ता चिरस्थायी रूप में समाविष्ट हो गयी। हृदय, फेफड़े, आमाशय, आँतें, जिगर, गुर्दे, तिल्ली आदि में भगवत्-सत्ता का प्रवेश हो गया। रक्त के साथ अस्थि-पिंजर सहित प्रत्येक नस-नाड़ी और कोशिकाओं पर भगवान ने अपना शासन स्थापित कर लिया।

शरीर के प्रत्येक अंग-अवयवों, पंच ज्ञानेन्द्रियों और पंच कर्मेंद्रियों ने भगवान के अनुशासन में रहना और उनका निर्देश पालन करना स्वीकार कर लिया। जीभ वहीं बोलेगी जो ईश्वरीय प्रयोजनों की पूर्ति में सहायक हो। देखना, सुनना, बोलना, चलना आदि इन्द्रिय-जन्य गतिविधियाँ दिव्य निर्देशों का ही अनुगमन करेंगी। जननेन्द्रिय का उपयोग वासना के लिए नहीं, मात्र ईश्वरीय प्रयोजनों के लिए अनिवार्य आवश्यकता का धर्म संकट सामने खड़ा होने पर ही किया जाएगा। हाथ-पाँव मानवोचित कर्तव्य पालन के अतिरिक्त ऐसा कुछ न सोचेगा जिसे उच्च आदर्शों के प्रतिकूल ठहराया जा सके। बुद्धि कोई अनुचित न्याय विरुद्ध एवं अदूरदर्शी अविवेक भरा निर्णय न करेगी। चित्त में अवांछनीय एवं निकृष्टस्तरीय आकाँक्षायें ने जमने पायेंगी। अहंता का स्तर नर-पशुओं जैसा नहीं, नर-नारायण जैसा होगा।

यहीं हैं वे भावनायें जो शरीर और मन पर भगवान के शासन स्थापित होने के तथ्य को यथार्थ सिद्ध कर सकती हैं। यह सब उथली कल्पनाओं की तरह मनोविनोद भर नहीं रह जाना चाहिए, वरन् उसकी आस्था इतनी प्रगाढ़ होनी चाहिए कि इस भाव परिवर्तन को क्रिया रूप में परिणत हुए बिना चैन ही न पड़े। सार्थकता उन्हीं विचारों की है जो क्रिया रूप में परिणत होने की प्रखरता से भरे हों। ‘सोऽहम्’ साधना के पूर्वार्द्ध में अपने काय-कलेवर पर श्वसन क्रिया के साथ प्रविष्ट हुए महाप्राण की-परब्रह्म की सत्ता स्थापना का इतना गहन चिन्तन करना पड़ता है कि यह कल्पना स्तर की बात न रह कर एक व्यावहारिक यथार्थता के, प्रत्यक्ष तथ्य के रूप में दृष्टिगोचर होने लगे।

इस साधना का उत्तरार्द्ध पाप निष्कासन का है शरीर में से अवाँछनीय इन्द्रिय लिप्साओं का, आलस्य-प्रभाव जैसी दुष्प्रवृत्तियों का, मन से लोभ, मोह जैसी तृष्णाओं का, अन्तस्तल से जीव का भावी अहंता का निवारण-निराकरण हो रहा है-ऐसी भावनायें अत्यन्त प्रगाढ़ होनी चाहिए। दुर्भावनायें और दृष्कृत्तियाँ, निकृष्टतायें और दुष्टतायें-क्षुद्रतायें एवं हीनतायें सभी निरस्त हो रही है, सभी पलायन कर रही है, यह तथ्य हर घड़ी सामने खड़ा दीखना चाहिए। अनुपयुक्तताओं के निरस्त होने के उपरान्त जो हलकापन-जो उल्लास स्वभावतः होता है और निरन्तर बना रहता है, उसी का स्वभावतः होता है और निरन्तर बना रहता है, उसी का प्रत्यक्ष अनुभव होना ही चाहिए। तभी कहा जा सकेगा कि ‘सोऽहम्’ साधना का उत्तरार्द्ध भी एक तथ्य बन गया।

इस तरह गायत्री की उच्चस्तरीय ‘सोऽहम्’ साधना के पूर्व भाग में साँस लेते समय ‘सो’ ध्वनि के साथ जीवन सत्ता पर उस “परब्रह्म” परमात्मा का शासन -आधिपत्य स्थापित होने की स्वीकृति है उत्तरार्द्ध में ‘हम’ को-अहंता को विसर्जित करने का भाव है। श्वास निकली साथ-साथ अहम् भाव का भी निष्कासन हुआ। अहंता ही लोभ और मोह की जननी है। शरीराध्यास में जीव उसी की प्रबलता के कारण डूबता हैं इसे विसर्जित कर देने पर ही भगवान का अन्तःक्षेत्र में प्रवेश करना-निवास करना संभव होता है। आत्म-समर्पण की इस स्थिति को प्राप्त होते ही मनुष्य में देवत्व का उदय होता है और तब ईश्वरीय अनुभूतियाँ चिन्तन में उत्कृष्टता और व्यवहार में आदर्शवादिता भर देती है। इसे महान परिवर्तन की आन्तरिक कायाकल्प की संज्ञा दी जा सकती है। ‘सोऽहम्’ साधना का यही है भावनात्मक एवं व्यवहारिक स्वरूप। ईश्वर साक्षात्कार की यह सबसे सरल, सहज एवं सर्वोपयोगी साधना है जिसे अपना कर हर कोई लाभान्वित हो सकता है।


अणु-अणु में समायी है, उस बाजीगर की सत्ता

दृश्यमान शरीर की स्थूल संरचना तो अन्य प्राणियों जैसी ही है; पर उसके अन्तराल में प्रवेश करने पर पता चलता है कि पग-पग पर उसमें विलक्षणताएँ भरी पड़ी है। इनके स्वरूप और उपयोग को जाना जा सके, तो तिलिस्म के वे पर्दे उठ सकते हैं, जिनके भीतर रहस्यमय सिद्धियों के अनन्त भाण्डागार भरे पड़े हैं। काय-कलेवर में स्थूल क्षमताओं का आधार अत्यन्त छोटी इकाई है-’जीन्स’। यह आँख से दृष्टिगोचर न होने वाली कोशाणुओं के अन्दर पाये जाने वाली सूक्ष्मतम इकाई है। इतने पर भी उनकी क्षमता देख कर आश्चर्यचकित रह जाना पड़ता है और सोचना पड़ता है कि जब उसके स्थूल अंश में इतनी बढ़ी-चढ़ी सामर्थ्य है, तो उसकी सूक्ष्म सत्ता को जाग्रत कर लेने पर व्यक्ति कितना विभूतिवान बन सकता है-यह कल्पना से परे है। इसे आज की विडम्बना ही कहनी चाहिए कि हम न तो उसकी अद्भुत सामर्थ्य को समझ पा रहे हैं, न स्वीकार कर पा रहे है। फिर उसके जागरण और सुनियोजन की बात ही कैसे बने।

काया का स्थूल भाग अन्नमय कोश छोटी-छोटी कोशिकाओं से बना है, जिसके अन्दर के द्रव में एक नाभिक होता है। इस नाभिक में अनेक धागों के समान संरचनाएँ होती है, जिन्हें गुणसूत्र कहते है। इनमें कुछ छोटी-छोटी सूक्ष्म गांठें उभरी रहती है। यही ‘जीन्स’ कहलाती है। यह जीन्स क्या है? कैसे यह अपनी आश्चर्यजनक भूमिका पूरी करते है? इस रहस्य पर से विज्ञान अभी पर्दा पूरी तरह उठा नहीं सका है। उनके संबंध में तेजी से शोध कार्य चल रहे है। बहुत से रहस्य खुले भी हैं, पर वह नहीं के बराबर है।

जीन्स की सूक्ष्म-संरचना के बारे में अभी तक पूरी तरह नहीं जाना जा सका है, किन्तु यह जानकारियाँ निश्चित रूप से हो गयी है कि शरीर के अंग-प्रत्यंग की विशिष्ट रचना से लेकर अनेक परम्परागत स्वभावों, रोगों, गुणों एवं क्रिया-कलापों को कैसे नियंत्रित किया जाय? यह पता विज्ञान अभी नहीं लगा सका है; किन्तु यह माना जाने लगा है कि यदि ‘जीन्स’ के गुणों एवं कार्य-प्रणाली को प्रभावित किया जा सके, तो आश्चर्यजनक उपलब्धियां प्राप्त हो सकती है। यह अन्नमय कोश के छोटे-से घटक एक कोशिका के नाभिक में रहने वाले नगण्य आकार वाले कण मनुष्य के आस-पास के वातावरण से लेकर उसके विचारों और भावनात्मक विशेषताओं के संस्कार ग्रहण करने में समर्थ है।

मनुष्य के विकास के संबंध में भारतीय मान्यता यह रही है कि उस पर आनुवांशिकता के साथ-साथ वाह्य वातावरण का भी प्रभाव पड़ता है। पहले इस मान्यता के प्रति उपेक्षा बरती जाने लगी थी। किंतु अब यह स्पष्ट हो गया है कि अपने वातावरण तथा अपनी चेष्टाओं द्वारा व्यक्ति जिन स्वभाव-गुणों को अर्जित करता है, वे वंशानुक्रम से प्राप्त नहीं होते और न ही कोई व्यक्ति उन अर्जित विशेषताओं को इसके द्वारा अपने बच्चों को प्रदान कर सकता है; पर यह तथ्य आँशिक रूप से ही सत्य है। उदाहरण के लिए यदि एक व्यक्ति ने अनेक भाषाएँ सीखी है, तो वह उस भाषा-ज्ञान की प्रचलित विधियों को ही अपनाना होगा तथा मेहनत करनी पड़ेगी; पर मिथ्या यह भी नहीं है कि अपने व्यवहार और आचरण को साध और शोध लेने से जो प्रखरता पैदा होती है, उसे अन्तस् की उस इकाई तक पहुँचाया जा सकता है, जो वंशानुक्रम का प्रमुख आणारित हैं भारतीय मनीषी इन सूक्ष्मताओं से परिचित थे, तभी वे सुसन्तति के लिए माता-पिता का चरित्रगत, तपस्वी, संयमी होना अनिवार्य बतलाते थे। इन्द्रिय लिप्साओं जैसी कुचेष्टाओं में संलिप्त रह कर सुसंतति की आकाँक्षा करते रहना आकाश कुसुम खिलाने के समान है। अन्नमय कोश की इन सूक्ष्मताओं से परिचित होकर अपना जीवनक्रम उस प्रकार व्यवस्थित कर व्यक्ति न केवल सुयोग्य संतति के जनक-जननी बनने की क्षमता से विभूषित होता है, अपितु उन अनेक विशिष्ट विभूतियों से सम्पन्न बनाता है, जिनसे मनुष्य शरीर की सार्थकता और गरिमा है। अन्नमय कोश की साधना स्वयं की इन क्षमताओं के विकास का ही दूसरा नाम है।

इसीलिए आनुवांशिकता और वातावरण दोनों को सामान महत्व दिया जाता हैं आनुवांशिकता द्वारा अर्जित गुण दूसरे तरीके से कदाचित ही प्राप्त होते हैं, पर इस बात से भी सर्वथा इन्कार नहीं किया जा सकता कि कुछ जन्मजात गुणों का आधार ही इसे माना जाता है। ये जन्मजात गुण वंशानुगत के लक्षण कहे जाते है। यह लक्षण गुणसूत्रों के आधार पर प्राप्त होते है। गुणसूत्र ही व्यक्ति की विशिष्टताओं का निर्माण करते है।

‘जीन्स’ का व्यवहार या आचरण से सीधा संबंध नहीं होता। जीन्स शरीर के ऊतक तथा अंगों के विकास को निर्देशित-नियंत्रित करते है। शरीर की ये क्रियाएँ स्पष्टतः व्यवहार को भी प्रभावित करती हैं और उस रूप में जीन्स का संबंध व्यवहार से भी होता है। उदाहरण के लिए यदि कोई व्यक्ति वंशानुक्रम से छोटा कद और बहरे कान प्राप्त करता है, तो निश्चय ही कुछ क्षेत्रों में उसकी योग्यता सीमित हो जायेगी। इसी प्रकार शारीरिक क्रियाओं में भाग लेने वाले हजारों रासायनिक तत्व भी जीन्स द्वारा ही निर्धारित होते है। इन तत्वों की उपस्थिति के आधार पर सशक्तता या दुर्बलता का संबंध जीन्स से ही होता है। ऐसे अनेक लक्षण वंश परम्परा से संबंधित होते है।

वंशानुक्रम के आधारभूत घटकों, जीन्स और क्रोमोजोम्स के अध्ययनों के निष्कर्ष इस तथ्य के द्योतक है कि अन्नमय कोश में निर्माण का सूक्ष्म आधार कितना व्यापक और जटिल होता है। पौष्टिक भोजन के रस-परिपाक का कारण व आधार बनती है। बढ़िया खाने-पहनने की चिन्ता करते रहने को ही जीवन का पुरुषार्थ मान बैठने वाले अन्नमय कोश के निर्माण के आधारों से अनभिज्ञ रह कर उसे अस्त−व्यस्त और दूषित, विकृत बनाते रहते है और भावी संततियों को भी उस विकृति का अभिशाप दे जाते है।

मूर्धन्य जन्तु विज्ञानी एवं दार्शनिक एस.वाल्टर स्मिथ ने इसी भारतीय विचारधारा का समर्थन करते हुए अपनी पुस्तक “हेरेडिटरी जर्नी” में लिखा है कि बुरा चिंतन और बुरा आचरण करने वाला समाज न सिर्फ अपनी जैसी ओछी संतानें पैदा करता है, वरन् व्यक्ति में विद्यमान उन विभूतियों को भी अंकुरित होने से कुचल कर रख देता है, जो संभावित महानता के रूप में व्यक्ति में पहले से ही विद्यमान थीं।

उल्लेखनीय है कि हर व्यक्ति में गुण-अवगुण समान रूप से विद्यमान होते है। यदि कोई सद्गुणी है, तो इसका कारण मात्र इतना है कि उसने अपनी उस विभूति को प्रयासपूर्वक उभार लिया है और दोष को दवा दिया, जिसके कारण वह लौकिक दृष्टि से सदाचारी प्रतीत होता है। इसी आशय का मन्तव्य प्रकट करते हुए डॉ. गोपीनाथ कविराज अपनी पुस्तक “भारतीय संस्कृति और साधना”, (खण्ड-2) के “सूर्य विज्ञान रहस्य “ अध्याय में लिखते है कि सूर्य विज्ञान के माध्यम से गुलाब के फूल को गुड़हल में अथवा जवा पुष्प को कमल में बदल देना प्रकट रूप से रूपांतरण जैसा लग सकता है; पर सच्चाई यह है कि गुलाब का गुड़हल कभी नहीं बनता, वरन् उसमें जो गुड़हल का प्रच्छन्न अंश है, वह सक्रिय हो जाता है और आकाश में अपने सजातीय अणुओं को खींच कर अपनी अभिव्यक्ति करता है। इसका यह मतलब कदापि नहीं कि गुड़हल से गुलाब की सत्ता बिल्कुल ही समाप्त हो गई, अपितु यथार्थता यह है कि वह अप्रकट रूप में अब भी उसमें मौजूद है। सूर्य विज्ञान द्वारा सिर्फ इतना किया जाता है कि जो प्रकट है, उसे अप्रकट बना दे और जो अप्रकट-अगोचर है, उसे गोचर कर दे।

प्रस्तुत विलुपित और अभिव्यक्ति के जिस सिद्धान्त से साधना विज्ञान प्राचीन काल से ही परिचित था, अब उसे “जेनेटिक्स” भी स्वीकारने लगा है। उसका “लाँ ऑफ डोमिनेन्स” इसी की स्वीकारोक्ति है। इसमें इसी बात को तथ्य रूप में अंगीकार किया गया है कि जन्तु अथवा व्यक्ति में शारीरिक या व्यावहारिक रूप में जो लक्षण दिखाई पड़ते है, सच्चाई मात्र इतनी ही नहीं होती, अपितु इसके विपरीत गुण भी उसमें अगोचर रूप में सदा बने रहते हैं-यह कथन भी उतना ही सत्य है, जितना दिन-रात का होना।

इस प्रकार इतना ज्ञात हो जाने के उपरान्त कि देव-दानव स्तर के लक्षण सदा साथ-साथ रहते है, मनुष्य का प्रयास मात्र उस पुरुषार्थ को कर गुजरना भर होता है, जो उसके अन्दर अघटित को घटित कर दे और उसे महानता की भूमिका तक पहुँचा दे। अन्नमय कोश में सन्निहित अति सूक्ष्म व उपेक्षणीय स्तर के घटक जीन्स उन्हीं लक्षणों को सँजोने वाले प्रतीक प्रतिनीतिध है। यदि व्यक्तित्व में पाये जाने वाले ये लक्षण हेय स्तर के है, तो यह तो इसका एक पक्ष हुआ। इसका दूसरा उत्कृष्ट और महान पहलू भी एक है, इसे सदा स्मरण रखना चाहिए और प्रयत्न एवं पराक्रम सदा उसी दिशा में गतिशील रखना चाहिए, ताकि सुषुप्ति को जाग्रति में परिवर्तित कर कुछ महत् और महत्वपूर्ण हस्तगत किया एवं स्वयं को अविस्मरणीय अभूतपूर्व जैसा बनाया जा सकें।


सही साधनों का अनुसंधान

“आपकी साधना, आपका तत्व ज्ञान, आपका ब्रह्मवर्चस् विश्व के कल्याण के लिए है भगवान! पर यह काँ सम्भव है कि आप सुदूर प्रान्तों का निरंतर परिव्राजक करते रहे और लोगों की ज्ञान-पिपासा को तृप्त करें। गुरुकुल की स्थापना करनी ही होगी देव! उसके बिना भावी पीढ़ी का आध्यात्मिक प्रशिक्षण किस प्रकार बन पड़ेगा? आप ही तो कहते है, कि धर्म तत्व का प्रशिक्षण और प्रसार किए बिना लोक जीवन का चारित्रिक, बौद्धिक, सामाजिक और आत्मिक विकास नहीं हो पाता।”

“सो तो यथार्थ है तात! “ महर्षि कणाद ने शिष्य धौम्यपाद के कथन का समाधान करते हुए कहा-”वत्स! जिस राष्ट्र के नागरिकों को शिक्षा के साथ दीक्षा नहीं मिलती वहाँ लोगों की बौद्धिक, आध्यात्मिक, धार्मिक, सामाजिक व्यवस्था सम्बन्धी क्षमताएँ कुण्ठित हो जाती है। इसलिए विद्यालय का निर्माण आवश्यक ही नहीं अनिवार्य हैं पर गुरुकुल चलते है जिन पर, ऐसे साधन कहाँ से उपलब्ध होंगे?”

“आप उनकी चिंता न करें देव! मुझे आदेश दें, साधनों का अनुसंधान मैं करूंगा। आवश्यकता हुई तो इस पुनीत उद्देश्य के लिए भीख भी मांगूंगा। वन के पक्षी अपना आहार जुटा लेते है। वणिक नौकाओं में धान्य लादकर समुद्र की विस्तृत सीमाएँ लाँघ जाते है और द्रव्यार्जन कर लाते है। बादल बरसने की इच्छा करते है तो उन्हें समुद्र से जल मिल जाता है। देव नदी गंगा ने जब लोक-कल्याण के लिए अपनी धर्म यात्रा आरम्भ की तब उन्हें भी ऐसी ही चिन्ता हुई थी, पर क्या हिमालय का अंचल इतना संकीर्ण था कि वह गंगा माता को वर्ष भर निरन्तर प्रवाहित होने के लिए जल न दे पाता? भगवान! मुझे विश्वास है सदुद्देश्यों के लिए साधनों का कभी अभाव नहीं होता।” धौम्य एक बार फिर अपना विनम्र निवेदन दुहराया।

“तुम्हारा संकल्प पूर्ण हो वत्स! जाओ मेरा आशीर्वाद तुम्हारे साथ है। तुम गुरुकुल की स्थापना के लिए साधनों की खोज करो।” महर्षि कणाद ने मुस्कराते हुए उत्तर दिया। ऐसा लगता था उनकी मुस्कुराहट में कुछ गहरा रहस्य छुपा है।

धौम्य चल पड़े। सम्पूर्ण राष्ट्र के नाम एक परिपत्र वितरित कर उन्होंने प्रजा से सहयोग की याचना की। उस समय महर्षि कणाद की तपश्चर्या का प्रभाव शरद पूर्णिमा के चन्द्रमा की भाँति दिव्य और निष्कलंक चमक रहा था। परिपत्र को पढ़कर जन-जीवन में उल्लास आ गया। तपस्वी, वैज्ञानिक, महर्षि की संवा में धन-वैभव का कुछ अंश लग सके यह प्रत्येक के लिए सौभाग्य की बात थी। जिसके पास जो कुछ था-खुशी-खुशी देने लगे। देखते-देखते धन-धान्य, रत्न, सोने, चाँदी वस्त्राभूषणों के ढेर लग गए। किसी ने भवन निर्माण का उत्तरदायित्व ले लिया, किसी ने छात्रों की भोजन व्यवस्था का। एक वर्ष के भीतर ही साधनों का अम्बार लग गया। धौम्यपाद सगर्व गुरुदेव के पास पहुँचे और उन्हें प्राप्त किए साधनों की तालिका भेंट की।

तालिका के अंकित अक्षरों को पढ़ते गए ऋषि कणाद, उतनी ही उनकी मुख मुद्रा गम्भीर होती गई।

भाग्य के संबंध में सुनिश्चित बात एक ही है, कि वह मनुष्य के प्रयासों के अनुरूप बदलता रहता है।

उन्होंने कहा-”तुम्हारा उत्साह सार्थक हो धौम्य, गुरुकुल की स्थापना का काम प्रारम्भ कर दी। विद्यार्थियों के प्रवेश का प्रबन्ध अविलम्ब अविलम्ब किया जाय। पर इससे पहले यह एकत्रित धन-सामग्री जहाँ से आयी है, यथावत उसे अविलम्ब वापस कर दिया जाय। जिन साधनों की आवश्यकता थी वे अभी तक नहीं मिले, अभी उनकी खोज करनी होगी।” महर्षि का प्रतिवाद करने की हिम्मत धौम्य में थी ही कहाँ? उन्होंने आज्ञा का अक्षरशः पालन किया। जहाँ से धन आया था, वापस लौटा दिया गया।

ऋषि कणाद ने उसी दिन मौन व्रत ले लिया। वाणी के प्रसुप्त होते ही स्वप्न जाल की भाँति उनकी क्रिया-शीलता जाग पड़ी। महर्षि प्रतिदिन सूर्योदय होते ही जंगल में प्रवेश कर जाते और दिन भर लकड़ियाँ काटते रहते। एक महीने में इतना लकड़ियाँ इकट्ठी हो गई जिनसे छात्रों के आवास का प्रबन्ध किया जा सके। अगले महीने घास और फूस की उतनी ही मात्रा काटी कणाद ने, जिससे पर्णकुटीरों में छाया का यथेष्ट प्रबन्ध हो जाता। अगले मास महर्षि ने सघन वृक्षारोपण का कार्य प्रारम्भ किया। कुछ ही समय में पौधे बढ़ते दिखाई देने लगे। चारों ओर हरियाली छा गई। इसी बीच उन्होंने पर्णकुटीर तैयार किये। निजी आश्रम, शिक्षकों के निवास, छात्रावास और पाठन कक्ष के निर्माण में ऋषि ने अपने स्वेद कणों की एक-एक बूँद उत्सर्ग कर दी। तब कहीं जाकर गुरुकुल की स्थापत्य आवश्यकताएँ पूरी हो पायी।

इस बीच भी उन्होंने अपनी आवश्यकता खेतों से बीने हुए दानों से ही पूर्ण की। महर्षि के इस कठोर श्रम को देखकर देश का जन-जन रोमाँचित हो उठा। हरेक की श्रद्धा महर्षि का चरण चूमने के लिए मचल उठी। लोगों ने अपने बालकों को भेजना आरम्भ कर दिया और इस प्रकार गुरुकुल की स्थापना हो गई। उसका प्रथम सत्र शुरू हो गया।

विद्यार्थियों की संख्या पर्याप्त हो गई। सामान्य किसानों के बच्चों से लेकर महात्माओं और महाराजाओं तक के बच्चों ने प्रवेश लिया। जन-जन को विश्वास था महर्षि कणाद की तपश्चर्या और ब्रह्मनिष्ठा पर। इसलिए जिसके भी लड़के विद्यालय में प्रविष्ट हुए, उन्होंने अपना अहोभाग्य समझा। किन्तु महर्षि की अब तक कोई भी सहायक उपलब्ध नहीं हुआ था। धौम्यपाद उनके आश्रम की देख-रेख करते थे। पर छात्रों के विद्याध्ययन से लेकर उनकी सामान्य देख-रेख तक का सारा कार्य महर्षि को स्वयं ही देखना पड़ता था। प्रथम सत्र के समापन का समय समीप आ चुका था। अब तक उन्होंने एक दिन भी विश्राम नहीं किया था। आश्रम के अतिरिक्त वे समीपवर्ती गाँव भी न जा पाए थे। उनकी श्रम-शीलता, लगन और अध्यवसाय के साथ महान तप और त्याग वृत्ति की चर्चा सारे विश्व छा गई। वृद्ध होने पर भी अभी उनके शरीर में किसी प्रकार की थकावट के लक्षण परिलक्षित नहीं हो रहे थे।

वर्षा का आगमन निकट देखकर एक दिन उन्होंने विचार किया कि बरसात में जंगल का संपूर्ण काष्ठ गीला हो जाएगा। इसलिए समिधाओं के लिए सूखा ईंधन इकट्ठा कर लेना चाहिए। कुल्हाड़ी विराजमान थी और वे आहृद के साथ आगे बढ़ते हुए जा रहे थे। मौन शिष्य मंडल पीछे-पीछे चल रहा था। बादलों ने छाया कर दी थी। सूर्यदेव ने अपना हल्का कर लिया था, इसलिए मौसम और भी सुहावना हो रहा था। ऋषि ने शिष्यों के साथ सायंकाल तक लकड़ियाँ काटी। उनकी गौरवर्ण वृद्ध देह से झर रहे स्वेद बिंदु ऐसे दीख रहे थे जैसे हिम- शिखर से गंगा का फैलाव मन्दगति से उतर रही हो। उनकी मुखाकृति और भी उद्दीप्त हो उठी थी। एक-एक विद्यार्थी की वही स्थिति थी। अपने-अपने गट्ठर लिए सभी छात्रों ने जब आश्रम में प्रवेश किया तब ऐसा लग रहा था जैसे श्रम, संयम, स्वावलंबन और अध्यवसाय ने अनेकों भव्य रूप ले रखे हो धीरे-धीरे आश्रम की प्राचीरों में समाते चले जा रहे हो।

ईंधन समिधाएँ, सुरक्षित स्थानों पर पहुँचा कर जब सब विद्यार्थी संध्या वंदन के लिए बैठे, तब भी महर्षि देख रहे थे कि इन सब के भोजन की व्यवस्था हो गई है या नहीं? किसी पर्णकुटीर में छेद तो नहीं हो गए, कल के लिए समुचित खाद्यान्न जुटाया जा चुका है या नहीं?

