नर वानर से देव मानव तक

डार्विन ने कहा है कि मनुष्य बन्दर की संतान है। यह विषय विवादास्पद है। फिर भी इतना जरूर है कि मनुष्य व बंदरों में आकृति भेद होते हुए भी कितनों की ही प्रकृति एक एक जैसी होती है। वनमानुषों जैसी मनोभूमि वाले नर पामरों की कमी नहीं है। ऐसे भी हैं जो कर्तव्यों के दायित्व को भूलकर निरुद्देश्य जीवन जीते हैं और मर्यादा बंधन का पालन उतनी ही मात्रा में उतनी ही देर तक करते हैं, जब तक कि उन्हें लगाम, नाच, अंकुश, हण्टर या चाबुक का भय दिखाता है। दबाव हटाते ही वे बंदरों की तरह स्वेच्छाचारी व्यवहार करते -पशु प्रवृत्तियों में मोद बनाते देखे जाते हैं।

मानवी आकृति निश्चित ही सुविधाजनक व सब चीजों में श्रेष्ठ है पर मानवी जन्म के साथ जुड़ा सौभाग्य तब सार्थक माना जाता है, जब आकृति के साथ मानवी प्रकृति भी हो। आकृति भगवान देते हैं, प्रकृति निज के पुरुषार्थ से अर्जित करनी होती है। इसके लिए जिन दो कदमों को उठाना पड़ता है उनकी धातु की गलाई-ढलाई से उपमा दी जाती है, पर इनके बिना कोई गति नहीं है। प्रगतिपथ पर चलने वाले हर किसी को एक कदम छोड़ना, दूसरा उठाना पड़ता है। पहला कदम है-संचित पशु प्रवृत्तियों का परित्याग। दूसरा कदम है-मानवी गरिमा को धारण करना। मानवी तन होते हुए भी मानवी गरिमा के अनुरूप जीवन जी कर प्रगति का पथ प्रशस्त किया गया कि नहीं, इसकी जाँच पड़ताल दो तथ्यों का पर्यवेक्षण करने पर ही हो सकती है। एक है-मर्यादा निर्वाह, दूसरा कर्तव्य पालन। इस कसौटी पर जो सही सिद्ध हो समझना चाहिए उसने मानवी जन्म को सार्थक बनाने का, देव मानव बनने का राजमार्ग अपनाया।


स्थितप्रज्ञता

आज अनहोनी हो गई। एक वर्ष लगातार साधना और तपश्चर्या करने के कारण निषाद कुल में जन्में बटुक काँदीवर को महर्षि अंगिरस ने क्षत्रियत्व प्रदान कर राज्य की सेना में प्रवेश का अधिकार दे दिया जबकि राजकुमार युयुत्स को उन्होंने असंयमी ठहराकर एक वर्ष के लिए क्षत्रियत्व का अधिकार छीन लिया। उन्होंने बताया -”राजकुमार ने अनेक महिलाओं का शीलभंग का उन्हें व्यभिचारिणी बनाया है। उन्हें एक वर्ष तक नंगे पाँव, उघारे बदन, राज्य की गौयें चरानी चाहिए और दुग्ध कल्प करके स्वयं को शुद्ध करना चाहिए। जब तक वे यह प्रायश्चित नहीं सम्पन्न करने कर लेते, उन्हें राजकुमार के सम्मानित सम्बोधन से भी वंचित रखा जायेगा। राज्य के सभी नागरिक उन्हें सिर्फ युयुत्स का सम्बोधन देंगे।”

महर्षि की इस घोषणा से सभा में सन्नाटा छा गया। कोई कुछ भी सोच पाने में स्वयं को असमर्थ अनुभव कर रहा था। राजदरबार में सम्पन्न हो रहे आज श्रावणी पर्व के हेमाद्रि संकल्प के सामंतों, सभासदों व स्वयं सम्राट सहित स्वयं राजकुमार भी उपस्थित था। महर्षि का यह नियम था कि पिछले वर्ष किसी ने पाप या बुराइयाँ की होतीं, जब तक वह उसका उचित प्रायश्चित नहीं करा लेते थे, नया यज्ञोपवीत किसी को भी प्रदान नहीं किया जाता था। नियम की कठोरता सम्राट से सामान्य प्रजाजन तक सभी के लिए एक-सी थी।

काँदीवर को क्षत्रियत्व और अपने आपको पदच्युत होते देखकर युयुत्स का दंभ उग्र हो गया। उसने याचना की-”गुरुवर! वासना मनुष्य का स्वभाव है। स्वाभाविक बातें अपराध नहीं गिनी जानी चाहिए। इस पर मनुष्य का अपना वश नहीं, इसलिए काम-वासना व्यक्ति के लिए क्षम्य है। “

अंगिरस तत्वदर्शी थे और दूरदर्शी भी। उन्होंने कहा-”युयुत्स! समाज और जातिगत स्वाभिमान से गिराने वाला कोई भी कर्म पाप ही गिना जाता है। फिर चाहे वह किसी की सहमति से ही क्यों न हो। जिन कुमारियों को तुमने भ्रष्ट किया है वे एक दिन सुहागिनें बनेंगी। क्या उनके पतियों के साथ यह अपराध न होगा? तुम्हारी यह स्वाभाविकता क्या समाज के असंयम और भ्रष्टता का कारण नहीं बनी। “

महर्षि अन्त तक दृढ़ रहे। युयुत्स पराजित होकर लौटे। उनके कंधे पर पड़ा यज्ञोपवीत व्याभिचार के अपराध में छीन लिया गया।

चोट खाया सर्प जिस तरह फुँकार मारकर आक्रमण करता है, युयुत्स का हृदय भी ऐसे ही प्रतिशोध से जलने लगा। वह महर्षि को नीचा दिखाने के उपक्रम सोचने लगा।

राजधानी में साँस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किया गया। उसका संचालन किसकी इच्छा से हो रहा है, यह किसी ने नहीं जाना। अच्छे-अच्छे संभ्राँत व्यक्ति आमंत्रित किये गये। महर्षि अंगिरस भी प्रधान अतिथि के रूप में आमंत्रित थे। मरकत-मणियों से जगमगाते राजमहल की आभा उस समय और भी शतगुणित हो गई, जब सामंतों-सभासदों के बीच नृत्याँगना काँचीबाला ने प्रवेश किया। उसके हाव-भाव, साज-श्रृंगार किसी के शाँत मन में विक्षोभ उत्पन्न करने के लिए पर्याप्त थे।

नृत्य प्रारंभ हुआ, पाँव थिरकने लगे। साज गति देने लगा। ताल के साथ नृत्य करती हुई काँचीबाला आभूषणों के साथ वस्त्रों को भी एक-एक कर फेंकती जा रही थी। अकस्मात साज बंद हो गया। दर्शक न जाने कहाँ गायब हो गए। अकेले अंगिरस और काँचीबाला। महर्षि पर एक कुत्सित दृष्टि निरपेक्ष करते हुए काँचीबाला ने प्रश्न किया-”मेरे नृत्य को देखकर आपको कैसा लगा?” “भोली बालिके!” महर्षि ठठाकर हँस पड़े-’समूची सृष्टि में व्याप्त रहे विविध घटना-क्रम भी तो भगवती आद्यशक्ति का सुमधुर नर्तन ही तो है। तुम्हारा नृत्य उसी की एक हल्की झलक मात्र है। पर......’

ऋषि को रुकते देख-उसने आशा भरे स्वर में पूछा-”क्या? नृत्य में भावों का समावेश नहीं हो पाया? “ ऋषि बोले-”क्या ही अच्छा होता, यदि तुम नृत्य के माध्यम से सृष्टि की आदि संचालिका की हलचलों को अभिव्यक्ति करतीं।” काँचीबाला हतप्रभ हो गयी। आयी थी भ्रष्ट करने, बन गई महर्षि की शिष्या। स्थितप्रज्ञ ऋषि की आँखों में करुणा-भरा ममत्व था। यह सब युयुत्स का प्रबंध था, पर तपोमूर्ति महर्षि का क्या बिगड़ना था। अन्ततः युयुत्स को प्रायश्चित के लिए जाना पड़ा।


आकाँक्षाओं को आदर्शवादी मोड़ दिया जाय

मनुष्य की अभिलाषाओं और आकाँक्षाओं में मूलतः उसकी प्रेरक शक्तियाँ समायी है। इच्छाओं का उफान जिस दिशा में उमड़ता है उसी ओर मस्तिष्क चल पड़ता है। सोचने का ढर्रा उसी पटरी पर लुढ़कता और बुद्धि उसी स्तर के साधन सरंजाम जुटाने का ताना-बाना बुनने लगती है। शरीर की क्रियाएँ उसी दायरे में अग्रसर होती हैं और साधन सहयोग, वातावरण उसी प्रकार के जुटने शुरू हो जाते हैं। अपने बनाये जाल में मकड़ी पूरी तरह फँस जाती है। मनुष्य अपनी इच्छाओं द्वारा विनिर्मित परिस्थितियों के जाल-जंजाल में जकड़ा रहता है। उसे इतना शारीरिक एवं मानसिक अवकाश ही नहीं मिलता कि जीवनोद्देश्य की दिशा में कुछ महत्वपूर्ण कदम बढ़ा सके। आकाँक्षाओं का महत्व समझा जाना चाहिए और उनकी दिशा निर्धारित करने के सम्बंध में समुचित ध्यान दिया जाना चाहिए। मानवी सुख-शाँति और सामाजिक प्रगति की कुँजी यही छुपी पड़ी है। पिछले समय में हुए वैयक्तिक अधोपतन और सामाजिक दुर्गति का यदि तात्विक लेखा-जोखा लिया जाय तो इसी निष्कर्ष पर पहुँचना पड़ेगा कि लोगों के सोचने का स्तर घटिया बन गया। उनकी महत्वाकाँक्षी संकीर्ण प्रयोजनों में अटक कर विकृतियाँ पैदा करती रह गई। मानवी अन्तःकरण के विश्लेषक आर.डी. लेंग के ग्रंथ “द डिवाइडेड सेल्फ” के पन्ने पलटने पर पता चलता है- इच्छाएँ सोचने को प्रेरित करती हैं। मस्तिष्क वह जादू का पिटारा है कि जिधर चलेगा उसी प्रकार के साधन और अवसर प्राप्त कर लेगा। यदि विलासी और संग्रही बनने की अभिरुचि भड़क उठे तो व्यक्ति उन्हीं के लिए रात-दिन सोचेगा और करेगा। पिछले दिनों यही हुआ है। व्यक्ति संकीर्ण स्वार्थों की परिधि में स्वयं को सीमाबद्ध रखता रहा है। वह लोभ-मोह को परम-प्रिय विषय बनाये बैठा रहा और काम क्रोध की आग बुझाने के सरंजाम इकट्ठा करता रहा।इस तरह की प्रवृत्तियों ने यदि उसे नर-पशु जैसा जीवन प्रदान किया तो आश्चर्य क्या? कुत्सित लालसाएँ जब-जब भड़कती हैं तो अपनी उग्रता के कारण मानवीय मर्यादाओं की तोड़-फोड़कर रख देती हैं। नैतिकता का कोई मूल्य उस प्रवाह के सामने टिक नहीं पाता। किसी भी प्रकार अपनी हविस पूरा करने की उतावली इतनी बेचैनी उत्पन्न करती है कि नीति और सदाचार, न्याय और औचित्य का ध्यान ही नहीं रहता। तृष्णाओं से, समस्त वासनाओं से पीड़ित अहंकार से उन्मत्त व्यक्ति जो कुछ भी न कर डाले वही कम है।

मनोविद एरिक फ्राम के ग्रन्थ “द एनाटमी आवह्यूमन डिस्ट्रक्टिवनेस” के अनुसार इच्छाओं का केन्द्र यदि पशु प्रवृत्ति से भरा रहे और मनुष्य अपने शारीरिक सुखों को पाने, अहंकार को संजोने और लालच को बढ़ाने में लगा रहे तो उस संदर्भ में कुछ भी अनर्थ करने में तत्पर हो सकता है। व्यक्तित्वों का निखार और उत्कर्ष आदर्शवादी विचारणा और कार्य पद्धति पर निर्भर है। जो लोग नीचा सोचते और ओछा करते है वे सम्पन्नता एकत्रित कर लेने पर भी किसी की या अपनी आँखों में अपना सम्मान सुरक्षित नहीं रख सकते। कोई बड़ा काम नहीं कर सकते और मूर्धन्य प्रामाणिक एवं गणमान्य लोगों की पंक्ति में नहीं बैठ सकते। धन-शिक्षा-स्वास्थ्य-सौंदर्य, कला-कौशल में कुछ प्रगति कर लेने पर भी उनके व्यक्तित्व निखर न सकेंगे और उनमें आत्मबल की न्यूनता ही बनी रहेगी।

विकासवान व्यक्तित्व की आधार शिला मनुष्य की आंतरिक अभिलाषाओं और आकाँक्षाओं पर निर्भर रहती है। वस्तुतः यही केन्द्र बिंदु व्यक्तित्व का सार तत्व है। मनुष्य वस्तुतः क्या है? यदि उसकी असलियत परखनी हो तो उसके अन्तरंग में घुसकर यह ढूँढ़ना होगा कि वह वस्तुतः चाहता क्या है? सामाजिक दबाव या लोकलाज के कारण बहुधा बाहर से वह प्रदर्शित किया जाता है जो सामाजिक सम्मान बनाए रखे। वास्तविक इच्छाएँ कई बार इस बाह्य प्रदर्शन से सर्वथा प्रतिकूल होती हैं। यह अंतर सामान्य व्यक्तियों में ही नहीं नेताओं, धर्मध्वजियों और दूसरे ख्यातिनामा व्यक्तियों में भी देखा जा सकता है। जब उनकी मनोदशा तथा करतूतों का नग्न स्वरूप छन-छन कर बाहर आता है तो उस सड़े मवाद की दुर्गन्ध से नाक फटने लगती है। बाहर से आदमी कुछ भी कहता-बताता रहे, असल में वह वही रहेगा जो स्वरूप अंतरंग में विनिर्मित किये बैठा है।

यह अंतरंग की अभिलाषाएँ ही जीवन का सार तत्व हैं। इसी बीज के अनुरूप परिस्थितियों के अंकुर उगते और साधनों के पत्ते जुटते हैं और उन्हीं के अनुरूप क्रिया-कलापों के पुष्प और परिणामों के फल सामने आकर उपस्थित हो जाते हैं। एक शब्द में यों कह सकते हैं कि आँतरिक अभिलाषाएँ ही जीवन का सर्वस्व हैं। वे जिधर बहेंगी उधर ही मन, शरीर, कर्तृत्व और वातावरण सहज ही बढ़ता ढलता चला जायेगा। इस प्रवाह के आगे कोई अवरोध ठहर नहीं सकता। समस्त प्रतिकूलताओं को चीरता हुआ वह प्रवाह अपने लिए रास्ता बना लेता है और उन साधनों को प्राप्त कर लेता है- उन स्थानों तक पहुँच जाता है, जिनकी प्रारम्भिक स्थिति में कल्पना कर सकना भी कठिन था।

मनोविज्ञान के इस रहस्य को हमें इसलिए समझना चाहिए क्योंकि विचार क्राँति की प्रक्रिया इसी मर्मस्थल को छूती है। उसका आरम्भ यही से होता है। हम साधनों का निर्माण करने नहीं चले हैं, क्योंकि अपनी दृष्टि में वे बार-बार झड़ने- उगने वाले पत्र-पल्लव मात्र हैं। निकृष्ट मनोभूमि के रहते अच्छी परिस्थितियाँ निरर्थक सिद्ध होती हैं और देखते-देखते पलायन कर जाती हैं। इसके विपरीत उत्कृष्ट मनोभूमि गई-गुजरी परिस्थितियों में भी आनन्द उल्लास का बाहुल्य अनुभव करती है और क्रमशः अनुकूल साधनों को जुटाती चली जाती है।

यह मनोवैज्ञानिक अनुभूति हमें बताती है कि सामाजिक विकास और नव निर्माण के लिए व्यक्तियों के विकास अनिवार्य रूप से आवश्यक हैं। इसलिए हमें जन-इच्छाओं को परिष्कृत करने की दिशा में सारा ध्यान केन्द्रित और प्रयत्नों को समवेत करना चाहिए। आज का इंसान बाहर से कुछ भी बकता या बनता हो, भीतर से बहुत ही लोभी, स्वार्थी, संकीर्ण, अनुदार और कामुक प्रवृत्ति का बन गया है। यदि पोस्टमार्टम करने चलें तो भावना शरीर का शवोच्छेद लगभग एक ही प्रकार का निष्कर्ष प्रस्तुत करेगा। हर आदमी अमीरी के आधार पर विलासिता-कामुकता और अहमन्यता का मजा उठाने के लिए व्याकुल है। उसे ऐश चाहिए, शान-शौकत चाहिए, वाह-वाही चाहिए, इसके अतिरिक्त उसे और कुछ नहीं चाहिए। ये चीजें उसे अति विशाल मात्रा में और अति शीघ्र चाहिए। इसी धुरी पर आज के व्यक्ति का सारा जीवन घूम रहा है।

इस प्रवाह को उलट सकना कैसे सम्भव हो सकता हैं? इसका उत्तर एक ही है कि अंतरंग की आकाँक्षा

मर्मस्थल में -आदर्शवादिता पैदा की जाय। ऐसा हो सके तो मन, मस्तिष्क समय श्रम सभी उस दिशा में

मुड़ चलें और साधन, सुविधा, परिस्थिति, सहयोग आदि के सारे सरंजाम उसी स्तर के सहज ही जुटने लगें। जो लोग निंदा, व्यंग्य, उपहास, लाँछन एवं अवरोध उत्पन्न करने में आज लगे हुए हैं वे कल अपनी हार मान लें और पत्थर से सिर फोड़ना छोड़कर उस अतिमानवी साहस के चरणों पर श्रद्धा सुमन बिछाने लगें।

बड़ा त्याग, बलिदान, पुरुषार्थ एवं अनुदान देने में लगाया जा सके तो सामान्य स्तर का मनुष्य भी धीरे-धीरे इतने महत्वपूर्ण कार्य कर सकता है कि उसका लेखा-जोखा तथाकथित संत महात्माओं से हजारों गुना

अधिक आगे ठहराया जाय। मनीषी गोपीनाथ कविराज के ग्रंथ “भारतीय संस्कृति और साधना” के शब्दों में कहें तो=“जब तक मनुष्य लेने की लिप्सा में डूबा रहता है-उसे अपने चारों ओर अभाव और दारिद्रय ही घिरा दीखता है। पर जब वह अपनी मनोदशा देने में रस लेने वाली बना लेता है तो धन न रहते हुए भी शारीरिक, मानसिक सम्पदाएँ इतनी बहुमूल्य दीखने लगती हैं, जिनके आधार पर लोक मंगल के लिए बहुत कुछ किया जा सकना सम्भव हो सके। “

नव निर्माण के लिए उत्कृष्ट भाव सम्पन्न व्यक्तियों की आवश्यकता है। लक्ष्मी और विद्या न होने से किसी को रंज नहीं करना चाहिए। जिन्होंने अपनी अभिलाषाओं, आकाँक्षाओं को आदर्शवादी बनाया है उन्हीं के द्वारा विश्व के भावनात्मक नव निर्माण का महान अभियान संभव है।


Quotation

सब पवित्रताओं में धन की पवित्रता बड़ी है। जो शरीर और कपड़ों को धोते रहते हैं। उनकी मलिनता छूटती नहीं। शुद्ध धन ही मन को शुद्ध बनाता है।


Article

अन्य सभी प्रगति प्रयासों की तरह अध्यात्मिक प्रगति के भी दो पक्ष है। एक है पात्रता का सम्पादक- योग्यता का विकास। दूसरा है तद्नुरूप उत्तरदायित्वों की-अधिकारों की उपलब्धि और उनका निर्वाह। बिना योग्यता के कहीं, कोई, किसी को बहुमूल्य सम्पदा प्रदान नहीं करता। भला अपनी बेटी कोई किसी कुपात्र के हाथों में कैसे सौंप देगा? किसी के हाथ अपने कारखाने की अर्थव्यवस्था क्यों कर सुपुर्द करेगा?

बादल सर्वत्र बरसते हैं पर उस पानी को जमा करना छोटे या बड़े बर्तनों के हिसाब से ही सम्भव होता है। छोटे गड्ढे या बड़े सरोवर में उनके विस्तार के अनुरूप ही पानी जमा हो पाता है। प्रतियोगिताओं में जीतने वाले ही पुरस्कृत होते हैं। पद उन्हें ही सौंपे जाते है जो उन्हें निर्वाह कर सकने की क्षमता को खरी सिद्ध करके दिखाते हैं। सोने का मूल्याँकन उसे कसौटी पर घिसने और आग में तपाने के आधार पर किया जाता है। यही पात्रता है जो आध्यात्मिक प्रगति की पहली सीढ़ी है।

ईश्वर का प्यार और अनुदान उसकी हर संतान के लिए प्रचुर प्रमाण में विद्यमान है पर उसकी उपलब्धि पात्रता के अनुरूप ही होती है। किसी के लिए चपरासी बनना भी सौभाग्य है और किसी को जिस श्रेणी का अफसर बनाया गया है उसे उससे भी बड़ी पदोन्नति जल्दी ही मिल जाती है। इसमें भेदभाव या पक्षपात जैसा कोई अन्याय नहीं। ऊँची श्रेणी में उत्तीर्ण होने वाले ही पुरस्कृत होते और छात्रवृत्ति पाते हैं।

दैवी अनुग्रह और अनुदान प्राप्त करने के लिए ये प्रमाणित करना पड़ता है कि पार्थी ने उसके लिए उपयुक्त प्रामाणिकता अर्जित कर ली है। इतना कर चुकने के उपराँत योग्यता का मूल्य प्राप्त करने में कोई कठिनाई नहीं आती। किंतु यदि इससे बचकर नियुक्तिकर्ता की मनुहार कर छुट-पुट उपहारों के सहारे फुसलाने का प्रयास करें और अपना उल्लू सीधा करने के लिए स्वामी भक्ति की दुहाई दे तो उसका सफल होना कहाँ तक सम्भव है? बैंक में ढेरों रुपया होने पर भी किसी का उतना बड़ा ही चेक स्वीकारा जाता है जितनी उसकी अमानत जमा है। कर्ज भी वापस किये जाने की गारण्टी पर मिलती है। इन मर्यादाओं की उपेक्षा करके कोई मैनेजर का स्तवन, अभिवादन या पुष्प अक्षत भेंट करके मनचाही राशि प्राप्त नहीं कर सकता। इस विश्व व्यवस्था का कण-कण नियम मर्यादाओं में बँधा है, ईश्वर भी। उससे कोई नाक रगड़ कर, गिड़गिड़ाकर, कुछ ऐसा प्राप्त नहीं कर सकता जो शानदार हो और आकाँक्षाओं के अनुरूप हो। ईश्वर से बहुत कुछ पाया जा सकता है किंतु नियत मर्यादाओं के अनुरूप ही।

जिन अध्यात्मिक अनुदानों की पात्रता के अनुरूप हमें उच्च स्तरीय वृद्धि-सिद्धियाँ मिलती है, उन्हें व्यक्तिगत जीवन की पवित्रता और प्रखरता कहा जाना चाहिए। दूसरे शब्दों में उन्हें चिंतन और चरित्र की प्रमाणिकता भी कहा जा सकता है। सर्वप्रथम साधक को इसी के लिए प्रयत्न करना होता है। अगली उपलब्धियाँ प्राप्त करने वाला पक्ष अति सरल है। रंगाई से पहले धुलाई आवश्यक है। बोने से पहले खेत जोतना पड़ता है। ईश्वर की अनुकंपा पाने के लिए भी यही करना पड़ता है।

जुताई, बुआई, सिंचाई का प्रबंध बन पड़ने पर ही फसल लहराती है और कोठा भरने जितनी उपज देती है। अध्यात्म क्षेत्र में इन्हीं तीन प्रयासों को उपासना, साधना और आराधना कहते हैं। उपासना ईश्वर की, साधना अपनी और आराधना समाज की। इन्हीं तीनों का मिलन गंगा, यमुना, सरस्वती का मिलन त्रिवेणी संगम कहलाता है और उसका अवगाहन करने वाला हर दृष्टि से कृतकृत्य बनता है।

उपासना कहते हैं-भगवान के समीप बैठने को। महान तत्वों की समीपता भी असाधारण लाभ प्रस्तुत करती है। स्वाति बूँद सीपी में पड़कर मोती बनती है और बाँस के संयोग से वंशलोचन। चंदन के निकट उगे हुए झाड़-झंखाड़ भी महकने लगते हैं। फूलों पर बैठने वाली मधुमक्खी ढेरों शहद एकत्रित कर लेती है। राजा के चपरासी की भी इज्जत होती है। ईश्वर के पास बैठना अर्थात् उपासना कैसे हो? इसका उपाय है उसके साथ अपने आप को जोड़ देना। इसमें अपनी हस्ती, अपनी इच्छा मिटाकर ईश्वर को, निज को समर्पित करना पड़ता है। नाला नदी में मिलता है, बेल पेड़ पर चढ़ती है, ईंधन आग में जलता है और तद्रूप बन जाता है। पत्नी अपना व्यक्तित्व अलग न रखकर पति में घुला देती है। फलस्वरूप वह विवाह होते ही पति की सम्पदा में साझीदार हो जाती है और उत्तराधिकार की दावेदार बनती है। ये लाभ वैश्या को नहीं मिल सकता। यद्यपि वह पत्नी से भी बढ़कर रिझाने वाले उत्तेजक उपचार करती है। महत्व क्रियाओं का नहीं भावनाओं का है। किसकी उपासना सच्ची किसकी झूठी है। इसकी एक ही परख है। अपनी मर्जी के अनुरूप इष्ट देव को चलाना या उसकी मर्जी के अनुरूप स्वयं चलकर अपनी स्वामी भक्ति और वफादारी का परिचय देना। कठपुतली की तरह हम अपने आप को बाजीगर की उँगलियों में बँधा लेते हैं और उसके इशारों पर नाचना आरम्भ कर देते हैं। तमाशा इतना मजेदार होता है कि दर्शकों की तालियाँ बजने लगती हैं। कठपुतली बाजीगर को अपनी मर्जी पर नचाना चाहे तो बात समझ में आने योग्य भी नहीं रह जाती। हमें ईश्वर के दरबार में भिखारी बनकर कामनाग्रस्त होकर नहीं जाना चाहिए वरन् ये देखना चाहिए कि उसकी इच्छा हमारे तई क्या है?

मनुष्य जीवन का अनुपम उपहार देकर सृष्टा ने हमसे ये आशा की है कि उसकी सृष्टि को अधिक सुँदर, अधिक समुन्नत बनाने का प्रयत्न करें। इसके लिए जितने भी प्रयास किये जाते है वे सभी ईश्वर उपासना के अंग माने जाते है। जप, तप, भजन, पूजन का मतलब ईश्वर को रिझाना नहीं, वरन् ये है कि मानवीय गरिमा का निर्वाह सतर्कता पूर्वक करें और उसे कलंकित न होने दें। ये स्मरण नाम रट के आधार पर बारम्बार किया जाता रहे। अपने आप को राम नाम का साबुन रगड़ कर शुद्ध-स्वच्छ बनाया जाय।

सिद्धाँत को समझ लेने के उपराँत पूजा उपासना का कर्मकाण्ड सरल पड़ता है। उसे अपनी पूर्व मान्यताओं के अनुरूप बहुत या थोड़ी देर अपनी रुचि या सुविधा के अनुरूप किया जाता है। ऋषियों तथा महापुरुषों का निजी जीवन गायत्री उपासना के आधार पर ही असाधारण बन कर रहा है। शास्त्रों और ऋषियों ने गायत्री को देव माता, वेद माता और विश्व माता कहा है। उसे आद्यशक्ति और उपासना विज्ञान का सार तत्व बताया है। हम उसी का जप और प्रकाश पुँज सविता का ध्यान करें, पर यह भी निताँत अनिवार्य नहीं है। जिन्हें यह न रुचे वे अपनी मर्जी के अनुरूप अन्य साधनायें कर सकते है, पर होना चाहिए उन सब में समर्पण भाव की प्रधानता। भिक्षुक या दरिद्र बनकर हम परमात्मा के दरबार में सम्मान नहीं प्राप्त कर सकते। कुछ छुट-पुट अनुग्रह पाकर खाली हाथ न आने का मिथ्या संतोष भर भले ही प्राप्त कर सकें।उपासना भले ही थोड़ी हो पर नियत, समय पूर्वक, नियम पूर्वक और भाव भरी होनी चाहिए। वह हमारी आत्मा को परमात्मा के साथ जोड़ने में बहुत हद तक सफल रहेगी। बिजली के ट्राँसफार्मर के साथ तार जोड़ लेने पर पंखे, बल्ब, हीटर, कूलर आदि यंत्र गतिशील हो उठते है। पानी की टंकी या लाइन के साथ जुड़े हुए नल यथेष्ट पानी देते रहते है। छोटे बैंक बड़े बैंक के साथ जुड़कर सम्पन्न हो जाते हैं। हम भी ईश्वर के साथ जुड़कर उसकी शक्तियों का अनुभव अपने भीतर करने लगते है। बूँद समुद्र में गिरकर अपना अस्तित्व खोती नहीं वरन् अपना आकार उतना ही विस्तृत कर लेती है। ईश्वर की आत्म समर्पण की उपासना करके हम अहंता खोते हैं बदले में उतने ही समर्थ हो जाते है जितना कि ईश्वर स्वयं है।

उपासना के उपराँत दूसरा चरण साधना का है। साधना अर्थात् अपने अंतरंग और बहिरंग जीवन को पवित्र, प्रखर एवं प्रमाणित बना लेना। मनुष्य वस्तुतः एक प्रकार का पशु है। जन्म जन्माँतरों से उसके संचित संस्कार इस जन्म में भी चिपके रहते है और हमारे अधिकाँश आचरण नर पशुओं जैसे होते है। अनगढ़ उच्छृंखल, असभ्य और मानवीय गरिमा की दृष्टि से गये बीते। इन्हें सुधारना और सुसंस्कृत बनाने का संकल्प-पूर्वक कठोर प्रयास करना, यही अपने को साधना है। बिखराव को, चंचलता को, उद्दण्डता को केन्द्रीभूत करना और मर्यादा के बंधनों में अपने को बाँध लेना ही साधना है।

अनगढ़ साँप, बिच्छू, रीछ, बंदर आदि को सधा कर ग्रामीण मदारी अपनी आजीविका चलाते हैं। सरकस के रिंग मास्टर शेरों, हाथियों, घोड़ों को सधाकर ऐसे करतब कराते हैं जिन्हें देखकर दर्शक दंग हो सकें और संयोजक की जेब भरें। माली पौधों को काट-छाँट कर, कलमें लगाकर इतना सुँदर बनाता और फल-फूलों की अनेकानेक प्रजातियाँ उत्पन्न करता है, ऐसे माली प्रशंसा प्राप्त करते हैं। हमें भी जीवन-क्षेत्र का ऐसा ही कलाकार, क्षेत्रज्ञ बनना चाहिए, ताकि हम जीवन के अंतराल में प्रसुप्त पड़ी हुई अनेकानेक विभूतियों को सजग और सक्षम बना सकें और संत, सज्जन, ऋषि और देवात्मा कहा सकें। इसके लिए संयम अपनाना होता है। इंद्रियों का संयम, समय का संयम अर्थ का संयम और विचारों का संयम, इसी नियमन को अध्यात्म की भाषा में तप-साधना कहते है। तप का अर्थ है तपाना-गरम करना। संचित कुसंस्कारों और आदतों से लड़ पड़ना और उन्हें अनगढ़ धातु को गलाकर उपयोगी उपकरण के रूप में ढाल लेना। सुसंस्कृत कोयला ही हीरा बनता है। तपाने से कच्ची मिट्टी के बर्तन बनते हैं और पानी को उबालने की शक्तिशाली, भाप बनती है। अनुपयुक्त चिंतन, चरित्र रुझान एवं आदतों को बदलने और उनके स्थान पर उच्चस्तरीय प्रवृत्तियों से अपने आपका कायाकल्प कर लेने को दूसरा जन्म होने, द्विजत्व प्राप्त करने जैसे शब्दों से उपमा दी जाती है। यही तपश्चर्या है। उपवास, ब्रह्मचर्य आदि में यही भीतरी महाभारत लड़ना पड़ता है। जो जितना निर्मल, पवित्र बन सका-चिंतन और चरित्र की मर्यादाओं के शिकंजे में कस सका, कुम्हार के आवे की तरह पक सका, समझना चाहिए कि वह घर में रहने वाला तपस्वी है। अच्छा हो तपोवन में घर बनाने की अपेक्षा घर में ही तपोवन बनाएँ और अपने सज्जनतापूर्ण सृजन कार्यक्रम से न केवल अपने को वरन् समूचे परिवार को इसी सुसंस्कारिता के-तप-साधना के ढाँचे में ढाल सकें।

पात्रता का विकास-अन्तरात्मा का परिष्कार-पात्रता का अभिवर्धन करने के लिए हमें साधना करनी चाहिए। सादा जीवन उच्च विचार की नीति अपनानी चाहिए। औसत नागरिक स्तर का निर्वाह करना चाहिए तथा जो समय, धन, श्रम, चिंतन आदि की बचत हो सके, उस कटौती को विश्व के कल्याण के - लोक मंगल के कार्यों में निमित्त लगाना चाहिए। इसी को पुण्य, इसी को परमार्थ, इसी को आराधना कहते हैं। पात्रता विकसित करने का यह तीसरा व अंतिम अवलम्बन है। भगवान का निराकार स्वरूप वह है जो कण-कण में समाया हुआ है। जो नियम अनुशासन मात्र है। हम उसके कायदे, कानूनों पर चलकर उसके प्रिय-अप्रिय, भक्त-अभक्त बन सकते हैं। भगवान का प्रकट प्रत्यक्ष स्वरूप है, यह विराट ब्रह्म प्रत्यक्ष संसार। इसे सुखी-समुन्नत बनाने के लिए अपनी क्षमताओं का नियोजन करना आराधना है। इसमें पिछड़ों की सहायता करने और दिग्भ्रांतों को सही राह बताने वाले प्रकाश की व्यवस्था बनाने के कार्यों को सम्मिलित किया जाता है। यों धार्मिक कर्मकाण्डों में लगने वाले श्रम साधन और पुरोहितों को दान-सम्मान प्रदान करना भी इसी प्रचलन में आता है। पर उसका औचित्य तभी है जब अदृश्य देवताओं को प्रसन्न करने की अपेक्षा उस दान प्रयोजन का उपयोग बुद्धि-संगत और भावनाओं को उमगाने वाला हो।

आराधना अर्थात् पुण्य-परमार्थ प्रत्येक के लिए आवश्यक है। हम जो बोते हैं, वही काटते हैं। संसार के साथ भलाई करना प्रकारान्तर से अपनी ही भलाई करना है। पिछड़ों को उठाना कालान्तर से स्वयं को भी ऊँचा उठाने वाली अदृश्य व्यवस्था का आह्वान करना है। पुण्य का प्रतिफल अगले जन्मों में भी मिल सकता है। भाग्योदय भी बन सकता है पर प्रत्यक्ष लाभ भी उससे कम नहीं है। आत्म-संतोष, यश और बदले में प्रकारान्तर से अनेकानेक प्रकार की उपलब्धियाँ हस्तगत होना ऐसा सत्परिणाम है जिसमें गँवाने जैसी कोई बात नहीं है। यह बोने-काटने जैसे व्यवसायगत सिद्धाँतों के अनुरूप भी है और ईश्वर को प्रसन्न करने वाला एक सर्वोत्तम साधन भी।

संसार के महामानवों का इतिहास एक ही राजमार्ग पर चला है। उनने उनने जनता के हित कामना से सत्प्रवृत्तियों का लक्ष्य पूरा करने की दृष्टि से कष्ट सहे, त्याग किये। इसका प्रतिफल निरर्थक नहीं गया, जनता ने उन्हें सिर आँखों पर बिठाया और उस पद तक पहुँचाया जिसके लिए असंख्यकों तरसते हैं।

संसार से हमने बहुत कुछ पाया है। जीवनोपयोगी अधिकाँश वस्तुएँ लोगों के परिश्रम से बनी हैं। उनके बुद्धि कौशल का अनुग्रह लाभ उठाकर हम उस स्थिति में पहुँचे हैं जिसमें हम आज है। यदि किसी का सहयोग न मिला होता तो कदाचित हम जीवित भी न रह पाते, सुसम्पन्न होना तो दूर। ऐसी दशा में आवश्यक है कि उस बगीचे को सींचे जिसकी छाया में बैठते और फलों से गुजारा करते हैं। ऋण मुक्ति का सही तरीका इस विश्व वसुधा को सुखी, समुन्नत बनाना ही है। इसे किये बिना कोई जीवन-मुक्त नहीं हो सकता।

उपासना, साधना, आराधना के उपरोक्त तीन माध्यमों को अपनाकर हम अपनी पात्रता को इस स्तर तक विस्तृत कर सकते हैं जिसमें देवताओं के अनुग्रह आकाश से होने वाली पुष्प-वर्षा की तरह हम पर बरसें।


इस मूसल के शस्त्र बने (Kahani)

यदुकुल के लड़के अनुशासन के अभाव में बड़े उद्दंड हो गये थे। उनने बड़ों के साथ शिष्टाचार बरतने तक की मर्यादा छोड़ दी थी। एक मुनि समीप वन में तप कर रहे थे। लड़कों को उनका उपहास करने की सूझी। वे एक लड़के को वधू के कपड़े पहनाकर पेट पर लोहे का मूसल बाँधकर ले गये और पूछने लगे-बताइए! इसको लड़का होगा या लड़की।

मुनि उनका उपहास समझ गये। उनने शाप दिया कि इससे जो भी होगा वह तुम्हारे सारे वंश का नाश करेगा।

ऐसा ही हुआ। इस मूसल के शस्त्र बने। गृह युद्ध हुआ और उसी में मर-कट कर उस परिवार के सारे लोग समाप्त हो गये।


बेताल का आत्मबोध

जैसा नाम वैसा ही गुण। उनका समूचा जीवन श्मशानों में ही बीता। कभी ताँत्रिक साधनाओं में तो कभी रणभूमि में। अवन्तिका की सेना उनके बिना सूनी थी। सम्राट विक्रमादित्य उनके बिना स्वयं को विवश महसूस करने लगे। प्रश्न कूटनीतिक चक्रव्यूह का हो, या सेना की व्यूह रचना का-उनकी बुद्धि चुटकी बजाते ढेरों समाधान प्रस्तुत कर देती। उनकी कोप-चण्डी शत्रु शिविरों को ऐसे सूना कर देती थी, जैसे तेज तूफान में कटी हुई फसलें उड़ जाती हैं। वह सम्राट विक्रम के चतुर्दिक् फहराने वाले यश ध्वज के दण्ड थे।

किंतु आज विवशता को विवश करने वाला स्वयं को विवश अनुभव कर रहा था। जिसकी कूटनीति के आगे बड़े-बड़े सम्राट सिर झुकाते थे, अपनी कूटनीति से आज वह आप ही पराभूत हो उठा था। कई दिन से उसके मस्तिष्क में निरंतर एक ही विचार उठ रहा था -”यह षड़यंत्र, ये कुचक्र किसके लिए किए, जीवन भर जिन पापों का भार उठाये घूमा, उससे क्या शरीर अमर हो गया?” आज पता चला कि दूसरों को पराजित और स्वयं को विजयी मानने वाला सर्वथा भूल में था। मनुष्य से बढ़कर काल-पुरुष है, कोई कितना ही ऐंठे, अकड़ दिखाए पर काल पुरुष को जीतना सदैव ही दुःसाध्य रहा। मृत्यु से कोई बच न पाया। जो अपने ही गोरखधंधे में लगा रहा वह अन्ततः पछताया और हाथ मलता हुआ ही गया।

आज उसके विवेक चक्षु खुल गए थे। प्रज्ञा असत्य के घने आवरण को भेदकर सत्य का दिग्दर्शन-मूल्याँकन कर रही थी। साँसारिक मोह टूट गया, दम्भ भर गया। जीवन भर का दोष-दूषण उनकी आँखों के आगे नाच रहा था और उसके लिए वह पश्चाताप की आग में जल रहा था। बार-बार मन-मस्तिष्क में हथौड़े की चोटों की भाँति एक ही आघात लगता-तब क्यों न वर्तमान जीवन क्रम को बदल डाला जाय?

राजसी परिधान उतार फेंके उसने। साधारण वेशभूषा में, हाथ में लाठी और उत्तरीय वस्त्र कंधे पर डाले प्रातः पीयूष बेला में वह घर से बाहर निकल पड़ा। क्षिप्रा के पावन तट पर खड़े होकर उनने अवन्तिका (उज्जयिनी) और भगवान महाकाल को प्रणाम कर पीछे मुड़कर बढ़ चले।

पर अभी बीस कदम ही बढ़े होंगे कि महाकवि कालिदास और बासन्तिका उधर से आते दिखाई दिये। उन्हें साधारण वेश-विन्यास में देखकर महाकवि को आश्चर्य हुआ पर इस महान इंद्रजालिक के लिए उनके मन में असम्भव की कुछ कल्पना न थी। तो भी पूछा अवश्य उन्होंने -”कहाँ चले बेताल भट्ठ? आज किस सम्राट का ज्योतिष बिगड़ा, किस पर शनि की दृष्टि गहरी हुई? क्या मालवा पुनः रणभेरी बजाने जा रहे हैं? पर छद्म नीति में तो बसन्तिका अपने साथ रहती आयी थी, आज आप अकेले कैसे?” बासन्तिका भी उन्हें अकेले जाते देखकर भौंचक्की थी।

महाकवि की ओर उस स्वाभिमानी बेताल ने ऐसे देखा, जैसे वास्तविक विजय के लिए वह आज ही निकला हो। उसने कहा-”आत्म प्रदेश का शासक मन बहुत कुटिल हो गया है कविवर! अब तो अंतिम और

निर्णायक युद्ध अपने आप से ही होगा। देखता हूँ, विजय जीवन की कुटिलताओं को मिलती है या आत्मबोध की आकाँक्षा को?”

