जो अभीष्ट है, उसे अंतरंग में खोजिए*******

सामान्यतया समाज में बहिर्मुखी अधिक दिखाई देते हैं। बहिर्मुखी दृष्टि बाहर का संसार देखती है। जो पसारा फैला पड़ा है, उसी का मूल्याँकन करती और उसी में रस खोजती है, जबकि अपने भीतर इससे भी अधिक बहुत मूल्यवान छिपा पड़ा है, जिस पर न कभी ध्यान जाता है, न कभी देखने की ललक ही उठती है। इसे विधि की विडम्बना ही कहना चाहिए कि पैरों के नीचे की जमीन में दबी हुई प्रचुर खनिज संपदा की ओर ध्यान ही नहीं जाता और आसमान के तारों से वैभव खोज लाने के लिए मन उड़ानें भरता रहता है।

वस्तुतः ब्रह्मांड की ही एक छोटी प्रतिकृति यह पिण्ड भी है। जो बाहर दीखता है, उसके बीज भीतर विद्यमान हैं। उन्हें उगाकर अभीष्ट आकाँक्षाएँ पूरा कर सकने वाले कल्पवृक्ष जैसे व्यक्तित्व की उपलब्धि प्राप्त कर सकना अपेक्षाकृत सरल है। बाहर का बिखराव व विस्तार बहुत व्यापक है। उसे ढूंढ़कर एकत्रित करने में इतना श्रम व समय लगता है जबकि घर का उत्पादन कहीं अधिक सस्ता पड़ता है।

मानवी अन्वेषण बुद्धि ने प्रकृति के विस्तार में से बहुत कुछ खोजा व पाया है। यह पुरुषार्थ और मनोयोग का ही प्रतिफल है। यही प्रयास यदि अंतरंग की खोज में नियोजित हो सके तो उससे भी कहीं अधिक मूल्यवान पाया जा सकता है, जितना कि जड़ जगत की बालू में से तेल निकालने के फलस्वरूप उपलब्ध होता है। मानवीसत्ता विलक्षण है-अद्भुत है। उसमें जड़ जगत की सभी विशेषताएँ निहित हैं। साथ ही वैभव चेतना की विभूतियों का सारतत्व संक्षिप्त किन्तु परिपूर्ण मात्रा में विद्यमान भी है। खोज का क्षेत्र बाहर भी बना रहे किन्तु अंतर्जगत की उपेक्षा की जाय, जहाँ आत्मसत्ता के कण-कण में सर्वाधिक आवश्यक व उपयोगी जीवन संपदा ओतप्रोत विराजमान है।

हम अपने को देखें, परखें, खोजें। अपना विश्लेषण करें व अंतर्निहित विभूतियों का साक्षात्कार करें तो प्रतीत होगा कि जो हमारे लिए नितान्त आवश्यक है, वह भीतर ही मौजूद है। यह वैभव इतना अधिक समर्थ व सशक्त है कि यदि उसे ठीक तरह नियोजित किया जा सके तो उसे खींच बुलाना-अनुदानों की अनुकम्पा अपने ऊपर बरसा पाता तनिक भी कठिन न रहेगा, जिसकी तलाश में हर प्राणी निरंतर मृगतृष्णा में खाली भटकता व कष्ट उठाता रहता है।


एक प्रेमी की व्यथा

“गुरुदेव! मुझे पता नहीं तुम कहाँ आए? क्या करते हो? मेरे मन में तो आज विरह-व्यथा के बादल घुमड़ रहे हैं। प्रेमी होंगे हो तुम्हें पता होगा, विरह की वेदना में कितनी छटपटाहट है। प्राणाधार! तुम कहाँ हो तुम्हें पुकार कर मेरा मन अधीर हो चला। संसार से विरक्ति कर ली, अब मेरा कौन रहा? तुम भी छोड़ दोगे? तुम्हारे भक्त की, तुम्हारे प्रेमी की कैसी दशा है? क्या तुम भी उसे देखने नहीं आयेंगे? क्या यों ही मन भटकता रहेगा और तुम दर्शन नहीं दोगे?”

“विरह की पीड़ा घनी-घनी और घनी होती जा रही है। मुझे अपनी परम ज्योति का साक्षात्कार करा कर संतोष दो गुरुवर! कब से आंखें तुम्हारी ओर निर्निमेष देख रही हैं। तुम कहोगे मैं पागल हो गया हूँ। देवेश! कैसे बताऊँ मेरी मनोदशा तुम्हें न पाकर कैसी हो गई है।”

“धैर्य टूट रहा है, इधर उधर दौड़ रहा हूँ, व्याकुल होकर भुजा पसारे तुम्हें पा जाने के लिए बेचैन भटक रहा हूँ। हृदय रोने लगता है। विरह अग्नि से सारा शरीर झुलसा जा रहा है। कैसे निष्ठुर हो तुम। अपने समीप नहीं रखना था तो जीवन क्यों दिया था? जीवन दिया तो भक्ति क्यों दी? भक्ति दे दी तो प्रेम विहीन ही रखते। पर अब जब यह कसक जाग गई है तो तुम्हें पाये बिना जीवित कहाँ रह सकता हूँ? तुम कहो तुम कहाँ हो? आते क्यों नहीं? दिखाई क्यों नहीं देते? जीवन की नाव में विरह का जल भर चुका है। नाव तली में बैठने को है, लगता है अब भी बचाने नहीं आओगे, तो संसार मेरे विश्वास को झूठा नहीं कहेगा? मेरी तपश्चर्या को विक्षिप्त का प्रलाप नहीं कहेगा क्या? क्या तुम यह सब सुनकर भी नहीं आओगे?”

“साँसें गहरी हो गई हैं, गर्म हो गई हैं। शरीर मूर्छित पड़ा है। रात में नींद नहीं आई। मन तुम्हारे लिए दौड़ता रहा। नक्षत्रों के बीच एक क्षण टिक कर तुम्हारे सौंदर्य का रसपान करने के लिए बिलखता रहा। तुम्हारी ज्योति कभी पूर्व में दिखाई दी, कभी पश्चिम में। इतना भटकाते हो, कभी दक्षिण में होते हो और जब तक आत्मा वहाँ पहुँचे तुम उत्तर की ओर क्यों चले जाते हो। क्या यह छलना ही तुम्हारी नीति है? क्या विरहाग्नि में मुझे जलाकर ही तुम्हें सुख मिलेगा?”

“तुम्हें तो करुणा-सागर कहते हैं, पर तुम बड़े निष्ठुर हो। तुम दीन-बन्धु हो पर तुम्हें मेरी दीनता पर दया कहाँ आई? कहते हैं तुम इतने स्नेह कातर हो कि प्रेम से भरी एक ही आवाज पर दौड़े चले आते ही पर अपना मन सारे ब्रह्मांड में भटक गया पर तुम कहीं भी तो नहीं दिखाई दिए। दयानिधि! तुम्हें मेरी पीड़ा का पता होता तो यों ही प्रकृति की ओट में न छुपे रहते। तुम ऐश्वर्यवान हो, प्रभुता संपन्न हो, सारे संसार में तुम्हारा ही वैभव है, तुम भला क्यों मेरे पास आने लगे? यों ही भटकाना था तो प्रेम का प्रकाश अन्तःकरण में जगाया ही क्यों?”

थके-थके शरीर में भी आत्मा को चैन नहीं मिलता। फिर एक प्रकाश आता है बुद्धि में ओतप्रोत हो जाता है। मस्तिष्क में फिर कोई कहने लगता है “आराध्य! मुझसे दूर नहीं हो। मन में तुम्हीं तो बसे हो, आंखों में तुम्हारी ही तो छवि विद्यमान है। मेरी पहुँच के बाहर थोड़े ही हो। अभी हाथ बढ़ा दूँ तो तुम्हें पकड़ लूँ। बहुत समीप हो तुम। कहीं ऐसा तो नहीं, फिर छल करने आये हो। अब पूरी तरह विश्वास कर लूँगा कि अब नहीं जाओगे, तभी हाथ बढ़ाऊंगा। तुम्हें मरे प्रेम की प्यास है तो फिर तुम मुझसे दूर क्यों हो जाते हो? अच्छा अब मैं हाथ बढ़ता हूँ तुम ओझल नहीं हो रहे हो पर पास भी तो नहीं आते। चमक उठते हो तुम जब मैं तुम्हें ढूंढ़ता हूँ, पर जब तुम्हीं में आत्म सात हो जाने के लिए दो पग आगे बढ़ता हूँ तो मैं ही मैं अकेला रह जाता हूँ तुम कहाँ चले जाते हो? कैसी विलक्षण कहानी है, कुछ कहते नहीं बनता गूँगे के गुड़ की सी मधुरिमा मेरे अंग प्रत्यंग में भर देते हो। इतना विश्वास दिलाते हो जितना संसार के करोड़ों जन मिलकर भी नहीं दिला सकते, पर इतने अविश्वासी हो कि एक ही क्षण में दूर भाग जाते हो। प्रभु! प्रेम की पीड़ा इतनी न बढ़े कि आग बन जाए और उसमें तुम्हारे भक्त का अस्तित्व ही समाप्त हो जाए।”

“समाप्त होना ही है तो हो जाए। कब तक यह दर्द सहूँ? तुम्हारे सान्निध्य की ललक है। चाह से मन भर गया है। तुम्हें पाने के लिए जो कुछ था सब छोड़ दिया, अब जो है वह तुम्हारा ही तो है। तुम्हारा तुममें ही समाप्त होता है तो हो जाने दूँगा। अब यह नहीं भूलूँगा कि मुझे अपना अहंभाव भी तुम्हीं में समर्पित कर देना है। अपने अस्तित्व को अब मिलन के रास्ते में बाधा न बनने दूँगा। पैरों में चाहे कितने काँटे और कंकड़ चुभें पर मुसकराता हुआ चलूँगा, जब तक तुम्हें स्वयं समा न जाऊँ, कितनी ही पीड़ा हो, कितनी ही छटपटाहट हो, हूक और ललक उठे मेरे पाँव रुकेंगें नहीं। दीवानगी का अंत तो अब तुममें समाकर ही होगा।”


आत्मज्ञान की उपलब्धि ही सर्वश्रेष्ठ सिद्धि

अनेक योनियों में रहकर, करोड़ों वर्ष तक कष्ट भोगने के बाद भटकते हुए जीव को मनुष्य शरीर प्राप्त करने का सौभाग्य प्राप्त होता है। प्रमादवश कोई इसे यों ही व्यर्थ गँवा दे, यह दूसरी बात है अन्यथा मनुष्य जीवन जैसी सुविधायें मिलना किसी भी योनि में संभव है, नहीं। मनुष्य ही एक ऐसा जीव है जो विचार कर सकता है, योजनायें बना सकता है, धर्माचरण कर सकता है, साधना कर सकता है। यह विशेषतायें, यह श्रेष्ठ उपलब्धियाँ इस बात की ओर संकेत करती हैं कि मनुष्य-जीवन प्राप्त हो जाना कोई साधारण बात नहीं है।

अपनी योग्यताओं का उपयोग लोग साँसारिक सुखोपभोग के साधन प्राप्त करने में भी कर सकते हैं किन्तु धन, स्त्री, मिष्ठान्न, पद, राजनीतिक महत्व आदि भौतिक विभूतियाँ भी स्थाई कहाँ है? माना कि इनमें इन्द्रिय-तृप्ति-जन्य सुख और हर्ष की अनुभूति होती है पर क्या यह किसी से छुपा है कि भोग अंत में रोग और शोक के रूप में ही परिवर्तित होते हैं। इन्द्रियाँ कभी तृप्त नहीं होती भोग-भोग की इच्छा को और भी अतृप्त बनाता है। वासना, वासना को ही भड़काती है फलस्वरूप मनुष्य दिन-प्रति दिन वृद्धावस्था और मृत्यु की ओर ही अग्रसर होता रहता है। साँसारिक कामनाओं में प्रत्येक दृष्टि से संतुष्ट व्यक्ति भी भय से नहीं बच पाते। रोग और शोक तो उन्हें भी घेरे रहते हैं।

हमें सुख की अभिलाषा क्यों हैं? और दुःख से निवृत्ति क्यों नहीं होती? हय एक महत्वपूर्ण प्रश्न है और इस सुलझा लेना ही ज्ञान का अंतिम ध्येय है। पर मनुष्य अज्ञान के कारण अपने सही जीवन-पथ का निर्धारण नहीं कर पाता इससे यह भी कहा जा सकता है कि उसे जीवन के प्रति सच्चे दृष्टिकोण का ज्ञान नहीं मिल पाता। पक्षी जिस प्रकार अपने आप को पक्षी शक्तिवाला, शेर अपने को शेर की शक्ति वाला, बंदर-बंदर की शक्ति वाला मानता है, मनुष्य भी ठीक उसी प्रकार अपने को मनुष्य की शक्ति वाला मानता है। मानवीय दृष्टिकोण से यह बात सही भी हो सकती है। शारीरिक दृष्टि से विचार करने पर यह बात बुद्धिसंगत भी हो सकती है। किन्तु घटनायें, हमें उस विचारधारा से सहमत होने के लिये बार-बार विवश करती हैं। जन्म, मृत्यु, रोग, शोक, धरती आकाश के विराट स्वरूप हमें यह सोचने को विवश करते हैं कि मनुष्य केवल मनुष्य जंतु मात्र ही नहीं है वह कोई और भी इससे भिन्न, विलक्षण सूक्ष्म तत्व है।

अपने आपको जानना ही आत्मज्ञान प्राप्त करना है। अपने को शरीर मानना यह अविद्या है और आत्मज्ञान प्राप्त करना ही विद्या है। पहली मृत्यु है और दूसरी अमरता। एक अंधकार है दूसरा प्रकाश, एक जन्म-मृत्यु है दूसरा मोक्ष। एक बंधन है दूसरा मुक्ति। नरक और स्वर्ग भी इन्हें ही कह सकते हैं। ये दोनों एक दूसरे से अत्यन्त विपरीत परिस्थितियाँ हैं, दोनों भिन्न-भिन्न दिशाओं को ले जाती हैं, इसलिये एक को ग्रहण करने के लिये दूसरे को त्यागना अनिवार्य हो जाता है।

ज्ञान और अज्ञान की समान परिस्थितियाँ इस विश्व में विद्यमान हैं। जिन्हें पदार्थों से प्रेम होता है वे प्रेयार्थी अज्ञानी कहे जाते हैं। भले ही उन्हें साँसारिक ज्ञान अधिक हो पर ब्रह्मवेत्ता पुरुष उन्हें कभी विद्वान नहीं मानते और नहीं उन्हें महत्व दिया जा सकता है क्योंकि भोग की इच्छा करने वाले व्यक्ति अँधेरे में चलते और अंधों की तरह ठोकरें खाते हैं।

आत्म-ज्ञान प्राप्त करना वस्तुतः ईश्वर की सबसे सुन्दर सेवा और उपासना है। हमारे पूर्वज कहते हैं परमात्मा बड़ा मंगल कारक है उसकी दृष्टि भी बड़ी मंगलमय है। यहाँ कष्ट और दुःख की कोई बात ही नहीं है, पर लोग अज्ञान-वश कष्ट भोगते और परमात्मा को दोषी ठहराते हैं। इसलिये इन मूढ़जनों से आत्मज्ञानी ही श्रेष्ठ है, जो परमात्मा की कलाकृति का अपने गुण कर्म और स्वभाव के द्वारा अनुमोदन करता है। आत्मज्ञानी ईश्वर के गुणानुवाद न गाये तो भी वह सच्चा ईश्वर भक्त ही माना जायेगा और परमात्मा भी उसे अपना प्यार दुलार अजस्र रूप में प्रदान करेगा। अपने आज्ञाकारी और कर्मनिष्ठ बेटे से प्यार कौन नहीं करता? भगवान निश्चित रूप से उन्हें अपना प्रिय मानता है।

आत्म-तत्व का ज्ञान मनुष्य के लिये सभी दृष्टियों से उपयुक्त है। शास्त्रकार का कथन है कि- “तेषाँ सुखं शाश्वतं नेतरेषम” अर्थात् आत्म-ज्ञान के सुख से बढ़कर और कोई सुख नहीं। कठोपनिषद् अध्याय दो की दूसरी बल्ली में आत्मा की विशदता और उससे प्राप्त होने वाले महान सुख का इस प्रकार वर्णन है-

“जो समस्त जीवों का मूल, चेतन और सब प्रकार की कामनाओं को पूर्ण करता है उस शरीरस्थ आत्मा का जो प्राप्त कर लेते हैं उन्हें ही नित्य और शाश्वत शाँति उपलब्ध होती है।”

यद्यपि यह आत्मा जीव रूप से हृदय में ही अवस्थित है तो भी वह अति सूक्ष्म है और सहज ही ज्ञान में नहीं आता। किन्तु जब कोई साहसी पुरुष अध्यात्म योग के द्वारा उसे जानने का प्रयत्न करता है कठिनाइयों में प्रविष्ट होकर उसे ढूंढ़ने का प्रयत्न करता है तो वह आत्मा की विशेषताओं से प्रभावित भी होता है और अंत में उसे प्राप्त कर साँसारिक दुःख और कष्टों से छुटकारा पा जाता है। यह लाभ आज के लोगों की दृष्टि से संभव है कुछ छोटे लगें पर इनके आगे साँसारिक भोग बिलकुल फीके और नीरस लगते हैं। यद्यपि वह इनसे वंचित भी नहीं रहता है अर्थात् उसे साँसारिक सुख संपदाओं की भी किसी तरह की कमी नहीं होती। स्वर्ग और मुक्ति का लाभ प्राप्त कर लेने पर लौकिक सुख तो दास-दासियों की तरह मनुष्य को अनायास ही प्राप्त हो जाते हैं। यमाचार्य ने शिष्य नचिकेता को आत्मज्ञान के द्वारा ब्रह्मविद्या का अधिकारी बना दिया था, वह नचिकेता राज-सुखों से भी वंचित नहीं रहा।

मूल प्रश्न श्रद्धा और विश्वास का है। मनुष्य के अंतःकरण में जिज्ञासा पैदा होनी चाहिए। ज्ञान की, आत्मा के रहस्य जानने की तीव्र आकाँक्षा ही इसका मूल आधार है। भगवान बुद्ध के अंतःकरण में यह जिज्ञासा इतने प्रबल रूप में प्रकट हुई कि हर दृश्य, पर हर समस्या उनके लिये और अधिक चिन्तन का आधार होती थी। हर बात के साथ “ऐसा क्यों हुआ” का प्रश्न जुड़ा रहता था। अपने आपके संबंध में, जीवन, मृत्यु ईश्वर और इस विराट जगत के रहस्य जानने के लिये उनके हृदय में तीव्र अकुलाहट रहती थी।

यद्यपि उन्हें वैभव-विलास की कुछ भी कमी न थी, तो भी वे इस प्रश्न का औचित्य सब के लिये एक समान देखते थे। अपने लिये भी उन्होंने यही देखा कि वैभव विलास में बड़ा होने पर भी मूलभूत समस्यायें मेरे साथ भी वैसी ही हैं। यह धन, यह राजसिंहासन न तो मेरे शारीरिक सौंदर्य की रक्षा कर सकता है और न जरा-मृत्यु से बचा सकता है और न जरा-मृत्यु से बचा सकता है तो उसका महत्व ही क्या रहा? मैं अपने आप की रक्षा नहीं कर सकता, तो फिर अपना शारीरिक महत्व ही क्या रहा? बस इसी उधेड़-बुन, आत्मज्ञान की तीव्र आकाँक्षा ने उन्हें तप के लिये आकर्षित किया। बुद्ध इस महान आध्यात्मिक आवश्यकता की सर्वोपरिता को न अनुभव करते तो उन्हें वे विभूतियाँ प्राप्त न होतीं जिनके आधार पर वे सामान्य श्रेणी के व्यक्तियों से ऊँचे उठकर भगवान बन गये। इसी जिज्ञासा का याज्ञवल्क्य से सही समाधान पाकर मैत्रेयी ब्रह्मवादिनी बन गयी।

आत्म तत्व निश्चय ही बहुत विशद है। बुद्धिमान व्यक्ति इस परम गोपनीय तत्व को प्राप्त कर अपनी मुक्ति के भागी तो बनते ही हैं साथ ही वे हजारों औरों को आत्मकल्याण के मार्ग में अग्रसर करने में भी समर्थ होते हैं किन्तु यह तत्व गोपनीय ही नहीं दुःसाध्य भी है। मनुष्य की जिज्ञासा ही उसे अधिकारी नहीं बना देती वरन् उस तत्व के अवगाहन की पात्रता भी होना आवश्यक है। अधिकारी व्यक्ति ही उसे प्राप्त कर सकते हैं जो भय और मोह की स्थिति में डगमगा न सकें और जिनमें इतनी दृढ़ता, गंभीरता और कठिनाइयों के सहन करने की क्षमता हो कि वे साधना काल की ऊँची-नीची, टेड़ी-तिरछी परिस्थितियों में भी बढ़ते रह सकें, वस्तुतः वही उसके पात्र होते हैं। ऐसे आत्मबल संपन्न व्यक्तियों पर ही समाज का भविष्य निर्भर है आत्मतत्व के खोजी वर्चस् संपन्न व्यक्तियों पर ही समाज का भविष्य निर्भर है आत्मतत्व के खोजी वर्चस् संपन्न व्यक्ति अगले दिनों और अधिक संख्या में पैदा हों, ऐसी नियति की इच्छा है कोई कारण नहीं कि महाकाल की यह इच्छा पूरी न हो।


मनुष्य में वह क्षमता तो है (kahani)

कोलम्बस ने जब अपना जहाज अमेरिका पहुँचा कर उस खाली क्षेत्र में लोगों को बसाने का एक ऐसा महान कार्य किया तो उन देशों में उसकी बड़ी प्रशंसा हुई। साथ ही अनेक ईर्ष्यालु भी पैदा हो गये वे अवसर पाते ही उसकी निंदा किया करते और कहते यह कौन बड़ा काम था? इसे तो हम भी कर सकते थे।

एक दिन कोलम्बस ने अपने सभी निन्दकों को दावत दी। भोज के समय उनने एक उबला हुआ अण्डा मँगाया और उपस्थित लोगों से कहा आप में से कोई इसे सीधा खड़ा कर सकते हों तो कर दिखायें।

सभी ने प्रयत्न किया पर अण्डा खड़ा न हो सका।

इस पर कोलम्बस ने उसका एक तरफ का पैदा दबा दिया। सीधा सपाट हो जाने पर अण्डा खड़ा हो गया।

उपस्थित लोग कहने लगे यह तो साधारण सी बात थी हम भी कर सकते थे। कोलम्बस ने फिर कहा मित्रों मनुष्य में वह क्षमता तो है कि बड़े काम कर ले पर उसके लिए सूझबूझ और उत्साह भी तो चाहिए। उसके बिना न आप अण्डा खड़ा करने में समर्थ हो सके और न अमेरिका में अपना खोजी जहाज ही ले जा सको।


“प्रिय” और “अप्रिय” का मनोविज्ञान

यह मानवी स्वभाव है कि जो वस्तुएँ उसके इर्द-गिर्द होतीं, उनमें से कुछ अच्छी लगती हैं कुछ बुरी प्रतीत होती हैं, जबकि कइयों को ओर ध्यान भी नहीं जाता। जो अच्छी लगती हैं, उनसे प्यार करते हैं, जो बुरी लगती है, उनसे घृणा करते हैं, जो उपेक्षित हैं, उनकी ओर आँख उठा कर भी नहीं देखते। हम चाहते हैं कि प्रिय वस्तुएं सदा अधिकाधिक परिमाण में पास रहें। उनकी समीपता सुखदायक होती है। सुखदायक वस्तुएँ सभी को सुहाती हैं।

यहाँ तनिक उस मनोविज्ञान की चर्चा कर लेना अनुचित न होगा, जिसके कारण वस्तुएँ प्रिय-अप्रिय लगती और प्रेम-घृणा की पात्र साबित होती है। कंगले को अपना कुरूप पुत्र भी राजकुमारों की भाँति प्रिय होता है, जबकि धनी पड़ोसी का रूपवान पुत्र सामान्य जैसा प्रतीत होता है। अपने लाड़ले को तनिक जुकाम हो जाय, तो ऐसी भागदौड़ मचने लगती है, जैसे कोई संघातिक छूत लग गई हो, पर पड़ोस का सुन्दर सलोना बच्चा बुखार में तप रहा हो, तो कोई चिन्ता नहीं क्लर्क अपनी टूटी साइकिल से संतुष्ट और प्रसन्न रहता है उसका कोई छोटा तार टूट जाय, तो चित्त भारी व उदास हो जाता है, जबकि अपने अधिकारी की महँगी रोयल्स रायस कार क्षतिग्रस्त हो जाय, तो कोई परवा नहीं। किसान को अपनी लहलहाती फसल देखकर जितना आनन्द होता है, शायद उतना हर्ष गाँव के जमींदार के अन्न से भरे कोठार देख कर नहीं होता। जमींदार के गोदाम को आग लग जाय, फिर भी वह चैन की नींद सोता रहता है, किन्तु उसके अन्न से भरे खेत को पशु चर जायँ, तो नींद गायब हो जाती है।

इससे ऐसा लगता है कि सदा गुणवान और रूपवान वस्तुएँ ही मन को भाती हैं-सो बात नहीं है। यदि बात ऐसी रही होती, तो कंगले, किसान व क्लर्क को भी दूसरों की हानि पर उतना ही दुःख होता जितना अपनी चीज के बिगड़ने या बरबाद होने पर, किन्तु व्यवहार में ऐसा होता कहाँ देखा जाता है? तो क्या यह मान लिया जाय कि सदा सुन्दर वस्तुओं से घोर वितृष्णा ही उपजती है? नहीं उक्त मान्यता भी ठीक नहीं। यह अधूरी व्याख्या है। सच तो यह है कि जिस चीज में जितनी मात्रा में अपनापन, आत्मभाव, स्वार्थभाव है, हव उसी परिमाण में प्रिय लगती है, गुण रहित हो, तो भी अच्छी लगती है, गुण रहित हो तो भी अच्छी लगती है। इसी मनोविज्ञान के कारण अपनी बुरी-से-बुरी वस्तु भी चित्ताकर्षक लगती है, जबकि दूसरों का अच्छा और आकर्षक सामान भी कोई विशेष आनन्द उत्पन्न नहीं कर पाता। अपनी बात में कोई दम न हो, तो भी कहने का अन्दाज ऐसा होता है, जैसे स्वयं अफलातून से कोई कम न हों, पर दूसरे की तर्क संगत सारगर्भित बात भी निस्सार और नीरस प्रतीत होती है। अपना व्यक्तित्व कौड़ी जितने मोल का न हो, फिर भी गर्व से सीना ऐसे फूला रहता है, मानों महामानवों-महापुरुषों की तो उनके सामने कोई औकात ही नहीं। वे बौने जैसे लगते हैं और खुद का बौनापन हिमालय जैसा विराट् और विस्तृत ऊँचाई वाला जान पड़ता है। यह सब आत्मसत्ता की प्रमुखता के कारण है।

व्यभिचारियों के लिए भौंड़ी नयन-नक्श वाली वेश्या ही रूप की रानी होती है। उसके सम्मुख विश्व-सुन्दरी का रूप-लावण्य भी फीका होता है। आये दिन समाचार पत्रों में यह खबरें छपती ही रहती हैं कि अमुक प्रेमी अथवा प्रेमिका ने प्रेम-विवाह न हो पाने के कारण आत्महत्या कर ली। यहाँ आत्मघात का कारण यह नहीं कि एक से विवाह न हो पाया, तो शादी की संभावना सदा-सदा के लिए सर्वथा समाप्त हो गई हो, अथवा संसार में लड़के-लड़कियों का अभाव पड़ गया हो। सच्चाई तो यह है कि प्रेमी-प्रेमिका का एक-दूसरे के प्रति अपनापन इतना घनीभूत हो जात है कि सारी दुनिया उस घनिष्ठ संबंध के आगे उबाऊ जान पड़ती है, सरस और सुन्दर समाप्य तो मात्र परस्पर का ही लगता है।

मकान और दुकान अच्छे अपने ही लगते हैं। उनकी साज-सज्जा और बनावट की प्रशंसा करते नहीं थकते। टूट-फूट, मरम्मत का खूब ध्यान रखते हैं। संयोगवश वह बिक कर दूसरों के हाथ में चले जायँ, तो एक प्रकार से निश्चिंतता आ जाती है। फिर वह हजारों वर्ष खड़े रहें या कल ही गिर पड़ें, इससे कोई मतलब नहीं। कल तक जो इतने प्रिय थे, जिनके टूटने-लुटने से दारुण दुःख पहुँचता था, वह एक झटके में ही समाप्त हो गया। इसका कारण क्या है? विरक्ति इतनी जल्दी इतनी अधिक कैसे पैदा हो गई? उत्तर होगा हस्तान्तरण से उत्पन्न हुई अनासक्ति के कारण। कल तक जो उसकी संपदा थी, जिनके साथ उसका आत्मभाव चिपका था, वह आज नहीं रहा। कल जिस रुपयों से भरी थैली को अत्यन्त उत्साह से छाती से चिपटाये फिरते थे, वह आज दूसरे व्यापारी के पास चली गई। यदि वे रुपये अब चोरी चले जायँ, तो उसके पहले के मालिक को कोई कष्ट नहीं होगा। उन रुपयों के बदले जा माल खरीदा है, अब वह प्यारा लगने लगा है। कल वह माल भी पड़ोस में पड़ा था, पर तब उसकी ओर आँख उठा कर भी न देखते थे, आज उसकी सुरक्षा के लिए चोटी का पसीना एड़ी तक बहा रहे हैं। माल वही कल था, वही आज है। अंतर केवल इतना हुआ कि कल वह पराया था, आज अपना हो गया। अपनापन ही तो अच्छा लगने का कारण है।

आये दिन मौतें होती व चिताएं जलती रहती हैं। उनके अग्नि संस्कार में भी हिस्सा कहाँ ले पाते हैं? मरघट के बगल से निकलते हुए उन शव संस्कारों पर एक उपेक्षापूर्ण दृष्टि डाल कर पुनः अपने में खो जाते हैं। न उनके पता पूछने की फुर्सत! न संवेदना जताने की औपचारिकता! सब कुछ सामान्य-सा प्रतीत होता है, पर जब अपना कोई प्रियजन मरता है, तब फूट-फूट कर रोते हैं, आंसुओं की झड़ी लगा देते हैं, दुनिया सूनी दीखती है, भूख-प्यास उड़ जाती है, दुःख-शोक की व्याकुलता में चारों ओर अँधेरा छा जाता है। पड़ोसी का भाई न रहा, तब चेहरे पर जरा-सी शिकन भी न आयी थी, पर आज इतनी व्याकुलता क्यों? मरते तो सभी एक समान हैं, किन्तु एक की मृत्यु का जरा भी शोक नहीं, दूसरे के लिए इतनी वेदना क्यों? इतनी व्यथा क्योंकि सब कुछ लुटा दीखने लगे? निमित्त यह है कि जिस व्यक्ति में आत्मभाव सम्मिलित कर रखा था, वह प्रिय था, प्रिय के विछोह में ही तो दुःख होता है। अपने घर पुत्र पैदा हुआ तो खुशी से पाँव धरती पर नहीं पड़ते, पड़ोसी के यहाँ बच्चा जन्मे, तो कुछ प्रयोजन नहीं। यह स्वाभाविक है।

यहाँ उद्देश्य मात्र यह बताने का है कि गुण-अवगुण के कारण ही हम वस्तुओं को प्यार नहीं करते, वरन् प्रमुख कारण उसमें आत्मभाव का, अपने स्वार्थ का समन्वित होना है। जिससे जितना स्वार्थ-संबंध है, वह उतना ही प्रसन्नता मिलती है। शोक-जन्य अप्रियता तो तब पैदा होती है, जब उनके लुटने, मिटने, बिगड़ने, घटने जैसी स्थितियाँ प्रस्तुत हों। यथार्थता तो यह है कि विश्व की एक भी वस्तु न तो प्रिय है, न अप्रिय। किसी कारणवश आकर्षित होकर जब अपना आत्मभाव उसमें सम्मिलित हो जाता है, तो वह मनभावन लगने लगती है। जिससे स्वार्थ का विरोध पड़ता है, वह बुरी लगती है और जिससे प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष कोई संबंध नहीं, उसके प्रति उपेक्षा रहती है। भले-बुरे के पीछे का यही मनोविज्ञान है। जो जितने अंशों में, जिस भाव में इस विज्ञान को धारण किये होता है, उतने ही अनुपात में सुख-दुःख अनुभव करता है।

दुःख निवारण और सुखोपार्जन के यहाँ दो ही उपाय हैं। एक तो स्वयं को निरपेक्ष और निस्पृह स्तर का बना लिया जाय कि आसक्ति के कारण उत्पन्न दुःख का अन्त हो जाय। दूसरा, अपने “स्व” को इतना विस्तृत और व्यापक बना लिया जाय, कि सब कुछ अपना प्रतीत होने लगे। प्रथम स्थिति को प्राप्त करना तो परमहंस स्तर के योगी-यतियों द्वारा ही संभव है, पर दूसरी स्थिति ऐसी नहीं, जिसे सर्वसाधारण प्राप्त नहीं कर सकें। वस्तुतः यह दोनों ही जीवन की दो चरमावस्थाएँ हैं। एक व्यक्ति को विरक्ति की ओर ले जाती है, तो दूसरी आसक्ति को ओर, पर यह आसक्ति व्यामोह से आविर्भूत साँसारिक लगाव जैसी नहीं होती। यह विशुद्ध आध्यात्मिक स्थिति है, जिसमें अपनेपन का भाव तो होता है, पर वह लगाव नहीं, जो कष्टकारक हो। आँसू जब बहुत अधिक दुःख हो, तब भी निकलते हैं और आनन्दातिरेक में भी। वैसे ही शोक मुक्त हो पाना इन दोनों अतियों द्वारा भी संभव है, पर सर्वसामान्य के लिए अपने आपे को विस्तृत कर आनन्द की स्थिति प्राप्त कर पाना ज्यादा सरल और सहज है। ऋषियों ने इसी अवस्था को उपलब्ध करने के लिए ‘आत्मवत् सर्वभूतेषु’ और “वसुधैव कुटुँबकम्” के सूत्र दिये हैं। जो जिस अनुपात में यह भाव-विकसित कर लेता है, उसके लिए वह संसार उतने ही अंशों में प्रिय लगने लगता है।

स्वर्ग की बड़ी महिमा गाई है। कथा पुराणों में उसका विस्तृत वर्णन मिलता है, उस सब का सार यह है कि वहाँ सब प्रिय ही वस्तुएँ हैं। जैसे स्थानों में रहना चाहते हैं, वह सब वहाँ मौजूद हैं। ऐसा स्वर्ग धरती पर स्वयं भी उतारा और बसाया जा सकता है, इसी जीवन में इन्हीं आँखों से उसे देखा एवं अनुभव किया जा सकता है। इसके लिए अभीष्ट आवश्यकता एक ही है-अपना आत्म विस्तार। आत्मभाव के विकास विस्तार के साथ ही पराये अपने लगने लगेंगे, दूसरे की खराब वस्तुएँ भी अच्छी लगने लगेंगी। प्रेम का अजस्र उत्साह फूट पड़ेगा, जिसमें बिराना कोई न होगा। जो होंगे, सब अपने प्रिय और प्रेमपात्र होंगे। प्रेमास्पदों का समुच्चय ही तो स्वर्ग है।


प्रायश्चित के लिए विवश (kahani)

एक ब्राह्मण ने बाग लगाया। हरियाली बढ़ने लगी तो एक गाय को उसे चरने का चस्का लग गया। ब्राह्मण ने झल्ला कर लाठी मारी तो उसका वहीं ढेर हो गया। गाय मार डालने की चर्चा फैली, तो मारने वाले को गौ हत्यारा ठहराया गया। उसे जाति बहिष्कृत किया जाने लगा, तो उसने चतुरता बरती। शास्त्र का कोई पन्ना खोलकर दिखाया कि हाथों का स्वामी इन्द्र है इसलिए पाप उसे ही लगेगा।

गौ हत्या का पाप इंद्र के पाप पहुँचा और बोला-मैं आप पर चढूँगा। विवरण सुनकर इंद्र ने पाप को साथ लिया और दोनों साधारण पथिक का वेष बनाकर उसी बगीचे में जा पहुँचे। लगाने वाले के कौशल की बड़ी प्रशंसा करने लगे। यह कहने लगे, ऐसे पुण्यात्मा का दर्शन कर पाते तो कितना आनंद आता।

ब्राह्मण यह प्रशंसा सुन रहा था। उछलकर आगे आ गया। बोला-मैं ही हूँ वह क्रिया कुशल व्यक्ति जिसने अपने हाथों यह बगीचा लगाया और इस प्रकार फलता फूलता बनाया। इंद्र ने पाप से कहा, जब हाथों के कृत्य का प्रतिफल ब्राह्मण को श्रेय तथा अर्थ लाभ के रूप में मिल सकता है तो उनके पाप का फल उसे क्यों न मिले? पाप ने बात समझ ली और उसी पर चढ़कर प्रायश्चित के लिए विवश करने लगा।


भाग्य पुरुषार्थी स्वयं बदलते हैं

वैयक्तिक शक्ति से परे, सनातन सत्ता को यदि स्वीकार न करें तो इसे हमारा अहंकार न करें तो इसे हमारा अहंकार ही माना जायगा। यह भूल मनुष्य को करनी भी नहीं चाहिए।इस सृष्टि के कण-कण का विधान परमात्मा के हाथ में हैं। उसे चाहे अटल नियम कहें बात एक ही है। उसे मानना अवश्य पड़ता है, उसे माने बिना मनुष्य को न तो विश्राम मिलता है, न अहंकार ही छूट जाता है। बुद्धि भी भ्रमित रहती है।

किन्तु मनुष्य का निज का भी अपने भाग्य विधान से कुछ संबंध अवश्य है। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि मनुष्य स्वाधीन नहीं है, उसका जीवन परमात्मा के विधान के अनुसार ही चलता है। न्याय की दृष्टि से उसका विधान भी है। ईश्वर ने कर्म-फल का एक सुदृढ़ नियम बना दिया है इसी के अनुसार मनुष्य का भाग्य बनता बिगड़ता है।

भ्रम इस बात से पैदा हो जाता है कि कई बार प्रत्यक्ष रूप से कर्म करने पर भी विपरीत परिणाम प्राप्त हो जाते हैं, तो लोग उसे भाग्य-चक्र मानकर परमात्मा को दोष देने लगते हैं। किन्तु यह भाग्य तो अपने पूर्व संचित कर्मों का ही परिणाम है। मनुष्य जीवन के विराट् रूप की कल्पना की गई है और एक जीवन का दूसरे जीवन से संस्कार-जन्य संबंध माना गया है। इस दृष्टि से भी जिसे आज भाग्य कहकर पुकारते हैं वह भी कल के अपने ही कर्म का परिणाम है। सृष्टि के प्राणियों में चेष्टा न हो तो अब तक जो ऐतिहासिक विकास हुआ है उसकी कल्पना न की जा सकती थी।

भाग्य का रोना-रोने का अर्थ तो इतना ही समझ में आता है कि हम अपने कर्म के लिये सचेत नहीं हो पाये हैं। अपनी शक्तियों का दुरुपयोग “अब नहीं” तब” किया था, जिसका कटु आघात भोगना पड़ रहा है। पर प्राकृतिक विधान के अनुसार तो यह भाग्य अपनी ही रचना है। अपनी ही किए हुए का प्रतिफल है। मनुष्य भाग्य के वश में नहीं है, उसका निर्माता मनुष्य स्वयं है। परमात्मा के न्याय में अभेद देखें तो यही बात पुष्ट होती है कि भाग्य स्वयं हमारे द्वारा अपने को संपन्न करता है उसका स्वतंत्र अस्तित्व कुछ भी नहीं है।