बालक अपने-अपने कक्ष में पहुँच चुके थे। दीप-वृन्द जल उठे थे। शान्त वातावरण में स्वाध्याय करते छात्र ऐसे भले लग रहे थे-जैसे नक्षत्रों से फूटती दिव्य किरणों ने मूर्त स्वरूप धारण कर लिया हो और तब महर्षि कणाद ने स्नान कर साधना कक्ष में प्रवेश किया। किन्तु आज उनका शरीर इतना थक चुका था कि साधना प्रकोष्ठ की तीन सीढ़ियाँ उनसे चढ़ी न जा सकी। अन्तिम पैर बढ़ाते ही वह लड़खड़ा गए। उनकी कृश देह माँ गायत्री की प्रतिमा के सम्मुख जा गिरी। ऋषि अचेत हो गए।

धौम्य भागते हुए आये। जल के छींटे देकर उन्होंने गुरुदेव को सँभाला। अचेतना दूर हुई। ऋषि ने आंखें खोली। पूछा-”धौम्य! विद्यालय के लिए किन्हीं साधनों का अभाव का हो तो खोजना उसे पूरा करना। अब यह शरीर बहुत थक गया है।” उनकी चरण रज मस्तक पर लगाते हुए धौम्य ने उत्तर दिया- “गुरुदेव! आपने जिन साधनों की आवश्यकता अनुभव की मैंने उन्हें देर से समझा। पर यह समझ अब कभी धूमिल न पड़ेगी।” सुनकर महर्षि की आँखें ज्योतित हो उठीं, मुख मंडल पर सौम्य विश्वास की आभा फैल गई। उनके प्राण-प्राणों की अधिष्ठात्री-गायत्री में विलीन होने लगे।


Quotation

जिसने दुख नहीं सहा वह सुख का मिठास क्या जानें। जो रोया नहीं उससे हँसना भी न आएगा। जिसने हार-जीत नहीं देखी उसे पुरुषार्थ का महत्व कैसे मालूम होगा। जिसे संदेह करना नहीं आता वह सही चिन्तन भी न कर सकेगा।


भवितव्यता टल नहीं सकेगी

अभी पिछले दिनों मूर्धन्य मनीषी जॉन हाँग की एक पुस्तक प्रकाशित हुई है-”दि कमिंग मिलेनियम”। यों तो यह पुस्तक पूर्णतः नोस्ट्राडोमस की भविष्यवाणी पर आधारित है, इस दृष्टि से इसमें नयापन कुछ नहीं है; पर इसे पढ़ने के उपरान्त काफी कुछ नवीनता दृष्टिगोचर होती है। तब विदित होता है कि लेखक ने इसकी वर्तमान संदर्भ में नये ढंग से नूतन व्याख्या प्रस्तुत की है। आने वाले समय एवं उसमें भारत की भूमिका की दृष्टि से यह पुस्तक विशेष उल्लेखनीय है।

वे लिखते हैं कि इस सदी का अन्तिम एवं आगामी सदी का दशक सम्पूर्ण विश्व के लिए संकटों एवं चुनौतियों से भरे होंगे। भारत के लिए यह अवधि अत्यन्त कष्टदायक प्रसव-वेदना जैसी साबित होगी, जिसमें उसे आन्तरिक क्लेशों एवं बाह्य दुरभिसंधियों की दोहरी मार झेलनी पड़नी; पर इसी बीच एक ऐसी नवीन चेतना का प्रादुर्भाव वहाँ से होगा जिससे उसके समस्त भीतरी कलह देखते-देखते समाप्त हो जायेंगे। इतना ही नहीं, उस नवजात चेतना का विस्तार अबोध शिशु से बालक-बालक से वयस्क और वयस्क से प्रौढ़ की तरह होता चलेगा और अन्ततः वह एक जनक्रान्ति का रूप लेकर सम्पूर्ण संसार में विस्तीर्ण हो जायेगा। इसके बाद भारत पूरे विश्व का मार्गदर्शक बन जायेगा एवं हर प्रकार से हर क्षेत्र में वह उसका मार्गदर्शन करेगा। फिर विश्व भौतिकवादी न रह कर अध्यात्मवादी बन जायेगा। वे लिखते हैं कि इसका यह तात्पर्य नहीं कि भौतिकवाद का समूल नाष हो जायेगा। इसका अस्तित्व तब भी बना रहेगा; किन्तु दृष्टिकोण अध्यात्मवादी बन जाने के कारण लोग उसका वही पहलू स्वीकारेंगे, जो कल्याणकारी हो। जिससे अशांति, वर्ग-विग्रह और असंतोष पनपता हो, अकर्मण्यता और आलस्य उपजता हो, उसका जनजीवन में दूर-दूर तक कोई स्थान न होगा। सब सक्रिय रह कर शान्तिपूर्ण जीवन व्यतीत करेंगे।

वे कहते हैं कि श्रेष्ठता की दृष्टि से आने वाला समय हर प्रकार से अभूतपूर्व होगा, इतना अभूतपूर्व और उत्कृष्ट, जिसे “न भूतो न भविष्यति” जैसा कुछ कहा जा सके। उन्होंने इसका नाम “दि एज ऑफ विज्डम” दिया है। उनका कहना है कि नोस्ट्राडेमस की भविष्यवाणी की निम्नस्तरीय व्याख्या ने ही उस सत्य को अब तक छिपाये रखा है, जो अपने अन्दर अनेकानेक तथ्यों को सँजोये हुए है, एवं जिसके अस्तित्व में आने का ठीक यही समय है।

“दि एज ऑफ विज्डम” की व्याख्या करते हुए वे लिखते हैं कि तब तक लोग सामान्य स्तर की बुद्धि से काम न लेकर विवेक एवं प्रज्ञा जैसी उच्च भूमिका सम्पन्न बुद्धि का प्रयोग करते पाये जायेंगे; क्योंकि उस समय इस स्तर की बुद्धि सर्वसुलभ हो जायेगी, अतः जो भी निर्णय-निर्धारण किया जायेगा, वह इस उच्चस्तरीय बुद्धि के कारण इतना सटीक और सारगर्भित होगा कि सभी उसे मानने के लिए बाध्य होंगे, कारण कि इसका दूसरा श्रेष्ठ विकल्प कोई होगा ही नहीं। इस प्रकार किसी भी समस्या का एक ऐसा सर्व-सम्मत समाधान निकाला जायेगा, जो सर्वमान्य होगा। इससे आज जैसी विवाद-विग्रह की स्थिति से बचा जा सकेगा और सभी परस्पर भ्रातृ-भावना से हिल-मिल कर रहेंगे। तब आज जितने न मत-मतान्तर दिखाई पड़ेंगे, न पथ-पन्थ। व्यावहारिक जीवन में अध्यात्म ही एकमात्र धर्म के रूप में जीवित रह जायेगा। जातिवाद को नये परिवेश में नये ढंग से परिभाषित किया जायेगा। यह एक ऐसी अभिनव व्याख्या होगी, जिसमें आज की अगणित जातियों का कोई महत्व या स्थान न रह जायेगा। सम्पूर्ण जातियाँ एक महासागर में समा जायेंगी और फिर उससे एक एवं एकमात्र जाति-मनुष्य जाति का उदय होगा, जो लम्बे काल तक अपने उस स्वरूप को अक्षुण्ण बनाये रखेंगी।

पदार्थ विज्ञान के अस्तित्व के बारे में वे लिखते हैं कि यह अपनी सत्ता बचा ले जायेगा; पर बुद्धि में विवेकशीलता के विकास के कारण उसका वह विनाशकारी स्वरूप न रह जायेगा, जो इन दिनों हम देख रहे हैं। इसका श्रेष्ठतम पक्ष ही आने वाले समय में पूजित होगा और वह ऐसे अनुसंधानों में निरत देखा जायेगा, जो समय, समाज व सम्पूर्ण मानव जाति को एक ऐसे चरम-बिन्दु पर पहुँचा दे, जिसके आगे पदार्थपरक और उन्नति कदाचित् शेष ही न रह जाय; किन्तु यह सब कुछ होगा कल्याणकारी ही। जिससे समाज का अमंगल और अनिष्ट होता हो, वैसे सरंजाम जुटाने बंद कर देगा। मानवी बुद्धिवाद का एक पहलू हुआ। वे लिखते हैं कि हर पहलू का एक दूसरा उत्कृष्ट और उदात्त पक्ष भी होता है। अगले दिनों विज्ञान इसी रूप में प्रतिष्ठित होगा। उदाहरण के माध्यम से समझाते हुए वे कहते हैं कि संगीत इन दिनों व्यक्ति को अधोगामी बनाने में संलग्न है-यह इसका एक आयाम है, पर इसका दूसरा आयाम इतना सशक्त व शक्तिशाली है, जो व्यक्ति को उत्कृष्ट की ऊँचाइयों पर पहुँचा दे। भविष्य में विज्ञान का यही आयाम अस्तित्व में रहेगा। दूसरा विनाशकारी पक्ष तूफान में फँसे तिनके की तरह नष्ट-भ्रष्ट हो जायेगा।

“दि एज ऑफ विज्डम” की अवधि के संबंध में लेखक लिखते हैं कि नोस्ट्राडेमस के अनुसार यह समय हजार वर्ष से भी ज्यादा होगा, जिसमें पृथ्वी पर वातावरण स्वर्गयुगी बना रहेगा। यह अवधि पीछे के सभी स्वर्णयुगों से लम्बी होगी और श्रेष्ठ इतनी, कि जिसे आने वाली पीढ़ियों चिरकाल तक याद करती रहें। नोस्ट्राडेमस की भविष्यवाणियों का गहन अध्ययन करने के पश्चात् ग्रन्थकार लिखते हैं कि संभवत; यह स्वर्णयुग मानवी इतिहास का अन्तिम स्वर्णयुग होगा। इसके उपरान्त शायद इसकी पुनरावृत्ति संभव नहीं और यदि हुई भी तो सभ्यता के नये सिरे से शुरुआत के बाद ही शक्य हो सकेगी। उनका कहना है कि उत्थान-पतन विकासक्रम की एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है; पर इस बार का उत्थान सम्पूर्ण मानव जाति को एक ऐसी उच्च भूमिका में पहुँचा देगा कि एक-एक व्यक्ति पूर्णत्व का अनुभव कर सकेगा।

नोस्ट्राडेमस-भविष्यवाणी के विभिन्न व्याख्याकारों को पढ़ने के बाद उन्होंने निष्कर्ष निकाला है, कि इसमें स्थान-स्थान पर कई व्याख्याकारों ने बड़े बेतुके अर्थ निकाले है। इनमें से कुछ ने सामयिक स्वार्थ-सिद्धि और अपनी श्रेष्ठता प्रदर्शित करने के लिए जानबूझकर ऐसा करवाया, जबकि कइयों से इस प्रकार की गलती साँकेतिक गूढ़ अर्थ को भली-भाँति न समझ पाने के कारण हुई। उनके अनुसार इस तरह की गलत व्याख्या की शुरुआत तब हुई, जब द्वितीय विश्वयुद्ध ज्योतिषियों से नोस्ट्राडेमस-भविष्यवाणी की व्याख्या अपने पक्ष में करवा ली। बस, तभी से उस भविष्यवाणी का स्वार्थपूर्ण प्रयोग आरंभ हुआ और तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर प्रस्तुत किया जाने लगा। वे बड़े खेदपूर्ण स्वर में कहते हैं कि यह उस द्रष्टा पुरुष के साथ भारी अन्याय है।

भविष्यवाणी चाहे कुछ भी हो, भवितव्यता को घटित होने से कोई रोक नहीं सकता। लगभग इसी प्रकार के उद्गार जॉन हाँग ने पुस्तक के अन्त में प्रकट करते हुए कहा है कि इससे कुछ बनने-बिगड़ने वाला है नहीं कि कोई किसी के कथन को विकृत रूप में प्रस्तुत करे या सही रूप में। इससे जो नुकसान होगा, वह मात्र इतना ही है कि जिस सत्य को किसी मनीषी ने हजारों वर्ष पूर्व उद्घाटित कर दिया था, बनावटी मुलम्मा चढ़ा देने के कारण लोग उससे अनभिज्ञ बने रहेंगे; पर इतने मात्र से उस सत्य को साकार रूप में अवतरित होने से रोका तो नहीं जा सकता। जो विधान बन चुका, उसे तो घटित होना ही है, फिर चाहे लोग उसे सही-गलत रूप में प्रस्तुत करें, विश्वास करें या न करं-इससे उसकी सुनिश्चितता में कमी तो आ नहीं सकती और न ऐसा ही हो सकता है कि वह अटल सत्य टाल जाय। आने वाला समय ऐसा ही उज्ज्वल है-हमें इसका दृढ़ विश्वास रखना चाहिए।


मुक्ति का मार्ग सरल (kahani)

इंजीनियर अमृतलाल ठक्कर की नियुक्ति बम्बई कारपोरेशन में उच्च पद पर हुई थी। उस बीच उन्हें मेहतरों के मुहल्लों में काम कराना पड़ा। उनको दयनीय स्थिति देखकर उनने विचारा कि ऊँचे वेतन के लिए नौकरी करने के स्थान पर यह अच्छा है कि इन पिछड़े लोगों की सेवा में जीवन समर्पित किया जाय।

बापा ने नौकरी छोड़ दी। गान्धी जी के साथ हो लिए और जीवन भर हरिजनों, आदिवासियों तथा

पिछड़े लोगों की सेवा में लगे रहे।

शिक्षा पूरी हुई, तो शिष्यों ने गुरु से कहा कि कृपया मुक्ति का मार्ग भी बता दें। गुरु ने कहा’-परिसर में जो देवी की मूर्ति है, उसे जी भर कर गालियाँ देकर आओ।” शिष्यों ने अक्षरशः उसका पालन किया और लौट कर गुरु के पास आये। गुरु ने पुनः आदेश दिया कि अब तुम लोग उस प्रतिमा पर फूल चढ़ा आओ। शिष्यों ने वैसा ही किया। अब गुरु ने उन्हें संबोधित किया-दोनों ही अवसरों पर मूर्ति की क्या प्रतिक्रिया थी? उन्होंने एक स्वर से कहा-कुछ नहीं। गुरु ने कहा-बस, मुक्ति का यही मार्ग है। भले-बुरे प्रसंगों में जब तुम लोग भी सहिष्णुता का अभ्यास कर लोगे, तो मुक्ति का मार्ग सरल हो जायेगा।

शिष्यों का समाधान हो चुका था। गुरु के उत्तर से वे संतुष्ट थे।


क्यों बढ़ता है अन्तर्राष्ट्रीय तनाव, कैसे आएगी शाँति?

अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में बढ़ता हुआ तनाव-अपने समय की सबसे बड़ी महत्वपूर्ण समस्या है। राष्ट्रों के बीच आपसी मतभेद पहले भी रहते थे, संघर्ष भी होते थे। फलस्वरूप जनशक्ति एवं धनशक्ति नष्ट होती रही है। किन्तु अब संकट कई गुना बढ़ गया है। आणविक अस्त्रों की होड़ हो या आर्थिक-राजनीतिक साजिशें-इन सभी ने मनुष्य को विनाश के उस कगार पर खड़ा कर दिया है, जहाँ वह आत्महत्या करने के लिए विवश है। तनावों के कारण क्या हैं? उन्हें कैसे दूर किया जा सकता है? विश्व की शांति और सुरक्षा इस बात पर ही टिकी है।

पाश्चात्य मनीषी बर्ट्रेंड रसेल ने अन्तर्राष्ट्रीय शांति को तहस-नहस करने में अग्रणी-तीन तत्वों को प्रमुख माना है। (1) हठोन्माद (2) राष्ट्रीय साम्प्रदायिकता (3) शिक्षा का विकृत लक्ष्य। उनका कहना था कि इन तीन के रहते विश्व में शांति स्थापना का लक्ष्य मात्र कल्पना बनकर रह जाएगा।

व्यक्तियों के समान राष्ट्रों की भी अपनी मान्यताएँ हैं। उनमें भले-बुरे दोनों तत्वों का समावेश है। अपना राष्ट्र, अपनी भाषा, अपनी संस्कृति, रीति-रिवाज, प्रथा-परम्पराएँ सबको प्रिय होती हैं। एक सीमा तक यह आवश्यक है और उपयोगी भी। पर अपना वर्चस्व सिद्ध करने के लिए अपनी मान्यताओं को थोपने दूसरे की उपेक्षा करने से ही विग्रह खड़े होते हैं। हर देश की साँस्कृतिक, भौगोलिक एवं सामाजिक परिस्थितियाँ अलग हैं। कोई भी एक शासन प्रणाली एवं संस्कृति ऐसी नहीं हो सकती जो सभी राष्ट्रों के लिए लाभकारी हो। भविष्य में भले ही एक ऐसी स्वस्थ व्यवस्था की संभावना है, जिसके द्वारा एक राष्ट्र, एक संस्कृति, एक शासन व्यवस्था का सपना शायद साकार हो सके, परन्तु वर्तमान में तो ऐसी कोई व्यवस्था नहीं बन सकी है-जिससे ऐसी अपेक्षाएँ की जा सकें।

हठोन्माद कई प्रकार के हैं, वे धार्मिक भी हैं; राजनीतिक भी। साम्प्रदायिक भी और अपनी व्यवस्था प्रणाली के भी। धर्म-मजहब अलग-अलग भौगोलिक एवं सामाजिक परिस्थितियों में पनपे और बढ़े हैं। उनके कर्मकाण्ड, साधना प्रणाली एवं मान्यताओं में भारी अन्तर दिखाई पड़ता है। क्रिश्चियन धर्म की अपनी विशेषता है, मुस्लिम धर्म की अपनी, पारसी, बौद्ध, ताओ, हिन्दू धर्म जिस परिवेश एवं भौगोलिक वातावरण में विकसित हुए हैं, उनकी छाप इन धर्मों में विद्यमान है। प्रवर्तकों ने इस बात का पूरा-पूरा

ध्यान रखा कि उस धर्म में स्थानीय परिस्थितियों के अनुकूल-अनुरूप समाधान विद्यमान हों। आचार संहिता-साधना प्रणाली में भी साँस्कृतिक एवं भौगोलिक परिस्थितियों की छाप रही है। एक धर्म के क्रिया कृत्यों, मान्यताओं में परस्पर भिन्नता होते हुए मूल लक्ष्य एक ही है-व्यक्ति एवं समाज का सर्वांगीण विकास करना।

पूर्वाग्रह अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करने, दूसरों पर थोपने का होता है। इस धार्मिक पूर्वाग्रह ने मनुष्य जाति को जोड़ा कम तोड़ा अधिक है। इसके स्थान पर प्रत्येक धर्म के प्रति उदारवादी सहिष्णुता की भावना रही होती, पारस्परिक स्नेह बढ़ता तो एक दूसरे को आपस की विशेषताओं से लाभान्वित होने को भी अवसर मिलता।

श्री रसेल के अनुसार आर्थिक एवं राजनीतिक प्रणाली के सम्बन्ध में हठोन्माद भी अंतर्राष्ट्रीय तनाव का एक कारण है। समाजवाद, पूँजीवाद, लोकतन्त्र के समर्थक अपने-अपने पूर्वाग्रहों से जकड़े रहते हैं। समाजवादी यह सोचता है कि समस्त विश्व के लिए एक मात्र कल्याणकारी समाजवाद हो सकता है। पूँजीवादी राष्ट्र अपनी व्यवस्था के हिमायती हैं। वे नहीं चाहते कि पूँजीवाद का अंत होने से उनके सुख-साधनों में किसी प्रकार की कमी हो। लोकतंत्र अधिक उपयोगी एवं श्रेष्ठ होते हुए भी अपनी विकृत प्रणाली के कारण उतना लाभकारी नहीं सिद्ध हो रहा है। जिनके हाथ में सत्ता है, वे तन्त्र में अभीष्ट सुधार करने एवं उसका स्वस्थ स्वरूप बनाने की आवश्यकता अब अधिक व्यग्रतापूर्वक अनुभव कर रहे हैं।

प्रणाली कोई सी न तो सर्वथा अच्छी है और न सर्वथा बुरी। यह एक राष्ट्र की सामाजिक, भौगोलिक एवं साँस्कृतिक परिस्थितियों के ऊपर निर्भर करता है कि कौन किसके लिए उपयोगी है। अतएव किसी भी तन्त्र अथवा वाद की सर्वोपरिता सिद्ध करने एवं प्रत्येक राष्ट्र द्वारा अपनाए जाने का पूर्वाग्रह भी साम्प्रदायिक भावना के समान ही घातक है।

अन्तर्राष्ट्रीय शांति में दूसरा अवरोध तत्व है-राष्ट्रीय साम्प्रदायिकता। स्वस्थ राष्ट्रीय भावना-प्रत्येक देश के उत्थान के लिए कुछ सामाजिक मूल्यों एवं नियमों का निर्धारण होना ही चाहिए। किन्तु,, राष्ट्रीयता के साम्प्रदायिक पहलू भी हैं जो विश्व शांति पर आघात करते हैं।

यह वह पक्ष है-जिसमें यह कहा जाता है कि अपने राष्ट्रीय हितों का अनुसरण रखना ही सर्वश्रेष्ठ है-भले ही वह दूसरे राष्ट्रों के चाहे जितने विपरीत हो और इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए कोई भी अमानवीय रास्ता क्यों न अपनाना पड़े? राजनेताओं एवं सत्ताधारियों द्वारा इसके लिए उत्तेजक नारों का भी प्रयोग किया जाता है। अठारहवीं शताब्दी में ब्रिटेनवासियों का नारा था-”उनका जन्म शासन करने के लिए हुआ है।” ब्रिटिश साम्राज्य का विस्तार इस नारे का ही प्रतिफल था। सदियों बाद आज अंग्रेजों का प्रभुत्व न रहने पर भी उनके मन में अपनी श्रेष्ठता का गर्व अभी भी बना हुआ है।

फ्राँसीसियों ने भी अपने देशवासियों को इसी प्रकार उभारा था। उनकी घोषणा थी कि “अशुद्ध रक्त से हमारी क्यारियों की सिंचाई हो” यह अशुद्ध रक्त उनकी दृष्टि में आस्ट्रिया वासियों का था। इसके विपरीत नेलसन ने अपने सैनिकों को आदेश दे रखा था कि फ्राँसीसी शैतान हैं, उनको समाप्त कर देना ही धर्म है। युद्धकाल के बारह वर्षों तक सैनिकों ने फ्राँसीसियों के विरुद्ध आक्रोश बना रहा। जर्मनी में हिटलर ने भी इसी प्रकार का प्रचार किया था। इतिहास बताता है- आत्मकीर्ति एवं अपना प्रभुत्व स्थापित करने के लिए किए जाने वाले साम्प्रदायिक प्रचार से विश्व सुरक्षा के लिए संकट के बादल ही घहराए हैं।

विश्व शांति में तीसरा अवरोधक तत्व रसेल की दृष्टि में है-शिक्षा के विकृत लक्ष्य। प्रत्येक देश में परम्परागत शिक्षा प्रणाली के दो लक्ष्य प्रधान हैं। प्रथम राज्य के विभिन्न कार्यों के लिए योग्य व्यक्ति तैयार करना। दूसरा विभिन्न प्रकार के उत्पादन के लिए व्यक्तियों को कुशल बनाना। इन दो सीमाओं से आगे बढ़ने वालों का अधिक से अधिक लक्ष्य होता है किसी क्षेत्र विशेष में-निपुणता प्राप्त करना विद्वान बनाना। विश्व की सम्पूर्ण शिक्षा प्रणाली इसी के इर्द-गिर्द घूमती है। जीवन, जीवन का स्वरूप एवं प्रयोजन जो गुरुतर प्रश्न है-से सम्बन्धित उत्तरों को खोजने के लिए वर्तमान शिक्षा में कोई स्थान नहीं है। एक मनुष्य का दूसरे से क्या सम्बन्ध है, जैसी महत्वपूर्ण जानकारियाँ, जिन पर समस्त मानवीय समस्याओं का समाधान अवलम्बित है, जैसे प्रतिपादनों की उपेक्षा शिक्षा में हुई है।

ज्ञान के महत्वपूर्ण स्रोत शिक्षा की इस दुर्दशा को देखकर प्रसिद्ध विचारक कींर्केगार्ड ने अपनी व्यथा इन शब्दों में व्यक्त की है-”आदमी थोड़ी-सी मिट्टी हाथ में लेकर सूँघ कर बता देता है कि वह किस प्रदेश की है। मैं जीवन को हाथ में लेता हूँ और सूँघने का प्रयत्न करता हूँ, लेकिन मुझे उसमें कोई गन्ध नहीं आती मैं कहाँ हूँ, कौन हूँ, यहाँ कैसे आया, जिसे दुनिया कहते हैं-वह क्या है, उसके निर्माण का प्रयोजन क्या है, संसार का सूत्रधार कौन है? जैसे महत्वपूर्ण प्रश्न जीवन पर्यन्त अछूते बने रहते हैं।”

लार्ड स्नो-शिक्षा के लक्ष्य एवं स्वरूप के विषय में कहते हैं-”असली शिक्षा वह है जिसमें विचारों का ऐसा समन्वय हो जिसकी सहायता से इस चारों ओर की दुनिया के आपसी सम्बन्धों को हम समझें और अनुभव करें।” आर्टेगर्ड गास्टेट-शिक्षा का प्रयोग स्पष्ट करते हुए लिखते हैं कि-”जो हमें निरर्थक अवमानना से ऊपर उठाकर श्रेष्ठ जीवन यापन के लिए बाध्य करे।

ख्यातिनामा चिंतक ई॰ एम॰ थुमाकर अपने ग्रन्थ “स्मॉल इज ब्यूटीफुल” में लिखते हैं कि-वर्तमान में ऐसी शिक्षा की आवश्यकता है-जो हमारे विचारों को सार्वभौम बनाए, अन्तस् में संवेदना जगाकर, समूची दुनिया को परिवार समझने का साहस प्रदान करे। हमें इस योग्य बना दे कि संसार को समझ सकें।”

हठोन्माद, राष्ट्रीय साम्प्रदायिकता, शिक्षा के विकृत कारण ऐसे हैं जिनसे अन्तर्राष्ट्रीय तनाव को बढ़ावा मिलता है। अन्तर्राष्ट्रीय क्षेत्र में शांति बनाए रखने के लिए तीनों ही क्षेत्रों में अभीष्ट सुधार आवश्यक है। हठोन्माद बुरा है और घातक भी। राष्ट्रीय साम्प्रदायिकता मानवीय मूल्यों को समाप्त कर देती है तथा विश्व सौहार्द जैसी उदात्त भावनाओं पर चोट पहुँचाती है। इन समस्याओं का समाधान-विचारों में व्यापक फेर-बदल करने में सक्षम, विचार क्रान्ति जैसी समर्थ और सक्षम प्रक्रिया से ही सम्भव है। इसमें स्वयं के समय, श्रम एवं साधनों का नियोजन करते ही समस्त मानव जाति में स्नेह-सौहार्द बनाए रख सकने की भूमिका-निभायी जा सकना सम्भव है।


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कीचड़ मत उछालो। हो सकता है कि वह निशाने तक न पहुँचे और उलट कर तुम्हें ही गंदगी से सान दे।


सत्यं-शिवं-सुन्दरम् की व्यावहारिक विवेचना

महामनीषियों, ऋषियों और तत्ववेत्ताओं ने मानव जीवन का जो सार खोज निकाला है, वह सत्यं, शिवं, सुन्दरम् की त्रिपुटी में सन्निहित है। जिस मनुष्य के जीवन में सत्य, शिव और सुन्दर की अवधारणा हो गई वह हर प्रकार से धन्य ही माना जायेगा। क्या लोक, क्या परलोक उसके लिए हर प्रकार से सार्थक तथा सुखदायक बन जाते हैं।

सत्यं, शिवं, सुन्दरम् की अनुभूति प्राप्त कर लेने पर फिर कुछ पाना शेष नहीं रह जाता। जीवात्मा जिस अनन्त एवं अक्षय आनन्द के लिए छटपटाता रहता है वह इन्हीं त्रितत्वों के अधीन रहता है। इनको पा लेने का अर्थ है आनन्द पा लेना।

धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष के क्रम में जिस प्रकार धर्म प्रथम है उसी सत्यं, शिवं, सुन्दरम् के क्रम में सत्य का प्रथम स्थान है। इन क्रमों में प्राथमिकता का अर्थ है प्रधानता। बिना धर्म के अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति असंभव है और बिना सत्य के शिवं एवं सुन्दरम् का कोई अस्तित्व नहीं है। जो सत्य है वही शिव और सुन्दर है और जो शिव तथा सुन्दर है उसको सत्य होना ही चाहिए। शिवं एवं सुन्दरम् को सत्य का ही परिणाम मानना चाहिए। जो सत्य का उपासक है उसे शिवं तथा सुन्दरम् की प्राप्ति स्वयं ही हो जाती है। अस्तु जीवन की सफलता तथा सार्थकता के लिए मनुष्य को सत्य की खोज और उसकी उपासना में ही संलग्न होना चाहिए।

सत्य क्या है, उसका निवास कहाँ है, और उसे किस प्रकार पाया जा सकता है? इन प्रश्नों का उत्तर है कि सत्य किसी भी वस्तु-विषय का वह अन्तिम स्वरूप है जिसमें किसी विकार अथवा परिवर्तन का अवसर न हो। सत्य का निवास संसार के प्रत्येक अणु में है और वह विश्वासपूर्ण जिज्ञासा के बल पर पाया जा सकता है।

इस सम्पूर्ण सृष्टि में जो कुछ प्रत्यक्ष रूप में

दिखाई दे रहा है वह चिरन्तन सत्य नहीं है। क्योंकि वह किसी विषय का विकृत स्वरूप है और प्रत्येक क्षण परिवर्तनशील है। सत्य की खोज करने के लिए किसी विषय के बाह्य स्वरूप से हटकर उसके अंतरूप की ओर दृष्टि डालनी होगी। उसके आदिम तथा अन्तिम रूप को खोज निकालना होगा। हम जो कुछ भी चर-अचर एवं जड़-चेतन प्रत्यक्ष रूप में देख रहे हैं वह सृजन है, निर्माण है जो किसी तत्व विशेष द्वारा निर्मित हुआ है। किसी भी वस्तु का वह आदि तत्व ही चिरन्तन सत्य है जो अन्त में पुनः अपने आदि स्वरूप को प्राप्त हो जाता है। इस प्रकार यदि सूक्ष्म दृष्टि से देखा जाय तो क्या मनुष्य, क्या वनस्पति, क्या पशु, क्या पक्षी अपने वर्तमान रूप में सत्य नहीं हैं? इनका सत्य स्वरूप उस तत्व में निहित है जिसकी सहायता से इन सबका सृजन हुआ है और वह तत्व एक मात्र परमात्मा ही है। परमात्मा की उपासना सत्य की उपासना और सत्य की उपासना परमात्मा की उपासना है।

सत्य की जो विवेचना ऊपर की गई है वह तात्विक दृष्टि से चरम सत्य की विवेचना है। किन्तु यही चरम सत्य संसार में जब व्यावहारिकता का रूप धारण करता है जिस प्रकार ईश्वर रूप होते हुए भी मनुष्य-विग्रह में उसकी उपाधि मनुष्य ही है। मनुष्य ईश्वर का व्यावहारिक रूप है जो सृष्टि की सहायता से आत्म-स्वरूप की अभिव्यक्ति के लिए सारे व्यवहार करता है। मनुष्य का सारा क्रिया-कलाप अपने सत्य स्वरूप को ही प्राप्त करने का उपक्रम मात्र है। व्यवहारिक दृष्टि से जीवन में ऐसे अनेक अवसर आ जाया करते हैं जब सत्य, असत्य के और असत्य सत्य के रूप अर्थ में लिया जा सकता है। मानिये कोई आततायी किसी को मारने के लिए उसका पीछा करता हुआ आता है और वह आदमी आपके देखते एक स्थान पर छिप जाता है। आततायी जाकर आपसे पूछता है कि आपने देखा है कि वह आदमी कहाँ छिपा है-आततायी को क्या उत्तर देंगे? यदि आप उस आदमी का ठीक-ठीक पता बतला देते हैं तो वह आदमी मारा जायेगा और आप हत्या के भागीदार बनेंगे और यदि आप ठीक-ठीक पता नहीं बतलाते हैं तो झूठ बोलते हैं। ऐसे अवसर पर कोई भी करणीय अथवा अकरणीय के असमंजस में पड़ जायेगा।

इस प्रकार के असमंजस के समय आपको निर्णय करने से पहले यह विचार करना होगा कि आप उस समय व्यवहार जगत में बरत रहे हैं अथवा अध्यात्म जगत में। यदि अध्यात्म जगत में बरत रहे है। तो निर्लिप्त भाव होने से “हाँ” और “न” दोनों स्थितियों में आप पाप के भागी न बनेंगे। उस समय आपका वही उत्तर सत्य होगा जो सहसा प्रथम बार ही आपके अंतःकरण में प्रतिध्वनित होगा। “हाँ” अथवा “न” कोई भी उत्तर देने के बाद यदि आपके अंतःकरण में कोई द्वन्द्व नहीं उठता और तत्काल उस घटना को भूलकर आत्मस्थ हो जाते हैं तो आपका कोई भी उत्तर निष्फल होगा जिसका परिणाम न पाप होगा और न पुण्य।

यदि आप उस समय व्यवहार जगत में चेष्टावान हैं तो आपको अपने कथन की उपयोगिता एवं परिणाम देखकर उत्तर देना होगा जिसमें अधिक से अधिक मानवीय हित का समावेश हो तो आपका वही उत्तर उचित होगा। उपरोक्त स्थिति विशेष में आपका निषेधात्मक उत्तर ही ठीक है, क्योंकि उस प्रकार किसी तात्कालिक हत्या के पाप से बच जायेगा और इस प्रकार आप एक सामयिक सत्य की रक्षा करेंगे।

सके अतिरिक्त यदि आप आततायी से भयभीत

होकर प्रच्छन्न व्यक्ति का पता बतला देते हैं और यह सोच लेते हैं कि वह व्यक्ति मारा जायेगा, तो मारा जाय; मैंने तो सत्य ही बोला है तो आपका वह सत्य घोर असत्य है, जिसके लिए आप पाप के भागी होंगे।

इसी प्रकार एक अन्य स्थिति में यदि कोई अपराधी आपकी जान में छिपा हुआ है और उसकी तलाश में पुलिस आपसे पूछती है तो आपका यह सोचकर न बतलाना कि बेचारा पुलिस के फंदे में फँसकर दण्ड पायेगा-तो आप की वह दया एक घोर असत्य ही है। निरपराधी तथा अपराधी की रक्षा में समानता नहीं हो सकती, फिर चाहे एक में आपको असत्य और दूसरे में सत्य कथन का सहारा ही क्यों न लेना पड़ा हो।

जिस व्यवहार जगत में हम विचरते हैं उसमें कथन की हितकारिता ही सत्य का स्वरूप है और यही “सत्य” के साथ “शिव” का समावेश है। किन्तु कथन की हितकारिता में किसी स्वार्थ, भय, क्रोध अथवा मोह का पुट नहीं होना चाहिए।

जिस प्रकार सत्य के साथ हितकारिता के रूप में “शिव” आवश्यक है उसी प्रकार “सुन्दरम्” अर्थात् मृदुता एवं मधुरता भी सत्य का अभिन्न अंग है। सत्य के इस अंश “सुन्दरम्” का संबंध भाषा तथा अभिव्यक्ति से है। किसी सत्य को विकृति, अतिरेकता, आवेश, कटुता अथवा उपहासात्मक व्यंग के साथ सामने रखना अथवा स्वयं समझना भी एक प्रकार से असत्य की ही सेवा है। किसी नग्न सत्य को भी शिष्टता का जामा पहना कर ही सामने लाना ठीक है अन्यथा कटुता के कारण किसी को अनावश्यक कष्ट देने वाला सत्य भी असत्य का ही रूप है। इस प्रकार सत्य का स्वरूप तभी पूर्ण होता है जब वह “शिवं एवं सुन्दरम्” के साथ ही हो।


मैं आजिज आ गया हूँ (kahani)

महाप्रभु ने धरती पर कोप बरसाने का निश्चय किया। सात दिन प्रलय मेघ बरसाकर सब कुछ को डुबा देने का निर्णय उन्होंने नूह को भी बता दिया।

महाप्रलय के बाद! कुछ न बचेगा तो नई सृष्टि कैसे बनेगी? नूह की उस जिज्ञासा पर महाप्रभु मुस्कराये, उनकी दूरदर्शिता को देखकर एक नाव बनाने का आदेश दिया। जिस पर वे खुद भी रहें और अपने साथ-साथ पशु-पक्षियों के भी कुछ जोड़े रख लें। जलयान बनाने के लिए एक वर्ष का समय दिया गया। वर्ष पूरा हुआ। महाप्रभु ने नूह को बुलाया और नाव बनने की बात कही। नूह ने सिर नीचा कर लिया। बोले-तीन बढ़ई बीमार पड़ गये। लकड़ी बेचने वाला मुकर गया। मैं क्या करता? चालीस दिन की मुहलत और दी गई। कहा गया कि इस अवधि में काम हो जाना चाहिए। चालीस दिन बीतने पर जब नूह खाली हाथ लौटे, तो महाप्रभु ने गरमाई दिखाई और कारण पूछा। “लुहार यात्रा पर चले गये। मजूरों ने हड़ताल कर दी। दोनों लड़के गाने-बजाने में लगे रहे। किसी ने साथ न दिया मैं क्या करता?” नूह ने विवशता व्यक्त करते हुए कहा। सात दिन का अवसर और दिया गया। पशु-पक्षियों के जोड़े भी बटोर लेने की आज्ञा हुई। अन्तिम दिन आया तो भी वह अकेले खाली हाथ खड़े थे। बिना पूछे ही बोले-पशु-पक्षी भाग खड़े हुए। पुचकारने से भी नहीं लौटे न वे बिकते हैं और न मेरी पकड़ में आते हैं। महाप्रभु, अब की बार अधिक क्रुद्ध थे। बोले-ऐसी ही गैरजिम्मेदारियाँ देखकर तो मैं आजिज आ गया हूँ और महाप्रलय बरसा रहा हूँ? यदि धरती वाले समय और फर्ज को समझते तो मुझे उसे डुबाने की जल्दी क्यों पड़ती?