कालिदास ने पूछा-”किंतु आर्य प्रवर! आपके बिना इस अवन्तिका का क्या होगा?” “यह सब मोह है-कविश्रेष्ठ! मनुष्य अहंकार वश ऐसा सोचता है, और भावी-पीढ़ी की प्रगति में बाधक बनता है। “

कालिदास और कुछ न बोल सके। बेताल आगे बढ़ गये और उधर सारे देश में खबर फैल गई, महातांत्रिक, राज्य के महामात्य बेताल भट्ट वानप्रस्थ लेकर समाज सेवा हेतु समर्पित हो गये।


न्यायप्रियता कलुषित हो जायेगी (Kahani)

रोम की एक अदालत में एक कवि पर मुकदमा चल रहा था। कवि ने जज से प्रार्थना की-”आप किसी तरह इतनी कृपा नहीं कर सकते कि मामले को थोड़ा-सा घुमा-फिराकर मेरे पक्ष में निर्णय कर दें। मुझ पर बड़ा उपकार होगा।” न्यायाधीश ने उत्तर दिया-”कविवर! मामले को घुमा-फिराकर आपके पक्ष में निर्णय कर देना बहुत कठिन काम नहीं है, परंतु जिस प्रकार छंद में एक मात्रा के अंतर से कविता दूषित हो जाती है उसी प्रकार न्याय मार्ग में जरा भी विचलित होने से मेरी न्यायप्रियता कलुषित हो जायेगी। “


हीरा जनम अमोल है

भविष्य के रंगीले सपने देखना एक बात है और जीवन को योजनाबद्ध रीति-नीति अपनाकर प्रगति पथ पर अग्रसर होना दूसरी। जीवन एक असाधारण अवसर या अनुपम सौभाग्य है। यह ऐसे ही खाने-सोने में समय बिताने के लिए नहीं मिला।

लाटरी खुल जाने पर मिली हुई राशि को किन कार्यों में, किस प्रकार काम में लाया जाय यह योजना तेजी से बनती और कार्यान्वित होने लगती है। जो इस सम्बंध में लापरवाही बरतते हैं, उनके हाथ आया हुआ धन बेहिसाब रखा जाता और बेसिलसिले खर्च किया जाता है। इस प्रकार वह सुयोग अधिक समय टिकता नहीं। व्यर्थ के कार्यों में खर्च हो जाता है। तब पहले जैसी गयी बीती स्थिति हाथ रह जाने पर पश्चाताप भी कम नहीं होता। सही स्थिति उनकी भी होती है जिनने सृष्टा की सर्वोत्तम कलाकृति मनुष्य जन्म के रूप में पाई तो सही पर उसे जैसे तैसे ही दूसरों की तरह आँख मीचकर खर्च हो जाने दिया।

मनुष्य अनुकरण प्रिय है। समीपवर्ती लोग जैसा भी भला-बुरा जीवन जीते हैं। परोक्षरूप में अपने को भी यही प्रेरणा मिलती रहती है कि कदाचित जीवन-यापन का यही तरीका सरल एवं सुगम है। यही स्वाभाविक भी है। इसलिए उसी के अनुकरण के लिए मन चलने और पैर उठने लगते है। आम आदमी का काम इसी ढर्रे को अपनाने से चल जाता है। उसे नये सिरे से नया कुछ सोचना नहीं पड़ता। साधारण जन्मों में पिछले जन्मों की पशु प्रवृत्तियाँ जाग्रत रहती हैं। वे ही मार्ग बताती और सूझ सुझाती रहती है। मनुष्य जीवन की गरिमा को समझ लेना भर पर्याप्त नहीं, वह तो कथा-प्रवचनों और धर्म-ग्रंथों में भी मिल जाती है। असली बात है उसे हृदयंगम करने की। मनुष्य जीवन की गरिमा को समझ लेना भर ही पर्याप्त नहीं, वह तो कथा-प्रवचनों और धर्म-ग्रंथों में भी मिल जाती है। असली बात है उसे हृदयंगम करने की। मनुष्य जीवन की कुछ ऐसी अनुपम एवं विशिष्ट महत्ता है कि जो उसे समझ सकेगा उसके लिए ही यह भी संभव होगा कि इस बहुमूल्य सौभाग्य का ऐसा कुछ उपयोग भी सोचे जो सामान्यों से आगे बढ़कर ऊँचा उठ कर हो।

मनुष्य जीवन एक कल्पवृक्ष है। इसकी शरीर संरचना ऐसी है जिसके द्वारा उन विभिन्न कार्यों को सँजोया जा सकता है जो सामान्य जीवधारियों के लिए संभव नहीं। इसी प्रकार उसका अपना चिंतन तंत्र भी इतना उच्चस्तरीय एवं दूरदर्शी है कि उसकी तुलना सृष्टि का अन्य कोई प्राणी नहीं कर सकता।

शारीरिक तत्परता और मानसिक तन्मयता का सुयोग यदि किसी लक्ष्य पर केन्द्रित किया जा सके तो उस दिशा में क्रमिक प्रगति तत्काल चल पड़ती है। यदि उसमें एकाग्रता, साहसिकता और एकनिष्ठ का समावेश हो तो प्रगति के अनेकों अवसर हस्तगत होते रहते हैं। साधन जुटाने, सहयोग पाने में उन्हीं की कठिनाई अनुभव होती है जो भीतर से पोले हैं। जिनका सामान्यतः कोई निश्चित लक्ष्य या स्थिर कार्यक्रम नहीं है।

जनसाधारण की जिंदगी खाने-पीने में ही बीत जाती है। मन लोभ-मोह और अहंकार में इस प्रकार जकड़ा रहता है कि उसे इस परिधि से आगे बढ़ने की और कोई सूझ सूझती नहीं। जिस राह पर अंधी भेड़ें झुण्ड बाँधकर चल रही हैं, उससे तनिक आगे पीछे हटकर चलने का साहस ही नहीं होता। इसी दशा में सामान्य स्तर का ही जीवन जीते हुए उसी मार्ग से श्मशान तक पहुँचना पड़ता है।

शरीर के लिए जिस प्रकार अन्न, जल और हवा की आवश्यकता समझी जाती है उसी प्रकार तीन बातें ऐसी हैं जिन्हें श्रेष्ठ जीवन जीने से मिली उपलब्धि कहा जा सकता है। वे तीन हैं-

1-आत्म संतोष, 2-लोक सम्मान, 3-दैवी अनुग्रह। इन तीन को जिनने प्राप्त कर लिया, समझना चाहिए उसने वह सब कुछ प्राप्त कर लिया जो प्राप्त करने योग्य है। इन्हें त्रिलोक विजय समझा जा सकता है और यह भी अनुभव किया जा सकता है कि शरीर, बुद्धि और आत्मा को जो उपहार मिलना चाहिए था वह मिल गया।

किसे क्या करना चाहिए? यह अपनी योग्यता, रुचि और परिस्थितियों पर निर्भर है। किंतु दिशा धारा तो स्पष्ट होनी ही चाहिए। यात्रा पथ का, लक्ष्य का निर्धारण तो रहना ही चाहिए। कार्यों की विस्तृत भूमिका में जाना तो व्यक्ति की अपनी मनोदशा पर निर्भर है किंतु यह सुगम है कि उसकी एक मोटी रूपरेखा बना ली जाय और उस पर विश्वास-पूर्वक चल पड़ा जाय।

इन तीनों की प्राप्ति के लिए दो आधारों को अपनाना पर्याप्त है। इनमें से एक है आत्म संयम, दूसरा पुण्य परमार्थ। इन दोनों को मजबूती से पकड़े रहने पर कोई भी किसी भी स्थिति का व्यक्ति अपने स्तर की सफलता उपलब्ध कर सकता है। अपनी व्यक्तिगत महत्वाकाँक्षायें ही लोभ-मोह और अहंकार के दलदल में फँसाती है। अमीरी, बड़प्पन, प्रदर्शन, अधिक सुविधाएँ, उपभोग का लालच ही प्रस्तुत जन समुदाय का प्रेरणा केन्द्र बनकर रह गया है। इन्हीं के सहारे लोग अपनी पूरी जिंदगी काटते हैं। सीधे उपायों से बढ़ी-चढ़ी तृष्णा का समापन नहीं हो पाता तो बुरे से बुरे कुकर्म करते हैं। यही दुष्प्रवृत्ति मनुष्य को नीचे गिराती है। पशुओं से भी गये-गुजरे पिशाच स्तर तक घसीट ले जाने का प्रयत्न करती है। इस पतन पराभव का उन्मूलन करना हो तो “सादा जीवन उच्च विचार” की सूक्ति को मन के कोने -कोने में बिठा लेना चाहिए। औसत भारतीय जीवन इसी का मापदण्ड है। व्यक्तिगत नीतिमत्ता भी इसी में समायी हुई है। संयमी का ही दूसरा नाम सदाचारी है। सदाचारी को ही ब्रह्मचारी, साधनारत एवं तपस्वी कहा जा सकता है। इसमें अपने धन, समय, विचार, और लपकते मन पर नियंत्रण प्राप्त करना पड़ता है। जो यह कर सका उसे आत्मकल्याण की साधना में सफल होकर रहने वाला समझना चाहिए।

यात्रा दोनों पैर क्रमबद्ध रूप से उठाते चलने पर पूरी होती है। आत्मोत्कर्ष का पहला चरण है-संयम। दूसरा चरण है, इसी के साथ जुड़ी हुई सेवा, जिसे पुण्य परमार्थ भी कहते हैं। अपने सुख को बाँट देना और दूसरों के दुख को बँटा लेना, यही है सेवा धर्म की आचार संहिता और विद्या। इसे कार्यान्वित करने के लिए आवश्यक नहीं कि व्यक्ति को धनी होना चाहिए और दूसरों को धन दान करना चाहिए।

कभी-कभी ही किसी के ऊपर ऐसी मुसीबत आती है, जब वह अपने पैरों पर खड़े होने की स्थिति में नहीं होता। वह बुरा समय जब तक रहे तब तक किसी को आर्थिक या शारीरिक सहायता भी नहीं दी जा सकती है। पर सदा न तो कोई देने की स्थिति में होता है और न लेने की। फिर सहायता के रूप में अनवरत चलने वाला क्रम एक ही हो सकता है, वह है -सत्परामर्श। लोग दिशा भूल कर कुमार्ग अपनाते और गई-गुजरी

जिंदगी जीते हैं। इससे उबारने का एक ही तरीका है कि जिन तक भी अपनी पहुँच हो, उन सभी को उत्कृष्ट आदर्शवादिता अपनाने-चरित्र चिंतन और व्यवहार को उत्कृष्ट रखने की प्रेरणा दी जाय। यही है सेवाधर्म जिसका निर्वाह कर सकना केवल संयमशीलों से ही बन पड़ता है। आत्मोत्कर्ष का मूलभूत आधार यही है।


मन में गुंजाइश होना (Kahani)

महाप्रभु ईसा को जब भी ठहरना होता, पतितों और तिरस्कृतों के यहाँ ठहरते।

सम्पन्न लोग उनका उपहास करते और कहते जब कुलीनों और सम्पन्नों के यहाँ ठहरने की आपको सुविधा है तो नीच लोगों के यहाँ क्यों डेरा डालते हैं? ईसा कहते रोगियों के यहाँ ही चिकित्सक के यहाँ जाना चाहिए। जो निरोग हैं उनके यहाँ जाना व्यर्थ है।

एक साधु ने छोटी झोंपड़ी बना रखी थी। उसी में गुजारा करता। जगह इतनी भर थी कि वह अकेला पैर पसार कर सो सके और करवट बदलता रह सके।

एक दिन जोर की वर्षा हुई। एक भीगता हुआ साधु रात के समय उस झोपड़ी पर आ पहुँचा दरवाजा खटखटा कर बोला उसे भी उस झोपड़ी में भीगने से बचने और रात बिताने के लिए जगह मिले।

भीतर वाले साधु ने दरवाजा खोला ओर अतिथि को भीतर ले लिया। झोंपड़ी में एक के सोने को जगह थी पर बैठ कर दो भी समय काट सकते थे। सो बैठकर समय बिताने लगे। इतने में एक और व्यक्ति भीगता हुआ वहीं आ पहुँचा। दरवाजा खुला था। उसने कहा मुझे भी जगह मिल जाये तो भीगने से बचाव हो सके। साधु ने तीसरे को भी भीतर ले लिया। कहा-इसमें एक के सोने की जगह थी। बैठकर हम दो भी समय बिता लेंगे। तुम्हें आना है तो खुशी से आओ। खड़े होकर हम तीनों भी रात काट लेंगे। तीनों ने खड़े-खड़े उस छोटी झोपड़ी में रात बिताई। इसे कहते हैं मन में गुंजाइश होना।


अग्नि तत्व-प्राण है देव संस्कृति का

वैदिक काल में देवताओं की प्रतिमा पूजन की परम्परा नहीं थी। उन दिनों एक ही परब्रह्म की मान्यता थी और उसका प्रतीक अग्निदेव को माना जाता है। ऋषियों ने जिन प्राकृत शक्तियों की स्मृति व प्रशंसा की है उनमें अग्नि का स्थान सर्वप्रथम है। ऋग्वेद का प्रथम मंत्र एवं शब्द अग्निदेव की स्तुति से ही आरंभ होता है। यह अग्नि ही यज्ञ का मुख्य अग्रणी, पुरोहित एवं संचालक है, क्योंकि उसी से इस विश्व ब्रह्मांड में रूप है, दर्शन है और प्रकाश है। उसी के आलोक से समस्त विश्व आलोकित है। उसी ज्ञान स्वरूप प्रकाशक, चेतना शक्ति की शासिका एवं अधिष्ठात्री अग्नि की अभ्यर्थना, उपासना से जीवन पवित्र बनता, आत्मोन्नति होती और अमृतत्व की प्राप्ति होती है।

देवताओं में सर्वप्रथम एवं सर्व समर्थ अग्निदेव की उत्पत्ति हुई। इसके गीता गीता से लेकर वेद-पुराणों तक में कितने ही प्रमाण मिलते हैं। महाभारत, अश्वमेधिक पर्व, 92 वें अध्याय में उल्लेख है-

“ब्रह्मत्वेनासृजं लोकानहमादौ महाद्युते।सृष्टोऽग्निर्मुखतः पूर्व लोकानाँ हितकाम्यया॥”

अर्थात् श्री भगवान ने कहा-”महातेजस्वी राजन! मैंने सबसे पहले ब्रह्मस्वरूप से लोकों को बनाया। लोगों की भलाई के लिए मुख से सबसे पहले अग्नि को प्रकट किया।” इसी अध्याय के वैष्णव पर्व में कहा गया है-”सभी भूतों से पहले अग्नि तत्व मेरे द्वारा पैदा किया गया,” इसलिए पुराण ज्ञाता मनीषी उसे ‘अग्नि’ कहते है।

भौतिक शक्तियों के उद्भव एवं उपयोगी परिवर्तनों में अग्नि का उपयोग प्रधान रूप में होता है। भोजन पकाने से लेकर धातु परिशोधन तक के अनेकानेक कार्य अग्नि द्वारा सम्पन्न होते हैं। तेल, कोयला, भाप, बारूद जैसे ईंधनों के सहारे अपने युग में यंत्रों का संचालन होता है। अग्नि का उपयोग केवल मनुष्य ही जानता है, अन्य प्राणी तो उससे दूर भागते हैं। अग्नि का है, उतना और किसी का नहीं। विद्युत भी अग्नि का एक विशेष प्रकार ही है। अणु-विखण्डन एवं विकिरण जैसे माध्यमों से प्रकट की जाने वाली ऊर्जा अग्नि ही है जो एक विशिष्ट तापधारा कही जा सकती है।

आत्मिक प्रयोजनों में अग्नि का और भी विशिष्ट उपयोग है। तपश्चर्या, योग साधना में अग्नि की समीपता और सहायता से अनेकों उपासनात्मक उपचार होते है। अग्निपूजा ही यज्ञ का प्रधान विषय है। न्यायदर्शन 4/1/62, मनुस्मृति-1-22, सिद्धाँत शिरोमणि (गणिताध्याय), गोपथ ब्राह्मण (1/4/24), गीता (4/22), ऋग्वेद (1/1/1), अनेकानेक आप्त वचनों में उपासनात्मक एवं अध्यात्म प्रयोजनों में अग्नि को प्रमुख माध्यम माना गया हैं। उसके प्रकटीकरण एवं क्रियान्वयन की पद्धति को अग्निहोत्र कहते हैं। भौतिक अग्नि में जब तक मनुष्य का परिचय नहीं था, तब की पिछड़ेपन और आज उस महाशक्ति के सहारे संभव हुई प्रगति वाली स्थिति की तुलना करते हैं तो दोनों के मध्य जमीन-आसमान जैसा अंतर दिखायी पड़ता है। यही बात दैवी अग्नि के संपर्क के बिना और उसकी सहायता से संभव आत्मिक प्रगति के बारे में भी कही जा सकती है। दैवी शक्तियों के साथ संपर्क बनाने और अनुग्रह पाने में अग्नि का सहयोग असाधारण है। अगरबत्ती, धूप, दीप में अग्नि की ही गरिमा है।

यज्ञाग्नि तो प्रत्यक्ष ही विष्णु स्वरूप है। ऋग्वेद 7/11/1 के अनुसार अग्नि के बिना देवता की अनुकम्पा प्राप्त नहीं होती। ऋग्वेद 7/1/7-7/11/1 तथा अथर्ववेद 5/12/2 के अनुसार हमारे अनुदान और प्रतिवेदन देवताओं के पास तक अग्नि के माध्यम से पहुँचते हैं। शतपथ ब्राह्मण 3-7-4-10, सांख्यायन - ब्राह्मण 3-7, महाभारत 7/7/10 में अग्नि को ही देवताओं का मुख बताया गया है। वे इसी माध्यम से मनुष्यों की भेंट स्वीकार करते और अपने वरदान उस पर उड़ेलते हैं। अग्नि को संस्कारित कर उसमें श्रद्धा-भावना-भावना के साथ एवं विधि-विधान के साथ जो भी आहुति दी जाती है, उसे देवता ग्रहण कर प्रसन्न होते हैं और मनुष्यों की सुख-सुविधा का संवर्धन करते है। उन्हें श्रेष्ठ बनाते हैं। स्वर्ग तक आत्मा को पहुँचाने वाला वाहन यज्ञाग्नि ही है। ब्रह्मांड की नाभि-ध्रुव केन्द्र जैसी आधारभूत सत्ता इसी में है। प्रत्यक्ष अग्नि पूजा यज्ञ का उपचार स्वरूप है, किंतु वह इतने तक ही सीमित नहीं है। वह अध्यात्म का चेतना जगत का अति प्रभावशाली ऊर्जा केन्द्र है जिसके सहारे व्यक्ति सूक्ष्म जगत से संपर्क साधने में समर्थ होता है। इस सम्बंध में ऋषि-मनीषियों का प्रतिपादन गंभीरतापूर्वक समझा जाना चाहिए। उनने ‘अग्नि तत्व’ को तीन भागों में विभाजित किया है और प्रत्येक का अलग-अलग महत्व और उपयोग बताया है। ये हैं-(1) पावक (2) पवमान और (3) शूचि। ‘पावक’ वह है जो गर्मी उत्पन्न करती है, चूल्हा जलाने जैसे लौकिक कार्यों में प्रयुक्त होती है। ‘पवमान’ मनुष्य की काया में रहने वाली वह अग्नि है जो भोजन पचाने से लेकर गतिशीलता तक के अनेक क्रिया-कलापों में काम आती है। तप, संयम द्वारा इसी को बढ़ाया जाता है और व्यक्तित्व के हर पक्ष को प्रखर किया जाता है। तीसरी-’शुचि’ वह है जिसके सहारे वातावरण को प्रभावित किया जाता है, अदृश्य जगत को अनुकूल बनाया जाता है। विश्व व्यवस्था को वही प्रभावित करती है।

यह विज्ञान के पावक का प्रयोग होता है जिसमें अग्निहोत्र के माध्यम से लौकिक प्रयोजनों में आने वाली ऊर्जा को विकृत होकर ऋतु प्रभावों और प्रकृति उपद्रवों के प्रेरक नहीं बनने दिया जाता और इस स्तर को देखा जाता है कि वह वर्षा से लेकर तूफानों तक की सभी हलचलों को जीव-जगत के लिए उपयोगी बनाये रह सके। पवमान को व्यक्तित्व के सर्वतोमुखी विकास के लिए प्रयुक्त किया जाता है। कषाय-कल्मषों की कुसंस्कारिता भी इसी से दूर होती है। सद्गुणों, सत्प्रवृत्तियों एवं विभूतियों को इसी आधार पर पाया-बढ़ाया जाता है। पवमान को साधना क्षेत्र की प्राण ऊर्जा कहा जा सकता है। तीसरी शुचि है जिसकी समर्थता और व्यापकता अत्यधिक है। उसके सहारे अदृश्य जगत के प्रवाह को निकृष्टता की विभीषिका उत्पन्न करने से रोका जा सकता है और सुखद संभावनाओं से भरा-पूरा सतयुग की स्थापना में योगदान लिया जा सकता है। इस प्रकार संक्षेप में अग्नि के तीन क्षेत्र ऊर्जा, प्रखरता एवं विश्व नियामक शक्तियों के रूप में जाना जा सकता है। यज्ञाग्नि का स्वरूप ऐसा बनाया जाता है कि उसके द्वारा पवमान और शुचि की भूमिका सम्पन्न की जा सके।

पावक, पवमान एवं शुचि के अतिरिक्त प्रयोग एवं प्रयोजन-भेद से संस्कार प्रक्रिया में अग्नि के और भी अनेकों नामकरण हुए हैं। गोमिल पुत्रकृत संग्रह में कुछेक के नाम इस प्रकार हैं-”अग्नेस्तु मारुतो नाम.....क्रव्यादों मृत भक्षणे।” अर्थात् गर्भाधान में अग्नि को मारुत कहते हैं। पुँसवन में ‘चंद्रमा’ शऽ्गणकर्म में ‘शोभन’ सीमन्त में ‘मंगल’ जातकर्म में ‘प्रगल्भ’ नामकरण में ‘पार्थिव’ अन्नप्राशन में ‘शुचि’ चूड़ाकर्म में सत्य, व्रतबंध अर्थात् उपनयन में ‘समुद्भव’ गोदान में ‘सूर्य’ तथा केशाँत (समावर्त्तन) में ‘अग्नि’ कहते हैं। विसर्ग अर्थात् अग्निहोत्रादि क्रिया-कलापों में ‘वैश्वानर’, विवाह में ‘योजक’, चतुर्थी में ‘शिखी’, धृति में ‘अग्नि’, प्रायश्चित-अर्थात् प्रायश्चित्तात्मक महाव्याहृत होम में ‘विधु’, पाकयज्ञ में ‘साहस’ लक्षहोम में ‘वन्हि’, कोटिहोम में ‘हुताशन’, पूर्णाहुति में ‘मृड़’, शाँति में ‘वरद’, पौष्टिक में ‘बलद’, अभिचारक में ‘क्रोधाग्नि’ वशीकरण में ‘शमन’, वरदान में ‘अभिदूषक’, कोष्ठ में ‘जठर’, और मृतभक्षण में ‘क्रव्याद’ कहा गया है।

योगाग्नि अथवा ज्ञानाग्नि शब्दों में भी ‘अग्नि’ का ही प्रयोग हुआ है। गीता में कथन है-

“ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मासात्कुरुते तथा।ज्ञानाग्नि दग्ध कर्माणं तमाहुः पण्डित बुधाः॥”

इस प्रकार अनेक नामों से प्रख्यात अग्नि तत्व के विभिन्न उद्देश्य एवं प्रयोजन हैं। अग्नि का शब्दार्थ है-ऊर्ध्वगामी। अगि-गतौ, अर्गना लोपश्च, अंग-नि और न का लोप -इस व्याकरणिक विश्लेषण से अग्नि शब्द से अग्नि तत्व में ऊर्ध्वगमन की विशेषता का संकेत मिलता है। वस्तुतः है भी वैसी बात-अग्निशिखा सदा ऊपर की ओर उठती है। उसके माध्यम से उठने वाला धुआं भी ऊपर की ओर ही चलता है। भाप की दिशा भी वही है। हवा गरम होने पर न केवल फैलती है, वरन् ऊपर की ओर भी बढ़ती है। यही क्रिया-कलाप चेतना को प्रभावित करने वाली ‘यज्ञाग्नि’ की भी है। वह संपर्क साधने वालों को ऊँचा उठाती-आगे बढ़ाती है। उत्कर्ष की उमंगे उठाने और तद्नुरूप साहस प्रदान करने में यज्ञाग्नि के माध्यम से असाधारण योगदान मिलता है।

भगवान की उपासना के जो-जो भी लाभ अध्यात्म तत्व दर्शन, शास्त्र निर्धारण, आप्त वचन एवं योगी-तपस्वियों के अनुभव बताते हैं, उन सबको ब्रह्मविद्या के महामनीषी यज्ञाग्नि के माध्यम से भली प्रकार उपलब्ध होने की बात कहते हैं। उपासनाओं के लिए अन्य इष्टदेवों का भी निर्धारण हो सकता है, पर उन सब प्रक्रियाओं में अग्नि को इष्ट मान लेना कहीं अधिक श्रेयस्कर है। उपासना कृत्यों की अनेकानेक विधि-व्यवस्थाओं में ‘अग्नि पूजन’ को अधिक वरिष्ठता इसलिए भी प्रदान की गयी है कि उसके अवलम्बन से मानवी गरिमा को बढ़ाने वाले देवत्व और वर्चस्व की उपलब्धि सहज एवं शीघ्र होती है।


हे दयानिधान्! आप हमें दुःख देते रहें

शरीर में विजातीय द्रव्य जमा हो जाता है तो उसकी विकृति बीमारी के रूप में फूट पड़ती है। रोग शरीर की एक आवश्यकता है, जिससे अपनी जीवनी शक्ति का आभास होता है। यह ज्ञान मनुष्य को न मिले और विजातीय तत्व भीतर ही बढ़ते रहें तो अकाल मृत्यु सुनिश्चित हो जाती है। मनुष्य जीवन का ऐसा ही संकेत है, जो मनुष्य को इस बात के लिए सचेत करता रहता है कि उसका लक्ष्य कुछ और है। मनुष्य शरीर रूप में एक आत्मा है, इस आत्म तत्व की ओर संकेत के भाव मात्र है दुःख। इसलिए वह ग्रहणीय है। दुःख के बिना इस जीवन का महत्व भी कुछ नहीं रह जाता है।

महाभारत में कहा है-”विपत्तियाँ हमारे जीवन में पग-पग पर आती रहें क्योंकि परमसत्ता के दर्शन विपदाओं में ही होते हैं। आपके दर्शन मिल जाते हैं तो मनुष्य जन्म-मरण के बंधनों से विमुक्त हो जाता है।” इस दृष्टिकोण को समझने के लिए दुःख और उसके प्रभाव पर, आइये विचार करें। कामनाओं की पूर्ति न होना, दुःख का कारण है और इससे विकल होना ही दुःख का प्रभाव है। दीन-हीन की तरह दुख को केवल भोगते रहना यह अभिशाप है, किंतु उसके प्रभाव से प्रभावित होकर सचेत होना निश्चय ही जीवन का वरदान है। सच मानिये यदि विपदायें मनुष्य के जीवन में न आयें तो उसकी अन्तर्मुखी चेष्टायें कभी भी जाग्रत न हों और जिस लक्ष्य को लेकर उसे यह मानव देह मिली है, वह साध्य सदैव अधूरा ही बना रहे। धन पाकर उसका उपयोग न करें तो उस धन और मिट्टी के ठीकरे में कोई अंतर नहीं होना चाहिए। मनुष्य का जीवन पाकर भी आत्म-ज्ञान से विमुख होना मनुष्य का सबसे बड़ा दुर्भाग्य है। दुःख जीवन निर्माण का संदेश वाहक है, उसका सत्कार होना ही चाहिए। सुख और दुःख दोनों समान रूप से इसलिए परमात्मा की ओर से मिले हैं कि इससे मनुष्य का जीवन एकाँगी न हो।

प्राकृतिक नियमानुसार आँशिक सुख और दुःख सबके जीवन में है। पर जो मनुष्य कामनाओं की पूर्ति से आसक्त अर्थात् सुख को ही साध्य मान लेते हैं, उनके लिए सुख ही दुःख स्वरूप हो जाता है क्योंकि परिस्थितियों की विपरीतता के कारण सदैव कामनाओं की पूर्ति होते रहना निश्चित नहीं है। सभी कामनायें पूरी नहीं होतीं। इसलिए दुःख पैदा होना स्वाभाविक है। एक बात यह भी है कि प्रत्येक कामना की पूर्ति एक नई कामना पैदा कर जाती है, इससे सारी चेष्टायें साँसारिक गोरख-धंधों में ही लगी रह जाती हैं और जीवन ध्येय की ओर मनुष्य का बिल्कुल भी ध्यान नहीं आकृष्ट हो पाता। दुःखों से भी केवल प्रभावित होते रहना-इससे भी प्रयोजन सिद्ध नहीं होता जब तक उसके मूल कारण पर आध्यात्मिक दृष्टि से विचार नहीं करते। धन के अभाव में कितने ही व्यक्ति इतने विकल रहते हैं कि सिवाय धन के और कुछ भी आँखों के आगे दिखायी नहीं देता। एक दृष्टिकोण यह भी है कि हममें भी दयनीय स्थिति के दूसरे व्यक्ति हैं। हम रूखी ही सही, दो वक्त खाते तो भी हैं किंतु कितने लोग ऐसे हैं जो एक समय आधा पेट भोजन और वह भी मुश्किल से प्राप्त करते हैं। इससे संसार और उसकी परिस्थितियों पर विचार करने की शक्ति आती है। भौतिकता से हटकर संसार की सूक्ष्म प्रतिक्रियाओं की ओर ध्यान जाता है। विचार करते-करते मनुष्य निजत्व पर आ जाता है। एक बार जैसे ही आत्म-ज्ञान के लिए असंतोष पैदा हुआ कि यों समझिये आपके अध्यात्मिक जीवन का सूत्रपात हुआ। यह परिस्थिति बन जाये तो जीवन लक्ष्य की ओर उन्मुख होना निश्चय ही समझिये। दुःख के समय सुख की भावी सम्भावना मात्र से दुःख सहते रहते है। सुख के समय भी ऐसी ही चेतना जाग्रत हो कि सुख और दुःख दोनों धूप-छाँह की तरह आने-जाने वाले हैं, ऐसी जागृति आने पर आपका जीवन सुख और दुःख दोनों से अतीत हो जायगा और आत्म-ज्ञान प्राप्त करने की निर्द्वन्दता आ जायगी। विपत्ति मनुष्य को शिक्षा देने आती है। इससे हृदय में जो पीड़ा, आकुलता और छटपटाहट उत्पन्न होती है इससे चाहें तो अपना सद्ज्ञान जाग्रत कर सकते हैं। भगवान को प्राप्त करने के लिए जिस साहस और सहनशीलता की आवश्यकता होती है, दुःख उसकी कसौटी मात्र है। विपत्तियों की तुला पर जो अपनी सहन शक्तियों को तौलते रहते हैं वही अंत में विजयश्री होते हैं, उन्हीं को संसार में कोई सफलता प्राप्त होती है।

दुःख एक प्रभाव सच्चे सुख की अनुभूति कराता है। एक बार जब सुख के सही स्वरूप का बोध हो जाता है तो सुख=लोलुपता मिट जाती है। दुःख को अनिवार्य और आवश्यक बताने का यह अर्थ नहीं कि सुख प्राप्ति के उपाय त्याग दें। जीवन को ऊँचा उठाने का प्रयत्न तो हो ही किंतु निष्काम कर्म से गिरा देने वाली जो सुख की तृष्णा होती है उससे बचना मानव-जीवन की शुद्धता प्राप्त करने के लिए आवश्यक है। इसका आभास दुःख के क्षणों में सरलता से प्राप्त कर लेते हैं इसलिए दुःख सापेक्ष है किंतु सुख उचित होते हुए भी साध्य नहीं है।

मनुष्य की वास्तविक आवश्यकता कामनाओं की पूर्ति का सुख नहीं है क्योंकि सुखी अवस्था में भी भय का अंत नहीं होता और नहीं तो मृत्यु के भय से तो कोई भी बच नहीं सकता। इससे यह प्रतीत होता है कि निर्भयता सुख प्राप्ति से बढ़कर है। दुःख निवृत्ति, चिर, विश्राम, पूर्ण स्वाधीनता और प्रेम स्वरूप की प्राप्ति-ये चार वस्तुयें जीवन की चतुर्मुखी आवश्यकतायें है। इन चारों की उपलब्धि उसे होती है जो परमात्मा की प्राप्ति के लिए, उसके आदेशों का पालन करने के लिए स्वेच्छा-पूर्वक, प्रसन्नता-पूर्वक तत्पर होते हैं। तपश्चर्या इसी स्थिति का नाम है। परमपिता को हमारी किसी वस्तु की आकाँक्षा नहीं है वे हमसे प्यार चाहते हैं, हमारी आकुल प्रार्थना पर ही वे रीझते है। विषयों में आसक्त जीवात्मा से वैसी प्रार्थना के जादूगर बन नहीं पाते, इसलिए तप का महत्व है। तप का एक ही अर्थ दुःख पैदा करना है। दुःख इसलिए अभीष्ट है कि इससे अन्तःकरण का सत्य परिभाषित होता है। मनुष्य जीवन का विराम इसी सत्य को पाता है। अपने आँतरिक उद्गारों को सतत् प्रार्थनाशील रखने के लिए दुःख चाहिए, कष्ट चाहिए। निरंतर हृदय में उमड़ने वाली वेदना चाहिए। यह दुःख जिसे मिले उसे ही यह समझना चाहिए कि उस परमात्मा का असीम अनुग्रह है। जिससे वे मिलना चाहते हैं उसे पहले दुःख का दूत भेजकर मिलने की स्वीकृति माँगते हैं। धन्य है वे लोग जो दुःख को परमात्मा का प्रसाद समझकर उसे अपने शीश पर धारण कर लेते है।

दुःख हमारे पुरुषार्थ को जगाने आता है। सुखी मनुष्य विलासी और व्यसनी, आलसी और प्रमादी बन जाता है, अहंकार उसे घेर लेता है और तृष्णाओं के पर्वत सामने आकर खड़े हो जाते हैं, किंतु जब दुःख सामने आते हैं तो मनुष्य को इसका प्रतिरोध करने के लिए अपनी प्रसुप्त शक्तियों को जाग्रत करना पड़ता है। पौरुष का निखार इन्हीं परिस्थितियों में होता है। सोने को अग्नि में तपाकर उसके मल विकार जलाये जाते हैं। इसी प्रकार दुःखों की अग्नि में तपा हुआ मनुष्य अपने अनेक दोष-दुर्गुणों से सहज ही छुटकारा पा जाता है। सुखों की प्राप्ति के लिए प्रयत्न करते रहना मनुष्य का स्वभाव है, वह अंतःप्रकृति की प्रेरणा से हर एक को करना ही होता है। करना भी चाहिए। पर जब दुःख के अवतार आयें तब घबराना तनिक भी नहीं चाहिए वरन् अपने व्यक्तित्व को विकसित करने का एक सुअवसर आया जानकर उसे भी शिरोधार्य करना चाहिए। दुःखों से हानि तभी है जब मनुष्य उनका अभ्यस्त बनकर दीनहीन बन जाय और अकर्मण्य बन उनसे छुटकारा पाने का प्रयास ही छोड़ बैठे। यह स्थिति न आने पावे तो दुःखों में परिस्थितियाँ मनुष्य को अधिक सुदृढ़ अधिक पुरुषार्थी, अधिक सहिष्णु एवं अधिक पवित्र बनाने में बड़ी उपयोगी एवं आवश्यक सिद्ध होती हैं। परमार्थ के लिए किये गये तप, त्याग में जो दुःख स्वेच्छा से वरण किया जाता है वह तो आत्मा के लिए अमृत की तरह मंगलमय सिद्ध होता है। ऐसे दुःख की याचना यदि परमात्मा से की जाय तो इसमें जीव का ही कल्याण है।


सभी जीव शूद्र (Kahani)

भगवान बुद्ध अनाथ पिण्डक के जैतवन में ग्रामवासियों को उपदेश कर रहे थे। शिष्य, अनाथ पिण्डक भी समीप ही बैठा, धर्मचर्चा का लाभ ले रहा था। तभी सामने से महाकाश्यप, मौद्गल्यायन, सारिपुत्र, चुँद और देवदत्त आदि आते हुए दिखायी दिये। उन्हें देखते ही बुद्ध ने कहा-”वत्स! उठो! यह ब्राह्मण मण्डली आ रही है, उसके लिए योग्य आसन का प्रबंध करो।”

अनाथ पिण्डक ने आयुष्मानों की ओर दृष्टि दौड़ाई, फिर साश्चर्य कहा-”भगवन्! आप सम्भवतः इन्हें जानते नहीं। ब्राह्मण तो इनमें कोई एक ही है, शेष कोई क्षत्रिय, कोई वैश्य और अस्पृश्य भी हैं।” गौतम बुद्ध अनाथ पिण्डक के वचन सुनकर हँसे और बोले-”तात! जाति जन्म से नहीं गुण, कर्म और स्वभाव से पहचानी जाती है। श्रेष्ठ रागरहित, धर्मपरायण, संयमी और सेवा भावी होने के कारण ही मैं इन्हें मैंने ब्राह्मण कहा है। ऐसे पुरुष को तू निश्चय ही ब्राह्मण मान-जन्म से तो सभी जीव शूद्र होते है। “


धरती के मानव को देवात्मा हिमालय का संदेश

घटना आज की नहीं, पर है इसी शताब्दी की। उस वर्ष हिमालय में हिमपात अधिक हुआ था। श्री बद्रीनाथ जी के मंदिर के पट वैसे सामान्य स्थिति में अक्षय तृतीया को खुल जाया करते हैं। किंतु वे जब जोशीमठ पहुँचे तो यात्री वहीं रुके थे। वह अक्षय तृतीया वाराणसी में ही मनाकर चले थे। मार्ग में तीन-चार दिन तो ऋषिकेश तक में ही रुकते-रुकते लग गये और तब मोटर-बसें केवल देव-प्रयाग तक जाती थीं। आगे का मार्ग उन्होंने पैदल पार किया।

भाग्य-देवता कुछ अनुकूल लग रहे थे। जोशीमठ पहुँचने पर पता लगा कि आज ही शाम को पट खुलने वाला है। बद्रीनाथ पहुँचने पर देखा-मार्गों पर तीन-चार फुट बरफ पड़ी थी और दुकानदार फावड़ों से बरफ हटा कर अपनी दुकानों के द्वार खोलने की कोशिश में लगे हैं। याद नहीं, दूसरे या तीसरे दिन बद्रीनाथ से आगे व्यासगुफा, सहस्रधारा तक चले गए। साथ में एक युवक पर्वतीय ब्राह्मण थे-मार्ग दर्शन के लिए। दो-तीन स्थानों पर अलकनंदा की धारा बरफ के प्रकृति निर्मित पुल से पार की। लेकिन जब वे दोनों वसोधारा के ऊपर की गुफा पर चढ़ने लगे, तब मार्गदर्शक ने मना किया। लेकिन जैसे उन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। इसी बीच पता नहीं कब उन्हें भाग्य भरोसे छोड़कर- मार्गदर्शक और मित्र वापस लौट गए। ऊपर किसी तरह वे पहुँचे भी और लौटे भी। लौटते समय या तो उनको मार्ग भूल गया अथवा जिस हिमनिर्मित पुल से उनने अलकनंदा पार की थी, वह इतनी देर में टूट गया था। हुआ कुछ भी हो, उनको माना गाँव के पास होकर घूमकर आने के लिए विवश होना पड़ा। माना गाँव सुनसान पड़ा था। घरों के दरवाजों पर ताले सीलबंद पड़े थे। वहाँ के निवासी जो सर्दियों में नीचे चले गये थे, अभी तक नहीं लौटे थे। जीवन में पहली बार एक जनहीन गाँव देखा-अद्भुत लगा वह सुनसान। वह कुछ और आगे बढ़ गये। सन्ध्या समीप थी। अस्ताचल से बार दिनपति ने जगती को देखा और उनके की छाया सम्पूर्ण धरातल पर फैल गयी। सम्पूर्ण हिमाच्छादित गिरि शिखर गैरिकवर्णी वीतराग संन्यासी के वेश में परिवर्तित हो गये। तरु-वीरुध और लताओं ने भी उसी वर्ण को अपना लिया। प्रत्येक शिला भी रंग गई उस रंग में। पक्षियों ने दिशाओं में मंत्रपाठ प्रारम्भ किया। अचानक बादल घिर आए, वर्षा किसी भी क्षण सम्भव थी। उनके पास न छाता था न बरसाती कोट। अतः स्थान पर पहुँचने की शीघ्रता स्वाभाविक थी।

सहसा उनके पैरों ने चलना अस्वीकार कर दिया। उनकी क्या अवस्था हुई कहना कठिन है। स्वयं सोच लें-आस-पास कोई नहीं था। उज्ज्वल हिमाच्छन्न पर्वत और उसके पीछे एक जनहित गाँव। मार्गदर्शक और मित्र तो कभी के चुपचाप खिसक चुके थे, जानने का कोई साधन था नहीं। सहसा सामने केवल दस गज दूर एक महाकाय आकृति आ खड़ी हुई। एक गम्भीर स्वर उभरा। कुछ क्षण लगे उन्हें अपने को आश्वस्त करने में। उनके सम्मुख वे जो कोई भी थे-कुछ आश्वासन दे रहे थे कि भय करने की जरूरत नहीं है। हाँ वे पुरुष थे-मानव पुरुष। किंतु उनका विशाल शरीर-जिसके सामने खड़े वह उनके घुटनों से कुछ ही ऊँचे लग रहे थे। नाभि से नीचे तक लटकती हिम धवल दाढ़ी-सुस्पष्ट दीर्घ भुजाएँ और लेकिन-उनके तेजोमय मुख को भली प्रकार देख पाना सम्भव कहाँ था। वह-वहाँ खड़े थे-यही कहाँ कम था। “कौन हो तुम?” उन्होंने शुद्ध देववाणी में पूछा था। ये भी संस्कृत के आचार्य थे। “गोपीनाथ”-अपना नाम बताकर संक्षिप्त परिचय दिया। इतनी देर में वे अपने को कुछ अधिक आश्वस्त अनुभव कर रहे थे। उन्हें पृथ्वी पर मस्तक रखकर प्रणाम किया। “गोत्र” प्रश्न हुआ। “सर्वाणि”-उत्तर सुनकर वे इतने हँसे कि पर्वतमालाएँ काँपती हुई प्रतीत हुई। “कोई विशेष बात नहीं” वे सौम्य स्वर में बोले-”तुम्हारे कुल पुरुष भगवान विवस्वान के आत्मज सावर्णि हैं-आगामी मन्वंतर के मनु। तुम्हारा यह क्षीणकाय-उन मार्तण्य तनय के सम्मुख, मैं भी इतना ही हस्वदेह, अल्पप्राण प्रतीत होने लगता हूँ। कहीं तुम अपने उन कुल पुरुष का साक्षात कर सको तो?...। लेकिन वे इस बार हँसे नहीं। “भगवन् आप?” जिज्ञासा उभरी। ‘मेरा जन्म त्रेता के अंत में हुआ था।’ उन्होंने सहज भाव से कहा। तब तक मानव देह ह्रास को प्राप्त हो चुका था और तुम्हें तो देखकर लगता है.....। पता नहीं क्यों उन्होंने अपनी बात अधूरी छोड़ दी।

इतने में गोपीनाथ जी को ध्यान आया कि पुराण वर्णित कलाप ग्राम कहीं यहाँ से पास होना चाहिए। अवश्य सामने जो दिव्य पुरुष उपस्थित हैं, वे वहीं के निवासी होंगे। उनके मन में उस भूमि के दर्शन की इच्छा प्रबल होने लगी। वत्स! तुम ठीक सोचते हो-हिमालय का गौरव और वैभव अनंत है। कलाप ग्राम ही क्यों-देवात्मा के इस ध्रुव केन्द्र में ऐसे अनगिनत स्थल हैं-जहाँ युग-युगान्तर साधनाएँ, तपश्चर्यायें, विशिष्ट- प्रयोग सम्पन्न होते रहे हैं-सम्पन्न हो रहे हैं। जहाँ तक भूमि का प्रश्न है, इन स्थानों पर तुम और तुम्हारे अनेक साथी आते-जाते रहते हैं, किंतु उसके निवासी जब तक स्वयं न चाहे, उन्हें तुम देख नहीं सकते।”

अद्भुत आश्चर्यजनक लगा-उस लोकोत्तर मानव का कथन। भला इन अति विशिष्ट मानवों के लिए प्रयोगों की क्या जरूरत? अंतराल में उभरे प्रश्न को उनकी सुविकसित संवेदना ने अनुभव कर लिया। “ऐसा मत सोचो-इनके प्रयोगों का उद्देश्य -स्वार्थ का जखीरा इकट्ठा करना अथवा अहं का सिक्का चलाना नहीं है। ये सभी देवपुरुष-ब्रह्मांड के हित में समर्पित हैं। तुम्हारे वैज्ञानिक और ज्योतिषी अनेक भविष्यवाणियाँ कर मानव के मन में हलचल पैदा कर देते है। सभी सुख चैन की नींद को त्याग चिंतातुर हो उस वक्त की प्रतीक्षा करते हैं और जब वक्त आता है-तब कुछ नहीं होता। भविष्य वक्ताओं के कथन अपने स्थान पर सही होते हैं। पर ये ही महापुरुष अपने प्रयोगों से स्थिति को टाल देते हैं। आज नहीं आगे भी देखोगे, युद्ध छिड़ेंगे, पर महाविनाश के पूर्व समझौते हो जायेंगे। लगेगा सभ्यता समाप्त हुई, पर कोई शाँतिदूत स्थिति संभाल लेगा। “