वास्तव में हमें शिक्षा लेनी चाहिए कि कर्म-फल ऊर्जा की तरह किसी भी दशा में नष्ट नहीं होता। किसी न किसी समय वह अवश्य सामने आता है। विवशतावश उस समय उसे भले ही भाग्य कहकर टाल दिया जाय पर इससे कर्म-फल का सिद्धान्त तो नहीं मिट सकता। हम जैसा करेंगे वैसा ही तो भरेंगे। यदि स्वेच्छापूर्वक परमात्मा ही जिसे जो जी चाहे देने लगे तो इस सृष्टि की सारी न्याय-व्यवस्था बिगड़ जायेगी। हम उस स्वतंत्रता को किस तरह काम में लावें यह एक अलग बात है किन्तु अपना कल्याण करने का अधिकार हमें ही है। न इसके लिये किसी को दोषी ठहराया जा सकता है और न किसी के भरोसे ही बैठा जा सकता है।

अपने सुख-दुख, उन्नति-अवनति, कल्याण- अकल्याण, स्वर्ग और नर्क का कारण मनुष्य स्वयं है फिर दुःख या आपत्ति के समय भाग्य के नाम पर संतोष कर लेना और भावी सुधार के प्रति अकर्मण्य बन जाना ठीक नहीं है।

ऐसी स्थिति आने पर तो हमें यह अनुभव करना चाहिए कि हम से जरूर कोई भूल हुई है और उस पर पश्चाताप करना चाहिए।

एक उदाहरण लें। संयम न रखने के कारण आपका स्वास्थ्य गिर गया है। शरीर में ऋतु-परिवर्तन को भी बरदाश्त करने की शक्ति नहीं रही, थोड़ी सी असावधानी से कभी पेट में गड़बड़ी पैदा हो जाती है, कभी सर दर्द करता है, जुकाम हो जाता है, सर्दी लग जाती है। आप कहेंगे क्या करें हमारा भाग्य ही खराब है वस्तुतः यह भाग्य का खेल नहीं है। आप थोड़ा सा भी निष्पक्षता और कठोर सत्य की साक्षी में विचार करें तो आप यह मानने के लिये विवश होंगे कि आपने असंयम के कारण ही वह स्थिति बना ली है जिसके कारण आपको इन कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। यदि आप संकल्प से काम लें, जिह्वा तथा कामेंद्रिय पर कसकर अंकुश लगाकर रखें तो आपका खोया हुआ स्वास्थ्य फिर से वापस आ सकता है। पाना या खोना भाग्य के हाथ की बात नहीं है। वह तो मनुष्य के पौरुष-अपौरुष का फल है। इसे ही बाद में चाहें तो भाग्य कह सकते हैं।

दूसरे व्यक्ति अपने पास के साधन को देखकर ईर्ष्या से जलता रहते हैं। सोचते हैं, यह व्यक्ति कितना भाग्यशाली है। भगवान ने उसे मोटर दी है, रहने के लिये सुसज्जित सभी कुछ है। धन से तिजोरियाँ भरी पड़ी हैं, किन्तु अपना तो जीवन ही कठिनाई से बीतता है। बड़ा कष्ट है। एक-एक पैसे के लिए दूसरों का मुँह ताकना पड़ता है। सच है, आप बड़ी मुसीबत में है, किन्तु दरअसल क्या आप उन गहराइयों में गए है, जिसके कारण आप निर्धन है। संसार के 60 प्रतिशत से भी अधिक व्यक्ति विधिवत् खाते-कमाते हैं। आप ही क्यों परेशान है? आप देखिए आपके जीवन में जरूर कहीं आलस्य, अकर्मण्यता, निरुद्योगता का चोर छुपा हुआ है। इसे भगाइये इस दुष्ट ने ही आपको निर्धन बनाया है। भगवान को तो आप नाहक कोसते हैं। महान विचारक बायरन ने कहा है-भाग्य साहसी और कर्मठ व्यक्ति की सहायता करता है। डिजरायली का भी ऐसा ही मत है- हम अपना ऐश्वर्य स्वयं बनाते हैं और उसी को अपना भाग्य कहते हैं।

भाग्यवाद का नाम लेकर अपने जीवन में निराशा निरुत्साह के लिये स्थान मत दीजिये। आपका गौरव निरंतर आगे बढ़ते रहने में है। भगवान् का वरद-हस्त सदैव आपके मस्तक पर है। वह तो आपका पिता, अभिभावक, संरक्षक, पालक सभी कुछ है। उसकी अकृपा आप पर भला क्यों होगी? क्या यह सच नहीं है कि उसने आपको यह अमूल्य मनुष्य शरीर दिया है। बुद्धि दी है, विवेक दिया है। कुछ अपनी इन शक्तियों से भी काम लीजिये, देखिए आपका भाग्य सदैव पुरुषार्थी का ही साथ देता है।

परिस्थितिवश यदि प्रयत्न के करने पर भी आपको उचित सफलता नहीं मिली तो आप इसे अपने पूर्वकृत कर्मों का फल मानकर तात्कालिक संतोष प्राप्त कर सकते हैं किन्तु अपने प्रयत्नों को यों ही ढीला मत छोड़िए। आज जो कर लेंगे, वही तो कल भाग्य बनेगा। कल आप अधिक सुख प्राप्त करें, इसकी तैयारी आज नहीं करेंगे, कब करेंगे? प्राणी की प्रकृति ही उसके कर्मों का कारण कही जाती है, इसलिये आज अपनी विश्वास शक्ति को जगाकर अपने जीवन के सद्गुणों को बढ़ाने का प्रयत्न कीजिये। इससे आपका भावी जीवन निश्चय ही सुखी तथा समुन्नत हो सकेगा।

कर्म चाहे वह आज के हों अथवा पूर्व जीवन के उनका फल असंदिग्ध है। परिणाम से मनुष्य बच नहीं सकता। दुष्कर्मों का भोग जिस तरह हो भोगना ही पड़ता है, शुभ कर्मों से उसी तरह श्री-सौभाग्य और लक्ष्मी की प्राप्ति होती है। यह सुअवसर जिसे उपलब्ध हो वही सच्चा भाग्यशाली है और इसके लिये


अपने अपराध की माफी (kahani)

रूस के राजा एलेक्जेंडर अक्सर अपने देश की आँतरिक दशा जानने के लिए वेश बदलकर पैदल घूमने जाया करते थे। एक दिन घूमने-घूमने एक नगर में पहुँचे, वहाँ का रास्ता उन्हें मालूम न था। राजा रास्ता पूछने के लिए किसी व्यक्ति की तलाश में आगे बढ़े।

आगे उन्होंने एक हवलदार सरकारी वर्दी पहने हुए देखा। राजा ने उसके पास जाकर पूछा-महाशय, अमुक स्थान पर जाने का रास्ता बता दीजिए। हवलदार ने अकड़ कर कहा-“मूर्ख!तू देखता नहीं, मैं सरकारी हाकिम हूँ, मेरा काम रास्ता बताना नहीं है। चल हट, किसी दूसरे से पूछ।” राजा ने नम्रता से पूछा-“महोदय, यदि सरकारी आदमी भी किसी यात्री को रास्ता बतादें, तो कुछ हर्ज थोड़े ही है। खैर, मैं किसी दूसरे से पूछ लूँगा, पर इतना तो बता दीजिए, कि आप किस पद काम करते हैं।

“ हवलदार ने और भी ऐंठते हुए कहा-“अन्धा है, क्या मेरी वर्दी को देखकर पहचानता नहीं कि मैं कौन हूँ।” क्या मेरी वर्दी को देखकर पहचानता नहीं कि मैं कौन हूँ” एलेक्जेंडर ने कहा-शायद आप पुलिस के सिपाही हैं, उसने कहा नहीं उससे ऊँचा। राजा-“तब क्या नायक हैं?’ हवलदार-उससे भी ऊँचा।” राजा-’हवलदार हैं हवलदार “हाँ, अब तू जान गया कि मैं कौन हूँ, पर यह तो बता कि इतनी पूछताछ करने का तेरा क्या मतलब? और तू कौन है?” राजा ने कहा मैं भी सरकारी आदमी हूँ। सिपाही की ऐंठ कुछ कम हुई, उसने पूछा “क्या तुम नायक हो? राजा ने कहा-नहीं उससे ऊँचा। हवलदार-तब क्या आप हवलदार है? राजा-’उससे भी ऊँचा। हवलदार-’दरोगा?’ राजा-’उससे भी ऊँचा’ हवलदार-’कप्तान?’ राजा- उससे भी ऊँचा।’-हवलदार “सूबेदार!” राजा “उससे भी ऊँचा।’

अब तो हवलदार घबराने लगा, उसने पूछा-’तब आप मंत्री जी है?राजा ने कहा ‘भाई बस एक सीढ़ी और बाकी रह गई है। सिपाही ने गौर से देखा, तो सादा पोशाक में बादशाह एलेक्जेंडर सामने खड़े है। हवलदार के होश उड़ गये, वह गिड़गिड़ाता हुआ बादशाह के पाँवों पर गिर पड़ा और बड़ी दीनता से अपने अपराध की माफी माँगने लगा।

राजा ने मीठी वाणी में कहा-भाई!तुम पद की दृष्टि से कुछ भी हो पर व्यवहार की कसौटी पर बहुत नीचे हो। जो जितना नीच होता है, उसमें उतना ही अहंकार होता है, तो पहले मनुष्य बनो, सहनशील नम्र-बनो। अपनी ऐंठ कम करो, क्योंकि तुम जनता के सेवक हो, इसलिये तुम्हारी तो यह विशेष जिम्मेदारी है।


“यत्र नार्यस्तु पूजन्ते”

शेरशाह सूरी के दरबार में आज विशेष चहल-पहल थी। दरबार ए आम में हर व्यक्ति शंकित, चकित सा अपने-अपने स्थान पर स्तब्ध मूर्तिवत् था। कभी-कभी एक दूसरे की ओर लोग प्रश्नवाचक दृष्टि से देख भर लेते थे। बात भी कुछ ऐसी ही थी।एक सामान्य दुकानदार की शिकायत पर बादशाह ने अपने युवराज को अपराधी की भाँति दरबार में लाने की आज्ञा दी थी। जन साधारण से लेकर उच्च-अधिकारियों के मन में कौतूहल, भय एवं उत्सुकता की सम्मिलित प्रतिक्रिया के फलस्वरूप उनके चेहरों पर विचित्र भाव झलक रहे थे।

घटना एक दिन पहले की ही थी। अपने शौर्य, साहस तथा सूझ-बूझ के आधार पर भारत का शासक बनने वाले शेरशाह का उत्तराधिकारी, हाथी पर बैठकर शहर घूमने निकला जिन्हें वैभव सहज ही प्राप्त हो जाता है वह बहुधा अपनी वृत्तियों का नियंत्रण खो बैठते हैं। किस तपस्या एवं विशिष्ट सद्गुणों के कारण वैभव मिला, यह जानकारी न होने से अहंकार प्रायः विपरीत दिशा में काम करने लगता है। युवराज की भी स्थिति कुछ ऐसी ही हो गई थी। शासक बनने के लिए क्या-क्या मूल्य चुकाने होते हैं यह शेरशाह को तो ज्ञात था, किन्तु उत्तराधिकारी कहा जाने वाला नवयुवक उससे अनभिज्ञ था। वह तो राज्य को अपना खेल एवं प्रजा को अपने लिए किसी भी प्रकार प्रयुक्त करने का अपना अधिकार समझता था।

गलत मान्यता गलत कार्य कराती हैं युवराज से भी वैसी ही भूल हो गयी। रास्ते में एक मोदी की दुकान पर उसकी नजर पड़ी। मोदी की पत्री दुकान पर बैठी थी। सुन्दर स्त्री को देखकर उसके कुरूप मन के कुसंस्कार जाग्रत हो उठे। स्वयं की विकृति का परिचय देते हुए उसने अपने पानदान में से दो पान के बीड़े उठाकर उस नवयुवती पर फेंक दिये।

बेचारी साध्वी सहम कर रह गई। गरीब घर की महिला-पति के सहयोग के लिए-बच्चों के पालन-पोषण के लिए दुकान पर बैठती थी। पुरुष द्वारा अपने सतीत्व के अपमान से उसके हृदय पर भारी आघात लगा। उसके पति ने भी वह सब देखा। किन्तु राजतंत्र में जनतंत्र जैसी व्यक्तिगत स्वतन्त्रता जन साधारण को कहाँ थी? बेचारा प्रतिकूल परिस्थिति समझकर खून का घूँट पीकर रह गया।

व्यक्तिगत रूप से कुछ कर सकने का अधिकार भले ही नहीं हो, किन्तु राज्य से न्याय की माँग का अधिकार तो सबका सदैव रहा है। परन्तु यहाँ सवाल था कि राजा से न्याय माँगा जाय, तथा उसका लक्ष्य उसी का लाड़ला हो तो क्या वह मिलेगा? कहीं उलटे अपने ऊपर ही तो चोट न पड़ेगी? उसके अन्तःकरण ने कहा उचित ढंग से प्रतिकार का प्रयास तो करना ही चाहिए। कल्पना में ही उलझकर सही दिशा में प्रयास रोकना उचित नहीं। उसने अपने पड़ोसियों से परामर्श किया। उन्हें भी घटना को देखकर क्षोभ था। बादशाह की न्यायप्रियता के प्रति जो भाव उनके थे, उसके आधार पर उन्हें आशा भी थी। जो भी हो सत्य का सहयोग करने का संकल्प पड़ोसियों ने भी किया और उस मोदी ने शेरशाह के पास जाकर अपनी फरियाद सुना दी। उसी की सुनवायी के लिए यह दरबार ए आम भरा था।

बादशाह अभी दरबार में नहीं पहुँचे थे। वे अपने निजी कक्ष में टहल रहे थे। किसी को भो आने की मनाही थी। उक्त घटना की सूचना मिलने के समय से ही वह काफी गंभीर हो गए थे। उन्हें सारी रात्रि नींद न आ सकी थी। उनके सामने रह-रह कर अपनी प्रगति का इतिहास तथा युवराज की करतूत घूम रही थी। उन्होंने अपने सद्गुण संपन्न व्यक्तित्व के बल पर ही साधारण जागीरदार से प्रगति यात्रा पूरी कर भारत का सिंहासन पाया था। उनके लिए सेना से लेकर सामान्य व्यक्तियों तक के विश्वास तथा सद्भावना का भी महत्व कम न था। गुणों की कीमत पर जीवन की उपलब्धियाँ प्राप्त करने वाला गुणों का महत्व भली-भाँति जानता है। उन्हें लग रहा था कि यदि प्रजा की मर्यादा से खिलवाड़ प्रारंभ हो गया, उनकी भावनाओं की कीमत न की गई तो अनर्थ निश्चित है। शासक और जनता में परस्पर सौहार्द-स्नेह व विश्वास समाप्त हो गया तो फिर राज्य नहीं चल सकता। युवराज को अपनी भूल का अनुभव एवं उसकी गम्भीरता समझाना बहुत आवश्यक है। तभी प्रधान सेवक ने दरबार भर जाने की सूचना दी। और शेरशाह उस ओर चल पड़े।

युवराज को दरबार में लाया गया। बादशाह ने दुकानदार की शिकायत सुनी और युवराज से सवाल पूछे। गवाहों से उसकी पुष्टि कराई। युवराज नतमस्तक थे उन्होंने दुकानदार की पत्नी पर पान के बीड़े फेंके। किन्तु अपने बचाव के लिए वह उसे सामान्य घटना सिद्ध करना चाहते थे। बोले-“जहाँपनाह! मैंने तो यूँ ही उस पर पान फेंक दिए थे। दुकानदार बेकार का तूल दे रहा है।

“यूँ ही। “शेरशाह शेर की तरह गरज पड़े। सारा दरबार अपने में सिमट कर रह गया। “किसी की आबरू से खेल जाना ‘यूँ ही’ हुआ? तुम किस गुमान में भूले हो वली अहद्? किसी की बीबी की इज्जत क्या होती है इसका तुम्हें अहसास नहीं। मैं अभी तुम्हें समझाए देता हूँ”और युवराज की पत्नी को दरबार में तलब किया गया।

युवराज को अपना बचाव महंगा पड़ गया था। लोग भौंचक्के रह गए। सभी धड़कते दिल से कार्यवाही देख रहे थे। बुरका ओढ़े धीमी चाल से चलने वाली अहद की बेगम दरबार में हाजिर हुई। इसका मुँह खोल दो पुनः सिंह गर्जना हुई। युवराज ने आँखें बन्द कर लीं, बेगम, जैसे जमीन पर गड़कर रह गयी, किन्तु आज्ञा की अवहेलना संभव नहीं थी। शेरशाह ने उस दुकानदार को अपने पास बुलाया-उसके हाथ में दो पान दिये और कहा-ये पान गुनहगार की बीबी पर फेंक दो।

‘इतनी कठोर प्रक्रिया की किसी को आशा नहीं थी। स्वयं बादशाह का हृदय धड़क रहा था। इसकी बहू लाचार सबके सामने मुँह खोले बेकसूर आँखों में आँसू भरे डरी सहमी खड़ी थी। किन्तु बड़ी हानि के सामने छोटी हानि नहीं देखी जाती। युवराज के जीवन की सही-गलत दिशा का प्रश्न था। उसे सुमार्ग पर न लाया जा सकता तो और भी भयंकर होता। अतः धड़कते हृदय से सब करते हुए भी वह ऊपर से शान्त गम्भीर बने बैठे थे।

पान हाथ में लिए फरियादी शान्त खड़ा था उसके मन में भी हलचल मच रही थी। उसके मन में भी हलचल मच रही थी। अचानक उसने हाथ जोड़े और कहने लगा-“शहंशाह! मैं हिंदू हूँ, हमारी देव संस्कृति की पुण्य शपथ है नारी माँ है उसके अक्षुण्ण सम्मान को भुला देना इस महान संस्कृति की संतति के लिए आत्मघात है।” कुछ क्षण रुककर वह फिर कहने लगा” मैं यहाँ अपराध रोके जाने की अर्जी लेकर आया था अपराध करने नहीं। इस बेचारी का तो कोई अपराध भी नहीं। फिर हमारे यहाँ तो स्त्री रमणी न होकर वंदनीय जननी है। युवराज ने अनजान में अपराध किया। अनजाने में अपराध करके युवराज यदि मैं जानबूझ कर के वही अपराध दोहराऊँगा तो परमात्मा क्या कहेगा? (खाली) “युवराज को सीख मिल चुकी जहांपनाह दुनिया ने देख लिया कि आपकी निगाह में प्रजा की हर बहू बेटी की इज्जत अपनी बहू-बेटी के समान ही है। अवज्ञा का यदि कोई दण्ड मेरे लिए हो तो वह मुझे दिया जाय, किन्तु मेरी संस्कृति की शपथ के विरुद्ध इस देवी के प्रति मुझे अपराधी न बनाया जावे-यह मेरी दूसरी फरियाद है।

“युवराज-बेगम अधिकाँश भावुक जनता के आँसू आ गए। फौलाद हृदय शेरशाह की आँखें भी गीली हो गई। वह अपने स्थान से उठा तथा दुकानदार की पीठ ठोकते हुए बोला- “निश्चित ही हिन्दू संस्कृति है, और तुम देवता हो-फरिश्ते हो, जन्नत का नूर तुम्हारे दिलो दिमाग में चमक रहा है। तुम्हारी फरियाद टालने की ताकत मुझमें नहीं है। यह फरियाद ही नहीं हुक्म भी है। तुमने मेरे काम को आसान बनाकर मेरा साथ दिया है। इसलिए बराबर के हक से कुछ कहने का तुम्हें भी अधिकार है। तुमने देव संस्कृति की शपथ के रूप में जो बात दरबार में कहीं-मैं चाहूँगा उसे हुक्म की तरह सारी जनता माने और उसकी पहल मैं खुद करता हूँ। तुम्हारी बात मंजूर है। यह कहते हुए शेरशाह ने स्वयं आगे बढ़कर अपनी बहू का मुँह ढक दिया। युवराज आगे बढ़कर दुकानदार से गले मिला। सभी भावविह्वल हो उठे।


उसी आधार पर मान्यता (kahani)

एक पादरी जहाज से यात्रा कर रहे थे। जहाज ने एक द्वीप के पास लंगर डाला। पादरी ने सोचा इस द्वीप पर कोई होगा तो उसे प्रार्थना सिखा आयें। वहाँ उन्हें केवल तीन साधु मिले। उनसे पूछा-कुछ प्रार्थना-उपासना करते हो? उन्होंने बताया “हाँ” हम तीनों की रक्षा करो।

पादरी हँसे, बोले क्या पागलपन करते हो, तुम्हें प्रार्थना करनी भी नहीं आती। भोले साधुओं ने प्रार्थना सिखाने का आग्रह किया। पादरी ने उन्हें बाइबिल के आधार पर प्रार्थना करना सिखाया अभ्यास हो जाने पर वैसा ही करने को कहकर जहाज पर आ गये। जहाज चल पड़ा।

दूसरे दिन पादरी जहाज के डैक पर टहल रहे थे। पीछे से आवाज सुनाई दी, “ओ पवित्र आत्मा रुको।” पादरी ने देखा वे तीनों साधु पानी पर बेतहाशा दौड़ते पुकारते चले आ रहे थे। आश्चर्यचकित पादरी ने जहाज रुकवाया उनसे इस प्रकार आने का कारण पूछा। वे बोले-“आप हमें प्रार्थना सिखा आये थे, रात में हम सोये तो भूल गये। सोचा आपसे ठीक विधि पूछ लें इसलिए दौड़ आये।

“पादरी ने पूछा-पर आप पानी पर कैसे दौड़ सके? उन्होंने कहा-“हमने भगवान् से प्रार्थना की, कहा-हम अनजान हैं, पवित्र पादरी जो सिखा गये थे भूल गये। दौड़ हम लेंगे, डूबने तुम मत देना। बस, इतना ही कहा था।

पादरी ने घुटने टेक कर उनका अभिवादन किया। कहा आप जैसी प्रार्थना करते हैं वही सही है, मैं ही आपको गलत समझा था। प्रभु करके जैसे आये थे वैसे ही लौट गये। सर्वव्यापी भगवान् सबके भाव समझता है, उसी आधार पर मान्यता देता है।


महाप्रभु ईसा के अज्ञात जीवन के अनसुलझे रहस्य

बाइबिल के ‘न्यू टेस्टामेण्ट’ के मत्ती, मरकुस, लूका, जाँन, यूहन्ना आदि अंजीलों के अंतिम काण्डों में ईसा के सूली पर चढ़ाये जाने, दफनाये जाने के बाद कब्र से गायब होने तथा पुनर्जीवित होने का वर्णन है। उनमें उल्लेख है कि पुनर्जीवन के बाद सबसे पहले उनने मरियम मबदलीनीनी एवं मरियम को दर्शन दिया और उनसे अपने शिष्यों को गलीलिया नामक पर्वत पर मिलने को कहा। यरुशलेम से सात मील दूर इम्माऊस में भी वे कुछ व्यक्तियों से मिले थे। गलीलिया पर्वत पर ग्यारह प्रमुख शिष्यों से मिलने के पश्चात् वे उन्हें वैतनिययाह तक ले गये और हाथ उठाकर आशीर्वाद दिया तथा अलग हो गये। शिष्य तो उन्हें प्रणाम करके वापस यरुशलेम लौट गये, पर ईसा कहीं अंतर्ध्यान हो गये।

अनुसंधानकर्ता मनीषियों ने उन लुप्तप्राय कड़ियों को अब खोज निकाला है जिनसे प्रमाणित होता है कि पुनर्जीवित होने और शिष्यों से मिलकर उन्हें कर्मक्षेत्र में उतरने का आदेश देने की यात्रा करते हुए दूसरी बार भारत आ गये थे और कश्मीर को अपना स्थायी निवास बनाया था। लोगों की उन पर श्रद्धा थी। 80 वर्ष से अधिक की परिपक्व अवस्था में वहीं पर उनने अपना पंचभौतिक शरीर त्यागा था, जिसके अनेकों प्रमाण अभी भी वहाँ विद्यमान है।

जर्मनी के मूर्धन्य मनीषी होल्गर केर्स्टन ने इस संदर्भ में गहराई से खोज-बीन की है। इसराइल, मध्य पूर्व देशों, अफगानिस्तान और भारत सहित उन सभी ऐतिहासिक स्थलों की उनने यात्रा की जो किसी न किसी रूप में ईसा से संबंधित हैं। उन्होंने अपनी और अपने पूर्ववर्ती खोजकर्ताओं द्वारा इस संबंध में की गयी प्रामाणिक खोजों को “जीसस लिव्ड इन इंडिया” नामक पुस्तक में सविस्तार प्रकाशित किया है जिसमें ईसा के सूली पर चढ़ाये जाने से पहले एवं बाद के अज्ञात जीवन की संपूर्ण जानकारी संग्रहित है। उसके अनुसार सन् 6 में लगभग 13 वर्ष की उम्र में ईसा व्यापारियों के एक वर्ग के साथ पहली बार भारत आये थे और लगभग 16-17 वर्ष तक पुरी एवं तिब्बत के बौद्ध विहारों में अध्ययनरत रहे। वैदिक साहित्य एवं बौद्ध दर्शन के अध्ययनरत रहे। वैदिक साहित्य एवं बौद्ध दर्शन के अध्ययन के साथ-साथ उनने उच्चस्तरीय तप साधनाएँ भी की थीं। यही कारण था कि जब सन् 30 में 30 वर्ष की आयु में वे वापस यरुशलेम पहुँचे तो भौतिक सिद्धियों और आत्मिक विभूतियों से संपन्न महामान बनकर पहुँचे। उनकी इस क्षमता से प्रभावित होकर लोगों की भारी भीड़ सदैव उन्हें घेरे रहती थी। अपने मिशन का प्रचार करते हुए तीन वर्ष से कुछ अधिक ही दिन बीते थे कि विरोधियों ने उन पर ईश निन्दा का अभियोग लगाकर सूली पर चढ़ा दिया और घोषणा कर दी गयी कि ईसा की मृत्यु हो गयी।

ईसा को जिस कब्र में दफनाया गया था, देखने पर वह खाली मिली चमत्कार स्वरूप जीवित होकर गलीलिया (गलीली, पर्वत पर चले गये थे जैसा कि बाइबिल में उल्लेख है कि वहाँ पर शिष्यों से मिलने के बाद वे लुप्त हो गये। सन् 34 में उनकी भेंट डैमस्कस (दमिश्क) में पाँल से हुई और वह उनका शिष्य बन गया। इसके बाद वे कुछ दिन निसबिस तुर्की में ठहरे और ईरान सहित आसपास के देशों में उपदेश करते रहे, तदुपरान्त तक्षशिला होते हुए कश्मीर आ गये और वहीं पर 80 वर्ष की उम्र में शरीर त्यागा, ऐसा केर्स्टन का मत है।

सुप्रसिद्ध कानूनविद् अलहज ख्वाजा नजीर अहमद ने भी अपनी पुस्तक “जीसस इन हेवन आन अर्थ” में लिखा है कि ईसा ने भारत में न केवल अपने यौवन के 17-18 वर्ष अध्ययन एवं साधना में बिताये थे, वरन् सूली पर चढ़ाये जाने के बाद पुनर्जीवित होकर दूसरी बार भारत आ गये थे और कश्मीर में रहने लगे थे। वृद्धावस्था में यहीं पर उनका स्वर्गवास हुआ था उनके अनुसार स्वयं मूसा भी कभी काश्मीर आयें थे।

पर्शिया के सुविख्यात इतिहासवेत्ता मीरकावन्द ने अपनी पुस्तक में लिखा है कि पुनर्जीवन के बाद ईसा डैमस्कस चले गये। जिस स्थान पर वे लोगों को उपदेश किया करते थे। वह “मायौम-इ-ईसा” के नाम से जाना जाता है और डैमस्कस से 5 कि0मी0 दूर स्थित है। ईसा को वहाँ ठहरे हुए कुछ ही दिन बीते थे कि तुर्की में निसबिस के प्रशासक ने उन्हें अपनी चिकित्सा के बुला लिया। ईसा ने पहले तो अपने एक शिष्य-थाँमस को उसके पास भेजा जिसके उपचार से ही बादशाह ठीक हो गया। पीछे वे भी निसबिस पहुँच गये। इमा-अबू-जफर मोहम्मद ने अपनी कृति “तफसीर-इब्न जरीर एत-तबरी” में लिखा है कि यह घटना सन् 35 के बाद की है। इसके पश्चात् वे जगह-जगह घूमते और उपदेश करते रहे।

सूली पर चढ़ाये जाने एवं पुनर्जीवित होकर अन्यत्र चले जाने के बाद उनका उपचार चले जाने के बाद उनका उपचार जड़ी-बूटी द्वारा किये जाने का उल्लेख तिब्बत हेमिस मठ में रखे दस्तावेजों में सुरक्षित है। इसकी पुष्टि करते हुए नोतोबिच ने अपनी कृति” द अननोन लाइफ ऑफ दी जीसस क्राइस्ट” में कहा है कि स्वस्थ होने के पश्चात् ईसामसीह ने तक्षशिला होते हुए दूसरी बार भारत में प्रवेश किया। उन दिनों बृहत्तर भारत की सीमाएं ईरान और अफगानिस्तान तक फैली हुई थीं। तुर्की और सीरिया के मध्य स्थित ‘निसबिस’ (नुसायबिन) को छोड़कर वे सन् 41-50 में तक्षशिला पहुँचे थे वहीं इनकी भेंट इण्डो-पर्शियन बादशाह गुन्दाफर से हुई। इससे पूर्व उन्होंने ईरान, पाकिस्तान एवं अफगानिस्तान की यात्राएँ की थी और जगह-जगह उपदेश किये थे। ईसा के पट्टशिष्य थॉमस ने अपने संस्मरण में इस बात की पुष्टि की है कि वह ईसा के साथ तक्षशिला में राजा गुन्दाफर के यहाँ ठहरा था। इससे पहले ईसा ने उसे भारत जाने का आदेश दिया था, पर थॉमस के इनकार करने और यह कहने पर कि वह यहूदी है और भारतवासियों को सत्य की शिक्षा कैसे दे सकता है? ईसा ने उसे इब्बन नामक एक दक्षिण भारतीय व्यापारी के हाथों इसलिये बेच दिया ताकि इसी बहाने वह भारत पहुँच जाय। वस्तुतः इब्बन राजा गुन्दाफर का एक कर्मचारी था जिसे एक वास्तुशिल्पी ढूँढ़ लाने के लिए नियुक्त किया गया था। इस तरह थॉमस राजदरबार में पहुँच गया। वहाँ उसे एक भव्य महल बनवाने के लिए एक बड़ी धनराशि दी गयी जिसे उसने जरूरतमंद गरीबों में खर्च कर दिया। बाद में यही राजा अपने भाई के साथ ईसा का शिष्य बन गया और थॉमस को दक्षिण भारत में मिशन के प्रचार प्रसार के लिये भेज दिया गया। मद्रास में उसने अनेकों अनुयायी भी तैयार किये चौथी सदी के आरंभ में उसकी हड्डियों के अवशेष को मायलापोर मद्रास से उनके पैतृक नगर इडेसा सीरीया ले जाया गया था। थॉमस की मद्रास में कब्र होने की पुष्टि मार्कोपोलो ने भी की थी।

प्रख्यात विद्वान हजरत मिर्जा गुलाम अहमद ने भी अपनी कृति में इस बात की पुष्टि की है कि ईसा ने अपने जीवन के अतिम 40 वर्ष ‘युज ओशफ’ के नाम से कश्मीर में बिताये थे। शत्रुओं से बचने के लिए ही उनने यह छत्त नाम रखा था। अग मुस्तफा ने अपने ग्रंथ-“अबली अहलिऊ-परस” में कहा है कि ईसा ही युजआशफ थे। तक्षशिला के पश्चात् उन्होंने उससे 70 मील दूर कश्मीर की सीमा पर स्थित-मुरी नामक एक छोटे से गाँव में निवास किया था वहीं पर उनकी माता का स्वर्गवास हुआ। आज भी वहाँ सदियों पुराना “मरियम मेरी का एक मकबरा बना हुआ है जिसे मरियम मेरी का स्थान” कहा जाता है।

सुविख्यात इतिहासवेत्ता मुल्ला नादिरी ने अपनी कृति “तवारीख-ए-कश्मीर” (कश्मीर का इतिहास) में ईसा के कश्मीर में निवास करने का सुविस्तृत वर्णन किया है। उनने लिखा है कि जिन दिनों ईसा- युजआशफ के नाम से यहूदियों के एक बड़े समुदाय के साथ कश्मीर आये थे उन दिनों वहाँ राजागोपदत्त-जिन्हें गोपानन्द भी कहा जाता था, का शासन था। यह घटना प्रथम शताब्दी के मध्य की है। यरुशलेम से दुबारा भारत आने के बाद ईसा ने अपना सम्पूर्ण जीवन इसी घाटी में व्यतीत किया। घाटी के लोगों की उन पर अगाध श्रद्धा थी। वे प्रायः एक संन्यासी की तरह एक-स्थान से दूसरे स्थान तक उपदेश करते हुए घूमते रहते थे, पर प्रायः कश्मीर अवश्य लौट आते थे! कश्मीर से ईसा का विशेष लगाव था। तब भारत का वह भूभाग हर दृष्टि से इतना समृद्ध और खुशहाल था कि उसे धरती के स्वर्ग की संज्ञा दी गयी थी। बाद में ईसा के साथ भी अनेक यहूदी परिवार आकर वहीं रहने लगे थे। नादिरी के अनुसार श्रीनगर से कोई 70 मील दूर एक गुफा है जहाँ ईसा मसीह ध्यान किया करते थे। इस गुफा के द्वार पर एक सुन्दर भवन निर्मित है जिसे ‘ऐश-मुकाम’ कहते हैं। यही पर मूसा का बहुमूल्य दण्ड (छड़ी)जो परम्परा से ईसा को मिला था, स्थापित था। यही दण्ड 15 वीं शताब्दी में प्रसिद्ध संत शेष नूरुद्दीन को प्राप्त हुआ था।

ईसा को जिस स्थान पर दफनाया गया था, वहीं पर ख्याति प्राप्त इतिहासवेत्ता एवं ‘कश्मीर रिसर्च सेन्टर फार बुद्धिस्ट स्टडीज’ के निदेशक प्रोफेसर फिदा हुसैन को पत्थर पर खुदे हुए चिन्ह और दूसरी तरफ क्रूस के चिन्ह बने हैं यह इस बात का सुनिश्चित प्रमाण है कि वह ईसा की ही समाधि है। उनके अनुसार जब दूसरी बार ईसा ने भारत में प्रवेश किया था उन दिनों उत्तरी भारत में राजा शालिवाहन (सन् 31 से 50 ई0) का शासन था। राजागोपानन्द का सन् 41 से 82 एवं कुशान राजा-कनिष्क का सन् 78 से 103 ई॰ तक शासन था। कनिष्क के शासनकाल में कश्मीर इण्डो-सीथिन राजवंशों की राजधानी थी। वहाँ अनेक धार्मिक, साँस्कृतिक बौद्धिक और राजनीतिक संस्थाएं थीं। ग्रीक और राजनीतिक संस्थाएं थीं। ग्रीक और राजनीतिक संस्थाएं थीं। ग्रीक और भारतीय दर्शन अपने चरम उत्कर्ष पर थे। उन्हीं दिनों लगभग सन् 80 में महाराजा कनिष्क ने श्रीनगर से 12 कि0 मी0 दूर हारान में विविध धर्मावलंबियों की एक महासभा में विख्यात मनीषी एवं आयुर्वेद के ज्ञाता नागार्जुन के साथ ईसामसीह भी उपस्थित थे। तब उनकी उम्र 80 वर्ष से अधिक थी। इस तथ्य की पुष्टि कवि कल्हन ने भी अपने प्रसिद्ध ग्रंथ ‘कादम्बरी’ में की है।

वस्तुतः ईसा की जीवन यात्रा देवसंस्कृति के बहुरंगी प्रवाह का एक अंग है जो रहस्योद्घाटन हुए हैं, वे सभी मत संप्रदायों को समीप लाकर देवसंस्कृति की संप्रदायों को समीप लाकर देवसंस्कृति की श्रेष्ठता का तथा “एकं सद्विप्रा बहुना वदन्ति” की ऋषि मान्यता का समर्थन ही करते हैं।


कलियुगी अभिशाप व सतयुगी संभावनाएँ

पतन सरल और उत्थान कठिन हैं। छत पर चढ़ने में साधन ढूँढ़ना और परिश्रम करना पड़ता करना पड़ता है किन्तु ऊपर से नीचे गिरने के लिए एक हलका धक्का पर्याप्त है। इतने भर से किसी को लुढ़कते हुए गहरे गर्त में आ पड़ने की दुर्गति हाथ लगती है। साधन चिरकाल से कठिनाई से जुटाए जाते हैं, पर उन सबको भस्मसात् करने में एक चिनगारी का छप्पर छू जाना सर्वनाश का कारण बनता है। ऐसा समुद्र जिसका जल पशु-पक्षियों तक के काम नहीं आता, पतन का क्रम ही ऐसा है, स्वर्ग तक पहुँचना कठिन है, पर वहाँ पहुँचने वाला यदि कुकृत्य करने लगे तो नरक जैसी दुर्गति में जा गिरने का उसका पथ प्रशस्त हो जाता है।

हमारी संस्कृति में सतयुग का बुढ़ापा जब आया तो उसमें विषाणुओं को आक्रमण करने का अवसर मिला। दमा, खाँसी, अपच, अनिद्रा, बहुमूत्र, रक्तचाप, आदि अनेकों रोग अनायास ही आ धमकते हैं जिनका जवानी की अवधि में कहीं अता पता तक न था। प्रकृति का नियम ही कुछ ऐसा है कि प्रकाश के उपरान्त अंधकार का साम्राज्य छाए। प्रकाश में पुरुषार्थ सतेज होता है, पर अंधकार में काम चलाऊ स्थिति बनाए रहने के लिए दीपक जलाने से लेकर चौकीदारी का नियम नहीं है। ऋतुएँ बदलती रहती हैं। काया भी जन्मती, बढ़ती और मृत्यु के मुख में चली जाती है युगों का परिवर्तन भी ऐसा ही होता रहा है। जन्म के समय प्रसव काल में सिर पहले बाहर निकलता है, पैर वाला कम महत्वपूर्ण अंग बाद में दीख पड़ता है।

सतयुग सृष्टा का आरंभिक विकासक्रम रहा है। इसमें उत्कृष्टताएँ ऊर्ध्वगामी एवं समुन्नत रही हैं। मानवी गरिमा का वह स्वर्णिम प्रभात काल रहा है। उसमें मनुष्य उन सब विभूतियों में सत्प्रवृत्तियों में जुटा हुआ था जिसके कारण उसे सृष्टा का ज्येष्ठ, श्रेष्ठ, वरिष्ठ युवराज कहलाने का अवसर मिला। प्रभात काल का उदीयमान सूर्य स्वर्णिम होता है एवं सविता कहलाता है और अर्घ्य के लिए, ध्यान धारण के लिए उसी का आश्रम लिया जाता है। सराहना सतयुग की होती है क्योंकि उसमें परिस्थितियां अनुकूल रहती हैं और अन्तः स्थिति उत्कृष्टता के अनुरूप सात्विकता सौम्यता, सज्जनता मनुष्य की विचारणा में क्रियाकलापों में भरी पूरी रहती है। इसीलिए उस काल को सराहा और देवयुग कहा जाता है।