आवेश-ग्रस्तता एक प्रकार की व्याधि

आवेश-ग्रस्त व्यक्तियों को उथला, ओछा, बचकाना आदि नामों से जाना जाता है, क्योंकि वे यथार्थता से दूर रहते हैं। देखा गया है कि छोटा बालक अपनी मर्जी को ही सब कुछ मानता है और उसकी पूर्ति न होने पर तुनक जाता है। उसकी इच्छा पूरी कर देने पर वह प्रसन्न हो जाता है। यह सोचने की उसमें क्षमता ही नहीं होती कि जिसके लिए वह मचल रहा था वह उपयोगी थी भी या नहीं। इस प्रकार बच्चों के अविकसित मस्तिष्क से यह सोचते भी नहीं बनता कि दूसरे लोग उनकी मर्जी पूरी करने की स्थिति में हैं या नहीं। उनके लिए यह सोचना भी कठिन होता है कि जो कुछ वे चाहते हैं वह दूसरों की दृष्टि में विचारपूर्ण और आवश्यक है भी या नहीं। मात्र अपनी ही मर्जी का सब कुछ मान लेने पर उसकी पूर्ति में प्रसन्नता और आपूर्ति में उद्विग्नता जिन्हें होने लगे उन्हें अविकसित स्तर का बालक ही कहना चाहिए। भले ही आयु की दृष्टि से वे बड़े ही क्यों न दीखने लगे हों।

आवेश भारी आतुरता, अधीरता का चिन्ह है। उसे असहिष्णुता भी कह सकते हैं, अनाड़ीपन भी। समझदारों में इतनी बुद्धि होती है कि अपनी मर्जी ही सदा सही नहीं होती और न यही संभव होता है जो चाहा गया है उसके तुरन्त जुटा देने के लिए दूसरों पर दबाव डालना उचित है।

यह संसार तालमेल के आधार पर चलता है। पारस्परिक व्यवहार में मिलजुल कर रहने और एक दूसरे की मान्यता को महत्व देते हुए चलने से ही हर मनुष्य का स्वभाव अलग-अलग प्रकार का होता है। मान्यताओं और परिस्थितियों में भी भिन्नता होती है। अपने-अपने वातावरण का प्रभाव हर किसी पर छाया रहता है। ऐसी दशा में यह आशा करना व्यर्थ है कि अन्य लोग अपनी मर्जी को उतना ही महत्व देंगे जितना कि हम स्वयं अपनी बात को देते हैं। इस तथ्य को समझते हुए हर किसी को दूसरों से उतनी ही आशा करनी चाहिए कि वे अपनी स्थिति के अनुसार ही सहयोग कर सकेंगे। जो जितना कर सके उनसे उतना प्राप्त करके ही संतुष्ट हो जाने से समझदारी है।

अपनी ओर से दूसरों की उचित बात स्वीकार कर लेना अथवा उनकी वाँछित सेवा सहायता कर देना तो किसी कदर संभव हो भी सकता है, क्योंकि वे हमारी आकाँक्षाओं का उतना महत्व नहीं समझते जितनी कि हमें अपने संबंध में आतुरता होती है। हर व्यक्ति अपने ढाँचे में ढला होता है। उसे अपनी इच्छा ही सर्वोपरि महत्व की लगती है। दूसरों की स्थिति क्या है? वह कहाँ तक की हुई इच्छा को पूरा करने की स्थिति में है; यह अनुमान लगाना दूसरों के बस की बात नहीं। इतनी अधिक आशा भी किसी से नहीं करनी चाहिए कि जो कुछ हमारे द्वारा चाहा गया है वह दूसरे लोग पूरा कर ही देंगे। हर किसी को अपने ऊपर नियंत्रण करना होता है। संयम बरतना पड़ता है और मिलजुल कर रहना पड़ता है। यह तभी बन पड़ता है जब अपनी ही तरह दूसरों की मर्जी को भी महत्व दिया जाय। सामंजस्य इसी को कहते हैं। यही उचित भी है, एवं पर्याप्त भी। एक दूसरे के प्रति सम्मान और सद्भाव बनाये रहना भी इसी आधार पर संभव होता है।

पशु-पक्षी तक प्राकृतिक रूप से कोई किसी के

पराधीन नहीं होते। स्वेच्छापूर्वक मिलते-बिछुड़ते रहते हैं। कुछ जीव-जन्तुओं को मनुष्य ने वशवर्ती बनाया तो है पर वे इससे प्रसन्न नहीं हैं। जब भी अवसर मिलता है वे स्वेच्छापूर्वक विचरण करने के लिए चल पड़ते हैं। पालने वालों के प्रति उनका लगाव भर होता है। पराधीनता किसी को भी स्वीकार नहीं। फिर मनुष्यों से ही वैसी आशा क्यों की जाय? बच्चे तक दबाव स्वीकार नहीं करते। पैरों से चलने लायक हो जाने पर वे इच्छापूर्वक भाग-दौड़ करने लगते हैं। दबोचने पर अप्रसन्न होते हैं। फिर बड़ों से ऐसी आशा किस आधार पर की जाय?

दाम्पत्य जीवन में पति का व्यवहार पत्नी के प्रति कठोर हो जाता है। वह उसे क्रीत दासी मानता है और चाहता है कि वह अपनी सुविधाओं का, इच्छाओं का परित्याग करे और वही करे जो उसे आदेश दिया जाता है। इसके औचित्य को पतिव्रत धर्म की दुहाई देते हुए गले उतारने का प्रयत्न किया जाता है पर यह थोथा तर्क है। दासों और बँधुआओं को दबाव देकर काम कराया जाता था पर उसका भी समझदारों ने औचित्य स्वीकार नहीं किया। उसे कुप्रचलन माना और उखाड़ फेंका। मनुष्य-मनुष्य के बीच सहकार का ही रिश्ता हो सकता है। पारस्परिक विचार विनिमय से ही किसी राजीनामे पर पहुँचा जा सकता है। भ्रान्तियों को समझदारी के साथ निवारण किया जाना चाहिए। इसके लिए तर्क प्रमाण उदाहरण आदि का प्रश्रय लिया जाना पर्याप्त है। दबाव तो विक्षिप्त, अपराधी या अविकसित बालक तक ही किसी सीमा तक क्षम्य हो सकता है। बड़े होने पर तो स्वेच्छा, सहमति ही उपयुक्त है। दबाव देकर अधिक लाभ उठाने की अपेक्षा यह अच्छा है कि विचार विनिमय द्वारा जितना सहकार बन पड़े उसी को पर्याप्त समझकर किसी प्रकार काम चलाया जाय। ऐसी थोड़ी सहकारिता भी किसी न किसी काम आती है। संसार का क्रम इसी आधार पर चल रहा है। मित्रों, परिजनों एवं सम्बन्धियों में भी इसी आधार पर तालमेल बिठाया जाना चाहिए। जो नहीं बन पड़ा उसके संबंध में खिन्न या रुष्ट होने की अपेक्षा यही अच्छा है कि सहयोग का आधार बना रहे, संबंध बिगड़ने न पायें। “या तो सब कुछ अथवा कुछ नहीं” की नीति अनुपयुक्त है। इससे भिन्नता की संभावना शत्रुता के स्तर तक जा पहुँचती है। समझा जाता है कि दबाव बाधित किया जा सकता है। इसकी कटु प्रतिक्रिया होती है और कटुता बढ़कर घृणा के स्तर तक पहुँच सकती है। ऐसी दशा में उलटा हुआ मानस प्रतिशोध तक पर उतर आता है।

आवश्यक नहीं कि सभी के विचार एक जैसे हों। प्रकृति ने फूल पौधे भिन्न रंग रूप के बनाये हैं। समता कम प्रसंगों में ही आती है। भिन्नता में एकता खोजना सुसंस्कारी दृष्टिकोण है। अनीति से असहयोग बरतना तो उचित है पर उसमें भी कानून को हाथ में लेने से काम नहीं चलता। इसके लिए व्यवस्था या अंकुश रखने की, दण्ड देने की जिम्मेदारी जिनकी हो उन तक प्रसंगों को पहुँचाना चाहिए। सामाजिक स्तर पर तो इतना ही हो सकता है कि सज्जनता एकत्रित होकर अनीति का विरोध करने तक उभरे।

संतुलन बनाये रहने पर ही मस्तिष्क इस स्थिति में होता है कि औचित्य का पक्षधर बना रह सके। मात्र अपना ही मान, बड़प्पन, आदेश पालन किया जाना चाहिए। यह मान्यता अधीर लोगों में ही पाई जाती है। आतुर वे ही होते है। आवेश उन्हीं पर चढ़ता है। अतिवादी अहंकार ही दूसरों के स्वतंत्र चिन्तन को नकारता है। उसी से यह सहन नहीं होता कि कोई अपनी स्वतंत्र सत्ता का परिचय दे और जो अरुचिकर लगे उसे गले उतारना अस्वीकार कर दे। हर व्यक्ति की अपनी स्वतंत्र चेतना है। उसकी अभिरुचि एवं पसंदगी का भी महत्व है। जो अधिकार एक को मिला है उसी को दूसरा भी अपना अधिकार कह सकता है। आवश्यक नहीं कि एक की मर्जी ही प्रधान रहे और दूसरा उसे मानने के लिए बाधित या विवश ही किया जाय। मतभेदों को तर्क के आधार पर सुलझाया जा सकता है।

अपने आवेश से दूसरे में आक्रोश उपजता है। एक को उलटी होने लगे तो पास बैठे दूसरों का भी जी मिचलाने लगता है। यही बात क्रोध के संबंध में भी है। यदि अपना स्वभाव मीठा, ठण्डा और शांत रखा जाय तो संपर्क में आने वाले क्रोधी प्रकृति के लोग भी शांत हो जाते हैं। दूसरों को मन मर्जी के बनाना कठिन है पर यह अति सरल है कि अपने को शांत, संतुलित और मृदुल मुस्कान का अभ्यासी बनाया जाय। इतना बन पड़ने पर वे समस्याएँ अनायास ही सरल हो जाती हैं जिनके कारण दूसरों पर आवेश-ग्रस्त, तुनक-मिजाज आदि का दोषारोपण करना पड़ता है।


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डरावनी काली छाया आगे-आगे ही बढ़ती, रहने नहीं देती है, तो छुटकारा पाने का एक ही उपाय है-अपना रुख बदलो और प्रकाश की ओर मुँह करके चलो।


पंचायत का फैसला (Kahani)

एक मुर्गा ऊँचे पेड़ पर बैठा था। एक चालाक

लोमड़ी ने उसे नीचे उतार कर दबोच लेने की तरकीब सोची।

लोमड़ी ने मुर्गे को पुकारा और कहा-”तुम जानवर को परसों वाली पंचायत की जानकारी नहीं है क्या? फैसला हो चुका है कि इस जंगल का कोई जानवर दूसरे को सताएगा नहीं। सभी मिलजुल कर रहेंगे। सो तुम नीचे आ जाओ। खेल-मेल से समय काटेंगे।”

मुर्गा असलियत ताड़ तो गया पर कुछ बोला नहीं-चुपचाप जहाँ का तहाँ बैठा रहा।

इतने में दूसरी ओर से शिकारी कुत्ते दौड़ते हुए आए लोमड़ी जान बचाने के लिए दूसरी ओर भागी।

मुर्गे ने लोमड़ी को पुकारा और पंचायत की बात याद दिलाते हुए कुत्तों से न डरने का परामर्श दिया।

लोमड़ी रुकी नहीं। भागते हुए उसने इतना ही कहा-”शायद तुम्हारी ही तरह इन कुत्तों ने भी पंचायत का फैसला न सुना हो।”


छाया-पुरुष, महज दिवा स्वप्न नहीं, एक सत्य

यदि किसी को अपनी ही प्रतिमूर्ति सामने दीख पड़े, तो इसे क्या कहा जाय-भूत? भ्रम? या सत्य? भूत इसलिए नहीं कहा जा सकता कि व्यक्ति अपनी अनुकृति को अपनी ही आँखों से सामने देखता है, जबकि प्रेत मरणोत्तर जीवन की स्थिति है। भ्रान्ति की मान्यता इसलिए अमान्य हो जाती है कि यह किसी एक को तो हो सकती है, अनेक को नहीं और जब एक ही भ्रम अनेकों को होने लगे, तो फिर यह भ्रम नहीं हो सकता। इसे सत्य कहना चाहिए। तो क्या ऐसा सत्य सम्भव है? रहस्यवादी इसका उत्तर “हाँ” में देते हुए कहते हैं कि इसमें असंभव जैसा कुछ भी नहीं।

साधना विज्ञान में एक साधना “छाया-पुरुष” की बताई गई है। इसमें अपनी ही प्रतिकृति को दर्पण में देख-देख कर श्रद्धा और विश्वास के माध्यम से उसे इतना सशक्त और सबल बना लिया जाता है कि वह एक स्वतंत्र सत्ता की तरह काम करने लगती है। आरंभ में यह सत्ता निर्बल होती है और मात्र दर्शन-झाँकी जैसे कार्य ही सम्पन्न कर पाती है; किन्तु जैसे-जैसे व्यक्ति की संकल्प शक्ति बढ़ती जाती है, वैसे ही वैसे “छाया-पुरुष” की समर्थता भी बढ़ने लगती है। फिर स्वामिभक्त सेवक की तरह ऐसे कार्य करवाने में साधक उससे सफल हो जाता है, जो सामान्य स्तर के साधक के लिए संभव नहीं होता और सामान्य स्तर का व्यक्ति उसे सिद्ध योगी मानने लगता है, जबकि उसकी अपनी योग्यता मात्र इतनी भर होती है, कि उसने अपनी गहन आस्था का आरोपण कर उसमें स्वयं को अनुप्राणित कर लिया। इसके अतिरिक्त अन्य कोई विभूति उसके अन्दर होती नहीं। यों कई विभूतिवान ऐसे भी होते हैं, जो अपनी प्रचण्ड तपश्चर्या द्वारा अपने आपे को एक से अनेक में विभाजित कर उन्हें इतना सामर्थ्यवान बना लेते हैं कि एक ही समय में कई-कई स्थानों पर भिन्न-भिन्न कार्य कर सकें; पर यह सब उच्चस्तर की तप साधना द्वारा ही संभव हो पाता है। इससे कम में इतना हो शक्य है, जितना “छाया-पुरुष” स्तर के साधक कर पाते हैं। यदा-कदा यही छाया-पुरुष वैसे लोगों के सम्मुख प्रकट हो जाते हैं, जो तप जैसे कोई क्रिया-कृत्य तो नहीं करते; पर जिनका अन्तराल तनिक शुद्ध और संकल्प सात्विक हो। ऐसे में अनेक बार ये महत्वपूर्ण सूचनाएँ दे जाते हैं, जो बाद में सही साबित होती हैं। ऐसी ही कुछ घटनाएँ पिछले दिनों घटित हुईं और सत्य भी सिद्ध हुईं।

प्रख्यात जर्मन कवि जोहानन उल्फगैंग वान गोएथ ने अपनी आत्मकथा में एक ऐसे ही प्रसंग का उल्लेख किया है। उन्होंने लिखा है कि सन् 1771 की एक सुबह वह घोड़े पर सवार होकर एक सुनसान रोड पर डूजेनहीम (जर्मनी) की ओर चले जा रहे थे, तभी पीछे से एक अन्य घुड़सवार बड़ी द्रुतगति से आगे निकल गया। अभी वह कुछ सोच पाते कि सामने एक अद्भुत दृश्य दिखाई पड़ा। उसी सड़क पर उनकी ओर आते हुए एक दूसरा घुड़सवार दिखाई पड़ा। वह घुड़सवार तो क्या था, बिल्कुल उनकी कार्बन कापी थी। अन्तर मात्र परिधान का था। उसने स्वर्णिम आभा लिए भूरे रंग की पोशाक पहन रखी थी। गोएथ ने ऐसी पोशाक अपने जीवन में पहले कभी नहीं देखी थी; पर वह सबसे अधिक आश्चर्यचकित उसके पहनावे पर नहीं, उस शक्ल पर हो रहे थे जो उनकी अपनी थी। वे अभी इसी असमंजस में थे कि यह दूसरा गोएथ कहाँ से कैसे आ गया? इतने में ही वह देखते हैं कि सामने वाला गोएथ उन्हें हाथ हिला रहा है, ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार विदाई के समय हाथ लहरा कर व्यक्ति एक-दूसरे के प्रति शुभकामना और खुशियां व्यक्त करते हैं। कुछ ही पल में दृश्य तिरोहित हो गया। गोएथ उलझन में पड़ गये कि जो कुछ उनने देखा, वह आँखों का भ्रम तो नहीं था? पर मन इसे भ्रम मानने को तैयार नहीं हो रहा था। केवल दृश्य को झलक-झाँकी भर होती, तो कुछ हद तक उसे भ्रान्ति मानी जा सकती थी; पर उस नकली गोएथ का मुस्कराना, हाथ हिलाना और विचित्र लिवास-इन्हें भ्रम कैसे माना जाय? आँखें सब कुछ साफ-साफ सामने देख रही थीं, फिर किस प्रकार इसे झुठलाया जाय? बुद्धि कुछ काम नहीं कर रही थी। कुछ दिनों तक गोएथ को यह घटना परेशान किये रही। फिर वह सब कुछ भूल गये। इस बीच आठ वर्ष का लम्बा अन्तराल बीत गया। एक दिन गोएथ बड़े विस्मय में पड़ गये; क्योंकि वह एकदम वैसे ही लिवास में उक्त रोड से घोड़े पर सवार होकर गुजर रहे थे। तब उन्हें आठ वर्ष पूर्व की वह घटना याद आयी, जिसमें उनने स्वयं को ही सुनहले भूरे वस्त्रों में सुसज्जित देखा था। गुत्थी अब सुलझ चुकी थी। उन्हें उक्त घटना का पूर्वाभास हुआ था। सूचना उनके ही छाया-पुरुष ने वैसे ही वस्त्राभूषण में स्वयं को अलंकृत कर दी थी। यह घटना तो महज छाया-पुरुष के अस्तित्व की बानगी देती है।

सत्रहवीं शताब्दी के मूर्धन्य मनीषी जॉन ओब्रे ने एक पुस्तक लिखी है-”ब्रीफ लाइव्स”। इस रचना में उन्होंने ऐसे अनेक उद्धरणों की चर्चा की है, जिसमें व्यक्ति को अपनी ही अनुकृति से आमना–सामना हुआ हो। एक घटना तत्कालीन प्रख्यात ज्योतिषी सर रिचर्ड नेपियर से संबद्ध है। एक बार नेपियर को उनका कमरा दिखाने दरवान उन्हें इमारत की ऊपरी मंजिल में स्थित उनके कमरे तक पहुँचाने गया। कमरे में प्रवेश कर नेपियर ने जब बिस्तर की ओर देखा, तो वह यह देख कर चौंक गया कि उसमें एक शव पड़ा है। उसने आक्रोश प्रकट करते हुए दरवान से इसकी शिकायत की, तो दरवान ने बिस्तर को जाँचते-परखते हुए आश्चर्य व्यक्त किया कि यहाँ तो कोई मृतक नहीं पड़ा है। बिस्तर तो सर्वथा खाली है। नेपियर ने एकबार फिर बिस्तर पर दृष्टि डाली। उसे पुनः पूर्ववत दृश्य दिखाई पड़ा। इस बार उसने तनिक निकटता और सूक्ष्मता से अवलोकन किया, तो ज्ञात हुआ कि यह तो उसका ही शव है। बिछावन में उसका अपना ही शरीर चेतनाहीन स्थिति में पड़ा था। कुछ क्षण तक अपनी उपस्थिति का भान कराने के उपरान्त दृश्य गायब हो गया। नेपियर ने यही समझा कि यह उसका दृष्टि भ्रम था। यह तो ओब्रे की कृति से ही ज्ञात हो सका कि वह उसका दृष्टि भ्रम नहीं, वरन् पूर्वाभास था। ओब्रे ने लिखा है कि इस घटना के कुछ ही माह उपरान्त नेपियर की मृत्यु उसी कमरे में उसी स्थिति में सोते-सोते हुई, जिस दशा में उसने स्वयं अपनी लाश देखी थी।

जॉन बास्को ने अपनी कृति “स्ट्रेंज एनकाउंर्ण्टस” में ऐसी कई घटनाओं का वर्णन किया है, जब व्यक्ति को अपने ही ‘ब्लू प्रिन्ट’ से सामना हो गया हो। 1929 के रोमन पादरी सन्त आर्थर बर्जर का उल्लेख करते हुए वे लिखते हैं कि एक दोपहर जब वे एक हल्की झपकी के पश्चात् जगे, तो उन्हें एक दिव्य दर्शन हुआ। उन्होंने सामने ही एक आभावान, कुहरे जैसी हूबहू अपनी ही अनुकृति देखी। अनुकृति की निगाहें आर्थर बर्जर पर टिकी थीं। चेहरे पर प्रसन्नता झलक रही थी और आँखों में एक विचित्र चमक थी। दोनों एक दूसरे को पाँच सेकेण्ड तक निहारते रहे, फिर अचानक बर्जर की प्रतिमूर्ति आँखों से ओझल हो गई।

एक ग्रीक प्रोफेसर पेड्रो केरोलिनो की चर्चा करते हुए बास्को अपने ग्रन्थ में लिखते हैं कि एक दिन जब पेड्रो शाम के समय कॉलेज से अपने कमरे में आया, तो दरवाजा खुला देख कर चौंका। अन्दर झाँक कर देखा, तो प्रकाश हो रहा था, जबकि उसे यह भली-भाँति स्मरण है कि कॉलेज जाने से पूर्व उसने बिजली के स्वीच बन्द किये थे और दरवाजे में ताला भी लगाया था। जब किवाड़ खुला देखा, तो उसे यही लगा कि चोर घुस आये हैं। वह सावधानी सेकमरे के भीतर प्रवेश करने लगा। सामने का पर्दा धीरे-धीरे हटाया, तो उसने देखा कि एक व्यक्ति उसकी ओर पीठ किये दीवार पर कील ठोक रहा है। उसे पूरा विश्वास हो गया कि वह चोर ही है; पर कील ठोकते देख कर वह कुछ असमंजस में पड़ गया। पेड्रो दबे पाँव उसकी ओर बढ़ने लगा। कुछ समीप आने पर उसने देखा कि वह व्यक्ति पेड्रो की ही एक फ्रेम की हुई तस्वीर दीवार में कील के सहारे लटका रहा है। वह कुछ क्षण खड़ा रहा और उस अविज्ञात व्यक्ति की अगली हरकत की प्रतीक्षा करने लगा। चित्र टाँग लेने के उपरान्त वह व्यक्ति मुड़ा, तो यह देख कर स्तम्भित रह गया कि वह तो उसी की प्रतिछाया है। कुछ पल तक दोनों एक दूसरे को देखते रहने के पश्चात् अनुकृति अंतर्धान हो गई।

पढ़ने-सुनने में ऐसी घटनाएँ बड़ी अटपटी जान पड़ती हैं और दृष्टिभ्रम-सी लगती हैं; पर साधना विज्ञान के छाया-पुरुष वाली मान्यता उक्त भ्रान्ति को निर्मूल साबित कर देती है, जिसमें कहा गया है कि साधना-विज्ञान में अपना ही प्रतिरूप तैयार कर लेने और उससे तरह-तरह के कार्य करवा लेने में आश्चर्य अथवा अचम्भा जैसा कुछ भी नहीं है। यदि व्यक्ति थोड़ा-सा प्रयास करे, तो नियमित अभ्यास द्वारा वह अपना न सिर्फ छाया-पुरुष तैयार कर सकता है, अपितु उससे अनेक ऐसे भी कार्य करवा सकता है, जो स्वयं उसके लिए संभव नहीं।


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मानव हृदय से बढ़ कर और कोई तीर्थ नहीं। भगवान इसी में बसते हैं और वहाँ तक जा पहुँचने वाले को दर्शन दिये बिना नहीं लौटने देते।


इक्कीसवीं सदी का आधार स्तंभ बनेगाआध्यात्मिक अर्थशास्त्र

मनुष्य की दृष्टि के संबंध में एक चौंकाने वाला आँकड़ा ‘विश्व स्वास्थ्य संगठन’ ने विश्व के सम्मुख रखा है। इसके अनुसार पूरे विश्व में इस समय एक अरब के लगभग व्यक्ति मायेपिया ( अर्थात् व्याधि जिसमें आँखों को दूर का स्पष्ट नहीं दिखाई देता) से ग्रस्त हैं। यह समाचार चिकित्सकों एवं वैज्ञानिक समुदाय को हैरानी में डाल सकता है। पर उससे एक संकेत यह भी मिलता है कि रोग की दृष्टि से न भी सोचा जाय तो भी अदूरदर्शिता (जिसमें दूर का भी विचार ही नहीं आता) से तो तकरीबन विश्व की समूची जनसंख्या ही ग्रस्त है। न दीखने का उपचार तो लेन्स उपचार से हो जाता है, पर जीवन व्यापार की जो योजनाएँ है- उनमें व्याप्त अदूरदर्शिता का उपचार किस प्रकार संभव है?