“प्रयोग तो आश्चर्यजनक है-पर मानव भी विनाश के कगार पर है। हाँ-आमंत्रित तो यही कर रहा है। आज वह और उसका समाज अस्वस्थ है।” समाज भी अस्वस्थ-बात समझ में नहीं आ रही थी। “मनुष्य सदा दुर्बल रहा है।” वे कह रहे थे-उससे त्रुटि नहीं होगी, उसके पद वासना-विचलित नहीं होंगे, यह कभी संभव नहीं हुआ। पर पहले वह सुसंस्कृत बनने, स्वस्थ रहने के विज्ञान और विधान को स्वीकार कर देवत्व की ओर छलाँग लगाता था। आज इन्हें अस्वीकार कर कीट-पतंगों की तरह बिलबिला रहा है।

यह सब सुनकर उन्हें अनेक पौराणिक कथाएँ याद हो आयीं। मानस चक्षुओं के सामने उभरने लगे-विशिष्ठ, अगत्स्य, याज्ञवल्क्य के वे प्रयास जिन्होंने समूचे मानव जीवन को संस्कार महोत्सव बना डाला था। यदि ऐसी स्थिति आज बनायी जा सके। विचार तरंगों से स्पन्दित हो वे कह उठे-”स्थिति बनेगी वत्स! धरती के मानव को हिमालय का संदेश देना-वह संस्कार के मंगल विधान को पुनः अपनाए। देवत्व की ओर बढ़ते प्रत्येक कदम को यहाँ की ऋषि सत्ताएँ सम्बल देंगी। देवात्मा हिमालय के संरक्षण में चल रहे प्रयोग भारत को केन्द्र बनाकर समूचे विश्व का कायाकल्प कर डालेंगे। उन दिव्य पुरुषों का यह प्रयोग अगले पचास वर्षों में पूरा होकर रहेगा। हाँ इस बीच धरती और धरती पुत्रों को बहुत कुछ सहना पड़ेगा। “ कुछ क्षण, पता नहीं कितने क्षण वे मस्तक झुकाये अपने चिंतन में लीन रहे-अगली शताब्दी की दुनिया का स्वर्णिम चित्र उनके अस्तित्व में पुलकन भर रहा था। पता नहीं कितना समय इसमें बीत गया और जब उन्होंने नेत्र उठाये, सम्मुख कोई नहीं था। वहीं हिमाच्छादित पर्वतमालाएँ, वही तीव्र-वेगा अलकनंदा और वहीं पीछे सुनसान माणा गाँव और हिमालय का शाश्वत संदेश-जिनके अनुरूप स्वयं को ढालकर गोपीनाथ प्राच्य विद्या के महान साधक महामहोपाध्याय डॉ. गोपीनाथ कविराज बन गये। संदेश के स्वर शाश्वत हैं-बस ग्रहणशीलता के लिए हमारी प्रतीक्षा है।


असाधारण विपत्तियां (Kahani)

द्रौपदी ने कौरवों को अपने राजमहल में बुलाया। जब वे अनोखी बनावट से भ्रमित होकर जल को थल और थल को जल समझने लगे तो द्रौपदी ने उनका उपहास उड़ाया और कहा-”अंधों के अंधे ही होते हैं।”

बात उपहास में कही गयी थी पर वह लगी अपमान भरे तीर जैसी। कौरवों ने उसी से रूठकर द्रौपदी को, पाण्डवों को नीचा दिखाने का निश्चय किया और बात बढ़ते-बढ़ते द्रौपदी को निर्वस्त्र करने से लेकर उसके पुत्र मारे जाने तक पहुँची। महाभारत में असंख्यों का असीम विनाश हुआ। शिष्टाचार का उल्लंघन करना साधारण बात होते हुए भी असाधारण विपत्तियां खड़ी कर देता है।

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आइये यंत्रों से मंत्र सिद्ध करें

शारीरिक-मानसिक परिष्कार करते हुए आत्मचेतना की गहराइयों में प्रवेश करना योगाभ्यास का प्रमुख लक्ष्य है। रोग-निवृत्ति एवं बाल-वर्धन के अतिरिक्त मानसिक ऊर्जा की प्रखरता तथा अन्तः में विद्यमान जीवनी-शक्ति को बढ़ाने और आत्मबल सम्पादन करने में आसन, प्राणायाम, ध्यान जैसी यौगिक प्रक्रियाओं का प्रचलन प्राचीनकाल से ही रहा है। इसके अभ्यासी योगी साधक अपनी इच्छानुसार हृदयगति, रक्तचाप, श्वसन दर, रक्त अभिसरण, शरीर ताप जैसी अनैच्छिक क्रियाओं पर नियंत्रण कर दिखाते हैं। मस्तिष्कीय उपादानों का रूपांतरण-परिष्करण भी वे कर लेते हैं। मानसिक एवं मनोकायिक रोगों से इससे सहज छुटकारा मिल जाता है। परंतु यह एक समय साध्य प्रक्रिया है जिसमें संयम, साधना के अतिरिक्त श्रम, मनोयोग, नियमितता एवं अविचल धैर्य आदि की आवश्यकता पड़ती है। साथ ही अनुभवी मार्गदर्शक के बिना भी गाड़ी आगे नहीं बढ़ती।

आज की व्यस्तता-युक्त अंधी दौड़ के युग में लोगों के पास इतना समय भी नहीं होता जो योग जैसे महत्वपूर्ण विषय की ओर ध्यान दें, उसे जीवन का अनिवार्य अंग बनायें और जीवन लक्ष्य तक पहुँचें। वैज्ञानिक आविष्कारों ने इस कमी को बहुत कुछ पूरा करने का प्रयास किया है। बायोफीड बैंक इस श्रृंखला में एक नवीनतम प्रयोग है जो मनुष्य को तनाव मिटाकर आत्मोन्नति के पथ पर अग्रसर होने के लिए प्रेरित-प्रोत्साहित करता है। अंतर केवल इतना ही है कि इसके द्वारा समाधि स्तर तक नहीं पहुँचा जा सकता जैसा कि योगाभ्यास की चरम परिणित में होता है। इसके द्वारा आँतरिक क्रियाओं का नियंत्रण नियमन जरूर हो सकता है। तनाव दूर कर शिथिलीकरण की स्थिति में विचार शून्यता की अवस्था भी प्राप्त की जा सकती है, जो कि योगाभ्यास की प्रमुख देन है। आत्मोत्कर्ष का भी श्री गणेश भी तो यही से होता है।

ब्रिटिश मनोविज्ञानी हेविट जेम्स ने अपनी प्रसिद्ध कृति “द कम्पलीट योगा बुक” में कहा है कि “बायोफीड बैंक” यौगिक अभ्यास का ही एक परिवर्तित रूप है जिसके प्रयोग से साधक का मनोबल बढ़ता है साथ ही वह ध्यान की गहराइयों में जाने का प्रयास करता है जिसे समस्त सफलताओं का मूलाधार माना जाता है। उन्होंने इसे “पुश बटन योगा” नाम से सम्बोधित किया है और कहा है कि बायोफीड बैंक एक प्रकार का “बॉडी-माइन्ड कन्ट्रोल” है, जिसे साधक योगाभ्यास द्वारा सम्पन्न करता है। इसके द्वारा व्यक्ति बहिर्मुखी चिंतन से विरत होकर अचेतन मन की गहराइयों में प्रवेश करने का प्रयत्न करता है जिसके द्वारा शरीर के अनैच्छिक तंत्र संचालित होते है। आँख और कान जैसी इन्द्रियाँ जो अभी तक बहिर्मुखी गतिविधियों का संचालन करने में व्यस्त थीं, इस प्रक्रिया द्वारा अंदर की ओर अभिमुख हो उठती हैं। इसके माध्यम से हम अपने रक्त प्रवाह की ध्वनि, माँसपेशियों का कोलाहल, स्नायु मण्डल की लय एवं अन्याय आँतरिक कायकीय प्रक्रियाओं को सूक्ष्म जगत में देख और सुन करते हैं और इच्छानुसार उन पर नियंत्रण साध सकते हैं जो अभी तक चेतन मन की पकड़ से बाहर थे।

बायोफीडबैक एक इलेक्ट्रॉनिक उपकरण से की जाने वाली प्रक्रिया है इसमें सेर्न्सस लगे होते हैं, जिनका सम्बंध शरीर से कर दिया जाता है। वे प्रकाश ज्योति श्रवण योग्य ध्वनि को ग्रहण करके शारीरिक हलचलों को डिजिट्स के रूप में या गति करती हुई सुई आदि के रूप में रिकार्ड करते हैं। इन हलचलों का सम्बंध जीवन की विभिन्न प्रक्रियाओं जैसे -हृदय गति, रक्त प्रवाह, माँसपेशियों, की विद्युत ऊर्जा, एवं मस्तिष्कीय ऊर्जा तरंगों आदि से होता है। बायो फीडबैक प्रशिक्षण द्वारा व्यक्ति अपने आँतरिक क्रिया–कलापों को ठीक उसी तरह से नियंत्रित कर सकता है जैसे कि फीडबैक लर्निंग द्वारा विद्यालय में बालक जटिलता एवं खतरों से भरे वातावरण में अपने जीवन अस्तित्व को बनाये रखने के लिए मेनुअल कार्यों तथा अन्याय मानवी प्रवीणताओं हस्त–कौशलों को हस्तगत करता है। प्रत्येक जीवधारी इसी फीडबैक का अनुसरण करता है।

शरीर विज्ञानियों के अनुसार शरीर के अनेकों क्रिया-कलाप स्व-संचालित होते है जिन पर हमारा नियंत्रण नहीं रहता। हृदय अपनी गति से धड़कता है तो रक्त अभिसरण अपनी गति से होता है। पाचन-श्वसन का अपना स्वतंत्र विज्ञान है। यह सभी कार्य आटोनामिक नर्वस सिस्टम द्वारा संचालित होते हैं। भावनाओं से सम्बंधित हलचलों का इससे घनिष्ठ सम्बंध होता है।

योगी अपनी इच्छानुसार हृदयगति, रक्तचाप, श्वास-प्रश्वास जैसी अनैच्छिक क्रियाओं एवं भावनात्मक उतार−चढ़ावों को नियंत्रित कर सकते हैं, तनाव एवं असंतुलन-जन्य मनोकायिक बीमारियों-मनोविकारों से छुटकारा पा सकते हैं। यद्यपि योग में यंत्रों का प्रयोग नहीं होता फिर भी योगी अभ्यास द्वारा उन परिवर्तनों को अनुभव कर लेता है। बायो फीडबैक का भी यही क्रिया पद्धति है। इसमें शारीरिक परिवर्तनों को देखने के लिए यंत्रों का उपयोग किया गया है। इस प्रशिक्षण में शरीर के भीतरी अवयवों में होने वाले परिवर्तनों को शक्तिशाली एम्प्लीफायर के माध्यम से देखा जा सकता है व संदेश भेजकर घटाया-बढ़ाया जा सकता है। हृदय की धड़कन व मस्तिष्कीय तरंगों को मापा जा सकता है। इच्छाशक्ति द्वारा मनचाही दिशा में इन्हें मोड़ा और नियंत्रित किया जा सकता है अंतःस्रावी ग्रंथियों के स्राव शारीरिक तापमान, मानसिक तनाव में हेर-फेर किया जा सकना संभव है। स्मृति सुधार, मनःशक्तियों का विकास, सृजनात्मक प्रवृत्तियों का विकास बायो फीडबैक के माध्यम से सुगमतापूर्वक सम्पन्न किये जा सकते हैं।

अमेरिकी मनोविज्ञानवेत्ता डॉ. जे. बोसवासियन ने अपने अनुसंधान निष्कर्ष में बताया है कि जिन क्रियाओं को योगी अचेतन अवस्था में करता है वही क्रिया बायोफीड उपकरण के माध्यम से कोई भी सामान्य व्यक्ति कर सकता है। जब सम्बंधित व्यक्ति को इस यंत्र द्वारा उसकी अपनी आँतरिक परिस्थितियों से परिचित कराया जाता है और उसमें परिवर्तन लाने के लिए मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया द्वारा प्रशिक्षित किया जाता है तो इससे उसका मनोबल बढ़ता है। आत्मविश्वास जाग्रत हो जाने पर ऐच्छिक क्रियाओं की तरह ही अनैच्छिक क्रियाओं को अभ्यास द्वारा उतनी ही आसानी से करना लगता है। धीरे-धीरे क्रमशः अचेतन मन की परतें खुलने लगती हैं और उनमें सन्निहित क्षमताओं से वह परिचित होने लगता है। संक्षेप में इसे शरीर पर मन का नियंत्रण किया जाना भी कह सकते हैं। मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि आटोनॉमिक स्नायुतंत्र की गड़बड़ी को मानसिक एकाग्रता या शिथिलीकरण प्रक्रिया द्वारा ठीक किया जा सकता है। यह विद्या अनैच्छिक तथा अचेतन मन द्वारा संचालित कार्य व्यवहार में हेर-फेर करने में समर्थ है। परंतु चेतन मन द्वारा सरलतापूर्वक फीडबैक न मिलने के कारण वह सफलता संदिग्ध ही बनी रहती है। अतः बायो फीडबैक का आश्रय लिया जाता है। यह वह वैज्ञानिक मार्ग है जो चेतना और मन को पदार्थ के ऊपर विस्तार पाने-नियमन करने में सहायता प्रदान करता है। इस संदर्भ में अमेरिका के दो मूर्धन्य मनोवैज्ञानिकों मार्विन कार्लिस तथा एम. एंड्रयूज लेविस ने अपनी पुस्तक “बायो फीडबैक टर्निंग आन द पावर ऑफ माइण्ड” में कहा है कि बायो फीडबैक द्वारा अभ्यास करने पर मनुष्य अपने आँतरिक क्रिया–कलापों शारीरिक मानसिक स्थिति को उसी प्रकार देख सुन सकता है जैसे टेलीविजन के पर्दों पर वह दृश्य देखता और संवाद सुनता है। वास्तव में अब यह संभव है।

ध्यान एवं शिथिलीकरण में जो प्रक्रिया अपनायी जाती है उसी का प्रयोग बायो फीडबैक में भी किया जाता है। इसके साधक अपने को प्रयोग के लिए बार-बार तैयार और आत्मनियंत्रण साधता है। इस उत्पन्न तनाव रहित स्थिति एवं सुखानुभूति को अधिक देर तक बनाये रखने के लिए इच्छा शक्ति को सुदृढ़ बनाता है। यही सुखानुभूति प्रेरक का कार्य करती है और अभ्यास का समय बढ़ता जाता है। इससे शारीरिक एवं मानसिक दोनों ही स्थितियों में परिवर्तन होने लगते हैं और साधक साधना क्षेत्र में प्रगति की ओर अग्रसर होने लगता है।

यूनिवर्सिटी ऑफ शिकागो के प्रसिद्ध वैज्ञानिक डॉ. जोय कामिया ने अल्फा ई.ई.जी. बायो फीडबैक पर गहन अनुसंधान किया है। इसमें साधक शारीरिक मानसिक शिथिलन एवं 8-13 चक्र प्रति सेकेंड वाली अल्फा मस्तिष्कीय तरंगों को अपने संकल्प बल के आधार पर स्वयं उत्पन्न करता है। इससे बीटा एवं थीटा तरंगों की स्थिति से परिवर्तित होकर मानसिक ऊर्जा अल्फा स्टेट में आ जाती है। उनके अनुसार यही वह स्थिति है जिसमें एक उच्चस्तरीय योग साधक विचार शून्यता की आनंददायी स्थिति में पहुँचता है। वैज्ञानिक प्रयोग परीक्षणों से अब यह सिद्ध हो चुका है कि योगी की विचार शून्यता की तन्मयता की स्थिति में उसके मस्तिष्क से अल्फा तरंगें निकलती हैं। सामान्य रूप से मस्तिष्क की सक्रिय अवस्था में 14 चक्र प्रति सेकिण्ड वाली बीटा तरंगें उससे फूटती रहती हैं जबकि सोते समय थीटा तरंगों का निष्कासन होता है। अल्फा तरंगों को उत्पन्न करने की कला की जानकारी हो जाने और उसकी सुखद अनुभूति को एक बार बायो फीडबैक पर देख सुन लेने के पश्चात साधक आत्म सुझाव द्वारा बार-बार प्राप्त करने का प्रयास करता है। यौगिक प्राणायाम एवं ध्यान द्वारा यही परिणाम उपलब्ध होता है। परंतु इस स्थिति को प्राप्त करने में समय भी अधिक लगता है और जोखिम भी रहती है। बायो फीडबैक में ऐसा कोई व्यवधान नहीं आता।

जापानी जेन योग साधकों पर अनुसंधान कर रहे वैज्ञानिक डॉ. जोहान स्टोयवा का कहना है कि योगाभ्यास से मन की निर्विचार-स्थिति अर्थात् शून्य अवस्था तक पहुँचने में लम्बी अवधि तक निरंतर प्रयास करना पड़ता है परंतु बायो फीडबैक विधि में स्थिति कुछ सप्ताहों से लेकर महीनों के भीतर प्राप्त की जा सकती है। उनके अनुसार सचेतन मन के नियंत्रण से मस्तिष्क की विद्युत तरंगों का परिवर्तन संभव है। इस से अचेतन मन की गहराइयों में झाँकने और उसमें संचित कुसंस्कारों को उखाड़ फेंकने में सहायता मिलती है साथ ही अचेतन मन की प्रसुप्त शक्तियों को भी जाग्रत करने का अवसर प्राप्त होता है। योग साधना में भी यही किया जाता है। संचित कुसंस्कारों से पिण्ड छुड़ाये बिना अध्यात्म क्षेत्र में प्रगति संभव नहीं।

शाँतिकुँज के ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान में बायो फीडबैक को जिसे “इलेक्ट्रॉनिक मेडीटेशन” भी कहा जाता रहा है अनुसंधान की एक विद्या के रूप में विकसित किया गया है। इस यंत्र में त्वचा का विद्युतीय प्रतिरोध-जी.एस.आर., माँसपेशियों की विद्युत-ई. एम. जी. इन तीनों द्वारा दृश्य एवं ध्वनि के माध्यम से साधकों को शिथिलीकरण का अभ्यास कराया जाता है। ध्यान प्रक्रिया द्वारा तीनों में परिवर्तन लाने हेतु उन्हें सतत् प्रशिक्षित किया जाता है। अपनी मनःशक्ति के माध्यम से साधक तनाव शैथिल्य द्वारा त्वचा की प्रतिरोध कम करता तथा ध्यान की स्थिति में ही दृश्यमान अल्फा तरंगें उत्पन्न करता है। इससे उसका संकल्प बल बढ़ता है, आत्मविश्वास जाग्रत होता है। परिणाम स्वरूप ध्यान की गहराई में प्रवेश करने और अंतराल में छिपी विभूतियों को जगाने का मार्ग प्रशस्त होता है।

शाँतिकुँज के ब्रह्मवर्चस शोध संस्थान में बायो फीडबैक को जिसे “इलेक्ट्रॉनिक मेडीटेशन” भी कहा जाता रहा है अनुसंधान की एक विद्या के रूप में विकसित किया गया है। इस यंत्र में त्वचा का विद्युतीय प्रतिरोध-जी.एस.आर., माँसपेशियों की विद्युत-ई. एम. जी. इन तीनों द्वारा दृश्य एवं ध्वनि के माध्यम से साधकों को शिथिलीकरण का अभ्यास कराया जाता है। ध्यान प्रक्रिया द्वारा तीनों में परिवर्तन लाने हेतु उन्हें सतत् प्रशिक्षित किया जाता है। अपनी मनःशक्ति के माध्यम से साधक तनाव शैथिल्य द्वारा त्वचा की प्रतिरोध कम करता तथा ध्यान की स्थिति में ही दृश्यमान अल्फा तरंगें उत्पन्न करता है। इससे उसका संकल्प बल बढ़ता है, आत्मविश्वास जाग्रत होता है। परिणाम स्वरूप ध्यान की गहराई में प्रवेश करने और अंतराल में छिपी विभूतियों को जगाने का मार्ग प्रशस्त होता है।


बुद्धि की सराहना की (Kahani)

चित्रकार ने अद्भुत चित्र बनाया। चेहरा बालों से ढँका था और पाँवों में पंख लगे थे। सभी ने चित्र के

अर्थ किये, किंतु मर्म की बात समझ न आ सकी, तो एक जिज्ञासु ने चित्रकार से पूछ ही लिया कि आखिर यह चित्र किसका?

चित्रकार ने कहा- “अवसर का”

लोग चौंके। फिर किसी ने पूछा- पर आपने इसका चेहरा क्यों ढँक दिया हैं?

चित्रकार बोला-जब अवसर मनुष्य के पास आता है, तब वह उसे पहचान नहीं पाता और इसके पाँव के पंखों से क्या तात्पर्य?-एक अन्य जिज्ञासु बोल पड़ा।

चित्रकार बोला-इसलिए कि जब कोई अवसर को ठीक समय नहीं पकड़ता, तो वह तेजी से उड़ जाता है। सभी ने चित्रकार की बुद्धि की सराहना की।


जो पीर पराई जाने रे

चीनाँशकु रेशमी वस्त्र धारण किये हुए वह एक दिन ग्राम्य सौंदर्य के दर्शनों के लिए घर से निकल पड़े। कृत्रिम संसाधनों से भरी-पूरी राजधानी में जो लालित्य कभी देखने को नहीं मिल सका, वह लावण्य लहलहाते हुए हरे-भरे खेतों, वृक्षों पर गीत गाते पक्षियों के कलरव, कल-कल करते झरनों और निर्धनता में भी मस्ती के गीत गाते हुए भोले-भाले ग्रामवासियों में भरपूर देखने को मिला। वह बढ़ते गये-बढ़ते ही गए। उन्मुक्त प्रकृति में सौंदर्य देखकर उन्हें जितनी प्रसन्नता हुई, अभावग्रस्त ग्रामीणों का दैन्य देखकर उनकी करुणा उससे कही अधिक उमड़ती गई। कवि आज सारे संसार का दुःख-दर्द अपने भीतर आत्मा में रखकर कहीं अन्तर्ध्यान हो जाना चाहता था। उसकी भावनाएँ जन-जन के हृदयों से एकात्म होने लगी।

कवि ऐश्वर्य में पले थे। उन्हें कभी किसी प्रकार का अभाव न हुआ था। वैभव-विलास उनके आँगन में खेलता था। वे सौराष्ट्र के राज कवि थे। राजधानी पाटव कवि की भक्ति श्रद्धा-दार्शनिकता पर अपना सर्वस्व लुटा सकती थी। उतना सम्मान राज्य में और किसी को न मिला था। स्वयं सौराष्ट्र नरेश आचार्य प्रवर की पद-धूल माथे पर चढ़ाना अपना सौभाग्य मानते। उनकी किसी भी इच्छा की पूर्ति में उन्हें अपने जीवन की सार्थकता अनुभव होती।

ऐश्वर्य से घिरे रहने पर भी कवि की भावनाएँ विशुद्ध संन्यासिनी थीं। उनके अन्तःकरण से करुणा का स्रोत उमगता था। किसी के भी दुःख-दर्द को दूर करने के लिए वह अपना सब कुछ दे डालने के लिए उतावले हो उठते। अपने एकांत चिंतन में वह एक ऐसे विश्व की कल्पना करते, जिसमें कोई दीन न हो-दुःखी न हो, रोगी और अस्वस्थ न हो। उनके काव्य की एक-एक पंक्ति में प्राणिमात्र के प्रति प्रेम, दया-करुणा और आत्म-भावना भरी होती है। यही कारण था कि राज कवि गाँव के किसान-मजदूरों से लेकर सौराष्ट्र नरेश तक के परम-प्रिय हो गये थे।

जैसे ही ग्रामवासियों ने सुना-आज राज कवि हेमचंद्र सूरि पधारे हैं, तो सब के सब उनके दर्शनों के लिए उमड़ पड़े। भेंट तो क्या वे दे सकते थे, किसी ने कंद लाकर रख दिए, किसी ने कुछ फूल-फल। जिसने षट्-रस व्यंजनों का रसास्वादन किया था उसके लिए भला, रूखे-सूखे-कंदों का क्या महत्व हो सकता था? पर आत्मा की सरसता तो थी ही, जिसकी वजह से वह ग्रामीणों की इन साधारण वस्तुओं में इतनी तृप्ति महसूस कर रहे थे-जितनी सौराष्ट्र नरेश द्वारा दिये जाने वाले किसी भोज में भी उन्हें न मिली थी, सच बात तो यह थी कि वह पदार्थ नहीं प्रेम -रस पान कर रहे थे।

आतिथ्य ग्रहण करने के बाद वह पास खड़े लोगों से बात-चीत कर रहे थे, तभी एक किसान आया। एक मोटा परिधान-लगता था, उसे सूत और सन मिलाकर बुना गया था-लाकर आचार्य के चरणों में समर्पित करते हुए उसने प्रार्थना की-”यह वस्त्र मेरी पत्नी ने आपके लिए बुना है, आप उसे स्वीकार करें तो हम अपने जीवन को कृतार्थ हुआ समझें। “

एक नजर उस टाट जैसे मोटे कपड़े पर, दूसरी नजर अपने वस्त्राभूषणों पर डालते हुए कवि की आंखें भर आयीं। ओह? घोर वैषम्य? जी-जान लगाकर परिश्रम करते हैं-ये लोग और उनके परिश्रम का आनंद राज्य के थोड़े से लोग लूटते हैं। इनकी दीनता का कारण हम हैं, जिन्हें अपने बड़प्पन का झूठा अभिमान हो गया है। हमने कभी एक बार भी नहीं सोचा कि हम भी उसी माटी के बने हैं, जिसने इन गरीब किसानों को शरीर दिया है, एक ही माँ के बेटों में इतना अंतर-इससे बड़ा कलंक सत्ताधारियों और लोकसेवियों के लिए दूसरा कुछ नहीं हो सकता।

आचार्य ने वह परिधान हाथ में लिया माथे से लगाया और शरीर पर धारण कर लिया। राजकीय वस्त्राभूषण उतार कर उस ग्रामीण को दे दिये। स्वयं उस मोटे वस्त्र में राजधानी लौट आये। राजकवि के वस्त्रों पर दृष्टि जाते ही महाराज द्रवीभूत होकर बोले-” आचार्य देव? यह क्या देख रहा हूँ? आप ऐसे वस्त्र पहनें, पाटण के लिए यह जीवन-मरण का प्रश्न है। क्या मैं उसका कारण जान सकता हूँ, इन वस्त्रों की क्या जरूरत आ पड़ी?”

आचार्य जो अब तक सरलता की प्रतिमा लगा करते थे, आज उनमें सूर्य-सी प्रखरता फूट पड़ी, उन्होंने कहा-”महाराज? अधिकाँश प्रजा ऐसे ही कपड़े पहनती है तो फिर मुझे ही बहुमूल्य वस्त्र पहनने का क्या अधिकार? यदि मैं ग्रामीणजनों को कुछ दे नहीं सकता तो उनसे लूँ भी क्यों? और आप जो देते हैं, वह भी तो उन्हीं का है।”

महाराज को अपनी भूल अनुभव हुई और उसके बाद वह जन-कल्याण में स्वयं को उत्सर्ग करने लगे।


अतिवादी-आत्मघाती

शरीर के प्रत्येक अंग अवयव को समुचित पोषण मिलना चाहिए साथ ही उसे इतना श्रम भी करने दिया जाना चाहिए कि माँसपेशियों और कोशिकाओं को सुसंचालित रहने का अवसर मिले। जिस प्रकार पोषण के अभाव में दुर्बलता आती है उसी प्रकार श्रम की कमी से भी वह क्षेत्र सूखने लगता है।

एक हाथ ऊपर रखने का अभ्यास करने वाले साधु उस हाथ की क्रियाशक्ति से वंचित हो जाते हैं। वह अंग सूख जाता है। लम्बा मौन रखने के बाद जीभ लड़खड़ाने लगती है। अंधेरी कोठरियों में रहने वाली बंदी प्रकाश में निकल नहीं पाते थे। कुपोषण से बच्चों को सूखा रोग लग जाता है। न्यूनता की तरह अति भी असंतुलन उत्पन्न करती है और रुग्णता के चंगुल में कस लेती है। कामुक नरनारी यौन रोगों से घिरते और समय से पूर्व नपुँसक होते देखे गये हैं। यह अति अल्प या अति कर्म की परिणित है जो समान रूप से हानिकारक है। अधिक बैठने वालों की तोंद निकल आती है और अतिशय चलने वालों की कमर झुकने लगती है। अति मात्रा में भोजन या अति उपवास करने वाले सुगठित नहीं रह पाते।

शारीरिक श्रम आवश्यक है, भले ही वह कृषक, श्रमिक के रूप में हो अथवा सैनिक, धावक, खिलाड़ी आदि के रूप में। बिनोवा के आश्रम में कुएं से पानी निकालने के लिए चरस चलाने का काम स्वयंसेवक ही मिलजुल कर करते थे। वे बागवानी के सर्वोत्तम व्यायाम बताया करते थे। वे कहते थे कि “यह एक उत्पादक व्यायाम हैं।”

मस्तिष्क से काम लेना उचित है इससे ज्ञानवृद्धि, बौद्धिक-तीक्ष्णता का लाभ मिलता है पर इतना दिमागी श्रम भी न किया जाय, जिसमें एक ही विषय पर निरंतर सोचते रहा जाय। न अन्य विषयों पर ध्यान जाय और न अन्य कोई काम करने का अवसर रहे। यह अतिवाद सर्वथा हानिकारक है। कहते हैं कि अतिशय मात्रा में पिया गया अमृत भी विष हो जाता है। अतिशय कठोर तपस्या में निरत भगवान बुद्ध को दैवी प्रेरणा मिली भी कि वे मध्यम मार्ग अपनायें और संतुलित रीति−नीति अपनाते हुए जीवनयापन करें।

समय से पूर्व बूढ़े हो जाने और याददाश्त खो बैठने में एक बड़ा कारण बुद्धिजीवियों का किसी एक विषय में तन्मय हो जाना है। एक प्रकार के “एग्नेजिया” नामक मानसिक रोग में व्यक्ति भुलक्कड़ हो जाता है और कई बार तो अपना तथा अपने परिवार वालों का नाम तक भूल जाता है। कोई क्रिया कर चुकने के उपराँत उसी को करने की फिर से तैयारी करता है। उसे यह याद नहीं रहता कि इस काम को अभी-अभी किया जा चुका है।

बहुत लाड़-प्यार से बच्चे बिगड़ते हैं। उद्दंड होते और अनुशासन की अवज्ञा करते हैं। किंतु दूसरा पक्ष यह भी है कि जिन बालकों की कुरूपता या कन्या होने के कारण उपेक्षा होती है वे हीनता की ग्रन्थि से ग्रसित हो जाते हैं। पतितों के या ससुराल परिवार के अन्य लोगों द्वारा तिरस्कार किये जाने पर कई महिलाओं की घुटन हिस्टीरिया के रूप में परिणत होती है। उन्हें दौरे पड़ने लगते हैं या भूतोन्माद जैसी विकृतियाँ आरंभ हो जाती है। भयानक सपने देखना भी चिंताओं अथवा आशंकाओं के कारण होता है। बाइबिल में लिखा है कि अत्यधिक ज्ञान मनुष्य को उन्माद की ओर ले जाता है। दार्शनिक सिनेका अपने समय के असाधारण विद्वान थे पर उनकी आदतों और हरकतों में से कोई एक ऐसी थीं जिनके कारण उन्हें छिछोरा कहा जाने लगा था।

एन्टोनी चेखोव, मैक्सिन गोर्की, एलेक्जण्डर ब्लॉक, सैमुअल जॉनसन, जैसे विद्वान और साहित्यकारों की जीवन गाथाओं के वे प्रसंग भी आते हैं जिन्हें उनकी महत्ता को देखते है बचकाना ही कहा जा सकता है। नशीले पदार्थों से होने वाली मानसिक विकृतियों की चर्चा प्रायः होती रहती है पर अतिवाद जैसे आचरण अपनाने वाले मनुष्य भी अपनी बौद्धिक क्षमता गँवा बैठते हैं और अधपगलों जैसे आचरण करते देखे जाते हैं। जो लोग समाज से कटे रहते हैं, और अपनी निजी समस्याओं और आकाँक्षाओं पर ही विचार करते रहते हैं उन्हें संसार नीरस लगने लगता है। किसी अन्य के प्रति सेवा सहानुभूति का भाव न रहने पर व्यक्ति अपने आपकी भी उपेक्षा करने लगता है और तनिक के कारणों पर आत्महत्या कर बैठता है। संसार के जिन देशों में आत्महत्या करने वालों की संख्या बढ़ी हैं, वे लोग किसी भी प्रकार मरे हों, उनके सम्बंध में यही पाया गया है कि वे सार्वजनिक जीवन नहीं बिताते थे। घर में घुसे रहते थे और वार्ता सिर्फ अपनी आकाँक्षा-अभिलाषाओं की ही करते थे। अन्ततः वे ऊबते-ऊबते आत्महत्या का फैसला कर बैठे।

साहित्यकार वाल्टेयर की आयु मरने योग्य हो गयी थी पर उन्हें मृत्यु का भारी भय लगता था। जब वे सोचते कि मरना पड़ेगा तो असहाय बालक की तरह फूट-फूटकर रोने लगते। जर्मन दार्शनिक शाँपेनहाँवर ने छुरे से किसी की हत्या होते देखी थी, उन पर तब से आजीवन छुरे का भय छाया रहा और दाढ़ी बनाने तक में रेजर का प्रयोग न कर सके।

कई व्यक्ति कुछ चिंताओं और आशंकाओं को मन में बसाये रहते हैं। कोई विपत्ति आने की कल्पना करते रहते हैं। भाग्यवादी, भविष्यवक्ता उनके ऊपर ऐसा ही रंग चढ़ा देते हैं, फलस्वरूप वे डरते-डराते दिन काटते हैं और जिंदगी भर हारे, थके-माँदे टूटे और निराश रहते हैं।

परेशानियों से रहित किसी का जीवन नहीं। उनसे जूझना भी एक प्रकार का व्यायाम है। जो लोग केवल सुख-सुविधाओं ही में जीते हैं और चाहते हैं, उनका धैर्य, पराक्रम और साहस विदा हो जाता है। आयु भर का अभ्यास उन सभी पराक्रमों का बना रहना चाहिए जो जीवन में आमतौर पर काम आते हैं।


पथिक निरुत्तर हो चला (Kahani)

 पेड़ काटने की योजना बनाते हुए लकड़हारे उस जंगल

में घूम रहे थे। हाथ में लोहे की कुल्हाड़ी भर थी।

साथियों को चिंतित देखकर वट वृक्ष ने कहा-”लकड़हारे हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकते। कुल्हाड़ी की कोई बिसात नहीं। हम लोग चिंतित क्यों हों? “

“चिंतित उस दिन होना पड़ेगा जिस दिन हममें से कोई फुटकर दुश्मन का साथ देगा और कुल्हाड़ी का बेंट बनेगा।” बात सच निकली। जंगल कटना तब आरंभ हुआ जब लोहे की कुल्हाड़ी को लकड़ी का बेंट हाथ लग गया।

कुम्भकार ने परिश्रम किया, बर्तन बनाये और खाना खाकर वही बर्तनों के समीप सो गया। वहाँ से एक राहगीर गुजरा। उसने कुम्भकार पर सहानुभूति दिखाते हुए कहा-तुम जमीन पर सोते हो? तुम इतने अच्छे बर्तन बनाते हो। इन्हें बाजार में बेचकर और अधिक धन कमाओ, बड़ा मकान बनाओ, खूब धन एकत्रित कर बड़े आदमी बन जाओ। कुम्भकार ने कहा-इससे क्या होगा? उसने कहा-फिर तुम्हें जमीन पर नहीं सोना पड़ेगा। नौकर चाकर होंगे। हाथ से काम भी नहीं करना पड़ेगा? कुम्भकार ने कहा-तब तो बड़ा आदमी बनना मुझे कतई पसंद नहीं, क्योंकि यदि मैं मेहनत नहीं करूंगा, फिर तो मेरा यह जीवन मिट्टी से भी बद्तर होगा। मिट्टी के बरतन भी बन जाते हैं किंतु मेरे अकर्मण्य जीवन का मोल तो मिट्टी के इन बर्तनों जितना भी नहीं होगा। पथिक निरुत्तर हो चला गया।


मानवी शिशु, जिन्हें पशुओं ने पाला

गर्भावस्था में आने से लेकर मृत्यु-पर्यन्त मनुष्य को अनेकानेक वातावरण में परिवेष्ठित हो रहना पड़ता है। गर्भकाल में वह अपनी अनुवाँशिकता से आवेष्ठित होता है और उस समय जन्मदात्री माँ के शारीरिक मानसिक स्वास्थ्य एवं भाव संवेदनाओं का उस पर प्रगाढ़ असर पड़ता है, किन्तु इस दुनिया में पदार्पण करते ही उसे जो प्रथम वातावरण मिलता है, उसका पारिवारिक परिवेश होता है। यह एक ऐसा वातावरण है जहाँ शिशु के व्यक्तित्व की गलाई-ढलाई होती है एवं इसकी नींव रखी जाती है, जिस पर कालान्तर में सुदृढ़ इसकी व्यक्तित्व का महल खड़ा किया जाता है, वैज्ञानिक अनुसंधानों से भी अब यह स्पष्ट हो गया है कि बच्चों को आनुवांशिकी से अधिक वातावरण, पारिवारिक परिवेश एवं परिस्थितियाँ प्रभावित करती है। शिशुओं के समग्र मानसिक विकास के लिए पारिवारिक शान्ति, सौहार्द्र और स्नेह-दुलार के साथ-साथ संस्कारोन्मुख प्रशिक्षण की व्यवस्था का होना भी नितान्त आवश्यक है।

नृतत्त्ववेत्ताओं, समाजशास्त्रियों एवं चिकित्सावैज्ञानिकों ने इस संदर्भ में गंभीरतापूर्वक अध्ययन अनुसंधान किया है। उनके अनुसार मनुष्य की ज्ञानवृद्धि-प्रशिक्षण एवं अभ्यास के अभाव में स्वाभाविक ढंग से नहीं हो पाती। इसके लिए जहाँ एक ओर माता-पिता या अभिभावक और शिक्षक आवश्यक हैं, वहीं दूसरी ओर तद्नुरूप उपयुक्त वातावरण का होना भी जरूरी है।

वेबिलोन के प्रसिद्ध राजा असुर वानापाल, फ्रेडरिक द्वितीय, जेम्स चतुर्थ और अकबर के समय में कुछ बच्चों पर इस तरह अलग रखा गये थे जिनमें उन्हें मानव समाज से इस तरह अलग रखा गया था कि उनका संपर्क किसी भी व्यक्ति से न हो सके। न तो वे किसी बातें सुन सकें और न उनके क्रिया-कलापों को देख सकें। केवल कुछ महिलायें ही उनके पालन-पोषण और रक्षण के लिए नियत की गयीं थीं जो बिना बोले कुछ संकेतों द्वारा ही उनका पालन पोषण करती रहीं। निश्चित अवधि के पश्चात् वे भी उनसे दूर हट जातीं और वहीं से उनका निरीक्षण करती रहती थीं। उन सभी प्रयोग-परीक्षणों से एक ही निष्कर्ष निकला था कि प्रशिक्षण एवं ज्ञानवृद्धि के अभाव में सभी बच्चे अविकसित, गूँगे-बहरे एवं व्यक्तित्व की दृष्टि से सर्वथा गये गुजरे थे।

“अन्डर स्टैण्डिंग ह्मन बिहेवियर “ नामक पुस्तक में ‘वाइल्ड चाइल्ड’ शीर्षक के अंतर्गत इस प्रकार के अनेक मानव शिशुओं का विस्तृत विवरण दिया गया है, जिनको असहाय अवस्था में पाकर विपरीत स्वभाव कहे जाने वाले वन्य हिंस्र पशुओं-यथा भेड़ियों, शेर, चीते, बन्दरों और भालुओं ने अपने बच्चों की तरह ममता एवं वात्सल्य भरे आत्मीयता से पाला पोषा। प्रख्यात जीवविज्ञानी डॉ. हिलवर्ट सिग्लर ने इस सम्बन्ध में किये गये अपने व्यापक अध्ययन एवं सर्वेक्षण के आधार पर बताया है कि हिंस्र पशुओं के साथ पले-पढ़े ये सभी मानव शिशु अपने वन्य पालकों के साथ पले-बढ़े ये सभी मानव शिशु अपने वन्य पालकों के साथ हिल-मिल कर हरते, उछलते-कूदते और शिकार करते पाये गये थे। रहन-सहन खान-पान एवं व्यवहार में भी वे पूरी तरह जंगली वातावरण के अनुरूप ढल गये थे।

अँग्रेजी के सुविख्यात साहित्यकार रडयार्ड किपलिंग ने “टारजन ऑफ दि एप्स “ नामक अपने शोघ में ‘टारजन नामक वन-मानव की कथा को बड़े ही रोचक-पूर्ण शब्दों में वर्णित किया है। टारजन एक ख्याति प्राप्त काँमिक स्ट्रीप ही नहीं अब वाइल्ड एक का एक विलक्षण नायक भी है। इसकी कथा इस प्रकार है कि एक ग्यारह वर्षीय अँग्रेज बालक एक जहाज से बिछुड़ कर अफ्रीका के घने जंगलों में जा फँसा, जहां उसे बन्दरों ने पकड़कर पाल-पोस लिया। अन्य पशुओं का भी उसे भावनात्मक सहयोग मिला और लगातार पन्द्रह वर्ष तक उनके बीच रह कर वह वन्य परिवार के हिंस्र तथा अहिंस्र प्राणियों का परिचित ही नहीं स्नेह भाजन भी बन गया था।

सर्वप्रथम वन्य पशुओं द्वारा पाले-पोसे गये मानव शिशुओं का प्रमाणिक विवरण चौदहवीं शताब्दी में तैयार किया था। सन् 1349 में जर्मनी के हैसे नामक बालक का नाम रिकार्ड में सर्वप्रथम अंकित किया गया था। लगभग बारह वर्षीय यह बालक जर्मनी के सघन जंगलों से खूँखार जानवरों के झुण्ड से जाल में फँसाकर पकड़ा गया था। इसके बाद समय-समय पर मध्य और पूर्वी योरोप के देशों में ऐसे अनेक बालकों को जंगली जानवरों के मध्य रहते हुए खोज निकाला गया। वे सभी गूंगे थे या अपने पालनकर्ताओं की तरह गुर्राने और कच्चा माँस खाने वाले थे तथा उन्हीं की तरह हाथ-पैरों से छलाँग मारकर चलते थे।

भारत में ब्रिटिश शासन काल में मेजर जनरल स्लीमैन नामक एक अँग्रेज अधिकारी ने इस संदर्भ में गहरी रुचि ली। सन् 1900 में उसने यह अनुमान लगाया था कि समूचे विश्व में प्रतिवर्ष प्रायः 6 हजार बच्चे जंगली हिंसक पशुओं की गिरफ्त में आ जाते हैं जिनमें से अधिकतर को वे अपने बच्चों की तरह पाल–पोसकर अपने परिवार अभिन्न सदस्य बना लेते हैं। उनके निर्देशन में पश्चिम बंगाल के मिदनापुर के जंगलों से अमला और कमला नामक दो लड़कियाँ खोज निकाली गयीं थी जिनमें अमला की आयु 18 माह और कमला की 12 वर्ष थी। अनेकों प्रयत्न करने के बावजूद भी उन्हें पूरी तरह प्रशिक्षित नहीं किया जा सका था दोनों की मृत्यु क्रमशः 9 वर्ष एवं 17 वर्ष की आयु में हो गयी थी।

सन् 1973 में इटली के प्राणि-व्यवहार विशेषज्ञों के एक खोजी दल आब्रूजी नामक पहाड़ियों के मध्य जंगली भेड़ियों के समूह से ‘रोमो’ नामक एक बच्चे को पकड़ा था। यह जंगल अपनी अत्यधिक सघनता एवं हिंस्र प्राणियों की बहुलता के लिए विख्यात है। रोमो भी पशुओं की तरह हाथ-पैरों की सहायता से छलाँग लगता और भेड़ियों की तरह गुर्राता था। इसी वर्ष बंदरों की टोलियों के साथ उछल-कूद करते हुए पाया गया था। बन्दरों के साथ छीना-झपटी करते समय वह भी अन्य साथियों की तरह घुड़की भरता और गुर्राता हुआ पेड़ की शाखायें हिलाने लगता। मनोवैज्ञानिकों के सतत् परिश्रम और प्रयासों से उसे कुछ ही महीनों में सामान्य व्यवहार क्रम में प्रशिक्षित कर लिया गया।

मानवीय व्यवहार विशेषज्ञों व अनुसंधानकर्ताओं ने वन्य पशुओं द्वारा पोद्वात मानव शिशुओं को दो प्रकार की श्रेणी में रखा है। पहली श्रेणी में वे बच्चे आते हैं जो किसी आकस्मिक दुर्घटना अथवा संयोगवश अपने माता-पिता या परिजनों से बिछुड़कर भूल-भटककर सघन जंगलों में फँसे, जहाँ उनकी असहाय एवं दयनीय अवस्था से द्रवीभूत खूँखार समझे जाने वाले जानवरों अपनी सन्तानों की तरह आत्मीयतापूर्वक पाल-पोस लिया था। दूसरी श्रेणी में उन बच्चों को रखा गया है जिन्हें शेर, चीते, बाघ, भालू और भेड़िये जैसे मानवीय रक्त और माँस से अपनी क्षुधा-पिपासा शान्त करने वाले प्राणियों ने उठा लिया था, किन्तु अपनी खुद की सन्तान न होने के कारण अथवा क्रूर और निर्मम मनुष्यों द्वारा अपने शिशुओं की हत्या कर दिये जाने पर सहज वात्सल्य भावना उमड़ पड़ने से उनको स्व-शिशुवत पाल लिया था।

गहन अध्ययनों एवं सर्वेक्षणों के आधार पर यह तथ्य भी उभर कर आया है कि पर्याप्त प्रशिक्षण तथा स्नेह-दुलार के अभाव में बच्चे मानसिक रूप से अविकसित रह जाते हैं और कितने ही मानसिक विकृति अथवा अन्य पारिवारिक कलह, कुँठा-कुत्साओं के कारण घर छोड़ कर जंगलों की ओर भाग जाते है। आज का तथाकथित सभ्य मानव भले ही स्वार्थी, निष्ठुर, क्रूर और मानवीय संवेदनाओं से रहित हो गया हो, किन्तु अध्ययनों से पता चलता है कि खूनी एवं हिंस्र समझे जाने वन्य प्राणियों की भाव संवेदनायें-प्रेम, ममता, समता और सद्भाव=सहयोग का स्रोत अभी सूखा नहीं है। वे मासूम असहाय बेसहारा बच्चों की व्यथा-वेदना पर टूक-टूक हो जाते हैं और अपनी विनाशकारी हिंसक प्रवृत्ति छोड़कर अपने निजी शिशुओं की तरह उन भी वात्सल्य भरी ममता का सागर उड़ेल देते हैं। बच्चे भी उन्हीं परिवारों का अभिन्न अंग बनकर रहने और तद्नुरूप अनुकरण आचरण तथा व्यवहार करने लगते है।

वन्य जीवों, जंगली हिंस्र पशुओं के साथ घुल-मिल कर जीवन-यापन करने वाले प्रकृति के कठोर आघातों से संतुलन बिठा लेने में समर्थ मानव शिशुओं के ये विवरण विचारशीलों, मनोवेत्ताओं एवं वैज्ञानिकों को सोचने के लिए विवश करते हैं कि यदि बच्चे को-भावी पीढ़ी को सुसंस्कृत वातावरण प्रदान नहीं किया गया, प्रशिक्षण एवं ज्ञान वृत्ति की समुचित व्यवस्था जुटायी नहीं जा सकी, तो अगले दिनों व्यक्तित्व की दृष्टि से मनुष्य को पशु मानव का जीवन व्यतीत करना पड़ सकता है। विश्व-विख्यात वैज्ञानिक मनीषी जॉन ग्रेन ने ‘यूनिसेफ ‘ के माध्यम से ठीक ही कहा है-”यदि आप एक बच्चे को उचित वातावरण पारिवारिक परिवेश, भोजन, माता-पिता का प्यार समुचित स्वतंत्रता एवं शिक्षा से वंचित रखते हैं तो आप एक ऐसे वयस्क का निर्माण करेंगे जो व्यक्तित्व की दृष्टि से अविकसित रहेगा और विकास की दशा में प्रगति को तेज करने की अपेक्षा उसे पीछे की ओर धकेलेगा।


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चंचलता का एक ही कारण है कामों को खिलौना समझकर खेलना। जब उन्हें तत्परतापूर्वक किया जाता है तो एकाग्रता का ध्यान साधना का आधा व्यवधान दूर हो जाता है। शेष आधा त दूर होता जब उनमें रस आने लगता है।


माँसाहार मानवता विरुद्ध है

मनुष्य समाज को गिराने वाली अनेकों दुष्प्रवृत्तियां हैं, पर माँसाहार उनमें से सबसे अधिक घृणित है। इससे मनुष्य में निष्ठुरता, क्रूरता, निर्दयता, स्वार्थ-साधन आदि समाज विरोधी प्रवृत्तियों की अभिवृद्धि होती है। करुणा, दया, क्षमा, संवेदना, सहानुभूति तथा सौहार्द्र जैसे आध्यात्मिक गुण नष्ट हो जाते हैं और ऐसे व्यक्ति अपने स्वाद, स्वास्थ्य एवं स्वार्थ के लिए बड़े से बड़ा अपराध करने में भी संकोच नहीं करते। जिस समाज में ऐसे अनात्मवादी व्यक्ति विद्यमान हों, उसमें मानवता के गुणों की अभिवृद्धि की आशा कैसे की जा सकती है?