प्रकृति चक्र गतिशील है। वह ऊपर से नीचे भी उभरता है। फव्वारे का पानी ऊपर उछलता है, किन्तु थोड़ा ऊँचा उठकर वह नीचे गिरने लगता है। यह गिरावट यदि चलती ही रहे तो उछलने वाला शीतल जल गन्दी नाली तक जा पहुँचता है और दुर्गन्धित, अस्पर्श्य बनता है। सत्संग जिस गति से उत्कर्ष का द्वार खोलता है, कुसंग उससे अधिक तेजी अपनाकर पतन के गर्त में गिरता है। सतयुग जिस क्रम से कभी फला-फूला उससे कहीं अधिक तेजी के साथ त्रेता और द्वापर की पतनोन्मुख प्रक्रिया तेज हुई। भगवान को जल्दी-जल्दी अवतार इन्हीं दिनों लेने पड़े हैं। अधर्म के उन्मूलन और धर्म के संस्थापन का कार्य जब मनुष्यों के लिए कठिन हो गया तो उसकी सहायता के लिए दिव्य अवतरण का सिलसिला चला। धर्म का साम्राज्य सतयुग में रहता है। इसलिए उन दिनों मनुष्य ही देवत्व की रक्षा कर लेता है। अवतारी दिव्य अवतरण तो असंतुलन को सन्तुलन में बदलने के

लिए ही होता है। जब सरकारें अपना काम ठीक तरह नहीं कर पातीं तो उन्हें भंग किया जाता है और राष्ट्रपति शासन या आपात स्थिति लागू की जाती है। अवतार यही है। हिरण्याक्ष, हिरण्यकश्यपु, वृत्रासुर रावण, कंस आदि का प्रादुर्भाव इस मध्यकालीन गए गुजरे समय में ही हुआ हैं। अवाँछनीयता विविध छिद्रों से इसी कारण फूटती रही है और उसका समय-समय पर दमन भी होता रहा है।

मध्यकाल के सामन्ती अंधकार युग का विस्तृत विवरण प्रस्तुत करना यहाँ अभीष्ट नहीं हैं। उस संदर्भ में इतना ही कहा जा सकता है कि उसमें विग्रह, विनाश, अनाचार, पतन, पीड़ा जैसी दुष्परिणतियों का ही दौर बहुलता के साथ रहा है। यों सत्व का सर्वनाश कभी भी नहीं होता। आदर्श विश्व अन्तरिक्ष में सितारों की तरह टिमटिमाते रहते हैं और अंधेरे की स्थिति भी ऐसी बनाए रहते हैं जिसमें सघन तमिस्रा का दौर रहते हुए भी काम चलाऊ प्रकाश बना रहे और यात्री को उस दुष्काल में भी रास्ता ढूँढ़ सकने का सुयोग बनता रहे। त्रेता और द्वापर की स्थिति ऐसी ही रही है। जिसमें निशा काल में भी चन्द्रमा की चाँदनी छिटकी रहे और सदाशयता का अस्तित्व जहाँ तहाँ दृष्टिगोचर होता रहे।

सघन तमिस्रा का घटाटोप तो इन दिनों कलिकाल में सघन छाया हुआ है, जिसमें संकीर्ण स्वार्थपरता का सर्वतोभावेन बोल-बाला हैं। अनास्था संकट ने हर दिशा में घेरा डाला है। जन साधारण में दुहरे व्यक्तित्व की उपज बढ़ चली है। बाहर से मनुष्य भलमनसाहत की वाणी बोलता है और विडम्बना रचता है, पर भीतर ही भीतर बहिरंग से सर्वथा प्रतिकूल अपना स्वरूप बनाता है। मन, कर्म, वचन, की एकरूपता नहीं रहती वरन् वे त्रिधाराएँ संगम नहीं बनाती, तीन दिशाओं में फूटती हैं। आदर्शों की व्यवस्था-विवेचना तो होती रहती है, पर उन्हें कार्य रूप में परिणत करने वाले बहुत खोजने पर कोई बिरले ही मिलते हैं। मर्यादाओं का पालन और वर्जनाओं का तिरस्कार कोई-कोई कभी-कभी ही करते हैं। चतुरता इसी सीमा तक बढ़ी है कि अनीति और अनाचार के पक्ष में भी तर्क, तथ्य कारण गढ़े और जोर-शोर से प्रतिपादित किए जाते हैं। सत्य को निरूपित करने वाली वाणी बहस में उलझती है और तब लगता है कि वाचालता जीतेगी और यथार्थता हारेगी वाद, पथ मत आदि इतने अधिक प्रकार के उभरे हैं कि उनके भूल भुलैयों से भरे मार्ग में भटकाव हाथ रह जाता है। सही मार्ग को खोजते नहीं बन पड़ता।

सताए या ठगे हुए व्यक्ति अनाचारों के लिए विपत्ति बनकर उभरते हैं। क्रिया की प्रतिक्रिया होती है। पापों का दुष्परिणाम उपस्थित होना निश्चित है। यह तत्काल लाभ कालान्तर में अनेक गुने संकट लेकर उभरता है और प्रकृति की क्रम व्यवस्था के अनुरूप सताने वाले को सताया जाता देखा जाता है। अनाचार से शारीरिक रोग, मानसिक प्रतिशोध और दैवी अभिशाप बनकर सामने आते हैं। तब प्रतीत होता है कि कर्मफल मिलने में देर भले ही लगे, पर सुनियोजित विश्व व्यवस्था में अंधेर नहीं है।

बढ़ते हुए अनाचार का नाम ही कलियुग का विस्तार है। इससे राजकीय, सामाजिक दण्ड तो मिलते ही हैं। शारीरिक, मानसिक, संताप भी कम त्रास नहीं देते। इसके अतिरिक्त कुपित प्रकृति विविध विधि अप्रत्याशित, अदृश्य संकटों की वर्षा करती है। भूकम्प, दुर्भिक्ष, बाढ़ दुर्घटना, महामारी, विग्रह, उपद्रव, युद्ध जैसे संकट इस प्रकार बढ़ते हैं कि अनाचारियों के अतिरिक्त वे लोग भी फँसते हैं जो दुष्टता की रोकथाम के लिए संघर्ष करने में डरते कतराते हैं। जिस प्रकार अनीति करना पाप है, उसी प्रकार उसका सहना भी अनर्थ है। दैवी विपत्तियाँ जन-जन को आगाह करती हैं कि समूची मानव जाति एक सूत्र में बँधी हैं। यदि एक जगह अनर्थ होता है तो यही सब इन दिनों हो भी रहा है एवं कलियुगी विनाश लीला को हम प्रत्यक्ष देख रहे हैं।

इसके निवारण का एक ही उपाय है-सत्प्रवृत्तियाँ एक जुट होने लगें तो सतयुग स्वतः आ जाता है। हमें आशावादी बने रह उम्मीद करनी चाहिए कि अगले दिनों अंधकार भरी मिशा तिरोहित होगी व नवयुग का, सतयुग का स्वर्णिम सूर्योदय होगा। ऐसा ही कुछ संकेत अदृश्य जगत से इन दिनों मिल रहा है।


Quotation

कर्तव्यनिष्ठ, बनो, सौदेबाजी न करो। सौदा बोने से पहले ही उपज की गारंटी चाहता है, जबकि कर्तव्य संसार के क्रम को समझता है कि बोने और काटने के सिद्धान्त पर दुनिया टिकी हुई है।


प्राण-पण से लग जाओ (kahani)

विवेकानन्द जी ने रामकृष्ण मिशन बनाकर मन्दिरों के साथ ही आश्रमों की परम्परा बनायी। जब वे अंतिम दिनों रुग्ण थे, तब कुछ लोगों ने कहा-“आप विश्राम क्यों नहीं करते’?” स्वामी जी ने कहा मेरा सेवा भाव मुझे बैठने नहीं देता। मैं केवल प्रेम का ही प्रचार चाहता हूँ, मेरे उपदेश वेदान्त की समता और आत्मा की विश्व व्यापकता पर ही आधारित है। दुखियों के दर्द को अनुभव करो और उनकी मस्तिष्क में इसी विचार को रखकर 12 वर्ष तक घूमा हूँ। मैं इस देश में भूखा-प्यासा भले ही मर जाऊँ, पर नवजवान! मैं तुम्हारे लिये यह वसीयत छोड़ जाता हूँ कि गरीबों, अज्ञानियों और दुखियों की सेवा के लिये प्राण-पण से लग जाओ।”


परिष्कृत धर्मतंत्र ही अतीत का गौरव लौटाएगा

जन मानस का स्तर ऊँचा उठाना इतना बड़ा और इतना महत्वपूर्ण कार्य है कि उसका प्रगति क्रम चल पड़ने पर प्रस्तुत समस्याओं में से हर किसी का समाधान सरलतापूर्वक निकल सकता है। अभावों की पूर्ति के लिए उपार्जन के जितने भी स्रोत हैं उनमें सबसे बड़ा है व्यक्तित्व का प्रामाणिक और परिमार्जित होना। यदि इसे उपलब्ध किया जा सके तो समझना चाहिए अवरोधों के जाल-जंजाल से छुटकारा मिल गया। यदि मनुष्य सद्गुणी बन सका तो समझना चाहिए कि विभूतियों को कही से भी घसीट लाने वाले चुम्बकीय शक्ति वाला पारस पत्थर हाथ लग गया। दरिद्रता पैसे की उतनी नहीं सतातीं जितना कि व्यक्तित्व की क्षुद्रता पटक-पटक कर मारती है और साधन होते हुए भी आये दिन रुलाती है।

दरिद्रता और कुछ नहीं पिछड़ेपन का ही दूसरा नाम हैं संकट कहीं दूर देश से नहीं आता। ओछा और अनगढ़ व्यक्तित्व ही उन्हें जहाँ-तहाँ से बीन बटोर लाता है। इन दिनों पिछड़ेपन को दूर करने के लिए अनेक आजीविका-अभिवर्धन के प्रगति-प्रयास चल रहे है। कितना अच्छा होता यदि इसी के साथ-साथ नैतिकता, बौद्धिकता और सामाजिकता से जुड़ी हुई सत्प्रवृत्तियों के अभिवर्धन पर भी उतना ही ध्यान दिया जा सकना बन पड़ा होता। संपदा में पदार्थों और साधनों की ही गणना होती है। अच्छा होता यदि शालीनता को भी इसी का एक पक्ष माना गया होता। उस अभिवर्धन के लिए भी समर्थ तंत्र खड़ा किया गया होता। वस्तुओं, पदार्थों, साधनों की आवश्यकता होती है, पर यह ध्यान देने योग्य है कि सूझबूझ और पुरुषार्थ परायणता ही अन्ततः समस्त अभावों को दूर कर सकने में समर्थ होती है। अव्यवस्थाओं, समस्याओं और संकटों से निपटने के लिए शक्ति भी चाहिए और अंकुश भी। कई बार इसके लिए दमन का आश्रय भी लेना पड़ता है और उद्दंडता पर अनुशासन थोपने वाले साधनों का भी प्रदर्शन करना पड़ता है। पर इस सबका सामयिक प्रतिफल ही हो सकता है। अनौचित्य की जड़ काटने लिए मनुष्य को विवेकवान, सद्गुणी और साहसी भी होना चाहिए। बाह्य उपचार दीखते भी है और जाने सराहे भी जाते हैं, किन्तु वास्तविकता यह है कि जो दीख नहीं पड़ता उसकी समर्थता कहीं अधिक है। शरीर कितना ही सुन्दर और बलिष्ठ क्यों न हो, अदृश्य प्राण के न रहने पर वह सारा सरंजाम कबाड़ बन कर रह जाता है।

भूलों में सबसे बड़ी भूल एक ही है कि दृश्य को सब कुछ माना गया और अदृश्य को उपेक्षा, अवमानना के गर्त में, गिरा न रहने देने के संदर्भ में, न उसे उखाड़ कर ऊँचा उठाने के संबंध में कुछ ऐसा किया जा सका जिसे कारगर कहा जा सके।

कठिनाई एक ही है कि अन्तः स्फुरणा उभारने वाले आन्तरिक अन्तः स्फुरणा उभारने वाले आन्तरिक पौरुष का स्तर दीन−दुर्बल जैसा हो गया और बाहर से सहारे दे सकने वाले अवलंबनों ने इस दिशा से मुँह मोड़ लिया शिक्षा का प्रबंध हुआ पर सचेतन को परिष्कृत कर सकने वाली “विद्या” का कहीं से कोई प्रबंध न बन पड़ा। न उसका तंत्र खड़ा किया गया और न उस प्रयोजन को पूरा कर सकने वाले उपाध्यायों का, पुरोहितों का वर्ग उभर कर आगे आया।

मुड़कर पीछे की ओर देखा जाय तो प्रतीत होगा कि अतीत में, आज की तुलना में साधनों का भारी अभाव था। पर जो कुछ हस्तगत था उसका सदुपयोग कर सकने में कौशल का समुचित प्रबंध बना रहने पर परिस्थिति इतनी उच्चस्तरीय रहती रही जिन्हें सतयुग का नाम दिया जाता रहा। तब मनुष्य में देवत्व की अभिव्यक्ति उजागर होती थी और धरती पर ऐसा वातावरण बना रहता था जिसे स्वर्गोपम कहा जा सके। हर किसी को सुख-शाँति उपलब्ध थी। हर किसी को हंसते-हँसते जीने, और मिल-बाँटकर खाने का अवसर उपलब्ध था।

आखिर यह सब बन कैसे पड़ा? जन्म से तो भी सभी प्रायः नर पशु की स्थिति में धरती पर आते हैं। उन्हें बनाने या उठाने में तो संबद्ध परिकर ही प्रधान भूमिका निभाते हैं। स्मरणीय अतीत में साधनों के उपार्जन का, उपयोग का सही तरीका तो अपनाया ही जाता रहा होगा। सबसे बड़ी बात यह बनी रही कि अन्तराल को परिष्कृत और व्यक्तित्व को समुन्नत बनाने के लिए कुशल कारीगर बड़ी संख्या में उपलब्ध रहे और कार्यक्षेत्र में तत्परतापूर्वक डटे रहे। इस पुण्य प्रताप का प्रतिफल था कि स्वल्प साधनों में असीम आनंद और सौजन्य ने समूचे वातावरण को कृत-कृत्य करके रख दिया।

लोक चेतना को समुन्नत स्तर का बनाये रहने का घोषित और निर्धारित उत्तरदायित्व पुरोहित का है। उसके लिए यही नियति थी जिसे श्रद्धापूर्वक सौंपा और शपथपूर्वक स्वीकारा गया था। राष्ट्र को जीवित और जाग्रत बनाये रखने का दायित्व यही पुरोहित वर्ग चिरकाल तक सँभाले-सँजोये रहा। फलतः जन-समुदाय के सभी घटक घड़ी के कल पुर्जे की तरह ठीक काम करते रहे। पेण्डुलम और मिनट यदि अपनी सही चाल पर चलते रहे तो घड़ी के बन्द होने का अवसर कदाचित ही आता है। लोक चेतना की सत्ता और महत्ता तो असीम है। पर उसमें कमी एक ही है- आत्म संकल्प को उभारने में स्वावलम्बी साहस कम ही जुट पाता है। उसे समर्थों का सहारा तलाशना पड़ता है। बच्चे भी तो अभिभावकों से प्रायः ऐसी ही आशा करते हैं।

प्राचीनकाल में एक विशेष वर्ग था जिसे “पुरोहित” कहते थे। उसकी कई श्रेणियाँ श्री ऋषि, तपस्वी, योगी, मनीषी स्तर की रीति-नीती अपना कर वे अपनी योग्यता और पात्रता संपादन करते थे ताकि उनके मार्ग दर्शन को जन समुदाय द्वारा स्वीकारा जा सके। इसके साथ ही वे उस सेवाधर्म को कार्यान्वित करना आरंभ कर देते थे जिसके आधार पर चिन्तन में उत्कृष्टता उभरती है और चरित्र एवं व्यवहार को ऐसा सुगढ़-समर्थ बना देती है कि उसके सहारे में न केवल निजी जीवन वरन् संपर्क में आने वाले परिकर को भी समुन्नत बनाने का अवसर मिलता है।

(खाली) क्षेत्र में जन संपर्क साधने और उन्हें भावनात्मक दृष्टि से परिष्कृत किये रहने का दायित्व निभाते थे। गुरुकुल संचालन के लिए उन्हें पत्नी की सहायता अनिवार्य रूप से अपेक्षित होती थी अपनी निजी जीवन का, पारिवारिक और वैयक्तिक स्वरूप आदर्शों से ओतप्रोत रखकर वे जनसाधारण के सामने एक उदाहरण प्रस्तुत करते थे कि किस प्रकार सीधे सरल तरीके से सर्वोपयोगी उत्कृष्ट जीवन जिया जा सकना संभव हो सकता था। लोकशिक्षण के लिए वे अपने यजमानों में स्वाध्याय-सत्संग की व्यवस्था बनाये रखते थे इसके लिए पर्व-त्यौहारों पर व्रत संस्कारों के माध्यम से सामूहिक प्रशिक्षण अधिक उपयोगी और प्रभावी समझा जाता था। अस्तु वे ऐसे ही अवलंबनों के सहारे अपने परिकर के यजमानों को उच्चस्तरीय प्रेरणाओं से अनुप्राणित किया करते थे।

साधु वर्ग का कार्यक्रम प्रव्रज्या पर अवलंबित रहता था। इसलिए उन्हें परिव्राजक भी कहा जाता था। परिव्राजक अर्थात् परिभ्रमण कर्ता इस आधार पर उन्हें व्यापक क्षेत्र के बहुसंख्यक निवासियों के साथ संपर्क साधने में सरलता होती थीं विभिन्न वर्गों और क्षेत्रों की स्थानीय समस्याओं और आवश्यकताओं को इस आधार पर समझ सकना उनके लिए सरल पड़ता था। साथ ही जहाँ जैसा समाधान संभव था वहाँ उसका कार्यक्रम बनाने, सरंजाम जुटाने एवं ढाँचा खड़ा करने का प्रयास करते भी बन पड़ता था। इस क्रिया-प्रक्रिया का महत्व इसलिए भी अधिक था कि ज्ञान पिपासा बुझाने के लिए जिन्हें मनीषियों से संपर्क साधने पहुँचना कठिन पड़ता था उन्हें वह लाभ घर बैठे भी मिल जाता था। बहुत लोग एक समय एकत्रित होकर एक मार्गदर्शक से उद्बोधन प्राप्त करें यह (खाली) तरह स्वयं ही परिभ्रमण पर निकला जाय और जन-जन को अपनी ऊर्जा से प्रतिभासित किया जाय। जिन्हें यह कार्यपद्धति पसन्द आती थी। वे अविवाहित रहते थे और तीर्थ यात्रा के नाम से जन-जागरण की पदयात्रा में निरन्तर निरत रहते थे।

साधु और ब्राह्मण वर्गों के समन्वय से उस लोक शिक्षण की आवश्यकताएँ भली प्रकार पूरी हो जाती थीं जिससे व्यक्तित्व निखरता है और उस प्रामाणिकता एवं प्रतिभा का अर्जन होता है जो भौतिक और आत्मिक सफलताओं का पथ प्रशस्त कर सके।

साधु और ब्राह्मण वर्ग के लोकनायकों का एक मिश्रित रूप भी था-वानप्रस्थ। इस वर्ग के लोग आधी आयुष्य तक पहुँचते-पहुँचते अपने सामान्य गृहस्थ जीवन के दायित्व पूरे कर लेते थे और फिर आत्मनिर्माण और लोक मंगल की समन्वित साधना में निरत होते थे। जो पत्रियाँ साथ रहना चाहतीं थी वे पति के साथ उसी प्रयोजन में निरत होती थी। जो अपने को असमर्थ पाती थीं वे परिवार को सँभालने और पड़ोस को यथा संभव अपनी उपस्थिति का लाभ देती थी।

तीर्थ स्थानों के सुव्यवस्थित आश्रम इसीलिए बने थे कि वहाँ वानप्रस्थ वर्ग के लोग आरण्यक व्यवस्था के अनुरूप अपनी वरिष्ठता का अभिवर्धन करें और समयानुरूप सेवा क्षेत्र के साथ भी संपर्क साधें गृहस्थ जन भी तीर्थों के प्रेरक वातावरण में कुछ समय निवास करके अपनी विशिष्टताओं में अभिवर्धन में अभिवर्धन करने वाली साधनाएँ संपन्न करते थे।

इसे समूचे धर्मतंत्र की मिली जुली सामर्थ्य ऐसी हो जाती थी कि उसका प्रभाव समूचे जन समुदाय पर पड़े बिना नहीं रहता था। दुष्प्रवृत्तियों के उन्मूलन और सत्प्रवृत्तियों के अभिवर्धन में सहायता मिले। इस आधार पर धर्मतंत्र इतनी कम सेवा साधना कर पाता था जितनी कि शासन तंत्र से भी नहीं बन पड़ती। शासन प्रायः अवाँछनीयताओं से निपटता रहता था, प्रगति के लिए आवश्यक साधन-सुविधाएँ भी जुटाता है किन्तु उस सब से भी अधिक महत्वपूर्ण पक्ष है व्यक्ति की शालीनता और दक्षता का। चिन्तन, चरित्र और व्यवहार में सुसंस्कारिता के समावेश का। इसके बिना समुचित साधन उपलब्ध कर लेने पर भी सार्वजनिक शान्ति और प्रगति का सुयोग बन नहीं पड़ता। धर्मतंत्र इसी महती आवश्यकताओं की पूर्ति करता था। इसी को परिष्कृत रूप में प्रस्तुत करने की आज आवश्यकता है।


समझदारी इसी में है कि मन संतुलित रहे

मानसिक स्वास्थ्य को सही रखने के लिए आवश्यक है कि जीवन को खिलाड़ी की तरह जिया जाय। उस भाग-दौड़ में लगने वाली छोटी-मोटी चोट-ठोकरों, हार-जीतों को महत्व न दिया जाय। इन्हें रात-दिन के, ज्वार-भाटों जैसा नियति का कौतुक-कौतूहल मात्र माना जाय। हर काम में चुस्ती और मुस्तैदी बरती जाय पर यह आशा न रखी जाय कि इच्छित कामना के अनुरूप ही परिस्थितियाँ बनती चली जायेंगी। प्रतिकूलताएँ भी आती रहती हैं। उनका खट्टा-मीठा स्वाद तो चखते रहा जाय पर अवसर ऐसा न आने दिया जाय कि हर्ष-शोक की इतनी असाधारण अनुभूति हो कि मानसिक संतुलन ही गड़बड़ा जाय। आवेश चढ़ दौड़े और उत्तेजना में ऐसा कुछ कर बैठे जो अस्वाभाविक एवं अनावश्यक हो। जिस के लिए पीछे पछताना और लोगों का उपहास तिरस्कार सहना पड़े।

हर काम को पूरी समझदारी, जिम्मेदारी, तत्परता और तन्मयता के साथ किया जाय। उसमें आलस्य-प्रमाद का प्रवेश न होने दिया जाय। उपेक्षा-शिथिलता का लाँछन न लगने दिया जाय। इतने पर भी यह निश्चित नहीं किया जा सकता कि जो चाहा है वही होकर रहेगा। तैयार इसके लिए भी रहा जाय कि आँशिक सफलता मिले अथवा सर्वथा असफल रहना पड़े तो विचलित होने की मनः स्थिति न बन पावे। सोचा जाना चाहिए कि संसार हमारे लिए ही नहीं बना है। इसमें असंख्यों की साझेदारी है। जो अपने लिए लाभदायक समझा जाता है वह दूसरों को हानिकारक भी हो सकता है। प्रकृति को संतुलन बनाये रहने के लिए सभी का ध्यान रखना पड़ता है। खेत में एक जोतता है तो दूसरा काटता है। यही बात घटनाक्रमों के संबंध में भी लागू होती है इच्छा पूर्ति की आतुरता को महत्वाकाँक्षा कहते हैं, आवश्यक नहीं कि वे हर किसी की पूरी ही होती रहें। अस्तु किसी भी विचारशील को हार−जीत के अनुकूलता-प्रतिकूलता में से कोई भी हाथ लगने की संभावना से पूर्व मानस बना लेना चाहिए। प्रतिक्रियाएँ ऐसी न हों जो आवेशग्रस्त मानस बना दें और अपनी वितर्क शक्ति का ही अपहरण कर लें। वहीं तो एक मात्र ऐसा माध्यम है जिसके सहारे कठिनाइयों से बचना-छूट सकना संभव होता है। अन्य मार्ग खोजने और नया उपाय सोचने के लिए चिन्तन चेतना काम करती रह सकती है। कि वर्तमान अवरोध से निपटा और नये सिरे से नया कदम उठा सकना संभव हो सके।

मन को हर स्थिति में हलका-फुलका रहने दिया जाय। संतोष और धैर्य को इतनी मजबूती से पकड़े रहा जाय कि वे किसी भी कारणवश छिनने न पायें। हर्ष-शोक को क्षणिक उभार समझा जाय और उन्हें जुगनू के चमक जैसा अस्थिर माना जाय। कल्पना की रंगीली उड़ानों में उड़ते हुए शेखचिल्ली का अनुकरण न किया जाय और न आशंकाओं से इतना भयभीत रहा जाय कि अगले दिनों कोई विपत्ति ही टूटने वाली है। नाविक रात को भी नाव चलाते हैं, पर ध्रुव तारे को देखकर दिशा ज्ञान पाते रहते हैं। उज्ज्वल भविष्य की संभावना पर विश्वास रखना, वह ध्रुव तारा है जिस पर विश्वास रखें रहने पर लक्ष्य तक जा पहुँचने की आशा-ज्योति प्रज्वलित रहती है। इसे स्वयं बुझा लेने पर तो इस तमिस्रा के माहौल में मात्र अंधकार ही हाथ रह जाता है। निराशा एक प्रकार की मानसिक अपंगता है, जिसकी पकड़ जाने पर कुछ करते धरते नहीं बन पड़ता। रुग्णता, दुर्बलता, जरा-जीर्णता जैसी परिस्थितियों में मनुष्य असहाय, असमर्थ बनकर रह जाता है। यही दशा उन लोगों की होती है जो किन्हीं छोटी-मोटी असफलताओं को तिल का ताड़ बनाते हैं। रस्सी का साँप बनना और झाड़ी में से भूत निकलता ऐसा ही मानसिक विभ्रम है जैसा कि निराश-ग्रस्त, खीचते, रोते-कलपते रहने वालों के सामने निरन्तर खड़ा रहता है। विपत्ति की इस मानसिक भँवर से बचे रहने में ही भलाई है। संतुलन शान्त, स्थिर और आशान्वित रहने का अभ्यास सतर्कतापूर्वक निरन्तर करना चाहिए।

शरीर की बलिष्ठता और सुन्दरता का महत्व सभी जानते हैं। उसके लिए इच्छा और चेष्टा भी करते हैं इससे अधिक महत्वपूर्ण मनोबल की प्रखरता और प्रसन्न मुद्रा को समझा जाना चाहिए। आत्म विश्वास के रहते कोई कार्य असंभव नहीं रह जाता। गई गुजरा परिस्थितियों में सर्वथा साधनहीन रहते हुए भी लोगों ने आत्मविश्वास के सहारे प्रगति का मार्ग स्वयं सोचा,खोजा, और उस पर स्वयं अपने पैरों चलते हुए उन्नति के चरम शिखर तक पहुँचे है। यह संभावना हर किसी के साथ जुड़ी रह सकती है, शर्त एक ही है कि किसी कठिनाई से निराश होकर हाथ पैर फुला कर न बैठा जाय।

मुसकान मनुष्य के पास एक प्रत्यक्ष दैवी वरदान हैं। जो हँसता-हँसाता रहता है वह चुम्बक की तरह आकर्षण शक्ति से भरा पूरा और कमल पुष्प जैसा सुन्दर सुगंधित बना रहता है।

यह अपना निजी उत्पादन है। यदि उसे स्वभाव का अंग बना लिया जाय और दृढ़तापूर्वक उसका अंग बना लिया जाय और दृढ़तापूर्वक उसका अभ्यास कर लिया जाय तो व्यक्तित्व असाधारण रूप से सुन्दर बन जाता है उसे न तो बुढ़ापा छीन सकता है और न कठिनाइयों के बीच रहते हुए भी उस पर कोई आँच आती है। शरीर मात्र यौवन के दिनों में ही बलिष्ठ रहता है। बचपन और बुढ़ापे में तो असमर्थता ही छाई रहती है। बीमारी और असंयम भी उसे लुँज-पुँज कर देते हैं पर आत्म विश्वास के आधार पर उपार्जित किया गया मनोबल ऐसा है जो सदा सर्वथा साथ देता है और प्रचण्ड जीवनी शक्ति की तरह हर कठिनाई से लड़ पड़ने के लिए समुद्यत रहता है। प्रसन्न रहना उच्चस्तरीय कला-कौशल है। जिसे मुसकाते रहने की आदत है वह संपर्क में आने वालों पर अपने को सफलता संपन्न होने की छाप छोड़ता है। उस सौंदर्य की अपनी अतिरिक्त गरिमा है। जिससे हर देखने वाला प्रसन्नता और उत्साह उपलब्ध कराता है। निकट आने वाले किसी फूले फले महकते वृक्ष की सघन छाया में बैठने जैसा आनन्द पाता है। प्रसन्न चेता के सान्निध्य में रह कर प्रसन्न रहने के कौशल में प्रवीण होने के लिए आरंभ में दर्पण में अपनी मुसकाती छवि का सौंदर्य अनुभव करते हुए स्वभाव का अंग बनाया जा सकता है फिर बाद में तो वह एक आदत ही बन जाती है जो व्यक्तित्व का अविच्छिन्न अंग बनी रहती है। बुरे दिनों में भी उसका साथ नहीं छूटता। प्रसन्न रहना प्रकारान्तर में सफल और सुखी जीवन को उपलब्ध कर लिये जाने की घोषणा करते रहना है। इस तथ्य पर विश्वास भी किया जाता है और संपर्क में आने वाले, उस स्तर को अपनाने वाले व्यक्ति से प्रभावित भी होते हैं। सम्मान करने और सहयोग भी देने के लिए स्वयं उत्सुक रहते हैं। इसके विपरीत संकोची स्वभाव के डरे सहमे उदास, एकाकी प्रकृति के लोग सदा उपहासास्पद बने रहते हैं। कोई उनकी कठिनाई पूछने और सहानुभूति दर्शाने नहीं आते जैसा कि इस प्रकार के लोग आमतौर से आशा किया करते हैं। जब हम हँसते हैं तो दूसरे लोग उस आनन्द में भागीदार बनने के लिए साथ लग लेते हैं, पर जब मुँह लटकाये रहने की स्थिति में होते तो पुराने साथियों में से भी अधिकाँश छिटकते और अलग हटते जाते हैं। दोनों परस्पर विरोधी परिस्थितियों में से किसी का वरण कर लेना सर्वथा अपने हाथ की बात है। परिस्थितियों की तुलना में मनःस्थिति का वर्चस्व कहीं अधिक बढ़ा चढ़ा है। इस प्रकार के रहस्य से हर किसी को अवगत होना चाहिए।

स्वभाव की कुटिलता एक ऐसी विपत्ति है जिसे दुर्दिनों का पूर्वाभास भी कहा जा सकता है। स्वार्थी, लालची, अहंकारी प्रकृति के व्यक्ति इच्छित बड़प्पन को सही रीति से पा सकने में सफल नहीं हो सकते, तब उन्हें कुटिलता ही सूझती है। आतंक और छद्म यह दो ही हथियार उनके पास बने रहते हैं जिनको वे उचित अनुचित का विचार किये बिना समय कुसमय इन हथियारों का प्रयोग करने लगते हैं साथ ही यह भूल जाते हैं कि क्रिया की प्रतिक्रिया भी होती है। तुर्की बेतुर्की जवाब भले ही न मिले पर ऐसों का सम्मान तो निश्चित रूप से चला जाता है। अवसर आने पर उस आक्रमण से प्रभावित लोग ही नहीं, सुनने, देखने वाले भी बागी हो जाते हैं और अवसर मिलते ही नीचा दिखाने में नहीं चूकते। यह स्पष्टतः पतन का मार्ग है। उच्छृंखलता, उद्दंडता अपनाने वालो में से सहयोग से, सम्मान से वंचित रहने के कारण प्रगति की दिशा में बढ़ा सकने वाली परिस्थितियाँ ही हाथ नहीं लगती। अनुशासनहीन, उद्दंडता, आक्रमण प्रकृति के व्यक्ति कभी कहीं तात्कालिक लाभ भले ही उठा लें पर वस्तुतः अपने व्यक्तित्व को इतना हेय बना लेते हैं कि किसी महत्वपूर्ण प्रगति के साथ जुड़ने की प्रायः समस्त संभावनाएँ ही समाप्त हो जाती है। ऐसे लोग खीजते, कुड़कुड़ाते, जिस-तिस पर दोषारोपण करते हुए ही जीवन यात्रा समाप्त करते हैं। ऐसा कुछ भी हस्तगत नहीं कर पाते जिसे अभिनंदनीय या अनुकरणीय कहा जा सके।

निषेधात्मक दृष्टिकोण अपना लेने पर हर किसी के दोष दुर्गुण खोजते रहने की आदत पड़ जाती है। सदा शिकायतें ही शिकायतें बनी रहती हैं, फलतः द्वेष की मनोभूमि बनती रहती है। द्वेष की प्रतिक्रिया प्रत्याक्रमण में भी हो सकती है। वैसा न हो तो विद्वेषी के प्रति किसी के मन में सहानुभूति उत्पन्न नहीं होती भले ही वह अपने को अनीति के विरुद्ध संघर्ष करने वाला शूरवीर घोषित करते रहें। सिद्धांतों का आवरण ओढ़कर भी संचित निकृष्टता को छिपाया नहीं जा सकता। वह पोटली में बँधी होने पर भी हींग की बदबू की तरह अपनी उपस्थिति की अप्रत्यक्ष घोषणा करती रहती है। किसी को सुधारने-बदलने का एक मात्र सही तरीका है अपने सद्भाव को बनाये रहकर प्रतिकूल समझे जाने वाले को सुधारने का अवसर देना। बुद्ध, गाँधी, ईसा, आदि ने यही नीति अपनाई और वे अपने अनोखे आदर्शों को सदा सर्वथा जीवित रहने के लिए छोड़ गये। युद्ध तो अब तक असंख्यों हुए है। उनसे मात्र विनाश ही हुआ है। किसी प्रकार की कहीं कोई समस्या नहीं सुलझी। इसी शताब्दी के दो विश्व युद्ध इस बात के साक्षी हैं कि संघर्ष की प्रक्रिया से जूझने हेतु पारस्परिक सहयोग की नीति अपनाने से हर दृष्टि से लाभ है। व्यक्तिगत विद्वेषों को भी पंचायत जैसे माध्यमों से बहुत हद तक हल किया जा सकता है। कानून भी किसी हद तक ऐसे प्रसंगों में सहायता कर सकता है। डाक्टरों द्वारा अपनायी जाने वाली वह नीति ही सही है जिसमें रोग को तो मारा जाता है पर रोगी के प्रति समुचित सद्भावना रखकर उसे बचाया जा सकती है। इन दिनों ऐसे मनोरोगों की ही अधिकता है जो अहंकारी, आक्रामक, उद्दंडता अपनाते और बदले में पग-पग पर ठोकरें खाते हैं। उन्हें सुधारना कठिन भले ही लगता है पर वह असंभव नहीं है।

लालच भी बुरी बात है। औसत नागरिक स्तर का निर्वाह अपर्याप्त मानकर जो धन में कुबेर और अधिकार में इन्द्र बनने की आकुलता सँजोये रहते हैं। उन्हें अनर्थ करने के अतिरिक्त और कुछ उपाय ही नहीं सूझता। विलासिता और अहमन्यता मिलकर आत्म प्रदर्शन की प्रवृत्ति भड़काती है। जिन्हें औरों से बड़ा बनाने भर की “ऊत” सूझती रहती है वे अपने ऊपर चित्र-विचित्र विडम्बनाएँ लादते और राम लीलाओं में लगायें जाने वाले कागज के पुतले रावणों जैसा दीखने के लिए कुछ ऐसे ही स्वाँग रचते हैं। ठाट-बाट, बचकाने श्रृंगार, महंगी फैशन, शेखी-खोरी, सस्ती वाहवाही लूटने के लिए कराई गई चमचागिरी, चारणबाजी, विज्ञापनबाजी, धूमधाम में समय और पैसा तो खर्च होता ही है साथ ही जिन्हें इस काम को करने के लिए सहयोगी बनाया जाता है उनका भी उसे दर गुजर किया जा सकता था। सस्ती वाहवाही लूटने की प्रवृत्ति चरितार्थ होते देखकर अन्य अनेकों के मन में वैसी ही नई विडम्बना रचने की ललक उभरती है और वे भी वैसा ही करने के लिए अपने ढंग से कुछ न कुछ कर गुजरने के लिए आतुर होते हैं। मृतक भोज, धूमधाम वाली शादियाँ, तीर्थयात्राओं के पीछे यह सस्ती वाहवाही लूटने की आशंका ही प्रधान रूप से काम करती है।

यह दुष्प्रवृत्ति भी कामुकता तरह ही आकर्षक,उत्तेजक और मस्तिष्क में खलबली मचाकर उसे सत्प्रयोजनों से विलग करती है। मानसिक क्षेत्र में वह गुंजाइश नहीं रहती जिससे प्रगति में दूरगामी योजनाएँ शांतचित्त से बन सकें और कोई ठोस उपलब्धियाँ हस्तगत कर सकें। यही कारण है कि लोकेषणा, कामेषणा, और वित्तेषणा को गर्हित स्तर का ठहराया गया है और इन विकृत महत्वाकांक्षाओं से बचे रहने के लिए कहा गया है। मनोविकारों से ग्रस्त न होने के लिए इन तीनों अनावश्यक उत्तेजनाओं से अपने आप को भड़काने-जलाने से बचकर ही रहना चाहिएं।

चिन्ता, भय , क्रोध, आवेश, आशंका कुकल्पना जैसी सनकों में अधिकाँश कुकल्पनाएँ ही काम करती रहती है। निराशा, हीनता दीनता जैसी प्रवृत्तियाँ भी मनुष्य को अपंग बनाती है इनसे बचना आत्म शिक्षण पर अवलंबित है। जिस पर दूसरों को कुमार्ग गमन से रोक जाता है उसी प्रकार अपने संबंध में अधिक सतर्कता और जागरुकता बरतने की आवश्यकता है।

मस्तिष्क को सदा रचनात्मक कामों में लगाये रहा जाय। इसी आधार पर प्रस्तुत विपत्तियाँ भी टलती हैं और प्रगति के लिए उपयुक्त राह भी मिलती है। अवाँछनीयताओं को निरस्त करने के लिए रचनात्मक दूरगामी परिणाम उत्पन्न करने वाले उपाय ही अपनाने चाहिए। मात्र कमर कसकर लड़ने पर उतारू हो जाना ही परास्त करने का उपाय नहीं है। इससे तो आक्रमण-प्रत्याक्रमण का ऐसा कुचक्र भी चल सकता है जिसका कभी कहीं अन्त ही न हो। कीचड़ को कीचड़ से नहीं धोया जा सकता। अनाचार के प्रति उसी अस्त्र का उपयोग करना, आवेश की स्थिति में लगता तो अच्छा भी है और आवश्यक भी पर उसकी परिस्थितियों पर ध्यान देने से निष्कर्ष निकलता है सर्वसाधारण को तालमेल की नीति ही अपनानी चाहिएं। प्रताड़ना देने का कार्य शासन के हाथ ही छोड़ देना चाहिए निजी क्षेत्र में तो असहयोग, विरोध और बहिष्कार जैसे आधार ही समस्याओं का ऐसा हल निकाल देते हैं जिनमें कुछ समय भले ही लगे पर और भी अधिक दूरगामी प्रतिक्रिया उत्पन्न करने से बचा लेते हैं।

मानसिक आवेशों से बचे रहने की गीताकार ने असाधारण उपयोगिता बताई है। शारीरिक स्वास्थ्य की रक्षा को ध्यान में रखते हुए भी उस नीति को अपनाया जाना चाहिए।


दोषी ठहराने से क्या लाभ? (kahani)

‘भगवान्! आपने इस संसार में लाल, पीले, हरे, सफेद, और नीले जैसे सुन्दर और आकर्षक रंग बनाये हैं। तब मैंने ही पूर्व जन्म में कौन-सा पाप किया था, जिसके कारण श्यामवर्ण मेरे ही हिस्से में आया। मेरी कालिमा किसी को पसन्द नहीं। हर व्यक्ति मेरी कुरूपता को देखकर नाक-भौं सिकोड़ता है। यह आपका सरासर अन्याय है।’ काले रंग ने उलाहने के स्वर में विधाता से कहा।

विधाता ने मुसकराते हुए कहा-’वत्स!तुम कितने मूर्ख हो। तुम्हें शायद यह भी मालूम नहीं कि मैं इस संसार में किसी वस्तु को कोई रंग प्रदान नहीं करता। सारे रंग सूर्य की किरणों में समाये हुए हैं। जिस वस्तु में उनका रंग खींचकर अपने में पचा लेने और फिर उसको विकीर्ण कर देने की जैसी क्षमता है, वैसा ही रंग जानता, सब रंगों को अपने भीतर भरता भर है निकालने का नाम नहीं लेता। इस दशा में कालिमा तो तेरे पल्ले बँधेगी ही। मुझे दोषी ठहराने से क्या लाभ?