यदि सारे समाज में इसी आर्थिक चिन्तन को आधार बना लिया जाय तो सौंदर्य, शालीनता, सदाचार, नैतिकता, स्वास्थ्य एवं स्वच्छता जैसे सरल अनार्थिक मूल्यों का भी अस्तित्व तब रह सकेगा जब वे आर्थिकता की कसौटी पर खरे उतरते हों। नीति-अनीति के मामले में भी यही आर्थिक चिन्तन बार-बार हावी होकर उसी अदूरदर्शिता को अपनाने को बाध्य करता है-जो तुरन्त लाभ की है।

वस्तुतः; स्थिति इसके बिल्कुल विपरीत है। भौतिकवादी, उच्छृंखल बुद्धिवादिता कितने ही तर्क दे लें, मानवता को कुपथ पर अपनी मर्जी से नहीं ले जा सकती। धन मानव जीवन के लिए आवश्यक है, पर इतना ही नहीं कि वही सब कुछ बन जाय। पहला स्थान अध्यात्म-परक मूल्यों का है। अर्थ की चर्चा इसके बाद की जाती है। धर्म से रहित अर्थ व्यर्थ है, हानिकारक है, रोग-शोकों को आमन्त्रित करता है। धन कमाने से पूर्व मानव में सदाचार की विवेक-बुद्धि जाग्रत होनी चाहिए-ताकि वह कमाई का सदुपयोग कर सके।

महर्षि जैमिनी ने “मीमांसा दर्शन” में निर्देश दिया है- “ यतो हि अभ्युदानि निःश्रेयस स धर्मः “- आध्यात्मिक उन्नति और नैतिक प्रगति एक दूसरे की परम मित्र है। पर उत्पादन को आधार बड़े-बड़े उद्योग नहीं श्रम-सहकार होना चाहिए। शुभाकर इसके तीन कारण बताते हुए इसी का ‘आध्यात्मिक अर्थशास्त्र’ की संज्ञा देते हैं। पहला तो यह कि इसी माध्यम से अपनी छिपी क्षमताओं एवं अविज्ञात शक्तियों का उपयोग करने एवं उन्हें विकसित करने का पूर्ण अवसर मिलता है। दूसरे सबके साथ काम करने से व्यक्ति में सहयोग की भावना जन्म लेती है। यह विचार मन से निकल जाता है कि यह काम ‘मैंने’ किया है। इसके स्थान पर जब ‘हम’ आ जाता है तो ‘अहं’ की विकृति नहीं पनपने पाती। तीसरे आध्यात्मवादी व्यक्ति जब वस्तुओं के निर्माण हेतु श्रम करता है तो आवश्यक वस्तुओं को सुन्दर-सुदृढ़ बनाने का भरपूर प्रयास करता है। जिसका किसी भी प्रकार के उत्पादन तन्त्र में नितान्त अभाव होता है।

बेरोजगारी, औद्योगिक अशांति, हड़तालें, अपराध, नैतिक पतन आदि सभी उसी प्रकार उत्पन्न हुई समस्याएँ हैं जिस प्रकार अल्पकालीन लाभ के लिए ली गई पाश्चात्य चिकित्सा पद्धति की एक तेज औषधि अपने पीछे दुष्परिणाम में रोगों का सिलसिला छोड़ जाती है। जब बाढ़ आती है तो अपने साथ महामारी, भुखमरी लेकर आती है। उसी प्रकार औद्योगीकरण के बूते समृद्धि की बाढ़ का दम्भ करने वाले देशों में इसकी परिणति-प्रेम, सौहार्द तथा धार्मिक-पवित्रता से कदापि निरपेक्ष-संकीर्ण, स्वार्थी, निष्ठुर व्यक्तियों की भरमार के रूप में देखी जा सकती है।

विज्ञान, टेक्नोलॉजी और औद्योगिकी के अनियंत्रित विस्तार से होने वाले दुष्परिणामों से राष्ट्र पिता गान्धी अवगत थे। उन्होंने स्वतंत्र ग्राम इकाइयों के निर्माण द्वारा ग्राम स्वराज्य का सपना देखा था। किन्तु प्रगति के पाश्चात्य अन्धानुकरण ने औद्योगीकरण को अधिक महत्व दिया। अधिक उत्पादन के तात्कालिक लालच ने दूरवर्ती सत्परिणामों को भुला दिया और मानव जाति के लिए गाँधी की कल्याणकारी योजना मात्र सपना ही बनी रही।

‘दि अमेरिकन रिव्यू’ में प्रकाशित शोधपत्र “वैल्यूज टू ए वाँयबेल फ्यूचर” के लेखक विलियम इर्विन थाम्पसन की कल्पना भी शुभाकर की भाँति ‘ग्राम्य स्वराज्य’ विचारधारा पर आधारित है। थाम्पसन का विश्वास है कि वर्तमान सभ्यता जिस ओर गतिशील है-उससे मानव आमूल-चूल परिवर्तन करना जरूरी है। उन्होंने एक ग्रामीण सभ्यता पर आधारित हो, जिसमें रहने वाले व्यक्तियों में आपसी स्नेह सौहार्द हो। उत्पादन के स्रोत छोटे कुटीर उद्योग हों।

इस संस्कृति का नाम इर्विन थाम्पसन ने ‘परा औद्योगिक संस्कृति’ दिया है। उनके अनुसार परा औद्योगिक संस्कृति में उत्पादन एवं श्रम शक्ति का विकेन्द्रीकरण छोटे-छोटे कुटीर उद्योगों के माध्यम से होगा। उनका कहना है कि आज प्रगतिशीलता एवं फैशन के नाम पर कितनी ही वस्तुएँ बनती हैं और उपयोगी होते हुए भी कुछ समय बाद फैशन के बाहर कह अनुपयोगी ठहरा दी जाती हैं। यह प्रवृत्ति हानिकारक है। अब जो वस्तुएँ बनेंगी-उपयोगिता के आधार पर विनिर्मित होंगी तथा वर्षों तक कारगर सिद्ध होंगी।

विलियम इर्विन ने अपनी ‘भविष्यत् संस्कृति’ को विकसित करने में चार आदर्शों पर बल दिया है। इन आदर्शों का नाम उन्होंने ‘कार्यकारी सामाजिक शक्ति’ रखा है। प्रथम आदर्श है-”राष्ट्रों का ग्रहीकरण” अर्थात् समस्त विश्व को एक कुटुम्ब के रूप में माना जाय। जब तक प्रत्येक राष्ट्र अपने को स्वतंत्र एवं अलग समझते रहेंगे तब तक आपसी सद्भाव नहीं बन सकता है। अपनी स्वतंत्रता को सुरक्षित रखने और दूसरों पर प्रभुत्व जमाने की दृष्टि से अधिकाधिक शस्त्रों के निर्माण एवं संग्रह की होड़ चलती है। फलतः आपसी तनाव एवं संघर्ष बढ़ते हैं। अतएव राष्ट्रों के एकीकरण का प्रयास आवश्यक है। दूसरा आदर्श है- “नगरों का विकेन्द्रीकरण”। वे कहते हैं कि नई संस्कृति में नगरों की ओर केन्द्रित परिधि के ध्रुवीकरण को हटाकर प्रकृति की ओर उन्मुख करना होगा। पर्यावरण के संकटों से इसी प्रकार बचना संभव है।

तीसरा आधार है- “तकनीकी शिक्षा (जिससे औद्योगीकरण को प्रोत्साहन मिलता है) के प्रति उत्साह को कम करना।” छोटे उद्योगों को बड़े उद्योगों के स्थान पर प्रतिष्ठित करना होगा। ‘थाम्पसन’ का कहना है कि बड़े उद्योगों में लगी तकनीकी शक्ति को, प्रकृति को सुरम्य पेड़ पौधों से युक्त बनाने में प्रयोग करना अधिक श्रेयस्कर होगा। बड़े-बड़े उद्योगों के विस्तार का प्रभाव पर्यावरण पर ही नहीं हमारे नैतिक वातावरण पर भी पड़ता है। जब हम नई वस्तुओं के अधिकाधिक निर्माण के स्थान पर सद्ज्ञान को, अधिक पूँजी वाली अर्थव्यवस्था की जगह क्षेत्रीय उत्पादन के लिए लघु उद्योगों वाली अर्थव्यवस्था को, तथा उपभोक्ता मूल्यों को स्थान देने लगेंगे, तो औद्योगिक असन्तुलन के खतरे घटने लगेंगे। आपसी मन मुटाव एवं तनाव भी समाप्त होता दीख पड़ेगा।

इर्विन की नव संस्कृति निर्माण प्रक्रिया का चौथा आदर्श है- “चेतना का अंतर्मुखीकरण”। इससे उनका अभिप्राय यह है कि मानव जाति आज बहिर्मुखी बनी हुई है। विचारशील वर्ग भी सभ्यता के विकास का चरम अर्थ-अन्तरिक्ष में अपनी बस्तियाँ बसाना अथवा उपनिवेश स्थापित करना मानता है। जबकि सभ्यता का चरम लक्ष्य है मनुष्य जाति का आँतरिक विकास। वर्तमान सभ्यता में इस अंतर्दृष्टि का अभाव है। इसके विकास द्वारा ही मानव जीवन से संबंधित भौतिक मूल्यों की प्रतिष्ठापना सम्भव है। ऐसी स्थिति में संसार का स्वरूप दूसरा ही होगा। भौगोलिक सीमाओं के विस्तार के लिए उन्मुख राष्ट्रों के बीच आपसी तनाव एवं संघर्ष पैदा होता है। चेतना के अन्तर्मुखी होने पर समस्त विश्व एक परिवार के रूप में दिखाई देगा। मनुष्य का लक्ष्य “ वसुधैव कुटुम्बकम “ की स्थापना होगा।

इन चार आदर्शों के आधार पर विकसित हुई ‘नवयुग संस्कृति’ का लक्ष्य समाज में सद्विचारों की समृद्धि होगा न कि वस्तुओं की समृद्धि। छोटे कलकारखानों, उद्योगों से विनिर्मित हुए उपकरणों का उपयोग तो होगा किन्तु मनुष्य पेड़-पौधों, पशु-पक्षियों के सहचर्य में रहकर अपनी चेतना के विकास एवं विस्तार के प्रयत्न को अधिक पसन्द करेगा। समाज की वास्तविक प्रगति इसी में मानी जाएगी। बस्तियाँ छोटी-छोटी तथा पेड़-पौधों से घिरी होंगी। आज जैसे महानगर नहीं होंगे, जिनके लिए ऊर्जा एवं खाद्यान्न जुटाना एक समस्या बनती जा रही है। तब बुद्धि को प्रखर एवं परिष्कृत तथा हृदय को उदात्त बनाना शिक्षा का लक्ष्य होगा न कि वस्तुओं का विस्तार।

इर्विन की ही भाँति-विश्व के हर विचारशील को परिवर्तनकारी शक्तियां यह सोचने के लिए मजबूर कर रही है कि एकाँगी भौतिक समृद्धि की नीति अदूरदर्शितापूर्ण है। सहजीवन, सौम्य जीवन एवं सन्तुलित जीवन क्रम की ओर वापस लौटने में ही कल्याण है। इस तथ्य को अगले दिनों समझाया ही नहीं अपनाया भी जाएगा। मानवीय अदूरदर्शिता को दूर करती चली आ रही इक्कीसवीं सदी के गतिमान चरण-इसी ओर बढ़ रहे हैं।


महाकवि माघ का प्राणोत्सर्ग

कल तक उनके पास छत्तीस हजार मणियों वाला रत्नहार था, सोने-चाँदी, हीरे-जवाहरातों की अकूत सम्पत्ति थी। लेकिन आज वह कंगाल थे-धनहीन निःस्व। पिता ने अपार सम्पत्ति उत्तराधिकार में दी थी। उन्हें मालूम था कि पुत्र की करुणा समुद्र की तरह अगाध है। वह दुखियों का दुःख नहीं देख सकता, पीड़ितों की पीड़ा नहीं सह सकता। वह अपनी सम्पूर्ण सम्पत्ति, सारी योग्यता को राष्ट्र की सम्पत्ति मानता है। इसलिए जो भी अभाव-ग्रस्त उसके द्वार आता है, उसे खाली हाथ नहीं जाने देता। कोई दुःखी रहा हो, उसका वृत्तांत कानों में पड़ा हो और तत्काल सहायता न पहुँची हो, ऐसा एक भी क्षण उसके जीवन में नहीं आया। यह, सोच कर ही उनके पिता ने एक ऐसा होर बनवाया था, जो कम से कम सुरक्षित बना रहता और उसे उदर पोषण की समस्या से मुक्त बनाये रखता। किन्तु पिता की आशा निष्फल गई।

श्रीमाल का अकाल इस सीमा तक बढ़ा कि लोगों के भूखों मरने की नौबत आ पहुँची। असह्य होती जा रही भूख की तड़प-धरती की संतानों को मौत के अँधेरे में धकेलती जा रही थी। शायद इसी दुःख को न सहन कर पाने के कारण धरती की छाती जगह-जगह से दरक गई थी। जो साधन सम्पन्न थे-अभी भी स्व में सिकुड़े-सिमटे थे। पर उनके हृदय में उठ रहे भावोद्वेलन ने उन्हें चैन से नहीं बैठने दिया। उन्होंने कहा-सम्पूर्ण देश जब क्षुधा, अत्याचार या महामारी की ज्वाला में जल रहा हो, उस देश के विचारशील और साधन-सम्पन्न व्यक्ति को चुप नहीं रहा जा सकता। सो उन्होंने अपनी सम्पूर्ण सम्पत्ति के साथ-साथ, पिता की दी हुई वह माला भी भूख से पीड़ितों के सहायतार्थ दान कर दी।

जिस प्रकार गुण और सज्जनता से विमुख हुए के पास से यश और समृद्धि भाग जाते हैं। वैभव क्षीण हो जाने पर उसी प्रकार उनके पास आने वाले याचकों और अतिथियों का आवागमन भी बन्द हो गया। अब उनके पास उनकी सहधर्मिणी विद्यावती के अतिरिक्त और यदि कोई था तो अन्तःकरण में कर्तव्य पालन का सन्तोष। मुख पर आत्म भाव का प्रकाश और वह महाकाव्य जिसमें उन्होंने मानव जीवन की मार्मिक प्रेरणाओं को छन्द बद्ध कर रखा था।

अभाव-ग्रस्त स्थिति में आत्म-विकास और लोक’-कल्याण के मार्ग में बाधा पड़ती देखकर वह चिन्तित हो उठे। उन्होंने अपनी धर्म पत्नी से पूछा-”भद्रे! ऐसी स्थिति में क्या यह उचित न होगा कि हम लोग किसी ऐसे स्थान पर चलें, जहाँ आजीविका का प्रबन्ध हो सके और अपनी रुकी हुई साधना का क्रम फिर चल उठे। श्रीमाल के पीड़ितों का दर्द मुझे अब भी असह्य हो रहा है, जब तक मेरे कानों में जनता के दुःख के समाचार पहुँचते रहेंगे, तब तक मुझे शांति न मिलेगी।”

आप ठीक कहते हैं स्वामी! उनकी विदुषी पत्नी विद्यावती ने उसी गम्भीरता से उत्तर दिया-”व्यक्ति को भगवान ने और कुछ नहीं तो सम्पूर्ण क्षमताओं से परिपूर्ण मानव शरीर तो दिया ही है। जब तक शरीर रहे, तब तक हम साधनों का अभाव क्यों अनुभव करें। क्यों न कहीं अन्यत्र चलकर वर्तमान परिस्थितियों से छुटकारे का मार्ग ढूंढ़ निकालें।”

वह और उनकी धर्म पत्नी दोनों चल पड़े। उन दिनों उज्जयिनी के महाराज भोज भारतीय कला और संस्कृति के लिए प्राण-पण से उत्थान के लिए जुटे थे। सरस्वती पुत्र भोज के दरबार में पाँडित्य को बड़ा सम्मान दिया जाता था। पैदल यात्रा करते हुए वह और उनकी धर्मपत्नी विद्यावती मालव पहुँचे। उन्होंने राजा भोज के बारे में बहुत कुछ सुना था, सो आजीविका की आशा से उन्होंने अपनी पत्नी विद्यावती को भोज के दरबार में भेजा। महाकाव्य साथ लेकर विद्यावती सम्राट भोज के समक्ष उपस्थित हुई, और उस पुस्तक की गिरवी रखने का निवेदन किया।

भोज ने महाकाव्य उठाया। यों ही देखने के लिए एक पृष्ठ खोला। एक बहुत भावपूर्ण श्लोक सामने दिखाई पड़ा। श्लोक में प्रकृति और परमेश्वर की विलक्षणता बड़े मार्मिक शब्दों में प्रतिपादित की गई थी। शब्द, छंद और उसमें भरे भाव-सभी कुछ अद्भुत अद्वितीय। सम्राट ने हतप्रभ हो पूछा- “कौन है इसका रचनाकार?” “मेरे पति महाकवि माघ।” विद्यावती का उत्तर था। ओह। कुछ सोचते हुए अति प्रसन्न और प्रभावित हुए सम्राट ने कोषाध्यक्ष को एक लाख स्वर्ण मुद्राएँ पारितोषिक देने का आदेश देकर विद्यावती की ओर मुड़ते हुए बोले-”महाकवि से कहना वह यहाँ आयें और रहें, राजदरबार उनका हार्दिक अभिनन्दन कर अपने को कृतार्थ अनुभव करेगा।”

विद्यावती जब अतिथिगृह छोड़कर निकलीं तो उन्होंने देखा कि वहाँ भी अकाल की छाया घिरी हुई है। हजारों याचक उनके पीछे लग गए। पति के आदर्शों का अन्तःकरण से पालन करने वाली माघ की धर्मपत्नी का हृदय उस समय इस तरह विह्वल हो उठा, जिस तरह किसी माँ का हृदय अपने बहुत दिन के बिछुड़े हुए पुत्र को देखकर हो उठता है। उनके मस्तिष्क में आया- “जब सारी प्रजा दुःख और पीड़ा से ग्रस्त हो तो साधनों का, चाहे कितने ही परिश्रम से कमाये गए हों, संग्रह नहीं होना चाहिए।” उन्होंने वह धन भी बाँटना प्रारम्भ कर दिया।

मार्ग में जो भी भूखा मिला, उसे अन्न लेकर दिया। जो भी पीड़ित और कराहता हुआ मिला, उसे औषधि दिलवाई वस्त्रहीनों को वस्त्र और याचकों को धन बाँटती हुई, विद्यावती जब माघ के पास पहुँची, तब तक प्राप्त की हुई सम्पूर्ण मुद्राएँ भी समाप्त हो गई। विद्यावती गई थी तब तो उनके पास महाकाव्य भी था पर लौटी तो हाथ बिल्कुल खाली थे। महाकवि ने धर्मपत्नी से सारा वृत्तान्त सुना तो उनका हृदय विद्यावती के इस आदर्श पर गदगद हो उठा। उनकी आँखों से प्रेमाश्रु फूट निकले।

अभी वे इस असमंजस में थे कि विद्यावती का स्वागत और सम्मान किस प्रकार करें? तभी याचकों की एक नई टोली आ पहुँची। उन्हें कई दिनों से खाने को भी न मिला था। माघ ने अपने चारों ओर नजर दौड़ाई। कुछ भी न दिखाई दिया। निराशा हाथ लगी। पास में कुछ भी तो नहीं था, जिसे देकर वे याचकों को संतुष्ट करते। गीली आँखों से दुःख के आँसू झर-झर झरने लगे।

महाकवि माघ की अश्रुसिक्त मुद्रा देखकर अकाल पीड़ित समझ गए, अब उनके पास कुछ नहीं रहा, सो वे चुपचाप लौट पड़े। लौट रहे दुखियों-पीड़ितों के चेहरे पर गहरी हो गई निराशा को देखकर माघ व्याकुल हो उठे। उनके हृदय की विह्वलता वाणी से फूट पड़ी-”मेरे प्राणों! तुम और कुछ नहीं दे सकते पर इनकी सहायतार्थ इनके साथ तो जा सकते हो। धन से न सही सम्भव है प्राणों से ही उनकी सेवा करने का सौभाग्य मिल जाय। ऐसा सुन्दर अवसर न जाने फिर कब मिलेगा?”

इन अन्तिम शब्दों के साथ महाकवि की जीर्ण काया एक ओर लुढ़क गई। चेतना ने अपने पाँव समेट लिए और अनन्त अन्तरिक्ष में न जाने कहाँ विलीन हो गई।


अनुभवी दुकानदार (kahani)

दुकानदार को नौकर की सख्त जरूरत थी। उसने अपने मिलने-जुलने वालों से कह भी रखा था कि “कोई पढ़ा लिखा ईमानदार आदमी मिल जाय तो मेरी दुकान के लिए बताना, क्योंकि मैं अकेला हूँ जब कभी बाहर सामान लेने जाता हूँ या अन्य किसी काम से इधर-उधर जाता हूँ तो दुकान बंद करनी पड़ती है। ग्राहक और मौत का क्या ठिकाना? कब आये और लौट जाये?”

कुछ दिनों बाद ही एक मित्र एक युवक को साथ लेकर उस दुकान पर पहुँचा, युवक परेशानियों का मारा हुआ था। तमाम रोजगार दफ्तरों में रजिस्ट्रेशन करा रखा था पर कहीं नौकरी का नंबर ही नहीं आया। उसने सोचा सरकारी नौकरी नहीं मिलती तो न सही, जीविका चलाने के लिए जो भी साधन उपलब्ध हो जाय उसे अपना लेना चाहिए। यही सोचकर बड़ी आशा लगाये वह युवक दुकान पर आया था। उसने अपने आने का उद्देश्य बता दिया। दुकान के मालिक ने उसकी योग्यता के सम्बन्ध में पूछा तो उसने पूरा विवरण बता दिया।

“ठीक है! अभी आप अपने घर जाइये। मैं सोचकर उत्तर दूँगा और आपके घर सूचना भिजवा दूँगा।”-मालिक ने सुनकर कहा।

युवक निराश होकर अपने घर की तरफ चलता बना।

मित्र ने दुकानदार से पूछा-”भैया! आपको व्यापार के लिए एक व्यक्ति की सख्त जरूरत थी। इसीलिए मैं उस युवक को आपके पास लाया था। मेरी दृष्टि में वह युवक परिश्रमी, ईमानदार, और पढ़ा लिखा भी है पर आपने उसे टाल दिया।”

“भाई साहब! मैं आपसे क्या कहूँ? उसमें एक कमी थी। मेरे प्रश्नों का उत्तर उसने दिया तो, पर श्रीमान, महोदय जी और साहब जैसे शिष्टता सूचक शब्दों का कहीं भी प्रयोग नहीं किया। व्यापार की सारी सफलताएँ शिष्ट व्यवहार पर ही आधारित हैं। शिष्टता के अभाव में तो मेरा सारा व्यापार ही चौपट हो जायेगा।” अनुभवी दुकानदार ने अपने मित्र को समझाया।


बुद्धिमत्ता के रूप में वज्रमूर्खता

मनुष्य अपने को शरीर समझता है और उसी के लिए जीवन भर मरता खपता है। इन्द्रियों की लिप्सायें और मनोगत लालसायें ही उसका इष्ट रहती हैं। उन्हीं में सूचना श्रम और समय लगा देता है। इतने पर भी उसकी तुष्टि नहीं हो पाती। लगता रहता है कि दूसरों की तुलना में हम कहीं पिछड़े रह गये। संसार में एक से एक बढ़कर सुविधा सम्पन्न पड़े हैं। उनके साथ अपनी तुलना करने पर यही लगता रहता है कि दूसरे लोग आगे निकल गये और हम पिछड़ गये। इसका क्षोभ असंतोष बना रहता है। कई बार दूसरों के भाग्य पर ईर्ष्या और अपनी स्थिति पर खीज भी उठती रहती है। इसी स्थिति में दिन गुजर जाते और अन्तिम दिन आ पहुँचता है।

इन्द्रिय तृप्ति के अत्युत्साह में शरीर का जीवन रस निचुड़ जाता है। जीभ का चटोरापन पेट की क्रिया शक्ति को बरबाद कर देता है। जननेन्द्रिय की उत्तेजना पूरी करते-करते मस्तिष्क खोखला हो जाता है। इस प्रकार शरीर की सज-धज को निरंतर ध्यान में रखते हुये भी वह भीतर ही भीतर खोखला हो जाता है। बीमारियों के घुन लग जाते हैं और एक-एक करके उनके उपचार करते-करते हैरान हो जाते हैं। न मर्ज मरता है और न मरीज। दोनों ही अपना-अपना तालमेल बिठाये रहते हैं और ऐसे ही टूटी गाड़ी घसीटते रहते हैं।

मन की अपनी भ्रान्तियाँ और उद्दंडतायें है। उसका लोभ, मोह, अहंकार इतना उद्धत होता है कि उन्हें पाटना समुद्र को पाटने जैसा है। लोभ और मोह का कोई अंत नहीं। इनकी पूर्ति के लिए जितना भी कुछ किया जाता है कम ही प्रतीत होता है। यह कमी जीवन भर बनी रहती है। अहंकार का दर्प न साज-सज्जा में पूरा होता है और न ठाट-बाट में न अमीरी के प्रदर्शन से। दूसरों का उत्पीड़न करने और अपराधों के लिये मूँछें ऐंठने पर भी बात नहीं बनती, क्योंकि इस पर भी न महिमा गाई जाती है और न महत्ता मानी जाती है। उलटे लोग मन ही मन दंभी, निरंकुश की उपाधि देते रहते हैं। मान के बदले घृणा ही हाथ लगती है। इन्हीं कुचक्रों में जिन्दगी काटने के साथ और तो कुछ हस्तगत होता नहीं उलटे पाप का पोटला सिर पर लदने के लिए भारी होता जाता है जिस कार्य के लिए यह सुर दुर्लभ देह मिली थी, वह तो योजनों दूर रह जाता है। इसे असफलता के अतिरिक्त और क्या कहा जाय? विशेषतया तब जब वह अपने ही भटकाव और कुचिन्तन के कारण सामने आई हो।

जीवन के संदर्भ में विचारणीय बात राई-रत्ती जितनी स्वल्प ही है। यदि इतना भर समझा जा सके कि जिस शरीर को सब कुछ समझा गया है उसकी वास्तविक आवश्यकतायें बहुत स्वल्प है। अन्न, वस्त्र और बिस्तर की आवश्यकतायें इतनी कम हैं जिन्हें शारीरिक श्रम और बुद्धि के संयोग से दो घंटे जितने स्वल्प उपार्जन में पूरा किया जा सकता है फिर बाईस घंटे का समय इतना बचता है जिसे उच्च उद्देश्य के लिए नियोजित करने पर इसी जीवन में नर से नारायण बना जा सकता है तथा पुरुष से पुरुषोत्तम।

आत्मा को भी प्रसन्न रखा जा सकता है और परमात्मा को भी। किन्तु इतनी मोटी, इतनी जानी–मानी बात-जानें क्योँ समझ में नहीं आती। बुद्धि का विपुल भण्डार होते हुये भी वह इस राई-रत्ती जैसी समस्या हल करने का सीधा रास्ता क्यों तलाश नहीं कर पाता?

जन्म के साथ कुटुम्ब का घेरा विनिर्मित मिलता है। लालन पालन में उसका श्रम, सहयोग, साधना और सद्भाव मिला होता है। इसी ऋण को चुकाना ऐसा बड़ा काम है जिसमें आधी जिन्दगी लग सकती है। जन्म के समय जिन सम्बन्धियों के साथ संयोग मिला था, उनमें माता-पिता, बड़े भाई-बहन, नाना-नानी इतने होते हैं कि उन्हीं को समुन्नत बनाना एक बहुत बड़ा काम है उसी को पूरा कर लिया जाय तो क्या कम है?

किन्तु एक ऐसा उन्माद आता है कि विवाह करने और अपना निजी कुटुम्ब बढ़ाने, नये प्रजनन में आँखें मूँद कर लग पड़ने का उत्साह जगता है किन्तु उन्हीं के साथ जन्मने वाली हजार जिम्मेदारियों को पूरा करना कठिन हो जाता है। फिर उन कुटुम्बियों की बात कौन करे जो जन्म के समय पहले से ही मौजूद है और जो बड़े होने पर अनेक प्रकार की आशायें करते थे।

विवाह इसलिए किया जाना चाहिए कि उद्देश्य पूर्ति की दिशा में नाव को घसीट ले जाने के लिए दूसरा साथी मिले। हाथ बँटाये और कार्य को सुन्दर सुव्यवस्थित करे। पद इसकी पूर्ति तभी हो सकती थी जब उसे साथी, सहयोगी, मित्र माना जाता। उसका शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य बढ़ाया जाता। जीवन-यापन की उच्चस्तरीय योजनाओं से उसे अवगत कराया और तदनुरूप प्रशिक्षित किया जाता। किन्तु होता इसके ठीक उलटा है। कामुकता के कोल्हू में पेलकर उसका सारा तेल निकाल लिया जाता है और उसका व्यक्तित्व बची हुई खाली की तरह निरर्थक बन जाता है। बच्चे चढ़ता हैं इतने पर भी दासी जैसा श्रम करने और अपराधी जैसा तिरस्कार करने के लिए विवश किया जाता है। फलतः उसका रहा बचा ‘स्व’ भी गये गुजरे स्तर का बन जाता है। ऐसी दशा में उसके परामर्श भी घटिया ही हो सकते है। इस जंजाल में से बचकर यदि उसके आगमन को एक सौभाग्य माना गया होता और सुसंस्कृत बनाने का प्रयत्न किया गया होता। स्वावलम्बन के योग्य उसकी क्षमताओं का विकास किया गया होता तो उसका आगमन भार न बनता जैसा कि आमतौर से देखा जाता है।

शरीर का उपयोग क्या है? उसे कैसे समर्थ रखा जा सकता है, इस गुत्थी का समाधान संतोष और संयम के आधार पर नितान्त सरलता पूर्वक हो सकता था, तब लोभ को इतना महत्व देने और उद्धत बनाने की आवश्यकता क्यों पड़ती?