समाज मनोविज्ञानियों का कहना है कि माँस-भोजन मानवता की स्थापना एवं स्थिरता के लिए बहुत बड़ी बाधा है। यह सब जानते है कि एक सूखी समाज के लिए स्वस्थ गुणों के नागरिकों का होना कितना आवश्यक है। व्यक्ति का सद्गुणी होना उसके आन्तरिक सदाचार पर निर्भर है अर्थात् सभ्य समाज की रचना तभी हो सकती है जब लोगों के मन स्वच्छ हों। यद्यपि पाश्चात्य मनोविज्ञानी इस तथ्य को आँशिक रूप से ही जान पाये है, पर भारतीय तत्त्वदर्शी-ऋषि-मुनियों ने इस बात को बहुत पहले ही अच्छी तरह जान लिया था कि मन और कुछ नहीं अन्न या आहार का सूक्ष्म संस्कार मात्र है। इसलिए उन्होंने आहार की सात्त्विकता पर बहुत जोर दिया है। उसके अनुसार मनुष्य के आहार का जो गुण होगा, उसके मन में भी वैसे ही गुणों का, विचारों का जन्म होगा और जैसे लोगों के विचार होंगे, आचरण भी वैसे ही होंगे। इस वैज्ञानिक तथ्य की समग्र जानकारी के बाद ही स्वच्छ सात्त्विक आहार ग्रहण करने की आवश्यकता का प्रतिपादन किया गया था और भोजन व्यवस्था को अनेक कड़े नियमों से प्रतिबन्धित कर दिया गया था।

भोजन की स्वच्छता, सादगी, सफाई और उसे भावनापूर्वक ग्रहण करने की भारतीय प्रणाली केवल मनोवैज्ञानिक ही नहीं थी, वरन् यह विचार-विज्ञान की गहन कसौटी पर कसी हुई थी। यदि मानव के निर्माण में उसकी प्रवृत्तियों के बनने में भोजन का कोई प्रभाव न होता, तो मनीषीजन उसकी खोज गुण-अवगुण की उपयोगिता एवं अनुपयोगिता पर इतना गहन अन्वेषण न करते। पिप्पलाद ऋषि, कणाद ऋषि जैसे महामनीषियों को प्राकृतिक अन्न-कणों से अपनी क्षुधा को शान्त करने की विवशता न रही होती।

आहार का मानवी मनोवृत्तियों पर पड़ने वाले प्रभाव पर अनुसंधान चिकित्सा-विज्ञानियों ने निष्कर्ष निकाला है कि माँसाहार से मनुष्य की मनोवृत्तियों क्रूर, दुस्साहसी, निर्दय और निष्ठुर बन जाती है। इन दुर्गुणों की अभिवृद्धि से समाज भी निश्चित रूप से प्रभावित होता है। जो व्यक्ति माँस के टुकड़ों के लिए जीवों पर दया नहीं कर सकता, वह अपने पत्नी-बच्चों के प्रति कितना दयालु होगा, कहा नहीं जा सकता। ऐसी भी परिस्थितियाँ आ सकती हैं अब अन्न न मिले और माँसभक्षी व्यक्ति सजातियों को ही अपना ग्रास बनाने लगे, तो आश्चर्य किस बात का?

स्वास्थ्य रक्षा की दृष्टि से भी माँस मनुष्य का स्वाभाविक आहार नहीं है। माँस भक्षण से सामयिक उत्तेजना और शक्ति का अनुभव हो सकता है, पर स्वास्थ्य को स्थायी रूप से सुदृढ़ और कार्यक्षम बनाने के लिए उसे कभी अधिक महत्त्व नहीं दिया जा सकता। इस सम्बन्ध में केवल भारतीय मनीषी या शास्त्र ही पर्याप्त प्रकाश नहीं डालते, वरन् वर्तमान समय में योरोप और अमेरिका के मूर्धन्य वैज्ञानिकों, शरीर-शास्त्र-वेत्ताओं तथा प्रसिद्ध डॉक्टरों ने भी जो खोज, परीक्षण एवं अनुभव किये हैं। और जो निष्कर्ष निकाले हैं, उनसे भी यही सिद्ध होता है कि माँसाहार स्थायी स्वास्थ्य की समस्या का हल नहीं कर सकता। उससे अनेकों प्रकार की शारीरिक-मानसिक बीमारियाँ ही उपजती हैं।

इंग्लैंड के सुप्रसिद्ध चिकित्सा विज्ञानी डॉ. हेनरी परडो ने अपने जीवन काल में शाकाहारी एवं माँस खाने वाले हजारों व्यक्तियों का परीक्षण किया। उनका कहना है कि ऐसे अनेक व्यक्ति थे जो माँसाहार त्याग कर शाकाहारी बन जाने से पहले की अपेक्षा अधिक स्वस्थ हो गये और कब्ज, एसिडिटी, गठिया, अल्सर,मिर्गी आदि रोगों से छुटकारा पा गये। अपनी शोध निष्कर्ष में उनने बताया है कि जो व्यक्ति पूर्णतया शाकाहार पर रहते हैं, वे माँसाहारियों की अपेक्षा रोगों के शिकार बहुत कम होते हैं।

इसी तरह का निष्कर्ष डॉ. रसेल तथा डॉ. पर्क्स जैसे विख्यात आहार विशेषज्ञों का भी है। डॉ. रसेल ने अपनी कृति “सार्वभौम भोजन” में लिखा है कि-’जहाँ माँसाहार जितना कम होगा वहाँ कैंसर जैसी प्राणघातक बीमारियाँ भी उतनी ही कम होगी। डॉ. पक्स अपने व्यक्तिगत अनुभवों का उल्लेख करते हुए कहते हैं कि-”माँसाहार के कारण ही वे बहुत दिनों तक सिरदर्द, मानसिक थकावट तथा गठिया से ग्रसित रहे।’

डॉ. हेग ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक-”डाइट एण्ड फूड” में लिखा है-शाकाहार से शक्ति उत्पन्न होती है अवसर पर माँसाहारी से उत्तेजना बढ़ती है। परिश्रम के अवसर पर माँसाहारी थक जाता है। जिसे इसकी आदत पड़ जाती है, वह शराब आदि उत्तेजक पदार्थों की आवश्यकता अनुभव करता है, नशीली दवाओं का प्रयोग करता है। यदि वे न मिलें तो सिरदर्द, उदासी, स्नायु दुर्बलता आदि का शिकार हो जाता है। ऐसे लोग निराशाग्रस्त होकर आत्म-हत्या तक कर बैठते हैं। ब्रिटेन, अमेरिका जैसे पाश्चात्य देशों में जहाँ माँस और नशाखोरी का प्रचार बहुत अधिक है, वहाँ आत्महत्यायें भी बहुत अधिक होती है, इसी प्रकार मेरी एस. ब्राउन, डॉ. शिरमेट, डॉ. क्लाडसन, जार्ज बर्नार्डशा, डॉ. लम्सशैप आदि प्रख्यात वैज्ञानिक मनीषियों ने भी माँसाहार से स्वास्थ्य पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों पर विस्तारपूर्वक प्रकाश डाला है।

माँसाहार से इस प्रकार की हानियाँ होने का मुख्य कारण उसमें पाया जाने वाला तत्व-’यूरिक एसिड’ है जो शरीर के भीतरी अंगों में विषैला प्रभाव डालता है। यह अम्ल जब अधिक मात्रा में रक्त में मिल जाता है तो मस्तिष्क में दर्द, निद्रा-ह्रास, श्वास विकृति, अजीर्ण और यकृत-विकार आदि अनेक रोग हो जाते हैं और व्यक्ति दुर्बलताग्रस्त हो मरण की ओर घिसटता जाता है।

पाया गया है कि शाकाहारी व्यक्ति माँस खाने वालों से अधिक सशक्त, सुदृढ़ एवं दीर्घजीवी होते है। माँसपेशी तंत्र तनावग्रस्त हो व्यक्ति को पंगुता की स्थिति में ले जा कर पटकता है। अंतर्राष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भाग लेने वाले प्रतियोगी पर किये गये एक अध्ययन में विशेषज्ञों ने निष्कर्ष निकाला है कि फल-हरी सब्जी, दूध-घी मेवा आदि शुद्ध भोजन करने वाले व्यक्ति देखने में दुबले–पतले भले ही लगते रहें, पर जीवनी शक्ति एवं स्फूर्ति में वे माँसाहारियों से कई गुना बेहतर स्थिति में रहते हैं।

पिछले दिनों जर्मनी में माँसाहारियों एवं शाकाहारियों में सत्तर मील पैदल चलने की एक प्रतियोगिता आयोजित की गयी। प्रतियोगिता में बीस माँसाहारी व्यक्ति थे और छह शाकाहारी। शाकाहारी, माँसाहारी से बहुत पहले गन्तव्य स्थान पर पहुँच गये। सबसे कम समय 14 घण्टे में 70 मील की दूरी तय करने वाला शाकाहारी ही था। 20 माँसाहारियों में से केवल एक व्यक्ति इस दूरी को तय कर सका और वह भी अन्तिम शाकाहारी के एक घण्टे बाद। उस एक को छोड़ का शेष केवल 45 मील तक चल सके, इसके बाद उन्हें वहाँ से मोटरों पर लाना पड़ा।

धार्मिक, नैतिक, शारीरिक अथवा सामाजिक-किसी भी दृष्टि से देखा जाय, शाकाहार ही मनुष्य का प्राकृतिक भोजन है। जहाँ माँसाहार के काम, क्रोध, आलस्य, प्रमाद, जड़ता आदि दुर्गुणों की वृद्धि होती है, वहाँ शुद्ध शाकाहार से स्फूर्ति, पवित्रता, प्रसन्नता, शक्ति तथा दीर्घ आयुष्य प्राप्त होती है। माँसाहार सामाजिक जीवन को भी कम क्षति नहीं पहुँचता। यह सामाजिक जीवन को अधः पतित बना कर लोगों के लिए अनेक उपद्रव खड़ा कर देता है, जबकि शाकाहार से परिवार व समाज में सुख समृद्धि का वातावरण बनता है। आज आवश्यकता इस बात की है कि मनुष्य अपने सहज स्वाभाविक आहार को ग्रहण कर स्वयं को सशक्त, पवित्र एवं दीर्घजीवी बनावे और ऋषियों की इस पवित्र भूमि से माँसाहार को सदा के लिए तिलाँजलि दे।


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प्रताड़ना के भय से शेर-हाथी जैसे जानवर भले ही वश में किये जा सकें, पर विकास के क्षेत्र में एक पत्ता भी नहीं उगाया और एक फूल भी नहीं खिलाया जा सकता।


अंतिम जीत सत्य की है

गजनी की सेना में अजीब चला−चली हो रही थी। भारी आवाज में न आने वाली बोली में हुक्म दिए जाते, घोड़े हिनहिनाते, शस्त्रों की आवाज होती। दूर पर जंगल के बिल्कुल पास जहाँ अमीर डेरे तम्बू डालकर पड़ा था, मशालें जल रह थीं। वहाँ से घोड़े छूट रहे थे और जैसे किसी महायंत्र की चरखी घूमती है वैसे ही सारी सेना में समझ में न आने वाले व्यूह बन रहे थे।

इधर धोधागढ़ के दरवाजे खुले और उदय होते सूर्य की सुनहरी किरणों में दानों के समान दीप्तिमान चौहान वीर जगमगाती बागें, केसरिया पाग और चमकते खड़गों से बैरियों को अंधा बनाते घुंघरू वाले घोड़ों और ऊंटों को नचाते गढ़ से उतरे। सबसे पहले चार गज आगे-आगे उतर रहे थे धोधा बापा। जैसे कोई तैराक समुद्र की तरंगों को चारों ओर फेंकता आगे बढ़ता है वैसे ही वे बढ़े। उनकी गर्जना दूर तक सुनाई देती थी। जहाँ तक उनका हाथ फिरता था यवन सेना में भगदड़ मच जाती, व्यूह पर व्यूह चकनाचूर हो जाते। उनकी केसरिया पाग इस भीड़ में भी चमकती -दमकती आगे बढ़ी- फिर अदृश्य हुई, फिर चमकी.......और अचानक पीछे से हरी पगड़ी और लाल दाढ़ी वाले सुल्तान ने आकर छल से बार किया। हजारों दुश्मनों की तलवारें उनकी मृत्यु शय्या पर छत्र की तरह तन गयी। यवन नाचते-कूदते पुकार लगाते गढ़ के अंदर प्रवेश कर चारों दिशाओं में फैल गये। चौक पर पहुँचते ही गजनी की नजर पत्थर की एक प्रतिमा पर पड़ी, वह स्तब्ध हो गया उसे देखकर। ऐसा अनुपम कला कौशल उसने आज तक नहीं देखा था। हाथी रुक गया-पीछे आ रही यवन सेना में भी ठहराव आ गया।

वह प्रस्तर निर्मित मानव मानों पराक्रम का प्रतीक हो। आकाश की ओर उठी हुई वे पैनी आंखें। स्वर्ग से अमृत को लाने वाले गरुड़ की दृष्टि थी वह। पैरों में लिपटे हुए नागों को वह हाथों से मसलकर नष्ट कर रहा था-मानों पक्षीराज गरुड़ ही हो। मंत्रमुग्ध अमीर ने पूछा -इसका शिल्पी कौन है? सामने आये, उसे आशा थी कि जनसमूह में से कोई आगे आयेगा और झुककर अभिवादन करते हुए कहेगा-सुल्तान! मैं इसका निर्माता हूँ। परंतु जब यह आशापूर्ण नहीं हुई तब अमीर ने तनिक ऊँचे और रूखे स्वर में फिर वहीं आदेश दुहराया, तब भी सन्नाटा छाया रहा। क्षुब्ध होकर सुल्तान ने पूछा -किसकी प्रतिमा है यह? महाप्रतापी सुल्तान ने अभी जिन्हें स्वर्गलोक पहुँचा दिया, उन्हीं की मूर्ति है यह। किसी ने बहुत डरते-डरते निवेदन किया। अब की बार सुल्तान की प्रतिमा में पहले जैसा सौंदर्य दिखायी नहीं दिया। उसने पूछा-क्या इस मूर्ति का शिल्पी इसी नगर में रहता है? जी। किसी ने सहमते हुए संक्षिप्त-सा उत्तर दिया। वह हमारे स्वागत कि लिए क्यों नहीं आया? तुरंत उसे यहाँ हाजिर किया जाय,तभी सवारी आगे बढ़ेगी।

सुल्तान ने दृढ़ स्वर में आदेश दिया। तुरंत शिल्पी को तलाश करके उसके सामने उपस्थित किया गया। गजनी ने उसे तीव्र दृष्टि से घूरते हुए प्रश्न किया-तुम्हीं ने बनाई है ये मूर्ति?

जी हाँ। शाँत स्वर में शिल्पी बोला।

कैसे? सुल्तान ने फिर सवाल किया कुछ अटपटा-सा।

कैसे? यह कैसे बताया जा सकता है? लताओं पर कलियाँ कैसे उगती हैं, क्या यह सुल्तान बता सकेंगे? शिल्पी ने प्रश्न को प्रश्न में ही लपेट लिया।

सुल्तान निरुत्तर! वह भीतर ही भीतर जल उठा फिर भी संयत होकर बोला- यह मूर्ति किसकी है?

महाप्रतापी धोधा राणा की। शिल्पी ने पूर्ववत निर्भीकता से कहा।

आज तेरा वह महाप्रतापी धोधा राणा तो क्या सामान्य मनुष्य भी नहीं है। जब वह कुछ नहीं है-तब उसे पराक्रमी बताना दुनिया को धोखा देना नहीं है?

यदि मैं आज आप की प्रतिमा बनाऊँ तो कल उसके सम्बंध में भी यही होगा। शिल्पी ने निर्भयतापूर्वक कहा। क्या मतलब? सुल्तान ने मस्तक पर प्रश्नात्मक रेखाएँ खिंच गई।

मृत्यु से कौन बच सका है सुल्तान? अंतर सिर्फ यह है कि एक सत्कर्म करके युगाँतर व्यापी कीर्ति अर्जित करता है। दूसरा नृशंसता और बर्बरतापूर्वक -हँसते खिलखिलाते जीवन पुष्पों को कुचल-मसलकर अपने लिए आहें, चीत्कारें बटोरता है।

शिल्पी कुछ और बोलता-इतने में सुल्तान ने लाल-लाल आँखों से शिल्पी को देखा और दृढ़ संयत स्वर में कहा-कलाकार! तुम्हारा हाथ पत्थर से स्वर्ग का निर्माण भले करे, किंतु तुम्हारी जीभ तुम्हें रसातल की ओर ले जा सकती है।

अमीर! कलाकार की जीभ और हाथ अलग-अलग नहीं होते। उसका मस्तिष्क और हृदय भी अलग-अलग नहीं होता। राजनीति भले ही वीरांगना हो, कलाकार की नीति तो पवित्रता है। वह मानती है जीवन में एक ही सत्य है और वह है परमसत्ता के आलोक में विकसित होना। जैसे कोई ज्वालामुखी धीरे-धीरे सुलगने लगे उसी तरह शिल्पी के एक-एक शब्द से सुल्तान का क्रोध प्रज्वलित हो रहा था। अब वह सहसा फूट पड़ा। सुल्तान चिल्ला उठा-किसी और ने यह बात कही होती तो उसका सिर कटवा लेता। परंतु ......फिर वह मुस्करा पड़ा और बोला- मैं तुम्हें बिल्कुल मामूली दण्ड दूँगा। सारी जनता के समक्ष तुम्हें इस मूर्ति को तोड़कर चूर-चूर करना होगा।

भीड़ में तहलका मच गया। कानाफूसी होने लगी। केवल तीन ही शाँत और स्थिर थे-सुल्तान, शिल्पी और मूर्ति। एक-एक क्षण एक युग जान पड़ता था। कई क्षण बीत गये, लेकिन शिल्पी का मौन न टूटा। वह अविचल भाव से खड़ा रहा। अंत में सुल्तान ने ही चुप्पी भंग की। मेरी आज्ञा स्वीकार है? नहीं, दृढ़ स्वर में शिल्पी का संक्षिप्त उत्तर था।

तो सिर कटाने के लिए तैयार हो जाओ।

हृदय गँवाने से सिर गँवाना कहीं अच्छा है।

क्या आज तक तुमने अपने हाथ से अपनी कोई रचना नष्ट नहीं की? अमीर ने शिल्पकार को उलझन में डालने के इरादे से प्रश्न किया।

एक नहीं अनेक प्रतिमाएं मैंने अपने हाथों से बनायीं और नष्ट की हैं।

किस कारण? सुल्तान ने विस्मित होकर पूछा। क्योंकि उनमें मेरी कला पूर्णतया अवतीर्ण नहीं हो सकी थी। मेरे हृदय का प्रतिबिम्ब उनमें नहीं प्रकट हो सका था। परंतु इस प्रतिमा की बात दूसरी है। यह मेरी सबसे सुँदर कृति है और मेरा काम सौंदर्य का निमार्ण करना है उसका विध्वंस नहीं। उस कार्य के लिए तो ईश्वर ने आप जैसे सुल्तान पैदा किये है।

जन समूह थर-थर काँप उठा। उपस्थित जनों में से प्रत्येक आकुल-व्याकुल हो गया। सबने समझ लिया-सुल्तान का इस तरह उद्धत अपमान करने वाला उद्धत कलाकार अब कुछ ही क्षणों में परलोक का मेहमान बनने वाला है। परंतु सब के सब चकित रह गये। अमीर सिर झुकाकर खड़ा था। बड़ी देर बाद उसने गर्दन ऊपर उठायी और कहा-कलाकार। मैंने तुम्हारे राणा को परास्त कर दिया है। शास्त्र की जीत अंतिम जीत होती है, यही मेरा आज तक का विश्वास था। परंतु आज तुमने मेरी आंखें खोल दीं। शास्त्र की जीत अंतिम जीत नहीं होती, सत्य की ही विजय होती है-यह ज्ञान मुझे मिल गया।


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मनुष्य भलाई के लिए जन्मा है जैसे पक्षी उड़ने के लिए।

डरपोक की आधी शक्ति नष्ट हो जाती है और आधी वृद्धि भी। बहादुर रहो और साथियों को भी बहादुरी की शिक्षा दो। डरपोक-अनाचारी का हौसला बढ़ाता है इसलिए वह भी एक प्रकार का अनाचारी है।


विचार प्रवाहों से विनिर्मित होता है प्रखर व्यक्तित्व

विचारणाओं-भावनाओं की उत्कृष्टता ही मानवी उत्कर्ष का अभ्युदय का प्रमुख आधार है। जो इस तथ्य से भली-भाँति अवगत हैं, वे अपनी चिंतन-चेतना को सदैव ऊर्ध्वगामी बनाये रखने का प्रयत्न करते है। विचार-शक्ति की महिमा से अनभिज्ञ व्यक्तियों को जिस-तिस प्रकार अस्त-व्यस्त जीवन जीने को विवश होते और अविकसित मनःस्थिति में ही दम तोड़ते देखा जाता है। विचारों का स्तर विधेयात्मक जैसा भी होगा, व्यक्तित्व भी तद्नुरूप ढलता चला जायेगा।

मनःचिकित्सक डॉ. जार्ज आर. वैच ने निषेधात्मक प्रकार की विचार धारा को मनुष्य का सबसे बड़ा आन्तरिक शत्रु बताया है। अपनी कृति-द इनर एनिमी में उनने लिखा है कि संसार में इससे बढ़कर हानिप्रद दुश्मन और कोई नहीं। बाहरी शत्रु मात्र आर्थिक या शारीरिक हानि पहुँचा सकते हैं और यदि सतर्कता बरती जाय-सावधान रहा जाय, तो उनसे लोहा लिया और निपटा भी जा सकता है। किंतु आँतरिक दुश्मन तो अंतराल में पनपने और मन-मस्तिष्क में उमड़ने-घुमड़ने वाले हेय विचार हैं, जिन्हें असावधान व्यक्ति न तो पहचान पाते हैं और न उनसे बचने या पीछा छुड़ाने का प्रयत्न ही करते है। उनने इसे हैण्डसम डेविल के नाम से सम्बोधित किया है, कारण कि यह सुँदर लुभावने सपने दिखाते और अपने मोहपाश में फँसाकर अन्ततः पतन की गर्त में जा धकेलते है। जीवनक्रम को अस्त-व्यस्त करके रख देने वाली इस विचार प्रक्रिया को दैत्य की श्रेणी में रखा गया है। विचार तंत्र का परिष्कार ही इससे त्राण पाने का सरल उपाय है।

विधेयात्मक विचार प्रक्रिया को अपनाकर ही आगे बढ़ा और ऊँचे उठा जा सकता है। प्रगति एवं व्यक्तित्व की प्रखरता का सूत्र सादा जीवन व उच्च चिंतन में ही निहित है। विश्व प्रसिद्ध लेखक डॉ. वेने डायर ने द स्काई इज द लिमिट नामक पुस्तक में विचारणा की इस श्रेष्ठतम स्थिति को टान्सेडिंग आँथोरीटेरियन थिंकिंग अर्थात् उत्कृष्ट प्रामाणिक चिंतन के नाम से सम्बोधित किया है और इस तरह के विचार प्रक्रिया को अपनाने वाले व्यक्ति को नो लिमिट परसन अर्थात् असीम एवं असाधारण व्यक्तित्व वाला बताया है। ऐसे व्यक्ति सामान्यजनों की अपेक्षा अपनी समस्याओं का समाधान स्वयं ढूंढ़ने तथा अपने बारे में निर्णय ले सकने की क्षमता से पूर्ण होते है और साथ ही परिस्थितियों के अनुरूप मनःस्थिति को ढालने की कला में भी पारंगत होते है। उनके चिंतन की परिधि ससीम न रहकर असीम हो जाती है। स्वतंत्र एवं व्यवस्थित सूझबूझ वाले व्यक्तियों के निर्णय सही और सार्थक सिद्ध होकर रहते हैं।

रेन डिकार्टे को आधुनिक दर्शन का जन्मदाता कहा जाता है। उनके कथनानुसार मनुष्य में ‘कोजीटो’ नामक एक विशिष्ट प्रकार की विचार ऊर्जा सतत् प्रवाहित होती रहती है। यदि उसे विधेयात्मक एवं रचनात्मक दिशा में मोड़ा-मरोड़ा जा सके तो मनुष्य सीमित एवं संकुचित दायरे से निकल कर अपने विराट स्वरूप की झाँकी आसानी से कर सकता है। जीवन दर्शन की समस्त संभावनाएँ इसी ऊर्जा प्रवाह पर निर्भर करती हैं। सामान्य से असामान्य बना सकने वाला जीवन तत्व इसी में विद्यमान है। डॉ. वेने डायर ने कोजीटो-को ही नो लिमिट-थिंकिंग अर्थात् असीम चिंतन से संबोधित किया और बताया है कि यह मानवी चिंतन की वह अवस्था है जिसमें ज्ञान कर्म और विचार की, चिंतन- चरित्र व्यवहार की तीनों धाराओं का सामंजस्य-समन्वय सरलतापूर्वक बैठ जाता है। केवल विचारणा मात्र ही मानवी व्यक्तित्व का प्रतीक नहीं होती वरन् समग्र व्यक्तित्व का निर्धारण आचार और विचार दोनों से मिलकर बनता है। चरित्र का निर्माण इसी से होता है। संसार में ऐसे कितने ही व्यक्ति पाये जा सकते हैं जिनके विचार बड़े ही उदात्त, महान और आदर्शपूर्ण होते हैं, किंतु उनकी क्रियाएं उनके अनुरूप नहीं होती। विचार पवित्र हो और कार्य अपावन, तो यह व्यक्तित्व की श्रेष्ठता कहाँ हुई? इसी प्रकार यह भी हो सकता है कि कोई ऊपर से बड़े ही सत्यवादी,आदर्शवादी और धर्मपरायण दीखते हों, किंतु भीतर कलुषपूर्ण विचारधारा ही प्रवाहित हो रही है। दोहरे जीवन जीने वाले ऐसे व्यक्ति खरे व्यक्तित्व वाले नहीं माने जा सकते। चरित्रवान उसे ही माना जायेगा और वास्तव में वही होता भी है जो विचार और व्यवहार दोनों को समान रूप से उच्चस्तरीय और पवित्र रखकर चलता है।

काय कलेवर जिससे आचरण और क्रियायें प्रतिपादित होती हैं, विचारों द्वारा ही संचालित होता हैं। उनके स्तर के अनुरूप ही व्यक्तित्व का निर्माण होता है जो व्यक्ति रचनात्मक विचारणाओं को जिस अनुपात में अपनाता, सँजोता और सक्रिय करता चलता है, उतना ही वह सदाचारी, पुरुषार्थी और परमार्थी बनता जाता है। इस आधार पर सुख शाँति के अक्षुण्ण बने रहने का आधार खड़ा होता है विचार प्रवाह के निम्नगामी होने पर व्यक्तित्व के विकास में विघ्न पहुँचता है। इस तरह की विचारधारा को डिकोटोमस अर्थात् विकृत एवं विघटनकारी प्रवाह के नाम से भी जाना जाता है। इस मानसिक रुग्णता की स्थित में अचिन्त्य चिंतन एवं अनौचित्यपूर्ण क्रिया–कलापों के जाल में फँस जाना कोई आश्चर्य की की बात नहीं है। अज्ञानता-अबोधतावश और असावधानी से ऐसा हो सकता है, किंतु तथाकथित सभ्यों के जब ऐसा सोचते और आचरण करते देखा जाता है जो मानवी गरिमा और सभ्यता के अनुकूल नहीं होता तब और भी अधिक आश्चर्य होता है।

वस्तुतः नो लिमिट परसन अर्थात् विशाल व्यक्तित्व का अर्थ है- संकीर्णताजन्य स्वार्थपरता के भव बंधनों का परित्याग करने वाली उत्कृष्ट चिंतन की रीति-नीति को अपनाकर अपने को लोकोपकारी आदर्शवादी विचारधारा के साथ जोड़ना। इस विद्या को जानने वालों के जमीन में सदैव प्रसन्नता और प्रशंसा ही दृष्टिगोचर होती है। निंदा आलोचनाओं से वह सदा अपने को दूर रखते हैं। राल्फबाल्डो इमर्सन जैसे अध्यात्मवेत्ता और आइंस्टीन जैसे वैज्ञानिक अपने उत्कृष्ट प्रमाणिक चिंतन के कारण ही दुनिया को नयी और रचनात्मक दिशाधारा दे सकने में सफल हो सके। यह सभी इस तथ्य का उद्घाटन करते है कि मानवी शक्तियों में विचार शक्ति का बहुत महत्व है। एक विचारवान व्यक्ति लाखों, करोड़ों का नेतृत्व कर सकता है। इस क्षमता से सम्पन्न व्यक्ति साधनहीन होने पर भी अपनी उन्नति और प्रगति का मार्ग निकाल लेते है। विधेयात्मक दिशाधारा अपनाकर ही महापुरुष समाज और राष्ट्र का निर्माण किया करते हैं। इस सामर्थ्य के बल पर अध्यात्मिक व्यक्ति कठिन से कठिन भव बंधनों को पार कर आत्म साक्षात्कार करते एवं परमात्म सत्ता से जुड़ते है। ऐसे व्यक्तित्वों का निर्माण किसी स्कूली पढ़ाई अथवा ऊपर के थोपे हुए ज्ञान से नहीं अपितु चिंतन-चेतना के परिष्कार से ही संभव है। तपश्चर्या का योग साधनाओं का अवलम्बन इसी प्रयोजन की पूर्ति करता है, शिक्षा का अर्थ भौतिक जानकारी देने वाली स्कूली पढ़ाई तक सीमित हो गया है। उसके द्वारा बहुज्ञता,कुशलता एवं अधिक उपार्जन क्षमता के लाभ तो मिल सकते हैं किंतु उच्चस्तरीय व्यक्तित्वों का निर्माण विचार परिष्कार से ही संभव है। चिंतन की उत्कृष्टता जहाँ होगी वहाँ जीवन में स्नेह-सौजन्य का सौमनस्य का बाहुल्य मिलेगा। इसी प्रकार संपर्क क्षेत्र में पारस्परिक सहयोग-सद्भाव उमड़ रहा होगा।

सामान्य लोगों की अपेक्षा दार्शनिक विचारक,संत मनीषी एवं कलाकार अधिक निर्धन और अभावग्रस्त स्थिति में होते हैं, पर उन्हें सम्पन्नों की तुलना में कही अधिक संतुष्ट, सुखी और शाँत समुन्नत देखा जाता है। इसका एक मात्र कारण यही है कि सामान्यजन सुख-शाँति के लिए जहाँ लौकिक और भौतिक सुविधा-साधन जुटाने में निरत रहते हैं वहीं महामानव मानसिक साधना अथवा वैचारिक साधना के अभ्यासी होते हैं, विकृत एवं विघटनकारी चिंतन के दुष्परिणामों को भलीभाँति समझने और उत्कृष्ट चिंतन की रीति-नीति अपनाकर कष्ट कठिनाइयों से छुटकारा पाने में समर्थ होते हैं। वस्तुतः मनुष्य की संरचना समन्वयवादी एवं मानवतावादी दृष्टिकोण को ध्यान में रखकर परमात्मा ने की है। इस तरह की विचारणा को मनीषियों ने कल्पवृक्ष की उपमा दी है जो व्यक्ति की हर आवश्यकता को पूरी करने की क्षमता रखती और उसे सन्मार्ग पर चलने के लिए अभिप्रेरित करती है।

शुभ और दृढ़ विचार मन में धारण करने और उत्कृष्ट चिंतन मनन करते रहने से सात्विक भावों की अभिवृद्धि होती है। मानसिक शक्ति का विकास होता और सद्गुणों की प्राप्ति होती है। अतः यह आवश्यक ही नहीं अनिवार्य भी है कि अपने सोचने विचारने की प्रक्रिया पर नये सिरे से मंथन किया जाय और उसमें से खोज-खोजकर निकृष्ट एवं हेय स्तर के विचारों को निकाल फेंका जाय। साधना, स्वाध्याय,संयम,सेवा के उपाय-उपचारों द्वारा सद्विचारों का आरोपण सहज संभव हो जाता है। प्रखर, प्रतिभाशाली व्यक्तित्व का निर्माण एवं उज्ज्वल भविष्य का निर्धारण इसी आधार पर संभव हो सकेगा।


विषमता मिटेगी, समता का युग आयेगा

समता वह प्रमुख आधार है, जिस पर नये युग की इमारत खड़ी होनी है। मनुष्य-मनुष्य के बीच जो आकाश-पाताल जैसा अंतर आज दिखायी पड़ रहा है, उसे मिटाने और घटाने का समय अब आ गया है। असमानता-ईर्ष्या-द्वेष पैदा करती है। उससे गिरे हुए वर्ग में हीनता-दीनता एवं पतनोन्मुख प्रवृत्तियाँ बढ़ती हैं और उठे हुए वर्ग में विलासिता, अहंकार, लोभ एवं अनुदारता जैसे दोष-दुर्गुणों की बाढ़ आती चली जाती है। असमानता इतनी ही सह्य और क्षम्य है-जितनी हाथ की पाँच उँगलियों में होती है। परिस्थिति और आवश्यकता में अंतर होने से मनुष्यों का स्तर थोड़ा नीचा-ऊँचा भी रखा जा सकता है, पर उसकी वैसी अति नहीं होनी चाहिए जैसी आज है।

असमानता से मनुष्य जाति के बीच भारी खाई उत्पन्न की है और एकता की जड़ पर भयानक कुठाराघात किया है। ईर्ष्या-द्वेष की आग भड़काने का, अलगाव आतंक युद्धों और संघर्ष की विभीषिकाएँ उत्पन्न करने का कारण यह असमानता ही है, जिसने समाज को अपराध और पाप की आग में झोंक दिया। जिसकी वजह से एक ही समाज में असंख्य गुटों में बँटना पड़ा। परिणाम में उत्पन्न ढेर की ढेर विकृतियों ने सरलता-सौजन्यता को बुरी तरह कुचल-मसल डाला। सभी मनुष्य, भगवान के समान रूप से प्रिय पुत्र हैं। हरेक के कर्तव्य और अधिकार एक से हैं। सभी को प्रकृति-प्रदत्त अनुदानों का समान रूप से लाभ उठाने का अधिकार है। असमानता प्रकृति नहीं हैं, ईश्वर प्रदत्त नहीं है, मानवी दुर्बुद्धिजन्य है।

इन दिनों इंसान-इंसान के बीच असमानता जिन आधारों

पर टिकी है, मनीषी एरिक फ्राम ने उनका संकेत अपने ग्रंथ ‘द सेन सोसाइटी ‘ में किया है उनके अनुसार आधार ये हैं- (1) जाति (2)लिंग (3)धन (4) पद। तनिक हम भी अपनी व्यस्तता में से कुछ पल उबर कर सोंचे तो सही कि क्या प्रतिफलित मान्यताएँ सही हैं? यदि वे अनावश्यक, अनुपयुक्त और असत्य सिद्ध होती हों, तो विवेक का तकाजा यही है कि बिना किसी पूर्वाग्रह का मोह पाले, इन्हें परे फेंक दिया जाय। ऐसा करके हम समता की उस प्रक्रिया को जन्म देंगे-जिससे प्रेम और प्रसन्नता की सुख और संतोष की धारा बह निकले। जिस नवयुग-सतयुग के अवतरण के लिए युग ऋषि की साधना रही है, जिसके लिए वह स्वयं को तिल-तिल तपाते-गलाते रहे, जिसके लिए उन्होंने अपनी समस्त साधना-क्षमताओं की आहुति दी और जिसके लिए वह आज भी सूक्ष्म जगत में सतत् सक्रिय हैं-उसकी आधार भूमि समता ही है। ऊँच-नीच की खाइयाँ-खड्ड जब तक है दुनिया में अशाँति ही रहेगी। अज्ञान और अन्याय का सम्मिश्रित स्वरूप असमानता के रूप में प्रकट होता है। इस दो जीभ वाली विश्व विभीषिका को आस्तीन में छिपी सर्पिणी की तरह साथ रखकर हम चैन से नहीं बैठ सकते।

गाय, घोड़ा, बंदर, कबूतर, तीतर की भाँति मनुष्य भी एक जाति है। नृतत्वविज्ञानी अर्नेस्टर फिशर के ग्रंथ “सोशल आर्गेनाइजेशन “ के पन्ने पलटें तो पता चलता है कि ऋतु और परिस्थिति के कारण मनुष्यों के रंग -रूप, आकृति-प्रकृति में थोड़ा बहुत अंतर हो सकता है, पर इससे उनके दरजे में कोई फरक नहीं पड़ता। इनसान भी एक प्राणी है और उस प्रकार के समस्त जीवों की एक ही जाति एवं स्थिति है। यह एक तथ्य है कि गरम देशों में जन्म लेने वाले काली चमड़ी के होते है। ठंडे देशों में जो पैदा होते हैं-उनकी चमड़ी गोरी होती है। मध्य एशिया के मंगोल नस्ल के पीले रंग-तिरछी आँखों और चपटी नाक वाले पाये जाते है।

यह रंग भेद केवल उत्पत्ति स्थान की जलवायु का अंतर बताता है। किंतु इस आधार पर उनके स्तर को नीचा-ऊँचा नहीं माना जा सकता। गोर लोग, काली चमड़ी वालों को, केवल रंग के आधार पर अपने से नीचा समझें, घृणा करें, मानवीय अधिकारों से उन्हें वंचित कर दें, यह अन्याय के सिवा और क्या है? संसार में रंग भेद को लेकर नीच-ऊँच की मान्यता बुरी तरह फैली हुई है। दक्षिण अफ्रीका के मूल निवासियों तथा भारतीयों के साथ वहाँ के गोरे निवासी जो घृणा, बैर- भाव की नीति अपनाए हुए थे, उसके विरुद्ध महात्मा गाँधी ने चलाया था। अमेरिका में अभी भी संघर्ष की स्थिति बनी हुई है। राष्ट्र संघ ने तथा विश्व के सभी विचारशील लोगों ने इसे अन्याय-मूलक और अवाँछनीय घोषित किया है। अब्राहम लिंकन, कनेडी आदि गोरे विचारशीलों ने आगे बढ़कर अपने वर्ग की इस संदर्भ में घोर निंदा की और प्रतिरोध में भारी त्याग भी किये। फिर भी गोरों का आग्रह अपनी सफेद चमड़ी के आधार पर उच्चता सिद्ध करने का ही है।