निराशा एक भ्राँति, जीवन उल्लास है।

जीवन का अर्थ है- सक्रियता, उल्लास, प्रफुल्लता। निराशा का परिणाम होता है-निष्क्रियता, हताशा, भय उद्विग्नता और अशान्ति। जीवन है प्रवाह जबकि निराशा है सड़न। जीवन पुष्प आशा की उष्ण किरणों के स्पर्श से खिलता है, निराशा का तुषार उसे कुम्हलाने को बाध्य करता है। निराशा एक भ्राँति के अतिरिक्त और कुछ नहीं।

आज तक ऐसा कोई व्यक्ति पैदा नहीं हुआ, जिसके जीवन में विपत्तियाँ और विफलतायें न आयी हों। संसार चक्र किसी एक व्यक्ति की इच्छा के संकेतों पर गतिशील नहीं है। वह अपनी चाल चलता है। इसके अलग-अलग धागों के बीच व्यक्तियों का अपना एक निजी संसार होता है। चक्र की गति के साथ आरोह-अवरोह अनिवार्य है, अवश्यंभावी है। उस समय सम्मुख उपस्थित परिस्थितियों का निदान-उपचार भी आवश्यक है पर उसके कारण कुँठित हो जाना व्यक्ति के जीवन की एक हास्यास्पद प्रवृत्ति मात्र है। उसका विश्व गति से कोई भी तालमेल नहीं। निराशा व्यक्ति का अपना ही एक मनमाना और आत्मघाती उत्पादन हैं। ईश्वर की सृष्टि में वह एक विजातीय तत्व है। इसीलिए निराशा का कोई भी स्वागत करने वाला नहीं।

निराशा, सोचने की त्रुटिपूर्ण पद्धति हैं। निषेधात्मक चिन्तन और दृष्टिकोण की निष्पत्ति है। गिलास आधा भरा है, आधा खाली है- इस पर दोनों तरह से सोचा जा सकता है। एक तरीका यह है कि हाय, हमारा गिलास आधा खाली है। इसमें अब रस कहाँ, स्वाद कहाँ। दूसरा तरीका यह है कि हमारा गिलास तो आधा भरा है, लाखों ऐसे हैं जिनके गिलास में एक बूँद भी जल नहीं हैं। वे प्रयास कर रहे हैं-पूरा गिलास भरने का। तब हमारे गिलास के भरने में क्या कठिनाई है?

मात्र कठिनाइयों, अभावों, पर विचार करते रहना मानसिक रुग्णता और विकृति है। वह आन्तरिक दरिद्रता के चश्मे से देखा गया वस्तु-जगत है। स्वामी विवेकानन्द के शब्दों में कहें-“तो वह नास्तिक है। क्योंकि उसे स्वयं पर भी विश्वास नहीं है। सृष्टि की व्यवस्था पर तो नहीं ही है।

सामान्य जीवन क्रम के उतार-चढ़ावों से ही जो उद्विग्न, अशान्त हो जाते हैं, वे जीवन में किसी बड़े काम को करने की कल्पना भी नहीं कर सकते। बड़े काम तो धैर्य,, अध्यवसाय तथा कठोर श्रम की अपेक्षा रखते हैं। मानसिक सन्तुलन वहाँ पहली शर्त है। तरह-तरह की जटिल, पेचीदी परिस्थितियाँ, बड़े कामों में पैदा होती रहती हैं। अशान्त, व्यग्र मनः स्थिति में डरते बीच कोई रास्ता नहीं ढूँढ़ा जा सकता असफलता और हताशा ही ऐसे व्यक्तियों की ललाट रेखा है।

इसका यह अर्थ नहीं कि बचकानी कामनाओं को लेकर सपने देखते रहा जायं उनकी परिणति तो भ्रम-भंग में ही होने वाली है। यथार्थ पर आधारित आशावादी सपने भी कई बार सच नहीं हो पाते फिर बाल कल्पनाओं की तो बात ही क्या? यथार्थपरक आशावादी सपने टूटने पर भी हताशा को नहीं, नवीन प्रेरणा को ही जन्म देते हैं क्योंकि परिस्थितियों की जटिलता से उपस्थित हो सकने वाली बाधाओं का अनुमान तो उनके साथ रहता ही है, अप्रत्याशित आघातों को झेल सकने की तत्परता भी विद्यमान रहती है। ऊँचे उज्ज्वल और यथार्थपरक आदर्शवादी प्रदान करते हैं तथा पुरुषार्थ की प्रेरणा देते हैं।

संसार बना ही सफलता-असफलता दोनों के ताने-बाने से है। सभी व्यक्ति असफलताओं, अवरोधों से हताश होकर, हिम्मत हारकर बैठ जायँ तब तो संसार की सारी सक्रियता ही नष्ट हो जाए। पतझड़ के बाद वसंत- रात्रि के बाद दिन- दुख के बाद सुख तो सृष्टि-चक्र की सुनिश्चित गति-व्यवस्था है। इसमें निराश होने जैसी कोई बात है नहीं।

इससे भी उच्च मनः स्थिति उन महापुरुषों की होती है, जो अपने समय की पतनोन्मुख प्रवृत्तियों से जूझने का संकल्प लेकर आजीवन चलते रहते हैं, यह जानते हुए भी कि पीड़ा का विस्तार अति व्यापक है और पतन की शक्तियाँ अति प्रबल हैं। अपने प्रयास का प्रत्यक्ष परिणाम संभवतः सामान्य लोगों को नहीं ही दीखे तो भी वे लक्ष्य-पथ पर धीर गंभीर भाव से बढ़ते ही जाते हैं। वे उत्कृष्टतम मनःस्थिति में जीते हैं।

ऐसे ही व्यक्ति देश समाज और युग के पतनोन्मुख प्रवाह का विपरीत दिशा में भी उस हेतु उत्साह जगा देते हैं। अपनी गतिविधियों से आये परिवर्तनों को नवीन दिशाधारा को वे स्वयं तो स्पष्ट देख पाते हैं, पर सामान्य व्यक्ति अपने परिवेश में कोई अधिक स्थूल परिवर्तन उस समय तक उत्पन्न नहीं देख पाने के कारण उन परिवर्तनों और सफलताओं को देख समझ नहीं पाते।

विशाल वटवृक्ष के पत्तों में वायु की प्रत्येक पुलक से स्पन्दन होता है, पीपल या बरगद के आधार में रंचमात्र हलचल नहीं होती। जबकि छोटे कमजोर पौधे झंझा के एक ही थपेड़े में लोटपोट हो जाते हैं। अवरोधों की राई को पहाड़ मान बैठने और निराशा के नैश अन्धकार में ऊषा की स्वर्णिम आभा का अस्तित्व ही भुला बैठने की गलती तो नहीं ही करनी चाहिए निराशा एक भ्राँति है यथार्थ जीवन में उसका कोई स्थान नहीं है।


जीवन यात्रा बने एक पर्वोत्सव

मनुष्य के हृदय भण्डार का द्वार खोलने वाली, निम्नता से उच्चता की ओर ले जाने वाले गुणों का विकास करने वाली यदि कोई वस्तु है तो प्रसन्नता ही है। यही वह साँचा है जिसमें ढलकर मनुष्य अपने जीवन का सर्वतोमुखी विकास कर सकता है। जीवन यापन के लिए जहाँ उसे धन, वस्त्र, भोजन एवं जल की आवश्यकता पड़ती है, वहाँ उसे हलका-फुलका एवं प्रगतिशील बनाने के लिए प्रसन्नता भी आवश्यक है। प्रसन्नता मरते हुए मनुष्य में प्राण फूँकने के समान है। प्रसन्न और संतुष्ट रहने वाले व्यक्तियों का ही जीवन ज्योति-पुँज बनकर दूसरों का मार्गदर्शन करने में सक्षम होता है।

प्रसिद्ध दार्शनिक इमर्सन ने कहा है “वस्तुतः हास्य एक चतुर किसान है जो मानव-जीवन पथ के काँटों, झाड़-झंखाड़ों को उखाड़ कर अलग करता है और सद्गुणों के सुरभित वृक्ष लगा देता है, जिसमें हमारी जीवन यात्रा एक पर्वोत्सव बन जाती है।”

जीवन यात्रा के समय में मनुष्य को अनेक कठिनाइयों एवं समस्याओं का सामना करना पड़ता है, किन्तु हँसी का अमृत पान कर मनुष्य जीवन संग्राम में हँसते-हँसते विजय प्राप्त कर सकता है। इतिहास के पृष्ठों पर निगाह डालें तो पता चलेगा कि महान व्यक्तियों के संघर्षपूर्ण जीवन की सफलता का रहस्य प्रसन्नता रूपी रसायन का अनवरत सेवन करते रहना ही है। रवीन्द्रनाथ टैगोर, तिलक, ईसा, विवेकानन्द, महात्मा गाँधी आदि इसका प्रत्यक्ष उदाहरण हैं कि किस तरह प्रसन्नता के मूल मंत्र को अपना जीवन दर्शन बनाकर संघर्षमय एवं कर्तव्य प्रधान कठोर जीवन को सफल एवं दिव्य बनाया जा सकता है।

हँसना जीवन का सौरभ है। जो व्यक्ति आनन्द की खदान को जान लेता है, उसे श्रेष्ठ वातावरण की प्रतीक्षा नहीं करनी पड़ती। वर्तमान समय में जो परिस्थिति उसके सम्मुख होती है, उसी में वह सुख अनुभव कर लेता है। संतुलित मनुष्य यह नहीं सोचता कि जब वह धनी होगा, तभी उसे सुख मिल सकता है। धन मनुष्य को कभी सुखी बनाए नहीं रख सकता। प्रसन्नता तो मनुष्य की आन्तरिक स्थिति की साक्षी है। उसके फूटते ही व्यक्ति को सब जगह तथा हर परिस्थिति में खुशी ही खुशी परिलक्षित होती है। स्वर्ग की चाह है तो आनन्द के जल से आत्मा को स्नान कराना पड़ेगा। स्वर्ग कहीं और नहीं है। वह मनुष्य के अन्दर ही छुपा हुआ है। अन्दर के आनन्द से ही मनुष्य अनन्त आनन्द की प्राप्ति कर सकता है।

मधुमक्खी फूलों से थोड़ा-थोड़ा शहद लाकर इकट्ठा करती है। उसके पास मधु का भण्डार कहीं से आ नहीं जाता है, वरन् उसके ही सतत् परिश्रम का परिणाम होता है। इसी तरह मनुष्य भी अणु-अणु करके प्रसन्नता को संचित करता रहे, तो उसे आश्चर्य होगा कि उसके पास सुख एवं आनन्द का विशाल भण्डार है। धन संपत्ति, जमीन जायदाद के सुख से हम वंचित रह सकते हैं पर प्रसन्नता हमारा जन्म सिद्ध अधिकार हैं वह हमारे कब्जे में है उसे हम जब चाहें प्राप्त कर सकते हैं।

जीवन में जिसने प्रसन्नता का महत्व न समझा उसके अभ्युदय के द्वार बन्द हो जाते हैं। वह दुःखी एवं निराश रहकर अपनी अमूल्य जिन्दगी को व्यर्थ गँवा देता है। तृष्णा उसकी सारी सुख सुविधाओं का हनन कर देती हैं। पास जो कुछ है उसमें उसे संतोष नहीं होता है। वह यह नहीं सोचता कि जितना मिला है उतना भी प्रसन्नता देने के लिए पर्याप्त है, तृष्णाएँ कभी भी तृप्त नहीं हो पाती है। इसके जाल में फंसकर वह प्रसन्नता को खो बैठता है और असन्तुष्ट बना रहता है। आत्मिक सुख उसे नहीं मिल पाता।

हम प्रसन्नता की खोज वाह्य पदार्थों में करते हैं। किन्तु हम यह भूल जाते हैं कि वह तो हमारे अन्तःकरण की स्थिति का नाम है। यदि हम स्वयं सन्तुष्ट एवं प्रसन्न हैं तो हमें सारी वस्तुएँ आनन्दमय प्रतीत होंगी। हम प्रसन्न नहीं होंगे तो हमें वस्तुएँ भी कुरूप एवं दुःखदायी लगने लगेंगी। हमारी मनोदशा के अनुरूप प्रकृति में भी परिवर्तन हो जाता है। संसार एक दर्पण है। उसमें हमारी ही प्रतिच्छाया हमें दिखलाई देती है।

एक विचारक का कथन है कि-“अगर तुम हँसोगे तो सारी दुनिया तुम्हारे साथ हँसेगी और अगर तुम रोओगे तो कोई तुम्हारा साथ न देगा”।

प्रसन्न व्यक्ति को देखकर दूसरे व्यक्ति के पास बैठकर दुखी व्यक्ति भी थोड़ी देर के लिए प्रसन्नता के प्रवाह में अपने दुःख को भूल जाता है। जो व्यक्ति हर समय मुँह फुलाए रहता है, वह जीवन के प्राण, उसके संजीवनी तत्व को नष्ट कर देता है। ऐसे व्यक्तियों के पास उठना-बैठना कोई पसन्द नहीं करता। खिन्नता नरक की भयानक ज्वाला की भाँति मनुष्य को दीन, हीन, दुखी एवं दरिद्र बना देती है।

अप्रसन्न प्रकृति का व्यक्ति दूसरों को भी हँसते हैं तो ऐसा लगता है कि ये सभी लोग हमारा मजाक बना रहे हैं। ऐसे लोग, प्रसन्नता की जीवन में क्या उपयोगिता है, इस तथ्य को भली-भाँति समझ नहीं पाते। उनका स्वभाव बन जाता है दूसरों को देखकर हँसना दूसरों का मजाक बनाना, दूसरों के नुकसान पर हंसना समय परिस्थिति एवं वातावरण का ध्यान किये बिना असभ्य ढंग से हँसने का हमें ध्यान रखना चाहिए कि यह हास्य, जीवन-विकास में सहायक नहीं होता उलटे मनुष्य के अन्दर आसुरी प्रवृत्तियों को जन्म देता है और जीवन को दुरूह बना देता है हमें ऐसी हँसी को अपने अन्दर स्थान देना चाहिए जो मनहूसों को भी हँसा दे, दुखी को खुश कर दे। दूसरों की पीड़ा हरण करने वाली सात्विक हँसी ही मनुष्य की जीवन यात्रा को मधुमय बना सकेगी।

मेसीलन का कहना है-“स्वस्थ एवं हँसमुख होना शरीर के लिए उसी प्रकार लाभप्रद है, जैसे सूर्य की धूप वनस्पतियों और शाक सब्जियों के लिए।

हँसो और मोटे हो जाओ”यह उक्ति अक्षरशः सत्य है। हँस वह व्यायाम है, जिसे करने से मनुष्य का शरीर पुष्ट होता है। हँसने से हमारी समस्त धमनियों में तेज रक्त का संचार होता है हम जब जी खोल कर हंसते हैं तो आमाशय, पाचन संस्थान, फेफड़ों आदि का अच्छा व्यायाम हो जाता है। छाती और पेट की नसों, पेशियों में दबाव पड़ता है वह पाचक रस पर्याप्त मात्रा में छोड़ने लगती है। फेफड़ों में रक्त की गति तीव्र हो जाती है। शरीर के जीवन तत्व सक्रिय हो जाते हैं। शिथिलता दूर हो जाती है। शरीर के जीवन तत्व सक्रिय हो जाते हैं। शिथिलता दूर हो जाती है। शरीर स्वस्थ बनता है। हँसने से वृद्ध व्यक्ति के मुख में भी रौनक झलकने लगती हैं। प्रसन्न एवं स्वस्थ रहकर मनुष्य लम्बी जिन्दगी जी सकता है।

प्रसन्नता ऐसा टॉनिक है जिसका नित्य पान करके व्यक्ति तन्दुरुस्त हो जाता है। खुशी ऐसी औषधि है, जिसका सेवन करने से मनुष्य के अन्दर के घाव ठीक हो जाते हैं। इससे व्यक्ति के मन पर जीम विषाद की धूल झड़ जाती हैं। इससे आरोग्य लाभ होता है।

मनुष्य का जीवन रोते बिलखते हुए जीने के लिए नहीं है। बल्कि गाते, मुसकराते, हंसते, खेलते बिताने के लिए है। मान लीजिये हमारे ऊपर गंभीर उत्तरदायित्व है तो इसका मतलब यह तो नहीं है कि हम रोनी सी सूरत बनाये घूमें। इससे तो दुख और दुगुना हो जाता है। मुसकान सुख की खान है। प्रसन्नता की वृत्ति हमारे नैतिक आचरण के लिए भी लाभकारी होती है। कड़ी से कड़ी बात को हँसकर टाल देने से अनर्थों से बचाव हो जाता है। कडुआ पन मिठास में बदल जाता है।

बहुत से माता-पिता अपने बच्चों को जोर से हँसने से मना करते हैं। इससे उनके शारीरिक, मानसिक एवं नैतिक विकास में बाधा पड़ती है। इससे उनके जीवन का आनन्द रस सूख जाता है और वह स्वाभाविक विकास से वंचित रह जाते हैं। घर में आनन्द एवं प्रसन्नता का वातावरण बनाना चाहिए व इस संबंध में बच्चों का विशेष ध्यान रखना चाहिएं। यही वह समय हैं जब उनमें प्रसन्न रहने की आदत डाली जा सकती है।

नये पौधे में जिस प्रकार खाद एवं पानी की आवश्यकता होती उसी तरह बच्चे के लिए पौष्टिक आहार के साथ प्रसन्नता भी आवश्यक होती है अगर नींव ही त्रुटिपूर्ण रह जायेगी, तो जीवन उन्नतिशील कैसे बन सकता है? प्रसन्नता जीवन वृक्ष की जड़ों को खाद-पानी देती है तथा व्यक्तित्व का सर्वांगपूर्ण निर्माण करती है। हमें उल्लास विस्तार की प्रक्रिया को अधिकाधिक बलवती बनाना चाहिए। यही व्यक्ति निर्माण प्रक्रिया है।

गुरु नानक ने कहा-“मेरा मत है सत्य-मार्ग, मेरी जाति वही है, जो अग्नि और वायु की है-जो शत्रु मित्र को एक समान समझते हैं। मुझे वृक्ष और धरती की तरह रहना है। नदी की तरह मुझे इस बात की चिन्ता नहीं कि मुझ पर कोई पवित्र फूल फेंकता है, या कूड़ा-कर्कट और मैं जीवित उसी को समझता हूँ, जो चन्दन की तरह हर समय जनता की सेवा में हिस्सा लेता हुआ अपनी सुगन्ध फैलाता रहे।” यह सुनकर शाह शरफ ने कहा-’दरवेश या फकीर कौन है?” मानक ने कहा-जो जिन्दा ही मरे की तरह रहे, जागते हुए सोता रहे जानबूझकर अपने आपको लोक-मंगल में लुटाता रहे।जो कभी क्रोध में न आवे, अभिमान न करे, न स्वयं दुखी हो, न किसी दूसरे को दुःख दें। जो ईश्वर में हमेशा निमग्न रहे और वही सुने, जो उसके अन्दर से ईश्वर बोलता है और उसी को हर स्थान पर देखे।” नानक के वचन सुनकर शाह शरफ को सन्तोष हुआ।


आपका मत क्या है? (kahani)

एक बार गुरु नानक पानीपत गए, जहाँ शाह शरफ नामक एक प्रसिद्ध सूफी फकीर रहते थे गुरु नानक ने इस समय गृहस्थियों के समान वस्त्र धारण किए थे। यह देखकर शाह शरफ ने पूछा- “फकीर होकर आपने गृहस्थों जैसे कपड़े क्यों पहन रखे हैं और संन्यासियों की तरह आपने अपना सिर क्यों नहीं मुड़ाया है?” नानक ने उत्तर दिया “मूड़ना तो मन को चाहिए, सिर को नहीं और मिट्टी की तरह नम्र होकर ही मन को मूड़ा जा सकता है।” अपने देश के संबंध में उन्होंने कहा-“ जो मनुष्य परमेश्वर के द्वार पर अपने सुख, स्वाद और अहंकार को त्यागकर गिर पड़े, वह जो वस्त्र धारण करे, परमात्मा उसे स्वीकार करता है। जब शाह शरफ ने पूछा-आपकी जाति क्या है? आपका मत क्या है? गुजर कैसे होती है?”


दृश्यमान संकट के मूल में सक्रिय परोक्ष हलचलें

सूर्य इस संसार को अपनी आभा और ऊर्जा से अनुप्राणित करता रहता है, यह उसकी उदारता है। जिस दिन वह अपनी रोशनी और ऊष्मा बिखेरना बन्द कर दे, उस दिन शायद यह सृष्टि भी बची न रहने पाए सूर्य का एक नाम ‘सविता’ भी है। सविता अर्थात् जीवनाधार। इस प्रकार यह स्पष्ट है कि सूर्य को बनाये रखने की शक्ति है। श्रुति का उद्घोष भी है “सूर्य आत्मा जगतस्थुषश्च” अर्थात् सूर्य जगत की आत्मा है। वराह मिहिर ने अपने ज्योतिषशास्त्र में दिनमान का एक नाम “कलात्मा” रखा है, अर्थात् “समय की आत्मा” क्योंकि उनके अनुसार समय का अस्तित्व भौतिक जगत में सूर्य के कारण ही है। यदि प्रभाकर न होता, तो दिन रात, सुबह शाम, पूर्वाह्न मध्याह्न, अपराह्न जैसी वेलाओं का ज्ञान भी मनुष्य को न होता। आप्त वचनों में दिवाकर को “त्रयी तनु” अर्थात् तीन शरीरों वाला-तीन गुणों वाला कहा गया है। इसमें सृष्टि, स्थिति और संहार की तीनों ही क्षमताएँ होती हैं। इसी बात का समर्थन करते हुए डॉ. गोपीनाथ कविराज अपने “सूर्य विज्ञान रहस्य” नामक निबन्ध में लिखते हैं कि सूर्य- रश्मियों से पदार्थों का सृजन, संहार और रक्षा तीनों संभव हैं। इसी के कारण सृष्टि-संरचना शक्य हो सकी है, वही इसे धारण किये हुए है और निरंतर उस ऊर्जा को प्रवाहित करने में निरत है, जिससे यहाँ के जीव-जंतु, वृक्ष-वनस्पति व पदार्थ अपनी सत्ता बनाये हुए हैं और चाहे तो वह अपनी प्रचण्ड ऊष्मा से संसार को-उसके पदार्थ एवं प्राणियों को क्षणमात्र में भस्मसात् कर सकता है।

वैज्ञानिक बताते हैं कि सूर्य वर्तमान में अपने अनुदान की तुलना में अभिशाप-वर्षा अधिक कर रहा है। उनके अनुसार सौर-कलंकों की संख्या और प्रचण्डता आजकल जितनी उग्र व अधिक हुई है, उतनी पहले कदाचित् ही कभी रही हो। विशेषज्ञों के अध्ययनों से पता चला है कि सूर्य-धब्बों का अपना एक ग्यारह वर्षीय चक्र है। इसमें वे नियमित रूप से उगते और डूबते रहते है। इन धब्बों का धरती के पदार्थ और प्राणियों पर सुनिश्चित प्रभाव पड़ता है-इस बात का उल्लेख वराहमिहिर ने अपनी पुस्तक “वृहत्संहिता” में विस्तारपूर्वक किया है। इसे आज के विज्ञान विशारद भी स्वीकार करते हैं। वे यह मानते हैं कि इन दिनों यहाँ के मौसम और पर्यावरण में जो आश्चर्यजनक परिवर्तन आया है, उसमें इन सौर-कलंकों का महत्वपूर्ण हाथ है। डॉ0ए0जी0 पीयर्स ने अपनी पुस्तक “ए टैक्स्ट बुक ऑफ एस्ट्रालॉजी” में लिखा है कि अनेक वर्षों के अध्ययन से यह ज्ञात हुआ है कि सौर-धब्बों की संख्या और गतिविधियाँ बढ़ने-घटने से वर्षा प्रभावित होती है। उनके अनुसार जब ये बढ़ते हैं, तो अनावृष्टि की स्थिति पैदा होते देखी गई है और घटने पर अतिवृष्टि। पीयर्स के तथ्यान्वेषण का समर्थन इन दिनों की परिस्थितियाँ भी कर रही है। आजकल सूखे के कारण भुखमरी की जो विकट स्थिति विश्व के कुछ हिस्सों में पैदा हुई है, वह सर्वविदित है। विशेषकर सूडान एवं अना अफ्रीकी देशों में दशा अत्यन्त दयनीय है। लोग भूख के कारण या तो दम तोड़ रहें हैं अथवा अस्थिपंजर बन कर जीवन की अंतिम सांसें गिनने पर विवश हैं एरिजोना यूनिवर्सिटी के डगलस राइस ने इसी बात को वृक्ष वलियों पर अध्ययन कर सिद्ध करने का प्रयास किया हैं वे कहते हैं कि जिस भाग में वृक्ष-वलियों के बीच की दूरी कम हो, वह यह दर्शाता है कि उन दिनों पेड़ को सूखे का सामना करना पड़ा, जबकि परस्पर की दूरी अधिक होने पर इस बात की सुनिश्चितता होती है कि उस दौरान वनस्पतियोँ को पर्याप्त वर्षा-जल प्राप्त हुआ। उनके अनुसार वनस्पति वाक्यों का सीधा संबंध अनावृष्टि और अतिवृष्टि से है और बरसात (सूर्य का वरुण से गहन संबंध होने के कारण) सौर-कलंकों से गहन तादात्म्य रखती है, अतएव रिंगों की पड़ताल के आधार पर सौर-गतिविधियों की जानकारी प्राप्त की जा सकती है और लगभग विगत तीन हजार वर्षों का मौसम संबंधी अनुमान लगाया जा सकता है।

पिछले दिनों तक सूर्य एवं दूसरे खगोलीय पिण्डों का प्राणी एवं वनस्पतियों पर प्रभाव ज्योतिषशास्त्र तक सीमित था तथा उसी का विषय माना जाता था, पर अब उस पर वान ने भी अपनी मुहर लगा दी है और यह स्वीकार कर लिया है कि उनका सुनिश्चित असर पदार्थ और प्राणियों पर पड़ता है। इसी आशय का मंतव्य प्रकट करते हुए मूर्धन्य वैज्ञानिक एवं “ब्रिटिश एसोसिएशन फॉर दि एडवांसमेंट ऑफ साइन्स” में लिखते हैं कि हमारे शरीर में जो अंतःस्रावी ग्रन्थियाँ हैं वह पर्यावरण में होने वाले रासायनिक परिवर्तनों के आधार पर स्वयं को समायोजित करती रहती है और छोटे-मोटे बदलावों से प्रायः अप्रभावित बनी रहती है, किन्तु जब कोई बड़ा परिवर्तन पर्यावरण में घटित होता है, तो वे प्रभावित हुए बिना नहीं रहती हैं। इनके प्रभावित होते ही व्यक्ति की इच्छा, आकाँक्षा, भावना, संवेदना में भारी हेर-फेर दिखाई पड़ने लगता है। सौर-सक्रियता के दौरान चूँकि शरीर-विद्युत और पृथ्वी की चुम्बकीयता में बड़ी उथल-पुथल होने लगती है, अतः शरीर-ग्रंथियों पर उसका निश्चित असर पड़ता है और व्यक्ति का व्यवहार असामान्य हो जाता है। विश्व के प्रख्यात भूगोलवेत्ता एवं येल यूनिवर्सिटी के प्रो0 हर्ण्टिगटन भी दीर्घकाल के अपने अध्ययन के उपरांत इसी निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि सौर धब्बों की अवधि में मानवी व्यवहार असामान्य हो जाता है।

प्रख्यात भारतीय ज्योतिर्विद् बी0 वी0 रमण ने अपने ग्रन्थ “प्लैनेटरी इन्फ्लुएनसेज आन ह्ममन अफेयर्स” में कुछ इसी प्रकार के विचार प्रकट किये हैं। वे उक्त पुस्तक के “प्लैनेट्स एण्ड मैन” नामक अध्याय में लिखते हैं कि सन् 1781,1830,1848,1870 की फ्राँसीसी क्राँति तथा 1956 में हंगरह की देशव्यापी उथल-पुथल को सौर-सक्रियता से जाड़ कर आधुनिक वैज्ञानिकों ने वस्तुतः कोई नया अन्वेषण नहीं किया, वरन् वर्षों पूर्व वाराहमिहिर द्वारा स्थापित तथ्य की ही पुनरुक्ति की है। आज की परिस्थितियाँ भी वराहमिहिर के अनुसंधान की पुष्टि करती हैं वर्तमान में विश्वभर में जो भीषण मार-काट, उथल-पुथल और अराजकता मची है उसे असाधारण और अभूतपूर्व ही कहा जा सकता है। ऐसी भयंकर स्थिति संपूर्ण धरा में पहले कभी रही हो, इसका कोई उदाहरण और प्रमाण इतिहास में नहीं मिलता। विज्ञानवेत्ताओं का यह भी कथन है कि इन दिनों सौर धब्बों की जो प्रचण्डता है, वैसी उग्रता पिछले समय में कभी रही हो, इसके भी साक्ष्य उपलब्ध रिकार्डों से प्राप्त नहीं होते। ऐसी स्थिति में यह सुनिश्चित जान पड़ता है कि बढ़ी-चढ़ी सौर लपटों का पृथ्वी के जन-जीवन को अस्त−व्यस्त और क्षतिग्रस्त करने में सीधा हाथ है।

यह सूर्य का एक पहलू हुआ। इसके इस विनाशकारी पक्ष के कारण ही इसका नाम “मार्तण्ड” पड़ा महर्षि गोबिल ने इसका अर्थ करते हुए कहा है कि मार्तण्ड वह है, जो ध्वंस में संलग्न हो। इस दृष्टि से सूर्य का उक्त नाम सार्थक है, किन्तु जो जबत की आत्मा हो, वह ऐसी विनाशलीलाएँ करे, यह बात गले नहीं उतरती और यदि यह सत्य है, तो इसके पीछे का तथ्य क्या हो सकता है? उत्तर विज्ञान का क्रिया-प्रतिक्रिया वाला सिद्धान्त देता है। उल्लेखनीय है कि पिछले दिनों तक और कुछ हद तक आज भी विज्ञान का बुद्धिवाद समस्त संसार को जड़ मानता रहा और किसी नियामक सत्ता एवं उसकी प्रतिक्रिया अथवा व्यवस्था से सर्वथा इनकार करता रहा हैं एकेश्वरवादियों की तो यह दृढ़ मान्यता है कि इस प्रकृति को मनुष्यों के भोग-विलास के लिए ही भगवान ने विनिर्मित किया है बस फिर क्या था, “ऋणं कृत्वा घृतं पीवेत्” का लोकायत दर्शन चल पड़ा और जनमानस पर वह इस कदर छाया कि प्रकृति और संसाधनों का बेतरह दोहन आरंभ हो गया। क्रिया जब एक सीमा को पार कर गई, तो निस्र्र ने प्रतिक्रिया दिखानी आरंभ की। सूर्य समेत सभी ग्रह नक्षत्र छेड़े गये भुज्रग की तरह हुँकरने और फुसकारने लगे। दिमान चूँकि सौरमंडल का सबसे समर्थ और धरती से समीप का तारा है, अतः अन्यों की तुलना में उसकी प्रतिक्रिया भी अधिक दुर्द्धर्ष दिखाई पड़ी। प्रसिद्ध खगोलशास्त्री स्टीटसन के अनुसार आजकल सूर्य से पराबैगनी किरणें पहले की तुलना में 30 प्रतिशत अधिक निःसृत हो रही हैं। वे कहते हैं कि इसका यह असाधारण परिमाण ही प्रस्तुत समय और समाज में व्यतिक्रम के लिए जिम्मेदार है। उनका कथन है की यदि उक्त मात्रा में 5 प्रतिशत की भी कमी हो जाय, तो मनुष्य मौसम के व्यवहार में सुधार की काफी संभावना हो सकती है।

यह तो वैज्ञानिकों का अनुमान है। अध्यात्मवादियों की दृष्टि में यह अनुमान मूर्तिमान तब तक नहीं हो सकता, जब तक चिंतन और कर्तृत्व में बदलाव नहीं आ जाय। उनके अनुसार मनुष्य जब तक बुद्धिवाद और जड़वाद का पल्ला पकड़े रहेगा, तब तक उसे ऐसी ही विसंगतियों व विपदाओं का सामना करना पड़ेगा। उबार तो इनसे अध्यात्मवादी दृष्टिकोण ही सकता है। ज्ञातव्य है कि भारतीय संस्कृति में जड़ में भी चेतन की उपस्थिति की अवधारणा है। इस आधार पर प्राचीन समय में समस्त ग्रह-पिण्डों को देवता माना और पूजा जाता था। कालक्रम में विज्ञान का जैसे-जैसे विकास हुआ, उसने जनमानस की इस श्रद्धा को अंधभक्ति कहकर तोड़ दिया। चन्द्रमा, मंगल, बुध व बृहस्पति पर उसने अपने यान एवं उपग्रह भेजे और प्रकारान्तर से यही सिद्ध किया कि वे कोई देवता नहीं वरन् वीरान और बंजर भूखण्ड मात्र हैं आस्था टूटी, तो उन्हें उपसाय मानने की परंपरा भी धीरे-धीरे समाप्त होती हुई लुप्त हो गई। फलतः प्रतिदिन जो अर्घ्य ओर यजन की आहुतियाँ श्रद्धासिक्त हृदय से वे पाते थे, वह मिलने बंद हो गये। परिणाम हमारे सामने हैं जिन उपक्रमों से वातावरण पुष्ट और देवता तुष्ट होते थे, जब वे ही विहित माने जाने लगे,देवों से अनुदान की आशा कैसे की जाय? स्थिति यहीं तक सीमित होती, तो किसी कद संतोष किया जा सकता था, किन्तु जड़वाद ने जनमानस की निष्ठा को इस हद तक नष्ट-भ्रष्ट किया कि प्रणेताओं और अनुयायियों की स्वयं की बुद्धि भी जड़ हो गई। वे यह भूल गये कि तथाकथित जड़ भी एक सीमा तक ही छेड़छाड़ बरदाश्त करते हैं। इसके उपरांत अपनी प्रतिक्रिया दिखाना प्रारंभ कर देते हैं। बस, इसी त्रुटि ने उन्हें प्रकृति से छेड़खानी के लिए प्रोत्साहित किया और आज वह चरमोत्कर्ष पर है। इसकी दुःखद परिणति भी निसर्ग के-खगोलीय पिण्डों के कोण के रूप में हमारे सम्मुख है। व अब अनुदान की जगह अभिशाप बरसाते अधिक देखे जा रहें है। विशेषकर सूर्य के संबंध में विशेषज्ञों की यह मान्यता दृढ़ हुई है कि इन दिनों वह ज्यादा कुपित हो गया है। क्रोध का शमन प्रसन्नता से ही हो सकता है। समस्त धरित्री का हित इसी में है कि हम सूर्य के साथ समस्त प्रकृति के साथ छेड़छाड़ बन्द करें, श्रद्धाभाव रखें-नियमित अर्घ्य व आहुति दें। सही अर्थों में तभी हमारी मानी जायेगी। अनुदान प्राप्ति का यही एकमात्र साधन है इसकी आवश्यकता और महत्ता समझी जानी चाहिए।


शूद्र ऋषि बना

दिन ढला और उसके साथ कवष की संपूर्ण आशाएँ भी ढल गई। प्रातः काल जब वह द्यूत क्रीड़ा के लिए बैठा था तब उसकी उमंगों का काई ठिकाना न था। दिन भर जन्म ओर मृत्यु की तरह हार और जीत के ज्वार-भाटे आते रहे और कवष उनमें कागज की नाव की तरह तिरता-उतराता रहा। अन्ततः पासे ऐसे पलटे कि नाव झकझोरे पर झकझोरे खाती गई। सूर्यदेव के अस्त होने की तरह वह भी पराजय के अनन्त सागर में डूबे गई। कवष उस दिन अपना सर्वस्व जुए में हार गया।

हारे हुए जुआरी की दैन्य दशा की उपमा दी जाती है। फिर जो सचमुच अपना सब कुछ जुए में ही हार गया हो उसकी दीनता का तो कहना ही क्या? कवष के लिए आज का दिन और दिनों की तरह न था। पहले भी वह कई बार हारा भी पर तब तक उसके पास साधनों का अभाव नहीं हुआ था। आज तो उसने अपनी संपत्ति के नाम का एक तिनका तक न छोड़ा था। जुआरी की क्या दुर्दशा होती है, यह उस दिन कोई कवषे पूछता तो वह संभवतः इस विषय पर सबसे अच्छा और प्रीवोत्पादक व्याख्यान प्रस्तुत कर सकता था। पर उस घड़ी तो उसके लिए यह संसार उस श्मशान की तरह लग रहा था, जिसमें पच्चीसों शव एक साथ दाह किए गए हों और अब वहाँ शृंगाल-भेड़ियों के अतिरिक्त और कुछ शेष न रहा हो। ऐसी व्यथित मनः स्थिति में जब वह घर की ओर चला तो मार्ग में ही उसे अपना पुत्र पड़ा मिल गया। ज्वर से पीड़ित किशोर बालक को औषधि मिलना तो दूर आज लगाता पांचवें दिन उसे आध पाव दूध के भी दर्शन न हुए थे। इस आशा से वह वन की ओर चला था कि वहाँ आमला और गूलरें मिल जाएँगी, उनसे वह अपना पेट भर लेगा। साथ ही भूखी बहन और पीड़ित माँ के लिए भी कुछ फल लेता जाएगा। किन्तु टूटी, थकी जर्जर काया ने साथ ही नहीं दिया। गाँव से बाहर आते ही बालक मूर्छित होकर भूमि पर गिर पड़ा।