मोह की पूर्ति के लिए अपने से पहले जन्मा परिवार ऋण उतारने के लिए पर्याप्त था। फिर कुटुम्ब में पले बच्चे भी तो जन्मते रहते हैं। उनको सुविकसित बनाने में मोह की तृप्ति भली प्रकार हो सकती थी।

विवाह यदि अत्यंत आवश्यक ही हो रहा था तो पत्नी की शक्तियाँ बच्चे पैदा करने में नष्ट होने से बचाई जा सकती थी और उसे एक सुयोग्य समर्थ साथी के रूप में विकसित करके विवाह करके विवाह को सार्थक बनाया जा सकता था। इसके लिए बढ़ती हुई जनसंख्या से हाहाकार करती हुई धरती पर और अधिक बोझ बढ़ाने की आवश्यकता न थी। पर कहा किससे जाय? यह जाल जंजाल वह तथाकथित बुद्धिमत्ता ही बुन देती है जो दूरदर्शिता की कसौटी पर मूर्खता से भी गयी बीती सिद्ध होती है।

बुद्धिमत्ता का एक और नमूना देखिये! अपने घटियापन को ठाट-बाट से, साज-सज्जा से, फिजूल-खर्ची से, आवारागर्दी से बढ़ाने का प्रयत्न किया जाता है। ठीक इसी प्रकार दूसरों पर आतंक जमाने, उद्दंडता प्रदर्शित करने, त्रास देने में बड़प्पन का अनुभव किया जाता है, जब कि सादा जीवन-उच्च विचार की नीति कहीं अधिक सस्ती पड़ती है। कहीं अधिक सम्मान प्रदान करती और साथ ही संतोष भी। पर उस बुद्धिमत्ता को क्या कहा जाय जो वज्रमूर्खता के रूप में निरन्तर हमारे सिर पर छाई रहती है।


Quotation

शरीर की संरचना क्रियाशीलता छोड़ दे तो मरण है। सृष्टि की गतिविधियाँ रुक जांय तो प्रलय है, और मनुष्य कर्तव्य छोड़ दे तो उसका पतन है।


महत्व श्रम का नहीं (kahani)

स्पेन के नाविक कोलम्बस ने दुस्साहसी नौकायन करके अमेरिकी महाद्वीप को खोज निकाला। उसकी कीर्ति सब ओर फैली। लौटने पर सम्मान सूचक अनेकों समारोह हुए।

ऐसे ही एक प्रीति भोज में उनके किसी विद्वेषी ने कहा- “यह कौन-सी बड़ी बात है। अटलाँटिक पार किया कि अमेरिका आ गया। इतने सरल काम के लिए इतने सम्मान की क्या जरूरत है।”

भोज समाप्त होने पर कोलम्बस ने एक उबला अण्डा मेज पर रखा और कहा- “आप में से कोई सज्जन इसे सीधे खड़ा कर देने की कृपा करें।”

सभी ने बहुत अकल दौड़ाई। कोशिश की पर वैसा न हो सका, जैसा कि करने के लिए कहा गया था।

कोलम्बस ने अण्डे का एक सिरा उँगली के सहारे चिपकाकर समतल किया और मेज पर खड़ा कर दिखाया।

उसने कहा- “देखा आप लोगों ने। अण्डा सीधा खड़ा कर देना कितना सरल था। पर सूझ-बूझ के अभाव में आप में से कोई भी इसे कर नहीं सका। महत्व श्रम का नहीं, सूझ-बूझ का भी होता है।”


वैदिक संस्कृति ही विश्व संस्कृति

संसार में फैली हुई सैकड़ों जातियों और विभिन्न देशों के निवासी आकृति, रंग, रूप, खानपान और परिस्थितियों के कारण वेश व बनावट में कितने ही बदल क्यों न गये हों, वे सब एक ही मूल-पुरुष से जन्में, एक ही स्थान से विकसित हुए है। एक घर में जब चार लड़के होते है तब बड़े होने पर चार घरों की आवश्यकता पड़ती है। बड़ा वहीं रह जाता है, शेष तीन नया घर बना लेते है। ऐसा करते-करते ही इस पृथ्वी पर इतने देश, इतनी जातियाँ बन गयी और वे ऐसी अलग-अलग हो गयीं कि अब उनको एक को पिता की सन्तान कहना भी कठिन हो गया है।

किन्तु धार्मिक भूगोल और मनुष्य-जाति के पुरातत्व इतिहास की खोज एक बार हमें फिर उसी ओर ले जाती है। उपलब्धियाँ और निष्कर्ष यह बताते है कि भारत कभी सारे संसार के सिरमौर की भूमिका निभाता था और यहाँ की संस्कृति विश्व-संस्कृति अनेक देशों में रहने वाले लोग भाषा की दृष्टि से एक थे, सभी ईश्वर उपासक और संगठन बनाकर जीवों को पालकर रहने वाले थे। सच्चाई, ईमानदारी आदि के पालन पर विशेष ध्यान दिया जाता था। राजाओं को अनेक अधिकार और सुविधायें इसीलिए दी जाती थीं कि वे खण्ड-खण्ड में बसे देशवासियों का निरीक्षण करते रहें और कभी कहीं उद्दण्डता न पनपने दें। यह सब राजे-महाराजे और शासनतंत्र भारतवर्ष से जुड़े रहते थे। उन्हें दिशा निर्देश यहीं से होता था। वेदान्त संस्कृति की आदि भूमि होने के कारण ‘चक्रवर्ती साम्राज्यों का यहीं से संचालन होता था। यह धर्म का एक आवश्यक अंग था और उसके लिए लोगों में ज्ञानधारायें ही प्रवाहित नहीं की जाता था। यह उत्तरदायित्व हिन्दुओं ने एक समर्थ और संगठित जाति उसका धर्मपूर्वक पालन भी करते थे। आज भी यदि हम ज्ञान-विज्ञान, धर्म-संस्कृति, आचार-विचार, रहन-सहन आदि की दृष्टि से समर्थ हो और शास्त्र व शक्ति के द्वारा विश्व-संघ की रचना एक महान आदर्श विश्व शान्ति के लिए कर सकें तो यह एक बड़ी बात होगी।

इतिहास इस बात का साक्षी है कि पहले ऐसा ही था। भारतीय संस्कृति मनु को आदि पुरुष मानती है। संसार के सभी देश और धर्म भी मनु को ही अपना पितामह मानते है। महाभारत, वनपर्व में कहा है-

“मनुन च प्रजाः सर्वाः स देवासुर मानुषाः। सृष्टय्याः सर्वलोकाश्च यत्रैगति पचचेगति॥’

अर्थात् सम्पूर्ण पृथ्वी पर अपनी-अपनी स्थिति के अनुसार जाकर बसे देवता, मनुष्य और राक्षस (यह मनुष्यों के क्रमशः गुण-विभाग हैं) सब मनु की ही संतानें है।

बाल्मीकि रामायण में उल्लेख है-

“अमरेन्द्रया बुद्धया प्रजाः सृष्टास्तथा प्रभो। एक वर्णाः समाभाषा एकरुपाश्च सर्वशः॥”

अर्थात् हे प्रभो! संसार भर में बसे सभी लोग एक ही जाति, एक ही भाषा और सब प्रकार का एक आचार-विचार वाले मनु के पुत्र है।

“एन्सियन्ट एण्ड मीडिवल इण्डिया” नामक ग्रन्थ के प्रथम खण्ड पृष्ठ 118 में प्रख्यात इतिहासविद् मैनिंग ने उपरोक्त तथ्य की जो तुलनात्मक व्याख्या की है, वह बड़ी महत्वपूर्ण है। वे लिखते है कि मानव-जाति के आदिजनक जिन्हें भारतीय ‘मनु’ कहते हैं, उन्हीं से समूचे संसार की समस्त जातियाँ बनी, यह निर्विवाद सत्य है। भारतीय मनु या मनस् की तरह जर्मन लोग भी आदि पुरुष को “मानस” कहते है, यहीं ट्यूटनों के मूल पुरुष समझे जाते है। जर्मनी के ‘मन्न’ और अँग्रेजी का “मैन”उच्चारण में थोड़ा अनंतर रखता है, पर वस्तुतः वह ‘मनु’ शब्द ही है। जर्मनी के ‘मनस’ और संस्कृति के मनुष्य’ में कोई अन्तर नहीं हैं

अनुसंधानकर्ताओं का कहना है कि बाहर गयी हुई जातियाँ कालांतर में अपने आहार-विहार और रहन-सहन बदलती अवश्य गयीं, पर वे लम्बे अर्से तक साधना, उपासना, व्यापार, धर्म और दर्शन, भाषा और शासन व्यवस्था आदि की दृष्टि से भारतीय संविधान से जुड़ी रहीं। ईसा से 1500 वर्ष पूर्व मध्य एशिया में ‘मिटानी’ और हिटाइट’ नामक दो पड़ोसी राज्य थे। मिटानी का शासक ‘मालिउजाला’ था। और हिटज्ञइट में ‘शाविलुउिमा’ राज्य करता था। प्राचीनकाल में जब दो राजाओं के मध्य सन्धि या किसी प्रस्ताव पर बातचीत होती थी तो अदालतों में जिस प्रकार भगवान की शपथ ली जाती है, उसी प्रकार देवताओं को साक्षी बनाया जाता था। इन दो राजाओं के मध्य हुई सन्धि का एक शिलालेख मिला है। उसमें जिन देवताओं की साक्षी दी गयी है उनके नाम इन्द्र, मित्र, वरुण, और नासत्य यानी अश्विनी कुमार है। यह देवता केवल ऋग्वेद में ही प्रयुक्त हुए है और संसार के किसी भी धर्म में नहीं। इससे स्पष्ट पता चलता है कि यह दोनों ही संभाग वेदान्त सभ्यता से प्रभावित थे।

मिश्र के संग्रहालय ‘एल अमारा’ में बेबीलोनिया का एक शिलालेख है जिसमें प्रयुक्त हुए नाम आर्तमन्य, यश दत्त, सुवर्ण, आर्जवीय आदि संस्कृतिनिष्ठ शब्द भी वेदों के ही है। कश्मीर में मिले ‘दबिस्तान’ नामक शिलालेख में बैक्ट्रिया के राजाओं की नामावली दी है, जो हिन्दुओं के नामों की तरह है, इस तथ्य को सुप्रसिद्ध इतिहासवेत्ता डॉ. मिले ने भी अपनी कृति “हिस्ट्री ऑफ इण्डिया” में स्वीकार किया है। हिस्टोरिकल हिस्ट्री ऑफ दी वर्ल्ड “ में कहा गया है कि इजिप्ट निवासी पणिकों की शाखा है। ये लोग पान्त देश से आये। यह पान्त पहले पाण्ड्य देश था और उनके पणि ही पाणिक है। उन्होंने ही फिनीशिया बसाया। लेखक ने उक्त पुस्तक में स्वीकार किया है कि इजिप्ट पहले भारत महासंघ का ही एक भाग रहा है, भले ही कालांतर में उसने अपनी अलग संस्कृति बना ली हो।

पुराणों में वर्णित आन्ध्रालय ही आस्ट्रेलिया है। महाभारत एवं रामायण में वर्णित पाताल लोक आज का अमेरिका है। बलि पाताल का राजा था। दक्षिण अमेरिका में उसके नाम का स्मरण कराने वाला नगर ‘बलिविया’ आज भी है यह किसी समय वहाँ की राजधानी थी। अंग देश से पहुँचने से पहले पेरु और मैक्सिको में स्वास्तिक का चिन्ह प्रत्येक मंगल पर्व पर प्रचलित था जो बिलकुल भारतीयों की अनुकृति है।

इण्डोनेशिया के द्वीप जावा, सुमात्रा, लम्बोक, बलि आदि के नाम तो ज्यों के त्यों महाभारत में आये हैं। वहाँ के लोगों के नाम अभी भी सुकर्णों, भीमों, अर्जुनों आदि होते हैं, जो यह स्पष्ट बताते हैं कि उनके नामों की शैली भारतीय थी अर्थात् वे संस्कारों की दृष्टि से भारतीय संस्कृति के ही अंग थे। वहाँ के लोकजीवन, साहित्य और छाया नाटकों में पुराण-काल की संस्कृति के दर्शन आज भी किये जा सकते है। कम्बोडिया, थाईलैण्ड और रूस के अधिकाँश राज्यों के नाम और वहाँ की संस्कृति में अभी भी भारतीय संस्कृति से बहुत अधिक साम्य पाया जाता है। यह उदाहरण इस बात के प्रमाण है कि सृष्टि में मानव-जाति का आदि पदार्पण भारतवर्ष में हुआ। यहीं जाति इस संस्कृति को लिए हुए सारे विश्व में फैलती चली गयी। भारत में पहले राष्ट्रसंघ स्थापित था, इसलिए सभी लोगों को भारतीय संस्कृति के अनुरूप जीवन पद्धति, नीति, धर्म, दर्शन आदि को अपनाना ही पड़ता था। विश्वभर में बिखरी समस्त मानव-जाति अपना पितामह देश भारत को ही मानती थी, इसलिए इसे विदेश मानने का कोई कारण ही नहीं थी, इसलिए इसे विदेश मानने का कोई कारण ही नहीं था। भारतीय संस्कृति को विश्व-संस्कृति मानकर ही वे लोग इसे अपने जीवन में स्थान देते रहे।

कालान्तर में धीरे-धीरे यहाँ के लोगों में भेदभाव, स्वार्थ-परायणता और ऊँच-नीच का भाव आता गया। उससे अथवा किन्हीं भौगोलिक एवं ऐतिहासिक कारणों से परिवर्तन होते गये और विश्व अनेक देशों, अनेक संस्कृतियों के रूप में दिखायी देने लगा। विश्व की अशान्ति का आज का कारण भी यही है कि जाति, गुण, कर्म, स्वभाव धर्म, दर्शन की एकता को भूलकर आज सारा संसार वर्ण, भेद, जाति और धर्म भेद के मैदान में कूद पड़ा है। उसी से परस्पर संघर्ष से तभी बचा जा सकता है, जब पुनः लोगों को पता चले कि हमारा मूल उद्गम भारतीय संस्कृति है। सारे संसार को एक सूत्र में बाँधने ओर सबका हित साधने की क्षमता भारतीय संस्कृति में है। वहीं अपने दूर-दूर तक जा बसे लोगों को मातृत्व और स्नेह देकर विश्व को पुनः एक राष्ट्र संघ, एक भाषा, एक ही मानव-जाति के मनकों में पिरो सकती है। अगले दिनों यही सब कुछ होने भी जा रहा हैं।


मेरी समझ में नहीं (kahani)

बंकिमचन्द्र अपने देश के मूर्धन्य विद्वान और साहित्यकार थे। उनकी रचनाएँ राष्ट्रीयता उत्पन्न करने वाली अग्रिम भूमिका निभाती रही है।

वे अँग्रेजी के विद्वान थे तो भी भारतीय लोगों की अँग्रेजियत देखकर उन्हें दुःख होता और क्रोध आता था।

एक उच्चपदाधिकारी मित्र ने उन्हें अंग्रेजी में पत्र लिखा उसे उनने बिना पढ़े ही लौटा दिया कि अंग्रेजी-न तो आपकी मातृभाषा है न मेरी। फिर हम लोगों के अँग्रेजी में पत्र व्यवहार करने का कोई कारण मेरी समझ में नहीं आता।


सूक्ष्म शरीर को सक्रिय बनाने वाली त्रिविध मुद्राएँ

शरीर के स्थूल अवयवों के विशिष्ट व्यायामों को ‘आसन’ कहते है। वे साधारण कसरतों से भिन्न है। कसरतों की पहुँच प्रधानतया माँसपेशियों तक सीमित रहती है। नस-नाड़ियों पर भी उनका प्रभाव पड़ता है, किन्तु आसनों की विशेष व्यवस्था में ऐसे आधार सन्निहित है जिनके सहारे भीतरी अवयवों को भी प्रभावित किया जा सके। आमाशय, आँखें,जिगर, गुर्दे, फेफड़े,हृदय आदि प्रमुख अवयवों को उनके द्वारा प्रभावित किया जाता है। उनकी असमर्थता एवं रुग्णता के निवारण में आसनों द्वारा विशेष सहायता मिलती है। किस स्थिति में, किस आसन का उपयोग कितने समय तक किया जाय, इसके लिए साधक की शारीरिक, मानसिक स्थिति का पर्यवेक्षक आवश्यक है। निदान के उपरान्त ही उपयुक्त उपचार की बात बनती है। इस संदर्भ में व्यायाम को अधिक स्थूल एवं आसनों को अधिक गहरी पहुँच वाला सूक्ष्म माना जाता है।

इनके उपरान्त गहराई की तीसरी परत में मुद्राओं का नम्बर आता है। वे प्रधानतया इंद्रियों की रहस्यमयी शक्तियों से संबंधित है। उनका प्रभाव इतनी गहराई तक पहुंचता है कि ज्ञानेन्द्रियों की क्षमता अधिक प्रखर बनायी जा सके और यदि उनमें किसी प्रकार की दुर्बलता, रुग्णता का समावेश हो गया हो तो उसका निवारण आरंभ हो सकें।

हठयोग के प्रयोगों में बीस मुद्राओं का उपयोग होता है। उनमें से कुछ का प्रभाव शारीरिक कुछ का मानसिक, कुछ का कारण क्षेत्रों की गहराई तक होता है। इनमें से सभी को जनता, सीखना सामान्य साधकों के लिए न तो आवश्यक है न उपयोगी। उनमें से जो प्रमुख प्रभावोत्पादक, अधिक सरल एवं अधिक उपयोगी परिणाम उत्पन्न करने वाले है। मात्र ऐसा ही तीन मुद्राओं का उल्लेख यहाँ किया जा रहा है। त्रिविध प्राणायामों की तरह मुद्राओं में भी तीनों का प्रयोग साधक की स्थिति के अनुरूप सुनिश्चित किये जाते है।

यह तीन मुद्रायें हैं-(1)-शक्ति-चालिनी मुद्रा (2) शिथिलीकरण मुद्रा और (3) खेचरी मुद्रा। इनमें से शक्तिचालिनी का संबंध मूलाधार से है। कुण्डलिनी का निवासी केन्द्र वही है। पौरुष, प्रजनन, उत्साही इसी केंद्र से संबन्धित है। शक्तिचालिनी के आधार पर मूलाधार को जाग्रत, नियंत्रित एवं अभीष्ट उद्देश्यों के लिए प्रयुक्त किया जाता है। शिथिलीकरण मुद्रा का संबंध हृदय चक्र से है। यह स्थान भाव संवेदनाओं शक्ति, एवं तेजस्विता का केन्द्र है। भावनाओं को दिशा देना भी इसी क्षेत्र के प्रयत्नों से बन पड़ता है। तीसरी मुद्रा-खेचरी मुद्रा है। उसका संबन्ध ब्रह्मरंध्र, सहस्रार कमल पर्वत की उपमा दी गयी है। यहाँ मन, बुद्धि, चित्त से सम्बन्धित सभी तंत्र विद्यमान है। खेचरी मुद्रा द्वारा उनमें से किसी को भी किसी भी प्रयोजन के लिए जाग्रत एवं तत्पर किया जाता है। बुद्धि मंदता एवं तनाव से लेकर मनोविकारों तक में इस केन्द्र की सहायता ली जा सकती है।

अध्यात्म विज्ञान में सूक्ष्म शरीर से सम्बन्धित तीन रहस्यमयी ग्रन्थियों का उल्लेख है। वे हैं- (1)ब्रह्म ग्रन्थि (2) विष्णु ग्रन्थि और (3)रुद्र ग्रन्थि। ब्रह्म ग्रन्थि का संबंध खेचरी मुद्रा से एवं विष्णु ग्रन्थि का शिथिलीकरण से है, जबकि रुद्र ग्रन्थि शक्तिचालिनी मुद्रा से संबंधित है। इन तीनों के स्वरूप, कारण रहस्य अभ्यास एवं प्रतिफल साधना ग्रन्थों में विस्तारपूर्वक बताये गये है। उन सबका सार संक्षेप इतना ही है कि मस्तिष्क, हृदय और प्रजनन तंत्र में वरिष्ठता एवं पवित्रता, प्रखरता उत्पन्न करने के लिए उपरोक्त तीन मुद्राओं की साधनाओं का प्रयोग किया जा सकता है और उनका चमत्कारी प्रतिफल देखा जा सकता है।

तीनों मुद्राओं का संक्षिप्त विवरण इस प्रकार है-

(1) शक्तिचालिनी मुद्रा-

शक्तिचालिनी मुद्रा वज्रासन या सुखासन में बैठकर की जाती है। इसमें मल एवं मूत्र संस्थान को संकुचित करके उन्हें ऊपर की ओर खींचा जाता है। खिचाव पूरा हो जाने पर उसे धीरे-धीरे पाँच मिनट तक बढ़ाते हुए यही क्रिया बार-बार दुहरायी जाती है। शक्तिचालिनी मुद्रा के साथ ही उड्डियान बंध अधोमुखी शक्ति को ऊर्ध्वगामी बनाने के लिए प्रयुक्त होता है। यह क्रिया स्वतः शक्तिचालिनी मुद्रा के साथ धीरे-धीरे होने लगती है। पेट को जितना ऊपर खींचा जा सके, खींचकर पीठ से चिपका देते है। उड्डियान का अर्थ है-उड़ना। कुण्डलिनी महाशक्ति का जाग्रत करने की यह पहली सीढ़ी है। इससे सुषुम्ना नाड़ी का द्वार खुलता है, मूलाधार चक्र में चेतना आती हैं। इन दोनों क्रियाओं के द्वारा समूचे कुण्डलिनी क्षेत्र पर ऐसा सूक्ष्म विद्युतीय प्रभाव पड़ता है जिससे इस शक्तिस्रोत के जागरण व मेरुदंड मार्ग से ऊर्ध्वगमन के दोनों उद्देश्य पूरे होते है। विवेकवान साधक इस शक्ति केन्द्र को जगाकर अनेक गुना प्रखर बनाते है ओर जागरण की इस प्रखरता का उपयोग व्यक्तित्व को प्रतिभा सम्पन्न बनाने, उच्चस्तरीय कार्य संपादन करने में प्रयुक्त करते है।

(2) शिथिलीकरण मुद्रा

योगनिद्रा का यह प्रथम चरण है। अचेतन को विश्राम देने, नयी स्फूर्ति दिलाने तथा अन्तराल के विकास-आत्मशक्ति के उद्भव का पथ प्रशस्त करने की यह प्रारंभिक क्रिया है। इस मुद्रा का अभ्यास शवासन में लेटकर अथवा आराम कुर्सी पर शरीर ढीला छोड़कर किया जाता है। यह क्रिया शरीर, मन बुद्धि को तनाव से मुक्त करके नयी चेतना से अनुप्राणित कर देती है। साधक को शरीर से भिन्न अपनी स्वयं की आत्मचेतना की प्रत्यक्ष अनुभूति होती है।

कोलाहल रहित वातावरण में शवासन में लेटकर पहले शरीर -शिथिलीकरण के स्वयं को निर्देश दिये जाते है। शरीर के निचले अंगों से आरंभ करके शनैः-शनैः यह क्रम ऊपर तक चलाते है। हर अंग को एक स्वतंत्र सत्ता मानकर उसे विश्राम का स्नेह भरा निर्देश देते है। कुछ देर उस स्थिति में छोड़कर धीरे से श्वास तीव्र करके शरीर को कड़ा और फिर ढीला होने का निर्देश दिया जाता है। धीरे-धीरे शारीरिक शिथिलीकरण सधने पर क्रमशः मानसिक शिथिलीकरण का अभ्यास करते हुए दृश्य रूप में शरीर पड़ा रहते देखने चेतनसत्ता के सरोवर में ईश्वर को समर्पित कर देने की भावना की जाती है। ध्यान योग की यह प्रक्रिया आध्यात्मिक दृष्टि से उपलब्धियों से भरी हुई है। शरीरगत तथा मनोगत इसके सत्परिणामों से आज विज्ञानवेत्ता भी परिचित हैं।

(3) खेचरी मुद्रा’

शान्त मस्तिष्क को ब्रह्मलोक और निर्मल मन को क्षीरसागर माना गया है। मनुष्य की व्यष्टि सत्ता और विश्व-ब्रह्मांड व्यापी समष्टि सत्ता का आदान-प्रदान ब्रह्मरंध्र मार्ग से होता है। यह मस्तिष्क का मध्य बिन्दु है, जीवसत्ता नाभिक है, यही सहस्रार कमल है। मस्तिष्कीय-मज्जारूपी क्षीरसागर में विराजमान विष्णुसत्ता के सान्निध्य और अनुग्रह का लाभ लेने के लिए खेचरी मुद्रा की साधना की जाती है। ध्यानमुद्रा में शान्तचित्त से बैठकर जिह्वाग्र भाग को तालु मूर्धा से लगाया जाता है। सहलाने जैसे मन्द-मन्द स्पंदन किये जाते है। इस उत्तेजना से सहस्र दल कमल की प्रसुप्त स्थिति जाग्रति में बदलती है। बन्द छिद्र खुलते है और आत्मिक अनुदान जैसा रसास्वादन जिह्वाग्र भाग के माध्यम से अन्तःचेतना को अनुभव होता है यही खेचरी मुद्रा है।

तालु मूर्धा को कामधेनु की उपमा दी गयी है और जीभ के अगले भाग से उसे सहलाना-सोमपान, पयपान कहलाता है। इस क्रिया से आध्यात्मिक आनन्द की-उल्लास की अनुभूति होती है। यह दिव्यलोक से आत्मलोक पर होने वाली अमृतकलश से प्राप्त अनुदान आत्मा को अमरता की अनुभूति देते है। इन तीनों मुद्राओं में से साधक अपनी स्थिति के अनुरूप अपनाकर उनसे मिलने वाले लाभों से सहज ही लाभान्वित हो सकते है।


VigyapanSuchana

स्टाक होम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इन्स्टीट्यूट द्वारा संग्रहित आँकड़ों से प्रकट होता है कि इन दिनों युद्ध की तैयारी पर समस्त संसार में जो धन व्यय हो रहा है, वह इतना अधिक है, कि उतने भर से समस्त संसार की स्थिति बदल देने वाली सृजन योजनाएँ पूरी की जा सके। इन दिनों हर वर्ष प्रायः 5000 अरब रुपया युद्ध आयुधों पर खर्च होता है। पिछले 30 वर्षों में यह व्यय 173 गुना अधिक बढ़ा है। विनाश साधनों की अभिवृद्धि में उसको भी विराम नहीं लगा है, वह दिन दूना रात चौगुना बढ़ रहा है।

दूसरी ओर निर्धन और पिछड़े देशों की स्थिति है कि जिसमें जीवनोपयोगी सुविधाओं के अभाव में बेमौत मरने वाले में 50 करोड़ व्यक्ति होते हैं, जिनमें से 30 करोड़ तो 15 वर्ष से कम उम्र के बच्चे ही होते है। युद्ध की तैयारी में खर्च होने वाला धन यदि तीन चौथाई पिछड़े जन-समुदाय की रोजी और शिक्षा-चिकित्सा जैसे साधन प्रदान, करने पर लग सका होता तो दुनिया का नक्शा कुछ दूसरी ही तरह का होता।


सचेतन तीर्थ सिद्धपीठ

इन दिनों तीर्थ आयोजनों का स्वरूप मेले–ठेले जैसा बनकर रह गया है। पिकनिक, मनोरंजन, पर्यटन जैसे उद्देश्यों के लिए लोग सैर-सपाटे के लिए निकलते है। भीड़-भाड़ का अपना मौज-मजा होता है जहाँ ऐसी भीड़-भाड़ होती है, वहाँ मनोरंजन के खेल तमाशे भी व्यावसायिक उद्देश्यों की पूर्ति के लिए जमा हो जाते है। सरकस, सिनेमा, कठपुतली, जादूगरी जैसे खेल तमाशे वालों की ऐसे अवसरों पर अच्छी आमदनी हो जाती है। चाय-पान, मिठाई, चाट-पकौड़ी जैसी स्वादिष्ट वस्तुएँ लेकर भी छोटे-बड़े दुकानदार पहुँच जाते है। खरीद फरोख्त के साथ दैनिक आवश्यकताओं की तथा जब तब जहाँ-तहाँ से मिलने वाली दक्षिणा भी वहाँ मिल जाती है। दुकानदारों से लेकर ठहरने-ठहराने का प्रबंध करने वाले तक कुछ न कुछ कमा ही लेते हैं। सरकारी मुंशी मेलाधिकारियों, पुलिस आदि को मिलाकर उस भीड़भाड़ का नाम भी हो जाता है। लोग भी मनोरंजन कर लेते है और आयोजक भी अपने आप से कोई कमी नहीं रहने देते। कपटी से मनचाहा प्रसंग कहलवाया जा सकता है, प्रेम-प्रकाशन का आधार तो और भी सस्ता है उनसे भी मनचाहा लिखवाया जा सकता है। विज्ञापन इसी का एक रूप है। उसके माध्यम से इच्छित प्रदर्शन कराया जा सकता है। इतने पर भी यह आवश्यक नहीं कि पैसे के बदले जो खरीदा गया है, वह वास्तविक और चिरस्थायी हो।

पैसे का उतना महत्व दृष्टिगोचर होते हुए भी यह आवश्यक नहीं है कि अपना संतोष, दूसरों का श्रेय और हर किसी का सौजन्य प्राप्त कर लिया जा सके। यदि उन्हें महत्वहीन माना जाय तो बात दूसरी है, अन्यथा साधन सामग्री के अनुसार कुछ न कुछ लाभ लोग उठा ही लेते है। कहीं-कहीं तो पशुओं के मेले भी लगते है, अक्सर और भी बढ़ जाते है।इस प्रकार मेला एक व्यवसाय बन गया है। उससे अपने-अपने ढंग से लोग लाभ उठते हैं।

कभी-कभी राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक स्तर के मेले प्रदर्शनियाँ भी जहाँ-तहाँ होती है। उत्सव आयोजन भी होते हैं कही-कही विशेष पर्वों या देवी-देवताओं के स्थानोँ पर ऐसी ही भीड़ हो जाती है सबका अपना-अपना उद्देश्य होता है। भीड़-भाड़ धक्का-मुक्का, खरीद-फरोख्त भर नहीं है। इन्हें तो मनोरंजन, की श्रेणी में ही गिना जा सकता है। भले वहाँ कोई देवालय बना हो अथवा नदी-तालाब को देखने-नहाने आदि का प्रबंध हो। इनकी अन्य दृष्टि से न सही, मनोरंजन, खरीद-फरोख्त, कौतुक की दृष्टि से तो कुछ न कुछ उपयोगिता ही है, किन्तु इसके साथ “तीर्थ” नाम ना जोड़ा जाय तो ही अच्छा है।

जिस तीर्थ शब्द के साथ शास्त्रकारों ने अनेक माहात्म्य जोड़े हैं, जिन्हें पुण्य-परमार्थ कहा है। आत्मशोधन, प्रायश्चित्त, पाप प्रकटीकरण आदि उद्देश्य के साथ जोड़ा गया है, उसका स्थान इन दिनों की भीड़-भाड़ वाले माहौल से सर्वथा भिन्न है। उसके साथ जीवन परिमार्जन की शिक्षा जुड़ी होती है। इतना ही नहीं जो दुर्गुण अपने स्वभाव में सम्मिलित हो गये उनके निष्कासन तथा जिन-जिन निर्धारित सद्गुणों की कमी पड़ गई है, उनकी पूर्ति के लिए भूलों के परिमार्जन के लिए प्रायश्चित करने की विद्या तीर्थ प्रक्रिया में सम्मिलित है, जिसे सम्पन्न करने के उपरान्त व्यक्ति अपने को अधिक निष्पाप हुआ अनुभव करे और यह समझे कि पहले की अपेक्षा पवित्रता एवं प्रामाणिकता की मात्रा बढ़ गई है। सद्गुणों का विकास-विस्तार हुआ है। ऐसा होने लगे तो यह समझना चाहिए कि तीर्थयात्रा बन पड़ी है। ऐसा जहाँ बन पड़ता है, वहाँ का वातावरण पवित्र बनता है। सामान्य स्थानों की अपेक्षा वह पुण्य परम्पराओं का बाहुल्य ही होता है। इतना ही नहीं उस प्रयोग प्रयोजन को सम्पन्न कराने वालों में अनुशासन बनाये रहने और नैतिक अंकुश को कसे रहने की तेजस्विता भी होती है। यह दोनों ही पक्ष वहाँ दीख पड़ते है जहाँ के सूत्र संचालक निजी जीवन में उत्कृष्टता और नैतिकता का अनुपात सामान्य लोगों की अपेक्षा कही अधिक ऊँचा बनाये रहते है। जले हुए दीपक ही दूसरे बुझे हुए दीपकों को जलाने में समर्थ होते है। अग्नि प्रज्वलित हो तो उसी के स्पर्श से साधारण ईंधन गर्मी खींचता ओर ज्योतिर्मय होता है। जो स्वयं ही निस्तेज है, वह दूसरों को ज्योति कैसे दे सकेगा। साबुन में मैल काटने और स्वच्छ बनाने का गुण होना चाहिए। यदि वे विशेषताएँ न हों, मात्र वैसी वेशभूषा बनाली जाय तो कोयले का बना साबुन और कीचड़ से धुला वस्त्र किस प्रकार किसी मैले कपड़े को स्वच्छ बनाने में समर्थ हो सकेगा?

जिसमें जो गुण विशेष मात्रा में होते हैं, वहीं दूसरों को यह विशेषताएं दे सकने में समर्थ हो सकता है। संगीतकार, कलाकार, पहलवान, विद्वान आदि की समरूपता का लाभ उन व्यक्तियों को मिलता है जो वैसा बनने की इच्छा रखते हैं किन्तु यदि अध्यापक ही उन विषयों से अनभिज्ञ हो तो समझना चाहिए कि उससे कुछ चाहने वालों को निराश ही होना पड़ेगा।

तीर्थ-इमारतों, देवालयों, प्रतिमाओं, जलाशयों आदि के सहारे ही बन जाते। वस्तुओं का प्रतिफल वस्तुओं के रूप में ही होता है। विशालकाय मन्दिर या ऊँची प्रतिमा आखिर पदार्थ ही है, उसमें चेतना कहाँ होती है? तीर्थ की विशेषता चेतनात्मक वातावरण में यह विशेषता होगी, वहीं से अभीष्ट आकाँक्षा पुरी हो सकने का सुयोग बनेगा। जो स्वयं ही भूखा भिखारी है, उससे यह आशा कैसे की जा सकती है कि वह किसी दरिद्र की दरिद्रता दूर कर सकेगा। उठे व्यक्ति ही दूसरे गिरे हुओं को उठाने में समर्थ हो सकते है। जो स्वयं ही कीचड़ में सने और खाई खंदक में पड़े हैं, उनसे यह आशा कैसे की जा सकती है कि दूसरों को उठाने या स्वच्छ बनाने का उद्देश्य पूरा कर सकेगा।

तीर्थ सचेतन होते हैं। वहाँ के सूत्र संचालक अनुशासित अध्यापक, चेतना की दृष्टि से आदर्शवादी और उच्च चरित्रवान होते है। उन्हीं के तत्वावधान में साधारणजनों को अधिक पवित्र, अधिक प्रखर और अधिक समर्थ बनने का अवसर मिलता है। इसीलिए यदि कहीं वस्तुतः तीर्थ बना हो या बनाया गया हो तो उसके सूत्र संचालक को सामान्य लोगों की अपेक्षा कहीं अधिक ऊँचा या प्रखर होना चाहिए। जो स्वयं अनुशासन पालन कर सका है, जिसने स्वयं जीवन में उत्कृष्टता अर्जित कर ली है, उसी को तीर्थ संचालक कहा जा सकता है या उसी से यह आशा की जा सकती है कि उसके संपर्क में आने वाला व्यक्ति ऊँचा उठेगा। ऊँचे पेड़ से लिपटने के बाद ही बेल ऊँचा उठ सकने में समर्थ होती है। हरे भरे पेड़ पर ही फूल या फल आते है। जो स्वयं सूख चुका है, निर्जीव बन गया है, जो अपनी हरियाली तक को बनाये नहीं रह सकता, वह साथ में लिपटी बेल का कुछ हित साधन कैसे कर सकेगा?