संसार में दूसरी जगहों पर तो गोरी-काली चमड़ी के आधार पर असमानता चल रही है, पर अपने देश में (भारतवासियों ने) तो इस दिशा में गजब ही कर दिया। एक परम्परा, एक ही रक्त,एक ही अंश, एक ही रंग के लोग कल्पित जाति-पाँति के आधार पर एक दूसरे को नीचा-ऊँचा मानने लगे हैं। विषमता की अति, इस सीमा तक पहुँच गई है कि तथाकथित ऊँची जाति वाले तथाकथित नीची जाति वालों के पास बिठाने तक में, मानवीय सामाजिकता के सामान्य शिष्टाचार एवं अधिकार तक से इंकार करते हैं। आदर्शवादी, धार्मिक और अध्यात्मिक कहे जाने वाले भारतीय समाज के माथे पर एक अति व्यंग और उपहास भरा ऐसा लाँछन है, जिसने उसकी गरिमा का मूल्य बुरी तरह गिरा दिया है।

किसी समय चारों वर्णों का सृजन गुण, कर्म, स्वभाव के आधार पर व्यवसायों के विभाजन की दृष्टि से किया गया था। उस व्यवस्था के निर्माताओं ने आज की दशा की कल्पना तक न की होगी। जातियाँ ही नहीं उपजातियों तक में बँटा हुआ भारतवर्ष बुरी तरह से विलगाव के रोग से ग्रसित हर दृष्टि से दीन-दुर्बल होता चला जा रहा है। देखने भर के लिए हम एक है, पर असलियत में जिस प्रकार संतरे के भीतर टुकड़े-टुकड़े के भीतर छोटे-छोटे टुकड़े भरे रहते हैं, उसी प्रकार हम जातियों -उपजातियों और नीच, ऊँच की मूढ़ मान्यताओं में बुरी तरह चिपके हुए है। बात इतने तक सीमित नहीं-यह विष राजनीति तक में प्रवेश कर चुका है। चुनावों में जीतने के लिए जाति-पाँत के आधार पर वोटरों का समर्थन प्राप्त करना एक प्रमुख तथ्य बन गया है। भीतर-भीतर पनपती इस दुर्बुद्धि के कारण देश के टुकड़े-टुकड़े होने, गृह युद्ध खड़ा होने-जैसे अनेकों खतरे आए दिन मँडराते रहते हैं।

असमानताओं में दूसरी, असमानता लिंग-भेद की है। पिछले दिनों सामंतवादी अंधकार युग में नर-नारी के बीच जो आकाश-पाताल जैसी खाई उत्पन्न हो गयी थी। वह धीरे-धीरे कम तो हो गयी है, पर अभी वह मूढ़ता अवाँछनीय रूप से विद्यमान है। पिछले दिनों तो नारी का मूल्य भेड़-बकरी जितना रह गया था। पति कभी भी पत्नी का परित्याग कर सकता था। पशुओं के मुँह पर नकाब नहीं चढ़ाए जाते, पर स्त्रियाँ मुँह पर नकाब चढ़ाकर पुरुषों से आगे निकल सकती थीं। पति के मर जाने पर स्त्रियों के लिए आजीवन वैधव्य भोगना या सती बनकर जल जाना ही मार्ग था, पर पुरुष पत्नी के मरने के बाद ही नहीं, उसके जीवित रहते भी अनेकों पत्नियाँ रख सकते थे। कन्या का जन्म दुर्भाग्य, पुत्र का जन्म सौभाग्य माना जाता था। कन्या को शिक्षा से स्वावलम्बन से वंचित रहना पड़ता था। एक तरह से अपाहिज एवं घर के पिंजड़े में बंद पंछी जैसी स्थिति उनकी थी। यद्यपि समय ने थोड़ा सुधार किया है। बड़े नगरों में स्थिति कुछ ठीक है, पर पिछड़े हुए देहातों में तो अभी भी वही दुर्दशा है।

नर और नारी-दो घटकों से मिलकर समाज बना है। दोनों की स्थिति-उपयोगिता-कर्तव्य एवं अधिकार समान है। इनमें से न कोई महत्वहीन है, न महत्वपूर्ण। न्याय की पुकार है कि दोनों को अपने व्यक्तित्व को समान रूप से विकसित करने का अवसर मिले। एकाँगी पक्षपातपूर्ण, कानून, प्रतिबंध, न्याय की कसौटी पर खरे न उतरेंगे। आज भले ही यह बात गले न उतरे पर कल तो इसे अनिवार्य शर्त के रूप में मानना होगा। जिस तरह जातीय जीवन में मनुष्य मात्र के नैसर्गिक और नागरिक अधिकारों को सम्मान के स्तर पर मान्यता देनी पड़ेगी। ठीक उसी तरह नारियाँ सिर्फ सम्मान की ही नहीं वर्चस्व की अधिकारिणी होंगी। राजतंत्र समाप्त हो गये, अब वर्ग तंत्र भी समाप्त होने जा रहा है। नये युग में किसी को इस आधार पर ऊँचा-नीचा न माना जाएगा कि उसका अमुक वंश में जन्म हुआ है। रंग-जाति या वंश के कारण किसी को न अहंकार जताने का अवसर रहेगा और न इस वजह से किसी को हीनता-दीनता अनुभव होगी।

तीसरा असमानता धन के आधार पर है। धनी और निर्धन की इसी असमानता के कारण एक व्यक्ति देवताओं जैसी सुख-सुविधाएँ भोगता है, और अप्रत्याशित सम्मान पाता है, जबकि निर्धन-भोजन, वस्त्र, चिकित्सा जैसी अनिवार्य आवश्यकताओं से वंचित हो जाता है। प्रख्यात रशियन मनीषी प्रिंस को पारिकन ‘क्राँति की भावना’ में संकेत करते हैं, यह विषमता न तो ईश्वर प्रदत्त है, न भाग्य का खेल। यह समाज में प्रचलित अर्थ प्रणाली के दोषपूर्ण होने का परिणाम है। पूँजी पर व्यक्ति का अधिकार न होकर समाज का स्वामित्व हो। हर व्यक्ति को अपनी क्षमता के मुताबिक श्रम करने को बाध्य होना पड़े और आवश्यकता के अनुरूप साधन मिलें तो गरीबी-अमीरी का वर्तमान भेद देखते-देखते नष्ट हो सकता है। संग्रह पर उत्तराधिकार नियंत्रण रहे तो एक पहाड़ जैसी अमीरी-दूसरी खाई जैसी गरीबी के विक्षोभ उत्पन्न करने वाले दृश्य देखने को न मिलें। निःसंदेह प्रचलित अर्थतंत्र दोषपूर्ण हैं। उसी के कारण ठगी, चोरी, जुआ, शेयर घोटाला, शोषण, विलासिता जैसे अनेकों अपराध उत्पन्न होते हैं। इसे बदलना ही होगा। प्राचीन काल में ऐसा न था। तब अध्यात्मिक समाजवाद प्रचलित था। नियम-कानूनों के बल पर नहीं-विकसित संवेदनाओं के आधार पर परिग्रह को, अतिरिक्त उपभोग, विलासिता को पाप की मान्यता प्राप्त थी। अब वे परम्पराएँ नहीं रहीं तो राजसत्ता के नियंत्रण में धन के ऊपर समाज का स्वामित्व एवं वितरण व्यवस्था रहने की आवश्यकता अनुभव की जा रही है। अगले दिनों यही प्रणाली प्रचलित होगी। लेकिन इसका ढाँचा मार्क्स की प्रणाली से पर्याप्त भिन्न और अलग होगा।

जिस नवयुग की आराधना में विचार क्राँति संलग्न है उसकी अर्थप्रणाली में समानता को ही आधार माना जायेगा। प्रस्तुत परिस्थितियों के अनुरूप साधनों से काम चलाकर हर किसी को संतोष करना पड़ेगा। तब लालच से प्रेरित असंख्य अपराधों की तथा ईर्ष्या-द्वेष के कारण उत्पन्न होने वाली आत्मिक अशाँति की कोई गुंजाइश न रहेगी। न कोई निठल्ला रहेगा, न किसी को बेतरह पिसना पड़ेगा। जरूरत इस बात की है कि हममें से प्रत्येक जन-जन को इस नजदीकी परिवर्तन से अवगत कराएँ। सम्पन्न लोगों में अभी से भविष्य के अनुरूप-ढलने की नाती-पोतों के लिए जोड़ने-गाँठने की ममता छोड़ने, धन को उपयोगी सत्प्रयोजनों में खर्च करने की प्रवृत्ति आ जाए। राजतंत्र भी इसके अनुरूप स्वयं बदल डाले-जिससे आर्थिक समानता समाज में स्पष्ट दिखायी पड़ने लगे।

चौथी असमानता ‘पद’ की है। प्रतिभाशील एवं सुयोग्य व्यक्तियों को उनकी अतिरिक्त क्षमता के अनुरूप काम सौंपे जांय,, यह ठीक है। उन्हें अपनी ईश्वर प्रदत्त विशेषताओं-विभूतियों का लाभ जन साधारण को देते हुए अपना भाग्य सराहना चाहिए एवं महत्वपूर्ण कार्य करने का अवसर पाने का संतोष करना चाहिए। पद के कारण सरकारी अफसरों को जो ठाटबाट, असाधारण वेतन, अस्वाभाविक, अनावश्यक सम्मान मिलना गलत है। इस प्रलोभन में ‘पद’ प्राप्त करने के लिए अयोग्य लोगों में भी लिप्सा एवं प्रतिद्वन्दिता पैदा होती है। यदि उच्च पदों पर शाँत, संतोष एवं सेवा के अनुपात से उपलब्ध लोकश्रद्धा मात्र का ही लाभ मिले, और आज जो आर्थिक लाभ, अहंकार पूर्ति के अवसर अकारण मिलते हैं वे न मिलें तो अवांछनीय व्यक्तियों को उसके लिए धमाचौकड़ी मचाने का आकर्षण न रह जाय। फिर तो सिर्फ उदात्त व्यक्ति ही श्रेष्ठ आदर्श लेकर उन महान उत्तरदायित्वों को अपने कंधों पर उठाने के लिए तैयार हो।

राजा जनक, चक्रवर्ती नरेश चक्कवेण-राज्य प्रमुख तो थे, पर अपनी आजीविका हल चलाकर, थोड़ी-सी कृषि द्वारा उपार्जित करते थे। महाराज रघु भारत सम्राट होने पर भी सामान्य मिट्टी के बर्तनों में अपना काम चला लेते थे। मौर्य साम्राज्य के संस्थापक और राष्ट्र के महामंत्री चाणक्य संतों-तपस्वियों जैसी सादगी अपनाते थे। महर्षि वशिष्ठ रघुवंशियों के राज्य संचालक एवं पुरोहित थे, पर उन्होंने अतिरिक्त सुविधाएँ नहीं ली। ईश्वर चंद्र विद्यासागर 500 रुपया मासिक वेतन पाकर भी सिर्फ 50 रुपये में अपना गुजारा करके शेष धन असमर्थ छात्रों की शिक्षा व्यवस्था में लगाते थे। उच्च पदों के महान दायित्व को ठीक तरह से समझ सकने की क्षमता इस प्रकार के उदार, उच्च चरित्र व्यक्तियों में ही हो सकती है।

प्राचीन काल की ब्राह्मण परम्परा की यही विशेषता थी कि मूर्धन्य व्यक्तियों को-वर्चस्व सम्पन्न पदाधिकारियों को साधारण जनता के स्तर का ही नहीं वरन् उससे भी कुछ कम-भौतिक सुविधाएँ लेकर संतुष्ट होना चाहिए। पदों के कारण उत्पन्न विषमता को यदि समाप्त न की जायेगी तो समाज का नेतृत्व अवाँछनीय व्यक्तियों के ही हाथ में रहेगा। धार्मिक, आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक हर क्षेत्र में पद का गौरव तभी रहेगा जब उसका भार सुयोग्य व्यक्ति वहन करें और नैतिक सुयोग्यता की एक महत्वपूर्ण कसौटी यह है कि पदाधिकारी जन साधारण को उपलब्ध होने वाली अथवा अपने लोक कार्यों के लिए मिली अनिवार्य सुविधाओं के अलावा व्यक्तिगत लाभ देने वाली सभी सुविधाओं से इनकार कर दें। अगले दिनों वर्ण, धन, लिंग की ही तरह पदों से उपजी विषमता को समाप्त होता देखा जा सकेगा।

इन पंक्तियों के द्वारा यह स्पष्ट किया जा रहा है कि नया युग तेजी से बढ़ता चला आ रहा है। उसे कोई रोक न सकेगा। प्राचीन काल की महान परम्पराओं को अब पुनः प्रतिष्ठित किया जाना है। अंधकार युग की क्रूर विषमताएँ तिरोहित होने वाली हैं। विचार क्राँति आन्दोलन इसी का व्यापक उद्घोष -जन-जन को दी जाने वाली सूचना है। परिस्थिति के अनुरूप जो समय रहते बदल सकेंगे वे संतोष और सम्मान प्राप्त करेंगे और जो बदलेंगे नहीं, मूढ़ता के लिए दुराग्रह करेंगे, उनके हाथ अपयश, असंतोष एवं पश्चाताप के अतिरिक्त और कुछ न लगेगा।


कुकल्पनाओं का अनौचित्य

जिस प्रकार नशीली वस्तुएँ तथा मिर्च मसाले की उत्तेजना शरीर और मन को हानि ही हानि पहुँचाती है, उसी प्रकार कुछ मानसिक कल्पनाएँ भी हैं जो अनावश्यक उत्तेजना उत्पन्न करती हैं और अत्यंत हानिकारक प्रतिक्रियाओं को जन्म देती हैं। इसी प्रकार कुछ मानसिक आवेश भी हैं जो सर्वथा अनावश्यक होते हुए भी कृत्रिम उत्तेजना के कारण अपना विषैला प्रभाव उत्पन्न करते और मात्र हानि ही हानि पहुँचाते हैं।

साधारण से मतभेदों या गलतफहमियों में विरोध, विद्वेष मान लिया जाय, जो उसकी प्रतिक्रिया क्रोध के रूप में उबलने लगती है। बात बढ़ती है और कटु भाषण से लेकर बात हाथापाई और मार-पीट तक जा पहुँचती है। कई बार तो आक्रामकता तक जाग पड़ती है और ऐसे अनर्थ खड़े कर देती है जिनके लिए पीछे पछताना ही शेष रह जाता है। चिंता, भय, निराशा, आशंका जैसे उद्वेग भी ऐसे होते है जिनके पीछे मात्र कुकल्पना ही होती है। तिल का ताड़ बन जाता है और राई का पहाड़ बन जाता है। गहराई में उतर कर कारण खोजने पर प्रतीत होता है कि बात छोटी-सी थी पर उस पर कुकल्पनाओं का पुट लगाते रहने पर मानसिक विक्षोभ इस हद तक बढ़ जाता है कि उससे अपनी और दूसरों की शाँति ही नष्ट हो जाती है।

इन आवेशों को मनोविकार की ही संज्ञा दी जा सकती है तथा इन्हें किसी अति कष्टकारक शारीरिक रोग से कम नहीं माना जा सकता। शरीर में संग्रहित विजातीय द्रव्य जैसी हानि पहुँचाते हैं वैसी ही विपन्नता-विकृत कल्पनाओं से उत्पन्न मनोविकार भी पहुँचाते देखे गये हैं। इन्हीं अवाँछनीय आवेगों में कामुकता भी है। वह कल्पना क्षेत्र में सीमित रहने पर अश्लील संभावनाओं-आशाओं तथा उपलब्धियों का ताना-बाना बुनती रहती है जिनके साकार होने की न तो संभावना रहती है और न तद्नुरूप परिस्थितियाँ बनने की आशा की जा सकती है। अश्लील कामुकता की दृष्टि से देखने पर विभिन्न नर-नारियों के सम्बंध में ऐसे सोच उभरते हैं जिनको सर्वथा अव्यावहारिक ही कहा जा सकता है। हर परिवार में कई नर-नारी मिलजुलकर निवास, निर्वाह करते हैं। इनमें से कई युवक-युवती भी होते हैं किंतु भावना की पवित्रता एवं स्वाभाविक रहने पर कोई किसी के सम्बंध में अचिंत्य नहीं करता। मन में घिनौने स्तर की कल्पना तक नहीं उठती। पर कल्पना क्षेत्र में अवाँछनीयता जग पड़ने पर ऐसे कल्पना चित्र उभरने लगते है। इन कुकल्पनाओं में से कदाचित ही कभी कोई साकार हो सकी हो।

संसार के प्राणियों में प्रायः आधे नर और आधे मादा होते है। वे मिलजुल कर साथ-साथ रहते और दैनिक निर्वाह क्रम चलाते हैं। कोई किसी के प्रति न तो अश्लील कल्पना करते हैं और न वे वैसा कुछ घटियापन दिखाने की अपेक्षा करते हैं। गर्भ धारण का एक विशेष अवसर होता है। इस समय मात्र मादा अपनी आवश्यकता जताती है। नर उसकी इच्छा-आवश्यकता की पूर्ति कर देता है। यह सारा प्रसंग कुछ घड़ियों में ही समाप्त हो जाता हैं और फिर वे अपने-अपने साधारण स्वाभाविक आचरण की स्वाभाविक स्थिति में आ जाते हैं। कोई किसी के प्रति अश्लील भाव-प्रदर्शन नहीं करता। ऐसी स्थिति आजीवन भी बनी रह सकती है। पहल यदि इंस्टीक्ट्स के कारण न हो तो। यही स्थिति मनुष्य के सम्बंध में भी है। कामुक स्तर का चिंतन न तो स्वाभाविक है और न आवश्यक। यह वस्तुतः एक प्रकार की मानसिक विकृति है, जिसका कारण निजी कुकल्पना भी हो सकती है अथवा साहित्य, चित्र, दृश्य, घटनाक्रम आदि भी ऐसे भड़काने का निमित्त कारण हो सकते हैं। अन्यथा नर और नारी परस्पर सहयोगी या मित्र की तरह स्वाभाविक शीलवान जीवन जी सकते हैं तथा पवित्रता एवं प्रसन्नता से भरा-पूरा निर्वाह कर सकते हैं। इन मनोविकारों से बचने में ही मनुष्य का हित है।

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सूर्योपासना की सार्वभौमिकता

आरोग्य संवर्धन, बलवर्धन, आयु, प्राण एवं आत्मोन्नति के विविध विधि उपचारों के लिए सूर्य-सान्निध्य का प्रचलन मानव जन्म की भाँति ही अति प्राचीन है। विश्व कि प्रायः सभी धर्मों में सूर्योपासना का कभी व्यापक रूप से प्रचलन था। इसका प्रमुख कारण सूर्य का जीवन से घनिष्ठ रूप से जुड़ा होना है। शास्त्र वचनों के अनुसार पृथ्वी पर जीवन निर्माण से लेकर विकास एवं मरणोत्तर तक की सारी प्रक्रियाओं-गतिविधियों का संचालन, नियमन प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से सूर्य द्वारा ही होता है। काया के निर्माण में भाग लेने वाले पंच तत्वों का उद्गम स्रोत भी उसे ही माना गया है। पंच भौतिक तत्वों में सर्वाधिक प्रबल वायु होता है जिसकी विकृति ही रुग्णता-अशक्तता का कारण बनती है। यदि इसे नियंत्रित रखा एवं प्रचण्ड बनाया जा सके तो न केवल दीर्घजीवी बना जा सकता है, वरन् ऋषि-सिद्धियों से लेकर स्वर्ग-मुक्ति तक का द्वार खुल सकता है।

वेदों में ओजस, तेजस् एवं ब्रह्मवर्चस् की प्राप्ति के लिए सूर्य की उपासना करने का विधान है। यजुर्वेद अध्याय 13, मंत्र 43 में कहा गया है कि सूर्य की सविता की आराधना इसलिए भी की जानी चाहिए कि वह मानव मात्र के समस्त शुभ और अशुभ कर्मों के साक्षी हैं। उनसे हमारा कोई भी कार्य या व्यवहार छिपा नहीं रह सकता है। सूर्य की दृश्य व अदृश्य किरणें समस्त विधाओं-दीवारों को बींधती हुई सृष्टि के कण-कण की सूचनायें एकत्रित करती रहती हैं। यह एक वैज्ञानिक तथ्य भी है। फिर मनुष्य तो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से प्रकाश रश्मियों के संपर्क में रहता ही है, क्योंकि सूर्य विश्व चक्षु जो ठहरा। भौतिक एवं अध्यात्मिक क्षेत्र में सूर्योपासना की सार्वभौमिकता एवं उस से मिलने वाले लाभों से समूचा आर्षवाङ्मय भरा पड़ा है। स्कन्द पुराण-काशी खण्ड 9/45-48 में सविता-सूर्य-आराधना द्वारा धर्म, अर्थ

काम, मोक्ष अर्थात् चतुर्वर्ग की फल प्राप्ति का वर्णन है। धन, धान्य, आयु, आरोग्य, पुत्र, पशुधन, विविध भोग, स्वर्ग, अपवर्ग आदि सभी सूर्य की उपासना करने से प्राप्त होते है। ऋग्वेद में सूर्योपासना के अनेकों प्रसंग है जिनमें सूर्य से पाप, मुक्ति, रोगनाश, दीर्घायुष्य, सुख प्राप्ति, शत्रुनाश, दरिद्रता, निवारण आदि के लिए प्रार्थना की गयी है। ऋग्वेद के ही 1/115/6 एवं 10/37/4 तथा यजुर्वेद 20/16 आदि मंत्रों में सूर्य की आधि-व्याधि निवारण एवं पाप कर्मों, आसन्न संकटों, अपकीर्ति से बचाने वाला तथा तथा प्रगति एवं अभिवृद्धि प्रदान करने वाला बताया गया है। यजुर्वेद के ही 5/33 एवं 8/40 मंत्रों में सविता को देवयान मार्ग पर ले जाने वाला तथा आराधक को सर्वश्रेष्ठ तेजस्वी बनाने वाला कहा गया है।

ब्रह्म पुराण के अध्याय 29/30 में सूर्य को सर्वश्रेष्ठ देवता मानते हुए सभी देवों को इन्हीं का प्रकाश स्वरूप बताया गया है और कहा गया है कि सूर्य की उपासना या आराधना करने वाले मनुष्य जो कुछ सामग्री सूर्य के लिए अर्पित करते हैं, भगवान भास्कर उन्हें लाख गुना करके वापस लौटा देते है। सौर सम्प्रदाय के अनुयायी एवं गायत्री महाशक्ति के उपासक अभी भी सूर्य की आराधना उसके तीन रूपों में करते हैं। सूर्योदय के समय ब्रह्म और उसकी शक्ति के रूप में, मध्याह्न में महेश्वर रूप में एवं सूर्यास्त के समय विष्णु-रूप में उपासना करते हैं। सूर्य अनुपम कल्पना शक्ति वाले, सिद्धि के प्रेरक, सबको कर्म की प्रेरणा देने वाले एवं बुद्धि प्रदाता है। उनके इस स्वरूप का वर्णन यजुर्वेद में बहुत से सुँदर ढंग से किया गया है। ऋषियों ने इसे अनुभूति के स्तर तक उतारा और उनसे मिलने वाले लाभों का वर्णन किया है। पातंजलि योग दर्शन में उल्लेख है कि सूर्य पर संयम करने से विश्व ब्रह्मांड का ज्ञान होता है। सामान्य साधना क्रम में भी सूर्य पर त्राटक करने या स्वर्णिम सविता का ध्यान करने से साधक को दिव्य दृष्टि प्राप्त होती है, जिसके द्वारा वह किसी को भी देखकर उसका प्राकृत स्वरूप और समस्त घटनाओं को जान लेता है। दूरस्थ वस्तुओं, घटनाक्रमों एवं प्रकृति के गर्भ में चल रही सूक्ष्म हलचलों की जानकारी वह प्राप्त कर सकता है। सविता देवता की उपासना से अभीष्ट की पूर्ति होती है। शास्त्रों में इसके अनेकों प्रमाण मिलते हैं। भगवान राम द्वारा रावण पर विजय एवं साम्ब का कुष्ठ रोग से मुक्त होना सूर्योपासना की इतिहास प्रसिद्ध घटनायें हैं। सूर्य आराधना से पुत्र प्राप्ति का उल्लेख करते हुए महाभारत में कहा गया है कि महारथी कर्ण का कवच कुण्डल सहित जन्म माता कुँती के गर्भ से उनके द्वारा की गयी सूर्य आराधना का ही प्रतिफल था। महाराजा अश्वपति ने सूर्य की उपासना करके सती सावित्री को अपनी कन्या के रूप में पाया था। यही कन्या सत्यवान को ब्याही गयी थी जिसने अपने तपोबल से उसकी मृत्यु हो जाने पर भी यमराज से उसे वापस ले लिया था। महाकवि कालीदास ने अपनी अनुपम कृति ‘रघुवंश’ में वनवास काल के समय सीता द्वारा सूर्य पर त्राटक करने का उल्लेख किया है। उसमें कहा गया है कि सीता ने राम को संदेश भेजा था कि वह गर्भस्थ शिशुओं को जन्म देने के पश्चात सूर्य पर दृष्टि निबद्ध कर अनन्य भाव से तपस्या करेंगी जिससे अगले जन्म में भी वह राम को पति रूप में प्राप्त कर सकें।

हिन्दू धर्म की भाँति ही जैन एवं बौद्ध धर्मों में भी सूर्योपासना का प्रचलन उनके उद्गम काल से ही प्रचलित है। बोध गया तथा भाजा की गुफा एवं उड़ीसा प्रान्त की अनन्त गुफा में सूर्य की प्रतिमा इसके प्रत्यक्ष प्रमाण हैं। जैन आगमों-विशेषकर “सूर्य प्रज्ञप्ति” में सूर्य सम्बन्धी विविध ज्ञान सम्पदा का प्रतिपादन किया गया है। इसी तरह आगम शास्त्र “भगवती” में ऐसे अनेकों प्रसंगों का वर्णन है जिससे स्पष्ट होता है कि जैन मुनियों की जीवन साधना के अनेक प्रयोग सूर्य से संबंधित हैं। उनकी मान्यता है कि सूर्य सान्निध्य से उनकी आतापना लेने से शरीर में बल और कान्ति की ओजस और तेजस की अभिवृद्धि होती है। प्राण-प्रखरता बढ़ती है। ‘तेजस् लब्धि’ के लिए जैन शास्त्रों में 6 महीने तक सूर्य की ओर मुख करके तप करने-आतप लेने का विधान है। कर्मक्षय एवं आभामंडल के विकास के लिए भी सूर्य मंडल या उसकी प्रकाश रश्मियों का ध्यान किया जाता है।

प्रख्यात मनीषी ए.बी.कीथ के अनुसार ग्रीक दर्शन में सूर्योपासना को अत्यन्त प्राचीन माना गया है। प्रसिद्ध दार्शनिक गेलिस ने भी उपरोक्त तथ्य की पुष्टि की है। ग्रीक दार्शनिक एम्पेडीलस का कथन है कि सूर्य ही इस संसार का सृष्टा है। उन्होंने सूर्य को अग्नि के मूल स्रोत के रूप में वर्णन किया है। ग्रीस में आज भी विवाह-शादियों में सूर्य मंत्र पढ़ा जाता है। रोमन में रविवार को पवित्र दिन माना और उस दिन की गयी पूजा, उपासना को अधिक फलदायी माना जाता है। महान दार्शनिक थियोडोसियन ने तो रविवार के दिन नृत्य, वाद्य, संगीत, थियेटर, सरकस आदि सभी मनोरंजन के कार्यों एवं द्यूतकर्म, मुकदमेबाजी आदि सभी का निषेध किया है।

चीन के सुविख्यात दार्शनिक ली की ने अपने ग्रंथ-”क आओ तेह सेंग“ में कहा है कि ज्योतिर्विद्या एवं खगोलशास्त्र का मूलाधार सूर्य ही है। उन्होंने सूर्य को “स्वर्ग पुत्र” नाम से सम्बोधित किया है और दिन का प्रदाता, ज्ञान-विज्ञान का स्रोत कहकर उसकी अभ्यर्थना की है। इसी तरह इस्लाम में सूर्य को-”इल्म अहकाम अन नजूम” का केन्द्र मानकर उसकी उपासना की गयी है। इतिहास-वेत्ताओं के अनुसार अकबर स्वयं सूर्य उपासक था। वह नित्य सूर्याभिमुख होकर सूर्य सहस्रनाम का पाठ करता और पूजन करता था। उसने एक आदेश निकाला था कि उसके राज्य में प्रातः, मध्याह्न, साँय एवं अर्धरात्रि को अर्थात् चार बार सूर्य की पूजा-आराधना होनी चाहिए। यूनान का सम्राट सिकन्दर भी सूर्य का उपासक था।

ईसाई धर्म में सूर्य-आराधना का महत्वपूर्ण स्थान है। इस संदर्भ में ईसाई धर्म ग्रंथ-”न्यू टेस्टामेण्ट” में सुविस्तृत वर्णन मिलता है। रविवार सूर्य का दिन होने से पूजा-उपासना के लिए इस धर्म के अनुयायियों के लिए विशेष महत्व रखता है। सेंटपाल का कथन है कि सूर्य के द्वारा पवित्र किया गया यह दिन दान की अपेक्षा रखता है। ईसाई लोग इस दिन को ईसा का पवित्र दिन भी मानते हैं।

आद्य शंकराचार्य ने संध्याभाष्य में सूर्य माहात्म्य का वर्णन करते हुए कहा है कि चराचर जगत के उत्पादक सूर्य की आराधना पापों का नाश करती है। वे हमारी बुद्धि को सन्मार्ग की ओर प्रेरित करते हैं। स्फूर्ति प्रदान करने, विश्व में गति का संचार करने, सद्विवेक जगाने एवं प्रेरणा देने के कारण ही सूर्य को “सविता” कहा जाता है। गायत्री महामंत्र में इसी अदृश्य तात्विक शक्ति की ओर संकेत हुए उसकी नित्य आराधना करने को कहा गया है। स्वामी रामतीर्थ सूर्य को सबसे बड़ा संन्यासी कहते थे। उनके अनुसार वही सबके प्रकाश, प्रेरक और जीवनदाता हैं। ज्ञानरूपी प्रकाश प्रदान करने का कार्य भी वही करते हैं, अतः वह सृष्टि के सबसे बड़े आचार्य हैं। उनका आश्रय लेकर मनुष्य अज्ञानान्धकार एवं त्रितापों से त्राण पा सकता है। ज्ञान का सद्विवेक का आश्रय लेकर ही मनुष्य श्रेय-पथ की ओर अग्रसर होता और भौतिक ऋद्धियों एवं आत्मिक विभूतियों का स्वामी बनता है। ज्ञान-विज्ञान एवं प्राण चेतना के भाण्डागार सविता देवता-सूर्य की ध्यान धारणा, पूजा, उपासना इसमें बहुत सहायक होती है।


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परिष्कृत कल्याणकारी विचार ही बनते हैं संस्कार

विचार मानव चरित्र के प्रकाशक हैं, पर तब जबकि वे आचरण से घुल-मिल गए हों। मनुष्य का चरित्र विचार और आचार दोनों से मिलकर बनता है। संसार में बहुत से ऐसे लोग पाए जा सकते हैं, जिनके विचार बड़े ही उदात्त, महान व आदर्शपूर्ण होते हैं। लेकिन उनकी क्रियाएँ-तद्नुरूप नहीं होती। विचार पवित्र हों और कर्म अपावन तो यह सच्चरित्रता नहीं हुई। इसी प्रकार बहुत से लोग ऊपर से बड़े ही सत्यवादी, आदर्शवादी और धर्म कर्म वाले वाले दीखते हैं, किन्तु उनके भीतर कलुषपूर्ण विचार धारा बहती रहती है। इन्हें भी सच्चे चरित्र वाला नहीं माना जा सकता। सच्चा चरित्रवान वही माना जाएगा और वास्तव में वही होता भी है, जो विचार और आचार दोनों का समान रूप से उच्च और पुनीत रखकर चलता हो।

प्रसिद्ध लोकोक्ति है-”धन चला गया, कुछ नहीं गया। स्वास्थ्य चला गया, कुछ चला गया। चरित्र चला गया, तो समझो सब कुछ गया।” लोक विख्यात यह कथन शत प्रतिशत सही है। गया हुआ धन वापस आ जाता है। रोज न जाने कितने लोक धनी वापस आ जाता है। रोज न जाने कितने लोग धनी से निर्धन और निर्धन से धनवान होते रहते हैं। इसी प्रकार रोगों-व्याधियों और चिन्ताओं के प्रभाव से लोगों का स्वास्थ्य बिगड़ता और तद्नुरूप उपायों से बनता रहता है। किन्तु गया हुआ चरित्र दुबारा वापस नहीं मिलता। ऐसी बात नहीं कि गिरे हुए चरित्र के लोग अपना परिष्कार नहीं कर सकते। दुष्चरित्रवान बन सकता है। इसके बावजूद वह अपने उस असंदिग्ध विश्वास को नहीं पा पाता, चरित्रहीनता के कारण जिसे वह खो चुका होता है।

मनीषी राल्फ लिंटन के ग्रन्थ “द स्टडी आँव मैन” के पृष्ठो में झांकें तो पता चलता है कि समाज जिसके ऊपर विश्वास नहीं करता, लोग जिसे सन्देह और शंका की दृष्टि से देखते हों, वह व्यक्ति बहुमूल्य होने पर भी निर्मूल्य ही है। यथार्थ चरित्रवान वही है, जो अपने समाज, अपनी आत्मा और अपने परमात्मा की दृष्टि में समान रूप से असंदिग्ध और सन्देह रहित हो। इस प्रकार की मान्य और निःशंक चरित्रमत्ता ही वह आध्यात्मिक स्थिति है जिसके आधार पर सम्मान, सुख, सफलता और आत्म शान्ति का लाभ होता है।

जीवन की बहुमूल्य विशिष्टता, सम्पदा, चरित्र, निर्माण का आधार संस्कार है। मनोविज्ञानी फ्राँसिस मेरिल के ग्रन्थ “द सीक्रेट सेल्फ” के अनुसार जिस प्रकार के संस्कारों का संचय हम करते रहते हैं, उसी के अनुरूप हमारा चरित्र बनता-ढलता चला जाता है। संस्कार मनुष्य के उन विचारों के ही प्रौढ़ रूप हैं जो लम्बे समय तक रहने से मस्तिष्क में अपना स्थायी स्थान ना लेते हैं। यदि सद्विचारों को अपनाकर उनका ही चिन्तन और मनन किया जाता रहे-तो संस्कार भी शुभ और सुन्दर बनेंगे। इसके विपरीत यदि असद् विचारों को ग्रहण कर मस्तिष्क में बसाया और मनन किया जाएगा-तो संस्कारों के रूप में कूड़ा-करकट ही इकट्ठा होता रहेगा।

संस्कार को प्रबलता और महत्ता इसी बात से सिद्ध है कि जहाँ सामान्य विचार क्रियान्वित करने के लिए मनुष्य को स्वयं प्रयत्न करना पड़ता है, वहीं संस्कार उसको यन्त्रवत संचालित कर देता है। शरीर यन्त्र, जिसके द्वारा सारी क्रियाएँ सम्पादित होती रहती हैं, सामान्य विचारों के आधीन नहीं होता। जबकि इस पर संस्कारों का परिपूर्ण आधिपत्य रहता है। न चाहते हुए भी शरीर यन्त्र संस्कारों की प्रेरणा से हठात् सक्रिय हो उठता है और तदनुसार आचरण कर बैठता है। इन संस्कारों को यदि मानव जीवन का भाग्यविधाता-आचरण का प्रेरणा कह दिया जाय तो असंगत न होगा।

विचारों का निवास चेतन मस्तिष्क और संस्कारों का निवास अचेतन मस्तिष्क में रहता है। चेतना मस्तिष्क प्रत्यक्ष और अवचेतन मस्तिष्क अप्रत्यक्ष अथवा गुप्त होता है। यही कारण है कभी-कभी विचारों के विपरीत क्रियाएँ हो जाया करती हैं। मनुष्य देखता है कि उसके विचार अच्छे और सदाशयी हैं, तब भी उसकी क्रियाएँ इस विचारों के विपरीत हो जाया करती हैं। इस रहस्य को न समझ पाने के कारण कभी-कभी वह बड़ा व्यग्र होने लगता है। विचारों के विपरीत कार्य हो जाने का रहस्य यही होता है कि मनुष्य की क्रिया प्रवृत्ति पर संस्कारों का प्रभाव रहता है और गुप्त मन में छिपे रहने से उनका पता नहीं चल पाता। संस्कार विचारों को व्यर्थ कर अपने अनुसार मनुष्य की क्रियाएँ प्रेरित कर दिया करते हैं। जिस तरह पानी के ऊपर दिखने वाले कमल के फूल की जड़-पानी की तलहटी में जमा कीचड़ में छुपी होने के कारण नहीं दिखती, कुछ उसी प्रकार परिणाम रूप क्रिया की जड़ अवचेतन मन में छुपी होने के कारण नहीं समझ में आती।

मानव मन के मर्मज्ञ लिन्डजे का शोध अध्ययन “थॉट एण्ड पर्सनालिटी” स्पष्ट करता है कि “कोई-कोई विचार ही तात्कालिक क्रिया के रूप में परिणत हो पाता है। अन्यथा मनुष्य के वे ही विचार क्रिया के रूप में परिणत होते हैं, जो प्रौढ़ होकर संस्कार बन जाते हैं। वे विचार जो जन्म के साथ ही क्रियान्वित हो जाते हैं, प्रायः संस्कारों की जाति के ही होते हैं। संस्कारों से भिन्न तात्कालिक विचार कदाचित की क्रिया में बदल जाते हैं, बशर्ते कि वे संस्कार के रूप में परिपक्व न हो गए हों। इसका कारण यही है कि उनके संस्कारों और प्रौढ़ विचारों में भिन्नता नहीं होती।”

संस्कारों के अनुरूप मनुष्य का चरित्र बनता है और विचारों के अनुरूप संस्कार। मार्टिनडेले के विचारकोष “थॉट्स इट्स-प्रोजेक्शन” के अनुसार विचारों की एक विशेषता यह होती है कि यदि उनके साथ भावनात्मक अनुभूति जुड़ जाती है तो वह विषय उसका प्रिय बन जाता है। यही प्रियता उवस विषय उसका प्रिय बन जाता है। यही प्रियता उस विषय को मानव-मन पर हर समय प्रतिबिम्बित बनाए रहती है। फलतः उसी विषयों में चिन्तन-मनन की प्रक्रिया भी अबाधगति से चलती रहती है और वह विषय अवचेतन में जा जाकर संस्कारों का रूप लेता रहता है। इसी नियम के अनुसार प्रायः देखा जाता है कि अनेक लोग, जो कि प्रियता के कारण भोग-वासनाओं को निरन्तर चिन्तन से संस्कारों में सम्मिलित कर लेते हैं, बहुत कुछ पूजा-पाठ, सत्संग और धार्मिक साहित्य का अध्ययन करते रहने पर भी उनमें मुक्त नहीं हो पाते। वे चाहते है कि संसार के नश्वर भोग और अकल्याण कर वासनाओं से विरक्ति हो जाए, लेकिन उनकी यह चाहत अधूरी बन रहती है।

दर असल विचार जब तक संस्कार नहीं बन जाते, मानव वृत्तियों में परिवर्तन नहीं ला सकते। संस्कार रूप भोग-वासनाओं से छूट सकना तभी सम्भव होता है, जब अखण्ड प्रयत्न द्वारा पूर्व संस्कारों को धूमिल बनाया जाय और वाँछनीय विचारों को भावनात्मक अनुभूति के साथ चिंतन, मनन और विश्वास के साथ संस्कार रूप में प्रौढ़ किया जाय। पुराने संस्कार बदलने के लिए नए संस्कारों को रचना परमावश्यक है।

यही परिवर्तित संस्कार-परिवर्तित चरित्र को जन्म देते हैं, संस्कारों के बदलाव के लिए-यदि धैर्यपूर्वक अटूट-प्रयत्न किया जा सके तो चरित्र में परिवर्तन दुःसाध्य नहीं। क्रूरकर्मा अंगुलिमाल का परम कारुणिक भिक्षु में बदल जाने, कामुकता की दुस्सह आग में जलते रहने वाले विल्वमंगल के जीवन में ब्रह्मचर्य की भक्ति भावना की शीतलता प्रवेश करने जैसा चमत्कार हमारे अपने जीवन में हो सकना सहज सम्भव है।

चरित्र ही वह धुरी है जिस पर मनुष्य का जीवन सुख-शान्ति और मान सम्मान की अनुकूल दिशा अथवा दुःख दारिद्रय अशान्ति-असंतोष की प्रतिकूल दिशा में गतिमान होता है। जिसने अपने चरित्र का निर्माण आदर्श रूप में कर लिया उसने मानों लौकिक सफलताओं के साथ पारलौकिक सुख-शान्ति की सम्भावनाएँ स्थिर कर ली।

तब क्यों न उज्ज्वल चरित्र के लिए उज्ज्वल संस्कारों को कंजूस के धन की तरह बटोरना शुरू कर दे, लेकिन उज्ज्वल संस्कार तो तभी पनप सकेंगे जब उज्ज्वल विचारों को हम ग्रहण करने लगेंगे। अकल्याण कारक दूषित विचारों को एक क्षण के लिए पास न फटकने दें। वेद भगवान का आदेश “आ नो भ्रदः क्रतवो यन्तु विश्वतः” (ऋग्वेद-1-89)सब ओर से कल्याणकारी विचार हमारे पास आएँ, हमारा जीवन मंत्र बन जाएँ।

इस महामंत्र की साधना से कुछ ही समय में शुभ विचारों से एकात्मक अनुभूति जुड़ जाएगी। उनके चिन्तन-मनन की निरन्तरता के फलस्वरूप वे माँगलिक विचार संस्कार बन-बन कर संचित होने लगेंगे जिनका प्रकाश चरित्र की असंख्य रश्मियाँ बनकर फूट निकलेगा। इनके प्रकाश में हमारा अपना भविष्य उज्ज्वल, उदीयमान, उत्कृष्ट बन सकेगा।


भलाई का अनुसरण (Kahani)

यदि तुम भलाई का अनुसरण परिश्रम के साथ करो तो परिश्रम चला जायेगा और भलाई रह जायेगी। यदि तुम बुराई का अनुसरण सुख के साथ करो तो सुख चला जायगा और बुराई रह जायेगी।


संयोग जो वरदान बना

आचार्य अन्यमनस्क बैठे चिन्तन की मुद्रा में कुछ सोच रहे थे, तभी एक छात्र उधर से गुजरा, पूछा-”सर, आज आप कुछ उद्विग्न और परेशान नजर आ रहे हैं।”

आचार्य ने एक गहरी निःश्वास ली, कहा-”हाँ, बात ही कुछ ऐसी है।” तो क्या मैं आपकी कुछ मदद कर सकता हूँ।”

“नहीं, धन्यवाद। तुम जा सकते हो”-आचार्य का शान्त और गंभीर स्वर था।

उसके जाते ही प्रो. स्मिथ पुनः चिन्तन-सागर मैं डूबने-उतरने लगे और समस्या का कोई आत्यन्तिक हल ढूँढ़ निकालने के बारे में सोचने लगे, तभी उनके दिमाग में एक माह पूर्व का वह हृदयविदारक दृश्य कौंध गया और साथ ही छात्र जेम्स यंग सिम्पसन का वह संकल्प भी, जिसमें कुछ कर गुजरने की अभीप्सा थी।

स्पिसन एक होनहार छात्र था और अन्य चिकित्सा, छात्रों की तुलना में मेधावी भी, अतः प्रोफेसर स्मिथ को आशा की कुछ किरण उधर से आती दिखाई पड़ी। यह विचार आते ही उनने निश्चय किया कि कल उससे इस संबंध में बात कर ली जायेगी और समस्या के निराकरण का कोई-न-कोई उपाय खोजने का प्रयास आरंभ किया जायेगा, ताकि लोगों को कष्ट से त्राण मिला सके। वह कुछ आश्वस्त हुए

किन्तु यह क्या! पुनः वही लोमहर्षक दृश्य आँखों के सामने तैरने लगा। एडिनबरा का अस्पताल। रस्सियों में जकड़ा मरीज टाँगों को काटने की तैयारी औरे उसका अरण्य रोदन। सभी विवश थे। यदि टाँगों को नहीं काटा जाता, तो जीवन-संकट उपस्थित होने का खतरा था और काटने पर पीड़ा और रोमाँच का आकुल व्याकुल कर देने वाला दृश्य!