कवष को पुत्र की इस करुणा-जनित स्थिति का उतना दुःख नहीं हुआ जितना अपने अधःपतित जीवन पर पश्चाताप। संतप्त हृदय से बच्चे को गोद में उठाकर कवष घर पहुँचा तो वह घर जो आज से कुछ वर्ष पूर्व सावन के खेतों की तरह लहलहाता दृष्टिगोचर होता था, ज्येष्ठ की तपती दोपहर सा दिखाई दिया जिसमें हरियाली नाम मात्र को ही रह जाती। ज्वाला ही ज्वाला तपन। पत्नी और पुत्री के जीर्ण शरीर को देखकर कवष का हृदय हाहाकार से भर गया।

उसने एक मिट्टी के फूटे बर्तन से थोड़ा जल लिया। चुल्लू भरी आँख मूँदी ऐसा लगा उसने कुछ कहा और वह जल धरती पर छिड़क दिया। धरती माता के पाँव स्पर्श कर कवष ने अपनी भूखी पत्नी और पुत्री को जल पिलाया और उन्हें लिटाकर एक ओर चुपचाप निकल गया।

कवष बदल गया। दूसरे दिन सारे गाँव में चर्चा फैल गई- “कवष का हृदय परिवर्तन हो गया है।” इसके बाद उसे किसी ने जुआ खेलते, माँस खाते नहीं देखा।

ईलुष का पुत्र कवष शुद्र योनि में जन्मा था। उसमें वह सभी दुर्गुण थे जिनके कारण उस युग में ब्राह्मण कुल में उत्पन्न व्यक्ति को भी शुद्र ठहरा कर उसे बहिष्कृत कर दिया जाता था। यह भी था कि जो इस प्रकार अन्त्यज श्रेणी से अपने आपको उठाकर श्रेष्ठ आचरण करने लगते थे, वे शूद्र भी उच्च वर्ण में ले लिए जाते थे।

कवष ने निश्चय कर लिया अब वह सारे बुरे कर्म धो डालेगा और अपनी अन्तरात्मा को निर्मल बनाकर एक सद्गृहस्थ का जीवन जियेगा। उसके इस संकल्प में इतनी शक्ति थी कि वेदव्यास को उसके इस निर्णय को ऋचा के रूप में स्थान देना पड़ा। अच्छाई का अनुकरण करने वाले हजारों लोगों के हृदय बदल डाले। उसके इस आदर्श का सर्वत्र सम्मान किया गया।

अप्रतिम सामाजिक सम्मान और ऋग्वेद के ऋषि मण्डल में अपना स्थान बनाकर कवष को वैसे ही अहंकार हो गया जिस प्रकार वर्षा ऋतु में छोटे-छोटे नाले-नदी का रूप धारण कर इतराते हुए बह निकलने हैं ऋषियों ने एक परम्परा बनाई थी कि जो अपनी निष्ठा को अधिकतम बलवान सिद्ध कर सकता है और अंतिम सिद्धि प्राप्ति तक साधना करने का साहस व्यक्त कर सकता है, सन्त और ऋषि बनने का अधिकारी भी वहीं बन सकता है। उत्तराधिकार में पाया हुआ धन और बिना परिश्रम हुआ सम्मान व्यक्ति के अहंकार को बढ़ाकर उसके पतन का ही कारण बनता है। इसलिए दूरदर्शी ऋषि भला ऐसी झूठी सिद्धि और सम्मान को क्यों महत्व देते? कवष ने नेकी का मार्ग अपनाया था। उसके लिए सराहा जाना अपनाया था। उसके लिए सराहा जाना उचित ही नहीं अनिवार्य भी था। सामाजिक जीवन में अच्छाइयों की बेल सम्मान और फलती-फूलती है। पर इतना नहीं कि वह आत्म कल्याण और लोकहित संपादन के लिए अपनी अब तक की योग्यता को पर्याप्त मानकर पाँडित्य का झूठा प्रदर्शन करने लगता।

कवष के साथ कुछ ऐसा ही हुआ उन दिनों कुरुक्षेत्र में भगवती सरस्वती के पावन तट पर विशाल यज्ञ सरस्वती के पावन तट पर विशाल यज्ञ का आयोजन हुआ। कवष बिना किसी प्रकार का निमंत्रण पाये उसमें सम्मिलित हुआ। बात इतने तक सीमित होती तो भी ठीक थी, उसने वहाँ जाकर अपने झूठे पाँडित्य का उद्धत प्रदर्शन कर डाला। ऋषिगण इस व्यवहार से बहुत क्षुब्ध हुए। उन्होंने कवष को बाहर निकलवा दिया और रेतीली मरु भूमि में छोड़ देने का दण्ड दिया।

इतना करने के बाद भी ऋषियों उसका संरक्षण नहीं छोड़ा। वे जानते थे कि उसमें साधना के बीज अंकुरित हो उठे हैं। यदि उसे तप करने का अवसर मिले तो वह बीज बढ़कर वृक्ष का रूप ले सकते हैं। यह दंड-जान-बूझकर इसी उद्देश्य आत्म प्रतिभा का विकास कराना ही होता था।

वह अन्त्यज जीवन के कष्ट पहले ही भुगत चुका था। उस पर उसे जुए ने और पीड़ित एवं प्रताड़ित किया था। किसी तरह साहस करके उससे मुक्ति ली और सभ्य एवं सुसंस्कृत जीवनयापन करना प्रारंभ किया। इस तरह उसने वर्षों से खोते हुए पारिवारिक सामाजिक एवं राष्ट्रीय सम्मान को अर्जित किया था। पर अब पुनः उसकी स्थिति राजगद्दी पर बैठा कर राज्य से निकाल दिए गए राजा की सी थी। जोन तो अपने आप पर गर्व कर सकता था न भविष्य के प्रति आशावान्। उसकी आँखों के आगे फिर, उस दिन वह अपना सर्वस्व जुए के दाँव पर हार कर एक-एक कौड़ी का भिखारी बन गया था।

अंतर्दाह से पीड़ित कवष के आगे अब इसके अतिरिक्त कोई चारा नहीं रह गया था कि वह अपनी व्यथा-परमपिता परमात्मा के समक्ष खोलकर रख दे। आज कई दिनों से उसे तृषा व्याकुल कर रही थी। पूर्ण निष्कलुष हृदय से कवष ने भगवान् वरुण देव से प्रार्थना की। इन्द्र और मरुद्गणों से सहायता की याचना की। भौतिक दृष्टि से न वहाँ कोई साधन था और न सहायक उपलब्ध थे। ऐसे समय ईश्वरीय शक्तियों के अतिरिक्त उसकी आवाज को सुनता भी कौन?

आज उसकी आत्मा पूर्ण निष्कलुष थी। मन का मैल धुल चुका था। अभिमान निकल कर जा चुका था। अपनी भावनाएँ और ईश्वरीय सत्ता के अतिरिक्त उस मरुस्थल में कवष को कुछ दिखाई नहीं दे रहा था। भावनाएँ उमड़ती ही गई आत्म शक्ति का प्रकाश विस्तार लेता ही गया और वरुण देव, मरुद्गण, एवं भगवान इंद्र को अब आना ही पड़ा। वे अपने प्रिय उपासक की सहायतार्थ मेघ लेकर दौड़े। देखते ही देखते मरुस्थल में सघन बादल छा गये। वर्षा होने लगी। कवष की तृषा के साथ उसका ब्रह्म दर्शन का भाव भी तृप्त हो गया।

ऋषि जो अब तक यह दृश्य दूर से देख रहे थे पास आये। कवष अपने देह भाव को त्याग कर आत्म जगत में प्रवेश कर गया। वह अब तक भावावेश में ही था। ऋषियों ने उसे “उठो महर्षि कवष”कहकर हृदय से लगा लिया। और एक बार फिर एक शुद्र के ऋषि बन जाने की बात सारे देश में गूँज गई।


सुखपूर्वक रहने लगे (kahani)

संत इब्राहिम बिन अदम एक बार कहीं जा रहे थे। उन्होंने देखा कि रास्ते में एक शराबी पड़ा हुआ है, उसके कपड़े मिट्टी से लथपथ हैं और मुँह कीचड़ से सना है। यह देखकर संत बोले जिस मुँह से ‘खुदा का नाम लिया जाता है उसे इस हालत में नहीं रहना चाहिएं और उन्होंने पास ही कहीं से पानी लाकर शराबी का मुँह धो दिया जब शराबी को इस बात का पता चला, तो उस पर बड़ा असर पड़ा। उसने शराब न पीने की प्रतिज्ञा की और सुधर गया।

एक बार अत्रि अपने आश्रम से चलकर एक गाँव में पहुँचे। आगे का मार्ग बहुत बीहड़ और हिंसक जीव-जन्तुओं से भरा हुआ था, सो अत्रि रात को इसी गाँव में एक सद्गृहस्थ के घर टिक गये। गृहस्थ ने उन्हें ब्रह्मचारी वेष में देखकर उनकी आव-भगत की और भोजन के लिये आमंत्रित किया। अत्रि ने जब समझ लिया कि इस परिवार के सभी सदस्य ब्रह्मार्सध्या का पालन करते हैं, किसी में कोई दोष-दुर्गुण नहीं है, तो उन्होंने आमंत्रण स्वीकार कर लिया।

भोजनोपराँत अवि ने गृहस्थ को प्रणाम कर प्रार्थना की “देहि में सुखदाँ कन्याम्” अपनी सुखद कन्या मुझे दीजिये, जिससे मैं अपना घर बसा सकूँ। उन दिनों वर ही कन्या ढूँढ़ने जाते थे। कन्याओं को वर तलाश नहीं करने पड़ते थे। उन दिनों नर से नारी की गरिमा अधिक थी। गृहस्थ ने अपनी पत्नी से परामर्श किया। अत्रि के प्रमाण पत्र देखे, और वंश की श्रेष्ठता पूछी और वे जब इस पर संतुष्ट हो गये कि वर सब प्रकार से योग्य है, तो उन्होंने पवित्र अग्नि की साक्षी में अपनी कन्या का संबंध अत्रि के साथ कर दिया। अत्रि के पास तो कुछ था नहीं, इसलिये गृहस्थ संचालन के लिये आरंभिक सहयोग के रूप में अन्न, वस्त्र, बिस्तर , थोड़ा धन और गाय भी दीं छोटी-सी किन्तु सब आवश्यक वस्तुओं से पूर्ण गृहस्थी लेकर अत्रि अपने घर पधारे और सुखपूर्वक रहने लगे।

इन्हीं अत्रि और अनुसुइया के द्वारा दत्तात्रेय जैसी संतान को जन्म मिला। भगवान को भी एक दिन इनके सामने झुकना पड़ा था।


जल्दी आ धमकने वाला वार्द्धक्य

बुढ़ापा इन दिनों इतनी जल्दी क्यों आ धमकता है? आयु कम होते हुए भी शरीर अशक्त-असमर्थ जैसी स्थिति में किस कारण आ जाता है? यदि यह वार्धक्य है, तो इसे रोकने के उपाय-उपचार क्या हो सकते है? इस संदर्भ की शोध आज विश्व भर की अनेक अनुसंधानशालाओं में हो रही है। वैज्ञानिक इसके कारण और निवारण ढूँढ़ने के लिए प्रयासरत है।

आस्ट्रिया के जरा अनुसंधान अकादमी के शोधकर्मियों ने इस संबंध में सर्वथा नये तथ्यों का पता लगाया हैं उनका कहना है कि आज जिस गति से समस्त संसार में पर्यावरण-प्रदूषण फैल रहा है और संपूर्ण निसर्ग विषाक्त बन रहा है, उसी का दुष्परिणाम मनुष्य समुदाय को भी असामयिक बुढ़ापे के रूप में भुगतान पड़ रहा है। वे कहते हैं कि पिछले 50 वर्षों में विषैले पदार्थ वायु, मिट्टी, पानी में इस तेजी से बढ़े हैं कि उसी अनुपात में उसी रफ्तार से मानवी आयु में घटोत्तरी देखी गई हैं। उनके मानवी आयु में घटोत्तरी देखी गई है। उनके अनुसार आजकल मियादी आयु (क्रोनोलॉजिकल एज) के कम होते हुए भी कायिक आयु (बायोलॉजिकल एज) के बढ़े-चढ़े दिखाई पड़ने के पीछे यही प्रमुख कारण है। उनका कथन है कि बालों का झड़ना, सफेद होना झुर्रियां पड़ना रोगग्रस्त हो जाना इनका सबसे बड़ा और प्रमुख कारण वर्तमान का विषैला वातावरण है। इसी के फलस्वरूप जब कभी कोशिकाओं में म्यूटेशन की क्रिया किसी प्रकार आरंभ हो जाती है, तो ऐसी असमानताएं शरीर में उत्पन्न हो जाती हैं, जो काया को रुग्ण और व्यक्ति को अस्वस्थ बना देती हैं। इस प्रकार अल्प वय में ही व्यक्ति ऐसे रोगों के चंगुल में आ फँसता है, जिनसे मरने के उपरान्त ही वह मुक्त हो पाता है।

दूसरे वर्ग के अनुसंधान कर्ताओं के अनुसार ऐसा होता तो प्रदूषण के कारण ही है, पर वे इसका निमित्त महत्वपूर्ण अणुओं के बीच बन्ध (बौण्ड) निर्माण को मानते हैं। बड़े पैमाने पर जब ऐसे बन्धों की रचना होती है, तो फिर कोशिकाएँ आगे अपना स्वाभाविक क्रियाकलाप जारी नहीं रख पातीं, परिणामस्वरूप अनेक विसंगतियाँ उठ खड़ी होती है।

बुढ़ापे के कारणों पर विस्तृत अध्ययन अल्बर्ट आइंस्टीन आयुर्विज्ञान महाविद्यालय, अमेरिका मेंटल हेल्थ फाउण्डेशन, लंदन-एवं यूरोपीय अनुसंधान विश्वविद्यालय, स्विट्जरलैंड की अन्वेषणशालाओं में भी पिछले दिनों बड़े पैमाने पर हुए है। उन्होंने इस अध्ययन में “पोजिट्रान एमीशन टोमोग्राफी” नामक विशिष्ट तकनीक का प्रयोग किया है। उनका कहना है कि शरीर कोशाओं की संख्या में ह्रास और उनकी जीवन-अवधि में कमी आना ही शायद बुढ़ापे का मुख्य कारण हो। उनका यह भी कथन है कि उम्र के साथ-साथ शरीर की ताप नियंत्रक क्षमता में कमी आने लगती है, जिससे बूढ़ों में सर्दी अथवा गर्मी सहने की सामर्थ्य घट जाती हैं। इस स्थिति में विटामिन “डी” की कमी के कारण हड्डियाँ भी कमजोर पड़ने लगती है। वृद्धावस्था में शरीर प्रतिरोधी क्षमता में ह्रास को शरीर विज्ञानी अस्थायी बताते हैं और कहते हैं कि एण्टीआक्सीडैण्ट के प्रयोग से इन्हें दूर किया जा सकता है। वार्धक्यावस्था में हृदय रोग और पक्षाघात की रोकथाम के लिए वैज्ञानिक रक्तचाप के नियंत्रण पर जोर देते एवं पेशियों को सक्रिय व सुगठित बनाये रखने के लिए हलके व्यायाम को लाभप्रद बताते हैं। प्राणायाम को एण्टी ऑक्सीडेण्ट माना जाता है।

अन्य समुदाय के वैज्ञानिकों का विश्वास है कि वार्धक्य की असामयिक उपस्थिति शरीर-रसायनों की सक्रियता में आने वाली कमी के कारण होती है। उल्लेखनीय है कि हमारे शरीर में मस्तिष्क एवं दूसरे अवयवों की कोशाओं में काफी भिन्नता होती है। विशेषज्ञों के अनुसार रासायनिक सक्रियता में आयी कमी का प्रथम प्रभाव अपेक्षाकृत अधिक संवेदनशील दिमागी कोशाओं में उत्पन्न होता है। बाद में यह असर शरीर के दूसरे भागों में संचारित होता है। इस सिद्धान्त के अनुसार मस्तिष्कीय सेलों में परस्पर संदेश-विनिमय का एक प्रमुख आधार एसीटाइलकोलीन नामक एक रासायनिक यौगिक है। एण्टीबॉडी निर्माण के कारण जब इसकी सक्रियता समाप्त हो जाती है, तो शरीरशास्त्रियों के अनुसार हाथ-पैरों की माँसपेशियाँ ढीली पड़ जाती है। उनका खिंचवा खत्म हो जाने के कारण वह शरीर में लटकने लगती हैं। पेशियाँ शिथिल पड़ जाने के कारण हाथ-पैर काँपने लग जाते हैं। जब ऐसी स्थिति पैदा होने लगती है, तो शरीर विज्ञान में उसे बुढ़ापा मान लिया जाता है। ऐसा इसलिए क्योंकि रचना-विज्ञान में उसे बुढ़ापा मान लिया जाता है। ऐसा इसलिए क्योंकि रचना-विज्ञान के हिसाब से यह अवस्था आयु के उत्तरार्ध में आनी चाहिए। जबकि शरीर रसायनों का उत्पादन कम और निष्क्रियता अधिक बढ़ने लगती है, अतएव उसे वार्धक्य स्वीकार लिया जाता है। किन्हीं कारणों से यह स्थिति समय से पहले पैदा हो जाय, तो वह भी बुढ़ापा ही कहलायेगा। इसलिए इन दिनों अकाल पैदा होने वाले इन लक्षणों को लोक प्रचलन में वृद्धावस्था मान लिया गया है।

यों स्मरण-शक्ति की न्यूनता भी इसका एक प्रधान लक्षण माना जाता है। यह लक्षण क्यों प्रकट होता है? इसके जवाब में शोधकर्मी बताते हैं कि वैसे तो इसका जवाब में शोधकर्मी बताते हैं कि वैसे तो इसका प्रकट कारण कार्टेक्स वाले हिस्से में तंत्रिका सेलों एवं हर एक सेल के चारों ओर पायी जाने वाली अनेक सहायक कोशिकाओं की संख्या में दृष्टिगोचर होने वाली कमी है, पर विशेषज्ञ तंत्रिका-तंतुओं में पड़ जाने वाले फंदों को भी इसका एक मुख्य कारण मानते हैं। वे बताते हैं कि प्रदूषित वातावरण के कारण जब शरीर में एल्युमिनियम का जमाव एक सीमा से अधिक बढ़ जाता है, तो तंत्रिका-फंदों की रचना के साथ-साथ स्मृति में लोप दिखाई पड़ने लगता है।

कीव इन्स्टीट्यूट ऑफ जेरेंटोलॉजी के वैज्ञानिकों ने भी इस दिशा में सराहनीय कार्य किये हैं। शोधदल के अध्यक्ष व्लादिमिर फ्रोलकिस का मानना है कि हमारे अंगों में उपस्थित होने वाले वार्धक्य संबंधी लक्षणों का एक महत्वपूर्ण कारण तत्संबंधी प्रणालियों के नियंत्रक जीन में आने वाली असमर्थता है। इसी जीन के कारण कार्यक्षमता घटने लगती है और कम वय में अधिक उम्र का भ्रम पैदा होता है।

बुढ़ापे के यह पदार्थ विज्ञान संबंधी शोध-अनुसंधान हुए। यों इनकी भी उपेक्षा नहीं की जा सकती। अपने स्थान पर ये भी महत्वपूर्ण हैं, पर अध्यात्म विज्ञान की इस संदर्भ में सर्वथा विपरीत मान्यता है। उसके अनुसार वातावरण भी उन्हीं शरीरों को प्रभावित करता है, जो कमजोर होते हैं। वीर्यवान-प्राणवान काया के आगे उनकी भी नहीं चलती दुनिया उन्हीं को सताती है, जो सीधे-सादे अथवा असमर्थ होते हैं। सामर्थ्यवान दस्युओं के गिरोह के सम्मुख तो शरीरवान पहलवानों का झुण्ड भी सहम जाता है। उनका सामना तो तद्नुरूप साहस और साधन जुटा कर ही किया जा सकता है। इन दिनों जनसामान्य का कायकलेवर बढ़ते असंयम के कारण भीतर से इतना खोखला हो गया है, कि बाहर से स्वस्थ-सुन्दर दीखते हुए भी प्रतिकूलता का एक सामान्य झोंका भी बर्दाश्त नहीं कर पाता व बीमार हो जाता है। इसके विपरीत जीवनी-शक्ति संपन्न लोग पर्यावरण के दुष्प्रभाव को सहजतापूर्वक झेल जाते हैं। यदि विचार-संयम, आहार-संयम एवं इन्द्रिय-संयम, का कठोरतापूर्वक निर्वाह किया जाय, तो कोई कारण नहीं कि काया को समर्थता और सशक्तता ही प्रदान करने वाली प्राण-ऊर्जा को अक्षुण्ण न रखा जा सके और उन विसंगतियों का सामना न किया जा सके, जो इन दिनों पर्यावरण प्रदूषण के रूप में विश्वव्यापी बनी हुई है। ध्यान-धारणा, उपासना एवं प्राणायाम द्वारा भी उक्त उद्देश्य की पूर्ति काफी अंशों में की जा सकती है, पर संयम के अभाव और प्रमाद के प्रभाव में ये उपचार भी निराशाजनक ही सिद्ध होंगे और लकीर पीटने की परम्परा बन कर रद्द जायेंगे। रासायनिक प्रतिक्रियाओं में उत्प्रेरकों के प्रयोजन इसी स्तर के होते हैं। आयुर्वेद में यदि पथ्य-कुपथ्य का ध्यान न रक्षा गया, तो उपयुक्त औषधि भी कुछ करने में असमर्थ ही साबित होती है। अतः ध्यान-धारणा, उपासना जैसी आध्यात्मिक क्रियाओं की समग्रता तब बन पड़ती है, जब उनके साथ संयम का अनुपान भी संयुक्त हो। यदि उक्त प्रक्रिया का निष्ठापूर्वक परिपालन किया जाय, तो न हम सिर्फ स्वस्थ, सबल रह सकेंगे, वरन् उन लक्षणों के लिए भी प्रबल प्रतिरोध प्रमाणित होंगे, जिन्हें इन दिनों बुढ़ापा अथवा वार्धक्य के रूप में देखा-समझा जाता है।


मुद्राएँ देने का आदेश (kahani)

रक्षा बंधन का पुनीत पर्व बीकानेर नरेश का दरबार लगा हुआ था राजद्वार पर ब्राह्मणों की लम्बी कतार थी। उन्हीं ब्राह्मणों के मध्य मालवीय जी एक नारियल लिये खड़े थे। शनैः शनैः कतार छोटी होती होती जा रही थी। प्रत्येक ब्राह्मण, नरेश के पास जाकर राखी बाँधता और दक्षिणा के रूप में एक रुपया प्राप्त कर खुशी-खुशी घर लौटता जा रहा था।

मालवीय जी का नंबर आया, तो वे नरेश के समक्ष पहुँचे। राखी बाँधी, नारियल भेंट किया और संस्कृत में स्वरचित आशीर्वाद दिया। नरेश के मन में इस विद्वान ब्राह्मण का परिचय जानने की जिज्ञासा उत्पन्न हुई। जब उन्हें मालूम हुआ कि यह तो मालवीय जी है, तो वह बहुत प्रसन्न हुए और अपने भाग्य की मन-ही मन सराहना करने लगे। मालवीय जी ने विश्व विद्यालय की रसीद वही उनके सामने रख दी’ उन्होंने भी तत्काल एक सहस्र मुद्रा लिख कर हस्ताक्षर कर दिये। नरेश अच्छी तरह जानते थे कि मालवीय जी द्वारा संचित किया हुआ सारा द्रव्य विश्वविद्यालय के निर्माण कार्यों में ही व्यय होने वाला है।

मालवीय जी ने विश्व विद्यालय की समूची रूपरेखा नरेश के सम्मुख रखी। उस पर संभावित व्यय तथा समाज को होने वाला लाभ भी बताया, तो नरेश मुग्ध हो गये और सोचने लगे इतने बड़े कार्य में एक सहस्र मुद्राओं से क्या होने वाला है। उन्होंने पूर्व लिखित राशि पर दो शून्य और बढ़ा दिये साथ ही अपने कोषाध्यक्ष को एक लाख मुद्राएँ देने का आदेश प्रदान किया।


सौर ज्वालाओं से प्रभावित ब्रह्माँडीय चेतना

पृथ्वी की परिस्थितियों, वातावरण, मौसम, वृक्ष-वनस्पतियों और प्राणी-समुदाय की शारीरिक-मानसिक स्थिति पर सूर्य की गति और उसमें समय-समय पर होते रहने वाले परिवर्तनों का असाधारण प्रभाव पड़ता है। वैज्ञानिकों एवं खगोलविदों की नवीनतम खोजो से यह तथ्य अधिक स्पष्ट रूप से उभर कर सामने आया है कि सौर धब्बों, सौर ज्वालाओं का सीधा प्रभाव अन्तर्ग्रही संतुलन एवं मानवी काया और मन-मस्तिष्क पर पड़ता है। जब भी इस तरह के परिवर्तनों में अभिवृद्धि होती है प्रकृति में असंतुलन बढ़ जाता है जिसकी परिणति प्राकृतिक विक्षोभों और विस्फोटक घटनाक्रमों के रूप में होती है।

सौर धब्बों के उभरने और उनके द्वारा पृथ्वी पर परिवर्तनों की शृंखला का सुविस्तृत वर्णन सर्वप्रथम वराहमिहिर ने बृहत्संहिता में किया जो आज पाश्चात्य वैज्ञानिकों के लिए अनुसंधान का प्रमुख-विषय बना हुआ है। खगोल वेत्ताओं का मत है कि हर ग्यारहवें साल सूर्य की सक्रियता बढ़ जाने से आणविक विस्फोट होती है जिसके कारण सूर्य से रेडियो विकिरण अधिक होता है। सामान्यतः मौसम परिवर्तन प्रकृति का नियम है जो विश्व के विभिन्न भागों में भिन्न-भिन्न पाया जाता है प्रकृति चक्र के अनुरूप यह बदलता भी रहता है, पर जिन दिनों सूर्य धब्बों की संख्या बढ़ जाती है उन दिनों पृथ्वी पर एक विशिष्ट प्रकार की जैव चुम्बकीय लहर चलती है। मौसम भी विशेष प्रकार का चलता है। मौरस भी विशेष प्रकार का चलता है जिन्हें हम पकड़ नहीं पाते, पर पेड़-पौधे उन्हें पकड़ लेते हैं। उन अदृश्य सूक्ष्म तरंगों का प्रभाव मानवी मन-मस्तिष्क को मध कर रख देता है और वह विवश हो कुछ से कुछ सोचने और कुछ से कुछ करने लग जाता है। सूर्य के इस प्रचण्ड तूफानी चुम्बकीय प्रवाह के माध्यम से विश्व ब्रह्माँड में गलाई और ढलाई की ध्वंस और सृजन की दोनों ही प्रक्रियायें साथ-साथ संपन्न होती हैं, पर उसका सर्वाधिक प्रभाव अवांछनीयताओं के विस्मार होने के रूप में ही सामने आता है, यद्यपि गेहूँ के साथ घुन के पिस जाने की कहावत भी चरितार्थ हुए बिना नहीं रहती।

अनुसंधानकर्ता सुप्रसिद्ध वैज्ञानिक जॉन का कहना है इस शताब्दी में सूर्य धब्बों की सबसे ज्यादा अभिवृद्धि सन् 1968 से आरंभ हुई है और सन् 2000 तक उत्तरोत्तर बढ़ती ही जायेगी। सौर सक्रियता का सामान्य चक्र ग्यारह वर्षीय होता है, किन्तु ग्रहणकाल में यह सक्रियता कई गुना अधिक बढ़ जाती है। खग्रास सूर्यग्रहण की अपेक्षा पूर्ण ग्रहणकाल में सौर धब्बों की संख्या भी सर्वाधिक बढ़ी-चढ़ी होती है। छोटे सूर्य ग्रहणों की शृंखला लम्बी है। कई बार तो एक ही वर्ष में पाँच से भी अधिक सूर्य ग्रहण होते देखे गये हैं, पर पूर्ण सूर्यग्रहण कई वर्षों बाद ही आता है। इस सदी में बड़े खग्रास सूर्य ग्रहण 21 अगस्त 1994 एवं 21 मई 1938 को हुए थे। ये दोनों ही क्रमशः प्रथम व द्वितीय विश्व युद्ध के पूर्व घटित हुए थे। 16 फरवरी 1980 का सूर्य ग्रहण उक्त दोनों से भी बड़ा था। अगले पूर्ण सूर्य ग्रहण क्रमशः 24 अक्टूबर सन् 1995 एवं 11 अगस्त 1999 में पड़ेंगे। पिछला पूर्ण सूर्य ग्रहण जो स्पष्ट देखा गया था वह 22 जनवरी 1818 को हुआ था। खगोलवेत्ताओं एवं भौतिक विज्ञानियों का कहना है कि सौर सक्रियता में निरन्तर हो रही अभिवृद्धि घटनाओं एवं विभीषिकाओं की दृष्टि से असामान्य स्तर की होंगी। अगले दिनों सूर्य धब्बों की संख्या और भी अधिक बढ़ जायेगी, परिणाम स्वरूप पृथ्वी पर जबर्दस्त चुम्बकीय तूफान उठेंगे और साथ ही सौर ज्वालायें एवं हवायें और भी घातक हो उठेंगी। उस समय न केवल वातावरण एवं मौसम में भारी परिवर्तन होगे, वरन् मनुष्य को भी शारीरिक, मानसिक तथा भावनात्मक रूप से उथल-पुथल का सामना करना पड़ेगा।

वस्तुतः अपनी पृथ्वी पर न केवल जीवन चक्र चलाने के लिए जिम्मेदार है, वरन् समूचे धरातल की भौतिक संरचना में अपनी शक्तियों से दीर्घकालीन परिवर्तन लाने के लिए भी उत्तरदायी है। करोड़ों किलो मीटर की दूरी के बावजूद भी सूर्य और पृथ्वी का संबंध अन्यान्य ग्रह-गोलकों की अपेक्षा अत्यधिक घनिष्ठ है यही कारण है कि सूर्य मंडल की गतिविधियों में होने वाले परिवर्तनों का सीधा प्रभाव पृथ्वी पर पड़ता है और उसमें भू भौतिकीय परिवर्तन आते हैं। सौर सक्रियता के कारण भू भौतिकीय परिवर्तन और प्राणियों की जैव रासायनिक संरचना तथा सौर गतिविधियों और भूकंप का भी आपसी रिश्ता है।

इस संदर्भ में कैलीफोर्निया-अमेरिका की सुविख्यात महिला जीवविज्ञानी मार्शा ऐडम्स ने गहन अनुसंधान किया हैं। उनका कहना है कि लगभग सभी जैविकीय एवं भौतिक परिवर्तन सौर गतिविधियों में उतार-चढ़ाव के कारण ही होते हैं। भूकंप एवं ज्वालामुखी विस्फोट से लेकर मौसम में विशेष परिवर्तन तक की भू-भौतिकीय प्रक्रियाएँ एवं हिंसात्मक गतिविधियों युद्धों, महामारियों से लेकर महाक्रान्तियाँ तक की घटनायें किसी न किसी तरीके से सौर हलचलों से जुड़ी हुई हैं विभिन्न अस्पतालों में 11 हजार-रोगियों का गंभीरतापूर्वक निरीक्षण-परीक्षण करने के पश्चात् उनने निष्कर्ष निकाला है कि सौर धब्बों की अभिवृद्धि के दिनों में मनुष्य में कुछ विशेष शारीरिक, मानसिक एवं भावनात्मक लक्षण उभरते हैं। प्रायः सभी जैविक क्रियायें सौर हलचलों में उत्पन्न तीव्रता के कारण अव्यवस्थित व अनियमित हो उठती हैं। यह भी पाया गया है कि उन्हीं दिनों भूकंप भी आते हैं। उनका मत है कि जो सामर्थ्य या प्रेरक बल मनुष्यों में दैहिक या मानसिक भावनात्मक लक्षण या परिवर्तन उत्पन्न करते हैं, वही बल भूकंप उत्पन्न करने वाले कारकों को प्रेरित करते हैं और उन्हीं के कारण मानवेत्तर प्राणियों-पशु पक्षियों के व्यवहार में भी विलक्षणता उत्पन्न होती हैं। जो भूकंप आने के ठीक पहले या कुछ देर बाद उत्पन्न होती है।

जीवविज्ञानी मार्शा ऐडम्स के अनुसार यह सभी प्रेरक-बल सौर सक्रियता में तीव्रता उत्पन्न होने के कारण उल्लेखनीय रूप से प्रभावित होते हैं। सौर हलचलों की-जिसमें सन स्पाट्स एवं सौर ज्वालायें भी सम्मिलित हैं-की तीव्रता न केवल भूकंप जैसी प्राकृतिक आपदाओं के लिए, वरन् विलक्षण मौसम स्थिति, नियतकालिक बीमारियों, आगजनी, दंगे राजनीतिक अस्थिरता, आपराधिक लहर आदि के लिए भी उत्तरदायी हैं। इस संबंध में उदाहरण प्रस्तुत करते हुए उनने कहा है कि अर्जेन्टीना व ब्रिटेन के मध्य फाकलैण्ड द्वीप का विवाद सौर गतिविधियों में वृद्धि के बाद ही उभरा था। इसके अतिरिक्त रेल दुर्घटनायें, वायुयानों की दुर्घटनायें-परिवहन तथा समुद्री यानों के एक्सीडेन्ट आदि के लिए भी सौर सक्रियता में अभिवृद्धि ही मुख्य कारण होते हैं। इसकी प्रभाव-प्रतिक्रिया मनुष्यों में कुछ दिनों बाद व्यक्त होती है, जब कि भूकंप लगभग चार दिन बाद आते हैं। देखा गया है कि शल्यक्रिया के पश्चात् स्वास्थ्य लाभ कर रहे व्यक्तियों के कच्चे घावों से सौर हलचलों की तीव्रता के दिनों अनियमित रूप से रक्त स्राव होने लगता है। रक्त स्राव की यह अनियमितता सौर गतिविधि बढ़ने के कुछ देर बाद और भूकंप आने से कुछ देर बाद और भूकंप आने से कुछ पहले देखी गयी है। इतना ही नहीं कुछ रोगियों में भावनात्मक असंतुलन देखा गया तो कुछ को उलटी करते और रोग निवारक औषधियों के प्रति प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए पाया गया है।

वैज्ञानिकों का कहना है कि सौर गतिविधियों में सबसे ज्यादा खतरनाक एवं शक्तिशाली ‘सोलर फ्लेअर’ अर्थात् सौर ज्वालायें होती हैं। जिह्य के आकार के लपलपाते हुए यह विशालकाय उभार अपने भीतर दो करोड़ डिग्री केल्विन से भी ज्यादा तापमान समेटे हुए होते हैं और 10 से 100 अरब मेगाटन हाइड्रोजन बमों के बराबर ऊर्जा मुक्त करते हैं जिससे किसी भी राष्ट्र को हजारों वर्ष तक बिजली आपूर्ति की जा सकती है। सूर्य धब्बों के चक्र-जिसमें धब्बों की संख्या प्रत्येक 11 वें वर्ष में अधिकतम होती है, के साथ-साथ सौर ज्वालाओं में भी अभिवृद्धि होती जाती है। जिन दिनों सूर्य धब्बों की संख्या अधिकतम होती है, उन दिनों 2-3 छोटी-छोटी सौर ज्वालायें या प्रदीप्ति प्रत्येक घंटे दिखती हैं, जब कि एक विशालकाय सौर ज्वाला प्रत्येक महीने दिखती है लेकिन ‘सोलर मिनिमम’ - अर्थात् कम से कम सूर्य धब्बों की स्थिति में कई सप्ताहों तक सौर प्रदीप्ति दिखायी नहीं पड़ते।

अनुसंधानकर्ताओं का कहना है कि जिस तरह पृथ्वी की सतह पर तेज हवायें चलती रहती है, उसी तरह से सूर्य की सतह पर भी सोलर विन्ड (सौर आँधी) चलती है, अन्तर केवल इतना ही होता है कि यह आँधी मात्र एक ही दिशा में चलती है। सूर्य-धब्बों की तीव्रता के दिनों यह तूफान सौर-मंडल से पृथ्वी पर आ जाता है और पृथ्वी पर आ जाता है और पृथ्वी की चुम्बकीय स्थिति में भारी बदलाव लाता है। 15 लाख किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चलने वाले सूर्य कणों से युक्त इस तूफान से पृथ्वी की भू-चुम्बकीय स्थिति में जो परिवर्तन होता है, उसका प्रभाव प्राणि जगत एवं वनस्पति जगत पर तो पड़ता ही है, साथ ही उसका अत्यन्त हानिकारक प्रभाव इलेक्ट्रानिक मशीनरी, संचार माध्यमों, विद्युत-आपूर्ति करने वाले संयंत्रों कृत्रिम उपग्रहों नाभिकीय संयंत्रों आदि पर पड़ता है इस संबंध में टेनेसी स्थिति ओकेरिज नेशनल लैबोरेटरी के विशेषज्ञ द्वय पाडँल बर्नेस तथा जेम्स वाँन डाइके ने पिछले दिनों 13 मार्च 1981 को घटित घटनाओं का हवाला देते हुए कहा है कि उस दिन सौर ज्वालायें विश्व इतिहास में अपने अब तक के प्रचंडतम रूप में थीं लाखों कि0मी0 लम्बी इन ज्वालाओं के कारण उत्पन्न सूर्यकणों युक्त तूफानी हवाओं से फ्लोरिडा के पास हाइड्रो क्यूबेक पावर-सिस्टम पूरी तरह फेल हो गया था। इन्हीं सूर्य-हवाओं के कारण न्यू-जर्सी स्थित एक नाभिकीय संयंत्र के सारे ट्राँसफार्मर जल कर राख हो गये थे।

डेनमार्क के वैज्ञानिकों ने भी सूर्य के धब्बों की क्रियाशीलता और विश्वव्यापी तापमान में गहरा संबंध खोज निकाला है। उनका कहना है कि

पृथ्वी के इन दिनों अधिक गरम होने का कारण सूर्य-हलचलों की तीव्रता में आया उतार-चढ़ाव हैं अगले दिनों सौर-गतिविधियाँ अधिक प्रचंड होगी जिससे न केवल भू-भौतिकीय परिवर्तन होगे वरन् मानवी चेतना भी प्रभावित होगी। सूर्य, जैसा कि बार-बार स्पष्ट किया जाता रहा है, मात्र जलता हुआ आग का गोला नहीं है, इसके आधिदैविक व आध्यात्मिक प्रभाव समग्र ब्रह्माँडीय चेतना पर बड़े गहरे स्तर तक पड़ते है। यही कारण है कि ऐसी सौर सक्रियता के समय सूर्योपासना, गायत्री उपासना सामूहिक धर्मानुष्ठानों की अत्यधिक महत्ता बतायी जाती रही है। आश्वमेधिक पराक्रम इन दिनों अत्यधिक फलदायी व मानव मात्र के लिए हितकारी होते हैं। संधिवेला में यदि अनायास आ पड़ें इन सुयोगों का हम सभी लाभ उठा सकें तो निश्चित ही सौभाग्यशाली कहलाये जायेंगे।


Quotation

शिक्षा वह जो हाथों को आजीविका, उपार्जन सिखाये और मानवीय दायित्वों का निर्वाह सिखायें। जो शिक्षा पेट के लिए पराधीनता सिखाये और मन के लिए विलासिता का आवरण उढ़ायें वह किस काम की?