तीर्थ तारने वाले को कहते है। मल्लाह स्वयं भी तैरता है, नाव को भी पार कराता है, उसमें बैठे यात्रियों को भी। यह सभी गुण जंगम तीर्थों में होना चाहिए। स्थावर तीर्थ तो इमारतों जलाशयों, मूर्तियों आदि जड़ पदार्थों में गिने जाते है। उनका प्रभाव-माहात्म्य आँखों से दीख पड़ने वाले मनोरंजक दृश्य जैसा ही होता है। मात्र इन स्थानों का सुहाना दृश्य देखकर अपने मनोरंजन की पूर्ति भर कर लेनी चाहिए।

असली तीर्थ तो प्राणवान होते है। उनका यह नामकरण उनकी जीवन्त एवं सार्थक गतिविधियों को देखकर ही किया गया था। अब भी सच्चे अर्थों में उस स्थान को ही प्राणवान कहा जा सकता है, जहाँ सत्प्रवृत्तियाँ सतत् चलती रहती हों, संपर्क में आने वालों को उन्हें अपनाने की प्रेरणा मिलती हो। जिस वातावरण से ऐसे सुसंस्कारित तीर्थों का संपर्क रहता है, वह स्वतः प्राणवान बनता चला जाता है। शान्तिकुँज गायत्री परिजनों के लिए विनिर्मित एक ऐसा ही तीर्थ है। ऐसे सचमुच के तीर्थ जहाँ भी होंगे, वहीं उनका माहात्म्य और प्रभाव भी दृष्टिगोचर होकर रहेगा।


नगर की निर्विरोध मेयर (kahani)

सन्त जुस्तान डीन फारसी लिटिल मदर के नाम से उस क्षेत्र में प्रख्यात थीं।

जब वे तेरह वर्ष की थीं तभी माता-पिता न रहे उन्हें अपने छोटे छः भाई बहिनों का पालन करके उन्हें स्वावलम्बी बनाना पड़ा। इस प्रयत्न में उनकी आयु का एक बड़ा भाग बीत गया।

जब भार हल्का हुआ तो लोगों ने उनके विवाह की चर्चा की उन्होंने कहा मेरे व्यक्तित्व का कण-कण मातृ भावनाओं से भरा है उसमें पत्नी तत्व विकसित होना संभव नहीं रहा।

वे सार्वजनिक जीवन में उतरी और अपने नगर निवासियों की कठिनाइयों को हल करने कराने में प्राणपण में जुटी रही। वे इतनी लोकप्रिय थी कि 69 वर्ष की आयु तक अपने नगर की निर्विरोध मेयर चुनी जाती रहीं।


विरक्ति विवेक पर आधारित हो

पक्षी चहक उठे, रथ के पहियों की गड़गड़ाहट सुनकर वन के मोर चौंक उठे। समूचे वन प्रान्त की भंग होती निस्तब्धता में ऐसा कुछ सामने लगा जो अनजाना था अपरिचित था-सर्वथा नया था। आगे पीछे अनुशासन बद्ध घुड़सवार सैनिकों से घिरी मगध की साम्राज्ञी महारानी क्षमा पधारी थीं। भगवान तथागत के चैत्य -विहार में महारानी का इस प्रकार अचानक आना? आस-पास विचरण कर रहे जनों के मन इस प्रश्न का हल ढूंढ़ निकालने में खोने लगे।

पर महारानी जैसे इस फुसफुसाहट तरंगित वातावरण से अविचलित*सी थी। वह धीरे-धीरे रथ से उतरीं। सैनिकों ने उनके सम्मान में गर्दन झुका लीं। उन्होंने एक तीव्र किन्तु गम्भीर दृष्टि निक्षेप उन पर किया और बोलीं “अब तुम लोग जा सकते हो।” स्वर नेपथ्य से आता लगा। रथों की गड़गड़ाहट थोड़ी ही देर में दूर-दूर बहुत दूर क्षितिज में जाकर विलीन हो गई।

सान्ध्य वेला में क्षमा ने तथागत के निजी आवास गृह में प्रवेश किया। वैराग्य से अभिभूत महारानी की मुखाकृति पर सात्विक आभा की चमक स्पष्ट थी। बुद्ध के चरणों में झुकते हुए उन्होंने कहा-”भगवन्! अब तक में अंधकार में भटकती रही। मुझे पता होगा ईश्वरीय नियमों के सम्मुख राजा और प्रजा दोनों ही समान है। मृत्यु और आधि भौतिक कष्टों परेशानियों के जाल-जंजाल से कोई भी नहीं बचता तो मेरा इतना जीवन व्यर्थ न गया होता। अब तक आत्मकल्याण के गई चरण पूरे कर लिए होते। प्रभु! अब मुझे शिष्या बनाकर मेरे आत्मकल्याण का मार्ग प्रदर्शित करें।

भगवान बुद्ध ने गम्भीर दृष्टि से क्षेमा की ओर देखा। एक क्षण कुछ अध्ययन किया। फिर कहा-”भद्रे! आत्मकल्याण के लिए साधना करने और गृह परित्याग से पहले यह जरूरी है कि जिन लोगों के प्रति अपने कर्तव्य हैं, उनकी पूर्ण स्वीकृति और सहमति प्राप्त की जाये। जब तक आप महाराज बिबिसार से आज्ञा नहीं प्राप्त कर लेतीं, दीक्षा का अधिकार आपको नहीं है।”

क्षेमा पुनः एक बार मगध लौटीं। वे सीधे बिबिसार के पास पहुँची। आभूषण रहित वेश और खुले हुए केश देखकर महाराज पहले ही समझ गए च्मा के मन में तीव्र आन्दोलन है। उन्होंने उठी हुई जिज्ञासा को रोकना उचित न समझा। महारानी के आग्रह पर उन्होंने अपनी स्वीकृति दे दी। वह पुनः भगवान बुद्ध के पास लौट आयी।

महारानी का धर्म पन्थ में प्रवेश राज्य की प्रजा के लिए कौतूहल और श्रद्धा का विषय बन गया था। हजारों की संख्या में नर-नारी एकत्रित होकर आश्रम पहुँचने और आत्मकल्याण की दीक्षा का आग्रह करने लगे। जब आश्रम में यह कोलाहल बढ़ता हुआ जा रहा था, तभी महारानी क्षेमा ने वहाँ प्रवेश किया।

भीड़ की ओर इशारा करते हुए भगवान बुद्ध ने कहा-”क्षेमा! देखो कितनी भीड़ तुम्हारा अनुकरण कर रही है जानती हो क्यों? सामान्य जन के पास भी ऐसी ही भक्ति होती, जैसी तुम्हारे हृदय में उमड़ रही है। किन्तु इनके पास न विचार होता है, न विवेक। इसीलिए इनका वैराग्य दृढ़ नहीं प्रबुद्ध व्यक्तियों के पद चिन्हों का अनुसरण करने का नियम संसार में सभी जगह है। आज तक तुम्हारा वैभव विलास का जीवन रहा, उसका अनुकरण यह लोग करते रहे। खान-पान, रहन-सहन व्यवहार बर्ताव में इनने वह सब बुराइयां पाल ली है, जो राजघरानों में होती है। इस स्थिति में इन्हें छोड़कर अकेले तुम्हें दीक्षा दी जा सकती है क्या?”

“नहीं भगवान्! “ क्षेमा ने संक्षिप्त उत्तर दिया। “तो फिर यह भी आवश्यक है कि इन सबमें भी उसी तरह का विचार-विवेक और वैराग्य जाग्रत हो, जिस तरह से तुम्हारे अन्तःकरण में उदित हुआ है। इसके लिए तुम्हें कुछ दिन इनके बीच रहकर इनके विकास की साधना करनी पड़ेगी। जब तुम यह दूसरा चरण भी पूरा कर लेगी, तब दीक्षा की पात्र बनोगी।”

क्षेमा उस दिन से जन -जन में ज्ञान-दान वितरण में जुट गई। कई वर्षों की समाज सेवा से जब उनका वैराग्य दृढ़ हो गया तब भगवान बुद्ध ने दीक्षा दी और आत्मकल्याण की साधना में प्रवेश कराया।


शिष्यों का संकल्प


शिष्यों का संकल्प (kavita)

क्रान्ति का अध्याय लिखकर, दे गये है आप जो, हम कदम उससे कभी, पीछे हटायेंगे नहीं।

याद तो हरदम सताण्गी, गुरुवर आककी, कायरों की भाँति हम, आँसू बहायेंगे नहीं।

आप शंकर बन जहर, पीते रहे संसार का, पर न व्रत छोड़ा कभी भी, आपने उपकार का।

दर्द इतना भर लिया था, जिन्दगी में आपने, ध्यान तक आया नहीं, क्षण भर कभी अधिकार का॥

किस तरह हम आप से, फिर कामना सुख की करें, बढ़ गये जिस राह पग, पीछे हटायेंगे नहीं।

इन्द्र-सा ऐश्वर्य पाकर भी, सदा वामन रहे, आह तक निकली न मुख से, घात है कितने सहे।

घूँट जीवन भर प्रभो, अपमान का तुमने पिया, भूल पाते है न कितना, दर्द दनुजों ने दिया॥

जानते हैं देव हम, उनको बहुत नजदीक से, किन्तु हम उनसे कभी, बदला चुकायेंगे नहीं।

दाँव पर बाजी लगी है, जीत हो या हार हो, प्रश्न यह उठता नहीं, अब कौन-सा आधार हो।

हम जहाँ भी है, हमारी हैसियत छोटी बड़ी, आपके चरणार-विन्दों, का वहीं उपहार हो॥

पाँव में छाले पड़ें या, आग पर चलना पड़े, किन्तु किंचित भी कदम यह डगमगायेंगे नहीं॥

आप हैं गुरु सूर्य-सम, पूजन प्रभो कैसे करें? लक्ष्य में आँखें लगी जो, वे सलिल कैसे झरें?

आप ओझल हो गये, तो क्या रहा संसार में, अर्चना के थाल में, श्रद्धा सुमन कैसे धरें?

आप जो दीपक जलाकर, रख गये हैं, सामने, लें, प्रभु विश्वास हम, उसको बुझायेंगे नहीं॥

क्रान्ति का अध्याय लिखकर, दे गये है आप जो, हम कदम उससे कभी, पीछे हटायेंगें नहीं,

-बलराम सिंह परिहारे


परम पूज्य गुरुदेव की अमृत वाणी

इस अंक में विदष प्रवास के समय दक्षिण अफ्रीका में केन्या की राजधानी ‘मोमबासा’ में 10 दिसम्बर 1972 को परिजनों के मध्य परम पूज्य गुरुदेव द्वारा दिया गया प्रवचन दिया जा रहा है।

गायत्री मंत्र जिन-जिन लोगों को याद हो, कृपा कर मेरे साथ-साथ बोलें-

ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।

भवानीशंकरौ बन्दे श्रद्धाविश्वासरुपिणो। याभ्याँ विना न पश्यन्ति सिद्धाःस्वान्तस्थमीश्वरम्॥

गोस्वामी तुलसी दास जी जब रामायण का निर्माण करने लगे तो उनके मन में एक विचार आया कि इतना बड़ा ग्रन्थ-जिसके जहाज पर बिठा करके संसार के प्राणियों का उद्धार किया जा सकता है, उसे बनाने के लिए मुझे क्या करना चाहिए? इसके लिए किस शक्ति की सहायता लेनी चाहिए? उन्होंने यह कहा कि भवानी-शंकर की वन्दना करनी चाहिए और उनकी सहायता लेनी चाहिए। उनकी शक्ति के बिना इतना बड़ा रामचरित मानस-जिस पर बिठा करके अनेक मनुष्यों को भवसागर से पार किया जा सकता है, कैसे सम्भव होगा? उन्होंने भवानी और शंकर की वंदना की जैसे कि सायंकाल आरती के समय हमने और आप लोगों ने भगवान शंकर और पार्वती की वन्दना की। पश्चात् उनके जी में एक और विचार आया कि आखिर भगवान शंकर हैं क्या? शक्ति कहाँ से आ जाती है? क्यों आ जाती है? उद्धार कैसे हो सकता है। ऐसे अनेक प्रश्न तुलसी दास जी के मन में उत्पन्न हुए। उनका समाधान भी उसी श्लोक में हुआ जिसका कि मैंने आप लोगों के सम्मुख विवेचन किया’-”भवानी शंकरौ वन्दे’ भवानी और शंकर की हम वन्दना करते है।

ये कौन हैं? ‘श्रद्धा विश्वास रुपिणौ’ अर्थात् श्रद्धा का नाम पार्वती और विश्वास का नाम शंकर। श्रद्धा और विश्वास-इन दोनों का नाम ही शंकर-पार्वती है। इनका प्रतीक विग्रह, मूर्ति हम मन्दिरों में स्थापित करते हैं। इनके चरणों पर अपना मस्तक झुकाते हैं। जल चढ़ाते हैं, बेल-पत्र चढ़ाते हैं, आरती करते हैं। यह सब क्रिया-कृत्य हम करते हैं, लेकिन मूलतः शंकर क्या हैं? श्रद्धा और विश्वास।- याभ्या विना न पश्चन्ति”-जिनकी पूजा किये बिना कोई सिद्ध पुरुष भी भगवान को प्राप्त नहीं कर सकते। भवानी शंकर की इस महत्ता और माहात्म्य पर मैं विचार करता रहा तब एक और पौराणिक कथा मेरे सामने आयी।

पौराणिक कथा आती है कि एक संकट का समय था जब भगवान परशुराम को यह मालूम पड़ा कि सब जगह अन्याय, अत्याचार फैल गया, अनाचार फैल गया। इसके निवारण के लिए क्या करना चाहिए? परशुराम जी उत्तरकाशी गये और वहाँ भगवान शिव का तप करने लगे। तप करने के पश्चात् भगवान शंकर ने उन्हें एक परशु दिया और कहा-अनीति का -अन्याय का और अत्याचार का इस संसार में से उच्छेदन किया जा सकता है और आपको करना चाहिए। भगवान शंकर की ऐसी महत्ता और ऐसी शक्ति का वर्णन पुराणों में पाया गया है, पर आज हम देखते हैं कि वह शक्ति कुँठित कैसे हो गयी? हम शंकर की पूजा करते हैं, पर समस्याओं से घिरे हुए क्यों हैं? शंकर की शक्ति वरदान हो करके सामने क्यों नहीं आती? शंकर के भक्त होते हुए भी हम किस तरीके से पिछड़ते और पददलित होते चले जा रहे हैं? भगवान हमारी कब सहायता करेंगे? यह विचार में देर तक करता रहा।

अठारह पुराणों का अनुवाद मैंने संस्कृत से हिन्दी में किया है। उसमें से शिवपुराण की एक कथा मुझे याद आयी, जिसने हमारी शंका का समाधान कर दिया कि भगवान शंकर-सहायता क्यों नहीं करते हमारी? क्यों नहीं उनकी शक्ति का लाभ मिलता? क्यों उनके चमत्कार हमें दिखाई नहीं पड़ते? जब कि शंकर भगवान के भक्त जिन्होंने क्या से क्या अनुदान प्राप्त किये हैं, जो भी तप करने के लिए खड़ा हो गया वहां न जाने क्या से क्या प्राप्त करता चला गया। हम और आप जैसे शिव-उपासक उस शक्ति को प्राप्त न कर सकते हों-सो ऐसी बात नहीं, पर कहीं न कहीं चूक रह जाती है-कहीं न कहीं भूल रह जाती है। उस भूल को हमें निकालना ही चाहिए। इसके बिना अध्यात्म का पूरा लाभ नहीं मिल सकेगा और दुनिया के सामने हम सिर ऊँचा उठा कर यह नहीं कह सकेंगे कि हम ऐसी शक्ति के उपासक हैं जो अपनी उँगली के इशारे से सारी दुनिया को हिला सकती है। तो गलती और चूक कहाँ हो गयी? चूक और गलती वहाँ हो गयी जहाँ भगवान शिव और पार्वती का असली स्वरूप हमको समझ में नहीं आया। उसके पीछे जो फिलॉसफी है वह समझ में नहीं आयी, मात्र उसका बाहरी स्वरूप समझ में आ गया।

भगवान शंकर का भी एक कलेवर है और एक प्राण एक बहिरंग स्वरूप है और एक अंतरंग स्वरूप। जब हम दोनों को मिला देंगे तब पॉजेटिव और निगेटिव दोनों तारों को मिला करके जिस तरीके से स्पार्क उठते हैं और करेण्ट चालू हो जाता है, उसी बहिरंग रूप के बारे में आप जानते है और जिस तक आप सीमित हो गये हैं वह कलेवर है तो इस मन्दिर में बैठा हुआ है। जिसके चरणों में हम मस्तक झुकाते है, जल चढ़ाते है, पूजा करते है, प्रार्थना करते हैं, आरती उतारते है और जयजयकार करते हैं-वह बहिरंग कलेवर है जिसकी भी सख्त जरूरत है, परन्तु यही सब कुछ नहीं है। हमें अंतरंग रूप के बारे में भी जानना चाहिए।

भगवान शंकर का अंतरंग रूप क्या है? उसकी फिलॉसफी क्या है? भगवान शंकर का रूप गोल बना हुआ हैं। गोल क्या-ग्लोब। यह सारा विश्व ही तो भगवान हैं अगर विश्व को इस रूप में माने तो हम उस अध्यात्म के मूल में चले जायेंगे जो भगवान राम और कृष्ण ने अपने भक्तों को दिखाया था। गीता के अनुसार जब अर्जुन मोह में डूबा हुआ था तब भगवान ने अपना विराट् रूप दिखाया और कहा-यह सारा विश्व ब्रह्मांड जो कुछ भी है-मेरा ही रूप है। एक दिन यशोदा कृष्ण को धमका रहीं थीं कि तैंने मिट्टी खाई है। वे बोले-नहीं-मैंने मिट्टी नहीं खाई है और उन्होंने मुँह खोलकर सारा विश्व ब्रह्मांड दिखाया और कहा- यह मेरा असली रूप है। भगवान राम ने भी यही कहा था। रामायण में वर्णन आता है कि माता-कौशल्या और काकभुशुंडि जी को उनने अपना विराट् रूप दिखाया था। इसका मतलब यह है कि हमें सारे विश्व को भगवान की विभूति -भगवान का स्वरूप मानकर चलना चाहिए। शंकर की गोल पिण्डी उसी का छोटा-सा स्वरूप है जो बताता है कि यह विश्व-ब्रह्मांड गोल है, एटम गोल है धरती माता-विश्वमाता गोल है। इसको हम भगवान का स्वरूप मानें और विश्व के साथ वह व्यवहार करें जो हम अपने लिए चाहते हैं दूसरों से, जो मजा आ जाय। फिर हमारी शक्ति, हमारा ज्ञान, हमारी क्षमता वह हो जाय जो शंकर भक्तों की होनी चाहिए।

भगवान शंकर के स्वरूप का कैसा-कैसा सुन्दर चित्रण मिलता है। शिवजी की जटाओं में से गंगा प्रवाहित हो रही है। गंगा का मतलब है-ज्ञान की गंगा। पानी बालों में से प्रवाहित नहीं होता-यदि होगा तो आदमी डूब जायेगा, पैदल नहीं चल सकेगा। इसका मतलब यह है कि शंकर -भक्त के मस्तिष्क में से ज्ञान की गंगा प्रवाहित होनी चाहिए उसकी विचारधारा उच्चकोटि की और उच्चस्तरीय होनी चाहिए। घटिया किस्म के आदमी जिस तरीके से विचार करते हैं, जिनकी जिन्दगी का मकसद केवल एक ही है कि किसी तरीके से पेट भरना चाहिए और औलाद पैदा करनी चाहिए, शंकर जी के भक्त को उस तरह के विचार करने वाला नहीं होना चाहिए। जो कोई ऊँची बात सोच नहीं सकते, देश की, समाज की, धर्म की, लोक-परलोक की बात, कर्तव्य-फर्ज की बात जिनकी समझ में नहीं आती-उनको इंसान नहीं हैवान कहेंगे और ज्ञान की गंगा जिन लोगों के मस्तिष्क में से प्रवाहित होती है उनका नाम शंकर का भक्त होता है। हमारे और आपके मस्तिष्क में से भी ज्ञान की गंगा बहनी चाहिए जो हमारी आत्मा को शान्ति और शीतलता दे सकती है और पड़ोस के लोगों को, समीपवर्ती लोगों को उसमें स्नान कराकर पवित्र बना सकती है। यदि हमारा मस्तिष्क ऐसा व्यवहार करता हो तो जानना चाहिए कि शंकर जी की छवि आपने अपने घरों में टाँग रखी है उसके मतलब को-उसकी फिलॉसफी को जान लिया और समझ लिया।

भगवान शंकर के मस्तक के ऊपर चन्द्रमा लगा हुआ है। चन्द्रमा शान्ति का प्रतीक है जो बताता है कि हमारे मस्तिष्क को संतुलित होना चाहिए, ठंडा होना चाहिए, बलिष्ठ होना चाहिए हम पर मुसीबतें आती है, संकट के कठिनाई के दिन आते है। हर हालत में हमें अपनी हिम्मत बना करके रखनी चाहिए कि हम हर मुसीबत का सामना करेंगे। इनसानों ने बड़ी-बड़ी मुसीबतों का सामना करेंगे। इनसानों ने बड़ी-बड़ी मुसीबतों का सामना किया है। जो घबरा जाते हैं उनका मस्तिष्क संतुलित नहीं रहता-गर्म हो जाता है। जिस व्यक्ति का दिमाग ठंडा है वही सही ढंग से सोच सकता है और सही काम कर सकता है पर जिसका दिमाग गरम हो जाता है-असंतुलित हो जाता है, तो वह काम करता है जो नहीं करना चाहिए और वह सोचता है जो सोचना चाहिए। मुसीबत के वक्त आज जब घटायें चारों ओर से हमारी ओर घुमड़ती हुई आ रही हैं, तब सबसे जरूरी बात है हम शंकर भगवान के चरणों में जाये। आरती उतारने के बाद मस्तक झुकायें और यह कहें कि आपके मस्तक पर शान्ति का प्रतीक, विभेद का प्रतीक चन्द्रमा लटक रहा है। क्या आप हमको धीरज देंगे नहीं? संतुलन देंगे नहीं? क्या शान्ति नहीं देंगे? हिम्मत नहीं देंगे? क्या आप इतनी भी कृपा नहीं कर सकते? अगर हमने यह प्रार्थना की होती तो मजा आ जाता, फिर हम शान्ति ले करके आते और शंकर जी के भक्तों के तरीके से रहते।

शंकर भगवान के गले में पड़े हुए है काले साँप और मुण्डों की माला। काले विषधरों का इस्तेमाल इस तरीके से किया है उन्होंने कि उनके लिए वे फायदेमन्द हो गये, उपयोगी हो और काटने भी नहीं पाये। शंकर जी की इस शिक्षा को हर शंकर भक्त को अपनी फिलॉसफी में सम्मिलित करना ही चाहिए कि विषैले लोगों से किस तरीके से ‘डील’ करना चाहिए, किस तरीके से उन्हें गले से लगाना चाहिए और किस तरीके से उनसे फायदा उठाना चाहिए। शंकर जी के गले पर पड़ी मुण्डों की माला भी यह कह रही है जिस चेहरे को मि बीस बार शीशे में देखते हैं, सजाने-सँवारने के लिए रंग-पाउडर पोतते हैं, वह मुण्डों की हड्डियों का टुकड़ा मात्र है। चमड़ी-जिसे ऊपर से सुनहरे चीजों से रंग दिया गया है और जिस बाहरी टुकड़े के रंग के हम देखते हैं, उसे उघाड़कर देखें तो मिलेगा कि इनसान की जो खूबसूरती है उसके पीछे सिर्फ हड्डी का टुकड़ा जमा हुआ पड़ा है। हड्डियों की मुण्डमाला की यह शिक्षा है-नसीहत है मित्रो! जो हमको शंकर भगवान के चरणों में बैठ कर सीखनी चाहिए।

शंकर जी का विवाह हुआ तो लोगों ने कहा कि किसी बड़े आदमी को बुलाओ-देवताओं को बुलाओ। उनने कहा नहीं, हमारी बारात में तो भूत-पलीत ही चलेंगे। रामायण का छन्द है- तनु क्षीन कोउ आति पीन पावन कोउ अपावन तनु धरे।” शंकर जी ने भूत-पलीतों का पिछड़ों का भी ध्यान रखा और अपनी बारात में ले गये। आपको भी इनको साथ लेकर चलना है। शंकर जी भक्तो! अगर आप इन्हें साथ लेकर चल नहीं सकते तो फिर आपको सोचने में मुश्किल पड़ेगी-समस्याओं का सामना करना पड़ेगा और फिर जिस आनंद में और खुशहाली में शंकर के भक्त रहते है, आप रह नहीं पायेंगे। जिन शंकर जी के चरणों में आप बैठे हुए हैं उनसे क्या कुछ सीखें, नहीं? पूजा ही करते रहेंगे आप! यह सब चीजें सीखने के लिए ही हैं। भगवान को कोई खास पूजा की आवश्यकता नहीं पड़ती।

शंकर भगवान की सवारी क्या थी? बैल वह बैल पर सवार होते हैं। बैल उसे कहते हैं जो मेहनतकाश होता है-परिश्रमी होता है। जिस आदमी को मेहनत करनी आती है वह चाहे भारत में हो, इंग्लैण्ड, फ्राँस या कहीं का भी रहने वाले क्यों न हो-वह भगवान की सवारी किया करते है जो अपनी सहायता आप करते है। बैल हमारे यहाँ शक्ति का प्रतीक है, हिम्मत का प्रतीक है। आपको हिम्मत के काम लेना पड़ेगा और अपनी मेहनत तथा पसीने के ऊपर निर्भर रहना पड़ेगा, अपनी अकल के ऊपर निर्भर रहना पड़ेगा, आपके उन्नति के द्वार और कोई नहीं खोल सकता स्वयं खोलना होगा। भैंसे के ऊपर कौन सवार होता है-देखा आपने शनीचर। भैंसा वह होता है जो काम करने से जी चुराता है। बैल -हमेशा से शंकर जी का बड़ा प्यारा रहा है। वह उस पर सवार रहे हैं, उसको पुचकारते हैं, खिलाते-पिलाते, नहलाते-धुलाते और अच्छा रखते है। हमको और आपको बैल बनना चाहिए-शंकर जी की शिक्षा है।

भगवान शंकर मरघट में निवास करते हैं। मरघट में क्यों रहते हैं? इसका मतलब है कि हमें जिन्दगी के साथ मौत को भी याद रखना पड़ेगा। सब चीजें याद हैं, पर मौत को हम भूल गये। अपना फायदा-नुकसान, जवानी, खाना-पीना सब कुछ याद है, पर मौत जरा भी याद नहीं? मौत की बात भी अगर याद रही होती तो हमारे काम करने और ऐसे न होते जैसे कि इस समय आपके हैं। अगर यह ख्याल बना रहे कि आज हम जिंदा है, पर कल हमें मरना ही पड़ेगा-आज मरे हैं, पर कल जिंदा रहना ही पड़ेगा तो यह स्मृति सदा बनी रहती कि हमको क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए। हमारे लिए मरघट और घर दोनों एक ही होने चाहिए। समझना चाहिए कि आज का घर कल मरघट होने वाला है और आज की जिन्दगी कल मौत में बदलने वाली है। मौत और जिन्दगी रात और दिन के तरीके से खेल हैं, फिर मरने के लिए डरने से क्या फायदा। यह नसीहतें हैं जो शंकर भगवान मरघट में रहकर के हमको सिखाते हैं।

भगवान शंकर न जाने क्या-क्या सिखाते हैं उनके शरीर को देखा जाय तो मालूम पड़ेगा कि उस पर भस्म लगी हुई है और गले में मुण्डों की माला पड़ी है। अगर सही ढंग से जीवन जीना आता होता तो हमने शंकर जी की भस्म का महत्व समझा होता। पूजा करने के बाद हम हवन करते और उसकी भस्म मस्तक पर लगाते हैं। इसका अर्थ है”भस्मान्तक शरीरम्-” यह शरीर खाक होने वाला है। यह शरीर मिट्टी और धूल है जो हवा में उड़ने वाला है। जिस शरीर पर हम लोगों को अहंकार और घमंड है, वह कल लोगों के पैरों तले कुचलने वाला है और हवा के धुर्रें की तरीके से आसमान में उड़ने वाला है। शंकर भगवान की यह फिलॉसफी अगर हमने समझी होती तो मजा आ जाता।

शंकर भगवान की तीन आँख हैं। दो आँखें तो सबकी होती है, पर शंकर जी की तीन आंखें क्यों बनायी गयी? शंकर भगवान की यह वह आँख है जो मनुष्य के ‘विवेक की आँख कहलाती है। यह तीसरी आँख आपके भी होती है। उन्होंने इसका इस्तेमाल तब किया जब कामदेव उन्हें हैरान करने और पाप में डुबाने के लिए चला आ रहा था। जैसे ही शंकर भगवान ने तीसरी आँख खोली, कामदेव जलकर भस्म हो गया। रामायण में यह कभी आप लोगों ने पढ़ी होगी, पर यह गौर क्यों नहीं किया कि तीसरी आँख क्या है? कामदेव जलने की बात क्या है? जिन लोगों ने साइंस पढ़ी है -वे ‘थ्री डायमेंन्सन’ की बात जानते हैं। तीसरी आँख हमें गहराई में घुसने की बात सिखाती है। गहराई में हम घुसते नहीं-बाहर की चीजें देखते हैं। हमें दो चीजें दिखाई देती हैं-सुख और दुख लाभ और हानि। यहीं दो चीजें है जो दोनों आँखें दिखा सकती है। ये दुनियादारी आँखें हैं जो भगवान ने आपको दी है। शरीर क्या माँगता है? इन्द्रियाँ क्या माँगती हैं? यह हम सबको मालूम दिखाती है। शंकर के हर एक भक्त को भी एक तीसरी आँख रखनी चाहिए और खोलनी चाहिए और वह है दूरगामी विवेकशीलता।