“ओफ! कैसी कठिन घड़ी उपस्थित हो गई थी।” प्रोफेसर मन-ही-मन बुदबुदाये, किन्तु रोगी की जीवन रक्षा के लिए एक डॉक्टर का कर्त्तव्य तो उन्हें निभाना ही था। उनके इशारे पर आरी चलने लगी और इसी के साथ एक दिल दहला देने वाली चीख उभरी और प्रतिध्वनित होती चली गयी।

सभी बेबस थे। सिम्पसन का कोमल हृदय इस पीड़ादायक दृश्य को देख न सका। रोगी के साथ-साथ वह भी बेहोश हो गया। जब उसे संज्ञा आयी, तो देखा बीमार शैय्या पर पड़ा अर्धचेतना की स्थिति में हल्की कराहें ले रहा है।

उसका मन उसकी दयनीय स्थिति और कराह से विचलित हो उठा। वह उठा और सीधे अपने होस्टल के कमरे में चला गया। किन्तु वहाँ भी चैन से आराम न कर सका। रह-रह कर उसके दृश्य-पटल पर उस रोगी की रोमाँचकारी झाँकी और कर्णकुहरों में तीव्र चीत्कार गूँज उठते। उसने तभी प्रतिज्ञा की, अब वह रोगियों को इस पीड़ादायक कष्ट से जब तक मुक्ति दिला नहीं देता, तब तक चैन की साँस नहीं लेगा। अभी वह कॉलेज में अध्ययनरत था, किन्तु दूसरे ही दिन से उसने अपने दो मेधावी छात्रों डंकन और कीथ को लेकर प्रतिदिन तीन-चार घंटे प्रयोगशाला में डटा रहता। भिन्न-भिन्न प्रकार के रसायनों के मिश्रण तैयार करता एवं तरह-तरह के जीव जन्तुओं पर उनका निरीक्षण-परीक्षण करता।

कई वर्ष बीत गये। तीनों ने डॉक्टरी की परीक्षा भी अच्छे अंकों से पास कर ली, किन्तु बेहोशीकारक दवा के आविष्कार के प्रति उनकी निष्ठ तनिक भी नहीं डगमगायी, यद्यपि इस बीच उन्हें असफलता-ही-असफलता हाथ लगी थी, पर वे तीनों भी जीवट व परिश्रम के धनी थे। एक बार जो बात ठान ली, सो-ठान ली। फिर उसे पूरा करके ही दम लेते। कहा भी गया है कि सफलता सिर्फ श्रमनिष्ठों के ही चरण चूमती है। हुआ भी ऐसा ही।

एक दिन जब वे तीनों प्रयोग-परीक्षणों में व्यस्त थे, तभी किसी कारण से सिम्पसन ने कीथ की ओर निहारा। उसने देखा कि डॉ. कीथ एक शीशी सूँघ रहे हैं और संज्ञाशून्यता जैसी स्थिति में धीरे-धीरे चले जा रहे हैं। अभी वह अपनी कुर्सी से उठते कि डॉ. कीथ की चेतना जाती रही और वे लड़खड़ा कर फर्श पर लुढ़क पड़े। सिम्पसन और डंकन इस आकस्मिक घटना से एकबार तो घबरा उठे, किन्तु मनोबल के धनी सिम्पसन ने डंकन को धैर्य बँधाया, कीथ की नाड़ी एवं अन्य परीक्षण किये। प्रसन्नता की बात थी कि वह केवल बेहोश थे। कुछ समय तक दोनों ने इन्तजार किया। शनैः-शनैः उनकी चेतना वापस लौटने लगी, तो उनकी खुशियों का ठिकाना ही न था। कुछ समय पश्चात् वे पूर्णतः स्वस्थ हो उठ बैठे उनकी पुनः शारीरिक जाँच दोनों ने की, पर कोई असामान्यता नजर नहीं आयी। इसके बाद इसकी पुष्टि के लिए उन्होंने इसी रसायन का उपयोग कुत्ते पर किया। कुत्ते में भी वैसी ही प्रतिक्रिया देखने को मिली। आरंभ में बेहोश होकर थोड़ी देर पश्चात् वह चैतन्य हो गया।

अब सिम्पसन आश्वस्त हो गये कि बेहोशीकारक रसायन हाथ लग गया। इसके माध्यम से सम्प्रति रोगियों को आपरेशन के दौरान अचेत कर कठिन पीड़ा की अनुभूति से मुक्त रखा जा सकता था। यह अविस्मरणीय दिन 4 नवम्बर 1847 का था। जब इस विलक्षण खोज की जानकारी कुलपति को दी गई, जिनकी प्रेरणा और प्रोत्साहन ने उन्हें लक्ष्य के प्रति आस्थावान बनाये रखा था, तो उनने उन तीनों को सर्वोच्च मानक उपाधि और पारितोषिक से सम्मानित किया। यह रसायन क्लोरोफार्म था, जो तत्कालीन चिकित्सा विज्ञान के लिए वरदान सिद्ध हुआ। उसके बाद के आपरेशनों में इसी माध्यम से रोगी को अचेत कर किया जाने लगा। यह बात और है कि आज इससे भी अच्छी औषधियों की खोज कर ली गयी है एवं एनेस्थेसियोलॉजी नामक एक परिपूर्ण विद्या विकसित हो गयी है। किन्तु यह कभी भी नहीं भुलाया जा सकता कि आरंभिक चरण इस दिशा में जिनने बढ़ाए उनको ही श्रेय जाता है। इस सबका जिसका विकसित रूप हम आज देख रहे हैं। संयोग से हुआ आविष्कार वरदान बन गया व संज्ञाशून्यता के रूप में एक उपलब्धि चिकित्सा विज्ञान को मिली।

हम समाज के अभिन्न अंग है। हम क्या देखते हैं समाज को अपने लिए किये जा रहे अनेकानेक परोपकारों के बदले यही एकमात्र कसौटी है अपने सार्थक जीवन की काश कुछ ऐसा हम का गुजरें कि समाज हमेशा हमें याद कर सके।


जानकारी से वंचित (Kahani)

मकड़ी ऐसा नादान कीड़ा अपनी लार से जो तार खींचता है वह उससे दो गुने मोटे लौह के तार से भी ज्यादा मजबूत होता है। वैज्ञानिकों ने अपने एक अनुसंधान में पाया है कि मकड़ी के जाले का तार एक सेन्टीमीटर के दस लाखवें भाग की मोटाई का होता है किन्तु मजबूती में उतने मोटे लोहे के तार से कई गुना ज्यादा होता है। अन्तरिक्ष विज्ञानियों ने अपनी शक्तिशाली दूरबीनों से ज्ञात किया है कि कुछ प्रजाति की मकड़ियाँ अपने जाले को गुब्बारानुमा बनाती हैं जो उसके मूल स्थान से 300 कि. मीटर की दूरी तय कर लेता है तथा 4000 मीटर की ऊँचाई तक उड़ भी सकता है।

मकड़ियों की यह कुशलता विज्ञान जगत के लिए एक अनसुलझा रहस्य है।

अर्जुन के एक पत्नी सुभद्रा भी थी। उनके गर्भ में जब बालक था तब वे युद्ध विद्या के अनेक दांव−पेंच पत्नी को बताया करते। उद्देश्य गर्भस्थ बालक को रणनीति में पारंगत करना था। यही समय बालक की प्रवृत्ति ढालने का था।

प्रसंग चक्रव्यूह वेधन का चल रहा था। छः चक्र बेधने तक की जानकारी सुभद्रा ने ध्यानपूर्वक सुनी पर जब सातवें का बेधन सुनाया जा रहा था तो उसे नींद आ गई और प्रसंग को अधूरा छोड़कर सो गई। गर्भस्थ बालक भी उस जानकारी से वंचित रह गया।

महाभारत के समय बालक अभिमन्यु तरुण हो गया था। उसे कौरवों द्वारा रचे गये चक्रव्यूह को बेधन करने जाना पड़ा। छः चक्रों के बेधन का कौशल उसे याद था उन मोर्चों पर उसने सफलता भी प्राप्त कर ली। पर सातवें मोर्चे पर वह उलझ गया उसे जीतने का रहस्य मालूम न था। इसलिए गड़बड़ा गया और शत्रुओं के हाथों मारा गया।

अभिमन्यु की वीरता इस प्रकार पराजित क्यों हुई। इसका रहस्य बताते हुए अर्जुन ने कहा उसे इस अन्तिम कथा की जानकारी गर्भकाल से सुभद्रा के सो जाने के कारण न मिल सकी थी।

गर्भावस्था हर प्रकार के शिक्षण के लिए सर्वोत्तम काल है।


साइंस को नकारते हैं, आकाश गमन के ये प्राण

विज्ञान के इस युग में महात्माओं का आकाश-गमन एवं सिद्ध संतों का आसन-उत्थान व्यापार कुछ विचित्र-विलक्षण-सा लगता और कपोल-कल्पित जैसा प्रतीत होता है। फिर भी यह सत्य है कि ऐसा योग-विज्ञान में एकदम असंभव भी नहीं, किन्तु भौतिक विज्ञान के गले यह तथ्य अब तक नहीं उत्तर सका कि आखिर यह संभव होता किस भाँति है। उल्लेखनीय है कि भौतिक विज्ञान अपने पदार्थवादी सिद्धान्तों पर आधारित है और उन्हीं सब को सत्य स्वीकारता है, जो इन सिद्धान्तों की कसौटी में खरे सिद्ध होते हैं। आकाश-गमन के संबंध में उसका एक ही असमंजस और तर्क है कि कोई भी वस्तु बिना किसी बल के सहारे गुरुत्वाकर्षण शक्ति के विरुद्ध ऊपर कैसे उठ सकती है?

पदार्थ विज्ञान की दृष्टि से विचार किया जाय, तो उक्त दलील में काफी दमखम ‘नजर’ आता है। भू-उपग्रह और हवाई जहाज ऊपर उठते और उड़ते सिर्फ इसलिए दृष्टिगोचर होते हैं कि उनके साथ पदार्थपरक एक विशेष सामर्थ्य जुड़ी रहती और हर क्षण काम करती रहती है। जब कभी यह क्षमता चुकती और खड़खड़ाती है, तो भयंकर दुर्घटनाएँ घटती नजर आती हैं और पल भर के भीतर विशाल कलेवर वाले यान और उपग्रह धूल में मिलते दिखाई पड़ते हैं। विज्ञान का यह उपरोक्त मत भी तर्क सम्मत जान पड़ता है। तो क्या योग विज्ञान के उपरोक्त दावे को झुठला दिया जाय और यह मान लिया जाय कि यह सब भ्रम-जंजाल में डालने वाले रंगीन सपने हैं? नहीं, इस सीमा तक शंका करने की आवश्यकता नहीं है। विज्ञान द्वारा ही इसे भी साबित किया जा सकता है कि ऐसा संभव है। हम प्रतिदिन आकाश में उड़ते हुए पक्षियों को देखते हैं। वे डैने हिलाते चलते हैं और बड़ी आसानी से नभ में विचरते दृश्यमान होते हैं। उन्हें जिस रफ्तार से जिधर जाना होता है उसी गति से उनके पर भी फड़कते रहते हैं। इस प्रक्रिया में वे एक प्रकार से गुरुत्वाकर्षण शक्ति को निष्फल-निष्क्रिय स्तर का बना देते हैं, जिससे उनके मार्ग में इस बल का कोई गतिरोध उत्पन्न नहीं होता। जब नभचरों जैसे सर्वथा निरीह जीवों के लिए यह एब संभव है, तो इस सृष्टि के सबसे बुद्धिमान-सामर्थ्यवान प्राणि-मनुष्य के लिए ऐसा क्योंकर असंभव होना चाहिए? उसके विशाल शक्तिभण्डार में सन्निहित अद्भुत शक्तियों के लिए ऐसा क्यों कर अशक्य होना चाहिए? यह सरल भी है और शक्य भी-विज्ञान के एक सिद्धान्त द्वारा इसे भली-भाँति समझा जा सकता है।

इन दिनों विशालकाय गुब्बारों द्वारा आकाश में सैर करने का आम प्रचलन चल पड़ा है। दिन-दिन यह इतना लोकप्रिय होता जा रहा है कि आये दिन इसकी प्रतिस्पर्धाएँ होती रहती हैं और हर एक, दूसरे द्वारा स्थापित रिकार्ड को प्रायः तोड़ने का प्रयास करता है। इसके लिए तेज रफ्तार प्राप्त करने के वह नित नवीन तकनीक और तरीके खोजता और अपनाता रहता है, पर इसका जो सामान्य सिद्धान्त है, वह यह है कि गुब्बारे के अन्दर की हवा को नर्म कर हल्का बना दिया जाय। भीतर की गर्मी जितनी और जिस अनुपात में बढ़ती जाती है, उसी अनुपात में हवा हल्की होने और ऊपर उठने लगती है। इस क्रम में एक ऐसा समय आता है, जब जल्द ही गुब्बारा जमीन छोड़ देता है। इसके कुछ क्षण पश्चात् उससे लटकता आदमी और यंत्र भी हवा में तैरने लगते हैं। हवाई सफर के उपरान्त जब उसे नीचे उतरना होता है, तो उपकरण से निकलती आग की लपटों को धीरे-धीरे घटाता जाता है। गर्मी कम होती है, तो गुब्बारे की हवा का हल्कापन भी कम होने लगता है और अन्ततः व्यक्ति सुरक्षित धरती पर आ जाता है। गुब्बारे से उड़ने और उतरने का यही मोटा सिद्धान्त है।

योग विज्ञान में वर्णित आकाश-गमन पर फिर अकस्मात् अविश्वास क्यों होने लगता है? इस प्रश्न पर सूक्ष्मता से विचार करने पर एक ही बात उजागर होती है-शरीर की स्थूलता और उसका वजन। हर पदार्थ और प्राणी पर पृथ्वी का आकर्षण बल कार्य करता है-यह विज्ञान का अकाट्य नियम है, पर पृथ्वी की इस प्रकृति पर विचार करते समय भौतिक विज्ञान गुब्बारे वाले सिद्धान्त को प्रायः भुला देता है, इसी से इस प्रकार की उलझन पैदा होती और सच्चाई संशय में पड़ती दिखाई देती है। उक्त सिद्धान्त के अनुसार यदि शरीर को इतना हल्का बना लिया जाय कि वह बल, गुरुत्व बल को निरस्त कर उस पर हावी हो जाय, तो शरीर के लिए ऊपर उठना और हवा में उड़ना संभव है। योग क्रिया द्वारा यही किया जाता है। इसकी अष्ट सिद्धियों “लघिमा” के दौरान इसी क्रिया को सम्पन्न और सिद्ध करने का विधान है। जो उक्त विद्या में प्रवीण और पारंगत हो जाते हैं, उन योगियों के लिए आसान-उत्थान और आकाश-गमन जैसी बातें अत्यन्त सरल और सहज जान पड़ती है।

समय-समय पर प्रकाश में आने वाले ऐसे प्रसंग भी इसी एक तथ्य की पुष्टि करते हैं कि योग विज्ञान में आने वाले ऐसे उल्लेख सर्वथा काल्पनिक न होकर वास्तविकता के धरातल पर आधारित हैं। ऐसे ही एक योगी की चर्चा “आटोबायोग्राफी ऑफ ए योगी” नामक पुस्तक में लेखक योगानन्द ने की है। उस योगी का उल्लेख करते हुए लेखक ने लिखा है कि अर्धरात्रि के समय जब वह अनपी पत्नी के सो जाने के पश्चात् ध्यान करता, तो वह अपने आसान से लगभग चार फुट ऊँचा उठ जाता था और उसको घेरे अनेक देव-देवियाँ होते थे। “लिविंग विद दि हिमालयाज मार्स्टस” नामक स्वामी राम चरित ग्रन्थ में भी ऐसे अनेक लाँगोम्पा लामाओं के उद्धरण मौजूद हैं, जो आकाश-गमन में सिद्धहस्त हैं। इनमें से कई लाँगोम्पा अपने दोनों पैरों को लोहे की मजबूत जंजीर से कसे रहते और तिब्बत की पहाड़ियों में लम्बी छलाँगे लगाया करते। यह ‘लाँगोम’ (आकाश-गमन) का प्रथम चरण होता। अभ्यासरत रह कर जो इसमें कुशलता प्राप्त कर लेते, वे अतितीव्र गति से आकाश-गमन करने में सक्षम हो जाते। फिर उनके लिए लम्बी दूरी थोड़े समय में तय कर लेना कोई बहुत कठिन नहीं रह जाता। ऐसे ही तीन लाँगोम्पाओं का वर्णन अलेक्जेन्डर नील ने अपनी रचना “दि मीस्टिक्स एण्ड मेजिशियन्स” के छठवें अध्ययन में किया है। भारतीय योगियों में इस प्रकार की अलौकिक शक्ति लोकनाथ ब्रह्मचारी, काठिया बाबा एवं परमहंस विशुद्धानन्द को प्राप्त थी। इनके अतिरिक्त दत्तात्रेय और भगवान बुद्ध भी इस विद्या में निपुण थे, ऐसा जैन एवं बौद्ध ग्रन्थों में उल्लेख मिलता है।

श्री दत्तात्रेय भगवान के संबंध में प्रचलित है कि वे एक अहोरात्र में भारत के अन्यान्य तीर्थों में वहाँ के साधन-भजन के समय उपस्थिति रह कर लोगों को आशीर्वाद दिया करते थे। भगवान तथागत के आकाश-गमन की चर्चा पाली-पुस्तकों में यत्र-तत्र देखी जा सकती देखी जा सकती है। एक कथा के अनुसार एक बार श्रावस्ती नगरी से अंतरिक्ष-गमन करते समय अपने एक प्रिय स्थविर ‘धनिय’ की कुटिया के ऊपर आकाश में कुछ क्षण रुक कर उनने आशीष दिया था और फिर वे अपने गन्तव्य की ओर चल पड़े थे। आदि-शंकराचार्य और नाथ सम्प्रदाय के गुरु गोरखनाथ के बारे में प्रचलित है कि वे इस कला में अत्यन्त दक्ष थे। योगवासिष्ठ, रामायण आदि ग्रन्थों में भी इस विद्या का उल्लेख मिलता है। उनमें वर्णित शिखिध्वज, चूडाला, वीताहव्य आदि ब्रह्मयज्ञ इस योग क्रिया में कुशल थे। इस्लाम धर्म के औलिया मियाँ मीर के संदर्भ में कहा जाता है कि वे यदा-कदा लाहौर से हिजाद आकाश मार्ग से जाते और कुछ घंटे वहाँ बिता कर पुनः वापस लाहौर उसी रात्रि को लौट आते थे।

विदेशों में भी ऐसे अनेक आध्यात्मिक नर-नारी हुए हैं, जिनमें आसन-उत्थान की अपूर्व क्षमता थी। मिश्र की सेण्ट मेरी नामक सन्त महिला के बारे में कहा जाता है कि वह जब संतत्व की भाव-भूमिका में आयी, तो मिश्र छोड़ कर फिलिस्तीन की मरुभूमि में एकान्तवास करने लगी। प्रार्थना करते वक्त उसका शरीर जमीन से, करीब पाँच फुट ऊपर उठ जाता था। प्रख्यात सन्त आंगस्टाइन ने अपनी कृति “जीवनस्मृति” में एक ऐसी साधिका का उल्लेख किया है, जिसकी सम्पूर्ण देह प्रार्थना के समय लगभग तीन फुट ऊँची उठ जाती थी। विशप सेण्ट पहरेदारों के सोने के पश्चात् जब गिरजाघर की टेबुल पर ध्यान मग्न होते तो यदा-कदा वे शून्य में स्थिर दिखाई पड़ते। सन्त फ्रांसिस के बारे में भी ऐसी ही जनश्रुति है कि राम के समय अपने बन्द कक्ष में जब वे ध्यानस्थ होते तो आधार-स्थल से कई हाथ ऊपर उठ जाते। स्पेन की ‘मीरा’ कही जाने वाली सन्त टेरेसा रात्रि के समय जब ईश-चिन्तन में लीन होती, तो अपने आसन से प्रायः तीन फुट उत्थित हो जातीं। सोलहवीं सदी की इस महिला संत के संबंध में प्रसिद्ध है कि एक बार स्थानीय विशप आलमेरेस डे गोनडोसा इनसे मिलने आये, तो यह देख कर वे चकित रह गये कि साध्वी खिड़की की ऊँचाई जितने अधर में बैठी हुई है।

इससे कुछ मिलता-जुलता जिक्र डॉ. गोपीनाथ कविराज ने अपनी पुस्तक “भारतीय संस्कृति और साधना” में किया है। इसमें वे अपने एक गुरु भाई की चर्चा करते हुए लिखते हैं कि कई वर्षों तक साधना करने के बाद उनकी स्थिति इतनी उच्च हो गई थी कि आसन पर बैठे-बैठे ही वे एक सर्वथा पृथक दिव्य लोक में पहुँच जाते। ज्ञातव्य है कि इस मध्य वे पूर्णतः चैतन्य रहते। उन्हें आसन के स्पर्श की प्रतीत भी सदा बनी रहती, किन्तु फिर भी न तो वह उनका अपना कमरा होता, न भौतिक जगत। आँखों से जो कुछ दिखाई पड़ता, वह इतना दिव्य और अलौकिक होता, कि उसकी कल्पना पंचभौतिक जगत में की ही नहीं जा सकती। कई बार वे वहाँ पूर्ण चेतना की स्थिति में चलते-फिरते भी और उसकी अलौकिकता के बारे में साथ-साथ सोचते भी। एक बार उन्होंने वहाँ की अद्भुत दृश्यावली को लिपिबद्ध करने की ठानी, अस्तु उस दिन कागज-कलम साथ लेकर आसान पर बैठे। थोड़ी ही देर में उनका उस दिव्य राज्य में पदार्पण हो गया। उन्होंने कलम उठायी और कागज पर वहाँ का ब्यौरा ज्योंही लिखने को उद्यत हुए कि सामने से दृश्य एकाएक विलुप्त हो गया। उनने अगल-बगल झाँका, तो स्वयं को पुनः अपने उपासना-कक्ष में पाया।

“गुरु-परम्परा-चरित” साधना ग्रन्थ में भी ऐसी कुछ योगियों का जिक्र किया गया है, जिनमें शून्य में उठने और भ्रमण करने की सामर्थ्य थी। इनमें भास्कर राय, राम ठाकुर, समुज्ज्वल आचार्य, शिशिर प्रभृति संत विशेष उल्लेखनीय है।

बौद्ध आचार्यों ने शून्य-भ्रमण की सिद्धि को तीन प्रमुख वर्गों में विभाजित किया है। प्रथम गति का नाम उनने “वाहन-गति” रखा है। यह नभचरों के सदृश्य की गति होती है। इसकी दूसरी श्रेणी “अधिमोक्ष गति” है। इसमें शरीर को गतिहीन रख कर दूरस्थ वस्तु को संकल्प-बल के माध्यम से सामने प्रकट कर लिया जाता है। इसका तीसरा विभाग “मनोवेग गति” के नाम से जाना जाता है। जैसा कि नाम से प्रकट है, यह गति अत्यन्त तीव्र होती है। सिद्ध महात्मा मन के समान इस वेगवान गति के सहारे ही अपनी स्थूल सत्ता क्षण मात्र में कहीं-से-कहीं प्रकट कर लेते हैं। इसलिए कहीं-कहीं इस गति को “मनोजवित्व” भी कहा गया है।

इतना सब जान-समझ लेने के उपरान्त विज्ञान के लिए ऊहापोह करने जैसी कोई बात शेष रह नहीं जाती। हाँ, एक प्रश्न इसकी प्रक्रिया संबंधी फिर भी बच रहा जाता है। इस बारे में इतना ही कहा जा सकता है कि पदार्थ विज्ञान को योग के दुरूह और रहस्यमय प्रक्रियाओं को समझने के फेर में न पड़ कर

इसे विशुद्धतः योग के विद्यार्थियों के लिए छोड़ देना चाहिए और स्वयं को पदार्थ के गहनतम अनुसंधान में ही लगाये रहना चाहिए, क्योंकि दोनों ही विज्ञान की दो पृथक शाखाएँ हैं। योगविद्या चेतना से संबंधित है, तो स्कूल-कालेजों में पढ़ाई जाने वाली “साइन्स” पदार्थपरक है। चेतन सूक्ष्म की पुष्टि व सिद्धि कभी संभव हो ही नहीं सकती। अस्तु पदार्थ विज्ञान को यह हठवादिता छोड़ कर चेतना विज्ञान से समन्वय व संगति बिठा कर चलना चाहिए। इसी में इन दोनों विधाओं का स्वयं का उत्कर्ष और संसार का कल्याण है। इसे जितनी जल्दी समझा जा सके उतना ही अच्छा है।


सत्परिणाम सामने आया (Kahani)

हेनरीफोर्ड ने गरीबी से जीवन आरंभ किया। अपनी लगन मेहनत और सज्जनता से अनेकों को सहयोगी सहायक बनाया और प्रगति मार्ग पर निरन्तर बढ़ते गये। प्रौढ़ होते-होते वे फोर्ड मोटरों के निर्माण के नाम से प्रख्यात हुए।

उनके कारखाने में एक मिनट में 50 मोटरें बनकर तैयार होती थीं। 20 हजार कर्मचारी काम करते थे। पर उन्होंने आय का बड़ा अंश परमार्थ के लिए नियोजित रखा। प्रायः दो तिहाई बचत का लोकहित के कार्यों में लगा देते थे। फोर्ड फाउंडेशन जैसी अनेकों संस्थाएँ उन्हीं के हाथों से चलीं और उनके द्वारा असंख्यों का विविध-विधि हित साधन हुआ।

वाजिस्रवा अपने समय के बड़े दानवीर थे। एक बार उनने हजार गौएं दान कीं। पर वे सभी थी दुर्बल, असमर्थ। यश के लिए संख्या तो बढ़ाई गई, पर उसमें गुणवत्ता न थी।

वाजिस्रवा के पुत्र नचिकेता ने पिता को टोका और कहा अच्छी वस्तु सुपात्र को देने से ही दान का प्रयोजन पूरा होता है।

वाजिस्रवा को आवेश आ गया। उनने कहा तू ही मुझे उत्तम लगता है। सो यमराज को तुझे ही दान करता हूँ।

नचिकेता प्रसन्नतापूर्वक यम के गुरुकुल में चले गये। वहाँ उन्हें अपनी सेवा और सज्जनता से मोह लिया। गुरु ने उन्हें उच्चकोटि की विद्याएँ पढ़ाई और उन्हें हर दृष्टि से प्रवीण पारंगत बनाया।

महत्वपूर्ण दान को सुयोग्य के हाथों सौंपने का सत्परिणाम सामने आया।


तन्मेमनः शिव संकल्पमस्तु

मनुष्य का स्वास्थ्य नदी के प्रवाह की तरह है। जब तक सब अंग ठीक से काम करते हैं, तब तक शरीर में शक्ति, स्फूर्ति और ताजगी रहती है। नदी के स्रोत की भाँति शरीर का भी स्रोत है-मनुष्य का अपना मन। मन की निर्मलता-निष्कलुषता न केवल आत्मोत्कर्ष के लिए आवश्यक है, वरन् शारीरिक स्वास्थ्य का आधार स्तम्भ भी वही हैं। यजुर्वेद संहिता में संहिता में एक मंत्र आता है जिसका चौथा पाद है-”तन्मे मनः शिव संकल्पमस्तु।” अर्थात् मेरे मन का संकल्प शिव हो, शुभ हो, कल्याणकारी हो। उसमें किसी व्यक्ति के प्रति पाप की भावना पैदा न हो। मनीषियों का भी यही मत है कि मन के शुभ विचारों से सब प्रकार के घाव भरे जाते हैं। जैसे वर्षा के जल से अकालग्रस्त क्षेत्र नंदन वन की तरह लहलहाते हैं, वैसे ही मन की शक्ति में एकाग्रता, प्रसन्नता और शान्ति प्राप्त होती है। प्रख्यात अमरीकी लेखक स्वेट मार्डन ने कहा है-’यदि आप अस्वस्थ विचारों को मन में स्थान देंगे तो शरीर पर उनका बुरा प्रभाव पड़े बिना नहीं रहेगा। ‘ जैसा बिम्ब में होगा वैसा ही प्रतिबिम्ब होगा’

आधुनिक चिकित्सा मनोविज्ञानियों ने भी गंभीरतापूर्वक किये गये अनुसंधानों के आधार पर है अब यह सिद्ध कर दिया है कि रोग की जड़ शरीर में नहीं, मन में होती है। उनके अनुसार स्वार्थ-भावना, कामवासना और ईर्ष्या का प्रभाव यकृत तथा प्लीहा पर पड़ता है। घृणा और क्रोध का प्रभाव गुर्दों तथा हृदय पर पड़ता है। योग सूत्र में कहा गया हैं-”चित्ता नदी नाम उभयता बहति, पापाय च बहति पुण्याय च बहति।” अर्थात् चित्त रूपी नदी दोनों तरफ बहती है-पाप की ओर भी और पुण्य की ओर भी।

लोग प्रायः रोगों के विषय में पुस्तकें पढ़कर यह सोचने लगते हैं कि उनमें किन्हीं रोगों के लक्षण मौजूद हैं। वे चिंतातुर हो जाते हैं। मन में किसी रोग के बारे में विश्वास जम जाने से शरीर अस्वस्थ होने लगता है, और उससे फिर चिकित्सा में भी अनावश्यक झंझट और बाधा उपस्थित हो जाती है। संकल्प का अर्थ है-अच्छा और पक्का इरादा। संकल्प महान रक्षक का काम करता है। शुभ संकल्प से व्यक्ति शिखर पर चढ़ जाता है। मास्टर चाँदगीराम और विश्वविख्यात गामा पहलवान के बारे में प्रसिद्ध है कि वे आरंभ में रुग्णकाय व्यक्ति थे, पर जब संकल्प जाग्रत हुआ और तद्नुरूप दिनचर्या में हेरफेर कर आगे बढ़े तो स्वास्थ्य की दृष्टि से सबसे आगे रहे। अमेरिका की प्रख्यात भविष्यवक्ता हेलेन कीलर शारीरिक रुग्णता एवं अपंगता का शिकार बचपन से ही थी। मिल सलीवन नामक महिला के प्यार भरे उद्बोधन ने प्रसुप्त पड़ी उसकी संकल्प शक्ति को जगाकर जीवन में नये प्राण फूँक दिये।

कलकत्ता-पश्चिम बंगाल में जन्में एक महान योगी हुए हैं- सोहंग स्वामी, जिन्हें वहाँ के लोग टाइगर स्वामी के नाम से आज भी याद करते हैं। बाल्यावस्था में उनका शरीर दुबला-पतला और रोगों से घिरा हुआ था, पर मन में सदैव यही संकल्प उठता कि “कोई शेर-चीता मिले तो उससे कुश्ती लड़ूं।” शरीर इतना सबल और सुदृढ़ हो जाय कि हिंसक जंगली जानवरों को सबक सिखा सकूँ। उन्होंने कहा है कि “मुझे तब पता नहीं था कि संकल्प शक्ति में “इच्छा शक्ति “ में भी कुछ जादू होता है, पर मैंने उसे अपने आप में सचमुच जादू पाया। मेरा स्वास्थ्य दिनों दिन अच्छा होता गया और मैं एक हट्टा–कट्टा युवक बन गया। “ एक बार जंगल में प्रविष्ट हो जाता तो वहाँ के हिंसक से हिंसक पशु-बाघ, शेर-चीते भी मुझे भेड़-बकरियों की तरह लगते और देखते ही दुम दबाकर भाग खड़े होते। वह जीव बड़ा ही दुर्भाग्यशाली होता जो उनकी दृष्टि में पड़ जाता उसकी मौत सुनिश्चित होती। कूँच बिहार के राजाध्यक्ष ने उनकी परीक्षा खूँखार आतंक का पर्याय बनी हुई थी।

एक बार उनकी ख्याति सुनकर स्वामी योगानंद उनसे मिलने गये और पूछा-आप खूँखार जानवरों से कैसे लड़ते हो? तो उन्होंने उत्तर दिया-’शारीरिक शक्ति से मानसिक शक्ति कही अधिक प्रखर है। यदि हम दृढ़ विश्वास कर लें कि बाघ नहीं बिल्ली है तो वह बिल्ली ही हो जायेगी। शारीरिक स्वास्थ्य, सौष्ठव, मानसिक संकल्प की ही देन है। अब तो विज्ञान ने भी यह सिद्ध कर दिया है कि मन-मस्तिष्क ही है जो माँस-पेशियों को नियंत्रित करता है। मस्तिष्क जितना प्रखर, पवित्र और बलवान होगा, उतना ही सूक्ष्म शरीर काम करेगा। जितनी शक्ति से हथौड़े का प्रहार किया जाता है उतनी ही गहरी चोट लगती है। उसी प्रकार शरीर हथौड़ा है, उसे शक्ति देने वाली मशीन तो मन की संकल्प शक्ति है। सारे कार्य मन की शक्ति पर निर्भर है, उसका उपयोग चाहे जैसे कर सकते हैं। यदि मन शरीर और इंद्रियों का दास होगा तो वह कुछ नहीं कर सकेगा, इसके विपरीत यदि मनुष्य प्रसन्न और शुद्ध अन्तःकरण वाला है, मन में सदैव शुभ और कल्याणकारी संकल्पों की विचार तरंगें ही हिलोरें मारती हैं तो निश्चय ही सुख, शाँति शरीर के पीछे भागने वाली छाया की तरह उसका पीछा नहीं छोड़ती।’


अकाल मृत्यु से बचने की रीति-नीति

फसल पक जाती है तो उसे किसान काट देते हैं। वृक्ष अतिशय पुराने हो जाते हैं तो उनकी खोखली जड़े तेज हवा का दबाव न सहने के कारण उखड़ कर उलट जाती हैं। घास गर्मी के दिनों में सूख जाती है। पेड़ों के पत्ते पुराने पड़ जाने पर शीतकाल में पतझड़ प्रस्तुत कर देते हैं। यह समय चक्र का सामाजिक अवसान है। मनुष्य का जीवन काल शतायु माना गया है। उतने समय तक कार्यरत रहने की उसमें प्रकृति प्रदत्त क्षमता है। मानवी काया के कलपुर्जों से यदि भौंड़ी छेड़खानी न की जाय तो वह मशीन बिना गड़बड़ाये पूरे समय अपना काम करती रह सकती है।

असमय की मृत्यु को अकाल मृत्यु भी कहते हैं। यों दुर्घटना में, किसी असाध्य रोग के चंगुल में फँस जाने के भी अकालमृत्यु कहते हैं, पर वास्तविकता को देखा जाय तो दूसरे ही तथ्य उभर कर सामने आते हैं। कितने ही लोग हैं जो जाने-अनजाने धीमी आत्महत्या के प्रयास में लगे रहते हैं और लगभग आधी आयु जीकर अपना विस्तार गोल कर लेते हैं। मन को तो किसी प्रकार के उलटे-सीधे तर्कों से समझाया जा सकता है, पर इतने भर से तथ्यों को झुठलाया नहीं जा सकता है। कुछ अपवादों को छोड़कर उत्थान-पतन के अन्य अनेक प्रसंगों की तरह पूर्णायु तक पहुँचना या बीच में ही पैर पसार देना यह मनुष्य की अपनी निजी गतिविधियों पर निर्भर है।

यों चाहने को तो सभी निरोग रहना और दीर्घ जीवन जीना चाहते है, पर इतने भर से मनोरथ की पूर्ति नहीं हो सकती। किसान तभी उपयुक्त फसल काटता है, जब खेत को जोतने से लेकर बीज बोने, खाद देने, सींचने और रखवाली करने में दत्तचित्त रहता है। उन सब कामों में उपेक्षा, अस्तव्यस्तता बरतने पर स्थिति को यथावत नहीं रखा जा सकता। ऐसे खेत भरपूर फसल नहीं देते और समय तक टिके नहीं रहते, उन्हें कृति-कीटक ही खा जाते हैं, पक्षी नोच लेते हैं और ऋतु-प्रभाव सहन न कर पाने पर वे असमय ही अपनी सत्ता खो बैठते है। मनुष्य के संबंध में भी यही बात है। यों वह मरने से डरता है। निरोग रहना और दीर्घजीवी बनना चाहता है, पर चाहने से क्या? चाहने को तो कोई कुछ भी चाह सकता है। पर पल्ले वही पड़ता है, जिसके लिए सुव्यवस्थित रीति से प्रयास किया जाता है। उलटी दिशा में चलने वाले तो ठोकरें खाते और औंधे मुँह गिरते ही देखे जाते हैं।

जीवनचर्या किस प्रकार बनानी अपनानी चाहिए, इसके लिए हर प्राणी को प्रकृति प्रदत्त मार्ग-दर्शन उपलब्ध है। यह स्वभाव में समाया होता है। यदि आदतों को बिगाड़ा न जाय और प्रकृति के परामर्श को ध्यानपूर्वक सुना जाय, तो उसी राजमार्ग पर चलना हर किसी के लिए संभव हो सकता है, जो निरापद है और निरोग जीवन जीने, पूर्णायुष्य पाने का राजमार्ग दिखाता है। मनुष्येत्तर अन्यान्य प्राणी इस अनुशासन को समझते, अपनाते हैं, फलतः उन्हें न तो बीमार होना पड़ता है और न अकाल मृत्यु ही मरते हैं। वृद्धावस्था की दुर्बलता आने से पूर्व उनकी समर्थ स्थिति में ही मौत उन्हें हिंस्र प्राणियों का रूप बनाकर उठा लेती है। नियति का मनोरथ है कि प्राणी तभी तक जिये, जब तक उसमें सशक्तता विद्यमान रहे। बच्चों, अभिभावकों पर निर्भर रह सकते हैं, पर प्रौढ़ होने के उपराँत यह व्यवधान किसी के भी सामने नहीं आना चाहिए कि वह परावलंबी रहे। अशक्त का अभिशाप सहन करते हुए भी पैर घसीटता रहे और दूसरों की कृपा पर निर्भर रहे। जो दुर्दशा सृष्टि के अन्यान्य प्राणियों में से किसी की भी नहीं होती, वह अकेले मनुष्य की ही होती है। मरने से पूर्व ढेरों समय वह रुग्णता और अशक्तता का त्रास पाते हुए व्यथित रहता है। साथ ही परिचर्चा, चिकित्सा तथा जीवन साधन जुटाने के लिए दूसरों की कृपा पात्र बनकर रहता है। सृष्टि के मुकुटमणि समझ जाने, सर्व सम्पदाओं और सुविधाओं को प्राप्त करने में समर्थ मनुष्य की यह दुर्दशा क्यों? इसका एक मात्र कारण है-जीवनचर्या में अनुपयुक्त रीति का समावेश करते रहना। इस उद्दण्डता का प्रतिफल भी उसे हाथों-हाथ मिलता है। बीमारियों से घिरे रहना और समय से बहुत पहले रोते-कराहते हुए चल बसना-यही है वह दण्ड, जिसे प्रकृति की अदालत में निष्पक्ष होकर दिया जाता है। धनी-निर्धन, ज्ञानी-अज्ञानी, पापी-पुण्यात्मा किसी को भी बख्शा नहीं जाता। जीवन सम्पदा, सुख-चैन से बिताने, अभीष्ट प्रगति की दिशा में वेग-पूर्वक बढ़ते चलने की अपेक्षा उसे प्रायः आधी आयु प्रदानकर्ता को वापस लौटानी पड़ती है। प्रगति और प्रसन्नता के स्थान पर बची-खुची जीवन अवधि रोते-कलपते गुजारनी पड़ती है। इस अवधि में उसे शारीरिक और मानसिक रोगों के यमदूत विविध शोक-संतापों की प्रताड़ना देते रहते है। इसे संयोग मात्र नहीं समझा जाना चाहिए, वरन् एक प्रकार से करनी का फल मानकर उसे सृष्टि क्रम में समाहित न्याय निष्ठ की प्रमुखता मानते हुए समझना चाहिए कि उस मार्ग पर न चलें, जिस पर काँटे बिछे और कंकड़ पत्थरों के चुभने वाले अम्बार पड़े हों।

जीवनचर्या का ककहरा भोजन से आरंभ होता है। जन्म लेते ही उसे पेट भरने की आवश्यकता पड़ती है। अभिभावक उसी को जुटाते है। इसका अर्थ है कि शरीर की मशीन को चलाने के लिए जिस ऊर्जा की आवश्यकता है उसमें आहार प्रमुख है। गीला, सड़ा या अनुपयुक्त ईंधन जलने पर आग की ज्वाला प्रज्वलित नहीं होती, वरन् उलटा धुआं उगलने लगती है। ऐसा धुआं जो अपने क्षेत्र को दुर्गन्धित काला करता है और संपर्क में आने वालों की आँख, नाक में प्रवेश करके जलन उत्पन्न करता है। इस प्रकार आग जलाकर जो लाभ उठाया जाता था वह तो बन नहीं पड़ता उलटे ईंधन के बरबाद होने के अतिरिक्त अवाँछित विग्रह उत्पन्न करता है। अनुपयुक्त आहार भी शरीर का पोषण करने के स्थान पर उसका विनाश करने लगता है। सभी जानते है कि विषपान करने पर जीवन सत्ता कुछ ही देर में समाप्त होती है। इसके अतिरिक्त पोषक रसायनें बिगड़ी स्थिति को सुधारने में भी चमत्कारी लाभ उत्पन्न करती हैं। यह आहार का गुणानुवाद है।

किस प्राणी के लिए क्या आहार उपयुक्त है, इसकी जाँच-पड़ताल जिह्वा का डॉक्टर कर लेता है। जो उपयुक्त खाद्य है वह हर प्राणी को उसके स्वाभाविक रूप में मिलता है। पकाने,तलने, मिर्च मसाले, नमक, शक्कर, मिलाने की उनमें अलग से आवश्यकता नहीं पड़ती। कोई प्राणी अपने आहार की दुर्गति बनाता भी नहीं। शाकाहारी, माँसाहारी वर्ग के प्राणी उपलब्ध आहार को मुँह में ही पीसकर पेट तक पहुँचा देते हैं। पेट में दाँत नहीं है, इसलिए आहार का आधा पाचन दाँतों द्वारा पीसे जाने और मुख ग्रंथियों का पाचक रस मिलने से पूरा हो जाता है। मनुष्य से मिलती-जुलती कार्य संरचना वाले सभी प्राणी इसी कार्य विधि से पेट भरते हैं। जीभ को वे व्यभिचारिणी चटोरी नहीं बनाते। मनुष्य ही अपनी रसना के स्वाद के नाम पर ऐसे पदार्थ माँगता है जो उत्तेजक होने के कारण किसी प्रकार निगलते तो रहते हैं, पर पीछे

उसकी नशेबाजी जैसी आदत पड़ जाती है और अधिकाधिक खट्टे-मीठे, नमकीन, जले-भुने पदार्थों की माँगे होने लगती हैं। तथाकथित स्वादिष्ट पदार्थों में तीन चौथाई भाग ऐसा होता है, जो शरीर को पोसता नहीं, वरन् उसके उपयोगी तत्वों का शोषण करके उन्हें बरबादी के गर्त में धकेलता है। मनुष्य का स्वाभाविक भोजन शाक-फल हो, तथा वे पर्याप्त मात्रा में न मिलें, तो अनाज को भी अंकुरित करके या उबालकर खाया जा सकता है। ऐसी आदत डाल लेने पर आहार सम्बंधी उस विकृति से बचा जा सकता है, जो रुग्णता या अकालमृत्यु का प्रमुख कारण है।


प्रगति के पथ पर (Kahani)