सूर्य चिकित्सा ही अब एक मात्र विकल्प

सूर्य स्वस्थता एवं जीवनी शक्ति का भण्डार है। उसकी किरणों द्वारा पृथ्वी पर अमृत बरसता है। सृष्टि में जो स्फूर्ति, हलचल, विकास वृद्धि एवं तेजस्विता दिखाई पड़ती है, उसका स्रोत सूर्य को यदि पृथ्वी से हटा दिया जाय, तो इस भूतल पर एक भी जीव का अस्तित्व नहीं रह सकता। तब अस्तित्व नहीं रह सकता। तब अतिशीत के कारण बर्फ का यह अंधकार पूर्ण गोला एक निकम्मी स्थिति में पहुँच कर अपने अस्तित्व को भी खो बैठने के लिए बाध्य होगा वैदिक साहित्य में पृथ्वी को रज और सूर्य को रेतस की उपमा दी गई है। पृथ्वी की उत्पादक शक्ति में प्राण डालने वाला यह सविता सूर्य ही है। वह रोग निवारक और स्वास्थ्य-संवर्द्धक भी है। जिस व्यक्ति में सूर्य शक्ति की जितनी मात्रा होती है, वह उसी अनुपात में स्वस्थ और सबल होता है।

इसकी परीक्षा उन वनस्पतियों और प्राणियों को देखकर सहज ही की जा सकती है, जो सूर्य के संपर्क में रहते हैं। दूर रहने वालो में न तो वह आरोग्यता दिखाई पड़ती है, न सजीवता। जिन पेड़-पौधों, लतागुल्मों को सूर्य का प्रकाश नहीं मिलता, वे या तो बढ़ते- पनपते ही नहीं अथवा यदि बढ़े-पनपे भी तो उनमें चैतन्यता, ताजगी एवं जीवनी शक्ति नहीं रहती। सूर्य के प्रकाश से वंचित रहने वाले प्राणी प्रायः पीले, निस्तेज, मुरझाये हुए, बीमार और अविकसित देखे जाते हैं।

सूर्य की इस विशिष्टता को ध्यान में रखते हुए आरोग्यशास्त्र के आदि आचार्यों ने इसका फायदा उठाने को सोचा और ऐसा नियम बनाया, जिससे अनायास उसका लाभ मिलता रह सके। यही कारण है कि प्राचीन भारतीय सभ्यता में शरीर को खुला रखने की प्रथा थी। तब परिधान उतने ही पहने जाते थे, जितने से लज्जा-निवारण का प्रयोजन पूरा हो सके। अनावश्यक परिणाम में वस्त्र ओढ़ कर उसका भार ढोने और दिनमान के अनुदान से वंचित रहने को अविवेकयुक्त माना जाता था। यही निमित्त है कि देवताओं और आदि पुरुषों के शरीरों को सीमित वस्त्रों में चित्रित दिखाया जाता है। तब अधोभाग को छोड़ कर शेष शरीर को प्रायः निर्वासन ही रखा जाता था, ताकि वह हिस्सा अंशुमाली के संपर्क में रहकर ऊर्जा और ऊष्मा का वह अंश ग्रहण कर सके, जो संपूर्ण शरीर के लिए आवश्यक और अभीष्ट है, एवं रोगनिवारक भी। आज इसे विज्ञान भी स्वीकारता है कि सूर्य-किरणों में विटामिन-डी जिस मात्रा में पाया जाता है, उस परिमाण में शायद ही किसी वनस्पति में उपलब्ध हो। इसके अतिरिक्त उसकी पराबैगनी किरणों में रोगनिवारण की कितनी सामर्थ्य है, यह भी कोई छुपा तथ्य नहीं।

“दि यूनीवर्स इन दि लाइट ऑफ माडर्न फिजिक्स” पुस्तक में मूर्धन्य विज्ञानवेत्ता प्लाक लिखते हैं कि वस्तुतः विज्ञान ने सूर्य के बारे में जितना कुछ अब तक जाना-समझा है, वह उसकी तुलना में नगण्य जितना ही है, जो अभी अविज्ञात है। प्राचीन ऋषियों ने पराविद्या द्वारा उसके सूक्ष्म रहस्यों को उद्घाटित किया था और उनसे लाभान्वित होने के लिए ऐसी रीति-नीति अपनायी थी, जो आज अवैज्ञानिक परम्परा जैसी जान पड़ती है, पर जैसे-जैसे विज्ञान स्थूल से सूक्ष्म की ओर बढ़ रहा है, उनकी वैज्ञानिकता स्थापित होती जा रहा है और यह भी साबित होता जा रहा है कि भारतीय ऋषियों के प्रतिपादन सूक्ष्म विज्ञान पर आधारित हैं सूर्य की आरोग्यवर्धक क्षमता उसी विज्ञान की एक कड़ी है, जिसके स्थल पक्ष को एक सीमा तक विज्ञान ने पुष्ट और प्रमाणित कर लिया है।

लगभग ऐसा ही मुतव्य प्रकट करते हुए प्रख्यात रूसी शरीर शास्त्री एवं भौतिक विज्ञानी प्रो0 जार्ज्स लाखोवस्की अपनी रचना “ली ग्राण्ड प्राबलम” में कहते हैं कि सूर्य समेत समस्त ग्रह-उपग्रहों से आने वाली किरणों का हम पर सुनिश्चित प्रभाव पड़ता है। यह प्रभाव कई बार इतने सूक्ष्म होते हैं कि स्थूल यंत्र-उपकरणों की पकड़ में नहीं आते। ऐसे में इनकी सूक्ष्म अनुभूति ही की जा सकती है। यही कारण है कि भारतीय तत्वज्ञों एवं ज्योतिषियों ने जन्म के समय इनकी विशिष्ट स्थिति को काफी महत्वपूर्ण माना है। उनके अनुसार सूर्य के स्थूल-सूक्ष्म दोनों प्रभावों है जिन्हें विज्ञान अब धीरे-धीरे अनावृत करता जा रहा है। अगले दिनों यदि उसके स्वास्थ्यवर्धक गुणों को और अधिक परिमाण में समझा और उपयोग में लाया जा सकें, तो आश्चर्य नहीं करना चाहिए।

“रीहैविलिटेशन एण्ड दि पावर ऑफ सन” ग्रन्थ में खगोलशास्त्री रपट ग्लीडों लिखते हैं कि यह विज्ञान का दुर्भाग्य है कि उसने अब तक सूर्य के विभिन्न पहलुओं का अध्ययन विश्लेषण किया, किंतु रोग निवारण के उसके सर्वाधिक महत्वपूर्ण पक्ष पर विशेष ध्यान नहीं दिया जा सका, अन्यथा आरोग्य संवर्धन की उसमें इतनी अद्भुत सामर्थ्य है कि यदि उस विधा को सर्वसुलभ बनाया जा सके, तो बड़े पैमाने पर गरीबों और दरिद्रों का उपचार उससे निःशुल्क संभव हो सकता है।

लंबे समय तक सूर्य की स्वास्थ्य-संवर्धक शक्ति का अध्ययन करने वाले चिकित्साशास्त्री अलक्जेण्डर कैनन अपनी कृति “दि इनविजिबल इन्फ्लुएन्स” में कहते हैं कि सूर्य में अदृश्य स्तर की कुछ ऐसी किरणें हैं जिनके गुण, धर्म ओर उपयोग को समझा जा सके, तो बीमारों के लिए वे वरदान सिद्ध हो सकती है।

इस प्रकार यह कहा जा सकता है कि विज्ञान अब शनैःशनैः सूर्य के उस पक्ष को अनावृत्त करने की दिशा में अग्रसर हो रहा है, जो इससे पूर्व तक करीब उपेक्षित स्थिति में पड़ा हुआ था, किन्तु रोग-शमन और स्वास्थ्य संवर्धन के क्षेत्र में जब उसे कुछ ठोस सबूत मिले तो वह इस दिशा में तत्परतापूर्वक शोध-अनुसंधान में संलग्न होता दिखाई पड़ रहा है।

यहाँ तनिक उस सिद्धान्त की चर्चा कर लेना अप्रासंगिक न होगा, जो इस सूर्य-चिकित्सा प्रणाली के मूल में कार्य करता है। उल्लेखनीय है कि इस संसार के सभी प्राण-पदार्थ सूर्य की सविता-चेतना की स्थूल अभिव्यंजना हैं। इस बात को कुछ हद तक विज्ञान ने भी सिद्ध किया है। रूस के विख्यात विज्ञानवेत्ता किर्लिपन ने जब पदार्थों एवं जीवधारियों के चित्र लिए, तो उनके चारों ओर एक विशेष आभा दिखाई पड़ी, जिसका नाम प्रभामंडल रखा गया। आत्मवेत्ताओं के अनुसार यह वही सविता चेतना है, जिसके कारण प्रत्येक जड़ और जीव का अपना स्थूल अस्तित्व होता है। फोटोग्राफी से यह भी ज्ञात हुआ कि मानवी शरीर में प्रत्येक अंग का अपना पृथक् रंग है। बाद के अध्ययनों से यह भी विदित हुआ कि जब शरीर का कोई अवयव रुग्ण होता है, तो वह अपना स्वाभाविक वर्ण त्याग देता है। इससे यह निष्कर्ष निकल कर सामने आया कि स्वस्थता का रहस्य इन रंगों के पारस्परिक संतुलन में निहित है।

इस जगत में प्रकाश का स्रोत सूर्य है। सूर्य और मानवी शरीर में कितनी समानता है, इसका उल्लेख करते हुए बी0वी0 रमण अपने ग्रंथ “प्लेनेटरी इनफ्लुएन्सेज आन ह्ममन अफेयर्स” (पु.65) में लिखते हैं कि सूर्य की संरचना जिन रासायनिक तत्वों व वर्णों से हुई है, वही मानवी शरीर के भी मूल घटक हैं- इस तथ्य का रहस्योद्घाटन स्पेक्ट्रोस्काप करता है। कहना न होगा कि जब इस जलते गोले के सप्त वर्णों का समीकरण बिगड़ता है, तो वहाँ भी भारी उपद्रव उठ खड़ा होता है। सौर-विस्फोट इसी असंतुलन का परिणाम हैं। पहले ही कहा जा चुका है कि सूर्य और पृथ्वी के जीवधारियों में गहन तादात्म्य है। अतः जब भी वहाँ असंतुलन उत्पन्न होता है, पृथ्वी के पदार्थ और प्राणियों में उसका प्रभाव पड़े बिना नहीं रहता। उस सौर-असंतुलन के कारण पृथ्वी पर प्राकृतिक आपदाओं से लेकर शारीरिक-मानसिक विपदाओं विपन्नताओं का आविर्भाव होता है। चूँकि इन दिनों सूर्य के सतरंगी किरणों का व्यतिक्रम हो गया है, अतः धरती पर जहाँ एक ओर बाढ़, भूकंप दुर्भिक्ष जैसे प्रकृति-प्रकोप बढ़े-चढ़े परिमाण में दृष्टिगोचर हो रहे हैं, रोगों, सनक व उन्मादों में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है।

यह सब पदार्थ और मनुष्य के स्वाभाविक सूक्ष्म वर्णों में व्यतिरेक का परिणाम है। सूर्य-चिकित्सा-विज्ञान द्वारा मानवी शरीर में आये रंग संबंधी इन्हीं बदलावों को सुधार कर व्यक्ति को स्वस्थ बनाया जाता है इसके लिए सूर्य चिकित्सक रंगीन काँचों का इस्तेमाल करते हैं और बीमार अवयव में उनके माध्यम से अंगों के प्राकृतिक रंगों की बौछार तब तक करते रहते हैं जब तक वह अपना नैसर्गिक वर्ण प्राप्त न कर ले। मूल वर्ण प्राप्त करते ही अंग स्वस्थ और व्यक्ति नीरोग हो जाता है। कई बार चिकित्सक प्रकाश की जगह जल का उपयोग करते हैं। उसमें अभीष्ट रंग के सूर्य प्रकाश को कुछ घंटे तक संचारित करने के उपरान्त पानी उस वर्ण के गुणधर्म को अपने में ग्रहण-धारण कर लेता है। कुछ दिनों तक इस जल के प्रयोग से वैसा ही प्रतिफल सामने आता दिखाई पड़ता है, जैसा प्रत्यक्ष रंगीन प्रकाश के सेवन से।

आयुर्वेद में वात, पित्त, कफ का सिद्धान्त है। वह भी इन रंगों से मिलता-जुलता है। पीला रंग वात, लाल पित्त और नीला कफ से बहुत कुछ समानता रखता है। आयुर्वेद के निष्णात् जिस व्याधि को पित्त से उत्पन्न मानते हैं, उसे सूर्य चिकित्सक प्रायः लाल रंग से पैदा हुआ निर्णय करेगा। वैद्य जैसे दो या तीनों दोषों के मिलने से कई-कई मर्जों की उत्पत्ति बताते हैं, वैसे ही दो-दो या तीन-तीन वर्णों की

कमी से कई-कई रोग आविर्भूत हो सकते हैं, ऐसी सूर्य चिकित्सकों की मान्यता है। रोग-निवारण के लिए तद्नुरूप वे अनेक रंगों के साथ-साथ उपचार करते हैं शरीर में जब इस अभाव की पूर्ति हो जाती है, तो मरीज स्वस्थ हो जाता है।

सूर्य को धरती का प्राण अकारण ही नहीं कहा गया है। साधक को नीरोग, सबल, तेजस्वी जीवनी शक्ति संपन्न बनाने की प्रक्रिया सविता देवता संपन्न करते हैं। यदि सूर्यदेव की इस सामर्थ्य का सही मूल्याँकन कर उनके आरोग्य-वर्धक रूप से लाभ उठा लिया जाय तो अशक्त समुदाय की एक बड़ी सेवा की जा सकती है। आने वाले दिनों में मानवी स्वास्थ्य के शारीरिक मानसिक विवा पक्षों में भगवान भुवन भास्कर की निश्चित ही अति महत्वपूर्ण भूमिका होगी, इसमें कोई संदेह नहीं। अनेक साधन बन सकते हैं और छोटे-छोटे विभाजनों का एक बड़ा स्वरूप बन सकता है। समस्याएँ भी बड़े पैमाने पर हल हो सकती है।

इसी स्तर का दूसरा सरकारी प्रयास है ग्राम पंचायतों का-मंडल पंचायतों का संस्थापन। उनके माध्यम से अनेकों स्थानीय झगड़े-झंझट सुलझ सकते है। निर्माण के कतिपय प्रयोजन पूरे हो सकते हैं।

यही सभी उपयोगी संस्थाएँ है, पर उनमें लोगों की व्यक्तिगत प्रतिभा, प्रामाणिकता, आदर्शवादिता कर्तव्य-परायणता विकसित करने जैसे दार्शनिक प्रयास का एक अतिमहत्वपूर्ण पक्ष बच जाता है। इसे भी हाथ में लिया जाना चाहिए, अन्यथा अध्यात्मिकता का पुट लगाए बिना मात्र भौतिक प्रयत्नों की दौड़ अपने उद्देश्य पूरा न कर सकेगी। इसके लिए धर्मतंत्र के माध्यम से लोक शिक्षण ही सबसे सरल और प्रभावी तरीका है। जन्म दिवसोत्सवों और तरीका है। जन्म दिवसोत्सवों और संस्कार आयोजनों के लिए हर घर में ऐसी विचार गोष्ठी भी हो सकती है, जिनमें पड़ौसी, संबंधी, इष्ट, मित्र शामिल होते रहें, और नव सृजन की प्रेरणा पाते रहें। पर्व-त्यौहारों पर महामानवों की जयन्तियों पर गायत्री यज्ञ और प्रज्ञा आयोजनों के रूप में ऐसे समारोह होते रह सकते हैं, जिनमें बड़े क्षेत्र की अधिकाधिक जनता को आमंत्रित किया जाय और आने का आग्रह किया जाय और आने का आग्रह किया जाय। इन छोटे-बड़े समारोहों का उद्देश्य व्यक्ति निर्माण, परिवार निर्माण और समाज निर्माण से संबंधित सभी समस्याओं का स्वरूप एवं समाधान बताने का प्रयत्न किया जाय संगठित होने, परस्पर संपर्क साधने और मिलजुल कर किसी योजना को कार्यान्वित करने के लिए प्रथम चरण के रूप में यह सरल एवं कारगर चरण है। सरकारी पंचायतों और सहकारी समितियों को भी योगदान देना चाहिए ताकि वे अधिक फूले और सुदृढ़ हों स्मरण रखने योग्य बात यह है कि विकृतियों का अधिक विस्तार चिन्तन दृष्टिकोण, व्यक्तित्व का स्तर गिर जाने से हुआ है। इस क्षेत्र की सफाई और रंगाई करने के लिए लोक मानस का परिष्कार निताँत आवश्यक है। जन मानस में घुसी हुई अवाँछनीयताओं का उन्मूलन और सत्प्रवृत्तियों का संवर्धन आवश्यक है। इसके लिए जितने भी उपाय-उपचार हो सकते हैं, उन्हें संगठित रूप में करने का प्रयत्न होना चाहिए।

संगठन का आरंभ करने के लिए आरंभ से ही बड़ी संख्या में लोग जमा करने की आवश्यकता नहीं है। यह कार्य कम से कम तीन से आरंभ किया जा सकता है। तीन व्यक्ति प्रयत्नशील रहें, अपना संपर्क क्षेत्र बढ़ाएँ तो उस संगठन की छत्र छाया में क्रमशः अनेकानेक लोग सम्मिलित होते चल सकते हैं। संख्या तीन से बढ़कर तीन सौ या तीन हजार भी हो सकती है। गायत्री परिवार के विराट परिकर का विस्तार इसी प्रकार हुआ है। एकाकी सूत्र संचालक का संकल्प मत्स्यावतार की तरह बढ़ता चला गया उसने सारा देश ही नहीं विश्व का एक बड़ा भाग भी अपने दायरे में समेट लिया। सदुद्देश्यों में क्षेत्र विस्तार की ऐसी ही अद्भुत शक्ति है। यदि उसके कार्य संचालक प्रामाणिक और लगनशील हो तो उसका आलोक व्यापक क्षेत्र में विकसित हुए बिना न रहेगा।

इस संदर्भ में एक ठोस कार्य यह होना चाहिए कि विज्ञजन नियमित रूप से चलती-चलनी चाहिए। भले ही वह न्यूनतम एक घंटा या दस पैसा नित्य जमा करने जितना स्वल्प क्यों न हो। यह समय और साधन की, अनुदान की सम्मिलित शक्ति संपदा इतना अधिक हो जाती है कि उसके एकत्रित होने पर अनेकों सत्प्रवृत्तियों का संचालन भली प्रकार हो सकता है।

समाज के नव निर्माण का न्यूनतम आधार समर्थ गुरु रामदास ने एक चार सूत्री कार्यक्रम बनाया था। (1) महावीर मंदिरों की स्थापना जहाँ से गतिविधियों का सूत्र संचालन होता रहे। (2) निकट ही व्यायामशाला की स्थापना जिसमें हर आयु और हर वर्ग के लोग स्वस्थता अर्जित करने का लाभ सोचकर परस्पर घुलते-मिलते रहें।(3) शिक्षा संवर्धन प्रौढ़ पाठशाला का-महिलाओं का बालकों का आदर्शवादी प्रशिक्षण। (4) नियमित कथाओं में यदि महापुरुषों की आदर्शवादी जीवन गाथाएँ किसी रूप में स्मरण कराई जाती रहें, तो उससे उससे उस अभाव की पूर्ति होती है कि आज सामने उच्चस्तरीय जीवन जीने वालों के घटनाक्रम देखने को नहीं मिलते। फलतः उनका अनुकरण भी नहीं बन पड़ता। कथाओं में दिवंगत लोग जीवित की तरह अपनी गरिमा का प्रदर्शन करते हुए भाव नेत्रों के सामने आ खड़े होते हैं। गाँधी जी, राजा हरिश्चन्द्र का नाटक देख कर ही सत्यनिष्ठा के लिए व्रतशील हुए थे। उपरोक्त चारों कार्यक्रम जिस क्षेत्र में आरंभ हुए उसमें से अनेकों स्वतंत्रता संग्राम में विविध विधि सहायता करने वाले भावनाशील उभरे।

इन दिनों भी उपरोक्त योजना का एक बड़ा अंश समाज सेवी योजना की दृष्टि से कार्यान्वित हो सकता है। जहाँ अनुरूप रचनात्मक कार्यों का शुभारंभ करना चाहिए।

दुष्प्रवृत्ति उन्मूलन एक कार्य है उसमें विष-वृक्ष की जड़े उखाड़ना प्रमुख है। किन्तु इतने से ही काम नहीं चलता। होना यह भी चाहिए कि झाड़-झंखाड़ उखाड़ने, रोड़े कंकड़ बीनने के उपरान्त जमीन जोता बोया जाय। उसमें फसल या उद्यान लगाने का कार्य आरंभ किया जाय। मात्र रोग, कीटाणु मारने से ही स्वास्थ्य संवर्धन की पूरी।


Quotation

एक कछुआ बीस मेढ़कों से भारी पड़ता है। एक आत्म विश्वास, बीस गुत्थियों को एक साथ सुलझाने और बीस संकटों से पार जाने में समर्थ होता है।


समाज के पुनर्निर्माण की दिशा में कुछ ठोस कदम

गाय घोड़ा आदि पालने वाले उनकी समुचित देख-भाल रखते हैं। कठिनाइयों को सुलझाते और सुविधाओं को बढ़ाते हैं तो वे हृष्ट पुष्ट भी रहते हैं। और मालिक की देख-भाल पर प्रसन्नता भी व्यक्त करते हैं। किन्तु उनकी उपेक्षा बरती जाय, तो न केवल उदास रहते हैं, और मालिक की देख-भाल पर प्रसन्नता भी व्यक्त करते हैं। किन्तु उनकी उपेक्षा बरती जाय, तो न केवल उदास रहते हैं, वरन् क्षीण भी होने लगते हैं। राजाओं के निजी हाथी-घोड़े उन्हें अन्यायों की तुलना में अधिक अच्छी तरह पहचानते थे और उनका आदेश पालने, वफादारी दिखाने में पीछे नहीं रहते थे इसका कारण यह था कि वे उनके हिमायती एवं साथी हैं। इसका परिणाम प्रतिदान के रूप में जानवरों की ओर से भी वैसा ही दिया जाता था लड़ाई के मैदान में वे मालिक के इशारे पर जान तक होमने को तैयार रहते थे।

समाज भी ऐसा ही महागज है उसके ऊपर उसके सदस्यों की पूरी देखभाल रहनी आवश्यक हैं। जो व्यक्ति अपने शरीर और मन के परिपोषण, अभिवर्धन का ध्यान रखता है उसकी काया सुदृढ़ बनी रहती है और दीर्घायुष्य जीने की सुविधा भी मिलती है। ठीक यही बात समाज के ऊपर भी लागू होती है। उसके सदस्यगण यदि सर्वजनीन उत्कर्ष का ध्यान रखते है, सामाजिक वातावरण को उच्चस्तरीय बनाए रखने में पूरा-पूरा ध्यान देते हैं तो उसका अभ्युदय,उत्कर्ष, परिष्कृति करण स्वाभाविक है। उपेक्षा का बर्ताव भी ऐसा है, जिसका परिणाम सड़ांध बढ़ते जाने और अनेकानेक विकृतियों के घुस पड़ने के रूप में दृष्टिगोचर होता है। यह न होने पाए इसके लिए उन सभी विचारवानों को समुचित ध्यान रखना चाहिए जो अपने आप को समाज का जिम्मेदार सदस्य मानते हैं। अपनी नागरिक जिम्मेदारी और समाज निष्ठा के प्रति निरंतर सतर्क रहते हैं।

समाज का आकार प्रकार बहुत बड़ा है। उसकी शाखा प्रशाखाएँ तो अनेकानेक हैं पर साथ ही वैसे कोंतर भी कम नहीं है जो थोड़ी सी खाली जगह होते ही पक्षियों द्वारा गहरी लम्बाई में पोजे खोखले कर दिए जाते हैं। इससे पेड़ कुरूप भी होता है और कमजोर भी। जहाँ मालिकों की देखभाल रहती है। वहाँ ऐसी दुर्गति बनने नहीं पाती।

प्रत्येक जिम्मेदार नागरिक को शरीर, परिवार उपार्जन की तरह ही समाज व्यवस्था के हर पक्ष पर ध्यान रखना चाहिए। जहाँ उत्कर्ष की गुँजाइश है, वहाँ मिलजुल कर उसकी पूर्ति करनी चाहिए। यहाँ यह आवश्यक है कि समाज सुधार एवं सामूहिक अभ्युदय का कार्य मिलजुल कर संगठित रूप से ही हो सकता है कोई प्रतिभावान कितना ही समर्थ चतुर क्यों न हों, पर एकाकी प्रयास से कुछ सीमित कार्य ही कर सकता है। इसलिए समाज के प्रति सच्ची निष्ठा रखने वाले प्रत्येक व्यक्ति को अपने प्रभाव-परिचय के क्षेत्र में समाज सेवी संगठन खड़े करने और उन्हें मजबूत बनाने के प्रयत्न करने चाहिएं राम, कृष्ण, गाँधी, बुद्ध आदि अवतारी महा मानव थे। फिर भी उन्होंने अपने-अपने कार्य प्रयोजनों के लिए साथियों के बड़े-बड़े समुदाय एकत्रित किए थे यह कार्य अपने समय में भी अनिवार्य रूप से आवश्यक है। समाज सेवा के एक-एक पक्ष को लेकर कतिपय अन्यान्य संस्थाएँ भी काम कर रही है। पर जिसने हर पहलू पर व्यापक दृष्टि से सोचा और नव निर्माण का समय ढाँचा बनाया हो, वह युग निर्माण योजना या प्रज्ञा अभियान अपने ढंग का अनोखा है। उसकी गतिविधियाँ इतनी लोकप्रिय हुई है कि समर्थक और सहायकों की शृंखला में भाव-भरी कड़ियाँ निरंतर जुड़ती जा रही हैं और संगठन सुदृढ़ ही नहीं सुविस्तृत भी होता जाता है। स्थान-स्थान पर अलग-अलग नाम, रूप, उद्देश्य और कार्यक्रमों को छुटपुट ढाँचे खड़े करने की अपेक्षा यही उत्तम है कि इसी संगठन के अंतर्गत काम किया जाय। अनेकानेकों की प्राण शक्ति के सम्मिलित ऊर्जा भण्डार का जो उद्भव हो रहा है, उसी महाप्रयास में अपना योगदान जोड़ देना चाहिए।

हम सबको यह स्मरण रखना चाहिए कि विनाश तो एक जलती हुई माचिस की तीली या चिनगारी भी कर सकती है, पर उठाने-बढ़ाने के लिए संयुक्त जनशक्ति का उद्भव किए बिना काम नहीं चल सकता। इसके लिए आर्थिक क्षेत्र को प्रधान मानकर सरकार की ओर से सहकारी संगठनों का विभाग बनाया गया है। उससे संबंधित अनेकानेक समितियाँ बन रही हैं। सहकारी बैंक-सहकारी स्टोर आदि खुल रहे है। यदि उस संगठन के सभी सदस्य देश सेवा की भावना से भरे पूरे हों और मिलजुल कर काम करने की आदत डाले, तो आर्थिक उत्कर्ष के समस्या हल नहीं हो जाती। आहार विहार के साधन भी जुटाने पड़ते हैं। लंका दहन तो एकांगी था। समग्रता के लिए रामराज्य की स्थापना भी उत्तरार्ध में आवश्यक हुई। घायल का मात्र आपरेशन ही पूर्ण नहीं है। उसके बाद टाँके लगाने और घाव भरने का दूसरा कार्य भी उतनी ही निष्ठा से करना पड़ता है। अंधेरा दूर करने के लिए प्रकाश जलाने तक की बात अच्छी होते हुए भी अधूरी है। पूर्णता तब बनती है जब उस प्रकाश की परिधि में कुछ उपयोगी कार्य भी ऐसे चल पड़े, जो रचनात्मक हों।

कुरीति उन्मूलन को एक महत्वपूर्ण पक्ष तो माना जाय पर यह न भुला दिया जाय कि उसके साथ ही सत्प्रवृत्ति संवर्धन के निमित्त भी जुटने की आवश्यकता है। परशुराम जी ने अपने जीवन में झाड़-झंखाड़ों का उच्छेदन किया और उसके उपराँत वे उद्यान आरोपण में शेष आधे जीवन को नियोजित किए रहे। अंग्रेजी सरकार को भगा देने के उपराँत अब हमें अनेकों सृजन योजनाओं के विकास कार्यक्रम पूरे करने पड़ रहे हैं।

सृजनात्मक प्रवृत्तियों में अर्थ उपार्जन को प्रथम दर्जा दिया जाता है। गरीबी हटाओ का नारा किसी उद्देश्य से दिया गया है। पर संतोष की बात इतनी है कि रोटी कपड़ा और मकान की आवश्यकताएँ शरीर के साथ इतनी सघनता पूर्वक जुड़ी हुई है कि व्यक्ति हर स्थिति में हर उपाय से इन्हें इस स्तर पर अर्जित कर लेता है कि वह जीवित रह सके।

जिसके बिना प्रगति रुकती है वह है शिक्षा का अर्थ सामान्यतया न्यूनतम साक्षरता और अधिकतम नौकरी में काम आने वाले प्रमाण पत्र तक सीमित समझा जाता है। पर असल में शिक्षा वह है जिसके आधार पर व्यक्तित्व को सुसंस्कृत, परिष्कृत एवं प्रतिभावान बनाया जा सके। यह प्रयोजन स्कूली पढ़ाई से पूरा नहीं होता क्योंकि उसमें जीवन काल से संबंधित महत्वपूर्ण बारीकियों का समावेश नहीं है। यह कार्य धार्मिक एवं सामाजिक सेवाभावी संस्थाओं को अपने जिम्मे लेना चाहिए। इस निमित्त स्वतंत्र कक्षाएँ और परीक्षाएँ चलनी चाहिए। अशिक्षितों को भी सुनने कहने के आधार पर यह ज्ञान प्राप्त करना चाहिए। स्कूली बच्चों को पाठ पक्का करने के अतिरिक्त आस्तिकता एवं सामाजिकता के हर पक्ष की शिक्षा दी जानी चाहिए। इसके लिए बाल संस्कारशाला जैसी स्थापनाओं की सेवा भावी अध्यापकों द्वारा ऐसे समय में व्यवस्था की जानी चाहिए जो स्कूली पढ़ाई से बचता हो। सबसे महत्वपूर्ण प्रयोग इस संबंध में हो सकता है सद्ज्ञान पुस्तकालय। इसमें मात्र उन्हीं विषयों की पुस्तकें रहें जो व्यक्तित्व के सर्वतोमुखी विकास एवं समाज में संव्याप्त समस्याओं के स्वरूप और समाधान के समय के अनुरूप एवं आदर्शवादी आधार पर सर्वसाधारण के सम्मुख प्रस्तुत कर सके।

इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए कला के कई पक्षों को भी काम में लाया जा सकता है। संगीत गायन, अभिनय के माध्यम से विचारणा एवं भावना की दिशा दी जा सकती हैं। कठिनाई यह है कि घटिया स्तर का मानस उथली, बचकानी प्रवृत्तियों को भड़काने वाले माध्यम ही पसंद करता है। आदर्शवाद उसके गले नहीं उतरता। ऐसी दशा में यह एक विशेष आवश्यकता सामने आ पड़ती है कि सर्वसाधारण की रुचि को निष्क्रियता से विरत करके उत्कृष्टता के साथ किस प्रकार जोड़ा जाय। इसका उपचार वह है जो दुर्व्यसनी अपने साथी संगाती बनाने बढ़ाने के लिए करते हैं। वे संपर्क साधते हैं। घनिष्ठता बढ़ाते हैं। अपने प्रिय आधारों के साथ उनका रिश्ता जोड़ते हैं, चस्का लगाते हैं। इसके बाद चिड़िया फंसाते हैं जो नियत पिंजड़े में ही जिन्दगी बिताती है। नशेबाजी का तौर-तरीका यही है। सत्प्रवृत्ति संवर्धन में भी समाजनिष्ठ लोगों को यही करना चाहिए उन्हें जीवन साहित्य को पढ़ाने सुनाने तथा इसी स्तर की कलायें रस लेने की आदत डालनी चाहिए। इसके लिए जनसंपर्क साधने और रचनात्मक कार्यक्रमों के आकर्षक दृश्य दिखाने की आवश्यकता है।

सामाजिक समस्याएँ विभिन्न क्षेत्रों भाषाओं, संप्रदायों, कबीलों में अलग-अलग प्रकार की हो सकती है पहले उन क्षेत्रों में जाकर स्थिति को समझना होगा। तदुपराँत लोगों की मनोभूमि के

साथ संगति बिठाते हुए उन्हें ऊँचा उठाने, आगे बढ़ाने की स्थिति के अनुरूप मार्ग दिखाना होगा।

शरीर के लिए रोटी कपड़ा और मकान की आवश्यकता पूरी करने के लिए आज लोगों द्वारा जिस प्रकार प्रयास किए जाते हैं उसी प्रकार चेतना की, अन्तरात्मा की तुष्टि, तृप्ति, एवं शान्ति के लिए शिक्षा की आवश्यकता है उसके लिए धर्म, दर्शन, नीतिशास्त्र, समाज विज्ञान जैसे विषयों में भी प्रवीणता प्राप्त करनी चाहिए समाज निर्माण के अन्याय अनेक कार्यों में आजीविका की तरह जीवन शिक्षा को भी अति आवश्यक माना गया है।


उपदेश का प्रयोजन (kahani)

राजा परीक्षित को शापवश एक सप्ताह में सर्प दंश से मरना था। उसने बचे समय का श्रेष्ठतम सदुपयोग करने में बुद्धिमत्ता समझी। विचार क्षेत्र में आदर्श भर लेने की दृष्टि से पुराण कथा सुनने की व्यवस्था बनाई गई।

कथा वाचक व्यास जी ने ही इस प्रस्ताव को अस्वीकार करते हुए, उनने अपने पुत्र शुकदेव जी को आमंत्रित करने का परामर्श दिया। व्यास के चरित्र में नियोग जैसे कई लांछन थे पर शुकदेव का चरित्र सर्वथा निर्मल था। वाणी के कथन मात्र से ही उपदेश का प्रयोजन नहीं सधता। धर्मोपदेशक का चरित्र-व्यक्तित्व भी पवित्र होना चाहिये।


दीर्घजीवी बन पाना सभी के लिए संभव है।

जीवन, मन और शरीर की शक्ति का समन्वित रूप है। यदि मन में विचार विकृत हुए और शरीर में विकृत हुए और शरीर में विकृति उत्पन्न हो गई तो वह जीवन न होकर क्रमशः विनाश की गति को प्राप्त होने लगेगा और धीरे-धीरे मृत्यु को प्राप्त हो जावेगा। मन और शरीर एक दूसरे से प्रभावित होते हैं। स्वस्थ शरीर में ही स्वस्थ मन का निवास होता है। स्वस्थ मन का प्रभव शरीर को स्वस्थ करने का साधन है क्योंकि रोगों की भूमिका मानसिक क्षेत्र में विकृति होने से ही बनती है और शरीर पर रोग तो मानसिक विकृति के घनत्व का परिणाम होता है।

जिन देशों में मनुष्यों की आयु अधिक पाई जाती है वहाँ का सर्वेक्षण करने से इस तथ्य की सिद्धि स्वतः ज्ञात हो जाती है। जरा वैज्ञानिकों ने जार्जिया क्षेत्र (सी0आय-एस0) का सर्वेक्षण किया तो उस छोटे से क्षेत्र में 100-100 वर्ष के 2100 व्यक्ति थे। जार्जिया के अलावा काकेशिया पर्वत के आस-पास के क्षेत्र में शतायु व्यक्तियों की कमी नहीं है। 100 से ऊपर 125 ,130,135,140 और 150 वर्ष के व्यक्ति मिलते हैं। कोई ऐसा परिवार नहीं मिलता जिसमें 100 वर्ष की आयु से कम का व्यक्ति उस परिवार का बुजुर्ग हो। वही परिवार सम्माननीय माना जाता है, जिसका बुजुर्ग लम्बी आयु का हो, वह 100 और 100 वर्ष से ऊपर की आयु भोग रहा हो। उत्तर पूर्व काकेशस के एक किसान श्री मखबूद बागीर ओगलीइवानोव एक किसान थे जिनकी मृत्यु 1990 में 150 वर्ष की आयु में हुई थी। उनके 23 बेटे-बेटियाँ और 150 नाती-पोते थे। 175 के लगभग परिवार में व्यक्ति थे। उनकी मृत्यु के समय उनकी बड़ी लड़की 120 वर्ष की थी। इस प्रकार के कई परिवार इस क्षेत्र में छोटे-बड़े रूप में देखने को अब भी मिलते हैं। उनके मनोविचार और खाना-खुराक एवं रहन-सहन का सर्वेक्षण दल ने अध्ययन किया है।

अधिकाँश दीर्घायु व्यक्तियों से पूछने पर कि तुम्हारे दीर्घायु जीवन का क्या रहस्य है, उत्तर में यही सार मिलता था कि “मन में किसी प्रकार की चिन्ता न होनी चाहिए। किसी प्रकार की मन में उलझन होने से उसी पर ध्यान जाता है, उसमें मन की शक्ति का व्यय होता है, शक्ति जीवन-प्रवाह की ओर न लगाकर उसे कुँठित बनाने-विकृति उत्पन्न करने में लग जाती है। क्रोध, ईर्ष्या, दम्भ आदि विकृतियाँ घुन की तरह लग कर मन को खोखला करती है। इसलिए मन में संकल्प उच्च हो है इसलिए मन में संकल्प उच्च हो पवित्र हों। यह न सोचो और कहो कि में वृद्ध हो गया हूँ मैं 55 वर्ष का हूँ यह कहकर अपनी शक्ति को क्षीण न करो, अपने भविष्य की सुन्दर योजनाओं की पूर्ति के व्यावहारिक चरण सक्रियता से बढ़ाओं।

शारीरिक निर्बलता या वृद्धावस्था के लक्षण मानसिक विकृति के ही परिणाम होते हैं। यह निश्चित है कि मोटर के जिस कल-पुर्जे से काम न लिया जायेगा, उस में जंग लग जावेगी। ऐसे ही शारीरिक अंगों का कार्य है। यदि हाथ को अधिक आराम दिया तो वह भी धीरे-धीरे निर्बल हो जायेगा। ऐसे ही शारीरिक अंगों का कार्य है। यदि हाथ को अधिक आराम दिया तो वह भी धीरे-धीरे निर्बल हो जायेगा। और अंत में लकवे जैसी स्थिति हो कर शक्ति शून्य होकर रह जावेगी। यथा शक्ति शरीर से पूर्ण काम लेना चाहिएं दीर्घजीवी व्यक्ति अधिकाँश में अपने शरीर को सक्रिय रखते रहे है। जो भी व्यक्ति शरीर श्रम के नियम का पालन किया है और दीर्घजीवन का लाभ उठाया है खुले आकाश में सोना, आक्सीजन का अधिक से अधिक सेवन करना, गहरी श्वास लेकर पूरे फेफड़ों में वायु का संचार करना ताकि शरीर से विकार निकल जावे, ऐसी आदतें बनाई है।

जीवन रस की वृद्धि और पुष्ट करने वाले तत्वों का सेवन कर मानव अपना कायाकल्प कर पुनः यौवन प्राप्त कर सकता है। शरीर के कोमल अंग जैसे फेफड़े, गुर्दे आंतें आदि शिथिल और कमजोर हो जाते हैं, वहीं नवीन शक्ति ग्रहण कर नवीन बन जाते हैं। उन्हीं में वही नवीन काया जैसी शक्ति उत्पन्न हो जाती है। नवीन युवापन पाकर मस्ती से जीवन जिया जा सकता है।

संसार में जितने भी महान पुरुष हुए है उनकी उत्तम कृतियाँ लगभग 50-60 वर्ष के ही पश्चात् संसार को उपलब्ध हुई हैं। गेटे कवि का-फास्ट 80 वर्ष की आयु के लगभग लिखा गया। रविन्द्र बाबू एवं श्रीपाददामोदर सातवलेकर 10 वर्ष तक लेखन कार्य करते रहे। बर्नार्डशा 14 वर्ष के लगभग तक उत्तम कृतियाँ विश्व को प्रदान करते रहे। नर्चिल, नेहरू आदि राजनीतिज्ञों एडीसन, कैरेले आदि वैज्ञानिकों ने दीर्घ जीवन प्राप्त कर अपनी योग्यता शक्ति का लाभ विश्व को दिया हैं वे लोग असफलता से निराश होकर नहीं बैठ जाते थे। असफलता मिलने पर यही कहते थे कि मैंने एक और तरीका जान लिया है कि जिससे काम करना चाहिए और अपने लक्ष्य की ओर नवीन-नवीन तरीकों से सूझ-बूझ से आगे बढ़ते रहना चाहिए।

मनोबल दीर्घ जीवन में एक आधार रूप में स्थिर है-मन के हारे हार है और मन के जीते जीत अतः मन को विकृति से बचाये रखना आवश्यक है। जीवन में सक्रियता हो, स्वच्छ वायु, खुला आकाश अधिकतम प्राप्त हो चाहे वे ऋषि हों या ग्रामवासी, वे दीर्घ जीवन प्राप्त करते पाये गये है। यदि उन्हीं के चरण चिन्हों पर चलें तो हम भी दीर्घजीवी हो सकते हैं।


सर्वोपरि आभूषण– संतोष

“मेरी महत्वाकाँक्षा के लिए क्षमा करें देव! मैं सुहागिन हूँ, किन्तु शरीर पर एक भी आभूषण न होने से भद्र महिलाएँ मुझे असम्मान की दृष्टि से देखती हैं। लोकसेवा आपके जीवन का लक्ष्य है स्वामी! आपकी सहधर्मिणी होने के फल स्वरूप मेरा भी कर्तव्य है कि मैं आपके आदर्शों का पालन करूं। किन्तु सामाजिकता को भी तो सर्वथा ठुकराया नहीं जा सकता। यही एक छोटी सी बात है। एक दो मंगल आभूषणों की व्यवस्था हो जाती तो इस असम्मान से बच जातीं। “लोपामुद्रा ने बड़े संयत एवं विनीत शब्दों में अपने मन की बात पति से कह दीं।

महर्षि अगस्त्य कुछ गंभीर होकर बोले-“ भद्रे! अपने मन की बात बड़ों से स्पष्ट कर देना उनका नैतिक अधिकार है। फिर पति-पत्नी तो एक दूसरे के अंतरंग सखा होते हैं। अपनी आकाँक्षाएँ एक दूसरे से व्यक्त न करे तो फिर गृहस्थी का आनन्द ही क्या रहे? इसमें भूल या क्षमा जैसी कोई बात नहीं है। गृहस्थ होने के साथ मुझे उन आवश्यकताओं का ध्यान रखना आवश्यक था, जिससे परिजनों को संतोष मिलता है। यह मेरी भूल है, जो आत्म-कल्याण के लोकोत्तर साधनों पर तो चर्चा करते रहे पर साँसारिक होकर भी साँसारिकता को सर्वथा त्याज्य समझते रहे। आगे कभी ऐसी भूल न होने देंगे।”

लेकिन वर्तमान परिस्थितियों में अपनी धर्मपत्नी लोपामुद्रा के आभूषणों की व्यवस्था कैसे हो, इसकी उन्हें स्वाभाविक चिन्ता उठ खड़ी हुई। महर्षि ने जप-तप किया था, साधना-उपासना का अभ्यास किया था, अष्टाँग योग की गम्भीरताओं में निमग्न हुए थे। पर लोकोपकार और आत्मतत्व की शोध में निरंतर व्यस्त रहने के कारण लौकिक संपत्ति न जुटा पाए थे। इसी कारण लोपामुद्रा की आकाँक्षा को पूरा करना उनके लिए चिन्ता का ही विषय था।

महर्षि ने हजारों शिष्यों को पढ़ाया लिखाया और योगाभ्यास कराया था। नीति, समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र तर्क मीमाँसा, तत्वदर्शन आदि अनेक विद्याओं से सैंकड़ों शिष्यों को दीक्षित प्रशिक्षित किया था पर अपरिग्रह की भावना से आज तक उन्होंने किसे भी कुछ स्वीकार नहीं किया था। यद्यपि पारिश्रमिक ले लेना उनका नैतिक अधिकार था, तथापि ब्राह्मणत्व के तेज और वर्चस्व को बनाये रखने के लिए उन्होंने धन को अपने से दूर ही रखा था। शिष्यगण जब कभी श्रद्धा-भाव से गुरुदक्षिणा के रूप में कुछ अर्पित करते तब वह उनकी श्रद्धा को सम्मानित करते हुए कहते”वत्स! तुम्हारी श्रद्धा का मेरे हृदय में परिपूर्ण सम्मान है रत्न-धन आदी तुम अपने जीवन में काम लाओ। मेरी सच्ची गुरु-दक्षिणा यही है-कि तुम मेरे भावों का विस्तार करो मैं जिन आदर्शों के लिए जीवन जी रहा हूँ तुम भी उनके निर्वाह के लिए प्रयत्नशील रहो।” महर्षि स्वयं अपना जीवन-निर्वाह भी अपने दो हाथों की कमाई से ही करते थे। ऐसा न करते तो ऋषि जीवन की शान कहाँ रहती?