शंकर का भक्त जब अपने भगवान के चरणों में जाता है तब वह देखता है कि ठप्पे पर मुझको भी अपने को ढालना चाहिए। शंकर भगवान क्या हैं-एक ठप्पा उसे कहते है जिसमें गीली मिट्टी चिपकाकर कुम्हार बर्तन बनाता चला जाता है। शंकर भगवान के लिए पूजा और आरती ही काफी नहीं है, बल्कि यह भी आवश्यक है कि उनका भक्त उनके जैसा हो जाय। पास बैठने का मतलब है-उनसे सीखना, उनके साथ सम्बन्ध जोड़ना। लकड़ी जब तक आग के समीप नहीं बैठती-अग्नि नहीं बन सकती। हमको शंकर भगवान के पास तक जाना पड़ेगा, दूर रहकर ही प्रणाम करने से काम चलने वाला नहीं है। शंकर जी से चिपक जाना चाहिए और अपने आपको ठप्पा बना लेना चाहिए। हमको अपनी तीसरी आँख खोलनी चाहिए और दूर की बात सोचनी चाहिए।

देवताओं की शिक्षाओं और प्रेरणाओं को मूर्तमान करने के लिए अपने ही हिन्दू समाज में प्रतीक पूजा की व्यवस्था की गयी है। जितने भी देवताओं के प्रतीक है, उन सबके पीछे कोई न कोई संकेत भरा पड़ा है, प्रेरणायें और दिशायें भरी पड़ी है। अभी भगवान शंकर का उदाहरण दे रहा था मैं आपको और यह कह रहा था कि सारे विश्व का कल्याण करने वाले शंकर जी की पूजा और भक्ति के पीछे जिन सिद्धान्तों का समावेश है हमको उन्हें सीखना चाहिए था, जानना चाहिए था और अपने जीवन में उतारना चाहिए था। लेकिन हम उन सब बातों को भूलते चले गये और केवल चिन्ह पूजा तक सीमाबद्ध रह गये। विश्व कल्याण की भावना को भी हम भूल गये। जिसे ‘शिव’ शब्द के अर्थों में बताया गया है। ‘शिव’ माने कल्याण। कल्याण की दृष्टि रखकर के हमको कदम उठाने चाहिए और हर क्रिया-कलाप एवं सोचने के तरीके का निर्माण करना चाहिए। यह विश्व शब्द का अर्थ होता है। कल्याण हमारा कहाँ है? सुख हमारा कहाँ है? यह नहीं वरन् कल्याण हमारा कहाँ है? कल्याण को देखने की अगर हमारी दृष्टि पैदा हो जाय तो यह कह सकते है कि हमने भगवान शिव के नाम का अर्थ जान लिया। “ॐ नमः शिवायः” का जप तो किया, लेकिन ‘शिव’ शब्द का मतलब क्यों नहीं समझा। मतलब समझना चाहिए था और तब जप करना चाहिए था, लेकिन हमारा मतलब को छोड़ते चले जा रहे हैं और बाह्य रूप को पकड़ते चले जा रहे हैं। इससे काम बनने वाला नहीं है।

हिन्दू समाज के पूज्य जिनकी हम दोनों वक्त आरती उतारते है, जप करते है शिवरात्रि के दिन पूजा और उपवास करते हैं, और न जाने क्या प्रार्थनायें करते कराते हैं। क्या वे भगवान शंकर हमारी कठिनाइयों का समाधान नहीं कर सकते? क्या हमारी उन्नति में कोई सहयोग नहीं दे सकते? भगवान को देना चाहिए, हम उनके प्यारे हैं, उपासक हैं। हम उनकी पूजा करते है वे बादल के तरीके से हैं। अगर पात्रता हमारी विकसित होती चली जायगी तो वह लाभ मिलते चले जायेंगे जो शंकर भक्तों को मिलने चाहिए।

शंकर भगवान के स्वरूप का जैसा कि मैंने आपको निवेदन किया, इसी प्रकार से सारे पौराणिक कथानकों, सारे देवी-देवताओं में संदेश और शिक्षायें भरी पड़ी हैं। काश! हमने उनको समझने की कोशिश की होती, तो हम प्राचीनकाल के उसी तरीके से नर रत्नों में एक रहे होते जिनको कि दुनिया वाले तैंतीस करोड़ देवता कहते थे। 33 करोड़ आदमी हिन्दुस्तान में रहते थे और उन्हीं को लोग कहते थे कि वे इंसान नहीं देवता हैं, क्योंकि उनके ऊँचे विचार और ऊँचे कर्म होते थे। वह भारत भूमि जहाँ से आप लोग पधारे है, वह देवताओं की भूमि थी और रहनी चाहिए। आपको यहाँ देवताओं के तरीके से आना चाहिए। देवता जहाँ कहीं भी जाते है वहाँ शान्ति, सौंदर्य, प्रेम और सम्पत्ति पैदा करते है आप लोग जहाँ कही भी जांय वहाँ आपको ऐसा ही करना चाहिए। आप लोगों ने जो अब तक मेरी बात सुनी, बहुत बहुत आभार आप सब लोगों का।

ॐ शान्ति।


Quotation

तकलीफों से बचकर आदर्शों को छोड़ बैठना न बहादुरी है न बुद्धिमानी। यह तो कायरता है और है नादानी। तकलीफों में पड़े-पड़े सड़ना तो और भी बुरी बात है। उनसे जूझने में ही भलाई है।


“अश्वमेध” जो ब्रह्मवर्चस् का जागरण कर रहे हैं!

शतपथ ब्राह्मण में अश्वमेध की व्याख्या करते हुए अनेकानेक इष्टियों में उसकी महिमा का गान हुआ है। तेरहवें काण्ड के इस प्रकरण के अंतर्गत उल्लेख आता है-

एषवाऽऊर्जस्वात्राम यज्ञः। यत्रैतेन यज्ञेन यजन्ते सर्वमेवोर्जस्वद् भवति॥ 13-3-7-6

अर्थात् “इस यज्ञ का नाम ऊर्जस्वान (दिव्य ऊर्जा प्रदान करने वाला )है। जहाँ यह यज्ञानुष्ठान संपन्न होता है, वहाँ सभी लोग ऊर्जास्वी (प्राणवान) बन जाते है।” थोड़ा इस अर्थ को गहराई से समझने का प्रयास करें। लौकिक अर्थों में ऊर्जा वह है जो कैलोरी के रूप में ग्रहण की जाती है। आहार में विभिन्न पोषक द्रव्यों को लेने से शरीर में जो ताकत आती है, वह ऊर्जा उत्पन्न करती है एवं जब यह ऊर्जा काया के अवसान के पश्चात् पलायन कर जाती है तो व्यक्ति निष्प्राण या मृत कहलाता है। स्थूल दृष्टि से ऊर्जा का यही अर्थ भौतिकी व जैविकी की विधाओं के अंतर्गत आता है। यदि प्राणवान शब्द से इसी ऊर्जा से अभिपूरित व्यक्ति की चर्चा की जा रही है तो इस धरती का एक-एक प्राणी इस परिभाषा में आ जाता है। स्थूल अंग-अवयव संरचना की दृष्टि से वह कैसा भी हो, इन इन्द्रियों का नियोजन वह चाहे जिस दिशा में करता हो, उसे इस परिभाषा के अनुसार तो प्राणवान ही कहना चाहिए। नरपशु जो शिश्नोदर परायण होते हैं तथा पशु जो मूक है, अपनी भावना विचारणा वाणी द्वारा व्यक्त नहीं कर सकते किंतु प्राणतत्व जिनके रोम-रोम में स्पन्दन कर रहा है, इसी दायरे में आ जाने चाहिए। किन्तु ऐसा है नहीं।

जब हम ऋषियों की अभिव्यक्ति की निराली शैली का गहरा विवेचन करते है तो हम पाते है कि वे व्यक्ति को इस यज्ञ के द्वारा “ऊर्जावान” बनाने की बात करते है। प्राण वे जो दिव्य ऊर्जा के पर्याय है। लौकिक नहीं। एक ग्राम पानी को जो एक सेंटीग्रेट तापमान तक ऊष्मायुक्त कर दे, वह लड़ाई ऊष्मायुक्त कर दे, वह इकाई ऊर्जा की एक कैलोरी कहलाती हैं यह लौकिक परिधि वाली ऊर्जा हैं किंतु अश्वमेध यज्ञ जिस ऊर्जा से याजक को-साधक को अभिपूरित करता है, वह अत्यन्त विलक्षण है। वह सामान्य ऊर्जा को दिव्यऊर्जा में बदलकर व्यक्ति को सामान्य न रहने देकर असामान्य रूप से प्राणवान-शक्ति संपन्न आत्मबल संपन्न ओजस्वी ऊर्जास्वी बना देता है। जिसकी ऊर्जा ऊर्ध्वमुखी हो, वह ऊर्जास्वी है। जो उसे असंयम के छिद्रों से नित्य के जीवन व्यवहार में अपनी जीवन जीने की अपव्यय प्रधान शैली से प्राणतत्व को गँवाता रहता है, वह तो मुर्दों में गिने जाने योग्य-निष्प्राण-निस्तेज-जीवनी-शक्ति-विहीन एक रोगी व्यक्ति समाज में है जिन्हें पीड़ित मानवता की पुकार, भाव संवेदना रूपी अध्यात्म ज्ञान समाज-राष्ट्र को क्षीण-दुर्बल बनाने वाली हलचलों से कोई मतलब नहीं। वे शरीर से ऊपर उठ ही नहीं पाते। अनगढ़ता प्रधान जीवन जीते हुए “हम शरीर है, इसका पोषण करना व इसे सँवारना चाहिए इससे जुड़े हैं, वे मेरे है, औरों से मुझे क्या मतलब?” इस मान्यता में प्रायः अपनी सारी जीवन सम्पदा होम कर देते है। ऐसे व्यक्तियों का अनुपात जिस समाज में अधिक रहता है, वह समाज दुर्बल-अशक्त होता है व जब जिसके मन में आता है अपनी शक्ति के बलबूते उन पर आधिपत्य स्थापित कर लेता है। निर्वीर्य ऐसे ही समाज के व्यक्ति कहे जाते है क्योंकि प्राण की हलचलें काया में दीख पड़ते हुए भी उनमें पौरुष-पराक्रम कहीं हिलोरें लेता दिखाई नहीं देता।

ऋषि कहते हैं-जो व्यक्ति शरीर से उठकर मन में तथा मन की दुर्बलताओं से मुक्त होकर चित्त में विद्यमान संस्कारों का भी साक्षी भाव से दर्शन-परिमार्जन कर जब शुद्ध अहं तत्व को प्राप्त होता है तो वास्तविक रूप से प्राणवान बनने की दिशा में अग्रगामी होता है। चेतना की एनोटॉमी का अंतःकरण चतुष्टय का यह पाठ पढ़ने के लिए किसी भी साधक को किसी मेडिकल कॉलेज या ऋषि आरण्यक की नहीं, अंतः की गुहा में प्रवेश कर इस तत्व की अनुभूति करने की आवश्यकता पड़ती है कि वह शुद्ध रूप में क्या है। आत्मसत्ता पर छाए है कि वह शुद्ध रूप में क्या है। आत्मसत्ता पर छाए धुँधलेपन को मिटाता हुआ जो पवित्रता के रूप में योग की उच्चतम सिद्धि को प्राप्त कर लेता है तथा अपनी शक्तियों को ऊर्ध्वमुखी बनाता हुआ अपनी ईश्वर प्रदत्त ऊर्जा को लौकिक से दिव्य ऊर्जा में बदल लेता है, वह निश्चित ही प्राणवान कहलाता है- प्राणमयकोश की सिद्धि का अधिष्ठाता बनता है तथा अपनी ऊर्जस्विता से सारे समुदाय के मनोबल को ऊँचा उठाता हुआ अध्यात्म की श्रेष्ठतम उपाधियों को प्राप्त करते हुए समाज व राष्ट्र की सर्वांगीण प्रगति का निमित्त कारण बनता है।

वैदिक काल को ऊर्जस्विता प्रधान व्यक्तियों का काल कहा जाता है। गायत्री रूपी वह रसायन जो अनगढ़ को भी ब्राह्मण बना देता है तथा यज्ञ रूपी वह तप साधना विधान जो आत्मतत्व का परिशोधन-परिष्कार करने की, आदर्शों को कर्तृत्व में समाहित करने की शिक्षा देता है, देव संस्कृति के दो मूल आधार रहे है। उसमें भी यदि अश्वमेधी स्तर का गायत्री महायज्ञ समाज में समय पर संपन्न हो रहा है, आत्मबल संपन्न ऋषिगण-राष्ट्र को तेजस्वी-पराक्रम बनाने के उद्देश्य से क्षात्रबल अपनाने वाले राष्ट्राधिपति उसे संपन्न करा रहे तो निश्चित ही यह मानकर चलना चाहिए कि असुरता से मोर्चा ले, मानसिक दुर्बलताओं से जूझते हुए जन-जन को ऊर्जस्विनी ओजस्वी, प्राणशक्ति संपन्न बनाने की प्रक्रिया संपन्न हो रही है। यदि कहीं इस पुरुषार्थ में व्यक्तिक्रम आ रहा है तो यह समझ लेना चाहिए कि धर्म के नाम पर कर्मकाण्ड की चिह्न-पूजा तो संपन्न हो रही है किन्तु इसमें वह अध्यात्म तत्व नहीं है जिसका मूल प्रयोजन हो देवशक्तियों और उनके अधिष्ठाता परमात्मा में सामंजस्य स्थापित करना है। अध्यात्म घनीभूत संवेदनाओं को जीवन में देने की प्रक्रिया का नाम है तथा वह सबसे पहले व्यक्ति को शूरवीर, प्राणवान तथा शक्ति संपन्न बनाने का कार्य संपन्न करता है। ऋषियुग में यहीं सब होने से प्राणवान व्यक्तियों का मनीषियों का-शूरवीरों का कभी अकाल नहीं था।

आज यदि कोई सबसे बड़ा संकट है तो वह है प्राणों का, मनोबल का, ओजस्विता का जीवनी शक्ति का। कहीं कोई प्राणवान, तेजस्वी, मनस्वी दिखाई ही नहीं देते जिन्हें समाज का कीर्ति-स्तम्भ कहा जा सके व यह आशा मन में रखी जा सके कि वे मानव मात्र का मार्ग दर्शन कर राष्ट्र व विश्व को संगठित -शक्तिशाली बना सकें। अशक्ति को दुःखों का सबसे बड़ा कारण बताया गया है तो असुरता के पैर जमने के लिए भी वहीं निमित्त कारण बनती है। अशक्ति से यहाँ तात्पर्य प्राणों की शक्ति की न्यूनता से है, किसी पोषक तत्व की कमी या व्याधि जन्य दुर्बलता से नहीं। हाँ! यह आवश्यक है कि शरीर व मन में रोगों के आ घुस पड़ने, घर में पैर जमा लेने तथा समाज में असुरक्षा को जन्म देने वाले अनेकानेक कारण उत्पन्न करने में अशक्ति की मुख्य भूमिका होती है। तनाव आज बाहर के कारणों से जितना नहीं हैं, उतना व्यक्ति की स्वयं की प्राण के कारण है तथा आत्मबल की कमी के कारण है। जब समाज व राष्ट्र की ईकाई ही कमजोर होगी तो कैसे एक सशक्त राष्ट्र रूपी भवन की आशा इन घटकों से लगायी जाय। यह आज का सबसे अहम् यक्ष प्रश्न है, जिसका उत्तर इक्कीसवीं में कदम रखने वाली नयी पीढ़ी हम से माँगती है।

सारी समस्याओं का समाधान अध्यात्म है, यह युगऋषि परमपूज्य गुरुदेव का मत हैं। अध्यात्म अर्थात् पशु प्रवृत्तियों को-एनीमल इंस्टींक्ट्स को देव आस्थाओं में बदल देने वाली एक सशक्त प्रक्रिया जो व्यक्ति को प्रसुप्त से जाग्रति में ले जाती है। निर्वीय-अनशक्त निस्तेज व्यक्ति प्राणों से युक्त तो है किन्तु उस कला से अनभिज्ञ है जो उन प्राणों का ऊर्ध्वगमन कर उसे वीर्यवान-शक्तिमान-तेजवान बनाना सिखाती है। अध्यात्म इसी उच्चतम स्तर का पराक्रम है तथा अश्वमेधी प्रक्रिया के द्वारा व्यक्ति को प्राणवान बनाता हुआ उस मूलभूत समस्या से जूझता है जो ऋषि अपनी विलक्षण शैली में इसी तथ्य को पुनः प्रतिपादित करता हुआ शतपथ ब्राह्मण में 13-3-7-8 में यह कहता है-

“एष वै ब्रह्मवर्चसी नाम यज्ञः। यत्रैतेन यज्ञेन यजनतऽआ ब्राह्मणों ब्रह्मवर्चसी जायते॥”

अर्थात्-”इस यज्ञ का नाम “ब्रह्मवर्चसी “ है अर्थात् ब्रह्मवर्चस् प्रदायक। इस यज्ञानुष्ठान में भाग लेने वालों को “ब्रह्मवर्चस्” की प्राप्ति होती है।

यह “ब्रह्मवर्चस् “ क्या है। अथर्ववेद में गायत्री महासत्ता से-वेदमाता से स्तुति करते हुए इह लोक के सात तथा परलोक में परमपद की प्राप्ति रूपी आठवें लाभ की प्राप्ति रूपी सूक्त में यहीं माँगा गया है।

“स्तुतामया वरदा वेदमाता प्रचेदयन्ताम्। पावमानी द्विजानाँ आयुः प्राणं प्रजाँ॥

पशु कीर्ति द्रविणं ब्रह्यवर्चसम!। मह्यम दत्वा व्रजत ब्रह्यलोकम्॥”

ब्रह्मवर्चस्-अर्थात् वह बल वह वर्चस् जो आत्मसत्ता को ब्रह्म के समकक्ष बनाता हो। आत्मबल संपन्न व्यक्ति ही ब्रह्मवर्चस् संपन्न कहा गया है। ऐसा व्यक्ति किसी से डरता नहीं सिवा भगवान के। किसी चीज का लोभ नहीं रखता न लौकिक वस्तुओं का न जीवन्मुक्ति का, मोक्ष का। उस का लक्ष्य एक ही होता है कि अपनी आत्मसत्ता के बलबूते वह मल्लाह की तरह अपनी नैया में बिठाकर मजबूत, माँसल, पराक्रमी भुजाओं के सहारे डाँड चलाता हुआ वह अगणित व्यक्तियों को मझधार में इससे उस पार पहुँचा दे। अकेले नहीं, अपितु समूचे समूह-समाज या राष्ट्र का दायित्व जिस पर हो जो सही अर्थों में “ग्रुप लीडर” लोकनायक हो तथा अगणित व्यक्तियों में प्राण फूँकने की सामर्थ्य रखता हो, ऐसा वर्चस्वी व्यक्ति ही ऋषियों को अश्वमेध रूपी महायज्ञीय पराक्रम से अभीष्ट है। ऐसे व्यक्ति जब समाज में अधिकाधिक संख्या में गढ़े जाने लगते है तो समाज निर्भय, सुरक्षित व संगठित हो प्रगति की दिशा में अग्रसर होता चला जाता है।

ब्रह्मवर्चस् के दो पक्ष शब्दार्थ की दृष्टि से स्पष्ट किए जा सकते है। एक “ब्रह्मविद्या” अर्थात् चिंतन का, दृष्टिकोण का परिष्कार तथा “वर्चस्” अर्थात् प्रसुप्त अंतःशक्तियों का जागरण, तेजस् का वर्धन-प्रतिमा का जागरण। यह प्रज्ञा और पराक्रम का युग्म है जो ब्रह्मवर्चस् से स्पष्ट होता है। गायत्री व सावित्री दोनों का इस शब्द में समन्वय है। जहाँ गायत्री मेधा संवर्धन करती-प्रसुप्ति का जागरण कर जीवन्मुक्ति का, शान्ति का, मोक्ष का पथ प्रशस्त करती है वहाँ सावित्री सर्वतोमुखी समर्थता, प्रखरता, पराक्रमशीलता मन्यु उभारने वाली प्रक्रिया है। एक प्राणाग्नि का जागरण करती है तो दूसरी ब्रह्माग्नि का। ब्रह्मज्ञान व ब्रह्मतेज के समन्वित जागरण से साधक का ब्रह्मवर्चस् जागता है एवं यही अश्वमेधीय पराक्रम संपन्न होता शतपथ ब्राह्मण के ऋषि ने दर्शाया है।

सभी जानते है कि गायत्री का महामंत्र देवता सविता है। सविता प्राण रूप है तो गायत्री प्राणों का त्राण करने वाली ब्रह्मवर्चस्-वर्धक दिव्य प्राण दिया है। सविता को भी प्रसविता प्रेरणादायक, उत्पत्तिकर्त्ता रचयिता कहा गया है। “वेद रहस्य” में श्री अरविंद कहते हैं कि साधक की प्राणशक्ति के जागरण की प्रक्रिया सविता की प्रेरणा से ही संपन्न होती है। सविता की परिभाषा करते हुए वे लिखते है-”जो रचयिता है, सत्य के रूप में सतुत्य है, मनुष्य का पोषक है, मनुष्य की अहंभाव से निकालकर विश्वव्यापी बना सीमित से असीम कर देता है वहीं सविता है।” वे लिखते है कि सूर्य सविता है अपने रचनात्मक प्रकाशक सौर रूपों वाली दिव्य सत्ता के रूप में। सूर्य विप्र है-प्रकाशमान, विशाल, स्पष्ट विचार वाला तथा ज्ञानाधिपति है। ऋग्वेद के पाँचवें मण्डल के 89 वें सूक्त के पहले श्लोक में बड़ी विलक्षण स्तुति सविता की आयी है। भाव है महान उस सविता देव की व्यापक स्तुतिः, (मही देवसय सवितुः परिष्टुतिः )जो तीन प्रकाश मान लोकों में जाता है और सूर्य की किरणें द्वारा पूरी तरह से अभिव्यक्त होता है।

अश्वमेध महायज्ञ एक विलक्षण अनुष्ठान रूपी प्रयोग है जो राष्ट्र के ब्रह्मवर्चस् पराक्रम शौर्य के जागरण के लिए इन दिनों भारत व विश्वभर में संपन्न हो रहा है। शतपथ ब्राह्मण के 13 वे काण्ड में अश्वमेध व सूर्य दोनों के लिए “ब्रह्मवर्चस्” संबोधन का प्रयोग हुआ है जबकि गायत्री महाविद्या भी ब्रह्मवर्चस् प्रदायक है जैसा कि अथर्ववेद में उल्लेख है। “एष वै तेजस्वी नाम यज्ञः” प्रसंग में भी यह अश्वमेध यज्ञ तेजस्विता प्रदान करने वाला है, यह कहा गया है। हम सभी इस महायज्ञ-यज्ञों के राजा अश्वमेध के माहात्म्य फलश्रुतियों को समझें व इसमें भागीदारी कर स्वयं समाज व राष्ट्र को शौर्य, तेज, वर्चस् संपन्न बनाये। यही इस युग का परम पुरुषार्थ है।


असमंजस दूर हो गया (kahani)

आत्म-ज्ञान की शिक्षा प्राप्त कर जब श्रुतधर वापस लौटे और हर वस्तु के बाहरी रूप का निरीक्षण परीक्षण आरंभ किया तो सर्वत्र गंदगी दिखाई दी और यहाँ तक कि अपना शरीर भी मल मूत्र का पिटारा भर दीखने लगा। संसार की भ्रान्तियोँ और दुराग्रह उन्हें बहुत हैरान करने लगे।

उद्विग्न होकर श्रतुधर पुनः गुरु के पास पहुँचे और अपने चिन्तन में उत्पन्न हुए असंतोष का विवरण सुनाया।

आचार्य जबाल ने कहा अपने दृष्टिकोण में पवित्रता का समावेश करो। उस बदली हुई दृष्टि से सभी पदार्थों और प्राणियों के भीतर पवित्रता का अंश सामने आवेगा और तुम संतोष की दुनिया में माँस ले सकोगे।

हल मिल गया और उनका असंतोष -असमंजस दूर हो गया।


अपनों से अपनी बात 1 - कैसे होंगे विश्व मानवता के लिए आने वाले कुछ वर्ष?

“दृश्य और अदृश्य दुनिया सन् 2000 की” शीर्षक से फरवरी 1979 माह की “अखण्ड ज्योति” पत्रिका में परम पूज्य गुरुदेव ने एक लेख लिखा था जिसमें आज हो रहे है, पूर्व में ही चुके तथा आगे संभावित घटनाओं का हवाला विस्तार से दिया गया है। प्रसिद्ध फ्रेंच भविष्य विज्ञानी जूलवर्न का हवाला देते हुए परम पूज्य गुरुदेव उसमें लिखते है कि उनके अनुसार “सन् 1990 तक सारी पृथ्वी विशेषकर शहरी क्षेत्रों में फैक्ट्रियों तथा कारखानों में धुआँ इतना अधिक बढ़ जाएगा कि 80 प्रतिशत वायु दूषित होगी। इस वायु प्रदूषण के कारण लोग पूरी तरह नष्ट तो नहीं होंगे पर उनकी स्थिति अर्थ विक्षिप्तों जैसी होगी। बीमारियां बढ़ेगी-साहस घटेगा अपराध विश्व भर में बढ़ेंगे। याँत्रिक सभ्यता के प्रति तीव्र रोष पैदा होगा तथा योरोपीय जातियों का झुकाव भारतवर्ष जैसे धार्मिक देश की ओर तेजी से बढ़ेगा। न केवल भारतीयों का अनुगमन वेश-भूषा, खान-पान, गृहस्थ जीवन इत्यादि के रूप में करेंगे वरन् भारतीय धर्म-संस्कृति के प्रति श्वेत-जातियों का आकर्षण इतना अधिक बढ़ जाएगा कि सन् 2000 तक दूसरों देशों में बीसियों हिंदू देवी-देवताओं के मंदिरों की स्थापना हो चुकी होगी और उनमें लोग उपासना, जप-यज्ञ, भजन-कीर्तन, भारतीय पद्धति के संगीत का आनंद लेने आने लगेंगे। यूरोपवासियों व सुदूर पश्चिम में अमेरिका-कनाडा में घरों में देवी-देवताओं के चित्र तक लगें, मैंने पूर्वाभास के समय देखे है।” यह सारा जूलवर्न का तब का कथन है।

आइए थोड़ा ऊपर दी गयी भविष्यवाणी पर विचार करे। यह एक सुनिश्चित तथ्य है कि वायु प्रदूषण चलती मोटर गाड़ियों के धुएं तथा फैक्ट्रियों की चिमनियों-बढ़ते सीमेण्ट-कंक्रीटों के जंगलों के कारण इतना बढ़ गया है कि व्यक्ति को सामान्य ऑक्सीजन मिल पाना दूभर हो गया। वह ताजी हवा अब दूर-दूर तक नहीं दिखाई देती। दिल्ली विश्व का नंबर दो का सबसे प्रदूषित क्षेत्र है। वहाँ हर पाँच व्यक्ति के पीछे एक कार या स्कूटर जैसे प्रदूषण फैलाने वाले वाहन है। प्रायः यही स्थिति सारे विश्व के महानगरों की है, जिनमें टोक्यो, हाँगकाँग, शेघाई, लंदन लाँस एंजेल्स, शिकागो, टोरोण्टो, पेरिस तथा न्यूयार्क भी आते है। ओजोन की परत बढ़ते प्रदूषण के प्रभाव के कारण पतली होते-होते झीनी हो गयी है, जगह-जगह छेद हो गये है। परिणाम स्वस्प स्कीन कैंसर से लेकर अन्याय जीवन-शक्ति घटाने वाली व्याधियाँ व तनावजन्य बीमारियाँ अपनी चरम सीमा पर है। इनसे मनोबल व जीवट में कमी आयी है।

प्रतिदिन आत्म हत्या करने वालों की संख्या बढ़ती जा रही है। प्रत्यक्षतः स्वस्थ किंतु अंदर से खोखले रोगी व्यक्तियों की संख्या नित्य वृद्धि पर है। अर्ध-विक्षिप्त व अपनी सनक में आतंक व नृशंसता का है। साँप्रदायिकता-पंथ व नस्लगत विद्वेषों के कारण सूक्ष्म जगत इतना प्रदूषित है कि सुदूर अमेरिका में जाति-नस्ल के आधार पर भयावह दंगों से लेकर, यूरोप में नाजीवाद के पुनः उभर आने तथा सर्विया-क्रोएशिया उन्मादी संघर्ष की नीति ने व्यापक स्तर पर जन हानि व न गिनी जा सकने योग्य धन-संपत्ति, सुख-शाँति की क्षति की है। सोमजिया व इथियोपिया में जहाँ एक ओर भुखमरी है, वहास् राज्य करने वाले मद में चूर नृशंस व्यक्तियों का समुदाय भी है जो कबीलों के युद्ध में तो निरत है ही, अन्य राष्ट्रों की सहायता सामग्री भुखमरी से मर रहे लोगों तक नहीं पहुंचने दे रहा है। प्रतिदिन 30000 व्यक्ति मौत के मुँह में जा रहे है। एशिया में कंबोडिया में अभी भी शाँति नहीं है व यू.एन. पीस-फोर्स को पुनः आना पड़ा है ताकि नर संहार रुक सके। भारत-पाकिस्तान-बंगला देश आदि देशों में पिछले दिनों जो कुछ हुआ, वह सबके सामने है। किस जाति व धर्म के व्यक्ति ने किसे मारा, यह नहीं अपितु विचारणीय व चिंताजनक यह है कि क्रूरता की बलिवेदी पर मानवता का हनन हुआ है। जिस पैशाचिक ढंग से पूजनीया मानी जाने वाली मातृसत्ता के साथ सामूहिक बलात्कार कर उनके गले में जलते टायर डालकर तड़पा-तड़पा कर उन्हें मारा गया है, इसने एक प्रश्नचिह्न मानव की संवेदना के अस्तित्व पर लगा दिया है।