विश्व विख्यात एक लड़की हेलन केलार जिसमें अपंगता का अनुपात क्रमशः बढ़ता ही गया। वह पूरी तरह अंधी जन्मी और बहरी हो गयी। दूसरे लोग उसे माँस का जीवित लोथड़ा भर कहते।

उसकी बड़ी बहन ने साहस किया कि वह अपनी इस छोटी बहन को स्वावलम्बी ही नहीं विचारवान बनाकर भी रहेगी। संकेत के द्वारा ही उसने उसे पढ़ाना, समझाना और अनुभव कराना आरंभ किया। लड़की ने भी इन प्रयासों में रुचि ले ली। सफलता मिलती चली गयी। केलार ने कई विषयों में एम.ए. पास किया और विश्वविद्यालयों ने उसे मानद डाँक्टरेट की उपाधि दी। उसने संसार भर का दौरा करके अपंगों को यह विश्वास दिलाया कि यदि वे चाहे तो गई-गुजरी स्थिति में भी प्रगति के पथ पर आगे बढ़ सकते हैं।


सर्वोपयोगी-सर्व सुलभ गायत्री साधना

गायत्री उपासना के सम्बन्ध में कई प्रकार की शंका-कुशंकाओं की, विधि-निषेधों की चर्चा होती रहती है। अक्सर यह सोचा जाता है कि उसके विधि-विधान में कोई गलती हो गई तो उससे अनिष्ट होगा। इसलिए लोग डरते हैं और यह जानना चाहते हैं कि कहीं कोई ऐसी चूक न हो जाय जिससे उन्हें लाभ के स्थान पर हानि उठानी पड़े। सही विधि के साथ हर काम करना उत्तम है। इसमें शोभा और सफलता दोनों की ही सम्भावना रहती है। चूक करने से इतना तो स्पष्ट है कि जैसा लाभ अपेक्षित है वैसा नहीं मिलता। इतने पर भी एक बात तो साफ है कि उससे किसी प्रकार के विपरीत प्रतिफल की या उलटा अशुभ होने की कोई आशंका नहीं है। गीता में भगवान कहते हैं-

“नेहा भिक्रम नाशोस्ति प्रत्यवायों न विद्यते। स्वल्पमप्यस्य धर्मस्य त्रायते महतो भयरत्॥”

अर्थात्-इस मार्ग पर कदम बढ़ाने वाले का पथ अवरुद्ध नहीं होता। उलटा परिणाम भी नहीं निकलता। थोड़ा-सा प्रयत्न करने भी भय से त्राण मिलता है।

परमात्मा का नाम किसी भी स्थिति में लिया जाय उसका सत्परिणाम ही हो सकता है। दुष्परिणाम तो दुष्कर्मों के निकलते हैं। भगवत् उपासना कोई दुष्कर्म नहीं है। जान-बूझकर या अनजाने भी सत्कर्म करते रहने का थोड़ा-बहुत लाभ ही होता है। यह बात किसी के भी मन में नहीं आनी चाहिए कि किसी के विधि-विधान में कमी रह जाने से किसी प्रकार का अनिष्ट हो सकता है। वाल्मीकि ने उलटा नाम जपा था, उसके विधि-विधान में यह स्पष्ट त्रुटि थी। इतने पर भी भक्ति भावना और चरित्र दृष्टिकोण बदल देने के कारण उनकी उस विधान त्रुटि के कारण कोई हानि नहीं पहुँची बल्कि वे सफलता के साथ चरम लक्ष्य तक पहुँचने में सफल हो सके।

तत्वदर्शी मनीषियों ने यह निर्देश किया है कि उपासना विधान के सम्बन्ध में एक मार्गदर्शक नियुक्त होना चाहिए। इस नियुक्त होना चाहिए। इस नियुक्ति से पूर्व यह बात भली प्रकार जान ली जाय कि मार्गदर्शक का ज्ञान-अनुभव परिपक्व है या नहीं और उसके परामर्श को प्रामाणिक माना जा सकता है या नहीं? इस खोज-बिन में जल्दी भी न की जाय। अपना समाधान हर दृष्टि से भली प्रकार कर लिया जाय। किन्तु जब निश्चय हो जाय तो उसकी बात को ही प्रामाणिक मान कर चला जाय। हिन्दू धर्म में दुर्भाग्यवश पिछले दिनों धार्मिक है। फलस्वरूप हर प्रसंग में अनेकों प्रकार के परस्पर विरोधी मत मिलते हैं। इन सबको सुना और माना जाय तो फिर शंकाएँ इतनी अधिक बढ़ जायेगी कि उनका समाधान किसी प्रकार भी संभव न हो सकेगा। गायत्री मंत्र में एक तीन-पाँच ओंकार लगाने सम्बन्धी मतभेद आए दिन खड़े रहते है। वस्तुतः प्रत्येक वेद मंत्र की शुरुआत में एक बार ओऽम् (ॐ) लगाने का नियम है, वही पर्याप्त है। पर किसी को उसे अधिक लगाकर जप करने का आग्रह हो तो उसे भी रोकने की जरूरत नहीं। भगवान के अधिक नाम ले लेने में कोई हानि नहीं है।

शंकाओं में बहुचर्चित शंका यह भी मानी जाती है कि गायत्री का वर्ण व्यवस्था, वर्ग भेद के साथ कोई सम्बन्ध है क्या? इसके उत्तर में यही कहा जा सकता है कि परमेश्वर की परम पावनी, परम सामर्थ्य सम्पन्न ऋतंभरा चेतना शक्ति का नाम गायत्री है। वह सूरज की तरह सर्वत्र अपना प्रकाश फैलाती है और बादलों की तरह बिना भेदभाव के बरसती है। चन्द्रमा की चाँदनी में बैठने का हर किसी को अधिकार है। आकाश की छत्र छाया में कोई भी बैठ सकता है। पवन का अभीष्ट उपयोग किसी के भी द्वारा सम्भव है। गंगा स्नान की हर किसी को छूट है। गायत्री सार्वभौम, सर्वजनीन, सर्वसुलभ मंत्र है। उसमें हर आत्मा को पवित्र बनाने-ऊँचा उठाने की शक्ति है। माता को अपने सभी पुत्र प्रिय हैं, इनमें से किसी को माँ के प्यार से वंचित नहीं किया जा सकता। देश, धर्म, जाति, वर्ण सम्प्रदाय से गायत्री महाशक्ति अधिक ऊँची है। सभी सीमा बन्धन मनुष्य कृत है। भगवान की व्यवस्था में इस प्रकार के कोई विभाजन नहीं हैं। अस्तु गायत्री उपासना किसी भी जाति, धर्म, देश का व्यक्ति कर सकता है।

गायत्री ब्राह्मण की कामधेनु है-इस कथन का तात्पर्य उसकी उपासना को किसी जाति-वंश विशेष तक सीमित करना नहीं वरन् यह कि श्रेष्ठ आचरण वाले परमार्थ-परायण ब्रह्मवृत्ति के व्यक्ति उस उपासना का समुचित लाभ उठा सकते है। उसमें सत्पात्रता को, व्यक्तित्व की उत्कृष्टता को बढ़ो का प्रोत्साहन भर है। यही बात स्त्री-पुरुष के भेदभाव के सम्बन्ध में भी है। भारतीय संस्कृति की अन्तरात्मा में आदि से अन्त तक मानवीय समानता का ही प्रतिपादन भरा पड़ा है। आर्षवाङ्मय के अनुसार स्त्रियाँ भी पुरुषों की भाँति सदा से धर्म कृत्यों में प्रवेश पाती रही हैं। गायत्री उपासना तो आदि शक्ति की ही उपासना है। फिर इसमें शक्ति स्वरूपा नारियों को वंचित रखना-किस प्रकार सम्भव है? माता और बेटी के बीच किसी प्रकार के प्रतिबन्ध हो ही नहीं सकते।

यज्ञोपवीत पहने बिना भी क्या गायत्री उपासना हो सकती है? इस प्रश्न चिह्न के उत्तर में यही कह सकते है कि यज्ञोपवीत पहनना और गायत्री मंत्र जपना अधिक प्रशंसनीय है। इसे सोने में सुहागा मिलने पर अधिक चमक आने की तरह अच्छा मान जायगा। पर सुहागे के बिना सोने का कोई उपयोग ही नहीं है, ऐसी बात नहीं है। शिखा और सूत्र-दोनों भारतीय-संस्कृति के प्रतीक चिह्न हैं। इन्हें धारण करना धर्म परम्परा का निर्वाह ही माना जायगा, पर जो धारण नहीं करते वे गायत्री भी जप न करें-यह तो ऐसा है जैसा कि यह कहना कि जिन्हें मिष्ठान उपलब्ध नहीं है वे अन्न भी न खायें। एक भूल तो यह कि शिखा-सूत्र रखने में उपेक्षा की गई। दूसरी भूल ऊपर से यह लाअ ली कि यज्ञोपवीत नहीं पहनते तो गायत्री उपासना भी क्यों करें? जिस औचित्य को नहीं अपनाया गया है-उसे अपनाने की बात सोचनी चाहिए। जनेऊ के साथ-साथ गायत्री भी छोड़ देना तो दुहरी गलती है। बिना जनेऊ पहने भी गायत्री उपासना भली प्रकार सम्भव है।

जिन्हें बीमारी, कमजोरी या अन्य किसी कारणवश उपासना से पूर्व स्नान करने की सुविधा नहीं रहती, वे भी गायत्री साधना कर सकते हैं। यों तो स्नान और वस्त्र शुद्धि की प्रशंसा ही की जायगी। पर हाथ-पैर और मुँह धोकर, पसीने वाले वस्त्र बदलकर भी उपासना हो सकती है। यहाँ तक कि रास्ता चलते, शारीरिक श्रम करते समय भी मंत्र जप चलता रह सकता है। ऐसी स्थिति में मुँह बन्द कर, मन ही मन मानसिक जप करने का विधान है।

रात्रि में जप हो सकता है या नहीं? इसमें भी कोई गंभीर बात नहीं है। सामान्यतया दिन काम करने और रात्रि विश्राम के लिए है। दिन भर का हारा थका शरीर मनोयोग-पूर्वक प्रसन्नता एवं उत्साह के साथ जप ध्यान नहीं कर सकता। रात्रि को जल्दी सो जाने-सुबह जल्दी उठ जाने का नियम शारीरिक, मानसिक स्वास्थ्य की दृष्टि से उत्तम है। इसी को ध्यान में रखकर सूर्यास्त के एक घण्टा पश्चात् तक जप पूरा कर लेने और प्रातः दो घंटा पूर्व आरम्भ करने का मोटा नियम बनाया गया था। प्राचीन काल में रात्रि में प्रकाश की वैसी सुविधा नहीं थी, जैसी आज है। ऐसी दशा में उन दिनों वह व्यवस्था उचित थी। किन्तु आज जब कि लोगों को दिन निकलते ही काम पर चला जाना होता है और रात्रि देर से घर आने का अवसर मिलता है। ऐसी स्थिति में यदि रात्रि को भी उपासना के लिए प्रतिबन्धित रखा जाय तो फिर उपासना के लिए कोई समय न बचेगा। पूज्य गुरुदेव के जीवन के पृष्ठो से स्पष्ट है कि उनके 24 लक्ष के 24 महापुरश्चरणों का जप रात्रि एक डेढ़ बजे से आरम्भ होता रहा है।

माला की सुविधा न हो तो गायत्री जप हो सकता है या नहीं? इसमें इतना जान लेना ही पर्याप्त है कि जप करने के लिए जितना समय निश्चित किया जाय, नियमित रूप से लगना चाहिए। घट- बढ़ होने से समस्वरता नहीं बनतीं। समय की गणना इन दिनों घड़ी से हो सकती है। प्राचीन काल में इसे हाथ से माला घुमाकर पूरा किया जाता था। इससे यह पता चलता था कि नियत समय तक जप पूरा हुआ या नहीं। माला घुमाकर पूरा किया जाता था। इससे यह पता चलता था कि नियत समय तक जप पूरा हुआ या नहीं। माला का यही मूल प्रयोजन है। किसी को किसी कारणवश माला की सुविधा न हो तो नियत समय की गणना छः मिनट में एक माला पूरी हो जाती है। जितनी माला अपनी हो, उसके हिसाब से घड़ी के द्वारा भी समय नियत रखा जा सकता है। यों माला के साथ परम्परागत श्रद्धा जुड़ी रहने से उसका भावात्मक महत्व तो है ही। इसी भावात्मक उल्लास से ओत-प्रोत होकर अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य का नियोजन गायत्री उपासना में करत रहना चाहिए। परम पूज्य गुरुदेव का जीवन-क्रम समस्त वैदिक वाङ्मय का जीवन्त भाष्य है और गायत्री महाविज्ञान उसकी साधनात्मक अनुभूतियों का रसामृत। इसका श्रद्धाभाव से अवगाहन उपासकों की समस्त शंकाओं को निर्मूल करता रहेगा। इसके अतिरिक्त अखण्ड ज्योति के पृष्ठो में प्रकाशित उनकी विचार चेतना की रश्मियाँ-हृदयगत संशय,अन्धकार को दूर भागने के लिए सर्व-समर्थ हैं। फिर भी जिनके मन में शंका उठे, वह शान्ति-कुंज से निःसंकोच पत्र-व्यवहार करके मार्गदर्शन प्राप्त करते रह सकते हैं।


नौ सद्गुणों की लड़ी है-यज्ञोपवीत का धागा

सुर्य के इर्द गिर्द नौ ग्रह घूमते हैं। नौ रत्नों की प्रमुखता गिनी जाती है। शरीर में प्रमुख नौ छेद हैं। यज्ञोपवीत के नौ धागे उन्हीं के प्रतीक हैं। एक जन्म पशु स्तर का होता है, जो पेट और प्रजनन की आपूर्ति सम्बन्धी क्रिया कलापों का होता है। शरीर निर्वाह के लिए ही सारे क्रियाकृत्य किये जाते हैं। सोच विचार भी उन्हीं के सम्बन्ध में उठते रहते हैं, किन्तु मनुष्य जन्म दूसरा जन्म माना जाता है। उसकी भूमिका में प्रवेश करने वाले को द्विज कहते हैं। द्विज अर्थात् दूसरा जन्म। एक पशु का, दूसरा उस मानव का, जिसे प्राणियों में सर्वश्रेष्ठ अथवा ईश्वर का राजकुमार कहते हैं। माता के गर्भ में तो सभी प्राणी एक जैसी प्रक्रिया के साथ जन्म लेते हैं, पर मनुष्य जन्म विशेष कर्तव्यों एवं दायित्वों का स्वयं वरण करने पर मिलता है।

भारतीय धर्म में वर्णाश्रम व्यवस्था पर बहुत जोर दिया गया है। द्विजत्व धारण करना उसी प्रक्रिया का प्रमुख संस्कार है। इसे यज्ञोपवीत धारण प्रक्रिया कहते है। उसके जिए वह आयु निर्धारित है, जिसमें मनुष्य जिम्मेदारियों को समझ सके और उनके निर्वाह हेतु कटिबद्ध हो सके। स्त्री-पुरुष का इसमें कोई भेद नहीं है। स्त्रियाँ मासिक धर्म के उपरान्त नया उपवीत बदल लेती हैं, जब कि पुरुषों को शवयात्रा में सम्मिलित होने पर इस प्रकार के परिवर्तन की आवश्यकता पड़ती है। छः महीने पुराने पर भी उसे बदल लेते हैं। पसीने के कणों का प्रवेश हो जाने पर नित्य तो उसे साबुन आदि से धोया जाता रहता है। यज्ञोपवीत में जाति-वंश आदि का कोई बंधन नहीं है। वह मनुष्य मात्र के लिए धारण करने योग्य प्रतीक है।

यज्ञोपवीत में नौ धागे होते हैं। प्रत्येक धागा एक आत्मिक उत्तरदायित्व को स्वीकार करने धारण करने और निबाहने का एक शपथ संस्कार है। आरंभ में तो उसका धारण धूमधाम के साथ होता ही है, पर जब कभी कोई अन्य धर्मकृत्य सम्पन्न किया जाता है, तब भी नया जनेऊ बदलते और पुराने को किसी पवित्र जलाशय में बहा देने का विधान है। जहाँ कोई जलाशय न हो, वहाँ किसी पवित्र स्थान में मिट्टी में गाड़ देते हैं, ताकि वह खाद बनकर भूमि की उर्वरता में अभिवृद्धि करे। लम्बाई, शरीर की लम्बाई को ध्यान में रखकर बनाई जाती है। इसलिए वह छोटी बड़ी भी हो सकती है।

मल-मूत्र त्याग करते समय उपवीत को कान पर धारण कर लेने की परम्परा है। हाथ धोकर उसे नीचे उतारना चाहिए। अधोज्ञाग को धर्मकृत्यों में अनुपयुक्त माना जाता है। इसलिए लम्बाई कमर तक की रखी जाती है। कदाचित कुछ बड़ी हो जाए तो उसे कम करने के लिए गले में एक फेरा लगा लेते हैं। ऐसा कर लेने पर कान पर चढ़ाने-उतारने में कोई भूल हो जाने पर भी वह महत्वहीन मानी जाती है। पीले रंग से रंगा हुआ उपवीत अधिक पवित्र माना जाता है। रंगे होने पर उसमें शरीर की गंदगी प्रकट नहीं होती है।

नौ महाव्रतों अथवा धर्म कर्तव्यों में नौ प्रमुख माने जाते हैं। इन्हें धर्म कर्तव्य भी कह सकते हैं। इनमें पाँच विधेयात्मक है, चार निषेधात्मक। विधेयात्मक अर्थात् जिन्हें अपनाये रहना आवश्यक है। निषेधात्मक अर्थात् जिनसे बचना चाहिए। बन पड़े तो उन्हें छोड़ना चाहिए। विधेयात्मक पाँच सद्गुणों में से यदि किसी में कुछ कमी रहती हो, भूल होती हो तो उस पर निरन्तर ध्यान रखा जाय और जो कुछ असंतुलन हो उसे पूरा करना चाहिए। प्रातः उठते समय उस दिन का कार्यक्रम इस प्रकार बनाया जाय जिसमें इन मानवी सद्गुणों का दैनिक क्रियाकृत्य में समावेश होता रहे। रात को सोते समय समीक्षा करनी चाहिए कि इन कर्तव्यों में कहाँ भूल हुई हो, उनकी गलती को उसी समय अनुभव करनी चाहिए और भविष्य में पुनः न होने देने की समझदारी बरतनी चाहिए। कम से कम सोते समय तो दिन भर के कार्यों की समीक्षा कर ही लेनी चाहिए। जो औचित्य बन पड़ा, उसके लिए अपने आप प्रशंसा करनी चाहिए और जो भूल रही हो, गलती की गई, उसे आगे न करने के लिए अपने ऊपर अधिक कड़ा अंकुश लगाना चाहिए। जिस प्रकार नित्य कर्मों में स्नान, मलमूत्र त्याग, भोजन करना सोना आदि कार्यों को नित्य कर्म समझ कर नियमपूर्वक किया जाता है, उसी प्रकार गुण-दोषों की समीक्षा करना और उन्हें घटाना-बढ़ाना भी नित्य कर्म में सम्मिलित रहना चाहिए।

पाँच सत्प्रवृत्तियाँ ये है-(1) श्रमशीलता (2) शिष्टता (3) मितव्ययिता (4) सुव्यवस्था (5) विवेकशीलता। इसके अतिरिक्त चार निषेधात्मक में से हैं- (1) इन्द्रिय निग्रह (2) समय संयम (3) अर्थ संयम (4) विचार संयम। इस प्रकार पाँच और चार मिलाकर नौ हो जाते हैं। इनके महत्व समझने पर लाभ और उपेक्षा करने पर हानि उठाने की बात स्वयं भी समझनी और समझानी चाहिए। इन्हीं गुणों के आधार पर नवयुग में सत्प्रवृत्ति उन्मूलन का प्रयोजन पूरा होता है। इन्हीं के आधार पर ग्रहण और परित्याग की दोनों प्रक्रिया बन पड़ती हैं। इन्हीं की सम्पन्नता पर स्वर्ग का अवतरण’ प्रक्रिया में समावेश, नवयुग का उद्देश्य भी है।

श्रमशीलता का उद्देश्य है अपने समय को श्रमपूर्वक निर्धारित कार्यक्रमों में लगाये रखना। निठल्ला न बैठना। आलस्य−प्रमाद को पास न फटकने देना। कार्यव्यस्तता से ही से ही शारीरिक स्वास्थ्य और मानसिक स्वास्थ्य का संवर्धन संभव होता है। औजारों पर धार रखने से ही उनकी उपयोगिता बनी रहती है, अन्यथा जंग लगती है और निकम्मा बना देती है। थकान वाले कड़े काम कर लेने पर थोड़े से विश्राम करने की या काम बदल लेने की आवश्यकता पड़ती है। वह भी अस्त−व्यस्त होने से नहीं, वरन् आवश्यकता के अनुरूप नियत निर्धारित करना चाहिए। यह किसी को भी नहीं सोचना चाहिए कि श्रम करने से थकान आती है, वरन् उसमें तो सुविधा ही रहती है। अतः गतिशीलता को बनाये रखने के लिए श्रमशीलता को आदत में, स्वभाव में सम्मिलित करना चाहिए, ताकि अधिक साहसिकता भरी प्रगति का अधिकारी बना जा सके। आलस्य साक्षात् दरिद्रता है। उसे अपनाने पर व्यक्ति हर दृष्टि से पिछड़ा ही रहता है।

दूसरा सद्गुण है-शिष्टता। अपनी नम्रता और दूसरों का सम्मान प्रकट करने की आदत हर छोटे-बड़े के साथ व्यवहृत करनी चाहिए। अपने कामों के लिए जहाँ तक हो सके, दूसरों पर निर्भर न रहा के लिए जहां तक हो सके, दूसरों पर निर्भर न रहा जाय, वरन् यथा समय दूसरों के कामों में हाथ बँटाने, सहायता देने का ही स्वभाव बनाना चाहिए। सैनिकों,स्काउटों जैसे अनुशासन पालन करना चाहिए। ऐसा एक भी व्यवहार न होने देना चाहिए, जिससे असंयता-कुसंस्कारिता का दोषारोपण लगे।

मितव्ययिता। पैसा न्याय और मेहनत के साथ ईमानदारी के नियमों को पालन करते हुए जितना कमाया जा सके, उतना कमाना चाहिए। खर्च उसमें से उतना ही करना चाहिए, जितना नितान्त आवश्यक हो। बच्चों को सत्प्रवृत्ति संवर्धन के लिए, परोपकार के लिए खर्च करना चाहिए। पुण्य-परमार्थ के लिए नियोजित किया गया पैसा ही सच्ची बचत है। उसी के आधार पर भौतिक और आत्मिक उन्नति का दुहरा आधार बन पड़ा है। दुर्व्यसनों की विपत्ति आमंत्रित करना है। इस अहंकार के अतिरिक्त ऐसी बुरी आदतें भी पड़ती है, जिनमें सब प्रकार हानि ही होती है। सादा जीवन उच्च विचार का सिद्धान्त उन्हीं से निभ पाता है-फिजूल खर्ची से बचने के लिए निरन्तर समझदारी बरतनी है।

चौथा सद्गुण है-सुव्यवस्था स्वच्छता। हर वस्तु को, समय को, संबंधित क्रिया-कलापों को इस प्रकार संभालना और सुनियोजित करना चाहिए कि कहीं भी फूहड़पन, अव्यवस्था और अस्तव्यस्तता न दीख पड़े। प्रगति का सबसे बड़ा आधार व्यवस्था बुद्धि जिसको व्यवस्थित रहना, व्यवस्थित रखना आता हो समझना चाहिए कि उसे यह समझ में आ गया, प्रगति के पथ पर कैसे चला जाता है और प्रामाणिकता, का सम्मान का अर्जन किस प्रकार किया जाता है।

पांचवां सद्गुण है-सहकारिता। अपने सुखों को बाँटना और दूसरों के दुःखों को बँटाना है। मिल−बांट कर खाना, हँसते-हँसाते जीना। खिलाड़ी की तरह हार-जीत में संतुलन बनाये रहना। मित्र बढ़ाना, शत्रु घटाना बढ़ाना सद्गुणों को सहकारिता कहते हैं। मिलजुल कर रहने से प्रसन्नता बढ़ती और कठिनाइयों से लड़ने की शक्ति आती है। यह पाँच प्रमुख सद्गुण है।

समझदारी, ईमानदारी, जिम्मेदारी और बहादुरी भी ऐसे ही चार सद्गुण हैं जिनको स्वभाव का अंग बनाने के लिए हर जगह सम्मान पाते, सफलताएँ अर्जित करते हैं।

संयम शक्ति का भण्डार है। असंयम रूपी छलनी में दूध दुहने और अपनी शक्तियाँ बिखेर कर खाली हाथ न होने और उनके सड़ने से अनेक प्रकार के रोग उपजते हैं। कामुकता के कुचक्र में मनुष्य अपनी जीवनी शक्ति गँवा बैठता है। मानसिक दृष्टि से खोखला रह जाता है। पैसे के संबंध में जो संयमी नहीं होता, फिजूलखर्ची के कुचक्र में फँसकर सदा दरिद्र और असंतुलित रहता है। जिसे अपने विचारों पर संयम नहीं, उपयोगी कल्पनाएँ करने, योजना बनाने की अपेक्षा ज्यों-त्यों अप्रासंगिक बातें सोचते रहते हैं, उन्हें मूर्खता दबोचती है, इन चारों असंयमों से हर किसी को बचना चाहिए।

वसंत पर्व 1989(8 फरवरी) को दिया गया उद्बोधन


परम पूज्य गुरुदेव की अमृतवाणी

गायत्री मंत्र हमारे साथ-

“ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्।”

देवियो! भाइयो! सामान्य सिद्धान्त का जिक्र मैं कल कर रहा था आपसे। अपने बाहुबल से, पुरुषार्थ से और पराक्रम से बहुत आदमियों ने भौतिक जीवन में और आध्यात्मिक जीवन में बहुत कुछ पाया है। यह मोटा सिद्धान्त आप सबको मालूम है। जन लोगों ने उन्नतियाँ की हैं दुनिया में, अपने पराक्रम और पुरुषार्थ किये हैं, वे धन भी कमाये हैं, विज्ञान की शोधें भी की है और जीवन में आगे भी बढ़े है। महर्षि विश्वामित्र का नाम आपको मालूम होगा। जब उन्होंने गुरु वशिष्ठ से कहा कि हमको राजर्षि नहीं रहना है, ऋषि बनना है, तो उनने कहा कि फिर तप किया। लम्बे समय तक महर्षि दधिचि ने तप किया। यह क्या है? यह प्रयोग और पुरुषार्थ है। आपको मालूम नहीं है, तप करने और पुरुषार्थ है। आपको मालूम नहीं है, तप करने और पुरुषार्थ करने से आदमी भौतिक जीवन में और आध्यात्मिक जीवन में उन्नति करते रहे हैं। इस सिद्धान्त में दो राय नहीं, एक राय है। ये क्या बात कह रहे हैं? मैं पराक्रम और पुरुषार्थ की बात कह रहा हूँ। इनका महत्व आपकी दृष्टि में कम यहाँ तो मुझे एक नई बात कहनी थी अनुदान की। अनुदान, जो कभी-कभी मिलते हैं और किसी खास मकसद के लिए मिलते हैं, उसकी बाबत कहनी थी। पुराने जमाने की बात बताऊँ। क्या चलिए बताता हूँ। अर्जुन हार गया था दुर्योधन से और मारे-मारे फिर रहा था। पाँडवों में से कोई नचकैया, कोई रसोइया बन रहे थे। थक कर बिलकुल निढाल हो गये थे। पराक्रम चुक रहा था, तब भगवान श्री कृष्ण ने कहा-आप महाभारत में काम कीजिए। हमारे अनुदान आपको मिलेंगे। अर्जुन ने केवल गाण्डीव पर रख कर तीर चलाये थे। श्रेय उन्हीं को मिल गया। भगवान ने फतह उन्हीं की करायी। यह मैं अनुदान की बात कह रहा हूँ, भगवान कृष्ण के अनुदान की और बताऊँ? अच्छा और बताता हूं। सुदामा जी को पैसे की आवश्यकता पड़ी। किस काम के लिए? सुदामा जी बड़े गरीब थे, और भिखारी थे, नंगे थे, भूखे थे। खबरदार! सुदामा जी की शान में ऐसी बात कही, तो मैं कान उखाड़ लूँगा। ब्राह्मण की बेइज्जती मत कीजिए, संत की बेइज्जती मत कीजिए, अध्यात्म की बेइज्जती मत कीजिए। मित्रों! बड़े शानदार आदमी थे सुदामा जी और शानदार काम के लिए-विश्वविद्यालय चलाने के लिए मदद माँगने गये थे। तब भगवान ने अपनी सारी की सारी कमाई द्वारिका से उठा कर के पोरबन्दर ट्राँसफर कर दी थी। पाई-पाई सुदामा जी के सुपुर्द कर दिया था। यह श्रीकृष्ण की कथा कह रहा था मैं आपसे और राम की कहूँ। राम की कथा कहता हूँ। एक आदमी का नाम था-विभीषण। शरीर की दृष्टि से बहुत कमजोर था, लेकिन रामचन्द्र जी ने उसे रातोंरात मालदार बना दिया, लंका का मालिक बना दिया। यह कैसे हो गया? भगवान का अनुदान था तो और किसको दिया था? हनुमान जी को दिया था। हनुमान जी की ताकत स्वयं की उपार्जित नहीं थी। स्वयं की रही होती, तो उन्होंने सुग्रीव की मदद जरूर की होती। सुग्रीव की मदद करने में वे बिल्कुल असफल थे। फिर क्या करने लगे? पहाड़ उठाने लगे, समुद्र छलाँग ने लगे। एक लाख पूत सवा लाख नाती-दो-दो लाख आदमियों से-दैत्यों से-जाइण्टों से-राक्षसों से अकेले मुकाबला करने लगे। राक्षस कैसे होते हैं? दो-दो योजन मूंछें ठानी। दो-दो योजना लम्बी उनकी मूंछें थीं। ऐसे जबरदस्त राक्षसों से लड़ने के लिए आमादा हो गये, हनुमान जी। कैसे हो गये? अनुदान था।

आप समझिए ऊँचे सिद्धान्तों को। आप तो समझना भी नहीं चाहते। श्रीकृष्ण भगवान और रामचन्द्र जी ने हर एक को किसी खास काज के लिए अनुदान दिये थे। नहीं साहब, मजा उड़ाने के दिया था, ऐयाशी के लिए दिया था। खबरदार।

भगवान के बारे में ऐसी बेइज्जती की बातें कहीं तो। बेकार की बात मत कहिए। मित्रों! अभी पुरानी बात बतायी मैंने। अब नई बात बताता हूँ। बिनोवा को गाँधीजी के अनुदान मिले थे। बिनोवा अपने आप उठे थे? नहीं, अपने आप सन्त रह सकते थे और अपनी गीता का प्रचार करते रह सकते थे और अपनी गीता का प्रचार करते रह सकते थे, पर दूसरा गाँधी, बापूजी ने बनाया था उन्हें और जिसने वामन अवतार के तरीके से अपने डगों से सारे हिन्दुस्तान को नाप डाला और सैकड़ों-एकड़ जमीनें मिलती चली गई और किसको मिले गाँधी के अनुदान? करमसद गाँव का एक पटेल मामूली बना दिया-हिन्दुस्तान का गृहमंत्री बना दिया था।

मित्रों! मैं अनुदान की बात कर रहा था।

मित्रों! मैं अनुदान की बात कर रहा था। चलिए अभी और बताता हूँ। पंडित नेहरू ने लाल बहादुर शास्त्री को मिनिस्टर बना दिया और प्रधानमंत्री बना दिया था। लाल बहादुर शास्त्री की कोई हैसियत नहीं थी। यह क्या दिया गया था-अनुदान। नेहरूजी का अनुदान। उन्होंने हीरालाल शास्त्री जो कि एक कन्या विद्यालय चलाते थे, राजस्थान का मुख्यमंत्री बना दिया था। ये क्या है? ये अनुदानों की बात कह रहा था। अनुदानों का जिक्र अक्सर मैं अपने प्रवचनों में करता रहा हूँ। उसमें से एक और कड़ी मैं हमेशा अपनी शामिल करता रहा हूँ। हमने अनुदानों से पाया है। आपने तो हमारी शक्ल देखी भी नहीं है अभी तक। आपने तो हमारा एक काम देखा है। गुरुजी कितने बड़े हैं? जितना बड़ा हमारा काम। आपकी दृष्टि से हमारा समग्र रूप नहीं आ सकता; क्योंकि आपकी आंखें बहुत छोटी है। आप हमारी औकात, इज्जत, ताकत और हस्ती का इतना मूल्यांकन करते हैं कि हमारी मनोकामना पूरी की कि नहीं। आपके बेटा हुआ कि नहीं हुआ। बेटा हो गया, तो गुरुजी चमत्कारी सिद्ध पुरुष और आपके बेटा नहीं हुआ तो सौ गाली। आपकी अक्ल, आपकी बुद्धि, आपकी दृष्टि ऐसी छोटी आँख होती है। आप हमारी हैसियत और व्यक्तित्व को इतना छोटा मानते हैं; जितना हमारे शरीर में कान की लम्बाई-चौड़ाई है। उतने को आप परखते हैं, उतने को सोचते हैं, उतने को देखते हैं। लेकिन हमारा व्यक्तित्व बहुत बड़ा है। कितना बड़ा है? आप कल्पना नहीं कर सकते है। बीस साल निकल जाने दीजिए। जो जिन्दा रहे, जरा देखना गुरुजी किसी आदमी का नाम था। हम आपकी दृष्टि में छोटे हो सकते हैं; लेकिन संसार के लिए हम बहुत बड़े आदमी हैं। जरा अगली वाली हिस्ट्री को पढ़ना। अगली वाली पीढ़ियों की आँखें से हमको देखना। सारी मनुष्य जाति के इतिहास में हम एक कमाल करने जा रहे हैं। तो क्या चीज है ये? अनुदान है हमारे। हमको बहुत शानदार अनुदान मिले हैं, ऐसे कि सारे इंसान के लिए इंसानी समाज के लिए, इंसानी भविष्य के लिए एक ऐसा नया इतिहास लिखेंगे, जिसे कि लोग याद करते रह जायेंगे, और अचम्भे में रह जायेंगे।

यह अनुदान में मिला है हमको।

मित्रों! मैं अनुदान की बात बता रहा था कि छोटे कामों के लिए अब ये दिन नहीं है। यदि आप हमारे पास बैठे और हमारे व्यक्तिगत जीवन में प्रवेश करें, तो आपको पता चलेगा कि आदमी का एक-एक सेकेण्ड का इन दिनों हमको सारे विश्व के लिए-सारे विश्व की सम्पदा के रूप में इस्तेमाल करना पड़ रहा है। ऐसे समय में आपका ये अनुदान-सत्र हमने खास मकसद के लिए लगाया है कि आपको कुछ कीमती सी चीजें दे दें। कभी आवश्यकता होती है, तो इसी तरह के अनुदान दिये जाते हैं। आवश्यकता होती है, तो इसी तरह के अनुदान दिये जाते है। आवश्यकता पड़ी थी रामकृष्ण परमहंस को और वे इस बात की तलाश में थे कि कोई ऐसा आदमी मिल जाय, तब उसको अनुदान देदें। बहुत मुश्किल से एक आदमी दिखाई पड़ा, जिसका नाम था विवेकानन्द। रामकृष्ण उनके पास स्वयं गये थे? जिसको दिया जाता है, वो वजनदार आदमी होना चाहिए। पहले भी व्याकुल थे; इन दिनों तो बहुत ही व्याकुल हो रहे हैं। व्याकुल देवताओं के अनुग्रह प्राप्त करने के लिए कुछ आपको काम करना है वहीं बात कहनी है आपसे। हमारा गुरु व्याकुल हो रहा था और हमारे घर आया था। देवता आपके भी घर आयेगा। आप यकीन रखिये; पर देवताओं को तो आप पागल समझते हैं। पागल मत कहिए। भगवान के साथ में व्यक्तिगत तालमेल मत भिड़ाइये। भगवान व्यक्ति नहीं है। वह एक कायदे का नाम है- भगवान व्यक्ति नहीं है। वह एक कायदे का नाम है-भगवान एक कानून का नाम है- भगवान एक नियम का नाम है-मर्यादा का नाम है। उसमें किसी व्यक्ति के साथ में व्यक्तिगत रूप से न तो नाखुशी की गुंजाइश है। नाराजी की गुंजाइश रही होती, तो चाइना वालों को, रशिया वालों को, जो ईश्वर पर विश्वास नहीं करते और न केवल विश्वास नहीं करते, बल्कि गाली-गलौज भी देते रहते हैं, अब तक भगवान जी ने कचूमर निकाल दिया होता।

तो मैं क्या कह रहा था? मैं ये कहने वाला था कि अनुदान-सत्र, जिसने हमने आपको बुलाया है, उसकी तीन शर्तें है- तीन कसौटियाँ है। एक कसौटी ये है, जिसका अर्थ होता है- ईश्वर का विश्वास-पत्रता का विकास। इसका दूसरा क्या है? उपासना। उपासना का एक बहुत छोटा अंग है- भजन। उपासना समग्र फिलॉसफी है। उपासना किसे कहते हैं? भगवान के नजदीक बैठना। भगवान के नजदीक बैठने का अर्थ होता है उसकी विशेषताओं को ग्रहण करना, मसलन आग के आप नजदीक बैठते हैं, तो आग की विशेषताओं को ग्रहण करते हैं। अपनी ठंडक और नमी दोनों को मिटा लेते हैं। गर्मी आपके अन्दर चली जाती और ठंडक दूर हो जाती है। उपासना इसी को कहते हैं। उपासना का अर्थ यही होता है कि आप सिद्धान्तों के लिए अपने आपको समर्पित कर दें। श्रद्धा इसी का नाम है। समर्पण इसी का नाम है। गीता ने बार-बार यही कहा है- ”मरुयेव मन आधत्रुस्व मयि बुद्धिं निवेशय।” अरे अभागे! अपनी अक्ल को हमारे पास ला-अपनी बुद्धि को-मनोकामनाओं को हमारे पास ला। अपनी उपासना के लिए यही करना चाहिए। हमने भी यही किया और आपको भी यही करना चाहिए। हमने भी यही किया और आपको भी यही करना चाहिए। हमने अपनी कठपुतली के सारे धागे अपने बाँस की हथेलियों में बाँध दिये हैं और वही वहाँ से नचाते रहते हैं। हमारी भक्ति इसी बात पर है कि हमने हर चीज को धागा से बाँध दिया है और ये कहा है कि आप हुक्म दीजिये। आपके हुक्म पर हम चलेंगे और आप तो जाने क्या कहते हैं? ये कहते हैं भगवान से कि आप अपनी तृष्णाओं के लिए, अपने घटियापन के लिए और कमीनेपन की पूर्ति के हलण् आप तो ये कहते हैं भगवान से अपने सिद्धान्तों का सफाया कर दीजिए-अपने कायदों का सफाया कर दीजिए। भगवान की शान को ध्यान में रखिए। भक्ति के नाम पर ये मत कहिए। हमारी कोई मनोकामना नहीं है। हमारी एक ही मनोकामना है- ‘‘मालिक तेरी रजा रहे और तू ही रहे, बाकी न मैं रहूँ, न मेरी आरजू रहे। “ यह भक्ति है। अगर भक्ति आप के पास आयी, तो आप देख लेना, भगवान आपके पास आयेंगे।

यह उपासना के बारे में बता रहा था, मित्रों! उपासना के अलावा एक और काम आपको पात्रता विकास के लिए करना पड़ेगा, उसका नाम है- साधना।

साधना किसे कहते हैं? आदतें एक, मान्यताएँ दो और आकाँक्षाएँ तीन -इन तीनों को उच्चस्तरीय बनाना पड़ेगा। यही साधना है। जरा ऊंचे स्तर पर उठ के तो देखिए। जिस जमीन पर आए रहते हैं, वहाँ पर चलना बहुत मुश्किल है। एक घंटे में आप तीन मील चलेंगे; लेकिन जरा ऊँचे तो उठिए, फिर आप देखिए एक घंटे में छः मील की रफ्तार से जाते हैं। बोइंग जहाज छः सौ मील की रफ्तार से चलते हैं, जरा उठिए। जो उपग्रह पृथ्वी के चक्कर काटते हैं, उन चक्करों को देखिए। वे ढाई हजार मील प्रति मिनट के हिसाब से चलते हैं। आप तो वहाँ पड़े हुए हैं, जहाँ सड़न-कीचड़ भरी पड़ी है; जिसको जमीन कहते हैं; जहाँ से न चलाना संभव है लेकिन अगर आप अपने व्यक्तित्व को परिष्कृत कर लेते, तब क्या कहूँ आपसे-आप बहुत शानदार आदमी होते। जब मैं आपसे कहता- साधक अगर आपने आप व्यक्तित्व को परिष्कृत किया होता तो मैं यकीन दिलाता हूँ, आपको आपका आकर्षक व्यक्तित्व देवताओं की कृपा को-भगवान की कृपा को-सिद्धियों को-अनुदानों को खींच के ले आता। आपमें से हर आदमी में कबीर के बराबर, रैदास के बराबर, विवेकानन्द के बराबर योग्यता है; पर हम क्या करें। ये घटियापन तो चैन नहीं लेने देता। खा गया घटियापन आपके पैसे को, आपकी अक्ल को, आपके श्रम को, हर चीज को खा लिया, साधना किसे कहते हो? अपने घटियापन को दूर कराने के लिए जद्दोजहद करना, लड़ाई करना। तपश्चर्या इसी का नाम है। उपासना इसी का नाम है। अनुष्ठन इसी का नाम है। जप इसी का नाम है, भगवान के ऊपर डोरे डालने का नाम नहीं है; खुशामदें करने का नाम नहीं है।

आध्यात्मिक उन्नति के लिए पात्रता की दो शर्तों के अतिरिक्त एक तीसरी कसौटी भी है, उसका नाम है-आराधना। भगवान के ऊपर असर डालने वाली यही एक चीज है, दूसरी कोई नहीं। उपासना, साधना स्वयं के लिए और भगवान को प्रभावित करने के लिए अंतिम चरण रह जाता है-आराधना। आराधना का अर्थ है- लोक सेवा, जनहित, जनकल्याण, समाजसेवा। अपने समय में से, अपने श्रम में से, अपनी मेहनत में से और पैसों में से भगवान का काम कीजिए। भगवान का क्या काम है? भगवान का एक काम है-उसकी दुनिया को सुसंस्कृत और समुन्नत बनाना, उसकी सभ्यता और संस्कृति और समुन्नत बनाना, उसकी सभ्यता और संस्कृति को बढ़ाना। सभ्यता किसे कहते हैं-लोगों की चाल-चलन में शालीनता का समावेश और संस्कृति उसे कहा गया है, जिसको उदारता कहते हैं, सेवा कहते हैं, करुणा कहते हैं, परोपकार, लोकमंगल और दान कहते हैं। आप भगवान की आराधना कीजिए, ताकि भगवान आपकी आराधना करें। हमने अपने बाँस की आराधना की है। उसने हमारी आराधना की है। हमने अपने आपको उनके सुपुर्द कर दिया है, उन्होंने अपने आपको हमारे सुपुर्द कर दिया है। ये कैसे? वाणी से नहीं, गपबाजी से नहीं, ख्वाबों से और कल्पनाओं से नहीं। कार्य से ऊँचे उद्देश्यों के लिए, देश के लिए, धर्म के लिए समर्पण से।

मित्रों! यह तीन काम अगर आप कर सकते हों-पात्रता विकास के लिए कुछ कदम बढ़ा सकते हों, तो उसी कदम के नाप-तौल के हिसाब से, उसी अनुपात से आपको वे अनुदान मिलेंगे, जिसे आप हजार वर्ष तक उपासना करने के बाद भी नहीं पा सकते थे, पर इन दिनों अनुदान से पा सकते हैं। कल हमने आपको अनुदानों की एक किश्त के बारे में जानकारी करायी थी, कि प्राणधारा का संचार प्राप्त करने के लिए दैवी शक्तियाँ आपकी क्या सहायता कर सकती हैं। उसके तीन लाभ हैं-एक लाभ है उसका-जीवन शक्ति, दूसरा लाभ है उसका-साहसिकता, तीसरा लाभ है उसका-प्रतिभा। ये तीन प्रत्यक्ष सिद्धियाँ हैं। चमत्कारी सिद्धियों की बात आप मत पूछिये। उसे यदि हम आपको बता भी दें, और करा भी दें, तो मारीच के तरीके से, भस्मासुर के तरीके से, कुँभकरण के तरीके से, रावण, हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष के तरीके से तबाही के मुँह में जाना पड़ेगा। उनको तो नहीं बताते, लेकिन आपके व्यावहारिक जीवन में तीनों चीजें आ सकती है। जीवनी शक्ति एक, हिम्मत दो, प्रतिभा तीन। जीवनी शक्ति उसे कहते हैं जिसमें आदमी अपने शरीर और जीवट को अक्षुण्ण रख सकता है, मौत से लड़ सकता है, बीमारियों से लड़ सकता है। ये क्या हैं? ये प्राणधारा है, जो हमको भी मिली हुई है। 71 वर्ष की उम्र में हम 17 वर्ष के आदमी के तरीके से जिंदा हैं। हमने कामधेनु का दूध पिया है और हमारे अंदर प्राणधारा है, जीवट है, इसलिए श्रम करने की शक्ति, बीमार न होने की शक्ति, पूरी की पूरी मात्रा में हमारे पास है, आप सुनते भी नहीं है।

प्राणधारा का दूसरा फायदा-साहसिकता है। साहसिकता हिम्मत को कहते हैं, जिसके सहारे नेपोलियन जैसा दो कौड़ी का आदमी कहाँ से कहाँ जा पहुँचा था।

कोलम्बस जैसा दो कौड़ी का आदमी अमेरिका जा पहुँचा था और सारे यूरोपियनों द्वारा अमेरिका पर कब्जा कराने के लिए उतना दूर जाने में समर्थ हो गया था। ये हिम्मत है। हिम्मत तो आप में है भी नहीं। हिम्मत के नाम पर तो जनाजा निकल गया है। रोज संकल्प लेते हैं-बीड़ी नहीं पियेंगे, सिगरेट नहीं पियेंगे, फिर क्या बात हो गयी? संकल्प शक्ति का अभाव। अच्छे कामों के लिए एक इंच आपकी संकल्प शक्ति काम नहीं देती है। श्रेष्ठ कामों के लिए संकल्प करना भगवान का अनुदान है। खराब कामों के लिए तो साहस हर एक में होता है। चोरी के लिए, डकैती के लिए, बेईमानी के लिए, बदमाशी के लिए, साहस हर एक में होता है, पर ऊँचा उठाने वाले साहस कभी किसी-किसी में पाये जाते हैं और जिनमें पाये जाते हैं, वे निहाल हो जाते हैं।

तीसरी चीज का नाम है-प्रतिभा। प्रतिभा किसे कहते हैं? जिसमें आदमी हावी हो जाता है, दूसरों पर। गाँधीजी सारे समाज पर हावी हो गये थे, बुद्ध सारे के सारे जमाने पर हावी हो गये थे। हावी होने वाली क्षमता का नाम है-प्रतिभा। प्रतिभा के अभाव में आपकी औरत तक कहना नहीं मानती। आपके बच्चे, आपके पड़ोसी, आपके सबोर्डिनेट आपका कहना नहीं मानते, लेकिन अगर आपके पास वो सामर्थ्य रही होती, तो दूसरे आदमी आपकी बात को मानने के लिए मजबूर होते।

मित्रों! हम इन्हीं वस्तुओं के आधार पर आगे बढ़े हैं। आपको भी प्राणसंचार धारा के लिए ये चीजें अनुदान में-अनुदान सत्र में हम देने को तैयार हैं। शर्त एक ही है कि आप अपने व्यक्तित्व को पात्रता के उपयुक्त बनाइए। ये समय बिल्कुल इसके लायक है कि आप ये फायदा उठा सकते हैं। आज हम आपको दूसरी किश्त सायंकाल को बतायेंगे कि सूक्ष्म शरीर में क्या-क्या चीजें अनुदान के रूप में हिमालय से मिल सकती हैं। कल तो बसंत पंचमी है। अगले दिन हम वो बतायेंगे कि कारण शरीर में विद्यमान ऋद्धि-सिद्धियों का जखीरा किस तरीके से प्राप्त कर सकते हैं। यह तीनों अनुदान आपके लिए बिल्कुल सुरक्षित है, शानदार हैं। ऐसे अनुदान हैं,जो आज की स्थिति की तुलना में आपको हजारों-लाखों गुना सामर्थ्यवान बना सकते हैं। हमारी बात समाप्त। ॐ शान्ति!