पर आज का प्रश्न उतनी ही उलझनों के साथ आ खड़ा हुआ, जितनी उलझने साँसारिकता से ग्रस्त मनुष्य अपनी भूलों के द्वारा पैदा कर लिया करता है। ऋषि ने आज तक पढ़ा था-“कामनाओं की बाढ़ से चिन्ताओं का बोझ बढ़ता है।”आज उसकी स्पष्ट अनुभूति हुई। अब वे इस बात का विचार करने लगे आभूषणों की व्यवस्था कैसे हो कि अपने आदर्शों का परित्याग भी न हो और लोपामुद्रा की भावना का अनादर भी न हो।

महर्षि अपने कुछ प्रमुख शिष्यों को लेकर राजा श्रुतर्वा के पास चल पड़े। श्रुतर्वा उनका शिष्य रह चुका था। गुरु के प्रति उसके हृदय में अपार आदर और निष्ठा थी। यह सोचकर ही महर्षि अगस्त्य उसके पास चले थे। तो भी उनका अंतिम निश्चय यही था कि वे आभूषण या आभूषणों के लिए वही धन स्वीकार करेंगे जो शिष्यों द्वारा न्यायपूर्वक अर्जित किया गया हो अनीति से उपार्जित धन ग्रहण करना ऋषि के लिए संभव न था।

गुरुदेव को अपने द्वार आया देखकर वीर्यवान श्रुतर्वा के हर्ष का पारावार न रहा। उसने उनकी सब प्रकार आवभगत की। वर्षों से बिछुड़े गुरु शिष्य, माँ-बेटे की तरह मिले। कई दिन स्वागत सत्कार में ही निकल गए। तब श्रुतर्वा को ध्यान आया कि गुरुदेव का आगमन किसी उद्देश्य के लिए तो नहीं हुआ। उसने शिष्यों से सब मंतव्य जाना। उसके लिए यह सौभाग्य की बात थी कि गुरूमाता की छोटी सी इच्छा उसके द्वारा पूरी होने जा रही थी।

प्रातःकाल उसने अनेक स्वर्ण मुद्राओं से भरी मंजूषा गुरु चरणों में समर्पित कर दी। उसे स्वीकार करने की प्रार्थना करते हुए श्रुतर्वा ने कहा- “ भगवन् आज्ञा दे तो श्रृंगार के लिए स्वयं साम्राज्ञी को आश्रम की गुरु भक्ति से महर्षि अगस्त्य का हृदय भर आया, किन्तु आभूषण स्वीकार करने के पूर्व उन्होंने प्रश्न किया-“वत्स! पहले ये बताओ इन आभूषणों में कहीं अधर्म और अन्याय की कमाई तो नहीं लगी।”

श्रुतर्वा ने किंचित चिंतित स्वर में बताया-“देव! यह आभूषण राजकोष से बने है। कोष के लिए धन प्रजा देती है कितने लोगों ने परिश्रम की कमाई दी है कितनों ने अधर्म की, यह तो मुझे भी अविज्ञात है। लगता है इसमें शोषण और उत्पीड़न से प्राप्त धन भी है। भगवान भूल हुई, जो आपका शिष्य होकर भी यह ध्यान न रख सका और परिग्रह में पड़ा रहा।’

निश्चय ही कर देने वालों में से कितनों ने ही बिना परिश्रम अनीतिपूर्वक धन कमाया होगा। इस आशंका के मन में आते ही महर्षि ने वह मंजूषा लौटा दी और उदास मन से वापस लौट पड़े।

अब वे राजा धनस्व राज्य के पास पहुँचे। धनस्व प्रजापालक और धर्मज्ञ राजा के साथ ही बड़ा निष्ठावान शिष्य था। किन्तु गुरु का सत्कार उसने बड़ी सादगी से किया। उसका निवास भी श्रुतर्वा जैसा नहीं था। पूछने पर ज्ञात हुआ कि धनस्व राज्य संचालन और अपने निर्वाह के लिए इतना कर लेता है जिससे राज्य की आवश्यकताएँ तो पूरी हो जाती है,पर बनता कुछ नहीं। महर्षि अगस्त्य ने शिष्य धनस्व की पीठ थपथपा कर आशीर्वाद दिया-“वत्स! जिस देश में तुम्हारे जैसे निजी निपुण और त्याग वृत्ति वाले शासक होंगे, वहाँ प्रजा कभी दुःखी न रहेगी।”धनस्व को अपने गुरु की आवश्यकता पुरी न कर सकने का दुःख अवश्य था, पर उसे अपना कर्तव्य परायणता के लिए संतोष भी था। उसी संतोष के साथ उसने गुरुदेव को सादर विदा दी।

इसके बाद महर्षि अपने कई शिष्यों के पास गए पर निराशा ही हाथ लगी। जहाँ शिष्य कर्तव्य परायण और परिश्रमी मिले वहाँ उपयोग से अधिक धन नहीं मिला। जहाँ धन मिला वहाँ साधन दूषित थे अतएव उनकी आशा सब जगह अधूरी ही रहीं।

अतंतः वे अपने दैत्य शिष्य इल्वण के पास गए। गुरु को पाकर शिष्य की वर्षों सोई श्रद्धा उमड़-पड़ी। महर्षि अगस्त्य का उसने भारी स्वागत किया। उसके पास धन संपत्ति और स्वर्ण आभूषणों का किंचित मात्र भी अभाव नहीं था। शिष्यों से उसने चुपचाप गुरु का आशय भी जान लिया। और इसके पूर्व कि वे कुछ कहें उसने अपने प्रमुख सेवकों के साथ प्रचुर आभूषण भरकर आश्रम भिजवा दिए। महर्षि को जब तक यह बात मालूम पड़े तब आश्रम में लोपामुद्रा के पास पहुँच गए।

आभूषण एक ओर रखवाकर विदुषी लोपामुद्रा ने सेवकों को जल पिलाया और उसने महर्षि की कुशल-मंगल पूछी। नौकरों ने वह सब समाचार सुनाए जिस तरह अगस्त्य श्रुतर्वा से लेकर इल्वण के दरबार तक दौड़े थे। लोपामुद्रा पति की इस अकारण भाग दौड़ के लिए बहुत दुःखी हुई। उन्हें अपनी महत्वाकाँक्षा रोक न सकने का बड़ा दुःख हुआ।

उन्होंने पूछा-इल्वण के पास इतना धन कहीं से आता है, जो उसने ढेर सारे आभूषण यहाँ पर भेजे दिए। सेवक हँस पड़े, कुछ पल बाद अपनी हँसी रोकते हुए बोले रोकते हुए बोले-भगवती वह शासक हैं, उनके लिए यह कोई बड़ी बात नहीं। इतना धन तो एक क्षण में किसी से भी अधिकार पूर्वक ले सकते हैं।

लोपामुद्रा की आंखें खुल गईं। उनके लिए अनीति की कमाई स्वीकार करना असंभव हो गया। उन्होंने जल्दी ही वे सारे आभूषण वापस कर दिए। इतने में महर्षि स्वयं भी आ पहुँचे। उन्हें अपनी असमर्थता प्रकट नहीं करनी पड़ी। लोपामुद्रा ने भरे हृदय से उनका स्वागत करते हुए क्षमा माँगी। महर्षि ने प्रेम पूर्ण स्वरों में उनसे कहा-देवी! आज तुमने सच्चा आभूषण पा लिया। संतो ही वह आभूषण है, जिससे बढ़कर दूसरा आभूषण धरती पर नहीं है।


वह जान गँवाता है (kahani)

एक व्यापारी के यहाँ नौका चालन द्वारा व्यापार होता था। एक बार दोनों बड़े लड़के नावों में माल भर कर विदेश बेचने ले गये। लौटते हुए परदेश से दूसरा माल लाने की योजना थी।

रास्ते में समुद्री तूफान आया। नावें उलट गयीं। उनमें रखे दो तख्तों के सहारे वे किनारे आ लगे। जान भर बच पायी। उस क्षेत्र में तीन यक्षिणियों का शासन था एक का नाम था वासना, दूसरी का तृष्णा, तीसरी का अपूर्णा। वे सुन्दर युवकों की तलाश में रहतीं कुछ दिन के भोग -विलास से उन्हें खोखला कर देती और इसके बाद दूर के सिंह-बाघों से भरे जंगल में उन्हें बेमौत मरने के लिए छोड़ देतीं। यक्षिणियों ने उन युवकों का भी इसी दृष्टि से उपभोग किया। उन्हें हिदायत कर दी कि घूमना हो, तो महल के इर्द-गिर्द ही घूमें दक्षिण दिशा में भूलकर भी न जावें।

दोनों भाई उनके पंजे से छूटकर घर जाने की फिक्र में थे, सो दाँव लगते ही दक्षिण दिशा की ओर तेजी से चल पड़े। दूर जाने पर एक जर्जर अस्थि-कंकाल रूप में युवक रोता मिला। उसने बताया यक्षिणियों ने खोखला करके यहाँ मरने के लिए छोड़ दिया है। रहस्य की बात यह है कि वे पीछा करे, मधुर बातें करें, तो भी उनकी ओर मुड़कर न देखना, अन्यथा वे भारी प्रतिशोध लेगी। ऐसा ही हुआ। यक्षिणियाँ पीछे दौड़ती हुई आई। एक भाई उनसे वार्ता करने लगा, उसे ले जाकर कुछ ही दूर पर मार डाला जिसने मुड़कर नहीं देखा, वह उनके जादू से बच गया और किसी प्रकार घर आ गया।

लिप्साएँ यक्षिणियाँ है। जो उनके कुचक्र में फँसता है, वह जान गँवाता है।


ज्ञान और विज्ञान के शक्ति स्रोत गायत्री और यज्ञ

भारत भूमि की प्रसुप्त अंतरात्मा को जगाने के लिये ज्ञान और विज्ञान की प्रतिष्ठापना करना सर्वप्रथम कार्य है। ज्ञान और विज्ञान इन दोनों के बल पर ही कोई व्यक्ति या राष्ट्र उन्नति कर सकता है। जब इन दोनों में एक की भी कमी हो जाती है तो अधःपतन आरंभ हो जाता है। ज्ञान का अर्थ है-विद्या बुद्धिमत्ता,विवेक, दूरदर्शिता,सद्भावना, उदारता, न्याय प्रियता। विज्ञान का अर्थ है-बल, योग्यता, साधन शक्ति, संपन्नता शीघ्र सफलता प्राप्त करने की सामर्थ्य आत्मिक और भौतिक दोनों ही क्षेत्रों में जब संतुलित उन्नति होती है, तभी, उसे वास्तविक विकास माना जाता है। प्राचीन काल में भारत भूमि इन दोनोँ से ही परिपूर्ण थी। साधारण जनता से लेकर राजपरिवारों तथा .ऋषि आश्रमों में ज्ञान और विज्ञान की समुचित प्रतिष्ठा थी। राजकुमार भी ऋषियों के आश्रम में जाकर ज्ञान प्राप्त करते थे और विज्ञान की रहस्यमय नाना कलाओं से विज्ञ बनते थे। दिव्य शस्त्रास्त्रों, दिव्य वाहनों, दिव्य सामर्थ्यों के आश्चर्यजनक वर्णन प्राचीन इतिहास पुराणों में भरे पड़े हैं। ऋषि लोग आत्म चिन्तन में, परमार्थ साधनाओं में संलग्न रहते थे तो भी उनको अष्ट सिद्धि नवनिधि सरीखी लोकोत्तर शक्तियाँ उपलब्ध रहती थी। भारत प्राचीन काल में बुद्धिमान बनने के लिये ज्ञान की और बलवान बनने के लिये ज्ञान की और बलवान बनने के लिये विज्ञान की उपासना करने में सदैव संलग्न रहता था। योगी लोग जहाँ भक्ति भावना द्वारा भगवान में संलग्न होते थे वहाँ कष्ट साध्य साधनाओं तथा तपश्चर्याओं द्वारा अपने में अनेक प्रकार की सामर्थ्य भी उत्पन्न करते थे। भावना से भगवान और साधना से शक्ति प्राप्त होती है, यह निर्विवाद है।

आज का ज्ञान प्रत्यक्ष दृश्यों अनुभवों तथा विज्ञान मशीनों पर अवलंबित है। भौतिक जानकारी तथा शक्तियों प्राप्त करने के लिये भौतिक उपकरण ही आज के वैज्ञानिक प्रयोग कर रहे है। यह तरीका बहुत खर्चीली, श्रमसाध्य, स्वल्प-फलदायक एवं अचिर-अस्थायी है। जो ज्ञान बड़े-बड़े विद्वानों, प्रोफेसरों, रिसर्च स्कालरों द्वारा उत्पन्न किया जा रहा है, वह भौतिक जानकारी तो काफी बढ़ा देता है, पर उससे अंतःकरण में आत्मिक महानता, उदार दृष्टि तथा लोकसेवा के लिये आत्म त्याग करने की भावना पैदा नहीं होती है। आज का तथाकथित “ज्ञान” मनुष्य को अधिक स्वार्थी, धूर्त खर्चीला एवं बनावट पसंद बनाता जा रहा है। दूसरी ओर जो वैज्ञानिक उन्नति हो रही है उससे एक ओर उससे अधिक हानि हो जाती है। रासायनिक खाद देकर खेती की पैदावार बढ़ाई जा रही है, पर इस प्रकार के खाद से जो खाद्य पैदा होता है, उसमें अनेक हानिकारक तत्व रहते हैं, उसमें अनेक हानिकारक तत्व रहते हैं जो स्वास्थ्य को बिगाड़ते हैं। कल कारखानों में वस्तुयें बड़ी मात्रा में तैयार होती है, पर उनके धुएँ से, शोर से वहाँ काम करने वालो पर तथा निकटवर्ती लोगों पर क्या प्रभाव पड़ता है, उसकी हानि का अंदाजा लगाया जाय तो उसकी हानि का अंदाजा लगाया जाय तो उसकी हानि भी कम भयंकर नहीं है वैज्ञानिक चिंतित है कि एक शताब्दी के भीतर पत्थर का कोयला जलाऊ तेल, पेट्रोल आदि पृथ्वी में भरे हुए ईंधन समाप्त हो जायेंगे तब आप की मशीनें बिलकुल बेकार हो जायेगी। बिजली बनाने की मशीनें बिलकुल बेकार हो जायेगी। बिजली बनने के स्रोत भी दिन-दिन सूखते जावेंगे और अणु विस्फोट से यदि अधिक शक्ति पैदा की जाने लगी, तो उसका प्रभाव वायुमण्डल पर बुरा होगा।

प्राचीनकाल में ज्ञान और विज्ञान के आधार आज से भिन्न थे। आज जिस प्रकार हर वस्तु जड़ जगत् में से, भौतिक परमाणुओं में से खोजी जाती और उपलब्ध की जाती है, उसी प्रकार प्राचीन काल में प्रत्येक बात, प्रत्येक वस्तु, प्रत्येक शक्ति आत्मिक जगत में से ढूंढ़ी जाती थी। आज का आधार भौतिकता है, प्राचीन काल का आधार आध्यात्मिक था। विज्ञान का यह सर्वविदित तथ्य है कि जितना कुछ पदार्थ प्रत्यक्ष रूप से दृष्टिगोचर हो रहा है-स्थूल है। उसकी अपेक्षा असंख्यों गुना वही पदार्थ अदृश्य-सूक्ष्म रूप से इस अखिल आकाश में भ्रमण करता रहता है पृथ्वी पर यदि सौ टन पानी भरा माना जाय, तो आकाश में करोड़ों टन पानी हर समय अदृश्य रूप से घूमता हुआ माना जायगा। हमारा विचार और संकल्प भी एक पदार्थ है। इस पदार्थ में एक प्रकार की चुम्बक शक्ति उत्पन्न की जा सकती है और उसकी सहायता से अदृश्य जगत में भ्रमण करते रहने वाले किन्हीं विशेष पदार्थों के परमाणुओं को खींचकर अपनी ओर लाया जा सकता है। विज्ञान के इस आधार को पकड़कर ऋषियों ने यह देखा कि जब सृष्टि के सभी पदार्थ के अणु अपने शरीर क्षेत्र तथा मनः क्षेत्र में विद्यमान है तो उनमें से उपयोगी अणुओं को विकसित करके उसी जाति के असंख्य अणुओं का जगत में से खींचकर अभीष्ट वस्तु प्राप्त कर लेने का प्रयोजन सिद्ध क्यों न किया जाय? उन्होंने इसी आधार पर विज्ञान की खोज की और अपने शरीर तथा मन में छिपी हुई नाना प्रकार की शक्तियों को विविध साधनाओं द्वारा जाग्रत किया। फलस्वरूप उनकी पकड़ने की शक्ति इतनी बलवान हो गई कि जिस प्रकार (खाली) अपनी लम्बी गर्दन पानी में डुबोकर चाहे जहाँ से मछली पकड़ लेती है, उसी प्रकार वे आकाश क्षेत्र में से नाना प्रकार की वस्तुएँ सामर्थ्य तथा शक्तियां पकड़ लेते थे।

ज्ञान और विज्ञान की हमारी प्राचीन शोध गायत्री और यज्ञ के आधार पर होती थी, क्योंकि यही दोनों आध्यात्म विद्या के माता-पिता है। गायत्री ज्ञान रूपिणी है, यज्ञ विज्ञान प्रतीक है। गायत्री मंत्र के 24 अक्षरों में मनुष्य जाति का ठीक प्रकार प्रदर्शन करने वाली शिक्षायें भरी हुई है। इसके अतिरिक्त उन अक्षरों का गुँथन रहस्यमयी विद्या के रहस्यमय आधार पर भी है। इन 24 अक्षरों को यदि शास्त्रोक्त उपासना विधान के अनुसार की उपयोग किया जाय, तो शरीर और मन में भरी हुई अलौकिक शक्तियाँ अपने-अपने ढंग से अपने-अपने समय पर स्वयमेव उद्भूत होती जाती है। आध्यात्मिक गुणों की तेजी से अभिवृद्धि होती है, बुद्धि तीव्र होती है तथा ऐसी दूरदर्शिता का विकास होता है, जिसके आधार पर जीवन की समस्या की अनेक गुत्थियों को सरल किया जा सके।

यज्ञ का विज्ञान अत्यन्त ही महत्वपूर्ण है। वेदमंत्रों की शब्द शक्ति को विशिष्ट कुण्डों,समिधाओं, हवियों चरुओ के साथ उत्पन्न की हुई विशेष सामर्थ्यवान अग्नि में सम्मिश्रित कर देने पर रेडियो सक्रिय शक्ति तरंगें रेडार यंत्र की तरह संसार के किसी भी भाग में भेजी जा सकती हैं, किसी व्यक्ति विशेष प्रयोजन के शरीर में भरी जा सकती है प्रकृति के गुह्य गह्वर में किसी विशेष प्रयोजन के लिये प्रविष्ट कराई जा सकती है। वर्षा, धान्य, दध, आरोग्य, प्राण जीवन आदि की पृथ्वी पर अभिवृद्धि कराने के लिये उनका उपयोग किया जा सकता है। भावनाओं विचारधाराओं तथा परिस्थितियों के परिवर्तन के लिये यज्ञ से उत्पन्न शक्तियों का उपयोग हो सकता है इस प्रकार के अगणित कारण और लाभ है जिनके कारण और लाभ है जिनके कारण यज्ञ को एक अत्यन्त आवश्यक प्रक्रिया माना गया है। हिन्दू धर्म में प्रत्येक पर्व, उत्सव, पूजन, कर्मकाण्ड व्रत, संस्कार, त्यौहार, उपासना, साधन यज्ञ के साथ ही होता है। प्रसूति गृह में अखंड अग्नि की स्थापना के साथ हिन्दू बालक का जन्म होता है और जीवन लीला समाप्त होने पर यज्ञ भगवान को अन्त्येष्टि के साथ शरीर सौंप दिया जाता है। यज्ञ को इतना महत्व ऋषियों ने इसलिये दिया था कि वह न केवल अनेकों भौतिक शक्तियों को देने वाला है, वरन् आत्मा का कल्याण करने वाला शरीर और मन को निर्मल, निर्विकार बनाकर शान्तिदायक परिस्थितियाँ उत्पन्न करने वाला भी है।

साँस्कृतिक पुनरुत्थान के लिये हमें ज्ञान और विज्ञान की आवश्यकता होगी। इसके बिना वह महान कार्य संपन्न न हो सकेगा। भारतीय संस्कृति का बीज मंत्र गायत्री है। उसी की शिक्षाओं तथा शक्तियों के आधार पर हमारा सारा ढाँचा खड़ा हुआ है। अग्नि के समान तेजस्वी रहना यही तो हिन्दू जीवन का आदर्श है। भौतिक माता-पिता हमें शरीर संपत्ति, शिक्षा सुविधा आश्रय, सहयोग, स्नेह आदि बहुत कुछ देते हैं। गायत्री माता और यज्ञ पिता की यदि हम प्रतिष्ठा और उपासना करें तो इसके द्वारा हम और भी उत्तम एवं महत्वपूर्ण वस्तुयें प्राप्त कर सकते है।


राजगृह में प्रवेश करने का साहस (kahani)

विक्रमादित्य ने चौथेपन में संन्यास ले लिया और वे अवधूत जीवन व्यतीत करने लगे। उनके स्थान पर जो भी राजा बैठता, उसे भयंकर ब्रह्मराक्षस रात्रि के समय मार डालता। इस प्रकार कितने ही राजाओं की मृत्यु हो गयी। भेद कुछ खुलता न था। सो कहीं से विक्रमादित्य के खोज निकालने और उनसे मार्ग निकलवाने का निश्चय किया गया। खोजने पर वे एक स्थान पर मिल भी गये। सारी स्थिति समझाई गयी और उन्हें गुत्थी सुलझा देने के लिए सहमत कर लिया गया।

विक्रमादित्य ने अपनी दिव्यदृष्टि से ब्रह्मराक्षस की करतूत समझ ली। उनने शयनकक्ष से बाहर इतने पकवान-मिष्ठान्न रखवा दिये कि उन्हें खाकर उसका पेट भर गया। फिर भी राजा को मारने के लिए शयनकक्ष में आ पहुँचा।

विक्रमादित्य बड़े बुद्धिमान थे। उनने ब्रह्मराक्षस को सम्मानपूर्वक बिठाया और वार्त्तालाप में लगाया। उससे उसकी शक्तियाँ और सिद्धियाँ पूछी। राजा ने उसकी भूख बुझाने का अधिक उपयुक्त प्रबंध करा देने का भी आश्वासन दिया। साथ ही मित्रता की शर्त रूप में यह वर माँगा कि उनकी आयु बता दें। ब्रह्मराक्षस ने 100 वर्ष बतायी है। राजा ने कहा-इनमें से आप दस घटा या बढ़ा सकते हैं क्या? उसने मना कर दिया और कहा यह कार्य विधाता का है।

विक्रमादित्य तलवार निकालकर खड़े हो गये और कहा जब आयु निर्धारित है, तो तुम मुझे कैसे मार सकते हो? निर्भय राजा के सामने राक्षस सहम गया और यहाँ से उलटे पैरों भाग खड़ा हुआ। इसके बाद राजगृह में प्रवेश करने का साहस उसने कभी भी नहीं किया।


परमपूज्य गुरुदेव की अमृतवाणी - एक अंतरंग कार्यकर्ता गोष्ठी

25 मार्च 1987

इस अंक में एक अंतरंग गोष्ठी का प्रसंग प्रस्तुत है जिसमें परमपूज्य गुरुदेव ने अपने कक्ष से अपने परिजनों को जो शांतिकुंज गायत्री तपोभूमि व क्षेत्रों में बिखरे पड़े है,संबोधित करते हुए उनसे आदर्श कार्यकर्ता के रूप में विकसित होने का आग्रह किया था। यह ऐतिहासिक गोष्ठी मूलतः काफी लम्बी थी, संपादन के साथ पाठकों के लिए प्रस्तुत है।

अपने बच्चों से, साथियों से मिशन के कार्यकर्ताओं से मिलने का मेरा बड़ा मन था। पर संयोग नहीं मिल पा रहा था। पहले मन यह था कि यहाँ बुलाऊँ और बुला करके एक-एक से बात करूं और अपने मन को खोलकर आप सबके सामने रखूँ और आपकी नब्ज़ भी देखूँ, पर अब यह संभव नहीं रहा। कितने कार्यकर्ता है? यहाँ शाँतिकुँज के स्थायी कार्यकर्ता एवं सामयिक स्वयं सेवक आये हुए है। एक समुदाय जो शुरू में आया था वह समुदाय न केवल यहाँ का, वरन् गायत्री तपोभूमि का, वह भी हमारा समुदाय है। सब लोगों को बुलाने के लिए मैं विचार करता रहा कि क्या ऐसा संभव है कि एक-एक करके आदमियों को बुलाऊँ और अपने जीवन के अनुभव सुनाऊँ और अपनी इच्छा और आकांक्षा बताऊँ तो भी पूरा नहीं हो सकेगा। इसलिए आप यह मानकर चलिए कि आप से व्यक्तिगत बात की जा रही है और एकाँत में अकेले में बुलाकर के कंधे पर हाथ रखकर के और आप से ही कहा जा रहा है किसी और से नहीं।

आप इन बातों को अपने जीवन में प्रयोग करेंगे तो मैं आपको यकीन दिलाता हूँ कि आपकी ऐसी उन्नति होती चली जायगी जैसी कि एक छोटे से देहात में जन्म लेने के बाद हम उन्नति करते चले आये और उन्नति के ऊँचे शिखर पर जा पहुँचे। आपके लिए भी यह रास्ता खुला हुआ है। आपके लिए भी सड़क खुली हुई हुई है। लेकिन अगर आप ऐसा नहीं कर पायेंगे तो आप यह विश्वास रखिये कि आप घटिया आदमी रहे होंगे किसी भी समय में और घटिया ही रह कर जायेंगे। भले से ही आप शांतिकुंज में रहें। आपकी कोई कहने लायक महत्वपूर्ण प्रगति न हो सकेगी और आप वह आदमी न बन सकेंगे जैसे कि बनाने की मेरी इच्छा थी।

अब क्या करना चाहिए? आपको वह काम करना चाहिए जो कि हमने किया है क्या किया है क्या किया है आपने? क्रिया-कलाप गिनाऊँगा। क्रियाकलाप गिनाऊँगा तो मुझे वहाँ से चलना पड़ेगा जहाँ से काँग्रेस का वालन्टियर हुआ और फिर यहाँ आकर के होते-होते वहाँ आ गया जहाँ अब है। यही बड़ी लम्बी कहानी है। उन सब कहानियों का अनुभव और निष्कर्ष निकालना आपके लिए मुश्किल हो जायगा। उस पर तो ध्यान नहीं देता, लेकिन मैं सैद्धाँतिक रूप से बताता हूँ।

हमने आस्था जायगी श्रद्धा जायगी। निष्ठा जायगी। निष्ठा, श्रद्धा और आस्था किसके प्रति जगायी? व्यक्ति के ऊपर? व्यक्ति तो माध्य होते हैं। हमारे प्रति गुरुजी के प्रति श्रद्धा है। बेटा यह तो ठीक है, लेकिन वास्तव में सिद्धांतों के प्रति श्रद्धा होती है। आदर्शों के प्रति श्रद्धा देवताओं के प्रति श्रद्धा होती है व्यक्तियों के प्रति श्रद्धा मूर्तियों के प्रति श्रद्धा देवताओं के प्रति श्रद्धा टिकाऊ नहीं होती। इसका काई ज्यादा महत्व नहीं महत्वपूर्ण वह जो सिद्धांतों के प्रतिनिष्ठा होती है। हमारी सिद्धांतों के प्रतिनिष्ठा रही। आजीवन वहाँ से जहाँ से चले जहाँ से विचार उत्पन्न किया है वहाँ से लेकर निरंतर अपनी श्रद्धा की लाठी हमने पकड़ी न होती तो तब संभव है कि हमारा चलना-इतना लम्बा सफर पूरा न होता। यदि सिद्धांतों के प्रति हम आस्थावान न हुए होते तो संभव है कि कितनी बार भटक गये होते और हवा का झोंका उड़ाकर हमको कहाँ ले गया होता? लोभों के झोंके नामवरी के झोंके यश के झोंके दबाव के झोंके ऐसे है कि आदमी को लम्बी राह पर चलने के लिए मजबूर कर देते हैं और कही से कही घसीट ले जाते हैं। हमको भी घसीट ले जाते हैं। हमको भी घसीट ले गये होते। ये आदमियों को घसीट ले जाते हैं बहुत से व्यक्ति थे जो सिद्धाँतवाद की राह पर चले और भटक करके कहाँ से कहाँ जा पहुँचे।

भस्मासुर का पुराना नाम बताऊँ आपको। मारीचि का पुराना नाम बताऊँ आपको। ये सभी योग्य और तपस्वी थे पहले जब उन्होंने उपासना-साधना शुरू की थी तब अपने घर से तप करने के लिए हिमालय पर गये थे। तप ओर पूजा-उपासना के साथ-साथ में कड़े नियम और व्रतों का पालन किया था। तब वे बहुत मेधावी थे लेकिन समय और परिस्थितियों के भटकाव में वे कहीं के मारे कहीं चले गये। भस्मासुर का क्या हो गया? मारीचि का क्या हो गया? जिसके प्रलोभन सताते हैं वे भटक जाते हैं और कही के मारे कही चले जाते हैं।

तो श्रद्धा आदमी को टिकाऊ बनाये रखने के लिए एक रस्सी या एक सम्बल है जिसके सामने जिसको पकड़ करके मनुष्य सीधी राह पर चलता हुआ चला जाता है भटक नहीं पाता आप भटकना मत। घर से आप चले थे न, यह विचार लेकर चले थे न कि हम लोक कल्याण के लिए-जन मंगल के लिए घर छोड़कर चल गये है। आप जब कभी भी भटकना मत।घर से आप चले थे न यह विचार लेकर चले थे न कि हम लोक कल्याण के लिए-जन मंगल के लिए घर छोड़कर चले गये है। आप जब कभी भी भटकन आये तो आप अपने उस दिन को उस समय की मनः स्थिति को याद कर लेना जबकि आपके भीतर से श्रद्धा का एक अंकुर उमा था ओर अंकुर उगकर के फिर आपके भीतर एक उमंग पैदा हुई थी और उमंग को लेकर के आप यहाँ आ गये थे। आप को याद है जब आप यहाँ आये थे, जिस दिन आप आये थे उसी मन को याद रखना।

साधु-बाबा जी जिस दिन घर से निकलते है उस दिन यह श्रद्धा लेकर निकलते हैं कि हमको संत बनना है। महात्मा बनना है, ऋषि बनना है तपस्वी बनना है। लेकिन थोड़े दिनों बाद वह जो उमंग होती है वह ढीली पड़ जाती है और ढीली पड़ने के बाद में संसार के प्रलोभन उनको खीचते हैं। किसी की बहिन बेटी की ओर देखते हैं किसी से पैसा लेते हैं किसी को चेला-चेली बनाते हैं किसी की हजामत बनाते हैं फिर जाने क्या हो जाता है। पतन का मार्ग यही से आरंभ होता है। ग्रैविटी गुरुत्वाकर्षण पृथ्वी की हर चीज को ऊपर से नीचे की ओर खींचती है। संसार भी एक ग्रैविटी है जो ऊपर से नीचे की ओर खींचती है। आप लोगों से सबसे मेरा यह करना है कि आप ग्रैविटी से खिंचना मत रोज सबेरे उठकर भगवान का नाम लिया कीजिए और भगवान के नाम के साथ में यह विचार किया कीजिये कि हमने किन सिद्धांतों के लिए समर्पण किया था। और पहला कदम जब उठाया था तो किन सिद्धांतों के आधार पर उठाया था उन सिद्धांतों को रोज याद कर लिया कीजिए कि हमारी उस श्रद्धा में, और उस निष्ठा में॰ उस संकल्प में और उस त्यागवृत्ति में कहीं फर्क तो नहीं आ गया। संसार ने हमको खींच तो नहीं लिया। वातावरण ने हमको गलत तो नहीं बना दिया। कहीं हम कमीने लोगों की नकल तो नहीं करने लगे। आप यह मत करना।

यह नहीं करेंगे तो क्या हो जायेगा? यदि आपकी श्रद्धा कायम रही तो फिर एक नयी चीज पैदा होगी। बीज यदि ठीक तरीके से बोया गया हो तो उसमें से अंकुर जरूर पैदा होगा। फिर क्या पैदा होगा आपको काम करने की लगन पैदा होगी। काम करने की ऐसी लगन ऐसी लगन की आप ने जो काम पूरा किया है उसको पूरा करने के लिए कितने तेज कदम उठाये जाये, यह आपके करते ही बनेगा आप फिर यह नहीं कहेंगे कि हमने छः घण्टे काम कर लिया, चार घण्टे काम कर लिया। यहाँ बैठे है वहाँ बैठे हैं। ओवरटाइम लाइये और ज्यादा काम हम क्यों करेंगे? नहीं फिर आप काम किये बिना रह नहीं सकेंगे।

हमारा भी यही हुआ। श्रद्धा जब उत्पन्न हुई तो हमने यह सोचा कि कही ऐसा न हो कि प्रलोभन हमको खींचने लगे। तो वहाँ से घर की संपत्ति को त्याग करने से लेकर के स्त्री के जेवरों से लेकर और जो कुछ भी था, सबको त्याग करते चले आये कि कही प्रलोभन खींचने नहीं लगे प्रलोभन खींचने नहीं पाये और वह श्रद्धा हमको निरंतर बढ़ती हुई चली आयी। फिर उसने लगन को कम नहीं होने दिया। घियामण्डी के मकान में 17 वर्ष तक बिना बिजली के हमने काम किया। न उसमें पंखा था न उसमें बल्ब। मकान मालिक से झगड़ा हो गया था, सो मकान मालिक कहता था कि मकान खली करो तो उसने बिजली के सेक्शन पर साइन नहीं किये थे और बिजली हमको नहीं मिली। 17 वर्ष तक हम केवल मिट्टी के तेल की बत्ती जलाकर रात को दो बजे से लेकर सबेरे तक अपना पूजा-पाठ से लेकर के और अपना लेखन कार्य तक बराबर करते रहे। पंखा था नहीं घोर गर्मियों के दिनों में भी काम करते रहे 18 घण्टे काम करते रहे। यह काम हमने किया।