यह सारा विवेचन श्री जूलवर्न की भविष्यवाणी के परिप्रेक्ष्य में किया जा रहा है जिसमें उनने प्रत्यक्षतः तो कुछ और कारण बताये है किंतु हो वही रहा है जो उनने व उनके जैसे अनेकों ने तब बताया था। अब दूसरा पहलू भी देखें। वे लिखते है कि “योरोपीय देशों का झुकाव भारतीय धर्म व अध्यात्म की ओर बढ़ेगा। अनेकानेक हिंदू मन्दिरों की स्थापना विदेश में सन् 2000 तक हो चुकी होगी।” वस्तुतः यही हो रहा है। परम पूज्य गुरुदेव के संदेशवाहकों की टोली जब इंग्लैंड, डेनमार्क, नार्वे, कनाडा तथा अमेरिका भारतीय संस्कृति का संदेश सुनाने गयी तो अगणित श्वेत पाश्चात्य नर-नारी इस तत्व-दर्शन को हृदयंगम करने के लिए उत्सुक दिखाई दिए। धर्म का विज्ञान सम्मत प्रस्तुतीकरण उनके लिए सबसे रुचिकर विषय था। गायत्री एवं यज्ञ के तत्व ज्ञान को जानने व उससे मनःशाँति पा जीवन को आध्यात्मिक प्रगति की ओर ले जाने की कोशिश जो उनने मनों में देखी गयी,कदाचित हमारे यहाँ के व्यक्तियों की तुलना में अधिक नहीं तो कम भी नहीं है। यही कारण है कि यहाँ से जो भी गया है, उसके अधकचरे ज्ञान को भी योगा-मेडीटेशन के रूप में शाँति का संदेश मानकर वे उसे जीवन में उतार रहे है। प्रायः चौदह सौ मन्दिर तो अभी भी अमेरिका में हैं वे दो सौ मन्दिर कनाडा में है। प्रतिवर्ष क्योंकि उनमें वृद्धि हो रही है तथा इसके लिए पुराने चर्चों को उपासना गृहों, ध्यानकक्षों या मन्दिरों में बदला जा रहा है। अपने चहाँ गिरती उपस्थिति (7 प्रतिशत) को देख कर चर्चों के कर्ताधर्ता भी नये विषयों का चयन कर उन लेक्चर आयोजित करने अथवा उनका अस्पताल-विद्यालय आदि रूपों में उपयोग किये जाने की वकालत करने लगे है। यह वही परिवर्तन की लहर है, जो मनीषी-दृष्टा-भविष्यवक्ताओं के अनुसार सन् 2000 तक एक नये ‘एरा’ के सूत्रपात के रूप में बदल जाएगी।

जो पूर्वाभास श्री जूलवर्न को भारत के संबंध में हुआ वही “श्री एलन राइट” को शाँतिकुँज के विदेश प्रवास हेतु गए दल के कनाडा पहुँचने के पूर्व हुआ। उनने “द सेंज एण्ड सीजर” शीर्षक से अप्रैल 1990 में कुछ भविष्यवाणियाँ “टोरोण्टो मेल” में प्रकाशित की थीं। अब तक के उनके सभी भविष्य कथन सही एवं समय की कसौटी पर खरे उतरे है। उनने कहा कि “अगले दिनों भारत की भूमिका क्रिश्चियन, मुस्लिम, हिंदू एवं बौद्धों सभी के लिए एक आध्यात्मिक तीर्थ के रूप में होगी। एक नये पोप का दर्शन मैं कर रहा हूँ जो न तो काला है, न गोरा किंतु वह दिव्य हिमालय की चेतना से सारे विश्व को अनुप्राणित करता दिखाई दे रहा है व उत्तर भारत में एक पावन सरोवर के पास खड़ा सबको दे रहा है। एक महिला मुझे दिव्य-प्रेम व आत्मीयता द्वारा सबका मार्ग दर्शन करती दिखाई दे रही है। वह सभी चर्चों व उपासना केन्द्रों में एकता का संदेश दे रही है। उसके हाथ में एक नयी आध्यात्मिक क्राँति आगामी सात वर्षों में होती मैं देख रहा हूँ।” दल के नेता प्रणवपाण्डया से हुई उनकी भेंट टोरोंटो के पत्रकारों व परिजनों के लिए अविस्मरणीय बन गयी। दोनों गले मिले व मिलते ही श्री राइट ने कहा कि “आप उसी क्राइस्ट के संदेशवाहक है जिसे मैंने स्वप्न में पूर्वाभास के रूप में देखा था।”

जो कुछ भी ऊपर लिखा गया, उसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं है। देव संस्कृति की राष्ट्र व विश्व के कोने-कोने तक दिग्विजय के माध्यम से पहुँचाने का संकल्प लेकर चली वह चतुरंगिणी जो शाँतिकुँज की चेतना से अनुप्रमाणित हो अश्वमेधिक पुरुषार्थों में गतिशील होती दिखाई देती है, अपनी गुरुसत्ता के एक-एक शब्द पर विश्वास करती हुई धैर्य पूर्वक कदम आगे बढ़ती चली जा रही है। यह यात्रा धीमी जरूर दीख पड़ सकती है किंतु इसी में विश्व मानवता की शाँति, सृजन, एकता व अखण्डता निहित है, किसी को भी इसमें सन्देह नहीं करना चाहिए। सामयिक कुछ संकटों से जो समय-समय पर अप्रत्याशित रूप से आकर सभी को उद्वेलित कर देते हैं, यह भी नहीं मानना चाहिए कि जो कुछ हो रहा है वह तो हमें महामरण की ओर ही ले जा रहा है। ऐसी परीक्षाएँ समय-समय पर महाकाल लेता ही रहता है।

रात्रि के अन्त में हमेशा सघन तमिस्रा छा जाती है। अंधकार गहन होने पर भी सभी को विश्वास रहता है कि पशु-पक्षियों का कलरव सुनाई देगा, शीघ्र ही पूरब में ऊषा की लाली छा जाएगी व दिनमान उगकर ही रहेगा। मरणासन्न व्यक्ति की साँसें दुगुने वेग से चलती है तो लगता है कि इसमें नये प्राण लौट आये हो किंतु “इंन्टेन्सीव केयर यूनिट” के इंचार्ज डॉक्टर-नर्सें जानते है कि यह प्राण जाने के पूर्व का काया का-जीवसत्ता का अन्तिम पुरुषार्थ है। बुझते दीपक की लौ एक बार जोर से लपलपाती है फिर तुरंत बुझ जाती है। लपलपाती लौ के बढ़ते प्रकाश को देखकर यह नहीं कहा जाता कि अब प्रकाश बना ही रहेगा। यह तो अंधकार आने के पूर्व की-दीपक बुझने के पहले की एक अवस्था मात्र है। मौत आने पर चींटी के पर आने लगते है, यह कहावत नितांत सत्य है। उपरोक्त उदाहरण उस संदर्भ में दिये गण् है कि अनीति, असुरता, आतंक, उन्माद, पारस्परिक द्वेष, वर्ग संघर्ष, अपराधी, मानसिकता के पलायन में अब कोई अधिक समय नहीं है। इनका बढ़ता उभार यही बताता है कि एक बार फिर पूरी ताकत से अच्छाइयों से-सत्प्रवृत्तियों से-आदर्शों की ताकत से व सूक्ष्म जगत की चेतना से संघर्ष लेने वे बढ़-चढ़कर अपना पराक्रम दिखा रही है पर वस्तुतः वह उनमें है नहीं। वह तो महाभारत के श्री कृष्ण द्वारा दुर्योधन व उसके साथियों के तेज हरने के रूप में कभी का महाकाल द्वारा छीना जा चुका है। अब तो सृजन की ही बारी है। वही होगा क्योंकि वही भवितव्यता है।

ज्योतिर्विज्ञानियों का ऐसा मत है कि विगत दिसम्बर माह में आए खग्रास चंद्रग्रहण के साथ ही धरती पर आने वाले अप्रत्याशित संकटों की बाढ़ ने और तीव्र वेग ले लिया है। 1992 के दिसम्बर माह से आरंभ हुई संकटों की श्रृंखला पूरे विश्व के अनेक अंचलों में प्राकृतिक दुर्घटनाओं, भूकम्प, बाढ़, सूखा, ज्वालामुखी, समुद्री तूफानों के रूप में आगामी दो वर्षों में और बढ़ेगी। पश्चिमी मध्य एशिया के कुछ राष्ट्र-यूरोप के कुछ राष्ट्रों, टूटे सोवियत संघ के कुछ राज्य तथा भारत के पड़ोसी देशों में गृहयुद्ध के बवण्डर छाए रहेंगे व इससे सारा विश्व प्रभावित होगा। आर्थिक मन्दी का दौर अभी 1995 तक चलेगा। प्रायः बीस से अधिक देशों में आतंक, अन्तःविग्रह व आर्थिक नीति के चलते सरकारें बदलेंगी व अराजकता की सो स्थिति बनी रहेगी, यान दुर्घटनाएँ, हिंसक संघर्ष कई अंचलों में और अधिक संख्या में घटित होंगे। इन सबके साथ-साथ जो ज्योतिर्विज्ञानियों ने गणित गणना करके बताया है, वह हम भारतवासियों के लिए मनोबल बढ़ाने वाला है। विश्व में आध्यात्मिक चेतना के प्रसार-विस्तार का कार्य भारत से ही आरंभ होगा व अगले दो वर्षों में यह क्रमशः बढ़ता चला जाएगा। धर्म -अध्यात्म का विज्ञान सम्मत रूप विश्व मानवता को एकता की दशा में लें जाने की प्रेरणा देगा। प्राच्यविद्या, योग, ज्योतिर्विज्ञान व अध्यात्म में शाँति का संदेश छिपा होने के कारण सभी का रुझान इनमें बढ़ेगा। संप्रदायगत विद्वेष कम होगा तथा देव संस्कृति के अनुयायियों की तादाद तेजी से बढ़ती चली जाएगी। इस कार्य में सूर्य की आराधना, गायत्री महाविद्या का अवलम्बन निश्चित रूप से महती भूमिका निभायेंगे।

जो भी कुछ ऊपर हमने कहा है, वह उन गणनाओं पर आधारित है जो ग्रहों की गति व स्थिति के आधार पर अनेकानेक विद्वानों ने करते हुए भविष्य का एक खाका खींचा है। आज का संकट सामयिक है। यह हमें संज्ञाशून्य बना विवेक से च्युत न कर दे। हम घबराकर, परेशान होकर अनिष्ट की आशंका से मनोबल न खो दें। जीवनी शक्ति, मनःसंतुलन व आत्मबल को अक्षुण्ण रखते हुए हम उन संकटों से जूझ सकें, यहीं युगधर्म है। परम पूज्य गुरुदेव सहित सभी विचारकों-मनीषियों-तत्व विज्ञानियों ने एक ही भविष्यवाणी की है-इक्कीसवीं सदी का भारत एक संपन्न सशक्त और समर्थ राष्ट्र होगा। प्रसूति काल की वेदना जब एक माँ नवशिशु की किलकारी सुनने के लिए सह लेती है, तो हम क्यों नहीं इस संधिकाल की दुखद घड़ी

से उबर सकेंगे। हम मनोबल बनाए रहें तथा एक ही कार्य करें, पारस्परिक सौहार्द बढ़ाने के लिए अपने आध्यात्मिक पुरुषार्थ में बढ़ोत्तरी। युगसंधि महापुरश्चरण तो सभी परिजन कर ही रहे है। सूक्ष्म जगत के संशोधन तथा सृजनकारी शक्तियों को सामर्थ्य प्रदान करने की दृष्टि से उसके अनुपात में वृद्धि कर दे। तभी “कलेक्टीव कान्शसनेस” समूह -चेतना जाग्रत हो एक सुरक्षा कवच हम सबके चारों ओर बना सकेगी। आगत से न डरकर उज्ज्वल भविष्य के लिए तैयारी में सन्निद्ध रहना ही आज की सबसे बड़ी समझदारी है।


असंख्यकों का मार्ग दर्शन (kahani)

रामानुजाचार्य को उनके गुरु ने एक मंत्र बताया। उसका सुविस्तृत प्रतिफल बताया। साथ ही यह भी कहा कि इसे किसी को बताना मत। अन्यथा तुझे नरक जाना पड़ेगा।

रामानुज ने मंत्र ले लिया उसका जप करने लगे। साथ ही यह भी सोचने लगे कि यदि अधिक लोगों को इसे बताया जाय तो उन सभी का कल्याण होगा।

बताने पर नरक जाने की चेतावनी भी थी। उससे अपनी ही तो हानि हो सकती थी। दूसरों को लाभ पहुँचाने के लिए यदि स्वयं कष्ट उठाना पड़े तो इसमें क्या हर्ज है।

उनका विचार यही हो गया। गाँव-गाँव जाकर लोगों का समूह एकत्रित करते और उस मंत्र का फल तथा विधान बताते। इस प्रकार उन्होंने असंख्यकों का मार्ग दर्शन किया। अपने नरक जाने जैसे कष्ट का कुछ भी विचार न किया।


अपनों से अपनी बात-2 - लीला पुरुष के सहचरों-अनुगामियों से एक भाव भरा अनुरोध

एक युगऋषि का अस्सी वर्ष जिया गया तपःपूत जीवन। आयुष्य का पल-लप ऐसा जो मानव मात्र की पीड़ा को मन में रखकर उन्हीं के निमित्त जिया गया। स्वभाव ऐसा सरल व मृदु कि हर कोई उन्हें अपना मित्र, सखा, आत्मीय समझता रहा। करुणा इतनी गहरी कि उसी ममत्व के सहारे देखते-देखते एक छतवार वृक्ष के नीचे एक विराट परिवार विनिर्मित होता चला गया, नाम जिसका रखा गया “गायत्री परिवार”। लाखों व्यक्तियों के हृदय के सम्राट, गायत्री परिवार-युगनिर्माण योजना के संस्थापक अधिष्ठाता परम पूज्य गुरुदेव का जीवन-वृत्त जब हम देखते है तो पाते है कि एक बहु आयामी हिमालय समान ऊँचाई वाला-अलौकिक सिद्धियों से भरा जीवन उनके द्वारा जिया गया, किन्तु दृश्य रूप में वह अति साधारण जान पड़ता है।

पूज्यवर पं. श्री राम शर्मा आचार्य जी का जन्म दिवस जो हम उनके आध्यात्मिक बोध दिवस के रूप में मनाते है पिछले दिनों 28 जनवरी को हमने मनाया एवं सभी परिजनों ने गहराई दृष्टि डालकर देखा तो पाया कि अगणित अनुदान उनमें से प्रत्येक ने पाये हैं, असंख्यों संस्मरण उनके मस्तिष्क पटल पर इस महापुरुष के अंकित है एवं अनेकों यादें साथ लेकर उन्हीं के सहारे अपनी नित्य की श्वास वे लिया करते है तथा स्वयं को कृतकृत्य मानते है। उनके संस्मरणों पर आधारित एक कार्यकर्ता प्रशिक्षण गोष्ठी का क्रम शान्तिकुँज में विगत दिसम्बर 12 माह की 16 तारीख से 31 तक चला एवं ढेरों ऐसी घटनाएँ उभर कर आयीं जिनसे लगा कि आज की परिस्थितियों में तथा आगामी 8-9 वर्षों में प्रत्याशित संकटों विपत्तियों में उनसे सभी को बहुमुखी मार्गदर्शन मिल सकता है। प्रस्तुत पंक्तियाँ उस जखीरे का पता लगाने जो विश्वभर के परिजनों के रूप में बिखरा पड़ा है, के निमित्त ही लिखी जा रही है ताकि संस्मरणों, अनुभूतियों लीला प्रसंगों के प्रकाश में हर व्यक्ति जान सके कि गुरुसत्ता के रूप में कैसा उसे आज भी वे पा सकते है अपनी निज की समस्याएँ ही नहीं, मानव मात्र की आज की हर समस्या का समाधान उसमें वे उपलब्ध कर सकते है चमत्कारों को उजागर करने की दृष्टि से नहीं यह शोध प्रक्रिया वस्तुतः इस प्रयोजन के लिए है कि हम सब जान सकें कि साधारण जीवन जीकर भी कैसे हर व्यक्ति गुरुसत्ता जैसा ही महानता संपन्न, प्रतिभा संपन्न लोकनायक बनता हुआ अपना जीवन धन्य बना सकता है।

एक सद्गृहस्थ साधक के रूप में श्री रामकृष्ण परमहंस का जीवन सभी के समक्ष उनके लीलामृत, वचनामृत तथा कथामृत के माध्यम से इस सदी के प्रारीं आया। लाखों व्यक्तियों के लिए ये प्रसंग जीवन को ऊँचा उठाने की प्रेरणा बनकर आए व अगणित व्यक्तियों ने अपने को लौकिक से आध्यात्मिक धाराकी ओर उन्मुख किया। एक बार राम कृष्ण जब ध्यानस्थ थे समाधि की गहन अवस्था में चलें गये थे तो उनके चारों ओर प्रकाश फैल गया। सहज ही उनकी आँख खुली तो उनने चारों ओर प्रकाश विस्तारित होता देखा तुरंत चिल्ला उठे “माँ! भीतर कर। बाहर मत जाने दे। नहीं तो चेले आकर चिपट जायेंगे। मैं तो साधारण आदमी बनकर जीना चाहता हूँ।” तुरंत प्रकाश तिरोहित हो गया तथा वे साधारण व्यक्ति की तरह दिखाई देने लगे। कुछ ऐसे ही प्रसंग परम पूज्य गुरुदेव के जीवन-वृत्त पर भी लागू होते है। अनेकों व्यक्तियों ने उनके भिन्न-भिन्न रूपों में दर्शन किए है तथा अपनी अनुभूति का संसार विनिर्मित किया। स्वयं वे कभी भी नहीं चाहते थे कि लोग उन्हें उस रूप में जाने या उसका प्रचार करें। नहीं तो वही होता जो किसी चमत्कारी सिद्धपुरुष के साथ होता है या होता आया है। फिर भी जैसे किसी हीरे को धूल के ढेर में सूर्यकान्त-श्यामन्तक मणि को कहीं किसी कपड़ों की थैली में बिना उस चमक के फैलाए पास नहीं रखा जा सकता, लगभग वैसा ही महापुरुषों के साथ होता आया है। सुपात्र व्यक्तियों को उनकी जानकारी मिलती रहती है।

श्री केशवचंद्र सेन ने एक बार कहा-”मेरा नाम समाचार पत्रों में क्यों निकालते हो? भगवान जिसे बड़ा बनाते हैं, जंगल में रहने पर भी लोग उसे जान लेते हैं। घने जंगल में फूल खिला है, भौंरा उसका पता लगा ही लेता है, पर दूसरी मक्खियाँ पता तक नहीं पाती। मैं। प्रसिद्धि नहीं चाहता। मैं तो चाहता हूँ कि दीन से दीन हीन से हीन बनकर रहूँ।” ऐसा जीवनमुक्त लीला पुरुष जानबूझ कर करते हैं क्योंकि जीवित रहते जो अगणित काम उन्हें करने हैं, उनमें इन सभी बहिरंग के पक्षों से बाधा आती है। राम कृष्ण परमहंस ने चमत्कार दिखाये नहीं व सहज ही हो गए। इसी तरह परम पूज्य गुरुदेव ने दृश्य रूप बिल्कुल साधारण रहने दिया, जो भी कुछ असाधारण घटा वह होता चला गया व ऐसा अगणित व्यक्तियों के साथ घटा। असाधारण से अर्थ है सामान्य जीवन चर्चा के पीछे से दर्शन कराती है हलचलें गतिविधियाँ जो उस महासत्ता के अस्तित्व का बोध कराती है।

जीवित रहते क्यों एक साधारण-सा दृष्टिगोचर होने वाला जीवन जिया गया, इसे स्पष्ट करते हुए परमपूज्य गुरुदेव जनवरी 1979 की “अखण्ड ज्योति” की अपनों से बात में लिखा हैं- “जब तक रंगमंच पर प्रत्यक्ष रूप से हमारा अभिनय चल रहा है तब तक वास्तविकता बता देने पर दर्शकों का आनन्द दूसरी दिशा में मुड़ जाएगा और हम जिस कर्तव्यनिष्ठा को सर्वसाधारण में जगाना चाहते हैं, वह प्रयोजन पूरा न हो सकेगा। लोग रहस्यवाद के जंजाल में उलझ जायेंगे। इससे हमारा व्यक्तित्व भी विवादास्पद बनेगा और जो करने-कराने हमें भेजा गया, उसमें भी हमें अड़चन पड़ेगी। निस्सन्देह हमारा जीवन अलौकिकताओं से भरा पड़ा है, रहस्यवाद के पर्दे इतने अधिक है कि उन्हें समय से पूर्व खोला जाना अहित कर ही होगा। पीछे वालों के लिए उसे छोड़ देते है कि वस्तु स्थिति को सच्चाई की प्रमाणिकता की कसौटी पर कसें और जितनी हर दृष्टि से परखी जाने पर सही निकले उससे यह अनुमान लगायें कि अध्यात्म विद्या कितनी समर्थ और सारगर्भित है।”...........”अभी तो उस पर वैसे ही पर्दा पड़ा रहना चाहिए जैसे कि अब तक पड़ा रहा है।” पाठक ध्यान दें-यहाँ स्पष्ट लिखा है कि पीछे वालों के लिए यह छोड़ देते है कि वे दृश्य जीवन के रहस्यों की पिटारी को खोलकर परखें। पीछे वाले कौन? वस्तुतः हम सब और वे सब जिनने उनके जीवन को भिन्न-भिन्न रूपों में देखा हैं

एक विशाल बहुकोणीय आर्कीटेक्टर की दृष्टि से विलक्षण संरचना को जो जिस कोण से देखता है, अपना दृष्टिकोण उसके बारे में वैसा ही बनाता है, वैसी ही परिकल्पना करता है। नंदादेवी माउंटएवरेस्ट के बाद में हिमालय की भारत में दूसरे नंबर की सर्वोच्च चोटी है। यों के-2 को भी एवरेस्ट के बराबर ऊँचा माना जाता है पर हम तिब्बत क्यों जाएँ व क्यों ही गिलगित की यात्रा करें। हिमालय के हृदय की इस विलक्षण चोटी की त्रिशूलपर्वत व पंचचूली चोटियों के साथ जब गढ़वाल की ओर से देखते हैं तो भिन्न-आकार की जब इसे अल्मोड़ा-बिन्सर रानीखेत से देखते हैं तो अलग आकार की तथा जब पिथौरागढ़ से देखते हैं तो कुछ अलग ही आकार-प्रकार की दिखाई देती है। पर्वत एक ही है पर दो सौ मील की परिधि में देखने पर कोण बदल जाने से उसका रूप व आकार भिन्न-भिन्न जान पड़ता है। फिर ट्रैकिंग करने वाला पर्वतारोही या पिकनिक मनाने वाला हनीमून मनाने वाला व्यक्ति उसे भिन्न रूप में देखता है तथा योगी-सिद्ध साधक जीवन्मुक्त तपस्वी व आध्यात्मिक दृष्टि से ऊँचा उठा व्यक्ति अलग रूपों में देखता है। एक ग्लेशियालॉजिस्ट के लिए वह केवल हिमाच्छादित पत्थरों का ढेर मात्र है। यही उदाहरण महामानवों के जीवनवृत्त पर भी लागू होता है।

हर व्यक्ति ने परम पूज्य गुरुदेव के जीवन को विभिन्न कोणों से विभिन्न भावों से देखा व समझा हैं, अनुभूति की है तथा उनके अनुदानों से लाभान्वित हुए, है। यदि वे अपने उन प्रसंगों को जो संस्मरणों से लेकर छोटे-छोटे घटनाओं के रूप में, प्रेरणादायी प्रसंगों के रूप में हो सकते हैं हमारे पास भेज सकें तो हम इन्हें पुस्तकाकार देकर सबके लाभ के लिए प्रकाशित करना चाहेंगे। उद्देश्य एक ही है गुरुदेव की महत्-चेतना के साथ लोगों के मनों को जोड़ देना। वे उन प्रसंगों में वे झलकियाँ देख सकेंगे जो उनके लिए जीवन मात्र के किसी भी मोड़ पर प्रेरणादायी बन सकती है। यह इतना बड़ा पुण्य है आज की परिस्थितियों में कि इसकी किसी भी मोड़ पर प्रेरणादायी बन सकती है। यह इतना बड़ा पुण्य है आज की परिस्थितियों में कि इसकी किसी और परमार्थ कार्य से तुलना नहीं की जा सकती। महापुरुषों के जीवन के छोटे-छोटे से क्रिया–कलापों में भी विलक्षणता छिपी होती है। पाठकों से तो हम एक ही अनुरोध करेंगे कि लोक-शिक्षकों की नर्सरी बनाने के लिए, उसका समुचित पोषण करने के लिए साधारण असाधारण जो भी घटना प्रसंग परम पूज्य गुरुदेव-परम वंदनीया माताजी के जीवन से जुड़ा हुआ उन्हें दिखाई दिया हो, किसी प्रामाणिक व्यक्ति से सुना हो या उनके पास लिखित प्रमाण के रूप में रखा हो वे हमें अपनी जैसी भी अभिव्यक्ति संभव हो लिखकर भेज दें। साथ ही उनके पास ऑडियो कैसेट्स के रूप में उनकी अमृत वाणी या पत्र हो तो उनकी काँपी हमें भेज दें। यह कार्य अभी व इन्हीं दिनों व अविलम्ब होना चाहिए क्योंकि धीरे-धीरे वह पीढ़ी समाप्त होती चली जाएगी जो उनके निकट संपर्क में उनके कार्यक्षेत्र के दिनों में चालीस व पचास के दशक में आयी थी। पत्रों पर “संस्मरण अनुभूति पूजयवा” यह ऊपर लिख दें तो पत्राचार विभाग से सम्पादन विभाग तक आने में कोई विलम्ब न होगा। उस पर अन्य कुछ न लिखकर उसे अलग से ही लिफाफे में भेजेंगे। हम प्रत्येक का नाम भी देना चाहेंगे। यदि वे नाम देने के अनिच्छुक होते तो हम नहीं देंगे।

श्री अरविंद की एक जीवनी श्री सतप्रेम की लिखी हुई है जो विशुद्धतः आध्यात्मिक प्रगति के बिंदुओं को पिरोती हुई एक विलक्षण संरचना है। एक अन्य जीवनी जो श्री के. आर. श्री निवास अयंगर की लिखी हुई है, अतिविस्तृत है तथा श्री अरविंद के जन्म से लेकर उनके महाप्रयाण तक का ऐतिहासिक के साथ-साथ उनसे जुड़े व्यक्तियों के कथनों के गुँथन से बना एक प्रामाणिक दस्तावेज है। एक ऐसा ही ग्रन्थ जन-जन की प्रेरणा हेतु विनिर्मित करने का उस गुरुसत्ता की प्रेरणा से ही संकल्प उभरा है तो वह निश्चय ही बनकर रहेगा। सभी जानते है तो वह निश्चित ही बनकर रहेगा। सभी जानते है कि श्री राम कृष्ण परमहंस के महाप्रयाण के बाद उनके लीलामृत-वचनामृत के प्रकाशन के पुरुषार्थ के बाद ही पूर्व व पश्चिम में लोगों ने उन्हें जाना था। स्वयं कलकत्ता में ही वे कहाँ अधिक परिचित थे, न ही वे चाहते थे। किंतु जब उनके जीवन के महत्वपूर्ण प्रसंग जन-जन के समक्ष आने लगे तो दक्षिणेश्वर लाखों व्यक्तियों की प्रेरणा बन गया, एक विराट स्तर का बवण्डर उठा व उसमें से संन्यासियों की टोली निकली, जिसके रत्न के रूप में स्वामी विवेकानन्द प्रकट हुए। वे ही अन्ततः अपने गुरु की वाणी को जन-जन तक पहुंचाने में सफल हुए। ऐसे अगणित विवेकानन्द व निवेदिता स्तर की आत्माएँ अपने मिशन में क्रियाशील हैं जो बहिरंग में तो दैनन्दिन जीवन के व्यापार में उलझी दिखाई देती हैं किन्तु अंतरंग से वे उच्चस्तरीय पुरुषार्थ करने में सक्षम है। उन्हें झकझोरना व देव संस्कृति को विश्वव्यापी बना देना अब हम सबका कर्त्तव्य बन जाता है।

स्वामी विवेकानन्द ने एक बार कहा था कि “मैं निराकारवाणी बनना चाहता हूँ” (आय वाण्ट टू बि. ए वाँयस विदाऊद फाँर्म) यह बिना किसी हिचक के कहा जा सकता है कि वे बने तथा बीसवीं सदी के पूर्वार्ध से लेकर इक्कीसवीं सदी में कदम रखने जा रही पीढ़ी के आदर्श है। एक ऐसे लोकनायक के रूप में उनकी छवि रही जिनने जहाँ शहीद भगत सिंह, आजाद, बिस्मिल, सुखदेव जैसों को प्रेरित प्रभावित किया, वहाँ तिलक, गाँधी पटेल आदि तथा महर्षि श्री अरविंद जैसे उच्चस्तरीय साधक भी उनके आदर्शों से प्रेरित दिखाई देते हैं परम पूज्य गुरुदेव को पुरुषार्थ जो 1911 से 1990 तक की अवधि के 80 वर्षों में संपन्न हुआ अपनी विचार सम्पदा के रूप में जो कुछ निधि हमें उत्तराधिकार में दे गया है उसकी तुलना तो किसी से नहीं की जा सकती किन्तु जैसे-जैसे वह प्रकाश में आएगा, लोग जान सकेंगे कि आज उनकी सूक्ष्म एवं कारण शरीर रूप में और भी अधिक सक्षम है।

परम पूज्य गुरुदेव एक बार दिन में दोपहरी में लेटे हुए थे। उठकर जब वे सब के बीच आए तो बोले “लड़कों! मैं सोता नहीं हूँ। शरीर तो यहीं रहता है पर मैं पहुँच जाता हूँ अगणित व्यक्तियों के पास। उनकी चेतना में प्रवेश कर उन्हें सुधारने की कोशिश करता हूँ। जब तुम लोग सब सो जाते हैं तो रात्रि को भी मैं यही सब करने का प्रयास करता हूँ।” हम उनके कथन पर विश्वास रखें व स्वयं को उस चेतना के प्रवेश हेतु सक्षम एक उचित पात्र बनाने की तैयारी में लगें, यहीं आज का सबसे प्रमुख आध्यात्मिक पुरुषार्थ है। यह एक आश्वासन भी है उन सबके लिए जिनके लिए आज स्थूल रूप में वे सशरीर नहीं है किन्तु उनकी चेतना अभी भी प्रवेश होने के लिए हम सबके चारों ओर विद्यमान है। आप हम सभी निहाल हो सकें, उन प्रेरणाओं से औरों का जीवन भौतिकता से आध्यात्मिक की ओर मोड़कर उन्हें उसका रसास्वादन का अवसर दे सकें, इससे बड़ा कोई युग धर्म नहीं।


पहले अपना बुरा (kahani)

एक राजा के राज्य में एक नदी बहती थी। जो आगे चल कर दूसरे राजा के राज्य में जाती थी।

पहले राजा ने कई जगह बाँध बनवा रखे थे ताकि खेतों को पहुँचता रहे। फिर भी अगले राजा के राज्य में भी नदी का पानी पहुँचता ही था पहला राजा बड़ा ईर्ष्यालु था। उसने हुक्म दिया कि अपनी नदी का एक बूँद भी पानी पड़ोसी राज्य में न जाने पाये इसके लिए ऊँचे-ऊँचे बाँध बना दिये जाँय।

इस प्रकार दूसरे राजा के राज्य में सूखा की स्थिति बन गई पहले राजा के राज्य में रुका पानी इतना अधिक जमा हो गया कि जिससे सारी जमीन डूब गई। मकान भी बैठ गये।

जो दूसरों का बुरा चाहता है उसका पहले अपना बुरा होता है।

*समाप्त*