मानव का सच्चा आभूषण सादगी

सादगी का परिपालन यह बताता है कि इस व्यक्ति की वृत्तियाँ लक्ष्य में केन्द्रित हो गई है। जिस व्यक्ति में जितनी अधिक सादगी होगी वह व्यक्ति उतना अधिक जीवन-लक्ष्य की ओर अभिमुख होगा। “साध्य को तिरस्कृत कर साधनों के लोभ और मोह में जकड़ा हुआ-दूसरों के लिए कुछ कर सके यह निताँत असंभव है। ऐसे लोग पहले अपनी सांकलें तोड़े, फिर आगे की सोचे।” ये उद्गार उस कर्मठ साधिका के है जिन्होंने समूचा जीवन इसी मंत्र की साधना में बिताया।

यह और कोई नहीं लौह पुरुष के नाम से पहचाने जाने वाले सरदार पटेल की पुत्री मणि बहन थीं। जिनके बारे में पटेल साहब कहा करते थे-कि “यदि मणि न होती तो मैं न जाने कब का मर गया होता”

एक बार मणिबेन अपने पिता को कुछ दवाई पिला रही थीं-कि वरिष्ठ काँग्रेसी महावीर त्यागी अपने कुछ साथियों के साथ कमरे में दाखिल हुए। बात-चीत के दौरान देखा कि उनकी धोती में जगह-जगह पैबंद लगे है। त्यागी जी ने देखकर कहा- मणिबेन तुम तो अपने को बहुत बड़ा आदमी मानती हो। तुम एक ऐसे बाप की बेटी हो जिसने साल भर में इतना बड़ा चक्रवर्ती राज्य स्थापित किया है, जितना बड़ा न अकबर का और न अशोक का। ऐसे बड़े सरदार की बेटी होकर तुम्हें इस तरह के दसियों पैबंदों से गुँथी धोती पहनने में शर्म नहीं आती?

मणि ने कहा-”शर्म आए उनको जो झूठ बोलते, बेईमानी करते और शेखी बघारते है, हमको क्यों शर्म आए।” त्यागीजी ने पुनः कहा-यदि इसी शहर में निकल जाओ तो लोग तुम्हारे हाथ में दो पैसे यह कहकर रख देंगे कि भिखारिन जा रही है। यह बात सुनकर सरदार साहब भी खूब हँसे। “यह तो बहुत अच्छा होगा, यह मेरी दवाइयों के लिए पैसे इकट्ठा कर लायेगी।” वहीं डॉ. सुशीला नायर भी थीं--उन्होंने बात को काटते हुए कहा-त्यागी जी किससे बात कर रहे हैं? मणि बहन दिन भर सरदार जी की बड़ी सेवा करती हैं, फिर डायरी लिखती है और फिर नियम से चरखा काटती हैं। जो सूत बनता है, उसी से सरदार के धोती-कुर्ते बनते है। आपकी तरह पटेल साहब का कपड़ा खद्दर भण्डार से थोड़े ही आता है। जब सरदार साहब के धोती-कुर्ते फट जाते हैं, तब उन्हीं को काटकर मणिबेन अपने लिए धोती-ब्लाउज बनाती है। उपस्थित लोग अवाक् हो सारी बातें सुन रहे थे। समाप्ति पर सभी के मुख से एक साथ निकला-ओह! कितनी पवित्र आत्मा है मणिबेन। तब तक सरदार बोल उठे-”अरे भाई! गरीब आदमी की लड़की है, अच्छे कपड़े कहाँ से लाये? उसका बाप कोई कमाता थोड़े ही है। “ उन्होंने अपने चश्मे का केश दिखाया, जो लगभग बीस बरस पुराना था। इसी तरह तीसियों बरस पुरानी घड़ी और एक कमानी का चश्मा देखा जिसके दूसरी ओर धागा बंधा था। स्वतंत्र भारत के पहले गृह मंत्री और उप प्रधानमंत्री के परिवार की यह स्थिति देखकर सभी लोग हतप्रभ रह गए। मणिबेन ने बात आगे बढ़ाते हुए कहा-”शोभा की परिभाषा बदलनी होगी, इसके सार को पहचानना होगा। आदि काल से इस देश ने त्याग को सर्वोत्तम शोभनीय माना है। आपके अनुसार देखा जाय-तो बापू, महात्मा, बुद्ध, स्वामी विवेकानंद, लंगोटधारी दयानंद, नंगे फिरने वाले तैलंग स्वामी निताँत अशोभनीय और असभ्य थे।”

“क्या यह सच है? यदि नहीं तो जान लीजिए, व्यक्ति की शोभा आँतरिक गुणों को उभारने, उनके द्वारा व्यवहार को निखारने, सभी में परमात्मा को देखने और उसकी सेवा में जुट पड़ने में है। साधनों को बटोरने में लगा हुआ कभी शोभनीय नहीं हो सकता। उसे स्वर्णालंकारों के भार से दबा हुआ देखकर भी पाखण्डी, लालची ही कहा जायेगा।” “नैतिक दृष्टि से स्वस्थ जीवन जी सके-इसके लिए जरूरत है सच्चाई को पहचानने और अंगीकार करने की, जो केवल सादगी रूपी परहेज से ही संभव है।” मणिबेन का यह कथन सुन सभी स्तब्ध रह गये और नत मस्तक हो एक-एक कर चलते बने।


बसंती चोला केसरिया बाना


बसंती चोला केसरिया बाना (Kahani)

अब दुख-दर्द हृदय का माँ! हमने पहचाना, इसीलिए तो पहन लिया है, यह केसरिया बाना।

बहती जो पंजाब-असम में, प्रबल आग की धारा, आज दहकने लगी उसी में, है कश्मीर हमारा,

सीमाएँ जल रहीं देश की, देती हमें दिखायी, अरे! उसी बढ़ती ज्वाला में, जलने लगी तराई,

हर पल बढ़ती हुई आग से, हमको देश बचाना, इसीलिए तो पहन लिया है, यह केसरिया बाना।

माँ! यह भीगी आँख तुम्हारी, और न अब नम होगी, और प्रतिष्ठ तेरी माता, कभी नहीं कम होगी,

त्याग–तितिक्षा में तपकर, हम कुँदन यहाँ बनेंगे, झुलस रही मानवता के हित, चन्दन यहाँ बनेंगे

कल जो की थी भूल, न हमको अब उसको दोहराना, इसीलिए तो पहन लिया है, यह केसरिया बाना।

यह बाना तप और त्याग की, खरी प्रेरणा देगा, इसमें सारा विश्व, नये युग की किरणें देखेगा,

दुर्भावों में यही मनुज का, रक्षक-ढाल बनेगा, अँधियारे में यही, धधकती हुई मशाल बनेगा,

भरी नजर से देख रहा है, इसकी तरफ जमाना, इसीलिए तो पहन लिया है, यह केसरिया बाना।

तपबल से जो तपोनिष्ठ ने, ऊर्जा यहाँ जगाई, धरती के हर कोने में है, जो ऊर्जा बिखराई,

बिखरी हैं जो दिव्य शक्तियाँ, उन्हें साथ है लाना, देववृत्तियों का अब फिर से, है संगठन बनाना,

सत्प्रवृत्ति से दुष्प्रवृत्ति का, हमको दम्भ मिटाना, इसीलिए तो पहन लिया है, यह केसरिया बाना।

जिसके ऋषियों ने धरती को, अनुपम ज्ञान दिया था, वैभव-संस्कृति-शाँति-व्यवस्था, का अनुदान दिया था,

जिसका है आभार विश्व के, हर अणु पर, हर कण पर, है प्रभाव मानवी चेतना पर, चरित्र-चिंतन पर,

उसी देव-संस्कृति का ध्वज, फिर जग में है फहराना, इसीलिए तो पहन लिया है, यह केसरिया बाना।

-शचीन्द्र भटनागर-


अश्वमेध लेखमाला - दशमावतार की अश्वमेध प्रक्रिया

कौन करेगा? कैसे होगा? इक्कीसवीं सदी में उज्ज्वल-भविष्य आने की घोषणा? सुनने वालों के मन में न जाने कितने सवालों का उठना स्वाभाविक है। भौतिक क्षेत्र में जहाँ विपत्तियों की बाढ़ है, वहाँ आत्मिक क्षेत्र में विकृतियों का अंधकार छाया हुआ है। समस्याएं दो-चार हो तो समाधान सोचे जांय। स्थिति कुछ ऐसी बन पड़ी है कि समस्याओं की गिनती करने में ही इनसानी बुद्धि का दिवाला निकल चुका है। घर-परिवार के छोटे दायरे से लेकर राष्ट्र-विश्व की व्यापक परिधि तक करुण कराहों का कुहराम मचा है। मूर्धन्यों से लेकर जनसाधारण तक सभी इस पर एकमत हो चले हैं कि परिस्थितियाँ मनुष्य के बूते के बाहर हैं।

लेकिन मनुष्य का बल है ही कितना? विशाल ब्रह्मांड में गतिशील हलचलों और परिस्थितियों में उसका स्थान नगण्य-सा है। सिर खड़े पानी से लदे बादल तक को वह बरसा नहीं सकता। मौत-बुढ़ापे तक को रोकने में असमर्थ है। अपनी यह असमर्थता जिस दिन उसे समझ में आ जाती है, उसी क्षण वह सामर्थ्य अवतरित होने लगती है-जो धरती से लाखों गुना भारी भरकम ग्रह-नक्षत्रों को उनकी कक्षाओं में ऐसे आसानी से घुमाती है जैसे कोई बालक गेंद घुमाता है। यह वही सामर्थ्य है-जिसके संकेत मात्र पर प्रकृति सामान्य नदी की तरह अपना करतब दिखाने के लिए विवश है। यह सृष्टि उसी की रचना है और उसे अपनी इस सुरम्य रचना का दुखद अंत कदापि सहन नहीं।

सृष्टि के इतिहास में जब कभी विनाश की घटाएँ-घहराई हैं,तब उसी का समाधान करने के लिए सूक्ष्म-जगत में एक दिव्य चेतना प्रादुर्भूत होती रही है। इस दिव्य चेतना को ही भगवान का अवतार कहा जाता रहा है। समय की आवश्यकता के अनुसार ही वह अपना स्वरूप प्रकट करते रहे हैं। युग की समस्याओं से उत्पन्न असंतुलन को सही करने और युग प्रवाह को उलटने के लिए भगवान उसी क्रम में लीला रचते रहे हैं। सृष्टि के आरम्भ में सर्वत्र जल ही जल था। प्राणि जगत में जलचरों की ही प्रधानता थी, तब उस असंतुलन को मत्स्यावतार ने साधा संतुलित किया। जब जल और थल पर प्राणियों की हलचलें बढ़ी तो उसके अनुरूप कच्छप काया ने संतुलन बनाया। उन्हीं के नेतृत्व में समुद्र मंथन के रूप में प्रकृति दोहन का पुरुषार्थ सम्पन्न हुआ। हिरण्याक्ष ने समुद्र में छिपी सम्पदा को ढूँढ़कर उसे अपने ही एकाधिकार में कर लिया तो भगवान का वाराह रूप ही उसका दमन करने में समर्थ सक्षम हो सका।

जब मनुष्य अपनी आवश्यकता से अधिक कमा सकने में समर्थ हो गया तो संकीर्ण स्वार्थपरता से प्रेरित संचय की प्रवृत्ति भी बढ़ी। संचय और उपभोग की पशु प्रवृत्ति को उदारता में परिणत करने के लिए भगवान वामन के रूप में छोटे-बौने और पिछड़े लोग उठ खड़े हुए और बलि जैसे सम्पन्न व्यक्तियों को स्वेच्छापूर्वक उदारता अपनाने के लिए सहमत कर लिया। उच्छृंखलता जब उद्धत और उद्दंड हो जाती है तो शालीनता से उसका शमन नहीं हो सकता। प्रत्याक्रमण द्वारा ही उसका दमन करना पड़ता है। ऐसे अवसरों पर नृसिंहों की आवश्यकता पड़ती है और उन्हीं का पराक्रम अग्रणी रहता है। उन परिस्थितियों में भगवान ने नर और व्याघ्र का समन्वय आवश्यक समझा तथा नृसिंह अवतार के रूप में दुष्टता के दमन एवं सज्जनता के संरक्षण का आश्वासन पूरा हुआ। स्वरूप कुछ भी क्यों न रहा हो, भगवान के अवतरण की प्रतिज्ञा एक ही रही है-’दुष्प्रवृत्तियों का उन्मूलन सत्प्रवृत्तियों का सम्वर्धन। मनुष्य के क्षात्रबल, ब्रह्मतेज, शौर्य और भावना को उमगा-उकसाकर अवतार चेतना अपना संकल्प पूरा करती रही है। ऐसा नहीं है कि मनुष्य में शौर्य और भावना का सर्वथा अभाव रहता हो। पर अपने एकांगीपन के कारण भावनाविहीन शौर्य विनाश के उन्मादी ठहाके लगाया करता है और शौर्य विहीन भावना अकर्मण्यता की बेड़ियों से कसी-बंधी आँसू बहाया करती है। अवतार का लीला संदोह मनुष्य की इन दोनों विभूतियों के बीच सामंजस्य पैदा कर इन्हें सही दिशा में सुनियोजित कर देता है। अपनी इस अलौकिक सामर्थ्य और क्रियापद्धति की विशेषताओं के कारण ‘यज्ञ’ को भी भगवान का स्वरूप और अवतार माना गया है। शास्त्रकारों ने-

यस्य राष्ट्रे पुरे चैव भगवान यज्ञ पुरुषः। इप्यते स्वेन धर्मेण जनैः वर्णाश्रमान्विते॥

कहकर इसका महात्म्य बताते हुए ‘भगवान यज्ञ पुरुष’ की संज्ञा दी है। हो भी क्यों न? देवपूजन, संगतिकरण और दान यज्ञ से निष्फल ये तीनों प्रवृत्तियाँ व्यक्ति और समाज के उत्कर्ष की तीन धाराएँ ही हैं। देवपूजन का अर्थ है परिष्कृत व्यक्तित्व-दैवी सद्गुणों का अनुगमन। संगतिकरण अर्थात् एकता--सहकारिता संघबद्धता, दान अर्थात् समाज परायणता, विश्व कौटुम्बिकता उदार सहृदयता। यही वे तीन शाश्वत सूत्र हैं जिनसे मानव और सृष्टि की प्रत्येक समस्या का समाधान सहज संभव है। इनकी शिक्षण प्रणाली को अवतार चेतना का नाम देना यथार्थ ही है।

अंशावतार होते हैं कलावतार भी। पूर्णावतार होने की बात भी दिव्यदृष्टि ऋषियों ने की है। अपने विभिन्न स्वरूपों और अनेकों प्रकारों में अंश और कला की अभिव्यक्ति करते हुए यज्ञ जहाँ अपनी पूर्णता प्राप्त करता है-वह-अश्वमेध है। इसे पहली बार भली प्रकार विकसित करने और पूर्णता देने वाले महाराज पृथु को चौबीस अवतारों में गिना गया। पृथु द्वारा किये गए अश्वमेध का वर्णन करते हुए भागवतकार कहता है-

अथादीक्षित राजा तु ह्यमेधेन शतेन च। ब्रह्मवर्ते मनो क्षेत्रे यत्र प्राची सरस्वती॥ -भगवान चतु. स्कन्ध अ. 29-1

“फिर पृथु ने एक सौ अश्वमेध यज्ञ करने का संकल्प किया जहाँ पश्चिम वाहिनी सरस्वती है ब्रह्म और मनु का ब्रह्मवर्त क्षेत्र है। “ पृथु के बाद अवतार और अश्वमेध जैसे परस्पर घुल-मिल गये। अवतार अश्वमेध हो गया और अश्वमेध अवतार। ‘अश्वमेध’ के अर्थ गाम्भीर्य पर विचार करें तो रहस्य समझ में आ जाता है। मेध शब्द का प्रयोग जब बलि के अर्थों में किया जाता है तो उसका तात्पर्य है-दुष्प्रवृत्तियों का विनाश, क्रूरता,पशुता, नृशंसता उन्मूलन, विच्छेदन हनन। मेध का प्रयोग मेधा के अर्थों में प्रधानतः लिया जाता है। इसके द्वारा मनुष्य के ब्रह्मवर्चस सोई संवेदना, विचार शक्ति, सत्प्रवृत्तियों का जागरण पोषण, अभिवर्धन, संकल्प, मूर्त होता है। अश्व की शब्द व्युत्पत्ति पर ध्यान दें-” अंश-क्वन अश्नुते अछानम अश्नुते व्यापनीति अर्थात् तीव्रगति वाला,मार्ग पर व्याप्त हो जाने वाला। इन अर्थों में अश्वमेध-दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन सत्प्रवृत्ति सम्वर्धन का तीव्रतम सर्वव्यापी होने वाला प्रयास है। “

यही कारण है कि बाद की बाद की अवतार लीलाओं में अश्वमेध के यजन का कोई न कोई स्वरूप, संकेत अथवा विवेचन अवश्य मिलता है। रावण के आतंक को धूल−धूसरित कर धरती पर स्वर्ग का अवतरण करने वाले भगवान राम ने जब अश्वमेध यज्ञ के बारे में वामदेव, जाबालि और कश्यप आदि ऋषिगणों से चर्चा की तो सभी ने प्रसन्नता जाहिर करते हुए कहा-

कुरु-कुरु महाभाग धर्मारण्ये त्वमुत्तमम। दिने-दिने कोटि गुणं यावर्द्वष शतं भवेत॥ -स्क. पु. 3-35-14

ये महाभाग रामचंद्र जी! आप इस धर्मारण्य में उत्तम यज्ञानुष्ठान कीजिए। इसके प्रभाव से स्थल की पवित्रता सौ वर्षों तक बढ़ती चली जायेगी। जो मनुष्यों में

कोटि-कोटि सद्गुणों का विकास और वृद्धि करती

रहेगी। इसी तरह गर्ग संहिता अश्वमेध खण्ड 10-7 में भगवान कृष्ण द्वारा उग्रसेन से अश्वमेध सम्पन्न कराने का वृत्तांत मिलता है। उन्हीं की प्रेरणा और व्यास के कथन के उपराँत सम्राट युधिष्ठिर द्वारा अश्वमेध सम्पन्न किये जाने के विवरण महाभारत अश्वमेधिक पर्व 71-94 में मिलते हैं। परशुराम की अवतार लीला में भी कुछ ऐसे ही प्रयास का दर्शन होता है।

इन सभी का अवतरण बढ़ते हुए अनाचरण के प्रतिरोध और सदाचरण के समर्थन-पोषण के उद्देश्य के लिए हुआ। परशुराम ने “अग्रतः चतुरो वेदाः पृष्ठः सशरो धनुः” का स्वरूप धारण कर सामन्तवादी निरंकुश आधिपत्य को समाप्त कर ब्रह्म विद्या का प्रचार विस्तार किया। राम ने मर्यादाओं के पालन पर जोर दिया तो मर्यादाओं के पालन पर जोर दिया तो कृष्ण ने धूर्तता और छल छद्म से घिरी परिस्थितियों का शमन “विषस्य विषमौषधम” की नीति अपनाकर लिया।

धर्म क्षेत्र में विकृतियाँ बढ़ीं तो उसका स्वरूप साबुन से भी गंदगी फैलने जैसा हो गया। मद्य-माँस मीन-मुद्रा और मैथुन के पंचमकार धर्म की आड़ में लोक व्यवस्था को तहस-नहस करने लगे और जन-जीवन में अस्त-व्यस्तता आने लगी। ऐसी स्थिति में बुद्ध ने धर्म व्यवस्था के लिए सज्जनों को संगठित कर विवेक को सर्वोपरि स्थान पर प्रतिष्ठित किया। “धम्मं शरणं गच्छामि, संघ शरणं गच्छामि, बुद्धं शरणं गच्छामि “ ही बुद्ध का लीला संदोह है। इसका शंखनाद सुनकर बुद्ध के आह्वान पर लाखों परिव्राजक साँस्कृतिक दिग्विजय के लिए निकल पड़े।

परिस्थितियाँ बदलती रही हैं। इसके लिए भगवान को भी अपना आधार बदलने रहना पड़ा है। अश्वमेध अभियान भी तद्नुरूप अपने नये स्वरूप और नई विशिष्टताओं के साथ आयोजित हुए हैं। विकास क्रम की व्यवस्था के अनुरूप भगवान के अवतार का स्वरूप स्तर तथा कार्यक्षेत्र भी विस्तृत होता चला गया। मनुष्य जब तक साधन प्रधान और काय प्रधान था तब तक शास्त्रों और साधनों से काम चलता रहा। लेकिन वर्तमान में परिस्थितियाँ भिन्न हैं।

इस समय बुद्धि-तत्व चतुर्दिक् छाया हुआ है। महत्वाकाँक्षाओं के क्षेत्र में अनात्म-तत्व की भरमार होने के कारण सम्पन्नता और समर्थता का दुरुपयोग ही बन पड़ रहा है। इस विकृति का क्षेत्र सीमित नहीं रहा वरन् समूची मानव जाति को ही इसने जकड़ रखा है। विज्ञान की उपलब्धियों से दुनिया बहुत छोटी हो गई। गतिशील तेजी से सिमटती और द्रुत गति से भागती दुनिया में भगवान का अवतार युगान्तरीय चेतना के रूप में जनमानस के सुविस्तृत क्षेत्र में अवतार का संकल्प मूर्त होना संभव है। पूर्वार्ध में बुद्ध ने धर्म-चक्र का प्रवर्तन किया था। साँस्कृतिक विजय की वैजयंती फहराई थी। लाखों व्यक्तियों ने इस प्रक्रिया में अपना योगदान सम्पन्न किया। आनंद जैसे मनीषी, बिम्बिसार जैसे श्रीमंत, आम्बपाली जैसे कलाकार और अंगुलिमाल जैसे दुस्साहसी, पराक्रमी प्रतिभाशाली लोग बड़ी संख्या में अपने तरह के अनूठे उस अश्वमेध अभियान के अंग बने थे। बुद्ध के पहले हुए अवतारों का कार्यक्षेत्र सीमित था। बुद्ध के पहले हुए अवतारों का कार्यक्षेत्र सीमित था। उनके समय की समस्याएँ छोटी और स्थानीय थीं। बुद्धकाल तक समाज विस्तार बड़े क्षेत्र में हो गया था। इसलिए बुद्ध का कार्य भी भारत की सीमाओं तक सीमित नहीं रहा।

उन दिनों जितने व्यापक प्रयास सम्भव थे वे सभी अपनाए गए। इसका प्रभाव भी पूरे एशिया में फैला। उससे भी आगे बढ़कर अन्य महाद्वीपों तक अपना आलोक पहुँचाया। बुद्धावतार का उत्तरार्ध कल्कि अवतार (प्रज्ञावतार) है। जो इन दिनों सम्पन्न हुआ है। भविष्य पुराण में किये गये अलंकारिक चित्रण में कल्कि भगवान को घोड़े पर सवार हाथ में तलवार लिये चित्रित किया गया है। यह और कुछ नहीं उनके द्वारा सम्पन्न किये जाने वाले अश्वमेध अभियान का संकेत भर है। बुद्धि प्रधान इस युग में समस्याएँ भी चिंतन प्रधान हैं। मनुष्य की प्रेरणाओं का केन्द्र मान्यताएँ-विचारणाएँ, इच्छाएँ होती हैं। उन्हीं के प्रवाह में समाज बहता है। ऐसे समय में अवतार का स्वरूप भी तद्नुरूप ही हो सकता है। समाधान भी अश्वमेध में छुपे हुए अर्थ गाम्भीर्य को प्रकट करने पर ही सम्भव है।

लोकमानस में घुस पड़ी विकृतियों को उलटने तथा अवांछनीयता अनैतिकता एवं मूढ़ मान्यताओं को निरस्त करने में साँस्कृतिक दिग्विजय अभियान ही सफल हो सकता है। मानवी चेतना को उत्कृष्टता ही दिशा में घसीट ले जाने वाला और सामाजिक क्षेत्रों को समान रूप से प्रभावित करने वाला प्रवाह ही अपने समय का अवतार हो सकता है और वही हो भी रहा है। कल्कि अवतार और उसके विश्वव्यापी अश्वमेध अभियान को इसी रूप में देखा समझा जा सकता है।

अवतार का आवेश दिव्य आत्माओं पर उतरना और उसे जो अभीष्ट होता है करा लेता है। दिव्य आत्माएँ उसकी प्रक्रिया का निमित्त मात्र बनती हैं। निष्कलंक अवतार का आवेश उसके साँस्कृतिक दिग्विजय अभियान से आ जुड़ने वाले परिव्राजकों-समयदानियों पर उतरेगा। उनसे ऐसा कुछ करा लेगा जिसे अनुभव कर वे स्वयं तो कृतकृत्य होंगे ही समाज और जन-जीवन भी धन्य-धन्य हो उठेगा। युगावतार का लीला संदेह इस समय अपनी पूरी तेजी पर है। वातावरण में परिवर्तन भी उसी तीव्रगति से हो रहे हैं। जिसके प्रभाव से वर्तमान युग का अंधियारा छँटने और इक्कीसवीं सदी के उज्ज्वल भविष्य में बदल जाने में देर नहीं।


संप्रदायवादी विषमता (Kahani)

वैदिक ऋषियों की राष्ट्र संबंधी परिकल्पना बड़ी विराट रही है। वे “राष्ट्रं वा अश्वमेधः” कहकर समूचे विश्व को एक ही धर्म-एक ही संस्कृति-एक ही शाश्वत मान्यता के दायरे में लाते हुए एकता-अखण्डता के पक्ष में रखने के पक्षधर रहे हैं। प्रस्तुत अश्वमेध श्रृंखला वस्तुतः समूचे भारत ही नहीं-विश्व को एकात्मता के सूत्र में आबद्ध करने के लिए महाकाल की प्रेरणा से ही बनी है। इसमें यजन प्रक्रिया से अधिक उस मूलभूत भावना का महत्व है जिसमें राष्ट्र की प्रसुप्त प्रतिभा व पराक्रम को जगाया जाता है। आज के संप्रदायवादी विषमता एवं जातिवादी अलगाव से भरे युग में अश्वमेध यज्ञों में भागीदारी का महत्व और भी अधिक बढ़ जाता है।


Quotation

दुबारा सपना देखा कि वह कुत्ता बन गई। मालकिन के रसोई घर में घुसी और व्यंजनों पर हाथ साफ करने लगी। मालकिन ने देख लिया, तो मोटे बेलन से पीट-पीट कर उसकी कमर तोड़ दी। अब की बार वह और भी जोर से कराही। बार-बार कराहते देखकर मालकिन ने उसे जगाया और चूमते हुए पीठ पर हाथ फिराया। बिल्ली ने महत्वाकाँक्षी सपनों की निरर्थकता अनुभव की और मालकिन का हाथ चाटते हुए बोली-”जो हूँ सो ही रहूँगी। निरर्थक सपनों में न उलझूँगी।’’


राजा ने समझा (Kahani)

कहते है कि कलिंग देश का राजा मधुपर्क खा रहा था। उसके प्याले में से असावधानी से थोड़ा-सा शहद टपक कर जमीन पर गिर पड़ा। उस शहद को चाटने मक्खियाँ आ गयी। मक्खियों को इकट्ठी देख छिपकली ललचायी और उन्हें खाने के लिए आ पहुँची। छिपकली को मारने बिल्ली पहुँची। बिल्ली पर दो-तीन कुत्ते टूटे। बिल्ली भाग गयी और कुत्ते आपस में लड़कर घायल हो गये।

कुत्तों के मालिक अपने-अपने कुत्तों के पक्ष का समर्थन करने लगे और एक दूसरे का दोष बताने लगें। उस पर लड़ाई ठन गयी। लड़ाई में दोनों ओर की भीड़ बढ़ी और आखिर सारे शहर में बवाल हो गया। दंगाइयों को मौका मिला तो सरकारी खजाना लूटा और राजमहल में आग लगा दी। राजा ने इतने बड़े उपद्रव का कारण पूछा तो मंत्री ने जाँचकर बताया कि भगवन् आप के द्वारा असावधानी से गिराया हुआ थोड़ा-सा शहद ही इतने बड़े दंगे का कारण बना गया है। तब राजा ने समझा कि छोटी-सी असावधानी भी मनुष्य के लिए कितना बड़ा संकट उत्पन्न कर सकती है।


अपनों से अपनी बात- - कर्मवीरों का प्रशस्ति पुरस्कार ज्ञान यज्ञ को सेवाएँ देने वालों को लोग जानें, याद करें।

यों जयपुर अश्वमेध की सफलता महाकाल के आशीर्वाद का प्रतिफल है, तथापि इस आयोजन से जुड़े ग्राम प्रदक्षिणा कार्यक्रम में दिन-रात प्रव्रज्या करने वाले, घर-घर अलख जगाने वाले, उसकी सफलता के निमित्त साधना करने वाले और रात-दिन एक करके वहाँ की व्यवस्थाएँ संभालने वाले कर्मवीर अश्वमेध के अविस्मरणीय अध्याय हैं। वे भुलाये नहीं भूलते। जब भी चर्चा होती है, वंदनीया माता जी गदगद अन्तःकरण से नींव के उन सुदृढ़ आधार स्तम्भों को ही याद करती है, जिन्होंने ज्ञान यज्ञ के अग्रिम मोर्चे संभाले और अज्ञानान्धकार से जूझते जनमानस के लिए सच्चे अर्थों में प्रकाश स्तम्भ बने।

अब हम भूल सुधारेंगे

एक बात स्पष्ट है कि अश्वमेध एक युद्ध एक कार्यक्रम है। प्राचीन काल में देव संस्कृति की बलपूर्वक स्थापना के लिए घोड़ा छोड़ा जाता था जो उसे पकड़ने का साहस करता था उसे युद्ध करना पड़ता था। आज का घोड़ा सिद्धाँतों का है। युद्ध संस्कृति और सभ्यता का है। एक ओर आँसू बहाती मानवीय संस्कृति है संवेदना है, सामाजिक जीवन से समाप्त हो रहे मानवीय मूल्यों की स्थापना का प्रश्न है तो दूसरी ओर आसुरी प्रवृत्तियाँ हैं हिंसा है, अपराध हैं, आदर्शविहीन आचरण और चिंतन में प्रविष्ट हो गई भ्रष्टता है। इसे देवासुर संग्राम कहा जा सकता है। एक ओर देवत्व खड़ा है दूसरी ओर आसुरी प्रवृत्तियों की काल मुख सेना। प्रश्न यह है कि संस्कृति और संवेदना जीतेगी अथवा पीड़ा-पतन और पराभव का त्रिपुरासुर?

स्पष्ट है कि यह अश्वमेध -अनुष्ठन एक प्रकार का ज्ञान यज्ञ है जिसमें जन-जीवन को अंधकार से प्रकाश की ओर चलने के लिए प्रेरित करना है, ज्ञान देना है, अन्तर्मुखी बनाकर जीवन के विराट का बोध कराना प्रमुख है। उसे बुराइयों से दुष्प्रवृत्तियों से अज्ञान से बचाना उसी का दूसरा पक्ष पहलू है। प्रदर्शन प्रधान यज्ञ तो उसका अंतिम भाग है। इसमें श्रेय उन्हीं कर्मवीरों को जाता है जो गाँव-गाँव अलख जगाते हैं, स्वयं साधना करते हैं औरों को साधना में प्रवृत्त करते हैं, ज्ञान-रथ, झोला-पुस्तकालय चलाते हैं, पत्रिकाओं के सदस्य बनाते हैं। देवासुर संग्राम में देवत्व के लिए लड़ने वाले, उसे विजयी बनाने वाले कर्मवीर योद्धा वस्तुतः यही लोग हैं जिनको भुला देना इतिहास की सबसे बड़ी भूल होगी।

देवसेना के युद्धक अलंकरण

जब भी कोई युद्ध समाप्त होते हैं देश के लिए लड़ने वालों को “गैलेन्द्री एवार्डस” वीरता पुरस्कार प्रदान किये जाते हैं। ब्रिटिश काल में विक्टोरिया क्रास सबसे बड़ा पदक था-हमारे देश में परम वीर चक्र, महावीर चक्र, वीर चक्र, कीर्ति चक्र आदि प्रदान किये जाने की परम्परा है। खेत रहे सैनिकों की स्मृति भी उलटे हथियारों की सलामी परेड से की जाती है। 26 जनवरी गणतंत्र दिवस पर राष्ट्रीय सम्मान और गौरव की रक्षा के लिए कार्य करने वालों को भारत रत्न, पद्म-विभूषण, पद्म-श्री, अर्जुन पुरस्कार (खेल जगत) कल-श्री (कला एवं संस्कृति) आदि उपाधियाँ और प्रशस्ति पत्र प्रदान किये जाते हैं इनका एक मात्र उद्देश्य अपने देश, धर्म, संस्कृति और राष्ट्रीय गौरवों की रक्षा करने वालों को श्रेय सम्मान और यश प्रदान करना होता है जिस देश में यह परम्पराएँ जितना व्यापक होती हैं वहाँ इस तरह के आदर्शों का विकास-विस्तार भी होता है। इस “साम प्रक्रिया” को भुलाया नहीं वरन् उसे और अधिक विस्तृत किये जाने की आवश्यकता है। परम पूज्य गुरुदेव ने “युग निर्माण योजना के शत सूत्रीय कार्यक्रमों” में सत्कार्यों के अभिनंदन को बहुत अधिक महत्व दिया है। सच पूछा जाय तो पाक्षिक पत्रिका के प्रकाशन का मूल-भूत प्रयोजन भी यही है।

अश्वमेध अभियान का अभिनव अलंकरण

ज्ञान यज्ञ के कर्मवीरों को उचित सम्मान देने की दृष्टि से प्रज्ञा अभियान शाँतिकुँज हरिद्वार और युग निर्माण योजना गायत्री तपोभूमि से निम्न प्रशस्ति कर देने का निश्चय किया गया है। यह प्रशस्ति पत्र अश्वमेध यज्ञ के अंतिम दिन समारोह-पूर्वक प्रदान किये जायेंगे। उससे ज्ञान यज्ञ के होताओं का-अश्वमेधिक कर्मवीरों का कुछ तो सम्मान होगा-यथार्थ सम्मान तो अन्तःकरण को मिलने वाला आत्म-संतोष और वह देव अनुग्रह है जिसकी वर्षा उन परिजनों पर होगी और हुए बिना नहीं मानेगी। प्रशस्ति पत्र यह होंगे :-

1-यज्ञ वीर-अश्वमेध यज्ञ के लिए न्यूनाधिक तीन माह का समय देने वाले गाँव-गाँव, घर-घर प्रव्रज्या करने वाले तथा व्यवस्थाओं में विशिष्ट योगदान देने के लिए “यज्ञ वीर” उपाधि प्रदान की जायेगी।

2-ज्ञान शिल्पी-हमारे वह परिजन जो निरंतर ज्ञान-रथ, झोला-पुस्तकालय चलाते है और अपने इस संपर्क क्षेत्र को जिन्होंने विशेष रूप से अश्वमेध का संदेश दिया-अश्वमेधिक कार्यक्रमों से जोड़ दिया।

3-साधक शिरोमणि- इस अश्वमेध की सफलता के लिए सवा लक्ष गायत्री महामंत्र का जप एक हजार गायत्री चालीसा के वितरण द्वारा गायत्री उपासना की प्रेरणा देने का कार्य करने वालों को यह प्रशस्ति पत्र दिया जायेगा।

4- श्रद्धा-भूषण-घर-घर श्रद्धा का बीजारोपण करने के लिए न्यूनतम नमन वंदन जितनी उपासना के लिए गायत्री माता के चित्र की एक सौ घरों में देव-स्थापना एवं अश्वमेध घट स्थापित कराने वाले श्रद्धा-भूषण होंगे। जहाँ चित्र स्थापना होगी उन्हें नियमित गायत्री उपासना, गायत्री चालीसा अथवा प्रातःकाल देव-चित्र को नमन वंदन करने का संकल्प भी कराया जाना चाहिए।

5-शत प्रेरक, सहप्रेरक- अखण्ड ज्योति, युग निर्माण योजना, युगशक्ति गायत्री (गुजराती व अन्य भाषाओं की) पत्र पत्रिकाओं के एक सौ सदस्य बनाने वालों को “शत-प्रेरक” तथा एक हजार सदस्य बनाने वालों को “सहस्र-प्रेरक” प्रशास्ति पत्र प्रदान किये जायेंगे।

एक अविस्मरणीय यादगार

पाँचों प्रकार के प्रशस्ति पत्रों में पाँच रंगों के आकर्षण एवं प्रेरणा-प्रद चित्र होंगे, इन सभी अलंकृत व्यक्तियों का भाव भरा अभिनंदन होगा तथा सेवाओं से सामाजिक जीवन को मिलने वाले पुण्यफल का गुणानुवाद अंकित होगा। आज की दुष्प्रवृत्तियों को काटने और सत्प्रवृत्तियों के रचनात्मक विकास की दृष्टि से यह सर्वाधिक समर्थ अस्त्र-शस्त्र हैं। ज्ञात नहीं भगवान परशुराम ने अपने फरसे से लोगों के सिर काटे थे अथवा नहीं पर जनमानस में व्याप्त अनास्था, कुँठा, दुश्चिंतन और दुराचरण को काटने वाले यह अस्त्र-शस्त्र निश्चित ही वह परशु होंगे जिनसे लोगों के मनों में सद्चिंतन का विकास होगा। सद्कर्म और सद्व्यवहार का विस्तार इसी तरह संभव होगा। अतएव इन महारथी योद्धाओं का सम्मान इस अश्वमेध का सर्वाधिक महत्वपूर्ण कार्यक्रम होगा। अपने परिजन न केवल इन के योग्य बने अपितु जिनकी सेवाएँ इस स्तर की हों उनके नाम-पते भी अवश्य भिजवायें ताकि इस ज्ञान यज्ञ को सफल और सार्थक बनाया जा सके।


महाभारत की रचना (Kahani)

महाभारत का अंतिम श्लोक पूर्ण हुआ। गणेश जी की अनवरत चलने वाली लेखनी को विश्राम मिला। महर्षि व्यास जी हँसते हुए गणेश जी से पूछा -”भगवन्! मैं इतने श्लोक बोलता रहा। अनेक प्रसंग तथा अनेक व्यवधान बीच में आये पर आप मौन ही रहे। इसका क्या रहस्य है?”

गणेश जी हँस पड़े, उनने कहा-”व्यास जी! जानते नहीं शक्ति का स्रोत संयम ही तो है। मैंने मौन रहकर ही तो इतना बड़ा महाभारत लिख सकने का कार्य किया है। मौन की महत्ता किससे छिपी है। वाणी का संयम सबसे बड़ा संयम माना जाता है, जो मौन रहता है, कम बोलता है वही तो कुछ कर गुजरता है।”

प्रसंग समाप्त होने ही वाला था कि अधूरी बात को पूरी करते हुए नंदी ने कहा-”सभी दीपों में तेल होता है किसी में कम किसी में ज्यादा। अक्षय तेल किसी में नहीं। प्राणियों में शक्ति तो रहती है पर वह विपुल नहीं, अक्षय नहीं। संयम द्वारा जो उसे नष्ट होने से बचा लेते हैं वे ही तो सिद्धि प्राप्त कर पाते हैं।” व्यास और गणेश दोनों ही इस तथ्य पर सहमत थे। महाभारत की रचना दोनों के सहयोग से इसी आधार पर हो सकी।

*समाप्त*