अब क्या बात रह गयी दो बातों के अलावा। दो बातों में से आप में से हर आदमी को देखना चाहिए कि हमारी श्रद्धा कमजोर तो नहीं हुई। एक और हमारी लगन कमजोर तो नहीं हुई अर्थात् परिश्रम करने के प्रति जो हमारी उमंग और तरंग होनी चाहिए उसमें कमी तो नहीं आ रही। किसान अपने घर के काम समझता है तो सबेरे से उठता है और शाम को रात के नौ बजे 10 बजे तक बराबर घर के कामों में लगा रहता है।वह 18 घण्टे काम करता है किसी से शिकायत नहीं करता कि हमको 18 घण्टे रोज काम करना पड़ता है। हमें अवकाश नहीं मिला या हमको इतवार की छुट्टी नहीं मिली और हमको यह नहीं हुआ वह नहीं हुआ इसकी कोई शिकायत नहीं करता क्योंकि वह समझता है कि हमारा काम है। यह हमारी जिम्मेदारी है। खेत को रखना, जानवरों को रखना और बाल-बच्चों की देखभाल करना यह हमारा काम है। जिम्मेदारी हर आदमी को दिन-रात काम करने के लिए लगन लगाता है और वह आपके प्रति भी है आपको भी व्यक्तिगत जीवन में अपनी श्रद्धा को कायम रखना एक और अपनी लगन को जीवन्त रखना दो काम तो आपके व्यक्तिगत जीवन के है वह आपको करने चाहिए।

अब एक और नयी बात शुरू करते हैं नयी बात यह है कि यह मिशन हमने कितने परिश्रम से बनाया। कितना विस्तार इसका हो गया, कितना विस्तार होता जाता है आप सुनते रहते है न-हजार कुण्ड के यज्ञीय समाचार आपको मिलते हैं। आपको 2400 शक्ति पीठों की स्थापना की बात मिलती है। इस साल जो युगनिर्माण सम्मेलन हुए है उन सम्मेलनों की बात याद है यहाँ तक कि शिविर चलते हैं उनकी बात याद है। गवर्नमेंट के कितने शिविरों को हम चलाते है इसकी बाद याद है यहाँ का फिल्म स्टूडियो टीवी स्टूडियो फिल्म चलाने वाले है यह सब बाते आपका याद है। बहुत बड़ा काम है बहुत बड़ी योजना है इस काम को हमने आरंभ किया लेकिन अब यह जिम्मेदारी हम आपके सुपुर्द करते हैं। आप में से हर आदमी को हम यह काम सौंपते हैं कि आप हमारे बच्चे के तरीके से हमारी दुकान को चलाइये बन्द मत होने दीजिये हम तो अपनी विदाई ले जायेंगे लेकिन जिम्मेदारी आपके पास आयेगी आप कपूत निकलेंगे तो तो फिर आदमी आपकी बहुत निंदा करेगा और हमारी बहुत निंदा करेगा।

कबीर का बच्चा ऐसा हुआ था जो कबीर के रास्ते पर चलता नहीं था तो सारी दुनिया ने उससे यह कहा-बूडा वंश कबीर का उपजा पूत कमाल आपको कमाल कहा जायगा और यह कहा जायगा कि कबीर तो अच्छे आदमी थे, लेकिन उनकी संतानें दो कौडी की भी नहीं है आपको संतानों को दो कौडी की भी नहीं है आपको संतानों को दो कौडी की पैदा नहीं करना है। आपको इस कार्य का विस्तार करना है जो काम हम करते रहे है वह अकेले हमने नहीं किया मिलजुल करके ढेरों आदमियों के सहयोग से किया है और यह सहयोग हमने प्यार से खींचे है समझा करके खींचे है आत्मीयता के आधार पर खींचे है। ये गुण आपके भीतर पैदा हो जाये तो जो आदमी आपके साथ-साथ काम करते रहते हैं, उनको भी मजबूत बनाये रहेंगे और नये आदमी जिन की कि इससे आगे भी आवश्यकता पड़ेगी नया युग लाने का संकल्प। नया युग लाने का संकल्प दो आदमियों का काम है, चार आदमियों का काम है हजारों आदमियों का काम है जो काम हमने अपने जीवन में किया है वही काम आपको करना है।

नये आदमियों को बुलाने का भी आपका काम है। कैसे बुलाना? यहाँ शांतिकुंज में कितने आदमी काम करते है? यहाँ शांतिकुंज में कितने आदमी काम करते है? यहाँ 250 के करीब आदमी काम करते हैं। एक कुटुम्ब बनाकर बैठे हैं और उस कुटुम्ब को हम कौर सी रस्सी से बाँधे हुए है, आत्मीयता की रस्सी से बाँधे हुए है ये रस्सियाँ आपको तैयार करनी चाहिए ताकि आप नये आदमियों को बाँध करके अपने पास रख सके और जो आदमी वर्तमान में है आपके पास उनको मजबूती से जकड़े रह सके। नहीं तो आप इनको भी मजबूती से जकड़े नहीं रह सकेंगे, यह भी नहीं रहेंगे। इनकी सफाई भी आपको करनी है आत्मीयता अगर न होगी और आपका व्यक्तित्व न होगा तो आपके लिए इनकी सफाई करना भी मुश्किल हो जाएगा।

इसलिए क्या करना चाहिए? आपके पास एक ऐसी प्रेम की रस्सी होनी चाहिए आपके पास ऐसी मिठास की रस्सी होनी चाहिए। आपके पास अपने व्यक्तिगत जीवन का उदाहरण पेश करने की ऐसी रस्सी होनी चाहिए। जिससे प्रभावित करके आप आदमी के हाथ जकड़ सके पैर जकड़ सके, काम जकड़ सकें। सारे के सारे को जकड़ करके जिन्दगी भर आपने साथ बनाये रख सके। यह काम आपको भी विशेषता के रूप में पैदा करना पड़ेगा। संस्थाएं इसी आधार पर चलती है संस्थाएं इसी आधार पर चलती है संस्थाएं इसी आधार पर चलती है। संस्थाओं की प्रगति इसी आधार पर टिकी है। संस्थाएं जो नष्ट हुई है संगठन जो नष्ट हुए है इसी कारण नष्ट हुए है। चलिए मैं आपको एक दो उदाहरण सुना देता है।

एक मैं उदाहरण सुनाऊँगा-स्वामी श्रद्धानन्द का। उन्होंने अपने व्यक्तिगत जीवन में अपने मकान को बेच करके गुरुकुल काँबडी नाम के एक छोटे से गाँव में छप्पर (खाली) रखने की हैसियत नहीं थी इसलिए पढ़ाना भी उनने ही शुरू कर दिया रसोइया रखने की हैसियत नहीं थी इसीलिए खाना पकाना भी उन्होंने शुरू कर दिया। यह लगन, यह निष्ठा जिन किन्हीं ने भी देखी वही आदमी प्रभावित होता हुआ चला गया, वही सहयोगी होता हुआ चला गया। यह उनका विश्वास था जिसने मकान बेच करके साथ बना दिया और (खाली) से लेकर के खाना पकाने तक के और पढ़ाने तक के और बच्चों के कपड़े धोने तक के-सारे काम अपने जिम्मे लिये। उनकी लगन उनकी श्रद्धा-बस यही दो शक्तियाँ जागी बस मैगनेट बन गया चुम्बक बन गया और लोगों का पैसा भी आता चला गया। यह भी होता हुआ चला गया बढ़ता हुआ चला गया। गुरुकुल कांगड़ी बन गयी और स्वामी श्रद्धानन्द की वजह से 40-45 आदमी उनके जमाने में -गुरुकुल कांगड़ी जिन दिनों स्थापित हुई थी ऐसे पैदा हुए जिन्होंने हिन्दुस्तान में तहलका मचा दिया आर्य समाजियो में नया जीवन फूँक दिया। नये गुरुकुल उन्हीं दिनों खुले थे। स्वामी जी ने उनको आज्ञा दी थी कि जैसा गुरुकुल यहाँ का गुरुकुल यहाँ का गुरुकुल कांगड़ी है तुम अपने क्षेत्र में वैसा ही गुरुकुल कायम करना। तो उन्हीं दिनों 20 के करीब गुरुकुल स्थापित हुए थे।

मैं अभी और उदाहरण सुनाता हूँ आपको। प्रेम महाविद्यालय का नाम सुना है आपने हमारी गायत्री तपोभूमि से कुछ आगे जाकर के वृन्दावन रोड़ पर बना हुआ हैं पहले जहाँ प्रेम महाविद्यालय था। राजा महेन्द्र प्रताप ने अपनी जमीन तो दान कर दी थी, बना भी दिया, लेकिन उसको चलाने के लिए बाबू सम्पूर्णानन्द और आचार्य जुगुलकिशोर ब्रह्मचारी कृष्ण चन्द्र जैसे पहली श्रेणी के लोग आये जिनका कि व्यक्तिगत चरित्र ज्ञान नहीं चरित्र और लगन उनमें थी उन्होंने क्या काम किया कि प्रेम महाविद्यालय में जो विद्यार्थी पढ़ने आते थे उनमें ऐसी लगन फूँक दी ऐसे प्राण फूँक दी-ऐसे प्राण फूँक दिये ऐसी जान दी कि यू0पी0 सत्याग्रह में किसी जमाने में ज बनमक सत्याग्रह प्रारंभ हुआ था तब पहली श्रेणी का था जिसमें कि इतने आदमी गिरफ्तार हुए, इतने आदमी जेल गये। इतने आन्दोलन हुए। इस सब का श्रेय 60 फीसदी श्रेय जो है प्रेम महाविद्यालय के विद्यार्थियों को था जो पहले साल में पढ़े। दूसरे साल में पढ़े तीसरे साल में पढ़े। उन पढ़े हुए विद्यार्थियों ने इतना हा-हाकार मचा दिया कि गवर्नमेंट को प्रेम महाविद्यालय बन्द करना पड़ा जितने भी विद्यार्थी थे चाहे वे सत्याग्रह कर रहे थे चाहे नहीं कर रहे थे-प्रेम महाविद्यालय के सारे विद्यार्थियों को मकानों से पकड़-पकड़ करके जेल में बन्द कर दिया कि इनको बागी बना दिया गया है।

दो उदाहरण एक मैंने श्रद्धानन्द का उदाहरण सुनाया दूसरा मैंने प्रेम महाविद्यालय का उदाहरण सुनाया। लगन की बात कह रहा हूँ आप से लगन की और आप से श्रद्धा की बात कह रहा हूँ श्रद्धा और लगन श्रद्धा और लगन। लगन आदमी के अन्दर हो तो सौ गुना काम करा लेती है। इतना काम करा लेती है कि हमारे काम को देखकर आपको आश्चर्य होगा। इतना साहित्य लिखने से लेकर इतना बड़ी क्रांति करने से लेकर के इतने आश्रम बनाने तक जो काम शुरू किये है वे कैसे हो गये? बेटा, यह श्रम है श्रम। यह हमारा श्रम है। यदि हमने श्रम से जी चुराया होता तो उसी तरीके से घटिया आदमी होकर के रह जाते जैसे कि अपना पेट पालना ही जिनके लिए मुश्किल हो जाता है। चोरी-ठगी से चोरी-चालाकी से जहाँ कहीं से मिलता पेट भरने के लिए कपड़े पहनने के लिए और अपना मौज-शौक पूरा करने के लिए पैसा इकट्ठा करते रहते पर इतना बड़ा काम संभव न होता।

तो क्या करना चाहिए। बेटे मैं नहीं बताता हूँ। कैसे कहूँ आपको, देख लीजिये और हमको पढ़ लीजिये और हमको पढ़ लीजिये। जिस दिन से हमने साधना के क्षेत्र में, सेवा के क्षेत्र में, अध्यात्म के क्षेत्र में कदम बढ़ाया, उस दिन से लेकर आज तक हमारी निष्ठा ज्यों की त्यों बनी हुई है। इसमें कही एक राई-रत्ती, सुई के नोंक के बराबर फर्क नहीं आयेगा। जिस दिन तक हमारी लाश उठेगी उस दिन तक आप कभी यह नहीं सुनेंगे कि इन्होंने अपनी श्रद्धा डगमगा दी। इन्होंने अपने विश्वास में कमी कर दी।

आप हमारी वंश परम्परा को जानिये और हम मरने के बाद में जहाँ कहीं भी रहेंगे भूत बन कर देखेंगे। हम देखेंगे कि जिन लोगों को हम पीछे छोड़ कर आये थे, उन्होंने हमारी परम्परा को निबाही है और अगर हमको यह मालूम पड़ा कि इन्होंने हमारी परम्परा नहीं निबाही और इन्होंने व्यक्तिगत तानाबाना बुनना शुरू कर दिया और अपना व्यक्तिगत अहंकार अपनी व्यक्तिगत यश कामना और व्यक्तिगत यश कामना और व्यक्तिगत धन-संग्रह करने का सिलसिला शुरू कर दिया। व्यक्तिगत रूप से बड़ा आदमी बनना शुरू कर दिया तो हमारी आँखों से आँसू टपकेंगे और जहाँ कही भी हम भूत होकर के पीपल के पेड़ पर बैठेंगे वहाँ जाकर के हमारी आँखों से जो आँसू टपकेंगे-आपको चैन से नहीं बैठने देंगे और मैं कुछ कहता नहीं हूँ। आपको हैरान कर देंगे हैरान। दुर्वासा ऋषि के पीछे विष्णु भगवान का चक्र लगा था तो दुर्वासा जी तीनों लोकों में घूम आये थे, पर उनको चैन नहीं मिला था। आपको भी चैन नहीं मिलेगा। अगर हमको विश्वास देकर के विश्वासघात करेंगे तो मेरा शाप है आपको कि आपको चैन नहीं पड़ेगा कभी भी और न आपको यश मिलेगा न आपको ख्याति मिलेगी, न उन्नति होगी।आपका अधः पतन होगा। आपका अपयश होगा और आपकी जीवात्मा आपको मारकर डाल देगी। आप यह मत करना अच्छा।

मुझे अपने मन की बात कहनी थी सो मैंने कह दी अब करना आपका काम है कि इन बतायी हुई बातों को किस हद तक कार्यस्त करें और कहाँ तक चले। बस ये ही मोटी-मोटी बातें थी जो मैंने आपसे कही। बस मेरा मन हलका हो गया अब आप इन्हें सोचना। मालूम नहीं आप इन्हें कार्य रूप में लायेंगे तो मुझे बड़ी प्रसन्नता होगी और मैं समझूँगा कि आज मैंने जी खोलकर आपके सामने जो रखा था आपसे उसे ठीक तरीके से पढ़ा समझा और जीवन में उतार करके उसी तरह का लाभ उठाने की संभावना शुरू कर दी जैसे कि मैंने अपने जीवन में की।

यह रास्ता आपके लिए भी खुला है, भजे आप पीछे -पीछे आइये साथ आइये। हमको देखिये और अपने आपको ठीक करिये। बस आज की बात समाप्त।


संकल्प सहज ही पूरा (kahani)

 एक जगह नारियल बिक रहे थे। एक मछुआरे ने दाम पूछा, तो उसने आठ आने बताये। वह सस्ते में देने की जिद करने लगा। दुकानदार ने कहा-एक मील आगे चले जाओ वहाँ नारियल का बगीचा है। सस्ते वहाँ नारियल का बगीचा है सस्ते वहाँ मिलेंगे। वहाँ नारियल का बगीचा है। सस्ते वहाँ मिलेंगे। वहाँ पहुँचा तो भाव चार आने का था। वह और सस्ता माँगने लगा, तो दुकानदार ने कहा पेड़ पर चढ़ जाओ और मुफ्त में तोड़ लाओ। वह चढ़ गया। कई नारियल लिये। पर नीचे झाँक कर देखा तो ऊँचाई से गिरने का भय लगने लगा।

उसने भगवान् से प्रार्थना की यदि सही सलामत नीचे पहुँचूँ, तो पाँच ब्राह्मण को भोजन कराऊँगा एवं खूब दान दूँगा। धीरे-धीरे सँभल-सँभल कर उतरा। आधी दूरी पर आ गया, तो बोला दो ब्राह्मण को भोजन कराऊँगा, और नीचे उतरा तो एक की बात करने लगा। जब जमीन पर आ गया, तो बोला ब्रह्म सबके भीतर है मेरे और परिवार के भीतर भी तो ब्राह्मण है। हम सब लोग नित्य की तरह साथ भोजन करेंगे तो ब्रह्मभोज का संकल्प सहज ही पूरा हो जायेगा।

आपत्ति के समय परोपकार करने की मनौती प्रायः इसी प्रकार अपूर्ण रह जाती है।

द्वापर युग में मालप देश में शिखिध्वज नाम का एक राजा था। उसकी पत्नी सौराष्ट्र की राजकन्या थी-नाम था उसका चूडाला। बहुत समय तक दोनों उपभोग में निरत रहे। पीछे उनके मन में आत्म ज्ञान की आकाँक्षा हुई। दोनों अपने-अपने ढंग से इस प्रयास में अग्रसर रहने लगे। रानी में संक्षेप में समझ लिया था कि दृष्टिकोण को बदल लेना और अन्तःकरण को साध लेना ही ब्रह्मज्ञान है। सो उस उपलब्धि पर वह बहुत प्रसन्न रहने लगी। राजा को भी सिखाती, तो वे स्त्री के प्रति हीन भावना रखने के कारण उसकी बात पर ध्यान नहीं देते थे।

राजा को कर्मकाण्डपरक तप-साधना में विश्वास था, सो वे एक विम चुपचाप रात्रि में उठ कर वन चले गये। रानी ने योगबल से जान लिया, सो राजकाज स्वयं चलाने लगी। राजा को कुछ काल के लिए प्रवास जाने की बात कह दी।

एक दिन उनने राजा से मिलने की इच्छा की, सो सूक्ष्म शरीर से वहीं जा पहुँची, जहाँ राजा था। वेष ऋषि कुमार का बनाया। परिचय पूछने पर अपने को नारद पुत्र कहा। राजा के साथ उनकी ज्ञान चर्चा चल पड़ी। पर संध्या होते ही वे दुःखी होने लगे। बोले मुझे दुर्वासा का शाप लगा है। दिन में पुरुष और रात्रि में नारी हो जाता हूँ। आपके पास टिक सकूँगा।

राजा ने कहा-आत्मा न स्त्री है, न पुरुष। न इनमें कोई छोटा है, न बड़ा। डरने जैसी कोई बात नहीं है आप हमारे मित्र हो गये है प्रसन्नतापूर्वक साथ में रहें कई दिल बीत गये। मित्रता प्रगाढ़ हुई, तो स्त्री बने ऋषि कुमार ने कहा मेरी कामना वासना प्रबल हो रही है रुका नहीं जाता। राजा ने कहा आत्मा पर कुसंस्कार न पड़े, तो शरीर क्रियाओं में कोई दोष नहीं है। उनका काम-क्रीडा प्रकरण चल पड़ा। न राजा को खेद था, न पश्चाताप। अब वे स्त्री पुरुष को समान मानने लगे थे।

चूडाला ने अपना असली रूप प्रकट किया और राजा को महल में घसीट लाई। स्त्री को हेय मानने और उसके परामर्श की उपेक्षा करने का हेय भाव उनके मन से विदा हो गया। राजा ने चूडाला को अपना गुरु माना प्रसन्नतापूर्वक राजकाज चलाते हुए आत्म ज्ञान में लीन रहे।

वशिष्ठ ने कहा है राम आत्मा एक है। स्त्री पुरुष होने से कोई अंतर नहीं आता। दृष्टिकोण बदल जाने पर ही मनुष्य ब्रह्मज्ञानी हो जाता है


रण बाँकुरों को आमंत्रण


रण बाँकुरों को आमंत्रण (kavita)

समय माँगता समर साथियों! आमंत्रण स्वीकार करो। जीवन-गति का नाम बाँकुरो, मरण न अंगीकार करो॥

अनचाहे जाने कितने ही, पाप-ताप तुम झेल चुके। इन्द्रिय रथ पर चढ़कर जग के खेल बहुत से खेल चुके॥

अब उन सब कर्मों का तुमको, प्रायश्चित करना होगा। बूँद-बूँद कनकर स्नेह की, धरती पर झरना होगा॥

राणा बनकर अशन और आसन में तृण स्वीकार करो, सीमा होती नहीं नींद की, आलस और प्रमादों की।

जागो तुम टेर रही, उज्ज्वल भविष्य की लाली है। तुम पर न्यौछावर होने को, प्रकृति हुई मतवाली है॥

अनुदानों की वर्षा के ये, मंगल क्षण स्वीकार करो,

छाँट-छाँट कर अपने मन का, सभी मैल धो डालो तुम। डरो नहीं कष्टों से उनको, अपना मीत बना लो तुम॥

जब संयम को साध हृदय से, त्याग-भाव अपनालोगे। सभी सफलताओं को अपने, मन का दास बना लोगे॥

अनुशीलन के लिये स्वयं, मन का दर्पण स्वीकार करो। प्राण फूँक दो हर सोये जीवन में, क्रिया-कलापों से। मुक्त करो बोझिल समाज को, कुँठा के अभिशापों से ॥

वहीं अर्चना-पूजा होगी, जहाँ तुम्हारा पथ होगा। ऐश्वर्यों की अगवानी में, कर्तव्यों का रथ होगा॥

आराधन करने को माटी का हर कण स्वीकार करो। जीवन गति का नाम बाँकुरो, मरण न अंगीकार करो॥

देवेन्द्र कुमार “देव”


“महाकाल की सवारी”


महाकाल की सवारी (kahani)

महाकाल की चली सवारी, चलो। साथ हो जायें। यह परिवर्तन की वेला है, युग परिवर्तन लायें॥1॥

महाकाल के चरण थिरकते हैं, देखो! द्रुतगति से। महाकाल की चाल, सँभाले सँभल रही न प्रगति से ॥

विकृतियों की छाती पर हो रहा, कि ताण्डव नर्तन। अब अनीति, अत्याचारों का, होगा निश्चित मर्दन॥

महाकाल के गण जैसे ही, हम भी कदम बढ़ाये। महाकाल की चली सवारी, चलो! साथ हो जायें॥2॥

गूँज रहे धरती-नभ में, जय महाकाल के नारे। महाकाल की तेवर के, देखो,! तो तनिक इशारे॥

पाप, पतन के डेरो में, अब हाहाकार मचा है। पाप, पतन अब, जनमानस में से, अतिक्रमण हटाये। महाकाल की कुपित दृष्टि से, कोई नहीं बचा है॥

दुष्प्रवृत्तियों, दुश्चिंतन को, छोड़ सकेंगे जो भी। हो जायेंगे महाकाल के, संगी-साथी वो ही॥

काम-क्रोध के लोभ-मोह के, आओ! बंधन तोड़ो। महाकाल की सद् प्रवृत्तियों से अब नाता जोड़ो।

महाकाल के गण बनने की, हिम्मत चलो जुटायें। परिवर्तन का चक्र चल रहा, सभी बदल जायेंगे।

जो न बदल पायेंगे, अपने आप कुचल जायेंगे ॥ अब कषाय-कल्मष, शोषण-उत्पीड़न नहीं टिकेंगे।

महाकाल के गण, भोगों के हाथों नहीं बिकेंगे ॥ डमरू बजा रहा प्रलयंकर, जागें और जगायें। महाकाल की चली सवारी, चलो! साथ हो जायें॥5॥

महाकाल संकल्पित है, नवयुग ‘प्रज्ञायुग’ होगा। प्रज्ञा पुत्रों का पौरुष, रंग लायेगा, ध्रुव होगा॥

विकृति चिंतन की विभीषिका से, अब मुक्ति मिलेगी। ज्ञान यज्ञ की ही मशाल, अब चारों ओर जलेगी॥

अंधकार से मुक्ति दिलाने, ज्ञान मशाल उठायें। महाकाल की चली सवारी, चलो! साथ हो जायें ॥6॥

मंगल विजय


विशिष्ट धारावाहिक लेखमाला (7) - युग पुरुष पूज्य गुरुदेव पं0 श्रीराम शर्मा आचार्य - जीवन मूरि की तरह है उनकी लेखनी

लेखनी की जड़ता भेद कर निकली साहित्य की चेतन सृष्टि साहित्यकार का तप है, उसके व्यक्तित्व की संजीवनी क्षमता है, जिसका स्पर्श मात्र निर्जीव निष्प्राण हो रहे मानव को उल्लास भरा जीवन दे डालता है। मनुष्य के विकास पथ पर प्रत्येक साहित्यकार ने इसी तप संजीवनी के बल पर उल्लास बिखेरा जीवन बाँटा है। बाँटने और बिखेरने के तौर-तरीके बदलते समय और परिवेश के अनुसार भले अनेक रहे हों। पर कार्य के पीछे रहने वाला भाव सदा एक रहा है “विकास पथ पर गतिमान मानव चरण रुकने न पाएँ।” इस भाव के बहुआयामी विकास के लिए अपनी चिंतन क्षमता, कल्पना शक्ति-भाव-संपदा, तर्क-सामर्थ्य खपाने वाले उस तपस्वी को साहित्य संसार कैसे भूल पाएगा? जिसने अर्ध शताब्दी से अधिक समय तक तपकर अपनी लेखनी द्वारा लक्षाधिक पृथ्वी में जीवन के तत्व सँजोये है।

शब्द संसार में विचरण करने वाले विचारशील मन के लिए उनका नाम सहज है। संभव है याद करने के ढंग अलग-अलग हो। कोई उनके अगाध पाँडित्य को याद करे। किसी को उनकी मनीषी चकाचौंध कर दे। किसी का मन उन युगाचार्य द्वारा प्रस्तुत वर्तमान समस्याओं की तत्वालोचना के सामने नत हो उठे। कुछ उन्हें अपने जीवन की निगूढ़ पहेलियों को सुलझाने वाले अपने पूज्य गुरुदेव के रूप में याद कर बैठें। तो किसी के मन में उनका छवि चित्र प्रज्ञा पुरुष क्रांतिदर्शी ब्रह्मर्षि के रूप में जगमगा उठे-जिसने मानव की उज्ज्वल भवितव्यता का मानचित्र तैयार किया है उसे उस ओर बढ़ चलने की सामर्थ्य दी है। भावना विचारणा कल्पना, के अनेक रूपों द्वारा उनकी पुण्य स्मृति अनगिनत ढंग से सँजोने पर भी युग मनीषी पं0 श्रीराम शर्मा आचार्य एक हैं अपने में सर्वथा अद्वितीय।

उनका रचना संसार उपयोगी, आवश्यक और समसामयिक होने के साथ ही साहित्य की दृष्टि से भी अनूठा और मोहक है। यहाँ दर्शन ने साहित्य कला की संवेदना और सौंदर्य पाया है और साहित्य कला ने दार्शनिक विचारशीलता को अपनाया है। अपने सामान्य क्रम में दर्शन और साहित्य दो अलग-अलग विधाएँ रही है। इनके अंतर की स्पष्टता समझने में प्रवेश करना जरूरी है। प्रचलित अर्थों में साहित्य के अनेक रूप हमारे सामने बिखरे दिखाई देते हैं। नाटक काव्य कहानी, व्यंग इनमें से किसी का संपर्क मन को साहित्यिकता का भान करा देता है इसके अनेक रंगों में स्वयं में मन को रँगते यह पहचान हुए बिना नहीं रहती कि साहित्य कला है। कला की अनेक विधाओं में सर्वथा उत्कृष्ट और सूक्ष्म।

जबकि दर्शन विचार है। अपने अस्तित्व के उदय से आज तक इसने अनेक शाखा-प्रशाखाओं के रूप में इससे अपना विकास किया है। वेद से श्री अरविंद, सुकरात से सार्त्र तक की लम्बी यात्रा पृथ्वी के दोनों गोलार्धों में पूरी हुई है। विचारों का क्षेत्र उतना ही व्यापक है जितना कि स्वयं मानव जीवन। ठीक यही बात साहित्य के संदर्भ में कही जा सकती है। पर इस समानता के बावजूद दोनों में गहरी विषमता है। एक का क्षेत्र बुद्धि है, दूसरे का भाव। बौद्धिकता के अभाव में दर्शन जन्म नहीं ले सकता और न भावों के अभाव में कला। यही कारण है- इमानुएल काण्ट को साहित्यकार नहीं कहा जा सकता और न बायरन को दार्शनिक।

इस अलगाव के बावजूद साहित्य दर्शन से नाता नहीं तोड़ सकता। कला स्वयं में पूर्ण नहीं है। युग मनीषी परम पू. गुरुदेव ने इसी तथ्य को अपनी साहित्य मीमाँसा का केन्द्र माना है। वे डा. ब्रैडले और मि. क्लाइव वेल की तरह कला की दुनिया को अपने में पूर्ण स्वतन्त्र सृष्टि नहीं स्वीकार करते। बात सही भी है जैसे ही इसे स्वयं में पूर्ण होने का दम्भ घेर लेता है अपनी उपयोगिता खो बैठती है। सृजन से विमुख इसकी चरमावस्था यही है कि मानव को उसके चरम स्तर तक ग्रहणशील बना दें। पर ग्रहणशील किस लिए? यहाँ एक ऐसा जटिल प्रश्न है जिसके बारे में आज कला की समस्त विधाएँ मौन हैं उनका यही मौन मनुष्य जाति को कुछ ऐसा दिए जा रहा है जिससे वह स्वयं की गरिमा भूल पशुता की ओर बढ़ चली है।

इस दुर्भाग्य पूर्ण स्थिति को युग ऋषि के शब्दों में कहें तो “भावनाओं को दिशा देने वाली कुँजी उन हाथों में चली गई जिनमें नहीं जानी चाहिए थी। बारूद की पेटी बालकों को थमा दी जाए तलवार बंदर को मिल जाय, सशक्त औषधियों का उपयोग कोई अनाड़ी करने लगे खजाने की व्यवस्था पागल संभाले तो उसका परिणाम अहितकर ही होगा। भावनाओं को प्रभावित करना एक ऐसा महत्वपूर्ण कार्य है जिस पर संसार का भाग्य और भविष्य जुड़ा हुआ है इसलिए इसको प्रयुक्त करने का अधिकारियों और मनीषियों को मिलना चाहिए जो कला को सद्विचारों सद्भावों का माध्यम बना सके।”

जो कलाकार अथवा कला स्वयं को ऐसा करने में अक्षम पाते हैं उनके न विकसित होने में मानवहित है। पाक कला प्रशंसनीय है इसकी उपलब्धि के रूप में बने अनेक व्यंजनों को देख किसी की लार टपकने लगना स्वाभाविक है। लेकिन यदि सारे व्यंजनों में जहर घुला हो तब व्यक्ति की ग्रहणशीलता का जागरण क्या परिणाम देगा? इस बिन्दु पर सोचने की आज किसी को फुरसत भले न हो पर परिस्थितियाँ कला विशेषज्ञों को इस पर सोचने की आज किसी को फुरसत भजे न हो पर परिस्थितियाँ कला विशेषज्ञों को इस पर सोचने के लिए विवश कर रही है। यहाँ कला का दोष इतना ही है कि उसने स्वयं को पूर्णमान अपने जन्म स्थान से संबंध विच्छेद कर लिया। यह तथ्य इसकी विविध विधाओं के लिए आवश्यक होने के साथ साहित्य के लिए अनिवार्य है।

साहित्य के जन्म का उद्देश्य यही था कि वह दर्शन को लोक जीवन के लिए ग्राह्य बनाए। अपनी शुरुआत में दर्शन व साहित्य अलग न थे। विचारो की खोज करने वाले ऋषि पर ही यह जिम्मेदारी थी कि वह उसे साहित्य के रूप में प्रस्तुत करें। यही कारण है वेदों में कवि शब्द ऋषि का पर्याय माना गया है और उसी की उपलब्धि वैदिक वाङ्मय है। कालान्तर में कार्य विस्तार वश उपनिषद् युग में दोनों के दो क्षेत्र हो गए उपनिषद् ने दर्शन का रूप लिया तो पुराणों ने काव्य काँ। षड्दर्शनों तक आते-आते इनमें उपनिषदों में पायी जाने वाली काव्य शैली का लोप हो गया। दर्शन सूत्रमय सूक्ष्म बुद्धि के लिए बोधगम्य हो गया तो काव्यलोक जीवन के लिए ग्राह्य। पर साहित्य का उद्देश्य दर्शन को लोक जीवन के लिए सुलभ बनाना ही रहा।

संस्कृत साहित्य की भाँति हिन्दी साहित्य के अस्तित्व के उदय में यही रूप देखते हैं। भक्ति युग में जन्म लेने वाले हिन्दी वाङ्मय में सूर-तुलसी और कबीर की भावधारा का एक ही उद्देश्य रहा है सर्व सामान्य के लिए दुर्लभ अध्यात्म दर्शन को सुलभ बनाना। आज भी हम जिसे श्रेष्ठ साहित्य की श्रेणी में रखते हैं उसका आधार कोई न काई विचारधारा रही है। देश की स्वतन्त्रता के समय और उसके बाद हिन्दी साहित्य जिन दो विचारधाराओं से प्रभावित हुआ वे गाँधी और मार्क्स की है, कहीं-कहीं कीर्केगार्ड, जेस्पर का अस्तित्व वाद और मानववाद अपनी झलक दिखा जाता है। मैथलीशरण, सियारामशरण सोहनलाल द्विवेदी आदि को यदि गाँधी प्रभावित करते हैं तो प्रेमचन्द्र निराला मुक्तिबोध नागार्जुन की लेखनी मार्क्स को केन्द्र बनाकर घूमती है। पंत को काव्य मानववाद की झलक दिखाता है।

दर्शन और साहित्य की अटूट घनिष्ठता सिद्ध होने के बाद भी यह पहेली बनी ही रहती है क्या सभी विचार मानव के समग्र विकास में सहायक है? इस सवाल का उत्तर तलाश रहे साहित्य मनीषी प्रभाकर माचवे की विकलता उन्हीं के शब्दों में नया प्रकाश चाहिए नया प्रकाश चाहिए पुकारती दिशा- दिशा, मिटे तृषा मिटे निशा बहुत हुआ उदासपन हमें सुहास चाहिए।” उनके इस उद्गार में नए विचारो की जरूरत की गहरी अकुलाहट है। ऐसे विचार जो मानव के समग्र विकास में सहायक सिद्ध हो सकें।

युग की यही विकल वेदना पू0 गुरुदेव का जीवन स्पन्दन बन गई और उन्होंने स्वयं को मौलिक विचारों की शोध और उनकी कलात्मक अभिव्यंजना में तन्मय किया। साहित्य सृजन के पीछे क्रियाशील अपने अंतर्भावों को शब्द देते हुए वे कहते हैं’-“हमारा जीवन रूढ़ियों एवं विडंबनाओं की धुरी पर नहीं घूमा है। उससे अति महत्वपूर्ण प्रयोगों-परीक्षणों और अनुभवों का एक अच्छा-खासा भंडार जमा हो गया है। हम चाहते थे कि यह उपलब्धियाँ जन सामान्य को वितरित करते जायें, ताकि वे सभी हमारी ही तरह जीवन की सार्थकता अनुभव कर सकें। लेख लिखने और प्रवचन करने का हमारा धंधा चलाने वाले दुकानदार हम नहीं हैं।सिर दर्द के अतिरिक्त कुछ हाथ न लगने वाले धंधे की अपेक्षा हम अपनी प्रतिभा के बल पर वे धंधे कर सकते हैं जिनमें मालामाल होने की पूरी गुँजाइश है। हमारे परामर्श से हजारों लाखों मनुष्यों ने अपनी गतिविधियाँ मोड़कर संपन्नता प्राप्त की है। फिर उन प्रयोगों को अपने लिए भी कर सकते थे। बुकसेलरो का धंधा जिसमें झंझट हजार मन और लाभ रत्तीभर है हमारे लिए क्या रुचिकर हो सकता है। इसी प्रकार प्रवचनों में सिर खपा कर दस-बीस रुपये दक्षिणा के लेने में हमें क्या रुचि हो सकती थी? हमारी प्रतिभा, विद्या और क्षमता बहुमूल्य है। उसको बाजार में भुनाया जाय तो बहुत कुछ वसूल किया जा सकता है। लेखन और प्रवचन हमारा व्यवसाय नहीं वरन् अंतःकरण की इठन है जो निरंतर इसलिए होती रहती है कि हमारी अनुभूतियों और उपलब्धियों का लाभ हमारे सहचरों को भी मिलना चाहिए। उपरोक्त दोनों ही क्रियाकलाप हम अपनी आँतरिक संपदा दूसरों को हस्तांतरित करने के उच्च उद्देश्य से चलाते रहे है।”

इस तरह उन्होंने दार्शनिक और साहित्यकार दोनों की भूमिकाएँ एक साथ निभाई। लोक भाषा को अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम बनाते हुए उनका प्रयास ठीक ऋषियों की भाँति है। सही अर्थों में कहा जाय तो साहित्य रचना का अधिकार भी ऋषिकल्प व्यक्ति को है। वैदिक युग में तो इसे साहित्य रचना के अनिवार्य मानदण्ड के रूप में स्वीकारा जाता था। किसी अनाधिकारी को साहित्य रचना करने की अनुमति न थी। अनाधिकार जाति का नहीं योग्यता का था। इसी वजह से शुद्रा इतरा के पुत्र ने ऐतरेय नाम से उपनिषद् की रचना की। जबकि ब्राह्मण धुँधकारी वंचित रह गया। इसी प्रामाणिकता के कारण छः प्रमाणों में शब्द प्रमाण को सर्वोपरि माना गया। अर्थात् “जो कुछ लिखा है अकाट्य प्रमाण है।”

आज के युग में यह बात कितनी ही अप्रासंगिक लगे किन्तु मानवता को नए युग में प्रवेश दिलाने वाले परमपूज्य गुरुदेव के साहित्य ने उनकी तप निष्ठा से जन्म पाया है। तब इसकी प्रभाविकता -सार्थकता को उन्हीं के शब्दों में कहे तो “तप प्राण से उपजे इस साहित्य में कितनी आभा है कितनी रोशनी है और कितनी गौलिकता है और कितनी शक्ति है यह कहने की नहीं अनुभव करने की बात है। जिसने इन्हें पढ़ा तड़प कर रह गए। रोते हुए आंसुओं की स्याही से जलते हृदय ने इन्हें लिखा है, सो इसका प्रभाव होना ही चाहिए हो रहा है और होकर रहेगा।” उनका रचना संसार दर्शन और साहित्य की संगम स्थली बना। इसे किसी नए युग के प्रतिष्ठापक के लिए अनिवार्य विवशता भी समझा जा सकता है कि वह दोनों तरह का श्रम साध्य काम अकेले करें। इसके लिए विचारों का अन्वेषण भर पर्याप्त नहीं। लोक जीवन तक तक उसे ग्रहण नहीं कर सकता जब तक उसकी ग्रहणशीलता न जगाई जाय। उनका यही प्रयास उन्हें साहित्य मनीषियों में उत्कर्ष प्रदान करता है ठीक ग्रीक दार्शनिक-संत एवं साहित्यकार श्री अरविंद की भाँति, जिनकी रचनाओं में कला और दार्शनिक विचारशीलता एक सँजोई है।

कला के अर्थों में साहित्य का मतलब है-शब्द अभिव्यंजना की शैली। आलोचक

*समाप्त*